Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikanerbhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Sanskrat Sahitya Me Sahasay Mulak Alankaro Ka Vikash
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राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा पी एच सी के लिए स्वीकृत तथा प्रासन-सहायता-सप्त धोसिस संस्कृत साहित्य में साहश्यमूलक अखंकारों का विकास लेखक- ब्रह्मानन्द शर्मा एम ए, एन एल वी, पी एपी प्राध्यापक संस्कृत विभाग गवर्नमेण्ट कालेज बामेर प्रकाशक- ब्रह्मानन्द शर्मा प्राध्यापक संस्कृत विभाग गवर्नमेख प्रवेश प्रथमेर मुझक परिक पत्रालय, प्रजमेर
श्रद्धेय गुरुवर
श्री विद्याधर जी शास्त्री
को
सादर समर्पित
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प्राक्कथन परम हर्प है कि साहित्यक्षेत्र में भारत के मूर्यस्य बाचाणे शाप से स्वागसीकत यह शास्त्रीय प्रस्म अब एक मुद्रित अन्य के रूप में सम रिवाकेन्द्रों के लिए सुमभ हो रहा है। यह प्रमन्य कोई सामान्य प्रशाम्भ महीं अपितु चिन्तनजन्म सूक्ष्म विवेचन से सम्पन्न बसेकारवानसम्बन्धी एक ऐसा महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है जिसके प्रकाशन से साहित्म-संसार मे एक अभिनय साहित्य-दर्शन का सम्मुदय होगा और अमरभारती के प्राचीन महाचार्यों की सूठम प्रतिपादन शेनी एवं उनकी मगाम विरेचन शक्ति के ज्ञान से बर्तमान हिन्दी क्षेत्र सर्वथा सुसमृद एवं रुसा होगा। आचार्य भी ब्रह्मानन्द की मह विशेषता है कि वे पूर्वाधार्यो क मतों की बालोचना में अनेक स्पों पर यपने स्मसन्म विवंचन को प्रस्तुत करते हैं और अपनी सूक्ष्मेरिका के कारण गतानुगतिक मति रे मनुगामी म बनकर महान् से महान आचार्यों की बासोपना में भी किसी प्रकार मा अमौचित्य नहीं देखते । यह ठोर कि स्पान स्थान पर पूर्वाचार्यों ने भी इन मों की स्थापना के प्रसंगो को उठाया है परन्तु इतना विशाम मोर व्यापक विवेचन सामान्यतया अन्यत्र सुमम महीं होता। मग यह र विशस है कि असंकारशाम की ग्रन्थमूची में यह पम्म सम्माननीय स्थान प्राप्त करेगा और बसकारों के मान्तरिक तत्व को सममाने में परम सहायक सिउ होगा । निस्संमार में इसके द्वारा बनारसमापी बामोषना के मए मध्याय का सूत्रपात होगा और पारस्परिक विमर्श के नारा असमारणाम या मोर मी मषिराषिक सविस होगा। बिवापर पानी भायरेक्टर हिन्दी विश्वमारतो
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भूमिका प्रस्तुत मप में यापि प्रधानठया सादृश्यमूमन असहारों का विवेपन है । परन्तु पर्योंकि ये सादृश्यमूलक मलहार सादृरम तस्व पर आश्रित ६ मत इनके विवेचन से पूर्व सादृश्य तत्त्व के स्वरूप तमा क्षेत्र का भी इसम विवेमम किया गया है। सादृश्यप्तस्व निक्ष्मण क प्रसंग मे मै ने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि सादृश्य समस्त कलाओं मौकिक व्यवहार्य एवं प्राकृतिक जगत् म किसी न किसी रूप में विद्यमान रहता है । साहित्य का ममित कमामों में प्रमुख स्थान है। इसलिए कसा सम्बन्धी सादृश्य के पिवेपन मे साहित्यसमन्धी सादृश्य का विवेचन विशेप रूप से किया गया है। सलिसकमाशिरोमणि इस साहित्य का क्या स्वरूप है इस विषय को मेकर आलारिकों ने औचित्य रस, अनि आदि को उसका स्वस माना है। मैंने यह प्रमाणित करने का प्रमम किया है कि साहित्य के ये विभिन्न स्वकर इस सादस्म तत्व से किसी न किसी प्रकार सम्बन्धित है। मनहारों की सादृरममूलकता के विवेचन के समय इस सादृश्य मूनकता की गहण्ई मे बाने के लिए वसरों के सम्पम-मतिरेकमाव एवं बाधयापिम्पव आ मसघारस्वरूपनिर्ममकारी मभिमतों का भी इसमें पूर्व विवेचन किया गया है। इस विवेषन से यह स्पष्ट होमा है कि पम्यसकारों के मूल में उपरम सादृश्य स्थित है। इस उपरण साबरम रे मतिरिक्त महासकारों * लिए एक और सत्य की अपेक्षा बौर यह है वों तथा अर्म का सारय । इस प्रार अर्थानुहमता गया संसारी का आवश्यक अंग है। ध्वनिवादियों का इससे विरोप है। मानारों को हारादि के समान माप आभूषण मानकर उन्हें मर्यका नियम क्स से उपयरक मही मानवे । मत इस प्रसंग म उन इस मत का मान किया है। समासरों की सादृश्यमूमम्मा का निरूपण करसे ममप प्रसंग उमके भन्य विरोपाधापक हेतुर्मोश भी विवपन किया है । उदाहरणत समर का निरूपण करते समय रस्पर तमा मम्मयर के मत पा सगरम २ करते हुए चमत्कारी अर्थ-वैपम्प को यमक का आवश्यक भंग सिस किया है। सायनुप्रास के प्रकरण में अभिहितान्वयवाद तवा बम्बिताभिपानवाद का निरूपण करके यह बताया है कि पूर्व मत के अनुसार ही लायनुप्रास का पृथक् यसकार होना मम्भव है । इसके बाद इन दोनों वावों में ममिहिताम्पयवाद की समीचीनता सिद्ध करके लाटानुप्रास को पृपक मानने का बौधिस्य सिद्ध किया है। सादृश्यमूलग भानवरों का विवेचन उनके मूल में विधमान सारपसम्बन्धी घिचवृति के आगार पर किया है। इस चित्तवृत्ति के भेव को ही मतदार विभावन का मामार मामा है। नित्तवृत्ति मे भेव न होने पर माया के सामारण अन्तर को असगार विमाजन का हेतु नहीं मामा है । इसी दृष्टि से कम्पक तथा विद्यानाप के वर्गीकरण की आमोबना करते हुए इन मलयारों के वर्गीकरण का प्रयास किया है। उपर्युक्त दृष्टि से विवेचन क फसस्थम्स अन्य आलसारिकों के अनेक सादृरपमूमर अलार अथवा उनके भेद इस श्रेणी से याहिर पने गाते है । कतिपय सादृश्यमूला मलधारों अपवा उनके भेर्यों का मम्प सादृश्यमूलक बलकारों में अन्तर्भाव हो जाता है तथा कतिपय सादृश्यमूसर असारों क पृषक मेदो की पृपक्ता नट हो जाती है। नाहरगत उम्मेख के मुड भेद कारस दीपक, मातादीपक प्रस्तुतार, सपा रुद्रट में उत्तर वर्षान्सरम्यास आतेप प्रत्पनीष एवं पूर्व का सादृश्य मूलक असमारा स बहिवि हो जाता है । शम्शेप पर पाभित उपमा सपा सपा आदि क भे मी सादृश्यमूलक बनमारा , भम्तर्गत नहीं थाले। उषयहरपालघर का अन्तर्भाव उपमा में हो पाता है। प्रती प्रथम द्वितीय तथा तृतीय भेद उपमा म तमा प्रसुप एवं पथम मेव म्पतिरेफ के मन्तगत घमे पाते है। परिणाम निदरामा तथा समित का यत्ताम पर में हो जाता है। संकीण उस्लेस विमिम सादृश्यमूसर मतकारों मे अन्तमूत हो जम्सा है। निश्पालगार सया अतिशयोक्ति के ममेरे भेद.' एवं पर्पोतो व रानम् मेद ममा प्राप्तिमा। असम एक उपमा मे मग्निविष्ट हो जाते है। रुद्रट के मस उभयस्याम, समुपप तपा साम्य ममा उग्रता प्रतिपम्पमा दीपन एवं उपमा के अन्तर्गत पसे मान हैं। दीक्षित की पपस्तापह्नुसि तथा भ्रातापहनुति शान्तमा प्रम' दृारोपपक एवं प्राप्तिमान में हो जाता है। अतिभयोक्ति के 'असमम्मे समत्व' मा 'कापमारणपो पौर्वापय विपयय' नामक भेदों, परम्परिसोपमा, परम्परिसम्पर एवं व्याकरण- मूनक उपमाप्रभेदो की माला मष्ट हो जाती है। असवामिभाग के समप आलारिकों के परस्परविरोधी मतों पर विपन करके उनमे से किसी एक को ममीचीनता सिंद की है अपरा दोनों मतों के असमोमोन प्रतीत होने पर अपना स्थान मत उपस्थित कले का प्रयन किया है। बाहरणत पनिरेक मे पेषम्मप्रतीप्ति के स्वरूप के विषय में खासारिकों मे मतभेद है। मम्मट तथा जगन्नाप के अनुसार यह देवप-प्रतीति उपमय के उत्कप के रूप में होती है तथा सय्यक, विश्वनाथ मादि के अनुसार यह उपमय के उस्कप अथवा अपकप इन दोनों में से फिमी भी कप में मम्भव है। इस प्रसग में सम्मपिकप व भय स्थिर करके स्पक एवं विश्वनाप आदि के मत की स्मापना की है। साक मे तापप्रमीति की प्रतिमा ६ विपय म प्रापीम नपा नगीन मानकारिकों में मतभेद है । प्राचीनों के अनुसार यह प्रक्रिया सतगा के द्वारा होती है तथा मवोमों के मनुसार यह ममेदससग से होती है। मत दोनों मतों का विपन कर नबीनों के मतका मौपित्य स्थापित किया है। उटोशाम विषयोपाबम बावश्यक है अमवा नहीं, हम विपप को मेकर मामकारिकों में मामेव है। स्स्यक क मनुमार विषय का उपादान मावश्यक है परन्तु मम्मर एवं विधनाप रे मनुमार इसका उपान मावश्यक नहीं । इस प्रसंग में दोनो मतों का विरोधन करके दिसौम मत की समीपीमता सिपी है। सम्भावना केवल अमेवर्ग के दाग होती है अमवा समवायादि धम्म सम्मम्मों काय मो वह सम्भव है इस विषय को मेकर प्राचीन सपा मम मामकारिकों में मतभेद है। प्राचीन प्रपम मत के पक्षपाती , तमा मम्म दितीय मतम प्रसंग में दाना मतों का विवेचन र द्वितीय मन को बसमोचीन मिद किया है। पृपा पृम मनगरों का निरूपण परसै समय उप अनवरविभप के मूल मे विधमान सादृश्यविषयक चित्तवृत्ति का स्वस्म निश्चित किया है तथा मलकारों की परिमापा एवं मेनोपमेव सादृश्यतत्त्व को लक्ष्य करस किए है। सादृश्य के आधार पर पकायें का उपर्युक्त पिरोपन करते हुए अलंकारों के विकास का भी विवेचन किया है। रस पनि औचिस्प बसकायवि साहित्यमान के विभिन्न सिवातों सादृश्यतस्व के इस प्रकार लमित होने के कारण यह प्रस्न उठना सर्वपा स्वाभाविक है कि सादृश्यतत्व पी इम व्यापकता का क्या कारण है। अत विभिन्न पार्शनिक दृष्टिकोणों से यह सिद्ध किया है कि विश्व के कार्यों में एक साम्प है। में अपने प्रयास मे यहाँ सम सफल हुआ हूँ तथा प्रस्तुत ग्रन्थ मानक्षेत्र की अभिवृद्धि म महाँ तक योग देगा इसका निर्णय विवाद हो करेंगे। इस अन्य ५ प्रकाशनार्य राजस्पाम विश्वविद्यालय न वार्षिक सहायता दकर मुझ मनुग्रहीत किया है। इसके लिए मैं उसका भरपन्त मामारी है। मैं अपने गुस्वर प्रदेय श्री विद्यामर बी शामी का अस्पन्त आभारी हूं भिमबी प्रमर मानज्योति मलकाराम तपा दर्शन के दुर्गम क्षेत्र मे मेरा सतत मार्गदर्शन कर रही थी । थी नरोत्तमदास मी स्वामी समा हा. फतहसिंह जी का मी म मामारी। जिनस मुझे पगमध मिसता रहता पा । अन्त में में भारत पे उन प्रापीन एवं महान् आलंकारिकों का अत्यन्त मामारी : जिमके विचारों से लाभ उठाकर एवं प्रेरणा प्राप्त पर में अन्य विद्वाना के मम्मुख रखने म समर्प हुआ हूं। प्लानन्द शर्मा विषय-सूची प्रथम अध्याय - सादृश्य सादृश्य का क्षेत्र पृष्ठ सपा समाज मे सादृश्य प्राति म सादृरम कला में सादृरप १५-१६ २०-२२ २३-२८ काव्य मे सादृरम -कवि की दृष्टि से सहृदय को मध्य करके भाग्य के स्वस्म सपा उमम सादरप ३४-३९ roury बोधिस्म तपा सादृश्य रस में सादृरम पनि में सादृश्य ५१-१४ द्वितीय अध्याय अतकारों के मूल में सादृश्य ५५-५९ धम्बामदारकोटि मे याने पासे पसंकार पायलका के मून मे सादृश्य ६०-६५ अनुप्रास मे उबारण सपा अर्य का सादृश्य थावस्या ६५-७३ अनुप्रास ७४-७७ यमप ७८-८१ मायानुप्रास ८२-८९ पन्नासकारों की प्राचीनता मामारण ऋग्वे में परदासपार 1 ९१-९२ रामायण एवं महाभारत में शमालेकार पाध्यमास मे शमासकार मलकारालके अन्यों में शासका का विकास १०४-११० सृतीय अध्याय मातगारों मे सादृश्य सादृश्य के लिए माइतिगत साम्य पावरपा अपवा नहीं ११४-११६ पृष्ठ संख्या 4 उपमानों का क्षेत्र ११७-१२१ सावृरयमूलक असकारों के मूल में विद्यमान सादृश्य मा स्वस्थ तथा उसके भेद १२२-१२९ आमकारिकों द्वारा किया हुआ सादृश्यमूमक अलंकारों का वर्गीकरण तपा उसकी आलोचना- रम्पकात निस्पण का विवेचन १५०-१४२ विधानाप द्वारा किए हुए वर्गीकरण पी मदोषता उपमा १४-१८९ उपमा के सस्व उपमेय तमा उपमाम १४-१५५ सापारमधर्म १५-१६७ वापक १६-१७० उपमा के मेदोषभेद सपा उनका वगीकरण १७१-१७२ उपमानों तपा माषारणपर्मो को बनेकता के श्रापार पर भेद १७२-१७५ सादृश्य के संश्लिष्ट धिषण आदि के आधार पर भेद १७५-१८० सादृश्य के वायत्व तथा व्यंम्पत्व के बापार पर किए हुए तपमाप्रमों का पयान- १८०-१८२ अबयों के उपावाम तपा अनुपादान के आधार पर सपमा के भेद- १५२-१८८ 1८८-१८९ अनन्वय असमामगार उदाहरणासकार तपा इसमा पपडन उपमेयोपमा २००-२०८ प्रसीप तथा उसका अम्य अलंकारों में अन्तर्भाव २०९-२१५ व्यतिरेक २१६-२२५ २२६-२३७ परिसाम तथा उसमा मपक में अन्तर्माण २३८-२४३ उत्सेस अपनि २५२-१८ - अन्य मेद १९८ पृष्ट संख्या निधपालकार का मासिमान् म अन्तर्माव उसोचा २६१-२७२ उस्तावमय २७३ मतियोक्ति २७४-२४ प्रतिवस्तूपमा २८५-२८९ दृष्टान्त २९०-२११ निवर्थना का अन्य मसकारों में मन्तर्भाव २९२-२९७ समिस असकार का कार में बसर्भाग २१८-२९९ दीपक ३००-३०६ तुरुपयोगिता ३०७-३०८ सहोक्ति ३०१-३१५ समारोक्ति ३१६-३२३ मप्रस्तुतप्रशंसा प्रस्तुतोकुर का पनि मे अन्तर्माव ਬਲਰੇ विततिकार का सन्दह में अन्तर्भाग ३४६-३० प्रान्तिमात् ३४८-३५३ स्मरण ३५४-३५ रुद्रट क कतिपय सादृश्यमूलक बसमार्गे का सादृश्यमूलप सकार से बहिर्भाव वैदिक काल में सादृश्यमूलक अर्मकारों का प्रयोग रामायण एवं महाभारत ३६५-३७३ काभ्यकाम ०७४-३८१ मनकारनाल के प्रन्या मे सादृश्यमूलक मालकारों का विकास ३८२-३९८ चतुर्थ अध्याय सादरप क मूम में रहस्य
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प्रथम अध्याय साहरप-निरूपण की भाषश्यकता सादृश्यमूसक ममा के विवेचन के लिए यह पाम मावस्यक है कि हम सर्वप्रथम सादृश्य के स्वस्म को पूर्ण सम मे समझ में तथा उसके फोन पर विचार रखे। माहरण सादृश्य की परिभापा निम्न प्रकार से की गई है- "तनिमये सति तद्गसभूयोधर्मवस्वम्' काव्यप्रकास टीका पृष्ठ ५४२ इस परिभाषा के भमुमार भिन्न वस्तुओं में धम अपना धर्मों की साधारममा क आधार पर सादृश्य होता है। उदाहरण के लिए मुख सपा पन्द्र को में सो उसके सादृश्य को इस प्रकार व्याप्त कर सकते हैं- 'चन्द्रभिनवे सति पन्द्रगताहादात्वम् मुभ पन्द्रसादृश्यम्" यहाँ मुमा तथा भन्द्र भिन्न है परन्तु आझादसा उन दोनों मे गरा गपर्म के रूप में विधमान है। बस इन दोनों म सादृश्य है। इस प्रकार सादृश्य में दो वस्तुएं होती है- मेद तया धर्मों की साधारणता । धर्मों की साधारणता को हम ममेद कह सकते हैं। इस प्रकार सादृश्य म भेद तमा अमेव दोनों होते है। बभेद जिस प्रकार धर्मों के रूप में होता है उस प्रकार भेद भी धर्मों के रूप में ही सम्भव है। इसका कारण यह है कि यस्तुओं की ससा गर्मों के काम होती है। मत उनमा भेद उममें विद्यमान भमा के रूप मे ही सम्भव है। स प्रकार सादृश्य में कुछ होते वा कुछ धर्म मसाधारण होते है। धर्मों की सापारयता से सामान्य रास्व स्नता है तमा उनकी असाधारणता से विसप तस्य बनता है। सादरप में सामान्य सपा विमेप मे दोमों तत्व होते हैं। निलिखित नति का यही माशम है- "या किविसामान्य कमिन विशप स विषय सदृश्या"- सर्वस्व पु. २४ सामान्य वस्व समग्र माम साधर्म है तथा दिप बत्त कर दूसय पर्म साधारण नाम पेपर्य है। अत साधर्म तपा बेषH इन दोनों के मिलने से सारय का जन्म होता है। नैयायियों ने उपमान प्रमाण के प्रकरण में सादृश्य का विवेचन किमा है । इनके अनुसार "गौरिव गवय' ' सादृश्य का प्रसिग ज्याहरण है। यहाँ गौ तथा गवय में कुछ मर्मो के कारण साधर्म्य है तपा फुल्छ के कारण वेधर्म है। इस प्रकार सायर्प तथा वैधम्य इन दोनों के मिसन से यहो सादृश्य है। सादृश्य के सिए यो साधर्म अपेचिस है उस मे धर्मों की सम्मा का काई विषान मही, परन्तु इतना अवश्य है कि इस साधर्म्य का प्रेम सना विस्तृत न होना चाहिए कि वह वस्तुओं के समस्त पर्मों को अपने अन्तर्गत कर ने पोंकि इस दशा मे कोई ऐसा धर्म म रह जाएगा जिसके पाषार पर पेपर्दा हो सके। वैषम्य तत्व का सर्वपा सोप होने के कारण वह सादृस्य भी सम्भव नहीं निसके लिए साधर्म्य के अतिरिक्त वैमर्य तत्व की भी अपेक्षा है। मम्मे तत्त्व से रहित इस अवस्मा को हम तप्य कहेंमे । तादृप्य साधर्म्य की परम विस्तृत अवस्या होती है । इस अवस्था में वस्तुओं के समस्त पर्म सापर्प की परिपि में आ जाते है। कमसमस्ति में यही बात है। यहाँ मुम मिस के साप है। तबूप के मिए भी प्राय' समान सब का प्रयोग होता है। द्रव्यों के सादृश्य से गुणादि के सादृरम मे सम्तर है। द्रव्य की परिमापा 'गुणवद द्रव्यम्' की गई है। अत द्रयों में तो उनमें विद्यमान गुणों की सापारपता के श्रापार पर सादृरम सम्भव है । गुणों में यह बात महीं होती । गुणों में गुणों की सत्ता नहीं होती जिनके पापार पर उनका सादृश्य हो । बातमुर्गों का सावरम गुग-साभारयता के मावार पर न होकर तारतम्य अपमा मात्राभेद के आपार पर होता है। उदाहरगतको वस्तुओं के वर्षों का सादृश्य उन वर्गों के तारतम्य के आधार पर होता १ वा हि गवयमबानापि मागरिको बा गोखपा गल्प विमान कुमिरापमा पुरण गम्मा नगी पापा स्मरन् पपा गोवारस्पमिशित रिया पति पदा वाक्यासारपसहरून ग्वारपपिशिापियसनमुश्माममुप- मितिनगलात्" मन प. १ "विमामुतवत् समपायिकरयमिविशम्पायर"-रोपित दर्शन-१५ है। यदि वे पस्तुएं श्वेत है तो उममें से एक में अन्य की मपेशा वेत वर्ष की अधिकता होगी। इस प्रकार उन दोनों स्पेस बमों मे तारजम्प के कारण धर्म होगा और फमत उनम सादृश्य होगा । गुणों के इस तारतम्य को गुममम्मिश्रण का परिणाम कहा जा सकता है। दो क्षेन वर्गों में से OF में अन्य की अपेक्षा जो न्यूनता होती है यह उसमे कृप्या गुण के किश्चिम सम्मियण के फलस्वस्य होती है। यह भी सम्भव है कि इन दोनों वर्षो में कृप्स गुण का मम्मिमरण हो । इस दमा मे उनमें तासम्म का कारण उनमें मिषित कृष्ण गुणों का साम्प होगा। इसी प्रभार दो मधुर रसों में सादृरप उनमे विधमाम माधुर्प तपा इस माधुर्य के मानाभेद के मस्वरूप होता है। मध्य नेपामिक पादृश्य को सापम्प के अतिरिक्त मौर कुछ महीं मानते । इनके अनुसार सादृश्य तमा साथ एक ही वस्तु है। बत मारय को पृपा पदार्प मानने की भावरपक्सा नहीं । निम सिमित कि इसकी समर्पक है- मष्यताकिकास्तु सादृरपस्पासिरिफापार्यवेऽष्टमपदार्थापत्या रम्यगुण कर्मसामाम्पविशेषससमवायामागा' एव पदार्या' इति स्वसिताम्त शनि मन्पमाना "सावरयं न पयार्यान्वरं किन्तु साधम्र्य सादृश्योकमेति "बदन्ति काम्य प्रकाभ टीका पृ० ५४२ । सादृश्य तथा साधर्म्य के सल्म पर विचार करने से प्रप्तीत होगा हि मम्मताकिकों का उपक मत उचित नहीं । साधर्म्य में कपात अश्यम सामान्य का ध्यान रखा माना है परन्तु सादृश्य में इसके अतिरिक्त अपया विशेप का भी ध्यान रखा जाता है। प्रथम में केवल प्राधारमना की प्रतीति होती है परन्तु निसीय मे इसके साप साप असाधारणता की मी प्रतीति होती है । मप्त दोनों में भेद स्पष्ट है। सादृश्य में हमारी दृष्टि एक वस्तु के दूसरी वस्तु से सम्बन्ध पर केन्द्रित रहती है। सापय में यह दानों पशुओं के एक धर्म से सम्बम्य पर पेन्द्रित रहती है । इस प्रकार सादृश्य में उपमेय ममुयोगी हाता है तथा उपमान प्रतियोगी होता है। साथम्य में उपमम तथा उपमाम दोनों अनुयोगी होते हैं पा सापारगपर्म प्रतियोगी होता है। पामनापाप की मिम सिमित उक्ति का यही भाग्य है- सादृश्यस्य प्रतियोगी "तथा पात्र सापपास्पसम्पपस्य साधारणपर्म प्रतियोगी उपमानमुपमेयोति द्वावप्यनुपोगिनी । उपमानम् अनुयोगी उपमेयम् । वासवोमिनी पृ. ४१ सादृश्य दो साधर्म्य से भिन्न न मानने वामे इसके विष्ठ कहते है कि सापर्प में भी सम्मन्य उपमेय का उपमान से होता है उपमेय तपा उपमान का समय सापारणपर्म से नहीं होता। इसके समर्पन में इन विद्वानों ने अनेक युक्तियां दी है। इन विद्वानों का यह मत भी सादृश्य तथा साधर्म को एक सिट कर सके ऐसी बात नहीं । वस्तुत' मुस्प प्रश्न यह नहीं है कि सादृश्य तथा साधर्म्य में सम्बों का प्रकार क्या है अपितु प्रश्न यह है कि सादरय तथा साधर्म्य के स्वरूप क्या है । सादृश्य के स्वरूप का कुछ विवेपन हो चुका है। बत' अब साधर्म्य को मसी भांति समाना मावरमक है। वामनाचार्य ने मम्मट के पदों की म्यास्या करते हुए सापर्म की परिभाषा इस प्रकार की है- "समान एक तुल्यो वा पर्मो गुणक्रियादिम्पो ययो ( वर्षापमानो पमेपयो) तो सपाणी तयोर्भाय' साधर्म्यम् ।"-वासबोधिनी पृ. ५४० इसे स्वीकार करने मे किसी को आपत्ति नहीं हो सकती । इस पंक्ति के ठीक बाद वामनाचार्य कहते हैं- "उपमानोपमेययो समानेन पर्मेसह सम्बन्ध स्पर्प ।'-पासबोधिनी पृ० ५४१ । यहाँ सहयुक्त प्रषाने (२।।। १९) इति पाणिमिसूत्रेण तृसोयेयम्" ऐसा कहकर वे 'समानेन भर्मेण सह का मर्प समान पर्म के साप लेते हैं । सादृश्य तपा सापH को एक मानने वाले विद्वानों का इससे मप्तमेव है । वैमे 'उपमानोपमेययो ममानेन धर्मेग सम्बम्म' को तो ये भी स्वीकार करते हैं। भोर स्वयं मम्मट ने भी इन शवों का उस्तेप किया है।' परम्स समानेन पर्मेण' का मर्प य विद्वान् 'ममान धर्म के साप' न मेफर 'समान धर्म के कारण' मेते हैं। हम परिभाषा के इस विवादग्रस्त १ "उपमानोपमेश्योरे-सापय भवाति परिव समानन पर समय उपमा।'-प्रम्य काय ५४ 2 They understand Mammota. Words उपमानोपमेय परिव "सायम्म मातीति योरेग समानेम पप सम्पर उपमा in the sense that Upama l the relation of connection (सच) अंग को टोरकर क्षेप अंच को मेफर घालत है पिसके सम्बय में किसी को मतमेव म होना चाहिए। इस मा के अनुसार सापH का वर्ष होवा है-यो वस्तुओं में समाम अपवा सामारस धर्म का होना । सादृश्य सपा साषम्य की इन परिमापाभों से स्पष्ट है कि सादृश्य सपा साप के दारा उपस्थित थिों में भेद है । सादृश्य का पिन सामर्म की अपेक्षा विस्त है । साग1 में हमें बस्सुओं में केवल साधारणधर्म दिलाई भते हैं । परम्नु सादृश्य मे इन सापारयमों के अतिरिक मम्य पर्म भी मिमे रहते हैं। इस प्रकार सादृश्य मे वस्तुओं का एक सामूहिक पपया विस्तृत चित्र होता है। हम अब यो वस्तुमों को देखते है तब सर्वप्रपम कोई साधारणवर्म हमें उन वस्तृमो मे दिम ई देता है। हम देखते हैं कि प्रयम वस्तु मे यह पर्म है सया पितोय में भी यह धर्म पह सापर्य का चित्रहमा । इसके बाद उस धर्म से युक्त दोनों बस्सुमों का सामूहिक अथवा विस्तृत चित्र हमारे सामने बाता है। इस दमा में उस धर्म का पूरा मान नहीं होता मपितु पस्तों के अन्य गुणों के साथ वह मुसा मिमा होना है। इन भूले मिले मित्रों में हमें सादृश्य दिखाई देता है । यह सादृश्य का चित्र एषा । "गौरिव गवय" मादृश्य के इस उताहरप्स से यह बात स्पष्ट हो पाएगी। यहाँ प्रथम हमें गौ तवा गवय के कतिपय That u IPuch exau between ठम्मान and उपमेव (only) and u broaght out through a proporty-common to both. They understand the inftrumental in समानेन धर्मर' in the acnso of them na' by menni of-through' und not of 'Saharshi'-inccompanying with' why some authors une vach expressions as test जामन्' or सम्पर। Journal of the Univernty of Bombay September, 57 -Vol LAVI (Nor aeries) Part 2, Arts No.32 Page---144 1 समानेनेतिएकामानिविषय-तणेत । भम्पपद पागलेकम्मरसम्पर-सम्मा इन मरम्पों के अनुसार इस धमान साप एकमरा बापारय निक्षता है।
साधारण अवयव दिखाई देते हैं। इसके बार गौ सपा गवय के सामूहिक चित्र हमारे सामने आते है जिनमें सामारणमर्म पृषक म्प से प्रतीत म होकर अन्य धर्मों से धुले मिसे रहते हैं। गौरिव गवय' में उपर्युक उवाहरण में सादृश्य का पित्र नेन्द्रिय का विपय है।कभी कमी सादृश्य का चित्र मेत्र का विषय न होकर अन्य इन्द्रियों में से किसी एक का विपय होता है । सवृक्ष वस्तुओं का स्वरूप निस इन्द्रिय का विषय होता है अथवा वस्तुओं का सावरपाषापक साभारणपम जिस इन्द्रिय का विषय होता है उन वस्तुओं का सादृश्य भी उमी इन्द्रिम का विषय होता है। जाहरणत जव किसी की वाणी को कोकिल की वाणी के समान बहा माता है तव सादरय कर्म का विषय होता है। इसका कारया यह है कि वाणी कर्ण का विषय है। बात इसका सादृश्यसम्बन्धी चित्र इसी इन्द्रिय का विषय हो सकता है। सादृश्य मवस्मा में इन वाणियों के दो मित्र हमारे सम्मुख पाते हैं उनमे साधारण धर्म माधुर्य भी हरा रहता है । मन भुवायों को वय के समान कहा जाता है सव सादृश्य त्वगिन्द्रिय का विषय होता है। यहाँ मुगाएं सपा बस यधिप मेष के विषय हो सकते है परन्तु इनमें सादरय कठोरता मावि में से जिस किसी धर्म को लक्ष्य करके विनाया गया है यह स्वगिन्द्रिय का विषय है। अप्त सादृश्य के समय इनके स्वगिन्द्रियगम्म पित्रहो हमारे सम्मुम आते हैं। मादृश्य का चित्र किसी इन्द्रिय का विषय हो यह निमित है कि यह चित्र साप के चित्र मे कुछ मिल भवश्य होता है। विरोधी प्रश्न कर सकते है कि सादृरम के उपमुक्त चबाहरणों में साधारणपर्म का उपादान महीं। बत' ऐसी दशा में सादृश्य तथा साधर्म्य के चित्रों में बोगिक भेव हो सकता है। परन्तु वहाँ साधारणपर्म का उपावाम होगा वहाँ इन चित्रों में भेद किस प्रकार सम्मप है । स्वाहरणत 'मुन कमसमिव सुन्दरम्' इस स्वाहरण में 'सुन्दरम्' पाम्ब का उपादान है। अत' सादृश्य के समय मुख तथा कमस के सौन्दर्यसम्बन्धी चित्र हमारे सामने आएंगे । इनका सादरय इमके सौन्दर्य प्रेम में होगा मौर इमका सापH भी इसी सौन्दर्य के रूम म है । अतः यहाँ सादृश्य तथा सापर्य मे मन्तर प्रतीत नहीं होता। इसका उत्तर इस प्रकार हो सकता है कि उपक दशा में मुस सपा मामत के यो सौर्य-सम्माधी चित्र हमारे साममे आते है ननमें पुष मन्तर बाप है। सौरयों में सामान्य सव के साय विश्वैप तत्व भी मिमा रहता है। मुख सया कमत के सोनार्य एक अपरा सत्रमा समान न होकर कवस समासीय है। इस प्रकार यहाँ सौन्दर्य-सामान्य की दृष्टि से साधारणता है परन्तु सौन्दर्य के प्रकार की दृष्टि में भेद है । इस प्रकार यहा सादृरम सपा साव में चित्रों में अस्तर अवश्य है। विरोधी प्रश्न कर सकते है कि मुन्न तथा कमल के सौनों मे वस्तुम मेद मते हो हो कवि तथा पाठक को पानी कल्पनास्थिति मप मेरको प्रतीति नहीं होती । उन्हें एक अपवा सवमा समान धौन्दर्य मुख नपा कमम में निमाई देता है। मत कवि तया पाठा क सम्मुन उपस्थित मादृश्य तपा सावम्य के चित्रों में उन्हें भेव मसित नहीं होता । विरोपी का मह वपन सर्वमा उचित है । ऐसी घमा में सादृरम तश मार्म को सीमारेखाए मिलतो मी प्रतीत होती है। परन्तु ससे इस बात में कोई मन्तर नहीं मासा कि सादृश्य सवा साधम्प में सेवास्तिक दृष्टि से भेष है । सासर्प मादृरय कारण अवश्य है परन्तु सापम्प-नाम की स्थिति मादरव ज्ञान की खिति से भिन्न है । सादृरप-शान की स्थिति साधर्म्य-मान की स्थिति के बाद होती है। इसमे साधर्म-शान के अतिरिक वेपम्पस म मी प्रतीति होती है। मनेक मसकारों मे सादृरप वाच्य न होकर पाप होता है । सपकादि असकारों मे यही माल है। यदि सादृश्य को साधर्म्य के अतिरिक म माना गाए तो सापारणवर्म के उपरान को बराा मे इन असकारों के सादृश्य का ध्यमस्व बसमीचीन सिद्ध हो पाता है न असंग म मनक बार साधारसमर्म का तो निर्देश होता है, परन्तु सादृश्य फिर मी म्पम्य माना माता है। मह सारम तपा सावर्य को एक मानने की अवस्था में सम्मम नहीं है क्योकि यहाँ साधारणपर्म का निरंत होगा महो साप वास्प होगा मोर यदि सादृस्य तथा सामर्प को एक माना जाता है तो सादृरय भी यहाँ पाप होना चाहिए। परनु उपयुक मसकारों में यह मात महीं होती। मत सादृरम को साथम्म से मिन्न मानना ही अपित होगा। विपर का यही मत है- "मम सवा सादृश्य मेग्यमिति सिगम्स' । एव व सादृरप पचन्तिर मेवामकारिकाभिमसम् । अम्ममा पर्मस्मोराने सहारमकर ५ मादृश्यस्म प्यावानुपातिरिति कपित्।" अमर बोसुम पृ. २९६ ८ प्रम उठ सकता है कि यदि सादृश्य साधर्म्य से भिन्न है तथा साधर्म सादृश्य का कारण है तो असंकारों को साधर्ममूलक न कहकर मादृश्यमूनक यों कहा गया । इसका उत्तर यह हो सकता है कि काम्प मे प्रधानतया बसूओं का सामूहिक तमा संश्लिष्ट चित्र उपस्थित किया जाता है, पस्तुओं के एक ग्राम धर्म का नहीं । स दृश्य का इस प्रकार के चित्र से निकट सम्बन्ध है। अत' भर्स कारों को सादृश्यमूलक कहा गया है। अब हमे यह देखना है कि प्राचीन मान्य आसनगारियों का इस विषय मे क्या मत है। इन मासकारिकों ने न तो सादृश्य तमा सावर्म मे से किसी की परिभाषा की है और न ही इनके भेद उपवा ममे का कहीं सट उल्मस किया है। इन मोगों ने कवस अपनी उपमा की परि भाषाओं में सादृश्य तथा साबम्प में से किसी एक शम का प्रयोग किया है। कुछ आलंकारिक सादृश्य शग का प्रयोग करते हैं तया फुध साधम्प का।' इस पर रा० मी एम. कुलकही कहते हैं कि प्राचीन बानकारिस सादृश्य तपासाबम्म को एक मानते थे।'• पुसणी के इस अनुमान १ भारत, एसी, मास्ट, अपपदाचित (समानन्द) बगाय प्रादि ने पारस शब्द का प्रयोग किया है या उदम मम्मद, रम्पक, मचन्द्र प्रप्पर- दीपित (विक्रमीमांसा ) विद्याभूषण मादि ने साधम्म सम्म प्रयोग किया है। R Chronologically speaking aboa diocasion of the dutinction between onani 001 of very lato ongin and tho carly alonkarikas were not aware of any soch distinction to us clear from ther wo of the rords aaश्य, साम and a sernonyms It in सम्म who Lint once the word stand instead of employed by hseminent pralocestors मरत मा and रिन् If ho had in mind thosupposed distinction he would have defloitely expecured it la bis * Even Mombate sho borrom tbot pond from nowhore give any clot to asumo any noch distinction. On the contrary ho employes the words साथमै साम्प बास synonymously Itaimply means by unge the words साम्प, पास्म, सापर्म or के लिए पर्याप्त आधार महीं। हमारे उपयुक्त विवेन से स्पष्ट है कि सापर्म बादृश्य का कारण है तमा साधर्म्य तया वेपर्य के सम्मिमय से बने हुए नादृरम में उस के एक प्रमुम तत्व के रूप मे मह सापर्य यहाँ रहता ही ३ त सादृश्य सया सापर्म को मिन्न मानने की अवस्था में भी यह सम्भव है कि कुछ बालकासि उपमा मे सादृश्प शम्न का सभिषेध करें तो कुछ सावH कम दूसरे साधर्म्य शम्द का सग्निवेश करले पाले अमेक माम्प मालगारिकों ने परिमापा में भेद पद का उस्लेख किया है। भट में तो इस बार कपन संकेतमान है। परन्तु मग्मट हया स्पमक' मे इसका सष्ट उल्लेख है। 'साधर्ममुपमा मे" उपमा की इस परिभाषा मे मम्मट मे भेद का सष्ट जस्लेख किया है। यहाँ मुख सोम यह संका कर सकते हैं कि यही भद का सन्निवा उपमा की अनन्वय से पृथक्ता सिर करने के लिए है। मौर मह यात मम्मट मे स्वयं कही है:- मेहसमनवयष्यवशाय -काव्य प्रकारा पृ० ५४६ । ठीक है भेद सम्म उपमा की अनम्बय से पृथक्ता सिद्ध करता है। परन्तु इसके साप ही साप उपमा की परिमापा में इसका स्पष्ट उसेस मेवप्रतीति को उपमा २ परम पायावस्यक मेग मी ममा देता है। इस प्रभर उपमा में सापर्म तथा वैषम्य दोनों प्रतीत होते हैं। za were treated as synonymour le capot ligbtly not aside tho arage of the boat alankaritas Journal of the University of Bombay, September, LXAVI (Ner series) Part 3 Art No. 82 1957 १ "तोहरि पम्पमुख्मानोपमेसमोर । मिपी रिमिकालादिरामयोगमा | प्रसारपर इस परिमापा अनुसार मिल पनुनीम पत्पर्म उपमा है। पखामिय होने के कारण ममें सापम के अतिरिक्त स्वयं प्रतीति ऐना मी प्रपन्त स्वामी समभर रस्मा में छापम्प तप्प पेपर्म रोनाश्री प्रवीति होगी। मा प्रवीति सास के प्रतिरिक मोरम नहीं। . 'तम्मानारमेषा तापम मेदामेस्माते उम्मा 1-मर हस पो परिमाय में प्रभेद साप साम मेरो सपिग। वा रुपमा में पाबरी मीवितीहै। २ मम्मट मे इम साधर्म्य तपा तुल्य बादि शवों का प्रयोग कतिपय ऐसे स्थों पर भी किया है जिनको देखकर सादृश्य तथा सामर्म को एक मानने वाले विद्वान् कह सकते है कि ये स्थान इस बात के प्रमाण है कि मम्मट को साधर्म तथा सादरप पर्यायवाची शब्दों के रूप में अभिप्रेत है। परन्तु मम्म विवान् इसके विपरीत उसने ही बोधिस्य के साथ कह सकते है कि ये स्खल साधर्म्य तथा सादृश्य को पृपा मानने की अवस्था में भी पूर्णत ठीक बैठते है। मेरे विचार से ये स्मल स्वत दोनों में से किसी मत के निर्मायर नहीं कहे पा सकते । ये स्पस इस प्रकार है- “असादृश्यासमवाषप्पुपमायाम् अनुचितार्यतायामेव पर्यवस्पछ । पया-'अप्नामि काम्पराचिन विततार्यरश्मिम् ।' अत्र काम्पस्प सशिना वर्षानां च ररिममि' साभम्य पुत्रापि न प्रतीतमित्यमुषितार्मस्वम् । काम्य प्रकाश पृ०७८३ सादृश्य तपा सापये की एकता के समक कहते है कि उपयुक श्लोक उपमा में वसादृश्य वोप के उदाहरण के रूप मे उस किया गया है । इसका अर्थ यह है कि इस लोक में मग्मट यह दिशामा पाहते है कि यहाँ वस्तुओं में सादृश्य नहीं है। लोक की प्यास्या में मम्मट कहते हैं कि यहाँ काष्य का पी से तवा भर्मों का ररिम से कोई साधर्म्य नहीं। बत मह निष्कर्ष निकसा कि मम्मट सादृस्पतपा सापपू को पर्यायवाची पायों के रूम में ग्रहण करते है। विचार करने पर प्रतीत होगा कि उपयुक निफर्प बावश्यक नहीं । यह तो ठीक है कि मम्मट यहाँ असादृश्य दिलाना चाहते है । परन्तु बसादृश्य का माम तमी हो सकता है पर हमें सासम्म म विलाई । अतः मसादृश्य दिलाने के लिए यह आवश्यक है कि सादृश्य कारणभूत सापर्प ना मभाव दिसाया गाए और यही बात पहो दिलाई गई है। इसीलिए वामनाचार्य करते हैं:- "एवं काम्पसचिनोरपररम्योम साप स्वामान सापप॑प्रयो म्पस्म सादृश्यस्य सुतरामभाप'--" बासयोपिमी पृ. दूसरा स्पस इस प्रकार है- सच सब सुस्पम्' इत्पुभयत्रापि तुल्पाविशनानां विभान्तिरिति साम्पपर्याप्मोचममा तुल्यताप्रतीतिरिति सामHस्मार्यत्वात् तृस्पादिशा पादाने मारी।' भाग्य प्रकाय पृ० ५५२ यहाँ भी तुस्मता भावि सपा सामर्म को एक मानना वापरयक नहीं। यहाँ यह कहा गया है कि अब तुल्य आदि सों का प्रयोग होता है तब म दो वस्तुर्मो में तृस्मसा मसाई जाती है। परन्तु वस्तुओं को तुम कहने से ही हमें उनकी तुल्यता का ज्ञान नहीं होता । हमें सुल्यता का मान तमी होता है जब हम साम्प पर विचार करते हैं। साम्प पर विचार करने से सुल्यता के मूस में स्थित इस साधर्म्य का माल हमें हो जाता है । इस प्रकार सापर्म यहाँ अगम्य होता है। इसीमिए वामनपार्म कहते हैं- इत्यत्रोमपत्रापि सामान्पत सादृरय शोधयित्वा विसम्मापारेषु वृत्य शापिशोपु धर्मविशेष विमा यमनयो सादृश्यमिति सारपस्य (तुल्यादिशमेनामिहितस्य ) मनुपपस्या धर्मनिर्भपसम्बन्धप्रसीम्तिरिति सापर्पस्पार्मस्वादुपमाया मार्यस्लमिति ।" वानवाषिनी पृ० ५५२। मम्मट पादिकतिपय मानवारिकों ने उपमा क घोप्ती तथा पार्षी पो दिमाग लिए है। उपमा का यह विसावन न आलङ्कारिकों के अनुसार हव मादि सपा सुस्प बादि शब्दो के भेव पर बापित है। इस आदि के प्रयोग पर मे उपमा को पौती मानते हैं तथा स्मादि के प्रयोग पर उपमा को आर्षी मानते हैं।' इव धादि तथा मुल्य आदि के इस मेव के लिए यह मावश्यक है कि इन पदों के धर्म में मेव स्वीकार किया जाए। सादृश्य तपासापर्म को पृमक मामने वामे विनों मे ऐसा स्वीकार करके देव मादि का मप साव, मिया है तपा तुस्प बादि का सादृश्य लिपा है।" व मादि का प्रयोग करने पर साधम्र्य साम्य होगा तपा सादृश्य मार्च होगा । तुल्यादि का प्रयोग करने पर सारण शाम होगा तथा सापने वार्य १ भोत्पापी मोद्यये मासे निवे व्या-म्परा २ पपेनवारियादा सत्यस्वस्यै सासमाये मौवी-म्बE५४९ साधास्वापात्पादिरायोपाने प्राप्रपा ५५२ ॥ १ बबानिराम्दानो सारस्पोमणमास्यसम्मपसे साप पर राममा नवनिम्मोगरयने अपारणमर्मतम्म्मम्म सप वाप्य सारस्पमतीति सम्पपी। स्पादियमान समपति शो समयादिधम्दप्रयोगायो सरस्म पाय ROM लापर्व पायमिति साथमोपे विरोपम्प एप भीत्यामा देवी माम। वामिनी पर LI होगा। पूर्व दशा में उपमा शादी होगी तपा रितीय दशा में उपमा मार्षी होगी। इस प्रकार इन बामपरिकों को श्रौती सपा भार्थी मामक उपमाविमावन का एक बाधार मिल जाता है।' सादृश्य तपा साधर्म्य को एक मानने वाले विमानों के पास तो इस विमामन का कोई मामार ही नहीं रह जाता। इन विद्वानों ने इस निभावन का आधार दूबने का प्रया अवश्य किया है परन्तु वह सफल नहीं कहा जा सकता । न विद्वानों के अनुसार इवादि का अर्थ सादृश्य होता है तथा तुल्यादि का मर्थ सदृष्य होता है। इस प्रकार दोनों शवों के वर्षों मे अन्तर है।' प्रम उठता है कि सादृश्य तथा स्वृश में क्या अन्तर है। इवादि के प्रयोग की दशा में वस्तुओं में सादृश्य होता है सपा तुल्यावि के प्रयोग की पक्षा मे वस्तुएं सदृश होती है। वस्तुओं के सवृश होने के शान में तथा उनके सादृश्यमान में वस्तुत कोई अन्तर प्रतीत नहीं होता। ये विद्वान् कहते हैं कि इवावि के द्वारा साचार सादृश्य का मान होता है तपा सुस्पादि के गाय धर्मी के व्यवधान से सादृश्य का ज्ञान होता है- 'साक्षास्सादृश्यप्रतिपादकेवादिशानां प्रयोगे श्रोती। धर्मिष्यवधानेमसादृश्यप्रतिपादकार्ना सवृत्तशम्दानो प्रयोगे वार्षी। -प्रतापख्यद्योभूपण "साचास्सादृश्यप्रतिपादका इसयपायदा तत्प्रयोगे मोती। धर्मिष्यवमानेन सादृश्यप्रतिपापास्तुत्पादिशा सत्प्रयोगे तु बार्षी। -एकावली पर मशिनाप की तरसा यह मत नषित महीं। हमें भय वस्तुओं में सादृश्य का ज्ञान होता है तमी हम उन्हें सदृषा समाते हैं।षत मव वस्तुओं को सदृश समझा जाता है १ से साधर्मा तथा समस्प को पृथक मानकर मी उपमा इस विमान का बदाम भिमा वा समता है परन्तु उसके करम अन्त (निस्सस उपमा २ प्रारख में किया जाएगा। इससे कम से म मादि तप्प त्यादि सर हो गया। २ "मादीनामपि प्रपात् मर्यवसान भस्मा तु सरस्पगमालमेन इति वषयागे भौतीपप । मारियाना तु भस्पा जशपरमम् अमाप सापक छानमिति देष प्रयागेमापी।" -एमापसी पर मशिनाप की परसा ।
तब निम्मित है कि उनमें सास्य का गान होता है । मपि यह कहा जाता है सदृश के प्रपोम से वस्तुओं के सदृध होले का मान महीं हो सकता तो हमारा सत्तर है कि देवम इसके प्रयोग से भी सादृश्य का ज्ञान नहीं हो सकसा। पस्तुत सादृश्यमान हमें साधम्म के वाधार पर होता है । उसे तो पे विशन् मानते नहीं और वस्तुओं के सादृश्यमान तया सदृश मस्तुओं के मान में मेद परमे का प्रयत्न करते है। सदृश बस्तुओं के मान की स्थिति मे ये विद्वान् उन वस्तुओ के सादृश्य शाम का निराकरण कर सके हों ऐसी बात नहीं। उन्हें इस सादृरयज्ञान को स्वीकार करना हो पा । परन्तु इन्होंने कहा कि तुल्यादि पदों के प्रयोय की क्या में सादृरपशान होता तो है, परन्तु यह विशेष्योन न होकर विशेषरहवेम होता है । इसादि के प्रयोग की दशा में इसके विपरीत बह विशेष्यरन होता है- "यपादिमा माश्यम' सम्बन्ध एव सामावमिषीयसे ( साताति क्षेप्यतया-प्रभा) पष्ठीयत् तुल्याविमिस्तु (सादृरमविशिष्टधमिप्रतिपादफेस्सू स्यादिभिस्त-प्रमा) धर्मपि ( विशेषरणतया सादृश्यामिपानाधस्विमिस्पर्म प्रमा):"-Sukthankar K PIPB यह मन भी उचित नहीं। यहाँ ज्ञान का विमान पाक्य रचना + स्वम्भमेव के प्रधार पर किया गया है। परन्तु शान का रिमावन मान के स्वस्पमेव के पार पर ही होना चाहिए मास्य रचना के सरूप तपा म्पारण के मावार पर महीं । यदि केवस वास्य रसमा के बाषार पर भेद किया जाता है तो पब फर्म मपुरम् मौर 'मस्मिन् फले मापुर्यम्' इन दोनों पायों से उत्पन्न माधुर्य के मन में अन्तर होना चाहिए । परन्तु हमें इस प्रकार के किसी अन्तर की प्रवीति नहीं होती। दूसरे परि वाक्य-रवमा क मापार पर सादृश्य में भेद करना ही है सो यह मावश्या महीं कि हमाधि के प्रयोग की दया में सादृश्य बिगेप्यम ही हो । वह विशेपणत्वेन मी सग्मय है। बाहरणत 'मुने चन्द्र हर आलाकम्' इस वाक्य मे इस शिवाम्स के मनुमार सादृश्य विपणन होता है विशेम्पलेन नहीं। इस बास्य का शानोष इस प्रकार है- बाजारकोपमामभूतचन्द्राभिन्नमाहादकमुपमेये मुखम् ।' यहां साधारणधर्म विशेषण के का में है। बस उस पर आमित सादृश्य भी इसी स में होगा। अस वापि समा तृल्यादि का मेव उनका क्रमश साधर्म तथा सादृश्य अर्म लेने पर ही सम्भव है। सादृश्य तथा साधर्म्य को एक मानने बामे कह सकते हैं कि हमादि का अर्थ साधर्म्य न होकर सादृरय होता है । अनेक स्मो पर इसी वर्ष में इसका प्रयोग मिसता है- "यपेरशन्नो सारयमातुयेतिरेरियो" -मामह २-३१ "यपा सादृरये"-पाणिमि २-१-७ हमें इसे स्वीकार करने में कोई बापति नहीं। हमारा यह मामह मही कि वादि का मर्म साधर्प लिया पाय तया तुस्पादि का सर्प सादृश्य लिया बाय । हमारा तो केवम इतना ही मन्तव्य है कि यदि वादि तपा तस्पादि में मेव किया जाता है तो वह फेवात इमके क्रमश साधर्म्य तथा सादृश्य बम मेने पर ही सम्मव है। परन्तु यदि इनके वर्ष में भेव मही निन्या पाता है तो इससे हमारे इस सिद्धान्त को हानि नहीं पहुंचती पि सादृश्य तपा सापH में भेद है। हमारा साम्प सादृश्य तपा साधर्म्य का यह मेव ही है इवादि तथा सुल्यादि का मेव हमारा साध्य नहीं । इपादि तपा तुल्यानि के वर्म मे भेद न रहने पर भी सादृश्य सपा साधर्म का यह मेर बमा रहेमा । उपमा मे हमें सादृश्य की प्रतीति होगी तपा पीपक, सृस्पयोगिता बादि में सापH की। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि सादृश्य सथा सापH एक म होकर भिन्न भिन्न है। पत्र इमत प्रामदोपमातमनचन्द्रामिणमासम्मपमेये मममिति बोध ।-यापारसपर्मसपमा चिदिरोपणत्या यथा पम इस मुखमा अमिपावी। दिप्मतमा पपा गुसमामात्यो । प्राहि उपमानपान कामदामिन उपमेण्मुलनकाव इति बोधः । 19 Sukthri kar APA P 11 सारश्य का क्षेत्र सादरम का देश मन्यन्त विस्मृत है । समस्त सृष्टि में हमें सदृश्य किसी म किसी रूप में देखने को मिलता है। क्षेत्र की दृष्टि स इस रुप के हम सोन भेद कर सकते है-तन, बमेतन सपा घेतन एवं अवेतम का सम्मिए । जहाँ मादृरम विधायें यषवा मार्यो के क्षेत्र में होता है वहां सादृस्य का स्वरूप पेतन होता है। विधार मममा भाव घेतनास्प हाते है। मत' सनमें विधमान सादृश्य मी उसी म मे सम्भव है । यह सादृश्य प्राय सोर अपमा समात्र में होता है। समाज में जहाँ व्यवहारसादृश्य के दर्सन होते हैं वहाँ सादस्प का यही रूप विद्यमान रहता है। स दृश्य का अभेतम रूप हमें पदार्पो के भौतिक स्वरूप में दिखाईसा है। प्रकृमि में विद्यमाम सादृश्य के कतिपय स्म सो श्रेणी के अनर्गत माते हैं। प्रकृति में सादृश्य के मौतन सपके मतिरिक्त सादृश्य के बेवन स्वहा भा सम्भव है। सम्पुरयसम्बन्धी घेतम तया अपेतन का मिश्रित स्वरूप सप्राय वस्तुमों में दिखाई देता है । मप्रास बलों में उनके मोतिक ों को मकर को साडरप होता है वह सादृश्य का मवेतन स्म होता है तपा उन भौतिक मंशों से भमिष्यत पेतनाग में साम्य होने पर सादृरम का भतम रूप होता है। उपाहरमा कान्ता, बासक आदि के विभिन्न मारीरिक अवयों में कोमलता मादि की दृष्टि से गो साइरस है वह सादृरप का मघेतम रूम है। मवयवों में विद्यमाम ये कॉममता मावि स्पूस घरीर के धर्म है । बत इससे सम्बन्धित सादृरय अपेतनता को कोटि में आता है । इसके अतिरिक्त इम प्रामियों के विभिन्न मों से अभिव्यक्त होने वाले प्रसन्नता एवं सोमादिक मार्यों में भी साम्य सम्भव है। यह साम्प पेप्समता की घेणी में माता है। इस प्रकार समान वस्तुओं मे साबरम के घेतम एवं मौतम दोनों ल सम्भव विमाता की सृष्टि के मतिरित कसासृष्टि में भी सादृश्य के पर्सन होते है । कमासृष्टि मनुष्य की सृष्टि है। मनुष्य की सृष्टि होने के नाते हमारा इससे निकट सम्बन्ध है। वैसे सेवान्तिक दृष्टि स हमाय सम्मम्म समस्त सृष्टि से है। समस घष्टि एक ही पेतन पक्ति का प्रकार है मौर उसी वक्ति का प्रकाश हममें है । इस प्रकार सम सृष्टि के साथ हमारा सम्बन्ध है । परन्तु इस सम्बन्ध का मान एक विचारस को ही हो सकता है। कलासृष्टि के साप सम्बन्ध का अनुमग प्रत्येक सहृदय को होता है। कसासृष्टि कलाकार को अनुभूति की व्यवना है। यह सत्य है कि कलाकार प्राय किसी ग्राम वस्तु को श्रापार बनाकर कलासर्यन में प्रवृत्त होता है परन्तु कलासर्जन के समय यह वाम वसु उसको घेतमा अपवा मनुभूति का अंग बन जाती है। इस प्रकार कला में कलाकार किसी बाह्य पस्तु का सटस्य स्म से निर्माण अपवा वर्णन म करके अपनी ही अनुभूति को रूप प्रदान करता है। शिल्ल सगा कता में यहो अन्तर है कि शिल्प में शिल्पकार तटस्य म्म से किसी वस्तु का निर्माण करता है, परन्तु कमा मे कलाकार वस्तु को बारमसाप्त करके अपनी अनुभूति को साकार बनाता है। इस प्रकार एक मानवीय अनुभूति की अमिष्य उना होने के नाते कसा से हमारा पनिष्ठ सम्बन्प है। मन हमे यह देखना है कि समाज प्रकृति सण कसा में यह सादृश्य किस प्रकार होता है।
समाज में साहरप समाज में इस सादृश्य के पद पद पर दम होते है। यह कहना मास्युक्तिपूर्म म होगा कि समाज की व्यावहारिक स्थिति सादृश्य पर अवसम्बित है। समाद का निर्माण पारसरिक सम्बों के आधार पर होता है। समाज में मनेक प्रकार के सम्बन्ध है। पिता-पुत्र का, मुरु पिप्य का भाई बहिन का, पति-पड़ो का, ये सब सम्बन्ध समाव के अन्तर्गत माते हैं और इन्हीं के सम्पा निर्वाह पर समाव की व्यावारिस स्पिति निर्भर है। इन सम्बन्धो का सम्पक निर्वाह सम्बन्धित व्यक्तियों के उभिस आचरण पर निर्भर करता है मौर इस माचरण का औचित्य प्रसुत समय के अन्तर्गत माने यासे सम्म व्यक्तियो के पारपरिप बाचरण के साथ प्रस्तुत आचरस के सादृस्प रखने में निहित है। यदि प्रस्तुत आवरण प्रस्तुत सम्बन्ध के अन्तर्गत आने वामे अन्य व्यक्तिया + पारपरिक आमग्गों से मेल माना है मद तो यह उचित कहा जाएगा सम्पया अनुषित । नयहरणन' पिता एवं पुत्र के पारस्परिक मायरण को लें। यदि प्रसुत पिता और पुत्र का मायरए पिता एवं पुत्र क मामान्य आपरण से मेत खाता है तब तो बह उचित कहा जाएगा अभ्यया अनुभित । इम प्रभार भवरण अपवा म्यवहार का बौमित्य सादरप पर ही अवसम्बित है और इस व्यवहार के मौचित्य पर समान को ध्यावहारिक स्पिति सममन्दिा है। समाज में विद्यमान समयों में सादृश्य पर मामित इम आचरण का प्रमुख स्थान है। हम प्रस्पेन सम्बन्ध मे दो भाग कर मास है--सूल तमा मूरप अपवा भौतिक एवं मानसिक । आमरण सम्बन्ध का सूक्ष्म अपना मानसिक अंगहै। सम्मन्य को सार्थकता मी अंग के मिवाह में है। उहणन पिता एवं पुत्र के सम्बन्ध को। इस समय का स्यूम में सम्ममनाभाव है या सूक्ष्म अंश पिता तया पुत्र का क्रममा सह नया था प्रदर्गन है । प्रस्तुत सम्बन्ध की सागता इसी द्वितीय मंचरे निर्वाह मे है। इस मभने प्रभाव म स्यूस मम्बन्ध का कोई मूस्य महीं यस्ता । पिता एवं पुन के उदाहरण में मानसिप भैम के समान में मोतिर ममन्य बना तो रहता है, भी कभी तो मानसिक समभाव मे मीनिक सम्बन्धमा उन्छे भी हो सकता है। पति तमा पसी समन्ध इसी प्रकार पर है।
देखा जाए समान की व्यावहारिक स्पिप्ति मे मानसिक पच पर माश्रित आचरण + इस सादृश्य का महत्त्व इसलिए है क्योंकि व्यवहार से सम्बन्ध इसी अध का है । म्यवहार में व्यक्ति को अपनी ओर से कुछ प्रयत्न करना पड़ता है। व्यवहार एक साध्य वस्तु है सिद्ध वस्तु नहीं । सम्बन्ध का यह मानसिक अंश भी मान्य के साध्य अंग को लक्ष्य करके प्रवृत्त होता है । सम्बन्ध * इस अंश मे व्यक्ति को अपनी बोर स प्रयन करना परता है। यह प्रमम दो प्रकार का होता है-नाम तथा आभ्यन्तर । पुत्र के आहरण का में सो ज्ञात होगा कि पिता से प्रति उसके आपरण के दो प्रकार हो समसे है-पहले प्रकार में पिता के आगमन पर पुत्र का आसन से सो हो जाना पिता को प्रणाम करमा मावि पधाएं आती है। इन चटार्यामा परीर स सम्बन्ध है । अतः ये वान प्रकार के अन्तमत बाती है। दूसरे प्रकार के अन्तर्गत पुत्र का पिता के प्रति प्रदाप्रवर्मन प्रावि हैं। इनका सम्बन्ध मन से है । अप्स ये आभ्यन्तर प्रकार के अन्तर्गत है। वस्तुत सो आचरण का प्रथम प्रकार मी मानसिक ही है। शरीर की वाम पटाएं हत्य में भाव की वाम अभिव्यक्ति मात्र है। हवस का यह माव उन बाण अभिव्यक्तियों के मूल मे रहता है सपा उनके सदभाव के समय उसका भी सदभाव रहता है । अत' समस्त आचरण का मानसिक मथवा मम प्रधान कहना अभिम उपयुक्त होगा। मावहारिक जगत् मे सम्बन्ध का यही मानसिक औ मियामीम रहता है । अत यह व्यावहारिक जगत् का मूल है । समान्य से स्पूल बंश क साप यह नाम नहीं । स्पूल अंश पूर्णसिद्ध होता है । अत व्यावहारिक क्षेत्र से उसका गहिर्भाव हो जाता है। उदाहरफन हम मातृवो भव" इस नियम को में । यहाँ पुत्र के लिए माता को देखनुस्य समझने का विमान है। माता का जन्मदात्रीत्व मंश तो पुत्र के लिए पूर्व सिट है । बत पुत्र के म्यवहार से उसका कोई सम्बन्ध नहीं। पन्तु माता को देवतुल्य' समामना यह मम पुत्र के लिए माध्य है। अत' इसके लिए पुत्र क भाषरण को अपेचा है । पुत्र मा गो आपरण इस नियम से मेन लाएगा यह रचित होगा तथा अम्प अनुचित होगा। इसी प्रकार समाज म मन्य अनेक नियम है जैसे 'पितृदेवो भव' 'भाचार्यत्वा' आदि। यहीं के सम्पा नियहि पर समार की व्यावहारिक रिपति अबसम्बित है। इनके सम्पा निर्वाह के लिए मावस्यर है कि सम्बन्धित व्यक्ति का माचरण इम नियों से मेल साए।
यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि परिस्थितिया के परिवर्सन के साथ समान में विद्यमान सम्पन्बों एवं नियों के स्वरूप में परिवर्तन होता रहता है। मत यह कहना कहाँ तक उचित है कि समाज की स्थिति सदा समयों नपा नियों के समान रूप से निर्वाह पर भवनम्मित है। इसका उत्सर यह हो सकता है कि समाम का प्रत्येक नियम तथा सम्पन्न परिपतनशील नहीं । दूसरे गो सम्बन्ध अपवा नियम परिस्थितिवक्ष पहितित होते मी है उनके सस्म का निर्धारण परिवर्तित परिस्थिति से साम्य असमा मेल के धाधार पर ही होता है मौर बब तक वह परिवर्तित परिस्मिति बनी रहती है तबतक तदनुसार परिवर्तित सम्पन्ध अथवा नियम से स्वरूप का समान रूप से मिहि नितान्त माचित है। इस प्रकार प्रत्येक दृष्टि से किसी न किसी प्रकार का सादृश्य समाम की व्यावहारिक स्थिति के लिए मावश्यक है।
प्रकृति में साहरय इस सादृश्य के दर्शन हमें प्रकृति में भी होते है । प्रकृति में विद्यमान मह सादृरप अनेक प्रकार का होता है । इस सावृस्य का एक प्रकार तो सग्मुम विधमान प्राकृतिक वस्तुओं तथा तस्ममान पूर्वकृष्ट प्राकृतिक वस्तयों का सादृश्य है । यह सादृरप यद्यपि सम्मुम विद्यमान प्रकृति के अन्तर्गत नहीं पाता + परम्सु सम्मुम विद्यमान प्रातिक सम्पर्क में माने पर अथवा वहाँ जाने पर इसका मान होता है । इसी दृष्टि से इसे प्रकृति में सादृश्य कहा है। प्रकृति के साप हमारा पनिष्ठ सम्बम है। इस सम्बन्ध के कारण प्राकृतिक वस्तुमा क दरान से उस्फा संस्कार हमारे मन मे बंकित हो गाते हैं । हम कासान्तर में बव ऐसी ही वस्तुओं को देखते हैं तब इनसे साग्प के माधार पर पूदृष्ट प्राकृतिक वस्तुओं का स्मरण करके यानन्द का अनुभव करते हैं । इस दशा में सादृश्य का गान थोडी देर के लिए हो होता है । इसके बाद हमारा ध्यान स्मर्यमाण वस्तु पर केन्द्रित हो वाता है और हम उस वस्तु से सम्बन्धित बपने पूर्व कार्य-कलापों पर विचार करने मगते हैं। स तो किसा भी वस्तु को दसकर तत्समान पूर्णपृष्ट वस्तु का स्मरण हो पाता है, परन्तु प्राकृतिक बस्तुओं मे ऐमा विशेप सस होता है। प्रकृति का पातावरण मान्त होता है। अस उसमें मस्तिष्क के साम्त होने के कारण स्मृति के लिए पूर्ण अवमान रहता है। प्रकृति में विद्यमान दूसरा सादरप प्रकृति में विद्यमान शान्ति समा युपि में निहित पान्ति का सादृश्य है। हम प्रकृति मे एक अपूर्व शान्ति पेसते है। हमारी चेतना के मूम में भी शान्ति विद्यमान है। सना के मूस मे स्किन इस शान्ति का प्रकृति में विद्यमान शान्ति से साम्य होने से हमें मानन्द की मनुभूति होती है। इस साम्प का मान म्यक्ति को प्राम' होता महों। परन्तु उसकी सत्ता अवरम होती है और इसी से मानन्दानुभूति होती है। भामुक तमा पबिहृदय म्पतियों को प्रकृति में इस शान्त भावना ही क्य साम्प नहीं मिलता मपितु अपन मन्य भाषों का भी साम्प मिसता है।
कवि प्रति को पेवन के रूप में देखता है तथा उस पर अपन भागों मा मायेप करता है। अपने भस्मास मे प्रकृति उस सल्ससित तया माने विपाद में वह उसे विपस्स दिसाई दती है। इस माव-साम्य के कारण रवि को मानन्द की अनुभूति होती है। अब तक प्रकृति मे बिस सादृश्य का विवेचन हुआ है वह मम्मुम स्थित प्रकृति का साम्प मन्य वस्तुओं से सध्य करके हमा है। ये वस्तुएं पाहे पूर्वदृष्ट प्रासिक पाय हो अथवा भाव हो, है ये अन्य ही । इसके अतिरिक्त सम्मुन स्थित प्राकृतिक वस्तुओं में परस्सर भी एक मादृरम होता है । सम्मुन स्थित प्राकृतिक वस्तुए ने प्रकार की होती है मनुष्य के प्रयास से निर्मित तपा सर्वषा नैसर्गिक अवस्था में विद्यमान । प्रयम मोटि म उद्यान मानि धाते है सया द्वितीय कोटि में वन, मरिता आदि आते है। उखान आदि में सादृश्य विधान स्पष्ट ही है। उद्यान मे यपि वृक्षो पादपों, पुप्पो आदि की विनिमता होती है परन्तु उनकी म्यवस्खा वहां सादृश्य को ध्यान मे रमार की जाती है और प्रधानत इसी से दर्शन के मन मे सौर्य मावना की उत्पत्ति होती है। नैसर्गिक मनस्मा में विद्यमाम प्रकृति म भी हम सादृश्य के दर्शन होते है। इस अवस्था में प्राति मे अनेक विविधताएं होती हैं। वर्गक उनमें से सट्टा वस्तुओं का पयन पर लेता है तथा इस चयन से उत्पन्न प्राकृतिक सौन्दप का मानद सेता है। सदृश मस्तुओं का यह पयन प्रगति की विशेषता क कारण म्मत हो पाता है। Alexander को निमसिमित उक्ति का यही मान्य है- 11 e find nature beautiful not because ble 18 benutıful herself bat bernaro yo rolect from nature and combino as the artut does more plainly thea ho Trorks with pgmonts" ~~Page s0 The man makes nature beautifnl br selection and if need be bg imaginatiro addition" l'age 33 Beauty and other forbis of laloc. उगहरणव परि एक बन का दृश्य हमारे सम्मुल है मीर हमारी दृष्टि एक मुहुए पृथको भोर जाती है तो वह दृष्टि उसी वृष र सीमित २२ नहीं रहतो, अपितु उस जैसे अन्य वृक्षों को भी मपना विषय बनाती है। फसत उन वृत्तों में सादृश्यदर्शन में कारण हम सौम्वय की अनुभूति होती है। इसी प्रकार एक सीमे वृक्ष के दृष्टिगत होने पर अनेक इसी जैसे वृक्ष हमारी दृष्टि के विषय बनकर अपनी पारस्परिक समानता के फलस्वरूप हमारे हृदय मे सौन्दय की भावना उत्पन्न करते हैं। यह सादृश्य प्रकृति में अनेक प्रकार से सम्मब है। प्रकृति विविपताओं का विशाल ममुदाय है परन्तु इस समुदाय मे चयन के फलस्वरूप सादृरय विमान कोई कठिन कार्य मही । वहीं इस मादृरय-विधान मे अभाव के कारण कोई कठिनता आती है यहाँ दर्शन अपनी कम्पना गति के सहार उस अमाव की पूर्ति कर लेता है। प्रकृति में अव तक जिस सादृश्य का विवेचन किया गया है वह म्म साम्प के पाषार पर ट्रया है। इस साम्प के मतिरिक्त व्यनि-साम्प के आधार पर भी प्रकृति मे सादृश्य हवा है। प्रकृति में प्रोता को अनेफ स्वर सुनाई देते है। इन स्वरों में विविधता होती है। परन्तु योता उनके श्रवण में तहीन होकर विविधता के जना स्वर वैशिष्टप को मही सुनता अपितु स्वर-सामान्य को अपना विषय बनाता है तपा निरन्तर एक समरस पनि की गुजार उसके मानो मे होती रहती है। नहो प्रोता अपना ध्माम स्वरों के इस सामान्य अंश पर कन्द्रित न करक उन विशेप को अपना लक्ष्य बनाता है वहाँ भी विभिन्न स्वरों में वह महल ही एक माम तपा म्यवस्था स्थापित कर लेता है। उदाहरणत श्रोता वृक्षों पर पत्तियों के विभिन्न मन्दों को सुनता है । इममे पुष्ट का स्वर मन्व होता है तथा कुछ का कपा। वृक्षों के नीचे यह सरिता की गग्मीर पनि सुनता है। इन विभिन्न प्पनियो मे प्रोता सहम ही समन्वय स्थापित कर लेता है और इस समन्वित रूप मे बह इन पनियां को निरन्तर सुनता रहता है। इस प्रकार प्रति में व्यक्ति को स-साम्य ममा प्वमि-साम्य दोना मिलते है और इन दोनों का जान मगमग साप साप सा पमता रहता है। इससे उसे एक अपूर्व मानन्द प्राप्त हुम्ता है।
"फला में साहश्य" काल को हम मावा को अमिम्यक्ति कह सकते हैं। भाव अमूर्त होते हैं। इन्हें मूर्त रूप देना ही कमा है। इसके लिए किसी माध्यम की मावश्यकता है। विभिन्न कम्ताओं मे ये माध्यम भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं। साहित्य मे शम मंगोत में स्वर, चित्र में रमा एवं रेय, मूप्ति में प्रस्तर यादि तथा वास्तु कसा म इट, चूना आF माध्मम का काम करते हैं । इन माध्यमो को कमा का भोग तत्त्व कहा जाता है। इस तस्व के दाय मागे मो मूत बनाने के लिए आवश्यक है कि इस तस्त को एक म्यवस्पिन न्म दिया पाए । स्थत मोग सत्त्व मावो की अमियक्ति में समय नहीं अपितु ससरा व्यवस्थित रूप ही ऐसा करने में समय है। यह व्यवस्थित मला का पतस्य कहा जाता है। पासास्य विद्वानो ने इस सपना सम्बन्ध स्वम भोग सत्व से जाम है और इस प्रकार रूप को भोग अपया माध्यम काका कहा है। परन्तु विचार करने पर प्रतीत होगा कि यह सप भोग अपना माध्यम काही रूम महीं होता अपितु भानों का मी म मन पाता है । इतना अवश्य है कि भार का अमूर्त रूप इस अमखा में भूनता को प्रास कर लता है। यह रूपतत्व समस्त कलाओ मा बारश्यक पत्र है। इतना अपरप है कि किसी कसा में माध्यम स सम्धिस रूपतत्व सर्वथा मौण अपवा नगप्प होता है तमा भावों से सम्बम्भित पतत्व ही आनन का प्रमाम पारण होता है। साहित्य कमा इसी प्रकार की कसा है । इसक माध्यम प्रय है। उपरण की दृष्टि से ये पनि स्वरूप है। साहिस्प चम्म आनन्द में शादों के इस स्वस्य मा महत्व ममस्य है। दूसरे धने का यह रूप तो मंगीत के अन्तर्गत बला जाता है। अत रह साहित्य को स्वतन्त्र कमा घिद करने हेतु नहीं। अन्य कलाओ से पाहिस्य क इस मद के कारण हम सर्वप्रथम साहित्य के अतिरिक्त अन्य सामों में ही रूपतत्व का विवेचन करेंगे। प-तत्व के विवमन में हम प्रथम उसके माध्यम से सम्बन्धित स्वरूप को सेफर पसते हैं। मापुनिर सन्दपमान म स्यात्व क पार गुण मामे गए है- सापेक्षता ( Proportion ) समता ( Symmetry ) संगति ( hemony) तपा सन्तुलन { inlance ) | AT यह स्पष्ट है कि समता र पतत्व का मावस्पर बैग है सपा ऐसा होने से यह कला के मापारी में से एक नापार है। इतना ही नहीं रूपतत्व के बम्प गुणों के विवेचन से यह भी स्पष्ट है कि उनके निर्वाह के लिए किसी न किसी स्म में समानता का ध्यान रखना अपेक्षित है। हम सर्वप्रथम सापेस्ता पो लेते है । मापेक्षसा का अर्थ है एक दूसरे की अपेक्षा रखना । इस सिदान्त के बनुमार मला में प्रत्येक अवयव की सृष्टि अन्य अवयव अमवा मपयों को ध्यान में मार हाती है। साहरणत एक मनुष्य के चित्र में सिर के आकार का निर्धारण सरीर के अन्य अपमयों को मक्य करके होता है। यदि अन्य अवयव विशाम है तो मिर मो विशाल होगा और यदि अन्य अवयव मधु है तो सिर मी सषु होगा। इतना ही नहीं, सिर की इस विशामता तथा मघुता की मात्रा का निधय मो अन्य अवयवों की विशालता अपवा सपुता मी मात्रा के आधार पर होगा। यदि ऐसा नहीं होता है और फलम' एक मभु परीर पर पिशाम मिरको योजना की जाती है छो वह प्यवस्थित रुपतत्व के सिए हानिकर होगा और कुरुपता का मनक होगा। पम्तुत भरीर में अवयवों के माधार का अनुपात पूर्णदृष्ट शरीरों ने यापार पर हमार मस्तिप्प में भक्ति रहता है। अस हम जब किसी मनुष्य का चित्र देखते है तो अमातकोण यह पाहते है कि इस चिन से अवयवों के अनुपात का सम्य हमारे मन में पहले से अंकित परयो के अनुपात से हो। सावता के सिदान्त मा स्वत' कोई मय नहीं। जब तक हम यह शाप्त नहीं विभमुक वस्तु के अवयवों के आकार पा अमुक अनुपात सोक में मिश्रित है तब तक यह कहना कि इस बस्तु के अवयवों की रचना उनके बापारसम्बधी पारस्परिक अनुपात को लक्ष्य करके की जानी चाहिए कोई अपं नहीं रखता । सापक्षता का सिदान्त वस्तुत पूत्र मिति अनुपात को मानकर पलसा है तथा उस अनुपात से साम्प के मिर्वाह का निर्देश करता है । इस प्रकार सापेक्षता के लिए समना मात्तित है। इतना मवश्य है कि सामाम्प समता मवयों की पारस्परिक समानता का निर्मम करती है तथा सायरता पूर्व सिभित अनुपाम से साम्य का मिश करती है। मगन का मप है भवयों में सामनत्य का हामा । किसी वस्तु में मनेक अवयब होते है। इस अनेक्सा के कारण पत्तु में विषिमता होती है । परनु बसु मनस्पित मतप के लिए थायरमक है कि इस सिपमा ममताहीपती सनेमा मेलाहीमा पतीति अवयवों के मामलम के कारण होती है । सामजस्य से अवयव पृपा पृथक् प्रसोत न होकर एक व्यवस्पिर एवं संश्लिष्ट चित्र हमारे सम्मुन उपस्थित करते हैं जो प्रत्येक कलाकृति के लिए यावरपक है। बत यह रट है कि संगति अथवा सामधारप क्ला के हफ्ता का प्राण है। महा यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह संगति अवपदों में किस प्रकार आती है। अवश्य ही संगति के लिए कुछ ऐसे मिपमो की मागश्यकता है जिनके फलस्वरूप संगति उत्पन्न हो। बिना किसी मम्म नियम को अपनाए मवयवों मे स्वत' संगति नहीं साईजा साती। भवनों में स्वत संगसि दो तमी साई जा सकती है व संगति का कोई पूर्व-निदिष्ट सामान्य रूप कलाकार के सम्मुख हो । परन्तु ऐसा मही झेसा । संमति का मान कलाकार को प्रभी होता है जब संगति कसाकृति में आ गुरुती है इससे पूर्व महीं । बम कसाकार कलाकृति के एक मवयर का निर्माण कर सेता है तथा एक अन्य अवयव का निर्माण करना चाहता है मिसनी पूर्व अवयव से संगति के तम स्वत” संपति का कोई निश्चित स्वम उसके सामने नहीं होता घिसका तरस्पता से मनुसरण करे वह दूसर अवश्य का निर्माण कर सके। इसमिएँ स्पटल अपवा भस्सा बह समानता आदि के सिद्धान्त अपमाला है मिमके फलस्वरूप कसाहति में संगति वाती है। मत' यह सिद्ध है कि संगति के निर्वाह के लिए समानता, सापेचता याविका निर्वाह यावश्यक है। सापेसा के मिए समानता भाषरमक है यह पहले सिंद किया जा पुका है । यस संगति के निर्वाह में समानता का प्रमुख स्पाल है। सन्तुलन का वर्ष है ए मवयव के रामम्प अवयव मपया बरयों के प्रभाव में वृद्धि करना । संगति के समान इस गुण का भी कोई पूनिधित सहप कलाधर के सम्मुख नहीं रहता परन्तु समसा के विभिन्न स्वरूपों को मपनाकर ही पह कसाहति में इस गुण को जम्म सा है । स्पसत्त में सन्तुनम पुण के निर्देश का उद्देश्य कसाकृति मे समनुमन साना ही नहीं मपितु इस गम के मभाव से उत्तम विधात प्रभाव से बरनामी है। इसका कारण यह है कि इस गुण के ममाप म भरपर विप सही सन्तुसन पर नही होता मपितु वह मम्म अषयों को भी प्रभावित पता है तपा उनके सन्तुलन कोमट कर देता है । इस प्रकार मवयन-रिशेप का २६ असन्तुसन उसी अवयव तक सीमित न रहकर समस्त अषयवसमुदाय को अपने क्षेत्र में से पाता है । संगति के बमाव में ऐसा नहीं होता । मवमव-विक्षेप की असंगति उसी अवयव तक सीमित रहती है। इस पक्षा मे केवल सना होता है कि असंगत अवयव का बम्प अवयवों से मेन मही मेठता । अन्य अवयमों का पारस्परिक मेस वैसा बना रहता है। परन्तु असन्तुलन में अवयय विशेष छना विपम अपवा वेमेम होता है कि उसका यह विपम स्वस्म समस चित्र को ही यस्त-व्यस्त कर देता है। इस प्रकार असम्सुलम असंगति का बड़ा सा रूप है । अत व्यवस्थित रूप-निर्माण के लिए इससे बचना परम यावश्यक है। कमाइति के स्वरूप मे बाम बाकार अथवा स की दृष्टि से ही साम्प महीं अपितु भाव की दृष्टि से भी साम्प होता है। हम भाव को कलाकृति के रूप से सर्वपा पृपा नहीं कर सकते। वस्तुतः हम सब कसाति का दर्शन करने में सब उसका स्पून आकार ही हमारी दृष्टि का विषय महीं बमता, परन्तु वे भाव भी हमारी वृष्टि के विषय पनते है जो उस माकार से व्यक्त हो रहे हैं । इस प्रकार हम बाम आकारमान को म देखकर मावों से मोतप्रोत बाकार को देखते हैं। यदि भगवान् पांकर की मूर्ति हमारे सामने है तो हम उस शान्त भावना को देखे बिना महीं रह सक्से जो उस मूर्ति के प्रत्येक अवयव से ससक रही है। यह हमा मत्युचिपूर्ण न होगा कि ऐसी दशा में एम एक बर मूर्ति का बाजार म देखकर शास्त भावना का मूर्त स्म देखते है। इस सान्त भावना के लिए भी साम्य का निर्वाह अपेत्तित है। हम यह पास भावना मूर्ति के एक नाम अवयव में प्रतिबिम्बित न देसार समस्त अवयों में प्रतिबिम्बित देखते है। इस भावना में शरीर के प्रत्येक बबयव की एक विशेप स्पिति होती है । मेत्र, मुस, इस वादि समस्त अवयव इस भावना के समय एक विषेप बाकार धारण करते हैं। अतः हम इन सब सवयों के इस विशेष आकार को देखकर लब बरयों में एक समान धान्त मापना के दर्शन करते है। मौर फसत एक पान्त मुद्रा हमारे सामने नाचने लगती है। यदि भाष के ममिष्य चक किसी एक पारीरिफ अवयव से शाम्त भावना की अभि- पति न होकर मन्य पिसी भाष की अमिम्पक्ति होती है तो सम मपयों से समान भाव के अभिव्यक्त म होने क पारस शाम्त भावना की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। इस प्रकार स्पष्ट है कि भाव की अभिव्यक्ति के लिए साम्य का निर्वाह मोक्षित है। चिषामा में चित्र के विभिन्न मवर्षों में ही नहीं अपितु उसके वर्गों से मी मावों की अभिव्यक्ति होती है। विभिन्न वर्ग विभिन्न मापनाओं मम व्यशर माने गए हैं जैसे हय रंग धीतमसा का नीला रंग मम्भीरता का तमा श्रेष्ठ गई स्वयमा का अभिभ्यासक माना गया है। इस प्रकार चिम के समस्त अवयों एवं पर्णो से एक समाम भाव की अभिव्यक्ति होने के कारप हमें यह पित्र उस भाव का मूर्स बम प्रतीत होता है। भावाभिव्यक्ति ने इस विषय को लेकर वास्तुमसा में बाधा अवश्य तपस्मित होती है। परन्तु इसका कारण मह महो कि वास्तुकमा में मानों की अभिष्यक्ति का मेश मी महीं होता अपितु इसका कारण यह है कि इस कला में भाषणों की मभिम्पति अत्यन्त अस्पष्ट होती है। दूसरे इस कला में प्रधानत वीवम के मार्यों को अभिव्यक्ति न होकर सनातन तथा पिरम्तम भावों की ममिव्यक्ति हम्सी है। ल भाषों का हमार जीवन से सोपा सम्बन्ध न होने के कारण सपा प्रस्तुत कमा में वाम आकार के अत्यन्त विशाम होने के कारण हमारा ध्यान आकार से मामे बहुत कम बनता है। कुष विशनों के मनुसार भाषामिम्पति का यह सिद्धान्त संगीत पर भी मागू नहीं होता । इनके मनुसार संगीत में कमल सर के मारोहापरोह का समसार होता है किमी भावविशेप का महीं । इन विधानों का यह मठ पूर्णत सत्य महीं। हम भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से संगीत के दो भैद र सकसे है-गुर सपा मिप्रित । सुर गीत म वापसंगीत मादि माते हैं। इस संगीत में भार्यों की सत्ता नहीं होती परन्तु मिधित संगीत मे मार्यो की सस्प हाती है। इस संगीत में पोता स्वरों के मायेहापरोड़ का ही मानाद नहीं सेता मपिनु उससे अभिव्यक्त होने वाले भागापा भी मानन्द सेता है। यह सम्मम है कि संगीत प्रस्पेर भाव पी मभिव्यक्ति न कर सके परन्तु हर्प विपाद आदि परस्सर सर्वपा मिन्न भागों की ममिम्पत्ति पह सरमता से कर सकता है और जहा ऐम नामों की ममिप्यक्ति होती है, वहां पह मायना होत होती है। एस मानों की अमिम्यक्ति के लिए भी साम्य प्रनिहिवापरया है।
उपयुक्त कलाओं के प्राय कलाकार बिस भाव को अभिव्यक्त करता है उसकी अनुमति प्राय पहले से विद्यमान रहती है। पूर्व विद्यमान अपनी इस ममुभूति को वह कसा के माध्यम भरा व्यक्त करता है। कमी कमी यह भी सम्मप है कि अमुभूति तपा अभिष्यक्ति का अस्तित्व समकासीम हो सपा अभिम्पत्ति का रूप धारण करने पर ही कलाकार को अनुभूति का माम हो। परन्तु ऐसी दशाओं में भी अनुभूति का कोई न कोई बंश अभिव्यक्ति से पूर्व अपरम रहता है सपा अमिष्यक्ति के समय अस्तित्व में आने वाली अनुभूति इसी पूर्व बनुभूति मा विकसित स्वरूप होती है। ऐसा प्राय' बहुत कम होता है कि बिना किसी प्रकार की पूर्व अनुभूति के कसाकार सहसा अभिव्यक्ति का रूप सड़ा कर सके । मत' अनुभूति अथवा इस अनुभूति के किसी अंश के पूर्व से विद्यमान रहने के कारण यह मावश्यक है कि अनुभूति तपा अभिव्यक्ति में साम्य हो । कला पी सफलता साम्प के इसी निर्वाह में निहित है। कसा में सादृश्य की यह सिद्धि विवेचफ की दृष्टि से की गई है । महा तक दर्शक का सम्बन्ध है उसे कसा में सादृश्य की प्रतीति कुछ ही मों में होती है । यहाँ उसे कसा में सापेकता मासि आदि तत्वों के पर्सन होते हैं वहां उसकी दृष्टि उम्ही तत्त्वो तक सीमित रहती है । इन तत्वों के निर्वाह के लिए समानता का ध्यान अपेचित अवश्य है परन्तु दर्शक उस समानता तक नहीं पाता।
"काम्प में साहस्य" में तस्व कान की दृष्टि से काव्य में भी इस सादृश्य का निर्वाह मपेधित है। काध्य का निर्माह सब के माध्यम से होता है। इस माध्यम के धारा काव्य धर्म की ममिष्यति कया है। अभिव्यक्ति से पूर्व यह अर्य कवि के हृदय में अनुभूति केस में रहता है । इस अनुभूति को मभिव्यक्ति में परिगस करना हो काथ्य का उद्देश्य है । अस काष्य के लिए अनुभूत तथा अभिव्यक्ति मे साम्प हाना निवान्द मावस्या है। कवि जिस वस्तु की मनुभूति करता है से ही यह मापा मारा अभिव्यक्त करना चाहता है। बत उसकी इस गमिष्यवाना की सफलता इसी में है कि यह अनुभूति का ही एक नाम रुप हो । वस्तुत अनुभूति सपा ममिभ्यक्ति के मून एक ही है। मान्तर है तो केवल इसके स्वरूप में है। कालिदास के निम सिसित शोकमा यही राय है-- "सामम्पपमा परिशानुसारी मुनि श्वेमाहरणाय यात । निपावरिलायरबदनाप श्लोफयमापपत यस्य शोक } इससे स्पष्ट है कि वास्मीकि के शोक ने ही श्लोक का रूप धारण किया । मस' लोक के रूप में जो वस्तु ममियत । वह कोई नवीन बस्तु नहीं पी मपितु जो वस्तु पहले अम्मत भी उमी मे मव म्पक भाप का कप पारस किया। कारपियोगस्प' शो श्लोकस्वनागत" इस वदि का यही तात्पर्य है। परी की काम्प की परिभाषा "शरीर वादिधर्मभ्यवस्मिता पदावनी" भी राम तथा वर्ष के साम्म की तक है। महाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि मन ममुभूति झी अभिव्यक्ति मा म पारण करती है तथा उसके साप विशेष रूप से सिफ्टी रहती है तो दोनों को पृमा मानने की क्या मावरपाता है। मो ने ऐसा ही यिा है। इनके मनुमार मभिष्पत्ति हो कसा का साथ है । यह अभिव्यक्ति वातरिक अमुभूति यपवा अभिपति के सा १ एम्पाली २ अम्मद ।।१० में होती है। बाप अमिष्यक्ति को इस बान्तरिक अनुभूति से कोई पृपा सत्ता महीं। कलाकार के हृदय मे बान्तरिक बनुभूति उत्पन्न होते ही अभिव्यक्ति वस्तुत पूर्णता को प्राप्त कर पुकती है। मत उसे शमादि के द्वारा बाम रूप देमा विशेष महत्त्व का नहीं- "When we have mastered the internal word, when Wohnvo olvidly and clearly conceived a figuro or statue, when we have found a muncal themo, expresson is born and w complete, nothing more is needed What we then do u to my aloud what we have already had within wing aloud what we have already rung Twithin", कोने का यह मत समीचीम महीं । फोघे के अनुसार आन्तरिक मनुभूति ही कमा अपवा काष्य के लिए पर्याप्त है । परन्तु हमारे विभार मे उसका अभ्यावि माम रूप में अभिव्यक्त होना अमिष्यक्ति की पूर्णता मिए मावश्यक है । बान्तरिम अनुभूति कवि की प्यक्तिगत वस्तु है । अत' वह सहयों के मास्वादन का विषय नहीं बन सकसी। काम्प के लिए आवश्यक है कि वह कवि की व्यक्तिगत घेतना तक सीमित न रहे अपितु सप्पो ने भास्वान का विषय बने । मत' आन्तरिक अनुभूति के लिए माप अभिष्यक्ति का रूप धारण करना बावस्यक है। दूसरे भनुभूप्ति उत्पन्न होते ही स्पस' अभिष्यक्ति का म पारण नहीं कर मेती। इसके लिए कवि को शभ्यादि मुटाने की हिमा का वामय मेना पड़ता है। असम दोनों में कुछ मन्तर मानना मावश्यक है। अनुभूति सपा अभिम्पक्ति का अन्तर दोनों के सपम्पमेव पर बामित है। अभिव्यक्ति का स्वम्म भापा होता है सपा अनुभूति का स्वरूप भाष मपवा भारों की तीव्रता । मापा के दो अंग लिए पा सको है-उसका तपारणांश नपा विधरोप भयवा भाषांस । पूर्व भंग पोत्रगम्य होता है तपा द्वितीय अंश बुद्धिगम्प षषवा हृदयगम्य । जहाँ तक मापा के इस पोरगम्म मैश का सम्बन्ध है मार्यों से इसकी पृषरता स्पष्ट है । अनुभूति १ सादिस्पशास्त्र दिस.पू. in के समय इस मंत्र की उपम्मिति नहीं होती। हो इतना मवरप है कि इस मंच का मावों से साम्प होता है। भाषा मे सधारण की कठोरमा सया कोमलसा भानों की कठोरतासया कोमलता को समय पर होती है । इसका निरुपण रस-प्रकरण में किया जाएगा)। भाषा के द्वितीय बस का भी अनुमति के समय उपस्थित मावों से मोशिक मन्तर है। मापा के शरा वभिव्यक्ति के समय प्रत्येक भाव मापा का रूप ग्रहण कर परा होता है। परन्तु अनुभूति के समय प्रत्येक भाव के साप ऐसी मात नहीं होती। उस समय करिके सम्मुस अनेक ऐसे भाव होते हैं जो मापा के रूप में उसके सम्मुख उपस्क्ति न होकर करस माररूप में उपस्थित होते हैं और फलस उसके लिए उन्हें मापा का रूप देना अवशिष्ट होता है यहि प्रश्न मावों का न होकर विचारों का हो तय तो हम कह सकते है कि विचारों की उपस्थिति प्राय मापारम्प मे होती है । परन्तु भार्यों के साप एसी वास महों। इसका कारण विचारों तथा भावों का स्वरूप भेद है । विमार धान पेसना के परिणाम है, परन्तु माग उद्वेलित पेतना क परिणाम है । मिस पेप्सना जब कोई परिणाम धारण करती है सव मन की बोतक मापा भी प्राय उपस्थित हो पाती है। परन्तु इस शान के फलस्वरूप जन भावना जागृत होती है जब वह भाषा के स में मही होती । उदाहरणत’ कवि भन किसी के प्रसन्न मुख को देखता है और उसे मुमकी प्रसन्नता का मान होता है तब इस मान के साप साम इस माम को पोतक भापा का मान भी चलता रहता है। कषि व मूग की मारुति देखता है मौर उसमें प्रसन्नता के भाव का दम करता है तब उसे यह मात होता है कि मेरे सम्मुम को यह आकृति विधमान है उस्का माम मुव है तश इस आकृति मे जो भाव विधमान है उसे प्रसन्नता कहते हैं। पर मुन की प्रसन्नता कदन के सस्ताप कमि को को अनुभूति होती है उसकी उपस्थिति भाषा केस मे महीं होती । इस बनुभूति में मानांस के साथ उसको दोषता काश भी मिसा रहता है। यह तीव्रता मापा केस में उपस्थित नहीं होता। मतः उसे मापा के रूप में मत करमा मनिष्ट रहता है। इसी की पूर्ति के लिए कवि पसा है कि इसका मुस पुप के समान विकसित है । इसी प्रकार परि पर भुगाों में कठोरता, पिनासता भारि माँ को रखना है सब उसके - हृदय में तनुरूम मावमा जागृत होती है। इस भावना मे कठोरखा, विशालता आदि धर्मोंने मान के साथ इन पर्मों के अतिशय का मान मी मिसा रहता है और यह मान सीये अतिशयशाम के रूप म न होकर मावों क वेग के रूप में होता है। इसी को ममिष्यक्ति के लिए कवि महता है कि ये मुजाएं वन के समान कठोर है, अर्गला के समान विशाम है स्यादि । इस प्रकार अमिप्यक्ति में प्रस्तुत विधान के अतिरिक्त अप्रस्तुत विधान भी रहता है। यह बप्रस्तुत विमान प्रस्तुत की सफल अभिव्यक्ति के लिए ही होता है । इस अप्रस्तुत विधान के अन्तर्गत उपर्युक्त उदाहरणों में पुष्प, पन तथा अर्गमा आदि के चित्र है । मप्रस्तुत विमान असकार निमान के अन्तर्गत पातर है। अभिव्यक्ति के लिए इस भसकार विधान के अतिरिक्त सर की लक्षणा तपा व्य चना पक्तियों का भी प्रयोग होता इससे यह स्पष्ट है कि अनुभूति तथा अभिव्यक्ति में अन्तर है। परन्तु इम अन्सर के होते हुए भी इतना निश्चित है कि अभिम्पक्ति को अनुभूति से सर्वपा पृषक महीं किया जा सकता । बनुभूति अभिव्यक्ति के मूल में रहती है तथा इस अमिष्यक्ति के साम साय बतती रहती है। इस प्रकार इन दोनों तत्वों को हम एक ही अनुभूति की दो स्पितियां कर सकसे है जिनमे एक अमूर्त है सपा दूसरी मूर्त है । यह अनुभूति यो पहने अमूर्त होती है मभिव्यक्ति की अवस्था मे मूर्त होकर मापा का रुप धारण करती है। व्यवहार से भी इस सिद्धान्त की पुष्टि होती है। गव हमारे हृदय में भाव-सरणि प्रवाहित होती है तो हम उसे तदनुस भाषा गारा अभि व्यक्त करने का प्रयत्न परसे है। जब तक तदनुम्म मापा हमें मिलती रहती है हमारी लसनी मयाप गति से पमती रहती है और हमें एक मानन्द का अनुमय होता रहता है। परन्तु सब भावो के मनुरूप मापा नहीं मिलती तब हमारी मेमनी की गति त बातो है मोर बह तभी आगे सरकती है बर मार्यों के मनुरूप भापा मिस गाए। मनुभूति तपा मभिव्यक्ति में पनिष्टता मवश्य है परन्तु दोनों में से हम किसी एक का सोप नहीं कर सकते। यही कारण है कि भारतीय मार्णकारिकों में अपनी काम्य की परिमापा म प्राय' सम्म तपा अदमों
म
.
।
मा सग्निवेश किया है। मामह की काव्य की परिमापा "शम्दापो सहितो
माध्यम्" ' से यह स्पष्ट है।
काव्य का साहित्य माम इसी तप्प का परिचायक है । साहित्य का
अम है 'सहितयोगि' । इसमे शम्द समा अर्थ दोनों को ससा आवश्यक
है। यह ठीक है कि प्राचीन काल में साहित्य के सिए काष्य शब्द का
ही प्रयोग होता था और साहित्यशास्त्र के लिए अलंकारशाम का प्रयोग
होता था परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि उन लोगो को उपर्युक्त सिद्धान्त
का गान न हो । भामह यादि की काव्य की परिमापाए यहाँ इस सिद्धान्त
को घोतक है वहाँ पालिदास का निम्नसिमित श्लोक इस सिद्धान्त का स्पष्ट
प्रतिपादन करता है-
'वागविय संपृक्ती वागर्षप्रतिपत्तये ।
भगत पितरौ वने पाक्सोपरमेश्वरी।"रघुवंश १।१
कपि को दो वस्तुओं की आवश्यकता है-दर्शन की सपा वर्णन की।
केवम दर्शन से व्यक्ति दार्शनिक होता है । मवि के लिए आवश्यक है
कि दर्शन के अनुरूप वर्णन भी हो । कवि की अनुभूति जन तदनुम्म भापा
धारा अभिव्यक्त होती है तभी उसकी कवि संज्ञा होती है । कवि के लिए
दृष्टि तपा सृष्टि का मश्गुल साम चस्प अपेक्षित है-
'दर्शनादर्णनाबाप सदा मोके कवियिप्रति
तथा हि पर्शने स्पग्छ निस्यऽप्यादिक्वेमुने ।
मोदिता कविता लोके मावजाप्ता न गणना ।'
इत्यादि उपयुक्त लोक इसी सिद्धान्त के प्रतिपादन है।
-साहित्यशाल प्र० स० पृ. २९७, २९८
।
१ मामार-११५
सहदय को लक्ष्य करके कान्य के स्वरूप तथा उसमें साहश्य का विवेचन अब तक काव्य मे साम्य का जो विवेचन हुआ है यह कवि को सक्ष्य करके निर्धारित किए हुए काव्य के स्वरूप को सामने रसकर हुआ है। संस्कृत साहित्यशास्त्र में काम्य के स्वरूप का विवेचन सहदय को लक्ष्य करके हुआ है। अत' अव हमें इसी दृष्टिकोण से काथ्य के विभिन्न स्वरूपों का विवेचन करके उनमे साम्प सिद्ध करना है। सर्वप्रथम हम काम्प के विभिन्न स्वरूपो का विवेचन करते है। माथ्य के पठम से सहृदय को विविध यनुभूतिया होती हैं। इन अनुमूसियो तक वह भाषा के माध्यम से पहुंचता है। भाषा के माध्यम से अनुभूतियों तक पहुँचने को हम अनुभूति तक पहुँचने की प्रक्रिया अपना व्यापार कह सकते हैं। काव्य के स्वस-भान के लिए अनुमति के स्वरूप जान से पूर्व अनुभूति तक पहुंचने के इस व्यापार का भान आवश्यक है योनि यह व्यापार अनुभूति तक पहुंचने का साधन ही नहीं अपितु अनुभूति के स्पस्प का मिश्म भी करता है। अनुभूति सम पहुंचने का यह व्यापार पद-शक्ति के माध्यम से होता है। भन्य-शक्तिमा तीन प्रकार की मानी गई है साचात् अर्पोखम की प्रमिमा साचात् बर्ष को गौण बनाकर अन्य अर्थ व्यनित करने की प्रक्रिया सपा साक्षात् अर्प को यामित करके अन्य वप सक्षित करने की प्रक्रिया । इनके नाम क्रमशः, अमिया स्पसमा तपा लचणा है। माष्य के स्वरूप-विवेपन के लिए हम सर्वप्रपम अमिपा म्यापार को खेते हैं। पाम्प में प्रमुक्त अभिषा म्यापार के लिए आवश्यक है कि समे ममता हो। सोर-व्यवहार मे दृष्टिगोचर सीमा अभिषा-व्यापार वहां मपेचित नहीं। इसका कारण यह है कि माम्म म पाहता का होना बावश्यक है। यह चारता मोर में प्रमुफ सीये प्यार से नहीं अपितु वातायुक्त मभिमा प्यापार से ही सम्मप है। इसीलिए मुन्तक मे बाक्ति को काम्य या जीवित रहा है। काम्य म प्रयुक्त विभिन्न असार इसी धमतायुक्त अमिषा म्यापार के परिणाम है। इन अमदारों को हम काम्य का स्पस्प कह सकते है । अपार सम्प्रदाय या निर्माण काव्य के इसी स्वस्म को लक्ष्य करते हुमा है। ध्यजना व्यापार पास्ता का प्रमुख कारण है। प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति समा उसका सौन्दय इसी व्यापार के कारण है। इस प्रतीयमान अर्थ को मनिकार ने पामार्य से पृपा मतापर महाकवियों की वारसी का उस्कृष्ट तस्व कहा है तथा इसकी तुलना भी के नारस्य से की है जो उसके प्रसिद्ध अवयों से भिन्न वस्तु है प्रप्तीयमान पुनरन्यव वस्स्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् । यत्तस्त्रसिढावयवातिरिस विभाति सावयपमियागनासु ।। ध्वन्यालोक-१४ प्रतीममान मर्प पी पास्ता का रहस्य व्यम्सना प्यापार में निहित है। सप्प यह है कि वो बात सीये मोर पर स से कह दी जाती है उसमें कोई घमसार महीं होता। परन्तु जो मात दिपार कही जाती है वह धमत्तारोत्पादक होती है । इसीनिए महा गया है कि 'गून सम् धमत्करोमि । सपना व्यापार में मही होमा है। मर यह काव्य की मारमा माना गया है । ध्वनि सम्प्रदाय का निर्माण काव्य के इमी म्वल्प को मश्य कसे हुया है। व्यवना व्यापार सम्म के अपांग का लक्ष्म करके ही प्रवृत्त नहीं होता अपितु उसके उपरांश को मध्य करपे भी प्रवृत्त होता है। ऐसी स्पिति मै सम अपना वास्प के वर्गों मे पनि निमसती है। परिवर्स मोमल होते में सो पामत माव और मदि वर्ण कठोर हों तो बहोर भाव प्पनिस होता है। इसे मातारिफों ने वर्ष पनि कहर है (इसका निरूपण रस एवं अनुप्रास प्रकरण में किया जायगा)। रीतिसम्प्रदाय के घर गुणों का अन्तर्भाव इसी वर्स पनि में दिया आ सकता है। सवणा म कति या प्रायन ल दो हेतुओं में से किसी हेतु का होना पावरपक माना गया है। इसीलिए कहा गया है। मुस्पार्पयापे तयोगे सरितोय प्रयोजनाद, अम्योऽयो समय यस्सा समजापिता किया। कामप्रकाश २१२ इन दो हेतुओं के अनुसार ममणा के दो मेट होते है--सटि एवं प्रयोजनवती । महो सक काव्य के स्वस्म का सम्बन्ध है सपणा का प्रपम मेव कति विचारणीय महीं। इसका कारण यह है कि काम के लिए पास्ता की सत्ता आवश्यक है। परन्तु सति सध्या में किसी प्रकार मा पमसार नहीं होता । उाहरणत हम डि मरमा के उदाहरण 'कर्मणि कुशन' को मेते हैं । इसमे किसी प्रकार का नमवार नहीं । अत' यह काव्य का स्वरूप महीं हो सकता। प्रयोमनवती सभणा मे प्रयोजन की सत्ता यावश्यक है। पाता की प्रतीति इसी प्रयोजन के कारण होती है। उदाहरणत हम प्रयोगनवतो लक्षया के उदाहरण 'गङ्गाया घोष को लेते हैं। यह प्रयोजन केम्प में पावनस्वादिधर्म विद्यमान है। इनमे पोप में पवित्रता का भोप होता है। बमलार की सत्ता इसी पवित्रता से वोष में है। इस पवित्रता का ज्ञान य्य उना प्यापार से होता है। इसीलिए कहा गया है कि 'प्रयोगन हि पशनाध्यापारगम्यम्'।" इस प्रकार प्रयोमनवप्ती सभणा के उदाहरों में व्य जमा व्यापार की भी सत्ता रहती है और चमत्कार-प्रतीति इसी व्यसना व्यापार के कारण होती है। अत' काम्पस्यम्प की दृष्टि से प्रयोजनमती मया के उदाहरण व्यवना व उवाहरमों के अन्तर्गत किए जा सकते हैं। हम इन उदाहरणो को लक्षणामूला म्पश्यना के उदाहरण कह सकते हैं। इसी म्प चना को लक्ष्य परफे ध्वनिकाष्य में भेदों में अविवक्षितबाम्यम्पनि नामद भेद माना गया है। मस प्रयोननवती सक्षणा के माधार पर काम्प का पृपा स्वरूप मानने की बावश्यकता नहीं। भापा रे माध्यम से सहृदय जिस अनुभूति तक पहुंचता है वह प्रधानस' वो प्रकार की होती है भावविषयक तथा अन्यबस्तुविषयक । प्रथम मे अनुभूति का विषय भाव होता है तथा द्वितीय मे भाव के अतिरिक्त मम्म वस्तु । अनुभूति का यह विभाजन उसके विपय के यापार पर किया गया है उसमे स्वरूप के आमार पर नहीं । स्वस्म की दृष्टि मे तो समस्त बनुभूप्ति भावनाका ही होती है। उदाहरणत अब हम भुमामा म वितास्तता पम को देखते हैं और उसमें फत्तस्वरूप हम विशामता की अनुभूति होती है सर पर मनुभूति एक पास पर्म के तटस्य ज्ञान के रूप में न होकर भावना १ काम्पमाश1५।
३७ रूप में होती है। विद्यासता धर्म का मान हमारे हृदय को स्पन्धित करपे उसमे गति उत्पन्न करना है और फलव यह मान शुष्क भान न रहकर मावना में परिवर्तित हो जाता है। इसना होते हुए भी इस प्रकार की भावना का विषय वाम ही होता है । अत हृदय का उसके साथ अधिक निकट सम्बाध नहीं होता। भावानुभूति में इसके विपरीत अनुभूप्ति का विषय पित्त हो की कोई वृप्ति होती है। में वृसिया रति, हास, शोक धादि हैं । इसका सदाव बनुभूति करने वाले के मित्त मे होता है। मपि भाग्य में इनका वर्णन पात्रादि के सम्बन्ध मे होता है तथापि यह निश्चित है कि ये वृसिमो मनुष्यमात्र की सामान्य वृत्तियो हान क नात पाठा के हृदय मे मी मित रहसी है। अत पाठक को अपने ही हृदय में मामान्य रूप से स्थित इन भावों को अनुभूति होती है। साहित्यशास मे इसे रस महा गया है। यह रस काव्य का प्रसिद्ध स्पस्प है। रस सम्प्रदाय का निर्माण काम्प के इसी स्वम्म को सक्ष्य करणे हुना है। रस का क्षेत्र मत्पन्स विस्तृत है। मावों से सम्बन्धित समस्त वर्णन रस म मन्तर्गत साता है। भाषों के प्रसंग में म्यिा ट्रया यम्य वस्तुआ का वर्णन भी एक प्रकार से मार्यों काही वर्मम है । यह यह समस्त रस अन्तर्गत बाता है। काम्य में रसानुभूति अममा भावानुभूति सदा ध्यस्मना म्यापार के द्वारा होती है। मका कारण यह है कि रस वाम्म न होकर सदा मम होता है। यदि रस वाय हो तो रसादि शम्बो के प्रयोग स उसकी अनुभूति सम्भव हानी चाहिए। परमा ऐसा कदापि नहीं होता। इसके विपरीत रसादि बाधा पाम्दो के प्रयोग की पता में भी पिमावारिसे प्रतिपादम से रस पी अमिष्यरित होती है। इससे यही नियम होता है कि रख पम्प है। इसीलिए साहित्यशानियों में रस को रसम्पनि यहाँ यह प्रम ठसा है कि यदि रसपी अभिव्यक्ति व्यजना व्यापार के द्वारा होती है तो रस को ध्यत्रमा के अतिरिफ काथ्य का स्वरूप १ रणतिपयमा स्प्रेऽपि न बाम'। सहि रसादिशम्देन गादि शमन याऽमिपीपय । न पामिनीयत । तमोगेऽपि पिमवायपोगे वस्पाऽमति परन्तरपयोगेऽरिपिमवादिप्रयोगे उस प्रतिपमेन्पवयम्परिकाम्प विभवामिपान दारेशेष प्रतीयते इति निधी, नाठो पम्प एवं । -म्पराशर २१०।
३८ मानने की क्या बावश्यकता है। इसका उसर यह है कि रसदशा में ध्ययना म्यापार होता तो अपरय है, परन्तु इसका क्रम इतमा सूक्ष्म होता है कि वह सहदय को लत्तित नहीं होता। सहृदय को ऐसा प्रतीत होता है मानो उसे वाया के मान के साथ ही रसानुभूति हो रही है। इसका कारण यह नहीं कि व्यञ्जना व्यापार के क्रम मा वहाँ पर अमाप है, अपितु उस पापार मा सचित न होना ही इसका कारण है। हमी पात को लक्ष्य करके यातकारिकों में रस को अलक्ष्यक्रमव्यम्प प्वनि कहा है । इस समस्त विवेचन से यहो सिर होता है कि रस दशा में प्य चना व्यापार की जो सिदिहा है वह केवल विवेचक की विरतपण बुद्धि के आभार पर हुई है। यहाँ तक सहृदय का सम्बन्ध है उसे इस प्रकार के व्यापार को प्रतीति नहीं होती पितु केवल रस पी प्रतीति होती है। इसलिए रस को पसना के अतिरिक्त काम्प का स्परम मानना समीधीन है। रसानुभूति में सहृदय को व्य जना की तो प्रसोति महीं होती, परन्तु एक अम्य सत्व की प्रप्तीति होती रहती है। यह तत्व भौचिस्प है। रसानुभूति के लिए मास्वादन की समरसता मावश्यक है और इस समरसता के लिए पौचित्य का निर्वाह आवश्यक है । नेसे पैसे मौषिस्य का निर्वाह होता रहता है सहृत्य को इसकी प्रतीति होती रहती है और इसके फलस्वरूप उसे रसानुभूति होती रहती है । जैसे ही इस औचित्य के निर्वाह में कोई वाघा बाती है वह सुरन्त सहदय का ध्यान रस से पन्यम आकष्ट करती है और फनत' रसभंग हो जाता है । इसीलिए ध्वनि कार ने कहा है - "अनौचित्यादृते मान्यद्रसभंगस्प कारणम् । प्रसिदौचित्ययमातु रसस्पोपनिषत्पय ।।" प्यन्यानोक पृ० ३३० इससे यह स्पष्ट है कि बौषिस्य रस के लिए अपेक्षित है। मत यह मी काम्य कर एक स्वरूप है। औचित्य सम्प्रदाय का निर्माण काम्पक इसी सम्म को लक्ष्य करके हुआ है। पाम्प में जहाँ सहदय को माव के अतिरिक्त अग्य गतु पी अनुभूति होती है यहाँ म्पसना अपवा अमिषा मे से कोई एक म्यापार काय करता है। दूसरे पदों में हम मह सक्से है कि यहाँ पाना अपवा मनकारों में से किसी एक को सता होती है। यह सत्ता केवर विरेचक की दृष्टि से ही नहीं होती अपितु सहृदय की दृष्टि से भी होती है। सहदप को वहाँ पाना बपका बलकार के चमत्कार की प्रतीति होती रहती है। और यह प्रतीसि उसकी अनुभूति का आवश्यक अंग होती है। अतऐसे स्थान ध्याना ममवा यासकार के बतर्गत मा मासे हैं। इसके लिए काम्य का पृपा स्वरूप मानने की बावश्यकता नहीं। इस प्रकार मोनिस्प रस, ध्वनि और अलंकार ये काष्य के विमिम सरूप हुए। हमे इसमें से एक एक को लेकर यह दसना है कि उनमें साम्प कहा तक स्थित है।
"भौषिस्य तथा साबरय" भौचित्य की परिभापा मेमेन्द्र ने निम्न प्रकार से की है- 'चित प्राहुराचार्या सदृशं किस यस्य यत् । सचितस्य प यो मावस्तवोचिस्य प्रचलते । -योचिस्पविचारचर्चा पृ. २मारिका ७ यहाँ सदृश से तात्पर्य अनुास से है । अत' अनुभूमप्ता को बौषिस्य पहा जा सकता है । अनुकूमता किसी वस्तु को अन्य वस्तु के प्रति होती है। इस प्रकार अनुकूमता में दो वसुए होती है—एक वह जो अनुकूल होती है तथा अन्य वह बिसके प्रति प्रथम वस्तु अनुकूल होती है। उदाहरणत मयूर तथा हाप इन वो वस्तुमों को लें। इनमें केयूर को हाय धारण करना हाय के अनुकूल है । यदि केयूर को हाथ में धारण न करके पैर में धारण किया जाता है तो वह पैर में अनुसूस न होकर प्रतिम होगा । अत ऐसा आचरण हास्य का जनक होगा । पेमेन्द्र की निम्नलिमित उक्ति का यही आशय है- 'पपठे मेखलया मितम्पफसरे तारेस हारेण पा पाणौ मूपुरवन्मनेन परणे केयूरपागन बा। सौर्येण प्रणत रिपो करपया नायाम्ति के हास्पाताम् ।। -औचिरविपारपत्रा पृ० १, २ यहाँ यह परम उठना स्वाभाविक है कि केयूर को पारण करना हाथ के लिए अनुकुस पो है। विधार करने पर प्रतीत होगा कि इसके से हेतु हैं। प्रपम है हाय सभा केयूर मे सादृस्य तथा द्वितीय है मोक म्पवहार। हाय तपा मेयूर मे एक पम साधारण है । वह है गोलाई की समानता। हाम में केपूर का विन्याप्त पोनों सो समान गोलाई केपारण किया जाता है । यदि केयर तपा हाप की गोलाई में यह समानता म होती तो प्रपमा दिलीप मे विन्यास उचित म होता । उदाहरणत मेन्यूर तपा पैर की गोलाई में समानता नहीं होती। बत प्रथम का निसीम में विन्यास बोषियमा अनक न होकर अनौविस्म का जनक होता है। वितीय हेतु है नोक-व्यवहार हम लोक में सदा केपूर का विम्यास झप में ही देखते है । अत इस प्रकार का आपरण हमे उचित प्रतीत होता है। विचार करने पर प्रतीत होगा कि भौचित्य की सोकव्यवहारमूनकसा भी एक प्रकार से सादृश्यमूलकता मे पयवसित होती है। माक में वस्तुओं के पारस्परिक सम्बन्धविशेप को निरन्तर देखने से हमारे मस्तिष्क में उन बस्तुओं के उस सम्बन्य का एक चित्र यक्ति हो जाता है । अत हम जब उन वस्तुओं को पुन प्रस्पच कम में देखते हैं तब नन्हें उमी पूर्व रूप मे सम्बद्ध देखना चाहते हैं। इस प्रकार हमारी यह इन्ध होती है कि प्रत्यक्ष चित्र सया पूर्व मंकित चित्र में साम्य हो। उराहणत हाय तपा केयूर क सम्बम्म को हम सोक में नित्यप्रति देखते हैं। इससे ऐसा ही चित्र हमारे मस्तिष्क म अमित हो जाता है। मत हम सब इन्हें पुम सोर में देखते हैं तो इस अपित पिन के समान ही देखना चाहते हैं । इस भक्ति पित्र के समान प्रत्यक्ष चित्र को देखकर एक प्रकार से हमारी मास इस पूर्ण होती है। इससे प्रस्पक्ष चित्र हमें उचित प्रतीत होता है सभा हमे एक प्रकार के मानन का अनुभव होता है। मौविस्य के द्वितीय हेतु लोक व्यवहार का पयवसान हो सादृश्य में महीं होता अपितु उसकी प्रवृति भी सादृश्य को ध्यान मे रखकर होती है। लोक में हाप तथा केपूर का सम्बन्ध स्पत' सपा स्वेच्छा से ही स्थापित नहीं हो पाता, परन्तु उनकी पारस्परिक समानता ही उनए सम्पपस्थापन पासारण है। इस समस्यस्थापन मन पसुमो का इस स्म म सम्वड मित्र हमारे मस्तिष्क म भक्ति होता है तथा इस मित्र से साम्य का निर्वाह प्रस्तुत चित्र के औचिस्प का हेतु है। इस प्रकार हाय तमा कपुरक प्रस्तृत पिम सबोषिस्य सिम पूर्व यक्ति पित्र के साम्य पर आमिस है यह पूर्व चित्र स्वयं साम्य पर बाधित है । मत हाप तया रपूर के औचिस्प का हेतु सोक म्पहार स्वयं सादृश्य परमाभित है। ६ ४२ उपर्युक्त विश्चम से स्पष्ट है कि हाप तपा केयूर के औचित्य का हेतु हम पाहे हाप तपा केयूर के सादृश्य को मार्ने पाहे लोक म्यवहार को यह निमित है कि प्रस्पेन दशा में इस औचित्य के मूत मे सादृश्य स्थित है। वस्तुस्थिति यह है कि विरमेपण की दृष्टि से तो प्रत्येक दशा में इन दोनों वस्तुओं के औचित्य के मूस में सादृरय स्थित है परन्तु नहीं सक वर्ष का सम्बन्ध है उसे इम औचिस्प + मूल में सादृश्य पर माभित लोक व्यवहार की पृषक् रूप से भी प्रतीति होती है । मारग्म में दर्शक को इन दोनों वस्तुओं के औचित्य के मूल में केवत मादृश्य की प्रतीति होती है परन्तु इस सादृरय के फलस्वस वोनों वस्तुओं को अनेक बार इस रूम में सम्मट देखने के बाद जब वह इनको पुम' इसी रूप में समन्धित वेमता है तब उसे उनके योपित्य के मूल मे उनका इस रूप में पूर्व भूमोदर्शन भी हेतु रे रूप में प्रतीत होने लगता है। प्रस्तुत रूप का पूर्ण भूयोवर्शन ही वस्तुत लोकम्यवहार है। काव्य के औचित्य के मूल में भी सादृश्य तथा मोकव्यवहार ये दो हेतु विद्यमान है। काम्प स सम्बन्धित सादृश्य का धर्म है फाय्य के किसी वंश का अन्य अंश अपवा मर्यो से साम्य । यह साम्य काप्म के लिए परम मावश्यक है। काम्य रे मास्मभूप्त रस को निप्पत्ति इसी साम्य के निर्वाह पर बाधित है। काव्य में औचित्य का निस्पण रस को मश्य परक किया गया है। अत' काव्यगत मौचित्य के लिए यह मावस्यक है कि माम्प के समस्त भंग प्रस्तुत रस से सम्बट हो । प्रस्तुत रस से सम्बन्धित होने कारण पाम्प में समस्त अङ्गा मे रमवृष्टि से साम्य होना स्वाभाविक है। बौविस्म का दूसरा हेतु है मोक-व्यवहार । भरतमुनि ने इस मोक- व्यवहार को मरम्पगत प्रोचिस्प का भापार माना है। उनकी निम्ममिसिन उत्तिया इसकी समर्थक है:- "एवं मोकस्प या वार्ता नानाजस्थान्तरारिमका । सा नाट्पे संविषातव्या माट्पवेचिरणे ॥" १२६ 'यानि नामाणि य पर्मा यानि पिस्पानि या छिया। मोधर्मप्रवृत्तानि तानि नाट्य प्रकीतितम् ॥" १२७ मादपशाम २२ । १२६, १२७ ॥
हाप समा केयूर के ओपित्यसम्बन्धी पूर्व विवेचन से स्पष्ट है कि इस नोक व्यवहार का पर्मवसान भी सादृश्य मे होता है। कतिपय पायास्प विछन् काव्यगत औचित्य के प्रथम हेतु सादृश्य को तो स्वीकार करते हैं परन्तु इसक वितोय हे लोकम्यवहार को स्वीकार नहीं करते । इनके अनुसार काष्य के लिए यह बावश्यक नहीं कि वह सोरस्यवहार से साम्य का निर्वाह करें। ये विद्वान् काम्प के लिए केवल एक साम्प का निर्वाह वापरयक समम है और वह है ससवा माम्तरिक साम्य अमवा बोधिन्य । इसे थे Internal consisteney कहते हैं । इसके अतिरिक्त उसके लिए यह मावश्यक नहीं कि यार्य जगत् से भी उसका साम्य हो। ये विद्या काव्य के सृजनात्मक सिद्धान्त (Creative theory) को मानने वाले हैं। इसके अनुसार काव्य का उद्देश्य जगत् का यार्य चित्र न सोध पर कल्पना के आधार पर उसका नव निर्माण करना होता है। अत' लोक्व्यवहार मे साम्म का निर्वाह उसके लिए अपेक्षित नहीं। इन विद्वाना मा उपर्युक्त सिसान्स वस्तुत' लोकव्यवहार से माम्म के निवासम्मन्मी सिद्धान्त पर विशेष प्रभाव नही गमता। लो म्यवहार के हम प्रयानत दो भेद कर सकते हैं मावप्प सभा आषरण-कम अथवा पटना । माष-स मोग-व्यवहार सब मनुष्यों तथा सब कानों मे समान का से देखने को मिलता है। देश उपा माल की सीमाएं इस पर प्रभाव नहीं गलतीं। रसि, हास, भोर माधि जो सामान्य माव मादिम मुग में विद्यमान थे वे अब भी उसी प मे दृष्टिगोचर होसे है। यत' काय्य म इनका इसी रूप में वर्णन सग्मय है । इममें यहां किसी प्रकार मा परिवर्तन मही किया जा सकता। हमारे माथ्य मे तो भानों क स निमाह की भोर मार भी विशेष ध्यान दिया गया है। इसका कारण यह है कि हमार कायों का नद्देश्य प्रधानत रसनिप्पत्ति रहा है नो भावादि क सामासिक का मिश्रण पर आमित है। रसपरिपूर्ण कामों में Internal cons15 tencr भी भागारिक इस सम्यक निर्वाह + फसस्यम्प हो भाती है। मोक-य्पबहार का दूसरा स है भापरण घटनाएं मारि। मापरण पटनाओं आदि पा सम्बन्ध पारों से होता है। माधरण तो पार्मो के होते ही है पटनाओं में से भी मनेर घटनाएं याभरण के अन्तर्गत पनी पाती है। यह नाचरण देश-विशेष सपा कास-विशेप में किया जाता है। इस देशविशेष तया काम-विशेप मे पात्र इस प्रकार का आपरण करके मयों को प्रकाशित करते हैं। काव्य में वरिस्त इस वापरण के लिए सोक- व्यवहार का ध्यान रखना आवश्यक है। इस बाचरण के मौचित्य का निर्सय पात्रों के स्वरूप तपा देसकालादि की परिस्मितियों को देखकर किया जाता है। पात्रों के सरप पर आथित भाचरण के औचित्य को संमत साहित्य पापियों ने प्रत्यौचिस्प पहा है सपा भागौपिस्प के प्रसङ्ग मे इसका विस्तारपूर्वक वर्णम किया है। उन्हरण के लिए कोष मनुष्यों का एक सामान्य भाव है परन्तु पात्रों के मेद स इस भाव को प्रकाशित करने पाले आचरण में भेद सम्भव है। पाम दिम्प, अदिम्य, सपा रिप्याविष्य आदि अनेक प्रकार के माने गए हैं । एक दिव्य पात्र कोप का प्रकाशन बिस बापरणय करेगा यह बाचरण मामारण पाम मे सम्भव नहीं। शिव एक विष्य पान है। ये क्रोम का प्रकाशन बिना किसी सुकुटि प्रावि विकार के कर सकते है। परन्तु एक साधारण पात्र ऐसा नहीं कर सकता । बत कोषप्रपाक्षक आपरण का वर्णन करते समय पात्रों के इस स्वम्मको ध्यान में रमना बावश्यक है। पदि सोक मे वृष्टिगोचर इस आचरण की काप्प में गमिस थापरण के समय उपेचा की जाती है तो अनौचित्य का जन्म होगा मौर हमें काम्प में वर्णित बामरण भसस्य प्रतीत हागा । काम्प के मास्वादन के लिए यह मावरमा है कि उसके वनों में हमें पूर्ण विश्वास हो । काष्य के सृजनात्मक सिदान्त पो मानने वाले कहते है कि काम्प में विश्वासोत्पादन (Makebeliers) मी समता होती है। इसके फलस्वम हम काम्प के वर्णन सम्बन्धी समस्त अविधासों पा परित्याग (Suspension of dabelrol) कर दवे है। इन विद्वाों का यह मत कुछ ही मैचों में सत्य है । मह ठीक है कि माम्म में विधासोत्पादन की भक्ति होती है। परन्तु इसकी एक सीमा होती है। इस सीमामा स्तंपन करने पर हमें पाम्प के वर्णन में १ मकवयो दिमा प्रदिम्मा दिम्पारिमाम इपुकार सत्यादि विकारर्षिता पासप फादः स्वर्ग पवनमानसमुद्रोत्सनापुसाहम दिमपेप। प्रदिमे मावदयम प्रशिषित वा वापदेयोपनिषदम्पम् । ताप्पा | अविश्वास हो जाता है। काम्य उसी पटना अपघा आपरण में हमाय विश्वास उत्पन्न कर सकता है जो लौकिक दृष्टि से सम्भप है । यो भापरण सोम में सम्भव नहीं अपवा को मोकानुभव शय पापित है उसे हम सस्य मानने के लिए कयापि तैयार नहीं हो सकते। यदि काम्य इस मोकानुभव की उपेक्षा रक बाधर्य एवं पतिशयोक्तिपूर्ण अविवसनीय पटनाओं एवं आपरमो का वर्णन करता है तो उससे इमारी कुतूहस गृत्ति मने ही जागृत हो हमारे हृदय को बह प्रभावित नहीं कर सकता और फसत इस दशा में रस निष्पत्ति सम्भव नहीं। उपयुक्त आमरण एवं घटनाओं का वर्णन जिप्त दन तया काल की सीमावो मे किया जाता है उस देश या मालकी परिस्थितियों का ध्यान रमना भी मावश्या है। काव्य को परते समय सहरम को मह मास होता है कि यो घटनाएं उसके सामने काम्य मे पट रही है ये अमुक देश वपा ममुक काल में घट रही हैं। भव उस देश एवं काल की परिस्थितियों से साम्म का निर्वाह उस काव्य के सिए मपक्षित है देशविरोप तथा कामविशेप की परिस्थितियों से साम्य के निर्वाह का यह धर्य नहीं कि कवि उस देश तथा कास में घटी हुई पटमाओं का ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विवेचन करे । परन्तु इससे केवस इतना अभिप्राय है कि कवि जिस समय की घटनाओं का वर्णन करे म्मका तलासीन परिस्थितिमो मे पटित होना सम्भव होना चाहिए। यह मावस्यक नहीं कि ये घटमाएं उस वस्तुप परिव होई हों। कवि द्वारा मपनाई हुई वस्तु चाहे ऐतिहासिक हो चाहे काल्पनिक कपि ससा बर्थन करते समय इतिहासकार का रूप कमी धारण महो गया। सस्टम वस्तु के वर्णन में तो कवि के लिए इतिहासकार बनने का प्रमही नहीं उठता ऐतिहासिक वस्तु के वर्णन में मी कदि कवि के रूप में ही रहता है। वह ऐतिहासिक सम्यों का प्रयोग अमरय करता है परन्तु यहीं तम यहाँ तक व उसके प्रति उद्देश्य रस निष्पस में सहायक होते हैं। जैसे ही कोई ऐतिहासिक घटना मपवा पटमोश मास रस का पोषक मोहर पिरोपी प्रतीत होता है वह उसका परित्याग करने तथा अन्य रसानुाम घटना के निर्माण में स्वतन्त्र है। मना होते हुए भी पदि उस देश तपा पास की परिस्थितियों की उपेक्षा करपे मनमाना बापरख मही कर सकता। माम में रस साहरय रस पी परिमापा मरसमुनि ने इस प्रकार की है- 'विमानानुभावव्यभिचारिसंयोगानसनिप्पति" नाटपघाम ६ । ९३ इस परिभापा से यह स्पष्ट है कि विभाव अनुमाव तथा म्यमिचारी के सचिस संयोग से रस की निप्पत्ति होती है। प्रस्पेक रस के विमावादि मिन्न भिन्न होते हैं । अस' रमनिप्पत्ति के लिए वापरयक है कि उन्हीं विमावादि का संयोग हो मो प्रस्तुत रस से सम्मट हों। यदि इनमें से कतिपय विमावादिक प्रस्तुत रस से सम्पर न होकर अन्य रम से सम्बद्ध होंगे तो उनका उस स्माम पर सग्निवेच अनौचित्य मा अना होगा और फास्त' रसभंग छोगा । यही कारण है कि औचित्य मा निर्वाह रस के लिए परम आवश्यक माना गया है। मानन्दवर्मन आदि ने रसनिस्मण के समय विमावादियों के औचिस्प का विस्तृत वर्णन इसी मात को लक्ष्य करके किया है। मानन्दवर्धन को निम्नलिमित उक्ति रस के लिए औचित्य के महत्व को स्पष्ट चोतक है- 'ममोचिरपादृते मान्यद्रमभंगस्य मारणम् । प्रसिद्धौचित्ययम्भस्तु रसस्योपनिपत्परा ।। पन्यामोष पृ० ३३. रस में विद्यमान इस औचित्य का निस्मग दो प्रकार से किया मा सकता है। विवेचक की दृष्टि से सपा सदय को दृष्टि से । विवेचक की दृष्टि से रस में औचित्य का चेत्र अत्यन्त विस्तृत है। उसे रस में सर्वत्र किसी म किसी रूम में पौषित्य दिमाई देता है। परन्तु सहस्य के साम ऐसी बात नहीं । उसके औचित्य का क्षेत्र सीमित है। वस्तुत' उसके लिए भोषित्य यही है यहाँ उसे ससमी प्रतीप्ति हो। यह भावश्यक महीं हि उसे औषिस्य उन सम स्थानों पर प्रतीत हो महाँ विवेचक उसकी सत्ता मिट कर सकता है। दूसरे सहृदय को यहाँ बोधिस्म की प्रतीति होती है वह मी कदम भारम्भिक होती है। उसकी सत्ता रम-प्रवाह में मीन हो जाती है और कबस रसानुभूति शेप रह जाती है।
हम पहमे विवेषक की दृष्टि से इस मौषिस्य का निरूपण करते हैं । इस बौचित्य के लिए दो तत्वों की बावश्यक्ता है-विभावादिका लोक- व्यवहार से सादृश्य तमा विभावादि म पारस्परिक सादृरय । पहमा सस्य इस प्रकार है- मोक में किसी स्थायी भाव के जो कारण, पाम तया सहकारी होते हैं ही सम मायी भाव से सम्पद रस म विमाप अनुभाव सया ममिवारी बन जाते हैं। उदाहरण सार में स्थायी भाव रति के को कारण, कार्य तमा सहकारी हाये ये ही साम्य अथवा माटक मे शगार रम + विमावादि वन माएंगे। मम्मट की निम्नसिमित उक्ति इसकी समयक है- पारगाम्पर कार्याणि सहकारोणि यानिय एमादे सामिनो मौके सानि पेनाटपाम्पपो। बिमावा मनुभावास्सलप्यन्ते म्यभिचारिण, व्यक्तः स विभावाचे स्थायी मागो रस स्मृतु ।' -काव्य प्रकाश सू. मत विमावादि क मौमित्य के लिए यह आवश्यक है कि साक- व्यवहार से चमका साम्प हो । लोक म्यवहार स विमानादि के इस साम्य का निर्वाह करते समय यह भी मापश्पक है कि पानाकि भेद से मौषित कारण, मार्य आदि मे पो भे उत्पन्न होता है उस मेद का भी ध्यान विभावादिकों में रखा जाए। मोक में पात्र पि, अरिष्य, दिप्यादिष्य तपा उत्तम, मध्यम अपम मादि मने प्रकार के होते हैं। पाओं ने इस भै के मनुसार उनके व्यवहार में भी भेट होता है । मत काय म बिमावारिकों का निसस रखे समय इस मेरा ध्यान रखार उससे साम्य पा निर्वाह मी मावस्यक है। मानन्दवर्मनादि ने प्रहरपौविश्य के सन्दर्गन इसरा वर्णन मर भोचिस्य , इमर तल को लते है । इसा मनुमार सब विभावाहिकों मए प्राम्य पहाता भारश्यक है। प्रपम माम्प रिमावा- रिको सपा सोमवहार की समानता देशप म मा परन्तु यह साम्प विभावावि में एष समान प्रस्व विषमाम होने कारण उन मबसे सादरप ४८ कस में होता है। विमानादि में से प्रत्येक का सम्बन्ध एक समान पित्तवृत्ति से होता है । यह पित्तवृत्ति उन सबके मूल में रहकर उनके सादृश्य का कारण होती है। विमावादि के प्रतिपादन के लिए कवि को किसी कथासूप अथवा मस्तु मा अवलम्बन करना पड़ता है। यह वस्तु प्रमानस' दो प्रकार की होती है-प्रसिद्ध तथा कविकस्पित । इन दोनों का बयसमम वह विभावारियों मे विजामन साम्प को सक्ष्य परके करता है। महो वस्तु कविकल्पिा होती है वहाँ तो उमका उस रूप मे मवमम्बन स्पध्द इस माम्य को लक्ष्य करके होता ही है, प्रसिद्ध वस्तु के अवसम्बन की दशा में भी यह सिमान्त चरितार्थ होता है । यह सम्भव है कि प्रसिद्ध वस्तु का कुछ अंश उपर्युत साम्य से मेम मनाए । ऐसी दशा में कवि उस बम का परियाग करने तथा उसके स्थान पर नए अंश की ममावमा परने मे स्वत्र है। वानन्द वर्षम का मही मत है।' रसामिप्यक्ति के लिए विमावादि का प्रतिपादन प्रस्तुत विपाम के मम्तर्गत आता है क्योंकि इनरा रस से सीधा सम्बन्ध होता है । इस प्रस्तुत विमान के अतिरिक्त रस मे मप्रस्तुत विमान भी रहता है । यह अप्रस्तुत विमान बसकारादि के रूप में होता है। इसका उद्देश्य प्रस्तुत विमान अथवा विभागादि में चास्ता माना होता है। स्वाहरणत मुम यदि बासमन है तो उसका चन्द्र से सादृश्य उसमे भारता का सनक है । इस मप्रस्तुत विपान के लिए भी यह बावरमा है कि वह उसी चित्तप्ति का परिणाम हो जो चित्तवृत्ति प्रस्तुत विधान के मूस मे है । महा कवि इस मितवृधि हटकर अन्य प्रयम को मफ्नाता है वहां उस प्रयत्र से उत्पन्न असकार असंगस हो पाता है भोर वह प्रस्तुत का उपकारक नहीं रहता । यही कारण है कि बासकारियों ने रस में उन्हों ममगारों का विमाम उपयुक्त माना है गो पृषा यन से उत्पन्न हों।' १ शियामा कम्यिानमगुण स्थिति स्पषमा पुनम्प्रेणाप्यन्तरा मारतोषिकामयो विधयो यया सपाव- प्रकिना सर्वाना 16- परतोय मनितम्पन्न । न तिवमा निक्षिण विबोनम् । इतिहागरेर परिसद पम्पासोकपू. १५ २ "रसदिसतया मस्त पा रास्पधिपो मोत् । अपम्पनिय सरोपनी मा पम्पानोर १५ ४९ रस की निष्पत्ति के लिए नहीं यह मावश्यक है कि समस्त भावों में साम्प हो वहाँ यह मा मावश्यक है कि मानों सपा उनकी अभिव्यक्ति के लिए प्रयुफ भाषा के उपरण में भी साम्प हो। मापा के उपरण तथा भाव का यह साम्य इन दोनों मितियो में विद्यमान सायुमण्डल की अवस्था की समानता के कारण होता है। भावानुभूमि सया उस अनुभूति को भाषा वाय अभिव्यक्त करने के समय मायुमान की एक दो अवस्था रहती है। प्रत न दोना में सादृश्य होता है। मावानुभूति के समय विस्त की अवस्पाएं प्रवानस' दो प्रकार की होती है-प्रत तपा घोप्त । इन अरम्यामों म प्रायुमगन मी ममा पिपिन तमा उत्तेभिव हा नाना है। वायुमणाप की शिथिलता को सवस्या म मापम अपयव मी से ही यम जाते हैं। इस स्थिति मे को मापा निकमती है वह कोमन होती है। यापुमाल की उसमना की अवस्था म मापस्-अवयवा म तनाव आ मासा है। इस स्पिति म मो मापा निकमती है यह कठोर होती है। इमस यह स्पष्ट है कि कोमल मापा के तारण सपा विस्त को मन मवस्या के समय वायुमराहल की एक नैसी अवस्था होती है समा ठार भाषा रेनबारण तथापित की दीप्तावस्प समय भो मायुमपाल की अपस्मा एक मेसी होती है। अस इस प्रकार की पित्तवृत्ति सवा इस प्रकार की भाषा में सादृश्य होता है। आसंकारियों न भाष तथा भावारे इसी साट्टरप को मध्य परक पर्यो का रमरम्म तथा रसम्मुत लदो भागों म विभाजन दिया है। यहाँ भाव तथा वर्णो मे सादृश्य हासा है यहाँ वर्ण रमरम्पत हात है तथा वहाँ इनमें सादृस्य नहीं होता वहां वर्ण रसगुत होते है । मव हम विभाषादिकों में आदित्यप्रतीति रा निम्मग महृदय की दृष्टि मे परते हैं । सहाय फो इस माधिस्य का गान हम विभाषादिका के सोनम्यवहार स साम्य पारण हाता है। निम्मानिखित उदाहरण से यह स्पष्ट है- १ "गरेक्सयागो समरमारि भूपमा । विरोपिर मु गंगारे न पा रखता। तक निश्पते पामरसे पदा। सरा पक्ष न पा रतरपुत्र ।" पिम्पा २.४
वार्चन मिश्रति पचपि मनोमि
कर्ण दवात्यभिमुने ममि भाषमागे।
माम न तिष्ठति मवामनरांमुसीना
भूमिम्मम्पविपया म तु दृष्टिरस्या ॥
-अमिझानशाकुन्तनम् १-२७
यहाँ मनुरागोत्पत्ति की अवस्था में विद्यमान शकुन्तला की अनुराग
सूचा चेटों का वर्णन है । उपर्युक अवस्था में विद्यमान भी सामान्य
की घटाओं का चित्र सहृदय के मन मे पहल से भक्ति रहता है । मत पर
वह इस अवस्था मे विधमान सकुन्तता की उपर्युक्त नेष्टाओं का वर्णन पाता
है तो पूर्व मक्सि चित्र के साप पूर्ण समता के कारण प्रस्तुत वर्षन मे उसे
योपित्य की प्रतीति होती है। इस प्रकार यह औचित्यप्रतीति साम्प
प्रतीति के कारण हम्बी है।
ध्वनि सिद्धान्त पनि सिद्धान्त रस विदात का पूरर माना जाता है । इस मिशन के प्रतिपादन के वय यानन्द ने रमक गिसो विरोधी मिदान की स्थापना नहीं की, परन्तु रस सिद्धान्त के दापों को दूर करम उसे स्पिरता प्रदान का।वनिवादियों न रस की मामा स्वीकार की समा इस पनि का हो एक भेद माना । रस के अतिरिक इन्होंने पनि क । मेद और मान। य वस्तुबान तथा मनकारध्वनि है।' वनि कइन नोनों भदा मइहोंने प्रवामता रसम्पनि हो ही दो । पनि ५ जो दो अम्म मद है उन्हें केवम गौण म्मान दिया तया इनका पयवसान रमापनि मे ही मना । प्रत यह कहना मनुपित म होगा कि इन अनुसार रसपनि ही वस्तुत भाष्य को बारमा है। मिनव तया आनन्द का यही मत है।' समस्त ध्वनियों पा पमपमान रस म होन र कारण रस म विद्यमान सादृश्य का सदमाव इन घ्यनियों म मानना माया उपिस है । यत यह पष्ट है कि शिव प्रकार रस म सादृश्य विद्यमान है उच प्रकार पनि न मी बह विषमाम है। i By bu theory of Dhranı he did not propound any rural doctrive to that of law, but only placed it ou a former basis by retaoving iu dclecto" -Theornerot laua and DusanPT8. २. "कसनेन पुनरस्प पनेमया मा बयप विस्मत्वात् । तपादि। पिनासता सरते मिलवमा कर बाप्पाजमविपित्र विचित्र यति । अविदित बस्तुमा विशिषधरस् ।' याम्प प्रभरापू. २१६ ३ तन रस एर बस्नुत माया यसबरप्पनी संवा र मति पपले विमानसोवा-रत्यभिधारण पनि कायस्पामेति तामाम्पेनोर॥" 'प्रतीयमानत्य पान्ममेदानेऽपि समयमुसेनेग्रजभव प्रयान्यात् ।'
५२ - प्वनि में सादृश्य की उपर्युक्त सिदि पनि सिद्धान्त तथा रस सिदान में साम्प को मेकर की गई है। इसके मतिरिक्त स्वतन्त्र रूप से भी यह सिद्ध किया जा सकता है फि ध्वनि में सादृश्य विधमान है। ध्वनि मे धन अपवा अप से किसी अन्य मर्म को अभिम्पति होती है। वहाँ यह अभिव्यक्ति सम से होती है यहां शब्द का यामार्य गौन हो जाता है तथा यहाँ यह अमिष्यक्ति धर्म से होती है यहां वह वर्ष स्वयं गौण हो जाता है। धनि की निम्नसिमित परिमापा स यह स्पष्ट है- "मत्रार्थ शम्बो वा तमर्षपसर्जनीक्तस्वायौ । म्यक्त काव्यवि प स थनिरिति सूरिमि कमित'' -ध्वन्यानोक १-१३ व्यप्याप की इस व्यक्ति की प्रक्रिया में साम्प का भी स्थान है। यह अवश्य है कि प्रतिमा की निर्मलता रे अमाव में म्यम्यार्य का शान सम्भव मही परन्तु यहाँ प्रसिभा की निमलता फवारा इस व्यम्पाय का मान होता है वहाँ यह साम्य का भी आघय लेता है। यजना के विभिन्न भेवों तपा उनके उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाएगा। यसमा के दो भव किए गए हैपाम्दी व्यसना तमा आर्षी माना। साम्दी व्यधना के पुन' दो भेद किए गए हैं । ये अमिमामूसा पजना समा लक्षणामूना पत्रमा है। सच्णामूना स्पना म फलविशेप बपया प्रयोगम की प्रतीति म्याना व्यापार के द्वारा होती है । चदाइग्गत गंगार्या मोष' में 'गंगातटे पोप' सख्या ३ सया भोर मे पावनत्वादिपर्म प्रयोजन मेम्स में है। इन पर्मों का मान पवना के द्वारा होता है।' अस' में व्यम्य है । इन पर्मों की प्रतीति पर विचार करने में प्रतीत होगा कि इनकी यह प्रतीनि गंगा सथा पोप के गुगों में अधिक सादृरममान पा मामय अवश्य मेती है। गंगा पर स्थित होने के कारण पोप में गंगा के पावनत्वादि धर्मो रा समाय प्रतीत होता है। गंगा म पावनस्वाति धर्म अत्यन्त प्रसिड है। बत पोप में इन धर्मों का होना सर्वमा स्वाभाविक है। १ बम्प प्रतीतिमापात सपणा समुपास्पते । परदेशगम्मेऽ म्यमामात्यय लिया | जाम्पप्रकाराम.२५ ममिपामूला व्यधना में बनेकार्मक शमों का वायफ्त्व संयोगादि के द्वारा नियन्त्रित हो जाता है । परन्तु फिर भी अवाश्य अर्थ अथवा अयों की प्रतीति होती रहती है। यह प्रतीति व्यजना व्यापार का विषय है। इसका उदाहरण इस प्रकार है- 'मद्रात्मनो दुरधिरहतनोविशासक्शोन्नते कृतशिनीमुखसंग्रहस्य यस्यानुपप्लुतगते परवारणस्य दानाम्बुसेकसुभग ससत करोऽभूत्' काव्यप्रकारा पृष्ठ ६८ महो प्रकरण के अनुसार वाथ्यार्य रामा से सम्बट है परन्तु फिर भी इस्ती से सम्बर अर्प की प्रतीति होती रहती है। यह प्रतीति ध्याना व्यापार पर बाधित है। इस व्यम्या की प्रतीति पर विचार करने से प्रतीत होगा कि यह प्रतीति शो के दपर होने के फलस्वरूप होती है। घर के दो वर्षो में से एक अर्थ वो वाम्य नहीं है वही यहा व्यसना व्यक्त होता है। इस प्रकार स्यश्यना के द्वारा मिस वर्ष का दोष होता है वह कोई नवीन वर्ष महीं अपितु शम्दों का एक अप ही बम्पार्थ का स्प भारण करता है। अत' शब्दों का एक मर्थ तपा व्यंग्या यहा एक अमषा सवपा समान है। मप्पयदीक्षिस के अनुसार उपर्युक्त उदाहरण मे द्वितीय अप व्यञ्चना का विषय न होकर अभिधा काही विषय है। मत' यहाँ दोनों अर्थ भाभिमेय है। अप्पयदीक्षित के अनुसार ऐसे स्मनों में पनि होती अवश्य है परन्तु यह प्रस्तुत तया अप्रस्तुत अर्थ के सादृश्य को मक्ष्य करके होती है मप्रस्तुत मर्म को सक्ष्य करणे महीं होती।' इस प्रकार उपर्युक्त उदाहरण में पम्पार्य रामा तपा हस्ती का सादृश्य है । हस्सी से सम्बद्ध धर्म को यहो ध्येय्या के बम्तर्गत मानमा उचित नहीं मांकि वह तो अभिधा काही द्वारा विपय है। १ अनेमस्प सदस्य पाया नियबिने। संभोगापरवामापीरुदम्मातिरनन् ।' काभ्पप्रभास. ३२॥ २. “यदा मातापावोरण रामयसिमा पनिमिप्यन्ति प्रस्तुत प्रभवामस्वामिभानमूलस्पोमादेरल सारस्व पम्पयाम्ब्रिायं न प्रताप स्पेन सपानन्द पृष्ठ ७EE अप्पयवोचित के इस म्यम्पार्थ का तो स्वम्प ही सादृश्य है । बत यह अर्य सादृश्य के पम्य रूप के अतिरिक्त और कुछ नहीं । मार्स म्पश्चना में वक्ता योता आनिमी विगिरतारेपारन माम्या से एक अन्य अर्प की प्रतीति होती है। यह प्रतीति प्यम्सना म्यापारमा विषय है।' इसपा उदाहरण इस प्रकार है- "माप्त होपारणमय नास्तीति साषित स्वया । तद्भण किं करणीयमेषमेव न वासर स्पाया॥ काव्यप्रकाश पृष्ठ २८॥ यहाँ व्यय्यार्थ रविहार की इम्छा है। इसीलिए मम्मट सिसत है- "मन रविहागर्थिनीति म्यम्यते । कास्यप्रकाश पृष्ठ २९ । यही वक्ता एम चरित्रहीन भी है। अत उसका आचरण निन्दनीय है। उपर्युक्त म्यम्पार्ष मो ऐसे ही आचरण मी ओर सस्त परता है। अब परित्रहीम स्त्री के आपरण तथा उपर्युक्त व्यस्यार्प में समानता है । मत' मह सष्ट है कि उपर्युक्त व्यंम्पार्ष यता के आचरण से साम्य के आधार पर व्यक्त होता है। ध्वनि में सादृश्य की उपर्युक्त सिदि मिवेषा की दृष्टि स की गई है। महो तफ पाठन का सम्बम्प है उम मी पनि म कुछ बंशों तक यह सादृश्यप्रतीति होती है। यह प्रतीति म्यञ्चना की प्रक्रिया का बजमात्र होती है। यह प्रतीति ध्यनना की प्रक्रिया में लीन हो जाती है और केवस प्वनिजम्य पमतकार शेप रह जाता है। १ परम्पपना बापाप्याम्पसप्रियः । प्रस्वापरेशममारेवगिरपात् प्रविमाद्ययन् । पोऽपलान्यापहियामागचे म्पटिरेब सा || प्रमान.२७।
द्वितीय अध्याय भलकारों के मूल में साहस्य समकारों के मूल सादृश्यमान के लिए यह मावश्यक है कि हमें वसकारों के आधार अयमा आघय का मान हो । इसका कारण यह है कि मादृश्य इसी मापार में निवास करके मतकारों का मूस वनता है तमा उसके मम का निर्माण इसी आधार से मनुसार होता है । स्वत मादृरप का कोई मूर्त स्म नहीं होता। इसक मूर्त रूप के लिए उन वस्तुओं के रूप पाशन पावरमक है जो सादृश्प का आधार यमकर उ मृत रूप प्रदान करती हैं। आमकारिको ने इस दृष्टि से अलंकारों + मुम्पत दो आधार पृया पृषक यचाए है। ये शब्द तथा अप है। इन पर आधिस असंकार कम सारदासकार तथा अर्यालकार होते हैं। कतिपम थालेकारिकों ने शम्न तथा सम दोनों को संयुक्त रूप से भी आभारों का एक मेव माना है तथा इस पर आथित अकार को समयासकार कहा है। परन्तु इसको मानने वाले बास कम है। पत' हम यस सम्वासकार सपा मर्यासार इन दो पसबार-भेदों को मानकर पतसे है गो क्रमम' पम्य तपा पर्ष पर मापित है। यहो यह प्रश्न उठ्ना स्वाभाविक है कि शाम सपा अर्थ का क्या स्वाप मानकर बालबारिक हमें असकारों का पृषक पृषात् आधार मिमिस करते हैं। पारमा सामान्य अर्थ मेने पर तो सम्म तमा अर्थ दोनों पृपर पृषा मापार सम्भव नहीं । इसका कारस यह है मिसन के १ पह हमें भरिपुराए में मिलता है- समायोरारा हमलले सम्म । एक महिता र प्रीवमिव निमार" -अमिपुरास २०५-१ भेग ने अमिपुराण की सम्परा काममुमणपणे ए इसे सीधर लिया। "शदापोमपदेशनिरन् समय। पापानाम्पतपन् पास्यम्यस्तरमानुशासति ।। सरस्ववारपटामरथ २१ ५६ सामान्य रूस में अर्थ का भी अन्तषि हो जाता है । शन मे दो बैध होते हैं-उबारगोश तपा अर्याश । इस प्रकार पद का यह अर्प मेने पर अर्थ एक पृपा बामार नहीं रहता, परन्तु बालकारिकों ने इसे पृपक् यापार माना है । अत' इस दशा मे हमें चम्प का वही म्प लेना चाहिए जो अर्म से इसकी पृपक्ता का घोतक हो। यह रूप उमका उच्चारमाश ही हो सकता है। यह पनि सम्प है तया फणं का विषय है। अब इसके विपरीत दुद्धि का विषय है। मासकारिकों ने अर्मकारों से आयार मा विवेचन करते हुए सद तथा अर्थ के इस रूप का उस्लेन नो नहीं किया है परन्तु भाषार क विषय में उनके प्राग अपनाए हुए शम्द तथा अर्थ के पृपासा सम्बन्धी सिमान्त को दसते हुए यही कहा ना सकता है कि उनका यही मर्म गृहीत है और यदि किसी पालंकारिक को यह अर्थ गृहीत नहीं सो उसमा मह मत युक्तिसंगत नहीं कहा जा सकता। मलबार-विमाजन के लिए दाम तया अर्प का उपर्युक्त अर्थ मेने पर यह स्पष्ट है कि मो असकार उभारण-पमस्कार पर आश्रित होता है वह नाकार होता है तया भो मतकार अर्प-चमकार पर बाधित होता है वह अर्यातकार होता है । अतमार-मान का आधार आप्रयापयिमान है।' यो अतकार जिस पर आश्रित होता है वह उसी का असंकार कहा माता है। नद्रभट दम्पन आदि ने इसी माययामयिमाव को असकार मान का मामार माना है। अमनर के श्रापय को जानना था सीमा और स्पष्ट है। यदि हम मसकार-बिशेप के स्पस्न का ज्ञान है तो यह निम्ति है कि हम उसके आधार मा भी भान है। इसका कारण यह है कि नर्मकार के स्वरूप में उमर पापार का स्वरप भी मिला रहसा है। उबहरा पागकार के स्पस्प में उसका बापार चरण-स्वरूप घम्ब विचमाम रहता है। अर्मकार के मामार-शान के इस स्पष्ट सिद्धान्त का निराकरण करने हुए मम्मट ने इसके स्थान पर मध्ययम्पतिरेकमाव की स्थापना की है। "यस्सरचे मरसत्तमम्वय' यदमाये यदमावो व्यतिरेफः" यह अन्य तया पतिरक का लक्षण है। बत' यदि कोई मस्तु किसी वस्तु के रहने पर रहे तमा न १ "मायामपिम्पमेनालापासवरमावस्प सोमदम्पपरमाना सर्वस ११४ रहने पर न रहे तो वह उस अस्प वस्तु पर बाधित हाती है । उदाहरणत दापति के भाव में योगी स्वप्ति होती है । मह अन्वय है । दाम अनि के ममाव में पडेपी उत्पत्ति नहीं होती । यह व्यतिरेक है। इस प्रमार पट का माव दाभादि के मा पर आश्रित है। दफादि पट कारण है तथा पर उनका कार्य है। यसकारों के बावार का गान भी इसी प्रकार होता है। यदि दाम्प विशेप के भाव मे अलेकार या सपा उसके अमार में म रहे हो वह सवार तम मद पर शापित होता है सपा शासकार प्रहलाता है। परन्तु यति पान मा परिवर्तन कर देने पर भी यसकार बना यह तो वह पद पर आश्रित न होकर वर्ष पर माणित होता है तथा बर्यामकार महसाना है।' मम्मर्याद का उपर्युक मप्त उमिन नही। उन्होंने अलंकार कर आधार मानने के लिए एक प्रणाली को अपनाया है। परन्तु मानेकार से पमलारोत्पत्ति की मानसिक दमा मम की साकिब स स मिन्न होती है। उस समय मम चमत्कार की सा स तई की दया को प्राप्त नहीं होता मौर व्यक्ति माम्बम-व्यतिरेक क सर्फ काम भय नहीं मेता । ममुक पसंकार किस पर बापित है यह माम अकार से उत्पन्न धमत्थर मानक काय ही हो जाता है। उसके शमसी कोई विभिन्न प्रक्रिया नही होती । उसके मानो हम उसी प्रमिया का मा मान सकते हैं। अमलातोति के सार पसार का आधार भी पुसा रहता है। अत उस समय हमे यह माम भी हो जाता है कि ममुक मसार किस तत्व पर बास्मत है मयमा इसम सि तत्व की प्रधानता है। अत सम्पयस्यतिरेसमाव अपनाने पो वापरयमता नहीं। मनपथ्यतिरेकमा सिद्धान्त पो मपनाने का प्रमाता तब उठता है पर हमे रिमो धतुरे मापार का निर्णय म करके हेतु मा निर्णय करना हो । उदाहरकत' हम पर को सेते हैं । भटमा आभार मृत्तिका । १ दोगुवासराणा रागन यो विमारा सम्वपापविरमा म्यामेन परियो । तर हि प्रमादिगामाताको मनिपाए मातभावाम पनुविभापिला रागवान पपरपाप्यो। -पाध्यश. ५१८ ५ तपा इसका हेतु दयाननदि है । मृत्तिका के मान के लिए अन्वयम्यतिरेस भाव अपनाने की आवश्यकता नहीं। मृत्तिका तो हम घट मे प्रत्यक्ष दिमाई देती है। यदि हमें पटना शान है तो निमित रूप से यह मी भान है कि घट मृतिका का बना हुआ है अथवा इसका आमार मृत्तिका है । अत इसके शान क लिए हम अन्वयम्पतिरेकभाव को नहीं अपनाते । अम्बपष्य तिरेकभाव को तो हम तमी अपनाते है जब हमे घट के हेतु परमादिमा शान अपचित हो जो हमें भट के माय दृष्टिगोचर नहीं होते। अता के साय भी यही बात है। बसपा के लिए हमें बिस वस्तु के मान की अपेक्षा है वह उनका पामार है हेतु नहीं। अत इसे जानने के लिए अवयव्यतिरेकमाव का अवतमान अपेक्षित नहीं । पपितयन बगनाप के अनुमार मम्वयष्यतिरेकभाव बाभयज्ञान के सिए मनावरया ही नहीं अपितु असमीचीन है । उनके अनुसार इसस मामय का चान नहीं होता । इससे तो केवम हतु का मान होता है और इस हेतु का अपने कार्य से उसी प्रकार का समय है मिस प्रभार का सम्बन्ध भट से दयगदि का है। दरगदि षट के आयय नहीं। वाथय के लिए बावश्यक है कि भाभिस की उसमें सत्ता हो । दयादि में पट की सत्ता महीं। शम सपा अर्प में मातमार की सत्ता रहती है। बत मन्वयष्यतिरेक के प्राय यह पता नहीं लग सकमा कि अमाहार का भाषार पार है यषषा मर्य।' बापमापयिभार का सपन नखे हुए मम्मट तथा उनके अनुयायियों मे मिन तो को उपस्पिस किया है वे भी निमूम है। भग्मटादि कहते है कि यामयावपिभाव एक मस्पष्ट सिद्धान्त है । अब सफ अनदार के पापय को जानने के साधन हमारे पास नहीं होगे तब तक मह कहना कि माया पयिमाप के प्रय अमरपा निर्णय हो जायगा उपित नहीं । आपारमा निर्मप किए बिना फेवतमाम इवमा कह देने से काम नहीं बन सकता कि यो अमहार सम्द पर आभित होगा वह सदासदार होगा सपा यो बर्ष पर आश्रित होगा वह मर्यात पर होगा। ऐसे भसकार पो प्रयया शाम पर मामित हों यपवा जो सर्वमा अर्म पर भापित हों नहीं मिलेंगे । मसदार १ भन्दपम्पतिमा छियायमा पर प्रति हारिवारतुन । प्राय पारगमा पुनस्सास्मिानापीमः ।" -माधार पर का प्रयोगन काव्य मे शोमा अथवा पारता माना होता है। काम्य अर्थ के बस मे होना है। इस प्रकार समस्त पादामेरारों किसी न किसी प्रकार मर्य से सम्बन्ध होगा ही अपामरारों का सो पद से सम्बन्ध होना स्वामा- विक है क्योंकि बिना शम के अर्थ की अभिभ्यक्ति ही नही होगी। मस' मामयामयिमाव के बारम शमालाकार अमिहार बन सकत है तथा अर्यासघर अगसहर बन सकते हैं। अत' अम्वयम्यतिरेकमाष को ही मलधर का आधार मानना उचित होगा। इससे बलधरों के निर्णय में महायता मिमेगो तथा विरोधो को उत्तर दिया जा सकेमा।' हमारे सपर्युक विवचन से स्पष्ट है कि बाधयामिभाव -रा मनारों के मिमय में कोई कस्मिता नहीं भाती । जैसे ही कोई असर अपने पमकार रूप में हमारे सम्मुस माला है हम इस भमरकार रे माघार का मान हो जाता है और हम उस बनधर को उस धामार से सम्बन्धित बलकार रहते हैं। उदाहरणस' यदि हमें असधारविधेप के स्वरूप उपरसरमसार की प्रतोति होती है तो यह स्पष्ट है कि इस प्रतोति का भापार उधरम है तथा यह मतधार सवारण अपवा शमसे सम्बन्धित है। इसे ही हम दादालार कहते हैं। इसी प्रकार प्रतिहार का भी निर्णय हो सकता है । मह ठीक है कि भार भावार सदमा मर्प से सम्बन्ध होता है सपा मामधार का मामार अप तो बिना दो सम्पब म होने के कारण से भनिफार्मत सम्पम्मित होता है। परन्तु इसका यह बर्ष महो नि हम वर्ष तपास का भी फमशा पादास्तधार सपा ममियरमापार मान लें। बापार के लिए भावरमक है कि यह घमवार-प्रतीनि रामा होना चाहिए। उपर्युक्त मसाये की पमस्पर प्रतीति में मर्ष सपा के धाम मह बात नहीं। मा ये इन समधारों के माधार महीं हे मा सकते। १ बरमदान बैंगलमा सवांसार शाक नामपरानोपाय पति पाविविविधनिरामयसम्पनिको सिनामुम्पोभरि मासपिनु म चम्पो पति वाम्यासाइपिया वापर काम्पसम 1 "ति म्यानस्य।
शब्दार्णकारकोटि में भाने वाले मसकार बलबागें के आधारभूत शब्द तथा वर्ष का पूर्व-निर्दिष्ट स्वरूम निश्मिन हो पाने पर तथा इस आधार को जानने की प्रक्रिया सात हो पाने पर बव हमें यह देखना है कि राम पर आधारित शम्दालगारों के अन्तर्गत कौन कौन से बार बाते है जिससे उन बसकारों के मूल में साम्प का विवेचन हो सके। बामरिकों ने शम्यमनारों के अन्तर्गत प्राय अनुप्रास पमक, बलेप, वक्रोक्ति आदि की गयमा की है। परन्तु पूर्वनिर्दिष्ट सिटाम्तों के अनुसार प्रतीत होगा कि रसेप, वक्रोक्ति आदि को सम्दानगरकोटि में रममा उपिस नहीं। रनेप अमकार के दो मेव माने गए है–समारलेप तपा अमगारमेप। पहले मे पदमङ्ग होता है तथा परण के प्रयम मे भेद होता है। दूसरे में पवमङ्ग नहीं होता तपा उबारम के प्रयास मे भेद महीं होना। ये दोनों रसेप पूर्वनिर्दिष्ट मापार के अनुसार अर्यातदारकोटि में बसे पाते है। धमगरलेप को तो मम्वामघर के मन्तर्गस मामने का प्रम ही नहीं उमा । इसमें पदभजन होने के कारण शरद एक रहता है और नगरण में प्रयन्त्रमेव नहीं होता । इसे स्म्यक ने एक वृन्त के समान कहा है जिसमें दो फम मगे हों।' ये फस मर्प के रूप में होते है। इन दोनों भषों की प्रतीति इसी एक पन से होती है। अत यह अर्यप्रतीति ही चमत्कार का आमार , "मतम पूर्वमान्तगतलायम्पारेनाइयरय सम्दे पिस्वम्" । -सर्वस्व पर ११। २ कुछ गिन् का नवे हैं कि 'प्रो राममे। मामक विशात के अनुसार उपयुक्त पवा में भी दो शम्द है। परन्तु यह फन एपित नही, पोषि पहा तक चारण का प्रमापामो वचारों में शप्प एकही दवा है। गरि प्रमद शम्पमेद सिमाव को माने तब ता बिरामी अब सेय में मो शम्दॉग और पा शम्दाशार न पाएगा | मतमा परमाया मही मत है प्रदे शलभदः इति रनि रनवरसमिम्पादासी सम्मापाभिवाst तपाबपतिमा सम्ममैदस्य प्रतीतायाव्याप्यवसातामावि सम्मम।। -सपस १९४1 - है। कारण यह है कि एक पद से प्राय एक मर्म निकला करता है। परन्तु उपर्युक दशा में उससे दो या अधिक धर्य निकलते हैं। मत इस दशा में धर्म का धमत्तारोत्पादक होना स्वामाविक है । अर्थ में धमतारो- साकद होने के कारण यह वर्षातकार है। यहो यह प्रश्न उठ सकता है कि उपर्युक्त दशा म भर्यों की प्रतीति माम्य के कारण ही हम्सी है। मत इसे शम्दालकार क्यों न मान लिया बाए । इसका उत्तर यह है कि श के द्वारा अप प्रतीति मलकार को मनालकार महीं बनासी । शासकार सो नहीं माना जा सकता है वही उधरपल्प शम बलकार-अन्य पमकार का पावरपक अंग हो । उपर्युक वचा में ऐसी भात महीं। अत यह सवालकार नहीं माना जा सकता। दूसरे यदि बाद के मर्यप्रत्यायकत्व को ही मालकार का मागार माना माता है धन तो समस्त मर्मासंगार पानामगार में परिवर्तित हो जाएंगे पोंकि उनमें मर्म का ग्रन पायों के द्वारा ही होता है और इस प्रकार वर्गासकारों का सर्वमा लोहो आएगा। रमेप पी दया मे व्यवहार में प्राय हम यह कह देत है कि यहाँ सम्म पमस्कार है । परन्सु विचार करने पर प्रतीत होगा कि इस शर धमलार से हमारा तात्पर्य यस्तुत अर्थ पमसार से हो होता है। अब हम " परभर' इस पद का प्रयोग करते हैं तब प्रश्न उठता है कि यह चमत्तार किस रूप में होता है। इसका उत्तर यही है कि यह अरूप मे होना है। सम्म से भी दो या मधिन अब निकलते ही पसार मा साधारण करते हैं । इस प्रकार शम्द-समसार का पर्यवसान अर्थ पमसार में ही भगरलेप में पम्प-ममतार होता मयस्य है परम्नु प्रमानता मपं पमस्कार की होती है। यही पारस है जिसमट बा िमे हम शम्बरलेप महार मी मलिकार माना है। मग्मट में इस पर दमट मादि की मालोचना की है। यह इस प्रकार है- गरिमितीयप (प्रभास) अपि प्रतिनिनिमित रानमेवा' इति नये यसाचिया परम् रमात्र स्नाी परवास्ति । मत एप प्रभास पदापारिवानापन म मुगान् । प्रत्पपा पनि निरी मामिमनोऽऽपि राम्दानद्वार एक स्पात् ।-रगदापर पर,५९७१ .
६२ 'शरसेप इति पोम्पते अतिकारमध्ये प सक्यते इति कोऽयं मया। -काव्य प्रकारा पृ० ५२७ मम्मटात यह बानोपना उचित नहीं । सम्परमेप सपा अपरसेप में रसेप के विभाजन का कवन इतना ही तात्पर्य है कि इनमें बांशिक भेद है इससे यह तात्पर्य नहीं कि ये शमगतकार तथा अर्यासकार पी विभिन्न कोटियों में आते हैं । दोनों का यह बांभिक मेद स्पष्ट है। बभगरनेप में तो देवम एक ही सा होता है परन्तु मंगरलेप में पदभग के पारस दो अन्य मनते हैं। इनके उपरण में भी प्रपनमेट होता है। ये दोनों एक मम्प में शिष्ट हो जाते हैं । इम इस लिष्टत को सम्यक ने बतुकापाय को संज्ञा दी है। इस शम्ममेव के होने पर भी चमत्कार सर्प के कारण ही होता है। बस इसे अर्यासकार के अन्तगत रसना उपिस होगा। मग तक हमने श्लेप बलकार के पाधारका निरूपण आप्रयापयिभान मनुमार किया है तपा इसका भाषार अर्प निमित करके इस अत्तकार को मासकारकोटि में रखा है। अब हम इसके आधार का निरूपण भषयम्पप्तिकमाय के शारा करते है तथा यह देखते है कि इस दृष्टि से यह असरार किस कोटि में आता है। यधपि अध्ययभ्यतिरेकमान का भवसमान अमरार के मापारमान के लिए मावस्यक नहीं परन्तु मम्मटान्द में अलंकारों के निर्माण के लिए यही सिदान्त अपनाया है सपा इसके भनुमार श्लेप को पदालगार कोटि में रखा है।बत हमे मह देखना है कि इस सिद्धान्त को अपना कर किया हुमा मम्मयादि का निमय ठीक है या नहीं। अन्वयम्पतिरेक के सिद्धान्त को अपमा कर मम्मट में दाम रसेप के भो उदाहरण प्रस्तुत किए है उनमे से एक निमतिक्षित है:- "वसंगर शशारतरकपान परिजनो विसी गो भूमी यस एप एफो घटुरमा । अवस्थेय म्यागोरपि मबति सवामरगुगे- विर्मा पके मूनि सितवनि वयं के पुनरमी ।।' - अपरम बरारन्यापन सम्मेष शम्दा प्राम' ६३ मम्मट के अनुसार महो "विषो में सदरमैप है। विचो के दो अर्थ ई-पन्द्र' समा 'भागमे । ये दो मर्म समी तक है जब तक यहाँ विषो' सर है।असे ही इस शम के स्थान पर हम इसके पर्यायवापी बन्ने प्रया 'माग्पे' मे से किसी एर शको रस है उपर्युक्त दो अर्मो म से एक अम का मोर हो जाता है मौर फरस रमपालसर मष्ट हो जाता है। इस प्रकार 'वियो' पान के समाप की दमा मे रमपमा समाव होने से तया इस मन के ममाव में रसेप का अभाव होने से मम्मट कहते हैं कि यह अनेकार शब पर आश्रित है। मत भन्दालंकार है। मम्मट पामह सई युक्तिमगत महीं क्योंकि इस तर्क को अपनाकर तो इतन हो औमित्य क साप इसे निमरीति से भासकार मी सिद्ध किया जा सकता है उपर्युक्त शोक में अर्यदय के समाव की दशा में रमेप का सदमाव रहता है सपा इस मर्पदय के प्रभाव में रमेप का समाव हो जाता है । अत यह निष्कर्ष निकता कि मध्य भयका एक प्रकार से सर्व ही रसप का आधार है। बत मह ममासंपर है। विरोपी यहाँ यह कह सकते है कि यह पस्तुत 'विपी' मा समाव तमा अपभाष ही है जो अन्य के प्रमश सबभान सभा बसमाप का कारण बनता है। परम्सु अन्ततोगत्वा है तो यह अश्य का सदपार समा असदभार ही जो रमपामकार का सीमा निस यक बनता है। दूसरे उपर्युक उदाहरण म तरे 'वियो' शब क परिपर्सन से मस कामभाव हो जाता है, परन्तु प्रस्पफ पया में एसा हाना मावश्यक नहीं। कमी कमी किसी पारद के स्थान पर ऐसा पर्यायवाची उम्प भी मिल सकता है जिसके वे ही दो वर्ष मिस्से । मन शम के परिवर्तन पर मय के समाप को हम सामान्य सिद्धान्त नहीं मना सकते । वस्तुन रसेप को निर्मापक रूम समयसकार भी मान्य मा साता पर मर्मस्य के रहते हुए भी केवलमात्र पान्द क परिवर्तन से सप पर मोर हो गए। हमारी इस माम्पता का आधार यह है कि हमारे सम्मुस रसेपर दो सम्भावित कारण है-म या मर्म मौर इनमें से किसी एक का हमें निर्णय करमा है। यहां किसी वस्तु के दो सम्भावित कार? म से हमें किसी एक का निर्मय करना हो मार हम मम्मयष्यतिरे कमाव को मनाए तो इनकी विस प्रक्रिया यही है कि हम इन दो कारणो मे से एक का तो रहने दें तया सस एक को हटाए मोर तब देखें लिस 'राम्रसेप इति पोम्पसे अलंकारमध्ये प सक्पते इति कोऽयं मय।' चाव्य प्रकाश पृ० ५२७ मम्मटकृत यह आलोग्ना उचित नहीं । समरलेप तथा अर्थरसेप में रमेप के विमानन का कवत इतना ही तात्पर्य है कि इनमें ओशिव भेद है इससे यह तात्पर्य नहीं कि ये शमासकार तथा प्रतिकार की विभिन्न मोटियों में बाते है । दोनों का यह मांशिक भेष स्पट है। अमंगरमेप में तो केवल एक ही मान्य होता है परनु समगरमेप में पदमंग के कारण दो पम्न मनते हैं। इनके उपरस में भी प्रयममेव होता है। ये दोनों एक शब्द में विष्ट हो जाते हैं। इनके इस शिष्टस्य को सम्यक मे जतुकान्याय को संज्ञा दी है। इस शम्यमेप से होने पर भी पमत्तार मर्य के कारण हो होता है । अतः इसे मसिकार के अन्तर्गत रसना उचित होगा। यव तक हमने रोप यसकार के आमार का निरूपण बापयायपिभाष के अनुसार किया है समा इसका भापार अर्म निश्चित करके इस असमर को असिमारपोटि में रमा है। अब हम इसके बापार का निम्मय अश्वसम्मतिरेकमाव के प्राग करते है सपा यह देखते है कि इस दृष्टि से यह असार किस कोटि में बाता है। यद्यपि अन्वयम्मतिरेकभाव का यवसम्म यसकार के मायारमान के लिए वापरयक महीं, परन्तु मम्मावि ने अमगारों के निर्धारण के लिए यही मिगम्त अपनाया है तपा इसके अनुमार श्मेप को शम्दाकार कोटि में रसा है।बत हमें यह रेमना। कि इस मिदान्त को अपना कर किया हुआ मम्मटार का निणय ठीक है या नहीं। सम्पयव्यतिरेप के सिद्धान्त को अपना कर मम्मट में घन रलेप के गो उदाहरण प्रस्तुत पिए हैं उनमें से एक निम्मतिक्षित है- "असंकार वापरनरमपान परिजनो विनीगांगो मुंगी यमुपप एको बहुपया । अवस्य म्यागोरपि मपति सामग्गुरो-- विपी यो मूनि सितानि वर्ष के पुनरमी ।' १ अप बकाम्यापेन स्वपमेष पदमो ARTH --सर्वस पृ. ११४ वियो' शन मम्मट के अनुसार यहां 'वियो में शम्बरलेप है। विवौ के दो वर्ष है-'पन्हें समा 'भाग्ये । ये दो मर्म तमो तक है मन तक यहाँ वियो' सा है। से ही इस शब्द के स्थान पर हम इसके पर्यायवाची 'मन्द्रे ययवा 'भाग्मे मे से किसी एक धन को रमते हैं उपर्युक्त दो अर्यो मे से एक वर्ष का लोर हो जाता है और फलत श्लेपासकार नष्ट हो आता है। इस प्रकार समाव को दशा में रखेप मा सदभाव होने से सपा इस घर के अमाव मे रखेप का अभाव होने मम्मट रहते हैं कि यह मकार पाम पर आमित है। अस पागलंकार है। मम्मट पा यह तर्क युक्ति नहीं क्योंकि इस तर्क को अपनाकर सो इतने ही मोमिन्य रे साम इसे निम्नरीति से सातकार भी सिय किया जा सकता है -उपर्युक्त सोक में अर्थहय के सदमाव की दशा रलेप का सदभाव रहता है तपा इस मर्मय के मभाव मे श्लेप का अभाव हो पाता है । अत यह निष्कर्ष निकमा कि मध्य मपवा एक प्रकार से वर्ष ही रखेप का आधार है । बत यह सिंगार है। विरोधो यहां यह कह सकते हैं कि यह वस्तुन 'विषो' भय का सदभाव समा असदमाव ही है जो अदय रे फमम सदभाव सपा असदभाव का कारण बनता है। परन्तु अन्ततोगत्या है सो यह अर्थप का सदभाव तथा असदभाव ही वो श्लेपालकार का सीया निण यक बनता है। दूसरे उपर्युक्त उदाहरण में दो 'वियो' पादक परिवर्तन से अद्वय का मभाव हो पाता है, परन्तु प्रत्येक बधा में ऐसा होना भावरपर महीं। हमें कमी कमी किसी के स्थान पर एसा पर्यायवाची शब्द भी मिल सकता है जिसके वे ही दो मर्म निकलें । मत शम्द में परिवर्तन पर मद्रय के ममान को हम सामान्य सियन्त नहीं बना सकते । बस्तुत रमेप को निर्णायक स से पम्पलकार तभी माना जा सकता है गर मय के रहते हुए भी मेवममात्र शम्द क परिवर्तन से रसेप पर मोम हो जाए। हमारी इस माम्पता मा आमार यह है कि हमारे सम्मुख रमेपरे दो सम्भावित पारण है-गद तथा बर्ष मोर इममें स किसी एक का हमे निर्णय करना है। वहां किसी वस्तु के दो सम्मानित , परमों मे से हमें किसी एप का निर्णय करना हो और हम मन्वयष्यसिरे कमाव को मपनाए तो इसकी उमित प्रक्रिया यही है कि हम हम दोषारणो में से एक को तो रहन दें तया देवत एक को हटाए मौर तर दखें कि उस वस्तु का सोप होता है या नहीं। मवि इस प्रकार उस पस्तु का मोर हो माए तभी हम कह सकते हैं कि हटा (षा कारण उस वस्तु मा यमा मारण है। गहरणत सुगन्ध के लिए हम पुष्प तपा पन इन दो सम्भावित कारणों को लेते हैं और इसके लिए अस्वयम्यतिरेकमान के सिद्धान्त को अपनाते है। इसको अपनाने की उचित प्रसासी यही है कि हम पुष्प तथा पत्र में से एक को रहने दें सपा अन्य को हटा लें और सब देखें कि सुगम्ब बनी रहती है या नहीं। हमे ज्ञात होगा कि पुष्प के हटाने पर पत्रक रहते हुए भी सुगम्ब मा सोर हो जाता है। तमी हम कहते हैं कि सुगन्ध का कारण पुष्प है। मेपानमार के निर्णय के लिए भी मम्मट को सम्वम ध्यतिरेकभाग का प्रयोग इसी स में करना चाहिए और उसे शय्बालार तमी कहना पाहिए मव अनुप क रहते हुए भी सब के परिवर्तनमान से स्नेप का सपन हो गाए । परन्तु रखप में ऐसा नहीं होता । मव' अन्वयव्यतिरेकमाष द्वारा भी कम से कम यह तो सिद्ध नहीं होता कि रमेप पाम्बासमार है। वकोक्ति भी इस आगार के अनुसार अर्यालकार के अन्तर्गत बाती है। वकोक्ति से यहां हमारा अभिप्राय संकुषित वक्रोक्ति यसकार स है, मामह तपा फुस्तक की प्यारक पक्रोक्ति से नहीं। यह तो सब पता की तथा काष्प की मूम है । इस पक्रोक्ति अर्मकार के दो भेद है-रमेप वक्रोक्ति तपा काकु वक्रोक्ति।' मम्मटावि ने इसे शन्धनकार के अन्तर्गत रखा है, परन्तु यह उपित महीं । रनेप बसिकार है । बत उस पर बापारिस वक्रोक्ति भी प्रयासकार ही होगी। काफ-वोक्ति मे भी अर्पतत्त्व का पमवार होता है। मत यह भी मसिकार के अन्तर्गत पाएगी। भनेक मासकारिकों ने पिन को भी शनाकार माना है। परन्तु इथे धर्मकारपोटि के अमर्गत रमना हा उचित नहीं । मित्र मय का अंग हो महो मन सकता। काम्य में राम तपा धर्म तरम होते है। इनमें सन स्थत साध्य न होकर सारनमात्र होता है और उसपा साम्य मर्य को सम्पन् प्रतीति क्यना होता है । परम्सु नव सम स्मत साध्य बन जाता है तो १ 'पदुम्मन्पपा पम्पमन्पपाम्पेन पोम्पते । लेय का पापा कोकिस्तपा दिया।' -अम्मा १.५ वह अयं से असमबहो मावा है और काम्य का अंग नहीं रहता। चित्र मे भी यही बात है । इसमे पामों का फेवस लिलबार होता है। उससे वर्ष का कोई उपकार नहीं होता। पुनवक्तपदासास को अनेर मानेमरियों न शालेकार न ममर्गत रसा है। परन्तु यह उचित नहीं । इस अनेकार म धमलार समान मर्य। जामाम पर मामित होता है। इसम न तो सदों को पुनशक्ति होती है और न मर्प दी पुनरुक्ति कंवल अर्मपुनरुक्ति का माभास होता है। अत यह मर्मसार शन्न पर आस्थित नहीं कहा जा सकता । अन्वयष्यतिरेकमाव को जनकार का मामार मानने वाम आनकारिकों ने इसे उभयालकार कहना नमित समझा है, परन्तु पम्वैपिश्य की उत्कटता कारण अथवा प्राचीन मतों के अनुरोम से इस मामगार के अन्तर्गत रखा है। मग्मट सया विश्वनाममा यही मत है।' इसस स्पष्ट है कि मम्वयम्पतिरेकमाव के अनुमार भी पुनरुतवरमास मे मर्मसत्य के समसार को सता है। परन्तु वे इसमे राम का भी नमस्कार मानते हैं। विचार करने पर प्रतीत होगा कि उनका मह निधार सदोष है । महाँ तक शारों के उधरण का प्रश्न है सनम म तो किसी प्रकार की पुनरुक्ति है और न किसी प्रकार का धमतार है। पुनरुक्ति बसवा पमस्कार की प्रतोति हमें तमी होती है मन हम अर्थ पर विचार करते हैं। मह कहना कि वर्ष की यह पुनरुक्ति सनों के कारण होनी है कोई धर्म नहीं रसता क्योंकि इस प्रकार तो समस्त मर्यमा पमसार दामों पर होने से समस्त ममिकार शम्बलकार बन जाएंगे। १ पुनरपामा चिनियाभरसम्दा एकपनि । नाम्पाय. १२२ २ एवं ए सपा पुनरबदामासा परम्परिवार पोमपोवामानित क्विा ठमपी-प्रभा . ०६८ एवम उतभर लाई-"प्रत १५ एपिशाया पुमाकदा सदासंघरमप्पे गपिवा" पाप मारा. "रादापालपरस्पापि पुनरकर मासप सिना पदासम्म सदिमाया प्रथम मेयर'-मालिया प.१९॥
रम्पक ने पुनरुतबदामास का कारण अपंपोनत्य माना है। इस प्रकार यह अपत्तिकार के अन्तर्गत आना चाहिए । मोब ने शामरारों की संस्था २४ तक पहुंचा दी है। इन्होंने माति, गति, छाया, मुद्रा मादि अनेक सम्बालंकार माने हैं। इस विषय में से एक भिन्न परमय का अनुसरण करते हुए प्रतीत होते हैं । नन्हें संस्कत के मान्य बालकारिकों का समर्थन प्राप्त नहीं और न उपर्युक्त अनपायें के दादा- संकार मानने का कोई उचित आपार ही निखाई देता है। इस प्रकार श्यनुप्रास, वृस्पनुपास माटानुप्रास तथा यमक शालार के अन्तर्गत रह जाते है । कुछ माषकारिकों मे छेकानुप्रास सपा प्रत्यनुप्रास को दो भेव माना है। कतिपय यामकारिक साटानुप्रास को भी अनुप्रास के मन्तगत मानते हैं। मामह ने मायनुप्रास को अनुप्रास के अन्तर्गत रसा है। उमट मे तीनों को भिन्न भिन्न मामा है। मम्मट ने साटानुप्रास का तो मिल माना है परन्तु घेकामुप्रास तथा वृत्त्यनुप्रास को अनुप्रास के मन्तर्गत रखा है। उम्पक तीनों को भिन्न भिन्न मानते है। विश्वमाम ने इस विषय में मम्मट का अनुसरण किया है, परन्तु उन्होंने अनुपास श्रुत्पनुप्रास तथा अन्स्पानुपास नामक दो भेद और किए हैं। इसमे मम्मट सपा विनाय का मस समीचीन है। मानुपाम तथा मृत्यनुप्रास पानों में केवल शम्ब (वर्णादि ) सारय होता है । अत उन्हें एक मतकार के पो मेद मानमा सपित होया । साटानुप्रास मे सम्बसाइरस + मतिरिक्त मर्पसादृश्य भी होता है । अतः इसे भिन्न मलकार मानना उभित होगा। १ अर्बपीनरच्यादेषामितावाद पालघरोऽयम्' पप पू. १५ २ पतुरियतिरिस्युका सम्दातंभर वाम । अपनर सोदाहरसमुप्यते ।।" सस्पती करायमरण २५ ३ "सायपाप्मनुमामिोजन्सपरे सपा ।" अम्पालभर २८ ४ लिए काम्पासकारखरसह १.३ से १. ५.लिए प्रम्प प्रकारा पु. ४६४-८ रेसिए बस्व ०४,५,८ .देसिए सहिस्पदर्पण.४५.. रे मूल में "शम्दालंकारों के मूल में साहस्य" इन समस्त प्रमालंकारों के मन में सादृश्य है । अनुपास वर्णादि का सादृश्य है । लाटानुपात के मूल में पदसादृश्य तप अर्थ सादृरय दोनों विद्यमान है। यमन में स्वरव्य जनसमुदाय का तो महरय होता है परन्तु वर्थ मे भेद होता है। पालकारिकों ने प्रार' आवृत्ति को गम्दालंकार मा मूल माना है । सम्यक् मे इसी आवृत्ति के आधार पर गन्दा संकारों के तीन आधार पसाए - पौनलत्य, अर्थपौनरम्य सपा पाम्दार्यपौनरुत्य ।' यह आवृत्ति समा मादृश्य मिन्न सत्त्व नहीं । हम मावृत्ति को सादृरप म मन्तभूत कर सकते हैं। अनुप्रास मे ध्यशों की अथवा म्प जनों एवं म्बरों की आवृप्ति होती है । यदि केवस व्यवनों की बावृत्ति होती है तो सगेम भेट होगा । इस प्रकार पक्षों की दृष्टि से अमेद तया स्वयें की दृष्टि से भेव प्रतीत होगा। ये दोनों भेद एवं ममेव मिलकर सादृश्य की प्रतीति कराएंगे। यदि पवन तथा स्वर दोनों की आवृत्ति होती है तो पाए रे वय वर्णो की दृष्टि स मे प्रतीत होगा। ये दोनों यमे तपा भेद मिलकर पूर्ववत् सादृश्यप्रतीति कराएंगे। इस प्रकार प्यमों सपा स्वयें की यावृत्ति भमे ही हो यह उपरण में सादृश्य की प्रतीति ही है दो पमतार का कारण है। साटानुप्रास में अभेद के दो तत्व होने हैं । ये पप्पोनरस्प तया अर्पपीनस्मस्प है । इसम भेद का एक सस्व होता है । यह तात्पयमेद है। धामपौनरम कपारण उपारम म सादृश्य की प्रतीप्ति होती है। अर्थ पौनरस्य तथा तात्पर्यभेद के कारण अर्थ में सादृश्य को प्रनोति होती है । इस प्रकार पाटाउप्राम में सादृश्य सपा मर्यसादृश्य दोनों विद्यमान है। समर में स्वर सपा पलम समुदाय की उसी कम से आवृत्ति होती है। यह आवृत्ति उपरण में सादृरयप्रतीति कामारण है। इस मसंगार १ सानप रामपोनसपर्य रादापोनर ऐति या पीतापप माय" में उचरण की सादृश्यप्रतीति के अतिरिक्त एक और तल की मावस्यकता है और वह है बावृस स्वरम्पयनसमुदाय में अमिद । इस प्रकार चारण-साम्य सब शब्दालंकारों का सामान्य तस है। सादामुप्रास तथा यमप में एक एक और मम्प तत्व होता है। साटा प्राप्त में वर्षमाम्य होता है तथा यमक में वर्षपम्य होता है। अनुमास में ग्यारव तथा अर्थ का सारश्य प्रापश्यक' अनुप्रास में उपरण-साम्य पो होता ही है, मलकार होने के माते इसमें एक और तत्व की आवश्यकता है। यह है इस उचरण का अर्थानुल्म होना । इसे हम उम्पारण तथा अर्थ का सादृरय कह सकते हैं । उपरण तमा अर्थ में घनिष्ठ सादृश्य होता है। यदि मर्ष माधुर्यपूर्ण है तो आवरया है कि वर्णो का उपरण भी कोममतापूर्ण हो । यदि अर्म मोम पूर्ण है दो वर्गों का मी कठोर होमा मावश्यक है। संगीत के उदाहरण से यह बात स्पष्ट हो पाएगी । संगीत में भावों की प्रधानता होती है। इस माव का मान वर्यज्ञान से सतना नहीं होता जितना वर्गों के स्वमाव तपा मय से होता है। हम अपरिचित माण के भी संगीत को सुनकर उसके भाव को गो समाप्त मेते है उसका कारण वर्षों सा स्वभाव तपा मय ही है। गर्यो तया अर्थ का यह सादृश्य भवभूति की निम पंक्ति से स्पष्ट हो जाएगा 'मयावपि कठोराणि मृानि मुसुमापि' पहा कठोरता तपा मोमसता के दो भान हैं और उन्ही के अनुसार कठोर सपा कोमल पों का विमान किया गया है। वर्मो तपा अर्थ का यह सादृश्य मिर्पिगार है। पतिपय वर्ण स्वार मे कोमल होते हैं तथा कतिपय स्वभाव से कठोर होते हैं। भारतीय सपा पाभारय सभी विद्वानों ने इस स्वीकार किया है।' वर्णो तपा अर्म के इस सादृरय को ममिमय मे वणवमि रहा है। कुम्नक ने इसे वर्स-वक्रता महा है तपा क्षेमेन्द्र म वोचिरप कहा है। - १ मानम ने बयों के इसी स्वभाव प्रापार पर लो एमप्पुन तया mar नामा दो मे किए हैं। रस-ममय में इसका विरकन हाजा।
अनकारशास्त्र में मनुपासमातियों अथवा वृत्तियों का विधान इसी
पर्णवमि पर आश्रित है।' मम्मट ने इस पणम्पनि को मृत्यनुप्रास का
अमितव ने सन्दम सपा निर्वास नामक दो मागों में बयो प्रविमान
किया :-
अन्रैरपि बद 'नि गर्णा रसपुर ' इत्यादि । समाबतो हिन पो
सन्दापयम्ती। आम्मे । तीच उपनागरिकोधिवा । लोगोपर
पवावमयः । तहिसराम...
समाप शिानों ने मौ क्यों दमा अपरे इस पोस्वोर किया है।
भरत पोप प्रादि में प्रमुख -
It is a general result of there con idorations
that if a tender subject is expressed in barab loogange
or & barb subject in tender language thero B &
certain loss of porsunuiveness a Rhetoric
-~-साहिस्सा.स.पू. ११०
* It u not cnough ao harakacas given offence,
The pound munt roem an echo of ronse
Lasag an criticism
-साहित्य वि. स. पृ. १२८
१ मम्मट अनुसार चिनिपतगत रक्यि मापार ।
पनियतपयतो रसविषपाम्पाय धि'-अम्पमा पु.सि को
पर परिमाणको पब रसके वारयको पर रोक।मम्मट ने धि नपा
गरिका, पाव कपा क्रममा नामा तीन भेद के माध्मया मापुर्षम्मक,
मोरोस या नोरिल पपयों से सम्म्प दिलाया।
-पापप्रकाश पृ.४४.
मान ने मीधिको तापित राम्दम्पपहार पा। उनका कपन
"
-
"जपनुगुणापेन पबहाद।
चौभियान समता Amlaer mr ny mami।।..
मूस माना है। परन्तु विचार करने पर प्रतीत होगा कि कामुप्रास में भी यह अपतित है। अनुप्रास का अर्य मग्मट ने 'रसायनुगत प्राप्टो न्यास' किया है।'यत इसमें वर्णविघाम प्रकृत रस के अनुसूस होना चाहिए। इसी मी व्यास्पा करते ए वामनाचार्य कहते हैं- 'तथा च अतिव्यवहिसस्तेम पमक्षस्प पापिका प्रस्तरसम्पयन्सस पर्यावृत्तिरनुप्रास इति फलितम् । प्रकृसरसप्रतिमऽपि बनुप्रास व्यवहारो भाक्त एव ।' काम्य प्रकाश टीका पृ० इससे स्पष्ट है कि प्रातरस से प्रतिकूल पर्ससाम्य में अनुप्रास घर का म्यवहार केवल गौण म्प से होता है । कानुप्रास अनुप्राम का एक मे है । अत अनुप्रास की सामान्य परिभाषा उस पर भी लागू होती है। घेकानुप्रास तथा वृत्पनुप्रास में कोई विशेप भेद भी नहीं । मनुप्रास को वर्णसाम्य मामा गया है। उसका भेव येकानुप्रास अनेक वर्गों की एक मार यावृत्ति कहा गया है तथा वृत्त्यनुप्रास एक अथवा अनेक वर्णो की भनेक बार बागृत्ति बहा गया है । बत एष अपवा अनेक गों की आवृत्ति के मूल में यदि रसोषितवरमय्यवहार अपवा वर्णवनि है तो यह कैसे हो सकता है कि अनेक वर्गों की एक बार आवृत्ति में उसकी कोई अपेक्षा न हो। 'म्पपहारो हि प्रतिनियुप्पते । तब रसामुगुण पौषित्वान् बाप्पाभने यो म्पहारस्वा पता शिल्पाचा वृत्तपः । पापमपामोपमागरिमणा'। पन्यासोप...१ अभिनव ने मी पति परणा, उपनागरिका एवं पसा मामा मेद करके उनका रस से समय दिलाया नागरिकमा उपमिता अनुप्रासति गंगारा बिमाम्पति । परमेषु पारिषु । कोमला हास्पा तथा तय सम्पमातर' इति मुक्त मनिना परसोषित व पाविरोष ति। साहिस्पराम.स. २१॥ १ऐलिए काम्पप्रमश.. २ काग्यप्रकारा पृ. ४६५ १ कप कार्य परस्पान्यापर काम्प प्रभय पृ.४६६ १ जहाँ तक इन दोनों मेदो के मूल का प्रश्न है, उभारण-सादृश्य इनके मूल में विद्यमान है। परन्तु केवप्त उपारण-सादृश्य काव्य का अंग नहीं बन सकता । उस रण ठादृश्य का फेवम शन्दों से सम्बन्ध होता है। परन्तु काव्य के सिए शम्दतस्व सया अर्यतस्व दोनों की आवश्यकता है । अर्प से असम्बद शब्द कोई अर्थ नहीं रखता । बत अर्थ से बसम्पद धारण सादृश्य का मी काव्य मे कोई मूल्य नहीं । शए की इसी अर्थानुसता का ध्यान रबर भामह मे काव्य की परिमापा 'सन्दापी सहितो पाम्पम्" की है । पगितराम नगन्नाम को भी विन्होंने काय की परिभाषा में धम पर बल दिया है 'रमणीयार्यप्र सपादक शम्ब काम्यम्" कहार चन्द का अर्थ से सम्बन्ध जोडना पग। यत केवल शब्दषमत्कार माम्प मा अंग नहीं बन सकता। लाटानुप्रास सपा सार्या आवृत्ति वाले यमक मे तो कुछ अंशों मे उभरम-साहस्य की इस रसानुस्मता की उपचा की जा सकती है परन्तु मर्महीन उभारण-सादृरप वामे घेकानुप्रासादि मे ऐसा सम्भव नही । लाटानु प्रास तथा सार्थक बावृत्ति बामे यमन में अर्थतत्व भी होता है । पहम म तसर्पभेद के साम बर्षसादृश्य होता है तथा दूसरे मे अपवैषम्य होता है। अत यह उपरण-सादृश्य वर्ष का उपकारक बन जाता है और ये दोनों मसार मणध्वनि के ममाव मे भी असार बने रहते हैं परन्तु एकानु प्रासादि में ऐसी यात नहीं। ध्वनिवादियों का पम है कि मानालसा असार की परिभाषा का मावश्यक मानहीं। उनके मनुसार अतार काष्य का नियमित रूप से उपकार नहीं करते। भी कमी ये काष्य का उपकार करते हैं सपा कमी कमी नहीं भी करते। ये बसहारको नाम्य का एक बाहिरी उपारण मानते है जो काथ्या उपकार पर भी सकता है मौर कभी कमी नहीं भी करता । पाम्य कर यह उपकार बससरपी मनुष्मता पर निर्भर पसा है। मनुकूलता को ये एक मिन सत्य मानते हैं । यह मसार के मन्तर्गत महीं माता । इसीलिए इन मोर्गो मे मसमारों की तुममा मौकिन माभूपों से १ ममहासकार १।१५ १ रांगाधर प.४ की है जो औचिस्प का ध्यान रसकर सर से मोरे जाते है। मम्मट आर का यही मस है।' पनिवादियों का यह कपन समित नहीं। नाम्प के असतायें की हार आदि से तुलना ठीक नहीं । हार एक नाम आभूपस्य है। इसकी सत्ता काठ से पृपक है । यह कराठ के सम्पर्क में भाकर कराठ की शोभा बढ़ाता है और उसमे माय सरीरी मी शोमा खासा है। माम्य के यसकारों के साय यह मात मागू नहीं होती। अलमारों की सत्ता पाद सपा अर्थ से मिन्न नहीं । रामसपा अर्थ ही अनारों के सरप है मौर इसी बप में वे प्रस्ट होते हैं । यनि अमकारों की सत्ता शम्य तपा अर्ष से पृपा हो तभी हम हारावि माम आभूपझो से सनकी सुममा कर सकते हैं । परम्सु ऐसी बात नहीं । बलकार काम्य मे बापर युग्ते महीं हैं अपितु अलधार के रूप में ही काम्य की अभिव्यक्ति होती है । इसीलिए पुस्तक का पपन है- 'तेनालक्तस्य काम्यस्ममिति स्थिति म पुन बाप्पस्मानारयोग "। पदि ऐसी बात है तो यह प्रम ही नहीं उठता कि अप्लायर काष्य का नियमित रूप से उपकार करते है अथवा नहीं। यह प्रश्न तो तभी उठता है पर असार फाम्य से भिन्न कोई वस्तु हो । काव्य का स्वरूप शम तथा म । मोर इसी म मे यसबार मी अभिष्यति होती है। यह एक विचित्र मात है कि अस धार अलकार होते हुए काम्प को असक्त नहीं करता । इससे तो अच्छा होगा कि हम उसे असार पी येणी में ही न रखें। केवल स्पूस परिमापा ही सो असार महीं है । उसक सिए सामाम्म तत्त्व वास्ता तपा विधित्ति की मावस्मरता है । प्राय सभी माप्तद्वारिकों मे बमधर के असहाराव के सिए इस पास्ता को स्वीकार किया है। भामह ने इसे पाहता पहा है। इनके मनुसार यह मक्ता सर मसहारों के मूम में है। इसी पकालिकोकुन्तर ने एक म्यवस्मित रूप दिया तपा इसकी महत्ता बताई। मत अमवार नहीं होगा यो पर्व में पास्ता साए । यदि १ उपस्थित पारेख बानुपित । हापरिपहारस्वग्नुमसोममारप ॥ -काम्पमश्रण. २ "सेश और किरनया प्रो सिमास्यते । नाबार्योलमारोऽनपा बिना ॥ ममममम 111 ।
मलद्वार अर्यानुकूल नहीं है तो वह अलङ्कार ही नही रहेगा और अलदार के लिए ही ऐसा क्यों कहें । ध्वनि मादि पर भी यह बात लागू होती है। ध्वनि के अनेकों मेदोपभेद किए गए है, यहां तक कि उनकी संख्या सहस्रों तम पहुँच गई है। प्रम उठता है कि क्या काव्य में इन भदोपभेदों के सनिवेशमात्र से काव्यत्व आ पाएगा। इसका उत्तर नकारात्मा ही होगा इन मेदापमेदा के सनिवेश के लिए बावश्यक है कि प्रपान अर्य से इनकी अनुकूलप्ता हो। यदि ध्वनि के लिए यह अनुकूमता आवश्यक है तो असदार के लिए क्यो नहीं? यदि इस अनुमूलता को ध्वनि का एक बज माना नाता है तो इसे अलवार का भी एक अभ मानने में कोई आपत्ति न होनी चाहिए । अस' यह निश्चित है कि अर्यानुकूलता बलद्वार मा यावरया बङ्ग है और ऐसा होने के कारण खेकानुप्रास नपा वृस्पनुप्रास दोनों मे वर्णवनि अपधित है।
" भनुमास वर्णध्वनि का ध्यान रमते हुए सदृश उपरण विधान अनुप्रास है। यह मात अनुप्रास के सभी मेनों पर समान रूप से मागू होती है। यह सचरण-सादृश्य व्यधनसाम्प पर निभर है अथवा म्पशन सपा स्वर पोनों के साम्म पर प्राय इस विषय को लेकर मासारिका मे मपनी परिमापाओं की रचना की है। प्राय सभी आप्तकारिक इस बात पर सहमत है कि केवस स्वर-सावरय चमत्कार का कारण नहीं हो सकता । प्रवीपकार ने इस विषय में स्पष्ट निर्देश किया है- म च स्वरमात्रसादृश्ये रसानुगम' न वा सहृदयहृदयावक- स्वसाक्षण' प्रर्म ।" काप्पप्रमाशटीका पृ० ११४ । पप्पक का यही मत है।' इस बात पर भी समी भासदारिक सहमत है कि सादृश्य के लिए आवृत्ति अभ्यवधान से होनी चाहिए ।' अधिक व्यवपान वाली आवृति सादृश्य तथा घमकार की जना नहीं होती। मम्मट ने वर्णसाम्प को मेकर 'वर्णसाम्यमनुप्रास" परिभाषा की है। विधनाम भी परिभाषा इस प्रकार है- अनुप्रास' सन्यसाम्प पम्येऽपि सरस्य यत् -साहित्यदर्पण पृ० १७४। जयदेव मे स्वर सभा पधन दोनों र समुदाय को आवश्यम' मानते हुए घकानुप्रास की परिमापा की है- 'स्वरम्प अनसन्दोहम्पहा मन्दोहदोहवा ।' मग्मट तथा विश्वनाय की परिभापा समान प्रतीत होती है। विधनाप मे पार या असे वर्गादि लिया है। मम्मट ने भी "स्वरसादृरये मि थ्य जन-सात्व वणसाम्पम्' "ऐसा थपनी मृत्ति मे कहा है । अत व्यसनमान १ 'प्रसारमत्ताने रेमसम्बरपौनसम्पमपारवा गप्यते -सस्प प०॥ २ कप:-सनिहित हेमाविध्यपानन मासरप पालारप्रवास म्पु दाता गोत -माद्यमशन gorty | काम्प प्राग.१४। ४ पम्पमारा का धाम्प पर्याप्त है। स्वरसाम्य उसमे धास्ता भवस्य मा देता है। अत स्वर तथा पत्रम दोनों ना सादृरम अनिवार्य नहीं कहा जा सकता। उपोतकार का यही मत है। स्यधन-साम्प निम्न प्रकार से सम्मप है एक ध्यान की एक बार मावृत्ति, एक व्यधन की अनेक धार आवृत्ति, अनेक म्पधनों की एक बार पावृत्ति तफा मनेफ पवनो को अनेक मार पावृति । इसमे एक म्य धन की एक बार आवृत्ति धमत्तारमनक नहीं होती। अत वह अनुप्रास का उपाहरण नहीं हो सकती। एक मधन अयमा अनेक मसानों की भने गार मावृति वृत्त्यनुप्रास कहलाती है तपा अनेक व्यधनों की एक पर मावृत्ति कानुप्रास कहलाती है।' वर्षमाम्य के लिए यह आवश्यक नहीं कि उसी वर्ण की मादृसि हो । सरमवृष वर्ष बामे पर भी मह साम्य सम्मर है। वादि सन्द्रिय के विपम हैं । यत' उनके साम्य का मान भी कर्णेन्द्रिय से होता है। कर्मेन्द्रिय का सम्बन्ध सबने नगरस से होता है। और वस्तुत' सन्द उपारण समप ही है। पुस्तक में सिमित गम्य वो उसी का एक लिपिबद्ध प्रतीक है। उचरण कयदि स्थानों से होता है। मत मर्मादि के सधारण स्थानों में यदि एकना है वो तममे माम्य की प्रसीसि होमी । बता वर्णसाम्य के सिए नातिसाम्य मावस्यक म होकर प्रतिसाम्प मापरयर है। एह पर्ण क माने पर उममे सादृश्य के लिए यह मावरपफ नहीं कि दूसरे वर्ण में भी हत्व हो परन्तु इतना पर्याप्त है कि दूसरा पर्स सी स्थान से उरित हो तपा समान प्रमनवाना हो । यही कारण है कि 'रह मप' मादि में -- यमपणा पासबाविस्म पति पत्पते । पपा 'प्रख्या वया इस्सी" रोत -प्रभाग.txt २ र सहप, सायनापर।
अनुप्रास माना गया है।'
पतिपय आलसारिफों ने इसे अनुप्रास का एक भिन्न भेट माना है
सपा इसका नाम प्रस्यनुप्रास रसा है। मोग ने इसे स्वीकार किया है। ये
तो अनुप्रास क मेदों म इस मर्वोत्तम समानते है ।' विघ्नाय न भी इस
अनुप्रास का एक मिन्न भेद माना है। उनकी मुत्पनुप्रास की परिभाषा इस
प्रकार है-
"तचापरवायदेका स्पाने तासुरवामि।
सादृश्य प्प समस्यैव मुत्पनुप्रास इप्यते ॥" -साहित्य दर्पण १०५
सहयों के कानों को यतीव सुसार होने कारण इसका माम उन्होंने
वृत्पनुप्रास रमा है।
कतिपय बालकारियों ने अनुप्रास का मन्स्यानुप्रास नामक एक और
भेर माना है। यह पद के अन्त मे माता है। विश्वमाय ने इसे स्वीकार
पिया है। इसकी परिमापा उन्होंने इस प्रकार की है-
'मजन पेयपाबस्व सहायेम स्वरण तु
आवस्यते अन्त्ययोज्यत्वावस्यानुप्रास एव तत् ।' –साहित्यदर्पण १०६
इसके दो भेट किए है-पादाम्तग तथा पदातग । इनके ज्यहरण
कमम निम्नलिखित है-
"कम पास्तवक विकाम काय प्रमाटितकरविलासः ।
'मा हसन्त पुनव वहन्त । साहित्यदर्पण पृ० ७७
भोज ने नामविरक्ति के मापार पर अनुप्रास कुछ भौर भेट पिए
हैं। ये निम्बत है
।
१ 'साम् च भविशवमपि एम। पपा 'राति गमा मनापति
मह संप' रति प भतिसाम्य स्पानेस्यात् ।' उगोठ-काम्पप्रकाराant
२ 'माय भन्यनुपासनेनुसनामः
१ एप पलमानामवीच भूषिमुनापाइम्वापरयनुप्रासा
साहित्यपण ..
"स्वमाता गौरयायोप्सामीप्यादिमिझ मा।
नामा विक्तिमिश्मेि तदनुप्रास उच्यते ॥
सरस्वतीकठामरण २९९ ।
स्वभाव का उदाहरण कलामम् गोमो का उदाहरण रतिरपि रति'
पोप्सा का माहरण 'शेरो' सपा आभीलम का माहरण पाय पायम्'
है। इन बसपा में कवस उधरमसादृश्य ही नहीं अपितु अर्थताप
१ देसिए रखतीकरण १९९४, २५५ ।
यमक
यमक का वर्णन प्राय सभी बालारिकों ने किया है। भरत मे इस
सम्दाभ्यास कहा है तथा इसके वस भेट किए हैं।' मट्टि का यमकवर्णन
विस्तृत है। इन्होंने इस मम्बन्ध में बीस लोक लिखे हैं। वही ने भी
इसका वर्णन विस्तार मे किया है। मामह मे यमक के पांच मेव किए है।'
टूट ने यमा का वर्णन नहीं किया है। रुद्रट, बामन आदि ने इसका
वर्णन किया है। मोज, मम्मट आदि ने इसका विस्तार वर्णन किया है।
यमक की परिमापा करने में बालारारिम प्रायः सहमत हैं। हेमचन्द्र,
मम्मट तथा विश्नाप की परिभाषाएं समान है। मग्मट की परिमापा इस
प्रकार है-
"अर्पे सस्पर्मभिन्नानो गर्णाना सा पुन' यति'।
-काश्यप्रकाश सू ११७॥
भोग तथा कसमिध की परिमापाएं प्रायः ममान है। भोष की
परिमाषा इस प्रकार है-
“विभिन्नापैकापामा या वृत्तियर्पसहते ।
-सरस्वतीकष्ठामरण २१५८ ।
हम्पक, जयदेव तथा विद्यानाप की परिमापाएं प्राय ममान है । म्या
पी परिभाषा इस प्रकार है-
"स्वरम्पपनसमुदायपोनमरयम् यमकम् ।
सवस्त सू०६॥
महा तर वर्णसमुदाय की पुमरुक्ति का प्रभ है ये परिमापाएं समाम
है। इनमे अन्तर है वास अपम्प की ओर संक्स करने मपमा म करने
का। स्स्यक को परिमापा में इस मोर कोई संक्त नहीं। मम्मट में यह
-
१ "राम्दामात पमः पादादिशु विपितर ।
एतराधियं पमा नारकामपन् ।
नारपणन १६६२-१५ ।
२ प्रादिमप्यान्वयमई पादाम्या वपापही।
समसपर यममित्येतत् पपयोप्पो ।
-मामहालापार २६
संत है अवरप परन्तु प्रत्येक दशा मे वर्ष-वैपम्प हो ऐसी याप्त नहीं । अर्म होने पर यह बर्य-पेपम्प होगा । मोम मे इस मोर स्पष्ट संकेत है। यदि अर्यवेपम्प को परिमापा का आवश्यक मा नही माना माता है सो मिरर्मक पर्यों की मपवा सार्थक एवं मिरया वर्षी की आवृत्ति भी यमको अन्तर्गत आएगी। अपनी वृत्ति मे मम्मट ने यह बात स्पष्ट कर - "समरसमरसो पमिरयादापामवैवस्वे धम्मेपामनर्पकत्वे भिन्नास- मामिति न युज्यते पातुम् इति बर्मे पतीत्युक्तम् ' काम्मप्रकाश पृ० ५०२ यदि ऐसी बात है तो अनुप्रास स निरर्पफ वर्णावृत्ति पामे यमक का विभेदक क्या है ? दोना में वर्षसाम्य है। अवैपम्प रिसी मे भी नहीं। यदि कहा जाता है कि अनुप्रास में स्वरसादृश्य केवल मानुपंगिक है परन्तु, यमक में यह अनिवार्य है तो भी यमक के इस मद को अनुप्रास में पृषर करने का यत्र सिट नहीं होता । उबारम साम्य दोनों में समान रूप से है। यह उधरण व्यधनों की आवृत्ति + कारण है अभया स्वरव्यचनसमुदाम की बावृत्ति के कारण, केवसमात्र इतने भेद से पृथक् मसंकार की बधा सिद्ध हों होती । यदि इतने म मेद करना ही है तो यह एक असारक दो भेद करा हो सकता है । अतः निरर्थक बर्मासि माने यमक को अनुप्रास पाहो एक भेद कहना उचित होगा। सार्थक तथा निरर्पक वर्गादृसि बाता यमक भी अनुपास स मित नहीं कहा जा सकता । इसमें एवं वर्मसमुदाय सार्यक अमरप है परन्तु नमस्कार का उससे कोई समत्व नहीं। उससे अम निरसता है केवल सनी यात है । परनु यह वर्ष मलकार राय नहीं । अनुप्रास में पास्ता उप्परन-सादृश्य तया वसप्पमि पर माधित है और यही बात इसमे है। अतः इसे मी मनुप्रास का एक भेद मामना सथिल होगा । मय पमक का तीसरा भे रह जाता है । इसमें अर्य-पम्प हाता है। इस पृषा मकार होने के लिए भी यह मावस्या है कि मावृत्ति सपना बससाम्प मर्यवेपम्प मधमलार माए। मर्यकपम्पमात्र में काम नहीं बत सरता । निम उपहरण से यह मष्ट हो आएमा- ८० "यदानतोऽयवानतो नयात्पर्य न यात्ययम्" काव्यप्रकान पृ.५०७ पामनाचाप ने इसकी प्यास्पा इस प्रकार की है- 'पम्पा पार्यस्पाम् बानत'-प्रगत अय अन नमात्पर्यनयस्य नीते अस्पर्य नाश मोतिविरमपमित्यर्प म याति नापिगम्छति । कुत' अयदानस' अयस्य शुभावहविभेदनित गनात् मर्याप्तपैव पाग्यास्य सुमावहनिपि दानाविरपर्प । काष्य प्रकापा टीका पृ० ५०७ यहां अवैषम्य है अवश्य परन्तु वह पमत्कारयुक्त नहीं तथा उसका कारण आवृत्ति नहीं । यहाँ अर्पबेपम्य का कारण भिन्न शम्ों का सनिवेश है। 'यवानतो' मे यद तपा बानतो दाम्य है । अमदानतो में अम तपा दानतो गर है। इन भिन्न शब्दों से भिन्न अर्ष की प्रतीति स्वाभाविक है। यही कारण है कि यहाँ अवैपम्प में पमतार नहीं । अवेपम्प का पमस्कार तो दूर रहा यह कहना अनुचित म होगा कि यहाँ मर्यवेपम्य की प्रतीसि ही महीं होती । प्रतीति मेषस यही होती है कि यहाँ विभिन्न शर्यों के समुवार को समान उचारण काम दिया गया है। परन्तु यमक मन कार के लिए इतना पर्याप्त नहीं। यह असंकार सभी सम्भव है जव वर्ष वैपम्प का कारण उन्ही शनों मी मावृत्ति हो तथा यह आवृत्ति बमस्कार का कारण हो। इस प्रकार उपर्युक्त लोक यम 7 उदाहरण सिब नहीं होता । यदि कहा जाता है कि इस भोक में समस्कार अवश्य है तो हमारा उत्तर है कि यह चमत्कार आवृप्तिमनित अर्यवेपम्य के कारण नहीं अपितु वर्णवनि के कारण है। इसमें ऐसे सदृग वर्गों का विमान है जो प्रस्तुत भाव के अनुकूस है। यहां तक पम्पनि के चमत्कार का सम्वम्म है यह सदृश बों के स्वमान पर निर्भर करता है । उसका सम्बन्ध केबस इम उधरण से होता है। इस सचरण अन्तर्गत विभिन्न दाग आते हैं या नही इससे दमका काई सम्बग्ध नहीं। आलंकारिको ने यमपके भनेकों भेदोपमेद क्यि है। में भेद सदृश वर्गों की म्यवस्था + मेव पर मानिस है। सवा की यह व्यवस्पा मोल में अमेक प्रकार से सम्भव है। यमा तपा अनुप्रास मा रसों से पैसा सम्मन्य है इस विषय मा मानम्ब पर्यन ने सविस्तर वर्णन किया है। ना अनुमार इन अकारों पा विमान - शहार रस के प्रतिकूल है। यमक को तो उन्होंने गनर मे सक्या मित बताया है। मिवसे है 'शारागिनो यसदेरम्पानुवन्धनात् । सर्वेष्वेव प्रमेदेषु नानुप्रास प्रकाशक || पन्यालोक २११४ "वम्यात्मभूते शशारे यमकादिमिबन्धनम् । शतावपि प्रमादिस्व विप्रसम्म विशेषत ।" ध्वन्यालोमे २०१५ इसी बात को स्पष्ट से हुए आनन्द का कथन है -- "यमक पप्रचत्वेन बुद्धिपूर्वक क्रियमाणे नियमनैव यमान्सरपरिग्रह आपतति शम्मविभेपान्वेपणाप" स्यन्यानोक पृ. २२१ ममिवादी मलकार को बाल माभूपण मानते हैं। अत इस दमा मे यमक का प्रकरण स योग कठिन ही है। परन्तु यह वान तासमी अनेरारा पर सायू होगी। प्वनिवासी अनकारों का स्वाप बताकर बोधिस्य क आधार पर उमरा रस आदि में एम्बन्ध जोहते हैं। इस प्रकार मलकाये को पहने मशागर वे फिर बौचित्य को एक समन्वय पी ङ्गला स्म म लाते है। परन्तु वमुस्थिति यह है कि अनुकूमता का विमार पूर्व माता है और वधक आवार पर मापा जो हम धारण सी है उसी बपतिपय भेद अलकार है। ऐसा मानन से बलकारों के प्रकरण पिरोष का परिसर हो आमा है। - लाटानुमास'- . सायानुप्रास का प्राय समी मानकारिको ने वर्णन किया है। प्राचीन आप्तकारिकों म भामह तथा सदमट ने इसका वर्णन किया है। भामह में तो इससी बोर केवस सकतमात्र है परन्तु उभट में इसका विस्तार स वर्णन मिलता है । मट्टि दण्डी, वामन तथा रट न इसरा पणन नहीं किया है। भोज मम्मट, हेमचन्द्र रुम्यक, जयदेव विश्वनाथ आदि न इसका वर्णन किया है। लाटानुप्रास की परिमापा प्राय सभी यातकारिको की समान है । मोन पी परिमापा निम्नलिमित है- अभिद फ्यावृत्ति प्रवृत्या भिन्नयेह या"-सरस्वतीकण्ठाभरण २०१०२ मम्मट की परिभाषा इस प्रकार है- शाबस्तु लायनुप्रासो मेने तात्पर्ममावत -माम्यप्रकाम मू० ११२ अन्य आसंकारिकों की परिभाषाएं मी इमी- समान है। इस परिभाषा + अनुसार लाटानुप्रास मे तीन तत्व है-शब्दावृत्ति अर्पसादृरय तथा सात्पर्यभव ! मावृत्ति को हम उभारणसादृश्य कह सकते हैं । गन्य गों पा ममुद्याप है। अतः जहाँ ता मारणमाम्य का प्रश्न है, इसमे तपा पमक एवं अनुप्रास में कोई विशेष भर नहीं । परन्तु इसमे अन्य दो विभेदक सस्व है । ये है अर्प-सादृश्य तपा तात्पयभेद । इनको साप मिनाकर भिन्न सात्पर्यकार्यमादृश्य कहा जा सकता है। कवल अर्थसादृश्य कहना पर्याप्त मही क्योकि यह तो पुनरुक्त दोप हाना है। उचारण-साम्प क इसके तमा अनुप्रास + उपाानों म अयं की दृष्टि स अन्सर होता है। अनुप्रास म उपारण-माम्य क उपादान वर्णादि निरर्पण होते है परन्तु इसमें वे सार्थक होते हैं। इमी मापक वर्णसमुदाय । सादृश्य विमान स यह अपसादृरप निस्मता है। इस प्रकार इसम अर्पतत्त्व भी होता है । इस मादृरपयुक्त बर्पतत्व मसात्पमभेत मन्वय के प्राण होता है । उदाहरणस' "यस्म म सविधे दयिता दरवहनस्तृहिनदीपितिस्तस्य । यस्य च सदिय दयिता दवाइनस्सुहिनदीधितिरसम्प " भाग्यमाा पृ०१९ त इस श्लोर मे दवा हनस्तुहिनदीपिति की आवृत्ति है । शन्दा का अर्थ भी दोना दमात्रा मे समान है परन्तु मन्वय करन पर तात्पय में भे हा माता है। पहली पंक्ति मे नुहिनीमिप्ति उद्देश्य है सपा दवहन विवेय है। इस प्रकार इसका अन्वय है.. 'तुहिनदीधित्तिदवाहनोऽस्ति दूसरी पंक्ति मे दवदहन उद्देश्य है तथा तुहिनदीपिति विषय है । इम प्रकार इसका अम्वय है- देवदहनस्तुहिनदोषितिरस्सि इसी बात को वामनानाय ने निम प्रकार स कहा है 'पू नुहिनीमितो दवाहनस्व विवेयम्, उत्तराचे तुन्वाहने नुहिनदीपिमित्व विधेयमित्युरेश्यविधेयमावविपर्यासेन पाब्दयोममपान्वय भेद्यतात्पमभेदोऽमि बोम्पम । नाम्यप्रकामी पृ०१९ पहली पंक्ति मे तुहिनदीयिति पवाहन का आरोप है नया दूसरी पंक्ति में दबदहन पर तुहिनदीषिति का आरोप है। आरोप म लक्षणा होती है। इसे सारोपा मतणा कहा जाता है। इसका प्रसिद्ध उदाहरण 'गोर्या हीका है। इसम सम्पाय बारप मान्य यानि गुण है।' य गौ तथा वाही में समान रूप से विद्यमान हैं । इस प्रभार 'दवाहनस्तुहिन यिति' में भी मक्ष्यार्य है। पूर्व पक्कि में यह सापपरत्व के रूप में है तथा दूसरी पक्ति म तिमत्व कप में है। मा होने पर भी पूर्वार्ध में शुहिन पीमिति पर भागा वहन का ही है तापकरस्व का महीं सपा उत्तरार्ध म दवाइन पर आयेप तुहिनोपिलिय हो है पीतारत्व का नहीं । यदि पूजाप म सुहिनीपिसि पर तापफरत का आरोप होतमा उत्तराप मवहन पर पोतकरस्व गाभारोप हो तो दोनों मर्यो मे भे हो जाए मोर इस प्रकार यह मायनुप्रास न रह । परम्तु पहो तपारस्व अपया पोतारस्व का भागा विधित नहीं । अम' मह माटानुप्रास ही है। दोनों पक्तियों म मयमा या प्रभावह ममिय अर्य काय है मया के द्वारा नहीं। पूवार्प म दवइन का अथ शबानम है तथा माया तापार है । उत्तराध म तुहिनीपिति मा अमिषेय अय पन्द्र है सपा मापा गीतार । यहाँ चमतार अभिरेय अस र मादृश्य र १ पिपाणकारा पृ.yount न दो उपमाआ मारण है । सल्यार्प यहां है अवश्य परन्तु वह गौण है तमा अमिषेय अर्थ कर उपकार है। अभिधेय अर्म के आरोप के अनुमार यहाँ दो रूम बनते हैं। कुछ के मनुमार यहाँ दो उपमाए है। पन्द्रिाकार मा यही मत है । ना अनुमार 'सुहिनदीधितिर्वपदहनतुल्य दबदहनस्तुहिनदीधितितुस्य " यह व्याम्या है। जैसा हो यहो पमस्कार न सो दो सपको पर माधित है धौर पर अपितु भिन्नतात्पर्यकतुल्यार्पकप्रग्यावृत्ति पर आश्रित है। दो वस्तुओं की पारस्परिक उपमा को उपमेयापमा कहते है । इसमा उदाहरण इस प्रकार है- पमनव मतिमतिरिय मता।' यहाँ कमला को मति फ समान तया मति को कमसा के समान कह कर यह सिद्ध किया है कि कोई तृतीय वस्तु इनक सुल्य नहीं । इस प्रार यहाँ पमलार तृतीयसदृशम्यवच्छेद के रूप मे है और बह दो वस्तुआ क पारस्परिक मादृश्य मारण है । परन्तु "यस्प न में ऐसी बात नहीं । यहाँ सुहिनवीमिति को दावानल के समाम बताकर तपा दावानम को तुहिनीपिति के समान वताकर यह मभिप्राय नही कि इनके सहन तृतीय वस्तु महीं । तुहिनदीपिति को भी दववहनतुत्य बताने से यह प्रपोजन महीं कि उन दोनों में बस्तुत सादृश्य है परन्तु इसके विपरीत प्रयोजन यह है कि अवस्था विशेष में सुहिनदीपिति दवदहन का सा माचरण करता है । मत तात्पर्य दोनो के सादृश्य से न होकर अबस्पा निशप के प्रभाव से है। मत मह उपमेयोपमा का स्थाहरम महीं। इमी प्रसार दोनों में यदि सपक मानें सो भी यह स्पष्ट है कि यहाँ पमसार पारस्परिक मारोप के कारण महीं । अत यह माटानुप्रास नामर भिन्न धर्मकार है। रम्पकमा साटानुप्राम का उदाहरण निम्नलिखित है-रविरिणानुग हातानि भवन्ति कमसानि कमसानि । सम्पप्रकाराया ४६६ २ सयस्व.२.
यहां कमस मद की प्राप्ति है । उपका अमं भी समान है। परनु पहमा नमम रेश्य है तथा दूसरा विमेय है। पहन का सम्बन्ध रबिन रणानुगृहीतानि से है तथा दूसरे का 'मम्ति' से है। महो धमकार का पारण मिन तात्पर्य के साथ मन पद की माप्ति है। कमल मे कमाल का सादृश्य नमस्कार का कारण नहीं । यदि कमस का कमल स सादृश्य अभिप्रेत हो सो अनम्वय रा राएगा । अनम्पय म उसी यम्भुमा उसी से सादृश्य विभावर बाप सम वस्तु का निपप किया जाता है। परन्तु मम को क्मस कहने स उपामानान्तरध्यवर से सारस्य नहीं । अस यहां अनन्वम मनकार नहीं। निधनाप में माटानुप्रास का मननय से भेद बताते हुए इसी भावृत्ति का महत्व बताया है। उनका करन है- 'अनम्बय ५ मन्देश्यमौधित्यादानुपक्षिाम् । अस्मिस्तु साटानुप्रासे साधारेव प्रयोगकम् ।। साहित्यर्पण पृ. ५२० सायनुप्रास म वर्मान्तरसमिसराम्यायनि मी होती है। रविकिरणा नुगृहोवानि भवन्ति कमनानि कमलानि में यह पनि है। इसम द्वितीय समम पर पोभावत्वादि मान्तर मे सबमित हो गया है। सोमावस्यादि दिलीप मिस का सक्ष्या है और इसका व्ययामम का सार्यम हाना । मर्मान्तरमितमाम्पनि उपादान सहमा पर आस्पित होती है। उपादान मत्तमा म अपनी सिदि लिए अन्य अर्थ वा आक्षेप किया माता है। कुम्ना प्रविशति' मना प्रसिष्ट उदाहरण है। पवन होने पारण पृत का प्रान से सम्बन्ध नही। मत अन्तयता वर्षका मायेप होता है । यह मण्यार है। इसका पयार्य है पुष्पगास्प । इमी भार उपयुक्त सहरा मे भी कमम सम्या में संमिस हो जाता है मौर उसग सम्पार्क प्री निपसता है । सना होने पर भी यहाँ प्रधानता प्रकार की है। धनि रसकी उपार है। बत यह माययाशमाही १ स्वसिदर मादा परार्प ममपा। उरदान सवल मेम्पन्ध गुदेव साया पाम प्रमाण २.१५ - , . अन्तरसममितवाम्मध्वनि के उदाहरण निमसिलित है:- 'स्वामस्मि पग्मि विदुपाम् समवायोऽन तिष्ठप्ति ।' पाग्यप्रकाश पृ०६३ 'कुन्ता प्रविशन्ति' काव्यप्रकाश पृ. ४३ प्रपम उगहरण मे 'वग्मि' उपाशादि मप मे परिणत हो जाता है तथा वितीय मे कुन्त सम् कुम्तयुक्त पुरुष में परिणत हो जाता है । इनक व्यम्यार्प फमश हितसाधनस्व' सपा पुरुपचाप्लुस्प है। इन उतहरखो की तुमना 'रविकिरणानुगृहीतानि भगम्ति कमलानि कममानि' से करने पर परस्पर भेट स्पष्ट है। इन उदाहरों में धमत्तार वस ध्वनि + कारण है परन्तु 'रविगिरणा म ध्वनि फा सन्माष होने पर भी यह नमल शब्द की आवृत्ति ही है बो चमत्कार का प्रपान कारण है। अन्वम की दृष्टि से 'यस्य म सविधे सपा 'रविकिरण की सुममा करने पर प्रतीत होगा कि पूर्व श्लोक मे समान शब्दों मा पारस्प रिक अन्वय भिन्न है। यह अन्वय वाक्य के अन्य परों के मन्षय पर निर्भर है। द्वितीय लोक मे अन्धय की दृष्टि से समान पाम्बों (कमल) का पास्य के भिन्न शम्ग से मरम्प है। 'सारस्तु माटानुप्रासो भेद तात्पयमात इस परिभाषा के अनुसार लाटानुप्रास +निए आवश्यक है कि अन्वय-सम्पन्म दो अभिषय अर्थ से भिन्न माना पाए । अमिहिनान्वयवादी एसा ही मानते हैं। उनक अनुसार अमिमा शक्ति द्वारा अन्वय का मान महीं होता। इसके लिए प्ति की आवश्यकता है । यह तात्पर्यवृत्ति है। इस मरा पों के अन्वय का नाम होर वाक्याप का नाम होता है। अत अभि हिताम्वयवालियों + अनुमार साटानुप्रास एप पृषक मसंगार माना जा सकता है । यदि अम्बप को पृपा सत्ता न मानबर उसे अभिप्रय अर्पही बम्तगत कर मिया जाए तो यह अपार मम्मप नहीं । उम दमा में का असम्पद रूप म अर्थ प्रतीत न होकर अम्बित गप में होमा । यही बन्धित अप उनपा अभियेय अर्प होगा। ऐसा नहीं कि पों के १ पिरोप विरेपन लिए पिए पापा का २५ पृपा पृपा अर्भ निकलें और बार म अम्बय के आधार पर उनको सम्मट किया माए । इस प्रकार इस दशा म भिन्नतापपातुस्पार्यक' पदावृत्ति बहना सम्भव नही होगा । यह तो तमी हा सकता है जब मन्वय पर आश्रिम नात्पर्य अमिमेय से अतिरिक्त हो । अपितामिपानवारियो का यही मन है। नो अनुमार मन्वित पदों का ही मर्य निकलता है । अत सम्बय झाम लिए किसी भिन्न व्यापार को मानने की पावरपक्वा मही। इस प्रचार अम्बित भय का अभिषेप अप मानने में लाटानुप्रास में प्रयुक्त समाम गमो का अर्थ भिन्न हो जाएगा। वहें भिन्नतासर्पकल्पायक न कहकर मिभार्यक कहना होमा । यह भिन्नाममन्य तो यमा म मी हासा है। इस प्रकार साटानुपात का यमर से कोई भेद म होगा। अन्वितामिपानवाग्मिो का उपर्युक मत समीचीन नहीं । 'गामानय' इस वाक्य म अन्धित माम् नमक अप का मान होने पर भी इस 'गाम' मन का प्रयोग व मन्य वाम म किया जाएगा तब यह जानने की मावस्यकता बनी ही रहेगी कि इस पर काक्सि मविप से सम्बध है। इम पा मम्प पर से सम्मम्प है कयानमार सान स काम नहीं चस सकमा । मह ज्ञान भी चाहिए कि वह पर कौनसा है मिसस इमा सम्मम है। मी बार पर सावकार न इस मत का सपान किया है। मम्विनामिशनवादी व्यवहार का आपय कर कहते हैं कि वालो गाम्मा स्प मे ही अर्यभान होता है. पृमा पृपा पायरे मप म मी। या अन्षय के पृपा साल की मावश्यकता महो। परन्तु हमारा यह प्रस्थत भनुभव किया मर्पमान के मिए हम मान की दो प्रश्मिामा म म हाना पाता है। पहली प्रकिया पृषर पुपक शसामगान को है तथा दूसरी उनरे मन्वयमान भी है। हम ग्राम पर पृपा पादों का यय भार हाता है परनु लो क अर्म का मान इसीलिए ना होता क्यापि १ वाप्प व पास्यास्पम्बियमिपानमारिन'-अप्पमका २७ अविलन एवापि ब्रम्पविऐपम्पमापकोदा कम कार बग्यत् । पशिशरापपैय मनमिति समिति उगाच काम्पकारापा.२० सन्दाकारों की प्राचीनता का कारण सम्दालाय की उत्पति उतनी ही प्राचीन है जिसनी प्राचीन करिता की उत्पत्ति है। इसका कारण यह है कि कविता के विषय तपा सन्दालदारों के विषय मे एक नियत सम्बम्प है। कविता का विषय हृदय मी अनुभूति होता है सपा सन्चालङ्कारों का विषय नचारण का सारम विधान है। हपय की अनुभून्ति तथा उचारण के सादृश्यविधान में गहरा सम्बन्ध है । हृदय की अनुभूति की अवस्था में समस्त वायुमण्डल तदनुकूम रुप मारण करता है और फलत उपरित भाषा में एक साम्म होता है। सायुमण्डल की समान अवस्था मे उपरित भाषा का बो स्वरुप होता है उममे एक साम्य होना स्वाभाविक है। हृदय की अनुभूति की अवस्था में समस्त वायुमण्डल भात हो पाता है । अत इस स्थिति में सचरित मापा मे एक प्रवाह होता है। यह प्रवाह एक प्रकारका साम्प ही है। कविता मे छन्दों का जो विपान है वह इसी सम्प का परिचायक है। एन्दों मे स्वरों के आरोहावराह का ध्यान रखा जाता है । । स्वरार इस मारोह्मपरोह क फलस्वहप भाषा मे एप प्रमाह आगाता है। अनुभूति + समय पवि के हवय की अवस्थाएं प्रधानत दो प्रकार की होती है। ये है नस्तास तथा विलमता। कवि जब उत्ससित होता है तब वह गाता है और नव विखम होता है तब रोता है। इस प्रकार इन अवस्थाओं में उसका भापा मे एक लय सपा साम्य होते हैं। मापा का यह साम्य पित्तवृत्ति का स्वाभाविक परिणाम होता है। इसके लिए पृषक प्रयककी अपचा नहीं। नो साम्पविमान पृथा प्रयम का परिणाम होता है वह प्रस्तुत पित्तवृत्ति र अनुकूम न होने कारण अनुचित होता है। कवि की अनुभूति मितनी अधिक तीव्र होती है उतना ही अधिक उसकी माषा मे माम्प होता है । यही कारण है कि स्तोत्रों मे यहाँ कवि की तमयता परम सीमा को पहुंच जाती है हमे मापा में अस्पन्त साम्प देसने पो मिलता है।
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अम्मेद में शन्दासकार
अनुभूति तपा उपारण साम्प में इस निपत सम्बन्ध के फलस्वमम हमें
मोकातीन कविता मे मो भाषा के सन्दरयविधान नपा उसके कतिपय
स्वाप सनातरों के दर्शन होते हैं । अम्वेव में वाप्रास तथा
वृत्यउपास का प्रयोग अनेक स्पों पर हुआ है-
'परा हि मे विमन्यव पन्ति वस्य इध्ये ।
वयो न वसतोस ।
'बतो निधान्यद्भुता चिकित्सा अभि परयति ।
फवानि या च करवा ॥ १।२२।११
मय दिप्सन्ति दिप्मयो न हायर जनानाम् ।
न देवममिमातयः ॥
अस्म स्पा मगरा मस्य मानव सुसंवृष सुप्रतीवस्य सुयुत ।
भावपसो अस्यतन सिम्धकोऽमे रेसन्ते अससन्तो अगरा ।।
प्रेहि प्रेहि पपिभि पूर्णामिपत्रा न पूर्वे पितर परेयुः। १.1१610
गर्नेको मावृप्ति मापा के सादृस्य क अन्तर्गत माती है। इस बावृत्ति
मा अम्बर में अनेक स्पों पर प्रयोग हुआ है। इससे मर्ष में एक बिगप
ममतारमा गया है।
बदा यो पीना पनमन्तरिस पतताम् ।
बद माय समुद्रिय ॥
पद मासो धृतरतो वा प्रवागत ।
पेदा मतपत्रामम ।।
यहाँ 'वेद' पर पो आवृत्ति हुई। इसमे शाम का आपियन म्यरत
होता है।
य' पृयिनी म्यममानामह
प पन्नाप्रकुपितान् अम्मात् ।
मो अन्तरि विममे वरीयो
यो वामस्तम्नास अनास इन्द्र।
२११२
पहा 'ए' की बावृत्तिाई है। इससे इनके मिन मिट सप
हमारे सम्मुख माते हैं।
सहयशी पुरुष सहमास सहसपात् ।
स भूमि विश्नो वृत्वात्पतिशागुमम् ॥
१०।१०१
यहाँ 'सहर' शम्ब की मादृसि हुई है। इसस शीर्ष मादिरे
साप साप सनकी मरमा म समानता प्रतीत होती है।
उपर्युक्त उदाहरणा मे मावृत्ति से को धमलार उत्पन्न होता है
आवृति क मा साप बावृत राम का अर्थ भी गया है।
से रहित पावृतिमात्र यही धमवारी जनक नहीं हो सकसी । इस
उपर्युक्त उपाहायों में अमलायत्पत्ति के लिए उपारणसाम्य तपा।
पादों के अर्थ इन दोनारेमान की अपेक्षा है।
रामायण एवं महाभारत
रामायण तया महामारत मे प्राय सभी प्रकार के भनुप्रार्थी का प्रयोग
बानपाए
"
सप स्वाध्यामनिस सपत्ती माग्विदो वरम् ।
नारद परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मनिपुङ्गवम् ।
एवं दत्वा सुतो सीता मन्त्रीरकपुरसताम् ।
यावीमनको यमा हर्पणामिपरिप्लुत ।
सर्वे भवन्तस्सौम्याच सर्वे मुचरितमता ।
पीमिस्सन्तु कास्था मा भूत् कालस्य पयय ।।
कृष्ण कमतपत्रात कसकानियसूदन । मादि पर्व
प्रथम भोक म सकार तथा वकार की साम् आवृप्ति होने क पारण
घेकानुप्रास है। इसी प्रकार द्वितीय श्लोक मे मी सकार की सात आवृत्ति
होने से धेनुप्रास है । तृतीय नया धतुम भोका में क्रमश स सपा क की
मसाव आवृप्ति है । यम यहाँ वृस्यनुप्रास है।
रामायण तश महाभारत में प्राय माकी आवृत्ति है तथा
उसस अर्थ म समसार आ गया है । इस वापृप्ति के स्वरूप तथा उम
मावृत्ति समिकमने पासे गर्म + प्रकार की दृष्टि से अनेक भेद सम्भव है।
माति र प्रकार को दृष्टि स प्रधानत तीन में सम्भव है । कभी कभी
समस्त थापृष्ठ पद स्वतन्त्र होते हैं कभी कभी उनमें से एक अपरा अभिय
स्वतन्त्र हाते ६ सपा मन्य समास मग होने + मासे परसन्न होते हैं। ममी
भी वे सब समाप्त न मंग होने के नाले परसव होते है।
मिसिसित त हरणा में भावृत शम मात्र है
"एप विहवा थम एप बीयवता पर।
एप युरप्यापिको मोरे सपमा परायणम् ॥'
'भवान् पिता मयन् मासा भवान परमो मुरु ।
सस्मात्स्वपे मुलस्पास्य दिपाय कुरु चितम् ।।
मालपापड
आपण
बादि पर 1 प्रथम लोक में 'एप की पावृत्ति हुई है। इससे राम के भिन्न भिन्न स्वरूप क्रम हमारे सम्मुस आते हैं। द्वितीय प्योक में 'भवान्' मन्त्र की आवृत्ति हुई है। इससे भीष्म को क्रमस मिन्न मित्र नपों में चित्रित किया गया है। मिमलिखित जाहरणों में पावृत्त शब्दों में से एर सा स्वतत्र है नषा मन्य परतन्त्र है- 'गन्यता मातुसकुन भरतेन तवा निमः । साना नित्पशनयो नीस प्रीतिपुरस्कृत ॥ मयोध्या कारण "तमोतयति सा कामे रायुमेवाजुहाव ह । सस्पो मझे महावीर्यों भीमो भीमपराक्रम ॥" प्रथम उदाहरण में 'रात्रतः पाद की आवृति हुई है। इसमे प्रयम शत्रुघ्न पद स्वतन्त्र है तपा द्वितीय परतत्र है। मावृत्ति के कारण यहा शन के नाम की अम्वर्यता व्यक्त होती है। इसी प्रकार विसीय उदाहरण में मोम पान की बावृत्ति हुई है। इससे भीम के नाम की अन्वर्षता प्यक्त होती है। इन उदाहरणों मे शगों को भावृत्ति चमत्कारोत्पत्ति का आवश्यक अंग है। शत्रुघ्न सपा मीम के नामों की अन्वर्भसा प्रतीति के सिए इतना ही पर्याप्त महीं कि उनमें विद्यमान गुणों का निर्देष कर दिया जाए परन्तु यह भी आवश्यक है कि यह निर्देश उन्हों पानों के द्वारा हो। निम्नलिसिप्त उवाहरमों मे आवृत शन्य पात्र हैं - 'तसा मे मनमानस्य पावकारतुलप्रभम् । प्रादुर्भूत महदभूत महावीम महाक्सम् ।। मतदारा स्तानाध सघनास्ससहजना। भपाम्बियस्सामारय समास्महसोपस । सारमग पार्षनाथस्य स्मरस्तप्ये महर्प ह ।। मादि पर्व उपर्युक्त लोकों म महस् त मादि म समास के अंग होने क माते परतात्र है। प्रथम नोक मे महत् की बावृत्ति हुई है। इसमे महत्ता पा जाकर मत होता है। द्वितीय उदाहरण म त तपा सह की आवृत्तिाई है। समास में होने के कारण सह का स रह गया है। इस आवृति स समृदिया भाषिक्प म्यक्त होता है। तृतीय साहरण में भी यह मात है। यातमा बासपाय . आवृत्ति से व्यक्त अर्थ की दृष्टि वे मावृत्ति अनेक प्रकार की हो सकती है। विश्वनाथ ने इस दृष्टि से बावृति अथवा कथितपद स निरूपण किया ।' रामायण सपा महाभारत में प्रावृप्ति से व्यक्त होने वाले अर्थ अनेक प्रकार के है। ये कमिक निमितरूपमम्पन्नता, उत्कर्ष अनुसता सार्थकता आदि हैं। निमिपसम्पन्नता की व्यक्ति की दशा में विशप्य को आवृति होती है । 'एप' विग्रहमान् धर्म "भवात् पिता मानि पूर्वोक्त शोषों में यही बात है। हम मे 'एप' भवान्' आदि विभप्य है। उत्कर्म की व्यक्ति की दशा में विशेषों की वावृति होती है। 'प्रादुर्भूत महदभूत वाय 'अमामियम्मामात्य 'आशिकों मे यही बात है। कभी कमी वावृत विशेषणो मे से एक साम निपेषभाव जोडपर प्रस्मक अवस्था पी पति की जाती है.- पताम्रमासानेपा नैन वक्ष्यन्ति रामसा। गुम कुशिमपुत्रेण अमनेनामृत यया ।। यहाँ बहसास तान्न का सवमा विपरीन है। इसम यह म्पक होता है कि राम एसी अवस्था मे हो अथवा इसके सपा विपरीत अवस्पा महा मर्थात् वे किसी मो अवस्था म पो म हों यत्तस इनका सामना नहीं कर मस्ते। बनता सार्थकता आदि की पति की दशा म मावृत्त शब्दों में से एक म विपरम अपना धर्म होता है तथा अन्य निशप्य अथवा धर्मी हता है । 'गमो नित्यसमो तस्पो मझे महावीर्यो मीमो भीम परामम इम ज्यहरकों में यही बात है। इनमें प्रथम शमन तथा मीम पर विशेष्य है तथा द्वितीय सश्रम तपा मोम मम्द विषयक भग है। १ कप प पदं पुन' । बिहिवस्थानुवापापे विपदे विग्यपि । देऽप सायपासेनामाया प्रसादने । अपान्तरसमितवाप्प हऽसभारण। गुग स्पेव । मया साहित्यार्पण पृ. ४५१ पालकाण कान्यकाल में शन्यासकार काव्यकाल के पूरवर्ती पवियों तपा काष्पकालीन कवियों में शब्दास कारों का स्थान स्थान पर प्रयोग हुमा है । प्राय समी प्रकार से मनुप्रास प्रयुक्त हए हैं । पश्योप, मालिवास आदि पूर्ववर्ती कवियों में इनका प्रयोग सीमित है। तपा माष, हर्प आदि काम्पकासीम पविया में समा प्रयोग प्रधुर है। एष प्रकार से कालफम रे अनुसार इन असकारों के प्रयोग में हमे पिकास देमने को मिलता है। सधपोप ने निम्नलिसिप्ति ग्लोष में वृत्त्यनुप्रास का प्रयोग किया है - कैघिदमुनगे सह वर्तयन्ति वल्मीकभूवा वनमारतेन' । बुद्धचरित ७ । २५ मिनतिक्षित शोक मे अम्स्यानुप्रास का प्रयोग है- 'स्निम्पामिरामिई दयंगमामि समासत स्नात इवास्मि घाग्मि । टचरित ७।४६ कासिदाम मे छेकानुप्रास वृत्त्यनुप्रास अश्यानुप्रास मा स्पाम स्थान पर प्रयोग किया है- अम प्रजानामधिप प्रमाते पायाप्रतिमाहितगन्धमात्याम् । पमाय पोतप्रतिववरसा यमोपमो पेनुमृपेमुमोच ।। -रपुर्वश ११ १२ 'पुरन्दरपी पुरमुत्फ्ता प्रविश्य पोरेरमिनन्धमान । भुने भुजगेन्द्रसमानसार भूप' स भूमेषु रमासस ।' -पुस २।७४ 'विसृष्टपाश्र्धानुचरस्य तस्य पार्धद्रमा पाशमृता समस्य । उदीरयामामुरिवोम्मपानामालोकशम्द पयसा विरावे । रघुवंग २।१ प्रयम मते की प्रथम पंक्ति में 'प्र' मी मसात आवृत्ति पारस वृत्यनुप्राम है तथा द्वितीय पंक्ति मे प्र की सात् भावृति के कारण बामप्रास है । द्वितीय भोर की प्रथम पंक्ति मे 'म' की असहत मासि कमारण वृत्पनुप्राम है। तृतीय भोक मे माप स्वर म क साय स्म की पर तथा पाक मन्त मे आवृत्ति होने में कारण पदान्त तथा पावान अन्स्यानुप्रास है। - कामिद्यस ने वर्गपनि का पूर्स ध्यान रखा है। मोजोवर्यम से अवसर पर कठोर वर्गों का तमा मानुयवर्णम के अवसर पर कोमल बों का प्रयोग करके उन्होंने भाव तमा माषा में एक सामग्रस्प स्मापित किया है- 'वारप्रतिष्टविटमम्पुरम्यर्णमागस्कृतमस्मृदि। यमा स्वतेषोभिरममतामाोगीय मन्त्रीपधिरुवीय ॥ रमुबंध २ । ३२ 'एकातपत्र जगत प्रभुत्वं नवं वय कान्तमिदं वपुच मत्पस्प हेतोह हामिम्पन्विभारमूर प्रतिमासि म स्वम् ।' -रषुवमा २।४७ प्रपम भोक मे मोजोवर्णन + अनुकूल कठोर वर्गों का प्रयोग हुआ है। यहाँ संयुक्त मखर तमा अम्य गणेश, प् र आदि कठोरता के प्रतीक है। इसके अतिरिक्त पीय समास का प्रयोग भी ओमस की अभिव्यक्ति में सापक है। द्वितीय रमोष की प्रथम पंक्ति में क्रमम पठारता सपा कोमलता की ममिम्यक्तिगई है। इस पंक्ति के प्रपम पण मे कठोरमारे मनुरुप कोर वर्गों का तपा द्वितीय चरण म कामसता क मनुक्ष्म कोमल वर्गों का प्रयाग हुमा है। इस पक्ति के पम्न अथवा थरणमात्र से फ्रमदा न कठोर सपा पोमम मार्यों का पता चल जाता है। भवभूति इस महानि के पिया मे मस्यन्त सिवहस्त है। सनरा 'वमादपि रायणि मुनि मुसुमा पि' भोक इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। इसक अतिरिक अन्यत्र भी बना स्पसा पर उन्होंने इस वर्णवनिया पित्रण दिया है। एक ही शोर मे गिप्तवृप्ति क परिवतम के साप उन्होंने मापा म परिवतन परक भाष तथा मापा का सुन्दर मामस्प स्यापिन भारपि माप तया मोहर में इम मनशारोंग प्रपुर प्रयोग हुआ है- 'भवाहापु प्रमदावनोदिन भवत्यधिभेप इवानुरासनम् । तथापि वक्त म्पयमायपम्ति मो निरस्सना0समया दुराषयः ॥' किरात १८ 'निमषिभोम्पससम्मपदमणा ससदिसम्छ मिनायसगिना । पशामत पारुपमूरबममा कुपन मागेन्द्रमिवन्द्रवाहनम् ।। माघ १२८ 'बगादयेप सभापतिप्रम' प्रमजनाध्येयवेन माझिना । सईव साभिर्यनदृष्वृिष्टिभिर्वहि पुरोऽभूत् पुरसूतपौरुप | नेपथ ।। ६७ प्रथम ग्लोर मे धकानुप्रास मा प्रयोग हुआ है। द्वितीय ग्लोक मे की असार आवृत्ति के कारण वृत्पनुप्राप्त है। इस शोक की द्वितीय पंक्ति में पर्णो के सादृश्य-विधान कमरा भाषा मे एक अदभुत प्रवाह आ गया है तपा संगीत मा सा मानन्द माता है। तृतीय शोक मे भी यही बात है। माम तपा श्रीहर्ष वर्गों के इस सादृश्यविपान म सिद्धहस्त है । इन दोनों कषियों की मापा मावों के सपा अनुरुप है। निम्नसिसित म्पहरण इसके समर्थक है:- वृहन्टिलानितरफष्ठभट्टनाद्वितीस्थलोलामिकम सुरविप' । जगस्पभोरप्रसहिष्णु वैष्णव न पत्रमस्याफमताधिकन्धरम् ।' माप।५४ 'पसस्पतंगप्रतिमस्तपोनिभि पुरोऽस्य यावान मुवि म्पमीयत । गिरेस्तहितानिय तावदुबोजवन पीठादुवतिष्टकम्युत ॥' माघ ११२ 'सुष्यनुनिस्वनसाधना गुगप्रगल्ममृष्टिम्पयितस्य संगरे । निगम्य तेग शिसिन परता वितेनुरिमालमिवायश परे । नेपप । प्रपम ग्लोक मे भोमस् मा वर्णन है । अत' उसने बनुरूप पठोर वर्गो का प्रयोग हया है। द्विसीय शोर मी प्रपम पक्ति म सपोनिपि रे नीचे उतरने का वर्णन है या डिसीय पंक्ति में भगवान् सप्प कसर होने का पणन है। इस प्रकार इन दोनों पक्तियों मे गति पानमन है । परनुल गतियों प्रपार मे मन्तर है। प्रथम गति में एक फ्रम तया समानता है। यह गति एष प्रधर स सरकने कप मे है। मत इमक पोत पर्ण मी मोमान तथा प्रवाहयुक्त है। दिलीप गति इमक विपरीत अस्पन्त दृत तथा एक पण भरपी है। सी गति म समय समस स्नायुमगाम मे एक तनाव होता स्वामाविक है। अत इसके सूपर बड भी बटोर हैं। इसी प्रकार तृतीय शोक की प्रपम पंक्ति में लोगोषणा के मनुास पर बों का प्रयोग हुआ है।
गथ काम्प'- संपत के गप काव्या में इन असंकायका प्रमुर प्रयोग हुआ है। उधर-साम्प, प्रमाह, सप मावि कविता की जो विशेपमाएं होती है सब इनम विद्यमान है। यही कारण है कि गधपत्य काव्य के उस्कृष्ट उदाहरण माने जात है। यही नहीं, संबत गप की इन विसपसामों को देखकर मासोमकों ने यहां तक कह दिया कि गए कवियों की कसौटी है।' पशकुमारचरित के रयिता दण्डो वर्णो के सादृस्यविमान के लिए सुप्रसिद्ध है। इन्होंने अधिकतर कोमल यो का प्रयोग किया है। इन कोमम बर्यो के सादृश्यविधान के फलस्वस्म उनकी भाषा मे सामिस्य, संगीत का माधुर्य तमा प्रवाह दखने को मिलता है । 'दनिस्सु पसामि त्पम् मह उक्ति उपर्युक्त कपन की समय है। निमसिमित माहरण में पदों का पूर्व सालिस्प है- 'निरोपिदेवपिसप्तपुष्पकारो देन्यव्याप्तापारो मगवाधिपतिरविधि रमारयमेमरया मृदुमापितया समा गमुमत्या मत्या कमिनया ध समयोयि । कुमार परित पृ० ११ यहो कोमल वर्णो समा स्वरो के सारयविमान द्वारा भाषा में संगीत का सा प्रवाह है। प्रसिद्ध गधनेमा वाण भी मापान सादृरमविधान के लिए प्रमिद्ध हैं। इस सादृरविमान के फलस्वरूप उनकी भाषा मे प्राय समी प्रकार का अनुप्रासों का प्रयोग हुया है- 'मासीवोपनरपतिशिर समधिसभामन पारमामन वापरसुरु दधिमासामलसाया भुवो भर्ता प्रतापानुगगावनतसमस्समामन्तवा कता महाभणामाहानामादर्ग सणास्त्राणामुत्पत्ति कनाना पुनभुवन गुस्थानामागम माम्यामृतरसानामुल्य गेसो मित्रमराहस्पारपानातुर्पहत उमरय प्रगतपिता गोशेबन्यानामाधपो रहिकाना प्रत्यायो धनुष्मता पोरेय माहसिनाममणीविग्यानो नोय र विनतानमनमो न्य इस पापकोटिश मुरसारितमासायमिलापसो राजा सो नाम । -कामरी पृ० १ गधीना निपान्ति'।
१०० यहाँ 'मासामेमसाया' 'मुवो मा वया समस्तसामन्तपफ' में क्रमश मकार मकार तथा सकार की सकृत् आवृत्ति के कारण सानुप्रास है। इससे उपारण में एक साम्य की प्रतीति होती है । 'महामर्याणाम् काना, शास्त्राणो, कनाना, गुणानो तपा रसानाम् में प्रत्येक के अन्त मे पानाम् का सग्निवेश करके साम्प उपस्पित किया गया है। इसी प्रकार मित्रमण तस्य तपा अहिवयमस्य मे मे प्रत्येक के अन्त में अकार के बाद स्य का प्रयोग हुआ है । इस प्रकार के प्रयोग अन्त्यानुप्रास के अन्तर्गत पात है। गोष्ठीबन्यानो, रसिकाना बादि में भी यही बात है। 'वैनतेय इप विनतानन्दजननो' तथा 'समुत्सारिखसक्लाराति' मे क्रमश पकार सपा सकार की सात् बावृत्ति + कारण एकानुप्राप्त है । इस प्रकार स्वरों एवं वर्गों के सारयविधाम के द्वारा उपर्युक्त गर्वाश मे अपूर्व मापा-मोठय प्रतीत होता है। बाग ने स्वरों एवं वर्णो के इस साम्य के अतिरिक वाफ्यों एवं वाक्यांशों के विम्पास में भी एक साम्य उपस्मिस किया है । जहां उन्होंने दीर्घ वाक्यों का प्रयोग किया है वहा स्नो प्राय ममी बाय दीर्ष एवं समासयुक्त मिलेंगे । परन्तु नहीं छोटे माझ्या का प्रमोग हुआ है वहाँ प्राय समी वाक्य छाने तथा समासविहीन अथवा अल्पसमासयुक्त मिलेंगे । यही बात वाक्यांशो के प्रयोग पर परितार्य होती है । वाक्यों एवं वाक्यांशों की इस एपरपसा के फलस्वरूप उनकी मापा में एक साम्प तथा प्रवाह दृष्टिगोचर होता है निममिमित उदाहरण में यही बात है- 'क्व त तदेयम् । क्वासाविम्द्रियजय । क्व तदभिस्व चेतस । क्व सा प्रमान्ति । य तरतुन्नमामागत ब्रह्मपयम् । 1 सर्वथा निष्फला प्रज्ञा । निगु णो धर्मशास्त्राभ्यासो निरर्म संसारो मिरुपकारको गुरुपदेश विवेको निष्प्रयागना प्रमुखता निवारण मान यात्र मनाया अपि यगाभिपंगे समुपीक्रियन्ते प्रमावैमामिभूयन्ते । यहाँ छोटे वाक्यों तया माश्योपों का प्रयोग मा है मौर फमत' भापा मे एक प्रवाहमा गया है। गीतगोयिम्द- भाषा क साम्पविधान की दृष्टि से जयपक गोसगोविन्द का विभिष्ट स्थान है। इसमे पर्चे एवं बौ मा एमा अदभुत साम्य है कि समस्त .
शोक एक ही धनि की पाला प्रतीत होता है। भाषा के इस साम्प निपान के अतिरिक्त इसमे भावो एवं भाषा मी अनुरुपता का भी पूर्ण ध्यान रमा गया है । भापा एवं भावों में ऐमा मञ्जुस सामवस्य है कि भापा के अवसमान से भाव की मभिम्पक्ति हो जाती है 'समितलमंगलतापरिशीसनकोमनमसयसमोरे । मधुकरनिकरमरग्पितकोक्लिकूगितलकुटीरे । पिहरति हरिरिह परसवसन्ते । नृत्यत्ति युवसियनेन सम सनि विरहिमनस्य दुरन्ते ॥ गोतगोविन्द यहाँ कोमल वर्गों के सादृश्यविधाम + द्वारा कोमल अषमा मधुरमाय की स्वत अभिव्यक्ति हो रही है। यहाँ हरि के बिहार तथा नृत्य का मधुर मान किया गया है । यह माधुप अर्ष तक ही सीमित नहीं अपितु मापा में भी यह बोतप्रोत है। यहां कवस हरि ही नृत्य नही कर रहे हैं मपितु उनके नृत्य की ममिष्मजा मापा मी मृत्य कर रही है। जयरेव ने अपने गीतगोविन्द मे सरस एवं गोमत भावों की अभिव्य जना की है । अत उनकी भाषा में तानुकूल सरसता एम कोममता दृष्टिगोचर हातो है । जयस्व अपनी कामतकान्त पदापसी के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध हैं । उनका निम्नलिखित लोक उन पर सक्या चरितार्म हमा है- 'यदि हरिस्मरणे सरस ममो यदि विमासकलासु कुनहलम् । ममुरकोमलकान्तपनि गम् तब गयठेवसरस्वतीम् ।।' गीतगोविन्द उना शोक म एमानुप्रास वृत्यनुप्रास, अन्त्यानुप्रास मादि विभिन्न अनुप्रासों कानो सुम्पर प्रयोग हुमा है यह भापा एवं भावों को इस अनुरुपता का स्वामावि परिणाम है। स्वोत्र साहित्य'- सोनसाहित्य में मापा एक भाषों की अनुरूपता सपा मापा का सादृश्य विमान अपनी परम सीमा तक पाप गया है । स्तोश हो ममिम्पति कवि की मार्मिक मनुभूति सपा सम्मयता के परिणाम है। इस अनुभूति सपा सम्मपता समय कवि के हृदय में केवल एक ही भावमा रहती है मौर - वह है अपने बाराध्यदेव के प्रति भक्ति की सोवता । भक्ति की यह सोवता यपि आराध्य देव को महप्ता से उत्पन्न होती है और इस महत्ता के कतिपय कारण भी हैं परन्तु कवि का उद्देश्य इन कारणों के आधार पर आयध्यदेव को महता का प्रतिपादन करमा न होकर फेवम अपने भावों के वेग के लिए अनुदप मापा (ठना होता है। इस भाषा में यद्यपि महता के कारण भी प्रसंगवश आ जाते हैं परन्तु ये फेवम गौस होते हैं । कपि का प्रधान उद्देश्य अपने समस्त माफ्य अवयों को हृदय की अनुभूति के अनुरूप बनाकर उस अनुभूति का भापण-अवययों के माध्यम के द्वारा प्रवाहित करना होता है। ऐसी दशा में स्वरा एवं वर्णों का आरोहावरोह एवं साम्पविधान स्वाभाविक है। कवि बहाँ अपने बारामदेव के कोमल मप का वर्णन करता है वहाँ उसकी भाषा मी कोमप्त एवं मपुर होती है परन्तु महो वह अपने बाराध्य देव के बोगस्वी रूप का वणन करता है वहां उसकी भाषा कठोर एवं पस्प होती है । निनिखित उदाहरण मे बहोर मापा का प्रयोग इसी बात को सक्ष्य करके हुवा है- जयस्वदविमममममुगमस्सुरवगदगनिनिगमतरूपमासहस्यबाट । पिमिद्धिमिद्धिमिध्वनम्मृदङ्गतुङ्गमंगलम्पनिकामप्रवर्तितप्रचण्डताय शिव -स्तोवरमगर पृ० १७२ तोपसाहित्य मे मापा के साम्पविमान फसस्वा घेकानुप्रास वृत्यनुप्रास अस्पानुप्रास आदि प्राप समो घरबालबारों का प्रयोग हुया है- "गोविन' गोकुसानन्द गोपाल गोपिषस्लमम् । गोवर्षमोदर पोर स व गोमतीप्रियम् ॥ मारयम नियकार नरवीर मयेतमम् । नृसिंह नागनाथ पप्त करने मसान्तकम् ।' -स्तानरमाकर पृ. यहाँ प्रपम श्लोष में ग को सपा द्वितीय शो मे मनी धमात् आवृत्ति पारण वृत्त्यनुप्रास है । प्रपम शोक मम साप ओ पी भी आवृत्ति ।ई है। इतमा ही मही न दोना लोसार प्राय प्रत्येष पद के अन्स म भनुम्बार मा विपाम करक उपारण-साम्य म बोर अपिर पृति की गई है। प्रस्यक शोर क अन्तिम पद ग पूर्व 'तपो का प्रयोग भी सादृश्यविधाम में सहायक है। इस प्रकार यह समस्त स्तोत्र सादरयों एवं यात सादृरयों को एक सुम्बर शहमा है। अरमानुप्रास का स्तोत्रसाहित्य में स्थान स्थान पर सुन्दर प्रयोग - हया है- 'रिमानन्दारी पय ममपरी सौन्दपरमाकरी नि तानिसमोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी । प्रामेयापलबंगपावनारी काशीपुराषौधरी मिधा देखि रुपावसम्बनकरी मातानपूर्णेश्वरी ॥ तोवरवाकर पृ० ६४६७ विषेश्वराम नरकार्यरतारणाय कर्नामृताय पशिशेखरभारमाय । कपूर कान्तिपवसाय जयपराय दारिद्रप मदहनाय मम शिवाय : -स्वासरनाकर पृ. १८३१८४ प्रथम स्तोत्र म म माद री की मागृप्ति से सपा द्वितीय स्तोत्र में का के बाद य की आवृति से उबारण की दृष्टि से एक सुन्धर साम्य उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त प्रमम स्तोत्र के प्रत्येक शो केमन्त म 'मिलो देहि पावसम्बनकरी मासाभपूर्णेवरी' का सनिवेश तपातिीय स्तोत्र में प्रत्येक लोक से अन्त में 'दारिद्रपदुलहनाय नम शिवाप' का सग्निवेम भी इन स्तोत्रों में विधमान नवारण-साम्प में सहायक है। इन स्सोमों में नहीं पही पाद अपवा पद के अन्त मे पसनसहित स्वर की यावृत्ति न हार केवल स्तर की मावृत्ति हुई है। यह बावृप्ति भी साम्पविधान में सहायक है- 'नमस्ते दारण्ये सिरे सानुकम ममस्त जगदष्पापित विपक्ष । ममस्त गावपादारविन्दे ममस्से उमसारिणि पाहि दुर्गे। 11 -स्तोत्रामावर पृ० १३ इस स्तोत्र मे यही रात है। सोनमाहित्य म लिएर एलोर प्राय घर पति मलिमापनार फलस्वरूप मभिव्यक्त न होकर मानस्पिति के अनुभूविस में परिणत होने के फसस्वाप भभिव्यक्तए है। पदान्तस्तान इसी मेमो के भन्तर्गत माते हैं। ला मी स्तानों की उपयुक सामान्य मिथेपताए मिसती है। भीममधाराबापरे निप्रतिक्षित स्तोत्र स यह स्पष्ट है- -
१०४
"मग गोबिन्द मम गोविन्द मोविन्द मग मूरमते ।
दिनमपि रखनी सायं प्राप्त शिशिरवसन्तौ पुनण्याप्त ।
कान' कीरति गम्छयायुस्तपपि न मुञ्चत्याचावापु । मग गोविन्द० ॥"
-स्तोत्ररमाफर पृ० १२ १५ ।
यहाँ सम्बों की आवृत्ति तया अस्मानुप्रास का सुन्दर प्रयोग हुआ है ।
भतकारशाल के अन्यों में शब्दालंकारों का विकास मसापराम के प्रन्यों में भरतमुनि का माटपशाम सबसे प्राचीन है। इस प्रप म शम्दामपणे में करम यम का निरूपण है। इससे हम यही मनुमान लगात है कि यमक से आरम्भ होकर शम्दासापर्गे मा मामिक विकासमा यमक की परिमापा नाटपाम निम्न प्रकार सकी गई है। "पागम्याम' यमकम् ॥ इस परिमापा में केवल सधारणसाम्य की बोर समेत है। परन्तु इस परिभाषा के लिए जो स्याहरण दिए गए हैं उनम स अनेक म हमारा ध्यान असम अचमत्कार को मोर मी जाता है। इस अयतत्व को परिभाषा कामा नहीं मनाया गया है। यह मर्मतत्व यमको उदाहरण! म दोनो में मिसता है-अमसादृश्य के रूप में तमा अपग्य के रूप म । निम्न- सिमित उपाहरण म अनस्व का प्रथम सप है- कतरीमुमुमपागुरदात, गाभत प्रमरकाननहस्ती। फवकीसुमपापुरदन्त मोमते प्रपरकानमहस्ती ॥ माटपमाभ-. निमसिमित बाहरण में अबतत्व कप जितीय मप है- पृश्न पुन सम्रमर पाभ्रमर पा रामा रामा विस्मयत चम्ममसेप। माटपान १७-६८1 नारपमान में यमक ने अनेक उपाहरणों म अषमत इस आंशिक पमसार का होना स्वाभाविप है। मापारण यह है कि यहां सप्तरण मादृश्य हाता है वहाँ अनेक दार्मा म ममगम भोशिर पमनार भी मम्भव है । य िनणरणमादृश्य मात्र एर श्राम ग्यापन की आवृत्ति तक सीमित रहे तब तो हमारा ध्यान देवस उभारणयादृश्य तक सीमित रहता है परन्तु उस क्षेत्र में यदि स्वयें एवं म्यधनों के समुदाय की आवृत्ति मा पाए तो हमारा ध्यान मर्यगत चमत्कार की ओर भी जा सकता है। स्वरों एवं पधनों के ममुझय की यावृत्ति के फलस्वहप समान उपरण वान जो विभिन्न पार मनते है उना धर्मगत सादृश्य मथवा पैपम्प पर भी हम विचार करने मयते हैं। इस प्रकार उभारण्यसादृरम होने पर घमकार को तीन मबस्पाएं होती है केवस उथ्थरपसादृश्य पा चमत्तार, उबारासादृरय के साप मर्य सादृश्य का आगिक पमत्कार तपा उधारणमादृश्य के साप अर्थवेपम्य का आदिक चमत्तार । माटपशाम मे चमत्तार पी इन तीनो अवस्पाओं में बाधार पर अमहारों का निरूपण न होकर उपरणसादृश्य के आधार पर केबस एक यमक का निन्पण किया गया है। इस प्रकार वहाँ इन तीनों अपस्मामों पो एफ में मिसा दिया गया है। भामह के पाम्दानारों के निमपण पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होगा कि उन्होंने उपर्युक्त सिद्धान्त क ापार पर मनने वात तीन यसकारों की पृपला तो अगस' स्वीकार की है परन्तु उस पृथकता का पापार उपर्युक सिद्धान्त को न बताकर उधरम सादृरय क स्वरुपमेद को बताया है। मानह न पहन अनुप्राम एवं यमक इन दो शमगमहारों का निर्देश दिया है।' इसके वा ग्राम्पानुमास तया साटीयानुप्राम का उल्मेम दिया है जो भामह के मनुमार मनुप्रास क मद प्रतीत होते हैं।' अनुप्राम के हम भदो पो पनि पृषा असार माम मिया गाए अपना प्राम्यानुमान को अनुपास यह दिया साए तथा साटोमानुपाम को पृपा असार यहा माय सो तीन १ अनुमासा सम्मको सदोलोम्म । पति बापमाप वाऽम्पैकदमता ॥ २ प्राम्पानुमासमन्यत् मम्पन्ने मुपियाऽपरे । सापेयम-पनुमासमिहेप्छम्पसर गया। -चाम्पामार२-८ १०७ मलबार हो जाते हैं। इस प्रकार मामह के मत एवं इन तीनों मनाघरों के पृपक्सासम्बन्धी मत में विशेष असर नहीं। पूपनिनिए सिद्धान्त को इन ममाये पर मागू फरसे हम कह सक्से है कि अनुप्रास में केवस उभारणसादृश्य होता है माटीयानुप्रास बरवा लायनुप्रास में उभारणसादृश्य के अतिरिक्त मर्यमादृश्य भी होता है सपा यमक म उचारणसादृश्य अतिरिक्त सर्यवेपम्प होता है। मामह ने इन असहारा क यो चाहरण दिए हैं उनमे य तस्व विद्यमान है। परन्तु इन असारो के भामह ने मो सत्तग किए हैं उनम कवल उभारणमादृश्य के स्परूपविशेप की बोर सकत है। मामह ने अनुप्रास का मतण 'सरूपवर्म विन्यास किया है। अत वर्णसाम्य को मामह अनुप्रास कहते हैं । यमन को भामह ने पदाम्पास कहा है। अव पन्साम्प उनके अनुसार यमक है। गणसाम्य तपा पदसाम्य उधारमसाम्प के भेद है। अत हम कह सकत है कि मामह ने उबारपसाम्म के मेदों को शम्दालारो के विभागन पा आगार मनाया है। परन्तु साथ म यहिम यह महें कि भामह शमनारा क विभाजन के समय पूर्वनिर्दिष्ट सिद्धान्त का मी अप्रत्यक्ष स्म से मनुसरण कर रहे थे तो अनुधित म होगा। भामह के प्रमालसरो के उदाहरणो पर इस सिझम्त का पूर्णत लागू होता हमारे इस मत को पृष्ट करता है। अपने शबास द्वारा के समणों म पूनिर्दिष्ट सिम्त को म अपनाकर उधरणसादृश्य क भेदसम्बन्धी सिझन्स को अपनाने स मामह मा गलालद्वार १काम्पालधार अनुप्रास, लायमानुपाठ तया ममा के उदाहरम समय में हिमा पिस्तया निवातेवि पपोदिउन् । २-५ शिरिनुप्ता पेहि परम्मनमुमोरितः।-२-८ जाना माना हेम राताध्यमवावा । बीस दिन मा गत स्नम् ।।-२-११ २ पाप्मसार २५ निएकापालहार २-६ १०६ विवेचन सन्तोषजनक नहीं हो सका है। भामह मनुप्रास एवं यमन कर भेद वर्मसाम्प एवं पदसाम्य में भेव पर आश्रित बताया है । परन्तु यहाँ तक उधरणसाम्प का प्रभ है इस दृष्टि से हमे इन गोनों असहारों से उत्पन्न घमतार मे कोई भेव प्रतीत नहीं होता । अत केवस वर्णसाम्य एवं पदसाम्य के भेव के आधार पर इन दोना बलबरों का मेद सन्तोषजनक प्रतीत नहीं होता । पूसरे केवल उभारणसादृश्य के भेदों के आधार पर अनामसारा का यिचन करने से लाटीयानुप्राम को अनुप्रास सपा यमक से पृपा मानने का कोई आधार नहीं रह जाता। भामह के लाटीयानुप्रास मे पवसाम्प है । मन' मामह के अनुसार वह यमक के अन्तर्गत पसा जाना चाहिए। परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया है। मामह के पान्यानवारविवेचन में जो दोप प सनका निवारण उद्धट ने कुछ अंशों तक कर दिया है । उदट ने भामह के उप्परणसादृश्य के सिद्धान्त को मपिक समीचीनता के साथ अपनाया है तथा इस सिद्धान्त के साथ वर्षसादृश्य में सियान्त की भी उद्भावना की है। उलूट + अनुसार उभारणसादृश्य पर आश्रित भार घेकानुप्रास तथा अनुप्रास है।' यमफ का उन्होंने निम्मरण नहीं किया क्योंकि उगारणमादृश्य के भेद के आधार पर पिए हुए मामह से अनुप्रास सपा यमक में पृपकरण मी असमीचीनता सम्मवत सम्होंने समझ ली और मर्मवेपम्य के बाशिक चमत्कार की बार उनका प्यान नहीं गया। उपरणसादृरप तथा बर्षमादृरप पर आमित अनवार को उन्होंने माटानुप्रास कहा तमा इसका पृपक अस्तित्व स्वीकार पिया।' उप्परणमादृश्य के प्रसङ्ग में उद्भट मे एक प्रमुख सिदाम्त का निरूपण १ देनुप्रासस्तु प्रयोदयाः मुतप्योकियो। -अपामारणार -1 अनुपात पर भी नुरागको निहिलिव पिसे या पनि उसमें रम्पारणाम होता है-सस्सम्यानपास विसपेवान पनि । पृषा भगनुमानरान्ति का सदा -चिY २ सम्मापिरोपेपि पुनधिः शान्तरात् । समान मा नया नायनुपात इप्पते ॥-काम्पसमारतरसम्म १-८ किया है। यह सिदाम्त है उपरक का भावानुकुम होना।' उट का मनुप्रास इसी तत्प पर मामित है । परवर्ती मालडारिकों मे अपन वृत्पनु प्रास का निरूपण उद्धट में इसी अनुप्रास के आधार पर किया है। बस्तुस' देखा जाए तो केवल उधरणसादृश्य का काव्य मे विशेष महत्व महाँ । काम्य मे नहीं यहाँ उचारपसादृश्य होता है यहाँ वहाँ चरण भावानुकूल होना समीपोन है। परन्तु नाटपचाख में केवन उपरयमादृरय पा निरूपण कर मा गया था । अत उबारण तपा मावो रे सादृरयसम्बधी सिद्धान्त का निहपण करने पर भी उद्भट परम्परा स बात ए सिद्धान्त का निराकरण नहीं कर सके और उस पर आधित समानुपाम की उम्हाने सप्ता स्वीकार की। यह कानुमास कालान्तर मे भी चलता रहा। इम विवेचन में यह स्पष्ट है कि स्ट्रट रे समय म अनुप्रास तमा साटानुप्रास ने मगमग आधुनिक तपा परिपत प प्राप्त कर लिया था। परम्सु यमप से परिपत हप का आविर्भाव अभी शेप मा। सरा माविर्भाव हमें मामन र काव्यातदारसूत्रवृत्ति मे मिलता है। मामन ने बमकी परिमापा निम्नप्रकार सकी है- 'पदमनकापर वास म्माननियमे यमकम्" । काव्यालबारसूति ११ इस परिमापा म भनेकार्यवा अपवा अपवेपम्प का स्पष्ट उल्लेख है। स्वट समा भोज में भी यमक म इस धर्मवैषम्य मा निर्म किया है। मम्मट मे यमपी परिमापा में पास नवीन व तपा प्रापोन भपका सामजस्य करने का प्रपत्र किया है। उन्होंने पमक मे अपम्पमानित यवरम किया है परन्तु यह अर्मवैपम्य यहाँ प्रत्येक दशा मे मावरपक नहीं। १ रनुपम की निसिमित गति से यह सर:- वामु प रसामिप्यतयागुगरेन प्रथा पृषानुमासो नमो। -माचिस २ उत्पविकमायामम्पागा मिमल माना। पुनणाधिय प्रयदहाति विषपास ॥ मलिमिपारस्पापा पापिय"। परपती प्रमाण १-म -
-
यह मर्यवेपम्प समी हागा घम विभिन्न वर्गों का कोई अर्य निकालता हो ।
अर्थ न निकलने पर उनक अनुसार यमक में मर्पवैपम्प मा प्रम महीं
उम्ता । उनकी निम्नलिखित परिभाषा से यह स्पष्ट है-
"अर्पे सस्पर्मभिन्नानां वर्णानो सा पुम श्रुति"।
-माव्यप्रकाश सूत्र ११७
यमा के मिसपण के समय एय्या में हर्म मम्मट की यह सामजस्य
पुद्धि नहीं दिखाई सती । मम्मट ने यमक की परिभाषा में मवीन दृष्टिकोण
को स्थान देकर उमका थापर नो किया मा, सम्पर ने तो प्राचीनता के
मोह में इस नवीनता का सपपा तिरस्कार कर दिया है। उनकी निमसिमित
परिमापा से यह स्पष्ट है-
'स्परम्पचनसमुदायपोनरुक्त्यम् यमकम् ।
६
इस परिभाषा मे पर्यवेपम्प पी ओर संकेत नहीं ।
---सर्वस्व सूम
तृतीय अध्याय अर्यालकारों में साश्य करि का एक उद्देश्य प्राय वस्तु के दर्शन स तत्पन्न अपनी मनुभूति को भ्या करना होता है । इस दशा म वह वस्तु का स्वनिनन्दन म करक प्रतिमास नियमन करता है। यदि मुख उसका वएपविषय है तो वह मुख का दाम और स्यूल वर्णन न करक मुखदान में उत्पन्न अपनी सौन्दपभावना को अभिम्यक परेमा । यह सौन्दप्रभावना मुखवधन से उत्पन्न अवश्य १६ है परन्तु इसमे कवि की कल्पना का वेश मिला हुया है । यह सोम्दममावना राम सौन्दय से भिन्न है । अत मुम्दर पार के प्रयोग सारा इस मभिव्यक्त नहीं किया जा सकता कवि अपने वर्णन के काय पाठन को उमो मौन्दर्यानुभूति की मानसिक स्थिति में सपामा चाहता है नियम पह मुमदर्शन के द्वारा पहुंचा है। 'मुस सुन्दर है बस प्रयोग प्रिय पाठा उस स्थिति में नहीं पहुंचाया जा सकता । अत यह बावश्यक हो जाना है कि कवि मुख से सादृरम रखन वामो एसी बस्तुशा का वर्णन गरे जिनका वसन पाठक को अमीष्ट मात्र मी अनुभूति नरान म समर्प हो। इस बात सोप्यान में रखर खट कहते हैं 'सम्यम् प्रतिपापितु स्वस्पतो रस्तु तरसमानमिति । पस्स्वन्तरभि स्यात् यता यस्मिन्सदौपम्यम् ।' मुम के सौन्दर्य की ममिव्यक्ति के लिए कवि कमान पन्द्र बादि ऐसी यस्तुमा म मुम्न र मादृश्य बताता है जो साक में अपने सौन्दय क लिए प्रमिव है । इन बस्तुश के साप सादृश्य के पशन से पाठनको वह सौन्दर्या- नुभूति सहर ही हो जाती को मुख मुमार है' केवस इतना बहन से सम्भव नहीं । पाममस या के साथ सौन्दर की भावमा गुड़ी है। सौन्दर्य के उपमान है। उपमान की परिमापा इस प्रकार है- "साधारणपमवरसेन प्रसिड पदार्य उपमानम् ' बालगोपिमी पृ० ३४५ १ काम्पसक्रम चन्द्र, कमम आदि का पौन्दम लोक में प्रसिद्ध है। पत 'मुन पन्द्र इस सुन्धरम्' ऐसा कहने से हमारी सौन्वय-भावना जागृत हो भाती है । 'मुस मुन्दरम् ऐसा कहने से हमारी को म्यूल भावना पी वह अब कल्पना के जगत् में पहुंच पाती है और इस प्रकार हम विकी मानसिक स्थिति के साप सादात्म्य स्थापित कर सकते हैं । यत सादृश्यविवान एक माध्यम है यो पाटनको कवि की मनोभूमि तक पाता है। इस सादृश्यविमान को अपनाकर कवि जिस भाषा का प्रयोग करता है यही सादरपमूलक अनेकार हैं। भावों की अभिव्यक्ति मे इन उमकारों का प्रमुख हाम है । संस्कृत के बालकारियों ने इस बात को स्पष्ट स्वीकार किया है । अपालकारों के विवेचन में उन्होंने इनके जो मूल तत्त्व निर्धारित किए है उनमें सादृश्य को प्रमुख माना है । ख्वट ने अासकारों के पार मूम मस्त माने है। ये यास्तव, प्रतिस्प औपम्प सपा रमेप है।' इस प्रकार इन चारों तत्त्वों में औपम्प प्रयवा सादृश्य भी एक सत्त्व है । वट में उपमा उप्रेता अपहनुति ममासोक्ति, मत उत्तर, अन्योक्ति, प्रतीप, अन्तिरम्पास, उभयन्यास प्रान्तिमान्, भाषेप, प्रत्पनीक दृष्टान्त, पूर्व, महोक्ति, समुख्य साम्य एवं स्मरण को इसी औपम्प , भेद माना है।' दण्डी मा उपमा मलार का विवेचन अत्यन्त विस्तृत है। इन्होंने उपमा के अनेक भेद किए हैं। परवर्ती बामकारियों ने इन्हें सतम्न असमार बना दिया है । एपी की अम्पोम्योपमा अमृतोपमा संशयोपमा निर्ण मोपमा असाधारणोपमा प्रतिषस्नूपमा, माहोपमा तपा उत्तचितोपमा परवर्ती माममारियों ने प्रमा उपमेयोपमा अतिनयोक्ति सन्देह निश्श्य अनन्वय प्रविवस्तूपमा, भान्तिमान् तपा प्रतीप अलंकार है । दण्डो का गमा संबंपी यह विस्तृत विवचन ल वमेव अर्नमागें की मादृश्यमूसकता का परिचाया है। १ अर्पस्पासंचरा बास्तबमौसम्पमतिराम सेम। पपामय विशेषा म्ये तु मबन्ति निम्म्यासकार 10 २ उम्मोदय साम्पसमपतिः संशयः समासोति । मनमुत्तमम्पोक्तिः प्रतीयमान्तरम्पा। टमपन्मानमाम्तिमरायान्यनताराता। पूर्ववतितमुणपसाम्पत्मरणानि तद्देवा । कायाकार ।
वामम मे समछ मतकारों को उपमाप्रपव कहकर उनकी सादृश्य
मूलम्सा पटत स्वीकार की है। एस्मक ने अर्थासकारों के मून तत्वों में
मौपम्य को माना है। विद्यानाप ने भी इसे एक सस्त माना है। उन्होंने
इसके लिए साधर्ष शम का प्रयोग किया है। मप्पयदीक्षित मे मनेक
बसकारों को उपमा ' मेव साकर बसकारों की सादृश्यमूलकता
सीकार की है। उनके मनुसार एक सपमा ही मिन भितम धारण करती
मिम मिन्न बालका- म परिवर्तित हो जाती है। यही नहीं उन्हेंनि यो
यहाँ तक कह दिया है कि जिस प्रकार ब्रह्ममान से समस्त विश्व का मान
हो जाता है उसी प्रकार उपमा स भी हो पाता है।'
मनेक मासकारिकों ने वोक्ति मपरा असिम को बसकारों का मूस
तत्व माना है । भामह की बकोकि मस्यन्त प्रसिस है ही। यह वक्रोक्ति एक
१ प्रतिस्थामतिरमामय:-काम्पासंपरस्य ।
२. 'प्रगान काण्या वाषिप्याकेपित मीयमानमाम्बा, चित् प्रसार
मातीपा, वित्तीयानरसम्वादयः, चिरापानमाना रति ।'
-प्रतापमयोभूषव पू. ५
1 तापम्ने बितिपर-मदपमान-प्रभेदमानम्, मेरनिदमपान पेति।'
-प्रापउपयोभूपप १.२५
४ उपमेम ऐपी सम्माता विमभूमिप्रमेवान् ।
पाती काम्पगि नस्पती अदिदा पेवा।
पर व मुम्ममिति बारपस्न दातदुपमा । सेबोधिमेनानकारघरमा
भको सपना पुर्व मुशमिव बनायुममेवामा 1 मुख मुसमिरे
स्पनयम "मुखस्स पुरत पदो मिपम इस्य प्रस्तुतपरसा मुकाम
सकारपिबर्टयतापमुम्मा' विमोसा १.६
सनिलिपि मानादियोपमामानात् ।
d मरतीवादी नस्ले तिमेदनीया स्' -विमीमांसा १.५
६ भव सर मोतिनपायी रिमाम्पते।
पास्वपिना भRSमया विना॥'
-~ममता 151
प्रकार का यतिमप है । 'विवसा वा विभेपस्म लोकसीमाविवर्तिनी" कहर दपी में इस मतिष्प को स्वीकार किया है। अभिमव के अनुसार यह अतिशय 'ससिकारसामान्यरूपम् है।' मम्मट ने इसके लिए प्राण नापतिष्ठते" शब का प्रयोग किया है। मुन्ता के वफोक्तिसम्प्राय पातो मह प्राण ही है। सादृश्य की इस भतिशय के साथ सुमना मरने पर प्रतीत होगा कि अनेक अवस्थाओं मे सादृश्य इस अतिश्चय के मूल मे रहता है। अतिशय का प्रयोजन भी कवि की अनुभूति को पाठक तक पहुंचाना होता है। यदि भुमामों की वीर्पता कपि पावर्ण्य विषय है तो उसकी अभिम्पत्ति के लिए उसमें अतिशय साना बावश्यक हो जाता है । यह अतिशय दीर्पतास्त्री साधारणधर्म के आधार पर होता है। कवि एसे उपमान का वर्णन करता है जिसमें साभारणपर्म का बतिचाप हो । सामायणमर्म से मसम्बट मन्म वस्तु का वर्णन नहीं किया जा सकता । मतिशय उस वस्तु को मानकर चलता है जिसका अविषय अमिप्रेत है और यह बस्तु सामायणापर्म हो सम्मम है । यह साधारणधर्म प्रस्तुत तया अप्रस्तुत में सम्पम्म स्थापित करता है । गो सायारणमर्म प्रस्तुत में अस्पमात्रा में रहता है वही अप्रस्तुत में मसिशयित मात्रा में रहता है । इसीलिए उपमान की परिमापा निम प्रकार से की गई:- 'भषिकगुणवत्वेन समाप्यमानमुपमानम्' बासवोषिनी पृ०५४ मुगाओं की दोर्पता को अभिम्यक्त करने के लिए वनमा मर्गमा से सापूरय दिनाकर मठिसय का वर्णन इसीलिए किया जाता है क्योंकि अर्गमा में वीर्षसाम्पी साधारणपर्म का भतिशय है। और इस अतिशय का प्रयोजन भी यही है कि दीर्घता के मतिराय से युक्त अर्यनामों-सदृश भुजामों के बहन से हम कल्पना की उस स्पिति में पहुँप बाएं जिसमें कवि वीर्ष १ विषामा निरोपरम लोकतीमातियतिनी। महारतियोकि स्पारसकायमा पपा ।'म्याप १।२१४ History of Sanskrit Poetics-P 65 'सर एपिपविएपविरापातिरेप मापतेनापतिको काम्याम्य. ।
भुगमों के वर्मम से पहुंचा है मौर फसत हमारी तपा कवि की क्सना स्थितियों में साम्प स्थापित हो पाए । यद्यपि पोवा की दृष्टि से मुगा तथा अर्मसा में मात्र मेद है परन्तु कषि तथा पाठर भी रस्पनाजस्य मितियों म यह भेद प्रतीत नहीं होता। "सापप लिए प्राकतिगत साम्य भावश्यक मयमा माही" सादृश्यविधान का उद्देश्य स्पनाजन्य इसी सपृश्य माव की अनुभूति करना होता है । 'मुस गम व मुन्दरम् से उद्देश्य मुम एक पन्द्र के स्यूत अपपा माइतिगत सादृश्य से न होकर मुसदम सपा पनर्सन से उत्पन्न फस्पनागम्य इनके सौन्वर्षसमन्धी सादृश्य स है। कल्पनापन्म इस सादृश्य के लिए मह मावस्यक महीं कि प्रस्तुत तमा अप्रस्तुत मे माकविगत पूर्ण सादृश्य हो । यो प्रविपाप मान का भारत से सम्पत्य होता है यहाँ भ्यूमाधिक रुप मे आकृतियत साम्य भवरय मषित परत बहो इसरा माठि से कोई सम्बन्ध महीं वहाँ इस साम्प को भावरपाया नहीं। मुबायों की दीर्घसा को म्यक्त करने के लिए उसके सपमान में माहात साम्य अपेक्षित है। दीर्घता त्यूस घरीर का मर्म है और माति के द्वारा इमही ममिष्यक्ति होती है। मत इस भाष को व्यक्त करने के लिए सादरम विपान में माविसाप पावश्यक है। मुगाओं का उपमान अर्गमा है। इनकी मात में अभ्य वैषम्य मले हो हो बीमता की दृष्टि से बाधिक साम्प ममरम है। यहाँ साधारपधर्म मारुति से सम्बन्प नहीं होता यहाँ इस मारुति गत सादृश्य को पावरयस्ता नहीं । वीरसा, सदाणा, बनसीससा आदि माँ का मारुति से सम्बग्य महीं मालकी अभिव्यक्ति के लिए उपमान में मातिसाम्प यावश्यक नहीं । वीरता की ममिष्यक्ति के लिए पुष्प की तृसन्य सिंह से परोपाती है, मया-पुरप सिंह इव पीर'। यहाँ पुरुष प्रमा सिंह में मारुतिगतसाम्प महीं। वीरसा मारमा पा गुस है। गरीरका नमसे कोई सम्बन्म नहीं। यही नहीं स्यूत शरीर पाने म्पति मै गोरता रोगाRAAT 1 -rrrr का यही मत है।' बत पीता माविकी अभिव्यक्ति के लिए बाकृतिगत साम्य की आवश्यकता नहीं। प्रश्न उठता है कि Face in the index of mind' इस्पादि उक्तियो पाति तथा मानों में निम्ति सम्बन्ध स्थापित करती है। अतः यह कहना कहाँ तक उचित है कि वोरसा आदि धर्मों का बामति से कोई सम्बन्ध महो? इसका उत्सर इस प्रकार है-उपर्युक्त उक्ति में भावों सपा वाकृति का जो सम्बन्ध स्थापित किया गया है यह प्राय मावों की उद्दीप्त स्पिति को मक्ष्य करके विमाया गया है मनुष्य के स्वमाव के अंग बने हुए भावों को मक्ष्य करके महीं दिखाया गया । मनुष्य को पारुति से मिन भावों का पता पनता है वे प्राय ऐसे नदीप्त भाव है बो बपने इस उद्दीपन के फलस्वस्म बारुति में मन्तर उत्पन्न कर देते है। आकृति से कतिपय ऐसे मावों का भी पता पस सकता है जो मनुष्य के स्वमाव के अंग बन गए हैं, परन्तु ऐसे भाप इने गिने ही होते हैं । मत नो बाधार पर यह महीं कहा जा सकता कि आकृति उन समस्त भानों की परिचायक है वो ममुप्य के परिष के अन्तर्गत आते हैं। शारीरिक मवयों के सौन्दप की अभिव्यक्ति के लिए इस भौशिक पातिगत साम्य का ध्यान रखा पाता है। पाश नासिका आदि के सौन्दर्य की ममिम्पत्ति के लिए मा सादृश्य क्रमश सर्प सुरुवम्यु मादि से दिसाया पाता है। इन उपमानों में अपने उपमेयों के साए भौतिक बातिगत साम्प है । इसका कारण यही है कि यह सौन्दर्य-भावना आकार पन्य है। प्रस्तुत आकृति हो कस्पना मा निफ्य पनकर सौन्दर्य पाल्म धारण करती है। मह सौम्दयमावना यपि एम आम्तरिक मापना परन्तु इसमें उस विषय की वह स्यून रूपरेखा बनी रहती है गिमसे यह उत्पन्न होती है। १ "भापत एपिप शौपादयो नाभरप सचिनु शोपादित चितस्पाभरमहापादेयमात् भार एपल शूर इस्पादेम्पमापदम्पनरेऽपि सियासितमात्रेण 'शा वि मारि गरेऽपि मनितासमय पर वि भविभागप्रतीतपो पपा म्पायन्ति "" कायााय . १४ ग्पमानों का क्षेत्र सादृश्यविपान के लिए पवि समस्म विध का अपनो कल्पना का क्षेत्र बनाता है मौर उसमें से उपयुक्त रुपमानों का धयम करता है । इस चयन के समय अपनी बनुभूति की स्पष्ट अभिव्यक्ति तो उसका प्रमुम उद्देश्य रहती ही है, इसके साथ साम वह कविपरम्परागत कृतियों का भी ध्यान रखता है। बप्पयदीपित तया हेमचन्द्र ने इसका समर्थन किया है।' कतिपय उपमान कविपरपरानुसार किसी मर्प में स्म हो जाते हैं। इनके अयसमात्र से पाठा को अभीष्ट अर्थ की अनुभूति हो जाती है। कवि अपने भार्यों की अभिव्यक्ति के लिए इनका धापप लेता है कमस, कोशिसस्वर भादिक्रम मुस, मधुर संगीत बादि के उपमाम के अर्थ में का हो गए है । मो प्रयोग से पाठक को मुख के सौन्दय सपा संगीत के मापुर्य की मामूति सहन ही हो जाती है । अत उक्त मानों की अभिव्यक्ति के लिए कवि बिना प्रयन के ही इनका पपन कर मेता है। इस प्रकार सठियां शनि की भावाभिव्यक्ति सपा पाठ की मावानुमूसि में सरसवा लायी है। कमी कमी कवि की मावामिम्पति के लिए एक वस्तु उपमान के सा में पर्याप्त महीं होती। बस वह पिस्तुओं का चयन करके उनका उचित समन्वय करता है तथा इन्हें एक पलिट उपमानाका सा है। "पुष्प प्रपालोपहित यदि स्मान्मुक्ताफस वा स्फुटविद्मस्पम् । ततोऽमुाविनवस्म तस्य वामौष्टपर्यस्सप मिसस्य ॥" कुमारसम्भव ११४ यहाँ ओष्ठ पर वितरी हुई हंसी उपमेय है। इसके लिए सष्ट्रिष्ट उपमान की योजमा की गई है। यह प्रयासोपहित पुष्पम् मयवा 'चिटुमस्प मुख्य फमम्' केस में है। कभी कभी कवि को वस्तुओं पारर्णन म परके उनके पारसारिस संबंध १ "षितमयसिद्धपमुरातोम्मानोपमेपन्सपोम्पपात सापमुमा । प्रत एक 'इममित्र मुनमा पदि मोमा पिनमांग.. 'मनिममुप्माममपरिवमुपमेपर प्रतिपाठिमी पपिरिणामयादेव।" साम्पानुयाम्न.३४॥
११८ - सम्मम्प का वर्णन करना होता है। इसके लिए यह ऐसी वस्तुओं का उपमान के रूप में चयन करता है मिनका पारस्परिक संदेष प्रस्तुत संबंस को अभिव्यक्त कर सके । ऐसी दशा में उसका प्रमुख उद्देश्य समन्मों का सादृश्य प्यक करणा होता है । सम्बद्ध वस्तुओं का सादृश्य हेवन गौण होता है तपा वह प्रधान सादृश्य का मंग होता है । मिमलिमित उदाहरण में यही बात है- 'न मसु न सानु गाण समिपास्योऽयमस्मिन् । मृदुनि मृगशरीरे तुमराशाविवामि ॥ शाकुन्तस १ । १० यहाँ प्रधान सादृस्य मृगशरीर तपा वाण के सम्बन्ध एवं सूमयशि सपा अमि के सम्बन्ध में है । मृगशरीर तथा बाण में नारमनाशक सम्बन्ध है तपा सूमराशि एवं मग्नि में दायदाहक सम्बन्ध है। पापाहरु मात्र माश्य माशक भाव का एक अंग है।बत नारमनाशक समन्ध तपा दापवाहन सादृश्य है । मृगमगर का तूसराशि से वपा वाण का अग्नि से मादृश्य इसमें केवल गौण है तपा प्रमाम सम्बन्ध र उपकारक है । मृगशरीर तपा तमराप्ति में कोमलता एवं बाग तया भग्नि में कठोरखा का भिन्न भिन्न सादृश्य विसाने से उसना प्रयोजन महीं जितना मृगमरीर तथा गाम के एक मराशि तपा अग्नि के पारस्परिक सम्बम्भों का सादृरय विमाने से है। कोममता को दृष्टि से तो मृगसरीर का सादृरय पुष्प से भी विमाया वा सकता है, परन्तु उस दशा में पुष्प तपा अनि के सम्बन्ध में कामयहक मार की दृष्टि से वह नमस्कार नहीं रहेगा मो तुमयसि के प्रयोग से विद्यमान है। वस्तुर्मों का यह पारस्परिक सम्बन्ध तीन प्रकार से होता है-अनुकूम रूप से प्रतिकूस का से सपा मसग्मय स्म से। उपर्युक्त उदाहरण में यह प्रतिकूम म से है। मम तथा बाण का सम्बन्ध प्रतिभूस है । मत उसका सादृश्य सूमराशि तथा अनि के प्रतिभून्न सम्बम्प से दिमाया गया है। अनुरुस सम्बन्ध निमनिमिव शोष में है- "यमा युधिष्ठिरो नाम सर्वधर्मसमाश्रय । दुमाणामिव सोपानो मधुमास इवाभवत् ॥' रसगंगाभर पृ० २१ यहाँ युमिष्ठिर क्या मोरों का एक मधुमास समारो ना सम्बन्ध
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हो । मूर्नता तपा अमूर्तता एवं चेतनता सभा बचेतनता का विषय उपमान
पयन के क्षेत्र से पाम है। कषि प्रार' अमूर्त वस्तुओं का सादृश्य मूर्त
वस्तुगों से दिखाते हैं । कीति तथा स्मित भमूर्त वस्तुएं है परन्तु उनका
सादृरय क्रमश हंसी तपा पुष्प से रिसामा गाता है-
"हसीव पवता कीति स्वगगामवगाहते" -चित्रमीमांसा पृष्ठ
"पुष्प प्रयाप्तोपहित यदि स्याम्मुत्यफल वा सुविद्रुमस्पम् ।
ततोचकुटिशदस्य सस्य सामोठपर्यस्तरुप स्मिसस्प ॥"
कुमारसग्मय १४
मतम का चेतम से सादृश्य तो मस्यन्त सुप्रसिद्ध है। इसका कारण
कवि की मानसिक स्पिति है। कवि अपने भाषणों का आरोप प्रकृति पर
फरता है और उसे पेतन के रस में म्यवहार करते देखता है। उसे प्रकृति
में अपने मावों पी झांकी देखने को मिलती है। यदि वह आनन्दित है तो
प्रति न आनन्दित मागी का आचरण करती हुई प्रतीत होती है और
यदि यह दुसी है तो प्रकृति में उसे वैसा ही वापरण दिखाई देता है।
"मस्अयुधम मस्समाम समर्छमारामिवर्तमानम् ।
सवाकिर नासनता प्रसूनेयमारसामैरिव पौरफम्या"
-गुवंय २ । १.
यहाँ मतामों का सादृश्य पौरखम्यामों से दिमाया गया है और 4
पुष्पवर्षा पती विसाई गई है।
"सैपा स्पप्ती पत्र विपिन्वता स्वा प्रष्ट मया नूपुरमेकमुपाम् ।
अदृस्पत स्वपरणारविन्दविलेपासादिव पदमौमम् ।।"
-रपुस ३ । २१
यहाँ निपल नूपुर का दुसी प्राणी से सादृश्य पम्प है तपा दुम के
पारण से मोन दिखाया गया है।
मूर्त वस्तुओं स ममूर्स से सपा पेसम का मबेसन से
सादरप
मी
पायों में अनेक स्पसों पर मिलता है
-
"सा देवतापित्रमिपिफ्यिायामन्याययो मध्यमनोकपार।
वमौ घसा सन ससो मतेन अमेव सातानिधिमोफ्पना ।"
-रघुवंश २०१६
यहाँ धेनु का सादृरम पदा से दिखाया गया है।
"स पाटलायो गवि वस्पिवास धनुर्धर केसरिणं ददर्श ।
अपित्यकायामिव भातुमय्या लोघदुम सानुमत प्रफुल्सम् ॥"
-रषुवम २।११
यहाँ पाटला गौ का सादृश्य धातुमयी अपित्यका से सपा केसरीरा
सादृश्य प्रस्न सोध्दुम से दिखाया गया है।
सारयम्बक पक्षकारों के मूल में विद्यमान साहश्प का स्वरूप तथा उमके भेद वस्तु की सम्यक् अभिव्यक्ति के लिए कवि गर सादृश्पविमान करता है तब उसका कहनावन्म सापुरपशान मिष्न भिन्न रूप धारण करता है और उसी के अनुसार भिन्न मिन मसकारों की अभिव्यक्ति होती है। 'अमुर वस्तु अमुक वस्तु के सदृश है यह सादृश्यहान यद्यपि उन सब शानों में मनुस्यूत रहता है, परम्तु उसके स्प भिष्ट भिन्न होगे हैं। कभी यह शान मनुभव काम धारण करता है तथा कभी स्मृति का । ज्ञान के ये दो प्रकार ही माने गए हैं - 'सर्वम्यवहारहेतुगु यो मुधिर्मानम् । सा शिविपा-स्मृतिरनुमति । संस्कारमात्रयम्य मान स्मृति । तविभन्न गानमनुभन ।' सर्कसंग्रह पृ २१ स्मृति की दशा म जिस अतकार का अभिम्पक्ति होती है वह स्मरगा संकार होता है। मनुमय का प्रकार का होता है-यपार्य तथा अयपा- "स द्विविध-पार्यायपार्यश्च ।" सर्कसंग्रह पृ० २३ अपपार्य अनुभव तीन प्रकार का होता है-संशय, विपर्यय तपा - "मयमार्यानमवमिविपः-संशयविपर्ययतर्कमेयात् ।' सर्कसंग्रह पृ. ५६ नहाँ तक कवि के मनुभव का सम्बन्ध है उसे हम सौकिक दृष्टि से न तो यपार्य कह सक्से हैं और न अयपार्म ही। कवि का यह अनुभव सत्प को आपार मानकर पसता है परन्तु इसकी सीमाएं उससे परे है। इस प्रकार कवि की दृष्टि से तो यह अनुभव सस्प है ही मौकिक दृष्टि से भी इसे मसस्प नहीं कहा जा सकता। उपमा, कमर, उत्प्रेचा, अतिशयोक्ति मावि मतकारों के स्वप पर विपार करने से यह स्पष्ट हो जाएगा । यदि मुना सौन्दर्य कविका पर्य विषय है तो कपिल अतकरणे में जमा 'मुस कमममिय' 'मुम कमसम्' 'मुखपमान मन्ये 'इदं मुसम् आदि प्रयोग परगा । इन सप - प्रयोगों की पना में कवि को यह माम ममा रहेगा कि यह मुसही है जिसके सौन्दर्य को अमिम्यक्ताने के लिए इस प्रकार के प्रयोग किए जा रहे हैं। यह कभी नहीं होता कि कवि मुस को मुख से भिन्न वस्तु समझकर उसो सापार पर याएरण करने सगे। यही नहीं ससन्छ तया मान्तिमान् मसंकायम भी जिनके माम क्रमश संशय तपा विपर्यय के पोतक है कपि का अनुभव भयपार्म शाम पी कोटि में नहीं जाता । ससह असवार में कवि को यो संशय होता है वह सौति पय से भिन्न होता है। यह कल्पनामम्य होता है । मतः कपि को इस अवस्था में प्रस्तुस वस्तु का शाम बना रहता है। वहीं यह संशय पवि को न होपर कमिमिवन पात्र को होता है वहाँ या वास्तविक होता है और फसत समयार्म मान के मन्तर्गत माता है। भ्रान्तिमान् मसंकार मे प्राति कवि को म होकर ममिमिवय पान को होती है। यदि को मह प्रान्ति कमी नहीं हो सकती। कारण यह है कि कवि का नदेश्य प्रस्तुन वस्तु का वर्णन करमा होता है। बत' यह वावश्यक है कि उसे उस वस्तु का शान बना रहे । शान्ति में यह सम्भव नहीं। प्रान्ति में एष वस्तु को सम्य वस्तु समान लिया जाता है । मस' यदि कवि को धान्ति हो तो यह प्रस्तुत वस्तु को अन्य वस्तु सममरर उस मम्य वस्तु का हो वर्गम करेगा मीर फलव यह पाठकों के सम्मुख प्रस्तुप्त वसु का विष ही मगित नहीं कर सकेगा। सादृश्य-प्रतीसि की बमस्मा म मिस बसकार की असिम्पत्ति होती है वह उपमा है । मुख कमसमिव इममा साहरण है। इस भवस्था में उपमेय तपा उपमान के पतिपय अवयों में ऐल्प तमा कतिपम में मनस्य प्रतीत होता है। इस प्रकार यह भेद तपा यमेव प्रतीति भी मवस्पा है। इस मवस्था म भेद-प्रतीति तपा बभेद-प्रतीति पर समान बस रहता है ।कमी कमी पह बस भेप्रतीति पर अधिक हो जाता है। यह भेद उपमेय के वापिस्य के रूप मे प्रतीत होता है। इस मवस्था में पतिरेक असगार की भभिम्पक्ति होती है । 'मुख कमलादनिरिभ्यते' इसका उपमानसर की सादृश्यप्रतीप्ति उसरोतर मात बदले साइप्पप्रतीति तक पहुंचती है। इसे भरोग की अपस्यारहते हैं । मारयप्रतीति की अवस्या में सो कुछ अपपयों में विभिन्नता बनी रहती है परन्तु इसमे वह सर्वधा सुख हो पाती है। उपमेय तपा अपमान के मवयव सर्वथा समान हो जाते है । इस अवस्था में रूपक की नपिम्पक्ति होती है । 'मुझे कमल मसि' इसका उदाहरण है। यहाँ मुख कमल के समान ही नहीं अपितु सदाकार बन गया है। इस अवस्था मे अवयों अमवा पर्मों की भेदप्रतीप्ति पयपि लुप्त हो पाती है, परन्तु अवयवियों अपवा पर्मियों की मेदप्रसीति यमी रहती है। यद्यपि मुख का कमस से तादूप्प स्थापित हो गाता है परन्तु दोनों की सत्ता पृपा पृथक बनी रहती है । मुम की सत्ता कमल की सत्ता म विसीन नहीं होसी । बत' सादृरप की यह प्रक्रिया और आगे बढ़ती है तथा उपमेय (धर्मी)मा निगरण प्रारम्भ होता है। उपमेय की इस निगरण अभिया में उटोवासकार की अमिम्पक्ति होती है। इस अवस्था को भातकारिकों में अध्यवसाय' की साध्यावस्था कहा है। इस मवस्या मे विषय का निगरम होकर विषय तपा विषमी मी सबया अभेदप्रतिपत्ति नहीं होती परन्तु इस मभेदप्रतिपत्ति की ओर हमारी मानसिक प्रक्रिया उम्मुम हो जाती है । 'मुख मन मम्ये के माय इस भवस्पा की ममिप्यक्ति होती है। इसमें मुल तपा ममत की पृषक सप्ता बनी हुई है । जहाँ तक स्वम्प का प्रश्न है पोनों के स्वम्म मिम मने हए परन्तु प्रतीसि ममम को ही हासी है। मत एम्पम ने इसे प्रतीति निगरह महा है। निगरण को यह प्रक्रिया उपमय के मिगीर्ण होने पर तथा उपमान मा मध्यवसाय होने पर समाप्त होती है। उग्रमा में पो अध्यबसाय साध्य था मह सब सिट हो जाता है । इस अवस्था म पापार को प्रभामहा न होर मप्यवसिम उपमान की प्रधानता होती है।' म्यापार घोसवणा समास हो जाता है। इस अवस्था म अभिम्पस अनबार बनिमयोक्तिपहलाता है। कमसम् सर उवहण है। यहाँ मुसपी सत्तागमन में विलीन हो विषनिगरानाभेप्रविषिपमियोऽप्पणय-समय ॥ २ विषपस्य निगम सत्यता प्राविकोपा । खनिगरसमति रापोतो । उपेवायो प्रतिनिगरगन् । समुद्रमप.५३ 1 "भसमयपश्विमापान्दम्-- सर्वस ५४ .
गई है और एक कमस ही अशिष्ट रह गया है। इस प्रकार यहाँ मुख की प्रवीति का ही नहीं उसके सम्मका भी निगरण हो गया है । यस सम्पा ने अतिश्योक्ति में स्वरूपनिगराण स्वीकार किया है। यो सादृरमविधान मुख तथा कमस म सादृश्य स बारम्भ हुआ पा वह उनक साप्प तथा मुन की निगरणप्रक्रिया में से होता हुआ सनो सपथा एक्प मे समास होता है और केवल नमल वप रहता है। मत कवि की कल्पनाबुद्धि सादृश्य, साटूप्प निगरण प्रक्रिया आदि विभिन्न अवस्थामों मे से होती हई ऐप तक पहुँम बातो है। इन भिन्न भिन्न अवस्थाओं में भिन्न भिन्न असहारों को ममिष्यक्ति होती है। सादृश्यस्थिति मै उपमा, उपमयोपमा सपा मनन्यय की, मादृप्यावस्था म पर परिणाम, उन्नेम समा अपहर्तुति की निगराणप्रक्रिया की अवस्था में उत्स्वेता को तपा एक्यापस्या में मतिमाक्ति की अभिम्पति होती है। कभी कभी कवि की दृष्टि वस्तुओं के सादृश्य की ओर म होकर प्रयान उनके सापारमधर्म पर पेन्द्रिन रहती है। उसकी दृष्टि मा केन्द्रविन्दु पस्तुर्मों पा सादृरय न होकर नो सगरणराँ रा धादृरय होता है। घावारणपो की इस सदृरप-प्रवीति म प्रतिवस्तूपमा सपा वृधन्त की मभिष्पत्ति होती है। प्रतिषस्तूपमा म जिन सापारमयमो मे सादृश्यप्रतीति होती है ये वैसे तो एक होते है परन्तु बामयभेद के कारण उनम भेद समित होता है। इस प्रकार भेद सपा अभेद के फलस्वरूप इनमें साइरय प्रतीत होता है। दृष्टान्त मे जिन सामारणयों में सादृश्यप्रतीति होती है वे मिन होते है परन्तु उनमें एरा सानाम्य तत्व होता है। इसो फलस्वर सट्टा प्रतीत होते है। प्रतिपस्मृपमा में सामारणपों के इस माहरप की संज्ञा स्मृप्रतिवस्तु माव रती गई है।सपी परिभापाए इस प्रकार है- सम्मम्मिनपस्व षमस्य विमानम्" ~पित्रमीपामा पृ २१ 'भापयामियोरपि वस्तुन एमसविनि वस्तुप्रतिषस्तुमाव' - रसगतापर १२६ इन परिमापाओं से यह स्पष्ट है कि प्रतिवस्तूपमा में सापारगमों में माश्रयमेव के कारण भेव लसित होता है। ये सापारणधर्म बस्तुत एक भले ही हों आपय मा भेद इनके स्वरों में कुछ अन्सर अवश्य माता है तथा हमें इसी रूप में इनकी प्रतीति होती है। पदार्थों के सादृश्य के समय हमारा प्रयोजन उनके इसी प्रतीत स्वरप से होता है अन्य किसी प्रकार स्वरूप से नहीं होता। प्रतिवस्तूपमा के मिससिमित उपाहरण से यह स्पष्ट है.- "धम्यासि वैवमि ! गुणैस्वार्यया समाप्यते मैपपोऽपि । त स्तुति का मलु पत्रिकामा सम्धिमप्युत्तरमीकरोति ।।" -साहित्यदर्पण पृष्ठ ५५४ यहो घेदी के समाकर्पण धर्म तपा पन्द्रिका के उत्तरमीकरण धर्म मे सादृश्यप्रतीप्ति होती है । समाकर्पगधर्म सपा उत्तरनीकरणधर्म वस्तुस' एक भमे हो हो हमें उमकी प्रतीति विभिन्न मों में होती है । इसका कारण उनका माभयभेद है । समार्पण का यहाँ सम्मम्प वैवर्मी तमा नेपप से है तपा उत्तरसीकरण का सम्बन्ध चन्द्रिका तपा समुद्र से है। इन बिभिन्न सम्बों में फमस्वल्य समाफर्पण तपा उत्तरमीकरण के स्वरुप मे अमर मा बाता है। दो चेतन वस्तुओं से सम्बद्ध होने के कारण समार्पण का स्वरूप अपेतन वस्तुओं से सम्पद तरसीकरण से भिम प्रतीत होता है। मत इन दोनों धर्मों में अमेव म मानकर सादृश्य मानना उचित होगा। यदि समाकर्पमा तपा उत्तरमीकरण म सावरपप्रतीति न मानकर बभेदप्रतीति मामी बासी है तो सामारणपर्म की बनुगामिता तपा पस्तुप्रतिवस्तुभाव मे कोई अन्तर नही होगा । प्रतिवस्तूपमा में साधारणधर्म का बस्तुप्रतिवस्तुमाव सर्वसम्मत है तथा यह साधारणषम पी बनुगामिवा स भिष्म माना गया है। दूसर पनि प्रतिरस्नुपमा म साधारणपो में मभेद माना जाता है यो हमारी पृष्टि का केन्द्रविन्तु सापारणधर्म म होकर एमर्माभिसम्बम्प हो मायगा । यह मानना उचित नहीं । वृष्टम में सापारणपों के मादृश्य मी संशा निमप्रतिबिम्बमान है। इमको परिमापा मिनसिरिमन है- २७ "वस्तुतो भिन्नयोधर्ममो परस्परसादृश्यादभिन्नतयाभ्यवसितयोद्विरुपादान बिम्बप्रतिविम्बमार" -चित्रमीमाता पृष्ठ २१ इसका उदाहरण मिसिखित है- 'अदिन्तिमुणापि सत्यविमणिति कर्णेषु वमति मनुषाराम् । अनभिगतपरिममा हि हरति दृग मानतोमाला ।' -~-साहित्यार्पण पृष्ठ ५५५ यहाँ कसे मधुपायवमनम' तया 'नेत्रहरणम्' सामारसयर्म है। इन दोनों में प्रीतिजममत्वधर्म विधमान है। अत इनम साम्य है। यह कहना कि दोनों परसान प्रोसि मे होता है अत दोनों म ऐक्य है उपिस महीं। दोनों के प्रीतिगमास्व प्रकार में भेद है सपा दोनों से उत्पन्न प्रीति मै विलक्षणता है। साहित्य-पग के टीकाकार श्रीरामपरणमट्टाचार्य मे इसका समर्थन किया है। कभी कभी कवि की दृष्टि वस्नुमों के एकधर्मामिसम्बन्ध पर कन्द्रिय रहती है । इस अवस्था में दीपक तुल्पयोगिता तमा सहोकि की अभिव्यक्ति होती है । तुस्ययोगिता की निम्नमिसित परिमापा से यह स्पष्ट है. "प्रस्तुसानामप्रस्तुनानो या यदा भवत् । एमपर्माभिसम्पन्न स्याता तुस्मपारिसा ।' पाहिएपदर्पण पृ ५५१ इस परिमापा के अनुसार एमपर्माभिसम्मन्य इस मलद्वार का आधार है ।इस असदार कनिममिमित सदाहरण पर यह मात परितार्थ होती है- "दंगमार्दन द्रष्टु कस्य विते न माससे । मामतीत्सावासीमा कठोरता ॥" - साहित्यदर्पण पृष्ठ ३१२ यहा माप्सती मावि मा एक कठोरतापर्म से सम्पप दिखाया गया है। दोपर या सहोक्ति म भी यही गात होती है। कभी भी कनि प्रस्तुम वस्तु को मप्रस्तुत क सदृश पबहार करते देसवा है। प्रस्तुत पस्तु के साम प्रस्तुत के सादृश्य पर उसका प्यान १ प्रविमनन एप पपमानासयपि मीदेवतदयपरलपपमिति भागा" -सरियपण ५५ १२८ केन्द्रित न होकर फेवस उनके व्यवहारसापूरम पर यह केन्द्रित रहता है और इसी व्यवहारसादृश्य के कारण उसे मप्रस्तुत की प्रतीति होती है। इस अवस्था में समसोक्ति बलधार की अभिव्यक्ति होती है- 'पाधूय यद्वसनमम्मुगसोचनाया वहोगयो कनककुरमविसासमानो । मासिङ्गसि प्रसममङ्गमशेपमस्पा धम्पस्त्वमेघ मतयाचसगन्धवाह ।' -साहित्यदर्पण पृष्ठ ५६३ यहाँ पायु हमामुक मा आचरण करती हुई प्रतीत होती है। वायुक इस प्रकार के मायरस से मामुक भी प्रतीति होती है। कभी भी प्रस्तुत ने साय सप्रस्तुत के अत्यधिक व्यवहारमावरम कारण कवि को प्रस्तुत में प्रस्तुत के ही दर्शन होते है और वह उसी का वर्णन करता है। इस पता में अप्रस्तुतप्रसासकार को अभिव्यक्ति होती है। सादृश्यमूलक अपसिझरों का यह वर्गीकरण कमि की चित्तवृत्तियों के यामार पर किया गया है। जो ममदार मिस चित्तवृति में मभिव्यक्त होता है वह उससे सम्बद है। भारतीय बासहारिकों में इसके वर्गीकरण में विश्पत भापा तथा उससे प्रभावित होने वाने सहृदय को मापार माना है । यपि मापा एक माध्यम है जिसके द्वारा कवि साइवय को अपनी ही अनुभूति तक पहुंचाता है पापि कवि को चित्तवृत्ति को भाधार मानकर भो वर्गीकरण किया गायगा उसमें भाषा तथा सहरम को आधार मानकर लिए एए वर्गीकरण से सागरण गितहपता आ जाना स्वाभाविक है। भाषा के प्रत्येक प्रयोग के लिए सत्सम्बर कषि पी पित्तवृत्ति दूग्ना मगमव नहीं । मत मापा के मापार पर किए गए कतिपय भेनें की माझ्या कवि की चित्तवृत्तियों के आधार पर सम्भव नहीं । दोनों की पाल्पाप्रणामी में भी साधारण मन्तर स्वामाविक है। कषि को पित्तवृत्ति अपवा मनुभूति से सरान ममिम्यक्ति की प्रक्रिया मषा पस ममिष्यक्ति से उसान सहदय की अनुभूति की प्रमिया में मम्तर है।
२०४
मापा सभा सहाय को आवार मनकर किए हुए वर्गीकरण में
भमसार का हेतु अलेगार भद का निर्णापर होता है । भापा अपने से
सम्बट मर्प के सदस्य कृदय में घमसार उत्पन्न करती है। यह
समसार ही मन्त्रकार होता है । अत इनार वर्गोकरण इनके पमलारहेतु
रापार पर ही सम्भव है। बालकारियों ने वर्गीकरण के इस आधार
को स्वीकार किया है । अलंकारों की परिमापा मे उन्होंने पमस्कारी अपवा
उसके पय यव पी सुन्दर हम आदि शन्दों का प्रय' प्रयोग किया है। एक
सपमा की हो परिभाषा में। इससे मह स्पष्ट हो जाएगा।
"सादृश्य सुन्दर वास्पार्योपसारकमुपमालकति -"
रसपगाधर पृ०
'हज सापर्यमुफ्मा" हेमचन्द्रमामानुगासम ११६
"ममत्वारि साम्पमुपमा माग्मट-काम्यानुनावम पृ. २३
'उपमानोरमेमस्पयाम्पयोरर्ययोदयो।
इस धामम्पमुग्मत्युच्यते पायोनिभि ।" चित्रमीमांधा पृ. ७
भपमी परिमापा की प्याक्या करते हुए भगनाप लिसने है-
"सौन्दय प चमतस्यावायासम् । पमतियनविप सापहरय
प्रमाण रसगंगारर पृ० २०४
इस प्रकार जगनाय ने सादृश्य को उपमा पा समस्यापायक ममया
उस पमसार का इंतु पहकर चमत्कारहेतु को स्पटम मलकार पा
मामार पीचर किया है। अन्य पासवारिकों के साथ भी यह पास है।
जिन मासारियों ने ममगर को परिमापामों में इन शम्दोंपा सभिवा
नहीं किया है। मसंगार सामान्यमान के मासे चमत्कार को
यहाँ मावश्या समान है । मासकारिता पाय पिएए अलका के
वर्गीकरण की मानोपना इसी दृष्टिकम्य स उचित है।
मालफारिकों द्वारा किया हुआ सादरपम्लक अलंकारों का घर्गीकरण तथा उसकी प्राणोचना रम्पकात निरूपण का विवेचन- रूप्यक ने सादृश्यमूलक असगरों का वर्गीकरण किया है। उनके अनुसार उपमा इन अनेकारों के मूम में है।' उपमा को सादृरय अपा सामग्ये कहा था सकता है । स्पा के अनुसार सापम्प तीन प्रकारका होता है-मेदप्राधान्य अभेवप्राधान्य तथा मेवमेवतुल्यस्व।' उपमा अनन्वय उपमेयोपमा तथा स्मरण को सम्यक ने भेदाभेन सुम्पत्व भाषित माना है ।' स्य्मक ने यहाँ स्मृति में बाधार का विवेचन पंतनाश के म को पृपक रसकर किया है। यहाँ पेतमाग का म स्मृति होता है । स्मृति मान का एक पृषा भेद मानी गई है । अस प्रस्तुत प्रकरण में स्पसहित चेतनोश को सभ्य करके यदि स्मृति को स्मरणालंकारा मावार माना जाए तो अनुचित न होगा । मभेदप्राधान्य के स्य्यक ने दो भेद किए है-मारोप सपा अध्यवसाय ।' सक, परिणाम, सम्रेह, प्रान्तिमार, उस्लेस सपा अपहनुति को उन्होंने मारोप पर यापित माना है। इस प्रकार प्रान्तिमान सपा सम्मेह मतकार जिममें चमकार कमय सादृश्यमूसर प्रान्ति तथा सम्देह पर पाभित रहता है इसी भेद के मन्तर्गत कर दिए गए हैं। १ "रमर प्रकारविम्पेसानेप्रकारबीचमूता-"ख पु. २४ २. "डायमे या प्रकारा:-मेदमपान्य म्पविरमद, प्रमेव सामान्य स्म सद पोखस्यत्व पथ उपमापार-' पल पृ. २४ "देते गरम मसपेन मेदाभेदारस्पापेमाय मरता-" ४ गप्पममेदाचाम्पे प्रारमर्मानकापन् हयित्वाप्पानगास्तव खपृ.॥ ..ऐपिर सख.१९॥
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"पत्र 'सहयुक्तऽप्रपाने' इति पाणिमिसूरेप विहिता सहायोगेप्रमाने हवीमा तय यमलकार' गुणप्रपममावावन्दिमयो' शाम्दार्पमर्यादया एकधर्मसम्बन्धस्य सवामस्पितिरिति ।'-यासबोषिनी पृ. ६७२ अब प्रश्न यह उठता है कि यहां पमलार का कारण यो वसों का एकधर्माभिसम्बष है अथवा सममें से एक का प्रधामत सपा अन्य का गोगत उस पर्म से सम्बद होना घमसार का हेतु है। इसका यही उत्तर हो सकता है कि चमत्कार का प्रमुख कारण यस्तुओं का एक्पर्मामिमम्बाप ही है । ममें से एक का प्रमामत तपा अन्य का गौणत उस धर्म स सम्बद होना केवल गौण है तथा प्रधान वमलार का उपकारक है। निम्नलिखित उक्ति इसी ओर संकेत करती है। "यदि तु दीपके तुल्ययोगिताया पोपमानोपमेययो प्रामान्येन किया विक्षपषर्मान्वय', इह तु गुणप्रभाममावनेवेति विशेष सम्मपि विम्पित्तिवि दोपानाषायकसया मानकारताप्रमोमक, अपिनु तवान्तरभेदताया इति विमान्यते, मिरस्पते प प्रापीनमुखातिएपम् तदा निविशतामियमप्प संकारान्तरेवेव, किरिसमययमाश्वासकारभेदे बमनममीनामानल्या. दमकागनन्स्यप्रसंगादिति ।"- रसगंगापर पृ० , Yes इस उक्ति से यह स्पष्ट है कि सहोक्ति मे उपमान तमा उपमेय का धर्म के साथ सम्पन्न गुणप्रभाममाव से मुक मसे ही हो गुगप्रयानमाव अन पारता का प्रणेजक नहीं । प्रधानता एमपर्मामिसम्बम्प पी ही है। वही षमतार का पारण है । अत बलकार मा मूम है। उपमानोपमेय का धर्म से मुणपयानमाय से सम्बम्प अवान्तर भेट का प्रयोग वा वा सकता है । एकपर्मामिममन्प सुस्पयोगिता तपा दीपक में भी होता है।' अत महोक्ति को उन्हीं का एक भेद कहना उचित होगा। १ वापत प्रसतानामपा वा पदा मोत् । पापामितम्पा म्पाचदा गुम्पमागिता it साहित्यदर्पण १.10 "अप्रस्तुतयस्तोकि निगपते-' -सायिगर | जीमपाई पर सिद रती हैं Bासपोगिता या दीपक में समर्मा मिसमर सेवा।
उमट मे एक मन्म पापार पर सहोक्ति को दीपक से पृपक सिट करने कायम रिया है। इनके अनुसार दीपक म दो सम्तुओं से सम्बर एक पर से पासित गा पा लियाएं होती है ये समकालीन महीं होती। महोकि में इसके विपरीस वे समकालीन होती है - संबहार धारकान इत्यानावपि पोनेन बस्तुदयसमवेते है ये रमेते मतभ तत्रापि सहोत्तिरव प्राप्नोतीस्मानयोक्तम्-सुन्यकाल इति ।" काम्पातकारसारसमह पृ. ७२ समट का यह मत पूर्यत सत्य महीं। यह ठीक है कि महोक्ति में एक राम्द से थोतिम विभिन्न वस्तुओं की क्रियाएं समकालीन होती है परन्तु दीपक मे ये सव असमझासीन हो ऐसो गात महो। 'प्रस्तुप्ताप्रस्तुतमो दपिकं तु निगपत" दीपा की इस सामान्य परिमापा के मनुमार दीपक लिए बस इतमा आवरमक है कि प्रस्तृत तमा अप्रस्तुत वओं का एक धर्म से सम्बन्ध होना चाहिए। यह धर्म परि जिया है सो फेवम इतना मावस्यक है कि इन वस्तुओं का इम प्रिया से सम्बन्ध हो । मस्तुओं इस मिया से सम्बर होने के कारण इन वस्तुओं की भी विभिन्न किया होगी उनके लिए बसमामीन होना पायरया नहीं। वे समकासीम सपा घसमकालीन में से कोई भी हो सकती है। दमरे प िदीपम मियामोरे लिए असनमानीन होना आवश्यक मान सिपा नाए तो मी सहोक्ति म उसका यह भेद दोनों क पृमा असकार होने का माधार नहीं हो मरता। पोपट म परमार का कारण वस्तुभा मा एकधर्मामिसम्मम्प होता है। विभिन्न वस्तुओं म सम्बत न धर्मों का धमकामीम अमवा मसमा सोन होना पमसार नापारण महीं होता । सहोति म भी बममार मा पारण बस्तुओं का पायाभिममन्य ही होता है । इस प्रकार धमसारहेतुर्मों के समान होने कारण दोर तपा महोतिको एप मगार के अनर्गत मानना उचित होगा । दूसरे पस्तुमा मे ममर एक पम मना पिया ही हो ऐमी बात नहीं । यह रिया के अतिरिक्त गुण माद भी हो सकता है। वहीं धर्म मिमा होगा यहाँ तो प्रियाओं के १ मपण.16 समकालीमत्व तपा बसमकालीमत्व के मापार पर दीपक तथा सहोकि में बोक्षिक भेद मिया मा सकता है, परन्तु महा यह पर्म गुण आदि होगा वही दीपक तथा सहो कि के भेद कामपा भावार होगा ? यत' इन वसंगारों को पृषक पृपा न मानकर एक मतकार के भेद मानमा उचित होगा। तुल्ययोगिता दीपक प्रतिवस्त्रपमा, मिना तपा पृष्टान्त को एम्यक मे गम्पमानापम्य पर माभित माना है 'मौर उनको एक प्रेसो में रमा है । गम्यमान औपम्य के आधार पर इनका विमामन नचित महों । यदि गम्ममानीपम्म अथवा ध्यम्म सादृश्य विमानन का आधार माना जाता है तो उपमा को छोड़कर अन्य मय मादृश्यमूना मलकार एक ही ग्रेणी में जा बाएंगे । उस पशा में गम्यमानौपम्य के अन्तगत उपर्युक ये पांच मनकार ही नहीं रहेंगे अपितु उपमा के अतिरिक्त मन्य सब सादृश्यमूलक मनकार या पाएंगे। दीपा तपा सुस्पयोगिता में पमसार का कारण एकमर्मामिसम्मम्म होता है। सहोक्ति में भी यही गस होती है। इसका विवेचन पहने किया मा चुका है । मत इन तीनों को एक ही मसकार के भेद मानना उषित है। रय्या तुस्पयोगिता तपा दीपक पो भिन्न भिन्न नसकार मानते हैं। इमरे अनुसार दीपा में उपमानापमेयमार बास्सा होता है परन्तु सुस्पयोगिता में वह वैचित होता है। सम्यक के अनुसार उपमेय के लिए प्रस्तृप्त होना सपा उपमान के लिए मप्रसृप्त होना आवश्यक है। दीपर में एप पर्म से सम्मत वस्तुएं प्रस्तुत सपा पप्रस्तुत होती है। मत वर्ष उनमें उपमानोपमेयभाव सम्भव है । सुस्पयोगिता में वस्तुएं मेवम प्रस्तुत षयवा देवम प्रस्तुत होती है । अतः यहाँ उपमानोपमेयभाव पहपकी इम्य पर निर्भर करता है।' १ एवमप्पबठायामो जालंधययनुत्तया गम्ममामीसम्माभपा परंपरा रानीमुष्पम्ने।' सबसपू. १ 6. मास्तर एक पूर्ण गुममारसिप्रो शुमापापविमोबा पिता, प्रारपिकलापारमिताप्रमरिताणानुमानोपमेयमार।" -सरल..॥ २ सम्पक का यह मत समीयोन नहीं । औपम्प के लिए केवल इसना भावश्यक है कि वस्तुओं मे कोई सागारमधर्म हो । मष दोया थपिए वस्तुओं में कोई साधारणपर्म होगा तव वे वस्तुएं पता ही उस साधारणधर्म के आधार पर सदृश हो जाएंगी। उनके सट्टा होने के लिए यह आवश्यक नहीं कि उनमे सनुप प्रस्तुत सया दुध मप्रस्तुत हो । सादृश्य की सामान्य परिमापा सद्विमानवे सति सदाभूयोधर्मवस्वम्' म इस प्रस्तुत सपा मप्रस्तुत का सग्निवेश नहीं। नगन्नाथ भी सादृश्य के लिए प्रस्तुताप्रसृप्त भाव को बावश्यक नहीं मानते।' बगमाप दोपा पा सहोतिको मुल्ययोगिता के अवान्तर मे मानसे है । तुरुपयोगिता मे एक धर्म से सम्बन्धित पार्य प्रस्तुत अथवा अप्रस्फुप्त होते हैं मोर दीपक मे वे प्रस्तुत तपा अप्रस्तुत हाते हैं। इस प्रकार तुस्पयोगिता तथा दीपक मे केवल आंपिक मे है। प्रथम मे अहो पम से सम्पर पदार्य या तो प्रस्तुत होने पाहिए या अप्रस्तृत वही सीपक में ये प्रस्तुत समा मप्रस्तुत दोनों प्रकार के होने चाहिए । जगमाय इस मांशिक भेव मो भिन्न मसकार होने के लिए पर्याप्त नहीं समाते । अत वे दीपक को तुल्ययोगिता के ही मन्वर्गस पर देते हैं।' सहोक्ति को इन्होंने तुरुपयोगिता तथा दीपक के अन्तर्गत माना है इसका विवेचन पहले किया जा चुका है। विधेयर को दीपर सपा तुस्पयोगिता को एक अर्मकार के भेद २ "नपदीपक बास्तवमीरम्य गम्पन्, उस्मानोपमेययो प्रावणासम्स. पोस्खा सावात् । उपगवाया व पेनिन, उपमानोपमेपसम्पामावात् । भवा पैलपपमिति पाप्यम् । उपमेयोपमानषोः प्रासाप्रावस्पाने मानामावात् । 'समिय बलं मतमि लम्' रापुरमेयोमाया प्रतीरे चौपम्पाना" -ग्यपर पृ. ४१६, ४५० १ "स्पयोगितातो राम धाममईति, पर्ममारा चमूलापा विधि परविरोछन्। न र मर्मस सदावेविरोऽपि पमियां प्रावधामावादम्पा माप्रायलेन पापयोगितामा पस्य विशेष विमाप्य पनि पोगितामा पमिया केवलप्रवास फेरसमस - विरोमय सम्पारसंघर tamar सामन्यसंप्रपा प्रदतक्पासषपापक्षमा" रगंगापर.४१ । मानने में तो कोई वापत्ति नहीं, परन्तु वे तुस्पयोगिता में पोपा का मन्तमपि न करके दीपक मे तुत्पयोगिता का मम्ताव करते है । दीपक अत्यन्त प्राचीम अनसार है। इसका स्लेस भरत मुनि ने भी किया है। माटपशाम में दीपक की परिमापा तथा उसका उदाहरण दोनों मिलते है । अतउसी में तुल्पयोगिता का अन्तर्माप उचित है।' हम दीपक को तुरूपयोगिता का भेद माने अथवा तुरूपयोगिता का दीपक का भेद मानें इससे बितेप अन्तर नहीं आता ।हमारा तासय केवम इतना ही है कि मैं दोनों पपा अकार न होकर एक ही मनकार विश्वधर को सहोक्ति का भी दीपक अपवा तुस्पयोमिता मे भन्तर्माण करने में कोई आपत्ति नहीं । बतदीपक तुल्पयोगिता समा सहो कि को एक हो अतकार के मेद मानना उचित होगा, उसका नाम कुष्ठ ही हो। प्रतिवस्तूपमा तपा दृष्टान्त में धमत्कार र पारण फमय सापरण धर्म का वस्तुप्रतिवस्तुभाव सपा मिम्मप्रतिविम्बमाय है। इस यास को एम्पा ने भी स्वीकार किया है।' रसगंगापरकार को भी मही मत मान्य १ "दीपमपि स्पयागिवामामेवान्तमति । मायावामामेव प्रातामताना पधर्माम्बप रवि ग्रामपाणिवाया एप को मेदा मुचिता । तस्मात्योगिताया मे माता दुरगाह इति, सचित्यन् । 'नानाविवरणस्थानो शम्दाना सम्पतिः । एमासन संयोगो पा दीपत्रमुप्पते । इति मारता भरतमुनिना सत्यागीकारत् वीर दस्पयोगिवन्तमवस्या- पिस्या तिरि । --प्रसभरमौतुम २९५, २६७ २ "वस्तुत'-दीपके परिवायां पै दम्ताया। बास्थ कर धर्माम्बपोऽत्र ३ गुरुमपानमामति विशेषत तरबान्तरमदम्पमेय साप्रपति म अतिरिकसम विभूतिपिरोपानापासवात् । तरमामा चीनानुमणमात्राप्रमाण- मेपास्या पर्पस्यन् । महंकारपस्नुम पु. ११ १ "प्रमापियामामाम्पसष विपतिमिमम पापापा प्रमा प्रतिषलमा। पितीपापसातापामते ।" HHH १३० है। उन मनुमार सापारणपम के पशुपतिवस्तु पार तथा दिनप्रतिबिम्ब माय मापार पर ही बालो की पृपक्सा सम्भव है । परन्तु यदि इन दोनों को एक ही असकार के दो भेद माना जाता है तथा यातुपतिरस्तुमाव एवं बिम्बप्रतिविम्वभाव को केवल अवानर भेद का कारण माना जाता है तो नहें इसमें कोई आपत्ति नहीं - "तस्मादस्मदुव पपा प्रागीतविहितोकिारयोरनयोविभाग संग ममीय । यदि तु न पा दाधियय तदैक्स्पैवासकारस्य हा भेदी प्रतिषस्तूपमा दृष्टान्सध । यथानमो लिपिसमययं तत्प्रभेदताया एष सापकम् नाल- भारताया इति मुवधम् ।"--रसगंगापर पृ० ४५५ इससे स्पष्ट है कि रसगंगायरकार को हम अमाये के पूरक मानने में कोई वाह महीं। वहें बारह है तो केवत इतमा हो कि यदि हम असकारों को पपर माना पाता है तो उनकी पृथक्ता का मायार साधार पधर्म का पस्तुप्रतिवस्तुमाव ता रिम्पप्रतिविम्ममाव ही हो सकता है भौर कोई नहीं। विशिनीकार का मत इसस भिन्न है। नो मनुमार प्रतिषस्यूपमा में मप्रस्तुत वर्ष का उपादान प्रस्तुम मर्प के साथ सादृश्य दिलाने के लिए होता है, परन्तु दृष्टान्त में यह सादृश्यप्रतिपत्ति के लिए न होकर प्रस्तुतार्य के स्पष्टीकरण लिए होता है- "विशिनीकारस्तु प्रतिस्पमायामार्पोपान तेन सह प्रातात्म सादरमप्रतिपस्पर्पम् । दृष्टम् तु तदुपाचन मे प्रयोऽर्थो न्यमापि स्थित इति प्रासाप्रसीतविमदीकरणमाघार्पम्, न तु सादृश्यप्रतिपत्त्यर्थम् । बत सादृश्यप्रतीस्परवीतिभ्यामनयोरपेयरपोद।"- रमपंगाधर पृ०४५ रसगंगापरकार इसका सएन पसे हुए मिलते है कि प्राम समा मप्रान्त का उपायन होनों में समान सप से हवा है। बस यह महमा समित नहीं कि एक मे सादृश्य प्रतीति होती है सथा अग्य में नहीं होती। दूसरे प्रतीति की स्पटवा सादृग्प का हो दूसरा नाम है "प्रासापावापायोसाशनस्पसंपाराऽप्यविशिधापार भाइ रमप्रत्ययः, मम्पत्र नलिस्पागामात्रत्वात् । परीत्यस्यापि सुरवस्वाप । एतादृशोऽर्थोऽन्यापि स्थित इति प्रवातोतिविमदीकरणस्य स्वदमिहि पस्य सादरगरपयिता।" रसगंगाधर १०५ १३८ रसगंगापरसार द्वारा विविनीकार के उपर्युक मत का इस प्रकार मण्डम उपित ही है। दोनों अमकारों में सादरपप्रतीति समान रूप से होती है । मत साधारणपर्म का वस्तुप्रतिवस्तुमाव तमा विम्वप्रतिबिम्ब भाव ही इन असकार्य का विमेवक है । परन्तु रसगंगापरवार द्वारा दोनों बसकारों को एक असंघर के मेव मानने के मिए तत्पर हो गाना पित नहीं । इन दोनों अलंकारों में वस्तुप्रतिस्तुभाव तपा यिम्पप्रतिबिम्बमाव के स में बमस्कारमेव स्पष्ट है । चमत्कारभेद ही अलकारभेद का हेतु माना गया है । यह बात रसगंगापरकार ने भी स्वीकार की है। वैसे तो सादृश्य बनेक अर्मकारों के मूम में रहता है, परन्तु रसगंगापरवार मे पमा को उमसे पृपा इसीलिए माना है क्योंकि उपमा मे वह सादृश्य चमत्कार का कारण है परन्तु दूसरों में नहीं। इसीलिए उन्होंने रुपमा की परिभापा में 'सुन र साम्य को साम्य का विशेषण बनाया है।' बत प्रतिस्पूपमा सथा दृष्टान्त को भिन्न भिन्न असंकार मानना ही उचित होगा। एम्पक मे समासोक्ति सपा मप्रस्तुतप्रशंसा को विशेषमविम्पित्ति' पर भाभिस मामा है । ये दोनों सादृश्यमूतक अत्तैमार है । सादृश्यमूमक धन- कारों का चमत्कार किसी प्रकार के सादृश्यविपाम पर बाभित रहता है। बत' इन बलकारों को विशेषणविधित्ति पर बापित न कहकर म्पबहारसादृश्य के कारण प्रस्तुत तथा मप्रस्तुत में से किसी एक के पाय अन्य के बाप पर मामित कहना अधिक उपयुक्त होगा। इनकी निम्मसिमित परिमापामों से यह स्पष्ट है- “परोक्किमेपक लिष्टे समासोक्ति" काव्यप्रकास सूत्र १४८ "अप्रस्तुतप्रसा या स्पारसेव प्रस्तुतामया" -सम्पप्रमश मूग १५१ यहां समासोहि की परिभाषा में लिप्टे' पम्द से यह तत्पर्य है कि वह अर्प प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत दोनों मोर सागू हो। 'मद से तात्पर्य केरस विपण ही महीं भक्तुि विरोपण के अतिरिक्त रे माप सब सस्य मो १ "स्व सुन्दर पापपारामुम्वइति-" रापापर.२.४ २ पिरोपयों समकार में गिरोस्पपिविचिते।
- सादृश्य के प्रतिपादक है। प्रदीपकार की निमलिमित उकि इसी मोर संकेत तो है- "बम विरोपणस्य लिएर चोपणम् प्राताप्रासमाधारणत्वस्म भोपम्पगत्वम्य साम्प्यस्य प सेमवात् ।' वासनोमिनी पृष्ठ ६१२ मप्रस्तुतप्रपीसा के प्रसङ्ग में मम्मट कहते हैं- "अप्राकरणिकस्यामिधानेन प्राकरणिकस्पाक्षेपोप्रस्तुसप्रश्वा" चाव्यप्रकाष पृष्ठ ६१८ पाममाचार्य का इस विषय में मत है- "तपा पाप्राकरणिकेम प्राकरमित्राक्षेपो प्रस्तुतप्रममा प्राकरशिकेना प्राफरगिजाप समासोक्तिरिति विवेक। एवं मान्यतान्सस्पान्यवृत्ता तापकसमलवीरमिति फसितम्।" लालबीमिनी पृष्ठ ६१८ इम सक्तियों से स्पष्ट है कि प्यमहारसादृग्य के कारण प्रस्तुत तथा मप्रस्तुत में से किसी एक के द्वारा अन्य का माप ही इन दोनों मसधारों के भमकार का कारण है। इम मतदारों में प का भी पमत्त्पर होता है। समासोक्ति में मह मप्रस्तुत के रूप में समा अप्रस्तुतप्रसंसा में प्रस्तुत के रूप में होता है। मत ये पम्पमूलक मसार है। परन्तु हैं ये असहारही। इन्हें पनि के मन्तर्गत रसना समित महीं। ध्यान में प्पम्याप प्रधान होता है परन्तु हममें वह मप्रमान है सया वाम्मा पासपमारक है। बात ये पनि के मन्तर्गत म होकर गुणीमूतव्यम के मन्तर्गत हैं। पमिनार का मही "प्रशारोन्यो गुणीभूतष्यम्य बाष्यस्य दृश्यते । पत्र पेप्प म्पये माध्यचारवं स्याप्रकार्यवत् ।।" --प्रन्यासोक ३३४ इस प्रमर भाषा मपवा तवन्य पमसार मापार पर सादृश्यमूसा मसारों का वर्गीकरण उपर्युक्त प्रभार से होता है । इसे सत्तेप में हम निम्म प्रसार से मिरा सकते हैं- मादृश्य के लिए सापारसपर्म की वापरयाता है। सादृश्य की परिमापा 'तमिले सति सदगतभूमोपर्मवस्यम् से स्पट है कि सादृरय के - लिए एक ऐसे धर्म की आवश्यकता है बो दो या मधिक वस्तुमों में विद्यमान रहे। यह मर्म उन वस्तुओं में रहकर उममे सम्बन्ध स्थापित करता है। बत सादृश्य एक सम्बन्ध-विशेष है तपा साधारणधर्म सस सम्बन्ध का हेतु है। यह सामारणपर्म दो प्रकार से सम्मय है-उपमेय सपा उपमान में इसका एक रूप से निर्देश हो अथवा पृषक म्प से। पृथक रूप से निर्देश पुन दो प्रकार का होता है-पस्तुप्रतिवस्तुभाव से अपवा विम्यप्रतिबिम्ब भाव से। इस प्रकार साधारणधर्म तीन प्रकार का होता है. साधारणवर्म का ऐक्म, वस्तुप्रतिवस्तुभाव सपा विम्बप्रतिविम्बमाव । पम्पक ने साधारण धर्म के यही तीन भेव माने है। इनके उदाहरण कम मिमलिलिस है- "मुझ कमसमिन सुन्दरमस्ति ।" "धन्यासि वेदभि ! गुणैरवारैया समाप्पत नेपमोऽपि । इत स्तुति का समु चन्द्रिकाया पदम्बिमप्युतरमीकरोति ।।" -साहित्यदर्पण पृष्ठ ५५४ "अविदितगुणापि सतविममिति' कर्णेपु ममति ममुपाराम् । अनषिगतारमप्तापि हि हरति दृशं मामतीमासा ॥" -साहित्यदर्पग पृष्ठ ५५५ प्रथम उपाहरण में एक ही सौन्दर्य धर्म मुख तथा कमस में उसी रूप में विद्यमान है । अत यहाँ साभारणधर्म में ऐसय है। द्वितीय उदाहरण में समाकरण सपा सत्तरसीकरण मे पस्तुप्रतिवस्तुभाव सपा तृतीय उपाहरण मपुपारावमन तपा मेहरम में पिम्पप्रतिबिम्बमाव है। भय सामारमपर्म मा निर्देश एक रूप से होता है सब सादृश्य दो प्रकार में सम्भव है-वाच्यतप से अथवा म्यम्याप मे । भव सादृरय गाम्य होता है तब हमारा प्यान सायारसपर्म पर पेन्द्रित न हार सन बस्तुओं के सम्पग्म पर कन्द्रित रहना है दिनको मह साधारणपर्म समय लिएए है। इस प्रकार इस दा में हमारी दृष्टि मा केन्द्रविन्दु मापारणवर्म म होकर १ वापि साधारयण्मस्प पचिरमुगामितकालयः विद् पस्नुमतिबस्नुमोन पदनिता पनिदेशे साम्पिभेदमा प्रतिवस्तूप- मावत् । सिप्रतिक्षिणमारो का सावत् ।'–प वस्तुओं का पादृश्य होता है मौर वही धमस्कार का कारण होता है। प्रस्तुत उदाहरण "मुख कमलमिव सुन्दरम्" मे हमारी दृष्टि मा केन्द्रबिन्दु सौन्दय म होकर मुख तथा कमल का इस रूप में सादृश्य है। इस दशा मे उपमा ममगार होता है। साधारणधर्म के एलय के निर्देश भेद के अनुसार सादृश्य भिन्न भिन्न स धारण करता है। ये साइप्य सम्मावना तमा ऐक्य है। य कमन सा, सोचा तपा अतिशयोकि अनार में होते हैं। कभी कभी यह सादृरय स्मरण, सरेह तपा भ्रान्ति के रूप मे अभिव्यक्त होता है। ऐसा क्रम स्मरण सन्देह तमा झाम्तिमान् बनहार मे होता है। साधारणषम की मनुगामिता की दशा में अब सादृरप व्यंग्य होता है तब हमारा ध्यान बस्तुओं के पारस्परिप सम्मम्प पर केनित म होकर उन पस्तुओं के सामारणपर्म से सम्बम्प पर ही केन्द्रित रहता है। इस प्रकार हमें वस्तुमों मे सादृश्य की प्रतीति म होकर एकपर्मामिसम्प्रम्य मी प्रतीति होती है मौर यही पमवार का हेमु होती है। निम्नलिखित नाहरणों से यह स्पष्ट है- 'मुख कमममिष सुदरमस्ति। 'मुबामाल सुन्दरे स्त।' प्रथम उदाहरण म सादृश्य वाध्य है। मत यहाँ मुल तथा कमन का मारय ममिप्रेस है। दूसरे उदाहरण म सादृश्य ध्येय है। बत वहाँ मुत सपा मम मा सौन्दप से सम्बन्ध मभिप्रेस है। प्रयम समाहरण का अर्थ है फि मुत कमस + मुमान सुन्दर है, मात् मुम नेसा मुगर है वैसा ही मुमर मम है अपवा मुम म जैसा सौम्य है वैसा ही सोन्य मम में है । मत एप हो सौन्दर्य मुन तपा कमस में समान रूप से विद्यमान है। फक्त दोनों मे सादृरय है। लिीय उपमहम म यह मान महों। सपा मर्य है कि मुम सपा ममम मुन्दर है-अयन मुम्ल मुनर है सपा कमल सुगर है मपमा मुस मे मौम्य है सपा कमन में सोन्य है। इसमा यह अर्थ नहीं निासताकि मेसा सौन्दर्य मुप म है जैसा ही सौन्दय पमत म है। बत' इमम धमत्तार पापारण मुस्त दपा मम पा सादरप म होकर हम दोनों का एक पर्म से सम्बन्ध धमलार मामार है। यह एकपसमिसम्बन्ध पीपक, तुस्पयोगिता तपा सहोक्ति में होता है। रसगमापरमार भी निभमिमित उक्ति दीपक तथा सुस्मयोगिता में विद्यमान इसी एकमसमिसम्बन्ध के चमत्कार की मोर संकेत करती है- "या यपोलमा पर्मियां पयोधर्माम्बय एवं चमत्कारी सम तुस्य योगिता दीपक वा । यत्र सादृशधर्मान्वयप्रयुक्त सादृश्यमभेदो वा वनोपमा समकादिकमेवासारताप्रयोबकम् ।" -रसगङ्गाधर पृष्ठ १२८ पव साधारणधर्म का निर्देश एफ स से न होकर वस्तुप्रसिपस्तुमाव से षयमा विम्बप्रतिबिम्बमाव से होता है तब हमारा ध्यान वस्तुओं के सम्बन्ध पर केन्द्रित म होकर उन धर्मों के ही सम्बन्ध पर केन्द्रित रहता है और पही चमत्कार का कारण होता है। मत इस वसा में मापारणमर्म का वस्तुप्रतिबस्तुभाष मपया बिम्बप्रतिबिम्बमाव धमत्कार का कारण होता है। बस्तृप्रतिवस्तुभाव का पमत्कार प्रतिवस्तुमा में तथा विम्बप्रतिबिम्बमाव का चमत्कार दृष्टान्त मे होता है। कमी कमी साधारपर्म का तो निर्देश भररम होता है परन्तु प्रस्तुत तपा मप्रस्तुत में से केवल एक का बमिधान होता है। मम्प पम्म होता है। इस पभा में साधारसमर्म के द्वारा मन्य मा बाप चमत्कार का कारण होता है। यह समासोकि तपा भप्रस्तुतप्रवसा में होता है। विधानाय पाप किये हुए वर्गीकरण की सदोपता विधानप का वर्गीकरण पमत्कार हेतु के पूर्वेस वापार की दृष्टि से सदोर सिद्ध होता है। इन्होंने सापा के तीन भेद किए है-मेप्रमान बमेदप्रपाम समा भेदामेवप्रधान।' उपक परिगाम, सह, शान्तिमात्, उल्सेन तपा अपहति को इन्होंने भमेदप्रपामसापर्ने परमपित माना है। इस प्रकार सम्ह सपा भान्तिमान् जिनमें पमरकार का हेतु मामा समेह तथा शान्ति है इसी प्रेणी में रख १ "गपम्प निषिधम्-मेवयानम्, प्रमेदमपान, भादप्रपान यति ।" -प्रतापपगोभूम् । २ 'मसापरिणामपन्देहप्रान्तिमारतेसापडगानामभेदमयन नपर्मनिरपनामम् ।
दिए गए है। दीपक तुल्पयोगिता, निदर्शना, दृष्टान्त, प्रतिवस्तूपमा महोक्ति, प्रतीप सपा व्यतिरेक को इन्होंने भेदप्रमालधाम पर बापित माना है।' इनमे केवप्त व्यतिरेक में ही धमलार बभेदप्रधानसाधम्म पर मामिव है। मत अभ्य मलपरों को इस श्रेणी में रखना उपित नहीं । उपमा, अनन्वय उपमेयोपमा तया स्मरण को इन्होंने भेदाभेवसाधारणमार्य पर बाभित माना है। यहाँ स्मरण को इस श्रेणी में रखना नचिस महीं । सो सभा अतिशयोक्ति को पहोंने मम्मवसाय पर आथित माना है। यह उपित ही है। समासोक्ति को इन्होंने विपरिध पर माणित माना है। इसे इसकी बपेधा ध्यपहारसादृश्म के प्रारा प्रस्तुत से अप्रस्तुत के माक्षेप पर वामित मानना अमिक उपयुक्त है। | "दीपासपोगितानिदनारतिबस्सम्मासहोमितीपम्पविरेश भेद प्रधानबम्य नियन" २ "ठप्मानमयोम्मेपोमामा मेयमेदवापारपरम्मत 1 "टदेधावियपा प्यवसम्मम्मे ।" ४, "साविको विरोपदीपिम्पमुमो-यपोभूस
उपमा
चामा की परिभाषा प्राय समी मानकारिकों ने को है, परन्तु उनकी
परिभाषाओं में पोग या अधिक असर है। एक बात पर ये आसपरिक
भवरप सहमत हैं मौर वह यह है कि इन्होंने अपनी उपमा की परिभाषा
मे सादृश्य साम्य, सापम्प आदि में से किसी एक गम का समिश
किया है। भरत दएको सरोव उगमाप तपा विश्पर ने मादृश्य राम
पा, वामम मामह, विणमास, विनाप तया वाग्मट मे साम्य शम्द का
सथा उमट, मम्मट, पम्पक एवं हेमचन्द्र ने सापये भर का सन्नियन
किया है।
कतिपय मानकारिकों मे सादृश्य साम्य अपवा सामर्म के अतिरित
मम्य पादों का भी मरनी उसमा की परिमापा म सभिदेश दिया है।
ये र प्रमानस तीन प्रकार के हैं -गुणनश अथवा उसका पय यवानी
पाय को सादृश्य आदि का कारण है उपमानोपमेय जिनमे सरप
स्थापित किया माता है तथा उपमा के मम्य अलंकारों से विभेद के
सूपा राम।
मामह तथा वामन मे गुणनेश तथा उपमामोरमेय दोनों प्रकार के
पायों का प्रयोग किया है
बिरुडेमोपमानेम देयकासक्रियादिभिः ।
उपमेयस्य परसाम्प गुसनेमेन मोपमा । -मामहालघर २।३०
"उपमानोपमेयस्य गुणनेशत साम्यमुपमा। -काष्यासकारसूत्र गरा१
दपी ने केबस गुणलेा के पपायवाची पद का प्रयोग किया है-
"यपाकश्चित्सादृरय योदभूत प्रतीयते ।
उपमा नाम सा सस्पा प्रपोज्य प्रवे॥'-काम्प २।१४
उरमट तया सम्यक ने उपमानोपमेय पा सनिषेग किया है
"
पतोहारि सापायमुपमानोरमैपयो ।
मिपोषिभिनयासाशियरपोपमा तु सत् ॥"
काव्यासकारमारसह १११५
3- "वमानोपमेययो साव भेदाभेदतुल्य वरमा।"~सर्वस्व सू० १५ मम्मट शिणनाम, निधनाप तथा विश्वर ने अम्य अमेकायें से भेद मूषक श ग सनिवेश किया है- "साप मुपमा भेटे" काव्यप्रकास सू. १२५ "स्पतासिन भिनन समतेन । पर्मत। साम्पमन्यम पयर्षस्य वाम्म कोषमा" -प्रसारख्यम्रोभूपण पृ० २१४ "सार्म वाध्यमवैगम्यं वारय समाग्यो ।" -साहित्यदर्पण २० । १४ "तकवाक्पवाय सादृश्य मिन्नयोपमा । -मसकारकौस्तुभ १०४ प्रयम परिमापा में भरे' के द्वारा अनन्वय का, दितीय में 'स्वत सिव धाविका या मादि का, तृतीय में 'बाम्य' आदि के द्वाय रूपमादि मा तपा पतुर्थ मे 'एक' आदि केरा उपमयोपमा मादि का ध्यवर मिया गया है। उसमा की परिभाषा में 'गुप्यत' भएमा इसक पर्यायवाची एय का पनि अनावरपर है। यह गुणलेश सादृरय श म मन्सर्भूत है। अत इसके पृथक् निर्देश की मावश्यकता महो। सादृश्य की परिभाषा 'तदिनस्वे सति तदासमूगोवर्मवस्वम्' की गई है। इस प्रकार 'सगवभू पोपपस्तम्' यपवा मपपपद्यामापयोग इसका एक भा है । यह मापनसामान्पपांग गुणपामाम्ययोग अपवा दिया-सामाम्ययोग के सर में होता है । अत 'गुएलेत' क पा निर्देश की मावस्यरसा नहीं। उपम मोपमप कमी पृषर निग की परिभार मे बावश्यम्सा नहीं । सादृश्य पान से न दोनों का काम पम सकता है। सादृश्य ऐसो दो पस्तुओं को मानकर बनता है निमम एक इमरी में समान हो । ये दो पस्तुए हो पा अमेय सपा उसमान होती है। जिस वस्तुमरामन्य पस्तु स सादृश्य दिया जाता है वह उरमेय होनी है तथा उसस निस सादृरप पिाया जाता है यह वरमान होती है। इस प्रकार उपमा मोपमेयभाव भी सादृश्य में यन्तहित है। उपमानोपमेयभाव के सादृश्य में इसी बन्ताव को सक्ष्य फरके मम्मटादि ने उपमा की परिभाषा में इन शब्दों का सनिवेश नहीं किया है। वामनाचार्य में इसका समर्थन समा में अन्य बनकारों से विमेव तत्वों का सनिवेश भी सचित महीं । अर्मकार-स्वास का निर्णायक पमरकारहेतु होता है। बत उसकी परिमापा में इस चमत्कारहेतु का हो सभिवेन होना चाहिए, चमत्कारहेतु से असमन अम्प अमकारों से विमेव तत्तों का महीं । विभेदक तत्वों का मन तो एक बाद भी किया है रिसा अलकारस्वरस से समा सम्बध नहीं बितना मर्मकार्य की पारस्परिक तुतना का तर्कप्रणाली से सम्पप है। अलंकार का मप समकार है। इस पमत्कार के पाप के मनुसार ही मिन्न भिन्न प्रकार बनते हैं । यत धर्मकार की परिभाषा में बमरसार अपवा उसके पय याची पदों का सनिवेश उचित है। पहां इन शब्दों का समिवेध नहीं भी होता वहाँ अपार के सामान्य सचम के द्वारा आप से इनकी उपस्थिति मामनी चाहिए । उमट, बाग्भट, हेमचन्द्र, बगनाम आदि मे उपमा की परिमापा में धमत्कारसूचक इल पों का प्रयोग किया है- "यन्येतोहरि साथम्यमुपमानोपमेययो । मिपोनिभिन्नामादिचन्दयोरुपमा तु सत् ॥" नाण्यानंकारसारसह १०१५ "चमत्कारि साम्पमुपमा ।"-कायाासन पृ०३३ "दर्य सापम्पमुपमा ।'-काम्पानुमासन ६।१ 'सादृश्य सुमर वाक्यार्थोपरफारममुपमामाति ।" -~-रसगंगापर पृ० २०४ १ . बोम्मानोपमेरस्यानुयोगितो पिना सापमाा सम्मपविरोध मोपरदले इति प्रमुपस्या प्रादेपेकापमानोपमेयस्म्पोरनुपोगिनीलामति न स्पून तपास्पर वि मालाबालपिनी ए. Rm जगभाप में अपनी उपर्युक्त परिगण में सादृश्य तथा सुन्दर भयो असिरित 'वारण पम्फारक कामी सनिवेश किया है । यम्य पनि वादियों के समाम अगमाय मस्रकार को गौण वपया अप्रधान स्वान देते तपा से प्रधान अर्म का उरस्कारक मानते हैं। जगताप रे मनुसार प्रपामता तथा मझारसा परस्सर-विरोधी है। परन्तु वस्तुस्थिति मह है कि बहा रमसार मनधर के कारण होता है यहाँ प्रधानता अकार की ही होती है और बही वारपार्य के रूप में ममिम्पक होता है। पाण्यार्य उससे कोई मिन्न वस्तु नहीं घिसका अलंकार उपचार करे । ऐसा तोतमी सम्भव है जब बर्मकार सम तथा मर्ष से मिष्ठ कोई वस्तु हो। परन्तु ऐसी बात नहीं । बसकार थम्ब तया वर्ष के रूप में अभिव्यक्त होता मोर उसी पाप। व्यम्याप पी प्रधानता की दमा में तो बसकार भव्यम्या से मिल पकर उसपा उपहारक होला सम्भव है परम पाण्यार्थी प्रधानता की रमा में ऐसी बात नहीं । यम्या पापा से मित्र होता है । मत उमरी मानतामोदा में वापा के स्व उपमा पर यादि उसके अंग होकर उसके उपस्कारक होते है। परन्तु जब प्रधामना वाभ्यार्म की होमी है तब ममगर उससे मिन होकर उसके उपस्कारक नहीं होते, परन्तु उसी रे स्वरूप होते है। विरंधर ने परिमापा में 'वाक्यार्योपरमार शम्द केस सन्निवेश के मिए जगनाप की मानोरमा की है.-- 'मार्पास्यास्यामाबादनलेपारत्वमित्युक्तम् न हि पाक्यार्प एवं कार्य ' इस मिपमे प्रमागमस्ति । सादृरयेन मुखस्यैवोतातस्य विरापतया तदरम्येणैव रसोरुपदि ।"-अनकारफोस्तुभ १० २५, २६ १ "R पावापरत्वमास्ति कधिषि प्रामादेन पठापा व मालाबालपरमपोस्रोिपास्तारपसमिया । रायपर पृ. २२० २ "पपभो गंगारे समीएस चिनियमित । स्पसादिरसरका पति पार" "पिरक्षा सतरामेन नापिन कपमान । सादिकारस्पानापनम् ।" -प्यम्पाक-१५ इसके अनुसार प्पयार्य की पना में भी यह आवश्यक नहीं कि असंकार पायार्थ का सपस्तारण हो। बव म्ययार्प रस होगा तब यह भी सम्मप है कि अगर उपमेय बिमाव का सरकप बढ़ाकर रस का उपचार करे मकिपाल्यार्प का । रसपी अमिम्पक्ति समस्त प्रारण से होती है उस एक वाफ्य से महीं। बत बर्मकार के लिए पाल्यार्प पा उपस्मारक होना कोई नियम नहीं। इस प्रकार सुन्दर हप अपवा पमतारी सादृश्य उपमा की परिभाषा के सिए पर्याप्त है और यदि सोन्दर्य अथवा चमसार यादि को बमपर सामान्य के स्वरूप के नाते यहां बाप से उपस्थित समझे तो केबस सादृश्य से ही काम पम पाएगा । कतिपय मानवारिक सादरय अपवा साम्म मा प्रयोग न करके साधर्म का प्रयोग परते हैं। यह पूर्व परिमापार्यों से स्पष्ट है । सादृरय सपा साधर्म में भेद है । सादृश्य में अवयवसामान्य के अतिरिक्त अवयपपिप का भी ध्यान रहता है परन्तु सापये में केवल सवयवसामान्य मा ध्यान रहता है । इसका विस्तृत विवेचम पहने किया पा चुका है। सादृरप तपा साधर्म्य क भेद को दृष्टि में रखते हए यह स्पष्ट है कि उपमा में सायर्य भी प्रतीति न होकर सादृश्य की प्रतीति होती है । 'मुक्ष कमसमिव मुन्दरम् इम उपमा के उदाहरण में साधारणपर्म सौम्पर्य के मापार पर मुन्नमा कमस से सादृश्य ममित है, मुन तथा कमस दोनों का साधारमपर्म सौन्दप से सम्बन्ध मभिप्रेत नही । महा समन्व मुमका ममम से है मुन तथा मम मा सौन्दर्य से महो । अव उपमा की परिमापा 'सुम्पर सापर्म्यम्' म करके 'सुम्दरम् सादृश्यम्' करमा उपयुक्त है।
उपमा के ताव - उपमेय सपा नपमान' सादृश्य के लिए ऐसी दो वस्तुओं की भावर मनसा है जिनमें से एक को दूसरी के सदन मताया माए । बिस पस्त को दूसरी के सदृश बसाया जाता है उसे पम्य रहते है तथा उमे जिसने सदा बताया जाता है उसे उपमान महसे है। सादरप के द्वारा उपमेय को तपमान के पास माया जाता है। एपमा का यही अर्प है।' 'मुख ममत मिव सुन्दरम्' इम उदाहरण में पमाम कमल के द्वारा उपमेय मुन को समीप सामा पाता है। यह समीप साना धर्मसामाम्पयोग के भारा सम्भम है। सौपर्य धर्म मृप में अत' यह उस कमल के समान है जो सौन्दर्प पा प्रतीक है | उपमान में साधारणधर्म या सणव सप्रमिय होता है। मत चमके साथ उपोर पा सदस्य दिखाने से स्पस्य में तम साभारणमर्म को प्रतीति मारही होती है जिस्वी परेय में प्रतीति गमा यदि को मभीए है। इसीलिए उपमान तथा उपमेय की परिमापाए निम प्रकार से की गई है- "साधारणपरत्वेन प्रमिट' पापमानम्, सदर्मपतमा पर्खनीय पार्प सपमेयम् ।"~-यालयोधिनी पृ० कतिपय विद्वानों ने नपमाम सपा उपमय पी परिभाषाएं अन्य प्रकार रोमी सपमान को रसमसवान् तथा उपमेय को निरष्टगुणवान् पहले ? वामन पापही मत है।' पपमान कोसागरपवान तण उपमेयो मिशन पाकर स्न गुण समपर्म के नागरस प्रारमग्नासक्ति महीं। परेमागे स्पामre ग्लाने से महिला प्रगतम एका मपपर्प सपा प्रतीयमानत शियन मही होता मोर महीम मारय पापास ग्रह BPा लिएर में गोपा अर्गा सण मीच में उत्त । मपितु हम सादृश्यमा प्रयोजन यही होता है कि उपमेया १ "परमपे में पने परिदिप्ते (रपमान्न नया टपमेय ब) अनये म्युम्मा होधिनी .५४ २ "मो तारमानीयो मिसागु नाम्पत् तापमान पर्मया म्पूमगु बनुपम् ।' पम्पहारस्पानिप.१४ उत्कर्ष मध्य अमिम्पक हो पार तपा इसका कारण भी यही होता है कि उपमेय मे कवि को गुण का उस्की प्रतीत होता है । इस गुणोत्तल को दिखाने के लिए पापि उपमेय का उपनान से बो सादृश्य दिन सा है यह इसीलिए क्योंकि उस मुयोकर्म का प्रदर्शन और किसी प्रकार सम्मम नहीं। यदि गुणोत्कर्ष तपा मुणापकर्ष के द्वारा उपमान सपा उपमेय में मेव माना माए सो उपमेय का साम्प उपमान से सम्भव नहीं । यह साम्प तो सभी सम्भव है पर इन दोनों में धर्म को सामारमवा मानी जाती है और वह भी बिना किसी उकर्य मयमा भपाप भनित भेदभाव के उपमान के लिए यह आवश्यक नहीं कि मह स्वस सिट हो । चपमाम पिमान का प्रयोमन उपमेय मे अभीष्ट सागरणधर्म की प्रतीति करना होता है। इसके लिए कवि करना का बाप लेता है और ऐसे उपमान की कल्पना करता है जिससे उसका उद्देश्म सिटहो सके । उपमान की सस्पता उपवा वसस्मता उसको परिमापा का अंग नहीं। अत कगि ऐसे उपमान का विषम करने में स्वतत्र रिसको सता मोक मे म दिखाई दे । भगभाप को निम्नसिस्ति सक्ति से यह सष्ट है- "उपमानोपमेययो सस्पस्वस्म सपणे प्रवेगामामामात्र दोपलेशोऽस्ति।" --रसगंगाधर पृ० २०५ जगन्नाय का कस्फ्तिोपमा का निमसिसित उदाहरण इस कपन का समर्पक :- 'स्वनामोमे फ्तत् भाति कमोनातु टिमोऽमक। सशीकविमतो मेरो सम्माम पोरग।"-रसगंगापर १० २०६ यहाँ शोकविन से सम्बमाम उरग उपमान है। यह सपमान सोक में अप्रसिदतिर मी इसके उपम म पनने में कोई वस्तु वापर महीं। कतिपय मानकारिकों का यह कपन उमित नहीं कि करिसतोरमा का उद्देश्य उपमानासर का अमाव बताना होता है मत यह उसमा म होकर सम्म मसंगार है। उपर्युक्त सदाहरण में उपमानामसर के मभाव की प्रतीसि म होकर मादृश्य की प्रतीति होती है । मत गनाप निसते हैं- -
१५५
"परे तु बस्था कल्पिोपमामा उपमानान्द्रयमारफतारवेनासंकाय
म्तरमार । तन। सादृश्यस्य अमत्कारितपापमान्तर्मानस्पेगोस्तित्वात् ।
सनिरपितस्वस्म सपणे प्रोमाभावात् ।'-रसगंगावर पृ. २०६
उपर्युक्त शोक की उपमा का बाहरण मानने के लिए विधेश्वर
में जगनाम की बासोपना की है। विश्पर अनुसार यह उदाहरण
उपमा का न होकर स्प्रेधा का है ।लक अनुमार उपमा मे उपमान
मासिउ म होना चाहिए ' उप्रेधा में यह वसिर हो सस्ता है।
विश्वेश्वर का यह मत रमित महीं । उपमा तया उपेक्षा का विभेदक
अमान की प्रसिदि तपा अप्रसिदिम होकर सादृश्य तपा सम्भावना है।
यह कोई नियम नहीं कि रेषा में रुपमान मरिमस्मित हो समा उपमा
में यह स्व सिर हो । विपनाम के मत का परिहार को समय
मप्पयदीपित मे यही बात कही है।'
भरतात प्राचीन मालकारियों के मस से भी यह स्पष्ट है कि उपमान
के लिए स्वत सिर होना आवस्या मही । भरतमुनि का कलिम्वोपमा का
निमलिमित बाहरण इसका मत है-
"सरन्यो धनयमित सीसामन्परगामिन ।
मतमा पियजन्ते चगमा इव पkar ||"-मारमशान १६ ॥ ५३
पहा 'गमा पर्वता' उपमान स्थत सिद्ध महीं अपितु कवितरित
है। मामन के अनुसार भी सिहोपमा में उपमान रेसिए सोन्प्रमिट
होना भावस्पक महीं।'
१ वर पिनयनामो मुदेव सविपोरग्स्पाय।"
-प्रसारपौतम पृ. २१
२ "asोचाम्पातपरे स्पनेत्युनमपुर । उखेवापानिवारस्प
विपरिपियोस्वादाम्पादिसम्मापनासपन र अम्पाप्मठपा व १
पदम्पा-पिर्मीमांत .
२ मा परिवाया ठिणमा पम्मानोस्मेनियमा ।
गुणापामापर।
प्रप्पाइरशासपु.
। कवि को उपमान-बयन के लिए कस्सना करने की स्वतन्त्रता अबरय है परन्तु वह मौफिक अनुपव की सपा अवहेमना नहीं कर सकता । लोक मे जिन वस्तुओं का सम्बन्ध वाषित है उनमें वह सम्पन स्पापित नहीं कर सकसा । अनि तया मन का विरोष लोमानुभव गय सिद्ध है। मपनी कल्पना फे मारा पवि इसका परिहार नहीं कर सकता । यदि वह ऐसा करता है तो असम्भव दोप माना पाया है- 'निष्नेतुयस्यादिव तस्य दीप्ता , भरा धनुर्मपनमण्यमान । जाम्बल्यमामा इव वारिपारा दिनार्षमाम परिवपिणो कति ।" -मामालार २।७ यहाँ सूर्य से वारिषाराबों का गिरना असम्भव है । अत यह उदाहरण सदोप है। सादृश्यविपान के लिए यह आवश्यक है कि अमेय सपा उपमान भिन्न हो । उसी वस्तु का उसमे सावृरय सम्भव नहीं । सादृश्य के सिए भेव सपा अमेद दोनों तत्वों की आवश्यकता है। उसी वस्तु का उससे सादृश्य दिनाने में यह सम्भव नहीं क्योंकि इस दशा मे बभेद तत्त्वमा लोप हो गाएगा मोर फलस पूर्ण एकता हो माएगी । हेमचन्द्र की मिसिमित उति पायही माशय है- "सायम्प घ वादिमिभिन्नानां गुणरियादिसामारणमर्मस्वम् । बभेवे कस्वमेव स्पात् । तेन 'पुरुप इव पुरुप' इति सत्यपि पुम्पारस्प पुष्परला मुगममपणे साम्पे नोपमा।'-काव्यानुसासन पृ० ३१९ पही मत भटका है।' महाँ उसी वस्तु का उसी वस्तु से सादृश्य वर्णित होता है, पहा पर्यवसान सादृश्य में न होकर अन्यसादृश्यम्यवर में होता है । अनन्वय में यही बात होती है। वहाँ उसी वस्तु का उसी वसु से सादृश्य ममिप्रेत १ "ठम्मानोपमेपमारय मास्पद सामगोपादाने सति मनधि, मय गौरिकाप गरिति । अत उत मिघोषिभिम शलादिरामपोरिति । महादयोऽत्र सम्मासिनिमित्तभूताः रिपार गौरिस्पमिधाने म प्राचिनिमिचर, गरबस्पबेरस्प प्रनिनिमिचापात् ।" -वाचि.15 .
म होकर अम्यसादरपथ्यवरऐद अपवा उसका अनुपमत्व अमित होता है। सादृरप स प्रयोमन इच' पद के सग्निवेश से महीं अपितु सादृश्य प्रतीप्ति से है। सादृश्य के लिए यह पर्याप्त नही कि शरदो द्वारा सादृश्य का वर्णन रयिा है परन्तु मावस्पक यह है कि हम वस्तुन सादृश्य की प्रतोति हो । सादृश्य का क्षेत्र भने तभा काप के वय उनम जुरे हए मॉं तक ही सीमित नहीं है परन्तु पार्षों पर सादृश्य की दृष्टि से विपार करना भी उसी के अन्तर्गत है। अस' 'मुलं मुनमिष' इस प्रकार शवों द्वारा सादृश्य के वणनमात्र म सादस्य को प्रतीमि सम्मम नहीं। पतिपय बातद्वारिक उपमान तथा उपमेय न मिन्नस्व के लिए यह बावरया समामत है कि उनमें सामान्यवि पभाव न हो । विशप भी सता सामान्य से पृथा नहीं होती। मत यहाँ उपमानोपमय म मामाम्य विमेपमाव हागा वहाँ भेगमाव के कारण सादृश्य समव मही होगा। जगनाय का यही मत है। इन अनुपार ‘एको हि दोषो गुणमनिपात निमप्रतीम्दो किरणप्निांक' नामक उगहरस म सामाम्म दोप तया गुण से फमा उना पिप इम्युमिरण क्या बक पृपा नहीं । अत उनम उपमानोपमेयमार सम्भव नहीं । अत यह उपमा का सहारण म होपर उदाहरणालद्वारा साहरण है।' नगमाय का मह मत समीपोम नहीं। अम्बय से हम उपर्युक्त भोप को इस प्रकार तिस समते है-- 'गुणसनिपान एको दोप दुरिणवा इस निमप्रति ।' इसम यह स्पष्ट है कि यहां सादृश्य गुणमनिपात पा दुकिरण म १ "परमेय दस्म स्पष्मानाम्मपद्य । असारपपिपमावस्तमिपारमन्परम् !'-मानहानसर ३ IM २ सामान्पादिय मेदाम्पनामितिविपापा अनिष्पाप्या उन्मार पनपताण्डमारयामरामविरित.। -तगंगावर पृ. २१ इनुरियनमानारिया रदात न मानव निरि'-गाभर १.२६ २. 'नम्रप्रमयस्प - तथा दोष का अंक से पृथक् पृय मणित न होकर गुणसग्निपात एवं दोप के सम्पम्प का इन्दुविरण एवं अंक के सम्पन्य से यमित है । यह सम्बन्ध निमग्यनिमन्चकमाव के स में है । दोप तथा गुससन्निपात का मिमसम्पनिमज्नकमाव बैंक सपा इन्दुफिरणा क निमम्पनिमम्मकभाव के समान है । यह कहना उचिप्त नहीं कि वो सामान्य वस्तुओं का सम्पन्न वो विभेप वस्तुओं के सम्बन्ध मे सदृश नहीं हो सकता । वित्तीय समन्ध के साप पुठीई वस्तुओं की प्रतीति से प्रपम सम्बध के साप पुरी हुई पस्तुजों की प्रतीति का भेद स्पष्ट है । यह मेवप्रतीति अन्य प्रकार से नहीं तो कम से कम सामाम्यविशेषमाव के स से तो स्पष्ट है । जिस सामान्यवि तपभाव को जगमाय मादृरमप्रतीति के बमाव का कारण बताते है वही वस्तुन' मेवप्रतीति का घोतक बनकर सादृश्यप्रतीति का कारण बनता है। यह कहना उचित न होगा कि रचनोपमा समा परस्परोपमा में ग्पमान तथा उपमेय म भद नहीं होता। पूर्व उपमेम के बार मे उपमान बन जाने पर रप्तनोपमा होती है। इसका उदाहरण इस प्रकार है- 'मणितिरिव मतिर्मतिरिव पेय घेप्टेव कीतिरतिविममा । चाम्मप्रकाश पृ० ५८० यहाँ पूर्व उपमा मा उपमेय मति मितीय उपमा मे उपमान मन गया है। यही नपमय उपमान में परिणत अवश्य हुआ है परन्तु उसी उपमा मे नहीं अपितु द्वितीय उपमा मे । इस प्रभार यहाँ उसी वस्तु का उसी वस्तु से सादृश्य न होकर इतना है कि पूर्व उपमा मे यो उपमय या वह द्वितीय उपमा में उपमान बन गया है। प्रपम उपमा मे चम पमेय का सपमाम उससे भिम है सपा द्वितीय में मी उम उपमान का उपमेय उससे भिन्न है। मत यहाँ उपमेय सपा उपमान म भेद न हो ऐसी मात नहीं । परस्परोपमा मे भी उपमेय तमा एपमान में भेद होता है- 'रमोमि स्पन्दनोदप्तमेश पनमन्तिम । भुवस्तसमिव म्योम कुषन् म्पोमेव भूतमम् ॥-पित्रमीमांसा पृ.१. १ वपिन ररानोमा, पपोमामुरमेयस्प यदि स्पानुपमानता।"-साहित्यदर्पण १.१५