Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Rajasthan Puratan Granthmala Granthank 114
Front matter
राजस्थान पुरातन अत्यमाला
राजस्थान राज्य द्वारा प्रकाशित
पामान्यत अखिलभारतीय तथा विशेषत: राजस्थानदेशीय पुरातनकालीन
संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दी, राजस्थानी ग्रादि भाषानिबद्ध
विविधवाहमयप्रकाशिनी विशिष्ट-प्रत्यावली
प्रधान सम्पादक
फतहसिंह, एम ए.,डी.लिट.
निदेशक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर
MDM
BOwb.
-7.
ग्रन्थाङ्क ११४
LDRAR
सांस्यायनमुनिप्रणीतं
सांख्यायनतन्त्रम्
प्रकाशक
राजस्थान-राग्याजानुसार
निदेशक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर (राजस्थान)
दिस० २०२६
भारतराष्ट्रीय पादाम १९६१
मुस-हरिप्रसाद पारीर, साधना प्रेम, जोधपुर
प्रधानसम्पादकीय वक्तव्य प्रस्तुत ग्रन्थ का सम्पादन श्रीलक्ष्मीनारायण गोस्वामी ने ५ हस्तलेखो के आधार पर किया है और पाठान्तरो को पाद-टिप्पणियों मे दे दिया है। विद्वान् सम्पादक ने पुस्तक के पाठ को शुद्धतम रूप मे प्रस्तुत करने के अतिरिक्त न केवल विद्वानो के लिए अपि तु साधको के लिए भी उपयोगी एव आवश्यक सामग्री को भूमिका तथा परिशिष्टो के रूप मे दे दिया है । यह ग्रन्थ यद्यपि आकार मे छोटा है, परन्तु 'वगला' की साधना के लिए यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सम्पादक ने मन्त्रोद्धार को स्पष्ट करने का जो प्रयत्न किया है वह स्तुत्य है और इससे प्रकट है कि श्रीगोस्वामीजी को तन्त्र के व्यवहारपक्ष का क्तिना ज्ञान अपनी पैतृक सम्पत्ति के रूप मे मिला है। इसीप्रकार पुस्तक की भूमिका के अन्तर्गत सम्पादक ने आगम निगमादि के विषय मे जो सामग्री प्रस्तुत की है वह भी बड़ी उपयोगी है और मैं इस सबके लिए विद्वान् सम्पादक को बधाई देता हू । तन्त्रशास्त्र के अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं, परन्तु व्यवहार- पक्ष की उपेक्षा करने से वे प्राय दुर्बोध बन गए हैं। मेरी इच्छा थी कि वह कमी इस ग्रन्थ मे नहीं रहती। श्रीगोस्वामीजी तन्न-व्यवहार मे भी पारङ्गत हैं, अत इस कमी को दूर करना उनके लिए कठिन नहीं था और उन्होने किसी सीमा तक इसको दूर किया भी है। परन्तु फिर भी ग्रन्थ के आकार के बढने के भय से बहुत सी सामग्री नहीं दी गई। प्राशा है वह सब दूसरे रूप मे तन्त्र- शास्त्र के व्यवहारपक्ष को उपस्थित करते हुए अन्यत्र दी जा सकेगी। ग्रन्थ का मुद्रण प्रारम्भ हो गया था, परन्तु सम्पादक महोदय की अनेक ध्यक्तिगत कठिनाइयो अथवा प्रतिष्ठान या प्रस म उपस्थित अनेक विघ्न- घाधामो के कारण, ग्रन्थ के प्रकाशन मे प्राशातीत विलम्ब हुमा जिसके लिए मैं प्रतिष्ठान की ओर से क्षमाप्रार्थी हूँ। अन्त मे, में प्रकाशन विभाग के अध्यक्ष म. विनयसागर तथा साधना प्रेस के व्यवस्थापक श्रीहरिप्रसाद पारीक को धन्यवाद अर्पित करता हूँ जिन्होने रुचि एव लगन के साथ इस ग्रन्थ को प्रकाशित करने म सहयोग दिया है। -फतहसिंह १ जनवरी, १९७० भोधपुर भूमिका भारतवर्ष एम धर्मप्रधान देश है। यहाँ अनादिकाल से निगम एव आगम- सम्मत धर्म की ही स्थिति प्रधान रूप में प्रचलित रही है । मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदो को निगम अथवा छन्द नाम से वामन, भट्टोजी दीक्षित आदि महापण्डितो ने अभिहित किया है-नितरामत्यन्त निश्चयेन वा गच्छन्ति अवगच्छन्ति । (जानन्ति) धर्ममनेनेति निगमश्चन्द' अर्थात् रिन्तर अथवा निश्चयपूर्वक जिसके द्वारा धर्म को जानते हैं उसे निगम अर्थात् छन्द कहते हैं। परा और अपरा-नामक विद्यालो' को स्थिति भी इसी म निहित है अत इसी निगम को धर्मशास्त्र के प्राचार्य मनु ने विद्या एव धर्म का स्थान माना है 'वेदप्रणि- हितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्यय' अर्थात् वदविहित कार्य हो धर्म एव तदितर कार्य अधर्म है। याज्ञवल्क्य ने भी पुराण, न्याय, मीमासा एव धर्मशास्त्रस्वरूप अङ्गो से युक्त वद को धर्म एव चौदह विद्यानो का स्थान बतलाया है-- 'पुर गन्यायमीमासाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिता । वेदा स्थानानि विद्याना धर्मस्य च चतुदश ।' त्रिकालदर्शी महर्षियो ने सम्पूर्ण दाब्दराशि को प्रागम-निगम-भेद से दो भागो मे विभक्त किया है । क्यो कि प्रकृतिसिद्ध नित्यशब्दब्रह्म इन्ही दो भागो मे विभक्त है । यद्यपि प्रथो वागेवेद सर्वम'२ वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता" आदि श्रौतसिद्धान्तो के अनुसार वाक्तत्व से प्रादुर्भूत होने वाले शब्दप्रपञ्च से कोई स्थान खाली नहीं है तथापि स्वर्गनाम से प्रसिद्ध १४ प्रकार के भूतसर्ग के साथ प्रधानरूप से अग्निवाक् और इन्द्रवाक् का ही सम्बन्ध है । पृथिवी भगिन- मयी है और धुलोकोपलक्षित सूर्य इन्द्रमय है । पार्थिव एव सौर अग्नि अन्नाद (अन्न खानेवाले) हैं और मध्यपतित चान्द्र सीम इन अग्नियो का मन बन रहा है । अन जब अनाद के उदर मे चला जाता है तो केवल अन्नाद-सत्ता ही १ 'T विद्य वदितध्ये परा वापरा च । (१) परा-मनिषद्विद्या। (२) पपरा- ऋग्वेदादि । २ ऐतरेयारण्यक० ३।११६ । ३ तैत्तिरीय ब्राह्मण समा।। यथाग्निगर्भा पृथिवी तथा छोरि द्रण गर्भिणी शतपथब्राह्मण १४१६७२. 'एप व सोमो राजा देवानामन यच्च मा' १६५ ४ ५ [ २ ] रह जाती है, अन को स्वतन्त्रता हट जाती है। इसीलिये त्रैलोक्य के लिये द्यावापृथिवी' का व्यवहार ही होता है । प्रत प्रधानत पृथिवीलोक एव सूर्य- लोक ही रह जाते हैं। दोनो अग्निमय हैं । पार्थिवाग्नि गायत्राग्नि है और सोर अग्नि सावित्राग्नि है। ये दोनो अग्नियां 'वाक्' पहलाती है। वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार पृथिवी को वाक् अनुष्टुप् और सूर्य की वाक् बृहती • कहलाती है । अनुष्टुप् वाक् से कचटतप नादिरूपा वर्णवाक् का तथा बृहती- वाक् से म आ इ प्रादिरूपा स्वरवाक् का प्रादुर्भाव होता है। 'स्वरोऽक्षरम्' के अनुसार स्वर अक्षर हैं, अविनाशी हैं । वर्ण क्षर' हैं, विनाशशील हैं। जिस प्रकार अर्थसृष्टि मे भौतिक क्षरकूट की प्रतिष्ठा प्रक्षरतत्व है उसी प्रकार 'शाब्दे ब्रह्मणि निष्णात पर ब्रह्माधिगच्छति' वे अनुसार अर्थब्रह्म की समान धारा म प्रवाहित हाने वाले शब्दब्रह्म मे भी क्षररूप वर्ण की प्रतिष्ठा अक्षररूप स्वरतत्व ही है। अर्थब्रह्म मे जैसे प्राररूप सूर्यसत्ता को छोडकर क्षररूपा पृथिवी अपने रूप मे प्रतिष्ठित नही रह सकती है इसी प्रकार सूर्यवाड्मूलक स्वरतत्व के विना पृथिवीमूलिका वर्णशाशि भी स्व-स्वरूप मे प्रतिष्ठित नही रह सकती है। स्वरमूलक इस सूर्यविद्या का ही नाम त्रयीविद्या' है । सूर्य नही तप रहा है, यीविद्या तप रही है, 'संपात्रस्येव विद्या तपति" मोर प्रयीमयाय त्रिगुणात्मने नम' का भी यही रहस्य है। यह वेदतत्व नित्यतत्व है, स्वय प्रादुर्भूत है, स्वय ब्रह्म के मुस से उद्गीर्ण है। इसीलिये महपियो ने इसे निगम' एव श्रुति की सज्ञा दी है। शति, मङ्गल, शुक्र, बुध, पृथिवी मादि सूर्य के उपग्रह हैं। सूर्य का ही प्रवयंभाग शनि मादिरूप में परिणत हो वर सूर्य के चारो मोर घूम रहा है । सूर्यविद्या या प्रशभूत पृथिवीलोक सूर्य के चारों ओर घूम रहा है। पृथिवी- विद्या सूर्यविद्या से पाई है। इसी रहस्य को समभाने के लिये महपियों ने पृथिवीविद्या का नाम 'मागम' रखा है। सूर्यविद्या की तरह पृथिवीविद्या स्वय निर्गत नहीं है अपितु निगम से पाई है 'निगमादागत भागम'। ऊपर पहा जा चुका है कि पृथिवी की वा वर्णवाक् स्वर से भिन्न है। मत प्रागमशास्त्रोक्त प्रयोगो का उदात्तादिस्वरो से विशेष सम्बन्ध नही माना जाता है। वहां केवल 'दय वा इदम - मत्ता पवायञ्च । तददोमय समागम्दति भत्तवारयायते नादम् । सवय सोऽत्ताग्निरेव स ।' दातपपराह्मण १७६१ २ 'तस्प या एतस्याग्नेगेवोपनिषत् । १०1५1१1१ । उपपत्राह्मणम् १०५।२। .
[४] - प्रादेश' को 'पागम' कहते हैं जिस प्रकार चारो वेदो में प्रक्ट आदेश निगम कहा जाता है। आगमवादी इस उद्ध्वमुख को परमेश्वर अर्थात् शिव का पञ्च- ममुख कहते हैं और वह अलस्रोत द्वारा ब्रह्मविद्या चार वेदो म ही समाप्त नहीं होती परन्तु देश, काल और निमित्तो के परिवर्तन से युगानुसार सिद्धजनो द्वारा प्रकट होती है। इसीलिये माण्डूक्योपनिषद्' को आगमप्रकरण हो कहते हैं । भागम का लक्षण वाचस्पतिमिश्र ने इस प्रकार किया है कि जिससे भोग और मोक्ष दोनो का स्वरूप समझा जा सके वह पागम है। प्राचीन वेद-साहित्य कर्मकाण्ड द्वारा केवल स्वर्गादि योगसाधनो का स्वरूप समभाता है अथवा ज्ञान काण्ड द्वारा केवल मोक्ष का स्वरूप और उसके साधन बतलाता है, परन्तु पञ्चम भागमे साहित्य भोग और मोक्ष को एकवाक्यता करके प्रमपूर्वक ध्यवहारसुख और परमार्थसुख दोनो दे सकता है। " सन्द्र-मागम तन्त्र वह विज्ञान है जो ऐसे साधनो और योगो का निर्देश करता है जिनके द्वारा मनोबल को उनति की जा सकती है। इन साधनो एव प्रयोगो का उद्देश्य निस्सदेह मोक्ष की प्राप्ति है। परन्तु एक जन्म मे सब लोग इस स्थिति पर नही पहुंच सक्ते, अभ्यास करते-करते उनके अन्दर कुछ विशिष्ट शक्तियां जागृत हो जाती हैं जिन्हें सिद्धि कहते हैं। सिद्धियां कुछ अलौकिक शक्तियां हैं जिनका प्रयोग वे ही कर सकते हैं जिन्होंने इन्हें प्राप्त किया है। अन्य कोई भी व्यक्ति इनका उपयोग नहीं कर सकता। पातञ्जल योगसूत्र में मणिमा, गरिमा, लघिमा आदि पाठ सिद्धियां मानी हैं। परन्तु उसके पीछे के ग्रन्यो ने चौतीस सिद्धियां मानी हैं । हिन्दू और बौद्ध तन्त्रों के विभिन्न भागमो के द्वारा निर्दिष्ट विधि एव साधनो का अनुसरण करने से इनमे से कुछ अथवा अधिक सिद्धियो का प्राप्त कर लेना सम्भव है। तन्त्रों का यह उद्घोष है कि जगत् के भौतिक साधनो की उन्नति द्वारा जो कुछ सम्भव हो सकता है, उसे एक ही व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति के विकास द्वारा सिद्ध कर सकता है। तन्त्रो के प्रति सामान्यतया यह भ्रान्ति फैली हुई है कि तन्य वेदो से भिन हैं भौर इनमे मनार्यों के से पाचरण एव व्यवहारो का दर्शन होता है। वस्तुत यह भ्रान्तिमान है । तन्त्र वेदबाह्य न होकर वेद-सम्मत है। हां, इतना अवश्य है कि तन्त्र वेदो को तरह किसी भी वर्ण के लिये अग्राह्य नहीं है। तन्त्रो मे सर्वसाधारणजनो के लिये साधन का मार्ग प्रस्तुत किया गया है। वेद की क्रियाएँ सामाग्यजनो के लिये अधिक परिश्रमसाध्य, व्ययसाध्य एव प्रतिबन्दै- 1 साध्य होने से उन क्रियाओं को यथाविधि सम्पन्न करना सहजसाध्य नहीं है। इसीलिये परमकारुणिक भगवान् शिव ने सहजसाधनगम्य तन्त्री का प्रकटी. करण 'आगम' नाम से किया है। तन्त्र को व्युत्पत्ति एवं परिभाषा भारतीय कोशकारों के अनुसार 'तन्त्र' शब्द का प्रयोग पागम, सिद्धान्त, शिवमुखोक्तशास्त्र आदि के अर्थो मे हुआ है, वामन, भट्टोजो दीक्षित आदि महावैयाकरण पण्डितों ने 'तन्त्र' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की है-'तनोति सर्वशास्त्राणां सिद्धान्तान् यत्तत्तन्त्रम्' अर्थात् जो समस्त शास्त्रो के सिद्धान्त अथवा निर्णयों का विस्तार करे उसे 'तन्त्र' कहते हैं। प्राचीन शास्त्रों मे यद्यपि तन्त्र-शब्द का प्रयोग अनेक विषयों के शास्त्रो के लिये हुआ है जैसे-'कपिलतन्न, वासिष्ठतन्त्र, जैमिनितन्न, पूर्वतन्त्र, उत्तर- तन्न आदि'। तथापि इस शब्द का अधिकतर प्रचलन आगमशास्त्र, निगम- शास्त्र अथवा शिवमुखोद्गीर्ण शास्त्र के लिये ही हुआ है- प्रागतं शिववक्त्रेभ्यो गतञ्च गिरिजापुखम् । वासुदेवस्य तस्मादागममुच्यते ।। (सिंह सिद्धान्तसिन्धु पृ०-४२९) , मतञ्च x x प्रागतं शिववस्त्राच्च गतश्च गिरिजामुखे। तेनागमानि तन्त्राणि कषितानि घरानमे॥१२७॥ यानि कानिधशास्त्राणि कथितान्यागमस्य च । तानि तानि प्रकम्यन्ते कौलाचरणहेतवे ॥१२८॥ (समयाचारतन्त्र) निर्गत गिरिजावत्राद् गत च गिरिजाभ तो। मत छ वासुदेवस्य तस्माधिगम उच्यते । प्रानावस्तु समन्ताच्च गम्पत इत्यागमः स्मृत.. तनुते प्रायते नित्य तन्त्रमिायं विदुयुधाः ॥ [श्रीसत्कारिशर्मालिखित भूमिया (दुर्गासप्तशती चौ० सम्बासस्कृत सीरीजी वाराणसी) J तन्त्र ची परिभाषा शास्त्रो में इस प्रकार प्राप्त है- [ ७ ] प्रस्य वामस्य सक्त तु जपेच्चान्यत्र वा जले। ब्रह्महत्यादिकं दावा विष्णुलोकं स गच्छति ।। अर्थात् इस वामसूक्त के पाठमात्र से ही विष्णुलोक की प्राप्ति अर्थात् 'तद्विष्णोः परम पदम्' के अनुसार विष्णुपदप्राप्तिरूपी मोक्ष की प्राप्ति होती है। निरुक्त (निघण्टु) मे वामशब्द का अर्थ 'प्रशस्य' लिखा है- 'प्रस्र मा. अनेमा, अनेद्यः, अनवद्यः, अनभिशस्ताः, उक्थ्यः, सुनीथः, पाक., वामः, वयुनमिति दश प्रशस्यनामानि । यहाँ वामनाम प्रशस्य का द्योतक है और प्रशस्य प्रज्ञावान् ही होते हैं-य एव हि प्रज्ञावन्तस्त एव हि प्रशस्या भवन्ति । ससे स्पष्ट है कि प्रज्ञावान् प्रशस्य योगी क नाम हो 'वाम' है और उस योगो के मार्ग का ही नाम 'बाम- मार्ग' है । इस मार्ग मे जितेन्द्रिय के लिये ही अधिकार की व्यवस्था है, न कि इन्द्रियलोलुप प्राणियो के लिये जैसा कि भगवान् शङ्कर का कथन है- परद्रप्रेप योऽन्यश्व परस्त्रीय नयुसक. । परापवादे यो मूकः सर्वदा विजितेन्द्रियः । तस्यंव बाह्मणस्यात्र वामे स्यादधिकारिता । (मेरुतन्त्र) अर्थात् परद्रव्य, परदारा और परापवाद से विमुख, सयमी ब्राह्मण ही वाममार्ग का अधिकारी होता है । प्रय सर्वोत्तमो धर्म शिवोक्त सर्वसिद्धिद । जितेन्द्रियाय सुलमो नान्यस्यानन्तजन्तुभि. ! (पुरश्चर्णिय) इसी प्रकार मेरतन्त्र प्रादि प्रागमग्रन्थो मे पञ्चमकारो को व्यारया इस प्रकार की गई है- मद्य मसच मोनच मुद्रा मेथनमेव च। माहुर्योगिना मुक्तिदायकम् ।। अर्थात-मद्य, मास, मीन, मुद्रा और मैथुन ये पांच प्राध्यात्मिक मकार ही योगियो को मोक्ष देने वाले हैं। भ्योमपद्धनिष्यन्दसुधापानरतो मवेत् । मद्यपानमिद प्रोक्तमितरे मद्यपायिनः॥ प्रहार ध्र-सहस्रदल से जो स्त्रवित होता है उसे सुधा (अमृत) रहते हैं जिसे - मकारपञ्चक फुलकुण्डलिनी द्वारा योगिजन प्राप्त करते हैं इसी का नाम मद्यपान है। इसके अतिरिक्त पीने वाला मद्यप कहलाता है। अर्थात्-ब्रह्मरन्ध्र के सहस्रारकमलरूपी पात्र से जो ब्रह्माण्ड को तृप्त करने वाली सुधा-धारा बहती है वही पीने योग्य मद्य (मदिरा) है। पुण्यापुण्यपशु हत्या ज्ञानखगने योगवित् । परे लय नयेच्चित्त मासाशी स निगद्यते ॥ अर्थात्-पुण्य-पापरूपी पशु को ज्ञानरूपी खड्ग से मार कर जो योगी मन को ब्रह्म मे लीन करता है, वही मासाशी (मासाहारी) है । मौर भी- कामक्रोधी पशू तुल्यो बलि दत्वा जप चरेत् । x X x कामक्रोधसलोभमोहपगुकांशिछत्वा विवेकासिना। मांस निविषय परात्मसुखद भुञ्जन्ति तेषा बुधा ।। अर्थात्-विवेकी पुरुष काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी पशुग्रो को विवेक रूपो तलवार से काट कर दूसरे प्राणियो को भी सुख देने वाले निविषयत्व मास का भक्षण करते हैं। मानसादीन्द्रियगण सय यात्मनि योजयेत् । स मीनाशी भवेद्देषि इतरे प्राणिहिसका ।। मन आदि सारी इन्द्रियो को वश में करके प्रात्मा लगाने वालो को ही मोनाशी (मत्स्याहारी) कहते हैं इससे इतर जीवहिंसक हैं । प्राशातृष्णाजुगुप्सामयविषयव गामानलज्जाप्रकोपा ब्रह्माग्नावष्टमुद्रा परतिजन पञ्यमान समन्तात् । नित्य सम्भावपेत्तानवहितमनसा दिव्यभावानुरागी , योऽसौ ब्रह्माण्डमाण्डे पशुहतिविमुखो रुद्रतुल्यो महात्मा ॥ अर्थात्-पाशा-तृष्णादि पाठ मुद्रामो को ब्रह्मरूपी अग्नि मे अच्छी तरह पकाता हुआ दिव्य भाव का अनुरागी जो योगी पशु-हिंसा से पराड मुख होकर सावधान मन से भक्षण करे, वह महात्मा पुरुष संसार मे रुद्रतुल्य होता है । या नाडी सूक्ष्मरूपा परमपदगता सेवनीया सुषम्णा , सा कान्ताऽऽलिङ्गनाहीं न मनुजरमणो सुन्दरी वारयाक्ति । 41 [९] कुर्याच्चन्द्रायोगे युगपवनगते मैथुन नैव योनी , योगोन्द्रो विश्ववन्धः सुखमयभवने तां परिष्वज्य नित्यम् ।। अर्थात् -परमानन्द को प्राप्त हुई सूक्ष्मरूपवाली सुपुम्णा नाडी है, वही आलिङ्गन करने योग्य उपभोग्या कान्ता है, न कि मनुष्यरूपा सुन्दरी वेश्या । सुपुम्णा का सहस्रचनान्तर्गत परब्रह्म के साथ सयोग का ही नाम मैथुन है, स्त्री- सम्भोग का नहीं। और भी- ध्यान देव्याः पदाम्भोजे पञ्चम परिकीर्तितम् । अर्थात्-श्रीदेवी के श्रीचरणो का चिन्तन ही पञ्चम अर्थात् मैथुन है । सारयाचनतन्त्र प्रस्तुत 'सारयायनतन्त्र' तन्न्शास्न का ही सारयायनमुनिप्रोक्त' एक लघुग्रन्थ है । यद्यपि इसकी परिगणना शिवमुखोद्गीर्ष नानागमो ममित ६४ तन्नो मे तो नहीं की गई है, फिर भी यह मुनिप्रणीत होने के कारण उपतन्त्रो मे अवश्य ही परिगणनीय है जैसा कि वाराहोता' के निम्न पयो से स्पष्ट है. बौद्धोक्ता युपतन्त्राणि पापिलोक्तानि पानि च । प्रभुतानि च एतानि जमिन्युस्तानि यानि वसिष्ठ प-विश्व नारदो गर्ग एवं पुल त्यो नायि सिद्धो पावरक्यो भास्तवा ।। शुनो बहपतिश्चैत्र पे मुनिसतमा । एनि प्रणोतान्यन्यानि उपतलापि यानि सस्याता तान्यन धर्मविपिहात्मा । सारासारतराव सापाता शिवोपत जैसा कि पूर्व मे परा जा चुका है कि 'जगत् के भौति साधनो की उन्नति के द्वारा जो युर सभव हो सकता है उसे एक ही व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति के विकास द्वारा सिद्ध कर समता है। इस मानसिक शक्ति को बढाने या उत्तम साधन है-पाणी द्वारा अथवा मन ही मन मन्यो का उच्चारण परना। प्रागम-ग्रन्थो में प्रपि महर्पियो द्वारा मुदोघंगाल पा पपजो नारो विर्या सास्यायनमुनि प्रति । उपदेशप मेरांव उक्तवा मेसन्दरे ॥१५॥ देवोक्टाधरा तासागर्म भुषित गारवायनतार प्रपम पटल) सवल्पाम-सीतात, -५८।। तन [ १० ] . तक अनुभूत एव सुपरीक्षित कुछ ऐसे शब्दो एव शब्दसमूहो का निर्देश किया गया है जिन्हें 'बीजमन्त्र', 'हृदयमन्त्र' अथवा 'मालामन्न' कहा गया है। इन मन्नो का निश्चित संख्या मे जप करने से (उच्चारण करने से) निश्चित ही अपने उद्देश्यो (मनोरथो) की प्राप्ति होती है जैसा कि निम्नोक्ति से स्पष्ट है-- 'एक. शब्द सुप्रयुक्त स्वर्ग लोके च कामधुरभवति' । प्रस्तुत ग्रन्थ इसी का एक ज्वलन्त उदाहरण है जिसमे नारदोपासिता श्री- वगलामुखीदेवी की पञ्चाङ्गोपासना-विधि के साथ ऐसे विशिष्ट १५ मन्त्रो के प्रयोग-विधान बतलाये गये हैं जिनके द्वारा साधक (उपासक) मनुष्य अत्यन्त विस्मयोत्पादक अलौकिक शक्तियो (सिद्धियो) को अजित कर अपनी समस्त अभिलापामो को प्राप्त कर सकता है। श्रीबगलामुखी श्रीवगलामुखी मागमग्रन्थो में वर्णित दश महाविद्याओ मे अन्यतम है , जिसे इस तन्त्र में बह्मास्त्रस्तम्भिनी विद्या, स्तब्धमाया, प्रवृत्तिरोधिनी, गला, मन्त्रजीवनविद्या, प्राणिप्राणापहारिका एव पट्कर्माधारविद्या के नाम से अभि- हित किया गया है- रह्मास्त्रस्तमिनी विधा स्तब्धमायामनुस्तया । प्रतिरोधिनी विद्या बाला च कुमारक ॥६॥ मात्रजीवन विद्या प्राणिनाणापहारिका। पटकर्माधारविद्या च ये से पर्यायवाचका. ॥१०॥ (प्रथम पटल) ऐसा प्रतीत होता है कि निगमशास्त्रोक्त वलगा' ही आगमशास्त्रो की वगलामुखी है क्योकि सस्कृतभाषा मे जैसे 'हिंस' शब्द वर्णव्यत्यय होने के कारण 'सिंह' और लौकिक भाषा में 'मतलब' मतबल बन जाता है वैसे ही निगम की २. विशत्यराधिका मन्या मालामन्त्रा इति स्मृताः। दशाक्षराधिका मन्त्रास्तदग्विीजसज्ञिता.। (सिंह सिद्धान्तसिन्धु पृष्ठ २६५) कालो तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्वरी। भैरवी छिनमस्ता च विद्या धूमावती तथा ।। बगला पिद्धविद्या च मातङ्गी कमलामिका । एता दश महाविद्या. सिद्धविद्याः प्रकीर्तिताः ।। (प्राणतोषिणी, पृष्ठ-७१७) यदा व कृत्यामुत्खनन्ति प्रथ सालसा मोघा भवति । तथो एवंप एतद्यद्यस्मा प्रय कश्चिद् द्विपन् भ्रातृव्या कृत्या वल्गा निखनति तानेवतदुस्किरति ।। (शतपथब्राह्मण-३१५४।३) ar
,
ख. ग्रथाङ्क-५५८५; लिपिकाल"१६वी शताब्दी (विक्रम), पत्र-सत्या
५१; माप-३४'५+३' से. मी ; पक्ति-६, अक्षर ३६;
दशा-सुन्दर, सुवाच्य एव अपेक्षाकृत शुद्ध प्रति ।
ग. ग्रथाङ्क-१८३६५; लिपिकाल-स० १७९६ (विरम) पनसस्या ४२;
माप-२३' x १२५ से. मो., पक्ति-१२; अक्षर ३३,
दशा-कुछ जीर्ण, सुवाच्य किन्तु अनुद्ध ।
घ ग्रन्थाङ्क-१८३६३, लिपिकाल-१९वी शताब्दी (विद्रम)पत्र स या-१२४,
पक्नि-६, अनर-१६,
दशा-ठीक-ठीक है, सुवाच्य किन्तु अनुद्ध प्रति है ।
रा० श्रीरामकृपालु शर्मासग्रह ग्रन्धाइ-माप-२६'-१०', लिपिकाल-70
१६२६ (वित्रम) पनसचा-४६, पवित-: अमर-४६, दरा-जर्ण,
सुवाच्य एव अगद्ध प्रति है।
मानार-प्रदर्शन
में राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर के निदेशक समादरपोच
टॉ० फतहस्तिहजी का विशेष आभारी हू जिनके सलरामर्श एव सत्प्रेरणा से
इस अतिविलम्बित य का सपादन-कार्य पूर्ण कर सका। जयपुर-निवासी
प० श्रीरामकृपालुजो दार्मा का भो में विशेष प्रागार मानता हूँ जिन्होंने अपने
समह म से टूढ पर इस ग्रन्य की प्रति हम प्रपित हो । साथ ही में प्रतिष्ठान
के सहयोगी विशपत पुस्तकाच-सहायक धीमती गणेशी पाच एप्रति.
लिपिकर्ता श्री ब्रजेशकुमारसिंह वो भी साधुवादो से सत्त करता हूँ जिन्हो।
पद्यानुक्रम बना पर मुझे सह्योग दिया । अन्लम में साधक विद्वानो से सनग
प्रार्थना व ना हूँ कि इस ग्रन्ध म दृष्टि-दोष एवं चित्तचाञ्चल्पपरा ही कोई
त्रुटि रह गई हो उसका वे समाधान करते हुये 'समादधतु सन्जना.' के अनुसार,
मुझे क्षमा कर।
कार्तिक मुक्त एकादशी
विषम सबद २०२६
विदुषामाधवो
गोस्वामी लक्ष्मीनारायणदीक्षित
विषयानुक्रमः प्रमाङ्क विषय पृष्ठ श्लोक १ प्रथमः पटलः पृष्ठ (1) पीताम्बरादेवीध्यानम् (२) मायावि-राक्षसाजेतुकामस्य कात्तिकेयस्य शिवम्मति जयोपायजिज्ञासा (३) कात्तिकेय प्रति जया शिवनिगदित ब्रह्मास्त्रविद्या- वगलामनुप्रशंसनम् (४) मारदस्य सांस्यायनमुनये ब्रह्मास्त्र विद्योपदेशः, तद्विछापा भूमौ प्रकाशकमश्च (५) ब्रह्मास्त्रविद्यामन्त्रोपासनाफल, मन्त्रलब्धये कुलगुरुमुखाद् दोक्षामहणावश्यकत्वश्य २-३ क २. द्वितीयः पटलः पृष्ठ ३-५ ३ २ ४ (१) द्विभुजापीताम्बराध्यानम् (२) दीक्षाविधिजिज्ञासा (३) पुस्तकलिखितमन्त्रजपे हानिसम्भवाव कुलगुरुमुखादीक्षाग्रहणप्रतिपादनम (४) सद्गुरुलक्षणानि (५) कारणत्रयेण विद्योपलब्धि., विद्याया राजसादिभेदत्रयञ्च (६) शिष्यलक्षणानि ४ १८-२२ १ ६ २ ३. तृतीयः पटलः पृष्ठ (१) वाङ्मुखस्तम्भिनीवगलामुखोध्यानम् (२) अभिषेक विधिजिज्ञासा (३) मन्नाभिषेचने कालनिर्णयः (४) शिष्यस्नापन, गायत्रीजपस्यावश्यकत्वञ्च (५) कलशनवकस्थापनविधिः (६) ऋत्विग्वरणविधिः कलशमानविधिश्च (७) विद्यामन्त्रोपदेशविधिः ६ ६ ६-७ ७ १५-२४ २५-२८ ८ २ साख्यायनतन्त्र प्रमाङ्क विषय पृष्ठ लोक ४. चतुर्थः पटलः ६ -- ... (१) प्रेतासनावगलामुखीध्यानम् (२) ब्रह्मास्त्रमन्त्रसन्ध्या जिज्ञासा (३) मन्त्रसन्ध्याविधिः (४) त्रिकालोपस्थानम् (५) मन्त्रसन्ध्योपस्थानयोरनिवार्यत्वम् ६-१० ૨ ३-१६ १७-२५ २६-२६ ५ पञ्चम. पटल: पृष्ठ ११-१३ ११ (१) श्रीवगलादेवीध्यानम् (२) एकाक्षरीमहामन्त्रजिज्ञासा (३) एकाक्षरीबीजमन्त्रोद्धार (४) ऋष्यादिकरपडङ्गन्यासविधि. (५) पञ्जरल्यासविधि: (६) मातृकान्यासविधि (७) वालामुखीयान तजपरिधिश्च १२-१३ ११-१५ १६-२४ १ १४ २ ६ षष्ठः पटलः पृष्ठ १४-१६ (१) स्तम्ननकारिणीबगलामुखोप्यानम् (२) एकाक्षरोमहामन्त्रप्रयोगजिज्ञासा (३) होमे कामनाभेदेन कुण्डनेदा (४) होमे कामनानेदेन स्थण्डिलनेदा (५) होम सहयानेदेन कुण्ड-स्थण्डिसमानानि (६) शान्त्यादिषट्कर्माणि तल्लक्षणानि प (७) कर्मभेदेन होमदम्याणि तत्सख्यातिनिधारण घ १२-१५ १६-२० २०-२७ ७ सप्तम. पटलः पृष्ठ १६-१८ १ (१) श्रीवगलाध्यानम् (पीताम्बरधरादेवोप्यामम) (२) पत्रिंशदक्षरोवगताविद्यामन्त्रजिज्ञासा (३) पशिशरोविद्यामन्त्रोदार (४) ग्यासविद्याक्रम (५) बगलामुखोम्यान तदावश्यवस्वञ्च (६) प्यादिकथनम् १०-१२ विषयानुक्रमः [ ३ पृष्ठ श्लोक क्रमात विपय (७) सङ्कल्पपूर्वक अपसंख्यानिरि: (5) तर्पण-होमद्रव्याणि तत्प्रकारच (6) पुरश्चरणलक्षणं तवकरणेऽसिद्धिश्च (१०) कर्मभेदेन सख्यायुतहोमद्रव्याणि १५-१६ १ 4. प्रष्टमः पटलः पृष्ठ १९-२१ (१) शिवा (बगलादेवी) ध्यानम् (२) बगलामन्त्रराजप्रयोगजिज्ञासा (३) फर्मभेदेन होमद्रव्ययोगा, नानाद्रव्ययोजन- प्रकार मन्त्रयोजनाविधिश्च (४) द्रश्यतपणेन परकृतकर्मनिरास. २ १८-२० २७-२६ . ६. नवमः पटलः पृष्ठ २१ २ (१) वगलामुखीध्यानम (२) बगलामनोः प्रयोगमूलयन्त्रजिज्ञासा (३) यन्योद्धार (४) यन्त्र मन्त्रलेखनविधिः (५) कर्मभेदेन नानापुष्पर्यन्त्रपूजाविधिः २१-२२ २२-२३ १०. ., दशमःपटल: पृष्ठ २३-२६ (१) पीताम्बरावगलाध्यानम् (२) मन्त्रलेपनप्रयोगजिज्ञासा (३) लेपने कर्मभेदेन चन्दनादिन्यनिरूपणम् १ २ २४.२६ ११. एकादशः पदल: पृष्ठ २६-२६ -- (१) वगलादेवीध्यानम् (२) यन्त्रराजतर्पणप्रयोगजिज्ञासा (३) फर्मभेदेन गुडावितपणद्रव्य निरूपणम् २ २६-२६ - १२. द्वादशः पटलः पृष्ठ २६-३१ (१) चिन्मयीवगलाध्यानम् (२) बगलागायत्रो जिज्ञासा २६ " ४] सांस्यायनतन्त्र क्रमा विषय पष्ठ श्लोक (३) गायत्रीमन्त्रोदारः (४) प्यादिरपनान्ते पुरश्चर्यान्यास-ध्यानादिनिरूपणम् (५) कर्मभेदेन गायत्रीमन्त्रप्रयोगाः १३. त्रयोदशः पटलः पृष्ठ ३६-३४ - ६ (१) बगलाम्बाध्यानन (२) यन्त्रपूजाजिज्ञासा (३) पत्रपूजाविधिः (४) पालामादौ पूजाविचार (५) पूजा-पारगम्य विचारः (६) मन्त्रसिदिपलायन १४ चतुर्दशा पटल पष्ठ ३४-३७ १ २ (२) बगलाम्यानम् (२) बगलाचावदिशा (३) देशदात मदिति सहारपूजा धनम् (४) सप्रिपमेए सोमासानाकि (५) प्रसंगारो सविधान सोगाना ना शेरपान १ (१) सोमायाने स्वपल्या पूजापान सरापन मृRITTER १५. पञ्चद पटस पाड r (1) राममायामिम (0) पानिमामा (३) पम्यानम (v) 11: SITARमपि (५) १४ माद: १५ पास पट। (1) HATH पापमानामम (२) remainm (1) Camvareer (In remarate विषयानुक्रमः क्रमाङ्क विपय पृष्ठ श्लोक ४२-४३ (५) बहद्भानुमुल्यस्त्रविद्योद्धारस्तत्प्रयोगविषिश्च (६) प्रयोगान्ते सौभाग्याचाऽवश्यकत्वम् ३५-४० - १७. सप्तदशः पटलः पृष्ठ ४३-४६ (१) वगलाम्बिकाध्यानम् (२) शताक्षरीमहामन्त्रजिज्ञासा (३) शताक्षरोमन्त्रोद्धार (४) प्रष्यादि-न्यासविद्या-ध्यानानि (२) जपसख्या-तर्पणद्रव्यादिकथनम् • (६) फर्मभेदाद्धवनद्रव्याणि सदाहुतिसल्या-समय-कथनञ्च १ २ ३-१० ११-१५ १६-१७ १८-२८ ४४.४५ ४५ १०. मष्टादशः पटलः १ २ (१) जिल्हास्तमनकारिणोक्गलाघ्यानम् (२) शताक्षरीहवनप्रयोगजिज्ञासा (३) विषमज्वराविविविधरोगपिनाशनार्थ नानाद्रव्याहुति- प्रयोगाः (४) यसीकरणाद्यमीप्सितकामनाभेदादनेकविधद्रव्याहुति- प्रयोगा (५) बम्बादिरोगशमनप्रयोगा. ४७-४८ (६) वश्याकर्षणप्रयोगाः (७) शत्ररोगकृत्प्रयोगाः (८) मारणप्रयोगाः १६. एकोनविंशः पटलः पृष्ठ ४६-५३ (१) चतुर्भुजावगलाध्यानम् (२) शताक्षरीमन्नप्रयोगोपसहारजिज्ञासा ४६ (३) रिपुमारमादिप्रसङ्ग गुलिकादिविविधप्रयोगा- स्तपिरासविधिश्च ४९.५० (४) पुत्तलिकाद्यमिचारिप्रयोगा ५१-५३ (५) प्रयोगोपसहारविधि ५३ १७-१६ २०-२५ २५-२७ २८-३४ ४० ४६ १ २ ३५-४३ २०. विशः पटलः पृष्ठ ५४-५७ (१) बगलादेवीध्यानम् ६] साख्यायनतन्य प्रमाङ्क विषय पृष्ठ २ ५४ (२) परविद्याभेदनोपायप्रश्न (३) परविद्याभेदिनीमन्त्रोद्धारस्तवृष्यादिकयनच (४) तन्न्यास ध्यान-पुरश्चर्याकथनम् (५) परविद्याभेदिनीमन्त्रस्य नानाप्रयोगा (६) सिद्ध मन्त्रमाहात्म्यवर्णनम् २१. एकविश पटल. १२-१५ १६-२६ ५७५६ २-२४ (१) परविद्यामक्षिणीवगलाध्यानम् (२) पर विद्यालयमादिमहदाश्चर्यकरा नानाप्रयोगा (३) प्रयोगोपसहारा २२ द्वाविंश पटल पृष्ठ ५६-६१ (१) बगलामुखीध्यानम् (२) बगलास्त्रविद्याप्रश्न (३) बगलास्त्रविद्याया क्रम (४) बगलास्त्रविद्यामनोद्धार (५) तदृष्यादि-न्यास-ध्यान पुरश्चर्याविधि (६) शत्रुक्षयदादिनानाप्रयोगा ५६ २ ५६.६६ ४-८ १ २ ३-४ २३. अयोविश पटल पृष्ठ (१) श्रीवरलादेवीध्यानम् (२) वगलास्नमहामन्त्र प्रयोगनिवासा (३) पासिद्धिप्रदप्रयोग (४) व्याधिनाशनप्रयोग (५) जिह्वा श्रोत्र प्राण पाद जठराग्नि गारस्तम्मन योगा (६) शमाया गमतावप्रयोग (७) रिपुस्त्रीणा बन्ध्याकरणप्रयोगस्तनाशनप्रयागश्च (6) रिपुलक्ष्मोविनाशकाद्यने के प्रयोगा २४, चतुधिश पटल पृष्ठ ६४-६६ ६-११ १२-१३ १५-२७ and (१) सस्तनपावगलाम्बाध्यानम् (२) बगलामन्त्रमालिकालक्षणजिज्ञासा ६४ ६४ २ -विषयानुक्रमः [७ कमाङ्क विषय श्लोक (४) हरिद्रामालानिर्माण विधि. ६४-६५ (४) मालासस्कारविधि. १५) मालाया भूमो पतने पुनस्तत्सस्कारः १५-१६ (६) शान्त्यादिकर्मभेदान् मालालक्षणानि (७) पुत्तलिकानिर्माणविधिः २०-२३ (6) प्राणप्रतिष्ठाचनजपविधिः २४-२७ २५ पञ्चविशः पटलः पृष्ठ ६६-७१ (१) बगलादेवीध्यानम् (२) चतुरक्षरीमहामन्त्रजिज्ञासा २ (३) चतुरक्षरीमहामन्त्रोद्धारः ६७ (४) चतुराम रो-यासविद्याकथनम् (५) चतुरक्षरी-ऋष्यादिकथनम् ६७ (६) बगलाचतुरक्षरीमन्त्रध्यान पुरश्चयो विधानञ्च ६८-६६ १२-२१ (७) योगिनीलक्षणम् २२ (८) लौकिक्यादिविविधपूजा तल्लक्षणानि च ६८ २३-२६ (8) योगिनो मता निगुंगा चतुर्थी पूजा २७ (१०) चतुर्विधचर्याया गोडादिदेशभेदात सृष्टपादिनामसङ्केत- स्तदर्चाविधिस्तत्फलानि च ६९-७० २८.४४ (११) मारीनिशदिकरणे हानिः ७०-७१ ४५ ४५ २६. पड्विशः पटलः पृष्ठ ७१-७३ (१) वगलादेवीध्यानम् (२) वगलाचतुरक्षरोमन्त्रप्रयोगजिज्ञासा (३) नानाद्रध्ययोगेन तर्पणप्रयोगविधिः २ . २७. सप्तविंशः पटलः पृष्ठ ७३-७६ ७३ . ११) परब्रह्माधिदेवतावा लाध्यानम् (२) बगलाचतुरक्षरोमत्रहोमप्रयोगजिज्ञासा (३) कर्मभेदाद कुण्डभेवा. स्थानभवा होमद्रव्ययोगाश्च २८. अष्टाविंशः पटलः पृष्ठ ७६-७८ । (१) स्तम्मनास्त्रस्वरूपिणीवगलाध्यानम् म सांख्यायनता वमा विपय पृष्ठ श्लोक २ (२) स्तम्भविद्यायाः प्रयोग जिज्ञासा (३) वगलाहृदयमान्य प्रशस्तिवर्णनम् (6) वगलाहृदयमन्त्रोद्धारस्तज्जपम यध्यादोप- कृत्रिमरोगादिनासनफलञ्च ७६ ७६-७७ १ २६. ऊनविंशः पटलः पृष्ठ (१) बगलाध्यानम् (२) बगलाहृदययन्त्र-प्रयोगजिज्ञासा (३) बगलाहृदय-यन्त्रोद्धार (४) स्वर्णादिनिमिते यन्त्रे वगलाहृदयमात्रलेखनमः (५) यन्त्रपूजाविधि (६) यन्त्रपूजाया कर्मभेदान्नानाकुसुमप्रयोगा २ ३ ४-७ ७९-८० ६-२२ ३०. त्रिशः पटलः पृष्ठ ८१-३ १ २ (१) बगलाध्यानम् (२) वालादाक्षरमन्त्रजिज्ञासा (३) वगलाष्टाक्षरमन्त्रोद्धारस्तवृष्यादिन्यासविद्याकथनञ्च (४) मन्त्रभेदेन वगलाध्यान तन्मपुरश्चर्या च {५) कर्मभेदाद विल्वादिविविधवक्षमूलेष जपविधानेन नानाकार्यसिद्धय. ८१-८२ ७-१२ ८२-८३ ३१. एकत्रिंशः पटलः पृष्ठ ८३-८६ ८३ १ २ ४ (१) भक्तचिन्तामणिवगलाध्यानम् (२) बगलाप्टाक्षरोमन्त्रप्रयोग जिज्ञासा (३) पुततीप्रयोग (४) नानाद्रव्ययोगेन जिह्वास्तम्भादिकृते भस्मचूर्ण- मक्षणाद्यने के प्रयोगा. (५) पशुपक्ष्याघनावरवाना स्थानविशेषेषु निक्षेपाद- रिपुमारणादिप्रयोगा. (५) नानावस्तुसयोगजधुपवासनादिप्रयोगा. ३२ विश पटलः पृष्ठ ८७-६० (१) प्रेतासनस्थावगलाध्यानम् १५-३ ७ १ विषयानुक्रम [. क्रमात विषय पृष्ठ नोक २ E७ ८७८ (२) वर्गलास्त्रोपसहारविद्या जिज्ञासा (३) ब्रह्मास्त्रस्तम्मिनीकालोविद्यामन्त्रीद्वार (४) विद्यामन्त्रपुरस्चर्याविधि (५) वालास्त्रोत्रयसहारकम (जिहास्तम्मनाद्यभिचार- शान्तिप्रयोगा) ३३. प्रस्त्रिश. पटल पृष्ठ ६०-६४ ८८६० १७-४० ६० ६० २ ५ १०-१२ १२ २२ २३-२८ ६३-६४ २६-२८ (१) श्रीवगलादेवोध्यानम् (२) बगलास्तोपसहारयन्त्र जिज्ञासर (३) फपिलानवनीतेनोपलिप्ते कदनोपने समयन्त्र- लेखनक्रम (४) यन्नस्याष्टदलेषु ताक्ष्यमालामनोखननिर्देश (५) ताक्ष्यमालामनोरुद्धार (৫) যমীলসবিতা দুলাবিধি (७) प्रभिचारशान्तिकरो यन्त्रधारणप्रयोग (4) विविधव्याधिविनाशनफरस्ताम्बूलघवणप्रयोग (6) मार्जन तोयपानादभिचारशान्ति (१०) धारणयन्त्रस्योद्धारस्त:प्राणप्रतिष्ठापूजाविधीच (११) विविधकृत्रिमरोगादिनाशनार्य तद्यन्त्रधारण- মান গাইল নময় ३४ चतुस्त्रिश पटल पृष्ठ ६४-६८ (१) वगलाध्यानम (२) समस्तकम सर्वोपद्रवादिनाशनजिज्ञासायाँ कृत्यावेश वश्य स्तम्मनप्रयोगकथनम् (३) तत्र ज्वालामुख्यादिपञ्चास्त्रप्रयोगविधि , लोक्यविजयास्त्रप्रयोगस्तत्फलकपनन्च (४) तद्धवन तपणप्रयोगा ३५ पञ्चत्रिश पटन पृष्ठ १८-१०० (१) बगलाध्यानम् (२) योजभेजिज्ञासा (बगलामन्यनिर्णयजिज्ञासा) (३) पनिशदक्षरीविद्याया पाविविधारे साख्यायन मह्मयामल जयद्रथयामल हारिद्रसहितामतानि १४ १ २ .] सौख्यायनतन्त्रे पमा विषयः दलोम ॥ 5 e १३-१५ ६६ (1) फ्लो सांख्यायनमतायव प्राधान्यम् (५) विद्यामन्य जपात्यूव मृत्युञ्जयमन्यजए. स्तदकरणेऽसिदिश्च (६) साध्यायनोतवोजसमाया पिरमायायोजोद्धारः (७) पोतवासामते स्थिरयोजलक्षण तदुद्धारश्च (८) रेफयुक्ताया स्थिरमायाविद्याया जपेनेव सर्वसिद्धि (६) लघुपोदा-महायोडादिन्यासान्त एव विद्यालय प्रतिपादनम् (१०) पीतवासामते वगलाध्याननिरूपणम् (११) सात्यायनमते पश्चिमाम्नायोतराम्नायभेदेन वगलापूजन निर्देश ३६. पत्रिश. पटल. पृष्ठ १००-१०२ 88 १५-१६ २०-२१ १०० २२ ૨ (१) बगलाध्यानम् (२) साररूपा सर्वकार्मणनाशनोपाय जिज्ञासा (३) मन्त्र-कवच-मन्त्रात्मक सर्वकामणनिर्णाशनो नाम प्रथमो योग (४) क्षुदकार्मणनिर्णाशनो नाम द्वितीयो योग (५) कवच स्तोत्र-मन्त्रात्मक फरकामनिर्णाशो १०० १००-१०१ ६-८ नाम योग १०१ ११-१२ १०१ १२-१३ (6) गायत्री-कवच मन्त्र-स्तोत्रात्मक सर्वकार्मण- नादानो नाम योग (७) तारा-काली-छिन्नमस्तामन्त्रात्मक सर्वदोष- निवारणो नाम योग (५) कवच-बाणात्मक सर्वदोषनिवारणो नाम योग (६) रणस्तम्भ-प्राणरक्षा-दिव्यरक्षाकारक साताम रोमन्त्र-फवष-हृदयात्मको योग (७) क्वच-चतुरक्षरोमन्त्रात्मक कवचचन्द्रवर्णात्मको योग (८) एकाक्षरी-वेदाक्षरो पत्रिशदक्षरी कवचात्मको- महाब्रह्मास्त्रयोग १०२ १८ १०२ १६-२५ ३५. पञ्चाश पटल १०२-१०५ (१) पीताम्बराध्यानम् -
विषयानुक्रमः
[ ११
क्रमात
विषय
श्लोक
.
२
१०३
१०४-१०५ १७३०
(२) रहस्यजिज्ञासा
(३) ब्रह्मास्त्रयोगफलप्रशंसनम्
(४) होमयोग-प्रयोगायनम् (प्रयोगोपसंहार )
(क) परिशिष्टम् पृष्ठ १०५-११६
शुष्यादिन्यासध्यानावियुताः
सात्यायनतन्त्रगतामन्त्र:
१०५-११६
११६.११८
(ख) परिशिष्टम
पृष्ठ ११६-११८
बचपजरकवरस्तोत्रम्
(ग) परिशिष्टम् पृष्ठ ११८-१२२
धगलामुखोत्रलोक्यविजय नाम कवचम्
(घ) परिशिष्टम्
१२२-१२
श्रीपोताम्बरारलाक्लोस्तोत्रम्
सास्यायनतन्त्रस्थानाम्पद्यानामनुक्रमः
११८-१२२
१२२-१२
१-१८
शुद्धिपत्रम् पृष्ठ पडक्ति प्रशुद्धम् मुद्धम् ७ २६ चान्य तलतलेन शातोदरी विविखेत् वाक्पतिस्तुवा ऋषिसख्यया सक्ष्मीवान् दाभिघातेन सस्मरेत् १६' लकार चान्ये तिलतलेन शालोदरों विलिखेत् ०वापतिस्तु वा पिसत्यया लक्ष्मीवान् गदाभिघातेन २४ २७ २८ २६ १७ सस्मरेत् ।। १७ लकार ह्र गदा ७ १६ गदा मनुः१५ मनुः। ४१ ४३ ४५ ३ १ २० ७ ५२ ५२ ५२ २३ ३ २५ तन्त्रराज जिह्वाभेदानार्थ जिह्मास्तम्भ सदाह: मूदनि ३. घ. पुस्तस्के जिल्लास्तम्भन. सक्षण विशेशो तु वन्यस्यता छन्दोत्र द्रावरांदेवताम् ॥२॥ भग्युत ॥६॥ tঘানৰ चसपंणम् ततत्फल. मण्डलात मन्त्रराज जिह्वाभेदना जिह्वास्तम्भ स दाहा • मूई नि ३. प. पुस्तके जिह्वास्तम्भन० लक्षण विशेपो तु विन्यस्पता छन्दोन हरिद्रावणं देवताम् ॥२२॥ भयुत ॥३॥ ध्यानपूर्वकम् चतपणम् तत्तत्फल. मण्डलात्त २१ ६८ ७२ ७४ २४ २ २ ७५ ४ २ २] शुद्धिपत्रम् पृष्ठ पंक्ति मगुवम् शुद्धम् ८५ २२ ३० ८७ E ८६ ६१ ६२ ॥२२॥ २२. तशाशश च ॥१७॥ १६.रा.तु षण्मास म.रा. यद्यदण परम कृलिम: निश्चतम् विशोपोऽय शवि लिखेद् चयथाक्रमम् नाजयेद् ॥२३॥ २२. रा० ०वद्दशाश च ॥१८॥ १६. रा. श्लोकादमिद नास्ति ८. रा. यद्यद्वप० परम् कृत्रिमः निश्चितम् विशेपोऽय र विलिखेद् घ यथाक्रमम् नायेद् १२ ६२ ९३ 12 २६-३० शीर्ष " ६६ १०० १०१ E सीप .:: १०७ योगोय योगोऽय त्रयस्त्रियः चतुस्विशः पञ्चधिशः पट्नसः पत्रिंशः द्वात्रिंशः पटिशः चतुस्त्रिा. पञ्चरिंशः मध्यमागे मध्यभागे ॐबीज *बीज ज्वालामुख्यस्र० ज्वालामुख्यस्त ऋष्यादि. ऋष्यादि श्रीवहद्भानुमुख्यत्र. श्रीबृहद्भानुमुख्यस्त्र. ग्राह्माणि ग्राह्याणि ह्नीलोह वगला. ह्रींहोंह्न वगला. हुँ फट् स्वाहा है फट् स्वाहा परविप्राभक्षिणी परविद्याभक्षिणी कीलकाय कीलकाय वगलास्त्रोपसहार० बगलास्त्रोपसहार० ॐ शिवाय ॐ शिखाय विघ्नर्मा विघ्नर्मा मन्त्ररूप मात्ररूपं ज्ञेय सम ૨૬ २६ ११० ७ ११२ ६ २१ २२ शुदिपयम् पृष्ठ पंक्ति प्रशुद्धम् शुद्धम् १२२ १२३ १२३ २४ फव नगात्मजे बीज स्थितिध्वसने सस्तम्भनम् वात सुदुर्लम मतीन्द्रिय इत्यपि पाठ. ८ फब नगात्मने बीज स्थितिध्वसने ०सस्तम्भन वान्त सुदुर्लभ •मतीन्द्रिय १ त्यपि पाठ. हृद्य गोप्यतम १२५ १२५ १२५ १२५ १२६ १२६ २५ २६ ७ ८ गोप्यतम सांख्यायनतन्त्रम् ॥धीः॥ सांख्यायनतन्त्रम् -000-00- ॥अथ प्रथमः पटलः॥ श्रीशिवाय नमः ।।' पोताधराय नमः ॥ मध्ये सुधाब्धिमणिमण्डपरत्नवेद्या सिंहासनोपरिगता परिपीतवर्णाम् । पीताम्बराभरणमाल्यविभूषिताङ्गी' देवी भजामि धृतमुद्गरवैरिजिह्वाम् ॥१॥ कौञ्चभेद उवाच- कैलाश (स)शिखरासीन गौरीवामागसस्थितम् । भारतीपतिवाल्मीकि-'शेपसयुतमीश्वरम् ॥२॥ अष्टदिक्पालकोशाष्ट-"विघ्नेशाष्टकसेवितम् । भैरवाष्टवृत देव मातृमण्डलवेष्टितम् ॥३॥ महापाशुपताकान्त प्रमथरावृत प्रभुम् । नत्वा स्तुत्वा कुमारश्च" इद वचनमब्रवीत् ॥४॥ चापचर्यासुनिपुर्णयुद्धचर्याभयङ्करैः । नानामायाविना चैव'जेतुमिच्छामि रक्षसाम्" || तस्योपाय च तद्विद्या वद मे करुणाकर। पुत्रोह तव शिष्योऽह कृपापात्रोऽहमेव च ॥६॥ श्विर उवाच-४ साधु साधु महाप्राज्ञ क्रौञ्चभेदन' कोविद । ब्रह्मास्त्रेण विना शत्रुसहारो" न भवेकलो ।।७।। . रख थीगणेशाय नमः। प.धीशको जयत.। २क, पीताबराय नमः; प. नास्ति। ३ ग. विभुपितागी। ४ ख घ क्रौंचभेदन उवाच : ग, कौंचभेदनोवाच । १५. वामासस्थितम् । ६ स. वाल्मीकी; ग. वाल्मिकी; घ. वात्मीक । ७. प.प.प. मष्टदिक्पाल केशाष्टः । ख.ग. भैरवाष्टकवत; प. भैरवाष्टयुत। ग. महापञ्चपदाका-तम्; प. महापासुपत्ताकांत । १.प कुमारोपि। ११ख नानामाया- बिनश्व ; घ नानामायाविन जेतु । १२ घ, भातुमिच्छामि। १३ खप राक्षसान् १ राक्षसा। १४ ग इश्वरोवाच । १५ घ. भदेन। १६ क.ग घ शत्रुसहार।
२] साल्यापनतन्ने तद्विद्यां च प्रवक्ष्यामि त्रिषु लोकेषु दुर्लभाम् । पुत्रो देयः शिरो देयं न देया यस्य कस्यचित् ।।८।। ब्रह्मास्त्रस्तम्भिनी विद्या स्तब्धमायामनुस्तथा । प्रवृत्तिरोधिनी विद्या बगला च कुमारक !itel मन्त्रजीवनविद्या च प्राणिप्राणापहारिका । पट्कर्माधारविद्या' च ये ते पर्यायवाचकाः ।।१०।। पप्रयोगास्त्रयो विद्या ये विद्यागमभूपिताः ।' तिरस्कृताखिला विद्या त्रिशक्तिमयमेव च ॥११॥ स्तम्भनेन विना शान्तिर्वश्यञ्चैव तु तद्विना । मोहनाकर्षणञ्चैव विद्वेपोच्चाटनन्तथा ॥१२॥ मारण भ्रान्तिरुद्वेगकारण' च कुमारक । विद्या च बगलानाम्नी मुनिगुह्य सुपावनम् ॥१३।। विना च स्तम्भिनीविद्या "न विद्या च प्रभासते। तस्मादेव" महाविद्या कमलासनजीवनम् ॥१४॥ पद्मजो नारदो विद्या" साख्यायनमुनि प्रति । उपदेशकमेणव उक्तवान्मरुकन्दरे ॥१५।। तेन देवीकटाक्षेण कृतवानागम भुवि । मूलमंत्रोपविद्याश्च अङ्गमन्त्राश्च विस्तरात् ॥१६॥ प्रयोग चोपसहार" तदाराधनतद्गुणम्"। विस्तरेणोक्तवानस्मि वक्ष्ये तत्सर्वमादरात् ।।१७।। स्वमन्त्राक्षरणी विद्या स्वमन्त्रफलदायका स्वकोतिरक्षिणी विद्या शनुसहारकारिका'५ ॥१८॥ परविद्याछेदन" च परयन्त्रविदारणम्" । परमन्नप्रयोगेपु सदा विध्वसकारकम् ॥१६॥ ४ १. ग. पट कर्माहार। २ ख.घ एते । ३. ख पटप्रयोगाश्रया विद्या पविद्यागम- भूषिताः। ४. ग विरात्रिमयमेव । घ. त्रिशक्ति खलु मेव । ५. ग. तपोचाटन। ६. ध भ्रांतिमु०। "." चिन्हान्तर्गतोऽश: ध पुस्तके नास्ति । ७ ख. तस्मादेता। ख. विद्या। है स जीवनी 1 १० ग घ. विद्या च । ११. ग. चोपहार । १२ प. ०लक्षणम् । १३. स स्वम प्ररक्षणी, घ. स्वविद्यारक्षणी। १४. ख. .दाधिका, ग ० दायका घ • दायिनी। १५. ग. ०कारक: घ, ०कारिणी। घ. देवनी। १७. ख ५. विदारिणी। १८ स. कारिका घ. .कारिणी।
द्वितीय. पटलः [३. परानुष्ठानहरण' परकीतिविनाशनम् । परापजयकृद् विद्या परेषा भ्रमकारणम् ॥२०॥ ये वा विजयमिच्छन्ति' ये वा जेतु क्षय' कली। ये वा क्रूरमृगेन्द्राणा" क्षयमिच्छन्ति मानवाः ॥२१॥ ये(य इ)च्छन्त्याकर्पशान्त्यादिवश्य सम्मोहनादिकम् । विद्वेपोच्चाटन प्रीति तेनोपास्यस्त्वय मनु ॥२२॥ सत्सम्प्रदायविधिना'' सद्गुरोर्मुखतस्तथा । उपदेशक्रमेणंव गृहीत्वा साधयेन्मनुम् ॥२३।। कुलाचारसमायुक्तः" कुलमार्गेण पुत्रक ! दीक्षा कुलगुरोयोगात् गृहोतव्या सुबुद्धिना" ॥२४ साधयेत्कुलमार्गेण तेन मन्त्र प्रयोजयेत् । उपसहारण' तेन कर्तव्य कुलयोगिना ॥२५ सौभाग्यचर्यासमायुक्त सदा तर्पणपूर्वकम् । सदा पूजासमायुक्त' चिन्तित भवति ध्रुवम् ॥२६॥ ऋषिसिद्धामरैश्चैव विद्याधरमहोरगैः । यक्षगन्धर्वनागंश्च पिशाचब्रह्मराक्षस:" ॥२७॥ पञ्चन्द्रियश्च सञ्चार सद्यो नाशकरो" मनु पिण्डजाण्डजजीवश्च किम्पुनः क्रौञ्चभेदन" ॥२८॥ इति षविद्यागमे सात्यायनतन्त्र प्रथम पटलम् ॥१॥ ।। अथ द्वितीयः पटलः ।। जिह्वाग्रमादाय करेण देवी वामेन शनून परिपीडयन्तीम्। गदाभिघातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढया द्विभुजा नमामि ॥१॥ ८ १. ख, हारियो। २. ख. विनाशनी। ३. ध परापजयिनी। ४, ख, कारणी में घ कारकम् । ५ ग विलयः। ६.ख. ग. जतुक्षय। ७. प. क्रू रमृगपर्चव। ८. ख घ. इच्छन्ति शान्तिकर्माणिग यच्छन्ति शान्तिकर्माणि । ६. क ग. मिद मनु. ; घ. मिद मनु । १०.घ. तसंप्रदाप० । ११. क. ख समायुक्तो। १२ घ. सुबुद्धिमान् । १३. घ. उपसहरण। १४ ग समायुक्तो। १५. ग समायुक्तः । १६. ग पोसाचा । १७. क. ग. प्र. नाशकर । १८. ग मुनिः; घ. मनु । १६. ग. भेदन.; घ भेदेन । २०. ख. ग. प्रथमपटलम् । घ, मत्रवर्णन नाम प्रथमः पटलः । २१. ग. परिपीडयति ।
सांख्यायनताचे प्रावभेद उधार- नमस्ते पार्वतीनाथ नमः पनगकङ्कण । वद दोक्षाविधि तात तत्सर्व स्तम्भनादय.' ॥२॥ ईश्वर उवाच:-- पुस्तके लिखितान्मन्त्रानवलोक्य जपेत्तु य.'। स जीवन्नेव चण्डालो मृत.' श्वानो भविष्यति ॥३॥ दोक्षामागं विना मन्त्र शंव शाक्तञ्च वैष्णवम् । यो जपेत्त दहत्याशु देवता च जुगुप्सति ॥४॥ दोक्षाविधि विना मन्त्र यो जपेत्कोटिकोटय । न स सिद्धिमवाप्नोति सिन्धुसंकतवर्षवत् ॥४॥ तस्मात्सर्वप्रयलेन दीक्षा कुलगुरोमुखात् । उपदेशक्रमणैव मन्त्रसड ग्रहण चरेत् ॥६॥ वेदवेदाङ्गपारज्ञ वेदान्तार्थसुनिश्चितम् । वैदिकाचारसयुज कुर्याद् गुरुमतन्द्रित ॥७॥ गर्भकोलागमासक नानाकोलपरायणम् । प्रष्टपाशविनिमुक्त कुर्याद् गुरुमतन्द्रित ॥८॥" पुरश्चरणकृत्सिद्धमन्त्रागमविशारदम् । उद्धत्तुचंब सहत्त समर्थ सत्यवादिनम् ॥६॥ प्रस्थानज्ञानपारोण" नीतिशास्त्रार्थकोविदम् । श्रीविद्यामययात्रा कुर्याद गुरुमतन्द्रित ॥१०॥ चाजासमायुक्त (क्तो)न्यासविद्याविशारदम् (६)। पत्तव्य सतत सिद्धि काशिनि. E गुस्पलाच" , १. घ. कोच मेदन., ग प्रौञ्चदनोवाच । २ स. स्वभनादिकम् ॥ स्तमनारत्रयो। ३. ध इस्वरोवाध। ४ प पेच्च य म पन्तिये, परति ६. पदासात। . प म घो। ८ प गुरसेवा- समासत । ६ ग मना दत। १..सोकोऽय स पुस्तक नास्ति, प पुस्तके विशेषतो. वलोक्यतेन लो -'पा समाप लग्ना जुगुप्सा पेति पञ्चरम् । कुल चीन व मानप पष्टपासान विवजयन" । ११ स.प्रास्थान, घ स्वस्पान.. १२ प..मन दितम् । १३ क प पुरु. ग गुरु.॥ १४ ग कत्तध्या; कपसम्प। १५ घ सिद्धिकालिए । .
द्वितीय: पटस गुरुशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा । अथवा विद्यया विद्या चतुर्थ नोपलभ्यते ॥१२॥ शुभ्रूषया गुरु सम्यक् तोपयेच्छिष्य अन्वहम्' । प्रसन्नचेतसा दत्त मन्त्रमुत्तममभक* ॥१३|| स्वल्पं का बहुलं चाय शिष्यद्रव्य गुरुः स्वयम् । गृहीत्वा मन्त्रमादत्ते विक्रीत तदुदाहृतम् ॥१४॥ राजस चव तद्विद्याद्' भोगद भुवि पुत्रक । विद्याप्रतिनिधि विद्याद् यद्दत्त तामस मतम् ॥१५॥ मोक्षार्थी च गुरुं यत्नात् शुश्रूपेणंव तोपयेत् । शुभ्रूपेणव यल्लब्ध' तद्विद्यात् सर्वसिद्धिदम् ॥१६|| नो देयं (या) विद्यया विद्या वित्तकाक्षी तथैव च । सच्छिष्याय प्रदातव्य' धनदेहाधवञ्चकः ॥१७॥ दुरालापसमायुक्त दुगुणेन समन्वितम् । सर्वथा वर्जयेच्छिष्य स्वगुरोर्वाभिमानिनम् ॥१८॥ अष्टपासमायुक्त भ्रष्टाचारसमन्वितम् । सर्वदा वर्जयेच्छिष्य गुरुसेवाधिवग्जितम् ॥१९॥' निमंत्सर निरालम्ब नोतिशास्त्रविशारदम् । नित्यानित्यविवेक व शिष्यत्वेनोपकल्पयेत् ॥२०॥ श्रद्धाभक्तिसमोपेत धनदेहाय वञ्चितम्"। अष्टपाशविनिमुक्त शिष्यत्वेनोपकल्पयेत् ॥२१॥ गुरुशिष्यावुभी मोहादपरीक्ष्या परस्परम् । उपदेश ददन् गृह्णन् प्राप्नुयात्तो पिशाचताम् ॥२२॥ इति पविद्यागमे सात्यायनतन्त्रे द्वितीय पटलम्॥ १. ख. तोपयच्छ ध्ठमन्वहम् । ग तोषयेच्छिष्यमावहम् । घ सतोष्याभीष्ट- सिदिदम् । २. ख मभंकः । ३. क.ख.ग. तदिया। ४. घ. तद्वत्त । ५ घ. (मृतम् । ६.ग. यल्लभ्य ५. क. ग. विद्या घ सा विद्या सर्वसिद्धिदा। ६ ग. नोपदेय। ११. ५ गुरुसेवाभिमानिनम् । १२. म. प. गुरुसेवाभिमानिनम् । १३. घ पुस्तके विशेषोऽय श्लोक:-- 'कामुक काञ्चनासक्त कहपालयजितम् । सर्वदा वजयेच्छिष्य गुरुसेवाभिमानिनम् ॥ १४. स. प. ०वञ्चकम् । १५. ख. ०दपरोक्ष्य १६. स. प. द्वितीयः पटल.. " ८ घ. घ.य लब्ध्वा। १०.ध.प्रदातव्या। ग..दपराक्ष।
सांस्पायनतन्ये ॥ अथ तृतीयः पटलः॥ चलत्कनककुण्डलोल्लसितचारुगण्डस्थला' लसत्कनकचम्पकद्युतिमदिन्दुविम्बाननाम् ।। गदाहतविपक्षका कलितलोलजिह्वाञ्चला' स्मरामि बगलामुखी विमुखवाड मुखस्तम्भिनीम् ॥१॥ प्रौञ्चभेद उपाच-४ पूजाधारणयन्त्रज्ञ सर्वमन्त्रविशारद । अभिपेकविधि तात वद मे करुणाकर ॥२॥ ईश्वर उवाच- अाश्विने कात्तिके चंव चैत्रमासे कुमारक । कुर्युस्तमभिपेक' च मानवा:" सिद्धिकाक्षिणः" ॥३॥ रखी गुरी भृगावजवासरे' च कुमारक । मन्त्राभिषेक कर्तव्य सतत सिद्धिकाक्षिभिः ।।४।। रोहिणोश्रवणे चैव पुष्ये चैव विशाखयोः । मन्त्राभिषेक कर्तव्य सद्य." सिद्धिकर भुधि ॥२॥ एव शुद्धदिने सम्यक् पूर्वेऽह्नि" समुपोषितम् । स्नापयेत्पञ्चगव्येन ततश्चामलकेन तु ॥६॥ तत शिष्य समानीय" देवतासन्निधौ पुन. । अयुत प्रजपेन्मन्त्र गायत्रीजपमाचरेत्' ॥७॥ देवस्येशानभागे तु गोमयनोपलेपितम् । रङ्गवल्ल्या लिखेद्यन्त्र रक्तपीतसितासित ॥८॥ । ग, पुस्तके 'चलकनककुण्डलो' इत्यस्मादयतनपदासो नास्ति । कुण्डला लसत् । २. घ. कलितर्वरि। ३ ख. घ. विमुखवाङ्मन । कोच्चभेदन उवाच, ग. श्रीचभेदनोवाच । ५ क पुस्तके 'पूजा' पाने "ज्य' एव च स पुस्तके 'यन्त्रज्ञ' स्थाने 'यन्त्रज्ञ' इति श-दो स्तः। ६. ग. पुस्तके 'कोञ्चभेदनोवाच' तथा च ईश्वरोवाच' इत्येवाप प्रपोग सर्वत्र दृश्यते; मतोऽग्रे एतच्छन्दयो रेप एव पाठा तर कहनोयो विद्भिरिति ७ स.चत्र। ८. स बंधासे तु। ६ ख ग. कर्तव्यमभिषेक, घ तंव्य चाभिपक । १०. ख.ग मानवः। ११ ख. ग सिद्धि काक्षिभिः । ग भगा वि]दो०; ध भुगो इदु.॥ १३ ग. स्वार्सी। घ सार्प । १४ ग. सर्व । १५.ग सिदिदिने। १६ ग पूर्ववह नि, प. पूर्वा । १७ ग घ समानीत्वा। १८. घ. गायत्री वदमातरम् । १६. क. ग. लेपिताम्, ख. लेपयेत् । प चलसनक- ४.स.प ततीय पटल awww पोडशाड गुलमान' तु लिखेद् विन्दुमनन्यपी । ततो(तदुपरि लिखेद् वृत्त'मष्टपत्र तु शोभनम् ||६|| प्रियड गुशालिगोधूमचरणकाटकमाषक । कुलत्थमुद्गनीवार' क्रमान्मध्यादि विन्यसेत ॥१०॥ प्रस्थ चंद चतुर्विंश प्रत्येक धान्यमेव च । अन्नण स्थूलकलश मध्ये संस्थाप्य बुद्धिमान् ॥११॥ प्रष्टपत्र' न्यसेत्पुत्र कलशाष्टकमादरात् । क्षालित वासित' शुद्ध कलश च समर्पयत् ॥१२॥ षोडशेरुपचारश्च धूपाद्यनव विन्यसेत । प्रापोवानेन पूर्यत नदीजलमकल्मषम् ।।१३।। निक्षिपेन्नवभाण्डषु नवरत्नान् कुमारक । कस्तूरीचन्दनोपेतान् नवभाण्डेषु नि क्षिपेत ।।१४॥ मध्ये देवी समावाह्य चिन्मयी बगलामुखीम । प्राणस्थापनमार्गेण केरलोक्तविधानत ॥१॥ वाणी चव रमा गौरी शची स्वाहा रतिस्तथा । दुर्गा छाया" समभ्यच्य पूर्वाद्यष्टकपत्रयो ॥१६॥ अर्चयेत्पूववत्पुत्र केरलोक्तविधानत । नवीननवसंख्याकवस्त्रणव तु वेष्टयत ॥१७॥ सुगन्धपत्रपुष्पादोन्। " विन्यसेत्कल् शान्तरे । तत्र शिष्य समानीत्वा(य)ऋत्विग्वरणमाचरेत् ॥१८॥ वेदवेदागपारीणमष्टो ४ ब्राह्मणमादरात् । प्रार्थयारमसयुक्त "मचयद्वस्त्रभूपर्ण ॥१९॥ शाकुनादिषु मन्त्रषु प्रथम कलशमाजनम् । लक्ष्मीसूक्तेन श्रीयुक्त" द्वितीय कलशन्तथा' ॥२०॥ १ ख माने। परएकाढकमाएको। मीवारा। ६ क चासित । ७ ख ग घ समचयत । - घ धूपाई परि । ९ प च दनोपेत । १० प पुस्तके वाण्यादिशब्दा द्वितीया ता दृश्य ते । १६ घ पूर्वाद्यष्टकसिद्धय । मुगन्धि पुत्र. घ सुगध पुष पुष्पादि। १३ ग शिष १४ घ .पारीणानष्टो। १५ च दक्ष्यसयुक्त. १६ घ कुम्भ मार्जनम् । १७ धीयुक्तं । १८ घ कुम्भमाजनम् । an ग घ ५ ख मत्रपत्र । .
. सांस्यायनता पौरुषेणंव सूक्तन तृतीय कलश तथा'। नारायणानुवाकेन' चतुर्थ रुद्रसूक्तकः ॥२१॥ पञ्चब्रह्ममयमंन्त्रः पञ्चम कलश तथा । पप्ठ चाम्भस्यवारेण ब्रह्मपल्ल्या च' सप्तमम् ॥२२॥ अष्टम कठवल्ल्या च मार्जयन्मनकोविद. । मध्यम पूर्वकला मूलमोण" मार्जयेत् ॥२३॥ एवञ्च मार्जन कृत्वा नवीनर्वस्त्रभूषणः । अलकृत्वा तु शिष्पर तमानीय मण्डपान्तरे ॥२४।। वामोपरि विन्यस्य मूर्द्ध नि चाघ्राय सादरात् । एकेक च पुरश्चर्या मूलमन्त्र कुमारक ॥२५॥ स हिरण्योदके पूर्व दद्याच्छिष्याय पुत्रक । स्वहृत्कमलमध्यस्था विद्या ज्योतिर्मयो पुनः ।।२६।। शिप्यस्य हृदयं चैव प्रविशन्तोति भावयेत् ।। तद्वच्छिप्यस्तु' सभाव्य गुरु यत्नेन तोपर्यन् ।।२७॥ एव मन्त्राभिषेकञ्च''कुर्याद् ब्रह्मास्त्रविद्यया । सिद्धिर्भवेत्पुत्र पुरस्चयां विना' भुवि ॥२८॥ रति पहिचाग सांस्यायनत नेतृतीय पटलम् • ॥३॥ सद्य:- 1 . ३ १. घ कुम्ममानम्। २. प. ० नुवाक्येन; ग नुजारेन , प पादाको नास्ति । ए गलिश तथा: प. कुम्भमार्जनम् । ४ ध प्रह्ममयो । ५ स. चाभस्व पारे । घ सारस्य पारेरा। ६ स. ग. ब्रह्मवल्ल्या : घ ब्रह्मवल्ल्यातु। ७. स. ग बटवल्ल्या; प नगुवल्ल्पा। ८. घ पपया पटोन च । १.प.मध्यस्प। १. ग प पूर्ण न। ११ प मुनमगा। १२. घ सन्धिप्य। प्रानीता। १४ प. पुस्तके विप पाट - हरपयोग तय सत्ता त माया पदे पदे। पष्ठरमोदक हत्या प्रस्थर च विभावया ॥ पियापे म । पुत्र सामान्य परियष्टये।" १५. प तमिप्यतु। १६ घ मानिदिमा च । घ. सर्व। पुमर्यादिना । १५ स. गमरहस्य । दोक्ष विशिश तोचपटल । । ३ चतुर्थः पटलः [. ॥ अथ चतुर्थः पटलः ॥ पीयूषोदधिमध्यचारुविलसदलोज्ज्वले मण्डपे, श्रीसिंहासनमौलिपातितरिपुप्रेतासनाध्यासिनीम् । स्वर्णाभा करपोडितारिरसना भ्राम्यद्गदा बिभ्रती, स्वप्ने' पश्यति तस्य याति विलय सद्योऽम्बर सर्वापदः ।।१ कोचमेव(दन) उवाच- 'गङ्गाधर नमस्तेऽस्तु गोरोपति नमो नमः । ब्रह्मास्त्रमात्रसध्या च वद मे करुणाकर ॥२॥ ईश्वर उवाच- मन्त्रमध्यापयेत् सम्यक् शिष्यस्य गुरुरादरात् । सदारब्ध तु तन्मन्त्र' मन्त्रसन्ध्या समाचरेत् ॥३॥ तन्मात्रसध्या वक्ष्यामि शरजन्मन् समासतः । मन्त्रसन्ध्याविहीनस्य सर्व तनिष्फल भवेत् ।।४।। पञ्चाङ्गविधिना स्नात्वा मन्त्रस्नानमनन्तरम् । तत: स्नायादङ्गमन्त्रमूलेनैव तु मार्जयेत् ।।५।। धोतवस्त्र परीधाय स्वगृह्योक्तविधानत. । नित्यकर्म समाप्याथ मन्त्रसध्या समाचरेत् ॥६॥ अड कुशेनैव मुद्रायाः सूर्यमण्डलग जलम् । मानयेत्तोयमध्ये तु ध्यानयोगेन बुद्धिमान् । आवाहिनी स्थापनी च सविधानमतः परम् । सनिरोधनमुद्रा च सम्मुखी प्रार्थनी तथा ॥८॥ एता मुद्राश्च ततो" दर्शयेत्साधकोत्तम.। शोधयेदड कुशेनादो चामतीकरण ततः ll तज्जल वामचुलुके गृहीत्वा साधकोत्तमः । मूलेनैव विधामन्त्र्य अष्टपत्राम्बुज लिखेत् ॥१०॥ १. घ. यस्त्वा । २. ग. सद्योप। ३. स. ग. प. गोरोप्रिय । ४. घ, मत्रसध्यापयेत् । ५. ख.प. सदारम्य । ६. ख, घ. तन्मन्त्र। ७ घ. समाचर। ८. घ.मतः परम् । ६. ख. मुद्रयाः अकुशेनंव । १०. क. सनिध्यानमतः । ग. सविधापनीतः। ११.ख. सतत। घ. तत्तोये। १२. प. नादा। १३. प. वामृती० । १४. प. तपा।
१. 1 सास्थापना मध्ये एकाक्षरीमन्य वगलानाम्नि पुषक । वेदसस्यामन्यवर्णान' सप्तपत्र' माल्लिखेत् ॥११ अन्त्यपने चाष्टवां ल्लिखेन्मू नमन तथा । पुनरेकाक्षरं मन्त्र त्रिसप्तमभिमन्वयेत् ॥ १२॥ तेन मूलेन सम्माज्य मार्जनझमतोभक । तामार्जनविधि वक्ष्ये ऐहिकामुष्मिकेपु च ॥१३॥ विधा मूर्द्ध नि द्विधा बाह्वोस्थिधा हन्नाभिदेशयोः । द्विधा पादेषु सम्माय सौम्पकर्मस्वय' कम: ॥१४॥ एवञ्च मार्जन कृत्वा गायत्र्या वगलाया । अध्ययञ्च निक्षिप्य हृदि सभाव्य देवताम् ॥१५॥ मूलेन मन्त्रित तोय त्रिवारञ्च त्रिधा क्षिपेत । एवमेव त्रिकालच मन्त्रसन्ध्या समाचरेत् ॥१६॥ उपस्थान निकालस्य वक्ष्येह कौञ्चभदन । उपस्थान विना सन्ध्या निष्फलानात्र संशयः ॥१७॥ गम्भीरा च मदोन्मत्ता स्वर्णकान्तिसमप्रभाम् । चतुभुजा त्रिनयना कमलासनसस्थिताम् ॥१८॥ मुद्गर दक्षियो पास वामे जिह्वा च बिभ्रतीम्"। पीताम्बरधरा सोम्या दृढपीनपयोधराम् ।।१६।। हेमकुण्डलभूपाङ्गी पीतचन्द्रार्द्धशखराम् । पोतभूषणभूपाङ्गी स्वणसिंहासने स्थिताम् ॥२०॥ एव ध्यात्वा तु देवेशी प्रातः सन्ध्या समाचरेत् । उपस्थान प्रवक्ष्यामि मध्याह्नस्य कुमारक ॥२१॥ दुष्टस्तम्भनमुग्रविघ्नशमन दारिद्रयविद्रावणम्, भूभृस्तभनकारण मृगदृशा घेत समाकर्षणम् । १. घ. देवसध्या २ क ५ सप्तपत्रः ३. ५ अन्त्यपत्र प्रमाणं । ४. स. कि सप्तः। ५ ख. वा। ६ ख ग . कप्वय । प. मार्गप्वय । ७. प. क्रमात् । ८.५ पुस्तके विशेषः पाठः "पादादिमून निपयन्त करकर्मपु मार्जयेत्" । ६. स. ध पिवेत् 1 ग. पुन । १० घ निष्पला ११. क. विभ्रकम् । घ. वचकम् । १२. प. पुस्तकेऽयमसो विशेषः- "रलसिंहासना वन्दे दवीं लोक्यसुदरीम्" । २३. ग. देवेशि। प. देवेस। १४ घ. मध्याहने च। - प.
पचमः पटल. . सौभाग्यकनिकेतन मम दृशोः कारुण्यपूर्णेक्षण' विघ्नोध बगले हर प्रतिदिनं कल्याणि तुभ्यं नमः ॥२२॥ एवं मध्यदिनोपास्थि कुरु कर्म सुपुत्रक' । 'उपस्थान प्रवक्ष्यामि" सायाह्नस्य कुमारक ॥२३॥ मातभञ्जय मद्विपक्षवदन जिह्वाञ्चला कोलय ब्राह्मो मुद्रय मुद्रयाशु धिषणामध्रयोगति स्तम्भय । शभूश्चूर्णय चूर्णयाशु गदया गौराङ्गि पीताम्बरे", विघ्नौघ बगले हर प्रतिदिन कल्याणि तुभ्य नमः ॥२४॥ सायमोपास्थि कर्तव्यमेवमेव कुमारक । विघ्नग्रहविनाशाय एवं ध्यायेज्जगन्मयोम्" ॥२५॥ मन्त्रसन्ध्या विना मन्त्र कोटिकोटि जपन्ति ये । न भवेन्मौनसिद्धार्थ मन्त्रसिद्धि कुमारक ॥२६॥ त्रिकालमाचरेत्सन्ध्यामुपस्थान तथैव च । रहल च जपेन्नित्य सिद्धि. षण्मासतो भवेत् ॥२७॥ पूर्वोक्तविधिवत्सध्या कृत्वा चाष्टोत्तर जपेत् । य य वापि स्मरन् पुत्र त त प्राप्नोति निश्चितम् ॥२॥ सन्ध्यामन्त्रेषु सर्वेषु अङ्गमेव कुमारक । न प्रसिद्धयत्यङ्गहीन" तस्मात्सध्या समाचरेत् ॥२६॥ इति षविद्यागमे सख्यिायनतने चतुर्व पटलम् ॥४॥ ॥ अथ पञ्चम. पटलः॥ पीतवर्णी मदाघूर्णा समपीनपयोधराम् । चिन्तयेद् वगला देवी स्तभनास्त्राधिदेवताम् ॥११॥ काँचभवन उवाच-- नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ भस्मोद्धूलितविग्रह । एकाक्षरीमहामन्त्र बगलाख्य महाप्रभो ॥२॥ १. ख. कारुण्यपूर्वेक्षण। २. घ, .पास्ति । ३. घ. क्रूर। ४. प पुस्तके विशेषः पाठ-- "उपस्थान चैवमेवत्कर्तव्य विषिवन्नर."। ५. '--'चिहानगतोऽशो नचास्ति प. पुस्तके । ६. म. पुस्तके नास्ति। ७. घ, पीताम्बरी। ६. प. मोपास्ति। ९. घ. मन्ही मेव। १०. प. विनाशे च। ११. घ. ध्याय। १२. प. जपेन तु। मीनिसिदाय। १४. प. स्मरेत्। १५. प. पूर्वेषु । १६. ख. न च सिदश्यग. होना। १७. घ. सध्यारिधिमि चतुर्थः पटलः । १८ घ. वद प्रभो।
साख्यापनतन्त्र ईश्वर उवाच- तत्तदेकाक्षरीबीज तत्तन्मन्नेपु जीवनम् । उत्तम बीजमुक्त 'च मानसर्वार्थसाधनम्' ||३|| नानामन्त्रेषु मन्त्र वा बोजाढय ' सर्वसिद्धिदम् । निर्बीजमेव निर्वीयं शिवस्य वचन यथा ॥४॥ तद्वीजोद्धारमनघ' सर्वसिद्धिप्रदायकम् । पूजन* च प्रयोग च वक्ष्येह तव पुत्रक ॥५॥ सान्त रान्तसमायुक्त चतुर्थस्वरसयुतम् । रेफाक्रान्त विन्दुयुक्त ब्रह्मास्त्रकाक्षर(रो) मनु ॥६॥ ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दोय (न्दोऽस्य)गायत्री समुदाहृतम् । देवता बगला नाम शक्तिश्चिन्मयरूपिणी ॥७॥ लं बीज ह्री च शक्तिश्च ई कोलकमुदाहृतम् । न्यासविद्या प्रवक्ष्यामि मन्त्रसिद्धिकर'' नृणाम् ।।८।। भूगुद्धि भूतगुद्धिञ्च मातृकाद्वितय न्यसेत् । पञ्चाक्षरेण" विन्यस्य तद्विधि शृणु पुत्रक ॥६॥ नेत्रबाण पुनः पञ्च नव पञ्चदशाक्षरम् । विन्यसेदगुलोभिश्च षडङ्गेषु तथैव च ॥१०॥ वक्ष्येऽह पञ्जर न्यास मन्त्रसिद्धिकर नृणाम् । बगला पूर्वतो रक्षदाग्नय्या च गदाधरी ॥११॥ पीताम्बरा" दक्षिणे च स्तम्भिनी चव नेते। जिह्वाकोलिन्यतो रक्षेत्" पश्चिमे सर्वतोमयो५ ॥१॥ वायव्ये च मदोन्मत्ता कौवेरे' च त्रिशूलिनी। ब्रह्मास्त्रदेवतशान्ये" पाताले स्तभमातर.' ॥१३॥ १५ बीजयुक्त । २ ध मत्र सर्वाथसाधकम् । १. ध बीजाज्य । ४. प. तपा ५ प मयमशो विशेष - 'एकाक्षरी बगला उदार'। ६. स. मनघ । ७. ग योजन । ८ स मनम्। १ ख घनाम्नी। १० ख. सिदिकरी। ११.स. घ मात्रा- क्षरेण । १२. घ. पीताम्बरी। १३. प नैऋतो। १४. प. जिता फोनयतो रक्षो। ग सवतामपि । घ. सवतोमयि । १६ प. कोवर्या । १८. प. पातालस्त धमातूक.। ११. स. सदषिमयो। ख घ. देवतेशान्य।
पघम: पटलः [ १३ ऊद्धवं रक्षेन्महादेवी जिह्वास्तम्भनकारिणी। एव दश दिशो रक्षेद् बगला सर्वसिद्धिदा ॥१४॥ एव न्यासविधि कृत्वा यत्किञ्चिज्जपमाचरेत् । तस्य सस्मरणादेव' शत्रूणा स्तम्भन भवेत् ॥१५॥ सर्व न्यासविधि कृत्वा बगलामातृका न्यसेत् । तन्मातृकाविधिं वक्ष्ये सारासारतर तथा ॥१६॥ तारञ्च मालकावणं बगलाबीजमेव च । नमोऽन्तेन च विन्यस्य मातृकास्थानतोऽनघ ।।१७।। ध्यानेन मन्त्रसिद्धिः स्याद् ध्यान सर्वार्थसाधनम् । ध्यान विना भवेन्मूक. सिद्धमन्त्रोऽपि पुत्रक ॥१॥ वादी मूकति रति क्षितिपतिर्वेश्वानर. शोति, क्रोधो शातति दुर्जन. सुजनति क्षिप्रानुग. खजति ।। गर्वी खर्वति सर्वविच्च जति त्वत्रिणा' यन्त्रित', श्रीनित्ये बगलामुखि प्रतिदिन कल्याणि तुभ्य नम ॥१६॥ एव ध्यात्वा जपेन्मन्न तत्वलक्ष सुबुद्धिमान् । गुडोदकेन सन्तर्य तद्दशाश कुमारक ॥२०॥ त्रिकोणकुण्डे जुहुयास्तनिम्नोगते शुभे । हयारिकुसुमेनैव सरत नाज्यसयुतम् ॥२१॥ ब्राह्मणान भोजयेत्पश्चात् तत्वसख्या तु युग्मकम् । मन्त्रसिद्धिर्भवेत्पुत्र नान्यथा शिवभाषितम् ॥२२॥ वाममार्गक्रमेणव वामामभ्यय पुष्पिणीम् । मन्त्रसिद्धि कर चतत्'' सर्वदा रिपुनाशनम् ।।२३।। परमन्त्रश्योपु नानाविमचेटकः। सद्यः स्तम्भनविद्या च" बगला च न सशयः ॥२४॥ इति षविद्यागमे सात्यायनताने पचम पदलम् ॥ १. १. देव। २. ग. घ. सर्व। ३. ख मातृकावरः। म. मानकावणं । ४. घ. त्यावेन । ५. प. साधकम् । ६. प. स्वात्रि प. स्वत्रिणो। ७. घ यत्रितो। ८. घ. जपे-मूलम् । ६. ख सरक्त याज्य । ग. सरक्त माहा। १०. घ. शिव. भाषणम् । चैव १२. ख. स्वभनकृदिया। घ,स्वभनविद्यादि। १३. म. .एकाक्षरमत्रकथन नाम पञ्चमः पटल..
१४] सांस्यायनातन्य ॥ अथ पष्ठः पटलः॥ पाठीननेत्रां' परिपूर्णवक्या' पञ्चेन्द्रियस्तम्भनचित्तरूपाम् । पीताम्बराढयो पिशितासना' सदा भजामि सस्तम्भनकारिणी सदा ॥१॥ कोचभेदन उवाच- नमस्ते योगिससेव्य नमः कारुणिकोत्तम । एकाक्षरीमहामन्त्रप्रयोग* वद शङ्कर ।।२।। ईश्वर उवाच- उत्तम कुण्डहोमञ्च स्थण्डिलञ्चैव मध्यमम् । स्थण्डिलेन विना होम निष्फल भवति ध्रुवम् ॥३॥ पट्कोण चाष्टकोणञ्च चतुष्कोण कुमारक । विविध स्थण्डिल चैव वक्ष्येऽह कुरु पादरात् ॥४॥ लक्ष्मी (.)शान्तिस्तथा पुप्टिविघ्नाविघ्ननिवारणः' । चतुरस्र हुनेत्कुण्डे तन्त्रवित् परिशोधिते ॥५॥ वशीकरणसम्मोहे वाणिज्ये द्रव्यसग्रहे। कीत्तिकामस्तु जुहुयाद्भगाकारे च कुण्डके * ॥६॥ दशेन्द्रियस्तभने तु दिव्यैर्गन्धस्तथैव च । त्रिकोणकुण्डे जहुयाद् गुरुमार्गेण बुद्धिमान् ॥७॥ विद्वेपरणे तु जहुयाद्वत्तुंले कुण्डमध्यमे । उच्चाटने तु जुहुयात् पट्कोणाख्ये तु कुण्डके (1८11 मारणे चाष्टकोणे तु कतत्तत्कर्मानुसारत तत्तद्रव्येण जुहुयात्तत्तद्ग्रन्थोक्तमेव च वक्ष्येऽह स्थण्डिलहोम' पटकर्मसु कुमारक । जुहुयाच्छान्तिवश्यपु स्थण्डिले चतुरस्रके ॥१०॥ विद्वेषणे स्तम्भने च जुहुयादष्टकोणके । मारणोच्चाटने पुत्र पट्कोरणेपु विधीयते ।।११।। . १ ग. पाटिन नेत्रा। घ. भालेन नेत्रो। २. घ. गात्रा। ३. स. प, पिशिताशनो। घ पिशिनी । ४. ग घ. ०महामत्र० । ५. घ. स्थहिल मध्यमं तथा। विद्या विघ्न । ७. क. कुण्डले । ८. घ कुण्डमध्यगे। ६. घ. च । ११. ख. घ. स्थहिले होम । १२ ख ग. पट्कर्मे । ६.ग.प. १.ग तत्तत्कामा ।
चष्ठः पटलः प्रादेश शतहोमे च' अरनिश्च सहस्रके। हस्त चायुतहोमेषु द्विहस्त लक्षहोमके ॥१२॥ गुणहस्त कोटिहोमे कुण्ड निम्नोन्नत सुत । स्थण्डिलस्य च वक्ष्यामि तान्त्रिकोतस्य लक्षणम् ॥१३॥ प्ररलिहस्तमात्र च द्विरनिश्च द्विहस्तयोः । शतं सहस्रमयुतं लक्षहोमेष्वय क्रमः ॥१४॥ सर्वत्रैवोन्नतं पुत्र प्रादेश स्थण्डिलक्रमम् । लक्षण स्थण्डिलः कुण्डे"नं ज्ञात्वा निष्फल हुतम् ।।१५।। शान्तिवश्यस्तम्भनानि विद्वेपोच्चाटन तथा । मारणान्तानि शसन्ति षटकर्माणि मनीषिणः ॥१६॥ नानारोगः कृत्रिमंश्च नानाचेटकमेव च । विषभूतप्रयोगेषु निरास: ' शान्तिरुच्यते ॥१७॥ वश्य जनाना सर्वेषा वात्सल्य हृद्गत स्मृतम् । स्तम्भन रोधन पुत्र सर्वकर्मसु निष्फलम् ॥१८॥ मंत्रस्य कलहोत्पत्तिविद्वेषणमुदाहृतम् । चलबुद्धिभ्रमेणोक्तमुच्चाटनमिदम्भुवि ॥१६॥ प्राणिनां प्राणहरण मारण समुदाहृतम् । प्रत्येकमेषा वक्ष्यामि होमयोग सुनिश्चितम् ॥२०॥ होम त्रिमध्वक्त जुहुयादयुतत्रयम् । रोगहन्ता'' ग्रहादिभ्यः सद्य. शान्तिकर भवेत् ॥२१॥ सुमन्त-'" कुसुमराज्य' कृत बाणायुत तथा । जुहुयानिशि काले च वश्य सम्मोहन" भवेत् ॥२२॥ बिभीतकसमिद्भिर्वा करजर्बीजमेव च । नेत्रायुत हुनेत्पुन स्तम्भन परम मतम् ॥२३॥ १.प.तु। २. प. चायुतहोमे तु। ३. घ. कोटिहोम। ६. ख. द्विहस्तकम्। ७. घ. स्थण्डिल क्रमात् । ८. ख. लक्षणंः। स्थडिल। ध. स्थदिले। १०. ख. कुण्ड । ११. क. प. निराशः । १२. क. मुध्यते । १३. प.निश्चितम् । १४. ख. मित्रस्य। १५. ख. .पि च मुदा० । रोगकृत्या। १५. ख. स्यमन्त । १५. प. राज्यः। १६. घ. मोहनका २०. प.परम् । . ४.घ.तथा। घ.कामत.
सत्यापनतम् निम्बार्कपत्रहोमन निम्वत लेन मिश्रितम् । नेत्रायुतेन विद्वप भवेत्पाषाणयोरपि ॥२४॥ उलूककाकयो: पर्वाणायतमखण्डिभिः । जुहुयाच्च ततो रात्री भवेदुच्चाटन सुत ।।२।। तिलतलसमायुक्त' शाल्मलीकुसुम तथा । लक्षमेक हुनेद्रामो प्रताग्नी प्रेतकानने ॥२६॥ नग्नः प्रेतमुखे भौम प्रेतकाप्ठेन बुद्धिमान् । मृकण्दुसदृश चंव मारण भवति ध्रुवम् ॥२७॥ इति पविद्यागमे सस्यायनतने पष्ठ पटलम् ॥६॥ ॥ अथ सप्तमः पटलः ।। पीताम्बरधरा देवी पूर्णचन्द्रनिभाननाम् । वामे जिह्वा गदा चान्य धारयन्ती भजाम्यहम् ॥ १॥ पौधभेदन उवाच- महापाशुपताकान्त नमः पन्नगभूषण । पनिशदक्षरी विद्या बगलापाशमेव च ॥२॥ ईश्वर उपाच-- मन्त्रोद्धार प्रवक्ष्यामि पुरश्चरणलक्षणम् । प्रयोग चोपसहार शान्ति तच्छ णु पुत्रक' ॥३॥ तार च बगलाबीज बगलापदमुच्चरेत् । मुखीति पदमुच्चार्य मर्वशब्द ततोच्चरेत् ।।४।। दुष्टाना पदमुच्चार्य वाच मुख पद वदेत् । स्तम्भयेति पद चोक्त्वा जिह्वा कोलय उच्चरेत् ॥१५॥ बुद्धिशब्द ततोच्चार्य विनाशय ततो वदेत् । स्थिरमाया' ततोच्चार्य प्रणव च ततोच्चरेत् ॥६॥ १. घ. तिलतलेन सयुक्त । २. ग. शाल्मिली। ३. . प्रेवमुख । ४. क. नो मे। घ भौमेः। ५. घ.प्रेत काष्ठं च । ६ स. मकण्ड.. घ. मृकुण्डसदृशे। •एकाक्षरीषट्प्रयोगकथन नाम षष्ठः पटलः ॥ ८. ख. भूषणम् । ६.ख. म. शिक्षदरी विद्या। १०. ख. वगला ता च मे बद। ग. वगलायाश्च मे वद । घ. वगलायाश्च देवता। ११. घ. साम्प्रत शृणु पुत्रक। १२. ख, वाचे । १३. ग. पदे। १४.ब. कीलयमुच्चरेत् । १५. ग विनाशयति । घ. विनासाया १६.ध. पद। स्तम्घमायां। ३ १७.५ सप्तम.पटलः [१७ वह्निजाया समुच्चार्य एव मन्त्र समुद्धरेत् । पत्रिंशदक्षर मन्त्र मन्त्रराजमिद भुवि ॥७॥ न्यासविद्या प्रवक्ष्यामि सदा सिद्धि करी पराम् । बगलामातृका चादी कामतातीयवाग्भवम् ।।८।। श्रीमायामातका चैव बगलापञ्जर न्यसेत् । लघुषोढा च विन्यस्य सर्वमन्त्रध्वय क्रमः ॥६॥ ध्यान यत्नात्प्रवक्ष्यामि ध्यान सर्वार्थसिद्धिदम् । भादो मध्ये तथा चान्ते ध्यान सर्वार्थ सिद्धिदम् ॥१०॥ चतुर्भुजा विनयना कमलासनसस्थिताम् । त्रिशूल पानपात्र च गदा जिह्वा च बिभ्रतीम् ॥११॥ बिम्बोष्ठी कम्बुकण्ठी च समपीनपयोधराम् । पीताम्बरा मदापूर्णां ध्यायेद् ब्रह्मास्त्रदेवताम् ॥१२॥ नारदो ऋषिरेवात्र बहतीच्छन्द एव च । देवता बगला नाम स्तम्भनास्तभचिन्मयीम् ॥१३॥ ल बीज चैव हं शक्ति. ई कीलकमुदाहृतम् । शत्रूणा स्तम्भनार्थञ्च जपेह विधिपूर्वकम् ।।१४।। सङ्कल्पपूर्वक मन्त्र कोलचक्रक्रमेण च । पृथ्वीलक्ष जपेन्मन्त्र न्यासध्यानसमन्वितम् ॥१५॥ तर्पयेत्तद्दशाशच हेतुमिश्रेण वारिणा। जुहुयाद्विल्वकुसुम' तद्दशाश च बुद्धिमान् ॥१६॥ ब्राह्मणान् भोजयेत्पश्चात्तद्दशाश घृतप्लुतम् । तर्पयेत् तर्पयामीति स्वाहान्त होममाचरेत् ॥१५॥ पूजा कालिको नित्य जपस्तर्पणमेव च । होमो ब्राह्मणभुक्तिश्च पुरश्चरणमुच्यते ॥१८॥ पुरश्चर्या विना मन प्रसिद्धयति" भूतले । एव स्वाधीनमन्त्रण' षट्प्रयोगान् समाचरेत् ॥६॥ १. स. सर्वकामार्थसिदिदम्। २ स. स्तभनास्त्रे प चिन्मयीं। ग घ स्वभनास्त्र च चिन्मयी ३. ग.₹। ४. घ जपेय । ५. ध हेतुसमिक्ष। ६. ग विल्वकसुम'। ७, प. तपणे। ८ प. घ उपत। १ घ. होम। १०. घ. पुरश्चर्या। म सा सिदपति। १२. ५ साषितमन्त्रणा 1 1 १८ ] तस्यायनता शान्त्याध (न्त्यथ) जुहुयाच्यालिसक्तुराज्यसमन्वितम्। गुणायुत हुते' धीमान् कुण्डे पूर्वोक्तमादरात् ॥२०॥ वशीकरणकार्येषु विल्वपत्र घृतप्लुतम् । गुणायुत चामलकप्रमाण क्रौन्चभेदन ॥२१॥ स्तम्भनेषु हुनेद्धीमान् तालक घृतसम्प्लुतम् । वदरीफलमात्र तु गुणायुतमनन्यधीः ॥२२।। विद्वेषणे च जुहुपात्पनिम्बार्क सयुत.६ रामो वेदायुत धीमान् सद्यो विद्वेषण परम् ॥२३॥ राजीलवणसयुकं वाणायुतमनन्यधीः । तस्य चोच्चाटन शीघ्र ध्रुवकूर्मादयोरपि ॥२४॥ तलतलेन सयुक्त मापहोम गुणायुतम् । प्रेताग्नी प्रेतकाष्ठ'' च जुहुयात्प्रेतकानने ॥२५॥ भीमवारे निशा' नग्नो जुहुयात्प्रेत उल्मुके"। सद्यो मारणमाप्नोति मृकण्डुसदृशोऽपि च ॥२६॥ ॥ इति पविद्यागमे सास्यायनतात्रे सप्तम पटलम्५ ।। ॥ अथाष्टमः पटलः ।। बिम्बोष्ठी चारुवदना समपीनपयोधराम् । पानपात्र वैरिजिह्वां धारयन्तो शिवां भजे ॥१॥ कौञ्चभेदन उवाच- नमः कौलागमाचार्य वेदवेदाङ्गपारग । बगलामलराजस्य प्रयोग वद शङ्कर ।।२।। ईश्वर उवाच--- राजीलवणमादाय मूलमन्त्रेण पुत्रक । ग्रस्त कृत्वा साध्यनाम जुहुयादयुत निशि ॥३॥ १. ख. ०६क्तुमाज्य० । २. ख. ग घ हुने । ३. ख. धृतप्लुते। पुस्तके पद्यमिद मास्ति। ५. ख. स्तभने सु। घ. स्वनने तु। ६. ख. घ.निम्बार्क सभवै । ७ ख. ग. घ. भवेत् । ८. घ. सद्य । ६. ग उच्चाटन । १० ख ध्रव कूर्मा। घ. ध्रवकर्मा। ११. ख. प्रेतकाष्ठे। ग. घ निशा। १३. ख. गोल्मुके। घ. दिङ्मुखे। १४. प. वा। राजकथन नाम सप्तम. पटलः। । प. मुच्चाटन। १२. ख, निशी। १५. घ.मा.
माटम. पटलः [१६ नानारोगहर चव नानाभूतनिकृन्तनम् । नानाकृत्रिमनाशञ्च भवेत्सत्य न सशयः ॥४॥ हरिद्राखण्डहोमेन अयुतेन कुमारक । वशीकरणसम्मोह भवेच्छङ्करभाषणम् ॥५॥ तालकेन हुनेद्रात्री नेत्रायुतमनन्यघोः । नानास्तम्भनमार्गेषु सत्यमेतन संशयः ॥६॥ खरस्य' रक्तमादाय जातिकमविरोधिनाम् । निम्बार्कपत्रमादाय प्रत्येक नाम चालिखेत् ॥७॥ प्रताग्नी प्रेतकाष्ठे च नग्ने च' प्रेतदिड मुखे । हुने प्रेतवने धीमानयुत द्वेषकारकम् ।।८।। अनाथस्य चितो रात्रौ शत्रुप्रकृति लिखेत् । हृदये नाम पालिख्य मारयति ललाटके || दहयुग्म लिखेद वाहो ऊर्वोस्तस्य' कुरुद्वयम् । एव च विलिखेत्सम्यक् सशत्रोर्वर्णमादरात्' ॥१०॥ ताडयेद् हृदये मन्त्री शतमष्टोत्तर जपेत् । तद्भस्म सग्रहे धीमान् गोपयनगराबहि । ॥११॥ पुनौ मनिशाकाले मन्त्रयेन्मूलमन्त्रतः । अष्टोत्तरसहस्रं च शत्रुमूनि विनि क्षिपेत् ॥१२॥ स शत्र : सप्तरात्रण म्रियते नात्र सशयः । उष्ट्रारूढ रिपुंध्यात्वाग्रस्य दण्डेनमन्त्रयेत् ॥१३।। नि.क्षिपेत्सप्तरात्रं तु सप्तधा मन्त्रित तथा । उच्चाटन भवेत्सत्य शिवस्य वचन यथा'५ ॥१४॥ प्रेतभस्म रवी'' ग्राह्य बगलामत्रराजतः । सहस्र मन्त्रयेच्छनो'" रात्री ८ नग्नो न ६ भीमके ।।१५।। १. ग... वाराह। २. ख. नग्नश्च। घ, नानो वा। ३. स. प. प्रेत- दिङ्मुख । ४. प. प. मालिक्ष्य। ५. ख. भिंस्मै। घ. ऊर्वोभस्म । ६. ख. स्वरात्रो.। घ. शत्रोवर्णसमादरात् । ७. ग. घ. गदया। ८. ख. ग. घ. सग्रहे। ६. घ. रोपयन। १०. प. शत्रोन्मूर्धनि । ११. प. निसिपेत् । १२.ख. प्रस्थ. घ. ग्रस्त कृत्वा तु। १३. घ, मनावित् । १४. स. मत्रिते। १६. क. वशी। १७. ख. भस्म। घ. रात्री। १८. घ. मत्री। १६. ख, नग्नोऽथ। ग. घ. नग्नेन । दण्डेन । तथा।
नषम.पटल [२१ wwwwwww शत सहस्रमयुत्त कार्यलाघवगौरवात् । ततर्पणासव' पीत्वा' प्रयोग शान्तिमाप्नुयात् ॥२८॥ न कर्तव्य मुमुक्षश्च' परपीडा कदाचन । प्राण कण्ठगतं कुर्यात् पश्चात् सस्कारमाचरेत् ॥२६॥ इति पविद्यागमे सांस्यायनस ने भष्टम पटलम् ॥८॥ ॥अथ नवम पटल.॥ पीताम्बरालकृतपीतवर्णी शातोदरी* शर्वमुखामृतार्चिताम् । पोनस्तनाला कृतपीतपुष्पा सदा स्मरेय बगलामुखी हृदि ॥१॥ काँच वन उवाच- नमोऽस्तु मत्रागमकोविदाय श्रीनीलकण्ठाय नमो नमस्ते । एतन्मनोयन्त्रमखण्डतेजसे प्रयोगमूल वद चन्द्रचूड ॥२॥ ईश्वर उवाच- यन्त्रप्रयोग यमशासने कलो यन्त्रप्रयोग यमिना च दुर्लभम् । यन्त्रप्रयोग यतयस्तु कुर्वता यज्ञादि गोविप्रयतश्च "रक्षणे ॥३॥ बिन्दु निकोण वृत्त च अष्टकोण ततोपरि। ततोपरि लिखेत्पुत्र पट्कोण वृत्तमादरात् ॥४॥ ततोपरि लिखेत्सम्यक् भूपुरद्वयमादरात्" । विन्दुमध्ये लिखे कोणत्रितये" त्रितय"विधा ॥५॥ अष्टकोणेपु" विलिखेद गायत्री बगलाह्वयाम् । षट्कोणेषु सुसलिख्य विद्या पत्रिंशदक्षरीम् ॥६॥ वृत्तेषु विलिखे पुत्र पञ्चाशद्वर्णमादरात् । भूपुरेषु च सलिख्य प्राणस्थापनक मनुम्" ॥७॥ ज तेक्षा १ ख तत्तपणाम्भ । २. खसपीत्वा। ३ ख मुमुक्षेश्च ०अष्टम पटलः। ५ ख शा तोदरी। ६ ख. ५ शवमुखामरा० । ७ क, ख ग येतन्मनोयत्रमखण्ड- ८ घ यमशासन । ६ घ कुवन् । १०. ख ध यज्ञादि। ११ घ यतश्च। १२ ख घ यि दु । ग बिन्दुः। १३ ख. ग घ पुस्तकेष्वयमशो विशेष - "fब दुमध्ये लिखेद्वीज बगलायाश्च पुत्रक। साध्य तीजगर्भ (मध्य घ) स्थ कुर्यात् सम्यक् सुबुद्धिमान् ।। १४ क ख ग पोज विविखेत् । १५ प त्रितयेपु। १६ घ त्रिया। १७. घ. मष्ट. परेषु। १८. पट्कोणके। १६ ख घ. च सलिरुप । २० प वृत्ते तु । २१ घ मनु ।
२२] सात्यायनता रजते स्वर्णपट्टे वा प्रादेश चतुरस्रके । लेखिन्या स्वर्णमय्या' च लिखेद्भार्गववासरे ।।८।। पूजायत्रमिद पुत्र पूजनात् सर्वसिद्धिदम् । पूजाविधि प्रवक्ष्यामि मुनिगुह्य सुपावनम् ॥६॥ मूलमन्त्रण सम्पूज्य उपचारंश्च पोडशं । शुद्धप्रदेशजा दूर्वा निर्मला च सुकोमलाम् ॥१०॥ सग्रहेक्षिालयेत् सम्यक् मत्रराजेन पुत्रक । मन्नान्ते च नम २ पूर्व नि क्षिपेद् दूर्वमादरात् ॥११॥ एव भूतसहस्र च पूजयेच्च दिने दिने । मण्डलाद्वयाधय. सर्वे मुच्यन्ते कृत्रिमादय ।।१२।। भूतप्रतपिशाचाद्या कूरा खेघरभूचरा । पूजनान्नारामाप्नोति शिवस्य वचन यथा ।।१३।। अचयेत्पूर्ववद्यन्त्रमुपचारश्च पोडशं । सग्रहेद्रतकुसुम' हयारिं च सुनिर्मलम् ॥१४॥ तेन पूजा प्रकर्तव्या पूर्वव-मण्डल सुघो । सम्मोहन च वश्यञ्च द्रव्यलाभ भवेध्रुवम् ॥१५॥ बिभीतकोद्भव पुष्पमाहरे गोमवासरे। पूजयेत्पूर्ववत्पुत्र नानास्तम्भनकर्मणि ॥१६॥ निम्बार्ककुसुमेनाथ यन्य वापि कुमारक । पूर्ववपूजयेन्मन्त्री" सद्यो विद्वषण भवेत् ।।१७।। धत्तूरकुसुमे व पूर्ववत्पूजयेत्सुत । उच्चाटन भवेत्सत्य नान्यथा शिवभाषणम् ॥१८॥ विपति दुकपुष्पेण पूर्ववत्सम्यगर्चयेत् । सद्यो विनाशमाप्नोति मृकण्डुसहशो" रिपु ||१६ १. स्वएमया , ३. ख पूर्वा । ४ ५ क्षिपेद्दी समार रात् । ५ घ ०दामया ६ ख स । ७. क. सग्रहे प्रकुसुम । प्रकत्तव्य । ६ घ .चाप, १०. घ पुत्रगाथ। ११.प. पूजयन् विनाशमायाति । घनाशमवाप्नोति १३ घ मकुम ।
दशमःपटल' [ २३ A शमन्तकुसुमेनैव' पूर्ववत्पूजयेन्नरः । पूर्ववज्जायते' लोके वेदशास्त्रार्थकोविदः ॥२०॥ पलाशकुसुमेनैव पूर्ववत्पूजयेन्नरः । सयो मन्दो भवेद्वाग्मी लभेत्सर्वज्ञता सुत ।।२।। पूर्ववत्पूजयेत् पुत्र प्रशोककुसुमेन च । ईप्सिता' लभते कन्या सा तु पुत्रवती भवेत् ।।२२॥ तुलसीमञ्जरीभिश्च पूर्ववत्पूजयेन्नरः । ज्ञानभक्तिश्च वैराग्य लभते तरलरपि ॥२३॥ नन्दावर्तेन* सम्पूज्य वातरोग व्यपोहति । मल्लिकाकुसमेनैव पूजयेज्ज्वरशान्तये ।।२४।। कुसुमेश्चम्पकरच॑ शीतज्वरनिवारणम् । मर्चयेन्जातिकुमुममेहरोग विनश्यति ॥२५॥ वन्यश्च मल्लिकापुष्पनि झोप" लभते ध्र वम् । केतकीकुसुमेनाय॑ द्रध्यवान् जायते ध्रुवम् ॥२६॥ एव च पूजयेद्यन्त्र न जपर्न च होमतः । प्रयोगसिद्धिर्भवति बगलायाः प्रसादतः ।।२७।। इति पविधायम सांख्यायनतन्त्र नयम एटलस"n ॥ अथ दशमः पटलः ॥ कम्बुकण्ठीसुताम्रोष्ठी मदविह्वललोचनाम् । भजेह बगला देवी पोताम्बरधरा शुभाम् ॥१॥ कौञ्चभेदन उवाच-- अष्टमूर्ते महामूर्ते नमस्ते चन्द्रशेखर । वद प्रयोग मत्रस्य' लेपनक्रममादरात्" । ईश्वर याच- पूर्वोक्त यन्त्रमालिख्य" प्राणस्थापनपूर्वकम् । भर्चयेदुपचारेण चन्दनेन विलेपयेत् ॥३॥ १. घ स्यमन्त। २. ग. पुत्रदान, ध.पुत्र घा० । ३. घ. ईप्सितां च। ४.५ लभेत् । ५. ग. लभ्यते। ६.प.च पररपि। ७. ख नन्दावसेव। नन्द्यावतश्च । घ. नद्यावनि। ८. घरचेत् । ९. गमहारोगे । १०. घ. निक्षिप्त । ११. म., पत्रप्रयोग नाम नवमः पटलः । १२. खग. कम्बुकाठी । १३. प. यात्रस्य । १४.प. लेपन०1 १५. घ..मालिख्या १६. घ. दुपचारश्च । .
२४ ] सांख्यायनतन्त्र बाणायुत जपेद्धीमान् नित्यपूजासमन्वितम् । राज्यसिद्धिर्मवेत्सत्यमयलेन' कुमारक ॥४॥ कस्तूरीलेपन कुर्यात्सम्यगचितयन्त्रके। नित्य वाणसहस्रच' न्यासध्यानसमन्वितम् ॥५॥ मण्डलद्वययोगेन रोगकृत्याग्रहादयः । तत्क्षणान्नाशमायान्ति' तम. सूर्योदये यथा ॥६॥ पूर्ति चाचपल' नित्य लेपयेद्यन्त्रमादरात् । जप कुर्यात्पूर्ववच्च मास वा मण्डल तु वा ॥७॥ वशीकर तु सम्मोह द्रव्यसग्रहमेव च । भवत्येव न सन्देहो नात्र कार्या विचारणा ।।८ हरिद्रातालक चैव अकक्षीरेण मदितम् । त्रिकाल लेपयेन्नित्य त्रिसहस्र जपेद्दिने ॥६॥ महास्तभनमाप्नोति' कर्णाक्षिवाक्पतिस्तुवा । मण्डलानगर" ग्राम रणसम्मोहमेव च'' ॥१०॥ सर्पपास्त्रिकर्वेश्च'' दुग्धर्ववार्कसम्भवः । क्षारेण' मर्दयेत्सम्यक् यन्नलेपनमाचरेत् ॥११॥ कृत्वार्धमण्डल चैव षट्सहस्र दिने दिने । विद्वेषण भवेत्सिद्ध शिवस्य वचन यथा ।।१२।। धत्तूर तिन्दुक बोज तालकेन समन्वितम् । निम्बपत्रद्वेनैव मर्दयेल्लेपत्रिधा ।।१३।। एव मासप्रयोगेण नगर ग्राममेव च । रणे वा राजगेहे" वा शोघ्रमुच्चाटन भवेत् ।।१४।। प्रेतान्न प्रेतभस्म'' च प्रेताङ्गार सम समम् । अकंवचीमय ८ क्षीर खल्वेनैव तु मर्दयेत् ॥१॥ १.क.मयनेन । ३. घ.माप्नोति । ४ घ सूर्योदय.. ६. ख. भूचिन्तायं फल । ७. प. मईयेत्। ८. घ. पक्ष्यात् । कर्णाक्षिवाक्युतिस्तु । घ. वर्णाक्षी वाङमतिस्तु। १०. प. नगरे । ख. सर्पपास्त्रिावाच । ग. सपंपास्त्रिकडुवा । घ. सर्पपी त्रिकटुश्चंव। १३. ग. क्षीरेण । प. सल्वेन। १४. प. नितिंदुरक । १५ प. रणं । १६. प. राजगह । १७. स.प्रेत. भूति। १८. ग. प्रकवचमयो । घ. प्रवचमय । १६. क. खलेनैव । घ तथा। ६.स. ११. प.वा।
दशमः पटलः [ २५ त्रिकालं लेपनं कुर्यात् प्रीतये होमयुक्तिना' । नित्यं' ऋतुसहस्र' तु मन्त्रराजमिम जपेत् ॥१६॥ पक्षान्मारणमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा। अथवा निम्वतैलेन तद्वत्कृत्वा तु मारणम् ॥१७॥ तिलतलेन संयुक्त मर्दयेद् गरमादरात् । यन्त्रस्य लेपनं कुर्यात् त्रिकालं मूलविद्यया ॥१८॥ सन्तपेद्दीपशिखया पक्षमेकं कुमारक । मारणं च भवेन्नित्यं नात्र कार्या विचारणा ॥१६॥ वजीक्षीरं त्रिकाले तु पूर्ववल्लेखनेषु च । तापज्वरस्य पीडाया पण्मासाद्रिपुमारणम् ॥२०॥ पूर्ववल्लेपनं चंव जपसन्तर्पण तथा । त्रिसप्तदिनमात्रेण मारण चोरगौरंग: ॥२१॥ धतूरद्रवसयुक्तं मर्दयेत्सर्पपं तथा। जपलेपनयोः पुत्र गुल्मरोगी भवेद्रिपुः ॥२२॥ निम्बपद्रवंचव विषकण्टकज तथा। विषतिन्दुकज चव त्रिविधं च समं समम् ॥२३॥ त्रिकाललेपन' कुर्यात् पट्सहस्र मर्नु जपेत् । पक्षेण" द्वादशाहेन" मारणं च समं समम् ॥२४॥ त्रिकाल लेपनं कुर्यात् पट्सहस्र मन जपेत् ।" मईयेदारनालेन मारिच त्रिफला तथा ॥२५॥ त्रिकालं लेपनं कुर्यात् त्रिकाले जपमाचरेत् । करपादादिदाहन भण्डलाच्छत्रुमारणम्" ॥२६॥ १. प. सन्तपेद्दीपवहि ना। २. घ. निसें। ३. प. क्रतु। ४.प. मद। ५. घ..रलवमा०। ६.घ. वचक्षीरं। ७. प. लेपनेन च। घ. वैरिका हो । ग. चोरसोरजः। १०.ख. यश्लेपनयो। २. जपलेपनया। ११.ग. अकण्टके। १२. स. प. त्रिकालें। १३. क. सहस्र। १४. घ. पक्षादा। १५.५. द्वादशाहं वा। १६. स. ग. घ. न संशयः। १५. पादद्वय पुस्तकान्तरेषु नास्ति । घ. कृत्वा। १६. क. करपाद्यपि०ग. करपादादि। घ. करपाददहेनैव । २०, क. वारणम्। ८. ग. जपः। २.
२६ ] सांस्यायनका गोमयलेपन' दत्वा गुल्मरोगी भवेद्रिपुः । गोमूत्रं छागमूत्र च मिश्रित पूर्ववत्तथा ॥२७॥ पित्तरोगो' भवेच्छरर्द्धमण्डलमावतः । लेपन छागरफ्तेन भ्रान्तान्पत्ति भवेद् ध्रुवम् ॥२८॥ मत्कुणस्य च रक्तेन उन्मादी जायते रिपुः ।। ॥ इतिषविद्यागमे ताल्पायनतात्रे दशम पटनम् toll ।। प्रथकादशः पटलः । नमस्ते वगलादेवीमासवप्रियभामिनीम् । भे(भ)जेह स्तम्भनायं च गदा जिह्वा च बिभ्रती कौञ्चभवन उवाच-- नमस्ते मोलिस तेव्य नम. पन्नगभूषण ! तपणेन प्रयोग च वद मे करुणाकर ॥२॥ ईश्वर उपाच- पूजयेद्यन्त्रराज च उपचारश्च पोडशः। तद्यत्रोपरि सन्त तर्पणस्य विधि शृणु ॥३॥ गुडोदकस्तर्पण च कुर्यास्पचायुत तथा । सान्तिकृत्य भवेच्छीघ्र नात्र कार्या विचारणा ॥४॥ द्रवेण" तर्पण पुर्यात् पूर्वसंख्यासु पुत्रक । चय सम्मोहन च भवेतपंणयोगतः ।।५।। मोहिनी यसमिश्र" जलेनैव तु तर्पणम् । नेत्रायुतप्रमाणेन जिहास्तम्भनमाप्नुयात् ।।६।। गतिगर्भ प वाक्यानि" गात्र श्रोत्र सपाक्षिकम् । क्षुधा तृष्णा प निद्रा" घ रतभन च भवेद् सुषम् ॥७॥ निम्बापत्र जद्रामिश्रित पारिणा । पञ्चायुत तर्पणेन समो विद्वेषण भवेत् ॥८॥ १.गपोमा २.५ पयरोगी। 1.प.प्रा ठपियो। प. प्रामवासि। घ प्रान्तिरोगी। ४. प. निविलेपन नाम सम पटसः । ५. मगमा... वमलावी बामप्रिमोदिनी। ६.प.विनो। ७. प. मोनि। ९. प. भूपऐ। पएस्य। १०. प. प.ए । ११ प. मोहनीदवसयुक्त। पतिस्ता गतिमा १५. प. प. वारपाणि । १४. प. तृप्या शुt fati एकादशः पदलः [ २७ बनार्कक्षीरमिथ च 'कान्ता च" तर्पणेन च । उच्चाटन भवेच्छनोरयुतमयमादरात् ॥६॥ प्रेतान्नं प्रेतभस्म' च प्रेताङ्गारं च पुत्रक । समं समं गर' ग्राह्य जीवेनैव तु मिश्रितम् ॥१०॥ नेत्रायुतं तर्पणेन साक्षाद् रिपुविनाशनम् । यारिपत्रजद्रावमिश्रित' मारणं भवेत् ॥११॥ कपूरमिश्रित तोय' पचाशच्छतमादरात् । नित्य च तर्पयेद् धीमान् मासमेकमतन्द्रितः ॥१२॥ पुराणज्वरमत्युग्रं पित्तरोग विनश्यति । चन्दनाम्भस्तर्पणेन ताप कृत्रिमज हरेत् ॥१३॥ कस्तूरीमिश्रित तोये राज्यलाभो भवेद् ध्रुवम् ।। यस्तु" तर्पणमत्रेषु" अयुत रविसख्यया ॥१४॥ कुबेरसदृशः श्रीमान् जायते नात्र संशयः । माध्वीद्रव्येण सम्मिश्न" पूजितं'४ शुद्धवारिणा ॥१५॥ रत्नायुत' तर्पणेन लक्ष्मीर्वा" जायते ध्रुवम् । गोक्षीरतपणेनैव ईप्सिता सिद्धिमाप्नुयात् ॥१६॥ तक्रण तर्पणं चैव" पित्तरोग व्यपोहति । मारनालेन संतप्यं जलदोष चशाम्यति ॥१७॥ हरिद्राम्भस्तर्पणेन स्त्रीणामाकर्षण भवेत् । शमतकुसुमेनैव'६ मिश्रित जलतर्पणम् ।।१८॥ पुत्रवान् जायते मो' अयुतेन न संशयः । कदलीफलगोक्षीरं शर्करा च सम समम् ।।१६॥ १.''ख.कराभ:। घ. कौशामः। २. क. उच्चाटनो। ३. ख. प्रतभूमि। ४. घ.चस०॥ ५. ख. मानेनैव । ६. घ. मयूरपरजे बारः। ७. क. तोये। ग. घ. मृत्युग्र। ६. घ. पुस्तकेऽय विशेषः पाठ:-- "गोहीद्रव्यस्तपणेन द्रव्यलामो भवेद् ध धम् ।" १०. ख. ग. पैष्टया । घ, पैष्टी। ११. . तर्पणमत्रेण । ग, वर्पणमात्रेषु। प. तपए.. मात्र। १२. घ. ऋषिसत्यया। १३. घ. समिध। १४. घ. पूरित। तत्रायुत । ५. तत्वायुतं । १६. ख. ग. घ. सक्षमीवान् । १७. ख. घ. सपरगनेव। १६.घ. स्यमन्त। २०. प. मृत्यो।
२८] सांस्यायनवाने पलाष्टक च प्रत्येक मिश्रित जलतर्पणम् । मनसिद्धिविना' सिद्धिर्भक्तिवैराग्यमेव च ॥२०॥ भ्रमज्ञानं व्यपोहति नान्यथा शिवभाषणम् । छागरक्तेन समिश्र चाचित तलतर्पणात् ॥२१॥ मूकाश्च कुरुते प्राज्ञान् रिपुसघाननेकशः। जलेन मिश्रित पुत्र शोणित विड्वराहजम् ॥२२॥ वेदायुत तर्पणेन उन्मादी जायते रिपुः । काकरक्तेन सम्मिश्र तर्पण मुद्धवारिणा ॥२३॥ जातिभ्रष्टो भवेच्छत्रुः स भवेन्निन्दको मुवि । उलूकरक्तसमिश्र वारिणा तर्पण तथा ॥२४॥ व्रणेन म्रियते शत्रुरयुतद्वयसमततः' ।" श्वानरक्तेन समिश्र वारिणा तर्पणं तथा ॥२४॥ श्वानवज्ज्वलते" शत्रुम्रियते नात्र सरायः । मार्जाररक्तसम्मिश्र'तर्पण वारिणा तथा ॥२६॥ क्षयरोगी भवेच्छत्रु. पग्मासम्रियते रिपुः ।" उष्टरोशोणित'" मिश्र तोये" सन्तप्र्पयेत् सह ॥२७॥ १. घ..ज्ञान। २. घ. तेन तपरपम्। ३. प. पलाद । ४. घ, सघानमेकस। ५. घ. विड्वराहाम्। ६. प. मिष्टवारिणा। ७. घ. सन्ततिनिन्दिता। पुस्तकदये विशेषोऽय पाठ.-- 'नेत्रायत' भवेच्या नेत्ररोगो न सराय। खररक्तेन समिश्र वारिया तपंण तया ।। ६ स. दयमन्ततः। ग. दयरोगत.) १७. प. पुस्तके पादयस्थानेऽयमयो दस्यते- तरावज्ज्वलते पत्र रयत ज्वरयोगत.।" ११. ख.जायते । प. प. जल्पते। १२. घ. सात १३. ख. पुस्तकेममातरमो विशेष मुजगशोणितेनैव तपंपैदरपत्र। निशि सहनमानेन सिद्ध रिपुषिनाशनम्" । १४. प. उष्ट्रस्य योरिणत । १३. सु. तोयः। घ. वोय। १६. प. सतप्यं बुद्धिमान् । . १ घ. नेवानुवाद । २ प नेत्रनायो।
मावाः पटलः { २६ मासेन शत्रुमरणं मकडुसदृशोऽपि वा। जपसख्या यत्र नोक्ता लक्षमेक कुमारक ॥२८॥ दिनसख्या पत्र नोक्ता पक्षमेव' न संशयः ।। इति पपिशगमे सांख्यायनतन्ने एकावश पटलम् ॥११॥ ॥ अथ द्वादशः पटलः" कोलागम कसवैद्या सदा कोलागमाम्बिकाम् । भजेऽह सर्वसिद्धयर्थं बगला चिन्मयी हृदि ॥१॥ काँचभेदन उवाच--- नमस्ते सर्वसर्वेश गवितासुरभजन । गायत्री वगलाख्या च वद मे करुणाकर ॥२॥ ईश्वर उपाच- मन्त्रोद्धार प्रवक्ष्यामि मन्त्रमाहात्म्यमेव च। पुर"श्चर्याप्रयोग च वक्ष्येऽह तव पुत्रक ॥३॥ ब्रह्मास्त्रायपदं चोक्त्वा 'विग्रहेति पद ततः । स्तम्भनेति पद चोक्त्वा वाणाय तदनन्तरम् ।।४।। धीमहीति पदं बोक्त्वा तमः' शब्द ततो(दो)च्यते । बगलापदमुच्चार्य उद्धरेच्च प्रचोदयात् ॥२॥ गायत्री वगलानाम्नी सर्वसिद्धिप्रदा भुवि । ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दोय(स्य) गायत्री समुदाहृतम् ॥६॥ देवता बगलानाम्नी चिन्मयी शक्तिरूपिणी । ॐ बोज 'चव शक्तिही". कोलक विद्यहे पदम् ॥७॥ चतुर्लक्ष पुरश्चर्या तद्दशाश च तर्पणम् । सद्दशाश हुनेदाज्य तावबाह्मणभोजनम् ॥६॥ न्यासध्यानादिक सर्वं कुर्यात् 'तन्मन्नतो जपेत् । प्रयोगानथ वक्ष्यामि गायत्रीबगलाह्वये हा १. प. पक्षमरूपा । २. घ. एकादश. पटलः। ३. ग, बगलास्य करुणाकरम् । ४.क. पुन । ५. ख. विग्रहेति पद तपा। प.विमति तत पदम् । ६. ग. तत। ५. तो। ५. ता.प. तोचरेतु। ८. स. यमुदाहृतम् । ख. वगला। १०. -'५ शक्तिह ली ११. '-'घ. तनमन्त्र राजवत् । १२. ख. वगलाहमा । ध, गामश्या वालाद्वा! चंव।
३०] साध्यापनाने तारादि प्रजपेन्मन्य मोक्षार्थी- च कुमारक । शान्त्ययं प' जपेत्पुष शारदावीजपूर्वकम् ॥१०॥ सम्मोहनार्थ प्रजपेत् कामराजपुरस्सरम् । स्तम्भनार्थ प्रजपेच्यक्तिदाहापूर्वकम् ॥११॥ वाराह शक्तिवाराह स्तब्धमायापुरस्सरम् । प्रजपेन्मन्यमेतद्धि मारण भवति ध्रुवम् ॥१२॥ वाग्भवादि जन्मत्र विद्यासिद्धिर्भविष्यति । बालादि प्रजपेन्मन्त्र 'कन्यका क्षिप्रमाप्नुयात् ॥१३॥ वाराहीबीजमध्यस्था' गायत्री लक्षजापनात् । भूलाभ (भो) जायते तस्य अनायासेन* पुत्रक ॥१४॥ श्रीबीजादि जपेत् पुत्र गायत्री बगलाह्वयाम् । कुवेरसदृश श्रीमान् जायते नात्र संशयः ॥१|| ताक्ष्यंवीजादि मन प्रजपेद् ध्यानपूर्वकम् । नानाविषप्रयोगाश्च ग्रहरोगादिनाशनम् ॥१६॥ भैरवी'" बीजमाद्य च प्रजपेच्च कुमारक । भूतप्रेतपिशाचाद्यास्तत्प्रयोगाद् व्यपोहति ।।१७॥ जपेदमृतबीजानि" गायत्री बगलाह्वयाम् । तापज्वरमहाताप' शमयेत्" क्रौञ्चभेदन ॥१८॥ जपेच्च वायुबोजादि गायत्री बगलाह्वयाम् । क्षिप्रमुच्चाटन चैव भवेच्छङ्करभाषणम् ॥१९॥ अग्निबीजादिगायत्री प्रजपेद् बगलायाम् । महता(दा)तापसयुक्तः५ पक्षाच्छत्रु तो भवेत् ॥२०॥ १. घ. मोक्षार्थ ३. प. तारावाराहपूर्वकम् । ४. ख. ग घ. पुस्तकेष्वय पाठ- स्तम्भनार्थ जपेत्पुत्र धगलाबीजपूर्वकम् ।। विद्व पणार्थ प्रजपेद्ध कारद्वयपूर्वकम् । उच्चाटनार्थ (घ. उच्चाटने) जपेत्पुत्र शक्तिवाराहपूर्वकम् । ५ प. कन्याकाक्षी मवाप्नुयात् । ६. घ. वाराहीमध्यबीजस्था। ८. क. ग. घ. गायत्री।-६. ख. बगलाह्वया । १०. घ. गलरोगादि। भैरव । १२. ख. घ. बीजादि। १३. ख तापज्वर महातापं । घ. महाबात । १४. घ. नाशयेत् । १५. घ. सयुक्त । २. घप्र। ७. ग. प्रत्यायासेन । ११.स.घ.
प्रयोदशः पटलः [३१ मायादि प्रजपेत् पुत्र गायत्री बगलाह्वयाम् ।' इष्टसिद्धिर्भवेत् क्षिप्र शिवस्य वचन यथा ॥२१॥ मन्त्र राजस्य गायत्री पादाद्यवयव' तथा।" गायत्री च विना मन्त्र न सिद्धयति कलो युगे ॥२२॥ पुरश्चरणकाले तु गायत्री प्रजपेन्नरा। मूलविद्या दशांश च मन्त्रसिद्धिर्भवेद् ध्र वम् ॥२३॥ स्यक्त्वा तनमन्त्रगायत्री यो जपेन्मन्त्रमादरात् । कोटिकोटिज पेनैव 'तस्य सिद्धिन जायते॥२४॥ जपसख्या यत्र नोक्ता लक्षमेक कुमारक । दिनसंख्या यत्र नोक्ता पक्षमेक न सशयः ॥२५॥ गायत्री वगलानाम्नी वगलायाश्च जीवनम् । मत्रादौ चाथ मन्त्रान्ते जपेद् ध्यानपुरस्सरम् ॥२६॥ इति पविधागमे सांस्यायनतन्त्र द्वादश पटलम् ॥१२॥ ॥ अथ त्रयोदशः पटलः ।। निधाय पाद हुदि गमपाणिना, जिह्वा समुत्पाटनकोपसयुताम् । गदाभिघातेन च फालदेशे', मम्बा भजेऽह बगला हृदब्जे । कौञ्चभेवन उवाच-- श्रीकण्ठ श्रीगराधार'• शार्दूलाम्बरभूषण''। शान्तवद् " वद मे पूजां बगलायाश्च शङ्कर ।।२।। १. मतः पर स. ग. घ. पुस्तकेषु विषः पाठः- "राजा पा राजपुत्रो का मरणान्तं वसीभवेत् । महामाया(ग. मायामाया)दिगायत्री मनपेद् बगसाह्वयाम् ।" २.प.तपा। ३. घ. पादाभावपद। ४. प. पुस्तकेय विप:- मसिविभवेद क्षिप्र शिव वचन या ५. स. प. मूल विधा। ६. -'प. न प सिरिभवेद प्रयम्। ५. स. ग. जपे । ५. जप । ८. प..दादसा पटसः। ६. ख. वासदे। प. फासदे। १०. प. पीपराधार ११. २. भूषणम् १२. प. सान्तवद्।
सख्यायनता पर वाप- बिन्दुमध्ये घसम्पूज्य स्वर्णसिंहासनोपरि । चिन्मयी वगलादेवी सर्वसिद्धिप्रदायिफाम् ॥३॥ चतुर्भुजा प द्विभुजा गर्दा जिहां च विभ्रतीम् । पीतवर्णा महापूर्णामचंपेन्मूलविद्यया ॥४॥ विकोणे पूजयेत् पर 'वाणी गोरी रमा" क्रमात् । तत्तद्वीजेन सम्पूण्य तदावाहनपूर्वकम् ॥शा पञ्चास्त्र' पञ्चकोणेषु वक्ष्ये तत्पूजनं प्रमात् । पूर्वकोणे तु समूज्य अस्त्र च वगलामुखीम् ।।६।। द्वितीयकोणे सपूज्य अस्त्रराज कुमारक । उल्कामुसोति विख्यात सन्मणव पूजयेत् ॥७॥ तृतीयकोणे सम्पूज्य अस्थराज कुमारक ! 'नाम्नो ज्वालामुखी चंव तन्मन्त्रणव पूजयेत् ॥८॥ "चतुर्थकोणे सम्पूज्य अस्त्रराज कुमारक' । जातवेदमुखीनाम्नी तन्मन्त्रणव पूजयेत् ॥६॥ पञ्चमेषु च कोणेषु अस्त्रराज कुमारक । बृहद्भानुमुखी ख्याता त्रिपु लोकेषु दुलंभा॥१०॥ पञ्चकोणेष्वेवमेतत्पञ्चास्त्र सम्यगर्चयेत् । मूलमन्त्रण तेनैव पूजायन्त्र कुमारक ॥११॥ तदुपरि समभ्यय॑ दिक्पालाष्टकमादरात् । वद्वाहन च तच्छक्तिदशायुतपुरस्सरम् ॥१२॥ तदुपरि समभ्यर्च्य मातृकाष्टकमेव च ।' तदुपरि समभ्ययं विघ्नेशाष्टकमेव च ॥१३॥ . १. ख. घ. मदाघूर्णा। म. महापूर्णा । २. घ. दापोगोरीरमाः । ३.घ.त- वाहनपूर्वकम् । ४. घ. पञ्चास्त्रान् । ५. '-' विह नगोऽशो प. पुस्तके नास्ति । ६. '-'चिह नान्तर्गतोऽशो नावलोक्यते प. पुस्तके । ७. घ. पद्यमिद नास्ति । ८.ध.पञ्च. मेषु च कोणेष्वेवमेव पञ्चास्त्र । ६. ख. तन्छक्तिदशायुच० । ध. तच्छक्तिस्तदायुषः । १०. घ पुस्तके विशेष:-- "तदुपरि समभ्ययं भैरवाष्टकमेव च।"
प्रयोदशः पटलः [ ३३ 'पूजायन कमेणव" एवमेव कुमारक । शालग्रामशिलाया वा वह्निमण्डलमध्यमे ॥१४॥ कन्यका चाथवा पुत्र पूजयेद् बगलाम्बिकाम् । उत्तम युक्तीपूजा मध्यम वह्निमण्डले' ॥१५॥ मधम* च शिलापूजा क्रम एप शिवोदितः । नमोऽतेनैव नाम्ना च पूजयेच्च कुमारक ॥१६॥ एव च पूजयेत् सम्यक् पुरश्चरणके विधौ। द्रव्य यस्त्रिविध" प्रोक्त पूजायां च विशेषतः ॥१७॥ गौडीमाध्वी च पैष्टो च गोडी चवोत्तमोत्तमा"। छागकुक्कुटमत्स्य च बगलाप्रीतिकारकम् ॥१८॥ त्रिकाल पूजयेद्देवी निकाल च जपेन्मनुम् । यस्य दर्शनमात्रेण पण्डितर्वाग्विदा वरैः ॥१९॥ तस्य प्रज्ञा पलानीय सम सूर्योदये" यथा"। तेजोभेदमनेक च सर्वशत्रौ'कुमारक ॥२०॥ वह्नौ यद्वत् प्रविशति तद्वद्वादय" चातुरी'। बगला मसिद्धस्य २ 'हृदय च प्रविश्यति ५३ ॥२१॥ प्रतिवादि" भवेत्स्तम्भो बहस्पतिसमोऽपि च । प्रज्ञाकर्षणशक्तिश्च बगला भूतले स्मरेत् ॥२२॥ विद्यामाकर्षणाय च स एव च संशय:' ब्रह्मचारी गृही वापि वानप्रस्थोऽथवा यति ॥२३॥ १. -'पूजायन्त्रक्रमे चैव । २.स.कन्यायो। ३ ५ बगलामुखीम् उत्तमा। ५. ध मध्यमा। ६. घ. वह्निमण्डलम् । ७. घ. मधम।। म स एष। ग. एव । घ. त्रय। ६. क.ग.शिदोदिता। १०. च निविषा ११. क ग त्तमा । १४.भस्य १५ प. पलायते। १६. प सूर्योदयः। १७. घ. तथा। १८ घ, शत्रो। १६. घ. प्रशस्यति। २० ख. तदद्वापद । २१. घ. चातुरम् । २२. घ. ०मत्रसिद्धिः स्याद। २३. . . दूरादेव प्रदशनात् । २४. घ. प्रतिवादी। २५. स. घ. भवेत् स्तन्धो । २६. ख. स्मृता। २७. घ. वज्ञामाकर्षणार्थ । २८. प. तु । २६. प. पुस्तकदयेऽपिकोऽयमको दृश्यते-- 'उल्लभ्य बगलामत्रमुपवास (घ. मुपासक)मनन्यधी."। यस्किचित् कुश्ते (प.क्रियते) कम पृथ्वी (ध पिला)बीमियाकुर. ( वांकुर )" ३४] सांस्यायनतन्त्र ३ - बगलाम-प्रसिद्धस्तु' संव पूज्यो यतीश्वर बगलामसिद्धश्च' यत्र तिष्ठति भूतले ॥२४|| पञ्चक्रोशप्रमाणेन विद्वानेव च भासते । न भासत चान्यविद्या न स्मरन परामुखो' ॥२॥ प्रयोग चैव न भवेद् वगला पर पुरा' । ग्रसने सर्वविद्याना बगला येव' भूतले ॥२६॥ वगलाया विना मन्त्र त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् । तत्सम्प्रदायविधिना साधयेद् बगलामुखीम् ॥२७॥ एव च बगलामन्त्र मन्त्र राजमिद भुवि ॥ इति पविद्यागम सास्यायनत त्रे त्रयोदश पटलम् ॥१३॥ ॥ अथ चतुर्दशः पटल ॥ सुधान्धो रलपर्यत मूले कल्पतरोस्तथा। ब्रह्मादिभि परिवृता वगला भावयद्" हृदि ॥१॥ कौञ्चभवन उवाच- वीर" विद्रूप विश्वश चिदानन्दस्वरूपिणे"। वगलार्चाविधि व वद मे करुणाकर ॥२॥ ईश्वर उवाच- 'सृष्टि स्थितिं च सहार" पूजा च त्रिविधा कली। केरले सृष्टिरूपा च गर्भकोलागमक्रमात् ॥३॥ अर्चन गौडदेशे १ च स्थितिमार्ग" कुमारक । सारूपा महदेशे तु सहाराचनमेव च ॥४॥ गुप्त कोलागम नाम गोडदेशार्चनादिभि " कामरूपागम नाम सहारक्रमपूजनम् ॥४॥ १ घ सिलिस्तु । २ - घ सर्व पूज्यो मुनीश्वरः। ३ प .सिटिश्च । ४ प तस्य वनात् पराङ्मुखो। ५ घ र्चार। ६ प परा। ७ घ प्रस्ते। ८ प एव । ६ ख घ तत्सम्प्रदाय० । घ त्रयोदस पटल । चिन्तयद। १२ घ चिद। १५ ५ स्वरूप । १४ - साहिस्पितिश्च सहार। १५ प गोडदेश। १७ स स्पितिमार्गे। कामरूपास्पदेशे तु । १६ प सहारक्रममेव । २० प नाम्ना । विधि। २१ ५ पाउदेशन चतुर्दशा पटसः लाटार्चन' चावलम्ब्य सांख्यायनमुनिस्तथा । उक्तवानागम' चैव सृष्टयर्थ शृणु पुत्रक ।।६।। सर्वाङ्गसुन्दरी श्यामा सर्वावयवशोभिनीम् । नवोढा पुष्पिणी चैव प्रार्थयेद्विप्रकन्यकाम् ॥७॥ कृष्णाष्टम्यां चतुर्दश्या पौर्णमास्या कुमारक । अथवा भौमवारे च निशा' भृगुजवासरे ॥६॥ 'सुवासिनी च"तलेन कुर्यादभ्यगन तथा । तूलिकातल्पमानीत्वा पास्तीर्योदड, मुखेषु च ॥६॥ तस्योपरि ततस्तीय शमन्त तिचम्पकः। कपूर चंब कस्तूरीमिश्रित चन्दन तथा ॥१०॥ सर्वाङ्ग लेपन कुल्लक्ष्मीसूकन बुद्धिमान् । पर्यङ्कोपरि तरकन्या चन्दनेन विलेपिताम् ॥११॥ ध्रुवायरिति" मन्त्रेण कुर्याइक्षिणतोमुखीम् । उन्मुखैत्यर्चन" कुर्यात् श्रीसूक्ते न कुमारक ॥१२॥ पादौ प्रसार्य" तत्कन्या गुप्तेनार्चनमाचरेत् । ज्यस्त्वा षोढाद्वय चादी बगलापञ्जर न्यसेत् ॥१३॥ कन्या चैव न्यसेदेव तत्तदङ्गानि ५ सस्मरेत्' गन्धद्वारेति ८ मत्रेण कुर्यात् कस्तूरिलेपनम् ॥१४॥ मूलमन्त्रेण चाभ्यर्थं पुष्पमाला समर्चयेत् । निवेदयेद् द्रव्यशुद्धि तव जपमाचरेत् ॥१२॥ शत वाऽथ सहस्र वा मत्रराजमिद सुत । पुरश्चरणमध्ये तु प्रतिभागंववासरे ॥१६॥ घ. कोडागौ। २. घ. उत्तमार्गप्रमे। ३. घ. सृष्टप, ४. ख.ग.प. निकायो। ५. ख. ग. प. भृगुवासरे । ६. घ. सुवासितेन। ७. ग. •दम्पगका ६. घ. मानीय। ६. प. मुखेन। घ. समास्तीयं । ११. प. वा छोरिति । १२. घ. सम्मुखे ध्यन। १४.स. कन्यो। ११. घ, तत्र चांगानि । १६. स. घ, सस्पृशेत् । १७. स. प. पुस्तकद्रये विशेषः पाठ-- धनजयपुर चव मर्चयेन (प. मायेन) मूलविद्यया । १५. प. पन्धद्वारे। ११. घ. तस्य । २०. ख.प. समर्पयेत् । ०दम्यगना। सस्तार्य।
साल्यापनतम् . अथवा पोर्णमास्या वा सौभाग्याचनमाचरेत् । प्रयोगसिद्धिद शस्त' मासिद्धिकर परम् ।।१७॥ एतत्पूजा विना पुत्र प्रयोग न भवेत् कलो। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रयोगादि च भूतले ॥१८॥ सौभाग्याची विना पुत्र न भवेज्जपकोटिभि. । अभिमानाप्टक त्यक्त्वा त्यक्त्वा चंवेपणात्रयम् ॥१६॥ त्यक्त्वा पञ्चेन्द्रियासक्ति सोभाग्यार्चनमाचरेत् । सुखदुख समे कृत्वा लाभालाभी जयाजयो ॥२०॥ शीतोष्णे समता कृत्वा सोभाग्याचनमाचरेत् । पोढाद्वय च न ज्ञात्वा यः करोत्यर्चन भुवि ।॥२१॥ स पतितो भवेत् पु सा रौरव नरक व्रजेत् । बाह्याभ्यतरत ' पुत्र अभेदज्ञानयोविना ॥२२॥ सौभाग्याचनकर्त्त गामनन्त शापमाप्नुयात् । सकल्प च विकल्प च त्यक्त्वा विश्रान्तमानस ॥२३॥ कुर्यात् सौभाग्यसम्पूजा च नो चेद् भ्रष्टो भवेन्नर । जितेन्द्रिय * सुख त्यक्त्वा कुर्यात् सोभाग्यपूजनम् ।।२४।। सुखापेक्षण यत् कुर्याद् देवताशापमाप्नुयात् । स्वस्थादेशविधि चंव न ज्ञात्वा क्रौञ्चभेदन ॥२॥ य करोत्यचन चैव स विप्र पतितो भवेत् ।। स्वपत्नी भ्रातृपत्नी वा गुरुभार्यामथापि वा ॥२६॥ प्रचयत षड्रसोपेता. साख्यायनमत विदम । दीक्षालयस्था रजकी कुलालगृहकन्यकाम् ।।२७।। १. ५ पुस । २ ध समो। ३ घ शीतोष्ण। ४ ग ब्रह्माभ्यन्तरत । | बाह्याभ्य तरयो ५ ५ ०कर्त.. देवता । ६ घ विभ्रातमानस । ७ प जिह्वद्रिय । घ स्वस्थदेशाविधि । ६ मत पर सघ पुस्तकद्वय विशष - "कल्पते (करोति घ) चित्तसक्षोभ तत(प. त्वत् क याया कुमारक । म्रा तचित्तो भवेत् सद्यो (ध सोपि) वाचस्पतिसमोऽपि वा" । घ पुस्तकेऽस्मादप्यधिकोऽयमगो दृश्यते- नोत्पादयत् कामनया वेदन च शरीरयो । वेदना जनयद्यस्तु स नर पतितो भवेत् ॥ १. घ पौवनोपेता।
पञ्चदशः पटलः [३७ पुलिन्दकन्यकां चंव मकण्डमतमादिशेत् । अर्चयेद् ऋषिपत्नी'च पूर्वोक्तां लक्षणान्विताम् ॥२८॥ अर्चयेद् विधिमार्गण पूजा दुर्वाससम्मता' । सर्वलक्षणसम्पन्नां पुष्पिणीमर्चयेत्तत: २६॥ मतङ्गमुनिनोक्तं च सद्यः सिद्धिकरं भुवि । इति' मार्गमतं' पुत्र नास्ति सिद्धिगुरोविना ॥३०॥ तस्मात् सर्वप्रयलेनायेद् गुर्वनुज्ञया ॥३१॥ ॥ इति पविद्यागमे सांख्यायनतन्त्र चतुर्वशः पटलः ॥१४॥ ॥अथ पञ्चदशः पटलः ।। पीतवर्णा मदापूर्णा दृढपीनपयोधराम् । वन्देऽहं वगला देवी स्तम्भनास्त्रस्वरूपिणीम् । कोचभेवन उवाष- राजराज स वै श्रीमान् रजतादिनिकेतन । पञ्चास्त्रविद्यां वद मे स्तंभनाख्यान्सपावनान् ॥२॥ ईश्वर उपाध- माद्यास्त्रं वगलानाम्नी रणस्तम्भनकारणम्"। उल्कामुखी द्वितीय च स्तम्भनं भुवनत्रये ॥३॥ ज्वालामुखी तृतीयास्त्रं स्तम्भनं त्रिपु" देवतः । जातवेदमुखी चैव चतुर्थास्नं कुमारक ॥४॥ ब्रह्मविष्णुमहेशानां स्तंभन नात्र संशयः । बहद्भानुमुखी चास्त्रं पञ्चमं तु कुमारक ||५|| षट्पञ्चकोटिचामुण्डा कालिकादिशतं.४ सपादकोटि त्रिपुरा स्तंभनास्वं च उत्तमम् ॥६॥ सुता १. घ. वैश्यपल्ली। ३. घ. प्रचंन । ३. प. दुर्वाससमता ४. घ. पुष्पिता । ५. प. मातममुनिना चोक्त। ६. ख, ग, घ. सिद्धि ७. घ. मागपत। ०प्रयत्नेन वा। ग. घ. प्रयत्नेन अचयेद् । ६. ख. सुख । ग. सचे। घ. सख। १०, स. स्तभनास्य सुपावनी। घ, स्तभनाख्या सुपावनी। ११. घ. कारणीम् । १२. घ. द्वितीया। १३. घ. ऋषि । १४. प. कालिकोटिशव। १५. प. पञ्चमम्।
पञ्चदशा पटल सस्कारेण विना मन्त्र साधकस्य प्रमादकृत् । लोकालोकस्तभन च नाम्ना उल्कामुखी' तथा ॥१६॥ मन्नोद्धार प्रवक्ष्यामि शरजन्मन् समासत । तार च स्तब्धमाया च शक्तिवाराहमेव च ॥२०॥ वगलामुखीपद चोक्त्वा बीजत्रय तु सर्व च । दुष्टाना पदमुच्चार्य पूर्वबीजप्रय वदेत् ॥२१॥ वाच मुख पद चोक्त्वा पूर्वबीजप्रय वदेत् । स्तम्भयद्वितय चोक्त्वा 'बीजत्रय ततो वदेत् ॥२२॥ जिह्वा कोलय उच्चार्य पुनर्बीजप्रय वदेत् । वृद्धि विनाशयोच्चार्य पूर्वबीजप्रय वदेत् ॥२३॥ प्रणव वह्निजाया च उल्कामुख्या प्रय मनु ।* पञ्चाशदूद्व चैवाष्टबीजबद्ध सुपावनम् ॥२४॥ ऋपिश्चाप्यग्निवाराहश्छन्दः ककुभमव च । उल्कामुखी देवता च जगत्स्तम्भनकारिणी ॥२५॥ बीज च वगलाबीज शक्ति. स्वाहासमन्वितम् । कोलक शक्तिवाराह न्यास पूर्ववदाचरेत् ॥२६॥ ध्यान यत्नात् प्रवक्ष्यामि मन्त्रभेदे कुमारक । घिलयानलसकाशा'' वीरवेषेण" सस्थिताम् ॥२७॥ वीराम्नायमहादेवी' स्तम्भनार्थं भजाम्यहम् । एव ध्यात्वा जपेन्मन्त्र मनुलक्ष कुमारक ॥२८॥ प्रपञ्चस्तम्भन कृत्वा स्वविद्या च प्रकाशयेत् । तालकेन हुनेत् पुत्र लक्षमेक हुताशने ॥२६॥ मत्रसिद्धिर्भवेत् पुत्र त्रैलोक्ये कोतिमान् भवेत् । तस्याज्ञया जगत्सर्व स्थावर जङ्गमात्मकम् ॥३०॥ कुमारक प्रवर्तन्ते" सर्वाश्चर्यकर भुवि । 'सिद्धि चतुर्विधा"" चंव एतन्मन्त्रस्य जापके ॥३१॥ १. ध पोल्का मुखो। २ घ पुनर्बीजश्रय । ३ प पुनजित्रय । ४ ५ पुनर्बीज. । ५. घ. स्तब्धमायां ध्र व वह निजायांवोल्कामुखीमनः । ६ घ. बीजयुक्त । ७ प. ऋषिश्च । यज्ञबाराहाछन्दः। ८ घशक्ति। ६. घ. मन्त्रभेद। १० प विनया०। ११.ख. वीरवेशेन । घ वीरावेरोन । १२. घ. विराण्मयी महादेवी। ११. क ख.ग. क्षपाशन । १४. घ. प्रवर्तव। १५. स. प. सिदिश्चतुर्विधा।
४. ] सांख्यायनतन्त्रे इच्छया वर्तते सर्वमाश्चर्यकरमादरात् । नदी नदश्च' रतिमान् नानापादपसकुलम् ॥३२॥ मागच्छेत्याज्ञया तस्य पुनर्गच्छन्ति चादरात्। किन्न स्यात् पद्ययुक्तानि माहात्म्य पदग मन ॥३३॥ कामयेन्मन्त्रमेतद्धि' क्रौंचभेदनकोविद ॥ इति षड्विद्यागमे सांस्यायनतन्ने यनसपटलः ॥५॥ मथ पोडशः पटलः ।। बन्धककुसुमाभासा बुद्धिनाशनतसराम् । वन्देऽह वगला देवी स्तम्भनास्त्राधिदेवताम् ।।१।। धवन उवाच- नमस्ते गिरिजानाध मन्त्र विद्यागमप्रभो। मधुना चास्मविस्तार वद मे करुणाकर ।।२।। ईश्वर उवाच-- तार च स्तब्धमायां प प्रासाद प ततः परम् । पुनलिस्य. स्तब्धमायो प्रणप घ ततः परम् ॥३॥ वगलामुखिपद चोक्त्वा सर्वदुष्टपद वदेत् । न(ल?)वार दीर्घसयुम बिन्दुना भूपित तपा ॥४॥ बोजपश्चय मुच्चार्य पाच मुख पर यदेत् । स्तभयदयमुच्चापं पञ्च बोजानि चोचरेत् ॥५।। जिहां वोलप उच्चार्य पञ्चबोजानि पोचरेत् । बुरि दिनाशययुग" पञ्चबीजानि पोचरेत् ।।६।। पहिनायासमाय" प्टियत्मिा" मनम्। जातवेदमगोमन्त्र जगदापारफम् 11011 पपवन बनोग्य मानायरः । पापि: पालाग्निस्तु पतिपय उपाहतम् ॥८॥ २. प. पिरलो।।.प. पागमयशपा.प.सार। ५. ग. प्रियातानि। प. पुस्तक रिप:- मित पाठाना माहात्म्य पेहरा मनो। पदयोग पुम्सामा मोपकारम 1.प. गोप.मर.1 ७. प. प्रयोग परुपमपटमः। ८.प.मापन १.. प. पुनमिले। ११ प. माराम प। १२. प. समानुः । १४. य. मनु। प. पाटो मारिवा १ प.महारप। 11.प. रमबोर पोरशः पटलः [४१ Awwanm जातवेदमुखी मत्रदेवता' समुदाहृता । ॐ बीज ही' च शक्तिश्च ह कीलकमुदाहृतम् ॥६॥ पूर्ववन्यासविद्या' च ध्यान वक्ष्यामि पुत्रक। जातवेदमुखी देवी देवता प्राणरूपिणी ॥१०॥ भजेऽह स्तम्भनाथं च स्तम्भनी विश्वरूपिणीम् । एव ध्यात्वा जपेमन्त्र शिल्लक्ष सुपावनम् ॥११॥ चर्मघगवसनो भूत्वा चिन्तिवार्थप्रद ध्रुवम् । गन्धर्वाचव यक्षाश्च गरुडोरगपनगान् ॥१२॥ वेतालडाकिनोप्रेतशाकिनीब्रह्मराक्षसान् । ऋषिदेवगणाश्चैव सिद्धानन्याश्च पुत्रक ॥१३॥ अधुना स्तम्भवत्येतत् सत्य शङ्करभाषणम् । तार च स्तब्धमाया च वहिबीज च पचकम् ॥१४॥ प्रस्फुरद्वितय चैव वीज चव प्रयोदश । ज्वालामुखी 'पदं चोक्त्वा वदेवीज त्रयोदश ॥१५॥ सर्वशब्द ततोच्चार्य दुष्टाना पदमुच्चरेत् । बोजा त्रयोदशं चोक्त्वा वाच मुख पद वदेत् ॥१६॥ स्तम्भयद्वितय चोक्त्वा पुनर्बीज' त्रयोदश । जिह्वा कीलय चोच्चार्य पुनर्बीज त्रयोदश ॥१७॥ बुद्धि विनाशय चोक्रवा" पुनर्बीज त्रयोदश । वह्निजायासमायुक्त ज्वालामुख्यमय" मनुः ॥१८॥ शतोतर भवेदिशबीजबदो मनुस्त्वयम् । प्रत्रिश्च ऋपिरेवा" गायत्रीछन्द उच्यते ॥१६॥ ज्वालामुखी देवता च स्तम्भनाय त्रिमूतिभिः । ध्यानं यत्नात् प्रवक्ष्यामि न्यास पूर्ववदाचरेत् ॥२०॥ १. घ. देवी देवता। २. रु. ५, ह्रीं। ३. घ. विद्या। ४. घ तम्मनी। ५. ५. विश्वरूपिणी । ३. प. मनूनां सभवेत्येतत् । ७ प. न्योत । ८. ५. च उचार्य । २. क बोज। १०.घ, बीजा। १. वीजा १२. घ. युग्म च। नापाययग्मच। १४. ख. ज्वालामुख्यास्त्वय । १५. प. स्तब्धमामानिन्हिजाया ज्वालामुखीमनुः। १६. प. ०रेवास्य । १७. प. एव च ।
४२ ] सांस्यायनतन्त्र ध्यान विना भवेन् मूकः सिद्धमन्त्रोऽपि पुत्रक । ज्वालापुजसटोन्मुक्ता' कालानलसमप्रभाम् ।।२१।। चिन्मयी स्तभनी देवी भजेऽह विधिपूर्वकम् । एव ध्यात्वा जपेन्मन्त्रमर्कलक्ष सुबुद्धिमान् ॥२२॥ तर्पण च गवा क्षीरस्तालकेन हुनेत् सदा । तर्पण च चतुर्लक्ष लक्षमेकं हुनेत्सदा ॥२३॥ सहस्रद्वितय चैव 'ब्राह्मणाना सुभोजयेत् । त्रिमूत्ति स्तम्भयेन्मत्री पञ्चतत्वान्यपि क्षणात् ॥२४॥ आश्चर्यद महामन्त्र नराणा दुर्लभ भुपि । इदानी मन्त्रराज च बृहद्भानुमुखाह्वयम् ॥२५॥ 'मारण स्तभबाण" च पाश्चर्य च कलौ युगे। तारं ह ला हलो च उच्चार्य हल हल ह लौ च ततः परम् ॥ २६॥ ह,लस्तथाप्युच्चरेत् पुत्र ह ला ह ली हलच ततः परम् । हल हलो ह लश्च ततश्चोक्त्वा वगलामुखिपद वदेत् ॥२७॥' सर्वशब्द ततोच्चार्य दुष्टाना पदमुच्चरेत् । वाच मुख पद चोक्त्वा स्तम्भयद्वयमुच्चरेत् ॥२८॥ आद्यबीज पुनश्चोक्त्वा* उद्धरेत् पुनराद्यवत् । जिह्वा कोलय उच्चार्य पूर्ववद् बोजमुद्धरेत् ।।२६॥ बुद्धि विनाशयोच्चार्य पूर्वबोजानि" चोच्चरेत्"। वह्निजायासमायुक्तो बृहद्भानुमुखोमनुः ॥३०॥" सविता च ऋषि ख्यातो" गायत्रीछन्द एव च । देवता स्तम्भनाथं च वृहद्भानुमुखी तथा ॥३१॥ १. प. ज्वलपुसजटामुक्त। २. प. मुत । २. स. ब्राह्मणान् सुत भोजयेत् । ४. प.गस्तम्भनदा । ५. प. ततस्तार। ६. प्रतः परपयमयो दृश्यते प. पुस्तके- "मायबोज मनोः सस्या उदरेत् पुनरादरीत" ७.१. मनो. सस्था। ८. प. पुनरादरात्। ६ प. नाराय उन्माम्य । पूतीनं। ११. प. समुच्चरेव । १२. प. पुस्तके स्वयममो विशप.- स्त.पमाया तारकप द्विजायातक युक्त । रहतानुमुसीमा पटुप्तरपतारादे" ॥ ११ प. ऋषिराना सप्तवसा पदला बीजं च बगलाबीजं शक्तिर्माया कुमारक ! कोलकं प्रणव चार विनियोगस्ततः परम् ॥३२॥ पूर्ववन्यासविधां च तन्त्र राजवदाचरेत् । ध्यानं यत्नात् प्रवक्ष्यामि मन्त्रभेदेन पुत्रक ॥३३॥ कालानल निभा देवी ज्वलत्युञ्जशिरोरुहाम् । कोटिबाहुसमायुक्तो वैरिजिह्वासमन्विताम् ॥३४॥ स्तम्भनास्त्रमयी देवी दडपीनपयोधराम् । मदिरामदसयुक्तां बृहद्भानुमुखी भजे ॥३५॥ एव पारवा जमिनमर्कलक्ष कुमारक । तर्पयेत्तद्दशाश च गुडोदकसमन्वितम् ॥३६॥ तालकेन हुनेत्तस्य दशाश सस्कृताग्निना । ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चात् तद्दशांश कुमारक ॥३७॥ मन्त्रान्ते च प्रकर्तव्यं सौभाग्यानमादरात् । सौभाग्या! विना पुत्र मन्त्रसिद्धिन जायते ॥३८॥ पञ्चास्त्रमन्त्रसिद्धिहि दिवि देवेषु दुर्लभा । गोपर्यत् सर्वदा पुत्र* 'गुप्ता वीर्यवती भवेत् ॥३६॥ 'न कर्तव्यः प्रयोगोऽस्य" शपयादि कदाचन । यः करोति प्रयोगं च देवताशापमाप्नुयात् ।।४।। इति षषिद्यागमे सांस्पायनतन्त्रे पोरशः पटलः ।।१६।। ॥ प्रथ सप्तदशः पटलः।। "जिह्वानमादाय 'करेण देवी" 'वामेन शत्रून् परिपोडयन्तीम् । पीताम्बरा पोनपयोधरादयां सदा 'स्मरेऽह बगलाम्बिका""हृदि ॥१॥ फोनभवन उवार-- चन्द्रचूड नमस्तेऽस्तु इन्दिरापतिपूजित । शताक्षरीमहामत्रं बगलायाश्च मे वद ॥२॥ १. घ. विनियोगं च। २. घ. संस्मृतम् । ३. प. ललज्जिह्वासमन्विताम् । ४.प. मदिरामोदसपुता। ५. घ. भजेत् । ६. घ. दुर्लभम् । ७. घ. पुषी गोप्ता वीर्यापतिर्। १. प. न कर्तव्य प्रयोगश्चि । १०. ख. घ. प्रापद्यपि। इतः पूर्वमयमंशो प. पुस्तके-'हरीहरेश्च समर्या'। १२. घ. करदयेन । मुत्पाटन्तिमरिक्तियुक्ताम् । १४. भ. पीत.। १५. घ. स्मरेयं बगलामुखी ६.घ.
४४ } सांख्यापनतन्त्र ईश्वर उवाच-- मन्त्रोद्धार प्रवक्ष्यामि पुरश्चर्याविधि तथा । प्रयोग चोपसहार वक्ष्ये ह तव पुत्रक ||३|| स्तब्धमाया च वाग्बीज माया मन्मथमेव च। श्रीवोज' शक्तिवाराह 'वगलामुखि चोच्चरेत् ॥४॥ स्फुरद्वय तथा चोक्त्वा सर्वशब्द ' तवोच्चरेत् । दुष्टाना पदमुच्चार्य वाच मुख पद वदेत् ।।५।। स्तम्भयद्वयमुच्चार्य प्रस्फुरद्वयमुच्चरेत् । विकटाङ्गीपद चोक्त्वा धोररूपीपद वदेत् ॥६॥ जिह्वा कीलय उच्चार्य महाशब्द ततोचरेत् । पश्चाद्भमकरी चैव बुद्धिं नाशय उच्चरेत् ॥७॥ विरामयपद' चोक्त्वा सर्वप्रज्ञामयीति च। प्रज्ञा नाशय उच्चार्य उन्मादीकुरु युग्मकम् ॥८ मनोपहारिणी चोक्त्वा स्तभमाया' समुच्चरेत् । शक्तिवाराहबीज च लक्ष्मीबीज'' ततः परम् ॥६॥ कामराज च हल्लेखों वाग्भव तदनन्तरम् । स्तब्धमाया ततोच्चार्य वह्विजायासमन्वितम् ॥१०॥ शताक्षरीमहामन्त्र वगलानाम पावनम् । ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दोस्य गायत्री समुदाहृता ॥११॥ देवता वगलानाम्नी जगत्स्तम्भनकारिणी। ह.लो बोज शक्तिरित्येव वाम्भव कीलक तथा ॥१२॥ पूर्वोक्ता न्यासविद्या च वगलापञ्जरादयः । न्यासानुक्तकमेणव" 'जपाद्या पच एव च पीताम्बरधरा सौम्या पोतभूषणभूषिताम् । स्वर्णसिंहासनस्था च मूले कल्पतरोरप"१४॥ १ घरमा च। २. ह.लीकार बगलामुखी। ३. घ, सर्व बन्द घोररूप पद। ५ प. मुच्चार्य। ६. प. विराश्मयोपदं। ७.प.सप्रज्ञाममोत्परे । ८. घ. उन्माद कुछ। ..घ स्तम्धमायो। १०. प. रमाबीजा ११ घ.न्यास- मुक्तकमेव । १२ ख जपादावाचरेत सुधी. प. पपादावन्त्यमेव च । १३. प. •स्तया।
सप्तदशा पटस वैरिजिह्वाभेदानार्थ' छरिका बिभ्रती शिवाम् । पानपात्र गदा पाश धारयन्ती भजाम्यहम् ॥१५॥ एव ध्यात्वा जपेन्मन्त्रमर्कलक्ष क्षपाशना । सप्पंयेद्धतुमिश्रण वारिणा वाथ पुषक ।।१६।। 'जातिपकसमिश्रजलेन' च कुमारक । पूजायुत च सन्तर्प्य ह्यचिंतेन जलेन च ।।१७।। मिध्वक्त पायसेन अथवा पायसाज्ययो । चरणा वा हुनेत् पुत्र सहर तत्वसख्यया ॥१॥ नानादेहजरोगाश्च कृत्रिमग्रहसमवान् । यावकाश्च' प्रयोगाश्च 'तुल्यधातुसमुद्भवान्" ॥१६ सद्योनाशनमायानि मन्त्रहोमेन साधकः । 'साज्यसक्तुघताक्त चशमन्तकुसुमेन वा ॥२०॥ षट्सहन हुनेत् पुत्र स्थण्डिले वाथ कुण्डके । वशीकर च समोह कोत्ति प्रज्ञा भवेद् ध्रुवम् ॥२१॥ तालकेन हुनेत् पुत्र सहस्र वसुसंख्यया। कुण्ड चैव भगाकारे राजतानो" कलौ निशा ॥२२॥ स्तम्भन च भवेत् पुत्र नान कार्या विचारणा । अक्श्च पिचुमद्देश्च" समिध" सग्रहेनर' ॥२३॥ प्रत्येक निसहन च प्रादेशसमिधा क्रम मन्न सर्व समुच्चार्य समिषाद्वयमेव च ॥२४॥ हुनेद् ध्यानसमायुक्त सद्यो विवषण भवेत् । विभीतकस्य समिधो ग्राह्यास्तु विसहस्रकम् ॥२५॥ षट्कोणकुण्डे जुहुयानिशायां कृष्णपक्षके । स्थावरांश्च गिरीश्चैव नदीपादपसकुलान'" ॥२६॥ १५. ०छेदनाथं । २ प क्षुरिको। ३ ख ग जाती(ति) एक । ४ प, वारणायुत। ६ प पुस्तके स्मारपरमधिकोशो दृश्यते- 'पर्यायफलदायक । उपरगन हुनेत्र'। ७-८ घ यावकाश्य प्रयोगाश्च ६ ख ग घ शल्प(स्य)धातु । १० ख, शाली सक्तः । ग साज्यसक्तु० । घ शालिशक्तुघताक्तां च । १५ प रजकानी। ख पिचुमश्च । १३ ष समिधा। ४ ख ग प्रादेशसमिघ क्रम । घ प्रादेश- समिधाक्रमात । १५ क प्रहास्तु । ग प्रहा। १६ प नदीपादपसकुसुमं तपा। ५ ध पायस ४६] सांस्पायनतन्त्र क्षणादुच्चाटन कुर्याद् होमस्यास्य प्रभावतः । निम्वतलेन सयुक्त शाल्मलीकुसुम तथा ॥२७॥' जुहुयाद्देवतां' ध्यात्वा' मारणं भवति ध्रुवम् । पट्कर्मनिर्माणमिद सुसिद्ध शताक्षरीमन्त्रमशेषदुःखहम् । होमेन सस्तम्भनमाचरेद् बुधो- विद्यासुसिद्ध मुनिगुह्यमादगत् ॥२८॥ ॥ इति पविचागमे तात्यायनतन्त्रं सप्तदश पटतम् ॥१७॥ ॥प्रय अष्टादशः पटलः॥ नमस्ते जगता देवो जिह्वास्तभनकारिणीम् । भजेऽहं पवनासार्थ साधकासतमानसाम् ॥१॥ कोचभवन उवाच- सम्यगजान" महेशान नित्यनित्यस्वरूपक''। चन्द्रचूड नमस्तेस्तु प्रयोग वद मे प्रभो ॥२॥ परवाच- पट्सहन हुनेत् पुष होममतन्द्रित: । 'सम्यग् विषज्वर"" हन्ति वगलाया: प्रसादतः ॥३॥ दुशेन हयात्तस्य तापज्वरहर" परम् । हुनेत् तावत् स्वेतदूर्वा ज्वरं पातुधिक हरेत् ॥४॥ त्रिमध्वस्त" वेतदूर्गा पट्सहस हुनेत्रमात् । नानाविध गर हन्ति नात्र कार्या विचारणा ॥५॥ दधिमित्र गुड़ चोभिः ॥रागुस्सम्मिाम् । जहयात् पट्स हस तु नानामहनिवारणम् ॥६॥ १. प. पुस्तके इलोकोप नास्ति। २.प. हयाइएका ४. घ. पदककर्माणि मिद १.प.वयसपमा प. सप्तमः। ६.प. परमः। पदमला। ९.प.नावा १. प. मदिरासन। १. प. मरमसान। ११.प. नित्यानिाय.। १२.प.सदलापबर। १३.प. पी. विपपुरा। १५. स. मिषितम् ।
भष्टावशः पटलः [४७ सर्षपं लवणोपेतं पूर्ववज्जुहुयान्नरः । नाशयेद् गुल्मरोग' च मोषधेन विना महत् ॥७॥ पट्सहस्र हुनेत् पुत्र शकराज्यसमन्वितम् । पित्तोद्रेकादिसर्वाश्च" रोगानाशयति' ध्रुवम् ॥६॥ शालिसक्तुं धृतोपेत वशीकरणमुत्तमम् । लाजाहोम' पट्सहस्र लभेद्वाञ्छितकन्यकाम् ॥९ हरिद्राखडहोम' तु षट्सहस सुबुद्धिमान् । गर्भस्तभो भवेनारी सापि वश्या भवेद् ध्रुवम् ॥१०॥ केतकीदलहोमेन गणिका वश्यमाप्नुयात् । हुनेत् पद्मदलेनैव नेत्र रोग विनश्यति ॥११॥ मल्लिकाकुसुमेनव अधिका च मतिर्भवेत्"। जातोफलेन जुहु यादुन्मत्तो जायते रिपुः ॥१२॥ पट्सहस्र देवकुसुम शर्कराज्यसमन्वितम् । बुद्धिगचंद चाञ्चल्य सज्ञानमुन्मतिस्तथा ॥१३॥ प्रलोकेन" क्षुद्रमतिर्दुर्बुद्धि सिद्धबुद्धिता"। तत्क्षणानाशमाप्नोति तम. सूर्योदये" यथा ॥१४॥ मास सपुटसयुक्त' 'द्रव्येण सममेव च। अयुत जुहुयाद्रात्रौ सयो धनपतिभवेत् ॥१५॥ मध्वाक्त 'भागमास च" त्रिसहन हुनेत् सुत । 'भूलाभ जायते" शीघ्र प्रामादिपतिरेव च ॥१६॥ गोडोद्रव्येण जुहुयात् सहन बाणसल्यया । बहुमूत्रादिरोगाश्च नाशयेत्तान् न संशयः ॥१७॥ . १.ग रुग्मरोग। २. प. पंत्योद्भवाश्च शतशो। ३. नाशयेत् । ४. स. ग. प. शालिशक्तु । ५. प. सितोपेत। ६. ५. लाहोमात् । ७. प. होमस्तु । ८. क. बहन। ६. स. वक्ष्या। १०. घ. मादरात् । ११. स. वाधिका शुभमतिर्भवेत् । १२. ५ देवपुष्प। १३. स. उदग। १४. उच्चाटकमतिस्तपा। १५. स. भविवेक ष, प्रविषको। १६. प. मन्दबुद्धिता। प. विविबुदिता । १७. घ. सूर्योदयो। १८. स. तु कुसफुटस्पैर । प. कुक्कुटसभूत । १६. प. विमषुः सहितेन । २०. प. धागपि. शित। २१. प सुलभ च भवेच् । २२, ५. प्रामाविका २३. क. ग. प नारायति ।
४८J सात्यायनतन्त्र माध्वीद्रव्येण जुहुयात् पट्सहस्र क्रमेण च । ज्वरपक्ष्यादिरोगांश्च' सद्यो नाशनमाप्नुयात् ॥१८॥ पैष्टीद्रव्येण जुहुयानिशास्वष्टसहस्रकम् । सग्रहग्रहरणोरोग सद्यो नाशनमाप्नुयात् ॥१६॥ भन्नेन 'अन्वहो हुत्वा' अन्नदानपतिर्भवेत् । घृतेन कान्तिमान् भूत्वा नारीणामात्मदो भवेत् ॥२०॥ क्षीरेण भ्रमनाशश्च दना तापननाशनम् । पञ्चगव्येन जुहुयात् पूर्ववत् पाप नाशयेत् ॥२१॥ गोमूत्रेण हुनेन्मन्त्री षट्सहस्र क्रमेण च। तालीमद्येन" जुहुयात् स्त्रीणामाकर्षणं भवेत् ॥२२॥ खजू रजेन द्रव्येण पुसामाकर्षणं भवेत् । तिलतैलेन जुहुयात् सर्वाकर्षणमाप्नुयात् ।।२३।। एरण्डतलेन जुहुयाद" वाचाकर्षणमाप्नुयात्"। कुसुभतेलहोमेन' काकगृध्राननेकशः" ॥२४॥ आकर्षण भवेच्छीघ्र खेचराः पक्षिजातयः । यवना" पानहोमेन अग्निमध्याद्रिपुः स्वयम् ।।२।। रोगी च जायते मासाच्छिवस्य वचन यथा । जुहुयादारनालेन पित्तरोगी भवेद्रिपुः ॥२६॥ निम्बपत्रद्रवेणेव वातरोगी भवेद्रिपुः । मोहिनीपप्रजद्राव: ६ दलेष्मरोगी भर्वेद्रिपुः ॥२७॥ - १. ग घ. ज्वरपत्यादि। २. प. हुस्वानकामी। ३. प. दानपरो । हेत्वा । ५. नारीण मन्मयो। ६ प. वापनिवारणम् । ७. प. पापशान्तये। ८. प. हुनेीमान् । ६. प. पुस्तके विरोप:- विदार विवशो भावादिपुन्तिो भविष्यति। १०. ख. तालीम येन । घ. तालमयेन । ११. प. एरणतलहोमेन । १२.१. गपाकर्षण। १३. स. ग. प. पुस्तकेप्यतः परमयमयो दृश्यते विशेष:-- 'पूर्ववयोममानतः । जसजाना प होमेन[प. जलवायचंय यो भंदा)भवेदापण सुठ । करजतलहोमेन'। १४. प. काकगुमायनेकरः। १५. प. पक्षिजा यत' पवमा यावतालाप १७. प. पग्निमांच रिपो.। १८ स. मोहिपजतदावः। . प.
एकोनविंशः पटलः [ ४६ अर्कपत्रद्रवेणव क्षयरोगी भवेद्विपुः ।' 'वजीक्षीरेण सयुक्तमारनालेन' पुत्रक [॥२८॥ जुहुयात् पट्सहस्र तु वगलाध्यानपूर्वकम् । नाडीव्रणसमायूक्तो' (:) षण्मासान्नियते रिपुः ॥२६॥ गर* च तिलतल च मारनालयुतेन च । 'ग्रामे वा नगरे वाय वगलाध्यानपूर्वकम् ॥३०॥ 'स्फोटवणाश्च जायन्ते" रिपोर्योजनमात्रता ।' तिलतलेन सयोज्य यावनालानमेव च ॥३१॥ जुहुयात् पूर्ववच्छत्रु मण्डलाच्छिन्शोपक."। कपूरमिलित व तिलतल हुनेत् सुधी.३ ॥३२॥ मारणं मण्डलाच्छनोत्रि कार्या विचारणा ॥३४॥ इतिषविद्यापमे सांसमापननन्ने प्रष्टादश पटसः॥१८ ॥ अथकोनविंशः पटल. ॥ चतुर्भुजा त्रिनयनां पीतवस्त्रधरां शुभाम् । वन्देऽह वगला देवी शस्तभनकारिणीम् ॥१॥ १. सप्तविंशतिपद्योतराखंस्थाधाविशतिपयपूर्वादस्य च स्थानेऽयमयो लभ्यते घ. पुस्तके- 'पविभोतकोद्भुत तस्य स्वरसहोमतः जातिभ्रष्टो भवेधव नपिपा शिवमापितम् ॥ सत्कारिपत्रद्रायः कर्मभ्रष्टो भवेद्रिपुः । निगुपडीपत्रजदावज्वररोगो भवेदिपुः ।। फसिपत्रजद्रावोमेन कुमारका बद्धकोष्ठाश्च रोगस्य स्वमादेनेवसिस्थति ॥ हरीतकीच होमेन बगरोगी भवेद्विपुः । २. घ. वनक्षीरेण समिधः। ३. प. नावापरो भूत्वा । ४. घ. मगर। पुस्तके विशेष:--- সমই রং যাই কা মক্কীয় ৰালি ধুৰৰয়া মাবু। भगदरपणो भूत्वा पग्मासान् प्रियवे रिपुः। ६. प. फोटकबहा रोगेन । ७. घ. रिपुर्यो । + मता परमशः स. प. पुस्तके विशेष 'प्रियते नात्र सन्देहः शिवस्य वचन यथा । क. स.पावनालासमेव १०. प. पूर्ववत्पुत्र । ११. प. म. छिन्नसराय । आपन मारणम् । १२. घ. मिश्रित १३. घ. सुत । १४. घ. म्रियते। १६. प. शिवाम् । घ.
५० ] सांख्यायनतन्त्रे स्कन्द' उपाध- नमस्ते योगिससेव्य नमः' कारुणिकोत्तम । प्रयोगं चोपसहारं वद मे सर्वमङ्गल ॥२॥ ईश्वर उपाच- प्रेताङ्गारमधी' कृत्वा सितवस्त्रेण' बुद्धिमान् । शल्य' तदन्तरे भस्म वैरिनाम' च सलिखेत् ।।३।। 'एका वगला देवी' 'वेष्टयेत् सम्यगादरात् । 'शताक्षरी च सवेष्टय ईशानादिपुर ' वेष्टयेत् ।।४।। तद्वस्त्र' गुलिकोकृत्य'' वेष्टयेत् प्रेतरज्जुना। भीमवारे समानीय स्थापयेद् वृक्षकोटरे ॥५॥ वृक्षमूले जपेन्मन्त्रममुत ध्यानपूर्वकम् । पुत्रदारादिसंयुक्त: पक्षाच्छमतो भवेत् ॥६॥ भूर्जपत्रे'' लिखेनाम" वगलाबीजमध्यमम् । कोटरे स्थापयेत् पुत्र विभीतकतरोस्तथा ।।७।। जिह्वास्तम्भ भवेच्छयो: पक्षमात्रेण पुत्रक । वृहस्पतिसमो वापि वाचस्पतिसमोऽपि वा ।।६ तालमध्ये लिखेनाम वमलावीजमध्यमम्"। प्राणप्रतिष्ठा कृत्वाऽथ" निर्दहेद्' दीपवह्निना ॥६॥ जपेत्ता सहस्रक शताक्षरमनु" तथा । जिह्वांस्तंभं भवेच्छोघ्रं शेषभाषापतिः स्वयम् ॥१०॥ प्रेतभाण्डे लिखेनाम प्रेताङ्गारेण साधकः । प्राणस्थापनक कृत्वा रखो रात्री सवुद्धिमान् ॥११॥ प्रेताग्नी प्रेतकाष्ठे तु" निईहेत् प्रेतकानने । नग्नः श्मशानमध्ये तु जपेद् दक्षिणदिड मुखः ॥१२॥ - १. प. क्रौञ्चभेदन। २. घ. महा। २. स. .मयों। प. मशि। ४. प. प्रेत- वस्त्र प.स. ग.२, पल्प। ६. घ. मरि। ७. प. एकाक्षरौं पवमा ८.प. मत्रताारीभिश्च ईशान्ये दिक्ष । ६.क. प. सदस्य। १०. प. गुटिकीयस्य । ११. ग. प. भूयंपत्र। १२. प. रिपु म । १३.छ.ग.प. मध्यगम्। १४. प..। १५. प. निदेही। १६. प. पताक्षरिमनु । १७. .चत्रो। १८. प्रमाणे १६. प. पु.
एकोनविश पटस [ ५१ - VIDE LIBRAR सहस्र ध्यानपूर्व तु प्रातर्यामे समासत एव कृत्वा तु सप्ताह ज्वरस्थो जायते भुवि ॥१३॥ मासान्मुत्युवशो' भूत्वा विनश्यति न संशयः । श्रीसूक्तमार्जनेनैव तन्मन्त्रेणाभिमन्त्रितम् ॥१४॥ BOMBAY शतमष्टोत्तर चैव सहस्र वा कुमारक । मश्रितोदकपानेन पुण्य सुखमवाप्नुयात् ।।१।। चिताभस्म चिताङ्गार चितान' च कुमारक । मोहिनीपप्रजद्रावयेत् सूक्ष्मतोऽनघ ।।१६।। सम सम रिपूच्छिष्ट मईयेत् कल्पयेत् पुन 'चतुरङ्ग ला पुत्तली" कुर्यात सर्वाङ्गसयुताम् ॥ ७॥ हृदि तमाम चालिल्य ललाटे वगला लिखेत् सर्वाङ्गे चाग्निबीज च लिखेद् बिन्दु च निईहेत ।।१८|| प्रेतवह्नो प्रेतकाष्ठे प्रेतमास सुपुत्रक । जपेत्तत्रायुत पुत्र रिपुर्गच्छेद्यमालये ॥१६॥ स्नुह्या क्षीरेण सयुक्त 'मह येत् श्वेतसपर्व चतुरङ्ग लपुत्तल्या लिखेत् पूर्ववदाचरेत ॥२०॥ 'स्थापयेच्चलयधोभागे"" यमघटकयोगत । तत्रोपरि दिवारानी अग्नि सस्थाप्य बुद्धिमान् ॥२१॥ बगलाबीजमध्यस्थ साध्यनाम च सलिखेत् । वेष्टयेद्वगलामन्त्र ईशानादिशताक्षरम् ॥२२॥ प्राणप्रतिष्ठा कृत्वा तु सहारक्रमतोऽयेत् । शताक्षर्यकसोरस्तु स्नुहोक्षीरेण लपयेत् ॥२३॥ 1घ समापयेत् । २५. । ३ क ख ग वो। वाय । पचितिभस्म । ६ ५ प्रतान। ७ घ चतुर पुसली चंव। ०यमालयम् । १० ५ स्नुही। ११ प. श्वेतसपप मईयेत् । १२ घ चुल्ल्य० । १३. सघ पुस्तकस्योऽयमशो विशेष - प्रयुत च दिवाराको एकाक्षरमनु जपेत् मसूरिकारवराच्छच पक्षान्मरणमाप्नुयात् । मपत्र लिखेनाम भकोरेए बुद्धिमान् । १४.५ ईशान्यादि। १५ ख ग घ पुस्तकेषु निम्नांशो विशेष सतपेद्दीपशिखया पुत्तली तो विशेषत । प्रष्टोत्तरशत कृत्वा याक्षर्यादि फरुपयेत् ॥ 13 ६ स.गध ५२ ] सांख्यायनतन्त्र . एव कृते सप्तरात्रं स शत्रुश्च मृतो भवेत् । मसूरिकाजरासक्तः पक्षाद् गच्छेद् यमालयम् ॥२४॥ मन्त्रयेनिम्बपत्रेण एकमेक क्रम क्रमम् । चन्द्रप्रसादमन्त्रण शीतलाविद्यया तथा ॥२॥' ॥ सपर्णा" क्षालयेत् क्षीरैः सदाहः शान्तिमाप्नुयात् ।' तिक्तकोशातकोजातिः तापिच्छी सादर तथा ॥२६॥ धत्तूरकं च तन्मूनि 'कारवेल्या फलाकृतिम् । 'षट्मन.शिलाबीजश्च" त् िपादद्वय तथा ॥२७॥ बदरीमूलतो गत्वा प्राणस्थापनक चरेत् । मन्त्रमुच्चारयेत्पुत्र तदन्तः शत्रुमुच्चरेत् ॥२८॥ श्रोत्रालीगण्डभ्र मध्ये जिह्वानासास्यशेफ्सो' । 'दक्षिणाभिमुखो भूत्वा वगलासम्पुटद्वयम्" ॥२९॥ ब्रह्मस्थाने तालुदेशे कण्टकानसख्यया। 'दक्षिणाभिमुखो भूत्वा" रोपयनग्नतस्तथा ॥३०॥ पञ्च पञ्च करे रोप्य पार्वे कुक्षौ च पृष्ठके । कण्टकान् सप्तसख्याकान् 'मन्त्रयेत् पूर्ववत् ऋमात्" ॥३॥ रोपयेत् पादयुग्मे तु प्रत्येक" द्वादशं तथा । 'मन्त्रपूर्व च सरोप्य" वदरीकण्टकास्तथा ॥३२॥ पुत्तली प्रेतवस्त्रेण बन वा प्रादेशगर्भके"। श्मशानाग्नो" क्षिपे रात्री बलि दद्याच्च कुक्कुंटम्" ॥३३।। १. प्रतः परमयमोऽवलोक्यते प. पुस्तके- "एकाक्षरीविद्यया व साक्षर्या व विद्यया"। २. सुपणान्। ३. प. पुस्तस्के निम्नांशो दृश्यते मंत्रित जुहया मत्री खोरे वापि तथैव प। सप्ताहान्छातिमाप्नोति तमः सूर्योदये उपा॥ ४. ध जाती। ५. स. कारवेस्य० । प. कारवल्या । १. स. म. पशिला निसरीजहर । घ. पदछिता निम्बपत्र च । ७. प. पुस्तके विशेषः पाठः- कटकान्तो (न्ता)पयेदकनेत्रावगेषु पुरक । ८.५ फसो.. ६. क. ग. घ. पुस्तकेषु नास्ति । १०. प. पुस्तके नास्ति । ११. घ. दक्षिणाभिमुखं स्पित्वा । १२. प. .नग्नतो रखो। १३. प. रोपये मन्त्रपूर्वकम् । १४. प. दादरा । १५. घ. ममपूर्वान समारोप्य १६. घ..पसं। १७. प. पमपाने । १८. प. निसिपे। १६. घ. कुमकुटम् ।
एकोनविंशः पटलः । ५३ अश्मयंद' रिपोरङ्गे नाडीशूलं भवेद् ध्रुवम् । तेनैव दुःखितः शत्रुः पक्षाद् गच्छेद् यमालयम् ॥३४॥ वक्ष्येऽह चोपसहारं जीवस्थोऽपि रिपु (पुर) यथा। रवी रात्री बलि दत्वा चानीत्वा साधकोत्तमः ॥३॥ उत्पाटय कण्टकान्यादो' क्षीरेण क्षालयेत् सुत । तच्छलाका च संक्षाल्य नि:क्षिपेत् कूपमध्यगे ॥३६॥ निःक्षिपेन् मन्त्रपूर्व च एक चोत्तरामुखः । शल्वकेनैव' मन्त्रेण मन्त्रयेत् कलशोदकम् ॥३७॥ सहस्रवार विधिवन्" मत्रेण वारिभिः क्रमात् । प्रयोग पीडितं तेन मायेच्छाम्भवेन तु ॥३८।। स्थापयेत् तेन मेण मन्त्रसिद्धिस्तु पुत्रक । ताम्रपा नदीतोये नदीवेगाप्रवेष्टितः ॥३६॥ तस्मिश्च मन्त्रयेत् साध्य मन्त्रणव शतं तथा। त्रिकालं प्राशयेतोय मध्याह्न मार्जनं तथा ॥४०॥ त्रिदिनं चाथवा पञ्च ऋषिसंख्यादिनेषु च." एवं कृते पीडितस्य पीडा सूर्योदये यथा ॥४१॥ 'सहरेच्छान्तिमाप्नोति तमः सूर्योदये यथा । न ज्ञात्वा चोपसंहार यः करोति नराधमः ।।४२।। स जीवन्नेव चाण्डालो मृतः श्वानो भविष्यति । प्रयोगं चोपसंहारमभ्यसेच्च कुमारक ॥४३॥ इति वविधाममे सोत्यायनतम् एकोनविंशः पटलः ॥६॥ - १. ख. प्रश्मर्षद । घ. मयतं । २. घ.रिपु। ३. प. पदा। ४.घ दद्यात ५. स. नीत्वा सा । घ. दानीत। ६. घ. कण्टकान् सर्वा । ७.६. प. तलालट तु। ४, घ, घोत्तर मुखम् । १०. ख. ग. शाभवेनैव । प. शालुवेशैन। ११. विपिना। १२. घ. मत्रित १३. ख, घ, प्रयोग। १४. प. मुदितं । १५. प. शालुवेन। १६. ५. सर्पयेत् । १७. प. तोय । १८. प. नदीवेगानिवेशितम् । १९. प. मंत्रयेत् थल्या मत्रेण शतवार सहलकम् । २०. ५. का। २१. प. पुस्तके विशेषः पाठ:-- देवता पान्तिमाप्नोति तमः सूर्योदय यया २२. घ. तस्य पीटा। २३. प. शान्तिमाप्नोति निश्चितम् । २४. प. पुस्तके नास्ति। २६. प. भिजायते। २६. प. एकोनविंशतिम।
सांख्यापनतम्ने ॥अथः विशः पटलः ।। सर्वावयवशोभाढया' समपीनपयोधराम् । हृदि सभावये देवी वगला सर्वसिद्धिदाम् ॥१॥ स्कन्द पाच- नमस्ते पार्वतीनाथ नमः पन्नगभूषण । परविद्याभेदन च वगलायाश्च मे वद ॥२॥ ईश्वर उवाच मन्त्रोद्धार प्रवक्ष्यामि मन्त्रसभेदनाविधिम् । प्रयोग चोपसहार शृणु सर्वं कुमारक ॥३॥ उद्धरेत्तारमादौ तु स्तब्धमायां ततः परम् । श्रीर्माया पाक्तिवाराह 'वाग्भवं मन्मथं तथा ॥४॥ विलिखेत्ताक्ष्यंबीज' च वगलामुखी' समुच्चरेत् । परप्रयोगमुच्चार्य ग्रसयुग्म 'ततः परम् ॥५॥ पूर्ववन्नवबीज च ब्रह्मास्त्रपदमुच्चरेत् । रूपिणोपदमुच्चार्य परविद्यापद वदेत् ।।६।। असनीति'' पद चोक्त्वा भक्षद्वितयमुच्चरेत् । पूर्ववनवबीज च परप्रज्ञापद वदेत् ॥७॥ हारिणीति पद चोक्त्वा 'प्रज्ञाख्यातियुग वदेत् पूर्ववन्नववीज च स्तम्भनास्त्रपद वदेत् ।।८।। रूपिणीपदमुच्चार्य बुद्धि 'वाचायुग वदेत् । पञ्चेन्द्रियपद चोक्त्वा ज्ञान भक्षद्वय वदेत् ।। पूर्ववन्नवबीज च बगलामुखि उच्चरेत् । हुं फट् स्वाहा'समायुक्त वगलामत्रमुत्तमम् ॥१०॥ शतोत्तर मत्रबीजमष्टाविंशतिरेव च । ५ ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दोऽस्य गायत्री समुदाहृता ॥११॥ १. घ .शोभाया। २. के. सभावयवे। ३. घ. कौञ्चभेदन । ४. घ. वाराह वाग्भवं स्मर। ५. घ. सलिखे। ६ मुखि। घ. कोचरेत् । तोच्चरेत् । ६. घ. पर । १०. घ. गसतीति। ११. प. भक्षयदया। १२. प. प्रज्ञा भ्रशययुग्मकम् । १३. प. विनाशययम्मकम् । १४. घ. श्वाधिचद्रवठिप मत्रमुत्तमम्। १५. पददमिद नास्ति घ. पुस्तके। . 4 ५. -- विश: पटस. [५५ Amwwwwwwwww परविद्याभक्षणी च वगला देवता स्वयम् । मात्र प्रयोग वक्ष्यामि मत्रस्यास्य कुमारक ।।१२। । पाशाङ्क शेनान्तरितः शक्तिबीजेन' विन्यसेत् । 'तत्तद्वागीश्वरोबोजैस्तद्वच्छीबीजतो न्यसेत् ॥१३॥ लघुषोढा च विन्यस्य क्रमादेव कुलेश्वगे। ध्यान यलात् प्रवक्ष्यामि कोञ्चभेदनकोविद ॥१४॥ सर्वमन्त्रमयी देवी सर्वाकर्षणकारिणीम् । सर्वविद्याभक्षणी' च भजेऽह विधिपूर्वकम् ॥१५॥ एव ध्यात्वा जपेन्मत्र लक्षमेक क्षपाशनः । सर्पयेदासवेनैव तद्दशाश कुमारक ॥१६॥ छागमासेन जुहुयान् मध्वाज्येन समन्वितम् । खण्डमामलकप्रख्यमयुत च कुमारक ॥१७॥ योगिनी वीरपूजां च ह्याचरेच्च समादरात् । मप्रसिद्धिर्भवेत्तत्र नात्र कार्या विचारणा ॥१८॥ परप्रयोगकालेषु' मन्त्रमेत कुमारक । 'सहस्रनितय जप्त्वा स शत्रुरवशिष्यते ॥१९॥ शत्रवश्च पुरश्चर्या यत्र कुर्वन्ति पुत्रक तत्रायुतं जप कुर्यात् तत्र विघ्न प्रजायते ॥२०॥ पत्र कुत्रापि रिपवस्तपः कुर्वन्ति निश्चलात् । तत्रायुत जपेन्मत्र असते" परविद्यया" ॥२१॥ प्रयुत तस्य मन्त्रन्तु"अभिमन्य" फल भवेत् । द्रव्याभिमानिनो ये च ये च विद्याभिमानिनः ।।२२।। रूपाभिमानिनो ये च 'ये च यौवनमानिनः । यत्र कुत्रापि तिष्ठति मंत्रमेत कुमारक ॥२३॥ १. शक्तिबीजप। २.प. सतो नागीश्वरी जनच्छीबीच प ततो न्यसेत् । 1. •७. प. भक्षिणी। ४. प. माध्वाज्येन। ५. प. प्रस्यमयुत। ७. घ, मेन । ८. प. सहस्रषिवयान पुत्र । ६. क. ग. निपुत्रक। १.. मस्ते । ११. प. रिपुषिद्यया। १२.प.मत्रस्य। १३. प. पग्निमत्य । १४. घ. मास्ति। ।
५६] साक्ष्यापनतन्त्रे . परविद्याभक्षणारय' मत्र चंवायुत जपेत् । श्वेतवेशान् समायाति दन्तगून्यो भवद्रिपुः ॥२४॥ सद्यो यौवनहीन तु 'तम सूर्योदय यथा'५ रूपवान व्रणयोगी च भवत्यव न सशय ॥२५॥ जात्याभिमानिनो ये च निन्दको भवति ध्रुवम् । 'तपोऽभिमानिनो ये च" अङ्गहीनो विजायते ॥२६॥ वैदिक च परित्यज्य विपरीतकृत' भवेत् । विद्याभिमानिन सर्वेश्प्ययुत'' जपमाचरेत् ॥२७॥ भवेद्विद्याविहीनोऽपि मुष्करो" भवति ध्रुवम् । देहाभिमानी पुरुपो नष्टदेहो भवेद् ध्रुवम ॥२८॥" दौर्भाग्यन समायुक्त " सर्व सम्माहन भवेत् । एतन्मनस्य माहात्म्य न जानन्ति ऋपीश्वरा ॥२६॥ 'सर्वे स्व"५ देहज मह्य" स्वप्रभावात्" प्रकाशिनी । योगाभ्यासो'८ योगसिद्धो तपस्वी सत्यवादिन ॥३०॥ मत्रण• सिद्धोऽसिद्धोऽपि यन प्रत्यति 'पुत्रक । परविद्याभदन च मनोपासनतत्पर [॥३१॥ यत्र गत्वा समासीन एतन्मन्त्रायत जपेत् । योगसिद्धो मनसिद्धस्तपस्वी शतजीविन '(त.)२॥३२॥ महाक्रान्तो 3 भवेनो चनिन्दकोपि भवेद ध्रुवम् । ये ये तन्मत्रराज च नित्यमष्टोत्तर जपेत ॥३३॥ 'एतद्राज्य स मासेन' अम्बासेवापरो" भवत् । न तत्समधिको भूयानव द्वषकरो भवत् ॥३४॥ २ प श्वेतकेगा । ३ प हीन । ५ च भवत्यव म सशय'1 ६ प पुस्तके नास्ति । ७ ५ नास्ति । ५ पिजायते । एघ विपरीतक्रमो। १० घ सर्व प्ययताज। ११ घ जपमासुत। १२ ख ष सूकरो। १३ ख घ पुस्तकस्थ पाठोऽय विशेष द्रव्याभिमानी पुरुषो नष्टद्रव्यो भवेद् ध्वम् । १५ ख सवस्व। १६ घ मोह। १४ घ समायुक्त । १७ ५ स्वप्रकाशात। १६ घ योगसिद्धि । २. ध योग। २१ ध तिष्ठति। २३ ख ग मदाका तो। पापा. २२ घ योगसिद्धस्तपस्वी च मसिदा समीपत । का वो। २४ घ ए। २५ घ द्राज्य च जना सर्वे। २६ घ वश्या सेवा। १ घ भक्षणार्थी १८ घ योगाम्यासे। २७ घ .समाधिको।
एकविश: पटल [ ५५ www नव निन्दाकरो भूयाद् यदीच्छेद्ये च (च्चेत्स्व)जीवितम् ॥ ॥इति पवियागमे साल्यापनातन्त्र विशति:२ पटर: ।।२०॥ ॥अथकविशः पटलः ।। परप्रज्ञोपसहारी' परगर्वप्रभेदिनीम् । परविद्याकर्पण' च प्रयोग वद शङ्कर ॥१॥ ईश्वर उवाच- विश्वमेतद्भकिमय' 'सा भक्तिर्वगलामया' । 'एतच्च भासमाना" तो वगलो च कुमारक ॥२॥ वाड मय चैव वैचित्र्य त्रिषु लोकेषु वर्तते। तद्गर्वहरणार्थ च विद्यामेता कुमारक ||३॥ मनसा त जपन्मन्त्र" मुख तस्यावलोकयेत् । भय च विस्मृतिभ्रान्तिस्तत्क्षणाद् भवति ध्रुवम् ।।४।। पानपात्र वैरिजिह्वां गदा शूलेन सयुताम् । पीतवर्णी मदाघूर्णा चिन्तयेदानन रिपो. ॥५॥ स तु भाषापतिः साक्षाद् वृहस्पतिरिव स्वयम् । 'स तु जात्यतरो," भूत्वा निन्दितो भवति ध्रुवम् ॥६॥ अस्त्रशस्त्रमय मन्त्र यो जानाति कुमारक । तत्र गत्वा महामन्त्र जपेद्देवीमनन्यधीः ॥७॥ त्रिसहस्र ध्यानयुक्त तस्य विद्या कुमारक । विस्मृतिश्च भवेच्छीघ्र नात्र कार्या विचारणा ॥८॥ अत्यन्तश्वयंसयुक्तो द्विपता वर्तते यदि । तस्य गेहे" भोमवारे निशि नग्नेन बुद्धिमान् ॥६॥ १. ५. यदीच्छेजोवनं भुवि । २. ध परविद्याप्रयोगनाम विशति । प्रज्ञापहरणी। ४. घ. प्रभेदनी। ५. स. प. प. पुस्तकेषु निम्नांशो विशेष:- परविद्याक्षिणी तो पता हृदि भावयत् । स्कद (घ. कोञ्चभदन) उवाच ।। नमस्ते योगिससेव्य योनिशबनमोनमः। ६. घ. कर्वणीच। ७. घ, ०न्छक्तिमय। ६. ५ तच्छक्तिवंगलादया। ६. स. एतत्प्रभासमानो। घ. एकत्र भासमानो। १०. घ. पजन्मत्र । ११. घ. सो जापतमो। १२. प. बपेभूवि० १३. प. सयुक्त। १४. स. दिषितो। घ. दिषतो। १५ घ. बत्तये। १६. प. गेहे । - ५८ ]] सांस्यायनतन्त्र प्रदक्षिणत्रयं कृत्वा दिशि कोवेरदिड मुखः । सहस्र सप्तरात्री' च नष्टद्रव्यो भवेद् ध्रुवम् ॥१०॥ ग्राम वा नगरं वाथ नित्य कृत्वा प्रदक्षिणम् । जपेदयुतसख्या तु तद्ग्राम तु* कुमारक ॥११॥ सस्यादिभिविनश्यन्ति द्रव्य चौरेण नश्यति । पशुभिम्रियते पुत्र मासाद्दोर्भाग्यमाप्नुयात् ।।१२।। फलित पुष्पित चैव शत्रोराराममाश्रितः । रवो रात्री निशाकाले नग्नो भूत्वा सुनिश्चयः ॥१३॥ प्रदक्षिणत्रय कृत्वाप्ययुत जपमाचरेत् । वृक्षो निर्मूलमाप्नोति शिवस्य वचन यथा ।।१४।। एकाक्षरी च बगला साध्याख्य' मध्यदेशतः । चिन्तयेज्जाप्यकालेपु सहस्र जपमाप्नुयात् ।।१५।। लक्षं जप्त्वा मनोरेव मृत्तिका च कुमारक । प्रवाहोपरि नि.क्षिप्य नद्या उपरि बुद्धिमान् ।।१६।। स्तम्भयेत नदोवेग महदाश्चर्यकारणम् । महानद्यामेवमेव कुर्यात्त' गुरुलाघवान्" ॥१७॥ व्यालव्याघ्रादयश्चैव ये ये करमगादयः । निसप्तमन्त्रित भस्म मूर्द्ध नि क्षेपणमानतः ॥१८॥ वाक्पाणिवदनाक्षणा च" तत्क्षणात् स्तम्भन भवेत् । मन्त्रयेत् सस्कृत भस्म मन्त्रेणानेन पुत्रक ॥१९॥ प्रष्टोत्तरशत सम्यक् ध्यानमात्रेण बुद्धिमान् । सर्वाङ्गोभूलन कुर्यात् तद्भस्मना" कुमारक ।।२०।। वनेचरास्तामसजन्तपम कोसरिजदुष्कर्म कदमहासपि, प्रेताश्च भूताश्च "पिशाचभूचरा.'सिंहाश्च सस्तभयति ध्रुव च ॥२१॥ १. घ. सप्तरत्र । ग सदा रात्री। ६ घ शनिश्चितम् । ७. स. ससाध्वं । घ. साध्यास्व । ०कालतु ९. स. ५ जपमाचरेत् । १०. घ. कुर्यातद। ११. ५ लाघवात् । १२. प. नि। १३ प. ध्यानपूर्वे सु। १४. ख वद्भस्मेन । १५. घ. पौरादि- १७. भूतानपि। १८. भूचरीश्च । क ख ग व ध्रुवम् । २.स.घ.का.प.च। ४. घ, धन । ५. घ. .चापि। दुष्कमकरा नराश्च । १६.५ प्रेताश्च।
द्वाविंशः पटलः [५ एतन्मन्त्रवर पुत्र मनसा जपमाचरेत् । वादार्थ चाथ वाणिज्य सभाया राजसन्निधौ ॥२२॥ गत्वा तु रिपवः सर्वे जिह्वास्तभनमाप्नुयात् । 'शत्रुमुद्दिश्य मन्त्र च भयुतं प्रजपेत्ततः ॥२३॥ पक्षमात्राद् भवेच्छयोजिह्वास्त मनमाप्नुयात् । तेनेव म्रियते शत्रुमण्डलार्धन ' मानवः ॥२४॥ दक्षिणामूर्तिमन्त्रेण मन्धित जलमादरात् । निकाल चैव पोत्वा तु मण्डलाच्छान्तिमाप्नुयात् ।।२।। इसि वर्षियागमे सख्यायनतन्त्र एकविशतिः पटलः ॥२६॥ ॥ अथ द्वाविशः पटलः ।। नमस्ते देवदेवेशी जिह्वास्तम्भनकारिणीम् । पानपात्र गदायुक्ता भजेऽह बगलामुखीम् ॥१॥ स्कन्द उपाच- त्रिपुरारे त्रिलोकशस्त्रिकालात्म स्त्रियवक । वगलास्त्र वदास्माक 'मयि वात्सल्यगौरवात्" ॥२॥ शिव उवाच- वगलास्त्रमिद पुत्र' सुरासुरसुपूजितम् । अगस्त्यः प्रोक्तवान् पूर्व राम दाशरपि प्रति ॥३॥ तेनोक्तमाञ्जनेयाय तेनोक्त चाजन प्रति । तद्विद्या च प्रवक्ष्यामि वालाहृदय"मनुम्" ॥४॥ प्रथम वगलाबीज वाराह तदनन्तरम् । 'मम शत्रूस्ततः शक्ति" वगलावोजमुद्धरेत् ॥शा वालामुखिपद चोक्रया 'बार मुख पद वदेत् । ग्रसद्वय ५ च उच्चार्य खाफीयुग्म "तत. परम् ॥६॥ १. प.-'प्राप्नुयाच्छय मुद्दिश्य सन्मत्र' प्रजपेत्ततः' । २. क. मसान। ३. घ. परविद्यार्पण नाम एकविधतिः । म्बिकाम्। ५. घ. क्रौंचमेदन। ६. घ..कालज्ञ। ७. घ. मानवात्सल्यगौरवान् । ८. घ. ईश्वर ६. घ. मन। १०. प. बगलास्त्रमिद। ११.. मनु। ५. पततः परम्। १३. प. सतश्च विरुवाराह । १४.प. मम पत्र १५.. पहयुग्म। १६. घ. साहियुग्म । ४.प.वगाहा.
सांस्थापनता भक्षयुग्म ततोच्चार्य शोणित पिव-युग्मकम् । वगलामुखि ' उच्चार्य' वगलाबोजमुच्चरेत् ॥७॥ 'शक्ति वाराहमुच्चार्य वर्मास्त्र च समुद्धरेत्" । 'त्रिचत्वारिंशद्वर्णयुक्त" वगलायाः' सुपावनम् ॥८॥ दुर्वासा नपिरेवात्र छन्दोऽनुष्टुप् भवेच्छुभम् । देवता वगलानाम्नो जगद्व्यापकरूपिणी ॥il ग्लौं' बीज ही च शक्तिश्च फटकार कोलक तथा । 'मत्रराजेन देव्याश्च"'व्यासविद्या समाचरेत् ॥१०॥ ध्यानभेद' प्रवक्ष्यामि मन्त्रभेदेन पुत्रक । चतुर्भुजा त्रिनयना पीनोग्नतपयोधराम् ॥११॥ जिह्वा खड्ग पानपात्र गदा धारयन्ती पराम् । पीताम्बरधरा देवी पीतपुष्परलताम् ॥१२।। विम्वोष्ठी चारुवदना मदापूर्णितलोचनाम् । सर्वविद्याकर्षिणी च सर्वप्रज्ञापहारिणीम् ॥१३॥ भजह चास्त्रवगला सर्वाकर्षपकर्मसु । एव ध्यात्वा जपेन्मन्त्र बाणलक्ष कुमारक ॥१४॥ तर्पयेत्तद्दशाश च जपासंमिश्रवारिणा'५॥ तदशाश हुनेत् पुत्र तालक चाज्यसयुतम् ॥१५॥ भगाकारे सुकुण्डेऽस्मिन्" मुद्रया हस' बुद्धिमान् । वदरीफलमात्र च माहुतीश्च कुमारक ॥१६॥ ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चात् सहस्र शतमेव च ! योगिनी पूजयेत् पुत्र द्रव्यशुद्धिसमन्विताम् ।।१७।। मन्त्रसिद्धिर्भवेत् सद्यो देवता च प्रसीदति । शिवालये जपेन्मत्रमयुत च सुबुद्धिमान् ॥१८॥ १. प. बगलामुखी। २. प. समुच्चार्य। ३. प. सद्बीज च पुनवंदेत् । ४. 'ततश्च शक्तिवाराह वाराह च समुच्चरेत्'। ५. प. श्यश्चत्वारिंशद्वर्ष । ६ घबगला- ७. प. दूर्वासो। ८ प. रेवास्य। ६ घ एव च। १०.घ.वास्थवगला ११. घ. ह्रौं । १२ मत्रराजवदेवान। १३ प. म्यान बलात् । १४ प.शिवाम् । १५ प. हेतुः समिधः। १६ घ पाल्पसयतम् । १७ प. तु कुम्हे । १८. स. हसीमुद्रण। घ. हसमुद्रण। १६. प. सत्य।
प्रावितः पटलः [१ शत्रुक्षय भवेत् सद्यो नान्यथा शिवभाषितम् । पट्सहस्र जपेन्मन्त्र निशाया चण्डिकालये ॥१९॥ जिलास्तम्भनमाप्नोति वृहस्पतिसमोऽपि वा। 'जपित्वा च" सहनं तु भैरवस्य च सन्निधो ।२०॥ बुद्धिन शो भवेत् सद्यो वाणोपतिसमोऽपि वा । वीरभद्रालये पुत्र प्रयुत जपमाचरेत् ॥२१॥ सिद्धिदो जायते वत्स नान्यथा शिवभाषणम् ।' मातृकासनिधो मत्री जपेद् दशसहस्रकम् ॥२२॥ सद्यः स्तम्भनमाप्नोति वाल्मीकिसदृशोऽपि वा। ध्यानपूर्व' जपेन्मन्त्री प्रयुत च कुमारक ॥२३॥ रूपयौवनवाञ्छत्रुाधिमान् भवति ध्रुवम् । विसहस्र जपेन्मन्त्र विसहस्र दिने दिने ॥२४॥ मण्डलाच्छत्रुसम्मोहं कुबेरसदृशोऽपि छ । ऐश्वयं नाशमाप्नोति कुवेरसदृशोपि वा ॥२॥ त्रिकालमयुतं जप्त्वा ध्यानपूर्व सुबुद्धिमान् । वगलाध्यानतो मन्त्रमयुत जपमाचरेत् ॥२६॥ सर्वाङ्ग" वायुना शत्रुः शीघ्र गच्छेद् यमालयम्"। पार्वतीसन्निधौ मत्री जपेदयुतमादिशन् * ॥२७॥ रात्रो पूजासमायुक्तो नग्नो दक्षिणदिङ मुखः । मन्धो भवति तच्छनुरवश्य कञ्चभेदन ॥२८॥ विघ्नराजं समभ्ययं रखो। तु अपमाचरेत् । निसहस्र जपेन्मन्न कुक्षिरोगी भवेद्रिपु ॥२६॥ मण्डलामाशमायाति मात्र कार्या विचारणा। प्रयोगान्ते च सस्कार पूजाकाले समाचरेत् ॥३०॥ इति भोपवियागमे सल्मायनतरे द्वाविशतिः पटलः ।। १. ख. पित्वाष्ट। घ, पत्र। २. घ. नियों बापते पत्र मिया शिष. भाषितम् । ३. प. मष्टसहस्रकम् । ४. घ. ध्यानात् पूर्व। घ. न्याषितो। १७. स.विसभ्यः। घ.मिसभ्य। ८. स. जपते म। पत्र समूह । १५. स. प. सर्वाङ्ग। ११. ५. यमालये। १२. प. दयुतषस्था। ११. प.सदोमंगला । १४. ५. रामो। ६.क.ग.
सांस्पायनता ॥ अथ त्रयोविशः पटलः ।। स्त्रसिंहासनासीना सुन्दराङ्गी शुचिस्मिताम् । बिम्बोष्ठी चारुनयना ध्यायेत् पीनपयोधराम् ॥१॥ फन्द उवाच- नमस्ताण्डवरुद्राय तापत्रयहराय च । वगलास्त्रमहामन्त्रः प्रयोगान् वद शङ्कर ॥२॥ शिव उवाच- निकाल तु समासीनो ध्यानपूर्व तु' साधकः । त्रिसप्त मन्त्रयित्वा तु जप पश्चात समाचरेत् ॥३॥ नित्य च त्रिसहस्र तु पण्मास विजितेन्द्रियः । वाचासिद्धिर्भवेत्तस्य शापानुग्रहकारका ॥४॥ अश्वत्थमूले प्रजपेदयुत ध्यानपूर्वकम् । भक्षणाद् व्याधिनाश च भवेदेव न सशयः ।।५।। विभीतकतरोमूले अयुत जपमाचरेत । जिह्वास्तम्भनमाप्नोति साक्षाद्वागीश्वरोऽपिवा ॥६॥ कपित्थवृक्षमूले तु प्रजपेदयुत तथा । श्रोत्रस्तम्भनमाप्नोति सद्यो बधिरता व्रजेत् ॥७॥ पिचुमदतरोमूलेऽप्ययुत जपमाचरेत । प्राणस्तम्भनमाप्नोति रोगी पोनसवान् भवेत् ॥८॥ कदलीमूलमाश्रित्य अयुत जपमाचरेत् । पादस्तम्भो भवेत् सद्यो वातरोगी भवेद् रिपुः ॥६॥ करञ्जमूलमाश्रित्याप्ययुत जपमाचरेत् । स्तम्भयेज्जठराग्निस्तु अन्नद्वेषो भवेद् ध्रुवम् ॥१०॥ विषतिन्दुकमूल च समाश्रित्य मनु जपेत् । प्रयुताच्च भवेत् पुत्र मात्रस्तम्भनमाप्नुयात् ॥११॥ नद्या समुद्रगामिन्या नाभिदघ्नजले'' स्थितः.'। तप्पयेद् वगलास्त्रेण प्रस्त कृत्वारिनाम च ।।१२।। १. घ. क्रौञ्चभेदन। २. ध. ईश्वर। ३. घ. सु । ४ घ. त्रिसहन। क.ख. ग. ०कारकम् । ६. घ. कपिस्पतरु.। ६. घ. नाभिमात्रे जले। १०. घ. नरः। ११. घ. तरिनाम । ७. घ. प्रास्त। ८.प. नरः।
प्रमोविशः पटलः दिने दिने सहस्र के बगलाध्यानपूर्वकम् । गर्भसावं भवेत्तस्य भार्यायाः' शिवभाषितम् ॥१३॥' चल्लोपलाशमूले तु जपेदयुतसंख्यया । मन्त्रमध्ये रिपोर्भायी प्रस्तं कृत्वा कुमारक ॥१४॥ तर्पणं च दिवा कृत्वा रातो रात्री जपेन्मनुम् । सापि वाध्या भवेत् सत्यं नात्र कार्या विचारणा ॥१॥ श्मशाने प्रजपेन्मन्त्रं प्रस्तं कृत्वा तु पूर्ववत् । सद्यस्तद्भार्यानाशं च भवेदेवं न संशयः ।।१६॥ शून्यागारे जपेदेवमयुतं' ध्यानपूर्वकम् । लक्ष्मीनाशयते नूनं स शत्ररवशिष्यते ॥१७॥ जंबीरतरुमूले तु अयुतं जपमाचरेत् । 'भ्रमाकुलकुलं सर्व मण्डलानाशमाप्नुयात् ॥१८॥ शतवार मन्त्रितं च शर्करोदकमेव च। रिपूणां चैव दातव्यं जिह्वास्तम्भनमाप्नुयात् ॥१६॥ ॥ र मन्त्रितं चैव नारिकेलफलोदक। पाययेद्रातिपरिपुभिजिह्वास्तंभनमाप्नुयात् ॥२०॥ नागवल्लीदल चंव क्रमुकं चूर्णमेव च । सहस्र मन्त्रित पुत्र दातव्यं शत्रु(यू)णां निशि ॥२१॥ ताम्बूलचर्वणाच्छत्रुजिह्वास्तंभनमाप्नुयात् । चन्दन चैव कस्तूरीपर्षित मन्वयेत् सुत ॥२२॥ पुनश्च मन्त्रयेत्ताम्रपाने गुणसहस्रकम् । तच्चन्दनलेपनेन' रिपुभ्रान्तो भविष्यति ॥२३॥ दन्तधावनकाष्ठ च मन्त्रयेत् त्रिसहस्रकम् । तत्काष्ठेन रिपोः"पुन दन्तधावनमात्रतः ॥२४॥ १.क.ग. घ. नार्यायाः । २. ५ पुस्तकेज्य पाठो विशेषः- वतो(त:) पलाशमूल तु प्रजपेच्च परे प्यम् । ३. प. रात्रौतु। ४. घ. जपेन्मत्र । ५. प. शोन। ६.७. प. पुस्तके नास्ति । ८. घ. प्राण्यद्वारा ६. घ..विलेपेन । १०. घ. परिभ्रान्तो। ११. घ. रिपुः।
सांख्यायनतर जिह्वां वाणी च बुद्धि च 'मनः पादादिक' तथा । स्तम्भनं च भवेच्छीघ्रं शिवस्य वचन यथा ॥२५॥ प्रेतवस्त्र रवी ग्राह्य चितिकाष्ठं च वेष्टयेत् ।' श्मशाने निखनेद् रात्री त्रिसहस्र जपेत्तदा ॥२६॥ शेषभाषापतिः साक्षाद् बृहस्पतिरपि स्वयम् । जिह्वास्तम्भनमाप्नोति सद्यो मूकत्वमाप्नुयात् ॥२७॥ इति पविद्यागमे सांस्यायनतन्त्र प्रयोविंशतिः पटलः ॥२३॥ ॥अथ चतुर्विशः पटलः ॥ अम्बा पीताम्बरादयामरुणकुसुमगन्धानुलेपा त्रिनेत्रा, गम्भीरा कम्बुकण्ठी कठिनकुचयुगा चारुबिम्बाधरोष्ठीम् । शवोज्जिह्वासिपत्र' शरधनुहिता व्यक्तगर्वाधिरूढा', देवी सस्तम्भरूपा सुविरलरसनामम्बिकां व भजामि ॥१॥ स्कन्द उवाच- नमस्ते वृषभारूढ नमः पन्नगकङ्कण। लक्षण वद मे देव वगलामन्त्रमालिका" ॥२॥ ईश्वर उवाच भृगुवारे च सगृह्य" 'पारामस्थनिशां तथा।। 'ता शुष्का' सप्तरात्र तु 'कृत्वा मेतामनन्तरम् ॥३॥ भूताविपरित" चैव कपिलागोमय तथा। पुनरेकान्तराद्ग्राह्य" भाण्डमध्ये तु नि.क्षिपेत ॥४॥ सविप जलसंयुक्त कुन्मेिलनमेव च । हरिद्रा तत्र नि क्षिप्य पूजयेदाशु तत्त्रमात् ॥५॥ चुह्लयोपरि च तद्भाण्ड रवी रात्री च नि.क्षिपेत् । द्विगुण जलसयुक्त'८ कुर्याम्मेलनमेव च ।।६।। १. घ. क्षुस्पिपासामल। २. ध. पुस्तकस्थोऽयं पाठो विशेशो दृश्यते- प्राण प्रतिष्ठा कृत्वा तु पूजा चंद तु कारयेत् । ३. घ. जपेन्मनुम् । ४. ध बगलास्त्रविवरण नाम त्रयोविशति.। ५. घ. .सिपत्रा ६ घ. शुक्लगरवादिस्टा। ७. घ. सुविरलवसना० । ८. घ, नमामि। क्रौञ्चभेदन। १०. भूषण । ११. जपमालिकाम् । १२. प. संग्राह्य । मारामस्वासिशो निधि १४. प. छायाशुष्क । प. छायाभुक । १५. प. वृत्त्वा तु सदनन्तरम्। १६ स. भूमावपतितं । प. भूमा(मो) तु पतित । १७, स. पुनरेका कराद् ग्राह्म। घ. पुनरेका साग्राह्य। १८. प. जपसयपतं ।
चतुर्विशः पटलः [६५ . अश्वत्थरिन्धनैरेव ज्वाला 'कृत्वा सुबुद्धिमान" । तस्या' मृदु भवेत्तावत्पचन सम्यगाचरेत् ।।७।। गोमयस्था हरिद्रा च क्षालयद्वारिणा* ततः । छायागुष्क च कर्तव्यं हरिद्रामणिमादरात् 11 तेन कुर्यान्मालिका च अष्टोत्तरशत तथा। पुण्यस्त्रीनिर्मित सूम' 'मनः सच्छेदयेत्" पुनः ॥६॥ तन्मालिका रखो 'वारेऽप्यमृतेनैव मार्जयेत् । मर्चयेन्मूलमन्त्रेण पोडशैरुपचारक. ॥१०॥ निवेदयेत् पायस च शर्कराज्यसमन्वितम् । सहस्र प्रजपेदादो" पञ्चाशद्वर्णमादरात् ॥११॥ 'एकाक्षरीमहामन्वंगलानाम्नि" पावनः । अयुत प्रजपेत् पुन मालिकासिद्धि माप्नुयात् ॥१२॥ एव च मालिका कुर्यान मत्रसिद्धिमपेक्षता। हरिद्रावस्त्रमाच्छाद्य सिद्धयर्थं जपमाचरेत् ।।१३।। हरिद्रामयपुष्प च हरिद्रामयचन्दनम्। समर्पयेदल कृत्य जप रात्री समाचरेत् ।।१४।। देवो भूत्वा जपेद्देवीमर्चयेद्विधिवद्यया। प्रमादान मालिका भूमी पतिता चेत् कुमारक ॥१५॥ पुन: पूजा प्रकर्तव्या पूर्ववज्जपमाचरेत् । अथ वक्ष्ये प्रयोगाश्च मालिकालक्षण तथा ॥१६॥ पञ्चविंशतिभिर्मोक्ष.." 'सर्ग त्रिशतिरेव च। वशीकरणसमोहे "कला'सख्या सुमालिका ६१७॥" १. प. कुर्यात् प्रयलता। २. घ. यावन् । ३. प. गोमवय । ४. प लक्षीयदा । ५. प. पुनः। ६. ख. पण्यस्त्री। प. स्त्रीनिमिते। ७ प. सूत्र। एक अषयेत् । ६. घ. राघो मूलेनैव तु । १०. प. प जपेचादो। ११. घ. एकाक्षर- महामन वंगलायाश्च । १२. घ, मपेक्षिता १३. प. हरिद्रावणंपुष्प । हरिद्रावणं चन्दनम्। १५. प. समप्यं पूजनं कृत्वा । १६. घ. था। १७. घ. मोक्षार्थी। १८. घ. षनाथों विशदेव च। १६. प. समोह । २० क. पुस्तके ऽममयो नास्ति । २१. मतः पर निम्नांगो विशेष: ग. घ. पुस्तकदये- 'विशद्भिः स्तम्मन विद्याद विनाये पञ्चमालिका।
१६] सांस्यायनतन्त्रे द्विपञ्चसप्तविंशद्भि' रुच्चाटे चार्कसंख्यया । ज्वरे' रोगादिपीडार्थ पच चव चतुर्दश ॥१८॥ पञ्चाशच्छान्तिकर्माख्ये' बुद्धि च चतुरुत्तरे। पञ्चदशाभिचारे' च मालिकाक्रममी(ई)दृशः ॥१६॥ भृगुवारे च सगृह्य' द्रव्याण्येवानि पुत्रक । 'हरिद्रापङ्कज वस्तु कर्पूर मृगनाभि च" ॥२०॥ श्रीखण्डरोचनागरु-केसर च समं समम् । मईयेन्मु(दु)पसि प्रज्ञः खल्वेनैव कुमारक ।।२१॥ तेन कुर्यात् पुत्तली च चतुरङ्ग लमानतः । सर्वाङ्गसुन्दरी'" देवी द्विभुजा वगलामुखीम् ॥२२॥ चित्रपीताम्बरधरा'' पोनोन्नतपयोधराम् । पीतवर्णा मदापूर्णामर्द्धचन्द्रा च पुत्तलीम् ।।२३।। प्राणप्रतिष्ठा कृत्वा तु सस्नाप्य विधिना कम् । प्रखण्डतण्डुलेनैव हरिद्राक्षतमेव च ॥२४॥ कृत्वा एकाक्षरीमन्त्ररक्षतान्" मूर्द नि नि.क्षिपेत् । नित्य चायुतपूजा च कुर्याच्चैव च पुत्रक ॥२५॥ देवी सम्पूजयेत्सम्यक जपं कुर्यात् सुबुद्धिमान् ।" एव कृत्वा तत्त्वलक्ष देवो प्रत्यक्षतामियात् ॥२६॥ पत् परस्मै" न वक्तव्य न वक्तव्य कदाचन । एव पूजाविधि कृत्वा पुरा 'दुर्वाससेन च"" ॥२॥ तत्वलक्षप्रमाणेन प्राप्त 'प्रन्योदित फलम् । दति पविद्यागमे सांस्पायनतने चतुर्मितिः पटलः ।रगा १. क. पुस्तके द्विपञ्च' होन: सप्तविंशदिः' पम एव दृश्यते । प. विद सप्त. विद्भिः। ३. प. कौष । ४. प पञ्चदरयानिः । ०मीदृशम् । १. प. समाए । ७. स. प. पुस्तके निम्नोऽर पाठो विशेष:- हरिद्वापर वस्तु चरन कुमुमानि च । कस्तूरी व कपूर कर मगनानि च । ८. प. गोरोचनमगोर पकेचर । ६ स. •तुपति प्रज्ञा प. मदचन्मदिरायुस्त । १... सुषा व सुन्दरी। ११.प. बगला वचधराव। १२. प. सस्पाप्रा.प. एकाक्षर। १४.प. पादप नास्ति। १५. प प्रत्यक्षमाप्नुयात् । १६. प. यस्म कस्म। १७. प. दुर्वासमोनिराट् । १८.प.पोस्त फरमानुपात् । १६. प. माताप्रकरण नाम पतुर्विति। 2.प.धीसप्प पागर'तपा: । २. प. ज्वर 1. घ. रक्त पञ्चविशा पटस: [६७ प्रय पञ्चविंशः पटलः ।। नमामि वगला देवी शत्रुवास्तम्भरूपिणीम् । भजेह विधिपूर्वं च जय देहि रिपून दह ॥१॥ उपाच- नमः कैलाशनाथाय नमस्ते मुनिसेवित । चतुरक्षरीमहामन्त्र वगलायाश्च मे वद ॥२॥ ईश्वर उवाच- सप्तकोटिमहामात्रै मन्त्रराजमिम शृणु। षदप्रयोगः स्तभन च सर्वकर्मोत्तमोत्तमम् ॥३॥ यदा शत्रुभयोत्सन' तदानीमेव पुत्रक । प्रयुत च जपेन्मन्त्र वगलाचतुरक्षरम् ॥४॥ मन्त्रोद्धार प्रवक्ष्यामि न्यासध्यानादिक तथा । प्रयोग चोपसहार वक्ष्येऽह तब युवक ॥५॥ वेदादि विलिखेत् पूर्व पाशबीज ततः परम् । स्तब्धमाया ततोच्चार्य अकुश बीजमेव च ॥६॥ चतुरक्षरी च बगलां सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमाम् । भ्यासविद्या प्रवक्ष्यामि मन्त्रभेदेन पुत्रक ॥७॥ पाशाङ कुशान्तरितशक्तिरमा च तन- तद्वन्यसेन्मदनवीजमथो वराहम् । वागीश्वरों च बगलाख्यसुबोजराज, वन्यस्यता करयुगे हृदयादिकेषु ॥६॥ चतुर्वणात्मिके मन्ने मातृकाबीजपूर्वकम् । प्रत्येकं च न्यसेत् पुत्र मन्त्र सिद्धिमवाप्नुयात् ||६|| अथवा वगलामन्त्र सर्वैरङ्ग लिभिन्यसेत् । ततो जपेन्मन्त्रराज वगलाचतुरक्षरम्" ॥१०॥ ब्रह्मा ऋपिश्च छन्दो त्र गायत्री समुदाहृतम् । देवता चगलानाम्नो ध्यान वक्ष्ये कुमारक ॥११॥ १. घ. क्रौञ्चभेदन। २. घ. कैलासवासायी ३. प. मोनिसेविता चतुरक्षरीमहामन । ५. प. ०मिद। ७. घ. वगला चतुरारी। क. प. प. चतुर्वर्णात्मक । ६. स. प. मत्र। १०. प. मगुलीपु न्यसेतपा। ११. प. चतुरसरीम्। ६.प.मय प्राप्त । -- १८] सस्यायनतन्त्र कुटिलालकसंयुक्ता' मदापूणितलोचनाम् । मदिरामोदवदना प्रवालसदृशाघराम् ॥१२॥ सुवर्णशैलसुप्रख्यकठिनस्तनमण्डलाम् । दक्षिणावर्तसन्नाभिसूक्ष्ममध्यमसयुताम् ॥१३॥ रम्भोरुपादपद्मा ता पीतवस्त्रसमावृताम् । एव ध्यास्वा महादेवी कुर्याज्जपमतन्द्रितः ।।१४॥ वेदलक्ष जपं कुर्यात् पर्वताने कुमारक । 'भिक्षाशिनः फलाशीनो" मोनो भूत्वा समाहितः ॥१५॥ तर्पण च दिवा कुर्याद् रात्री वा प्रजपेन्मनुम् । एव कुर्यात् पुरश्चर्या देवी प्रत्यक्षमाप्नुयात् ।।१६।। रात्री होमं च कर्तव्यं दिवा ब्राह्मणभोजनम् । हरिद्रावस्त्रसयुक्त हरिद्रावर्ण चन्दनम् ॥१७॥ 'हरिद्रा चाक्षमाला च५ द्रावर्णदेवताम् । स्मरेच्च जपकाले तु सर्वसिद्धिकर नृणाम् ॥१८॥ मधूकपुष्पसमिश्रचितेन जलेन वा । तर्पण तद्दशांश च देवतामूर्द्ध नि नि.क्षिपेत् ॥१६॥ माज्येन मिश्रितं चैव शकरापायसं हुनेत् । पूर्णाहुत्यन्तमनघ' ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः।।२०।। योगिनी पूजयेत् पश्चाद् द्रव्यगुद्धिसमन्वितः । मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य नाय कार्या विचारणा ॥२१॥ आदो भास्वररूपिणी* कुरु तदा सद्वराजा योगिनी, नानालक्षणसयुता कुचभरा प्रौढा नवोढा तया । स्ता(स्ना)ताभ्यजनभूपर्णश्च सहिता सच्चन्दन लेपिता, पूजागारमुपानयेद्रहसि सा'द्रव्यश्च शुद्धया रहा ॥२॥ १. ५. कटिलोलासयक्ता। २. . .पराम्। १. प, सुवर्णकलरा। भिक्षाशी च फलाशोथ। ५. घ. हरिद्राया क्षमा माला। ८. घ. सजातिको। १. नचन्दन। तो। घ. सद् । ११. स.प. सह । ६. स.मनप। घ. मनना। ७.स. भास्कर। घ. भापर.1 पञ्चविंशः पटलः [६६ लोकिके' चैव गुप्ताय सौभाग्यार्चा कुमारक ।' 'मन्त्रसिद्धिकरं वक्ष्ये गोपनं कुरु सर्वदा ॥२३॥ मङ्गत्रयेण संयुक्त लोकिकानमेव च । चतुरंगुलसंयुक्ता गुप्तपूजा कुमारक ॥२४॥ सौभाग्या_विधिश्चव' पञ्चाङ्गोपासनं भुवि । योपिद्भुक्तिद्रव्ययुक्त लौकिकार्चनमेव च ॥२॥ योषिच्छुद्धिद्रव्यपूजा पञ्चमीयुतमादरात् । एतत्सौभाग्यपूजा च मुनिगुह्यमुपासनम् ॥२६॥ बिन्दुपात्रयता पूजा निगुणा योगिनां मतम् । एतच्चतुर्विधा पर्या" देशनामार्चनाविधि:" ॥२७॥ वक्ष्येऽहं विधिवत्पुत्र न देयं यस्य कस्यचित् । सृष्टिः स्थितिश्च संहारं जीवन्मुक्तिपदं तथा ॥२८॥ एतदर्धाविधिर्नामसकेत मुनिभिः सह । सृष्टिश्च गोडदेशेषु स्थिति: केरलदेशके ॥२६॥ संहारा कामरूपे 'कुरुपाञ्चालयोः परम् । पीठोपरि समावेश्य गर्भकोलागमक्रमात् ॥३०॥ अर्चन ६ गोडदेशीयं सृष्टिपूजाक्रमस्त्वयम् । पूर्वोक्तलक्षणोपेतां मृदुपर्यङ्कके ' तथा ॥३१॥ शयनीकृत्य कन्या"च स्थित्यझिममादरात् । केरले तु स्थितिश्चैव सिद्धयसिद्धिकरो" तथा ॥३२॥ कोलसारं च तन्नाम सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमम् । पूर्वोक्तलक्षणोपेतास्तिष्ठन्ति कन्यका भुवि ॥३३॥ १.प. लौकिकी। २. प्रत. परं निम्नाशोऽय प. पुस्तक एव दृश्यते- एव त्रिविषपूजा च मुनिगुह्यं सुपावनं । एककस्य च पूजाया लक्षण कथ्यते सुत ।। ३. पादयुग प. पुस्तफे नास्ति । ४. घ. चतुरङ्गसमायुक्ता । ५. श्लोकोऽयं ग. पुस्तके नास्ति । ६. ब. घ. विधि चैव । ७. प. योषितादि। ८.मत: पर निम्नायो घ, पुस्तक एवाऽवलोक्यते-- पोपिच्छ दिद्रव्यपूजा सुगुप्ताचनमादरात् । १. घ. मुनिगुप्त सुपावनम् । १. प. मता। ११. घ. चार्चा । १२. प. नामानं । १४. प. मुवर्त पद। १५. घ. योगिभिः। १६. घ. देशे तु । १७. प. कोलिकारवो (र्चा, चार) तत्पराम् । १८. घ. भर्गकोलागमः। १६.क.मोचनं । घ. प्रचना। २०. प. गोडदेशीय। २१. फ. मृत्यु। २२. ग. घ. पयनीकृतकन्यो। २३. घ. स्थित्यामध्यं० २४.ख.प. सद्यः सिदिकरी।
सांख्यायनतन्य कामरूपाख्यदेशे तु संहाराह्वयपूजनम् । पूर्वोक्तलक्षणोपेता कृत्वाभ्यञ्जनमादरात् ॥३४॥ बिन्दुमात्रं गृहीत्वा तु कृत्वा मुक्त्यर्चनं भुवि । कुरुपाञ्चालदेशीयमनिशं पूजनं तथा ॥३५॥ कोलसारपर' नाम चागमं भुवि दुल्लभम् । सम्यक् पूजाविधिश्व उपसहृतमानस: ॥३६॥ पञ्चमी चंव कर्तव्या सौख्यायं तस्य पुत्रक । 'पानं चैव समासेन' जपध्यानसमन्वितः ॥३७॥ देवो भूत्वा स्वयं पुत्र पञ्चमी च समाचरेत् । सहाराचंनयोरेवमुपसंहृत्य पूजनम् ॥३८॥ सम्पूजयेत् पञ्चमी चंव सौरयायं तस्य साधकः । प्रादी मध्ये तथा चान्ते विन्दुपात्रार्थमेव च ।।३।। अर्चयेत् पञ्चमी कुर्याद् ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः । कुरुपाञ्चलदेशेऽथ' निर्गुणा विधिस्तथा ॥४०॥ एतद विधिश्चव दुर्लभो" विधिशङ्करः" । गोडदेशार्चन पुंमा शान्तिपुष्टिकर" सदा ।।४।। एवमेव विधिः पुत्र सर्वेश्वर्यप्रदायकः । कामरूपार्चन पुंसा मारणविप्रयोगदा'५ ॥४२॥ कुरुपाञ्चालदेशाचर्चा सर्व सिद्धिप्रदा सदा।" एतद विधि चव य. कराति सुवुद्धिमान् ।।४३॥ जीवन्मुक्तः स एवान स सिद्धो नान संशयः । नारीनिन्दा न कर्तव्या स्वपादस्तां न" सस्पृशेत् ॥४४॥ नारी दृष्ट्वा मानसेन वन्दन च समाचरेत् । स्वप्रियामर्चयेत् पुन प्रिया पञ्चमिका चरेत् ॥४५॥" १. घ. बिन्दुपात्र । २. गुप्वाचन। ३. घ. देशे तु मनिध। ४. प. सारतर। ५. प. शुचि। ६. ख. जपसहव० । प. उपसपेद्वत्यसायकः । ७. प.न्यासं न्यस्वोमयोदेश। ८. घ. सहारानयोग व उप० । ६. पूजयत्। १०. प. विन्दुप्रात्यर्थः। १३. प. भुपि पप्मुस । १४. प. पुष्टिकरि तपा। १५. ख. मारणादिप्रयोगदम्। प. मारणादिप्रयोगकृत् । १६. पदयुग्म प. पुस्तके नास्ति। १८. प. स्पृशेत् । २६. लोकोय नास्ति प. पुस्तके । तु। १२. घ. दुल्लभम् । १७. प. स्वपादीत च।
पशि पटल wwwAN स्वप्रियाविन्दुपार' च गृहीत्वा साधकोत्तम । असह्यनार्चन कृत्वा विन्दुपात तथैव च ॥४६॥ उन्मादी च भवेत् पुत्र मृत श्वानो भविष्यति । ॥ इति पविद्यागमे पाल्पायनतन्त्र पञ्चविशति पटल ॥ २५॥ ॥अथ षड्विश पटल.॥ जातवेदमये देवि जगज्जननकारिणित जय पीताम्बरधरे 'बगलाय नमो नम.' ॥१॥ स्कन्द उवाच- नमस्ते सिद्धस सेव्य सिद्धविद्याधराचित । वगलाचतुरक्षर्या प्रयोग पद शङ्कर ॥२॥ शिव उवाच-- 'प्रयोग तर्पण "" वक्ष्येऽह तव पुत्रक । तर्पण देवतावास तर्पण यत्रसिद्धिदम् ॥३॥ तर्पण मन्त्रसस्कार सर्व तत्तपणाद भवेत् तपण द्रव्ययोग च तत" सिद्धिर्न संशयः ॥४॥ अर्चन कलशे चव कारामण्डलवजितम्"। गृहीत्वा क्षालयेत् सम्यक् पूजयन्मूलमन्त्रत ॥५॥ तज्जल च समानीय पूजयेत सुसमाहित । मापो वा इति मन्त्रेण मन्त्रयेतज्जल पुन ॥६॥ उपचार पोडशभि पूजयेत् कुम्भमादरात । तत्पवित्रण सयुक्त तर्पणस्यायुतेन च ॥७॥ तेनोक्तविधिना सम्यक पूजन तदुदाहृतम् । काकोलूकच्छदेनेव" पवित्र ग्रन्थिमादरात् ।।८॥ तत्पवित्रण सयुक्त तपणस्यायुतेन" च । नेत्ररोगी भवेच्छनुर्दिवान्धो जायते ध्रुवम् ॥६॥ १. घ स्वस्त्रिया। २. ख साधकोत्तम । ३. घ. पूजाप्रकरण नाम०। ४१. ६ ७ ष पुस्तके द्वितीया त पाठ । ८ घ. वगलाम्बो नमाम्यहम् । १ौंचभदन १. प ईश्वर। ११ पतपणास्य प्रयोग च । १२ घ. मनसिदिद। सञ्च। १४ घ कालमण्डल। १५ मूलविद्यया। १६ प. काकोलूकछाम्पो १७ प वपणनायुतेन प।
७२] सांस्यायनतन्ने काकपत्रेण सयुक्त' पवित्रग्रन्थिमादरात् । तेनैव सह सन्तयं अय्युत साधकोत्तमः ॥१०॥ काकवद् भ्रमते शनुमहीमामरणान्तिकम् । काकोलूकस्य पक्षाभ्यामेको कृत्वा' सुवुद्धिमान् ॥११॥ कृत्वा पवित्रग्रन्थि च तेन सन्तप्यं चादरात् । अयुत वगलामन्त्रः शत्रुविद्वेषणं भवेत् ॥१२॥ विड्वराहमजारोमः पवित्रग्रन्थिमादरात् । तर्पयेदयुत तेन' बगलाचतुरक्षरः ।।१३।। अन्नद्वेपो जायते च स शनुरवशिष्यते । केश च कलशस्थ च पविन ग्रन्थिमादरात्॥१४॥ प्रयुत तर्पणेनंव 'स शो शन'' भवेत् । उप्ट्रोमेण कृत्वा तु पवित्रग्रन्थिरेव च ॥१॥ तेनायुत तर्पणेन मूको भवति पण्डितः। पूर्ववद्वाजिरोमेण तर्पण च कुमारक ।।१६।। हिक्वारोगो भवेत्तस्य' शीघ्र भ्रान्तो भविष्यति । खररक्तेन समिधर्माचत जलतपंणात् ॥१७॥ जिह्वास्तभो भवत्येव वाणीपतिसमोऽपि वा । श्वानरवतेन समिश्रमचित शुभवारिणा ॥१८॥" अयुत" तर्पणात्पुत्र'५ उन्मादी जायते रिपुः । काकरवतेन सम्मिश्रमर्चित शुद्धवारिणा ॥१६॥ अयुत तर्पणात्पुन काकवद् भ्रमते महीम् । उलूकरसमिथमचित शुभवारिणा ॥२०॥ रिपुरुषो भवेत् पुत्र प्रयुताम्न न उसयः । मार्जारवालरक्तेन मिश्रिताज्जलतर्पणात् ॥२१॥ " १.प.कृत्वा तु। २. प. मातरणान्तिकम् । ३. प. एकोकृत्य तु। बुद्धिमान् । ५. प. गध्रवाराहोमः। ६. प. चंव। ७. ख. मन्यतेपो। प. अन्तदेपो। ८. प. ०माचरेत् । ६. प. स्वशक्त्या० । १०. घ. मवैच्छीघ्र । ११. घ. रिपुर। १२. घ. शुद्धवारिणा। १३. घ. पुस्तकेय श्लोको मास्ति। १४. घ. भयुतात् । १५. घ. तत् पुत्र। १६. प. मिश्रित जलतर्पणम् ।
सप्तश: पटलः | ७३ ग भ्रान्तचित्तो भवेच्छत्रुरयुताच्च न सशयः । विड्वराहस्य' रक्तेन मिश्रित जलतर्पणम् ।।२२।। उन्मादौ च भवेच्छत्रुरयुतादेव' पुत्रक ! लुलायरक्तसम्मिश्रजलेनैव तु तर्पणम् ॥२३॥ 'मयुतादरिगवं तु" भूकम्य कुरुते नृणाम् । भुजङ्गरक्तसमिश्रलेनैव तु तर्पणम् ॥२४॥ शत्रूणां मारण पुष अयुताच्च न संशयः । छागरक्तेन समिधमचितेन जलेन च ॥२शा तपणेनायुतेनैव व्रणरोगी भवेद्रिपुः । शशकस्य तु रकन मिश्रितेन जलेन च ॥२६॥ क्षयरोगो 'भवेन्मयोध्ययुताच" न उशयः । मत्कुणस्य च 'रकन मिश्रितेन जलेन च ॥२७॥ भयुतात्तस्य शत्राश्च भवेन्मरणमुत्तमम् । मेषस्य पुच्छरकेन 'मिश्रितेन जलेन च ॥२८॥ प्रयुताज्ज्वररोगी' च जायते तत्क्षणादियु.। द्रव्येणेव च समिश्रचितं जलपणम्" ॥२६॥ प्रयुताचिन्तित कार्य भवत्येव न संशयः । एततर्पणयोग व सिद्धात् सिद्धतर सुत ॥३०॥ न वक्तव्यं न वक्तव्यं न वक्तव्य कदाचन ।। इति षषिद्यागमे सत्यापनत पवितः" पटला ॥२६॥ ॥ अथ सप्तविंशः पटलः ।। नानालङ्कारशोभाया नरनारायणप्रियाम् । वन्देऽहं बगला देवों परब्रह्माधिदेवताम् ॥१॥ स्कन्द उवाच- वन्दे पाशुपताध्यक्ष परमानन्दविग्रह । वद होमप्रयोग व वगलाचतुरक्षरः ।।२।। १. घ. विड्वराहेण । २. घ. अयुताञ्चव। ३. प. मयुदक्षिणा पञ्च । ४. प, तर्पणात्। ५. घ. मिधित जलतर्पणम् । ६. घ. भवेच्छवरयुतात् । ७. घ. मिश्रित जलवणम्। ८.प. मिधित जलतर्पणम् । . प भयुताचर्मरोगी। १०. घ. पुस्तके पाठोऽय विशेष:-- नरपतेन समिचित जनतपणम् । ११. प. चतुरक्षरीतर्पण प्रयोग नाम पड्विशति । १२. प. क्रौञ्चभेदन ।
७४] सश्यायनाने शिव जयाच'- वक्ष्ये होमविधि सम्यक् सावधानेन श्रूयताम् । अयुत पुष होम' च पिचुमदफलहुँनेत् ॥६।। प्रयुताच्छनुसहारो भ्रान्तभीतो' भवेद् ध्रुवम् । 'करवीराणि रक्तानि" प्रयुत चाज्यसयुतम् ॥४॥ हुनेत् त्रिकोणकुण्डे तु प्रयुताद् रिपुमारणम् । विपतिन्दुकबीज च सौवीरद्रवसयुतम् ॥शा' ग्राममध्ये हुनेन् मन्यो भगाकारे च कुण्डके । तद्ग्रामे वेदशास्त्राणि सर्वं विस्मृतिमाप्नुयात् ।।६।। शेषभाषापतिप्रख्यः स एव जडतामियात्' । वटमूल समाश्रित्य कृत्वा कुण्ड त्रिकोणकम् ।।७॥ तत्फलेन हुनेद् रात्री प्रयुत चाज्यमिश्रित । भाषापतिसमो विद्वास्तत्क्षणाद् भ्रान्तिमाप्नुयात् ।।८।। अश्वत्थमूलमाश्रित्य पट्कोणाकृतिकण्डके । तत्फल च हुनेद् रात्री प्रयुत चाज्यमिश्रितम् ॥६॥ स्फोटकवणसयुक्तो 'म्रियते यमशासनात् । उदुम्बरस्य" मूले तु पट्कोणाकृतिकुण्डके ॥१०॥ कोमल तत्फल सम्यगयुत चाज्यमिश्रितम् । जुहुयाद्रजकस्याग्नौ जुहुयाद्दक्षिणामुख ॥११॥ ग्राम वा नगर वाथ रण राजकुल 'तु वा नाडीव्रणसमायुक्तो नानादु खेन पुत्रक ॥१२॥ म्रियते न च सन्देहो नात्र कार्या विचारणा । राजवृक्ष समाश्रित्य तन्मूले च कुमारक ॥१३॥ १.ध. ईश्वर। २. घ होमाच् । ३. घ. नान्तचित्तो। ४. प. हयारिरक्त- कुसमः। ५ घ. तत्क्षणाद्। ६ ख घ. पुस्तकद्वये विशेषोऽय पाठ - प्रयुत जुहुयानमत्री तत्क्षणाद्रिपुमारणम् । पलारानीजमयुत तिलसलेन सयुतम् ॥ ७ घ ०प्रख्या। ८. ध सर्व विस्मृतिमाप्नुयात् । ६ प. पुत्र । १० घ. मारक भवति ध्रुवम् । ११. प प्रोदुम्बरस्य । १२ प. नग्नो दक्षिणदिङ्मुख । १३ घ. तथा। १४ घ. नात्रा सप्ततिः पटलः [५५ हस्तमा भगाकारं कुण्डं कुर्याद् विचक्षणः । तत्फलं निम्बतलेन मिश्रितं निशि बुद्धिमान् ॥१४॥ नेत्रायुतं हुनेद् धीमान् ग्राम-वा नगरं तथा । स्फोटकवणसंयुक्तो हुस्तपादादिभानतः ।।१५।। पर्यायान् म्रियते चैव नात्र कार्या विचारणा । सपं लवणं चव तिलतलेन मिश्रितम् ॥१६॥ अयुतं जुहुयान्मन्त्री ज्वररोगी भवेद्रिपुः । पिचुमदस्य' तैलेन मिश्रितं लवण तथा ॥१७॥ हुनेच्च' पूर्ववत् कुण्डे अयुत प्रेतपावके । कुष्ठरोगी भवेच्छम्रियते तेन निश्चितम् ॥१८॥ शमीमूले हुनेत्पुत्र 'शृणु वक्ष्यामि तत्फलम्" । तिलतलेन सम्मिश्र तत्फलं निशि पुत्रक ॥१९॥ जुहुयात्तत्क्षणात् पुत्र 'शृणु वक्ष्यामि'' तत्फलम् । वातरोगी भवेच्छत्रुम्रियते नात्र संशयः ॥२०॥ भपामार्गस्य बीजं तु तिलतलेन मिश्रितम् । शमीमूले हुनेत्पुत्र प्रयुतं ध्यानपूर्वकम् ॥२२॥ तरस्थाः शत्रुभाश्चि तद्गृहे तत्र योषितः । वध्याः स्त्रियो भवेयुश्च सत्यमेव' शिवोदितम् ॥२२॥ शमीमूलं समाश्रित्य शलाई च समासतः' । तिलतलेन समिश्र जुहुयादयुत तथा ॥२३॥ प्रेताग्नी रजकाग्नी वा पूर्वोक्त चंव कुण्डके । वैरिस्त्रीणां भवेत् सद्य: स्रवद्रकं निरन्तरम्" ॥२४॥ तिलतलेन संमिधं शलाटु"शाल्मलीभवम्"। पूर्ववच्च हुनेत् पुत्र मेहरोगी" भवेद्रिपुः ॥२!! २१. घ. शत्र। १२. प. पिचुमदेन । ३. प. हुनेतु। .४, ख, ग, घ, भगाकारे तु कुण्डके। ५०.प. सयुक्त। ६. घ. वक्ष्यामि शृणु । ७. घ..सत्यमेतत् । ६. प. शाह, लस्य च मासतः। है. घ. सद्यो। १०. घ. पापद्रपतं ११. प. सुनिश्चितम् । १२. प. लूप। १३. प. भवेत् । १४. घ. महदोगी।
७६ ] साल्यापनतन्त्र एव होमप्रयोग च रात्रौ कुर्यात् कुमारक । 'प्रयोग चोपसहार सत्पुत्रायापि नो वदेत्' |॥२६॥ इति पविद्यागमे सास्यायनतो सप्तविंशति' पटल ॥२७॥ ॥ अथाष्टाविशतिः पटल ॥ बालभानुप्रतीकाशा नोलकोमलकुन्तलाम् । वन्देऽह वगला देवी स्तम्भनास्त्रस्वरूपिणीम् ।।१।। स्कन्द उवाच-. विश्वनाथ नमस्तेऽस्तु विरूपाक्ष नमो नमः । सुगम स्तम्भविद्याया प्रयोग वद शङ्कर ॥२॥ शिव उवाच- वगलाहृदय मत्र गुप्नगुप्ततर' तथा । एतच्छ्वणमात्रेण मत्रसिद्धिमवाप्नुयात् ॥३॥ न घ्यान न च होम च न जप न चतर्पणम् । सकृदुच्चारणान् मत्राच्चिन्तित" भवति ध्रुवम् ॥४॥ न चाभिपेक न च मत्रदीक्षा, न चात्र" दिक्काल ऋतुश्च" देवता । न चापि पञ्चेन्द्रियनिग्रह च, सकृत् स्मरन्वै वगलाख्यहृन्मनुम् ॥५॥ वगलाहृदय मा ब्रह्मादीना च दुर्लभम् । सकृत् स्मरणमात्रेण वाञ्छित फलमाप्नुयात ॥६॥१५ - १. घ पुस्तकेऽयमशो विशेष -प्रयोगादो प्रयोगान्ते पूजा कुर्यात् प्रयलत २ ध पुस्तके श्लोकोऽप विशषो लभ्यते- एव य कुरुते पुत्र प्रयोग सिदिमाप्नुयात । पूजा विना कृत कम प्रयोग निष्पल भवेत् ॥२७॥ ३ घ चतुरक्षरीहोमकपन नाम सप्तविंशतिः । ४ प. बालभाव. । ५. घ ०कुण्डलाम । घ क्रौञ्चभदन। ७ घ सुभग। ईश्वर। ६ घ गुप्तात.। १० घ तस्य चिन्तित । ११ प न चापि। १२ ख दिक्कालक्रमश्च । घ. दिक्पा. १३ । देवताच । १४ ५ •हन्मनुत १५ पद्यानमिद ग. पुस्त कद्वयधिक दृश्यते- सचारवान् भवेत् पङ्ग वादी मूकत्वमाप्नुयात् । ६ अष्टाविंशः पटलः [७७ दरिद्रोऽपि भवेच्छीमान् स्तब्धीभवति' पण्डितः । चतुरो मुष्करपचव' कीतिमान् निन्दको भवेत् ।।७।। कवीश्वरोऽपि चोन्मादी' भोगासक्तोऽपि रोगवान् । रोगवान् क्षयरोगी स्यात् कुलजो' निन्दको भवेत् ॥el मानो लघुतरश्चंव नैष्ठिको भ्रष्टता व्रजेत् । एतद्विना फलो पुत्र सुकृतकीतिकारणम् ॥६॥ गुणश्च वर्तते पुसा तस्योत्पन्न कारणम् । वगलाहृदय म सकृदावर्त्तयेत्तु य ॥१०॥ तस्योल्लघनमाण नष्टः स्यात्पपजोऽपि वा। वगलाहृदय मत्रमुपासनपरस्य च ॥११॥ करोति यस्य सन्तोप तस्य सिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् । येन केनाप्युपायन हन्मत्र येन" जायते ॥१२॥ सन्तोष जनयेत् तस्य" चिन्तित फलमाप्नुयात् । तन्मन्त्रोदारमतुल तत्वतः स्वविधानत" ॥१३॥ वक्ष्येह तव सर्वञ्च क्रौञ्चभेदन तच्छणु । पाशवीज ततोच्चार्य स्तब्धमाया ततोच्चरेत् ॥१४) अकुश बोजमुच्चार्य भूव (वा) राह तथोचरेत् । वाराहं वाग्भव चैव कामराज तत परम् ॥१५॥ श्रीबीज भुवनेशी च वगलामुखिपद वदेत्' मावेशयद्वय चोक्त्वा पाशबीजमतोञ्चरेत् ॥१६॥ स्तब्धमाया ततोच्चार्य मङ्कश बीजमुच्चरेत् । ब्रह्मास्त्ररूपिणी चोक्त्वा एहियुग्मं ततोचरेत् ॥१७॥ पाशबीजमतोच्चार्य" स्तब्धमाया ततोच्चरेत् । अड्कुश बोजमुच्चार्य मम शब्द ततोच्चरेत् ॥१८॥ १. क. स्तल्ली। ख घ. स्तब्धो भवति । २. प. पुष्कर । ३. प. उन्मादी। ४. ग. गवान् । घ. सत्यवान् । ५. घ. च। ६. घ. कुलवान् । विहीनस्तु .स घ. सुकृत कोशि। ६. स. ग, तस्योपासनः । १०. घ. तस्य। ११. घ. यस्य. १२ प. सद्यः। १३. ५. तदाराधनलक्षणम्। १४. प. सर्वत्र १५. घ. समुच्चार्य। १६. प. मुञ्चरेत् । १७. प. बगलामुखि उच्चरेत् । १. प. समुच्चायं । १६. प. पापबीज समुच्चार्य। . ७. घ. लज्जा- घ.तस्य नाशन ७८] साक्ष्यापनतो हृदये 'तु समुच्चार्य' प्रावाहययुग वदेत् । सान्निध्य कुरुयुग्म च पुन:जत्रय वदेत् ।।१६।। ममैव हृदयेत्युक्त्वा चिर तिष्ठद्वय वदेत् ।' "पुन:जत्रय चोक्त्वा हु फट् स्वाहासमन्वित. ॥२०॥ अशीतिवर्णसयुक्तो 'वगलाहृदय मनुः" ।' वन्ध्यामुन्मार्जयेदङ्ग वगलाहृदयेन च ॥२१॥ वन्ध्या पुत्रवती चैव षण्मासाद् भवति ध्रुवम् । वगलाहृदयेनैव त्रिसप्तमभिमन्त्रितम् ।।२२।। 'पय. पिबति वा सा स्त्री वन्ध्या" पुत्रवती भवेत् । कृत्रिमेषु च रोगेपु नानाभयसमुद्भवे" ॥२३॥ त्रिसप्तमन्त्रित तोय सद्यो नमल्पमातनोत् । नित्यमष्टोत्तरशत'" वमलाहृदय मनुम् ।।२४॥ चिन्तित च भवेत् पुत्र नात्र कार्या विचारणा । इति पविद्यागमे सास्यायनतो मष्टाविंशति पटल ॥२॥ ॥ अथोनत्रिशः पटलः । नमस्ते देवदेवेशि नम. स्वर्णविभूषणे । पानपात्रयुते देवि वगले त्वा नतोऽस्म्यहम् ॥१॥ सम्ब'४ उपाच- प्रष्टमूर्ते नमस्तुभ्य मानन्दगणसागर' । वगलाहृदय यन्त्र प्रयोग वद शङ्कर ॥२॥ ईश्वर उपाय- विन्दुत्रिकोणपटकोणक्तत्रयविभूपितम् । पटकोण चैव वृत्त च भूपुरदयसयुतम् ॥३॥ १. पदमुच्चार्य । २. निम्नायोज्य ध पुस्तक एव रयते विराप - पायबीज सतोचाय सम्पमायो ततोचरेद । ३. प भर.सरोजमुच्चार्य। ४. प. स्वाहेति उम्परत । १.प .मत्रोऽय.प मुनिगुह्य सुपावनम्। ७ प पुस्तक एवायमचो विशेष- पुत्र देव शिरो देय न देर हृदय मनु । ८.५ म्यायो मायदेव १ प. पिचेदुस्यकाल तु । १०.प.सापि। •समुन्चर। १२. घ. •पाटोतर २५।। प. हृदयप्रयोग नाम मारियति । १४. प. कोचोंदन । १५. पानादारामागर। ६५ मन्त्र । 4 एकोनविश पटल [७६ wwwwwwww 1 मध्य लिखेन्महामन्य वगलाहृदय तथा । त्रिकोणेषु लिखेद् बीज वगलाख्य सुपावनम् ॥४॥ पट्कोणे वा लिखे मन्त्र पत्रिंशद्वर्णकारकम् । शताक्षरीमहामन्त्रमाद्यवृत्त लिखेत् क्रमात ॥५॥ 'तस्योपरि च सवेष्टय वगलाबीजमादरात्" । तस्योपरि विलिखेद्यन्त्र 'स्वर्णे वा रोप्यपत्रके लिखित्वा शुभलग्ने तु स्पष्टरेखाश्च सलिखेत् । स्पष्टबोजानि सलिख्य पूजयेदवासरे ॥७॥ 'सहन प्रजपेन्मन्त्र दुर्गाहृदयमादरात्"। योगिनी पूजयेत्तत्र धूपदीपानादिभि ||६ कोलाचनविधानेन मन्त्रसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् । सुरक्तं पूजयेद्यन्न 'हयारिकुसुम शुभ ८ ॥ इष्टसिद्धिर्भवेत्तस्य मयुत जपमादरात् । मल्लिकाकुसुमेनवह्यष्टोत्तरशत जपेत् ॥१०॥ वगलाहृदयनैव ह्ययेज्ज्वरशान्तये । 'मल्लिकाकुसमेनैव ह्यष्टोत्तरशत जपेत् ॥शा वगलाहृदयनव अष्टादशशत तथा । अभ्रतिवेदशास्त्राणां व्याख्याता भवति ध्रुवम् ॥१२॥ १ ख ५ पुस्तकरय पादयस्थाने निम्नाशो लभ्यते- तदुपरि च सवेष्टय पञ्चाशत्रणमादरात् । तस्योपरि च सवेष्टघ वालाबीजमादरात् ।। तस्योपरि च षटकोणे वगला चतुरक्षरी । कोणे कोणे लिखे मन्त्र प्रत्यक , कुमारक ।। २ ख ५ एव च। ३ घ स्वरोप्यादिताम्रके। ४ मस्या निम्नांशो दृष्यते. अधिक खप पुस्तकयुग्मे-- 'प्रष्टम्यो घ चसुदश्यां नवम्यो मोमवासरे" उत्तराभिमुखो भूखा लेखिम्या स्वराजावया ॥ ५ घ स्पष्टरेखासु। ६५- प्रजपेद् बगलायाश्च सहन हृदय मनु । ७ घ मिदमत्रो भवेद । ८ घ हयारैश्च सुबुद्धिमान् । २ ख •कुसमैश्चय । कुममंदियः। १० -यम तकुसुमेनव ह्यचयच्छतमादरात् ।। धमथुतान् । 1. कृष्णाष्टम्यो। 2 4 मया पौरिखमादिने । 3 हेमवारयो ।
८.] सांस्यायनतात्रे वकुलः पूजयेद्ययं पुत्रवान् जायते नरः । 'पलादाकुसुमैरर्चेद्यत्र राज' कुमारक ॥१३॥ विद्यासिद्धिर्भवेत् पुत्र पूर्वसंख्यामात्सुत' । पापभेण सम्पूज्य पूर्ववद्यमादरात्' ।।१४॥ कुवेरसदृशो भूत्वा 'लभते भुवि सपद." । नन्द्यावत्र्यन्त्रराज पूजयेत् पूर्ववत् सुत ॥१५॥ त्रैलोक्य 'वशमाप्नोति पूजायाश्च प्रभावतः" । चम्पकैनैव सम्पूज्य पूर्ववद्विजितेन्द्रियः ।।१६।। तस्य दर्शनमात्रेण वादिना स्तम्भन भवेत् । विल्वपत्रेण सम्पूज्य पूर्वसख्यासु बुद्धिमान् ॥१७॥ द्रव्यलाभ' भवेत्तस्य तत्क्षणादेव पुत्रक ।' अशोकपुष्पं. सम्पूज्य पूर्ववद्विजितेन्द्रियः ॥१८॥ श्रेष्ठराज्य भवेत्युन अनायासेन साधकः । केतकीकुसुमेनैव पूर्ववत्पूजयेत्सुत ।।१६ निधान लभते तस्य शिवस्य वचन यथा । पीतवर्णेन पुष्पेण 'निर्गन्धेन सुगन्धिना ॥२०॥ अर्चयेदयुत मत्री पोडशेरुपचारकः । वाचा. सिद्धिर्भवेत्तस्य देवीरूपो न संशयः ॥२२॥ तस्य दर्शनमात्रेण सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् । यजेतद्वगलायन्त्र'' मुनिगुह्य सुपावनम् ॥२२॥ प्रकाशयन कस्यापि देवताशापमाप्नुयात् । इति षविद्यागमे साल्पायनत एकोनविंशः पटलः॥२९॥ भेदन । १. घ. पालाशपुष्पसपूज्य. मेघराज। २. पूर्वसध्या पुषक। ३ घ. पूर्ववत् क्रौंच- ४. घ. मोदितो भुवि सपदः । ५. ध वशमायाति यावज्जीव न संशयः। ६. घ. द्रव्यलाभो। ७ घ. पुस्तक एव निम्न: श्लोको दृश्यते विशेष.- तुलसीमरीभिस्तु पूर्ववत्पूजयेन्नरः । राजलामो भवेत् सद्य प्रयत्नादेव पुत्रक ॥ ८. ख. विधान। ६- घ. निर्गन्धर्वा सुगन्धिभिः । १०. प. वाञ्छा। ११. घ.. एतदगलाम। १२. घ. न देय यस्य । १३. घ, बगायत्रप्रकाशन नाम एकोनविंशः।
शि: पटल' [१ . २ । अथ त्रिशः पटल'। नमस्ते देवदेवेशि पुत्रपौत्रप्रवद्धिनी(नि)। स्तम्भनाथं भजेह त्वा पीतमाल्यानुलेपनाम्' ॥१॥ स्फाव' उवाच- नमस्ते सर्वसर्वेश पुराणपुरुषोत्तम । आगलाष्टाक्षरमत्र वद मे करुणाकर ॥२॥ शिव उयाच- वेदादि 'विलिखेत् पूर्व पाशबीजमनन्तरम् । स्तम्भमाया' ततोच्चार्य अङ्क श बोजमेव च ।।३।। 'हु फट् स्वाहा-समायुक्त मन्त्रमष्टाक्षर' तथा । ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दोऽस्य" गायत्री समुदाहृता ।।४।। 'देवता बगलानाम्नी चिन्मयो विश्वरूपिणी"। ॐ बीज ह ली शक्तिश्च को कीलकमुदाहृतम् ॥५॥ ग्यासविद्या च वगलामन्त्रराजवदाचरेत् ध्यान चैव प्रवक्ष्यामि मन्त्रभेदेन पुत्रक ॥६॥ युवती च मदोद्रिका" पीताम्बरधरा शिवाम् । पीतभूषणभूपागी समपीनपयोधराम् ॥७॥ मदिरामोदवदना प्रवालसहशाधराम्। 'पानपात्र च शुद्धि च"" विभ्रती वगला स्मरेत् ।। एव ध्यात्वा जपेत् पुत्र वगलाष्टाक्षरीमनुम् । ध्यानेनैव जप कुर्याद् ध्यायेदाद्यत्तयोस्तथा ॥६॥ 'प्रशोकमूले निवसन् मधुरारससयुतम्" । हरिद्रामालिकाभिश्च वर्णलक्ष जपेन्मनुम् ॥१०॥ १ पोतमाल्यांबुलपनाम् । २ घरा कोचभदन । ३ ख प रा बगलाष्टाक्षरी- मन । ४. स. प रा. ईश्वर। ५ ख शक्तिरामी हु। ६. स. ध रा. स्तब्धमाया। ७. रा बीजमुश्वरेत। - स. बगला । ६ष मनमष्टाक्षरी। १०. रा बन्दोत्रा ११. ''मयमश ख. पुस्तके नास्ति । रा. ०बीजरूपिणी। १२ सघ बगला०।१३. ख. प. मदोन्मता। रायोषना च मदोन्मतो। १४ घ. रा वैरिजिह्वा पानपात्र । १५. ध रा. मत्र। १६ रा ध्यायन। १७. ख पराम् । १८. प रा प्रशोकमूलमाधिस्य हरिनाम्बरसयताम् ।
८२ । सांख्यायनता . अष्टायुत तपंण च हेतुसम्मिश्रवारिणा । तद्दशाश हुनेत् पुत्र अन्नन' 'च सम मधु' ॥११॥ योगिनी पूजयेत् पश्चाद् गर्भकोलागमनमात् (मः)। ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चाच्छत' 'वाष्टरात तु वा ॥१२॥५ एतन्मयस्य माहात्म्य शिवो जानाति नान्यथा । विल्वमूले जपेन्मत्रमयुत ध्यानपूर्वकम् ॥१३॥ लक्ष्मीवान् जायते पुत्र दरिद्रस्तु न संशयः । अश्वत्थमूले प्रजपेदयुत पूर्ववन्नरः ॥१४॥ अश्रुतानाच शास्त्राणा व्याख्याता भवति ध्रुवम् । शमीमूले जपेन्मत्रमयुत पूर्ववन्नरः ॥१५॥ भ्रष्टराज्य लभेत्पुत्र" अनायासेन निश्चितम्। वदरीमूलमाश्रित्य प्रयुत पूर्ववज्जपेत् ॥१६॥" वशीकरणसम्मोहो 'जाय (ये)ते नात्र संशय.' उदम्बरत रोमूले" पूर्ववज्जपमाचरेत् ॥१७॥ कुवेरसदश श्रीमान् जायते नात्र संशयः । कदलीमूलमाश्रित्य पूर्ववज्जपमाचरेत् ॥१८॥" १. पायेन । रा. ताफल । २ रा. कुसुम मधु । ३. प. रा. पुष पार्ट। ४. रा. वातु तदकम् । ५. स प. रा पुस्तकेषु विशेषः पाठो दृश्य- घ रा. ध्यानोक्तां बगला देवो चमंदादर्शनीभवेत् । स. ईमदर्शने भवे देवि नान्यथा तिवमापितम् । ७. घ. ध्यानपूर्वकम् । ८. ख प. प्रश्रुतानि । रा. मयुतं । ६. ख प. शास्त्रारिण। रा वेदशास्त्राए। १०.छ. प्रजपेपर। ११. स. भवेत् सद्यो। १२. स. रा. दुवक। १४. श्लोकोऽय मास्ति घ. पुस्तके । १५ रा स्वभावेनं जायते। १६ प. मोदुम्बर० । १७ प पुस्तके दलोकोऽय नास्ति १८. घरा. मयुत पूर्ववत् अपेत् । १६. प. पुस्तके पचमदो नास्ति । ६. ख. प. दरिद्रोऽपि एफनिश पटल. [३ 'प्रयोगादीनि सर्वाणि सर्वसिद्धिर्भवेत्सुत" ॥१९॥ ॥ इति पविद्यागमे साख्यायनतन्त्र त्रिंशत्पटलः ॥३०॥ ।। अथ एकत्रिंशः पटलः॥ विराटस्वरूपिणी देवी विविधानन्ददायिनीम् । भजेऽह बगला देवी भक्तचिन्तामणि शुभाम् ॥१॥ फोञ्चभेदन उवाच-- चन्द्रोपेन्द्र महेन्द्रादिसनुतः सर्वमङ्गला(ल)। बगलाष्टाक्षरीमन्त्र(त्र) प्रयोगान् वद शङ्कर ॥२॥ १. स. पुस्तके एतदशस्थानेऽयमशः समुपलभ्यते--- 'प्रयोगादीनि सर्वाणि पूर्वधकारयेत् सुधीः । एतत्कमेव पुत्र बगलाष्टाक्षरोविधि। सक्षेपेन मया प्रोक्त किम-पच्छ,ोतुमिच्छसि ।। मस्या निम्नातो पपुस्तक एवं दृश्यते- प्रयुताल्लभते भोग काश्चित शिवता इव । पूगीवन समाश्रित्य मयुत पूर्ववज्जपेत् ॥१६॥ निक्षेप लभते पुत्र प्रयुतान्मासमात्रत्तः । जंबीरतश्माश्रित्य प्रयतं पूर्ववज्जपेत् ।।२०।। राजा चैव यथो भूत्वा सर्वस्व दीयते ध्रुवम् । उद्यानवनमात्रिस्य मयत पूर्ववाजपेत ॥२१॥ य य वापि स्मरेत् पुत्र तवं प्राप्नोति निश्चितम् । पुष्पवाटया जपेन्मत्रमयुत पूर्ववत् सुत ॥२२॥ राजलाभो भवेत्तस्य नात्र कार्या विचारणा नदीतीरे जपेन्मंत्रमयुतं पूर्ववानरः ॥२३॥ पुत्रवान् जायते लोके धनधान्यादिसयुतः। एतन्मयी जपेन्मत्र ततत्फलमवाप्नुयात् ॥२४॥ एसदाक्षरीमा सर्वमत्रोत्तमोत्तमम् । प्रयोगादीनि सर्वाणि सर्वसिद्धिर्भवेत्सुत ॥२५॥ २. मष्टाक्षरीप्रयोगं नाम वियपटलः । ३. रा नमस्ते लोकजननी (नि) ध्यासवाल्मीकिवन्दिते । स्तम्ब (म) नावरूपिण्यं वगले तो नमाम्यहम् ॥ .. रा. इ-द्रोपेन्द्र महेन्द्रादिसन्तुष्ट । ५. रा. प्रयोग।
८४] मस्यायनतन्य ईश्वर उपाच- सपंप लवण चैव चितामस्म सम समम् । अकंक्षीरेण सल्वेन मईयेत्' सूक्ष्मतोऽनघरे ॥३॥ अङ्ग प्ठमात्रा' कृत्वा तु पुतली पूर्ववत् सुत । बदरीकण्टक' चैव सर्वाङ्गे तस्य लेपयेत् ॥४॥ पारनालस्य भाण्डे तु अधोमुखी' विनिक्षिपेत् । 'मङ्गारवासरे पूज्या" पुनस्तयंव निक्षिपेत् ॥५॥ एव मासनय कृत्वा 'जिह्वास्तभ भवेद् रिपोः । रवी रात्रौ च सगृह्य चिताभस्म समादरात् ।।६।। बगलाष्टाक्षरोमन 'प्रयत मत्रयेत् सुत । खाने पाने च तद्भस्म दातव्य वैरिणस्तथा" |७|| जिह्वा मुख' च कर्णाक्षिपादादिस्तभन भवेत् । तेनैव नियते शनुर्मासान्मण्डलमाप्रतः ॥८॥ आरनालेन'५ तद्भस्म रहस्येन विनिक्षिपेत् । तदन्न भक्षणेनैव बुद्धिन शोऽपि'" जायते ।।६।। तद्भस्म तिलतलेन शिरोभ्यङ्ग समाचरेत् । तेनैव तत्क्षणात् पुनः चित्तचाञ्चल्यवान् भवेत् ॥१०॥ तद्भस्म चूर्णमिश्र 'कृत्वा चूल च वर्णकम् । 'तेन शत्रुस्तरक्षणाच्च बुद्धिजाडवो भवेद् ध्रुवम् ॥११॥ विप्रचाण्डालयोः शत्य (सत्य) प्रेतवस्त्रेण वेप्टयेत् । बगलाष्टाक्षरीमन मत्रयित्वा सहस्रकम् ॥१२॥ १. रा. मदय। २ रा. सूक्ष्मतो मुखम् । ३. प. मात्र ४. रा. कण्ट कान् । ५. रा. निक्षिपेत् । ६. रा प्रषोभागे। रा. पङ्गारवारे सम्पूज्य शत्र स्तम्भो भवेद् ध्र वम् । है रा सग्राह्य। १०. रा. मात्रयेनयुत। ११ वरिषा तथा। १२. रा मति.. १३. रा. वर्णादि०। १४ रा. शव मण्डल नात्र सरायः। १५ रा. पारनाले च। १६. रा प निक्षिपेत् । १७. रा. बुद्धिभ्रष्टोऽनि । १८. स. शत्र। १९ रा.चित्त चाञ्चल्यवान् । २०. रा. मिश्र तु। २१. रा. कृत्वा ताम्बूल. चर्वणम् । २२. रा. कृत्वा तत्क्षणाच्छन् । २३. रा. शल्य । २४. रा बगलाटाक्षर मंत्र:। २५. रा मवस्त्रकम् ।
एकत्रितः पटलः रवी रात्रौ शत्रगेहे' ईशान्ये नव(चंव) निक्षिपेत् । मण्डलातद्ग(तग)हस्थोऽपि म्रियते नात्र संशयः ॥१३॥ कटक' पुरपक्षस्य विसहस्र तु मन्त्रयेत् । निक्षिपेच्छश्रुसदने नित्य कालमाप्नुयात् ।।१४॥ काकोलूकदल व भोमे वा रविवासरे। समहेत् प्रेतवस्त्रेण वेष्टयेद् रविवासरे ॥१५॥ निक्षिपेद् रविवारे तु रिपु(पो),हे तु बुद्धिमान् । ग्र(ग)हविद्वेषण* सद्यो जायते नात्र संशयः ॥१६॥ सर्प (पं) मण्डूकयोः शल्यं प्रेतरज्वा तु वेष्टयेत् । निक्षिपेच्छत्रुसदने सशत्रु रवशिष्यति ॥१७॥ मार्जारबालरोमाञ्चणि) रखी रात्री च सम हेत् । प्रेतवस्त्र रवी ग्राह्य शिवनिर्माल्य मेव च ॥१८ll रवो रात्री च सग्राह्य नरास्थि च सम समम् । चूर्ण (णी) कृत' तु तत्सर्व मन्त्रयेदयुत तथा ॥१६॥ धूपयेच्छत्रुसदने तस्य सचारयो(ग)-स्थले । 'तथूपवासने शत्रु को" भवति तत्क्षणात् ॥२०॥ तज्चूर्ण देवतागारे भृगुवारे च धूपयेत् । पलायते च तन्मत्रो" शिवस्य वचन यथा ॥२१॥ गजाश्ववृषभोलूकमहिषोरगकुक्कुटम् १२ । तच्चूणं धूपयोगेन सर्व तुजलादिकम् ।।२२।। नियते सप्तरात्रेण स्वेदजाण्डजपिंज(ड) जा." । एतचूर्ण वृक्षमूले धूपयेच्च" कुमारक ॥२२॥ फलित पुष्पित वाथ स्थूलवृक्षमथापि वा। "सप्ताहात् शुष्कता" याति सिद्धियोगः कुमारकः ॥२४॥ १. रा. गुहे। २. रा. मण्डल तु ग्रहस्तोपि । ३. एकठक ४.स.पर- पुष्टिश्च । ५. रा. भोमवारस्य वासरे । ६ रा.सु । ७ रा. गृह । ८ रा मार्जारी. रोमवाली ६. रा. पूणं कृत्वा । १७. रा. धूपवासने दावश्च मूको। ११. रा. पलायसो धर्न मुक्ति। १२. रा कुरा । १३. रावेतमाचारजापि च । १५. रा. समाहाच्छुकांत । रा. •तु।
८६ ] साख्यायनतन्ने मृगाणा' चव হায়ূন্য खाने पाने प्रयत्नत । बुद्धिनाशो भवेश्छनु(त्रो) स्त्रिदिन भक्षणात् सुत ॥२५॥ प्रजा' बुद्धि श्रिय चव ऐश्वयं हरते नृणाम् । एतच्चूर्णप्रयोग च ऋषीणामपि दुर्लभम् ॥२६॥ चिताभस्म रवी रात्री सग्रहेच्च तदर्भक । अयुत मन्त्रयित्वा तु रिपुमूनि विनिक्षिपेत् ॥२७॥ काकवद् भ्रमते शत्रुमहि (ही)मामरणान्तिकम् । 'शिलामामलक प्रस्थ' ८ सहस्र सग्रहेद् बुध. ॥२८॥ 'अर्कवारे तु सध्याया' मत्रेणैकेन मन्त्रात्]'' मनित निक्षिपेद् दूरे(द्वारे)" दक्षिणाभिमुखेन च ॥२६॥ नित्य चंव सहस्र तु निक्षिपेद् दशवासरे। उच्चाटन भवेच्छत्रो न्यथा शिवभाषणम् ।।३०॥ धतूरपत्रमादाय सहस्र मन्त्रयनिशि। प्रेतवस्त्रग सवेष्टय भीमे सयुनिकेतने ॥३१॥ निक्षिपेद् द्वारदेशे तु मूको भवति तद्रिपु । तन्मार्गे सचरेद् यस्तु तत्सर्वेऽप्यरिमन्दिरे" ॥३२॥ 'खरबाल च रोम च प्रतरज्जुस्तथैव च । मन्त्रयदयुत मत्र निक्षिपेच्छनुमन्दिरे ॥३३॥ पक्षाद वा मासयोगेन् ‘स शत्रुर्बान्धर्व सदा"। म्रियते नात्र ८ सन्देहो नात्र कार्या विचारणा ॥३४॥ एतच्च बगलामन्त्रप्रयोग भुवि दुल्लभम। गुरुपुत्राय दातव्य" न दद्याद्" यस्य कस्यचित् ॥३५॥ इति 33 साम्यायनतात्र प्रष्टाक्षरीप्रयोग नाम ४ एपिटल । १ रा पिता २ रा भक्षयत्. ४ रा हनते । प्रयोग । ६ दुलभ.. ७ ए रहेत। ८ रा टापूमूल के प्रस्थ । कापितस्यायो। १० रा स यदेत् । ११ रा. विनिक्षिपे। १२ स..वासरम्। १३ रा.प्यतिम दधी। १४ रा. साबालक रोमाणि। १५ १६ । दयतमात्र। १७ रा बुटिनारानपूर्वकम् । १८ रानप। १६. रा.प्रयोगो। दुल्लभ । २१ रा दातम्यो। २२ रा देयो। रा थोपविधाममे । २४ रा नास्ति। ३ रा प्रज्ञा। ५. रा. २० रा.
द्वात्रिः पटल [८७ ॥ अथ द्वात्रिंशत्पटलः ॥ मन्त्रादौ तव बोजपूर्वकमथ क्ली ब्लू म्ल' सौ ग्लौ जपान', तावाद्ध्यानपराया प्रतिदिन पीत्ता (ता)क्षमालाधरः । साध्याकर्षणवश्यमाशु बगले साध्यस्य शोन भवेत, प्रेतात्यासनपूर्विके विवसने तत्प्रेमभूमी निशि ॥१॥ कौञ्चभेवन उवाच- नम. पापविदूराय नमस्ते चन्द्रशेखर । बगला'चोपसहारविद्या वद सुपावनो[म् ॥२॥ ईश्वर उवाच- ब्रह्मास्मस्तम्भिनो कालो विद्या चास्त्रसुपावनी । तस्यास्मस्मरणादेव बगला शान्तिमाप्नुयात् ॥३॥ तद्विद्या च प्रवक्ष्यामि शान्तो तच्छणु" षण्मुख । उच्चरेच्छतिवाराह वाराह" तदनन्तरम् ।।४।। पाग्वीज च ततो(यो)च्चार्य भुवनेशी" ततः परम् । महामाया' ततो(थो)च्चार्य धोवीज तदनन्तरम् ॥५॥ कालोशन्दद्वय घोक्ता(स्त्वा) महाकालोपद" वदेत् । एहि शब्दद्वय चोवस्था कालरात्रो (नि)पद वदेत् ॥६॥ स्फुरद्वय समुच्चार्य प्रस्फुरद्वितय" लिखेत् ॥७॥ स्तभनास्पद चोक्त्वा शमनीपदमुच्चरेत् । हूं फट् स्वाहा-समायुक्त मन्त्रमेव समुद्धरेत् पचाशद्ध्व मत्रस्य वर्णत्रयविभूषितम्" । ब्रह्मास्त्रस्तमिनोकालोमन्त्रमेता सराय. ॥६॥ पलाशमूलमाश्रित्य लक्षमेक जपे[तस्मयः । तप्पयेत्तद्दशाशेन" कपूरमिश्रित जल.७॥१०॥ १. रा.नास्ति। २ रा.सो. ३ रा.पे। प्रायासन.. ६. रा. चगमा। ७ रा. पात्र । ८. स मरण माण। ९ क. साई १०. रा.प. ११. रासार। १२. रा. भुवनेश। रा.मभमाया। १४. रा. कालि। १५ रा. महाकालि। १६ रा महामोहम्मा २५. रा. वदेत्। १८. रा. समुन्चरेत् । १६. रा मन्त्रा २०. रा. नवोन विभूपित. २१. रा. जपेपर। २२. ००६ ॥ २१. रा. जसम्। ४.रा.परायल।
१८ ] साख्यायनतन्ने पलाशपुष्पर्जुहुयाच्चतुरस्र च कुण्डले (के)। ब्राह्मणान् भोजयेत् पुत्र' सहस्र शतमेव वा ।११।। मन्नसिद्धिमवाप्नोति देवता च प्रसीदति । ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दोभ्य (स्य) गायत्री समुदाहृतम् ॥१२॥ देवता कालिका नाम स्तंभनास्त्रविभेदिनी । ध्यानं यत्नात् प्रवक्ष्यामि मन्त्रभेदेन पुत्रक ।।१३।। काली करालवदनां कलाधरधरां शिवाम् । स्तम्भनास्त्रकसहारी ज्ञानमुद्रासमन्विताम् ॥१४॥ वीणापुस्तकसयुक्ता कालरात्रि नमाम्यहम् । बगलास्त्रोपसहारीदेवता* विश्वतोमुखीम् ॥१५॥ भजेऽह कालिका देवी जगद्वशकरा' शिवाम् । एव ध्यात्वा तु मन्त्रज्ञः प्रजपेच्छुद्धि (ख)" मानसः ।।१६।। वक्ष्येऽह घोपतहारक्रमं लोकोपकारकम्"। जम्बोरफलमादाय मन्त्रयेच्छतमादरात् ॥१७॥ भक्षयेत् प्रातरुत्थाय निद्रान्ते च कुमारक । एव चार्कदिन कृत्वा जिह्वास्तम्भादिकृत्तिमम् ॥१७॥ सद्यो नर्मा(म)ल्यमाप्नोति तमः सूर्योदये यथा । रवी श्वेतवधा ग्राह्य मन्त्रयच्छतमादरात् ॥१६॥ प्रात.काले भक्षयित्वा विसहस्र मन जपेत् । वाच" मुख पद चंद जिह्वा बुद्धीन्द्रियाणि च" ॥२०॥ स्तम्भित मन्ययोगेन तत्सर्व शान्तिमाप्नुयात् । ताम्रपाने समादाय नदीजलमकल्मषम् ॥२१॥ रातवार मन्त्रयित्वा प्राशयेच्छान्तिमाप्नुयात्" गोमूत्र चैव सगृह्य मन्नयेच्छतमादरात् ।।२२।। १. रा. पश्चात् । २ रा. समुदाहृतः। ३. रा. नाम्नी। स्वकमंदिनी। ५ रा.लाधारधरी। ६. रा. स्तभनास्त्र सहारि घंह भद्रमालिकाम् ॥१४॥ स्तभनास्त्रोपसंहारि ज्ञानमुद्रासमन्वितम् (ताम्)। ७. रा. बालास्त्रोपसहारि विश्वतो । ८, रा.देवसामुखी। ६. रा. जाइयवायकरी। ११. रा. कोलोपकारकम् । १२. रा. स्वेतवला । १३. वाचा । २४. रा. जिह्वायम्पादिकादपि । १५. रा. लोपामिद नास्ति। १.रा.तुपामास । ४. रा.स्तम्भना- १०. रा..रिसद्धि।
द्वात्रिः पटला [ ९ एवं कृत्वा जपेन्मन्' उन्माद शास्तिमाप्नुयात् । मन्त्रयेदारनालं च प्रातः प्रातः पिबेन्नरः ॥२३॥ मण्डलज्वररोगं व नासमाप्नोति निश्चितम् । 'अष्टोत्तरं मन्त्रयित्वा धारोलंब पिवेन्नरः ॥२४॥ गर्भस्तभनदोष च मण्डलाच्छान्तिमाप्नुयात् । भस्म च मन्त्रयेत् प्रातः त्रिसप्त विशतेन' वा ॥२५॥ तण" सहितं पीत्वा विसहस्र दिने दिने । वगलामत्रयोगेन एतत्प्राणसमुद्भवः ॥२६॥ नाशयेदाशु तत्सर्वं तुलराशिमिवानलः । यक्षयूप' समानीता" मत्रयेच्छतमादरात् ॥२७॥ धूपयेत्तेन सर्वाङ्ग दशरात्र कुमारक । यक्षपोद्भव" चं प्रयोग व कृत्तिमम् ॥२८॥ तत्क्षणान्नाशमाप्नोति नाय कार्या विचारणा । रवो ब्राह्मी समादाय छायागुष्क समाचरेत् ॥२६॥ मन्त्रयेत् विसरतु मक्षयेत् प्रातरेव च । एतद्विद्या जपेन्नित्य निसहन कुमारक ॥३०॥ बगलास्त्रकृत" यद्यत् प्रयोग दुर्लभम् भुवि । तत्सर्व नाशमाप्नोति मास मण्डलमात्रतः ।।३।। ब्राह्मीरस समादाय मन्त्रयेच्छनधा पुनः । शर्करासहित पीत्वा सहस्र जपमाचरेत् ॥३२॥ नानाकृत्रिमदोप च वगलामन्त्रत: ५ कृतम् । अमङ्गल्यो [] भव नाय" भूतले यदि दुलमम् ॥३३॥ - १. रा. तु दण्मासं। २. रा. उत्पादः। ३. रामप्टोसयत मप्र धारोप्य । ४. रा.मण्डलानाशमा०। ५. रा. मात्रयन् । ६. रा, सप्तमेव । ७. रा. मात्र। ८. रा. यचदासमुद्भवम् । ६. । वृक्ष। १०. रा. समानीय । ११. रा. वृक्षः पोद्भव। १२. रा.नामा १३. रा. समाहरेत् । १५. प. गलाविकत । रा. गर्भया मन्त्रि १६ रा. वाघ । १७. रा. यत्तु।
१०] सख्यायनतन्त्रे मण्डलानाशमाप्नोति तम सूर्योदये यथा । एतद्विद्या साम्प्रदाय' गुरूक्तान्' लब्धमन्त्रवान् ॥३४॥ लक्षमेक जपेन्मन्त्री प्रयोग नाशमाप्नुयात् । अशक्तश्च स्वय पुत्र 'कुर्वते ब्राह्मणामपि ॥३॥ द्विगुणा जपमाप्नोति तमः सूर्योदये यथा । एतद्विद्या सम्प्रदाय वद्वये ब्राह्मणानपि ।।३६।।५ द्विगुण जपमात्रेण सर्वशान्तिमवाप्नुयात् । एतद्विद्या विना पुत्र कलौं च बगलामुखि (खी) ॥३७।। प्रयोगशान्तिन' भवे[न्] मत्रपत्रोपधादिभि । सप्तकोटिमहामत्रप्रयोगेषु च पुत्रक ॥३८|| एतद्विद्यापुरश्चर्या नाशयेदागु निश्चयम् ।। नम श्रीकालिकादव्यं कालरा ये नमो नम ॥३६॥ उपसहाररूपिण्यै देव्यं नित्य नमो नम इति पापडविद्यागमे सात्यायनल 'प्रयोगसहार नाम" द्वात्रिंशत्पटल ॥ . ॥४०॥ ॥अथ त्रयस्त्रिशत्पटल ॥ पीनोत्तुङ्गजटाकलापविलसद्भ लेन्दुसच्छेखराम्,' बिभ्राणा शितशान्तकुम्भमुकुटा"3(ट)नेत्रत्रयालड कृताम । शब्दब्रह्ममयी त्रिलोकजननी शक्ति परा शाम्भवोम, देवीश्रीबगला सुरासुरवरैरभ्यचिता भावयेत् ॥१॥ फौञ्चभेदन उवाच- नम शिवाय साम्बाय ब्रह्मणेऽनन्तमूत्तये । वद मे चोपसहार यत्र लोकोपकारकम् ।।२।। समादाय । २ रा गुरुतो । ४ रा प्रापयेदवा- ह्मणानपि। ५ रा पद्यमिद नास्ति। ६ घशात न। ७ प नागयेण। ८ घ निश्चय । हैरा पद्यास मिदं नास्ति। १० रा पद्यादमिद नास्ति। ११ समास्ययमशः। १२ रा बाले दु.॥ १३ रासितः। १४ घ श्रीबगला ब्रह्मास्त्रवीसुरनरभ्यचितामाश्रये ।
प्रारमशः पटलः [१ ईश्वर उपाय- कपिलानवनीतं च कदलीपत्रमध्यतः' । लिपत्वा' मंत्र' लिखेतत्र 'कृत्वा पूजा" च साधकः ॥३॥ Aषट्कोणं चाष्टकोणं च वृत्त भूपुरमेव च । पट्कोणकर्णिकायां व(च)पट् बोजानि मनोलि खेत् ॥४॥ शिष्टाक्षराणि कोणेषु ब्रह्मास्त्रस्तम्भिनीमनुः । अष्टपत्रे लिखेन्मंत्र तापमालामनुस्तथा ॥५॥ फोऽयंस्ताक्ष्यमनुश्चेति वक्ष्येऽह मन्वनायकम् । Bाचवणं समुच्चार्य ताक्ष्यंबीज ततः परम् ॥६॥ ॐ नमो पदमुच्चार्य पश्चाद् भगवते पदम् । ताक्ष्यबीज पक्षिराजायोक्त्वा ताक्ष्यं ततः परम् ॥७॥ सर्वशब्दं ततो (थो) च्चार्य अभिचारपद वदेत् । ध्वसकाय पद क्षोमों हुं फट् स्वाहा-समन्वितम् ॥८॥ B ताक्ष्यस्य मालामन्त्रश्च द्वात्रिंशद्वर्णसयुतम् । मष्टपने वेदवेदवर्णान् पूर्वादितो लिखेत् ॥ १. रा. कदलोपएंके तपा। २-३.घ.लिप्य यत्र। ४. रा. यामध्ये। A-Aचिहनान्तर्गतांशस्थाने रा. पुस्तके निम्नाश एवोपलम्य- पट्कोणमध्ये विलिखेद्ब्रह्मास्नस्तभिनीमनुः । मष्टप लिखेमन्त्र साक्ष्यमालामनुस्तपा" B-B चिहनावगंवांशस्थाने रा. पुस्तके निम्नाद्वितः पाठभेदो दृश्यते-- मन्यवर्ण समुन्चायं चतुर्थस्वरपूर्वकम् ॥४॥ विन्दुना भूषित पुत्र वाक्यं एकाक्षरी वा ॥ ॐकारनीजमुना वायवीय ततः परम । ॐ नमो पदमुम्चायं ततो भगवते पदम् । पक्षिराका दन्चार्य भिचारपद वदेत् ॥ ध्यसाय पद चोक्त्वा ह फट स्वाहासवितम् ॥६॥ मत्र:-*यो नमो भगवते पक्षिराजाय मभिचारादिसकलकरित्रमध्यसकाय फट् स्वाहा । ५. लोकस्यास्य रा. पुस्तके निम्नोऽय पाठ :- मालामर तापंविधा पविधाएंसंयुता ।। मष्टपत्र लिखेरात्र प्रापिएकमेण तु ॥७ ६२ ] सात्यायनता प्राणप्रतिष्ठा यत्रस्य' पाद्यवृत्ते लिसेत् सुत । तदुपरि लिखेद् वर्णान् पञ्चाशल्लिपिसयुतान् ॥१०॥ पाशाइशं च विलिसेद् भूपुरेषु यथाक्रमम् । प्रष्टकोणे लिसेद् वान' वान्ते वर्म फट तथा ॥११॥ एवं लिखित्वा यत्रं च पूजयेन्मानसेन तु । एवं कृत्वा तु तत्सर्व नवनीत कुमारक ॥१२॥ भक्षयेद् बदरीमात्र साय प्रातस्तु बुद्धिमान् । देवतावेशमतुल मन्नयन्त्रादिकृत्रिमः ॥१३॥ शल्यदारुमय 'तत्र प्रयोग वगलाश्च यत्" । नारायेमण्डलादेव शिव स्य वचन यथा ॥१४॥ एतद्यन्त्र हृदि ध्यायेद् दु.खकाले सुबुद्धिमान् । दशरामाद् व्यपोहतु(ति) दारुणरपि' कृलिम: ॥१५॥ रोप्य वा स्वर्णपट्ट वा लिखेद् यतमिम बुधः। पूजयेद् रक्तपुष्पेण' षोडशरुपचारकः ।।१६।। कण्ठे वा बाहुमूले वा शिखाया वा कुमारक । बयित्वा वाभिचार नाशमाप्नोति निश्चतम् ॥१७॥ नागवल्लीदलेनेव' एतद्यत्र कुमारक । चूर्णेन विलिखेत् सम्यक् पूर्व ताम्बूलचर्वणम् ॥१८॥ एवं कुर्यात् प्रातरेव तद्वत् साय समाचरेत् । मासत्रय" चरेदेव कृत्रिम हरते नृणाम् ॥१६॥ कुर्यात कृत्लिमरोगेण पीडिताय कुमारक । तत्कायंगौरव चैव लाघव चावलोकयेत ॥२०॥" पक्ष वाथ निसप्ताह" मास वा मण्डल तथा। यथा क्याधित्रियुक्त च तावत्काल कुमारक ॥२१॥ १. रा. मन्त्र तु। २. रा..वर्ण । ३ रा.एसयुतम्। श्लोकोय रा. पुस्तके नास्ति । ६. रा. कत्रिमः। ७.'-' रा. याच बगलायोग- ६. रा. दारुणानपि। ६. रा. कृरित्रमान् । १०. रा. बुधैः। रा. रक्तपुष्पस्तु। १२. रा. निश्चयात् । १३. रा..व। १४. रा. मासमात्र। १५. रा. पुस्तकेऽतः परं विशोषोऽय श्लोको दृश्यते- स्तम्भनास्त्रोपसहार मन्त्रणव कुमारक । मार्जनं बिल्वपत्रण मारोहादवरोहकम् ॥१७॥ १७. रा. त्रिसप्ताय। १८. रा. व्याधिविमुमत । *१८ ४. रा.वजा मात्रतः। १६ रा.. लोकयन्।
प्रयस्त्रि: पटना [ ६३ अनेन(नया)विद्यया पुत्र मार्जन मुनिसमतम्' । प्रथवा मन्त्रित तोय' सद्यः कृषिमनाशनम् ॥२२॥ भूपुर वृत्तयुग्म च तन्मध्ये च कुमारक । पञ्चकोण लिखेत् सम्यक् तन्मध्ये पन्द्रमण्डलम् ।।२३।। इन्द्रमध्ये लिखेद् विद्या कृत्रिमध्नी' च कालिकाम् । मनुरेष लिखेत् सम्यक् स्यष्टवर्णन सयुतम् ॥२४] पञ्चकोणे लिखेन्मन्त्र' पञ्च ब्रह्मास्यमेव च । माद्यपत्र लिखेन्मन्त्र प्राणस्थापनक तथा ॥२५॥ द्वितीये विलिखेत् सम्यक् पञ्चाशद्वर्णमादरात् ।। पाशाड.शवि लिखेद् भूपुरेषु चपथाक्रमम् ।।२६।। एतद्यन्न लिखेद् भूये कसूर्या (स्तूर्या) कोञ्चभेदन । यन्त्रे प्राणान् प्रतिष्ठाप्य पञ्च ब्रह्ममनुं जपेत् ॥२७॥ निसहस्र सहस्र वा त्रिशत शतमेव च । ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चाद् वित्तशाठघ न कारयेत् ॥२८।। तद्यत्रधारणादेव कृत्रिमादिरने कश:" तत्क्षणानाशमाप्नोति जोवेद्" वर्षशत तथा ॥२६॥ एनयन्त्र'' हृदि ध्यात्वा मानसेनंव पूजयेत् । त्रिसप्तदिनमात्रेण नानाकृत्रिमनाशनम् ॥३०॥ ताम्रपाने जल ग्राह्य श्रीसूके नेव मन्त्रयेत् । शत वादंशत वाथ त्रिसप्तमष पुनक ॥२१॥ तुलसीमजरोभिश्च नाजमंद रोगपीडितः । मारोहाइवरोहेग ऋचान्ते मार्जन तथा ॥३२॥ त्रिकालमेककाल का मायेद् ध्यानपूर्वकम् । त्रिमोथा च यद्रोग नाशमाप्नोति निश्चितम् ॥३३॥ श्रीसूक्तेनैव जिह्वायर्या मायेत् तुलसीदलः । त्रिसप्त" प्रातरुत्याय जिह्वास्त [भ]नशान्तिकृत् ॥३४॥ १. रा. मुनिसरतम् । २. तोय। ३. रापन्द्रमध्ये ४. रा. कृरित्रमने। ५. रा. भष्टवर्गण। १. स. पञ्चवर्ग। ७-२...म: १. पण ११..रनेका १२. प. उपे । १३. रा. एवं पर। १५ रा.रोप- पोधिते। १६. स्त्रिमोप (4)। १७. स. त्रिवहन। १०. प्रास।
६४ ] सांस्यायनतन्त्र गोक्षीर प्रातरुत्थाय श्रीसूक्तनैव मयत् । दशवार' ध्यानपूर्व तत्क्षोर प्राशयनर." ॥३५॥ कौटिल्यस्थापन चंच माजयन्मूलविद्यया । पुत्तल्यादिप्रयोग च नाशमाप्नोति निश्चितम् ॥३६॥ ताम्रपान जल गुद्ध मत्रयदकसंख्यया । तज्जलप्राशनादेव बुद्धिध्र शो' विनश्यति ॥३७|| उष्णोदक ताम्रपात्र त्रिसप्तमभिमप्रयत। नानागूल च हृद्रोग नाशमाप्नोति पुत्रक ॥३॥ इति थोषविद्यागमे स्तभनास्त्रोपसहार' नाम यत्तिगत्पटल । ॥ अथ चतुस्त्रिश पटल ।। विश्वेश्वरी विश्ववन्द्या विश्वानन्द स्वरूपिणी। पोतवस्त्रादिसन्तुष्टा' पोतद्रुमनिवासिनो ॥१' कोचभेदन उवाच विश्वाराध्य भवानीश विश्वोत्पत्तिविधायक' । ब्रूहि मे कृपया तात सकलागमकोविद ॥२॥ ईश्वर उवाच- समस्तकम्मणा ध्वसे सर्वोपद्रवनाशने । जातिस्तम्भे मन स्तम्भे क्रूरकमनिवारणे ॥३॥ अष्टदेतालशमने सवभरवनाशने" मात णा शान्तिजनक स्तम्भन जलरक्षसाम् ।।४।। 'देवदानवदंत्यारोन् (रि)शमने भ्रमनाशने"। समस्तोपद्रवध्वसे पूतनादिविनाशने ॥शा - । १ रा पूर्ववत्पीर प्राशयन्नर तत्पर । २ रा बुदिना तो। ३ रा पुस्तके 'सास्यायनत 'इत्यधिक पाठ । ४ रा उपमहारप्रयोग। ५ र पीतवस्त्रापा। ६ ख पुस्तके- ईश्वरी विश्ववद्या घ विश्वान तररूपिणी। पीतवस्तुदय तुष्टा पोत हृदयनिवागिनीम ।। ७ ख गुरगाकर । रा कुमारक। ८ ख रा पद्यात मिदनास्ति। समस्ते । १. ख परकृत्यानिवारो। ११ रा समयविनाशिनीं। १२ स देवदानवदत्या- दिशमनोडर विनागने। १३ छ पूषनादिविधारणे ।
चस्त्रियाः पटलः [ १५ कपटादिविनाशार्थे ' प्राप्ते प्राणस्य सङ्कटे । विशन्मनुधिनाशार्थ षट्त्रिंशद्रोगनाशने ॥६॥ सूचिप्रयोगविध्वसे महाशस्त्रास्त्रपातने । गतिस्तम्भे मतिस्तम्भे सूर्याग्निस्तम्भनेषु च ॥७॥ नानारोगविनाशार्थ नानाक्लेशनिवारणे। रणे राजकुले शान्ती प्रयोगनाशनेति च ॥८ परप्रयोगविध्वसे परकृत्यानिवारणे । कृत्यावेशस्तम्भनोऽध प्रयोग पण्मुखाचर' अनेन योगवय्येण सर्वदोषनिवारणम् । शृणु षण्मुख तद्योग सर्वयोगोत्तमोत्तमम् ॥१०॥ 'पीतावरणभूपी च पीतवस्त्रद्वयान्वित." पीतयज्ञोपवीतस्तु महापीताश (स)ने" स्थित.'' 'ज्वालामुख्यभिध वाण त्रिशतं प्रजपेत् सुत""। 'हरिद्राक्षमणि पीत"" सर्वकार्य जपादिकम् ॥१२॥ वडवानलनामान बारामादौ जपेच्छतम् । उल्कामुख्यभिध" बाण द्विशतं प्रजपेत् सुत ॥१३॥ जालामुख्यभिषं बापा विशत प्रजपेत् नर.' जातवेदमुखीबाण 'येदसख्याशत" सुत ॥१४॥ बृहद्भानुमुखीबागं जपेत् पश्चशत सुत । 'य एकादि महाविद्या कुल्लुकादिसमन्विताम् ॥१॥ नेत्र लक्ष जपेन्मन्न फरफर्मादिनासने"। हरिद्रा चरेद्रौ(दो)म काम्य गौरवमिति ॥१६॥ १ स फरमहाविनासाये। २. ख. विशनष्टि दिनासा। .स. पदविद्वाए। ४. स. मरिणस्तम्भ। १. ब. रतिस्तम्भ । १.ख भनेऽपि। ७.प.श्री। ८ स. त्याविप ८. प. पम्मुखापरः । रा.पण्मुखाचरेत् । '-'पपीताभासभूप दया पोतहावितः । ११. स. महापोतासुनि । १२. प. सुप्त । १३. -' मयमको प. रा. पुस्ता नास्ति । १४. प. हरिद्वारा मणिना। १५. प. उल्कामुखामिय। १६. स.मुस । रा. १७. स. सदस्ते सस्मरेत् । १८. ७ एकाक्षरी १६. प.पुमारिका रकर्मए । रा. कुकर्मादि। २१. ए. हरिद्रा। 1 २०.प.
प्रयस्त्रिशः पटलः [ १७ उल्कामुखो द्वितीयास्त्रं स्तम्भनं भुवनत्रये" । ज्वालामुखीतृतीयास्नं स्तम्भनं ऋषिदेवतः ॥२८॥ जातवेदमुखीवाणो ब्रह्मविष्ण्वादिरक्षणे' । 'सर्वकर्मस्तम्भने च चतुर्थं प्रजपेत् सुत ॥२६॥ बृहद्भानुमुखीवाणं पञ्चमं परिकीर्तितम् । पट्पञ्चकोटिचामुण्डा कालीकोटिशतं सुत ॥३०॥ सपादकोटित्रिपुरा पञ्चाशलोटिभैरवाः । नारसिंहा यातुधानाः पूतनाः कोटिचेटकाः ॥३१॥ समस्तस्तम्भनं पुत्र पञ्चमेन प्रजायते । हस्ते सम्पाद्य 'पञ्चास्त्रं शासनास्त्र" स्मरेन्मुखे ॥३२॥ स कल्पमुखभागी' स्यान्नान कार्या विचारणा । त्रैलोक्यविजयाख्यं च स्मरेदस्वेन्द्रमुत्तमम् ॥३३॥ यथोक्तकुण्डेपु हुनेद् वेदिकायां विशेषतः । चुल्यां शकटया प्रेताग्नी पञ्चस्थाने हुनेदपि ॥३४॥ चत्वरे सर्वकार्यार्थ होमयेदुक्तमार्गतः । 'सकूचं सकस्रवो चंव तद्धश्वि (वि)श्च इति ऋमात्" ॥३॥ प्रणि (णी)ता प्रोक्षणीपात्रमाज्यस्थाली च पण्मुख' । सकलं पूर्णपात्र च 'ब्रह्मचर्येण योगतः ॥३६॥ क्रमात् सर्वे तु सम्पाद्य होम कुर्यात् प्रयत्नतः । "क्रूरकर्माणि नश्यन्ति" नालन हुनेत् सुत ॥३७॥ पोतपुष्पश्च जुहुयात् क्रूरकर्मविनाशने"। "फरतर्पणयोगेन फरविघ्ननिवारणम्"८ ॥३८॥ १.-'प.निलेकोस्तम्भने जपेत् । २. ब्रह्मविद्या । ३. स. सर्वकर्मसंस्तम्भे । रा, सर्वकर्माणि स्तम्भे । ४. . .वारण: । ५ ख. पञ्चमः। कोतितः। ७. ख. पटपूतनाः । रा. ०पूतनाः। ८.स. सपार्य। ६. ''स, चापार प्रसितास्त्र । १०. स. फरसुखभागी। रा. संकल्पमुखिमोगः। ११.'-.. समिस्कुशा म कसुची व स्विमावहींति परमात् । १२. स. सम्मुखाः। १२. ५. कलां। १४. स. ग्रहाचयों तु जापकः । रा. ब्रह्माचार्य योगकः। १५.प. प्रयोगवित् । १६.प. रा. श्रूरकर्माणनिर्मा। १७. स. कूरकृरित्रमनायने । १६.'-.-पोछेन सयेदेव कर- प्रहनिवारणम्। रा. करे सपणया देवी ।
१८ ] सास्यायनतन्त्र इति सक्षेपतः पूर्व' किमन्य' श्रातुमिच्छसि । इति थोपविद्यागमे साँस्यायनले चतुस्त्रिशल्पटल ३ ॥३४॥ ॥ अथ पञ्चतिशः पटल.॥ योपिदाकर्षणासचा फुल्लचम्पकसन्निभाम् । दुष्टस्तम्भनमासक्ता' वगला स्तम्मिनी भजे ॥१॥ फोञ्चभेदन उवाच--- नमस्ते सर्वसर्वेश करद्युतिसनिभ' । योगिन् सर्वादिसर्वज्ञ वीजभेद वद प्रभो ॥२॥ ईश्वर उवाच- अथात सम्प्रवक्ष्यामि वगलामन्त्रनिर्णयम् । पटियशदक्षरी विद्या त्रिपुरे चंब तिष्ठति ॥३॥ सारयायन मते देव्या नारायण'' नपि स्मृत.''। 'गायत्रीछन्द उद्दिष्ट देवता वगलाह्वया ॥४॥ साख्यायनमते देवि वामाचारविधिमंत । ब्रह्म याम त्रसम्मत्या ब्रह्मा चास्य ऋषि स्मृत ॥५॥" गायत्री छ द प्रादिष्ट देवता सब कोत्तिता'१५ ॥ 'जयदयास्पयामले तु"पिनारद एव हि ।।६।। छन्दादिक पूरवत् स्यादिति सक्षपतो मतम् । हारिद्रसहिताया तु ऋपि रायणो मत ॥७॥ अनुष्टुपदाद प्रारयात' देवता वगलामुखो। साख्यायनमत देवो (वि)कलो जामत्ति' केवलम् ।। मृत्युजयजप कृत्वा ततो विद्या जपेन सुत । मृत्युजय विना देशो 'वाला नहि सिद्धरति ॥९॥ १ ख. प्रोक्त। २ स किम यच् । स द्वारिगति(एकत्रिशन)पटल ।।१२। ४ घ .सत्य। ५ सलमचम्म501 स्तम्मनासका। ७ रा कपूर- घवल .. है -'ख त्रिधा च परितिष्ठिता। रा .व निष्ठि । द ख योगी। १० सदेवो ११ ख नारदोऽम्य। १२ स मत। १३ ---मनुष्टुरहर मास्यात देवता वगलाह्वया । रा ०देवता मद कीतिता । १४ पद्यमिद प पुस्तके नास्ति । १५ प पुस्तके नास्ति पद्यामनिम्। १६ ख जयदयालयामले । रा जदयामरे १७ सबिष्टुप छद समास्यात । १८ स जाति। १६ ए मुषो । २० -' पुस्तके नास्ति। . ६ 7 प्रपत्रिंशः पटलः [६९ - 'ऋपिच्छन्दत्रितयक मतभेदात् प्रदर्शितम् । बीजसज्ञा प्रवक्ष्यामि'' साख्यायनमुखोद्भवाम् ॥१०॥ शिववोज' वह्नियुक्त रतिबिन्दुसमन्वितम् । 'वह्निशिवान्तराले तु" भूबीज योजयेत् (पेत्) सुत* ॥११॥ स्थिरमाया इति' भोका विद्या वेकाक्षरी शुभा । प्रनया विद्यया देवि किन सिद्धयति भूतले ॥१२॥ पीतवासामते पुर स्थिरमाया शृणु प्रिये । 'स्थिरमायासमायुक्त स्थिर बीजमितीरितम् ॥१३॥ तदुद्धार शृणु प्राज्ञ गगनाद्धं समुद्धरेत् । स्थिरबोज समुद्धस्य रतिबिन्दुसमन्वितम्" ॥१४॥ स्थिरमाया द्वितीया तु इन्द्रस्त चन्द्रभूषितम्" 'इयं सप्ता" महाविद्या कीलिता स्तम्भिता शिवे ॥१५॥ रेफयोगान्महेशानि" निश्शप्ता" फलदायिनी । रेफयुक्ता जपेद्विद्या 'फलसिद्धिर्न सशयः ॥१६॥ रेफहीना जपेद्विद्या कोटिजाप्यन सिद्धयति । तस्माद्रफेण सयुक्त स्थिरदा परमेश्वरि ॥१७॥ सजपेच् 'च ततः पुत्र तस्य सिद्धिर्भविष्यति । लघुपोढा महापोहा पञ्जर न्यासमेव हि ॥१८॥ वगलामातृकान्यास" 'कुल्लुका च विचिन्त्य । सेवादिकामराजान्त न्यासमृत्युञ्जय" जपेत् ॥१६॥ १. -' चिन्हस्पोऽयो प. पुस्तके नास्ति । २. प.। समुद्भवात् । ३. सजीव घोज। ४. स. वहि नरांवा । रा. वहि नः शि०। ५. स शिवे। ६. स.विय। ४. स.देवि। ८.ख.--स्थिररूपा तु या माया स्पिरमाया तु सामा। रा. स्पिरपातु मामाया पिरमाया समायतु । ६.स.प्रा। १०. स. रा. गगनाएं। ११. ख. विभूषितम् । १२. स.विय देवि विचन्द्रभूषिता। १३. प. रा.इम समा। १४. प. रा. कलिता। १५ प. रा. सुवा १६. प. रा. महा संव। १७. प. रा. नित्यमा। १८. स. रेकहीनो न जपेत् । १६. स. जाये। २., स. माद फतु संयोग्य । रा.उस्माद कस्तु सयुक्त। २१. ख. स्थिराधः । २२. स, प्रयतो देवि। रा.सबसे शतः पुत्र २३. प. मातुका म्यस्य। २४. प. रा.सादाचरित तदा। २५. प. सत्यादि.1 प.रा. पस्य। २० १०० ] सांस्पायनताने ततो वे प्रजपेद्विद्या सदा जाग्रत्स्वरूपिणीम् । पीतवासामते देवि पञ्चप्रेतगता' स्मरेत् ॥२०॥ चतुर्भुजा वा द्विभुजा पोताणवनिवासिनीम् । सुधार्णवसमासीना मणिमण्डपमध्यगाम् ॥२१॥ साख्यायनमते देवि संम्मरेद् यत्नतः शिवे'। सुन्दर्याः पश्चिमाम्नाये बगला परितिष्ठति ॥२२॥ श्रीकाल्यामु(उत्तराम्नाये वगला पूज्यता सुत । इति पविद्यागमे सांस्यायनतन्त्र पञ्चत्रिशस्पटल ॥३॥ ॥ अथ पट् त्रशः पटलः ।। योगिनीकोटिसहिता पोताहारोपचञ्चलाम् । वगला परमा वन्दे परब्रह्मस्वरूपिणीम् ॥१॥ क्रॉवभेदन उवाच- चिदानन्दघनावास'. 'वरमन्य च मा वद"' सर्वातीत परेशान 'सर्वभूतहिते रत" ॥२॥ ईश्वर उवाच- अथ 'स्कन्द प्रवक्ष्यामि''' 'सर्वकर्माणि नाशनम्। कि केन तामस प्राप्त'" किं केन शान्तिकारणम् ॥३॥ कारण तत्र केन स्यात् तत्सर्व कथ्यते शृणु। मादी मन्त्र जपेत् पुत्र त्रिसहस्रमन्द्रितः ।।४।। ततः कवचमालम्ब्य'" पुनम्मंन्त्र जपेत् तथा' पदिशद्वारमावर्य' पुरश्चरणमुच्यते ॥५॥ सर्वकर्माणि निर्माशे • योगोऽय परिकीत्तितः । अनुलोमविलोमेन द्वितीयो योग ईरितः ॥६॥ १. घ. रा. पुष । २. घ. मत। २. प. रा. चरेत् । ४. घ. रा. पुत्र । ५ . रा. सुत । ६. ख. परिनिष्ठिता। रा. परितिष्ठताम् । ७. ख. वित्रिंश (दात्रिंश) ८. घ, पीताहारोपि० । रा. पीतहारो। ६.घ, रा. देवी। •षनस्वामिन् । ११. स. सारमन्यमहश्वर । रा. सारमन्य ५ मा वद । १२.स.स भूतहिताम्वर । १३. ख पमुख मध्शामि। १४. स. सर्व कर्मानाशनम् । १६. ख. कारकम् । १७. घ. रा. ०मारभ्य। १८. प. १६. घ. रा. पशिदणमाहत्या । २०. ख. सर्वकर्मनि । पटल:। 4 ख. रा. नाम सम्प्राप्स। रा. तत । + BOMBAY-7.51 द्वात्रिंशः पटलः [१.१ Bombay-400094 Annshakti Nagar, 21, Shanti Niketa.la 7.M.MERRIA त्रिशतं च शतं चापि मष्टोत्तरसहस्रकम् । अष्टोत्तरशतं वापि कवचं पूर्ववद् भजेत् ॥७॥ क्षुद्रकमणि' निर्माशे योगोऽयं परिकीर्तितः। अनुलोमविलोमेन योगो वसुविधः स्मृतः || पत्रिंशद्वारमावत्यं भवेदेवं विधिः सुत' । कवचं प्रपठेदादी मध्ये स्तोत्रं 'तु उच्चरेत् " Hell शतावर्तनमात्रेण 'क्रूरकर्मणनाशनम् । अनुलोमविलोमेन द्वितीयो योग ईरितः ॥१०॥ गायत्रों कवचं पुन मन्त्रं स्तोत्रं पुनश्च सा। पविधवारमावत्यं पत्रिंशावर्तन चरेत् ॥११॥ पनेन क्रमयोगेन सर्वकर्मविनाशनम् । तारायां कालिकायां च छिन्नायामेवमेव तु* ॥१२॥ मनुक्रमेण सर्वत्र कुर्यादावर्तनं बुधः। मन्त्रमात्रकार्यमेतत् सर्वदोषनिवारणम् ॥१३॥ कवचं प्रथम" बाणः कवचं च द्वितीयकम् । कवचं च तृतीयं स्यात् कवचं च चतुर्थकम् ॥१४॥ कवर्ष पञ्चमं वाणः कवचं प्रपठेत् कृती"। अनुलोमविलोमेन द्वितोयो योग ईरितः ॥१५॥ रणस्तम्भे 'सर्वकर्मानाशने मृत्युस्तम्भने""। 'प्राणरक्षादिव्यरक्षादेव्यो रक्षणकर्मणि" ॥१६॥ योगोऽयं कथितः पुत्र वगलामन्म ईरितः", शताक्षरी जपेदादौ कवचं हृदयं तथा ॥१७॥ १. प. स. भवेत् । २. प. रा.मुद्रकर्माणि । ३. प. भवेदेक पुनस्तपा ! रा. भवेदेक. ४. ख. पुनश्च तत् । ५. प. रा. क्रूरकर्माणि ६. स. सर्वकमनायनम् । ७. प. रा. चिन्मयामेव एव च । ८. स. मनुक्रमेण । ६. स, मन्त्रयान. •विनाशनम् । ११.ख. पञ्चमो। १२. स. रितीयाः। १३. स. खतोय.। ख. पतपंकः। १५. स. रा. पश्यमो। ११.ध.रा.वतः। १७. स. मन.स्वाभ सर्वकर्मणनाशने। मत्युस्तम्भ प्राणरक्षादिम्पराकमरिण । १९. स. कात्यादी मन्त्रयोपतः। रा. कल्पास। ।
१०२] सात्यायनताले . कवच वेदवणं च कवच चन्द्रवर्णकम्' । अनेन मयागेन योग क्मणनासन २ ॥१८॥ 'एकाक्षरी जपदादो' कवच प्रपठद् यत.' । वेदाक्षरी जपदादी कवच प्रपठेत्तथा ॥१९ वेदाक्षरी ततो जाम कवच तदनन्तरम् । पत्रिंशदक्षरी जाप्य कवच तदनन्तरम् ॥२०॥ वेदाक्षरीमनुपुर' कवच प्रथम तथा । 'कवच च द्वितीय स्यात् कवच च तृतीयक" ॥२१॥ 'कवच च चतुर्थ स्यात् कवच पञ्चमस्तथा' । कवच हृदय वाच कवच शतवण कम् ॥२२॥ 'कवचात् कोलन योग प्रलोक्यरक्षणाकर" अनेन क्रमयोगेन त्रैलोक्यस्तम्भन भवेत् ॥२३॥ इन्द्रादिपदसस्तम्भ समुद्रस्तम्भनेऽपि च । 'महाविद्यास्तम्भन च सत्य ब्रह्मास्त्रस्तम्भनम १२४॥ 'महापाशुपतादोना स्तम्भने मृत्युपातने । महाब्रह्मास्त्रयोगो हि गोपनीय प्रयत्नत ॥२५॥ इति पविद्यागमे साख्यायनतर ईश्वरषण्मुखसवावे महादिव्यप्रयोग कथन नाम' पशिटल. ।। अथ पञ्चत्रिंश पटलः ।। पोतवणसमासीना पोतगन्धानुलेपनाम् । पोतोपहाररसिका भजे पीताम्बरा पराम् ॥१॥ कोचभवन उवाच- स्वामिन् सिद्धगु(ग)पाध्यक्ष समस्तगणपारग । रहस्य सूचित पूर्व किन्न मह्य प्रदर्शितम् ॥२॥ योगकर्माणि नागन । ३ प जपेदादो कवच १ ख षडवरणक । ६ ख पञ्चचत्वारिंश मनु । रा चत्वारिंश मनुपुर - चिहनस्थांसद्धपी ध. पुस्तके नास्ति । ६ ख हृदया। कवचारकोलयन मनु प्राण लोक्यरक्षण । १३ अयमशो नास्ति व पुस्तके। १४ १५ घर पि १६ घ रा नास्स्ययमा । १७ २ घ रा ५ घ वदाक्षरो। ४ ख तथा। ११ ख क्षणात १२ घ ०स्तम्भनेति । ख महापाशुपतास्त्रादिपातने । ष चतुस्त्रिशत (त्रिविशत) पटल चधिशा पटता ईश्वर उवाच- तत्त्व वद महादेव यदि पुत्रोऽस्मि ते वद । रहस्यातिरहस्यं च कथ्यते शृणु पुनक ॥३॥ अमात्याना च दुष्टाना पकाना दुरात्मनाम् । क्षुदप्रहादिजातीना संन्यानामपि पुत्रक ॥४॥ फरग्रहविनाशाय सर्वशान्त्यर्थमेव च । पराभिचारशान्त्यर्थ रक्षायें च विशेषतः ॥५॥ अपमृत्युविनाशाचं रोगशान्त्यर्थमेव च । परसेनाविनाशाय स्वसेनारक्षणाय च ॥६॥ प्रात्मार्थ च पराथं च विजयार्थं च षण्मुख । वेतालाश्च विनाशार्थे भैरवादिप्रशान्तये ॥७॥ ससस्तविपनिना मुष्टिकुक्षिविधानपि । शस्त्रास्त्रवाणसधाने सहारास्त्रादिनाराने ll शस्त्रास्त्रस्तम्भने पुत्र तद्वच्छवि (व)विधावति । स्तब्धीकरणनिशि(शि) मृतकोत्थापनेपि च ॥६॥ देशोपद्रवनाशार्थे राष्ट्रभङ्गे समागते । कोटिकृत्याविनाशार्थे स्वेष्टरक्षणकर्मणि ॥१०॥ हृतनष्टप्रणष्टादिवारुगाग्नेयजातिषु । पत्रपुष्पफलं शाखामटावक्षोरनोरके ॥११॥ महाविप तैजसे तु विष्मूविजरकृते । उद्घान्तलिनासाथै घटकृत्याविनाशने ॥१२॥ जलकृत्याविनाशार्थ स्थल कृत्याविनाशने । वृक्षकृत्यानाशना गन्धकृत्याविषावपी (पि) ॥१३॥ महेन्द्रपदनिधि विरूडानासनेऽपिच भेरूडनाशनार्षे च रिक्षावेशभरवे ।।१४।। सस्पस्तने दाहनाशे मन्त्रमण्डलरोगहृत् । सप्तब्रह्मास्त्रयोगोऽयं सर्वधा चलति वम् ॥१५॥ अमोघमत्यूनाशाय समाश्चर्यकमाय (१)दि । त प्रयोगमहायोग शृणु सावहितो भव ।।१६॥
सांस्पायनतन्त्र कुण्डे वा स्थण्डिले वेद्या चत्वरे पितृकानने । चुल्या सकटया(शकटया)वा देवि होतव्य सर्वकर्मणि ॥१७॥ शुभशक्षादियोगे तु प्रयोगमादरे(तसुत । स्वस्तिवाचनमासाद्य द्विजाना वरण चरेत् ॥१८॥ वगलास्त्र मध्यमागे करे निष्ठुरवधनम् । पञ्चास्न दक्ष (क्षि)णाशे च मूलास्त्र होमकर्मणि ॥१६॥ लोक्यविजयास्त्र च स्मरेदस्वेन्द्रमुत्तमम् । निष्ठुराश्चालयेदेव दीपकास्त्र प्रयोजयेत्॥२०॥ पूर्वभागे तु पञ्चास्त्रमुत्तरे मुण्डमुत्तमम् । महोग्रविजय दक्षे विजयान प्रयोजितम् ।।२१॥ हेलार्का चदला तूर्या तथा पञ्चाङ्ग ली प्रिया। पश्चिमे कीर्तिता विद्या वधद्वयपुरस्सरम् ॥२२॥ प्रादौ गणपति पूज्य द्वारपूजादिसयुतम् । वित्राणा वरण कृत्वा वगलादीपमाचरेत् ॥२३॥ मण्डले वगलादोपो(प) कवचे मूलदोपकः । पीताशा (शो) पोतवस्त्राढवा(ढयः) पीतयज्ञोपवीतवान् ।।२४॥ पीताशनी पीतभक्षी पीतशय्यापरायण. । हरिद्राक्षेण मणिना सर्व कार्य जपादिकम् ।।२।। हरिद्राभि. सुरक्ताभि. रोचनातमिश्रितः । बिल्वप्रसूनजुहुयात् सर्वोत्पातनिवारणम् ।।२६।। अथवा पीतपुष्पैस्तु हरिद्रामधुयोजनम् । हरिद्रया दरिद्राणि नश्यन्त्येव न संशयः ॥२७|| अनेन योगच (व)यण सर्वोत्पातनिवारणम् । पीतामरणभूषाढव (ढव) पोतशालानिवासकृत् ॥२६॥ शतमाटोत्तरशत त्रिशत च सहस्रकम् । त्रिसहस्र पञ्च तथा दिग्विशत्यादिरेव च ॥२६ पञ्चविंशच्च पञ्चाशत् सहस्र लक्षमानकम् । लक्षोपरि महेशानि न होमोस्ति महीतले ॥३०॥ सुन्दयाँ कालिकाया च वैदिके कोटिमात्रकम् । होमस्य तु दशाशेन तपंण मार्जन तथा ।।३।।
पञ्चत्रिशत्पटल
१०५
ww
सुरया तप्पए पुन तेन माजनमाचरेत् ।
अभिपेको विप्रभोज्य साङ्गयोग प्रसिद्धयति ॥३२॥
नात. परतरो योगो विद्यते भुवि मण्डले ।
सर्वकर्मविनाशार्थ विपनाशार्थमगुतम् ।।३३।।
गोपनीय गोपनीय गोपनीय प्रयत्नतः ।
रहस्यातिरहस्य च रहस्यातिरहस्यकम् ॥३४॥
इति सक्षेपत• प्रोक्त तोषयेद्दक्षिणादिना ।
प्रयोगस्योपसहार (र) कर्तव्य सिद्धिमिच्छता ॥३५॥
इति पविद्यागमे सात्यायनतन्त्र
पञ्चविगत (चतुस्विशत) पटल ॥३॥
सास्यायनतन्त्र ww परिशिष्टम्-(क) ऋष्यादि यासध्यानादियुताः । सांख्यायनतन्त्रगता मन्त्राः ।। १. एकाक्षरीबगलामन्त्रः--ही। ॐ अस्य श्रीबगलामुरयेकाक्षरीमहामन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्रीछन्दः श्रीवगलामुखी देवता ल वीज, ह्रो शक्ति, ई' कीलक श्रीबगलामुखीदेवताम्बा- प्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोग । ऋष्यादिन्यासः ब्रह्मपये नम शिरसि, गायत्रीछन्दसे नमो मुखे, श्रीबगलामुग्नीदेवतायै नमो हृदि ले बीजाय नमो गुह्ये, ही शक्तये नमः पादयोः, रं कीलकाय नम सर्वाङ्गे। फरल्यास.--ॐ ह्रां अडगुष्ठाभ्या नमः, ॐ ली तर्जनीभ्या स्वाहा, ॐ हलू मध्यमाभ्या वषट् ॐ ह्ल अनामिकाभ्या हुम, ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्, ॐ हलः करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । हृदयादिन्यास.. .-ॐला हृदयाय नम , ॐली गिरसे स्वाहा, ॐ शिखायै वषट्, ॐ ह्लै कवचाय हुम्, ॐल्लो नेत्ररथाय पट, ॐ ह्रः अस्त्राय फट् । ध्यानम्- वादी मूकति र इति क्षितिपतिवानरः गीतति, कोधी शान्तति दुर्जन सुननति क्षिप्रानुगः खञ्जति । गरी खर्वति सर्वविच्च जडति त्वद्यन्त्रिणा यन्त्रितः, श्रीनित्ये बगलामुसि प्रतिदिन कल्याणि तुम्य नमः ।। [पन्नमः पटल पृष्ठ-१२, १३] २. थौदगलापनिशदक्षरीविद्यामन्त्रः :-ॐही बगलामुखि सर्वदुष्टाना धाच मुरा पद स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धि विनामय हो ॐ स्वाहा । ॐ अस्य श्रीबगलामु पीपत्रिंशदक्षरीविद्यामहामन्यस्य श्रीनारदपिः, बृहतीछन्द ,' श्रीबगलामुखीदेवता, लें वीज, है शक्ति, ई पीला, श्रीबगला- मुसीदेवताप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । पम्प २. 'अनुप्रयर' यम्यत्र एयते । .. स्यम्पत्र ।
परिशिम (क) १०७ Ww कन्यासः ऋष्यादिन्यास:--श्रीनारदर्षये नमः शिरसि, वृहतीछन्दसे नमो मुखे, श्रीबगलामुखीदेवतायै नमो हृदये, ल बीजाय नमो गुटे, हैं शक्तये नमः पादयोः, ई कीलकाय नमः सर्वा । ह्रो घडगुष्ठाभ्यो नमः, ॐ ह्री बगलामुखि तर्जनीभ्या स्वाहा, ॐ ह्री सर्वदुष्टाना मध्यमाभ्यां वषट्, ॐ ली वाघ मुख पद स्तम्भय अनामिकाभ्यां हैं, ॐ ली जिह्वा कीलय कनिष्ठिकाभ्या वौषट्, ॐ ह्री बुद्धि विनाशय ह्री ॐ स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । हृदयादिन्यास:-- --ॐ ह्री हृदयाय नम, ॐ ह्री बगलामुखि शिरसे स्वाहा, ॐ लो सर्वदुष्टाना शिखायै वषट्, ॐ ह्री बाच मुख पदं स्तम्भय कवचाय हुँ, ॐ ली जिह्वा कीलय नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ ह्री बुद्धि विनाशय ली ॐ स्वाहा अस्त्राय फट् । ध्यानम्-चतुर्भुजा त्रिनयना कमलासनसस्थिताम् । त्रिशूल पानपात्र चे गदा जिह्वा च विभ्रतीम् ।। विम्बोष्ठी कम्वुकण्ठी च समपीनपयोधराम् । पीताम्बरा मदापूर्णा ध्यायेद् ब्रह्मावदेवताम् ।। [सप्तम. पटलः --पृष्ठ-१६-१७] ३. श्रीबगलामुखीगायत्रीमन्त्रः :-ॐ ही ब्रह्मास्त्राय विद्महे स्तम्भन- बाणाय धीमहि तन्नो वगला प्रचोदयात् । ॐ अस्य श्रीबगलागायत्रीमन्नस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्रीछन्द, ब्रह्मास्त्र- बगलादेवता, ॐ बीज, ह्रीं' शक्तिः, विद्महे कोलक, श्रीबगलामुखीदेवताप्रसाद- सिद्धये जपे विनियोग । ऋष्यादिन्यास:-श्रीब्रह्मर्षये नमः शिरसि, गायत्रीछन्दसे नमो मुखे, श्रीब्रह्मास्त्रवगलामुखीदेवतायै नमो हृदये, ॐ बीजाय नमो गुह्ये, ही शक्तये नमः पादयोः, विद्महे कीलकाय नमः सर्वाङ्गे । करन्यासः- हो ब्रह्माखाय विद्महे अड गुष्ठाभ्यां नमः, स्तम्भनवारणाय धीमहि तर्जनीभ्या स्वाहा, तन्नो बगला प्रचोदयात् मध्यमाच्या वषद्, ॐ ह्री ब्रह्माखाय विद्महे अनामिकाम्या हुम्, स्तम्भनवारणाय धीमहि कनिष्ठिकाभ्यां वौषद्, तलो बगला प्रचोदयात् करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । १. "हो' इत्यपि पाठः ।
सात्यायनतन्ने ww हृदयादिन्यासः--ॐ ह्री ब्रह्माखाय विद्महे हृदयाय नमः, स्तम्भनवारणाय धीमहि शिरसे स्वाहा, तन्नो बगला प्रचोदयात् शिखायै वषट्, ॐ ह्री ब्रह्माखाय विद्महे कवचाय हुम्, स्तम्भनवारणाय धीमहि नेत्रत्रयाय वौषट्, तन्नो वगला प्रचोदयात् अस्त्राय फट् । ध्यान पूर्ववत् । द्वादर. पटल.-पृष्ठ-२६] ४ पश्चपञ्चाशरक्षरो बगलामुखोपचाखमन्न.-ॐ ह्री हू ग्लों बगला- मुखि ह्रां ह्री हल सर्वदुष्टाना ल ह्रीं ह्नः वाच मुख पद स्तम्भय स्तम्भय लः ह्रो ले जिह्वा कोलय हतूं ली ला बुद्धि विनाशय ग्लौं हूँ ली * स्वाहा ।। ॐ अस्य श्रीवगलामुखीपञ्चास्त्रमहामन्त्रस्य वमिष्ठऋपिः, पतिश्छन्द, रणस्तम्भनकारिणी बगलामुखी देवता, लें वीज, ली शक्ति , र कोलक श्रीबगला. मुखीदेवताम्बाप्रसादसिद्धधर्थे जपे विनियोग । ऋष्यादिन्मास:--श्रीनारदऋषये नम.शिरसि श्रीबगलामुखीदेवताय नमो हृदय, ल बीजाय नमो गुह्ये, हैं शक्तये नम पादयो ई कोलकाय नम सर्वाङ्गे। फरन्यासः-ॐ ह्री अङ्गुष्ठाभ्या नम , ॐली बगलामुखि तर्जनीभ्या स्वाहा, ॐ ह्ली सर्वदुष्टाना मध्यमाभ्या वषट्, ॐ ह्री वाच मुख पद स्तम्भव अनामिकाभ्या हुम, ॐ ह्री जिह्वा कोलय कनिष्ठिकाभ्या वौषट्, ॐ ह्री बुद्धि विनागय ली ॐ स्वाहा करतलकरपृष्ठान्या फट् । एव हृदयादिन्यास । ध्यानम्-पीताम्बरधरा देवी द्विसहस्रनुनान्विताम् । सान्द्रजिह्वा गदा चार धारयन्ती शिवा भजेत् ॥ [पञ्चदा पटल -पृष्ठ ३८-३६] ५. भष्टपश्चाशदक्षर उल्कामुख्यतमन्त्र -ॐली ग्लो वगलामुगि ॐ ली ग्लो सर्वदुष्टाना ॐ ह्रीं ग्लो वाच मुग पद ॐ ह्री ग्लो स्तम्भप स्तम्भय ॐ हीं ग्लो जिह्वा कीलय ॐ ह्री ग्लो बुद्धि विनाशय *ली ग्लो ली ॐ स्वाहा ।' १. "जो ग्लो बगलामुखि बोहोनसबंदुराना छलन. बाथ मुख पर सम्भय जिहां कोलय हामोह बिनागय महा सो ही स्वाहा" इत्पेशविधो मोय हस्पत । २ "नीं ग्लौं बगलामुलि समुशना होगाच पुरुष पर सोal स्तम्भय स्तम्भय होता बिदा शालय कोलोनोस् नाग नागयोतो गहा" स्यपि मात्रमेटो हत्याम्पत्र ।
परिशिष्टम् (क) १०९ ॐ अस्य श्रीउल्कामुख्यनमन्त्रस्य श्रीअग्निवराह' ऋपि, ककुप् छन्दः, श्रीउल्कामुखी देवता, ह्नी वीज, स्वाहा शक्तिः, ग्लौं कीलक, जगत्स्तम्भनकारिणी श्रीउल्कामुखीदेवताम्बाप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यास:-श्रीवराहपये नमः शिरसि, अनुष्टुप्छन्दसे नमो मुखे, श्रीउल्कामुखीदेवताय नमो हृदि, ली बीजाय नमो गुह्ये, स्वाहाशक्तये नमः पादयोः, ग्लौं कीलकाय नमः सर्वाङ्गे। मूलमन्नवत्करपडङ्गन्यासाः । ध्यानम्-विलयानलसकाशा वीरा वेदसमन्विताम् । विराण्मयी महादेवी स्तम्भनाथं भजाम्यहम् ।। [पञ्चदश. पटलः-पृष्ठ-३६] ६. पष्टिवरात्मक. श्रीजातवेदमुख्यखमन्त्र.- 1.-ॐ ह्री हसौ ली ॐ बगला- मुलि मर्वदुष्टाना ॐ ह्री हसौं ह्नी ॐ वाच मुख पद स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्री हसौं ह्ली ॐ जिह्वा कीलय ॐ ह्ली सौ ली ॐ बुद्धि नाशय नाशय ॐ ह्ली हसौं ॐ स्वाहा । ॐ अस्य श्रीजातवेदमुख्यत्रमन्त्रस्य श्रीकालाग्निरुद्र ऋषिः, पक्तिरछन्दः, श्रीजातवेदमुखी देवता, ॐ वीज, ही शक्ति, है कीलकम्, मम श्रीजातवेद- मुखीदेवताम्बाप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । प्यादिन्यास:-श्रीकालाग्निरुद्रपये नमः शिरसि, पक्तिच्छन्दसे नमो मुखे, श्रीजातवेदमुखौदेवताय नमो हृदये, * बीजाय नमो गुह्ये, ह्रीं पतये नमा पादयोः ह कोलकाय नम. सर्वाङ्गे। मूलमन्यवत्करपडङ्गन्यासा:- ध्यानम्-जातवेदमुखी देवी देवता प्राणरूपिणीम् । भजेऽह स्तम्भनाथं च स्तभिनी विश्वरूपिणीम् ।। [पोडशः पटलः-पृष्ठ-४०-४१] 1. 'यजवाराह इत्यपि पाठ'। २. 'मनुष्टुप' स्यम्पा १. मन्नोऽय सूत्रानुसारेण तु दापष्टिवरमको नापते किम्बम्पर निम्नोसरोया हस्पते पष्टिवर्ण:- "हो हो हो बगलामुक्षि सर्वदुष्टाना हो हो मो वा मुझ पर स्तम्भय स्तम्भय हो हो ही मि कीलय मी हो मुवि नाराय माराय माहो होस्वाहा ॥ ४. 'ही' इत्यपि पाठः। ५. चिन्मयोमिति पायचित् ।
सौख्यायनतारे wwwwvA ७ विंशोत्तरशनवरात्मको ज्वालामुख्यखामन्त्र -ॐ ली रॉ री रू₹ रौं प्रस्फुर प्रस्फुर वगलामुसि' ॐ ह्री रां री सैरै री प्रस्फुर प्रस्फुर सर्वदुष्टाना ॐ ह्लो राँ री रूरै रौं प्रस्फुर प्रस्फुर वाच मुव पद स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्नी रा री हरे रो प्रस्फुर प्रस्फुर जिह्वा कीलय कोलय ॐ हो रा री रूरै रौ प्रस्फुर प्रस्फुर बुद्धि विनाशय विनारायली रा री रू र रौप्रस्फुर प्रस्फुर स्वाहा ।। ॐ अस्य श्रीज्वालामुरयन मन्नस्य श्रीमति म पर्गायनो छन्द , श्रीज्वाला- मुखी देवता, ॐ बीज ही शक्तिः, है कोलक श्रीज्वालामुखीदेवताम्बाप्रसाद- सिद्धयर्थे जपे विनियोग । ऋष्यादिन्यास ~श्री अनिऋषये नमः शिरमि, गायत्रीछन्दमे नमो मुखे, धोज्वालामुखीदेवतायै नमो हुदि, ॐ वीजाय नमो गुह्य, हो शक्तये नम पादयो, हैं कोलकाय नम. सर्वाङ्ग। मूलमन्त्रवत्करपडङ्गन्यासा ध्यानम्-ज्वलत्यमासनायुक्ता कालानलसमप्रभाम् । चिन्मयी स्तम्भिनी देवी भजेऽह विधिपूर्वकम ।। (पाडा पटल --पृष्ट-४१] ८. पडुत्तरशताधिकवरणात्मका श्रीवृहद्भानुमुख्यत्रमन्त्र -ॐ ला ह्रीं हल हल हो ल. लाली हलू लै लौ ह्र ॐ बगलामुखि ॐ लॉ ह्री हलू लै ह्रौ ह्ल ह्रां ह्री हलू ल लौ ह्र ॐ सर्वदुष्टाना वाच मृस पद स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्रां ह्रो हलू लै ह्रीं ह्र ली ह्ली लूज़ लो ' ॐ जिह्वा कीलय ॐ ह्रां ह्री ल ल हो ह ह्रां ह्ली हाँ लै लौ ह्न बुद्धि नाशय ॐ ह्रां ह्ली लू लो ह्र ह्रां ह्री हलू ल ह्रा ह्ल * ली ॐ स्वाहा । । एतत्पदस्थाने 'गालामुखि' पद सूत्रे वतने विस्य ग्रहणा-मत्रै एकासरयूमता रार तस्तत्पदमेवान सहीतम। २ सूत्रे तु 'वह्निबीज च पञ्चक' इति दशनावर ररररर' इति बी नानि ग्राह्मारिण किन्तूपयुक्तबोजानामन्यत्रापि व्यवहारास्त्रापि स्कृनातीत्यूह्यानि ३ अन्याय मन्त्रचतुरुत्तरशतवर्णात्मकोऽपि दृश्यो यथा-ॐ ह्रां ह्रीं हू हू ह्रीं ह्न ह्रः ह्रां ह्रीं ह्लह्नों ल ल बगलामुखि * हा ह्नीं हह ह्रौं न ह ह्रां ह्रीं हह ह्रौ त दुष्टाना वाच मुख पद स्तम्भय समय ला हो तह ह्रौं स सही हं हो हो ह. जिह्वा कोला तो हो हह ह ह हलो जो ह ह ह्रौं ल, युधि माशय ॐ ह्रां हो त लौ ह ह हाही ह. हूल ल. स्वाहा ॥
परिशिष्टम् (क) ॐ अस्य श्रीवृहद्भानुमुख्यस्त्रमन्नस्य श्रीसविता ऋपिः, गायत्री छन्दः, वृहद्भानुमुखी देवता, ह्नी वीज, ह्रो शक्तिः, ॐ कोलक, श्रीवृहद्भानुमुखी- देवताम्बाप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यास:-श्री सवित्यूपये नमः शिरसि, गायत्रीछन्दसे नमो मुखे, श्रीवृहद्भानुमुखीदेवताय नमो हृदये, ही वीजाय नमो गुह्ये, ही शक्तये नम. पादयोः, ॐ कोलकाय नमः सर्वाङ्गे। मूलमन्त्र वरकरपडलन्यासा: । ध्यानम्-कालानल निभा देवी ज्वलत्पुतशिरोरुहाम् । कोटिवाहुसमायुक्ता वैरिजिह्वासमन्विताम् ॥१॥ स्तम्भनास्त्रमयी देवी दृढपीनपयोधराम् । मदिरामदसयुक्ता वृहद्भानुमुखी भजे ॥२॥ [सप्तदशः पटल:- पृष्ठ-४२-४३] ६ श्रीबगलामुखीशताक्षरोमहामन्त्रः-ल्ली ऐं ह्रीं क्ली श्री ग्लौं ह्नी बगलामुखि स्फुर स्फुर सर्वदुष्टाना वाच मुख पद स्तम्भय स्तम्भय प्रस्फुर प्रस्फुर विकटाङ्गि घोररूपि जिह्वा कीलय महाभ्रमकरि बुद्धि नाशय विरामयि' सर्वप्रज्ञामयि प्रज्ञा नाशय उन्मादीकुरु कुरु मनोपहारिणि ही ग्लों थीं पली ही ऐ ही स्वाहा ॥ ॐ अस्य श्रीवगलामुखीशताक्षर महामन्त्रस्य श्रीब्रह्मा ऋषिः, गायत्रीछन्दः, जगरस्तम्भनकारिणी श्रीबगलामुखी देवता, ही वीज, ह्री शक्तिः, ऐं कीलकं, जगत्स्तम्भनकारिणी श्रीवगलामुखीदेवताम्बाप्रसादसिद्धपर्थे जपे विनियोगः । मूलमन्त्रवाकरपडङ्गन्यासाः । ध्यानम्-पीताम्बरधरा सौम्पा पीतभूषणभूषिताम् । स्वर्णसिंहासनस्था च मूले कल्पतरोरधः ।।।। वैरिजिह्वाभेदनाथं छुरिकां' विभ्रती शिवाम् । पानपात्र गदा पारा धारयन्ती भजाम्यहम् ।।२।। (सरदराः पटलः-१-४४-४५) 'सम्मा कुरा पति पायोरि हरायो। .. 'भरिका १. 'पिरामय'त्यपि पाठ इतिपाठोपत्र ।
सांख्यायनतन्त्र १० अष्टाविशत्युत्तरंफशताक्षर श्रीबगलामुखीपरविद्याभेदनमन्त्र:'--ॐ ह्री श्री हो 'ग्लो ऐं क्ली हुँ क्षी' वगलामुथि परप्रयोग ग्रस ग्रम ॐ ह्री श्री ही ग्लो ऐं क्ली हुँ क्षी ब्रह्मास्त्ररूपिरिण परविद्याग्रसिनि भक्षय भक्षय ॐ ह्ली श्री ही ग्लो ऐं क्ली हुँ क्षी परपनाहारिणि प्रज्ञा भ्रगय भ्रशय ॐ ह्री श्री हो ग्लौं ए क्ली हुँ क्षी स्तम्भनाबपिणि बुद्धि नाशय नाशय पञ्चेन्द्रियजान भक्ष भक्ष ॐ ह्री श्री ह्री ग्लो ए क्ली हुँ क्षी बगलामुखि हुँ फट् स्वाहा ।' ॐ अस्य श्रीपरविद्याभेदिनीबगलामन्त्रस्य श्रीब्रह्मा कपि गायत्रीछन्द, परविद्माभक्षिणी श्रीबगलामुखी देवता प्रां बीज, ला शक्ति पा कीलक, श्रीजगलादेवीप्रसादसिहिद्वारा परविद्याभेदनार्थे जपे विनियोग । ऋष्यादिन्यास ---श्रीवापय नम गिरसि, गाय पीछन्दने नमो मुषे, परविद्याभक्षिणीश्रीवगलामुखीदेवताय नमा हृदये, या वीजाय नमा गुह्य, ह्री शक्तये नम पादयो, को कीलकाय नम सर्वाङ्गे । करन्यास -प्रां ह्री को अगुष्ठाभ्या नम , वद वदतजनीम्या स्वाहा, वाग्वादिनि मध्यमाभ्या वपद्, स्वाहा अनामियाभ्या हु, ए पली सौं कनिष्ठिकाभ्या वौपद, ह्लीं करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । हृदयादिन्यास - माँ ह्री को हृदयाय नम , वद वर शिरसे स्वाहा, वाग्वादिनि शिखायै वषट् स्वाहा कवचाय हुँ, ए क्ली मौ नत्रयाय वौषट्, ल्ली अस्त्राय फट् । ध्यानम-सरमन्यमयी देवी सर्वाकर्षणकारिणीम् । सर्वविद्याभक्षिणी च भजह विधिपूर्वकम् ।। [विंश पटल -पृष्ठ-५४-५५] बगलास्त्रमन्त्र --ॐ ह्री हु ग्लौं ह्री बगलामुखि मम गवून् ग्रस ग्रस खाहि खाहि भक्ष भक्ष गोणित पिव पिव बगलामुखि ही ग्लो हु 'फट् स्वाहा । सप्तविसोत्तरशताक्षर एव भवति । २ गसो हुँ ए क्ती क्षी' तथा 'यु ए को हुँ दमों' इति पाठनदी क्वचिदृश्यते । ३ पपि पुस्तके तु '--' शब्दस्योपयोगो नावलोश्यते, न चंतादृश एरस्थाहा शम्दय्यवहारस्त- शादियो अत्यावश्यको सभाध्या वरण सत्यानुपरकत्वात् । राक पुस्तके 'फट- स्वाहा' स्याने 'ही स्वाहा' इति दृश्यते । अत्र पुस्तकेऽप्यय मो चियरिंगरक्षरात्मक कएव होत: किन्त्वसौ ऋष्यादिम्यासे 'फट कोलक' मिति ग्रहणादसाधुरेव प्रतीयते । ११. त्रिचत्वाशिवक्षरो १ सूत्रानुसारेण वर्णोबारादय मत्र - परिशिष्टर (क) ॐ अस्य श्रीवगलास्त्रमन्त्रस्य श्रीदुर्वासा ऋपि, अनुष्टुप् छन्द , अस्त. रूपिणोश्रीवगलामुखी देवता, ग्लौं चीज, ह्रीं शक्ति, फट् कोलक श्रीप्रस्त- रूपिणीवगलाम्बाप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोग । ऋष्यादिन्यास.--श्रीदुर्वाससे नपये नम शिरसि, मनुष्टुप्छन्दसे नमो मुखे, प्रस्त्ररूपिण्यै श्रीबगलादेवताय नमो हृदये, ग्लो वीजाय नमो गुह्म, ही शक्तये नम पादयो, फट् कोलकाय नम सर्वाङ्ग । करन्यास-ॐ ली अङ्गुष्ठाभ्या नम , वगलामुखि तर्जनीभ्या स्वाहा, सर्वदुष्टाना मध्यमाभ्या वपद्, वाच मुख पद स्तम्भय अनामिकाम्या हुँ, जिहा कीलय कनिष्ठिकाभ्या वौपट, बुद्धि विनाशय ह्री ॐ स्वाहा करतलकरपृष्ठाम्या फट्। हृदयादिन्यास --ॐ ली हृदयाय नमः, बगलामुखि शिरसे स्वाहा, सर्वदुष्टाना शिखायै वषट् वाच मुख पद स्तम्भर कवचाय हुँ, जिह्वा कोलय नेत्रत्रयाय वौषट, बुद्धि विनाशय ली ॐ स्वाहा अस्त्राय फट । ध्यानम्-चतुर्भुजा त्रिनयना पोनोलतपयोधराम् । जिह्वा सङ्ग पानपात्र गदा धारयन्तो पराम् ॥१॥ पीताम्बरधरा देवी पीतपुष्परलङ्कृतान । विम्बोष्ठी चारुवदना मदापूगितलोचनाम् ।।२।। सर्वविद्याकपिणी च सर्वप्रज्ञापहारिणीम् । भजेऽह चास्नबगला सर्वाकर्षणकर्मसु ||३|| (द्वाविश पटल --१४-५६-६०] १२. श्रीबगलाचतुरक्षरीमन्न -ॐा ली को 1 ॐ अस्य श्रीवगला- चतुरक्षरीमन्त्रस्य श्रीब्रह्मा पि , गायनीछन्द , श्रीवगला देवता, ह्नी वीज, प्रो शक्तिः, को कोलक श्रीवगलामुखीदेवताम्बाप्रसादसिधयें जपे विनियोग । ऋष्यादिन्यास -श्रीब्रह्मर्पये नम सिरसि, गायत्रीछन्दसे नमो मुसे, श्रीबगलादेवताय नमो हृदये, ही धीजाय नमो गुह्य मा सक्तये नमः पादयो, पो कीलपाय नमः सर्वा। फरन्यास--ॐला पङ्गुष्ठाभ्या नम, ॐ ह्री तर्जनीभ्या स्वाहा, ॐ हा मध्यमाभ्या वपद, ॐ हले अनामिकाम्या हूँ ह्रीं कनिष्ठिकाभ्या वौपट, ह मस्त्राय फट् । . १- Anu व विती' तराब 'गरी पाररतो किया दराने रित।
साख्यायनतन्त्र हृदयादिन्यासः -ॐ ला हृदयाय नम , ॐ ह्री शिरसे स्वाहा, हलू शिखायै वषट्, ॐ हल कवचाय हुँ, ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ ह्रः अस्त्राय फट्। ध्यानम्-कुटिलालकसयुक्ता मदापूरिणतलोचनाम् । मदिरामोदवदना प्रवालसदृशाधराम् ।।१।। सुवर्णशैलसुप्रख्यकठिनस्तनमण्डलाम्' । दक्षिणावर्तसन्नाभिसूक्ष्ममध्यमसयुताम् ।।२।। रम्भोरपादपद्मा ता पीतवस्त्रसमावृताम् । [पन्द्रविंशः पटलः-पृष्ठ-६७-६८] १३. अशोत्यक्षरात्मकः श्रीवगलाहृदयमन्त्र -ॐ२ पा ली को ग्लो' है ऐ क्ली श्री ही वगलामुखि अावेसय ग्रावेशय मा ह्ली को ब्रह्मास्त्ररूपिरिण एहि एहि प्रा ली को मम हृदये आवाह्य आवाहय सन्निधिं कुरु कुरु आ ल्ली को मम हृदये चिर तिष्ठ तिष्ठ पा ली क्रो हुँ फट् स्वाहा । अस्य मनस्य ऋष्यादिन्यास-ध्यानादयो नवोल्लिखिताः पुस्तके । [अष्टाविंशः पटल:- :-पृष्ठ-७७-७८] १४. धीमगलाष्टाक्षरात्मको मन्त्रः--ॐा ही को हुँ फट् स्वाहा । ॐ अस्य श्रीवगलाष्टाक्षरात्मकमन्त्रस्य श्रीब्रह्मा ऋषिः, गायनीछन्दः, श्रीबगलामुखी देवता, ॐ वीज, ह्री शक्ति , को कोलक श्रीबगलादेवता- म्याप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । ऋप्यादिन्यास:-श्रीब्रह्मर्षये नम शिरसि, गायत्रीछन्दसे नमो मुसे, श्रीबगलामुसीदेवतायै नमो हृदि, ॐ वीजाय नमो गुह्ये, ही शक्तये नमः पादयोः, को कीलकाय नम सर्वाङ्गे । ---ॐ हला अडगुष्ठाभ्या नम । ॐ ली तर्जनीभ्या स्वाहा, ॐ लूं मध्यमाभ्या वषट्, ॐ लं अनामिकाभ्या हुँ, ॐ ह्ली कनिष्ठिकाभ्या ह्न करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । हृदयादिन्यास - ॐ ह्ला हृदयाय नम ,ॐ हलो शिरसे स्वाहा, हलू शिखायै वषट्, ॐ हं कवचाय है, ॐ ह्रौं नत्रयाय वौषट्, ॐ हलः अस्त्राय फट् । १. सुवर्णसविलसत. इत्यपि स्वचित । २. पचपोद स व मधित किरबनेन विनाऽयं मत्र एकोनागोत्यक्षERक स्यारत एकामवंतम् . 'लो' इति मतियाराहनी- मस्याने रा. पुस्तके बाराही म.' इति वर्तते । ४. सानिध्पपीति पाटोऽपत्र । करन्यासः वौषट्, ॐ परिशिम (क) ११५ M ध्यानम्-युवती' च मदोद्रिक्ता पीताम्बरधरा शिवाम् । पीतभूपणभूपाङ्गी समपीनपयोधराम ॥१॥ मदिरामोदवदना प्रवालसदृशाधराम् । 'पानपात्र च शुद्धिं च विभ्रती वगला स्मरेत् ।।२।। [त्रिंशः पटलः-पृष्ठ-८१] १५. एकोनषष्टिवरणत्मिकः श्रीबगलोपसहारविद्यामन्त्रः-ग्लौं हुँ ऐ ह्री श्री कालि कालि महाकालि एहि एहि कालरात्रि आवेशय आवेशय महामोहे महामोहे स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर स्तभनास्त्रशमनि हुँ फट् स्वाहा। ॐ अस्य श्रीवगलास्त्रोपसहारविद्यामन्त्रस्य श्रीब्रह्मा ऋषिः, गायत्रीछन्द., स्तभनास्त्रविभेदिनी श्रीकालिका देवता, की बीजं, फट् शक्ति , स्वाहा कोलक श्रीबगलाप्रसादसिद्धिद्वारा ब्रह्मास्त्रोपसहारार्थे जपे विनियोग. । ऋष्यादिन्यास:-श्रीब्रह्मपये नम शिरसि, गायत्रीछन्दसे नमो मुखे, स्तम्भनास्त्रविर्भदिनीश्रीकालिकादेवताय नमो हृदये, क्री वीजाय नमो गुह्ये, फटशक्तये नमः पादयोः, स्वाहा कीलकाय नमः सर्वाङ्गे। करन्यासः--ॐ अड्गुष्ठाभ्या नमः, ॐ की तर्जनीभ्या स्वाहा, ॐ फू मध्यमाभ्यां धपट्, ॐ के अनामिकाभ्या हूँ, ॐ को कनिष्ठिकाभ्या वौषट्, ॐ कः करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । हृदयादिन्यास.. •---ॐ मा हृदयाय नमः, ॐ की शिरसे स्वाहा, ॐ . शिखायै वषट्, ॐ के कवचाय हूँ, ॐ को नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ क्रः अस्त्राय फट् । ध्यानम्-काली करालवदना कलाधरधरा शिवाम् । स्तम्भनास्त्रकसहारी ज्ञानमुद्रासमन्विताम् ॥१॥ वीणापुस्तकसयुक्ता कालरानि नमाम्यहम् । बगलास्रोपसहारीदेवता विश्वतोमुखीम् ।।२।। भजेह कालिका देवी जगदशकरा शिवाम् । [द्वानिशः पटलः-पृष्ठ-६७.८८] १. ना मित्यन्यत्र । २. 'मोम्मत्ता' मित्यपि पाठः । ३. 'वविजिहां पानपान इति पाt.पि दृश्यते । ४. 'की' इत्यन्यत्र । ५. एप मारस्तु रा. पुस्तकतमूत्रोदार- स्वकारः । पुस्तकल्पमात्त विपशामक एप मनो जायते कालराधि पाते प्राधेशय प्रावेशप' इति परविरहाद ।
साल्पायनतन्त्र १६. द्वात्रिंशद्वरत्मिकस्ताक्ष्यमालामन्त्रः -ॐ क्षी नमो भगवते क्षी पक्षिराजाय सर्वाभिचारध्वसकाय क्षीमो फट् स्वाहा । [बगलोत्कीलनविधि:]- प्रणव पूर्वमुच्चार्य कूर्चयुग्म समुच्चरेत् । कामवय वाग्भव च लज्जापटक समुच्चरेत् ॥१॥ श्रीकाराष्टकमुच्चार्य वगलादापमुच्चरेत् । उत्कीलनपदद्वन्द्व अग्निजाया समुद्धरेत् ॥२॥ शापोद्धारप्रकारोऽय तन्नराजे प्रकीर्तितः । उत्कोलिता ब्रह्मविद्या मन्नानेन सिद्धयति ।।३।। स्पष्टायः-ॐ हूँ हूँ क्ली क्ली वली ऐ ही ही ही ही ही ही की की क्री की की क्री की की बगलाशापमुत्कीलय उत्कीलय स्वाहा ।। ALA परिशिष्टम् (ख) ॥ अथ वज्रपञ्जरकवचस्तानम् ।। ध्यात्वा मनसा सम्पूज्य मुद्रा: प्रदर्श्य पञ्जर न्यसेत्- शिव उवाच- पञ्जर तत्प्रवक्ष्यामि देव्या पापप्रणाशनम् । य प्रविश्य न वाधन्ते वाणं रपि नरा भुवि ।।१।। ॐ ऐं ह श्री श्रीमत्पीताम्बरा देवी वगला बुद्धिवद्धिनी । पातु मामनिश साक्षात् सहस्राकयुतद्युतिः ।।२।। शिखादिपादपर्यन्त वज्रपञ्जरधारिणी। श्रीब्रह्मास्त्रविद्या या पीताम्बरविभूपिता ॥३॥ वगला मामवत्वन मूर्द्धभाग महेश्वरी। कामाइ शा क्ला पातु वगला शाखबोधिनी ॥४॥ १. प्रय मन्त्रः पुस्तके द्वानिशाक्षर एवोद्धोषित: किन्तूद्धारास्त्रिशाक्षर एक समयति स वोपरि प्रदशित एव । रा० पुस्तके चंष एव मत्रः पड्दिशाक्षर एव स्वीकृतोऽस्ति पया- क्षी ॐ नमो भगवते पक्षिराजाय मभिधार ध्वस काय हे फट स्वाह।'
परिशिष्टम् (ख)
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पीताम्बरा सहस्राक्षो ललाटे कामितार्थदा ।
ॐ ऐं ह्री श्री श्रोः [मे पातु पीताम्बरसुधारिणी ॥५॥
करीयोनं व युगपदतिरत्नप्रपूजिता ।
ॐ ऐ ही श्री पातु बगला नासिका मे गुणाकरा ॥६॥
पीतपुष्ष पीतवस्त्र : पूजिता वेददायिनी ।
ॐ ऐ ही श्री पातु वगला ब्रह्मविष्ण्वादिमेदिता ॥७॥
पीताम्बरा प्रसन्नास्या नेत्रयोयुगपद्धृवोः ।
ॐ ऐं ह्री श्री पातु बगला वलदा पोतवखपृक् ।।
अधरोष्ठी तथा दातान् जिह्वा च मुखगा मम ।
ॐ ऐं ह्री श्री पातु बगला पीताम्बरसुधारिणी III
गले हस्ते तथा वाही युगपद द्धिदा सताम् ।
ॐ ऐ ह्री श्री पातु बगला पीतवखावृता घना ।।१०।।
जवाया च तथा चोरी गुल्फयोश्वातिवेगिनी।
अनुक्तमपि यत्स्थान स्वक्केशनखलोम मे ॥११॥
असृग्मास तथास्थीनि सन्धयश्वाति मे परा।
थोशिव उचाव-
इत्येतद्वरद गोप्य कलावपि विशेषत. ॥१२॥
पञ्जर बगलादेच्या दीर्घदारिद्रचनागनम् ।
पञ्जर य पठेद्भक्त्या स विनाभिभूयते ॥१३॥
अव्याहतगतिश्चापि ब्रह्मविष्ण्वादिसत्पुरे।
स्वर्गे मत्वं च पाताले नारयस्त कदाचन ॥१४॥
प्रवाधन्ते नर व्याघ्राः पञ्जरस्थ कदाचन ।
अतो भक्त: कोलिकन स्वरक्षापं सदैव हि ॥१५॥
पठनीय प्रयलेन सर्वानर्थविनाशनम् ।
महादारिद्रपशमन सर्वमाङ्गल्यवर्द्धनम् ॥१६॥
विद्याविनयसत्सौख्य महासिद्धिकर परम् ।
इद ब्रह्मास्त्रविद्यायाः पक्षर साधु गोपितम् ॥१७॥
पठेत् स्मरेद् ध्यानसस्थः स जीयामरस नर ।
य पर प्रविश्यव मन्य जपति वै भुवि ॥१८॥
सालापनमन्त्र
कोलिको वा कोशिको वा व्यासवर विचरेद् भुदि।
चन्द्रसूर्यप्रभुभूत्वा वसेत् कल्पा पुत दिवि ॥१६॥
सूत उवाच-
इति पयितमशेष श्रेयसामादिचीज,
भवशतदुरितप्त ध्वस्तमोहान्धकारम् ।
स्मरगमतिशयेन प्रातरेवान मर्यो,
यदि विशति सदा य. पञ्जर पण्डित स्यात् ।।२०।।
इति श्रीपरमरहस्पातिरहस्ये श्रीपीताम्बराया.
पज्जरं सम्पूर्णम् ॥
घोप्रसमास्तु ।। श्रीबगलामुखी श्रीयता मिति पोप सुदि १३,
सवत् १६२२ लिखित फाश्या दुर्गाबाई इव पुस्तकम।।
परिशिष्टम् (ग)
॥ अथ बगलामुखीत्रलोक्यविजय नाम कवचम् ।।
श्रीभैरव उवाच-
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि स्वरहस्य च कामदम् ।
श्रुत्वा गुप्ततम गोप्य कुरु गुप्त सुरेश्वरि ॥१॥
कवच वगलामुख्या सकलेटप्रद कलौ ।
यत्सवं च पर गुह्य गुप्त च शरजन्मन ॥२॥
बैलोक्यविजय नाम कवचेश मनोरमम् ।
मानगर्भ मलरूप समिद्धिविनायकम् ॥३॥
रहस्य परम ज्ञय साक्षादमृतरूपिणम् ।
ब्रह्मविद्यामय वर्म दुर्लभ प्राणिना कलौ ॥४॥
पूर्णमेकोनपश्चाशद्वर्ण मन्त्रमययुतम् ।
त्वद्भक्त्या वच्मि देवेशि गोपनीय स्वयोनिवत् ॥शा
श्रीदेव्युवाच-
भगवन् करुणासागर विश्वनाथ सुरेश्वर ।
कर्मणा मनसा वाच्य न वच्म्यग्निभुवोऽपि च ॥६॥
परिशिष्टम् (ग) www भैरव उवाच- प्रैलोक्यविजयाख्यस्य कवचस्यास्य पार्वति । मन्त्रगर्भस्य मु(सू) तस्य ऋषिदेवस्तु भैरव ॥७॥ उरिणत छन्द समास्यात दवी फ्ली (च) बगलामुखी । चीज क्लो यो च शक्ति. स्यात् स्वाहा कोलकमुच्यते ॥६॥ विनियोग समाख्यातस्त्रिवगफलसाधने । देवी ध्यात्वा पठेदर्म मन्त्रगर्भ सुरेश्वरि MM विना ध्यानेन नो सिद्धि सत्व जानीहि पारंति । चन्द्रोद्भासितमूर्द्धजा रिपुरसा मुण्डाक्षमालाकरा, वाला पोतस्रगुज्यला मधुमदारक्ता जटाजूटिनीम् । शत्रुस्तम्भनकारिणी शशिमुखो पीताम्बरोद्भासिता, प्रेतस्था वगलामुखी भगवती कारुण्यरूपा भजे ॥१०॥ ॐ क्लीं मम शिरसि पातु देवो लो बगलामुखी। ॐ क्ली पातु मे भाले देवी स्तम्भनकारिणी ॥११॥ ॐ अं ई ह भ्रषौ पातु वगला क्लेशहारिणी। ॐ हस पातु मे नेरे नारसिंही सुमरी ॥१२॥ ॐ ह्री श्री पातु मे जद्धे म मा इ मुवनेश्वरी। ॐ क्लो स मे श्रुती पानु ई उ ऊ ऋ मुखेश्वरी ॥१३॥ ॐ ह्री मोह्री सदाव्यान्मे नासा ऋल सरस्वती। ॐ ह्री हाँ में मुख पातु ल ए ए छिन्नमस्तका ॥१४॥ ॐ श्री मे यधरौ पातु मो मो दक्षिणकालिका । ॐही हू. मे द तान पातु म म मे रद्रकालिका ॥१शा *श्री श्री रसना पातु क स ग घ चरात्मिका । *ऐ सौ मे हनी पातु ङ च छप च जानको ॥१६॥ * श्री श्री (पली) मे गल पातु म अट ठ गमश्वरी। *ही स्कयो सदाव्या मे ड ढ ण चंव तोतला ॥१७॥ ॐ ह्री मे भुजौ पातु त थ द वरवरिणनी। ॐ वली सौ. मे स्तनो पातु ध न प परमेसरो॥१
१२०
सास्यायनतारे
ॐ जू क्रो मे रक्ष वक्ष फ ब भ भगवासिनी ।
ॐ क्राँ हा पातु मे कुक्षि म य र चरिपलभा ॥१६॥
ॐ श्री ह. पातु मे पाश्वों न व लम्बोदरप्रसू ।
ॐो हू पातु म नाभि श प पण्मुखपालिनी ॥२०॥
ॐ ऐ सौ पातु मे पृष्ठ स ह हाटकरूपिणी ।
ॐ क्ली ए पातु मे शिश्न ळ क्ष ह तत्वरूपिणी ॥२१॥
ॐ क्ली हू मे कटिं पातु पञ्चाशद्वएंमातृका ।
ॐ ए वली पातु मे गुह्य अ ा क गुह्यकेश्वरी ॥२२॥
ॐ श्री ऊरू सदाव्यान्मे इ ई ख रगगामिनी ।
ॐ जू स पातु मे जानू उ ऊ ग गणवल्लभा ।।२३ ।
ॐ श्री ही पातु मे जवान. घ च महारिणी।
ॐ श्री स पातु मे गुल्फो लु ल. ड च च कालिका ॥२४॥
ॐ ए ह्री पातु मे सन्धी ए ए छ ज जगप्रिया ।
ॐ श्री क्ली पातु मे पादौ श्री श्री झ भगादरी ॥२५॥
ॐ ह्री मे सववषु पातु अ अ ही त्रिपुरेश्वरी ।
ॐ श्री पूर्वे सदाव्या मा अ या ट ठ शिखामुखी ।।२६।।
ॐ ह्री याम्या सदाव्या मा इ ड ढ ण च तारिणी।
ॐ ह्री मा पातु वारण्या ई त थ द च सेश्वरी ॥२७)
ॐ य मा पातु पौवेयाँ उ ध न प पिलपिला ।
* श्री पातु शान्या ऊ फ व वैन्दवेश्वरी ॥२८।।
ॐ श्री मा पातु चाग्नेय्या ऋ भ म य च योगिनी।
ॐ ऐ मा पातु नं त्या ऋ र राजेश्वरी सदा ॥२६॥
ॐ था मा पातु वायव्या ? ल लम्वितकेशिनी ।
ॐ प्रभाते च मा पातु ल व वागीश्वरी सदा ॥३०॥
ॐ मध्याह्न च मा पातु ए श शङ्करवल्लमा ।
ॐ ह्री क्ली श्री पातु मा साय ऐ प शायरी सदा ॥३१॥
ही निशादौ च मा पातु पो स सागरशायिनी ।
क्ली निशीथ च मा पातु औ ह हरिहरेश्वरी ॥३२॥
परिशिष्टम (म)
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प्ली ग्राह्मे मा मुहूर्तेऽव्याद ळ' त्रिपुरसुन्दरी।
विस्मारित च यतस्थान वर्जित कवचेन तु ॥३३॥
ह्री तन्मे सकल पातु मक्ष क्ली बालामुखी।
इतीद फवच गुह्य मन्त्राक्षरमय परम् ॥३४॥
अलोक्यविजय नाम सर्ववर्णमय स्मृतम् ।
अप्रकाश्यमदातव्य न श्रोतव्यमवाचकम् ।।३५॥
दुर्जनायाकुलीनाय दीक्षाहीनाय पार्वति ।
न दातव्य न दातव्यमित्याज्ञा परमेश्वरि ॥३६॥
प्रदीक्षित उपाध्यायविहीन शक्तिभक्तिमान् ।
कवचस्यास्य पठनाद साधको दीक्षितो भवेत् ॥३७॥
कवचेशमिद गोप्य सिद्धविद्यामय परम् ।
ब्रह्मविद्याममिद यथाभीष्टफलप्रदम् ॥३॥
न कस्य कथित चैतत् त्रैलोक्यविजयेश्वरी ।
यस्य स्मरणमात्रेण देवी सद्यो वशीभवेत् ॥३६॥
पठनादारणाच्चास्य कवचेशस्य साधक ।
फलो विचरते वीरों यथा ही वगलामुखी ॥४०॥
इम मन्म स्मरन्मन्त्री समाम प्रविशद पथा।
नि. पठेत् कवचेशन्तु युयुत्सु साधकोलम ॥४॥
शबून कालसमानान् तु जित्वा स्वगृहमेष्यति ।
मूनि धृत्वा तु कवच मन्त्रगर्भ तु सापक ॥४२॥
ब्रह्माद्यानमरान् सर्वान् सहसा वशमानयेत् ।
धृत्वा गले तु कवच साधकस्य महेश्वरि ॥४३॥
वशमायान्ति सहसा रम्भाद्यप्सरसा गणा ।
उत्पातेपु प घोरेप भयेषु विविधेषु च ॥४॥
रोगेषु क्वाश च मन्त्रगनं पठेन्नर।
कर्मणा मनसा बाचा तद्र शान्तिमेष्यति ॥४॥
योदेव्या बगलामुख्याः कवचेश मया स्मृतम् ।
प्रैलोक्यविजय नाम पुत्रपौवधनप्रदम् ।।४।।
ऋणहर्तारमेतत्स्यालक्ष्मीभोगवियनम् ।
फाध्या धारयते कुक्षौ पुत्र पश्यति नान्यथा ॥७॥
सरियायनतात्रे मृतवत्सा च विभृत्याथ कवच बगले सदा । दीर्घायुयाधिहीनस्तु तत्पुत्रस्तु भविष्यति ॥४॥ इतीद बगलामुस्या. कवचेश सुदुर्लभम् । लोक्यविजय नाम न देय यस्य कस्यचित् ॥४६॥ अकुलीनाय मूढाय भक्तिहीनाय देहिने । लोभयुक्ताय देवेशि न दातव्य कदाचन ।।५०॥ शिप्याय भक्तियुक्ताय गुरुभक्तिपराय च । लोभदन्तविहीनाय क्वचेश प्रदीयताम् ॥५१॥ अभक्तभ्यो विपुत्रेभ्यो दवा कुष्ठी भवेन्नरः । पल गृह न चानोति पर च नरक ब्रजेत् ॥५२॥ दीपमुज्ज्वाल्य मूलेन पठेद्वमैदमुत्तमम् । प्राप्ते कन्याकंवारे च राजा तदगृहमेप्यति ॥५३।। मण्डलेशो महेशानि सत्य सत्य न सशयः । इद तु कवचेश तु मया दिव्य नगात्मने ॥५४॥ पूजनात् पठनाच्चास्य चतुर्वर्गफलप्रदम् । गोप्य गुप्ततर देवि गोपनीय स्वयोनिवत् ॥५५|| इति रुद्रयामले उमामहेश्वरसवादे बगलामुखोप्रैलोक्यविजय नाम बर्ष सम्पूर्ण धोजगदम्बार्पणमस्तु । मिति माघकृष्ण ५ सवत् १९२२ ईद दुर्गायाः । परिशिष्टम् (घ) ॥ अथ श्रीपीताम्बरारत्नावलीस्तोत्रम् ।। ।। श्रीगणेशाय नमः । श्रीपीताम्बरायै नमः। प्रोङ्कारद्वयसम्पुटान्तरपुट मायास्थिराद्वन्द्वित, तन्मध्ये बगलामुखीति विमल सम्बोधन सर्व च । दुष्टानामथ वाचमाशु च मुख' सस्तम्भयेत्यक्षर, जिह्वा कीलय कीलयेति च लिखेद् बुद्धि तथा नाशय ॥१॥ ब्रह्मास्त्र सकलार्थसिद्धिजनक षट्त्रिंशदात्मक- म्प्रोक्त पद्मभुवा हिताय जगता यन्नारदाने पुरा । 1. स. पदा परिशिष्टम (घ) जीवन्मुक्तपदे विभान्ति सुधियो येपा मुखे भासते, निर्द्वन्द्वामृतसागरेग्दुकिरणाहारावफोरास्तु ते ॥२॥ प्रोमित्यादिस्वरूप' जपति तव शिवे शब्दतन्मात्रगर्भा- वाची यस्मात् परार्थप्रकटितपटवो वर्णरूपा निरीयु. । ब्रह्माद्यः पञ्चतत्वः परिवृतमनध चित्प्रबोषाधिगम्य, दुर्जेय योगयुक्त. कथमपि मनसा' योगिभि हमाणम् ।।३।। हो बीज 'हृदि यस्य" भाति विमल लक्ष्मीः स्थिग तद्गहे, धर्य तस्य कलेवरेऽपि विशते दीर्घायुषो भूतले । कल्पान्तेष्वपि वृद्धिमेति विमला तद्वशक्ल्लो परा, शौर्य स्थैर्यमुपैति तस्य पुरतत्रस्यन्ति वादीश्वरा. In बर्द्धवारिधिमुद्यतो जनकजानाथोऽपि पीताम्बरे ! त्वा ध्यात्वार्णवशोषणे कृतमतिः सेतु प्रचके द्रुतम् । जित्वा रावणभुप्रशत्रुमवलान् वन्दीन् विमुच्याऽमरान, कीति लोकसुखोदया व्यरचयत् कल्पस्थिरामम्बिके ।शा गर्वी सर्वति रति क्षितिपतिमूकायते वाक्पति- वह्नि शीतति दुर्जन. सुजनते पुष्पायते वासुकि । श्रीनित्ये बसले तवरक्षर पदयंन्त्रीकृता यन्त्रिताः, के के नो निपतन्ति स्तमुकुटाभन्द्राकंतुल्या प्रपि ॥६॥ लावण्यामृतपूरिते तव कृपापाङ्ग निमग्ना नरा "ब्रोशादिदिगीशषदमपि ते जानन्ति गुजोपमम् । येषा चेतसि सस्थितासि बगले । ते विश्वरक्षासम:, प्रारब्ध दढयन्ति सत्वरतर विन रविन्नीकृताः ॥७॥ मुख्यत्व समुपैति ससदि तवापाडावलोके नर, कि तच्चित्रमहो स्वय प्रभवते सृष्टिस्थितिप्यसने । यश्चित्त तव भाति मामक इति" त्वदर्शन यस्य वा, त सर्वा हरिणमादयोऽप्पतितरामाराषयन्ते प्रवम् ॥८॥ क्षीपाना२ बलदायिनी जलनिषो 'पोतस्थितो नाविफा," धनकुञ्जगहरगिरियाघ्रादिभीतेष्वपि । ..४ तत्माए 1.स.मोमित्याला..। ३. तपसा I ... हरये वि। ६. भरते। ७. ततिः। ...ये निस्यतो। ९. भ्रामु.॥ १७.बलंगारिरिपोरा मूतमणि ११. स. भक्तिमाशु कुरते। १२. सिमाना। ११. पोस्पितानां गतिः । १४.साल। ११. . सत्येभ्यपि १२४ साख्यायनतन्त्र । (वा पीताम्बरधारिणी 'परशिवा चन्द्रार्द्धचूडा गदा." हस्ता वामकरे प्रतोपरसनामुन्मोलयन्ती' भजे 118) स्वेच्छ ये प्रणमन्ति पादयुगल पीताम्बरे ! तावक, ते वाञ्छाधिकमर्थमाप्य सकला सिद्धि भजन्ते पुन । यद्यकत्तुं मुरीकरोति वगले । स्वत्साधकोऽनाघुना, तत्सखातमिवेक्षते तव कृपापागावलोके क्षरणात् ॥१०॥ वाणी' सूक्तिसुधारसद्रवमयो सालकृतिम्तन्मुखे, शापानुग्रहकारिणी कविजनानन्दैकसद्धिनी। च्याक क्षमते विशालमतिमास्त्वत्सेवको वाड्मय, किं चिन यदि सृष्टिमागु रचते ब्रह्माण्डकोटघायते ॥११॥ देवि । त्वद्भक्तदृष्ट्या तुहिनगिरिमुखा पर्वता पासुतुल्या ज्वालामालाश्च चन्द्रामृतकरसदृशा पुप्पना यान्ति नागा । मूकत्व वावपतीन्द्रा सरसि समतुलामाश्रयन्ते समुद्रा राजानो रङ्कभाव रणभुवि रिपको विद्रवन्ते विशखाः ।।१२।। लेख्य तावकमन्त्रवीजममल दुष्टौघसस्तम्भन, वश्याकर्षणमारणप्रमथनप्रक्षोभणोच्चाटने। ध्यक्त वज्रमिवापर यदि मुखे जागत्ति तस्याग्रत , पादान्त परिसश्चरन्ति रिपवो ये सप्तद्वीपेश्वरा ॥१३॥ नानारत्नविभूषितामलमरिणद्वीपे सुधासागरे, कल्पानीकहकाननान्तरगता या रलवेदी परा। तनाकारितपश्वप्रेतकमये सिहासने सस्थिता, ध्यायेऽह करुणाकरा हरिहराराध्यामशेपार्थदाम् ॥१४॥ वाग्देवी वदने वसत्यविरत नेत्र च लक्ष्मी करे दान दीनकृपालुता च हृदये वीरत्वमाजी त्वद्भक्तस्य भवाब्धिपारतरणे तत्त्वोदयो जायते, तेनेद नलिनीदलोपरि जलाकार जगद् भासते ॥१५॥ चनकाश्चनतुल्यपीतवसना चन्द्रावतसोज्ज्वला, केयूराङ्गदहारकुण्डलधरा भक्तोदयायोद्यताम् । सदा। १. परचमूविद्रावरपोद्यद्गदा। २ पामकरेग । ३ रात्ररसना ५ मुक्ति । त्राघुना । ७ कोटचालये । ८ वा । - परिशिष्टम् (4) wwwvvv . . स्वा ध्यायामि चतुर्भुजा त्रिनयनामुग्रारिजिह्वां करे, कर्पन्तीमहमम्ब पाहि बगले ! वारण त्वमेवासि मे ॥१६॥ मातस्ते महिमानमुग्रमधिक प्रोक्त स्वय मानव- वक्यि सन्द्रियते श्रमेण यदि वा सत्या गुणाम्भोनिः । को निश्शेषतया सुरैररिदितान्तस्य पद्यालये, तस्मात सर्वगता खमेव सदसद्रूपा सदा गीयते ॥१७॥ खन ताऱ्यासमोयम प्रकुरुते ताक्ष्यं च खखाधिक, वान्त स्तम्भयते जलाग्निशमने याऽव्यक्तशक्तिः शिवे। तद्वोज बगलेति मेऽस्तु रसनालग्न सदैवामल, यद्ब्रह्मादिसुदुर्लभ भुवि नरः सत्प्राक्तनलभ्यते ॥१८॥ स्तम्भत्व पवनोऽपि याति भवती भक्तस्य पीताम्बरे । कि चित्र यदि वारिधि स्थलपद मेरुस्तु मापोपमाम । कल्पानोकहकामधेनुप्रमुख रत्नेरलिन्दस्थित - वञ्छिार्थाधिकदानमाशु कुरुते दीनेष्वदीनेष्वपि ॥१९॥ भाग्यायस्य मुखे विभाति विमला विद्या विशेषाधिका, पशिद्धिरथोदिता बहुगुणीजस्तु सर्वार्थदा। त सर्वे प्रणमन्ति मानवममो सेन्द्रा सुस भूसुराः, 'क्रान्ताशेषमहोदय स्वकलनाकातत्रिलोकालयम्" ॥२०॥ यत्किनिद्भुवने विभाति विमल रत्न महानन्दन." या या वृत्तिरुदारता जनयते यद्यत्पर सुन्दरम् । यत्किश्चिद्भुवनेऽथवा नु.२ महता शब्देन वा कीर्त्यते," तत्सर्व तव रूपमेव बगले । ससारपारप्रदे ॥२१॥ जाग्रत्पूर्णकृपामृतोषभरिते श्रीमत्कटाक्षेक्षणे, सर्वार्थप्रतिपादकव्रतधरे ये ये निमग्ना नरा ! तेषा भाग्यमतीन्द्रिय निगदितु ब्रह्मादयो न क्षमा ये सङ्कल्पविकल्पमात्ररचना. प्राणात्यये हेतवः ॥२२॥ हस्ते सगृह्य चाप शरघरनिकरकिरात महाजी, पार्यो ब्रह्माखविद्याभ्यसनपटुमतिद्वन्द्वयुद्धे तुतोष । १. ल. 'सहिपते रस्यपि पाठ । २. 'ताभ्यंजपोचत' इति पास। ३. वासु' चित् । ४. 'सरप्राकृतम्बते' इति पाठः। ५, परमोऽपि। १. पत्नो। ७ लाने. स्थिते. । ८. ममु । ६.पान्ताशेषः । १.. स्वकलनाकामया। ११. महानन्दरम् । १२ ए.। १३ कात्तिते। १४.मितशर १२१ सास्यायनतन्त्र तत्सर्व देववृन्दैरथ रियुनिवर्वीक्षित सिद्धलोके. धैर्य शौर्य च सर्व तव वरजनित भाति पीताम्बरेऽन ।।२३।। पोतां पीतजटाधरा त्रिनयना पीतासुकोल्लासिनी, हेमाभागरुचि शशाइमुकुटा सच्चम्पकस्रग्युताम् । हस्तमुद्गरवनवैरिरसना सविभ्रतीमादरात्, दीप्ताङ्गी बगलामुखी निजगता मस्तम्भिनी चिन्तये ॥२४॥ कर्णालम्बितलोलकुण्डलयुगा श्वेतेन्दुमौलि कर, केयूराङ्गदपाशमुद्गरगदावज्रादिकान विभ्रतीम् । देवी पीतविभूषणामरिकुलध्वसोद्यता ये नरा ध्यायन्त्याशु लभन्ति सिद्धिमतुला ते वालिशा स्यु कथम् ।।२५।। लध्ध्वा मातरशेपकान्तिभरितानन्द कृपावीक्षण, वर्षीयानपि मोहितु प्रभवति स्त्रीवृन्दमुन्मीलितुम् । कि तच्चिनमनेकधा भ्रमयते दृष्टया निलाकीमिमा, सूर्येन्दुस्तनधारिणीमपि बलात् कन्दर्पदाधिक ५ ॥२६।। यन्त्र जैत्रमनकदु खशमन पीताम्बरे | तावक- मोङ्कारद्वयसम्पुटेन पुटित शिष्टस्तथावेष्टितम् । तद्वाह्ये स्थिरमाययाप्टपुटित पाशाशाद्यावृत, येषा चेतसि 'भाग्यतो निवसत ते विश्वसर्गक्षमा " ॥२७॥ कर्पूरागुरुचन्दनमृगमदोरोचनाकेशर- स्त्वत्पादाम्बुजमर्चयन्ति वगले। ये प्रत्यह मानवा । ते लब्ध्वा श्रियम भुतामपि चिर भोगाश्च भुक्त्वाऽवनी, सायुज्यालयमाविशन्ति परमानन्दोऽस्ति यत्राधिक ।।२।। लब्ध्वा पादयुगे रति तव शिवै क्षुद्रोऽपि देवेन्द्रता. मासाद्यामरसुन्दरीभिरमल गदिवि क्रीडति । ये हित्वा तव भक्तिमन्यभजनानन्दाश्चिर ते नरा भ्रष्टा धर्मपराइमुखा भ्रमधियो भार वहन्ते भुवि ॥२६॥ यामाराध्य हरो हरत्वमभजद् विष्णुस्तु विश्वात्मता, चक्रे सृष्टिमजोऽव्यवोचदखिल वैदादिसद्वाड्मयम् । ध्यात्वा ध्वान्तमशेषमाशु हरते सूर्योऽपि पीताम्बरे । तीन तापमपाकरोति रजनीनाथोऽपि चूडाश्रितः ।।३०।। १ख स्थयं। २ समस्त । ३ पोतेग्यु०। ४ भरित दिव्य। ५. अधिकाम् । ६... सस्यिताक्षि बगले ते विश्वरक्षाक्षATI ७. सतत।
परिशिष्टम् (घ) nanananana बुद्धि नाशय कीलयाशु' सिनामङ्घ घोगति स्तम्भय, दुष्टान् द्रावय मारयारिनिवहान् दासाविर पालय । इथ ये बगलामुखी पदगति लब्ध्वा पठिष्यन्ति ते, यन्नारूढमिवारिवन्दमखिल कर्तुं समर्था सदा ॥३१॥ ध्यात्वा स्वा बगले। पुरा गिरिसुता चक्रे शिव स्व वर, प्रोक्त नापयितु शिवेन गदिता सकल्पनाग्नौ तदा । २त्यक्ताग्निर्गलितावलि गिरिसुतात् त्यक्तवा गलस्तन्मुखात्, तस्मात् त्व बगलामुखी निगदिता नित्या परा योगिनी ॥३२॥ नागेन्द्रदेवसिद्धमुनिवरनिवहन राक्षसेन्द्र- दिक्पालदिक्करीन्द्रदिनकरप्रमुख सद्ग्रहैस्तारकाये । ब्रह्माद्यं स्थूलसूक्ष्म रविदितमुदिता त्व परा चोन्मनी त्व, नित्या पीताम्बरा व रिपुभयशमनी भक्तिचित्तासनस्था ॥३३|| "शम्भुर्यद्गुणगानतोद्यतमतिर्नाट्योत्सवस्ताण्डवे, चक्रे चन्द्रमयूखकम्पनकरा' नीराजना' पादयो । "हेमाम्भोजदलेर्जटाजलभरैरानन्दितौलिभि', पूजा प्रत्यहमातनोनि नटयन स्वहस्ततालादिभि ॥३४॥ या दने चतुराननोऽपि वदने चितारविन्दस्थिता, या वक्ष स्थलसस्थिता हरिरजामालिङ्गध पीताम्बराम् । यदेहार्धमुरीचकार पुरजित सौन्दर्यसाराधिका, पट्चक्राक्षररूपिणी भज सखे । देवी जगत्पालिकाम् ॥३५॥ हस्ते भाति गदा सदात्तिशमनी रलावली त्वद्भजे, पादे नूपुरमीशमौलिमरिणभिराजित'२ राजते । ताटङ्क श्रवणे कुचोपरि सदा कस्तूरिकालेपन, काश्मीरद्रवमङ्गरागसधिका पीतच्छवि तन्वते ॥३६॥ ॐकारद्वयसम्पुटन पुटिता 'विद्यागमे सस्थिता पट्चक्राक्षरवीजसाररचिता पशिदमिकाम्"। १. स.कोलयारि । २. स्यक्त्या.. ३. मागेन्द्र यस वि० । भक्त.. ५. गुरगणानतापरमविनियोत्सथे। ६. कम्पनमियानोराजन ] . हेमाम्मोजजन। नन्दिता मोलिभि। १०. पुभित्। ११ जगपापिहा । १२. नीराजन । १३ लसदा। १४ पोता कवि। १५ विधामवास्ये स्थिता । ६. पत्तववरणमिकाम् ।
१२८ सास्यायनत .... Now 'ये-जानन्ति जपन्ति सन्ततमभिध्यायन्ति गायन्ति वा, ते वन्द्या वियुधेश्वरलि भुवने सिद्धाचिता. सिद्धये ॥३७॥ स्वाहाशक्तिरपासने तव ऋषिः श्रीनारदो देवता, नित्या श्रीवगलामुखी निगदिता छन्दो भवेत् निप्टुभम् । बीज तु स्थिरमायया विरचित नानाविधस्तम्भने,' प्रोक्त पद्मभुवाऽखिलाप्तिविनियोगोऽप्यच्युताकारता ॥३८) हृद्य सर्वसुरेश्वरैश्च ऋपिभिर्दुष्प्राप्यमेवाद्भुत, स्तोत्र गोप्यतम स्वभाग्यवशत प्राप्त पठिप्यन्ति ये। सूक्त्या देवगुरु 'धनेन धनद' जित्वा चिरञ्जीविता, पण्मासात् सुखसागरे शिवसमाक्रीडा करिष्यन्ति ते ॥३६॥ देवी स्वप्नगता स्वयंव लिखित मह्य ददावद्भुत, दिव्यास्त्र पुरत पटस्व विमल सिन्दूरवर्ण कर. । रोमाश्चाङ्कितहर्पमाप्य लुलितरङ्ग पठन्त नर- प्राप्तोऽह परमोदयप्रदमिद ज्ञान कवीन्द्रादिदम् ॥४०॥ प्राप्ता श्रीबगलामुखीवदनन स्वप्ने सुविद्या मया, पनिंशद्भिरिमं. सुवर्णनिचय सद्वीजरत्नावली। येषा कण्ठगता विभाति जगतीपीठे प्रयोगक्षमा, वश्याकर्षणमोहमारविधी स्तम्भे तथोच्चाटने ॥४१॥ चलत्कनककुण्डलोल्लसितचारुगण्डस्थलाम्, लसत्कनकचम्पक्धुतिविराजिचन्द्राननाम् । गदाहतविपक्षका कलितलोलजिह्वाञ्चला, स्मरामि बगलामुखी विमुखवाड मुखस्तम्भिनीम् ॥४२॥ ॥ श्रीपीनानारत्नावलीस्तोत्रम सम्पूर्णन।' तवत् १८९० शाके १७५५ प्रापाढमासे शुक्लपक्षे ५ मश्वासरे लिखित ब्रह्मचारि- काशिनायेन ॥ श्रीगङ्गाविश्वेश्वराम्या नम ॥ 1. ख पाय एकचत्वारिंशच्छ्लोकादनन्तर विद्यते । २. नानाविधिः । ३. प्यसत्कारक। ४. नित्य । ५. शरत्या। ६. धनधनपति। ७. सलिन। ८. कवीन्द्राचितम् । १. ख.श्लोकोऽय नास्ति । १.. इति श्रीनारदोक्त पीताम्बरादेवीस्तवराजस्स्तोत्रम् ।
सांख्यायनतन्त्रस्थानाम् 5.MXRWFI 11, Shand Miketan, Anasin Nagar, पद्यानामनुक्रमः Pombay-100094 पृष्ठाड पद्याङ्क प्रग्निबीजाधिगायत्री ३०-२० पड कुशेनंव मुद्राया. ६-७ प्रकाश बोजमुच्चायं ७७-१५ सङ्गयेण समुफ्त ६९-२४ पङ्ग.ष्ठमात्री कृत्वा ८४-४ अघोराश्च पाशुपती ६६-२६ भत्यन्तश्वयंसयुक्तो ५७-६ प्रपा पीतपुष्पैस्तु १०४-२७ प्रपवा पौर्णमास्यो वा ३६-१७ मषवा वगलामन्त्र ६७-१० प्रय फ.६ प्रवक्ष्यामि १००-३ प्रपात: सम्प्रवक्ष्यामि १८-३ मधम च शिलापूजा ३३-१६ अधुना स्तम्भयत्यतत ४१-१४ भनाथस्य चिती रात्री १९-९ अनुक्रमेण सर्वत्र १०१-१३ धनुष्टुपछ द मास्यात १८-८ मनेन मयोगेन १०१-१२ मनेन (नया) विद्यया पुत्र ६३-२२ अनेन योपवयण १०४-२८ अनेन योगवण ६५-१० पन्स्यपत्र चाष्टपनि १०-१२ पन्ध्यवर्ण समुच्चार्य ६१-टि. प्रदेपो बायते च ७२-१४ मन्नेन पावही हवा ४८-२० मध्ययोगसमारम्भ ६६-२५ अपमत्युविनाशापं १०३-६ प्रपामागस्य बीज तु ७५-२१ प्रमारयान च दुष्टाना १०३- प्रमोषमुस्यनाशाय १०३-१६ मम्बी पीताम्बराहपो पहए. ६४-१ मयतान्चिन्तित कार्य ७३-३० अस्ताच्छा सहारो ७४-४ अयुताज्वररोगी प ७३-२० प्रयुतात्तस्य शोश्च ७३-२८ प्रयतादरिगर्व तु ७३-२४ प्रयुताल्लमते भोग ५३-१६ प्रयुत च दिवाराको ५१-टि. प्रयुत जुहया-मत्रो ७४-दि. मयुक्त जुहयामन्त्रो ७५-१७ प्रयुत तपंगापुर ७२-१६.२० प्रयुत तपणेनैव ७२-१५ प्रयुत तस्य मन्वन्तु ५५-२२ ममुत मन्त्रयिस्वा तु ८६-२७ मरानहस्तमात्र च १५-१४ पपञ्चकवणेन ४०-८ पकंपनवेगव ४६-२८ प्रर्कपत्र लिखेन्नाम ५१-टि. भकंवारे तु सध्यायो १६-२६ मर्चन कलशे चंद ७१-५ प्रचन मोडदेशीय ६९-३१ भचन गौरदेश प ३४-४ प्रचंयेत् पञ्चमी कुर्याद ७१-४० मचंयस्पूर्वयस्पुत्र ७-१७ पचयापूर्ववद्यन्न २२-१४ मचयेन् पदसोपेत ३६-२७ प्रत्येदयुद मन्त्री ८०-२॥ भचयेद विधिमार्गेरए ३४-२८ पद जिह्वा पदो पाई ३८-१६ अलोकेन क्षुद्रमति ४५-१४ मोतिषणंसमुरतो ७८-२१ प्रशोकमूसे निवसन् ०१-१. परमयंदं रिपोरजे ५२-३४ सांस्यायनतन्त्र ६ द्रादिपदसस्तम्भ १.२-२४ मिदिभवेत्तस्प ७९-१० उ प्रश्रुतानां च शास्त्राण ८२-१५ अश्वत्यमूनमाश्रित्य ७४-९ प्रश्वत्यात प्रजपेद् ६२-५ अश्वत्यरि धन रेच ६५-७ प्रष्टकोणेपु विलिखेद २१-६ अष्टदिक्पानकोशाप्ट. १-३ प्रष्टपत्र न्यसे पुत्र ७-१२ अपाशसमावत ५-१६ अष्टमूर्ते नमस्तुभ्य ७८-२ मटमूत महामूर्त २३-२ महम कठवल्या च ८-२३ मम्या ध चतुदश्यो ७६-टि. महवेतालशमने ६४-४ अपायुत तपण च ८२-११ महोतरशत सम्यक ५८-२० प्रस्त्र-शस्त्रमय मन ५७-७ उच्चाटनायं जपत्सुत्र ३०-टि. उत्सम कुण्डहोमनत्र १४-३ उत्साटप कपटका यादो ५३-३६ दरतारमात ५४-४ उन्मादी च भवेच्चत्र ७३.१३ उपचार पोवाभि ७१-3 उपस्यान चंवमेतत ११-टि. उपस्थान त्रिकालस्य १०-१७ उलककाकयो पत्रं १६-२५ उल्कामुखी द्वितीयास्त्र -२ उल्लघ्य बगलामत्र ३३-टि. उपगोदक ताम्रपाने ६४-३८ ऊध्वं रक्ष महादेवी १३-१४ ऋषिच्छ दविनायक ९८-१० ऋषिश्चाप्यग्निवाराह ३६-२५ पिसिद्धामरश्चंद ३-२७ प्रा प्राकपण भवच्छीघ्र ४०-२५ प्रागच्छेत्याज्ञया तस्य ४०-३३ माज्यन मिश्रित चव ६८-२० मात्मा च पराध च १०३-७ मादी गणपति पूज्य १०४-२३ मादौ भास्वररूपिणी कुरु तदा ६८-२२ माद्य बीज पुनश्चोकरवा ४५-२६ भाधवीज मनो सरूपा ४२-१८ माधास्त्र बगलानाम्नी ३७-३ पारनालस्य भाण्डे तु ८४-५ मारनालन तद्भस्म ८४-६ मावाहिनी स्थ पनी च ६-८ भाश्चयद महामात्र ४२-२५ माश्विने कात्तिके चव ६-३ ए एकाक्षरोमहामत्र ६५-१२ एका रीविद्यया च ५२-टि. एकाक्षरी च बगला ५०-१५ एकाक्षरी जपेदादौ १०२-१६ एका बगला देवी ५०-४ एतच्चूरा प्रयोग च ६६.९६ एतरपूजा विना पुत्र ३६-१८ एतद विवि म ६६-२६ एतदविषिश्चय ७०-४१ एतदष्टाक्षरीमत्र 5 टि-२५ एतद्यन्त्र लिखेद भूर्ये ६३-२७ इच्या वत्तते सर्व ४.-३२ इति सक्षेपत प्रोवत १०५-३५ इदमध्य लिखेद विद्या ६३-२४ पध नुक्रमः श्रो ॐ नमो पदमुच्चायं ६१-७.टि. क एतद्य- हृदि ध्यात्वा ६-३० एतद्यन्त्र हृदि ध्यायेद ६२-१५ एतद्राज्य स मासेन ५६-३४ एतद्विद्यापुरश्चर्या ६०-३६ एतन्मन्त्रवर पुत्र ५६-२२ एतन्मनस्य माहात्म्य ८२-३ एता मुद्राश्च ततो 8-8 एरण्डतलन जुहयाद् ४८-२४ एवमेव विधिः पुत्र ७०-१२ एव कुर्यात् प्रातरेव ६२-१६ कृत्वा जपेमात्र ८९-२३ एव कृते सप्तरात्र ५२-२४ एवं च पूजयेद्यन्त्र २३-२७ एव च पूजयेत् सम्यक् ३३-१७ एव च माजनं कृत्वा १०-१५ एवं च मार्जन कृत्वा ८-२४ एष व मालिकां कुर्यान् ६५-१३ एव विविधपूजा च ६९-४० एव ध्यात्वा जपेत् पुत्र १-६ एवं ज्यावर जनमत्र ५५-१६ एष ध्यात्वा जपेरमात्र १३-२० एवं ध्यात्वा जपेन्मन्त्र ४३-३६ एवं ध्यात्वा जपेन्मान्य ४५-१६ एव पात्वा तु देवशी १०-२१ एवं यासविधि कृत्वा १३-१५ एव भूतसहस्र च २२-१२ एवं मध्यदिनोपास्थि ११-२३ एक मायाभिषेकजच ८-२० एवं मासत्रय कृत्वा ८४-६ एवं मासप्रयोगेण २४-१४ एव यः कुरुते पुत्र ७६-टि. एवं रोगसमायुक्तो २०-२७ एवं लिखित्वा पन च १२-१२ एव शुक्रदिने सम्यक ६-६ एव होमप्रयोग च ७६-२६ एहि-समय पोक्त्वा ७-६ कण्टक पुरपक्षस्य ८५-१४ कण्टकान्तीपर्यदर्क ५२-टि. कण्ठे वा बाहुमूले वा ६२-१७ कदलोमूलमाश्रित्य ६२-६ कन्यको पाथवा पुत्र ३३-१५ काया चव न्यसे देव ३५-१४ कपदादिविनाशार्थे ६५-६ कपिस्यवृक्षमूले तु ६२-७ कपिलानवनीत च ६-३ कर्पमिश्रित तोय २७-१२ कम्बुकण्ठो सुताम्रोष्ठी २३-१ करजमूलमाधिस्या० ६२-१. करोति यस्य सातोप ७७-१२ कसपत्रजद्रायः ४६.टि. कल्पते चित्तसंक्षोम ३६.टि. कवसात कीलन पोषः १०२-२३ कवच च चतुर्थः स्यात् १०२-२२ कवच पञ्चमबारपः १०१-१५ कवच प्रपम बाणः १०१-१४ कवच वेदवणं १०२-१८ कवीश्वरोऽपि पोन्मादी ७६-5 कस्तूरी मिश्रित तोये २७-१४ कस्तूरीलेपन कुर्यात २४-५ काकपत्रेण सयुक्त ७२-१० काकवद्भमते शत्रुः ७२-११ काकवद्भमते शत्र. ८६-२५ काकोलूकदल चंद ८५-१५ कामराजं च हल्लेखो ४४-१० कामरूपास्पदेस तु ७०-३४ कामुक काञ्चनासक्तं ५-टि. कारण तत्र केन स्यात् १००-४ कालानलनिर्भा देवी ४३-३४ ।
४ सात्यायनता क्षुदप्रयोजनः पुत्र २०-10 ख सरस्य रक्तमादाय १६-. खरबाल च रोम प ८६-३३ खरजेन दम्येण ४८-२३ खाने पाने च तद्भस्म १६-१६ ग कालोसन्ददय चोक्त्वा ८७.६ काली करालवदना ८८-१४ कि तस्य जपयुक्ताना ४० टि. कुटिलालकसयुक्ता ६८-१२ कुण्डे पा स्पण्डिले वेद्यो १०४-१७ कुबेरसदृशः धीमान् २०-२० कुवेरसदृशः श्रीमान् ८२-१८ कुवेरसहश श्रीमान २७-१५ कुबेरसहयो भूत्वा ८०-१५ कुमारक प्रवन्तेि ३६-३१ पुरुपाञ्चालदेशा ७०-४३ कुर्यात कृत्तिमरोगेण १२-२० कुर्यात् सौभाग्य सम्पूजा ३६-१४ कुलाचारसमायुक्३ ३-२४ पुन जुहुयातस्य ४६-. सुपचम्ररभ्य २३-२५ राहविनासाय १०३-५ करवा एकामरोमात्र ६६-२५ इत्यापमडल पंव २४-१२ अवा पवित्रा प च ७२-१२ अप्पाटम्या घस्या २५-८ वेतमीदलहोमन ४७-११ बलासशिखरासोन १-२ कोऽपात यमनुस्चति ६१-६ मिस तरफम्पक ७-११ कौटिवस्थापन पव१४-१६ सारपरनाम ७.-६ कसमार पनाम १६-३३ गङ्गाधर नमस्तेऽस्तु १-२ गजाश्ववृषभो कूरू १५-२२ गतिगनं वाक्यानि २५-७ गत्वा तु रिपद सई ५१-२३ गम्भीर पमद.al १०-१५ गर च तिलतल प ४६-३० गभकोलागामासक्त ४-८ गस्तभनदोष च ६९-२५ गायत्री पद धादिष्ट १५-६ गायत्री बगलानाम्नी २१.६ गायत्री बगलानाम्नी ३१-२६ गायत्री पद पुत्र १०१-११ गुरोकस्तपण प २६-४ गुए पच वर्मा मt ७५-१. गुरबात कोटिहोमे १५-१३ गुपागम नाम ४-५ गुरधिप्याभो मोहाद. ५-२२ गुपया विद्या ५-१२ परतावरिनाम २.-१९ गोशोर प्रासरस्थाय ४-३६ गोपनीय गोपनी १०५-१४ गायत्मदा पु+ ४१-४. मामयरपा हरित ६५-६ गोपन सग २६-१७ पोभूषण नेमात्री ४५-२२ गोगरगोन .. पोरसा 10-11 समास कौलागमहसबनी १-१ बोखारनविचार - समारन कुदि ४ -२३ शराको भव: २८-२७ एरोमो भव माँ ७१-२७ मोरे प्रमनार ४०-२१ Yमति निनाय १.१-६ पद्यानुक्रमः गोडी मावी च पष्टीच ३३-१८ प्रसनीति पदं चोकरवा ५४-७ ग्राममध्ये हुनेमन्त्री ७४-६ ग्राम वा नगरं वाथ ५८-११ ग्राम वा नगर वाथ ७४-१२ ग्लों बीजं ह्रीं च शक्तिश्च ६०-१० च चक्रपूजासमायुक्त (क्तो) ४-११ चतुरक्षरी च बगला ६७-७ चतुर्थकोणे सम्पूज्य ३२-६ चतुर्भुजां च द्विभुजा ३२-४ चतुर्भुजा त्रिनयनां १७-११ चतुर्भुजा त्रिनयना ४६-१ चतुर्भुजा वा द्विभुजा १००-२१ चतुल्लक्ष पुरश्चर्या २६-८ चतुध्यात्मिके मन्त्र ६७-६ चत्वरे सर्वकार्यार्थ ९७-३५ चन्द्रचूड नमस्तेऽस्तु ४३-२ चन्द्रोपेन्द्रमहेन्द्रादि ८३-२ चमंगवसनो भूत्वा ४१-१२ चलसनककुण्डलोल्लसित०६-१ चापचर्यासुनिपुण १-५ चिताभस्म चिताङ्गार ५१-१६ चिताभस्म रवी रात्री ८६-२७ चितिवस्त्र रवा ग्राह्य २०-२१ चित्रपीताम्बरधरा ६६-२३ चिदानन्दघनावास १००-२ चिन्मयी स्तभनी देवी ४२-२२ चुलयोपरि च तद्भाण्ड ६४-६ अपेच्च वायुवीजादि ३०-१६ अपेतत्र सहस्र के ५०-१० अपेदमृतबीजानि ३०-१८ जम्बीरतरुमूले तु ६३-१८ जल कृत्याविनाशार्थे १०३-१३ जातवेदमये देवि ७१-१ जातवेदमुखीबाणो ६७-२९ जातवेदमुखी मत्र. ४१-६ जातिपकसमिध. ४५-१७ जातिभ्रष्टो भवेच्छत्रुः २८-२४ जास्याभिमानिनो ये च ५६-२६ जिह्वाग्रमादाय करेण देवी ३-१ जिह्वाग्रमादाय करेण देवी ४३-१ जिह्वा मुख च कर्णाक्षि ८४-८ जिह्वास्तम्भनमाप्नोति ६१-२० जिह्वाम्तमो भवत्येव ७२-१८ जिह्वास्तम्भ भबेच्छत्रो. ५०-८ जिह्वा कोलय उच्चायं ३८-११ जिह्वा कोलप उच्चार्य ३६-२३ जिह्वा कोलय उचार्य ४०-६ जिह्वा कोलय उच्चार्य ४४-७ जिह्वा खङ्ग पानपात्र ६०-१२ जिह्वां वाणी च बुद्धिं च ६४-२५ जीवन्मुसः स एवात्र ७०-४४ जुहयात्तत्क्षणात् पुत्र ७५-२० जुहुयात् पूववच्छत्र ४६-३२ जुहुयात् पट्सहन तु ४६-२६ जुहयाद्दवता घ्यावा ४६-२५ ज्वालामुखी तृतीयास्त्र ३७-४ ज्वालामुखी देवता च ४१-२० ज्वालामुख्यभिध बाण ६५-१४ त छन्दादिक पूर्ववत् स्याद् १८-७ छागमासेन जुहुयान् ५५-१७ ज तक्रेण तर्पण चंद २-१७ तऋण सहित पीत्वा ६-२६ तचूर्ण देवतागारे ८५-२१ जपसख्या यत्र नोक्ता ३१-२५ ६ साख्यायनतन्ने तलतलेन सयुक्त तुज्जल च समानीय ७१-६ तज्जल वामवुलुके -१० नतो नागीश्वरी सवच ५५-टि० ततोपरि लिखेलसम्पक २१-५ ततो पलासमूलं तु ६३-टि. ततो व प्रजपेतिया १००-२० सतः कवचमालम्ज्य ततः शिष्य समानीय ६-७ तत्कारिपत्रजद्रावं. ४६-टि. तारणानासमाप्नोति ८९-२६ तत्तदेकाक्षरीबीज तत्सवित्रे सयुक्त सत्ययोग तत्र उपत्वा टि. तत्फलेन हनद रात्री ७४-८ तपाः शुभाश्चि ७५-२२ तत्वलक्षमारोन ६६-२८ तत्त्ववद महादेव १०३-३ दुसार शुशुप्रास ६३-१४ अदुपरि प सवेष्टप ७६ टि. तदुपरि समन्वय ३२-१२,१३,टि. तन्द्रस्म पूर्णमिथ ०४-११ वाम तिललन ४-१. दबोजोदारमनप वपत्रधारणादेव - सस्त्र गुलिभार १०-५ afteपप्रध्यापि पिसमि ७-४ तामाघसम्म दमि सामालिका पोको १५-१. सपनादुर ७-६ तपंप गयो र ४२-२१ तपर पाकुद १५-१६ सरा पारा -१५ तपरा म.मसार 01-४ प्पामा वदेशहर १७-18 १८-२१ तस्मात्सप्रयत्नेन तस्मात सर्वप्रयत्नेना० ३७-३१ तस्मिन्च मात्रयेत सायं ५३-०४० तस्य दशनमात्रेण ८०-१७, २२ तस्य प्रज्ञा पलानीय ३३-२० तस्योपरि च षटकोणे ७-टि. वस्योपरि च तवंटप ७६-६ तस्योपरि ततस्तीयं ३५-१. तस्थोपाय च तदियो १-६ तस्पोल्लपनमा ७७-११ ताडयद इद मन्यो १६-११ तम्बूलपवणाच्या ६२-२२ ताम्रग जत पाए १३-११ ताम्रा उत र १४-३७ तार घालावोज ११-४ तारच मातवावर्ण १३-१७ तार पविलिखेव पूर्व १८- तारपस्व.माया प ४०-३ तारादि प्रज.म.न.-१. ताबोजामिन ताचा मालामाघरच तालरेन ने तर त सनने पुष AIRATो १५-६ तापमान १-१७ तासमसिम त RRसमा १६-२६ fati fair nah गु समान २१-२॥ गुममा ११-१२ मु240 ताराम २८.12. ८.1. HTTETीप १६-२२ . पद्यानुनमः . . तेन कुर्यान्मालिका प तेन देवीकटाक्षेण २-१६ तेन पूजा प्रत्तंव्या २२-१५ तेन मूलेन सम्माज्यं १०-१३ तेन शत्रुस्तरसरणाच्य २४-११ तेनायुत तपंगेन ७२-१६ तेनोवतमाञ्जनेयाय ५६-४ तेनोतविधिना सम्यक् ७१-८ त्यत्वा पञ्चेन्द्रियासक्ति ३६-२० स्यत्वा तम्मागायत्री ३१-२४ निकाल तु समासीनो ६२-३ त्रिकाल पूजयेदेवी ३३-१६ त्रिकालं लेपन कुर्यात् २५-१६,२४,२५,२६ घिकालमयुत जप्त्वा ६१-२६ त्रिकालमाचरेत्सध्या १५-२७ विकालमेककालं वा ६३-३३ त्रिकोणकुण्डे जुहुया० १३-२१ त्रिकोणे पूजयेत् पुष ३२-५ पिदिन चायवा पञ्च ५३-४१ विधा मूदं नि द्विधा बाहो १०-१४ त्रिपुरारे त्रिलोकशः ५६-२ बिमध्वषतं पायसेन ४५-१५ विमवक्त वेतदूर्वा ४६-५ त्रिशत च शत पापि १०१-७ त्रिसप्तमन्त्रित तोय ७८-२४ त्रिसहन ध्यानयुक्त ५७-८ विसहस्र सहस्र वा ६३-२८ लोक्य वशमाप्नोति ८०-१६ त्रैलोक्यविजय नाम ८६-२१ वलोक्यविजया च १०४-२. दशेन्द्रियस्तंभने तु १४-७ दयुग्म लिखेद् बाही १६-१० दिने दिने सहस्र के ६३-१३ दीक्षामार्ग विना मन्त्र ४-४ दीक्षाविधि विना मन्त्र दुरालापसमायुक्तं ५-१८ दुर्वासा प्रापिरेवान ६०-६ दुष्टस्तम्भनमुपविघ्नशमनं ११-२२ दुष्टाना पदमुच्चार्य १६-५ दूर्वा होम निमध्वक्त १५-२१ देवता कालिका नाम ८८-१३ देवता बगलानाम्नी २६-७ देवता बगलानाम्नी ८१-५ देवता बफ्लानाम्नो ४४-१२ देवता शान्तिमाप्नोति ५३-टि. देवदानवदैत्यारीन ६४-५ देवस्येशानभागे तु ६-८ देवी भूरवा जपेहवीं ६५-१५ देवी सम्पूजयेत्सम्यक् ६६-२६ देवो भूत्वा स्वय पुष ७०-३८ देशोपद्रवमाशा) १०३-१० दौर्भाग्येन समायुक्तः ५६-२९ द्रवेण तर्पण कुर्यात् २६-५ दव्याभिमानी पुरुपो ५६-टि. द्रव्यलाभ भवेत्तस्य ८०-१५ द्विगुणा जपमात्रेण ६०-३७ द्विगुण जपमाप्नोति ६०-३६ द्वितीयको सपूज्य ३२-७ द्वितीये विलिखेत् सम्यक् ६३-२६ द्विपञ्चसप्तविद्भि ६६-१७ द्विशत मन्त्रित चंव ६३-२० . द घ दक्षिणामूर्तिमन्त्रेण ५६-२५ दधिमिध गुडूचीभिः ४६-६ दम्तधावन काष्ठ च ६३-२४ दरिद्रोऽपि भवेच्छीमान् ७६-७ धनजयपुर व ३५-टि. धीमहीति पद चोक्त्वा २६-2 धूपयेच्छत्रुसदने ८५-२० द सांस्यायनतग्ने घूपयेरोन सर्वाङ्ग ८६-२८ धोतवस्त्र परीषाय धत्त र कुमुमेनंव २२-१८ पत्तूरक च तम्मूनि ५२-२७ पत्त रद्रवसयुक्त २०-२२ घत रपत्रमादाय ८६-३१ धत्त र तिन्दुक बोज २४-१३ ध्यानभेद प्रवक्ष्यामि ६०-११ ध्यानेन म प्रसिद्धि स्याद ध्यान यलारप्रवक्ष्यामि ध्यान यलात प्रवक्ष्यामि ३८-१५ ध्यान यत्नात् प्रवक्ष्यामि २६-२७ ध्यान विना भवेमूक ४३-२१ ध्र वारिति मन्त्रण ३५-१२ . न न कर्तव्य मुमुक्षश्च २१-२६ नगरे वाथ ग्रामेबा ४६ टि. नग्न प्रतमुखे भौमे १६-२७ न चाभिषेक न च मात्र दीक्षा ७६-५ नद्या समुद्रगामिन्यो ६२-१२ न ध्यान न च होम च ७६-४ नन्द्यावर्तन सम्पूज्य २३-२४ नमः कैलाशनाथाय ६७-२ नम कोलागमाचाय १५-२ नम पापविदुराय ८१-२ नम शिवाय साम्बाय १०-२ नमस्ते गिरिजानाथ ४०-२ नमस्ते जगा देवी ४६-१ नमस्ताण्डवरुद्राय ६२-२ नमस्ते देवदेवेशि ७८-१ नमस्ते देवदेवेशि ८१-१ नमस्ते देवदेवेशी ५६-१ नमस्ते पावतीनाथ ५४-२ नमस्ते पावतीनाथ ४-२ नमस्ते मोलिनसेन्य २६-२ नमस्ठे योगिससेव्य ५७-टि. नमस्ते योगिससय १४-२ नमस्से योगिस व्य नमस्ते लोकजननी ८३-टि. नमस्ते वगलादेवी २६-१ नमस्ते कृपभारूद ६४-२ नमस्ते सर्वसर्वेश २६-२ नमस्ते सर्वसर्वेश ८१-२ नमस्ते सर्वसर्वश १८-२ नमस्ते सिद्धससेव्य ७१-२ नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ नमामि देवी नमोऽस्तु मनागम कोधिदाय २१-२ नागवालीदलेनैव ६२-१८ नागवल्लीदल चैव ६३-२१ नात परतरो योगी १०५-३३ नानाकृत्यिमदोपच नानादेहजरोगाश्च ४५-१६ नानाम श्रेषु मन्त्र वा १२-३ नानारोगविनाशायं ६५-८ नानारोगहर चैद १६-४ नानारोगे कृत्रिमश्न १५-१७ नानालद्वारशोभाढी ७३--१ नारदो पिरेवाव १७-१३ नारी दृष्टवा मानसेन ७०-४५ नाशयदा तत्सव ८६-२७ निक्षिपेत्सप्तराव तु १६-१४ निक्षिपेनवभाण्डेयु ७-१४ निक्षिपे मन्त्रपूर्व च ५३-३७ निक्षिपेद द्वारदेशे तु ८६-३२ निक्षिपेद् रविवारे तु ८५-१६ निक्षेप लभते पुष ८३-टि-२० नित्य व शिसहस्र तु ६२-४ नित्य व सहन तु ६६-३० निधान लभते तस्य ८०-२. निधाय पाद हृदि वामपाणिना ३१-१ सास्यायनतन्त्र पृष्ठाडू पद्यात ८ २ ६ २२ २४ ७ २३ २२ ४३ २५ २३ ३ ४४ १ ४८ ८ ७६ टि. पृष्ठाङ्क पद्यार पाशाड कुशान्तरित शक्ति. ६७ पाशाड कुशेनान्तरित पिचुमदतरोमूल पित्तरोगी भवेच्छा पीतपुष्पश्च जुहुयात पोतयज्ञोपवीतस्तु पीतवर्णसमासीना १०२ १ पीतवरणी मदापूर्णा पीतवर्णा मदापूर्ण पीतवासामते पुत्र ६६ पीताम्बरधरा देवी १ पीताम्बरधरा सौम्या पीताम्बरा दक्षिणेच पीताम्बरालङकृतपीतवर्ण पोतावरणभूषी च पीताशनी पीतभक्षी १०४ २५ पीताशी पीतवाणीच पोनोत्तगजटाकलापविलसद . १० पीयूषोषिमध्यचारविलसद. । पुतली प्रतवस्त्रण पुत्रवान् जायते मत्यों पुत्रवान जायते लोके पुत्रो देय शिरो देय टा० पुन पूजा प्रकारच्या पुनयो मनिशाकाले पुनश्च मन्त्रयताम्र० पुरश्चरणकल तु २३ पुरश्चरण कृत्सिद ६ पुरश्चर्या विना मत्र १६ पुराणज्वरमत्यन २७ पुलिन्दकन्यका चव २८ पुष्पवाटचा जन्मत्र ८३ टि०.२२ पुस्तके लिडिता मात्र न पूजयेद्यन्त्रराज च ३ पूजा कालिको नित्य पूजाधारणय त्रज्ञ पूजायत्र मेलव पूजाय त्रमिद पुत्र पूर्ति पादपल निस्य पूर्वभागे तु पचास्त्र पूर्वव पूजयत्तत्र पूर्ववनवबीज च पूर्ववन्यास विद्या च पूर्व यासविद्या च पूषवल्ले पन व पूर्वोक्तविधिवत्सध्या पूर्वोक्त यन्त्रमालिख्य पूर्वोक्ता न्यासविद्यां च पष्टोद्रव्येण जुहुयान पोस्पेणंव सूक्तेन प्रजपेद् बगलायाच प्रजा बुद्धि थिय चंव प्रणव वाह्नजाया च प्रोता प्रोक्षणोपात्र प्रतिवादि भवेस्तम्भो प्रत्यक विसहस्र प प्रथम वगलाबोज प्रदिक्षणप्रय कृत्वा प्रपञ्चस्तम्भन कृत्वा प्रयोगशातिनं भवेन प्रयोगादीनि सर्वाणि प्रयोग व न भवेद् प्रयोग चोपसहार प्रयोग तपण व प्रस्थ पंव चतुर्विस प्रस्थानज्ञानपारोणं प्रस्फुरद्विवय चंच प्रारुप्रतिष्ठा कृत्वा तु प्राणप्रतिष्ठा वा तु प्राणप्रतिष्ठा वृत्वा तु - ३६ २२ २४ ७८ ५८ १०,१४ ६० ६३ १६टि. ३४ ४ २ ७ ४ ६४ टि. २४ पद्यानुक्रमः पृष्ठाङ्क पचा प्राणप्रतिष्ठा यत्रस्य ६२ प्राणिना प्राणहरण प्रात काले भक्षयिस्वा द २० प्रादेश शहोमे च प्राप्नुया छत्रमुद्दिश्य ५६ टि. प्रियङगुशालिगोधूम १० प्रतमस्म रवी ग्राह्य प्रेतभण्डे लिखेट्राम प्रतवस्त्र रवी ग्राह्य २६ प्रेतो प्रतकाप्ठे प्रतानो प्रेतकाष्ठ तु प्रतानी प्रतकाष्ठ च प्रेतातो रजकारणीच २४ प्रताङ्गारमी (यों) करवा ३ प्रतान प्रतभस्मच १० प्रतात प्रतभस्म च २४ १ पष्ठा पद्याङ्क बि दुत्रिकोणषटकोण ३ विदुना भूपित पुत्र १ टि. बि दुपात्रयुता पूजा वि दुमध्ये च सम्पूग्य बिन्दुमध्ये लिखेदरीज २१ दि. वि दुमात्र गृहीत्वा तु विभीतकसमिद्भिवा १५ २३ विभीतकोद्भव पुष्प २२ बिम्बोष्ठी कम्बुकण्ठी च १७ बिम्बोष्ठों चारुवदना १८ बिम्बोष्ठी चारुवदन ६० बोज च बमलावीज ३१ २६ बोज च बगलाबीज ३२२ बीजरञ्चकमुच्चार्य बुदिध्र शो भवेत सद्यो २१ बुदिशब्द ततोच्चाय बुद्धि विनाशयोच्चार्य ४२ बुद्धि विनाशय चोक्त्वा १८ वहद्भानुमुखीबाण । वृहद्भानुमुखोवाए ६७ ब्रह्मविष्णुमहेशाना ब्रह्मस्थाने तालुदेश ५२ ब्रह्मा ऋषिश्च छदोयन्दिोऽस्य)१२ ७ ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दोय ६७ ब्रह्मास्त्रस्तम्मिनी कली ३ ब्रह्म स्त्रस्तम्भिनी विद्या २ 2 ब्रह्मास्त्रायपद चोरवा २६ ब्रह्मणान् भोजलश्च त ६० ब्रह्मणान् भोजपेसश्चात ब्रह्मणान् भोजयेतश्चात् १७ व मोरस समादाय ८६ ३२ . फ फलित पुष्पित चंद फलित पुष्पित वाप २४ ब २२ ८७ ४ अगलाबीजमध्यस्थ बगलामसिदिस्त बगलामुखिपद चोक्त्वा बगलामुखिपद चोक्त्वा बगलामुखीपद चोक्त्वा बगलाया बिना मन्त्र बदरीकण्टक चव बदरीमूलतो गत्वा बचन निपुरमचंद बम्बूककुसुमाभास बाणायुत जपेतीमान् बालमानुषतीकामा विद् त्रिकोण वृत्त च ५२ १ ७ भायुग्म तदोपचाप भक्षयेत् प्रातस्याय २१ सोस्यायनतन्त्र मक्षयेद् बदरीमात्र भगाकारे सुकुण्डेऽस्मिन् भने ह क लिका देवी भजे.ह चास्त्रवगला भह स्तम्मन पंच भवविद्याविहीनोऽपि भुजामोहितेनंव भूतपिशाचाधाः नताविपरित चंच भूपुर वृत्तयुग्म च भूपये लिसनाम भनिश्चि भगवारे च समूह भगुवारे पसगव भावी बोजमाप भोमवार ENTERो प्रमशान ena प्राचिर) भवा E८ पृष्ठान पद्याइ पृष्ठाद पचास मनमा त जप-मन्य मनोपहारिणी चोवत्वा t मात्रजीवनविद्या र २ ६० १४ म-धान्ते च प्रशतंय मन्त्रमध्यापयेत् सम्यक मत त्रिसदस्यतु ८६ ३. टि. मानवनिम्रपत्र ५२ २५ २२ मन्धराजस्व गायत्री म.प्रमाया दिना मात्र ६३ मानसिस्मिवानोनि म.सिभिवत् प्र १२ २.असिस्मात् पुर ममभिवेत् सपो ६६ २० मजा तर रोजामप. म. जुकामको सम्परा सिदोसियोऽपि २८ मशेदार पदयामि ८२ माकोशार मामि १६ २. माधोदार समि ३ माराम दशम ८॥ मरापि मनमान . . ३ ५२ दि. - ४ ४४ or . ७८ मरसोग मनोरन माना.. 4.11am मरानrict मरबमा मा मोसमा भyuu म1G45मर समे एकमात्र मा. मामना महानोपन 17 II . । ४ १२ १. महाग, महा 401 मनम hair 113421 मारन माकोरम्परा - ४ मा ... मjatt.ruln.
पधानुक्रमः पूष्ठा पधाह १ ६८ २१ योगिनीकोटिमहिता योगिनों पूजयेत् पश्चात् योगिनी पूजयेत् पश्चाद् योगिनी वीरपूजा च योगोऽय कपितः पुत्र योपिच्छुद्धिव्यपूजा पोपिदाकपासक्ती यः करोत्यचंन चंव १८ १०१ ६६ २६,दि. १८ र द पृष्ठाङ्क पद्यात मानो लघुतरश्चंव ७७ ६ मायादि जपेत् पुत्र ३१ २१ मारसे चाष्टकोणे तु मारण भ्राग्निरुग २ मारण मण्डलाच्यो मारण स्तमबाणं च ४२ मारिबालरोमाञ्च मालामन्त्र ताक्ष्यविद्या टि. भासा-मत्युवशो भूत्वा १४ मासेन शत्रुमरण २६ २८ मांस सपुटप्स युक्तं मुदगर दक्षिणे पाश १ मकाच कुरुते प्राज्ञान २८ २२ मूलमन्त्रेण चाम्ययं मनमात्रेण सम्पूज्य १० मूलेन मन्त्रित तोय १० मगाणा चंव शत्रणा मृत्युञ्जयजप करवा मैत्राय कलहोत्पत्ति मोक्षार्थी व गुरु यानात् ५ मोहिनीद्रवसमिधं ६ म्रियते न च सन्देहो म्रियते नात्र सन्देहः ४६ टि. म्रियते सप्तरात्रए रजते स्वर्ण पट्ट वा रणस्तम्भे सवकर्मा रत्नसिंहासना वन्दे १. टि. रलायुत तणन २० ८५ २० ૧૨ १३ २ ८३ टि०२३ ५ ८३ दि.२१ सम्मोहपादपद्माता रवी गुरो भगावन्न रवी रात्री च निक्षिप्य रवो रात्रोध सग्राह्य वो रात्री च सलिरूप रवी रात्री शोहे राजराजः स वै श्रीमान् राजलाभो भवेसस्य राजस चंव तद्विद्या राजा चंब ययो भूत्वा राजा वा राजपुत्रो वा राजीलवणमादाय राजोलवरसयुक्त रात्री पूजासमायुक्तो रात्रोहोम च कर रिपुरधो भवन पुत्र रूपयौवनवाञ्चा. रूपाभिमानिनो येच रूपिणीपदमुच्चायं. रेफयोमामहेशानि रेफहीना बपेदिया य ३ १८ २४ ६७ ७२ यत् परस्म न वक्तव्य २७ यत्र कुत्रापिरिपत्र २१ पत्र गया समासीन: ३२ यथोत कुण्डपु नेद यदा शत्रुभयोरपन ६७ यात्रप्रयागं यमशाहने कलो २१ युवती च मदोदितां ये (य इन्स्यार्पशारयादि ३ २२ ये वा विजयभिच्छन्ति ३ २१ २४ २३ ७ १ EE १४ सांस्पायनतम् पृष्ठा पद्याङ्क ४८ रोगी च जायते मासाच रोपये पादयुग्मे तु ३२ रोहिणीश्रवणे चंव ६ ५ रोप्ये वा स्वर्णपट्टे वा ल ६० ८२ १४ ८२ लक्षं जपवा मनोरेवं लक्षमेक जपे-मन्त्री लक्ष्मीवान् जायते पुत्र लक्ष्मीः शान्तिस्तथा पुष्टिः लघुषोढा च विन्यस्य लाटाचंन चावलम्ब्य लिखित्वा शुभलग्ने तु लौकिके व गुप्तान लें बीज चंद्र है शक्तिः लें बीज हो च शक्तिच ६ ४० पृष्ठाङ्क पद्यात वडवानलनामानं वनेचरास्तामसजन्तश्च वन्दे पाशुपताध्यक्ष २ वाध्या पुत्रवती चंव २२ व.यश्च मल्लिकापुर वल्लीपलासमूले तु वशीकर तु सम्मोह २४ वशीकरणकार्यपु २१ वशीकरणसम्मोहे ६ वशीकरणसम्मोहो वश्य जनानां सर्वेषा वह्निनायासमायुक्त वह्निजाया समुच्चार्य वह्निरोजेन सवेष्टय २. २३ दह्रो यत् प्रविशति २१ यापारिणवदनाक्षणाच वाग्बीजं च सतो वाग्भवादि जपे-मन्त्र वाङ्मय चैव वैचित्र्य ३ वाच मुख पद चोक्त्वा ३६ २२ वाणी चव रमा गौरी वादी मूकति रति क्षितिपतिः १३ वाममार्गन मेराव २३ दामोहपरि विन्यस्य वायध्ये च मदोन्मत्ता वाराह शक्तिवाराह वाराह बगलादोज वाराहीबीजमध्यस्था विडवगहमजारोमः विघ्नराज समन्यच्च २६ विदार दिवसो भावाद् टि. विद्यामापाच २३ विद्यारूपे भवेत् पुत्र टि. विद्यासिदिभवेत् पुष विपणे च जुहुया. २३ व १३ ३ ७ १२ घकुल. पूजयेद्यन्त्रं वक्ष्ये होमविधि सम्यक वह चोपसहार घट्येऽह चोपसहारं वक्ष्येह तक सवञ्च पक्ष्येह पर ग्यास वक्ष्येऽह विधिवत्पुन वक्ष्येऽह स्थण्डिल)म वगलामातकान्यास वगलाष्टाक्षरीमन धगलास्त्रात यत् वाला मध्यभागे वगलास्त्रमिद पुत्र वगलाहत्येनंव वगला हृदय मत्र बजाकंक्षीरमिध च वोक्षोरं त्रिकाल तु १६ ७ 8 १६ ३ ७६ ११,१२ . २० ३ Co पधानुक्रमः पृष्ठाडू पद्या, विद्वेषणेतु जुयाद ८ १४ २ ६२ ८ ५४ ६५ टि. २ २ २ २२ विद्वपणे स्तम्मने च विना च स्तम्भिनीविद्या विप्रचाण्डालयोःशश्यं विभीतकतरोर्मूले विरादस्वरूपिणों देवी विरामय पदचोकाया चिलिखेत्ताध्यंवोच विशद्भिः स्तम्भन च विश्वनाथ नमस्तेऽस्तु विश्वमेतद्भक्तिमय विश्वाध्य भवानीय विश्वेश्वरी विश्ववाद्या विषतिन्दुकपुष्पेण विपतिन्दुकमूलं च वीणापुस्तकसयुक्ती वीर विप विश्वेश वीराम्नापमहादेव पक्षमूले जपेन्मात्र वृत्तेपु विलिखेपुर बेतालडाकिनीप्रेत वेदलक्ष जप कुर्यात वेदवेदाङ्गपारज्ञ वेदवेदांगपारीख वेवाक्षरी ततो जाप्यः वेदाक्षरीमनुपुर पेशदि विलिखेत् पूर्व वैशादि विलिखेत् पूर्व वेदायुत तपन वैदिक च परित्यज्य परिजिह्वाभेदानार्थ ध्यालण्याघ्रादयश्चव २ पृष्ठा पद्या शतमष्टोत्तर चंव शतमष्टोत्तरशत १०४ २६ पतवार मन्त्रयित्वा ८८ २२ पतवार मन्त्रित च शताक्षरीमहामन्त्र शतावर्शनमात्रेण शतोत्तर भवेतिपद शतोत्तर मत्रबीज शत त्रिशतक पुत्र शत वाऽथ सहस्र वा शत सहस्रमयुत २८ शश्वश्च पुरश्चर्या २० शत्रुनय भवेत् सद्यो शत्रूणा मारण पुत्र २५ घमात कुसुमनंव २३ २० शमोमूले हुने पुष शमीमूल समाश्रित्य सायनीकृत्य कन्यो च ६९ ३२ शल्यदारूमय तत्र शस्त्रास्त्रात भने पुष ए शाकुनादिपु मात्रेपु २० शानिवश्यस्तम्भनानि शान्ताध (स्य जुहुयाच्छालि १७ २. शालिसातुं पतोपेत शिववीन वह नियुक्त शिष्टाक्षराणि कोणेषु शिष्यस्थ चंव शीतोपणे समता कृत्वा शुभशादियोगे तु शुश्रूषया गुरु सम्यक मून्यागारे जपेदेव दोषभापापतिप्रत्यः रोपभायापति: साक्षाद ६४ २७ एममा प्रजपे मन पक्षामपितसमोपेत ५ २१ ७ ७ ६८ ४ ७ १६ १०२ २० १०२ द २७ ७ बरन म्रियते शत्रु २८ सास्ति वाराहमुस्वार्य सांस्यायनतन्त्र पृष्ठाङ्क पद्याङ्क २ श्रीकण्ठ धीगराधार श्रीखण्डरोचनागर श्रीबीज भुवनेशी च श्रीबीजादि जपेत पुत्र धीमायामातका चव श्रीसूक्ते व जिह्वाया श्रेष्ठराज्य भवेत्पुर थोनालीगण्डभ्रू मध्ये स्वानवबलते १७ ३ ५१ टि. ८० ५२ २६ शतु २६ . टिक ४ ४ ७६ ७० १०१ पट्कोरराकुण्डे जुहुयान पट्कोणमध्ये विलिखेद. पटकोण चाटकोणञ्च पटकोण चाष्टकोण च पटकोरी वा लिसे.मात्र षटत्रिशद्वारमावत्यं षट्पञ्चकोटिचामुण्डा पटप्रयोगास्त्रयो विद्या पट्सहस्र देवकुसुम पट्सहस्र हुनेत पुत्र पट्स हस हुनेत पुत्र षट्सहस्र हुने पुत्र पोडशाडगुल मान तु पोडशंरुपच रंच पृष्ठाडू पद्याड सद्यो नमल्यिमाप्नोति सद्यो यौवन होन तु ५६ २५ सद्यः स्तम्भनमाप्नोति सन्तयेद्दीपशिखया २५ १६ सतपेद्द पशिखया सतोप जनयेततस्य १३ सध्यामश्रेयु सर्वेषु २४ स पतितो भवत पुसा सपर्णाक्षालयेत क्षीरः ५२ सपादकोटित्रिपुरा सप्तकोटिमहाम । सम सम रिपून्दिष्ट समस्तकम्मरणा ध्वसे ६४ समस्तविपनिनाश समस्तस्तम्भन पुत्र ६७ सम्पूजयेत् पञ्चमी चंव सम्मोहना) प्रजपेत् ३. सम्यग्ज्ञान महेशान ४१ २ सर्पमण्डूकयो शल्य ८५ सर्वकर्माणि निर्मा सवत्रवोमत पुत्र सर्व न्यासविधि कृत्वा सवमत्रमयी दवी सर्वसम्म ततोच्चायं सवाद ततोच्चार्य सवशब्द तोच्चाय ४२ २५ सर्वाङ्गमुन्दरी श्यामा ३५ सर्वान वायुना शत्रु सर्वाङ्ग लेपन कुर्यात् सर्वावयवशोभाढा सर्व स्व देहज मह सपंपास्त्रि दूश्य २४ सपप लवण - ÇY ३ सपंप लवणोपेत सविता व पिः था ६ २ २१ ३ ८ 8 स ६७ २२ स कल्पमुखभागी स्यात् सङ्कल्पपूवक मन्त्र समहेश लयत सम्यक सजीवमेव चाण्डाल. सचारवान् भवत पज: स तु मापापतिः साक्षाद सासम्प्रदायविधिना सद्यो नाशनमायाम्ति ३ २२ ७ पद्यानुनमः पृष्ठाङ्क पाडू पृष्ठ'डू पाह १९ १३ ४४ ४२ टि. १०३ द ४२ २४ ३० टि. ६० ५ २२ १२ १७ २२ ३ २५ ११ २५ सविषं जलसंयुक्तं सशत्रुः सप्तरोग सस्यस्तमे दामनाये सस्यादिभिविनश्यन्ति सहस्र ध्यानपूर्व तु सहस्र प्रजयेन्मन्त्र सहन विसरपंच सहनवारं विषिवन् सहिरण्योदके पूर्व साख्यायनमते देवि सख्यायनमते देवि सांख्यायनम देव्या साधयेत्कुलमार्गेण साधु साधु महाप्राज्ञ सान्त रान्तसमायुक्त सायमोपास्थि कर्तव्य सिद्धिदो जायते वत्स सुखापेक्षेण यत् कुर्याद सुगन्धपत्रपुष्पादीन सुपापो रत्नपर्य सुग्दयाँ कालिकाया च सुमातकुसुमराज्य सुरया तपणं पुत्र सुवर्णशैलसुप्रख्य सुवासिन च तैलेन सुवासिनी ब्राह्मणाश्च सूचिप्रयोगविध्वसे सृष्टि स्पिति च सहार सौभाग्यचर्यासमायुक्त सोमायाचनकता सौमाग्या विषिश्चय सीमाम्याचा विना पुत्र संक्षेपेन मया प्रोक्त सबपेच च ततः पुष सस्कारेण विना मत्र सहरेच्छ सिमाप्नोति सहारा कामरूपे स्तम्घमाया च वारबीज सब्घमायो ततोच्चार्य स्तन्यमाया तारक च स्तब्धीकरणनिधि स्तम्मन्यमुच्चार्य स्तम्भदितय चोक्वा स्तम्भनार्थ जपेत्पुत्र समनास्त्रपद धोक्त्वा स्तम्नास्त्रमयी दवी स्तम्भनेन विना शान्ति स्तम्मनेषु हुनेदीमान् स्तम्भन च भवेत् पुत्र स्तमन च भवेच्छीघ्र स्तम्भये नदीवग स्तम्भित मन्त्रयोगेन पापयेच्च कपाल तु स्थापयेच्चुलपयोभागे स्थापयेत् तेन मत्रण स्थिरमाया इति प्रोता स्थिरमाया दितीयर्या तु स्नुह्या क्षीरेण सयुक्त स्फुरदय तपा चोक्त्वा स्फुरदय समुच्चाम्यं स्फोटकवणसयुक्तो. स्फोटवणारच जायने स्वप्रिया दिनुपात्र च स्वमन्त्राक्षरणी विद्या स्वर्ण सिंहासनासोना स्वल्प वा बहुल चाय स्वामिन् सिदगुणाध्यक्ष ३६ २५ २१ १५ २२ १२५ ४२ २० ६ ५७ ७ ७ ४ ३ ३ २ ६६ २५ २ ६३ टि. . ३८ १६ हरिदापत्र वस्तु सांस्पायनतन्त्र १८ पृष्ठा पवार ७४ ५ ४ १० १९ ५ ६ १०४ २६ हरिमामयपुष्प हरिद्र पासमासांप हरिद्रासमणि पोट हरिद्रासहोम तु हरिद्वापरहोमेन हरिद्रातालक पद हरिद्राभिः मुक्ताभिः हरिद्वाम्मतपणेन हरिद्राहोममाण हगतकोश्च होमेन हस्तमा भगाकार हारियोति पदं चोवस्या हिवारोगो भवेत्तस्य पृष्ठा पाइ हनेच पूर्ववत् कुण्डे हुनत त्रिकोणाकुण्डे तु हुनवानसमायुक्तः ४५ 'ह फट् स्वाहासमायुक्त ८१ हननष्टप्रयादि हृदये तु समुच्चायं हृदि माम चालिरूप हेपकुण्डन भूप कमी हेलाप चला तू १०४ २२ ह.लस्तपाप्युच्च रेत पुत्र हाही ह च ततोच्वाय ही हश्च उतचर YE टि. ५४ ७२ १७ नाका EO HAT 7. 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