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मुक्तिप्रकाश
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MARRIMINANT
मुक्तिप्रकाश
किचक
पादरी पी. एम. बक साहिब
लखनऊ
हिस्ट पबनिशिङ्ग हैम.
मन् १९१०.
मुक्ति प्रकाश ॥
पहिला पब ॥
साभाष.
मेरे बुढ़ापे का प्रारम्भ हुमा.
पर लाक लाने का दिन निकट है.
इस जगत में हमारा जीवन डेही
दिनां की यात्रा . मुझे बछी चिन्ता
और चाह है कि अपने मंगी यात्रियों
के लिये मैं महायता और अगुवाई
का कारण बनं. विशेष करके मैं उन
को भलाई का मार्ग दिखाना चाहता
हूं जो पाप की बुराई और मच्चे धर्न
की कुशलता कम ममझते हैं. मनुष्य
में दो बस्तये पाई जाती हैं, अर्थात
शरीर और श्रात्मा, शरीर माटी से
[ २ ] बना हुप्रा है और मृत्यु उसको बहुत बल्द शिकार कर लेती है. श्रात्मा श्रमर और अनमोल बस्तु है. प्रात्माही की भलाई की अधिक चिन्ता होनी चाहिये. इस संसार की सारी सम्पत्ति शरीरसी से सम्बन्ध दो चारदिन सक जगत की बस्तु से काम है और तब वह सब छूट कर फिर हाथ म प्रायेंगी. वह इस ये ग्य नहीं हैं, कि हम में अधिक पियार करें. पर- लोकही हमारी प्रात्मा का घर और निस देश है. जो प्रात्मा के लिये सच्चा धन प्राप्त किया जाये तो वह धन अविनाशी होगा. अमहाना है कि वह जाता रहे. परलोक की मुख्य পি জি৪ মাস কলা অহয় ? शास्मिक और स्वर्गीय जीवम है. वह जीवन सबही मिलता है जब कि हमारी प्रात्मा से पाप और उसकी
[ ३ ]
अशुद्धता दूर की जाती है. यह जीवन
ईश्वर की संगत में बीतता है. यह
आत्मिक जीवन इसी संसार में मनुष्यों
को दिया जाता है. प्रारम्भ में वह
जीवन छोटे बालक मासा होता है,
और उसको पालना और बढ़ाना
हमारा एक बहुत बड़ा काम है. यह
जीवन हर प्रकार से पवित्र और
उसका बड़ा बैरी पापही है. इसी
दशा में जो मनुष्य धर्मी होना लाहते
हैं मे पापों और अपराधों मे बचे
रहें जब हम पाप और अपवित्रताई
से
छुटकारा
पायें तबही ईश्वर हमारे
संग संग रहता है. उसी के दर्शन और
सङ्गत मे श्रात्मा का जीवन बना रहता
और बढ़ता जाता है. ईसर से न्यारा
मनुष्य को आत्मा हाजिर तो रहेगी,
पर उसकी भलाई और कुशलतानाश
होगी. जब मन में ईश्वर का बासा
[४ ।
+
प्राप्त हो तो मेरी मिद्ध होगी और
आत्मिक बल बढ़ता जायेगा. जब हम
परमेश्वर की संगत जाने तो तुम से
बडी मित्रता और प्रेम होगा उसी
दशा में वह स्वर्गीय पिता है और
हम उमके प्यारे पुत्र ठहरते हैं. जब
ईवर मे ऐमा मेल प्राप्त होता उसकी
इच्छा बड़ी प्रसन्न और प्यासी होगी
और उस पर चलने की सही चिन्ता
और चाह बनी रहेगी. प्राज्ञाकारी
में भी ईश्वर मादी महायता करता
रहता है. जब वह हमारा हाथ पकडे
रहे तो गिरने का डर न होगा. वह
अपने विश्वास करने हारे सन्तान को
हर प्रकार से सम्भालता है. वह मनुष्य
जो ईश्वर के दर्शन और संगत को
पाकर उसको जानते हैं और सच्चे
धर्मी और मन के पवित्र बन रहे हैं
सकल मंसार के लोगों के लिये उसी
[ ५ ]
ईश्वर के चुने हुये साक्षी हैं. मघ को
ऐमां को भाक्षी की आवश्यकता बहुत
है, ताकि वह जानें कि पाप मे उद्धार
और पामेश्वर से संगत और मित्रता
को प्राप्त करना कमी बहाई श्रार
महिमा की बात है. यह भी मय का
जानना चाहिये कि वह ऐसी मुक्ति
पा सक्त हैं. में दृमरों के नाम की
प्राशा में वह अ ते लिखता हूं जिन्हें
मैं ने बहुत दिनो मे परख कर रख कर
भली भांति जान लियाई पर
करे कि हम सब नमी का वह ज्ञान
और पहचान पाये जो उभ के दर्शन
बार र संगत में मिलता श्रीर
रक पाप
से बना हम उसकी इच्छा पर चलते
हुये इस जीवन का काटते जायें ॥
[ ६ ]
दूसरा पर्व ॥
पाप की पहिचान र पछतावा.
मैं
अवान था जब देवर ने मेरी
भास्मा की श्रांखां को यहां ले खोल
दिया कि मैं पाप और बेधर्मी की
बुराई और संमारिक वस्तुओं की
व्यर्थता का जान सका. मैं उन लोगों
की सभा में था जो सच्चे धर्मी और
ईश्वर के पियार कानेहारे थे मैं ईश्वर
के बयान का उपदेश सुन रहा था.
जब मनुष्य ऐसे धर्मियों के मन हो
भार ईथर का ज्ञान सीखें सा त्राण.
कर्ता को अवमर मिलता है कि पाप
की पहचान दे और त्रागा का मार्ग
दिखाये मैं ने बडी सफाई के साथ उस
वक्त अपने पापों को और उनके
अन्त को देख लिया. मुझ को पूरा
ज्ञान हुप्रा के यह सब बुराइयां मेरीही
[ 9 ]
हैं और कि
मुझ ही को उनका लेखा
देना होगा. काईकाई कहता है कि
ईवरही पाप कराता है. अनहोना है
कि यह बात मत्य हो. यदि यह बात
सत्य होती तो केवल ईश्वरही पापी
ठहरता और सब मनुष्य निष्याप
होते. यदि पाप के विषय में श्वर
मनुष्यों को निबंल करता तो वह
अपराधी नहीं हो सकते. वह लकड़ी
जो मारने में किसी का काम प्राये
पाप नहीं करती और न वह दगड के
ग्य है यह चलाई चलती और
पलने से नहीं बच सकती. यदि
मनुष्य ऐमे दुर्घस्न ठहरते तो निष्पाप
होते. परन्तु सब अपराधी जो अपने
माप को पहचानते हैं भली भांति
बाम लेते कि हमही पापी और दंड
पाने हारे हैं जब मैं ने ऐमी सफाई
के साथ अपने पापों को देखा तो मेरा
[८]
मंड बन्द और ईश्वर के साम्हने मैं
निरुत्ता हुप्रा मुझ
में बड़ी घबड़ाहट
और भय उत्पन्न हुप्रा. मैं ईश्वर को
भूस्न गया था. मैं अप स्वार्थी बन कर
अपने हो लिये अपने जीवन का काट
रहा था मुझे मोच और ममझ न
थी कि ईश्वर ने हमी काया मुझ
को संसार में भेज दिया था कि मैं उसका
प्रणाम और मेवा कर और दूसरे
मनुष्य को भनाई और कुशलता के
लिये अपने जीवन के दिनों को
सिता ऊं. अपनी प्रात्मा की मुक्ति के
विषय में मैं नींद की सी
था. बहुत
सो बाता में ईश्वर की
प्राज्ञायें उलंघन की गई थीं मेरी
अयोग्यता और मन को बुगाई
बहुत ही बड़ी दिखाई देती थी अपने
पापा से मुझ में बड़ा घिन उत्पन्न
हुआ और उनके कारण मुझे अपार
दशा में
-
[ ]
शाक हो गया, मैं ने साफ देखा कि
वह प्रात्मा जो अपराधी और अशुद्ध
हे। अवश्य नरक की अधिकारी होगी.
मनुष्य को आत्मा को
दशा
और लमके
बासा में मेल हो जायेगा अनहोना
है कि पापी मनुष्य दंड और क्लेश से
बचे रहें. जब पाप मिटे और हमारी
प्रात्मा निर्मन हो जाये तक हो सुख
और चैन की मूरत हा मक्ती धर्मी
और पवित्र मनुष्य की भलाई और
कुशन्नता की नव और माता ईश्वर
को मंगल ही में पाया जाता है. जब
मेरो पाखें खुली और मुझ पर यह बातें
प्रगट हुई ता दुर और ब्य'कुल्न ता के
मारे अडी कपरूपी हुई और बहुत
प्रांमू बहने स्नगे. यही दशा अवश्य
हर एक का होगा जब
मन की मलीनता और उनकी बुराई
की
पहचान प्राप्त हो जाये. अब पाप
पाप श्रीर
दृष्टि श्राई. [ १० ] हो और मनुष्य न हरे और न घम- डाये तो भली भांति जाना जाता है, कि अबलो पाखें नहीं खुली और कि प्रज्ञामता का अंधियारा छा रहा है. जब मैं ने इसी रीति से अपनी भात्मिक दशा को पहिचाना तामारी संसारिक बस्तुयें तुच्छ और निर्लाभ कहीं भलाई की प्राशा जगत में देखी न गई. यह संसार मेरे लिये किमी काम का न रहा. ईश्वर मे बही सफाई के साथ पाप का अन्त दिखलाया. जब प्रात्मा में पाप का बिगाह हाजिर हो तो शरीर का चैन और सुख देना हमको ठट्ठों में उडामा है. जब घर का स्वामी महा दुखी हो तो समे चिन्ता न होगी कि घर प्रख्या हो या बुग पहिले से मेरे पाप वैसेही बुरे थे पर जब उनको बुगाई का ज्ञान म हुमा तो मैं अपने पाप को कुल
[ १९ ]
मलामता था. कैसे शोक की बात
है कि पाप में अधिक लोगों को ऐसा
ही धोखा होता है.
वह
समझते हैं
कि मलाई प्राप्त होगी जबकि बिमाश
सामने हाजिर है यदि ईश्वर मुझको
ज्योति न देता तो मैं जल्द नष्ट हो
तीसरा पर्व॥
यीशु मसीह का ग्रहण करना.
लाख मेरी प्रात्मा में ईश्वर की
ज्योति के आने से ऐसे शेक और
घबड़ाहट और भय उत्पन्न हुये तो मैं
मे यीशु मसीह पर मन लगाया. जब
कोई पापी अपने मन की अपार बुराई
और मलीनता को पहिचाने और यह
भी जान ले कि इनका फल बिनाश है
[ १२ ]
तो कोई दूभरा दृष्टि नहीं पाता जिस
पर उद्धार के लिये भरोसा हे। ईश्वर का
एकलौता पुत्र इमी कारण देह धारण
करके भगत में पाया कि मारे पापियों
को जेा उसे ग्रहण करें उनके पापों में
बचाये, जब नुमका जन्म हुआ ते एक
नाम जे उमे दिया गया इम्म नुएल
था. इम बड़े नाम अर्थ यही है, अर्यात
ईश्वर हमारे मङ्ग. अर्चि माह में
मनुष्य के सारे गुमा हाजिर है तामी
सम्पर्णता के माय ईश्वर का स्वभाव
भी नस में पाया जाता है ताकि वह
अत्यन्त बडा काम जिपके लिये वह
संमार में प्राय पूरा किया जाये वह
में पापिया के बदले में बलिदान
हुप्रा. फिर तीसरे दिन वह जी नठा
और मदा ला जीता रहता है. ईश्वर
होकर पर हमार सङ्ग रहते हुये वह
पापमोचन और प्रात्मक पवित्रताई
मृत्यु
[ १३ ]
के देने के लिये हर प्रकार से तैयार
रहता है. वही अकेला मनुष्यों से
कहता है, कि “हे मब लोगो जो
परिश्रम करते और बेझ मे दबे हो,
मेरे पाम आओ, मैं तुम्हें विश्राम
देऊंगा." केवल उसी के विषय में
लिखा है, कि वह अपने लोगों को
उनके पापों से बचायेगा. " उसी के
ग्रहण करने से पाप और उसकी
अशुद्धता
से मिलता
है. ऐसे उद्धार का पाना मुक्ति का
पाना हे. यीशु मसीह की ग्रहणता
ऐसी मुक्ति की शर्त है. प्रार्थना और
बिन्ती के करने से मुके पूरा ज्ञान
हुश्रा कि यह हमारा मुक्तिदाता
तैयार और पास है कि मुझे बचाये.
परन्तु उसकी ऐसी तैयारी श्रीर
हाजिरी के ज्ञान के माथ मैं इस बात
के विषय में भी नई रीति मे
बुझाया
प्रपार
[ १४ ]
गया कि उसका ग्रहण करना क्या है
और कैसा कठिन है. ऐसी दशा हुई कि
गोया मसीह श्राप खडा हाकर मुझ
पूञ्चता है. प्रश्न यह था कि "यदि
मैं तुझे ग्रहण करू और तेरे पापों
को मिटाकार मन की मलीनता
दूर करू तो क्या, तू मुझे अपनी
श्रात्मा का राजा कर लेगा? क्या, तू
मेरेही लिये जियेगा और जीवन भर
सब बातो में मेरी इच्छा पर चलेगा?"
इस बात के पूछने से मैं बहुत पमहा
भया और मन मसीह से कुछ हट
भी
गया. मुझ में अपस्वार्थ का राज हुआ
था और उसका बल बहा था.
तैयार था कि बैगल की शिक्षाको
सत्य जानूं, और कि ईसाइयों की
रीतियों का ग्रहण करू, और कि
प्रगट में ईश्वर का भजन किया करूं.
में तैयार भी था कि कुकम्मों से अलग
[ १५ ]
रहूं परन्तु इम्मानुएल ने इन बातों से
बहुत अधिक करके मुझ से मांगा. में
ने भली भांति जान लिया कि अगर
मसीह की यही शर्त ग्रहण की जाये
तो नब जब मसीह की इच्छा और
हो और मेरी और तो अपनी इच्छा
को दबानाही पड़ेगा, और कि बहुत
से कामों को करना होगा जो मुझे
प्रसन्न नहीं हैं. पहिले ऐमी शतं के
ग्रहण करने से मैं ने साफ इनकार
किया. जब फिर मैं ने अपने पापों
और उनके दंड को देख लिया तो
ऐसा डर और शोक और व्याकुलता
हुई कि फिर मैं ममीर से बिन्तो
करने लगा. मैं ने चाहा कि प्रभु सम
कठिन शर्त को दूर कर दे और मुक्ति
का पाना और सहन करे. परन्तु उस
ने इस बात में मेरी ममुनी. अमहाना
था कि वह ऐसी बिनती को प्राय
है. मचमुच
[ १६ ]
करे. पाप का मूल और सोता यही
है कि मनुष्य अपनी ही इच्छा पर चले
जब कि वह ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध
मैं यही चाहता था कि
मैं जाप करताह जाऊ और कि
मसीह मुझे उम्के दंड से बचा ले.
उस बचाने की सीति हर प्रकार से
दूसली , परमेश्वर ही को इच्छा का
मागच्च धर्म और पवित्रता का
माग है, जो उस से न्यारा है से
पापही की बाट पर चलेगा और पाप
का फल पायेगा मुझ मे बड़ी अज्ञा-
नता था जिससे मैंने
इच्छाका
ग्रह गा कर ना बुरा जाना ऐसी अज्ञानता
में कितने लोग फसे रहते हैं. एक दो
घंटे ला इस भारी शर्त के ग्रहण करने
से मैं इनकार करता रहा. धर्मी मित्रों
ने मुझे बहुत समझाया कि यीशु पर
विश्वास किया जाये. पर मुझे विश्वास
प्रभु
को
[ १०
करने का ज्ञान न था. मैंने तो मन में
मान लिया कि यीशु मसीह ही अकेला
मुक्तिदाता है, नहीं तो मैं उसकी
और क्या फिरता. मैं समझताता था
कि उमी के द्वारा में पाप मिटाये जाते
और मन शुद्ध किया जाता है. यह
में न मानना था कि बिश्वास करने
में मब बड़ी बात यह कि हम
प्रभु की इच्छा को ग्रहण कर लें और
नुस ४३१ चलने को तैयार हो. जलक
यही बात न हे। तब तक हमबिश्वास
करने में बहुत दूर रहते हैं. प्रभु ने
मेरी बड़ी व्याकुलता
दुख
कर मेरी सहायता कि ई, नहीं ता में
उस कठिन शर्त का कभी ग्रहण न
कर सकता. पीछे मैं ने मन से उस भारी
प्रश्न के उत्तर में मसीह से यह कहा,
कि “हां, हे प्रभु, अब मैं तैयार हूं
श्रार तेरी इच्छा को ग्रहण कर लेता
प्रार
को देख
[ १८)
एं, और उसी पर चलते हुये मैं अपन
बोधन का बिताखंगा." विशेष करके
मेरे लिये मसीह पर विश्वास करना
यही था. इस शर्त के पूरा करने में
प्रभु ने अवसर पाया कि मुझ में और
मेरे लिये अपना बहा काम करे. सुम
अद्भुत काम के करने में उसने कुछ भी
देरी न किई. उस काम का बर्थन बड़े
ध्यान्द के योग्य है।
चौथा पर्व
पापमोचन पर नया जस,
मैं न पहिले म जाना पार न
सोचा था ईक यीशु मसीह ऐमो
अद्भुत रीति से ममुष्यों को मुक्ति
पार मम को सेरी और प्रानन्द दे
सकता है मुझे सामथ नहीं है कि
[ १९ ]
उसका पूरा बर्गन करूं. जब मैंमे प्रभु
को इच्छा को ग्रहण किया तो एकाएक
भन की सारी घडाहट और भय दूर
दुखा. शोक के सारे प्रांसू पोछे गमे.
मम बही शांति और चैन से भर गया
मुझे ज्ञान न था कि ईश्वर की ओर
अनुष्य
की प्रात्मा को ऐसा सुख
मिल सका है. उसी वक्त भी ईश्वर
का अद्भुत दर्शन भीतर की प्रांखां को
दिया गया और उस से मुझे बड़ा
अचम्भा हुआ. मैं पहिले न जानता
था कि मनुष्यों को ऐसा ईश्वरीय दर्शन
मिल सकता है. उस दर्शन के सङ्ग
इंचर का अथाह प्रेम नई रीति में
मुझ पर प्रगट हुश्रा. बैवल में उस
प्रेम का बहुत बर्णन तो मिलता
पर उस रात से पहिले मुफे सूझा न
गया कि ईश्वर मुझही को पियार
करता. उसी समय मैं ने समझा कि
[ ० ]
वह मेरा स्वर्गीय पिता है और पिता
की नाई
मुझ
से प्रेम करता है. मेरे
मन में उसी वक्त भी परमेश्वर से
पुत्र
का सा प्रेम जारी हुआ. नया जन्म
पाकर मैं उस रात को उसका सचा
पुत्र बना और इसी दशा में ऐसा प्रेम
हो सकता था. नये जन्म के बिना
अनहोना है कि यह प्रेम किसी के
मन में दूष्टि प्राये जब यह बड़ा प्रेम
किसी में पाया जाये तो उससे प्रगट
है कि नया जन्म प्राप्त हुआ. इस
नमे
और
अद्भुत
प्रेम के संग मुझे साक्षी
ईश्वर की ओर से बड़ी मफाई के साथ
मिली कि तेरे सारे पाप मिटाये गये
हैं. ईश्वर के साम्हने मेरी ग्रहणता
प्यारे पुत्र की सी थी. मेरे मन की
मलीनता भी भस्म किई गई थी. उसके
बदले में पात्मिक पवित्रताई दी गई.
उसी दशा में ईश्वर और मेरे बीच में
[ २१ ]
हूं
ऐसा परस्पर का प्रेम जारी हुआ था.
मैं ने गाया उसी रात को अपने
स्वर्गीय पिता की गोद में पनाह पाई
मैं भली भांति उस प्रेम को जानता
जो
मनुष्य
के बीच में और विशेष
करके उनके बीच में जो एकही कुटुम्ब
के हैं, और वह प्रेम बड़े प्रादर के
योग्य है. पर ऐमा प्रेम उसके साम्हने
जो ईश्वर में हो जाता है जब कि पूरे
नाप के साथ नया और आत्मिक
जीवन किमी को दिया जाता बहुतही
तुच्छ ठहरता है. मैं ने उस रात को
समझ लिया कि सच्चा धर्म पवित्र
प्रेमही है. प्रेम का यह जीवन उस
ममय मुझे दिया गया. इम बड़ी
तब्दीली और नये जीवन के संग मन
का ऐमा आनन्द हुश्रा जो अकथ्य
और महिमा संयुक्त था मेरी मात्मा
गोया स्वर्ग के प्रानन्द के सागर में
[ २ ]
इख रही थी. शोक के प्रांसुओं के
बदले प्रानन्द के बह रहे थे. मेरी
श्रात्मा बर को बाई और स्तुति
करतो गई. जब में ईबर की भजनपर
मंडली से अपने घर जाता था तो देख
पड़ा कि सब तारे भी घर की बहाई
कर रहे मार्ग में शुष भी मेरे संग
मानन्द करते हुये दृष्ट श्रामे. मैं नया
मनुष्य बना था और सारी सहि
भी ईश्वर की महिमा से परिपूर्ण होकर
नई दिशा देती थी. जब किसी की
प्रात्मा में ईश्वर का बासा हो जाये
तो आकाश और पृथिवी की बस्तुर्ये
भई और बड़ी मनोहर देखी जाती
इन बातों के तजुरुवे से मैं बड़ा
अचिम्भत हुमा, क्योंकि मुझे कुछ शान
और सोच न था कि ऐसी रोति से
यीशु मसीह मुक्ति दे सक्ता है और म
मैं एसी बड़ी प्राशीषों की बाट देखता
[ २ ]
था, ईश्वर मब पढ़नेहारों को सहा
प्रारिमक जीवन दे और तब वह
भनी भांति इस वर्णनको समम्हगे।
पाचवां पर्व,
पाप करने के विषय में मनकी तब्दीली.
अब अत्तालीम बरस के लगभग
बीत गये जब से उस गत का यीशु
मसीह के द्वारा मेचर मुझको मिला
और में उसका सच्चा पुत्र बना. ज्यों
ज्यों काल के बीतने से वह रात दूर
होती जाती है त्यों त्यों मन और
जीवन की वह तब्दीली जो प्राप्त हुई
महा और अद्भुत दिखाई देती है.
मम रात को मैं सचमुच नई रीति से
जीने लगा. तब से साल बसाल मुस
प्राप्मिक और नये जीवन की महिमा
[ २४ ]
बढ़ती जाती है. वह जीवन मेरे लिये
अनमोल ठहरता है. उसी कई एक
बड़ी उत्तम बातें पाई गई, जो मुख्य
बिचार के योग्य हैं. पढ़ ने हारों के
लाभ की आशा से मैं उन बालेर
लिख देता हूं ॥
एक बात यह है कि कामों के विषय
में मेरी आत्मा में बढ़ी लब्लीमी हुई.
अब नया जन्म पाकर मैं ईश्वर का
सच्चा पुत्र बना तो बिलकुल नई गति
से में उसकी व्यवस्था का शाबन्द हुआ।
पामेश्वर को व्ययम्या उनकी प्रगट
किई हुई इच्छा है. उस इच्छा
अनुमार बनना और मरना मच्चा धर्मी
होना है. ऐमी ब्यवस्था को बिरुद्धता
पाप है. उन मारी ज्ञानां में जो
ईश्वर की इच्छा से सम्बन्ध हैं मनुष्यों
की आत्मा को दशा र चालचलन
का नमूना मिलता है. हर एक मच्चा
[ २५ ]
धर्मी इम नमूने को बड़े प्रानन्द के
मंग ग्रहण करता है. जब मेरे मन में
ईश्वर से पुत्र का प्रेम जारी
हुआ
ता
वह व्यवस्था या उमझी प्रगट किई
हुई इच्छा बड़ी पियारी होने लगा
और उम ब्यवस्था की बिरुद्धता जो
ही पाए का मेाता है मुफ बड़ी
घिनौनी हो गई. उसी समय से मैं
आत्मिक पवित्रताई और सच्चे धर्म
की उत्तमता और महिमा जानने लगा.
न केवल वह बातें ऐसी बडी और
उत्तम दृष्ट आई पर मुझे ऐमी सामर्थ्य
भी दिई गई कि पाप पर जयवन्त होकर
मैं भवाई में मार्ग पर चल सक्ता था.
नये जन्म के पाने मे पहिले जब परी-
क्षाओं में बुराई की श्रेपर बड़ा खिंचाव
हो जाता था तो मैं दुर्बल होकर पाप
में फंभ जाया करता था. उन दिनों
में भी अन्तःकरण में
कुछ
उजियाला
[ २६ ]
तो था और मैं धर्म की भलाई और
पाप की बुराई को पहिचानता था
परन्तु एक बड़ी रोक यह थी कि मुझ
में बल की ऐसी कमी थी कि कुकर्मों
के खिंचाव को जीत लेगा अनहोना
था. मैं ऐसा अपस्वार्थी भी था और
मन में पाप की और ऐसा झुकाव
था कि मुके पर की व्यवस्था प्रमा
न हो सकी. मुझ में मईवर मे और
न मनुष्यों में प्रेम पाया जाता था.
प्रेमही केबल में ईश्वर की इच्छा पूरी
किई जाती है. अगर प्रगट में हम
उसकी प्राजाओं पर चले और प्रेम
महो तो सच्ची श्राज्ञाकारी न होगी.
जब मैं पहिले अपस्वाथ के मार्ग में पाप
करता था तो मेरा मन बारबार मुके
दोषी ठहराताथा और मैं बहा लज्जित
हुआ करता था. मैं वक्त बवक्त भी
ठहराता था कि श्रागे को मैं कुकम्मों
[ २७ ]
मे भ्यारा एगा और सुकर्मो बना
रहूंगा. पर ऐसी भली चिन्ता और
पाह से कुछ भीम बना. अपनी प्रात्मा
में मैं न ऐसा बिगाह पाया कि अबही
परीक्षा हो तो मैं लालच या क्रोष या
पैर या किसी दूसरी बुराई और मली-
मता में फंसा करता था.मैं पापड़ी का
दास था और उससे छूट मा अनहोना
था. मैं ईश्वर का सच्चा प्रणाम न कर
मकता था. पाप के कारण उससे बैर
और बिरुद्धता बनी रहती थी. ऐसी
दशा को बुराई का कुछ जान मुझ में
तो था, परन्तु उससे छुटकारा पामा
मेरे बल से बाहर था. बारबार नेकी
का इरादा तो करता था पर पूरा
करमा अनहोना था. उस लड़ाई में
मेरी प्रात्मा बराबर हार जाया करती
बी. हार जाने के कारण मुझे बड़ी
शर्म और घबहाहट हो जाती थी.
[ २ ]
जब उस रात को नया
मन और
नया जीवन मिला तो वह पुरानी
दशा दूर हुई. मेरी प्रात्मा की सब
शक्तियों में बड़ी तब्दीली दृष्ट आई.
मनुष्य में अन्तःकरण या कानशन्स
राज करने के लिये उत्पन्न किई गई.
जब वह ठीक हो तो पाप की बुराई
और धर्म की भलाई पहिचानी
जाती, और वह पाप के करने से
मना करती और धर्म के करने में उभा.
इती है. पापही कानशन्स को मिहा-
सन पर से उतार देता और उमी के
कारण वह अपना काम नहीं कर सक्ती
है. उम रात को मेरी कानमेन्म फिर
गद्दी पर बैठाई गई और उसको नया
अधिकार और बल दिया गया. उसी
वक्त से वह बहुत सी बातों को मना
करने लगी जिनके विषय में वह
पहिले चुपही रहती थी. वह उस रात
[ २९ ]
.
से बहुत से नये फराइज़ भी प्रगट
करने लगी जिन को
पूरा करना
अवश्य हुआ. उसने हर एक गन्दी
चिन्ता और बुरी इच्छा का मना
किया. वह लालच को मन में जगह
न देती थी. वह अपस्वार्थ और घमंड
और सारी आत्मिक और शारीरिक
अशुद्धता के बिरुद्ध हुई. उमकी अगु-
वाई यही थी कि ईश्वर का प्रणाम
बराबर किया जाये और कि उसकी
इच्छा के अनुसार मनुष्यों की भलाई
और मुक्ति के लिये प्रार्थना और
परिश्रम होते रहे. कानशन्स के राज
में अधिक बल के पाने से कामयाबी
भी हुई. गोया कानशन्स को उसके
सब कार्य में नये और अच्छे सहायक
दिये गये. मेरी बुद्धि को नया और
पात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ था. उस
जान में बड़ी महिमा पाई जाती थी.
[२]
उसकी ज्योति में चर का दर्शन
मिला था. वह चर सर्वशक्तिमान
और सर्वज्ञानी और पवित्रता और
प्रेम से भरा हुमा दृट पाया. घर
के संचियाले में मैं ने अपनी प्रामा
की उत्तमता और उसकी मुक्ति की
बहाई को पहिचान लिया. यह भी
भुझ पर प्रगट हुआ कि वह पात्मिक
जीवन जो मसीह से मिलता है कैसा
अनमोल है. हम बातों के सामने से
मेरी कामशम्स को बड़ी सहायता
पहुंची. अनहोना है कि कानशन्स
शक्ति प्रज्ञामता के अंधियारे में
अपना काम करे. पाप की दशा में
अंधेरा सदा बना रहता है. नये जीवन
के साथ ईश्वर अावश्यकता के अनु-
सार रजियाला देने लगता है कि
कान शन्स के राज में भलाई और
श्राशीभ हो ॥
[ ३१ ]
उसी रात को भी मेरी इच्छा की
शक्ति को अद्भुत तब्दीली प्राप्त हुई.
पहिले बही घबडाइट मार डरक
कारण मैं नेश्वर की इच्छा को ग्रहण
किया. मैं ने गाया लाचार होकर
मसीह को अपने तई दे दिया कि
उसकी सेवा करूं और पाप के दंड से
बचं. जब मेरी इच्छा को शक्त प्रभु
के हाथ आई तो उसने
अद्भुत
रीति
से उसकी
दशा बदल डाला उसके
बड़े अनुग्रह मे वह उसी की इच्छा से
यहां तक मिलाई गई कि उसी समय
से ईश्वर की प्राचाओं पर चलना
बहुतही प्रसन्न हुप्रा. मुझ में किसी
चिन्ता और चाह का पता न रखा
कि प्रभु को छोड़कर कोई दूसरा मन
और जीवन का हाकिम किया जाये.
यही चाह स्थिर हुई कि जो हो सो
है। परन्तु ईश्वरही मेरी प्रात्मा का
[ ३२ ] राआ बना रहे. अब मेरी इच्छा में ऐसी तब्दीली हुई तो वह भी कान- शन्स को बड़ी मददगार बन गई. जब आज्ञाकारी की नियत प्राप्त हा तो कान शन्म का काम सहज हो जाता है. यह नियत उस रात मुझ को मिली ।। बर्णन किया गया कि तुम वक्त ईश्वर का बड़ा प्रेम मन में जारी किया गया. उससे पहिले जगत को बस्तये मुझे बड़ी पियारी लगी और मैं उन्हीं को अपनी मुख्य संपत्ति जानता था. ऐमे संसारिक प्रेम में अपार बुराई और मलीनता है. उस अशुद्ध प्रेम के कारण मैं ईश्वर को किसी रीति से न चाहता था. उस रातको प्रभु ने मेरे प्रेम की बिचारी शक्ति को उठाकर और पवित्र करके नया जीवन दिया. उस वक्त से घर की गोद प्रेम का घर बनी रही. उसी की संगत से स्वर्ग का सा प्रानन्द
[ ३ ]
मिलता है. वही गोद गोया मेरी
मात्मा के लिये बैकुंट ही ठहरी.
ईश्वर की गोद उसी रात को मुझे प्राप्त
हुई. जब ईश्वर से ऐसी मित्रता और
प्रेम हुआ तो उससे कानशन्स को बड़ी
सहायता मिली. प्रेम के कारण ईश्वर
को इच्छा पर चलना बहुतही सहज
हो जाता है.वह प्रेम बराबर कान शन्स
को उभारता रहता है कि प्रभु की
इच्छा हर प्रकार से मानी जाय.
कामशन्स के राज में
वह
कामयाबी का कारण होता है।
सस रात को मेरी श्रात्मा प्रभु के
राज में पहुंची और तब से वह उसी
राज में बास करती है. ईश्वर के राजही
में मनुष्यों की कानशन्स अपना काम
कर सकती है. जब यीशु मसीह से
बुद्धि और इच्छा और प्रेम की शक्तियों
को ऐसी तब्दीली प्राप्त हो जाये तो
प्रेम बड़ी
[ ३४ । हम पाप के मार्ग पर चलना ग्रहण नहीं कर सकते हैं. प्रभु के राजही में सच धर्म और नेकी की सूरत पूरी रीति पर पाई जाती है। पर्ब। छठवां पवित्र लडाई का जमाना. नये जन्म में ईश्वर की ओर से मनुष्य की आत्मा को बहुत बड़ी तबदीली ता मिलती है, तो भी वह ममय जो जगत में काटा जाता धार्मिक और आत्मिक लड़ाई का जमाना है. संसार वह खेत है जिस में महा दुष्ट आत्मा अर्थात शैतान पर और हर प्रकार के पाप पर जय- वन्त होमा अवश्य है. जो मनुष्य पुषिधी पर कुकर्मी और अपराधी रहते हैं इस लड़ाई में हारही नाते
। ३५ ]
हैं. वह जो ईश्वर का अनुग्रह और
महायता पा पाकर जीत जाते हैं से
अपनी आत्मा को संभालते और उस
के बल को बढ़ाते जाते हैं. धर्मियों
के लिये यह लहाई सिद्धता का मार्ग
है. हमारा स्वर्गीय पिता मर्मज्ञानी
और प्रेम से परिपूर्ण होकर अपने
संतानों के लिये यही रास्ता धुम लेता
है. हर प्रकार का पाप हमारी प्रात्मा
का बड़ा शत्र है और यदि एक एक
पर जय प्राप्त न हो तो विनाश की
जोखिम है. जब मैं यीशु पर विश्वास
करके ईश्वर का पुत्र बना तो मुपके
जाम न था कि यह स्लष्टाई मागे
होगी और जीवन भर रहेगी. ईश्वर
की संगत पाकर यह सोच
हुम्रा
मैं जीत चुका. पर बहुत जल्द इस
लहाई का जाम मुफे प्राप्त होने लगा.
शैतान हमारी दशा को देखकर हमारी
[ ३६ ]
परीक्षा करता है. कभी वह बातें जिन
के
द्वारा
वह हमें फंसाने चाहता
है बाहर मे दृष्टि प्राती हैं और कभी
भीतर पाई जाती हैं. दूसरों की सहा-
यता की आशा मे मैं कई एक ऐसी
बातें लिख देता हूं।
कमी कभी जब शरीर दुर्बल या
मांदा हे तो उदासी समा जाती और
बड़ी कठिनता से विश्वास घटने से
बचाता है ऐसी दशा में उसको प्रार्थना
करके संभालना है. यदि ईश्वर पर
भरोसा स्थिर म रहे तो हार जाने
का डर बहुत बड़ा होगा. ऐसी दशा
में किसी वक्त प्रार्थना में मन जैसा
चाहिये न लगेगा, और बिनती करता
पहना कठिन काम है. कठिन हो या
सहज हो प्रार्थना करता रहना है,
जब तक कि जीतने का तखरिबा प्राप्त
न हो, नहीं तो शैवान जयवन्त होगा.
[ ३१ ] प्रार्थना में ईश्वर की बाट को देखमा है कि विश्वास और प्रेम बहाल रहे और बढता जाये ॥ किसी वक्त शैतान संमारिक बस्तुयें ऐसी रीति मे दिखाता है कि दृष्टि में आत्मिक बरदानों से अधिक लाभ- दायक ठरती इल प्रात्मिक बर. दानों के साम्हने संसारिक वस्तुयें मचमुच विणकुन तुच्छ हैं और इस बात को मदा स्मर्ण करना चाहिये. इस बात के विषय में ईश्वर की शिक्षा बहुत साफ है और नम शिक्षा का बड़ी दृढ़ता के मंग थाम्मे रहना अवश्य है ऐसा न हो कि बैरी जीत माये ॥ कभी कभी हमारे विश्वास और प्रेम की परीक्षा लिये ताकि उनका बल्ल यढ़े ऐसा देख पड़ता है कि प्रभु ने अपना मुख हमारी शात्मा से छिपाये रक्खा है. ऐमी दशा में उसकी
[ ३८ ]
बड़ी प्रतिज्ञा को स्मर्ण करना चाहिये
कि मैं तुम्हें न छाई गा और उसकी
बाट को देखना चाहिये कि फिर
दर्शन दे. ठीक वक्त पर उसका मुख
फिर दृष्टि प्रायेगा. उसकी इच्छा
नहीं है कि उसके सन्तान उसकी
संगति से न्यारे रहें. ऐसी परीक्षा में
इमारा बड़ा काम यही है कि अपने
विश्वास को स्थिर रखें और अपने
स ई उसके हाथ में छोड़ दें. मुक्ति के
प्राप्त करने में हम अपने तई ईश्वर
के हाथ में सांप देते है कि सदा
ला उसी के बने रहें, और किसी
परीक्षा में यह उपाय न बदलने पाये.
ईश्वर हर प्रकार से विश्वास योग्य है,
और अगर हम उसके बने रहें और
बराबर उस पर भरोसा करें तो
हमारी प्रास्मा में मुक्ति का काम
किसी दशा में न रुकेगा।
[ ३९ ]
कभी कभी इस बात से बही कठि-
मता होती है कि वह काम को प्रभु
हमको देता भारी बोझ सा देख
पष्टता है. सस पर दृष्टि करके बही
घबष्टाहट मन में समा जाती
हर है कि हम ईश्वर को कठोर स्वामी
समझने लगें. ऐमी दशा में बड़ी
हिम्मत और बहादुरी धाहिमे कि
मुक्ति का काम म रोका जाये. एक
बात सदा मन से माममा अवश्य
है, अर्थात कि ईश्वर. उस सामर्थ्य से
आहर जो वह हमें देने को तैयार है
काम का बोझ हम पर न डालेगा.
अनहोना है कि स्वर्गीय पिता जो
अपार प्रेम का मेाता है अपने मिज
पुत्रों से अंधेर और अन्याय का काम
करे. जब उस काम में जो ऐसा कठिन
दृष्टि पाये हाथ लगायें तो प्रभु ऐसा
अनुग्रह और सहायता देता है कि
[४०]
वह सहज हो जाता है. इस बात
को मैंने कितनी बार परखा और
सच पाया. यदि ऐसे काम को हम
देखते देखते निराश और बेहिम्मत
हो जाये तो सचमुच हार जायेंगे.
परन्तु अगर हम ईश्वर पर भरोसा
रख कर आगे बढ़ने की उसकी इच्छा
पर चलें तो वह सेवा पूगी किई
आयगी और हम जयवन्त होंगे. ऐसी
सेवा का फल बहा उत्तम भी पाया
आयगा. कभी गमा नहीं होता है
कि हमारे लिये ईश्वर का दिया
हुमा बोझ अधिक भारी और उसका
दिया हुआ बल कम हो ।
यह तजुर्बा भी आत्मिक जीवन
में मिलता है कि शैतान मित्र के
भेष पहिने हुये और मित्रता की
बातें बोलते हुये पाता है कि हमें
बहकाये और भरमाये. इसी रीति
[ ४१ ]
का
से समने
प्रादम
श्रीर
हवा प्रदन
की बारी में परीक्षा किई और
पाप में फंसाया. इस काम में उसको
बड़ी कपट और चतुराई है. जब ऐसा
हो तो ईश्वर से बिन्ती करके बल
और अगुवाई प्राप्त करना अवश्य है
और उसका साम्हना करके जीत लेना
है. जब हम प्रभु को अपने संग कर
रक्खें तो हार न जायेंगे।
इम जगत में वक्त बवक्त बड़ा
और शोक हम सब को मिलता
है. कदाचित मृत्यु हमारे किसी मित्र
या प्यारे को हम मे अलग कर दे,
या कोई रोग हमें मताये, या जीवन
के बिताने में तंगी हो जाये. ऐसी
बाते संसार में अनगिनत हैं. यह दुख
का काल है. अब ऐसी बातें हो तो
ईश्वर पर पूरा भरोसा रखकर धीरज
के साथ उन सब को सहना फर्ज है।
[ ४२ ]
वह थोड़े ही दिन तक रहेंगी. हमारे
प्यारे जो मर गये हम मे थोड़ी देर
मागे स्वर्गीय घरों में प्रवेश कर गये
और हमें फिर जल्द मिलेंगे. जब
बिश्वास स्थिर रहे तो संसार के सारे
दुख भलाई का कारण होंगे. वह
भलाई एकाएक दृष्टि न पायेगी,
परन्तु जब समय पाये से बह देखी
जायेगी. कुन दुःखां मे श्रामिक बल
बढ़ता जाता है॥
इम पात्मिक लहाई में एक और
परीक्षा यह भी है कि शैतान बार
बार हमें एकाएक लेता है कि मम
में क्रोध या बैर जगह पाये. उसकी
इच्छा है कि यह बातें हमारे लिये
गिरने का कारख हो. ऐसी दशा में
अवश्य है कि बड़ी चौकसी हो प्रारकि
ईश्वर से बिन्ती कई जाये ताकि हम
अपने बैरीके इस जाल में न फंस जायें।
४३
मैं जानता हूं कि अधिक मिश्वामी
लोग बिशेष करके लहाई के प्रारंभ में
कभी कभी किमी परीक्षा से थोड़ी देर
के लिये गिराये भी जाते हैं परन्तु
वह सिपाही जिम में पूरी हिम्मत
और बहादुरी पाई जाती है लड़ने
से हाथ न खींचेगा जवलो कि गिरा-
नेवाला आप हार न जाये. हा,
संसारिक लहाई में कभी ऐमा हाता
है कि सब से बलवन्त
और
बहादुर
सिपाही जत नहीं सकते हैं परन्तु
उस लड़ाई में जा शैतान और पाप
से होती है जयवन्त होने की सामर्थ्य
हर एक विश्वासी का दिई जाती है.
पाप के हर एक मार्ग से हुम न्यारे
रह सकते हैं. ईश्वर का अनुग्रह बम है।
मेरे तसारखा इस लड़ाई में मारो
के तजरिबे से मिलता है. कभी कभी
शैतान जीतने लगा. किसी किसी
[ ४४ ]
वक्त मैं गिरने से न बचा. परन्त कभी
ऐसा न हुमा
कि मैं लड़ने से रह
गया जब लो कि शैतान ही न हार
गया और मैं जयवन्त न हुआ. जब
एक बार अचेत होकर मैं गिराया गया
तो उससे ऐसा चैौकस किया गया कि
मस परीक्षा से मैं बचा रहता था.
लामही सीखती है कि दो बार जाल
में नहीं फंसती. उस रात में अब नया
जन्म मिला मैं जान बूझकर और
अपनी इच्छा से किसी पाप के मार्ग
में नहीं गया. नये मसीही शिष्यों के
गिरने का मुख्य कारण यही है कि
प्रारम्भ में आत्मिक ज्ञान की कमी
है. इस लड़ाई में तजरिबे के पाने से
शैतान की चतुराई और मक्कासी जानी
जाती है. पाप करने का श्रादत से
विशेष कर के बचा रङ्गना अवश्य है.
जब किसी पाप की आदत हुई ते
[ ४५ }
शैतान जीत चुका. इस बात मे मुझे
बड़ी शांति और श्रानन्द है कि उस
रात के पीछे जब कि वह तब्दीली
मिली पहिचाने हुये पापों के ग्रहण
करने में
प्रभु
ने अपने बड़े अनुग्रह
और प्रेम के कारण मुझे बचाये रक्या.
हां, शरीर में रहते हुये तो हर एक
मनुष्य भूलचूक अवश्य करेगा, क्योकि
यह जीवन बालकही का ठहरता है
और इस जगत में रहते हुये अक्षा-
मता से पूरा छुटकारा नहीं मिल
सकता है. इस संसार में हम सब
शिष्य या सीखने हारे हैं. अनहोना है
कि शिष्य एकाएक गुरू के बराबर
हो जाये. कारीगर की माई सीखने-
बाले का हाथ काम में नहीं बैठ सक्ता
है. भूलचूक में साक्षी महीं है कि प्रेम
में कमी है. जब छोटा बालक वर्तन
में प्रेम के कारण मातापिता के पास
[ ४६ ]
पानी ले जाते हुये उम में में
गिरा दे तो उसे देखकर कोई म
मोचेगा कि उसका पियार पूरा न
था. उस और मल की कमी के कारण
पानी गिराया गया. इम संमार में
मब घर्मियों की यही दशा रहती है.
श्वर मन के प्रेमही को देखता है.
नब बैकुण्ठ में मियान पन और पूरी
मामर्थ्य प्राप्त हो जाये ऐमो कमी की
बातें ी म रहेंगी. ऐशी भूल चूकें
मुझ से बहुतायत के साथ होती चली
पाई हैं और कितनी बार शोक और
पछतावा के कारण हुई. मैं उनको प्रभु
के पास ला लाकर क्षमा भी मांगता
पाया, और उसमे बिनती सुनकर सब
को क्षमामी किया. मनकी उम तब्दीली
के दिन से बराबर यही इच्छा और
इरादामा कि जहां लों ज्ञान और
समझहोईश्वर ही की इच्छा हर बात
[ ४७ ]
में पूरी की जाये. हर प्रकार की बुराई
से घिन और बिरुदता स्थिर रही
और बढ़ती गई. उमी रात को गाया
सच्चे धर्म और पवित्रताई की दशा
मेरा मिजदेश हुई और उसीकी बस्तुयें
और बरदाम मेरे लिये बम ठहरे.
जाम धूमकर पाप के देश की सम्पत्ति
से मेरा कोई काम न रहा. यह बड़ी
तब्दीली ईश्वर के अनुग्रह मे और
प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हुई. ईश्वर
ही की स्तुति और बहाई हो ।
सातवां पर्य।
मनुष्यों से प्रेम रखना.
जब उस रात मेरी प्रात्मा को
ऐसी अद्भुत तब्दीली प्राप्त हुई तो
मनुष्यों से मया और बहुत बड़ा प्रेम
जारी किया गया. भास्मिक और
[ ४८ ]
स्वर्गीय जीवन के संग यह जान भी
दिया गया कि सकल संसार के मनुष्यों
को वही मुक्ति जिसे मैं ने प्राप्त किया
था मिल सकती है. उसकी एक मी
श्रावश्यक्ता भी सब को होती है.
यदि ईश्वर ऐसी मुक्ति के देने में किसी
के विषय में पक्षपात करता तो यह
बरदान मुझ को कभी न मिलता.
मुझ में कोई बात न थी जिससे ईश्वर
मुझे बचाये और दूसरों को पाप में
छोड़ दे. उसी वक्त मुझ में बड़ी चिन्ता
और चाह उत्पन्न हुई कि सारे जगत
के लोग भी इसी जीवन और प्रानन्द
और बडी सम्पत्ति में मेरे संग भागी
हो जायें. इस बात के ज्ञान से कि
बहुत थोड़े मनुष्य हैं जो इस तज.
रिबे को जानते हैं हृदय में बड़ी
उदासी और दुख पहुंचा. मुझे अचम्भा
की बात है कि उस वक्त एकाएक सारे
[ ४९
कुछ संदेह
जगत के लोगों के लिये ऐमी चिन्ता
और प्रेम मन में समा गया वह मुक
में
हर प्रकार में नई बात थी.
नहीं कि वह मोरेश्वर की ओर से
भुक को दिया गया. मैं ऐसे प्रेम की
राह न देखता था. नस वक्त ने पहिले
में चैन और सुख नार कितनी वस्तुयें
अपनेहीलिये चाहता था और दूसरों
को चिन्ता ज सवल व था, मुक्क
में
संसारिक पदार्थों ले जड़ा प्रेम था
और मैं धनवान होने का अभि-
लापी था जन मुक्ति के विषय में मैं
सोचता भी था तो केवल अपनी ही
भलाई के लिये उसे प्राप्त करने की
चिन्ता ही थी. बिचार यही था
कि किमी वक्त मरने से पहिले उस
को प्राम का नंगा कि नर्क में पाप
के दण्ड से खचा रहूं. कुछ भी चिन्ता
न थी कि मैं पापमोचन और पवित्र
। ५० ।
पाप के
मन पा लूं ताकि दूसरों की सहायता
करूं कि वह भी बचाये जाये.
मुझ
में
अपस्वार्थ हो का राज था
जीवन में यही दशा मदा पाई जाती
है. केवल अपने ही लिये चिन्ता और
सपाय किया जाता है जब ईश्वर से
नया जन्म और श्रार प्रात्मिक जीवन
मिलता है तो इस बात के विषय में
अद्भुत तब्दाली हाती हैं. उस तब्दीली
को पाकर मैं जान गया कि ईश्वर की
इच्छा हर प्रकार से और है. वह
मुक्ति के पाले हुओं के द्वारा मे दूसरों
को खिचवाने चाहता है कि वह भी
बचाये जायें. जब हम पाप से बच
कर ईश्वर के मित्र बने तो अपने मन
में भी यही चिन्ता र बडी चाह
पाते हैं. जब किसी में ऐमी लालसा
उत्पन्न हो जाये तो
वह
भलाई के वास्ते प्रभु से बिन्ती भी
दूसरों की
[ ५१ ]
करेगा और उनके बचाने के काम में
हाथ लगायेगा. अब तक किसी में
अपस्वार्थ बनी रहे तो प्रगट कि
उसके आत्मिक जीवन नमिला और
वह ईश्वर से दूर है. जब वह दशा
प्राप्त है। जिनमें हम दूसरों को मुक्ति
लिये चिन्ता र प्राथना करें
ཀིrསྡུག
प्रभु
* उनके बचाने काम
में भाग हो जाये तबही इस धन्य
हैं. अपने संताने के द्वारा से ईश्वर
भगत के लोगों पर अपनी सहिमा
और प्रचार प्रेम का प्रगट कर देता
है. हर एक का जो पाप से बचाया
जाये इम बले काम में जगह और भाग
दिया जाता है. जो कोई
अपनेही
लिये जाने चाहे प्रभु की संगत न
मानेगा. ईश्वर अपने मित्रों के मन
में दूसरों से अपना सा प्रेम जारी
कर देता है. जब दूसरों से सच्चा प्रेम
[ ५२ ]
हो तो अनहोना है कि उनकी मुक्ति
की चिन्ता न किये जाये. उसी रात
से मैं ऐसी चिन्ता और चाह औरों
के विषय में जानने लगा. थे दिनों
के पीछे मेरे मन में बड़ी सफाई के
साथ यही साक्षी आई कि प्रभु तुझे
बुलाता है कि उपदेशक के काम में
अपने जीवन को काटे. मुके ज्ञान
था कि ऐसा काम बहुत ही कठिन है
और किऐमी संवा में संसारिक और
शारीरिक चैन्न कम मिलेगा. अगर
कोई इली चार से इस काम का
ग्रहण करे कि शरीर पले यार जगत
में सुरस मिले तो बड़ा अयोग्य काम
किया गया. समाविक लाभ की आशा
से मात्मिक और धर्मिक मेवा में
प्रवेश करना पाप भी ठहरता है. ऐसे
मनुष्य पर ईश्वर की प्राशौष न होगी.
जब मनुष्य देह की भलाई के लिये
[ ५३ ]] इस काम में हाथ लगाये तो दूम की मुक्ति की चिन्ता और चाह कम करेगा और उसकी सेवा में अवश्य डीलापन और बेफाली होगी किसी मनुष्य का अधिकार नहीं है कि अपने लिये ऐसो अहत्मिक सेवा चुन ले. जो बिन बुलाये उसमें हाथ लगाये ईश्वर की ओर से धन्य न होगा. ऐसे रेवकों रका चुननेहारा प्रभु सायही है जब किसी में ईश्वर का पूरा प्रेम हे और वह मनुष्यों हा भी जैसा चाहिये पियार करता तो धन्य बलब इस बल मेवा के लिये बुलाया आवे र तक ग्रहण करके शाम योग्यता और सरगर्मी सा उसमें अपना जीवन काटता जाये. इस बड़ी सेवा में उत्तम अवसर मिला कि मनुष्यों के सचाने में सहायता करे. इस काम में उपाय तो है कि नप- En
[ ४ ]
देशक पाला जाये ताकि भएना सारा
वक्त वह शिक्षा देने और ईश्वर के
लिये लोगों के उभाड़ने में सिताये.
यह मेघा जम कि भली भांति लिई
जाये ऐसो भारी है कि और कामों
के निशे समय नहीं हेला है. बटे हुये
जीवन में फलदारी कम मिलेगी, इस
सेवा आत्मिक और स्वर्गीय बदला
है हाल मचा धर्मा संसारका साथ
की आशा के इस काम हाथ न
हालेगा एक और बात स्म ण करने
के ये है, अर्थात कि न केवल
उपदेश पर आत्मिक
प्रगुत्रा
लोगों
के बचाने की सेवा में ईद के संग
भागी है. सज मनुष्य जेर श्रर को
जानते और उनके पिया करते हैं
इम के काम में हिस्सेदार और सहा-
यक हेरते हैं वही विश्वामो दूसरों
की मुक्ति की लालसा के कारण उनके
५५ ]
लिये बिन्ती और परिश्रम करते जायें
से अपने सात्मिक जीवन में अधिक
अढ़ती पायेंगे इसी मार्ग में हर एक
धर्मी के लिये बड़ाई पर प्रदर की
सूरत है ईश्वर चाहता है कि उसके
सन्तान प्रममा में हुन्न रहें और
श्रादर के १५३ हो जाये अब दृसरों
की भलाई और मुक्ति रोचन्ता
और चिन्ता र मिति चार
तर म बार में प्रभु की इच्छा पूरी हो
सकती है बहन जो केवल का पही
लिये जर मात्मा में लेटाकर और
घटने कालमा जाने जा
अपने बुढ़ाई में मुझे बा मानन्द
है कि ईश्वः को इच्छा के भानुमार
मैं ने न्द आत्मिक सेवा ॐ महा
किया और मनुष्यों के सत्र ने के काम
में अपने जीवन को मिलाया. मैं ने
इम बड़े काम में मुख्य ति से ईश्वर
[ ५६ ]
की भगति पाई और मझे आशा
कि मेरे द्वारा से बहुत से लोगों ने
प्रभु में मेन और मित्रता प्राप्त शिर्ड
हर एक मनुष्य जो इस सा की सेवा में
सहा ता करे और दूम की भलाई
शा कारणा हे। लाये धन्य है ।
८
प्राठयां पब
मत और धर्म का स्वभाव.
उपर रात को प्रात्मक तब्दीली
से मैं ने नई नीति में पाया कि
सत मल सा मूल और उत्तमता क्या
है और कि मच्चे धर्मा हाने से क्या
अर्थ है पहिले मैं ने नवी को धर्मी
माना जा सल मला शिक्षा को
ग्रहण कर ले, और उमा मोतिय
पर चला करे, और प्रगट में ईश्वर का
प्रणाम करने हारा हे. हेश्वर की
[ ५७ ]
हैं
व्यवस्था की आज्ञाओं के विषय
में मैं ने यह बात साथी कि वह
सिपाहियों की नाई, जे मार्ग की
दोनेां और सफ बधे हुये खड़े
एक सफ के सिपाही कितने
कामां का मना
कर रहे हैं, कि
इल के ल करना. नार वर्षद करो
तो भारी दण्ड पाण. दूसरो और
के उतार रही हैं कि यह काला
श्रा घाना, नाम दाना मफे के
अपने पार हथियार दिखा दिखा
कर सकी और घुडको देते हैं कि
लोग उन हरें और अपने फज को
पूरा करने आयें मैं ने यह भी समझा
कि अगर मल को ही होते और
पूजा
की सारी बात और
व्यवस्था की सारी प्रासायें सानी
जाये तो इम्म जीवन के पी के स्वर्ग
में बड़ा बदला मिलेगा, और कि
-
[ ५८ ]]
तस बदले में ऐसी बस्तुयें प्राप्त होगी
कि सुख और प्रानन्द पूरा होगा.
जब उस रात को यह नया और
स्वर्गीय जीवन मिला तो मैं ने भली
भांति पहिचाना कि ऐसे विचार बहुत
कच्चे हैं और कि मचे मत और धर्म
के मार्ग में जो दशा मिलती है मेर
हर प्रकार से दूमी हर अधिक
पानमा हेपत्ती है. हां, मन मत रह
शान सेए जैसे ग्रहगा करना पवश्य
है. नाना प्रकार की रीते भी हैं जिन
को मानना फर्ज है व्यवस्था भी दी
गई है जो बड़ी श्रादर योग्य ठहरती
साहजिसकी जान पर मलना
होता है. प्रण्ट में ईअर का प्रणाम
करना होना भी वश्य है यह
सब बातें अपनी जगह में भली दडू.
रती हैं परन्तु सच्चा धर्मों और भक्त
ना दूसरी बात है. इन बातों में
[ ५ ]
सत मत का मूल काम पूग नहीं
होता. उस रात की तब्दीलो में यह
ज्ञान मिला कि मत मत एक द्वारा
है जिम से शरीर में रहते हुये मनुष्य
ईश्वर का दर्शन पाकर उसकी मंगत
में अपने जीवन के शिनासे ईश्वर से
ऐमी संगत एक मित्रता का आयकर
लेना सो धार्मिक सामा और
सात्मिक सावन काका ईश्व
पीयर स्वयि औचन मततका
इजहार बहीनी सिका
वर्णन इस पेश किया है.
तम में तीन बहुत सी साप लें हैं जे
बड़े बिचार के थे गया हैं ।
१. म लथे म , जीवन
में ईश्वर * मना पनि सर जती
है. यह ईश्वरीय ज्ञान ईशः दर्शन
और संगत में प्राप्त हेता है, यह
तजरिबे का ज्ञान होता है, और ऐसा
..
[ ६०
poeng
सान सा उत्तम है. तजरिबे के
ज्ञान में ऐसी सफाई और सच्चाई पाई
जाती है कि उन के विषय में संदेह
जगह नहीं पा सकता है सुमी सुनाई
बातो का ज्ञान दूसरे प्रक्षार का हाता
है. हम सदा गर्मी, भूध पियास,
उंजियाला आपया, सुख दुख
इत्यादिको पहिचान तजरिबे से पाते
हैं. जब बुद्धि ठीक है। ता भव मनुष्य
माना है। ऐसी वस्तुयें या ऐसी
दशाथ मार से हैं भार उनका
इनमा ५३: भूखता उहाता है. जब
মক द्वार से नया जन्म और नया
जीवन मिला मनुष्य का मन ईश्वर
का घर हो जाता और उसने
उसका हानि और दर्शन पाया
जाता है. पिता पुत्र की मी संगरू हे
जाती है. वन के दिन ऐका संगत
में बिताये जाते हैं. जब ईश्वर में ऐसी
[ ६१ ]
संगत बनी रहे तो उसके होने के
विषय में संदेह करना होना है.
उसकी शक्ति बनता और प्रेम
की अद्भुत महिमा के मसले हुये
कोई च नहीं सकता कि वार में
कमी हे. देसनेहा सू के अंधेश
नहीं मान कर ति हैं. ईशा कई ऐसी
संगत मार मित्रता इन ए मनुष्य
प्राप्त कर सकता है के होने
और महिमा का ज्ञान Xमल
भकतामा भार्गत मत
को बड़ाई और बारम दान थाना है ।
२. नया राम जन्म और
जीवन को पाकर मनुष्य की इच्छा
ईश्वर की इच्छा के ग्रहगा करती और
उस से पूरा मेल है। आता है. हां,
प्रारम्भ में ईश्वर की इच्छा के आधीन
आना मुक बहुत ही कठिन काम
ता हुआ, पर यह दशा अरूद दूर हुई.
यह कठिनता भात्मिक जीवन केपाने से पहिले थी. अब नये अन्म के पाने से मैं ईश्वर का निज पुत्र बना तो उसकी इच्छा बड़ा पियाशी हो गई. इमो मार्ग में ईश्वर की और मेरी इच्छा में एकता हुई. ईअर को छोड़ कोई नहीं मिलता जे भयोग्य है किस बात में और सदा लोलको इच्छा ग्रहण की जाये पर ईश्वरसब- और भशक्तिमान और पवित्रता और प्रेम करे पर पूर्ण होकर ऐसा योग्य है कि हर एक मनुष्य बड़े अानन्द के संग उसके प्राधान हो सके और ऐसा आधी. नता सब पर फर्ज है उस इच्छा में अपार महिमा पाई जाती है. उसको सम्पत्ति में मनुष्यों की भलाई और कुशलता को सारी बस्तुयें बहुतायत के साथ पाई जाती हैं. उस इच्छा के ज्ञानी
[ ६३ ]
भीतर गोया सारे योग्य और लाभ.
दायक कामों के लिये जगह बहुत है.
वह हमारे जीवन को श्राशीष और
सुकर्मों के लिये गाया ऐपी लम्बी
कुरी है जैसा मूर्य और चन्द्रमा और
तारों के वारत पाकाश लम्बा चौड़ा
है. किसो भलो बस्तु या काम के लिये
ईश्वर की इच्छा में शाहर आने की
कुछ भी आवश्यक्ता नहीं है. सारा
जीवन पूरे चैन और प्रानन्द के संग
उस इच्छा के भीतर बीत सकता है.
जब ईश्वर की इच्छा हमका किसी
वस्तु के लेने या किसी काम के करने
से रोकती है तो कारण यह है कि
हानि और बिनाश का डर है पिता
होकर वह प्रेम के कारण हमें हानि
और बिनाश में बचाने चाहता है.
पहिले में इस बात के दबाव के कारण
कि पाप का दण्ड बिनाश होगा ईश्वर
[ ६४ ]
की इच्छा का प्राधीन हुआ. परन्तु अब
नया और प्रात्मिक जीवन मिला तो
मैं उस इच्छा को बहुत प्रसन्न माग्य
पाया पार ज्यों ज्या यह जवन
बढ़ता गया त्यों त्यों वह इच्छा अहु.
मूल्य और प्रिय होती गई. उसकी
उत्तमता और महिमा बागुन दृष्टि
माती है. ईश्वर को इच्छा धर्मिय
का कि देश मे या ठह तो जिस
में उनकी आत्मा का ४५ होता है
मजस में नशा सुखद
धदि पूर्ण है. धर्मी मनुष्य की इच्छा
उसके सारे कामे से ईश्वर का ठहराया
हुश्रा वजीर मा प्रधान है. जब यह
वज़ीर अपने प्रभु को इच्छा पर चले
तबही उसका सारा काम ठोक होगा
ईश्वरीय इच्छा में बाहर जाने की
मात्रा नहीं है. उस इच्छा की हद्दों
के भीतर हमारे लिये जगह और
। ६५ ]
काम बम है. ईश्वर के आगे ऐसी
प्राधीनता में सच्चे धर्म की नेव और
मूल है. उनी आधीनता की दशा में
सतमत का फल दृष्टि प्राताले
३ जब नया और आस्मिक जीवन
प्राप्त हे। ते ईश्वर के निज
पुत्र हेकर
हमारी प्रात्मा में स्वर्गीय पिता से
पुत्र का मा बड़ा प्रेम जारी होगा.
उस आत्मिक जीवन का मुख्य गुण
प्रेम ह' है. ईश्वर प्रेम है, और उसके
निज पत्र अपने पिता को माई होंगे.
पवित्र प्रेम गाया आत्मिक जीवन का
जीवन है जब प्रेम पूरा हो तो उसी
के कारण आत्मिक और धार्मिक
जीवन के और बड़े गुण भी उत्तम
और लाभदायक होते हैं. संगत पाकर
ईश्वर के दर्शन और पहिचान का
पाना इसी कारण बहुत बड़ी बात
है कि वह हमारी प्रास्मा का प्यारा
हो गया है. जब प्रेम न हो न हम
उसको पहिचान सकते और न उस
की पहिचान की अधिक चाह हो
सके. प्रेमही हमारी आत्मा को उभा-
हता रहता है कि ईश्वर की पूरी
संगति हो और कि उसका अधिक
ज्ञान प्राप्त होता जाये. कितने लोग
ईश्वर के ज्ञान के सीखने में निश्चिन्त
और सुस्त होते हैं और कारणा यही
है कि उनमें प्रेम की कमी है. जहां
प्रेम पूरा हे तो अवश्य बड़ी चाह और
चिन्ता होगी कि ईश्वर के गुण और
उनकी महिमा जाने जायें. जब
ईश्वर का दर्शन और साफ होता जाये
और उससे संगति बढ़े तो प्रेम भी
तरक्की पाता जायेगा. प्रेम ही के
कारण भी ईश्वर के प्राधीन होजाना
सहज होता है. प्यार करनेहारे चाह.
तेही हैं कि ईश्वर की अकेली इच्छा
[ ६७ ] पूरा हो पूरी की जाये जबही ईश्वर की इच्छा से बिरुद्धता हो तो साफ प्रगट है कि उससे प्रेम की कमी है. प्रेम की दशा में ईश्वर की इच्छा को पापन्दी पूरी निर्बन्धता ठहमती है. प्रेमही के मार्ग में प्रभु का जुआ सहज और उसका बोझ हलका है. जब प्रेम तो ईश्वर की सारी प्राज्ञायें हर प्रकार से ग्रहण योग्य ठहरती हैं और उनमें से कोई भी भारी नहीं है. प्रेम करना ईश्वर की व्यवस्था को पूरा करना है. प्रेम ईश्वर के आगे प्राज्ञाकारी करेगा और अनहोना है कि प्रेम पड़ोसियों की बुराई करे प्रेम अपने प्रभुही का राज चाहेगा और जान बूझ कर कोई काम न करेगा जिससे उसकी इच्छा टल जाये. प्रेम के लिये ईश्वर की गोदही बैकुंठ ठह- रती है और वह उस की संगति में
[ ६८ ]
और कुशलता
प्रानन्द
की
सारी
बस्तुयें पाता है. ऐसे प्रेम के आगे
इम संसार की सम्पत्ति और धन
तुच्छ और नाचीज हे सृष्टि में कोई
पदार्थ नहीं है जो पिधार करनेहारी
मात्मा को ईश्वर से अलग कर सके.
म प्रेम हा तो ईश्वर ही में पूरी मेरो
मिलती है. जब हम इसी रीति से
ईश्वर की पहिचान प्राप्त करें और
मक माधीन हो जाये और प्रेम के
माग में उसके साथ साथ चलें तो हम
जानेंगे 'क मनुष्यों की कुशलता और
भलाई के लिये कैसा उत्तम उपाय
किया गया है। इन्हीं बातों में मुक्ति
का बयान और पहिला फल मिलता
है. परलोक में इस मुक्ति की पूरी
फसल हमें दी जायेगी, पर उस में यह
तीन बड़ी बातें पाई जायेंगी अर्थात
ईश्वर की पहिचान, ईघर का राज
और ईचर का प्रेम. उस मनुष्य के
लिये जिसने मुक्ति पाई सारी सृष्टि
ईश्वर की महिमा से भरपूर पाई जाती
है. वह हर जगह में अपना स्वर्गीय
पिता हाजिर पाकर उस से संगति
प्राप्त करेगा. जब ईश्वर में ऐसा प्रेम
और मित्रता हा मनुष्यों से भी प्रेम
'इगा ईश्वर और मनुष्य के प्रेम में
ऐसा मेल है कि उन्हे अलग करना
अनहोना ह जब किसी के यह
प्रात्मिक और अद्भुत जीवन मिले तो
वह समझ लेगा कि ऐमाही जीवन
सब के लिये है. यदि पाप और उस
की मलीनता से छुटकारा प्राप्त हो
तो सब मनुष्य ईश्वर की मुख्य मंगति
और उम संगति से बड़ा दर्जा और
श्रादर पा सकते हैं. बैबल की यह
शिक्षा हे कि सब जो पवित्र और
धर्मी बनें ईश्वर के घर में याजक
[ 9 ]
में जब
और सजा होंगे. अर्थ यह है कि वह
सब ईनार की महिमा में भागी होंगे
और उसकी बड़ी सेवा करेंगे. ऐसी
बडाई और कुशलता के पाने में पाप
ही केवल रोक सकता है. ईश्वा सब
को सन्तानों की नाई पियार करला
हे और मसीह ने सत्र के लिये मृत्यु
का स्वाद चखा. इमी
दशा
किसी को यह सात्मिक जीवन मिले
और ईश्वर से मेल हो तो वह सब
मनुष्यों में भी प्रेम रक्खेगा और सब
के लिये चिन्ता और बिन्ती करेगा ।
जब हम इसी तरह पवित्र और
धर्मी बने ते सतमत की शिक्षा
श्रीररीतों और व्यवस्था की प्राज्ञा
में
अद्भुत उत्तमता और बड़ाई दृष्टि
पाती है. उस शिक्षा की ज्योति में
ईश्वर और पात्मिक बस्तुओं की
महिमा देखी जाती है. ऐसी रीतियों
[ ११ ।
में आतिमक पदार्थो की परछाई
मिलती है जिस से वह भली भांति
जाने जायें और उनसे पूरी महायता
औरसामर्थ प्राप्त हो धर्मी लोग ईश्वर
की बन्दगी और प्रणाम के लिये वक्त
बवक्त एकट्ठा हुश्रा करते हैं कि उस
की अधिक निकटता प्राप्त हो और
कि संगति का तजरिबा बढ़ता जाये
ऐसे आत्मिक जीवन में व्यवस्था की
आज्ञारों कठोर सिपाहियों के समान
नहीं हैं जो हमें डरा हुसका सकते
हैं कि हम अपनी इच्छा को पूरा न
करें, परन्तु वह
प्रिय मित्रों और
अगुवाओ को नाई हैं जिनके सीखने
और समझने मे हम अपनी कम उमरी
र अज्ञानता की दशा में मानी और
मृत्यु और बिनाश के मागी में न
जायें. ईश्वर सन्तान तो ज्यवस्था
के नहीं, परन्तु अनुग्रह के आधीम
[ १२ ] तथापि इस लड़काई के जीवन में ऐसी प्राज्ञायें अवश्य हैं कि उन के द्वारा से शिक्षा और अगुवाई प्राप्त हो. यह नया जीवन और मच्चा धर्म पाकर हम मचमुच निर्बन्धता का तर्जात्रा प्राप्त करते हैं वह सच्चाई और मसान और प्रेम को निर्बन्धता है ससका पाकर ईश्वर की इच्छ! बसी प्रमन्न योग्य और पियामी ठरतो. उस पर चलते हुये दामता और कैद की दशा नहीं जानी जाती बढे मानन्द के संग ईश्वर हो का मार्ग ग्रहण किया जाता और किमी दूमरे को धुन लेना अहाना है. मैं ने यह नया र अत्मिक जीवन पाकर मत- मत और धर्मको उत्तमता और महिमा को देख लिया है, और इमी प्राशा से उम का वर्णन लिखता हूं कि दूसरों को भी वही आशीश और आनन्द
[ १३ ]
प्राप्त हो. यह बिरादगना प्रेम को
पाती है।
नवां पर्व ॥
आत्मिक जीवन र जगत का
कामकाज.
मन की तब्दीली और वह मया
जीवन
मुझ
को ऐसे समय में प्राप्त
हुअा अ में संसारिक काम काज में
लगा रहता था. दिन बदिन परिश्रम
पूरा था. कई एक बरस है पीछे मैं
ने उम पुराने काम को छोड़ दिया
कि मसीह के लिखे उपदेशी बनं. उम
असे में जब शरीर जगत के काम में
लगा रहा तो मेरी आत्मा ने समय
अवसर पाया कि ईश्वर का
प्रणाम और सेवा करती माये. किसी
संसारिक पेशे या सेवा में
मनुष्य
को
ग्रेन
[ ७४ ]
प्रात्मा की सारी शक्ति काम नहीं
पाती है. जब शरीर जगत का काम
काज करता जाये तो प्रात्मा कार की
संगति में रहती हुई उमको प्रणाम कर
सक्ती है. हनूक हमारे समान मनुष्य
था और अपने घराने को उमने पाला
और अपने बाल बच्चों को मिखलाया,
तो भी उसके विषय में लिखा है कि
ईश्वर से ऐसी संगति रही कि तीन सौ
बरम लेां वह तुमके संग संग चला
तब ईश्वर ने उसको जीते हुये स्वर्ग
पर उठा लिया.
यूसुफ
और
मूसा
और
समूएल
और दानिएल इत्यादि
अपने अपने देश के राज में बड़ा
पद रखते थे, और उनका काम बहुत
ही भारी था, तथापि उन्हें ने ईश्वर
से ऐसी संगति और मित्रता प्राप्त
किई कि सारे जगत के लोगों के
खिये वह बड़े अच्छे नमूने बने. मेरे
७५ ] प्रभु उन दिनों में जब मंसारिक कामे से हाथ भरे रहते थे मैं ने काम करते हुये प्रार्थना में से बली निक- टता और संगति पाई न केवल काम के वक्त ऐसा भवभर मिला, पर चैन के वक्त भी मैं पुस्तकों को बड़े ध्यान के साथ पढ़ता गया और धार्मिक और आत्मिक शिक्षा सीखता गया. मैं ने जैसा अवसर मिल सका दूसरों की सहायता के लिये चिन्ता और काम भी किया. कितनों का यह सोच है फि वही मनुष्य ईश्वर का दर्शन पा सके और उसकी सेवा कर सकें जो संसाधिक काम काज को बिलकुल छोडही दें और गोया बनप्रासी बन बैठें. ऐमा विचार बड़ी भूल की बात है. सब को ईश्वर से संगति रखने की आवश्यक्ता है. इसके बिना जीवन बे फल रहता है. मनुष्य
[ ७६ ]
पशु नहीं है कि केवल देह के प्रति-
पालन को चिन्ता और उपाय हो.
तथापि शरीर को पालना और
संभालना है यदि सब मनुष्य बनबासी
हो जाते तो संसार के सारे लोग
भूखों भर आते और जगत वीरान
मार
सूनसान
हाजाती. संसारिक काम
काज को चला चला कर मनुष्य मच्चे
भक्त और धर्मी भी हो मक्ते हैं. यह
दोनों बात अवश्य हैं वह मनुष्य
अपने संसारिक काम में ईश्वर की सेवा
और प्रणाम नहीं करते इसी कारण
से नहीं करते कि ईश्वर से प्रेम प्रार
मित्रता प्राप्त न हुई. जब जगत की
बस्तुओं का लालच हो और उन्हीं
काकाई पियार करे तो ईश्वर की
संगति के लिये समय न मिलेगा.
समय और अवमर पाना या न पाना
प्रेमही की बात है. महां प्रादमी
जा
[ 9 ]
प्रेम
का धन है, तहां उसका मन लगा
रहेगा. जब ईश्वर ही हमागी आत्मा
का अधिकार है तो जो काम हो
या न हो हम अपने जीवन को
असी के साथ साथ काटेंगे
पूरा
ऐसी संगति से हमें रुकने न देगा.
कितनाही परिश्रम क्यों न हो ईश्वर
ऐसी प्रात्मा से अपनी जगह पायेगा.
हर एक पेशे और
हर प्रकार की
सेवा में समय आवश्यक्ता के अनु.
सार खाने और माने इत्यादि के
मास्ते लिया जाता है, नहीं तो
जी सकते हैं. अपनी
मात्मा की भलाई और मुक्ति के
लिये भी सब के सब वक्त ले सक्त हैं.
यह विचार कि जो प्रादमी संसा-
रिक पेशों और कामों में फंसे हुये
हैंथर को नहीं जान सक्त और
उसकी मेवा और प्रणाम पूरी रीति
मनुष्य नहीं
[ 9 ]
से नहीं कर सक्त हैं शैतान की ओर
से होगा. जब किसी काम या पेशे
में सच्चाई और नेकचलनी हो ईश्वर
का दर्शन और संगति हर एक को
मिल सक्ती है. मुक्ति और उसके सारे
बरदान और आशीर्षे सूर्य की ज्योति
की नाई सब के लिये हैं. तजरिबे के
द्वारा यह मुझे प्राप्त हुश्रा और यह
बिद्या हर एक मनुष्य को मिल
सक्ती है।
दसवां पळ ॥
आत्मिक जीवन की रक्षा और
बढ़ाव.
जब मनुष्यों को ऐसी प्राल्मिक
तब्दीली मिले तो वह यीशु मसीह
के शिष्य हो जाते हैं. शिष्य का मुख्य
काम सीखना है. धर्मियों के लिये यह
{ ७ ]
संसार पाठशाला के समान है. प्रभु
श्राप सञ्चा गुरू है. उसके चेले उस
के साथ रहते हुये सीखते हैं. हमारा
सारा जीवन इस पाठशाले ही में
काटा जाता है. एक बहुत बडो बात
जिसको सोखना अवश्य है से यही
है कि आत्मिक जीवन कैसे बिताया
जाये कि उसका हानि न पहुंचे
और कि वह बढ़ता जाये. रक्षा
करने और पालने के बिना किसी
प्रकार का जीवन हानि से नहीं
मचता और न वह बढ़ता है.
एक
और बात यह भी है, कि जैसा
जीवन बड़े
बड़े दर्जे का हो तैसाही
उसकी अधिक चिन्ता
अवश्य होता और उसका पालना
अधिक कठिन पाया जाता है.
पशुओं का जीवन ऐसा है कि उन
का प्रतिपालन करना बहुत सहज
करना
1
[८०
है वह बस्न और घर के बिना भली
भांति
गुजर करते और
भोजन बहुत मोटा होता है. मनुष्य
के शरीर के लिये बडा परिश्रम
करना होता है कि आवश्यक्ता को
बस्तुयें प्राप्त हुमा करें. ईश्वर की
मारी कारीगरी में
मनुष्य
को अत्माये
मब से उत्तम और बही है आत्माओं
का सच्चा जीवन अद्भुत है. ऐसे
जीवन का रक्षा और प्रतिपालन
करना बहुतही भारी काम ह उमसे
आदमियों का कोई बड़ा काम नहीं
दिया गया. हां एक रीति से ईश्वर
आप अकेला प्रात्माओं का रक्षक
और पालने हारा है. परन्तु वह हम
को इस काम में यहां ला सपना
भागी कर लेता है कि हम बड़ी कठि.
मता से अपने फजी को पूरा कर देते
हैं. शरीर के लिये भी वह सारी
[ ८१ ]
बस्तुयें जो खाने में आती हैं ईश्वर
की ओर से हैं, तथापि किसान को
बझा परिश्रम करना अवश्य है कि
गोया ईश्वर को देने का अवसर मिले.
इसी रीति से पात्मिक भोजन का
देनेहारा ईश्वर ही है, पर कई एक
शर्ते हैं जिन को पूरा करके हम उससे
ले सक्त हैं. प्रात्मा की रक्षा और
प्रतिपालन में धर्मी आदनी ईश्वर से
मिलकर काम करते हैं. इस भारी
सेवा में बड़ी सच्चाई और हिम्मत और
सरगर्मी अवश्य है. ऐसे काम में बड़ी
बुद्धि और समझ भी चाहिये. हर एक
मनुष्य को अपनी ही प्रात्मा की रक्षा
और प्रतिपालन के लिये चिन्ता और
परिश्रम करना होता है. यह बहा
काम हम एक दूसरे के लिये नहीं
कर सक्ते हैं. हां. हम आवश्यक्ता के
अनुसार कदाचित उस मार्ग को दिखा
है
प्रभु की संगति जैसाकि चाहिये
[ २ ]
सके जिस में मात्मिक भोजन और
बख और घर इत्यादि मिलें, पर उस
मार्ग पर चलना हर एक को अपना
ही काम ठहरता है. जो कोई उस
पर चलने से मना करे उन प्रात्मिक
बस्तुओं के पाने से खाली हाथ रहेगा.
इसी बात में हर एक धर्मी अपनी
ही प्रात्मा का रक्षक और पालनहारा
होता है जब वह मनुष्य जिसने नया
और आत्मिक जीवन को प्राप्त किया
ईश्वर का ठहराया हुआ काम करे
तो प्रभु के अनुग्रह से वह जीवन
अवश्य कुशल क्षेम रहेगा और बढ़
तो जायगा, वह शरीर जो चंगाहो
और भलीभांति पाला जाये आपही
प्राप बढ़ता जायेगा. इसी रीति से
जब प्रात्मा की दशा ठीक हो और
उसको
प्राप्त होती जाये तो वह भी बराबर
[ ८३ ]
दूसरों के
बढ़ती जायेगी. मैं ने अपने तमरिबे
में तीन बड़ी और मुख्य बातें पाई
जिन से पात्मिक जीवन बहाल रहता
और अधिक होता जाता है. यह
बातें यही हैं, अर्थात पहिलो, बैवल
का काम में लाना. दूसरी, प्रार्थना
में लगा रहना. तीसरी,
लिये ऐसी सेवा करना मिस से वह
भी मुक्ति पायें. इन तीन बातों को
खोलो लिख देता हूं.
वैबलको काम में लाना. वैवल
ईश्वर की ओर से मनुष्यों को मिली.
वह इसी कारण दी गई कि उसके द्वारा
पात्मिक जीवन प्राप्त हो और बढ़ता
जाये. वह ईअर और मुक्ति की शिक्षा
से
भरपूर है जो मादमी मन मे बैबल
को पढ़ा करें कि उसकी श्रात्मा अचे
और बने उस में मुक्ति का मार्ग
पायेगा. उसका सारा ज्ञान पात्मिक
१
.
[ ८४ ]
जीवन से मुख्य रीति से सम्बन्ध है.
कई एक बातें हैं जिनके कारण उस
को पढ़ा करना बहुत लाभदायक
होगा. पहिली यह है कि उस में
मुक्ति का मार्ग दृष्टि प्राता है.
उस मार्ग का जानना सब को
बहुत ही अवश्य है. उस से पाप की
अपार बुराई और उसके सारे फल का
ज्ञान मिलता है. बैल के द्वारा जाना
जाता है कि किस उपाय से पाप
और मन की मलीनता दूर की जाये
और कुमम्मों के करने से हम कैसे बचें.
उम में कितनों का वर्णन मिलता है
जिन्हा ने पाप से छुटकारा पाकर
ईश्वर से संगति और मित्रता प्राप्त किई.
वह हमारे लिये नमूमा हैं. बैबल में
यह शिक्षा भी है कि सच्चे धर्म का
बदला और फल कैसा उत्तम श्रीर
धन्य है. फिर जब बैबल जैसा कि
[ ८५ ]
चाहिये काम में आये तो उसमें हमारी
प्रात्मा के प्रतिपालन की सय बस्तुयें
मिलती हैं. वह गाया
स्वर्गीय
और ईश्वरीय बजार है जिस में
सष कुछ जिस की श्रावश्यक्ता
धर्मियों को हो सके पाया जाता है.
यह बजार ईश्वर के सन्तानों के वास्ते
सदा खुला रहता है और उस में
भोजन और बस्त्र इत्यादि की चीजें
बहुतायत के संग पाई जाती हैं उस
बजार में किसी पदार्थ की कमी नहीं
है. फिर बैजल के
द्वारा
वह
सारे
फराइज प्रगट किये जाते हैं जिनको
पूरा करना अवश्य ह. ईश्वर की सारी
आज्ञायें जिन पर चला करना है उस
में लिखी हुई हैं. उसके द्वारा जाना
जाता है कि कौन से काम ईश्वर को
प्रसन्न हैं और किन से
वह
है, कि किन कामों से मनुष्य सुख
चिन्न करता
[ ८६ ]
और
कुशलता
पायें और फिन से
बिनाश प्राप्त होगा. बैबल के विषय
में एक और बहुत बड़ी बात यह है
कि उसी की ज्योति में ईघर अपने
आप को मनुष्यों पर प्रगट करता है.
अन मात्मा की प्रांखें ठीक हो और
बैब जानी जाये तो उसके संजियाले
में ईश्वर अवश्य दृष्टि प्रायेगा. एक बड़े
शानी से यह प्रश्न किया गया, कि
"आप बैबल को सत्य क्यों मानते
हैं?' यही उत्तर दिया गया, कि
"मैं उस में ईश्वर को पाता हूं
कितने श्रादमी बैबल को पढ़ते
कि उसकी शिक्षा को खंडन करें. जब
यही चिन्ता हो तो लाभ की सूरत
कम है. जब सचाई के साथ उस में
ईश्वर का खोज होतो उस ज्ञानी का
तजरिखा प्राप्त होगा. बैवल के पढ़ने
और समझने के लिये दिन ब दिन
[ ८५ ]
समय निकलमा चाहिये. जब मन
लगाकर यह काम हुमा करे तो उस
से जल्द बड़ी शांति और आनन्द
प्राप्त होगा, पढ़ने में बैवल का बड़ा
आदर करना अवश्य है. वह ईश्वर
ही की लिखाई हुई पुस्तक ह. उस
के समझने के लिये ईश्वर से बुद्धि
और सहायता मांगनी चाहिये. ईश्वर
का और मुक्ति का सच्चा ज्ञान बहुत
ही गहरा है
ईश्वर के मिखाने के
बिना वह समझा न जायेगा. ईश्वर
की प्रेरणा मे यह धर्म पुस्तक लिखी
गई, और उस के प्रेरणा से उस की
शिक्षा प्रावश्यक्ता के अनुसार समझ
में पायेगी
वह प्रेरणा ईश्वर के पवित्र
मात्मा के द्वारा लिखनहारों को
भिला. समझने के लिये उमी पवित्र
प्रात्मा से सबको प्रेरणा भी प्राप्त हो
मक्ता है. मांगने की शर्त से पवित्र
[ ८८ ]
मात्मा हम को दिया जाता है कि
बैमल के पढ़ने में समझ और आशीश
दे. इसी दशा में बैबल के पढने में
बड़ी प्रार्थना अवश्य ह. जो मनुष्य
बिन प्रार्थना किये उसे पढ़ा करे न
ससकी मूल बातें समझेंगे और न उस
में ईश्वर का दर्शन पायेंगे. कम
प्रादमी बैबल की उत्तमता और
मिठास खा जानते हैं और कारण
यही है कि ईश्वर से न्यारा रहते
हुये उस को देखते हैं जब पवित्र
प्रात्मा के द्वारा ईश्वर संग हो और
हमें सिखाये तो बैबल की महिमा दृष्टि
श्रायेगी ऐसीही दशा में बैबल में खाने
के लिये ईश्वरीय भोजन, पीने के लिये
अमृत जल, सांस लेने के लिये स्वर्गीय
पवन, दृष्टि के लिये आत्मिक जि.
याला, पहिनने के लिये धर्म और
पवित्रताईका बस्त्र और अपने बासा
[ ८] केलिये सोनहला घर हम पाते हैं. सक पवित्र आत्मा की ज्योति में बैबल काम आये तो हम ईश्वर का सच्चा प्रणाम कर सक्ते हैं और उसके द्वारा उस सेवा की सामर्थ्य और तैयारी मिलती है जिस से दूसरों को भी मुक्ति प्राप्त हो. जगत में रहुत सी और पुस्तके भी हैं जिन के देखने से आत्मिक जीवन का लाभ और बल मिलता है और जैसा अवसर मिले उन्हें पढ़ना उचित और अवश्य है, परन्तु सत्र में बैबल ही उत्तम श्रीर लाभदायक पाई जाती है. उन्हीं दूसरी पुस्तकों से अधिक प्राशीश मिलेगी जिनके द्वारा बैबल के सम- झने में सहायता प्राप्त हो. अड़तालीस बरसों से मैं इस उत्तम और ईश्वरीय पुस्तक को मन से पढ़ता प्राया हूं और अब तक उसकी महिमा और [ ० ] बड़ाई बढ़ती रहती है. जब जब प्रार्थना और ध्यान के संग उस को देखता हूं तो उम में मई नई और बहु. मूल्य बातें पाता हूं जिन से प्रात्मा को बड़ा प्रानन्द और सेरी मिलती है. उसी में सचमुच जीवन का सोता पाया जाता है. ऐसी उत्तमता और महिमा का भेद यही है कि मुख्य रीति मे उसी में ईश्वर का बामा मिलता है मुझे प्राशा है कि पढ़ने. हारे इस बात की परीक्षा करके वैवल की महिमा को देखें और उसे मन से ग्रहण कर लें ॥ २. सच्ची प्रार्थना मये और आत्मिक जीवन की रक्षा और बढ़ाव की एक बड़ी और मुख्य शर्त है. সাল। करना, जब समझ और सच्चाई के साथ हो, ईश्वर से बात- चीत करना है मसीह के द्वारा मे
[ ९९ ] .
ईश्वर हमारे साथ हो जाता है कि
प्रार्थना में संगति प्राप्त हो. यदि मन
से निरन्तर प्रार्थना हुमा करे तो ईश्वर
से वह संगति भी निरन्तर होगी. उस
संगति में जो सची प्रार्थना के द्वारा
मिलती है ईश्वर की बड़ी महिमा
दृष्टि पाती है और ऐसी दशा में
उसकी स्तुति बराबर की जायेगी.
ईश्वर की बड़ाई मार स्तुति का
करना प्रार्थना का एक भाग है. फिर
अब प्रार्थना में घर की ऐसी संगति
प्राप्त होती है तो हम अपने अप.
राघों और निर्बलता और अयोग्यता
भली भांति पहिचानते और यह
बातें उसके आगे बड़ी दीनताई के
संग मान ली जाती हैं. ऐसी बातों
का इकरार भी प्रार्थना की एक बड़ी
बात है प्रार्थना में शरीर और ग्राहमा
की आवश्यक्ता के अनुसार संसारिक
[ २ ]
और श्रामिक बस्तुयें और श्राशीशे
मांगी जाती हैं. इन का मांगना भी
प्रार्थना है. ईश्वर का मुख्य बचन
कि ऐसी बिनती सुनकर मैं दिया
करूंगा. जब प्रार्थना करते हुये हम
ईश्वर की दया और प्रेम को देखें
और सस से मांगे हुये पदार्थों को पायें
तो उसका धन्यबाद करना उचित है.
ऐसी प्रार्थनाओं से धर्मियों को बड़ी र
प्राशीश मिलती हैं और पात्मिक
जीवन इस मार्ग में बहुत बढ़ता
जाता है. बैघल के पढ़ने और प्रार्थना
के करने में बड़ा मेल है. वह मुख्य रीति
से एक दूसरे से सम्बन्ध हैं. बैवल के
द्वारा ईश्वर मनुष्यों से बोलता है.
प्रार्थना के द्वाग मनुष्य ईश्वर से
बातें करते हैं. दोनों के द्वारा ईश्वर
से अद्भुत संगति प्राप्त होती है.
प्रार्थना करने से ऐसी शक्ति मिलती
[ ९३ ]
है कि बैबल की बातें समझ में आयें.
और उसका बहा आत्मिक धन
अपना कर लिया जाता है. बैबल
के पढ़ने से प्रार्थना करने में ऐसी
अगुआई और महायता प्राप्त होती
है कि वह बडी पाशीश और श्रानन्द
का कारण हो जाती है. सच्ची प्रार्थना
में मुख्य बिनती यही होगी कि मसीह
के द्वारा ईश्वर आप हम को मिले
और कि उस से संगति पूरी और बे
रोक हो. जब ईश्वर आप हमारा हुआ
तेह प्रात्मा का धन गिनती मे बाहर
हो गया. जब यह तजरिबा मिले तो
बैघल और प्रार्थना की महिमा जानी
जायेगी. ऐसी दशा में स्वर्ग के चैन
और आनन्द का बयाना प्राप्त हो
जाता है. बैबल के पढ़ने और प्रार्थना
के करने से जो मैं ने फल पाया मैं
इस प्राशा से लिख देता हूं कि दूसरों
[ 8 ]
को वही लाम पहुंचे और कि वह
आत्मिक जीवन में भी भागी हो
जायें ॥
३. मनुष्यों के आत्मिक जीवन की
रक्षा और बढ़ाव की तीसरी शर्त
और द्वारा यही है कि और लोगों
के लिये वह सेवा करें जिस से वह भी
मुक्ति को प्राप्त कर लें. सब प्रादमी
जो पाप से बचाये जायें और ईश्वर
से संगति पाय यामक का पद
पाते
हैं. याजक वही है जो ईश्वर के घर
में बेशक प्रवेश कर सकता है. सब सच्चे
याजक ईश्वर के संग होकर अपने
जीवन को बिताते हैं. वह ईश्वर के
मुख्य मित्रों में गिने जाते हैं. वह
जन जो ईश्वर का बैरी या बिरोधी
है सच्चा याजक नहीं हो मक्ता है. जब
ऐसा बड़ा दर्जा किसी को दिया जाये
तो इस विचार से नहीं है कि वह केवल
। (५ ]
अपनी ही भलाई को प्राप्त करे. सच्चे
याजक का सब से बड़ा काम यही है
कि दूसरों के लिये बिनती किया करे
और उनकी ऐसी सेवा करे कि वह
भी प्रभु की और फिरें और पाप से
उद्धार पायें. हर एक धर्मी को बिन्ती
और सेवा से किसी न किसी आदमी
की मुक्ति सम्बन्ध है. सब मनुष्य जो
ईश्वर से मेल और मित्रता रखते हैं
उसके धुने हुये हैं कि उनके द्वारा से
संसार के लोग मुक्ति की शिक्षा सीख
लें और पश्चात्ताप करके
प्रभु
ग्रहण कर लें और बचाये जायें. ऐसी
सेवा प्रेम की सेवा होगी. जब मऐग
प्रेम होता आवश्यक्ता के अनुसार
आदमियों के शरीर के लिये भी चिन्ता
किई जायेगी. जब दूसरों की मुक्ति
और भलाई के लिये जैसा कि
चाहिये बिनती और परिश्रम किया
का
[ ९६ ]
जाये तो करनेहारों को बड़ी प्राशीशे
प्राप्त होगी. ऐसी सेवा और बिनती
से हमारा प्रात्मिक जीवन स्थिर
रहेगा और बढ़ता जायेगा. ऐसे बड़े
काम के लिये प्रभु श्राप समझ और
सामर्थ्य देता है वही साथ होकर
ऐसी सेवा में फल दिया करता है,
जब सचाई और हिम्मत हो तो
मसीह आप अगुवाई करता और
सिखाता है कि किस किस को और
किस किम रीति से ईश्वर की ओर
फिरना है. एक धर्मी का यही बर्णन
है. वह संसारिक पेशे से अपना
गुजारा करता था. ससकी आमदनी
यहां तक बढ़ गई कि उसके पादरी
को चिन्ता हुई कि ऐसा न हो कि वह
लालच में फंसकर प्रभु की संगति
से न्यारा हो जाये. ऐसी दशा में
पादरी साहिब ने उसके पास जाकर
[ 9 ]
प्रेम के साथ उससे बिमती किई कि
एक पड़ोसी के लिये प्रार्थना और
परिश्रम करे ताकि वह पाप से बच
कर सच्चा धर्मी बने. साहिब ने
उस भारी और कठिन काम को
ग्रहण किया. प्रभु के अनुग्रह और
सहायता से उम बड़ी सेवा में वह
कामयाब हुआ. वह पड़ोसी नया
और अच्छा प्रादमी बना. उस पड़ोसी
के बचाने में उस साहिब ने ऐसी
प्राशीस और आनन्द पाया कि उस
ने चाहा कि मैं किमी दूसरे को भी
प्रभु के पास खींच लाऊ. फिर ईश्वर
ने अगुवाई और सामर्थ्य दो और वह
जीत गया. इस षष्ठी सेवा में सस
साहिब को ऐसी अभिलाष और
हिम्मत हुई कि उसके द्वारा डेढ़
सो प्रादमी मसीह को ग्रहण करके
श्रास्मिक जीवन में उसके साथ भागी
और लालच
[ ८ ]
हुये. उस बड़ी सेवा का एक फल यह
भी हुश्रा कि वहसाहिव मिसके द्वारा
है इतने मनुष्य विश्वासी और धर्मी
बने बहुत बलवन्त हुआ
के जाल से बचा रहा. उसकी इसी
सेवा में पाप के जोखिम से शरण
मिली और उसका प्रास्मिक जीवन
बहुत बढ़ता गया. वही जन अधिक
भाशीस और अनुग्रह पायेगा जो
दूसरों की भलाई और मुक्ति के लिये
बिनती और परिश्रम करेगा. जब हम
भूखों पियासे को श्रामिक भोजन
भीर अमृत जल खिलायें पिलायें तो
भाप खूध खायेंगे पीयेंगे. वही मनुष्य
धन्य रहता है जो अपने जीवन औरों
को धन्य करने में बिताये. एक मेरा
धनवान और धर्मी जान पहिचान
था. एक दिन किसी कारण उसका
मन बहुत भारी और उदास मा.
[]
यह विचार
उसको नाम म था कि क्या ऐसी
बेधनी हुई. उस दशा
में
मन में पाया कि “मैं कंगालों को
कुछ दू." कई सौ रुपिया लेकर वह
घर से निकला और रोगियों और
विधवाओं इत्यादि में घूमते हुये
बांटता गया. बहुतही जल्द शांन्ति
और आनन्द उसके मन में जारी हुमा
चोर नदी की नाई बहता गया.
उसका सारा शोक और व्याकुलता
दूर हुई. ईश्वर के उजियाले से उसका
मन भर गया. ईश्वर ने हमको
दूसरों की सेवाही के लिये उत्पन्न
किया और इसी मार्ग में आत्मिक
जीवन की रक्षा और बढ़ाव को
सूरत है अपस्वार्थी का जीवन बहु-
तही छोटा है और घटता जायेगा.
बा लखपती या करोड़पती जो
अपनेही लिये जीता है भिखारियों
[ १०० ]
से भी अधिक कंगाल रहता है. शरीर
पले तो पले पर ससकी प्रात्मा
मूखों मरेगी. जब मनुष्य मया जन्म
पाकर ईधर के सन्तान बने और अपने
प्रभु और दूसरे लोगों के लिये जीयें
तो सच्ची बड़ाई और पूरी कुशलता
प्राप्त करेंगे. उन्हीं को यह धम दिया
जायगा जो बहुमूल्य है और सदा
ले
काम आयेगा और पूरी सेरी का
कारण होगा.वह धन सदाले बढ़ताभी
जायेगा, मुझे बड़ी चिन्ता और चाह
है कि परीक्षा करने में सब पढ़नेहारे
बैघल और सच्ची प्रार्थना और आत्मिक
सेवा की उत्तमता और महिमा जान
लें. जो बातें मैं ने तजरिबा से सीखी
से मैं आत्मिक जीवन की रक्षा और
बढ़ाव के विषय में इसी भाशा से लिस
देता हूं कि दूसरों के लिये वह श्राशीस
और सहायता का कारस हो ।
[ १०१ ]
ग्यारहवां पय ॥
आत्मिक जीवन की भरपूरी.
वह नया और पात्मिक जीवन
जैसा उस रात को मुक दिया गया
बहुत बटा बरदान ठहरा. उसके साथ
इंचर की सच्ची पहिचान मिली और
श्राधीनताई और प्राज्ञाकारी का
खभाघ दिया गया. उस समय से
ईश्वर का बड़ा प्रेम मुझ में
पाता रहा. ईश्वर से फिर न्यारा
होने का विचार तक भी न हुप्रा.
उसके पीछे वह ज्ञान और प्राज्ञा.
कारी और प्रेम बढ़ते गये. परन्तु उस
रात से मेरी प्रात्मा में पूरी सेरी
बराबर न रही. ईश्वर की संगति और
दर्शन मैं तो पाता गया. मेरी इच्छा
में इस बात की स्थिरता रही कि मैं
इंचर के मार्ग से न हटूं. लगातार
जगह
[ १०२ ]
और सचाई के साथ मैं ईश्वर का
प्रणाम और सेवा करता रहा. बैबल
के पढ़ने और प्रार्थना करने में में
बहुत वक्त लेता गया अपने काम
को मैं परिश्रम और यत्र के साथ
चलाता रहा. जान बूझ कर मैं मे
अपने मन में किसी बुराई को जगह
न दिई. तो भी कभी कभी अपनी
श्रात्मा में विश्वास की
पाती थी.बार बार प्रार्थना करने में
जैसा कि चाहिये मन न लगता था. मये
जीवन में किसी किसी वक्त फीका-
पन सा हुआ. ईश्वर की संगति में
लगातार पूरी सेरी न मिली. मैं इन
बातों के विषय में निर्मल हुधा.
में ने यह भी जान लिया कि कनी
कभी मेरी श्रात्मा में कोई कोई बात
उठती जो पुराने जीवन से सम्बन्ध
है. ऐसी बातें मेरी इच्छा के विरुद्ध
घटी दृष्टि
[ १०६ ] कुछ न बरपा हुई यह मुझ पर प्रगट हुशा कि हृदय में पहिले के बैरियों में से कोईकाई अब लो हाजिर है. वह बैरी राज करने तेा न पाते थे, पर तो भी ईश्वर को संगति में पूरी सेरीके पाने से वह मेरी प्रात्मा का कुछ रोका करते थे. उनके कारण वक्त बवक्त मेरे मन पर बादल सा छा जाता था. जब मैं अधिक सीखता गया और ईश्वर से बिनती करता गया तो यह ज्ञान मुझे मिला कि इन सारे बैरियों से भी प्रभु को शक्ति और काम के द्वारा छुटकारा प्राप्त हो सक्ता है. जबमेरे मुक्तिदाता मेरे भीतर के बैरियां की सेना पर जय- वन्त हो चुका तो क्या, वह दस एक सिपाहियों से हार जावेगा जो अलग अलग होकर छिप रहे हैं कि मुझे हानि पहुंचा दें? हमारा प्रभु ऐसा
[ १०४ ]
दुर्बल नहीं है कि ऐसे से उसका
बड़ा काम रुक जाये. जब अधर्म के
अठारह बिसवे उसकी शक्ति से दूर
किये गये तो क्या, वह दो बिसवे जा
रह गये उसके द्वारा मिटाये न जायें?
जब उसने मुझ
में अपना राज आरी
करके अपने लिये चैदिह प्राने का
प्रेम प्राप्त कर लिया तो क्या, वह
सोलह पाने का छाजिर नहीं करसक्ता
है? जब वह मुझ में मुक्ति के काम का
प्रारम्भ कर चुका,
तो क्या वह उसका
पूरा नहीं कर सक्ता है? जब प्रभु
यीशु के द्वारा ईश्वर प्राप हमारा
अधिकार बनाता निश्चय यह अधि.
कार ऐसी भर पूरी के साथ मिल
सकेगा कि हमारी प्रात्मा की सेरी
सिद्ध हो जाये. वैबल में ऐसी सेरी
और सिद्धता का बहुत बर्णम मिलता
है. कितने जनों का संदेश उस में
[ १०५ ] पाया जाता है जिन्हों ने ईश्वर की संगति में प्रास्मिक जीवन की भर- पूरी पाई और वह सब ऐसे बैरियों से पूरी रीति से बचे रहते थे. प्रभु यीशु ने बार बार ऐसी सिहता का बर्णन किया और यह अगुवाई दिई गई है, कि "तुम ईश्वर की सारी पूर्णता लों पूरे किये जाओ.' जब लों ऐमी पूर्णता प्राप्त न हो तबलों हमारे स्वर्गीय पिता की सारी इच्छा पूरी न किई जायेगी. जब पहले धर्मियों ने ऐमी भरपूरी पाई ने संसार की भलाई के लिये उनसे बड़ी सेवा हुई. जब मैं ने ऐसी भरपूरी के प्रास्मिक जीवन का ज्ञान पाया और उसकी आवश्यक्ता को समझ लिया तो मैं बही अभिलाष से ससका खाज करने लगा. मैं ने नई रीति से अपने श्राप को ईश्वर के लिये अभिषेक
बही चाह
[ १०६ ]
किया और उससे बड़ी बिनती किई
कि यह बहुमूल्य धाशीस मुक्के दी
जाये. मैं ने यह पूरी पवित्रताई और
शक्ति और प्रेम और धर्म की सम्पत्ति
जो जीते जो मनुष्यों को मिल सके
भार
लालसा से मांगी.
ईश्वर ने मेरी बिमती सुनी और ऐसी
बहुतायत और पूर्णता के सङ्ग मांगा
हुमा बरदान दिया कि मेरा प्रानन्द
बयान से बाहर और महिमा से
भरा था. ईघर की संगति नई रीति
से प्राप्त हुई. प्रात्मिक प्राशीसे बड़ी
अधिकाई के संग मिलने लगी मुझे
पहिले जान न था कि ऐसी पूर्णता का
सजरिबा मनुष्यों को दिया जाता है.
ईश्वर का यह बड़ा काम मेरी प्राशा
से बहुत प्रागे पहुंचा. मन की सेरी
मई रीति से पूरी होने लगी. घर
का दर्शन बहुत अधिक अद्भुत हुभा.
[ १०७ ]
वैबल की उत्तमता और महिमा
बहुत बढ़ गई. प्रभु का पवित्र मात्मा
नई रीति से मेरा
गुरु
और
अगुवा
हो गया. उस आत्मा के सजियाले
में यीशु मसीह सारे स्वर्गीय बरदानों
का द्वारा दृष्टि प्राया. उसकी महिमा
बहुत अधिक सफाई के साथ दिखाई
देने लगी. पवित्र प्रात्मा में प्रभु यीशु
के द्वारा पिता परमेघर के पास पहुं.
चने का अधिकार बेराक मिला.
प्रार्थना करने और बैबल के पढ़ने में
ईश्वर से गोया सापात बातचीत होने
लगी. ईबर के भजन और सेवा करने
में बड़ी मिठास और आनन्द पाया
जाता था, और वह सारा फीकापन
जो पहिले होता था दूर हुमा,
विश्वास में नया बल दूष्टि प्राया
और उसकी पाबेदारी बहुत बढ़ गई
मात्मिक काम के चलाने की मई
[ १०८ ]
सामर्थ और फलदारी प्राप्त हुई. नई
रीति से मन में प्रेम की अग्नि जलने
लगी. ईघर का राज जो मनमें जारी
किया गया था बहुत अधिक प्रसन्न
हुधा. प्रभु के अनुग्रह और शान में मैं
अधिक बढ़ता गया. ईश्वर की इच्छा
पर चलना और उसकी ठहराई हुई
सेवा को पूरा करना मेरे मन का
मुख्य इरादा बना रहा. मात्मिक
जीवन की ऐसी भरपूरी की शिक्षा
ईसाइयों की सब मंडलियों में पाई
जाती है और यह हो सकता है कि सब
विश्वासी और धी लोग उसका
तजरिया जाने. मसीह के कितने
चेले मिलते हैं जिनकी यही शाती है
कि प्रभु के द्वारा ईश्वर की संगति
में ऐसी मेरी और पूर्णता प्राप्त हुई.
ऐसेही जीवन के पाने से इस जगत
में यह मालिक सेवा तो ईश्वर की
[ १०९ ] और से हमको मिली पूरी हो सकती है और उसी के पाकर परलोक के काम की तैयारी भी प्राप्त होगी. जबही ऐसी अधिकाई का श्रामिक जीवन मिले तो जैसा कि चाहिये हम बढ़ते भी जायेंगे. जब शर्ते पूरी किई जाये तो गाया हमारी प्रात्मा का घेरा बढ़ता जायेगा. लुटिया का भर देना और बात है और पीपे को भर देना और. आत्मिक जीवन में गाया लुटिया बढ़ते बढ़ते पीपा हो जाता और पीपा बढ़ते बढ़ते तलाव, और सलाव बढ़ते बढ़ते मदी. ऐसे बड़े हुये जीवन के लिये ईश्वर में भरपूरी बनी रहती है. जब बैबल सूब काम पाये, और प्रार्थना निर- स्तर होती रहे, और और दूसरों के बचाने में सेवा पूरी किई जाये तो हमारी प्रारमा श्राप बढ़ती रहेगी.
[ १९० ]
जब ऐसा पात्मिक जीवन प्राप्त हो
तो मनुष्य अपनी दुर्बलता और
कंगाली को भली भांति जामकर पूरी
रीति से समकेंगे कि सारी पूर्णता
जो मिल सके ईश्वरही की ओर से
है. ईश्वरी में हमारी आत्मा के
लिये धनवानता
की
दशाहो
सक्ती
है. उस से न्यारा कंगालता बेहद
बनी रहेगी. ऐसा जीवन पाकर मन
में घमंड जगह न पायेगा. ईश्वर के
साथ साथ रहते हुये सदा नये नये
बरदान प्राप्त हुआ करते हैं और प्रेम
और चैम और आनन्द और बल की
नदी अधिक गहरी और चाही हाती
जाती है. बुढ़ापे के काल में शरीर
की दुर्बलता बढ़ती जाती है, परन्तु
श्रात्मा की कुशलता और सामर्च
अधिक होती जायगी.ईचर के सन्तानों
की प्रात्मायें जवानीहीकी दशा में
[ १११ ]
बनी रहती हैं, और उनकी शक्तियां
सदा बढ़ती जाती है. प्रभु यीशु में
धात्मिक जीवन की पूर्वता स्थिर
रहती है. मसीह मृत्यु पर जयवन्त
हुम्रा और सर्बदा लो जोता रहता
है. वह अपने से यह कहता है, कि
"कि मैं जीता हूं, तुम भी जीते
रहोगे." जब हमारी प्रात्मा ईघर
से पूरा मेल और मित्रता रखती हो
तो इस रोगी और दुर्बल शरीर से
अलग हो जाना और स्वर्गीय घरों
में जो हाथ के बनाये हुये नहीं हैं
प्रवेश करमा मृत्यु नहीं होगी. बासा
की ऐसी तबदीली सब विश्वासियों
के लिये बड़े प्रानन्द और शांति
और कुशलता की बात ठहरेगी. देह
के मरने के विषय में तबही व्याकुलता
और घबड़ाहट हो जब कि घर से
संगति प्राप्त न हुई. प्रभु बचाये
{ ११२ ]
हुओं के लिये शारीरिक मृत्यु में हानि
का पता भी न मिलेगा.
मैं इस छोटी पुस्तक में अड़तालीस
बरस की बातों का तजरिबा लिख
देता हूं. समय बस हुआ कि इन बातों
की भली भांति परीक्षा किई जाये.
ऐमी परीक्षा नाना प्रकार की दशाश्री
में हुई. कभी दुष्ट प्रात्मा शैतान से
बही खड़ाई हुई, कभी रोगी हुमा
यह लो कि जीमे की माशा जाती
रही, कभी मम के बड़े पियारे मृत्यु
मे न्यारे किये गये, बराबर आत्मिक
मेवा का बोझ बहुतही भारी हुआ,
परन्तु कभी ऐसा न हुमा कि ईश्वर
का अनुग्रह या सहायता में घटी
पाई गई और उसमे कभी मुझे मिराशी
में म दाहा. कितनी बार उसकी दया
और कृपा की अधिकाई के कारण
मैं ने अचम्भा किया. उसने मेरी
। ११३ ]
चिन्तियाँ और बिनारों से बहुत
अधिक अनुग्रह किया. मैं ने उसकी
विश्राम ग्यता सिद्ध पाई. मस धन्य
ईश्वर से जिसने मुझे पाप ये छुटकारा
दिया, और मम की मलीनता को
दूर किया, पर मेरी सहायता और
अगुश कि, और मुझे अपनी
मंगति में भागी और लिया, मैं भक्ष
पद हार के लिये विन्ती करना
कि वह को प्रभ यीशु के द्वारा
AY AIR ने गार । के भने
सन्तान बने हैं शुमी भार्ग डे मनुष्यों
को पूर्वी भलाई ६ अमला को
परत अद्भुत हीति में पाई जाती है।
मामासस