Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Dayan Kalptru Vol- 27

Pt. Gashilal · 2012/02/01

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AA A abploaGolgolvalsolgalseioscovalsolveool ਵਾਰ 4 dawolonoslooloolsetoprostof00 पू० श्री अमोलक ऋषिजी महाराज स्मारक ग्रन्थमाला पुष्प सख्या ५७ ध्यान-कल्पतरु T alcotootooloolaslooloolantonsatoarelor 10005 लेखक:- श्रीमज्जैनाचार्य शास्त्रोद्धारक जैन दिवाकर बाल-ब्रह्मचारी पूज्य श्री अमोलकऋषिजी महाराज OYoyou सयोजक पंडित मुनि श्री कल्याणऋषिजी महाराज oldalool वीर संवत् २४-३ प्रमोलाब्द २२ तृतोय श्रावृत्ति आधा मूल्य 12 विक्रम संवत् २०१४ सितम्बर १६५७ ईस्वी. गुगुणा Domeon JYOOOO प्रकाशक- श्री अमोल जैन ज्ञानालय गली न.२ धूलिया (प खा.) Soc प्रथम सस्करण १२५० प्रतियाँ द्वितीय संस्करण १५०० प्रतियाँ तृतीय संस्करण १००० प्रतियाँ: [ सर्वाधिकार प्रकाशक के स्वाधीन ] मुद्रक श्री जैनोदय प्रिंटिंग प्रेस, चौमुखापुल, रतलाम श्री अमोल जैन ज्ञानालय-धूलिया ( प० खा० ) हमारी इस प्रकाशन संस्था को आर्थिक सहायता देने वाले सज्जनों की शुभ नामावली हमारे सदस्य - हैदराबाद २७ سے - " धूलिया यादरि बैंगलोर नागपुर " ६ बार्शी " रायचूर ६ जन्म दाता:- १ श्रीमान् राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी प्रेमराजजी चन्दूलालजी छाजेड़ मोतीलालजी गोविन्दरामजी श्रीश्रीमाल ४ होरालालजी लालचन्दजी धोका केवलचन्दजी पन्नालालजी बोरा सरदारमलजी नवलचन्दजी पुगलिया स्तम्म:- ७ श्रीमान् जैन श्रावक संघ दलीचन्दजी चुन्नीलालजी बोरा शम्भूमलजो गंगारामजी मृत्या १० अगरचन्दजी मानमलजी चौरडिया ११ कुन्दनमलजी लू कड़ की सुपुत्री श्री सायरबाई १२ नानचदजी भगवानदासजी दूगड़ १३ बस्तीमलजी हस्तीमलजी मूत्था १४ तेजराजजी उदयराजजी रूनवाल मुकनचन्दजी कुशलराजजी भंडारो १६ नेमीचन्दजी शिवराजजी गोलेच्छा १७ पुखराजजी सम्पतराजजी धोका १८ इन्दरचदजो गेलड़ा १६ विरदीचन्दजी लालचन्दजी मरलेला जसराजजी बोहरा की धर्मपत्नी श्री केशरबाई २१ , चम्पालालजी लोढा की पत्नी श्रमती घोसीवाई २२ सज्जनराजजी मूथा की धर्मपत्नी श्री उमराववाई २३ चम्पालालजी पगारिया अमोल जैन स्था० सहायक समिति गिरधारीलालजी बालमुकनजी लू कड़ बंगलोर मद्रास बैंगलोर घोड़नदी रायचूर वेलर यादगिरि मद्रास सुरापुर सिकदराबाद बालदूर (म.) मद्रास पूना पोरद २४ ( ४ ) " " " -- " " संरक्षकः- २६ श्रीमान किसनलालजी बच्छावत मूत्था की पत्नी गिलखीलाई रायचूर २७ हसराजजी मरलेचा की धर्मपत्नी मेहतावबाई पालंदूर (म) २८ जयवतराजजी भवरलालजी चौरडिया मद्रास २६ निहालचन्दजी मगराजजी साकला वेलूर ३० लाला रामचन्द्रजी की धर्मपत्नी पार्वतीबाई हैदराबाद ३१ पुखराजजी लू कड़ की धर्मपत्नी गजराबाई बैंगलोर ३२ किशनलालनी फूलचन्दजी लूणिया मिश्रीलालजी कात्रेला की धर्मपत्नी मिश्रीबाई ३४ उमेदमलजी गोलेच्छा को सुपुत्री मिश्रीबाई हैदराबाद ३५ गाढमलजी प्रमराजजी वाठिया सिकदराबाद ३६ मुल्तानमलजी चन्दनमलजी साकला ३७ जेठालालजी रामजी के सुपुत्र गुलाबचदजी (स्व० माता जवलबाई को स्मृति में) ३८७ गुलाबचन्दजी चौथमलजी बोहरा रायचूर ३६ जसराजजो शातिलालजी वोहरा ४० दौलतरामजी अमोलकचन्दजी धोका यादगिरि ४१ मांगीलालजी भएडारी मद्रास ४२ हीराचन्दजी खिवराजजी चौरडिया ४३ किशनलालजी रूपचन्दजी लूनिया ४४ मांगीलालजी बसीलालजी कोटड़िया ४५ मोहनलालजी प्रकाशमलजी दूगड ४६ पुखराजजी मीठालालजी बोहरा पेरम्बूर राजमलजी शान्तिलालजी पोखरणा ऋषभचन्दनी उदयचन्दजी कोठारी ४६ आर जेतारामजी कोठारी जवानमलजो सुराणा की धर्मपत्नी मायाबाई पालन्दूर मिश्रोलालजी राका को धर्मपत्नी मिश्रीयाई पुदूपेठ। ५२ माणकचदजी चतुर की धर्मपत्नी रतनवाई वेलूर ५३ वोरोदासजी पोरवाल की धर्मपत्नी पानीवाई बंगलोर एम० कन्हैयालाल एन्ड ब्रदर्म समदडिया हीराचन्दजी साखला की धर्मपत्नी भूरीबाई ५६ निहालचन्दजी घेवरचन्दजी भटेवरा वेलूर J७ विनयचन्दजी विजयराजजी भटेवरा गुलाबचन्दजी कंवलचन्दजी भटेवरा गुप्तवानी बहिन रामचन्द्रजी बाठिया की धर्मपत्नी पानीवाई ६१ बाँजराजजी धाड़ीवाल की धर्मपत्नी मिश्रीबाई त्रिवेल्लूर " " " "2 " " 1 " " १ " " " "F " ५६ ६० " प ( ५ ) तिररातूर उलदूरपेठ ओपेरमपूर मद्रास बैंगलोर " " " " " ७० " " " ६२ श्रीमान् सम्पतराज एन्ड कम्पनी ६३ आशकरणजी चौरड़िया की धर्मपत्नी केमरवाई ६४ जुगराजजी खिंवराजजी केवलचन्दजो बरमेचा ६५ नवलमलजी शम्भूमलजी चौरड़िया मिश्रीलालजी पारसमलजो कानेला ६७ केशरमलजी घीसूलालजी कटारिया ६८ मुल्तानमलजी चन्दनमलजी गरिया ६६ चुन्नीलालजो की ध० प० झूमीबाई अचलदासजी हसराजजी कहाड ७१ एन० शान्तिलालजी बलदोटा ७२ धोंडीरामजी की धर्मपत्नी रगूबाई ७३ जुगराजजी मूत्था की धर्मपत्नी पताशीबाई डू गरमलजी अनराजजी भीकमचन्दजी भवरलालजी सुराणा मिश्रीलालजी बोरा की धर्मपत्नी नेनीबाई ७६ केवलचन्दजी बोरा की धर्मपत्नी पार्वतीबाई , सूत्रालालजी शकरलालजी जैन वक्तावरमलजी गादिया की धर्मपत्नी गगाबाई अमरचन्दनी मरलेचा की धर्मपत्नी चौथीबाई गोविन्दराम मोहराम ट्रस्ट के सेक्रेटरी श्री दीपचदजी सचेती ८१ स्व० रूपचदजो भसाली की धर्मपत्नी श्री जतनबाई २ (स्व० श्री अनराजजी जवाहरमलजी मँडलेचा के स्मरणार्थ) श्रीमान् बसीलालजी मेघराजजी मडलेचा ८३ हीरालालजी मोतीलालजी भलगट भिकचदजी लालचदजी बूरड ( महावीर स्टोर ) मुलचदजी माणकचदजी चोपड़ा (साकोरा वाले) ८६ स्व० लच्छोरामजी भडारी की धर्मपत्नी श्रीमती तुलसाबाई सिधनूर पूना निफाड काठपाडी मद्रास बैंगलोर ७५ " " " माम्फलम-मद्रास ७६ ८० पल्लावरम-मद्रास धूलिया फत्तेपुर " फत्तेपुर गुलबर्गा पिंपलगाँव (बसत) नान्दुड़ी (नासिक) 卐 - प्रस्तावना [प्रथमावृत्ति की ] मोक्षः कर्मक्षयादेव, स सम्यग्ज्ञानतः स्मृतः । ध्यानसाध्यं मतं तद्धि, तस्मात्तद्धितमात्मनः ।। इस जगत् के निवासी सभो जीव एकान्त सुख चाहते हैं। ऐसा सुख , मोक्ष में है। इसीलिए प्राय' सभी धर्मावलम्बी ( भिन्न-भिन्न मतानुयायी) अपने अपने धार्मिक कार्यों का अन्तिम फल मोक्ष-प्राप्ति घतलाते हैं। साथ ही मोक्ष के नाम की अलग-अलग स्थापना करके फिर वहाँ तक पहुँचने के लिए प्रयत्न- शील रहते हैं। अब सोचना यह है, कि वह दु खरहित एकान्त सुखप्रदायक मोक्ष कैसे प्राप्त होता है ? ऊपर के श्लोक में बताया गया है कि मोक्ष कर्मों के क्षय से मिलता है। कर्मों का क्षय कैसे हो? यह बात सम्यग्ज्ञान से मालूम होती है । सम्यक्त्व या सम्यग्ज्ञान ध्यान से पैदा होता है । ध्यान का अर्थ है-विचार । विचार करते-करते ज्ञान पैदा होता ही है। योगवाशिष्ठ नामक ग्रन्थ में तो विचार को ही ज्ञान कहा गया है- "विचार परम ज्ञानम् ॥” अर्थात् विचार ही परम ज्ञान है। इस प्रकार मिद्ध हुश्रा कि एकान्त सुख का मूल-कारण ध्यान है । ध्यान का स्वरूप समझने की दृष्टि से इस ग्रन्थ की रचना हुई है । इम में शुभ, अशुभ, शुद्ध, अशुद्व ध्यान का विवेचन करके अशुद्ध और अशुभ से बचने को तथा शुभ और शुद्ध ध्यान करने की रीति सरलता के साथ बताई गई है, जिससे इसे पढने और मनन करने वाले अपने इष्टार्थ की मिद्धि का उपाय जान मर्के । "जयतीति जिन" जो जीतता है, वह जिन है। जिन का अनुयायी जैन है । जिन राग-द्वेप को सर्वथा नष्ट करते हैं, उनके अनुयायो नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं इस प्रकार जिस जैन धर्म में राग-द्वेप को नष्ट करने का हो खाम कार्यक्रम हो, उस में साम्प्रदायिक-मतभेद और क्लेश के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता । पानी से वस्त्र जल नहीं सकता, श्राग से जलता है। ठीक उसी प्रकार प्रेम से-सगठन से फूट हो नहीं सकती, रागद्वेप की आग से होती है । यह मत्य श्राज से दो हजार वर्ष पहले इस आर्यावर्त (भारत) में प्रत्यक्ष था। हजारों साधु, हजारों साध्वियाँ, लाखों श्रावक, लाखो भाविकाएँ तथा असह ख्य सम्यग्दृष्टि जोव सब एक जिनेश्वर देव के ही अनुयायो थे । इसी सगठन के प्रभाव से जैन धर्म उस समय सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित था। घडे-बड़े सुरेन्द्र नरेन्द्र आदि भी इस पर श्रद्धा रखते थे। बड़े-बड़े गजा-महाराजा भी अपने अपार वैभव का ऋद्धि समृद्धि का त्याग करके जैन भिक्षुक बनते थे और धीरे-धीरे श्रात्मकल्याण की साधना में लग कर मोक्ष प्राप्त करते थे। माधुओं (जैन भिनुकों) को मोक्ष की प्राप्ति का सूत्रानुमार मुख्य हेतु यही मालूम होता है कि वे ध्यान करते थे। जैसा कि उत्तराध्ययनजी सूत्र में माधुओं के लिए दिनकृत्य और रात्रिकृत्य का वर्णन करते हुए २६ वें अध्यान में कहा है - । - ( ७ ) - पदम पोरिसी सज्झायं, बीयं भाणं झियायइ । तइयाए भिक्खायरिए, चउत्थी भुञ्जोवि सज्झायं ।। अर्थात् -दिन के प्रथम प्रहर में स्वाध्याय (मूलसूत्र का पठन), दूसरे प्रहर में ध्यान (सूत्र के अर्थ का विचार ) तीसरे प्रहर में भिक्षाचर्या (भिक्षा के द्वारा निर्दोष आहारादि का ग्रहण ) और चौथे प्रहर में फिर से स्वाध्याय-यह दिन कृत्य । रात्रिकृत्य भी लगभग ऐसा ही है, सिर्फ तीसरे प्रहर में "तइए निद्दामो- खं तु" निद्रा से निपटने की बात कही है। इस प्रकार दिनरात के ६ प्रहर ज्ञानध्यान में निकालने का विधान है। इसी तरह श्रावकों के लिए भी इसी सूत्र में ५ वें अध्ययन का वर्णन करते हुए फरमाया है- अगारि सामाइयंगाणि, सडी कारण फासए । पोसह दुहम्रो पक्खं, एगरायं न हावए । अर्थात्-गृहस्थ श्रावक त्रिकाल सामायिक व्रत * शुद्ध श्रद्धा युक्त होकर स्पर्श (करे ) और अष्टमी चतुर्दशी दोनों पक्षों में पौषधनत ५ करे । ऐसा धर्मध्यान करने में एक रात्रि भी व्यर्थ न खोए । गतकाल में श्रावकों का भी एक दिन में कम से कम एक प्रहर धर्मध्यान में बीतता था। महीने में छह दिन पूरी तरह से धर्मध्यान में बीतते थे। धर्मध्यान में उनका मन इतना एकाग्र हो जाता था कि वस्त्र, आभूषण तो क्या, प्राण तक कोई हरण कर लेता तो भी उन्हें पता न रहता था। कुएडकौलिकजी, कामदेवजी आदि श्रावक ऐसे ही ध्यानी थे । जब श्रावक भी ऐसे थे तो मुनियों के लिए तो कहना ही क्या ध्यान से निवृत्त होने पर वे अन्य कार्य में लग जाते थे जरूर, पर ध्यान में किया हुआ निश्चय सदा उनके अन्त करण में रमण करता रहता था। इससे राग, द्वेष, विषय, कषाय, आदि दुर्गुणों को अन्त करण में प्रवेश करने का अवकाश ही नहीं मिलता था। परनिन्दा में, दूसरों के दोष हूँढने में, विकथा में व्यर्थ समय खोने की उन्हें फुरसत ही नहीं मिलती थी । उनका सारा समय ज्ञान, ध्यान और सत्कार्यों में निकलता था, जिससे उनके मन में शान्ति रहती थी । ऐसे ही श्रमणोपासकों के लिए तथा श्रमणों के लिए मोक्ष का द्वार सदा खुला रहता था। अब जरा देखिये | आज कल के श्रावकों और साधुओं को भी । बहुत से तो ध्यान में समझते ही नहीं । उन्हें तो इस ग्रन्थ से बात समझ में आ जायगी, किन्तु बहुत-से जो ध्यान और काउसग्ग (कायोत्सर्ग) को एक समझ बैठे हैं, उनका भ्रम दूर करना जरूरी है। यदि ध्यान और काउसग्ग में अन्तर न होता तो बारह प्रकार के तप में दोनो अलग-अलग न गिनाये गये होते । कायोत्सर्ग का अर्थ है-काया (शरीर) का उत्सर्ग (त्याग) करना । उपसगों का असर काया तक ही रहता है इसलिए काया को और आत्मा को भिन्न समम कर शान्ति से कष्टों को सहना । ध्यान का अर्थ विचार है । ध्यान का महत्त्व न समझने से इस समय ध्यान नष्टप्राय हो रहा है । व्रतधारी उच्छृ खल हो रहे हैं, विकथा आदि अनेक प्रपचों में फस रहे हैं, वैरागी सरागो वन रहे हैं। बहुत-से साधु धर्म के नाम पर अनेक झगड़े उठा रहे हैं । अपने-अपने पक्ष को किसी तरह स्थापना करके घोलते हैं -"यह मेरा अच्छा है और वह तेरा खराब है । मोक्ष का अधिकार सिर्फ उनको है, जो हमारी मान्यता के अनुसार चलते हैं, बाकी सब मिध्यात्वी हैं । हमें छोड़ कर अन्य मुनिवेषियों को * सममात्र में प्रवृत्ति करने का व्रत, जो तीनों काल किया जाता था। x शानादिगुणों के पोपण का व्रत, बो १ महीने में ६ वार करते थे।

गया, त्यों ही मालूम हुआ दूसरी आवृत्ति में शुद्धि के ४०० विज्ञप्तिपत्र इस आशय क छपवाये गये थे कि "यदि प्रथमा- वृति में कोई सिद्धान्त विरुद्ध बात हो या और भी किसी प्रकार की कमी रह गई हो तो लिख कर हमें सुचित करने की कृपा करें" और प्रसिद्व-प्रसिद्ध विद्वानों के पास भेजे गये थे, किन्तु उनमें से सिर्फ तीन मुनिवरों ने शुद्व करकं प्रतियाँ भेजी थीं । वे तीनो मुनिराज ये हैं ५-जैन श्वेताम्बर साधुमार्गीय पाठ कोटी मोटी पक्ष के कच्छदेशपावनकर्ता परमपूज्य श्री कर्मसिंहजी महाराज के शिष्यवय प्रवरपडित कविवरेन्द्र विशुद्ध चारित्रपालक श्री नागचन्द्रजी महाराज । २-जैन श्वेताम्बर साधुमार्गीय परमपूज्य श्री जयमलजी महाराज की सम्प्रदाय के परम पडित मुनिराज श्री प्रभाकरसूरि (प्रसन्नचन्द्र ) जी महाराज | ३-जैन श्वेताम्बर साधुमार्गीय पण्डितराज शुद्ध सयमी श्री माधव मुनिजी के शिष्यवर्य विद्या- विलामी श्रीमूल मुनिजी । इन तीनों मुनियों की ओर से भेजी गई सूचनाओं के अनुसार शुद्धि वृद्धि करके इस दूसरी आवृति की १५०० प्रतियाँ छपवाई गई हैं। यह ग्रन्थ ऐसी सुन्दर स्याद्वाद-अनेकान्तवाद की शैली से लिखा गया है कि जैनों को ही नहीं, जैनेतरों को भी इसके पढने से बहुत लाभ मिलता है । इसलिए नम्र सूचना है कि सभी प्रात्मार्थी सज्जनों को चाहिए कि वे इसे कम से कम एक बार तो पढ ही डालें। हम निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि जो इस ग्रन्थ को मनन चिन्तन के साथ पढेंगे, वैसा आचरण करेंगे, उन्हें इप्ती भव में परम सुख अनुभव होगा । ज्यों ही पुस्तक का मुद्रण शुरु किया कि जैन श्वेताम्बर साधुमार्गीय कान्फ्रेन्स का पाँचवा अधिवेशन सिर्फ दो ही महीने बाद होने वाला है । इतने थोड़े समय में ५३ फार्म की यह पुस्तक छाप कर देना और जिल्द वगैरह का काम निपटाना कितना कठिन कार्य है ? यह तो प्रेस के कत्ती धर्ता ही समझ सकते हैं । इतनी मडप से पुस्तक छपवाने का कारण केवल यही था कि हम चाहते थे. "कान्फ्रेन्स" के अधिवेशन के अवसर पर पधारे हुए धर्म-बन्धुओं के हाथों में यह ग्रन्थ एक साथ दिया जा सके । छपाई की शीघ्रता के कारण ही इस ग्रन्थ मं अशुद्धियाँ रहने की सम्भावना दीखती है, सो कृपालु पाठकों को चाहिए कि वे मूल-आशय की ओर ध्यान रख कर गुण ग्रहण करें। दक्षिण हैद्राबाद के ज्ञानवृद्धि खाते की तरफ से अब तक निम्न लिखित साहित्य गुरुदेव पू० श्री अमोलक ऋषिजी महाराज के सदुपदेश से अमूल्य वटवाया गया है जैनतत्त्व प्रकाश (४००० प्रतियाँ), २ तत्त्व निर्णय (२००० प्र ) ३ भीमसेनहरिसेन चरित्र ( १००० प्र ), ४ जिनदास सुगुणी चरित्र ( १००० प्र ), ५ तार्यकरसहस्री ( १५०० प्र ), ६ सिंहलकुमार चरित्र ( १००० प्र ), ७ मुवन सुन्दरी चरित्र (१००० प्र ), ८ मदन श्रेष्ठी (१००० प्र), ६ चन्द्रसेन- लीलावती चरित्र (१००० प्र ), १० केवलानन्द् छन्दावलि (४५०० प्र ), ११ जैन सुबोध हीरावलि ( १००० प्र ), १२ जैन शिशुबोधिनी ( १५०० प्र ), १३ भक्तामर स्तोत्र ( २००० प्र ) १४ जैन गणेश- बोध ( १५०० प्र ), १५ नित्यस्मरण ( ५०० प्र ), १६ ( इस ), ध्यानफल्पतरु । २७५० प्र ), १७ परमा- त्ममार्गदर्शक ( १००० प्र), १८ मदिरा सती चरित्र ( १००० प्र ), १६ श्रानुपूर्वी (३००० प्र.),-ये कुल ३२२५० प्रतियों । इनके अलावा १ जैनामूल्यसुघा (१००० प्र ), २ धर्मतत्त्व सग्रह (१५०० प्र ) नित्य स्मरण (२००० प्र ), ४ धर्मतत्त्व सग्रह (गुजराती आवृति १२०० प्र )-इस प्रकार कुल ४१४५० इकतालीस हजार चार सौ पचास प्रतिया मुमुनुओं के हाथों में भेंट दी गई। यह लम्बी-चौड़ी सूचा देने को धाशय यही है कि अन्य मुनिराज तथा श्रावकवृन्द मिल जुल कर ज्ञान के प्रचार और प्रसार की प्रेरणा ले सकें । विज्ञेपु किमधिकम् । गुणानुरागी- वीर स २४३६ विक्रम स. १६७० १ - सुखदेवसहाय ज्वालाप्रसाद -:आवश्यक सूचना:- ध्यान या विचार अनेक तरह के होते हैं। उन सब का सग्रह करके श्री सर्वज्ञदेव ने चार विभाग किये हैं। इन चार विभागों में सभी प्रकार के विचारों का समावेश हो जाता है । "ध्यान कल्पतरु" लिखते समय इस बात का पूरा ध्यान रहा है-कुछ तो शास्त्रानुसार और कुछ प्रज्ञानुसार। विचार के दोनों अन्तिम किनारे इस में बताये गये हैं। अधम से अधम विचार का फल निगोद है तो उच्च से उच्च विचार का फल मोक्ष । विना विचार के कोई कार्य नहीं होता नहीं हो सकता। हाँ, अकस्मात् कुछ हो जाय तो बात . दूसरी है इस प्रन्थ में ससार के शुभ विचारों का चित्र खाचा गया है, साथ ही आर्त और रौद्र ध्यान के अन्तर्गत ससार में होने वाली बहुत-सी वर्तमानकाल की बातों का भी समावेश किया गया है। इसे पढ कर पाठक यह न समझ लें कि सारे सासारिफकार्यों को लेखक ने उत्थापना कर दी है, यदि मैं उत्थापना भी कर दूं तो ससार के कार्य रुकने वाले नहीं हैं । यह सिलसिला तो अनादिकाल से चला आया है बड़े-बड़े सर्वज्ञदेव भी जब घूमते हुए ससार चक्र को नहीं अटका सके, तो फिर मैं बेचारा किस गिनती में हूँ । परन्तु जो काम हाथ में उठाया है, उसका यथामति यथातथ्य निरूपण करना ग्रन्थकार के लिए जरूरी हो जाता है, इसीलिए इसमें ससार की आजकल की बहुत-सी प्रवृत्तियों का चित्रण हो गया है। यह तो निश्चितरूप से कहा जा सकता है कि श्रा-रौद्र ध्यान खोटे हैं और इनका फल कुगति है- इसलिए खोटे ध्यान से छूटने पर ही आत्मा को सुगति मिल सकती है । परन्तु यह नहीं कहा ना सकता कि सारे ससारी जीव एकान्त खोटे ध्यान ही करते हैं । बहुत-से ससारा जीव कभी-कभी धर्म ध्यान भी करते हैं और शुभाशुभ फल की मिश्रता होने से उन्हें देवगति प्राप्त होती है। देवगति में भी धर्म ध्यान फरने से उन्हें फिर से उच्च गति मनुष्य गति प्राप्त होती है । मनुष्य गति में शुभ ध्यान करते करते शुद्ध ध्यान होने पर मोक्षगति प्राप्त होती है । इत्यलम् -- -अमोलक ऋषि बालब्रह्मचारी, जैनाचार्य, शास्त्रोद्धारक स्वर्गीय पूज्य श्री अमोलकऋषिजी महाराज ( संक्षिप्त जीवन-परिचय) के १-जन्म स्थान -भोपाल (मालवा) २-माता-पिता.-सुश्राविका श्रीमती हुलासा बाई और धर्मप्रेमी श्रीमान केवलचन्द जी कॉस- टिया (श्रोसवाल बड़े साथ)। ३-जन्मतिथि –सवत् १९३३ भाद्रपद कृष्णा चतुर्थी के दिन प्रात काल ६ बजे । ४- दीक्षा के समय आयुः--ग्यारह वर्ष, पाँच महीने और सत्ताईम दिन । ५-दीक्षातिथिः-सवत् १६४४ फाल्गुन कृष्णा दूज गुरूवार । ६-दीक्षा स्थान -याष्ट्रा (भोपाल) ७-दीक्षा गुरुः-सरल स्वभावी मुनि श्री चैनाऋपि जी महाराज । ८-बत्तीस सूत्रों का अनुवाद –सवत् १६७२ कार्तिक शुक्ला पचमी गुरुवार पुष्य नक्षत्र योग में स्थान-हैदराबाद में प्रारम्भ किया गया और सवत १६७५ में मार्गशीर्ष कृष्णा पचमी को अर्थात कुल तीन वर्ष और पन्द्रह दिनों में समाप्त हुआ । ६-आचार्यपद-सवत् १९८६ की ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशो को बुधवार के दिन इन्दौर (मध्य- भारत में सर सेठ हुक्मीचन्द जी की नसियाँ में महोत्सव पूर्वक पूज्य श्री को "प्राचार्यपद" प्रदान किया गया था । १०-वृहत साधु सम्मेलन –सवत १६६० में चैत्र शुक्ला दशमी बुधवार को अजमेर जो बृहत- साधु सम्मेलन हुआ था, उसमें सम्मिलित होकर अनेक महत्वपूर्ण समस्याओं को हल करने में आपने सफल सहयोग दिया। ११-विहार क्षेत्रः-दक्षिण-भारत, हैदराबाद, कर्णाटक, खानदेश, मध्य प्रदेश, वरार, वम्बई, गुजरात, कच्छ, काठियावाड, मेवाड़, मारवाड़, गोरवाड़, देहली, पजाब, शिमला-इत्यादि । १२-सयमकालीन जीवन'-आप श्री बाल ब्रह्मचारी थे। सभी सम्प्रदायों के साधुगण और श्रावकवृन्द की आपके प्रति सहानुभूति और भक्ति थी । श्राप शान्त, दान्त, तपस्वी, मनस्वी सुकवि और साहित्यकार थे । अपने युग में एक आदर्श-साधु के रूप में आपश्री की ख्याति थी। १३-साहित्य सेवाः-आपश्री के द्वारा सम्पादित, सकलित, अनूदित और रचित ग्रन्थों की कुल- संख्या १०२ है । इनकी कुल प्रतियाँ १,७६,३२५ प्रकाशित हुई । इन अन्यों की मूल (प्रेस) कॉपी के पृष्टों की सख्या लगभग पचास हजार थी । १४-शिष्यसमुदाय -आपके द्वारा दीक्षित कुल १४ शिष्य हुए। १५-सयमकाल-पूज्य श्री जी कुल ४८ वर्ष ६ माम और १२ दिन तक सयम पर्याय का प्रसन्नता पूर्वक पालन फरते रहे। १६-पुण्यतिथि -सवत् १६६३ के दूसरे भाद्रपद को कृष्णा चतुर्दशी को अर्थात् १४ सितम्बर १६३६ की उदय रात्रि को २ वजे धूलिया ( पश्चिम खानदेश) में समाधिपूर्वक शान्ति के साथ पूज्य श्री ने महाप्रयाण किया था, उस समय आपकी आयु साठ वर्प नौ दिन की थी। विशेप'-चरित्रनायक पूज्य श्री जी के पिताजी श्री केवलचन्द्रजी कॉसटिया ने भी भागवती-दीक्षा अगीकार की थी और वे "वपस्त्री श्री, केवलऋपिजी" के नोम मे जैन ममाज में विख्यात और पूजनीय यने । बैंगलोर, मैसूर, महाराष्ट्र ॐ ॥ श्री जिनेन्द्राय नमः ॥ ॥ ध्यान-कल्पतरु॥ ॥ ॥ मंगलाचरसम् ॥ अणुत्र थम्ममुईरहत्ता, अणुत्तरं झाणवर कियाइ, सुसुक्क सुक्कं अपगंडसुक्क, संखिंदुएगंतवदातसुक्कं ॥१॥ अणुत्तरग्गं परम महेसी, असेसफम्म स विसोहइत्ता, सिद्धिं गते साइमणंतपत्चे, नाणेण सीलेण य दसणेण ॥२॥ -श्रीसूत्रकृतागम् सूत्रम्, अध्ययन ६ सर्ष श्रेष्ठ धर्म प्रकाशक श्रमण भगवान् श्री महावीर (वर्धमान ) स्वामी ने सर्वोत्तम, उज्ज्वल से अति उज्ज्वल, दोष मल रहित ध्यान का श्राराधन किया । कितने उज्ज्वल ध्यान का आराधन किया? इसका उत्तर दृष्टान्त पूर्वक कहते हैं-जैसे अर्जुन स्वर्ण उज्ज्वल होता है, पानी के फेन उज्ज्वल होते हैं, शख और चन्द्रमा की किरणें उज्ज्वल होती हैं, ऐसा अथवा इन से भी अधिक उज्ज्वल, सर्व ध्यानों में श्रेष्ठ, ऐसे शुक्ल भ्यान का पाराधन किया। उस ध्यान के प्रसाद से महा ऋषीश्वर समस्त कर्मों का नाश-क्षय करके निर्मल हुए । निससे अनंत ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त चारित्र, और अनन्त वीर्य रूप अनन्त चतुष्टय को प्राप्त करके श्रादि सहित किन्तु अन्त रहित-ऐसी सिद्धगति (मोक्षगति ) को जो कि लोफ के ऊपर अन माग में है, प्राप्त की । ऐसे मी महावीर (वर्धमान) स्वामी को मेरा त्रिकरण विशुद्धि पूर्वक त्रिकाल ममस्कार हो। .

* ध्यान-कल्पतरु * - विषय प्रवेश :- ध्याता ध्यानं तथा ध्येयं, फलं चेति चतुष्टयम् ॥ इति सूत्रसमासेन, सविकल्पं निगृह्यते ॥१॥ -ज्ञानार्णव ध्याता अर्थात ध्यान करने वाला, ध्यान अर्थात् चित्त एकाग्र कर स्थिर वैठना, ध्येय अर्थात ध्यान फा विपय-भूत पदार्थ, किसी एक ही प्रकार का मन में विचार करना । फल अर्थात् एकाग्रता पूर्वक विचार करने से ध्याता को प्राप्त होने वाला परिणाम । इन चारों ही ध्यान की शाखाओं का स्वरूप यथावुद्धि इस प्रथ में बताने का प्रयत्न करूँगा । उसे पाठकगण दत्तचित्त हो पढे, अशुभ से बचे, शुभ में प्रवृत्ति कर इष्ट-अर्थ को सिद्ध करने में समर्थ बनें। अपास्य खंडविज्ञानं, रसिकां पापवासनाम् ॥ असत् ध्यानानि चादेयं ध्यानं मुक्तिप्रसाथकम् ।। -ज्ञानार्णव ग्रन्थ अर्थात्-खंड विज्ञान अर्थात् क्षयोपशम रागादि सहित ज्ञान में आसक्ति रूप पाप-वामना को, तथा अन्यान्य मतावलबियों के माने हुए आर्त-रौद्र आदि असत्य ध्यानों को छोड़कर, मुक्ति साधक सद् ध्यान का आदर करना चाहिये, जिससे इष्ट अर्थ की सिद्धि हो । अहो भव्य गण | हम चर्म चक्षु से या हृदय ज्ञान चक्षु से इस विश्व में होने वाली प्राणियों की विचित्र प्रकार की वृत्तियों को प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा अथवा परोक्ष प्रमाण द्वारा अवलोकन करते हैं कि कोई सुखी है, कोई दुखी है, कोई आनन्द में है तो कोई शोक में, कोई हसता है, तो कोई रोता है, आदि। इन वृत्तियों का आधार चित्त-वृत्ति पर ही रहा हुया प्रतीत होता है। विश्व में रहे हुए पदार्थों में भले बुरे को कल्पना कर, उनके सयोग वियोग से लाभ हानि, मान अपमान आदि सकल्प विकल्प उत्पन्न होते रहते हैं । सकल्प विकल्प अनुसार ही श्रात्मा बन जाता है, इससे निश्चय होता है कि सुख-दुख का मुख्य हेतु विचार (ध्यान) ही है। विशेष रूप से इसमें यह भी प्रतीत होती है कि सभी प्राणियों को सुख (निन्द) प्रिय है । इसकी प्राप्ति के लिये ज्ञानी, मुमुक्षु, विषयी, पामर आदि सभी प्रकार के अधिकारीजन स्वकल्पित आनन्द प्राप्त करने के लिए अनेक विध चेष्टा फर रहे हैं ।* कोई ज्ञान में, कोई योग में, कोई भक्ति में, कोई धर्म में कोई धन प्राप्ति में, कोई स्त्री-काम-सयोग में, कोई पुत्र के प्यार में, इत्यादि अनेक वृत्तियों में निमग्न हुए दृष्टिगत हो रहे हैं। अखड आनद की प्राप्ति के वास्ते ही, आज दिन तक अनेक शास्त्रों की रचनो की गई है, अनेक कार्य क्रियाओं के अनुष्ठान की योजनाएँ हुई हैं। . * पाठकगण ! ज्ञान, मक्ति, योग, धर्म, ये श्रानन्द प्राप्ति के उपाय है, परन्तु एकान्त रूप से नहीं पूर्ण रूप से नहीं, इनका खुलासा आगे न्यावलोकन से होगा, इसलिए यहाँ किसी प्रकार का विक्स न करें ।

(३) * ध्यान-कल्पतरु* - - प्रतिदिन नवीन २ सुधार होते ही जा रहे हैं, इसी तरह सर्व देश, सर्व काल और सर्व स्थिति में जो जो अनादि काल से प्रवृत्तियाँ बनती जा रही हैं, सो शानद प्राप्त करने के लिये ही हैं। तो भी आज दिन तक सभी विश्ववासी प्राणी अखह, पूण आनन्द मय नहीं बन सके । ऐसा कोई भी ग्राम या देश दृष्टिगत नहीं हो रहा है, जहाँ कि अखड-आनंद वर्तमान हो । जहाँ देखें, वहाँ शोक, मोह, दुस की थोडी बहुत प्रति छाया का अनुमव होता ही रहता है। जिसे देखो, वह अखड आनद के लिये तड़फता ही रहता है। इससे सुविदित होता है कि जिसकी प्राप्ति के लिये प्राणी प्रयास कर रहे हैं, उसकी प्राप्ति का जो सच्चा उपाय है, वह हाथ नहीं लगा है। जिस २ प्रयास में अल्पज्ञ अथवा श्रज्ञ मनुष्य सलग्न हैं, वह अखड आनद की प्राप्ति का सच्चा उपाय भी नहीं है । कपोल कल्पित उपाय से इष्ट अर्थ की सिद्धि नहीं होती है। यदि होती हो तो उपयुक्त उपाय करने वाले आज दिन तक दुःखी नहीं रहते । अखड आनद की प्राप्ति का कोई उपाय दुनिया में नहीं है, ऐसा नहीं हो सकता । यह सत्य मानि. येगा कि जो वस्तु होती है, उसी के लिये प्रयास किया जाता है। किन्तु सच्चा उपाय नहीं मिलने पर जब कार्य की सिद्धि नहीं होती है तब अल्पज्ञ, अज्ञानता धारण कर नास्तिक बन जाते हैं । सब कल्पनाओं को, साधनों को बाकाश-कुसुम की प्राप्ति के उपाय जैसे निकम्मे जान कर छोड़ बैठते हैं । और पुद्गलों के आनद में मशगूल बन "क्षणमात्र सुखी बहुकाल दुःखी" अर्थात् क्षण भर के लिये कल्पित सुख भोग कर, अनन्त काल तक के लिये दुख के मोक्ता बन जाते हैं। यह बात भी प्रत्यक्ष द्वारा सिद्ध हो रही है। सर्वज्ञ जिनदेव ने प्रयास कर जो अनड अानंद प्राप्त किया, तथा जिसका अपने अन्त फरण में पूर्ण निश्चय हो गया, उस उपाय द्वारा सपूर्ण विश्व में अखड आनंद की प्राप्ति अन्य जीवों को मी कराने के वे इच्छुक थे । असत् उपाय के उद्यम से पीड़ित ऐसे पामर प्राणियों की दशा का अवलोकन कर, करुणा- सिन्धु लिनदेव का हृदय गद्गद् हो गया । श्रतएव भगवान् ने आत्मा में प्रकटित अनन्त दान-शक्ति-लब्धि का सद् व्यय कर सभी जीवों को अखड श्रानद युक्त बनाने के लिये, सभी समझ सकें ऐसी अनेक भाषामय. अर्ध मागधी भाषा द्वारा महा परिषद् में सद् बोध का उपदेश दिया। जिसे श्रवण कर, मनन कर, आराधन फर, अनन्तानत जीवों ने अखण्ड आनन्द प्राप्त किया । उसी प्रभाव को धागे चालू रखने के लिये उन भग- वान् सर्वज्ञ के शिष्य-गण ने भविष्य काल में भव्य-जीवों पर परोपकार करने की बुद्धि से शात्रों की रचना की, जिनके द्वारा वर्तमान समय में भी परम उपकार हो रहा है। उन शास्त्रों में अखह धान की प्राप्ति का सद् उपाय पृथक् पृथक रूप से वर्णित होने के कारण तथा अर्ध-मागधी भाषा में होने से वर्तमान काल के अल्पज्ञों के लिए पूर्ण रूपेण लाभ की प्राप्ति का अभाव देखकर इस समय देश की विविध प्रचलित भाषाओं में प्रथ रचे जा रहे हैं। उन प्राचीन और अर्चिन ग्रन्थों की प्रवृत्तियों को देखने से निश्चय होता है कि सुख दुख का मुख्य हेतु ध्यान है, मन की प्रवृत्ति रूप विचार ही कारण है। ध्याता ध्येय रूप वन नाता है जिससे शुभ अशुभ की प्रवृत्तियों होती हैं, और उनसे हो सुख दुःख फी प्राप्ति होती है। वह ध्यान क्या है ? कितने प्रकार का है ? ध्याता ध्येय रूप कैसे बनता है ? कैसे सुखी दुखी होता है ? कौन से ध्यान से सह आनन्द को प्राप्ति होती है ? इन सभी प्रश्नों का विस्तृत रूप से स्वरूप जानने ( ४ ) * ध्यान-कल्पतरु * - , का, अनुभव करने का, और प्राप्त करने का उपाय, इस ध्यान कल्पतरु की छाया में दत्तचित्त से विश्रांति लेकर यानी मन लगाकर पढ़ने से मालूम हो सकेगा और क्रियात्मक रूप देने से आपको उसका अनुभव भी हो सकेगा। -: स्कन्ध :- ध्यान शब्द की धातु "ध्या" है । "ध्या" का अर्थ अन्तःकरण में विचार करना-सोचना है । ध्यान के भेद शास्त्र में इस प्रकार किये गये हैं- :शाखा:- से किं तं झाणे १ झाणे चउविहे पण्णत्ते, जहा-अट्टे झाणे, रुद्द झाणे, धम्मे झाणे, सुक्के झाणे । -उववाई सूत्र शिष्य सविनय प्रश्न करता है कि गुरु महाराज | ध्यान के भेद कितने हैं ? गुरु-हे शिष्य | ध्यान के चार भेद भगवान् ने फरमाये हैं। उन्हें में अनुक्रम से कहता हूँ- १ आर्त ध्यान, २ रौद्र ध्यान, ३ धर्म ध्यान और ४ शुक्ल ध्यान । अन्तःकरण में विचार दो तरह के उत्पन्न हुआ करते हैं, कभी अशुभ यानी बुरे और कभी शुभ यानी अच्छे । अशुभ विचारों को अशुभ ध्यान और शुभ विचारों को एव शुद्ध विचारों को शुभ ध्यान तथा शुद्ध ध्यान कहते हैं। ऊपर कहे गये सूत्र में अशुभ ध्यान के दो भेद किये गये हैं-आर्त ध्यान और रौद्र ध्यान | उसी प्रकार शुभ ध्यान के भी दो भेद किये गये हैं-धर्म ध्यान और शुक्त ध्यान । इन चारों का विस्तृत वर्णन आगे अलग २ शाखाओं में किया जायगा । - अशुभ ध्यान :- ऊपर कहे हुए चारों ध्यानों में से सर्व प्रथम अशुभ ध्यान का वर्णन करता हूँ, क्योंकि मोक्षार्थी अशुभ ध्यान का स्वरूप समझेंगे तब उससे वचकर शुभ में प्रवेश करने के लिये प्रयत्नशील हो सकेंगे। अज्ञात-वस्तु-तत्वस्य, रागाधुपहतात्मनः ॥ स्वातन्त्र्यवृत्तिर्या जन्तोः, तढसद्धयानमुच्यते ।। -ज्ञानार्णव ग्रन्थ जिसने वस्तु का यथार्थ स्वरूप नहीं जाना है तथा जिसकी आत्मा राग, द्वप, मोह इत्यादि दुगुणों से पीड़ित हैं, ऐसे जीव की स्वच्छन्द प्रवृत्ति को प्रशम्त अशुम ध्यान कहा जाता है । यह ध्यान जीवों को स्वत यानी विना उपदेश के ही होता है, क्योंकि यह अनादि वासना ननित है। इसके दो भेदों में से प्रथम प्रारी ध्यान का स्वरूप यहाँ बताते हैं- -: प्रथम शाखा श्रात-ध्यान :- संसारवर्ती सकर्मी जीवों को शुभ-अशुभ कर्मों के सयोग से इष्ट का संयोग, अनिष्ट का वियोग, इष्ट का वियोग, अनिष्ट का सयोग, अनादि काल से होता ही आया है। इन सयोग वियोग के कारणों से ३ .

(५) * ध्यान-कल्पतरु * मन में सकल्प विकल्प उत्पन्न होते ही रहते हैं। इसे "पार्त-ध्यान" ही समझना चाहिये । जिनेश्वर भगवान ने इसके मुख्य चार भेद कहें हैं- -: आर्च ध्यान के भेद-प्रथम उप शाखा :- अट्ट झाणे चउविहे पण्णत्ते, तंजहा:-१ अमणुण्णसंपनोगसंपउत्ते, तम्स विप्पोंग संति समणा गए यावि भवति, २ मणुएणसंप्पोगसंपउत्ते, तस्स अविप्पभोग संति समणा गए यावि भवति, ३ आयंकसंपयोगसंपउत्ते तस्स विप्पयोग संति समणा गए यावि भवति, ४ परिमूसिया काममोगसंपउत्ते तस्स अविप्पयोग संति समणा गए यावि भवति ।। -उववाइसूत्र आर्त ध्यान चार प्रकार से भगवान ने फर्माया है, वह कहा जाता है:- १ अमनोश-खराब शब्दादि का सयोग होने पर यह विचार होवे कि इनका वियोग कब होगा? इसको अनिष्ट सयोग नाम आर्त ध्यान कहा जाता है । २ मनोज्ञ-अच्छे शब्द श्रादि का सयोग होने पर विचार होवे कि इनका वियोग कदापि न हो, इसे इष्ट-सयोग प्रा ध्यान कहा जाता है। ३ ज्वर, कुष्ठ आदि अनेक प्रकार के रोगों की प्राप्ति होने पर विचार हो कि इनका शीघ्र नाश हो, इसे रोगोदय आर्त ध्यान कहा जाता है। ४ इष्ट काम भोग की प्राप्ति होने पर विचार हो कि इनका वियोग कदापि न हो, इसे भोगेच्छा 'श्राव॑ ध्यान कहा जाता है। --: प्रथम पत्र अनिष्ट संयोग :-- १ अनिष्ट सयोग नाम आर्च ध्यान-सांसारिक जीव ने अपने शरीर को, स्वजन स्नेहो आदि कुटुम्ब को, वर्ण श्रादि घन को, गोधूम (गेहूँ आदि धान्य को, गो आदि पशु को, और घर मकान आदि को अपने सुख दाता मान लिये हैं, इस सुख-सामग्री को नष्ट करने वाले सिंह, सर्प, बिच्छू , खटमल जू श्रादि जान. वर, शत्रु चोर, नृप श्रादि मनुष्य, नदी समुद्र आदि जल स्थान, अग्नि, वच्छनाग अफीम श्रादि विष, तार तलवार आदि शस्त्र, गिरि कदरा आदि मृतिका स्थान एव भूत श्रादि व्यतर देव इत्यादि भयकर वस्तु के नाम श्रवण कर, स्वरूप अवलोकन कर देख कर इनके स्मरण होने से, तथा प्राप्त होने से मन को सकल्प- विकल्प धवराहट होती है, तब इनके वियोग की इच्छा करे कि ये मेरे प्राण हरण के लिए क्यों मेरे पीछे लगे 'हैं ? मुझे क्यों सता रहे हैं ? हे भगवन् । इनका शीघ्र नाश हो तो बहुत ही अच्छा, इस प्रकार के चिन्तवन को तत्वज्ञ पुरुषों ने "पात ध्यान का प्रथम भेद" कहा है। --: द्वितीय-पत्र इष्ट संयोग :-- इष्ट-सयोग नाम श्रात ध्यान नोक द्वारा कहा जाता है. राज्योपभोगशयनासनवाहनेषु, स्त्रीगंधमाल्यवररत्नविभूषणेषु । अत्यामिलापमतिमात्रमुपैति मोहात, ध्यानं तदामिति तत्प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥ -सागार धर्मामृत - - - - (६) * ध्यान-कल्पतरु * - इष्टकारी, प्रियकारी, राज्यैश्वर्य, चक्रवर्ती वलदेव मॉडलिक राज्य, सामान्य राज्य की वृद्धि, भोग- भूमि ( युगलिया ) के अखड सुख सौभाग्य, मन्त्रीश्वर प्रधान, श्रेष्ठ सेनापतियों के विलास, नव युवतियाँ, मनुष्य देव सम्वन्धी स्त्रियों के सग काम भोग, पर्यंक पलग आदि शय्या, अश्व, गज, रथ आदि वाहन, चन्दन, पुष्प, आदि सुरभिगन्ध, मनमोहक पदार्थ सेवन, रत्न जटित रजत-सुवर्ण आदि अनेक प्रकार के आभूषण गहने, रेशमी जरी जारजेट आदि वस्त्रों से शरीर सुशोभित करना, मनोहर रूप बनाना, इत्यादि तरह तरह के कामभोगों को भोगने की जो मोहनीय कर्म के उदय से अभिलाषा होती है, तथा उपयुक्त में से जिस क्सिी पदार्थ की प्राप्ति होने पर उसका उपभोग करते समय जो अन्त करण में सुख का आभास होता हैं, तथा जो ऐसे विचार प्राते हैं कि मैं कैसे कैसे इष्ट-सुख को भोग रहा हूँ , या उनकी बारम्बार अनुमोदना करना इत्यादि स्वाभाविक उद्गार निकालना, अन्त करण में आनन्द का अनुभव करना तथा वैसे विचार प्रक्ट करना आदि इस प्रकार के विचार आर्त्त ध्यान का दूसरा रूप है-ऐसा तत्त्वज्ञों द्वारा कहा जाता है। पाठातर-बहुत से कहते हैं कि आर्त ध्यान का दूसरा प्रकार "इष्ट वियोग' है । जैसे-काल ज्ञान ग्रन्थ आदि द्वारा, या स्वर आदि लक्षणों द्वारा, या ज्योतिष आदि विद्या के प्रभाव द्वारा, शरीर का वियोग स्वल्प यानी थोड़े काल में होने वाला जानकार विचार उत्पन्न हो कि "हाय रे हाय । अब मैं इस सुन्दर शरीर को, प्रिय कुटुम्ब स्नेहियों को, और कष्ट से उपार्जित लक्ष्मी को त्याग कर चला जाऊँगा । इसी प्रकार अपने सहायक स्व-जन मित्रों के वियोग से मुर्छित हो गिर पड़ना, विलाप प्रलाप करना, श्रात्म प्रहार करना (सिर-छाती श्रादि पीटना,) मृत्यु का चिन्तवन करना, दूसरे प्रकार का आर्त ध्यान है। इसी प्रकार घर-सपत्ति का किसी भी द्वारा अपहरण किया जाना, अग्नि से जल जाना, पानी में बह जाना या डूब जाना, पृथ्वी में गड़े हुए धन का विरूप हो जाना वदल जाना, यानी धन का कोयला या पानी हो जाना, राजा या पचों द्वारा हरण किया जाना, व्यापार आदि में हानि का होना, यश-कीति के लिये धनादि से अभिमानी वन कर लग्न आदि कार्य में अधिक व्यय करना, अशक्ति या दरिद्रता आदि से दुःख प्राप्त होने पर पश्चात्ताप करना, "हाय रे ! हाय ।। अव क्या करू गा" आदि संकल्प विकल्प भी आत ध्यान रूप वृक्ष की द्वितीय शाखा है। इसी प्रकार इन्द्रिय पोषक पदार्थों की प्राप्ति का विचार करना, अनेक वाद्य-यत्र, वारागना, पुष्प- वाटिका, इत्र, अवीर श्रादि, षट् रस भोजन, वस्त्र, भूषण, अशन, शयन, श्रादि नश्वर पदार्थों के सयोग मिलाने सवधी पापारभ कार्यों का चितवन करना भी आर्य ध्यान है। --: तृतीय-पत्र रोगोदय :-- सभी जीव आरोग्य आदि सुख के इच्छुक क हैं। । परन्तु अशुभ वेदनीय फर्म के उदय से जो जो रोग उत्पन्न होते हैं, असाता वेदनीय का उदय होता है, उसको भोगे विना छुटकारा नहीं हो सकता है। श्रीउत्तराध्ययनजी सूत्र में फरमाया है कि- " कडाण कम्माण न मोक्ख अत्थि" अर्थात-कृत कर्मों के फल को भोगे विना छुटकारा नहीं मिल सकता है। कहा भी है कि- कृतकर्मक्षयो नास्ति, कन्पकोटिशतैरपि ॥ अवश्यमेव मोक्तव्यं, कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥ .

* ध्यान-कल्पतरु* (७) है । ४३२००००००० वर्षों का एक कल्प माना जाता है। ऐसे करोड़ो फल्प में भी कृत कर्मों का फल भोगे बिना मुक्ति नहीं हो सकती है। मनुष्य के शरीर पर साढ़े तीन करोड़ रोम गिने जाते हैं और एक २ गेम के स्थान पर पौने दो रोग कहे जाते हैं, इस प्रकार विचारियेगा कि यह शरीर कितने रोगों का घर जहाँ तक साता वेदनीय कर्म का जोर है, वहाँ तक सब रोग दबे हुए हैं, ढके हुए हैं, और पापोदय होते हो कुष्ठ (कोद), भगदर, जलोदर अतिसार, श्वास, खासी, ज्वर श्रादि अनेक उदर विकार, रुधिर विकार, इत्यादि भयंकर से भयकर रोग उत्पन्न होकर पीड़ा (वेदना) देते हैं, तब चित्त में आकुलता व्याकुलता होकर अनेक प्रकार के सकल्प विकल्प उत्पन्न होते हैं, यह तीसरे प्रकार का प्रारी ध्यान है। उन रोगों के निवारण करने के लिए अनेक प्रकार के औषधि-उपचार करने की भावना होती है । अनन्त काय एकेन्द्रिय से लगाकर पचेन्द्रिय तक के जीवों का विविध रीति से प्रारम्भ, समारभ, छेदन, भेदन पचन, पाचन श्रादि क्रियाएँ करने के विचार अन्त करण में उत्पन्न होते हैं । शीघ्रता से उनका नाश करने की चटपटी लगती है। उनकी हानि वृद्धि से हर्ष शोक होता है । "हे प्रभो । स्वप्न में भी ऐसा दुःख न हो" ऐसी अभिलाषा होता है। इस प्रकार के सब भावनामय विचार तीसरे आर्श ध्यान के अन्तर्गत आते हैं। -: चतुर्थ पत्र भोगेच्छा :- पाचौं इन्द्रियों सवधी काम भोग* भोगने की इच्छा करना भोगेच्छा भारी ध्यान है। श्रवण इन्द्रिय (कान) से राग-रागिनी, किन्नरियों के गायन और वाय-यत्रों के मजुल और मनोहर राग सुनने की भावना करना और उसमें धानंद मानना, चक्षु इन्द्रिय (ख) से नृत्य नाच, षोडश शृंगार से विभू- षित स्त्री पुरुष, बाग बगीचा, आतिशबाजी के ख्याल, महल, प्रासाद, मडप आदि की सजावट, रोशनी आदि देखने की भावना करना और उसमें श्रानद मानना, घ्राण-इन्द्रिय-(नाक) से इत्र पुष्प आदि सुगंधित पदार्थों को सू धने की भावना करना और उसमें आनद मानना, रस-इन्द्रिय (जीभ) से षट् रस भोजन करने की तथा अभक्ष्य भक्षण करने की भावना करना और उसमें आनद मानना, इसी प्रकार शयनासन, वस्त्र, आभूषण स्त्री आदि के विलासमय भोग भोगने को इच्छा करना और उनमें आनद मानना चतुथ भोगेच्छा नामक प्रार्त्त ध्यान है। इसी प्रकार यह भावना करना कि इनका सयोग सदा ऐसा ही बना रहे. तथा मैं बड़ा भाग्यशाली हूँ कि मुझे इष्ट प्रिय सुस्त्र मय सर्व सामग्री प्राप्त हुई है, एष इनमें खुशी मनाना भी भोगेच्छा आर्त ध्यान के अन्तर्गत ही है ॥१॥ भोगान्तराय फर्मों के उदय से इष्ट सुख देने वाली सुसामग्री को प्राप्ति नहीं होने पर एवं किसो दुसरे को राज्य ऐश्वर्य, या ऐन्दिक सुख एव ऋद्धि का भोग करते देखकर जी ललचाना भी आ ध्यान के हो धन्तर्गत है। शास्त्र अन्य का श्रवण कर भोग उपभोग की अत करण में अभिलाषा करे कि हे प्रभो । एक अथवा प्राधा राज्य मुझे मिल जाय, या कोई देव मेरे स्वाधीन हो जाय, वश में आ जाय, तो मैं भी ऐसी मौज मजा करूँ, आनन्द का उपभोग करूँ कि मेरा जन्म सफल हो जाय । उहाँ तक ऐसा सुख मुझे नहीं मिले, वहाँ तक मैं अधन्य हू , अपुण्य हूँ , श्रादि २ विचार भी आर्त ध्यान ही है ॥२॥ * पाच इन्द्रियों में से कान और शास्त्र ये दो इन्द्रियाँ कामी है । अथात् शब्द सुनना और रूप देखना रूप रसानुभव करती हैं। और प्राण, रस, और स्पर्श ये तीन इन्द्रियां मोगी है। यानी गध, स्वाद और स्त्री आदि का अमोा करती है।

(८) * ध्यान-कल्पतरु * , --- - तप, सयम, प्रत्याख्यान, श्रादि धर्म क्रियाओं का नियाणा* करना, फल माँगना, राज्य और ऐन्द्रिक सुख की वॉछा करना भी आर्त ध्यान ही है ॥ ३ ॥ अपनी क्रिया के प्रभाव से आशीर्वाद देना, अन्य स्व-जन मित्र आदि को धन शाली या सुखी करने की अभिलाषा करना भी आर्त ध्यान है ॥४॥ अपने स्व-जन, मित्र या पडौसी श्रादि को सुखी देख, अपने मन में भरणा करना, अपने आपको अन्य की अपेक्षा दरिद्र मानना-यह भी आर्त ध्यान ही है ॥ ५ ॥ इस प्रकार उपयुक्त मन की प्रवृत्तियाँ, अन्त करण के विचार चौथे प्रकार के प्रारी ध्यान हैं। द्वितीय प्रतिशाखा---प्रार्तध्यान के लक्षण :- अट्टस्स णं झाणस्स चत्तारि लक्खणा पण्णत्ता, तंजहा १ कंदणया, २ सोयणया, ३ तिप्पणया, ४ विलवणया । -उववाइ सूत्र आत्त ध्यान के चार लक्षण । १ आनंदन-रुदन करना, २ शोक-चिंता करना, ३ आँखों से आंसू डालना, ४ विलाप करना । आत ध्यान करने वाले को पहिचानने के लिये भगवान् ने सूत्र में बाह्य चिह्न रूप ४ लक्षण फर माये हैं.-१ अनिष्ट का सयोग, २ इष्ट का वियोग, ३ रोग प्रादि दुख की प्राप्ठि ४ भोग आदि सुख की अप्राप्ति । इन चार प्रकार के कारणों में से किसी भी एक कारण के उपस्थित होने पर सी जीवों को फर्मों की प्रबलता से स्वभाव रूप से ही चार काम या चार अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं.- -: प्रथम पत्र-कंदणया :- १ कदण्या-यानंदन करना, रुदन करना जैसे कि हाय रे । मेरे सुसयोगों का नाश हो गया और कुसयोग को प्राप्ति क्यों हुई ? हा देव हा प्रभो ।। इत्यादि विचार उत्पन्न कर 'अरडाट" शब्द से रुदन करना। -: द्वितीय पत्र-सोयणया :-- २ सोयणया-सोच-चिन्ता करना गाल पर हाथ रख कर नीचो दृष्टि फर “सुन मुन्न" होकर बैठना, पागल समान स्थिति कर पृथ्वी खोदना, तृण तोड़ना, तथा मूर्छित हो पड़े रहना । -: तृतीय पत्र-तिप्पणया :- ३ तिप्पणया--अांखों से अनुपात करना, थोड़ी २ ढेर में वन्तु विशेष को स्मरण कर रोना, निश्वास डालना लिप्पणया भारी ध्यान है। * दशाश्रुत स्कन्ध में नियाणा दो प्रकार के कहे गये हैं-१ भव प्रत्यय नो सम्पूर्ण मव तक चले, जैसे नारायण वासुदेव के पद का नियाणा । इनको व्रत प्रत्याख्यान सयम पाटि नहीं होता । २ वस्तु प्रत्यय--किसी वस्तु की प्राप्ति का नियाणा जैसे द्रौपटी जी को, नहाँ तक वस्तु नहीं मिले, वहां तक सम्यक्त्व की प्राप्ति नहीं होती। + श्लेष्माश्रु वाघवमुक्त, प्रेतो भुक्ते यतोऽवश अतो न रोटितव्य हि, प्रिया कागा त्वशक्तिभि ॥ मरने वाले के पीछे उसके स्वजन लेही के रोने पर वो अश्रु और श्लेष्म डालते हैं, उनको यह मरने वाला साता है। ऐसा मिताक्षर अथ में कहा है। , * ध्यान-कल्पतरु* (8) - - के -: चतुर्थ पत्र-विलवणया :- ४ विलवणया विज्ञाप करना, अग पछाड़ना, हृदय पर प्रहार करना वाल तोड़ना। "हाय रे । जुल्म हुआ, गजब हुश्रा, महान अनर्थ हुआ, इन्यादि भयकर शब्दों का उच्चारण करना । क्लेश, टटे मताडे करना। दीन तथा दयाजनक शब्दोच्चारण करना । श्रादि श्रादि सब आर्त ध्यान के लक्षण जानना चाहिये । कहा भी है- शंका-शोक-मय-प्रमाद-कलह-चिन्ता-प्रमोंभ्रान्तयः । उन्मादो विषयोत्सुकत्वममकृत् , निद्राङ्गजाय नमः ॥ मूर्छादिभिः शरीरिणामविरतं, लिङ्गानि बाह्यान्यलं । प्राधिष्ठितचेतसां श्रुतधरै, या गणितानि स्फुटम् ।। ज्ञानावर्ण ग्रन्थ हर बात में शका करना शोक, भय, प्रमाद, अमावधानी, क्लेश, चित्त भ्रम, भ्रान्ति, विषय सेवन की उत्कंठा निरन्तर निद्रा लेना, अग में जहता, शिथिलता, चित्त में खेद, वातु में मूर्छा, इत्यादि चिह्न प्रारी ध्यानी में पाये जाते हैं । ऐसा शास्त्रों के पारगामो विद्वानों ने फरमाया है। श्रात ध्यान पुष्प और फल:- आर्त ध्यानी को प्राप्त वस्तु को प्राप्त करने की अत्यत उत्कठा श्राशा तृष्णा रहती है। रात दिन उधर ही लक्ष्य लगा रहता है, जिससे दूमरे कामों में भी विविध रोति से खराबी आती है, हानि पहुँचती है, धर्म-क्रिया, मयम तप आदि करके भा कु हरीक की तरह वास्तविक लाभ नहीं प्राप्त कर सकता हैं । अखड पूर्व पुण्य को उपस्थिति के बिना इष्ट वस्तु की प्राप्ति नही हो सकती है और न वस्तु स्थिर ही रह सकता है। जो मनुष्य अप्राप्त वस्तु के लिय, अथवा प्राप्त हाकर नष्ट हुई वस्तु के लिये मुर झर कर * एक बार की बात है कि जब द्वाप के पूर्व महाविदेह क्षेत्र के पुष्प कलावती विजय के पुडरीक नामा राजधानी के पद्मनाभ राजा के कु डरीक राजकुमार ने दीक्षा ग्रहण की थी । हमके दूसरे भाइ पुडरीक कुमार को राज्य ऋद्धि प्राप्त हुई थी। माह को राज सुग्व भोगते देखकर कु डरीक का मन चचल हो गया । गुरु का साथ छोड़ कर महल के पीछे की अशोक वाटिका में गुप्त रीति से आकर वेट गया । माली द्वारा माइ के आने की सबर सुनकर राजा पुडरीक शीघ्र ही भाइ के दर्शन के लिये आया। मुनि का चित्त उठान देवा । पूछने पर मुनि ने राज्य वैभव की प्रगसा की, इस पर मुनि के चित्त को चचल जान कर राजा ने अपने वस्त्र श्राभपण उतार कर मुनि को दे दिये और मुनि के धर्म उपकरणो को वस्त्र-पात्र श्रादि को राजा ने ग्रहण कर लिये । तथा गुरु दर्शनाथ चल दिया । मार्ग में तीन दिन लगे, और तीन ही डिन का तेला कर लिया था, गुरुजी से मेंट कर पारणा क्यिा, पारणे में रूपा-सूवा निर्दोष भोजन किया, उस नोरम माजन के करने से गजा के शरीर में महती वेदना पीड़ा उट पड़ी हुइ, एव श्रायुष्य पूर्ण कर सवाथ सिद्धि विमान में देवता रूप में उ पन्न हुया । इधर पुंडरीक राज्य वेश धारण कर राज्य सुख को भोगने के लिये अत्यत मून्य ग्रस्त हुआ। बल बढ़ाने के लिये अश्विक पर्ण रीति से मात महिरा आदि अमक्ष्य पदार्थों का अत्यधिक भन्नण क्यिा, इनसे शरीर म असह्य वेदना छ । तीन दिन में श्रायु'य पूर्ण कर भोगो को बिना भोगे ही मर कर सातवी नग्छ म उत्पन्न हुआ । , (१०) * ध्यान-कल्पतरु * । । - - मरते हैं, वे कोई भी कार्य करने में सफल नहीं हो सकते हैं। बल्कि श्रीनमिराज ऋषि के शब्दों में "कामे पत्थेमाणा, अकामा जति दोग्गइ " अर्थात् अप्राप्त, नहीं मिले हुए कामभोगों की प्रार्थना तृष्णा करता हुआ कामभोगों को बिना भागे ही मरकर दुर्गनि नरक-तिर्यंच आदि खराब गति में चला जाता है। कदाचित् किंचित् पुण्योदय से मनुष्य गति को प्राप्त करने पर भी दु खो, दरिद्री, होन, दीन होता है। यदि देवता हो जाय तो अभोगिया * देव होता है जो कि स्वामी-देव के अधीन रहकर अनेक विध कष्ट भोगता है। इसे स्वामी की खुशी में अपनी खुशी माननी पड़ती है। भोगान्तराय कर्म के उदय से प्राप्त पदार्थों को भी नहीं भोग सकता है । अन्य के भोग-सुखों को देखकर झूरना पड़ता है। प्रात्त ध्यान आर्त ध्यानी के साथ इतने निकट का सम्बन्ध बाँध लेता है कि अन्य भवों में भा साथ साथ रहता है, तथा संवध नहीं तोडता है। (२) आर्ग-ध्यानी प्राप्त हुए भोग-सुखों में अत्यन्त आसक्त रहता है । देवगति में ऐसे सुखों को अनन्त वार भोग लिये हैं, फिर भी समझता है कि ऐसी वस्तु मुझे कहीं भी नहीं मिली ऐमा अनुभव कर उस वस्तु को क्षण भर के लिये भी नहीं छोडना चाहता है। इतनी महती आसक्ति के योग से इस भव में भी शूल, सूजाक, गरमी, चित्त भ्रम श्रादि विविध रोगों से पीड़ित होता है, औषधि एव पथ्य में लगा रहता है, प्राप्त भोग्य पदार्थों को भोग नहीं सकता है। घर में उपस्थित सामग्री को देख देखकर झूरता है । ‘फब इस रोग से मुक्त होऊँ और कब इन पदार्थों को भोगू " ऐसी भावना में ही पड़ा रहता है। ३) आर्त ध्यानी को जिस वस्तु की प्राप्ति हुई है, उस वस्तु से अधिक किसी दूसरे के पास देख कर, सुनकर, उस वस्तु को प्राप्त करने की अभिलाषा होती है । इस प्रकार उत्तरोत्तर वस्तुओं को प्रोप्त कर उन्हें भोगने की अभिलाषा अधिकाधिक घढती जाती है, और इसी में उमका जन्म पूरा हो जाता है । वृद्ध- अवस्था प्राप्त हो जाती है, तो भी इच्छा तृष्णा तृप्त नहीं होती है । भर्तृहरि ने कहा है कि "तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा" अर्थात् हम जीर्ण वृद्ध हो गये हैं, परन्तु तृष्णा-वाँच्छा जीर्ण नहीं हुई । इस सृष्टि में सख्यातीत पदार्थ रहे हुए हैं, परन्तु उन मब की प्राप्ति एक ही समय में और एक ही साथ नहीं हो सकती है। तृष्णा की शाति के बिना दुःख नही मिट सकता है । इस कारण-माला से निश्चय होता है कि आत्त दु ख का ही कारण | यह बात ध्यान जैसा -इस जन्म में-दुःख- दाता हैं, उससे भी अधिक दुखदाता इसको परभव में समझना चाहिये । क्योंकि जो आत्मा प्राप्र वस्तु पर अत्यधिक आसक्ति रखता है, इस कारण से उस आत्मा के वन समान कठिन और कठोर कर्मों का बन्ध पड़ता है। ये कर्म आत्मा को दुगति में ले जाकर भयकर दुखदाता वनेंगे । उस समय भीपण रुदन करने पर भी बन्धन से मुक्ति नहीं मिलेगी। ऐसा सोच समझ कर सम्यक् दृष्टि, पावक, साधु श्रादि इस आत्तै ध्यान को त्यागने का प्रयत्न करें और सुखी हो । यह श्रारी ध्यान सकर्मी जीवों के साथ अनादि काल से लगा हुआ है, यह स्वभोवन' ही उत्पन्न होता रहता है। प्रथम क्षण में यह रमणीय प्रतीत होता है परन्तु अतिम क्षण में अपथ्य आहार जैसा घोर दु ख प्रद है। इसके चार पाये तो पाँचवें गुणस्थान तक हो होते हैं, निदान-नियाणा के प्रभाव हो जाने पर तीन पाये छटे गुणस्थान तक होते हैं। इस ध्यान वाले के कृष्ण लेश्या, नील लेश्या और फापोत लेश्या, ये तीन अशुम लेश्याएँ होती * जो देव नौकर रूप से स्वामी को मेवा करते हैं, उनके लिये ये नौकर देव विमान बनाते हैं । विमान उठाते हैं । अश्व आदि पशु का रूप बना कर सवारी का काम देते हैं । ये श्रमोगिया देव हैं । ध्यान सदा एकान्त रूप से है इस भव में- * ध्यान-कल्पतरु * (११) । इस ध्यान में मन रहकर मरने वाले की विशेषत तिर्यच्च गति ही होती है। यह ध्यान "हेय है यानी छोड़ने योग्य हैं। परम पूज्यश्री कहानजी ऋषिजी महाराज की सम्प्रदाय बालब्रह्मचारी मुनिश्री अमोलकऋषिजी म. रचित श्री ध्यान फल्पतरु प्रन्थ की प्रथम शाखा रूप भात ध्यान नामक परिच्छेद समाप्त । के -द्वितीय शाखा रौद्रध्यान :- रुद्रक्रराशयप्राणी-प्रणीतस्तत्त्वदर्शिमिः ॥ रुद्रस्य कर्म भावो वा रौद्रमित्यभिधीयते ॥ जानार्णव जो क र आशय परिणाम पाला नीच विचारों पाला प्राणी होता है, उसे रुद्र कहा जाता है। और उस रुद्र प्राणी के कार्य अथवा भाव-परिणाम को रौद्र भ्यान कहा जाता है। जैसे मदिरा पान करने से मनुष्य की बुद्धि विकल हो जाती है और वह विशेष रूप से कर कर्मों में ही आनन्द मानता है, वैसे ही प्रत्येक ससारी जीव अनादिकाल से कर्म रूप मदिरा के नशे में पागल धना हुधा कुकर्मों को करने में हो श्रानद मानता है । उन कुकर्मो के करते समय जीव के अन्त करण में जो विचार पाते हैं, जो श्रानन्द की अथवा अन्य विषय को मानसिक तरगें उठती हैं उन्हें ही तत्वज्ञ पुरुषों ने "रौद्र-ध्यान" भयानक ध्यान फरमाया है। -: प्रथम प्रति शाखा--रौद्रध्यान के भेद :- रुद्द झाणे-चउन्विहे पएणत्ते तजहाः-१ हिंसाणुबंधी २ मोसाणुबंधी ३ तेणाणुबंधी ४ सारक्खणाणुबंधी। अर्थात् रौद्र (भयंकर) ध्यान के ४ भेद भगवान ने फरमाये हैं वे यहाँ कहे जाते है -१ हिंसानुबधी रौद्र ध्यान यानी हिंसक कार्यों की अनुमोदना करना, उनको प्रशंसा करना । २ मृषानुवंधी रौद्र ध्यान यानी मिध्या मूठे कामों को अनुमोदना करना, प्रशसा करना । ३ तस्करानुवधी रौद्र भ्यान यानी चोरी के कामों को अनुमोदना करना, प्रशसा करना । ४ सरक्षणानुबंधी रौद्र ध्यान यानी विषय-सुखों की रक्षा करने वाले कामों की अनुमोदना करना उनको प्रशसा करना । इन चारों का ही पणन भागे सविस्तार किया जाता है.. - (१२) * ध्यान-कल्पतरु * - -: प्रथम पत्र-हिंसानुबंधी :- १ हिंसानुवधी रौद्र ध्यान का स्वरूप श्लोक द्वारा इस प्रकार है- संछेदन दमनैः ताड़नस्तापनैश्च, बन्थप्रहारदमनैश्च विकृन्तनैश्च । यस्येह रागमुपयाति न चानुकम्पा, ध्यानं तु रोद्रमिति तत्प्रवदति तज्ज्ञाः ।। -सागार धर्मामृत छेदन, भेदन, ताडन, तापन, वन्धन, प्रहार, दमन, आदि प्रवृत्ति करना, कुरूप करना, इत्यादि कामों में अनुराग रसना, अथवा इन कामो को देखकर दया नहीं लाना यह सब हिंसानुबन्धी रौद्र ध्यान है । १) दु.ख किसी को भी प्रिय नहीं है। अनाथ जीव कर्म की अधीनता से, पराधीनता से, निरा. धार और असमर्थ हो जाते हैं। हीन, दीन और दुखी हो जाते हैं । कर्म वशात् एकेन्द्रिय आदि अवस्था प्राप्त हुई है । वे रात और दिन सुख के इच्छुक हैं । यथाशक्ति सुख प्राप्त करने के लिये घोर प्रयत्न करते हैं । गेम दयनीय असमर्थ जीवों को मतलव से अथवा विना मतलब से दुख देना, सताना, दुःख से पीड़ित को देखकर हर्ष मनाना, यह सब रौद्र ध्यान है। एकेन्द्रिय से लगाकर पचेन्द्रिय जीव तक किसी भी जीव को या सचित्त पदार्थ को स्वय अपने हाथ से, अथवा दूसरे के हाथ से प्राण रहित करते देख कर, टुकडे २ करते देखकर, लोहे की शृखला-वेड़ियों में बांधते देख कर, रस्सी, सूत, सण आदि से वाधते देख कर, कोठरी, तलघर, कारागृह आदि में कजे करते देखकर, कान, नाक, पूछ, सींग, हाथ, पांव, चमड़ी, नख आदि किसी भी अगोपाग का छेदन-भेदन करते देखकर, फलसाने में विचारे जीवों का वध होता देखकर एव उनका करुणा पूर्ण श्राक दन सुन कर टुकड़े होने पर उनको तड़फते देखकर श्रादि विविध, रीति से, जीवो को दु ख देते देखकर या उनका वध करते देखकर थानंद मानना, "वहुत अच्छा हुआ, इसे मारना हा चाहिये था वधन में डालना ही चाहिये था इमे फासी शूली देना हो चाहिये था बडा जुल्मी था वचता तो गजब कर डालता, पाप कटा, मर गया तो पृथ्वी का भार हलका हुश्रा" आदि आदि शब्दोच्चारण करना, आनद मानना यह मव हिंसानुवधी रौद्र ध्यान है। (२) पाहा वा, वा । ये महल, मदिर, वगला, हाट, दुकान हवेली कोट, किल्ला, खाई, बुर्ज, तीर-रतभ, मृतिका पाषाण श्रादि के खिलोने, मृत्ति, भडोपकरण, वर्तन श्रादि बहुत अच्छे वने हैं, अच्छे रग और शिल्प कला श्रादि से कितने सुशोभित हा रहे हैं। धन्य हैं उस कलाकार को, वह पूग शिल्प शास्त्री था : क्तिनी अच्छी और मनोहर वस्तु बनाई है। इमी प्रकार कूप, बावड़ी, नल, तालाब, हौज, कुड, झरना, मारी, लोटा, गिलाम, कलशा श्रादि वहुत ही अच्छे और मनोरम बने हैं । यह पानी कितना सुन्दर, स्वादिष्ट. शीतल सुगधित और मधुर है । कैसा उम्दा फवारा छूट रहा है, कितना सुन्दर छिड़काय हो रहा है। चूल्दा, मट्टी. ऐंजिन, मील दीपक, पिलमौद, हडिया, गिलाम, झूमर, चिमनी श्रादि बहुत ही अच्छे एव सु शोभायमान हैं । क्तिनो उम्दा झगमग रोशनी हो रही है। चित्र विचित्र,विविध रंगमय क्या हा सुन्दर श्रातिशबाजी छूट रही है धूप की सुगन्ध कितनी वढिया है और कैसी मघमघा रही है । क्या हो शीतल सुगन्धित हवा चल रही है। क्तिने उम्दा पंखा व पसी चल रहे हैं। मूला कसा अच्छा घूमता है, वाजित्रो का नाद कितना मधुर और मनोरम है। - . - * ध्यान-कल्पतरु * (१३) -- - - विचित्राकार ऊँचे ऊँचे वृत्तों का समूह क्या हो शोभायमान हो रहा है। ये वृक्ष काटे जाकर इन द्वारा प्रासाद, म्तम्भ, पाट श्रादि वनाने योग्य हैं, ये फल बड़े मधुर हैं। खाने योग्य हैं, गुणकारी हैं, इनका शाक बढ़ा स्वादिष्ट बनता है। क्या ही हरी हरी हरियाली छा रही है, इसको देखने में बड़ा आनन्द आता है। हार-तुरे कितने मनोहर बनाये हैं। कदमूल आदिक औषधियाँ कितनी अच्छी पौष्टिक और स्वादिष्ट हैं। ये काड़े, खटमल, डाँस, मच्छर आदि प्रलय के जीव हैं, ये जरूर मारे जाने चाहिये । जलचर मछली आदि, भूचर गाय श्रादि, वनचर शूअर श्रादि, खेचर पक्षी आदि पका कर खाने योग्य हैं। इन हाथी घोडों की सजावट कैमी अच्छी की गई है। सेना शत्रु का नाश करने जैसी है। बहुत अच्छे चित्र विचित्र पक्षियों को पीजरे में रक्खे हैं। अजायब घर म्यूजियम की विचित्र शोभा है । चूहों से रोगों की उत्पत्ति होती है, ये मारने योग्य हैं । सर्प-विच्छू आदि विषमय जीवों को अवश्य मारना चाहिये-इनसे पुण्य होगा। सिंह का शिकार क्षत्रियों को अवश्य करना चाहिये । कैसा शूर-सुभट है कि एक पल में हजारों का सहार कर देता है । इस प्रकार उपरोक्त सभी विचारों को एंव ऐसे ही अन्य विचारों को हिंसोनुवधी रौद्र ध्यान कहना चाहिये। अश्वमेध यज्ञ में अग्नि में घोड़ा होमा जाना चाहिये, गोमेघ यज्ञ में बैल, अजमेघ यज्ञ में बकरा, नरमेध यज्ञ में मनुष्य आग में होमे जाने चाहिये, इससे धर्म होता है, स्वर्ग मिलता है ये सब विचार भी रौद्र ध्यान के ही हैं। कई एक पापमय शास्त्रों के अभ्यासी कहते हैं कि अमुक अमुक जानवरों के अगोपांग, मास, रक्त, हड्डी, चमहा आदि को अमुक रीति से सेवन करने से अमुक अमुक रागों की शाति होती है। कई एक मनुष्य मनोरजन के लिये फुत्त आदि शिकारी जानवरों द्वारा निरपराध दोन पशु पक्षियों को पकड़वा कर आनद अनुभव करते हैं । कई एक वदर, रीछ प्रादि पशुओं मे नृत्य, गायन प्रादि रूप खेल तमाशा करवा- फर एष देखकर श्रानद अनुभव करते हैं। इसी प्रकार मुर्गा, भैंसा, मेंढा या मनुष्य आदि की परस्पर को लड़ाई देखकर आनद अनुभव करते हैं । यह भी हिंसानुवधी रौद्र ध्यान है। कई एक मनुष्य जीवों का सहार करने की भावना से तोप, बन्दूक धनुष बाण, खड्ग, कटार, छुरी, चाकू, श्रादि का सग्रह करते हैं । या शस्त्रों को देखकर जीयों को मारने की इच्छा करते हैं। फई एक चक्की, चक्का हल, बखर, कुदाली. फावडा, गेंती, उखल, मूसल, सरोता, हसिया, हथोड़ा, कैंची श्रादि का अनावश्यक रूप से सग्रह करते हैं । या इन्हें देखकर साह करने की भावना करते हैं। हाथ में आने पर इनको चलाने की इच्छा करते हैं या भावना रखते हैं, अकारण हो इन्हें घुमा फिरा कर देखतेहैं, यह भी सब हिंसानुबन्धी गैद्र ध्यान है। स्मिो का बुरा चिंतन करना, अपने से अधिक रूपवान धनवान, गुणवान, पुण्यवान, प्रतापवान, वह परिवारी और सुसी को देखकर ईर्पा करना, उनके दुःखी बनने का विचार करना, अमुक की विशेषता . . । - । - - (१४) * ध्यान-कल्पतरु * - से मेरा आदर नहीं होता है, यह मेरे सुख में और लाभ में हानि पहुंचाने वाला है, अमुक आदमी मुझे हर समय दवाता रहता है, सताता रहता है इसकी मृत्यु कब श्रावे और कव पाप कटे, इत्यादि इत्यादि विचार भी हिंसानुबन्धी रौद्र ध्यान है। पृथ्वी आदि छ• काया के जीवों की हिंमा हो, ऐसे ग्रथ रचना अथवा ऐसे ही हिंसाजनक यज्ञ, होम, पूजा, श्रादि का उपदेश करना, हिंसाजनक औपवियों वाले शास्त्री की रचना करना, दुष्ट मन्त्र की साधना करना, बीभत्स :कथा-उपन्यामों की रचना करना या पढना, हिंसक, चोर, व्यभिचारी दुष्ट, दुर्व्य- सनी आदि नीच जनों की सगति में रहना. अथवा उपरोक्त अशुभ प्रवृत्तिमय कार्यों का चिंतन करना भी हिसानुवन्धी रौद्र ध्यान ही है। निर्दय ऋावी, अभिमानी, कपटी, लोभी, नास्तिक आदि जघन्य पुरुपों के हृदय में सदैव हिसानुबन्धी रौद्र ध्यान का ही विशेष रूप से अस्तित्व पाया जाता है । इसी प्रकार हिंसा से उत्पन्न होने वाली वस्तु को भोगने के समय आनन्द का अनुभव करना भी हिंसानुबन्धी रौद्र ध्यान है । हिंसा-जनित वस्तुएँ-जैसे-१ गिरनी में पीसा हुश्रा पाटा, २ चीनी शकर, ३ हड्यिा हाथी दांत का चूड़ा, ४ कचकड़े की बनी वस्तुएँ, ५ पखों की बनी टोपियाँ ६ चमडे के पुट्ठ आदि, ७ अग्रेजी दवाइयाँ, ८ सावुन-मोमवन्ती, ६ रेशमी कपड़े, १० खराव केशर, ११ चर्वी का घी श्रादि वस्तुओं को उपभोग करने की भावना भी हिंसानुवन्धी रौद्र ध्यान है । इसी प्रकार वेर, मूली अादि की शाक भाजी, जुआर, वाजरी के मुट्ट, सुला सड़ा अनाज एव औषधि आदि को एव विना देखे किसी भी सजीव वस्तु को खाते पीते श्रानद अनुभव करना भी हिंसानुवधी रौद्र ध्यान है। क्यों कि इनमें त्रस जीवों के अस्तित्व की सभावना होती है। महाभारत एव अन्य सग्रामों के इतिहास को या कथा आदि ग्रथ को पढ़ने सुनने के समय उनकी मन में अनुमोदना करना भी हिंसानुबंधी रौद्र ध्यान है। इस प्रकार हिंसानुवधी रौद्र ध्यान का वहुत विवेचन किया जा सकता है, किन्तु मव का साराश रूप अर्थ इतना ही है कि किमी को भी दु ख देने का विचार करना या दुमरे के वध से, हानि से वनो हुई वस्तु का अनुमोदन करना भी हिंसानुवधी रौद्र ध्यान है। उपरोक्त वस्तुएँ निम्न प्रकार से हिसा ननित है- १ गिरनी के आटे को बरावर जमा कर ऊपर शक्कर भुर भुराने से अनेक सूक्ष्म त्रस जीव दिखाई पड़ते हैं । २ चीनी शक्कर हड्डियों के चूर्ण और गाय के रक्त से शुद्ध की जाती है । ३ हाथी दांत के लिये प्रति वर्ष अफ्रिका आदि देशो में हजारों हाथी मारे जाते हैं। कचकडे की उत्पत्ति में मी पचेन्द्रिय जाति के प्राणी विशेष मारे जाते हैं। ५ टोपी आदि वस्त्रों में लगाये जाने वाले पखों के लिये पशु पक्षियो का शिकार किया जाता है, उनकी हत्या की जाती है। ६ चमड़े को सुकुमार और सुन्दर बनाने के लिये एव नगारा आटि ढोलों के लिये जीवित नानवरों के ही चमडे ज्यों के त्यो उतार लिये जाते हैं, या बाल पशुओं की हत्या की जाती है । ७ अग्रेजी दवाइयो म प्राणियो के मास, श्रादि का समिश्रण होता है, शराब की मिलावट होती है । कॉडलीवर अाइल तो मछली विशेप का ही अर्क होता है, ऐसा ही अन्य में भी जानना । ८ सावुन मोमबत्ती आदि में चर्ची का समिश्रण होता है । ६ केशर की खेती में रक्त का खाद दिया जाता है । १० रेशम कीटों को उबाल कर, उन्हें मार कर, तैयार क्यिा जाता है, मील के कपड़ों में चर्बी का क्लप लगाया जाता है । ११ वनम्पति ननित घी में कमी कमी ची का मी समिश्रण कर दिया जाता है । इस प्रकार जो उपरोक्त वस्तुओं का उपभोग और उपयोग करता है, उसे श्रार्य से कहें ? रस्त * ध्यान-कल्पतरु* (१५) मैं से . -: द्वितीय पत्र-मृषानुबन्धी :- मृषानुबन्धी रौद्र ध्यान का स्वरूप श्लोक द्वारा कहा जाता है- असत्यचातुर्यबलेन लोकाद्, वित्तं ग्रहीष्यामि बहुप्रकारम् । तथाश्वमातङ्गपुराकराणि, कन्याटिरत्नानि च पन्धुराणि ॥ १ ॥ असत्यवाग्वञ्चनया नितान्तं प्रवर्त्तयत्यत्र जनं वराकम् । सद्धर्ममार्गादतिवर्त्तनेन, मदोद्धतो यः स हि रौद्रधामा ।। २ ॥ -ज्ञानार्णव ग्रन्थ असत्य और चतुराई के बल से लोगों से अनेक प्रकार से धन सग्रह कर लू गा, मन कल्पित अनेक शास्त्रों को रचकर अपना मत चलाऊँगा, चाहे वे शान सत्य हो कि झठ, दयाशील हों या दया के निषेध करने वाले हों तो भी परवाह नहीं करूंगा। लोगों को वाणी की चतुराई से मोहित कर उनके पास सुन्दर कन्या, रत्न, धन धान्य, गृह-घर आदि ग्रहण कर लँगा। और मेरे जीवन को सुख से चलाऊँगा, इत्यादि विविध रीति से अन्त करण में असत्य विचारों का उत्पन्न होना ही मृषानुवन्धी रौद्र ध्यान है । मृषा- वाद जगत में नाना प्रकार के दोष फैलाने की शक्ति रखता है। इसन्निये छोटे बड़े सभी झूठ को खराब सम- झते हैं । झूठ से समी चिढते हैं। फिर भी आश्चर्य है कि जनता उसे नहीं छोड़ती है। मृषानुबन्धी रौद्र ध्यान की सत्ता कितनी बलवती है कि इसके बल से खराब काम में भी आनन्द का अनुभव होता है। कई एक अपनी चतुराई बतलाते हैं कि हम कितने भारी विद्वान् हैं, कितना सुन्दर प्रपच रचा है कि इसके बल से अगहीन, रूपहीन, इन्द्रियहीन और गुणहीन कन्या को भी कितने अच्छे और ऊचे घराने में पहुँचा दी-शादी करा दी और इतने रुपये नगद दिना दिये । बुद्दे का, रोगी का, नपु सक का कितनी अच्छी युक्ति से लग्न करा दिया। चाहे भविष्य में जीवन- पर्यन्त वे रोते रहें, हमें क्या मतलब ? हमने तो हमाग मतलब सिद्ध कर लिया । इसी प्रकार गाय, घोड़ा आदि पशुओं की, सोता मैना आदि पक्षियों की, खेत, बाग, बावड़ी आदि की झूठी प्रशसा कर, प्रपच फैला फर, रूप में-श्राकार प्रकार में परिवर्तन कर, बुरे को अच्छा बतला पर अधिक कीमत उठा लेना, और खुशी मनाना, मृषानुवन्धी रौद्र ध्यान है। पुराने वस्त्रों को रग आदि के प्रयोग से रूपान्तरित कर बेच कर खुश होना, खोटे आभूषणों को सञ्च' कह कर बेचना, अच्छा माल वना कर खोटा देना और खुश होना, मृषानुबंधी रौद्र ध्यान है । विश्वास देखकर कोई गुप्त धन, श्राभूषण श्रादि अमानत रूप से रख गया हो तो उसको दवा देना, उसके मालिक को नहीं देना, झूठी गवाहियें देना, झूठे खत लिखना, झूठे खतों के आधार से दूसरे के धन मकान आदि का अपहरण करना और प्रसन्न होना यह सव मृषानुवधो रौद्र ध्यान है । व्यापारिक अथवा अन्य कामों में धोखे बाजी कर एव प्रपच फैला कर दूसरे को ठगने का विचार फरना और उसमें प्रसन्न होना भी मृषानुवधी रौद्र ध्यान है। थपना मन माना मिथ्या पथ चलाना, वीतराग प्ररूपित शास्त्र को छोड़ कर अनेक कल्पित प्रथ. चरित्र आदि की रचना करना, एवं इन द्वारा अनभिज्ञ मोले मनुष्यो को भ्रम में डालना, दया में पाप बतला , .

(१६) * ध्यान-कल्पतरु * , कर, दया वर्म से तिलाजलि दिलाकर हिंसा मार्ग पर चलाना, और इन कार्यों में प्रसन्नता अनुभव करना मृपानुवधी रौद्र ध्यान है। स्त्र मचालित विपरीत धर्म के सबंध में कहना कि मैं ने इतने ग्राम और इतने मनुष्यों को अपने मत में दीक्षित कर लिये है और इसी बात में खुशी मनाना मृषानुवधी रौद्र ध्यान है । नानवान् , प्राचारवान , जिनेश्वर के शुद्ध मार्ग का प्रचार करने वाले, क्षमावान् ब्रह्मचारी आदि धर्म दीपकों की महिमा सुनकर* ईर्षा करना, उनका अपमान करने के लिये उन पर मिथ्या कलक लगाना, उनकी निंदा करना, एव अपनी मिथ्या बात को दूसरे के द्वारा सत्य मानने पर हर्प प्रकट करना, ऋतु काल में रति दान धर्म ठहरा कर कुलीन स्त्रियो को भ्रष्ट करना, धर्म के लिये की जाने वाली हिंसा में पाप नहीं वतलाना, ब्रह्मचारी नाम धरा कर व्यभिचार करना, महात्मा आदि उच्च शब्दों से सबोधन किये जाने पर आनद अनुभव करना यह सब मृषानुवधी रौद्र ध्यान है । वधिर-यानी बहिरे की, अन्धे की, लगड़े की, अनङ्ग की, कोढ श्रादि रोग से प्रसित रोगो की, निर्बुद्धि की-आदि दया पात्र मनुष्यों की हसी करना, इन्हे चिढाना, उन्हें चिढते देख कर आनन्द अनुभव करना, जुश्रा, ताश, शतरज श्रादि खेल तमाशों में स्वभावत. ही झूठ बोलना, व्यर्थ के विवाद में, प्रवादियों को कपट पूर्वक छलने में, जाल फैलाने में, हस्तकौशल से या इन्द्रजाल से विविध कौतुक बताने में, मत्र-यत्र आदि के आडम्वर द्वारा अपनी प्रतिष्ठा-महिमा सुनने में खुश होना मृपानुवधी रौद्र ध्यान है। शास्त्रार्थ करते समय (व्याख्यान देते समय) स्वार्थ दृष्टि से विभिन्न अर्थ करना, विपरीत अर्थ करना, अर्थ का अनर्थ कर देना, झूठी बातों से श्रोताओं को खुश करके शानद अनुभव करना-मृपानुवधी रौद्रध्यान है। जो पुस्तकें दया, सत्य शील श्रादि गुणों से रहित हैं और जिनमें केवल सग्राम, लड़ाई, झगड़ा, काम-लीला, शृगार रस श्रादि का वर्णन हो, ऐसी पुस्तकें अथवा कथा-वार्ताएं सुन फर या सुना कर आनद मानना-मृषानुवन्धी रौद्रध्यान है। मृपानुवन्धी का अर्थ तो बहुत विस्तृत होता है, परन्तु माराश इतना ही कि जिसमें झूठ हो, भयकरता हो, जघन्यता हो, अकारण ही पाप रहा हुश्रा हो, ऐसे पापपूर्ण विचारों का नाम मृपानुवन्धो रौद्रध्यान है। इसी प्रकार ऐसे हा पापपूर्ण विचारों में आनन्द मानना भी मृपानुवन्धी रौद्रध्यान जानना चाहिये। -: तृतीय पत्र--तस्करानुबंधी :- ३ तस्करानुवघी रौद्र ध्यान का मूल स्वरूप श्लोक द्वारा इस प्रकार है:- यच्चोर्याय शरीरिणामहरहरिचन्ता समुत्पद्यते, कृत्वा चौर्यमपि प्रमोदमतुलं कुर्वन्ति यत्सन्ततम् । मनहरण छट -सज्जन को देखकर दुर्जन करत कोप, ब्रह्मचारी देव-कामी कोप करे मन में । निशा के नगैया ताको देख कोप करे चोर, धर्म शील देख पापी जल उठे तन में ।। शूरवीर देवर कायर करत कोप, कवियों को देस मूढ हामी करे नन में। धन के धनी को देख निर्धन कोप करे, बिना ही निमित्त खाक डारे तिहू पन म ॥

* ध्यान-कल्पतरु * (१७ ) चौर्येणाऽपि हृते परैः परधने यजायते संभ्रम- स्तच्चौर्यप्रभवं वदन्ति निपुणा रौद्रं सुनिन्दास्पदम् ।। -शानावर्ण अन्य चोरी करने की सदा चिंता करना चोरी करके अति हर्ष मनाना, अन्य से चोरी कराना, चोरी से लाम की प्राप्ति पर खुश होना, चोरी के काम में कला-कौशल बताने वाले को प्रशसा करना इत्यादि विचार तस्करानुबन्धी रौद्रध्यान है, जो अति निंदनीय है। जीव तृष्णा रूपी विकराल जाल में फंपा हश्रा है। सारे ससार के अन्न धन, लक्ष्मी, सुस-ऐश्वर्य पर स्वामित्व चाहता है परन्तु इतना पुण्य पूर्व जन्मों में सचित नहीं किया है जिससे कि सर्वाधिपति वन सके । प्रमादी तो बिना परिश्रम के द्रव्य प्राप्त करना चाहते हैं और इसी में तृमि मानते हैं । पाप के उदय से उनको चोरी के सिवाय दूसरा कोई उपाय नहीं दिखाई पड़ता है । इस कारण वे चौर्यानुबन्धी रौद्रध्यान मे ही सलग्न रहते हैं। ऐसी पापी श्रआत्माएँ विचार करती हैं कि बादलों से आच्छादित आकाश का वातावरण हो, अन्ध- कार पूर्ण रात्रि हो, ऐसे समय में फाले वस्त्र धारण कर गुप्त रीति से जाकर खात देकर धन ले आऊँगो । किसी को क्या शक्ति है जो कि मेरा सामना करे । मैं शस्त्रकला में ऐसा प्रवीण हूँ कि एक ही झटके में अनेक के बटके कर दू, टुकड़े कर दू और ऐसा भागू कि किसकी माता ने दूध पिलाया है, जो कि मुझे पकड़ सके । मैं अनेक विद्या का ज्ञाता हूँ। सबको निद्रा-ग्रस्त कर सकता हूँ। बड़ी २ जजीरों को और तालों को एक ही फकरी से तोड़ सकता हूँ। सेना को स्तम्मित कर सकता हूँ | अजन-सिद्धि से जमीन में गड़े हुए गुप्त धन को देख सकता है । अन्धकार में भी प्रकाश के समान देख सकता हूँ इत्यादि रूप से विविध कलाओं को मैं धारण करने वाला हूँ। किसी की क्या शक्ति है जो मेरी बराबरी कर सके । हजारों वीर मेरी आज्ञा में हैं । व मो मरे समान हो कलाओं में प्रवीण हैं और शूरवीर हैं । मैंने बड़े २ राजाओं को कम्पायमान कर दिये हैं । मैं थोड़े ही समय में धनवानों का सहार कर सर्व ऋद्धि-सिद्धि का स्वामी बन जाऊँगा और निश्चिन्त होकर श्रानन्द का अनुभव करूंगा। अमुक स्नी बहुत रूपवती है, उसका भी हरण करूँगा । अमुक भूषण, वल, पात्र, पशु, मनुष्य-नौकर श्रादि सभी उत्तम पदार्थों को मेरे अधीन करूँगा और इनको भोग कर अपनी आत्मा को तृम करूँगा इत्यादि विविध विचारों को अन्त करण में स्थान देना ही तस्करानुबन्धी गैद्रध्यान है। कितने ही ऐसे नाम धारी सेठ हैं जो कि जन साधारण को अपनी सेठाई बतलाने के लिए उत्तम उत्तम वस्त्र, श्राभूषण पहिनते हैं तिलक, छापा, माला, कठो से शरीर विभूषित कर, माला हाथ में फेरते हुए, बड़े धर्मात्मा दन कर ऊ च ऊ वी गद्दो पर तकियों के सहारे दुकान पर बैठते हैं । ग्राहक रूप शिकार के पाते ही, माला फेरते हुए, भगवान का नाम उच्चारण करते हुए, माठे २ वचनों के साथ उस भोले ग्राहक फो पान-वीही श्रादि द्वारा ललचा कर, भ्रमा कर, ऐमो हुशियारा से ठगाई करते हैं कि किसको शक्ति है, जो कि इनकी ठगाई को समझ जाय । वोल में, मोल में, तोल में, माप में, छाप में. नवाब में उगाई चला कर, जहाँ तक हो सके, वहाँ तक उसे लूटने में कोई कसर नहीं रखते हैं । ग्राहक का विश्वास में लेने के लिये गाय की, बच्चे की, भगवान फी सौगंध सा जाते हैं । दमड़ी दमड़ी के लिये सौगघ खा जाते हैं । इष्ट लाभ हाने पर बड़े प्रसन्न होते हैं । अच्छा माल वतलाकर खोटा देते हैं । अच्छे में बुरा मिला कर दे देते हैं । हिसाव में, व्याज में दूसरों का - . - (१८) * ध्यान-कल्पतरु * घर डुवा देते हैं । ऐमी २ अनेक चोर क्रियाएँ कर सरे बाजार में साहूकार कहलाते हैं। अपनी धूर्तता को बुद्धिमानी समझ कर वडा अानद अनुभव करते हैं। यह सब चौर्यानुवधी रौद्र ध्यान है। इसी प्रकार कितने ही साधुओं का शरीर दुर्बल देसकर कोई पूछे कि "महाराज | श्राप तपस्वी हैं ?" उस समय तपस्वी नहीं होने पर भी यह कहे कि "हाँ ! माधु सदा तपस्वी ही होते हैं। ऐसा कहने वाला तप का चोर है। इसी प्रकार शुद्ध श्राचार नहीं होते हुए भी एव मलिन वस्त्र धारण करके याचारवान कहलावे, श्वेत बाल होने से स्थविर कहलावे, रूपवान होने पर राज ऋद्वि का त्याग करने वाला कहलावे, क्र र परिणामी होता हुआ भी दाभिक रीति से वैरागी कहलावे, इत्यादि प्रकार की धर्म ठगाई करके श्रानद मानना यह भी तस्करानुबधी रौद्र ध्यान है। किसी के मकान, बगीचा, धर्मशाला, वस्त्र, आभूपण, बर्तन, भोजन, पानी, अन्न, फल पुष्प आदि और तृण कंकर श्रादि निमूल्य पदार्थ भी उमक मालिक को आज्ञा बिना देस करके, स्पर्श करके, अथवा भोग करके आनद मानना, यह भी चौर्यानुवधी रौद्र ध्यान है। दूसरों के जिन जिन पदार्यों को सुने देखे अथवा जाने, उनको ग्रहण करने की, अपने अधिकार में करने की अथवा भोगने की अभिलापा करना, यह भी चौर्यानुवधी तीसरा रौद्र ध्यान चोर चोरी करके वस्तु लाया हो, उनको सम्ते भाव से लेकर आनन्द अनुभव करना, चोर को महायता देना, खाने पीने की वस्तुत्रो से और वखों से उसको साता देकर उससे चोरी करवाना और वह माल स्वयं लेकर आनन्द अनुभव करना, राज्य का टेक्स नही चुका कर प्रसन्न होना, जिस वस्तु को बेचने के लिए राजा द्वारा अपने राज्य में इन्कारी की हुई हो, उसको गुप्त रूप से लाकर बेचना और प्रसन्न होना इत्यादि रूप से इन सभी को तस्करोनुबन्धी गैद्रध्यान के ही भेदानुभेद समझना चाहिए | सबका मतलब इतना ही है कि मालिक को आज्ञा विना अथवा उसकी इच्छा के बिना बलपूर्वक किसी भी वस्तु पर अपना स्वामित्व कायम करके प्रानन्द मानना, तस्करानुबन्धी रौद्रध्यान है। -: चतुर्थ पत्र--संरक्षण :- वहारम्भपरिग्रहेपुनियतं रक्षार्थमभ्युद्यते, यत्संकल्पपरम्परां वितनुते प्राणीह रौद्राशयः । यञ्चालम्व्य महत्त्वमुन्नतमना राजेत्यहं मन्यते, तत्तुर्य प्रवदन्ति निर्मलधियों रौद्र भवाशंसिनाम् ।। --ज्ञानार्णव जो प्राणी रौद्र (कर) चित्त होकर विविध प्रारभ परिग्रह की रक्षा के लिये नियम पूर्वक प्रयत्न फरे, और उसमें ही अपनी महानता समझता हुअा, उन्नत चित्त वाला होकर ऐसा माने फि में इन सबका स्वामी हूँ इत्यादि विचारों को प्रवृत्ति को तत्त्वज्ञ महापुरुपी ने संसार की इच्छा करने वालं जीवों का चौथा विपय सरक्षण नामक रौद्र ध्यान कहा है। * तवतेणे वयतेणे, म्वतेणे थ जे नरा अायारभावतेणे अ, कुवह देवकिनिस ॥ तप का, व्रत का, रूप का, आचार का और भाव का चोर मर करके किचिपी ( देवतानो मं चांद्याला जैसे ) देव होते है। .

* ध्यान-कल्पतरु* ( १६) के का सयोग -: विषय संरक्षण रौद्र ध्यान :- इस ससार में सभी जीव पापी ही पापी हैं, ऐसा भी नहीं समझना, तथा सभी पुण्यात्मा ही है, ऐसा भी नही सममना । सभी ससारी जीवों के पुण्य और पाप दोनों ही अनादि काल से लगे हुए हैं । पाप की वृद्धि होने से दुःख की विशेषता और पुण्य की वृद्धि होने से सुख को विशेषता होती है। जो अधिक होता है, वही स्पष्ट मालूम होता है। फिर भी उसका प्रतिपक्षी गुप्त रूप से अवस्थित होता ही है। जिनके पुण्य की अधिकता होती है, उनके लिये सुखदायक मन अनुकूल सामग्रियो मिलता है और वह उनका वियोग कदापि नहीं चाहता है। ( यह वर्णन श्राव॑ ध्यान के दूसरे भेद में हो गया है)। प्रत्येक वस्तु का स्वभाव ही श्रध्र व, अशाश्वत् और क्षण भगुर है । "समय समय में अनत हानि, ऐसा जो भगवान ने फरमाया है, वह सत्य है । वस्तु का स्वभाव प्रत्येक क्षण में पलटता पलटता किसी भी क्षण वह वस्तु भी सर्व रूप से नष्ट हो जाती है, ऐसी स्थिति में उसे नष्ट नहीं होने देने का प्रयत्न करना और उसे बचाने का प्रयत्न करना, यही विषय सरक्षण रौद्र ध्यान है। राज्य-लक्ष्मी के प्राप्त होने पर ऐसा विचार आना कि, "कहीं मेरे राज्य का कोई दूसरा शासक अपहरण नहीं फरले", इसलिए सर्व प्रथम यह व्यवस्था की जाय कि चतुरगिनी सेना (हाथी, घोड़े, रथ, पैदल ) तैयार करूं, श्रेष्ठ श्रेष्ठ पराक्रमशील सैनिकों का सग्रह करूँ, अविश्वसनीय स्थानों पर छावनी कायम करूँ इत्यादि विचारधारोएँ एवं उद्धतों के सहार का उपाय सोचना, शत्रु के राज्य में जासूसों द्वारा समाचार सग्रह करवाने की सोचना, जागीरदारों को इनाम पुरस्कार आदि द्वारा सतुष्ट रखने की सोचना, जिससे कि वे समय पर युद्ध में काम आ सकें, मजबूत शहरपनाह, गहरी खाई एव शतघ्नी आदि शस्त्रों से सयुक्त उच्च बुर्ज तथा पका गढ़ बनवाने की सोचना, धनुष, वाण, तलवार आदि विविध शस्त्र-अनों को सग्रह करने की सोचना, धनुर्वेद आदि की शिक्षा ग्रहण करके सग्राम विद्या में प्रवीण बनने की भावना करना, समय पर विजय प्राप्त करने के लिए कसरत और औषधि आदि के सेवन द्वारा शरीर को परिपुष्ट करने की भावना सोचना इत्यादि उपरोक्त उपायों से राज्य-रक्षण की चिंता करना, यह भी विषय सरक्षण रौद्रध्याल है । द्रव्य को तिजोरियों में रखू , जिससे अग्नि चोर श्रादि का उपद्रव नहीं पहुंच सके, मैला कुचेला और पागल जैसा रहूँ, जिससे कि कोई कौटुम्बिक पुरुष अथवा चोर श्रादि धन का हरण करने के लिए मेरा पीछा नहीं कर सके, किसी के साथ मैत्री भाव नहीं रखू, जिससे कि समय पर किसी की भी प्रार्थना भङ्ग नहीं करनी पडे, मितव्ययता के साथ थोडे ही खर्चे में अपनी जीविका चलाऊँ, नीचे दर्जे की वस्तु काम में लाऊँ, आदि विविध उपायों से द्रव्य का रक्षण करूँ , महिलाओं को पर्दे में रखू . आदमियों का पहरा रखू, खान-पान, वस्त्र, आभूपण की मर्यादा रखू, अल्प वोलू एव महिलाओं को हर प्रकार से सन्तुष्ट रखें, जिससे वे अन्य की इच्छा नहीं करें इसी प्रकार स्वजन, मित्रों को सान-पान, वस्त्र, श्राभूषण, स्थान, सन्मान से सन्तुष्ट फरूँ, जिमसे कि वे समय पर पूरा काम दे सके, मकान को मरम्मत करा करके, सफाई से रतूं कि जिससे गिरे नहीं इत्यादि विविध गति से सम्पत्ति और सन्तति के रक्षण के विचार करना, यह भी विपय सरक्षण रौद्रध्यान है। - यह मेरा शरीर रत्नों के पिटारे से भी अधिक प्रियकारी है. इसलिए इसको शीत, उष्ण, वर्षा ऋतु में यथायोग्य वस्त्र, आहार, पानी और मकान से सुख पहुँचाऊँ, डास मन्छर आदि क्षुद्र प्राणियों के काटने से इसे घचाऊँ, शत्रुओं से रक्षण करने के लिए शस्त्रों की और सुभटों की व्यवस्था करूं. क्षुधा को इष्ट भोजन (२०) * ध्यान-कल्पतरु * . - - से, तृपा को ठण्डे पानी से, वात, पित्त आदि रोगों को औपधोपचार से, व्यन्तर आदि के उपसर्गो को मन्त्र आदि द्वारा हटा कर इस शरीर को सब प्रकार से सुरक्षित रखता हुआ इसे अखण्ड सुखी रक्खू, ऐसा विचार करना, अपना गौर वर्ण, और मतेज पुष्ट शरीर देख कर प्रसन्न होना, शरीर को अभक्ष्य आदि पदार्थों द्वारा परिपुष्ट करने की भावना रचना, शरीर के, स्वजन सम्बन्धियों के और सम्पत्ति के नाश करने वाले जो व्यक्ति हैं, उन पर दुष्ट परिणाम लाना, उन्हें देख कर क्रोधातुर हो जाना, उनके नाश के लिए विविध उपायों वाली योजनाएँ मोचना, अपना शरीर, धन आदि यदि दूसरों के अधिकार में हों, उनको स्वतन्त्र करने के लिए विविध कुयुक्तियों का विचार करना, इन मभी को विपय सरक्षण नामक रौद्रध्यान समझना चाहिए । इस प्रकार इस ध्यान के अनेक भेद हैं, परन्तु सब का तात्पर्य यही है कि इस ध्यान में विशेष रूप से अपने रक्षण का और अन्य के लिए परिताप पैदा करने का ही विचार रहता है, इसीलिए इसे रौद्र (भयकर ) ध्यान कहा जाता है। =द्वितीय प्रति शाखा रौद्र ध्यानी के लक्षण :- रोदस्स णं झाणस्स चत्तारि लक्खणा पण्णता तंजहाः-१ उसण दोसे, २ बहुल दोसे, ३ अण्णाण दोसे, ४ अामरणांत दोसे । रौद्र ध्यान के ४ लक्षण हैं:-१ हिंसा आदि पापों का विचार करना, २ इसी सबधी बहुत अधिक विचार करना, ३ अज्ञानियों के शास्त्रों का अभ्यास करना, और ४ मृत्यु हो जाने तक भी पाप का प्रायश्चित नहीं करना। जिस ध्यान का नाम ही "रौद्र यानी भयकर" ऐसा हो, तो फिर उसका विचार, कर्तव्य और स्वरूप भयकर हो, यह स्वाभाविक ही है। सर्व प्रथम विचार मस्तिष्क मे प्रवृत्ति शील होते हैं और तत्पश्चात कार्य में प्रवृत्त होने के लिये प्रेरणा करते हैं । रौद्र ध्यान (भयकर विचारों) के होने से रौद्र कार्य के विषय में जैसी प्रवृत्ति होती है, उसके मुख्य चार भेद भगवान् ने फरमाये हैं - -: प्रथम पत्र--उषण दोष :- हिंसा झूठ, चोरी और विपय सरक्षण इन चारों ही की पोषणता के लिये जो जो काम किये जाएँ, वे उषण दोष हैं। जैसे कि हिंसा की पोषणता (पृद्धि) के लिये अनक फावड़े, कुदालियाँ, श्रादि पृथ्वी को खोदने वाले तथा फोडने वाले शस्त्रों का सयोग मिलाना, अधूरे हो तो उनके हत्थे लगवाना, धार सुधरा कर परिपूर्ण करना, पृथ्वी के छेदन-भेदन के श्रारभ में उन्हे लगाना इसी प्रकार जल के प्रारम की वृद्धि के लिये चड्स, रहट, मशक, घड़ा, कलशा आदि द्वारा और कुधा, बावडी, तालाव, नल फुबारा, हौज, आदि स्थान धनवा कर पानी का श्रारभ करना अथवा करवाना । अग्नि के लिये चूल्हे, भट्टी, दोपक, चिलमे, आतिशबाजी श्रादि करना या करवाना एव अन्य को ऐसे कामो में लगवाना, हवा के श्रारंभ के लिये पखी, पंखें, वाजिंत्र आदि लगाना या लगवाना, वनस्पति के आरभ के लिये मजी, बाग बगीचे, वाड़ी इत्यादि लगाना या लगवाना, पत्र, पुष्प, फल, तृण आदि का छेदन, भेदन, पचन, पाचन, भक्षण आदि करना या करवाना, ये सब उपण दोप के अन्तर्गत हैं। त्रस के प्रारम्भ के लिए धुश्रा आदि के प्रयोग से मच्छर, डाम, सटमल आदि को मारना, नाल. पाश से जलचर भूचर, सेचर प्रादि को अधिकार में करना, तलवार, भाला प्रादि शन्नों द्वारा छेदन भेदन । - - * ध्यान-कल्पतरु * ( २१ ) . - ताड़न तर्जन करना, मनुष्य पशु को घाव पड़ जाय ऐसे कठिन बन्धन से बाधना, कठोर प्रहार करना, आहार पानी की अन्तराय डालना, अङ्गोपांग का छेदन भेदन करना, शक्ति से अधिक काम लेना, परिश्रम कराना, सदैव निर्दय होकर अयना से एकान्त स्वार्थ को ही माधना करना अथवा बिना कारण दो अन्य को सन्ताप उत्पन्न करना श्रादि-आदि उपरोक्त कार्यों को करने वाला रौद्रध्यानी हो है, ऐमा समझना चाहिए । इसी प्रकार झूठ का पोषण करने के लिए अनेक पाप-शाब काम शास्त्र, कादम्बरी आदि का पाठ करना, झूठे झगड़ों को जीतने के लिए अनेक चालाक आदमियों की संगति करना, तथा ऐसे हा कायदों का, कानूनों का अभ्यास करना, भूठे ख्याल और कविताएँ बनाना, चकार मकार आदि से शुरू होने वाली गालो का उच्चारण करना, वीभत्स और अयोग्य शब्द बोलना, निडर निर्लज्ज होफर प्रवृत्ति करना, इसी प्रकार चोरी की पुष्टि के लिए चोरों के शस्त्र-कोश, कुदाल, गुप्ति आदि का सग्रह करना चोरी की कला का अभ्यास करना, "गोह चिपक जाने वाले जानवर विशेष को पालना, चोरों को संगति में रहना, धाडा-डाका पटकना, चालाकी से अन्य का माल हरण कर लेना, इसी प्रकार विपय-सरक्षण के पोपण के लिए, भुत-इन्द्रिय के पोषण के लिए मृदग आदि बनाने के लिए जीवित पशुओं का चमड़ा निकालना अथवा निकलवाना, सारगो आदि बनाने के लिए गाय श्रादि को नस तोड़ना तुड़वाना, चक्षु इन्द्रिय के पोषण के लिए शृगार सामग्रो सजाना, मोतियों को चीरना चीरवाना, सण कपास आदि पोलना, फतवाना, मशीन आदि द्वारा वस्त्र आदि बनवाना, अनेक शृगार सजाना, स्त्री आदि के शृगार को देख कर तथा स्त्री सम्बन्धी नाटक ख्याल आदि देख कर बगीचा श्रादि लगाना, घ्राण इन्द्रिय के पोषण के लिए यन्त्र आदि के प्रयोग से इन आदि निकल- वाना, पुष्प आदि सुगन्धित द्रव्य का सेवन करना, पुष्प-वाटिका आदि बना करके उसका उपभोग करना, रस इन्द्रिय के पोषण के लिए मदिरा, मास का भोगना, कन्दमूल आदि अभक्ष्य का भक्षण करना, पौष्टिक उन्मादक वस्तु का सेवन करना, रसायन भस्म आदि का सेवन करना, स्तम्भन के लिए गुटिका आदि का सेवन कर महाकामी बनना, स्पर्श इन्द्रिय के पोषण के लिए अनेक पुष्प आदि वाली शय्या पर सोना, उत्तम वस्त्र, आभूषणों से श्रृंगार सजना, हार, तुर्रा इत्र, पुष्प आदि से शगेर को सुशोभित करना, चू चू करने वाली जूतियाँ पहिन कर अकड़ कर तन कर चलना, वेश्यादि के नृत्य में भाग लेना, गान-तान में मस्त होकर तान मे तान मिलाना और उसमें मस्त हो जाना । काम के चौगसा प्रामनों के चित्रों को बार बार देखना इत्यादि रूप से पांचों इन्द्रियों के पोषण के लिए विविध उपायों को योजनाएँ सोचना, ये सब उपण दोप सम्बन्धो रौद्ध्यान ही है। -: द्वितीय पत्र--बहुल दोष :- उपरोक्त इन्हीं कामों को विशेष विशेष करना, ज्यों २ करते जाना त्यों २ अधिकाधिक इच्छा बढ़ाते जाना और इच्छा को तृप करने के लिए उन्हीं कार्यों को अधिकाधिक रूप से करते जाना, परन्तु फिर भी राप्त नहीं होना, यहा बहुल दोष है । -: तृतीय पत्र--अज्ञान दोष :- रौद्र ध्यान का यह स्वभाव ही है कि वह उत्पन्न हाते हो तत्काल सद् ज्ञान का नाश करके जीव को अज्ञानी यांनी मूढ़ बना देता है। सुकाये से प्रीति को इटा कर कुकार्य में सलग्न कर देता है। इससे सत् शास्त्र भ्रवण में सत्मगति में, अप्रीति और अरुचि हाती है और २६ प्रकार के पाप-सूत्रों के अभ्यास में इससे * २६ पाप सूत्र-१ ममि कपन, २ उत्पात, ३ स्वप्न, ४ अग स्फुरण, ५ उल्लापात, ६ पक्षी स्वर, ७ व्य- वन, तिलमस सवधी, ८ लक्षण एवं सामुद्रिक, इन पाठों ही के अर्थ, पाठ और क्या मेद से (८४३)= २४ रूप हुए । २५ काम क्या, २६ विद्या रोहिणी आदि, २७ मत्र, २८ तत्र, और २६ अन्य मतियो के प्राचार विधान ।' . , ( २२ ) * ध्यान-कल्पतरु * भोगी धूप पुष्प . प्रीति होती है। विपय में प्रवृत्ति कराने वाले, ऐसे कविता-ग्रथ, कल्पित प्रथ, कोक-शास्त्र आदि पढ़ना और सुनना, ऐसे कुशास्त्र पढना जिनमें हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन आदि पापों के सेवन में निर्दोपता वतलाई हो, वशीकरण, उच्चाटन, श्राकर्षण, स्तभन आदि निकृष्ट विद्याओं का अभ्यास करना, गालियाँ गाना, ठट्ठा मस्करी करना, पुरुपों को त्रियों के वस्त्र प्राभूपण पहिनाकर नृत्य, गान, कुचेष्टा श्रादि कराना, दयामय उत्तम धर्म को त्याग कर हिंसा धर्म में रुचि रखना, कामी, कपटी, लोभी, कनक कान्ता के धारी, स्त्री के अवीर आदि की सुगध में ही मस्त रहने वाले, सचित्त का श्राहार करने वाले, मास मदिरा के भोगने वाले, विविध रग के वस्त्रों और आभूपणों से शरीर को शृगारित करने वाले, रुष्ट होने पर नाश का काम करने वाले और तुष्ट होने पर इच्छा पूर्ति करने वाले इस प्रकार राग और द्वप से भरे हुए, इत्यादि रूप से अनेक दुर्गुण धारी को अपना देव तथा अपना गुरु जानना, मानना, पूजना, भक्ति करना और जो त्यागी है, वैरागी हैं शात दात हैं, वीतरागी हैं, उनको गुरु और देव नहीं मानना, इनका अपमान करना, इन्द्रियों की पोपणता में ही और कषाय के सेवन में ही धर्म समझना, आत्मा का कल्याण मानना, सत्य पूर्ण कायों पर अरुचि करना तथा कुकामो पर रुचि जगाना, इत्यादि प्रकार के विचारों को 'अज्ञानदोष (अणाणदोस)' नामक रौद्र ध्यान समझना चाहिये । ऐसे ही लक्षण इस दोष के होते हैं। : चतुर्थ पत्र--अामरणांत दोष :- वन जैसे कठिन हृदय वाला रौद्र ध्यानी होता है । दूसरे के सुख दुस की उसे सर्वथा पर्वाह नहीं होती है । वह तो केवल अपना ही सुख चाहता है । दूसरे को अपने से अधिक सुखी देखकर वह दुःखी हो जाता है, और उसके यश का, सुख का नाश करने के लिये विविध उपाय करता है । निर्दयता पूर्वक क्रूर- परिणामों के साथ त्रस स्थावर का वध करता है । उनको त्रास देते ममय तड़फते हुए देखकर प्रसन्न होता है । उन्हे ज्यादा २ सताप उपजाता है। निडर, निष्ठुर और पाप रूप अकार्य करते हुए भी सर्वथा सकोच नहीं करता है । झूठ बोलते हुए नहीं डरता है । चोरी से नहीं हटता है । मैथुन क्रिया में अति आसक्त रहता है। परिग्रह के प्रति मूर्छा रखने वाला होता है । कोध, मान, माया और लोभ की भावनाओं में प्रवन्नता रखने वाला होता है। वह राग द्वीप का घर होता है । महा क्लेशी, चुगलखोर, गुणियों के गुणों को ढाकने वाला, गुणियों के प्रति मिथ्या कलक लगाने वाला, अपनी वस्तु का अत्यत प्रेमी और दूमरों की वस्तु का अत्यत द्वपी, कपटी, ऊपर से मीठा और हृदय में जहर वाला कुगुरु, कुदेव, धर्म पर श्रद्धा रखने वाला, इन पर प्रतीति तथा आम्ता रखने वाला, इत्यादि रूप से अठारह ही पापों में अनुरक्त, धर्म मात्र भी नहीं चाहने वाला मृत्यु शय्या पर पड़ा हुश्रा होने पर भी अपने किये हुए कर्मों का सर्वथा पश्चा- ताप नहीं करने वाला ऐसा फठोर, घर कुटुम्ब में ही अत्यत लुब्ध, ऐसे घृणित और निकृष्ट पाप पूण विचार ही आमरणांत दोष नामक रौद्र ध्यान है । ऐसे अामरणांत दोष मय विचारों के साथ प्राण छोड़ कर अन्य गति में जाने वाला प्राणी 'अामरणांत दोप मय रौद्र ध्यानी" कहलाता है। -: रौद्रध्यान के पुष्प और फल :-- रौद्रध्यानी के परिणाम मदा कर ही रहते हैं। मद मत्सर से उसका हृदय पूर्ण रहता है । रात और दिन पापपूर्ण विचार ही मन में घूमते रहते हैं। और इस कारण से उसके वन कर्मों का बन्धन सदैव होता ही रहता है। ऐसे रौद्रघ्यानियों द्वारा धर्म के काम विलकुल ही नहीं बन पाते हैं। यदि देसादेखी कुछ किया भी तो क्रूर प्रकृति होने के कारण से उसका अच्छा फल नष्ट हो जाता है। उसके हाथ कुछ नहीं प्राप्त होता है । उसके विचारों से कुछ भी प्राप्ति नहीं होती है । जैसा होनहार होने वाला होता है, वह तो होकर ही . का नाम . - * ध्यान-कल्पतरु * ( २३ ) -- - , रहता है। उसके मलिन परिणामों से उसके कर्मों का बन्धन अवश्य पड़ता ही है एव नीच कर्मों का फल प्राप्त करने के लिए रौद्रध्यानी को नरकगति की ही प्राप्ति होती है । उसे वहाँ पर यहाँ किये हुए कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। वहाँ फे परम अधार्मिक देव उसकी उसी तरह से हिंसा करते हैं, उसे उसी तरह से मारते हैं, जिस तरह की उसने हिंसा की हो । काटने वाले को काटते हैं, छेदने वाले का छेदन-भेदन करते हैं, सिंह, सर्प, बिच्छू, कीड़े, मच्छर श्रादि जीवों के घातक को वे देव अपनी शक्ति द्वारा उन जीवों जैसा ही रूप धारण करके चीरते हैं, फाड़ते हैं और खाने जैसी क्रिया करते हैं, मासभक्षी को खिलाने जैसी क्रिया फरते हैं। यहाँ पर मदिरा पीने वालों को वहाँ पर गरम-गरम पिघलता हुआ सीसा और ताबा पिलाते हैं। विषय लुब्ध को अग्निमय लोह पुतली के साथ सम्भोग कराते हैं । राग-रागिनियों के रसिक के कान का, रूप लुब्ध के आँख फा, गन्ध विलासी के नाक का और जिहवा के लोलुप की जिहवा का वे देव वहाँ पर छेदन भेदन करते हैं । गरम और खारे पानी से भरी हुई वैतरणी नदी में उन्हें स्नान कराते हैं । तलवार की धार से भी अति तीक्ष्ण ऐसे पत्र वाले शाल्मली वृक्ष के नीचे उन्हें बिठा कर हवा चलाते हैं, कुम्भीपाक में पकाते हैं, फसाइयों की तरह शरीर क तिल तिल जितने टुकड़े करते हैं । इस प्रकार कर्मों का फल भोगना पड़ता है। फई एक सागरोपम तक रो रो कर दुःख सहन करने पड़ते हैं । इनसे छूटना बड़ा ही कठिन कार्य है। ऐसे इस रौद्र ध्यान को दोनों लोक में रौद्र यानी भयफर दुःखों का दाता जानना चाहिये । रौद्रध्यानी के परिणाम अक्सर कृष्ण लेश्यामय ही होते हैं । वह हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन और परिग्रह इन पाचों पापों में ही फसा रहता है। मिथ्यात्व, अम्रत, प्रमाद, कषाय और अशुभ योग इन पाचों श्राश्रवों का वह सेवन करने वाला होता है। प्राचीन फर्मों के फल को अनुभव करते समय उसके परिणाम अशुद्ध ही होते हैं, अतः पुन वैसे ही फर्मो का बन्ध कर लेता है । इस प्रकार कर्म बन्धन के चक्कर में वह परिभ्रमण करता ही रहता है। रौद्रभ्याली का ससार से मुक्त होना अति ही कठिन है । वह अनन्त ससार फरता है। अतः यह शैद्रध्यान "हेय” यानी त्योगने के योग्य है। . , -: दोनों का समुच्चय :- आर्त ध्यान और रौद्र ध्यान दोनों ही अठारह पापों से भरे हुए हैं। ये महामलिन सत्पुरुषों द्वारा निन्दनीय और अनाचरणीय है। ये दोनों ही ध्यान अनायास ही पूर्व कर्मों के उदय से स्वभाष रूप से ही उत्पन्न होने वाले हैं। जहाँ तक फर्मों की प्रबलता रहती है, वहाँ तक निरन्तर हृदय में पैदा होते ही रहते हैं। ये इतने शक्तिशाली हैं कि उच्च स्थान प्राप्त बड़े-बड़े झानियों को, ध्यानियों को, तपस्वियों को, सयमियों को और मुनियों तक को उदय में आकर क्षण भर में पातालगामी बना देते हैं । ये मोक्ष मार्ग में अर्गला के समान वाघा स्वरूप और अटकाने वाले हैं। सबृत्ति का नाश करने वाले हैं। ये फलक के समान फाले हैं, * चार कोस का लवा, चार कोस का चौड़ा और चार कोस का गहरा, ऐसे चौरस कुए में देव कुरुक्षेत्र के युगलियों के बालों को श्राख में डालने पर भी खटके नहीं ऐसे सूक्ष्म से सूक्ष्म कतर कतर करके ठसा ठस रूप से भरे वाय, ऐसे चालो से मुँह तक परिपूर्ण रीति से मरे हुए कुए में से सौ सौ वर्ष में केवल एक एक बाल श्रश निकालते रहे, इस प्रकार नितने वर्षों में वह सारा का सारा कुआ खाली हो जाय, उतने वर्षों का एक पल्योपम होता है, ऐसे दस फरोम फरोही कुए खाली होवें, इतने वर्षों का एक सागरोपम होता है। - ( २४ ) * ध्यान-कल्पतरु * काम जैसे विप वाले है और पाप वृक्ष के बीज हैं। अन्य द्रव्य आदि का तो छोड़ना सहज है, परन्तु इनसे वचना बहुत ही कठिन है । प्रबल प्रतापी उच्च प्रात्माएँ ही इनका नाश करके अनन्त, अक्षय, अव्यावाध मोक्ष के सुखों को प्राप्त किया करती हैं परम पूज्य श्री कहानजी ऋषिजी महाराज की सम्प्रदाय के वाल ब्रह्मचारी मुनिश्री अमोलक ऋषिजी म. रचित "ध्यान कल्पतरु" ग्रन्थ की द्वितीय शाखा रूप रौद्रध्यान नामक परिच्छेद समाप्त । -: उपशाखा-शुभ ध्यान :- मोक्षः कर्म-क्षयादेव, स सम्यग्ज्ञानतः स्मृतः । ध्यानसाध्यं मतं तद्धि, तस्मात् तद् हितमात्मनः ।। कर्मो के क्षय से ही मोक्ष प्राप्त होता है, और कर्मों का क्षय सम्यग् ज्ञान से होता है, ऐसा कहा गया है । इसी प्रकार सम्यग् ज्ञान शुभध्यान से होता है । इसलिए मुमुक्षुओं के लिए ध्यान ही श्रात्म-फल्याण का हेतु है। -: प्रथम शाखा-ध्यान मूल :- इस ससार में दो बातें अनादिकाल से चली आ रही हैं, एक अच्छी और दूसरी उसके प्रतिपक्ष रूप बुरी। एक दूसरे से एक दूसरे की पहिचान होती है । जैसे रात्रि से दिन की और दिन से रात्रि की शीत से उष्ण की और उष्ण से शीत की, आचरणशील से व्यभिचारी की और व्यभिचारी से आचरणशील की, इस प्रकार परस्पर में पहिचान हुआ करती है। सभी पदार्थों के गुण-अवगुणों की परीक्षा करके श्री दशवकालिक सूत्र की आज्ञानुसार 'ज सेय त समायरे” अर्थात जो श्रेयस्कर यानी कल्याणकारी हो उसी का आचरण करना चाहिए । उसे हो स्वीकार करना चाहिए। अशुम ध्यान में तो प्रवृत्ति विना प्रयास के ही स्वाभाविक रूप से हुआ ही करती है। क्यों कि उसका अनादि काल से सबध है। किन्तु शुभ ध्यान में प्रवृत्ति होना अति कठिन है। कारण यह है कि कोई भी शुभ कार्य सहज में नहीं वना करता है। जैसे किसी विप के प्रयोग से मूर्छित हुश्रा पुरुप किंचित् विप का प्रभाव दूर होने पर चैतन्यता लाम करता है, अथवा जैसे गाढ़ निद्रा में सोया हुअा पुरुष एक देश ( २५ ) * ध्यान-कल्पतरु * । निद्रा के अभाव होने पर कुछ स्मरण शक्ति युक्त होता है, अथवा जैसे पित्त आदि विकारों के कारण से मुछित पुरुष के विकार कुछ अशों में दूर होने पर किंचित् चैतन्यता उत्पन्न होती है, वैसे ही निगोद आदि एक इन्द्रिय पर्याय में अनवानन्त काल तक परिभ्रमण करते करते अकाम (अनिच्छा पूर्वक परवशात् ) कष्ट सहन करते करते कर्मो का किंचित् अश कमजार होने पर द्वीन्द्रिय धादि त्रस पर्याय की प्राप्ति होती है। पुन कर्मों की अधिकता होने पर वह त्रस पर्याय प्राप्त जोव निगोद आदि पर्याय में चला जाता है। इस प्रकार अनन्तानन्त समय तक गमनागमन करते करते अति कठिनता से अनन्तानन्त पुण्यों को वृद्धि होने पर जीव पचेन्द्रिय पर्याय को प्राप्त करता है । पचेन्द्रिय पर्णय को प्राप्त करके भी पुन क र कर्मों का पाच- रण करता हुआ पीछा निगोद आदि अवस्था में चला जाता है, और यदि पचेन्द्रिय ही बनो रहा तो भी नरक आदि में असख्य काल तक रहना पड़ता है। इस प्रकार अनन्तानन्त दुख भोगते भोगते ज्या ज्यों अशुभ कर्मों का अश घटता जाय और शुभ कर्मों का अश बढ़ता जाय त्यों त्यों यह जीव घुणाक्षर न्याय* के समान मनुष्य रूप में उत्पन्न होता है। ऐमा होने पर भी पाय-क्षेत्र उत्तम कुल और इन्द्रियों की परि- पूर्णता इत्यादि सामग्री का मिलना अति ही कठिन है। यदि पुण्यादय से प्राप्त भी हो जाय, तो भी शुभ ध्यान के अनुरुप योग्यता प्राप्त होना अति हो कठिन है। क्यों कि जिम श्रात्मा में अनादि भव्य सिद्धता का गुण होता है, वही आत्मा कषाय मल को विशुद्ध कर सम्यक्त्व रत्र को प्राप्त कर सकता है। ऐसी ही श्रात्मा अनादि से प्रवर्तमान स्वभाष रूप धार्त रौद्र ध्यान का स्वरूप जान करके इनसे अपने आपको अलग करके शुभ ध्यान की योग्यता प्राप्त कर लेता है । अतएव शुभ ध्यान के लिये सर्व प्रथम सम्यक्त्व की आवश्यकता । क्योंकि सम्यक्त्वी ही शुभ ध्यान में प्रविष्ट होने के लिये समर्थ होते हैं । इसीलिये सम्यक्त्व की दुर्ल भता का कथन सब प्रथम किया गया है। अनादि कालोन मिथ्यात्वी को शुम-पुण्य के सयोग से सम्यक् दर्शन की उत्पत्ति हुआ करती है। परन्तु वह सज्ञी, पर्याप्त, मंदकषायी, भव्य, गुणदोष का विवेकी, साकार उपयोगी और जागृत अवस्था वाला होना चाहिये यानी इन गुणों से युक्त को ही सम्यक् दर्शन की प्राप्ति हुश्रा करती है। इनसे विपरीत असझी, अपर्याप्न, तीन कषायी, अभव्य निराकार उपयोगो, मोह निद्रा स मूछित, और समूर्छिम जीवों को सम्यक् दर्शन नहीं उत्पन्न हुआ करता है । पांच लब्धियों में से करण लब्धि नामक जो पांचवीं लब्धि है, और जिसके तीन भेद हैं, उनमें से अतिम जो अनिवृत्ति करण नामक लब्धि है उसके अते समय में सर्व प्रथम उपशम सम्यक्त्व प्रकट होता है। -: पाच लब्धिया :- १ क्षयोपशम लब्धि, २ विशुद्ध लब्धि, ३ देशना लब्धि, ४ प्रयोग लब्धि और ५ करण लब्धि है। इन पांचों लब्धियों की यथा क्रम प्राप्ति होने पर ही सम्यक् दर्शन की प्राप्ति हुआ करती है। चार लब्धियाँ तो भव्य और अभव्य के भी हो सकती हैं, परन्तु करण लधि तो उन्हीं को हुश्रा करती है जो कि सम्यक्त्व और चारित्र को अवश्य ही प्राप्त करने वाले होते हैं। -: लब्धियों का स्वरूप :- ज्ञानावरणीय आदि प्राठों हो कर्मों को सभी अप्रशस्त प्रकृतियों की शक्ति का अनुभाग बंध समया * नै कोइ घुन नामक जीव काष्ट म उत्पन्न होर उसको खाने के लिये प्रयत्न करता है और काष्ट को पोदते पोते पनायास ही उसमें किसी भी अतर विशेष की आकृति बन जाती है, वैसे ही जीव को भी कर्मों के हल्के पड़ने पर मनुष्य पचाय की प्राप्ति हो जाया करती है।

(२६) * ध्यान-कल्पतरु * नुसार अनत गुना कम होता हुआ अनुकम से उदय में श्रावे, तब ऐसा सयोग बनता है कि जिससे क्षयोप- शम लब्धि की प्राप्ति होता है। इस क्षयोपशम लब्धि के प्रभाव से प्रात्मा में सातावेदनीय श्रादि शुभ प्रकृतियों का वध कराने वाले धर्मानुराग रूप शुभ विचारों की प्राप्ति होती है, और इमे ही विशुद्व लब्धि कहते हैं । छ द्रव्य और नव पदार्थो का स्वरूप प्राचार्य आदि के उपदेश से पहिचानना यहो देशनालब्धि है। + इन तीन लब्धियों से सयुक्त जीव यथाममय विशुद्धता की वृद्धि करता है और आयुकर्म को छोड़ कर शेप सात कर्मों की स्थिति जव अन्तमुहूत्त कम कोटाकोटी सागरापम जितनी रह जाती है उस समय में जो पूर्व स्थिति थी, उसमें से और भी क्मों का स्थिति का घात करे इस प्रकार घातिया कर्मों का अनुभाग- वन्ध काष्ठ और लता के समान साधारण अवस्था में भा जाय याना पर्वत समान दुर्भेद्य, नहीं रहे एव अघातिया कर्मों का अनुभाग नीम या कॉजी ममान साधारण अवाथा में आ जाय यानी इलाहल विप समान नहीं रहे एव अनुभाग का भी बहुत कुछ छेद कर डाले ऐमी स्थिति में कार्य करने की जो योग्यता प्राप्त होती है, वही "प्रयोग लब्धि है। किन्तु जिस पर्याप्त और सज्ञी पचेन्द्रिय के परिणाम सक्लेश रूप हों, तथा उत्कृष्ट स्थिति बन्ध और उत्कृष्ट अनुभाग वन्ध हो ता ऐसे जीव के प्रथम उपशम सम्यक्त्व भी नहीं होता है। --: द्वितीय उपशाखा-शुभध्यान विधि :- किसी भी कार्य को विधि अनुसार करने से उस इष्ट कार्य की सिद्धि शीघ्र हुश्रा करती है । अतः मोक्ष कार्य की सिद्धि करने वाला नो ध्यान है, उसके सम्पादन की विधि का यहाँ पर उल्लेख किया जाता है । क्षेत्र द्रव्य काल भाव यह, शुभाशुभ विधि जान । अशुभ तजी शुभ आचरी, ध्यारो यह थर्म ध्यान ॥ क्षेत्र द्रव्य, काल और भाव इन चारों के शुभ और अशुभ रूप से आठ भेद होते हैं इनमें से अशुभ भेदों का त्याग करके शुभ भेदों का ही ध्यान करना चाहिए । ध्यान में मन को स्थिर करने के लिए क्षेत्र की, द्रव्य की काल की और भाव की शुद्धि की अति आवश्यकता है। सर्व प्रथम क्षेत्र सम्बन्धा शुद्धि-अशुद्धि का कथन करते हैं - ---: प्रथम पत्र-क्षेत्र :--- (१) अशुद्ध क्षेत्र की स्थिति विभिन्न प्रकार की कही गई है. उनमें से मुख्य रूपरेखा इस प्रकार है:- (१) दुष्ट राजा के स्वामित्व का क्षेत्र और जहाँ पर अधार्मिक, पाखण्डी, म्लेच्छ कुलिंगी रहते हों, ऐसा क्षेत्र इन स्थानों पर उपसर्ग होने की सम्भावना रहती है * अशुम कर्मों का रसोदय घटने से सक्लेश वाले विचारों की कमी होती है, और तब विशुद्ध विचारों की वृद्धि होना स्वाभाविक ही है। + नरक श्रादि स्थानों पर उपदेशक नहीं हैं, वहाँ पूर्व जन्म में पठित तत्वो के सस्कार से श्रीर परम अधा- र्मिक देवों के उपदेश से सम्यक्त्व की उत्पत्ति होना कहा जाता है।

8 ध्यान-कल्पतरु * (२७) , . (२) जहाँ पर पुष्प, फल, पत्र, धूप, दीप या मदिरा-मांस आदि हो, ऐसे स्थानों पर मन के चचल होने की सम्भावना रहती है। (३) जहाँ पर व्यभिचारी स्त्री-पुरुष क्रीड़ा करते हों, कामोद्दीपक और शृगारमय चित्र लगे हुए हों काम-क्रीड़ा के शाखों का पठन-पाठन होता हो, वाद्य-यन्त्र बजते हों ऐसे स्थानों पर विकार उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। (४) जहाँ मल्ल-युद्ध और कुश्तियाँ तथा लड़ाई-झगड़ा होता हो, झगड़े के शास्त्र पढ़े जाते हो, पचायती मामले चलते हों, ऐसे स्थानों पर सक्लेश पैदा होने की सम्भावना रहती है। (५) जहाँ स्वामी द्वारा किसी का भी प्रवेश किया जाना निषेध किया गया हो, ऐसे स्थानों पर रहने से चोरी, क्लेश और मध्य में ही निकाले जाने की सम्भावना रहती है। (६) जहाँ जुश्रा खेला जाता हो. फंदी रहते हों, मद्य-मांस बिकता हो, शिकारी रहते हों, शिल्प- फार ( कलाकार, चमार, सुनार, लुहार, रगरेज) आदि रहते हों, ऐसे स्थानो पर चित्त- विग्रह होने की सम्भावना रहती है। (७) जहाँ नपु सक, पशु, तिथंच प्राणी, कुलक्षणा नारी, भांड, नटखट पुरुष आदि अयोग्य प्राणी रहते हों, ऐसे स्थानों पर अप्रतीति यानी अविश्वसनीयता की सम्भावना रहती है। उपरोक्त ढग के क्षेत्र अशुद्ध और अयोग्य होते हैं, इन स्थानों को छोड़ कर ध्यान करना चाहिए । (२) शुभ क्षेत्रों की गणना निम्नोक्त स्थानों के रूप में अथवा ऐसे ही अन्य क्षेत्रों के रूप में की जा सकती है। (१) निर्जन स्थान. जहाँ विशेष मनुष्य आदि की बस्ती एवं आवागमन न हो । (२) समुद्र अथवा नदी के किनारे पर वृक्षों के झुरमुट वाले स्थान । (३) लताओं के मण्डप वाले स्थान । (४) गुफा सयुक्त स्थान । (५) पर्वत का फन्दरामय स्थान । (६) श्मशान की छत्रियों वाला स्थान । (७) सूखे वृक्षों की कोटर यानी खोखल रूप स्थान । (D) शून्य ग्राम अथवा शून्य गृह । (१) अशुद्ध क्षेत्रों में वर्णित दोषों से रहित स्थान । (१०) शून्य एवं जीर्ण-शीर्ण देवालय इत्यादि स्थान निर्जीव निर्दोष और एकान्त हो तो वे ध्यान करने के योग्य हैं । ऐसे स्थानो पर ध्यान करने से चित्त में समाधि यानी शांति रहती है। -: द्वितीय पत्र-द्रव्य :- (३) जहाँ अस्थि, मांस, रक्त, चर्म मेद, मज्जा, चर्वी और मृत जानवरों के फलेवर, खान-पान के पदार्थ, पक्वान, ताम्बूल, औषधियाँ, इत्र, तेल. शय्या, पलग, असन, स्री-पुरुप के शृगार के वस, आभूपण, कामासन, स्त्री थादि के चित्र इत्यादि रूप से विविध प्रकार के द्रव्य हो वहाँ ध्यानियो का चित्त स्थिर रहना अति कठिन है, ऐसे अशुभ द्रव्यो के बीच में मन का निग्रह होना अति कठिन है। - (२८) * ध्यान-कल्पतरु ** पराल है, ध्यान . । (४) किन्तु शुद्ध. निर्जीव, पृथ्वी-शिला-पट पर, काष्ठ के ग्रामन रूप पाट एव चौकी पर, के श्रासन पर, ऊन सूत श्रादि द्वारा निर्मित शुद्व वस्त्र पर ध्यानस्थ होने से परिणामो की धारा स्थिर रहने की सम्भावना है, के इच्छुक को आहार भी थोडा तथा हलका ही करना चाहिए। आहार विशेप घृत तथा मसाले आदि मे रहित होना चाहिए । शीत आदि काल के अनुसार तथा प्रकृति के अनुकूल होना चाहिए । समयानुसार तथा परिमित मात्रा-अनुमार होना चाहिए। ऐसा निर्दोप आहार करने से ही चित्त सुस्थिर एव ध्यान के अनुकूल रह सकता है। ध्यान की इच्छा रखने वालो के लिए आज के युग मे तीन प्रासन विशेप उपयुक्त हैं । १ पद्मासन, २ पर्यकासन और ३ दण्डामन । पालथी लगा कर दोनों बाघो पर दोनो पैर मिश्रित रूप से जमा कर विकसित कमल के समान दोनों हाथो की हथेली पर हथेला रख कर नाभि के पास स्थिर रखते हुए सुस्थिर ढग से बैठना पद्मासन है । साधारण पालथी लगा कर बैठना पर्यकासन है। दण्डे के समान सीधे और स्वस्थ रूप से खड़े रहना दण्डासन है। श्रासन तो कई एक अन्य भी हैं, जैसे कि वीरासन, लगुडासन, अम्बखुजामन, गोदूहासन आदि परन्तु वर्तमान युग में शारीरिक सघटन और शक्ति का ह्रास हो जाने से अन्य आसनो के द्वारा ध्यान- योग की साधना विशेप समय तक हो सकना कठिन है। स्मरण-साधना अथवा गणना-साधना वीच की तीन अगुलियों के नौ अशो के आधार से बारह बार गिनने से एक सौ आठ बार के रूप में परिपूर्ण हो जाती है। हाथ में माला लेकर गिनना तो मध्यम श्रेणी की साधना है। ध्यानी के लिये ध्यान में स्थिर होते समय नाक के अग्र भाग पर दृष्टि को स्थिर और स्थायी रूप से जमाते हुए, चित्रस्थ मर्ति के समान स्थिर और निश्चल होकर दोनों होठो को जरा ढीला रखते हुए एव चित्त सवधा सभी व्याधियो तथा विकल्पो से परिमुक्त होकर बैठने से ध्यान की सिद्वि सुलभता के साथ होने की समावना रहती है। -: तृतीय पत्र-काल :- (५) अशुभ काल - पहला, दूसरा, और तीसरा श्रारा अपेक्षा कृत रूप से तथा छठा पारा, इनमें धार्मिक पुरुषो के अभाव से ध्यान क्रिया की साधना अति स्वल्प ही होने की सभावना रहता है । इसी प्रसार अति उष्णकाल, अति शीत काल अति जीवोत्पत्तिकाल, दुष्काल, विग्रहकाल, रोग प्रस्तकाल इत्यादि समयो में भी ध्यान साधना वरावर नहीं हो सकती है क्यो कि ये अथवा ऐसे ही अन्य काल विग्रह करने वाले गिने जाते हैं। (६) शभ काल.- ध्यान के लिये सर्वोत्तम काल तो चौथा श्रारा ही गिना जाता है। क्यो कि उसमें वफा पम नागच श्रादि महननों की और उत्तम सस्थानों को एष अन्य अनुकूल सयोगो को विशेषताएँ रहा करती हैं। यही कारण है कि मारणांतिक कष्ट उपस्थित होने पर भी उसे सहन करते हुए ध्यान में स्थिर रहा जा -- T सकता था। इस पंचम काल में शारीरिक सस्थान और सहननो की न्यूनता होने से उस प्रकार का ध्यान नहीं हो सकता हैं । तथापि सर्वथा नास्ति रूप नहीं समझ लेना चाहिये । गुणी वस्तु का स्वभाव सदैव गुण रूप * ध्यान-कल्पतरु* ( २६ ) . हो रहेगा, चौथे बारे में शक्कर बहुत ही अधिक मधुर हुआ करती थी फिर भी काल प्रभाव से इम पचम फाल में मिठाम में अन्तर आने पर भी शक्कर मधुर हो अनुभव में श्राती है हमा तरह से हम युग में भी यथा विधि किया हुआ ध्यान गुणकर्ता हो होगा । समयानुसार ध्यानकर्ता को शोत उष्णकाल का अपनी प्रकृति के अनुसार भी विचार रखना ही चाहिये। श्रीउत्तराध्ययन सूत्र में "वीय माण मियाइह” ऐसा फरमाया है। जिमका त्पर्य यह है कि दिन के और रात्रि के द्वितीय प्रहर में ध्यान किया जाय । कितने ही ग्रन्थों में रात्रि के चौथे प्रहर में ध्यान करने का उल्लेख पाया जाता है । यद द्रव्य क्षेत्र, काल और विधि की विविता और शुभाशुभ स्थिति केवल अपूर्ण ज्ञानी और अम्थिर चित्तवृत्ति वालों के दृष्टिकोण से कही गई है, किन्तु जो पूर्ण ज्ञानी हैं, अडोलवृत्ति वाले हे और निर्विकार हैं, उनके लिए तो ध्यान दृष्टि से सभी क्षेत्र, द्रव्य और काल अनुकूल ही हुश्रा करते हैं। -: चतुर्थ पत्र-भाव :- (७) अशुद्ध भाव- अशुभ अथवा अशुद्ध भावों का वर्णन जैसा श्रार्तध्यान और रौद्रध्यान में बतलाया गया है, वैसा ही समझना चाहिए । विषय, कषाय, श्राश्रव, अशमयोग, असमाधि, चपलता, विफलता, अधैर्य, नास्तिकता, कठोरता, रागद्वष रूप परिणाम श्रादि सभो अशुभयोग ही गिने गये हैं । इनसे भावों में मलिनता हो पैदा हुधा करती है। (८) शुभ भाव चार प्रकार के कहे गये हैं । वे इस प्रकार हैं- मैत्रीप्रमोदकारुण्य-मध्यस्थानि नियोजयेत् । धर्मध्यानमुपस्कतु', नद्धि तस्य रसायनं ।। -योग शास्त्र अर्थात् मैत्री भाव, प्रमोद । व, करुणा भाव और मध्यस्थ भाव, इन चारों हो भावना के बल से धर्मध्यान की रसायन पैदा होती है।* १ मैत्री भावना -"मित्ति मे सव्वभूएसु, वेरै मज्झ ण केणइ ।" अर्थात् सभी प्राणियों के साथ मेरी मैत्री भावना है और किसी के भो साथ में मेरा वैर अथवा शत्रुता नहीं है । इस ससार में सभी जीवों का जो परम्पर में माला, पिता, पति, पन्ना, पुत्र, वहिन, पुत्रवधू आदि का सम्बन्ध है, यह प्रत्येक जीव के साथ अनन्त बार हो चुका है। श्रीभगवती सूत्र और श्रीजम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति में कहा गया है कि असई अदुवा अणतखुत्तो' अर्थात् इस श्रात्मा ने ससार में अनन्त वार जन्म मरण करके मम्पूर्ण समार का सश किया है । इस सिद्धान्त के श्राधार से विश्ववासी सभी जीव अपने मित्र हैं। जैमा वर्तमानकालोन कुटुम्ब पर प्रेम होता है, वैसा ही १ . * मैत्री करुणामुदितो पेक्षाणा, सुख दुव पुण्यापुण्यविपयाणाम् भावना तच्चित्त प्रसादनम् ॥ ३३ ॥ -पातबल योग दर्शन- अथ-सुन्वी प्राणियों में मित्रता, दुखियों पर दया, धर्मात्माओं के प्रति हर्ष, योर पापियों पर मध्यस्थवृत्ति, ऐने व्यवहार से चिच प्रसन्न रहता है।

(३०) * ध्यान-कल्पतरु * के . सभी जीवों के साथ रखना चाहिए। सूक्ष्म (जो थॉग्यो से दिसलाई नही पडे ), वादर (जो आँखों से दिसलाई पडे ) , स ( जो चल फिर सकें) और स्थावर (जो चल फिर नहीं सकें), इन सभी प्रकार जीवों को अपनी आत्मा के समान ही समझना और सभी को सुसी चाहनो, यही मैत्री भावना है ।* (२) प्रमोद भावना- इस समार मे अनेक सत्पुरूप हैं, और वे विविध मद् गणो से युक्त हैं, कितने ही महापुरुप ज्ञान सागर हैं। अनेक सूत्रों के नाता, स्यावाद की शली द्वारा जैनोगमों के रहस्य को श्रोताओं के हृदय में जमाने वाले, सिद्वान्तों के सम्बन्ध को समझाने वाले, तर्क वितर्क द्वारा गम्भीर विपय को भी सरल करके बताने वाल, नय निक्षेप प्रमाण थादि न्याय के पारगामी, कुतार्किकों का शात रीति से समाधान करने वाले, प्रभावशाली सद्बोच स धर्म को उन्नति करने वाले, विलक्षण कवित्व शक्ति एव वक्तृत्वशक्ति के धारण करने वाले, श्रादि श्रादि अनेक ज्ञान गुणों के धारक हैं। यात्म ध्यानी, गुण ग्राही, अल्पभापी, स्थिर- श्रासन शील, गुणानुरागी, सदैव धम रूप वाटिका में अपनी श्रात्मा को रमण कराने वाले होते है । कितने हो महान तपस्वी होते हैं । मास क्षमण श्रादि विशाल तप के करने वाले, उपवास प्रायविल श्रादि के कर्ता, पटरस रूप विगय के त्यागी, एक दो द्रव्य पर ही निर्वाह करने वाले, शीत ताप, केश लुम्वन श्रादि विविध काय-क्लेश रूप तप के करने वाले हैं। कितने ही ज्ञान और तप की शक्ति से रहित होने पर भी स्वधर्मी वन्धुओं की सेवा भक्ति किया करते हैं। श्राहार, वस्त्र, शैय्या, आसन, आदि का प्रतिलाभ देते हुए साता उपजाया करते हैं। कितने ही सद्गृहस्थ तन मन धन से चारों ही तीर्थों की भक्ति करने वाले होते हैं। धर्म की उन्नति करने वाले और प्राप्त पदार्थो को सन्मार्ग में लगाने वाले होते हैं। ऐसे ही उत्तमोत्तम अनेक गुणज्ञों के दर्शन करके, उनकी प्रशसा सुन कर प्रसन्न होना, तथा ऐसे विचार लाना कि "धन्य भाग है कि हमारे धर्म में ऐसे २ नररत्न उत्पन्न हुए हैं, जो कि धर्म की प्रभावना फरते हैं, ऐसे महापुरुपों की सदैव जय हो ।” ऐसा विचार कर उनका सत्कार सन्मान करना, उन्हें साता उपजाना, अन्य द्वारा उनकी भक्ति की जान पर हर्पित होना इत्यादि रूप से प्रकटित होने वाली भावना प्रमोद भावना है। (३) करुणा भावना- मासारिक मभी प्राणी कर्माधीन होकर अनेक कष्ट पाते रहते हैं। कितने ही अन्तराय कर्म की प्रबलता से हीन दीन होकर दुःखी हो रहे हैं । खाना, पीना, वस्त्र, गृह श्रादि के प्रभाव से पीड़ित हैं, कितने ही वेदनीय फर्म की वृद्वि से कुष्ट आदि विविध रोगों से ग्रसित होकर महान् दुःख्न भोग रहे हैं। अनेक प्राणी फाष्ट खोड़ा वेड़ी आदि रूप से वन्दी होकर विपत्ति में अमित । कई शत्रुओं द्वारा बन्दीगृह में पड़े हुए हैं। बहुत से ऐसे हैं, जो कि शीत, ताप, सुधा, तृपा यादि विविध रीति से कष्ट पा रहे हैं । कितने ही अधे, लूले, लगडे, बधिर, मूक, गू गे श्रादि रूप से विकलांग होकर महान् कष्ट भोग रहे हैं। कितने ही पश, । पक्षो, १ * यथा यात्मन प्रिया प्राणा तथाऽन्येपामपि प्राणिनाम् | इति मत्वा न कर्त्तव्य, घोर प्राणिवधो बुधै ॥ अर्थात्-नैसे अपने प्राण अपने को प्रिय हैं, वैसे ही अन्य प्राणियों को भी उनके प्राण प्रिय हैं, ऐसा समझ कर बुद्धिमानों को घोर पाप रूप प्राणि वध यानी जीव हत्या नहीं करना चाहिए ।

* ध्यान-कल्पतरु * (३१) - जलचर, वनचर, श्रादि प्राणी पराधीनता को जाल में पड़े हुए । ऐसे दुःखी प्रोणीवध, वन्धन, ताडन, के तर्जन आदि का दुःख पा रहे हैं । इत्यादि रूप से अनन्त प्राणी विविध विपत्तियों को भोग रहे हैं। वे सुख लिए लालायित हैं। 'अरे । कोई दयावान् हमें सुखी करे, जीवन दान देवे दुख सकट से उद्धार करे", इत्यादि रूप से करुणामय प्रार्थना किया करते हैं । ऐसे दुखी जीवों को देख कर सहानुभूति प्रकट करना, करुणा लाना, उन्हें दु ख से छुड़ाने के लिए यथाशक्ति यथायोग्य प्रयत्न करना एव उन्हें सुसी देखने की भावना उत्पन्न करना ही करुणा भावना है। (४) माध्यस्थ भावना.- इस विश्व में कितने ही प्राणी अघोर कर्मी, पापी, सद्गुणों को और सत कमों को छोड़कर दुर्गुणों को और दुष्ट कर्मों को किया करते हैं। सदा क्रोध में सतप्त रहते हैं, मान से अकडे हुए रहते हैं, माया से भरे हुए होते हैं, लीभ में तत्पर रहते हैं, निर्दयता पूर्वक अनाथ प्राणियों की हिंसा करते रहते हैं, मदिरा मांस, फन्दमूल श्रादि अभक्ष्य पदार्थों का भक्षण किया करते हैं, असत्य, चोरी, मैथुन आदि में अपनी चतुराई बतलाया करते हैं, विषयी वेश्यागामी और परस्त्रीगमन में आनन्द मानते हैं, जुश्रा आदि दुर्व्यसनों में अनुरक्त और अठारह पापों में सलग्न, देव गुरु धर्म के निमित्त हिंसा करने वाले, हिंसा में धर्म मानने वाले, फुदेव, कुगुरु, कुधर्म की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाले, अच्छे की निंदा करने वाले और अपनी प्रशसा में मग्न इत्यादि ऐसे पापी जीवों को देख कर राग द्वष से रहित होकर मध्यस्थ विचारों के साथ ऐसा विचार करे कि "अहो । देखो, इन बेचारे जीवों की कैसी विषम कर्म गति है। चार गति रूप ससार में अत्यन्त कष्ट सहन करते-करते, अनन्त कष्ट से मुक्ति कराने वाली, अनन्तानन्त पुण्यों के उदय से, मनुष्य जन्म श्रादि उत्तमोचम सामग्रियाँ प्राप्त हुई है, उन्हें ये व्यर्थ में खो रहे हैं, इन्हें कुमार्ग में लगा रहे हैं । सुख की इच्छा से दुख का उपार्जन कर रहे हैं, ककर के खरीदने में चिंतामणि रत्न दे रहे हैं और विष लेकर बदले में अमृत दे रहे हैं, सुघरने के स्थान पर विगाड़ का कार्य कर रहे हैं।" "हे प्रभो । इन बेचारे अनाथ और पामर जीवो की इन कुकर्तव्यों के फल को भोगने के समय में क्या दशा होगी ? कैसी विडम्बना प्राप्त करेंगे ? उस समय कैसा प्रायश्चित करेंगे ? परन्तु इन मूढ जीवों का क्या दोष है ? अज्ञानता वश और अशुभ कर्मो के उदय से इनको सद्बुद्धि की प्राप्ति नहीं हो रही है, जैसा-जैसा जिनका भवितव्य होता है वैसा वैसा ही उनके लिये सयोग प्राप्त होता रहता है।" इस प्रकार के विचारों से उन पर रागद्वष नहीं लाते हुए मध्यस्थ भाव से उन पर उदासीनता और उनकी उपेक्षा करना, यही माध्यस्थ भावना है। इन चारों ही भावनाओं की इस प्रकार प्रारो- धना करते हुए और ऐसा ही व्यवहार करते हुए यह आत्मा राग, द्वष, विषय, कषाय, क्लेश, मोह आदि शत्रुओं का नाश करने में शक्तिशाली हो सकती है। ऐसी भावना रखने वाली आत्मा के हृदय में उक्त गगद्वप प्रात्मक शत्रुत्रों के लिये टिकने का स्थान प्राप्त नहीं हो सकता है। -: तृतीय उप शाखा-शुभ ध्यान साधन :- पूर्वाचार्यों ने चित्त (मन) की प्रसन्नता और ध्यान की सिद्धि करने के लिए आठ अङ्ग फरमाये हैं। वे इस प्रकार हैं- कश्चिद्यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधय इत्यष्टावङ्गानि योगस्य लाना स्थानानि ।

(३२) * ध्यान-कल्पतरु * १ यम, २ नियम ३ आसन, प्रोणायाम, ५ प्रत्यहार, ६ धारणा, ७ ध्यान और = समाधि । इन आठ प्रकार के साधनो से योगाभ्यास यानी ध्यान की सिद्धि होती है। - प्रथम पत्र-यम :- - "अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यपरिग्रहाः यमाः।" यम के पाँच भेद है.- (१) अहिंसा-वस स्थावर सभी प्राणियों को अपनी आत्मा के समान समझना और उनके साथ मैत्री भाव रखना, जिससे सभी प्राणी सज्जन वृत्ति को वारण करें । (२) सत्य-इन्द्रियों और मन द्वारा जैसे भाव मालूम हुए हों, जो किसी के लिए दु खदाता नहीं हो, जो गुणों के ही प्रसारक हों ऐसे वचन अवसर के अनुमार हो बोलना, यही सत्य धर्म है और इसी रीति से वचनों की सिद्धि हुअा करती है। (३) अस्तेय-स्वामी की आज्ञानुसार जितनी आवश्यकता हो, उतनी ही सजीव अथवा निर्जीव वस्तु लेना, जिसके विना काम रुका हुआ हो, और जो स्वामी द्वारा अन्त करण के हर्ष के साथ दी जाती हो । यही अस्तेय धर्म है। (४) ब्रह्मचर्य-इन्द्रियों को और गन को जो विकारमय बनावे, ऐसे शब्द आदि विषयों से निवृत्ति धारण करना ही ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य से शरीरवल और बुद्धिवल बढ़ता है। (५) अपरिग्रह-मनोज्ञ और अनमोज्ञ वस्तुओं पर रागद्वेष की भावनाएँ नहीं लाना और पदार्थों की मर्यादा बाँधना अपरिग्रह धर्म है। इससे त्रिकालज्ञ बनता है। इन पाँची ही यम रूप धर्म का परिपूर्ण पालन करना चाहिए। -: द्वितीय पत्र "शौचसंतोपतपस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः " नियम के भो शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर ध्यान ये पाँच भेद होते हैं (१) शौचछ वाह्य दृष्टि स सात दुव्र्यसनों का त्याग करे । वे सात दुर्व्यसन इस प्रकार हैं:- १ ठगाई, २ ईर्षा, ३ मदान्धता, ४ पर वस्तु रमणता, ५ श्रावश्यकता से अधिक सचय, ६ मिथ्या व्यवहार, जिससे दूमरों को क्षोभ पैदा हो और ७ अनाचार । शरीर को अपवित्र पदार्थो से अलग रक्खे जिसमे पास पास वालों को घृणा नही होवे । श्राभ्यन्तर शुचि का तात्पर्य है-काम, क्रोध आदि से अलग रहना, जिससे मन सदैव निर्मल रहे। ® सत्यशौच तप शौच, शौच इन्द्रियनिग्रह । सर्व प्राणभूत दया शौच, जल शौच तु पचम ॥ सत्य बोलने से, तप करने से, इन्द्रियो का निग्रह करने से, जीवों की रक्षा करने से और जल से, इन पांचों पद्धति से पवित्रता की प्राप्ति हुआ करती है। अशुचि करुणाहीन, अशुचिनित्यमैथुन । अशुचि परद्रव्येप्सा, अशुचि परनिन्दा भवेत् ।। दया रहित, नित्य मैथुन सेवन करने वाला, चोरी करने वाला और निन्दक ये चारो सदा अशुद्ध ही रहते हैं। -चाणक्य नीति -नियम :- ।

* ध्यान-कल्पतरु * ( ३३ ) - २) सन्तोष-अन्न श्रादि का श्राहार उतना ही करे, जिससे कि क्षुधा तृपा की निवृत्ति हो जाय । वस्त्र उतने ही ग्रहण करे, जिनसे कि लज्जा आदि व्यवहार सिद्ध हो जाय और शीत आदि उपसर्गों से रक्षा हो सके, मकान, शय्या आदि का प्रति परिमित रूप से ही व्यवहार करे और वह भो अनित्यवासी होकर इच्छाओं और आकांक्षाओं से परे रहे, जिससे कि निर्दोष जोवन के साथ शांत और सुखी हो सके । (३) तप-शीत, ताप, सुधा, तृषा, ताड़न तर्जन वाक्य प्रहार इत्यादि कष्टों को समभाव से सहन करे, धर्म, वृद्ध-सेवा, सद्गुण आदि का प्राचरण करे, जिससे ऋद्धि-सिद्धि को प्राप्ति होवे । (४) स्वाध्याय-शास्त्रों का पठन, मनन और कार, णमोकार आदि का स्मरण करे, जिससे इष्ट देवता प्रसन्न हो और इष्ट कार्य की सिद्धि होवे । (५) प्रणिधान-ईश्वर में सभी भावों को समर्पित कर दे, अर्थात दोनहार किसी भी प्रयत्न से टाला नहीं टल सकता, ऐसा जानकर शुभाशुभ वर्ताव से मन में मक्लेश नहीं लावे, ऐसा करने से समाधि भाव की प्राप्ति होती है इस प्रकार इन पाँच नियमों को धारण करना चाहिए । - तृतीय पत्र-श्रासन :- समं कायशिरोग्रीवं, धारयनचले स्थिरः। संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं,, स्वंदिशश्चानवलोकयन् ॥ प्रशांतात्मा विगतभी ब्रह्मचारी व्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तों युक्त आसीतमत्परः ।। युञ्जन्नेवं सदाऽत्मानं योगी नियत मानसः । शान्ति निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ।। श्रीकृष्ण कहते हैं कि "अहो अर्जुन | काय अर्थात् पोठ, मस्तक, और गर्दन, को सम करके अर्थात् सीधी खड़ी रेखो में निश्चल करके स्थिर होता हुआ, दिशाओं को यानी इधर-उधर नहीं देखे, और अपनी नाक की नोक पर दृष्टि जमा कर, निडर हो, शान्त अन्तःकरण से ब्रह्मचर्य प्रन पाल कर तथा मन का सयम करके मुझ में हा चित्त लगा कर, मत्परायण होता हुआ युक हो जाय। इस प्रकार सदा अपना योगाभ्यास जारी रखने से मन काबू में होकर योगा को मुझ में रहने का तो अोर अन्त में निर्वाण पद अर्थात् मेरे स्वरूप में लीन कर देने वाली शान्ति प्राप्त होता है। इस प्रकार प्रासन वही श्रेष्ठ है, जिससे मन की और शरीर को स्थिरता बनी रहे । उपरोक्त यम और नियम से बाह्य और पाभ्यन्तर दोनों तरीकों से आत्मा को शुद्ध करके, दृढ़ श्रासन पर स्थित होकर फिर ध्यान की सिद्धि के लिए प्राणायाम आदि क्रियाएँ की जानी चाहिए, उन्हीं का अव उल्लेख किया जाता है। -: चतुर्थ पत्र-प्राणायाम :- "तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोगतिविच्छेदः प्राणायामः।" स्वास उच्छ वास का रोकना ही प्राणायाम कहलाता है। प्राणायाम करने वाले के लिए शुद्ध स्थान, स्वच्छ श्रासन, चिन्ता रहित मन और रोग रहित शरीर फो आवश्यकता हुआ करती है । भोजन करने के पश्चात् अथवा मल नत्र के परित्याग करने के शफामय समय में प्राणायाम को क्रिया करना उचित नहीं है। इन बातों का पूर्ण विचार कर उपरोक्त श्रासन पर स्थित होकर प्राणायाम की क्रिया प्रारम्भ करना चाहिए ।

( ३४ ) * ध्यान-कल्पतरु* सर्व प्रथम अपने इष्टदेव का स्मरण " अथवा "श्रई' के जाप के रूप में करना चाहिए । तत्पश्चात ऐसा सकल्प करे कि मैं शरीर शुद्धि के लिए प्राणायाम प्रारम्भ करता हूँ। तत्पश्चात प्राणायाम की क्रिया प्रारम्भ करे । वह इस प्रकार है:- -: वाह्य प्राणायाम :- सर्व प्रथम इडा नाड़ी अथवा इगला नाड़ी यानी दाहिनी नासिका के छिद्र से धीरे-धीरे प्राण वायु उदर में अथवा हृदय में भरना, इसे कुम्भक प्राणायाम कहते हैं. उस वायु को दो मिनिट तक रोके रखना, इसे पूरक प्राणायाम कहते हैं। इसके बाद पिंगला नाड़ी यानी वायीं नामिका के छेद से उस रोकी हुई वायु को धीरे-धीरे निकालना ' रेचक प्राणायाम' कहलाता है। ऐसी साधना हो जाने पर समझ लेना चाहिए कि मैं प्राणायाम क्रिया को साध सकूँगा।" इस प्राणायाम के साधक को प्रति दिन इसी तरह से प्रात'काल. मध्याह्नकाल और सायकाल, तीनों कालों में अस्सी-अस्सी वार साधना करनी चाहिए । यो वरावर दो महीने तक साधना करने से 'सुपुम्ना" का उत्थान हुआ गिना जाता है । इस उत्थान क्रिया से श्रात्म ध्यान करने की योग्यता प्राप्त होती है । मन की स्थिरता होती है और शरीर के भीतर की प्राण वायु बहुत शुद्ध हो जाती है। इस प्रकार दो महीने की साधना के बाद केवल कुम्भक प्राणायाम की क्रिया प्रारम्भ की जाती है। केवल कुम्भक की क्रिया में भी प्राणायाम के समान ही सब विधि करना चाहिए । विशेषता इतनी ही है कि हृदय में अथवा उदर में वायु को यथाशक्ति दो मिनिट से कुछ अधिक मिनिट तक रोक रखना चाहिए, इसे केवल कुम्भक प्राणायाम कहा जाता है । इस रीति से प्रतिदिन तीनों समय में प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और सायकाल में बीस-बीस बार और बाद में तीस-तीस बार दो महीने तक यह क्रिया की जानी चाहिए । ऐसी साधना होने पर केवल कुम्भक प्राणायाम की सामान्य सिद्धि हुई, ऐसा कहा जा सकता है । इस केवल कुम्भक क्रिया की साधना से पित्त से और कफ से उत्पन्न होने वाले छाती के रोग, क्षय रोग और श्वासरोग आदि रोगों की शाति होती है। शरीर हलका होता है । मन में स्वस्थता बढ़ती है, जिससे मन में उठने वाले अनेक विकल्प शान्त हो जाते हैं। -: पॉच वायु की शुद्धि का उपाय :- हदि प्राणो गुदेऽपानं, समानो नाभिमंडले। उदानः कण्ठदेशे स्यात्, व्यानं सर्गशरीरगं ।। हृदय में प्राण वायु रहतो है, गुदा में अपान वायु रहता है नामि मण्डल में समान वायु, कण्ठ उदान वायु और सारे शरीर में व्यान वायु रहता है। प्राण वायु के विजय के लिये हृदय में चित्तवृत्ति को स्थित करके "ऐ " मन्त्र का स्मरण किया जाता है, अपान वायु के विजय के लिए नाभि मण्डल में चित्तवृत्ति को स्थित करके रौ मन्त्र का जाप किया जाता है। समान वायु के विजय के लिए भी चित्तवृत्ति को नामि मण्डल पर एकाग्र कर ' मैं " मन्त्र का ध्यान किया करते हैं। उदान वायु को जीतने के लिये कठ स्थान में चित्तवृत्ति को रोक कर "ग्लो" मन्त्र की साधना की जाती है और ध्यान वायु को जीतने के लिये सारे शरीर में चित्तवृत्ति को रोक कर " क्लो" मन्त्र की आराधना की जाती है । यह जाप एकाग्रतापूर्वक एक मुहूर्त तफ किया जाता है, इस प्रकार पाँचों वायु पर नियंत्रण प्राप्त कर लेने पर जठराग्नि की प्रबलता ।

* ध्यान-कल्पतरु * ( ३५ ) होती है, जिससे शरीर सम्बन्धी अनेक रोग जलकर भस्म हो जाते हैं, शरीर में स्वस्थता और लघुता प्राप्त होती है। अन्य कई एक लाम भी होते हैं, ऐसा कथन श्रीहेमचन्द्राचार्य ने स्व रचित योग शाम नामक प्रथ में किया है।* -: श्राम्यंतर प्राणायाम :- मन वचन, और काया को ही आत्मा समझना, जड़ चैतन्य में अन्तर नहीं जानना, पौद्गलिक तत्त्वों में ही तन्मय होना, यह सब बाह्य-आत्म-भाव है। इनका त्याग करना ही आभ्यतर रेचक प्राणायाम है। आत्मा को ज्ञान, दर्शन और चारित्र द्वारा पूग्ना, यही पूरक प्राणायाम है । औपशमिक और क्षायोप- शमिक आदि भावों को स्थिर करना हो आभ्यतर कुम्भक प्राणायाम है। इस तरह से दोनों प्रकार के प्राणायामों से श्रात्मज्ञान को ज्योति प्रदीप्त होती है। -: पंचम पत्र---प्रत्याहार :-- प्राणायाम करने से यदि मन में विग्रह उत्पन्न हो जाय तो उसको स्थिर करने के लिये प्रत्याहार करना पड़ता है। प्रत्याहार कर्ता को बहिरात्म भाव से, इन्द्रियों को विषयों से, मन को पौद्गलिक परिणति से विलग करो, औदायिक भावों से चित्तवृत्ति को मोड़कर क्षायोपशमिक औपशमिक और क्षायिक भावों की वृद्धि करनी पड़ती है। इसी प्रकार शरीर के किसी भी एक अवयव पर मन को स्थिर कर एकाग्रता लानी पड़ती है, इससे मन पर नियत्रणता प्राप्त होती है। इस प्रकार कुछ समय तक मन की एकाग्रता का अभ्यास करना पड़ता है, तत्पश्चात मन की वृत्तियों को अन्तमुखी करके धारणा वृत्ति धारण करनी पड़ती है । छठा पत्र--धारणा :- " देशबंधश्चित्तस्य धारणा अर्थात्-भटकते हुए चित्त को रोक कर इष्ट देव में एकाग्रता पूर्वक स्थिर करना ही धारणा है । जैसे फामी का मन कामिनी में, लोमी का मन धन में, और विद्यार्थियों का मन विद्या में बिना किसी प्रेरणा के ही रात दिन सलग्न रहता है, वैसे ही अथवा इनसे भी अधिक ऋषि मुनियों की चित्तवृत्ति धारणा वृत्ति को धारण करते समय एकान्त रूप से तत्त्वार्थ के चिन्तन में और सत्शास्त्रों के रहस्य में अखड रूप से रमण करती रहती है । जैसे वासुदेव महाराज प्रतिवासुदेव को परिपूर्ण रीति से पराजित करने के लिये वीरता से प्रेरित होकर प्रवृत्ति करते हैं, वैसे ही कर्म शत्रु को पराजित करने के लिये चित्त वृत्ति को अखड रूप से सलग्न करना चाहिये। मुमुक्षु प्राणी ऐसा चिन्तन करे कि "मैं अनन्त ज्ञान आदि चतुष्टय का धारक हूँ, अनन्त शक्तिमान हूँ, और मेरे ये प्रतिपक्षी फर्म रूप शत्रु हैं, इन्होंने मुझे अपने निज स्वभाव से मुलाया देकर अनन्त दुःख रूप विडम्बना में ढाल रक्खा है, मुझे यह वात अब मालूम हुई है, मेरे लिए यह परम सौभाग्य है कि यह विचार धारा मेरे सुधार की सूचना देने वाला है। अव उपेक्षित होकर इस असाधारण अवसर को चले जाने देना मेरे लिए सर्वथा उचित नहीं है। ऐसी दृढ़ता पूर्वक धारणा करने से सांसारिक सभी पदार्थों के प्रति रागद्वेष के परिणाम मद पड जाते हैं । अात्मा समभावो हो जाती है। आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। अव धागे फर्म शत्रुओं के नाशक ध्यान का कथन किया जाता है। * " देखा देखी साघे योग, पड़े पिण्ड के बढे रोग ,, इस लोकोक्ति को ध्यान में रखते हुए प्राणायाम फियाओं की साधना गुरुज्ञान के बिना नहीं की जानी चाहिये ।

* ध्यान-कल्पतरु * --: श्राठवां - --: सातवां पत्र-ध्यान :- "तत्र प्रत्येकेकतानता ध्यानं ।" धारणा के पश्चात् ध्यान होता है, जिसकी धारणा निश्चित की हो, उसमें तन्मयता लाना, उससे अभिन्न होना ही ध्यान है । ध्यान के दो भेद हैं-१ मावलम्बन ध्यान और २ निरावलम्बन ध्यान । णमोकार मन्त्र, णमोत्थुण, लोगस्स, ॐ, अहँ अथवा सोऽह तत्त्वममि, श्रह ब्रह्माऽस्मि इत्यादि पदों का अवलम्बन लेकर जो ध्यान अथवा चिन्तन किया जाता है, वह सावलम्बन ध्यान है । इसी प्रकार किसी भी बाह्य अथवा आन्तरिक यात्म भाव पर या फिमी एक प्रत्यक्ष वा परोक्ष पदार्थ पर दृष्टि स्थापित फर उसके द्रव्य गुण पर्यायों का ज्ञान पूर्वक विचार करना भी सावलम्बन ध्यान ही है। केवल आत्म तत्व का विकल्प रहित चिन्तन करना निरावलम्बन ध्यान है। इस प्रकार ध्यान करने से समाधि भाव की प्राप्ति हुआ करती है। पत्र--समाधि :- "तदेवार्थमात्र-निर्मामनं, स्वरूपशुन्यमिव समाधिः ।" ध्यान के पश्चात ही समाधि की प्राप्ति हुआ करती है । समाधि अवस्था में ध्याता भान भूल कर स्वयमेव ध्येय रूप बन जाता है। परिपूर्ण रीति से प्रात्मानुभव को प्राप्ति हुआ करती है । निर्विकल्प वृत्ति मे श्रात्म स्वरूप में तन्मयता उत्पन्न हुआ करती है। ऐसी ही अवस्था में अखण्ड सुख का अनुभव होता है। ऐसे समाधिशील की मुखमुद्रा सदा प्रफुल्लित, वचन शीतल, इन्द्रियाँ निर्विपयो, काया अत्यन्त गौरवयुक्त, मन निश्चल और अकुटिल तथा जीवन सभी के लिए आनन्ददाता बन जाता है। "त्रयमेकत्र संयमः।" धारणा, ध्यान और समाधि इन तीनों का सम्मिलित सयोग ही सयम है । सयम से हो सभी सुखों की और परम पद की प्राप्ति हुआ करती है। ---: शुभ ध्यान का फल :--- इस विधि से किया हुश्रा ध्यान आत्मा के लिए मोक्ष पथ को सम्पर्क कराने वाला है । हृदय के ज्ञान दीपक को प्रज्वलित करने वाला है । अतीन्द्रिय श्राभ्यात्मिक सुख की प्राप्ति कराने वाला है । इस प्रकार ध्यान क्रिया का अभ्यास करने से ही आध्यात्मिक शान्ति की प्राप्ति हो सकती है । ध्यान प्रेमो प्रात्मा के चित्त को इन्द्रियां के विषय अपनी पार पाकर्पित नहीं कर सकते हैं। मोह रूप निद्रा स्वयमेव क्रमश' नष्ट होती हुई अन्त में परिपूर्ण रूप से क्षय हो जाती है और इसके स्थान पर ध्यान समाधेि रूप आध्यात्मिक निद्रा अपना स्थान लेती है। इस प्रकार शुद्ध ध्यान में प्रवृत्ति करने से श्रात्मा में महान पराक्रम प्रस्फुटित होता है क्रम से वीतराग दशा की प्राप्ति होती है ऐसे समय में ध्याता को मुक्ति सुख का अनुभव इसी अवस्था में होने । इस प्रकार प्रवल शक्ति युक्त ध्यान का यह विधि पूर्वक विवेचन हुआ। इन क्षेत्र आदि आठ प्रकार के शुद्धाशुद्ध ध्यान साधनों में से अशुद्ध का परित्याग करके शुद्ध का धाराधन करने से और यम नियम आदि अाठा साधनों को विधि पूर्वक साधना करने मे ध्याता को ध्यान की सिद्धि प्राप्त हो सकेगी। परम पूज्य श्री कहानजी ऋपिजी महाराज के सम्प्रदाय के वाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी महाराज द्वारा रचित "ध्यान कल्पतरु" ग्रन्थ की शुभ ध्यान नामक उपशाखा समाप्त । लगता * ध्यान-कल्पतरु * (३७) तृतीय शाखा--धर्म ध्यान :- जैसे अशुभ ध्यान के दो भेद भार्त ध्यान और रौद्र ध्यान कहे गये हैं, वैसे ही धर्म ध्यान के भो दो भेद जानना चाहिये । वे इस प्रकार हैं-१ धर्म ध्यान और २ शुक्ल ध्यान । पहले उपशाखा में शुभ ध्यान करने की विधि बतलाई गई है, अब यहाँ पर ध्यानस्थ हो जाने के बाद सात्विक विचार करने की पद्धति का निरूपण किया जाता है। (१) जिन सात्विक विचारों के बल से एकान्त रूप से कमों की निर्जरा होती हो, सभी कर्मों का क्षय होता हो और मोक्ष रूप फल की प्राप्ति होती हो, वे विचार शुक्ल ध्यान के अन्तर्गत हैं। इसका विस्तृत वर्णन आगे किया जायगा। (२) जो सात्विक विचार धारा विशेषत अशुभ कर्मों का और किंचित् शुभ कर्मों का नाश करे, निर्जरा और पुण्य प्रकृति का उपार्जन करावे, वह धर्म ध्यान है। अब इनका क्रमश. वर्णन किया जाता है। - प्रथम प्रतिशाखा-धर्म ध्यान के पाये :-- धम्मे झाणे चउविहे चउप्पडायारे पण्णते तंजहा-आणा विजए, अवाय विजए, विवाग विजए, संठाण विजए । धर्म ध्यान के चार पाये, चार लक्षण चार अवलम्बन और चार अनुप्रेक्षा, यों सोलह भेद श्रीतीर्थकर भगवान् ने फरमाये हैं। उनमें से चार पाये इस प्रकार हैं-श्राज्ञा विचय अपाय विचय, विपाक विचय, और सस्थान विचय । जैसे वन के चिर स्थायित्व के लिये जड़ का मजबूत होना अति आवश्यक है, वैसे ही ध्यान को स्थिर करने के लिये चार प्रकार के विचारों का चिन्तन मनन करना पड़ता है ( १ ) श्रीभगवान् ने इस जीव को मुक्ति के लिये हेय ( छोहने योग्य ) झेय ( जानने योग्य ) और उपादेय (ग्रहण करने के योग्य ) के रूप में क्या आदेश उपदेश फरमाया ? इसका चिन्तन करना आज्ञा विचय धर्म ध्यान है। (२) यह जीव अनन्तकाल से क्यों दुखी है ? और यह दुस किन कारणों से दूर हो सकता है ? ऐसा विचार करना अपाय विचय धर्म ध्यान है। (३) फर्म क्या है ? कैसे उत्पन्न होते हैं ? और क्या-क्या फल देते हैं ? इस ढग के विचार करना ही विपाक विचय धर्म ध्यान है। (४) इम ससार में इस आत्मा को परिभ्रमण करते करते प्रतन्तानत काल हो गया है, तो फिर इस ससार का क्या स्वरूप है ? ऐमा चिन्तन करना ही सस्थान विचय धर्म व्यान है। अव क्रमश इन चारों का विस्तृत वर्णन किया जाता है ( ३८) * ध्यान-कल्पतरु * और पर्याय इतने सूक्ष्म और अग्राह्य हैं कि अपन -: प्रथम पत्र---अाज्ञा विचय :- आज्ञा विचय नामक धर्म ध्यान का ध्याता ऐमा अनुचिन्तन करे कि इस विश्व में रहने वाले अनेकानेक प्राणो यात्म कल्याण की श्राकाक्षा किया करते हैं, उम श्रात्म कल्याण की प्राप्ति केवल श्रीजिने- श्वर भगवान की श्राज्ञा अनुसार प्रवृत्ति करने से ही हो सकती है श्रीजिनेश्वर भगवान की आज्ञा में रहत हुए ही साधु वर्ग और श्रावक वर्ग जो किया करते हैं. वह क्रिया ही आत्म कल्याण की माधिका है । भगवान के आदेश से अधिक, अथवा कम, अथवा विपरीत ढग से श्रद्वा होना ही मियात्व है। अतएव वीतराग भगवान् जिनेश्वर देव की क्या प्राज्ञा है ? इमी का विचार करने की सर्व प्रथम श्रावश्यकता है। भगवान श्रीजिनेश्वर देव सर्व जाता ओर केवलज्ञानी थे, उन्होंने अधो लाक, मध्य लोक, और उर्ध्व लोक नीनों ही लोका में भूतकाल, भविष्यत् काल, और वतमान काल में जीव तथा पुद्गलों की अनन्तानन्त पर्यायो का जो परिवर्तन हुश्रा, होगा और हो रहा है, उसका प्रकाशन किया ऐसा स्थिति में उनके आदेश उपदेश से विश्व व्यापी चराचर पदार्थो के हम समारी जीव ज्ञाता हुए । अगोचर यानी अदृश्य पदार्थों के गुण जैसे माधारण आत्माओं की तो बात हो क्या ? चार ज्ञान के धारक द्वादशागों के पाठक, महान मुनि लक्ष्य में अथवा ध्यान में अाना भी कठिन है। जो पदार्थ अपनी बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा अमाल कर शास्त्रों आदि का अध्ययन कर सत्य रूप से जान सकते हैं, ऐसा दृढ आत्म विश्वास श्रीतीश्वरकल्प घृत्ति व होता है। मानने से ही हुआ है। क्योंकि हम सब यह निश्चय पूर्वक समझते हैं कि श्रीवीतरार স্বাস্থ্য रहित हैं, वे सभी प्रकार के पक्षपात से रहित हैं, अतएव वे कदापि और किसी भी अवस्था, रवयुक्त, मन पणा नहीं कर सकते हैं, श्रीसर्वज्ञ प्रमु ने केवल ज्ञान द्वारा जैसा देखा, वैसा ही आदेश उप कारण से वह सब पूर्णरीत्या सत्य हो सभी सुखों श्रीजिनेश्वर भगवान द्वारा उपदिष्ट ज्ञान मागर में से कुछ तत्वों का नाम निदी श्लोक द्वारा किया जाता है- सूत्रार्थ-मार्गण-महाव्रत-भावना च, पंचेन्द्रियोपशमताऽतिदयाद्रभावः वंथप्रमोक्षगमनागतिहेतुचिन्ता, ध्यानं तु धर्ममिति तत्प्रवदन्ति तज्ञाः ॥ -मागार धर्मामृत मूत्रों का अर्थ, जीवों की मार्गणा, महाव्रत, भावना, पांच इन्द्रियों के दमन का विचार, दयाभाव, कमों के बधने छूटने के उपाय, चार गति और गमनागमन हेतु, इन का चिन्तवन श्रोर ध्यान करना ही विचारकों द्वारा धर्म ध्यान की श्रारावना करना कहा गया है । ध्यान कर्ता को मर्व प्रथम श्रुत ज्ञान की आवश्यकता हुआ करती है, अत यहाँ पर अव श्रत ज्ञान का वणन किया जाता है। -: सूत्रार्थ :- सुयकेवलं च णाण, दोगिण विसरिसाणि होति योहारो॥ सुयणाणं तु परोक्खं, पच्चक्खं केवलं णाणं -गोम्मट सार जीवनाएड ३६८ है ज्ञान + ।

* ध्यान-कल्पतरु * (३६) 20 - श्रत ज्ञान और केवल ज्ञान दोनों बराबर हैं। अन्तर इतना ही है कि अ त ज्ञान तो परोक्ष है और केवल ज्ञान प्रत्यक्ष है । केवली भगवान ने जो जो भाव केवल ज्ञान द्वारा मालूम किये हैं, वे सब उपदेश द्वारा जनता के हित के लिये प्रकाशित कर दिये गये हैं इस प्रकार वचनों द्वारा प्रकाशित ज्ञान ही अत ज्ञान । केवलो के वचन से हो नरक, स्वर्ग, यावत् मोक्ष तक की रचना छद्मस्थ जानते हैं। यह भी अ त ज्ञान हो है । वह अ त ज्ञान स्वय भू रमण समुद्र से भी अधिक गभीर, लोकालोक से भी बड़ा, सब पदार्थों में शिरो- मणि, और करोड़ों सूर्यों से भी अधिक प्रकाश का कर्ता है । * बारह अंग शास्त्र। चार अनुयोग, १ अग, २ उपांग, ३ छेद, मूल और अनेक प्रकीर्णक प्रन्थों द्वारा इसका विस्तार किया गया है। यह ज्ञान अनेक चमत्कारिक विद्याओं का सागर है, शब्दों द्वारा अवर्णनीय है, बडे बडे विद्वान् भी इसका पार नहीं पा सकते हैं. ५ श्रत ज्ञान ही सवा तीर्थ है, जिसमें पाप का जरा भी अश नहीं है । इसमें म्नान करने से यानी इसका अध्ययन करने से बड़े-बड़े पापात्मा भी पवित्र हो गये हैं । यह ज्ञान हो जगत के जीवों का उद्घार करने में शक्तिशाली है। यह योगियों का तीसरा नेत्र है, इत्यादि विविध गुणों मे सयुक्त है, ऐसा यह श्रुत्त ज्ञान है । अभ्यास द्वारा इसकी प्राप्ति करने में धर्मध्यानी को जरा भी प्रमाद नहीं निजाचाहिये । अब आगे जो वणन किया जाने वाला है, वह सब श्रतज्ञान के अन्तर्गत ही समझना चाहिये । '" बारह अग इस प्रकार हैं - आचारांग, २ सूत्र कृतांग, ३ स्थानाग, ४ समवायाग, ५ व्याख्या प्राप्ति, गंग व ज्ञातासूत्र, ७ उपासक दशाग, ८ अन्त कृद्दशाग ६ अनुत्तरौपपातिक दशाग, १० प्रश्न व्याकरण धम्म और १२ दृष्टिवाद । पथम चरणानुयोग-जिसमें आचार का वर्णन है, जैसे प्राचाराग आदि शास्त्र । दूसरा गणितानुयोग, विवाग विजष्ल्या का कथन है, जैसे चद्र प्रज्ञप्ति श्रादि शास्त्र । तीसरा धर्म कथानुयोग, जिसमें धार्मिक कथाश्रो का धर्माता सूत्र आदि । और चौथा द्रव्यानुयोग, जिसमें धर्मास्तिकाय आदि पट द्रों का उल्लेख है, जैसे श्रीतीर्थकर दे शास्त्र । ये चार अनुयोग हैं। विचय, और प्राचाराग आदि रूप से जिन बारह अगों का कथन किया गया है, उनमें से दृष्टिवादाग नामक श्रागम में अमाव है। इसलिये याब कल ग्यारह ही अग गिने जाते हैं। २ उपाग १२ हैं, वे इस प्रकार हैं-१ उववाइ, २ रायप्पसेणी, ३ जीवाभिगम, ४ पन्नवणा, ५ नबू द्वीप प्रिज्ञाप्त, ६ चद्र प्रज्ञप्ति, ७ सूर्य प्रज्ञप्ति, ८ निरियावलिका, ६ कप्पवडिंमिया, १० पुष्फिया, ११ पुग्फ चलिया और १२ वरिह दशा। ३ छेद अथ चार है - व्यवहार, २ बृहत्क्ल्प, ३ निशीथ, और ४ दशा श्रुत स्कए । ४ मूल सूत्र भी चार है -१ दशवैकालिक, २ उत्तराध्ययन, ३ नदी और ४ अनुयोग द्वार । ५ अक्षरात्मक अतज्ञान के मूल अक्षर ६४ हैं । तेतीस च्यजन, सत्ताइस स्वर और चार योगवाह हैं । इनके सयोग जनित अथात् द्विसयोग, निसयोग, चतुस्सयोग इत्यादि रूप से चौसठ मयोगो तक मागों की प्रक्रियाएँ होती हैं । इस प्रकार परस्पर गुणा करने से उत्पन्न होने वाले अक्षरों का एक्त्र प्रमाण समत्त और अपुनरुक्त यह है -१८४४ ६७ ४४ ० ७ ३ ७० ६५५ १६ १५ । इतने अग प्रविष्ट अोर अग बाह्य अत के समस्त अपुनरुक्त अक्षर हैं । पुनरुक्त प्रक्षरों की संख्या का नियम नहीं है । इनमें सर्वश्रुत जान का ममावेश हो जाता है । परम श्रागम में प्रसिद्ध मध्यम पद में १६ ३८८२ ० ७८८८ अक्षर होते हैं । अग प्रविष्ट श्रुत ज्ञान के पदों की बोड ११ २८ ३५.८. ० ० ५ है । इनमें बारह ही अग रूप श्रुत शान का समावेश हो गया है । अग बाह्य अनरो का प्रमाण ८० १०८ १७५ है । यह क्थन ४ प्रकीर्णक दशवैकालिक, उत्तराध्ययन आदि की अपेक्षा से है। ऐसा उल्लेख दिगम्बर मत के दवाथ ननदी अर्थ प्रकाशित नामक वनिका के प्रथम अध्याय में है । गोम्मट सार यादि में भी है। भग .

(४०) * ध्यान-कल्पतरु * होने वाले मनुष्य । -: मार्गणा :- गड दिए काए, जोए चेए कसाय णाणे य । संजम दंमरण लेसा, भव सम्मे सन्नि श्राहारे ॥ तृतीय कर्म ग्रन्य गति, इन्द्रिय, काया, योग, वेद, कपाय, ज्ञान मयम, दर्शन, लेश्या, भव्य, सम्यक्त्व, सज्ञी और आहार, ये चौदह मार्गणाएँ हैं। मार्गणाश्रा का ज्ञान प्रति गहन है, इनक विचार से ध्यान में अच्छो स्थिरता रहने की सम्भावना हे अतएव यहाँ मार्गणानां का कथन किया जाता है। १) गति-जिन स्थानों मे ससारी जीव आते रहते हैं और जाते रहते हैं। ये गति रूप स्थान चार हैं.- (अ) नरक गति, अधो लोक में दु ख मय स्थान, जो कि सात हैं। (आ) तिथंच गति, एकेन्द्रिय सूक्ष्म प्राणी, जो कि मर्व लोक व्यापी हैं, और बादर एकेन्द्रिय मे पचेन्द्रिय पर्यन्त पशु पक्षी श्रादि जीव हैं। इ) मनुष्य गति, तिरछे लोक में अथवा मध्य लोक में कर्मभूमि और अकर्मभूमि में उत्पन्न ( ई ) देवगति-भवनपति पाताल लोकवासी देवता, वाण व्यतर मध्यलोक दोमी देवता, ज्योतिष सूर्यचक्र नक्षत्र ग्रह तारा आदि अाकाश वासी देवता, वैमानिक कल्पातीत नौ अवेयक, और अनुत्तर विमान वासी देवना। ये चार गतियाँ हुई। पाँचवी गति मोक्ष कही जा सकती है, परन्तु वहाँ से पुन श्रागमन नहीं होता है। ( २ ) इदिए यानी इन्द्रिय, जिससे जीव की जाति अथवा प्रकार का ज्ञान हो । इसके पाँच भेद हैं। (अ) एकेन्द्रिय-पृथ्वी आदि केवल स्पर्श इन्द्रिय वाले प्राणी । (आ) दो इन्द्रिय-स्पर्श और जिह्वा वाले जीव जैसे कि कीडा आदि । ( इ ) त्रीन्द्रिय-स्पर्श, जिह्वा और नाक वाले जाव, जैसे जू खटमल प्रादि । ( ई ) चतुरिन्द्रिय-स्पश, जिह्वा नाक और आँख वाले जीव । जैमे मनखी श्रादि । ( उ ) पचेन्द्रिय-पश, जिह्वा नाक, आँख और कान वाल जाय, जैस मच्छ श्रादि जलचर प्राणी, पशु गाय आदि स्थलचर प्राणी, हम आदि खेचर जीव, नारकी, मनुष्य देवता श्रादि । इनके सिवाय अनीन्द्रिय जीव *सिद्व और केवली भावान कहे जाते हैं । (३) काए = काया, जीवों के भेद को समझाने वाली शरीरस्थिति। इसके ६ भेद हैं.-(१) पृथ्वी- काय = मिट्टी के जीव, (२) अपकाय = पानी के जीव (३) तेउकाय = अग्नि के जाव, (४) वायुकाय = हवा के जीव, (५) वनस्पतिकाय =वृक्ष पौधे हरियाली के जीव, ये मब एकेन्द्रिय ही हैं। (६) समाय = हिलने डुलने वाले और चलने फिरने वाले जीव । द्विइन्द्रिय से लगा कर पचेन्द्रिय तक के जीव । * सिद्ध भगवान् के इन्द्रियाँ नही होती है और केवली मगवान् अथवा अरिहन्त देव सर्वज्ञ, और सर्वदर्शी होने से उनकी इन्द्रियों उपयोग में नहीं आया करती है। 1 * ध्यान-कल्पतरु * (४१ ) - %3D (४) जोए = योग, जो दूसरे से सबध करे वह योग है। योग ३ होते हैं, मनोयोग = अन्त करण क विचार । वचन योग शब्दों का उच्चारण, और काया योग=शरीर के काम । (५) वेए = वेद, विकारों का उदय होना हो वेद है। वेद ३ हैं, खी वेद, पुरुष वेद और नपु सक वेद । (६) कसाय =क्षाय जिनसे श्रात्मा विकार अस्त होकर बेभान हो जाय । कपाय ४ हैं:-क्रोध, मान- अभिमान, माया- कपट और लोभ-तृष्णा। (७) णाण = ज्ञान, जिससे पदार्थों का स्वरूप जाना जाय । इसके अाठ भेद हैं -(१) मति ज्ञान, बुद्धि और इन्द्रियों सबधी, (२) अ त ज्ञान, शाबों सवधी, (३) अवधि ज्ञान, सभी रूपी पदार्थों का ज्ञाता, (४) मन पर्याय ज्ञान, मन की बात जान लेने वाला, (५) केवलज्ञान-सर्व द्रव्य क्षेत्र काल भाव को जानने वाला, ये पांचों ज्ञान केवल सम्यक दृष्टि वालों को ही हुआ करते हैं । (६) मति अज्ञान, कुबुद्धि वाला ज्ञान, (७) अत अज्ञान, कुशाखों वाला ज्ञान और (८ विभग ज्ञान अथवा कुअवधि ज्ञान, विपरीत रूप से रूपी पदार्थों को जानने वाला । ये पीछे के तीन ज्ञान मिथ्या दृष्टि वालों को हुआ करते हैं। (E) सयम-कुफर्मों से श्रात्मा का निग्रह करना, आत्मा को वश में रखना हो सयम है । सयम सात प्रकार का है, १ श्रवती, जिमने मिथ्यात्व से अपनी आत्मा की रक्षा करके सम्यक्त्व में सयोजित कर दी हो । २ देश व्रती = श्रावक । ३ सामायिक मर्यादित काल की सामायिक श्रावक के लिये और जीवन पर्यंत की सामायिक साधु के लिये । ४ छेदोपस्थापना सयम = दोप से निवृत्ति कराने वाला । ५ परिहार विशुद्धि सयम-विशेष ढग का शुद्व चारित्र । ६ सूक्ष्म सपराय सयम-अति सामान्य लोभ के सिवाय शेष कषाय का निसमें क्षय अथवा क्षयोपशम हो जाय । ७ यथाख्यात सर्वथा दोष रहित चारित्र । (8) दसण-दर्शन, सामान्य प्रतिभास रूप देखना । दर्शन ४ प्रकार का है:-चतु दर्शन आँखो द्वारा सामान्य प्रतिभास होना, अचक्षु दर्शन-आँख के सिवाय शेष चार इन्द्रियों और मन द्वारा सामान्य प्रतिभास होना । अवधि दर्शन केवल प्रात्म शक्ति के आधार से ही रूपी पदार्थों का सामान्य प्रतिमास होना । केवल दर्शन-सभी लोकालोक पर्यंत द्रव्य क्षेत्र काल और भाव का प्रतिभास होना। (१०) लेश्या कर्मों से आत्मा की श्रोतप्रोत अवस्था जिसके कारण से हो । लेश्याएँ ६ हैं। (१) कृष्ण लेश्या महा पाप रूप, (२) नील लेश्या अधर्म रूप (3) कापोत लेश्या-बक्र स्वभाव रूप धृष्टता रूप, (४) तेजो लेश्या न्याय भावना रूप, (५) पद्म लेश्या-धर्म भावना रूप, (६) शुक्ल लश्या-मोक्ष प्राप्ति रूप । अयोगी केवली और सिद्ध भगवान लेश्याश्रा से रहित होते हैं। (११) भव्य ससार में जीव दो प्रकार के हैं, भव्य और अभव्य । मोक्ष गामी भव्य हैं और फदापि मोक्ष में नहीं जाने वाले श्रमव्य हैं । सिद्ध भगवान भव्याभव्य स्थिति से परे हो गये हैं। (१२) सज्ञो मन जनित छान सहित जीव सज्ञी है, माता पिता के सयोग से उत्पन्न होने वाले मनुष्य, तिर्यच्च प्राणा तथा देवता और नारकीय जीव सन्जी है । मन जनित झान से रहित प्राणी अथवा विना मन वाले प्राणी अमज्ञा कहलाते हैं । पाँच स्थावर, तीन विकलेन्द्रिय, और समृमि । विना माता- पिता के सयोग से उत्पन्न होने वाले मनुष्य और तिर्यश्च नामक सुक्ष्म जन्तु, असक्षा है । सिद्ध भगवान सनो श्रसज्ञो अवस्था से रहित होते हैं। . (१३) सम्यक्त्व-पनाथों की यथार्थ श्रद्धा ही सम्यक्त्व है। सम्यक्त्व सात प्रकार का होता है। (१) मिध्यात्त सम्यक्त-बाध रूप से मिध्यात्र का भावना होते हुए भो अन्तःकरण की सम्यक्त्व जैसी (४२) * ध्यान-कल्पतरु * स्थिति हो । (२) सास्वादन सम्यक्त्व-किंचित मात्र से धर्म पर श्रद्धा उत्पन्न होकर पुन मिथ्यात्व ग्रहण करने से पूर्व की स्थिति । (३) मिश्र सम्यक्त्व अद्वा की चचलता और गड़बड़ अवम्या । (४) क्षायोपशमिक सम्यक्त्वमोहनीय कर्म का प्रकृतियों क उपशम होने पर उत्पन्न होने वाली श्रद्धा । (६) वेदक सम्यक्त्व- क्षायिक सम्यक्त्व के कुछ ही क्षण पहले उत्पन्न होने वाली श्रद्धा । (७) क्षायिक सम्यक्त्व-मोहनीय कर्म की सात प्रकृतियों के क्षय होने पर उत्पन्न होने वाली श्रद्धा । (१४) अाहार आहार करने वाला प्राणी पाहारिक कहलाता है और एक शरीर को छोड कर अन्य गति में शरीर धारण करने के लिए जाते समय माग में श्राहार नहीं करने वाला एष मोक्ष गमन थे समय भी श्राहार नहीं करने वाला प्राणी अनाहारिक कहलाता है । तात्पर्य यह है कि विग्रह गति में जाते समय जीव अमाहारिक होता है। यों तो चोन्ह ही मार्गणाएँ सागर समान अर्थ गभीरता वाली है, परन्तु ग्रन्थ विस्तार के भय से यहाँ पर सक्षिप्त रूप से वर्णन किया है । ध्यानी इनका विस्तार पूर्वक चिन्तन करें। -- , »: महावत :- महाव्रत अर्थात वडे व्रत । जैसे तालाब के जल पाने के नाले रोक देने से उसमें पानी का भाग- मन बन्द हो जाता है, वैसे ही व्रत प्रत्याख्यान करने से प्राणी के लिये आश्रव का द्वार वन्द हो जाता है। श्रावकों के व्रत मर्यादा पूर्वक होने से अणुव्रत कहलाते हैं, जब कि साधुओं व्रत तीन करण और तीन योग सहित होने के कारण से वे महाव्रत कहलाते हैं। इनकी सख्या पाँच है। ध्यानीजन बहुधा महाव्रती ही होते हैं । अतएव उन्हें अपने व्रतों पर सूक्ष्म विचारणा करना अतिआवश्यक है। (१) सव्व पाणाइवायाश्रो विरमणं = अर्थात् त्रस, स्थावर सूक्ष्म, बादर, सभी जीवों की हिंसा से तीन करण तीन योग पूर्वक सर्वथा निवृत्ति । इसमें सर्वथा हिंसा का त्याग है। (२) सव्व मुसावायाो विरमण = क्रोध, लोभ हँसी, भय आदि से सर्वथा तीन करण तीन योग पूर्वक झूठ बोलने से निवृत्ति । (३) सव्व अदिन्नादाणाश्रो विरमण = थोड़ी, बहुत, हल्की, भारी, सचित्त, अचित्त, सभी को सर्वथा तीन करण तीन योग पूर्वक चोरी से निवृत्ति । (४) सव्व मेहुणाश्रो विरमण = देवी, मनुष्य स्त्री, नियंच मादा आदि सभी से तीन करण तीन योग पूर्वक मैथुन सेवन से निवृत्ति । (५) सव्व परिग्गहाश्रो विरमणं = थोड़ा, बहुत हल्का, भारी, सचित्त और अचित्त इत्यादि परिग्रह से तीन करण तीन योग पूर्वक सर्वथा निवृत्ति । (छठा व्रत-सव्व राइ भोयणाश्रो विरमण = अन्न पानी, मेवा, मिठाई मुख वास, पान, सुपारी इत्यादि सभी साने पीने की वस्तुओं से रात्रि के लिये तीन करण तीन योग पूर्वक निवृत्ति । ) ध्यानी पुरुष इन महाव्रतों के प्रति भावना पूर्वफ और विविध भागा पूर्वक चिंतन करने से अपने कर्त्तव्य में सफल होगे। * करना नही मन से, वचन से, काया से, कराना नहीं मन से वचन से और काया से, अनुमोदना नही मन से, वचन से और काया से । ये तीन करण तीन योग रूप : कोटि रूप मर्यादा हुई ।

* ध्यान-कल्पतरु * (४३) . -: बारह भावनाएँ :- अनित्य भावना-द्रव्यार्थिक नय से श्रात्मा अविनाशी स्वभाव वाला है। इससे भिन्न राग प आदि विमाव रूप कर्म हैं। फर्मो के सयोग से हो स्त्री पुत्र श्रादि सचित्त द्रव्य, सुवर्ण आदि अचित्त ज्य और अन्य सम्मिश्रित द्रव्यों की प्राप्ति हुई है। ये सभी अनित्य हैं, अध्र व हैं विनाशशील हैं । ऐसी प्रनित्य भावना जिनके हृदय में रमती रहती है उनकी ममत्व भावना सभी वस्तुओं पर से हट जाती है, जैसे वमन किये हुए पदार्थों के प्रति जरा भी आसक्ति नहीं रहती है, वैसी हो भावना अनित्य भावना की आराधना करने वालों की हो जाया करती है। ऐसे ही महात्मा अक्षय, अनत, सुख रूप स्थान मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं। (२) अशरण भावना-इस श्रात्मा के लिये केवल ज्ञान, दर्शन, चारित्र, अरिहत आदि पच परमेष्टि देव ही शरण रूप हैं। अन्य देवेन्द्र, नरेन्द्र, म्वजन, सेना, घर, धन, या मत्र, तत्र, यत्र श्रादि कोई भी शरण देने वाले नहीं हैं। जैसे सिंह द्वारा आक्रान्त हिरण के बच्चे को अन्य हिरण नहीं छुड़ा सकते हैं, अथवा समुद्र के मध्य भाग में पतित जीव के लिये जहाज के अतिरिक्त अन्य कोई शरणदाता नहीं हो सकता ऐसा विश्वास करने वाले सासारिक पर द्रव्यों से ममत्व उतार कर अपने निज श्रात्म स्वभाव और निज आत्म गुणों पर ही अवलबित होंगे, तभी वे श्रात्म स्वरूप का विकास करके सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर सकेंगे। (३) ससार भाषना-इस ससार में जितने भी द्रव्य हैं, उन सब को ज्ञानावरणादि पाठों कर्मों के योग से शरीर पोषण करने के लिये अन्न जल आदि रूप से तथा आँख कान आदि इन्द्रियों के रूप से इस नीव ने अनन्त बार ग्रहण किये हैं। ऐसा विचार करना द्रव्य ससार भावना है। यह लोक असख्यात प्रदेशों वाला है। उनमें से प्रत्येक प्रदेश पर यह जीव अनन्त बार जन्मा है और मरा है । यह विचार धारा क्षेत्र ससार भावना है। उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल चक्र का समय बीस करोड़ा करोड़ी सागरोपम का है, उसके प्रत्येक समय में इस आत्मा ने जन्म मरण किये हैं, ऐसा विचार करना काल ससार भावना है। क्रोध आदि चार कषाय सम्बन्धी और मन आदि तीन योग सम्बन्धी जो प्रकृति आदि वन्ध के भाव हैं, उन्हें अनन्त वार प्रहण कर करके छोड़ दिये हैं। ऐसी विचारणा भाव ससार भावना है। ऐसे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव रूप ससार में यह जीव अनादि काल से परिभ्रमण करता था रहा है। अव जो आत्मा इस परिभ्रमण स निवृत्त होकर संसार से उदासीनता लावेगा, वही मोक्ष प्राप्त कर सकेगा। (४) एकत्व भावना-इस जोब के लिए स्वाभाविक अनन्त सुख का प्रदान कर्ता केवल ज्ञान ही है। यह अनन्त गुण रूप है। यही आत्मा का स्वाभाविक शरीर है। यह अखड और अक्षय रूप से हितकर्ता नहीं हैं। क्योंकि अन्य पदार्थ तो मन में सकल्प विकल्प उत्पन्न किया करते हैं। जो कि दु ख के ही उत्पादक हैं। ऐसा समझकर वाह्य वस्तुओं पर से ममत्व उतार कर जो केवल श्रात्मा पर ही दृष्टि जमावेगा, वही आत्म तत्त्व का अनुसधान कर निजानन्द को अथवा स्वाभाविक श्रानन्द को प्राप्त कर सकेगा। (५) अन्यत्व भावना-यह आत्मा असान वश होकर ससार में रहे हुए कितने ही सजीव पदार्थों को अपना कुटुम्ब समझ रहा है, और कितने ही अजोव पदार्थों को अपना सहायक मान रहा है किन्तु वे सब कर्माधीन और फर्ममय हैं। वे द्रव्य स्वय अपने आपको सुखी वनाने में असमर्थ हैं, तो फिर वे मरों को क्या सुखी बना सकेंगे ? जो स्वय विनाश से घच नहीं सकता है, वह अन्य को विनाश से क्या बघावेगा? इतने अनन्त समय तक इस श्रात्मा ने जो कष्ट अनुभव किया, वह सब उन्हीं की कृपा का फल .

(४४ ) * ध्यान-कल्पतरु * - । है। ऐमा निश्चित रूप से समझ कर हे श्रात्मन । तू ऐमा विचार कर कि 'मैं तो शुद्ध चैतन्य रूप हूँ। ये सब सासारिक पदार्थ मेरे मे भिन्न हैं, ये मेरे नहीं है, और में इनका नही हूँ" ऐमी श्रद्वा कर सभी द्रव्यों से अनासक्त हो जाने पर ही अपने वास्तविक महान् स्वरूप की प्राप्ति हो सकेंगी, और तभी सच्चो शाति प्राप्त हो सकेगी। (६) अशुचि भावना-इम शरीर को पवित्र करने के लिये अमान्य अपकाय वाले जल मे इसे स्नान कराया जाता है, और इस प्रकार जीव हिंसा सग्रहीत की जाती है, किन्तु जैसे विष्टा आदि अशुचिमय घट को साफ करने पर भी वह घृणा की और उपेक्षा का पात्र ही बना रहता है वैसे ही यह शरीर थन्दर से तो ज्यों का त्यो ही अशुचिमय ही बना रहता है। इम शरीर की उत्पत्ति ही रज और वीर्य जैसे पदार्या से हुई है। घृणित रूप से परिणत होने वाले पदार्थो से ही इमकी वृद्धि हुई है। इम शरीर के संयोग से पवित्र पदार्थ भी अपवित्र हो जाया करते हैं। सुगन्धित पदार्थ भी दुर्गन्ध युक्त हो जाते हैं । प्रशसनीय मी निंदा के पात्र बन जाते हैं। मनोहर भी अवाछनीय रूप में परिणत हो जाते हैं। बहुत काल पर्यन्त प्रेमपूर्वक रखे हुए पदार्थ भी इस शरीर का मवध होते ही घुरे पर (दरम्य घृणित पदार्थों के ढेर पर) फेंकने के योग्य बन जाया करते हैं । इम शरीर में से निकलने वाले सभी पदार्थ घृणा को ही उत्पन्न करने वाले होते हैं। इस प्रकार इस शरीर को बनाने वाले पदार्थों में से कौन से ऐसे हैं, जिन पर प्रेम किया जाय ? किन्तु आश्चर्य है कि मोह रूप मदिरा मे बेभान हुए प्राणी अशुचि मय पदार्थों को ही प्राण मम प्यारे मान कर पाप सग्रह कर रहे हैं। इससे अधिक और कौन मी अज्ञानमय दशा है ? प्राणियों के शरीर में से ही निकले हुए पदार्थों को लरा उनके हाथों में रखकर देखियेगा कि "वे उन्हें प्यार करते हैं ? या उनसे घृणा ?" इत्यादि विविध रूप से विचार कर इस अशुचिमय शरीर के प्रति अनामत होकर, इस शरीर में रहे हुए परम पवित्र ज्ञान आदि रनों के धारक श्रात्म तत्त्व का ही अनुसधान करते रहना चाहिये । इस अशुचिमय कारागृह से आत्मा को छुड़ाने के लिये ब्रह्मचर्य आदि पवित्र व्रतों को धारण करना चाहिये और परम पवित्र शिव स्थान-मोक्ष स्थान को प्राप्त करना चाहिये। ७) श्राश्रव भावना-जैसे छिद्र वाली नाव (नौका ) पानी में डून जाती वैमे ही मिथ्यात्व, अव्रत, प्रमाद, फपाय रूप पाप मय जल में तैरने वाली श्रात्मा रूप नाव में शुभाशुभ याग रूप छेद हो जाने से ससार रूप समुद्र में यह आत्मा रूपी नौका डूब रही है। ऐसा समझ कर आश्व का परित्याग करके आत्मा को ससार रूप समुद्र मे पार करने का उपाय मोचते रहना चाहिये । (८) मसार भावना-श्राव भावना में जिन पाप रूप कारणों का उल्लेख किया गया है, उन्हे रोकना ही सवर है। सम्यक्त्व, व्रत, अप्रमाद, अक्पाय और स्थिर योग ही सवर हे । इनके द्वारा प्रात्मा में ज्ञान आदि रत्न त्रय की अक्षय निधि का सविकाम करके ससार समुद्र के किनारे स्थित मोक्ष रूप पट्टन अथवा नगर में श्रात्मा को मस्थापित करे। (8) निर्जरा भावना-जीव का स्वभाव तो मोक्ष में जाने का ही है। परन्तु अनादि काल से सव- धित कर्म रूप वोमा के दवाव से नहीं जा सकता है। जैसे तुम्वे का स्वभाव तो जल के ऊपर तैरते रहने का ही है, परन्तु यदि कोई उम पर पटसन से निर्मित और मिट्टी मे मिश्रित पतली रस्सियां के पाठ पुट ऊपरा ऊपरी मयोजित कर, एव उन्हें सुखाकर पानी में डाले तो वह तुम्बा मिट्टी के पुटो मे सयुक्त होने के कारण तत्काल डूब जाता है, कालान्तर में ज्यों ज्यों वे पुट लघु से लघुतर होते जाने हे, त्यो त्यों वह तुम्बा ऊपर पाना जाता है। इस प्रकार पुटों से सर्वथा वन्धन रहित होते ही वह तुम्बा तत्काल पानी को सतह पर श्रा नाता है। इसी तरह से जीव रूप तुम्बा है, जिस पर प्राठों फर्म रूपी मिट्टी और पटसन का लेप - * ध्यान-कल्पतरु * (४५ ) - - और पट लगे हुए हैं। जिनके कारण से ही वह ससार रूप समुद्र में डूबा हुआ है । मुमुनु आत्माएँ उन लपों को गलाने के लिये ही बारह प्रकार की तपस्याएँ किया करती हैं एवं कर्मों के लेप से मुक्त होकर ससार के अग्र भाग पर स्थित अनत और अक्षय रूप मोक्ष स्थान को प्राप्त कर लिया करती हैं। (१०) लोक भावना-अनन्तानन्त श्राकाश रूप अलोक के मध्य भाग में ४४३ घनाकार *राज जितने क्षेत्र में लोक है। लोक के मध्य में १४ राज लम्बी और एक राजू चौड़ी त्रस नाड़ी है । उसमे उस और स्थावर जीव भरे हुए हैं । बाकी का सर्व लोक केवल स्थावर जीवों से ही भरा हुआ है । लोक के ऊपर अग्र भाग पर सिद्ध स्थान है। जो आत्माएँ सभी कर्मो से मुक्त हो जाती हैं, वे ही उस मुक्त स्थान पर विराजमान हुआ करती हैं। वहाँ से फिर कभी भी चलायमान नहीं हुश्रा करनी है। सदैव अव्यावाध और अक्षय सुख में लीन रहती हैं। हे आत्मन् । उस स्थान को प्राप्त करने का तू उपाय कर । ऐसी भावना लोक भावना है। (११) बोधि दुर्लम भावना-सांसारिक अन्य सभी प्रकार की वस्तुओं की प्राप्ति तो सरल है, किन्तु बोध बोज रूप सम्यक्त्व रन की प्राप्ति होना बहुत हो कठिन है । जरा इसका विचार किया जाय तो पता चलेगा कि बोध बीज की प्राप्ति बहुधा मनुष्य जन्म में ही हुआ करती है । कहा भी है कि-'दुल्लहो खलु माणुसो भवे' अर्थात् मनुष्य जन्म मिलना बहुत ही कठिन है । ६८ बोलों का जो अल्पाबहुत्व है, उसमें प्रथम बोल में ही कहा गया है कि 'सब से थोडे गर्भज मनुष्य" इस बोल की व्याख्या की जाती है कि- ३४३ राज का सम्पूर्ण लोकाकाश व्यापो क्षेत्र जोवों से ठसाठस परिपुर्ण रीति से भरा हुआ है । बालाप जितना भी स्थान खाली नहीं है। उसमें से त्रस जीव केवल चौदह राजू जितने क्षेत्र में ही हैं । इसमें से आधे सात राजू में नीचे सात नरक है । ऊपर कुछ कम सात राजू में स्वर्ग हैं, इन दोनों के बीच में "कुछकम" वाले भाग में यानी १८०० योजन जितने ऊँचे और एक राजू जितने चौड़े तिरछे लोक में मध्य लोक की गणना की जाती है। इसमें असख्यात द्वीपसमुद्र हैं। इन द्वाप समुद्रों में से पैंतालीस लाख योजन जितने मर्यादित क्षेत्र में ही मनुष्य लोक गिना जाता है। इतने क्षेत्र में से भी बीस लाख योजन जगह तो केवल समुद्रों ने ही रोक ली है। शेष पच्चीस लाख योजन में भी पर्वत, नदियाँ श्रादि अनेक हैं । मनुष्य के तो फेवल १०१ क्षेत्र ही है। इनमें से भी कर्म क्षेत्र भूमि के तो केवल १५ हो क्षेत्र हैं । उसमें भी पायभूमि कम है । जैसे भरत क्षेत्र के ३२ हजार देशों में से केवल २५॥ देश ही श्राये हैं। ऐसे हो अन्य क्षेत्रों में भी आर्य भूमि की न्यूनता ही है। इन पन्द्रह कर्म क्षेत्रों में से केवल पाँच महाविदेह क्षेत्रों में ही सदा धर्मक्रिया फरने का सुयोग रहता है। शेष भरत और ऐरवत नामक इस क्षेत्रों में दस करोड़ा करोड़ी सागरोपम जितने काल समय में से केवल एक करोड़ा करोड़ी सोगरोपम काल में ही धर्म क्रियाओं का सयोग रहा करता है इस स्थिति में भी धर्म का सयोग मिलना अति ही कठिन है। यदि किसी प्रकार मिल भी गया तो आर्य क्षेत्र, उत्तम फुल, दीर्घ श्रायु, परिपूर्ण इन्द्रिय सपन्नता, नोरोग शरीर, सुख पूर्वक आजीविका, सद् गुरु दर्शन, शास्त्र श्रवण, मनन, और चिन्तन आदि का सयोग तो गिलना और भी अधिक कठिन है । यदि इन बातों का सयोग मिल भी गया तो भी भव्यत्व, सम्यक्त्व शीलता, सुलभ बोधकता, स्वल्प कर्म शोलता श्रादि की प्राप्ति अति ही कठिन है । ऐसे सब सयोग मिले, तव कहीं धर्म पर रुचि जागृत होती है। तत्पश्चात् हो बोध बीज रूप सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है। देखा। * ३६१२७७० मन लोहे का एक भार माना जाता है । ऐसे हजार भार का एक गाला कोई देवता बहुत वा ने भामाश में ने छोडे और ऐना करने पर वह गोला छ मास, छ दिन, और छ घड़ी में जितना दंत्र पार रे, वह देव एव राड़ परिमाण तमझना चाहिये ।

(४६) * ध्यान-कल्पतरु* में बोध वीज ८प सम्यक्त्व की प्राप्ति कितनी कठिन है ? अत. हे भव्य जन अत्यत पुण्योदय से ही अपन इस उच्च अवस्था तक पहुँच सके हैं। बोध वोज की प्राप्ति हुई है, ऐमो अवस्था में इसे व्यर्थ नहीं खोना चाहिये। श्रात्मा रूपी क्षेत्र में इस सम्यक्त्व रूप बीज को सस्थापित करके ज्ञान रूप जल द्वारा इसका निरन्तर पालन पोपण करते रहना चाहिये । जिससे कि धर्म रूप वृक्ष उत्पन्न हो जाय और इस प्रकार मान रूप फल की प्राप्ति प्रामानी से हो सके। (१२) धर्म भावना-"धारयतोति धर्म " पाप को अोर गिरते हुए प्राणों को जो धारण करे अथवा चावे, *वही धर्म है। ससार सागर विविध दु.खों से भरा हुआ है। इसमें गिरते हुए जीव को वचा करके मोक्ष स्थान में पहुँचाने वाला हो धर्म कहा जाता है । मोक्षार्थी के लिये धर्म का अति अावश्यकता है। अब प्रश्न यह है कि वह धर्म कोन सा है ? श्री दशवकालिक सूत्र के प्रारभ में ही कहा गया है कि "धम्मो मगलमुक्टुि, अहिंमा सजमो तबो" अर्थात मगलकर्ता और सर्वोत्कृष्ट धम वहो है, जो कि अहिमा दया, सयम इन्द्रिय दमन और तप रूप हो। वंद की ऋचा भी कहती है कि "अहिंसा परमो धर्म" अर्थात् परम उत्कृष्ट धम वही है, जहाँ कि अहिंसा फा दया का सर्वान रूप से निवाम हो । विष्णु पुराण में कहा गया है कि:--"अहिंसो लक्षणो धर्म" और अधःप्राणिनाम् वद्य." अर्थात अहिंसा व दया हो धर्म का लक्षण है और हिंसा ही अधर्म है । कुरान कहा गया है कि "फला तज अलू बूतन कुक मका वर लहय वनात' अर्थात तू अपने पेट को पशु पक्षियों की फन मत बनायो। वाइविल में उल्लेख है कि:-Thou shalt not kill अर्थात तू हिंसा मत करना । इत्यादि रूप से मभी शास्त्रों में धर्म का मूल दया ही कहा गया है । दया के दो भेद हैं -स्व दया और पर दया । छः काया जीवों की रक्षा करना, यह तो पर दया है, और अनाचार श्रादि पापों से अपनी श्रात्मा की रक्षा करना सो स्त्र दया है । इन दोनों प्रकार की दयाओं के परिपालन से ही श्रात्मा सर्व दु खों स परिमुक्त हो मकती है और मोक्ष के अनत एव अक्षय सुखों की प्राप्ति कर सकती है। मुमुक्षु प्राणियों के लिये ये बारह ही प्रकार को भावनाएँ मोक्ष प्राप्ति में सीढ़ियों के समान साधन रूप -: पाँचों इन्द्रियों की उपशमता :- इन्द्रियाणां प्रसंगेन, दोपमृच्छत्यसंशयम् । सनियम्य तु तान्येव, ततः सिद्धि नियच्छति ॥ इन्द्रियों के वश में होने से जीत्र अनेक विडम्वनाएँ पाते हैं और इन्द्रियों को अपने वश में करने से प्रानन्दमय मोक्षपद की प्राप्ति कर सकते हैं (१) श्रोत्रेन्द्रिय-जीव सम्बन्धी अजीव सम्बन्धी और मिभ सम्वन्धी शब्दों को ग्रहण करने का स्वभाव कान का है । इसके वश में पड़ने पर मृग पशु श्रादि मारे जाते हुए देखे जाते हैं। (२) चक्षु इन्द्रिय-काला, हरा, लाल, पोला, और सफेद आदि रंग ग्रहण करने का स्वभाव आँख का है । इसके अधीन होने पर पतग धादि प्राणी मरते हुए देखे जाते हैं। * "दुर्गतौ पतन्तम् प्राणिनम् धारणात् धर्म " इति उच्यते । अर्थात् दुर्गति में पढ़ते हुए प्राणी को जो पकड़ ले अयवा बचा ले, उसे धर्म कहा जाता है। योग शास्त्र ।

* ध्यान-कल्पतरु * (४७) - ? (३) घ्राण इन्द्रिय-नाक का स्वभाव सुरभिगन्ध और दुरभिगन्ध प्रहण करने का है । इस के वश में पड़ने पर भ्रमर श्रादि जीव अपने जीवन से हाथ धोते हुए पाये जाते हैं। (४) रसना इन्द्रिय-जिला का स्वभाव खट्टा, मीठा, तीखा, कडुश्रा, और कपायला आदि रमो को ग्रहण करने का है। इसके वश में पड़कर मछत्ती आदि जीव मृत्यु का सामना करते हुए पाये जाते हैं। (५) स्पर्श इन्द्रिय-इसका स्वभाव हलका भारी, ठण्डा, गरम, लूखा, चिकना, कोमल, खुरदरा, आदि जानने का है । इसके वशीभूत हुए प्राणी हाथो आदि मारे जाते हुए पाये जाते हैं। विचार कीजियेगा कि एक इन्द्रिय के वश में पड़ने पर भी अकाल मृत्यु देखी जाती है, तो फिर पाँचां इन्द्रियों के वश में पड़ने वालों की तो कैसी दुगति होगी? कृत कर्मों का बदला तो दुर्गति में जाकर अवश्य ही भोगना पड़ेगा। अज्ञान के कारण से ही जीव दु ख रूप इन्द्रियों के विषय में सुख मानते हैं । आश्चर्य तो इस बात का है कि- (अ) यदि शब्द सुनने मात्र से ही सुख प्राप्त होता हो तो गाली सुनकर दुख क्यों होता है ? जव कि स्त्रियों द्वारा गाई जाने वाली गालियों से तो सुख अनुभव होता है । शब्द प्रहण करने का और सुखोत्पत्ति का स्थान एफ ही है तो यह विभेद क्यों उत्पन्न हुआ (आ) रूप देख करके प्रसन्न हुआ करते हैं, तो फिर अशुचि पदार्थ देखकर घृणा क्यों करते हैं ? वह अशुचि पदार्थ भी तो पूर्वकाल में चित्त के लिये श्राफर्षण पदार्थ था । एवं यही पदार्थ भविष्य में पुनः रूपान्तरित होकर उपयोगी अवस्था में परिणत हो सकता है। यदि आपको वास्तव में अशुचि पदार्थों से घृणा है तो स्त्री सम्बन्धी अशुचि कार्यों के प्रति आनन्द अनु. भव क्यों करते हैं? (इदुर्गन्ध श्राने पर नाक को क्यों सिकोड़ते हो ? यह भी तो पदार्थ का ही एक धर्म है । दुर्गधिन पदार्थ भी तो अन्य पर्याय में परिवर्तित होकर मनोहर हो जाया करते हैं। यदि वास्तव में दुर्गन्ध के प्रति घृणा हो तो मृत्यु लोक सम्बन्धी पाँच सौ योजन पर्यन्त क्षेत्र व्यापी दुर्गंध से सदैव के लिये सच्चे अर्थो में मुक्त होने का प्रयत्न क्यों नहीं करते हो ? (ई) जिह्वा के धर्म रूप मधुर रस से ही जो सुख की प्राप्ति होती हो तो फिर वैद्य से ऐसा क्यों कहा जाता है कि "शक्कर खाई, जिससे बुखार आ गया। तथा घो खाया, जिससे खांसी हो गई ।" इस प्रकार घी शक्कर जैसे पदार्थों से भी दुख उत्पन्न हो सकता है, तो फिर अन्य पदार्थों की तो बात हो क्या है । आयुर्वेद कहता है कि "रस भोक्ता ते रोगयुक्ता अर्थात् अमर्यादित रसों के भोगा रोगों के घर ही हुआ करते हैं । इस प्रकार रस का भोग नव रोग का हो कारण है, तो फिर इसमें सुख कैसे माने ? (उ) चित्त मुनि ने ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती से कहा है कि "सब्वे श्रामरणा भारा, सव्वे कामा दुहावहा" अर्थात सभी प्रकार के आभूषण भार रूप ही हैं तथा सभी भोग दुःखों को हो जाने वाले हैं। यह उक्ति सर्वथा सत्य ही है । जैसे सोना भी धातु है और लोहा भी धातु है । राजा की भोर से सोने को वेदी मिलने पर तो प्रसन्नता होती है कि हमें पैर में सोना पहिनने की शुभ श्रामा प्राप्त हुई है, और जब लाहे की वेदी पहिनाई जाती है, तब रोना पाता है, इस ।

(४८) * ध्यान-कल्पतरु * . विचार से जाना जा सकता है कि भूपण श्रादि वाद्य पदार्थों में सुन्य दुःख नहीं रहा हुआ परन्तु म्वय की कल्पना में ही सुख दुःख का स्थान है । फाम भोग भी इसी प्रकार सुख के दाता नहीं, परन्तु दु.ग्व क ही दाता हैं। इनका नाम हो विषय है। विप और विषय में केवल "य" का ही फर्क है। और इसी फर्क के कारण विषय विप से भी अत्यधिक घातक हैं। विप तो खाने पर ही खाने वाले को मारता है । जव कि विपय नो उसक विचार मात्र से ही विदल और पागल बना कर विषयी की नाना प्रकार से वेइज्जती कराता है । कहा भी है कि विपस्य विपयाणां च, दूरमत्यन्तमन्तरम् । उपमुक्ते विपं हन्ति, विपयास्तु स्मरणादपि ॥ विप और विषय में अत्यन्त ही अन्तर एव दूरी है । क्यों कि विप तो खाने पर प्राण हरता है, नव कि विपय स्मरण मात्र से हा मार डालता है। भगवान का आदेश है कि "काम भोगानुरयण अणतससारवडण" अर्थात् काम भोगों में अनु रस्त रहने से अनत ससार वढता है । साराश यह है कि विष तो एक हा भव में मारता है, जब कि विषय अनत भव तफ मारता ही रहता है। यह विषय भोग इतना मधुर जहर है कि इसके प्रताप से वडे २ ज्ञानी और ऋपि मुनि भी विह्वल हो जाते हैं, विषय सुख को वाचो किया करते हैं और पतित भी हो जाया करते हैं। किन्तु यह विचार करियेगा कि इससे कितनी और कैसा हानियाँ हुआ करती हैं । शक्ति, बुद्धि, तेज, सत्त्व श्रादि सात्विक गुण तो नष्ट हो जाया ही करते हैं, किन्तु साथ २ में अति लोलुपता के कारण से सुजाक, प्रमेह गर्मी आदि विविध वामारियों भी उत्पन्न हो जाती हैं, जिमसे सड़ सड़ कर, कीडे उत्पन्न हो जाया करते हैं और अत में घोर वेदना सहन करते हुए मर कर नरक में उत्पन्न होना पड़ता है, जहाँ कि अग्नि से परितप्त, लाल लाल लोहे की पुतलियों से चिपटना पड़ता है और करुण श्राक दन करना पड़ता है। ऐसे दुखों के सागर समान विपय को सुख का मागर माने. उसे बुद्धिमान कैसे कहा जाय ? इस प्रकार अत्यन्त कष्टप्रद हम खेल पर लक्ष्य देकर धर्म ध्यानी पाँचो इन्द्रियों सम्बन्धी विषय भोग की अभिलाषा रूप अज्ञानता को दूर कर निर्विषयी एव निर्विकारी बन कर परम सुख को प्राप्त करें। किं वहुना लेखनेन इह, संक्षेपादिदमुच्यते । त्यागो सर्व विषयाणाम्, कर्त्तव्योऽखिलमुमुक्षुभिः ।। अधिक लिख कर क्या करना है ? सक्षेप से इतना ही कहना है कि "मोक्ष के अभिलापियों को सर्वथा विषय का परित्याग हा कर देना चाहिये " -: दया भाव :- श्रीसूत्रकृताग (सूयगडाग) सूत्र के द्वितीय श्रुतस्कन्ध के प्रथम अध्ययन में परम पूज्य अरिहन्त भगवान् ने फरमाया है कि- ® दीपक देख पतग जला, और म्वर शब्द सुन मृग दुखदाई । सुगध लेई - मरा भ्रमरा, और रस के कान मच्छी विरलाई ॥ काम के काज दुखी गजराज, यह प्रपत्र महा दुखदाई । जो मुक्ति पद चाहत हो, इन पांचों को वश कीजे रे भाई ।। 1 * ध्यान-कल्पतरु * (४६) "तत्थ खलु भगवता छजीवनिकायहेऊ पण्णत्ता । तंजहा-पुढवीकाए जाव तसकाए । से जहाणामए मम असायं दंडेण मुट्ठीण वा लेलूण या कवालेण वा आउट्टिजमाणस्स वा हम्ममाणस्स वा तजिजमाणस्स वा ताडिजमाणस्स वा परियाविजमाणस्स वा किला मिजमाणस्स वा उद्दविजमाणस्स वा जाव लोमुक्खणणमायमवि हिंसाकारगं दुक्खं भयं पडिसंवेदेमि, इच्चे जाण सव्वे जीवा सन्चे भूता सव्वे पाणा सव्वे सत्ता दंडेण वा जाव कवालेण वा श्राउट्टिज- माणा वा हम्ममाणा वा तजिअमाणा वा ताडिजमाणा वा परियाविजमाणा वा किलामिज- माणा वा उद्दविजमाणा वा जाव लोमुक्खणणमायमवि हिंसाकारगं दुक्खं मयं पडिसंवेदन्ति । एवं नच्चा सव्वे पाणा जाव सत्ता ण तया, ण अजायेयव्वा ण परिघेतव्या, ण परितावे- यन्वा, ण उद्दवेयव्वा । से बेमि जे य अतीता जे य पडुप्पन्ना जे य आगमिस्सा अरिहंता भगवंता सव्वे ते एवं आइक्खंति, एवं मासंति, एवं पण्णवेन्ति, एवं पर्वेति सव्वे पाणा जाव सत्ता ण हतव्या ण अजावेयव्वा, ण परिघेतव्वा, ण परितावेयव्या, ण उद्दवेयध्या। एस धम्मे धुवे णितिए सासए, समिञ्च लोगं खेयहिं पवेइए।" द्वादश जाति की परिषद् में भगवान श्री तीर्थंकर देव ने निश्चय के साथ फरमाया है कि "छ काया के जीवों की हिंसा कर्म वन्ध का कारण है।" उन छ. काया के नाम इस प्रकार हैं -पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु, वनस्पति और त्रस । इनके दुख को अपने ऊपर घटाते हुए दृष्टान्त पूर्वक समझाते हैं कि "जैसे मुझे असाता देने से, दंड से, हड्डी से मुष्टि से, पत्थर स, ककर से, माग्ने से, तर्जना ताड़ना द्वारा परिताप उत्पन्न होता है, दुख देने से उद्वग उत्पन्न होता है, काया को प्राण रहित कर देने से, शरीर के बालों को उखाड़ने से ऐसे हो हिंसा के कारणों से, जैमा दु ख और डर मुझे होता है ऐसा ही सभी जीवों को, सब स्थावर काय के जीवों को, सभी विकलेन्द्रिय प्राणियों को, यावत् एकेन्द्रिय जीव से लेकर पचेन्द्रिय जीव तक के सभी प्राणियों को दडे से, ककर श्रादि से, आक्रोश ताड़ना से, तजन से, परिताप उपजाने से, दुख देने से, उद्वग उत्पन्न करन से, प्राण रहित करने से रोम मात्र उखाड़ने से, एवं ऐसे ही अन्य हिंसामय कृत्यों से व जीव भी अपने समान हो दुख अनुभव करते हैं और इसी प्रकार डरा भो करते हैं । ऐसा जान कर किसी भी प्राणी, भूत, जीव, सत्व को मारना नहीं, दडे से ताड़ना नहीं, बल पूर्वक पकहना नहीं, या कष्ट देने की दृष्टि से किसी काम में लगाना नहीं, शारीरिक मानसिक दु ख उत्पन्न करके परिताप पहुँचाना नहीं, किंचित् भी उपद्रव करना नहीं, शरीर को निर्जीव करना नहीं, ऐसा उपदेश गत काल में हुए अनत तीर्थंकरों ने दिया है, वर्तमान काल में भी तीर्थंकर ऐसा ही उपदेश देते हैं, और भविष्यत् काल में होने वाले तीर्थकर भो ऐसा हो उपदेश देवेंग। तीनों काल के तीर्थंकरों का ऐसा ही समान उपदेश है जो कि सदेह से रहित है। साराश यही है कि किसी भी प्राणी भूत, जीव सत्व को नहीं मारना नहीं ताडना, तर्जन परिताप नहीं पहुँचाना, वधन में नहीं डालना, शारीरिक मानसिक दु ख उत्पन्न नहीं करना, यावत काया से प्राणों को विलग नहीं करना" यही दया रूप धर्म व है नित्य है, शाश्वत है । इन वचनों के प्रति ऐसा ही विचार फरना कि "सभी जीव वेचारे फर्मों के वश में होकर दुःख के सागर में पडे हुए हैं, उनके दुम्स को जानने पाले खेदज्ञ श्री तीर्थकर भगवान ने फरमाया है कि सबको दया पालो, सब का रक्षा करो।" । - - (५०) * ध्यान-कल्पतरु * - . कल्लाण-कोडि-जणणी, दुरंत दुरिया दूर ठवणी । मंसार भव नल तारिणी, एगंत होइ सिरी जीवदया ।। करोड प्रकार मे यानो विविध रोति से कल्याण को उत्पन्न करने वाली, दुर्दमनीय दुरित यानो पाप का नाश करने वाली, ससार रूप महा मागर को पार करने में नौका के समान, इत्यादि अनक सत्कामों को करने वाली, और सत्कल को देने वाली, ऐमी श्री जीव दया माता हे * दया ही धर्म का मूल है। सभी मत मतातर केवत्त एक दया के महारे से ही चल रहे हैं । दया अनुकम्पा सम्यक्त्वी का (धर्मी का ) लक्षण है । श्रादर्श सिद्वान्त रूप पवित्र दया को धर्म ध्याना अपने हृदय में सदैव स्थान देते हैं । मदा दया युक्त भाव रखते हैं। दयालु अन्य जीवो को दुःखी देवकर परुणा लाते हैं। त्रम श्रथवा स्थावर जीवों को शारीरिक गेगो से एव चिन्ता आदि मानसिक पीड़ाओं से पीडित देखकर उन्हें करुणा उत्पन्न हो जाया करती है । जैसे प्रत्यक्ष रूप से किसी बधिर यानी बहरे प्राणी को देसकर दया शील विचारने लगता है कि "इस वेचारे के फोन से पाप का उदय है कि जिसके कारण से यह सुन नहीं सकता है ।" अथवा एक ही प्राणो को अया और वहिरा देस कर और भी अधिक दया के भाव उत्पन्न हो जाया करते हैं । इसी प्रकार किसी को भगो- पाग से हीन, अथवा अन्न वस्त्र से रहित, अथवा रोग शोक से ग्रसित देख कर अनेक प्रकार के अनुकम्पा के विचार उत्पन्न हुन्श्रा करते हैं। इसी तरह से दीन अनाथ तिर्यंच पशु अन्न वस्त्र, गृह इत्यादि के दृष्टिकोण से निराधार है, पराधीनता वश होकर क्षुधा तृपा, शीत आतप, आदि विविध दुःख सदैव भोगा करते हैं। तिर्यश्च पचेन्द्रिय जीव की अपेक्षा से चतुरिन्द्रिय जीव को दुख अधिक है, क्योंकि वह उसकी अपेक्षा से एक इन्द्रिय हीन है, इस रीति से चतुरिन्द्रिय से तीन इन्द्रिय वाले जीव में, तीन इन्द्रिय से दो इन्द्रिय वाले जीव में,दो इन्द्रिय से एक इन्द्रिय वाले जीव में,और एकेन्द्रिय से निगोद वाले जीव में उत्तरोत्तर दुग्व अधिकाधिक रूप से व्याप्त है। क्योंकि निगोद अवस्था में एक ही शरीर में अनन्त जीव एक शरोरी रूप से रहते हैं। एफ मुहूर्त में ये जीव ६५५३६ जन्म मरण करते हैं । इनकी इतनी दयनीय दशा है कि दुःख से छूटने का उपाय करने की शक्ति तो दूर रहो परन्तु अपना दुख भी ये प्राणी दूमरों को प्रदर्शित नहीं कर सकते हैं। ये बेचारे कृतकर्मों का फल भोगते रहते हैं। इनकी घात करने वाले नित्य नूतन कर्मो का बन्धन करते रहते हैं। कर्मों को बांधने वालों की भी भोगते समय ऐसो हो दशा होती है। किन्तु भोजिनेश्वर देव के * दीर्घ दृष्टि से महादयालु श्रीतीर्थकर मगवान् के वचनों की ओर दृष्टिपात कीजियेगा, उनका श्रीमुख से म्पष्ट श्रादेश है कि छ' काय में से किसी भी एक जीव की हिंसा करने से उस जीव को भी मेरे ही समान दुख का अनुभव होता है। ऐसी स्थिति में धर्म के नाम पर अथवा अन्य रीति से हिंसा करके उस परम पिता प्रभु को प्रसन्न करना चाहते हो? यह कितनी मोह मय श्रज्ञान दशा है। + अणिक राजा के मुत, हाथी भव दया पाली, मेघरथ दया कान, माड दियो मरणो। धर्म रुचि दया धार, कर गया वेड़ा पार, बोणिक पड़ह बजायो, सूत्र में है निरणो॥ नेमिजी ने दया पाली, छोड़ टी राजुल नारी, मेतार्यजी ने दया पाल, मेट दियो मरणो । तेवीसवां जिनराज, तापस के पास जाय, जीवने बचाय दीनो, नवकार को है शरणो।। सवैया सवायो कीनो, घनाक्षरी नाम दीनो, जीव दया धर्म पालो, जो तुम चाहो तिरणो। -कृपाराम मुनि ।

* ध्यान-कल्पतरु * ( ५१ ) अनुयायी और दयाधर्म के महत्त्व को जानने वाले ज्ञानी ही इन जीवों को अभयदान देते हैं। दया धर्मी अनुभव करता है कि ससार में चोरों ओर हिंसा का ताडव नृत्य हो रहा है, परन्तु मेरे प्रबल पुण्यों का उदय है कि श्री जैन धर्म का ज्ञान मुझे प्राप्त हुश्रा । श्री सूयगडागजी सूत्र में कहा गया है कि “एय खु नाणिणो सार, जन्न हिंसइ किंचण" अर्थात निश्चय रूप से ज्ञान प्राप्त करने का सार यही है कि किंचित् मात्र भी जीव की हिंसा कदापि नहीं करना । इमलिये निरन्तर ऐसा ही ध्यान करना कि "श्रव तीनों योगों को विशुद्धि के साथ मभी जीवों को अभय दान देने वाला बनूं । सभी के प्रति वैर विरोध से निवृत्ति ले लू" ऐमा करने से फिर मुझे मोक्ष में जाने से कोई भी किसी भी प्रकार से रोकने में समर्थ नहीं हो सकेगा। अतएव यह त्रिकाल सत्य सिद्धान्त है कि 'दया ही मोक्ष का सधा हेतु है।" -: बन्ध :- - - - फर्मों के बंधन से परिमुक्त होने पर ही आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति हुश्रा करती है । इसलिये मुमुक्षु के लिये बन्ध का म्वरूप जानना अति आवश्यक है। सूत्र में बध चार प्रकार का वतलाया गया है - प्रकृति वध स्थिति बध, अनुभाग बध और प्रदेश बध । इन चारों प्रकार के बध का स्वरूप मोदक के दृष्टान्त से समझाया जाता है.-- (१) प्रकृति बधः-जैसे सूठ आदि पदार्थों से निर्मित मोदक का स्वभाव वायुजनित रोगों को मिटाने का होता है, उसी प्रकार ज्ञानावरण कर्म का स्वभाव ज्ञान को रोकने का है । दर्शनावरण कर्म का स्वमाव दर्शन गुण को आच्छादित करने का है। वेदनीय कर्म का स्वभाव अमत निराबाध सुख को उत्पन्न नहीं होने देने का है । मोहनीय कर्म का स्वभाव निर्मलता और निर्ममत्व गुण को प्रकट होने से रोकने का है आयुष्य फर्म का स्वभाव अजर अमर स्थिति नहीं पैदा होने देने का है । नाम फर्म का स्वभाव अमूर्त धर्म एव अरूप धर्म को पैदा होने देने से रोकने का है । गोत्र फर्म का स्वभाव सर्वोच्च स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त करने में बाधा डालने का है । और अन्तराय कर्म का स्वभाव अनत शक्ति एव अनत बल वीर्य को रोकने का है। (२) स्थिति वध -जैसे अमुक पदार्थो से निर्मित मोदक अमुक महीनों तक अथवा अमुक समय तक नहीं विगढ़ता है, एव अमुक काल तक टिक सकता है, इसी प्रकार ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अतराय, इन चारों कर्मो की उत्कृष्ट स्थिति तीस करोड़ा करोड़ी सागरोपम की है । मोहनीय कर्म की स्थिति * एक इन्द्रिय वाले जीव की हिंसा की अपेक्षा से दो इन्द्रिय वाले लीव हिंसां में पाप अधिक रहा हुआ है, दो इन्द्रिय वाले जीव की हिंसा की अपेक्षा से तीन इन्द्रिय वाले जीव की हिंसा में पाप अधिक रहा हुआ है, यो उत्तरो- चर तीन इन्द्रिय वालों की अपेक्षा से चतुरिन्द्रिय वाले जीव में, चतुरिन्द्रिय वाले जीव से पचइन्द्रिय वाले नीव में, तियंच की अपेक्षा से मनुष्य की हिंसा में पाप अधिक रहा हुअा है । साराश यह है कि जो उच्च स्थिति अपेक्षा कृत प्राप्त हुई है, उतका कारण अनन्तानन्त पुण्य की वृद्धि और उसका उदय है। इसी कारण से उत्तरोचर हिंसा ननित पाप की मात्रा अधिकाधिक होती जाती है । जैसे अतिसाधारण स्थिति वाले दीन हीन श्रादमी को गाली देने में और किसी उच्च और वहे श्रादमी को गाली देने में दोनों की स्थिति में महान् अन्तर है, वैसे ही उत्तरोतर परिवर्तित स्थिति के कारण उन वीवों की हिता के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिये । लो जीव जितना ही उच्च स्थिति को प्राप्त हुआ है, वह उतने ही अशों में श्रात्म फ्ल्याण के समीप पहुचा है। अतएव उसको मारने से उसके श्रात्म कल्याण के प्रति महती हानि हुइ है अत गृहन्थियों को चाहिये कि स्थावर काय वाले पदार्थो की मर्यादा लेते हुए निर्दोष त्रस जीवों की हिंसा से अपने श्रापको वचावें। . - ( ५२ ) * ध्यान-कल्पतरु * सित्तर करोहा करोड़ो सागरोपम की है । नाम तथा गोत्र कर्म की उत्कृष्ट स्थिति वीम करोड़ा फरोडी सागर की है । ग्व आयुष्य वर्म फी उत्कृष्ट स्थिति तैतीस सागर की है। (३) अनुभाग वध -जैसे अमुक मोदक का म्वाद मीठा होता है और अमुक को कडुश्रा, तरह से ज्ञानावरण फी दशा वादला द्वारा सूर्य को ढक देन जैयो, दर्शनावाण की दशा आँखों पर पट्टो देने जैमी, वेदनीय की शहद में लिप्त तलवार की धार को चाटने जैसी, मोहनीय को मदिरा पीन से उर नशे के जैमी, श्रायुष्य की खोडे वही जैसी, नाम कर्म की कुंभकार द्वारा निर्मित घट, कलशा श्रादि जै गोत्र कर्म की चित्रकार द्वाग चित्रित चित्रां जैमी, और अतगय कर्म का दशा इन्कार करने वाले भडारं जैसी कही गई है। (४) प्रदेश बन्ध-जैसे अमुक मोदक के निर्माण में दुगुनी शकर पडती है तो अमुक प्रकार के मोदक में तीन गुनी श्रथवा चार गुनी। इसी प्रकार स किसी कर्म के प्रदेशों की वर्गणा सख्यात हात तो किमी की अनन्तानन्त वर्गणा होती है। चारों वध में से प्रकृति वध और प्रदेश वध तो योगों की प्रवृत्ति से हुआ करते हैं। तथा स्टि और अनुभाग वध कपायों के कारण से हुश्रा करते हैं। ये चारों वधन प्रवाहिक रूप से जीव के स अनादि काल से चले आ रहे हैं। किसी ममय लोन रमोदय होता है तो किसी समय मन्द रसोदय । सर में यह दृश्य देखा. जाग है कि कोई कर प्रकृति वाला है तो कोई शात प्रकृति वाला । कोई दीर्घायु है कोई अल्पायु है। कोई सुसयोगों वाला है तो कोई दुष्सयोगों वाला है। कोइ गौर वर्ण वाला एव सुम ठित शरीर वाला है, तो कोई कुरूप काला और दुप्सगठित शरीर वाला है। इन विचित्र परिस्थितियों देखकर अच्छे पर न तो राग करना चाहिये और बुरे पर न द्वेप ही लाना चाहिये । उन वेचारे प्राणिय फा इममें क्या दोष है ? जिनके जैमा बन्ध का उदय है उनको वैसा सयोग प्राप्त हुआ है। इस स्थिति ! वदलन की शक्ति उनमें नहीं है। अतएव उन्हे भला बुरा नहीं फहना चाहिये। इस प्रकार सद् भावन धनाये रखें। यदि स्वयं के लिये भी इट अथवा अनिष्ट सयोगा की प्राप्ति हुई हो तो भी धर्म ध्यानी स भावनाएँ बनाये रखें, तथा हर्प शोक से अतीत रहे । ऐसी स्थिति द्वारा हो परम श्रानन्द रूप सुख रूप मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। -: मोक्ष गमन :- बघ - और पर - A "वन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोनो ही मोक्षः " -तत्वार्थ सूत्र -- जैसे घीज में से अंकुर उत्पन्न होने का अनादि कालीन स्वाभाविक शक्ति सम्बन्ध रहा हुआ है किन्तु यदि उस बीज को अग्नि द्वारा किंचित जला दिया जाय तो वह अकुर उत्पत्ति की शक्ति नष्ट हो जात है। उसी तरह से यदि उपरोक्त चारों प्रकार के वधमय सम्पूर्ण कर्मो को 'वध अभाव और निजरा रूप ध्यानानि द्वारा पूर्ण रीति से जला दिये जाय तो जन्ममरण रूप ससार से मुक्ति प्राप्त होकर मोक्ष स्थिति उत्पन्न हो सकती है। से बन्धन के संयोगा से तुम्बा पानी में डूबा रहता है, और उम वधन के टूटते ही जैसे तुम्ब स्वभावत. जन की सतह पर आकर तैरने लगता है वैसे ही आत्मा का स्वभाव भो कर्मों के वधत्तों के टूटते * ध्यान-कल्पतरु * ( ५३ ) । हो मोक्ष स्थान के अग्र भाग पर तत्काल पहुँच कर स्थित हो जाने का है ।* उस मोक्ष स्थान का स्वरूप इस प्रकार का है:--लोक के मध्य में जो चौदह राजू लवी सनाड़ी है, उसके सर्वोच्च भाग पर पैंतालीस लाख योजन की लबी चौड़ी गोलाकार पत्ते जैसी एक सिद्ध शिला है, जो कि मध्य में पाठ योजन जितनी मोटी है, यह क्रमश पतली होती होती अतिम किनारे पर अत्यत पतली है, अत्यत निर्मल श्वेत रग वाली है। इस शिला का प्रतिम भाग एक योजन जितना है, उसमें से भी चौथाई योजन के छठे भाग जितने क्षेत्र में ही सिद्ध स्थान अथवा मोक्ष स्थान है । जहाँ पर कि मुक्त आत्माएँ अत्यत विशुद्ध स्व-आत्मप्रदेशों के रूप में सस्थित हैं। यह मोक्ष स्थान लोकाकाश और अलोकाकाश के अत्यत सर्वोच्च सघि स्थान पर स्थित है । विशुद्धतम से विशुद्धतम आत्म प्रदेशों की स्थिति हो सिद्ध अवस्था है। एक श्लोक द्वारा सिद्ध भगवान् के स्वरूप को इस प्रकार वर्णन करने का प्रयास किया गया है आत्मोपादानसिद्धं स्वयमतिशयवद् वीतवाथं विशालं, वृद्धिहासव्यपेत विषयविरहितं निष्प्रतिद्वन्द्वभावम् । अन्यद्रव्यानपेक्षं निरुपममितं शाश्वतं सर्वकालम् , उत्कृष्टानन्तसारं परमसुखमतस्तस्य सिद्धस्य जातम् ॥ श्री सिद्ध परमात्मा निज आत्म स्वरूप में सस्थित हैं, स्वय अतिशय युक्त हैं, अव्याबाध स्थिति पाले हैं, हानि-वृद्धि से रहित हैं, प्रतिपक्षमय प्रतिस्पर्धा से रहित हैं, अनुपम हैं, ज्ञान आदि की अपेक्षा से अनन्त स्वरूप हैं, नित्य है, सर्वकाल उत्तम हैं, परम सार युक्त हैं, इत्यादि रूप से अनतानत सुख का अनुभव करते हुए सिद्ध परमात्मा शोभायमान हैं । सिद्ध परमात्मा अतीन्द्रिय सुख के भोक्ता हैं, इन्द्रिय सुख सो क्षणिक और कहने मात्र का है, एव परिणाम की दृष्टि से भी दुख रूप ही है। इन्द्रियों के विषयों का पोषण दु ख का सागर ही है, ऐसा पहले हो कहा जा चुका है, अत. सिद्ध भगवान् अतीन्द्रिय अनन्त सुखों के भोता है। आठों कर्मों के प्रात्यतिक क्षय होने पर ही सिद्ध अवस्था की प्राप्ति हुई है, अत सिद्ध परमात्मा में इस प्रकार गुणों का आविर्भाव हुअा है:- ज्ञानावरणीय कर्मों के नष्ट होने से अनतानत स्वरूप केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई है । दर्शनावरणीय कर्मों के नाश से अनत रूप केवल दर्शन उत्पन्न हुआ है । वेदनीय कर्म के क्षय से निरावाघ और अक्षय सुख प्राप्त हुआ है । मोहनीय कर्म के कटने से शुद्व क्षायिक सम्यक्त्वशील एव निर्मल रूप हुए हैं । आयुष्य फर्म के दूर हाने से अजरामर पदवी पाये हैं । नाम कर्म के अलग होने से अरूप अवस्था मिली है। गोत्र कर्म के झड़ जाने से दुर्गुणो से रहित सर्वोच्च अवस्था प्राप्त हुई है। अन्तराय फर्म के खत्म हो जाने से अनत दान लब्धि, लाभ लब्धि, भोग लब्धि, उपभोग लब्धि और अनन्त वल वीर्य लब्धि के धारण हार हुए हैं। इस प्रकार सिद्ध भगवान के अनत गुण हैं। ध्यानी इन्हीं गुणां का ध्यान करता रहे । * जैसे जितनी पानी की सतह होती है, वहीं तक तुम्बा आकर ठहर जाता है, एव ऊपर नीचे अधिकाधिक मिनागमन नहीं करता है, वैसे ही लोक के अग्रभाग से आगे धर्मास्तिकाय का अभाव होने से जीव वही तक जाकर टदर जाता है, और इसी कारण से भागे अलोवाकाश में गति नहीं कर सकता है।

( ५४ ) * ध्यान-कल्पतरु * - -: गति गमन :- नरक गति, तिर्यञ्च गति, मनुष्य गति, देव गति और मोक्ष गति के, प्रत्येक के चार चार कारण कहे गये है:- -- (१) महा प्रारम्भ वाला-सदा त्रस स्थावर जीवों की हिंसा होती हो, ऐसे कारखाने श्रादि का चलाने वाला। (२) महा परिग्रह वाला-अनर्थ रीति से भी द्रव्य का उपार्जन करने वाला, पाप कार्य करते हुए नही डरने वाला, "चमडी जावे, परन्तु दमड़ी नही जावं" ऐसा महा लालची और कृपण । (3) कुत्सित थाहारी-मॉस मदिरा का सेवन करने वाला, अभक्ष्य पदार्थों का भक्षक । (४) पचेन्द्रिय जीवा का घातक-मनुष्य पशु आदि की घात करने वाला। इन चारों फर्मों वाला, अथवा इनमें से किसी भी एक का फर्ता मर कर नरक गति में जाने वाला होता है। (५) मायावी = कपटी दगावाज । (६) निविड मायावी = मीठा ठग, धूर्त । (७) मत्मरी गुणों का द्वेपी। (८) कूड माणे कूड तोले = खोटा तोल और खोटा माप रखने वाला । इन चारों फर्मो वाला अथवा इनमें से किसी भी एक का आचरण करने वाला मर कर तिर्यञ्च गति में जाने वाला होता है। (६) भद्रिक सरल स्वभाव वाला, (१०) विनीत नम्र, कोमल स्वभाव वाला, मेल मिलाप रखने वाला, (११) दयालु = दुःखी को देखकर करुणा लाने वाला, यथा शक्ति दुःखी की सहायता करने वाला, (१२) अमत्सरी-गुणानुरागी, शुभैपो । इन चार कर्मों वाला प्राणी मनुष्य गति में जायो करता है। (१३) मराग-सयमी- शरीर पर, शिष्य पर, उपकरणों पर ममत्व भावना रखने वाले साधु, (१४) सयमासयमी= श्रावक, (१५) वाल-तपस्वी-हिंसामय तपस्या करने वाले, कद मूल के भक्षक तपस्वी, (१६) अकाम निर्जरा-पराधीनता अथवा परवशता के कारण से दु ख सहन करने वाले, इस प्रकार इन चार कामों वाले प्राणी देवगति में जाया करते हैं। (१७) ज्ञानी-जीव श्रादि नौ तत्त्वों के यथार्थ ज्ञाता, (१८) दर्शनी-सायिक सम्यक्त्व वाले, यथार्थ श्रद्धा वाले, (१६) चारित्र शील-यथाख्यात चारित्र वाले, शुद्ध सयमी, (२०) तपस्वी-सम्यक ज्ञान पूर्वक यथार्थ रीति से तपस्या करने वाले, इन चार कामों के करने वाले मोक्ष में जाया करते हैं । इस प्रकार धर्म ध्यानी इन बीस कामों में से चार गति के १६ कामों को छोड़कर मोक्ष में पहुँचाने वाले केवल चार कामों की हो साधना करे। -: हेतु :- - ससार-परिभ्रमण के सत्तावन हेतु कहे गये हैं- पच्चीस कपाय, पन्द्रह योग, वारह अवत, पाँच मिथ्यात्व, ये ही सत्तावन हेतु है । इनका स्पष्टी करण इस प्रकार है-~- पच्चीस कपाय-(१) अनन्तानुबंधी क्रोध-पत्थर की विभाजित रेखा समान, जो कि कभी भी नहीं मिले । (२) अनन्तानुवधी मान-पत्थर के स्तम्भ समान, जो कि कभी भी मुके नहीं । (३) अनन्तानुवधी * ध्यान-कल्पतरु * ( ५५ ) । माया-बॉस की जड़ समान, गाँठ में भी गाँठ । (४) अनन्तानुबधी लोभ-किरमिच के रंग समान, जल जाय तो भी नहीं मिटे। इन कषायों वाला मृत्यु प्राप्त करके नरक में नाता है। और इन कपायों वाला मिथ्यात्वी ही होता है। (५) अप्रत्याख्यानावरण क्रोध-पृथ्वी की विभाजित रेखा समान, जो कि वर्षा होने पर मिल जाय । (६) अप्रत्याख्यानावरण मान-हड़ी के स्तम्भ समान, जो कि प्रयत्न करने पर झुक जाय । (७) अप्रत्याख्यानावरण माया-मेंढे के सींग समान विकृति वानी । (८) अप्रत्याख्यानावरण लोभ-गाड़ी के पहिये के ओंगन के रग समान, नो फि क्षार आदि द्वारा विशेष प्रयत्न पर, ठीक किया जा सके । इन कषायों वाला श्रावफव्रतों को नहीं ग्रहण कर सकता है। एव मृत्यु प्राप्त करके तिर्यञ्च । एव मृत्यु प्राप्त करके तिर्यञ्च गति में जाता है । (8) प्रत्याख्यानावरण क्रोध-धूलि अथवा रेत की रेखा के समान, जो कि हवा के चलते ही समान रूप धारण कर लेती है। (१०) प्रत्याख्यानावरण मान-काठ स्तम्भ समान, (११) प्रत्याख्यानावरण माया-चलते हुए बैल के मूत्र समान इधर उधर टेढ़ाई लिये हुए। (१२) प्रत्याख्यानावरण लोभ--कीचड़, मैल आदि के रग जैसी स्थिति वाला । इन कषायों वाला साधु व्रतों को ग्रहण नहीं कर सकता है और मृत्यु प्राप्त करके मनुष्य गति में जाया करता है। (१३) सज्वलन क्रोध-जन रेखा के समान । (१४) सज्वलन मान-बेत लता अथवा तृण समूह समान । (१५) सन्चलन माया-बांस के छिलके के समान (१६) सज्वलन लोभ-पतग के रग अथवा हल्दी के रग समान । इन कषायों वाला यथाख्यात चारित्र को और केवल ज्ञान केवल दर्शन को नहीं प्राप्त कर सकता है । मृत्यु प्राप्त करने पर ऐसी आत्मा देव गति में जाया करती है। (१७) हास्य इसना । (१८) रति प्रसन्नता पूर्वक राग माव । (१९) अरति उदासीनता पूर्वक उपेक्षा अथवा द्वष । (२०) भय-हर । (२१) शोक-चिन्ता । (२२) दुगुछा-घृणा, नफरत । (२३) स्त्री वेद-पुरुष के साथ मैथुन भावना । (२४) पुरुष वेदत्री के साथ मैथुन भावना । (२५) नपुसक वेद-स्त्री पुरुष के साथ मैथुन भावना । इन पचीस ही कषायों के सयोग से कमों में अनुभाग शक्ति और स्थिति शक्ति पैदा हुआ करती है। , - जलता योगों के पन्द्रह भेद इस प्रकार हैं -१ सत्य मनोयोग, २ असत्य मनोयोग, ३ मिश्र मनोयोग और ४ व्यवहार मनोयोग, जो सत्य और असत्य दोनों से रहित हो, वह व्यवहार मनोयोग है । जैसे किसी गाव में पहुंचने पर यह कहना कि "अमुक गांव आ गया ।" तेल, बत्तो के जलने पर भी यह कहना कि "दोपक इत्यादि रूप से व्यवहार का स्वरूप समझ लेना चाहिये । ५ सत्य भाषा, ६ असत्य भाषा, ७ मिश्र भाषा, और ८ व्यवहार भाषा । औदारिक शरीर सात धातुओं वाला मनुष्य तियंचों का शरीर । (१०) औदारिफ मिश्र-औदारिक शरीर की उत्पत्ति के समय और वैक्रियिक करते समय, जो मिश्र स्थिति होती है, वह औदारिक मिश्र है। (११) क्रियिक शरीर-शुभाशुभ पुद्गलों से निर्मित, देवताओं और नारकीय जीवों का शरीर । (१२) वैकियिक मिभ-वैक्रियिक शरीर की उत्पत्ति के समय अथवा उत्तर पैक्रियिफ करे, उस समय की विशेष शारीरिक स्थिति । (१३) आहारक शरीर-पूर्वधारी मुनि द्वारा कोई सशय उत्पन्न हो जाने पर प्रात्म प्रदेशों द्वारा की जाने वाली पुतले के रूप में विशेष प्रक्रिया । (१४) आहार मिक्ष-आत्म प्रदेशों सवधी प्रक्रिया को समेटते समय और पुन नन्हें आत्मस्थ करते समय की विशेष शारीरिक स्थिति । (१५) फार्मण शरीर-श्रात्म प्रदेशों के साथ सम्बन्धित फर्म प्रदेशों की विशेष स्थिति। ये पन्द्रह प्रकार के योग कर्मों का पाकर्पण करते रहते हैं।

( ५६ ) * ध्यान-कल्पतरु * . वारह प्रकार के अवतों का स्वरूप इस प्रकार (१ मे ६ तक) पृथ्वी पानी अग्नि, वायु, वनस्पति और नम इन काया सबंधी प्रारम्भ समारम करना। (७ से १२ तक) श्रोनेन्द्रिय, चक्षुरिन्द्रिय, प्राण इन्द्रिय रसइन्द्रिय, स्पर्शइन्द्रिय और मन । इन छ. इन्द्रियों के पोपण के लिये जो व्रत, मर्यादा और प्रत्याख्यान नहीं किया जाता है, और अमर्यादित जीवन व्यतीत किया जाता है, वही अव्रत अवस्था है, इमसे निरन्तर कर्मों का वधन होता रहता है। विचार कीजियेगा कि-इन्द्रियों के पोपण के लिये विविध रीति से कितने जीवों का घमासान होता है। ढोल नगाड़ा श्रादि मढने के लिये जीवित पशुश्री की साल उतारी जाती है, कितनी निर्दयता पूर्वक उनको हत्या की जाती है। अनेक पृथ्वी काय के पिंढ रूप कच्ची धातु को गला कर आभूपण बनाये जाते हैं। इसमें त्रस और स्थावर दोनों का प्रारभ समारभ होता है । इसी प्रकार मनोहर मकान, रेशमी सूती वन, श्राभूपण, भोजन सामग्री सभी का निर्माण प्रारभ पूर्वक ही होता है । मास, मदिरा, अभक्ष्य आहार, पर स्त्री गमन, वेश्या गमन श्रादि सभी महान पापकारी कार्यों में बेचारे बस स्थावर जीवों का भयंकर नाश रहा हुआ है, ऐसा दोघ दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट विदित होता है । एक वस्रोत्पत्ति में ही देखियेगा कि सर्व प्रथम तो सेत को हल द्वारा हाकना, जोतना पड़ता है, इसी में पृथ्वी के गर्भ में रहे हुए जीवों का नाश हो जाता है। तत्पश्चात् उममें खाद डालना पड़ता है, जो कि जीवों का नाश रूप ही है। नींदाई खोदाई की क्रिया द्वारा भी जीव हिंसा स्पष्ट ही है । इसके बाद पौधे पर उत्पन्न वनस्पति काय के जीवमय कपास को चूटा जाता है। उसे एकत्र कर महा आरभ वाले कारखाने द्वारा विनौले शौर रूई अलग अलग की जाती है, तत्पश्चात् हिंसा के प्रचड रूप मील द्वारा कपड़ा तैयार किया जाता है और उस पर चर्वी का कलप चढाया जाग है इस प्रकार कपड़ा तैयार हो जाने पर रगरेज द्वारा भट्टी आदि की सहायता से उसे रगा जाता है । इस सारी प्रक्रिया का अध्ययन कीजियेगा और सोचि यगा कि एक वस्त्र के निर्माण में असंख्य बस और स्थावर जीवों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से स्पष्ट हिंसा होती है, इस प्रकार महान अनर्थ द्वारा एक वन का निर्माण होता है। इसी प्रकार एक आभूपण की उत्पत्ति को क्रिया का विचार कीजियेगा किः-सर्व प्रथम तो खान से सैकड़ों मिट्टी पत्थर आदि सोदने पर मिट्टी मिश्रित सोना चाँदी की प्राप्ति होती है। इसके बाद भट्टी द्वारा उसे गला कर मिट्टी अलग की जाती है और धातु अलग को जाती है। तत्पश्चात सुनार उसे गला कर श्राभूपण घनाता है एव विविध क्रियाओं द्वारा उज्ज्वल बना कर पहिनन योग्य तैयार करता है। इसमें कितना प्रारभ समारम रहा हुआ है ? क्तिने मोह और लोभ, मान के परिणाम रहे हुए हैं ? यह विचारने पर अपने आप मालूम हो जाता है। ऐसे ही भोजन मकान अादि विविध सांसारिक सामग्री के निर्माण मे पापों का पुन रहा हुआ है, ऐमा उपयोग पूर्वक दृष्टि डालने से स्पष्ट रीत्या प्रतीत होता है । इम पाप पुञ्ज का विचार करते ही हृदय रोमांच हो पाता है। विचारो का प्रवाह उमड़ पड़ता है कि यह ससार कितने कितने महान् पापों से भरा पूरा है। किसी भी तरफ दृष्टि डालियेगा तो पता चलेगा कि प्रत्येक सामारिक कार्य में कितना जुल्म और कितनी निर्दयता रही हुई है। सांसारिक कितने ही पाप तो ज्ञात अवस्था में हैं और कितने ही महाघोर पाप अपनी अज्ञात अवस्था में उत्पन्न हो रहे हैं। हमारो मर्यादा नहीं होने से, व्रत प्रत्याख्यान नहीं होने से, यानी अवत और अप्रत्याख्यानी अवस्था के कारण से उन पापों की क्रियाएँ हमारी आत्मा में आया ही - * ध्यान-कल्पतरु * (५७) करती हैं। यह नियम अमर्यादित, अम्रती, और अप्रत्याख्यानी सभी सासारिक जीवों के लिये समझना चाहिए । जैसे घर के किवाड़ बन्द नहीं करने को दशा में बिना नाने और बिना देसे एव अनिच्छा होने पर भी कचरा रूप धूलि, तृण आदि घर में पाया ही करते हैं, वैसे ही प्रत्याख्यान नहीं करने की दशा में पाप का समूह आत्मा के प्रति आकर्षित होकर पाया ही करता है। ऐसा जान कर, विश्वास कर मुमुनु जीवों को बारह ही अव्रतो से दूर ही रहना चाहिये । -: पाँच मिथ्यात्व :- १ प्रत्येक सांसारिक आत्मा अनादि ससार में अनादिकाल से भ्रमण करता आ रहा है. इसका मूल कारण मिथ्यात्व ही है। इसका छूटना महा कठिन है। क्योंकि इसका सम्बन्ध अनादि काल से है। इसके छूटे बिना मोक्ष नहीं मिल सकता है। अत. मुमुनु घात्माओं के लिए इसका स्वरूप जानना अति आवश्यक और अनिवार्य है । इसके मुख्य पाँच भेद कहे गये हैं- (१) अभिग्रह मिथ्यात्व, (२) अनभिग्रह मिथ्यात्व, (३) अभिनिवेशिक मिथ्यात्व, (४) संशय मिथ्यात्व और ५ अनामोग मिथ्यात्व । (१) अभिग्रह मिथ्यात्व-खोटे पक्ष को हठ पूर्वक और निश्चित रूप से धारण करना । अज्ञान, मद, कोध, मान, माया, लोभ, रति, अरति, निद्रा शोक, झूठ, चोरी, मत्सर, भय, हिंसा, माह, क्रीड़ा, और हास्य, इन अठारह दोष वाले को सत् देव मानना और इनसे रहित को कुदेव मानना], हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन, परिग्रह, पाँचों इन्द्रियों के विषय-भोग, चारों कषाष, आदि दुगुणों से युक्त तथा ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, वीर्य, श्रादि पाँचों श्राचारों से रहित, ऐसी श्रात्मा को अपना गुरु मानना, एव हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन परिग्रह, क्रोध, मान, मायो, लोभ, राग द्वेष, क्लेश, पैशुन्य, निन्दा, इर्प, शोक, रात्रि भोजन, एव मिथ्यात्व इन अठारह कामों में धर्म समझना और इनसे उल्टे कामों में अधर्म मानना, यही अभिप्रद मिथ्यात्व है। इन देव, गुरु और धर्म के प्रति विपरीत कामह रखना ओर इन्हें छोड़ने के लिये कहा जाय तो उत्तर देना कि 'यह तो हमारी पौढ़यों से चला आ रहा धर्म है, इसे हम कदापि नहीं छोड़ेगें। ऐसा हठाग्रहा होना ही अभिग्रह मिथ्यात्व है। . -1 । (२) अनभिग्रह मिथ्यात्व-सुदेव कुदेव, सुगुरु, कुगुरु, सुधर्म, और धर्म, सभी को एक समान ही समझ कर उन्हें वन्दना, पूजना, अनाभिग्रह मिथ्यात्व है। इस प्रकार सत्यासत्य का निर्णय नहीं करना, कोई समझावे तो कहना कि "अपने को मतमतान्तरों के झगड़े से क्या करना है ? सभी धर्मों में सन्त, विद्वान् और गुणवान हैं, तो फिर किसे झूठा कहना १ अपने लिये तो सभी अच्छे हैं (३) श्रामिनिवेशिक मिश्यात्व-कुदेव, गुरु कुधर्म, और, कुशीष को किसी सत्सगति से यथार्थ रूप में समझ भी जाय कि यह खोटा है " फिर भी लोक पवहार अथवा कुल, गुरुषों के लिहाज में पड़कर उन्हें नहीं छोड़ना, और इस प्रकार विचार करना कि 'यदि मैं इस परम्परा का परित्याग कर दूगा, तो मेरे गुरु, मित्र गण वजन और वधु व मुझे उपालम्भ देंगे, मेरी निंदा करेंगे, इस परम्परा रूप धर्म के मानने वाले यहाँ बहुत मनुष्य हैं, और इन्हनि मुझे अपन धर्म का नेता मान रक्सा है, ये सब मेरी श्राज्ञा को मानते हैं, इन्हाने मेरे मान सन्मान को बहुत बढ़ा रक्या है, ऐसी स्थिति में यदि में इस धर्म का परित्याग कर दूंगा तो ये सब मेरे विपरीत हो जायगें, और मेरो निन्दा एंव अपमान के स्वरूप T - (५८) * ध्यान-कल्पतरु * करना प्रारम्भ कर देंगे। इत्यादि प्रकार से विविध विचारों से ग्रसित होकर अमत्य को अमत्य जानता हुआ भी उसे नहीं छ' सक एव अपने जन्म को व्यर्थ खोता हुआ भो उसके लिये जग भी चिन्ता नहीं करना, ऐसे भारी कर्म शोल जीव को मिथ्यात्व विचार धारा को "श्राभिनिवेशिक मिथ्यात्व' कहा जाता -- - (४) संशय मिथ्यात्व-कितने ही अल्पज्ञ जीव तथा अज्ञानी पुण्योदय से जैन धर्म को पा गये; जैन-शास्त्रों को सुन भी लिया, और क्रिया भी करते रहे; परन्तु फिर भी कितनी ही गभोर बातों के प्रति शकाशील होकर सोचते रहे कि सुई के अग्र भाग जितन क्षेत्र में अनत जावों का पिंड कैसे रह सकता है ? पानी की बून्द में असंख्यात जीव कैसे समा सकते हैं ? पूर्व जितना, पल्योपम जितना और सागरोपम जितना आयुष्य कैसे हो सकता है ? हजारों लाखों धनुष्यों जितनी अवगाहना कैसे हो सकता है ? नगरियों का प्रमाण और जन-सख्या इतनी कैसे हो सकती है ? चक्रवर्ती को ऋद्धि और पराक्रम इतने विपुल परिमाण में कैसे हो सकती है ? लब्धियों की शक्ति क्या सही वात है ? भूगोल खगोल का हिसाब कैसे क्या सही हो सकता है अरूपी जीवराशि, सूक्ष्म जीव-पिंड, और मोक्ष के अनिर्वचनी सुख, ये क्या सत्य घटनाएँ हैं ? इन असभव सो प्रतीत होने वाली बातों को सत्य रूप में कैसे मानी जाय ?" इस प्रकार शकाओं का समूह तो उत्पन्न कर ले, परन्तु यह नहीं सोचे कि "अनत ज्ञानी के समुद्र समान विस्तृत और गभीर वचन मेरो लोटे जितनी अल्प एव क्षुद्र बुद्धि में कैसे समाविष्ट हो सकते हैं ? वीतरागी आत्मा मिथ्या प्रवचन क्यों कहेंगे ? केवल ज्ञान द्वारा उन्होंने जैसा देखा, वैसा आदेश-उपदेश दिया।" संसार की विचित्र परिस्थितियों पर विचार करने से उपरोक शकाओं का बहुत कुछ समाधान हो सकता है। वे इस प्रकार हैं- (१) फरोड़ औपधियों को एकत्र फर एक महारसायन रूप औषधि वनाई जाय, और उसमें से एक राई जितनी औपधि ली जाय, तो क्या उसमें करोड़ औषधियों का अश है या नहीं ? है ही। जब कृत्रिम वस्तु में भी सूक्ष्म रीत्या करोड़ पदार्थ का अश रह सकता है, तो फिर प्राकृतिक फन्द मूल के टुकड़ों में अनन्त जीव रहे हुए हों तो इसमें क्या आश्चर्य है ? (२) आज भी हाथी जितने और ह्वेल मछली जितने विशालकाय प्राणी उपलब्ध हैं, एव कुन्थुश्रा जैसे अति सूक्ष्म कीटाणु भी पाये जात हैं, तो फिर यदि गत काल में मनुष्य आदि की अधिक, अवगाहना और अधिक आयु का उल्लेख है तो इसमें क्या आश्चय है ? (३) हाथी आदि विशान काय प्राणी दूर से ही दिखाई पड़ते हैं और कुन्थुप्रा आदि सूक्ष्म प्राणी नजदीक से भी कठिनाई पूर्वक देखे जाते हैं। अतएव यदि सूक्ष्मतम से सूक्ष्मतम पृथ्वी आदि काया के जीव हमें दृष्टि गोचर नहीं हो सके तो इसमें क्या आश्चर्य है ? (४) श्राजक्ल भी लदन, न्यूयॉर्क बम्बई, कलकत्ता प्रावि बड़े २ शहर हैं, जो कि एक करोड़ तक की जन संख्या वाले हैं और पचास पचास माइल तक के क्षेत्रफल में फैले हुए हैं, तो फिर प्राचीन काल में बारह योजन जितने विस्तृत नगर यदि बसे हुए हों तो इसमें कोई आश्चर्य जैसी बात नहीं है। (५) क्षेत्र की विस्तीर्णता, कोटि घरों के उल्लेख, और मानव की करोड़ों की संख्या से यदि शंका उत्पन्न होती है, तो यह भ्रम मात्र ही है। क्योंकि "कोटि" शब्द अनेक अर्थों में आया है। आज भी कोटि अर्य कोड़ी भी लिया जाता है, जोकि "बीस" सख्या का वाचक है। इसी तरह से सम्भव है कि "कोड़ी, अथवा "कोटि" शब्द का उस समय में कोई विशेष अर्य रहा हुभा होगा, जोकि कालान्तर में लुप्त हो गया। .

* ध्यान-कल्पतरु * (५९) (६) आजकल भी विश्व में ऐसे ऐसे सेठ मौजूद हैं, जिनको श्राय प्रति मिनिट सैकड़ों रुपयों की ही नहीं, बल्कि हजारों रुपयों तक की है, तो फिर उस काल में "इभपति" सेठ हुए हैं, तो इसमें कौनसी नई बात हुई है ? (७) लोहे की मोटी और मजबूत साफल तोड़ने वाले यदि आज भी उपलब्ध हैं, तो यदि गतकाल में अनन्त बन्नी हो गये हैं, ऐसा उल्लेख कोई अतिशयोक्ते भरा नहीं कहा जा सकता है। (८) पृथ्वी का अन्त किसने देखा है ? ऐसी स्थिति में अमख्यात द्वीप समुद्रों का उल्लेख करना और उनमें प्रकाश करने वाले चन्द्र सूर्य की विशेष सख्या बतलाना कैसे मिथ्या हो सकता है ? (१) आँख से नहीं दिखलाई पड़ने वाले शब्द और गध के परमाणुषों का अस्तित्व यदि मानी नाता है तो फिर नहीं दिखलाई पड़ने वाले अरूपी पदार्थों की सत्ता क्यों नहीं मानी जाय ? (१०) घृत आदि भोग्य पदार्थों का स्वाद जैसे यथास्थिति अनुसार शब्दों द्वारा नहीं कहा जा सकता है, तो फिर मोक्ष के अगम्य सुखों का बयान कैसे किया जा सकता है ? उन सुखों का अनुभव तो भोगने पर हो भोक्ता अनुभव कर सकता है। इस प्रकार कितने ही स्थूल विचारों द्वारा कितनी हो स्थूल बातों का निर्णय किया जा सकता है, तो भी सम्यक्त्व दृष्टि वीतराग के वचनों पर पूरा पूरा विश्वास रखते हो हैं। जैसे जौहरी के कहने से लाख रुपयों वाले हीरे को लाख रुपयों का ही माना जाता है, और उस पर वैसा ही विश्वास भी किया जाता है। किन्तु सशयी प्राणी सशय में पढ़कर अपना सम्यक्त्व खो बैठते हैं और मिथ्यात्वी बन जाते हैं । इसे ही सांशयिक मिथ्यात्व कहा जाता है। ( ५ ) अनामोग मिथ्यात्व-एकान्त जड़ और मूढ़ अवस्था। न कुछ समझना और न कुछ फरना । धर्माधर्म के नाम को भी नहीं पहचानना। जैसे एक इन्द्रिय आदि वाले जीव प्रवक्तव्य अवस्था में है, ऐसी स्थिति में होना ही अनामोग मिथ्यात्व है। मिथ्यात्व का अर्थ है-झूठापन । सत्य को असत्य और असत्य को सत्य समझना ही मिध्यात्व है। यह मिथ्यात्व बुद्धि को भ्रममयी बना कर आत्महित का नाश करने वाला है, ऐसा जानकर ध्यानी पुरुष इसका त्याग कर दे। इस प्रकार धर्म-ध्यान के प्रथम चरण रूप प्रज्ञाविचय सम्बन्धी केवल एक ही गाथा का विस्तार पूर्वक अर्थ सपन्न हुआ। इसमें से ज्ञेय (जानने योग्य ) को जाने, हेय (छोड़ने-योग्य ) को छोड़े, और उपादेय (श्रादरने योग्य ) को प्रादरे, यानी अंगीकार करे । शास्त्रों में अनेक स्थानों पर भगवान की आज्ञा का चिंतन करने के लिये साधुओं के लिये आदेश है । जैसा कि-"सजमेणं तवसा अप्पाण भावमाणे विहरह" अर्थात पाँचों स्थावर फाया तोन विक्लेन्द्रिय जीव, पचेन्द्रिय प्राणो का सयम याने दया पाले । अजीव पस पात्र आदि यत्नापूर्वक लेवे, सब के साथ प्रीतिभावना मैत्री भावना का व्यवहोर करे । सदा उपयोग पूर्वक ही प्रवृत्ति करे । दिन में दृष्टि पूर्वक और रात्रि में रजोहरण से पृजफर प्रत्येक वस्तु को काम में लावे। अयोग्य वस्तु को यत्नपूर्वक एकान्त स्थान पर परठे यानो टाले । इस तरह सत्रह प्रकार से संयम की परि- पालना करे। वारह प्रकार से निर्जरा रूप तप की आराधना करे । (१) अनशन-दो घड़ी अथवा अधिकाधिक रूपमे यथा शक्ति जीवन पर्यंत के लिये पाहार का त्याग करे (२) अनोदरी-भूख की अपेक्षा कम खावे, अथवा पाय मादि कम करे (३) भिक्षा द्वारा आजीविका चलावे । (४) रसों का (विगय का) परि- स्याग करे । (५) काया को केश-लु चन श्रादि क्रिया द्वारा क्लेश पहुँचाकर सहन शील चि का विकास करे।

(६०) * ध्यान-कल्पतरु* . - (६) प्रति सलीनता-इन्द्रियों के विषय की, पाय और योगों की प्रवृत्ति को घटावे । (७) लगे पाप का प्रायश्चित लेकर शुद्ध होवे । (८ से १२) विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, ध्यान अथवा कायोत्सर्ग का यथा विधि पालन करे। इन वारह ही प्रकार के तप को ज्ञान पूर्वक श्रारापना करत हुए अात्म ध्यान करते हुए विचरें; और ऐसी हो प्रवृत्ति रखें। भगवान ने उत्तराध्ययनजी सूत्र में मार्मिक शब्दों द्वारा फरमाया है कि "समय गोयम ! मा पमायए" अर्थात हे गौतम । (अथवा हे मुमुक्षु आत्माश्री 1) श्रात्म साधना रूप मोक्ष प्राप्ति के कार्य म जरा मी प्रमाद मत करो ! किंचित् मात्र मी आलस्य मत करो। -~: पाँच प्रमाद :-- + संसारे ॥ . मद-विसय-कसाय-निदा; विकहा य पंचमा भणिया । एए पंच पमाया; जीवा पाउंति अर्थात्-मद विषय फपाय, निद्रा और विकथा, ये पाँच प्रकार के प्रमाद कहे गये हैं, जो कि जीवों को संसार में डूबाते रहते हैं। (१) मदः-आठ उत्तम वातों के आधार से मद भी आठ प्रकार का कहा गया है। वे पाठ उत्तम वातें इस प्रकार हैं:- १ जाति, २ कुल, ३ वल, ४ रूप, ५ लाम, ६ ज्ञान, ७ तप और ८ ऐश्वर्य-स्वामित्व । इन पाठों हो उत्तम वातों की प्राप्ति जीवों को शुभ पुण्योदय से हुश्रा फरतो है । यदि कोई श्रात्मा इन प्राप्त शुम बातों का उपयोग सयम, व्रत, ब्रह्मचर्य और परोपकार श्रादि शुभ कार्यो में नहीं करके केवल अपने थहकार को हो, मद की ही वृद्वि करता है, तो उसकी मृत्यु होने पर उसे दुर्गति की प्राप्ति हुश्रा करता है। यदि इन प्राप्त शुभ सयोगों के बल पर यत किंचित् यश कौति होने लगती है तो मद में फुल कर यह आत्मा सोचने लगती है कि "मैं पडित हूँ, शुद्ध श्राचरण वाला हूँ, वक्ता हूँ, ममा व्यक्ति मेरा सत्कार सन्मान करते हैं, मैं जगत प्रसिद्ध हूँ, सरस्वती कठाभरण हू, वादी विजयी हूँ, इत्यादि उपाधियों से अलकृत. अधिक क्या सोचूं ? मैं एक अद्वितीय महात्मा हू । "इम प्रकार के विचारों में जो भरा हुआ हो; अथवा ऐसी बातें जो अपने मुख से कहता हो अत में ऐमी आत्माएं ज्ञान आदि से भ्रष्ट होकर नष्ट हो जाया करती है। अभिमानी अपने पति साधारण सद् गुण को भी मेरू के समान समझना है । और दूगों के महान गुण को एव अपने विशाल दुर्गण को गई के तुल्य मममता है। इन्हीं कारणों से उमका उद्धार नहीं हो है । इस प्रकार मद अनेक दुगुणों की खान है । इमी लिये मद और मदिय एक ही शब्द द्वारा पुकारे, नाते हैं। (२) विषय-शब्द, रूप, गध, रस, और स्पर्श इन पाँचों इद्रिय गुणों की प्राप्ति शुभ पुण्योद्य से ही होती है । इनका सदुपयोग यदि "गुणियों के गुणों के उच्चारण में, साधु दर्शन में, तप में" आदि सत्कार्यों में नहीं लगाकर बोभत्स शब्दोधारण में, रूपं अवलोकन में गंध ग्रहण में अभक्ष्य भक्षण और भोग विलास में करता है, वह नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। अमृत समान इन पाँचों गुणों को विषय में लगा फर इन्हें विष रूप बना देते हैं। जिसका परिणाम दोनों लोक में भयकर दुख प्राप्ति के दूसरा कुछ नहीं है। इसीलिये विषय और विष समान ही कहे गये हैं। . सकता t- * ध्यान-कल्पतरु * (६१) है - (३) कषाय-क्रोध, मान, माया और लोभ ये चारों हो कषाय महा पाप के मूल हैं। इनके वश में होकर जीव अपना स्वरूप भूल जाता है। प्रात्मघात, द्रव्यनाश, यश नाश, कुलसहार, श्रादि अयोग्य और अकरणीय दुष्कार्य इन कषायों के कारण से जीव करते समय भी नहीं हिचकिचाता है। कपाय के आवेश में श्राफर निर्बल अनाथ को स्व-पराक्रम से और बली को कपट से नष्ट करने में लज्जित नहीं होता । इन महा पापों द्वारा अपनी आत्मो को मलिन कर दोनों लोक में दु स्व का भोक्ता बनता है। इसीलिए "कषाय-फर्मो का आगमन" ऐसा अर्थ है । 'कषाय पाले" का प्राकृत रूप “कसाइ" बनता है । जिसको व्यंग अर्थ में हिन्दी में घातकी कहा जा सकता है । (४) निन्दा-प्राकृत शब्द "निदा" के निद्रा और निन्दा दोनों अर्थ लेकर यहाँ विवेचन किया जाता है। दशवैकालिक शास्त्र में कहा गया है कि "पिट्ठिमस न खाइन्जा" अर्थात् किसी की भी पीठ पीछे निन्दा नहीं करना चाहिये । ऐसी निन्दा को मांस भक्षण के समान कहा गया है। निन्दक पुरुष ज्ञाना शुद्ध आचरणशील, प्रभावक, धर्मोन्नति के का, तपस्वी, क्षमाशील आदि के गुणानुवाद को सुनकर उन्हें सहन नहीं कर सकता है। उन गुणों को निन्दक ढांकने का प्रयत्न करता है। उनकी निन्दा करता है। दोष नहीं होने पर भी उनके प्रति दोष लगाता है। भोले लोगों को उनके प्रति रहो हुई भक्ति को कुतर्को द्वारा इटाने का प्रयत्न करता है । इस प्रकार नीच निंदा रूप दुर्गुण पस्तिष में निंदा का हो पात्र है।* । , अमुक अमिमानी है, : निन्दा विषयक सद्बोध :- अहो आत्मन् । तू रात और दिन दूसरे के दोषों को ही देखने के लिये तत्पर रहता है, और यही विचारता रहता है कि अमुक क्रोधी है, अमुक कपटी अथवा वह लालचो है वह विश्वासघातक है, वह हिंसक है, झूठा है, चोर है, व्यभिचारी है, फेवल दिखाऊ भक्त है, प्रभु का स्मरण तो फरता है परन्तु बड़ा पाखडी है, धूर्त है, ठग है; ग्रहीत प्रतों का भंग करने वाला है, इत्यादि विविध गति से दूसरों के दोषों को देखकर उन्हें अपराधी घोषित करती है, इस प्रकार के जीवन-व्यवहार से खुद का हो मन मलिन रहता है, एवं निरन्तर ऐसी भावनाओं के कारण से तथा ऐसे हो सस्कारों से निंदक के भी मन पर ऐसे सचोट सस्कार जम जाया करते है कि कुछ ही समय में स्वयं वचनों द्वारा भो ऐमा हो उल्लेख करने लग जाता है तथा उन्ही दोषों में स्वय भी प्रसित हो जाता है एवं पास पास के वातावरण को भी इन्हीं प्रवृत्तियों के कारण से दूषित बना देता है। परिणाम यह होता है कि स्वय भो पाप-पक में गहरा फस जाता है और इस कारण से दूसरों का सुधार करना तो दूर रहा, परन्तु खुद ही निंदा का और धिक्कार का पात्र वन नाता है। एव आसपास की जनता भी ऐसे निंदक की विरोधिनी बन जाती है । नतीजा यह प्राप्त होता है कि लाम के बदले मूल में हो घाटा पड़ना प्रारम हो जाता है। निंदक मनुष्य का स्वभाव भी धीरे धीरे बहुत खराब हो जाता है। जैसे एक लौकिक दृष्टान्त है कि फिसी गजा महाराजा ने रत्न जटित एक सुन्दर और मनोहर महल बनाया था। उसको देखने के लिये अनेक मनुष्य आये और सभी ने उसकी भूरि भूरि प्रशसा की, परन्तु जब एक चाहाल आया और उसने सवैया नरक निगोद ममे, निन्दा का घरण हार, चडाल समान जिसकी, सगति नही काम की । आपकी बहाई पर हानि में मगन, मूद ताक्त पराये छिद्र नीति है हराम की ।। । पर की निन्दा सुन कान, खुशी नहीं होना कभी, पीछे से करेगा नर, बदी तेरे नाम की विलोक कहत निंदक | तेर माहे दोष है, यहां से मेर नाय, आगे गति यम धाम की।

( ६२ ) * ध्यान-कल्पतरु * रसा है। . महल को चारों ओर से भली भाति देख लिया तो देखने के बाद कहने लगाकि इम महल में "पाखाना" तो बनाया ही नहीं। ऐस ही निंदक मनुष्य का सदा नीच बुद्धि रहा करती है । ऐमा पुरूप तो सभी सद्गुणों को त्यागकर केवल दुगुणों को ही देखता रहता है। अरे अात्मन | तू दूसरे के ढगुणों को देख कर उनकी निंदा करता है, किन्तु विचार कर कि "क्या उन्हीं दुर्गुणों से तुम्हारी आत्मा घचा हुई है या नहीं ?" 'क्या तू सभी प्रकार से निर्दोष है ?" जरा सूक्ष्म दृष्टि से मन को शांत कर इन गभीर प्रश्नों पर विचार कर । सर्व प्रथम बात तो यह है कि तुम्हारे हृदय में इस निन्दा रूप घडे दुर्गुण ने हो निवास स्थान वना । तुम अपने श्रापको "राजा, ब्राह्मण, साहूकार, अथवा पटेल" आदि विविध उत्तम और उच्च उपाधियों द्वारा विश्व में विघोपित करके अपनी पूजा प्रतिष्ठा तथा यशः कीर्ति बढा रहे हों, परन्तु क्या उन्हीं उपाधियों के अनुसार, उन्हीं पदवियों के अनुमार शुद्ध नीति के साथ प्रमाणपूर्वक चलते हो। धर्मात्मा, पुण्यात्मा, सम्यक दृष्टि, श्रावक, साधु, महात्मा, प्राचार्य, तपस्वी पडित ओदि नाम धारण तो कर लिये, परन्तु क्या उनके अनुरूप आचरण का परिपूर्ण पालन करते हो ? इस तरह से आंत रिक यात्म दृष्टि से विचार करने पर सहज रीत्या प्रतीत होगा कि मैं स्वय हो निन्दा का पात्र हूँ। जव स्वय ही दुर्गुणों से युक्त हैं तो फिर अपनी खरावी सुधारना छोड़कर दूमरों को सुधारने के लिये जाना कैसे युक्ति सगत हो सकता है ? दूसरों के दुर्गुणों को सुधारना तो दूर रहा, उन्हें उल्टा अपनी आत्मा में बढ़ाने का ही प्रयत्न कहा जायगा । इस प्रकार अपनी आत्मा को ही डुबाना है और ऐसा करना कितनी महती मूर्खती है ? अतएव सारांश यही है कि सत पुरुषों का कर्त्तव्य दूसरों की निन्दा करना कदापि नहीं है। "दुनिया दोरगी है। यह लौकिक कहावत है, इस पर विचार करके हे आत्मन् । तू अपने सद्गुणों फो दूसरों को बतलाकर प्रशसा प्राप्त करने की आकाक्षा मन कर । यदि तुम्हारे सद्गुणों के स्वरूप को बिना समझे ही कोई तुम्हारी निन्दा करता है और सद्गुणों को भी दुगुणों के रूप में देखता है, तो भले ही उन्हें ऐसा करने दे, तुम्हारे सद्गुणों को सिद्ध करके उन्हे वताने की कोई आवश्यकता नहीं है । क्योंकि इस विस्तृत विश्व में कोई एक मनुष्य तो नहीं है कि जिसको तुम समझा कर चुपचाप बैठ जाओगे। आज यदि किसी एक को समझाओगे तो कल दुसरा नया निदक खड़ा हो जावेगा। इसी प्रकार दूसरे को समझाओगे तो तीसरा तैयार हो जावेगा। यों अलग-अलग को कहाँ तक समझाते रहोगे ? यदि समझाने का प्रयत्न भी करोगे तो थक जाओगे। और इस तरह से तो अपना इष्ट अर्थ सिद्ध नहीं कर सकोगे। क्योंकि इस प्रकार की वैयक्तिक समझावट तो आत्म श्लाघा ही प्रतीत होगी। और आत्म श्लाघा ही सद्गुणों का नाश करने वाली कही गई है। इससे तो सद्गुणों की स्थिति नीचे की ओर ही गति करेगी। इस प्रकार निम्नगति ही निन्दा की फैलावट करने वालो कही गई है। जैसे दपेण में अच्छी अथवा ,बुरी वस्तु का प्रतिविम्व पड़ता है और इससे दर्पण को कोई हानि लाभ नहीं हुधा करता है परन्तु देखने वाले को ही अपने रागद्वेषमय परिमाणों से जनित संकल्प-विकल्पों के द्वारा सुख अथवा दुःख का अनुभव हुश्रा करता है। वैसे ही शुद्ध प्रात्मा की यदि किसी प्रवृत्ति से किसी दूसरे को विपरीतता अथवा भविपरीतता प्रतीत होती हो, एवं इस कारण से यदि वह उस शुद्ध आत्मा की निन्दा, मथवा स्तुति करे तो उससे शुद्ध प्रात्मा के लिये कदापि किसी भी प्रकार का हानि लाभ नहीं होने धाज्ञा है। परन्तु केवल निन्दा करने से निंदक की भात्मा हो मलिन होगी। तीर्थकर जैसे अत्यन्त विशुद्ध - . ।

* ध्यान-कल्पतरु * ( ६३ ) . 4 महात्माओं को भी समार के अज्ञ पुरुषों ने दोषमय घोषित किये, तो फिर दूमरे साधारण पुरुषों की तो बात ही क्या है ? जैसे चरम तीर्थंकर प्रभु महावीर गोशाल जैसे विरोधी स्वार्थियों के द्वारा निंदा करने पर भी चलित विचलित नहीं हुए और सूर्य के समान धर्म प्रकाश की वृद्धि करते रहे, वैसे ही आत्म-साधक को भी किसी के शब्द पर लक्ष्य नहीं देना चाहिए। एव सर्वथा शब्दोच्चारण नहीं करते हुए केवल अपने इष्ट साध्य की ओर ही लक्ष्य देते हुए साधना करते रहना चाहिये । इस प्रकार की प्रवृत्ति से स्वभावत साधक फे सद्गुण निन्दक के हृदय में सूर्य समान ज्ञान-प्रकाश को प्रकाशित कर देंगे, और इस प्रकार की रीति से स्व एवं पर का परम कल्याण सिद्ध हो सकेगा। जैसे किसी गरीब मनुष्य को यदि कोई श्रीमान् अथवा धनाढ्य कह दे तो इससे वह धनवान नहीं हो सकता है, अथवा किसी धनाढ्य को गरीब कह देने मात्र से वह गरीब नहीं हो सकता है, सारांश यह है कि जो जैसा होता है, वह वैसा हो रहता है । इसी तरह से किसो सद्गुणो को दुगुणी कहने से वह दुगुणी नहीं हो सकता है, भथवा दुर्गुणी को सद्गुणो कहने मात्र से वह सद्गुणो नहीं हो सकता है। "अपनी यश कीर्ति की आकांक्षा करना” यह भी एक प्रकार का फायरतापूर्ण दोष है। क्योंकि जिसके मन में कीर्ति की आकांक्षा रहती है, उसके हृदय में सदैव एक विशेष प्रकार का भय समाया हुश्रा, रहता है कि "यदि मैं अमुक अमुक कार्य करूंगा तो दुनिया मुझे क्या कहेगी ? अथवा मैं कौनसा कार्य करू ! कि जिससे मुझे सब अच्छा कहें।" इत्यादि विविध विचारों के कारण से लौकिक विरुद्ध किन्तु आत्मोन्नति के साधक कार्गे को और लोकोचर के लिये शुद्ध कार्यों को करने में हिचकिचाहट अनुभव करता है, एव यथाविधि आत्मोन्नति नहीं कर सकता है। आदर्श मार्ग तो यही है कि आत्मानन्द साधक को लौकिक रष्टि से शुद्धता बतलाने का प्रयत्न छोड़ कर सर्वज्ञ को दृष्टि में प्रतिभासित शुद्धता को प्राप्ति के लिये ही निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए। क्योंकि ससार के जीवों को शुद्धता बतलाने से इष्ट अर्थ रूप मोक्ष की प्राप्ति कदापि नहीं हो सकेगी। परन्तु यदि आपकी शुद्धता सर्वज्ञ के दृष्टि कोण से यथार्थ है, तो फिर विश्व में किसकी शक्ति है, जोकि श्रापके साधना- मार्ग में और सिद्धि मार्ग में किसी प्रकार का विघ्न उपस्थित कर सकें। निदा यानी नींद-यह भी सत्कार्य में विघ्न पैदा करने वाला एक महान् शत्रु है। धर्म कार्यों में भी इसका अन्तित्व पाया जाता है। कितन ही मनुष्य ऐसे हैं, जो कि मुनि प्रत धारण कर प्रमाद अवस्था में प्रस्त हो जाते हैं । विना परिश्रम से ही होने वाले आहार, वन, उपाश्रय रूप धाश्रय स्थान धादि जीवनव्यवहार की सामग्री का उपयोग करते हुए निश्चित हो जाते हैं और अपना अधिकांश समय केवल निद्रा लेने में हो व्यतीत करते हैं । यह निद्रा रूप प्रमाद इस लोक और पर लोक दोनों ही भवों के लिये दु खप्रद ही है। (५) विकहा यानी विकथा । यह चार प्रकार की कही गई है-१ देशका, २ राजकथा, ३ स्त्रीकथा, और ४ भातफया-भोजनकथा । इसी प्रकार चारो सम्बन्धी, धन सम्बन्धी, धर्म खण्डन की, वैर-विरोध की, गुण पाषफ, कामोत्तेजक की, क्लेश कारिणो, पर पीड़ा कारिणी, ग्लानि उत्पादक, इत्यादि रूप से अनेक प्रकार की विकथाएँ हैं। ऐमी कथा वार्ताओं में हो जो मूर्ख मनुष्य अपना अमूल्य मानव जीवन पूरा कर देते हैं, वे महान् अन्याय करते हैं। कितने ही विद्वान् नामधारी पुरुष सभा समितियों को प्रसन्न करने के लिये अनेक कपोल कल्पित वातों से, फल्पित वातों से, कल्पित विषयों वाली दालों से, और हास्य, शृगार भित्स आदि रसों द्वारा जनता को अति रजित किया करते हैं । ऐसे व्याख्याता भक्तों सहित फूटी नाव के * दोहा-दश गोगा दश मोगली, दश गोगा का बच्चा । गुरुची तो गप्पा मारे, उब ही वाणे सच्चा ।।

(६४) * ध्यान-कल्पतरु* - दृष्टान्त के समान पाताल में ही पहुंचते हैं। ये पाँचों प्रमाद बडे ही दुर्धर्प हैं, श्रीभगवतीजी शास्त्र के श्राठवें शतक में फरमाया हुआ है कि "चार ज्ञान के धारक, चौदह पूर्वधारी, श्राहारक लब्धि वाले मुनिराज भो यदि इन पाँचों प्रमादों के चक्कर में श्रा जाय, तो श्रायुष्य के पूर्ण होने पर अधोगति हो प्राप्त होती है। ऐसे इन दुष्टतापूर्ण प्रमादों की स्थिति को जानकर परम पिता प्रभु महावीर ने स्पष्ट आदेश दिया है कि समय मात्र के लिये भी क्षण मात्र के लिये भी इनका महवाम मत करो । क्योंकि इनकी तिचित सगति भी ऐसा असर करती है फि फिर प्राणात हाने पर भी इनमे छुटकारा पाना अंति कठिन है। आजकल जैनधर्म जैसे परम पवित्र धर्स को जो दुर्दशा हो रही है, उसका कारण भी इन्हीं प्रमादों का प्रसाद है। अतएव वे ही महात्मा ध्यान सिद्वि को प्राप्त कर सकेंगे, जो इन पाँचों प्रभादों से अपनी आत्मा को वचा सकेंगे । यह आज्ञा विचय रूप ध्यान अपार अर्थ मे परिपूर्ण है। परन्तु यहाँ पर इतना विवेचन करने के बाद अब साराश रूप से थोड़े में इतना ही कहना है कि- किं बहुणा इह, जहा जहा राग दोसा लहु विजिजति । तहा तहा पयइयव्वं, एसा आणा जिणिंदाणं ।। विशेप क्या कहा नाय ? थोडे में हो यह समझना चाहिये कि जैसे-जैसे राग और द्वीप लघुता को प्राप्त होवे, वैसा वैसा प्रयत्न करना चाहिए, यहो श्रीजिनश्वर भगवान की श्राज्ञा है। इस आज्ञा विचय रूप धर्म-ध्यान में प्रवेश करने से मिथ्यात्व आदि अनादि मल चैतन्य का आत्मा से इस प्रकार अलग हो जाता है, जैसे कि जल से रजरूप मल हट जाता है। यह ध्यान प्राधि, व्याधि, और उपाधि रूप ज्वाला से जलते हुए जीव को शान्त करने में इतना हो शक्तिशाली है, जितनी कि पुष्करावर्त नामक मेघ विश्व ज्वाला को शांत करने में शक्तिशाली है। यह ध्यान मोह रूप वनचरों को नाश करने के लिये केशरी सिंह के समान हैं, बुद्धि विवेक को बढ़ाने के लिए मरविती के समान है, योगियों के मन को समाधिमय करने के लिये शांत श्रावास रूप है, इत्यादि रूप से अनेक गुणो का सागर है। ऐसे मोक्ष प्रद आज्ञा विचय का चिंतन और मनन धर्म ध्यानी सदैव किया करत हैं। . - 'द्वितीय-पत्र अपाय विचय- -- जहत्ता । प पहुँचाने वाला, अप्पाणमेव जुज्झाहि कि ते जुरमेण - वज्झयो अप्पाणमेव अप्पाणं, मुहमेहए अर्थात् श्रीउत्तगध्ययनजी सूत्र के नौघे अध्ययन में श्रीनमिराज ऋषि शकन्द्र महाराज से कहते कि-"अपनी प्रात्मा में रहे हुए दुगुणों के साथ ही युद्ध फैगे. बाह्य युद्व से क्या अर्थ सिद्ध होने वाला है १ बाह्य युद्ध से तो केवलकषाय हा बढ़ने वाला है यात्मस्थ कषायों के साथ ज्ञान आदि गुणों द्वारा युद्ध फरने से ही प्रात्मा विनयशील और सुखो हो सकता है।" - ने "अपाय-विचय” नामक धर्म ध्यान का ध्याता ऐसी भावना प्रस्फुटित करे कि "मेरा जीव सदा सुखं चाहता है, अनन्त भवों से मैं सुख के लिए तह रहा हूँ , अनेक उपाय करने पर भी विपरीतता हो प्राप्त होती है, मेरे द्वारा कृतं परिप्रेम विफल हो जाता है, इसका कारण क्या है ? " मेरे परिश्रम को नष्ट करने वाला; मुझे प्राप्त होने योग्य और मेरे गुण धर्म रूप अक्षय, अनन्त, अध्याबाघ, सुख को व्याघात ऐसा कौनसा शत्रु हैं ? "विचार करने पर मुझे इतना निश्चय तो हो 'चुका है कि वह शत्रु वाम होता तो मुझे कष्ट पहुचाते समय वह अवश्य रष्टिगोचर होता, मेरे शत्रु तो मेरे ही घर में अपना घर बनाकर बैठे हुए हैं । मेरा अनु- मान सही हैं, 'अब मुझे उन शत्रुओं को बाहर ढूढने की प्रावश्यकता नहीं रही है। आश्चर्य है कि इतने दिनों तक मुझे यह स्थिति क्यों नहीं दिखाई दी ?" "अरे । दिखाई कैसे पड़े ? क्योंकि मैं तो आज दिन तक इनको देखने के लिये अपना घर छोड़कर अन्य अन्य स्थानों पर भेटकता फिरा।" "ये तो अन्दर हो अन्दर रहते हुए मेरे प्रयत्नों पर पानी फेरते रहे। अव तो मुझे अपनी भूल सुधारनी ही चाहिये । प्रात्मस्थ इन बाय शत्रुओं को अच्छी तरह से पहिचानने के लिये अब मुझे बाह्य दृष्टि बन्द कर देना चाहिये। भगवान् ने सहा फरमाया है कि "एक समय में दो कार्य नहीं हो सकते हैं।" ऐसी भावना का गम्भीर विचार करके एव आँखें बन्द करके मन को एकाग्र करते हुए ऐसा चिंतन फरे कि "ये मेरे शत्रु बड़े प्रवल हैं, इन्होंने अपनी साम्राज्य स्थापित कर रखा हैं।" नो, मुमुचुःआत्मा इस तरह से "अपाय-विषय' नामक धर्म-ध्यान के द्वितीय चरण का ध्याता धनेगा, यह अनन्तकाल से अपाय यानी हानि पहुंचाने वाले कर्म शत्रुप्रो का नाश कर सकेगा, एवं एकाग्रता पूर्वक ऐसा चिंतन तथा मनन करने से ही सर्व सिद्धियों की सफलता प्राप्त कर सकेगा। सारांशं यही है कि फर्म-द्धि के फरने वाले कामों से निवृत्ति भावं धारण करके, प्रात्म सुख के उपायों में सलग्न हो करके, मोक्ष मार्ग की प्राप्ति करने में शक्तिशाली वने। तभी समय आने पर परम-सुख का भोक्ता अवश्यमेव हो सकेगा। "T T - T - तृतीय-पत्र "विपाक-विच" में इस विश्व को रचना और इसमें घटने वाली घटनाएँ अत्यन्त ही आश्चर्यकारक भौर विचित्रताम से परिपूर्ण है। मूल स्वभाव और मौलिक्ता की दृष्टि से सभी सांसारिक प्रात्माएं समान ही हैं, फिर मैं देखा जाता है कि "कोई सुसी है, कोई दुखी है, इसी प्रकार से नीच, उच्च, मूर्ख, 'विद्वान् , दरिद्री, श्रीमान आदि रूप से भिन्न भिन्न दिखलाई पड़ रहे हैं। इसका क्या कारण है ? कोई मी जीव अपने आप को अपना बुरा नहीं चाहता है, अत. यह निश्चित ही है कि जीव को बुराई की ओर एव दुःख सुख की ओर प्रेरित करने वाला इस जीव के साथ अन्य कोई अवश्य हो है। वह कौन है ? इस प्रश्न का गम्मीरतापूर्वक विचार करने से प्रतीत होता है कि "अपाय विचय” नामक परिच्छेद में विचार फरने से ज्ञात हुवा था कि- आत्म-प्रदेशों के साथ दूध पानी की तरह मिले हुए कर्म परमाणु ही इस परिस्थिति के उत्पादक हैं, ये ही आत्मा के मुख्य शत्रु हैं। ये कर्म रूप शत्रु दो प्रकार के विपाक पैदा किया करते हैं--(१) अशुभ फर्मो से जनित कष्ट पूर्ण का फल और (२) शुभ कर्मो से जनित सुख पूर्ण मोठा फल । शुभ कर्मों के फल को भोगते समय जीव को मानन्द अनुभव होता है, और उस समय सन पौद्ग लिक सुखों में आसक्ति रखने से वह नवीन अशुभ कर्मों का उपार्जन करता है और जिसका परिणाम भविष्य दुःख रूप में प्राप्त करता है। इस प्रकार शुभ फमों के क्षय होने पर अशुभ का बंधन करता है और अशुभ तय होने पर पुनः किंचित अर्थ में शुभ का वध करता है। यों ही रात और दिन की तरह एव चक के समान फभी शुभ तो कभी अशुभ के फन्दे में पड़ता हुआ अनादिकाल से यह जीव जन्म-मरण की माला धारण करते हुए चला पा रहा है। अव शुभाशुभ कर्मों के उपार्जन करने की रीति का शास्त्रानुसार विचार करना अति आवश्यक है। फिन कर्मों से लीव सुख प्राप्त किया करता है और किन फर्मों से दुःख प्राप्त किया करता है, इसी का यहाँ पर शाघानुसार सक्षेप से विचार किया जाता है - (१) प्रश्न-प्रति-इन्द्रिय (कान) की हीनता किस कारण से हुमा करती है ? उत्तर-विक्था सुनकर खुश होने से, सत्य को असत्य और असत्य को सत्य रूप से कहने से, बधिर-वहिरे को चिडाने से अथवा उसकी इसी करने से, कान शक्ति वाले को वहरा बनाने का प्रयत्न करने से, दीन और अनाथों के करुणा जनक शब्दों पर और उनकी प्रार्थनाओं पर ध्यान नहीं देने से, सदोध मय शास्त्रों के प्रवण नहीं करने से, इत्यादि कारणों से बहरेपन की प्राप्ति हुआ करती है। इन्हीं कारणों से कान सम्बन्धी रोगों की उत्पत्ति भी हुआ करती है, पवं चतुरिन्द्रियता का संयोग हुभा करता है। (२) प्रश्न-अतिइन्द्रिय की प्रबलता किन कारणों से हुभा करती है ? उत्तर-सुशास्त्र और सुकथा के प्रवण करने से, यथातथ्य नैसा का वैसा ही विश्वास करने से, वहये पर दया करने से, इनकी यथाशक्ति सहायता करने से, दीनों की प्रार्थना पर भ्यान देकर मधुर वचन वोलने से, उनको सन्तुष्ट करने से, गुणियों के गुण सुनकर प्रसन्न होने से, किसी को भी निन्दा नहीं सुनने से, इत्यादि कारणों से कान इन्द्रिय सम्बन्धी भायेग्यता, सुन्दरता, तीन श्रुत-शक्ति और पधेन्द्रियदा की करती है। प्राप्ति हुभा * ध्यान-कल्पतरु * (६७) --------- . . - - - (३) प्रश्न-चक्षुइन्द्रिय की हीनता किन कारणों से हुआ करती है ? उत्तर-स्त्री पुरुष के सुन्दर रूप को देखकर विषयानुराग उत्पन्न करने से, कुरूप वाले को देखकर उससे घृणा करने से, उसकी निन्दा करने से, अधे की हसी करने से, उसको चिड़ाने, मनुष्य पशुओं की आँखों को किसी प्रकार से कष्ट पहुँचाने से अथवा उन्हें फोड़ने से, फुशास्त्र एंघ घणित पुस्तक-पत्र आदि के पदने से, नाटक श्रादि रागोत्पादक खेल देखने से, नेत्रों सम्वन्धी विषय में आसक्ति रखने से, क्रूर दृष्टि से देखने से नेत्रों द्वारा, चेष्टा अथवा राममय फटान करने से, इत्यादि कारणों से अन्धेपन की, काणेपन की टेढ़ी आँख की, इत्यादि रूप से आँखों की हीनता अथवा नेत्र रोगों की प्राप्ति हुधा करती है, एव तेइन्द्रियता का सयोग हुआ करता है। (४) प्रश्न-चक्षुइन्द्रिय की प्रबलता किन कारणों से हुधा करती है। उत्तर-साधु साध्वियों के दर्शन करके प्रसन्न होने से, धर्मानुराग उत्पन्न करने से, विषय-राग को उत्पन्न करने वाले रूप को देखकर तत्काल ही उस ओर से दृष्टि हटा लेने से, नेत्र के रोगियों पर दया करने से, सत्शास्त्रों का और सात्विक पुस्तकों तथा पत्रों का पठन-पाठन करने से, काम-विषय के प्रति नेत्रों पर नियत्रण रखने से इत्यादि कारणों से रोग रहित, सतेज मनोहर, और दीर्घ दृष्टि वाली आँखों की प्राप्ति हुआ करती है। (५) प्रश्न-प्राणइन्द्रिय की होनता किन कारणों से हुधा करती है ? उत्तर-सुगन्धित पदार्थों पर अनुराग रखने से,इत्र आदि और पुष्प आदि को रागदृष्टि से सेवन करने से, दुर्गध युक्त पदार्थो पर घणा लाने से, उनके प्रति द्वष उत्पन्न करने से, नाक हीन की, गू गे की हँसी करने से, उसे दुख देने से, और मनुष्य पशु पक्षी श्रादि जीवों के नाफ को छेदने से, काटने से, भेदन फरने से अथवा इन्हीं कामों को कराने से गूगा और नकटा हुआ करता । तथा बेइन्द्रिय अवस्था का सयोग हुश्रा करता है। (६) प्रश्न-घ्राणइन्द्रिय की नीरोगता किन कारणों से हुआ करती है ? उत्तर-साधु साम्यो, सज्जन, गुरुजन, और गुणी आदि पुरुषों के प्रति नमस्कार, विनय, नम्रता आदि करने से, सुगन्धित पदार्थो के प्रति आसक्त नहीं होने से, नाकहोन प्राणियों को सहायता करने से, अथवा उन पर दया करने से स्वस्थ, सुशोभित और शक्ति शोल घ्राणइन्द्रिय की प्राप्ति हुआ करती है। (७) प्रश्न-जिह्वा इन्द्रिय की हीनता कैसे हुश्रा करती है ? उत्तर-मदिरा, मांस, कन्दमूल, आदि अभक्ष्य पदार्थों के अक्षण करने से, षटरस मय पदार्थो में अत्यन्त लोलुपता रखने से रसना जीभ के पोषण के लिये वनस्पति काया के जीवों को महारम्भ करने से असत बोध और कुउपदेश द्वारा हिंसा का प्रचार करने से, पाखड और आडम्बर का प्रचार करने से, मर्म प्रकाशित करने से, मृपावाद बोलने से, फर्कश और कठोर भाषा बोलने से, मूक गू गे की, अस्पष्ट और षड़- पड़ रूप से अथवा अटक-अटक फर बोलने वाले को हँसी करने से, सत, सती, गुणी और सज्जनों की निंदा करने से, अन्य प्राणियों की नाम को कष्ट पहुँचाने से अथवा उसका छेदन भेदन करने से, एवं उनके स्वासोच्छवास को रुधने से, रसना इन्द्रिय की हीनता हुआ करती है, मूक और गू गा बनता है, अशोभनीय एव अप्रिय वचनों वाला होता है, दुर्गघमय मुख वाला बनता है, तथा एकेंद्रियपने को प्राप्ति हुआ करती है। (८) प्रश्न-रसना इन्द्रिय के स्वस्या की प्राप्ति कैसे हुआ करती है ? है -- - - , (६८) * ध्यान-कल्पतरु * Trna 3 - - 1 . उत्तर-अभक्ष्य पदार्थों का त्याग करने से, पटसों के प्रति आसक्ति नहीं रखने से, सद्बोध का और अहिंसामय धर्म का प्रचार करने से, सद्गुणों का उच्चारण करने से, सभी के लिये सुखदायक ऐसे वचनों को वोलने से, रसनाहीन प्राणियों की सहायता करने से अयवो उन पर दया करने से रसना इन्द्रिय फ्री स्वस्थता और मधुर स्वर की प्राप्ति हुआ करती है। (१) प्रश्न-हाथों की हीनता किन कारणों से हुआ करती है ?- उत्तर-दूसरों के हाथ काटने से अथवा उनको पीड़ा पहुँचाने से, खोटे तोनने और खोटे मापने के काम करने से खोटे लेस और मूठे स्टाप दस्तावेज आदि लिखने म, कुशास्त्रों का निर्माण करने-कराने से, चोरी करने से, लूले प्राणियों को हँसी-मजाक करन से, अन्य प्राणियों को अपने हाथ से 'छेदने से, भेदने से, उन्हें मारने पीटने से, ताड़ना करने से, और पक्षियों के पत्र आदि काटने से हार्था की होनता का प्राप्ति हुआ करती है। (१०) प्रश्न-हाथों को स्वस्थता और वलिष्ठता की प्रानि किन कारणों से हुआ करती है ? उत्तर-दान देने से, खोटा और हिंसाकारक लेन देन नहीं करने से, खोटे लेख और झूठे दस्तावेज नहीं लिखने से, सात्विक तथा धर्म-पृद्धि के लेख लिखने से,'अदत्तादान नहीं ग्रहण करने से हाथों से दुःखो और हीन प्राणियों पर दया करने से अथवा उनकी सहायता करने से, इत्यादि कामों से हायों को स्वस्थतो और वलिष्ठता की प्राप्ति हुश्री करती है। (११) प्रश्न-पावों की हीनता और रुग्णता किन फारणों से हुआ करती है ? 'उत्तर-उन्मार्गगामी होने से, हिंसा श्रादि कामों में बढ़ चढ कर भाग लेने से, धर्म-कार्य में आलस्य करने से, पृथ्वीकाय, अपकाय, वनस्पतिकाय, और वेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय प्रादि जीवों को पैरों तले रोदने से, छोटे बड़े प्राणियों के पावों को कष्ट पहुंचाने में अथवा तोड़ने मरोड़ने से, लगडे अथवा विकृत-अगोपांग वाले की हँसी मजाक करने से. चोरी श्रादि कुकृत्य करने से, इत्यादि कामो के पैरों की विकृति की और पैरै हीनता को प्राप्ति हुश्रा करती है।। (१२) प्रश्न-पांवों की सुदृढ़ता और नीरोगता कैसे प्राप्त होती है ? । उत्तर-उन्मार्गगामो नहीं होने से, अन्य को सुमार्ग बतलाने से, सचित पदार्थों को पैरोतले नहीं रोदने से, लंगड़ों पर और विकृत अगोपाग वालों पर क्या करने से और उनको सहायता करने से, इत्यादि सत्कायों के बल पर पैरों को बलिष्ठता, निरोगता और स्वस्थता प्राप्त होती है। (१३) प्रश्न -निर्धनता क्यों होती है ? उत्तर-चोरी, कपट, धूर्तता, ठगाई, जुल्म, 'हिमाकार्य, व्यापार, हत्यादि तरीकों से धन एकत्र किया जाय तो भविष्य में निर्धनता का संयोग होता है। धनियों के प्रति द्वष रैखने से, किसी को भी निर्धन को बनाने की भावना से, परिश्रम से कमाये हुए किसी के भी धन को छानने की भावना रखने से जनता घर-वस्त्र अन्न प्रादि से वचित करने के प्रयत्न से गरीबों का हीन दृष्टि से देखन से और उन्हें कटु वचन बोलने से, किसी के भी प्रति फलक लगाने स.., किसों को जंजाल में फैमाने से किसी को भी पानीविका को करने का प्रयत्न करने मे, साधु-अवस्था में धन रखने से, दूसरे की आमदनी में अतराय डालने से, किसी की भी धरोहर दवा देने से, मनुष्यों को निर्धन बनाने से, इत्यादि कारणों में निर्ध ता का सयोग हुश्री । यदि किसी का धन अग्नि में जलावे, पानी में दुबावे अथवा अन्य तरीकों से नाश करे) तो उसको . कारण से - 7 - प नष्ट करता * ध्यान-कल्पतरु * (६९) - हुश्रा - भी समय पाने पर अपने धन को अग्नि द्वारा, जल द्वारा एव अन्य रूप द्वारा नष्ट होता हुआ देखना पड़ता है और महान खेद उठाना पड़ता है। (१४) प्रश्न-धन सम्पत्तिशाली कैसे होता है ? उत्तर-निर्धनों पर दया करने से और उनकी सहायता करने से, अन्य को सम्पत्तिशाली देखकर प्रसन्न होने से, प्राप्न द्रव्य पर ममत्व भाव नहीं रखने से, दान पुण्य आदि धार्मिक कार्यों में धन को व्यय फरने से, अनाथ अपाहिज, लूले लगड़े की सहायता करने से, एव सत् कार्यो में धन को व्यय करने से धन- सम्पत्ति की प्राप्ति करती है। (१५) प्रश्न-पुत्र हीनता का क्या कारण है ? उत्तर-पशु पक्षी, मनुष्य प्रादि के अनाथ बच्चों को कष्ट देने से अथवा उन्हें मारने से, यूका-जू , लीख आदि को मारने से एव इनके अहों को फोदने से, सतति वाला पर द्वेष करने से, गाय भैस आदि के बछड़ों को दूध पीते समय अचानक ही स्वींच लने से, छोटी और अल्प आयु में हो बछड़ा वछड़ी को बेचफर माता सतान का पारस्परिक वियोग पैदा करने से, बीजों को गिरी निकालने से, इत्यादि कारणों से सतान होनता की प्राप्ति हुआ करती है। (१६) प्रश्न--सतति-शीलता किन कारणों से होती है। उत्तर-पशु, पक्षी, मनुष्य आदि के अनाथ बच्चों की रक्षा करने से, उनको सहायता पहुँचाने से, उन्हें आजीविका उपार्जन करने योग्य बनाने से, इत्यादि सत् कार्यों से सतान की उत्पत्ति हुआ करती (१७, प्रश्न--कुपुत्र की उत्पत्ति किन कारणों से होती है ? उत्तर-दूसरों की सतान को अविनय आदि दुर्गुण और बुद्धि सिखला कर माता पिता का प्रविनय कराने से, पिता पुत्र का झगड़ा देखकर प्रसन्न होने से, पारस्परिक फूट को उत्पन्न कराने से, अपने माता-पिता को संताप देने से, दूसरों से लिये हुए ऋण को समय पर नहीं चुकाने से, दूसरे को धरोहर को दवा लेने से, आदि कारणों से अविनीत और कुपुत्र की उत्पत्ति हुआ करता हैं । (१८) प्रश्न-सुपुत्र की उत्पत्ति किन कारणों से होती है ? उत्तर-माता व पिता की भक्ति करने से, और अन्य को भी ऐमा ही करने का उपदेश देने से, पुत्रों को धर्म-मागे पर लगाने से, पुत्र का विनय देख कर प्रसन्न होने से, आदि कारणों से सुपुत्र का सयोग प्राप्त हुआ करता है। (१६) प्रश्न-अयोग्य पनी का सयोग किन कारणो से होता है ? उत्तर-पति पनो के परस्पर में क्लेश उत्पन्न कराने से दम्पति के झगड़े को देखकर खुश होने से, स्त्री को विपरीत बात समझाने से, अथवा उसे अत्यधिक विषयासक्त बनाने से, सती स्त्रियों की निंदा करने से, उनपर फलक लगाने से, अन्य की योग्य स्त्री का देख कर अपने मन में दुखी हाने से, इत्यादि कारणों से अयोग्य पनी का संयोग हुआ करता है। (२०) प्रश्न-सुयोग्य पत्नी का संयोग किन कारणों से होता है ? उत्तर-मर्यादा पूर्वक शील पालने से, व्यभिचारिणो स्त्रियों की संगति से दूर रहने से, उन्मार्ग- गामिनी स्त्रियों को सुधारने से, सती स्त्रियों की प्रशंसा और सहायता करने से, पति-पत्नी का पारस्परिक विरोघ मिटाने से, इत्यादि कारणों से सुयोग्य पत्नी का रायोग हुआ करता है। - - ७०) * ध्यान-कल्पतरु* - . . उत्तर- (२१) प्रश्न-अपमान और मानहानि किन कारणों से हुआ करती है ? उत्तर-अन्य का अपमान करने से, माता पिता गुरु श्रादि वृद्ध पुरुपो का विनय नहीं करने से, गरीब और बुद्वि रहित पुरुपो का अपमान करने से, शत्रुश्रो का अपमान सुन कर खुश होने से, अपने ही मुख से अपनी प्रशसा करने से अपने गुणों का अहकार करने से, गुणशील पुरुपो के प्रति द्वेष करने से, गुणवानो की वदना नहीं करने से, दूसरों को वदना करने के कार्य से निपेध करने से, स्वछन्दता पूर्वक व्यवहार रखने से, इत्यादि कारणों मे अपमान का सयोग प्राप्त हुआ करता है। ( २२ ) प्रश्न-सन्मान की प्राप्ति किन कारणों से हुश्रा करती है ? उत्तर-तीर्थकर, साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका, सम्यक् दृष्टि, ज्ञानी, गुणो, धर्म-दीपक धादि महापुरुषों के गुणग्राम करने से, गुणो की प्रभावना करने से, घड़ों का श्रादर, विनय, भक्ति करने से, सत्पुरुपो की फोर्ति सुनकर प्रसन्न होने से, उनके प्रति वदना करने और कराने से, स्वय गुणी होने पर मी अपने गुणो का प्रकाशन नहीं करने मे, सदा नम्र रहने से, इत्यादि कारणे से सर्व स्थान पर सन्मान प्राप्ति का भयोग हुश्रा करता है। (२३) प्रश्न-क्लेशकारक कुटुम्ब की प्राप्ति कैसे होती है ? -कुटुम्बों में झगड़ा कराने से, क्लेश देख फर प्रसन्नता प्रकट करने से, श्रादि कारणों से क्लेश कारक कुटुम्ब का संयोग हुश्रा करता है। (२४) प्रभ-अच्छा कुटुम्ब कैसे मिलता है ? उत्तर-स्व और पर के कुटुम्बों में संप कराने से, निर्धन कुटुम्वों की हर प्रकार से सहायता करने से फुटुम्बो में प्रेम देख कर प्रसन्न होने से, इत्यादि कारणो से सुखप्रद कुटुम्बों को प्राप्ति हुआ करती है। (२५) प्रश्न-रोगमय शरीर की प्राप्ति किन कारणों से होती है ? उत्तर-रोगियों को दुख देने से, उन की निंदा करने से, हँसी करने से, औषधि दान में अंतराय देने से, उनके रोग को बढाने से, असाता उत्पन्न करने से, माधुओं के वस्त्रों को मलिन देख कर उनके प्रति अरुचि उत्पन्न करने से, इत्यादि कारणों से रोगमय शरीर की प्राप्ति हुआ करती है। (२६) प्रश्न-म्वस्थ और नीरोग शरीर की प्राप्ति कैसे होती है ? उत्तर-दीन दुखियों को, रोग ग्रस्तों को देखकर उन पर दया करने से, उनको सुख उपजाने से, साधु-साध्वियों को औषधि आदि का दान देने से,और ऐसे ही अन्य कारणोंसे नीरोग शरीर प्राप्त होता है। (२७) प्रश्न-कर स्वभाव वाला किन कारणों से होता है ? उत्तर-कुसगति से प्रसन्न रहने से और सत्सगति से अलग रहने से, वात बात में सतप्त हो जाने से, श्रोदि वातों से क्रूर स्वभाव वाला होता है । नरकगति से आया हुआ भी क्रूर होता है । (२८) प्रश्न-मेल मिलाप रखने वाला किन कारणों से होता है ? धैर्य धरने से, उत्तर-साधु के दर्शनो से प्रसन्न होने से, कुसगति के त्यागने से, कुवचन सुनकर प्राप्त वस्तु पर सतोप रखने से, आदि सद्गुणो से मेल मिलाप रखने वाला हुश्रा करता है । तथा जो देवगति से आया हो, वह भी मेल मिलाप की प्रवृत्ति वाला ही होता है।

* ध्यान-कल्पतरु * (७१) . - (२६) प्रश्न-पापात्मा किन कारणो से होता है ? उत्तर-जनता को धर्म से भ्रष्ट करने से, सद्धर्म की निन्दा करने से, कुधर्म की महिमा करने से, अधर्मियो की सगति करने से, श्रादि कारणों से पापमय आत्मा वाला बनता है। (३०) धर्मात्मा किन कारणों से होता है ? उत्तर-प्रधर्मियो को धर्मात्मा बनाने से और धर्मोन्नति तन, मन, धन से करने पर धर्मात्मा बनने का सयोग प्राप्त हुआ करता है। (३१) प्रश्न--निर्बल शरीर वाला कैसे बनता है ? उत्तर-दीन गरीबो को सताने से, अन्न वन की अतराय देने से, निर्वल को दबाने से, झगड़ा करने से, बंध-वध करने से, और अपने बल का अभिमान करने से निर्बल शरीर वाला बना करता है। (३२) प्रश्न-बलवान शरीर वाला कैसे बनता है ? उत्तर-दीन, अनाथ जोवो पर क्या करके उन्हें साता उपजाने से, संकट में उनकी सहायता करने से और अन्न वस्त्र श्रादि उन्हें देने से, बलवान शरीर वाला बना करता है। (३३) प्रभ-कायर किन कारणो से होता है ? उत्तर-जीवो को भयभीत करने से, जीवों के हृदय में भय जनित धक्का उत्पन्न करने से, दूसरों की इज्जत में धक्का पहुँचाने से, राज्य, पच, चोर, सर्प, विष, अग्नि, पानी, देव, भूत, श्रादि भयकर वस्तुओं के नाम स्मरण करा कर जीवों के हृदय में भय उत्पन्न करने से, पशुओं को त्रास देने से, उनको भड़काने से, चमकाने से, जीवो को डरे हुए देखकर प्रसन्न होने से, इत्यादि कारणों से कायरता का संयोग हुश्री फरता है। ( ३४ ) प्रश्न-वीरता की प्राप्ति कैसे होती है ? उत्तर-दीन, दुखी, अपराधी को अभयदान देने से, उन्हें भय से बचाने से और उन पर श्राये हुए उपद्रव, संकट, परीपह, उपसर्ग श्रादि का निवारण करने से, ऐसे ही पुण्य कार्यों से वीरता की प्राप्ति हुआ करती है। (३५) कृपण वृत्ति क्यो पैदा होती है ? उत्तर-धन द्रव्य के होने पर भी दान नहीं देने से, दान देते हुए को मनाही करने से, दान देते को देखफर दुखी होने से, और दान-वृत्ति की निंदा करने से, इस प्रकार की प्रवृत्ति से कृपण पृत्ति का पंघ पढ़ता है। (३६) प्रश्न-दान देने की वृत्ति कैसे पैदा होती है ? उत्तर-दीन-गरीब होने पर भी दान देने से, दूसरो को दान देते देखकर प्रसन्न होने से, शक्ति अनुसार दोन-दुखियो की सहायता करने से सदा दान देने की अभिलापा रखने से, धर्मोन्नति को सुन फर, देखकर प्रसन्न होने से, इस प्रकार की प्रवृत्तियो से दान देने की वृत्ति का वध पढ़ा करता है। (३७ प्रश्न-मूर्खता क्यो कर प्राप्त होती है ? उत्तर-विद्वानों-पडितो की हसी मजाक करने से, निंदा, अविनय और आशातना करने से, ज्ञान प्रसार में भगय देने से, झान के उपकरण पुस्तक आदि का नाश करने से, शान पर- अरुचि लाने से, .

(७२) * ध्यान-कल्पतरु * ज्ञान-वृद्धि में जी चुराने से, दूसरों के लिखित साहित्य को अपने नाम से प्रकाशित करने से, सत्य शास्त्र को मिथ्या घोपित करने से, झूठे शाष को सत्यरूप से प्रकट करने से, इत्यादि कारणों से ज्ञानावरणीय फर्म का वध पड़कर के मुर्खता की उत्पत्ति हुआ करती है। (३८) प्रश्न-पडिताई अथवा बुद्धिमत्ता का उदय किन कारणों से हुश्रा करता है ? उत्तर-विद्या-दान देने से, विद्या-प्रसार में, तन, मन और धन का व्यय करने से, विद्वानों की महिमा और सगति करने से धार्मिक और सात्विक पुस्तको का प्रचार करने से, इत्यादि कामों से ज्ञाता वरणीय कर्मों को बधन टूटकर बुद्धिमत्ता का उदय हुश्रा करता है। (३६) प्रश्न-परतंत्रता क्यों प्राप्त होती है ? उत्तर--अन्य को वधन में डालने से, अधिक परिश्रम कराकर कम मजदूरी देने से, कर्जदारों का घर लूटने से, उनकी बेइज्जत करने से, कुटुम्ब के नौकरो को श्राहार आदि की अतराय देने से, वल पूर्वक उनसे अधिक काम कराने से, पशु पक्षियों को कारण ही बाड़े में अथवा पीजरे में बद रखने से, दूसरी को पराधीन देखकर प्रसन्न होने से, दूसरों की स्वाधीनता नष्ट करने से, इत्यादि प्रकार की प्रवृत्तियों से पराधीन बनने का कर्म चधन होता है। (४०) प्रश्न-स्वाधीनता की प्राप्ति कैसे होती है ? उत्तर-कुटुम्ब को और नौकरों को सताप नहीं देने से, थाहार, वस्त्र, स्थान आदि को साता उप- नाने से, शक्ति से अधिक परिश्रम नहीं कराने से, मनुष्य पशु पक्षी श्रादि को बदीखाने में नहीं रखने से, बंदियों को स्वतत्र करने से, दूसरों को स्वतंत्रता की रक्षा करने से, अपनी स्वछदता पर नियंत्रण रखने से, गुरुजनों की आज्ञानुसार प्रवृत्ति करने से, इत्यादि प्रकार के सत्कार्यों से स्वाधीनता की प्राप्ति हुआ करती है। (४१) प्रश्न-कुरूप काया की प्राप्ति क्यों होती है ? उत्तर-स्वय रूप शालो होने पर यहकार करने से, अन्य सुन्दर रूपवालों की निंदा करने से, कुरूप वालों की हसी मजाक करने से, उनका अपमान करने से शृगार-मावना तथा शृगार-प्रवृत्ति रखने से इत्यादि कारणों से कुरूप काया की प्राप्ति हुआ करती है। (४२) प्रश्न-सुरूप शरीर की प्राप्ति कैसे होती है ? उत्तर-सुन्दर होकर भो अभिमान नहीं करने से, रूपवती स्त्रियों को विकार-दृष्टि से नहीं देखने से, कुरूप वालों का अनादर नहीं करने से, शोल-ब्रह्मवर्य का पालन करने से. ऐसे ही कामां से सुन्दर शरीर की प्राप्ति हुआ करती है। (४३) प्रश्न-धन सपत्ति शाली होकर भी उसका उपभोग किस कारण से नहीं कर सकता है। उत्तर-प्राणियों के खाने, पीने वस्त्र, आभूषण आदि के उपयोग करने में अतराय डालने से, खुद तो सभी प्रकार की वस्तु का भोग और उपभोग करे, परन्तु स्त्र प्राप्रितों को उनस वचित रखते हुए उन्हें तरसाने से, उन्हें ललचाने से, अन्य को भोग-उप भोग को वस्तुएँ भोगते हुए देख कर दुःखी होने, इन प्रवृत्तियों से धन-संपत्ति शाली होने पर भी उसका उपभोग नहीं कर सकता है। (४४) प्रश्न-सुखों का उपभोक्ता किन कारणों से होता है ? उत्तर प्राप्त भोगोपभोग की वस्तुओं को दान पुण्य में और स्वधर्मियों को प्रदान कर दे, वो भवि- ध्य में इष्ट भोग्य वस्तुओं की प्राप्ति का वध पड़ता है। .

* ध्यान-कल्पतरु * ( ७३ ) - (१५) प्रश्न-क्रोधी किन कारणों से होता है? उत्तर-क्रोध करने से, क्रोधियों को प्रशसा करने से, मनुष्य, पशु, देवताओ के युद्ध की बाते सुन- कर प्रसन्न होने से, शिकार खेलने से, क्षमा शील को सताप उत्पन्न कराने से उनकी निदा अथवा सो करने से "क्रोधित स्वभाव" के वध की नींव पड़ा करती है। (४६) प्रश्न-धूर्तता क्यों कर प्राप्त होती है ? उत्तर-धर्म-क्रिया में, दान-पुण्य में, जप-तप में कपट करने से, थोड़ा करके बहुत बतलाने से, अहकार का प्रदर्शन करने से, इत्यादि रूप वृत्तियों से "धूर्तता" का बध पडा करता है। (४७) प्रश्न-सरल स्वभाव कैसे प्राप्त होता है ? उत्तर-सरल-स्वभाष के साथ सभी प्रकार की प्रवति करने से, अहकार का प्रदर्शन नहीं करने से, "सरल-स्वभाष का बध पढ़ा करता है। (४८) प्रश्न-चोर क्यों बनता है ? उत्तर-चोर-फर्भ को अच्छा जानने से चोर को सहायता देने से, चोर की चुराइ हुई वस्तु लेने से, चोर-कर्म की कला बतलाने से, चोर को प्रशसा करने से, "चोर" का बध पड़ा करता है। (४९) प्रश्न—“साहुकार" पद कैसे प्राप्त होता है ? उत्तर-अचौर्य कर्म के धारण करने से और चोरों की सगति से दूर रहने से “साहुकार" पद की प्राप्ति हुधा करती है। (५०) प्रश्न–कसाईपना क्यों प्राप्त होता है ? उत्तर-हिंसा की प्रशसा करने से, हिसा करने की कला बतलाने से, हिंसा के शस्त्र वनाने से और प्या-फार्य की निंदा करने-“कसाईपने" की प्राप्ति हुआ करती है । (५२ ) प्रश्न-दयालु प्रकृति कैसे प्राप्त होती है ? उत्तर-हिंसक की सगति से दूर रहने से, हिंसक को उपदेश द्वारा दयालु बनाने से, हिंसक को अन्य आजीविका का प्रबन्ध कर। कर हिंसा कार्य से छुड़ा कर दया शील बनाने मे " दयालु-प्रकृति " का बन्ध पड़ता है। (५२ ) प्रभ-अनायारी क्यों कर बनता है ? उत्तर-विकृत भाष रखने से, अशुद्ध और अभक्ष्य वस्तु के भोगने से, आचारवान-रियो शील की निंदा करने से, अनाचार सेषन में अानन्द मानने से, अनाचारियों का सहवास करने से, अनाचार को भला जानने से, आदि प्रवृत्तियों से " अनाचारी " बनने का वन्ध पडता है। (५३) प्रश्न-शुद्ध आचरण घाला किन कारणों से होता है ? उत्तर-अनाचारियों को शुद्ध श्राचग्ण वाले वनाने से, अनाचार के प्रति घृणा-भाव रखने से, शुद्ध आचरण वाले की सेवा-प्रशंसा करने से, अभक्ष्य पदार्थों का त्याग करने मे, नीति-पालन की ओर प्रवृत्ति करने से, श्रादि कामों से " शुद्ध आचरण वाला वनने " का बन्ध पड़ा करता है। (५५) प्रश्न-भाइयों में प्रेम कैसे होता है ? उत्तर--मनुष्यों का पशुओं का झगड़ा मिटाने से सगठन कराने से, सगठन देख कर प्रसन्न होने से, सगठन कारम रहे, ऐसा प्रयत्न करने से, " भाइयों में प्रेम " नामक प्रकृत्ति का वन्ध हुआ करता है। - ( ७४ ) * ध्यान-कल्पतरु * फल की इच्छा 8 । (५६) प्रश्न-अन्तर द्वीपों में जन्म किम कर्म से होता है? उत्तर-मिथ्याली साधु माध्वियों को दान देने से, योग्य और उत्तम माधुनों को कपट पूर्वक और से दान देने स, दान देकर अमिमान करने से, आदि कारणों से अन्तर द्वीप में " मिथ्यात्वी युगलिया पुरुप " रूप से उत्पन्न होने का वन्ध पडता ( ५७ ) प्रश्न-युगलिया ( भोग भूमि के पुरुष ) बनने का योग किन कार्यों से हुआ करता है ? उत्तर-शुद्ध आचरण वाले साधुओं को प्रसन्नभाव से निर्दोष आहार, स्थान, वक्ष, पात्र आदि का दान देने से, और दूसरों द्वारा दिलाने से, अन्य को देते देख कर प्रसन्न होने से, अकर्म भूमि में सम्यक दृष्टि युलिया " रूप से उत्पन्न होने का वन्ध पड़ता है। ( ५ ) प्रश्न-अनार्य देश में किस कर्म से जन्म हुआ करता है ? उत्तर-झूठा कलक लगाने से म्लेच्छ क्षेत्रों की सुम्ब-सम्पत्ति को प्रिय भावना के साथ देखने से म्लेच्छ वेश धारण करने से, म्लेच्छ कामों की प्रशसा करने से, धार्य देश को छोड़ कर अनार्य देश में निवास करने से, इत्यादि कारणों से " अनार्य देश " में उत्पन्न होने का बन्ध पड़ा करता है । ( ५ ) प्रश्न-धार्य देश में किस कर्म से जन्म हुआ करता है ? उत्तर-आर्यों की चाल चलन पसन्द करने से, अनायर्या के व्यवहार और उनके कामों का परित्याग करने से, अनार्यों को आर्य वनाने से, मुनि-साधुओं का प्रशसा करने से, पार्यों की यथा-शक्ति सहायता करने से, आदि कर्मों के कारण से " आये देश में उत्पन्न होने का वन्ध पड़ा करता है। (६०) प्रश्न-बोझा उठाने वाला मजदूर-हमाल किन फर्मों से ऐसे दु.ख प्रद कार्यों का कर्त्ता बनता है? उत्तर--मनुष्य और पशुओं से शक्ति से भी अधिक वोमा खिंचवाने से, शक्ति से अधिक काम लेने से, वेगार में पकड़ने से, बल पूर्वक काम कराने से, थोड़ा कहते हुए अधिक वोमा लाद देने से, ज्यादा वोमा उठाया हुआ देख कर प्रसन्न होने से, श्रादि कामों के करने से " हमाल, लद्दू वैल, गाड़ी नागा खींचने वाले वैल और घोड़ा" श्रादि की योनि प्राप्त होती है। (६१) प्रश्न- कुकवि, भाट, चारण " की योनि किस सयोग से प्राप्त होती है ? उत्तर-मुकया, कुवार्ता, कुउपन्यास, कुनाटको के प्रेमो वनने से, मिथ्या शास्त्रों का प्रसार करने से, धर्म कथा का नाम रख कर काम-भावनाएँ उत्पन्न हों, ऐसी कथाओं के कहने से, विषय-पोषक और शृगार रसमय कविताएँ रचने से विषय सम्बन्धी वचन रोग रागिनियाँ सुनने से, इनमें सक्ति रखने से, धादि क्रियाओं द्वारा कुकवि, भाट, चारण का जन्म धारण करना पड़ता है। (६२) प्रश्न-सुकाव किस कर्म के उदय से होता है ? उत्तर-जिनराज और मुनिराज के गुण और कीर्ति को सुनकर प्रसन्न होने से, शास्त्र कर्ता, गणधर, श्राचार्य आदि धर्म नायकों की प्रशसा करने से, ज्ञान-घृद्धि मे धन लगाने से, धार्मिक कवियों को सहायता देने से, धार्मिक कविताओं के रहस्यमय अर्थो से प्रसन्न होने से, इत्यादि रूप से साहित्यिक अनुराग से विद्वान कवि बनने का सौभाग्य प्राप्त हुया करता है। (६३ ) प्रश्न-दीर्घायु कैसे प्राप्त होती है ? उत्तर-मरणोन्मुख जीवों को द्रव्य देकर अभयदान देने से, उन्हें खाने, पोने, और स्थान आदि की सहायता पहुँचाने से, वन्दी प्राणियों को स्वतन्त्र करने से, संसार के प्रति तटस्थ भावना रखने से, * ध्यान-कल्पतरु * (७५) . - दयालु स्वभाव रखने से, अनाथों की सहायता करने से, साधुओं को निर्दोष अाहार आदि का दान देने से दीर्घायु का बन्ध पड़ता है। (६४) प्रश्न-अल्प आयु क्यों प्राप्त होती हैं ? उत्तर-जीवों की घात करने से, गर्भहत्या करने से, आजीविका का भग करने से, जूं खटमल आदि को मारने से, साधुजी को धमनोज्ञ और असाताकारी आहार आदि देने से, शुद्ध रीति से ग्रहण करने वाले सोधुजी को अशुद्ध रीति से आहार आदि का दान देने से, अग्नि, विष, शस्त्र आदि के प्रयोग द्वारा जीवों को मारने से अल्प आयु का बन्ध पड़ता है । ( ६५ ) प्रश्न-सदा चिंता व्याप्त होने का क्या कारण है ? उत्तर-अनेक जीवों को चिन्ता प्रस्त होना पडे, ऐसा कार्य करने से अथवा निरन्तर चिन्तारत रहने से, "सदा चिन्ता उत्पादक कर्म का बन्ध पड़ा करता है (६६) सदा निश्चितता रहे, इसमें मूल कारण क्या है ? उत्तर-दूसरों की चिन्ता दूर करने से, धर्मात्माओं को देख कर प्रसन्न होने से, दुःखी पीड़ित को सन्तोष उत्पन्न कराने से, आदि कार्यों से 'निश्चितता-जना कर्म का बन्ध हुश्रा करता है। (६७) प्रश्न - दास गुलाम क्यों बना करता है ? उत्तर-नौकरों को बहुत सताने से, उनसे अत्यधिक काम लेने से. और परिवार संख्या अधिक होने पर उसका अहंकार करने से दासता" का बन्ध पड़ता है। (६८) "स्वामी कैसे बना है ? उत्तर-धार्मिक पुरुषों की, तपस्वियों को वैयावश्च करने से, धार्मिक किन्तु दु खो मनुष्यों की सहा- यता करने से उनका पोषण करने से अन्य द्वारा धर्मात्माओं की सेवा भक्ति कराने से, सेवा-भक्ति करते हुए देखकर प्रसन्न होने से, इत्यादि कारणों से "स्वामी" बनने का बन्ध पढ़ता है। (६६) प्रश्न-नपु सफ क्यों होता है ? उत्तर-नपु सफ के नृत्य गायन, इसी मजाक को देखकर प्रसन्नता प्रकट करने से, पुरुष होते हुए स्त्री का वेश धारण करके नृत्य करने से, और ऐसा ही कराने से, बैल, घोड़े आदि पशु और मनुष्यों को षधिया कराने से, पुरुषत्व से हीन कराने से, नपुसक के साथ विषय-सेवन करने से, नपु सफ जैसी चेष्टाएँ फरने से, स्त्री पुरुष के सयोग को दलाली करने से, विकलेन्द्रिय प्राणियों की हिंसा करने से, आदि कारणों से नपुसक बनने का बन्ध पड़ता है। (७०) प्रश्न-बी जन्म क्यों होता है ? उत्तर-स्त्रियों के विषय में अत्यन्त प्राप्तक्ति रखने से,पुरुप होकर भी स्त्री का वेशपनाने से स्त्रियों को तरह चेष्टाएँ करने से, कपट करने से, श्रादि कारणो से "स्त्री" बनने का योग प्राप्त हुआ करता है। (७१ ) प्रश्न-निगोद में उत्पत्ति क्यों होती है ? उत्तर-देव, गुरु और धर्म की निन्दा करने से, कंद मूल का भक्षण करने से निगोद में जन्म महण करना पड़ता है। (२) प्रश्न-एकेन्द्रिय में जीव क्यो जन्म लेता है ? उत्तर--पृथ्वी, पानी, अग्नि, हषा, वनस्पति, कद मूल, वृक्ष, घास, फूल, पत्र आदि का छेदन भेदन ने से एकेन्द्रिय गति में जन्म लेना पड़ता है। . - (७६) * ध्यान-कल्पतरु * (७३) प्रश्न-विकलेन्द्रिय मे जन्म क्यो होता है ? उत्तर--निर्दयता के साथ त्रम जीवों की घात करने में, अनाज को बहुत दिनो तक मप्र फरक रखने से, त्रस जीवों की उत्पत्ति हो ऐसी वस्तुथो का सग्रह करने से, मन्छर, खटमल को निवारण करने के लिये धुआँ श्रादि का उपचार करक उन्हें मारने मे जिनमें त्रस जीवा क उत्पन्न होने को आंशका हो- ऐसे बेर आदि फलो का भक्षण करने से, गदे नाले गटर मे पेशाब करने से, इत्यादि कारणो से विकलन्द्रिय जाति में पैदा होने का योग हुश्रा करता है। (७४) प्रश्न--विक्लाग शरीर क्यो प्राप्त होता है ? उत्तर--जीवों के हाथ, पाँव, कान, नाक, आँस, अंगुली, आदि अंगोपांगो का छेदन-भेदन करन से, कानो को क्तग्ने से, उन्हें विधन से, अथवा गृग क ढग मे क्तरने से, एव ऐमी क्रियाएँ करते हुए देखकर प्रसन्न होने से, इत्यादि कारणो से विक्लाग शरार की प्राप्ति का वन्ध हुश्रा करता है। (७५) प्रश्न--अगों की परिपूर्णता कैसे प्राप्त होती है ? उत्तर--दूसरे प्राणियो के अगोपागो का छेन्न भेदन करते हुए देखकर उनकी सुरक्षा करने स, विक्ल अग वालो की करुणा और सहायता करने से, उनको सुधारने अथवा नीरोग करने के लिये उपचार आदि सम्बन्धी प्रयत्न करने से, ऐसे शरीर से असमर्थ प्राणियों की आजीविका का प्रबन्ध करके उन्हें सहा यता पहुँचाने से, "अगो की परिपूणता" प्राप्त होने का वन्ध पड़ा करता है। (७६) प्रश्न-नीच जाति में जन्म किन कमों से होता है ? उत्तर--अपनी उच्च जाति का, उच्च कुल का मद अहकार करने से, उच्च जाति वालो को निंदा करने से, निम्न जाति वाले से द्वप करने से, हल्के दर्जे के काम करने से, ऐमे हो कामो से नीच जाति में जन्म लेने का वन्ध पडा करता है। (७७) प्रश्न--उच्च जाति में जन्म किन कर्मो से होता है ? उत्तर-सत्पुरुषों के गुणों की प्रशसा करने से, उन्हें वन्दना नमाकार करने से, अपने दुगुणों का प्रक्ट करने से, चारों तीर्थों की भक्ति करने से, ऐसे कार्या से राजा आदि क उच्चकुल में जन्म लेन का बन्ध पड़ता है । यदि क्रिया और भावनाओं में कुछ कमी रह जाय तो तिथंच गति प्राप्त होने पर भी राज मान्य "हाथी, घोड़े जैसी सम्माननीय जाति प्राप्त होने का बन्ध पडा करता (७८) प्रश्न-ऊँची जाति में उत्पन्न होकर भा दास बनने का सग किन कर्मो क कारण से प्राप्त हुआ करता है? उत्तर-उच्च कामो का अभिमान करने से गुरु की आज्ञा का भग करने से, उच्च स्थिति में पहुँचा हुआ होकर नीची स्थिति वालो पर झूठा कलङ्क अथवा मिथ्या धाराप लगाने से बड़ा श्रादमा होता हुश्रा भी हल्के दर्जे के काम करने से, उच्च जाति का हाकर दास जना जैसी वृत्ति का श्राचरण करने से, ऐसे ही कारणो से दास बनने का कम-बन्ध हुश्रा करता है। (७६) प्रश्न-आजीविका के लिये देश विदेश में किन कर्मो के उदय में फिरना पड़ता है? उत्तर-भिनुको को लालायित करके और वार बार भटका करके तत्पश्चात कुछ दान देने से, नौकरों का वेतन समय पर नहीं देकर मानसिक कष्ट पहुँचा कर तत्पश्चात देने से, धर्म के नाम पर दान की घोषणा करके उस दान-द्रव्य को समय पर नहीं देकर बहुत देरी करके देने से, अथवा थोड़ी थोड़ो किश्तो में .

1 * ध्यान-कल्पतरु * ( ७७ ) बांट फर इस प्रकार देने से, इत्यादि कारणो से "बिदेश मे श्राजीविका" के लिये भटकाने वाले कर्मों का बन्ध पड़ा करता है। (८० ) प्रश्न-सुख पूर्वक श्राजीविका की प्राप्ति किन कर्मों के उदय से हुआ करती है ? उत्तर-धर्मात्माश्रो को उनके स्थान पर ही श्राहार, वस्त्र, श्रादि पहुँचा कर सहायता करने में उन द्वारा धर्म-वृद्धि कराने से, स्थिर चित्त से धर्म-ध्यान की आराधना करने से स्थिर मनोवृत्ति वाले का कीर्ति बढाने से, इत्यादि कारणो से घर बैठे ही सुख पूर्वक आजीविका प्राप्त होने के कारण रूप कर्मों का बन्ध हुआ करता है। (८१) प्रश्न-किस कर्म के उदय से कपट पूर्वक आजीविका उपार्जन करने का प्रयोग होता है ? उत्तर-कपट पूर्ण भावो के साथ दीन पुरुषो को दान देने से, साधु-मुनिराज को भक्ति रहित दान देने से, चोर आदि नीच पुरुषो के द्वारा आजीविका चलाने से उनको प्रशसा करने मे, सत्यता के साथ आजीविका चलाने वाले पर झूठा कलक लगाने से, इत्यादि कारणो से कठिनाई पूर्वक और कपट पूर्वक श्राजीविका चलाने का मौका उपस्थित हुश्रा करता है । (२) प्रश्न-सत्यता पूर्वक श्राजीविका क्यों चला करती है ? उत्तर-सरल भावो के साथ विनय पूर्वक धर्मात्माओ को आहार देने से, दीन प्राणियो की रक्षा करने से, निर्दोष आजीविका नहीं मिलने पर क्षुधा आदि परीषहो को सहन करने से, कुव्यापार का परित्याग करने से, इत्यादि पुण्य कार्यों से सरलता पूर्वक श्राजीविका प्राप्त होने का क़र्म-बन्ध हुश्रा करता है। (८३) प्रश्न-मनुष्य और पशुओं को बाजार में अन्य पदार्थों की तरह बेचे जाने का कर्मोदय क्यों होता है ? उत्तर-मनुष्यों का और पशुओं का क्रय विक्रय का धन्धा करने से, कन्या-विक्रय और पुत्र विक्रय ( बेटी का पैसा लेने से अथवा लड़के का निलक आदि के रूप में दव्य लेने का सौदा ) करने से, अथवा ऐसे ही कार्यो की दलाली करने से, ऐसे कर्मो का बन्ध पड़ता है कि जिससे मनुष्य को अथवा पशु को दास रूप में बाजार में बेचे जाने को प्रसग पैदा होता है। (८४) प्रश्न--सामुदायिक फर्मों का बन्ध कैसे छुपा करता है ? उत्तर--जिस स्थान पर मनुष्य का अथवा पशु का बध हत्या होती हो, वहाँ पर देखने के लिये अनेक मनुष्यों के साथ खडे रहने से, मारते समय अथवा हत्या के समय ऐसी कल्पनाएँ करने से कि "देखें, इसे कितनी शीघ्रता के साथ मारा जाता है", तत्पश्चात घर जावें, अनेक मनुष्यों के सोय सम्मिलित होकर सत्यदेव, सत्यगुरु, और सत्य शास्त्र की मिलकर निन्दा करने से, इयादि रूप से अनेक प्राणियों के साथ मिलकर जिन फर्मो फा वन्न किया जाता हैं. पीछा उनका फल भी सम्मिलित रूप से ही भोगा जाता है। जैसे कि नाव में अनेकों का एक साथ डूब जाना, श्राग में एक साथ सैकडों का जल मग्ना, प्लेग आदि बीमारियों के घेरे में फंसकर अनेक जनों का एक साथ हो मौत के घाट उतर जाना,श्रादि परिणाम सामुदायिक फर्म वन्ध का ही फल है। (८५) प्रश्न--एक माथ अनेक जोयों का स्वर्गधाम पाने देवलोक गमन कैसे होता है ? उत्तर- धर्म महोत्सव, दोक्षा उत्सव, केवल उत्सव, घऔर धार्मिक मभा में व्याख्यान-श्रवण श्रादि निर्जरा के उत्पादक सत्कार्यों में अनेक पुरुषों के साथ सम्मिलित होने से, इनके प्रति प्रसन्नता प्रकट करने स, वैराग्यमय भावों के पैदा करने से, ओर इनको प्रशसा करने से एक साथ अनेक जीवा के देवलोक में जान का फर्म वन्ध हुआ करता है। - .

( ७८) * ध्यान-कल्पतरु * ( 45 ) प्रश्न --किमी किमी को अकारण ही द्वप उत्पन्न हुआ करता है, इसका क्या कारण है ! उत्तर--गतजन्मो में किमी को दु ख दिया हो अथवा उसको हानि पहुँचाई हो, ऐसे कारणों से अकारण हो पूर्वकर्म के उदय से तुप उत्पन्न हुआ करता है। (८७ प्रश्न--अकारण हो किसी के प्रति प्रेम जागृत होने का क्या कारण है ? उत्तर-- गत जन्मों म उसने हमे दुःखों से छुटकारा दिलाया हो, हमे साता उपजाई हो, वन में, पर्वतों में, अथवा सग्राम में निराधार होने पर हमें शरण दी हो, अथवा दिलाई हो, इत्यादि कारणों से, अकारण ही प्रेम जागृत हुया करता है, अथवा अकारण हो सहायता देने की भावना जागृत हुआ करती है । (८) प्र--श्रीपधि श्रादि का बहुत उपचार करने पर भी किस कर्म से रोगों से मुक्ति नहीं होती है ? उत्तर--पूर्वजन्मों में वैद्य आदि होकर जनता के साथ विश्वासघात किया हो, इच्छापूर्वक जानकर खराव औपधि दी हो. रोगियों का रोग वढाया हो, ज्योतिप विद्या का ज्ञाता होकर ग्रह, नक्षण, भूत प्रेत आदि की व्याधि होने का झूठा डर बतला कर दूसरों को लूटा हो, देवी-देवताओं को मान्यता कराई हो, विष, शस्त्र, अग्नि श्रादि से अपघात की हो, ऐसे कार्यों के फर्मबन्ध का ही यह परिणाम होता है कि अत्यन्त उपचार करने पर भी रोग वीमारी और अन्य व्याधियों से मुष्ठि नहीं हुआ करती है। (८८) प्रश्न--धनवान का धन धर्म कार्यो में नहीं लग सके, इसका क्या कारण है ? उत्तर--जिसने गत जन्मों में कुशिक्षा दो हो, वेश्या श्रादि के नृत्य में धन का व्यय किया हो, कुव्यसनो में धन का खर्च किया हो, दूसरो का नुक्सान सुनकर प्रसन्न हुआ हो, जुधा और सट्टा फाटका में धन का व्यय किया हो, ऐसे व्यक्ति का धन सद्कार्यों में नहीं लगा करता है। क्यो कि उल्लिखित बुराइयों के कारण से उसकी बुद्धि निर्मल नहीं हुआ करती है । (६०) प्रश्न-गर्भ मे ही मृत्यु होने का क्या कारण है ? उत्तर--अपनी सौत का अथवा अपना औषधि उपचार से या मन्त्र आदि से गर्भ-इत्या करने और कराने पर ऐसे हो कर्मों का बध पडता है कि जिससे उस आत्मा का मृत्यु गर्भ में ही हो जाया करती है। (६१) प्रश्न--हितोपदेश प्रतिकूल रूप से अनुभव क्यों होता है ? उत्तर-अन्य को कुशिक्षा देकर कमार्ग पर चलाया हो, गुरु के, पिता के हितकारी वचन नहीं सुने हो, शिक्षक की हँसी की हो, ऐसे कार्यो के कर्म बन्ध से हितोपदेश भी प्रतिकूल ही अनुभव होता है। (१२) प्रश्न-जाति स्मरण ज्ञान और अवधि ज्ञान किन कारणों से हुआ करता है ? उत्तर-तप-सयम के पालन से, ज्ञानियों की सेवा करने से, ज्ञान की महिमा करने से ज्ञान सामग्री का बहुमान करने से इन ज्ञानों की प्राप्ति का बध पड़ा करता है। (६३ ) प्रश्न-व्रत-प्रत्याख्यान क्यों नहीं ग्रहण किये जा सकते ? उत्तर-दूसरों के ग्रहीत व्रतों को भग कराने से, शुद्ध प्रती के आचरण में दोष लगाने से, दूसरों के व्रत भंग होते हुए देखकर प्रसन्न होने मे, ब्रत प्रहण करने के पश्चात् सफल्प-विकल्प करने से, बार वार व्रतों के भग करने से, इत्यादि कारणों से व्रत-प्रत्याख्यान नहीं प्रहण किये जा सकते हैं। (६४) प्रश्न कसाइयों के हाथ से काटा जाय, इसमें किस पाप का उदय है ? अवस्था पर * ध्यान-कल्पतरु* (७९) . . उत्तर-कसाइयों के साथ व्यापार करने से. फसाइयों को पशु देने से, कसाई जैसे कृत्य करने से, कपट पूर्वक घात करने से, वन चरों की शिकार खेलने से, माँस खाने से, इत्यादि कार्यों के कर्म-वध से हो पशु गति प्राप्त होकर कसाइयों के हाथो में पड़कर कटनो पड़ता है। (१५) प्रश्न-पाप काम को भी धर्म-रूप माने, इसका क्या कारण है ? उत्तर-भ्रष्टाचारी फी सगति करने से, पाप को धर्म का रूप बतलाने से, सुदेव-सुगुरु सुधर्म को निंदा करने से ऐसे कार्यों के परिणाम से पाप में भी धर्म-बुद्धि ही उत्पन्न होती है। (६६) प्रश्न-व्यभिचारी क्यों होता है ? उत्तर–वेश्या के साथ सभोग करने से, वेश्या की सगति करने से, कुशील पालो की प्रशंसा करने से, पशुओं के लिये व्यभिचार का सयोग मिलाने से, मैथुन-क्रिया करते हुए देखकर प्रसन्न होने से, व्यभि- चारी हुआ करता है। (६७) प्रश्न-ब्रह्मचारी कैसे होता है ? उत्तर-शील पालने से, शीलवान की प्रशसा महिमा करने से, शीलवान की सहायता करने से, शील से भ्रष्ट लोगो की सगति से दूर रहने से, ब्रह्मचारी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुश्रा करता है ।* (8) प्रश्न-ऋद्धि शील होने का क्या कारण है ? उत्तर-सुपात्र दान देने का फल है। (९६) प्रश्न-मांगने पर भी वस्तु क्यों नहीं मिला करती है ? -धनवान होकर भी दान नहीं देवे तथा आश्रितों को ललचावे, तो भागामी जन्मों में मागने पर भी प्राप्ति नहीं होती है। (१००) प्रश्न-भिक्षुक कौन होता है ? उत्तर-छल छिद्र देखने वाला और निंदक बहुधा भिखारी हुआ करता है। (१०१) प्रश्न-विवाहित स्त्रियाँ क्यों मरा करती है ? उत्तर- अनेक स्त्रियों का स्वामी होकर उन्हें मारे, दुख देवे, तो आगामी जन्म में स्त्री होकर अकाल मृत्यु प्राप्त करता है। (१०२) प्रश्न-चित्त विभ्रम क्यों रहता है ? उत्तर--मदिरा, भग अफीम श्रादि नशैली वस्तुओं का सेवन करने से। (१०३) प्रश्न-दाह ज्वर क्यों होता है ? उत्तर-मनुष्य, पशु पर अधिक वोमा लादने से। (१०४) प्रश्न-गल विधवा क्यों होती है? उत्तर-पति की घात करके व्यभिचार सेवन करने से, पति का अपमान करने से। (१०५) प्रश्न-अकाल मृत्यु क्यों होती है ? पत्तर-पशु पक्षी के वच्चे एव अढे मारने से, लोखों को फोड़ने से, पैदा हुई वनस्पति के अफर फो तोडने से, खडित करने से। उत्तर- , * देह प्रश्नोचर नुदृष्ट वरगिनी नामक दिगम्बर गत्य के अनुसार है। ।

(८२) * ध्यान-कल्पतरु * . ( १४० ) प्रश्न--बिल्ली क्यो बनना पड़ता है ? उत्तर--कपट करने । ( १४१) प्रश्न--नेवला, सर्प योनि किस कर्म का फल है ? उत्तर--लोभ का परिणाम है। ( ११२) प्रश्न-नाहरु ( वाला रोग क्यों होता है ? उत्तर--बिना छना हुश्री पानी पीने से, जीवाणी (पानी छानने के बाद कपडे में बचे हुए जीव समूह) का यत्न नहीं करने से विवेक पूर्वक उन्हें यथा स्थान पर नही डालने से। (१४३ ) प्रश्न--मनुष्ययोनि कैसे मिलती है ? उत्तर-क्षमा, दया, नम्रग से। (१४४) प्रश्न-स्त्री मर कर के पुरुष कैसे हो सकती है ? उत्तर-सत्य, शील, सन्तोप, विनय, आदि गुणो के धारण करने से। (१४५) प्रश्न-देवता कौन हो सकता है ? उत्तर-साधु, पावक, और अकाम निर्जरा करने वाला। (१४६) प्रश्न-लक्ष्मी स्थिर कैसे रह सकती है? उत्तर-साधुओ को दान देकर किसी भी प्रकार का पश्चात्ताप नहीं करने से। (१४७ ) प्रश्न काणा (एक आँख वाला) क्या होता है ? उत्तर--बीज, फल, फूल श्रादि को छेदने से तथा हार, गजरे आदि बनाने से । (१५८) प्रश्न-गलित कोढ़ क्यों होता है ? उत्तर-सुवर्ण, चादी, लोहा, ताबा, आदि धातुओं की खानों को खोदने से। (१४६ ) प्रश्न यश का काम करते हुए भी अपयश क्यों होता है ? उत्तर-सचित्त औपधि करने से, अन्य द्वारा कव उपकार को नहीं मानने से। (१५०) प्रश्न-आँख में बामणी (फुन्सी विशेष ) क्यों होती है ? उत्तर-नमक के समूह को खोदने से। (१५१) प्रश्न-आँख मजारी ( विल्लो की आंखों जैसी ) क्यों होती उत्तर-सम्यक् दृष्टि होते हुए भी मिथ्यात्वियों के जैसे अथवा अनार्यों के जैसे कामों को करने से । (१५२ ) प्रश्न-रूड-मुड शरीर क्यों मिला करता है ? उत्तर-न्यायाधीश होकर कठिन दड देने से। (१५३) प्रश्न-कठमाल का रोग क्यों होता है ? उत्तर-मछलियों का थाहार करने से । (१५४ ) प्रश्न-बाह्यरूप से स्वस्थ दिखलाई पड़ने पर भी बांतरिक रूप से रोगी क्यों होता है ? उत्तर-रिश्वत लेफर झूठा न्याय करने से। (१५५ ) प्रश्न-सयोग होकर भी पुन उसका वियोग शीघ्रता पूर्वक क्यों होता है ? उत्तर-कृतवता, मित्र द्रोह और विश्वासघात करने से। (१५६) प्रश्न-डरपोक स्वभाव क्यों होता है ? उत्तर-कठोर दड देने वाला कोतवाल होने से एवं अन्य को डराने से। (१५७) प्रश्न-खुजली का गेग क्यों होता है ? उत्तर-तेइन्द्रियजीवों को,जू, लीख, खटमल, पिस्सू, दीमक श्रादि जानवरों को मारने से। . ? ।

* ध्यान-कल्पतरु * (८३) (१५८) प्रश्न-जुंएँ अधिक क्यों उत्पन्न होती हैं ? उत्तर-मछलियों का श्राहार करने से तथा जूं ओं को अग्नि आदि में डालकर मारने से । १५६) प्रश्न-तपस्या क्यों नहीं की जा सके ? उत्तर-तप, जप का अभिमान करने से, एव तपस्या करने वाले के लिये अतराय पैदा करने से । (१६०) प्रश्न-अशोभनीय वाणो क्यों मालूम पड़े ? उत्तर-वाक्य-चतुराई का अभिमान करने से, तथा फठोर वचन बोलने से । (१६१) प्रश्न-अपयश वाला क्यों होते ? उत्तर-सासू, ननद, देवरानी, जेठानी, भाई भोजाई के प्रति ईर्षाभाव रखने से । (१६२) प्रश्न-युवास्था में ही स्त्री क्यों मर जाय ? उत्तर-भोगों की तीव्र अभिलाषा रखने से, अमर्यादित रूप से विषय सेवन से । (१६३ ) प्रश्न-समूच्छिम मनुष्य कौन प्राणी हुआ करता है ? उत्तर-गंदे नालों का, गटरों का निर्माण करने वाला एव समूर्छिम मनुष्यों की हत्या करने वाला । (१६५) प्रश्न-अधिक भूख क्योलगा करती है ? उत्तर-खेती का काम करने से, शक्ति शील श्राश्रितों को भूख की वेदना उत्पन्न करने से । (१६५ ) प्रश्न -मृगी रोग यानी अपस्मार की बीमारी क्यों हुया करती है ? उत्तर--लोहार की धमनी धमने से, मृगो रोग वाले को सताने से। (१६६ ) प्रश्न--बोलते समय उबासी क्यों आवे? उत्तर-रगार के काम करने से और तोतले को चिड़ाने से । (१६७) प्रश्न--बोलते समय थूक क्यों उड़ता है ? उत्तर-गोबर को सदाने से । (१६८) प्रश्न--जहाज क्यों हूब जाय ? उत्तर-टट्टियों में टट्टी जाने से, मूत्र-नालियों में पेशाब करने से, और सारी रात्रि तक मूत्र को एक ही वर्तन में सग्रहीत रखने से (१६६) प्रश्न--खोजा यानी नपुंसक क्यों होता है ? उत्तर-जगलो की कटाई करने से तथा खोजो के साथ क्रीड़ा करने से । ( १७०) प्रश्न--यौवन अवस्था में ही दांत क्यो गिर जाते हैं ? तथा बाल भी श्वेत-सफेद क्यो हो जाते हैं ? उत्तर-फोमल वनस्पति का छेदन भेदन करने से, एष इनकी चटनी कचूमर करने से । (१७१) प्रश्न निरन्तर पीप बहने वाला फोड़ा क्यों होता है ? उत्तर-फलों को चीर कर उनमें मसाला भरने से। (१७२) प्रश्न-शरीर में कीड़े क्यों उत्पन्न हुश्रा करते हैं ? उत्तर-दूसरों पर पेशाय आदि घृणित पदार्थों के फेंकने से, एवं सदी वस्तुओं के खाने से। (१७३ ) प्रश्न-एफ साथ ही अनेकानेक रोग क्यों हुमा करते हैं ? उत्तर-प्रामों को उजाड कर लूटने से, डाका डालने से । (१७४ ) प्रश्न-श्रापित पुरुष विद्रोही क्यों हो जाते हैं ? उत्तर-भोजनालय चलाने से अच्छी वस्तु वतना फर खोटी वस्तु देने से । (१७५) प्रश्न-बारह वर्ष तक गर्भ में मूढ गर्भ ही क्यों रहे ? उत्तर-पेशाव इकट्ठा करके रात्रि भर तक उसे पढ़ा रहने देने से । ।

(८२) * ध्यान-कल्पतरु * . । ? , ( १४० ) प्रश्न--बिल्ली क्यो वनना पड़ता है ? उत्तर--कपट करने से। ( १४१) प्रश्न--नेवला, सर्प योनि किस कर्म का फल है ? उत्तर--लोभ का परिणाम है। (१४२) प्रश्न-~नाहरु ( वाला रोग क्यों होता है? उत्तर--विना छना हुओ पानी पीने से, जीवाणी (पानी छानने के बाद कपडे में बचे हुए जीव समूह ) का यत्न नहीं करने से विवेक पूर्वक उन्हें यथा स्थान पर नहीं डालने से। (१४३ ) प्रश्न--मनुष्ययोनि कैसे मिलती है ? उत्तर-क्षमा, दया, नम्रता से । (१४४) प्रश्न-स्त्री मर कर के पुरुष कैसे हो सकती है ? उत्तर-सत्य, शील, सन्तोप, विनय, श्रादि गुणो के धारण करने से । (१४५) प्रश्न-देवता कौन हो सकता है ? उत्तर-साधु, श्रावक, और अकाम निर्जरा करने वाला। (१४६) प्रश्न-लक्ष्मी स्थिर कैसे रह सकती उत्तर-साधुओ को दान देकर किसी भी प्रकार का पश्चाताप नहीं करने से । (१४७ ) प्रश्न-~-काणा (एफ प्रॉस वाला) क्यो होता है ? उत्तर-वीज, फल, फूल आदि को छेदने से तथा हार, गजरे आदि वनाने से । (१५८) प्रश्न-गलित कोढ़ क्यो होता है ? उत्तर-सुवर्ण, चादी, लोहा, ताबा, आदि धातुओं की खानों को खोदने से । (१४६ ) प्रश्न-यश का काम करते हुए भी अपयश क्यों होता है ? उत्तर-सचित्त औपधि करने से, अन्य द्वारा कृत उपकार को नहीं मानने से। (१५०) प्रश्न-आँख में वामणी (फुन्सी विशेष ) क्यों होती है ? उत्तर-नमक के समूह को खोदने से । (१५१) प्रश्न-आँख मजारी (बिल्ली की आखों जैसी ) क्यों होती है ? उत्तर-सम्यक् दृष्टि होते हुए भी मिथ्यात्वियों के जैसे अथवा अनार्यों के जैसे कामों को करने से। (१५२) प्रश्न-रूड-मुड शरीर क्यों मिला करता है ? उत्तर-न्यायाधीश होकर कठिन दड देने से। (१५३) प्रश्न-कठमाल का रोग क्यों होता है ? उत्तर-मछलियों का आहार करने से । (१५४ ) प्रश्न-बाह्यरूप से स्वस्थ दिखलाई पड़ने पर भी आंतरिक रूप से रोगी क्यों होता है ? उत्तर-रिश्वत लेकर मूठा न्याय करने से । (१५५) प्रश्न-सयोग होकर भी पुन उसका वियोग शीघ्रता पूर्वक क्यों होता है ? उत्तर-कृतघ्नता, मित्र द्रोह और विश्वासघात करने से। (१५६) प्रश्न-डरपोक स्वभाव क्यों होता है ? उत्तर-कठोर दड देने वाला कोतवाल होने से एवं अन्य को डराने से। (१५७ ) प्रश्न-खुजली का गेग क्यों होता है ? उत्तर-तेइन्द्रियजीवों को, जूं, लीख, खटमल, पिस्सू, दीमक आदि जानवरों को मारने से। - * ध्यान-कल्पतरु * (८३) (१५८) प्रश्न-जुंएँ अधिक क्यों उत्पन्न होती उत्तर -मछलियों का श्राहार करने से तथा घुओं को अग्नि थादि में डालकर मारने से । (१५६ ) प्रश्न-तपस्या क्यों नहीं की जा सके ? उत्तर-तप, जप का अभिमान करने से. एव तपस्या करने वाले के लिये अतराय पैदा करने से । (१६०) प्रश्न--अशोभनीय वाणो क्यों मालूम पड़े ? उत्तर-वाक्य-चतुराई का अभिमान करने से, तथा कठोर वचन बोलने से । (१६१) प्रश्न-अपयश वाला क्यों होवे ? उत्तर-सासू , ननद, देवरानी, जेठानी, भाई भोजाई के प्रति ईर्षाभाव रखने से । (१६२) प्रश्न-युवास्था में ही स्त्री क्यों मर जोय ? उत्तर-भोगों की तीन अभिलाषा रखने से, अमर्यादित रूप से विषय सेवन से । (१६३) प्रश्न-समूछिम मनुष्य कौन प्राणी हुआ करता है ? उत्तर-गंदे नालों का, गटरों का निर्माण करने वाला एव समूचिम मनुष्यों की हत्या करने वाला। (१६१) प्रश्न-अधिक भूख क्योलगा करती है ? उत्तर-खेती का काम करने से, शक्ति शील आश्रितों को भूख की वेदना उत्पन्न करने से। (१६५ ) प्रश्न -मृगी रोग यानी अपस्मार की बीमारी क्यों हुया करती है ? उत्तर-लोहार की धमनी धमने से, मृगी रोग वाले को सताने से। (१६६) प्रश्न--बोलते समय उबासी क्यों आवे? उत्तर--रगार के काम करने से और तोतले को चिढ़ाने से । (१६७ ) प्रश्न-बोलते समय थूक क्यों उड़ता है ? उत्तर-गोबर को सदाने से। (१६८) प्रश्न--जहाज क्यों डूब जाय ? उत्तर-टट्टियों में टट्टी जाने से, मूत्र-नालियों में पेशाब करने से, और सारी रात्रि तक मूत्र को एक ही बर्तन में सग्रहीत रखने से । (१६६ ) प्रश्न -खोजा यानी नपुंसक क्यों होता है ? उत्तर--जगलो की कटाई करने से तथा खोजो के साथ क्रीड़ा करने से। ( १७० ) प्रश्न--यौवन अवस्था में ही दांत क्यो गिर जाते हैं ? तथा बाल भी श्वेत-सफेद क्यो हो जाते हैं ? उत्तर -कोमल वनस्पति का छेदन भेदन करने से, एवं इनकी चटनी कचूमर करने से । (१७१) प्रश्न निरन्तर पीप बहने वाला फोड़ा क्यों होता है ? उत्तर-फलों को चीर कर उनमें मसाला भरने से। (१७२) प्रश्न–शरीर में फीदे क्यों उत्पन्न हुश्रा करते हैं ? उत्तर-दूसरों पर पेशाय श्रादि घृणित पदार्थों के फेंकने से, एवं सदी वस्तुओं के खाने से । (१७३ ) प्रश्न-एक साथ ही अनेकानेक रोग क्यों हुआ करते हैं ? उत्तर-प्रामों को उजाह कर लूटने से, डाका डालने से । (१७४) प्रश्न-प्रापित पुरुष विद्रोही क्यों हो जाते हैं ? टत्तर-भोजनालय चलाने से, अच्छी वस्तु वतला फर स्रोटी वस्तु देने से । ( १७५ ) प्रश्न-बारह वर्ष तक गर्म में मूढ गर्भ ही क्यों रहे ? उचर-पेशाव इफट्ठा करके रात्रि भर तक उसे पड़ा रहने देने से । .

( ८४ ) * ध्यान-कल्पतरु * ( १७६) प्रश्न-चौवीस वर्ष तक मुढ गर्भ क्यों रह जाय ? उत्तर-तीघ लालपा के साथ विपय संवन से, गर्भ हत्या करने में। (१७७ ) प्रश्न--मदा शरीर जलन क्यों अनुभव करता रहे ? उत्तर-फूलों का मर्दन करने से, तथा वहुत इन उबटन आदि लगाने से (१७८) प्रश्न-बी वाम क्यों रह जाता है ? उत्तर--फूलों का इन निकालने मे, मनुष्य, पशु के बच्चो को हत्या करने से । (१७९ ) प्रश्न अनेक स्त्रियों के होने पर भी पुत्र क्यों नहीं होता है ? उत्तर-यनेकानेक वनस्पतियों का रस निकालने से। (१८०) प्रश्न--हरामग्वोर क्या होता है ? उत्तर-अनेक जलचर जीवों को मारने से, फसाई के काम करने में। (१८१) प्रश्न--शतिशील क्यों नही होवे ? उत्तर--मनुष्यों के रक्त से औषधि बनाने का कार्य करने से । (१८२) प्रश्न--शरीर भारी भारी क्यों हो? उत्तर-श्रासव, शराब, मदिरा, अधिक पीने से । (१८३) गर्भावस्था में बच्चा टेढा क्यों हो जाय ? उत्तर- साधु के ऊपर फ्लंक लगाने से, शुद्ध आहार लेने वाले साधु को अशुद्ध आहार देने मे । (१८४) प्रश्न-नरफ तिर्यंचगति में रहने का परिणाम क्या होता है ? उत्तर-काम निर्जरा होती हैं, एव मनुष्य गति को प्राप्ति का सुअवसर पाता है। पहले दुस है तो तत्पश्चात् सुख भी है। जैसे क्सिी फुलोन के प्रति कोई फलक श्रा जाय, सस्न म्जा प्राप्त करे, किन्तु वाद में न्याय होने पर निर्दोप प्रमाणित हो जाय, तो परिणाम स्वरूप छुटकारा प्राप्त कर लेता है, वैसा ही यहाँ पर भी सममता चाहिये। ( १८५ ) प्रश्न-मोक्ष कैसे प्राप्त होता है ? उत्तर-ज्ञान, दर्शन, चारित्र, और तप कर सम्यक प्रकार से आचरण करने से इनकी निर्दोष गति से श्राराधना और परिपालना करने से, एव स्पर्शना करने से। इत्यादि रूप से कर्मवन्धन करने के, भोगने के और इनसे छुटकाग पाने के अनेक कारण शाखों में तथा ग्रन्थों में बतलाय गये है। क्तिने हो कर्मों का वन्धन और फल जहाँ का तहाँ इमी भव में भी प्राप्त हुश्रा करता है। कितने ही कर्मों का बन्धन यहाँ होता है तो उनका फल किन्हीं आगामी जन्मों में भी मिलता है। अनन्तज्ञानी सर्वन प्रभु ने ससारी जीवों की कर्म फल मे उत्पन्न होने वानो विपादशा को सम्यक् प्रकार से जान लिया है परन्तु वाणी द्वारा उसका वर्णन नहीं कर सके हैं क्योंकि मम्पूर्ण विश्व अनन्त जीवों से परिपूर्ण है। और प्रत्येक जीव के साथ अनन्तानन्त फर्म वर्गणाओं के पुद्गल लगे हुए हैं। इसी प्रकार प्रत्येक वर्गणा के वणे आदि सम्बन्धी पर्यायों की प्रान्त व्याख्याएँ हो सकती है। ऐसा अपरपार विपाक विचय का वर्णन भाषा द्वारा कदापि नहीं हो सकता है । तथापि धर्म ध्यान की आराधक धामिक आत्माएँ ज्ञानी की थाज्ञानुशार विपाक विचय का यथाशक्ति विचार करती हुई कर्मों की विचित्रताओं मे परिचित हो सकती है। ऐमी प्रात्माएँ ही कर्म बन्ध के कारणों से ववती हुई और कर्म क्षय करने के माग में प्रवृत्ति करती हुई अनन्त श्राध्यात्मिक सुख प्राप्त कर सकती है अथवा सुख प्राप्त करती ही है। - -- चतुर्थ-पत्र--"संस्थान-विचय Papete संस्थान का अर्थ प्राकृति है। इस अखिल विश्व का तथा विश्व में रहने वाले पदार्थों की प्राकृति का विचार करना ही "संस्थान विचय" नामक धर्म ध्यान है। अनन्त अाकाश होने से क्षेत्र रूप स्थिति भो अनन्त रूप ही है इसका पार पाना अथवा इसके अतिम छोर का पता लगाना असभव हो है। अतः इसका एक नाम "श्रलोक" भी है। इम अलोक क मध्यभाग में ३४३ घनगजू जितनी लम्बाई चौड़ाई रूप जगह में जीवा जीव रूप और रूपो-अरूपी पदार्थ रूप एक पिंड है, इसे हो लोक कहा जाता है। यह लोक नीचे सातवीं नरक के पैदे में सात राजू जितना चौड़ा है। ऊपर सात राजू को ऊँचाई तक यानी लोक के मध्य भाग में सिकुड़ता सिकुड़ता बराबर बीचो- बीच भाग में एक राजू जितना चौड़ा है। इसी प्रकार ऊपर बढ़ते बढते जहाँ ऊँचाई ग्यारह गजू तक की है, वहाँ पर इस लोक को चौड़ाई पाँच राजू जितनी है, और यहीं पर पाँचवा देवलोक भी है । इसी प्रकार ऊपर ज्यो ज्यों लम्बाई चलती जाती है, त्यो त्यो यह पुन सिकुड़ता हुश्रा अतिम चौदह राजु की ऊँचाई पर यानी लोक के धन भाग पर पुन एफ राजू जितना ही चौड़ा रह जाता है। यहीं पर मोक्ष स्थान है। इसका उदाहरण यों दिया जाता है कि-मिट्टी के छोटे छोटे बनाये जाने वाले जो दीपक होते हैं, उनमें से सर्व प्रथम एक दीपक को उल्टा रखना, उसके ऊपर दूसरे दीपक को सीधा रखना, और पुन सोधे दीपक पर एक और उल्टा दीपक रखना, यो तीन दीपको की स्थापना प्राकृति के समान ही लोक का नक्शा समझना चाहिये । अथवा जैसे कोई वादमी अपने पैरों को पसार कर एव कमर के स्थान पर हाथ लगा कर खडा रहे, ऐसी ही प्राकृति वाला यह लोक है। ऐसा उल्लेख भी भगवती श्रादि शास्त्रो में है। . . इस लोक के मध्य भाग में एक निसेनी ( सीढियो का ढाँचा) जैसी एक राजू जितनी चौडी पव सातवीं नारको से लगोकर ठेठ मोक्ष पर्यंत तक चौदह राजू जितनी लम्बी एक बम नाल है, इसमें त्रस और स्थावर दोनो प्रकार के जीव हैं। इस त्रस नाल के वाहिर के क्षेत्र में केवल स्थावर जीव हा है। प्रस-नाल के आधे नीचे के भाग में सोत राजू जितने स्थान में सात प्रकार के नरक स्थान हैं, जहाँ पर केवल वे ही प्राणी उत्पन्न हुश्रा करते हैं, जो पाप के भयफर वोमे से लदे हुए हैं एव जो घोरातिघोर पापी हैं। ये अपने घृत फर्मों का अशुभ फल भोगते हुए महा दुःखा होते हैं । यह स्थान उल्टे दीपक जितना समझना पाहिये । इस नाल के मध्यभाग में जहाँ पर दो दोपको का सम्मेलन सा प्रतीत होता है, वहाँ पर गोलाकार रूप से १८०० योजन जितना ऊँचाई वाला क्षेत्र है, उसे ही मध्यलोक अथवा तिरछा लोक कहा जाता है। इसके ठीक मध्य में एक लाख योजन जितना ऊँचा और नाचे के भाग में दश हजार योजन जितना चौड़ा एव सर्वोपरि भाग पर एक हजार योजन जितना चौडा मल्लस्तम्भ जैसा मरुपर्वत है । इसी पर्वत के चारो भोर चूड़ी के आकार जैसा गोल एक लाख योजन जितना लम्बा चौड़ा जम्बूद्वीप है । इस द्वीप के वाहिर चारो और चूड़ी रूप से घेरा डालने वाला दो लाख योजन जितनी चौड़ाई वाला लवणममुद्र है । पुन इसके चारो और फिरता हुआ चार लाख योजन जितनी चौड़ाई वाला धातकी सण्ड द्वीप है। पुनः इसके पारो ओर पाठ लाख योजन जितनी चौड़ाई वाला कालोदधि समुद्र है । इसके भी चारो ओर गोलाकार (८६ ) * ध्यान-कल्पतरु* प में मोलह लाग्य योजन जिननी चौडाई वाला पुष्कर द्वीप है। यो एक के बाद दूमरे एक दूसरे को चूडी के प्रावार में घेरते हैं। क्षेत्रफल में दो दो गुणे वडे बडे होते हुए असख्यात द्वीप और असख्यात ममुद्र हैं। सवकी श्राकृति अथवा सम्यान चडों के समान ही समझना। मेरुपर्वत के मल में मम भूमि है। वहाँ मे ७६० योजन ऊपर तारा मडल है। वहाँ से १० योजन अपर सूर्य का विमान है। इसमे ८० योजन उपर चन्द्रमा का विमान है। इसके बाद बीस योजन ऊपर के क्षेत्र में शंप सभी ज्योतिप देवताओं के विमान प्रागये हैं। ढाईद्वीप के अन्तर्गत जी ज्योतिषी देवताश्रो के विमान है, उनका सस्यान यानी आकार आधे कवीठ के समान है। और बाह्य रूप से ईट जैसे है। आगे उपर मृदग के सस्थान जैसी श्राकृति वाले सात राजू में कुछ कम जितनी ऊँचाई तक ऊँचा लीक कहा जाता है। यहाँ पर वारह देवलोक, नौ लोकान्तिक देव नौ अवयक, पाँच अनुत्तर विमान, इन देवताओं के विमान हैं। इनमें सभी विमानों को सख्या EYE७०२३ हैं । इनमें से क्तिने ही चार कोण वाले, कितने ही तीन कोण वाले, और कई एक गोलाकार हैं। जो जीव पुण्य प्रवृत्तिमय होता है, वही इन देवलोक रूप स्थानो में जन्म प्रहण कर सकता है, एव स्वकृत पुण्य कर्म के फलानुसार सुखो का उपभोग कर सकता है। इन देवताओं का सर्वोच्च और अतिम स्थान सर्वार्थ सिद्ध विमान है, इसी से वारह योजन की ऊँचाई पर मोक्ष स्थान है। इसे सिद्ध शिला भी कहा जाता है। वह खुले हुए छत्र के श्राकार की है और क्षेत्रफल में पैंतालीस लाख योजन की लम्बाई चौडाई वाली है। इसके सर्वोपरि भाग के एक योजन के चौवीसवें भाग में अनन्तानन्त सिद्ध भगवान् स्थित हैं। जो अरूपी और अनन्तज्ञानशाली हैं। इनका स्थिति-स्थान अलोक से स्पर्श करता हुआ है। इस प्रकार सक्षेप में लोग का और लोक में स्थित स्थूल पदार्थों के सस्थान का यानी प्राकृति का वर्णन हुआ ससारी जीयों के शरीर की प्राकृति अथवा सस्थान छ प्रकार का कहा गया है । (१) समचतुरस्त्र मस्थान, (२) न्यग्रोधपरिमण्डल सस्थान, (३) स्वाति सस्थान, (४) कुब्जक सस्थान, (५) वामन संस्थान, (६) हुँडक सस्थान । इनकी परिभाषाएँ इस प्रकार हैं-- (१) जिस शरीर की रचना चारों ओर से समान हो, यानी पद्मासन रूप से वैठने पर दोनों घुटनों की लम्बाई दोनो कधों के बराबर हो, वैसे ही वायें कधे से वायें घुटने तक की लम्बाई दाहिने कधे और दाहिने घुटने की लम्बाई के बराबर हो, तात्पर्य यही है कि शरीर को प्राकृति ऊपर नीचे तथा बोच में समभाग से हो । जैसी कि कितनी ही जैन मूर्तियों की बनावट इसी प्रकार की देखी जाती है । यही सम चतु रस सस्थान है। (२) जिन शरीर की रचना बड़ वृक्ष के समान हो जिसमें उक्त वृक्ष के समान नीचे तो केवल . ठूठ जैसा हो, और ऊपर से शाखाया एव प्रतिशाखायो से शोभायमान हो वैसे ही कमर के नीचे का भाग तो अशोभनीय हो, और ऊपर से शोभा वाला हो ऐमी शरीर की रचना न्यग्रोध परिमण्डल है। (३) जिन शरीर की रचना खुरसानी (1) इमली के समान हो, याने ऊपर का भाग तो तूट के समान होता हुआ अशोभनीय हो, और नीचे का भाग शोभायमान हो, ऐसी शरीर की रचना स्वाति सस्थान कहो जाती है। -- , * इस पुष्कर द्वीप के बिलकुल बीचोबीच म चूड़ी के आकार सा गोलाकार रूप से मानुपोत्तर पर्वत है, निध इस द्वीप के टो भाग हो गये हैं। प्रथम भाग में तो मनुष्यो की बसती है, किन्तु दूसरे में नहा । इस प्रकार नम्बद्वीप, धातकी सड़ और आधा पुष्करद्वीप, यो कुल दाई द्वीप में ही मनुष्या का निवास स्थान है । दाई द्वीप म इन्हीं की गिनती की जाती है।

* ध्यान-कल्पतरु * (८७) . (४) बौना रूप शरीर रचना वामन सस्थान है। (५) पोठ पर अथवा छाती पर कुबड होना, यही कठजक सस्थान हैं (६) शरीर के अगोपाग किसी खास शकल के नहीं होकर आधे जले हुए शव के जैसे प्रतीत होने वाले हो, ऐसी खराब शरीर रचना हुँडक संस्थान कही जाती है । इन छ सस्थानो में से नरक पाँच स्थावर, तीन विकलेन्द्रिय, और श्रसन्नी तिर्यंच पचेन्द्रिय जीवों के फेवल एक यही हुँडक सस्थान होता है। सज्ञी मनुष्य और सज्ञी तिथंच जीवो के छ ही सस्थान हो सकते हैं। सभी देवता, तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव, आदि उत्तम पुरुषो केवल एक ही समचतुरन सस्थान होता है। अजीव रूपी पुद्गलों के संस्थान पाँच प्रकार के कहे गये हैं-(१) परिमडल, (२) वट्ट, (३) तस, (४) चउरस, और (५) पायत । (१ परिमडल यानी गोल, चूड़ी के श्राकार जैसा, (२) वट्ट यानी मोदक के श्राकार का, (३) तस अर्थात तीन कोण घाला, सिंघाड़े के जैसा. (४) चउरस का अर्थ चार कोण वाला है, जैसे कि चौकी (बाजोट ), (५ ) श्रायत का मतलब है जिसकी चौड़ाई और लम्बाई समान न हो, जैसे कि साधारण लकड़ी के समान । इन पाँचों हो प्राकृति वाले अनेक रूपी पदार्थ इस ससार में है । देवताओं के विमान, द्वीप, समुद्र आदि अनेक सांसारिक पदार्थ इन्हीं पाँचों श्राकृतियों में से किसी एक आकृति जैसे ही हैं। इन शारीरिक अथवा पौद्गलिक आकृतियो पाले शरीरों को इस जीव ने ससार में परिभ्रमण फरते समय अनन्त वार धारण किया है। यह जीव सब प्रकार से उच्चनीच सस्थानमय वस्तुओं का स्वामी अनेक बार बना है। इनका उपभोग किया है। इसलिये विचारणीय है कि "हे जीव | पुण्योदय से यहाँ पर सुन्दर शरीर और मनोहर स्त्री श्रादि तुझे मिली है, और शयन, श्रासन, वसन, धन, आभूषण, वाहन, आदि इष्ट ऋद्धि की भी तुमे प्राप्ति हुई है, किन्तु फिर भी गत जन्मों के अनुसार इनकी अनित्यता का विचार क्यों नहीं करता है ? और क्यों इनमें इतनी अधिक ममता अथवा आसक्ति रखता है। इनके फ़दे में क्यों फंसा हुआ है ? क्या मृत्यु प्राप्त करके पुन चारों गतियों में चक्कर लगाना कहा गया है कि-"जहाँ धासा वहाँ वासा अर्थात् जहाँ पर आशा अथवा धासक्ति है, वहीं पर जन्म मरण का चक्कर भी रहा हुआ है। ऐसा जान करके अच्छे सस्थान वाले पदार्थों पर से भी ममत्व भावना का परित्याग करना चाहिये । और यदि किसी समय अशुभ कर्मों के उदय से अमनोरम सस्थान वाले पदार्थों का शरीर का या स्त्री आदि कुटुम्ब परिवार का सयोग मिल जाय, अथवा अमनोज्ञ शयन-- श्रामन का योग हा जाय, तो भी मन म खेद नहीं जाना चाहिये। क्योंकि बाह्य सस्थान अथवा आकृति तो क्वन व्यावहारिक रूप है इससे अपनी प्रातरिक अात्मिक स्थिति पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है और न अपनी सिद्धि में ही पाई अन्तर पान वाला है। श्रत सारांश यही है कि जिससे कोई हानि लाम नहीं होता हो, उस पर अधारण हा रुष्ट होना अथवा सतुष्ट होना अज्ञानता ही कही जायगी। इसी प्रकार और भा विचार करना चाहिय कि “ हे जीव तू ज्ञानी है, तो फिर व्यर्थ की वातों पर रागद्वप करके कर्मों का वन्धन क्यों करता रहता है । फिर ज्ञानशील होने पर तुमे क्या लाभ पहुँचा ? " इत्यादि रूप से गम्भीर विचारणा करके अच्छे अथवा बुरे सस्थान वाले पदार्थों पर उत्पन्न होने वाले राग द्वेप मय भावों को कम फरना चाहिये । तथा सदा एक ही प्राकार में रहने वाला जो निज आत्मा सम्बन्धी गुण और परमात्मा का स्वरूप है, उसी में अपनी विचार-धारा को सयोजित करना चाहिये । इस प्रकार धर्म ध्यान के चार पायर्या का सक्षिप्त स्वरूप कहा गया है । धर्म ध्यानी यथा बुद्धि अनुमार इनका विचार करके अपनी आत्मा को धर्म-ध्यान में स्थापित करे। ? - - (८८) * ध्यान-कल्पतरु * द्वितीय प्रति शाखा-"धर्म-ध्यानी के लक्षण " उववाह-सूत्र म धम्मस्स णं माणस्स चत्तारि लक्खणा पण्णता । तंजहा-आणाई, निमग्गई, उचएसई, सुत्तरुई। धर्म-ध्यान के ध्याता को पहिचानने के चार लक्षण बतलाये गये हैं। (१) जिनराज की आज्ञा के प्रति रुचि होना, वह आज्ञा-रुचि लक्षण है। (२) जिनराज द्वारा प्रतिपादित ज्ञान का अभ्यास करने के प्रति रुचि होना, वह निसर्ग रुचि है। (३) सद्बोध श्रवण करने को रुचि होना, यइ उपदेश रुचि है। (४) जिनागम को श्रवण करने की रुचि होना, यह सूत्र रुचि है। रुचि का अर्थ उत्कृष्ट इच्छा है । जैसे कामी को काम को, लालची को धन की, यश-कीर्ति के इच्छुक को यश-कीर्ति की, भूस से पीड़ित को अन्न को, प्यास वाले को जल की, समुद्र में पतित को जहाज की, गंगो को थोपधि की मार्ग को भूने हुए को सही मार्ग की, इत्यादि रूप से जो जिस कार्य का अर्थी वा आकाक्षो होता है, उसे उस कार्य को परिपूर्ण करने की स्वाभाविक इच्छा होती है । और जहाँ तक वह कार्य परिपूण नहीं हो, वहाँ तक उसके मन में उत्कठामय बेचैनी सो रहती है, और यदि पुन उनका वियोग हो जाय, तो उनकी प्राप्ति के लिये पुनः वैसी ही उत्कठा जागृत हो जाती है, ऐसी मन की स्थिति का नाम हो रुचि है। सांसारिक जीवों को जैसी रुचि व्यावहारिक और पौद्गलिक कामों के प्रति होती है, वैसी ही रुचि धर्म-ध्यानी की भी आत्म साधक कामों के प्रति हुश्रा करती है। इस प्रकार आत्म-साधना सम्बन्धी पारमार्थिक कामों के ये मुख्य चार भेद कहे गये हैं । प्रथम-पत्र--आज्ञा-रुचि अनादि काल से ही इस जीव ने जिनाज्ञा का उल्लघन किया है, और स्वन्छ' आचरणशील रहा है, इसी कारण से यह जीव इचने समय से ससार में परिभ्रमण करता रहा है। उत्तराध्ययन सूत्र कहा गया है कि- अपनी इच्छाओं का निरोध करने से और जित्नाना में प्रवृत्ति करने से मोक्ष की प्राप्ति हुआ करती है श्रतएव मुमुक्षु को चाहिये कि वह थपनी इच्छा को रोक करक वीतराग की थाना में प्रवृत्ति करने का प्रयत्न करे। श्रव यह सोचना है कि वीतराग को श्राज्ञा क्या है ? राग और द्वप को प्रात्यतिक रूप से और समूलतया नष्ट करने वाले को ही " वीतरोग" कहा जाता है । जिन्होंने राग और द्वेष क क्षय करन में ही एकान्त रूप से लाभ जाना है, वे निश्चय ही राग और द्वीप को क्षय करने की हो याज्ञा प्रदान करेंगे। यह सशय से रहित वात है। ऐसा नान करके वोतराग की श्राक्षा का इच्छुक सदैव मध्यस्थ परिणामों वाला ही बना रहे। एवं सभी प्रकार के प्रति वन्धों से परे रहे। प्रतिवन्ध चार प्रकार के कहे गये हैं.-(१) द्रव्य से सजीव, अजीव और मिश्र तीन प्रकार के हैं। सजीव का तात्पर्य द्विपद रूप मनुष्य पक्षी श्रादि और चतुष्पद रूप पशु गाय श्रादि है। अजीव का तात्पर्य पशु वस्त्र, पात्र, धन, मकान आदि हैं। और मिश्र का तात्पर्य वन, श्राभूपण, श्रादि से अलकृत मनुष्य, आदि का है। में ।

* ध्यान-कल्पतरु * (८६) - (२) क्षेत्र से प्राम, नगर, घर, खेत आदि हैं। (३) काल से-घड़ी, पहर, दिन, पक्ष, मोम, वर्ष श्रादि हैं। और ( ४ ) भाव से--क्रोध आदि कपाय, मोह, ममता, आसक्ति श्रादि हैं । इन चारों हो प्रतिबन्धों से रहित होना चाहिये । मुमुक्षु क्षुधा, तृषा, शीत, ताप आदि से जनित यष्टों को समभाव पूर्वक सहन करता रहे । मीठे अथवा कडुवे वचनों के प्रति निरपेक्ष रहे । निद्रा, प्रमाद और आहार परिमित एव सयमित ही रक्से । सदैव ज्ञान, ध्यान, तप, और सयम में आत्मा को सयोजित करते हुए ही समय व्यतीत करता रहे । इस "आज्ञारुचि" नामक विषय का पहले आज्ञा विचय नामक अध्ययन में विस्तार पूर्वक विवंचन कर दिया गया है, अत पूर्व वर्णन तो विचार रूप समझना और इस समय किया गया यह वर्णन प्रवृत्ति की इच्छा - . रूप समझना। द्वितीय -पत्र--निसर्ग रुचि . (२) निसर्ग रुचि-धर्म ध्यानी पुरुष के लिये इस विश्व के सभी पदार्थ ऐसे मालूम होते हैं कि मानों वे सब धर्म ध्यान के ध्याता को सदुपदेश दे रहे हों। श्रीश्राचारागजी शास्त्र के आदेश अनुसार ज्ञानी महात्मा श्रास्र के स्थान पर भी सवर उत्पन्न कर लिया करते हैं। जैसे कि नमिराज ऋषि ने *महिलाओं की चूड़ियों को ध्वनि सुन करके वैराग्य प्राप्त किया, जब कि अन्य साधारण पुरुषों को तो ऐसी ध्वनि से काम भावनाएँ हो उत्पन्न हुश्रा करती हैं। इसी प्रकार से भव्य जोषों के लिये वृक्ष, पर्वत, खान, पान, वस्त्र, आभूषण, ग्राम, श्मशान, रोग, हर्ष, शोक, बादल, विद्युत सयोग, वियोग निवृत्ति भाव आदि वस्तुएँ वैराग्य उत्पन्न करती है। ऐसे सयोगों से स्वभावत जो वैराग्य उत्पन्न हुआ करता है, उसे हो निसर्ग रुचि कहा जाता है। क्तिने ही मनुष्या को जाति स्मरण ज्ञान के बल से अपने पूर्वकाल के ९०० भवों का ( यदि लगातोर रूप से सही पचेन्द्रिय रूप से हो उत्पन्न हुए हों तो ) ज्ञान होने पर एव गतजन्मों में कृतकों के भोगे हुए फलों को देख करके वैराग्य उत्पन्न हुअा करता है। इस ढग से विविध कारणों द्वारा स्वभावत तत्त्वज्ञान की ओर जो रुचि उत्पन्न होती है, उसे हो निसगे सचि फहना चाहिये । कभी कभी अाजकल ऐसी साप्रदायिक मनोवृत्ति पैल गई है कि-"ये श्रावक हमार और यह दोन इमारा, इस प्रकार के प्रतिबधनों में बधने से ही इस समय वीतराग देव के अनुयायियों में धर्म-ध्यान की हानि और क्लेश' की वृद्धि होती हुइ दिखलाई पड़ रही है । अात्मार्थियो को इन झगड़ो से बच करके अप्रतिबध निहार करते रहना चाहिये, जिससे कि धर्म-ध्यान का अखड और निराबाध प्रचार होता रहे । - * मिथिला नगरी के नमिगय राजर्षि के शरीर में एक बार दाह ज्वर की उत्पत्ति हुई थी, उस समय रोग शांति के उपचार के लिये वैगों के कथनानुसार रानियों ने "बावन-चटन' घिसना प्रारम्भ किया, तो उनके हार्थों म रही हुइ चड़ेया से कुछ विशेष आवाज होने लगी, उस समय श्रीराजर्षि बोले कि "मुझे यह ध्वनि अच्छी नहीं लग रही है, "दम पर नभी रानियो ने केवल मोभाय स्वरूप एक एक वृद्धी ही हाथ म प कर शेप सभी चड़ियाँ उतार कर अलग प टी।" ऐसा करते ही ध्वनि के बन्द हो जाने के कारण से रातर्षि को पिचार हुआ कि "अनेक चड़ियों होने प तो ध्वनि उठ रही थी, परंतु एक के होते ही शान्ति हो गई, उसी प्रकार में भी अनेक पारिवारिक जनो के मध्य में रहने से ही अगांति अनुभव कर रहा हूँ। और यदि इनके बन्धनो से मुक्त होकर स्वतन्त्र रूप से अकेला ही विनरूँ, तो परिपूर्ण गान्ति का अनुभव कर सफ्ता हूँ ।" इतना विचार करते ही गेग भी शान्त हो गया, तथा वे अपने विचार के मनुना दीना ग्रहण करने अनन्त सुम्बी हुए।

(8.) * ध्यान-कल्पतरु * ऐसा भी होता है कि अन्य मतावलम्बो को अज्ञान पूर्वक तपस्या का कष्ट सहन करने से, अकाम निर्जरा होने से, ज्ञानावरणीय कर्म के क्षय से अथवा उपशम मे विभग ज्ञान की प्राप्ति हो जाया करती है, ऐसे समय में जब वह जैन मतावलम्बी माधुश्री की उत्कृष्ट और शुद्ध किया देखता है, तो उसे इस ओर अनु राग उत्पन्न हो जाया करता है। ऐसी स्थिति में विभगवान श्रवधिज्ञान के रूप में बदल जाया करता है। उमी समय तत्त्वज्ञान पर मचि जागृत होती है तथा सम्यक्त्व भी प्राप्त हो जाया करता है । यही निसर्ग रुचि | इस तरह से येन केन प्रकारेण तत्वज्ञान के प्रति श्रास्तिकता उत्पन्न हो तथा परिणामों में दृढता प्राप्त हो, यही सयोग धर्म ध्यान के ध्याता के लिये "निसर्ग रुचि" रूप लक्षण कहा जाता है - तृतीय-पत्र-उपदेश-रुचि (३) उपदेशरुचि'-श्री तीर्थफर, केवल ज्ञानी, गणधर महाराज, साधु, साध्वी. श्रावक, श्राविका, सम्यक् दृष्टि, इत्यादि महापुरुष जव शाखों के अनुसार उपदेश किया करते हैं, उस उपदेश से धर्मध्यान के ध्याता की जो सचि नागृत होती है, वही उपदेशरुचि है। दशवैकालिक सूत्र के चौथे अध्ययन में फरमाया हुधा है कि- । - - -- सोचा जाणइ कल्लाणं, सोचा जाणइ पावगं । उभयं पि जाणइ सोचा, जं सेयं तं समायरे ॥ सुनने से ही मालूम हुआ करता है कि अमुफ सुकृत्य करने से अपनी आत्मा का कल्याण होता है और अमुक पापकृत्य करने से बुरा होता है । एवं अमुक काम करने से अच्छा और बुरा-मिभित-फल होगा। जैसे कि इन्द्रियों की तृप्ति में सुख तो अल्प हो रहा हुआ है, जबकि दु ख अनन्त रहा हुआ है ऐसी दोनों बातें समझनी चाहिये । मिश्र पक्ष गृहस्थ धर्म ही है। जिसे शास्त्रों में " धम्माधम्मी" तथा चरित्ताचरित्ते " भी कहा जाता है। गृहस्थ-अवस्था में आजीविका के लिये प्रयत्न करते समय कुछ न कुछ पाप तो अवश्य होता ही है । ऐसा समझने हुए उदासीन-वृत्ति के साथ पश्चात्ताप पूर्वक आजीविका- साध्य प्रयत्न धर्म-ध्यानी आत्मा किया करता है। एव प्रात्म-कल्याण का इच्छुक छात्मा जव जव अवसर मिला करता है, तव तव अत्यन्त हर्प के माथ धर्म-किया भी करता रहता है । उपरोक्त तीनों वातें--(१) आज्ञारुचि, (२) निसर्ग रुचि, और ( ३) उपदेश-रुचि, सुनने पर हो सम्यक् प्रकार से भली प्रतीत होती हैं । मुमुतु इन्हें स्वीकार करके सुखी होते हैं। इस प्रकार धर्मध्यान का रहस्य व्याख्यान सुनने से ही ज्ञात हो सकता है। व्याख्यान में सदैव कुछ न कुछ नवीन अनुभव सुनने में आता ही है । और नवीन सद्वोध से स्वाभाविक तत्वरुचि तथा तत्त्वज्ञता प्राप्त होती ही है। ध्यानस्थ होने पर उक्त तत्त्वज्ञता हृदय में स्थायी स्थान प्राप्त करती है । उस समय में चित्त अन्य वृत्तियो से निवृत्त हो जाया करता है। और ऐसा होने पर धर्म-ध्यान की ओर प्रवृत्ति बढ़ती है, जिसका परिणाम " ध्यान का सिद्धि " ही होता है। अतएव सारांश यह है कि धर्म-ध्यायी उपदेश श्रवण, मनन, निदिध्यासन, की ओर प्रवृत्त होता है, एव तद्नुसार प्रवृत्ति करने की ओर अधिक रुचि उत्पन्न होती है । । चतुर्थ-पत्र--सूत्र-रुचि - (५) सुत्तरुइ-भगवान की द्वादशांगी वाणी को ही सूत्र कहा जाता है। इस प्रकार है- (१)माचारांग-इसमें साधुओं के लिये भाषरणीय ब्रतों का और प्रयों का विधान है।

* ध्यान-कल्पतरु * (६१) ( २ . सुश्रगडांग सुत्त-इसमें अन्य मतावलम्बियों के धर्म का स्वरूप वतलाते हुए उनका निराकरण किया गया है। (३) ठाए गिसुत्त-इसमें दश स्थानक के रूप में विविध ज्ञातव्य बातों का सकलन है। (४) समवायागसुत्त-इसमें जीवादि पदार्थों के स्वरूप को क्रमिक राख्या के रूप में समझाया है। (५) विवाह-पन्नति-व्याख्या प्रज्ञप्ति यानी भगवतो सूत्र में विविध प्रकार का अधिकार है। (६) णाया धम्म कहा यानी ज्ञाताधर्म कथांग में धर्म कथाओं का अधिकार है। (७) अतगडदसायो यानी अन्तकृत दशांग में चरम शरीरो आदर्श महापुरुषों का कथन है। (८) उपासकदाग में यश श्रावको का वर्णन है। (६) अणुत्तरोषवाइन सूत्र में अनुत्तर विमान में पैदा हुए पुण्यशाली आत्माओं का वर्णन है। (१०) प्रश्न व्याकरण सूत्र में पानव और संवर का अधिकार है। (११) विपाक सूत्र में शुभ कर्म और अशुभकर्म के परिणामों की कथाश्रो का उल्लेख है। (१२) दृष्टिवादांग में सर्वज्ञान सम्बन्धी बातों का समावेश किया गया है परम पिता, वीतराग देव श्रीजिनेश्वर भगवान् की यह द्वादशांगी वाणी अगाध ज्ञान के सागर रूप है। तत्त्वज्ञान से परिपूर्ण है। इस वाणी के नाता के हृदय में इसके द्वारा अपूर्व चमत्कार उत्पन्न हुधा प्रतीत होता है। श्रात्मा के स्वरूप को बताने वाली. मिथ्या-भ्रम को नाश करने वाली, मोह रूप पिशाव को भगाने पाली, मोक्ष के पथ पर अनंत अक्षय, श्रव्याबाध सुख को देने वाली केवल श्रीजिनेश्वर भगवान् की वाणो है, जो कि गुणां को खान है। इसो के पठन, मनन, श्रवण, निदिध्यासन, में धर्म ध्यानी महात्मा सदैव प्रेमपूर्वक उत्सुक रहा करते हैं। इसके प्रत्येक शब्द को अत्यन्त उत्सुकुता पूर्वक प्रहण करते हैं और उसके रहस्य के प्रति अन्त करण को सयोजित करते हुए और एकाप्रतापूर्वक उसमें लीन होते हुए अपूर्व और अनुपम धानन्द का अनुभव किया करते हैं। तृतीय प्रति शाखा-धर्म-ध्यानी के आलम्बन धम्मस्म ण माणस्स चत्तारि आलंवणा पण्णता, तंजहा:- -वायणा, पुच्छणा, परियट्टणा, धम्मकहा । धर्मष्यान की आराधना करने वाले के लिये चार प्रकार का पालम्बन कहा गया है -जैसे युद्ध पुरुष के लिये मार्ग में चलते समय लकड़ी प्राधार भूत होती है, अथवा महल पर चढ़ते समय, सीढ़ियों को अतिक्रमण करते समय रस्सी आधार भूत होती है, वैसे ही धर्मध्यान में प्रवृत्ति करने वाले महात्मा के लिये भी चार प्रकार का माधार कहा गया है । (१) वायणा-सूत्रों का वाचन, (२)पुच्छणा-संदेह के निवारण के लिये गुरु से पूछना, (३) परियट्टणा=पठित ज्ञान की बार वार पावृत्ति करना, और (४) पम्म-कहा-धर्म-फया अथवा व्याख्यान आदि कहना, सुनना।

( 8२ ) * ध्यान-कल्पतरु * प्रथम पत्र-" वायणा" (१) वाचना--गीतार्थ, बहु-मत्री, श्राचार्य, उपाध्याय, इत्यादि विद्वानों द्वारा पठन पाठन करना, लिग्वित-मुद्रित सूत्र-ग्रन्थों का वाचन करना, यह प्रवृत्ति धर्मध्यान के ध्याता के लिये प्रथम पालम्बन रूप थाधार है। चौथे बारे में बुद्धि प्रवल और तीक्ष्ण हुश्रा करती थी, जिससे शास्त्र आदि लिखने को न तो परिपाटी थी और न आवश्यकता हो । उस काल में शिष्य अपने गुरु की कृपा से अतिम्वल्प काल में हो अपरिमित ज्ञान कठाप कर लिया करते थे। कितने ही शिष्य तो ऐसे होते ये कि चौदह पूर्वो की विद्या भो-जो कि यदि लिखी जाय तो उमके लिखने में ही १६३८३ हाथी डूब जॉय, इतनी स्याही की आवश्यकता हो सकती इतना विशाल ज्ञान भी एक मुहूर्त मात्र में ही कठस्थ कर लिया करते थे । आचार्य महाराज " उप्पन्ने वा, विगए वा, धुवे वा " यह त्रिपदी मात्र ही बोला करते थे, और शिष्य इन तीन पदों को सुनते ही चौदह पूर्वो जितना ज्ञान प्राप्त कर लिया करते थे। इस त्रिपदी का मक्षिप्त भावाथ इस प्रकार है कि-" विश्व का प्रत्येक द्रव्य, प्रत्यक तत्व उत्पत्तिशील है, नाश शील है और नौव्य शील भी है । " जैसे जल से भरे हुए विशाल कृप में यदि तेल की एक सूक्ष्म वूद डाल दी जाय तो, वह पानी क प्रत्येक श्रश में पहुँच जाती है, वैसे ही प्राचार्य महाराज द्वारा सिसाया हुश्रा सक्षिप्त शब्द भी विस्तृत रूपमें परिणत होकर महान ज्ञान का रूप धारण कर लेता है। उस ममय में ऐसे ऐसे महाज्ञानी विद्यमान थे कि जिनके दृष्टिवाद नामक अगतान के एक कोने में ही चौदह पूर्व का ज्ञान समाविष्ट हो सकता था इतने उत्कृष्ट ज्ञान के रसानद में उनकी अन्तरात्मा इतनी विलीन अथवा सनीन हो जाया करती थी कि छः छ मास तक उनका ध्यान नहीं टूटा करता था । एव इतने समय तक उन्हें भूख प्यास, शीत, उष्णता, आदि शारीरिक और प्राकृतिफ पीडाएँ भी अनुभव मे नहीं पाया करती थीं । ऐसी महती और प्रबल बुद्धि करती थी । ऐसी परिस्थिति में लिखने का कष्ट क्या उठाया जा सकता है ? चौथे भारे के समाप्त होने के बाद लगभग ६७६ वर्ष व्यतीत हो जाने पर "प्रीदेवर्द्विगणिक्षमा श्रमण" नामक आचार्य हुए। एक समय रोग विशेष को शान्ति के लिये वे मूठ का एक गाठिया लाये । कुछ समय बाद उसका उपयोग करने की दृष्टि से उन्होंने उस गाठिये को कान में रख लिया, किन्तु घटना ऐसी हुई कि वे आचार्य महाराज उस गाठिये को यथा समय पर साना भूल गये और सायकाल को देवसिम प्रतिक्रमण करते समय आज्ञा लेने के लिये ज्यों ही वदना प्रारम्भ की कि वह गाठिया झट से कान में से पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसे देखते ही उन्हें विचार उत्पन्न हुश्रा कि-अाजकल भी जव किं एक पूर्व जितना ज्ञान उपलब्ध है, ऐसी स्थिति में भी बुद्धि इतनी मन्द हो गई है, ता आगे क्या दशा होगी ? यदि ज्ञान सर्वश्वरूप से नष्ट हो जायगा तो घोर अन्धकार फैल जायगा । इसलिये यही मार्ग हितकर होगा कि थवज्ञान का कागज पर लिखा जाना प्रारम्भ किया जाय। ऐमा लिखित ज्ञान भव्यजीवों के लिये भविष्य में महान् हितकर सिद्ध होगा। ऐसे ही विचारों की प्रेरणा से उन्होंने सक्षेप में प्रागमों का लिखना प्रारम्भ किया। 'सक्षेप" शब्द यो लिग्वना पड़ा कि प्राचाराग मे मूल रूप से १८००० पद थे, जब कि आजकल केवल २५०० श्लोक जितनी ही रचना उपलब्ध हैं। छ गाथा-सोलससय चउतीसा, कोडी तियसीटि लक्खय चेव । सत्त सहस्साट्ठसया, अदासीदी व पदवरणा ॥ ३३५ || गोम्मटसार अर्य-१६३४८३०७८८८ अक्षर वाले शब्द को ही एक पद "पागम में कहा गया है ! उनकी हुआ - * ध्यान-कल्पतरु * (६३) . । इस प्रकार देवर्द्धि गणि क्षमा श्रमण के काल में दृष्टिवादांग को छोड़ कर के ग्यारह अग आदि ७२ सूत्रों की संक्षेप में ही लिखावट हो मकी । जिनके नामों का उल्लेख श्री समवायाग और नन्दी सूत्रों में है । शेष सम्पूर्ण ज्ञान यहीं से अस्त हो गया । आज कल वर्तमान इस पचम पारे में तीर्थंकर केवली, गणधर, द्वादशांग के पाठो, और पूर्व घर आदि अपार ज्ञान के धारक कोई नहीं रहे । श्री उत्तराध्ययनजी के दशवें अध्ययन में कहा गया है कि न हु जिणे अज दिस्सइ, बहुमए दिस्सइ मग्गदेसिए । सपइ नेयाउए पहे, समयं गोयम ! मा पमायए ॥ ३१ ॥ अर्थात्-अभी इस पचम काल में तीर्थकर भगवान नहीं दीसते हैं, किन्तु मोक्षमार्ग का उपदेश बनाने वाले बहुमत सद्गुरु दिखलाई देते हैं । हे गौतम | उनके बतलाये न्याययुक्त पथ को प्राप्त करने मे समय मात्र का भी प्रमाद मत करो। इस प्रकार श्राज फल और मुमुक्षु जीवों के लिये केवल जिनोक्त शास्त्र और सद्बोध के फर्ता सद्गुरु मात्र ही आधार है । मोक्षार्थियों की इच्छा तृप्ति करने वाला केवल सत् शास्त्रीय ज्ञान मात्र ही है । यह ज्ञान सूत्रों में अथवा ग्रन्थों में सन्निहित है । इनका रहस्य गीताथ, बहुमुत्री, औत्पातिको बुद्धिवाले और दीर्घ दृष्टि वालों के पास से प्राप्त किया जा सकता है । जिन सत् पुरुषों ने अपने गुरुओं की सत्सगति में रह कर शात्रीय ज्ञान को यथाविधि से ग्रहण किया है, जो न्याय-मागे के पथिक होते हुए लौकिक और लाकात्तर दृष्टि से शुद्ध प्रवृत्ति में प्रवृत्त जो क्षमा शील, सयमी, निगरभ वाले, और निष्परिग्रही है, ऐमे हा महात्माओं के चरणों की सेवा करते हुए शात्रों का अभ्यास करते रहना चाहिय । शास्त्र समुद्र अतिगइन गूढार्थों से परिपूर्ण है। उसके यथार्थ स्वरूप का ज्ञान होने पर ही आत्म-कल्याण को समावना है। आज कल कितने ही मुर्ख अभिमान वश होकर बिना गुरुजनो की सहायता लिये ही साधारण कोटि को पुस्तकों का केवल वाचन करके अपने श्रापको पहित मानने लगत हैं । ऐसे मूरों ने ही अनेक स्थानों पर तो भव्य g. - . गाथा-अट्रठारस छत्तीस बादाल, अडकडी अडबि छप्पएण ।। सत्तरि अठावीस चउदाल, सोलस सहस्सा ॥ ३५७ ॥ गोम्मटसार इगि दुग पचेयार तिवीस दुतिणउ दिलक्ख तुरियादी। चुलसीदि लक्खमेया कोडी य विवागसुचम्हि ॥ ३५८ ॥ गोम्मटसार अर्थ-पर्व गाथा में वर्णित पद मर्यादा के अनुसार ऐसे पद बारह अगों में इस प्रकार थे-आचारांग में अठारह हजार पद थे, सूयगहाग म छचीस हजार थे, ठाणाग में बियालीस हबार थे, ससवायाग में एक लाख चौंसठ हसार पद थे, मगवतीची में दो लाख अठाइस हजार थे, शाताबी में पाच लाख छापन हजार थे, उपासक दशागजी में ग्यारह लाग्न सत्तर हजार थे, अन्तगडागबी में तेइस लास्त्र अटाइस हजार थे, अणुचरोववाई में बानवे लाख चवालीस हजार ये, प्रश्न व्याकरण में तिरानवे लान्त्र सोलह हजार पद थे, और विपाक सूत्र में एक करोड चौरासी लास पद थे, इस प्रकार ग्यारह अगों के पदों की जोड चार करोड पन्द्रह लाव दो हजार पदों जितनी है । दृष्टिवाद नामक बारहवें में एक अग्त्र पाठ करोड़ श्रडस्ट लाल छ पन हजार पांच पद ये, यह भी ध्यान म रहे कि यहां पर बो अक्षर तथा पदों का प्रमाण बताया है, वह अपुनरुक्त अक्षर तया पदो का प्रमाण समझना । विशेष गोम्मटसार जीव पांद से वानना । ग (६४) * ध्यान-कल्पतरु * न . -- श्रर्य का अनर्थ करते हा शास्त्र को शस्त्र बना दिया है। जो अहिमा मय परम धर्म अनन्त भवा के परि- भ्रमण को मिटाने वाला है, जो परम पवित्र है, उसे ही हिमा का रूप दे दिया है, और अनन्त भयों को वढा वाला बना दिया है । इमालिग फहना पड़ता है कि मुमुक्षुओं को मर्व प्रथम शास्त्र की विधि के अनुसार मान-दाता गुरु क गुणों की परीक्षा करनी चाहिये । तत्पश्चात उनके चरणों में रहते हुए विनय पूर्वक ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। श्री सूयगडागजी सूत्र के ११ – अध्ययन में धर्मापशफ के लक्षण इस प्रकार कहे गये हैं - पायगुत्त सयादंत चिन्नमोए प्रणामवे । जे धम्म सुद्धमक्खाइ, पडिपुण्णमणालिसं १ अर्थात-~-मन, वचन, और पाया रूप श्रात्मा को पाप-मार्ग में जाने से जो रोकते हैं, जो अपनी वृत्तियों को वश में करने वाले हो, जो अपनी आत्मा को कुमार्ग में नही जाने देते हो जो सदैव पाँची इन्द्रियों को और मन को विषयो से निवत्त करके ध्यान की ओर लगाने वाले हैं। जिन्हो ने सांसारिक भारम्भ परिग्रह रूप प्रवाह को बन्द कर दिया है। जो मिथ्याच, अघ्रत, प्रमाद, कपाय और अशुभ योग रूप पाँचों प्रास्रवो से रहित हैं। जिन्हो ने 'अहिंसा, सत्य, अचौर्य ब्रह्मचर्य, और निष्परिग्रहत्व" रूप पाँची महावतों को धारण किया है, और जो थन्य अनेक गुणो से युक्त हैं, वे हो ' सत्य, शुद्ध तथा तथ्य" रूप से श्री वीतराग प्रभु द्वारा उपदिष्ट धर्म का कथन कर सकते हैं। इनके कथन में ही देश नव धर्म, और सर्व व्रत धर्म" का परिपूर्णतया वर्णन पाया जा सकता है। जो कि अनुपमेय ही है । तदनुसार ऐसे गुणों की सेवा में रहते हुए ही ज्ञान सपादन करना चाहिए । व्यवहार में यह देखा जाता है कि दातार से अन्न, वख द्रव्य आदि ग्रहण करते समय लघुता प्रदर्शित की जाती है, एवं तालाब आदि से जल प्रहण करते समय भी झुकना पड़ता है, ऐसी स्थिति में ज्ञान जैसे सर्वश्रेष्ठ पदार्थ को ग्रहण करने के लिये कितनी नम्रता चाहिये ? इसी दृष्टि कोण से ज्ञान प्राप्त करने की विधि श्रीउत्तराध्ययनजी सूत्र के प्रथम अध्ययन में इस प्रकार फरमाई गई है- श्रासणगों न पुच्छेजा, नेव सिजागो कयाइ वि । आगम्मुक्कुडुङ्गो संतो, पुच्छेजा पंजलीउडो ॥ २२॥ एवं विणयजुत्तस्स, सुत्तं सुत्तं प्रत्यं च तदुमयं । पुच्छमाणस्स सीसस्स, वागरेज जहासुयं ॥ २३ ॥ अर्थात्-अपने श्रासन पर बैठा हुआ ही अथवा शय्या पर सोता हुआ ही प्रश्न श्रादि ज्ञान- विचारणा नहीं पूछे, क्योंकि ऐसा श्रासन अभिमान वाला है। अभिमान ज्ञान का शत्रु हैं। सोते सोते हो ज्ञान प्रहण करने से अविनय और प्रमाद होता है। प्रमाद ज्ञान का नाशक है। अतएव जब प्रश्न पुछने की अथवा ज्ञान ग्रहण करने की इच्छा हो, तव श्रासन से उठकर अविनय, मान और प्रमाद का परित्याग करते हुए जहाँ गुरु महाराज विराजमान हों, उनके सम्मुख नम्रता पूर्वक उपस्थित होकर, दोनों घुटने पृथ्वी पर स्थापित करके, दोनों हाथ जोड़ करके, नम्रता प्रदर्शित करते हुए सम्मुख रहते हुए सन्मान गर्मित वचनों द्वारा प्रश्न अथवा शका एव सूत्रार्थ जिज्ञासा प्रदर्शित करे। 'क्या उत्तर प्राप्त होता है?" ऐसी उत्कठा रखते हुए एकामना पूषक उनके प्रति "जी, तहेत" (शुद्ध रूप तहेति) द्वारा उच्चारण करते हुए उसका सम र्थन करे। जितना याद रह सके, सतना ही प्रहण करे। अधिक याद नहीं रहने की स्थिति में एक ही साथ अधिक ज्ञान प्राप्ति का मोह नहीं रक्खे । इस प्रकार विनय पूर्वक पूछने से गुरु महाराज जो कुछ भी जानते हैं, उसे अपने विनीत शिष्य को यथा विधि प्रदान करने का प्रयत्न करेंगे। -- .

* ध्यान-कल्पतरु * (६५) - द्वितीय पत्र-पृच्छना (पुच्छणा) सद्गुरु की उपासना करके जो ज्ञान ग्रहण किया है, उसकी पुनरावृत्ति करते समय किसी प्रकार की शंका उत्पन्न हो जाय, किसी शब्द या अथ का विस्मरण हो जाय अथवा किसी के प्रश्न पूछने पर उत्तर न श्रावे, तब पूर्वोक्त विधि के अनुसार गुरु महाराज के सम्मुख पाकर पृच्छा या पृच्छना की जाती है। पृच्छना का अर्थ है प्रश्न करना या पूछना । विनीत शिष्य इस प्रकार प्रश्न फरता है-'हे कृपालो । आपने अनुग्रह फरके मुझे अमुफ वस्तु पढ़ाई थी । उसमें मुझे इस प्रकार का संशय उत्पन्न हुआ है। हे पूज्य । मैं उसका निराकरण-निवारण करन का आपको कष्ट देता हूँ। इस कष्ट के लिए क्षमा कीजिए और मार्ग बतलाइए।" इस प्रकार नम्रता भरे वाक्य कह कर अपने मन की शका स्पष्ट रूप से गुरुजी के सामने प्रकाशित करे। गुरु महाराज जो उत्तर दें, उसे एकाग्रतापूर्वक, उत्सुक भाव से सुने और 'जी, तहत्ति' इत्यादि कोमल और मीठे वचनो से वधाता हुए ग्रहण करे । जहाँ तक मन का पूरी तरह समाधान न हो जाय वहाँ तक तर्क उठा-उठा कर पूछता ही जाय, न लज्जा का अनुभव करे, न भयभीत हो, न घबरावे । निश्चल चित्त से पूरा समाधान प्राप्त करके सदेहरहित होवे । पूछे हुए विषय को इतनी अच्छी तरह समझ ले कि कालान्तर में कोई वह बात उससे पूछे तो उसे पूरी तरह समझा सके । . तृतीय पत्र-परिवर्तना ( परियट्टणा) - इस प्रकार अभ्यास करके निश्चित और निस्सन्देह किये ज्ञान की परियट्टणा करनी चाहिए, अर्थात उसे बार-बार फेरना चाहिए, पुनरावृत्ति करनी चाहिए । क्योंकि इस काल में बुद्धि इतनी तीव्र नहीं है कि जो एक बार पढ़ लिया, उसे फिर न फेरने पर भी वह विस्मृत न हो जाय । बार-बार फेरे बिना उसमें भूल पद हो जाती है। बार-बार फेरने से और भी अनेक लाभ होते हैं । भगवान् ने श्री उत्तराध्ययन सत्र के २६ वें अध्ययन में फर्माया है- परियट्टणाए वंजणाई जणयइ, चंजणलद्धिं च उप्पाएइ ।' अर्थात् ज्ञान को बार-बार आवृत्ति करने से अक्षरानुसारिणी लब्धि उत्पन्न हो जाती है, जिसके प्रभाव से एक अक्षर या पद का अनुसरण करने से आगे पीछे के दूसरे अक्षरों और पदों का ज्ञान हो आता है । इस लब्धि को प्राप्त करने वाला अपनी विना पढ़ी विधा में से भी दूसरे के भूले हुए अक्षरों को पता सकता है। सीखे हुए ज्ञान की श्रावृत्ति करे तो ऐसी न करे जैसे वच्चे 'गुणनी ' किया करते हैं कि जो याद फर रक्खा है उसे तोते को तरह विना समझे चूमे वोल दिया । मतलव कुछ समझ में न आया, ध्यान कहीं तर्क-वितर्क और शका-प्रशका करने से ज्ञानी वन नाराज नहीं होते, बल्कि प्रसन्न होते हैं और शान्ति ऐसाय ननाधान करते हैं।

(६६) * ध्यान-कल्पतरु * अन्यत्र रहा। श्रावृत्ति करते समय अणुप्पेहा (अनुप्रेक्षा) अर्थात उपयोग रखना चाहिए । मुख से जिन-निन शब्दों को बोले, उनका अर्थ अपने मन में विचारता जाय । ऐसा करने से अनेक नाम) होते हैं। शास्त्र में । कहा है.- प्रश्न-अणुप्पहाए णं भंते ! जीवे किं जणयह ? उत्तर-अणुप्पेहाए णं पाउययजाओ सत्तकम्मपगडीओ धणियबंधणवद्धानो सिदिल- बंधणबद्धाश्रो पकरेइ । दीहकालद्विइयाश्रो हस्सकालट्ठियारो परेइ । भाउयं च कम्मं सिया वन्धई, सिया नो बन्धइ । असायावेयणिजं च णं कम्मं नो भुजो भुजो उवचिणइ । प्राणाइयं च णं श्रणवदग्गं दीहमद्धं चाउरन्तं संसारकान्तार खिप्पामेव वीइवयइ ।। -श्रीउत्तराध्ययन, अ २६,२२ अर्थात्-उपयोग के साथ ज्ञान को फेरने से या शब्द का अर्थ परमादृष्ट से विचारने से जीव श्राठ कमों में से, श्रायुष्य कर्म को छोड़ कर शेष सात कर्मों को, जो पहले निविड ( मजबूत ) बघे हों उन्हें शिथिल करता है, बहुत काल तक भोगने योग्य फर्मप्रकृत्तियाँ बाँधी हों तो थोड़े समय में भोगने योग्य बना लेता है । तीन फल देने वाली बाँधी हों तो मद फल देने वाली बना लेता है। बहुत प्रदेश वाली प्रकृतियों को अल्पप्रदेश वाली कर लेता है। श्रायु फर्म पदाचित बाँधता है और कदाचित नहीं भी बाँधता है । असाता- वेदनीय ( रोग और दुःख देने वाले ) कर्म को बार-बार नहीं बाँधता है। और अनादि तथा कठिनाई से पार होने योग्य ससार रूपी कान्तार ( जगल) के लम्बे मागे को शीघ्र ही पार कर जाता है। अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर लेता है। श्री बद्धमान महावीर स्वामी ने अपने मुखारविन्द से अनुप्रेक्षा (चिन्तन-मनन ) का कितने विस्तार से गुणानुवाद किया है। अनुप्रेक्षा फी शाक्त इतनी उत्तम और महान है। ऐसा जान कर खूब उपयोग लगा कर वार-बार ज्ञान को फेरना चाहिए। - - चतुर्थ-पत्र--धर्मकथा ( धम्मकहा ) इस प्रकार वारवार नो ज्ञान पक्का किया है, वह अन्तरात्मा में रम गया, उसका हूबहू रस परिणत हो गया। अब उसका दूसरों को लाभ पहुंचाने के लिए धर्मक्था करनी चाहिए । धर्मकथा का अर्थ है व्याख्यान करना । पीठाणागसूत्र में धर्भकथा के चार भेद बतलाये हैं और फिर एक-एक भेद के चार-चार प्रभेद बतलाये हैं। अतएव धर्मकथा के सोलह भेद हात हैं। वह इस प्रकार हैं- (१) श्राक्षेपिणी कथा-श्रोता को रागद्वप और मोह श्रादि से हटाकर तत्त्व की ओर आकर्षित करने वाली कथा श्राक्षेपिणी कथा कहलाती है। यह कथा इस प्रकार से करना चाहिए कि प्रोता के मन में हूबहू चित्र अफित हो जाय और उसका असर जल्दी खत्म न हो जाय । तत्त्व हृदय में पका ठस जाय, रुच जाय और पच जाय । इस फ्था के चार मेद हैं-(१) प्रथम साधु के धर्म का अर्थात् पाँच महायत, पाँच समिति और - तीन गुप्ति, इस प्रकार १३ तरह के चारित्र आदि का क्थना करना । जो साधु धर्म पालने में समर्थ न हो, उनके लिए श्रावक के बारह प्रत आदि का उपदेश करना अथवा यथाशक्ति प्रत नियम आदि धारण करने (१) त्रस नीव की हिंग न करना और स्थावर जीवो की मर्यादा करना । (२) स्थूल असत्य न बोलना' * ध्यान-कल्पतरु * (६७) को सूचना करना। (२) स्याद्वादशैली से निश्चयनय और व्यवहारनय के अनुसार प्रवृत्ति करने की रीति की प्ररूपणा करना। जैसे निश्चयनय के अनुसार ज्ञानादि रत्नत्रय को आगधना से और व्यवहारनय के अनुसार रजोहरण मुख वत्रिका प्रादि साधु के लिंग को धारण करके शुद्ध क्रिया करने से मोक्ष प्राप्त होता है। निश्चय के बिना व्यवहार और व्यवहार के बिना निश्चय की सिद्धि होना कठिन है । व्यवहार में शुद्ध प्रवृत्ति फरफे निश्चय की श्राराधना करने से ही सिद्धि प्राप्त होती है । ( ३ ) श्रोताओं के सशय को निवारण करने के लिए अपने मन से ही प्रश्न उठा कर आप ही उनका समाधान करे जिससे इष्ट अर्थ की सिद्धि हो । प्रश्नों का उत्तर मार्मिक तथा प्रभावशाली शब्दो में देकर समाधान करे। ( ४ ' सब को रुचिफर, सरल और सत्य सद्बोध देवे किन्तु ऐसा उपदेश न करे जिससे पक्षपात या द्वष बढे, श्रात्मश्लाघा हो या पर• निन्दा हो । पाप की निन्दा करे, पापो की नहीं। (२) विक्षेपणी कथा-श्रोता को कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग में लान का उपदेश विक्षेपणो कथा कहलाता है। जो श्रद्धा से या चारित्र से चलित परिणाम वाला हो, उसे पुन सबोध देकर श्रद्धा और सयम में स्थिर करने के लिए या कुमागे में स्थित को सुमार्ग में लाने के लिए यह कथा की जाती है। इस फया के भी चार भेद हैं-(१) मिथ्यात्वियों के परिचय से अथवा प्रथावलोकन से किसी की श्रद्धा भ्रष्ट हो गई हो तो उसे जैनमत्त का गहन और सूक्ष्म ज्ञान बतला कर, अन्यमतों के साथ तुलना करके, दोनों में प्रत्यक्ष फर्क बतलाना, जिससे उसकी बुद्धि तत्काल ठिकाने था जाय । (२) एकान्त अन्य मत में ही किसी का मन लगा हो तो उसे उसी के मत के शोरों में बसलाई हुई साधु की कठिन क्रिया तथा जैनमत से मिलती हुई बातें बतानाकर उससे पूछे कि इस प्रकार की क्रिया करने वाले जैन साधु हैं या दूसरे ? इस प्रकार सत्य दृष्टि से बताकर वीतराग धर्म में दृढ़ श्रद्धालु बनाना । (३) जब उनकी श्रद्धा जैनमत पर जम जाय, तब उनके हृदय के मिध्यात्व को दूर करने के लिए, न्यायशास्त्रों का आश्रय लेकर खुलमखुल्ला मिथ्यात्व का स्वरूप बतलाना और उनके हृदय के शल्य का उद्धार करना । (४) जिनका हृदय निमेल निश्शल्य हो चुका है उन्हें ऐसा उपदेश देकर दृढ श्रद्धालु बनाना कि जिससे फिर मिथ्यात्व का प्रवेश न हो सके। उन्हें सम्यक्त्व का विस्तार से यथातथ्य, रुचिजनक स्वरूप बताना तथा अनेक प्रश्नोत्तर करके ऐसा पक्का करना कि किसी के डिगाने पर भी वह डिग न सके। . - । ( ३ ) सवेगनी कथा-स अर्थात सीधा और अच्छा वेग उत्पन्न करने वालो अर्थात् श्रोता को धेराग्य की ओर बढाने वाली कथा मवेगना कथा कहलाती है। इसके भी चार भेद हैं-(१) इस लोक सम्बन्धी जिन-जिन वस्तुओं पर समारी जीवों का प्रेम है. उनको अनित्यता और अमाता आदि बतलाना जैसे-देखते-देखते वस्तुओं के स्वभाव में, स्वरूप में कैसा अन्तर पड़ जाता है । ताजा वस्तु और वासी वस्तु को देखने से मालूम होता है कि वस्तु का स्वभाव क्षणभगुर है, अर्थात पल-पल में पलटता रहता है। जो गुण और जो स्वाद गर्म वस्तु में था, वह ठहो होने पर नहीं रहा । इसी प्रकार इम शरीर को देखो। जन्म होने के बाद जवानो तक इसकी सुन्दरता में कैसो धद्धि होती है । फिर वृद्धावस्या में कितनी होनता पाती जाती है और अन्त में तो नष्ट हा हो जाता है । जो इस शरीर का हाल है वहो ससार को सब वस्तुओं का हाल समझना चाहिए। क्षण क्षण में नय नये पुद्गल पर्याय उत्पन्न हाते हे और पुराने नष्ट होते रहते हैं। (३) वही चोरी न करना (४) परस्त्री का त्याग करना (५) परिग्रह की मर्यादा करना ( ६ ) दिशा की मर्यादा करना (७) उपभोग परिभोग की मयाटा चरना (८) अनथदण्ड का त्याग करना (६) सामायिक करना (१०) पेशावकाशिफ त दारण करता (११) पोमा ग्ना (१२) मुनिराज बाटि सुपात्र को यथायोग्य सयम में तदानादान देना।

(६८) * ध्यान-कल्पतरु * . मब पदार्थों में पदम ही बडा अन्तर नहीं पड़ता है, किन्तु पड़ते पडते ही पड़ता है, अन्त में वे पानी के बुलबुले के समान विनाश को प्राप्त होते हैं। पुद्गलों का ऐसा स्वभाव जानकर ममत्व का त्याग करना चाहिए फिर मनुष्य जन्म श्रादि सामग्री प्राप्त हुई है, उसकी अनित्यता वतलाकर उसके सदुपयोग का उपदेश देना चाहिए। जैसे चौरासी लाग्य जीवयोनियों में अनन्त फाल परिभ्रमण करते-करते, महान पुण्य के उदय से समस्त भवभ्रमण का अन्त करने वाली मनुष्यजन्म शास्त्र श्रवण, शुद्व-श्रद्धा और धर्म पाल' आदि की सामग्री अत्यन्त कठिनाई से मिली है। जो मनुष्य इसे व्यर्थ गँवा देगा, उसे कितना पश्चाचा' करना पड़ेगा? और यह सब सामग्री पाफर जो काम करना चाहिए, उसे जो कर लेगा उसे कैसा मानन प्राप्त होगा। इत्यादि कथन फर के वैराग्य प्राप्ति करा कर धर्म में सलग्न करना। (२) अल्पज्ञ जीव लालच में आकर धर्मवृद्धि करेंगे, ऐसा विचार कर देवों की ऋद्धि का भोगों का, वैक्रिय आदि शक्तियों का, दीघ श्रीयु का, नीरोगता का तथा आहार आदि का वर्णन करना । जैसे जो विशेप और निर्दोप धर्म का श्राचरण करते हैं उनको उत्तमोतम सुख मिलते हैं और जो समार के काम भोगों में श्रासात रहते हैं, पापारभ करते हैं, वे नरक में जाकर दुःख भोगते हैं । इत्यादि कह कर नरक की क्षेत्रवेदना, परमाधामी जनित वेदना आदि का वर्णन करना । हे जीव । क्षणिक सुख के लिए क्यों सागरोपम तफ दुःख भोगने का काम करता है। इत्यादि रूप से सममने से श्रोता पाप को छोड़ कर धर्म-मार्ग में उद्यमवान होता है। (३) 'न पेमरागा परमत्थि वन्धो अर्थात जगत् में प्रेमराग (ग्नेह के पास ) के समान और कोई वन्धन नहीं है। प्रेम के पाश में फंसे जीव अपने सुख दुःख और भले बुरे का विचार नहीं करते । अपने म्वजन मित्र आदि का पोपण करने के लिए अनेक प्रारम्भ करते हैं। किन्तु उनकी स्वार्थ परायणता को नहीं पहिचानते हैं। जब कु कुमपत्री देते हो तो कितना परिवार इकट्ठा होता है। परन्तु जब सकट पड़े तब स्वजनों की सहायता लेने के लिए 'सकटपत्री' लिखो तो कितने स्वजन पायेंगे ?x अजी, आना तो दूर रहा, माल खाने वाले ही कहेंगे कि-क्या लडडू बनार्य विना नाक जाती थी ? इत्यादि कह कर उसका अपमान फरते हैं। ऐसे म्वार्थियों का पालन पोपण करके, सिर पर पाप का भार लाद कर, नरक तिर्यंच गति में, अकेले ही अपने किये कर्मों का फल भोगा है ! पाप में कोई भी हिस्सेदार नहीं बन सकता । इमी लोक में देख लीजिए। चोर को ही सजा मिलती है, चोरी का माल खाने वाले कुटुम्वियों को नहीं । ऐमा नानकर फर्म-वन्धन से डरना चाहिए, धर्म का आचरण करना चाहिए। जो ऐसा करता है वह सुखी होता है । इत्यादि समझाने से श्रोता का माह कम होता है । वह वर्म में सनम होता है । ® णिच्चेदरधातुसत्तय, तरुटस बेइन्दियासु छन्चेव । मुरणिरय तिरिय चउरो, चउटस मणुए मदसहस्सा ।। अर्थात्-नित्यनिगोद की ७ लाग्य, इतरनिगोट की ७ लाग्य, पृथ्वीकाय की ७ लाख, अपाय की ७ लाख, अग्निकाय की ७ लाग्य, वायुकाय की ७ लाग्ब, प्रत्येक वनस्पिति की १० लाग्व, द्वीन्द्रिय की २ लाख, त्रीन्द्रिय की २ लाग्व, चतुरिन्द्रिय की २ लाख, नारकों की ४ लाख, तियंच पचेन्द्रिय की ४ लाग्न और मनुष्य की १४ लाख, यह ८४ लाख नीवयोनियां हैं। x एक मराठी कवि ने कहा है- सम्पदा बहु आलीयावरी, सोयरे जमा होती त्या घरी। गेलीयास ती रुष्ट होउनी बन्धु सोयरे जाती सोहनी ॥. - , * ध्यान-कल्पतरु* (86) नहीं रहता है (४) कुटुम्ब पर से ममत्व कम होने के बाद मर्व पुद्गलों पर से ममत्व कम करने का बोध दे। नसे यह जीव अनादिकाल से मोह मदिरा के नशे में बेसुध होकर अपने निज स्वरूप को भूल कर, पर पुद्गलों को त्रियोग से रमणीय समझ कर सेवन कर रहे हैं । ये यह नहीं सोचते कि पराये अपने कब होंगे!* इस ससार व्यवहार मे अभी जो एफ बार धोखा देता है, चतुर मनुष्य दूसरी बार उसकी छाया में भी खड़ा । परन्तु इन पुद्गलों ने तो अनन्त-अनन्त वार अपने को धोखा दिया है । कभी शुभ इष्ट सयोग हुअा तो हँसा दिया, कभी अनिष्ट सयोग हुआ तो रुला दिया। कभी नौ ग्रैवेयफनक ऊँचा चढाया और कभी सातवें नरक के नाचे निगोद में लेजाकर दवा दिया। कभी सब के लिए मनोज्ञ बनाया तो कभी विष्ठा के समान सबकी घृणा का पात्र बनाया । ऐसा बना दिया कि सब थूकने लगे। इन पुद्गलों ने अनत बार ऐसी अनन्त विडम्बनाएँ की हैं। आगे भी जब तक इनका ससर्ग नहीं छूटेगा, तब तक ये अपना स्वभाव कमो नहीं छोड़ेंगे । फिर इनको सगति में पड़ कर कौन मूर्ख बने ! कौन अपनी फजीहत करावे । ऐसा समझ पर अपनी प्रात्मा का सुख चाहो तो पुद्गलों के ममत्व को त्यागो । सम्यग्ज्ञान दर्शन और चारित्र, यह रत्नत्रय हैं। इनके स्वभाव में कभी फर्क नहीं पड़ता है। श्रात्मा के गुण स्थिर स्वभाव वाले हैं। इनको पहचान कर अखण्ड प्राति धारण करो जिससे आत्मा शुद्ध चैतन्य रूप होकर अनन्त अक्षय अव्यावाघ सुख का भोक्ता बने। । इस प्रकार का बोध देकर श्रोताओं का मन मोक्ष की ओर खींचना सवेगनी कथा कहलाती है (४) निवेदनो कथा-ससार से उदासान बनाने वाली कथा निवेदनी कथा कहलाती है । सवेगनो पथा में ससार का यथार्थ स्वरूप दर्शाया था। और निदनी में ससार से निवृत्त होने की प्रेरणा की जाती है। इसके भी चार भेद हैं- (१) समार में भ्रमण कराने वाले कर्म ही हैं। कभी कभी इस भव में किये कर्म इसी भव में मोगने पड़ते हैं । जैसे-हिंसा से शूली पर चढ़ना पड़ता है, झूठ बोलने से अप्रतीति का माजन बनना पड़ता कारागार का दण्ड सहना पड़ता है, चोरी करने से कैद, खोड़ा, हथकड़ी बेदी आदि फल भोगने पड़ते हैं, व्यभिचार करने से बदनामी होती है, गर्मी, सुजाक आदि भयानक और घृणित रोगों का शिकार बन कर सड़ सड़ कर मरना पड़ता है आदि आदि । जगत् के जीव जितने भी कर्म करते हैं, सुख के लिए ही करते हैं। परन्तु सुखी बहुत थोड़े हो दीखते हैं। इससे स्पष्ट समझा जा सकता है कि जिस उपाय से सुख होता है, उसे जीव नहीं समझते हैं और दुःख का उपाय फरक सुख चाहते हैं । फिर उन्हें सुख की प्राप्ति हो तो कैसे हो ? अनि से शीतलता कदापि नहीं मिल सकती। इसी प्रकार लोग धन से सुख चाहते है मगर धन में सुख कहाँ है ? जरा विचार . - * दो भाइयों का आपस में बहुत प्रम था। एक को नेरू (बाले) का रोग हुा । दूसरे ने बमीकन्द और हरितकाय का श्रारम्भ करके औषधोपचार किया। वह मर कर नरक में नारक हुा । दूसरा भाई, नो रोगी था, रोग फा अकाम कष्ट सहन करके परमाधामी देव हुआ । वह नरक म अपने भाई को मारने लगा । बोला-तूने मेरे प्रेम के वशीभूत होकर वमीक्न्ट का बहुत प्रारम्भ किया है । ले उसका फल भोग । नारक ने कहा- मैंने तो तेरे लिए ही पाप किया था और न ही मुझे मारता है । यह कैसा अन्याय है ? परमाधामी ने कहा-दम न्याय अन्याय कुछ नहीं बानते । तेरे किये कर्म तुझे ही भोगने पड़ेगे । बोपगा सोनावेगा।"

- कितने ही जन पाप कर्म करते हुए भी सुखी दिसाई देते हैं। वह सुख उनके इन पाप कर्मा (१००) * ध्यान-कल्पतरु * कीजिए * धन उपार्जन करते ( कमाते ) समय शीत, ताप, तुघा, तृपा श्रादि अनेक कष्ट सहन करने पड़त हैं। ज्यों-ज्यों धन वढता जाता है, त्यों-त्यों तृष्णा भी अधिक बढ़ती जाती है। और ' तृष्णायां परम दुःखम् । अर्थात तृष्णा ही सब से बड़ा दुख है। धन की वृद्धि हुई तो उसको रक्षा करने की चिन्ता लग जाती है। कहीं मेरा धन राजा, चोर, अग्नि पानी, पृथ्वी, कुटुम्बी और देवता श्रादि के निमित्त से नष्ट न हो जाय ! व्यय (खर्च) हो जाय और रोकड़ में एक पाई भी घट जाय तो सेठजी को चैन नहीं पड़ता फिर सब का सब नष्ट हो जाय तव तो कहना ही क्या है ? इत्यादि विचार करने से दुःख का ही साधन दिखाई पडता है। कितनेक लोग स्त्री में सुख मानते हैं। परन्तु इस काल में पूर्ण पतिव्रता स्त्री मिलना बड़ा कठिन है। हाँ, कुमार्या अनेक मिलती है। वे उत्तम जाति की होकर भो पति का अपमान फरतो हैं। पति के सन्मुख अनाचार करती हैं । पति को अपने हुक्म में चलाती हैं । इतने पर भी दूसरे के घर में चली जाती हैं और पति के नाम को तथ कुल को बट्टा लगाती हैं। क्या ऐसी ही स्त्रियों में सुख समझते हो ? कुछ लोग पुत्र से सुख मानते हैं । पुत्र के लिए सम्यक्त्वग्ल में भी वट्टा लगा कर कुदेवों के तथा ढेड़-चमारों के पाँवों में पड़ते हैं और धर्मभ्रष्ट होते हैं। कदाचित पुत्र मिल भा गया तो इस काल में सपूर मिलना मुश्किल है। हाँ, कपूत बहुत दिखाई देते हैं जो अपने वृद्ध माता-पिता पर वचनों और लाठियों के प्रहार करते हैं। घर पर और धन पर अपना अधिकार करके अदालत के दर्वाने खटखटाते हैं और झगड़ा फरके फजीहत करते हैं । इस प्रकार पुत्र का सुख तो प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है । कहाँ तक कहा जाय ? ' ससारम्मि दुक्खपउराए । अर्थात् इस ससार में दुखो को ही प्रचुरना है- सारा ससार दुखों से परिपूर्ण हैं। इस प्रकार पाप के फल बताना पहली सवगिनी कथा है। (२) अव पुण्य के फल देखिए । जो किसीको दुग्व नहीं देते हैं, वे हमेशा निश्चिन्त होकर श्राराम करते हैं। समय पड़ने पर सब मिल कर उनकी सहायता करते हैं। जो असत्य भाषण नहीं करते, उनकी पंचायत में तथा राजसमा में इज्जत होती है । चाग न करने वाले बड़े विश्वासपात्र गिने जाते हैं। धन के भडार में जाएँ तो भी उन्हें कोई नहीं रोकता है। जो ब्रह्मवारी होते हैं. उनका तेज, बल, बुद्धि नारोगता अनुपम होती है । जो ममता और तृष्णा से रहित है वे सदा सुखी हैं। 'सन्तोषो नन्दन वनम् ' अर्थात सन्तोप नन्दन-वन के समान सुखदाता है । देखिए न, माधुजी धन के बिना ही बड़े-बड़े राजाबों-महा- राजाओं के पूज्य होते हैं । निश्चिन्त होकर सम्यग्ज्ञान के द्वारा अपनी श्रात्मा में रमण करते हैं । सोधे अन्न और वस्त्र से शरीर-निर्वाह करत हैं । सदा आनन्द में रहते हैं। शुभ कृत्यों का यह फल इमा भव में प्रत्यक्ष दीख पड़ता है। (३) कितने कर्म ऐसे हैं जो इस भव मे वाधे जाते हैं, किन्तु उनका फल आगे चल कर मिलना है । यहाँ का नहीं है, पूर्वोपार्जित शुभ कृत्यों का समझना चाहिए । वर्तमान कालोन पाप कृत्यों के फल उन्हें भविष्य * अर्थस्योपार्जने दुस्समर्जितस्यापि रक्षणे । नाशे दुख व्यये दुख, धिगर्थ दुखमाजनम् || धन का मान करने में दुख उपार्जन करके रक्षा करने में दुःख नाश होने में दु ख और व्यय करने में भी दुखा इस दुखदायी द्रव्य को धिक्कार है। । -- -- * ध्यान-कल्पतरु * (१०१ ) - में भोगने पड़ेंगे । उदाहरण के रूप में समझिए कि पहले पकवान खाये जाएँ और वाद में कांदा (प्याज) खाया जाय तो खाने वाले को पहले पकवान फी डकार आएगी, फिर कांदे की । एक श्रादमी पालकी में बैठता है और चार पालकी उठाकर चलते हैं। पालकी में बैठने वाला उतर फर गद्दी पर लेटता है और पालकी ढोने वाले उसके पाँव दबाते हैं । यह पाँचों मनुष्य प्रकट रूप में एक सरीखे हैं, फिर भी पुण्य-पाप के फल भोग रहे हैं। अगर कर्म का उदय बदल जाय तो पालकी उठाने वाले उसमें सवार हों और सवार होने वालों को पालकी उठानी पड़े । पाप-पुण्य की यह विचित्र रचना है । पाप पुण्य के फल कभी परभव के इस भव में, कभी इस भव के इसी भव में और कभी इस भव के परभव में और कभी परभव के परभव में भोगे जाते हैं। (५) कितनेक कर्म ऐसे हैं कि इस भव में शुभ कृत्य फरके उपार्जन किये गये हैं, किन्तु उनका फल आगामी जन्म में मिलेगा। किसी धर्मात्मा पुरुष को दु ख में देखते हैं तो लोग शका करते हैं कि धर्म करने से यदि सुख होता है तो यह दुखी क्यों है ? किन्तु इस प्रकार धर्म के फल में शफा करने का कोई कारण नहीं है। प्रत्यक्ष देखिए, अभी कोई औषध ली जाती है तो लेते ही गुण नहीं करती है, किन्तु अपनी अवधि पर पध्य का पालन करने से गुणकर्ता होती है। जब तक पहले के विकार का क्षय नहीं होगा, तब तक उस औषध फा गुण दिखलाई नहीं देगा। इसी प्रकार जब तक पहले के अशुभ कर्मों का बल कम नहीं होगा, तब तक धर्मक्रिया का फल दिखलाई देना कठिन है । परन्तु इतना तो निश्चय समझिए कि- करणी तणा फल जाणज्यो, कदिय न निष्फल होय । जो जीव जन्मते ही सुखी दृष्टिगोचर होते हैं, वे पूर्योपार्जित पुण्य का ही फल भोग रहे हैं। इसी तरह यहाँ की फरणी आगे फल देगी। निर्वदनी कथा का मुख्य हेतु यह है कि- कडाण कम्माण न मोक्ख अस्थि । अर्थात-कृत कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है, चाहे वह फल इस जन्म में या आगामी में भोगा जाय । ऐसा समझकर फर्मवध से बचने का सदैव प्रयत्न करना चाहिए । पाचना, पृच्छना और परिवर्तना करके जो ज्ञान पक्का किया है, उसका लाभ यह चार प्रकार की धर्मकथा फरके दूसरों को भी देना चाहिए । धर्मध्यान के यह चार पावलम्बन अाधार कहे हैं । धर्मध्यानी को इन चारों कामों में मन को रमण फराना चाहिए और इन्द्रियों को विकार-मार्ग से हटा कर अच्छी तरह धात्मसाधन करके इष्ट अर्थ की सिद्धि करनी चाहिए। - - (१००) * ध्यान-कल्पतरु * - मानते हैं। पुत्र कीजिए * धन उपार्जन करते ( कमाते ) समय शीत, ताप, क्षुधा, तृपा आदि अनेक कष्ट सहन करने पड़ते हैं। ज्यों-ज्यों धन बढता जाता है, त्यों-त्यों तृष्णा भी अधिक बढ़ती जाती है। और ' तृष्णायां परम दुःखम् । अर्थात् तृष्णा ही सब से बड़ा दुख है। धन की वृद्धि हुई तो उमको रक्षा करने की चिन्ता लग जाती है। कहीं मेरा धन राजा, चोर, अग्नि पानी, पृथ्वी, कुटुम्बी और देवता श्रादि के निमित्त से नष्ट न हो जाय ! व्यय (खर्च) हो जाय और रोकड में एक पाई भी घट जाय तो सेठजी को चैन नहीं पड़ता फिर सब का सब नष्ट हो जाय तब तो कहना ही क्या है ? इत्यादि विचार करने से दुःख का ही साधन दिखाई पड़ता है। कितनेक लोग स्त्री में सुख मानते हैं। परन्तु इस काल में पूर्ण पतिव्रता स्त्री मिलना बड़ा कठिन है। हाँ, कुभार्या अनेक मिलती हैं। वे उत्तम जाति की होकर भो पति का अपमान करतो हैं । पति के सन्मुख अनाचार करती हैं । पति को अपने हुक्म में चलाती हैं। इतने पर भी दूसरे के घर में चली जाती है और पति के नाम को तथ कुल को बट्टा लगाती हैं। क्या ऐसी ही स्त्रियों में सुख समझने हो ? कुछ लोग पुत्र से सुख के लिए सम्यक्त्वरल में भी वट्टा लगा कर कुदेवों के तथा ढेड़-चमारों के पाँवों में पड़ते हैं और धर्मभ्रष्ट होते हैं । कदाचित पुत्र मिल भा गया तो इस काल में सपूत मिलना मुश्किल है। हाँ, कपूत बहुत दिखाई देते हैं जो अपने वृद्ध माता-पिता पर वचनों और लाठियों के प्रहार करते हैं। घर पर और धन पर अपना अधिकार करके अदालत के दाने खटखटाते हैं और झगड़ा फरके फजीहत करते हैं । इस प्रकार पुत्र का सुख तो प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है । कहाँ तक कहा नाय ? ' संसारम्मि दुक्खपउराए ' अर्थात् इस संसार में दुखों को ही प्रचुरता है- सारा ससार दुखों से परिपूर्ण हैं। इस प्रकार पाप के फल बताना पहली सवेगिनी कया है। (२) अव पुण्य के फल देखिए । जो किसीको दु ख नहीं देते हैं, वे हमेशा निश्चिन्त होकर पारा फरते हैं। समय पड़ने पर सब मिल कर उनकी सहायता करते हैं। जो असत्य भाषण नहीं करते, उनके पचायत में तथा राजसमा में इज्जत होती है। चोरी न करने वाले बड़े विश्वासपात्र गिने जाते हैं। धन भहार में जाएँ तो भी उन्हें कोई नहीं रोकता है । जो ब्रह्मवारी होते हैं, उनका तेज, वल, बुद्धि नीरोगता अनुपम होती है । जो ममता और तृष्णा से रहित है वे सदा सुखी हैं। ' सन्तोपो नन्दन धनम् ' अर्थात सन्तोप नन्दन-वन के समान सुखदाता है। देखिए न, माधुजी धन के बिना हो वड़े-बड़े रामाधों-महा- राजाओं के पूज्य होते हैं । निश्चिन्त होकर सम्यरज्ञान के द्वारा अपनी आत्मा में रमण करते हैं । सोधे अन्न और वस्त्र से शरीर-निर्वाह करत हैं। सदा प्रानन्द में रहते हैं। शुभ कृत्यों का यह फल इसा भव में प्रत्यक्ष दीख पड़ता है। (३) कितने कर्म ऐसे हैं जो इस भव में बांध जाते हैं, किन्तु उनका फज आगे चल कर मिलना | यहाँ कितने ही जन पाप कर्म करते हुए भी सुखो दिखाई देते हैं। वह सुख उनके इन पा कर्मा का नहीं है, पूर्वोपार्जित शुभ कृत्यों का समझना चाहिए । वर्तमान कालोन पाप कृत्यों के फल उन्हें भविष्य * अर्थस्योपार्जने दुखमर्जितस्यापि रक्षणे। नाशे दुख व्यये दुख, धिगर्थ दुखमाजनम् ॥ धन का मार्बन करने में दुख उपार्जन करके रक्षा करने में दुःखं नाश होने में दुख और व्यय करने में भी दुख इस दुखदायी द्रव्य को धिक्कार है। --- । - (१०३ ) * ध्यान-कल्पतरु * - - , घटिफा (घड़ी ) मोह-निद्रा में प्रस्त जीवों को 'क्ट-फट ' शब्द करके मानों यह चेतावनी दे रही है कि-तुम एक बजा दो बजे, आदि क्या कहते हो ? जैसे फटने से वस्तु में कमी होती है इसी प्रकार घटी-घटी (घड़ी-घड़ी ) करके समस्त वस्तुओं का श्रायुष्य फम हो रहा है । सम्पूर्ण आयुष्य क्षय होने पर वस्तु का नाश हो जाता है । अर्थात् पहले क परमाणु विखर फर (अलग-अलग होकर ) रूपान्तर प्राप्त करते हैं । भिन्न स्वभाव के बन जाते हैं। यह अवस्था देखकर जीव विभावपरिणति के वशीभूत होते हैं । कहते हैं-हाय, मेरा अमुक नष्ट हो गया, अमुक मर गया। यह मेरा नहीं है। हाय हाय । यह कैसे हो गया। ऐसे अवसर पर झानी जन चेतावनी देते हैं-हे चेतन । इस जगत् की दशा देख कर चेतो। तुम दूसरों के लिए हाय-हाय करते हो, परन्तु तनिक अपनी ओर तो देखो । अपनी स्थिति का तो विचार फरो। गत काल की सब घटिकाएँ व्यतीत हो गई और उन्होंने तुम्हारी काया तथा सपत्ति का रूपान्तर कर दिया। रम्य को अरम्य और अरम्य को रम्य बना दिया। अब जो घटिकाएँ शेष रह गई हैं, वे जब पूर्ण होंगी तो तुम्हारी शरीर-सम्पत्ति का क्षय हो जायगा। फिर तुम कोटि-कोटि उपाय फरोगे और बीती हुई घाटकाओं को बुलाना चाहोगे तो वे नहीं आने की I+ पश्चात्ताप करोगे तो भी कुछ नहीं होने का । ऐसा जान कर हे हितार्थी । जो आयु शेष रही है उसे व्यर्थ मत गँवा । चिन्तामणि रत्न के समान इन घड़ियों को फर्मोपार्जन में व्यय मत करो। इस क्षण भगुर ससार में प्राप्त हुए क्षणविनश्वर जीवन को पाकर जो आत्म- सुधार करना है सो कर ले और इस अमूल्य अवसर को सार्थक कर ले । अगर तुम शरीर को नित्य सममते हो ओ तो यह भी नित्य नहीं है । क्षण-क्षण में इसके स्वभाव में तथा रुप आदि गुणों में अन्तर पढ़ रहा है। यह प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रमाणों से सिद्ध है । देखिए, जीव जब पहले पहल मनुष्य पयोय रूप में प्राता है, तब माता के रज और पिता के वीर्य का श्राहार करके माह (चावलों के धोवन) के समान शरीर को प्राप्त करता है । फिर काल के स्वभाव के अनुसार फर्फ पड़ते-पढ़ते उन पुद्गलों में कुछ कठिनता आती है तो वे रेट ( नाक के मैल), बेर और श्राम के रूप में परिणत हो जाते है । तत्पश्चात् अगोपांगों के अकुर फूटते हैं और इन्द्रियों के छिद्र पड़ जाते हैं। बाल श्रादि या बाते हैं तब सम्पूण शरीर के अवयवों का निर्माण होता है । जन्म के समय पुण्योदय हुआ तो सीधा पड़ कर बाहर पाता है। फिर अज्ञान और असमर्थ अवस्था में पराधीनता के अनेक कष्ट सहन फरके ज्ञानावस्था में, विद्य भ्यास में तरुण अवस्था प्राप्त होने पर विषयभोग का सामग्रियां प्राप्त करने में, तरुणियों का प्यारा वनने में, तथा कुटुम्ब का भरण-पोषण करने में लगा रहता है। पृद्धावस्था प्राप्त हुई तो काया-नगरी ऊजह होने लगती है। शरीर थर-थर काँपने लगता है। कानों से कम सुनाई देता है, आँखों का तेज घट जाता है, नाक झरने लगती है, दन्तावली गिर जाने से पोपला हो जाता है जीम लड़थड़ाने लगती है, स्वर मद पड़ जाता है, जठरामि काम नहीं करती, पाचनशक्ति मुख घट जाती है इस कारण अनेक व्याधियाँ उठ खड़ी होती हैं, कमर मुक जाती है, टांगे थक जाती हैं और पैर + ना ना वच्चइ रयणी, न सा पडिनियत्तइ । अहम्म कुणमाणस्स, अफ्ला मन्ति राइओ। अर्ध-जो समय बीत रहा है, वह वापिस लौट कर नहीं पाता । अधर्म का प्राचरण करने वाले का समय निपल होता है। रितने जीव गर्म में श्राडे हो जाते है तो क्ट-फ्ट कर निकाले जाते हैं। - ।

प्रतिशाखा धर्मध्यान की चतुर्थ अनुप्रेक्षाएँ । थम्मस्स णं झाणम्स चत्तारि अणुप्पेहायो पएणत्ताओं । तं जहा-(१) अणिचाणुप्पेहा (२) असरणाणुप्पेहा (३) एगत्ताणुप्पेहा (४) संसाराणुप्पेहा । अर्थ-भगवान ने धर्मध्यान को चार अनुप्रेक्षाएँ ( भावनाएँ ) फरमाई हैं । वे इस प्रकार हैं--(१) अनित्यानुप्रेक्षा (२) अशरणानुप्रेक्षा (३) एफत्वानुप्रेक्षा (४) ससारानुप्रेक्षा। धर्मध्यान फरने वाले महात्मा उपयोग-युक्त होकर इन चार भावनाओं का बार-बार चिन्तन फरते हैं। प्रथम पत्र-अनित्यानुप्रेक्षा धर्मास्किाय आदि पट् द्रव्यमय यह लोक द्रव्यदृष्टि से शाश्वत है । छहों द्रव्य अपने-अपने गुणों में तथा स्वरूप में नित्य हैं, परन्तु इनको स्वभाव और विभाव रूप पर्याय (अवस्थाएँ) उत्पन्न होती हैं और विनाश को भी प्राप्त होती रहती हैं। अतएव पर्याय अनित्य हैं। बहुत से ससारी जीवों को वस्तु के स्वरूप का किंचित् भी ज्ञान न होने से और पर्याय का परिवर्तन प्रत्यक्ष दिखलाई देने से, घे पर्यायों पर नित्यानित्य बुद्धि धारण कर लेते हैं। उनके प्रति ममत्व करके राग-द्वेप को प्राप्त होते हैं। इस बुद्धि को शुद्धि करने के लिए यहाँ खुलकर स्पष्टता से विचार करते हैं। नाम धर्मास्तिकाय अधर्मास्तिकाय अाकाशास्तिकाय काल जीवास्तिकाय | पुद गलास्तिकाय १ द्रव्य से एक अनन्त अनन्त अनन्त असख्य प्रदेशी | असख्य प्रदेशी | अनन्त प्रदेशी | असख्य प्रदेशी असख्य प्रदेशी| अनन्त प्रदेशी क्षेत्र से | लोक प्रमाण लोक प्रमाण लोकालोक प्रमाण अढाई द्वीप प्र० लोक प्र० लोक प्रमाण काल से | अनादि अनन्त अनादि अनन्त अनादि अनन्त , अनादि अनन्त अनादि अनन्त थनादि अनन्त माव से श्ररूपी श्ररूपी श्ररूपी नरूपी ग्ररूपी रूपी सक्रिय, पूरण, - गुण से अचेतन, अक्रिय, अचेतन, अक्रिय, अचेतन, श्रक्रिय, अचेतन, अश्यि, चेतना ज्ञान, स्थिति सहायक अवगाहनादावा वर्तनादि सहायक दर्शन आदि गति सहायक गलन (१०३ ) * ध्यान-कल्पतरु * घटिका (घड़ी) मोह-निद्रा में ग्रात जीवों को 'क्ट-कट ' शब्द करके मानो यह चेतावनी दे रही है कि तुम एक बजा दो बजे, श्रादि क्या कहते हो ? जैसे क्टने से वस्तु में कमी होती है इसी प्रकार घटी-घटी (घड़ी-घड़ी) करके समस्त वस्तुओं का श्रायुष्य कम हो रहा है । सम्पूर्ण आयुष्य क्षय होने पर वस्तु का नाश हो जाता है । अर्थात् पहले क परमाणु विस्वर कर (अलग-अलग होकर ) रूपान्तर प्राप्त फरते हैं । भिन्न स्वभाव के बन जाते हैं । यह अवस्था देखकर जीव विभावपरिणति के वशीभूत होते हैं । कहते हैं-हाय, मेरा अमुक नष्ट हो गया, अमुक मर गया। यह मेरा नहीं है। हाय हाय | यह कैसे हो गया। ऐसे अवसर पर हानी जन चेतावनी देते हैं-हे चेतन | इस जगत् की दशा देख कर चेतो। तुम दूसरों के लिए हाय-हाय करते हो, परन्तु तनिक अपनी ओर तो देखो। अपनी स्थिति का तो विचार करो। गत काल की सब घटिकाएं व्यतीत हो गई और उन्होंने तुम्हारी काया तथा सपत्ति का रूपान्तर कर दिया। रम्य को अरम्य और अरम्य को रम्य बना दिया । अब जो घटिकाएँ शेष रह गई हैं, वे जब पूर्ण होंगो तो तुम्हारी शरीर-सम्पत्ति का क्षय हो जायगा। फिर तुम कोटि-कोटि उपाय फरोगे और बीती हुई घोटकाओं को बुलाना चाहोगे तो वे नहीं आने की I + पश्चात्ताप फरोगे तो भी कुछ नहीं होने का । ऐसा जान कर हे हितार्थी । जो आयु शेष रही है उसे व्यर्थ मत गँवा । चिन्तामणि रत्न के समान इन घड़ियों को फर्मोपार्जन में व्यय मत करो। इस क्षण भगुर ससार में प्राप्त हुए क्षणविनश्वर जीवन को पाकर जो श्रात्म- सुधार करना है सो कर ले और इस अमूल्य अवसर को सार्थक कर ले । अगर तुम शरीर को नित्य सममते हो श्रो तो यह भी नित्य नहीं है । क्षण-क्षण में इसके स्वभाव में तथा रुप आदि गुणों में अन्तर पड़ रहा है। यह प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रमाणों से सिद्ध है। देखिए, जीव जब पहले पहल मनुष्य पयोय रूप में आता है, तब माता के रज और पिता के वीर्य का आहार करके मांड (चावलों के धोषन) के समान शरीर को प्राप्त करता है। फिर काल के स्वभाव के अनुसार फर्क पड़ते-पढ़ते उन पुद्गलों में कुछ कठिनता पाती है तो वे रेट (नाक के मैल), बेर और श्राम के रूप में परिणत हो जाते है । तत्पश्चात् अगोपांगों के अकुर फूटते हैं और इन्द्रियों के छिद्र पड़ जाते हैं। बाल आदि आ जाते हैं तब सम्पूर्ण शरीर के अवयवों का निर्माण होता है। जन्म के समय पुण्योदय हुआ तो सीधा पढ़ कर वाहर पाता है। फिर अज्ञान और असमर्थ अवस्था में पराधीनता के अनेक कष्ट सहन फरके ज्ञानावस्था में, विद्य भ्यास में तरण अवस्था प्राप्त होने पर विषयभोग का सामग्रियां प्राप्त करने में, तरुणियों का प्यारा वनने में, तथा कुटुम्ब का भरण-पोषण करने में लगा रहता है। वृद्धावस्था प्राप्त हुई तो काया-नगरी ऊजह होने लगती है। शरीर थर-थर काँपने लगता है । कानों से कम सुनाई देता है, आँखों का तेज घट जाता है, नाफ झरने लगती है, दन्तावली गिर जाने से मुख पोपलो हो जाता है जीम लदथड़ाने लगती है, स्वर मद पड़ जाता है, जठराग्नि काम नहीं करती, पाचनशक्ति घट जाती है इस कारण अनेक व्याधियाँ उठ खड़ी होती हैं, कमर मुक जाती है, टांगे थक जाती हैं और पैर + जा जा वच्चइ रयणी, न सा पडिनियत्तइ । अहम्म कुणमाणस्स, अफ्ला मन्ति राइओ। अर्ध-तो समय बीत रहा है, वह वापिस लौट कर नहीं पाता । अधर्म का आचरण करने वाले का समय निपल होता है। फितनेक वीव गर्म में श्राठे हो नाते हैं तो क्ट-क्ट कर निकाले जाते हैं ।

( १०४ ) * ध्यान-कल्पतरु * - फॉपने लगते हैं। इस प्रकार शरीर की शक्ति होन और निकम्मी हो जाने पर जिनको प्यारे लगते थे, उन्दी को खारे ( फटुक) लगने लगे। * और अन्त में ? एक दिन वह पाया कि सारी श्रायु क्षीण हो गई तो सब स्वजनों ने मिल कर उमी शरीर को चित्ता में जला फर भस्म कर दिया। मारा खेल खत्म हो गया। यही इस शरीर की कहानी है । स्पष्ट है कि यह शरीर क्षण-क्षण में अपनी दशाएँ पलटता रहता है निरन्तर नये-नये रूप धारण करता रहता है। वाल्यावस्था को तरुणावस्या निगल जाती है और तरुणावस्या को बुढापा निगल जाता है। अन्त में मौत श्राफर वृद्धावस्था को भी डकार जाती है । इस तरह मच्छ गलागल लग रही है। हाँ यह न समझिए फि वाल्यावस्था से तमणावस्था और तरुणावस्था मे वृद्धावस्था अवश्य आएगी। यह भरोसा नहीं है। काल को 'समदर्शी' कहते हैं । उमे वालक, युवा या वृद्ध का कुछ भी विचार नहीं है । सय उसके लिए समान है । यह किसी को भी और कभी भी निगल सकता है। चन्द्र और सूर्य काल की चक्की को चला रहे हैं । जैसे चक्की के दो पाट होते हैं, वैसे ही काल- पक्की के भी दो पाट हैं । इसका भूतकाल रूप एक पाट तो स्थिर है और भविष्यकाल रूप पट चलायमान रहता है । जो आयु रूपी कील से सट कर स्थित है, वे बचे हे । ख टा छूटा कि आटा वना। अपने देखते- देखते बहुतों का आटा बन गया, जो बाकी बचे हैं उनका भी एक दिन होने वाला है। देह की यह दशा देख करके भी जो इमे नित्य जान कर मोह में भासक्त हो रहे हैं, उनकी बुद्धि पर आश्चर्य होता है। इस शरीर का नाम 'औदारिका है। इसके दो अर्थ किये जाते हैं-(१) उदार अर्थात् प्रधान और (२) उदार-उधार अर्थात माँग कर लिया हुआ । जैसे करियावर करने के लिए पचायती जगह पचों से माँग कर उदार-उधार ली जाती है। उसे सिंगार कर. सजा कर जो कृत्य करना होता है, वह कर लिया जाता है। फिर उस जगह को छोड़ने में पश्चात्ताप नहीं होता है । और यदि करियावर करने से पहले, अवधि पूरी होने पर, पचों के सिपाही मकान खाली करवा लेते हैं तो रोना पडता है कि हाय, कुछ भी इसका उप- योग न कर पाया। इसी प्रकार यह शरीर ( पचभूतवादी के कथनानुसार) पृथिवी श्रादि पंचभूतों का बना है । यह शरीर रूप वाडा क्रियावर (अच्छी क्रिया-धर्मकरनी) करने को मिला है। इसे पाकर जो धर्म क्रिया कर लेते हैं, उन्हें मरते समय पश्चात्ताप नहीं होता है । जिन्होंने धर्म क्रिया नहीं की है, उनके शरीर को जब काल छुडाएगा तो उन्हें पश्चात्ताप के साथ छोडना पड़ेगा। ऐसा जानकर इस क्षणभङ्गुर शरीर से जितना धर्माचरण हो सके, शीघ्र कर लीजिए, जिसमे कि इसे छोडते समय पश्चात्ताप न करना पड़े। * छप्पय-मनुष्य तो अवतार वर्ष चालीमे मीठो, मड़वो होय पचास साठे शोध पईठो। सत्तर सगो न कोय श्रमीए नाहिं सगाई। नब्वे जगो होय हसे सूत्र लोग लुगाई ।। वर्ष श्राया जब सैकड़ा तन हुआ सब खोकरा, पतिमठा पति को कहे अब मरे न छटे अकरा ।। -- - * ध्यान-कल्पतरु * (१०५ ) - बैठता है, जैसे शरीर की अनित्यता है उसी प्रकार कुटुम्ब को भी समझिए । क्योंकि माता पिता श्रादि स्वजन भी औदारिक शरीरी ही है। अपने से पहले पाए माता पिता, मामा, काका, आदि, अपने साथ श्राये माई, वहिन स्त्री, मित्र आदि और अपने बाद में प्राये पुत्र पौत्र श्रादि, तथा और भी जगत के जीव देखते देखते आयु समाप्त करके चले गये । कुछ चले जा रहे हैं और जो रहे हैं वे भी सब एक दिन चले जाएंगे। जिसने जन्म लिया है वह अवश्य मरेगा । अतएव कुटुम्ब-परिवार को भी अनित्य ही सममिए । जैसे कुटुम्ब अनित्य है वैसे धन भी अनित्य है । धन को 'दौलत' भी कहते हैं । अर्थात इसको दो लत (आदतें) हैं-श्राना और जाना । तथा अपने पोषक स्वामो-को क्षण भर में हँसाना और क्षण भर मे रुलाना । दौलत किसी के पास स्थिर नहीं रहती है । कहावत है-'जर जोरू और जमोन, किसी की न हुई यह तीन ।' जर्मनी की तिजोरियों में, खूब गहरे गडहे में और नगी तलवारों के पहरे में रक्खी जाय तो भो वह नहीं रहने की । पुण्य क्षोण होने पर हाथ से रक्खा हुश्रा धन भी रूपान्तर पाकर ककर, कोयला, पानी, साँप या बिच्छू जैसा दीखने लगता है । लक्ष्मा ऐसो अनित्य है । घर भी इसी प्रकार अनित्य है । लकडी और मिट्टी के सयोग से बने घर को मनुष्य नित्य समझ परन्तु यह जीर्ण होकर बिखर जाएगा। कितने हो घर और प्राम आदि नवीन बसते हैं और उजड जाते हैं, विनष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार इनकी अनित्यता प्रत्यक्ष दोसती है। इसी भांति उपभोग ( एक बार भोगने योग्य अन्न और पुष्प आदि) और परिभोग (बार-बार भोगने योग्य वन, श्राभूषण आदि ) भी भनित्य हैं । क्षणिक हैं। प्रत्येक वस्तु को उत्पत्ति के साथ ही साथ उसकी पर्यायों में फर्क पहना प्रारम्भ हो जाता है। विनाश-काल तक फर्क पढते-पडते उसका स्वरूप ही और का और हो जाता है। यह अनित्यता प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है। प्रत्यक्ष देखते हैं कि जब जीव आता है तब बाह्य रूप में कुछ भी साथ लेकर नहीं आता है। उत्पन्न होने के बाद ही शरीर सम्पत्ति श्रादि का सयोग मिलता है । फिर वह भी पचसमवाय के अनुसार होन होते होते सारा का सारा यही प्रलय को प्राप्त हो जाता है या रह जाता है। और जीव जैसा पाया वैसा ही अकेला आगे चला जाता है । यह तमाशा एक ही बार में पूरा नहीं हो जाता, अनादिकाल से यही रीति चली आ रही है और चलती जाएगी। मिलना और बिछुडना ही पुद्गलों का धर्म है और यह धर्म सदा बना रहेगा। अच्छे का बुरा और बुरे का अच्छा नय का पुराना और पुराने का नया, प्रत्यक्ष रूप से या परोक्ष रूप से होना पुद्गलों को जो स्वभाव है, वह तो सदैव होता ही रहता है । इस तमाशे को देखते हुए भी पुद्गलों को नित्य मान कर मनुष्य उन पर लुब्ध हो रहे हैं । इसस अधिक विस्मय को बात और क्या हो सकती है। मूद प्राणी की आयु ज्यों-ज्यों हीन स्थिति को प्राप्त होती है त्यों त्यों वह ममत्व और पाप को वृद्धि करता जाता है और उनका फल भुगरने के लिए आप भी रूपान्तर पाकर रौरव नरक में गिरता है। वहाँ असा यातनाओं का पात्र बन कर रोता है। अग्नि स्नान से शोतलता चाहना और विष भक्षण करके अमरत्व की आशा करना जैसी मूढता है, वैसी हो पुठ्ठालों के संयोग से सुख की अभिलाषा करना भी है। फिर भी प्रात्मद्रोहाजन ऐसी ही इच्छा फरते हैं। ऐसे अज्ञानजनों को समझाएँ तो कैस समझाएँ ? * पाल, स्वभाव, मवितव्य, कर्म और पुरुषार्थ इन पाच के योग से सब कार्य होते हैं। - । - (१०६) * ध्यान-कल्पतरु * - अनित्यता को समझने के लिए निम्नलिखित घातों पर ध्यान दीजिए'- (१) प्रतिदिन सन्ध्या के समय वृक्षों की शाखाओं पर पक्षियों को समूह श्रा जमता है । शाखा पर एफ बैठा, उस पर दूसरे को नहीं बैठने देना चाहता, क्योंकि उसे वह अपनी मान रहा वही पक्षी सूर्य का प्रकाश होने पर नाना दिशाओं में उड़ जाते हैं। उस वृक्ष का एक पत्ता भी उनके नही जागा । इसी प्रकार शरीर रूपी तरु पर प्राणी रूपी पक्षी चार गतियों में से आकर बैठे हैं । काल सूर्योदय के होते ही सब प्रयाण कर जाएँगे । देह यही रह जाएगा। (२) वाजीगर की डुगडुगी का शब्द सुनते ही चहुँ दिशाओं से मनुष्यो के झुन्ड के झुन्ड : पढ़ते हैं और ज्यों ही वाजी समेटी कि सब इधर-उधर लौट जाते हैं और अकेला वाजीगर अपने दर भएड को लेकर अपने रास्ते लगता है। इसी प्रकार नीव रूपो वाजीगर की पुण्य-मामग्री देखने के । कुटुम्बी आदि मिले हैं। पुण्य समाप्त हो जाने पर सव अपनी-अपनी राह लगेंगे और जीव अकेला अ रास्ते लगेगा। ( ३ ) मेला-यात्रा आदि के अवसर पर चहुँ ओर से मनुष्यों का समागम होता है । किन्तु ही काल के पश्चात वहीं सुनसान जगल रह जाता है। (४) विवाह आदि के अवसर पर स्वजनों का समूह एकत्र होता है, और उत्सव समाप्त होते सब चल देते हैं, केवल घर-धनी ही रह जाता है। (५) सन्ध्या की वेला बहुधा आकाश में सन्ध्याराग (विचित्र-रग) का दिखाव होता है, पर क्षण भर में ही वह विलीन हो जाता है और घोर तिमिर का प्रसार हो जाता है। इस प्रकार अनित्यता का प्रत्यक्ष भास कराने वाले अनेक दृश्य सदैव दिखाई देते रहते हैं, फिर र मोह-ममता की धुन्ध में भन्ध बने जीव उन पर विचार नहीं करते । एक जगह राज्याभिषेक-महोत्सव की धूमधाम और विवाह समारोह का उत्साह दृष्टिगोचर होता है किन्तु उसी स्थल पर, उसी ममय पुद्गलों का रूपान्तर होने पर मृत्यु श्रादि अनिष्ट प्रसग उपस्थित हो जात है तो हाहाकार मच जाता है । श्मशान यात्रा की तैयारी होने लगती है । क्या यह प्रत्यक्ष नहीं देखा जाता इस जगत में अनित्यता को समझने के ऐसे-ऐसे क्या थोड़े साधन हैं ? अधिक क्या कहा जाय ? जिन परमाणुओं और जिन पदार्थों से तेरे शरीर की रचना हुई है और उसे पोषण मिल रहा है, वही परमाणु और पदार्थ अतीतकाल में तेरे शत्रु बने और तेरे धारण किये अनन्त शरीरों का उन्होंने विनाश किया था। फिर भी आज तू उनसे अत्यन्त प्रीति कर रहा है । समय आने पर अब भी वही तेरे शरीर के घातक बन जाएंगे । सारांश यह है कि पुद्गलों के सयोग से ही सम्बन्ध जुड़ता और सयोग से ही मिटता है। श्रायुष्य को क्षण-क्षण में श्री भगवतीसूत्र में प्राचीचिमरण कहा है, जो संसार के प्राणी मात्र के क्षीण करता है। जैसे अजलि में लिया पानी बूंद-बूँद करके कम होता जाता है, उसी प्रकार ससार के समस्त जीवों की प्रायु क्षण-क्षण में घटती जा रही है। स्वप्न का साम्राज्य मेघों का समूह, बिजली की चमक, इन्द्र धनुष और माया का ऐश्वर्य प्रादि . अनेक पदार्थ क्षणिकता के सूचक हैं। हे भव्य । इनको आँखों से देख । चित्त में जरा सोच-विचार कर * ध्यान-कल्पतरु * (१०७) -- . समझ । यह पदार्थ मानो सद्बोधदाता गुरु हैं और समझा रहे हैं कि-हे चेतन ! अब तो चेत, चेत । मोह के अन्धकार को दूर कर, अज्ञान का पर्दा हटा और अन्तर की ज्योति से देख । फपिल केवली ने फर्माया है- अधुवे असासयम्मि संसारम्मि दुक्खपउराए । अर्थात यह ससार अध्रुव ( अनिश्चल ) अशाश्वत और दुखों से परिपूर्ण है । इसमें रह कर जो ममत्व-मुर्छा करते हैं, वही दुखी होते हैं । जब जीव के देखते-देखते पदार्थों का वियोग या नाश होता है, तब जीव को ही पश्चात्ताप होता है कि हाय, मेरी प्राणप्रिय वस्तु कहीं चलो गई । और नव पदार्थों को छोड़ कर जीव जाता है तब भी उसी को रोना पड़ता है कि-हाय । इस ऐश्वर्य को छोड़ कर मैं जा रहा हूँ । इस प्रकार दोनों दशाओं में जीव को ही सन्ताप होता है । पदार्थ कभी नहीं रोते न सन्ताप का अनुभव करते है। वे नहीं सोचते कि-'हाय । मेरा मालिक कहाँ गया ?' उनके मालिक बनने वाले तो बहुतेरे बैठे हैं। ऐसा समझ कर हे सुखार्थी धर्मार्थी जावो | इस अनित्यानुप्रेक्षा का एकाग्रता के साथ विचार करके अनित्य और अशाश्वत वस्तुओं के प्रति ममता का त्याग करो। निजात्मगुण ज्ञानादि रत्नत्रय में, जो नित्य, शाश्वत, अक्षय और अनन्त है, रमण करो और सुखी बनो। * द्वितीय पत्र-अशरणानुप्रेक्षा स्याद्वादमत में सब तरफ अनेकान्त दृष्टि से देखा जाता है । निश्चयदृष्टि से देखा जाय तो कोई किसी को शरणदाता नहीं, कोई किसी को श्राभय नहीं दे सकता । सब द्रव्य अपनी-अपनी शक्ति के बल पर हो टिके हुए है । अतएव कोई किसी का कर्ता-हर्ता नहीं है। व्यवहारदृष्टि से जीव दुःख या कष्ट उत्पन्न होने पर दूसरों को निमित्त मान कर उनकी शरण में जाने की अभिलाषा करते हैं । मेरी वस्तु को हानि न हो जाय, मुझ पर किसी प्रकार का कष्ट श्राफर न पड़ नाय, अतएव मैं किसी शरणदाता, शरणागत प्रतिपाल की शरण ग्रहण करूँ, इस प्रकार का विचार करके नोव दूसरों की शरण में जाता है। परन्तु वह यह नहीं सोचता कि मैं जिस दुख से बचने के लिए जिसकी शरण लेने जा रहा हूँ, वह स्वय उस दु स्त्र से बचा है या नहीं ? स्वय बचा होगा तो दूसरे को बचाएगा । जो अपनी ही रक्षा नहीं कर सकता, वह दूसरों की क्या खाक रक्षा कर सकेगा ? फिर व्यर्थ ही उसकी शरण में जाने से क्या लाभ है? इस तथ्य को सामने रखकर विचार कीजिए कि श्राप जिन जिनकी शरण ग्रहण करते हैं, वे वास्तव में शरण देने योग्य हैं या नहीं ? उन सब पर अलग-अलग विचार कीजिए । हे जीव । तू इस शरीर के द्वारा अपनी रक्षा चाहता है, परन्तु देख । यह शरीर पुद्गलों का पिएड़ है। क्षण-क्षण में नष्ट हो रहा है। आधि, व्याधि और उपाधि से ग्रस्त है। इसमें पुन पुन रोगों का उद्भव होता है । यह जग से पीड़ित है और मृत्यु का भक्ष्य है । यह स्वय अपनी रक्षा नहीं कर सकता तो तेरी क्या रक्षा करेगा ? अतएव शरीर को शरण मानना न्यर्थ है। - - * बहु पुण्यकेरा पु जथी शुम देह मानवनो मल्यो, तोए अरे भवचकनो पाटो नही एके टल्यो। नुस्ख प्राप्त करतां सुख टले हे नेक ए लक्ष लह्यो,, क्षण-क्षण निरन्तर माव मरणे का अहो राची रह्यो। -कवि रायचन्द्रजी.

(१०८) * ध्यान-कल्पतरु * - अगर तू अपने परिवार को और मित्रों को शरणदाता समझना हो तो भी तेरी बुद्धि से विचार कर | यदि तू द्रव्योपार्जन मे कुशल हुश्रा और सब की इच्छा के अनुसार चला तो माता- भून पिता कहेंगे-हमारा पुत्र रत्न है। भाई कहेंगे-हमारी बाँह है । वहिन कहेगो-हमारा वीरा होरा है स्त्री कहेगी-मेरे भरतार करतार ( परमेश्वर ) हैं। इस प्रकार सारा परिवार प्रशसा करेगा और तेरे पादर फा वशवती रहेगा। सब 'जी हाँ, नी हाँ करेंगे । इसके विपरीत तू मुर्ख और वेकमाऊ हुश्रा तो वही माता-पिता कहेंगे-पेट में पत्थर पड़ा हो तो नींव ( मकान के पाये ) में लगाने के काम प्राता। यह कपूत तो इस काम का भी नहीं है ! मा कहेगा-मेरा वैरी है। बहिन कहेगी-भाई लाई (गरीब ) है । सी कहेगो-मोल्या ( मोल लिया हुआ गुलाम ) है । इस प्रकार सब स्वजनों से अपमान और दु.ख को प्राप्ति होती है स्मरण करो, स्वार्थ-लुब्ध माता ने ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती को मार डालने का उपाय किया था। कनकर राजा जन्मते ही पुत्रों को मार देता था । भरत-बाहुबलो दोनों भाई आपस में लडे । कोणिक ने अपने पित श्रेणिक राजा को पीजरे में कैद कर दिया । दुर्योधन ने मारे कुटुम्ब का सहार किया और सूर्यकान्ता रानी अपने प्रियतम पति राजा प्रदेशी के प्राण हरण कर लिए। प्राचीन काल के ऐसे-ऐसे अनेक उदाहरण हैं। वर्तमान में भी ऐसी अनेक घटनाएं घट रही हैं क्या ऐसे स्वार्थी जन कभी शरणभूत हो सकते हैं ? कदापि नहीं । शरीर, धन और परिवार आदि, जिन्हें तू प्राणों से भी अधिक प्रिय समझ रहा है और जिनः लिए चिन्तामणि के सदश मनुष्य जन्म गँवा रहा है, वह भी तेरे लिए शरणभूत नहीं होते तो अन्य की वा ही क्या है। तात्पर्य यह है कि जो स्वय विकराल काल रूपी वेताल के पाश में फंसे हुए हैं, वे दूसरे को डर पाश से नहीं बचा सकते । कोल बली वड़ा जबर्दस्त है । सम्राट् चक्रवर्ती राजा, सुरेन्द्र शक्रेन्द्र आदि दव वडे-बडे वलिष्ट दैत्यों के समान शस्त्रधारी क्षत्रिय, वेदपाठी ब्राह्मण, श्रीमन्त, साहूकार, जमींदार, जागीरदार सहस्र विद्याओं के साधक विद्याधर, सिंहादिक वनचर, सर्प आदि उरचर, वन, आभूपण श्रादि-आदि को भी सचेतन या अचेतन क्यों न हो, समी के पीछे काल-बेताल लगा है। इस मसार म काज से आंधक बल वान् और कोई नही है। कोई घर, भूगृह, गुफा, पहाड श्रादि स्थान इस ससार म नहीं है जो काल से वच सके और जहाँ छिप कर मनुष्य काल से बच जाय । अमृत और अमरवेल नाम धारण करने वाला प्रोप धियाँ और वृटियाँ भो काल रोग को मिटाने म समर्थ नहीं है, तो और्ग का क्या कहना है ? रोहिणी और प्रज्ञप्ति आदि विद्याएँ, घटाकणे आदि मत्र, विजय और प्रताप श्रादि यत्र तथा रस- सिद्धि धादि तत्र भी काल से बचाने में समर्थ नहीं हैं । शतघ्नी आदि कोई शस्त्र भी तो ऐसा नहीं है, जिमसे काल यो डराया जा सके । संसार के भयानक से भयानक शस्त्र तो काल के ही सहायक हैं। उनसे काल कैसे डरेगा ? काल की शक्ति अनूठी है । वह पानी में गलता नहीं, अग्नि में जलता नहीं, हवा में उडता नहीं और पत्रमय दीवारों से भी रुकता नहीं । यम जैसे पराक्रमी से भी डरता नहीं है-दवता नहीं है। काल अत्यन्त विचारहीन है। वह किसी को नहीं गिनता । बालक, तरुण, वृद्ध, नवविवाहित, धन- वान्, निर्धन, गरीव, सुखी दुस्खी, अनेकों को पालने वाले, अनेकों को मारने वाले प्रादि-अादि किसी भी * ध्यान-कल्पतरु * (१०६ ) मनुष्य को परवाह नहीं करता। काल नहीं देखता कि श्रीज दीपावली या होली का त्यौहार है। नहीं सोचता कि इसके अनेकों काम अधूरे पड़े हैं । नहीं विचार करता कि यह उच्च कुल का है या नीच कुल का, अभी रात्रि है या दिन है। नहीं देखता कि यह भोगों में आसक्त है । नहीं खयाल करता कि यह मनुष्य है या पशु है, नारक है। अथवा देवता है । उसे किसी पर दया नही, किसी पर करुणा नही । किसी के साथ रियायत करना वह जानता ही नहीं। कोई कैसा भी क्यों न हो, काल के झपट्टे में पाना चाहिए । झपट्टे में आया कि तत्काल गटक लिया। अनन्त प्राणियों को और अनन्त वस्तुओं को अनन्त-अनन्त बार भक्षण कर चुका है, फिर भी काल का पेट नहीं भग। आग से भी अधिक अतृप्त रहने वाला, महाविकराल भयानक राक्षस के समान है। विश्व में जो महाप्रतापी और प्रचण्ड शक्तिशाली समझे जाते हैं, वे बड़े-बड़े सुरेन्द्र और नरेन्द्र भी काल की परछाई मात्र से थर-थर काँपने लगते हैं, घबरा जाते हैं, भान भूल जाते हैं और हाय-हाय करने लगते हैं। यह काल उनका भी तो मुलाहिजा नहीं करता । यह तो सिर्फ अपना मतलब साधने की ओर ही दृष्टि रखता है। ऐसे निर्दय निर्लज्ज काल-वेताल के वशीभूत हुए जीव, ऐसे ही स्वय अशरण और निराधार दूसरे जीवों की शरण चाहते हैं और उनको शरण लेकर सुखी बनना चाहते हैं । उनको चाह वैसी ही है जैसी मृगतृष्णा के जल से प्यास बुझाने की चाह । ऐसे लोग वन्ध्या के पुत्र को खिलाना चाहते हैं और आकाश-कुसुमों से शृङ्गार करना चाहते हैं । अगर यह सब असंभव है तो ससार में किसी वस्तु की शरण पाना भी असभव है । जरा काल के स्वभाव का विचार तो करो। यह प्रत्येक वस्तु का एक बार श्राहार करके तुरन्त उसका निहार कर देता है और तुरन्त ही उसके भक्षण का लोलुपी बन कर उसके पीछे पड़ जाता है । दूसरी बार जब तक उसका भक्षण न कर ले, तब तक क्षण-क्षण में उसका क्षय करता रहता है और अपसर पाकर अनजान में ही उसे खा लाता है। फिर भी यही का यही हाल । इस प्रकार श्राहार-निहार करते-करते अनन्तानन्त समय व्यतीत हो गो गया। फिर भी यह तृप्त नहीं हुआ है और न होगा ही। अपने म्यजन की मृत्यु देख कर मृढ मानव चिन्ता और शोक करता है परन्तु यह नहीं सोचता कि मैं स्वय काल की दाढ़ों में दबा हूँ, जग जोर लगने की देर है । फिर यही हाल मेरा भी होगा जो इसका हुश्रा एक मनुष्य वन मे सो रटा । अचानक हो गत्रि के समय दावानल भड़क उठा । वह मनुष्य चारों तरफ से दावानल स घिर गया । उष्णता प्रतीत हुई तो उसकी नींद खुल गइ । वह तत्काल एक घृक्ष पर चढ़ गया। चारों ओर जगली जानवरों को जलते देख कर हँसने लगा कि यह जनावह मरा ! उस को यह पता नहीं कि यह वृक्ष जला कि मेरी भी यहा दशा होगी। श्राशय यह है कि जैसे जगत् के अन्य जीव मृत्यु के शिकार हो रहे हैं, उसी प्रकार तुमे मी एक दिन मरना होगा। इसमें सन्देह नहीं है। - वाप-दादे गये, वे भी इस धन-सम्पत्ति और कुटुम्ब-परिवार के द्वारा अपनी रक्षा नहीं कर सके तो तुम कौन-से समथ वली हो? तुम भी इनके द्वारा नहीं बच सकोगे। ॐ बन्नात्य मन्त्रणा मस्त्र, सम्स वस्थि पलायण । बो बाणे न मरिस्सामि, सो हु से सुए मिया ॥ -उत्तराध्ययन, अयात्-जिसकी मौत के साथ मित्रता हो, वो मौत आने पर भाग कर बच सक्ता हो, बो समझना हो कि में पभी नहा मरूँगा, वही सोचे कि मैं श्राब नहीं, फल कर ल गा!

( ११० ) * ध्यान-कल्पतरु * N निश्चय समझिए, अन्त काल में सब वजन मुँह ताकते ही बडे रहेंगे। सारी सम्पदा से अपने स्थान पर पड़ी रह जायगी और एक दिन सब की वही दशा होगी, जो चित्त मुनि ने कही है:- जहेह सीहो व मियं गहाय, मच्चू नरं नेइ हु अन्त काले । न तस्स माया व पिया व भाया, कालम्मि तम्मंसहारा भवन्ति ।। --उत्तराध्ययन अ. १३, २२ अर्थात -जैसे वन में फिरने वाले मृगयूथ (हिरनों के झुन्ड) में से सिंह एक मृग को पकड़ कर ले जाता है, तब सब हिरन थर-थर काँपते हैं और अपनी-अपनी जान बचाकर भागते हैं, इसी प्रकार परिवार के समूह में ने मृत्यु रूपी सिंह जच एक मनुष्य को ले जाता है, तब सब के सब मुंह ताकते ही बडे रह जाते हैं। कोई वचा नहीं सकता। मृत्यु में या मरने वाले के पुण्य पाप में कोई हिस्मा नहीं बटा सकता। यागे तुम्हारी सहायता करने के लिए सम्पत्ति में से कुछ भी साथ नहीं जाएगा। कहा भी है:- धनञ्च भूमिः पशवश्च गोष्टे, कान्ता गृहद्वारि जनाः श्मशानम् । देहश्चितायां परलोकमार्ग, कर्मानुगो गच्छति जीव एकः ॥ अर्थात-धन, जमीन, पशु, घर सम्पत्ति श्रादि सब अपने-अपने स्थान पर रह जाएंगे । प्यारी पत्नी घर के दरवाने तक आएगी। कुटुम्बीजन देह को श्मशान तक पहुँचाने श्राएँगे। देह चिता में भस्म हो जायगी। अकेले जीव को ही अपने किये शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार परलोक के मार्ग में जाना पडेगा। ससार की एक भी वस्तु साथ नहीं जाने वाली है। ऐसा निश्चय फरके हे सुखार्थी जनो | इस दुर्लभ मनुष्य जन्म श्रादि सामग्री को, अन्य के शरण के लालच में पड़ कर मत गॅवायो । निश्चय समझो कि जगत् का कोई भी पदार्थ मेरा रक्षक नहीं है, सब भक्षर हैं। ऐसा जान कर उन पर से ममता त्याग दो और तरणतारण, दुखनिवारण, निराधार के आधार गरीबनिवाज महाकृपालु, करुणासागर, अनन्त दुःखों से उद्धारकर्ता, विकराल काल-व्याल के दुःख हता, अनन्त अक्षय अजर अमर अविनाशी अतुल सुखस्वरूप मोक्ष स्थान के दाता श्री अर्हन्त सिद्ध आचार्य उपाध्याय और साधु-यह पच परमेष्ठी ही व्यवहार में शरणभूत हैं । निश्चय में अपनी आत्मा ज्ञानादि रत्नत्रय रूप गुण ही है जिनका आश्रय-शरण ग्रहण करने से आत्मा अजर-अमर और परमानन्द एव परमसुखमय बनता है। 8 सवेया-कचन के श्रासन सुखासन क्चन के, पलग सत्र इनामत घरे रहे । हाथी हथलासन में घोडे घुड़सालन में, कपड़े जामदानी में घड़ी बधे ही रहे। वेटा और वेटी अर दौलत का पार नाही, जेवरो के डिब्बे पै तो ताले ही पड़े रहे। देह छाड़ि डिगे जब हो चले दिगम्बर, कुल के कुटुम्बी सब रोते ही खडे रहे। के * ध्यान-कल्पतरु * (१११ ) , - तृतीय पत्र-एकत्वानुप्रेक्षा जैसे सुवर्ण और मिट्टी का अनादि सम्बन्ध होने के कारण दोनों एक ही रूप में दिखाई देते हैं। अर्थात् सुवर्ण भी लाल मिट्टी सरीखा दीखता है, परन्तु हैं तो दोनों अलग-अलग ही । अगर दोनों एक ही हों तो मिट्टी में से सुवर्ण अलग निकले नहीं । वास्तव में स्वर्ण और मिट्टी पृथक्-पृथक् हैं, सिर्फ अनादि- सम्बन्ध के कारण एक मालूम पड़ते हैं। स्वर्णकार मिट्टी से स्वर्ण को अलग करने के लिए-उसे अपने शुद्ध रूप में लाने के लिए मुस, अग्नि, सुहागा, क्षार और द्रव्य क्षेत्र काल तथा भाव को अनुकूलता का उपयोग फरता है। तब सोना मिट्टी से अलग होकर निज रूप को प्राप्त करता है। इसी प्रकार जीव और कर्म का सम्बन्ध अनादि काल का है। इस सम्बन्ध को तोड़ने के लिए चार वस्तुओं की आवश्यकता होती है। (१) ज्ञान-जैसे स्वर्णकार मिट्टी से स्वर्ण को निकालने की विधि का ज्ञाता होता है और विधि- पूर्वक प्रयत्न करके कार्य करता है, उसी प्रकार जीव ज्ञान के द्वारा फर्म से अलग होने की विधि का ज्ञातो होता है। ज्ञान से उसमें कर्तव्यपरायगण होने की शक्ति पाती है। (२) दर्शन-सम्यग्दर्शन मूल के समान है, क्योंकि श्रद्धा ही सद्गुणों के रहने का स्थान है। (३) चारित्र-सयम रूपी क्षार भी आवश्यक है । चारित्र ही कर्म-मैल को फाड़ने वाला है। (४) तप-तपस्या रूपी अग्नि भी अनिवार्य है, क्योंकि तप रूपी अमि ही कर्म-मैल को जलाने में - समर्थ है। पुष्प, इन चारों पदार्थों का योग मिलने पर और औदारिक शरीर रूप द्रव्य, श्रार्य क्षेत्र, चौथा धारा आदि काल और भव्यता रूप माष का सयोग मिलने पर यथाविधि साधना करने से अनादिकालीन कर्म-मैल को नष्ट करके श्रात्मा अपने निज-स्वरूप को प्राप्त कर सकता है। दूध में घी मिला होता है । उसे अलग करने के लिए खटाई, रवाई, भाजन और मथने वाले का सयोग चाहिए | यह सयोग मिलने पर छाछ रूप मैल को छोड़ कर घृत अपने रूप को प्राप्त होता है। इसी प्रकार इन और लोह और चुम्बक प्रादि दृष्टान्तों के द्वारा जीव और कर्म का अनादि सवध समझना चाहिए । जैसे इनके अनादि सबध को छुड़ाने के लिए और निज रूप में लाने के लिए विविध उपाय किये जाते हैं, उसी प्रकार आत्मा को भी अनादि फर्म-सबध से पृथक् करने के लिए उपयुक्त ज्ञान आदि चार साहित्यों का सयोग अफसीर उपाय है। बड़ा विद्वान और सदा शुचि-पवित्र-रहने वाला पुरुष वारुणी (मदिरा) के नशे में उन्मत्त होकर, अशुचिमय उकरड़े में लोटने में ऐसा अानन्द मानता है जैसे मुलायम गद्दी-तकिये पर लोटने में माना जाता है । और गटरों को हवा को सुगधमय बगीचे की सैर के समान समझता है । कोई इस गदगी से हटने को कहे तो कहने वाले को मूर्ख समझ कर गालियाँ देने लगता है किन्तु वही शराबी जब नशे मे मुक्त होता है तो अपनी दुर्दशा देख कर लज्जित होता है और किसी के कहे बिना ही उकरड़े को त्याग कर चला जाता है। इसी प्रकार जीव रूप पवित्र और ज्ञानो पुरुप मोह रूपी मदिरा के नशे के वशीभूत होकर भोग (विषय) रूप अशुचि से परिपूर्ण कर्म रूप उकरडे पर लोटता हुआ आनन्द मानता है। वह विषयों से विरक्त और सद्बोध के दाता को मूर्ख मानकर उसके उपदेश का अनादर करता है । किन्तु जब उसका मोह का नशा इतर जाता है तो वही जीव सतसमागम आदि प्रसम पाकर सुध (होश में आ जाता है और अज्ञानावस्था में किये कर्मों के लिए पश्चाचाप फरके तत्काल विपयों से विरक्त्त होकर एकीभाव को अगीकार करता है (११२) * ध्यान-कल्पतर * । - - जैसे वचपन मे बकरियों में पला हुश्रा सिंह का बच्चा, अपनी जाति को भूल कर अपने आपको वकरा ही मान रहा था, किन्तु वन में मच्चे सिंह को देख कर बकरियों का सग छोड़ कर एकाकी स्वच्छन्द विचरण करने वाला वना । इसी प्रकार जीव अनादि फर्म सबध से निज स्वरूप को भूल कर कर्मजनित उपाधि को अर्थात् शरीर सम्पत्ति श्रादि को अपनी समझ रहा है । जब सद्गुरु के बोध से उसे आत्मा के असली स्वरूप का भान होता है, तब वह समझने लगता है कि-मैं चेतनस्वरूप ह । सब प्रकार की प्राधियों, व्याधियों और उपाधियों मे रहित हूँ। यह शरीर और सम्पत्ति विपत्तियों का घर है । मैं निराकार हूँ, यह साकार है । मैं शुद्ध और शुचि हूँ, यह अशुद्ध और अशुचि है । मैं अजर-अमर हूँ, यह क्षण भगुर अनन्त ज्ञानादि गुणों से समृद्ध सिद्ध युद्ध स्वरूप ह , यह जड़ है । इस प्रकार इनका और मेरा किमी भी प्रकार का सबध नहीं है। इनके ससर्ग से मैं ने चार गतियां में, चौवोस दडकों में और चौरासी लाख योनियों में, उन-नीच आदि जातियों में अनन्त-अनन्त विडवनाएँ भोगी हैं। श्रव इनका सग त्याग कर एकत्व भाव धारण करना ही मेरे लिए योग्य है। इस प्रकार विचार करके ससार के समस्त सवों का परित्याग करके वीतराग दशा का अवलम्वन करना चाहिए। जैसे वादलों के फट जाने पर सूर्य अपने स्वाभाविक प्रकाश से देदीप्यमान हो उठता है, उसी प्रकार कर्मपटल के हटने पर आत्मा के निज गुण मानादिक प्रकाशित होने लगते हैं और आत्मा स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। एकत्वभावना का चिन्तन करने वाला विचार करे कि मैं कौन हूँ ? एक हूँ या अनेक हूँ ? दीखने में तो एक ही शरीर का धारक हूँ, परन्तु जो एक मान तो अनेकता* कैसे बने ? माता पिता कहते हैं- मेरा पुत्र है, तो क्या में पुत्र हूँ ? वहिन कहती है-मेरा भाई है, तो क्या मैं भाई हूँ ? स्त्री कहती है- मेरा भर्तार है, तो क्या मैं भर्तार हूँ ? पुत्र-पुत्री कहते हैं-मेरा पिता है, तो क्या मैं पिता हूँ ? इसी प्रकार कोई फाका, कोई बावा, कोई मामा, कोई मौसा, कोई व्याई, कोई जमाई श्रादि-आदि कह कर मुझे बुलाते हैं । अव विचार होता है कि वास्तव में मैं क्या हूँ ! कौन हूँ? और किसका हूँ ? अहा, आश्चर्य है कि मेरा पता लगाना मुझे ही मुश्किल हो रहा है । मैं स्वय को ही नहीं समझ पाता हूँ। मैं एक होकर भी क्तिन नामों का धारक बना फिरता हूँ। मैं निश्चय से विचार करता हूँ तो प्रतीत होता है कि यह सब कर्मों के खेल है। परमार्थ दृष्टि से पुत्र हु न पिता हूँ न कोई अन्य हूँ । न कोई मेरा हैं, न मैं किसी का हूँ। अगर मैं इन नामों वाला होता तो सदा इसी रूप में बना रहता पुरुप हूँ ? यदि मैं पुरुष होने को निश्चय करूं तो भी नहीं बनता । ऐसा हो तो अन्य अनेक जन्मों में खी, पर्याय धारण करके पुरुष की इच्छा क्यों की ? इसी प्रकार में सा होता तो दूसरे जन्मों में पुरुष होकर स्त्री का ससर्ग क्यों चाहता? *एगया खत्तिो होई, क्यो चडाल-बुक्कसो । ठश्रो कीडपयगो य, तो कुथुपिवीलिया ॥ एवमावलोणीसु, पाणिणो कम्मकिविसा । न निविज्जति ससारे, सन्ठेमु व खत्तिया ।। -उत्तराभ्ययन,श्र.३ गा १५ नैसे क्षत्रिय राजा महापरिश्रम से पूरा राज्य प्राप्त करके मी तृप्त नहीं होता है, इसी प्रकार यह जीव भी कर्भ क्षत्रिय हुश्रा, कभी चाडाल हुश्रा, कमी युक्कस ( वर्णसकर) हुआ, कमी कीड़ा तो कभी पतंग हुश्रा । इस प्रकार नाना पोनियो में परिभ्रमण करता हुआ और अनेक रूप धारण करता हुश्रा मी कृतार्थ नहीं हुआ । खेद और आश्चर्य ! - मैं मैं * ध्यान-कल्पतरु * (११३ ) इस प्रकार विचार करने से यह सब भाव मिथ्या प्रतीत होते हैं । मैं मोह के उन्माद में बेसुध होकर फर्म सयोग से विकल हो रहा हू । राह भूला हू । जैसे नट नाट्यशाला में स्त्रो का भी रूप बना लेता है और पुरुष का भी रूप बना लेता है, और जैसा रूप बनाता है वैसा ही अभिनय करता है, परन्तु श्रान्तरिक दृष्टि से देखा जाय तो वह नट वैसा नहीं है । न राजा है. न रानी है, न संयोगी है, न वियोगो है । वह इन सब भाषों से अलग है। केवल दर्शकों को दिखान, इंसाने, रुलाने और फंसाने के लिए अनेक भावों को दर्शाता है । अन्तर में वह उन सब से अलग है। इसी प्रकार ससार रूपी नाट्यशाला में, चैतन्य रूपी नट ने, कर्मों के निमित्त से उच्च, नीच, एकेन्द्रिय से पचेन्द्रिय तक, चाण्डाल से चक्रवर्ती तक के रूप धारण करके, उस-उस पर्याय के अनुरूप कार्य किये है, किन्तु अन्त में एक भी रूप कायम नहीं रहा । सब अपने-अपने स्थान और समय पर समाप्त हो गए। चैतन्य उन सब से अलग ही रहा । यह है कर्मों का तमाशा | अब जग कमों के नशे का उतार आया दीखता है। इस कारण किंचित् मान हुधा है और इस प्रकार का विचार पाने से कर्मों की विचित्रता समझ कर भेद-विज्ञानी बना है। हे जीव ! अब विभाव को त्याग कर स्वभाव में रमण कर । देख चेतन | जब तू आया था, मोता के उदर से बाहर निकला था, तब अकेला ही था। तेरे देखते-देखते अनेक जन गये हैं वे सब अकेले ही अकेले गए हैं। इसी प्रकार तू भी अकेला ही जायगा। घशुभ कर्मों के फल भोगने के लिए नरक में और शुभ कमों के फल भोगने के लिए स्वर्ग में गया तो अकेला ही गया। धन, वस्त्र, मफान, भोजन, भूषण श्रादि में भाग लेने वाले अनेक स्वजन हैं, परन्तु कुत कर्मों में भागीदार बनने वाला कोई नहीं है। इस जगत् में परिभ्रमण करते हुए अनन्त जीवों में से, रास्ते चलते-चलते, थोड़े दिनों के लिए कोई स्त्री वन नाता है और कोई पुत्र हो जाता है। ऐसे-ऐसे अनेक सम्बन्ध स्थापित. करके पुद्गलपरावर्तन के फेर में पढ़कर वे किधर के किधर चले जाते हैं। फिर उनका पता लगना ही मुश्किल हो जाता है। हे जीव । तू भी कई का पिता, कई का पुत्र, कई की स्त्री आदि बना चुका है और छोड़ चुका है। अव न घे तुझे पहचानते हैं, न तू उन्हें पहचानता है। ऐसे-ऐसे विचार तेरे सामने उपस्थित होते हैं, फिर भी तुझे अपना एकत्व नहीं मालूम होता, यही आश्चर्य है हे श्रात्मन् । जगत के समस्त पदार्थ तुमसे भिन्न हैं और तू उनसे भिन्न है । तेरा उनके साथ कुछ भी सम्बन्ध नहीं है । अतएव तू अपने निज स्वरूप को पहिचान । तू शुद्ध है, सत् है, चिदानन्द है, सिद्ध के समान है। तू सदैव इसी स्वरूप का ध्यान किया कर, जिससे तेरा सच्चा स्वरूप तुझे प्राप्त हो जाय ! - L . * यह अभिन्न काया नही, साथ बायगी भ्रात । तो वैभव परिवार की, रही दूर ही बात ॥ पर जिनके हित पाप त , चला नग्क के द्वार । देख भोगते स्वर्गसुख, वे ही अपरम्पार ।। दुनिया के बाजार म, चल कर पाया एक । मिले बहुत पर अन्त में, रहे न हाय अनेक ।। तेरे अनुगामी स्वजन, गये कौन-ची वाट ? तू रोता ही रह गया, पक्डे-पकडे खाट" ( ११४ ) * ध्यान-कल्पतरु * चतुर्थ पत्र-संसारानुप्रेक्षा M ससार के स्वरूप का विचार करना ससागनुप्रेक्षा है। 'संसरन्ति अस्मिन इति संसारः पर जिममें जीव परिभ्रमण करते हैं वह समार कहलाता है । ससार चार प्रकार है और वह चार गतियों के से प्रसिद्ध है। चार गतियाँ निम्नलिखित हैं (१) नरफगति-' नरान फायन्ते इति नरक. ' यह नरक शब्द की व्युत्पत्ति है। यह अधकार परिपूर्ण तमोमय गति है । नरकगति के सात स्थान अधोलोक में एक दूसरे के नीचे हैं --(१) रत्नपा श्यामवरणे के रत्नमय भयफर स्थान वाली भूमि । (२) शर्कराप्रमा-जहाँ तलवार से भी अधिक तीर स्थान है । ( ३) वालुकाप्रमा-वह भूमि जो भड़भूजे के भाड से भी अधिक उष्ण वालू (रेती) वाली है (४) पक्प्रभा-जहाँ समस्त स्थान रक्त, मास, पीव आदि से परिपूर्ण हो। (५) धूमप्रभा-जहाँ राई मिर्च के धूम्र से अधिक तारण धूम्रमय स्थान हो । (६) तम प्रभा-भादवा महीने म, सघन मेघों की घ छाई हो और अमावस्या की रात्रि हो, रव जैसा अवकार होता है, उससे भी अधिक अधकारपूर्ण भूमि (७) तमस्तम.प्रभा-घोर अत्यन्त घोर तिमिर से व्याप्त स्थान । यह मात नरक के गुणनिष्पन्न नाम (गोत्र) हैं। इन नरकों में ४२ अन्तर ( खाली जगइ ) और ४६ पाथडे (प्रस्तर) अर्थात नारक जीवों के रहने के स्थान हैं। चौरासी लाख नारकावास हैं। इन नरकों में रहने वाले सम्यारष्टि जीव तो अपने किये कर्मा का फल जान कर समभाव से दुः भोगते हैं। मिथ्यादृष्टि हाय-हाय और त्राहि-त्राहि करके यातनाएँ मुगतते हैं। नरक में तीन प्रकार के वेदना है-परमाधामी ( यमदेवों ) द्वारा दी जाने वाली वेदना (२) आपस में एक दूसरे को उत्पन्न जाने वाली वेदना और (३) क्षेत्र वेदना । परमाधामी देव पन्द्रह प्रकार के हैं-(१) अम्ब-नारकियों को श्राफाश में उछाल कर एकदम छोड़ देते है। (२) अम्बरीप-नारकी जीवों के छुरी वगैरह से छोटे-छोटे टुकड़े करके भाड़ में पकने योग्य बनाते हैं। (३) श्याम-लातों, घूसों और कोड़ों वगैरह से नारकियों को पीटते हैं, भयानक स्थानों में पटक देते हैं और काले रंग के होते हैं। (४) शबल-शरीर की बातों को, नसों को और कलेजे प्रादि को बाहर निकाल डालते हैं और चितकबरे रंग के होते हैं। (५) रौद्र-नारकी जीवों को शक्ति और भाले श्रादि की नोंक में पिरो देते हैं। (६) उपरोद-अगोपांगों को तोड़-फोड़ देते हैं। (७) काल-भाग में फदाई आदि में डाल कर पकाते हैं। (८) महाकाल-चिमटे आदि से चमड़ी और मांस आदि नौंचते हैं और नारकिया को जबर्दस्ती खिलाते हैं। (१)असिपत्र-शत्रों से काटते हैं। (१०) धनु - शिकारी की तरह धनुष-वाण से भेदते हैं-नारकियों के कान आदि काट लेते हैं। .

* ध्यान-कल्पतरु * (११५ ) । (११) कुम्भ- कुभियों में पकाने वाले। (१२) पालुफ-भड़भूजे की तरह अत्यन्त तप्त वालू में नारकी जीवों को चनों की तरह भूनने वाले । (१३) वैतरणी-मांस, रुधिर तांबा, शीशा आदि अत्युष्ण पदार्थों से उबलती हुई नदी में नार- कियों को फैक फर तैराने वाले । (१४) खरस्वर-शन की अपेक्षा भी अधिक तीक्ष्ण पत्तों वाले शाल्मलि वृक्ष के नीचे बैठा कर पत्ते गिराने वाले। (१५) महाघोष-भयभीत नारकों को पशुओं की तरह वाड़े में या अधेरी कोठरियों में बन्द कर देने वाले और जोर से चिल्ला कर उन्हें वहीं रोक रखने वाले देव । परमाधामी देवों के यह सामान्य काम बतलाये हैं। इनके सिवाय वे और भी अनेक प्रकार के दुःख देते हैं। पूर्वजन्म में जिन्होंने जैसे पापफर्म किये हैं, उन्हें वैसा ही फल देते हैं। जैसे मासभक्षी को उसी का मांस नाँच-नौंच कर खिलाते हैं । मदिरा पीने वालों को रांगा उबाल कर पिलाते हैं। परनोगामी को लोहे की उष्ण पुतली का प्रालिंगन कराते हैं । हिंसफ जिस प्रकार की हिंसा करते हैं, उन्हें उसी प्रकार मारते हैं। इस प्रकार परमाधामी देव नाना प्रकार की दुस्सह वेदनाएँ देते हैं और नारक जीव बेचारे पराधीन होकर पाकन्द करते हैं और विषश होकर वेदनाएँ भोगते हैं। (२) नरक में दूसरी वेदना श्रापस की है। तीसरे नरफ से आगे परमाधामी देव नहीं जाते, किन्तु वहां के नारकी तरह-तरह के विकराल भयकर रूप बना कर परस्पर लदते हैं, मारते हैं और हाय- हाय करते रहते हैं। जैसे नये आये कुत्ते पर पुराने कुत्ते टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार एक दूसरे पर सदैव टूटते रहते हैं। (३) नरफ की तीसरी क्षेत्रजनित वेदना है । यह वेदना प्रधान रूप से दस प्रकार की है:- (१) अनन्त सुधा-नारकी जीव को इतनी भूख लगती है कि तीन लोक के समस्त भक्ष्य पदार्थ एफ को खिला दिये जाएँ तो भी तृप्ति न हो, परन्तु जीवन पर्यन्त एफ दाना भी खाने को नहीं मिलता। (२) अनन्त तृषा-इतनी प्यास सताती है कि ससार भर का पानी पी लेने पर भी न बुझे, परन्तु एफ वूद भी कभी नसीव नहीं होती। ( ३) अनन्त शीत-शीत योनि वाले नरकों में इतनी सर्दी पड़ती है कि लाख मन का लोहे का गोलो भी विखर जाय। (४) अनन्त उष्णता-उष्णयोनि वाले नरकों में इतनी गर्मी पड़ती है कि लाख मन का लोहे का गोला भी गल कर पानी हो जाय । & (५) अनन्त दाइबर । (६) अनन्त रोग-नारकों का शरीर सभी महान् रोगों से व्याप्त रहता है। (७) अनन्त खाज (खुजली) (c ) अनन्त निराधारता-नारकियों के लिए कोई शरण नहीं। (९)भनन्त शोक (चिन्ता) (१०) अनन्त भय-सदेव भयभीत रहते हैं। पते फे चार नरक उपायोनि वाले हैं। पांचवे ने सातवें तक शीतयोनि वाले हैं।

(११६ ) * ध्यान-कल्पतरु * २ - यह दस प्रकार की वेदना स्वभाव से हो सब नरकों में सदैव बनी रहती है । इन दुःखमय नाक स्थानों से यह जीव अनन्त वार उत्पन्न होकर दुख भोग पाया है। + (२) तिर्यचगति--तिर्ने वहुत वढने से तिर्यञ्च (पशु) कहलाते हैं । तिर्यञ्च के ४८ भेद हैं- पृथ्वीकाय, अपकाय, तेजस्काय और वायुकाय के सूक्ष्म और पर्याप्त और अपर्याप्त के भेद से सोलह भेद हुए । वनस्पतिकाय के सुक्ष्म साधारण और प्रत्येक, यह वादर के भेद से श्राठ भेद, इन आठों के तीन भेद हैं । इनके पर्याप्त और अपर्याप्त भेद करने पर छह भेद हो जाते हैं। द्वीन्द्रिय, श्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय के पर्याप्त-अपर्याप्त करने से भी छह भेद होते हैं। पचेन्द्रिय तिर्यच्च पाँच प्रकार के हैं-जलचर, स्थलचर, खेचर, उरपरिसद और भुजपरिसर्प। इनके सज्ञी ( मन वाले) और असज्ञी (विना मन के ) भेद से दस भेद और दसों के पर्याप्त और अपर्याप्त है भेद से वीस भेद हैं। इस प्रकार तियंचों के सब मिल कर भेद होते हैं । यह वेचारे कर्माधीन हो परवश में पड़े हैं । पृथ्वी खोदी जाती है, फोड़ी जाती है, गोवर आदि मिलाकर निर्जीव की जाती है। पानी गर्म किया जाता है। नहाने धोन-वगैरह गृहकार्यों में ढोला जाता है। क्षार धादि मिला कर निर्जीव किया जाता है । अग्नि प्रज्वलित की जाती है, वुझाई जाती है, पानी मिटा आदि से मारते हैं। वायु को पखा, झाड़ श्रादि से खाडने झटकने फटकने और उघाडे मुख बोलने आदि से मारते हैं । वनस्पति को छेदन भेदन, पीडन, गालन, अग्नि और मसाला आदि से निर्जीव करते हैं। मिट्टी, पानी, हरित वनस्पति, ईंधन, अनोज वत्र पात्र आदि के आभय में रहने वाले दोन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय नीव गमनागमन प्रारम्भ-समारम्भ, धूम्र आदि का प्रयोग शीत, उम्ण श्रादि के द्वार अनेक प्रकार से उपजते भी हैं और मन्ते भी हैं । जलचर जीव पानी समाप्त हाने से और नया पानी पाने से मरते हैं तथा धीवर आदि उन्हें मारते हैं । वेचारे स्थलचर या वनचर पशु शोत, ताप, वर्षा, भूख, प्यास आदि के कष्ट सहन करते हैं और काटे, कमर, कीचड़ एव कोड़ों वाली भूमि में पडे पडे जन्म पूरा गृहहीन, वस्त्रहीन, दीन, गरीब, अनाथ और घास-फूस श्रादि निर्माल्य तथा जितना मिले उतना हो खाकर सतोष करते हैं। ऐसे निरपराध जीवों को भी रसगृद्ध निदेय लोग मार डालते हैं। कोई बन्धन में डाल देते ! इसी प्रकार ग्रामवासी पालतू गाय, भैंस आदि पशु भी निर्माल्य वस्तु खाकर अपना जीवननिर्वाह करते हैं, वह भी जितनी मिल जाय सतनी ही खाकर सन्तोष कर लेते हैं। फिर भी खेसो आदि अनेकानेक कामों में सहायक होते हैं और दूध श्रादि जैसे उत्तम पदार्थ देते हैं। अपने स्वामी को इच्छा के अनुसार चलते हैं। ऐसे वेचारे गरीब पशुओं पर असह्य भार लाद देते हैं । कठिन वधनो से वाँध देते हैं। कठोर प्रहार करके मारते हैं। यक जाने पर भी मार-मार कर जबदन्ती चलाते हैं । जब पशु दुःख से, रोग से अथवा थकावट से मूर्छित हो जाते हैं और गिर कर पड़ जाते हैं, तो उसे श्वास रोक कर उठाते हैं। खाना-पीना मी पूरा नहीं देते हैं, मगर काम पूरा लेते हैं । अपना मतलब पूरा होने पर वह नित्य कृतन लोग उन्हें कसाई + घम्मा, वशा, शीला, अ जना, अरिष्टा, मघा और मायवती, यह सात नरकों के सात नाम हैं । रत्नग्रमा श्रादि पूर्वोक्त इनके गोत्र है। १ जो दृष्टि में श्रा सकें । २ जो दिखाई दे सकें । ३ जिस जीव में जितनी पर्याप्तियां सभव ई, उन्हें पूर्ण करने वाला जीव | ४ जिसकी पर्याप्तियां अधुरी हो। ५ एक शरीर के आश्रित रहने वाले अनन्त जीव । ६ एक शरीर का एक ही स्वामी हो । ७ पानी में रहने वाले मत्स्य श्रादि । ८ पृथ्वी पर रहने वाले गाय आदि । आकाश में उड़ने वाले पदी आदि । १० पेट रगड़ कर चलने वाले सर्प आदि । ११ भुजाओं से चलने वाले चहे श्राटि। करते हैं।

* ध्यान-कल्पतरु * (११७ ) आदि के हाथ बेच देते हैं। कसाई उन्हें शस्त्र से रिवा-रिवा कर मारता है। इन दोनों और अनाथों पर फरुणा करने वाला कौन है ? ऐसी तिर्यञ्च-गति में अपना जीव अनन्त वार उत्पन्न हुआ है और भयकर दुःख भोग चुका है। (३) मनुष्यगति-जो मन चाहो साधना कर सके वह मनुष्य कहलाता है । मनुष्य के ३०३ भेद हैं। असि , शस्त्र-हथियार ) से, मपि ( लेखन ) से और कृषि ( खेती ) से जहाँ श्राजीविका चलती हो वह फर्मभूमि कहलाती है। कर्मभूमि के पन्द्रह क्षेत्र हैं-५ भरत, ५ ऐरवत और ५ महाविदेह । यह तीनो क्षेत्र नम्बुद्वीप में एक-एक, धातकाखण्ड द्वोप में दो-दो और पुष्कराध क्षेत्र में दो-दो हैं । इस प्रकार पाँच २ होने से तीनों के पन्द्रह भेद है । इन पन्द्रह कमभूमियों में उत्पन्न होने वा ने मनुष्य कर्मभूमिज मनुष्य कहलाते हैं। जहाँ उपर्युक्त प्रसि, मषि और कृषि फर्म नही होते. किन्तु दस प्रकार के कल्पवृक्षों से जीवन- निर्वाह होता है, उसे अकर्मभूमि कहते हैं । अकर्मभूमि के तीस क्षेत्र हैं -हैमवत, एरण्यवत, हरिवर्प, रम्यक- घर्ष, देवकुरु और उत्तरफुरु, इन छह क्षेत्रों के पूर्वोक्त रीति से पाँच-पाँच भेद होते हैं-एक-एफ जम्बूद्वीप में, दो-दो धातकीखण्ड में और दो-दो पुष्करार्ध में, । इस प्रकार ६४५=३० भेद अकर्मभूमि के हैं। इन अकर्मभूमियों में उत्पन्न होने वाले मनुष्य अकर्मभूमिज कहलाते हैं। जम्बूद्वीप के चुल्ल हेमवन और शिखरि पर्वत में से पाठ दाढे ( फोने ) लवणसमुद्र में गई हैं। इन सातों दाढों पर पाठ-पाठ द्वीप हैं । यह ७४८=५६ अन्तद्वीप कहलाते हैं । समुद्र के अन्दर होने से इनका नाम अन्तर्वीप है। इनमें अकर्मभूमि की तरह ही मनुष्य रहते हैं। यह १५+३० +५६-१०१ मनुष्य हुए । इनके पर्याप्त ओर अपर्याप्त के भेद से २०२ भेद होते हैं। + चौदह स्थानों में सम्मूर्छिम मनुष्य स्वभाव से उत्पन्न होते हैं । वे अपर्याप्त दशा में ही मर जाते हैं। अतएव १०१ क्षत्रों के भेद से उनके भो १०१ भेद होते हैं। पूर्वोक्त २०२ भेदों में यह १०१ भेद मिला देने से भनुष्यों के सब भेद ३०३ हो जाते हैं। . - । फर्मभमि में महाविदेह को छोड़कर शेष सब क्षेत्रों में छह आरों की प्रवृत्ति होती रहती है। इस कारण कभी पौद्गलिक सुखों की वृद्धि और कभी हानि होती है । सदा एक-सी परिस्थिति न रहना भी दुख का कारण है। महाविदेह क्षेत्र में सदा चौथे पारे की सी स्थिति रहती है फिर भी वहाँ नाना प्रकार के मनुष्य होते हैं दस प्रकार के कल्पवृक्ष-(१) मत्तांग (मधुर रस देने वाले)। (२) मृ गार-वर्तन देने वाले । (३) तुडियग-बाजे देने वाले । (४) दीपकाग-टीपक जैसा प्रकाश देने वाले । (५) ज्योतिरग-सूर्य के समान प्रकाश देने वाले। (६) चित्राग-विचित्र रगों के पुष्प देने वाले । (७) चित्ररस - इच्छित भोजन देने वाले । (८) मनोवेग-रत्न- जटित आमषण देने वाले । (६) गेहागार-रहने को मकान देने वाले । (१०) अनियाण-श्रेष्ठ वस्त्र देने वाले । ३० अर्मममियों और ५६ अन्तद्वीपो में रहने वाले मनुष्यों की इन दस प्रकार के कल्पवृक्षों से इच्छापूर्ति होती है। + (१) उच्चार (विष्ठा ) में (२) प्रस्रवण (मूत्र ) में (३) क्प्म में (८) रेट (नाक के मैल) में (1) वमन म (६) पित्त में (5) रक्त में (८) पीप में (६) शुक्र (वीर्य) में (१०) शुक्र के सूखे पुदगल पुन भीगने से (११) मृतक्तेश्वर-पचेन्द्रिय के मृतक शरीर में (१२) स्त्री पुरुष के तमोग में ( ३) नगर की नालियों में श्रीर (१८) लोक फे सर्व अशुचि स्थानों में (शीतल होते हा तमाल असख्य मनुष्य उत्पन्न हो जाते है। - (११८) * ध्यान-कल्पतरु* हुए। . - तात्पर्य यह है कि ममि में सर्वत्र दुःख ही दु'स है । असि ( हथियारों ) से श्राजीविका करने वाले अनेक गरीव, विवश और निरपराध जीवों की घात करते सिपाही होकर अपराधियों और निरपराधों को बिना कारण भी मारते हैं । कितने ही राजा आदिक समाम और घोर पाप का उपार्जन करते हैं। करते हैं। कोई-कोई अपने ही कुटुम्ब का महार फर डालते हैं, तो वेचारे एकेन्द्रिय आदि को तो बात ही क्या है। शस्त्र अनर्य का कारण है। शस्त्र हाथ में पाया कि परिणाम हिंसामय मपि (लिखाई ) की श्राजीविका फरने वाले वणिक श्रादि, साई. कृ जडे, फलाल आदि आदि का अयोग्य व्यापार करके, अपने सामर्थ्य से अधिक वजन उठाये, गाँवडे-गाँवड़े में भटकते है, गुलामी करते हैं और घोर कष्ट सहन करते हैं। फपि के कर्म में एफेन्द्रिय से पचेन्द्रिय तफ जीवों की हिंसा करते हैं और शीत, ताप, रुघा, तृषा यादि महान कष्ट सहन करते हैं। उनकी तीनों ही ऋतुएँ घोर परिश्रम करते-करते व्यतीत होती है । अभी वर्तमान स्थिति पर ही दृष्टिपात कीजिए । स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्रत्येक को कोई न कोई दुःख सताता ही रहता है । द्रव्य है तो प्राय कुटुम्ब का अन्तराय होता है और कुटुम्ब लम्बा-चौड़ा है तो दरि- द्रता रहती है । धन और कुटुम्ब दोनों हैं तो परस्पर में प्रीति नहीं है। शरीर रोगग्रस्त है । सदा क्लेश वना रहता है । लेन-देन का और इज्जत-श्राबरू वगैरह का अनेक प्रकार का दुख सदैव दुखी बनाता रहता है । बहुत-से बेचारे गरीब है, उन्हें अपना पेट भरने में हो महा मुसीवत का सामना करना पड़ता है, तो परि- वार का भरणपोपण तो दूर रहा कोई अगोपॉगहीन, लूले, लंगडे, अन्धे, वहिरे होते हैं। कितनेक अनार्य देश में उत्पन्न हुए हैं । वे नाम मात्र के मनुष्य हैं। उनके फर्म पशुओं से भी गये-वीते हैं। धर्म का नाम तक नहीं समझते। मनुष्य का भी श्राहार करते हैं । वस्रहीन-नगे फिरते हैं । माता, बहिन और पुत्री का समागम करने में भी लजित नहीं होते । जगल में भटकते-भटकते जिन्दगी पूरी कर देते हैं। अकर्मभूमि में उत्पन्न होने वालों को सासारिक सुख की उत्कृष्ता प्राप्त होती है। हरिधर्ष और रम्यफवर्प में सुख की मध्यमता है तथा हैमवत और ऐरण्यवत में सुख की फनिष्ठता है। वहाँ के सब मनुष्य भद्रपरिणामी हैं, परन्तु धर्महीन जीवन यापन करते हैं, अतएव पशु के समान हैं। पूार्जित पुण्य से प्राप्त हुए दशविध कल्पवृक्षों के योग से सुख भोगते हैं और अन्त में मर जाते हैं। अन्तीपों में रहने वाले मनुष्य भो नाम मात्र के हैं। पानी पर, पहाड़ों में और वन में वास करते हैं। उनका शरीर तो मनुष्य जैसा हो होता है, किन्तु किसी का मुख हाथी जैसा किसी का घोड़े जैसा, किसी का सिंह या गाय जैसा होता है। यह मिथ्याष्टि होते हैं। पुण्योदय से इनकी भी इच्छा कल्पवृक्षों से पूर्ण होती है। सम्मुर्छिम मनुष्य केवल मनुष्य के मल-मूत्र धादि मे उत्पन्न होते हैं, जिससे वह मनुष्य कहलाते हैं, परन्तु दृष्टिगोचर नहीं होते हैं । यक्ष्म रूप में, एक स्थान पर असख्यात जन्मते हैं और तुरन्त मर जाते हैं। विष्ठा पर विष्ठा और मूत्र पर मुत्र त्यागने वगैरह से हर समय इनको हिंसा होती रहती है। ऐसे दुःखमयी स्थानों में जन्म लेकर यह जीव अनन्त-अनन्त विडंवनाएँ भोग पाया है। (फिर भी मनुष्य मन्म को भेष्ठ गिनने का कारण यही है कि तीर्थकर, साधु और बारह व्रतधारी श्रावक वगैरह इसी जन्म में होते हैं। मनुष्य जन्म के विना मुक्ति भी प्राप्त नहीं हो सकती। । - * ध्यान-कल्पतरु * (११६) । . (४) देवगति-दिव्य-उच्च गति वाले जीव देवता कहलाते हैं । देवताओं के १६८ भेद हैं । मूल में देवता चार प्रकार के हैं- १) भवनपति, (२) व्यन्तर, (३) ज्योतिष्क और (४) वैमानिक । असुरकुमार, नागकुमार सुपणकुमार, विद्युत्कुमार, अग्निकुमार, उदधिकुमार, दिशाकुमार, द्वीप- कुमार, पवनकुमार और स्तनितकुमार, यह दस तथा पूर्वोक्त १५ परमाधामी मिलकर २५ प्रकार के भवनपति देवता है। यह नरफ के प्रथम अन्तर में निवास करते है। पिशाच, भूत यक्ष, राक्षस, किन्नर, किंपुरुष, महोरग, गधर्व, इसिवाई, भूईवाई, श्रानपन्नी, पान- पन्नी, कदिय, महाकदिय, कोहड और पहदेव, यह सोलह व्यन्तर तथा अन्नज़म्भक, पानजृम्भक, लयनजम्भक, शयनजम्मक, वनजम्भक पत्रजृम्भक, पुष्पजम्भक, फल जम्भक, बीजजृम्भक और अभिपत्रजृम्भक, यह दस जम्मक देव मिल कर कुल २६ भेद गिने जाते हैं। यह पहले नरक के उपर पृथ्वी के नीचे रहते हैं। चन्द्र सूर्य, प्रह, नक्षत्र और तारे, यह पाँच अढाई द्वीप में चलते-फिरते हैं और अढाई द्वीप से बाहर स्थिर हैं । इस प्रकार चर-अचर के भेद से ज्योतिष्क देव दस प्रकार के गिने जाते हैं। तीन पल्योपमिक, तीन सागरोपमिक और तेरह सागरोपमिक, यह तीन नीच जाति के किल्विषी . । देव है । . सौधर्म,ईशान,सानत्कुमार,माहेन्द्र ब्रह्म, लान्तक महाशुक्र सहस्रार, पानत, प्राणत,पारण, अच्युत, यह बारह देवलोक ( स्वर्ग ) हैं । सारस्वत, श्रादित्य, वरुण, पहि, गर्दतोय, तुषित, अरिष्ठ, अमिदेव और अन्याबाघ, यह नौ लौकान्तिक उच्च देव हैं, जो पांचवें देवलोक में रहते हैं। भद्र, सुभद्र, सुजात, सुमानस, सुदर्शन, प्रियदर्शन, आमोह, सुप्रतिभद्र और यशोधर यह नौ वेयक है। विजय, वैजयन्त जयन्त अपराजित और सर्वार्थसिद्ध, यह पाच अनुत्तर विमान हैं। विमानों के भेद के अनुसार देवों के भा भेद होते हैं । अतएव २५+२६+१०+३+१२+ +६+५= ६६ भेद हुए। इन सब के पयाप्त-अपर्याप्न क भेद से १६८ देवों के भेद होते हैं। अन्य तीन गतियों की अपेक्षा देवगति में सुस्व की अधिकता है। सब बैंक्रिय शरीर के धारक हैं। मन चाहे जैसे और मन चाहे जितने रूप बना सकते हैं । देवता निरोगी, महादिव्य एव सदा तरुण शरीर वाले होते हैं । इनकी जघन्य ( कम से कम ) आयु दस हजार वर्ष की और उत्कृष्ट आयु तेतीस सागरोयम को होती है। सैकड़ों-हजारों वर्षों में क्षुधा लगी कि तत्काल सर्व दिशाओं में से, रोम-रोम से, शुभ पुद्गलों का आहार करके तृप्त हो जाते हैं। विभिन्न प्रकार से अनन्योपम विषयसुख भोगते हैं। इनके सामान्य नाटक में दो हजार वर्ष और बड़े नाटक में दस हजार वर्ष व्यतीत हो जाते हैं । वहाँ रात्रि नहीं होती। सदा महाप्रकाश बना रहता है। देव इतने सुम्वों के भोको होने पर भी दुखो है, क्योंकि आखिर तो चुघावेदनीय उन्हें भी लगी है। फिर सब देवताओं का दर्जा एक-सा नहीं है । कितनेक इन्द्र ( राजा के समान ) है तो कितनेफ सामानिक तीन पल्योपमिक देव ज्योतिषचक्र के • पर रहते हैं । तीन सागरिक दूसरे देवलोक के ऊपर और तीसरे के नीचे रहते हैं। तेरह नागरिक छठे देवलोक के पास रहते हैं । यह चिद्र प और हीन म्पिति वाले हैं । चार तीर्थ का निन्दक, धर्मटा और निह नव इस देवयोनि में जन्म लेता है ।

( १२०) * ध्यान-कल्पतरु * (इन्द्र की बराबरी के होने पर भी प्रभुता से रहित ) है । कोई-कोई त्रायस्त्रिंशक है अर्थात् पुरोहित आदि के समान है । कोई-कोई श्रात्मरक्षक (पहरेदार) है । कोई-कोई पारिपद्य है तो कोई-कोई अनीक (सैनिक) है। कोई गाने वाले हैं तो कोई नाचने वाले भी है । कोई आभियोग्य (नौकर) है तो कोई प्रजा के समान है । कोई लोकपाल है तो और किल्विपो है । यह दस प्रकार का श्रेणीभेद बारह देवलोकां तक है । इनमें जो अधिक ऋद्धि वाले देव है , उन्हें देखकर कम ऋद्धि वाले देव लज्जित होते है और पश्चात्ताप करते हैं कि मैं ऐसा क्यों नहीं हुप्रा ! कोई-कोई व्यभिचारी देव अन्य देवों को सुरूपा देवी का अपहरण करते अथवा वस्त्राभूषण का अपहरण करते हैं, तो इन्त्र उन्हें दण्ड देता है, वज्र का प्रहार करता है। इससे उन्हें छह महीनों तक महावेदना भोगनी पड़ती है। सब से बड़ा दुःख मृत्यु का है । देव इस दुःख से वचे नहीं है । मृत्यु से छह महीने पहले उन्हें आलस्य आने लगता है, चित्त में भ्रम पड़ने लगता है और माला कुम्हलाने लगती है । महल, वस्रों और आभूषणों की ज्योति मन्द प्रतीत होने लगती है, वह अच्छे नहीं लगते । इत्यादि चिहनों से देवता अपना मृत्यु सन्निकट जान कर चिन्ता और शोक में डूब जाते हे कि-हाय । ऐसे सुख को छोड़ कर अब प्रशुचि स्थान में उत्पन्न होना पड़ेगा। इस प्रकार महाशोक के सागर में डूबे हुए चे आयुष्य समाप्त करते है । बारहवें देवलोक से ऊपर के देवता अहमिन्द्र है , उन पर कोई मालिक नहीं है। परन्तु वे भी सुधा और मृत्यु की पीडा तथा मानसिक पीडा का अनुभव करते है । पाँच अनुत्तर विमानों को छोड कर वाचा सब जगह यह जीव अनन्त वार उपज कर मर चुका है। ससार की कोई ऐसी विडम्बना नहीं है जो इस आत्मा ने अनन्त वार न भोगी हो। चार गतियों के दुखों का यहाँ सक्षेप में वर्णन किया गया है। नरक और निगोद के ढ'स्व अपार है । यो सारा ससार दुःखों से भरा है। थी धी धी संसारे, देवो मरिऊण जं तिरिय होइ । मरिऊण रायराया परिपच्चइ निरयजालाए । -जैन वैराग्यशतक अर्थात्-किसी को एक वार और किसी को दो वार धिक्कार दिया जाता है, परन्तु इस ससार को तीन वार धिक्कार है, क्योंकि देवता जैसे महाऋद्धिशाली और महान सुख के भोक्ता भी मर फर पृथ्वीकाय, अर्थात जलकाय, वनस्पतिकाय आदि एकेन्द्रिय तिर्यंच जाति में उत्पन्न हो जाते है और राजाओं के राजा चक्रवर्ती भी भर कर नरक में चले जाते हैं। जरा आश्चर्य की बात तो देखिए । चक्रवर्ती का जीव मर कर नरक में गया है और उसका शरीर यहाँ पड़ा है। यहाँ उसके शरीर का संस्कार, अर्चना, शृगार प्रादि किया जाता है और वहाँ परमाधामी देव उस जीव को मारते हैं, दुस्सह यावनाएँ पहुँचाते हैं। देखिए क्या शरीर के हाल और क्या जीव के हाल हे जीव । महान् पुण्योदय से प्राप्त मनुष्य जन्म आदि सामग्री का लाभ ले । भवभ्रमण से छूटने का उपाय कर । अनन्त, अक्षय, अव्यावाध मोक्षसुख को प्राप्त कर। धर्मध्यान के ध्याता की चार मनुप्रेक्षाओं (विचारणाओं) का स्वरूप कहा । इन भावनामों में रमण करने से धर्मध्यान में एकाग्रता प्राप्त होती है। -- * ध्यान-कन्पतरु * ( १२१) - धर्म ध्यान का फल इस धर्म ध्यान में एकान्त एकाग्रता न होने से अर्थात् पुद्गल-परिणति से मिश्रित विचार और प्रवृत्ति होने से एकान्त रूप से फर्मनिर्जरा न होकर पुण्य की अधिकता होती है । इस पुण्यफल को भोगने के लिए ध्यान की अधिकता एव गंभीरता के अनुरूप उच्च या उच्चतर देव गति प्राप्त होती है। स्वर्गलोक में उत्पन्न होने की शय्या है । उस पर एक देवदूष्य नामक वस्त्र ढंका हुआ होता है। धर्मध्यानी का जीव यहाँ से शरीर त्याग करके उस शय्या में जाकर उत्पन्न होता है । एक मुहूर्त के पश्चात् पर्याप्तियाँ पूर्ण करके उम वस्त्र को ओद फर (शरीर को ढंक कर ) बैठ जाता है। उसी समय उसके आज्ञाकित देव और देवियाँ अत्यन्त हर्ष के साथ वहाँ एकत्र होते हैं और हाथ जोड़ कर अत्यन्त नम्रता- पूर्वक पूछते हैं-आपने क्या करनी की थी, जिससे आप हमारे नाथ बने ? देवों में जन्मते ही स्वाभाविक रूप से अवधिज्ञान होता है । नवोत्पन्न देव यह प्रश्न सुनकर अवधि. ज्ञान के प्रयोग से अपने पूर्वभव का हाल जानता है और देवलोक की ऋद्धि से चकित होकर अपने पूर्वभव के सम्बन्धियों को चेतावनी देने के लिए तैयार होता है । तब वहां के देव कहते हैं-एक मुहूर्त मात्र हमारा नाटक देखकर जो श्रापकी इच्छा हो सो कीजिए यह कहकर घे देव सामान्य नाटक करते हैं। उस नाटक के अभिनय में यहां के दो हजार वर्ष व्यतीत हो जाते हैं। तब तक यहाँ के सम्बन्धी मर-खप जाते हैं और वह देवता भी स्वर्गीय सुखों में लुब्ध हो जाता है। बारह देवलोक के ऊपर के सब देव अहमिन्द्र हैं, अर्थात् सबं बराबरी के हैं। कोई छोटा-बड़ा नहीं है। । इस कारण यहाँ नाटक आदि करने वाला कोई नहीं है। किन्तु बारहवें स्वर्ग के उपर अल्पमोही जीव हो उत्पन्न होते हैं। उनकी रुचि ज्ञान-ध्यान के सिवाय दूसरी तरफ मन्द हो होती है। ये सावधान होते हो पूर्वसम्पादित ज्ञान के ध्यान में तन्मय हो जाते हैं। उनका तेतोस सागरोपम का आयुष्य परमानन्द परम- सुख में व्यतीत हो जाता है। वहां का श्रायुष्य पूर्ण करके वे मनुष्य होते हैं। उन्हें इस उत्कृष्ट वस्तुओं का योग मिलता है। + ऐसे मनुष्य देवता के जघन्य तीन और उत्कृष्ट १५ भव या सख्यात भव करके शुक्लध्यानी बनकर मोक्ष मात करते हैं। । । orL 8 दूसर देवलोक से ऊपर देवियां उत्पन्न नहीं होती। (१) उत्तम क्षेत्र, मकान, धन, गांव प्रादि पशु और नौकर-चार (२) सन्मित्र (३) न्यात-परिवार (४) उन्च गोत्र (1) मुन्दर शरीर (६) नीरोगता (७) तीव्र बुद्धि (८) यश (६) विनीतता (१०) बल-पराकम, इन दस पोलों का जहां सयोग हो, वहां पुण्यात्मा अवतार लेते हैं।

। १२२ ) * ध्यान-कल्पतरु * - उपशाखा-शुद्धध्यान गुप्तेन्द्रियमना ध्याता, ध्येयं वस्तु यथास्थितम् । एकाग्रचिन्तनं ध्यानं, भ्यानं, फलं संवरनिर्जरे ॥ अर्थात-शुद्ध ध्यान करने वाले पाँच इन्द्रियों को और मन को अपने अधीन करके, शुद्ध वस्तु से । और एकाग्रता-अभिन्नता-स्थापित करके निश्चत होकर ध्यान करते हैं। हम ध्यान का फल सबर (आगामी कर्मों का निरोध ) और निर्जरा ( पूर्वोपार्जित कर्मों का क्षय) होता है। इससे ममस्त कर्मों का क्षय होने पर मोक्ष के अनन्त अक्षय अध्यवाध सुस फी प्राप्ति होती है। अतएव मुमुक्षुओं को शुद्धध्यान की विशेष आवश्यकता है। यहाँ इस विषय पर प्रकाश डाला जाता है उल्लिखित शोक में शुद्धध्यान करने के लिए इन्द्रियों का और मन का निग्रह-गोपन करने को प्राव ध्यकता वनलाई है। परन्तु इन्द्रियाँ मी मन के अधीन हैं । उत्तराध्ययन सूत्र में कहा है- एगे जिए जिया पंच | अर्थात्-एक मन को जीतने से पाँचों इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं और भा कहा है - मन एव मनुष्याणां कारणं वन्धमोक्षयोः । अर्थात-धर्मबन्ध का और कर्ममुक्ति का प्रधान कारण मन ही है। प्रसन्नचन्द्र राजर्पि इस कथन के ज्वलन्त उदाहरण है। * श्रतएव मनको जीतने को श्रावश्यकता है। गीता में कहा है- * राजगृह नगर के महाराजा अणिक, गुणशील बाग में विराजमान भगवान् श्री महावीर के दर्शन करने जर रहे थे | मार्ग में वह प्रसन्नचन्द्र राजर्षि को सूर्य के ताप में अडोल ध्यान में मग्न देख श्राश्चर्य चकित हो गये । भगवान् महावीर स्वामी की सेवा में पहुँच कर, नमस्कार करके प्रश्न पूछा-भगवन् । प्रसन्नचन्द्र राजर्षि दुष्कर तप कर रहे हैं। वह श्रायुप्य पूर्ण करके कहाँ उत्पन्न होंगे ? भगवान्-अमी मरें तो पहले नरक में। श्रेणिक-ऐ ? पहले नरक में ? भगवान्-नहीं दूसरे नरक म! श्रेणिक-प्रभो। यह क्या दूसरे नरक में ? भगवान्-नहीं तीसरे में। इस प्रकार अाश्चर्यचकित हो श्रेणिक प्रश्न करते गये और भगवान् चौथी, पांचवीं, छटी यावत् नरकभूमि बतलाते गए । बोशिक ने फिर चकित होकर पूछा-ऐसे महामुनि सातवे नरक में जाएँगे ? तब भगवान ने उत्तर दिया- नहीं छठे में । इस प्रकार भेणिक पछते गये और भगवान् पांचवीं, चौथी, तीसरी, दूसरी, प्रथम नरमभूमि और फिर भवनपति, व्यन्तर, ज्योतिप्क, देवलोक, अवेयक और अनुचरविमान का नाम फरमाते गए । उसी समय देवदु दुमी का निर्घोष सुनाई पड़ा । तत्र श्रेणिक ने पूछा-महाराज । यह देवदुदुमी क्यों बजी? मगवान्-उन प्रसन्नचन्द्र राजर्षि को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ है। यह सुनकर मेणिक अत्यन्त ही विस्मित होकर पूछने लगा-मते । बड़े अाश्चर्य की बात है कि अभी तो सात नर परमाते थे और अभी केवलज्ञान प्राप्त हो गया। इसका क्या कारण है? सातवा * ध्यान-कल्पतरु * (१२३ ) असंशयं महाबाहो ! मनो दुनिग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय ! वैराग्येण च गृह्यते ।। -भगवद्गीता श्रीकृष्ण कहते हैं-हे अर्जुन ! मन को वश में करना बड़ा ही कठिन है. क्योंकि मन अति चपल किन्तु निरन्तर अभ्यास करने से और वैराग्य से वश में हो सकता है। आचार्य हेमचन्द्र भी कहते हैं। अतिचञ्चलमतिसूक्ष्मं सुदुर्लभं वेगवत्तया चेतः। अर्थात् यह मन अत्यन्त चचल होते हुए अति सूक्ष्म भी है । अतएव इसकी गति को रोकना बड़ा कठिन है। किसी से भी पूछ देखो कि--भाई, तुम मन को वश में कर सकते हो ? तो वह यही कहेगा-बहुत उपाय करते हैं, परन्तु पापी मन वश में नहीं रहता है । क्या करें ? ऐसे चचल मन को वश में करने का उपाय इस श्लोक में बतलाया है कि निरन्तर के अभ्यास से जो वैराग्य प्राप्त करता है, वह मन को वश में कर सकता है। पाँच इन्द्रियों के छिद्रों द्वाग शब्दादिफ विषयों का प्रवेश होता है। उनका ग्रहण होने से मन राग- षमय परिणत होकर सुखी या दुखी बनता है। मन की राग-द्वेष रूप परिणति को रोकना ही वैराग्य कहलाता है। राग-द्वेष रूप परिणति में परिणत होना मन का अनादि काल का स्वभाव पड़ रहा है। अत- एव एकाएक उसका रुकना बहुत ही कठिन है। फिर भी रोकने का प्रयत्न करना चाहिए । जैसे जोश के साथ उमड़ते भाते नदी के पूर को कोई एकदम रोकना चाहे तो वह नहीं रुक सकेगा, किन्तु उसे पलटने का प्रयत्न किया जाय तोषद हो सकता है । बस, इसी प्रकार मन के वेग को पलटने का प्रयत्न करने की आवश्यकता है। अभ्यास किस प्रकार करना चाहिए ? जिन-जिन शब्दादिक विषय रूप पुद्गलों की ओर मन आकर्षित हो, उमो समय उन पुद गलों के स्वभाष गुण और फल की ओर मन को फिरा दिया जाय और विचार किया जाय कि यह क्षणिक और क्टुक फल देने वाले हैं। हर समय ऐमा अभ्यास रखने से मन किसो समय इन्द्रियों के विषयों से निवृत हो जाएगा। . भगवान्-तुम्हारे साथ के एक सुभट ने उन मुनि को देख कर कहा था यह साधु बड़ा निर्दय है। छोटे से १च्चे पर राज्य का मार डाल कर आप साधु बन गया है और वेचारे उस बच्चे को परचक्री सता रहा है। यह सुनते ही राजर्षि शोधातुर हो उस परचक्री के साथ मनोमय सग्राम करने लगे । राजन् उसी समय तुमने पृच्छा की। राजर्षि ने अनेक सैन्य सुमों का संहार करके शत्रु को मारने के उद्देश्य से, चक्र लेने के लिए सिर पर हाथ डाला ( उस समय सातवे नरक के योग्य कर्मदलिक सचित किये थे) तो रहमुड मस्तक पाया । राजर्षि उसी समय चौक उठे। उन्हें भान हुअा कि मैंने साधु होकर यह क्या पाप कर डाला ? (उसी समय मंचित कर्मद लिक क्षीण होने लगे जैसे-वैसे ऊचे चढते गये, शुद्ध विचार में एकाग्र होने से घातिया कर्म नष्ट हो गरे । तर फेवलज्ञान की प्राप्ति हो गई। (शुद्ध घ्यान की यह महिमा है 1 ) यह सुनकर राजा भौणिक अत्यन्त प्रसन्न एर तथा सामान को एवं अन्य अमणो को वन्दना कर अपने स्थान की ओर गये।

( १२४ ) * ध्यान-कल्पतरु * और फिर मन को ध्यान में स्थिर करने के लिए एकाग्रता का अभ्यास करना चाहिए । यद्यपि यका- यक मन का एकाग्र होना कठिन है, तथापि अभ्यास से वह भी हो सकता है । नित्य नियम के रूप में जा क्रिया की जाती है सर्वप्रथम उसी में चित्त को एकाग्र करने का प्रयत्ल करना चाहिए । प्रतिक्रमण करना है। तो प्रतिक्रमण के शब्दार्थ आदि में ही मन को गड़ा देना चाहिए | उस विचार को छोड़ कर दूसरी ओर नहीं जाने देना चाहिए । इसी प्रकार स्वाध्याय करते समय स्वाध्याय में, धमकथा करते समय धर्मकया में, गोचरी करते ममय गोचरी में और श्राहार करने समय आहार में एकाग्र करना चाहिए । इस तरह समन्त दिवस एव गनि सम्बन्धी कार्यों में सदा मर्वकाल, क्षण भर का व्यवधान डाले बिना मन को एकाग्रता का अभ्यास करना आवश्यक है । यो कुछ समय तक अभ्यास करते रहने से मन सहज ही एक वस्तु पर टिकन लग जाता है। फिर तो किसी भी इष्ट पदार्थ पर उसकी एकाग्रता हो सकती है। इस प्रकार अभ्यासयुद्ध वैराग्य मन को अडोल ध्यानी बनाता है। किस पर एकाग्रता की जाय और किस वस्तु का ध्यान किया जाय, यह वात आगे के प्रकरण वतलाई जाती है। . में प्रथम प्रतिशाखा । श्रात्मा 'जे रंग नाणइ से सव्वं जाणइ, जे सचं जाणड से एगं जाणइ । -श्रीमदाचागंग, अ.स २० अर्थ-जो एक को जानता है वह सब को जानता है और जो सब को जानता है यही एक जानता है। सहज ही प्रश्न उठता है-वह एक पदार्थ कौन-सा है ? और कैसा है कि जिसको जानने से सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती है ? उसी का स्वरूप यहाँ दिखलाया जाता है। वह वस्तु प्रात्मा है। आत्मा के तीन भेद हैं-(१) यहिगत्मा (२) अन्तरमा और (३) परमात्मा । एको भाव सर्वथा येन दृष्ट', सर्व भावा, सर्वथा तेन दृष्टा । , सर्व भावा सर्वथा येन दृष्टा, एको भाव' सर्वथा तेन हण्ट । जिसने एक पदार्थ को पूर्ण रूप से देखा, उसने समस्त पदार्थों को पूर्ण रूप से ठेखा और जिउने समस्त पदार्थों को पूर्ण रूप से देखा, उसने एक पदार्थ को पूर्ण रूप से टेवा । निज रूपे निज वस्तु है, पर रूपे पर वन्त । जिसने जाण्यो पैच यह, उसने जाणा समस्त ।।

* ध्यान-कल्पतरु * ( १२५ ) प्रथम पत्र-बहिरात्मा (१) बहिरात्मा-रक्त मास श्रादि धातुओं से बना हुआ, प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला यह हाडों का पीनरा, जो रग-विरगी चमड़ी से ढंका हुआ है। मनुष्यों और तियञ्चों ( पशुओं ) का शरीर तथा अन्य अशुभ पुद्गलों ( वन्तुओं ) से बना नरकनिवासी जावों को शरीर और शुभ पुद्गलों से बना हुआ देवलोक. निवासी जीवों का शरीर । यह सब वहिरात्मा कहलाता है, क्याकि अज्ञानी जीव इसी को श्रात्मा माने वैठे । वे अपने शरीर को हाथ लगा कर कहते हैं-मैं गोरा हू, मैं काला हूँ, मैं लम्बा हूँ. मैं छोटा हूँ मैं मोटा हूँ, मैं पतला हूँ मेरा छेदन-भेदन होता है, मेरे अगोपाग दुखते हैं, कहीं मरा आत्मा का विनाश न हो जाय अज्ञानी जोव इन्द्रियों क शब्द आदि विषयों के पोषण में मजा मानत हैं । में स्त्री हु, मैं पुरुष हूँ, में न सक हूँ, इत्यादि विचार करक परस्पर भाग म श्रानन्द मानते हैं। तात्पय यह है कि जो शरीर को आत्मा माने, शरीर के सुस-दुख से अपना सुख-दुःख माने, शरीर को पुष्टि से हर्ष और कष्ट से दु ख मानते हैं, वे बहिरात्मा (शरीर) को आमा मानने वाले + घज्ञानी हैं। शुद्धध्यान के ध्याता को इस अनादिकालीन भाव अनादिकालीन भाव को मिटाने, देहाध्यास त्यागने और परिणामों की विशुद्धि करने के लिए विचार करना चाहिए कि यह शरीर पुद गलों के सयोग से निपजा है और प्रात्मा अरूपी सथा अमृत्त है। दोनो में बड़ा अन्तर है। श्री उत्तराध्ययन सूत्र में कहा है - नो इंदियग्गेझ अमुत्तमावा, अमुत्तभावा वि य होइ निचो। अज्झत्थहेऊ निययस्स बन्धो, संसारहेउ च वयंति बन्धं ॥ अर्थात्-मूर्तिक पदार्थ ही इन्द्रियों द्वारा प्रहण किये जाते हैं और जो पदार्थ इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किये जाते हैं, वे जड़ होते हैं। परन्तु यह चेतन तो अमूर्तिक (अरूपी) हैं। उसे इन्द्रियाँ ग्रहण नहीं कर सकतीं । वह जड़ नहीं है अविनाशी और नित्य है। अनादि देहाध्यास के कारण जड़ और चेतन एक रूप प्रतीत हो रहे हैं, जैसे दूध और घृत । यह जड़ और चेतन का सबध ही ससार का कारण है। इस अनादि सबध का अन्त करन के लिए श्री आचारांग सूत्र में फर्माया है - जे एग णामे से बहू णामे, जे वह णामे से एगं णामे । अर्थात-जो एक मोह (भमत्व । को नमाता है, यह बहुतों को नमाता है, अर्थात् समस्त कर्मा फो नमाता है । और जो बहुत ( सर्व ) को नमाता है, वही एक ( ममत्व ) को नमाता है । + देहात्मवद्धिज पाप, न तद् गोवधकोटिभि । यात्माऽहबुद्धिन पुण्य, न भूतो न भविष्यति । प्रयात्-सो शीर को ही आत्मा मानते हैं, उन्हें करोड़ों गायो का वध करने वालो से भी अधिक पार लगता है और में श्रामा ही है ऐने विचार वाले को जितना पुण्य होता है, उसकी कोई तुलना ही नहीं हो सकती। । 4 ( १२६ ) * ध्यान-कल्प * और भी कहा है. -- एग विगिंचमाणे पुढो विगिचड़, पुढो विगिंचमाणे एगं विगिचइ ।। अर्थात-जो एक (मोह) को खपाते हैं, वे सब (को) को खपाते है और जो मव को खपाने वही एक को खपाते हैं। इस प्रकार विचार करके, शरीर में प्रात्मबुद्धि का परित्याग कर, ममता का त्याग करके अन्तरात्मा की ओर लक्ष्य देना चाहिए । द्वितीय पत्र-अन्तरात्मा अन्तरात्मा में रमण करते हुए ध्यानी विचार करते हैं-मैं जिसे मैं कह कर सवोधन करता हूँ, सो केवल लौकिक व्यवहार से करता हूँ। क्योंकि श्रात्मा निष्फलक है । इसे कौन सवोधन कर सकता है ? आत्मा तो श्रात्ममय पदार्थ को हो ग्रहण करता है, अन्य को नहीं । अन्य को तो अन्य ही ग्रहण करते हैं। ऐसा भेदविज्ञान (जड़ और चेतन की भिन्नता का भान ) जिसे होता है वही अन्तरात्मा (निज आत्मस्वरूप) की ओर लक्ष्य देता है। अंधकार में स्तभ मनुष्य के रूप में प्रतिभासित होता है, किन्तु अधकार के नष्ट होने पर वह यया तध्य स्तभ का स्तभ ही दीखता है। प्रकाश होने पर भ्रम का विनाश हो जाता है। इसी प्रकार अनन्त सूर्या के प्रकाश से भी अधिक भाज्वल्यमान जड़-चेतन का भेदविज्ञान होने पर आत्मा का यथार्थ प्रतिमास होता है। अन्तरात्माविज्ञानी के विचार १-स्त्री-पुरुष श्रादि को जो पर्याय है, वह फर्मजनित पर्याय है । वह चेतन का स्वभाव नहीं है। चेतन तो निर्वेद और निर्विकार है । तो फिर हे आत्मन् ! विकारी वस्तुओं को देखकर क्यों विकारी बनता है ? २---शत्रु-मित्र की नो भावना उत्पन्न होती है, वह भी कर्मम्वभाव है। निश्चय में तो 'अप्पा मित्त ममित्त च' अर्थात आत्मा स्वय ही अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु है। अकृत्य से निवृत्त हो तो अपनी आत्मा ही मित्र है, नहीं तो शत्रु का काम करता ही है। ऐसा विचार करके शत्रु-मित्र पर तया अच्छी-बुरी वस्तु पर समभावी बने, राग-द्वप न करें। ३-इतने दिनों तक मैं घालक की तरह अनेक चेष्टाएँ करता रहा सो अन्य की प्रेरणा से कर रहा था, चेतन की प्रेरणा से नहीं । चेतन तो अनन्तज्ञानादिक शक्ति का धारक है। वह किसी भी प्रकार की कोई भी चेष्टा (खेल-तमाशा) नहीं करेगा। ४-इतने दिनों तक बाह्य पदार्य सच्चे भौर प्रिय-अप्रिय मालूम पड़ते थे। अब वही स्वप्न और इन्द्रजाल सरोखे क्षणभगुर और निस्सार मालूम पड़ने लगे। ऐसी स्थिति में इनका क्या भरोसा ? असत्य को सत्य मानना तो मिथ्यात्व है। ५-जिस परमात्मा को अविनाशी कहा जाता है, वह मैं हो हूँ। फिर किसी मो जड या चेतन के द्वारा मेरा विनाश हो, यह मिथ्या भ्रम है। 'मरे सो और, और मैं और, ' इस विचार से निर्मय बने । -- - * ध्यान-कल्पतरु * ( १२७ ) - ६-अहा! आश्चर्य है कि जिन कामों से या जिन कारणों से अज्ञानी जीव फर्म का बन्ध करते है. उन्हीं कामों एव कारणों से ज्ञानी जन फर्भ-बन्धन को तोड़ कर निमुक्त बनते हैं। इस विचार से सब से ममत्व घटावे। -इतने दिनों तक मैं नाना रूप धारण करके ससार-परिभ्रमण करता रहा, इसका कारण भेद- विज्ञान का अभाव ही था। अब में भेदविज्ञान में ही रमण करूँगा। ८-भेदविज्ञान रूपी जगत्तारक वाहन (जहाज) सभी प्राप्त कर सकते हैं, वह सब के सामने जा रहा है, फिर भी अनन्त जाव ससार-सागर में डूब रहे हैं । इसका एक मुख्य कारण भेदविज्ञान का अज्ञान ही है। अब मैं तो इस अज्ञान से छुटकारा पाऊँ। -क्या मना है । यह श्रात्मा, श्रात्मा के द्वारा हो पहचानी जाती है । न चश्मे से और न दूरबीन से देखी जा सकती है। इसे देखने के लिए किसी भी अन्य साधन को आवश्यकता नहीं है। १०-आश्चर्य की बात तो यह है कि ज्ञानी जन जिन विषयों को अप्रिय, दु ख का निमित्त एव अकल्याण कर मानते हैं, उन्हीं को अज्ञानी प्रिय और सुख का साधन समझते हैं। तप-सयम आदि ज्ञानियों को सुखदाता भासित होते हैं, उनको अज्ञानी अप्रिय और दुःखदाता समझते हैं । ११-' वही हूँ मैं वही हूँ मैं ' ( सोऽहम्. सोऽहम् ) इस प्रकार की प्रवल एव एकनिष्ठ भावना करता हुभा यह यात्मा परमात्म-पद प्राप्त कर लेता है। कहा है-'अप्पा सो परमप्पा' अर्थात् आत्मा ही परमात्मा है। इससे बढ़ कर सद्बोध और क्या होगा? १२-मैंने मेरी ही उपासना प्रारभ कर दी तो फिर अन्य की उपासना करने की क्या आवश्यकता ? क्योंकि मैं स्वय परमात्म स्वरूप ह । * १३-भेदविज्ञानी को दुष्फर तप से महान् उपसर्ग भी किचित् मात्र खिन्न नहीं कर सकते, चलित नहीं कर सकते। १४-राग आदि शत्रुओं के क्षय से अथवा उनकी मदता से ही अन्तरात्मा का ध्यान होता है। १५-जो भ्रमरहित होकर जीव और देह को अलग-अलग समझेगा, वही कर्मबन्धन से छूट कर मोक्ष प्राप्त करेगा। रागादि शत्रु शान्त हुए कि प्रात्मा का दर्शन होने लगा। १६-अज्ञान और विभ्रम के हटने से ही प्रात्मतत्त्व का भास होता है। १७-जिस काया को प्राणप्यारा समझ रक्खा था, ज्ञान होने पर वही काया तप सयम आदि में गलादी जाती है। १८-आत्मज्ञान के अभाव में, कोरो तपस्या करने से दुःख से छुटकारा नहीं मिल सकता। १६-बहिरात्मा रूप, धन, बल, विषयसुख प्रादि का अहोनिशि ध्यान किया करता है और अन्त- रात्मा इनसे विरत रहता है। २०-अज्ञानी सिर्फ बाह्य त्याग से सिद्धि मानते हैं और ज्ञानी बाह्य एष आन्तरिफ-दोनों प्रकार को उपाधियों के त्यागसे सिद्धि मानते हैं। + * य परमात्मा स एवाइ, पोऽह स परमस्तत । अहमेव मयाऽऽराध्यो, नान्य कश्चिदिति स्थिति ॥ -जो परमात्मा है वही मैं हूँ और दो मै हूँ वही परमात्मा है । श्रत मुझे अपनी ही पाराधना करनी पादिर। यही वास्तविक तथ्य है । reap (१२८) * ध्यान-कल्पतर * . २१-अध्यात्मनिष्ठ ज्ञानी व्यवहार साधने के लिए वचन और काया से अन्यान्य कार्य करते भी मन से एकान्त अन्तरात्मा में हो लीन रहते हैं। २२-श्रात्मसाधना करते समय जो उपमर्ग और परीषह सहन करने पड़ते हैं, उन्हें अध्यात्मनिर महात्मा दुःख रूप नहीं समझते हैं। यही नहीं, बल्कि सुख रूप समझते हैं, जैसे रोगी कटुक औषध के व को न देखता हुआ गुण का ही गवेषक होता है। + २३-ज्ञानी पुरुप को श्रात्मसाधना के सिवाय अन्य कार्य करने का अवकाश ही नहीं मिलता है २४-परमानन्द तो आत्मा मे ही है, भोले । वाहर क्या खोजता फिरता है। २५-इच्छा ही ससार है और इच्छा का त्याग करने से सहज ही ससार छूट जाता है । २६-जैसे पहने हुए वष जीणं होते हैं, वेरगे हो जाते है या नष्ट हो जाते हैं, शरीर जीर्ण, वेरंग भौर नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार शरीर ओर आत्मा के विपय में भी समझो । २७-अज्ञानी जीव परवन्तु में अज्ञान के कारण मजा मानते हैं और ज्ञानी भ्रमहीन होने से अन्त. रात्मा में ही आनन्द की अनुभूति करते हैं। २८-स्थिर स्वभावी ही मोक्ष पाते हैं। स्थिरता हो सम्यग्दर्शन की ऋद्धि है। २६-लौकिक प्रीति से वचनालाप, वचनालाप से चित्त विभ्रम, चित्त विभ्रम से विकलता और विफलता से चचलता, इस प्रकार एक से दूसग दुगुण बढ़ता चला जाता है। अतएव लौकिक प्रीति का त्याग करके आत्मप्रेम ही धारण करना उचित है। ३०-जब ज्ञान होता है तो जगत् बावला सा दिखाई पड़ता है और जव ध्यान होता है तब वस्तु का यथार्थ स्वरूप मासित होने लगता है ! उस स्थिति में पदार्थ का जैसा स्वरूप है, वैसा ही दीखता है, अर्थात राग-द्वप नष्ट हो जाते हैं। ३१-श्रात्मा श्रात्मा के द्वारा, ऐसा विचार करे कि 'मैं श्रात्मा हो हूँ, शरीर से न्यारा दृढ़ निश्चय होने से फिर स्वप्न में भी देहाध्यास न होगा । इसी से आत्मसिद्धि प्राप्त हागो। ३२-जाति और लिंग की अहंता त्याने सेहो सिद्धि होती है। ३३-जैसे वत्ती दीपक के साथ जुड़ कर स्वय दीपक रूप बन जाती है, उसी प्रकार प्रात्मा सिद्ध- स्वरूप का अनुभव करने से सिद्धरूप हो जोता ३४-थात्मा का पाराध्य आत्मा ही है, अन्य नहीं । प्रात्मा श्रात्मा की धाराधना करने से हो परमात्मा बनता है। जैसे-काष्ठ से काष्ठ रगडा जाने से अग्नि उत्पन्न होती है। ३५- मैं मर गया' ऐसा स्वप्न थाने से श्राप मरते नहीं हैं. इसी प्रकार जागृत अवस्था में भी आपके मरने से प्रात्मा मरती नहीं है। ३६-ज्ञानी नन अवसर, शक्ति, अभ्यास, समय, विनय, स्वसमय परसमय (स्वमत-परमत) अभिप्राय, इत्यादि का विचार करके निष्काम होकर प्रवृत्ति करते हैं। नैन छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैन दहति पावक | । न चैन क्लेदयन्त्यापो, न शोषयति मारुतः ॥ अर्थ-इस आत्मा को तीक्ष्ण शस्त्र भी लेद नही सकता, प्रचण्ड अाग भी जला नहीं सकती, पानी गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकता । किर डर काहे का ! " ऐसा - - * ध्यान-कल्पतरु * (१२६ ) और ३७–शरीर जैसे बाहर असार है, वैसे ही अन्दर भी। ३८-ममत्व का प्रभाव ही मुक्ति का मार्ग है। ३६-लोक का स्वरूप जान कर लोकमज्ञा और लौकैपणा से दूर रहो। ४.-परमार्थदर्शी मोक्षमार्ग के सिवाय अन्यत्र रति (सुख ) का अनुभव नहीं करते । वही मोक्ष प्राप्त करते हैं। ४१-फेवली भगवान को न बन्ध है, न मोक्ष है। ४२-परमार्थदर्शी को कुछ भी जोखिम नहीं है। ४३–अज्ञानी सदा सोया रहता है, ज्ञानी सदैव जागृत है। ४४-जो शब्द, रूप, गध, रस और स्पर्श की सुन्दरता-असुन्दरता में समभाव रखते हैं, वहो ज्ञान ब्रह्म ( निर्विकल्प सुख ) को जानते हैं और वही लोकालोक को जानते हैं १५-कर्मबन्धन को काटने से ही पवित्र आत्मा के दर्शन होते हैं। ४६-जो अपनी ओर देखता है, वही सब ओर देखता है। ४७-जो क्रोध को छोड़ेगे, वे मान को छोड़ेगे जो मान को छोड़ेगे वे माया को छोड़ेंगे, जो माया को छोड़ेंगे वे लोभ को छोड़ेगे, जो लोभ को छोड़ेंगे वे राग को छोड़ेंगे, जो राग को छोड़ेंगे वे द्वष को छोड़ेंगे, जो द्वष को छोड़ेगे वे मोह को छोड़ेंगे, जो मोह को छोड़ेंगे वे गर्भ से छूटेंगे, जो गर्भ से छूटेंगे वे जन्म से छूटेंगे, जो जन्म से छूटेंगे वे मरण से छूटेंगे, जो मरण से छूटेंगे वे नरफ से छूटेंगे जो नरक से छूटेंगे वे तिर्यञ्चगति से छुटेंगे जो निर्यश्चगति से छूटेंगे वे समस्त प्रकार क दु ख से छूट जाएँगे। ४८-आत्मज्ञान के बिना शास्त्रज्ञान निकम्मा है। ४६-इन्द्रियों के सुख का त्याग कर आत्मज्ञान प्राप्त करने की साधना करते समय ऐसा नहीं समझना चाहिए कि इन्द्रियों के सुख छूटने से दुखी बन जाते हैं, क्योंकि श्रात्मनान को सिद्धि होने पर सारा जगत् अमृतमय ही बन जाता है। उस अलौकिक अमृतपान से जन्म-मरण का दुख दूर हो जाता है और पात्मा परमसुखमय बन जाता है। ५०-हे प्रात्मन् । परमार्थदृष्टि खोल और निश्चय कर कि-में अतीन्द्रिय हूँ अर्थात् मेरे इन्द्रियाँ नहीं हैं। मैं इन्द्रियों का गोचर भी नहीं हूँ। इन्द्रियों के विषय शब्द श्रादिक हैं और वे श्रास्मा में नहीं हैं। श्रतएव में अतीन्द्रिय हूँ और अवश्य हूँ अर्थात् वचन के द्वारा मेग वर्णन नहीं हो सकता-वचनागोचर हूँ। मैं अमूर्तिक हूँ चैतन्यमय हूँ, श्रानन्दमय हूँ।' ऐसा विचार कर निज रूप में निश्चज होना चाहिए । ५१-हे आत्मन् अपने स्वरूप का ऐमा विशुद्ध और निर्मल अनुभव कर कि यह श्रात्मा समस्त नोक के यथार्थ स्वरूप को प्रकट करने वाला अद्वितीय सूर्य है । ससार में सामान्य अग्नि से दीपक का, दीपक से मसाल का ममाल से गैम का और गैम से बिजली का प्रकाश अधिक गिना जाता है। इन सब कृत्रिम प्रकाशों से चन्द्रमा का नैसर्गिक प्रकाश अधिक होता है और चन्द्रमा को अपेक्षा भी सूर्य का प्रकाश अधिक होता है, परन्तु श्रात्मा को ज्योति को वरावरी तो कोटि-कोटि सूर्य मिल कर भी नहीं कर सकते । दीपक श्रादि फा प्रकाश वायु आदि विरोधो वस्तुओं के समर्ग से नष्ट हो जाता है । चन्द्रमा और सूर्यका प्रकाश राहू या मेघों आदि का प्रावरण होने पर अथवा उनके अस्त होने पर नष्ट हो जाता है । किन्तु आत्मा का प्रकाश ( १३०) * ध्यान-कल्पa6* - जव पूर्ण रूप में एक बार चमक उठता है तो फिर कमी अस्त नहीं होता । तीन लोक के सूक्ष्म, बादर, परा- घर पदार्थ सब एक ही साथ प्रकाशित होने लगते हैं। उस समय आत्मा परमानन्दी बन जाता है। इम प्रकार के विचारों से प्रवृत्ति करने वाले को अन्तरात्मा समझना चाहिए । अन्तरात्मा को प्राप्त फर लेने पर ही परमात्मा बना जा सकता है। तृतीय पत्र-परमात्मा समस्त फों से विनिमुक्त, अनन्त ज्ञानादिक अष्ट गुणों से सम्पन्न, सिद्धि को प्राप्त, अजर-अमर- अविकार अरिहन्त और मिद्ध भगवान ही परमात्मा हैं। पुरायफल इन तीनों आत्माओं का ध्यान विशेपतया अप्रमत्त मुनि को होता है । क्योंकि अप्रमत्त दशा ही ध्यान में विशुद्धता और उत्कृष्टता उत्पन्न करती है । ध्यान के वल से महामुनि उच से उच्चतर गुणस्थानों पर आरूढ़ होते हुए, सुख पूर्वक सर्व कर्मों का क्षय करके सिद्धि-स्थान प्राप्त करते हैं ।

* ध्यान-कल्पतरु * (१३१ ) द्वितीय शाखा-उपध्यान चार पिण्डस्थञ्च पदस्थञ्च, रूपस्थं रूपवर्जितम् । चतुर्था ज्यानमाम्नातं, मन्यराजीवभास्करैः ।। -ज्ञानार्णव अ. ३६ अर्थात्--(१) पिण्डस्थध्यान (२) पदस्थध्यान (३) रूपस्थध्यान और (1) रूपातीतध्यान, यह चार प्रकार के ध्यान माने गये हैं इनके प्रभाव से भव्य जीवों को केवलज्ञान रूपी भास्कर (सूर्य) की प्राप्ति होती है । इनका सक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है:- पदस्थ मन्त्रवाक्यस्थं, पिण्डस्थं स्वात्मचिन्तनम् । रूपस्थं सर्वचिद्रूपं, रूपातीतं निरञ्जनम् ॥ द्रव्यसग्रह। १-मूल मत्राक्षरों का स्मरण करना पदस्थध्यान कहलाता है। २-स्व-प्रात्मा के पयायों का विचार करना पिण्डस्थध्यान है। ३-चित्स्वरूप अहन्त भगवान् का ध्यान करन रूपस्थष्यान है। ४-निरजन निराकार सिद्ध परमात्मा का ध्यान करना रूपातीतध्यान है। आगे क्रमशः इन चारों ध्यानों का विस्तार पूर्वक स्वरूप दिखलाया जाता है। - प्रथम पत्र-पदस्थध्यान पदों का अर्थात् मंत्रों का ध्यान करना पदस्थभ्यान है। मन को तृप्त करने वाले पद (वाक्य ) मंत्र कहलाते हैं। जगत् में मत-मतान्तरों की विभिन्नता के कारण इष्ट देव सम्बन्धी प्रद्धा में भी मिन्नता आ गई है। अतएव भिन्न-भिन्न मतावलम्बो भिन्न-भिन्न देवों के नाम से मत्र-रचना करके उनका स्मरण करते हैं। जैसे-ॐ नम शिवाय, ॐ नमो वासुदेवाय, प्राटि । इसी प्रकार जैनमत में माननीय महामहिम पचपरमेष्टी । उनका स्मरण सर्वोत्तम है । वह स्मरण अनेक प्रकार से किया जा सकता है। यया- पणतीससोल छप्पण चतुदृगमेगं च अवह झाएह । परमेट्ठीवायगाणं, अण्णं च गुरुवएसेणं ॥ द्रव्यत्तग्रह. अर्थात्-पैनीस (३५), सोलह (१६), पाठ (८), पाँच (५), चार (४) दो (२) और एक (१) भतरों के स्मरण से पच परमेष्ठी का जप-ध्यान हो सकता है। इनके अतिरिक्त अन्य प्रकार से भी, धिक भक्षरों से प्यान होता है। उसे गुरु के उपदेश के अनुसार समझ कर फरना चाहिए । हैं - । न्यूना- ( १३२ ) * ध्यान-कल्पतरु * - ३५ अक्षरों का मूल मंत्र १२३४५६७ ८९ १० ११ १२ १३ १४ १५१६१७१८१६२०२१२२२३ २४ २५ २६ ण मो अरि ह ता ण, ण मो सि द्धा ण, ण मो श्रा य रि या ण, ण मो उ व ज्मा याणं, २७२८ २९ ३०३१३२ ३३ ३४ ३५ ण मो लो ए स व्व सा हूण, १६ अक्षरों का मंत्र + १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८६१०१११२ १३ १४ १५ १६ अ रि इ त सि द्ध श्रा चा ये उ पा ध्या य साधु आठ अक्षरों का मंत्र १ २ ३ ४ ५ ६ ७८ अ रि ह त सि द्ध साहू, पांच अक्षरों का मंत्र J १ २ ३ ४ ५ अ सि आ उ सा चार अक्षरों का मंत्र १ २ ३ सिद्ध सा हू दो अक्षरों का मंत्र १ २ सिद्ध एक अक्षर का मंत्र 1 + इसमें पच परमेष्ठी के नाम मात्र हैं । * इन मंत्रों का स्पष्टीकरण इस प्रकार है-आठ अक्षरों के मत्र में अरिहंत और सिद्ध, यह मेल मंत्र के दो पद कायम रख कर पीछे के तीन पद साह ' शब्द में लिये हैं, क्योंकि प्राचार्य, उपाध्याय अोर साधु-यह तीनो साधु हैं। पांच अक्षरों के मन में अरिहन्त का, सि सिद्ध का श्रा प्राचार्य का, उ उपाध्याय का और मा साहू का सूचक है। इसमें प्रत्येक परमेष्ठी का वाचक श्राद्य अक्षर लिया गया है। चार अक्षरों के मन में अरिहन्त और सिद्ध परमेष्ठी 'सिद्ध' ' पद में लिये गये हैं, क्याकि अरिहत भी निश्चय से उसी भव में सिद्ध होने वाले हैं । अत उन्हें सिद्ध कहने में कोई हानि नहीं । बाट के तीना पट साधु म अन्तर्गत किये हैं। दो अक्षरों के मंत्र में आगे के चारो परमेष्ठियों को सिद्ध पद में ही गर्भित कर दिया है, क्याकि चारो की इच्छा सिद्ध पद प्राप्त करने की है। - - .

* ध्यान-कल्पतरु * ( १३३ ) यह पच परमेष्ठी के नाप-स्मरण की सक्षेप में गति बतलाई है। इनके अतिरिक्त शास्त्रों एव अन्या में और भी मत्र बतलाये हैं। उनमें से कुछ यहां दिखलाये जाते हैं मंगलशरणोत्तमपदनिकुरम्बं यस्तु संयमी स्मरति । अविकलमेकाग्रधिया, स चापवर्गश्रिय श्रयति ॥ अर्थात-मगल, शरण और उत्तम-इन पदों का जो स्मरण करता है, वह मुनिराज मोक्ष रूपो महालक्ष्मी प्राप्त करते हैं। यह पद यह हैं मङ्गलपद-चत्तारि मगल, अरिहन्ता मगलं, सिद्धा मगल, सोहू मगल, केवलिपएणत्ता - । धम्मो मगल । - - उत्तमपद-चत्तारि लोगुत्तमा, अरिहता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलि- पएणत्तो धम्मो लोगुत्तमो। शरणपद-चत्तारि सरणं पयज्जामि, अरिहते सरण पवजामि, सिद्धे सरणं पवजामि, साहू सरणं पवज्जामि, फेवलिपएणत्त धम्म सरण पवज्जामि । श्री उत्तराध्ययन सूत्र में कहा है- चउवीसत्थएणं दसणविसोहिं जणयइ । चतुर्विशतिस्तव से अर्थात् चौवीस तीर्थकरों की स्तुति करने से दर्शन (सम्यक्त्व) को विशुद्धता- निर्मलता-होती है। वह चतुर्विशतिस्तव यह है लोगस्त उजोयगरे, धम्मतित्थयरे अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसपि केवली ॥१॥ उसममजिअं च वंदे, ममवमभिणंदणं च सुमई च। पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं चंदे ॥ २ ॥ सुविहिं च पुप्फदंत, सीयलसिज्जंसवासुपूज्जं च । विमलमणत च जिणं, धम्म संतिं च बंदामि ॥३॥ कुंथु अरं च मग्निं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च । चंदामि रिद्वनेमि, पास तह वद्धमाणं च ।। ४ ।। जिणे । एकाक्षर मत्र में पांचों परमेष्ठी समाविष्ट हैं । वह इस प्रकार- अरिहता असरीरा, पायरिया पुण उवझया मुणियो। पदमस्वरनिपएणो श्रोकारो पच परमि'ठी ॥ परिदन्त को श्रादि का श्र, अशरीर (सिद्ध ) की आदि का मी अ और श्राचार्य की प्राटि माया, यह तीना 'प्रकार मिल कर प्यारण के अनुसार एक दी 'श्रा ' बनते हैं । इस श्रा के साथ उपाध्याय के उ की गुणसधि होने में 'श्रा+७=श्रो अक्षर वन बाता है। इसमें मुनि शब्द की श्राटि का 'म् । मिलने से 'श्री' रूप सिद्ध होता है। एत तरह 'या' में पांचों परमेष्टिया का समावेश हो जाता है।

( १३४ ) * ध्यान-कल्पतरु * -- एवं मए अमिथुया, विहयरयमला पहीणजरमरणा । चउवीसंवि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयतु ॥ ५ ॥ कित्तिय-वंटिय महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। प्राग वोहिलाभ, समाहिवरमुत्तमं दिन्तु ॥६॥ चन्देसु निम्मलयरा, श्राइच्चेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥ ७ ॥ -स्तुतिमगलपाठ भी मत्र रूप है। उसके विषय में शास्त्र में कहा है- 'थवथुइमंगलेणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? थवथुइमंगलेणं नाणदसणचरित्तबोहिलाभं जणयइ । नाणदसणचरित्तदोहिलामसंपन्ने य णं जीवे अन्तकिरियं कप्पविमायोववत्तिगं पाराहणं धाराहेइ ।। -उत्तराव्ययन, अ. २६-१४ यहाँ बताया गया है कि स्तव-स्तुतिमंगल अर्थात् 'नमो त्यु ण' रूप मंत्र पढने से ज्ञान की निर्मलता होती है-बुद्धि की वृद्धि और विशुद्धि होती है । सम्यक्त्व शुद्ध होता है । चारित्र की वृद्धि होती है। बोधिबीज का लाभ होता है। ज्ञान, दर्शन, चारित्र को शुद्धि होने से मोक्ष की प्राप्ति होती है । कदाचित् पुण्य की वृद्धि हो जाय तो १२ देवलोक, : प्रैवेयक या ५ अनुचर विमान में महान ऋद्विधारी देव होता है। मन्त्र इस प्रकार है:- "नमोत्थु णं अरिहंताणं भगवंताणं आइगराणं तित्थयराणं, सयंसंबुद्धाणं, पुरिसुचमाणं पुरिससीहाणं पुरिसवरपुंडरीयाणं पुरिसवरगंधहत्थीणं, लोगुत्तमाण लोगनाहाणं लोगहियाणं लोग- पईवाणं लोगपज्जोयगराणं, अभयदयाणं चक्खुदयाणं मग्गदयाणं सरणदयाणं जीवदयाणं बोहिदयाणं, थम्मदयाणं धम्मदेसियाणं धम्मनायगाणं थम्मसारहीण धम्मवरचाउरंतचक्कवट्टीणं, दीवो साणं सरणगइपइहाणं, अप्पडिहयवरनाणदंसणधराणं वियदृछउमाणं जिणाणं जावयाणं, तिन्नाणं तार- याणं, बुद्धाणं वोहयाणं, मुत्ताणं मोयगाण, सम्वन्नूणं सव्वदरिमीणं, सिव-मयल-मरुय-मणंत- मक्खय-मव्वाबाह-मपुणरावित्तिसिद्धिगइनामधेयं ठाणं संपत्ताणं, नमो जिणाणं जियमयाणं ।" यहाँ णमोकार, चतुर्विशति स्तव (लोगरस) और नमोत्थु ण, का स्मरण करना बतलाया गया है। परन्तु इनके सिवाय जिनभापित सूत्रों का समाय (मूल पाठ का पदना) तथा अन्य जिनस्तवन, मुनि- स्तवन, वैराग्य एव श्रात्मज्ञान से परिपूर्ण, अध्यात्मरस से युक्त पाठों का स्वाध्याय एव परियट्टणा आदि करना सब पदस्थध्यान कहलाता है।* उपयोग को स्थिर करके पदस्थध्यान करने से जीव परमोत्कृष्ट रस में डूब कर महानिर्जरा करता है। *बी यह पद पदस्थध्यान का बीनमन्त्र है।

* ध्यान-कल्पतरु * (१३५) द्वितीय पत्र-पिण्डस्थध्यान पिण्ड अर्थात शरीर में स्थित प्रात्मा की भिन्नता का चिन्तन करना पिण्डस्थध्यान कहलाता है। गर्भित पुद्गलपिण्ड में, अलख अमूर्तिक देव । फिरे सहज भव-चक्र में, यह अनादि की टेव ॥ - अर्थात्त यह पिण्ड (शरीर ) सप्त धातुओं से बना हुया, महा अशुचि का भण्डार, क्षण क्षण में पलटने वाला, मृगापुत्र के शब्दों में 'बाहिरोगाण आलए' अर्थात् प्राधि (चिन्ता), व्याधि (रोग) और उपाधि (दुःख ) का घर है। ऐसे शरीर में 'अलख निरजन' देव विराजमान है । किन्तु देहाध्यास-देह में अहवुद्धि धारण करने के कारण तथा कर्मों के सयोग से इसका स्वभाव अनादि काल से संसार-परिभ्रमण फरने का हो रहा है । कहा भी है- जो जो पुद्गल की दशा, ते निज माने हंस । या ही भरम विभावतें, बढ़े कर्म को वंस ॥ जगत् में जो पौद्गलिक पदार्थ हैं, उन्हें आत्मा अपना मान रहा है। पुद्गलों की अवस्थाओं में स्वामाविक परिवर्तन आने पर अपने में परिवर्तन होना मानता है। पुद्गलों के प्रयोग-वियोग में अपना ही सयोग-वियोग समझता है । मतलब यह है कि अपना अनन्तज्ञानमय जो चैतन्य स्वरूप है, उसे कर्मों के नशे में मस्त होकर भूल गया है-भ्रम में पड़ गया है और अपने स्वभाव को त्याग कर विभाव में अनुरक्त हो रहा है। इसी से कर्मों की वृद्धि होती है और भवभ्रमण करना पड़ता है । कहा है- कर्म-संग जिय मूढ़ है, पावे नाना रूप । कर्म रूप मल के टले, चेतन सिद्धस्वरूप ॥ यह जन्म-मरण, यह ससार परिभ्रमण, यह मूढ़ता और नशा सब कर्मों की सगति का ही परिणाम है, क्योंकि चेतन सो सिद्धस्वरूप परमात्मा है । भवभ्रमण करना इसका स्वभाव है ही नहीं, ऐसा होता तो मिद्ध भगवान को भी पुनर्जन्म लेना पड़ता । आत्मा तो कर्मों के सयोग से ही मूढ़ बन कर एकेन्द्रिय आदि योनियों में अनेक प्रकार के रूप धारण करता है । फर्म रूप मैल दूर हुआ और देहाध्यास छूटा कि पह निज रुप फो-सिद्धस्वरूप को प्राप्त हो जाता है। अनादि काल से ज्ञानावरण धादि फर्मों के साथ ससारी जीवों का सम्बन्ध होने से श्रात्मा को अनन्त ज्ञानमय शक्ति पाच्छादित हो रही है। अतएव वह विभाव रूप परिणत हो रहा है । जैसे कीचड़ के सयोग से पानी की स्वच्छता नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार कर्मसयोग से चैतन्य की विमाव-परिणति रही है। जब मवस्थिति परिपक्व होती है, तब सम्यक्त्व आदि सामग्री प्राप्त होती है। तभी कर्मों का सबध मष्ट होता है और शुद्ध चैतन्य का अविर्भाव होता है । उसी समय आत्मा का सर्वज्ञ सर्वदर्शित्व स्वभाव प्रकारा में पाता है और एक ही समय में त्रिकाल एव त्रिलोक के सर्व पदार्थ उसके ज्ञान में मलकने लगवे ₹ा मोहै। 11 (१३६) * ध्यान-कल्पतरु * सिद्धां जैसा जीव है, जीव सो ही सिद्ध होप । कर्म-मैल का श्रांतरा, बुझे विरला कोय ।। कर्म पौद्गलिक रूप है, जीव रूप है ज्ञान । दो मिल के बहु रूप हैं, बिछुड़े पद निर्वान || वास्तव में जीव सिद्ध स्वरूप हो है । ऐसा न होता तो वह सिद्ध पद को कैसे प्राप्त कर सकता ? जीव को ही सिद्ध पद की प्राप्ति होती है, अन्य को नहीं। देरी इतनी ही है कि वह कर्म और जीव के अर्थात अपने निज के मूल स्वभाव को पहचान ले । कने पुद्गल रूप हैं, पुद्गल जनित निर्जीव जड़ पदार्थ हैं और जोव ज्ञानस्वरूप अरूपी और चैतन्य-चमत्कारमय है। इन दोनों के अनादि सबध के कारण ही देहाच्यास उत्पन्न होता है और देहाध्यास के प्नभाव से भव-भव में नाना प्रकार के कायारूप धारण करता है । ऐसा जानने वाले भेदविज्ञानी जगत् में थोड़े ही हैं। जो इस मर्म को जानेंगे, वही कर्म सवध को तोड़ कर निर्वाण प्राप्त करने का उपाय करेंगे। जीवो उवोगमश्रो, अमुत्ति कत्तो सदेहपरिमाणो । भोत्ता संसारत्थों, सिद्धो सो विस्ससोड्दगई ॥ -द्रव्यसग्रह। जीवो-शुद्ध निश्चयनय से यह जीव आदि मध्य और अन्त रहित, स्व तथा पर का प्रकाशक, उपा धियों से रहित, शुद्ध ज्ञान रूप निश्चय प्राण से जीता है, फिर भी अशुद्ध नय का अपेक्षा अनादि कर्मवध के वशीभूत होकर अशुद्ध द्रव्यप्राणों और भावप्राणों से जोता है। अतएव वह जोव है उवधोगमश्रो-शुद्ध द्रध्यार्थिक नय से परिपूर्ण निर्मल दो उपयोग हैं । ताप हो यह जीव है । किंतु अशुद्ध नय से क्षायोपशमिक ज्ञान और दर्शन से युक्त है। अमुत्ति-जीव व्यवहारनव से मूर्तिक फर्माधीन होने से वर्ण गध, रस और स्पर्श से युक्त मूर्तिक दीखता है, किन्तु निश्चयनय से अमूर्त, इन्द्रियों के अगोचर शुद्ध स्वरूप का वारक है। पत्ता-जीव निश्चय नय से कियारहित, निरुपाधिक ज्ञायकैकस्वभाव.का चारक है, फिर भी व्यवहार नय से मन वचन काय के व्यापार को उत्पन्न करने वाले कर्मों से युक्त होने के कारण शुभ-अशुभ कर्मा का कर्ता है। सदेहपरिमाणो-जीव निश्चय स्वभाव से शुद्ध लोकाकाश के बरावर असख्यात प्रदेशों का धारक है, फिर भी शरीर नाम कर्मोदय के कारण, सकोच-विस्तार स्वरूप होकर देहपरिमाण होता है । जैसे दीपक , को जिस भाजन में रख दिया जाय, उसी के बराबर परिमाण में प्रकाश करता है उसी प्रकार नीव फर्मोदय से प्राप्त छोटे या बडे शरीर के बरावर होफर रहता है। भोत्ता-जीव शुद्ध द्रव्यार्थिफ नय से रागादि समस्त विकल्पों से रहित और उपाधियों से शून्य है, तथा अात्मस्वभाव से उत्पन्न हुए सुख रूपो अमृत का आस्वादन करने वाला है, फिर भी अशुद्ध नय से इस स्वाभाविक सुख के अभाव में शुभाशुभ कर्मों से उत्पन्न हुए सुख और दुख को भोगने वाला है। ससारस्थजीव शुद्ध निश्चय नय से ससार रहित, नित्यानन्द रूप एक स्वभाव का धारक है, किन्तु अशुद्ध नय से द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और भव रूप पांच प्रकार के ससार में रहता है। - * ध्यान-कल्पतरु * (१३७ ) सिद्ध-जीव निज प्रात्मावरूप की प्रामि रूप सिद्धत्व के प्रतिपक्षो कर्मोदय के कारण व्यवहार नय से प्रसिद्ध है, किन्तु निश्चय नय से अनन्तज्ञानादि स्वभाव का धारक होने से वस्तुत सिद्ध है। विस्ससोडगई-जीव व्यवहार नय से चार गतियों में भ्रमण करने वाले कर्मों के उदय से ऊँची, नीची और तिी दिशा में गमन करने वाला है तो भी निश्चय नय से केवलज्ञानादि अनन्त गुणो की प्राप्ति रूप मोक्ष में नाते समय स्वभाव से हो ऊर्ध्वगमन करता है। शुद्ध चैतन्य उज्ज्वल द्रव, रह्यो कर्म मल छाय। तप-संयम से धोवतां, ज्ञानज्योति बढ़ जाय । भव्य जीवो । आत्मा-अनात्मा का समीचीन स्वरूप समझ कर आत्मा को देहपिण्ड और कमपिण्ड से अलग करने वाले शान से युक्त तप और सयम का आचरण करो । इससे भात्मा कर्म रहित, शुद्ध चैतन्य स्वरूप + में प्रकट हो जायगा। यह चेतन ज्ञानादि रनों का भाजन है। जैसे चांदी खटाई में धोने से सज्वल हो जाती है, उसी प्रकार यह चेतन भी उज्ज्वल हो जाता है। ज्ञान थकी जाणे सकल, दर्शन श्रद्धा रूप । चारित से श्रावत रुके, तपस्या क्षपण स्वरूप ॥ झान से आत्मा और कर्म की परिणति को पहचाने, दर्शन से उस पर जिनोक्त आगम के अनुसार सत्य श्रद्धा करे । चारित्र से जीव और फर्म को पृथक्-पृथक् करने के मार्ग पर लगे और तपस्या के द्वारा जीव और कर्म को पृथक-पृथक जीव कर्म मिन्न मिन्न करो, मनुज जनम को पाय । ज्ञानातम वैराग्य से, धीरज ध्यान जगाय ॥ यह उपाय मनुष्य जन्म में ही होता है। अतएष हे मुमुक्षुओ । तुम्हे इष्टार्थ की सिद्धि का यह मनुष्य जन्म आदि अवसर प्राप्त हुआ है, तो अब वैराग्य और धैर्य के साथ, ज्ञानयुक्त होकर ध्यानस्थ वन फर जीव को कर्म से अलग करो।. जीव और फर्म की भिन्नता जानने का तथा उन्हें भिन्न-भिन्न करने का यह उपाय सक्षेप में कहा गया है। प्रथकारों ने इस विषय में और भी कहा है। + जैसे स्फटिक रत्न स्वभाव से ही निर्मल-उज्ज्वल रूप होता है, परन्तु उसके नीचे रक्त आदि वर्ण का फोर्ड अन्य पदार्थ रख देने से वह रगमय दीखता है, वैसे ही श्रात्मा कोदय के कारण अशुद्ध रूप ही मासित होता है। स्वभाव से वह निर्मल ही है। पिण्ठस्य ध्यान में सस्थित होकर आत्मा की ज्ञानज्योति को प्रकाशित करने का सरल उपाय एक अन्यकार ने रतलाया है। वह यह है-शुभध्यान में म्हे अनुसार द्रव्य आदि शुभ सामग्रो से युक्त होकर ध्यानस्थ हो । बब स्वास बाहर निकले तो अन्तःकरण में विचार करे कि मैं अपना स्थान छोड़ कर बाहर आया । और नव श्वास मीतर जाय तो सोचे कि मैं भीतर चला। इस प्रकार विचार करते करते शीर्ष स्थान मे कटम्धान म और कटम्पान से नाभि- समलम्यान में जाकर विराजमान हो जाय ! वहाँ स्थिर होकर अन्दर की दृष्टि खोलने से ऐसा भासित होगा कि मैं नाभिकमल पर ही सस्थित हूँ । इस प्रकार जब अात्मा के सूक्ष्म स्वरूप का भान हो तब उस सूक्ष्म स्वरूप को समझ कर नाभि से प्राद् नाजू चारी श्रोर अवलोकन करे । फरे । -- - . -- ܚ + ( १३८ ) * ध्यान-कल्पतरु * इसके अतिरिक्त पिण्डस्यध्यान में सप्त भगी न्याय से थात्मतत्त्व का विचार करे । यथा- (१) प्रत्येक पदार्थ अपने चतुष्य ( द्रव्य, क्षेत्र काल भाव ) को अपेक्षा से अस्ति रूप है, वैसे श्रान्मा चेतन गुण की अपेक्षा सत् है । यह पहला 'स्यादम्ति' भग (२) जो पदार्थ स्वचतुज्य की अपेक्षा अम्ति रूप है, वहो परचतुष्टय की अपेक्षा नास्ति रूप है, जैसे आत्मा जड़ता गुण की अपेक्षा नहीं है । यह दूसरा 'स्यान्नास्ति' भग है। सब पदार्थ अपने-अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से हैं और पर द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से नहीं है, जैसे प्रात्मा चेतन गुण की अपेक्षा है और जडता गुण की अपेक्षा नहीं है। इस प्रकार क्रम से स्व-पर चतुष्टय की अपेक्षा अस्ति-नास्ति रूप है। यह 'स्यादस्ति नास्ति' तीसरा मंग हुभा । (४) अनन्त धर्ममय पदार्थ का परिपूर्ण स्वरूप एक साथ कहा नहीं जा सकता । अस्तित्व कहें तो नास्तित्व का और नास्तित्व कहे तो अस्तित्व का प्रभाव हो जाता है । इस प्रकार एक ही समय में दोनों गुणों का कथन नहीं किया जा सकता। केवली भगवान भो एक समय में अनेक भावों को जान तो सकते हैं, किन्तु वाणी द्वारा कह नहीं सकते। तो फिर दूसरों का तो कहना ही क्या है। अतएव प्रत्येक पदार्थ स्यात अवक्तव्य रूप है। यह चौथा भग है। . इस प्रकार अवलोकन करने पर यदि अन्धकार दिखाई दे तो उसी समय दृढ निश्चय से कल्पना करें कि-'इस अन्धकार का शीघ्र ही विनाश हो | और अनन्तप्रकाशमय सूर्यमण्डल का मेरे हृदय में प्रकाश हो, ऐसी दृढ कल्पना करके सूक्ष्म रूप से ही अाकाश की अोर (ऊपर) अवलोकन करे । ऐसा करने से उसी ममय सूर्य जैसा प्रकाश अन्त वरण मं दिखाई देने लगेगा। इस प्रकार निरन्तर अभ्यास करने से अन्तरात्मा की ज्ञानज्योति में दिनोंदिन विशुद्धता की वृद्धि होती है । अान्तरिक गुह्य पदार्थों का ज्ञान होने लगता है और अनेक गुप्त शक्तियां प्रकट हो जाती हैं। एक ग्रन्थकार का कथन है कि पिण्डस्थ ध्यान में पांच तत्वो का विचार करने से ज्ञानज्योति का प्रकाश होता है । वह इस प्रकार है-~ध्यानस्थ होकर, दृढतापूर्वक पहले पृथ्वीतत्व का विचार करे । गोलाकार पृथ्वी के मध्य में क्षीर- सागर की और उसके मध्य में जम्बूद्वीप का क्मल कल्पित करे । मेरु पर्वत की कर्णिका स्थापित करे । उस कर्णिका पर एक सिंहासन की कल्पना करे और उस पर अपने विराजमान होने की कल्पना करें। फिर दूसरे अग्नितत्व का चिन्तन करे । हृदय में १६ पाखुड़ी के कमल पर '' स्वर से लगा कर 'अ' स्वर तक पाखुड़ी पर एक-एक स्वर की स्थापना करे ! फिर उसमें से धूम्र निक्लने की क्ल्पना करे | फिर चिन्तन रे कि उसमें से महाज्यालाएँ निकलने लगी हैं, कमल भस्म हो गया है। भक्ष्य (ईधन) के अमाव में अग्नि शान्त हो गई है। तत्पश्चात् तीसरे वायुतत्व का विचार करे कि महावायु प्रकट होकर मेरु पर्वत को कम्पायमान करने लगा और पहले की पड़ी मस्म को उड़ा ले गया है, जिससे वह स्थान साफ रो गया है। तदनन्तर नलतत्व का चिन्तन क्रे-आकाश म गर्जना- रव हो रहा है । बन्दें पड़ने लगी हैं। मूसलधार पानी बरसने लगा है। अब वह मन्म का स्थान धुल कर एक टम स्वच्छ हो गया है । मेघ चले गये हैं। अन्त में आकाशतत्व का चिन्तन को अब मेरी आत्मा सप्त धातुमय पिंड से रहित, पूर्ण चन्द्र के समान प्रकाशमान, निर्मल, सर्वज्ञ देव के समान हो गई है। हद और गाद सक्ल्पमय चिन्तन करने से हूबहू ऐसा चित्र अक्ति हो जाना चाहिए।

* ध्यान-कल्पतरु * (१३६) (५) एक समय में आत्मा में स्वचतुष्टय की अपेक्षा अस्तित्व है और एक साथ स्व-पर-चतुष्टय को अपेक्षा प्रवक्तव्यता है । इस प्रकार प्रथम और चतुर्थ भग के सम्मिलन से पाँचवाँ भग बनता है । 'स्यात् अस्ति श्रवक्तव्य' यह पाँचवाँ भग है। (६) इसी प्रकार द्वितीय और चतुर्थ भग के सयोग से 'स्यान्नस्ति अवक्तव्य' भग बनता है। यह छठा भग है। (७) तीसरे स्यात् अस्ति-नास्ति' भग के साथ चौथे भग का सयोग करने से सातवाँ 'स्यात् अस्ति • नोस्ति श्रवक्तव्य' रूप सातवाँ भग निष्पन्न होता है । क्योकि वस्तु अस्ति रूप भी है, नास्ति रूप भी है और अवक्तव्य (वचनागोचर ) भी है। यह सात भग केवल अस्तित्व धर्म की अपेक्षा कहे हैं। अन्य धर्मों की अपेक्षा भी ऐसे ही सात भग होते श्रतएव नित्यत्व, अनित्यत्व एकत्व, अनेकत्व धादि धर्मों के भी यही भग बनते हैं। आत्मा के स्वरूप का चिन्तन करने में जो निमग्न है, उसे अनेक प्रकार से आत्मा का चिन्तन करना चाहिए और पुद्गलपिण्ड से प्रात्मा की भिन्नता की प्रतीति करनी चाहिए। आत्मा के निश्चय स्वरूप में निष्ठ बनना चाहिए। पिण्ठस्थध्यान में इस प्रकार चिन्तन करने का मुख्य हेतु यह है कि इधर-उधर सब वस्तुओं में भ्रमण करते हुए मनको रोक पर एक मात्र आत्मा की तरफ लगाया जाय । मन जब बात्मा में लीन हो जाता है तव अन्य पुद्गलों को प्राण नहीं करता है और इससे नवीन फर्म का बन्ध नहीं होता है तथा पुरावन फर्म क्षण-क्षण में क्षीण होफर अलग हो जाते हैं और आत्मिक ज्योति पूर्ण प्रकाश पाती है। इस स्थिति में आत्मा के समस्त प्रयोजन सिद्ध हो जाते हैं। पिण्डस्थध्यान का सक्षेप में यही मार है कि-झानादि अनन्त अनन्त पर्यायों का पिण्ड एक मैं आत्मा हूँ और धर्ण श्रादि अनन्त पर्यायों का पिण्ड फर्म तथा उससे उत्पन्न हुआ शरीर है । अतएव दोनों के स्वभाव अलग-अलग होने से दोनों अलग-अलग हैं। ऐसा निश्चय चिन्तन करना पिण्डस्थध्यान है। इस ध्यान से भेद विज्ञान की प्राप्ति होती है. जिससे आत्मा स्व स्वभाव में स्थिरतायुक्त हो जाता । क्षान्त, दान्त बन जाता है । आत्मा के स्वाभाविक गुण जागृत हो जाते हैं । सब प्रकार के भयों से मुक्ति मिलती है। ऐसे भेद विज्ञानी को घोर भयानक स्थान में, हिंस्त्र प्राणियों के समूह में अथवा प्राणान्तिक उप- सर्ग के प्रसग में भी किंचित भी क्षोभ नहीं प्राप्त होता है। अखण्डित ध्यान की एकाग्रता से वह स्वल्पकाल में ही इष्टार्थ को सिद्धि कर लेते हैं M@GIA (१४०) * ध्यान-कल्पतरु * तृतीय पत्र-रूपस्थध्यान - यह है.. रूपी परमात्मा के गुण में चित्त का स्थिर होना रूपस्थध्यान कहलाता है। अन्तिपाहुड़ में कहा है:- जे जाणइ अरिहंते, दव्यगुणपज्जवहिं य । ते जाणाइ नियप्पा, मोहो खलु जाइ य विलयं ।। अर्थात-जो अईन्त भगवान् का स्वरूप द्रव्य, गुण, पर्याय के द्वारा जानेगा, वही प्रात्मा के नित्र स्वरूप को जानेगा और जो आत्मा के निज स्वरूप को जानेगा वही मोह कर्म का नाश करेगा। रूपी परमात्मा के पाचक आपस में मिलते-जुलते तीन शब्द हैं-अहंत, अरिहन्त और अरुहन्त । इनका अर्थ (१) देवेन्द्रों और नरेन्द्रों के पूजनीय तथा अतिशय एवं अष्ट महापातिहार्यों से युक्त हो सो अन्ति। (२) कर्मों तथा राग-द्वेष आदि आन्तरिक शत्रुओं का नाश करने वाले अरिहन्त कहलाते हैं । (३) जन्म के अंकुर को त्था रोग श्रादि दुखों के अकुर नष्ट करने वाले अरुहन्त कहलाते हैं । यह तीनों एक ही घाति कमों को नष्ट करने वाले, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, जीवन्मुक्त, सशरीर परमात्मा के नाम हैं। श्री अरिहन्त भगवन्त अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तचारित्र और अनन्ततप रूप अनन्तचतुष्टय से युक्त है । समवसरण के मध्य में, अशोक वृक्ष के नीचे, मणि-रनों से जटित सिंहासन के अपर, चार अङ्गुल थधर, छत्र चामर एवं प्रभामण्डल को विभूति से युक्त, वारह प्रकार की परिषद् से परिघृत होकर दिव्य ध्वनि प्रकाश करते हैं। उनकी दिव्यध्वनि की आवाज भाद्रपद महीने के मेघ की गर्जना को तरह, चार- चार कोस तक चारों ओर फैलती है, जिसे श्रवण करके अच्युतेन्द्र, शकेन्द्र, धरणेन्द्र, नरेन्द्र ( चक्रवर्ती) और वृहस्पति जैसे विद्या में पारगंत, पट शास्त्रों के पारगामी, महातेजस्वी, वक्तृत्वकला के धारक, महा- प्रवीणजन भी चकित रह जाते हैं और विचार करते हैं-श्रहा, कैसी अतुल और ज्ञान के सागर है ! एक-एक वाक्य की कैसी शुद्धता, मधुरता और सरलता है । इस प्रकार गुणानुराग धनुरक्त होकर वाह-वाह करते हुए अत्यन्त आनन्द को प्राप्त होते हैं। जैसे क्षुधातुर मिष्टान्न भोजन को और तृपातुर शीतोदक को ग्रहण करता है, उसी प्रकार श्रोतागण जिनेश्वर देव के एक-एक शब्द को प्रीतिपूर्वक ग्रहण करके अपने हृदय को शान्त करते हैं, परम वैराग्य को प्राप्त होते हैं और उस परम कल्याणी वाणो को प्रवण करके सब कामों को भून कर एकाग्रता धारण करते हैं। अहन्त भगवान की मुद्रा भी अनुपम होती है। अत्यन्त मनोहर, शान्त, गम्भीर, महान तेज से सम्पन्न, एक हजार पाठ उत्तमोत्तम लक्षणों से विभूपित, देदीप्यमान-झिलमिलाती हुई, सर्वोत्तम और अत्यन्त प्यारी मुद्रा के दर्शन से देव और मानववृन्द लुब्ध होते हैं । उनका अन्त करम वोल उठता है- अहा ! क्या स्वरूप सम्पदा है । क्या अपूर्व वैराग्य दशा है। निकामी, अक्रोधी, अमानी, अमायी, अलोभी, अरागी, अद्वेषी, निर्विकार, निरहंकार, महादयालु, महामगलमय, महारक्षपाल, अशरण शरए, तरण तारण, भवदुःख निवारण, जन्म सुपारण, जगदुद्धारण, . । अदभुत शक्ति है । प्रभु में * ध्यान-कल्पतरु * (१४१) . . अचिंत्य अतुल्यशक्ति के धारक, त्रिदु सवारक, अक्षोभ अनत भावनेत्रों से शोभित, परम निर्यामक, परम वैद्य, परम गारुड़ि, परम ज्योति, परम जहाज, परम शात परम फात, परम दात, परम महत, परम इष्ट, परम मिष्ट, परम ज्येष्ठ, परम श्रेष्ठ, परम पण्डित धर्म मण्डित, मिथ्यात्वखडन, परम उपयोगी, आत्मगुणभोगी, परमयोगी, महात्यागी, महावैरागी, अचिन्त्य, अगम्य, महारभ्य, अनन्त दानलब्धि अनन्तलाभलब्धि अनन्त भोगलब्धि अनन्त उपयोमलब्धि और अनन्त बल-वीर्यलब्धि के धारक, क्षायिक सम्यक्त्व यथा- ख्यातचारित्र, केवलज्ञान, केवलदर्शन से सुशोभित, अष्टादश दोषों से विनिमुक्त, चौतीस अतिशय और पैंतोम पाणी के गुणों से मडित, परम शुक्ललेश्यी, परम शुक्लध्यानी, एकनिष्ठभावी, परम कल्याण स्वरूप, परम शान्त रूप, परम पवित्र, विचित्र, परम दाता भोक्ता, सर्वज्ञ सर्वदर्शी, सिद्ध, बुद्ध, सद्गुणवृद्ध, अचिन्त्य शक्तिसमृद्ध, परम हितैषी, महा-ऋषि, निरामय (नीरोग ) महाचन्द्र महासूर्य महासागर, योगीन्द्र मुनीन्द्र, देवाधिदेष, अचल, विमल, अकलक, अवक त्रिलोकतात. त्रिलोकमात त्रिलोकभ्रात त्रिलोकेश्वर, त्रिलोकपूज्य, परम प्रतापी, परमात्मा, शुद्धात्मा प्रानन्दकन्द, ध्यान्तनिकन्द लोकालोफावलोकी,मिथ्यात्वातमिरतिरस्करण, सत्यस्वरूपी, सकल सुखदाता, स्याद्वाद शैली के विधाता अन्त महाप्रभु देशना देते हैं- अहो भव्यो बूझो, बूमते क्यों नहीं हो ? घेतो, चेतो मोहनिद्रा त्यागो । ज्ञानदृष्टि से देखो। महान्-महान् पुण्योदय से प्रत्युत्तम मनुष्य जन्म आदि सामग्री तुम्हें प्राप्त हुई है। इसे पृथा मत गॅवायो । अनन्तज्ञानादि त्रिरत्नों से भरा हुश्रा अक्षय खजाना तुम्हारे पास है । उसे देखो, पहचानो और सँभालो। उसी के रक्षक बनो । इस खनाने को लूटने वाले मोह, मद, विषय, कषाय रूप ठगोरे तुम्हारे पीछे लगे है। उनके फैद से बचो । इनके प्रसग से अनन्त मवभ्रमण की परम्परा में पड़ कर जो-जो विपत्तियाँ सहन को उन्हें स्मरण करके पुन दुःखों के सागर में पड़ने से बचो । बवने का उपाय करने का यहो समुचित समय है । यह अपूर्व अवसर हाथ से चला गया तो फिर हाथ लगना अत्यन्त कठिन है। अगर इस अवसर को गॅवा दोगे तो फिर घोर पश्चात्ताप करना पड़ेगा । यह अटल सत्य है । अतएव प्राप्त हुए दुर्लभ लाम को मत गँवाओ। जो लाभ लेना है, क्षण भी प्रमाद न करके ले लो । आत्मा के शाश्वत कल्याण के पथ पर प्रयाण करो। अक्षय और अखण्ड शान्ति प्राप्त करने का प्रयास करो। मानो, मान जाश्रो विकराल मायाजाल को तोड़ो, दुनिया के दद-फर छोड़ो, चलो हमारे साथ, हो जात्रो सावधान हम अपने शाश्वत, अविचल परमानन्दमय, परमसुखमय माक्ष-नगर में जाते हैं । तुम्हें पाना है तो आ जायो । यही तुम्हारा असलो घर है । उस घर में एक बार प्रवेश करने पर पुनर्जन्म-मरण नहीं करना पड़ता । अनन्त-सदा काल तक वहीं असीम अव्यावाध सुख में रहना होगा । हे भव्यो, हे मुमुक्षु प्रो, चेतो, चेतो, चेतो । अईन्त भगवान् का इस प्रकार का उपदेश सुन कर और उसके अनुसार आचरण करके भूतकाल में अनन्त जीव मोक्ष* गये हैं। वर्तमान में असख्यात जीव मोक्ष जा रहे हैं और भविष्यत् काल में अनन्ता- नन्त जीव मोक्ष जाएंगे। - हे आत्मन् । ऐ मेरो प्यारो अात्मा तुने प्रबल भाग्योदय से भी जिनेश्वर भगवान् का मार्ग पाया है। तुझे उनके यथातथ्य गुणों की पहचान हुई है। अतएव उन जैसा बनने के लिए उनके गुणों में लो * श्रव्यवहार राशि में से ६ महीने और ८ समय म १०८ बीच निकल कर नियम से व्यवहार राशि में आते है- कम और न ज्यादा । पार इतने ही जीव व्यवहार गशि में से निकल कर मोक्ष म बाते हैं । फिर भी तीनों ही कालो में निगद के एक शरी में के बीवा की तस्या का एक श्रश भी कमी वाली नहीं होता है। ऐसा सुदृष्टि तरगिणी नामर गिर परम्परा के अन्य में उल्लेख है।

( १४२ ) * ध्यान-कल्पतरु * 1 लगा। उन्हीं के आदेश-उपदेश का अनुसरण कर । उन्होंने जो कृत्य किये हैं, वही कृत्य कर । तर पहा, तन्मय हो, तल्लीन होजा जैसे स्वप्न-दशा में दृष्ट वस्तु के ध्यान में लोन होकर उसी रूप श्राप वन जाना है और अपनो मूल स्थिति भून जाता है । मगर वह तो मोहदशा है । निर्मोह अवस्था मे-शानदशा में लप- लोन होकर अर्हन्त भगवन्त के गुणों में तन्मय वन । इस तन्मयता के प्रभाव से तेरो अनन्त प्रात्मशकि प्रक्ट होगी और तू स्वय ही अहन्त वन जायगा । चतुर्थ पत्र-रूपातीतध्यान रूप से अतीत ( रहित ) अर्थात् अरूपी सिद्ध परमात्मा का ध्यान-चिन्तन करना रूपातीतध्यान है । कहा है:- जारिस सिद्धसहावो तारिमसहावो हि सबजीवाणं । तम्हा सिद्धतरुई, कायव्वा भव्वजीवेहिं ।। -सिद्धपाहु अर्थात्-जैसा सिद्ध भगवान् को श्रात्मा का स्वरूप है, वैसा हो सब जीवों की श्रात्मा का स्वरूप है। अतएव भव्य जीवों को सिद्ध स्वरूप में रुचि करना चाहिए अर्थात् सिद्ध स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। जं संठाणं तु इहं भवं चयंतस्स चरिमसमयम्मि । श्रासीय पएसघणं, तं संठाणं तहिं तस्स ॥ दीहं पा हस्सं वा, जं चरिमभवे हवेज्ज संठाणं । तत्तो तिमागहीणं, सिद्धाणोगाहणा भणिया ।। -उववाईसूत्र अर्थात-मनुष्य जन्म के चरम (अन्तिम) समय में जिस श्राकार में यहाँ शरीर रहता है, आयु पूर्ण होने पर जीव के आत्म प्रदेश उसी आकार में वहाँ ( मोक्ष में ) रहते हैं। हाँ, अन्तिम शरीर की भव गाहना से तृतीयांश हीन ( तीसरा भाग कम ) अवगाहना में लोक के अग्रभाग-सिद्ध क्षेत्र में वह प्रदेश विराजमान हो जाते हैं। वही सिद्ध भगवान की अवगाहना कहलाती है। + + नासिका श्रादि स्थानों में नो छिद्र हैं, वे भर जाते हैं और घनाकार (निविड़) प्रदेश हो जाते है । इसी कारण तृतीयांश अवगाहना कम हो जाती है । सिद्धों की अवगाहना जघन्य एक हाथ चार अगुल, मध्यम चार हाय सोलह श्रगुल और उत्कृष्ट ३३३ धनुष ३२ अगुल होती है । प्रश्न-अरूपो की अवगाहना कैसे? उत्तर--(१) अरूपी के लिए अरूपी दृष्टान्त ही लीजिए । जैसे अाकाश अरूपी है, फिर भी उसे लोक और अलोक रूप कहते हैं । अपेक्षा से साटि और सान्त मी कहते हैं और घटाकाश तथा पटाकाश भी कहते हैं। मतलब यह है कि अरूपी में भी रूपी पदार्थो के ससर्ग से रूपी जैसा व्यवहार किया जाता है । अन्यथा अाकाश को घटाकाश, पटा- काश कैसे कहते ? यही बात सिद्धों की अवगाहना के सम्बन्ध में समझना चाहिए । श्रन्तर इतना ही है कि भामाश अरूपी है श्रचेतन है और सिद्ध श्ररूपी चेतन है। (२) किसी विद्वान् से कहा नाय कि श्राप जिवनी विद्या पढे हैं, वह सब हमें हस्तामलकवत् (हथेली पर रक्वे श्रांवले की तरह) बतलाइए । तो वह अपनी विद्या को बतला नहीं सक्ता । उसी प्रकार सिद भगवान् को भी शान- स्वरूपममलं प्रवदन्ति सन्त' अर्थात् परमात्मा को सन्त पुरुष शानमय और निर्मल बतलाते हैं।

* ध्यान-कल्पतरु * ( १४३) - -- जीव कैसा है, यह श्री आचारांग सूत्र के अनुसार कहते हैं- मई तत्थ न गाहिया, ओए, अप्पतिट्ठाणस्स खेयन्ने। सिद्ध भगवन्त के रूप का या गुण का वर्णन करने में 'सव्वे सरा नियट्ट ति, अर्थात् सभी स्वर-शब्द हार जाते हैं, वह अबक्तव्य है । किसी भी शब्द में उनके स्वरूप का वर्णन करने की शक्ति नहीं है । क्योंकि यहाँ तक मति, कल्पना या विचारणा दौड़ ही नहीं सकती है। बड़े-बडे ब्रह्मवेत्ताओं 'सुरगुरु-गृहस्पति और सर्व शास्त्रों के पारगामियों को बुद्धि अभी तक वहाँ न पहुची तो अब कैसे पहुँचेगी ? बहुत अधिक दौड़ लगाई तो इतना ही कह सके कि वहाँ अकेला जीव कर्म-फलक से और सर्व सग से रहित, सच्चिदानन्दमय, अपने ही प्रदेशों से युक विराजमान है। यह सम्पूर्ण ज्ञानमय ही है। सिद्ध स्वरूप के सबध में और भी कहा है 'नदीहे, न हस्से, न वद्दे, न तंसे, न चउरंसे, न परिमंडले; न किण्हे, न गीले, न लोहिए, न हलिद्धे, न सुकिल्ले न सुरहिगंधे, न दुराहिगंधे; न तित्ते, न कडुए, न कसाए, न अंविले, न महुरे, न कक्खडे, न मउए, न गुरुए, न लहुए; न सीद, न उण्हे, न गिद्धे, न लुक्खे; न काऊ, न रुहे; न संगे, न इत्थी, न पुरिसे, न अन्नहा, परिगणे, सएणे; उवमा न विञ्जति; अरूवी सत्ता, अपयस्स पयं नत्थि । -श्रीमदाचारांग सूत्र अर्थात-सिद्ध अवस्था को प्राप्त प्रात्मा न लम्बा है, न छोटा है, न लड्डू जैसा गोल है, न तिकोना है, न चौकोर है, न चूड़ी जैसा मठलाकार है । न काला है, न हरा है, न लाल है, न पीना है, न श्वत है, सुगंधमय है, न दुर्गन्धमय है, न मिर्च जैसा तीखा है, न कटुक है, न कसैला है, न खट्टा है, न मीठा है, कठिन है, न कोमल है, न भारी है, न हल्का है, न ठहा है, न उष्ण है, न चिकना है, न रूना है, इत्यादि किसी भी प्रकार का नहीं है। न उसे जन्म लेना पड़ता है, न मरना पड़ता है, किसी भी परपदार्थ का संग भी नहीं है । न वह स्त्री है, न पुरुष है, न नपुसक है। (३) रूपी पदार्थ का दृष्टान्त दिया जाय तो जैसे मिट्टी की मूस में मैण का पट लगा-पीतल आदि घातु का रस डाल कर श्रामषण श्रादि धनाते हैं । वह आभूषण उसमें से निकाल लेने पर मूस में मौम का श्रामास मात्र आकार रहता है । उसी प्रकार सिद्ध भगवान् की अरूपी आकार की अवगाहना है। (४) काच में दीखता हुआ प्रतिबिम्ब केवल प्रतिमास मात्र है, उसी प्रकार सिद्धों की अवगाहना समझना चाहिए। (५) सिद्ध भगवान् ज्योति स्वरूप कहे जाते हैं । इसका श्राशय यह है कि जैसे कमरे में एक दीपक जलाया तो उसका प्रकाश कमरे में समा बाता है और बहुत दीपक बलाये तो उनका मी प्रकाश उसी कमरे में समा जाता है। फिर मी प्रकाश क्षेत्र को रोकता नहीं है ( जमीन वाड़ी नहीं होती है)। ऐसे ही अनन्त सिद्ध मोक्ष में हैं । जहाँ एक हैं वहां अनन्त है, फिर भी जगह रुकती नहीं है । एक दीपक का प्रकाश बितनी बगह में फैलता है, वही उसकी अवगाहना एसी प्रकार सिहों की अवगाहना समझनी चाहिए। (६) सिद्ध भगवान् छमस्य की अपेक्षा श्ररूपी ई-टीवते नहीं हैं, तिर मी केवलज्ञानी उन्हें देखते हैं । वही जीप द्रव के प्रदेश है और उन्हीं की अवगाहना समझनी चाहिए । इन दृष्टान्तों से सिद्धा की अवगाहना समझती चाहिए। है, (१४४) * ध्यान-कल्पतरु * - तो वह कैसा है ? समस्त पदार्थो का परिक्षाता है-पूर्ण रूप से जानने वाला सदा स्थिरभूत विराब मान है । जगत में एक भी पदार्थ ऐसा नहीं है, जिससे उसको उपमा दी जाय, वह अरूपी सत्ता है। जो पदार्थ देखे हों, उन्हीं से उपमा दी जा सकती है और वही वचन से कहे जा सकते हैं। वे सब रूपी ही हो सकते हैं। अरूपी को रूपी की उपमा छाजती नहीं है और मिद्ध भगवान की अवस्था किसी भी प्रकार के विशेषण से व्यक्त करने योग्य नहीं है। इसीलिए कहा जाता है कि सिद्ध भगवान् को जानने के लिए बुद्धि और कहने को शब्द शक्तिमान नहीं है। केवल स्थूल और अपूर्व स्वरूप को व्यक्त करने के लिए, आभास मात्र देने के लिए शब्दोच्चारण किया जाता है। शास्त्र में कहा है - जह सव्वकामगुणियं, पुरिसो भोत्तूण भोयणं कोई । तण्डा-छुहाविमुक्को, अच्छेज्ज जहा अमियतित्तो ॥१८॥ इय सव्वकालतित्ता, अउलं निव्वाणमुवगया सिद्धा। सासयमव्वावाहय, वट्टइ सुही सुहं पत्ता ॥ १६ ॥ -उववाईसूत्र कोई पुण्यवन्त श्रीमन्त पुरुष सब प्रकार की सुख-सामग्री से युक्त है, तथा मनोज्ञ राग-रागिणी आदि अवण करके, नाटक आदि देख करके, पुष्प इत्र आदि सू घ कर, इच्छित पट्रसमय भोजन करके और इच्छानुसार समस्त सुखों का भोगोपभोग करके तृप्त हो जाता है और निश्चिन्त होकर सुख-शय्या पर मानद से बैठता है, वह कामनाओं से रहित एव सन्तुष्ट हुआ है. उसे अब भोग भोगने को कुछ भी इच्छा नहीं रह गई है, इसी प्रकार सिद्ध भगवान् सिद्धिस्थान में सब प्रकार से तृप्त हैं, निरीह (निष्काम) हैं, अतुल, अनुपम, अमिश्र, शाश्वत, अव्यावाध, निरामय, अपार सुख से तृप्त हुए की भाति सदा विराजमान हैं। उनको कदापि, किसी भी काल में, किसी भी प्रकार की, किंचित मात्र भी इच्छा उत्पन्न नहीं होती है । ऐसे परमानन्द परम सुख में सदा काल सस्थित रहते हैं। ऐसे-ऐसे सिद्ध परमात्मा के अनेक गुणों का रटन करके, मनन करके, निदिध्यासन करके, एकाम चित्त से तल्लोन होकर ध्यान करना चाहिए । ध्यान करते समय अन्य कल्पना को किंचित् मात्र भी हृदय में प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। ऐसा तन्मय हो जाय कि जिधर दृष्टि करे उधर वी-बहा दृष्टिगाचर हा । इस प्रकार तन्मय बना हुआ साधक दृढाभ्यास से, उसी स्वरूप को ज्ञानदृष्टि से देखने लगेगा । तत्पश्चात् सिद्ध स्वरूप की और स्व-स्वरूप की तुलना करे कि मिद्ध में और मुझ में क्या अन्तर है ? कुछ भी तो नहीं । जो यह स्वरूप है, वही वह रूप है । मेरा निज रूप हो परमात्मा के सदृश है। मैं सवज्ञ. मर्वदर्शी, अनन्त शक्तिमान हूँ, निष्कलक, निगबाध, चैतन्यमय मिद्ध बुद्ध परमात्मा मैं ही हूँ। इस प्रकार भेदरहित वुद्धि की निश्चलता-स्थिरता होने लगेगो । ऐसी स्थिरता प्राप्त करके अपने आपको शरीररहित, कर्म-कलक रहित शुद्ध चिदानन्दमय जानने लगे। पूर्ण एकत्व को प्राप्त फरे, द्वितीयपन किंचित भी न रहे। इस स्थिति में ध्याठा, व्येय और ध्यान का पार्थक्य मिटकर एक हो रूप रह जाता है। यही निर्विकल्प दशा है, यही अभेदसमावि है और यही अखण्ड चिन्मात्र की अनुभूति है। जिनके सर्वविकल्प दूर हो गए हैं, रागादि दोषों का क्षय हो गया है, जो जानने योग्य सर्व पदार्थों को यथातथ्य जानने लगे हैं, जो समस्त प्रपचा से विमुक्त हो गए हैं, मोक्षस्वरूप बन गय हैं और जिनको आत्मा में सम्पूर्ण ज्योति का प्रकाश प्रकट हो गया है, ऐसे परम पुरुष हा रूपातात ध्यान में ज्याठा कहलाते हैं। 4 - - । । .

( १४५ ) * ध्यान-कल्पतरु इस ध्यान के प्रभाव से, अनादि कालीन सुदृढ कर्मों का बन्धन क्षण मान में छिन्न भिन्न हो जाता है तथा तत्क्षण केवलज्ञान और केवलदर्शन का आविर्भाव होता है । ( यह ध्यान आगे कहे जाने वाले शुक्ल ध्यान के पेटे में है।) ऐसे शुद्ध ध्यान के प्रभाव से ध्याता पुरुष की आत्मा निर्मल हो जाती है और आठ ऋद्धियाँ एव आठ प्रकार की आत्मशक्तियाँ प्रकट हो जाती हैं । वे इस प्रकार हैं - (१) ज्ञानऋद्धि-यह अठारह प्रकार की है-(१) केवलज्ञान (२) मन पर्यवज्ञान (३) अवधिज्ञान (४) चतुर्दश पूर्वज्ञान (५) दशपूर्वज्ञान (६) अष्टाग निमित्तज्ञान* (७) बीजबुद्धि-जैसे शुद्ध क्षेत्र में योन्य वषो से घान्य को वृद्धि होती है, उसी प्रकार सहजानन्दी आत्मा में ज्ञान की विपुल वृद्धि होतीहै-अल्प ज्ञान का प्रचुर परिमाण में परिणत होना । (८) कोष्ठ बुद्धि-जैसे कोठो में रक्खा धान्य कम नहीं होता, उसी प्रकार प्राप्त हुश्रा ज्ञान कम न हो, उतना का उतना ही बना रहे । (६) पदानुसारिणी-एफ पद का अनुसरण करके अनेफ पदों को-सम्पूर्ण प्रथ-को समझ जाने की शक्ति । (१०) सभिन्न श्रोता-सूक्ष्म शब्द भी सुन ले तथा एफ समय में अनेक शब्द सुनने की शक्ति । (११) दूरास्वाद- भिन्न-भिन्न स्वादों को एक ही समय में जान लेना तथा दूरगत रस का स्वाद जानने को शक्ति होना । (१२-१६) प्रोत्र : चक्षु, घ्राण, रसना और स्पर्शन-इन पाँचों इन्द्रियों को तीव्र शक्ति होना (१७) प्रत्येक बुद्धता-बिना ही उपदेश सुने अन्य सयोग से वैराग्य आना (१८) वादशक्तिवादविवाद में इन्द्र प्रादि देवों को भी पराजित कर देने की शक्ति - होना। (२) किया ऋद्धि-इसके नौ भेद हैं-(१) जलचर-पानी में चले पर डूबे नहीं (२) अग्निचाणर-बाग पर चले परन्तु जले नहीं । (३-६) पुष्पचरए, पत्रचरण बीजचरण अर्थात फूल पर, पत्ते पर और बीज पर चलना, तथा ततुचरण-मकड़ी के जाले के ततु के सहारे भी चल सकना (७) श्रेणाचरण-पक्षी की तरह उड़े (८) जघाचरण तथा (8) विद्याचरण-प्रथोत् अघा को हाथ लगाकर तथा विद्या के प्रभाव से क्षण मात्र में अनेक योजन तक चला जाना । (३) वैक्रिय ऋद्धि-के ग्यारह भेद हैं-(१) अणिमा-छोटा सा शरीर बनाना (२) महिमा-बड़ा भारो शरीर बनाना (३) लधिमा-हवा जैसा हल्का शरीर बनाना (४) गरिमा-घर जैसा भारी शरीर बना लेना (५) प्राप्ति-पृथ्वी पर रह कर मेरु की चोटी का स्पर्श कर ले (६) प्राकाम्य-पाती पर स्थल- की तरह चले और पानी की तरह पृथ्वी में डूब जाय (७) ईशत्व-तोर्थकर भगवान के समत्रमरण आदि को जैमो ऋद्धि बना लेना (6) वशित्व-सब को प्यारा लगे (E) अप्रतिघात पर्षन को भा भेदकर उसके अन्दर निकल जाय (१०) अन्तर्धान-अदृश्य हो जाना और (११) काम रूप-इच्छानुमार रूप बना लेना। * निमित्त के श्राठ अग-(१) अन्तरिक्ष अाकाश म ग्रह नक्षत्र चन्द्र सय मेव आदि को देखकर (२) भौम-पृथिवी के कांपने से पृथ्वी के भीतर का निधान । (स्वजाना) जान ले (३) अंग-मनुष्य के अंग फडकने का पल जानना (४) स्वर-पत्नियों के बोलने से (५) लक्षण-मनुष्य-पशु श्रादि के लन्नण (शारीरिक चिहन देव कर (६) व्यवन -तिन मसा आदि का फल जानना (७) उत्पात-रक्तवर्ण ।टिशा श्रादि का फन बानना (८) म्वन-स्वप्न का क्ल बानना । इन पाठ निमितो ने शुमागुम पल को जानना । चारह योउन तक की दूरी से शुन्द को नुनले तया पचेन्द्रियों के विषय को नौ योचन की दूरी से ही पहचान से।

(१४६) * ध्यान-कल्पतरु * . - . (४) तप ऋद्धि के सात भेद है (१) उग्रतप-एक उपवास का पारणा करके दो उपवास करें दो के पारणे तीन उपवास, इस तरह जीवन पर्यन्त बढाता जाय सो उपतप, जीवन की कामना त्याग करके तप करना उग्रोग्रतप एकान्तर उपवास करें और उसमें अन्तराय आ जाय तोबेले वेले पारणा करें, इस प्रकार चढ़ाना जाय सो अवस्थितोपतप । (२) दीप्त तप-तपस्या करने से शरीर तो दुर्बल हो जाय, परन्तु शरीर से सुगंध भावे कान्ति पढे ( ३ ) तप्ततप-जैसे तपे लोहे पर पड़ा हुआ पानी मुख जाता है, उसी प्रकार तीव्र क्षुधा लगने से थोड़ा श्राहार करे जिससे कि लघुनीत बड़ी नीत की बाधा न हो, शरीर में देवता से भी ज्यादा बल पा बाय और अनेक लब्धियाँ प्राप्त हो (४) महातप ऋद्धि-मासक्षमण यावत छहमासी तप करे, क्षण भर मी प्रमाद न करके श्रुतज्ञान में लीन रहे, जिससे परमश्रत, अवधिज्ञान एव मन. पर्ययज्ञान की प्राप्ति हो । (५) घोरतप-महावेदना उत्पन्न होने पर भी किंचित् प्रमाद न करना, औषध न लेना, ग्रहण किया तप न छोड़ना, उग्र (विकट ) अभिग्रह धारण करना, शरीर की सार-समाल न करना, ममत्वहीन होकर विचरना । (३) घोर पराकम-तप और सयम के अतिशय से जगत्त्रय को भयभ्रान्त कर सकना, समुद्र को भी सोख जाने की शक्ति हो जाना और पृथ्वी को भी उलटी कर देने की शक्ति श्रा जाना, ऐसी-ऐसी अन्य महाशक्तियाँ मी उत्पन्न हो जाना (७) घोरगुण ब्रह्मचारी-नौ वाडों से विशुद्ध और नौकोटि से युक्त शुद्ध शीलघ्रत आदि के प्रभाव से तीन जगत के भयानक रोग को उपशान्त फरके शान्ति का प्रसार कर सके, सब भयों को दूर कर सके, व्यन्तरभय न हो, जंगमविप, स्थावरविष आदि का किंचित् भी असर न हो, जहाँ रहे वहाँ महामारी दुर्भिक्ष श्रादि उपद्रव न हो, इत्यादि महाप्रभाववान हो । (५) बलऋद्धि-के तीन भेद हैं-(१) मनोबली-राग, द्वेष, सकल्पविकल्प परिणाम से रहित मन रहना (२) वचनबली-अन्तमुहूर्त में द्वादशांगी का अभ्यास करे, बहुत समय तक पढ़ने पर मी थकावट न हो ( ३) कायवली-मास वर्ष पर्यन्त कायोत्सर्ग करने पर भी थकावट न होने की महाशक्ति होना । (६) औषधऋद्धि-के अोठ भेद हैं-(१) श्रामौषध-चरण की धूल के स्पर्श से रोगी का रोग दूर हो जाना (0) खेलौषध-श्लेष्म ( फफ) के स्पर्श से (३) जल्लौषध-पसीने के स्पर्श से (४) कान, अाँख, नाक आदि शगेर के मैल के स्पर्श से ( ५ ) विप्रौषध-मल-मूत्र के स्पर्श से (६) सर्वोषध-पूर्वोक्त सभी वस्तुओं के स्पर्श से रोगो का रोग नष्ट हो जाना (७) आशीविषौषध -विष भी अमृत के रूप परिणत हो जाय तथा वचन के श्रवण मात्र से सव विष दूर हो जाय (८) दृष्टिविषौषध--कृपा दृष्टि मात्र से विष अमृत बन जाय और कोप करके देखे तो अमृत भी विष हो जाय, महाविकारी भो निर्विकारी बन जाय, ऐसा महाशक्तिमान होना। (७) रसऋद्धि-इसके छह भेद हैं-(१) श्राशोषिष कोपयुक्त वचन मात्र से भौर (२) दृष्टिविष दृष्टिमात्र से दूसरे के प्राणों का नाश कर सके (३) क्षीरानको-नीरस आहार हाथ के स्पर्श मात्र से चोर जैसा हो जाय तया वचन मात्र से निबेल पुष्ट- सबल-हो जाय (४) मधुमास्रवी-कटुक आहार स्पर्श मात्र से से मधुर हो जाय तथा वचन मधु ( शहद ) जैसे परिणत हों (५) सर्पिरानवो-रूखा पाहार स्पर्श मात्र घृत सस्कृत के समान हो जाय तथा वचन से रोग का नाश कर सके (६) अमृतालवी-पर्श से विष भी अमृत हो जाय तथा वचन से जहर उतर जाय। (८) क्षेत्रऋद्धि-के दो भेद हैं-(१) अक्षोणमहानस-थोड़ा सा आहार भी स्पर्श मात्र से अक्षय हो जाय, चक्रवर्ती की सेना के भोजन करने पर भी समाप्स न हो (२) अक्षीणमझोलय-स्पर्श मात्र से भोजन, वन, पात्र मादि सब अक्षय हो जाय । - .

* ध्यान-कन्पतरु * (१४७ ) यह सब १८+६+११+७+३+६+६+२=६४ भेद लब्धियों अर्थात् ऋद्धियों के हैं। महान् तप और शुक्लध्यान के प्रभाव से ऐसी-ऐसी लब्धियाँ, श्रात्मशक्तियाँ मुनिराज को प्राप्त हो जाती हैं, परन्तु वे कदापि उनके फल की इच्छा नहीं करते हैं, उन लब्धियों का प्रयोग करना तो दूर हो रहा। अहो! अनन्तवीर्योऽयमात्मा विश्वप्रकाशकः । त्रैलोक्यं चालयत्येव, ध्यानशक्तिप्रभावतः ।। अर्थ-अहा ! यह अात्मा सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करने वाली है । इसकी शक्ति का फोन वर्णन कर सकता है ? यह अनन्त- अपार शक्ति से सम्पन्न है। आत्मा ध्यान के प्रभाव से, कदाचित् अपने पराक्रम को आजमावे तो, क्षण मात्र में तीनों लोकों को हिला सकती है। ध्यान का यह द्रव्य-प्रभाव है । भाव-प्रभाव से तो शुद्ध ध्यान अनन्त अक्षय मोत-सुख की प्राप्ति . कराने वाला है।

(१४८) * ध्यान-कल्पतरु * चतुर्थ शाखा-शुक्लध्यान 'सुक्के झाणे चउन्विहे चउप्पडोयारे पन्नत्ते । तं जहा:-' अर्थात-शुक्लध्यान के चार पाये, चार लक्षण, चार बालबन और चार अनुप्रेक्षाएँ, यह सोलइ भेद भगवान् ने फरमाये हैं। वे जैसे हैं वैसे यहाँ वतलाये जाते हैं.- धर्मध्यान की योग्यता प्राप्त करके, शुद्ध ध्यान ध्याते हुए मुनि अधिक गुणों को प्राप्त करते हैं । तब वह धीर वीर मुनीश्वर शुक्लध्यान के ध्यानी बनते हैं। शुक्लध्यानी के गुण शुक्लध्यान की योग्यता जिनको प्राप्त होती है, उनकी आत्मा में स्वभावत' सद्गुणों का उद्भव होता है। वह गुण 'सागार धर्मामृत' ग्रंथ की टीका में इस प्रकार बतलाये हैं। यस्येन्द्रियणि विषयेषु निवर्तितानि, सङ कल्पमप्यविकन्पविकारदोपः। योगैः सदा त्रिभिरहनिशितान्तरात्मा, ध्यानं तु शुक्लमिति तत्प्रवदन्ति सन्तः।। अर्थात्-(१) जिसकी इन्द्रियाँ विषयातीत हो गई हों, पाँच इन्द्रियों के २३ विषय और २४० विकारों से निवृत्त होकर, शान्त बनकर कुमार्ग में प्रवेश करने से अटक गया हो, । २) इच्छातीठ- मन सब प्रकार की इच्छा से निवृत्त होगया हो, जिससे चित्त में किसी भी प्रकार का सकल्प विकल्प 'चचलपन) भी न रहे । एकान्त न्यायमार्ग की ओर लग गया हो । सुरागनाएँ (अप्सरोएँ ) और सुरेन्द्र की ऋद्धि भी चित्त में क्षोम न उपना सकती हो, ध्यान से विचलित न कर सकती हो । इस लोक में पूजा-प्रतिष्ठा एवं & पांच इन्द्रियो के २३ विषय और २४० विकार इस प्रकार हैं- (१) ओरोन्द्रिय के जीवशब्द, अजीवशन्द और मिश्रशब्द, यह तीन विषय शुभ-अशुभ के मेद से ६ प्रकार के हैं। इन पर राग और द्वेष धारण करना १२ विकार हैं। (२) चक्षुरिन्द्रिय के काला, हरा, लाल, पीला और श्वेत, यह पांच विषय सचित्त, अचित्त और मिश्र के भेद से १५ प्रकार के हैं। शुभ-अशुभ के भेद से इनके ३० भेद होते हैं । इन ३० पर राग द्वाप करना ६० विकार हैं। (३) घाणेन्द्रिय के दो विषय हैं-सुगध और दुर्गन्ध । सचित्त, अचित्त और मिश्र के भेट से छह मेट है। इन पर राग-द्वष करना १२ विकार है। (४) रसेन्द्रिय के खष्टा, मीठा, तीखा, कटुक और कसैला, यह पांच विषय सचित्त, अचित्त और मिश्र के मेट और शुभ-अशुभ के मेद से ३० हैं। इन पर राग-द्वष धारण करना ६० विकार हैं। (५) स्पर्शनेन्द्रिय के हल्का, भारी, शीत, उष्ण, रुक्ष, चिकना, नरम और कठिन, यह आठ विषय सचित्त, अचिच और मिश्र के मेद से २४ और शुभ-अशुभ के भेद से ४८ मेद होते हैं । इन पर राग-द्वेष करना ६६ विकार हैं । यो कुल २३ विषय और २४० विकार है। - से १५ * ध्यान-कल्पतरु * ( १४६) लाघा की तथा परलोक में देवऋद्धि आदि की वाछ। न रहे । मेरु के समान परिणामों की धारा स्थिर हो गई हो। (३) योगातीत-अर्थात मन वचन काय के योगों का निरोध कर दिया हो । मन को श्रात्मज्ञान में रमा दिया हो, बिना प्रयोजन वचनों का उच्चारण न करे और काया का व्यापार भी बिना प्रयोजन न करे। एक स्थान पर स्थिर हो । (४) कपायातीत-क्रोध आदिपायों को आग को बुझा कर शीतल बन गया हो। अपमान या दूसरे मारयान्तिक कष्ट-घोर उपसर्ग श्राने पर भी फम्पित होना तो दूर रहा, परन्तु मन में दुर्भाव भी न लाना । ( ५ ) क्रियातीत- + अर्थात कायिकी श्रादि २५ क्रियाओं से निवृत्त हो गया हो । मन धादि के व्यापार से सर्वथा निवृत्त बनने पर वाह्याभ्यन्तर क्रिया का श्राना बद हो जाने से निष्क्यि बना हो। (६) दृढ़ सहनन (७) शुद्धचारित्र-जिनोक्त क्रिया करने वाले, विशुद्ध अध्यवसाय पाले (८ ) शोक और विकलता आदि से रहित तथा (8) निष्कप अर्थात अडोलवृत्ति वाले । इन सब गुणों से युक्त महापुरुष ही शुक्लध्यान कर सकते हैं। शुक्लध्यान के भेदो का वर्णन आगे किया जाता है। प्रथम प्रतिशाखा-शुक्लध्यान के पाये सूत्र-पुहुत्तवियक्के सवियारी, एगत्तवियक्के अवियारे, सुहुमकिरिय अप्पडिवाई, समुच्छिन्नकिरिए अणियट्टी। अर्थ-(१) पृथक्त्ववितर्क सविचार (२) एफत्ववितर्क अविचार (३) सूक्ष्मक्रिय अप्रतिपाती और (४) व्युच्छिन्नक्रिय अनिवृत्ति, शुक्लध्यान के यह चार पाये हैं । यह चारों पाये उत्तरोत्तर प्रगाढ़ हैं और पूर्ण स्थिरता की ओर बढ़ते जाते हैं। -- प्रथम पत्र-पृथक्त्ववितर्क - जीव और अजीव को पर्याय का पृथक्-पृथक् ( अलग-अलग ) विचार करे, अर्थात् श्रुतज्ञान (शास्रोक्त रीति ) से पहले जीव की पर्याय का विचार करते करते अजीव की पर्याय में प्रवेश करे और फिर अजीव की पर्याय का विचार करते-करते जीव की पर्याय में प्रवेश करे । नय निक्षेप, प्रमाण, स्वभाव, विभाव श्रादि रोति से भिन्न भिन्न चिन्तन करे, आत्मद्रव्य से धर्मास्तिकाय की पृथक्ता करे, द्रव्य गुण पर्याय का भी पृथक्त्व करे, आत्मा के मामान्य-विशेष गुण का भी पृथक्त्व करे, एक पर्याय के भो द्रव्य गुण पर्याय के भेद का चिन्तन करे और आत्मा के असख्यात प्रदेशों में से एक प्रदेश को भी व्यजन अर्थ और योग से चिन्तन करे, उसके द्रव्य, गुण और पर्याय का विचार करे । इस प्रकार विविध रूप से एक-एफ वातु का विचार करते हुए अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क उपजावे और अपने ही मन से उनका समाधान करता जाय । इस प्रकार उसमें तल्लोन बन कर अपनी आत्मा को ओर लक्ष्य पहुँचाये कि यह इन्द्रिय गोचर होने वाला +(1) प्रयोजन होने पर कर्म करना अर्थदण्ड क्रिया (२) निष्प्रयोजन क्रिया करना अनर्थदण्ड क्रिया (३) बंधात करना हिनादण्ड (3) अचिंतित कर्म हो जाना अक्म्मात् दण्ड (५) भ्रम से घात करना दिद्धिविपरियासिया मिया (६) झट बीनना मृपाप्रत्यय क्रिया (9) चार्ग कग्ना श्रदत्वादान दण्ड (८) अशुम ध्यान करना आध्यात्मिक प्रिया (E) अभिनान करना मानप्रत्यया (') भित्र पर दूप करना मित्रद्वेप प्रत्यया क्रिया (११) कपट करना माया- प्रलपा () लालच रुग्ना लोम प्रन्यया (१३) सूक्ष्म-गमनागमन प्राटि से होने वाली क्रिया । यह क्रिया केवलज्ञानी फोलादी। मातादि। १ (१५० ) * ध्यान-कल्पतरु * - तर्क- पुद्गलपिण्ड और इमके भीतर रहने वाली चैतन्यमय श्रात्मा--दोनों अलग दीखते हैं। यह भेद प्रत्यक्ष से प्रतिभासित हो रहा है। किन्तु अनादिकालीन एकत्रता के कारण, वहिष्टि में एक रूप दिखलाई देत किन्तु वस्तु स्वरूप से निज-निज गुणों से अलग-अलग हैं। जैसे क्षीर और नीर ( दृध और पानी ) मिन्ह कर एक रूप प्रतीत होते हैं, फिर भी दूध अपने स्वभाव में है और पानी अपने स्वभाव में हैं, अगर दोनों वास्तव में एकरूप हो गये होते तो हम को चोंच के पुद्गलों के प्रभाव से अलग-अलग कैसे हो जाते ? इसी प्रकार देह और जीव तथा फर्म और जीव एक रूप दिखाई देते हैं फिर भी आत्मा का चैतन्य गुण और बड़ का जड़ता गुण निज-निज सत्ता में अलग अलग है । अब मुझे दोनों को पृथक्ता का भास हुआ है। अब अनादि एकत्ववृत्ति का त्याग कर निज चैतन्य स्वभाव में स्थिरता प्राप्त करना योग्य है । द्वादशांग वाणी पानी रूप समुद्र में गोता लगाना चाहिए। यह ध्यान चौदह पूर्व के पाठी को ही होता है। इस ध्यान में मन वचन काय के योगों को इदता अपेक्षित है। फिर भी इस ध्यान के समय योगों का परिचत्तन होता रहता है । ध्याता एक योग से दूसरे योग का और दूसरे योग से तीसरे योग का अवलम्बन लेता है । विचार पलटने के कारण ही इस ध्यान का नाम पृथक्त्व वितर्क है । + यह पाठवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें गुण-स्थानों में वर्तमान मुनि को होता है । इस ध्यान से चित्त शान्त हो जाता है । धात्मा की अन्तष्टि जागृत हो जाती है । इन्द्रियाँ निर्विकार होता है और मोह का क्षय तथा उपशम होता है। द्वितीयपत्र-एकत्ववितर्क एकत्ववितर्क का विचार पहले पाये से उलटा है। अर्थात पहले पाये में पृथक् पृथक वितों का प्रतिपादन किया गया था, किन्तु इसमें एकता रूप तर्क वितर्क है । एकत्ववितर्क ध्यान में विधार पलटता नहीं है । एकत्ववितर्क ध्यानी एक द्रव्य का, एक पर्याय का या एक अणु का चिन्तन करते में एकाग्रता लगाते हैं और सुमेरु की तरह स्थिर हो जाते हैं। यह ध्यान सिर्फ बारहवें गुणस्थान में होता है। इस ध्यान में सलीन होने के पश्चात क्षण मात्र मोहनीय कर्म की प्रकृतियों का नाश हो जाता है और तदनन्तर अन्तमुहूर्त में ही ज्ञानावरणीय, रणीय और अन्तराय कर्म क्षरण हो जाते हैं। इस प्रकार चारों धनघातिया कर्मों का क्षय हो जाता है। (यहाँ तेरहवाँ गुणस्थान प्राप्त हो जाता है और दूमरे पाये से आगे बढते हैं।) तेरहवें गुणस्थान में प्रवेश करते ही केवलज्ञान और केवलदर्शन की प्राप्ति होती है। केवलज्ञान अपूर्व ज्योति है । वह पहले कभी नहीं प्राप्त हुआ, प्रथम वार ही प्राप्त होता है। केवल- ज्ञानी सर्वज्ञ सर्वदर्शी होते हैं। सर्व लोक और अलोक वाय और पाभ्यन्तर तथा सूक्ष्म और बादर, समस्त पदार्थों को कंवली भगवान् हस्तामलकवत् जानने और देखते हैं। त्रिकाल के भवितव्य को एक ही समय मात्र में देख लेते हैं । अनन्त दानलब्धि, भोगलब्धि, उपभोगलब्धि, लाभलब्धि और वल-वीर्यलव्धि की प्राप्ति होती है । उसी समय देवेन्द्र, मुनीन्द्र (धाचार्य) उन्हें नमस्कार करते हैं । कदाचित ऐसे महात्मा ने तीसरे पहले के भव में तीर्थक्कर गोत्र को उपार्जना की हो तो उसी समय समवसरण की रचना होती है । वली भगवान् समवसरण के मध्य में ३४ अतिशयों से युक्त होकर विरा- नमान होते हैं और ३५ गुणों से युक्त वाणी का प्रकाश करते हैं। उस वाणी रुप सूर्य का उदय होने में + पृथक् विविध प्रकार, वितर्क श्रुतशान थोर विचार अर्यात व्यजन योग तथा अर्थ का सक्रमण ! , उसी में दर्शनावर (१५१) * ध्यान-कल्पतरु * - - मिध्यावतिमिर का तत्तण नाश हो जाता है और भव्यजन रूपी फमलों का वन प्रफुल्लित होता है। उनके सद्बोध के प्रवण से, लघुकर्मी जीव सतपथ पर श्राद होकर भवभ्रमण रूप या सचित पाप रूप कचरे को जलाकर भस्म करते हैं और मोक्ष के सन्मुख होकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं । फेवलज्ञान ऐसा परमोपकार फरने वाला है । फेवली भगवान ही तीसरे पाये को प्राप्त करते हैं। तृतीयपत्र-सूक्ष्मक्रिय अप्रतिपाति सूचमकिय अप्रतिपाति नामक शुक्लध्यान का तीसरा पाया तेरहवें गुणस्थान में वर्तमान केवल- शानियों को होता है । इस ध्यान में सूक्ष्म अर्थात् थोड़ी क्रिया-कर्म- की रज रह जाती है। जैसे भुना हुश्रा अनाज खाने से पेट तो भरता है, परन्तु बोने से उग नहीं सकता है। इसी प्रकार अघातिया फर्मा की सत्ता से चलन आदि क्रिया कर सकते हैं, परन्तु वे धर्म भवांकुर उत्पन्न नहीं कर सकते । अब तक श्रायुकर्म है, तव तक वे कर्म रहते हैं और उनके योग से सूक्ष्म ईपिथिका क्रिया लगती है। अर्थात् मन, वचन, काय के शुभ योग की प्रवत्ति होने से, आहार विहार निहार आदि करने से सूक्ष्म जीवों की विराधना होने के कारण क्रिया लगती है। वह क्रियाकर्म पहले समय में बँधता है, दूसरे समय में वेदन किया जाता है और तीसरे समय निर्जीर्ण कर दिया जाता है, अर्थात् दूर हो जाता है। जैसे कांच पर लगी रज हवा से दूर हो जाती है, उसी प्रकार वह कर्म भी दूर हो जाते हैं । मोहनीय फर्म का अभाव हो जाने से उसमें स्थिति नहीं पड़ती, वह ठहर नहीं सकता। अप्रतिपाति का अर्थ है-एकबार प्रकट होकर फिर नष्ट न होने वाला । जैसे मति आदि चार ज्ञान परिणामों की वृद्धि से बढ़ते हैं और हीनता से हीन हो जाते हैं या चले जाते हैं, किन्तु केवलज्ञान एक बार पाकर फिर नहीं लौटता है। उसमें सम्पूर्णता है, अतएव हानि-पृद्धि भी नहीं होती है। चतुर्थपत्र-समुच्छिन्नक्रिय शुक्लध्यान के चौथे पाये का नाम समुच्छिन्नक्रिय अनिवृत्ति है । बह ध्यान चौदहवें गुणस्थान में होता है। चौदहवें गुणस्थान का नाम अयोगी-केवली गुणस्थान है । अर्थात् इस गुणस्थानवी भगवान् मन वचन और काय के योगों से रहित हो जाते हैं, जिससे समस्त क्रियाओं का उच्छेद (नाश) हो जाता है। जहाँ योग और लेश्या नहीं, यहाँ क्रिया का कोई कारण ही नहीं रहा। अतएव चे अक्रिय हो जाते हैं अनिवत्ति का तात्पर्य है शैलेशी सुमेरु पर्वत के समान स्थिर ) अवस्था को प्राप्त होना । इस अनुपम स्थिर अवस्था को प्राप्त कर लेने के कारण वे शुद्ध चितस्वरूप, परमानन्दमय और परम विशुद्धता निर्मलता से महित हो जाते हैं । अघातिक कर्मों का भी क्षय हो जाने से शुद्ध चैतन्य की अभिव्यक्ति हो जाती है। फिर वे उस स्वभाव से कदापि निवृत्त नहीं होते। जिस स्थिति में मोक्ष पधारते हैं उसी स्थिति में अनन्त-अनन्त काल तक विद्यमान रहते हैं। यह शुक्लध्यान का चौथा पाया है। द्वितीय प्रतिशाखा-शुक्लध्यान के लक्षण सूत्र-'सुक्कस्स ण झाणस्स चत्तारि लकखणा पनत्ता । तंजहाः-विवेगे, विउस्सरगे, भवहिए, भसंमोहे। मर्यात्-शुक्जम्यान के ध्याता के चार लक्षण (पहचान-चिह्न ) मगवान् ने फर्माये हैं वे इस प्रकार हैं-(१) विवेक भर्थात् निवृत्ति भाव २) व्युत्सर्ग-सर्वसग-परित्याग (३) अवस्थित-स्थिरीभूत (1) मसमोह मर्यात् मोहहोना। । .

(१५२ ) * ध्यान-कल्पतरु * । - भाकर प्रथम पत्र-विवेक विविक्त शुक्लध्यानी का सदा यही विचार रहता है कि- एगो मे सासओ अप्पा, नाणदसणसंजुश्रो । सेसा मे बाहिरा भावा, सव्वे संजोगलक्षणा ।। अर्थात-मैं एक हूँ। मेरा दूसरा कोई नहीं है । मैं दूसरे किसी का नहीं हूँ । अर्थात मुझे किसी भी द्रव्य ने उत्पन्न नहीं किया । जीवाव्य अनादि अनन्त है। इसको उत्पन्न करने की या नष्ट करने की शक्ति किसी भी अन्य द्रव्य में नहीं है । यह कमा उत्पन्न भी नहीं हुआ, क्योंकि इसकी सत्ता अनादि है, और कमी इसका नाश भी नहीं होने का, क्याफि यह अविनाशो और अनन्त है। इसी लिए कहा है-' मे सासमा अप्पा' अर्थात् मेरी श्रात्मा शाश्वत है । आत्मा असग है, अभग है, अरग है, सदा अपने चैतन्य गुण में रमण करने वाला है। पर-सग की इसे कुछ आवश्यकता नहीं है । आत्मा का निजगुण ज्ञान और दर्शन है । वह अनादि अनन्त है । ज्ञान और दर्शन कहने को तो दो हैं, परन्तु सगत्व को अपेक्षा एक ही हैं, क्याकि अकेलो ज्ञान किसी भी स्थान और किसी भी काल में ठहर नहीं सकता । ज्ञान के साथ ही दर्शन रहता है। ज्ञान का अर्थ जानना और दर्शन का अर्थ श्रद्धान करना अथवा देखना है । यहो जीव के लक्षण हैं। इनके सिवाय और जो कुछ है, वह सूक्ष्म ('अदृश्य ) हो या वादर (दृश्य ) पदार्थ हो, * सब चैतन्य द्रव्य से स्वभाव में और गुण में अलग है, क्योंकि वह सब अचेतन हैं, और सयोग-वियोग उनका सहज स्वभाव । कभी इधर-उधर से मिन भो जाते हैं और क्छुिड़ भी जाते हैं । इनका कुछ भरोसा नहीं है-श्रात्मा के साथ इनका कोई एकत्व नहीं है। आत्मा तो विशुद्ध चिदानन्दस्वरूप है। ऐसा जान कर शुक्लध्यानी स्वभाव से ही निवृत्तिभाव को प्राप्त होते हैं। अन्य प्रवृत्ति को प्रात्म- स्वभाव में प्रवेश करने का अवकाश ही नहीं मिलता है। द्वितीय पत्र-व्युत्सर्ग शुक्लध्यानी स्वभाव से ही सदा सर्व सग के त्यागी होते हैं कपिल केयलीजी ने फर्माया है.- विजहित्तु पुव्यसंजोगं, न सिणेई कहि वि कुब्जा । असिणेह सिणेहकरहिं, दोसपनोसेहिं मुच्चए मिक्ख ।। सव्वं गथ कलहं च, विप्पजह तहाविह भिक्खू । सब्वेसु कामजाएसु, पासमाणो न लिप्पई ताई ॥ * पुद्गल छह प्रकार के होते हैं -(१) बादर बादर जो टुक्डे होने पर आपस में मिलें नही, नेसे पाषाण, काष्ठ श्रादि । (२) बाद नो टुक्डे होने पर भी फिर मिल जाएँ, जैसे घृत, तेल, दूध श्रादि । (३) वाटर सूक्ष्म- नो दिखाई दें परन्तु ग्रहण न किये जा सकें, धूप, छाया, चांदनी श्रादि । (४) सूक्ष्म बाटर-शरीर से स्पृष्ट हो परन्तु दिखाई न दें, जैसे हवा, सुगध आदि । (५) सूक्ष्म-परमाणु, जिसके दो माग नहीं हो सकते हो । (६) सूक्ष्मस्म- -गोम्मटसार कर्म वर्ग के पुद्गल । - .

(१५३ ) * ध्यान-कल्पतरु * . . - सब प्रकार के संयोगों का-माता पिता श्रादि के पूर्व सयोग का, श्वपुरपक्ष के पश्चात-सयोग का और प्राभ्यन्तर सयोग गग द्वाप तथा कपाय रूप परिणति का फल महाक्लेश रूप प्रतीत हुश्रा, अतएव सब प्रकार के सयोगों से ममत्व दूर हो गया, सवध हट गया । शब्द आदि काम तथा गध श्रादि भोग पाश (बन्धन ) के समान मालूम हुए, प्रत उनसे स्वभावत विरक्त हो गए-राग-द्वप से रहित हो गए । यह सयोग ससार परिभ्रमण कराने वाला है, अत मुमुच पुरुष किसी भी पदार्थ पर राग न करे । जो अपने प्रति अनुराग रखते हैं, उनके प्रति भी स्नेह धारण न करे सर्वत्र राग-द्वेष विहीन वृत्ति धारण करे । सब प्रकार के सयोग का तथा कलह का त्याग करे । ससार के जितने भी काम-भोग हैं, उनके असली रूप को -दुखप्रद परिणाम को समझ कर षट्काय का और अपनी आत्मा का रक्षक मुनि कहीं भी लिप्त न हो। इस प्रकार की वृत्ति बन जाने से ज्ञानादि ग्लत्रय की स्वाभाविक ज्योति प्रदीप्त हो जाती है। श्रात्मा अनन्तज्ञान, अनन्त. दर्शन, चारित्र और अनन्त शक्ति रूप चतुष्टय का भोक्ता बन जाता है। तृतीय पत्र-अवस्थित अवस्थित अर्थात स्थिरीभूत हुए । अनन्त चतुष्टय की प्राप्ति से सर्वज्ञ, सर्वदर्शी निर्मोही बने । समस्त इच्छाओं से विनिमुक्त हुए । 'मेरुरिव धीग' अर्थात् जैसे प्रचड से प्रचड वायु चलने पर भी सुमेरु पर्वत चलायमान नहीं होता, उसी प्रकार महान् प्राणान्तिक कष्ट प्राप्त होने पर भी परिणामों को धारा कदापि चल- विचल नहीं होती । सदैव अविचल रहते हैं श्री उत्तराध्ययन सूत्र के द्वितीय अध्ययन में कहा है समणं संजयं दंतं, हणिज कोई कत्या। नत्थि जीवस्स नासो चि, एवं पेहेज संजए ॥ अर्यात-कषायों के नष्ट होने से श्रमण पद को प्राप्त, अपनी आत्मा को साधने के कारण सयत और रागादिक रिपुओं का नाश होने से दान्त बने हुए ऋषिराज महाराजाधिराज को किसी भी कर्मोदय से, कोई किसी भी प्रकार का कष्ट दे, प्राणों का घात करने वाला उपसर्ग करे, फिर भी वह तो यहो सोचते हैं फि मेरी प्रात्मा अविनाशो है, अनुपसर्ग है, उसका कदापि विनाश नहीं हो सकता। शरीर का अन्त आ सकता है, किन्तु यह मेरा नहीं है। नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः । न चैन क्लेदयन्त्यापो, न शोषयति मारुतः ।। -~भगवद्गीता, यह आत्मा शस्त्र से छेदी-भेदो नहीं जा सकती, आग इसे जला नहीं सकती, पानी गला नहीं सकता और हवा सुखा नहीं सकती। श्रतएव मुझे काई किसी भी प्रकार का उपसर्ग उपजाने में समर्थ नहीं है। 'नस्थि जीवत्स नासोति' जीव का नाश कदापि नहीं हो सकता अतएव में अमर हूँ। यह मनुष्य पशु या देव जिसका नाश करने के लिए प्रवृत्त हुए हैं, वह तो नाशवान है । आज, फल या कभी आगामी काल में इसका नाश अवश्य ही होगा। करोडो यत्ल करने पर भी यह रह नहीं सकता। जिनके अन्त करण में इस प्रकार का निश्चय हो जाता है, उन्हें किसी भी प्रकार की बाधा, पीड़ा दुख रूप मान्म नहीं पड़ती । गजसुकुमार मुनिराज के सिर पर भाम के भगारे रख दिये। तड़-तड़ करके ( १५४ ) * ध्यान-कल्पतरु * खोपड़ी जलने लगी और आखिर भस्मीभूत हो गई । परन्तु उनकी नाक पर या ललाट पर सलबट मी नहीं पड़ा! जैसे मरे हुए पशु के शरीर को चमड़ी उधड़ ली जाती है, उसी प्रकार खधक ऋषिराज के जीवित शरीर की चमड़ी उधेड़ी गई। रक्त की नालियाँ बह गई। परन्तु ऋषिराज ने तनिक-सा हाय मी नहीं किया। स्कन्धक मुनि के पाँच सौ शिष्य कोल्हू में तिलों की तरह पोल दिये गये, परन्तु वे नेत्रों में सारा मो लाली न लाये। मेतार्य मुनिवर के मस्तक के चारों ओर गोली चमड़ी का पट्टा फस कर लपेट दिया गया और उन्हें धूप में खड़ा कर दिया गया धूप से सूखकर चमड़ी सिकुड़ी तो आँखें बाहर निकल कर छिटक पड़ी । किन्तु उनके मन में तनिक भी दुर्भाव नहीं आया। ऐसे-ऐसे अनेक उदाहरण शास्त्रों में विद्यमान हैं। ऐसे महान् उपसर्ग के समय परिणामों को धारा एक-सो बनाए रखना सहज नहीं है, किन्तु मोक्ष प्राप्त करना भी तो आसान नहीं है। उन महात्मामों ने यही निश्चय हो गया था कि 'नत्यि जीवस्स नासो त्ति' अर्थात् आत्मा अजर अमर है,जीव का कदापि विनाश नही हो सकता। जलने वाला, गलने वाला, पड़ने वाला, सड़ने वाला तो श्रात्मा से अलग ही है, मैं आत्मा अलग हूँ। मैं केवल दृष्टा हूँ। इस प्रकार की परिणामधारा स्थिरीभूत हो जाने से उन महात्माओं ने स्वरूप काल में ही अनन्त कर्म वर्गणाओं का क्षय किया और अनन्त, अक्षय, अव्यावाध मोक्ष-सुख प्राप्त किया। चतुर्थपत्र-अमोह है शुक्लध्यान का चौथा लक्षण अमोह है। शुक्लध्यानी स्वभाव से ही मोहरहित होते हैं। मोहो बध्नाति कर्माणि, निर्मोही विमुच्यते । अर्थात-मोह से कर्म का बंध होता है और निर्मोहदशा कर्म-बन्धन से छुड़ाती है। इस प्रकार का निश्चय होने से शुक्लध्यानी को स्वभाव से ही निर्मोह अवस्था प्राप्त हो जाती है संसार में कोई भी पदार्थ उन्हें मोह को उत्पन्न करने वाला नहीं जान पड़ता उत्तराध्ययनसूत्र में चित्त मुनीश्वर के कथन का उल्लेख है कि- सन्वं विलवियं गीयं, सव्वं नर्से विडंबियं । सन्वे आभरणा मारा, सव्वे कामा दुहावहा ॥ अर्थात्-सभी गोत-गान विलाप के समान हैं, क्योंकि दोनों के-गीत के शब्दों और विलाप के शब्दों के उत्पन्न होने का स्थान और समावेश होने का स्थान एक ही है। मुख से दोनों उत्पन्न होते हैं और कानों में दोनों का समावेश होता है। दोनों राग-द्वेष की परिणति से परिपूर्ण हैं। गायन प्रेम का दर्शक और उदासी को दर्शक-दोनों प्रकार का होता है, इसी प्रकार रुदन भी प्रेमदर्शक और उदासीदर्शक दोनों तरह का होता है। प्रेम या उदासीनता का भाव जीव की मोह, गृद्धि आदि रूप भावना पर निर्भर है। गीत मोह-मद से भरे हुए होते हैं, कर्म विकार से उनका उद्भव होता है और चित्त में विचित्रनो उपजाने वाले होते हैं। इस प्रकार वे अनेक प्रसदभावों के कारण हैं। ऐसा जान फर और केवलशान से प्रत्यक्ष देख कर वेवों, * ध्यान-कल्पतरु * (१५५) किन्नरों, या मनुष्य आदि के गीतों को श्रवण करते हुए भी किंचित् मात्र भी राग-द्वप रूप परिणति उत्पन्न नहीं होने देवे । इसी प्रकार ससार के समस्त नृत्य नाटक विडम्बना रूप हैं। नृत्य और नाटक देस--देख कर हर्ष और उल्लास एव अनुराग तथा श्रासक्ति का अनुभव करने वाले लोग ऐसे कर्मों का वध करते हैं जिससे चतुर्गति रूप ससार में परिभ्रमण करना पड़ता है और नाना प्रकार की विडम्बनाएँ भोगनी पड़ती हैं । अत- एव विडम्बनाओं के कारण होने से नृत्य नाटक श्रादि विडम्बना रूप ही हैं । रागी जीव नाना तरह की विडम्बनाएँ भोगते हैं। कभी स्त्री, कभी पुरुष, कभी ऊँच और कभी नीच, इस प्रकार अनेक और विचित्र रूप धारण करके अनेक जनों के समूह या देवगणों के बीच में हास्य, रुदन और नृत्य श्रादि फरके बतलाना पड़ता है। फल की विचित्रता को भूलकर दोनों (नर्तक और प्रेक्षक ) इर्षानन्द में मन्न हो जाते हैं, मानों भवभ्रमण को विडम्बना से अभी तक सुप्त नहीं हुए हैं। सो अब स्वत नाच कर या नाव देख कर तृप्तिलाम कर रहे हैं। शुक्लध्यानी जगत् की यह विडम्बना देखकर, अपने ज्ञान से समस्त ससार के नाटक देखते हुए भी राग-द्वप के वशीभूत नहीं होते हैं-पूर्ण रूप से अलिप्त रहते हैं। इसी प्रकार समस्त प्राभरण (गहने ) भार रूप हैं । पृथ्वी से ही ककर पत्थर लोहा श्रादि सामान्य धातु उत्पन्न होते है और पृथ्वी से ही चाँदो सोना आदि धातुएँ तथा हीरा पन्ना भादि रत्न उत्पन्न होते है दोनों एक सरीखे जद रूप हैं, भारभूत हैं। फिर भी सरागी पुरुष ककरों और पत्थरों का वजन लादने में दुख मानते हैं, किन्तु रत्न के आभूषणों से लदे फिरते हैं, और उसमें हर्ष का अनुभव करते हैं । वीतराग पुरुष यथार्थ दृष्टि से देखते हुए आभूषण-विभूषित पर और नाम पर मध्यस्थ भाष धारण करते हैं। न किसी पर राग और न किसा पर द्वष करते हैं। इस जगत में जितने भी दुःख हैं, वे सब कामभोगों से ही उत्पन्न होते हैं। जो कामभोगों का अर्थी है, वही अनन्त दुःखमय ससार भार को वहन करता है । कामभोगों की अभिलाषा ही समस्त दुःखों और विपत्तियों का मूल कारण है। जगत् में प्रत्यक्ष हो यह सब तमाशा दीख रहा है। ऐसा जान फर ज्ञानी महात्मा स्वभाव से ही समस्त अभिलाषाओं से युक्त हो कर शान्त बन जाते हैं और मोह का सर्वथा नाश करके बोतराग बनते हैं। तृतीय प्रतिशाखा-शुक्लध्यान के आलम्बन सुक्कस्स णं झारणस्स चत्तारि आलंवणा पएणत्ता । तं नहा-खंती, मुत्ती, भअवे, महवे । अर्यात् शुक्तध्यान के चार भाधार हैं-(१) क्षमा (२। निर्लोमता ३) सरलता और (४) नम्रता। प्रथम पत्र-क्षमा समाश्रमण क्षमास्वभाव में रमण करते हुए अन्य की ओर से, परपुद्गलों से या स्वपरिणति की विपरीतता से, अगर चित्त में क्षोभ उपजाने वाले पुद्गलों का सयोग मिल जाय तो अपनी बात्मा के अथवा पर फी मात्मा के ज्ञान दर्शन चारित्र रूप पर्याय की सकरप-विकल्प द्वारा घात करे नहीं, कराधे नहीं और करने की प्रच्या जाने नहीं । अपने क्षमा रूप अमूल्य गुण का कदापि पात न होने दे। शुम-अशुभ सयोगों -- ( १५६ ) * ध्यान-कल्पतरु * में चित्तवृत्ति को स्थिर रखे और पुद्गलों के स्वभाव की तरफ दृष्टि रख कर विचार करे कि-जिन-जिन पुद्गलों का, जिस-जिस समय, जिम-जिस प्रकार से परिणत होने का द्रव्य क्षेत्र काल भाव रूप सयोग मिलता है, उस समय वे उस रूप में परिणत हुए विना नहीं रहते । यह जगत् का अनादि का स्वभाव है। शुक्लध्यानी की परिणति स्वभावतः इस पुद्गलपरिणमन की ओर से विरक्त रहती है, अतएन उसका उनकी आत्मा पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। पुद्गलों को कोई भी परिणति जगत में विद्यमान रहा हुए भी वीतराग की आत्मा का स्पर्श नहीं कर सकती, उनको अात्मा में किंचित भी विकार उत्पन्न करने में समर्थ नहीं हो सकती। - जगत की कार्य-परम्परा अनादिकाल से चली आ रही है और अनत काल तक चलती रहेगी। मन वचन काय के शुभाशुभ व्यापारों का चक्र अप्रतिहत गति से चल रहा है। मिथ्यात्व के भ्रम से भ्रान्त जीव दुर्विचार, दुरुच्चार और दुराचार करके, दूसरों से करा कर और फरने वालों का अनुमोदन करके कम- वर्गणा के पुद्गलों को आकर्षित करता है । जैसे चिकना घड़ा उड़ती हुई रज को आकर्पित करता है और मलिन बन जाता है, उमी प्रकार जीव उम कर्म-रज से मलीन हो जाता है। इस प्रकार निज स्वभाव का आच्छादन हो जाता है और परभाव में रमण करके विमाव को प्राप्त होता है। ज्ञानी पुरुष काच के घड़े का तरह निर्लेप होते हैं। उनकी आत्मा में मोह का चिकनारन नहीं होता । अतएव कामेण वर्गणा के पुद्गल उनकी आत्मा के साथ विपक नहीं सकते, ठहर नहीं सकते । वे मनोयोग आदि गेनों योगों की प्रवृत्ति से स्वभावतः ही अलग रहते हैं । निन आत्मा के गुणों में रमण करते हैं। इस जगत् में अनेक जीव वोलते हैं और अनेक जीव सुनते हैं। उस सब पर हम ध्यान नहीं देते हैं तो वे पुद्गल अपनी आत्मा में राग-द्वप को उत्पन्न नहीं करते हैं। उन्हीं शब्दों को श्राप अपनी भोर खींचें और यह मान लें कि यह गाली मुझे ही दी है तो, वे पुद्गल आपकी आत्मा में परिणत होकर आपको द्वीपपूर्ण बना देंगे। श्राप जरा दीर्घ दृष्टि से विचार कीजिए । वास्तव में कोई आपकी निन्दा करता ही नहीं है, क्योंकि आत्मा का स्वभाव ही ऐसा नहीं है कि उसकी निन्दो की जा सके । श्रात्मा तो ज्ञानादि अनन्त गुणों का सागर है और ज्ञानादि गुणों की निन्दा कोई करता ही नहीं है । निन्दा तो विषय काय श्रादि को को जाती है और वह परिणति कर्म ननित है । कम पुद्गलरूप हैं, उनका स्वभाव यात्मा से सवथा विपरीत है। इसी कारण वे निन्दा के पात्र हैं। उनकी निन्दा तो होगी हो । चेतन ! तू चैतन्य स्वभाव वाला है । कर्मों से अलग है। फिर फर्मों के अधीन होकर तथा जड़-चेतन को एक मान फर क्यों मलिन बनता है ? पुद्गलों की निन्दा सुनकर क्यों बुरा मानता है ? जिन्हें जगत् बुरा कहना है, उन्हीं को वे वचन लगें और उन्हीं दुगुणा का नाश हो कि जिससे मेरा हित हो सके। शुक्लध्यानी की श्रात्मा में ऐसे और इसमे भी अत्युत्तम विचार ठसे रहते हैं। वे स्पष्ट रूप देखते हैं कि क्रोध विश्वानल होकर जीवों की स्वाभाविक परिणति को शान्ति को और मद्गुणों को भस्म कर रहा है। वे चाहते हैं कि मेरी आत्मा इस भीपण आग से अलग हो रहे । शुक्लध्यानी की आत्मा नानादि गुणों के महासमुद्र में अवगाहन कर रही है, उसे क्रोध की ज्वालाएँ स्पर्श नहीं कर सकतीं। उन्हें वह छू नहीं सकती। वे सदा सवृत्त, निवृत्त, शान्त, शीतलीभूत अखण्डानन्द में रमण करते हैं। । । से -- - । - . -- - * ध्यान-कल्पतरु * ( १५७) द्वितीय पत्र-निर्लोभता उस मे अखिल जगत लोभ और तृष्णा के पाश में फंस रहा है। शुक्लध्यानी महात्मा जड़ मूल से पाश को छिन्न भिन्न करके सन्तोष में स्थित हुए हैं । ज्ञानी जन भलीभांति जानते हैं कि इस जगत् में कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं है जिसका म्वामी यह जीव कई वार न बन चुका हो या भोगोपभोग न कर चुका हो । अनन्त-अनन्त बार यह जीव समस्त पुदगलों का स्वामी बना है और अनन्त अनन्त यार सब का भोग मो कर चुका है। एक बार अाहार करके निहार को हुई वस्तु को देखते ही घृणा और जुगुप्सा उत्पन्न होती परन्तु आश्चर्य की बात तो यह है कि जिन वस्तुओं का अनन्त वार श्राहार करके निहार फर आया है, उन्हीं का भोगोपभोग करने के लिए बहुत से जीव तरम रहे हैं, तडफ रहे हैं, उनको तृष्णा व्याकुल हो रहे हैं । जिन वस्तुओं को अनन्त बार भोग लने पर भी तृप्ति नहीं पाई, उन्हें एक बार और भोग लेने से क्या तृप्ति श्रा जाएगी १ नहीं, सन्तोष धारण किये विना कदापि तृप्ति नहीं पा सकती। मगर मोह की लोला अपरम्पार है । जगत् के जीव विचारहीन बन रहे हैं । पत्तमान काल के शरीर के पुद्गल तथा पहले धारण किय हुए शरीरों के पुद्गल, जगत् के सब जीवों के भक्ष्य बन चुके हैं। सब ने उन सघ पुद्गलों का आहार करके निहार कर दिया है। उसी प्रकार अन्य सब प्राणियों के धारण किये शरीरों के पुद्गलों का अपन भी अनन्त बार भक्षण कर चुके हैं। यह जीव जगत को समस्त ऋद्धि का स्वामी बन चुका है और जगत के समस्त जीवों का दास भो बन चुका है। यह जीव अनन्त पर्याय रूप ससार में भ्रमण कर आया है, सब खाद्यों को खा चुका है, सर्व पेयों को पी चुका है, किन्तु प्रयोजन कुछ भी सिद्ध नहीं हुश्रा, अाखिर रहा वैसा का वैसा हो । वास्तविक दृष्टि से देखा जाय तो न मैं किसी का हुआ, न कोई मेग हुा । न मुझे किमी ने खाया और न मैं ने किसी को खाया | पुद्गल हो पुद्गल का भक्षण करता है और छोड़ता है। ये भोव पुद्गलों में ही होते रहते हैं । मुझे उससे प्रयोजन हा क्या है ? मैं चेतन और यह पुद्गल । जैसे नाटककार नाना प्रकार के रूप धारण करके प्रेक्षकों को प्रसन्न करने के लिए अनेक अभिनय करता है, कभी रोता है, कभी हसता है, आदि-श्रादि । परन्तु प्रेक्षक को उसका चरित्र देखकर सुख-दुःख का अनुभव करने की क्या आवश्यकता है? इसी प्रकार इस जगत के नाटक का मैं प्रेतक हूँ । इसको विचित्रता देखकर, इसके विचार में लीन होकर मुझे दुखी होने का कोई आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार की भावनाएँ और इनसे भी प्रत्युत्कृष्ट भावनाएँ शुक्जध्यानी के हृदय में स्वभाव से हो प्रवृत्त होती रहती हैं । इस कारण सहज ही सर्वसग के परित्यागी होकर, सिद्धात्मा की भाँति सदा निरीह भाव में, तृप्ति पूर्वक रमण करते रहते हैं । - - तृतीय पत्र-आर्जव । आर्जव का अर्थ है-ऋजुता या सरलता । शुक्लध्यानी स्वभाव से हो सरलता के साथ प्रवृत्ति करते हैं। सूत्रकृतागसूत्र में बतलाया गया है कि प्राये और सरल आत्मा हो धर्ममार्ग मे गति-प्रवृत्ति कर सकता है। ज्ञानी समझते हैं कि वक यात्मा का धनी अन्य को ठगने जाता है तो आप ही ठगा जाता है और एक पार गाया हुआ प्रापी फर्मानुयोग से मवान्तरों को प्रोणियों में अनन्त वार ठगा जाता है । सर्व पुद्गल- (१५८) * ध्यान-कल्पतरु * है परिणति में परिणत पदार्थ कुटिलता से भरे हए हैं । सकर्मा जीव उनमें परिणामों की प्रवृत्ति करता हुआ पुद्गलों का पाकपण करके तद्र प बनता है। उसे मायाशल्य कहते हैं । मायाशल्य मिथ्यादर्शन का मूल इस शल्य से आत्मा के ज्ञानादि गुणों का आच्छादन होता है। शल्य फाँटे को कहते हैं। जैसे शरीर के भोतर रहा हुअा फाँटा तन्दुरुस्ती में बाधा पहुँचाता उसी प्रकार माया रूप शल्य जिनके हृदय में प्रविष्ट है, उनका ध्यान समीचीन नहीं हो पाता । जैसे साध म्यान में बाकी तलवार प्रवेश नहीं करती है, उसी प्रकार वक्र प्रकृति के धनी के हृदय में शुभ ध्यान प्रवेश नई करता है। ऐसा निश्चय होने से शुक्लध्यानी के हृदय से माया स्वभाव से ही नष्ट हो जाती है। शुक्लध्यानी विचारते हैं कि कपट किसके साथ किया जाय ? चैतन्य के निज गुण तो कपट से छर नहीं जा सकते । आत्मा का निज स्वभाव सरल शुद्ध और पवित्र है। उसे छोड़कर मलिनता में पड़ना है अज्ञान दशा है। ऐसा जान कर शुक्लध्यानी महात्मा स्वभाव से ही परम ज्ञानी परमध्यानी, निष्कपट, निर्विकार सदा अत्मगुणों में निमग्न, वाह्य और अन्तरग में शुद्ध सरल प्रवृत्ति करने वाले ही होते हैं । । चतुर्थ पत्र-मादव । । । मान का मर्दन करना मार्दव कहलाता है। शुक्लध्यानी महापुरुष स्वभाव से हो अभिमान हो होते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि इस जगत् में बड़ा मीठा और वडा जबर्दस्त शत्रु अभिमान है। यह मनुष्त को ऊँचा चढ़ाफर नीचे गिरा देता है। नीचे गिरा देता है । जो देवलोक के सुखों में मम हो रहे हैं, उन्हें तिर्यञ्च गति में डालत है। अभिमान से ऐसी अनेक विडवनाएँ होती हैं। शुक्लध्यानी जानते हैं कि अभिमानी किस बात का किया जाय ? देखिए, अभी किसी निरक्षर मूह मनुष्य को कोई पण्डित कहे तो वह चिढता है । निर्धन को श्रीमत कह दिया जाय तो यह बुरा मानता है कहता है-हमारी इसी करते हो ? इसी प्रकार ज्ञानी के कोई गुणग्राम करे तो यह यही सोचते हैं कि या सम्पूर्ण गुण तो मेरी आत्मा में है ही नहीं। फिर इन प्रशंसा-वचनों को सुन कर मुझे अभिमान करने की क्या आवश्यकता है ? यह मेरी प्रशसा नहीं करता है, किन्तु मुझे उपदेश करता है कि सत्य, शील, दया क्षमा आदि गुणों को स्वीकार करो। शुक्लध्यानी सर्वोत्तम गुणों से सम्पन्न होकर भी अपने गुणों का किंचित् मात्र भी अभिमान नहीं फरते । वे सदैव निरभिमान रहत हैं । मनुष्य का विचार करन चाहिए कि जो प्रशसा या स्तुति की जाती वह तो गुणों की को जाता है, उसका अभिमान गुणों को तो होता नहीं है फिर बीच में मुझे अभिमान करने की क्या आवश्यकता है ? ससार में सुनते हैं कि अमुक अच्छी वस्तु की सराहना की, जिससे वह बिगड़ गई, उसे नजर लग गई । बस, इसी प्रकार गुणानुवाद करने से तू अभिमान करेगा तो तेरे ही गुणों की खराबी होगी । ऐसा जान कर क्यों अभिमान करना और क्यों गुणों को खराब करना? सद्गुणों की जो प्राप्ति हुई है, वह आत्मा का सुधार करन से हुई है। अब उसी से बिगाड़ करना कितनी भयकर भूल है। शुक्लध्यानी पुरुषों को स्वभावत. इस प्रकार का निश्चय होने से उनकी आत्मा सदैव निरभिमान- नम्रीभूत रहती है। शुक्लध्यान के ध्याता मुनिवरों को इन पार सदगुणों का स्वभाविक मालम्बन रहता है, अतएव वे अखण्ड मप्रतिपाती ध्यान में लीन रहते हैं। ।

* ध्यान-कल्पतरु * (१५६ ) - चतुर्थ शाखा-शुक्लध्यान की अनुप्रेक्षाएँ सुक्कस्स ण माणस्स चत्तारि अणुप्पेहाओ पएणत्तायो । तं जहा–अवायाणुप्पेहा, असुमाणुप्पेहा, अणंतवित्तीयाणप्पेहा, विप्परिणामाणुप्पेहा । अर्थात्-शुलभ्यान ध्याता को चार अनुप्रेक्षाएँ-विचारणाएँ कही गई है। वह इस प्रकार हैं- (१) अपायानुप्रेक्षा-दुख से निवृत होने का विचार (२) अशुभानुप्रेक्षा-अशुभ प्रवृत्ति श्रादि से निवृत्त होने की भावना (३) अनन्त वृत्तितानुप्रेक्षा-अनन्त भव परम्परा की विचारणा (४) विपरिणामानुप्रेक्षा- विपरीत परिणामों से निवृत होने का विचार । शुमलध्यानी को यह चार प्रकार का विचार स्वाभाविक होता है। प्रथम पत्र-अपायानुपेक्षा भवभ्रमण करने वाले जीव को (१) मिथ्यात्व (२) अविरति (३) प्रमाद (४) फषाय और (५) योग अनन्त विडम्बना देने वाले हैं। (१) मिथ्यात्व-निनात्मा की वीतरागदशा के अनुभव में जो विपरीत रुचि होती है, उसमें अभिनिवेश (श्राग्रह ) उत्पन्न करने वाला तथा पर-पदार्थों को प्रात्मतत्त्व से सम्बन्धित करके सम्पूर्ण द्रव्यों में विपरीत श्राग्रह उत्पन्न करने वाला विकार मिथ्यात्व है। (२) अविरति-अन्तरग में, 'श्रात्मा ही परमात्मा है' इस प्रकार की भावना से उत्पन्न हुए परम- सुख रूप अमृत के समान भोजन करने की रुचि को जो पलट दे वह, तथा बहिरग में जो व्रत आदि न धारण फरने दे, उसे अविरति कहते है। (३) प्रमाद-अन्तरंग में प्रमाद रहित शुद्धात्मा की अनुभूति से विचलित करने वाली परिणति तथा बहिरंग में मूल गुणों और उत्तर गुणों में अतिचार उत्पन्न करने वाली प्रवृत्ति प्रमाद है। (४) कषाय-अन्तरग में, परम उपशममूर्चि, स्वमाष से ही केवलज्ञानादि अनन्त गुणों को धारण फरने वाले शुद्ध प्रात्मस्वरूप में जो क्षोभ उत्पन्न कर दे तथा बहिरग में विषयों के संबंध से क्रूरता आदि आवेश रूप नो कोष आदि हैं, यह कषाय (५) योग-निश्चय से श्रात्मा क्रियारहित है। किन्तु व्यवहार से, वीयांन्तराय फर्म के चयोपशम से उत्पन्न, मन वचन और फाय की पुद्गलवर्गणाओं का अवलम्वन करने वाला और कर्मों को ग्रहण करने में फारणभूत घात्मा के प्रदेशों का सघलन योग कहलाता है। वह पाँच आस्रव ससारी जीवों में अनादिकाल से हैं। इनसे अनत ससार रूप परिमति हो रही है। अर्यात् यह पाँच प्रास्रव अनादि काल से प्रात्मा में विद्यमान हैं और आत्मा को अनन्त ससार में परिभ्र. मण फरा रहे हैं। शुक्लध्यानी मुनि ने पाँचों प्रास्रवों का नाश कर दिया है अतएव वे (१) क्षायिफ सम्य- पत्व (२) ययात्यात पारिन (३) अप्रमत्चदशा (४) वीतरागता और (५) स्थिरस्वभावता को प्राप्त । - -- - ( १६०) * ध्यान-कल्पतरु * जाता द्वितीय पत्र-अशुभानुप्रेक्षा जीवों के शुभाशुभ होने के दो मार्ग हैं-(१) निश्चय भौर ( २ ) व्यवहार । निज गुणों में प्रवृत्ति करना निश्चय है और वाह्य प्रवृत्ति को व्यवहार कहते है। छद्मम्थों के लिए व्यवहार पहला है अर्थात वे व्यवहार शुद्ध कार्य करते हुए निश्चय की ओर दृष्टि रखते हैं और सर्वज्ञ निश्चय की प्रवृत्ति करते हुए व्यवहार को नहीं बिगाड़ते हैं। कर्म संबंध के विपय में भी दोनों दृष्टियों से अर्थात निश्चय नय और व्यवहारनय से विचार किया । व्यवहार में कर्म के कर्ता पुद्गल है। हैं। त्रियोगरहित शुद्ध प्रात्मा की जो भावना है, उससे विमुम्ब होकर, उपचरित श्रमद्भूत व्यवहारनय मे ज्ञानावरणीय आदि द्रव्य कर्मों का तथा औदारिक वैक्रिय श्राहारक-इन तीन कर्मों का एव शरीरपर्याप्ति, श्राहारपर्याप्ति, श्वासोल्लास पर्याप्ति, मनःपर्याप्ति और भाषा पर्याप्ति रूप नोकर्म का तथा उपचरित अमद्भूत नय से वाह्य विषय-घट पट श्रादि का भी यही कर्ता यह व्यवहारमय की व्याख्या कही गई। निश्चयनय की अपेक्षा से चेतन कर्म का फर्ता है। वह इस प्रकार स्वभाव मे रागादि विकल्पों रहित और क्रिया से रहित जीव ने रागादि उत्पन्न करने वाले कमों का उपार्जन किया। उन कर्मों का होने पर श्रात्मा अपने स्वभाव से च्युत होकर भाव कर्मों का अर्थात राग फर्मों का अर्थात राग द्वप श्रादि का कर्ता होता और जब यह जीव तीनों योगों के व्यवहार से रहित, शुद्ध तत्त्वज्ञ एक स्वभाव में परिणत होता अनतज्ञान और अनन्त सुख श्रादि का तथा शुद्ध भावों का एकदेश शुद्धनिश्चय से कर्ता होता है । मुर जीव निश्चय से अनन्त ज्ञान आदि शुद्ध भावों का ही कर्ता हैं। इस प्रकार शुद्धाशुद्ध भावों की जो परिणति है, उसका फर्त्ता जीव को ही समझना चाहिए। क्यों नित्य, निराकार, निष्क्रिय ऐसे आत्मस्वरूप की भावना से रहित जीव ही कर्म का कर्ता कहा गया है । प परिणति ही शुभाशुभ वन्ध का मुख्य कारण है। अत उससे निवृत्त होकर अपनी आत्मा में ही भान करनी चाहिए। जीव व्यवहारनय से कर्मों के फल सुख-दुख रूप फल का भोक्ता है । निश्चयनय से चैतन्य म का ही भोक्ता है । वह चैतन्य भाव किसका है ? इस पर विचार किया जाय तो ज्ञात होगा कि वह पार काहा है। शुद्ध निज श्रामा के ज्ञान से उत्पन्न हुए पारमार्थिक सुख रूपी अमृतरस का पान न करता हु आत्मा उपचरित असदभूत व्यवहार नय से इष्ट तथा अनिष्ट पाँचों इन्द्रियों के विषयों में उत्पन्न हुए सु तथा दुःख को भोगता है। इसी प्रकार अनुपचरित असद्भुत व्यवहार को दृष्टि से अन्तरग में सुम्य तर दु.ख को उत्पन्न करने वाले, द्रव्य कमे सात-साता रूप उदय को भोगता है और वहा आत्मा हर्प तय 'शोक को प्राप्त होता है। शुद्ध निश्चयनय से प्रात्मा परमात्मस्वभाव के सम्यक् श्रद्वान, ज्ञान और चारित्र र उत्पन्न अविनाशी आनन्द रूप एक लक्षण का धारक है। और उसी श्रानन्दामृत का भोका साराश यह है कि स्वभाव से उत्पन्न हुए सुखामृत के भोजन की प्राप्ति न होने से आत्मा इन्द्रिय- । जनित सुख को भोगता हुआ ससार में परिभ्रमण करता है, और स्व-स्वभाव से उत्पन्न होने वाला इन्द्रिय का अगोचर जो सुख है,वही वास्तव में ग्रहण करने योग्य है। शुक्तध्यान के ध्याता उमी सुम्ब हैं, जिससे संसार रूप वृक्ष के शुभ-अशुभ, मधुर-कटुक, उबग-नीचता श्रादि फला का दाता एव पुदगल- मय परिणति में परिणत विभाव का सहज ही त्याग हो जाग है । अतएव वे शुद्ध प्रात्मानन्द चैतन्यमय स्वभाव में सदा रमण करते हैं। - 4 को ग्रहण करते * ध्यान-कल्पतरु * ( १६१ ) तृतीय पत्र-अनन्तवृत्तितानुप्रेक्षा - - अनन्त ससार में परिभ्रमण करने की जो प्रवृत्ति है, उससे निवृत्त होने का स्वाभाविक हो विचार होना अनन्तवृत्तितानुप्रेक्षा है । यथा इस अात्मा ने ससार में अनन्त पुद्गलपरावर्तन किये हैं। वे पुद्गल- परावर्त्तन आठ प्रकार के हैं:- ( १ ) द्रव्य से बादर पुद्गलपरावर्तन-औदारिक, वैक्रिय, तैजस और फार्मण शरीर तथा मन, वचन और श्वासोच्छवास के भेद से सात प्रकार का है। अर्थात औदारिक आदि उक्त सातों के जितने पुद्गल जगत् में हैं, उन सब का स्पर्श करना। (२) द्रव्य से सूचम पुद गलपरावर्तन-पूर्वोक्त सातों प्रकार के पुद गलों में से पहले सम्पूर्ण लोक के सब औदारिफ पुदगलों का अनुकम से स्पर्श करे, किंचित मा छोड नहीं तत्पश्चात् इसी प्रकार वैकियपुद् गला का, फिर तैजसपुद गलों का और इसी क्रम से सातों का स्पर्श करे । (३) क्षेत्र से बादरपुद गलपरावर्त्तन-सुमेरु पर्वत से दशों दिशाओं में आकाश की असख्यात श्रेणियाँ मकड़ी के जाले की तरह फैली हैं। उन सब को जन्म-मरण करके स्पर्श करे। (४) क्षेत्र से सूक्ष्म पुद्गलपरावर्तन-पूर्वोक्त प्रकाश श्रेणियों में से पहले एक श्रेणी ग्रहण करके उसमें जन्म मरण करे और अनुकम से, मेरु से लगाफर लोकपर्यंत जन्म मरण करता जाय-जरा भो छोड़े नहीं । फिर दूसरी श्रेणी में, फिर तीसरी श्रेणी में, इस प्रकार समस्त असख्यात श्रेणियों में जन्म-मरण फरके उनका स्पर्श करे। (५) काल से बादर पुद्गलपरावर्तन-समय, पावलिका, स्तोक, लव, मुहूर्त, दिन, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, पूर्व, पल्य, सागर, श्रवसर्पिणी, उत्सर्पिणी और कालचक्र, इन सब कालों में जन्म मरण करके इन्हें स्पर्श करे। (६) काल से सूक्ष्म पुद्गलपरावर्तन-प्रवसर्पिणी काल के प्रथम समय में जन्म लेकर मरे, फिर दूसरी बार अवसर्पिणो फाल लगे तो उसके दूसरे समय में जन्म लेफर मरे, इस प्रकार प्रापलिका का समय पूर्ण होने तक जन्म मरण करे। फिर जब अवसर्पिणी काल लगे तो उसकी पहली प्रालिका में जन्म लेकर मरे, दूसरी वार की अवसर्पिणी की दूसरी पावलिका में जन्म मरण करे । इस प्रकार स्तोक का काल पूरा फरे। इसी प्रकार अनुक्रम से पूर्वोक्त सभी कालों को जन्म मरण करके स्पशे करे। (७) भाव से वादर पुद्गलपरावर्चन- -पाँच वर्ण, दो गध, पाँच रस और आठ स्पर्श के पुद्गलों फा स्पर्श करना। ८) भाव से सूक्ष्म पुद्गलपरावर्तन-पहले एक गुण काले वर्ण के जगत् में जितने पुद्गल हैं, उन सब का स्पर्श करे फिर दो गुण काले वर्ण वाले पुद्गलों का स्पर्श करे, इसी प्रकार तीन गुण काले यावत् असख्यात गुण काले वणे के पुद्गलों का स्पर्श करे । इस तरह काले वर्ण के समस्त पुद्गलों का स्पर्श करने के पश्चात् हरे वर्ण के पुद्गलों को काले पुद्गलों की तरह अनुक्रम से स्पर्श करे । यही क्रम वोसों तरह के पुद्गलों का स्पर्श करने में समझना चाहिए । सब पुद्गलों का स्पर्श करने पर परावर्तन पूरा होता है। इस प्रकार पाठ पुद्गलपरावर्तन करने पर एक पुद्गलपरावर्तन कहलाता है। प्रत्येक नीव ने ऐसे मनन्त पुद्गलपरावर्तन पूर्ण किये हैं। अपना जीव भी इन्हें कर चुका है।

( १६२) * ध्यान-कल्पतरु * - से - । - इस भवपरम्परा में भ्रमण करते-करते अनन्तानन्त पुण्योदय होने पर मनुष्य जन्म की प्राप्ति हुई। तव शुक्लध्यान पर आरूढ होने योग्य अत्युत्तम सामग्री की प्राप्ति हुई है। यह सामग्री उन पुद्गलपरावनों मुक्त करके अखडिल, अचल, निरामय मोक्ष का सुख देने वाली है। ऐसा निश्चय शुक्लध्यानियों को म्वभाव से ही होता है । तथा अनन्त जीव अनन्त पुद गलों का परावर्तन करते हुए विभाव रूप विचित्रता को प्राप्त होते हैं, उनकी प्रतिच्छाया उनको शुद्ध आत्मा में पडती है। अतएव वे अप्रतिपाती शुङ्गशध्यान में सदा मन रहते हैं। चतुर्थ पत्र-विपरिणामानुप्रेक्षा ३४३ रज्जुपरिमित यह सम्पूर्ण लोक सचेतन-अचेतन पदार्थों से परिपूर्ण है । लोक के समस्त पुन गल क्षण-क्षण में विपर्यास पा रहे हैं । मिट्टी के पिण्ड में से कुम्भार अच्छे-बुरे और छोटे बड़े अनेक प्रकार के भाजन बनाता है । मनुष्याकार, पशु के श्राकार के तथा नाना आकारों के चित्र-खिलौना-बनाता है। उन्हें देखकर बहुत से लोग किसी को अच्छा और किसी को बुरा कहते हैं । यद्यपि वह सब भाजन और खिलौने एक ही मिट्टी से बने हैं उनके उपादान में कोई अन्तर नहीं है, सिर्फ दृष्टि का फेर है । इसी प्रकार सम्पूर्ण लोक जीवों और पुद गलों से भरा है। अनन्त परमाणुओं के समूह से और पच कारणसमवाय की प्रेरणा से पूरण गलन (मिलन-विछुड़न) होने पर अनेक श्राकारों का निर्माण होता है । इस प्रकार अनादि काल से पुद गलों का परिणमन हो रहा है और अनन्त काल तक होता रहेगा। एक रूप मिटता है और दूसरा रूप उत्पन्न होता है। यह क्रम कभी वन्द होने वाला नहीं है। इसी लोक में राग-द्वेष के पुद गल भी सर्वत्र भरे हुए हैं। जैसे लोहा चुम्बक को अपनी ओर खींचता है, उसी तरह जीव उन पुद गलों को ग्रहण करता है और मिथ्यात्व एव मोह को शक्ति से वे आत्मा के साथ एकमेक होकर चिपट जाते हैं । इन पुद गलों के निमित्त से जीव के परिणामों में सकल्प-विकल्प होता है और वह विभिन्न वस्तुओं पर राग-द्वप धारण करता है। जिन पर राग उत्पन्न होता है वे और जिन पर द्वष उत्पन्न होता है वे वस्तुएँ उन्हीं पुद्गलों के परमाणुओं से बनी हैं । घर, धन स्त्री, स्वजन, वन, भूषण, मिष्ठान्न, विप श्रादि-श्रादि सब वस्तुएँ इन्हीं पुद गलों से बनी हैं। क्षण-क्षण में इनका रूपान्तर हुमा ही करता है और उसी के अनुसार जीवों की परिणति में फेर होता है । जीवों को परिणति में राग द्वेष के भाव उत्पन्न होने से वे उन पुद गलों का आकर्षण फरके गुरु (भारो) वनते हैं और गुरुता के कारण उमति अर्थात मोक्षगति प्राप्त नहीं होती है । भवभ्रमण का यह मुख्य कारणा अनादि अनन्त है। पुद गलों की यह परिणति उनका स्वाभाविक गुण है । चेतन उसमें लीनता.(लुब्धता। धारण करके दुखी हुआ, विपर्यास को प्राप्त हुश्रा । शुक्लध्यानी को ऐसा निश्चय-ज्ञान होता है। अतएव वे सब पुद्र से राग-द्वेष की वृत्ति को हटा देते हैं और उनके झानादि गुण प्रकट हो जाते हैं। ज्ञानादि गुण प्रकट होने से उन्हें स्व-पर विवेक हो जाता है। वे समझ जाते हैं कि मेरे आत्मगुण श्रखड हैं, अविनाशा है, सदा एक ही रूप में रहने वाले हैं, अगुरूलघु हैं। न तो कभी उनका सयोग हुआ है, न कभी उनका वियोग होता है। अनादि काल से वे निज में ही हैं। परन्तु परगुणों से ढंके हुए थे, जिससे इतने दिनों तक पहचान नहीं पाए । अव उन पुद्गलों से विपरीत शक्ति धारण करने वाले गुणों का सयोग होने से निज गुण प्रकट वायु के योग से बादल विखर जाते हैं और सूर्य अपने स्वामाविक रूप में चमकने लगता है, उसी प्रकार पुद गलपर्याय रूप वादल वैराग्य की वायु से दूर हो गए हैं और अनन्त झानज्योति का अरुणो- दय हुभा है, जिससे पूर्ण प्रकाश हो गया है। अब मैं कालान्तर में समस्त पुद गलों के सयोग से व्या पुद- गलों में हुए हैं। जैसे * ध्यान-कल्पतरु * (१६३ ) गलजनित वैभाविक परिणति से पृथक् होऊँगा । मेरा सत्-चित्-आनन्द रूप प्रफट होगा । मैं निरामय, नित्य, अटल सुख का भोक्ता बनूंगा। शुक्लध्यान का फल यह चार प्रकार का विचार शुक्लध्यानी महामुनि के निर्मल अन्त करण में स्वभाव से ही परिणत होता रहता है । इस विचार के प्रबल प्रभाव से उनकी आत्मा समस्त विभावों से और पुद् गलननित परि- रणति से निवृत्त और सब कर्मो से विमुक्त हो जाती है। वे पूर्ण विशुद्ध और परमपवित्र स्थिति को प्राप्त होते है तथा अनन्त, अक्षय अन्याबाध मोक्ष के सुख में तल्लीन रहते हैं। यह शुक्लध्यान के ४ पायों, ४ लक्षणों, ४ पालम्बनों और ४ अनुप्रेक्षाओं का वर्णन सम्पूर्ण हुआ। ग्रन्थकार का अन्तिम निवेदन मैं एक अल्पज्ञ, विषय-फपाय का सदन और अनेक दुगुणों से परिपूर्ण हूँ। ध्यान जैसे गहन विषय का यथार्थ वर्णन करने में असमर्थ हूँ । शुक्लध्यान मेरे अनुभव से बाहर है । मैं ने जो कुछ लिखा है, जिनो- क सूत्रों और कतिपय ग्रन्थों के अनुसार लिखा है। कितनेक स्थलों पर सहन बोध के आधार पर भी लिखा गया है। अत पाठकगण से मैं नम्रतापूर्वक क्षमायाचना करता हूँ। इस ग्रंथ में जो भी अशुद्धियाँ रह गई हों, उनके लिए भी मैं क्षमा चाहता हूँ। शान्तिः शान्तिः - ॐ शान्तिः समाप्त गया - परिशिष्ट - । - श्रद्धालु पाठको! इस ग्रन्थ के तीसरे सस्करण की प्रम कॉपो अनेक व्यक्तियों द्वारा कराई गई थी। हमें अत्यन्त • है कि उनका लापर्वाही के कारण इसमें मूल ग्रन्थ की अनेक टिप्पणियाँ और कहीं कहीं तो पन्ने के पन्ने छूट गये हैं। किन्तु यह सब प्रथ छप चुकने के बाद हमें मालूम हुआ, इसलिए परिशिष्ट रूप में उन छूटे हुए प्रशों को हम यहाँ उद्धृत कर रहे हैं कि जिससे प्रथ का श्राशय ठीक तरह से समझ में आ जाय । हम विश्वास दिलाते हैं कि इसके चौथे सस्करण में ऐसी कोई गड़बड नहीं रह पायगी और प० मुनि श्री कल्याण पिजी महाराज के निरीक्षण में किसी एक ही विद्वान् के द्वारा इसके अगले सस्करण की प्रेस कापी तैयार कराई जायगी। इस बार प्रेस कॉपी करने वालों की लापर्वाही को हम अपने प्रमाद के कारण या उन पर पूर्ण विश्वास होने के कारण पहचान नहीं पाये । इसके लिए प० मुनि श्री कल्याण ऋषिजी म० स० से तथा पाठकों से क्षमा की आशा करते हैं । -प्रकाशक | टिप्पणियाँ: १-पृष्ठ १३ पर बारहवीं पक्ति के लिए पृष्ठ के नीचे -"प्लेग रोग के फैलते ही चूहे स्वय मर कर मानो घर के मालिफ को सावधान करते हैं। उनके इस उपकार को न समझ कर अज्ञानी उन्हें मारने लग जाते हैं।' २-पृष्ठ १६ को चौदहवा पक्ति में 'शतरज' शब्द के लिए पृष्ठ के नीचे -"शत + रज अर्थात् जिससे मौ प्रकार के रज (दुख , पैदा हों।" ३–पृष्ठ १६ की सत्रहवीं पक्ति में 'स्वार्थ' शब्द के पहले - "अपने मर्म को बात-जिससे पोल खुलती हो-छिपाना।" ४-पृष्ठ २६ की चौदहवीं पक्ति के 'प्रयोगलब्धि' शब्द के लिए पृष्ठ के नीचे -"यह लब्धि भव्य और अभव्य को सामान्यरूप से होतो हे।" ५-पृष्ठ २७ को इक्कीसवी पक्ति के लिए पृष्ठ के नोचे-"उत्तराध्ययन सूत्र अट्ठारहवें अध्ययन में वर्णन पाता है कि गर्दभालि मुनि नागरवेल लठा से आच्छादित मण्डप में ध्यान कर रहे थे-"अप्फोव- मएडवम्मि ज्मायति खवियामवे ।।" ६-पृष्ठ ६६ की चौवीमवीं पक्ति के लिए पृष्ट के नीचे -"उववाई सूत्र के अनुसार मालूम होता है कि माँ-बाप की भक्ति करने से ६४ हजार वर्ष की आयुष्य वाले देवत्व को प्राप्ति होती है।" ७--पृष्ठ ७३ पर एक प्रश्न और उत्तर --"(५४) प्रश्न-भाइयों में किन कारणों से लड़ाई होती है ? उत्तर-हायो मुर्गे, घोडे,भैंसे, मेंडे, कुत्ते श्रादि जानवरों का आपस में लड़ाने मे तथा इनको लडाई देख कर प्रसन्न होने में । धर्म ( २ ) ८-पृष्ठ ८४ पर पच्चीसवीं पक्ति के लिए पृष्ठ के नीचे'-"७ नम्बर से ऊपर के प्रश्नोत्तर गौतमपृच्छा और धर्मज्ञान प्रकाश के अनुसार तथा कुछ बढा कर लिखे गये हैं।' मूलग्रन्थ के बड़े-बड़े अंश:- १-पृष्ठ १०२ पर 'अतएव पर्याएँ अनित्य हैं।' इस वाक्य के आगे-'इन छहों द्रव्यों में गुण- पर्याय का साधर्म्य बताते हैं । अगुरु लघु पर्याय छहों द्रव्यों में एक-सा है। पुद्गल द्रव्य को छोड़कर शेष पाँचों द्रव्यों में अरुपी गुण भी एक-सा है । अचैतन्य गुण जीव-द्रव्य में नहीं है, शेष पाँचों में हैं । सक्रिय गुण निश्चय से तो पुद्गल में है, किन्तु व्यवहार से जीव में भी गिना जाता है, शेष चार प्रक्रिय हैं । यदि भिन्नता बताने वाले गुणों का कथन किया जाय, तो कहना होगा कि चलन गुण धर्मास्तिकाय में है, शेष पाँच में नहीं । स्थिति गुण अवर्मास्तिकाय में है, शेष पाँच में नहीं । अवकाश गुण आकाशा- स्तिकाय में है, शेष पाँच में नहीं । वर्तमान गुण काल में है, शेष पाँच में नहीं । चैतन्य गुण जीव में है, शेष पाँच में नहीं । मिलन-बिछुड़न गुण पुद्गल में है, बाकी के पाँच द्रव्यों में नहीं । इस प्रकार छह द्रव्यों के जो मूलगुण हैं, वे अपने-अपने स्वामी में ही रहते हैं, अन्य में नहीं। धम, अधर्म आकाश इन तीन द्रव्यों में तीन गुण और चार चार पर्याय एक-से हैं । तीन गुणों से काल द्रव्य का भी साधर्म्य है । और अधर्म असख्यात प्रदेशी और लोकव्यापी हैं । आकाश अनन्तप्रदेशी लोकालोक व्यापी है । काल द्रव्य उपचार से अढाई द्वीप तक व्यापक माना जाता है, क्यों कि बाह्य काल का आधार चन्द्र-सूर्य की गति पर ही रहा है। जीव द्रव्य अनन्त है। एक-एक जीव के प्रदेश असख्यात-असख्यात है। एक जीव शरीर भर में व्याप्त है और सब जीव लोक-भर में । पुद्गल द्रव्य के परमाणु अनन्त हैं। प्रत्येक परमाणु वर्ण-गन्ध रस और स्पर्श से युक्त है। निश्चय नय से छहों द्रव्य अपने अपने स्वरूप में परिणत होते रहते हैं। हर एक द्रव्य का परिणमन गुण अलग-अलग है, इसीलिए वे अलग-अलग हैं। व्यवहार से जीव और पुद्गल दोनों परिणामी हैं। राग-द्वेष युक्त जो जीव है, उसका पुद्गल साथ परिणमन करने का स्वभाव है, सो अशुद्ध परिणमन से उत्पन्न होता है। धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन चारों का परिणमन निज गुण में होने से शुद्ध-परिणमन कहलता है, किन्तु जीव का परिणमन्त पुद्गल के सयोग से होता है, इस लिए अशुद्ध-परिणमन कहलाता है । अशुद्ध-परिणति के फल-स्वरूप अनादिकाल से ससारी जीव समय समय पर सात या आठ कमों की वर्गणाएं ग्रहण करके अशुद्ध बनते- रहते हैं । पुद्गल द्रव्य के दो परमाणु एकत्रित होने पर द्वयणुक बनता है, तीन परमाणु एकत्रित होने पर ज्यणुक । इसी प्रकार सख्यात परमाणुओं के मिलने पर सख्योणुक और असख्य परमाणुओं के मिलने पर असख्याणुक बनता है । यदि अनन्त परमाणु एकत्रित हो जाये तो अनन्ताणुक कहलाता है। इतने परमाणुओं के स्कन्ध को भी जीव ग्रहण नहीं कर सकता । जब अभव्य जीवों से अनन्त गुणे अधिक परमाणु इकट्ठे होते हैं, तब औदारिक शरीर के ग्रहण करने लायक स्कन्ध होता है। इससे अनन्त गुणा अधिक पुद्गलों का स्कन्ध बने तब चक्रेय शरीर को ग्रहण करने योग्य होता है । इससे अनन्तगुणा अधिक होने पर आहारक शरीर के ग्रहण करने योग्य होता है। इससे तैजस के, तेजस से भाषावगणा के, भाषावर्गणा से श्वासोच्छ्वास के, श्वासोच्छ्वास से मनोवर्गणा के और मनोवर्गणा से कर्मवर्गणा के पुद्गल अनन्त गुणे अधिक होते हैं। के ( ३ ) उपयुक्त पाठ वर्गणाओं में से चौदोरिक, वैक्रय, श्राहारक और तेजम-इन चारों यो वार वर्गणों कहते हैं । इनमें ५ वर्ण, • गन्ध, ५ रस और ८ स्पर्श-ये २० बोल पाये जाते हैं याका फी भाषा, श्वासोच्छ्वास, मन और कर्म ये चार वर्गणाएँ सूक्ष्म कहलाती हैं । इनमे ५ वर्ण, २ गन्ध ५ रम और ४ स्पर्श-यै १६ बोल पाये जाते हैं । एक परमाणु में १ वर्ण १ गन्ध, १ रस और दो स्पर्श-ये पाँच योल पाये जाते हैं। इस प्रकार आठ वर्गणाओ के दलिक आकाश में मेहताव ( रगदार दीये ) के प्रकाश के समान आत्मा के असख्यात प्रदेशों के साथ मिल कर रहते हैं।" २-पृष्ठ २६ पर "प्रथम उपशम सम्यक्त्व भी नही होता है" इस वाक्य के आगे-"साथ हो विशुद्ध क्षपक श्रेणी में सभावित जघन्य स्थितिबन्ध और जघन्य स्थिति के अनुभाग प्रदेश का सत्व होते हुए भी सम्यक्त्व की प्राप्ति नहा होतो । प्रथम उपशम सम्यक्त्व के सन्मुख होकर मिथ्यारष्टि विशुद्धता की वृद्धि करता हुश्रा प्रयोग लब्धि के प्रथम समय से लगा कर पूर्वस्थिति के सख्यातवें भाग मात्र एक अन्त फोडाकोठी सागर परिमाण प्रायष्य बिना सात कर्मों का स्थिति बन्ध करता है । उस अन्त कोडा- कोडी सागर स्थितिवन्ध में से पल्य के संख्यातर्व भाग के कम होने पर सामान्यत अन्तमुहूर्त पर्यन्त स्थि- तिबन्ध करता है। इस क्रम से संख्यात स्थितिबन्ध श्रेणी कर पृथक (७०० तथा ८००) सागर कम होने पर दूसरा प्रकृतिबन्ध श्रेणी स्थान होता है। आगे इसी प्रकार इतने इतने स्थितिबन्ध के कम होने पर एक- एक स्थान होता है । यों बन्ध के कुल३४ *श्रेणी स्थान होते हैं । इससे लगाकर प्रथम उपशम सम्यक्त्व तक पन्ध नहीं होता। यह चौथी लब्धि का वर्णन हुआ। पाँची है, करणलब्धि । यह भव्य जीवों को ही होती है। इसके तीन भेद हैं--अध करण, अपूर्व- फरण और अनिवृत्तिकरण । इन में से अनिवृत्तिकरण का काल अन्तमुहूर्त है । इससे सख्यात गुणा फाल अपूर्वकरण का है। इससे सख्यात गुणा काल अध करण का है किन्तु यह भी अन्तर्मुहूर्त परिमाण ही हैx और भी कहा है कि अतीतादि त्रिकालवी अनेक जीवों से सम्बन्धित इस अध प्रवृत्ति करण की विशुद्धता रूप परिणाम असख्यात लोक परिमाण है। वह परिमाण अधःप्रवृत्ति करण के जितने समय हैं, उतने में सामान्य रूप से समय-समय पर बढ़ते रहते हैं-इससे इम करण के नीचे के समय के परिणाम की सख्या और विशुद्धता ऊपर के समयवर्ती किसी जीव के परिणाम से मिलती है, इसी से इसका नाम अधःप्रवृत्तिक । इस अध प्रवृत्तिकरण के चार आवश्यक हैं - (१)-प्रति समय अनन्त गुणी विशुद्धता की वृद्धि। (२)- स्थितिबन्ध श्रेणी अर्थात् पहले जितने परिणामो से फर्म का स्थितिबन्ध होता था, उन्हें घटा घटा कर स्थितिवन्ध करे। लाल रंग के मेहतार नामक चारुद के खमाल (') का अग्नि के सयोग से होने वाला प्रकाश अरूपी आगश को लाल रंग का बना देता है, उसी प्रकार पुद्गल का सम्बन्ध श्ररूपी श्रात्मा के साथ होने से वह तद्गुणमय होता है । *इसका अधिक खुलासा लघिसार प्रत्य में है । पर गन्द का वही श्राशय है-फपाय की मन्दता । xअन्टन के मेद असख्य है।

- ( ४ ) (३)–सातावेदनीय आदि की प्रशस्त कर्म-प्रकृति समय-समय पर अनन्त गुणी बढती हुई गुड, शक्कर, मिश्री और अमृत के समान अधिक से अधिक सुखद होती जाती है-यह अनुमाग बन्ध | (8)-असातावेतनीय आदि की अप्रशस्त कर्म प्रकृति नीम, कॉजी आदि के समान समय-समय पर अनन्त गुणी कम होती है-यह अनुभाग बन्ध है किन्तु हलाहल जैसा नहीं है। २-अधः प्रवत्ति करण का काल अन्तमुहूर्त बीत जाने पर दूसरा अपूर्वकरण होता है इसके परिणाम प्रथमसे असख्यात लोक गुने हैं । यह बात बहुत जीवों की अपेक्षा से कहीं जा रही है,अन्यथा एक जीव को अपक्षासे तो एक समय में एक ही परिणाम होता है। साथ ही एक जीव की अपेक्षासे जितने अन्तर्मुहूर्त के समय हैं, उतने ही होते हैं। ऐसे ही अध करण का भी एक समय में एक परिणाम होता है। बहुत जीवों की अपेक्षा से असख्य परिणाम होते हैं। अपूर्वकरण के भी परिणाम सदेश-रूप से समय -समय पर बढ़ते रहते हैं । इस अपूर्वकरण के परिणाम में ऊपर के समय के परिणाम वैसे नहीं है, जैसे नीचे के । प्रथम समय की उत्कृष्ट शुद्धता से द्वितीय समय की जघन्य शुद्धता अनन्त गुणी है। इस प्रकार परिणामों में अपूर्वता होने के कारण हो इसका नाम अपूर्वकरण है। अपूर्वकरण के पहले समय से लगाकर अतिम समय तक अपने जघन्य से अपना उत्कृष्ट और पूर्व समय के उत्कृष्ट से उत्तर समय का जघन्य-यों कर्म के परिणाम साँप की चाल के समान क्रमशः अनन्त गुने विशुद्ध होते हैं। अपूर्व करण के पहले समय से लगाकर यावत् सम्यक्त्व मोहनीय, मिश्रमोहनीय के का पूर्ण काल, जो जिस काल में गुण-सक्रमण करके मिथ्यात्व को सम्यक्त्व मोहनीय, मिश्रमोहनीय के रूप में परिणत करे, उस काल के अन्तिम समय तक -१ गुण श्रेणी, २ गुण सक्रमण, ३ स्थितिखण्ड और ४ अनुभाग खण्ड-ये चार श्रावश्यक होते हैं। और भी कहते हैं कि अघ करण के प्रथम समय से लगा कर गुणसंक्रमण पूर्ण होने के काल तक स्थितिबन्ध श्रेणी होती है। यद्यपि प्रयोगलब्धिसे ही स्थितिबधश्रेणी होतो है, फिर भी प्रयोगलठिधसे सम्यक्त्व होने का अनवस्थितपन है-ऐसा नहीं कहा जा सकता । इसलिए यहाँ ग्रहण नहीं किया । स्थितिबन्ध श्रेणी का काल और स्थितिकांड काडोत्करण का काल-ये दोनों समान रूप से अन्तमुहूर्त मात्र हैं । वहाँ पहले बंधा था-ऐसा कर्मपरमाणु रूप द्रव्य उसकी सत्ता में से निकाले जो द्रव्य गुण श्रेणी में दिये, उस गुण श्रेणी के काल में अनुक्रम प्रति समय असख्यात गुणी जो पक्तिबद्ध निर्जरा होती है, उसे गुणश्रेणी निर्जरा कहते हैं । गुणाकार के अनुक्रम से प्रति समय व्यवस्थित प्रकृति के परमाणु पलट कर अन्य प्रकृति रूप में परिणत होते हैं, सो गुणसक्रमण कहलाता है। पहले बँधी थी, उस सत्ता में रही कर्म-प्रकृति की स्थिति का घटना, सो स्थिति- खएड है। पहले बंधी थी-ऐसी सत्ता में रही हुई अशुभ प्रकृति के अनुभाग का घटना, सो अनुमागखन्ड । ये चारा कार्य अपूर्वकरण में अवश्य होते हैं। अपूर्व करण में प्रथम समय सम्बन्धी प्रशस्त-अप्रशस्त प्रकृति का जो अनुभाग सत्व है, उससे उसके अतिम समय में प्रशस्त प्रकृति का अनन्त गुना बढ़ता हुआ तथा अप्रशस्त प्रकृति का अनन्त गुना घटता हुआ जो अनुभाग सत्व होता है, सो उसमें प्रतिसमय अनन्त गुणी विशुद्धता होने से, प्रशस्त प्रकृति के अनन्तगुणे अनुभाग काड का माहात्म्य करके अप्रशस्त प्रकृति के अनन्तवें भाग के वरावर अन्त समय में संभवता है। इन स्थितिखण्डादि का विशेष अधिकार मी है, किन्तु प्रन्यगौरख के भय से यहां नहीं लिखा जा रहा है। . से . . ( ५ ) इस प्रकार अपूर्वकरण के सम्बन्ध में कहे हुए स्थितिकाएडादि कार्यों की विशेषता तोमरे अनिवृत्ति- करण से समझना । विशेष यही है कि यहाँ समान समयवर्ती अनेक जीवा के परिणाम सरीसे है, इसलिए अनिवृत्ति करण के अन्तमु हर्टी के जितने समय हैं, उतने ही अनिवृत्ति करण के परिणाम हैं, इससे सिद्ध होता है कि प्रति समय एक-एक ही परिणाम होता है । यहाँ तो स्थितिखड, अनुभाग खण्डादिक का प्रारम्भ और ही परिमाण लिया होता है, सो अपूर्वकरण सम्बन्धी स्थितिखडादिकों को अन्तिम समय में ही समाप्ति हुई। यहाँ यह प्रयोजन है कि अनिवृत्ति करण के अन्त समय में दर्शन मोहनीय की और अनन्तानुबन्धा चतुष्क की प्रकृति, स्थिति, प्रदेश, अनुभाग की समस्तरूप से उदय होने की अयोग्यता-रूप उपशम होने से तत्त्वार्थ की श्रद्धा रूप जो सम्यक्त्व होता है वह उपमिक सम्यक्त्व है । "सम्यग्दृष्टि श्रावकविरतानन्तवियोजकदर्शनमोहक्षपकोपशमकोपशान्तमोहचपकक्षीण मोहजिनाःक्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः ॥" -तत्वार्थ स्त्र अ०६ अर्थात् १-प्रथम उपशम सम्यक्त्व की उत्पत्ति के अनिवृत्तिकरण के अन्त समय में रहने वाला जो विशुद्ध सातिशय मिध्या-दृष्टि है, उसके आयुष्य कर्म को छोड़ शेष सात कमों की निर्जरा का जो गुण श्रेणी निर्जरा द्रव्य है, सो असख्यातगुणा है । २- उससे असयति सम्यग्दृष्टि गुण-स्थान को प्राप्त होते ही अन्तमुहर्त पर्यन्त प्रतिसमय अस- ख्यात गुणा । ३--उससे देशविरति गुणस्थानी के अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त निर्जरी होने योग्य फर्म पुद्गल रूप गुण श्रेणी द्रव्य असख्यात गुणा है। ४-उससे सफल सयम ( सर्वविरति ) ग्रहण करने के आदि का अन्तमुहर्त पर्यन्त प्रति समय असख्यात गुणाकार रूप कर्म की निर्जरा होने योग्य द्रव्य असख्यात गुणा है ।। ५--उससे ॐ अनन्तानुबन्धी श्रादि बारह कषाय और नौ नोकषाय का परिणमन कराता है । तीन फरण के प्रभाव से उन्हीं का गुणश्रेणी निर्जरा द्रव्य असख्यात गुणा है। ६-उससे x दर्शन मोहनीय को क्षय करने वाले का गुणश्रेणी निर्जरा द्रव्य असंख्यात गुणा है। ७-उससे अपूर्वकरणादि तीन गुणस्थानी कषाय के उपशम करने वाले को गुणभणी निर्जरा द्रव्य असख्यात गुणा है। ८-उससे उपशान्त-कषाय-गुणस्थानी का, जिसने सकल मोहनीय को उपशान्त किया है, गुणभणी निर्जरा द्रव्य असख्यात गुणा है । - + यह सात अप्रमत्सयत गुणस्थानी को होता है, क्योंकि छटवां प्रमत्तसयत गुणस्थानी तो सातवें में से गिरने पर होता है। अनन्तानुबन्धी की विसयोजना, अविरत-देशविरत-प्रमत्तसंयत-अप्रमत्तसयत-इन चार गुणस्थानों में होती है उिस गुणस्थान में विसयोजना होती है, वहीं अन्तर्मुहूर्त प्रति समय श्रसख्यातगुणी निर्जरा होती है। * दर्शनमोहनीर का दय, फरणय से समर्थ प्रवकेवली मनुष्य को अविरतादि आदि-चार गुणस्पान में ६-उससे क्षपक श्रेणी वाले-अपूर्वकरण आदि तीन गुणस्थान वाले का गुणश्रेणी निर्जरा द्रव्य असंख्यात गुणा है। १०-उससे केवली जिनेश्वर को गुणश्रेणी निर्जरा द्रव्य असख्यात गुणा है। जो उपयुक्त दस स्थानों को प्राप्त होते हैं, उनके आदि के अन्तमुहूर्त पर्यन्त परिणाम की विशुद्धना की अधिकता के कारण प्रति समय आयु को छोड शेष सात कर्मों के परमाणुओं की निर्जरा होती है । यहाँ निर्जरा तो स्थान-स्थान पर असख्यात गुणी बढ़ती जाती है, किन्तु निजंग का काल असख्यातवा भाग घटता जाता है। इस प्रकार ज्यों-ज्यों कषाय को मन्दतारूप परिणामों को विशुद्धि में जीव प्राणे बढते जाते हैं, त्यों-त्यों ज्ञानादिक आत्मगुणों का प्रकाश भो क्रमश बढता जाता है। साथ ही आत्मा अधिक से अधिक ध्यान की योग्यता पाती जाती है। ज्ञानार्णव ग्रन्थ में ध्याता के लक्षण बताते हुए कहा मुमुक्षुर्जन्मनिर्विष्णः, शान्तचित्तो वशी स्थिरः । जिताक्षः संवृतो थीरो. ध्याता शास्त्रे प्रशस्यते ॥ अर्थात् ध्याता के शास्त्र में आठ लक्षण बताये हैं। जिसमें निम्नलिखित आठ लक्षण हों, उसी ध्याता की प्रशंसा की गई है १-मुमुक्षुः-जिसे मुक्ति पाने की इच्छा हो, वही ध्यान के कष्ट सहने को तैयार होगा। इसलिए मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा होनी चाहिये । -२-जन्मनिर्विरण -जो पौद्र्गालक क्षणिक सुखों से विरक्त हो, जन्म से ( संसार में बार-बार- जन्म लेने की परम्परा से ) उदासीन हो, उसी के परिणाम ध्यान में स्थिर रह सकते हैं। इसलिए ध्याता विरक्त होना जरूरी है। ३-शान्तचित्त -मन का शान्त रहना भी जरूरी है। जो परीपहों और उपसर्गों में शान्त नहीं रह सकता, वह ध्यान नहीं कर सकता! ४-वशी:-इन्द्रियों पर काबू होनो भी ध्याता के लिए जरूरी है। जिसकी इन्द्रियाँ अपने वश में न हों, वह ध्यान नहीं कर सकता। ५-स्थिर:-आसन पर बैठने के बाद ध्याता को स्थिर रहना चाहिए। ६-जिताक्ष:-जिसे सांसारिक विषय सुख की अभिलाषा न हो, वही ध्यान ठीक रूपसे कर सकता है। ७-सवृत-जिसने अपनी आत्मा को हिंसा आदि पाँच पाश्रवों से दूर करके अहिंसादि पाँच महा- व्रतो के पालन में लगा दी है तथा मनोवृत्तियों को विकार मार्ग से हटाकर आत्म-ज्ञान की खोज में लगा दी है एव जिसने लोलुपता का परित्याग कर दिया है, वही ध्यान करने योग्य बन सकता है। लोलुपता एकदम घाना काफी कठिन है, इसलिए धीरे-धीरे इसका अभ्यास करना चाहिए । सोचना चाहिए कि अमुक वस्तु नहीं खाई तो क्या ? अमुक वस्त्र नही पहना तो क्या ? प्रारम्भ में यह मी मुश्किल मालम होगा, किन्तु धीरे-धीरे अभ्यास से सरल सहन होने लगेगा । इसी रीति से प्रयत्न करते रहने पर किसी वक्त निर्ममतभी प्रात को किया जा सकेगा।

( ७ ) ८-धीर-ध्यानस्थ होने पर उतना धैर्य होना जरूरी है कि कितने भी फठिन परीपद या उपमा में भी मानसिक परिणामों में चचलता न आने पाये । ध्यानमें प्रवेश करते समय कहा जाता है-"अप्पाण- वोसिरामि” अर्थात् मैं इस शरीर का ममत्व छोड़ता है । यह शरीर मेरा नहीं है और न मैं इस शरीर का हूँ। इस प्रकार जव मान लिया कि शरीर अपना नहीं है, तब भले ही कोई शरीर को खा जाय, जला डाले, काटे या कुछ भी करे हमें चिन्ता क्यों होनी चाहिये ? ऐसा मन में निश्चय हो तभी ध्यान में मफलता प्राप्त हो सकती है। ध्यान इसी लिए किया जाता है कि कर्मो का क्षय हो और फर्मो का क्षय विना उपमर्ग महे, नहीं होता । जो परीषह उपसर्ग आदि के दुख पाते हैं, वे कर्मो के क्षय के लिए ही पाते हैं । इस प्रकार दुःख-सहन-रूप कर्जा चुकाने के समय पील नही हटना चाहिए। ऐसा दृढ निश्चय- पूर्वक धैर्य धारण करने से ही ध्यान सिद्ध होता है । इन आठ गणों को धारण करने वालों को हो "ध्यानसिद्धि प्राप्त होती है। ऐसा जानकर शुभ ध्यान करने वाले मुमुक्षु जनों को पहले आठ गुण क्रमश अभ्यास द्वारा प्राम करने चाहिये। - - ३-पृष्ठ ६५ पर "ये मेरे बड़े प्रबल शत्रु हैं, इन्होंने अपना साम्राज्य स्थापित कर रखा है" इस वाक्य के आगे- मोह का परिचय हे भव्य जीवो | ध्यान पूर्वक देखो कि-इस विश्व में अविद्या नामक एक नगरी है, इसके अज्ञान रूप तीन कोट याने किले हैं, गद हैं। जिसमें चारों गति रूप चार दरवाजे हैं । इस नगरी के मध्य में "श्र. सयम" रूप एक महल है, जिसमें "अधर्म' नामक एक सभागृह है । इस सभा -गृह में "भ्रष्ट,मति" रूप सिंहासन जमाया हुआ है । इसी सिंहासनपर अति प्रचढ शरीर वाला और मद-अहकार रूप मदिरा में प्रस्त "मोह" नामक एक राजा बैठा हुआ है । इसके सिर पर 'अनाज्ञा' नामक एक छत्र लगा हुआ है। रति पार अरति नामक दासियों "हर्ष, शोक" रूप चवर ढोल रही है। इस राजा ने चमकते हुए पाप रूप वखों को धारण कर रखा है। अम्रत रूप मुकुट आदि आभूषण पहने हुए हैं। श्रारम सबधी क्रिया रूप तलवार मन रूप रेशमी भ्यान में रखी हुई है । जड़ता रूप ढाल पाछे शोभायमान है। इस राजो की 'माया' नामक एक पटरानी है। जो कि "चार सज्ञा" नामक चार दासिसा से शोभायमान है । इसके "कामदेव” नामक एक पुत्र है । इस प्रकार की समृद्धि के अतिरिक्त इस राजा की सेवा में "ज्ञानावरणीय" श्रादि सात मोड- लिक राजा हैं । मिथ्यात्व नामक प्रधान है। प्रमाद नाम वाला पुरुष पुरोहित हैं। राग द्वेष सेनापति है। क्रूर भाव कोटवाल है । व्याक्षेप (पागलपन) ही नगरसेठ है । कुव्यसन भंडारी है । कुसगति ही नाकेदार है। निंदक नामक पटेल है, कुकवि ही भाट है । प्रणाम (दूर से नमस्कार ) ही दृत है । दंभ दुर्दान्त याने सुभद है। पाखड ही द्वारपाल है । इत्योदि व्यक्तियों द्वारा यह सभा महा भयकर रूप धारण किये हुए है। इस नगर में चौरासी लाख रूप जीव-योनियों ही चौरासा लाख चौहट्टे हैं। प्राणियों के शरीर ही मकानात है, जिनमें विविध प्रकृतियों वाली प्रजाका निवास है। इन प्रजाजनों का स्वभाव भी बड़ा ही विचित्र है। सामान्य सत्कार मात्र से ही फूल जाते हैं और जरा से अपमान मात्र से ही रुष्ट हो जाते हैं। साधारण लाम में प्रसन्न हो जाया करते है और अल्प हानि होते ही शोक ग्रसित हो जाया करते हैं । इस प्रकार विविध विचित्रताशील प्राणी यहाँ के निवासी है । इम राजा की चतुरगिनी सेना की स्थिति ऐसी है फि-मान गजाधीश है, क्रोध आश्वाधीश है, कपट रयाधीश दे, और लाभ पैदल सेना का सेनापति है। इस प्रकार विकट और दुर्जेय सेना का स्वामी यह राजा है। - .

१ ( ८ ) दुर्भाग्य से एक "चैतन्य' नाम वाला यात्री घूमते-घूमते इस अधम नगर में आ पहुँचा । यहाँ की ऐसी भयकर स्थिति देखकर यह यात्री अत्यन्त भयभीत हो उठा और अपने अन्त करण में सोचते लगा कि तो प्रबलतम शत्रु सामने उपस्थित हो गया, अब मैं इससे किस प्रकार मुक्त होऊँ ? में अकेला इस पर किम प्रकार विजय प्राप्त कर सकू गा ? और अपनी मुक्ति रूप इष्ट सुख को कैसे प्राप्त कर सकू गा ? यहाँ पर मेरा तो कोई भी सहायक नहीं दिखाई दे रहा है । हे भगवन् अब क्या करूँ ? आत्म-परिचय हाय । हाय यह । . - - पुण्योदय से उसी समय चिन्ता प्रस्त यात्री चैतन्य को विवेक नामक एक सज्जन और सत्पुरुष दिखलाई पडा । उसने प्रेमपूर्वक चैतन्य को देखते ही निवेदन किया कि "अहो महानुभाव | आप कोई सत्पुरुष विदित होते हैं, एव मुझे यह भी अनुभव हो रहा है कि आप किसी न किसी महती चिन्ता से प्रस्त हैं। यदि आप को किसी महान् शत्रु की ओर से भय दिखलाई पड़ रहा हो, तो भी भयभीत नहीं होना चाहिये । ऐसी स्थिति में कायरता का परित्याग करके प्रबलतम शूरवीर बनना ही एक मात्र फत्तव्य होता है।" विवेक पुरुष के ऐसे शान्त और सहायक वचनों को सुनकर चैतन्य को साहस हुआ और उस आगन्तुफ पुरुष को अपना हितैपी जानकर उत्तर दिया कि- "हे भाई । शक्ति के अभाव में शूर-वीरता का क्या अर्थ हो सकता है ?" इस पर विवेक पुरुष ने उत्तर दिया कि "अहो महानुभाव । यह आप क्या फरमा रहे हैं ? आपकी विभूतिमय ऋद्धि इस "मोह" राजा की ऋद्धिसे कई गुनी अधिक प्रबल और शक्तिशालिनी है। आपकी शक्ति, श्रापका परिवार, और आपकी सेना प्रबल और अजेय है। हमतो श्राप जैसे व्यक्तियों का ही सरक्षण करते हैं । किन्तु आपने तो हमारी ओर कभी दृष्टिपात ही नहीं किया, और प्रतिपक्षी शत्रु को ही प्रबलतम समझ कर उसकी गुलामी में फसें रहे। यही कारण है कि हम आप जैसे स्वामी के आदर विना कि कत्तव्य विमूढ होकर चुपचाप बैठे रहे। आज आपने सौभाग्य से इधर पदापण किया तो इस सेवक से शुभ समागम हो गया। अब निवेदन करता हूँ कि अपनी शक्ति, परिवार और सेना को स्थिति का अव लोकन कीजियेगा, और तत्पश्चात् आज्ञा दीजियेगा कि ' मोह जैसे शत्रु को हम जड़-मूल से नष्ट करदें और इष्ट फल की प्राप्ति करके महान् सुख का अनुभव कर ।" इतना सुनते ही चैतन्य को धैर्य वधा और कहने लगा कि "हे प्रिय मित्रवर । मुझे मेरे परिवार का करायो" विवेक बोला-"ध्यानपूर्वक स्मृति में लाइयेगा कि आपकी राजधानी रूप नगरी का नाम "श्रद्धा" है, जिसके चारों ओर एक के बाद एक ऐसे तीन गढ याने किले हैं, जिनके शुभनाम "तान-गुप्ति" है। इस भव्य नगरी के दान, शील, तप और भावना रूप चार महान् द्वार है। इस नगरी के बीचों बीच में सयम नामक गज-प्रासाद हैं। जिसमें "समिति" नामक मनोहर सिंहासन है । इस सिंहासन के शोमावर्धक "जिनाज्ञा" रूप छत्र और 'शम सवेग" नामक रमणीय चंवर हैं। इसमें नैतिकता प्रधान न्यौपार वाले "शुभ-भाव" नामक सेठ वसते हैं । जिनकी "पुण्य" नामक दुकानों पर 'शुभकर्म" नामक ऋद्धि सिद्धि सुशोभित है । "सात्विक क्रियाओं का ही यहा पर क्रय विक्रय होता है इस प्रकार विविध रूप से श्रापका रम्य परिवार मापकी महती आकाक्षा के साथ उत्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा कर रहा है। - शान . - ( ६ ) - अतएव सावधानी के साथ आप अपनी स्वामित्वमय नगरी में मादर प्रवेश करियेगा, फिन्तु "सावधानी के साथ" कहने का तात्पर्य यह है कि मोह नृप ने प्रत्येक प्रवेश द्वार पर मजदूत रक्षा गौकियाँ स्थापित कर रखी हैं । उनसे भयभीत मत होना । लोनिये, यह "ज्ञान" नामक तल पार ग्रहण कीजियेगा, इसके बल पर श्राप अवश्य विजयी हो जॉयगे । इतना सुनते हो "चैतन्य" यात्री को अपनी स्थिति का सम्यक् प्रकार से स्मरण हो पाया, और हर अात्म बल के साथ नगरी में प्रवेश करने के लिये त पर हो गया । प्राथमिक-युद्ध . ज्यो ही नगरी के प्रवेश द्वार की रक्षक-चौकी पर चैतन्य ने अपना प्रथम काम रकवा कि इतने में हो मिथ्यात्व के मिथ्यामोह, मिश्रमोह, सम्यक्त्वमाह तथा अनन्तानुबधी क्रोध, मान, माया, और लोभ नामक सात दुर्जेय योद्धा मामने श्राफर खड़े हो गये और ललकार के माथ बोल-"कौन है ? आगे बढ़ने से कम नायो । आगे बढ़ने का 'मोह' नामक बादशाह का हुक्म नहा है।" चैतन्य ने उनके इन शब्दों की बिना पवाह किये ही आगे बढना चालू रक्खा । परिणाम यह होता है कि "चैतन्य और उन सातों योद्धाश्रा" का परस्पर गंभीर सघर्षमय युद्ध प्रारम्भ हो जाता है। किंचित “समय में ही चैतन्य को महान् पराक्रमशील ज्ञान तलवार के द्वारा वे साता युद्धवीर घायल होकर भाग गये । चैतन्य प्रसन्नता पूर्वके नगरी में प्रवेश करते हैं । नगरी का सौन्दर्य देखकर मुग्ध हो जाते हैं । इतने में 'दूसरी रक्षा चौकी सामने दिखलाई पड़ती है। जहाँ पर कि विविध शस्त्रों से सन्नद्ध "अवत” नामक बारह प्रबल योद्धो समुपस्थित थे । योद्धानों की ज्योंही दृष्टि चैतन्य पर पड़ी कि गर्व पूर्ण भाषा में बोल उठे 'अहो । यात्री | अहो चैतन्य " इस सयम नामक मनोरम राज प्रासाद में प्रवेश करने के लिये किससे आज्ञा प्राप्त की है ? लौट जाओ यहाँ प्रवेश मत करो।" इतना सुनते हो गभीरता के साथ चैतम्य ने अपने शस्त्रागार में से 'प्रत्याख्यान' नामक अचूक भाला निकाला । भाले के प्रथम प्रहार से ही घे नामधारी वीर धराशायी हो गये। फिर क्या था ? चैतन्य महाराज ने निश्चिततापूर्वक 'सयम' नामक लावण्यता-मय राजप्रासाद में प्रवेश किया । सामने ही समु- पस्थित 'सुमति' सिंहासन पर जाकर अपना अविचल आसन स्थापित कर दिया। 'जिनाज्ञा' नामक छत्र धारण कर लिया । छत्र के धारण करते हो 'धीरता और लज्जा नामक दासियों ने पाकर 'शम और सवेग' चंवर हाथ में लेकर उन्हें "चैतन्य नामक महान और अद्वितीय सम्राट के ऊपर ढोरने लगी। समाट के श्रागमन की वार्ता सुनकर सारा ही परिवार सहर्प और विनय के साथ सेवा में समुपस्थित हो गया। चैतन्य ने सभी का यथा योग्य सत्कार किया । 'तत्त्व रुचि और सुबुद्धि' नामक अपनी पटरानियाँ को इतने दिन तक के विरह दुख म दग्ध उनके चित्त को शान्त करन के लिय अपनी दाहिनी और बायों मुजाभा की ओर ममीप में श्रासन दिया। 'पच महाप्रत' नामक पाँचों सामन्त मरटारा को मालिक राजा का पत्र प्रदान किया । तत्पश्र्थात् चैतन्य देव महाराजा ने अपना शामन व्यवस्था इस प्रकार निर्माण की "सम्यक्त्व" को प्रधान मत्री, "उद्यम" को पुरोहित, “उपशम" वोर को प्रधान सेनापति, "शात- भाव ' फो फोटपाल, "शुम-भाव" को नगर-मेठ, परम भागम रूप द्रव्य से परिपूर्ण भडार के रक्षणार्थ पिशान को भहारी 'मन्मा को नाकेनार, 'व्यवहार' को पटेल 'गुणीनन' को भाट, 'मत्य' को दूत 'न्याय' - r . . " - ( १० ) को द्वारपाल 'मनो-निग्रह' को अश्वाशि, मार्दव-विनय' को गजाधीश 'श्राव' को स्थाधीश, 'सतोष' के पदाति सेनाधीश इत्यादि रूप से राज्य पदा पर योग्य और अनुभवी व्यक्तियों को नियुक्त किये । इस तरह से राज्य सचालन की व्यवस्था करके श्री चैतन्य देव राजाधिराज श्रानन्द पूवक श्रद्धा नगरी का राज्य करने लग । परन्तु फिर भी अपने प्रबलतम शत्र मोह राजा का भय हृदय में छिपा हुआ हो था । महायुद्ध की की तैयारी एक दिन की बात है कि जब राज्य दरबार लगा हुआ था, सामन्तवर्ग और उच्चाधिकारी एव भूत समुदाय अपने अपने आसन पर सुशोभित हो रहे थे। सभा की शोभा अद्वितीय प्रतीत हो रही थी, कि एर ही मनोहर और महत्त्वपूर्ण प्रसग पर चैतन्य महाराज बोले कि-'अादरणीय उपस्थित सज्जनो । मैं श्राप सयोग और सहवास से अत्यन्त प्रसन्न हूँ. राज्य की आत्मान्नति रूप व्यवस्था श्रादर्श ढग से प्रगति क रही है, परन्तु जब तक अपना प्रबल प्रतिपक्षी मोह नामक राजा पूरी तरह से पराजित नहीं हो जाय, तः तक अखड और अचल सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती है। इसलिये 'मोह' राजा 'आत्यतिक' रूप से नष्ट हं जाय, जड मूल से खत्म हो जाय, और सर्वा श रूप से नि शेष हो जाय, ऐमा हो ठोस प्रयत्न करने को हर सभी की कर्त्तव्य पूर्ण निष्ठा और योजना बद्ध प्रयत्न होना चाहिये। "इतना सुनतेही विवेक मित्र और सामन्त आदि वर्ग की ओर से नम्रतापूर्वक बोला-“हे नाथ हे स्वामिन् । युद्ध के लिये तैयार होने के श्राज्ञा सभी को दीजियेगा, और सात्विकता पूर्ण शस्त्रों से सन्नद्ध होकर इसी समय उस शत्रु पर धावा बोल दीजियेगा। हम सभी घनघोर आध्यात्मिक युद्ध से सलग्न होकर मोह- सेना को तितर बितर कर चकनाचूर कर देंगे। आप की महती आकाक्षा के अनुरूप ही मोह राजा को सर्वथा प्रकार से पराजित करके एव उसे नाम शेष करके आपके साध्यरूप लक्ष्य को श्रीमान के कर कमलों में समर्पित कर देंगे। और इस प्रकार से आप के इष्ट अर्थ की साधना पूण रीति स सम्पन्न कर देंगे। एव ऐसी स्थिति में ही समं स्थायी सुख का रसास्वादन कर सकेंगे।" उपरोक्त महा सभा में उल्लिखित प्रस्ताव को सर्वानुमति से अनुमोदना देकर सभी वीर और महा पीर तथा योद्धा और सुभट मोह को पराजित करने के लिये, युद्ध करने की तैयारी करने लगे। सैन्य सामर्म सजाने लगे। मोह राजा को भी अपने गुप्तचर 'परिणाम उर्फ विचार' नामक व्यक्ति द्वारा यह समाचार प्राप्त हुए कि चैतन्य महाराजा ने श्रद्धा नगरी में प्रवेश कर 'सयम' नामक राज प्रासाद पर अधिकार कर लिया है और अपनी राज्य व्यवस्था को सुस्थापित करके हमारे ऊपर आक्रमण करने को निश्चित योजना तैयार कर ली है। इतना ज्ञात होते ही मोह राजा ने अपने वर्ग के व्यक्तियों को एकत्र किया, और क्रोध पूर्वक उन्हें सबोधित करते हुए कहा 'आदरणीय मित्रगण और सामन्त वर्ग। चैतन्य देव को मैं अनन्त वार समझा चुका हूँ कि तुम मेरे विपरीत कोई काय मत किया करो, उसके प्रयत्ल को हम फई वार निष्फल कर चुके हैं-अनेक बार हमने उसकी बेइज्जती की है, किन्तु फिर भी बार बार घर्क खाने पर भी उसे लज्जा नहीं आती है, मैंने है कि अबकी बार उसने हमें पराजित करने के लिये प्रबलतम व्यवस्था की है। अत. आप सभी से निवेदन है कि हमें भी उससे लड़ने के लिये तैयार हो जाना चाहिये । अवको यार हमारा ऐसा प्रयत्न होना चाहिए कि हम उसे पराजित करके फैद करने और सदैव के लिये उसे अपने अधिकार में करलें यानी उसको दो - , सुना पूरा पूरा गुलाम बनालें।

- ( ११ ) मोह राजा का ऐमा प्रभावशाली व्याख्यान सुनते ही पाखड नामक सेवक ने मभी का स्थिति ज्ञात कराने की दृष्टि से 'कुबोध' नामक भेरी घजाई और सूचना दी कि 'अहो । मोह राजा के मामन्तवर्ग और योद्धागण । चैतन्य देव की सेना के साथ युद्ध करने के लिये तैयार हो जाओ।' सूचना सुनने मात्र की ही देरी थी कि सभी सेवक सावधान हो गये। सभी सेनापति अपनी अपनी सेना को तैयार करने में सलान हो गये। मद रूप मदिरा से मदोन्मत्त अभिमान रूप हाथी सेना, चचल और चपल मनरूप अश्व सेना विविध जोलपाश रूप रगों से शोभायमान एव झन झन शब्द करती हुई कपट रूप रथ सेना, और अति बलिष्ठ लोभ रूप पैदल सेना, तत्क्षण युद्ध के लिये तैयार हो गई। मोह राजा भी तामस रूप कवच धारण करके कुक्रिया रूप शस्त्रों से सुशोभित होते हुए तीन कुलेश्या रूप काली, नीली, और हरि पताकाएँ फरकाते हुए, कुआलाप प्रलाप रूप वाद्य-यत्रों की मनकार से गगन मडल को गर्जित करते हुए, 'कर्मोदय' नामक मुहूत में प्रस्थान करते हुए, 'कर्मारोहण' नामक युद्ध क्षेत्र में उपरोक्त चतुरगिनी सेना के साथ चैनन्य देव के प्रति युद्ध करने के लिये (श्राफर ) उपस्थित सघिदूत दोनों पक्षों की रण-सज्जा एव युद्ध तत्परता देख करके 'अध्यवसाय' नामक सधिपाल चैतन्य देव के पास श्राकर नम्रतापूर्वक निवेदन करने लगा कि 'हे चैतन्य देव महाराज | मैं दोनों पक्षों का हितैपी हूँ, अतएव हित भावना के साथ प्रार्थना है कि मोह राजा बहुत प्राचीन कालीन सम्राट है, आप जैसे तरुण नृपति के लिये उनका अपमान करना योग्य नहीं है। आप जानते ही हैं कि उनका सेना-बल प्रबल है, वे महान् प्रतापशाली हैं। उन्होंने तीनों लोक पर अपना अधिकार स्थापित कर रखा है। उन्हें पराजित करके श्राप विजयी होवें, यह अति कठिन वस्तु है । कहीं ऐसा प्रसग उपस्थित नहीं हो जाय कि आपकी सेना भयभीत होकर मोह राजा से ना मिले और श्रापको अपमानित होना पड़े। राज्य भी हाथ से निकल जाय और दु खां का समूह हो केवल शेष रह जाय । अतएव मेरी तो बोध पूर्ण सम्मति यही है कि आप मोह के सम्मुख जाकर सधि करलें। नीति का वाक्य है कि-"वृद्धों की सेवा में जाने से अपमान नहीं हुआ करता है।" यह सुनकर चैतन्यदेव हँसते हुए बोले फि "मैं सब समझता हूँ" जहाँ तक सिंह गुफा में निद्रा लेते हुए सोता रहता है, उतने समय तक ही वनचरों को उन्माद करने का अवकाश मिला करता है। चिरकाल से आकाश में हवा के बल पर उडती हुई और घूमती हुई धूल-गशिको रजकणों के समूह को मेघ क्षणभर में ही दवा देता हैं । मोह की श्रातरिक जैसी स्थिति को मैं पहिचानता हूँ, वैसी पहिचानने वाला इस त्रिखड़ में दूमरा और कोई नहीं है। इतने समय तक मैं अबोधसा रहा, यही मेरी भयकर भूल थी, अन्यायी को दह देना और उसका नाम शेष कर देना ही हमारा प्रधान और परम कर्तव्य है । क्या तुम्हें ज्ञान नहीं फि मोह के अधिकार में रहने से ही मेरी आज दिन तक इतनो वेइज्जती हुई है। प्रत्येक क्षण उसकी स्मृति मात्र मे ही मुझे दुःख उत्पन्न हुश्रा करता है । अब मुझे मूर्ख मत समझो, मूर्खता करके पुन उसके अधि- फार में जाना और अपना अनादर कराना मैं नहीं चाहता । आज दिन तक मुझे अपने परिवार का ज्ञान नहीं था, परन्तु विवेक मत्रीश्वर का भला हो कि उन्होंने मुझे इस दुख पूणे गुलामी से मुक्त होने का मार्ग बतलाया भौर तदनुकूल सामग्री वतलाई । मैं तो स्वय ही मोह राजा के सम्मुख होकर उसको नष्ट करने के ।

लिये कटि बद्ध था कि वह सामने ही प्रागया, यह अच्छा हो हुा । तुम जरा थोड़ी देर तक खड़े रहो और मेरी सेना का प्रथल पराक्रम देखो, "त्रिलोक पूज्य के रूप में कहे जाने वाले मोह महाराजा को कैप्टी दुर्दशा होती है ?" , -- युद्ध का प्रारम इतना कहने के बाद चैतन्य देव ने अपने 'सद्गुरु' रूप अद्वितीय योद्धा द्वारा 'सद्बोध' नाम: भेरी बनवाकर संपूर्ण सेना को तत्काल सुसज्जित होने की आज्ञा प्रदान की। उसी समय शातरस से परिपूर्ण मनो निग्रह रूप अश्व सेना वैराग्यमद से मस्त मार्दव-नम्रना रूप गज-सेना, सरलता से सुशोभित श्रार्जव ऋजुता रूप रथ सेना और सदा तृप्ति शील सतोप रूप पैदल सेना यों चतुरंगिनी सेना क्षमा रूप बख्तर धारण करके, विविध तप रूप अनेक शनों से सुसज्जित होकर, स्वा ध्याय रूप नगाड़े याने ढोल बजवाते हुए, भजन रूप शहनाइया की गर्जना कराते हुए, तीन शुम लेश्या रूप, लाल, पीली और सफेद पताकाएँ फरकाते हुए और वैराग्य पथ मे वीरता पूर्वक आगे बढते हुए, गुए- स्थान-आरोहण रूप रणागण में युद्ध करने के लिये आ खडे हुए । इस प्रकार दोनों ओर से युद्ध सेनाओं के स्णक्षेत्र में व्यवस्थित रूप से उपस्थित होते ही दोनों स्वामियों ने अपनी अपनी सेना को युद्ध करने की प्रामा प्रदान करदी । सर्व प्रथम मोह नृपति की ओर से -"मिथ्यात्व मत्रीश्वर" अपने अनन्तानुबधा श्रादि सोलह कषाय और नौ नो कपाय रूप पच्चीस सामन्तों और अनेक युद्ध बोरों के साथ चैतन्य देवकी सेना का सामना करते हुए चैतन्य देव को अभिमान पूर्वक कहने लगा कि 'हे चैतन्य | मालूम होता है कि तुम मेरे त्रिलोक व्यापी पराक्रम को भूल गये हो । तुमको अनन्त बार विविध रीति से हानि पहुंचाते हुए बुरी तरह से पराजित किया है, फिर भी तुम्हें लज्जा का अनुभव नहीं होता और लड़ने के तैयार हुए हो । सावधान 'हो जाओ । मैं अभी एक क्षण में हो तुम्हें एक तीक्ष्ण और अचूक बाण द्वारा पतित करके पाताल लोक में अधोगति में पहुंचाता हू | अपने स्वामी भक्त सेवक कुदेव, कुगुरु, कुधर्म और कुशास्त्र रूप नौकरों द्वारा तुम्हारी मान-हानि करवाता हूँ। इस प्रकार बकवाट करता हुआ, अपलाप करता हुआ, 'कुश्रद्धा' रूप घाण खीच करके खड़ा हो गया । उसी समय समीप में उपस्थित "विवेक" नामक प्रधान मित्र चैतन्य महाराज से बोला 'हे स्वा- मिन । यह पाखण्डी और अभिमानी "मिध्यात्व' नामक प्रधान मत्री अपने 'सम्यक्त्व' नामक मन्त्री के दृष्टि क्षेप मात्र से ही देखने मात्र से ही पराजित होकर काल-धर्म को प्राप्त हो जायगा । इसके मरते ही मोह की सम्पूर्ण सेना शिथिल हो जायगी और इस प्रकार अपनी श्रद्धा" नगरी सभी प्रकार से निश्शक श्रोर निर्विन हो जायगी।' इतना सुनते ही चैतन्य देव ने अपने प्रधान मत्री 'सम्यक्त्व' को प्रति युद्ध करने के लिये प्राज्ञा प्रदान की। आज्ञा पाते ही 'सम्यक्त्व' मत्रीश्वर को 'पाँचों सम्यक्त्व' रूप सहायक प्रधान युद्ध वीर के साथ और अन्य योद्धाओं के साथ 'मिथ्यात्व' के सम्मुख जा खडा हुआ । 'मिथ्यात्व' की सेना को ललकारते हुए 'तत्वातत्व विचार' रूप धारण को 'ध्यान' रूप धनुष पर चढ़ाकर और लक्ष्य निर्धारित करते हुए ऐसा खींचकर मारा कि एक हो प्रहार से 'मिथ्यात्र' नामक युद्धवीर अपने सहायक वीरों के साथ रणक्षेत्र में ही काम आगया, याने मृत्यु को प्राप्त हो गया। सर्व प्रथम ही प्रभावशाली विजय के प्राप्त होते ही चैतन्य देव की सेना में जय-विजय के नगारे बजने लगे। मिथ्यात्व प्रधान मत्री के रण क्षेत्र में इस प्रकार काम थाने के ममाचार सुनते ही मोह राजा तो हतप्रतिभा हो गये और बलवान् मन्त्री के वियोग से अत्यन्त दु ग्वी हुए | तब 'अत्रतराय' नामक प्रधान - - - . ( १३ ) उप सेनापति नम्रतापूर्वक अपने स्वामी मोह देव से बोला कि 'हे नाथ । चिन्ता न कोजियेगा, अभी में अपने प्रधानजी की मृत्यु का बदला ले लेता हूँ । अनादि काल से धक्के खाने वाला चैतन्य मेरे सामने क्या वस्तु है ? इतना कहकर और मोह देव को श्राश्वासन देकर, वहाँ से अपने बारह 'अवत' नामक मामन्त वारों को साथ में लेकर युद्ध स्थलो में श्रा उपस्थित हुआ । चैतन्य देव को सामने देखते ही बोल उठा-अरे । चैतन्य । तेरे ऐसे ढोंगों को और दम-पाखएडो को मैंने अनेक बार नेस्त नाबूद किये हैं, फिर भी तू सामना करते हुए शर्मिदा नहीं होता है। क्या तुमे ऐमा कार्य करते हुए लज्जा का अनुभव नहा होता है ? तो फिर श्रा ना, अपनी करतूतो के फल चखले ।' उसी समय सुहृद् 'विवेक चन्द्र' बोल उठे कि " अहो । महाराज चैतन्य देव ! इस अनतराय फो सदल बल जीतने के लिये अपने रण कुशल और उद्भट योद्धा 'श्रो सर्वव्रतराय' सर्वथा समर्थ हैं । वे अपने आज्ञानुवर्मी अनुचरों के साथ इम व्यर्थाभिमानी अवतराय को क्षण मर में ही धराशायी कर दंगे । और सयम महल को सदैव के लिये निर्विन एवं निरापद बना दगे।"फिर क्या था ? आज्ञा प्राप्त करते ही श्री सर्वव्रतराय ने वैराग्य रूप वाणों की अविरल वृष्टि प्रतिपक्षी शत्रुत्रा पर करते हुए अन्तर्मुहूर्त में ही उन्हे काल धर्म प्राप्त करा दिया। चैतन्य देव के सैन्य शिविर में जय विजय की तुरहियाँ बजने लगी, और मोह राजा की सेना में घोर निराशा को निशि परिव्याप्त हो गई । शत्रुओं का हृदय रह रह कर कल्पना करने लगा कि अब विजय प्राप्त होना अत्यंत कठिन है। इमी समय सामन्त श्रेष्ठ श्री प्रमादसिंहजी ने वीरता पूर्वक हँसते हुए कहा कि “ऐसे प्राप्ठम्बर तो चैतन्य ने अनेक बार किये हैं, मैं इतना शक्तिशाली हू कि पूर्वधारी मुनियों तक को मैंने नरकगामी बना दिये हैं, तो फिर इस दोन हीन चैतन्य की तो बात हो क्या है ? जैसे हवा के मौके से बादल तितर बितर हो जाया करते हैं, वेसे ही अभी मैं चैतन्य को सेना को भी अस्त-व्यस्त कर देता हूँ। इतना निवेदन करके और मोह राजा का आशीर्वाद प्राप्त कर के मामन्त श्रेष्ठ श्री प्रमादसिह नी भी अपने सहचर और विश्वस्त पाँचों साथियों को एव अनुचर सुमटी को माथ में लेकर चैतन्य की बीर. वाहिनी के सम्मुख उपस्थित होकर गर्जना करने लगे कि-"श्राओ मेरे साथ युद्ध करो, अब मेरे सामने से भाग कर कहाँ जाओगे १ मैं तुम समी का घमट अभी चूर चूर किये देता हूँ।" इतना सुनते ही चैतन्य देव की ओर से रणविद्याविशारद श्री उपशमराव तुरन्त ही अपने पाँचों अप्रमाद नामक साथियों और वोर-सेवकों को साथ में लेकर शत्रुओं से भिड़ पड़े। 'भाव-मन' रूपी तोप के द्वारा परिणाम रूप' और 'शुभ विचार रूप' गोलियों की घनघोर वर्षा करते हुए अल्प काल में ही श्री उपशमराव ने प्रमादराय को उसके सहचारियों के माथ वहा पर वीर-गति प्राप्त करादी। चैतन्य देव हर्षित होकर 'ध्यान' रूप आनन्द में मग्न हो गये । कामदेव की रण कुशलता मोह राजा तो प्रमादराय की मृत्यु के दुखद समाचार सुनते ही वेहोश हो गया । कुछ समय के अनन्तर पुन होश आने पर माह राजा का पुत्र 'कामदेव' सेवा में उपस्थित होकर विनय पूर्वक बोला कि:- "अहो । पूज्य पिताश्री जी । आपके मेरे जैस पराक्रमशाली पुत्र के होते हुए आपश्री इतनी चिन्ता क्या फरते हैं ? अमी तणमर में हो-बात को बातमें ही मैं चैतन्य देवको अधिकार में किये देता हूँ।" राजकुमार फो बात सुनते ही तानों "वे रूप महाशक्तिसानी पुरुप खद होकर कहने लगे कि हे महाराज राजकुमार की महायता के लिये जाने को तैयार हैं, हम चैतन्य देव के गर्व को क्षण भर में खर्व कर देंगे।" हम ( १४ ) . - तब अश्व-सेना के सेनापति श्री क्रोधरायजी खडे होकर तमतमाते हुए बोले कि-'अपनी माता का दूध पचाने वाला ऐसा कौन है ? जो कि मेरे सामने खड़ा रह सके। राग, द्वेष, कलह, विवाद, वकवाद, कुत्सित वाद, आदि मेरे साथी वीर एक से एक बढकर है । ऐसे वीर सिंह के सामने कौन टिक सकता है ?" इसके बाद गज-सेना के अध्यक्ष श्री अभिमानसिंह बोले कि-'मैंने चैतन्य देव को अनेक बार दीन हीन बनाया है, मेरी वीर श्रणी में प्रविनय, मान, मद, दप, गर्व, आदि उत्कट वीर पुरुष विद्यमान हैं, और इनके पराक्रम क आगे हमारा शत्र हतवार्य हा जायगा । इतना सुनते ही रथ-सेना के स्वामी श्रा कपट प्रमादजी भी कहने लगेक-- मैंने चैतन्य देव को अनेक बार कायर बना करके स्त्री-वेश धारण कराया है। लहगे, साड़ो और चूडियाँ श्रादि पहिना कर उसे निर्वीय किया है तो क्या मैं उसे इस समय यों ही छोड़ दू गा १ कदापि नहीं । मेरी वारता-प्रविनी सेना में माया, उपाधि, कूट, वचना, छन्न प्रप व व्यग, धोखा श्रादि एक से एक बढकर रणकुशल शूरवीर मौजूद हैं, मेरे इन बहादुरों की करामात विश्व विख्यात हैं।' इस प्रकार युद्ध-मन्त्रणा होने के पश्चात् कामदेव' उपरोक्त तीनो कुशल वीरों और अन्य सहायक सैनिकों के साथ सुशोभित होता हुश्रा एव 'अनुराग, रति श्रासक्ति, आदि अपने युद्ध याजों को बनाते हुए रण-क्षेत्र में प्रा उपस्थित हुए। तत्काल ही चैतन्य देव को सामने देखते ही उनपर 'विषय-राग' रूप तीक्ष्ण, विमिश्रित कटाक्षमय बाणों की घनघोर एव अविरल वर्षा करना प्रारभ कर दी। क्रोध-सेनापति जानल्यमान अग्निबाण छोड़ने लगे। अभिमान-सेनापति ने स्तमन विद्या का प्रयोग करना प्रारभ कर दिया । माया-सेना पति ने गुप्त और परोक्षरीति से क्षति पहुँचाने की प्रवृत्ति चालू कर दी। इस प्रकार प्रलयंकारो विनाश की स्थिति उत्पन्न कर दी। जीत का पलडा पराजय के रूप में परिवर्तित होते देख कर महामति विवेक महानु- भाव महामहिम श्री चैतन्य देव से धीरता, वीरता और शान्ति के साथ बोले कि 'आप घबराइयेगा नहीं, शान्ति को ढाल को सामने कर दीजियेगा, और अपनी व्यूह रचना इस प्रकार कीजियेगा कि-कामदेव के मामने निवेदराय को, क्रोध के सामने क्षमाचन्द्रजी को, मानदेव के सामने मार्दवसिंहजो को, और कपट राज के सामने आर्जव प्रसादजी का खड़े कर दीजियेगा । ये सभी रण-विद्या विशारद है, अत हमारे इन दुदमनीय शत्रुनां का ये क्षण भर में ही नाश कर देंग।" इस प्रकार की व्यूह रचना का सनिश्चय करके उक्त सनापतियों को तदनुसार प्रवृत्ति करने का आदेश दिया । श्रादेश प्राप्त करत हो 'सभी सेनापति अपनी २ सेना के साथ 'अठारह हजार शालाग' नामक अजेय रथ पर श्रारूढ होकर 'सात्विक विचार-धारा' रूप मनकारी की मानझनाहट करते हुए शत्रुओं के सम्मुख निडर होकर प्रफुल्ल मन के साथ या उपस्थित हुए। 'नववाड़ रूपी अभेद्य सरक्षक व्यूह का निर्माण करते हुए वैराग्य वाणों की मेघधारा के समान लक्ष्य भेदी घृष्टि करने लगे। परिमाण यह हुआ कि काम देव तत्काल ही मृत्यु के शरणागत हो गये । इसी प्रकार क्षमा चन्द्र द्वारा क्रोधराज, मार्दवसिंह द्वारा मानदेव और आर्जव प्रसाद द्वारा कपट राज कालगति को प्राप्त हुए। कामदेव के मृत्यु प्राप्त करते ही "तीनों वेद-पुरुष, खो-नपुमक" नामक लड़ाकों का तो इस प्रकार अस्तित्व ही नष्ट हो गया जैसा कि गधों के सिर पर से सींगों का अस्तित्व ही नष्ट है। इस अभूत पूर्व विजय से चैतन्य देव की सेना में जय विजय के गगन भेदी नारे लगाये जाने लगें। चैतन्य महाराज अपनी प्रसा- धारण महत्ता का परम आनन्द अनुभव करते हुए निर्विषयी शान्ति और सरलता को प्रतिमूर्ति से हो गये। लोभराय रण क्षेत्र की और जब युद्ध के समाचार मोह राजा को प्राप्त हुए और उसने जाना कि 'मेरा प्यारा पुत्र और तीनों दुर्जेय बलिष्ट वीर-शिरोमणि भी युद्ध में ही काम आगये तो वह अचानक ही मृच्छांग्रस्त होगया। होश माने पर हाय हाय !! और त्राहि त्राहि करने लगा। कुछ समय के बाद मोह राजा लाल लाल भा. +4 ही रण . ( १५ ) क्रोध पूर्वक बोलने लगा कि-'अब मैं खुद मे जाकर और चैतन्य देव का सामना कर उमे मृत्यु का श्रालिंगन कराऊगा।' उस समय ममीप में बैठे हुए श्री लोभराय वोन कि 'पाप जैस महा प्रतापी और महा पराक्रमी महाराजा को चैतन्य जैसे साधारण वालक से युद्ध करने के लिये जाना उचित प्रतीत नहा होगा, अतएव मैंने एक योजना सोची है कि-चैतन्य को अपना 'उपशम मोह' नामक गढ देने का लोभ देकर उस उस में प्रविष्ट करा दगे । जब वह उसमें जम जायगा, तब अपने जो गुप्तचर सनिफ उम गढ म रह रहे हैं, वे शनै शनै सूक्ष्म युक्ति से चैतन्य की सेना का सवथा क्षय कर देंगे। ऐसी स्थिति को उप- स्थिति होते ही चैतन्य अपने आप ही अपने अधिकार में आ जायगा।' यह सम्मति गोह राजा को बहुत हो अनुकूल प्रतीत हुई । श्रत में सोच विचार कर मोह राजा ने लोभ चन्द्र को वैसा ही फरने की आशा प्रदान का। बड़ी २ श्राशाओं के साथ उत्साह पूर्वक लोभ चन्द्र ने भी 'हास्य,रति, अरति, भय,शोक, दुगु च्छा श्रादि सैनिकों के साथ सुसज्जित होकर युद्ध क्षेत्र की ओर प्रस्थान किया । चैतन्य देव के शिविर की यह स्थिति है कि 'धर्म-स्थान' नामक परिपद्-गृह में अपने सभी मांडलिक राजाओं, सामन्तों और वीर सेनापतियों को एकत्र कर चैतन्य देव के सभापतित्व मे प्रधान नायक श्री विवेक चन्द्र सब को सबोधित करत हुए कहने लगे-'प्रिय सज्जनो । अपना अधिकाश कार्य सानन्द विजय के साथ परिपूर्ण हो गया है और जो कुछ शेष रहा है, वह भी थोड़े ही समय में परिपूर्ण हो जायगा, ऐसा पूर्ण विश्वास है । परन्तु गुप्तचरों द्वारा विदित हुआ है कि "उपशम कपाय” नामक गढ़ में मोह राजा ने अनेक गुप्तचरों को नियुक्ति कर रखी है। अतएव सावधानी की आवश्यकता है कि कहीं लोभ वश हम पतित नहीं हो जॉय । उस गद में हमें किसी भी दशा में प्रवेश नहीं करना चाहिये । मार्ग में आने वाले सभी प्रकार के उपसर्गों को और परीपहों को शान्ति पूर्वक सहन करते हुए केवल 'क्षीण कषाय" नामक गढ़ में हो हमें प्रवेश करना है। इस रोति से ही हम मोह राजा का समूल नाश याने ओत्यतिक क्षय कर सकेग यहा हमारा अतिम लक्ष्य है। और इसी में हमारी परिपूर्ण एव निविघ्न विजय रही हुई है। प्रधान नायक के इस सुमधुर और सुललित भाषण से सभी अत्यत प्रसन्न हुए और सर्वानुमति से इस एक हो लक्ष्य से सहमत होते हुए सभी बोर वर रण-सज्जा से सन्नद्ध होकर "क्षीण मोह" नामक दुर्जेय गढ़ को जीतने के लिये उस ओर चल पड़े। थोडी ही दूर गये होंगे कि मोर्ग में लोभचन्द्र महोदय से ममागम हो गया। चैतन्य देव की सेना को क्षीण-मोह' नामक गढ की ओर बढते हुए देखकर लोभचन्द्र बोल उठे-'हे भाइयो । इतनी शीघ्रता क्यों कर रहे हो ? हमारा राजा तो आप के आगे हार चुका है, अब तो हम भो श्राप के ही शरण में आ पड़े हैं, अतएव हमसे लड़ने की अथवा डरने की कोई बात नहीं है । लो देख्नो सामने ही हमारा सुविख्यात 'उपशम-कपाय' नामक गढ दिखाई दे रहा है, इसी पर अपना अधिकार फरके इममें श्रानन्द पूर्वक राज्य फीजियेगा। मोह राजो तो हताश होकर हतवीये हो जाने के कारण दीन हीन अवस्था में हो चुपचाप बैठ जाने वाले हैं। वे अब तुमसे किमी भी प्रकार का लडाई झगड़ा नहीं करेंगे।" । . - चैतन्य देव की सेना उपरोक्त, लोमचन्द्र के भाषण सवधी घटने वाली घटना से पूरी तरह से परिचित ही घी, अत लोमचन्द्र के 'विपकुम्भ पयोमुत्रम्' के समान मधुर, परन्तु परिणाम में घातफ वचनों से कोई भी ललचाये नहा, और ध्येयकी ओर भागे ही बढ़ना चालू रक्खा। लोभचन्द्र अपनी बात की अपहेलना होते देखार असहिप्णुता से उत्तेजित होकर कर्कश शब्दोंमें बोल उठा 'अरे दुष्टो मेरे बधु-बांधषो को मारकर कहाँ चले जा रहे हो । ठहरो ! अब मैं तुमको छोड़ने वाला नहीं हूँ । इतना कह कर चैतन्य की ।

. - अतिम युद्ध . ( १६ ) सेना पर 'इच्छा, तृष्णा, मुर्छा, आकाक्षा, गृद्धता, आशा आदि नामक विविध याणों की घनघोर और अन्धाधुन्ध वर्षा करने लगे । लोभचन्द्र के इस प्रकार के तीक्ष्ण प्रहारो को देखते ही तत्क्षण चैतन्य देव ने 'क्षायिकपारिणामिक-धारा' रूप वाणों को प्रतिपक्षी पर अचूक दृष्टि के साथ मर्म भेटी वर्षा करनी प्रारम्भ की। फिर क्या देर थी ? थोड़ी ही देर में लोभचन्द्र भी अपने अनुयायी सैनिकों के साथ ही नरकगति का पथिक बन गया । इस प्रकार मोह राजा की सभी प्रकार की फोन समाप्त हो गई । ततपश्चात् चैतन्य देव ने निश्चिन्त होकर एव निरापद होकर 'क्षोणकषाय' नामक गढ़ में अपने दल-बल सहित जयविजय के नारों के साथ प्रवेश किया। मोह राजा का जब यह समाचार मोह राजा को विदित हुआ कि-लोभचन्द्र तो मपरिवार रण-क्षेत्र में ही काम आगया है । और चैतन्य देव ने 'क्षीण-कपाय' नामक अजय और अभेद्य गढपर अपना पूर्ण अधिकार स्थापित कर लिया है, तो उसके सारे अगोपाग सन्न हो गये, अब उसे जीतने की श्राशा तो दूर रही, परन्तु अपनी इज्जत और जान की रक्षा करना भी दूभर मालूम पड़ने लगी। फिर भी अपने स्वभाव अनुमार अहकार का प्रदर्शन करने हुए खुद ही चैतन्य देव का पराजित करने के लिये, और इनसे युद्ध करने के लिय कटिबद्ध हुया । तब 'ज्ञानवरणोय, दर्शनावरणीय, और अन्तराय' नामक शेष बचे हुए माथियों को एव अन्य अवशिष्ट सेना एकत्र करके चैतन्यदेव से अतिम युद्ध करने के लिये युद्र-स्थल की ओर चल पडा । जव चैतन्य देव को स्वय मोह गजा के युद्ध के लिये श्रागमन की बात मालूम पडो, तो उन्होंने 'क्षायिक सम्यक्त्व, एवं क्षायिक यथाख्यात चरित्र' नामक अजेय और महान् पराक्रम-शानी अद्वितीय रण योद्धाओं के साथ 'करणसत्य, भावसत्य,योगसत्य' नाम अभेद्य कवच धारण करके और वीतराग मय अपाय शील' शव लेकर 'सपूर्ण संवुड़ता याने सवर' नामक व्यवस्था से निश्चित होकर, 'सपूर्ण भाव-शीलता'नामक मद से मस्त होकर, महाज्ञान नामक वाद्य-योंकी झनकार में सेनाकी शोभा मे वृद्धि कराते हुए, महाभ्यान नामक पताका फरकाते हुए, महा तप-तेज से प्रदीप्त होते हुए, 'अमोह और अविकार' का दृढता को धारण करते हुए, 'श्रप्रतिपाती-अवस्था' से सुशोभित होते हुए, क्षायिक श्रेणी' नामक युद्धक्षेत्र में अपने विश्वस्त सहायकों और आज्ञानुवर्ती अनुचरों के साथ अंतिम युद्ध करने के लिये या उपस्थित हुए। चैतन्य देव को इस प्रकार सुसज्जित और युद्ध-मन्नद्ध सामने ही पडे देख कर मोह राजा अपने स्व. भाव-अनुसार मद-अहकार से मस्त होना हुश्रा बोला कि 'रे चैतन्य ' मेरी परम कृपामे ही तू मेरे घरमें बड़ा हुश्रा, अनत समय तक तूने मेरी सेवा को, अरे । नमक हराम ! अब मुझसे ही लड़ने के लिये तैयार हुआ, तुझे जो यह ऋद्धि प्राप्त हुई है, वह सब मेरा ही पुण्य प्रताप है, ऐमी ऐमी सृद्धि तुझे पहले भी अनेकवार मिल चुकी है, तूने भूतकाल में अनेक यार सामना किया है, और प्रत्येक बार मैंने तुझे पराजित किया है, इस प्रकार अनत-प्रसगों पर तू ने बुरी तरह से मुँह की खोई है । अनतबार विविध गति से हानि उठाने पर भी तुझे लज्जा का अनुभव नहीं होता ? भूतकाल के अनुभव को भूलकर बार बार मेरा मामना करता है। कुछ लिहाज करते हुए, थोडी बहुत तो लज्जा रख । चैतन्य देव ने शाति-पूर्वक गंभीर वचनों के साथ उत्तर देना प्रारम्भ किया कि-'६ नाच प्रात वाले मोह राजन् तुमने अनत 'बार मेरी मान-हानि की है, तुमने मुझे अनेक प्रयेगा पर लजित किया है। 'इस प्रकार मेरी दुर्दशा करने वाले तुमको मैंने भली भाति पहचान लिया है। इस कारण से तुम्हारी परि- स्थिति का मुझे सम्यक् प्रकार से ज्ञान हो गया है और यही कारण है कि विममे मैंन तुम्हारे मपूण - .

- ( १७ ) परिवार का नाश कर डाला है। अब मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ और यदि तुम भी मरगु देवी का चालान करना चाहते हो, और अपने परिवार का सर्व भाँति से लाश देखकर तुम भी नाम गेप होना पायो तो आओ, परस्पर युद्ध करके इस समस्या को भी हल कर लें । इतना कात हा चैतन्य गेय ने गा के मस्तक पर 'ज्ञायिक विचार धारा' नामक तीक्ष्ण तलवार का अचूक प्रहार किया। प्रहार को गोट टोक लक्ष्यभेदी सिद्ध हुई और मोह राजो देखते ही देखते प्राणों से हाथ धो बैठे। उमी ममय मोr राजा के प्राणान्त होते ही 'ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय' नामक मोह क मागन्त बोर भयभीनगर उत्काल उसी स्थान पर ही काल-कवलित हो गये। शेप बचे हुए 'नाम कर्म, गोत्र कर्म, वेदनीय फर्म, और आयु कर्म' नामक सैनिक चैतन्य देव के शरणागत होकर एव परों में पहकर निवन्न करने लगे कि- महामहिम हे 'जगत् वद्य ! हे अनन्त स्वरूप चतन्य देव । आज से हम आपक शरण म श्राय है, और धापके हो श्राज्ञानुवर्ती होकर अापके चरण कमला में रहना चाहते हैं, जिस क्षण श्राप जैसी अाशा प्रदान करेंगे।' उसो क्षण धिना ननुनच किये उमफा अक्षरश पालन करेंगे।' चैतन्य देव ने उन्हें निबन्न, अनाथ, अशरण और शक्ति हीन जानकर अपनी सेवा में भक्ति पूर्वक रहने को आवा प्रदान कर दी। चतन्य देव की विजय इस प्रकार चैतन्य देव की 'सर्व एश्वर्य सम्पन्नता' नामक श्रखह और अचल विजय के प्रात होते ही अनेक देवी-देवता धाकाश में उपस्थित होकर जय जय को दिव्यचनि, उच्चारण करने लगे। श्रेष्ठ द्रव्य को पुष्टि करने लगे, और देव दुन्दुभी बजाने लगे । चैतन्य देव को 'केवल ज्ञान और फेवल दर्शन' नामक अक्षय महाद्धि की प्राप्ति हुई। तीनों लोक में चैतन्य देव की आज्ञा मानी जाने लगी, और ये 'निलोक वंद्य' 'त्रिलोक-पूज्य' जैसो महत्ता को धारण करने याले बने । विवेक मत्रीश्वर की सम्मति से चैतन्य महाराज का सभी प्रकार का कार्य निर्विघ्नता के साथ और पूर्ण यश के साथ सपन्न हुश्रा एव परिपूर्ण हुअा। तत्पश्चात् युवक सम्राट महाराजाधिराज श्री चैतन्य देर पानद पूर्वक अपने अध्यात्मिक-शक्तियों रूप परिवार के साथ सयमरूप महल में परमानंद का अनुभव करते हुए निवास करने लगे। एक दिन विवेक मत्रीश्वर अपने महाराजा की समा में उपस्थित होकर निवेदन करने लगे कि "हे महाराज आपके जय-विजय-से और आपको सिद्धि से मैं अत्यत ही प्रसन्न हूँ। आप अब सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हो गये हैं, अत्त' मैं आपकी सेवा में श्रव किसी भी प्रकार को सम्मति प्रदान करने में सबथा असमर्थ हूँ। फिर भी एक अत्र सम्मत है कि इस समय तक भी धापके चार शत्रु शेष रह गये हैं, अन उनके लिये भी कुछ विचार करना अति आवश्यक है।" महाराज ने उत्तर प्रदान दिया कि 'इस सवध में विशेष विचारणीयं जैसा कुछ नहीं है, वे दीन, हीन और निवेल हैं। वे मेरे श्राक्षानुवर्ती हैं, वे ऐसा ही कार्य किया करते हैं जिनसे कि विश्व का हित-साधन हो। मुझे उनसे कोई हानि नहीं हो रही है। 'आयुष्य, नाम, गोत्र, और यदनीय' ये चारों शरणागत विरोधी केवल 'आयुष्य' के बल पर टिके हुए हैं। चेचारे श्रायुष्य का द्वास तो स्त्रमावत प्रत्येक क्षण हो ही रहा है। इसके मवया क्षीण होते ही शेष तीन भी स्वभावत्त अपने आप ही नष्ट हो जायेंगे | तत्पश्चात् मैं अनन्तानतकाल के लिये अक्षय, अमर, शाश्वन, नित्य, निराबाघ, स्थिति को प्राप्त होता हुआ निरजन एवं निराकार अवस्था को धारण करता हुआ परमपद् मोतरूप शिवपुर में अपने जन्म मरण रहित अनुपमेय पासन की स्थापना फरफे परम सुख का भोका होता हुआ सभी प्रकार से कृतकृत्य हो जाऊंगा। + + - गछ ४५ । " ~: शुद्धि-पत्र :- ग्रन्थ का स्वाध्याय करने से पहले निम्न लिखित त्रुटियों को शुद्ध कर पृष्ठ पंक्ति अशुद्र पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध है कलह। क्लहाच्चित्तभ्रमोद् ४० ३१ अपकाय अपकाय घ्रान्तयः। ४२ १४ व्रत प्रत ६ मूर्छादिभिः मूर्छादीनि १६ २० अवन्था अवस्था २७ संसार सवर १३ ३ इन द्वारा इनके द्वारा २४ कर्मक्षेत्रभूमि कर्म भूमि १४ २७ हजारों लगभग ७० हजार ४६ १५ वद्यः वधः ।कच० । ४ कचकड़े ४६ १६ तू तुम ३४ इस प्र० ऐसी खबरें बहुधा अख ४७ १० उपमुक्त उपमुक्त वारों में प्रकाशित हुई हैं। विषयास्तु विषया २६ घना कर बताकर १६ बीमारियों बीमारियाँ २२ १३ कायों कार्यों २५ ०नेन इह, नेन, २६ श्रास्ता आस्था २६ फर्त्तव्यो० फर्त्तव्यः सुमुमुक्षुमिः ॥ १४ अनुरुप अनुरूप ५२ १७ दुष्सयोगों दु'संयोगों ८ यद यह सुसंगठित सुगठित विविक्षा 'विवक्षा १८ दुष्सर्गाठत कुगठित १४ विफलता विकलता दूष लोभ १२ हास० हास० प्रत्यहार प्रत्याहार १३ ०पममि० ०पमममि० १२ ही ६ हड़ी के भाट के १७ अनमोक्ष अमनोज्ञ ११ काष्ठ बेत के ५ घास १७ पाप कपाय ५ निरावलम्बन निरवलम्बन १७ (८) (1) घास ५३ १० युवास्था युवावस्था निर० ८४ २ मूद ५६ सादि ३ धर्म ध्यान ३२ १३ चउप्पडायारे चउप्पडोयारे पएणते ३८ अनुसार इ०६० ६१ (७) (5) ३८ २४ तमाः॥ तज्ञाः ।। और ह १५ नाता साता विवाह ३६ १६ व्याख्या ६४ १४ तथा तथ्य, यथातथ्य ४० ३ काए, यका देवों की४क्षाक १७ सूर्य पर सूर्य, चन्द्र " " " १६ द्वेष ११ लीम (प २ R - बहिस १० निरा० छोड़ (मूद) २१ स्वाति शुभ ध्यान २७ ओर 15 ३२ विर्य

नथा सके
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१०३
११६ ३३ पा सके
११७ १७ साठों भा
पाठ-श्रठि सात-सात
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११६ ४ सुपर्ण सुवर्ण
१२७ ३ निमुक विमुच
पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध
१२८
२३ त्याने
त्यागने
१३० ६ पुण्यफल पुष्प-फल
१४५ १८ चागर चरा
१४६
३४ द्वि। द्वि० अतस्कध।
२३ फेयली
केवलो
१६२ १८ लोहा चुम्बक चुम्बक लोहे
खेल (कफ)

मुंद्रक'-
श्री जैनोदय प्रिंटिंग प्रेस,
धौमुखीपुल,
रतलाम.

अमोल-प्रकाशन १ जेनतत्त्वप्रकाश 1 . -: ताचिक ग्रन्थ :- -: कविता-ग्रन्थ :- १७ अमूल्य प्रभात २ परमात्ममार्गदर्शन १८ अमोल-कहानी ३ध्यान कल्पतरु १६ बृहदालोया ४ चर्म तत्त्व संग्रह २० सदास्मरण ५ सद्धर्म बोध २१ अमृत भजनमजगै ६ जैनतत्त्वज्ञानदिग्दर्शन २२ अमृत सुबोध शतक ७आत्मविजय २३ अमृत कविता कुज पच्चीसवाल का थोकड़ा २४ जिन गुण-गीतिका ६ लघुदण्डक का थोकड़ा : चरित्र ग्रन्थ :- १० श्री अमोलक जैन बोलमाला २५ अमृत चरित्रोद्यान २६ मदन श्रेष्ठी चरित्र -: सूत्र ग्रन्थ :- २७ शान्तिनाथ चरित्र ११ सार्थ आवश्यक मूत्र ८ प्रद्युम्नकुमार चरित्र १२ श्रतगड सूत्र (मूल) वीरसेन कुसुम श्री चरित्र १३आगम सुधा ३० जिनदास सुगुणी चरित्र १४शाखस्वाध्याय ३१ धन्ना शालिभद्र चरित्र -: मूक्ति ग्रन्थ :- ३२ भीमसेन हरिसेन चरित्र ३३ हरिवश चरित्र १५ जैनागम सूक्ति सुधा ३४ वीरागढ सुमित्र चरित्र १६ अमोल सूक्ति रत्नाकर ३५ मृगांकलेखा चरित्र कथा-साहित्य १ज्ञानाराधना २ प्रद्युम्न कुमार ३ धर्मवीर जिनदाम ४ अभय कुमार ५ मल्ली जिन ६ जिन सुन्दरी ७ महामती चेलना धन्ना शालिभद्र महिला जीवन मणिमाला (भाग १६) उपर्युक्त पुस्तकें निम्नलिखित पते पर मिलेगी श्री अमोल जैन ज्ञानालय गली नं. २, धृलिया (प. खा.)

Dayan Kalptru Vol- 27

Author
Pt. Gashilal
Title
Dayan Kalptru Vol- 27
File name
Dayan Kalptru Vol- 27
Text
OCR done
Citation
1968
Published
2012/02/01
Publisher
Rajkot, Shri Akhil Bharat
Language
Sanskrit
Pages
196
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Classification
Literature
DLI number
407848
Barcode
99999990071072.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
jXaNLBfpJSV
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Dayan Kalptru Vol- 27