Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
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चरित्रगठन
श्रीयुक्त बाबू ज्ञानेन्द्र मोहन दास प्रणीत बंगला
"चरित्रगठन" का हिन्दी अनुवाद
अनुवादक
पण्डित जनार्दन झा
प्रकाशक
इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग
१६२४
पञ्चन श्रावृत्ति
सर्वाधिकार रक्षित
[मूल्य
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सूचीपत्र
विषय
निवेदन
...
पहला परिच्छेद
.
...
सच्चरित्रता ही उन्नति का मूल है
साधुता का धर्म सत्यप्रियता
अपना दोप स्वीकार करना महत्व का लक्षण है
पोरेश्वर मुखोपाध्याय की उदारता
मनुप्यता ...
साधना
११
१६
२६
२२
दूसरा परिच्छेद
...
शिष्टाचार...
शिष्टाचार के विषय में बोटोममझ...
स्वार्या लीग शिष्टाचारी नहीं हो सकते
जीवन-मुकुर
माघारस कामों में सजनवा का प्रकाश
ॐ स्वाभाविक महानुभूति सुजनता का एक अंग है ...
पृष्ठ १८ ... विषय शिष्ट व्यवहार में लोकलना आदि कुसंस्कारों पर ध्यान न देना चाहिए शिष्टाचार प्रान्तरिक विनय का चाय लक्षण है बाध्यत्राघकभाव तीसरा परिच्छेद ... ... ... ... सदय दान दया से यढ़कर कोई धर्म नहीं दया के अवतार नमा और सदय व्यवहार से लोग शत्रु को भी अपने वश में कर सकते हैं नौकरों के साथ कैसा व्यवहार करना उचित है स्वामित्व आयूयन चौथा परिच्छेद ... और स्वर्गीय दूत भद्र मनुष्य सत्साहस... परोपकार... वह मनुष्य नहीं देवता है नैतिक बल और बड़प्पन सम्मानरक्षा .
विपय पृष्ठ पाँचवाँ परिच्छेद ... मधुर-भाषण विनय विनय का अवतार ... ... ... छठा परिच्छेद अशिष्टता ... ... ११० ११४ ... 'पाप' और 'तुम' शब्द का व्यवहार इसी दिल्लगी झूठा परिहास भयङ्कर परिहास शिष्ट परिहास मीठा तिरस्कार ... ... ... १२४ सातवाँ परिच्छेद ... जातीय दुर्वलता असमर्थता दिखलाना "न हो सकेगा। उत्साह विनयकुमार की प्रतियोगिता २४१ २४३ ... ... ...
विषय
कर्म करने ही में बड़प्पन है
कर्म-माहात्म्य
१५१
१५६
पाठवा परिच्छेद
.
जन्मभूमि
स्वदंशानुराग
...
...
.
.
प्रादर्श पुरुष
...
गृहकलह
देशोपकार
राजभक्ति
মনকি
१६४
१६६
१७२
-१७८
१८५
१६४
...
निवेदन
यह उपन्यास नहीं, न किस्से-कहानी की किवान है। यह
याबू ज्ञानेन्द्रमोहन दास के फंगला "चरित्रगठन का हिन्दी
अनुवाद है। ज्ञानेन्द्र बाबू ने चरित्रगठन पुस्तक की रचना
करके मानव-समाज का कितना बड़ा उपकार किया है, यह
वर्णनातीत है। सभी सभ्य समाज के प्रश्न विद्वान समालोचक
मुक्तकण्ठ से इसकी प्रशंसा कर चुके हैं।
मनुष्य-जीवन के साथ चरित्र का कैसा घनिष्ठ सम्बन्ध है,
यह कहने की आवश्यकता नहीं । सचरित्रता और दुश्चरित्रता
के फलाफल की बातें किससे छिपी हैं ? हाँ, इतना अवश्य
कह सकता हूँ कि यह चरित्रगठन दुश्चरित्ररूपी रोग का
महापध है। अन्यकर्ता ने इस पुस्तक में चरित्रसुधार की जितनी
बातें लिखी हैं, सभी मन्त्र के बराबर हैं। पढ़ने के साथ चित्त
पर असर कर जाती हैं। फैसा ही कोई दुश्चरित्र क्यों न
हो, जो इसे एक बार पढ़ेगा वह उसी घड़ी से अपने
चरित्र सुधार पर तत्पर होगा । इतना ही नहीं, बल्कि उसे
दुश्चरित्रता की बातों पर इतनी घृणा उत्पन्न होगी कि वह भूल
कर भी कभी उनका नाम न लेगा।
संसार में ऐसा कौन मनुष्य होगा, जो अपने सन्तान को
. . (२.) सच्चरित्र देख प्रसन्न न हो? जो स्वयं दुश्चरित्र है, यह भी अपने सन्तान को दुश्चरित्र देखना नहीं चाहता । वह यही चाहता है कि किसी तरह उसके सन्तान सच्चरित्र हो । कितने ही लोग अपने सन्तान को शिक्षित और सच्चरित्र बनाने के लिए हज़ारों रुपये खर्च कर डालते हैं , पर तो भी सफल- मनोरथ नहीं होते। ऐसे लोग एक बार अपने सन्तान को यह पुस्तक पढ़ने को दें, तव देखें, उनका मनोरथ कितना शीघ्र सफल होता है। दुश्चरित्र सन्तान से केवल मां-बाप को ही कष्ट नहीं होता, बल्कि उनके परिवार-मात्र को कष्ट होता है । साथ ही इसके समाज का और देश का भी अमङ्गल होता है। इसलिए इस चरित्रगठन की घर-घर में आवश्यकता है जिसके घर में कम से कम एक प्रति भी चरित्रगठन रहेगा, उसके सन्तानों को दुश्चरित्र होने का भय कदापि न रहेगा। जो नवयुवक विद्यार्थी चरित्रगठन के अभिलापी हैं वे ते इसे अवश्य ही पढ़े और विशेषकर उन्हीं के लिए यह पुस्तक बनाई गई है। वे इस पुस्तक को पढ़कर आप तो लाभ उठावें ही, किन्तु अपने भावी सन्तानों को भी विशेष लाभ पहुंचे सकेंगे । इस पुस्तक के सभी विषय सुपाठ्य हैं । जिस कंतव्य से मनुष्य अपने समाज में श्रादर्श बन सकता है उसक उल्लेख इस पुस्तक में विशेषरूप से किया गया है। उन्नति, उदारता सुशीलता, दया, क्षमा, प्रेम, प्रतियोगिता आदि अनेक विषयों का वर्णन उदाहरण के साथ किया गया है। अतएव क्या बालन क्या युद्ध, क्या युवा, क्या स्त्री समी से मेरा. सानुनय निवेदन . .
।
कि ये इस पुस्तक को एक बार अवश्य एकाम मन से पढ़ें और
। इससे पूर्ण लाभ उठावें।
यदि हिन्दी-प्रेमी मनन महाशय इस पुस्तक को पसन्द करेंगे
तो मैं अपने परिश्रम को सफल समदूंगा।
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जनार्दन झा
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पहला परिच्छेद है . सच्चरित्रता ही उन्नति का मूल मनुष्य जो कुछ काम करते हैं, सुख के लिए ही करते हैं। सुख पाने की इच्छा सबको रहती है। सबका उद्देश यही रहता है कि हमको सुख मिले । किन्तु गला फाड़कर सुख-सुख चिल्लाने से किसी को सुख नहीं मिल सकता। सुख तभी मिल सकता है और उन्नति भी तभी हो सकती है.. जब चित रीति से अपने कर्तव्य कर्म का पालन किया जाय । तुम लोग जो इतना धन खर्च करके और परिश्रम करके विद्यालाभ कर रहे.ही सो क्यों ? सुख ही के लिए न ? यदि तुम सुख-दुःख की बात न समझकर यह कहो कि हम धन प्राप्त करने के लिए विद्याभ्यास करते हैं तो मैं कह सकता हूँ कि तुमने विद्याभ्यास का असली तात्पर्य नहीं समझा । धन भी तो लोग सुख से समय बिताने ही के लिए कमाते है-इससे यह न समझना चाहिए कि सिर्फ रुपया कमाने ही के लिए चालकों को विद्याभ्यास कराया जाता है। शिक्षा का प्रधान उद्देश है चरित्रगठन । यदि शील-स्वभाव अच्छा न हुआ तो विद्या- भ्यास का फल क्या हुआ? मनुष्य-योनि में जन्म लेने ही से कोई मनुष्य कहलाने योग्य नहीं होता। मनुष्य कहलाने के लिए शिक्षा ग्रहण करना नितान्त आव- श्यक है। बिना शिक्षा पाये वास्तविक मनुष्यता प्राप्त नहीं होती; इसी लिए बचपन में बालकों को शिक्षा दी जाती है। हम केवल द्रव्यलाभ ही के लिए विद्या सीखते हैं-ऐसा किसी को न समझना चाहिए । बल्कि उन्हें यह समझना चाहिए कि हम मनुष्यपद को ४ । चरित्रगठन! सार्थक करने के लिए विद्या पढ़ते हैं। सञ्चरित्रता ही मनुष्य-जीवन का प्रथम साधन है। सभी लोग विद्या पढ़कर शिष्टाचार, विनय, उपयुक्त साहस, सहनशीलता और सत्यपरायणता प्रादि अनेक गुणों से अपने हृदय को अलङ्कृत-कर और सच्चरित्र बनकर बहुव-कुछ अपनी उन्नति कर सकते हैं। सचरित्र होने से लोगों को मानसिक सुख का विकास विशेष रूप से होता है। और वे सञ्चरित्र व्यक्ति अपने जीवन के दिन बड़े सुख से व्यतीत करते हैं। दुश्चरित्र लोगों का तो कोई.संसार में विश्वास तक नहीं करता ।। सच पूछो तो भारतवर्ष की अवनति का कारण भारतवासियों की दुश्चरित्रता हो है । भारतवासी यदि अपने स्वभाव को न विगाड़ते तो उन्हें ऐसे दुःख का दिन देखने में न प्राता । आजकल श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजी के सहश सुशील, युधिष्ठिर के सदृश सत्यप्रिय, भीष्म के सदृश दृढ़प्रतिज्ञ, भीम, अर्जुन आदि के सदृश भ्रातृवत्सल, विदुर के समान विनयी, व्यास, वसिष्ठ, कपि- लदेव प्रादि ऋपियों के समान ज्ञानी और पूर्वकालिक आर्यगणों के समान धर्मभीरु, राजभक्त तथा दया, क्षमा आदि गुणों से युक्त प्रायः एक भी मनुष्य कहीं दिखाई नहीं देता। पर तो भी अभी तक आदर्श पुरुषों का एक दम लोप नहीं हुआ। इस पवित्र विशाल भारतवर्ष में प्रादर्श पुरुपों.का बिलकुल प्रभाव हो जाना क्या कभी संभव है ? इस.वर्तमान भारत में भी अनेक महापुरुषों ने जन्म ग्रहण करके अपने, उदार, चरित्रों से लोगों को. अनेक. उपदेश दिये हैं। 'क्या घर, क्या बाहर, क्या स्वदेश और क्या विदेशः अब भी . . . . . - -- , . पहला परिच्छेद। उन्हें कितना पश्चात्ताप होगा। संभव है वे अनुतप्त कर एफ- दम जीवन्मृत की तरह समय वितायेंगे । दुःख, तना और जोम से उनका मन बराबर व्यग्र ही होता रहेगा। उनके पहले की काल्प. निक प्राशा, उद्यम और उत्साह सभी एक साथ मिट्टी में मिल जायेंगे। अतएव हे युवकगण ! यदि तुम लोग पढ़ने के समय अपने भविष्य सुख के काल्पनिक चित्र की रचना न करके अपने चरित्र' को सुधारो तो नैराश्य के बदले तुम्हारी आशा अवश्य फलवती होगी । काल्पनिक सुख के बदले सच्चे सुख पाओगें । जैसे कितने ही प्रादर्श पुरुष अपनी सचरित्रता से संसार में अक्षय कीर्ति स्थापित करके अमर हो गये हैं। तुम लोग भी उनके मार्ग का अनुसरण फरफे वैसे ही चिरफाल के लिए यशस्वी हो जाओगे। क्योंकि सब उन्नतियों का मूल मचरित्रता ही है ।। चरित्र सुधारने के लिए किन-किन सामग्रियों की आवश्यकता है वह इस पुस्तक के पढ़ने से तुम्हें मालूम हो जायगी । इसमें नई यात एक भी नहीं है, तथापि आदि से अन्त तक पड़ जाने पर तुम समझ जाओगे कि इस पुस्तक में ऐसे अनेक विषय हैं, जिन्हें तुम पहले जिस प्रकार समझे हुए थे, उनसे उनका अर्थ विलक्षण है। जब तुम उन विषयों के यथार्थ भावं जान लोगे तब प्राप से आप तुम्हारी आँखें खुल जायेंगी। सधरिन पुरुष का संक्षिप्त लक्षण इतना ही है कि उसमें सत्य- प्रियता, शिष्टाचार, विनय, परोपकारिता और चित्त की विशुद्धता; ये गुण पाये जायें, शेप- जितने गुण हैं वे सब इन्हीं गुणों के अन्तर्गत है। . For चरित्रगठन साधुता का धर्म सत्यप्रियता है . जितना ही सत्यप्रियता का अभाव है उतना ही सुजनता का.. हास है। सत्यप्रियता समाज के लिए एक ऐसा उत्तम बन्धन है. कि जिससे समाज की बहुत-सी बुराइयाँ दूर हो जाती हैं। सिर्फ झूठ नं बोलने के भय से ही समाज का बहुत कुछ सुधार हो सकता है। किन्तु बहुत लोगों के मुँह से यह सुनने में आता है कि विना झूठ बोले काम नहीं चलता। पाठशालाओं में शिक्षकों के निकट सज़ा पाने के डर से विद्यार्थिगण, घर में माँ-बाप और अन्यान्य गुरुजनों से धिकारे जाने के भय से लड़के-लड़कियाँ, मालिक के डर से नौकर और समाज की निन्दा और लोकलज्जा के भय से गाँव के रहनेवाले झूठ बोलना अङ्गीकार करते हैं। अब यह सोचना चाहिए कि घर-घर में व्याप्त होनेवाले इस मिथ्याभाषण का मूल क्या है ? इसका मूल डर है। डर जाने ही पर लोग झूठ का सहारा लेते हैं । भीरुता और कायरता के सिवा इस मिथ्याभापण का और कारण क्या कहा जा सकता है। कई एक सामान्य गुणों के प्रभाव से यह भारी दोपं उत्पन्न होता है। विना विचारे जब कोई अनुचित कर्म कर बैठता है तब उसे भय होता है। वह सोचता है-दीप स्वीकार करने ही पर मैं दण्ड पाऊँगा, क लोग मुझ पर क्रोध करेंगे। पड़ोस-पड़ोस के लोग मुझे घृणा की दृष्टि से देखेंगे; और भी मुझे कितने ही दुःख झेलने पड़ेंगे । ऐसी हालत में क्या करना चाहिए ? अपना दोप स्वीकार करके दण्ट पाना उचित है अथवा झूठ के सहारे अपना दोप छिपाकर उद्धार घर पदला.परिच्छेद। पाना उचित है ? फोई तो उस अपराधी व्यक्ति को यह सलाह देगा कि अगर दो-एक झूठ यात बोलने से सारा सङ्कट मिट जाय तो भूठ बोलने में हर्ज ही क्या ? शुद्ध-चरित्रवान कहेंगे कि अपराधी अपने दोप को छिपाकर एक चार किसी तरह बच सकता है किन्तु उसी घड़ी से उसके भविष्य की प्राशा, शुभसङ्कल्प सर्वदा के लिए लुप्त हो जाता है। अपने अपराध-जनित सङ्कट से रक्षा पाने के लिए बार-बार उसे झूठ बोलना पड़ता है। हृदय के उच्च भाव सभी एक-एक कर निकल जाते हैं। अपना दोष स्वीकार कर लेने पर. सत्यवादी को दण्ड ज़रूर होता है किन्तु सत्य के प्रभाव से उसका हृदय उस दण्ड की अपेक्षा अधिक उन्नत होता है। उसके मन से सारा भय भाग जाता है, उसे झूठ बोलने के लिए फिर कभी बाध्य होना नहीं पड़ता किन्तु जो लोग मिथ्यावादी हैं ये हमेशा ही भयभीत रहते हैं, उनका हृदय उद्विम रहा करता है। उनके जी में प्राप ही पाप ग्लानि होती रहती है। वे कौटिल्य धारण करके नीच से भी नीच कर्म करने लग जाते हैं। बाहर से चे भले ही ऐश्वर्यशाली देख, पढ़ें पर भीतर से वे परावर वेचैन रहा करते हैं। जो लोग सत्यमापी है, उनके मन में शान्ति, हृदय में साहस, बोली में स्पष्टता और दृष्टि में तेज भरा रहता है। सभ्य समाज में उनका आदर होता है। अच्छे गुणों की प्रतिष्ठा सभी समय सब देशों में होती है। सत्यभापण एक पद प्रधान गुण है जिसके धारण.से मनुष्यमात्र गौरवान्वित हो सकता है। जो असत्य. सेवी हैं ये किसी काल में पढ़ाई नहीं पा.सकते। जिन सब गुयाँ.की ज्योति से संसार जगमगा रहा है उन चरित्रगठन ।. गुणों को प्राप्त करने का अभिलाप किसे न होगा.? उन. सब र को कोई एक. ही साथ..प्राप्त कर लेना चाहे.यह कभी हो सकता। हाँ, एक-एक गुण का अभ्यास करके लाग गुणों से भ का अलङ्कृत कर सकते हैं। अवगुण अनायास ही प्राप्त होता किन्तु गुण विशेष साधन का फल है। यदि .तुम गुणों का सं करना चाहो तो उसका सुगम उपाय यही है कि सबसे पहले सत्य का सहारा लो । दृढ़तापूर्वक प्रतिज्ञा करो कि "मैं झूठक न बोलू गा" बस, एक सत्यः का प्राश्रय ग्रहण करने ही से है जितने गुण हैं वे आपसे आप आकर तुम्हारा हाथ पकड़ेंगे। एक बड़े विज्ञ.महात्मा का कथन है--"ज्ञान ही शक्ति है ज्ञान का स्वरूप सत्य है, और अज्ञान, का असत्य । इस सिद्धान से सत्य और शक्ति में कुछ भेद न रहा। जिसमें जितना सत्य E भाग है वह उतना हो शक्तिमान है ! संसार में जितने अनि सङ्घटित हुए हैं, हो रहे हैं और होंगे इनका एक मात्र कार सत्य की हासता है। एक बार भारतवर्ष की ही बात सोचक देखो। इस भारत में जब सत्यं का सम्मान था, सबके. विचार विशुद्ध थे, छल-कपट को.लोग महापाप समझते थे, तम भारत में शक्ति, समृद्धि और सुख था । ज्यों-ज्यों सत्य का हाट होने लगा त्यों-त्यों भारतवासी पार्यगा शक्तिहीन होने लगे। हाय प्राचीन भारत को सत्यप्रियता, स्वधर्मनिष्ठा, साधुता, धोरवा श्री वीरता के साथ वर्तमान भारत की असत्यपरता; दुराचार, अशि एता, अधीरता और भारुता की तुलना करते हैं तो हृदयं विदीर हो जाता है. और लन्ना.से सिर-नीचे झुक जाता है। किन्तु तु माचा + पहला परिच्छेद। लोग यदि अब भी सत्यव्रत धारण करके अपने चरित्र को सुधारोगे तो थोड़े ही दिनों में वर्तमान भारत के समस्त फलकों को मिटा डालोगे। कितने ही विदेशियों ने जो हम लोगों को बहुत-बहुत गालियाँ दी हैं और कितने ही विदेशी जो हम लोगों की मूर्खता पर अब भी हसते हैं और हम लोगों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं वे लोग भी क्षमाभाव धारण करेंगे और तुम लोगों के महत्त्वं का परिचय पाकर बार-बार तुम्हारी प्रशंसा करेंगे। अतएव सर्वदा सत्यपालन करने का दृढ़ संकल्प करो, सङ्कट के समय में भी सत्य का त्याग न करो, और अपने दोप छिपाने के लिए कभी असत्य को अपने पास न फटकने दो। मुक्तकण्ठ से अपना दोप स्वीकार झरो, पर भीरुता का धारण स्वप्न में भी न करो । . , अपना दोप स्वीकार करना महत्त्व का लक्षण है जिन्हें मानसिक बल नहीं है वे ही अपना दोष स्वीकार करने में थरथराते हैं। वे यह नहीं सोचते कि अपराध स्वीकार करना हृदय की दुर्वलता न होकर हृदय का महत्त्व है । अपना दोष प्रकट कर देने ही से मनुष्य निर्दोप होता है, उसके मन में शान्ति प्राप्त होती है, चरित्र निर्मल होता है और अपयश के बदले सुयश प्राप्त होता है। अनुचित कर्म करके दोप स्वीकार करना साधुओं का काम है। जो लोग दोप छिपाते हैं उन्हें चोर समझना चाहिए । .
r . . १२ चरित्रगठन । जो अपना दोप जितना ही छिपाने की चेष्टा करता है उतना ही वह अपने को और दोपी बनाता है। अपने दोपों को छिपाकर कोई साधु नहीं कहला सकता, साधु तभी कहला सकता है जब वह साफ़-साफ़ अपना दोपं प्रकट कर दे और अपने किये हुए दोपों पर पश्चात्ताप करें। दोप छिपाने के लिए झूठ बोलना, एक दोप के रहते दूसरा दोप करने के बराबर है। दोप से दोप का उद्धार कभी नहीं हो सकता । कीचड़ से कोई कीचड़ का दाग़ साफ़ नहीं कर सकता। प्राग से कोई आग को नहीं बुझा सकता । जैसे आग बुझाने के लिए पानी आवश्यक है। वैसे ही दोष दूर करने के लिए सत्य की आवश्यकता है। इसे भली भांति याद रक्खो कि एक झूठ के छिपाने के लिए दूसरे झूठ की ज़रूरत पड़ती है अर्थात् जहाँ मुँह से एक बात झूठ निकली, तहाँ दूसरा झूठ आप से प्राप प्रा खड़ा होता है । एफ झूठ के लिए न मालूम कितने झूठ बोलने पड़ते हैं, इससे उत्तरोत्तर दोपों की हो वृद्धि होती है। जिनका चरित्र बिगड़ा है, जो हृदय के दुर्वल हैं; वे अपने दोप छिपाने की बहुत कोशिशें करते हैं। आज-कल ऐसे ही लोगों की संख्या अधिक है जो अहङ्कार में फूले रहते हैं। व्यसनों को ही अपना कर्त्तव्य समझते हैं और पढ़-लिखकर भी मूर्खता का काम करते हैं। कितने ही बुद्धिहीन.ता. जगह-ज़मीन के लिए, प्रभुता पाने के लिए, क्षणिक सुख-भोग के लिए और भी अनेक छोटे छोटे लाभों के लिए अपने अमूल्य चरित्र को कलङ्कित कर बैठते हैं। . कितने ही लोग अंपने दुश्चरित्रजेनित दोषों को छिपाने के " " -४ . -- - पहला परिच्छेद। १३ हेतु बहुत द्रव्य खर्च करके और अनेक प्रकार के वाह्याडम्बर करके सुयश प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं और समय-समय पर कृतकार्य भी होते हैं। किन्तु सत्य सत्य ही है, असत्य को कभी वृद्धि नहीं होती । इस नियम से उनका नाम और यश थोड़े ही दिनों में लुप्त हो जाता है। जिनका आचरण अच्छा है वे वाह्या- डम्बर कुछ न करके भी सभ्य समाज में सम्मानित होते हैं और जनसाधारण में भी सर्वत्र उनका प्रादर होता है। जिनका पाचरण अच्छा नहीं, वे यश के लोम से अनेक अच्छे काम को करके भी अपने दुश्चरित्र का कलङ्क दूर नहीं कर सकते। उनके विषय में सब लोग यही कहा करते हैं कि "वे कितने ही अच्छे अच्छे काम कर गये हैं सही, किन्तु उनका जीवन पवित्रता से रहित था । ऐसे लोग जन-समाज में धन्यवाद और कृतज्ञता के पात्र हो सकते हैं किन्तु उन पर लोगों को श्रद्धा वा भक्ति उत्पन्न नहीं होती ! हृदय से कोई उन पर प्रेम प्रकट नहीं करता। सुयश का काम करके भी लोगों की दृष्टि में अश्रद्धेय, अप्रीतिभाजन और अपूज्य होने का दुराचार ही एक-मात्र प्रधान कारण है। अच्छे आचरण फा प्रभाव इतना प्रवल है कि एक सचरित्र पुरुष की देखा-देखो समस्त जाति की उन्नति हो सकती है। ऐसे ही एक दुश्चरित्र के संसर्ग से सारा गांव बिगड़ जा सकता है। सिद्धान्त यह कि दुराचारी का सम्पर्क, संक्रामक (ौपसर्गिक ) रोग की तरह, सर्वथा त्याज्य है। सत्य से विचलित न होना जैसे साधुओं का धर्म है वैसे ही अपने दोष का स्वीकार कर लेना सञ्चरित्र पुरुषों का प्रधान लक्षण . . . ।
. १४ चरित्रगठन-1... है। स्वर्गीय महात्मा गोविन्द.मोहन राय विद्याविनोद इस विषय में हम लोगों के आदर्शस्वरूप हो.गये हैं। इन्होंने अपनी बाल्यावस्था: में ही अपनी तेजस्विता, सत्यप्रियता और अपने महत्व का जो कुछ परिचय दिया है वह सभी के लिए अनुकरणीय है । बाल्यकाल में एक बार महात्मा गोविन्द मोहन नाव पर आरूढ़ होकर रङ्गपुर. जा रहे थे। लोगों का कथन है कि उन्हें विद्याशिक्षा के लिए उनके पिता के पास आत्मीय-गण लिये जा रहे थे। तब रेल न थी । जल- मार्ग से ही लोग दूर-दूर की यात्रा करते थे। इन दिनों जो रास्ता रेलगाड़ी में बैठकर लोग कई घण्टों में तय करते हैं उन दिनों, उस रास्ते के तय करने में कई दिन लग जाते थे। नाव के यात्रिगणों. को तो रसोई प्रादि बनाने और खाने-पीने प्रादि के सभी काम नाव पर ही करने होते हैं। रङ्गपुर के इन नौकारूढ़ यात्रियों ने रास्ते में कहीं मछुओं से यथेष्ट मछलियाँ मोल ली। उनमें एक बड़ी मछली जीवित थी । घर में जिस प्रकार लोगों को मनमाना सुस्वादु भोजन मिलता है, दूरवर्ती नदी के पथ में, उस प्रकार मिलना कप सम्भव है ? यद्यपि नाव की सवारी बड़े प्राराम की होती है तथापि समय अधिक, लगने के कारण लोगों का जी ऊब जाता है और कई बातों को असुविधा भी, होती है। ऐसे अवसर में यदि जल-यात्रियों को कोई अभिलपित वस्तु मिल जाय तो फिर उनके प्रानन्द की सीमा नहीं रहती । उन यात्रियों ने जबसे घर छोड़ा तबसे ऐसी घढ़िया मछली उन्हें कभी नहीं मिली यो । एकाएक ऐसी अच्छी मदली मिल जाने से वे लोग घड़े हो प्रसन्न हुए। पालक गोविन्द मोहन को तो उस समय मारे खुशी के - पहला परिच्देश स्खल-कूद फरना चाहिए था किन्तु उनऊ मुंह पर प्रसन्नता का चिहमान भी दिखाई न दिया। सभी लोग प्रानन्द में उमॅग रहे घे। केवल बद घालफ सोच में पड़ा था। उनके मन में यही चिन्ता हो रही थी, यही सोच-सोचकर यह व्याकुल हो रहा था कि अपनी उदरपूर्ति के लिए लोग इतनी पड़ी मछली को मार डालेंगे। पालफ ने सोचा--"मैं अपने हाथ से तो इसे मारूंगा नहीं और न पकाये जाने पर इसका स्पर्श ही करूँगा । किन्तु मेरे सामने लोग इसे मारकर टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे यह मैं कैसे देख सकूँगा।" जब लोग स जीवित मत्स्य को यह समझफर कि कहीं भाग न जाय, निरापद स्थान में रखकर किसी दूसरे काम को चले गये तम उस पालक ने मदली फो नदी के अगाध जल में छोड़ दिया। गोविन्द मोहन इस बात को भली भांति जानते थे कि वह मछली हो उस दिन सय के प्रानन्द का कारण हो रही थी और से पानी में छोड़ देने से वह सबका क्रोध-भाजन बनेंगे तथापि मछली की प्राण-रक्षा करने में उन्होंने ज़रा भी भागा-पोछा न किया। अब उनके बड़े भाई और सांय के लोगों ने मछली की तलाश फो और मछली न मिली तब वे लोग अधीर हो उठे। चालक गोविन्द मोहन ने भर्त्सना का कुछ भय न करके साफ़-साफ़ उन लोगों से कह दिया कि "मैंने हो मछली को पानी में भगा दिया है।" जिन्हें इन दयालु पुरुप का जीवन-वृत्तान्त जानने की अभि- लापा ही वे १३०४ साल की नव्यभारत-पत्रिका पढ़ें।
चरित्रगठन ।
वीरेश्वर मुखोपाध्याय की उदारता
सन् १८८८ ई० के ग्रीष्मकाल में वशीर मुहम्मद खाँ नाम
का एक कावुली सौदागर वङ्ग देश से अफगानिस्तान लौटते वक्त
पक्षाव के वन्न शहर में दो-चार दिन के लिए ठहर गया । शहर के
प्रान्त में एक बड़ा बाग था । वह उसी में ठहरा । जब वहाँ से वह
अपने देश को जाने लगा तब जल्दी में उसकी रुपये की थैली वहीं
छुट गई । उस थैली में पाँच हज़ार रुपया था। जब कुछ दूर भाग
बढ़ा तब वह अपने पास रुपये की थैली न देखकर उस वाग की
तरफ दौड़ चला। रास्ते में उसे एक तेरद्द चौदह वर्ष का बङ्गाली
वालक मिला। उस बालक ने उसे घबराया हुआ-सा देखकर
पूछा-"क्या आपकी कोई चीज़ खा गई है?"सौदागर ने कहा-
"मेरी रुपये की थैली खो गई है ।। बालक ने तुरन्त थैली दिखला-
कर कहा-"यह श्राप की है ? लीजिए।"
काबुली ने थैली के रुपये वालक को दिखलाकर पूछा-
"तुम्हारे मन में इन रुपयों का लालच क्यों न हुआ ?" बङ्गाली
बालक ने कहा-मैंने बचपन से यही शिक्षा पाई है कि दूसरे के
द्रव्य को मिट्टी के बराबर समझना चाहिए।"
लड़के की यह बात सुनकर काबुली को बड़ा ही प्रानन्द
हुश्रा
उसने अपने मन में कहा-"ऐसा पुत्र-रन पाकर न मालूम
इसके मां-बाप को कितना इंप होता होगा." आखिर सौदागरने
उसके इस महोपकार के बदले पुरस्कारस्वरूप पाँच रुपया उसे देना
-
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पहला परिच्छेद। चाहा। लड़के ने कहा-"मैंने आपका ऐसा कौनसा उपकार किया है जिसके बदले में आपसे मैं यह रुपया लूं। आपका रुपया भाप को दे दिया, यह तो मैंने अपने कर्तव्य का ही पालन किया है।" उक्त काबुली ने इस वृत्तान्त का अँगरेजी के एक समाचार- पत्र में प्रकाशित कर दिया । उसने अपने लेख के अन्त में लिखा है -"वह रुपया मेरा न था, मेरे मालिक का था। यदि वह लड़का रुपया छिपा रखता तो मुझे कैद में जाना पड़ता और मुझसे लोगों का विश्वास उठ जाता । लड़के ने जो मेरा उपकार किया है शन में उसका वर्णन नहीं हो सकता । उसके निकट मैं अपनी कृतज्ञता किस तरह प्रकट कर सकूँगा, यह मैं नहीं जानता। उसके सौजन्य की प्रशंसा जितनी की जाय थोड़ी है। मैं अपने इस परमोपकारी बालक को इस ज़िन्दगी में कभी न भूलूँगा । उसके दीर्घजीवन और सुख-सम्पत्ति के लिए मैं सर्वदा ईश्वर से प्रार्थना किया करूंगा। मैं उस बालक को ह्रदय से यही आशीर्वाद देता हूँ कि वह सर्वदा सुखी रहे, कभी वह किसी तरह का कष्ट न पाये और हर एक काम में कामयाबी हासिल करे " लड़के का नाम वीरेश्वर मुखोपाध्याय है। धन्नू ज़िला-स्कूल के एन्ट्रन्स क्लास में पढ़ता है। (वामायोधिनी-पत्रिका) नैतिक बल के प्रभाव का ही नाम भीरुता या कायरता है। स्कूलों में ऐसे लड़कों की संख्या कितनी होगी जो अपराध करके स्वीकार करते हों ? ऐसे विद्यार्थी कितने होंगे जो दण्ड पाने की धात जानकर भी अपने अपराध को प्रकट करने का साहस रखते हो ? यदि तुम्हारे मन से भोरता दूर न हुई तो तुमने बड़े-बड़े - चरित्रंगठन। अन्थों को पढ़कर ही क्या किया। जब तक तुम भीरु बने रहोगे तब तक मैं यही कहूँगा कि विद्या का फल तुम्हें प्राप्त नहीं हुआ। जब तुम अंच्छे मार्ग से चलोगे तब तुम्हारी जितनी भीरता, जड़ता और मलिनता है वह इस तरह दूर हो जायगी जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार दूर हो जाता है। इस समय जो मिथ्या-भापण और जातीय भीरुत्व घर-घर आदर पा रहे हैं और जिन कारणों से प्राचीन भारत इन दिनों लज्जा और ग्लानि से एकदम तेजहीन हो पड़ा है, इसका कारण भी नीतिवल का प्रभाव ही समझना चाहिए। रामायण, महाभारत और राजस्थान प्रादि अन्धों से दृष्टान्त दिखलाकर अथवा हम लोगों के प्रातःस्मरणीय ईश्वरचन्द्र विद्या- सागर और राममोहन प्रभृति महानुभावों का पवित्र नामोल्लेख करके ही अपने को धन्य मानने से काम न चलेगा। यदि महा- स्माओं के चरित्र का अनुकरण न करोगे, यदि उनके उपदेशानुसार काम न करोगे, तो सैकड़ों रामायण, हज़ारों महाभारत और लाखों राजस्थान के रहते भी इस दीन-हीन भारत का कलङ्क न मिटेगा। तुम्हारे ग्रन्थों से संसार उतना परिचित न होगा जितना तुम्हारे एक साधारण से साधारण अच्छा काम करने से । सुपथ का अव- लम्बन करके अच्छे कामों को कर दिखाना हो तुम्हारा कर्तव्य है। सुपथ ढूँढ़ने के लिए तुम्हें कहीं जाना न पड़ेगा। महात्मानों का सर्वव्यापी सुयश और उनका पवित्र जीवन-चरित्र ही सुपथ का दिखलानेवाला है। पालक गोविन्द मोहन ने अपना दोप.खोकार करके जैसा कुछ बड़प्पन दिखलाया है, पालक वीरेश्वर मुखोपाध्याय .
पहला परिच्छेद। १६ . . - ने पाँच हज़ार रुपयों को. मिट्टी के बराबर समझकर अपनी निर्लोभता, सत्यवादिता, साधुता और कर्तव्य-बुद्धि का जैसा कुछ परिचय दिया है, इच्छा करने से तुम लोग भी अनायास वैसे-वैसे कामों के द्वारा सुयश प्राप्त कर सकते हो, विश्वासपात्र बन सकते हो और अपनी उन्नति करते हुए संसार फा भी बहुत कुछ उपकार कर सकते हो। , मनुष्यता मनुष्य होकर भी मनुष्यता का ज्ञान होना कठिन है। धन उपार्जन करके कुटुम्ब-पालन करने से अथवा अधिक धन-सम्पत्ति का स्वामी होकर आमोदप्रमोद के साथ जीवन निर्वाह करने ही से कोई मनुष्य नहीं. कहला.सकता । न अनेक शास्त्र पढ़कर दी कोई मनुष्य होने का दावा कर सकता है। मनुष्य का लक्षण केवल धनवान् वा विद्वान होना ही नहीं है। यदि ऐसा ही होता तो समय-समय पर कितने ही धन-कुवेरों का और कितने ही शास्त्रज्ञ विद्या-विशारदों को लोग पशु कहकर क्यों तिरस्कार करते. .? "लिखने-पढ़ने से क्या होगा, उनमें मनुष्यता का बिलकुल प्रभाव है।" इस प्रकार का वाक्य-प्रयोग कभी-कभी लोगों के मुंह से सुना जाता है । इससे समझ लो कि धन-सम्पत्ति और विद्या के साय मनुष्यता का सम्बन्ध नाम-मात्र का है । मनुष्यता एक.और ही पदार्य है। प्रात्मा के साथ इसका घनिष्ठ सम्बन्ध है। जिन्हें आत्मबल है उन्हीं को मनुष्यता.प्राप्त होती है । . अात्मसंयम और, चरित्रगठन . २० आत्मत्याग,ये ही दो. मनुष्यता के लिए प्रधान गुण हैं । चित्त और इन्द्रियों को अपने वश में रखने ही का नाम आत्मसंयम. है। परोपकार के लिए सुख-दुःख की कुछ:परवा न करना ही .प्रात्म: विसर्जन है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य ये जो छ: आत्मा के शत्रु हैं केवल इन्हीं को दवाने का नाम प्रात्मसंयम नहीं है, बल्कि इन शत्रुओं के साथ ही साथ पञ्चेन्द्रिय का निग्रह फरना आत्मसंयम का लक्षण है। ज्ञानेन्द्रियों में सबसे प्रबल जिह्वा है; इसलिए सबसे बढ़कर जिह्वा का शासन करना आवश्यक है। मोधादि शत्रुओं के शासन से इन्द्रियों का भी शासन कुछ हो ही जाता है, किन्तु अभ्यास के दोष से कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि जिस समय.तुम्हारे मन में न क्रोध है न हिंसावृत्ति की ही प्रवृत्ति है, उस समय में भी तुम किसी व्यक्ति के सरल प्रश्न का कठोर उत्तर दे डालते हो. अथवा हसी. में कोई मर्मच्छेदी घात बोल देते हो। चाहे इस प्रकार कठोर वातें बोलकर दूसरों के जी. दुखाने का तुम्हारा अभिप्राय न हो पर. बोलने से तुम कब बाज़ आते हो । इसका कारण यही है कि तुम्हारी जिवा. अभ्यास की वशवर्तिनी हो रही है। वह अनायास अपना काम कर लेती है. और तुम्हें कुछ हिताहित का बोध तक नहीं होने देती । इसलिए जी का रोकना बड़ा ही कठिन है । जब तक.तुम शरीर और मन को विगाड़नेवाले चुरे अभ्यासों को दूर करने में समर्थन होगे तब तफ.तुम अपनी उन्नति करने में असमर्थ ही बने रहोगे। विद्यार्थियों में कितने ही ऐसे निकलेंगे जो अपनी बुरी लत के दुष्परिणाम को । पहला परिच्छेद। 1 जानफर भी उससे विरत नहीं होते। विरत न होने का कारण चिरकाल फा अभ्यास ही है। उस अभ्यास को जीतने के लिए = उन्हें वीरत्न धारण करना चाहिए | यदि तुम अपने अभ्यास पर विजय प्राप्त करोगे तो पीछे तुम्हें वैसा ही आनन्द प्राप्त होगा जैसे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने से होता है। जब तुम अपने शरीरस्थ शत्रु को जीतोगे तर तुम्हें वह शक्ति प्राप्त होगी जिससे संसार को भी जीत सफोगे। मान लो, 'किसी विषय की पालोचना हो रही है। उसके विचारार्थ तुमको किसी ने मध्यस्थ नहीं बनाया है। शायद तुम्हारी अवस्था या तुम्हारी बुद्धि उस विचार के उपयुक्त नहीं है। तथापि तुम अपने चचल स्वभाव के कारण अपना मतामत प्रकाश करने लगे। यह आदत भी बहुत बुरी है। विना अधिकार पाये किसी विपय में हस्तक्षेप करना भारी भूल है। अध्यापक दत्तचित्त होकर तुम्हें किसी मानचित्र ( नकशे ) में विशेप-विशेप स्थान दिखला रहा है । तुम उसकी उँगली की ओर दृष्टि करके मन ही मन गतरात्रि की चाँदनी में उपवन के अपूर्व सौन्दर्य की भावना कर रहे हो। तुम्हारी मान- सिक दृष्टि उस उपवन की शोभा की ओर खिंची है । किन्तु तुम्हें यह याद रखना चाहिए कि विना मनोयोग दिये किसी यात की धारणा नहीं होती । उस-प्राकृतिक शोभा का माधुर्य कैसा ही क्यों न हो, इन दोनों आँखों को वह जिस तरफ़ चाहे भले ही खींच ले जाय; पर मानचित्र के स्थानावलोकन के समय तुमको उचित है कि मानसिक दृष्टि को अन्यत्र न जाने देकर अपने इन 3B
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चरित्रंगठन।
दोनों नयनों के साथ उसे शिक्षक के बताये स्थान में दृढ़ता से
रोक रक्खो। बाह्य और प्राभ्यन्तरिक दोनों नेत्रों को अपने वश
में कर लेना चाहिए। इस प्रकार अपने इन्द्रियों को और काम
क्रोधादि.शत्रुओं को दवाने की चेष्टा करते रहना चाहिए। यदि
चित्तवृत्ति को तुमने अपने वश में कर लिया तो मानो तुमने प्राधी
मनुष्यता प्राप्त कर ली.। मनुष्यस्व का प्रधान स्थान हृदय है और
आचार-व्यवहार से ही हृदय का परिचय होता है। लोग अच्छे
व्यवहार से मनुष्य और बुरे व्यवहार से पशुओं के तुल्य गिने
जाते हैं। तुम यदि उदार, परोपकारी, विनयी, शिष्ट, प्राचारवान,
और कर्तव्य-परायण होगे वो संसार के सभी लोग तुम्हें मनुष्य,
कहेंगे और तब तुम भी समझोगे कि मनुष्यता किसे कहते हैं ।
-
साधना
दोहा
मणि-मुक्ता चाहूँ नहीं, नहीं. राजसम्मान ।
मैं चाहूँ सशरित-युत,
जीवन शुद्ध महान ॥१॥
कायर बने अधर्म डिग, अरु सुधर्म ढिग वीर ।
सम्पति में विनयी बनू, विपति-समय में धीर ॥२॥
बालक-सम मेरी रहै, निर्मल मति-गति नित्य ।
छल-प्रपञ्च तजिसत्ययुत, करौं सदा शुभ कृत्य ॥२॥
दूसरा परिच्छेद। शिष्टाचार बहुत लोगों का खयाल ऐसा ही है. कि अदव-कायदे से चलने ही का नाम शिष्टाचार या सुजनवा है। कितने ही लोग कर्ण-सुखद मधुर वाक्यों से और बनावटी व्यवहारों से लोगों का सत्कार करके सुजनता प्रकाश करना चाहते हैं। किन्तु इसे वास्तविक सुजनता नहीं कह सकते। लोगों में जो प्रागत-स्वागत करने का व्यवहार प्रचलित है, उसी को शिष्टाचार मान लेना ठीक नहीं । यद्यपि अदय-लिहाज़, खातिर-नम्रता, श्रद्धा, भक्ति और मधुर भापण आदि शिष्टाचार के अन्तर्गत है; तथापि इनमें किसी एक को शिष्टाचार समझ लेना भूल है। शिष्टाचार या सौजन्य में अनेक महत्व भरे हैं। शिष्टाचार का अर्थ है साधु का आचरण । जो साधु का सा व्यवहार करेगा वही शिष्टाचारी कदला सकेगा। शिष्टाचार के साथ विद्या का कोई घनिष्ठ सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि कितने ही अनपढ़ लोग भी शिष्टाचारी होते देखे गये हैं। जो विद्वान दुर्जन हैं वे सभा-समाज में निन्ध समझे जाते हैं। किन्तु जो मूर्ख होकर भी सुजन है वह समाज में प्रादरणीय समझा जाता है। सबसे प्रथम लोगों का स्वभाव ही देखा जाता है। स्वभाव की उत्तमता और नीचता ही पर लोगों का महत्व और नीचत्य निर्भर है। विद्या की परीक्षा सब काल में नहीं होती, किन्तु स्वमाव सभी काल में परखा जाता है। संसार में फेवल विद्या पढ़ने.ही से कोई शिष्ट या सुजन नहीं बन सकता । विद्या पढ़कर भी शिष्टा- .
'चरित्रंगठन। चार के द्वारा ही सुशील और सत्पात्र बनकर कोई, लोगों का श्रद्धा- स्पद हो सकता है। विद्यार्थी सुशील होने पर शिक्षकों का प्यारा होता है, सन्तान सुशील होने पर माँ-बाप और गुरुजनों के प्यारे होते. हैं। ग्रामवासी लोगों की शिष्टता से गाँव स्वर्गतुल्य हो जाता है। देशवासियों की साधुता विदेशियों की श्रद्धा और प्रीति प्राप्त करती है । सुशील शिक्षकों पर विद्यार्थियों की भक्ति और श्रद्धा बढ़ती है। मालिक यदि अपने नौकरों के साथ अच्छा बर्ताव करे तो' नौकर उसके हृदय से बाध्य और भक्त होते हैं। इस प्रकार परस्पर अच्छा व्यवहार करने से लोग बड़े आनन्द के साथ समय बिता सकते हैं। एक दिन महाराज रामसिंह अपने साथियों को लेकर आखेट करने जङ्गल को गये. पहाड़ की तराई के वन में हिरन, भालू और वाघ आदि पशु हूँढ़े जाने लगे। किन्तु बहुत तलाश करने पर भी वे जङ्गली जानवर कहीं दिखाई न दिये। आखिर महाराज ने एक वनैले सुअर के पीछे अपना घोड़ा दौड़ाया। वह इतनी तेज़ी से भागा कि महाराज का घोड़ा और उनके शिकारी कुत्ते उसके पास तक न पहुँच सके । महाराज, उसके पीछे बहुत दूर निकल गये । महाराज के साथी लोगों ने उनको खोजते हुए एक घने जङ्गल में प्रवेश किया। महाराज, उस जङ्गल.से. बहुत दूर ना पड़े। साथ में कोई नहीं था । प्यास के मारे उनका कण्ठसूखने लगा। घोड़ पसीने से तर हो गया। सूर्य की प्रखर किरणों से उत्तप्त होकर 'राजपुताने को मरुभूमि मानों प्राग, वरसाने लगी। वालुकामय पृथ्वी मानों प्राग की ज्वाला से लिपट गई। ऐसे समय में महा- दुसरा परिच्छेद । राज घूमते-फिरते एक छोटेसे पहाड़ की तलहटी में एक झोपड़ी के पास आ पहुँचे। झोपड़ी में एक अत्यन्त वृद्धा स्त्री के सिवा और कोई न था । उस वृद्धा की अवस्था देखकर यही जान पड़ता था कि वह अब कुछ दिन में ही संसार से चल बसेगी । महाराज कड़ी धूप में चलकर.वहुव व्याकुल हो गये थे। उन्होंने अधोर होकर बड़े ही विनीत भाव से उस वृद्धा से घोड़ासा ठण्डा जल मांगा । वहाँ पास ही एक बहुत बड़ा पहाड़ था, जिसमें दो झरने ऐसे थे जिनसे बरावर पानी गिरा करता था। महाराज को झरने की बात मालूम न थी। वृद्धा प्रतिदिन सवेरे झरने का जल ला. कर अपनी कुटी में रख देती थी। वृद्धा ने तुरन्त एक मिट्टी के बर्तन में ठण्ढा जल लाकर जयपुर के अधीश महाराज रामसिंह के सामने रख दिया । वृद्धा को क्या मालूम कि ये जयपुर के महाराज हैं । रामसिंह ने शीतलं जल पान करके हृदय को ठण्ढा किया। उनकी प्यास और थकावट दूर हुई । मन ही मन उन्होंने वृद्धा को बहुत धन्यवाद दिया। जब राजा का चित्त स्वस्थ हुआ तब उन्होंने वृद्धा को अपने पास बैठाकर पूछा-"तुम्हारा निर्वाह कैसे होता है, और तुम्हारे परिवार के लोगों में अब कौन-कौन है, और कहाँ रहते हैं ? वृद्धा बोली-"सिपाहीजी, मेरे तो और कोई नहीं है सिर्फ एक पुत्र है किन्तु वह नालायक बेटा भी प्रायः धारह वर्ष से इस बूढो दरिद्र माँ को छोड़कर न मालूम कहाँ चला गया। किसो- किसी के मुँह से सुना है कि जयपुर के महाराज रामसिंह के पहाड़ी फिले में मेरा लड़का कुछ काम करता है। मेरे भरण-पोपण + : 7 . २८ चरित्रााठन:: का कुछ उपाय नहीं है। पधिक लोग यहाँ पाकर पानी पीते हैं. और मुझे कुछ देना चाहते हैं; किन्तु पानी पिलाकर मैं किसी.से कुछ नहीं लंती, क्योंकि मैं यह जानती हूँ कि प्यासे को पानी पिलाकर और भूखे को कुछ खिलाकर उसके बदले में कुछ लेना भारी पाप है। जङ्गल की लकड़ी, मृगछाला, पहाड़ी चिड़ियाँ, और काष्ठोपधि इत्यादि बिक्री करके किसी तरह. मैं पेट भर लेती हूँ। किन्तु अव अत्यन्त वृद्धा होने के कारण मुझसे परिश्रम करते नहीं बनता, तथापि लाचारी से करना ही पड़ता है। बुढ़ापे में इस . तरह की लाचारी से बड़ा ही कष्ट होता है। मैं अपने जीवन का शेष समय बड़े ही दुःख से बिता रही हूँ। इस अवस्था में लड़के की जुदाई तो मुझे एक प्रकार से मारे ही डालती है।" यह कह- कर वह रोने लगी। राजा रामसिंह ने अपने .बहुमूल्य रूमाल से उसकी आँखों के आँसू पोंछे। वृद्धा बेचारी क्या जानती कि जिसके साथ वह यात कर रही है वही जयपुर के सिंह बहादुर हैं। वह उन्हें सिपाही-जानकर फिर कहने लगी- "सिपाहीजी, सुना है. महाराज रामसिंह पड़े दयालु हैं ? पार उनकी रानी भी खूब लिखी-पढ़ी हैं ? .. राजा ने कहा-"मैं एक दिन राजा से तुम्हारी मुलाकात फरा. दूंगा। वृद्धा--"बेटा, तुम पागल तो नहीं हुए हो ? राजा का दर्शन क्या सबको नसीब होता है। बड़े प्रादमियों की तो राजा मे जन्दी मुलाकात होती ही नहीं, में किस गिनती में हूँ। बई पुण्य सं राना का दर्शन होता है। अगर तुम महाराज के सामने मुझे महाराज राम- । दूसरा परिच्छेद। ले भी जानोगे तो मैं उन्हें नजराना क्या दूंगी। मैं सोने का सिक्का कहाँ पाऊँगी जो उनके नज़र करूँगी ? पहरेदार मुझसे नाराज होकर अपनी तलवार से मेरी धजियाँ उड़ा देंगे, राजदर्शन तो दूर की बात है। राजा सफी घात का कुछ जवाब न देकर उसकी झोपड़ी में चटाई पर लेट गये। थफे तो छ ही, लेटने के साथ उन्हें नोंद आ गई। दिन के पिछले पहर जब सोकर उठे तब ये घोड़े पर सवार होकर जयपुर की तरफ चल पड़े। दूसरे दिन सबेरे ही महाराज ने उस वृद्धा के पुत्र की खोज की। जब वह महाराज के सामने हाज़िर किया गया, तब राजा ने उसे खूप डॉटा और उसने जो अपनी माँ को त्याग दिया था उसकी इस प्रसाधुता पर उसे बड़ा ही धिक्कारा। और पहरेदार को अपने साथ फदार-पालकी ले जाकर उस वृद्धा को ले पाने का हुक्म दिया। वृद्धा आ पहुँची । राजा की आज्ञा के अनुसार सिपाही लोग उसे महल में ले गये। युद्धा किसी तरह राजा के सामने जाना नहीं चाहती थी। वह डर से कॉपने लगी। जब महाराज खुद उसके सामने प्राकर खड़े हुए तय तो उन्हें पहचानकर वृद्धा समझ गई कि मेरी झोपड़ी में जो पानी पीने आये थे वे सिपाही नहीं महाराज ही थे।'धृद्धा ने हाथ जोड़कर उनसे क्षमा मांगी। राजा ने उसे अभयदान देकर सन्तुष्ट किया और उसे माँ कहकर पुकारा । तब उस वृद्धा का डर दूर हुआ। महाराज रामसिंह ने उसकी जीवन-यात्रा के लिए पचास रुपया मासिक वृत्ति नियते चरित्रंगठन। कर दी और उसके बेटे को सेना-विभाग के एक ऊँचे पदं पर नियुक्त करने का हुक्म दिया। इस प्रकारं माता और पुत्र दोनों मिलकर महाराज की कृपा से सुखी हुएं । एक सप्ताह के बाद धुंद्धा फिर अपनी उसी पुरानी झोपड़ी में चली गई। (वामा-बोधिनी पत्रिका) महाराज ने जो इस वेचारी बूढ़ी दरिद्णिी. के साथ ऐसः अच्छा व्यवहार किया उससे क्या उनकी प्रतिष्ठा में कुछ हानि हुई ? अथवा उनका महत्व घट गया ? पल्कि इस प्रकार के शिष्टाचार से उनका महत्त्व और भी अधिक बढ़ गया। वे प्रजा के विशेप. श्रद्धास्पद और प्रोतिपांन हो. उठे. “महाराज की. यह उदारता जैसे राजा-महाराजाओं के लिए अनुकरणीय है वैसेही सर्वसाधारण लोगों के लिए भी आदर्श-स्वरूप है। महाराज ने उस वृद्धा के ऊपर जैसी सुजनता दिखलाई उसकी अपेक्षा उस वृद्धा ने भी तो उनका कम शिष्टाचार न किया। एक अशिक्षित दरिद्र बूढ़ी का इस प्रकार अपरिचित अतिथि के साथ शिष्टाचार अवश्य प्रशंसनीय है। श्राज-कलं तो शिक्षित समाज में भी शिष्टा- चार नाम मात्र का रह गया है। शिष्टाचार के विषय में खोटी समझ . कोई-कोई उद्धत प्रकृति के मनुष्य अंशिष्ट .१६ पाती होफर कहा करते हैं कि शिक्षा और . :.५ 'शिष्टाचारी होकर हम लोग कपटाचारी होना नहीं दूसरा परिच्छेद। लोगों को ईश्वर ने जैसा कुछ भला-बुरा स्वभाव दिया है उसी के अनुसार चलना ठीक है। हम लोग अभी जिसे सत्य मानते हैं, शिष्टाचारी होने पर उसे. असत्य और भगद्धेय समझेंगे और जिसे मिथ्या मानते हैं उस पर.हम लोगों को श्रद्धा उत्पन्न होने लगेगी। शिष्टाचारी बनकर हम लोग भ्रमजाल में पड़ना नहीं चाहते । कितने ही भद्र, सन्तानगण इन चिकनी-चुपड़ी पातों में भूलकर भारी व्यामोह में पड़ जाते हैं और यथेच्छ व्यवहार से अशिष्टता के शिखर पर चढ़कर एकाएक अकर्तव्यरूपी .गड्ढे में आ गिरते हैं। तुमलोग फभी ऐसे भ्रम में न पड़ो। भ्रम में पड़ना ही अधःपात का कारण समझो। जो लोग यह कहते हैं कि जो जितना ही पवित्र आचरण से रहना चाहता है वह उतना ही कपटाचारी होता है वे लोग अपनी सरलता और सत्यप्रियता के अनुरोध से अपने घर की सामग्रियों को और अपने मैले कपड़ों को भी साफ फरना कपटाचार ही समझगे । मानों उनका. यही सिद्धान्त है कि जो जिस अवस्था में रहे उसे उसी में रहना चाहिए। अवस्था का परिवर्तन होना ही मानों उनके लिए कपट है। ऐसी समझ वालों से पूछना चाहिए कि जो सोना खान से निकलता है उसकी खाभाविक मलिनता दूर करने और विशुद्ध बनाने के हेतु लोग उसका परिशोध क्यों करते हैं ? देदीप्यमान करने के हेतु पार-मार उसे मांग में क्यों तपाते हैं? जिस अवस्था में वह खान से निक- लता है उसी अवस्था में उसे क्यों नहीं रहने देते ?: महारमा कृष्ण- दास पाल, द्वारकानाथ. मित्र, जनरल. वाशिंगटन, सर पालटर स्कोट, और सिडनी स्मिथ आदि अनेकानेक महोदय विनय और . .. ३२, चरित्रगठना सौजन्य के प्रभाव से संसार में जैसा कुछ अपना नाम संस्थापित कर गये हैं, वे अशिष्टता और उद्दण्डता का काम करके क्या उसका शतांश भी स्थापित करने में समर्थ हो सकते थे ? अशिष्ट लोग चाहें तो धीरे-धीरे चेष्टा करके कुछ दिनों में शिष्ट हो सकते हैं। वे सच्चे शिष्टाचारियों के प्राचार-व्यवहार बातचीत, और क्रिया-कलापों से भली भाँति शिक्षा-लाभ कर सकते हैं। महात्मा राजनारायण वसु सुजनता के मानों अवतार थे। शिष्टाचार इनमें स्वाभाविक था! क्या धर्ना; क्या दरिद्र, क्या परि- चित और क्या अपरिचित वे सबके साथ अच्छा बर्ताव करते थे,. सबका सम्मान करते थे। वे अपने नौकरी के ऊपर भी अपनी शिष्टता प्रकट करने में कुण्ठित न होते थे। कर्तव्य का पालन . करना ही वे परम धर्म समझते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि वे जहाँ जाते थे देवता के समान आदर पाकर श्राप तो सुखी होते. हो थे किन्तु औरों को भी सुखी करते थे। .. .. जो लोग दरिद्र होकर भी कठोर-मापी और उद्धत हैं उनको ता. कोई वात ही नहीं, धनवान् भी यदि ऐसे दुःशील हों तो वे लोगों के नितान्त अप्रिय हो उठते हैं। कोई उन्हें हृदय से नहीं चाहता। जो उनसे कुछ पाता है वह भी उन्हें प्रसेव्य ही समझता है। जो लोग अप्रिय-भाषी हैं उन्हीं का साधारण नाम दुर्मुख है। जिन लोगों से अच्छे व्यवहार की प्राशा की जाती है वही लोग कभी-कभी अयोग्य व्यवहार कर बैठते हैं। उनकी इस अशिष्टता का, मूल अज्ञानता नहीं कहा जा सकता। किन्तु उनका अत्यन्त . , दूसरा परिच्छेद। दुर्वल, दुर्विनीव हृदय हो उसका मूल कहा जा सकता है । जो व्यक्ति प्रज्ञानता से अशिष्टता फा-कोई काम कर जाता है, वह 'अशिष्टता का दोप जानकर सम्भव है कि बहुत शीघ्र अपने को सुधारे, किन्तु. हृदय की दुर्वलता के कारण जो पशिष्ट व्यवहार फरते हैं उनका सुधार होना कठिन है। जो दोष को जानकर भी उस अपनाये हुए हैं, उन्हें दोप अपना सहघर समझ सहसा नहीं छोड़ सकता; जय तफ वह अपने ऊपर पूर्णरूप से सहचर का विरक्तिभाय न देखेगा, दूर न होगा। कितने ही लोग ऐसे हैं जो अशिष्टता करना नहीं चाहते पर जय उनसे अशिष्टता का कोई काम हो जाता है तब एक बार तो वे उसके लिए पछताते हैं किन्तु जब याही दो-चार बार उनसे अशिष्टता हो जाती है तब वे उसके लिए कुछ सोच नहीं करते और न उसके दुष्परिणाम की ही कुछ परवा करते, इसलिए एक बार भूल से भी अशिष्ट व्यवहार का होना मङ्गलप्रद नहीं होता । जो लोग प्रशिष्ट हैं उनके साथ रहना बड़ा ही दुःखद होता है। अतएव जो सुख से रहना चाहें, उन्हें अशिष्ट लोगों की संगति से दूर ही रहना चाहिए। नरेशचन्द्र छोटी उम्र में अच्छे बुद्धिमान थे । वृद्धगण कहा करते थे कि यह यालक है। इससे संसार का बहुत कुछ उपकार होना सम्भव है। नरेश पाबू में सब गुण रहने पर भी उसका कठोर स्वभाव सव.अनिष्टों की जड़ हो रहा था । गुरुजन - उसके कर्कश स्वभाव को न जान सके इसी से उसे स्वभाव कोमल. करने की कोई शिक्षा न दी गई: और न इसके लिए कोई विशेष. प्रयत्न ही किया गया। नरेश क्रमशः बढ़ने लगा और कुछ दिन में . G ३४ चरित्रंगठन । उसने लिखना -पढ़ना अच्छी तरह सीख लिया। युवा होने पर वह द्रव्य का उपार्जन भी अच्छा करने लगा। संसारका सभी.भार एक-एक फर उसके सिर पर प्रा पड़ा। नरेश वायू की बुद्धि और विचार ने इस समय एक भिन्न मार्ग का अवलम्बन किया है। वह सबसे कहा करता-है-"मैं किसी से सहायता नहीं चाहता, कोई मेरी सहायता न करे और न मैं ही किसी की सहायता फरूँगा। भिखमंगों को अन्नःदेना पालसियों की संख्या बढ़ाना है, ऐसे ही भाँति-भांति के बुरे विचारों से उसका दिमाग भर गया. कोई फ़कीर जम उसके पास कुछ मांगने जातो तब वह तुरन्त क्रोध में भरकर बोल उठता-"ईश्वर ने हाथ-पैर दोनों दिये हैं; फमा खानो" शहर में भिखारियों की तो कमी ही नहीं; रोज़-रोज़" कितने ही अन्धे, लँगडे, लूले; भूखे, दीन, हीन उसके द्वार पर आकर---"म भिक्षा दो" कहकर पुकारने लगे । उन सवों पर निर्दयता के साथ कठोर वाक्यों का प्रयोग करते-करते नरेश का स्वभाव इतना बिगड़ गया कि अब वह अपने नातेदारों के साथ भी कठोर भापण करने लगा। किसी के द्वारा समझाये जाने पर तो वह भाग की तरह और प्रज्वलित हो उठता था। घोड़े ही दिनों में वह अपने व्यवहार से अड़ोस-पड़ोस क्या, सारी वस्ती के लोगों फा अप्रिय बन बैठा। दो-एक आदमी के सिवा कोई उसके साथ धावचीत भी नहीं करता था। सभी लोग उसके स्वभाव से प्रस. न्तुष्ट थे । एक दिन एक अनाथ बालक उसके-घर भिक्षा माँगने गया। यदि वह साधारण भिखमगे का सा होता तब तो नरेश उसे दूर-दूर फहकर ही भगा देता, किन्तु लड़के का स्वरूप अच्छे , .
दुसरा परिच्छेद।
३५
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कुलशील का सा देख पड़ा। ता भी. उसके हृदय में दया न पाई।
उसने अपने वन केसदश कण्ठस्वर से उसको इस तरह धुड़का कि
वह कांप उठा। उस बालक ने अपने मन में कहा-इस वरहन
धुड़ककर यदि यह मीठो बातों के साथ दो थप्पड़ भी मारता तो
उतना दुःख न होता । वह वालक कुछ नावालकर चुपचाप वहाँ
से चला गया।
जानकीनाथ बाबू कलकत्ते के किसी सौदागर के कार्यालय में
मुनीम थे। वे बड़े ही दयालु.थे। जो कोई भूखा उनके पास जाता
था, उसे वे दो-एक मुट्ठी अन्न देते थे। वह अनाथ बालक जानकी-
नाथ बाबू के निकट पाया ।
जानकी बाबू ने पूछा-तुम क्या चाहते हो?
बालक:-मैं दरिद्र हूँ, मेरे पास कुछ नहीं है। जो पाप
ख़ुशी से देंगे मैं वही लूँगा।
जानकी बाबू-भोजन क्रिये हो या भूखे हो ?
बालक-नहीं, मेरी माँ ने भी दो दिन से कुछ नहीं खाया है।
जानकीनाथ बाबू ने एक पुर्जा लिखकर उसके हाथ में दिया
और कहा-"जिस मोदी के नाम से मैंने यह पुर्जा लिख दिया
है उसे जाकर दो, वह तुम्हें एक-मन चावल, दो पसेरो दाल,
एफ सेर घी और नमक, मसाला, तरकारी देगा सो अपनी भूखी
माँ के पास, ले जाओ।" उन्होंने एक मज़दूर भी उस लड़के के
साथ फर दिया। लड़के की दोनों आँखों में आँसू भर पाये।
जानकी वायू ने कहा--"कुछ चिन्ता नहीं, अनाओं का नाथ
ईश्वर है। वही दीन-दुखियों की रक्षा करता है।"
चरित्रंगठन 1 .."महाशय, ईश्वर की कृपा पर निर्भर होकर ही. भिक्षा के लिए घर से बाहर निकला हूँ। मेरी आँखों में आँसू पाने का दूसरा कोई कारण नहीं है। मैं इस महल्ले के एक रईस के पास गया था। उनके बाहरी ठाट-बाट से मैंने उन्हें धनवान और दाता समझा; किन्तु उन्होंने ऐसी फटकार बतलाई कि मुझे भागने का रास्ता न सूझा। आपने जो मीठी बातें कहकर मेरे साथ इस प्रकार को दयालुता दिखलाई है उससे मेरा हृदय द्रवित हो. उठा है। मैं किसी प्रकार अपने हृदय के आवेग को नहीं रोक सकता यह 'कहकर बालक उनकी कृतज्ञता प्रकाश करता हुआ चला गया । उधर नरेश वायू के घर में एक रात को सेंध लगी। उनके घर में जितना माल असवान था सब चोरी हो गया । जय चोर उनके घर से द्रव्य ढा रहे थे तब वे जाग पड़े । ने पड़ोसियों के नाम ले लेकर फितना ही चिलाये, कितना हो पुकारा, पर एक व्यक्ति भी उनकी सहायता करने न आया। प्राखिर वे हाय-हाय करके रह गया। चोर घड़ी निर्भयता के साथ सब माल ढा-कर ले गये।
. दुसरा परिच्छेद। स्वार्थी लोग शिष्टाचारी नहीं हो सकते "से चीटियां अपने सुख के लिए बगीचे की शोभा बिगाड़ डालती है, भर अच्छे पेड़ों की खोदकर उन्हें मुखा डालती हैं, पसेही स्वार्थ- लोलुप लोग अपने सुख के लिए दूसरे की हानि करने में जरा भी नहीं हिचकते।" (येकन) जो लोग स्वार्थ साधन को ही जीवन का उद्देश मान पठे हैं उन लोगों से समाज का कोई उपकार होना सम्भव नहीं । स्वार्थी लोग सर्वदा यही सोचते हैं कि किसी तरह अपना मतलव निका. लना चाहिए। अपने मवलय की यात सिद्ध हुई तो सब हुश्री। संसार भले ही गारत हो, उससे मेरा क्या हानि-लाभ ? मैं किस तरह सुखी होऊँगा? मैं कैसे धनी होऊँगा? समाज में मेरा सम्मान कैसे बढ़ेगा ? जो दिन-रात अपने मन में यही चिन्ता करता रहता है और उसके साधन में जी-जान से लगा रहता है उस अन्धे को यह नहीं सूझता कि स्वार्थ-त्याग ही से स्वार्थ-सिद्धि प्राप्त होती है। वे खान्य यह नहीं समझते कि हम दूसरे से जैसे अपने उपकार की प्राशा रखते हैं वैसेही अन्य व्यक्ति भी हमसे उपकृत होने की आशा रखते हैं। तुम जिस तरह धन चाहते हो, सुख-सम्मान चाहते हो उसी तरह और लोग भी चाहते हैं। अपनी किसी चीज़ के बिगड़ने पर जैसे तुम दुखी होते हो वैसेही अन्य लोग भी दुखी होते हैं। जैसे तुम अपने पाराम, अपनी प्रतिष्टा और अपने सम्मान की बात सोचते हो वैसेही सघ सोचते हैं । जब तुम दूसरे की ज़रा-सी भी टेढो भौहें, एक बढ़ी-चढ़ी घाव और परिदास नहीं चरित्रगठन । साधारण कामों में सुजनता का प्रकाश . -1 पहले यह बात कही जा चुकी है कि शिष्टाचार की कोई सीमा निर्दिष्टानहीं है। हम लोग पारिवारिक, सामाजिक और राजकीय वातों के इतने पावन्द है कि जब तक जागते रहते हैं तब तक प्रायः इन तीनों में से एक न एक फा.दयाव हमारे ऊपर रहता ही है.। हम लोगों को स्वतन्त्रता का सुख प्रायः उतनी ही देर तकः मिलता है जब तक कि हम लोग गाढ़ी नींद सोते हैं। हम लोगों को जीवन का अधिकांश समय दूसरों के साथ में रह: फर ही.विताना पड़ता है। जो लोग अपनी प्रतिभा के वल से संसार में प्रसिद्ध हुए हैं, जिन लोगों के जीवन-चरित्र बड़े आदर के साथ पढ़े जाते हैं, उन लोगों का जीवन जैसी घटनाओं से भरा है, साधारण लोगों का जीवन भी ऐसी ही घटनाओं से भरा है। महापुरुषों के असाधारण जीवन-चरित्र जैसे विचित्र घटनाओं के प्रदर्शक होते हैं वैसे ही साधारण मनुष्यों का जीवन-चरित्र भी सामान्य घटनाओं का एक धारावाही इतिहास है । यद्यपि सच्चे शिष्टाचारी साधु पुरुषों का जीवन-चरित्र सर्वथा उपादेय है तथापि साधारण मनुष्य का कोई-कोई सामान्य जीवन-वृत्तान्त भी कम उपादेयः याः कम :चमत्कारजनक नहीं है। दिनचर्या के सामान्य विषयों में सुजनता का कोई-कोई कामः ऐसा हो पड़ता है, जो समारोह के समय में नहीं होता। जिस समय अशिष्ट जन भी सुजनता प्रकाश करने में मुंह नहीं मोड़ते वह समय उस समारोह काल से कहीं बढ़कर अच्छा है। .
दूसरा परिच्छेद । ४१ अँगरेजो के किसी- विद्वान् ने कहा है:कि "अभ्यास ही मनुप्यों का साधारण स्वभाव है। जिन लोगों ने बचपन में सौजन्य-शिक्षा का लाभ नहीं किया, जो लोग सौजन्य-प्रकाश फरनं का सङ्कल्प करके भी अपने कठोर स्वभाव के दोष से अशिष्ट व्यवहार कर बैठते हैं, वे लोग साधारण कामों में शिष्टाचारी दोने फा अभ्यास करते-करते अन्त में शिष्ट और सुशील हो सकते हैं। कैसी ही कोई बात क्यों न हो, क्रमशः अभ्यास करते-करते यह स्वाभाविक हो जाती है । वाचाल मनुष्य मितभाषी बनने की नकल करते-करते कुछ दिनों में यथार्थ ही में मितभाषी हो जाता है। तब फिर उसे नकल करने की ज़रूरत नहीं होती । जो स्वभाव के चञ्चल हैं, ये गम्भीर भाव का अभ्यास करके गम्भीर बन सकते हैं । इसी प्रकार जो गम्भीर प्रकृति के मनुष्य हैं वै वाचाल बन्धु- बान्धवगणों में रहकर उन लोगों के मनःसन्तोपार्थ वाचालता का अनुकरण करते-करते स्वभावतः वाचाल हो जाते हैं। हमलोगों के देश में शिष्टाचार के एक से एक बढ़कर असंख्य दृष्टान्त विद्यमान हैं; किन्तु अाजकल -शिष्टाचार का एक प्रकार से मर्वत्र प्रभाव-सा हो रहा है। इसका कारण और कुछ नहीं, केवल शिष्टाचार का असल अर्थ न समझकर कितने ही विलास- प्रियों का; और शिक्षाज्ञान से दीन धनवानों की रीति-नीति और मार्ग का, अन्धवत् अनुकरण करना मात्र है। चिरकात तरू अशिष्ट व्यवहार से हृदय की कोमलला नष्ट हो जाने पर भी कोई इस बात को अस्वीकार नहीं कर सकता; कि प्रशिष्ट लोगों के संसर्ग की अपेक्षा शिष्टाचारी विनयी-सज्जन की
शेष सुख है । मनुष्य-समाज को सुखी बनाने के हेतु
पाय हैं। उनमें शिष्टव्यवहारं भी यदि एक उपाय.मान
और इससे दूसरी कोई उपकारिता न समझी जाय तो
की शिक्षा नितान्त आवश्यक है। सामान्य सुजनता
-कभी लोगों का विशेष उपकार हो जाता है।
ते में ड्रन (नाली) बनने के पहले सड़क के किनारे एक
[ बना हुआ था । वह कीचड़ और मैले पानी से वरा-
इता था। उसमें यदि कोई गिर पड़े तो फिर उसका
कठिन हो जाता था। किसी समय एक वृद्ध अन्धा
जधर जाना चाहिए उधर न जाकर भूल से नाले की
रहा था। एक गाड़ी पाने का शब्द सुनकर एकाएक
डिग धरके नाले के विलकुलं पास पहुंच गया। वह
बरा ही चाहता था कि इतने में एक तेरह-चौदह वर्प के
उसको विपद में पड़ते देख झट दौड़कर उसे रोका,
भय न खाय इसलिए रोकने का कारण भी उससे
। जब गाड़ी आगे निकल गई तब वह लड़का वृद्ध को
कर आप जिधर जा रहा था चला गया । उस अन्धे
का ऐसा सदय व्यवहार देखकर उसे बहुत आशीर्वाद
दि बालक उस भिखारी को अभद्र वेश में देखकर उसके.
दो से घृणा करता और वृद्ध की विपद की ओर ध्यान न
बर चला जाता अथवा उसके आसन्नसङ्कट पर दूर ही
7 बूंद आँसू गिराकर चल देता तो इससे क्या बालक का
समझा जाता? कभी नहीं । उसके इस साधारण काम से
.
- दूसरा परिच्छेद। ४३ जो इतना बड़ा उपकार हुआ--एक असहाय असमर्थ मनुष्य की प्राण-रक्षा हुई-इसे कौन नहीं, स्वीकार करेगा ? दो-एक भद्र .मनुष्य भी ठीक उसी समय उस रास्ते से जा रहे थे, वृद्ध को नाले की तरफ़ जाते देखकर बोले-"अहा, यह प्रभागा अन्धा अभी नाले में गिरकर जरूर अपना हाथ-पाँव तोड़ डालेगा।" एक व्यक्ति ने परिहास करते हुए कहा । "इस बूढ़े की मृत्यु.निकट श्रा पहुँची ।" अन्धा बहुत वृद्ध होने के कारण कान से कम सुनता था; इसी से उन लोगों की बात उसे सुनाई न दी । उस बालक ने कुछ न कहकर अन्धे को विपद से बचा लिया। इस तरह की कितनी ही घटनायें रोज-रोज हुश्रा करती हैं। उनकी गणना कोई कहाँ तक कर सकता है ? मनुष्यों की सामान्य सहानुभूति और सदय व्यवहार के अभाव से संसार का कितना बड़ा अनिष्ट हो रहा है इसका भी कोई निर्णय नहीं कर सकता.! यह घटना विशेष चमत्कार-जनक न होने पर भी तुम लोग इससे इतना ज़रूर समझोगे कि दूसरे का दुःख देखकर केवल दया दिखलाने, अथवा व्याकुल होकर दो-एक बूंद. आँसू गिराने से कुछ नहीं होता, केवल मन ही मन भावना करने से कार्य सिद्ध नहीं होता, कार्य की सफलता. कार्य करने ही में होती है। जिसे तुम मन में अच्छा समझो, उसे सोचते ही न रहो, उसका व्यव. हार भी करो। भले-बुरे कामों का साक्षी तुम्हारा अन्तःकरण ही है । अन्तःकरण तुम्हें अच्छा काम करने के लिए प्रेरणा करता. है, किन्तु कुबुद्धि तुम्हें रोक रखती है । अतएव जब तक कुंबुद्धि को हृदय से दूर न करोगे तब तक तुमसे एक.मी. अच्छा काम
४४
चरित्रंगठन।
होने की कोई आशा नहीं कर सकता । तुम स्वार्थ त्यागकर ज्यों-
ज्यों सुजनता का अभ्यास करोगे त्या-त्यों कुबुाद्ध आप से प्राप
दूर होती जायगी और सुबुद्धि की क्रम ही क्रम वृद्धि होगी।
सुबुद्धि की वृद्धि होने पर तुम संचरित होकर अपनी सुजनता से
लोगों का बहुत कुछ उपकार कर सकते हो। बहुत लोगों का
कथन है कि "वह सुजनता ही किस काम की, जिसका उद्देश
अच्छा नहीं ।" ऐसे ही दया का यदि कुंछ काम न किया तो
केवल दया की चिन्ता करने से क्या फल ?
.
स्वाभाविक सहानुभूति सुजनता का
एक अंग है.
"सभी समय में सुजनता का प्रकाश करना: असम्भव है। किन्तु यथार्थ,
महानुभूति रहने से समय-समय पर सुजनता का प्रकाश किया. जा.
सकता है।"
नवीन और नक्षत्र नाम के दो लड़के एन्ट्रन्स परीक्षा देने कं.
लिए तैयार हो रहे थे। नवीन दरिद्र का लड़का था इस कारण
परीक्षा में उत्तीर्ण न होने से वह आइन्दे न पढ़ सकेगा। नक्षत्र
विशेप धनवान् का बालक तो न था किन्तु नवीन की अपेक्षा उसकी
अवस्था. कुछ अच्छी थी। इसी समयः
दुर्भाग्यवश नवीनः के पिता
फा देहान्त हो गया अपनी प्रभागिनी माता के वही एक मात्र
सन्तान था। उसने अपने मन में सोचा- "मैं इस समय अपना
.
1
दूसरा परिच्छेद । ४५ 7ठ छोड़कर किसी काम की खोज में फिरूँगा. तो अपनी माता का दारिद्रन-दुःख दूर न कर सकूँगा । इसलिए जिस तरह होगा वेिशिका परीक्षा अवश्य दूंगा।" इस प्रकार वह. मन ही मन संकल्प करके जान लड़ाकर परिश्रम करने लगा। जब परीक्षा देने का समय समीप आ पहुँचा तब उस बालक नवीन ने परीक्षार्थ.धन के लिए अपनी मां के पास जाकर रुपया माँगा। उसकी माँ रोने लगी। उसके पास ऐसी एक भी वस्तु-न-थी जो गिरवी-रखकर कुछ रुपया संग्रह कर सकती । वह तो केवल अपने बालक का मुंह देखकर ही अत्यन्त कष्ट से दिन काट रही थी। नवीन अपनी माता को रोते देख फिर कुछ न बोला, वह चुपचाप अपने सोने की कोठरी में जाकर आँसू बरसाने लगा। इसी,समय नक्षत्र नं पाकर देखा कि नवीन रो रहा है। रोने का कारण पूछने पर जब नक्षत्र को सब समाचार विदित हुश्रा' तय नसने कहा--"भाई नवीन, तुम इतने ही के लिए रो रहे हो । चलो, हम तुम्हारे नाम से रुपया जमा कर पाते हैं ।" नतत्र ने ठीक समय पर नवीन का. रुपया दाखिल कर दिया। उसके बाद कुछ समय तक नक्षत्र के साथ नवीन की न हुई। नियत दिन में परीक्षा का फलाफल जानने के लिए सभी विद्यालय में जाकर उपस्थित हुए । प्रोफेसर ने परीक्षोत्तीर्ण विद्यार्थियों के नाम पढ़कर सुनाये । नवीन ने परीक्षो- त्तोर्य होकर सरकार से छात्रवृत्ति पाई है। नक्षत्र विश्वविद्यालय के प्रधान छात्रों में गिना जाता था। अध्यापक लोग एफ-स्वर से कहा फरते थे कि नक्षत्र विश्वविद्यालय के उत्तीर्ण छात्रों में प्रथम होगा। किन्तु नक्षत्र का नाम नहीं । नन ने नवीन का नाम मुनकर . -- . . चरित्रगठन। बड़े उल्लास से उसका हाथ पकड़कर अपने हृदय का आनन्द प्रकट किया। मानों उसकी कृतज्ञता में नवीन की दोनों आँखों में आँसू भर आये। प्रधान अध्यापक ने यह मामला देखकर कुतूहलवश नक्षत्र को एकान्त में बुलाकर पूछा-'इस बार परीक्षा में तुम्हारे उत्तीर्ण होने की पूरी प्राशा थी, हम लोगों को पूरा विश्वास था कि तुम सबमें प्रथम होगे । तुमने परीक्षा क्यों नहीं दी ?" नक्षत्र ने कहा-"नवीन की आर्थिक अवस्था अच्छी नहीं है। मुझे मालूम हुआ कि रुपये के प्रभाव से वह इस साल परीक्षान.दे सकेगा और उसके पास खर्च के लिए.इतनी पूँजी भी नहीं जो फिर वह भागे पढ़ सके। परीक्षा न देने पर उसको पढ़ना छोड़ देना पड़ेगा। नवीन की माता बड़े कष्ट से दिन बिता रही है। वह बेचारी रुपया कहाँ पावेगी जो अपने पुत्र को पढ़ावेगी ! नवीन के बाप का देहान्त भी इसी वर्ष हो गया है। इसलिए ऐसे सङ्कट के समय नवीन को सान्त्वना देना मैंने बड़ा श्रावश्यक समझा । इसी से मैंने अपनी फीस का रुपया नवीन को ऋण देकर उसी के नाम से जमा कर दिया। मेरे परीक्षा में न जाने का यही कारण हुआ। मैंने यह सोचकर, कि मेरे परीक्षा में न जाने की बात सुनकर शायद नवीन रुपया न ले और मेरे पिता मुझपर नाराज़ हों; परीक्षा के पहले किसी से कुछ नहीं कहा। जब मेरे पिता को सव समाचार विदित हुए तब उन्होंने वह रुपया.जो मैंने नवीन को ऋण दिया था वापस लेना उचित नहीं समझा." अध्यापक ने नक्षत्र के मुंह से ये बातें सुनकर नक्षत्र के उदार हृदय की और उसके निःस्वार्थ- भाव की बहुत प्रशंसा की।
दूसरा परिच्छेद ।
ष्टि व्यवहारमें लोकलज्जा आदि कुसंस्कारों
पर ध्यान न देना चाहिए
पहले ही कहा जा चुका है कि उस सुजनता से कोई फल
ही जो व्यवहार में न लाई जाय । सुजनता की सार्थकता तभी
ोती है जब उसका काम किया जाता है । इससे यह न समझना
माहिए कि मौखिक शिष्टाचार का कुछ प्रयोजन ही नहीं । मौखिक
शष्टता को एकदम छोड़ ही न देना चाहिए। क्योंकि सब
नमय सुजनता का काम करने की आवश्यकता नहीं होती।
रान लो कि जहाँ केवल दो एक मीठी बातों से ही किसी का
सम्मान करके सौजन्य दिखलाना है वहाँ मौन हो रहना या उससे
वरुद्ध बर्ताव करना उपहास का अथवा असन्तोष का कारण होता
है। कार्यमान की सीमा निर्दिष्ट है। किसी काम की सीमा पार कर
जाना उचित नहीं। सीमा-उच्चन से फल उलटा हो जाता है।
मान्य व्यक्ति को भी अत्यधिक सम्मान दिखलाना उसके लजा,
दुःख और अपमान का कारण होता है । लार्ड वेकन ने अपनी पुस्तक
में एक जगह लिखा है कि प्रमाण से अधिक शिष्टता दिखलाने से
लोगों को उद्वेग होने लगता है और विश्वास भी उठ जाता
है। इसी तरह जहाँ उचित उपकार और विशेप सौजन्य
प्रकाश करने का प्रयोजन है वहाँ लोकलज्जासे या प्रात्मगौरव से
अथवा किसी दूसरे ही कुसंस्कार के कारण केवल मौखिक सुजनता
दिखलाना ठीक नहीं। जहाँ दैहिक बल की आवश्यकता है वहाँ
याचिक शक्ति कुछ काम नहीं देती । इस बात की सत्यता
४८
चरित्रंगठन।
जा
निम्नलिखित . एक यथार्थ घटना के द्वारा भली भाँति प्रकट
होती है।
सन् १८८८ ई० के जाड़े का मौसम था। फ्रांस की राजधानी
पैरिस शहर के राज-मार्ग से रात को एक अन्धा वृद्ध मनुष्य हाथ
में एक वीणा लिये धीरे-धीरे जा रहा था । वह बुढ़ापे की कमजोरी
और भूख से अत्यन्त विह्वल होकर धीमे शब्दों में पधिकों से भीख
माँगता फिरता था। वह सङ्गीत-विद्या में बड़ा ही निपुण था।
किन्तु इस समय उसे यह सामर्थ्य नहीं कि गा-बजाकर. वह
लोगों के चित्त को अपनी ओर आकृष्ट कर सके। रात बहुत
बीती जा रही थी। राजमार्ग क्रमशः पथिकों से शून्य हुमा
रहा था।
वृद्ध मन ही मन सोचने लगा-पाज इस रात में अब मेरी
और कौन दृष्टि डालेगा! कौन मेरी खबर लेगा? दो दिन से तो
कुछ खाया नहीं । आज रात में यदि कुछ खाने को न मिलेगा तो
मेरे प्राण न बचेंगे । वह इस प्रकार सोचता हुआ सड़क के किनारे
। उसी समय तीन युवक उस रास्ते से कहीं जा रहे थे।
वे तीनों अच्छे कुलशील के थे और गाने-बजाने में कुशल थे; के
तीनों युवक उस वृद्ध के हाथ में सितार देखकर उसके पास जा
पहुँचे और उसका सारा वृत्तान्त सुनकर बड़े दुःखी हुए।
तीनों के हृदय में दया उमड़ प्राई । आँखों से आंसू टपकने लगे।
पहला युवफ वोला-भाई; आओ, हम लोग इस वृद्ध को कन्धे
पर उठाकर अपने घर पर ले चलें ।
• धामायोधिनी पत्रिका से उद्धत ।
.
बैठ गर
उन
--
दूसरा परिच्छेद। ४६ “दूसरे ने कहा-यह तो बड़ी सहल बात है, किन्तु डेरे पर ले जाकर हम लोग इसका कुछ विशेष उपकार न कर सकेंगे। हम लोगों को तकलीफ उठाकर भी जिसमें इसका कुछ उपकार हो सो करना चाहिए। तीसरे ने कहा-एक काम करा, इसका जो व्यवसाय है हम लोग आज उसी का अवलम्बन कर इसके साथ सहानुभूति प्रकट करें । इसका सितार ले इस राजमार्ग में इसी की तरह गा. बजाकर हम लोग पधिकों से कुछ द्रव्य एकत्र करें और इस वृद्ध को दे इसका दुख दूर करने की चेष्टा करें। तृतीय युवक के मुँह से यह प्रस्ताव सुन पहला युवक वृद्ध के पास से सितार लेकर बजाने लगा। वह सितार बहुत अच्छा बजाना जानता था। सितार का मधुर शब्द सुनकर क्रमशः पथिक लोग वहाँ पाकर जुटने लगे। दूसरे युवक ने गाना शुरू कर दिया। उन दिनों पैरिस शहर में जिन सव स्वदेशानुरागवर्द्धक गीतों को लाग अधिक पसन्द करते थे, उसने उन्हीं में का एक गीत गाया। सुननेवालों ने खुश हो जिससे जो कुछ बन पड़ा उन गाने-बजाने- वालों को पुरस्कार-स्वरूप द्रव्य दिया। चारों ओर से उन गुणियां के निकट रुपये बरसने लगे। दूसरे युवक का गाना जब ख़तम हुआ तब तीसरा गाने लगा। इसका स्वर बहुत ही मीठा था। पथिकगण मुग्ध होकर सुनने लगे। इसका गाना समाप्त होने पर फिर पथिकों ने कितने ही रुपये पुरस्कार में दिये । वह भूखा वृद्ध भिखारी यह व्यापार देखकर चकित हो गया। वह इतना विस्मित हुआ कि कुछ बोलने तक की भी सामर्थ्य उसे.न रही। जब पधिक- चरित्रगठन। गण क्रमशः चले गये तब उन तीनों युवकों ने पथिकों से जो-रुपये पाये थे वे वृद्ध के हाथ में रख दिये । वृद्ध आनन्द और कृतज्ञता से पुलकित होकर तीनों युवकों को हृदय से आशीर्वाद देने लगा। जब वे जाने लगे तब वृद्ध ने उनके नाम पूछे और कहा कि मैं जय तक जोता- रहूँगा, ईश्वर के निकट प्रार्थना करने के समय आपका नाम लूँगा और आप लोगों की भलाई के लिए निश्छल- भाव से प्रतिदिन ईश्वर की प्रार्थना करूँगा। प्रथम युवक ने अपना नाम बतलाया-विश्वास । दूसरे ने कहा-मेरा नाम धैर्य है। तीसरे ने कहा-मेरा नाम प्रेम है। तदनन्तर तीनों युवक चले गये । वृद्ध के शरीर में रोमाञ्च हो पाया। उसने मन ही मन कहा- मैं विश्वास-शून्य, शून्य और ईश्वर तथा मनुष्यों के प्रति प्रेमशून्य होकर चारों ओर मारा मारा फिरता था; इन तीनों युवकों का शिष्ट व्यवहार देखकर आज मेरे हृदय में विश्वास, धैर्य और प्रेम का उदय हो पाया हो ! धन्य तुम्हारी दया है !" अब तुम लोग अपने मन में सोच सकते हो कि.वे तीनों युवक यदि वृद्ध की दुर्दशा पर केवल आँसू बहाकर या दो-एक मीठी बात कहकर चल देते तो उससे उस वृद्ध का क्या उपकार होता? पर उन तीनों ने परोपकार को कर्तव्य मानकर, आत्मगौरव या लोक-लज्जा' की तरफ ध्यान न दिया । . यदि वे गाने-जाने . ईश्वर, तुम धन्य : .
दूसरा परिच्छेद। कोच करते तो क्योंकर उस वृद्ध का इतना बड़ा उपकार कर सकते। एक और घटना की बात सुनाता हूँ। एक दिन लूप- लाइन के गुष्करा स्टेशन में जब रेलगाड़ी श्राफर ठहरी तब रेल के कितने ही यात्री उतरे । एक वृद्धा भी वहाँ उत्तर पड़ी। उसके पास एक गट्ठर था जो वज़न में कुछ भारी था। उसने गाड़ी से गट्ठर निकालकर बाहर लाने की बहुत कोशिश की पर वह न ला सकी। इधर गाड़ी चलने का भी समय हो गया, झुण्ड के झुण्ड यानी लोग गाड़ी में प्राकर बैठने लगे। वृद्धा ने जब गट्ठर बाहर निकाल लाने का कोई उपाय न देखा तब उन रेल के कितनों हो यात्रियों से गट्ठर बाहर कर देने के हेतु विनती की पर उस समय किसकी कौन सुनता है । किसकी ओर कौन कपात करता है ? सव अपने-अपने कामों में स्वार्थवश अन्धे हो रहे थे। किसी ने वृद्धा की विनती पर कान न दिया। वृद्धा रोने लगी। तथापि किसी ने उस पर ध्यान न दिया । किन्तु उसके रोने-फलपन की बात एक दूसरे मनुष्य ने दूर से सुनी । कासिमबाज़ार के महाराज मुनीन्द्रचन्द्र नन्दी उस ट्रेन से फलकत्ते जा रहे थे। वे अपनी गाड़ी से उतरकर तीसरी श्रेणी की गाड़ी में जहाँ वह बुढ़िया थी दौड़कर आये और जल्दी-जल्दी उसफा गट्ठर उसके माथे पर रख दिया। तब गाड़ी छूटने ही पर थी, गाड़ी छूटने की घंटी पहले ही बज चुकी थी; वे वृद्धा के कृतज्ञता प्रकाश करने के पहले ही लपककर अपनी गाड़ी में जा बैठे । युद्धा अपनी गठरी माथे पर ले, प्रोखों के आसपछिती हुई, कृतज्ञता प्रकाश करती हुई और महा- चरित्रराठन। गण क्रमशः चले गये तब उन तीनों युवकों ने पथिकों से,जो रुपये पाये थे वे वृद्ध के हाथ में रख दिये । वृद्ध आनन्द और कृतज्ञता से पुलकित होकर तीनों युवकों को हृदय से आशीर्वाद देने लगा। जब चे जाने लगे तब वृद्ध ने उनके नाम पूछे और कहा जब तक जोता रहूँगा, ईश्वर के निकट प्रार्थना करने के समय, आपका नाम लूँगा और आप लोगों की भलाई के लिए निश्छल- भाव से प्रतिदिन ईश्वर की प्रार्थना करूँगा। कि मैं प्रथम युवक ने अपना नाम बतलाया-विश्वास । शून्य दूसरे ने कहा-मेरा नाम धैर्य है। तीसरे ने कहा-मेरा नाम प्रेम है। तदनन्तर तीनों युवक चले गये । वृद्ध के शरीर में रोमाञ्च हो पाया। उसने मन ही मन कहा-"मैं विश्वास-शून्य, धैर्य- और ईश्वर तथा मनुष्यों के प्रति प्रेमशून्य होकर चारों ओर मारा मारा फिरता था; इन तीनों युवकों को शिष्ट व्यवहार देखकर आज मेरे हृदय में विश्वास, धैर्य और प्रेम का उदय हो आया ईश्वर, तुम धन्य हो ! धन्य तुम्हारी दया है !" अब तुम लोग अपने मन में सोच सकते हो कि वे तीनों युवक यदि 'वृद्ध की दुर्दशा पर केवल आँसू बहाकर या दो-एक मीठी बात कहकर चल देते तो उससे उस वृद्ध का क्या उपकार होता? पर उन : तीनों ने परोपकार को कर्तव्य मानकर :प्रात्मगौरव या लोक-लना. की तरफ ध्यान न दिया। यदि ये गाने-बजाने में .
दूसरा परिच्छेद। ५१ कोच करते तो क्योंकर उस वृद्ध का इतना बड़ा उपकार कर सकते। एक और घटना की बात सुनाता हूँ। एक दिन लूप- लाइन के गुष्करा स्टेशन में जब रेलगाड़ी श्राफर ठहरी तम रेल के कितने ही यात्री उतरे। एक वृद्धा भी वहाँ उतर पड़ी। उसके पास एक गट्ठर था जो वज़न में कुछ भारी था। उसने गाड़ी से गट्ठर निकालकर बाहर लाने की बहुत कोशिश फी पर वह न ला सकी। इधर गाड़ी चलने का भी समय हो गया,झुण्ड के झुण्ड यात्री लोग गाड़ी में प्राकर बैठने लगे। वृद्धा ने जब गट्ठर बाहर निकाल लाने का कोई उपाय न देखा तब उन रेल के कितनों ही यात्रियों से गदर बाहर कर देने के हेतु विनती की पर उस समय किसकी कौन सुनता है । किसकी ओर कौन दृक्पात करता है ? सब अपने-अपने कामों में स्वार्थवश अन्धे हो रहे थे। किसी ने वृद्धा की विनती पर कान न दिया। वृद्धा रोने लगी। तथापि किसी ने उस पर ध्यान न दिया । किन्तु उसके रोने-फलपने की बात एक दूसरे मनुष्य ने दूर से सुनी । कासिमबाज़ार के महाराज मुनीन्द्रचन्द्र नन्दी उस ट्रेन से फलकत्ते जा रहे थे । वे अपनी गाड़ी से उतरकर तीसरी श्रेणी की गाड़ी में जहाँ वह बुढ़िया थी दौड़कर आये और जल्दी-जल्दी उसका गट्ठर उसके माथे पर रख दिया । तब गाड़ी छूटने ही पर थी, गाड़ी छूटने की घंटी पहले ही बज चुकी थी; वे वृद्धा के कृतज्ञता प्रकाश करने के पहले ही लपककर अपनी गाड़ी में जा बैठे । वृद्धा अपनी गठरी माथे पर लं, आँखों के आंसू पोछती हुई, कृतज्ञता प्रकाश करती हुई और महा- ।
चरित्रगठन। गण क्रमशः चले गये तब उन तीनों युवकों ने पथिकों से जो रुपये पाये थे वे वृद्ध के हाथ में रख दिये । वृद्ध प्रानन्द और कृतज्ञता से पुलकित होकर तीनों युवकों को हृदय से आशीर्वाद देने लगा। जब वे जाने लगे तब वृद्ध ने उनके नाम पूछे और कहा कि मैं जब तक जोता रहूँगा, ईश्वर के निकट प्रार्थना करने के समय आपका नाम लूँगा और आप लोगों की भलाई के लिए निश्छल- भाव से प्रतिदिन ईश्वर की प्रार्थना करूँगा। प्रथम युवक ने अपना नाम बतलाया--विश्वास । दूसरे ने कहा- -मेरा नाम धैर्य है। तीसरे ने कहा-मेरा नाम प्रेम है। तदनन्तर तीनों युवक चले गये । वृद्ध के शरीर में रोमाञ्च हो पाया। उसने मन ही मन कहा '-"मैं विश्वास-शून्य, धैर्य- शून्य और ईश्वर तथा मनुष्यों के प्रति प्रेमशून्य होकर चारों ओर मारा मारा फिरता था; इन तीनों युवकों का शिष्ट व्यवहार देखकर आज मेरे हृदय में विश्वास, धैर्य और प्रेम का उदय हो पाया ईश्वर, तुम धन्य हो! धन्य तुम्हारी दया है !" अब तुम लोग अपने मन में सोच सकते हो कि वे तीनों युवक यदि वृद्ध की दुर्दशा पर केवल आँसू बहाकर या दो-एक मीठी बात कहकर चल देते तो उससे उस वृद्ध का क्या उपकार होता? पर उन : तीनों ने परोपकार को कर्तव्य मानकर प्रात्मगौरव या लोक-लजा की तरफ ध्यानः न दिया। - यदि चे गाने-बजाने में .. .
दूसरा परिच्छेद। (Good old man ) कहकर पुकारते थे। देशी या विदेशी जो कोई उनसे मिलने. प्राता था वह उनके साथ बातचीत करके मुग्ध हो जाता था। एक बार राजनारायण वाबू हाईकोर्ट के एक मद्यपायी एटर्नी के साथ तीन घण्टों से भी अधिक समय तक सहिषाता- पूर्वक बैठकर बातचीत करते रहे। उन्होंने यही सोचकर इतनी देर तक उसके असह्य प्रलाप-वाक्यों का सहन किया कि विदा कर देने से शायद उसके मन में दुःख होगा। धार्मिक, सामाजिक, और साहित्य-सम्बन्धी प्रादि अनेक विषयों में कितनों ही के साथ उनको वादानुवाद करने का अवसर प्राप्त हुआ पर ऐसी बात उनके मुँह से कभी न निकली जिसे सुनकर किसी के हृदय में चोट पहुँचती । कितने ही लोग समालोचना के लिए उनके पास प्रत्य भेजते थे। जिसे प्रशंसा के योग्य समझते थे उसकी मुक्तकण्ठ से प्रशंसा करते थे। और दोपों को इस मधुर भाव से दिखलाते थे जिससे किसी के हृदय में ज़रा भी दुःख.न होता था। वे जो लोगों के साथ इस तरह का व्यवहार करते थे उसका प्रधान कारण उनका स्वाभाविक विनय ही था। , ( सजीवनी) जिनके अन्तःकरण में विनय का भाव नहीं है उनकी सुजनता अस्वाभाविक हो पड़ती है। वे अधिक समय तक शिष्टाचार के नियम को रक्षा नहीं कर सकते । उनके कण्ठस्वर, असहिष्णुता, उदासी- नता, और क्रोध भाव से. उनकी बनावटी सुजनता का, पता शीघ्र लग जाता है.।. विद्वानों ने क्या स्त्री, क्या पुरुष, दोनों ही के लिए विनय को ही प्रधान भूषण माना है, 'शीलं परं भूपणम्, . - । - , चरित्रगठन-1 राज को बहुत-बहुत आशीर्वाद देती हुई चली गई। अाजकल तो कितने ही फर्स्ट क्लास के मुसाफ़िर तीसरे दर्जे की गाड़ी के पास जाने में भी पसोपेश करते हैं, उन्हें लोकलज्जा मालुम होती है. और एक मैले-कुचैज्ञे वस्त्रयाली असहाय अबला. के, माथे पर गठरी: उठाकर रख देने का नाम सुनकर तो शायद नाक सिकोड़ेंगे; दरिद्र लोगों का स्पर्श करना मानों उनके लिए महापाप है। इस प्रकार दुखियों. से घृणा करने का कारण स्वाभाविक:सुजनताका अभाव, हृदय की सङ्कीर्णता.और कुसंस्कार ही है। - शिष्टाचार आन्तरिक विनय का बाह्य लक्षण हैं : '. यह कहना अत्युक्ति न होगी कि राजनारायण, बाबू - का शिष्टाचार आदर्शस्वरूप था। बापू द्विजेन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था कि उनके. सदृश सज्जन और सुशील मुझे कोई दिखाई नहीं देता। यथार्थ में सत्पुरुप के सभी गुण उनमें विद्यमान थे। रुग्ण होकर 'जवावे.शय्यागत हुए थे तब भी उन्होंने अपनी शिष्टता नःछोड़ो। जो लोग उनसे प्राशीर्वाद लेने के लिए उनके पास जाते थे, 'उन लोगों से.वे.विनयपूर्वक कहते थे कि मैं उठने में असमर्थ हूँ इसी से मैं आपका अभिवादन उठकर ने कर सका, आप मेरी इस अशिष्टता को क्षमा करेंगे. इस अनन्यदुर्लभ शिष्टाचार के कारण वे छोटे-बड़े सव. मनुष्यों के प्रिय थे । साहब लोग उन्हें गुड ओल्ड मैन . A दुसरा परिच्छेद । ५३ (Good old man) कहकर पुकारते थे । देशी या विदेशी जो कोई उनसे मिलने प्राता था यह उनके साथ बातचीत करकं मुग्ध हो जाता था। एक बार राजनारायण यावू हाईफोर्ट के एफ मद्यपायी एटनी के साथ तीन घण्टों से भी अधिक समय तक सहिष्णुता- पूर्वक बैठकर बातचीत करते रहे। उन्होंने यही सोचकर इतनी देर तक उसके असह्य प्रलाप बाक्यों का सहन किया कि विदा कर देने से शायद उसकं मन में दुःख होगा। धार्मिक, सामाजिक, और साहित्य-सम्बन्धी आदि अनेक विषयों में कितनों ही के साथ इनको वादानुवाद करने का अवसर प्राप्त हुआ पर ऐसी बात उनके मुँह से कभी न निकली जिसे सुनफर किसी के हृदय में चोट पहुँचती। कितने ही लोग समालोचना के लिए उनके पास प्रन्ध भेजते थे। जिसे प्रशंसा के योग्य समझते थे उसकी मुक्तकण्ठ से प्रशंसा करते थे और दोपों को इस मधुर भाव से दिखलाते थे जिससे किसी के हृदय में जरा भी दुःख.न होता था। वे जो लोगों के साथ इस तरह का व्यवहार करते थे. उसका प्रधान कारण उनका स्वाभाविक विनय ही था। (सजीवनी) जिनके अन्तःकरण में विनय का भाव नहीं है उनकी सुजनता अस्वाभाविक हो पड़ती है। वे अधिक समय तक शिष्टाचार के नियम की रक्षा नहीं कर सकते । उनके कण्ठस्वर, असहिष्णुता, उदासी- नता, और क्रोध:भाव से उनकी धनावटी सुजनता का पता शीघ्र लग जाता है । . विद्वानों ने क्या स्त्रो, क्या पुरुष, दोनों ही के लिए विनय को ही : प्रधान भूपण माना है, 'शीलं परं भूपयम्' .
५४ चरित्रगठन । सोने-चांदी के भूपणं जैसे शरीर की बाहरी शोभा बढ़ाते हैं वैसेही विनयरूपी भूषणे मन को अलंकृत कर उसकी शोभा बढ़ाता है। सुजनता या शिष्टाचार इसी विनय धर्म का बाह्य लक्षण है। जिसका हृदय दुर्विनीत है वह कभी सुजनता प्रकाश करने में समर्थ न होगा। .. बाध्यबाधकभाव रेभरेन्ड चार्ल्स किरली ने कहा है कि "हम लोग जब जन्म लेते हैं तभी से अकेले रहकर अपनी रक्षा नहीं कर सकते। जितने लोगों के साथ हम रहते हैं, उन लोगों से हमें शारीरिक, मानसिक कामों के सम्पादनार्थ सहायता पाने की सर्वदा आवश्यकता रहती है। हम लोग जो कपड़े पहनते हैं, वे दूसरे ही के बनाये हैं, जिस घर में हम रहते हैं उसे भी किसी दूसरे ही ने बनाया है। अन्य व्यक्ति ही हम लोगों के भोजन का पदार्थ संग्रह करके रखता है। दूसरों का काम करके जैसे हम लोग जीविका प्राप्त करते हैं वैसेही दूसरे व्यक्ति भी हम लोगों का काम करके जीवन-निर्वाह करत हैं । बाल्यावस्था में माँ-बाप ही लाड़-प्यार से बच्चे को पालते-पोसते हैं। तदनन्तर ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती जाती है त्या-त्यों अन्यान्य व्यक्तियों की सहायता आवश्यक होती है। बिना सहायक के हम लोग एक दिन भी सुख से नहीं रह सकते । विद्या सीखने के लिए शिक्षक और पाठशाला का प्रयोजन होता है। वाणिज्य-व्यवसाय में विविध देशवासियों के साथ व्यवहार करना पड़ता है। अपने सायद जातीय धर्म, समाज और राज-नियम के अनुकूल चलना होता है; सुख-दुख में स्वजन बन्धुगणों के साथ हप-शोक मनाने की आव- श्यकतायें पड़ती हैं। इन्हीं सब कारणों से हम लोग हमेशा ही दूसरे का मुँह ताका करते हैं, और उससे सहायता पाने की आशा रखते हैं। देश, काल और पात्र के भेद से इस बाध्यबाधकभाव की हास- वृद्धि होती है । कोई व्यक्ति जब किसी विशेष कारण से किसी के द्वारा विशेष उपकृत होता है तब वह व्यक्ति अपने उपकारी के निकट अधिक बाध्य या ऋणी होता है। परिचित हो चाहे अप- रिचित, शत्रु हो अथवा मित्र, धनी हो या दरिद्र, पण्डित हो या मूर्ख, हम लोग एक बात के लिए सबके निकट सम भाव से ऋणी हैं। उसी तरह और लोग भी हमारे निकट ठीक उसी घात के हेतु ऋणी हैं । जो ऋण हम लोगों के जन्म-काल से प्रारम्भ होकर उन के साथ ही बढ़ता है, उसी भृण का नाम शिष्टाचार है। हम लोगों को इस ऋण से उद्धार पाने की सर्वदा चेष्टा करनी चाहिए । जब तक हम लोग शुद्ध हृदय से शिष्टाचार न करेंगे तब तक ऋण के भार से दवे हो रहेंगे ।" बाध्यबाधकभाव को भी शिष्टाचार के अन्तर्गत ही समझना चाहिए । ५
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तीसरा परिच्छेद
"
दरिद्रान् भर कौन्तेय मा प्रयच्छेश्वरे धनम् ।
व्याधितस्यौपधं पथ्यं नीरुजस्य किमौषधैः ॥ १॥
उपकर्तु प्रियं वक्तुं कर्तुं स्नेहमकृत्रिमम् ।'
सज्जनानां स्वभावोऽयं केनेन्दुः शिशिरीकृतः ? ॥२॥
उपकर्तुमप्रकाशं क्षन्तुं न्यूनेष्वयाचितं दातुम् । .
अभिसन्धातुं च गुणैः शतेषु कश्चिद् विजानाति ॥ ३ ॥
भावार्थ-दरिद्रों को धन देना चाहिए, धनवानों को धन देने से क्या
फल ! जो रोगी है उसी को दवा देनी चाहिए नीरोग को श्राप देना
वृथा है॥१॥
सवका उपकार करना, मधुर वचन बोलना, सब पर प्रेमभाव रखना,
सज्जनों का स्वाभाविक गुण है । चन्द्रमा स्वभाव से ही शीतलं है ॥ २ ॥
अप्रकट रूप से उपकार करना, प्राधितों पर उमा की दृष्टि रखना, कुछ
न मांगने पर भी दरिद्रों को दान देना, और सद्गुणों के साथ प्रीति करना
सौ में विरला ही कोई जानता है ॥ ३ ॥
दोहा
मधुर वचन बोलो सदा करो न मन अभिमान ।
क्षमा दया भूलो नहीं जो चाहो फल्यान ॥१॥
अधम जनहु पै साधु गन करें दया-विस्तार ।
निज.प्रकाश नहिं देत कै? चन्द्र श्वपच-आगार ॥ २ ॥
तीसरा परिच्छेद। १७ सदय-दान . संसार में जो लोग इतना दान कर रहे हैं, डङ्क फी चोट से अपने दान का सुयश चारों ओर फैला रहे हैं, प्रति रविवार को भिखारियों के कोलाहल से जो सारा महत्रा गूंजने लगता है, यह किस लिए ? फभी-कभी छपे हुए पत्रों में जो दान का बहुत बड़ा प्रशंसा-सुचक लेख देखने में आता है, इसका क्या प्रयोजन ? इससे क्या दाताओं की दया पूर्ण-रूप से प्रकट होती है ? यदि यही सच है, तो दाहने हाथ से भीख देने के समय यायें हाथ में लाठी क्यों ? याचकों की प्रार्थना पूरी करते समय भौहें टेढो करके कठोर वचन बोलने का ही क्या प्रयोजन ? तुम रूसे मन से, आँखें लाल कर, क्रोध-पूर्वक जो दान करते हो उस दान से क्या याचकों का मन प्रसन्न होता है.? अप्रसन्न-चित्त से जो.दान किया जाता है, उसे ग्रहण कर याचक प्रसन्न नहीं होता, उसके हृदय में व्यथा होने लगती है। वह जी खोलकर दाता को कृतज्ञता प्रकाश नहीं कर सकता। वह तुम्हारा घृणित दान ग्रहण करने के समय कर तुम्हारा सहास्य मुँह, दया से भरी हुई आँखें और मधुर मूर्ति को मन ही मन ध्यान करके परम पिता परमेश्वर के निकट तुम्हारी मङ्गल- कामना करेगा! हाँ, इतना निश्चय जानो कि वह अपनी दरिद्रता को बार-बार धिक्कार देकर तुम्हारे क्रोध-सूचक रक्त नेत्र और भयङ्कर मूर्ति का चित्र हृदय में धारण अवश्य करेगा और जय-जय तुम्हारे वज्रोपम वचनं का उसे स्मरण होगा क्व-तब उसका भन्न । हृदय. काँप उठेगा । अब तुम स्वयं विचार सकते हो कि इन दोनों " ५५ चरित्रगठनः . प्रकार के दानों में अच्छा कौन है। यदि तुम सच्चा सुख पाने की इच्छा रखते हो, यदि. तुम दूसरे के मनो मन्दिर में विहार करना चाहते हो और सारे संसार को अपना बनाया,चाहते हो तो अभिमान त्यागकर विनय-सहित मीठी बात बोलने का अभ्यास करो । मधुर वचन के साथ दान करने से दाता का पुण्य.बढ़ता है और दान लेनेवालं का भी मन. प्रसन्न होता है। मनुष्यों के लिए मधुर-भाषण एक वह.प्रधान गुण है जिससे संसार के सभी लोग सन्तुष्ट हो सकते हैं, अतएव मनुष्य-मात्र को प्रिय:भापी होने का प्रयत्न करना चाहिए। 'प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः । तस्मात् प्रियं च वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥ १ ॥ चायक्यः। ऐसी वाली बोलिए मन का प्रापा खाय । औरन को शीतल करै पापहु शीतल होय ॥ १ ॥ कागा का से लेत है कोयल का को देत । तुलसी मीठे वचन से जग अपना कर लेत ॥ २॥ जनाब इब्राहिम खाँ का नियम था कि जब तक वे भूखे अतिथि को भोजन न करा लेते थे तब तक आप जल-स्पर्श: तब नहीं करते थे। एक दिन, बरसात के मौसिम में झड़ी अधिक हो के कारण एक भी अतिधि उनके यहां न पाया। वे सारे दिन भूखे रहे। आखिर शाम को उन्होंने अतिथि को ढूँढ़कर ले आने के हेतु अपने नौकरों को चारों ओर भेजा और , खुद भी अतिथि र्फ . . .
, तीसरा परिच्छेद। तलाश में बाहर निकलकर इधर-उधरं घूमने लगे। उन्होंने देखा कि सामने एक अत्यन्त वृद्ध, जिसके दाढ़ी-मूंछों के वाल विलकुल सफेद हैं, वृष्टि की झड़ी में पड़कर थर-घर काँप रहा है । वे उस वृद्ध के पास जाकर दया से द्रवित होकर वोले-"महाशय, आप कृपा करके आज मेरे घर प्रातिथ्य ग्रहण करें " वृद्ध प्रसन्नता- पूर्वक उनका निमन्त्रण स्वीकार कर उनके घर गया । इब्राहिम खाँ के नौकरों ने प्रतिथि को बड़े आदर से बैठने को प्रासन दिया। जब वह वृद्ध हाथ-पाँव धोकर आसन पर बैठा तब वे नौकर उसके आगे भोजन की सामग्री परोसने लगे। जनाय इब्राहिम खाँ उस अतिथि के सामने आ खड़े हुए। जब सब सामग्रो-परोसी जा चुकी तब वह वृद्ध भोजन करने लगा। किन्तु ईश्वर को विना धन्यवाद दिये, विना ईश्वर का नाम स्मरण किये उसे भोजन करते देख इब्राहिम अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे और बोले- "तुम्हारा यह कैसा व्यवहार है ? जिनको कृपा से तुम्हें यह मधुर अन्न खाने को मिला है, तुम उन्हें बिना धन्यवाद दिये ही कुत्ते की तरह खाने लगे। तुममें वृद्ध को सौ समझ नहीं देख पड़ती।" इसके उत्तर में वृद्ध ने कहा--"मैं नास्तिक हूँ. उसका ऐसा उत्तर सुनकर इब्राहिम का सर्वाङ्ग क्रोध से जल उठा। उन्होंने तुरन्त उसे अपने घर से बाहर कर दिया। तय इब्राहिम के हृदय में देववाणी हुई-“हे इन्नोहिंम ! मैंने जिसको यन्न-पूर्वक भन्न देकर इतनी बड़ी उम्र तक बचा रक्खा है तुम उसे चरिनगठन।" घड़ी भर भी अपने यहाँ न ठहरा सके और तुमने उसके साथ इतनी घृणा की। वह नास्तिक था, एतदर्थ तुमने दान से अपना हाघ क्यों खींचा ? इब्राहिम अपनी भूल समझकर पछताने लगे। (वामाबोधिनी पत्रिका) वहुतों की यह धारणा है कि जिसको मैं दान दूंगा उससे दो वात कहने का भी मेरा अधिकार है। पर यह बात ठीक नहीं । जब हम दान करने चले हैं तब शिष्टाचार की वात क्यों भूलेंगे ? दरिद्र को धन देने और भूखे को अन्नदान करने के लिए जाकर यदि तुम्हारे हृदय ने कठोरता धारण की अथवा दुखियों का दुःख देखकर 'तुम उत्तेजना-वश तत्काल दान करके पीछे पछताने लगे तो ऐसे दान से दान न करना ही अच्छा है। जो दान दया-पूर्वक नहीं किया जाता उससे कोई महत्व प्रकट नहीं होता वरन् नीचता ही' प्रकट होती है। इसलिए तुम जो कुछ किसी को दान दो, प्रसन्न मन से दो, दान करने के समय विनय का भी स्मरण रक्खा । .. , दया से.. बढ़कर कोई धर्म नहीं जिसके हृदय में दया नहीं, वह मनुष्यों के समाज में रहने योग्य नहीं है । दूसरे का दुःख दूर करने की और जिसके चित्त की प्रवृत्ति नहीं है, दूसरे की आँखों में आँसू देख जिसकी आँखों में आँसू न भर पाये, दूसरे की विपद देख जिसका हृदय दुःख से तीसरा परिच्छेद। व्याकुल न हो उठा ऐसे कठोर हृदय के मनुष्य; ऐसे स्वार्थपरायण, "ऐसे समाज के काँटे जन-मण्डली से जितनी ही दुर अलग रहें उतना ही अच्छा है। कितने ही ऐसे ज्ञानगर्विष्ट वृथाभिमानी हैं जो देश, काल और पात्र का विचार करके दया या सुजनता दिखलाते हैं। लोगों में पीछे उनकी निन्दा होने लगती है, उनके निर्मल चरित्र और पवित्र नाम में कलङ्क लग जाता है, उनका उम्न मस्तकं झुक जाता है, और उनके हृदय में अशान्ति छा जाती है। जो देश, काल और पात्र का विचार करके दया या सुजनता दिखलाते हैं वे इस भय से सर्वदा शङ्कित रहते हैं कि पीछे कहीं लोग हमारी निन्दा न करें, हमारे निर्मल चरित्र और पवित्र यश में कहीं कलङ्क न लग जाय, हमारा उन्नत मस्तक नीचे की ओर न मुक जाय । वे जो कुछ करते हैं यश पाने के लिए। जिस कर्तव्य- पालन में उन्हें यश पाने की प्राशा न होगी उसे वे क्यों करेंगे ? किसी कङ्गाल को अपने हाथ से एक मुट्ठी अन्न देते वक्त वे चारों ओर एक बार चकित नेत्र से देखकर उसी घड़ी अन्तर्धान हो जायेंगे। भूखे को एक मुट्ठी अन्न देना वे यशस्कर नहीं समझते इसी से उन्होंने बिना उसे कुछ दिये छिप रहने ही में अपना बड़प्पन ममझा। रास्ते में कोई छोटे कुल का मनुष्य असहाय अवस्था में गिरा पड़ा है, उसकी सहायता करना तो दूर की बात है उन्हें उसके साथ बात करने, उसकं दुख का दाल पूछने में पड़ी लज्जा हो पाती है मानों ऐसा छोटा काम करने से लोगों में उनका चरित्रंगठन सम्मान घट जायगा। उन्हें लोग व कूफ समझेगे । इसी से वे बेचारे मर्यादा के सागर ऐसा निन्दित कर्म करना नहीं चाहते । यह न समझना चाहिए कि इन लोगों में सब निर्दय ही होते हैं, इन लोगों में कितनों ही के हृदय में दया काबीज अवश्य है किन्तु वह वीज अभिमानवश अंकुरित होने नहीं पाता । जो सङ्कट में पड़ा है उसे उससे छुड़ाना, दरिद्रों की पर्णकुटी में प्रवेश कर प्यास से मरते हुए किसी व्यक्ति के सूखे कण्ठ में एक चुल्लू जल डालना अघवा उसके साथ सहानुभूति प्रकट करके उसके आँसू पर प्रॉस बरसाना, जो मनुष्य दुर्भिक्ष से पीड़ित होकर अनाघं की तरह धरती पर लेटा पड़ा है उस अचेतन अस्थिचर्मावशिष्ट मरणोन्मुख दीन मनुष्य के मुँह में अंन्न डालना कदापि निन्दित कर्म नहीं है; ऐसे काम करन- वाले की निन्दा न होकर सर्वत्र प्रशंसा ही होती है, बल्कि इस दयालुता के कारण लोग उसे दयाः का.अवतार मान उसकी पूजा करने के हेतु स्वतः प्रवृत्त होते हैं। किन्तुःहा दुर्भाग्य, अभिमान और लोकलज्जा का भय लोगों को ऐसे काम करने से रोकता है। इसे कुसंस्कार के सिवा और क्या कह सकते हैं? जैसे कोई आदमी विशेष उपकार करके किसी अंसहाय के भग्न हृदय को प्रसन्न करता है वैसेही उसे चाहिए कि सत्कर्म के मार्ग में सामाजिक हानिकर कुसंस्कार-कण्टकों का समावेश न होने दे.। मान लो, किसी कारण से दया के अधीन होकर हम एक अच्छा काम करने के लिए उद्यत हुए पर लोक-लज्जा वा समाज-निन्दा के भय से हम उसे कर न सके । हृदय की बात हृदय में दो विलीन हो गई। इस प्रकार निर्दय और प्रशिष्ट-व्यवहार की बात सोचकर हम लोग तीसरा परिच्छेद । 'मन ही मन अपने को बार-बार धिक्कारते हैं सही, किन्तु शिष्टता का काम 'पा पड़ने पर उसे पूरा नहीं करते। उस समय पश्चात्ताप की यात बिलकुल भूल जाते हैं। दया के अवतार. हम लोगों में दया गुण से भूपित कितने ही व्यक्तियों ने मातृ- भूमि का मुख उज्ज्वल किया 1 कितनों ही ने सत्कर्म में असंख्य दान देकर अपनी उदारता दिखलाई है। नि:स्वार्थ दान के बल ले कितने ही हम लोगों में प्रातःस्मरणीय हो गये हैं.। किन्तु दयावतार कहने से विद्यासागर.महाशय का ही बोध क्यों होता है यह। मैं नहीं कह सकता। और लोग उन्हें जैसा कुछ समझ पर देशवासियों के निकट विद्यासागर-महाशय दया के अवतार ही कहाकर विशेष परिचित हैं। स्वदेश वासियों के समीप उनकी दया का नवीन परि- चय न देना होगा। उनके जीवनचरित में पाठकगणों ने उनको असीम दया के अनेक वृत्तान्त पढ़े ही होंगे। उनकी.दया केवल अपनी ही जाति पर न होकर. सव पर समान थी । फ्रांस में जाकर निवास करने के समय बैंगला के प्रसिद्ध कवि माइकेल मधुसूदन दत्त ने विपदमस्त होकर जब अपने स्वदेशीय बन्धु-बान्धवों से सहायता पाने की प्राशा. छोड़ दी तप भी उनके हृदय में एक व्यक्ति से साहाय्य मिलने की प्राशा जाग्रत थी। यदि उस व्यक्ति की.सदा- यता से उन्हें वञ्चित होना पड़ता तो मेघनाद-बंध और ब्रमाङ्गना के कवि का.आज कोई नाम तक न जानता। सारी निराशा में उन्हें चरिनगठन । यही एक भरोसा था कि विद्यासागर महाशय अभी वङ्गदेश में विद्यमान हैं उनसे अवश्य ही सहायता मिलेगी। माइकेल उन्हें दया के, अवतार ही करके जानते थे। जब उन्होंने अपनी रक्षा का कोई उपाय न देखा तब वे दया अवतार विद्यासागर महाशय के शरणापन्न हुए। कहना न होगा, शीघ्र ही उनका अभीष्ट सिद्ध हुप्रा । उन्होंने विपद के पजे से छुटकारा पाया । विद्यासागर महाशय ने अपने सुख को तुच्छ समझकर परोपकार-व्रत में ही अपने जीवन का उत्सर्ग:कर दिया था। वे अपने हाथ से दीन दुखियों की आँखों के आँसू पोछते थे । शोकात को आश्वासन, भयार्त को अभय, भूखों को अन्न, निराश्रय को आश्रय, रोगी को औषध और दरिद्र को धन देते थे। जो स्वयं दीन जनों के घर जा- जाकर उनकी खोज-खबर लेते थे. उन्हें कोई क्योंकर दया का अंवतार न मानेगा ?.सन् १८६७ ई० के घोर दुर्भिक्ष के समय जब झुण्ड के झुण्ड लाखों बी-पुरुष स्वजन-समाज से रहित होकर अन्न के प्रभाव से घर छोड़कर पेट की आग से व्याकुल हो पागल की तरह यत्र-तत्र घूमने लगे थे, जब असंख्य नर-नारियों की कङ्गाल मूर्तियों से राजमार्ग:भर गया था, जब "हा अन्न, हा अन्न" कह- कर कितने ही निराहारी काल-कवलित हो रहे थे, उस समय दयावतार विद्यासागर ने ही बहुत धन खर्च करके बड़े ही उत्साह के साथ अन्नदान करके और इस प्राण-संहारी दुर्भिक्ष के निवारणार्थ सरकार की दृष्टि प्राकर्पित कर लाखों नर-नारियों के प्राण बचाये । भारत देश के प्रत्येक स्थान में यदि विद्यासागर के समान एक-एक व्यक्ति जन्म ग्रहण करते तो उस करालः अकाल का प्रकोप बहुत . तीसरा-परिच्छंद। लोगों को सताने न पाता । दूसरे का दुःख देखकर जिनका हृदय द्रवित हो उठता था, जिनकी आँखों में आंसू - उमड़ पाते थे, समाज ने जिसे अस्पृश्य कर रखा था उसे समाज के मुकुट होकर भी जिन्होंने आदर-पूर्वक प्राश्रय दिया था अब तुम्ही कहो, वे दया के अवतार थं या नहीं ? तुम लोग इस आदर्श-पुरुष का जीवन- चरित पढ़ो और उनके पवित्र चरित्र से शिक्षा ग्रहण कर अपने हृदय को दया से अलङ्कृत करो। जब तुम्हारे हृदय में दयाका प्रवाह प्रवाहित होगा तब तुम सारे संसार को अपने अधीन कर लोग। . क्षमा और सदय व्यवहार से लोग शत्रु' को भी अपने वश में कर सकते हैं चीन राज्य में किसी समय राजधानी से दूर एक स्थान में कुछ प्रजा विद्रोही हो उठी। चीन के बादशाह मन्त्रियों को साथ लेकर विद्रोहियों को दबाने चले । उन्हें स्वयं उपस्थित होते देख विद्रोहियों ने तुरन्त अपना अपराध स्वीकार कर लिया । विद्रोह का संवाद पाकर बादशाह ने यह कहकर यात्रा की थी कि "विद्रो- हियां का नाश करकं ही लौटूंगा। इस कारण सव मन्त्री सचिने लगे कि यादशाह इस समय विद्रोहियों के लिए जरूर कोई कठोर दण्ड की आज्ञा देंगे। किन्तु बादशाह ने उन लोगों का. अपराध एकदम क्षमा कर दिया और कितनों ही के साथ सुजनता का भी चरित्रंगठन व्यवहार किया। उनका ऐसा दयायुक्त व्यवहार देखकर मन्त्रिगण बड़े ही विस्मित हुए। यहाँ तक कि प्रधान मन्त्री ने क्षुब्ध होकर सम्राट को प्रतिज्ञा की बात स्मरण दिलाकर कहा-"क्या आप इन विद्रोहियों का विनाश न करेंगे ? चलने के समय आपने क्या प्रतिज्ञा की थी? अभी इन लोगों पर इस प्रकार संदय व्यवहार करने से क्या आपके सत्य की रक्षा होती है ?” सम्राट नै मुसकुरा कर कहा-"मेरा कथन सत्य हुप्रा । मैंने शत्रु-नाश करने की बात कही थी, देखो यहाँ मेरा एक भी शत्रु नहीं, अवं सभी मेरे मित्र हो गये हैं।" मतलब यह कि जो काम अस्त्र-शस्त्रों के द्वारा सिद्ध नहीं होता वह कोमल व्यवहार से शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है। तुम्हारा कोई पड़ोसी यदि दुर्जन है तो उसके साथ तुम सर्वदा सदय व्यवहार करो, उसके सभी अपकारों को भूलकर उसके दुःख के दिनों में उसकी सहायता करो, वह भले ही तुम्हारे फरे पर तुम उसके साथ हमेशा मित्र का सा व्यत्र- हार करो। कुछ दिन में वह पाप ही आप लजित होकर अपना स्वभाव बदलकर तुम्हारे साथ सच्ची मित्रता करने लग जायगा। धीरे-धीरे उसका कठोर हृदय कोमलता धारण करेगा, दिन-दिन उसके उद्धत भाव का ह्रास होगा और उसका कठोर कण्ठस्वर क्रमशः मधुवर्पण करने लगेगा । व्यवहार के दोष से जैसे अपना आदमी पराया हो जाता है वैसेही व्यवहार-गुण से कट्टर शत्रु भी मित्र बन जाता है। तुम लोगों ने क्या कभी वैष्णवों के शिरोमणि महात्मा नित्या- नन्द देव की असीम क्षमा, उदारता, मधुर भाषण और देव-दुर्लभ साथ शत्रुता .
६७ तीसरा परिच्छेद। प्रेम की बात नहीं सुनी है ? :वङ्ग के प्रति प्रसिद्ध दुर्दान्त डाकू जगाई और मधाई दोनों भाइयों ने नित्यानन्दजी के प्रेमगुण से मुग्ध होकर घड़ी भर में ही अपने दुष्ट स्वभाव को वदल.डाला । उन दुष्ट डाकुओं ने बड़ी निर्दयता के साथ उन पर अस्त्रप्रहार फर उन्हें रुधिराक्त कर डाला था। किन्तु क्षमासागर प्रेमिक निताई.ने जब प्रसन्न-मन से प्रादरपूर्वक उन डाकुओं को लपककर गले से लगाया तब उनके इस कोमल व्यवहार से उन डाकुओं का वनवत् कठोर हृदय पानी-पानी हो गया। देखो, महात्मा के क्षणिक संग से वह अशान्त, दुश्शील, असाधु और मनुष्यों का परम शत्रु डाकू कैसा धीर, शील, सुजन और संसार का बन्धु बन गया। , नौकरों के साथ कैसा व्यवहार करना उचित है कितने ही लोग यह समझते हैं कि नौकरों के साथ शिष्टाचार या सदय व्यवहार करने से वे स्वेच्छाचारी और बेअदब हो जाते हैं जिनको रुपया देकर हमने अपने आराम के लिए रक्खा है उनके साथ शिष्टाचार का बर्ताव कैसा? उनका चाल-चलन अच्छा न होगा या वे अपना काम अच्छी तरह न करेंगे. तो उन्हें अवश्य दण्ड देंगे । बहुत जगह प्रायः लोग नौकरों के साथ ऐसाही व्यव- हार किया करते हैं । ससान नौकरों के साथ भी वे वैसाही.वर्ताव रखते हैं जैसा कि एक अशिष्ट, चोर, वञ्चक भृत्य. के, साथ । वे नौकरी की ओर जब देखें गं तम कड़ी ही दृष्टि से, नौकरों के लिए चारत्रगठन । . । उनकी भी हमेशा चढ़ी ही रहेगी। नौकरों के साथ मधुर-भाषण करना मानों वे अपनी लघुता समझते हैं। नौकरों पर दया दिख-' लाना.मानों उनके लिए महापाप है। यहाँ तक कि वे अपना राय जमाने के लिए निरपराधी नौकरों को भी फंठोर वचन कहने या उनके ताड़न करने में परम पुरुषार्थ समझते हैं। क्या नौकरों के साथ ऐसा निर्दय और कठोर व्यवहार करने से उनका महत्व बढ़ता है ? कभी नहीं । बल्कि ऐसा करने से फल उलटा ही होता है । ऐसे दुर्विनीत मालिक पर नौकरी की भक्ति, श्रद्धा और ममता का हास हो जाता है। और वे अपमानित भृत्यगण अपने अपमान. काः बदला चुकाने के लिए मालिक के विरुद्ध भांति-भाँति के पड:' यन्त्र रचा करते हैं। अँगरेज़ों में स्वजाति-वत्सलता यहाँ तक प्रबल है कि परस्पर एक-दूसरे.पर अनुराग और सहानुभूति प्रकट करते हैं । अपनी जाति को वे कभी निन्द्य नहीं समझते । भारी से भारी अपराध हो जाने पर भी वे अपने सजातीय भृत्य को कठोर दण्ड देना उचित नहीं समझते । किन्तु हमारे देश में लोगं बात-बात में विजातीय हों चाहे सजातीय, नौकर-नौकरानियों का तिरस्कार करते हैं और कभी-कभी चपेटाघात से भी उनकी ख़बर लेते हैं।' मालिकों के प्रशिष्ट व्यवहार से ही नौकरों का स्वभाव क्रमशः बिगड़ जाता है और वे भी अपने मालिकों के साथ छिपे-छिपे अशिष्टता का काम करने लग जाते हैं। स्वर्गीय भूदेव मुखोपाध्याय महाशय के साथ किसी एक सज्जन कुलीनं व्यक्ति काः घनिष्ठ परिचय था; वे लोगों से कहा करते थे कि उनके यहाँ के नौकर प्रायः कभी कुछ चोरी नहीं. .
तीसरा:परिच्छेद। करते थे । रुपया-पैसा, या गहना जब कमी कहीं पड़ा पाते थे तव झट वे मालिक के सामने लाकर रख देते थे। एक दिन. उनकी गृहिणी उनसे कह रही थी-"मैं समझती हूँ कि नौकर लोग चालकों की अपेक्षा भी अधिक दया-पात्र हैं । लड़के यराघर हमारे आपके पास रहते हैं, वे जब.जो चाहते हैं,. पाते हैं। हम लोग चरावर उन्हें सुखी रखने की चेष्टा करते हैं । वे जब बीमार होते हैं तब हम उनके पास से उठना तक नहीं चाहती। नौकर बीमार होने पर फष्ट के मारे अधीर.होकर जब वाप-बाप कहकर चिलाता है तब उसके रक्षार्थ माँ-बाप थोड़े ही उसके पास आते हैं ? उस समय उसके साथ ही लोगों को माँ-बाप कासापाचरण करना चाहिए । नौकर पर पूरा विश्वास होने पर तुम बहुत खुश होते हो तो उसे संन्दूक की कुली सौंपते हो, किन्तु वह तुम्हारी दया के भरोसे अपने प्राण तक को तुम्हें सौंप देता है।" मुखोपाध्याय महाशय के घर में नौकरों का काम बँटा था। सब अपने-अपने निर्दिष्ट कामों को बड़ी सुघराई से किया करते थे। उनमें जब कभी कोई बीमार होता था अथवा छुट्टी लेकर घर जाता था तब उसका काम दूसरे नौकर अपनी खुशी से आपस में थोड़ा-थोड़ा करके वोट लेते थे; उसके लिए खासकर दूसरे नौफर रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। छुट्टी का वेतन नौकरी फा नहीं काटा जाता था। बीमार होने पर दवाई और पथ्य- पानी के लिए नौकरों को मालिक की ओर से.खर्च मिलता था। अपने नौकरों को वे कभी। खैराती औषधालय में नहीं जाने देते थे। उनके यहाँ एक भी नौकर चोर अथवा मिथ्यावादी न । . .. . - चरित्रगठन था। अपने मालिक के साथ नाकर सर्वदा निश्छल व्यवहाँ रखते थे। जिनकी अवस्था ऐसी नहीं है जो किसी का विशेष उपका कर सकें, उन्हें इतना तो ज़रूर चाहिए कि दो मीठी बाते. बोलक ही दूसरे को प्राप्यायित करें। "वचने किं दरिद्रता." स्वामित्व किसी जङ्गल में चिड़ीमार ने पक्षियों को फंसाने के लिए जाल फैलाकर चावल बिखेर दिये । चावल चुगने के लिए कितने है कबूतर उस जाल के भीतर जाकर बैठे और उसमें फंस गये । जब उसमें से निकलने का कोई उपाय न देखा तब वे कबूतर जाल लंक उड़े। उन कबूतरों के प्रधान चित्रग्रीव अपने आश्रितों को विपद से छुड़ाने की इच्छा से अपने मित्र हिरण्यक नाम -चूहे के पास गया दोनों मित्रों में परस्पर प्रिय-सम्भापय होने के बाद वह चूहा चित्रप्रोव के सम्मुख पाया और कुछ देर विस्मित हो कुछ न बोला; ततः पर उसने पूछा- मित्र: यह क्या ?". . चित्रग्रीव-"यह हम लोगों के विना विचार काम करने का फल है।" यह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीव का . बन्धन काटने को उद्यत हुा । तव चित्रग्रीव ने कहा- मित्र, ऐसा न करो, पहले इन आश्रितों का बन्धन.काटकर इनकी प्राण-रक्षा करो, पीछे मेरा बन्धन काटो ?
. . । तीसरा-परिच्छंद । .. " हिरण्यक ने कहा--मेरे दाँत कमज़ोर हैं, मुझमें इतनी शक्ति नहीं जो सवका बन्धन काट सकूँ। अतएव में पहले तुम्हारा बन्धन काटकर यथासाध्य औरों का भी बन्धन काढूँगा। इन सवों का बन्धन काटते-काटते मेरे दाँत बिलकुल टूट जायँगे तब फिर तुम्हारा बन्धन कैसे काहूँगा। चित्रग्रीव-~मित्र, यह बात तुमने सच कही है। किन्तु पहले जहाँ तक तुमसे हो सके इन्हीं का बन्धन काटो, मैं किसी तरह अपने आश्रितों का दुःख नहीं देख सकता । ये कबूतर विना द्रव्य के मेरे प्राश्रित बने हैं। अतएव अपना प्राण गवाकर भी इनकी रक्षा करना मेरा धर्म है।" यह सुन हिरण्यक प्रानन्द से पुलकित होकर बोला-"मित्र! तुम धन्य हो । प्राश्रितों पर जैसा तुम्हारा वात्सल्य-प्रेम है, उस गुग्ण से तो तुम तीनों भुवन का प्राधिपत्य पाने योग्य हो । यह कहकर उसने सब कबूतरों के वन्धन काट डाले । नाफरों के साथ मालिक को जैसा शिष्ट व्यवहार करना उचित है, वैसेही आश्रयदाता को अपने आश्रितों के साथ करना चाहिए। यह समझकर कि ये हमारे प्राश्रित हैं इनके साथ जो चाहेंगे व्यवहार करेंगे, यथेच्छ पाचरण करना बड़ा ही अनुचित है। जो '- तुम्हारा मुँह देखकर धैर्य धारण किये रहता है; जो तुम्हारे हित- साधन के लिए प्राण तक देना चाहता है; जिनको आश्रय देने ही के कारण तुम्हारो प्रभुता सार्थक हो रही है, उन प्राश्रितों की रक्षा करना हो तुम्हारा परम धर्म है। आनितगणों की रक्षा करना जैसा आवश्यक है वैसा ही उनके दोपों का संशोधन करना भी न्यायसंगत - - - चरिन्नगठना.... है। आश्रित कोई अपराध करे तो उसको दण्ड देना अनुचित नहीं है किन्तु निष्कारण आश्रितों को सताना महापाप है। आजकल आत्माभिमान और स्वार्थपरता की मात्रा इतनी बढ़ी है कि बात-बात में आश्रितगण सताये जाते हैं.। अपराध कोई करे पर.सज़ा पावेंगे अधीन व्यक्ति ही। आश्रितों के असतः कार्य पर उपयुक्त शासन और सत्कार्य पर पुरस्कार इन दोनों को उचित रीति से प्रयुक्त होत तो बहुत ही कम देखने में आता है। जो प्रभु शक्तिसम्पन्न और उदारचेता हैं, वे.अपने आश्रितों को, वे किसी अवस्था में क्यों न हो, संकट से बचाने के लिए अपनी जान तक की कुछ परवा नहीं करते । जिस नीति और धर्मवल से राजा प्रजागणों का पालन करके राज्यशासन करते हैं; सेनापति सैन्यगणों की रक्षा में तत्पर रहते हैं, गृहपति परिवार का पालन करते हैं, माँ अपने बच्चों को 'पालती है और गृहस्वामिनी अपनी बहू-बेटियों की रक्षा करती हैं उसी एक नीति और धर्म के नियम पर सब जातियों में, सव सम्प्र. दायों में, छोटी-बड़ी सब श्रेणी के मनुष्यों में प्राश्रित जन भी रक्षा पाते हैं। प्राश्रितों के पालन का व्यवहार पशु-पक्षियों तक में भी पाया जाता है । जब वे झुण्ड बाँधकर जङ्गल में फिरा करते हैं तब उनमें जो प्रधान फ्री तरह सबके आगे रहता है, उसका ध्यान इमेशा अपने अनुयायियों पर रहता है, विपद की आशङ्का देखकर वह अपने प्राश्रित अनुयायियों को छोड़कर भागता नहीं, बल्कि उस समय उसका तेज, साहस, विपद से.उद्धार पाने का कौशल और अपने दल में किसीका अनिष्ट न हो यह सोचकर उस तरफ़ साफाक्ष दृष्टि रखना, चित्त को चकित कर देता है । उसको ऐसी . , .. तीसरा:परिच्छेद। न्यायपरता के साथ आश्रितों की रजा काश्य देखकर प्रानन्द के साथ ही साथ आश्चर्य में डूबना पड़ता है। न्यायपूर्वक प्रभुत्व' करना ही प्रभु का. धर्म है । कबूतरों के राजा चित्रमोव की बात जो पहले कही जा चुकी है आशा है तुम उसे उपकथा-मात्र न समझकर उससे शिक्षा ग्रहण करोगे। - आबूबन और स्वर्गीय दूत मियाँ प्रावूवन हृदय के बड़े ही सच्चे घे। वे सबको समान दृष्टि से देखते थे । एक दिन की बात है, रात में वे सोये थे, आधी रात को जब उनकी आँखें खुली तब उन्होंने देखा कि सारे घर में उजाला हो रहा है और उस उजाले में प्रफुल्ल कमल-सा एक अत्यन्त सुन्दर देवदूत सुनहरी पुस्तक में कुछ लिख रहा है। प्रावूमन तो निप्पाप थे। उन्हें ऐसा आश्चर्य दृश्य देखकर ज़रा भी डर न हुआ । उन्होंने निर्भय होकर पूछा-आप इस पुस्तक में : क्या लिख रहे हैं? उस देवदूत ने धीरे से उनके कानों में कहा-संसार में जो लोग ईश्वर को हृदय से प्यार करते हैं मैं उन्हीं लोगों के नाम इस वही में लिखता हूँ। आबूबन ने कोमल स्वर में कहा--"क्या मेरा नाम भी लिखा है १५ देवदृत ने हंसफर कहा-"नहीं।" तब प्रावूबन ने विनयपूर्वक कहा-"नहीं लिखा है तो इवना ७४ चरित्रंगठन। लिख लो, पाबूबन सब मनुष्यों को अपना ही सा जानकर प्यार करता है ।" यह सुनकर देवदूत अलक्षित हो गया। हाय, आबू- वन का नाम उस पुस्तक में न लिखा गया ! दूसरी रात वह देवदूत फिर आबूबन के पास अपना तेज प्रकाश करता हुआ आ पहुँचा। उसने वह सुनहरी वही प्रावूवन की नज़र के सामने रख दी। आबूबन ने देखा, जितने महात्माओं के नाम उस बद्दी में लिखे घे सबसे पहले प्रावूवन का ही नाम लिखा था। यह देखकर आबू बन के आनन्द की सीमा न रही। क्या तुम लोग श्रावून के इस पवित्र चरित्र से कुछ शिक्षा- लाभ न करोगे ? मनुप्य-मात्र को हृदय से.प्यार करना सीखो। जो सब मनुष्यों को प्यार करता है वह ईश्वर का प्यारा होता है। , चौथा परिच्छेद रोगशोकपरीतापयन्धनन्यसनानि च । आत्मापराधवृक्षाणां फलान्येतानि देहिनाम् ॥ १॥ - भावार्थ-रोग, शोक, सन्ताप, बन्धन और दुःख ये सब मनुष्यों के अपने अपराधरूपी वृक्ष के फल हैं ।। १ ।। स्वयं न खादन्ति फलानि वृत्ताः पिवन्ति नाम्भः स्वयमेव नद्यः । धाराधरो वर्षति नात्महेतोः परोपकाराय सता विभूतिः ॥ २ ॥ वृक्षों के फल, नदियों का जल, मेव की वृष्टि-जैसे ये चीजें स्वार्थ-सुख के लिए नहीं होती वैसेही सज्जनों का धन अपने सुख-भोग के लिए न होकर दूसरों के उपकार के ही लिए होता है ॥ २॥ दानाय लक्ष्मीः सुकृताय विद्या चिन्ता परब्रह्मविनिश्चयाय । परोपकाराय पासि यस्य वन्यनिजोकोतिलकः : स एकः ॥ ३॥ जो धन को दान निमित्त, विद्या मोधर्म-निमित्त, चिन्ता को ब्रह्मविचार के निमिस धार यापी को दूसरे के उपकार-निमित्त समझकर चरितार्थ परोघे संसार में किससे पूजित नहीं होते ? ॥ ३ ॥ .
चरित्रगठन। वित्ते त्यांग: तमा शक्ती दुःखे दैन्यविहीनता। निर्दम्भता सदाचार स्वभावोऽयं महात्मनाम् ।।४।। धन रहते दान, शक्ति रहते उमा, विपद में धैर्य और सदाचार में निरभिमानता वहीं दिखलाते हैं जो महात्मा हैं ॥ ४ ॥ . सत्पूरुषः खलु हिवाचरणैरमन्द- मानन्दयत्यखिललोकमनुक्त एव । पाराधितः कथय केन करैरुदार- रिन्दुर्विकासयति कैरविणीकुलानि ॥ ५ ॥ जो सज्जन हैं वे बिना कहे ही अपने उदार चरित्र से सबको भानन्द देते हैं। द्विजराज ( चन्द्रमा) से किसने कंब प्रार्थना की जो वह अपनी सुधामयी किरणों से श्रातपतप्त कुमुदिनी के हृदय का परिताप हरण करके उसे प्रफुल्लित करता है ॥५॥ 'भद्र मनुष्य सांसारिक मनुष्यों को अनेक प्रकार के सामाजिक और राजकीय नियम पालन करने होते हैं। भिन्न-भिन्न प्रकृति के मनुष्यों के साथ प्राचार-व्यवहार करना होता है। संसार में रहकर कोई यह चाहे कि हम सदा हर एक कॉम मीठी बातों से या विनंय से ही सम्पन्न कर लेंगे यह हो नहीं सकता । मनुष्य एक-दम क्रोधहीन, शान्त, विनयों, और कोमल-हृदय होकर रहेगा यह नहीं हो सकता। और ऐसा होकर सर्वदा रहने ही से यदि कोई अपने को सच्चरित्र, शिष्ट या कर्तव्य-परायण मान ले, सो भी नहीं। समय के अनुसार कोम.
। 1 चौया.परिच्छेद। लता या कठोरता का व्यवहार करना समुचित है। मान:लो, तुम कहीं जा रहे हो। रास्ते में तुमने देखा कि एक बलवान पुरुप के द्वारा एक दुर्वल मनुष्य सताया जा रहा है अथवा कोई असहाय अबला डाकू से अभिभूत होकर आधी रात में सहायता के लिए रा-रीकर पुकार रही है। ऐसे समय में यदि तुम क्षमाशील होकर उस बलवान् के अत्याचार पर कुछ न बोलो, उस अनाथ अबला को संकटग्रस्त देख उसकी कातर-प्रार्थना पर ध्यान न देकर अपनी शान्त-शीलता प्रकट करो तो जान लो कि तुम निस्सन्देह कायर हो, तुम्हारी वह क्षमाशीलता, और शान्त-स्वभाव ही तुम्हार चरित्र को कलङ्कित कर रहे हैं । किन्तु उस हृदयद्रावक दुर्नीत व्यवहार को देखकर यदि तुम्हारा रक्त गरम हो उठे, क्षमा की जगह क्रोध उत्पन्न हो और उपेक्षा की बात न सोचकर उस असहाय.की सहायता के लिए उद्यत हो जाओ तो तुम यथार्थ में सत्पुरुप कहलाया। क्रोध, क्षमा, दया, शासन, विनय, अपेक्षा प्रादि सभी समय के अनुसार व्यवहार्य है। जो लोग समाज में सम्भ्रान्त या भद्र गिने जाते हैं उन्हें इन सब गुणों को उचित रीति से व्यवहार में लाना चाहिए। युरोप देश में पहले "नाइट" उपाधिधारी एक सम्प्रदाय था। दुष्टों का दमन करना ही उसके जीवन का प्रधान लक्ष्य था। यं. लोग अस्त्र-शस्त्र से सुसजित हो घोड़े पर चढ़कर विपद-प्रस्त नर-नारियों के उद्धारार्थ बराबर इधर-उधर घूमा करते थे। नाइट मम्प्रदाय के सभी लोग सुशिन्नित, उयशोद्भव और रण-कौशल में चास्नगठन । . . . - एक से एक बढ़े-चढ़े थे । वे अयलागणों को देवता की तरह मानते थे । इस नाइट सम्प्रदाय के सम्भ्रान्त व्यक्तियों की शूर-वीरता और साधुता के कितने ही दृष्टान्त युरोप के इतिहास में पाये जाते हैं। नाइट लोग केवल अपने बाहु-बल से विख्यात हुए घे यह बात नहीं है; वे लोग राजभक्ति, साहस, बल, युद्ध कौशल, पालक और लियों के प्रति स्नेह और श्रद्धा, पीड़ित व्यक्तियों का पक्षावलम्बन, अत्याचारियों के साथ युद्ध-तत्परता और पराजित शत्रुओं पर दया, बन्धुवगों पर विश्वस्तता, सत्यवादिता और चरित्र की निर्मलता प्रादि अनेक सद्गुणों के अधिकारी होकर प्रसिद्ध हुए थे। ये लोग 'नाइट' अर्थात् शूर कहलाकर देशमान्य हो रहे थे। अब ऐसे बहुगुणान्वित पुरुषों का कोई विशेष सम्प्रदायः न , रहने पर भी : कितने ही परोपकारी कर्तव्य- परायण सम्भ्रान्त व्यक्ति-विशेष सम्मान-सूचक नाइट उपाधि से भूपित किये जाते हैं । इन दिनों सरकार की सुविचार-पद्धति और सुशासन-प्रणाली के कारण दुष्टों को दबाने के.लिए शूर-सम्प्रदाय की आवश्यकता न रही, इसी से वह सम्प्रदाय उठ गया। किन्तु जो सम्भ्रान्त हैं, जो समाज के सुधारक हैं, उन्हें उक्त सम्प्रदायवाले की गुणावली अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए। जो लोग कर्तव्य- परायण हैं, साहसी हैं; दुखियों के सहायक हैं, बन्धुवत्सल हैं, क्षमा-शील हैं, सच्चरित हैं और सत्यवादी हैं वे ही यथार्थ में सम्भ्रान्त या भद्र कहलाने योग्य हैं। एक विख्यात लेखक ने कहा है कि सम्भ्रान्त होने के लिए अच्छे कपड़े या विलास की सामग्री आवश्यक नहीं है। भड़कीली पोशाक याचाहरी सजावट को सुन्दर .
चौघा परिच्छंद । स्वभाव नहीं कहते। भद्र मनुष्य कहने से इतना अवश्य समझना होगा कि वे शान्त; विनयी, सज्जन और उदार हैं । इस सिद्धान्त से कौन भद्र है और कौन अभद्र है इसका निर्णय सहज ही में हो सकता है। मनुष्यों के स्वभाव का परिचय उनकी वाली और च्यवहारों से पाया जाता है। केवल बाबाउम्बर देखकर कोई किसी 'के स्वभाव को जल्दी नहीं परख सकता। क्योंकि बहुतसे लोग "करतय वायस भेप मराला" के हो चरितार्य करनेवाले हैं । भद्र 'पुरुषों के लिए स्वार्थपरता से बढ़कर घृणोत्पादक अपराध दूसरा नहीं है। सुजनता या शिष्टता का दो नाम भद्रता है। सज्जन, शिष्ट, सभ्य, साधु ये सब भद्र के ही पर्यायवाचक शब्द हैं। इनमें किसी एक शब्द के अधिकारी होने हो से शिप्टवाची सभी शब्दों पर उनका अधिकार : पहुँच जाता है। अशिष्टता के जितने कार्य हैं इनमें सबसे धृणित स्वार्थपरता ही है । मानो शिष्टता और स्वार्थ- परता में परस्पर विरोध है। रेभरेंड चार्ल्स किस्ली ने कहा है- "यदि ईश्वर से पाये हुए गुण को एक ही साथ नष्ट करना चाहो, यदि तुम अपने ऊपर कष्ट उठाकर दूसरे को दुःखी करना चाहो तो इसके लिए मैं तुम्हें एक.. बहुत ही सुगम मार्ग बता देता हूँ-तुम स्वार्थी हो जाओ । स्वार्थी होने से तुम्हारा अभिलाप पूर्ण होगा। दूसरे प्रकार का दुर्व्यवसाय करने की कोई जरूरत न रहेगी। इसी एक स्वार्थता में सभी दुर्व्यवसाय भरे हैं। तुम अपने मन में एक बार सोच- कर देखो-तुम्हें लोगों का कहाँ तक सम्मान करना चाहिए, और 'तुम्हारे विषय में उन लोगों की क्या धारणा है। इन सब बातों को .. ।
चरित्रगठन ।। जब तुम अच्छी तरह सोचोग तब तुम्हें किसी में लेशभर सुख या सन्ताप न मिलेगा निःस्वार्थपरता के कामों में भी लोग अपने हिताहित की बात सोच लेते हैं। वे यह क्यों नहीं सोचते कि हम लोग दूसरे के लिए जो कर्तव्य समझते हैं वह अपने लिए भी वैसाही समझे। जिन कामों को हम अपने लिए सुखद न समझे उन्हें दूसरों के लिए भी न समझे। इन दोनों प्रकार के कर्तव्यों में एक की अवहेला करने से दूसरे की अवहेला स्वतः होती है। जब तक दूसरे का उपकार अपना ही उपकार मानकर न करोग दूसरे का दुःख अपना दुःख न मानोगे तब तक निःस्वार्थः परता का उच्च पदःप्राप्त न कर सकोगे। हम लोगों को अपने शरीर और मन की रक्षा बड़ी सावधानी से करनी चाहिए । इन दोनों की रक्षा के साथ ही साथ सत्कर्म का साधन हम लोगों का प्रधान कर्तव्य है। महर्पिगण जिन सब कामों के करने का उपदेश देते हैं, शरीर स्वस्थ रहने ही पर उन कामों को कोई कर सकता है। शरीर की अस्वस्थता में ठीक-ठीक नियम का पालन नहीं होता। अतएंव शरीर का स्वास्थ्य ठीक रहना भी आवश्यक है। कैसे ही बड़े विद्वान क्यों न हों; अत्याचार के निवारण की सामर्थ्य नरखकर उपदेश-मूलकः सुन्दर-सुन्दर श्लोकों को वार-बार पढ़ा करें तो उससे सामाजिक कर्तव्य की रक्षा नहीं होगी। यहाँ अत्याचार के निवारण के लिए उपयुक्त शक्ति की आवश्यकता है। दुर्बल मनुष्य प्रायः स्वभाव के रूखे और कठोर-भापी हुआ करते हैं। उनकाः सङ्कीर्ण हृदय अच्छे कामों की ओर. होता। उनका दुर्दम्य मनोवेग उनकी बोली- और कण्ठ-स्वर से -- - . . प्रवृत्त नहीं चौघा परिच्छेद। ८१ तुरन्त व्यक्त हो जाता है। ऐसे स्वभाव के मनुष्य कभी-कभी भद्रता की सीमा पार करके पीछे आप ही लजित होते हैं। अनेक कारणों से मनुष्य को प्रात्मरक्षा की ओर भी विशेष ध्यान रखना चाहिए । औरों का उपकार और अपनी रता इन दो कामों के लिए दैहिक बल की बड़ी आवश्यकता है। जीवन अल्प- कालीन है और यह शरीर अनित्य है इसमें सन्देह नहीं; किन्तु यही सोचकर यदि शरीर की रक्षा न की जाय तो इस शरीर से दुसरं का उपकार कैसे हो सकता है। परोपकार करने, यहुज्ञता, और बहुदर्शिता प्राप्त करने तथा प्रकृति देवी की प्राज्ञा के अनुसार चलने के लिए अपनी रक्षा करना आवश्यक है। यदि जन्म लेकर और सांसारिक व्यापारों को देखकर तुम बहुदर्शिता नहीं प्राप्त कर सके, लोगों का कुछ उपकार न कर सके तो फिर जीवन धारण करने का क्या प्रयोजन ? मनुष्य-जन्म लेने का क्या फल ।। औरामचन्द्रजी ने जब विजय-लाभ किया तब रावण की माँ निकपाको भागते हुए देखकर कहा था-"अरी बूढ़ी, तुमने इतना पुत्र-शोक पाया, अपने पात्र; प्रपौत्रादिकों की मृत्यु देखी तब भी तुम्हें अब तक अपने जीवन का मोह बना ही है ?" यह सुनकर निकपा ने कहा-"महाराज, मैं प्राण के माह से प्रात्मरक्षा नहीं करती, तुम्हारी और भी अमानुपी लीला देखने की लालसा है। जब जीती रहुँगी तब तो देवूगी।" 'शरीर-रक्षा की ही और विशेष मनोयोग दंकर मानसिक उन्नति की ओर ध्यान न देना भी ठीक नहीं । स्वास्थ्य-रक्षा नितान्त पाव- श्यकीय है इसमें तो कोई सन्देह ही नहीं, किन्तु स्वास्थ्य-रक्षा की •'- -- -चरित्रंगठन। .. अपेक्षा भी अधिक प्रयोजनीय है चरित्र-रक्षा । विना मानसिक चल पाये चरित्र की रक्षा हो नहीं सकती, अतएव शारीरिक बल साथ ही साथ मानसिक वल भी प्राप्त करना चाहिए । संसार में आमद-खर्च के हिसाब पर सूक्ष्म दृष्टि रखनेवाले लोग बहुत हैं, पर वास्थ्य-रक्षा पर दृष्टि देनेवाले लोगों की संख्या अल्म है। प्रथम श्रेणी के लोग ( देहाभिमानी ) बड़े ही स्वार्थी होते हैं, वे अपने हानि-लाभ की चिन्ता में ही जीवन व्यतीत करते हैं। उनका हृदय ऐसा सङ्कीर्ण होता है कि वे सामान्य कारण की बातों में भी सुख- दुःख पाये विना नहीं रहते । थोड़े ही में उन्हें आकाश-पाताल का अनुभव होने लगता है । वात-बात में उन्हें विपदस्थ होने का भय बना रहता है। दूसरी श्रेणी के लोग स्वास्थ्य-पूर्वक रहने में सुख और किसी तरह का गड़बड़ होने पर दुःख का अनुभव करने लगते हैं । उनके मन में दिन-रात यही चिन्ता बनी रहती है कि हम नीरोग कैसे होंगे, हमारे शरीर में कान्ति और तेज की वृद्धि कैसे होगी, हमारी जठराग्नि तीत्र कैसे होगी और कैसे हम वलिष्ठ होंगे। ज्यों-ज्यों उनकी उम्र बढ़ती है त्या-त्यों उनके मन की चिन्ता भी चढ़ती जाती है। कोई रोग उन्हें दवा न ले इसका भय उनके जी में हमेशा बना रहता है। इस श्रेणी के लोग औरों के सुख- दुःख पर ध्यान न देकर अपने शरीर को पुष्ट रखना और प्राराम से रहना ही कर्तव्य की इतिश्री समझते हैं। उनकी धारणा है कि ईश्वर ने सांसारिक सुख भोगने ही के लिए उन्हें मनुप्य बनाया है। इसी से दिन-रात वे अपने सुख के लिए हाय हाय करते हैं। ये सब संसार के अनिष्टकारी काम-किङ्कर, स्वार्घजोलुप लोग यह , ।
" चौथा परिच्छंद। नहीं जानते कि मनुष्यता किसे कहते हैं। इन लोगों के कुरुचि-पूर्ण दृष्टान्त से कितने भोले-भाले नर-नारीगण ठग जाते हैं, इसकी संख्या नहीं। संसार में धन और-प्राण दोनों रक्षणीय हैं। यथा- साध्य इनकी रक्षा करना ही चाहिए, किन्तु धन-संग्रह में हो जीवन का समर्पण कर देना अथवा अनित्य शरीर के सुख-साधन में ही बरावर लगे रहना ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल नहीं है। जो क्षणस्थायी है उस पर विशेष ध्यान न देकर जो चिरस्थायी है, जो अविनाशी है उसी पर विशेष ध्यान देना और उसे पाने के लिए संयत्न होकर अपना तन, मन, धन अर्पण करना उचित है। जो लोग स्थायी ऐश्वर्य के लिए क्षणभंगुर शरीर और चञ्चला 'लक्ष्मी का मोह नहीं रखते वे देवत्व प्राप्त करके महाधन कं अधिकारी होते हैं। सञ्चरित्रता ही चिरस्थायी ऐश्वर्य है। चरित्र की उन्नति से सब प्रकार की उन्नति होती है और चरित्र बिगड़ने से सभी वाते विगढ़ जाती हैं। सारी अवनति और अमङ्गल की जड़ दुश्चरित्रता ही है। चरित्र नष्ट होने से सभी गुण नष्ट हो जाते हैं। चरित्र को सुरक्षित रखके ही कोई अपनी स्वास्थ्य-रक्षा और भाध्यात्मिक उन्नति कर सकता है। जिनका चरित्र अच्छा है वे भद्र है, और अभद्र वही है जो सच्चरित्र के विरुद्ध आचरण करते हैं। . --- :
-चरित्रंगठन । अपेक्षा भी अधिक प्रयोजनीय है चरित्र-रक्षा। विना मानसिक बल पाये चरित्र की रक्षा हो नहीं सकती, अतएव शारीरिक बल के साथ ही साथ मानसिक बल भी प्राप्त करना चाहिए । संसार में आमद-खर्च के हिसाब पर सूक्ष्म दृष्टि रखनेवाले लोग बहुत हैं, पर स्वास्थ्य-रक्षा पर दृष्टि देनेवाले लोगों की संख्या अल्प है। प्रथम श्रेणी के लोग ( देहाभिमानी ) बड़े ही स्वार्थी होते हैं, वे अपने हानि-लाभ की चिन्ता में ही जीवन व्यतीत करते हैं। उनका हृदय- ऐसा सङ्कीर्ण होता है कि वे सामान्य कारण की वातों में भी सुख- दुःख पाये विना नहीं रहते । थोड़े ही में उन्हें आकाश-पाताल का अनुभव होने लगता है । वात-बात में उन्हें विपदस्थ होने का भय बना रहता है। दूसरी श्रेणी के लोग स्वास्थ्य-पूर्वक रहने में सुख और किसी तरह का गड़बड़ होने पर दुःख का अनुभव करने लगते हैं। उनके मन में दिन-रात यही चिन्ता बनी रहती है कि हम नीरोग कैसे होंगे, हमारे शरीर में कान्ति और तेज की वृद्धि कैसे होगी, हमारी जठराग्नि तीत्र कैसे होगी और कैसे हम बलिष्ठ होंगे । ज्यों-ज्यों उनकी उम्र बढ़ती है त्या-त्यों उनके मत को चिन्ता भी बढ़ती जाती है । कोई रोग उन्हें दवा न ले इसका भय उनके जी में हमेशा बना रहता है। इस श्रेणी के लोग औरों के सुख- दुःख पर ध्यान न देकर अपने शरीर को पुष्ट रखना और पाराम से रहना ही कर्तव्य, की इतिश्री समझते हैं। उनकी धारणा है कि ईश्वर ने सांसारिक सुख भोगने हो के लिए उन्हें मनुष्य बनाया है। इसी से दिन रात वे अपने सुख के लिए हाय-हाय करते हैं। ये सय संसार के अनिष्टकारी काम-किङ्कर, स्वार्थलोलुप लोग यद्द .
चौथा परिच्छंद। नहीं जानते कि मनुष्यता किसे कहते हैं। इन लोगों के कुरुचि-पूर्ण दृष्टान्त से कितनं भाले-भाले नर-नारीगण ठगे जाते हैं, इसकी संख्या नहीं । संसार में धन और प्राण दोनों रक्षणीय हैं । यथा- साध्य इनकी रक्षा करना ही चाहिए, किन्तु धन-संग्रह में ही जीवन को समर्पण कर देना अथवा अनित्य शरीर के सुख-साधन में ही बरावर लग रहना ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल नहीं है। जो क्षणस्थायी है उस पर विशेष ध्यान न देकर जो चिरस्थायी है, जो अविनाशी है नसी पर विशेष ध्यान देना और उसे पाने के लिए सयत्न होकर अपना तन, मन, धन अर्पण करना उचित है।' जो लोग स्थायी ऐश्वर्य के लिए क्षणभंगुर शरीर और चञ्चला लक्ष्मी का. मोह नहीं रखते वे देवत्व प्राप्त करके महाधन के अधिकारी होते हैं। सच्चरित्रता ही चिरस्थायी ऐश्वर्य है। चरित्र की उन्नति से सब प्रकार की उन्नति होती है और चरित्र विगड़ने से सभी बातें बिगड़ जाती हैं। सारी अवनति और अमङ्गल की जड़ दुश्चरित्रता ही है। चरित्र नष्ट होने से सभी गुण नष्ट हो जाते हैं। चरित्र को सुरक्षित रखके ही कोई अपनी स्वास्थ्य-रक्षा और प्राध्यात्मिक उन्नति कर सकता है । जिनका चरित्र अच्छा है वे भद्र है, और अभद्र वही है जो सच्चरित्र के विरुद्ध आचरण करते हैं। . -- 1 ८४ चरित्रगठन। सत्साहस . श्रीमान् आदिनाथ सेन; ढाकाप्रदेश के भूतपूर्व स्कूल इन्स्पेकर स्वर्गीय रायसाहव दीनानाथ सेन के पुत्र थे। एक दिन:की बात है चे पालकों के साथ क्रिकेट खेल रहे थे।खेलने की जगह के पास ही एक कुआँ धा अकस्मात् एक तीन वर्ष का वालक उस; कुएँ में गिर पड़ा । आदिनाथ बाबू उस लड़के को पानी में डूबते हुए देखकर अपने प्राण का मोह न करके उसके उद्धारार्थ: कुएँ में कूद पड़े । अन्यान्य वालकों ने झटपट कुएँ में एक रस्सी गिराई । 'आदिनाथ ने एक हाथ से लड़के को पकड़ा और दूसरे हाथ से डोरी पकड़ी। लड़के रस्सी खींचकर उन्हें बाहर निकालने लगे। उनके कुछ दूर पानी से ऊपर आने पर रस्सी : टूट गई और वे लड़के को लिये ही फिर कुएं में गिर पड़े। वे तैरना जानते थे। लड़के को एक हाथ से ऊपर उठाकर दूसरे हाथ से पानी पर तैरने लगे। लड़कों ने झटपट एक और मोटी रस्सी लाकर कुएँ में लटकाई। उस रस्सी के सहारे प्रादिनाथ बाबू उस लड़के को "लिये कुएँ के बाहर निकल पाये। श्रीमान् प्रादिनाथ बाबू ने जलमग्न बालक को बचाने के लिए 'अपने जीवन की परवा न की। यह अच्छा दृष्टान्त सभी को अनुकरण करने योग्य है । हम आशा करते हैं, युवक-गण आदिनाथ बाबू के इस उपयुक्त साहस को न भूलेंगे और किसी को विपदस्थ होते देख यथासाध्य उसे उस विपद से उद्धार करने की चेष्टा करेंगे। (सब्जीवनी) 1 चौघा परिच्छेद । इस तरह की भी कितनी ही बातें सुनी और देखी गई हैं। किसी के मकान में आग लगी है। हवा खूब तेज़ी से बह रही है।.बात की बात में प्राग ने चारों ओर से मकान को घेर लिया है। ऐसे प्राण-संकट की जगह भी कितने ही दयावान लोगों ने साहस-पूर्वक मकान के अन्दर घुसकर मृत्यु के मुँह में पड़े हुए खो-पुरुषों के प्राण बचाये हैं । यही सब सत्साहस के उदाहरण है। असत् साहस करनेवाले लोगों की कमी नहीं, किन्तु इस प्रकार सरसाहस करनेवाले लोग विरले हो हैं। प्रयल धर्म और नैतिक चल के द्वारा ही मनुष्यों के हृदय में ऐसे अच्छे साहस के काम करने की प्रेरणा होती है। जो लोग सैकड़ों विन्न-बाधाओं को पार कर, खलि. देकर, लोकलज्जा आदि कुसंस्कारों का कुछ भय न करके न्याय और सत्य के रक्षार्थ सर्वदा मुस्तैद रहते हैं उन लोगों को बहुत कुछ सत्साहस करना पड़ता है। स्वार्थ को जला- परोपकार बिना प्रेम के उदय से कोई सरचे परोपकार की वृत्तिः धारण नहीं कर सकता। किसी का निरपेक्ष होकर उपकार करना ही सञ्चो उदारता है। यह सोचकर किसी का उपकार करना कि मैं उपकार करता हूँ तो वह भी मेरा उपकार करेगा, स्वार्थ से खाली नहीं कहा जा सकता । ऐसे उपकार को वणिकवृत्ति कहना अनु- चित न होगा । सत्कर्म करने से जो हृदय में एक प्रकार का प्रलो- चरित्रगठन। - किक प्रानन्द उत्पन्न होता है. उस, प्रानन्द का उपभोग ऐसे मत- लवी उपकारी लोग नहीं कर सकते.1: अनुराग पर ही यह सारा संसार ठहरा है। यह अनुराग सन्तानों पर गुरुजनों के ऊपर, बन्धु-बान्धवों के साथ और ईश्वर के प्रति स्नेह, श्रद्धा, प्रणय, प्रेमभक्ति इत्यादि के भिन्न-भिन्न नाम से व्यवहृत है। अनुराग का जब अभाव होता है तभी.मन. में मलिनता, ईर्ष्या, द्वेष, दुःख और आर्तनाद आदि. अनभिलपित दोप.आ-प्राकर एकत्र होते हैं । मनुष्यों के हृदय में अनुराग ही जीवन का सुख और भाव प्रकट करता है । दूसरे को अपने बराबर समझने से और शत्रु को मित्र करके मानने से लोग वन के पशु, पक्षी और हिंस्र . जन्तुओं को भी मित्र बना सकते हैं 1 काट से भरे हुए संसार को सुख का स्वर्ग बनाने के लिए एकमात्र अनुराग.चाहिए। जो अनुराग पाकर भी उसका उचित उपयोग करना नहीं जानते उन्हें अनुराग का वास्तविक सुख नहीं मिलताः। प्रफुल्लता का वह मनुष्य नहीं देवता है जो, नित परहित:निरत, रहि, करै सभी सों प्रेम । गिनै न निज सुख दुःख का, यहै जासु व्रत नेम ॥ १ ॥ जो चित में .सोचत रहत, पर उपकृति की बात । '. भेद-बुद्धि तजि · भूलि. 'हू, करत न पर-अभिघात,।। २.१.. 'दया राखि सब जीव पै, करि सबको उपकार.। .:: मधुर : वचन भापत सदा, तापत करि सत्कार ॥ ३ ॥ . - , चौथा परिच्छेद । ७ , विनय दया अरु प्रेम से, जासु हृदय भरपूर ।। नहिं मनुष्य वह. देवता, गहहु तासु पद-धूर-॥ ४ ॥ , नैतिक बल और बड़प्पन सत्साहस के साथ नैतिक बल का इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है कि इन दोनों को कोई अलग-अलग नहीं कर सकता । जहाँ नैतिक बल है वहीं सत्साहस है। अतएव सत्साहस को नैतिक बल के अन्तर्गत मानना होगा । नैतिक वल भद्रता का चिह्न है । कोई अच्छे कुल में ही क्यों न उत्पन्न हो, यदि वह नैतिक बल से विहीन है तो समाज में वह अभद्र गिना जाकर निन्दास्पद समझा जाता है। हम लोग अपने जीवन में एक भी सत्साहस का सुयोग न पाने पर भी नित्य के अनुष्ठित छोटे-छोटे कामों में ही नैतिक वल को चरितार्थ करने लगते हैं। उन्हीं के अनुरूप हम लोगों के चरित्रगत जीवन गठित होते हैं। किन्तु सच्चे नैतिक वल का जिनक पास अभाव है वे सभ्य समाज में अनादरणीय समझे जाते हैं। कोई सुन्दर शरीर, चटकीली पोशाफ, उच्च वंश, और प्रचुर धन आदि अनेक गुणों से भी नैतिक बल का मुकाबला नहीं कर . 'सकता। - धर्म और नैतिक बल के अनेकानेक दृष्टान्त हमारे पौराणिक इतिहास में वर्णित हैं। उन सबों को केवल पुराण की कहानी-मान करके ही न समझो। अाजकल के लिए तो वे सब दृष्टान्त असम्भव हो रहे हैं. किन्तु हमारे देश में अब भी इस गुण का ७ चरित्रगठन। एकदम अभाव नहीं हो गया है । अव भी कितने ही महान पुरुष, सत्य, न्याय.और कर्तव्य का पालन कर उन पौराणिक दृष्टान्तों को प्रमाणित कर रहे हैं और तुम.लोगों की आँखों के सामने आदर्श- स्वरूप अपने चरित्र को छोड़े जा रहे हैं। तुम लोगों को उस वीरसिंह नामक गाँव के पुरुषसिंह की वात याद होगी। नैतिक बल के लिए वे तुम लोगों के अवश्य प्रादर्शस्थल हैं । नैतिक शक्ति की बदौलत ही वे मनुष्यता के उच्चतम आसन के अधिकारी हुए थे। आजकल जो विद्यासागर महाशय के पवित्र नाम का स्मरण और उनकी प्रतिमूर्ति की पूजा सामाजिक लोग हृदय से कर रहे हैं इसका कारण वही असाधारण नैतिक बल जानना चाहिए । तुम लोगों को इस पुस्तक में विद्यासागर महाशय-प्रभृति अनेक महात्माओं के चरित का उल्लेख जगह-जगह देखने में आवेगा। सर्वजन-मान्य महामहिम देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने जब अपने पिता के प्रतिष्ठित "कारठाकुरकम्पनी" नामक सुप्रसिद्ध महाजनी कोठी का आधिपत्य प्राप्त किया, तब उनकी देख-भाल से कोठी का कारवार ठीक-ठीक चलने लगा। कुछ दिन के लिए वे कोठी छोड़कर अन्यत्र गये। उनके पीछे कर्मचारियों की सावधानी और सुस्ती से कोठीका काम गड़बड़ा गया। ग्रामद.कम और ऋण बढ़ने लगा। कोठी का काम यहाँ तक बिगड़ गया कि पानेवाले लोगों के हुण्डी के रुपये भी यथासमय देना कठिन हो उठा। इससे कोठी की मर्यादा जाती रही और व्यापार भी ढीला पड़ गया। प्राखिर हिसाब करने से जाना गया कि कोठी लगभग करोड़ रुपये की देनदार हो गई है। पानेवाले महाजन यह खबर पाकर सोच करने लगे। कितने ही तो ।
चौथा परिच्छेद । हताश हो पड़े। देवेन्द्रनाथ ठाकुर उस समय युवा थे। उन्होंने अपनी अवस्था, पानेवालों की अवस्था और वाणिज्य-व्यवसाय के मान-महत्व की सभी बातों पर दृष्टि दी । यह करोड़ रुपया ऋण उनके पिता का किया था, यह भी उन्होंने जाना । वे पिता के उत्तराधिकारी सूत्र में बद्ध हो चुके थे। ऋण चुकाते हैं तो उनको सारी सम्पत्ति उनके हाथ से चली जाती है और वे दरिद्र की मण्डली में गिने जाते हैं। एक तरफ़ उनके ऐश्वर्य के मध्याह्न समय में सर्वस्व लुप्त होने की सम्भावना और दूसरी तरफ़ अपने धन को दवा रखने से कितने ही निरपराध महाजनों के सर्वनाश होने का भय । उनके सलाह देनेवाले लोग वैसेही घे जो स्वार्थ- माधन को ही मुख्य बतला रहे थे। किन्तु न्यायशील और कर्तव्य- निष्ट देवेन्द्र बाबू ने सबके सामने संकल्प किया कि कोठी के स्वत्त्व के साथ मैं अपना सर्वस्व देकर भी पितृ-मृण का परिशोध करूँगा।" उनके जीवन की इस तरह की अनेक घटनाओं में यह भी एक है। सांसारिक लोग किसी प्रकार का प्रलोभन देकर उन्हें पथच्युत नहीं कर सके, स्वार्थ की महिमा गाकर उनके मन को विचलित नहीं कर सके। जिन कामों को उन्होंने श्रेष्ठ समझा, उनके अनुष्ठान में आपने कभी पैर पीछे न किया । धनवान् के घर जन्म लेकर, बड़े लाड़-प्यार से सुख-पूर्वक पाले जाकर और स्वयं अतुल ऐश्वर्य का अधिकार पाकर भी जिन्होंने संसार के आपातरमणीय सैकड़ों सुख-प्रलोभन को तुच्छ गिनकर जीवन के अन्तिम समय तक अपने पविन चरित्र की रक्षा की; कहो उनका नैतिक बल कैसा प्रसाधारण था?
वे . . चरित्रगठन | . दूसरे का जो कुछ बाकी है और यथार्थ है, उसे दे डालने में अपनी हानि होते देखकर भी जो दे देना. ही उचित समझते हैं। जो किसी प्रकार का अनुचित काम.करके परीक्षा के समय अशुभ परिणाम का भय न करके अपना अपराध स्वीकार करते हैं; बालक हो चाहे वृद्ध हों, नैतिक बल और अच्छे, पाचरण से जन-समाज में अवश्य उच्चासन के अधिकारी होते हैं। जो व्यक्ति नैतिक बल से बलवान हैं वे लोकनिन्दा, लोकलज्जा, उपहास प्रादि कुसंस्कार के बन्धन को तोड़कर संकोच रहित हो प्रकाश्यरूप से लोकोपकारी सत्कर्म का अनुष्ठान करते है। कभी-कभी ऐसी घट- नाएँ हो जाया करती हैं । जब कितने ही व्यक्ति अपना नैतिक बल प्रकाश करने में संकुचित हो पड़ते हैं और अपनी मर्यादा की हानि होने के भय से वृथा डरने लगते हैं तब कोई महान् पुरुप अपने असाधारण नैतिक बल से उन व्यक्तियों के भय को दूर कर देता है । जगद्विख्यात महाधनी दानवीर एन्ड्र कार्नेगी के बड़प्पन की बात किससे छिपी है ? कार्नेगी की अतुल सम्पत्ति की एक मात्र उत्तराधिकारिणी थी उसकी भतीजी न्यान्सी। न्यान्सी ने अपने चचा के गाड़ीवान हिबार के प्रेम में आसक्त होकर उसे पति बनाना चाहा । संसार के सर्वसाधारण लोग न्यान्सी के इस प्रयुक्त विवाह से क्या कहेंगे ? किन्तु,कार्नेगी को यह सुनकर कुछ क्रोध या खेद न हुआ । उसने प्रकाश्यरूप में कहा-"मेरा भूतपूर्व गाड़ी होकनेवाला हिवार प्रत्यन्त सच्चरित और सुशील युवक है। इस कारण मेरी भतीजी न्यान्सी यदि उसके साथ व्याह करेगी तो हम लोगों को इसमें', चौघा परिच्छेद । . , कोई असन्तोप न होगा। बल्कि न्यान्सी किसी गुणहीन ध्यू फ से विवाह न कर ऐसे गुणवान युवक को पति बनाना चाहती है, यह • हम लोगों के लिए दर्प का विषय है।" उच्चवंशोद्भव धन-कुवेर कार्नेगी का यह नैतिक वल कुछ साधारण नहीं है। महात्मा कृष्णदास पाल का नाम बहुतों ने सुना होगा। ये सच्चे स्वदेश-हितैपी, उदार, साधु-प्रकृति के मनुष्य थे । साधारण अवस्था से इतनी बड़ी उन्नति करते और दरिद्र के सन्तान को इस प्रकार देशमान्य होते देख किसे अचम्भा न होगा ? उनके सदृश भद्र पुरुप बहुत ही कम दिखाई देते हैं। ये महात्मा अपनी जाति के समाज में, अँगरेज़ों के समाज में, बड़े लाट साहब की कौंसिल में और अपने बन्धुवों की सभा में, सभी जगह सम भाव से सम्मानित । और पूजित थे । अब भी इस बात की चर्चा लोगों में चलती है। एक दिन एक ऊँचे दर्जे का कर्मचारी अँगरेज़ ( सरकारी नौकर) कृष्णदासजी से मिलने उनके घर पर पाया । इस समय कृष्णदास अन्दर हवेली में थे। उनके वृद्ध पिता मामूली कपड़े पहने घर के थाहर बैठे थे। यह सरकारी नौकर घोड़े पर चढ़के प्राया था। घर के सामने सामान्य कपड़े पहने युद्ध को देखकर उसने उन्हें घर का कोई एक भृत्य समझकर घोड़े की लगाम पकड़ने को कहा । वृद्ध उसकी बात पर कर्णपात न करके कृष्णदास को ऊँचे स्वर से पुकारने लगे। महात्मा कृष्णदास ने पिता के अप- मान की बात जानकर झट-पट दबे पाँव बाहर आकर उस अंग- रेज़ से समझाकर कहा-"महाशय, ये हमारे पिता हैं ।" यह सुनकर वह राजकर्मचारी अँगरेज़ अत्यन्त अप्रतिम. होकर कृष्ण- 'चरित्रंगठन । दास और उनके पिता के निकट बार-बार क्षमा के लिए प्रार्थना करने लगा और बोला--"कृष्णदास बाबू, पाप नैतिक बल और उदारता के कारण यथार्थ में ही पूज्य - सम्मान-रक्षा अपने से उच्चपदस्थ व्यक्तियों का सम्मान करना तो शिष्टाचारी भद्र मनुष्यों का कर्तव्य है ही; किन्तु अपने से न्यून-पदस्थित या अधीन व्यक्तियों के उपयुक्त मान का पालन करना भी विशेष सौजन्य का चिह्न है। जो सच्चे शिष्टाचारी हैं वे सबकाः उचित सम्मान करते हैं। अभद्रता का काम करके वे कभी किसी का जी नहीं दुखाते। कितने ही लोग अपने अधीन व्यक्तियों से यथोचित सम्मान न पाने पर अपने को अपमानित समझते हैं। किन्तु जिन लोगों से वे ऐसे व्यवहार फी आशा करते हैं, वे लोग भी अच्छे कुल-शील के हैं और अपना उचित आदर चाहते हैं, इस पर वे ध्यान नहीं देते। इससे प्रकट हुआ कि जो अपने अधीन लोगों से सम्मान पाना आवश्यक समझते हैं उन्हें उनकी सम्मान- रक्षा के ऊपर भी ध्यान रखना चाहिए। ऐसे लोग भी बहुत हैं जो समाज में अपने को भद्र कहकर परिचय देते हैं और अपने कुल-शील, मान-महत्व बहुत बड़ा मानते हैं और दूसरे पर प्रकट करने की चेष्टा करते हैं। अपनं सम्मान पाने का अनेक प्रयत्न करने पर भी जब उनका कोई सम्मान नहीं करता तब वे सर्वसाधारण के निकट हास्यास्पद होतं , चौथा परिच्छेद। - हैं । सय लोग उनकी इसी उड़ाया करते हैं । जो लोग दूसरे को छोटा समझकर भाप उच्चतम होना चाहते हैं और दूसरे का अपमान करके अपनी मान-रक्षा का अभिलाप रखते हैं वे इस मनुष्य-प्रकृति के सम्बन्ध में नितान्त अनभिज्ञ हैं। उच्च श्रेणी की शिक्षा का प्रभाव, दूसरे के अभ्युदय की असहिष्णुता, हिंसा और द्वेप आदि नीच प्रकृति की प्रवृत्ति हो इस अनभिज्ञता का कारण कही जा सकती है। ऐसे क्रूर लोग सच्चे माननीय लोगों का भी सम्मान नहीं करते, साधारण लोगों की तो कुछ वात ही नहीं । इन बातों से चे नीच प्रकृति के मनुष्य प्राप ही अपनी छुटाई को प्रमाणित करते हैं। मान्य व्यक्ति को सम्मानित करने से जो अपना महत्त्व बढ़ता है, यह बात उनके ध्यान में नहीं पाती । उनके अधीन लोग विशेष विद्या, बुद्धि और धन न पाकर भी भद्र सन्तान हैं, इस बात को वे भूल करके भी नहीं सोचते । तुम लोग यदि अपने को मान्य बनाना चाहो तो मान्य व्यक्ति की सम्मान-रक्षा करने में कभी आलस्य न करो । इस विषय में कलकत्ता हाईकोर्ट के भूतपूर्व जज स्वनाम-ख्यात श्रीमान् द्वारकानाथ मित्र महाशय हम लोगों के आदर्श-स्वरूप हो गये हैं। वे अपने जीवन में कभी किसी मान्य व्यक्ति का सम्मान करना नहीं भूले । वे अपने अधीन लोगों को तथा साधारण से साधारण व्यक्तियों को मधुरभाषण के द्वारा सर्वदा प्रसन्न रखते थे - और निश्छल व्यवहार से सवको प्राप्यायित किये रहते थे। इन बातों में वे अपनी अप्रतिष्ठा न समझकर बड़प्पन समझते थे । किसी उत्सव के समय साधारण अवस्था के भद्र पुरुषों के सम्मान ।
६४ चरित्रगठन । . में किसी प्रकार की त्रुटि न हो इसलिए वे स्वयं उन लोगों की अभ्यर्थना करते थे और उच्चपदस्थ सम्भ्रान्त व्यक्तियों के सत्कार का भार वन्धु-बान्धवगणों को देते थे। उनका यह अन्य-दुर्लभ सौजन्य ही उन्हें सवका प्यारा बना रहा था। वे जो छोटे-बड़े भद्र-अभद्र सभी के साथ निष्कपट व्यवहार करते थे और सबका . यथायोग्य सम्मान करते थे, इसमें उन्हीं का महत्व और गौरव बढ़ता था। भले-बुरे व्यवहारों के कारण से ही समाज दो भागों में विभक्त हुआ है-सभ्य और असभ्य । जो नीच प्रकृति के मनुष्य हैं वे अविनयी, दुष्ट, कठोरभाषी, दुराचारी और हृदय के सङ्कीर्य होते हैं । इसी से वे लोग असभ्य समाज में परिगणित होकर सभ्य-समाज से सर्वदा अलग रहते हैं। किन्तु अच्छे आचरण से नीच जाति के लोग भी असभ्य-समाज में आदरणीय समझे जाते हैं और व्यवहार के दोपों से उच्च जाति और उच्च वंश के लोग समाज में निन्द्य गिने जाते हैं । इससे समझना चाहिए कि व्यवहार ही मनुष्यों को बड़ा या छोटा बनाता है । तुम लोग जब वयःप्राप्त होगे, जब तुम लोगों में कितने ही अग्रगण्य, मान्य और धनाढ्य बनोगे, तब तुम्हें बड़े लोगों से भेट करने तथा शिक्षित समाज में आने जाने का काम पड़ेगा। यदि अभी से तुम अपने स्वभाव और चरित्र को उत्तम बनाने की चेष्टा न करोगे तो तुम्हें समझना चाहिए कि तुम अनेक विषयों में प्रशिक्षित ही रहे। इसके लिए किसी दिन तुम ज़रूर पश्चात्ताप करोगे। जव समाज तुम्हें अभद्र कहकर तुम्हारी उपेक्षा करेगा तब भी तुम्हारे मन में . क पांचवा परिच्छेद । अपि च मानसमम्बुनिधिर्यशो- विमल शारदपार्वणचन्द्रिका ॥ ५॥ । जो सज्जन हैं वे सदा मीठी बातों से दूसरों का उपकार करते हैं। उनका हृदयरूपी समुद्र सर्वदा सुयशरूपी पूर्णचन्द्र स्पर्श करने के हेतु बढ़ता ही रहता है ॥१॥ ऐश्वर्यस्य विभूपणं सुजनता शार्यस्य वाक्संयमः ज्ञानस्योपशम:कुलस्य विनया वित्तस्य पात्रे व्ययः । अक्रोधस्तपसः क्षमा वलवतां धर्मस्य निर्व्याजता सर्वेषामपि सर्वकारणमिदं शीलं परं भूपणम् ।। ६ ।। ऐश्वर्य का भूपण सुजनता है। शूरता का कोमलालाप, ज्ञान का शान्ति, कुलीनता का विनय, धन का सत्पात्र में दान, तपस्या का निष्क्रोध, बलवानों का क्षमा और धर्म का भूपण निश्छलता है ; किन्तु शील सबके लिए सब भूपणों का भूपण है अर्थात शील से बढ़कर दूसरा भूपण नहीं ॥६॥ मधुर-भाषण मीठी बातों में न मालूम कैसी मोहनी शक्ति है, जिससे लोग असाध्य कामों को भी साध्य कर सकते हैं। अच्छी चीज़ों की ओर प्रापसे आप मनुष्य-मात्र का हृदय आकृष्ट होता. है और जो बुरी चीज़ है उस पर स्वभावतः मनुष्यों को घृणा उत्पन्न होती है। मधुर वचन में अवश्य ही ऐसी कोई विलक्षण माधुर्य-शक्ति है जो लोगों के चित्त को हर लेती है। मधुर वचन से निर्दय के हृदय में पाँचवाँ परिच्छेद कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् । को विदेशः स विद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ।। १ ।। काकः कृष्ण : पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः । प्राप्ते वसन्तसमये काकः काकः पिकः पिकः ॥२॥ तास्तु वाचः सभायोग्या याश्चित्ताकर्षणक्षमाः । स्वेषां परेषां विदुषां द्विषामविदुषामपि ।। ३ ।। भावार्थ-समर्थ पुरुषों के लिए कुछ भार नहीं, व्यवसायियों के लिए कोई दूर देश नहीं, विद्वानों के लिए कोई विदेश नहीं, प्रियभापियों को कोई पराया नहीं ॥१॥२॥३॥ वाङमाधुर्यान्नान्यदस्ति प्रियवं वाक्पारुष्यायोपकारोऽपि नष्टः । किं तद् द्रव्यं कोकिलेनोपनीतं को वा लोके गर्दभस्यापराधः ॥४॥ मधुर वचन से बढ़कर संसार में कुछ प्रिय नहीं है। कटु भापय से कोई उपकार भी करे तो यह निय नहीं होता ॥४॥ अविरत परकार्यकृतां सतां मधुरमातिशयन वचोऽमृतम् ।
पाँचवा परिच्छेद । 'जिन्होंने यह प्रतिज्ञा कर ली है कि "हम सबसे मीठी बात लेंगे। वे छिप-छिपे अपने प्रेम, स्नेह और दयावृत्ति का परि- बालन करते हैं। सब कोई परीक्षा करके जान सकते हैं कि हम ोगों को जहाँ तक मधुर-भापण करना चाहिए, नहीं करते हैं। ह बड़े ही खेद का विषय है। (वामा-बोधिनी पत्रिका) विनय वङ्गदेश के एक प्रसिद्ध प्रतिष्ठित दार्शनिक विद्वान् ने लिखा है कि "अभिमानी लोगों का मुंह देखने में बड़ा ही भयङ्कर मालूम होता है । अहङ्कार शत्रुता उत्पन्न करता है, ईर्ष्या को बढ़ाता है और संसार के अच्छे रास्तों को कण्टकाकीर्ण करता है। किन्तु विनय शत्रु को मित्र बनाता है, ईर्ष्या-सर्पिणी के विपैले दाँतों को तोड़ता है और संसार के कठिन से कठिन मार्गों को भी पुष्प-शय्या की तरह कोमल बना डालता है। विनय कितने महत्व की वस्तु है- यह अल्पबुद्धि लोग नहीं समझते । उन्होंने जहाँ घोड़ी विद्या-बुद्धि की बातें सीखी तहाँ मारे अहङ्कार के फूल उठे। अहङ्कार का ठीक उलटा विनय है। अहङ्कार दोप है और गुण है। मनुष्यमात्र गुण के पक्षपाती होते हैं, इसलिए वे अहङ्कार नहीं देख सकते और विनय देखकर हृदय से प्रसन्न होते हैं। बिनय अपने गुण से जैसे शत्रु को मित्र बना सकता है वैसेही - विनय , .
चरित्रगठन। दया का सञ्चार हो पाता है । कठोर स्वभाव के मनुष्यों का मन कोमल हो जाता है । यहाँ तक कि घोर शत्रु भी मित्रता का.व्यव- हार करने लगता है । मधुर स्वर की तरङ्ग क्या नहीं कर सकती ? काल के समान महा विषधर साँप भी सङ्गीत से मोहित होकर डसना भूल जाता है। जङ्गल के पशु-पक्षी वश में हो जाते हैं। मनुष्य तो अपने को भूल ही जाता है। मधुर-भाषण की महिमा सङ्गीत से कुछ कम नहीं है। मधुर शब्द कर्णकुहर में प्रवेश होते हो लोगों का ह्रदय द्रवित हो उठता है। यह अमृतवाणी यदि विनय के साथ मिल जाय तो मानों सोने के साथ सुगन्ध मिल गया। हम लोगों को मधुर-भापण के प्रभाव से बहुत हानि सहनी पड़ती है। यह जानकर भी हम लोग मधुर-सम्भापण करना नहीं सीखते । मीठी वात बोलने के लिए कुछ खर्च नहीं करना पड़ता, वल्कि बहुत धन खर्च करके भी लोग जो काम सिद्ध नहीं कर सकते वह दस-पाँच मीठी वातों में सिद्ध हो जाता है। जो लोग मधुर वचन बोलते हैं और जो उसे सुनते हैं, दोनों ही के हृदय में शान्ति-सुख प्राप्त होता है; मन में पवित्र भाव का उदय होता है; आत्मा तृप्त होता है। मधुर- भापी लोग सबके प्यारे होते हैं। जहाँ मीठी बातें बोली जाती हैं वहाँ की हवा मधुमय हो जाती है। एक मधुरभापी व्यक्ति सैकड़ों के सुख का कारण होता है। मधुर वचन के सुननेवालों को दुःख, शोक, शोच, और विपाद की बातें भूल जाती हैं। जिनके हृदय में प्रेम और दया नहीं है उनके मुँह से प्रायः मधुर वचन नहीं निक- लता । प्रेम और दया ही मधुरं वाक्यों का उत्पत्तिस्थान है। जो लोग प्रेमिक और दयालु हैं वे बहुधा मिष्टभापो ही होते हैं। . ।
पाँचौं परिच्छेद। १०१ जानते कि भय से इस प्रकार वशीभूत होकर प्रसन्न-मन से कोई अपनी दीनता प्रकट नहीं कर सकता । जो शिक्षक जितने ही अधिक बिनयों होते हैं उनके शिष्यगण उनके प्रति उतनी ही अधिक भक्ति और विनय का व्यवहार दिखलाते हैं। महात्मा लोग अपने विनय, प्रेम और सदय व्यवहार से सबके हृदय को मोहित कर अपनी ओर आकृप्ट कर लेते हैं और शिष्यगणों की भक्ति-कुसुमाञ्जलि से नित्य पृजित होते हैं । महात्मा भूदेव मुखोपाध्याय ने अपनी पुस्तक में कहीं लिखा है-“यलवान् पुरुषों के निकट जो दुर्बल व्यक्ति अधीनता या नम्रता दिखलाता है उसे भक्ति नहीं कह सकते । किसी की श्रेष्ठता पर जो. स्वतः सद्भाव उत्पन्न होता है उसीका नाम भक्ति है।" 'महान पुरुषों के पवित्र चरित्र ही इस भक्ति के उत्पादक हैं । साधुगण अपने चरित्र की निर्मलता और विनय प्रेम-सहित मधुर भाषण से बड़े-बड़े प्रबल प्रतापी राजाधिराजों को अपने पैरों के समीपं प्राकर्पित कर उनके धनगर्वित हृदय में दैन्य और विनय के बीज बोते हैं। केवल कौपीन पहन, सारे शरीर में भस्म लेप कर साधु-वेप धारण करने हो से कोई साधु नहीं फहला सकता । आजकल कितने ही असाधु साधु का वेश धारण करके समाज का बहुत ही प्रनिप्ट कर रहे हैं। यही वेषधारी वञ्चक भक्त अविनय, क्रोध और अशिष्टता के अवतार हैं । हृदय स्थित काम-क्रोधादि शत्रुओं को विना दबाये कोई साधु नहीं हो सकता। किन्तु इन कपटाचारी साधुओं के अन्तःकरण में वे सब शत्रु सर्वदा प्रबल बने रहते हैं। तुम लोग भूलकर भी ऐसे कपट-वेपधारी मनुष्य का कभी अनुकरण न करो। . । ।
१०० चरित्रगठन । " अहङ्कार भी मित्र को शत्रु बनाता है और शत्रुओं की संख्या बढ़ाता है। सौजन्य, विनय और मधुर भापण परस्पर जैसे मिले जुले हैं. वैसेही अशिष्टता, कठोर भाषण और अहङ्कार भी 'परस्पर सहानु- भूति रखते हैं। विनयी किसी काम में सफलता प्राप्त करता है और. अविनयी निष्फलता । जो लोग उद्दण्ड हैं, उद्धत हैं उनका एक भी उद्देश सफल नहीं होता। इन सब बातों की सचाई के लिए कोई प्रमाण ढूँढ़ना न पड़ेगा। विनय और अविनय के फलाफल.की, घटना प्रतिदिन हुमा करती है । उसी से लोग पूर्वकथित वातों की सत्यता को प्रमाणित कर सकते हैं। यदि तुम्हारे मन में सन्देह हो तो तुम स्वयं परीक्षा कर देखो। विनयी लोगों की अधीनता आपसे आप लोग स्वीकार करते हैं; किन्तु अहङ्कारी से रुष्ट होकर कोसों दूर भागते हैं। यदि तुम लोग सीधे उपाय से अपना सुयश संसार में फैलाना चाहो तो विनयी, मिष्टभापी और निरभिमानी घनो । जो लोग सच्चे साधु महात्मा हैं वे साधारण लोगों की अपेक्षा अधिक विनयी होते हैं। किन्तु बहुतों का विश्वास है कि साधु- संन्यासी लोग क्रोध के अवतार होते हैं। विनय किसको कहते हैं यह तो वे जानते भी नहीं। साधारण लोगों की तो कोई बात ही नहीं, बड़े-बड़े सेठ, साहूकार, राजा, महाराजों को भी वे तुच्छ दृष्टि से देखते हैं। इसी प्रकार गुरुभक्त शिष्यों की गरीबी से भरे हुए व्यवहार और सङ्कोच देखकर कितने ही लोग यह समझते हैं कि "गुरु देव के क्रोध की आशङ्का से डरकर वे अपनी इतनी दीनता दिखलाते हैं।" जो लोग ऐसा खयाल करते हैं उनमें अधिकांश लोग प्रायः अविनीत होते हैं। वे यह नहीं पाँचवाँ परिच्छेद। १०१ जानते कि भय से इस प्रकार वशीभूत होकर प्रसन्न-मन से कोई अंपनी दीनता प्रकट नहीं कर सकता। जो शिक्षक जितने ही अधिक विनयी होते हैं उनके शिष्यगण उनके प्रति उतनी ही अधिक भक्ति और विनय का व्यवहार दिखलाते हैं । महात्मा लोग अपने विनय, प्रेम और सदय व्यवहार से सबके हृदय को मोहित कर अपनी और आकृष्ट कर लेते हैं और शिष्यगणों की भक्ति-कुसुमाञ्जलि से निय पृजित होते हैं। महात्मा भूदेव मुखोपाध्याय ने अपनी पुस्तक में कहीं 'लिखा है-"बलवान पुरुषों के निकट जो दुर्बल व्यक्ति अधीनता या नम्रता दिखलाता है उसे भक्ति नहीं कह सकते । किसी की श्रेष्ठता पर जो स्वतः सद्भाव उत्पन्न होता है उसीका नाम भक्ति है।" महान पुरुषों के पवित्र चरित्र ही इस भक्ति के उत्पादक हैं। साधुगण अपने चरित्र की निर्मलता और विनय प्रेम-सहित' मधुर भाषण से बड़े-बड़े प्रवल प्रतापी राजाधिराजों को अपने पैरों के समीप प्राकर्पित कर उनके धनगर्वित हृदय में दैन्य और विनय के बीज बोते हैं। केवल कौपीन पहन, सारे शरीर में भस्म लेप कर साधु-वेप धारण फरने ही से कोई साधु नहीं कहला सकता । आजकल कितने ही असाधु साधु का वेश धारण करके समाज का बहुत ही प्रनिप्ट कर रहे हैं। यही वेषधारी वञ्चक भक्त प्रविनय, क्रोध और अशिष्टता के अवतार हैं. । हृदय-स्थित काम-क्रोधादि शत्रुओं को विना दबाये कोई साधु नहीं हो सकता। किन्तु इन फपदाचारी साधुओं के अन्त:करण में वे सब शत्रु सर्वदा प्रबल बने रहते हैं। तुम लोग भूलकर भी ऐसे कपट-वेषधारी मनुष्य का कभी अनुकरण न करो। .. .
१ -चरित्रगठन । " . विनय का अवतार . . नभोभूपा पृपा कमलवनभूपा मधुकरी- वचोभूपा सत्यं वरविभवभूषा वितरणम्-: मनोभूपा मैत्री विमलकुलभूषा सुचरितम् , सदोभूपा.सूक्तिः सकलगुणभूषा च विनयः ।। जो लोग धन, जन, बन्धु, वान्धवगणों से घिरे हुए हैं, सम्पत्ति की सुख-गोद में पले हैं, जिनका इशारा पाने पर सैकड़ों आदमी एक साथ आज्ञापालन करने के हेतु खड़े हो जाते हैं, जिनकी इच्छा से अत्यन्त दुर्लभ सामग्री भी हँसी-खेल की तरह बात की बात में इकट्ठी होती है, मुण्ड के झुण्ड नर-नारी-गण जिनकी दया से प्रति- पालित हो रहे हैं ऐसे अतुल सम्पत्ति के अधिकारी को विनय-वश होकर किसी के निकट सिर नवाते हुए क्या तुमने कभी देखा है ? कैसे देखोगे ? संसार में ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। • किन्तु इस श्रेणी के लोगों में, जिन्होंने समान बलवाले शत्रु के निकट विनयावनत होकर भयङ्कर वैरी को भी परम मित्र बना लिया, कहो, उनकी यह अहङ्कार-शून्यता और दीनता कितनी बड़ी थी ? उनका यह उदार. चरित्र कैसा अलौकिक प्रानन्द देनेवाला है ? ऐसे महान पुरुष ने. तुम्हारी ही इस जन्मभूमि में जन्म ग्रहण किया था। वङ्ग देश में ऐसे लोग बहुत कम होंगे जो उनके नाम से परिचित न हों। उन प्रातःस्मरणीय विनयावतार महात्मा का नाम, था लालावायू। इनके आश्चर्य-वैराग्य, असाधारण विनय, दीनता और असीम दानशीलता की ख्याति दूर दूर तक चारों ओर फैली - गये। लालावायू वास्तव में ही विनय के अवतार घे। यह नीचे की पाँचवाँ परिच्छेद। १०३ हुई थी । क्या स्त्री क्या पुरुप, क्या वालक क्या वृद्ध, सभी के मुंह से लालाबाबू की प्रशंसा सुनी जाती थी। लालाबाबू अपने अतुल ऐश्वर्य को त्यागकर एक साधारण अवस्था के दीन व्यक्ति की तरह शुद्ध मन से परमार्थ की चिन्ता में लग गये । वे दुर्भिक्षपीड़ित दीन- दुखियों को बड़ी उदारता के साथ अन्न-वस्त्र देते थे। उन्होंने वृन्दावन में एक अन्नसत्र (क्षेत्र) स्थापित किया था। जो भूखे वहाँ जाते थे उन्हें भोजन मिलता था। उन्होंने वहाँ एक मन्दिर भी श्रीकृष्णरायजी का वनवाया। सारे वङ्ग देश में लालावावू की घर- घर प्रशंसा होने लगी । मुक्तकण्ठ से लोग उनकी स्तुति करने लगे। किन्तु उस विनयी लालावावू के कानों में अपनी प्रशंसा की वात खटकने लगी। जिन्होंने अहङ्कार को पैरों के नीचे दबाकर विनय और दैन्य को माथे का मुकुट बना रक्खा है, जिन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति को परोपकार-व्रत में लगाकर अपने को भगवञ्चरणार. विन्द में अर्पित कर दिया है उन्हें प्रात्मप्रशंसा की बातें क्योंकर सह्य हो सकती थी। वे आत्मनिन्दा की बातों से अपने को उपकृत मानते थे, और अपनी त्रुटि के संशोधन में तत्पर होते थे, किन्तु अपनी प्रशंसा सुनते ही उन्हें मरण-दशा प्राप्त होती थी और वे अपराधी की तरह सङ्कोचभाव धारण कर चुप हो रहते थे। वे चारों ओर से अपनी प्रशंसा की-बातें सुन-सुनकर घबरा उठे और प्रशंसा से परित्राण पाने के हेतु वङ्गदेश छोड़कर वृन्दावन चले N लिखी घटना से स्पष्ट विदित होगा। वृन्दावन के यात्रिगण जो पुलिन या वासस्थली नामक स्थान , १०४ चरित्रगठन-1 के पूर्व और अपूर्व देवमन्दिर और श्रीकृष्णरायजी. को विनि प्रकार से सेवा होते देखते हैं वह इन्हीं लालावायू की कीर्ति : लालाबाबू इसी मन्दिर में निवास करके और दिन- भगवान् का भजन करके समय विताने लगे। उन्होंने तब दीक्षा (मन्त्र ) ग्रहण न की थी। उन दिनों भक्तिमार्ग परम ज्ञाता साधु श्रीकृष्णदास बाबाजी वृन्दावन में वास क थे। इन्हीं महात्मा ने वैष्णव भक्तगयों के अपूर्व जीवन-चरित्र भ माल ग्रन्थ का अनुवाद वङ्गभाषा में किया है। लालाबाबू ने कृष्णदास बाबाजी की साधुता, असाधारण भगवद्भक्ति, अ ङ्कारशून्यता और असीम पाण्डित्य की बात सुनी, तब वे वाब से मन्त्र लेने के लिए व्यग्र हो उठे। श्रीकृष्ण दास बाबाजी इस पहले ही लालाबाबू.की पूर्वावस्था, वैराग्य, दया और विनय श्रा अनेक गुणों की बातें सुन चुके थे। उनका हृदय भी लालावायू ओर आकृष्ट हुआ । जो गुणी है वहो गुण का आदर करता है एक दिन लालाबाबू ने बाबाजी के.प्राश्नम में जाकर अपना प्रति लाप प्रकट किया। गुरु-शिष्य दोनों ही योग्य हैं। दोनों ही ए दूसरे के प्राचार-व्यवहार से एक प्रकार अवगत हैं। किन्तु प स्पर सम्भापथ का यह पहला अवसर है। साधुओं का चरि बड़ा ही विचित्र होता है। ऐसे जगद्विदित, संसार से विरत भगवद्भक्त फो शिप्य पाकर मन्त्र देने में क्या कोई विलम्ब फरता किन्तु कृष्णदासजी ने फा पूर्ण रूप से सम्मान फरः अत्यन्त कोमल...और . था..तम् पाँचवाँ परिच्छेद । १०५ लालाबाबू बावाजी फी घात सुनकर विस्मय और विपाद में डूब गये । जो लोग हृदय के प्रौढ़ नहीं हैं, जिन लोगों के मन में अह- कार का आभास कुछ-कुछ बना है वे ऐसे मौके पर क्या करते ? वे प्रापे से बाहर हो जाते और महात्मा कृष्णदास को निःस्पद गर्वित, पाण्डित्याभिगानी कहकर दूसरे गुरु की तलाश में अग्रसर होते । यावाजी ने ऐसा क्यों कहा है, इस बात के तत्त्व की खोज वे न करते । किन्तु लालाबाबू एक भिन्न प्रकृति के मनुष्य थे । उनका स्वभाव और लोगों से विलक्षण था। वे अपनी ही त्रुटि को बात सोचने लगे। उन्होंने अपने मन में पहले यह बात सोची कि मैं सर्वत्यागी होकर श्रीवृन्दावन में वास कर रहा हूँ, अपने ठाकुरद्वारे में एक मुट्ठी भगवान् का प्रसाद पाकर पाठों पहर उनका नाम जपा करता हूँ। किन्तु मेरे मन की मलिनता अब भी दूर नहीं हुई है। सेठजी के ठाकुरद्वारे की तरफ़ भिक्षा के लिए जा ही नहीं सकता हूँ। अव भी मेरे मन में शत्रु के प्रति घृणा और विद्रुप-बुद्धि बनी है तब मेरा हृदय पवित्र कहाँ हुआ ? शत्रु, मित्र, 'मान, अपमान आदि भेदज्ञान के रहते अहङ्कार का भाव नष्ट नहीं हो सकता । मैं इन्हीं गुणों से बाबाजी का कृपाप्रार्थी होने गया था ! धन्य हो बाबा कृष्णदास, धन्य है तुम्हारी महिमा । तुम्हारी ही । कृपा से मैं तुम्हारा दास होने योग्य वयूँ तो वनूँ " जिस सेठ का ज़िक्र अपर आया है वह जयपुर का एक महाधनाढ्य महाजन था और भगवान् का पूरा भक्त था । वृन्दावन में उसका एक बहुत बड़ा ठाकुरद्वारा है और भगवत्सेवा का अच्छा प्रबन्ध है। इस सेठ के ऐश्वर्य की सीमा न थी। मथुरा के प्रास- . - ११४ चरित्रगठन। । उन्हें अवश्य प्राप्त था और केवल उन्हों को प्राप्त था। क्योंकि वे अपने पवित्र माचरण से जगद्वन्द्य हो रहे थे। इससे साधारण लोगों को उनका अनुकरण करना उचित नहीं है। सभ्य समाज में यदि कोई "पापा कहकर सम्बोधन करे तो समझना होगा-बह चाहता है कि अन्यान्य लोग भी उसे वैसा ही सम्बोधन करें। कोई भद्र पुरुष यदि तुम्हें "प्राप" कहकर पुकारे तो तुम उसे कभी "तुम" न कहो। उसके प्रति तुम्हारा "तुम" कहना नितान्त अनुचित है। किन्तु कितने ही प्रात्माभिमानी इस पर ध्यान नहीं देते, वे समझते हैं कि दूसरे को "तुम" कहने ही में अपने बड़प्पन की रक्षा होती है पर यह बात नहीं है। इस प्रकार की अशिष्टता से उनके बड़प्पन में बड़ा ही प्राघात लगता है। जो लोग शिष्टता फी वातों से अनभिज्ञ हैं वे हो प्रायः ऐसी असभ्यता का काम करके सभ्य समाज में उपेक्ष्य समझे जाते हैं। जिन लोगों ने अपने उद्योग से, अपनी सच्चरित्रता के गुण से और विद्या-विनय से ऊँचा पद प्राप्त किया है, वे कितने ही हीन कुल के क्यों न हो उनके पद की मर्यादा का हास करना वा उन्हें हेय समझना शिष्टता के विरुद्ध है। हँसी-दिल्लगी किस समय, किस ढङ्ग से, किसके साथ हँसी-दिल्लगी करनी चाहिए, इसका विचार भी बहुत ज़रूरी है। हास्य का मूल कारण आमोद-प्रियता है। किसी के साथ हँसी-दिल्लगी करने का मुख्य छठा परिच्छेद। ११५ उद्देश चित्त को प्रसन्न करना है। किन्तु अयुक्त रीति से जो हँसी- दिल्लगी की जाती है उसमें खुशी के वदले रख ही उठाना पड़ता है। वह हँसी किस काम की जिससे दूसरे के हृदय में दुःख पहुँचे । कितने ही लोगों ने दूसरे का प्रयुक्त परिहास करके अपने प्राण तक गँवा दिये हैं। इस कारण इस विषय में सबको सावधान रहना ज़रूरी है। ऐसी इसी किसी के साथ न करो जिससे उसका परि- णाम भयङ्कर हो उठे। हँसी वहीं तक अच्छी है जहाँ तक परस्पर उसे विनोद का कारण समझें। जब हँसी से एक के हृदय में चोट पहुँची तब वह हँसी हँसी न रही। वह ईर्ष्या-द्वेप का रूप धारण कर भारी अनिष्ट उत्पन्न करती है। बुरे ढङ्ग से परिहास करने पर दोनों में असमक्षस हो सकता है और उससे दोनों ही का प्रमङ्गल हो सकता है। असत् परिहास,असभ्यता, अश्लील बातों से किसी के साथ दिल्लगी करना सर्वथा त्याज्य है। क्योंकि ऐसे अनुचित परिहास से असन्तोष का वीज अङ्क रित होता है। जो लोग शिष्ट हैं, सज्जन हैं; वे अनुचित परिहासकर्ता के साथ प्रायः बातचीत नहीं करते । कदाचित् उनसे कुछ कहने का प्रयोजन हुआ भी तो प्रयोजन की बातें करके शीघ्र ही वहाँ टल जाते हैं। जो 'लोग सभ्य हैं, सुशील हैं, उनके निकट दुर्योध, दिल्लगीवाज़ सम्मान नहीं पाते। ऐसे-ऐसे लोगों का सम्मान अशिक्षित समाज में ही हुआ करता है। (वामायोधिनी पत्रिका) - चरित्रगठन। झूठा परिहास . तेरह सौ शताब्दी में इंगलेंड के लोगडायन का विश्वास करते थे । वल्कि राजा ने यह कानून बना दिया था कि जो वृद्धा स्त्री डायन मन्त्र-द्वारा किसी का अनिष्ट-साधन करेगी तो उसको प्राण- दण्ड दिया जायगा । एक समय एक वृद्धा उपर्युक्त अपराध में एक न्यायकर्ता के सामने लाई गई। न्यायकर्ता ने उस खो के डायनपन के सम्बन्ध की सब बातें सुनकर घबराहट के साथ वकीलों को. सम्बोधन करके कहा-"महाशयगण, मैं आप लोगों के निकट अपनी एक भूल स्वीकार करने के लिए बाध्य होता हूँ । युवापन में मेरा स्वभाव बड़ा हो चञ्चल था, लोगों के साथ हँसी-ठट्ठा करना 'मुझे बड़ा ही अच्छा लगता था। मुझे स्मरण हो रहा है, उस युवत्व-काल में मैंने हँसी में एक छोटे से काग़ज़ के टुकड़े पर एक कविता लिखकर इस स्त्री को यह कहकर दिया था कि इसमें डायन का मन्त्र लिखा है। मैं समझ रहा हूँ यह वृद्धा मेरा मिथ्या परिहास न समझ उसी कागज़ के टुकड़े को लेकर डायन की वृत्ति करने में प्रवृत्त हुई है। इसका अपराध नहीं । अपराध मेरा हो है। इसके पास जो मन्त्र-लिखित काग़ज़ का टुकड़ा है, उसे आप लोग खोलकर देखेंगे तो मेरे कथन की सत्यता प्रमाणित होगी ।" वकीलों ने उस कागज़ के टुकड़े में ठीक न्यायकर्ता की लिखित 'कविता.देखी। (वामाबोधिनी पत्रिका) छठा परिच्छेद। भयंकर परिहास इंगलैंड के किसी बोर्डिग हाउस (छात्रालय) में एक अत्यन्त साहसी युवा था । वह भूत का विश्वास नहीं करता था। उसके कई सहपाठी और साधी युवकों ने आपस में विचार करके स्थिर. किया कि उसे एक दिन भूत बनकर डराना चाहिए। इस तरह विचार करके उन लोगों ने उससे जाकर कहा-"देखो मित्र, मेरे यहाँ इन दिनों भूत का बड़ा ही उपद्रव हो रहा है। हम लोगों ने भूत को अपनी आँखों देखा है ।" साहसी युवक ने हँसकर कहा, "क्या पागल हुए हो ?" क्या तुम लोग भूत को सचमुच मानते हो ? भूत कोई चीज़ नहीं है। दिमाग में ज्यादा गरमी पहुँचने और शरीर कमज़ोर होने से नाना प्रकार के काल्पनिक दृश्य देखने में आया करते हैं; भयङ्कर मूर्ति की भावना होने लगती है। = उसी को लोग भूत समझ बैठते हैं । जब तक मैं अपनी आँखों से न देगा, तब तक मुझे विश्वास न होगा।" साथियों ने कहा- "माजकल तो प्रायः हम लोगों को नित्य ही भूत का दर्शन होता है। तुम भी किसी दिन उसे देखोगे । जो हो इसको किसी तरह यहाँ से भगाना चाहिए ।” युवक ने कहा- "उसके भगाने की . धात क्या कहते हो ? मैं आज ही पिस्तौल में गोली भरकर रख दूंगा। यदि कोई दुष्ट मनुष्य भूत बनकर हम. लोगों को हराता है तो वह ज़रूर ही मरेगा । नहीं तो समदूंगा, भूत यथार्थ ही होता है।" कुछ दिन के बाद एक रात में जब सब लोग सो गये तब उस . ११८ चरित्रगठन युवक के साथियों में से एक व्यक्ति चुपचाप उस साहसी युवक के सोने की कोठरी में प्रवेश करके काले कपड़े से अपना सारा बदन ढाँपकर उसकी चारपाई के पास खड़ा होकर गम्भीर स्वर में गुनगुनाने लगा। इसके पहले ही इस व्यक्ति ने.उसके पिस्तौल में से, किसी तरकीब से, गोली निकाल ली थी। शीशे की धुंधली रोशनी में वह कृष्णवस्त्रावृत मनुष्य बड़ा ही भयङ्कर दीखता था। उस युवक ने चौंककर अपने तकिये के नीचे से पिस्तौल निकाल- कर उस काले डरावने जीवित भूत से कहा-"यदि तुम मेरे साथियों में कोई हो तो हाथ जोड़ विनय करता हूँ कि परिहास परित्याग करो, नहीं तो तुम्हारा मृतक शरीर अभी धरती पर लोट जायगा।" वह काला भूत ज़रा भी न डरा और उस युवक की तरफ अग्रसर होने लगा। पिस्तौल का शब्द घर में गूंज उठा, किन्तु वह ज्यों का त्यों खड़ा रहा। उस भूत-मूर्ति ने पिस्तौल से पहले ही जो गोली निकाल ली थी उसे उस युवक की देह पर चुपचाप फेंक दिया। युवक पिस्तौल को व्यर्थ होते देख भय से छत होकर विछौने पर लेट गया। वह कृत्रिम भूत विकट हास्य करके वहाँ से चल दिया। कुछ देर के बाद उसने वेप बदल उस युवक के पास आकर देखा तो उसका मृतक शरीर शय्या पर पड़ा है। जिस परिहास से मनुष्य की जान ही चली जाय, उसे कोई परिहास कैसे कह सकता है ? वह परिहास नहीं किन्तु प्राण- संहारिणी लीला है। इंगलेंड में इस तरह की एक और घटना होने की 144 L
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अथवा कुछ और ही तरह का अनिष्ट सङ्घटित हो जाने पर उन मूखों को बड़ा हर्ष होता है । इस प्रकार के सामान्य, पैशाचिक परिहास से कभी-कभी इतना बड़ा अनिष्ट सङ्घटित होता है कि सैकड़ों मनुष्यों को जीवन से हाथ धोना पड़ता है। साधुता का एकदम अभाव और प्रशिक्षा ही उन राक्षसरूपधारी मनुष्यों को ऐसे बुरे परिहास की ओर झुकाती है। प्राणापहारी परिहास- रसिकों के साधारण दुष्ट व्यवहार से जैसे महा भयङ्कर अनिष्ट हो सकता है वैसेही सहृदय साधु व्यक्ति के सामान्य उद्योग से कितने ही अनिष्टों का निवारण हो सकता है। नीचे की लिखित यथार्थ घटना से इसकी सत्यता भली भाँति प्रमाशित होती है। दूसरे की अनिष्ट घटना की बात सुनकर जो मूर्ख हैं, जो राक्षसीय परिहास के लोलुप नर-पिशाच हैं वे मारे खुशी के. नाचने लगेंगे, इसमें सन्देह नहीं। खूब ज़ोर से वर्षा होने के कारण गोवरडाँगा की निकटवर्तिनी छोटीसी अपरयमुना नदी के दोनों किनारे पानी में डूब गये। नदी का प्रवाह प्रखर वेग से बहने लगा । जहाँ-तहाँ पुल टूटने लगे। गोवरडाँगा से मछलन्दपुर तक रेल का मार्ग पानी की बाढ़ से तहस-नहस हो गया । पटरी के नीचे से ईट, पत्थर और मिट्टीवह- कर कहाँ गई, क्या हुई, इसका कुछ पता नहीं; किन्तु यह हाल रेलवे-कर्मचारी को मालूम न था। उन्हें सड़क टूट जाने की किसी. ने. खयर न दी। उसी दिन खुलना से एक ट्रेन बेखौफ तेज़ी के साथ भक भक करती हुई आ रही थी। रेलवे सड़क के पास ही एक धीवर मछली मार रहा था। वह गाड़ी पाते देख और , छठा परिच्छेद । १२१ एक साथ हज़ारों मनुष्यों की मृत्यु होने की बात सोचकर गाड़ी = रोकने के लिए अपने पहनने का कपड़ा ऊपर उठाकर पताका की तरह हिलाने लगा; किन्तु ड्राइवर उसका वह सङ्केत न समझ मका । गाड़ी अपनी गति में वरावर आती ही रही । धीवर ने जब देखा कि दो ही एक मिनट में गाड़ी यात्रियों को लिये नदी के गर्भ में गिरकर रसातल जाना चाहती है, तब वह अपने प्राण का कुछ मोह न कर अति शीघ्र रेलवे लाइन पर पाकर खड़ा हो गया और कपड़ा हिलाकर सङ्केत करने लगा। ड्राइवर ने सामने एक आदमी को पटरी पर खड़ा देख गाड़ी रोकी । धीवर की इस धर्म- बुद्धि और सदय व्यवहार से हज़ारों मनुष्यों की जान बची और तीस-चालीस हज़ार रुपये लागत को रेलगाड़ी नष्ट होने से बची ! इस धीवर की सहृदयता और समयोचित कार्यकारिता के जोड़ का दृष्टान्त इतिहास-ग्रन्थों में कम ही पाया जाता है ।" (सजीवनी) इस तरह की और इसके विपरीत आचरण की सैकड़ों हो घटनाएँ रोज़-रोज़ हुआ करती हैं जिनसे कितने ही लोगों का कल्याण और कितनों ही का सर्वनाश होता है । इसको गणना कोई कहाँ तक कर सकता है। हमारे देश में अब भी कहीं- कहीं देखा जाता है कि कोई-कोई त्री-पुरुष साधारण बातचीत करते वक्त किसी विशेष विषय को समझाकर कहने अथवा श्रोता (सुननेवाले ) का ध्यान आकृष्ट करने के अभिप्राय से बार-बार उसके अङ्ग पर आघात करते हैं । जिन्हें इस प्रकार चोट खाने की आदत नहीं है वे मन ही मन कुढ़ते हैं और अपनी अवज्ञा समझते है। इस फराघात से उन्हें क्लेश भी होता है, किन्तु वक्ता को इस
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छठा परिच्छेद । १२३ वातचीत के समय कोई ऐसी बुरी आदत न चलना चाहिए जिससे सुननेवाले के मन में किसी प्रकार की घृणा उत्पन्न हो। खेद का विषय यह है कि उनके इस बुरे अभ्यास का अनुकरण छोटे-छोटे वालक-बालिकागण भी करने लग जाते हैं। इस प्रकार के कुंत्सित अभ्यास को भी अशिष्टता का ही एक अंङ्ग मानना चाहिए । जो अशिक्षित हैं, जिन्हें गुरुजनों से कभी अच्छी शिक्षा नहीं मिली है, वे ही लोग ऐसी अशिष्टता की बातों को शरण देते हैं। शिष्ट परिहास मूर्ख लोगों का परिहास अश्लीलता से भरा हुआ होता है, जिसे कोई पसन्द नहीं करता । बल्कि जिसके साथ परिहास किया जाता है वह खुश न होकर अपना अपमान समझता है। किन्तु जो लोग सुशिक्षित हैं और शिष्ट हैं उनका परिहास सबके हृदय को प्रसन्न करता है; सभी लोग उस परिहास को पसन्द करते हैं और कुछ न कुछ उससे शिक्षा भी ज़रूर ग्रहण करते हैं। कभी- कभी तो उस परिहास से विनय और शिष्टता का विशेष परिचय मिलता है। कितने ही लोग यह समझते हैं कि जो विद्वान् और शिष्ट है वे सर्वदा हो गम्भीर भाव धारण किये रहते हैं। वे किसी के साथ हास्य-परिहास नहीं करते । किन्तु वास्तव में विद्वान् शिष्टगण जैसे प्रफुलहृदय, सरस यांव बोलने में प्रवीण और समी- चीन परिहास के प्रिय होते हैं, वैसे संसार में और लोग नहीं होते। । 1 १२४ चरित्रगठन। शिष्ट जनों के परिहास से शिक्षा मिलती है, बुद्धि बढ़ती और सुरुचि-पूर्ण प्रसन्नता प्राप्त होती है । यदि तुमलोग शिष्ट जनं के सदश परिहास करने में समर्थ न हो सको तो उन परिहासों के अवश्य त्याग दो जो दूसरों को बुरे लगें और जिससे किसी के मन विनोद न होकर प्रत्युत घृणा उत्पन्न हो। मान लो कि जिस बु परिहास से तुम कंवल अपने ही मन-विनोद पाने की इच्छा रखते हो वही परिहास यदि कोई दूसरा व्यक्ति तुम्हारे साथ करे तो क्या उस वैसा ही विनोदास्पद समझोग? फिर वह परिहास ही किस काम का जो सबकं हृदय में हर्पप्रद न हुआ। दूसरे के हृदय दुःख पहुँचाकर अपने हृदय में आनन्द मानना बड़ी ही घृणा का विषय है। म. मीठा तिरस्कार जिनका मधुर भाषण और निश्छल व्यवहार स्वाभाविक है, उनका तिरस्कार भी माधुर्य से भरा होता है। वे इस युक्ति से तिरस्कार करते हैं जिससे तिरस्कृत व्यक्ति के मन में क्रोध उत्पन्न नहीं होता, प्रत्युत शिक्षा का ही लाभ होता है। कितने ही लोग आँखें लाल कर कठोर वाक्यों से जब किसी को फटकार बताते हैं तब वह तिरस्कृत व्यक्ति रुष्ट होता है, और उसके मन में शत्रुता उत्पन्न होती है। अभिप्राय यह कि तिरस्कार करने का फल विपरीत होता है । इसलिए जो सज्जन हैं वे सहसा किसी की भर्त्सना नहीं करते। हमलोग अपनें बन्धु-वान्धवों को दोपी देख- छठा परिच्छेद। १२५ कर प्रायः उनका तिरस्कार किये बिना नहीं रहते। मधुर-भाषण से किसी का सत्कार करना कठिन नहीं है, किन्तु शिष्टता-पूर्वक किसी का तिरस्कार करना बड़ा ही कठिन है। सुशिक्षित और शान्त प्रकृति पुरुपों के अतिरिक्त अन्य लोग इस तरह की मीठी मार मारना नहीं जानते । यह उन्हीं सज्जन महात्माओं का काम है कि मीठे तिरस्कार के द्वारा कितने ही दुर्जन व्यक्तियों के कठोर स्वभाव को.कोमल बना डालते हैं। उनके इस मधुर तिरस्कार का अनु- करण सवको करना चाहिए। एक समय किसी दुष्ट ने महात्मा वायुजित् को बहुत दुर्वचन कहे और उनके माथे पर ऐसे ज़ोर से तानपूरे का प्रहार किया कि तानपूरा टूट गया । महात्मा वायुजित् ने उसके इस दुर्व्यवहार को चुपचाप सह लिया। उन्होंने अपने घर आ दूसरे दिन सबेरे नौकर के हाथ एक थाल मिठाई और दो रुपये उस दुष्ट के पास भेजकर उससे यह कहला दिया-"कल रात में जो मुझे कटु वचन कहकर आपने अपना मुँह फ.डुअा किया था, उसके बदले यह मिठाई खाइए और इन रुपयों से दूसरा नया तानपूरा खरीद लीजिए।" बद्द मनुष्य वायुजित की ऐसी शिष्टता और सुजनता देखकर बड़ा ही लजित हुआ और अपनी दुर्जनता की बात याद कर बार-बार पछताने लगा। उसने तुरन्त वायुजित् के पास जाकर उनसे क्षमा मांगी और वह सर्वदा के लिए उनका शिष्य बन गया। मेघडिष्ट सम्प्रदाय के संस्थापक सुप्रसिद्ध वारली किसी उच्चपदस्य राजकर्मचारी के साथ एफ गाड़ी में बैठकर कहीं जा रद थे। जब कुछ दूर आगे गये और गाड़ी बदलने का समय १२६ चरित्रगठन। समीप आया तब महात्मा वास्ली ने उस युवा कर्मचारी से कहा- "मैं आपका साथ पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ हूँ। पर एक बात के लिए मैं आपसे कुछ प्रार्थना करता हूँ।""युवा ने कहा- "आपकी अभ्यर्थना पूरी करने के लिए मैं यथासांध्य चेष्टा करूँगा। आप मुझसे कभी किसी अनुचित काम के लिए तो अनुरोध करेंगे ही नहीं ।" वास्ली ने कहा-" मुझे आपके साथ अभी बहुत दूर तक जाना है। इससे प्रापके निकट मेरा यही सानुरोध निवेदन है कि यदि मैं अपने को भूलकर शपथ करने लगू अथवा कोई अश्लील बात बोलूँ तो आप उसी घड़ी मेरा विलक्षण रूप से तिरस्कार करें।" यह कहने की आवश्यकता नहीं कि वह युवा पुरुष ही इन दोनों दोषों से दूपित था । वह उनके इस गुणकारी; परमपिध रूप, मधुर सच्चे तिरस्कार का मर्म समझ गया । युवक ने हँसकर कहा--"इस तरह का तिरस्कार आपके सिवा किसी और से मिलने की आशा नहीं थी। उस युवा ने उस दिन से सावधान होकर अपने दोनों, दोपों को धीरे-धीरे दूर कर दिया । महात्मा का मीठा तिरस्कार व्यर्थ न हुआ । (वामाबोधिनी) अच्छे उपदेशों के द्वारा जो.फाम सिद्ध नहीं होता वह कभी- कभी कोमल तिरस्कार के द्वारा सिद्ध हो जाता है, जो काम अनेक प्रकार की कठोर भर्त्सना और सैकड़ों प्रकार की ताड़ना से सफल नहीं होता वह एक साधारण मीठे तिरस्कार से सफल हो जाता है। मीठे तिरस्कार से तिरस्कार करनेवाले व्यक्ति पर तिरस्कृत व्यक्ति को क्रोध या द्वैप उत्पन्न न होफर श्रद्धा और भक्ति का उदय होता है। " छठा परिच्छेद। १२७ तिरस्कार की मधुरता और कोमलता में ऐसी कुछ शक्ति है जो उद्दण्डता और क्रोधान्धता को दूर कर देती है । जब उस व्यक्ति के मन में औद्धत्य और क्रोध का भाव नहीं रहता तब वह मारे लज्जा के सुखकर काट हो जाता है और अपने यथार्थ दोप पर दृष्टि देकर मन ही मन पछताने लगता है। अपने दोपों पर उसे आप ही पाप घृणा उत्पन्न होने लगती है। कोई यह न समझे कि मीठा तिरस्कार केवल मीठी बातों में हो धरा है, यह धौर, गम्भीर, सचरित्र, सहृदय व्यक्ति के स्वाभा- विका कोमल व्यवहार से और निर्दयों के प्रति सदय आचरण से प्रकट होता है। उन महानुभावों का इस प्रकार का कोमल पाच- रण ही अप्रकट रूप से मधुर तिरस्कार का आकार धारण करता है और वही मधुर तिरस्कार तिरस्कृत व्यक्तियों के हृदय में परम- हितकारी उपदेश का काम करता है । मधुर तिरस्कार तिरस्कर्ता और तिरस्कृत दोनों ही के लिए शिक्षा की सामग्री है।
सातवाँ परिच्छेद
परगुह्यगुप्तिनिपुणं गुणमयमलिखैः समाहितं नितराम् ।
ललिताम्बरमिव सज्जनमाखव इव दूषयन्ति खलाः ॥ १॥
.
भावार्थ-दूसरों के अवगुण को छिपानेवाले, गुणमय सज्जन, जो
सुन्दर वस्त्र के समान सबके अपेक्षित हैं उन्हें चूहों के सदृश दुष्ट लोग दूषित
कर डालते हैं ।।१।।
कतिपयदिनपरमायुपि मदकारिणि यौवने दुरात्मानः ।
विदधति तथापराधं जन्मैव यथा वृथा भवति ॥ २॥
यह जीवन के दिन का है ? तथापि दुरात्मा लोग जवानी के जोश में
श्राकर ऐसा बुरा काम कर बैठते हैं जिससे उनका मनुष्य जन्म वृथा हे।
जाता है ॥२॥
विद्या विवादाय धनं मदाय
शक्तिः परपां परिपीडनाय ।
.: सलस्य साधोर्विपरीतमेतद
ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥ ३ ॥
दुष्ट जनों की विद्या विवाद के लिए, धन गर्ने के लिए, और शक्ति
दूसरों के सताने के लिए होती है किन्तु जो सज्जन हैं उनकी विद्या ज्ञान के
लिए, धन दान के लिए और शक्ति दूसरों के बाण के लिए होती है ॥३॥
१२६ सातवों परिच्छंद। सौजन्यधन्यजनुपः पुरुपाः परंपां दापानपास्य गुणमेव गवेपयन्ति । त्यक्त्वा भुजङ्गमविपाणि पटीरगर्भात सौरभ्यमेव पवनाः परिशीलयन्ति ।। ४ ।। जो सज्जन पुरुष हैं, वे दूसरों के दापों को ग्रहण न कर गुणभाग का ही ग्रहण करते हैं जैसे पवन चन्दनस्थित सर्प के विप का ग्रहण न करके सुगन्ध-मान का ग्रहण करता है ॥४॥ जातीय दुर्वलता भारतवासी हिन्दुओं में स्वजातिद्वेप प्रायः सर्वत्र देखा जाता है, और सब दोपों में यदि कोई प्रधान दोप है तो यहो। ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है जो अपनी जाति की प्रशंसा सुन- कर प्रसन्न और निन्दा सुनकर दुःखी होते हैं। किन्तु यह स्वभाव भारतवासियों का अकृत्रिम नहीं है। दूसरे के दोपों को ढूँढना या दूसरे की निन्दा करना भारतवासी हृदय से पसन्द नहीं करते। वे किसी विरोध के कारण हो ऐसा करते हो, यह भी नहीं। यदि उनका यही आन्तरिक अभिप्राय होता तो भारत देश की निन्दा उन्हें असह्य क्यों होती । यदि कोई यह कहे कि भारतवर्ष बहुत दिनों से पराधीनता की वेड़ी पहन चुका है और यह अज्ञानता और भौरुता का घर बना है, इसमें प्रार्यगण बहुत थोड़े दिनों से रहने लगे हैं, तो ऐसा कहनेवाला भारतवासी के .
चरित्रगठन । . निकट ज़रूर हास्यास्पद होगा । भारतवासी उसे भारत को सर्वो- स्कृष्ट होने का शतशः प्रमाण शास्त्रों से निकालकर दिखलाये विना न रहेंगे, और भारतवर्ष हो पार्यों का सबसे प्राचीन वासस्थल है, इसे इतिहास द्वारा सिद्ध कर देंगे। माँ अपने सन्तान को क्रोधवश ताड़ना करती है किन्तु दूसरा कोई उसे मारने आता है तो वह उसकी रक्षा करती है। इससे यह समझना चाहिए कि सन्तान पर माता का क्रोध आन्तरिक नहीं रहता। भारतवासी की निन्दा भारतवासी के मुँह से सुनी जाती है, किन्तु विदेशियों के मुँह से भारतवासी की निन्दा सुनना सह्य नहीं होता। भारतवासी लोग हृदय से ऐसा नहीं चाहते कि भारत की कोई निन्दा करे । कभी-कभी लोगों के मुँह से जो यह सुनने में आता है कि "भारत नष्ट हो गया, भारत- वासियों को अब सुख कहाँ ? देश का दिन-दिन अधःपात हो रहा है।" यह भारतवासियों के अन्तःकरण की बात नहीं है। अन्त:करण से वे भारत की दशा पर खेद नहीं प्रकट करते । यदि चे हृदय से भारत की उन्नति चाहें और उसके लिए उचित उद्योग करें तो भारत को उन्नत दशा में प्राप्त होते देर न लगे। यदि भारत के स्त्री-पुरुप, बालक-बालिकागण दूसरे को निन्दा और व्यर्थ के वाद-विवाद में समय नष्ट न कर अपने जीवन के कर्तव्य का पालन करें, दूसरों के सद्गुणों को ग्रहण करें और अपने चुरे अभ्यास तथा दोपों को दूर कर दें तो थोड़े ही दिनों में भारत का कलङ्क मिट जाय । जो लोग अपनी उन्नति और अवनति तथा अपने हिताहित के . सातवाँ परिच्छेद । १३१ विषय की बात नहीं सोचते, वही अन्यान्य लोगों की बातें चला- कर अपने सदुपयुक्त समय को नष्ट करते हैं। जो आलसी हैं उन्हीं को परायों के भले-बुरे कामों की समालोचना करने का अवसर प्राप्त होता है। किन्तु जो लोग अपने कर्तव्य में लगे रहते हैं उन्हें तो अपना काम पूरा करने ही का समय नहीं मिलता दूसरं की बात करने का उनका अवकाश कहाँ । सब लोग यदि अपने- अपने कर्तव्य का उचित रीति से पालन करें तो कोई कलङ्क का भागी नहीं बन सकता। हम लोगों में दूसरों के छिद्रान्वेषण करने के अनेक कारण हैं । किन्तु उनमें प्रधान कारण स्वार्थपरता ही है। पराये की निन्दा करके हम लोग भले ही जितना चाहें आनन्द का अनुभव क्यों न करें पर अपनी निन्दा की बात सुनकर हम.मरने पर उद्यत हो जाते हैं। अपनी निन्दा का यथार्थ कारण हूँढ़कर उसे दूर न कर निन्दकों के साथ शत्रुता का व्यवहार करने लगते हैं। यदि कोई किसी पड़ोसी का नाम लेफर, उसको निन्दा करने लगे तो वह बड़ी प्रसन्नता से उसे सुनेगा और पड़ोसी की निन्दा का प्रतिवाद न करके उसमें अपनी तरफ से और योग-दान देगा. और अपने पड़ोसी का दीप सर्वत्र फैलाने के लिए उस निन्दक का उत्साहित करेगा। किन्तु उसी व्यक्ति से यदि कोई यह कहे कि. तुम घृणित. महल्ले में रहते हो, तुम्हारं महल्ले की निन्दा जहाँ-तहाँ सुनने में: आती है-इत्यादि, तो वह तुरन्त उसकी बात में अपनी अरुचि दिखलाफर यथाशक्ति प्रतिवाद करने की चेष्टा करेगा और अप- १३२ चरिनगठन । बाद का मिथ्या कारण कहकर उसे अपने महल्ले को निष्कलङ्क होने का विश्वास दिलायेगा। इसी प्रकार जब कोई विदेशी किसी सम्प्रदाय वा किसी प्रदेश-विशेप की ओर लक्ष्य करके निन्दा करता है तब भिन्न प्रदेश के अधिवासी वा भिन्न सम्प्रदाय के लोग उस, पर विशेष ध्यान नहीं देते । किन्तु वही विदेशी यदि किसी एक प्रदेश का नाम न लेकर समस्त भारत को निन्दा करने लग जाय तो वे पहले की तरह चुप न हो रहेंगे, बल्कि वे भारत. के यथार्थ दोषों को भूलकर मुक्त कण्ठ से भारत-गुण -गान करने लगेंगे और तब वे समझेगे कि निन्दा उन्हीं की हो रही है। विदेशियों के दुरपवाद से भारत का उतना अनिष्ट नहीं होता जितना भारत- वासियों के परस्पर की निन्दा से हो रहा है। हिंसा, द्वेष और निन्दा के वशवर्ती होकर यदि एक.आदमी दूसरे की. निन्दा करे तो दोनों ही कादुर्नाम लोगों में विख्यात होता है। उसी तरह एक प्रदेशवासी यदि दूसरे प्रदेशवासी.की और एक सम्प्रदाय के लोग दूसरे सम्प्रदाय की परस्पर निन्दा करें तो.समस्त देश निन्दा से क्यों न भर जाय । इसी निन्दावाद को देश का भयङ्कर शत्रु करके मानना चाहिए । जब हम अपने देश को श्राप, ही निन्दा करेंगे, अपनी, जाति का आपही..उपहास करेंगे तब अन्य देशी लोग हमारे देश को निन्दा करने में कब चूकेंगे। हम लोगों के मुँह से भारत की निन्दा सुनकर ही विदेशी लोगों को भारत की निन्दा करने का अवसर प्राप्त होता है। जब हम अपने को आप ही निन्द्य समझेगे तब दूसरा भी हमें अवश्य ही.निन्द्य समझेगा। जब तक भारतवासी: परस्पर के विभिन्न: भार को न छोड़ेंगे तब तक - सातवाँ परिच्छेद। १३३ भारत की प्रशंसा सुनने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त नहीं हो सकता। प्रतिष्ठित व्यक्तियों के गुण की प्रशंसा तो अवश्य करनी हो चाहिए, किन्तु उनके सामान्य दोपों पर दृष्टि न देना बड़े महत्त्व की बात है। आजकल ऐसे कितने ही छिद्रान्वेपी हैं जो दूसरे के अनेक गुणों की ओर हकपात न कर उसके सामान्य दोप की बात लेकर ही उसे दोपी ठहराते हैं और प्रशंसा के बदले उसकी निन्दा करते हैं। खेद का विषय है कि हम लोग अपने महत्व को खो बैठे हैं। स्वार्थपरता ने महत्व की जगह इस समय अपने अधिकार में कर ली है। जब तक स्वार्थपरता की प्रबलता रहेगी तब तक हम लोग महत्व का कोई काम नहीं कर सकेंगे। अन्यान्य देश के लोग हमेशा अपने काम में लगे रहते हैं, अपनी उन्नति की बातें सोचा करते हैं। किन्तु दम भारतवासी आलस्य से समय विताने ही को सुख समझ बैठे हैं। जिन लोगों को अपने जीवननिर्वाह-योग्य स्थायी सम्पत्ति मिल गई है वे नम- झते हैं कि संसार में उनके करने योग्य कोई काम नहीं; वे किसी प्रकार के उद्यम को आवश्यक नहीं समझते। किसी प्रकार का सपरिश्रम व्यापार करना उनके लिए बड़ी ही लज्जा का विषय है। जो लोग किसी प्राफ़िस के कर्मचारी हैं; वे यही सोचते रहते हैं कि कब उन्हें पेन्शन मिलेगी। दैवयोग से जहाँ उन्हें पेन्शन मिली कि सब कामों से हाथ खींचकर आराम से अपने जीवन का शेप समय बिताने लगे। किन्तु जब किसी अँगरेज़ कर्मचारी को ऐसा अवसर प्राप्त होता है तब वे चुपचाप बैठकर आराम करने को १३४ चरित्रगठन । बात न सोचकर बड़े उत्साह के साधं कोई लाभदायक भारी व्यापार ठान देते हैं । वे उसी को सुख-साधन समझते हैं। उसी में उन्हें पूरा आनन्द मिलता है। आलसी होने का एक कारण दैहिक दर्विल्य भी है। जिनका शरीर बलिष्ठ नहीं है वे ही प्रायः आलस्य की शरण लेते हैं। इसी दुर्बलता के दोष से इम लोगों को निरुत्साह होकर चुपचाप बैठ- कर आराम करने की बात सूझती है। परिश्रम से देह का बचायें रहते हैं और काम की बात से कोसों भागते हैं। . हम लोग जन्मभूमि छोड़कर अल्पकाल के लिए भी देशान्तर घूमने नहीं जाते । अनेक ऐसे कारण हैं जिससे हम लोगों को विदेश जाने का सुयोग नहीं मिलता। किन्तु जिन लोगों को सब प्रकार का सुभीता है वे अशिक्षित होने के कारण विदेश जाना नहीं चाहते । ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है जो अपने देश से देशान्तर गमन कर भिन्न भिन्न स्थानों की रीति-नीति से परिचित हो और अन्यान्य देशवासियों का स्वदेशानुराग, खजाति-वत्सलता, साहसिकता और सद्गुणावली देखकर कुछ शिक्षा ग्रहण करें । विदेश जाने से स्वदेश पर अनुराग बढ़ता है। देहात के रहनेवाले युवक छात्रगण जब गरमी की छुट्टी के समय. कलकत्ते के छात्रालय का परित्याग कर घर जाने लगते हैं उस समय उन लोगों के हृदय में आनन्द की तरङ्ग लहराने लगती हैं मानो संसार की सारी यांत- नाओं से छुटकारा पाकर वे स्वर्गीय सुखनगरी की जा रहे हैं। जो लोग सर्वदा एक ही स्थान में रहकर समय बिताते हैं उन्हें वह सातवा परिच्छंद। १३५ प्रानन्द नहीं मिलता । प्रदेशवासी युवकों के मन में अन्य काल में जन्मभूमि की उतनी चिन्ता नहीं रहती, किन्तु विदेश से घर पाने के समय अपनी जन्मभूमि का सारा सुख उन्हें स्मरण हो पाता है। तब मातृभूमि की सभी वस्तुयें सुन्दर प्रतीव होने लगती हैं। अपने देश से बाहर जाने और विदेश से स्वदेश लौट पाने के समय अपने देश का अनुराग लोगों के हृदय में स्पष्ट रूप से व्यक्त होता है। ज्ञान प्राप्त करने की हमारी स्पृहा ज्यों-ज्यों तीण होती है त्यों- त्यां कुसंस्कार और अज्ञानता आदि दोपों की वृद्धि होती है। विद्यालय के विद्यार्थिगण अपने नियमित पाठ के अतिरिक्त विद्या- सम्बन्धी कोई दूसरा विषय न पढ़ेंगे । आफ़िस के कर्मचारी लोग आफ़िस के कामों को समाप्त कर अवशिष्ट समय में कोई दूसरा काम न करेंगे। उसे वे पालस्य में ही वितावेंगे अथवा खेल- तमाशे में भुगतान करेंगे । किन्तु ऐसा काम न करेंगे, ऐसी पुस्तकें न पढ़ेंगे जिससे उनका विशेष फल्याण हो। जो लोग वाणिज्य व्यापार करते हैं वे दिन-रात अपने प्राय व्यय, लाभ-हानि की चिन्ता में ही व्यस्त रहते हैं, उन्हें आध्यात्मिक बल तथा अपने देश की कल्याण-विपयंक बातों के सोचने का अवसर नहीं मिलता। जो लोग विशेष धनवान हैं वे सर्वदा भोग-विलास में निमग्न रहते हैं और उपाधि पाने के लिए लालायित रहते हैं। उनके सभी काम दुसरं को सहायता पर निर्भर रहते हैं। विना दूसरे के सहारे उनका एक काम भी नहीं चलता। वे धन से दूसरे का परिश्रमदेखरीदकर अपने को परिश्रमी बनाते हैं। उन्हें अपने नित्य के आवश्यक १० -- चरित्रगठन । कामों से जो समय बचेगा उसे वे हास्य-परिहास में खर्च करेंगे। वे अपने धन और समय दोनों ही को प्रायः व्यर्थ के कामों में नष्ट कर डालते हैं। धनवानों में सब ऐसे ही हैं यह बात नहीं है। अब भी देश के कितने ही सच्चे हितैपी महानुभाव विद्यमान हैं जो धन और समय को वृथा नष्ट नहीं करते, किन्तु ऐसे उदार पुरुषों की संख्या जन तक अधिक न होगी तब तक भारत का कलङ्क न मिटेगा। हम लोगों को एक और भारी रोग यह हो गया है कि विना दूसरे के दोपों का अनुसन्धान किये जी को विश्राम नहीं होता । पर यह नहीं जानते कि इससे हम लोगों की कितनी बड़ी हानि होती है। असल में यह रोग ऐसा बुरा है कि हम लोगों को ऊँची शिक्षा ग्रहण करने के अयोग्य बना डालता है। हम लोगों को जहाँ तक हो सके शीघ्र ही इस व्याधि का प्रतीकार करना चाहिए, नहीं तो यह संक्रामक होकर सबको असमर्थ बना डालेगा। हृदय की दुर्वलता जैसे हम लोगों को दूसरे के गुण-दोष की समालोचना में प्रवृत्त कराती है वैसे ही आत्माभिमान भी हम लोगों को दूसरे के दोपादोप की बातों में उलझाता है। तुद्र-हृदय मनुष्य अपनी चरित्र-गत क्षुद्रता व्यक्तिमात्र में देखता है और उसकी घोषणा करके अपनी क्षुद्रता छिपाने की चेष्टा करता है किन्तु वह मूर्ख यह नहीं समझता कि एक आदमी की हीनता और निन्दा की बात दूसरे के निकट प्रकट करने में क्या लाभ ? जब हम लोग एक ही देश के और एक ही जाति के हैं तब अपने देशवासी की या स्वजाति को निन्दा अपनी ही निन्दा हुई। पर छोटे हृदयवाले मनुष्य .
सातवा परिच्छेद। ऐसा नहीं समझते । वे देश और जाति सबसे अपने को पृध मानते हैं और इसी में वह अपना बड़प्पन समझते हैं। हम लोग पाँच मनुष्य मिलकर साझ का कोई व्यापार नहीं चला सकते । इसका कारण हम लोगों की जातीय दुर्वलता ही है। सब लोग यदि अपनी ही रुचि और अपनी ही प्रसन्नता के सार काम करना चाहें तो साझे का काम चल नहीं मकता । जय तक मतैक्य न होगा तब तक कोई साझे का व्यवहार कर ही नहीं सकता । ई और सन्देह से व्यवसाय में बड़ी वाधा पहुँचती है। यदि परस्पर एक-दूसरे का विश्वास न करे तो जाति-सम्बन्धी एंक्य- भाव समूल नष्ट हो जाय । जिस देश में जातीय सद्भाव का अभाव है वहाँ दीनता का प्रभाव दिन-दिन क्यों न बढ़ेगा? जब तक सभी लोग स्वार्थभाव का त्याग न करेंगे तब तक देश की दशा न सुधरेगी। जब तक हम लोग अपने अभिमान को त्यागकर स्वार्थता का जलालि दे, स्वजातीय लोगों के साथ प्रेम और विश्वास करना न सीखेंगे तब तक भारत की दीन दशा और हन लोगों की जातीय दुर्वलता दूर न होगी। जैसे किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति को अच्छा काम करते हुए देख. कर हर्ष होता है वैसे ही किसी अच्छे व्यक्ति को प्रालस्य की गोद में निद्रित देखकर मन में घृणा उत्पन्न होती है । यह मनुष्यों का एक स्वाभाविक धर्म है । अच्छा काम कैसा हो छोटा क्यों न हो, उसमें महत्व अवश्य रहता है। मान लो कि किसी धनवान व्यक्ति ने किसी चिकित्सालय की सहायतामें एक हजार रुपया दिया, इसमें उनका - १३६ चरित्रगठन। जैसा कुछ महत्व देखा गया, कोई दरिद्र अनाथ बालक सड़क पर पड़ा भूख से व्याकुल हो रो रहा है, उसे उठाकर यदि कोई उसके हाथ में दो पैसे दया-पूर्वक रख दे तो इस काम से इस व्यक्ति का बड़प्पन क्या वैसा न समझा जायगा? ईश्वर को सृष्टि में हम लोग और प्राणियों की अपेक्षा श्रेष्ठ गिने जाते हैं। जब इस संसार में छोटे से छोटे कीड़े-मकोड़े तक किसी न किसी काम में लगे रहते हैं, तब हम लोगों को क्या निश्चेष्ट होकर रहना उचित है ? मनुष्य जब तक किसी काम में प्रवृत्त नहीं होता तब तक उसके हृदय में पूर्णरूप से विकास नहीं होता। जब परिश्रम की आग हृदय में बलने लगती है तब सारी बुरी प्रवृत्तियाँ लकड़ियों की तरह जलकर राख हो जाती हैं। हम लोग जब आलस्य के अधीन होते हैं तभी हम लोगों की चित्त-वृत्ति बुरे कामों की ओर झुकती है और तभी दूसरे की निन्दा, वृथा विवाद और 'हास्य. परिहास प्रादि अनुचित काम करने का हमें अवसर प्राप्त होता है । हम लोग यदि प्रालस्य को दूर कर दें तो सहज ही में जीवन की भविष्य उन्नति प्राप्त हो सकती है। (प्रदीप) हमारी सब प्रकार की उन्नति के मार्ग में आलस्य ही भारी कण्टक है। हम लोगों की समस्त दुर्वलताओं का कारण. आलस्य ही है । आलसी ही लोग अकसर दूसरों की निन्दा किया करते है। जो लोग आलस्य रहित हैं, कर्मवीर हैं, उन्हें ऐसी खोटी बात घोलने का . समय कहाँ ? जो लोग अकर्मण्य हैं, आलसी हैं, वे " - 1 सातवाँ परिच्छेद। १३६ दूसरे की निन्दा करने के साथ ही साध आत्मप्रशंसा करने में भी नहीं चूकते। बड़े खेद का विषय है कि हम लोग आत्मश्लाघारूप कठिन अपराध के अपराधी है। पर-निन्दा की अपेक्षा भी प्रात्म- प्रशंसा करना बड़ा ही घृणा का विषय है, इसका सर्वदा स्मरण रखना चाहिए, किन्तु हम लोग इसे एक प्रकार भूल ही जाते हैं। . . असमर्थता दिखलाना नित्य की कितनी ही व्यावहारिक बातों से जातीय बलाबल का कुछ-कुछ ज्ञान हो जाता है। जिस देश में शक्ति, सामर्थ्य, कार्यदक्षता, निरालस्य, दृढ़ प्रतिज्ञा, प्राशा, उत्साह और जाति- प्रियता है वहाँ के निवासियों के मुँह से प्रायः उन्हीं के सम्बन्ध की बातें निकलती है। किन्तु हम लोगों के देश में क्या स्त्री क्या पुरुप, क्या युवा क्या वृद्ध सभी की बातचीत में प्रालस्य, असम- थता, अकारण अप्रसन्नता, निरुद्योगिता और नैराश्य का भाव कुछ न कुछ प्रकट हो ही जाता है। परस्पर सहानुभूति न. रहने हो के कारण लोग अफसर कहा करते हैं-- "गये तो गये, जाने दो,, इसमें हमारा या तुम्हारा क्या बिगड़ता है। ऐसेही कोई-कोई कहते हैं-"मर जाना ही अच्छा है," "जी कर क्या करूँगा" "मुझे इस संसार में रहना ही के दिन है," "सब छोड़-छाड़कर संन्यासी हो जाना ही अच्छा है" इत्यादि। हम लोगों के समाज में नैराश्य, निरुद्यमता और असन्तोप आदि अवगुण - दिन-दिन बढ़ता ही जाता है । "मैं अक्षम हूँ, मुझसे अब कोई काम नहीं - १४० चरित्रगठन। हो सकता।" इस तरह की बात उन्हीं के मुँह से सुनना कुछ अच्छा लगता है जिनके बाल सफेद हो गये हैं; शरीर का चमड़ा सिकुड़ गया है; आँखों की ज्योति मन्द हो गई है; दाँत विलकुल टूट गये हैं और कानों से कम सुनाई देता है। ऐसे जीर्ण-शीर्ण, वृद्ध यदि अपनी असमर्थता दिखलावें तो वह किसी को अप्रिय नहीं जान पड़ती ; किन्तु यही बात यदि किसी बुद्धिमान युवक के मुंह से निकले तो वह किसे सद्य होगी। विशेषतः यह बात उन लोगों के मुँह से, जो अभी विद्याध्ययन कर रहे हैं, जिन्हें अपना चरित्र सङ्गठित करने का यही मुख्य समय है, जिनको और दूसरा कोई काम नहीं, सुनकर लज्जा को भी लज्जा हो पाती है। किन्तु हमारे देश के छात्रगण यह न समझकर ऐसे अमूल्य समय, को हँसी-खेल में गँवा देते हैं। साधारण कामों में भी कितने ही यह कहकर कि "मुझसे नहीं हो सकता," अपने को प्रालस्य की गोद में छिपाते हैं। कितने ही लोग अपनी इच्छा पूरी न होने, अथवा किसी काम में सफलता प्राप्त न करने के कारण निरुत्साह. दोकर उद्यम करना छोड़ देते हैं। जब आलस्य,उन्हें आ घेरता है तव दैव के भरोसे हाथ पर हाथं धरकर बैठ रहते हैं और कहा करते हैं --"जो देव करेगा, होगा।" इस कातरोक्ति से उनका कोई काम सिद्ध नहीं हो सकता; बल्कि उनकी इस कापुरुपोक्ति का अनुकरण और लोग भी करने लगते हैं । किसी विद्वान् ने कहा है-"भाग-अभाग मनुष्य के दोनों अपने हाथ ।" इसका अभिप्राय यही है कि जैसा उद्योग करोगे सिद्धि भी वैसी हो होगी। हम लोग किश्चित. परिश्रम करके फल अधिक प्राप्त हैं सातवाँ परिच्छेद । १४१ करना चाहते हैं। पर ऐसा होना कब सम्भव है । अन्त में यथेष्ट फल न पाकर हम लोग खेद प्रकाश करने लगते हैं और सुब्ध होते । यह नहीं सोचते कि हमने परिश्रम ही क्या किया था। इस कर्मक्षेत्र संसार में यदि हम लोग महात्माओं के बताये मार्ग पर चलें, प्राणपण से अपने कर्तव्य का पालन करें और आशा कम रक्खें तो अवश्य ही आशातीत फल प्राप्त होगा। अतएव तुम लोग यह बात कभी मुँह से न निकाली कि-"हमसे यह नहीं हो सकता, हम असमर्थ हैं।" "न हो सकेगा" "न हो सकेगा" यह काम भाई, कभी न बोलो अति हीनताई। न क्यों सकोगे कर सो विचारो, अधीरता को मन से निकारो ॥ १ ॥ नहीं बनोगे यदि कर्मवीर, सभी कहेंगे तुमको अधीर । असाहसी को हँसते सभी हैं, न प्रेम जी से करते कभी हैं ॥२॥ हम अध्यवसाय, दृढ़ प्रतिज्ञा और प्रात्मवशता के अभाव से कितनी ही बार कर्तव्य-पालन में असमर्थ होकर कर्तव्य-भ्रष्टता के दोप से दोपी होते हैं, कर्तव्य-मार्ग में जहाँ कोई साधारण भी विन .
* १४२ चरित्रगठन । आ पड़ा तहाँ हम लोग पागे न बढ़ पीछे हट पाते हैं। यहाँ तक किः, कर्तव्य-पालन का संकल्प भी भूल जाते हैं। और अपने साहस और वल को एकदम खो बैठते हैं। भारतवासियों का शारीरिक बल और मानसिक शक्ति उन्नतिशील अँगरेज़ जाति की अपेक्षा न्यून नहीं है किन्तु हम लोग उसे उचित रूप से व्यवहार में लाना नहीं जानते । हम लोगों का उत्साह कुछ ही देर के लिए विकासोन्मुख होकर कुम्हला जाता है। कोई अपनी शक्ति का वाल्यकाल में, कोई युवावस्था में और कोई वृद्धावस्था में विकास दिखलाता है। पुरुष-परम्परा से, समभाव से, या कुछ बड़े उत्साह से, अपने जीवन-पर्यन्त उत्साह-पूर्वक कोई काम कर दिखलाना तो हम लोगों के लिए कल्पना से बाहर की बात हो रही है। कैसा ही कोई विषय क्यों न हो, अधिक देर तक उस पर हम लोगों का चित्त स्थिर नहीं रहता । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण सभा, समाज, सम्प्रदाय आदि हैं। हम लोग जब किसी अच्छे काम में हाथ डालते हैं तब पहले तो असाधारण परिश्रम, पूर्ण उत्साह और बड़ी स्पृहा के साथ काम करते हैं। किन्तु, खेद के साथ कहना पड़ता है कि थोड़े दिनों के वाद हमारा सारा उत्साह और परिश्रम शिथिल हो जाता है । अन्त में जिस उद्देश से वह काम ठाना था उसे. भूलकर "यह काम हमारे किये न होगा, हम इसे पूरा न कर सकेंगे” कहकर हम दूसरे काम की ओर झुक पड़ते हैं । विद्युत की.तरह क्षणस्थायी उद्यमशीलता या उत्साह, एक काम पूरा होते न होते दूसरा काम ठान देना, एक साधारण काम में प्रवृत्त होकर छोटे बालक की तरह हम नहीं कर सकेंगेशकहकर परिश्रम और प्रतिज्ञा सातवाँ:परिच्छेद । १४३ से हट जाना, क्या हमारी जातीय दुर्बलतायें नहीं हैं.? किसी काम ; में जहाँ एक बार निष्फलता हुई तहाँ हम लोग फिर उस पर दृष्टि-पात भी नहीं करते। दो बार की चेष्टा से जिस काम को पूरा नहीं कर सकते, तीसरी यार उसे पूरा करने का प्रयास नहीं करते । "जो दस बार की चेष्टा करने पर भी सिद्ध न होगा उसके लिए सौ बार चेष्टा करेंगे। जो सौ बार की चेष्टा से सम्पन्न न होगा उसके लिए हज़ार वार कोशिश करेंगे, इस काम को हमी पूरा करेंगे, हम इसे विना पूरा किये न छोड़ेंगे, हम अवश्य ही इसे सिद्ध करेंगे।" हम लोगों में इस तरह की बढ़-प्रतिज्ञा करनेवाले बहुत ही कम लोग मिलेंगे । इस भारत के सुसन्तान स्त्री-पुरुष न जाने कप दृढ़प्रतिज्ञ होंगे और कब आपसे अपनी रक्षा करने की शिक्षा प्राप्त करेंगे? . उत्साह "दृढ़ प्रतिज्ञा, अध्यवसाय, यात्मवश्यता और उद्योगपरता से मनुष्य क्या नहीं कर सकता ? जय तुम बरामर परिश्रम करते रहोगे तय सो काम सुम्हें श्राज असाध्य जान पड़ता है वह कल सुसाध्य जान पड़ेगा।" मुग्धबोध व्याकरण के रचयिता प्रसिद्ध वैयाकरण वापदेव बचपन में बड़े ही मन्दबुद्धि थे। उन्हें अपना पाठं बारम्बार यह श्राख्यायिका सन् १८८१ ई. के घामायोधिनी पत्रिका में प्रकाशित "योपदेचेर जीवनी" शीर्षक लेख के अाधार पर लिखी गई है और वामा. चोधिनी के सम्पादक महाशय की याज्ञा से इसमें प्रकाशित हुई है।
१४४ चरित्रगठन । अभ्यास करने पर भी याद न होता था। किन्तु विनीतस्वभाव होने के कारण वे गुरुदेव के विशेष कृपापात्र हो रहे थे । बोपदेव ने बड़े परिश्रम और बड़े यत्न से बहुत दिनों तक व्याकरण के ग्रन्थ पढ़े पर उन्हें कुछ बोध न हुआ। उनके सहपाठी एक-एक कर सभी शब्द-शास्त्र में विद्वान हो गये किन्तु वे कुछ भी शिक्षा-लाभ न कर सके। इससे उनके अध्यापक और वे (घोपदेव ) दोनों ही क्षुब्ध हुए। एक दिन अध्यापक ने पढ़ाते वक्त मीठी बातों में वोप- देव का कुछ तिरस्कार किया, इससे वोपदेव के मन में लज्जा के साथ ही साथ बड़ी ग्लानि हुई। वे मन ही मन सोचने लगे:- "इतना परिश्रम, इतनी चेष्टा से इतने दिनों तक पढ़ा, पर कुछ भी समझ में न आया.। यदि इतने दिनों में कुछ बोध न हुआ तो अब क्या होगा।" यों सेोच-विचारकर वे चुपचाप पाठशाला से चल दिये और उदासीन की तरह इधर-उधर घूमने लगे। गुरु अपने प्रिय विद्यार्थी के वियोग से बड़े दुःखी हुए और यह भी समझ गये कि पाठशाला परित्याग करने का कारण उनका तिर- स्कार ही हुआ। किसी समय वोपदेव चलते-चलते थककर,सरोवर के सामने पेड़ के नीचे बैठ गये। कुछ देर के बाद उन्होंने देखा कि एक युवती मिट्टी के घड़े में पानी भरकर उसे पत्थर की सीढ़ी पर रख. कर सरोवर में स्नान करने लगी। स्नान कर चुकने पर वह उस घड़े को यगल में लेकर, अपने घर को चली। जहाँ वह घड़ा रक्सा था वहाँ रोज़-रोज़ घड़ा रखने के कारण घिसकर कुछ. गड्ढा-सा हो गया था। यह देखकर बोपदेव के मन में एक .
सातवा परिच्छेद। १४५ नवीन भाव का उदय हुमा। वे बड़ी देर तक मन ही मन कुछ 'सोचते रहे, अन्त में उठ खड़े हुए श्रीर प्रसन्न-मन से गुरु के घर लौट आये। अध्यापक अपने प्रिय शिष्य को देख अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने बड़े स्नेद के साथ उनका स्वागत किया। जब बोपदेव स्वस्थ हुए तय अध्यापक ने हर्प से गद्गद होकर वापदेव से इस प्रकार मानसिक परिवर्तन का कारण पूछा । बोपदेव ने सारी घटना आदि से अन्त तक कह सुनाई और कहा-"गुरुजी ! चिरकाल तक घर्पण का फल प्रत्यक्ष देखकर इस समय मुझं अच्छा उपदेश मिल गया। मिट्टी की रगड़ खाते-खातं जम कठिन पत्यर का उस प्रकार घिसना मैंने अपनी आँखों देखा तय सोचा कि बार-बार चेष्टा करने और लगातार परिश्रम करने से मेरी बुद्धि और स्मरण-शक्ति तीक्ष्ण और परिष्कृत क्यों न होगी ?" उस दिन से बोपदेव खूब जी लगाकर असाधारण अध्य- वसाय और परिश्रम के साथ व्याकरण पढ़ने लगे। पहले का मन्द संस्कार उनका नष्ट हो गया । अव उन्हें प्रत्येक सुत्र का भाव भली । भाँति समझ में आने लगा। थोड़े ही दिनों में बोपदेव ने व्याकरण- शास्त्र में असाधारण योग्यता प्राप्त कर ली। बोपदेव ने पाणिनि का व्याकरण बहुत बड़ा और दुरवगम्य देखकर सुगम मुग्धबोध व्याकरण वनाया। बोपदेव यह ग्रन्ध बनाकर अपना नाम अमर कर गये। यदि वे सूत्रों का विवरण स्वयं न लिख जाते. तो उतका तात्पर्य कितने ही विद्वानों की समझ में प्रायः न आता । मुग्धवोध व्याकरण सुगम होने के कारण सबको पसन्द प्राया और इसी से इसका इतना अधिक.प्रचार हुआ। जिस व्याकरण की टीका लिख- M १४६ चरित्रगठन । कर राम तर्कवागीश प्रभृति विद्वानों ने असाधारण पाण्डित्य को प्रतिष्ठा पाई, वह मुग्धबोध वोपदेव ने मन्द-बुद्धि बालकों के लिए लिखा था। "अब मुझे कुछ न आवेगा" कहकर जो पाठशाला छोड़कर चले गये थे, जो अपनी मन्दबुद्धि के कारण गुरु से तिर- स्कृत हुए थे, उन्हीं ने फिर परिश्रम करके कैसी अच्छो योग्यता प्राप्त की, इसे एक बार विचारकर देखो । अध्यवसाय का क्या ही अद्भुत प्रभाव है! बार-बार अनुशीलन करने का चमत्कार क्या ही विलक्षण है !! आत्मवशता और हद-प्रतिज्ञा की क्या हो असा- धारण शक्ति है !! मार्किन युक्तराज्य के प्रेसीडेंट गारफ़ोल्ड बड़े ही स्वतन्त्र चित्त के मनुष्य थे। हम से यह काम न हो सकेगा। यह वाक्य उनके मुँह से कभी किसी ने नहीं सुना । एक वार उनके ऊपर एक अत्यन्त कठिन काम का भार आ पड़ा, तब उनकी माँ ने उनसे कहा-"जेम्स, जो कोई काम करना हो पहले यह सोच लेना चाहिए कि यह हमसे होगा या नहीं। 'हाँ, या ना, कुछ स्थिर हो जाने पर जान लो.कि आधा काम सम्पन्न हुआ। मेरे पिता हम लोगों को अकसर यह कहकर उपदेश दिया करते थे कि "मन माने तो हूँदो उपाय " जेम्स अपनी मां के इस उपदेश और उत्साहवाक्य को अपने जीवन में कभी न भूले । वे माता के बड़े ही भक्त थे । मातृभक्ति ने ही उन्हें संसार में इतने उन्नत पद पर पहुँचाया था । उनको अपनी उन्नति का मार्ग सुगम करने के लिए कोई सामग्रो न घी । उनका बाल्यकाल बड़े ही.कष्ट से कटा था, किन्तु वे अपने उद्योग और -- सातवा. परिच्छेद । १४७ बुद्धि से दरिद्र सन्तान होकर भी सबसे उच्च पद का अधिकार हस्तगत कर सके। वे आत्मपौरुप के गुण से कठिन से कठिन काम सम्पन्न करने में समर्थ हुए थे। उनके विशुद्ध चरित्र ने और उनकी मातृ-भक्ति ने उनके सभी प्रभावों को दूर कर उनके हृदय में असाधारण शक्ति का सञ्चार कर दिया था। "जो किसी अच्छे काम में आप प्रवृत्त होता है, उसकी सहा- यता ईश्वर करते हैं। यह उपदेश माँ के मुँह से बचपन में मातृभक्त गारफील्ड को बराबर सुनने में प्राता था । घुद्धिमती माँ का उपदेश गारफील्ड कभी न भूले । R - विनयकुमार की प्रतियोगिता अँगरेज़ी के किसी विद्वान् की उक्ति है-"लक्ष्य से कुछ ऊपर दृष्टि स्थापित करो नहीं तो लक्ष्यभ्रष्ट होगे।" इस उक्ति को अच्छी तरह समझकर काम करने से प्रायः विफलता न होगी। तुम किसी अवस्था में क्यों न रहो, इस अमूल्य उपदेश-वाक्य का स्मरण करके काम करोगे तो अपने अभीष्ट को ज़रूर पूरा कर सकोगे । शिक्षा, शिल्प, वाणिज्य प्रादि उच्च विभाग की तो कोई बात ही नहीं; साधारण बात ही में इसकी सत्यता का प्रमाण मिल जाता है। समतल भूमि से ज़रा ऊँचे खड़े होकर देखने में और लोगों की अपेक्षा अवश्य ही कुछ अधिक सूझता है। खेल की जगह में यदि तुम अन्यान्य वालकों से अच्छा खेल चरित्रगठन । करना जानते हो तो तुम्हारा स्थान सवको अपेक्षा ऊपर होगा. पीछे तुम कदाचित् उन लड़कों के साथ न खेलो, इस समय से । तुम्हें कभी अप्रसन्न न होने देंगे। तुम्हारे अनेक उपद्रव को वे खुर्शी से सह लेंगे और तुमको प्रादर्श मानकर तुम्हारे ही सहश नाम पाने का अभिलापा करेंगे । जब तुम्हारे साथी तुम्हारे बराबर मान पैदा करना चाहते हैं तब तुम्हें अपना लक्ष्य कुछ और ऊँचा बनान चाहिए। ऐसी अवस्था में वे तुम्हारे साथी तुम्हारी बराबरी न कर सकेंगे। तुम उन लोगों प्रधान के प्रधान बने ही रहोगे और वे बालक तुम्हारा उसी तरह आदर-सत्कार करेंगे। कलकत्ते के किसी कालेज में नरेन्द्र और रमेशचन्द्र ये दो विद्यार्थी एक ही कक्षा में पढ़ते थे। दोनों विद्यार्थी प्रति वर्ष परीक्षा में प्रथम और द्वितीय होते थे। सहपाठियों में उन दोनों की बरावरी कोई नहीं कर सकता था। वे दोनों छात्र अपने निर्मल चरित्र और मेधाशक्ति के द्वारा अध्यापकगणों के अत्यन्त प्रिय हो रहे थे। उन दोनों से कुछ भूल भी हो जाती थी तो उसे अध्या- पकगण क्षमा कर देते थे। जिस कक्षा में नरेन्द्र और रमेश पढ़ते थे उसमें सात-आठ विद्यार्थी और भी निम्न श्रेणी से तरको पाकर उनके साथ पढ़ रहे थे । वे सब विद्यार्थी भी बुद्धिमान और परिश्रमी, थे परन्तु नरेन्द्र और रमेश के बराबर न होने के कारण उनके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। ईर्ष्या उत्पन्न हुई इतनी हो; अपनी त्रुटि पृर्ति करने अथवा परीक्षा में उन दोनों से बढ़ जाने की चेष्टा उन लोगों ने न की । केवल यही सोचने लगे कि-"हम लोग इतना परिश्रम करते जी लगाकर अपना पाठ अभ्यास करते हैं; परीक्षा के सातवां परिच्छेद। १४६ समय सभी प्रश्नों के ठीक-ठोक उत्तर लिख पाते हैं; तय न मालूम नरेन्द्र और रमेश सर्वप्रधान कैसे हो जाते हैं । इन दोनों पर अध्या- पकों की विशेष कृपा है इसी से परीक्षा में ये दोनों प्रधानताप्राप्त करते हैं। नहीं तो जवाब क्या हम लोग उनसे बुरा देते हैं ?" इस प्रकार के ईर्ष्यायुक्त सोच-विचार और तर्कवितर्क से उन लोगों के पढ़ने में किसी समय व्यर्थ का विन्न प्रा खड़ा होता था। उन वालकों में विनयकुमार नाम का एक विद्यार्थी बड़ा ही बुद्धिमान था। उसने एक दिन अपने मन में सोचा-"नरेन्द्र और रमेश प्रतिवर्ष परीक्षा में प्रथम और द्वितीय होते हैं इसका कारण क्या ? उन दोनों को अध्यापकगण इतना क्यों मानते हैं ? इसका कोई विशेष कारण अवश्य होगा। पहले उस कारण को जानना चाहिए। यह सोच कर विनय प्रति दिन रमेश और नरेन्द्र के हर एक काम, यावचीत और चाल-चलन को ध्यान-पूर्वक देखने लगा। उन दोनों के साथ उसने बड़ी घनिष्ठता को और किस समय वे दोनों कौन काम करते थे, कितनी देर पढ़ते थे, कितनी देर हँसी-खेल में बिताते थे, और छुट्टी के समय को किस तरह विताते थे, इन सब बातों का पता उसने लगा लिया । जब उन दोनों के प्राज्ञिक कृत्य से विनय भली भाँति परिचित हो गया तब एक दिन अपनी कोठरी में बैठकर एकाम मन से विचारने लगा--"जिस तरह में पढ़ रहा हूँ इस तरह पढ़ने से उन्नति की कोई पाशा नहीं है । रमेश और नरेन्द्र का जो कुछ व्यवहार देखा है वही उन्नति का वास्तविक मार्ग है वे दोनों अपने समय को क्षणभर भी वृथा नहीं जाने देते। काम के समय अपना कर्तव्य भूलकर कभी किसी के साथ बातचीत fis चरित्रंगठन। प्रसन्न होगा, नयनादि इन्द्रियगण तृप्त होंगे। इसी को पुरस्कार समझो । यदि उस काम से तत्काल विशेष लाभ न हो तो इससे अधीर न हो, किसी न किसी दिन तुम्हें अपने कर्म का यथेष्ट फल मिल हो जायगा। "न हि किञ्चित्कृतं कर्म लोके भवति निष्फलम् ! अर्थात् "किया हुआ कोई काम कभी निष्फल नहीं होता। किसी अच्छे काम को तुम भली भाँति पूरा कर सकोगे तो वही तुम्हारे लिए पुरस्कार होगा।" उन कामों को भूलकर भी न करो जो नीति-विरुद्ध हो । याद रक्खा जो काम बुरा उसका परिणाम फी अच्छा नहीं हो सकता । बबूल के पेड़ में श्राम कभी नहीं फल सकता । जो लोग बुरा काम करते हैं उन्हें अन्त में परिताप के सिवा कुछ हाथ नहीं आता। अपकर्म करने से शारीरिक और मानसिक अनेक हानियाँ होती हैं और लोगों में निन्दा होती है। अपकर्मियों का सभ्य समाज में कहीं आदर नहीं होता और उन्हें सब लोग घृणा की दृष्टि से देखते हैं। एक सज्जन बंगाली इंगलैंड से स्वीज़रलैंड देश देखने गये थे, वहाँ के एक प्रधान शहर के रेलवे स्टेशन पर उतरे और एक कुली को पुकारा। कुली ने आकर उनकी गठरी कन्धे पर लं ली। बंगाली ने उससे किसी होटल में ले चलने को कहा । वह उनको अपने साथ लेकर चला। उस कुली ने रास्ते में उनसे पूछा- किस देश के रहनेवाले हैं ? आपका स्वरूप देखकर यह नहीं मालूम होता कि आप किस देश के निवासी हैं।" वाबू-"मैं भारतवर्ष का निवासी हूँ।" "आप - सातवाँ परिच्छेद । १५७ कुली-"मैं आपसे एक और वात पूछना चाहता हूँ। क्या आप कृपा करके मेरे प्रश्न का उत्तर देंगे?" बाबू-"तुम्हें जो कुछ पृछना हो पूछ सकते हो। मैं यथा- साध्य उत्तर दूंगा।" तब कुली उनके साथ वार्तालाप करने लगा। कुली की विज्ञता-भरी बातचीत सुनकर बाबू ने विस्मित होकर कहा- "तुम पढ़े-लिखे लोगों की तरह वात कर रहे हो, फिर कुली का काम क्यों करते हो ?" कुली ने कहा-"दूसरे फा गलग्रह होने की अपेक्षा कुली का काम करना मैं अच्छा समझता हूँ आज मैं कुली का काम कर रहा हूँ। कोई दिन ऐसा भी पा सकता है जिस दिन मैं साधारण-तन्त्र का सभापति भी हो सकता हूँ" खोज़रलैंड का कुली विद्वान् होकर भी गठरी ढोकर जीवन- निर्वाह करता है । दूसरे का गलग्रह होकर कुक्कुरोपादेय पिण्ड से जीवन विताना अच्छा न समझकर कुली का काम करना अच्छा समझता है। यह क्या बड़प्पन की बात नहीं है ? किसानों का काम, बढ़ई का काम, कुम्हार का काम, कुली का काम और इस तरह के जितने काम हैं, निन्द्य नहीं हैं-ये सब काम मनुष्यों के उपयोगी हैं । जो काम शारीरिक परिश्रम से सम्बन्ध रखता हो और लोकोपकारी हो, वह काम बुरा नहीं है। जो काम नीति- विरुद्ध है वही बुरा है। दूसरे का गलग्रह होने की अपेक्षा कुली होना ही अच्छा है। कोई व्यावहारिक काम करके जीवन-निर्वाह - .
चरित्रगठन । . करना कलङ्क का विषय नहीं है। कलङ्क और नीचता बुरे कामों के करने में है। काम करने की योग्यता रखने पर दूसरे का आश्रित होना भी नीचता है। (प्रदीप) जितनी उन्नतिशील जातियाँ हैं, सवों ने कर्म का माहात्म्य स्वीकार किया है। भारतवर्ष की तरह यूरोप में भीख मांगने की प्रथा नहीं है और वहाँ भीख लेना जैसा लज्जा-जनक और हीनता- सूचक है वैसा ही भिक्षा देना भी आलस्य का सहारा देना कह- कर अपराध में परिगणित है। इसी से यूरोप और अमेरिका में किसी को भिखारी कहना सख्त गाली में गिना जाता है । अमेरिका के बड़े-बड़े कालेजों के कितने ही दरिद्र विद्यार्थी गरमी की छुट्टी के दिनों में गाड़ी हाँककर, नाट्यशाला में कोई काम करके, धर्म- मन्दिर में घण्टा वजाकर और और भी ऐसे कितने ही काम करके : रुपया कमाते हैं और उन रुपयों से कालेज का खर्च चलाते हैं। इसमें वे लोग लज्जा नहीं करते। किन्तु दूसरे का गलग्रह होना अथवा दूसरे का उपार्जित धन भिक्षा करके लेना वे अवश्य लज्जा का विषय समझते हैं। इस प्रालस्य-प्रधान भारत देश के निवा- सियों में यह भाव जाग्रत नहीं होता, इसी से दूसरे का गलप्रह होना लोग 'कलङ्क नहीं समझते। कोई काम करकं अपना जीवन निर्वाह करना महत्व की बात है। पर वे इस पर भी ध्यान नहीं देते।
. पाकर साता परिच्छेद । कर्म-माहात्म्य सुनो सफल भारत-सन्तान, करो फर्म जिससे दो मान । सब सुख का कारण है कर्म, यही मुख्य मानव का धर्म ॥१॥ पराधीन किंवा स्वाधीन, हो धनाढ्य अथवा अति दीन । फरी सुकर्म धर्म में लीन, होकर नित पालस्यविहीन ॥२॥ जितने हुए वीर-वर धीर, ज्ञानी ऋपि मुनि विमल-शरार । सो जानहु सब कर्म-प्रभाव, फर्महोन को सभी अभाव ||३|| यह दुर्लभ नर-देह, बना नहीं आलस का गेह । जय तक रहे देह में प्रान, तब तक करो कर्म-सम्मान ॥४॥ सब सुख-सिद्धि फर्मवश जान, करो न कभी फर्म-अपमान। योग यज्ञ अरु जप तप ध्यान, सबका है शुभ कर्म निदान ॥५॥ जितने हैं जड़ जीव जहान, भले बुरे गुन अवगुन खांन । उन सबके प्रति हेतु महान, फर्म शुभाशुभ एक प्रधान ॥६॥ फल सुकर्म का है सुखभोग, पाते हैं सवं सज्जन लोग। । जो कुकर्म में देते योग, वे पाते दुख दारिद रोग ॥७॥ जो चाहो अपना कल्याण, नित सुकर्म पर रक्खो ध्यान । सुजन कर्म करके तज शोक, लेते बना. लोक परलोक ।।८।। मृतक प्रालसी एक समान, कर न सक कुछ कर्म-विधान । इससे नित स्वशक्ति अनुसार, करो कर्म कुछ नीति विचार भाग्य-दोप दे कितने लोग, दुख पाते तज फर उद्योग । जो करते व्यापार, कभी न वे पाते दुख-भार ॥१०॥ , उद्यम १६० चरित्रगठन । उद्यम है सब सुख का मूल, देता मिटा हृदय का शुल ! इससे उद्यम करो . महान, पाओगे दिन दिन सम्मान ॥११॥ करो नित्य दैहिक व्यायाम, होगा तन सुडौल वल-धाम । करो मानसिक श्रम अभ्यास, दिन दिन होगा बुद्धि-विकास||१२|| खेती करो बनज-व्यापार, जिससे खुले लाभ का द्वार। पहले पालो निज-परिवार, पीछे करो देश-उपकार ॥१३॥ देकर तुम दोनों को दान, करो न मन में कुछ अभिमान ! दुष्ट जनों से करो न प्रीति, गहो सदा सजन की रीति ॥१४॥ सबके साथ उचित व्यवहार, करके वनो विनय - आगार । खुश होकर सारा संसार, तुमको सदा करंगा प्यार ॥१५॥ .
अाठवाँ परिच्छेद । , जन्मभूमि "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।" परस्पर विद्वेष जाति के लिए जैसा कलङ्क है वैसा ही स्वदेशानुराग जाति के लिए गौरव है। स्वजाति-विद्वेप हृदय को नीच से नीचतर बना देता है और स्वदेश का प्रेम हृदय को प्रशस्त और उन्नत करता है। मान्यवर महात्मा भूदेव मुखोपाध्याय ने, अपनी पुस्तक में, किसी जगह लिखा है। "जो लोग अपने देश और अपनी जाति में पूर्ण प्रेम रखते हैं, उन्हें मनुष्यों में देवता समझना चाहिए।" भारत देश में भिन्न-भिन्न जाति के लोग हैं, भाषा भिन्न-भिन्न है, प्राचार-व्यवहार भी पृथक-पृथक हैं और जल-वायु भी सर्वत्र एक-सा नहीं है। एक ही देश में इतनी जाति-विभिन्नता और व्यवहार-विभेद देखकर विशेष कुतूहल उत्पन्न होता है। अन्य जातियों में इस प्रकार की विभि. नता रहते भी भारतवासियों की अपेक्षा स्वदेशानुराग अधिक देखने में माता है। स्काटलैंड के रहनेवाले कोई अँगरेज़ वेल्सनिवासी अँगरेज़ को स्वजाति कहकर पुकारने में कुण्ठित नहीं होते, किन्तु एक गुजराती एक बङ्गाली को स्वजाति न कहेगा । यद्यपि दोनों हिन्दुधर्मावलम्बी हैं और दोनों ही एक ही उपदेश-पथ के पधिक है। जब दोनों ही एक धर्म के उपासक हैं, एक .
चरित्रगठन। १६२ देश के निवासी हैं और दोनों ही. को मूल भाषा (संस्कृत) एक है, तब केवल प्रादेशिक भाषा के भेद से अथवा पहनावे-पोढ़ावे की विभिन्नता से अपने को अलग-अलग मानना अनुचित है। जो लोग इस प्रकार की परस्पर भेद-बुद्धि रखते हैं वे जन्म-भूमि का अर्थ नहीं समझते । यदि जन्म-भूमि का अर्घ ठीक-ठीक उन्हें मालूम हो जाय तो ऐसी भेद-बुद्धि न रहने पावे । ऐसा कभी न समझो कि जिस घर में, जिस गाँव में, अथवा जिस प्रदेश में तुमने जन्म प्रहण किया है वही स्थानमात्र तुम्हारी जन्म-भूमि है। हम लोगों की जन्म-भूमि बहुत बड़ी है। तुम चारों और जो कुछ देख रहे हो, चारों ओर से जिनके वीच तुम घिरे हुए हो, धानों से हरे-भरे खेत, नाना प्रकार के फलों से भरपूर वाग, बड़े विस्तृत मैदान, घने जङ्गल, भाँति-भाँति के सरोवर और नदियाँ, बड़े-बड़े ऊँचे विन्ध्य-हिमालय प्रादि पर्वत, राजधानी की अनेका- नेक ऊँची अटारियों से लेकर गाँव के छोटे-छोटे तृणकुटीर तक, अतुल धन-सम्पत्ति के अधिकारी राजा-महाराजा से लेकर दुर्भिक्षपीड़ित अस्थिचर्मावशेष स्त्री-पुरुप पर्यन्त, दा-एक सुखी जनों का आनन्दोत्सव और शत-सहस्र दुखियों का एक साथ आर्तनाद करना, थोड़ा-पहुत बनज-व्यापार और अधिकतर खेती-ये सब तुम्हारे जन्म भूमि के अन्तर्गत हैं। हम लोगों के माँ, बाप, भाई, बहन, चचा, भतीजा, मामा और भानजे प्रादि जितने परिवार के लोग हैं और जितने पड़ोसी हैं, उन सबके साथ प्रेम, सद्भाव और मधुर भाषण का अवसर जो हमें प्राप्त होता है वह जन्म-भूमि की ही बदौलत । सुख की जितनी सामग्रियाँ है हम - . .
- आठवा परिच्छेद। १६३ लोगों को जन्म भूमि के द्वारा प्राप्त हो सकती हैं। प्रतएव हम लोग जिस पृज्य दृष्टि से अपनी माता को देखते हैं उचित है कि उसी दृष्टि से जन्म-भूमि को भी देखें । हम लोग सभी इसी भारत- माता को सन्तान हैं। सन्तानों के द्वारा पूजा पाने का जितना अधिकार मो को है उतना ही जन्म-भूमि को है । आज तक जितने पराक्रमी, महाशक्तिशाली मम्राट् हुए हैं, जितने महान् वीर, धीर, धार्मिक पुरुषों ने संसार में जन्म लिया है और जो मनुष्य-समाज में देवता की तरह पूज्य दृष्टि से देखे जा चुके हैं; क्या उनमें तुम ऐसे एक व्यक्ति का भी नाम यतला सकते हो जो मातृ-भक्तन रहे हो ? तुम सैकड़ों पुराण कं और हज़ारों इतिहास-प्रन्य के पन्ने उलटकर देखोमातृभक्ति-विहीन या स्वदेश-विद्वेषी एक व्यक्ति का भी नाम कहीं न पानागं । जो मातृभक्त नहीं हैं, जिन्हें जन्म-भूमि में अनुराग नहीं है, वे कदापि बड़ाई नहीं पा सकते । वे मान्यमण्डली में कभी परि- गणित नहीं हो सकते। द्वापर में धर्मप्रवीर युधिष्ठिर आदि और कलिकाल के ऐति- हासिक महावीर एलेकर्जेन्डर, महाप्राज्ञ पिटर, वाल्स, वाशिंगटन, गारफ़ोल्ड, और भारतीय वीरवर शिवाजी, महात्मा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, रामगोपाल घोष, आदि कितने ही जननी और जन्म-भूमि की सेवा कर गये हैं। जो संसार में बड़े होते हैं वे माता और मातृभूमि की सेवा से कभी पराङ मुख , नहीं होते। अतएव मनुष्यमात्र का, कर्तव्य है कि मातृ-सेवा के साथ ही साथ जहाँ तक हो सके जन्म-भूमि का भी उपकार कर । - चरित्रगठन ।" स्वदेशानुराग जन्म-भूमि ही की दूसरी संज्ञा स्वदेश है। आजकल कितने ही अनभिज्ञ जन स्वदेशानुराग का अर्घ विगाड़कर देश के अनेक अनिष्ट साधन में प्रवृत्त हो रहे हैं। विदेशियों को गाली देने अथवा प्रच: लित राजशासन के विरुद्ध कोई काम करने, किंवा सामाजिक नियम के विरुद्ध आन्दोलन करने से स्वदेशानुराग प्रकट नहीं होता। जन्म- भूमि के जो सच्चे हितैषी हैं वे ऐसा काम कभी नहीं करते । देश के अंश में जो हितकर कार्य है उसका अनुष्ठान करना और जो हानिकारी है उसके प्रतिकार का नीति-सम्मत यत्न करना स्वदेश-प्रेमी पुरुषों का कर्तव्य है, किन्तु देशसुधार का कोई अच्छा प्रयत्न न कर केवल सुधार-सुधार चिल्लाने से कोई फल नहीं होता। जो यथार्थ में स्वदेशानुरागी और स्वजाति-हितैपी हैं, वे स्वदेश के बाहरी सौन्दर्य बढ़ाने पर चा सुनीति-सम्मत नियमावली पर या कठोर शासन पद्धति पर लक्ष्य नहीं रखते। वे.सामाजिक बाह्य नियमों पर भी मनोयोग न देकर सामाजिक मनुष्यों के हृदय की उन्नति और उनके चरित्र- सुधार की ओर विशेप ध्यान देते हैं। देशवासी लोग जब तक सत्य- वादी, शिष्ट और कर्तव्य-परायण न होंगे तब तक हज़ार कठोर नियमों का पालन करके तथा विशेष विद्या, रत्न प्राप्त करके भी देश को उन्नत दशा में न ला सकेंगे। राजा के. कठोर शासन से भी बढ़कर प्रात्म-शासन आवश्यक है। जो अपनी ही रक्षा करने में असमर्थ है वह दूसरे की रक्षा कहाँ तक कर सकता है ? दूसरे की उन्नति देखकर हृदय में विद्वेष-भाव का उदय , बुद्धि और प्रचुर धन- 1 आठवाँ परिच्छेद। होना अत्यन्त गर्हित है। जो उच्च हृदय के मनुष्य हैं उनके हृदय में ऐसा विद्वेष उत्पन्न नहीं होता। वे गुण का ग्रहण करते हैं, दोषों का त्याग करते हैं, और जिससे उन्हें कल्याण की प्राशा होती है उसका आदर करते हैं और जिससे अमङ्गल होने की सम्भावना देखते हैं उससे विरत होते हैं। महान् पुरुपों का यही कर्तव्य है। विजातियों को निन्दा करने और उन लोगों के साथ अशिष्ट व्यव- हार करने से हृदय इतना संकीर्ण हो जाता है कि मनुष्यत्व और महत्व दोनों एक साथ लुप्त हो जाते हैं और उदारता की सब बातें एक-एक करके हृदय से बाहर हो जाती हैं। हृदय का भाव वात से और कामों से प्रत्यक्ष होता है। अन्य- देश-वासी काम देखकर ही प्रशंसा वा निन्दा, श्रद्धा अथवा घृणा करते हैं। जो लोग ईविश दूसरी. उन्नत जाति के साथ सदय व्यवहार करने से मुंह छिपाते हैं और जिन्हें मारे अभिमान के अपने जाति-गत दोप और अन्य जातियों के गुण नहीं सूझते वे स्वदेशानुरागी नहीं कहला सकते, बल्कि वे भारत-माता की अयोग्य सन्तान और स्वदेशविद्वेपी कहलाने योग्य हैं। मनुष्यों का यह एक स्वाभाविक धर्म है कि सभी देशवासी अपने-अपने देश का हित चाहते हैं । क्या धनी, क्या दरिद्र, क्या संसारी, क्या विरक्त, बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री सभी अपने-अपने देश को प्यार को दृष्टि से देखते हैं। जो जाति पराधीन है उसे भी अपने देश का अनुराग होता है। अनुराग की सार्थकता तभी है.जब उचित रीति से अपने देश का उपकार किया जाय । जो लोग प्रयुक्त रीति से देश का उपकार करना चाहते हैं वे वास्तव में उपकार न । , १६६ चरित्रगठन । करकं देश का अपकार ही करते हैं। यदि सब लोग, नाति- नियमानुसार देश का उपकार करना चाहें तो देश का बहुत कुछ उपकार कर सकते हैं। जो पड़ासी अपने पड़ोसवालों का साहाय्य करते हैं; जो माँ. बाप अपनी सन्तति को सञ्चरित्र और सुशिक्षित बनाते हैं, जो अध्यापक विद्यार्थियों को अपने पुत्र के समान जान विद्यादान देते है और उन्हें स्वदेशानुराग का प्रकृत अर्थ और स्वजाति-प्रीति का महत्व बतलाते हैं तथा सुशिक्षा, सुनीति के द्वारा उनके चरित्र सुधारते हैं; जो बालक अपने गुरुजनों के आज्ञाकारी, सत्यभापी, और सञ्चरित्र हैं और जो लोग जन्म भूमि का अमङ्गल अपना ही अमङ्गल. समझते हैं, वे ही स्वदेश के सच्चे प्रिय-पात्र हैं। H आदर्श पुरुष जिस देश के आदर्श पुरुष जैसे होते हैं, उस देश की उन्नति तदनुरूप ही होती है। महापुरुषों के प्रादर्श-स्वरूप जीवन चरित्र की देखा-देखी जातीय जीवन गठित होता है। आदर्श पुरुप उन हृदय के हुए तो जाति उन्नत होती और आदर्श नीच प्रकृति के हुए तो जाति की अवनति होती है। इसी से भिन्न-भिन्न देशवासियों की शिक्षा, सभ्यता, भाव, कल्पना, बुद्धि, मानसिक भावना और. संस्कार भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं। संसार में ऐसा कोई देश नहीं है.. जो सामाजिक, राजनैतिक, सांसारिक, पारमार्थिक, दैदिक और मानसिक प्रादि सभी विषयों में सर्वोच्च प्रादर्श बन सके। कहीं मान- . 1.
- , - . आठवां परिच्छंद। १६७ सिक, फहीं शारीरिक, कहीं मना-विज्ञान और कहीं जड़-विज्ञान की विशेष रूप से उन्नति होती है। अतएव देशकाल का विचार न करकं, जिस समय जिस देश के जो सर्वोपरि सर्वमान्य प्रादर्श हो, टनकं प्रशस्त गुणों का ग्रहण करना सर्वथा उचित है। ऐसा कोई समाज नहीं है जिसमें कुछ न कुछ दोप न पाया जाय । ऐसी कोई नीति, शिक्षा और संस्कार नहीं जो सर्वघा भ्रान्ति-रहित हो; भ्रान्ति तो हमारे पग-पग में उपस्थित है। . प्राचीन आर्यगणों के ज्ञान, प्रेम, विश्वास, गुरुभक्ति, शिष्टता, सरलता, सत्य-परायणता, निःस्वार्थता, स्वधर्मानुराग, स्वजाति- प्रियता, स्वदेशानुराग, राजभक्ति और भगवद्भक्ति हम लोगों के लिए आदर्श हैं। हम लोग जो इन पादों को सर्वतोभाव से ग्रहण नहीं करतं यह हम लोगों को भूल है। यद्यपि भारतवासी वाल्मीकि आदि महर्पिगणों के, श्रीरामचन्द्र, विदेह, युधिष्ठिर प्रादि महाराजों के, भीष्म-प्रभृति वीरगणों के, लक्ष्मण, भीम, अर्जुन आदि भ्रातृगणों के सचरित से शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं, तथा भारत की ललनायें श्रीसीता, सावित्री, दमयन्ती आदि पतित्रताओं के प्राचरण से पति-भक्ति की शिक्षा पा सकती है तथापि ग्लैडष्टोन, विलवरफोर्स, वाशिंगटन, गारफील्ड, म्याजिनी, वेल्स, महाविज्ञ अलफड, पिटर, घिउडर पार्कर, और एमर्सन-प्रभृति महानुभावों के सद्व्यवहार से भी सभी देशवासी कुछ न कुछ शिक्षा ज़रूर पा सकते हैं। हम लोग जैसे अपनी जन्म-भूमि का अनन्त ज्ञान का भण्डार मानते हैं, प्राचीन आर्यगणों के पवित्र जीवन पर गर्व करते हैं और अन्य देशवासियों से उँगली दिखाकर कहते हैं कि "संसार में ऐसे-ऐसे १२ चरित्रगठन । , वृद्धावस्था अमूल्य पुरुप-रत्न और देशों में कहाँ पाइयेगा। किन्तु अन्यान्य देश जिन स्वदेशीय प्रादर्श पुरुषों के प्रभाव से प्रत्यन्त उन्नत अवस्था में प्राप्त हुए हैं और अपने अनेकानेक कला-कौशल की प्रभा से संसार को देदीप्यमान कर रहे हैं वे भी उन अादर्श पुरुपों पर, उनकी गुणा- वली पर, उनके विज्ञानशास्त्र-द्वारा नये-नये आविष्कार पर, भारत की दृष्टि प्रार्पण कर स्पर्धा-पूर्वक कह सकते हैं कि "पाश्चात्य संसार के ये अपूर्व और अलभ्य पारस तुम लोगों के देश में कहाँ हैं ? हम लोगों का यह उद्यम, व्यवसाय, ऐक्यभाव, गुणगवेपणा, साहस, जाति-प्रियता तुम लोगों में कहाँ है ? हम लोगों में जो उन्नति की इच्छा और ऊँचा खयाल रोमरोम में भरा है, होने पर भी हम लोगों को जो श्रम-सहिष्णुता, ज्ञान प्राप्त करने की अभिलाषा और एकाग्रता रहती है, वह तुम लोगों के देश में, तुम लोगों के समाज में, तुम लोगों के श्रमभीरु युवा-पुरुपों में कहाँ है ?" अपने देश के प्राचीन-कालिक गुण-गौरव पर फूलकर निश्चेष्ट भाव से बैठे रहने से कुछ न होगा । जोगुण विदेशियों में उत्तम हैं वे उनसे ग्रहण करी। जो गुण देशोपकारी हैं, जो असत्य से सम्बन्ध नहीं रखते, उन्हें ग्रहण करने में कोई लज्जा नहीं। किन्तु ऐसा भी फरना उचित नहीं कि जो रत्न तुम्हारे भण्डार में मौजूद हैं उन्हें दूर फेंककर और उन पर घृणा की दृष्टि डालकर देश-देशान्तर से रत्न लाकर भण्डार भरो । इससे भी तुम कृतकार्य न हो सकोगे। तुम लोगों का जो अपना जातीय गौरव है, जिस गौरव से संसार को सभी जातियों में तुम प्रतिष्ठित गिने जाते हो और जिस अमृत- मय विद्वत्ता को देश-देशान्तर के विद्वान अब भी लालच-भरी दृष्टि . , प्राठवाँ परिच्छेद। . से देख रहे हैं। पहले इन सब गुणों के अधिकारी हो लो, पहले अपने घर को सँभाल लो, तब देशान्तरीय गुणों का भी संग्रह, जहाँ तक हो सके, ज़रूर करो । युवक छात्रगण ! तुम लोग वाशिंगटन और म्याज़िनी का जीवन-चरित्र जी लगाकर पढ़ो। देश, काल और पात्र के अनुसार गुणियों का प्रादर करना और उनके गुणों का अनुकरण करना दोष नहीं है। वरन् प्रशंसा ही है। किन्तु अपने घर के पास, अपनी आँखों के सामने, जो महात्माओं के सुचरित्र विद्य- मान हैं उन पर तुम उदासीनता प्रकट न करो। तुम लोगों के जातीय गौरव-स्वरूप महात्माराममोहन राय,ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, भूदेव मुखोपाध्याय, राजनारायण वसु और कृष्णदास पाल आदि जितने महान पुरुप अवतीर्ण हुए हैं, उनके आदर्श पवित्र चरित्र को कभी न भूलो । जो आदर्श तुम्हारे सामने विद्यमान हैं जिनका अनुकरण तुम बड़ी सुगमता से कर सकते हो, सुलभ.प्रादर्शो की उपेक्षा कर केवल वैदेशिक प्रादर्श का अनुकरण करने से तुम उनकी घराबरी नहीं कर सकते । तुम लोगों के देश का जल-वायु, तुम लोगों का समाज, शिक्षा, संस्कार और अवस्था आदि सभी विदेशियों से विलक्षण हैं। प्रतएव विदेशी महात्माओं का सम्पूर्ण रूप से अनुकरण करना कभी हितकर नहीं हो सकता । तुम तभी उन्नत हो सकते हो और अपनी जाति का भी कुछ कल्याण तभी कर सकते हो जब तुम अपने देशवासी सज्जन महात्माओं के बवाये पथ पर चलोगे । तुम अब बिलकुल बालक ही नहीं हो, युवापन की सीमा में पाँव रख चुके हो । शिक्षा भी पा रहे हो । शिक्षा पाने के साथ ही १७० चरित्रगठन। साथ तुम्हारी बुद्धि और प्राचार-व्यवहार भी संशोधित हो रहा है और विचारने की शक्ति भी धीरे-धीरे बढ़ रही है। अब एक वार तुम सोचकर कहो तो, तुमने कर्तव्य का कौनसा मार्ग अपने लिए पसन्द कर रक्खा है ? अभी से यदि तुम अपने कर्तव्य का अन्वेषण न करोगे तो फिर कब करोगे ? तुम लोग स्वदेशानुरागप्रिय न होकर केवल स्वदेश.के सच्चे हितैपी और स्वजाति-प्रिय बनो । जिसमें तुम्हारा बाहरी और भीतरी भाव एक-सा प्रकट हो, तुम लोग आहार-व्यवहार, भूषण- वन और भापा आदि का वर्ताव अपने देश के अनुकूल ही रक्खा। ऐसा न हो कि तुम्हारे स्वरूप से, तुम्हारी भापा से, लोग तुम्हें न पहचान सकें कि तुम भी भारतमाता ही के एक सुसन्तान हो। आजकल कितने ही भद्र पुरुष भारत के योग्य सन्तान अधिकतर भोजन, वस्त्र और लौकिक व्यवहार में विदेशी का अनुकरण करते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं ? केवल वैदेशिक सभ्य समाज में सभ्य वनने के लिए। किन्तु भली भाँति समझ रक्खा, ऐसे अनुकरणशील भारतवासियों पर.सभ्य विदेशिगण प्रायः हृदय से घृणा करते हैं और भारतवासियों की कुशिक्षा पर हँसते हैं। ग्रह-कलह आठवाँ परिच्छेद। १७६ स्वाभाविक विषय है। उन्नत दशा में प्राप्त हो चाहे नीच दशा में, स्वाधीन हो किंवा पराधीन, सभी जातियों में ऐसा होता है। आपस में कभी न कभी कुछ अनबन हो ही जाती है । इसी खयाल से बात-बात में साधारण विषय के लिए स्वजाति के साथ विवाद करके मुक़दमा खड़ा करना और परस्पर एक दूसरे को दबाने की चेष्टा करना अपने जातीय विरोध की घोपणा कर देश को कलङ्कित करना कदापि उचित नहीं है। जब तक हमलोग तिलमात्र भूमि के लिए सर्वस्व नष्ट करना पुरुषार्थ समझेगे, सौ के लिए लाख पर हाथ फेरेंगे, तब तक उन्नति की कोई पाशा नहीं। हम लोगों को यथासम्भव घर का झगड़ा घर में ही निपटा लेना सर्वथा उचिंत है। यदि किसी एक वस्तु के लिए दो मनुष्य झगड़ रहे हैं और उसके लिए परस्पर मार-पीट होने की सम्भावना है तो ऐसे अवसरं में अपनी थोड़ोसी क्षति सह कर शान्त हो जाना यथार्थ में बड़- प्पन की बात है। थोड़ा-सा स्वार्थ त्याग करने ही से सारा बखेड़ा मिट सकता है। किन्तु भारत के दौर्भाग्य से अाजकल ऐसे स्वार्थ- त्यागियों की संख्या बहुत ही अल्प है । स्वार्थपरता को तिलाञ्जलि दिये बिना कोई सहिप्णु अथवा क्षमाशील नहीं हो सकता। वैसेही विना क्षमाशील हुए कोई समाज की उन्नति नहीं कर सकता और न जातीय दुर्वलता ही को दूर कर सकता है । गृह-विवाद में जब तक एक सहनशील न होगा तब तक फलहानि किसी प्रकार शान्त नहीं हो सकती । ऐसे सजन विरले ही हैं जो कलहाग्नि को भड़कते देख अपने शीतल सलिलोपम सस्वभाव से उसे बुझाने को चेष्टा करें। नहीं तो दुष्ट लोग उनचासों घायु की शक्ति ले कर उस - १७२ चरित्रगठन। . कलहाग्नि को प्रलयाग्नि बनाने के हेतु विना बुलायं स्वयं आकर योग देने में कब चूकते हैं ? जब तक भारत में ऐसे अनर्थकारी दुष्टात्माओं की वृद्धि रहेगी तब तक भारत की वृद्धि नहीं हो सकती। सच पूछो तो वे ही लोग भारत के उन्नति-पध के काँटे बने हुए हैं। जिस दिन भारत में किसी की कोई बुराई नचाहेगा, किसी के अनिष्ट होने की बात सुनकर कोई हर्प न प्रकट करेगा उस दिन भारत अपने को निष्कलङ्क समझेगा । भारत को निष्कलङ्क बनाना भारतवासियों के हाथ में है मान लो, सभी लोग यदि स्वार्थान्ध हो जाये तो निःस्वार्थ भाव का सत्पथ किसे कौन दिखलावेगा। और जो अन्धे हैं उन्हें पध- च्युत होने की आशङ्का बनी ही रहती है। यही कारण है कि भारत में स्वार्थान्धं होने कारण दिन-दिन लोग पध-च्युत हो रहे हैं। पथ-प्रदर्शक कहीं संयोग से एक हुआ भी तो हज़ारों स्वार्थान्ध उसे अपने समान जान उसके बताये मार्ग पर पाँव रखने में अपनी मान-हानि समझते हैं और यथेच्छ मार्ग पर चलकर अन्त में ठोकर स्सा गिर पड़ते हैं। ऐसे पतित व्यक्तियों से देशोद्धार की आशा करना वृथा है । स्वार्थान्ध विशाल नेत्रवालों से वह जन्मान्ध कहीं अच्छा है जो महात्मा के बताये मार्ग से कभी विच्युत नहीं होता । जो स्वार्थ की रक्षा करते हुए यघासाध्य दूसरे का उपकार करते हैं वे उन स्वार्थियों को अपेक्षा अच्छे हैं जो दिन-रात अपने ही लिए हाय-हाय करते रहते हैं। "संसार के लोग भले ही भाड़ में जायें पर मेरा अभीष्ट सिद्ध हो, इस प्रकार की स्वार्थता बड़ी ही निन्द्य और त्याज्य है। . . 7 । पाठवा परिच्छेद। १७३ मनुष्यों का यह एक स्वाभाविक धर्म है कि श्रेष्ठ लोगों की कही हुई बातों को ही प्रमाण मानकर तदनुसार काम करना चाहते हैं। श्रीकृष्णचन्द्र ने अर्जुन से कहा है-"यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोफस्तदनुवर्तते।" अर्थात् श्रेष्ठ पुरुप जो प्राचरण करते हैं और जिन बातों को मानते हैं, सर्वसाधारण लोग उन्हीं पाचरणों को प्रादर्श मानकर और उन्हीं बातों को प्रामाणिक समझकर काम करते हैं। कभी-कभी लोग जान-बूझकर भी स्वार्थवश कर्तव्य में कुण्ठित हो जाते हैं। किन्तु जहाँ अपना एक साधारण उपकार अच्छे कामों के रास्ते में काँटा हो रहा है वहाँ अपने अभिलपित उपकार को तिरस्कृत कर देना ही महत्व है। मान लो, कोई एक ऐसा स्वार्थ है जिससे तुम लाभ उठा रहे हो और हज़ारों की हानि हो रही है वहाँ तुम्हें स्वार्थ त्याग देना ही समुचित है । वह सुख किस काम का जो हज़ारों के मन में दुःख पहुँचाकर प्राप्त हो। जिनका हृदय उच्च है, जो जन्म-भूमि के सच्चे हितैपी हैं वे वैसा ही काम करते हैं जिससे हज़ारों क्या लाखों मनुष्य सुख पाते हैं। एक-एक कर जब सभी लोग अपनी उन्नति की चेष्टा करेंगे और यधासाध्य कर्तव्य का पालन करेंगे तभी जाति की और देश की उन्नति होना सम्भव है। किन्तु पहले इसका निर्णय कर लेना बहुत ज़रूरी है कि देश का वास्तविक कल्याण क्या है ? यद्यपि इसका निश्चय करना कठिन है तथापि इस विषय में सच्चरित्र, विद्वान, दीर्घदर्शी, महात्माओं का जो सिद्धान्त है उसे मानकर काम करना चाहिए। यदि तुम लोग बाते में जानना चाहो कि चरित्रगठन । अपने देश और अपनी जाति का कल्याण किस तरह किया जा सकता है तो हम कह सकते हैं कि अपने स्वभावगत दोषी को दूर कर सच्चरित्र वनो और ऐसा काम करो जिसमें विदेशी लोग तुम्हारी प्रशंसा करें। देश का गौरव और सुख तुम्हीं लोगों के सद्व्यवहार पर अवलम्बित है। संसार में सभी लोग आदर्श पुरुष हो होकर जन्म नहीं लेते । सो व्यक्तियों में कोई एक आदर्श हो जाता है। तुम यदि यह सोचोगे कि हम पहले अपने को आदर्श लोगों के समान कार्यक्षम बना लेंगे तब कोई काम करेंगे तो तुमसे कुछ न हो सकेगा। तुम्हें चाहिए कि अभी से छोटे-छोटे अच्छे काम करने प्रारम्भ कर दो, आदर्श बनने की इच्छा को दूर कर केवल आदर्श पुरुषों के बताये सत्कर्मों का यथासाध्य अनुष्ठान करी। जैसे-जैसे तुम्हारे सत्कर्म की संख्या बढ़ती जायगी वैसे-वैसे तुम्हारा चरित्र सुधरताजायगा और तुम्हारी जन्म-भूमि गौरवान्वित होती जायगी। भारत में एक से एक बड़े आदर्श. के रहते भी भारत की उन्नति नहीं होती; इसके कितने ही कारण प्रत्यक्ष हैं। उन प्रत्यक्ष कारणों में हमारी जातीय दुर्वलता प्रधान कारण है और यही भारत के लिए भारी कलंक है। संसार के सभी लोग हमें अनु- करणप्रिय कहकर हँसते हैं और तरह-तरह की बातें कहा करते हैं । इन दिनों यह अनुकरणप्रियता एक प्रदेशगत न होकर सारे भारतवर्ष में फैल गई है। आजकल भारत में स्वाभाविकता लुप्त हो चली है और कृत्रिमता का युग पाया है । लोगों के भावभाषा, पोशाक, आहार-व्यवहार, रुचि आदि से यह भली भाँति प्रकट होता है . .
आठवाँ परिच्छेद। खेद का विषय यही है कि भारत में इन दिनों विजातीयगणों के दोपों का दो लोग अधिक अनुकरण कर रहे हैं। वे देशगत दोपों का उद्धार क्या करेंगे कि और दिन:दिन दोपों का संग्रह कर देश को दोषों का भण्डार बना रहे हैं। गुण के अनुकरण की अपेक्षा दोष का अनुकरण करना सुगम है। किन्तु दोप के अनुकरण में हानियाँ कितनी हैं, इसे भी तो सोचना चाहिए। दस दोषों का अनुकरण न कर एक गुण का अनुकरण करना अच्छा है। जैसे दोष में अनेक बुराइयाँ भरी हैं वैसेही गुण में अनेक लाभ हैं। हम लोग यदि अपने-अपने हृदय की ओर दृष्टि दें तो दोपही दोप देखने में आवेंगे। हम लोग परसर एक-दूसरे का विश्वास नहीं करते, साधारण से भी साधारण स्वार्थ का त्याग करना नहीं चाहते। इसी से हम लोग साझे का कोई कार- चार नहीं कर सकते । हमलोग विदेशियों के यहाँ अधीनता स्वीकार करके बड़ी सावधानी के साथ मनायोग-पूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, किन्तु अपने देशवासी स्वजातीय की अधीनता स्वीकार कर सोत्साह मन से कर्तव्य-पालन नहीं करते। हम लोग केवल भय.फे अधीन होकर कर्तव्य का यत् किञ्चित् पालन करते हैं। किन्तु कर्तव्य समझकर उसका पालन नहीं करते । अपने को कर्तव्य का पावन्द नहीं जानते । इसका कारण श्रद्धा का अभाव है। जब तुम लोग स्वजातीय महान व्यक्तियों पर श्रद्धा और भक्ति करोगे, जब प्रापस में सबको सब पर विश्वास और सहानुभूति प्रकट होगी, जब अभि- मान और स्वार्थपरता.छोड़कर अपनी जाति की अधीनता स्वीकार कर अपने कर्तव्य को भली भाँति सम्पन्न कर सकोगे तभी तुम . ."
चरित्रगठन । । जानोगे कि "हम उन्नत दशा में प्राप्त हुए हैं। तब समझोगे कि विदेशी सत्पुरुषों की गुणावली का अनुकरण कुछ फलित हुआ है। अपने देश के उच्च प्रादर्श की उपेक्षा करकं विदेशीय दोपों का अनुकरण कर हम लोग कभी उन्नत दशा में प्राप्त नहीं हो सकते । बल्कि दोषों का अनुकरण करते-करते हमारी दशा दिन-दिन मन्द ही होती जायगी। इसी से कहा जाता है कि तुम लोग काला- तिपात न करके स्वजातीय महानुभावों के वताये मार्ग का अनु- सरण करो और पाश्चात्य देशवासियों के दोप का अनुकरण न कर उनकं गुणों का ही अनुकरण करो। स्वदेशीय और विदेशीय के सद्गुणादर्श पर अपना चरित्र गठित कर उन महानुभावों की तरह जीवन विताकर तुम भी संसार में अपनी अक्षय कीर्ति संस्था- पित करा - क्या देश, क्या जाति, क्या धर्म, जिस पर जिनका अनुराग होता है वह बचपन से ही उनके हृदय में अङकुरित होने लगता है। बुद्धिमानों की बुद्धि का परिचय वाल्यकाल से हो प्राप्त होने लगता है। माइकेल मधुसूदन दत्त, नवाब अब्दुललतीफ़ और विज्ञवर भूदेव मुखापाध्याय तीनों सहपाठी थे। एक समय ये तीनों एक साथ बैठ- कर अपने-अपने भविष्य जीवन के सम्बन्ध की बातें कर रहे थे। मधुसूदन ने कहा- "मैं बैरन के समान कवि होना चाहता हूँ।" नवाब साहब ने कहा- -"मेरी ख्वाहिश है कि मैं किसी ऊँचे पद पर प्रतिष्ठित होऊँ. भूदेव बाबू ने कहा-"मैं यही चाहता हूँ कि देश के कल्याण- . ..
। आठवा परिच्छेद। साधन में मेरा जीवन व्यतीत हो।" भूदेव बापू ने प्रथम अवस्था में जो सङ्कल्प किया था उसे अच्छी तरह नियादा । इस महात्मा ने जीवन के शेप फाल तफ जन्म-भूमि के लिए प्राणपण से परिश्रम कर देश का यहुत-कुछ कल्याण किया। इन्होंने परोपकार करने में कभी मुँह न मोड़ा। इनका उपकार भवन सबके लिए प्रवारित द्वार था। जो साहाय्य पाने की आशा से उनके पास जाते थे, वे इनसे कुछ सहायता पाते ही थे। साधुता, चरित्र की निर्मलता, प्रेम, दया पार निःस्वार्थपरता में भूदेव वायू यथार्थ ही भूदेव थे । इस आदर्श पुरुप ने अनेक प्रकार से स्वजाति का कल्याण करके मरते दम तक अपनी जन्म-भूमि का स्मरण रक्खा। कुछ विशेष धनवान न होकर भी कर्तव्यप्रिय भूदेव बाबू ने देश की भलाई के कामों में अपनं उपार्जित डेढ़ लाख रुपये दान कर दिये। उनकी यह उदारता क्या साधारण महत्व की बात है ? सब लोग द्रव्य से देश का उपकार नहीं कर सकते । धनवान धन देकर, विद्वान विद्यादान करके और कर्मवीर अपने शारीरिक बल से देश का यथासाध्य उपकार कर सकते हैं। जो जिस अवस्था में हैं, इच्छा करने से वे उसी अवस्था में देश का कुछ न कुछ उपकार अवश्य कर सकते हैं। तुम लोग ऐसा कभी न सोचो कि "हमसे क्या हो सकता है। चेष्टा करने से बहुत कुछ देश का कल्याण कर सकते हो । उच्च प्रादर्श कोसामने रख अपने-अपने चरित्र को सुधारो, लज्जा और अभिमान को त्याग कर कर्तव्य पालन करो और सत्- पथ से कभी विचलित न होओ। तुम अपने को इस योग्य बनाओ जिसमें अन्यान्य लोग भी तुम्हारे चरित्र का अनुकरण कर सुधरें चरित्रगठन । पर सत्कर्म के अनुष्ठान में प्रवृत्त हो । राजनीति के विरुद्ध कोई म करके अपने देश का गौरव बढ़ाने की चेष्टा न करो, देशानु- सन के आज्ञानुमोदित कार्य करके ही यधासाध्य अपनी जाति उन्नति करो। ऐसा करने से यदि तुम बालक भी हो तो वृद्ध- न सर्वत्र सम्मान पाओगे। अलौकिक वा असाधारण कोई काम न रके भी तुम देश की दशा सुधार सकते हो। सबसे पहले देशोन्नति लिए चरित्र का सुधार ही आवश्यक है। जब तुम लोग चरित्र- त प्राप्त करोगे तभी भारत का कलङ्क दूर होगा । देशोपकार 'असाधारण काम करने की प्रबल शनि सब मनुष्यों में नहीं होती, जन्तु यथासाव्य सर्वदा हितकर काम करने की सामर्थ्य सभी मनुष्यों में ती है।" एक अँगरेज़ सौदागर के कार्यालय में एक हिन्दुस्तानी मुनीम का काम कर रहा था । वह किसी समय सख्त बीमार हो गया। ह सुनकर कार्यालय के अध्यक्ष उसे देखने गये। मुनीम की मानदारी और सच्चरित्रता से साहव उस पर पूरा विश्वास और नेह रखते थे। "ऐसा सच्चा विश्वासपात्र आदमी ढूँढ़ने से भी नल्दी नहीं मिलेगा । उस मुनीम के न रहने से व्यापार-सम्बन्धी कामों में बड़ी हानि पहुँचना सम्भव है। इस प्रकार भांति-भाँति की चिन्ता करते हुए साहव मुनीम के पास पहुँचे । साहब को देख- करं व्याधि-पीड़ित मुनीम का मुरझाया हुआ मुँह कुछ प्रफुल्लित ता हो गया और वह बड़े कष्ट से तकिये के सहारे बैठकर साहब . पाठवाँ परिच्छेद । १७६ को इस सुजनता और सदय व्यवहार के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद देने लगा। साहब उसकी बीमारी का हाल पूछते और प्राश्वासन देते हुए अचम्भे के साथ विस्फारित नेत्र से उसके घर के चारों ओर देखकर और उल्लसित होकर वोले-"वाबू , आप सचमुच अपने देश के अनुरागी हैं। जो लोग घर में बैठे थे वे सभी चकित होकर साहब के मुंह की ओर देखने लगे। साहब ने उन लोगों कं हृदय का भाव समझकर कहा-"आप लोगों को आश्चर्य होता होगा, किन्तु मैं देख रहा हूँ, इनके सदृश स्वजाति-हितैपी और स्वदेशप्रिय व्यक्ति प्रापके इस भारत में बहुत कम हैं। भारत के कितने ही स्वदेशहितेपी सम्भ्रान्त लोगों से मेरा परिचय है। उनमें कोई सुवक्ता है, कोई सुलेखक हैं और कोई राजकीय उच्च पद के अधिकारी हैं। उन लोगों ने अपने देश की भलाई का काम करके अच्छा नाम हासिल किया है, किन्तु मेरे मुनीम के सदृश निरपेक्ष और निश्छल बहुत थोड़े होंगे । इनका प्राचार, व्यवहार, भोजन, भूषण, वस्त्र प्रादि सभी अपने देश के अनुकूल हैं। अपने देश की बनी वस्तुओं पर वाबू को एक हार्दिक अनुराग है । भारत बड़ी विचित्र वात तो यह देखने में आती है कि यहाँ के निवासी बड़े-बड़े प्रसिद्ध स्वदेश-हितैपिगण अपने घर को विला- यती विलास-सामग्रियों से और यूरोप की अन्यान्य सजावट की चीज़ों से सुसज्जित करते हैं। उन सजावटी चीज़ों के लिए वे हज़ारों रुपये खर्च कर डालते हैं, किन्तु इनका यह लम्बा-चौड़ा घर अपने देश की बनी हुई चीज़ों से ही सजा हुआ है और इसी से घर की इतनी अधिक शोभा बढ़ रही है।" । , में मुझे चरिन्नगठन .. . यह सुनकर उस मुनीम का मुँह और नेत्र हर्प से प्रफुल्लित हो है। उसने मुसकुरा कर कहा-"मैं आपके सदय व्यवहार से त्यन्त कृतार्थ हुआ हूँ। मेरे देशानुराग के सम्बन्ध में जो कुछ आपने कहा है, उसमें मेरे बड़प्पन की कोई बात नहीं। वह मैंने अपना कर्तव्य समझ कर किया है और कर्तव्य के पालन में ही. च्चा सुख है। मैंने जिस देश में और जिस समाज में जन्म लिया , उस देश को और.उस समाज को अपना देश और अपना नमाज कहने का मुझे अधिकार है। वे दोनों ही मेरे पादरणीय और मेरे अनुराग की सामग्री हैं। उनकी उन्नति की चेष्टा करना पार उनके कल्याण की बात सोचना मेरा पहला कर्तव्य है। जनको जितनी सामर्थ्य है वे उतना ही काम करके अपने कर्तव्य का पालन कर सकते हैं। मैं स्वजातीय आदर्श. पुरुपों पर विशेष सक्ति और श्रद्धा रखता हूँ इसलिए मैंने उन लोगों की पवित्र मूर्तियों से अपने घर को सुशोभित कर. रक्खा है । इन सब चित्रों के देखने से स्मरण हो पाता है कि इन लोगों ने अपने देश के कौन-कौन से काम भलाई के किये हैं। जब इन लोगों की उदारता की बात सोचता हूँ तब हृदय आनन्द और उत्साह से भर जाता है । अपने देश के बने वस्त्र, घर के उपकरण और अलङ्करणीय वस्तुएँ मुझको अत्यन्त प्रिय हैं। अपने देश की शिल्पकारी को मैं हृदय से चाहता हूँ। इसलिए अपने देश के श्रमजीवियों के उत्साह- चर्द्धनार्थ उनके हाथ की बनाई.हुई चीज़ों को, प्रयोजन न रहते भी, खरीद.लेता हूँ। आप लोगों की भाषा और साहित्य से सम्बन्ध रखता हूँ सही, किन्तु स्वदेशीय सुलेखकों की पुस्तकें प्रकाशित होते . , आठवाँ परिच्छेद । १८१ ही खरीदता हूँ। अपने देश के वालक-बालिकागण जिसमें सच्चरित्र और सुशील हों उसका ह्रदय से यत्न करता हूँ। मेरी एक-मान यही इच्छा है कि हमारे भारत-देशवासी दूसरी जाति की अयो- ग्यता और दोपादोष की समालोचना में समय न बिताकर अपनी जाति के युवकगणों को सच्चरित्र बनाने का प्रयत्न करें और दूसरे के दोपों पर हकपात न करके पहले अपनी त्रुटि का संशोधन करें और अपने घर के दृपित व्यवहारों को सुधारें" साहब ने कहा-"बाबू, प्रापका सयाल बहुत ऊँचा है। आपके गुणों से जो मुझे प्रसन्नता हुई है वह वास्यों के द्वारा प्रकाशित नहीं की जा सकती " मुनीम ने कहा-"मेरी जो अवस्था अभी बीत रही है उससे मेरे बचने की अव प्राशा नहीं है। इसलिए मैं अपने एक-मान पुन को अभी आपके हाथ सौंपता हूँ। आप मेरे पालक हैं, पिता के समान है, इसे दयादृष्टि से देखेंगे और जिसमें यह सुपथगामा हो, अच्छे रास्ते से कभी विचलित न हो, इसे ऐसा सटुपदेश देंगे। आपका पाना मेरे लिए बड़ा ही उपकारक हुआ। ये सब मेरे पड़ोसी जो यहाँ उपस्थित हैं, बड़े ही प्रतिष्ठित हैं। ये कागज़ में प्रापके हाथ अर्पण करता हूँ। आप मेरे इस जीवन की वासना को पूरी करेंगे।" यह कहकर मुनीम ने चन्द कागज़ात साहब के हाथ में दे दिये। अनन्तर बेटे को अपने पास बैठाकर कहा- बेटा, बाल्यकाल में मैं बड़ा हो दुर्घत्त था, मेरे दुःस्वभाव, कठोर- भापण और अभिनय से दुःखी होकर मेरे पिता मुझसे बरावर नाराज़ रहा करते थे। पिता ने बड़े यल से मेरा लालन-पालन .
चरित्रगठन । - , किया, वहुत द्रव्य खर्च करकं मुझे शिक्षा दिलवाई, पुत्र के प्रति पिता का जो कुछ कर्तव्य है उन्होंने.प्रायः सब.किया; किन्तु मेरे वुर आचरण से अत्यन्त अप्रसन्न होकर आखिर उन्होंने मुझे घर.से निकाल दिया और पोप्य ..पुत्र तक लेने का मनामें सङ्कल्प कर लिया । इसी अवसर में एक साधु. महात्मा की कृपा से मेरी:मति बदल गई । मुझमें जो स्वभावगत दोष थे वे धीरे-धीरे दूर हो चले। सत्सङ्ग के प्रभाव से कुछ दिनों में मेरा चरित्र सुधर गया । मैंने अपने को पिता.का असन्ताप-भाजन जानकर मन में यही निश्चय किया कि भीख मांगकर और परमेश्वर का भजन करके जीवन बिताऊँगा । किन्तु उस महात्मा ने : मुझसे कहा-"वत्स, भीख माँग कर जीवन बिताने को.वात कभी मन में न: लांयो:। भीख माँगना बड़ा ही निकृष्ट कर्म है । जगदीश्वर ने इस संसार की रचना इस अभिप्राय से नहीं की है कि लोग आलसी होकर अपने जीवत को व्यर्थ बिता दें. 1. यह संसार, कर्म-क्षेत्र है। कर्म करना मानो ईश्वर को आज्ञा पालन करना है। तुम स्वयं कोई काम न करके दूसरे के श्रमलब्ध धन का अंश ग्रहण करके पेट भरोग; यह कदापि युक्तिसङ्गत नहीं है । तुस असमर्थ नहीं हो, ईश्वर ने तुम्हारे शरीर में शक्ति दी है, तुमने शिक्षा प्राप्त की है, तत्र भी यदि तुम दूसरे का गलग्रह होकर रहना चाहो तो तुम अपने को देश का शत्रुसमझो। इसलिए मैं कहता हूँ कि यदि मेरी बात मानो तो , खेती; वतज, अथवा शिल्पकारी का कोई काम करी । अभिप्राय यह कि किसी अच्छे व्यवसाय.का.अवलम्बन.करी । तब तुम.अंपने परिवार,का भी पालन कर सकोगे.और दीन-दुखियों का कुछ: उपकार भी कर:' . , आठवाँ परिच्छेद। १८३ सकोगे।" उन मद्दामा के उपदेश को स्वीकार कर मैं सौदागरी माफ़िस में काम करने लगा जो अब तक कर रहा हूँ। जब मेरे पिता ने मेरे चरित्र-संशोधन की बात सुनी तवं उन्होंने फिर मुझ पर प्रसन्नता प्रकट कर मुझे अनुग्रह का पात्र बनायो । अन्तकाल में जो कुछ धन उनके पास था वे सब मुझको दे गये। उनसे जो कुछ धन मुझे मिला उसको मैंने कभी अपने हाथ से नहीं छुआ। वह ज्यों का त्यों सुरक्षित है। वह पैतृक धन मैं तुम्हें दिये जाता हूँ। विना विशेष प्रयोजन पड़े तुम भी उसे लेने के लिए हाथ न बढ़ाना । तुम्हारी जो स्वतन्त्र सम्पत्ति है उसी की सहायता से तुम अपने प्रभावों को पूर्ण करना । जिस स्वतन्त्र-सम्पत्ति का नाम मैंने अभी लिया है, वह अक्षय सम्पत्ति तुम्हारी सुशिता और चरित्र- वल है। तुम अपनी सुशिक्षा और सच्चरित्रता से अपने सभी अभावों को यथासाध्य पूर्ति कर सकोगे । किसी अच्छे व्यवसाय का अवलम्बन करके नीति-पूर्वक उपार्जित धन का परिमित रूप से खर्च किया जाय तो सुख से परिवार-पोषण करने पर भी प्रचुर धन-सञ्चय हो सकता है। अपव्यय करने ही से लोग प्रभावग्रस्त होते हैं। जो अपव्यय नहीं करते उन्हें प्रायः कभी अभाव का सामना नहीं करना पड़ता। मैं श्राद्धत्य-पूर्ण जीवन की गति रोककर साधुमतानुसार अपना जीवन-निर्वाह करके प्रायः एक लाख रुपया अब तक जमा कर सका।. जिसमें प्राधा तुम्हें मिलेगा और आधा स्वदेशीय श्रम- जीवियों और अनाथों की सहायता में व्यय होगा। वे रुपये किस तरह, किसको, कितने दिये जायेंगे इसका विशेष विवरण उस - . १३ . १८४ चरित्रंगठन1 काग़ज़ में लिखा हुआ है जो अभी मैंने साहब के हाथ में दिया है। वत्स, मेरा जीवन अब पूर्ण हुभा । ईश्वर तुम्हें दीर्घायु करें और तुम्हें अच्छी बुद्धि दें। सत्सङ्ग का त्याग कभी न करो। दुष्ट लोगों की बातों में पड़कर कभी पथच्युत न होओ। "चरित्र सुधारने से क्या होगा ऐसा कभी मन मैं न सोचो। "धन-सम्पत्ति की अपेक्षा चरित्र को हीःश्रेष्ठ समझो।" इतना कहते-कहते मुनीम की ज़बान रुक गई। उसकी आँखों से.अाँसु की धारा बह चली। थोड़ी देर तक सभी लोग चुप रहे । रुग्यं मुनीम क्लान्त होकर तकिये पर सिर रखकर चुपचाप लेट : रहा। साहब आँसू-भरी आँखों से और उदास मुंह से उठे और कई एक प्रतिष्ठित पड़ोस- वालों को साथ ले अपनी कोठी की ओर रवाना हुए । ''वह मुनीम जो कुछ विल कर गया था साहब ने उसका उचित रूप से रक्षण किया। कुछ दिन के बाद उसका बेटा उसी के पद पर नियुक्त हुआ। राजभक्ति माननीय सुवक्ता सुरेन्द्रनाथ वन्द्योपाध्याय जब राजकीय विषय • में वक्तृता देने पक्षाब गये थे तब समाज-संस्कारक, राजभक्त, केशवचन्द्र सेन ने उन्हें यही सलाह दी थी कि "ब्रिटिश गवर्नमेंट फा शासन :ईश्वरदत्त है, जिसमें यह बात?,सब पर भली भाँति विदित हो, आप.वही करें " : ईश्वर की प्राज्ञा-पालन करने में भारतवासी प्राणों तक का ..
पाठवाँ परिच्छेद। १८५ मोह नहीं करते । यह यात-महात्मा केशवचन्द्र भली भाँति जानते ये और वे यह भी जानते थे कि वैदेशिक राजा के प्रति भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशवासी सर्वसाधारण प्रजागणों के हृदय में राजभक्ति उत्तजित करने के लिए इससे बढ़कर और कोई अच्छा उपाय नहीं है । महाराज मनु ने कहा है-"जहाँ राजा नहीं.वहाँ नाना प्रकार के उपद्रव आ खड़े होते हैं। इसलिए ईश्वर ने लोगों के रक्षार्थ ईशान, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, चन्द्र, और कुबेर इन' पाठ दिक्पालों का अंश लेकर राजाओं की सृष्टि की है। यह शास्त्र का वचन केवल विद्वान ही लोग जानते हैं यह बात नहीं है। हिन्दूमात्र जानते हैं कि राजा देवता का अंश लेकर जन्म लेते हैं। "यालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः । महती देवता ह्यपा नररूपेण तिष्ठति ।” मनुजी के इस वचन को भारतवासी हिन्दू हृदय से मानते हैं। इसी कारण हिन्दू राजा को बड़ी ही पूज्य दृष्टि से देखते हैं और उनकी पूजा तथा दर्शन पुण्यमुलक समझते हैं। उनकी प्रसन्नता के लिए नाना प्रकार का मङ्गलाचार करते हैं । भारत में राजभक्ति एक स्वाभाविक गुण है । इसे कोई प्रत्युक्ति न समझे। स्वदेशी हो चाहे विदेशी, स्वधर्मी हों चाहे विधर्मी, वृद्ध हों या बालक, कोई क्यों न हों, राजसिंहासन पर विराजमान होकर नीतिपूर्वक प्रजापालन करने ही से हिन्दू उन्हें प्रष्ट दिकपाल का. अंशावतीर्य मानेंगे, उन्हें देवता समझकर पूजेंगे और उनका चित राजसम्मान करेंगे। जो राजा स्वयं राज्यशासन का काम. नहीं कर सकते वे प्रतिनिधि तथा अन्यान्य राजकर्मचारियों के द्वारा अपने कर्तव्य का सम्पादन करते हैं। ये प्रतिनिधि.अौर राजकर्मचारि- .
चरित्रगठन ।। - " , गण भी प्रजागणों के राज्यतुल्य ही आदरणीय हैं। और प्रत्येक भारतवासी की भावना भी ऐसी ही है। अत्यन्त दीर्घदर्शी, ज्ञान के अपार सागर, ऋपिगण और नीतिज्ञ जन, राजा और प्रजाओं के बीच जो यह पवित्र सम्बन्ध निर्णय कर गये हैं उसे कभी न भूलो। कभी उसका त्याग न करो। जिस समय वादशाह अकबर दिल्ली के राजसिंहासन पर विराजमान थे, उस समय उनके कितने ही प्रधान कर्मचारी देशी राजा ही थे, जो बड़े शक्तिशाली थे और साम्राज्य की सभी बातों से.परिचित थे; राजभक्ति, शासन-प्रणाली और राज्य के गृढ़ रहस्य को. कोई ऐसी बात न थी जो उन लोगों को मालूम न हो । किन्तु उन लोगों ने क्या कभी विधर्मी वादशाह के निकट छल से सिर नवाया था.? वे लोग सच्चे हृदय से वादशाह के भक्त और शुभ- चिन्तक थे । इसका कारण राजभक्ति ही समझनी चाहिए । हमारी राजभक्ति धर्म में परिगणित है। क्या हिन्दू, क्या मुसलमान, क्या क्रिस्तान-राजा सव बरावर हैं, सभी पूज्य हैं.। उनमें भेदज्ञान करना अनुचित है। वे ईश्वर के भेजे हुए एक अतुल शक्तिशाली देव हैं और हम लोगों के वही कर्ता-हर्ता हैं। हमें चाहिए कि सर्वदा अपने राजा का हृदय से कल्याण मनांवें और उनकी आज्ञा का पालन करें। . . :कुरुक्षेत्र और प्रभासक्षेत्र के महायुद्ध में हिन्दुओं का ऐश्वर्य, .हिन्दुओं की ज्ञानशक्ति और हिन्दुओं का साम्राज्य जब एक ही "साथ नष्ट हो गया; बड़े-बड़े तेजस्वी ऋषिगण और धर्म-नीतिज्ञगण अन्तर्हित हो गये; शास्त्र, शिल्पज्ञान और विज्ञान का दीप बुझ .
. आठवाँ परिच्छेद । १८७ गया, तब भारत के उस भयङ्कर महाश्मशान के बचे कुछ अंशमात्र राजपुताना, मणिपुर और दाक्षिणात्य-प्रभृति इने-गिने देश रह गये सही, किन्तु पूर्वपुरुषों का जो महत्व था उसे प्रायः सब खो बैठे। विलासप्रियता दिन-दिन बढ़ने लगी। एक-एक कर सभी देशों में सङ्कोर्णता और कुसंस्काररूपी अन्धकार छा गया । अनाचार, अत्या- चार, ईर्ष्या, द्वेप, हिंसा, गृहविवाद आदि दुर्व्यवहारों से यह पवित्र भारतभूमि पैशाचिक लीला की वीभत्स नाट्यशाला बन गई । भारत का पुनरुत्थान एक प्रकार असम्भव सा हो गया । किन्तु यह देव- भक्त सभ्यता का प्रादिनिवासस्थल पुण्यभूमि भारतदेश इस प्रकार मर्वनाश को प्राप्त हो, यह ईश्वर की इच्छा न थी। ईश्वर ने भारत- वासियों की उद्दण्डता दूर करने के लिए इसका शासन-भार मुसलमानों के हाध दिया। मुसलमानों का शासनकाल पूरा हुमा, पर तो भी भारतवासी उद्यमहीन, आलसी और दुवृत्त के दुत ही बने रहे। परस्पर का विद्वेष बना ही रहा। ईश्वर ने सोचा, जब तक विशेप शक्तिशाली, उद्योगशील, उदार, न्यायी और सुचरित्र जाति के द्वारा भारत का सम्पूर्ण रूप से शासन न होगा तबतक भारतवर्ष की उन्नति न होगी, तब तक देश की दशा न सुधरेगी और न तब तक कोई कर्तव्य-परायण होगा। इसी से भारत का शासन-भार ईश्वर ने अगरेज़ों को सौंपा। हम लोग शान्ति-पूर्वक रहने ही में परम सुख मानते हैं । अँगरेजों के शासन काल में हम लोगों ने यही शान्ति पाई है। भारत में जो पहले अतुल ऐश्वर्य घा, जिसका वर्णन पुराण, काव्य, और इतिहास प्रन्यों में पाया जावा है, जिसका कुछ बचा हुआ अंश अब भी जहां-तहाँ देखने में माता 1 ." 'चरित्रंगठन। है, किसी समय वह एक-दम लुप्त हो गया था। जलमार्ग और... स्थलमार्गदोनों भयावह हो रहे थे। जहाँ सुन्दर शहर बसा था वहाँ भयानक जङ्गल उपज गया था। अच्छे-अच्छे धान के खेत मैदान बन गये थे । मुनिगणों का शान्तिमय तपोवन हिंस्र जन्तुओं और चोर-डाकुओं का विश्रामस्थान हो गया था और कितने ही । मज़बूत किले और देवालय ज़मीन के नीचे दब गये थे, जिनका अँगरेज़ के शासन-समय में अव धीरे-धीरे पुनरुद्धार होने लगा है। यद्यपि अब भी सभ्य लोगों के प्राचीन-कालिक कला-कौशल के विस्मयोत्पादक चिब कहीं-कहीं कुछ दिखाई देते हैं और मुसलमानों ने अपनी शिल्पकारी के द्वारा उन्हें कुछ परिष्कृत भी किया था तथापि बार-बार की लड़ाई-भिड़ाई से, धर्म, समाज और देश के दुर्दशापन्न होने से हस्तलिखित. अनेक शास्त्र, गुप्त विद्या, विज्ञान आदि भारत की.अमूल्य रत्नावली कहाँ छिप गई, वह अब ढूँढ़े भी नहीं मिलती । आजकल दैहिक और मानसिक बल प्राप्त करने की शिक्षा का प्रचार और जिस देश और जाति के पुनरुद्धार की कुछ 'पाशा न थी उनका सुधार और भाषा का परिप्कार सर्वत्र हो रहा है सभी लोग देशोन्नति की बात सोच रहे हैं। पाश्चात्य विज्ञान की शिक्षा से लाभ उठाने का प्रयत्न कर रहे हैं। इन दिनों किसी के धन, धर्म और प्राण पर किसी प्रकार की विपद का भय नहीं रहा। चोर-डाकुओं की संख्या. दिन-दिन घटती जा रही है। कितने ही जंगली असभ्य जाति के लोग शिक्षित बनाये जा रहे हैं। भारत के एक प्रान्त से दूसरे प्रान्तं में जाने के लिए जलमार्ग और स्थलमार्ग:दोनों सुगम हो गये हैं। भिन्न-भिन्न प्रादेशिक भापाओं की . .
. - आठवाँ परिच्छेद। १८ क्लिष्टता दूर कर दी गई है, इस समय सभी अपने प्रतिवासी के साथ एक भाषा में पालाप करके प्रसन्न होते हैं। लड़के-लड़कियों को सुशिक्षित बनाने के लिए विशेष चेष्टाएँ की जा रही हैं। सभी के लिए सुविचार का रास्ता खुल गया है। समुद्र पार जाकर संसार की प्राकृतिक शोभा देखकर चित्त प्रसन्न करने के लिए इससे अच्छा अवसर मिलना सम्भव नहीं और विविध जातियों की रीति, नीति, आचार, विचार, भाव, भापा और विज्ञान प्रादि की शिक्षा ग्रहण करने का, तथा उन लोगों के साथ वाणिज्य-व्यापार करके विशेष धन प्राप्त करने का, रास्ता साफ हो गया है। हम लोग अपने सुख-दुःख की बात राजा के कानों तक पहुँचाने का अधिकार पाये हुए हैं । उद्यमशील और प्रतिभाशाली उन्नत जाति का कार्य- कौशल देख हम लोगों की जड़ता और आलस्य दिन-दिन क्षीण होता जाता है और उन्नति का उत्साह दिन-दिन बढ़ रहा है। ‘अपने सुधार का इससे अच्छा अवसर कब प्राप्त होगा ? भारत के युवकगण, अब तुम्हें सुविधा के लिए और क्या चाहिए ? तुम्हें जो कुछ अधिकार दिया गया है, उस पर यदि तुम, चलोगे तो, बहुत-कुछ देश का उपकार कर सकोगे। वैदेशिक जितनी चीजें हैं सब बुरी हैं, ऐसा खयाल कभी न करो । जो चीज़ अच्छी है वह हर हालत में अच्छी है। जिसके द्वारा हम उपकृत हो चुके हैं, उसके लिए हमें अवश्य कृतज्ञता प्रकाशित करनी चाहिए। सब जातियों में सब लोग समान ही गुणशील के नहीं होते। व्यक्तिगत दोप देखकर सम्पूर्ण जाति.को ही दुपित ठहराना उचित नहीं। तुम अँगरेज़ों के चरित्र की जितनी समालोचना करोगे उतना ही अधिक अच्छी तरह १६० चरित्रगठन-:- . तुम्हें गुण देखने में आवेगा । अँगरेज़ बहादुरों ने कैसे समय में हमारा क्या उपकार किया है, जिन्हें हम अपने धर्म के प्रतिकूल मानते हैं उन लोगों ने हमारा भाषा-विषयक और शिक्षा-सम्वन्धी कहाँ तक हित-साधन किया है, इन बातों को जितना सोचोगे उतना ही उन लोगों के प्रति कृतज्ञः होगे.। । कृपि,वाणिज्य, शिल्प, शिक्षा आदि किसी विभाग में जो हम पूर्णता को नहीं प्राप्त होते. हैं यह हमारी ही त्रुटि है। हमारी अव- नति. का कारण हमारी अयोग्यता है । स्थिरचित्त से विचार कर देखोगे तो स्पष्ट दिखाई देगा। सरकार ने हम लोगों की उन्नति का रास्ता खोल दिया है। राज. के प्रधान कर्मचारीगण मीठी-मीठी वातों से, उत्तेजक वाक्यों से, कभी-कभी उपदेश के व्याज से, धिक्कार वाक्यों से और भी अनेक प्रकार से हम लोगों की आँखें खोल देने की चेष्टा किया करते हैं: उन्नति-साधन के लिए हमें उत्साहित करते हैं। ऐसा सुअवसर ..पाकर भी यदि हम अपनी उन्नति के लिए चेष्टा न करें, परिश्रम न करें तो यह हमारा हो दोष कहा जायगा। इस प्रकार समझाये जाने पर भी यदि हम अपने कर्तव्य पर ध्यान न दें तो इसमें दूसरे का क्या दोप है ? राजा की आज्ञा के अनुसार चलना ही राजभक्त का लक्षण है। कोई. राजाज्ञा के विरुद्ध चलने में दण्डितः होने के भय से, कोई प्रभीष्ट-सिद्धि की. इच्छा से, खुशामद करके राजा का अनुग्रह- लाभ फ़रने की चेष्टा करते हैं। खुशामद अत्यन्त घृणित वृत्ति है। युक्तिपूर्वक खुशामद. से राजा,की प्रसन्नता प्राप्त करने पर भी वह हृदय की हीनता:द्योतक ही समझो जायगी। राजा भी ऐसा नहीं .. .
पाठयों परिच्छेद। १८१ चाहते कि कोई उन्हें खुशामद के द्वारा प्रसन्न करके अपना स्वार्थ 'सिद्ध फरे।"खुशामद की बातों से वे कभी खुश नहीं हो सकते। जो कोई भक्तिपूर्वक उनकी आज्ञा का पालन करेगा वह विना खुशामद किये ही उनका प्रीतिमाजन बनेगा। जो लोग राजनियम के अनुसार चलते हैं, उन्हें दण्ड पाने का भय नहीं रहता । भयवश कोई काम करने की अपेक्षा भक्तिवश काम करना विशेष फलप्रद है। तुम अपने मन में ऐसा कभी न ममझो कि खुशामद न करने से तुम अश्रद्धेय या अप्रीतिभाजन चनोगे । खुशामद के लिए हम शिष्टता की सीमा क्यों उलङ्घन करें? किसी व्यक्ति का एक दोप देखकर उसके अन्यान्य गुणों की प्रशंसा क्यों न करें ? हम अपनी शक्ति के प्रभाव और बुद्धि के दोष से जिस स्वच्छन्द शान्तिमय जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते, वह जिनकी कृपा से पा सकते हैं। उनकी कृतज्ञता हम हृदय से क्यों न प्रकाश करें ? उनका उपफार हम क्यों न मानें ? जिस 'प्रकार संसार में अधिकांश लोग अपने बुद्धिदोप से अभीष्ट फल- साधन में असमर्थ होते हैं और अपने भोज्य पदार्थों से वञ्चित होकर पछताते हैं उसी प्रकार हम अपने बुद्धि-कौशल से और दूसरों के उदार गुण से दूसरों का भाग्य पदार्थ भी प्राप्त कर सकते हैं। जिस विलासप्रियता, प्रालस्य और गृह-विवाद के कारण राजपूतों का गौरव-सूर्य अस्त हुआ, उन्हीं कारणों से जब मुसल- मानों को अमलदारी भी नष्ट हो गई, तब सम्भव था कि उस अराजकता के समय अपेक्षाकृत बलवान् नूतन शक्तिशाली कोई अन्यजातीय राजा यहाँ अपना अधिकार जमा लेता (किन्तु हम N ११२ चरित्रगठन। 1- .. लोगों के सौभाग्य से, जो जाति इस समय संसार में सवकी अपेक्षा अधिक शक्तिशाली है, जो अपने ज्ञान-पल से,बाहु-बल से, ऐश्वर्य-बल से और चरित्र-बल से समस्त सभ्य जातियों में अग्रसर हो रही है, उसी महोन्नत जाति ने भारत के शासन का भार अपने हाथ में लिया । यदि अँगरेज़ लोग भारत में न पाते तो हम लोगों ने इस . आधी शताब्दी में जो कुछ उन्नति की बातें देखी हैं वे कई शता- ब्दियों में भी शायद दिखाई नहीं देती। । न कोई मनुष्य भ्रमशून्य हो सकता है, और न कोई जाति दोप-शून्य हो सकती है। जो बात एक जाति के सामने सभ्यता समझी जाती है वही अपर जाति की दृष्टि में अशिष्टता का रूप. धारण करती है। किन्तु जो बात सात्विक गुण से सम्बन्ध रखती है वह सर्वत्र समभाव सेः माननीय है। कोई. जाति ऐसी नहीं जिसमें गुण-दोष दोनों मिले न हो। तो जिस जाति में गुण का भाग अधिक है उस जाति को आदर्श मानकर चलने से, और बराबर उसके गुणों पर दृष्टि रखने से विशेप कल्याणं की सम्भावना है। तुम लोग इस: उन्नतिशील जाति के सम्पर्क से विद्या, बुद्धि, साहस, उद्योगपरता और सहिष्णुता प्रादि.अनेक गुणों के आधार- स्वरूप प्रचुर शिक्षा का लाभ कर सकते हो । अतएंव ऐसे शुभाव- सर में गाल पर हाथ रख चुपचाप बैठे न रहो । यथासम्भवः उन्नति की चेष्टा करो। • केशवचन्द्र सेन महाशय ने इस प्रकार के सैकड़ों प्रबन्ध लिख- कर भारतवासियों को राजभक्त होने के निमित्त कई वार कितने ही उपदेश दिये थे । राजा के साथ प्रजा का सद्भाव सर्वदा वनारहे, . - पाठवा परिच्छेद। १६३ एतदर्घ वे जगदीश्वर के निकट सर्वदा प्रार्थना करते थे। ये, और महात्मा कृष्णदास पाल, राजा और प्रजा के बीच सेतु-स्वरूप थे । ये लोग राजभक्ति के साथ ही साथ कभी-कभी राजकीय कार्य में दोप भी दिखलाया करते थे, इससे सरकार उनसे अप्रसन्न न हो- कर उनका सत्परामर्श सादर स्वीकार करती थी। इसका कारण यह है कि ये लोग द्वेष-बुद्धि से दोष की आलोचना न कर शुद्ध हृदय से, कोमल शब्दों में, विनय-पूर्वक, यथावसर त्रुटि दिखला. कर मच्छी सलाह देते थे। इससे उनकी राजभक्ति और भी अधिक प्रकाशमान होती थी। केशव याबू राजभक्ति को ही धर्म का मूल-सिद्धान्त मानते थे। वे सर्वदा ऐसी ही चेष्टा करते थे, जिसमें सर्वदा राज्य में शान्ति बनी रहे। इस विषय में उनका आवेग और उत्तेजनामय वाक्य ही उनके सहायक थे। वे राजा के अनुग्रह- लाभ करने की इच्छा नहीं रखते थे। सरकार ने उन्हें कई बार उच्च पद और विशेष उपाधि से सम्मानित करना चाहा, 'किन्तु उन्हों ने कभी स्वीकार न किया । पर तो भी प्रधान राज-पुरुपगणों ने, यहाँ तक कि स्वयं राजराजेश्वरी महारानी विक्टोरिया ने, उनका यथेष्ट सम्मान किया था। वे भारतेश्वरी को माता के समान जानते थे और ब्रिटिश-शासन में, उन्हें प्रत्यक्ष ईश्वर की महिमा देख पड़ती थी, इसी से उन्होंने अपने अन्तःकरण की वात प्रकट करके कहाधा-"ब्रिटिश का शासन ईश्वरप्रदत्त है। हम लोगों को चाहिए कि अँगरेज़ के शासन-काल की स्थिरता के लिए ईश्वर से नित्य प्रार्थना करें। हम लोगों को अँगरेज़ से अभी बहुत कुछ शिक्षा ग्रहण करना बाकी है। तुम लोग खुशामद अथवा भय के वशवर्ती - ११४ चरित्रंगठन । होकर राजभक्ति दिखलाने की चेष्टा न करो, बल्कि अपने धर्मशास्त्र की प्राज्ञा के अनुसार राजा को देवता का अंश जानकर उनकी आज्ञा पालन करो और उपकृत मनुष्यों की तरह अपने रक्षक और उपकारक गवर्नमेंट की कृतज्ञता प्रकाश · कर शुद्ध हृदय से राजभक्त बनो। भगवद्भक्ति श्रेयःसुतिं भक्तिमुदस्य ते विभी विश्यन्ति ये केवलवधिलब्धये ॥ तेपामसा क्लेशल एव शिप्यते .नान्यद्यथा स्थूलतुपावधातिनाम् ॥ . ..(श्रीमद्भागवत) भावार्थ-“हे नाथ, जो लोग श्रापकी कल्याण-कारिणी भक्ति को छोड़- कर केवल ज्ञान-प्राप्ति के लिए क्लेश उठाते हैं, उन्हें सिवा क्लेश के और कुछ फल हाथ नहीं पाता, जैसे चावल निकले हुए धान के तुपों के कूटनेवालों को क्लेश के सिवा कुछ फले उपलब्ध नहीं होता इसी तरह भक्ति के विना कोरा ज्ञान व्यर्थ है।":. मनुष्यों को केवल विद्यां पढ़कर और कोरी पण्डिताई करके वी सन्तुष्ट न हो जाना चाहिए। कोई मनुष्य विविध विद्यापारङ्गत, प्रतिभाशाली और यहुदी हो सकता है, किन्तु नैतिक बल और सचरित्रता के प्रभाव से वह सभ्यसमाज में ,गण्य नहीं हो समता । किसी के हृदय में जय वृत्ति का अभ्यास पड़ जाता है सय बुद्धि से सहसा नहीं रोक सकती। जिन्हें नैतिक बल का पाठवा परिच्छद। . अभाव है उन्हें धार्मिक होने के लिए बुद्धि-बल का भरोसा करना वृथा है । नैतिक बल-हीन व्यक्ति बुद्धिमान होकर भी कर्तव्य-विमुख और अकर्तव्यपरायण हो जाते हैं । जो शक्ति नैतिक वल में है वह बुद्धि में नहीं है। बुद्धि केवल मार्ग दिखलानेवाली है।. पथिक जान-बूझकर पधच्युत हो जाय, इसकी उत्तरदायिनी बुद्धि नहीं। किन्तु नैतिक बल पथ पर चढ़े हुए व्यक्ति को विचलित नहीं होने देता। मनुष्य को बुद्धि रहते भी नैतिक बल की उपेक्षा न करनी चाहिए । जैसे बुद्धि के साध नैतिक बल का अल्प सम्बन्ध है वैसेही विद्या के साथ भी बहुत ही कम सम्बन्ध है। यदि ऐसा न होता तो जो लोग उच्च शिक्षा पाये हुए हैं, साहित्य-संसार का अलङ्कार कहलाकर विख्यात हैं, और मेधावी हैं, उनमें कोई-कोई मद्यपानासक्त, अपव्ययी और दुराचारी क्यों होते हैं ? उनकी वह विशाल विद्या, प्रतिभा और मेधा उन्हें पाप-चिन्ता और अपकर्म: से क्यों नहीं हटाती ? अतएव क्या स्त्री, क्या पुरुष, सबके लिए यही प्रथम शिक्षा श्रावश्यक है कि वे धर्म और नोति-पथ के पथिक हो । जो शिक्षा धर्म और नीति से रहित है वह शिक्षा नहीं, वरन कुशिक्षा है । जिस कर्म में धर्म और नीति का सम्बन्ध नहीं है वही अपकर्म है। जिन्हें बाल्यावस्था में धर्म और नीति की शिक्षा नहीं दी जाती, वही दुश्चरित्र होकर अपने वंश को और अपने देश को कलङ्कित करते हैं । शिक्षा का मुख्य उद्देश, बालकों को दुश्चरित्र से बचाना है। दुश्चरित्र विद्वान् से वह मूर्ख कहीं बढ़कर. अच्छा है जो सच्चरित्र है। सच्चरित्रता के अभाव से कोई अपना ही कल्याण नहीं कर सकता,वह दूसरों का कल्याण क्या कर सकेगा? बालकों चरित्रंगठन । -- . को सञ्चरित्रं बनाने के लिए नीति और धर्म का उपदेश देना प्रार- म्भिक शिक्षा है। बचपन में जो चित्रःहृदयपट पर खिंच जाता है वह मिटाये भी नहीं मिटता। अतएव बालकों के हृदय में धर्म और नीति का बीज सबसे पहले ही अङ्कुरित होना चाहिए । चरित्र बिगाड़नेवाली बातों से उन्हें स्वप्न में भी सम्पर्क न होना चाहिए । यद्यपि देश, काल, जाति, समाज और संस्कार के भेद से धर्म और उपासनाःभिन्न-भिन्न है तथापि सव:धर्मों का मूल-सूत्र एक ही है। सभी सम्प्रदायों के उपास्य और प्राश्रय -एक ईश्वर ही हैं। वही जगत्पिता: हैं; वही जगद्गुरु हैं, वहीं सम्राट के सम्राट् है, और वही चराचर के प्रधान शासक तथा. पालक हैं। वे सत्यं, प्रेम, दया; न्याय; ज्ञान और मङ्गल. का. अक्षय भण्डार हैं। उन सर्व- शक्तिमान जगदीश्वर में अटल विश्वास और भक्ति करना ही धर्म का प्रथम साधन है। जिस पर तुम्हारी भक्ति होगी, जिस पर तुम्हारा प्रेम होगा, उसकी प्रसन्नता के काम तुम, अवश्य करोगे। अतएव तुम्हें यदि भगवान में भक्ति होगी तो नीति-पूर्वक लोकोपकारी काम करने की तुम में स्वत: प्रवृत्ति होगी और अनुचित कामों पर वृणा उत्पन्न होगी। श्रीकृष्ण भगवान् ने गीता में कहा है-"अपि चेत् सुदुराचारी भजते : मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो. हि सः । तिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्ति निगच्छति ।" अर्थात् जो. दुराचारी है, किन्तु शुद्ध मन से ईश्वर का भजन करता है वह थोड़े ही दिनों में धर्मात्मा होकर शान्ति-सुख पाता है। इसलिए बालको; यदि तुम: निश्छल भाव से ईश्वर की भक्ति करोगे, सच्चे मन से ईश्वर की उपासना करोगे तो संसार के ।
- पाठवा परिच्छद। १६७ सभी मनुष्य तुम्हें सच्चरित्र और धर्मात्मा कहकर तुम्हारा सम्मान करेंगे । ईश्वर की भक्ति के द्वारा जब तुम्हारे हृदय में कर्तव्य-बुद्धि जाग्रत होगी और बुरे कामों से घृणा उत्पन्न होगी तब तुम ईश्वर के प्रीतिकर कामको श्राप ही समझने लगोगे । किसी पाश्चात्य विद्वान् का कथन है कि "फर्तव्य. फा पालन करना ही धर्म है। जो लोग उचित कर्म का त्याग नहीं करते उनके धर्म की रक्षा प्राप ही आप होती है। हमारे शास्त्रकारों ने.भी तो यही कहा है-"धर्मस्तु विहितं कर्म ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः 17. जीवन की सार्थकता तभी है जब धर्म का पालन होता रहे । धर्म- दीनं जीवन मृत्यु का नामान्तर मात्र है बल्कि अन्याय-पूर्वक जीवन से मरण श्रेष्ठ है। धर्म में प्रवृत्त होने के लिए प्रथम मनुष्यत्व का झान होना आवश्यक है। मनुष्यत्व का ज्ञान तभी हो सकता है जब ईश्वर में निष्कपट भक्ति और विश्वास उत्पन्न हो। निष्कर्ष यह कि मनुष्यों का प्रथम कर्त्तव्य, प्रथमः सांधन, भगवद्भक्ति ही है। भरावद्भक्ति प्राप्त करनेवालों को.धार्मिक या सञ्चरित्र होना कठिन । नहीं । ईश्वर में अटल विश्वास और भक्ति मनुष्यत्व-लाभ करने का प्रथम सोपान है। जो ईश्वर के भक्त नहीं हैं वे.मनुष्य होकर भी मनुष्यता से रहित हैं; अतएव विद्याध्ययन के साथ ही साथ वालकों के हृदय में ईश्वर-भक्ति फ़ा अंकुर उत्पन्न हो जाना चाहिए, जो युवावस्था में फूलने फलने योग्य हो । वे बालक युवा होने पर अपने चरित्र को ठीक नहीं रख सकते, जिन्हें बचपन में भगवद्भक्ति और । धर्म की शिक्षा नहीं दी जाती । नीति-पूर्वक-चलने पर भी तब तक मनुष्य का. जीवन अधूरा रहता है जब तक उसे भगवद्भक्ति प्राप्त - चरित्रगठन। न हो । उस त्रुटि को पूरा करनेवाली भक्ति ही है। मान लो, हम सभी काम अच्छे किये, पर ईश्वर में हमारी भक्ति न हुई तो हम मनुष्य-जीवन में एक भारी त्रुटि रह गई। जिनका हृदय फोमल शान्त और विशुद्ध है उन्हें ईश्वर की आराधना करने का अधिक अवश्य प्राप्त होता है। पर उस अधिकार की सफलता तभी है ईश्वर में प्रेम उत्पन्न हो । अन्यान्य अनेक शुभ साधन से चरि सर्वाङ्गसुन्दर होने पर भी उसकी कठोरता दूर नहीं होती । कम कभी तो उसकी कठोरता उसके सारे सौन्दर्य को पार करके या निकल पड़ती है। किन्तु भगवद्भक्ति में चित्त को द्रवित करनेवाल वह अनुपम शक्ति है .जो चरित्र को अमृत के समान मीठा श्री नवनीत के सदृश कोमल बना देती है। चरित्र मनुष्य को मनुष्या प्रदान करता है किन्तु भगवद्भक्ति चरित्रवान् को देवत्व प्रदान कर है और उनके प्रागे अलौकिक प्रानन्द लाकर रख देती है। त तक वह भक्ति प्राप्त नहीं होती जब तक पवित्र हृदय से उस अनुशीलन न किया जाय । ईश्वर में भक्ति उत्पन्न होने के अने साधन हैं । यथा भक्तजनों का जीवन-चरित्र और भक्तिमूलक अन् का पढ़ना, भगवद्भक्त साधुओं से सत्सङ्ग कर उनके उपदेशानुसा चलना, उनके चरित्र में सौन्दर्य और माधुर्य का अनुभव करन आदि। जो ईश्वर की भक्ति को हृदय से चाहेगा उसे वह अवश मिलेगी। अतएव. यदि अपने मनुष्य-जीवन को.सार्थक करना चा . हो ।
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