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Prakaranpanchakam

Shastri,krishna Pant · 2012/08

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अच्युतप्रन्थमालाया (ख) विभागे चतुर्थ प्रसूनम्
श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचित
प्रकरणापञ्चकम्
भाषानुवादसहितम्
प्रकाशनस्थानम्
अच्युतग्रन्यमालाकार्यालय,
काशी

प्रश्वरार:
प्रेष्ठिप्रपा ओगौरीशहरगोपनका,
पायुतमन्यमाखा कार्यालयः,
पासी
मुद्रका
श्री श्रपूर्वकृष्णवर
इंडियन प्रेस, लिमिटेड,
पनारस-ग्रांच

अच्युतप्रन्यमालायाः (ख) विभागे चतुर्थ प्रसूनम् श्रीमच्छङ्कराचार्यप्रणीतात्मबोधादिपञ्च- प्रकरणानां संग्रहरूपं प्रकरणपञ्चकम् भाषानुवादसहितम् फाशिकोजोखाराममटरूमल्लगोयनका-संस्कृतमहाविद्यालय पुस्तका- लयाध्यक्षेप अच्युतमन्धमालाध्यक्षेण च सादिस्याचार्य- श्रीकृष्णपन्तशास्त्रिणा सम्पादितम् प्रकाशनस्थानम्- अच्युतग्रन्थमालाकार्यालयः, काशो प्रथमावृत्तिः १५०० सं० १६६० [ मूल्यम्" , प्राकथन विधाता की रचना बड़ी विचित्र है। उसने इस जगत् को एक विशाल प्रदर्शनी के रूप में सुसज्जित किया है। सिंह जैसे महा- बली एवं घातक जीव यहाँ हैं, तो मृगछाने जैसे निर्बल एवं सुन्दर जोवों की कमी नहीं है; गजराज जैसे विशाल-कलेवर जाव हैं, तो चौटो जैसे क्षुद्रकाय जीवों का प्रभाव नहीं है, कोयल जैसे मिष्टभाषी जोव हैं, तो कौवे से कटुभाषियों का घाटा नहीं है । अजगर से पालसी हैं तो मधुमक्खी सरीखे उद्यमी भी हैं। कहने का सारांश यह है कि बलवान से भी बलवान, निर्बल से भी निर्बल, सुन्दर से भी सुन्दर, कुरूप से भी कुरूप, विशाल से भी विशाल, शुद्र से भी तुद्र सभी प्रकार के प्राणी इसमें विद्यमान हैं। लेकिन इस विशाल अजायबघर या चतुर बाजीगर के कीड़ास्थल में उच्च स्थान केवल मानव जाति को प्राप्त है। विचार करना चाहिए कि माना जाति में कौन ऐसी विशेषता है, जिससे वह इन सबके ऊपर स्थान पा सकी, सबकी स्वामिनी बन बैठी। अवश्य ही मानव जाति में एक विशे- पता है, जो अन्यत्र कहीं नहीं पाई जाती । वह है उसकी धर्मशीलता । धर्म से ही वह उन्नत स्थान की अधिकारिणी हुई है। अन्यथा उसका भी वही स्थान होता, जो अन्य जीवों का। सम्भव है, उससे भी गिरा हुआ होता। किसी ने ठीक कहा है- श्राहारनिद्राभयमैथुनञ्च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेपामधिको विशेषो धर्मेण हीना पशुभिः समानाः ।। पूर्वोक्त धर्म में भी अधिकारी के रुचि-भेद से तारतम्य है । कोई वर्तमान दुख की निवृत्ति के लिए धर्म करता है, तो कोई भगवत्तत्व .

- शान के लिए, कोई ऐहिक वघा पारलौकिक सुस-समृद्धि के लिए। पर कोई ज्ञानो महानुभाव लोकशिक्षणार्थ निष्काम धर्म करते है। भगवान ने श्रीमुख से कहा है- चतुर्विधा भजन्ते मा जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । यात जिज्ञासुरार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।। उदारा सर्व एवैते ज्ञानी यात्मैव मे मतम् । यद्यपि " हि कल्याणकृत कश्चिद् दुर्गति तात गच्छति" इस पचन के अनुसार ये सभी श्रेष्ठ हैं, पर ज्ञानी के भगवान का आत्मा प्रासाचात्कार सब धर्मों का फल है, सब धर्मों का सार है। मानव जाति की सफलता को परिसीमा वही है। श्रीमद्भागवत में लिखा है--सृष्टि के प्रारम्भ में स्थावर-जङ्ग- मात्मफ जगत् के अन्यान्य जीवों की सृष्टि करके भी जब भगवान प्रहा को अपनी कृति से सन्ताप नहीं हुआ तब उन्होंने ब्रह्मसाक्षा- स्कारक्षम मानव की सृष्टि की। उससे उन्हें बडा परितोष हुमा, अपनी कृति में जो प्रभाव-सा खटक रहा था, वह आनन्दोद्रेक में परियत हो गया। सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयामशपाया वृक्षान् सरीसृपपशून् खादशमस्यान् । तेस्तैरतुष्टहदयः पुरुष विधाय ब्रह्मावलेोकधिपणं मुदमाप देव ॥ [मा० ११क. अ.] इसलिए कहना होगा कि मानव जाति की सर्वोच्च सभ्यता ब्रह्म- साक्षात्कार पर ही निर्भर है। २०वीं शताब्दी के कुछ लोग इस फथन का भले हो उपहास करें। वे भले ही कहें कि वैज्ञानिक अभिनव आविष्कार ही मानव जाति की उच्चता के द्योतक हैं। पर उनकी इस उक्ति में कुछ सार नहीं है। यदि वैज्ञानिक आविष्कार . हो मानव जाति की उच्चता के द्योतक होते सर्वोच्च पद भृङ्गोकीट (बिलनी) को, जो दूसरे के बच्चों को अपने घोंसले में भरकर अपना रूप दे देती है, मिलना चाहिए। क्योंकि अविरत परिश्रम करने पर भी आज तक जिस आविष्कार में किसी वैज्ञानिक को सफलता नहीं मिली, उसे वह अनादि काल से कर रही है। इसके अतिरिक्त बहुत से कीड़े-मकोड़े ऐसी सुन्दर रचनाएँ करते हैं, जिसे देखकर बड़े बड़े कलाविद् भी दङ्ग रह जाते हैं। दूसरी बात यह भी है कि सभी प्राणियों का सुख एवं शान्ति की ओर स्वाभाविक आकर्षण है। चरम सुख एवं घरम शान्ति ही सबका चरम लक्ष्य है। उसकी प्राप्ति जिससे हो, वही सभ्यता की पराकाष्ठा है। हमारे पूर्वज ऋषि-महर्षियों ने उसी की प्राप्ति के लिए सांसारिक सुख-समृद्धि की उपेक्षा की थी। उसके प्रति हेय बुद्धि रखने से ही वे कृती हुए थे। भाधुनिक विज्ञान सुख-साधन की अपेक्षा दुःख का साधन हो रहा है। जब से विज्ञान के युग का श्रीगणेश हुआ है, तभी से मानव समाज मे अनेक प्रकार के दुःख एवं अशान्ति का साम्राज्य-सा छा गया है। यद्यपि मानव समाज के अस्थायी सुभीते के लिए इससे बहुत कुछ आविष्कार हुए हैं, परन्तु इनके सुखोपभोग की अपेक्षा इनसे भी अधिक सुविधा देनेवाले पदार्थों के आविष्कार को इच्छा लोगों को अधिक बेचैन किये हुए है। जितने अभिनव भाविष्कार होवे नावेंगे, उतनी हो बेचैनी भी बढ़ती जायगी। मनुष्य की तृष्णा की कोई सीमा नहीं है। तृष्णा पिशाची से जितना मनुष्य सम्बन्ध रक्खेगा, उतना ही दुःख का भाजन होता जायगा। उससे छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय है-उपासना, जो पूर्वोक्त ब्रह्म-साक्षात्कार का द्वार है। वह दो प्रकार की है--निर्गयोपासना एवं सगुणोपासना । निर्गुणो- पासना यद्यपि बड़ी दुरूह है, परन्तु है भी अपार मानन्ददात्री । - - (४) साधारण सुख भी जब कठिनाई से ही मिलवा है तो अपार सुख के लिए कठिनाई का क्या पूछना है ? प्रस्तुत पुस्तक, जिसे लेकर हम पाठकों के सम्मुख उपस्थित हो रहे हैं, निर्गुणोपासना रूप विशाल मन्दिर में प्रवेश पाने की इच्छा- वालों के लिए प्रवेशिका स्वरूप है। निर्गुणोपासना कब से प्रच- लित हुई यह नहीं कहा जा सकता। अनादि वेदों, उपनिपदी में जहां-तहाँ निर्गुणोपासना की चर्चा की गई है। उसका अस्तित्व अनादि काल से है। लेकिन उसका जो परिवर्द्धित एवं परिष्कृत रूप हम लोगों के सम्मुख है, उसका सम्पूर्ण श्रेय शङ्करावतार प्राचार्यप्रवर भगवान् शङ्कर को है। उन्होंने अपनी विलक्षण प्रतिभा, अलोकिक अध्यवसाय और निस्सीम पाण्डित्य से, यदि वह पहले फुल्या के रूप में था, तो उसे सागरगामिनी गङ्गा का रूप दिया । उन्हीं भगवान शङ्कर ने अनायास साधारण से साधारण पुरुष को बोध कराने के लिए अनेक प्रकरणों की रचना की है उन्हीं में से पांच उत्तम प्रकरणों का यह संग्रह है। इसकी सरलता को देखकर कुछ लोग कहते हैं कि यह पाण्डित्यमूर्ति उन शङ्कर की कृति नहीं है, जिनकी प्रौढ़ लेखनी से ब्रह्मसूत्रभाष्य, उपनिषद्भाष्य एवं गीताभाष्य सरीखे गभीराशय ग्रन्थ प्रसूत हुए थे। यह रचना इनके स्थानापन्न परवर्ती शङ्कराचार्यों की होगी। जो भी हो, इस विषय में हमारे पास भी कोई अकाट्य प्रमाण नहीं है। लेकिन प्रसिद्धि यही है कि ये सभी प्रकरण प्रादि शङ्कराचार्य के ही हैं। जब वैदिक धर्म एफ और चौद्धों के अविरत प्रहारों से जर्जर- फाय हो रहा था और दूसरी ओर शाक्त और कापालिक प्रादि अहे। में तहस-नहस होकर उनके अनाचारों से दुपित भी हो चला था, तष एक ऐसे मनस्वी महापुरुष के अवतार की बड़ी भावश्यकता थी, जो विपक्षियों से वैदिक सभ्यता की रक्षा फरवा

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२
हुआ उसमे विद्यमान दोषों का परिशोधन करता। भगवान् शङ्कर
इसी परिस्थिति में अवतीर्ण हुए। जन्मते ही वे सितारे की तरह
चमकने लगे।
ससार के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा महा-
पुरुष मिले, जिसने इतने अल्प वय में इतने महत्त्वपूर्ण कार्य किये
हों। अवश्य ही भगवान् शङ्कर का कार्यमय जीवन विश्वमानव
के इतिहास में प्रादर्शखरूप है।
केरल देश के फालटो' नामक ग्राम मे विद्याधिराज' नामक
एक ब्राह्मण रहते थे। उनके पुत्र का नाम शिरगुरु था। शिवगुरु
की पत्नी का नाम था सुभद्रा देवी । उनको बहुत दिनो तक सन्तति
नहीं हुई। इससे दम्पती खिन्न रहते थे। एक दिन सुभद्रा देवी
ने अपने पति से कहा-नाय ! शास्त्रों मे बहुधा मिलता है कि
शङ्कर भगवान की आराधना निष्फल नहीं होती। शिवगुरु ने पत्नी
की सलाह मान ली और बहुत दिनो तक शिवजी की आराधना की।
9-तस्येवरस्य प्रणतातिहत्तु प्रसादत प्राप्तनिरीतिभावः ।
कश्चित्तदाभ्याशगतोऽमहार कालट्यभिज्ञोऽस्ति महान् मनोज्ञ ॥
२-कश्चिद् विपश्चिदिह निश्चलधीविरेजे
विद्याधिराज इति विश्रुतनामधेयः ।
रुद्रो वृषादिनिलयोऽवतरीतुकामा
यापुत्रमारमपितरं समरोचयरस..
३-पुनोऽभवत्तस्य पुरात्तपुण्यैः सुब्रह्मतेजाः शिवगुर्वभिरयः ।
ज्ञाने शिवो यो वचने गुरुस्तस्यान्वर्थनामा कृतलब्धवर्णः ॥
शं० दि० २१३,४,१
४-भक्तेप्सितार्थपरिकल्पनक्ल्पवृत्तम्
देवं भजाव कमित सकलार्थसिद्ध्यै ।
तनोपमन्युमहिमा परमं प्रमाणम्
नो देवतासु जडिमा जडिमा मनुष्ये ॥
शं० दि.२०

में उन्हें , शिवजी ने उनकी प्राराधना से प्रसन्न होकर ब्राह्मण के रूप दर्शन दिया और अभीष्ट सिद्धि के लिए वर देकर अन्तर्हिव हो गये। शिवजी के प्रसाद से उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई थी, इसलिए उन्होंने पुत्र का नाम शङ्कर रक्खा। शङ्कर पाल्यावस्था से ही बड़े मेधावी एवं प्रतिमा-सम्पन्न थे। थोड़ी ही अवस्था में वे अनेक विद्याओं में पारङ्गत हो गये। अपने ग्रन्थों में उन्होंने जिस प्रतिभा का परिचय दिया है, उससे स्पष्टतया ज्ञात होता है कि वेद-वेदाङ्ग प्रादि शास्त्रों का उनको असाधारण ज्ञान था। फेवल आठ ही वर्ष की अवस्था में उन्होंने संन्यास ले लिया और नर्मदा नदी के तौर पर प्राचार्य गोविन्दपाद के समीप दर्शनशास्त्र का परिशीलन करने लगे। गोविन्दपाद ही उनके गुरु थे। गुरु के प्रति उनमें जो प्रगाढ़ भक्ति यो, वह उनके ग्रन्थों में सर्वत्र स्फुट है। गोविन्दपाद ने कोई प्रन्थ रचा या नहीं इस विषय में प्राचार्य मौन हैं। गोविन्दपाद कितने बड़े विद्वान थे? इसके उत्तर में शङ्कराचार्य की उनके प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा का निर्देश करना ही पर्याप्त है । उनके संन्यास लेने के समय को घटना बड़ी विचित्र है। प्राचार्य के पिता तो जब वे केवल ३ वर्ष के थे, तभी दिवंगत हो गये माता से उन्होंने आज्ञा मांगी। पर यह कैसे हो सकता था १-देवः कृपापरवशे द्विजवेषधारी प्रत्यक्षता शिवगुरुंगत धात्तनिद्रम् । प्रोवाच भौः किमभिवाञ्छसि किं तपस्ते पुनार्थितेति वचनं स जगाद विप्रः ॥ शं० दि. २७ २--पुत्रोऽस्तु मे बहुगुणः प्रथितानुभावः सर्वज्ञतापदमितीरित प्रावमापे। दद्यामुदीरितपदं तनयं तपोमा पूणों भविष्यसि गृह द्विज गच्छ दारैः॥ शं० दि० २ । १३ , कि अपने जावन के एकमात्र प्राधार प्रिय पुन को माता संन्यास लेने की आज्ञा देती। श्रोशङ्कराचार्य ने बहुत अनुनय-विनय किया, ज्ञानोपदेश' किया; पर माता ने उनकी एक न सुनी। शङ्कराचार्य बड़े प्रस- मनस में पड गये। एक और उनका मन संसार से विरक्त था, दूसरी और माता उन्हें संसारसूत्र में बाँधना चाहती थीं। माता की प्राज्ञा विना वे संन्यास लेना भी नहीं चाहते थे। इसी बीच में एक दिन जय कि शङ्कर भगवान अपने गृह के समीप को नदी मे स्नान कर रहे थे, प्राह ने उनका पाँव पकड़ लिया। यह बात जब माता को मालूम हुई, उन्हें बड़ा दुख हुआ। वे प्रति स्वर में शिवजी की स्तुति करने लगी और लगी अपने जीवन को कोसने। शङ्कर ने माता से कहा--माता, यदि आप मुझे संन्यास लेने की आज्ञा दे देती है तो शायद माह मुझे छोड दे। लाचार होकर माता को माज्ञा देनी पड़ी और शङ्कर ने मन से संन्यास ले लिया। उसी समय दुष्ट नक ने उनका पाव छोड़ दिया। तदनन्तर शङ्कर भग- वान ने माता से कहा-माता, संन्यासी के योग्य जो कार्य हो उसे फहिये। भोजनाच्छादन की तो मुझसे आपको कोई प्रावश्यकता ही नहीं है, क्योकि जो लोग मेरे पैतृक धन को लेगे, उनका यह अवश्य कर्तव्य होता है कि वे जीवनावस्था में तुम्हारी देख-रेख करें, मरने के बाद पारलौकिक संस्कार करें। माता ने कहा-पुत्र! संन्यास स्वीकार करने से जलचर के मुख से तुम्हारा जो छुटकारा हुमा वह मुझे अभीष्ट है। लेकिन मेरी मृत्यु के बाद तुम्ही को मेरा संस्कार करना होगा। इस पर शङ्कर- , कति नाम सुता न लालिताः कति वा नेह वधरभुक्षि हि । क नु ते क पता कथा वयं भवसः खलु पान्यसनमः॥ शं. दि.१।१३।

श्रयम्ब रानिसमये समयान्तरे वा सञ्चिन्तय स्ववशगाऽवशगाऽथवा माम् । एप्यामि तय समय सकलं विहाय विश्वासमाप्नुहि मृतावपि संस्करिष्ये । शंदि०१७१। कहकर संन्यासी हो गये। अध्ययन समाप्त होने पर गुरु की आज्ञा से प्राचार्य काशी पधारे। काशी को उन्होंने अपने प्रचार का केन्द्र बनाया। वहीं से उनकी सर्वतोमुखी प्रतिभा का विकाश हुआ। उन्होंने अपने प्रन्यों की रचना काशी तथा वदरीधाम में की थी। १६ वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने अपने सब ग्रन्थों की रचना कर ली थी। अन्ध-रचना-काल में वे विद्यार्थियों को अध्यापन भी कराते थे। उनके चार शिष्य प्रसिद्ध हैं-(१) पद्मपादाचार्य, (२) सुरेश्वराचार्य, (३) हस्तामलकाचार्य एवं (४) त्रोटकाचार्य । ग्रन्थों को समाप्त फर एवं छान-सम्पत्ति से सम्पन्न होकर शङ्कर भगवान् दिग्विजय के लिए प्रस्थित हुए। दिग्विजय में अधिक समय लगा होगा, क्योंकि उस समय कटक से लेकर अटक तक और कन्याकुमारी से केदार तक परिभ्रमण सहजसाध्य नहीं था। पण्डितों को शाखार्थ में परास्त करना भी काल सापेक्ष है। इससे ज्ञात होता है कि भग- वान् शङ्कर ने अपनी प्रायु के १२ वें वर्ष से लेकर १६वें वर्ष तक का काल प्रन्य-रचना में व्यतीत किया और १७ चे से ३२वे वक का समय दिग्विजय, मठ-स्थापन तथा मन्दिर स्थापन आदि में व्यतीत किया । दिग्विजय में उन्हें राजाओं से भी सहायता मिली थी। इस विषय में स्वामी विद्यारण्य लिखते हैं- अथ शिध्यवरैर्युतः सहसैरनुयातः स सुधन्वना च राज्ञा । ककुमी विजिगीपुरेप सर्वा प्रथमं सेतुमुदारधी प्रतस्थे । श. दि. १. कृतपूजः सपकैशिकेश्वरेण । १६।।

स्वामी विद्यारण्य ने महामुनि व्यासजी के साथ प्राचार्य शङ्कर के साक्षात्कार का वर्णन किया है। वे लिखते हैं--एक दिन प्राचार्य फाशी में मणिकर्णिका के समीप अपने शिष्यों को पढ़ा रहे थे इतने मे एक बुड्ढा ब्राह्मण आकर कहने लगा-आप क्या पढ़ा रहे हैं? शिष्यों ने कहा- -ये महाभाग हमारे गुरु हैं। समस्त उपनियो का अर्थ इन्हें हस्तामलकवत् है, ब्रह्मसूत्र पर इन्होंने भाष्य रचा है और भेदवाद का निरास किया है। वृद्ध ने भाष्यकार से कहा- आपके विषय में ये लोग बड़ी डोंग हाँक रहे हैं, इससे हमे कोई प्रयो- जन नहीं है। यदि पाप परम ऋषि के सूत्रों का अर्थ जानते हों तो किसी एक सूत्र का व्याख्यान कीजिए । भाष्यकार ने बड़े विनय से सूत्रार्थज्ञ गुरुओं को प्रणाम करके कहा-भगवन् । सूत्रार्थज्ञता कातो मुझे तनिक भी अहवार नहीं है, तो भी जो आप पूछेगे उसे कहूँगा। उन्होंने तृतीय अध्याय के प्रारम्भ का "तदन्तरप्रतिपत्तौ०" सूत्र भाष्यकार ने दृष्टान्तपूर्वक तुरन्त उसकी स्पष्ट व्याख्या कर दी। परन्तु उक्त वृद्ध ने सैकड़ों विकल्प करके उनकी व्याख्या का खण्डन कर दिया। भाष्यकार ने भी दृढ़ता से उनकी उति का खण्डन और अपने पक्ष का समर्थन किया। इस प्रकार बरावर माठ दिन तक वाद-विवाद चलता रहा। शास्त्रार्थ का अन्त न देखकर पद्मपादाचार्य ने आचार्य से कहा- ये साधारण वृद्ध नहीं हैं, वेदान्त के परमरहस्यज्ञ साक्षात महामुनि वेदव्यास हैं। आप सासात् शङ्कर हैं। आप लोगों का विवाद इसी प्रकार वर्षों तक अविरत चल सकता है। ऐसी परिस्थिति में मैं किङ्कर क्या करूं? यह सुनकर शङ्कराचार्य बड़े विनय और श्रद्धा से मदामुनि की स्तुति करने लगे--भगवन् ! आप प्रानन्दधन परमात्मस्वरूप हैं। यमामनन्ति ध्रुतयः पदार्थ न सन्न चासत पहिर्न चान्तः । स सच्चिदानन्दधनः परारमा नारायणस्वं पुरुषः पुराणः॥

(१०) इत्यादि अनेक श्लोक इस प्रसङ्ग में स्वामी विद्यारण्य ने उनकी प्रशंसा के लिए लिखे हैं महामुनि ने भी प्राचार्य के अलौकिक पाण्डिस को भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा-माप शुकदेव के समान हमारे स्नेह- भाजन है- स्वमसदादेः पदवीं गतोऽभूरपण्डपाण्डित्यमोधयं ते। शुकपिवरप्रीतिकरोऽसि विद्वन् पुरेव शिष्यैः सह मा नभीस्वम् ।। और प्राचार्य के माध्य को बड़ी श्लाघा फो। उनको सब विषयों में अप्रतिहत गति देसफर कहा-माप साचात् शानराशि शङ्कर उनसे यह भी अनुरोध किया कि आप नास्तिकता एवं द्वैत का निरास कर पृथ्वी में अद्वैतमत का प्रचार कीजिए। किंवदन्ती है कि इसी लिए १६ वर्षको प्रायु शङ्कराचार्यजी को उन्होंने और दो। जब तक चन्द्र सूर्य रहेंगे तब तक आपके भाष्य का जगत् में भादर होगा- ऐसा वर देकर व्यासजी अन्तर्हित हो गये। यहीं से प्राचार्य शङ्कर का दिग्विजय-प्रयाण प्रारम्भ होता है। जब वे प्रयाग पहुँचे तो वहाँ भट्टपाद कुमारिल से उनका मिलन हुमा। कुमारिल भट्ट उस समय तुपानल प्रायश्चित्त कर रहे थे। उन्हेंने वैौद्धों से उनका मत पढ़कर पाछे उसका खण्डन किया था। इस गुरुद्रोह का प्रायश्चित्त तुपानल में प्रवेश करना ही उन्होने उचित स्वामी विद्यारण्य लिखते हैं कि भट्टपाद द्वारा अपने भाष्य पर वार्तिक लिसाने के लिए शङ्कराचार्य प्रत्युत्सुक थे। जब उन्होंने सुना कि कुमारिल तुपानल में प्रविष्ट हुए हैं, तब वे उनके समीप गये और अपना भाष्य उन्हें दिखाया। कुमारिल ने भाष्य की बड़ी प्रशंसा की और कहा-केवल अध्यास भाष्य में हो पाठ हज़ार वार्तिक हो सकते हैं। यदि मैंने दीतान ली होती तो अवश्य इस पर वार्तिक लिखता। भूयाच भाष्यमिदमारविचन्द्रतारम् ।० दि००।११ - . समझा।

। प्रयाग मे कुमारिल से मिलने के बाद शङ्कराचार्य मगधदेशवो 'माहिष्मती नगर में गये। वहाँ तदानीन्तन पण्डित-मण्डन मण्डन मिश्र से उनका साक्षात्कार हुआ। मण्डन मिश्र बड़े मीमांसक थे। उस समय उनके समान मगध में कोई दूसरा पण्डित नहीं था। प्राचार्य ने शास्त्रार्थ मे उनको परास्त किया। इनके शास्त्र-विचार में मध्यस्थ थों मण्डन मिश्र की पत्नी श्रीमती भारतीदेवी। ये तात्कालिक रम. शियों की विद्वत्ता के विषय में अपूर्व दृशन्त हैं। शङ्कर और मण्डन के समान महापण्डितो की विचार-चर्चा में मध्यस्थता के लिए कितने विपुल ज्ञान की आवश्यकता घो-यह बात अनायास समझ में आ सकती है। मण्डन मिश्र ने, शास्त्रार्थ में पराजित होने पर, सन्यासाश्रम प्रहय कर लिया और वे सुरेश्वर नाम से विख्यात हुए। शङ्कराचार्य प्रार मण्डन-कुमारिल के मत में पार्थक्य इतना ही है कि प्राचार्य शङ्कर फर्मकाण्ड को ज्ञान का सहकारी मानते हैं, किन्तु भट्टपाद कुमारिल तथा मण्डन मित्र कर्म को ही परम पुरुषार्थ मानते हैं। मण्डन को पराजित करके प्राचार्य दाक्षिणात्य विद्वानों पर विजय प्राप्त करने के लिए दक्षिण की ओर अग्रसर हुए। वहाँ उन्होंने शैव, फापालिक प्रादि को पराजित कर उनके अवैदिक माचार को दूर किया। इसी बीच में उग्रभैरव नामक एक कापालिक ने प्राचार्य के कार्यो से असन्तुष्ट होकर उनका बलिदान करना पाहा। इसी इच्छा से यह प्राचार्य का फपटशिष्य हो गया, पर उसकी अभिलापा सिद्ध नहीं हुई। जब वह प्राचार्य का नौवन लेने के लिए उतारू हुआ, तभी पद्मपादाचार्य ने उसे धराशायी कर इस घटना से शङ्कराचार्य के मसाधारण व्यक्तित्व क्या उनकी अलौकिक साधना का परिचय मिलता है। फापालिक के सन के नीचे भी वे अविचल एवं शान्त रहे। । . दिया।

( १२ ) यहाँ से आचार्य और दक्षिण की ओर अग्रसर हुए। तुगभद्रा नदी के तट पर उन्होंने शारदा देवी को स्थापना की। उसी के साथ एक मठ बनवाया, जो शृङ्गेरी मठ नाम से विख्यात है। सुरे- श्वराचार्य इसी मठ के अध्यक्ष नियुक्त हुए थे। किवदंती है कि इसी मठ मे रहते समय पद्मपादाचार्य ने 'पञ्चपादिका' को रचना की थी। यहीं से प्राचार्य की आज्ञा पाकर पद्मपादाचार्य तीर्थ-यात्रा करने के लिए चले गये। प्राचार्य भी योगदृष्टि मे अपनी माता का प्रासन समय जानकर माता के समीपं उपस्थित हुए। मावा का वैकुण्ठ- वास होने पर उनके संस्कार आदि से निवृत्त होकर फिर वे शृङ्गेरी मठ को लौट आये। वहाँ से पुन: दिग्विजय के लिए प्रस्थित हुए। इस यात्रा में उन्होंने पुरी धाम में गोवर्द्धन मठ की स्थापना की और पद्मपादाचार्य को उक्त मठ फा अध्यक्ष नियत किया। वहाँ से काचो में जाकर वहाँ के शाक्त सम्प्रदाय के भीतर जो अनेक अना- चार थे, उनका परिशोधन किया। प्राचार्य के भनेक महत्त्वपूर्ण फार्यों में यह भी एक महत्त्व का कार्य है कि उन्होंने सभी सम्प्रदायों के दोषों को दूर करने की प्राण-पण से चेष्टा को । शाक्त, कापालिक मादि सम्प्रदायों के अनाचारों का निःशेष परिशोध कर उन्हें पवित्र किया, परन्तु किसी सम्प्रदाय की उपासना में हस्तक्षेप नहीं किया। मालूम होता है कि प्राचार्य के अलौकिक प्रभाव से अनेक तात्कालिक राजा-महाराज प्रभावित हो उठे थे। इससे आचार्य को अपने कार्य में अपूर्व सफलता प्राप्त हुई । इस संस्कार-कार्य में आचार्य को बहुत काल-यापन करना पड़ा। इस प्रकार दक्षिण भारत मे सर्वत्र वैदिक धर्म-पताका फहराकर तथा वेदान्त की महिमा का उद्घोष कर प्राचार्य ने दूसरी बार फिर उत्तर भारत को प्रस्थान किया । कुछ दिन बरार प्रान्त में रहकर वे उज्जयिनी पहुँचे। उस समय वहाँ भैरवगणों की भीषण साधन-नीति का साम्राज्य छाया हुआ था।

किंवदंती है कि श्रीशङ्कराचार्य ने उस देश के तात्कालिक राजा को अपने मत में लाकर उसकी सहायता से भैरव प्रादि के अनाचार का बलपूर्वक परिशोधन किया था। उज्जयिनी से प्राचार्य गुजरात गये। उन्होंने द्वारफा में एक मठ की स्थापना की और हस्तामलकाचार्य को उसका प्रधिपति नियुक्त किया। वहाँ से मार्ग में विद्वानों को शाख-विवार में परास्त करते हुए प्राचार्य काश्मीर शारदाक्षेत्र में पहुंचे। शारदापीठ में अपने भाष्य की प्रतिष्ठा फराफर, यहाँ के तात्कालिक विद्वानों को जीवकर, अपने मत का प्रचार किया। वहाँ से लौटफर प्राचार्य प्रासाम प्रान्त में उपस्थित हुए। वहाँ कामरूपस्थिव शाक पण्डित अभिनवगुप्त के साथ उनका शालार्थ हुमा। अभिनवगुप्त शास्त्रार्ध में प्राचार्य के सामने नहीं ठहर सके। स्पन्द सम्प्रदाय के प्राचार्य काश्मीरी अभिनवगुप्तपाद से ये अभिनव भिन्न हैं। स्पन्द सम्प्रदाय के अभिनवगुप्त दशवी शताब्दी में हुए थे। इनके साथ प्राचार्य का साक्षात्कार फदापि सम्भव नहीं है। शास्त्रार्थ में भसफल होफर एक मभिनवगुप्त ने अभिचार के बल से प्राचार्य को भगन्दर रोग से पीड़ित कर दिया। पश्चात् पद्मपादाचार्य की चेष्टा से प्राचार्य इस रोग से निर्मुक्त हुए। भाचार्य प्रासाम से लौटकर बदरी धाम को प्रस्थित हुए। वहां उन्होंने ज्योतिर्मठ फी स्थापना की और साथ ही पदरीनारायण जो फा मन्दिर भी बनवाया। प्राचार्य ने उपयुक्त मठ का अध्यक्ष नोटफाचार्य को बनाया। इस प्रकार भारत में पारा मोर भ्रमण फर, वर्णो, मानमों एवं सम्प्रदायों में विद्यमान मनाचारों का निरा. करण फर भाचार्य ने भारतीय संस्कृति को जो सेवा की वह प्रवाईनीय है। उनके पीछे भी उसकी स्थिति अविचल धनी रहे, इसके लिए भी वे रचनात्मक कार्य फर गये। भारत की पारी दिशामों में मठों की ( १४ ) स्थापना सन्दौने इसी उद्देश्य से फी घो। इन मठों से इस दिशा में भय भी कुछ न कुछ कार्य हो हारहा है। यदरीनारायाण के मन्दिर फो प्रविष्ठा फर भापार्य फेदारधाम चले गये। वही भारतगगन फा देदीप्यमान सूर्य परत हो गया । श्रीशङ्कर भगनत्पाद के जीवन की सभी घटनाएँ लिसो जाये तो एफ पड़ा पोया वैयार हो सकता है। यह प्रति संक्षेप में फेवल दिग्दर्शनमात्र । भगवान् शङ्कराचार्य का प्रवतीर्ण हुए इस विषय में अनेक मत- मतान्तर है। कोई उनका माविर्माव-काल ४४ पोटान्द पूर्व मानते है तो कोई षष्ठ शसान्दो के शेप में टनकी उत्पत्ति निश्चित करते है। कोई-कोई अष्टम शताब्दी के शेष भाग तक पहुँच चुके हैं। सभी ने अपने पक्ष की सिद्धि के लिए प्रयल युक्तियाँ उपस्थित फी हैं, अपनी अभीष्ट-सिद्धि के लिए पूर्व चेष्टा फी है। परन्तु शङ्कराचार्य के प्रन्यों की अन्तरङ्ग पहिरन समीक्षा के उपरान्त सधा उन मदों के फागज-पत्रों की मालोचना के पश्चात् जिनकी गुरु-परम्परा अविच्छिन्न रूप से चली पा रही है, उपर्युक मव प्रसिद्ध प्रतीत होते हैं। श्रीयुक्त राजेन्द्रनाथ पोप महाशय ने शङ्कर-काल-निर्णय सम्बन्धी अनेक प्रन्यों का अवलोफन फर, शृङ्गेरी प्रभृति मठों की आचार्य. परम्परा से सम्बन्ध रसनेवाले कागज़ात फी आलोचना कर एवं अनेक विद्वानी तथा भाचार्यों से परामर्श कर, इस दिशा में अच्छा प्रयत्न किया है। वे एक समीक्षा के उपरान्त इस निश्चय को पहुंचे है कि प्राचार्य का जन्म ६८४ खोटाब्द में हुआ था। शय ने प्राचार्य के उपर्युक्त जन्म-काल को स्थिर करने के लिए अनेक हृदयङ्गम युक्तियाँ दी है, जो वस्तुत: युक्तियुक्त भी हैं। विस्तार-भय से उनका यहाँ पर उल्लेख करने में असमर्थ हैं, जो इस विषय के जिज्ञास हो, उन्हें 'प्राचार्य शष्टर ओ रामानुज' पुस्तक देखनी चाहिए। घोष महा- हम .

+ भगवान प्रादि-शङ्कराचार्य के निम्नलिखित मन्ध प्रसिद्ध है। (१) ब्रह्मसूत्र-भाष्या (२) एकादशोपनिषद्भाष्य (३) गीता-भाष्य (४) विपासहस्रनाम-माध्य (५) सनत्सुजातीय-भाष्य (६) हस्तामलक-भाष्य (७) ललितात्रिशती-भाष्य (८) प्रकरण अन्य ** कुछ लोग कहते हैं कि श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्य तथा सर्वसिद्धान्तसंप्रह की रचना भी थादि-शङ्कराचार्य ने ही की है। पाचार्य के सभी ग्रन्थों के अनेक संस्करण निकल चुके है। वाणी- विलास प्रेस, श्रीराम से प्रकाशित संस्करण अति उत्तम है। + (1) ईशावास्योपनिपद्भाप्य (२) केनोपनिषद्भाप्य (३) कठोपनिषद्- भाष्य () प्रश्नोपनिषद्भाष्य (१) मुण्डोपनिषद्भाष्य (६) माण्डूक्योपनिषद्- भाष्य (७) ऐतरेयोपनिषद्भाष्य (८) तैत्तिरीयोपनिषद्भाष्य (6) छान्दोग्यो- पनिषद्भाष्य (10) वृहदारण्यकोपनिषद्भाष्य (1) नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिष. माप्य। ६(6) विवेकचूडामणि (२) उपदेशसाहस्री (१) अपरेशानुभूति (७) वाक्पत्ति (१) स्वामनिरूपण (१) धारमग्रोध (७) शतक्षोकी (6) दशश्लोकी (1) सपंधेदान्तसिद्धान्तसंग्रह (१०) प्ररोघसुधाकर (11) स्वारमप्रकाशिका (१२) मनीपापञ्चक (१३) अद्वैतपञ्चरन (1) निर्वाणपटक (1) अद्वैतानुभूति (१६) यमानुचिन्तन (१७) प्रश्नोत्तररनमालिका (65) सदाचारानुसन्धान (11) योगतारावली (२०) उपदेशपन्चक (२१) धन्याष्टक (२२) जीवन्मुक्कानन्दलहरी (२३) प्रनारमधीविगहरामकरण (२४) यतिपञ्चक (२५) पञ्चीकरण (२६) तत्त्वोपदेश (२०) एकरलोकी (२८) मायापञ्चक (२) प्रौदानुभूति (१०) प्रमशानाम्टोमाला (३) लघुवाश्यचि (२२) निर्माणमारी (३३) कारपषियक (३४) स्वरूपानुसन्धान ।

(२) खोत्रसमूह
(१०) प्रपञ्चसार (तन्त्र)
भगवान् शङ्कराचार्य के अन्धो मे किसकी रचना पहले हुई और
किसकी पश्चात् इस प्रकार क्रमिक निर्देश करना कठिन है। कुछ
लोग कहते हैं कि उनकी सर्व प्रथम कृति विष्णुसहस्रनामभाष्य है।
बदनन्तर उन्होंने प्रकरण प्रन्यों की रचना को।
पश्चात् गीताभाष्य
और उपनिषद्भाष्य रचे । ब्रह्मसूत्रभाष्य उनकी सबसे अन्तिम कृति है।
परन्तु इस विषय में दृढतापूर्वक कुछ निश्चय नहीं किया जा सकता।
इसमें कुछ सन्देह नहीं है कि ब्रह्मसूत्रभाष्य में शङ्कर भगवान की
सर्वतोमुखो असाधारण प्रतिभा तथा मनीपा का पद-पद में परिचय
मिलता है। उसकी प्रति प्रोढ़ प्रतिपादनशैली एवं पदार्थगाम्भीर्य
देखकर निरसन्देह कहा जा सकता है कि वह भावार्य को सर्वोत्कृष्ट
कृति है। सम्भवतः यह सर्वान्तिम भी हो।
इन पाँच प्रकरणों का भाषानुवाद वेदान्त-शास्त्र के मर्मज्ञ गङ्गा-
तीर-निवासी एक महात्माजी की कृपा से सम्पन्न हुआ है।
महात्माजी की प्राज्ञा से मैं उनका प्रात.स्मरणीय नाम प्रकाशित
करने में असमर्थ हूँ।
यह पुस्तक २ वर्ष पूर्व ही छप चुकी थी। किन्तु मेरे प्रमाद
से इसके प्रकाशन में विलम्ब हुमा है। एतदर्घ पूज्य महात्माजी
वया उदार पाठकों से समा-याचना करता हूँ।
काशो
विनीत
चैत्र शुष्ट १ सं० १८६०
रोकृष्ण पन्त
in
०(१) गणपति-स्तोत्र (२) सुब्रह्मण्य स्तोत्र () ईश्वर सोम (१) देवी-
खोत्र (१) विष्णु स्तोत्र (6) संकीर्ण-खोत्र ।

विषय-सूची
पृ० सं०
-१८
२१-२६
विपय
मात्मवोध
प्रौढानुभूति
लघुवाश्यवृत्ति
तत्त्वोपदेश
अपरोक्षानुभूति
A
४१-६२
६५-१०१

आत्मबोधः

॥ श्रीः॥
॥ प्रात्मवोधः॥
तपोभिः क्षीणपापानांशान्तानां वीतरागिणाम् ।।
मुमुक्षूणामपेक्ष्योऽयमात्मवोधी
विधीयते ॥१॥
नाना तपस्याओ से तिनके पाप नष्ट हो चुके हैं, शान्त, और,
विपयो से निस्पृह मुमुक्षुजनो के विचारने के योग्य इस आत्मवोध
नामक निनन्ध का निर्माण किया जाता है ॥१॥
बोधोऽन्यसाधनेभ्यो हि साक्षान्मोक्षकमाधनम् ॥
पाकस्य वहिवज्ज्ञानं विनामोक्षोन सिद्धयति ॥२॥
ज्ञान अन्य साधनों से उत्पन्न होता है और साक्षात् मोक्ष का
साधन है, जैसे अग्नि के बिना पाफ की सिद्धि नहीं होती, उसी प्रकार
ज्ञान के बिना मांत को सिद्धि नहीं होती है ॥॥
अविरोधितया कर्म नाविद्यां विनिवर्तयेत् ॥
विद्याऽविद्यां निहन्त्येव तेजस्तिभिरसङ्घयत् ॥ ३ ॥
विरोध के प्रभार से कर्म अविद्या की निवृत्त नहीं कर मरुता,
जैसे तेज अन्धकार के समूह को नष्ट कर देता है, वैसे ही ज्ञान प्रविद्या
को निवृत्त कर ही देता है ॥ ३॥

आत्मबोध
अवच्छिन्न इवाज्ञानात्तनाशे सति केवलः ।।
स्वयं प्रकाशते हयात्मा मेघापायेंऽशुमानिव ॥४॥
आत्मा अज्ञान से अवन्छिन्न ( आवृत) की भाति प्रतीत होता
है, अज्ञान के नाश हो जाने पर केवल (एक) आत्मा प्रकाशमान
होता है, जैसे मेघों के हट जाने पर सूर्य स्वय प्रकाशमान होता है॥४॥
अज्ञानकलुपं जीवं ज्ञानाभ्यासाद्विनिर्मलम् ॥
कृत्वा ज्ञानं स्वयं नश्येज्जलं कतकरेणुवत् ॥५॥
जैसे जल को निर्मल करके कतकरण ( निर्मली का चूर्ण ) नष्ट
हो जाता है वैसे ही अज्ञान से मलिन हुए जीव को ज्ञान के अभ्यास
से निर्मल करके ज्ञान स्वय नष्ट हो जाता है ।। ५ ॥
संसारः स्वमतुल्यो हि रागद्वेपादिसंकुलः ॥
स्वकाले सत्यवद्भाति प्रबोधे सत्यसद्भवेत् ॥६॥
रागद्वेप आदि से परिपूर्ण यह ससार स्वप्न तुल्य है, जैसे स्वप्न
स्वप्नकाल में सत्य की भॉति प्रतीत होता हुआभा जाग्रत् अवस्था होत
ही असत्य हो जाता है, वैसे ही जामत्काल मे सत्य की भाँति प्रतीत
होता हुआ भी यह ससार तत्त्वज्ञान होते ही असत्य हो जाता है ।।६।।
तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिका रजतं यया ॥
यावन्न ज्ञायते ब्रह्म सर्वाधिष्ठानमद्वयम् ॥ ७ ॥
तर तक शुक्ति मे रजत की भाति यह जगत् सत्य ज्ञात होता है,
जब तक सर्वाधिष्टान अद्वित्तीय ब्रह्म का ज्ञान नहीं होता ॥७॥
उपादानेऽखिलाधारे जगन्ति परमेश्वरे ॥
सर्गस्थितिलयान् यान्ति बुबुदानीव वारिणि॥८॥

आत्मबोधः बुद्बुद जल मे उत्पत्ति, स्थिति और लय को प्राप्त होते हैं, वैसे ही यह समस्त जगत् सर्वाधार सर्वोपादान ( सब के कारण) ब्रह्म में उत्पत्ति, स्थिति और लय को प्राप्त होता है ॥८॥ सच्चिदात्मन्यनुस्यूते नित्ये विष्णौ प्रकल्पिता। व्यक्तयो विविधाः सर्वा हाटके कटकादिवत् ॥८॥ जैसे सुवर्ण मे कटक कुण्डल आदि कल्पित है, वैसे ही सत् चित् रूप से सब मे अनुगत (घटघदव्यापी ) एवं नित्य, विष्णु मे नाना प्रकार की सब व्यक्तियाँ कल्पित हैं॥६॥ ययाकाशो हपीकेणो नानोपाधिगतो विभुः॥ तद्भ दाद्भिनव भाति तनाशे केधलो भवेत् ॥ १०॥ जैसे व्यापक आकाश भी नाना उपाधियों ( घटाकाश, मठाकाश प्रादि ) के योग से नाना मालूम पड़ता है, उसी भाति व्यापक पर- मात्मा भी नाना उपाधियों के योग से भिन्न जैसा प्रतीत होता है, उपा- धियों का नाश होने पर वह एक ही है ॥१०॥ नानोपाधिवथादेव जातिनामाश्रमादयः ।। मात्मन्यारोपितास्ताये रसवर्णादिभेदवत् ॥ ११ ॥ जैसे जल मे उपाधियों के योग से अम्ल, फटु एवं तिक्त आदि रस और नील पीत श्रादि वणों के भेद आगंपित है, उसी प्रकार आत्मा मे नाना उपाधियों के योग से जाति, नाम और पाश्रम आदि आरोपित है ।। ११॥ पञ्चीकृतमहाभूतसंभवं कर्मसंचितम् ॥ शरीर मुखदुःपाना भोगायतनमुच्यते ॥ १२ ॥ पोकृत महाभूतों का कार्य, फर्मों में रचा हुआ, यह ग्यून शरीर सुखदुःनों के भोग का स्थान कहा जाता है ॥१०॥ . .

आत्मबोधः पञ्चमाणमनेबुद्धिदथेन्द्रियसमन्वितम् ॥ अपञ्चीकृतभूतोत्यं सूक्ष्माङ्गं भोगसाधनम् ॥ १३ ॥ पञ्च प्राण, मन, बुद्धि और दश इन्द्रियों से युक्त अपञ्चीकृत महा- भूतो का कार्य सूक्ष्म शरीर भोग का साधन है ॥ १३ ॥ अनाद्यविद्यानिर्वाच्या कारणोपाधिरुच्यते ॥ उपाधित्रितयादन्यमात्मानमवधारयेत् ॥ १४ ॥ अनादि एवं अनिर्वचनीय अविद्या कारणशरीर कहा जाता है इन तीन उपाधियों से जो भिन्न है और इनका साक्षी है, वह आत्मा है, ऐसा निश्चय करना चाहिए ।। १४ ।। पञ्चकोशादियोगेन तत्तन्मय इव स्थितः ॥ शुद्धात्मा नीलवस्वादियोगेन स्फटिको यया ॥१५॥ जैसे नील पीत आदि वस्त्रों के योग से स्फटिक नीलपीत रूप हो, जाता है, वैसे ही शुद्ध आत्मा पञ्चकोश आदि के योग से तत् तत् कोशरूप हो जाता है ।। १५ ।। वपुस्तुपादिभिः कोशैर्युक्तं युक्तयवधा ततः ॥ मात्मानमान्तर शुद्ध विविञ्च्यात्तण्डुलं यया॥१६॥ जैमे लोग तुप ( भूसा ) से युक्त तण्डुलो को कृटकर तुप से पृथक कर लेते हैं, उसी प्रकार पञ्चकोशो से युक्त सर्वान्तर शुद्ध प्रात्मा को अन्वय व्यतिरेक रूप युक्ति से पृथक कर लेना चाहिये ॥ १६ ॥ सदा सर्वगतोऽप्यात्मा न सर्वचावभासते॥ बुद्धावेवावभासेत स्वच्छेपु मतिबिम्बवत् ॥१७॥ सर्वदा सर्वत्र स्थित भी आत्मा सर्वत्र नहीं भासता है, किन्तु स्वच्छ दर्पण में प्रतिबिम्ब को भाति बुद्धि मे ही भासता है।। १७ ।।

७ आत्मबोधः देहेन्द्रियमनेषुद्धिप्रकृतिभ्यो विलक्षणम् ॥ तद्धृत्तिमाक्षिणं विद्यादात्मानं राजयत्सदा ॥१८॥ जैसे अमात्यादि प्रकृतियों से राजा भिन्न है, उसी प्रकार देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि से भिन्न, उनकी वृत्तियों के साक्षी को आत्मा जानना चाहिये ॥ १८॥ व्यापृतेष्विन्द्रियेष्वात्मा व्यापारीवाविवेकिनाम् ।। दृश्यतेऽभ्रेषु धावत्सु धावन्निव यथा शशी ॥१॥ जैसे मेघो के चलने से चन्द्रमा चलता हुआ दिखाई देता है, उसी प्रकार अज्ञानी पुरुषों को इन्द्रियों के व्यापार मे आत्मा के व्यापार की प्रतीति होती है ॥१८॥ प्रात्मचैतन्यमाश्रित्य देहेन्द्रियमनाधियः॥ स्वकीयार्थेषु वर्तन्ते सूर्यालेकं यया जनाः ॥२०॥ जैसे सूर्य के प्रकाश को पाकर संसारी जीव अपने अपने कार्य में संलग्न हो जाते हैं, वैसे ही आत्मा कं चैतन्य को पाकर देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि अपने अपने विषय में प्रवृत्त होते हैं ॥२०॥ देहेन्द्रियगुणान् फर्भाग्यमले सच्चिदात्मनि ।। अध्यस्यन्त्यविवेकेन गगने नीलतादिवत् ॥२१॥ जैसे अाफाश में नौलता का अभ्यास करते हैं, वैसे हो निर्मन सत् चित् स्वरूप आत्मा में अज्ञान से देह, इन्द्रिय के गुण और कों का प्रध्यास करते हैं ॥१॥ मज्ञानान्मानसोपाधेः फर्तृत्वादीनि चात्मनि ।। कल्प्यन्तेऽम्बुगते चन्द्रे चलनादि यथाम्भसः ॥२२॥ , - आत्मबोधः जैसे जलस्थ चन्द्रमा मे जल की चञ्चलता की कल्पना करते हैं, उसी तरह अज्ञान से मन रूप उपाधि के कर्तृत्व एवं भोत्तत्व की आत्मा मे कल्पना करते हैं ॥ २२॥ रागेच्छासुखदुःखादि घुद्धौ सत्या प्रवर्तते ॥ सुषुप्तौ नास्ति तन्नाशे तस्माद्बुद्धस्तु नात्मनः ॥२३॥ राग, इच्छा, सुस, दु.स आदि बुद्धि के सद्भाव मे ही प्रवृत्त होते हैं, सुषुप्ति में बुद्धि के नाश होने पर प्रवृत्त नहीं होते, इसलिए राग आदि बुद्धि के ही धर्म हैं, आत्मा के धर्म नहीं हैं ।। २३ ।। प्रकाशोऽस्य तोयस्य शैत्यमग्नेर्ययोष्णता ॥ स्वभावः सच्चिदानन्दनित्यनिर्मलतात्मनः ॥२४॥ जैसे सूर्य मे प्रकाश, जल मे शोतलता, एवं अग्नि मे उष्णता स्वभावसिद्ध है, उसी प्रकार अात्मा मे सद्रूपता, चिद्रूपता, आनन्द- स्वरूपता, नित्यता और निर्मलता स्वभावसिद्ध हैं ॥ २४॥ मात्मनः सच्चिदंशश्च बुद्धवृत्तिरिति द्वयम् ।। संयोज्य चाविवेकेन जानामीति प्रवर्तते ॥२५॥ आत्मनेा विक्रिया नास्ति बुद्ध?धी न जात्विति ॥ जीवः सर्वमलं ज्ञात्वा ज्ञाता द्रप्टेति मुहाति ॥२६॥ अात्मा के सत् चित् अंश को और बुद्धि की वृत्ति को अज्ञान से मिलाकर मैं जानता हूँ, ऐसा कहता है । आत्मामे विकार नहीं है । बुद्धि मे ज्ञान नहीं है। जीव इन बातो को न जानकर मैं जानता हूँ, करता हूँ, देखता हूँ इस प्रकार व्यर्थ ही मोह को प्राप्त होता है ।। २५-२६॥ रज्जुसर्पवदात्मानं जीवं ज्ञात्वा भयं वहेत् ।। नाहं जीवः परात्मेति ज्ञातश्चेनिर्भयो भवेत् ॥२७॥ १-लं निषेधार्थक अव्यय है।

.
आत्मबोधः
रज्जु मे सर्प के भ्रम की भॉति आत्मा को जीव समझकर भय
को प्राप्त होता है, मैं जीव नहीं हूँ, किन्तुपरमात्मा ही हूँ, इस प्रकार
जानने से निर्भय हो जाता है ।। २७ ।।
आत्मावभासयत्येका बुद्धयादीनीन्द्रियाणि हि ॥
दीपो घटादिवत्स्वात्मा जस्तै वभास्यते ॥२८॥
जैसे दीपक घट आदि को प्रकाशित करता है, किन्तु घट आदि
दीप को प्रकाशित नहीं कर सकते, उसी प्रकार आत्मा बुद्धि आदि
इन्द्रियो को प्रकाशित करता है, किन्तु जड़ बुद्धि आदि से आत्मा
प्रकाशित नहीं होता ॥२८॥
स्वबोधे नान्यबोधेच्छा बोधरूपतयात्मनः॥
न दीपस्यान्यदीपेच्छा यथा स्वात्मप्रकाशने ॥२६॥
जैसे प्रकाशरूप होने से दीपक अपने प्रकाश के लिए दीपान्तर
को अपेक्षा नहीं करता है, उसी प्रकार स्वप्रकाश आत्मा को अपने
ज्ञान के लिए अन्य ज्ञान की अपेक्षा नहीं होती है।॥ २६॥
निषिध्य निखिलोपाधीन्नेति नेतीति वाक्यतः॥
विद्यादैक्यं महावाक्यैर्जीवात्मपरमात्मनाः ॥३०॥
'नेति नेति' इत्यादि वाक्यों से सब उपाधियों का निषेध कर
महावाक्यों से जीवात्मा और परमात्मा की एकता जाननी
चाहिये ॥३०॥
साविद्यक शरीरादि दूर्य बुबुदवत्क्षरम् ।।
एतद्विलक्षणं विद्यादहं ब्रह्मति निर्मलम् ॥३१॥

प्रात्सवोधः
अविद्या से उत्पन्न हुए शरीर आदि दृश्य पदार्थ जल ल-बुद्बुद
की
भाँति नश्वर हैं, इनसे विलक्षण, निर्मल ब्रह्म को ही आत्मा समझना
चाहिये ॥ ३१ ॥
देहान्यत्वान मे जन्मजराकार्यलयादयः॥
शब्दादिविययैः सङ्गो निरिन्द्रियतया न च ॥३२॥
मैं देह से भिन्न हूँ, अतः जन्म, जरा, कृशता, स्थूलता
और मृत्यु
आदि देहधर्म मेरे धर्म नहीं हैं; मैं इन्द्रियों से पृथक हूँ, अत: इन्द्रियों
के विपय शब्द आदि से मेरा सम्बन्ध नहीं है ।। ३२ ।।
अमनस्त्वान्न मे दुःखरागद्वेषभयादयः ।।
प्रमाणो ह्यमनाः शुभ्र इत्यादि श्रुतिशासनात् ॥३३॥
मैं मन नहीं हूँ, अतः दुःख, राग, द्वेष और भय आदि मेरे धर्म
नहीं हैं। 'अप्रायो खमनाः शुभ्र' इत्यादि श्रुति मुझको प्राण और
मन से रहित एवं शुद्ध बतलाती हैं । ३३ ।।
निगुणो निष्क्रिया नित्या निर्विकल्पो निरञ्जनः ।।
निर्विकारो निराकारो नित्यमुक्तोऽस्मि निर्मलः॥३४॥
मैं निर्गुण, निष्क्रिय, नित्य, निर्विकार, निरजन, निर्विकल्प,
नित्यमुफ और निर्मल हूँ॥ ३४॥
अहमाकाशवत्सर्व बहिरन्तर्गतोऽच्युतः।
सदा सर्वसमः सिद्धो निःसङ्गो निर्मलाचलः ॥३५॥
मैं प्रकाश की भॉति सब के बाहर भीतर स्थित हूँ, अच्युत
(अविनाशी) हूँ, सदा सव मे सम हूँ, सिद्ध हूँ, निस्सङ्ग हूँ, निर्मल
हूँ और अचल हूँ ॥ ३५ ॥

प्रात्मवोधः
नित्यशुद्धविमुक्त कमखएडानन्दमद्वयम् ॥
सत्यं ज्ञानमनन्तं यत्परं ब्रह्माहमेव तत् ॥३६॥
नित्यशुद्ध, नित्यमुक्त, एक, अखण्डानन्द, अद्वितीय, सत्य, ज्ञान-
स्वरूप और अनन्त जो ब्रह्म वह मैं ही हूँ ॥ ३६॥
एवं निरन्तरकृता ब्रीवास्मीति वासना ॥
हरत्यविद्याविक्षेपान् रोगानिव रसायनम् ॥३०॥
इस प्रकार नित्य अभ्यास करने से दृढ हुई–में ब्रह्म ही हूँ--यह
वासना अज्ञान और तज्जनित वित्तेपो को उसी प्रकार नष्ट कर देती
है, जैसे रसायन रोगों को दूर कर देता है ॥ ३७ ॥
विविक्तदेश मासीनो विरागो विजितेंद्रियः।
भावयेदेकमात्मानं तमनन्तमनन्यधीः ॥८॥
एकान्त में बैठकर राग को त्यागकर इन्द्रियों को अपने वश
मे करके एकाग्रचित्त होकर मैं अनन्त हूँ और एक हूँ, ऐसा चिन्तन
करना चाहिये ॥ ३८॥
आत्मन्येवाखिलं दृश्यं प्रपिलाप्य धिया सुधीः ।
भावयेदेकमात्मानं निर्मलाकाशवत्सदा ॥ ३८ ॥
समस्त दृश्य प्रपश्य को बुद्धि से आत्मा में लीन फरक बुद्धिमान
पुरुष निर्मल आकाश के सदृश एक आत्मा का सदा चिन्वन फर ॥३६)
रूपवर्णादिकं मर्य विहाय परमार्यवित् ।।
परिपूर्णचिदानन्दस्वरूपेणापतिष्ठते॥४०॥

१२
प्रात्मबोधः
परमार्थवेत्ता पुरुष नाम रूप आदि सब को छोडकर परिपूर्ण
चिदानन्द रूप से स्थित होता है।॥४०॥
ज्ञातृज्ञानज्ञेयभेदः परे नात्मनि विद्यते॥
चिदानन्दैकरूपत्वाद् दीप्यते स्वयमेव हि ॥४१॥
परमात्मा मे ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय का भेद नहीं है; चिदानन्दैकस्वरूप
होने से यह स्वतः प्रकाशमान है।। ४१ ॥
एवमात्मारणो ध्यानमयने सततं कृते॥
उदितावगतिज्वाला सर्वाज्ञानेन्धनं दहेत् ॥४२॥
इस तरह आत्मा रूप अरणि में निरन्तर ध्यान रूप मघन करने
से उत्पन्न हुई ज्ञान रूप ज्वाला समस्त अज्ञान रूपी इन्धनी को नष्ट
(दग्ध कर देती है ॥ ४२ ॥
अरुणेनेव बाधेन पूर्व सन्तमसे हते ॥
तत साविर्भवेदात्मा स्वयमेवांशुमानिव ॥४३॥
जैसे प्रथम अरुणोदय से अन्धकार के नष्ट हो जाने पर पीछे
सूर्य प्रकट होता है, उसी भाति ज्ञान से अज्ञान के नाश हो जाने
पर आत्मा स्वयमेव प्रकट हो जाता है ॥४३॥
आत्मा तु सततं माप्तोऽप्यप्राप्तवदविद्यया॥
तन्नाशे माप्तवद् भाति स्वकरठाभरणं यथा ॥४४॥
आत्मा तो सर्वदा प्राप्त है, परन्तु अविद्या के कारण अप्राप्त की
भॉति प्रतीत होता है, विद्या से अविद्या के नष्ट हो जाने पर अपने
कण्ठ में स्थित भूपण की भाति प्राप्त हुआ सा प्रतीत होता है ॥४४॥

प्रात्मवाघः स्थाणी पुरुषवद्भान्त्या कृता ब्रह्मणि जीवता ।। जीवस्य तात्त्विके रूपे तस्मिन् दृष्टे निवर्तते ॥४५॥ स्थाणु में जैसे पुरुष का भ्रम होता है, उसी प्रकार ब्रह्म मे जीव का भ्रम किया गया है। जीव के तात्त्विक (वास्तविक ) स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर वह भ्रम निवृत्त हो जाता है ॥ ४५ ॥ तत्त्वस्वरूपानुभवादुत्पन्नं ज्ञानमञ्जमा॥ अहं ममेति चाज्ञानं बाधते दिग्भ्रमादिवत् ॥४६॥ तत्त्व स्वरूप के अनुभव से उत्पन्न हुआ ज्ञान अहंता ममता रूपो अज्ञान का उसी प्रकार नाश करता है, जैसे सूर्य का उदय दिग- भ्रम का नाश कर देता है ॥४६॥ सम्यगविज्ञानवान् योगी स्वात्मन्येवाखिलं स्थितम्॥ एकञ्च सर्वमात्मानमीक्षते ज्ञानचक्षुया ॥ ४७ ॥ यधार्थ ज्ञानवान योगी ज्ञानदृष्टि से समस्त विश्व को स्वात्मा में और एक आत्मा को समस्त विश्व मे स्थित देखता है ।। ४७ ।। आत्मैवेदं जगत्सर्वमात्मनेोऽन्यन्न किञ्चन ॥ मृदा यद्घटादीनि स्वात्मानं सर्वमीक्षते ॥४८॥ यह समस्त ससार आत्मा ही है, प्रात्मा से पृथक कुछ भी नहीं है, जैसे घट शराव आदि मृत्तिका से भिन्न नहीं है, किन्तु मृत्तिका स्वरूप ही हैं, इसलिए ज्ञानवान सबको आत्मा ही समझता है ॥४॥ जीवन्मुक्तस्तु सद्विद्वान् पूर्योपाधिगुणांस्त्यजेत् । स सच्चिदादिधर्मत्वं भेजे भमरकोटवत् ॥४८॥ - प्रात्मबोधः जीवन्मुक्त विद्वान् पूर्वोक्त उपाधि (शरीरादि) के गुणों का त्याग करे, भ्रमर और कीट की भाँति सत् चित् प्रादि धर्मो का स्वीकार करे ॥४६॥ तीवी महार्णवं हत्वा रागद्वेषादिराक्षसान् ।। योगी शान्तिसमायुक्त आत्मारामा विराजते ॥५०॥ मोहरूपी समुद्र को तैरकर और रागद्वेषादि रूपी राक्षसों को मारकर शान्ति को प्राप्त हुआ योगी आत्मा ही मे रमण करता है ॥५०॥ वाह्यानित्यसुखासक्ति हित्वात्मसुखनिर्वृतः॥ घटस्थदीपवच्छश्वदन्तरेव प्रकाशते ॥५१॥ बाह्य अनित्य सुख की प्रासक्ति का त्याग कर आत्मसुख से सुसी होकर घट मे स्थित दीपक की भाति सदा भीतर ही प्रकाशमान होता है॥५१॥ उपाधिस्थोऽपि तद्धमरलिप्तो व्योमवन्मुनिः। सर्वविन्मूढयत्तिष्ठेदसक्तो वायुवच्चरेत् ॥ ५२ ॥ शरीरादि उपाधियों में स्थित भी मुनि आकाश की भॉति उपाधियों के धर्मो से लिप्त नहीं होता है सर्वज्ञ होता हुआ भी मूर्ख को भौति रहता है, आसक्तिरहित होता हुआ भी वायु की भाति विचरता है ।। ५२॥ उपाधिविलयाद्विप्या निर्विशेष विशेन्मुनिः। जले जलं वियद्व्याम्नि तेजस्तेजसि वा यथा ॥५३॥ जैसे उपाधि के नाश होने से जल जल में, आकाश आकाश में, तेज तेज में लीन हो जाता है, उसी प्रकार उपाधि के लय-चिन्तन मे विशेष भाव का त्यागकर मुनि विष्णु में प्रवेश कर जाता है ॥५३॥ जन , आत्मबोधः यल्लाभान्मापरो लाभो यत्सुखान्नापरं सुखम् ॥ यज्ञानान्नापरं ज्ञानं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ॥५४॥ जिसके लाभ से बढ़कर अन्य लाभ नहीं है, जिसके सुख से बढ़कर अन्य सुस नहीं है, जिसके ज्ञान से बढ़कर अन्य ज्ञान नहीं है, वह ब्रह्म मैं हूँ, ऐसा निश्चय करना चाहिये ॥ ५४ ॥ यद् दृष्ट्वा नापरं दृश्यं यद् भूत्वा न पुनर्भवः। यज्ज्ञात्वा नापरं ज्ञेयं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ॥५५॥ जिसका दर्शन करके अन्य के दर्शन की अभिलाषा नहीं रहती है, जिस स्वरूप को प्राप्त कर पुनर्जन्म नही होता है, जिसका ज्ञान प्राप्त करके ज्ञानान्तर की इच्छा नहीं होवी है, वह ब्रह्म मैं हूँ, ऐसा निश्चय करना चाहिये ।। ५५॥ तिर्यगूलमधःपूर्ण सच्चिदानन्दमद्वयम् ॥ मनन्तनित्यमेकं यत् तद्बामेत्यवधारयेत् ॥५६॥ तिरछे ऊपर नीचे सर्वत्र परिपूर्ण, सत्, चित, आनन्द, अद्वितीय, नित्य, एक और अनन्त जो ब्रह्म है, वह मैं ही हूँ, यह निश्चय करना चाहिये ।। ५६ ॥ अतव्यावृत्तिरूपेण वेदान्तैर्लक्ष्यतेऽव्ययम् ॥ अखण्डानन्दमेकं यत्तद्ब्रह्मत्यवधारयेत् ॥५॥ वेदान्वी लोग ब्रा से भिन्न का निषेध करके जिस भव्यय असण्डानन्द एक ब्रह्म का लक्षण करते हैं, वह प्रझ मैं ही हूँ, ऐसा निश्चय करना चाहिये ॥ ५७ ॥ - , ५ आत्मवोधः अखण्डानन्दरूपस्य तस्यानन्दलवाश्रिताः ।। ब्रह्माद्यास्तारतम्येनभवन्त्यानन्दिनेोऽखिला: ॥५॥ अखण्डानन्द रूप उस ब्रह्म के आनन्द-लन को प्राप्त कर ब्रह्म आदि समस्त प्राणी अानन्दवान होते हैं ।। ५८ ॥ .तद्युक्तमखिलं वस्तु व्यवहारश्चिदन्वितः॥ तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म हीरे सर्पिरिवाखिले ॥५६॥ समस्त विश्व चैतन्य से युक्त है और सब व्यवहार चैतन्य-युक्त हैं, इसलिए दूध मे घो के समान ब्रह्म सर्वव्यापक है ॥ ५-६ ।। मनण्वस्थूलमहस्वमदीर्घमजमव्ययम् ।। प्ररूपगुणवर्णाख्य तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ॥६० जो न अणुरूप है, न स्थूल, न हस्व, न दीर्घ, न जन्मता है और न मरता है, नाम, रूप और गुणों से रहित है, वह ब्रह्म मैं हूँ, ऐसा निश्चय करना चाहिये ।। ६० ॥ यद्भासा भास्यतेऽर्कादि भास्यैर्यत्तु न भास्यते ॥ येन सर्वमिदं भाति तद्ब्रह्मत्यवधारयेत् ॥ ६१ ॥ जिसके प्रकाश से सूर्य चन्द्र आदि भासित होते हैं, परन्तु सूर्य और चन्द्र आदि के प्रकाश से जो प्रकाशित नहीं होता है, जिससे यह सब प्रतीत होता है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ, ऐसा निश्चय करना चाहिये ॥६१।। स्वयमन्तर्बहिर्याप्य भासयन्नखिलं जगत् ।। ब्रह्म प्रकाशते वह्निमतताय सपिण्डवत् ॥६२ ॥ अग्नि से ता लौहपिण्ड की भॉति भीतर और बाहर व्याप्त होकर सारे जगत् को प्रकाशित करता हुआ ब्रह्म प्रकाशमान हो रहा है।।६।।

प्रात्मवोध जगद्विलक्षणं ब्रह्म ब्रह्मणोऽन्यन्न किञ्चन ।। ब्रह्मान्यद्भाति चेन्मिथ्या यथा मरुमरीचिका ॥६३॥ ब्रह्म जगत से विलक्षण है, ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं है; ब्रह्म से भिन्न अन्य कुछ यदि प्रतीत होता है तो उसे मृगतृष्णा की भाति मिथ्या समझना चाहिये ॥ ३ ॥ दृश्यते श्रूयते यद्यद् ब्रह्मणोऽन्यन्न तद्भवेत् ॥ तत्त्वज्ञानाच्च तद्ब्रह्म सच्चिदानंदमद्वयम् ॥६॥ जो देखने में और सुनने में आता है, वह ब्रह्म से विलक्षण नहीं वास्तन मे वह ब्रह्म सत् चित्, आनन्द और अद्वितीय है ।। ६४ ॥ सर्वगं सचिदानन्द ज्ञानचक्षुर्निरीक्षते ॥ अज्ञानचक्षुर्नेक्षेत भास्वन्तं भानुमन्धवत् ॥६५॥ सत् चित्, आनन्द सर्वव्यापक है परन्तु ज्ञाननेत्र से ही दीसता है। जैसे प्रकाशमान सूर्य को अन्ध पुरुष नहीं देस सकता, वैसे ही सर्वन व्यापक सत् चित् आनन्द को अज्ञानचतु (अज्ञानी) नहीं देख सकता ॥६५॥ श्रवणादिमिरुद्दीप्तज्ञानाग्निपरितापितः ।। जीव. सर्वमलान्मुक्तः स्वर्णवद् द्यातते स्वयम् ॥६६॥ श्रवण प्रादि से प्रदीप्त और ज्ञान रूप अग्नि से परिवात जीर सब मलों से रहिव होकर स्वयं स्वर्ण की भाँति चमकता है ।। ६६ ।। हृदाकाशोदितो ह्यात्मा योधभानुस्तमेोपहत् ।। सर्वव्यापी सर्वधारी भाति भासयतेऽखिलम् ॥६॥ ३ . श्रात्मवोधः हृदयाकाश मे उदय हुआ आत्मज्ञान रूप सूर्य अज्ञान रूप अन्ध- कार को नष्ट कर देता है, सर्वव्यापक सर्वाधार होकर स्वयं भास- मान होता है एवं सबका भान करवाता है ॥ ६७ ॥ दिग्देशकालाद्यनपेक्ष्य सर्व शीतादिहनित्यसुखं निरञ्जनम् । यः स्वात्मतीयं भजते विनिष्क्रियः स सर्ववित् सर्वगतोऽमृतो भवेत् ।। ६८ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्द- भगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृता आत्मबोधः सम्पूर्णः दिक, देश, काल आदि की जिसको अपेक्षा नहीं है, जो सर्व- व्यापक है, शीतोष्ण श्रादि द्वंद्वों को हरनेवाला है, नित्य सुख, उपाधि- रहित और आत्मतीर्थ है, उसका जो पुरुष सेवन करता है, वह कर्मों के बन्धनों से रहित होकर सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और अमर हो जाता है ।। ६८ ॥ इति + RASHTRA प्रौढानुभूतिः ॥ श्रीः ।। प्रौढानुभूतिः पौढमौढनिजानुभूतिगलितद्वैतेन्द्रजालागुरु- गुढं गूढमघौघदुष्टकुधियां स्पष्टं सुधीशालिनास्। स्वान्ते सम्पगिहानुभूतमपि सच्छिष्यावयोधाय त- त्सत्यं संस्मृतवान् समस्तजगतांनै निजालोकनात्।१। गुरु ने अत्यन्त परिपक्व आत्मज्ञान से द्वैवरूपी इन्द्रजाल को हटाकर पाप से दूषित घुद्धियों के लिए अतिगुप्त, सुबुद्धियों के लिए सुलम, समस्त जगतो के आत्मस्वरूप, उस सत्य कायद्यपि वह बार बार हृदय में स्वयं अनुभूत था तो भी-शिष्य जनों के हित के लिए स्मरण किया ॥१॥ द्वैतं मय्यखिलं समुत्थितमिदं मिथ्या मनःकल्पितं तोय तायविवर्जिते मरुतले भ्रान्त्यैव सिद्धं न हि । यद्येवं खलु दृश्यमेतदखिलं नाहं न वा तन्मम मौढानन्दविवेकसन्मयवपुः शुद्धोऽस्म्यखण्डोऽस्म्यहम्॥२॥ मुझ मे जो यह द्वैत उत्पन्न हुआ है यह सारा द्वैत जल- शून्य मरुस्थल में जल की भॉति भ्रमसिद्ध, कल्पित और मिथ्या है; क्योकि यह किसी प्रमाग से भी सिद्ध नहीं है। 'जब ऐसा . ।

२२ प्रौढानुभूतिः ही है तो यह समस्त जगत् न मद्रूप है, न मेरा है, यदि होता तो मैं या मेरा कहने का प्रश्न भी होता, मैं तो प्रौढ़ आनन्द चित् सत् रूप, शुद्ध और असण्ड हूँ॥२॥ देहो नाहमचेतनाऽयमनिशं कुड्यादिवनिश्चितो नाहं प्राणमयोऽपि या दृतिधृतो वायुर्यथा निश्चितः । सोऽहं नापि मनोमयः कपिचलः कार्पण्यदुष्टो न वा बुद्धिर्बुद्धकुवृत्तिफेव कुहना नाज्ञानमन्धन्तमः ॥३॥ में देह नहीं हैं, क्योंकि देह घट कुड्य आदि की भांति सदा निश्चित अचेतन है, प्राणमय कोश भी मैं नहीं हूँ, क्योकि वह चर्म की नली में भरे हुए वायु के समान जड़ है। वानर के समान 'चञ्चल एवं कार्पण्यदुष्ट (पहिर्मुसता से दूपित) मनोमय कोश भी मैं नही हूँ; कुत्सित आचरण करने वाली एवं वेश्या की भाँति चञ्चल बुद्धि भी मैं नहीं हूँ, घोर अन्धकार रूप अज्ञान भी मैं नहीं हूँ ।।३।। नाहं खादिरपि स्फुटं मरुतलभ्राजत्पपासाम्यत- स्तेभ्यो नित्यविलक्षणोऽखिलढशिः सौरमका यया। दृश्यः सङ्गविवर्जिता गगनवत्सम्पूर्णरूपोऽस्म्यहं वस्तुस्थित्यनुरोधतस्त्वहमिदं वीच्यादिसिन्धुर्यया।४। आकाश आदि पञ्चभूत भी मैं नहीं हूँ, क्योकि ये तो स्पष्ट हो मरुस्थल मे प्रकाशमान मृगतृष्णा की नदी के सदृश हैं, मैं उनसे नित्य विलक्षण हूँ, सूर्य के प्रकाश के सदृश में समस्त जगत् का ज्ञानरूप प्रकाश हूँ, दृश्य जगत् से मेरा संग नहीं है, मैं आकाश के समान सम्पूर्ण हूँ, वास्तव में यह समस्त मैं ही हूँ, क्योंकि वीचि तरङ्ग, बुद्बुद आदि समुद्र रूप ही तो हैं ॥४॥ .

२३ प्रौढानुभूति नितास्म्यहमस्मि निर्मलचिदा- काशोऽस्मि पूर्णाऽस्म्यहम्, निदेहोऽस्मि निरिन्द्रियोऽस्मि नितरां निष्प्राणवर्गाऽस्म्यहम् । निर्मुक्ताशुभमानसेोऽस्मि विगल- द्विज्ञानकोशोऽस्म्यहम्, निर्मायाऽस्मि निरन्तरोऽस्मि विपुल- प्रौढप्रकाशोऽस्म्यहम् ॥ ५॥ मैं निद्रेत हूँ, निर्मल चिदाकाश हूँ, पूर्ण हूँ, देह और इन्द्रियों स रहित हूँ, प्राणवर्ग से भी रहित हूँ, न में मनोमय कोश हूँ, विज्ञानमय कोश हूँ और न मै माया हूँ, किन्तु मैं निरन्तर ( अटूट) प्रौढ प्रकाश हूँ॥५॥ मत्तोऽन्यन्न हि किंचिदस्ति यदि चिद्- भास्यं ततस्तन्मृषा, गुञ्जावहिवदेव सर्वकलना- धिष्ठानभूतोऽस्म्यहम् । सर्वस्यापि इगस्म्यहं समरसः शान्तोऽस्म्यपापोऽस्म्यहम्, पूर्णोऽस्मि द्वयवर्जितोऽस्मि विपुला- फाशोऽस्मि नित्योऽस्म्यहम् ॥ ६ ॥ मुझ से अन्य कोई वस्तु नहीं है, यदि चिति का भास्य (दृश्य ) है तो यह सब मिथ्या है। गुलामति के समान में सब कल्पनाओं -

२४
प्रौढानुभूतिः
का अधिष्ठान हूँ। मैं सबका ज्ञान हूँ, समरस हूँ, शान्त हूँ, अपाप
हूँ, पूर्ण हूँ, द्वैत से रहित विपुल ग्राकाश हूँ, नित्य हूँ ॥ ६ ।।
मप्यस्मिन्परमार्थ के श्रुतिशिरो-
वेद्ये स्वतो भासते,
का वा विप्रतिपत्तिरेतदखिलं
भात्येव यत्संनिधेः।
सौरालोकवशात्प्रतीतमखिलं
पश्यन्न तस्मिञ्जनः,
संदिग्धोऽस्त्यत एव केवल शिवः
कोऽपि प्रकाशोऽस्म्यहम् ॥ ७ ॥
उपनिपदो से वेद्य एवं स्वयं प्रकाश मुझ परमार्थ वस्तु मे किसको
विवाद हो सकता है? मेरी ही सन्निधि से यह सारा जगत् भासता
है, सूर्य प्रकाश से प्रकाशित जगत् को देखता हुआ पुरुष कभी भी
सूर्य की सत्ता के विषय मे सन्देह नहीं कर सकता, अत एव मैं केवल
शिव, प्रकाश रूप कोई हूँ॥ ७ ॥
नित्यस्फूर्तिमयोऽस्मि निर्मलसदा-
काशोऽस्मि शान्तोऽस्म्यहं,
नित्यानन्दमयोऽस्मि निर्गतमहा-
मोहान्धकारोऽस्म्यहम् ।
विज्ञातं परमार्थतत्त्वमखिलं
नैनं निरस्ताशुभं,
मुक्तमाप्यमपास्तभेदकलना
कैवल्यसंज्ञोऽस्म्यहम् ॥८॥

प्रौढानुभूतिः मैं नित्यस्फूर्ति (नित्यज्ञान) हूँ, निर्मल सदाकाश हूँ, शान्त हूँ, नित्यानन्दमय हूँ, महामोहान्धकार से रहित हूँ, जिसमें किसी प्रकार का अशुभ नहीं है, जो मुक्त पुरुषों का प्राप्तव्य स्थान है, वह अपना परमार्थ-स्वरूप मैंने जान लिया है; सब भेदों से रहित कैवल्यसंज्ञक मैं ही हूँ॥८॥ स्वामद्वैतवदेव जाग्रतमपि द्वैतं मनोमाधक मिथ्येत्येव विहाय सच्चिदमलस्वान्तकरूपोऽस्म्यहम्। यदा वेद्यमशेषमेतदनिशं मद्रूपमेवेत्यपि ज्ञात्वा त्यक्तमरुन्महोदधिरिव प्रौढोगभीरोऽस्म्यहम् ॥ स्वाप्न-द्वैत की भाँति जापत-द्वैत भी मनामात्र है, मिथ्यात्वबुद्धि से उसका त्याग कर मैं सत् चित् एवं निर्मल स्वान्त रूप हूँ, अथवा ज्ञान का विषय यह सारा जगन् मेरा ही रूप है, यह जानकर पवन- रहित निश्चल महासमुद्र की भाँति में प्रौढ़ एवं गम्भीर हूँ॥ ॥ गन्तव्य किमिहास्ति सर्वपरि- पूर्णस्याप्यखएडाकृतः, फर्तव्यं फिमिहास्ति निष्क्रियतना. मेक्षिकरूपस्य मे। नितस्य न हेयमन्यदपि या नो याप्युपेयान्तरं शान्तोऽद्यास्मि विमुक्ततायविमला मेघो यथा निर्मलः ।। १०॥ सर्वन परिपूर्ण मुझ परसण्डाकार को कहा जाना है? मर्यात फही नहीं। सय नियामों से रहित मुझ मान-स्वरूप को क्या कर्दम्य ४ २६ प्रौढानुभूतिः है अर्थात् कुछ नहीं। द्वैत तो है ही नहीं अतः न तो त्याग करने के योग्य कोई वस्तु है और न ग्रहण करने के योग्य, आज मैं घरसे हुए (वृष्टि कर चुके हुए) मेघ की नाई निर्मल हूँ ॥१०॥ किं न प्राप्तमितः पुरा फिमधुना लब्धं विचारादिना यस्मात्तत्सुखरूपमेव सततं जाज्वल्यमानोऽस्म्यहम् । किं वापेक्ष्यमिहापि मम्यतितरां मिथ्याविचारादिकं द्वैताद्वैतविवर्जिते समरसे मौनं परं संमतम् ॥११॥ पहिले मुझे क्या प्राप्त नहीं घा? अब विचार आदि साधने से क्या मिल गया है ? मैं तो वही सुखरूप सदा प्रकाशमान हूँ, विचार आदि सब मिथ्या है, मुझे उनकी कौन अपेक्षा है ? मैं द्वैत और अद्वैत से रहित समरस हैं, इसलिए मौन ही सर्वसम्मत है ।। ११ ।। श्रोतव्यं च फिमस्ति पूर्णसुदृशो मिथ्यापरोक्षस्य मे मन्तयं चन मेऽस्ति किचिदपि वा निःसंशयज्योतिषः। ध्यातृध्येयविभेदहानिवपुपो न ध्येयमस्त्येव मे सर्वात्मैकमहारसस्य सततं नो वा समाधिर्मम ॥१२॥ मुझ मे परोक्षत्व की कल्पना मिथ्या है, मैं तो नित्य अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) हूँ, मेरे ही सम्बन्ध से सारे विश्व का प्रत्यक्ष होता है, फिर मैं परोक्ष कैसे हो सकता हूँ? जिस शर्करा के सम्बन्ध से तण्डुल आदि समस्त पदार्थ मधुर हो जाते हैं, क्या उस शर्करा मे भी मधुरता का सन्देह हो सकता है ? मैं पूर्ण ज्ञानरूप हूँ, मेरे लिए श्रोतव्य (सुनने के योग्य) क्या है ? जिसका ज्ञान न्यून वह भले ही श्रवण करे, में निःसशय ज्योतिःस्वरूप हूँ, इसलिए मेरे लिए मन्तव्य ( मनन करने के योग्य ) कुछ भी नहीं है, जिसको संशय हो वह मनन करे, .

प्रौढानुभूतिः
मुझमे ध्याता और ध्येय का भेद ही नहीं है, अत: मेरे लिए ध्येय
(ध्यान करने योग्य ) कोई नहीं है, मैं तो एक ही रूप से सबका
आत्मा हूँ, मुझे समाधि से क्या प्रयोजन है ॥ १२ ॥
प्रात्मानात्मविवेचनापि मम ना विद्वत्कृता रोमते-
नात्मा नास्ति यदस्ति गोचरवपुः कावाविवेक्तु क्षमी।
मिथ्यावादविचारचिन्तनमही कुर्वन्त्यदृष्टात्मका
भ्रान्ताएव न पारगादृढधियस्तूष्णीं शिलावस्थिताः॥१३॥
पण्डितो से की गई यह आत्मा और अनात्मा की विवेचना भी
मुझे पसन्द नहीं है, अनात्मा है ही नहीं, यदि कहो कि इन्द्रियों
द्वारा नजर आता है, अतः वह है, तो कौन मनुष्य विवेक कर
सकता है कि वह सत्य है ? क्योकि स्वप्न के पदार्थ भी इन्द्रियों
से ही दिखाई देते हैं और वे होते हैं सब असत्य। जिन्होने प्रात्म-
दर्शन नहीं किया वे मूर्ख ही मिथ्या-वाद, मिथ्या-विचार एवं मिथ्या-
चिन्तन किया करते हैं
शास्त्रपारङ्गत दृढ़बुद्धि लोग तो शिला
के समान चुप रहते हैं ।। १३ ।।
वस्तुस्थित्यनुरोधतस्त्वहमहो
कश्चित्पदार्थो न चा-
प्येवं कोऽपि विभामि संततथि-
मानसागोचरः।
निष्पापोऽस्म्यभयोऽस्म्यहं विगतदु:-
शङ्काकलङ्कोऽस्म्यहं,
संशान्तानुपमानशीतलमहः-
प्रौढप्रकाशोऽस्म्यहम् ॥ १४ ॥

प्रौढानुभूति: यद्यपि वस्तुस्थिति के अनुरोध से मैं किसी पद का अभिधेय नहीं हूँ, धापि मैं कोई अलौकिक रूप से विराजमान हूँ मैं निरन्तर ज्ञानस्वरूप हूँ, मन और वाणी का अगोचर हूँ, निष्पाप हूँ, अभय हूँ, दुष्ट शङ्कायों के कलङ्क से रहित हूँ, अत्यन्त शान्त, अनुपम, शीतल एवं तेजरूप प्रौढ़ प्रकाश हूँ ॥ १४ ॥ योऽहं पूर्यमितः प्रशान्तकलनाशुद्धोस्मि युद्धोऽस्म्यहं यस्मान्मत्त इदं समुत्थितमभूदेतन्मया धार्यते। मय्येव मलयं प्रयाति, निरधिष्ठानाय तस्मै सदा सत्यानन्दचिदात्मकाय विपुलमज्ञाय मां नमः ॥१५॥ जब इस जगत् की सत्ता नहीं थी, तब भी सब कल्पनाओं से रहित, शुद्ध एवं ज्ञानस्वरूप में था, मुझसे ही यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, मैंने ही इसे धारण कर रखा है, मुझमे ही यह लोन हो जाता है। अधिष्ठानरहित, चिदानन्दस्वरूप और महाबुद्धि जो मैं हूँ, मेरे लिए सर्वदा नमस्कार है ॥ १५ ॥ सत्ताचित्सुखरूपमस्ति सततं नाहं च न त्वं मृपा नेदं वापि जगत्मदृष्टमखिलं नास्तीति जानीहि भाः । यत्प्रोक्तं करुणावशात्त्वयि मया तत्सत्यमेतत्स्फुट श्रद्धत्स्वानघ शुद्धबुद्धिरसि चेन्मात्रास्तु ते संशयः॥ सदा सब वस्तु सत् चित् और सुखस्वरूप हैं, न मैं हूँ, न तुम हो, न यह दृश्यमान जगत् ही है, इन सबको मिथ्या समझो। अनघ ! दया के वश में होकर मैंने जो कुछ तुमसे कहा है उसे तुम सत्य ही जानो। हे वत्स ! श्रद्धा करो, तुम शुद्धबुद्धि हो, तुम्हें इस विषय में कभी संशय नहीं होना चाहिये ॥ १६ ॥ - है .

२६ प्रौढानुभूतिः स्वारस्यैकसुबोधचारुमनसे प्रौढानुभूतिस्त्वियं दातव्या न तु माहदुग्धकुधिये दुष्टान्तरङ्गाय च । येयं रम्यविदर्पितोत्तमशिसमाप्ता चकास्ति स्वयं साचेन्मर्कटहस्तदेशपतिता कि राजते केतकी॥१७॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्द- भगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः तो मौढानुभूतिः समाप्ता अटूट ज्ञान से शुद्ध चित्तवाले शिष्य को प्रौढानुभूति का उपदेश देना चाहिये। मोह से कलुपितयुद्धि और मलिन-अन्तःकरणवाले के लिए इसका उपदेश नहीं करना चाहिये। सौन्दर्य के पत्तपाती पुरुप से देवता आदि के शिर पर चढ़ाई गई केतकी की जो शोभा होती है, क्या बन्दर के हाथ में पड़ने पर भी उसकी वैसी ही शोभा हो सकती है ! ॥१७॥ इति लघुवाक्यवृत्तिः ॥ श्री॥ ॥ लघुवाक्यवृत्तिः॥ ज्ञान । स्थूलो मांसमयो देहः सूक्ष्मः स्याद्वासनामयः ॥ ज्ञानकर्मेन्द्रियैः साधं धीमाणौ तच्छरीरगौ ॥१॥ शरीर दो हैं—स्यूल और सूक्ष्म । स्थूल शरीर मासमय है और सूक्ष्म है वासनामय । सूक्ष्म शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रियो के साथ बुद्धि और प्राण रहते हैं ॥१॥ अज्ञानं कारणं साक्षी बोधस्तेषां विभासकः ।। बोधाभासे बुद्धिगतः कर्ता स्यात्पुण्यपापयोः ॥२॥ सुषुप्ति अवस्था में अनुभूयमान अज्ञान कारण शरीर है। पूर्वोक्त इन तीनो शरीरों का साक्षी एव प्रकाशक है। बुद्धि मे रहने- वाला बोधाभास (ज्ञान का प्रतिबिम्ब ) पुण्य और पाप का कर्ता है॥२॥ । स एव संसरेत्कर्मवशाल्लोकद्वये सदा ।। बोधाभासाच्छुद्धबोधं धिविच्यादतियत्नतः ॥३॥ वह बोधाभास ही कर्मवश से इस लोक तथा परलोक में आवा- गमन करता है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वोधाभास से शुद्ध बोध ( ज्ञान ) को पृथक कर ले। जागरस्वप्नयोरेव बोधाभासविडम्बना ॥ सुप्तौ तु तल्लये बोधः शुद्धो जाड्य प्रकाशयेत् ॥४॥ ५ - . ३४ लघुवाक्यवृत्तिः जागरण और स्वप्न में ही बोधाभास का अभिनय होता है। सुपुप्ति में, जब कि योधाभास का लय हो जाता है, तब शुद्ध बोध दी अज्ञान का प्रकाश करता है ।।४।। जागरेऽपि धियस्तूष्णीभावः शुद्धेन भास्यते॥ धीव्यापाराश्च चिद्भास्याश्चिदाभासेन संयुता॥५॥ जागरण मे बुद्धि के तूष्णोभाव का प्रकाश शुद्ध बोध ही करता है। चिद् आमास के साथ बुद्धि के सारे व्यापार शुद्ध बोध ही से प्रकाशित होते हैं।॥५॥ वहितप्तजलं तापयुक्तं देहस्य तापकम् ॥ चिद्भास्या धीस्तदाभासयुक्तान्यं भासयेत्तथा ॥६॥ जैसे आग के संयोग से गरम हुआ जल आग के ही ताप से देह को तपाता है, क्योंकि प्रीष्ण्य जल का स्वाभाविक गुण नहीं है, वह आग के सम्पर्क से उसे मिला है, उसी प्रकार चिति से ही प्रकाशित होनेवाली बुद्धि भी चिति के प्रकाश से सारे जगत् को प्रकाशित करती है, उसमे स्वयं प्रकाश करने का सामर्थ्य नहीं है ॥ ६ ॥ रूपादा गुणदोषादिविकल्पा बुद्धिगाः क्रियाः॥ ताः क्रिया विषयः साधं भासयन्ती चितिर्मता॥७॥ रूप आदि विषयो मे गुण दोष श्रादि का विकल्प--यह अच्छा है, यह बुरा है, ऐसी कल्पना करना बुद्धि का काम है, परन्तु रूप आदि विषयों के साथ उसके कामों का प्रकाश करनेवाली चिति ही है॥७॥ रूपाच्च गुणदोषाभ्यां विविक्ता केवला चितिः। मैवानुवर्तते रूपरसादीनां विकल्पने ॥ - , लघुवाक्यवृत्तिः चिति, रूप आदि विषयों से एवं उनके गुण दोषों से भिन्न है, रूप रस आदि के विकल्प (रूप को छोड़कर रस तक जाने ) में केवल चिति ही अनुसरण करती है, विषय और गुण-दोष अनुसरण नहीं करते ॥८॥ क्षणे क्षणेऽन्यथाभूता धीविकल्पाश्चितिर्न तु ॥ मुक्तासु सूबवबुद्धिविकल्पेषु चितिस्तथा ॥ धुद्धि के विकल्प प्रतिक्षण बदलते रहते हैं, पर चिति कभी नहीं बदलती। जैसे मोतियों की माला मे तागा पिरोया रहता है, ठीक वैसे ही बुद्धियो की वृत्ति मे चिति अनुस्यूत है ॥६॥ मुक्ताभिरावृतं सूत्र मुक्तयोर्मध्य ईक्ष्यते ॥ तया वृत्तिविकरपैश्चित्स्पष्टा मध्ये विकल्पयोः॥१०॥ मोतियो से ढका हुआ तागा मोतियों के बीच में देखा जाता है, से ही बुद्धि के विकल्पो से घिरी हुई चिति स्पष्ट ही दो विकल्पों के वोच में रहती है ॥१०॥ नष्टे पूर्वधिकल्पे तु यावदन्यस्य नादयः ।। निर्विकल्पकचैतन्यं स्पष्ट तावद्विभासते ॥११॥ पहले विकल्प के नष्ट हो जाने पर जब तक दूसरा विकल्प उत्पन्न नहीं होता तब तक निर्विकल्पक चैतन्य साफ भासता है ॥ ११ ॥ एकद्विविक्षणेष्वेवं विकल्पस्य निरोधनम् ।। क्रमेणाभ्यस्पतां यन्नाद् ब्रह्मानुभवकांक्षिभिः ॥१२॥ अम-ज्ञान की अभिलाषा करनेवाले पुरुप पहिले इस प्रकार एक, दो, तीन क्षणों तक विकल का निराध कर प्रमश: सावधानी से विकल्प के निरोध का अभ्यास बढ़ावै ॥ १२ ॥ - - . लघुवाक्यवृत्तिः सविकल्पकजीवोऽयं ब्रह्म तन्निर्विकल्पकम् ॥ नहं ब्रह्मेति वाक्येन सोऽयमोऽभिधीयते ॥१३॥ जीव सविकल्पक है, ब्रह्म निर्विकल्पक, 'अहं ब्रह्मास्मि' यह महा- वाक्य इसी अर्थ का प्रतिपादन कर रहा है ॥ १३ ॥ सविकल्पकचिद्योऽहं ब्रह्मैकं निर्विकल्पकम् ।। स्वतःसिद्धा विकल्पास्ते निरोधव्याः मयत्नतः॥१४॥ जो सविकल्पक चिति है वह अहं-पदार्थ ( जीम ) है, निर्वि- कल्पक चिति ब्रह्म है, विकल्पों का प्रवाह स्वतः सिद्ध है उसे यत्न- पूर्वक रोकना चाहिये ॥ १४ ॥ शक्यः सर्वनिरोधेन समाधिोगिनां प्रियः॥ तदशक्तौ क्षणं रुद्ध्वा श्रद्धालु यतां स्वकाम् ॥१५॥ योगियों की परम प्रिय समाधि सब विकल्पों के निरोध से ही हो सकती है, यदि सब विकल्पों का निरोध सदा के लिए नहीं कर सके तो भी एक क्षण भर के लिए रोककर श्रद्धालु पुरुष अपनी ब्रह्मता का निश्चय करं ।। १५ ।। श्रद्धालुब्रह्मतां स्वस्य चिन्तयेद् बुद्धिवृत्तिभिः ।। वाक्यवृत्त्या यथाशक्ति ज्ञात्वाद्धाभ्यस्यतांसदा॥१६॥ श्रद्धालु पुरुष बुद्धि वृत्तियों से अपनी ब्रह्मवा का चिन्तन करे, इस वाक्यवृत्ति नामक अन्ध के द्वारा उसका यथाशक्ति ज्ञान प्राप्त कर सदा अभ्यास करे ।। १६ ॥ तचिन्तनं तत्कयनमन्योन्यं तत्मबोधनम् ॥ एतदेकपरत्वं च ब्रामाभ्यासं विदुयुधाः ॥ १७ ॥ .

लघुवाक्यवृत्तिः ब्रह्म का ही चिन्तन, ब्रह्म का ही कथन, परस्पर ब्रह्म का ही प्रबोधन करना एवं एकमात्र ब्रह्म-परायण होना ही ब्रह्माभ्यास कहा गया है ॥ १७॥ देहात्मधीवद्ब्रह्मात्मधीदाय कृतकृत्यता। यदा तदायं म्रियतां मुक्तोऽसौ नात्र संशयः ॥१८॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्द- भगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृता लघुवाफ्यत्तिः सम्पूर्णा देह में जैसी दृढ़ आत्मबुद्धि है, वैसी प्रात्मबुद्धि यदि ब्रह्म में हो जाय तो कृतकार्यता प्राप्त हो गई। कर्तव्यो की इतिश्री हो गई। संसार में जो सबसे बड़ा कार्य है, जो सब सुकर्मो का फल है, वह है ब्रह्म में आत्मबुद्धि की दृढ़ता होना। पुङ्गव को प्राप्त हो गई उसके लिए अब कुछ कर्त्तव्य शेष नहीं रहा। यह चाहे जब मरे, निस्सन्देह मुक्त ही है। वह जिस पुरुष इति तत्त्वोपदेशः ॥श्रीः॥ ॥ तत्त्वोपदेशः॥ तत्त्वंपदार्थशुद्धयर्थं गुरुः शिष्यं वचोऽब्रवीत् ।। वाक्ये तत्त्वमसीत्यत्र त्वंपदार्थ विवेचय ॥१॥ 'तत्' पदार्थ और 'त्वम्' पदार्थ के निश्चय के लिए गुरु ने शिष्य से कहा- हे वत्स ! 'तत्त्वमसि' इस वाक्य मे पहिले 'त्वम्। पदार्थ का विचार करो ।। १ ।। न त्वं देहोऽसि दृश्यत्वादूपजात्यादिमत्त्वतः ॥ भौतिकत्वादशुद्धत्वादनित्यत्वात्तथैव च ॥२॥ तुम देह नहीं हो, क्योंकि देह दृश्य है, रूपवान् एवं ब्राह्मणत्व । आदि जातिमान् है, भौतिक (भूत-कार्य ) है, अशुद्ध है और अनित्य है ॥२॥ अदृश्यो रूपहीनस्त्वं जातिहीनोप्यभौतिकः । शुद्धनित्योऽसि द्वयूपो घटो यद्वन्न दग्भवेत् ॥३॥ तुम अदृश्य हो, रूप-रहित एवं जाति-रहित हो, अभौतिक हो, शुद्ध हो, नित्य हो, ज्ञान रूप हो। जैसे घट का ज्ञान घट नहीं है, फिन्तु घट से पृथक है, उसी प्रकार तुम देह के ज्ञान हो, देह नहीं हो ॥३॥ ।

४२
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तत्वोपदेशः
न भवानिन्द्रियारयेषां करणत्वेन या अतिः ।।
प्रेरकस्त्वं पृथक् तेभ्यो न कर्ता करणं भवेत् ॥४॥
तुम इन्द्रिय रूप नहीं हो, क्योकि श्रुति ने इन्द्रियाँ ज्ञान-करण
बतलाई है, तुम तो इन्द्रियो के प्रेरक (प्रेरणा-कर्ता) हो, अत:
इन्द्रिया से पृथक हो, क्योंकि कर्ता करण नहीं होता ॥ ४ ॥
नानैतान्येकरूपस्त्वं भिन्नस्तेभ्यो कुतः शृणु।।
न चैकेन्द्रियरूपस्त्वं सर्ववाहं प्रतीतितः॥५॥
ये इन्द्रियों अनेक है, तुम एक हो, हे सौम्य ! तुम इन्द्रियों से
विलक्षण कैसे हो? इस बात को सुनो-तुम एक इन्द्रिय रूप तो
हो ही नहीं, क्योकि मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, इस प्रकार सव
इन्द्रियों में आत्मबुद्धि होती है। यदि एक इन्द्रिय अात्मा होती तो
अन्य इन्द्रियों में अहंबुद्धि न होती ।। ५ ॥
न तेषां समुदायोऽसि तेपामन्यतमस्य च ॥
विनाशेऽप्यात्मधीस्तावदस्ति स्यान्नवमन्यया ॥६॥
तुम इन्द्रिय-समुदाय रूप भी नहीं हो, क्योकि उनमें से एक का
नाश होने पर भी प्रात्मबुद्धि बनी ही रहती है।
नाश हो जाने पर समुदाय का नाश हो जाने से आत्मबुद्धि नहीं
होनी चाहिये पर ऐसा होता नहीं, आँसों के वेकार हो जाने पर भी
कान आदि अन्यान्य इन्द्रियो मे आत्मबुद्धि ज्यो की त्यो बनी
रहती है॥६॥
अन्यथा एक का
प्रत्येकमपि तान्यात्मा नैव तत्र नयं शृणु ॥
नानास्वामिकदेहोऽयं नश्यद्भिनमताश्रयः ॥७॥

- तत्त्वेपदेशः प्रत्येक इन्द्रिय भी आत्मा नहीं है, इस विषय मे एक युक्ति सुनो- लोक में प्रसिद्ध है कि जिस पुरुष के अनेक स्वामी होते हैं, वह नष्ट हो जाता है, क्योंकि एक ही काल में सब उसे विभिन्न आदेश देंगे, पहिले तो इसी बात पर उसे असमस हो जायगा कि-किसका आदेश पहिले करूं और किसका पीछे ? मान लीजिये, इस विषय मे उसने किसी प्रकार सफलता पा भी लो, तो जिसका कार्य वह पीछे करेगा वह उसके लिए अवश्य क्रुद्ध होगा और सम्भव है मार डाले। ठीक यही अवस्था अनेक स्वामीवाले शरीर की भी हो जायगी ॥७॥ नानात्माभिमतं नैव विरुद्धविषयत्वतः॥ स्वाम्यक्ये तु व्यवस्था स्यादेकपार्थिवदेशवत् ॥८॥ आँख-कान आदि इंद्रियों के विषय भिन्न भिन्न है इसलिए पूर्वोक्त युक्ति के अनुसार उनमें ( इन्द्रियों में) भी किसी का मनोरय पूर्ण नहीं होगा, क्योंकि नेत्र देह को सुन्दर रूप की ओर आकर्षित करेगे तो नासिका सुगन्ध की ओर, कान सुमधुर गीत की प्रार, रसना स्वादु रस की ओर-ऐसी अवस्था में बेचारा शरीर लाचार होकर किसी का भी अभिलाप पूरा नहीं कर सकेगा। स्वामी होने से तो एक राजापाले देश की भांति व्यरिया हो सकती है ॥८॥ न मनस्त्वं न वा प्राणो जडत्यादेव चैतयोः॥ गतमन्यत्र मे चित्तमित्यन्यत्यानुभूतितः ॥८ न तुम मन दो, न माग हो, क्योकि ये दोनों (मन और प्राप) जड़ हैं; 'मेरा मन अन्यन चला गया शा' इस प्रकार भेद का भी अनुभव होता है॥

, तत्त्वोपदेशः क्षुत्तृड्भ्यां पीडितः प्राणो ममायं चेति भेदतः॥ तयोटा पृथक् ताभ्यां घटद्रष्टा घटाद्यथा ॥ १०॥ प्राण क्षुधा और पिपासा से पीड़ित होता है, परन्तु तुम इन दोनों से रहित हो। 'मेरा प्राण' इस व्यवहार से भेद भी प्रतीत होता है, तुम इन दोनों के साक्षी हो और दोनो से वैसे ही पृयक हो, जैसे घट का साक्षी घट से ॥ १० ॥ सुप्ती लीनास्ति या बोधे सर्व व्याप्नोति देहकम् ॥ चिच्छायया च सम्बद्धा न सा बुद्धिर्भवान् द्विज ॥११॥ हे सौम्य ! सुपुप्ति-अवस्था मे जो अज्ञान में लीन हो जाती है और जामत्काल मे सारे शरीर मे व्याप्त रहती है, जिसमे चेतन की छाया (प्रतिविम्ब ) पड़ती है, वह बुद्धि भी तुम नहीं हो ॥ ११ ॥ नानारूपवती बोधे मुप्तौ लीनातिचञ्चला। यता दगेकरूपस्त्वं पृथक् तस्य प्रकाशकः ॥ १२॥ क्योकि बुद्धि जाग्रत्काल में घट-पट आदि अनेक रूपो कोधारण करती है, सुपुप्ति में लीन हो जाती है, और अति चञ्चल है, तुम तो केवल ज्ञान रूप हो, बुद्धि के प्रकाशक हो, अत: बुद्धि से भिन्न हो ।॥ १२॥ सुप्तौ देहाद्यभावेऽपि साक्षी तेपां भवान् यतः ।। स्वानुभूतिस्वरूपत्वान्नान्यस्तस्यास्ति भासकः॥१३॥ सुषुप्ति अवस्था में, जब कि देह अादि का अभाव रहता है तब भी उनके सातो तुम हो, स्वयं अनुभव रूप होने से तुम्हारा कोई प्रकाशक नहीं है।॥ १३ ॥ .

. तत्त्वोपदेशः प्रमाणं बोधयन्तं तं वोधं मानेन ये जनाः ।। बुभुत्सन्ते त रोभिर्दग्धु वाञ्छन्ति पावकम् ॥१४॥ इन्द्रिय लिङ्ग आदि सब प्रमाणों का ज्ञान करानेवाले ज्ञान रूप आत्मा को जो प्रमाणो से जानना चाहते हैं, लकड़ियों से अग्नि को जलाना चाहते हैं ॥१४॥ विश्वमात्मानुभवति तेनासौ नानुभूयते ॥ विश्वं प्रकाशयत्यात्मा तेनासो न प्रकाश्यते ॥१५॥ अात्मा विश्व का अनुमा करता है, विश्व से प्रात्मा का अनुभव नहीं हो सकता; आत्मा विश्व का प्रकाश करता है, विश्व से आत्मा का प्रकाश नहीं हो सकता ॥१५॥ ईदृशं तादृशं नैतन परोक्षं सदेव यत् ॥ तद्ब्रह्मत्वं न देहादिदृश्यरूपोऽसि सर्वक ॥१६॥ वह न ऐसा है, न वैसा है, न परोक्ष है, वह वो सत् (अपरोक्ष) ही है, अर्थात् जो इन्द्रियों का विषय होता है, उसे 'ऐसा' कहते है, आत्मा किसी भी इन्द्रिय का विषय नहीं है, इसलिए उसे 'ऐसा नहीं कह सकते । जो परात होता है, उसे 'पैसा' कहते हैं, प्रात्मा तो अहं प्रतीति से नित्य अपरोन है, इसलिए 'वैसा' भी नहीं कह सकते। वही प्रल तुम हो, देह आदि दृश्य रूप तुम नहीं हो, क्योकि तुम सरके साती हो, तुम्हारा साक्षी कोई नहीं है ॥ १६ ॥ इदन्त्येनैव यद्भाति सर्व तच्च निपिध्यते।। भवाच्यतत्वमनिदं न येद्य स्वप्रकाशतः ॥ १७ ॥ जो जो पस्तुएँ इदं रूप से प्रवीत होती हैं उन सबका श्रुति ने निषेध किया है, जो 'इदं' इत्याकारक प्रतीति का विषय नहीं है, ।

, , . तत्त्वोपदेशः किसी शब्द का वाच्य नहीं है, वह आत्मा स्वयं प्रकाश होने से किसी से भी वेद्य (प्रकाश्य) नहीं है ।। १७ ] सत्यं ज्ञानमनन्तञ्च ब्रह्मलक्षणमुच्यते॥ सत्यत्वा ज्ञानरूपत्वादनन्तत्वात्त्वमेव हि ॥१८॥ सत्य, ज्ञान और अनन्त, यह ब्रह्म का लक्षण कहा जाता है, तुम सत्य हो, ज्ञान हो, अनन्त हो, अत: तुम ब्रह्म हो ।। १८ ।। सति देहायुपाधी स्याज्जीवस्तस्य नियामकः । ईश्वरः शक्त्यु पाधित्वाद् द्वयोर्याधे स्वयंप्रभः॥१६॥ देह आदि उपाधि की दृष्टि से वही ब्रह्म जीव है, भाया रूप उपाधि से वही जीव का नियामक-ईश्वर है, ज्ञान से दोनों उपा- धियों का वाध होने से वह स्वयं प्रकाश है ॥१६॥ अपेक्ष्यतेऽखिलनिन यन्मानमपेक्षते ॥ वेदवाक्यं प्रमाणं तद् ब्रह्मात्मावगती मतम् ॥२०॥ अन्य सब प्रमाए जिसकी अपेक्षा करते हैं और जो किसी भी प्रमाण की अपेक्षा नहीं करता, वह वेद-वाक्य-हमारा प्रत्यगात्मा ही ब्रह्म है, इस ज्ञान मे-प्रमाण है ॥ २० ॥ अतोहि तत्त्वमस्यादिवेदवाक्यं प्रमाणतः॥ ब्रह्मणोऽस्ति यया युक्तया सास्माभिः संप्रकीर्यते॥२१॥ इसलिए 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य जिस युक्ति से ब्रह्म में प्रमाण हैं, वह युक्ति कही जाती है ॥ २१ ॥ शोधिते त्वंपदार्च हि तत्त्वमस्यादि चिन्तितम् ॥ सम्भवेन्नान्यथा तस्माच्छोधनं कृतमादितः ॥ २२ ॥ - तत्त्वोपदेशः त्वं पदार्थ को शुद्ध कर लेने पर 'तत्त्वमसि' आदि विचार हो सकता है, बिना शोधन के नहीं हो सकता, इसलिए पहिले 'त्वम्' पदार्थ का शोधन किया जाता है ॥ २२ ॥ देहेन्द्रियादिधर्मान्यः स्वात्मन्यारोपयन्मृपा ॥ कर्तृत्वाभिमानी च वाच्यार्यस्त्वंपदस्य सः॥२३॥ जो स्थूलत्व, कृशत्व आदि देह-धर्मों का और इन्द्रियों के कारणत्व- बधिरत्व आदि धर्मों का अपने मे मिथ्या आरोप करके अपने को कर्ता और भोक्ता मानता है, वह 'त्वं' पद का वाच्य अर्थ है ॥ २३॥ देहेन्द्रियादिसाक्षी यस्तेभ्यो भाति विलक्षणः॥ स्वयं वोधस्वरूपत्वाल्लक्ष्यार्यस्त्वंपदस्य सः ॥२४॥ जो स्वयं ज्ञानस्वरूप होने से देह और इन्द्रियों से विलक्षण एवं देह और इन्द्रियों का साक्षी है, वह 'त्वम्' पद का लक्ष्य अर्थ है ॥ २४ ॥ वेदान्त-वाक्य-संवेद्य-विश्वातीताराद्वयम् ॥ विशुद्ध यत्स्वसंवेद्य लक्ष्यार्थस्तत्पदस्य उः ॥२५॥ वेदान्त-वास्यो से जानने योग्य, विश्व से अतीच, अविनाशी, अद्वितीय शुद्ध एवं स्वसवेद्य (स्वयंप्रकाश ) जो तत्त्व है, वह तत्पद का लक्ष्य अर्थ है ॥ २५ ॥ सामानाधिकरण्यं हि पदयोस्तत्वमायोः ॥ सम्बन्धस्तेन वेदान्तैनौक्यं प्रतिपाद्यते ॥ २६ ॥ तत् और त्वं इन दोनों पदों का सामानाधिकरण्य (एकानाचकता) सम्बन्ध है, उक्त सरंध से वेदान्ती लोग ब्रह्म एवं जीव की एकता का प्रतिपादन करते हैं ।। २६॥

तत्त्वोपदेशः भिन्नमवृत्तिहेतुत्वे पदयारेकवस्तुनि ॥ वृत्तित्वं यत्तथैवैक्यं विभक्त्यन्तकयोस्तयाः ॥२७॥ सामानाधिकरण्यं तत्सम्प्रदायिभिरीरितम् ॥ तथा पदार्थयारेष विशेषणविशेष्यता ॥२८॥ प्रवृत्ति का निमित्त (वाच्यतावच्छेदक) भिन्न होने पर भी जैसे दो पदो की एक अर्थ मे वृत्ति (वोध्यता) अथवा एक विभक्त्यन्त दो पदों की एक अर्थ मे वृत्ति (योध्यता) होती है, वैसे ही दोनों पदार्थों का विशेषण-विशेष्य-भाव होता है, साम्प्रदायिक उसको सामानाधि-, करण्य कहते हैं ॥ २७-२८ ॥ अयं सः सेाऽयमितिवत् सम्बन्धो भवति द्वयोः ।। प्रत्यक्त्वं सद्वितीयत्वं परोक्षत्वं च पूर्णता ॥ २८ ॥ परस्परविरुद्धं स्यात्तता भवति लक्षणा ॥ लक्ष्यलक्षणसम्बन्धः पदार्थप्रत्यगात्मनः॥३०॥ यह वह है, यह यह है, यह दो पदार्थों के सामानाधिकरण्य का उदाहरण है। 'अयम्' पद का प्रवृत्ति निमित्त प्रत्यक्षत्व तथा 'स:' पदका प्रवृत्तिनिमित्त परोक्षत्व है, इस तरह भिन्न प्रवृत्तिनिमित्त होते हुए भी 'अयं सः' इन दोनों पदों की एक ही ब्राह्मए पिण्ड में वृत्ति (बोध्यता ) होने से इन दोनों पदों का सामानाधिकरण्य सम्बन्ध है; 'तत्त्वमसि' इस वाक्य मे 'त्वम् पद का प्रवृत्तिनिमित्त प्रत्यक्त्व ( अपरोक्षत्व ) एवं स-द्वितीयत्व है, 'तत्' पद का प्रवृत्ति- निमित्त परोक्षत्व एवं परिपूर्णत्व है। ये परस्पर विरत है, इसलिए यहाँ पर लक्षणा होती है; पदार्थ और प्रत्यगात्मा का लक्ष्य लक्षण भाव सम्बन्ध है ॥ २६-३०॥ , . तत्वोपदेशः मानान्तरोपरोधाच्च मुख्यार्थस्यापरिग्रहे। मुख्यार्यस्याविनाभूते प्रवृत्तिलक्षणोच्यते ॥३१॥ जहाँ पर प्रत्यक्ष आदि अन्य प्रमाणों के विरोध से शब्द मुख्य अर्थ का बोध न करा सके, उस स्थल में उसको मुख्य अर्थ के सम्बन्धी अमुख्य अर्थ में प्रवृत्ति होती है। वही लक्षणा कही जाती है। अर्थात् जिस व्यापार के द्वारा शब्द अमुरय अर्य का बोध कराता है, उसे लक्षणा कहते हैं ।। ३१ ।। विविधा लक्षणा या जहत्यजहती तथा ॥ अन्योभयात्मिका जेया तबाद्या नैव सम्भवेत् ॥३२॥ लक्षणा तीन प्रकार की होती है-जहती, अजहती और उभयात्मिका। इनमे पहिली-जहतो लक्षणा की यहाँ सम्भावना नहीं है ॥ ३२ ॥ वाच्यार्यमखिलं त्यक्त्वा वृत्तिः स्याद्या तदन्विते ॥ गङ्गायां घोष इतिवज्जहती लक्षणा हि सा ॥३॥ वाच्यार्थस्यैकदेशस्य प्रकृते त्याग इष्यते ॥ जहती संभवेन्नैव सम्मदायविरोधतः ॥३४॥ अपने वाच्य अर्य का सर्वथा त्याग कर वात्य अर्थ के सम्बन्धी मे जो शब्द को वृत्ति, वह जहती लक्षणा कही जाती है। इस लक्षणा का उदाहरण-'गङ्गायां घोपः' है। यहाँ पर गङ्गा शब्द के वाच्य अर्थ (प्रवाह) मे घोष (गोप-ग्राम) को आधारता बाधित है, क्योंकि प्रवाह मे ग्राम की स्थिति असम्भव है। इसलिए 'गडा' शब्द अपने वाच्य अर्थ (प्रवाह ) के सम्बन्धी तीर को बोधित करता है, *प्रवाह रूप वाच्य अर्थ का तीर रूपलक्ष्प अर्थ के साथ सामीप्य सम्बन्ध है। ७ अतः तत्त्वोपदेशः यह लक्षणा जहती हुई। प्रस्तुत 'तत्त्वमसि' वाक्य मे वाच्य अर्थ के एक देश का त्याग इष्ट है, न कि समस्व वाच्य अर्थ का, यह जहती लक्षणा का लक्ष्य नहीं हो सकता। इसमे सम्प्रदाय का भी विरोध है।। ३३-३४ ।। वाच्यार्थमपरित्यज्य वृत्तिरन्यार्थके तु या। कयितेयमजहती शोणाऽयं धावतीतिवत् ॥३॥ वाच्य अर्थ का त्याग न कर वाच्य अर्थ के सम्बन्धी मे जो शब्द की वृत्ति, वह अजहती लक्षणा कद्दी जाती । इसका उदाहरण 'शोणो धावति' है। यहाँ शोण शब्द का वाच्य है-रक्त वर्ण, वह गुण है, उसमें धावन प्रिया सब प्रमाणो से विरुद्ध है, इसलिए वाच्य अर्थ जो रक्त वर्ण-उसका त्याग न कर उसके सम्बन्धी प्रश्च मे शोण शब्द की जो वृत्ति, वह अजहती लक्षणा है ।। ३५ ।। न सम्भवति साप्यत्र वाच्यार्थेऽतिविरोधतः॥ विरोधांशपरित्यागो दृश्यते प्रकृते यतः ॥३६॥ पाच्य अर्थ के रहने पर अति विरोधी होने से 'तत्त्वमसि' वाक्य में अजहती लक्षणा भी नहीं हो सकती, क्योंकि प्रकृत श्रुति-पाक्य में विरुद्ध अंशों का त्याग देसा जाता है ।। ३६ ॥ * यदि 'तत्वमसि' श्रुति-वाक्य जहती रया का लक्ष्य मान लिया जाय, तो अद्वैत सम्प्रदाय से यदा विरोध होगा क्योकि उक्त सम्प्रदाय के अनुसार ब्रह्म से अतिरिक्त अन्य कोई पदार्थ है ही नहीं। ऐसी दशा में यदि 'तत्' और 'रवं' पद के क्रमशः सघनत्व विशिष्ट ब्रह्म तपा प्रयकाव विशिष्ट प्रझा रूप वाच्य अर्थ का जहती रक्षणा के रक्षण के अनुसार सर्वपा त्याग कर दिया जाय, तो फिर पचा ही कौन मर्थ? जिसका कि सहती लक्षणा बोध करावे। तात्पर्य यह कि जहती लपणा में केवल वाच्य अर्थ ही ज्यों का स्यों नहीं बना रहता, प्रत्युत वह अपनी निष्पत्ति के लिए भर्यान्तर का भी प्राश्रय लेता तत्त्वोपदेशः वाच्यार्यस्यैकदेशं च परित्यज्यैकदेशकम् ॥ या बोधयति सा जेया तृतीया भागलक्षणा ॥३७॥ वाच्य अर्ध के एक देश का त्याग कर दूसरे एक देश का जो बोध कराती है, वह भागत्याग ( जहदजहती ) लक्षणा कही जाती है ॥ ३७॥ सोऽयं विम इदं वाक्यं बोधयत्यादितस्तथा ॥ तत्कालत्वविशिष्टञ्च तथैतत्कालसंयुतम् ॥३॥ प्रतस्तयाविरुद्ध तत्कालत्वादिधर्मकम् ।। त्यत्वावाक्यं यया विमपिण्डं बोधयतीरितम् ॥३८॥ 'सोऽयं विप्र' इस वाक्य मे 'सः' पद भूतकाल-विशिष्ट ब्राह्मण का बोध कराता है और 'अयं पद वर्तमानकाल-विशिष्ट ब्राह्मण का; इसलिए परस्पर विरुद्ध अंश-भूतकाल और वर्तमानकाल का त्यागकर 'सोऽयं विप्रः' यह वाक्य ब्राह्मण्य के शरीर-मात्र का चौध कराता है, जैसा कि कहा गया है ॥ ३८-३६॥ तथैव प्रकृते तत्त्वममीत्यत्र श्रुतौ शृणु ॥ प्रत्यक्त्वादीन् परित्यज्य जीवधर्मास्त्वमः पदान्४० है। जैसा कि-'शोगो धावति' वाक्य में दिखलाया जा चुका है। प्रस्तुत ध्रुति- वाक्य के 'तत्' पद और 'रवम् पद का क्रमश पाच्य अयं है-परोक्षय घादि विशिष्ट ब्रह्म थौर प्रत्यस्व धादि विशिर या। दोनों पदो के केवल वाच्यार्य में ही विरोध काफ़ी है, क्योंकि परेपरव और प्रत्यक्त्व आदि विरुद्ध धर्म दोनों दले। में विद्यमान है। इसी विरोध को हटाकर दोनों में एकता स्थापित करने के लिए लषया का प्राध्य किया गया है। यदि जहती लपणा अनुसार वाच्य पर्थ में अन्य अर्थ का मिश्रण किया जाय, तो अति विरोध में सन्देश ही क्या है। - के , ५२ तत्त्वोपदेशः सर्वतत्यपरोक्षादीन् परित्यज्य तसः पदात् ॥ शुद्धं कूटस्थमद्वैतं बोधयत्यादगत्परम् ॥४१॥ वैसे ही प्रत (तत्त्वमसि ) श्रुति-वाक्य में भी जानो, यहा पर प्रत्यक्त्व ( अपरोक्षत्व ) आदि जीव-धर्मों का त्वं पद से त्यागकर और सर्वज्ञत्व-पंगक्षत्व आदि ईश्वर-धर्मों का तत् पद से त्यागकर श्रुति शुद्ध, कूटस्थ एवं अद्वितीय परब्रह्म का आदर से बोध कराती है।४०-४११॥ तत्वमाः पदयोरैक्यमेव तत्त्वमसीत्यलम् ॥ इत्यमैक्यावबोधेन सम्यग्ज्ञानं दृढं नयः ॥४२॥ 'तत् त्वम्' पदार्थों की एकता का ही 'तत्त्वमसि' वाक्य बोध कराता है, इस प्रकार एकता का ज्ञान हो जाने पर फिर "अघातो ब्रह्म- जिज्ञासा" इत्यादि न्यायों से वह भली भाँति दृढ़ हो जाता है ॥४२॥ अहं ब्रह्मेति विज्ञानं यस्य शोक तरत्यसौ ॥ मात्मा प्रकाशमानाऽपि महावाक्यैस्तथैकता॥४३॥ तत्यमाध्यितेऽथापि पौर्वापानुसारतः॥ तथापि शक्यते नैव श्रीगुरोः करुणां विना ॥४४ अपरोक्षयितु लोके मूढैः पण्डितमानिभिः॥ अन्तःकरणसंशुद्धौ स्वयं ज्ञानं प्रकाशते ॥४॥ येदवाक्यरतः किं स्याद् गुरुणेति न साम्प्रतम् ॥ भाचार्यवान् पुरुषो हि देत्येवं श्रुतिर्जग ॥ ४६ ॥ जिस पुरुप को 'अहं ब्रह्म' यह ज्ञान हो जाता है, वह शोक- सागर को तैर जाता है। अहंयुद्धि से यद्यपि आत्मा सवको प्रकाश- मान है, पूर्वापर-पर्यालोच से महावाक्य तत् और त्वम् पदों की एकता भी बदलाते हैं, तथापि श्रीगुरु की करुया के बिना लोक में पण्डित

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तत्त्वोपदेशः
ने का अभिमान रखनेवाले मूयों से जीव तथा ब्रह्म की एकता नहीं
निी जा सकती । अन्त.करण की शुद्धि होने से वेद-वाक्यों के द्वारा
यं ही ज्ञान हो सकता है, गुरु का कुछ प्रयोजन नहीं है, यह नहीं
हा जा सकता, क्योंकि श्रुति स्वरां कहती है-"प्राचार्यवान पुरुप
ज्ञान प्राप्त कर सकता है"॥४३-४६॥
अनादाविह संसारे वोधको गुरुरेव हि ।।
तो ब्रह्मात्मवस्त्वैक्यं ज्ञात्वा दूश्यमहत्तया॥४७॥
अद्वैते ब्रह्मणि स्थेयं प्रत्यगनमात्मना सदा ॥
तत्प्रत्यक्षात् परित्यागमद्वैतब्रह्मचिद्धनम् ॥ ४॥
अनादि इस ससार मे गुरु ही बोधक (ज्ञान देनेवाला) है, अत.
जीवात्मा और ब्रह्म की एकता जानकर, दृश्य जगत् को असत्ता का
निश्चय करके मैं ही ब्रह्म हूँ ऐसी भावना से सदा अद्वितीय ब्राह्म
में स्थिति करनी चाहिए। आत्मा के प्रत्यक्ष से अद्वितीय चिद्धन
ब्रा का प्रत्यक्ष हो जाता है ।। ४७-४८॥
प्रतिपादा तदेवान वेदान्तर्न जड द्वयम् ॥
सुखरूपं चिदद्वैतं दुःखरूपमसज्जडम् ॥ ४ ॥
वेदान्ती लोग उस अद्वितीय ब्रह्मतत्व का ही प्रतिपादन करते हैं,
जड और द्वैत का प्रतिपादन नहीं करते। चिद्-अद्वितीय तथा सुस
रूप है, असत्---जड एवं दुःख रूप है ॥ ४६॥
वेदान्तस्तद्वयं सम्यङ निर्णीतं वस्तुतो नयात् ॥
अद्वैतमेव सत्यं त्वं विद्धि द्वैतमसत्सदा ॥५०॥
इन दोनों का निर्णय वेदान्त्रियों ने युक्तियों द्वारा किया है। है
सौम्य । तुम अद्वैत को ही सत्य समझो और द्वैत को असत्य जानो ॥५०॥

. . तत्त्वोपदेशः शुद्ध कथमशुद्धः स्याद श्यं मायामयं ततः॥ शुक्तौ रूप्यं मृषा यद्वत् तथा विश्वं परात्मनि ॥५१॥ शुद्ध में अशुद्ध कैसे रह सकता है ? यह दृश्य जगत् मायामय है, जैसे शुक्ति में रजत-प्रतीति भ्रम है, उसी प्रकार परमात्मा में विश्व- प्रवीति भी मिथ्या है ॥ ५१ ॥ विद्यते न स्वतः सत्वं नासतः सत्वमस्ति वा॥ बाध्यत्वान्नैव सद्रुतं नासत् प्रत्यक्षभानतः ॥१२॥ इस दृश्य जगत् की स्वतः सत्ता नहीं है, तुम्हारी ही सत्ता इसमें प्रतीत हो रही है। यह दृश्य जगत् असत् है, असत् की सत्ता नहीं हुआ करती। नेति नेति इत्यादि वाक्यों से द्वैत का बाध होता है, इसलिए द्वैत सत् नहीं है और असत् भी नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष दिखाई देता है। असत्पदार्थों ( शशशृङ्ग, वन्ध्यापुत्र आदि ) का प्रत्यक्ष नहीं होता ॥ ५२ ॥ सदसन्न विरुद्धत्वादतो निर्वाच्यमेव तत् ॥ पूर्वमेक एवासीत्सृष्ट्वा पश्चादिदं जगत् ॥ ५३ ॥ प्रविष्टो जीवरूपेण स एवात्मा भवान् परः। सच्चिदानन्द एव त्वं विस्मृत्यात्मतया परम् ॥५४॥ जीवभावमनुमाप्तः स एवात्मासि बोधतः ।। अद्वयानन्दचिन्मानः शुद्धः साम्राज्यमागतः ॥५५॥ परस्पर विरुद्ध होने से सत्-असत् रूप भी नहीं है, अत: वह अनिर्वचनीय ही है, जो पहिले एक ( अद्वितीय) सत् ही था, वही जगत् की सृष्टि करके पश्चात् जीव रूप से उसमें प्रविष्ट हो गया है, इसलिए तुम वही परमात्मा हो। तुम सच्चिदानन्द ही हो, . यः . । तत्त्वोपदेशः उस परजा को भूल से प्रात्मा न समझकर जीवभाव को प्राप्त हुए हो। ज्ञान-दृष्टि से तुम वही परमात्मा हो। तुम अद्वयानन्द, शुद्ध, चिन्मान एवं सम्राट् हो, ज्ञान से साम्राज्य को प्राप्त हो गये हो॥५३-५५ ॥ कर्तृत्वादीन् यान्यांसस्त्वयि ब्रह्माद्वये परे॥ तानीदानी विचार्य त्वं किं स्वरूपाणि वस्तुतः॥५६॥ तुम अद्वितीय ब्रह्म मे जो तुम्हें पहिले कर्तृत्व भोक्तृत्व आदि धर्म प्रतीत होते थे उनका अब विचार करो कि वास्तव में उनका क्या स्वरूप है ।। ५६ ॥ अवैव शृणु वृत्तान्तमपूर्व श्रुतिभाषितम् ।। कश्चिद्गन्धारदेशीयो महारत्नविभूपितः ॥५॥ स्वगृहे स्वाङ्गणे सुप्तः प्रमत्तः सन् कदाचन ।। रात्रौ चौरः समागत्य भूषणानां मलेभितः ॥ ५ ॥ बद्ध्वी देशान्तरं चौरैर्नीतः सन् गहने धने॥ भूषणान्यपनृत्यापि बद्धासकरपादकः ॥ ५ ॥ निक्षिप्तो विपिनेऽतीवकुशकण्टकवृश्चिकैः ।। ज्यालव्याघ्रादिभिश्चैव सङकुले तसङ्कटे ॥६०॥ इसी विषय मे छान्दोग्य श्रुति का कहा हुआ अपूर्व इतिहास सुनो-गान्धार (कन्धार ) देश-निवासी, महारत्नी से भूपित, एक पुरुष अपने घर के आँगन मे मत्त होकर सोया था। रात्रि में चोर आया और यह आभूषणों के लोभ से उस पुरुप को पौधफर दूसरे स्थान मे, गहन वन में, ले गया। वहाँ उसके सब आभूषण चोरों ने उतार लिये और हाथ पांव घाँधकर कुश, कास, विच्छू, साँप और - तत्वोपदेशः व्याघ्र आदि से अत्यन्त सड्कल, वृक्षों से परिपूर्ण, वन मे उसे फेंक दिया ॥ ५७-६०." व्यालादिदुष्टसत्वेभ्यो महारण्ये भयातुरः॥ शिलाकण्टकदर्भाद्यर्देहस्य प्रतिकूलकैः ॥ ६१॥.' क्रियमाणे चिलुठने विशीणीङ्गोऽसमर्थः ॥ क्षुत्तडातपयाचग्न्यादिभिस्ततोऽतितापकैः ॥६२ बन्धमुक्तौ तथा देशमाप्तावेव सुदुःखधीः॥ दद कैश्चिदाक्रोशन्नेकस्तत्रैध तस्थिवान् ॥६३ ॥ महारण्य मे सर्प-व्याघ्र आदि दुष्ट जीवो के भय से पीडित, शिला, काटे और कुशों से देह के छिल जाने से जर्जरित, अतएव असमर्थ, अति दुःखदायी भूख-प्यास और शीत-उष्ण से सतप्त, बन्धन से मुक्त होने के लिए और अपने देश जाने के लिए अति व्याकुल एवं बैठे बैठे रोते और पुकारते हुए उसको कई घंटोहियो ने देखा ॥ ६१-६३ ॥ तया रोगादिभिर्वर्गः शत्रुभिदुःखदायिभिः ।। चौरैर्दैहाभिमानाद्यः स्वानन्दधनहारिभिः ॥६॥ ब्रह्मानन्दे प्रमत्तः स्वाज्ञाननिद्रावशीकृतः॥ अद्धस्त्वं बन्धनैर्भागतृष्णाज्यरादिभिटूढम् ॥६५॥ अद्वयानन्दरूपात्त्वां प्रच्याव्यातीवधूर्तकैः ।। दूरनीतोऽसि देहेपु संसारारण्यभूमिपु॥६६॥ सर्वदुःखनिदानेषु शरीरादित्रयेषु च ॥ नानायोनिपु कर्मान्धवासनानिर्मितासु च ॥६७ ।। * बसवं बन्धनोंद भगतृष्णावरादिभिः (१) ५७ तत्त्वोपदेशः प्रवेशिताऽसि सृष्टोऽसि बद्धः स्वानन्ददृष्टितः॥ अनादिकालमारभ्य दुःखं चानुभवन्सदा ॥६॥ गांधार-निकासी की भॉति ब्रह्मानन्द में प्रमत्त (ब्रह्मानन्द की ओर कभी ध्यान न देते हुए) एवं आत्म-अज्ञानरूपी निद्रा के वशीभूत तुम भी दुःखदायी राग-द्रेप आदि शत्रुओ तथा आनन्द रूप धन को हरनेवाले देहाभिमान आदि चोरो के द्वारा भोगेच्छा-ज्वर आदि पन्धनों से दृढ़ वाँधे गये हो। इन धूतों ने तुम्हे अद्वयानन्दं रूप ब्रह्म से गिराकर संसार-रूपी वन मे, मनुष्य आदि के देह मे दूर पदक दिया है। तुम समस्त दु:खों के कारण तीन ( स्थूल, सूक्ष्म, एवं कारण ) शरीरो में हठात् प्रविष्ट कराये गये हो, कर्म-वासना से निर्मित नाना योनियो में पटके गये हो, इसी को आत्मानन्द समझकर बद्ध हुए हेर, अनादि काल से लेकर सदा दुःस का ही अनुभा कर रहे हो।। ६४-६८ ॥ जन्ममृत्युजरादापनर कादिपरम्पराम् ।। निरन्तरं विपए णोऽनुभवन्नत्यन्तशोकयान् ॥६॥ अविद्याभूतबन्धस्य निवृत्तौ दुःखदस्य च ॥ स्वरूपानन्दसम्माप्तो सत्योपायं न लब्धवान् ॥७॥ , जन्म-मृत्यु-जरा प्रादि दोप रूप नरक-परम्परा का निरन्तर भाग करते हुए अतण्य अत्यन्त शोक से व्याकुल हुए तुमने दुःखदायी अविद्यारूपी वन्धन की निवृत्ति के लिए और स्वरूपानन्द की प्रामि के लिए सत्य उपाय का लाभ नहीं किया । ६९-७०॥ पया गान्धारदेशीयश्चिरं दैवाद्दपालुभिः ।। कैश्चित्पान्यैः परिमाप्तैमुक्त दृष्टयादियन्धनः ॥७९॥ r ५८ तत्त्वोपदेशः सः स्वस्यैरुपदिएर पण्डितो निश्चितात्मकः॥ ग्रामाद् ग्रामातरं गच्छन् मेधावी मार्गतत्परः॥७२॥ गत्वा गान्धारदेशं स स्वगृहं प्राप्य पूर्ववत् ॥ बान्धवैः संपरिप्यक्तः मुखीभूत्वा स्थितोऽभयत्॥७३॥ गान्धारवासी वह पुरुष, जिसका वृत्तान्त पहिले कहा जा चुका है, बहुत दिनो तक वहीं पड़ा रहा, अन्त में कुछ दयालु बटोही उसे मिले, उन्होंने उसर्फ नेत्रों की पट्टियाँ एवं हाथों की हथकडियाँ सोल दी; उसे गान्धार जानवाला मार्ग बतलाया। वह पुरप बुद्धिमान था, उसे उनके बतलाए हुए मार्ग में विश्वास हो गया। उसी मार्ग के अनुसार एक प्राम से दृसर ग्राम में जाता हुआ वह गान्धार पहुँचा और अपने घर में जाकर अपन सगे-साथियों से गले मिला और फूला न समाया ॥७१-७३ ।। - त्वमप्येवमनेकेषु दुःखदायिपु जन्मसु ॥ भ्रान्तो दैवाच्छुभे मार्गे जातश्रद्धः सुकर्मकृत् ॥७४॥ वर्णाश्रमाचारपरोऽवाप्तपुण्यमहोदयः । ईश्वरानुग्रहाल्लब्धो ब्रह्मविद् गुरुसत्तमः ॥१५॥ विधिवत्कृतसंन्यासी विवेकादियुतः सुधीः॥ प्राप्तो ब्रह्मोपदेशोऽद्य वैराग्याभ्यासतः परम् ॥७६॥ उसी प्रकार तुम भी दुखदायी अनेक जन्मों मे घूमते हुए दैवयोग शुभ मार्ग में श्रद्धालु होकर शुभ कर्मों में लगे हो, वर्णाश्रम धर्मों के परिपालन से तुम्हारे पुण्यों का उदय हुआ है और ईश्वर की कृपा से तुम्हें ब्रह्मज्ञ गुरु की प्राप्ति हुई है। तुमने विधिवत् सन्यास

तत्त्वोपदेशः
धारण किया, विवेक-वैराग्य आदि के अभ्यास से आज तुम्हे ब्रह्म-
विद्या प्राप्त हुई है।७४-७६ ।।
पण्डितस्तत्र मेधावी युक्तया वस्तु विचारयन् ॥
निदिध्यासनसम्पन्नः प्राप्ता हि त्वं परं पदम् ॥७॥
वेदान्त के श्रवण से तुम पण्डित तथा बुद्धिमान हो गये हो। युत्ति
से आत्म-वस्तु का विचार करके निदिध्यासन से सम्पन्न होकर तुम
परम पद को प्राप्त हो चुके हो ॥७॥
अता ब्रह्मात्मविज्ञानमुपदिष्टं यथाविधि ।
मयाचार्येण ते धीर सम्यक्तव प्रयत्नवान् ॥७॥
भूत्वा विमुक्तवन्धसत्वं छिन्नं द्वैतात्मसंशयः॥
निर्द्वन्द्वा निःस्पृहो भूत्वा विचरस्व यथासुखम् ॥७॥
हे धीर ! इसी लिए मुझ प्राचार्य ने विधिपूर्वक तुम्हारे लिए
ब्रह्मात्म-विज्ञान का उपदेश किया है, अब तुम यन्न से सब बन्धनों
को त्याग कर, द्वैत रूप सशयो का नाश करके, निर्द्वन्द्व और निस्पृह
होकर सुखपूर्वक विचरो ॥ ७८-७६ ॥
वस्तुता निष्प्रपञ्चोऽसि नित्यमुक्तः स्वभावतः॥
नते बन्धविमाक्षी स्तः कल्पिता तो यतस्त्वयि।।८०॥
वास्तव मे तुम प्रपञ्च से रहित हो, स्वभाव ही से नित्य मुक्त
हो, तुम्हारा बन्ध और माक्ष नहीं है, वे तुममे कल्पित है ॥२०॥
न निरोधी न चोत्पत्तिन बद्धो न च साधकः।।
न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥१॥

तत्त्वोपदेशः
न निरोध (प्रलय ) है, न उत्पत्ति ( मृष्टि ) है, न कोई बद्ध है,
न साधक है, न मुमुक्षु है, म मुक्त है-यही परमार्थ है ॥१॥
श्रुति-सिद्धान्त-सारोऽयं तथैव त्वं स्वया धिया ।
संविचार्य निदिध्यास्य निजानन्दात्मकं परम् ॥२॥
साक्षात्कृत्वा परिच्छिन्नाद्वैतब्रह्माक्षरं स्वयम् ॥
जीवन्नेव विनिर्मुक्ता विश्रान्तः शान्तिमाय ॥८३॥
यह सब श्रुतियो का सिद्धान्त है, इसी प्रकार अपनी बुद्धि से
विचार कर, निदिध्यासन कर, निजानन्द रूप, अपरिन्छिन्न अद्वैत,
अक्षर, परब्रह्म का साक्षात्कार कर, जीवनमुक्त एव विश्रान्त होकर
शान्त हो जाओ ||८२-८३ ॥
विचारणीया वेदान्ता वन्दनीयो गुरुः सदा॥
गुरूणां वचनं पथ्यं दर्शनं सेवनंनृणाम् ॥ ४॥
सदा वेदान्त का विचार करना चाहिये और गुरुओ का चन्दन
करना चाहिय, क्योकि मनुष्यो के लिए गुरुओ का पंचन, दर्शन और
सेवन हितकर है ॥ ८४ ॥
गुरुर्ब्रह्म स्वयं साक्षात् सेव्यो वन्द्यो मुमुक्षुभिः ।
नाद्वैजनीय एवायं कृतज्ञेन विवेकिना ।।८।।
गुरु साक्षात्स्वयं ब्रह्म है, अत मुमुक्षुओं को गुरु की सेवा और
वन्दना करनी चाहिये।
कृतज्ञ विवेकी शिष्य द्वारा गुरु को कभी
भी उद्वेग नहीं होना चाहिये ।।८५ ॥
यावदायुस्त्वया वन्द्यो वेदान्तो गुरुरीश्वरः ॥
मनसा कर्मणा वाचा श्रुतेरेवैप निश्चयः ॥८६॥

तत्त्वोपदेशः जय तक तुम जीवित रहो तब तक तुम्हे मन, कर्म एवं वचन से वेदान्त, गुरु तथा ईश्वर का अभिवादन करना चाहिये। यही श्रुति का निश्चय है ॥८६॥ भावाद्वैतं सदा कुर्यात् क्रियाद्वैतं न कहिचित् ।। अद्वैतं विपु लोकेषु नाद्वैतं गुरुणा सह ॥८॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्द- भगवत्पूज्यपादशिप्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृती तत्वोपदेशः समाप्तः. . भाव* (सिद्ध) पदाधों मे सदा अद्वैत की भावना करे, पर साध्य ( क्रिया) में अद्वैत-भावना कभी न करे। सिद्ध पदार्थों में भी गुरु को छोड़कर तीनों लोको मे अद्वैत भावना करं, परन्तु गुरु के साथ अद्वैत-भावना न करे। अर्थात् घट-पट आदि भाव पदार्थों में सदा ये सब ब्रह्म रूप ही हैं-ऐसी भावना करं । लोक-मर्यादा को अक्षुण्ण रसने के लिए सान-पान विवाह-शादी आदि क्रियाओं में व्यवहार अवस्था में-अद्वैत की भावना न कर, क्योंकि ऐसा करने से देना-देखी अज्ञ लोग भी ऐसा ही करने लगेंगे। ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में ब्रह्म से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। उसके सामने वास्तव में भक्ष्य-अभक्ष्य, कोई लोग इसका ऐसा थर्थ करते है- के साथ भाव का यहत करना चाहिये, अधार जैसा गुरु का प्रम- विषयक भाव हो वैसा ही भाव करना चाहिये। गुरु के साथ निया फा पद्धत नहीं करना चाहिये, अर्थात् जैसा गुरु ग्राचरण करे वैपा माचरण नहीं करना पाहिये। यह व्याख्या "ईस्वराणा पयो माहां तथैवाचरितं काचित्" मागत स्कंध० १०, ५०३३, श्लोक १२. के अनुसार की गई है। इन दोनों प्रों में कोन हराम है, इसका विचार इमपाको पर निर्भर करते है। . गुरु . . तचोपदेशः गम्य-भगम्य और मपादय अनुपादेय श्रादि का प्रश्न ही नहीं है। परन्तु व्यवहार-दशा में ग्रंदाज्ञानी को भी इम सरणि का अवलम्ब नहीं फरना चाहिये, क्योंकि ऐसा करना समाज में बड़ा असामसाय पैदा कर सकता है। प्रज्ञानियों के हित के लिए अनादि काल से जो लोक-मर्यादा चली आ रही है, उसमें भारी क्षति पहुँचा मफता है। तीनो लोकों में प्रीत की भावना कर, पर गुरु के साथ अद्वैत भावना म फरे; क्योंकि जब गुरु के साथ में भी ब्रह्म रूप हूँ और गुरु भी ब्रह्म रूप , मुझमें और गुरु में भेद ही क्या है? ऐमी अद्वैत भावना हो जायगी तो सदाचार-प्राप्त अभिवादन, अनुगमन और आज्ञापालन आदि व्यवहारों की उपेक्षा हो जायगी। इसमे सदाचार का उल्लङ्घन, गुरु के प्रति कृतघ्नता तथा लोकापवाद का भय अनिवार्य है।।८७ ॥ इति ప్రములను अपरोक्षानुभूतिः

॥ श्री"
॥अपरोक्षानुभूतिः॥
S
श्रीहरि परमानन्दमुपदेष्टारमीश्वरम् ॥
व्यापकं सर्वलोकानां कारणं तं नमाम्यहम् ॥१॥
परमानन्दरूप, आदि उपदेशक, घटघटव्यापी, सब लोकों के
कारण, भगवान् श्रीहरि को मैं नमस्कार करता हूँ॥१॥
अपरोक्षानुभति मोच्यते मोक्षसिद्धये ॥
सद्भिरेषा प्रयत्नेन वीक्षणीया मुहुर्मुहुः ॥२॥
मोक्ष-सिद्धि के लिए अपरोक्षानुभूति नामक ग्रन्थ का निर्माण
किया जाता है, मोक्षार्थी सज्जनों को चाहिये कि बार बार इसका
पर्यालोचन करे ॥२॥
स्ववर्णाश्रमधर्मेण तपसा हरिताषणात् ।।
साधनं प्रभवेत्युंसां वैराग्यादिचतुष्टयम् ॥३॥
शास्त्र-विहित अपने अपने वर्ण-धर्म और आश्रम धर्मों के अनुष्ठान
रूप तप से श्रीहरि भगवान प्रसन्न होते हैं और उनकी प्रसन्नता से
मनुष्यों को वैराग्य प्रादि चार साधनों की प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥
ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु वैराग्य विषये धनु।।
यथैव काकविष्ठायां वैराग्य तद्धि निर्मलम् ॥४॥

वस्तुनः स
वै॥५॥
.
अपरोक्षानुभूतिः
जैसे काक-विष्ठा में हेय बुद्धि होने के कारण आपामर प्राणि-मात्र
का वैराग्य होना स्वाभाविक है, उसी भॉति ब्रह्मा (हिरण्यगर्भ) से
लेकर स्थावर (वृक्ष) पर्यन्त जीवों के भाग्य पदार्थों में यदि वैराग्य
हो जाय, तो वही सच्चा वैराग्य है ॥४॥
नित्यमात्मस्वरूपं हि दृश्यं तद्विपरीतगम् ॥
एवं यो निश्चयः सम्यग् विवेको
आत्म-स्वरूप नित्य ( अविनाशी ) है, जगत् उसके विपरीत
( विनाशशील ) है, इस प्रकार के दृढ़ निश्चय को घस्तुविवेक
कहते हैं।॥ ५॥
सदैव वासनात्यागः शमोऽयमिति शब्दितः ।।
निग्रहो बाह्यवृत्तीनां दम इत्यभिधीयते ॥ ६ ॥
सदा वासनाओं (भोग्यों के सूक्ष्म संस्कारो) का त्याग करना शम
कहलाता है और बाह्य वृत्तियों का निग्रह दम कहा जाता है॥६॥
विपयेभ्यः परावृत्तिः परमपिरतिहि सा॥
सहनं सर्वदुःखानां तितिक्षा सा शुभा मता ॥७॥
चित्त का समस्त विपयों से विमुस हो जाना ही परम उपरति
है, सकल दुःसो को सहनशीलता—तितिक्षा कही जाती है ॥ ७ ॥
निगमाचार्यवाक्येपु भक्तिः श्रद्धेति विश्रुता॥
चित्तैकाट्य तु मल्लक्ष्ये समाधानमिति स्मृतम् ॥८॥
वेद और आचार्य के पचनों में भक्ति को श्रद्धा कहते हैं । ब्रह्मरूप
सत् लक्ष्य में एक वर्तन से दूसरे बर्तन में गिरती हुई अटूट तेल की
धारा के समान चित्त की एकाग्रता को समाधि कहते हैं॥८॥

अपरोक्षानुभूतिः संसारबन्धनिर्मुक्तिः कय स्यान्मे दयानिधे॥ इति या सुदृढा बुद्धिर्वक्तव्या मा मुमुक्षुता ॥८॥ है दयासागर ! संसाररूपी बन्धनों से मेरी मुक्ति कैसे होगी ? इस प्रकार की सुढ़ भावना को मुमुक्षुता कहना चाहिए ॥ ॥ उक्तसाधनयुक्तेन विचारः पुरुपेण हि ॥ कर्तव्यो ज्ञानसिद्धयर्थमात्मनः शुभमिच्छता ॥१०॥ पूर्वोक्त साधनों से युक्त, अपने मङ्गल की कामनावाले पुरुष को ज्ञान की सिद्धि के लिए विचार करना चाहिए ॥ १० ॥ नात्पद्यते विना ज्ञानं विचारेणान्यसार नैः॥ यया पदार्थभानं हि प्रकाशन विना क्वचित् ॥११॥ जैसे प्रकाश के बिना पदार्थों की प्रतीति कहीं नहीं होती, उसी प्रकार विचार के विना अन्य साधनों से ज्ञान उत्पन्न नहीं होता। अर्थात् विचार करने से ही ज्ञान होता है, अत: मुमुक्षु के लिए विचार करना परम आवश्यक है ॥ ११ ॥ केोऽहं कथमिदं जातं को वा कर्तास्य विद्यते ॥ उपादानं शिमस्तीह विचार: सोऽयमीदृशः ।।१२।। यह जगत् कैसे उत्पन्न हुआ ? इसका कौन रचयिता है ? और कौन उपादान कारण है ? इस प्रकार का विचार ही विचार कहा जाता है ।। १२ ।। नाहं भूतगणो देहो नाहं चाक्षगणस्तथा।। एतद्विलक्षणः कश्चिद्विचारः सेोऽयमीद्वशः ॥१३॥ - मैं कौन हूँ?

१८ अपरोक्षानुभूतिः मैं भूतो (पृथिवी आदि पञ्च महाभूतों) का समूह नहीं हूँ, न देह हूँ, न चक्षु आदि इन्द्रियों का समूह ही हूँ; किन्तु मैं इन सब से विलक्षण (भिन्न-स्वभाव ) कोई हूँ, इस प्रकार के विमर्श को विचार कहते हैं ॥ १३ ॥ अज्ञानप्रभवं सर्व ज्ञानेन प्रविलीयते ॥ संकल्पो विविधः कर्ता विचार: सोऽयमीदृशः॥१४॥ यह सारा जगत् अज्ञान से उत्पन्न हुआ है, ज्ञान से इसका लय हो जाता है, अनेक प्रकार का सङ्कल्प ही इसका कर्ता है, इत्यादि विमर्श विचार कहलाता है ॥ १४ ॥ एतयोर्यदुपादानमेकं सूक्ष्मं सदव्ययम् ॥ यथैव मृद्धटादीनां विचारः सेोऽयमीदृशः ॥१५॥ जैसे मृत्तिका घट आदि का उपादान ( कारण ) है, वैसे ही अविनाशी, सूक्ष्म एवं अखण्ड सत् अर्थात् ब्रह्म, स्थूल और सुक्ष्म दोनों प्रकार के जगत् का उपादान है, इस प्रकार के विमर्श को विचार कहते हैं ॥ १५॥ अहमेकाऽपिसूक्ष्मश्च ज्ञाता साक्षी सदव्ययः॥ तदहं नात्र संदेहो विचार: सोऽयमीदृशः ॥१६॥ सवका ज्ञावा, साक्षी, सूक्ष्म, अखण्ड एवं अविनाशी जो ब्रह्म है, वही मैं हूँ, इसमे कोई सन्देह नहीं है, यही विचार का है।॥१६॥ मात्मा विनिष्कलो हो को देहो घहुभिरावृतः॥ तयोरैक्यं प्रपश्यन्ति किमज्ञानमतः परंम् ॥१७॥ . स्वरूप

,
क
अपरोक्षानुभूतिः
प्रात्मा निरवयव (अखण्ड ) एवं एक है, देह बहुत सी वस्तुओं
का समुदाय है, तो भी लोग उन दोनों को एक मानते हैं, इससे
बढ़कर अज्ञान क्या होगा? ॥१७॥
मात्मा नियामकरवान्तदेही नियम्यवाह्यकः ।।
तयोरैक्यं प्रपश्यन्ति किमज्ञानमतः परम् ॥१८॥
आत्मा नियामक (प्रेरक ) एवं अन्तरङ्ग है, देह नियम्य (प्रेर्य)
एवं बाह्य है, तथापि लोग उन दोनों में एकता का अनुभव करते हैं,
इससे बढ़कर अज्ञान क्या होगा ? ॥१८॥
मात्मा ज्ञानमयः पुण्यो देहो मांसमयोऽशुचिः।।
तयारक्यं प्रपश्यन्ति किमज्ञानमतः परम् ॥१८॥
आत्मा ज्ञानमय एवं पवित्र है, देह मांसमय और अशुचि है ।
इतना बैलत्तण्य होते हुए भी लोग आत्मा और देह की एकता का
अनुभव करते हैं, इससे बढ़कर अज्ञान क्या होगा ? ॥१६॥
प्रात्मा प्रकाशक: स्वच्छो देहोतामस उच्यते ॥
तयारैक्यं प्रपश्यन्ति फिमज्ञानमतः परम् ॥२०॥
आत्मा प्रकाशक और स्वच्छ है, देह तामस कहा जाता है, तो
भी उन दोनों की एकता का अनुभव करते है, इससे बढ़कर अज्ञान
क्या हो सकता है ? ॥२०॥
मात्मा नित्यो हि सद्रूपी देहेऽनित्या हसन्मयः ।।
तयारक्यं प्रपश्यन्ति किमज्ञानमतः परम् ॥२१॥

.
अपरोक्षानुभूतिः
आत्मा नित्य और सद्प है, देह अनित्य और असद्प है,
तो भी उन दोनों की एकता का अनुभव करते हैं, इससे बढ़कर
अज्ञान क्या होगा ? ॥ २१ ॥
मात्मनस्तत्प्रकाशत्वं यत्पदार्थावभासनम् ॥
नाग्न्यादिदीप्तिवद्दीप्तिर्भवत्यान्ध्यं यतो निशि ॥२२॥
जिससे सकल पदार्थों का भान होता है, वही आत्मा का प्रकाश
है, सूर्य अग्नि के प्रकाश के समान उसका प्रकाश नश्वर नही है,
किन्तु वह हमेशा एकतार रहता है। सूर्य का प्रकाश दिन मे रहता
है, रात्रि में नहीं, इसी से रात में अन्धकार हो जाता है। परन्तु
परमात्मा का प्रकाश ऐसा नहीं है।॥ २२॥
देहोऽहमित्ययं मूढो मत्वा तिष्ठत्यहा जनः ।।
ममायमित्यपि ज्ञात्वा घटद्रष्टेव सर्वदा ॥२३॥
जैसे घट को देखनेवाला पुरुष घट को अपने से भिन्न देखता
है, वैसे ही यह देह मेरा है, इस प्रकार देह को अपने से भिन्न
देखता हुआ भी मूर्ख 'मैं ब्राह्मण हूँ' इस प्रकार देह ही को आत्मा
समझ बैठता है, यह बड़े आश्चर्य की बात है ॥ २३ ॥
ब्रह्मैवाहं समः शान्तः सच्चिदानन्दलक्षणः ।।
नाहं देहो ह्यसदूपो ज्ञानमित्युच्यते बुधैः ॥२४॥
मैं सर्वत्र सम, शान्त, सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म ही हूँ, असद्-
रूप देह नहीं हूँ, पण्डित लोग इसको ज्ञान कहते हैं ॥ २४ ॥
निर्विकारो निराकारो निरवद्योऽहमव्ययः॥
नाहं देही ह्यसद्रूपो ज्ञानमित्युच्यते घुधैः ॥२५॥

.. अपरोक्षानुभूतिः मैं निर्विकार, निराकार, निर्दोष और अव्यय हूँ; असत् रूप देह मैं नहीं हूँ; पण्डित लोग इसको ज्ञान कहते हैं ॥ २५ ॥ निरामया निराभासो निर्विकल्पोऽहमाततः ॥ नाहं देहो हसदूपो ज्ञानमित्युच्यते बुधैः ॥२६॥ मैं निरामय (नीरोग) हूँ, निराभास हूँ, निर्विकल्प हूँ, आतत ( व्यापक ) हूँ, मैं असन् रूप देह नहीं हूँ; पण्डित लोग इसे ज्ञान कहते हैं॥ २६ ॥ निगुणा निष्क्रिया नित्या नित्यमुक्तोऽहमच्युतः॥ नाहं देहो ह्यमदूपी ज्ञानमित्युच्यते बुधैः ॥२७॥ मैं निर्गुण हूँ, निष्क्रिय हूँ, नित्य हूँ, नित्यमुक्त हूँ, अच्युत हूँ, असत् रूप देह नही हूँ; पण्डित लोग इसको ज्ञान कहते हैं ॥२७॥ निर्मला निश्चलोऽनन्तः शुद्धोऽहमजरोऽमरः ।। नाहं देहो यमदूपो ज्ञानमित्युच्यते बुधैः ॥२८॥ मैं निर्मल हूँ, निश्चल हूँ, अनन्त हूँ, शुद्ध हूँ, अजर हूँ, और अमर हूँ, असत् रूप देह नहीं हूँ; पण्डित लोग इसको ज्ञान कहते हैं ॥२८॥ स्वदेहं शोभनं त्यक्त्वा पुरुषाख्यञ्च सम्मतम् ॥ किं मूर्ख शून्यमात्मानं देहातीतं करोपि भाः॥२६॥ श्रुतियों से सम्मत, सुन्दर, पुरुष नामक,सतरूप स्वदेह को छोड- कर हे मूर्स ! तू देहातिरिक्त शून्य आत्मा को क्यो मानता है ? ॥२६॥ 9 इस श्लोक में देहात्मवादी की ओर से शङ्का की गई है। निम्न- लिखित श्लोको में उक्त शङ्का का निरास किया गया है।

" - अपरोक्षानुभूतिः स्वात्मानं शृणु मूर्प त्वं श्रुत्या युक्त्या च पूरुपम् ।। देहातीतं सदाकारं सुदुर्दशं भवादृशाम् ॥३०॥ हे मूर्य! तू अपने प्रात्मा को मुन। यह श्रुतियों और युक्तियों से सिद्ध, देहातिरिक्त और सत् रूप है, तुम्हारं सदृश मूर्स लोग उसका दर्शन नहीं कर सकते ॥ ३० ॥ अहं शब्देन विख्यात एक रप स्थितः परः। स्यूलत्यान्नकतां प्राप्तः कर्य स्वाहकः मुमान् ॥३१॥ फेवल एक ही परमात्मा वेदों में अहं शब्द मे विख्यात है, देह स्थल होने के कारण उससे अभिन्न नहीं हो सकता, अत. देह पुरुष रूप कैसे कहा जा सकता है ? ॥ ३१ ।। अहं द्रष्टतया सिद्धो देहो दृश्यतया स्थितः ।। ममायमिति निर्देशात् कर्य स्यादेहकः पुमान् ॥३२॥ मैं द्रष्टा रूप से सिद्ध हूँ, देह दृश्य रूप से वर्तमान है, क्योंकि यह मेरा शरीर है, इस तरह का व्यवहार होता है; अत: देह पुरुप कैसे हो सकता है १ ॥ ३२ ।। अहं विकारहीनस्तु देहो नित्यं विकारवान् ॥ इति प्रतीयते साक्षात् कथं स्याद्देहकः पुमान् ॥३३॥ मैं निर्विकार हूँ, देह नित्य विकार को प्राप्त होता है; जब ऐसी साक्षात् प्रतीति होती है तो कुत्सित (मलमूत्र से भरा हुआ) देह पुरुष (आत्मा) कैसे हो सकता है ? ॥ ३३ ॥ यस्मात्परमिति श्रुत्या तया पुरुषलक्षणम् ॥ विनिर्णीतं विशुद्धन कथं स्यादेहकः पुमान् ॥३४॥ ne सर्व पुरुष अपरोक्षानुभूतिः क्योंकि उपनिपदों में जहाँ तहाँ 'परम्' 'परम्' इस श्रुति ने देह प्रादि धर्मों के लक्षण्य से पुरुप के लक्षण का निर्णय किया है। अर्थात् जो परम है, देहादि के धर्मों से परे है, वही पुरुष है, ऐसा श्रुति ने प्रतिपादन किया है, इसलिए कुत्सित देह पुरुप कैसे हो सकता है ? ॥ ३४ ॥ एवेति सूक्त पुरुषसंक्षिते ।। अप्युच्यते यतः श्रुत्या कथं स्यादेहकः पुमान् ॥३५॥ पुरुषसूक्त को "पुरुष एवेद सर्वम्" इस श्रुति ने भी पुरुप सर्वात्मा है-ऐसा कहा है, फिर देह पुरुप कैसे हो सकता है ? ॥ ३५ ॥ प्रसङ्गः पुरुपः प्रोक्तो बृहदारण्यकेऽपि च ।। अनन्तमलसंसृष्टः कथं स्याद्देहकः पुमान् ॥३६॥ बृहदारण्यक मे भी पुरुष को प्रसङ्ग ( अन्य संसर्गरहित ) कहा है,तो अनन्त मलो से भरा हुआ देह पुरुष कैसे हो सकता है ? ।। ३६ ॥ तत्रैव च समाख्यातः स्वयं ज्योतिर्हि पूरुषः ।। जडः परप्रकाश्योऽयं कथं स्याद्देहकः पुमान् ॥३७॥ वहीं पर पुरुष स्वयंज्योति ( स्वप्रकाश ) कहा गया है; अचेतन एवं सूर्य आदि से प्रकाशित होनेवाला यह देह पुरुष कैसे हो सकता है ? ॥ ३७॥ मोक्तो हि कर्मकाण्डेन ह्यात्मादेहाद्विलक्षणः॥ नित्यश्व तत्फलं भुङक्त देहपातादनन्तरम् ॥३८॥ कर्मकाण्ड ने भी आत्मा को देह से विलक्षण एवं नित्य बतलाया है। और वही देह के नष्ट हो जाने के बाद यज्ञ आदि के फल का .

७४
,
अपरोक्षानुभूतिः
उपभोग करता है। यदि देह को ही आत्मा मानो तो "स्वर्गकामः
सोमेन यजेत" इत्यादि श्रुतियों से प्रतिपादित तत् तत् यज्ञ करने से
जायमान स्वर्ग प्रादि सुस का उपभोक्ता कौन रह जायगा ? शरीर
तो अब रहा नहीं, रास का ढेर हो गया है, अत: मानना पड़ेगा कि
देह से अतिरिक्त आत्मा है और वह अविनाशी है ॥ ३८॥
लिङ्गं चानेकसंयुक्तं चलं दृश्यं विकारि च ॥
अव्यापकमसद्रूपं तत्कथं स्यात्पुमानयम् ॥३॥
लिङ्ग देह भी अनेक पदार्थों के संयोग से बना है, विनाशो है,
जड़ है, विकारी है, अव्यापक एवं असद्रूप है, इसलिए वह भी पुरुष
कैसे हो सकता है ? ॥ ३६ ।।
एवं देहद्वयादन्य आत्मा पुरुष ईश्वरः ॥
सर्वात्मा सर्वरूपश्च सर्वातीतोऽहमव्ययः॥४०॥
इस तरह दोनों-स्थूल एवं सूदम-देहो से विलक्षण-आत्मा
कहिये, पुरुष कहिये या ईश्वर कहिये-कोई है। वही घट-घट-
व्यापी, सर्वरूप होता हुआ भी सब से पृथक् एवं अविनाशी
मैं हूँ॥४०॥
इत्यात्मदेहमानेन प्रपञ्चस्यैव सत्यता॥
ययोक्ता तर्कशास्त्रैण ततः किं पुरुपार्थता ॥४१॥
देह को आत्मा मानकर तर्कशास्त्र ने जो प्रपञ्च की सत्यता कही
है, उससे कौन पुरुषार्थ सिद्ध हुआ? ॥ ४१ ॥
इत्यात्मदेहभेदेन देहात्मत्वं निवारितम् ॥
इदानी देहिभेदस्य ह्यसत्वं स्फुटमुच्यते ॥४२॥

अपरोक्षानुभूतिः पूर्वोक्त रीति से देह और आत्मा मे परस्पर भेद सिद्ध हो जाने से देहात्म-वाद का सण्डन हो चुका । अब देही (जीव) के भेद की असत्यता स्पष्टतया कही जाती है, अर्थात् 'देहो' (जीवात्मा) आत्मा (परमात्मा ) से भिन्न है, इस बात की असत्यता का प्रतिपादन किया जाता है ॥ ४२ ॥ चैतन्यस्यैकरूपत्वाद् भेदो युक्तो न कर्हिचित् ॥ जीवत्वं च मृपा ज्ञेयं रज्ज्यां सर्पभ्रमो यथा ॥४३॥ देही ( जीवात्मा) मे परमात्मा का भेद कदापि युक्ति-युक्त नहीं है, क्योंकि वे दोनो चैतन्य स्वरूप हैं। यदि कहो कि जीवात्मा में जीवत्व आदि विरुद्ध धर्म है, सो ठीक नहीं, कारण कि जीवात्मा में जीवत्व वास्तविक नहीं है, किंतु रज्जु मे सर्प के भ्रम की भाँति अज्ञान कल्पित है। यहाँ पर ऐसा अनुमान किया जाता है- जीवात्मा परमात्मा से अभिन्न है, कारण कि वह चैतन्य रूप है, जो जो चैतन्य रूप है, वह परमात्मा से अभिन्न है, जैसे परमात्मा चैतन्य स्वरूप होने के कारण परमात्मा से अभिन्न है, ऐसा ही यह ( जीवात्मा ) भी है, अतएव इसका और परमात्मा का अभेद अवश्य है। यदि कहो कि-जीवात्मा परमात्मा से भिन्न है, क्योंकि उसमे जीवत्व आदि विरुद्ध धर्म हैं, जो विरुद्ध धर्माश्रय होता है, वह भिन्न होता है, जैसे-घोडे से गाय विरुद्ध धर्माश्रय होने के कारण भिन्न है, वैसे ही यह भी है, अत: उससे भिन्न है, इस प्रकार के अनुमान * जीवारमा परमात्मनोऽभिन्न चैतन्यकरूपवात् , यो यश्चैतन्यैकरूप स स परमात्मनेाऽभिन्न , यथा परमात्मा, तथा चायमतस्तथा । न च जीवात्मा परमात्मना भित्र जीवस्वादिविरुद्धधर्मत्वात्, यो यो विरुद्वधर्माश्रय. स वतो भिद्यते यथा गौरवात् तथा चायमतस्तथेति वक्तुं शक्यते, जीवत्वस्य . , तनावास्तववाद।

, अपरोक्षानुभूतिः से भेद की सिद्धि हो जायगी, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि वहाँ पर जीवत्व मिथ्या है ॥४३॥ रज्ज्वज्ञानात् क्षणेनैव यद्वद्रज्जुर्हि सर्पिणी ॥ भाति तद्वचितिः साक्षाद् विश्वाकारण केवला॥४४॥ यह रज्जु है, ऐसा रज्जुविषयक ज्ञान न होने से जिस प्रकार रज्जु ही क्षण भर में सर्पिणी बन जाती है, रज्जु में साँप का भ्रम हो जाता है, वैसे ही चिति ( चैतन्य-ब्रह्म ) के अज्ञान से केवल चिति ही विश्व के आकार मे परिणत होती है, चिति में ही विश्व का भ्रम होता है। वास्तव मे चिदि से पृथक कुछ भी नहीं है ।। ४४ ।। उपादानं प्रपञ्चस्य ब्रह्मणोऽन्यन्न विद्यते ॥ तस्मात्सर्वप्रपञ्चोऽयं ब्रह्मवास्ति न चेतरत् ॥४५॥ इस जगत् रूप प्रपञ्च का उपादान ( कारण ) ब्रह्म से अतिरिक्त कोई नहीं है, इसलिए यह सारा प्रपञ्च ब्रह्मस्वरूप ही है; उससे अतिरिक्त नहीं है ॥ ४५ ॥ व्याप्यव्यापकता मिथ्या सर्वमात्मेति शासनात् ।। इति ज्ञाते परे तत्त्वे भेदस्यावसरः कुतः ॥४६॥ जगत् एवं ब्रह्म का व्याप्य व्यापक भाव मिथ्या है, क्योंकि शास्त्र । कहता है-इस जगतीतल मे जो कुछ है, वह सव ब्रह्म ही है जगत् व्याप्य है, ब्रह्म व्यापक है-ऐसा व्यवहार इन दोनों के बीच मै भेद सिद्ध होने से हो सकता है परन्तु भेद तो है नहीं, और अभेद में ऐसा व्यवहार कदापि नहीं हो सकता। इस प्रकार परम तत्व को जान लेने पर भेद का अवकाश ही कहाँ है? ॥ ४६ ।। . -

७७
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अपरोक्षानुभूतिः
श्रुत्या निवारितं नूनं नानात्वं स्वमुखेन हि ॥
कर्श भासी भवेदन्यः स्थिते चाद्वयकारणे ॥४७॥
'नेह नानास्ति किञ्चन' इस श्रुति ने श्रीमुख से नानात्व ( भेद)
का निषेध किया है। अद्वैत-प्रतीति के कारणों के रहते हुए द्वैत का
भान कैसे हो सकता है ? ॥ ४७ ।
दोषोऽपि विहितः श्रुत्या मृत्योर्मृत्यु स गच्छति ॥
इह पश्यति नानात्वं मायया वञ्चिता नरः ॥४८॥
'मृत्यो स मृत्युमाप्नोति' इस श्रुति ने भेद-दर्शन मे दोष का
विधान किया है जो माया-ञ्चित पुरुष ब्रह्म मे नानात्व ( भेद)
देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है ।। ४८ ।।
ब्रह्मणः सर्वभूतानि जायन्ते परमात्मनः ॥
तस्मादेतानि ब्रह्मैव भवन्तीत्यवधारयेत् ॥४८
परमात्मस्वरूप ब्रह्म से सब जीव उत्पन्न होते हैं, इसलिए ये
सब ब्रह्म ही हैं-ऐसा निश्चय करना चाहिए ॥ ४६॥
ब्रह्मैव सर्वनामानि रूपाणि विविधानि च ॥
कर्मायपि समयाणि विभीति श्रुतिर्जगौ ॥५०॥
ब्रह्म हो सब नामा, विविध रूपो एवं नाना कर्मों को धारण करता
हे-ऐसा श्रुति ने कहा है ॥ ५० ॥
सुवर्णाज्जायमानस्य सुवर्णत्वञ्च शाश्वतम् ॥
ब्रह्मणो जायमानस्य ब्रह्मत्वं च तया भवेत् ॥५१॥

. अपरोक्षानुभूति जैसे सोने के चने हुए फटक-कुण्डल आदि आभूपणो में सुवर्णता का अपलाप कभी नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार ब्रह्म से जाय- मान इस ससार रूप प्रपञ्च की ब्रह्मता भी अक्षय है ।। ५१ ।। स्वल्पमप्यन्तरं कृत्वा जीवात्मपरमात्मनाः ॥ योऽवतिष्ठति मूढात्मा भयं तस्याभिभाषितम् ॥५२॥ जो मूर्स जीवात्मा एवं परमात्मा में तनिक भी भेद मानता हे, उसके लिए श्रुति ने जन्म-मरण का भय कहा हे ॥ ५ ॥ यत्राज्ञानाद्भवेद्रुतमितरस्तन पश्यति॥ आत्मत्वेन यदा सर्व नेतरत्तत्र चावपि ॥५३॥ जिस अवस्था में अज्ञान से द्वैत-बुद्धि रहती है, वहीं पर एक दूसर को देखता है, जब सारे जगत् को ब्रह्मभाव से देखने लगता है तव अणुमान भी दूसरा नहीं है। अर्थात् द्वैत का एकमान कारण अज्ञान है, उसके निवृत्त होने पर द्वैत स्वत निवृत्त हो जाता है और सारा प्रपञ्च ब्रह्मरूप से भासने लगता है ॥ ५३ ॥ यस्मिन् सर्वाणि भूतानि ह्यात्मत्वेन विजानतः॥ वै तस्य भवेन्माहो न च शोकाऽद्वितीयतः॥५४॥ जब ब्रह्मज्ञानी मनुष्य समस्त प्राणियों को ब्रह्मरूम जान लेता है, तव अद्वैत होने से उसे न शोक होता है, न मोह, क्योकि शोक-मोह आदि द्वैत होने से ही हो सकते हैं, अद्वैत में शोक-मोह के लिए स्थान हा कहा है ? तब न मिन है, न शनु, न सयाग है, न वियोग ।। ५४ ।। अयमात्मा हि ब्रह्मैव सर्वात्मकतया स्थितः। इति निर्धारितं श्रुत्या वृहदारण्यकस्थया ॥५॥ . .

७६ अपरोक्षानुभूतिः बृहदारण्यकस्थ अति ने यह निर्णय किया है कि यह प्रत्य- गात्मा हो ब्रह्म है और यही सर्वस्वरूप है ।। ५५ ॥ अनुभूताप्ययं लोको व्यवहारक्षमाऽपि सन् ॥ असद्रूपो यथा स्वम उत्तरक्षणवाधतः ॥५६ ॥ जैसे स्वप्न का जगत् अनुभव का विषय होता हुआ भी, व्यवहार में समर्थ होता हुआ भी, असत् रूप है, क्योंकि जामत्काल में उसका बाध है, वैसे ही यह जाग्रत् अवस्था का जगत् भी भले ही अनुभव का विषय हो और भले ही व्यवहार-समर्थ हो, पर है असत्य, क्योंकि वनकाल में इसका बाध हो जाता है ॥ ५६ ।। स्वप्नो जागरणेऽलीकः स्वप्नेऽपि न हि जागरः॥ द्वयमेव लये नास्ति लयेोऽपि भयान च ॥५७॥ जाग्रत्-अवस्था मे स्वप्न-जगत् मिथ्या हो जाता है, स्वप्न मे जाग्रत् नही रहता और सुषुप्ति-अवस्था मे दोना नहीं रहते; स्वप्न और जाप्रत् मे सुपुप्ति भी नही रहती ।। ५७ ॥ त्रयमेव भवेन्मिय्या गुणवयविनिर्मितम् ॥ अस्य द्रष्टा गुणातीतो नित्यो ह्ये कश्चिदात्मकः॥५॥ सत्व, रज और तम से विनिर्मित ये पूर्वोक्त तीनो लोक मिथ्या कल्पित हैं। सत्त्व आदि तीनो गुणों से परे, अविनाशी, अद्वितीय और आनन्दरूप ब्रह्म इनका साक्षी है ।। ५८ । यद्वन्मृदि घटनान्तिं शुक्तौ वा रजतस्थितिम् ॥ तद्वब्रह्मणि जीवत्वं भ्रान्त्या पश्यति न स्वतः॥५६॥ .

। अपरोक्षानुभूति जैसे मिट्टी मे घड़े का भ्रम होता है या सीप मे चाँदी की भ्रान्ति होती है, वैसे ही प्रज्ञान से ब्रह्म में जीयत्व का भान होता है; वास्तव में ब्रह्म में जीन-भाव नहीं है ॥ ५४॥ यथा मृदि घटो नाम कनके कुण्डलाभिधा॥ शुक्ती हि रजतख्याति वशब्दस्तथा परे॥६० ॥ जैसे मिट्टी में घडा, सोने में कुण्डल और सीप में चाँदी केवल नाम-मात्र हैं, वस्तुत. घड़ा, कुण्डल और चॉदी क्रम से मिट्टी, सोना और सीप से अतिरिक्त नहीं हैं, किन्तु तद्रूप ही हैं, उसी प्रकार पर- ब्रह्म मे जीव भी नाम मात्र है ।। ६० ।। यथा व्योमनि नीलत्वं यथा नीरं मरुस्थले । पुरुपत्वं यथा स्याणातद्विश्वं चिदात्मनि ॥ ६१ ॥ जैसे नीरूप अाकाश में नीलिमा मालूम होती है, जैसे जल-शून्य मर-प्रदेश मे हरिण को जल के तालाव के तालाब दिखाई देते हैं, जैसे सम्भे में मनुष्य की भ्रान्ति होती है, ठीक उसी प्रकार चेतन आत्मा मे विश्व का भ्रम होता है। अर्थात् जैसे नीलिमा, जल और पुरुषत्व कम से आकाश, मरुभूमि और सम्भे मे अज्ञान से कल्पित और मिथ्या हैं, उसी भॉति चिदात्मा में विश्व भी अज्ञान-कल्पित और मिथ्या है ॥ ६१ ॥ ययैव शून्ये वेतालो गन्धर्वाणां पुरं यथा ॥ ययाकाशे द्विचन्द्रत्वं तद्वत्सत्ये जगस्थितिः ॥६२॥ जैसे शून्य स्थान मे वेताल की स्थिति, आकाश मे गन्धवों के नगर और दो चन्द्रमा की स्थिति मनगढन्त एवं निराधार है, उसी प्रकार सत्य { प्रात्मा ) मे संसार की स्थिति भी भ्रममूलक है। - . अपरोक्षानुभूतिः अर्थात् जैसे पूर्वोक्त वेताल आदि अलीक एवं असम्भूत पदार्थ हैं, उसी प्रकार यह जगत् भी अलीक एवं असम्भूत है, पर अज्ञानवश हम लोग इसे सत्य-सा देखते हैं, वास्तव में यह कुछ नही है ॥ ६२ ।। यथा तरङ्ग कल्लोलैर्जलमेव स्फुरत्यलम् ॥ पात्ररूपेण तानं हि ब्रह्माण्डौघैस्तयात्मता॥३॥ जैसे छोटी-बड़ी लहरों से केवल जल ही अभिव्यक्त होता है, क्योंकि जल के अतिरिक्त तरङ्गो में और है ही क्या ? जिसका कि वे प्रत्यायन करे, घट आदि पात्रो के रूप से ताँबा ही अभिव्यक्त होता है, क्योकि तौवे के घड़े मे ताँबे से अतिरिक्त और क्या है ? उसी प्रकार ब्रह्माण्ड-समूह से आत्मा का ही स्फुरण होता है ॥ ६३ ॥ घटनाम्ना यथा पृथ्वी पटनाम्ना हि तन्तवः॥ जगन्नाम्ना चिदाभाति जयं तत्तदभावतः॥६४ ॥ जैसे पृथिवी ही 'घ' नाम से एवं तन्तु हो 'पट' नाम से प्रवीत होते हैं, उसी प्रकार चित् ( ब्रह्म ) ही 'जगत्' नाम से प्रतीत होता है; इस बात को घट-पट आदि तत् तत् कार्यों के लय-चिन्तन से जानना चाहिए ॥ ६४॥ सर्वोऽपि व्यवहारस्तु ब्रह्मणा क्रियते जनैः॥ अज्ञानान्न विजानन्ति मृदेव हि घटादिकम् ॥६॥ जैसे मिट्टी ही घट आदि के द्वारा जलानयन आदि कार्य करती है, उसी प्रकार यह सारा व्यवहार ब्रह्मा से ही मनुष्यों के द्वारा किया जाता है, परन्तु अज्ञाननश लोग उसे जानते नहीं ॥६५॥ कार्यकारणता नित्यमास्ते घटमृदोर्यया । तथैव श्रुतियुक्तिभ्यां प्रपञ्चब्रह्मणोरिह ।। ६६ ॥ - ८२ अपरोक्षानुभूतिः जैसे घट और मृत्तिका का कार्य-कारण भाव नित्य है, वैसे ही प्रपञ्च (जगत् ) और ब्रह्म का नित्य कार्य-कारणभाव अति तथा युक्ति के द्वारा निश्चित है ॥६६॥ गृह्यमाणे घटे यद्वन्मृत्तिका भाति वै बलात् । वीक्ष्यमाणे प्रपञ्चेऽपि ब्रह्मेवाभाति भासुरम् ॥६॥ घड़े को हाथ में लेकर सूक्ष्म रीति से देसने पर भी जैसे हठात् मिट्टी का ही भान होता है, वैसे ही प्रपञ्च को विचारपूर्वक देखने पर केवल प्रकाश रूप ब्रह्म ही भासता है॥६॥ सदैवात्मा विशुद्धोऽपि ह्यशुद्धोभाति वै सदा॥ यथैव द्विविधारज्जु निनोऽज्ञानिनोनिशम्॥६॥ जैसे एक ही रज्जु, ज्ञानी को रज्जु रूप से और अज्ञानी को, जिसे यह रज्जु है, ऐसा ज्ञान नहीं हुआ उसको-सर्प रूप से प्रतीत होती है, वैसे ही सदा विशुद्ध आत्मा अज्ञानी को अशुद्ध प्रतीत होता है ।। ६८॥ तथैव मृण्मयः कुम्भस्तद्वद्देहोऽपि चिन्मयः॥ मात्मानात्मविभागोऽयं मुधैव क्रियते बुधैः ॥६॥ जैसे घडा मृण्मय है-मिट्टो का बना हुआ है, उसी प्रकार देह भी चिन्मय है-ब्रह्ममय है, अर्थात् ब्रह्म से बना है, विद्वान् लोग आत्मा और अनात्मा का विभाग वृथा ही करते हैं, क्योंकि विभाग दो पदार्थो मे होता है, जब सब प्रात्मरूप ही है आत्मा से अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, तब विभाग कैसा ? ॥ ६६ ।। सर्पत्येन यया रज्जू रजतत्वेन शुक्तिका ।। विनिर्णीता विमूढेन देहत्वेन तथात्मता ॥७०॥ . .

अपरोजानुभूतिः
जैसे रज्जु और शुक्तिका को-यह रज्जु है-इस बुद्धि से रज्जु
को और यह शुक्तिका है-इस बुद्धि से शुक्तिका को-न जानने.
वाला पुरुष रज्जु को सर्प और शुक्तिका को रजत समझ बैठता है,
उसी प्रकार तत्तज्ञान-विमुख मूर्ख आत्मा को देह समझ बैठा है;
अर्थात् आत्मा का देहरूप से निर्णय कर लेता है।।७।।
घटत्वेन यथा पृथ्वी पटत्वेनैव तन्तवः ॥
विनिर्णीता विमूढेन देहत्वेन तथात्मता ॥१॥
जैसे पृथिवी का घट रूप से और सूत का पट रूप से लोग
निर्णय करते हैं, अर्थात् जैसे मिट्टी को घड़ा एवं सूत को कपड़ा
कहते हैं, उसी प्रकार मूर्ख ने आत्मा का देह रूप से निर्णय
किया है॥७१॥
कनक कुण्डलत्वेन तरङ्गत्वेन वै जलम् ॥
विनिीता विमूढेन देहत्वेन तयात्मता ॥ ७२ ।।
जैसे लोग सुवर्ण का कुण्डल रूप से एवं जल का तरङ्ग रूप से
निश्चय करते हैं, उसी प्रकार मूर्ख ने आत्मा का देह रूप से निश्चय
किया है।॥७२॥
पुरुषत्वेन वै स्थाणुर्जलत्येन मरीचिका ॥
विनिर्णीता विमूढेन देहत्वेन तथात्मता ॥७३॥
जैसे सम्भे का पुरुष (चोर ) रूप से एवं मृग-तृष्णा का जल
म्प से निर्णय किया जाता है, उसी प्रकार मूर्स ने प्रात्मा का देह
रूप से निर्णय किया है॥ ७३ ॥
गृहत्वेनैव काठानि खङ्गत्वेनैव लोहता ।।
विनिणोंता विमूढेन देहत्वेन तयात्मता ॥७॥

अपरोक्षानुभूतिः जैसे काष्ठो का गृह रूप से और लोहा का वलवार रूप से निर्णय किया जाता है, उसी प्रकार मूर्स ने आत्मा का देह रूप से निर्णय किया है ॥ ७४॥ यथा वृक्षविपर्यासो जलाद्भवति कस्यचित् ॥ तददात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥७॥ जैसे जल रूप दोप से किसी आदमी को पेड उलटे दिसाई देते हैं, अर्थात् जैसे जल में प्रतिविम्वित पेड उलटे दिसाई देते हैं, उसी प्रकार अज्ञान-वश मूर्स आत्मा मे देहत्व की प्रतीति करता है॥७॥ पोतेन गच्छतः पुरुः सर्व भातीव चञ्चलम् ॥ तद्वदात्मनि देहत्त्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥ ७६ ॥ जैसे जहाज से यात्रा करते हुए मनुष्य को निकटवर्ती सभी वस्तुएँ चलती सी मालूम होती है, उसी प्रकार अज्ञान-वश मूर्स प्रात्मा में देहत्व को देसता है ॥ ७६ । पीतत्वं हि यथा शुभ्र दोपाद् भवति कस्यचित् ॥ तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥ ७ ॥ जैसे कॉमला आदि दोप से किसी मनुष्य को सफेद वस्तु पीली दिखाई देती है, उसी प्रकार अज्ञान के योग से मूर्स आत्मा में देहत्व की प्रतीति करता है॥ ७७ ॥ चक्षुभ्यां भ्रमशीलाभ्यां सर्व भाति भ्रमात्मकम् ॥ तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥ ८ ॥ ,

अपरोक्षानुभूति
जैसे भ्रमणशील (घूमनेवाले ) नेत्रों से सभी वस्तुएँ घूमती हुई
मालूम हेती है, उसी प्रकार अज्ञान के योग से मूर्ख प्रात्मा मे देहत्व
की प्रतीति करता है ।। ७८॥
अलातं भ्रमणेनेव वर्तुल भाति सूर्य्यवत् ॥
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥७॥
जैसे जलती हुई लकडी ( उल्का) घुमाने से सूर्य के समान गाल
मालूम होती है, वास्तव में यह गोल है नहीं, उसी प्रकार अज्ञान-
वश मूर्स आत्मा मे देहत्व की प्रतीति करता है ॥ ७ ॥
महत्त्वे सर्ववस्तूनामणुत्वं हतिदूरतः ॥
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगः ॥०॥
बडा बडा वस्तुएँ क्या न हा लेकिन अति दूर से वे सब अणु-
सा मालूम होती हैं, अर्थात् जैसे अति दूर उपाधि से बडी बडा
वस्तुएँ भी छोटा दिखाई देती हैं, उसी प्रकार प्रज्ञान-वश अज्ञानी
आत्मा में देहत्व को देखता है ।।८०॥
सूक्ष्मत्वे सर्ववस्तूनां स्थूलत्वं चोपनेप्रतः॥
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगत. ॥१॥
बहुत सा वस्तुएँ अति सूक्ष्म होने पर भी चश्मा लगाने से
बडा मालूम हावी हैं, उसी प्रकार अज्ञान-वश अज्ञानी प्रात्मा मे देहत्व
को प्रतीति करता ह ॥१॥
काचभूमौ जलत्वं वा जलभूमौ हि काचता।
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥२॥

अपरोक्षानुभूतिः
जैसे काष्ठों का गृह रूप से और लोहा का तलवार रूप से
निर्णय किया जाता है, उसी प्रकार मूर्स ने आत्मा का देह रूप से
निर्णय किया है ।। ७४॥
यथा वृक्षविपर्यासा जलाद्भवति कस्यचित् ॥
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥७॥
जैसे जल रूप दोप से किसी आदमी को पेड़ उलटे दिखाई
देते हैं, अर्थात् जैसे जल मे प्रतिविम्वित पेड़ उलटे दिखाई देते
हैं; उसी प्रकार अज्ञान-वश मूर्ख आत्मा में देहत्व की प्रतीति
करता है ॥७॥
पोतेन गच्छतः पुंसः सर्व भातीव चञ्चलम् ।
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥ ७६ ॥
जैसे जहाज से यात्रा करते हुए मनुष्य को निकटवर्ती सभी
वस्तुएँ चलती सी मालूम होती हैं, उसी प्रकार अज्ञान-वश मूर्स
प्रात्मा में देहत्व को देखता है ।। ७६ ।।
पीतत्वं हि यथा शुभ्र दोषाद् भवति कस्यचित् ॥
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥७॥
जैसे कॉमला आदि दोप से किसी मनुष्य को सफेद वस्तु पीली
दिखाई देती है, उसी प्रकार अज्ञान के योग से मूर्स आत्मा में देहत्व
को प्रतीति करता है ।। ७७ ।।
चक्षुभ्यां भ्रमशीलाभ्यां सर्व भाति भ्रमात्मकम् ॥
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥८॥

तद्वदात्मनि देहत्त्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥ २॥ " अपरोक्षानुभूति. जैसे भ्रमणशाल (घूमनेवाले ) नेत्रों से सभी वस्तुएँ घूमती हुई मालूम हेती है, उसी प्रकार अज्ञान के योग से मूर्स आत्मा मे देहत्व की प्रतीति करता है ।। ७८ ।। मलातं भ्रमणेनैव वर्तुलं भाति सूर्यवत् ।। तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः॥८॥ जैसे जलती हुई लकडी ( उल्का) घुमाने से सूर्य के समान गाल मालूम होती है, वास्तव मे वह गोल है नहीं, उसी प्रकार अज्ञान- वश मूर्स आत्मा मे देहत्व की प्रतीति करता है ॥ ७६ ॥ महत्त्वे सर्ववस्तूनामणुत्वं पतिदूरतः॥ तद्वदात्मनि देहत्वपश्यत्यज्ञानयोगतः ॥८॥ वडा बडा वस्तुएँ क्या न हा लेकिन अति दूर से वे सब अणु- सी मालूम होती हैं, अर्थात् जैसे अति दूर उपाधि से बडी बडी वस्तुएँ भी छोटा दिखाई देती है, उसी प्रकार अज्ञान-वश अज्ञानी आत्मा मे देहत्व को देखता है ॥८०॥ सूक्ष्मत्वे सर्ववस्तूनां स्थूलत्वं चोपनेवतः। तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगत. ॥१॥ बहुत सी वस्तुएँ अति सूक्ष्म होने पर भी चश्मा लगाने से बडा मालूम हाती हैं, उसी प्रकार अज्ञान-वश अज्ञानी आत्मा में देहत्व की प्रतीति करता है॥८१ ॥ काचभूमौ जलत्वं वा जलभूमौ हि काचता॥

अपरोत्तानुभूतिः
जैसे काच के गच में जलस्व-घुद्धि होती है और जल मे काच की
बुद्धि, उसी प्रकार अज्ञान के योग से अज्ञानी को आत्मा मे देहत्व
का भान होता है ।।२।।
यद्दनौ मणित्वं हि मणौ वा वहिता पुमान् ।
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥३॥
जैसे पुरुप.को अग्नि में मणित्व-बुद्धि-यह मणि है ऐसी बुद्धि-
होती है और मणि मे अग्नित्व-बुद्धि, उसी प्रकार अज्ञान के योग से
आत्मा में देहत्व-घुद्धि होती है ।। ८३ ॥
अभ्रेषु सत्सु धावत्सु धावनिव यथा शशी ॥
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥८४ ॥
मेघो के दौड़ने पर चन्द्रमा दौड़ता दिखाई देता है, वैसे ही
अज्ञान-पश आत्मा में देहत्व-बुद्धि होती है ॥ ८४ ॥
यथैव दिग्विपर्यासो मोहाद्भवति कस्यचित् ।।
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥५॥
जैसे किसी आदमी को अज्ञान से दिशाओ का विपर्यय
(दिग्भ्रम ) होता है, उसी प्रकार अज्ञान के योग से आत्मा में देहत्व
का भान होता है ।। ८५ ॥
यया शशी जले भाति चञ्चलत्वेन कस्यचित् ॥
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ॥८६॥
हिलते हुए जल में जैसे चन्द्रमा भी हिलता हुआ दिखाई
देता है, उसी प्रकार अज्ञान के योग से आत्मा में देहत्व का
भान होता है ॥८६॥

.
अपरोक्षानुभूतिः
एवमात्मनि न ज्ञाते देहाध्यासो हि जायते ॥
स एवात्मा परिज्ञातो लीयते च परात्मनि ॥ ८ ॥
इस प्रकार आत्मविषयक ज्ञान न होने पर आत्मा मे देहाध्यास
होता है-देहात्म-द्धि होती है, पर ज्ञान का विषय होता हुआ
वही प्रात्मा परमात्मा मे लीन हो जाता है ॥२७॥
सर्वमात्मतया ज्ञातं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥
अभावात् सर्वभावानां देहानां चात्मता कुतः ॥८॥
सारा चराचर जगत् आत्मत्वेन जाना जाता है, अर्थात् जैसे
रज्जु मे सर्प का भ्रम होता है, उसी प्रकार आत्मा मे जगत् का
•भ्रम है। ऐसा जब है, तो पृथिवी आदि किसी पदार्थ का भी अस्तित्व
नहीं रहा, क्योंकि भ्रान्त ( कल्पित) पदार्थ असत् होते हैं। ऐसी
अवस्था में भ्रान्त पदार्थो से रचित-अतिशय असत् देह को सार
पदार्थ-प्रात्मा मान लेना कहाँ की बुद्धिमानी है ? ।। ८८॥
मात्मानं सततं जानन् नय कालं महामते ॥
प्रारब्धमखिलं भुञ्जन्नोद्वेगं कर्तुमर्हसि ॥ ८८ ॥
हे महामते ! तुम सदा आत्म-विषयक ज्ञान का उपार्जन करते
हुए समय बिताओ, पूर्व जन्म के कर्मों का भोग करते हुए कभी
दुःखी न होओ ॥६॥
उत्पन्नेप्यात्मविज्ञाने मारब्धं नैव मुञ्चति ॥
इति यच्छ्र यते शास्त्रात्तन्निराक्रियतेऽधुना ।। ८०॥
आत्म-ज्ञान हो जाने पर भी प्रारब्ध नहीं छोड़ता, अर्थात् अतीत
जन्मों के सुकृत-दुष्कृत का उपभोग करना ही पड़ता है, ऐसा जो शास्त्र
से सुना जाता है, उसका अब हम निराकरण करते हैं ॥१०॥

अपरोक्षानुभूति
तत्त्वज्ञानोदयाध्वं प्रारब्धं नैव विद्यते ॥
देहादीनामसत्यत्वाद् यथा स्वप्नः प्रबोधतः ॥ १॥
जैसे जाप्रत्-अवस्था मे स्वप्न का रहना असम्भव है, उसी
प्रकार तत्त्व-ज्ञान के अनन्तर प्रारब्ध ( अतीत जन्म के कर्म ) नहीं
टिक सकता, क्योंकि तब देह आदि सर असत् हो जाते हैं, नही
रहते हैं। देह आदि से ही प्रारब्ध का सम्बन्ध है, जब सम्बन्धी ही
नहीं रहा तो वह किसके आधार पर रह सकता हे १ ॥६१॥
कर्म जन्मान्तरकृतं मारब्धमिति कीर्तितस् ।।
तत्तु जन्मान्तराभावात्पुसा नैवास्ति कहिचित् ॥४२॥
अन्यान्य जन्मो में किया गया कर्म प्रारब्ध कहा जाता है।
आत्मा का जन्मान्तर होता ही नहीं, इसलिए आत्मा से उसका
सम्बन्ध है-ऐसा कदापि नहीं कहा जा सकता ॥२॥
स्वप्नदेही ययाध्यस्तस्तथैवायं हि देहकः ॥
अध्यस्तस्य कुतो जन्म जन्माभावे स्थितिः कुतः॥३॥
जैसे स्वप्न-देह अध्यस्त (भ्रान्तिकल्पित ) है, वैसे ही यह
जाग्रत्-देह भी भ्रान्तिकल्पित है। भ्रान्ति से कल्पित का जन्म कहाँ ?
जन्म के प्रभाव से प्रारब्ध की स्थिति कैसा ? ॥ १३ ।।
उपादानं प्रपञ्चस्य मृद्भाण्डस्येव कथ्यते ॥
अज्ञानं चैव वेदान्तस्तस्मिन्न व विश्वता ॥४॥
जैसे मिट्टी घडे प्रादि वर्तनों की उपादान कारण कही गई है, उसी
प्रकार इस सार जाल का उपादान कारण वेदान्तियों ने अज्ञानको
माना है। यदि अज्ञान नष्ट हो जाय तो ससार कहाँ १ ॥६४ ॥

अपरोक्षानुभूतिः यथा रज्जु परित्यज्य सपं गृह्णाति वै भ्रमात् ।। तद्वत्सत्यमविज्ञाय जगत् पश्यति मूढधीः ।।८५॥ जैसे अँधेरे मे पडी हुई, वायु के हिलोरों से कुछ कुछ हिलती हुई रस्सो को रस्सी न समझकर अज्ञानवश मनुष्य उसे साँप समझ लेता है और उससे भय खाता है; ठीक इसी प्रकार अज्ञानी ब्रह्म को न जानकर जगत् को देखता है, ब्रह्म में जगत् का भ्रम करता है ॥६५॥ रज्जुरूपे परिज्ञाते सर्पभ्रान्तिन तिष्ठति ॥ अधिष्ठाने तथा ज्ञाते प्रपञ्चः शून्यतां प्रजेत् ॥६६॥ जब रस्सी का रस्सी के रूप मे ज्ञान हो जाता है, तब साँप का भ्रम नहीं ठहरता, इसी प्रकार अधिष्टान रूप ब्रह्म का ज्ञान होने पर यह प्रपञ्च ( जन्जाल ) शून्य हो जाता है ॥६६॥ देहस्यापि मपञ्चत्वात्मारब्धावस्थितिः कुतः। अज्ञानिजनबोधार्य प्रारब्ध वक्ति वै श्रुतिः ॥७॥ देह भी तो प्रपञ्च रूप ही है, तो ऐसी अवस्था मे, उससे सम्बन्ध रखनेवाले प्रारब्ध की स्थिति कैसे मानी जा सकती है। श्रुवि ने जो प्रारब्ध का कथन किया है, वह केवल अज्ञानियों को समझाने के लिए, क्योकि अगर श्रुति प्रारब्ध का निर्वचन न करती तो सम्भव है लोग कार्याकार्य का विचार न करते ॥ १७ ॥ क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ बहुत्वं तनिषेधार्थं श्रुत्या गीतञ्च वै स्फुटम् ॥४॥ परावरे - पर ब्रह्मादि है अपर (निकृष्ट) जिससे ।

अपरोक्षानुभूतिः
"उस परमात्मा के दर्शन होने पर इसके सन कर्म नष्ट हो जाते
हैं' इस श्रुति ने प्रारब्ध के निषेध के लिए ही कर्म शब्द में वर-
वचन का उपादान किया है।
उच्यतेऽर्वलाच्चैतत्तदानद्वयागमः ॥
वेदान्तमतहानञ्च यता ज्ञानमिति श्रुतिः ॥८॥
यदि अज्ञानी पुरुप अज्ञान में प्रारब्ध का स्वीकार करें तो दो
दोपों की प्राप्ति होती है-(१) प्रारब्ध रूप द्वैत का अड्डीफार
करने से अनिर्मातप्रसङ्ग, (२) मोक्ष के अभाव मे ज्ञान के सम्प्रदाय
का उच्छेद; केवल इन दोपो की ही प्राप्ति नहीं है, प्रत्युत वेदान्त के
मत-अद्वैत-का त्याग भी हो जायगा इसलिए जिससे ज्ञान की
प्राप्ति हो वह श्रुति अर्थात् श्रुति-प्रतिपादित अद्वैत ही अङ्गीकार्य है।
तात्पर्य यह कि विद्वान् की दृष्टि में अव्यक्त से लेकर स्वकीय देह
पर्यन्त ससार नहीं है तो प्रारब्ध कैसे रह सकता है ? अज्ञानी
पुरुप विद्वान के वोध पर विश्वास करते हुए उसके शरीर की स्थिति
देखते हैं। प्रारब्ध के सद्भाव का प्रतिपादन करनेवाली श्रुति उनके
अनुभव का अनुवाद करती है ॥ १६
बिपञ्चाङ्गान्यथो वक्ष्ये पूर्वोक्तस्यैव सिद्धये ॥
तैश्च सर्वैः सदा कार्य निदिध्यासनमेव तु ॥१०॥
पूर्वोक्त ज्ञान की प्राप्ति के लिए मैं पन्द्रह अङ्ग कहूँगा, उन सब
अङ्गों से सदा निदिध्यासन करना चाहिये ।। १००।
नित्याभ्यासाइते माप्तिन भवेत् सच्चिदात्मनः॥
तस्माद्ब्रह्म निदिध्यासेज्जिज्ञासुःश्रेयसै चिरम्॥१०१॥

अपरोक्षानुभूतिः
नित्य अभ्यास के विना सच्चित् आत्मा की प्राप्ति नही होती,
इसलिए जिज्ञासु पुरुष को कल्याण के लिए ब्रह्म का निदिध्यासन
करना चाहिये ।। १०१॥
यमोहि नियमस्त्यागामानंदेशश्चकालतः॥
मासनंमूलबन्धश्च देहसाम्यं च दूस्थितिः ॥१०२॥
प्राणसंयमनं चैव प्रत्याहारश्च धारणा ॥
आत्मध्यानं समाधिश्च प्रोक्तान्यङ्गानि वैक्रमात१०३
यम, नियम, त्याग, मौन, देश, काल, आसन, मूलबन्ध, देह-
साम्य, स्थिति, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, आत्मध्यान और
समाधि क्रम से ये पन्द्रह अङ्ग कहे गये हैं ॥ १०२-१०३ ॥
सर्व ब्रह्मेति विज्ञानादिन्द्रियग्रामसंयमः।।
यमोऽयमिति सम्मोक्तोऽभ्यसनीयो मुहुर्मुहुः॥१०४॥
सभी ब्रह्म है-इस ज्ञान से इन्द्रियों का संयम करना अर्थात
इन्द्रियों से विषयों का भोग करते हुए भी विषयों को उनके वास्तव
खरूप ब्रह्म रूप से देखना यही यम है, इसका घार बार अभ्यास
करना चाहिये ।। १०४॥
सजातीयप्रवाहश्च विजातीयतिरस्कृतिः ॥
नियमेाहि परानन्दो नियमात् क्रियते बुधैः ॥१०॥
सजातीय (ब्रह्माकार) वृत्ति का प्रवाह विजातीय घट-पट
आदि वृत्तियों का तिरस्कार परमानन्दरूप नियम है, जिसका विद्वान
नियमपूर्वक अनुकरण करते हैं ॥ १०५ ॥

अपरोक्षानुभूतिः त्यागः प्रपञ्चरूपस्य चिदात्मत्वावलोकनात्॥ त्यागो हि महतां पूज्यः सद्यो मोक्षमयो यतः।।१०६।। चिदात्मक दृष्टि से प्रपञ्च के रूप का त्याग करना ही त्याग है, त्याग की महात्माओं ने बड़ी श्लाघा की है क्योंकि वह शीघ्र ही मोक्षदाता है॥१०६ ॥ यतो वाचा निवर्तन्ते अमाप्य मनसा सह ।। यन्मानं योगिभिर्गम्यं तद्भजेत्सर्वदा बुधः ॥९०७॥ मन के साथ वाग् आदि इन्द्रियाँ जिसको न पाकर लौट जाती हैं, यागी लोग ही जिसे पा सकते हैं एवं जो मौनस्वरूप है, सदा उसी ब्रह्म का सेवन विद्वान को करना चाहिये ।। १०७ ॥ . , वाचो यस्मान्निवर्तन्ते तद्वक्तु केन शक्यते ॥ मपञ्चो यदि वक्तव्यः सेोऽपि शब्दविवर्जितः॥१०॥ जिससे वाणियाँ निवृत्त होती हैं, अर्थात् जहाँ तक वाणियों की पहुंच ही नहीं है, उसका वर्णन कौन कर सकता है। यदि कहिये प्रपञ्च का वर्णन करना चाहिये, क्योकि वह तो वर्णन योग्य है, यह कहना भी उचित नहीं है, कारण कि प्रपञ्च भी शब्दरहित है, अनिर्वचनीय है ॥ १०८॥ इति वा तद्भवेन्मौनं सतां सहजसंज्ञितम् ॥ गिरा मौनं तु बालानां प्रयुक्तं ब्रह्मवादिभिः॥१०८॥ महात्माओं का यह स्वाभाविक मौन ( सहजावस्था ) है, वाणी का मौन तो ब्रह्मवादियों ने मूसों के लिए कहा है ॥ १०६ ।।

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अपरोक्षानुभूति
पादावन्ते च मध्ये च जनो यस्मिन्न विद्यते।
येनेदं सततं व्याप्तं स देशो विजनः स्मृतः॥११०॥
आदि, मध्य और अन्त मे जिसमे जन नहीं है और जिससे
यह सारा जगत् व्याप्त है, वह देश विजन कहा गया है ॥ ११० ॥
कलनात्सर्वभूतानां ब्रह्मादीनां निमेषतः॥
कालशब्देन निर्दिष्टो यखण्डानन्द अद्वयः॥१११॥
ब्रह्म आदि समस्त भूतों का निमेष मात्र मे सहार करने
से काल शब्द का अर्थ अखण्डानन्दस्वरूप,
ही है।। १११ ॥
सुखेनैव भवेद् यस्मिन्नजस्रं ब्रह्मचिन्तनम् ।।
मासनं तद्विजानीयान्नेतरत्सुखसाधनम् ॥११२॥
अद्वय ईश्वर
जिस स्थिति में सुख से निरन्तर ब्रह्म का चिन्तन होवे उसी को
आसन जानना चाहिये ॥ ११२॥
सिद्धं यत्सर्वभूतादि विश्वाधिष्ठानमव्ययम् ॥
यस्मिन्सिद्धाःसमाविष्टास्तद्वै सिद्धासनं विदुः॥११३॥
जो सब भूतों से आदि सिद्ध है, सारे विश्व का अधिष्ठान एव
अविनाशी है और जिसमे समस्त सिद्ध लोग प्रविष्ट हुए हैं, विद्वान्
लोग उसी को सिद्धासन कहते हैं । ११२।।
यन्मूलं सर्वभूतानां यन्मूलं चित्तबन्धनम् ॥
मूलबन्धःसदा सेव्यो योगोऽसौराजयोगिनाम् ॥११४॥

- . अपरोक्षानुभूतिः जो सब भूतों का मूल कारण है, और जो चित्त के बन्धनों का मृल है, उस मूलबन्धन का मदा सेवन करना चाहिये, राजयोगियों का यही योग है।। ११४ ॥ प्रजानां समतां विद्यात्समे ब्रह्मणि लीयते ॥ नौच्चेन्नैव समानत्वमृजुत्वं शुष्फवृक्षवत् ॥११॥ सर्वत्र सम जो ब्रह्म उसमे अङ्गो का लय कर देवे (सन अङ्गों का ब्रह्मरूप से चिन्तन करे, यही अङ्गो की समता है)। यदि यह नहीं है तो वह समानता नहीं है, सूसे पेड के समान सीधा- पन है ।। ११५ ॥ दृष्टिं ज्ञानमयों कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयंजगत् ॥ सा दृष्टिः परमेोदारा न नासाग्रावलोकिनी ॥११६॥ ज्ञानमय दृष्टि से ब्रह्ममय जगत् को देसे वही दृष्टि श्रेष्ठ है, नासिका के अग्रभाग मे स्थित दृष्टि श्रेष्ठ नहीं है ॥ ११६ ॥ दृष्टदर्शनदृश्यानां विरामो यत्र वा भवेत् ॥ दृष्टिस्तत्रैव कर्तव्या न नासाग्रावलोकिनी ॥११७॥ जहाँ पर द्रष्टा, दर्शन और दृश्य इन तीनों का अभाव है, वहीं पर दृष्टि करनी चाहिये; नासिका के अग्रभाग मे स्थित दृष्टि प्रशस्त नहीं है ॥ ११७ ॥ चित्तादि सर्वभावेषु ब्रह्मत्वेनैव भावनात् ॥ निरोधः सर्ववृत्तीनां प्राणायामः स उच्यते ॥११॥ चित्त आदि समस्त पदार्थों में ब्रह्म-भावना करने से जो सव वृत्तियों का निरोध है, वही प्राणायाम कहा गया है ।। ११८ ॥

अपरोक्षानुभूतिः निधनं प्रपञ्चस्य रेचकाख्यः समीरणः ॥ ब्रह्मैयास्मीति या वृत्तिः पूरको वायुरीरितः॥११॥ नेति नेति आदि श्रुतियो से प्रपञ्च का निषेध करना रेचक नामक प्राणायाम है तथा मैं ब्रह्म ही हूँ ऐसी वृत्ति करना पूरक नामक प्राणायाम कहा गया है। ११६॥ ततस्तवृत्तिनैश्चल्यं कुम्भकः प्राण संयमः॥ अयं चापि प्रबुद्धानामज्ञानां घ्राणपीडनम् ॥१२०॥ पूर्वोक्त वृत्तियों को निश्चल कर देना कुम्भक प्राणायाम है, यह प्राणायाम ज्ञानियों का है। अज्ञानियो का प्राणायाम तो केवल नाक को पीडित करना मात्र है ॥ १२० ॥ विषयेष्वात्मतां दृष्ट्वा मनमश्चितिमज्जनम् ॥ प्रत्याहारः स विजयोऽभ्यसनीयो मुमुक्षुभिः ॥१२१॥ विषयो मे आत्मभाव को देखकर मन का चैतन्य में निमग्न हो जाना प्रत्याहार है, मुमुतु जनो को इसका बार वार अभ्यास करना चाहिये ॥ १२१ ॥ यत्र यत्र मनो याति ब्रह्मणस्तत्र दर्शनम् ॥ मनसो धारणा यैव धारणा सा परा मता ॥१२२॥ जिस जिस विपय मे मन जावे उसी में ब्रह्मदर्शन होने से मन को उसी विषय मे जो स्थिति है, यही श्रेष्ठ स्थिति है ॥ १२२ ।।

६६
अपरोक्षानुभूति
ब्रीवास्मीति सवृत्त्या निरालम्वतया स्थितिः॥
ध्यानशब्देन विख्याता परमानन्ददायिनी ॥१२३॥
मैं ब्रह्म ही हूँ, इस श्रेष्ठ वृत्ति से पालम्व रहित जो स्थिति वहीं
ध्यान श द से कही गई है और वह परम आनन्ददायिनी है ॥१२३।।
निर्विकारतया वृत्त्या ब्रह्माकारतया पुनः ॥
वृत्तिविस्मरण सम्यक
समाधि नसंज्ञकः ॥१२४॥
.
पहिले वृत्ति को निर्विकार कर फिर ब्रह्माकार करके जो वृत्ति
का विस्मरण करना है, वही ज्ञानसज्ञक समाधि है ॥ १२४ ।।
एवं चाकृत्रिमानन्दं तावत्साधु समभ्यसेत् ॥
वश्या यावत्क्षणात्पुसः प्रयुक्तः स भवेत्स्वयम् ॥१२५॥
इस अकृत्रिम ( स्वत सिद्ध ) अानन्द का तर तक अभ्यास
करता रहे जब तक मन क्षण क्षण मे अनायास वश मे न होने
लग जाय ॥ १२५ ।।
ततः साधननिर्मुक्तः सिद्धो भवति योगिराट् ।।
तत्स्वरूपं न चैकस्य विपयो मनसा गिराम् ॥१२६॥
इसके अनन्तर यागिराज साधन के बिना ही सिद्ध हो जाता
है। यह स्वरूप किसा की भी मन वाणी का विषय नहीं है ॥१२६॥
समाधी क्रियमाणे तु विघ्ना पायान्ति वै बलात्
अनुसन्धानराहित्यमालस्यं भोगलालसम् ॥१२७॥

अपरोक्षानुभूतिः लयस्तमश्च विक्षेपो रसास्वादश्च शून्यता ।। एवं यद्विघ्नबाहुल्यं त्याज्यं ब्रह्मविदा शनैः ॥ १२८॥ समाधि करते समय नाना प्रकार के विन्न बलात् आते हैं, जैसे स्मरणाभाव, आलस्य, भोगों की इच्छा, निद्रा, तन्द्रा, वितेप (विषया- कार इत्ति), रसास्वाद (ब्रदर्शन से पूर्व ही वृत्तियों के रुकने से आनन्द) और शून्यता ( अन्धकार सा ) ऐसे विनों का ब्रह्मज्ञानी को शनैः शनैः त्याग करना चाहिए ॥ १२७-१२८ ॥ - . भाववृत्त्या हि भावत्वं शून्यवृत्त्या हि शून्यता॥ ब्रह्मवृत्त्या हि पूर्णत्वं तथा पूर्णत्वमभ्यसेत् ॥ १२६ ॥ भाववृत्ति ( अस्ति आत्मा) से भावत्व (उत्तम लोकों की प्राप्ति), शून्य वृत्ति ( नास्ति आत्मा) से शून्यता ( स्थावरादि योनियों की प्राप्ति) होती है, एवं ब्रह्मवृत्ति से (मैं ब्रह्म ही हूँ ऐसी वृत्ति से) पूर्णता प्राप्त होती है। पूर्णता का ही अभ्यास करना चाहिए ॥१२॥ ये हि वृत्ति जहत्येनां ब्रह्माख्यां पावनी पराम् ॥ वृथैव ते तु जीवन्ति पशुभिश्च समा नराः ॥ १३० ॥ जो लोग परम पावन इस ब्रह्मात्मक वृत्ति का त्याग करते हैं, वे वृथा जीते हैं और पशुओं के समान हैं ॥ १३० ॥ ये हि वृत्ति विजानन्ति ये ज्ञात्वा वयन्त्यपि ॥ ते वै सत्पुरुषा धन्या वन्द्यास्ते भुवनत्रये ॥१३१॥ जो लोग इस वृत्ति को जानते हैं और जानकर बढाते भी हैं वे सज्जन ही धन्य हैं और वीनों लोकों में पूज्य हैं।। १३१ ॥

अपरोक्षानुभूतिः येषां वृत्तिः समा वृद्धा परिपका च सा पुनः ॥ ने वै सद्मामतां प्राप्ता नेतरे शब्दवादिनः॥ १३२ ॥ जिनकी वृत्ति सम है, वृद्धि को प्राप्त हो गई और फिर परिपाका- वस्था को पहुँच गई है, वे ही ब्रह्मता को प्राप्त हुए हैं । शाब्दिक ज्ञानी लोग ब्रह्मरूप नहीं हुए ।। १३२ ॥ । कुशला ब्रह्मवार्तायां वृत्तिहीनाः मुरागिणः । तेप्यज्ञानितमा नूनं पुनरायान्ति यान्ति च ॥ १३३ ॥ जो लाग वेदान्तचर्चा में निपुण हैं, ब्रह्माकार वृत्ति से रहित हैं और विपया मे प्रेम रसते हैं, अवश्य ही वे परम अज्ञानी जन जन्म लेते हैं और मरते हैं अर्थात् मोक्ष मार्ग पर कदापि आरूढ नहीं हो सकते ॥ १३३ ।। निमेपाधं न तिष्ठन्ति वृत्ति ज्ञानमयी विना ॥ यया तिष्ठन्ति ब्रह्माद्याः सनकाद्याः शुकादयः॥१३४॥ जो लोग क्षणमात्र भी ब्रह्माकार वृत्ति के बिना नहीं रहते, उनको ब्रह्मादि, सनकादि और शुकादि के समान उच्च स्थान मिलता है॥ १३४॥ , .. कारणता याता कारणे न हि कार्यता कारणत्वं स्वतो गच्छेत्कार्याभावे विचारतः ॥१३॥ कार्य में ( घट में ) कारण (मृत्तिका) होता है, कारण (मृत्तिका ) में कार्य ( घट ) नहीं होता। विचारदृष्टि से कार्य - wh प अपरोक्षानुभूति का प्रभाव (लय चिन्तन) करके कारणता (ब्रह्म रूपता) को प्राप्त होना चाहिए ॥ १३५॥ अथ शुद्धं भवेद्वस्तु यद्वै वाचामगोचरः॥ द्रष्टव्यं मृद्धटेनैव दृष्टान्तेन पुनः पुनः ॥ १३६ ॥ इस प्रकार अभ्यास करने से उस शुद्ध ब्रह्म को, जो वाणी का अविषय है, स्वत. प्राप्त हो जाता है। यार बार घट और मिट्टी के दृष्टान्त से यह देखना चाहिये ॥ १३६ ॥ अनेनैव प्रकारेण वृत्तिब्रह्मात्मिका भवेत् ॥ उदेति शुद्धचित्तानां वृत्तिज्ञानं ततः परम् ।। १३७ ।। इसी प्रकार से ब्रह्माकार वृचि उत्पन्न होती है, इसके अनन्तर शुद्धचित्त पुरुषां को वृत्ति का ज्ञान होता है ॥ १३७ ।। कारणं व्यतिरेकेण पुमानादौ विलोकयेत् ॥ अन्वयेन पुनस्तद्धि कार्य नित्यं प्रपश्यति ॥ १३ ॥ पहिले पुरुष कारण (मृत्तिका) को व्यतिरेक से (घट से पृथक) देखे, फिर अन्वय से ( कार्यरूप घट मे मिली हुई मृत्तिका को) नित्य कार्य में देखे ॥ १३८ । कार्य हि कारणं पश्येत्पश्चात्कार्य विवर्जयेत् ।। कारणत्वं स्वतो नश्येदवशिष्टं भवेन्मुनिः ॥ १३ ॥ कार्य में कारण को देखे फिर कार्य का लयचिन्तन से त्याग कर दे, तब कारणाभाव नष्ट हो जाता है, शेष जो शुद्ध स्वरूप है, वही मुनि है, न कार्य है न कारण ॥ १३ ॥ na , . १०० अपरोक्षानुभूति: भावितं तीव्रवेगेण वस्तु यनिश्चयात्मना ॥ पुमांस्तद्धि भवेच्छीघ्रं यं भ्रमरकीटवत् ॥ १४० ॥ तीन वेग से निश्चयात्मक वृत्ति द्वारा पुरुप जिस वस्तु का ध्यान करता है भ्रमर और कीट के समान शीघ्र ही उसी रूप को प्राप्त हो जाता है ॥ १४०॥ अदृश्यं भावरूपं च सर्वमेतच्चिदात्मकम् ॥ सावधानतया नित्यं स्वाल्मानं भावयेद् बुधः ॥१४१॥ यह सारा जगत, मनवचनागोचर तथा सञ्चित् आत्म स्वरूप ही है, विद्वान पुरुष को चाहिये कि वह आत्मा का नित्य ध्यान करे ॥ १४१॥ दृश्यं दृश्यतां नीत्वा ब्रह्माकारण चिन्तयेत् ॥ विद्वान् नित्यसुखे तिष्ठेद् धिया चिंद्रसपूर्णया ॥१४२॥ दृश्य जगत् को अदृश्य करके उसका ब्रह्माकार से चिन्तन कर, विद्वान् चैतन्य रस से परिपूर्ण वृत्ति से नित्य सुख मे मग्न रहे॥१४२॥ भाईः समायुक्तो, राजयोग उदाहृतः ॥ किञ्चित्पककपायाणां हठयोगेन संयुतः॥१४३ ॥ पूर्वोक्त १५ अङ्गो से युक्त यह राजयोग कहा गया है, जिनका मन कुछ परिपक्व हो गया हो उनको हठयोग का भी सयोग करना चाहिये ।। १४३ ॥

अपरोक्षानुभूतिः परिपक्कं मनो येषां केवलोऽयं च सिद्धिदः । गुरुदैवतभक्तानां सर्वेषां सुलभी भवेत् ॥ १४ ॥ श्रीमच्छङ्करभगवत्पूज्यपादविरचिता परोक्षानुभूतिः समाप्ता जिनका मन परिपक्व हो चुका है उनको ही राजयोग सिद्ध हो सकता है गुरु तथा ईश्वर के भक्तों के लिए वह अत्यन्त सरल है ।। १४४॥ 1 आत्मबोधश्लोकसूची श्लोक पृ० श्लो उ प्रखण्डानन्दरूपस्य १६-५८ | उपादानेऽखिलाधारे अज्ञानकलुष जीवम् ४---५ उपाधिविलयाद् विष्ण१४ -५३ अज्ञानान्मानसोपाधेः ७–२२ उपाधिस्थोऽपि तद्धमैः १४-५२ प्रतद्व्यावृत्तिरूपेण १५-५७ ए अनण्वस्थूलमहस्व० १६-६० | एवमात्मारा ध्यानं० १२-४२ अनाद्यविद्यानिर्वाच्या ६-१४ एवं निरन्तरकृता० ११-३७ अमनस्स्वान्न मे दुख० १०-३३ अरुणेनेव बोधेन १२-४३ जगद्विलक्षणं ब्रह्म अवच्छिन्न इवाज्ञानात् ४--४ | जीवन्मुक्तरतु तद्विद्वान् १३-४६ अविरोधितया फर्म ३~-३ ज्ञातृज्ञानज्ञेयभेदः १२-४१ प्रहमाकाशवत्सर्वम् १०-३५ मा तत्त्वस्वरूपानुभवाद् १३-४६ मात्मचैतन्यमाश्रित्य ७-२० | तद्युक्तमखिलं वस्तु १६-५६ आत्मनः सच्चिदंशश्च ८-२५ तपोभिः क्षीणपापानाम् ३-१ मात्मनो विक्रिया नाति ८-२६ । तावत्सत्यं जगद्भाति प्रात्मन्येवाऽखिल दृश्यम् तिर्यगूर्ध्वमधः पूर्णम् १५-५६ ११-३६ | तीर्खा मोहार्णवं हत्वा १४-५० आत्मा तु सतत प्राप्त १२-४४ द मात्मावभासयत्येको ९-२८ दिग्देशकालाधन० १८-६८ मात्मैवेदं जगत्सर्वम् १३-४८ दृश्यते श्रूयते यद् यद् १७-६४ भाविद्यक शरीरादि ६-३१ देहान्यत्वान्न मे जन्म १०--३२ १४

प्रात्मबोधलोकसूची
पृ० श्लो०
पृ०
हा०
देहेन्द्रियगुणान ७-२१
₹
देहेन्द्रियमनोबुद्धि० ७-१८ | रज्जुसर्पवदात्मानम्
रागेच्छासुखदुःखादि ९-२३
नानोपाधियशादेव ५-११ | रूपवर्णादिकं सर्वम् ११-४०
नित्यशुद्धविमुक्तकम् ११-३६
निर्गुणो निष्क्रियो नित्यो वपुस्तुषादिभिः कोशैः ६-१६
१० -३४ । विविक्तदेश आसीनो ११-३८
निषिष्य निखिलोपाधीन व्यापृतेष्विन्द्रियेष्वात्मा ७-१९
श
प
श्रावणादिभिरुद्दीप्त० १७-६६
पञ्चकोशादियोगेन
पश्चप्राणमनोबुद्धि. ६-१३ । सच्चिदात्मन्यनुस्यूते ५.
पञ्चोकृतमहाभूत ५-१२ सदासर्वगतोऽप्यात्मा ६-१७
प्रकाशोऽर्कस्य तोयस्य ६-२४ सम्यग विज्ञानवान योगी
६
बाह्यनित्यसुखासक्तिम् १४-५१ सर्वगंसच्चिदानन्दम् १७-६५
बोधोऽन्यसाधनेभ्यो हि ३---२ संसार: स्वप्नतुल्यो हि ४-६
स्थाणी पुरुषवद्भान्त्या १३-४५
यथाफाश हपीकेशो ५-१० स्वयमन्तर्वहिप्प्य १६-६२
यद् दृष्ट्वा नापरं दृश्यम्१५--५५ | स्वबोधे नान्यबोधेच्छा ६-२६
यद्भासा भास्यतेऽर्कादि१६-६१
यल्लामानापरो लाभ: १५-५४ हृदाफाशोदितोहात्मा १७-

प्रौढानुभूतिश्लोकभूचो
पृ० श्लो
पृ० श्लोक
मा
मात्मानात्मविवेचनापि
मत्तोऽन्यन्नहि किश्चित् २३-
२७-१३ मयस्मिन् परमार्थक २४-७
क
कि न प्राप्तमित पुरा २६-११ । योऽहं पूर्वमितः प्रशान्त.
ग
२८-१५
गन्तव्यं किमिहास्ति २५-१०
व
द
वस्तुस्थित्यनुरोधतः २७-१४
देहो नाहमचेतनोऽयम०२२-३
द्वैतं मय्यखिलं समुस्थितमिद.
श्रोतव्यञ्च किमस्ति २६-१२
२१--२
नाहं खादिरपि स्फुटम् २२--४ सत्ताचित्सुखरूपमस्ति २८-१७
नित्यस्फूर्तिमयोऽस्मि २४-~-८ ! स्वाप्नद्वैतवदेव जाग्रतमपि
निद्वैतोऽस्म्यहमस्मि २३-५
२५-६
स्वारस्यैकसुबोधचारुमनसे
प्रौढप्रौढनिजानुभूवि० २१--१
२६-१७

लघुवाक्यवृत्तिश्लोकसूची
पृ० श्लो०
पृ० श्लो
म
प्रज्ञानं कारणं साक्षी ३३---२ | मुक्ताभिरावृतं सूत्रम् ३५-१०
स
र
एकद्वित्रिक्षणेष्वेवम् ३५---१२ रूपादी गुणदेोपादि० ३४---७
रूपाच्च गुणदोषाभ्याम्३४.
क्षणे क्षणेऽन्यथाभूता ३५-~-
व
वह्नितप्तजलं ताप०
जागरस्वप्नयोरेव ३३--४
जागरेऽपि धियस्तूीभाव: शक्यः सर्वनिराधेन ३६--१५
३४-~-५ श्रद्धालुब्रह्मतो स्वस्य ३६-१६
तचिन्तन तत्कथनम् ३६-१७ स एव संसरेत कर्म० ३३---३
सविकल्पकचिद् योऽहम्
देहात्मधीवद् ब्रह्मात्म०३७-१८
सविकल्पकजीवोऽयम् ३६-१३
नष्टे पूर्वविफल्पे तु ३५---११ ' स्थूलो मांसमयो देहः ३३---१

तत्वोपदेशश्लोकसूची पृ० श्लो० पृ० ग्लो ग अतो हि तत्त्वमस्यादि ४६-२१ गत्वा गान्धारदेशं स ५८-७३ अतस्तयाविरुद्धम् ५१-३६ | गुरुर्ब्रह्म स्वयं साक्षात् ६०-८५ अतो ब्रह्मात्मविज्ञानम् ५६-७८ अत्रैव शृणु वृत्तान्तम् ५५-५७ जन्ममृत्युजरादोष० ५७-६६ अद्वयानन्दरूपात्त्वाम् ५६-६६ । जीवभावमनुप्राप्तः ५४-५५ अदृश्यो रूपहीनस्त्वम् ४१-३ अद्वैते ब्रह्मणि स्थेयम् ५३-४८ तत्त्वंपदार्थशुद्धयर्थम् ४१. -१ अनादाविद ससारे ५३-४७ | तत्वमा: पदयोरैक्यम् ५२-४२ अपरोतयितुं लोके ५२-४५ तत्वमार्योध्यतेऽथापि ५२--४४ प्रपेक्ष्यतेऽखिलैर्माने ४६-२० तथा रोगादिभिर्वगः ५६-६४ अयं सःसोऽयमितिवत्४८-२६ तथैव प्रकृते तत्त्व० ५१-४० अविद्याभूतबन्धस्य ५७-७० त्रिविधा लक्षणा ज्ञेया ४६-३२ अहं ब्रह्मेति विज्ञानम् ५२-४३ | त्वमप्येवमनेकेषु ५८-७४ इदन्त्वेनैव यद्भाति ४५-१७ ईदृशं तादृशं नैतद् ४५-१६ देहेन्द्रियादिधर्मान् य: ४७-२३ क देहेन्द्रियादिसाती य: ४७-२४ कर्तृत्वादीन यान्यांस०५५-५६ क्रियमाणे विलुठने न तेषां समुदायोऽसि ४२-६ न त्वं देहोऽसि दृश्यत्वात् ४४-१० ४१-२ तुझ्या पोडित. प्रायो १०८ तत्त्वोपदेशश्लोकसुची पृ० श्लो० पृ० स्लो० न निरोधो न चोत्पत्ति:५६-८१ न भवानिन्द्रियाण्येा ४२-४ मानान्तपिरोधाच्च ४९-३१ न मनस्त्वं न वा प्रायः ४३-६ य न सम्भवति साप्यत्र ५०-३६ यघा गान्धारदेशीयः ५७---७१ नानात्माभिमतं नैव ४३--८ यावदायुस्त्वया बन्धो ६०-८६ नानारूपवती बोधे ४४-१२ व नानतान्येकरूपरत्वम् ४२---५ वर्णाश्रमाचारपरः ५८-७५ नितितो विपिनेतीव ५५-६० वस्तुवा निष्प्रपञ्चोऽसि ५६-८० प वाच्यार्थमखिलं त्यक्त्वा४६-३३ पण्डितस्तन मेधावी ५६-७७ वाच्यार्थस्यैकदेशस्य . ४६-३४ परस्पर विरुद्धं स्यात् ४८-३० वाच्यार्थमपरित्यज्य ५०-३५ प्रतिपाद्यं तदेवान ५३-४६ विचारणीया वेदान्ता: ६०-६४ प्रत्येकमपि तान्यात्मा ४२-७ विधिवत्कृतसंन्यासी ५५-५६ प्रमाणं बोधयन्तं तं ४५-१४ । विद्यते न स्वत: सत्त्वम् ५४-५२ प्रविष्टो जीवरुपेण ५४-५४ विश्वमात्मानुभवति ४५-१५ प्रवेशिताऽसि सृष्टोऽसि ५७-६८ वेदान्तवाक्यसंवेद्य० ब वेदवाक्यरत: कि स्यात पन्धमुत्ती तथा देश. ५६-६३ ५२-४६ बता देशान्तरं चारैः ५५-५६ वेदान्तैः तवयं सम्प ब्रह्मानन्दे प्रमत्तः स्वा० ५६-६५ भ व्यालादिदुष्टसवेभ्यः ५६-६१ भावाद्वैतं सदा कुर्यात ६१-८७ भूत्वा विमुक्तयन्धस्त्वम् ५६-७४ शुद्ध कयमशुद्धः स्यात् ५४-५१ भिन्नप्रवृत्तिहेतुत्वे ४८-२७ । शोधिवे वंपदार्थे हि ४६-२२

स
तच्चोपदेशश्लोकसूची
१०६
प्र० श्लो
श्लो०
अतिसिद्धान्तसारोऽयम् सामानाधिकरण्यं हि ४७-२६
सामानाधिकरण्यं तत् ४८-२८
साक्षात्कृत्वा परिच्छिन्नाद्वैत.
६०-८३
सति देहाछुपाया स्यात् सुप्तौ लीनास्ति या ४४-११
४६-१६ सुप्तौ देहाद्यभावेऽपि ४४-१३
सत्यं ज्ञानमनन्तब्च ४६-१८ सोऽयं विप्र इदं वाक्यम्
सदसन्न विरुद्धत्वात् ५४-५३
५१-३८
सर्वज्ञत्वपरोक्षादीन ५२-४१ सः स्वस्थैरुपदिष्टश्च ५८-७२
सर्वदु.खनिदानेषु ५६-६७ ! स्वगृहे स्वागणे सुप्त ५५-५८

अपरोक्षानुभूतिश्लोकसूची पृ० श्लो० प० श्लो० प्रात्मा नियामकश्चान्त: अङ्गानां समता विद्यात् ६४-११५ प्रात्मानं सततं जानन् ८७-८८ प्रज्ञानप्रभवं सर्वम् ६८-१४ आत्मा विनिष्कलो ह्येकः अथ शुद्धं भवेद्वस्तु ९६-१३६ । ६८-१७ अदृश्यं भावरूपञ्च १००-१४१ प्रात्मा प्रकाशक: स्वच्छः अनुभूतोऽप्ययं लोकः ७६-५६ ६६-२० अनेनैव प्रकारेय ६६-१३७ पादावन्ते च मध्ये च ६३-११० अपरोक्षानुभूति इ अनेषु सत्सु धापत्सु ८६-८४ | इति का सद्भवेन्मानम् १२-१०६ अयमात्मा हि प्रीव ७८-५५ इत्यात्मदेहभेदेन ७४-४२ अलात भ्रमणेनैव ८५-७६ इत्यात्मदेहमानेन ७४-४१ प्रसङ्गः पुरुषः प्रोको ७३-३६ महमेकोऽपि सूक्ष्मश्च ६८-१६ । उक्तसाधनयुक्तेन ६७-१० महं द्रष्टतया सिद्धो ७२-३२ उच्यतेऽर्वलाचवत् ६०- प्रद विकारहीनस्तु ७२-३३ उत्पन्नेऽप्यात्मविज्ञाने ८७-६० महं शब्देन विख्यातः ७२-३१ उपादानं प्रपञ्चस्य प्रा उपादानं प्रपञ्चस्य ८८-६४ मात्मनस्तत्प्रफाशत्वम् ७०-२२ ए मात्मा ज्ञानमयः पुण्य:६६-१९ एतयोर्यदुपादानम् ६८-१५ मात्मा नित्यो हि सद्रूपः एभिरङ्गः समायुक्तो १००-१४३ ६९-२१ । एवञ्चात्रिमानन्दम् १६-१२५ अपरोक्षानुभूविश्लोकसूची पृ० श्लो पृ० श्लो ८७-८७ / चित्तादिसर्वभावेषु २४-११८ ७४-४० चैतन्यस्यैकरूपत्वाद् ७५-४३ एवमात्मनि न ज्ञाते एवं देहद्वयादन्यः तत साधननिर्मुक्त: ६६-१२६ कनकं कुण्डलत्वेन ८३-७२ कर्म जन्मान्तरकृतम् ८८६२ ततस्तवृत्तिनैश्चल्यम् ८५-१२० तत्त्वज्ञानोदयादूद्धर्वम् ८८-६१ फलनात् सर्वभूतानाम् ८३-१११ तत्रैव च समाख्याव: ७३-३७ फाचभूमी जलवका ८५-८२ तथैव मृण्मय कुम्भः ८२-६६ कारण व्यतिरेकण E-१३८ कार्यकारणता नित्यम् ८१-६६ त्रयमेव भवेद् मिथ्या ७६-५८ कार्ये कारणता जाता ८-१३५ त्रिपञ्चाङ्गान्ययो वक्ष्ये ६०-१०० कार्ये हि कारणं पश्येत् त्याग प्रपञ्चरूपस्य ६२-१०६ ९६-१३६ दृश्यं दृश्यता नीत्वा कुशला ब्रह्मवार्तायाम् १८-१३३ १००-१४२ कोऽहं फथमिदं जातम् ६७-१२ दृष्टदर्शनदृश्यानाम् २४-११७ क्षोयन्ते चास्य कर्माणि ६-६८ दृष्टिं ज्ञानमयों कृत्वा ६४-११६ ग देहस्यापि प्रपञ्चत्वात् ८६-६७ गृहत्वेनैव काप्यानि ८३-७४ । देहोऽहमित्यय मूढो ७०-२३ गृह्यमाणे घटे यद्वत् ८२-६७ दोषोऽपि विहित. श्रुत्या ७७-४८ घटत्वेन यथा पृथ्वी ८३-७१ न घटनाम्ना यथा पृथ्वी ८१-६४ नाहं भूतगणो देहो ६७-१३ निगमाचार्यवाक्येषु ६६- चतुयी भ्रमशीलाभ्याम् नित्यमात्मस्वरूपं हि ६६-५ ८४-७८ नित्याभ्यासारते ६०-१०१ अच्युतग्रन्थमाला से प्रकाशितपुस्तकों का सूचीपत्र- (क) विभाग १. भगवन्नामकौमुदी-[ भगवन्नाम की महिमा का प्रतिपादक अनुपम प्रन्ध] मीमांसा के धुरन्धर विद्वान् श्रीलक्ष्मीधर की कृति, अनन्तदेव रचित 'प्रकाश' टोफा सहित । सम्पादक- प्राचार्यवर दामोदरलाल गौरवामी। पृ० सं० १५०, मू०-पा० १० २. भक्तिरसायन-भक्तिस्वरूप का परिचायफ प्रत्युत्तम ग्रन्थ यतिवर मधुसूदन सरस्वती रचित, प्रथम उल्लास में ग्रन्थ- कार रचित शेष दो उल्लासों में प्राचार्यवर श्रीदामोदरलाल गोस्वामी रचित टोका से विभूषित । सं०-~-प्राचार्यवर दामोदरलाल, गोस्वामी। पृ० सं० १०० मू०-आ०१२ ३. शुल्वसूत्र-[कात्यायन श्रौतसूत्र का परिशिष्ट अंश ] वेदा- चार्य पं० विद्याधर गौड़ की बनाई हुई सरलवृत्ति सहित । सं०-वेदाचार्य विद्याधर गौड़। पृ० स०६०, मू०-या०४ ४. कात्यायनातसूत्र--[ इसमें दर्शपूर्णमास से लेकर अश्व- मेध, पितृमेध पर्यन्त कितने ही यज्ञों की विधियाँ साङ्गोपाङ्ग वर्णित हैं] महर्षि कात्यायन प्रणीत, वेदाचार्य पं० विद्याधर गौड़ द्वारा रचित सुसरल वृत्ति से अलङ्कृत । सं०-वेदाचार्य विद्याधर गौड़। पृ० सं० लगभग १०००, मू०-२०६ ५. प्रत्यक्तत्त्वचिन्तामणि-(प्रथम भाग) [ शाङ्करभाष्यानु- सार वेदान्त का सुसरल पद्यमय ग्रन्य] श्रीसदानन्द व्यास . विरचित, अन्धकार रचित सरल संस्कृत टीका सहित । सं०- साहित्याचार्य प्राकृष्ण पन्त शास्त्री। पृ० सं०३४०, मू०-३०२ ६. भक्तिरसामृतसिन्धु-[भक्तिरस से परिपूर्ण यह अन्य सच- मुच पीयूपसिन्धु है ] श्रीरूपगोस्वामी प्रणीत, पोजीव गोस्वामी प्रणीत दुर्गमसङ्गमनी टोकासहित सं०-प्राचार्यवर दामोदर- लाल गोस्वामी। पृ० सं० ६२५, मू०-९०३ ७. प्रत्यक्तत्वचिन्तामणि-(द्वितीय भाग ) पृ० स०४५०, मू०-२०२प्रा०४ -तिथ्यर्क-[तिथियों के निर्णय आदि पर पूर्व एवं प्रामा- णिक ग्रन्थ] श्रोदिवाकरविरचित। स०-साहित्याचार्य श्रीकृष्ण पन्त शास्त्री। पृ० स० ३४०, मू०-०१ मा०८ १. परमार्थसार-(वेदान्त का अति प्राचीन अन्य ) श्रोपत बलि भगवान की कृति प्राचीन दोका तथा टिप्पणो से विभूषित स०-न्याय-व्याकरणाचार्य श्रीसूर्यनारायण शुक्छ । पृ० स० १००, मू०-प्रा०६ १०. मेमपत्तन-[कृष्णभक्ति से सराबोर चैतन्य सम्प्रदाय का एक अपूर्व अन्य ] भक्तवर रसिकोत्तस प्रणीत टीका से अलङ्कृत । स०- -साहित्याचार्य श्रीकृष्ण पन्त पृ० सं० २३०, मू०-२०१ (ख) विभाग १.खण्डनखण्डखाद्य-[उच कोटि का वेदान्तमन्ध] कवितार्कि- कशिरोमणि श्रीहर्ष रचित, पण्डितवर पोचण्डीप्रसाद शुक्छ विरचित भाषानुवाद से विभूपित । पृ० स० ४३५ (बड़ा आकार), मूक-रु०२ भा०१२ कृति तथा भद्भुत शास्त्री।

२. काशीकेदार-माहात्म्य-[ब्रह्मवैवर्तपुराणान्तर्गत] साहित्य- रजन श्रीविजयानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित भाषानुवाद सहित । सं०-साहित्याचार्य श्रीकृष्ण पन्त शास्त्री। पृ० सं० २६+६०४, मू०-रु० २ मा०८ ३. सिद्धान्तबिन्दु-[ वेदान्त का प्रमेय यहुल अपूर्व अन्य ] प्राचार्यप्रवर मधुसूदन सरस्वती विरचित, भाषानुवाद तथा टिप्पणी से विभूषित । सं०-साहित्याचार्य श्रीकृष्ण पन्त शास्त्रो। पृ० स० २८०, मू०-२०१ मा०४ ३. प्रकरणपञ्चक-भगवान शङ्कराचार्य के प्रात्मबोध, प्रौढानुभूति, तत्त्वोपदेश आदि ५ प्रकरण-ग्रन्थों का भाषानुवाद सहित संग्रह । सं०-साहित्याचार्य श्रीकृष्ण पन्त शालो। पृ० स० १३०, मू०-मा०८ यन्त्रस्थ ग्रन्थ- (क) विभाग में १. पटसन्दर्भ, विविध टीकाओं से विभूषित। (ख) विभाग में २. भक्तिरसायन, भापा टीका सहित । मिलने का पता- (१) अच्युतग्रन्थमाला कार्यालय, काशो। (२) गीता प्रेस, गोरखपुर। नोट-अच्युतप्रन्यमाला के स्थायो ग्राहकों को उक्त सभी पुस्तकें पान मूल्य पर दी जायेंगी।

२. काशीकेदार-माहात्म्य-[ब्रह्मवैवर्तपुराणान्तर्गव) साहित्य- रजन श्रीविजयानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित भाषानुवाद सहित । स.-साहित्याचार्य श्रीकृष्ण पन्त शास्त्री। पृ० स० २६+६०४, मू०--रु. २ मा०८ ३. सिद्धान्तविन्दु-[ वेदान्त का प्रमेय-बहुल अपूर्व प्रन्य ] प्राचार्यप्रवर मधुसूदन सरस्वती विरचित, भाषानुवाद तथा टिप्पयो से विभूषित । स०-साहित्याचार्य श्रीकृष्ण पन्त शाखो। पृ० स० २८०, मू०-२०१ मा०४ ४. मकरणपञ्चक-भगवान् शङ्कराचार्य के प्रात्मवोध, प्रौढानुभूति, तत्त्वोपदेश आदि ५ प्रकरण-अन्यों का भापानुवाद सहित सप्रद । स० -साहित्याचार्य श्रीकृष्ण पन्त शालो। पृ० स० १३०, मू०-पा०८ यन्नस्थ ग्रन्थ-- (क) विभाग में १. पटसन्दर्भ, विविध टीकाओं से विभूपित । (ख) विभाग में २.भक्तिरसायन, भापा टीका सहित । मिलने का पता- (१) अच्युतग्रन्थमाला कार्यालय, काशो। (२) गीताप्रेस, गोरखपुर । नोट-प्रच्युतप्रन्यमाला के स्थायी प्राहकों को उक्त सभी पुस्तके पौन मूल्य पर दी जायेगी।

Prakaranpanchakam

Author
Shastri,krishna Pant
Title
Prakaranpanchakam
File name
Prakaranpanchakam
Text
OCR done
Citation
1933
Published
2012/08
Publisher
Kashi.,achut Granth Mala Karyalay
Language
Sanskrit
Pages
129
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
405058
Barcode
99999990292167.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
jg6qIbWRU3B
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