Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Swami Shraddhanand

Uma Chaturvedi · 2011/03

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. समाज सुधारक स्वामी श्रद्धानन्द

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समाज सुधारक
स्वामी श्रद्धानन्द
उमा चतुर्वेदी

DPB New Delhi
अनिल मान
2619 20, मारिट,
नागr,किनी
र गमि,fri 110032
1989

विषय-सूची 7 13 19 25 29 32 38 53 59 66 1 पपन 2 नई दिशा की ओर ३ जिनसे प्रभावित हुए 4 गगाई 5 मोतीलाल नहरू गे भेंट 6मिर पामरे दिग्दन पेर और महात्मा 8 स्वामी दयानद से भेंट 9 परस्य जीयन 10 मरसारीतरी 11 साहौर में भायमा 12 मार समाज में प्रवेश 13 पांग्रेस गापार मरो भेंट 14 भाप गमाग में 16 मारममावरे 16 गमान धम मेपर 17 गुपन पाना गरों गीरि मे परम 19 एमगारे में 20 रोमारोमन दीपनाम: hीमारि 70 78 90 95 98 103 107 120 126

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1 बचपन समाजसुधारक क्रातिकारी विचारो के निष्ठावान समाज मुबारक श्रद्धानद का जम सम्वत 1913 विक्रमी (सन् 1856) को फाल्गुन मास मे कृष्ण पक्ष की प्रयोदशी को पजाब प्रात के जालघर जिले के पास वहने वाली सतलज नदी के किनारे बसे प्राकृतिक सम्पदा स सुसज्जित तलवन नगरी म हुआ था। जम के ग्रह लग्ना के अनुसार इनका नाम मुशीराम रखा गया था । ज म लग्न पनिका के अनुसार इनका नाम बुद्धि विवेक के देवता 'बहस्पति' पडा । सचमुच मुशीराम ज्ञान सागर के गुरु सावित हुए। श्री मुशीराम का जन्म एक सम्प न खत्री परिवार में हुआ था। इनके दादा का नाम श्री गुलाब राय था। जो उस समय के राजा नौनिहाल सिंह की रानी श्रीमती हीरादेवी के मुख्य मुग्तार व मुशी थे। इस कारणवा मुशीराम का परिवार एक राजसम्मान से भोनप्रोत प्रतिष्ठिन परिवार था। मुशीगम के पिता का नाम लाला नानक चद था जो हर कोतवाल के प्रतिष्ठित पद पर नियुक्न हुए थे मुशीराम के प्रपितामह का नाम सुखानद पा । इनका ननिहान तलवन मे या। नाना नानी को सुखानद से हार्दिक स्नह था। इसलिए उहोने सुखानद को तलवन में ही अपने पास रख लिया। सुखानद के तीन पुत्र और एक पुत्री थी। जो मुशीराम को मा थी। सुनानद जी के एक पुत्र का नाम लाला क हैलालाल था। जो उस समय महाराजा रणजीत सिंह के दरबार मे कपूरथला रियासत क वकील थे। उनले दूसरे पुन गुलाब राय थे। जो रानी हीरादेवी के पे। रानी हीरादेवी जव जाल घर आ गयी तो इही लाला 8 के पुत्र का नाम लाला नानक चद था जो मुशीराम के पिता थे। लाला नानक चद बडे धमपरायण, ईश्वर भक्त और बड ही शिव भक्त ५ । साथ ही साथ वे बडे याग्य और क्मठ व्यक्ति थे । त्यपनी योग्यता के आधार पर कपूरथला रियासत मे थानेदार के पद पर नियुक्त हो गये। लाला नानक चद ने बड़ी मेहनत और ईमानदारी मे अपन कतव्यो का पालन किया । वह बहुत ही कायकुशल और स्पष्टवादी और सच्चे व्यक्ति थे। उनकी इन विशेषताओ के कारण रियासत के दीवान दानिशचद से लडाई हो गयी। जिस कारण उहोने इस नौकरी को लात मार दी। नौकरी छोड़ने के बाद लाला नाना चद काफी परेशानिया म फस गये । उह काफी समय तक कोई अच्छी नौकरी नहीं मिली। इधर पारिवारिक जिम्मदारिया दिन प्रतिदिन बढती जा रही थी । उहें अपन परिवार को अच्छी शिक्षा देनी थी। लडकी प्रेम देवी सयानी हो रही पी। उसका विवाह करना पा। पर आर्थिक परेशानिया कुछ करन नहीं दे रही थी। सन् 1856 का समय, सामाजिक बदलाव का युग था। उस समय अग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह की आग धीरे धीरे सुलग रही थी। पूरे देश में अग्रेजो के क्पटपूर्ण व्यवहार के कारण वातावरण विस्फोटक रूप ले रहा था। स्थान-स्थान पर छोटी छोटी पटनाए घट रही थीं जो आन वाले समय मा समेत पौं । मानपुर, दिल्ली, मरठ, मासी, वगाल और विहार में विद्रोह की तैयारियां चल रही थी। उस समय ही ऐमा लगन लगा पा जस भारतवामी, अंग्रेजों को हिदुस्तान से निकाल कर दम पंगे। पजाव में भी अग्रेज विरोधी वातावरण तयार हो गया था। रिन्तु अग्रेज सरकार न यही चतुराई से विरोध की येल वहा बढन स रोक दी पो। इस वायजूद रत्तर और पश्चिमी भारत के प्रतिठिन नताओं न नि पानी कोशिन जारी रखी। हिसार में विद्रोह से अकुर पटने मग । अग्रेजी पोज को उसी समय हिसार पहचान के आदेश दिए गय ।

9 अग्रेज फोज अपन लाव-लश्कर समेत हिसार की ओर चल दी। उसी समय लाला नानक चद ने भी रोजगार की तलाश मे हिसार की ओर का रुख क्यिा। अग्रेज फौज शाम के समय हिसार शहर की सीमा पर पहुंच गयी। उसने शहर के बाहर अपना डेरा अल लिया । अग्रेजी फौज का माडर अपनी फौज हेतु भोजन के लिए बेचैनी से इधर उधर देख रहा था। तभी लाला नानक चद भी अपने घोडे पर सवार होकर उधर से गुजरे, उन्हाने अग्रेजी फौज के कमाण्डर को सलाम किया । अग्रज कमाडर भी भोजन की तलाश में था। उसे लाला नानक च द बहुत प्रतिष्ठित और सम्पन व्यक्ति लगे। उसने उहें तुरन्त अपने पास बुलाया और फौज के लिए भोजन की व्यवस्था का अनुरोध किया। फौज दिन भर की भूखी-प्यासी थी । अग्रेज कमाण्डर खुद भी दिा- भर का हारा-पका था। भूख और प्यास दोनो से ही क्लात था। इस स्थिति मे और अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह के कारण किसी से सहायता भागना भी उसे अनुचित लग रहा था ।किसपर विश्वास किया जाय और क्सि पर नहीं । हिसार मे भी अग्रेजो को अपन दोस्त और दुश्मन का फ्क करना आसान नहीं था। नानक चन्द के व्यक्तित्व मे अग्रजो के प्रति भासक सम्मान भाव था जिस कारण कमाण्डर ने उनसे सहायता माग ली। लाला नानक चन्द तुरन्त ही भोजन का इन्तजाम करन का वायदा कर हिसार रियासत के अदर घुस चले गए। उहोन हिसार शहर में प्रवेश करते ही देखा कि एक चौधरी के यहा भारी मात्रा मे भोजन की व्यवस्था है। चौधरी से पूछने पर नानक पद को मात हुआ कि उस दिन चौधरी के पिता का श्राद्ध था इसलिए ब्राह्मण भोजन की व्यवस्था की गयी थी। लाला नानक चद ने चौधरी को समझाया कि नगर के पाहर अग्रेज फौज मा घमकी है। इस कारण इतन ब्राह्मण भाजन करने शायद ही आ सकें। इस कारण इनना स्वादिष्ट भोजन व्यथं M. अगर यदी भोजन भूखे प्यासे अग्रेज सैनिको सर पहुंचा दिया 10 खाना व्यथ भी नही जायेगा तथा इसके साथ-साथ अग्रेज फौज प्रसन हा जायगी, चौधरी को अग्रेज सरकार से भारी इनाम मिलने की सभावना हो सकती है। चौधरी को लाला नानक चद की राय समझ मे आ गयी। सारे पकवान लेकर अग्रेज फौज के डेरो मे जा पहुचे । भूखे अग्रेज अधिकारी इतने भारी मात्रा म पकवान देखकर गदगद हो गये । उसने नानक चद को गले लगा लिया। उनका नाम पता पूछा और साथ ही साथ अग्रेज कमाडर ने जागे भी अग्रेज फौज की मदद करते रहन का आश्वासन मागा । लाला नानक च द ने तुरत ही उनकी बात मान ली। अग्रेजी फौज ने हिसार शहर मे फ्ली हुई विद्रोह की आग को बुया दिया । सेना ने नगर पर कब्जा कर लिया । धीरे घोरे हिसार शहर की हालत सामाय हा गयी। लाला नानक च द न अग्रेजी फौज की इस काम में भी सहायता की। इस कारण प्रसन होकर अग्रेज सरकार न उहें सरकारी सेवा में ले लिया और हिसार रियासत का कोतवाल नियुक्त कर दिया। कुछ समय बाद ही अग्रेजो न उहें रियासतदार धनावर सहारनपुर भेज दिया । उह अभी सहारनपुर आय योडे ही दिन हुए थे नि अग्रेजा ने नेपाल के पास नेपाल घाट की लडाई मे फौज के साथ भेज दिया। यहा भी लाला नानक चदन वही ईमानदारी और योग्यता के साथ अपने बायका सम्प-न किया। इसी दौरान उ ह पुत्र रत्न के 7 मे मुशीगम की प्राप्ति हुई। 1857 म सारे देश म अग्रेजों के सिताफ महान प्रांति फ्ल गपी । जगह जगह अग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह फैलन लगा । दिल्ली, अवध विहार यगाल, मध्य प्रदेश में विद्राह ने अग्रेज सरकार में छा शदिए । सारे देश मे अग्रेजा के विरद विद्रोह का वातावरण स्यापित पर दिया था। रोग सारे देश म ही यह भावना फंसा हुई पी पर अंग्रेज सरकार का सूप अभी अस्त होने वाला नहीं था। अग्रेज सरकार न यरी हा वैरहमी स यह विद्रोह दबा लिया। माना नानर पन्दन इस पास में भी अप्रेमो पा भरपूर साप 11 दिया, जिसके इनाम मे उन्हे बरेली शहर मे पुलित इस्पेक्टर वना दिया गया। लाला नानक चन्द को अपने सम्मानजनक पद के कारण मान- सम्मान मिलता था। जाल घर और तलवन में उनके परिवार को भर- पूर सम्मान मिलता था। वालक मुशीराम उनके सबसे छोट पुत्र थे। उनले सीताराम, मूलाराम, आत्माराम नामक भाई थे और प्रेम देवी और द्रोपदी नाम की बहनें थी। मुशीराम अपन परिवार मे सबसे छोट थे। इसलिए घर और बाहर उन्हें सबसे ज्यादा लाड प्यार मिलता । तीन वप के होने पर मुशीराम अपने पिता के पास सपरिवार बरेली चले गये । वरेली मे पुलिस लाइन मे मुशीराम दिनभर घूमते और खेलते रहते थे। उनके दो बड़े भाई आत्माराम व मूलाराम मोलवी से पढन जाया करते थे । मुशीराम भी उनके साथ या ही चले जाते व अपने भाइयो के पास बठे रहते । जो कुछ मौलवी जी इनके दोना भाइयो को सिखात बह सब मुशीराम भी सीखते जात । उनकी बुद्धि बचपन से ही बडी प्रखर थी। लाला नानक चद की बदली जब बरेली से बदायू काट इस्पक्टर के पद पर हो गयी थी, मुशीराम तब बड हो गए थे। वह अपने पिता के साथ कोट चले जाते थे। वहा मुहरिर, मुशियो, वकीलो के साथ घूमते व सेलते रहते थे। जिनस प्रसन्न होकर कागज, कलम दवात आदि इनाम में मिलते थे । इही कागजो पर दिन भर वह उर्दू, फारसी लिपि के अक्षर लिसन का अभ्यास करते रहते थे। बदायू के बाद मुशीराम के पिता नानक पद की बदली बनारस हो गयी । बनारस में उनकी पदोन्नति निरीक्षक पुलिस इन्स्पेक्टर पद पर हो गयी थी। उनको प्राय दौरे पर रहना पडता था। इस वजह से उनका परिवार अकेला रहता था। इसलिए लाला नानक चन्द न एक पजावी परिवार को बिना किराये के ही अपने मकान में जगह दे ताकि उन बच्चो की अच्छी तरह देखभाल हो सके। ।

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पर वह पजावी परिवार में रहने कारण धर्माध और छुआछूत
के विचारो से ग्रस्त था। बात बात पर पुराणपयो आचरण करन के
कारण नानक पद के परिवार पर भी इस पजाबी परिवार का असर
पड़ा। बालक मुशीराम भी देखा-दखी छुपा छूत का विचार करने
लगा।
लाला नानक चन्द अपने परिवार को इस तरह के दुष्प्रभाव में
मुक्त रखना चाहते थे । इसलिए उहीन इस मतिभ्रष्ट परिवार को
अपने मकान से हटा दिया।
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* 2 नयी दिशा की ओर उस जमाने की जैसी परम्परा थी कि बच्ची की शिक्षा का कोई समुचित प्रवध नहीं था। उन दिनो स्कूल कालेज समुचित मात्रा में नहीं थे । पर बनारस आने पर नानक चद का ध्यान अपने बच्चों की शिक्षा की ओर गया। उहोने अपने बच्चो को पढाने के लिए एक हि दी अध्यापक को लगा दिया जो घर पर ही आकर बच्चा को पढाने लगा। पर नानक चद अपने बच्चो की इस तरह की शिक्षा व्यवस्था से ज्यादा दिन स दृष्ट नहीं रहे। कुछ दिनो वाद पिता नानक पद ने अपन सारे बच्चो को एक अच्छी पाठशाला में भरता करा दिया। बालक मुशी राम को विधिवत शिक्षा तो वनारस में ही आकर भारम्भ हुई। उनके बडे भाई तो बरेली-बदायू मे भी मदरसों में पढते थे। बनारस आकर सब बच्चे हिन्दी पढने लगे थे। वाशी मे ही नानक पद ने मुशी राम का यज्ञोपवीत संस्कार विया । लाला नानक चन्द बडे कमाण्डो और पुरातन परम्पराओ पर विश्वास करन वाले थे। वे बडै पूजा-पाठी और शिव भक्त थे। प्रतिदिन रामायण पाठ करते थे। मुगी राम की माता भी बहुत धार्मिक प्रवृत्ति की एवं सुशील स्वभाव को महिला थी। वे अपन बच्चो को बहुत प्यार करती थी। उनवे और पिता के धार्मिक सस्वार उन बच्चों म आय थे। पुलिस जसे प्रप्ट विभाग मे रहन पे बावजूद नाना चन्द अपने पूजा के नियमों का पालन करते रहत थे। इस प्रकार धमपरायण माता पिता के धार्मिक विचारो का पूरा प्रभार मुशीराम पर पड़ा । * 14 यमोपवीत सस्वार ये बाद उन दिनो बालर यो अपि पुस गुरुकुल भेजने की परम्परा पी। पर उन दिनों कोई अपिलमा गुरु धुल नहीं था। इसलिए यह कर्माण्ड औपचारिक रूप से ही हुआ था। उनके साप भी गुरुकुल जाने का नाटक सपन्न दिया गया था। जिसका दुष्प्रभाव वालक मुशीराम पर पुरी तरह पहा । उनके बाल मन पर इस पाखा का इतना सराव असर पड़ा पि उहें इस तरह धार्मिर सस्कारों के प्रति वितप्णा हो गई। नानप चन्द प्रात काल उटकर दनिय नियात्रा से निवत होकर यो ही भक्ति भाव से शिव-पूजा परत थे। माता पिता को दम्मा देखी मुशीराम भी इन धार्मिक मस्कारी म अपना ध्यान लगाते थे। धमक प्रति कोई मास्था उनके मन में नही पो। जो यछ था यह धार्मिक सस्कारो का प्रभाव था। उन दिनो बनारस में स्वामी दयान द मा आगमन हुआ । जा उन दिनो निराकार भगवान का प्रचार कर रहे थे। मूर्ति पूधा, धार्मिक सस्कारो पर कुठाराघात कर रह थे। उनके नास्तिक विचरो से धर्मा वलम्बियो न उहैं जादूगर कहना शुरू कर दिया । उन्के बाकी सब अवगुणा को छोडकर उनका विशालकाय शरीर और मुह पर जो तेज विद्यमान था, यह उनके विरोधियो को जादू सा लगता था। यह आय धम के प्रचार का दौर था । इस तरह को अस्वाह उडते उडते मुशीराम के घर तक भी पहुची । उनकी मा ने अपने सारे बच्चो का घर से निकलना बद कर दिया । उहें डर था कि वहीं इन बच्चो को दयान द नाम का यह जादूगर गायत्र कर न ले जाये । की यह कसी विडम्बना है कि जिस व्यक्ति ने बडे होकर आय समाज का उत्थान दिया उसो को बचपन में इस डर से घर से न निकलने दिया गया कि यह यही बिगड न जाय । वनारस मे डेढ़ साल रहने के बाद ही नानक चद की फिर बांदा बदली हो गयी। अपने पूरे परिवार के साथ नानक चद बादा आ गये। भाग्य 15 मुशीराम वादा में भी पढने लगे। काशी के धार्मिक सास्कारिक वातावरण मे रहने के बाद, वादा जसे इलाके म रहन पर मुसीराम को बहुत कठिनाइया आयी। उनका मन बांदा मे नही लगता था। वादा तब भी बाज की ही भाति सस्वारविहीन उजड्ड सा शहर था। मन के परिताप से शरीर को भी अपार क्प्ट मिला और वालक मुशीराम बीमार पड गये। बहुत से डॉक्टर, वध, हकीमों का इलाज चला पर व्यथ ही रहा । मुशीराम ठीक ही नहीं हुए। तब नानक च द को बादा शहर के निवासी ने बुद्धू भगत का पता बतलाया। नानक च द न बुद्ध भगत को अपने घर बुलवाया । बुद्ध भगत न मुशीराम को देखा भाला फिर कुछ अपन निदान से दवाए भाग्यवश उन दवाओं ने रामवाण का काम किया । मुशीराम उन दवाओ से रोग मुक्त होने लगे। धीरे धीरे बुद्ध भगत की दवाओ के प्रभाव से बिलकुल रोग मुक्त हो गये। अपने प्राण बचाने वाले बुद्ध, भगत के प्रति मुशीराम मे बहुत आदर की भावना थी। वह उनके हर प्रकार से एहसान मद थे। कहत हैं बुद्ध भगत पहले बहुत लडाकू प्रवत्ति के व्यक्ति थे । एक- दूसरे पर मुकदमा करना और लडना झगडना उनका स्वभाव था । अपने इसी स्वभाव के कारण वह पक्के मुकदमेबाज बन गये थे। साथ साथ ही वह बहुत कनूस थे। एक दिन बुद्ध भगत को कहीं रामायण सुनने का अवसर मिला। रामायण सुनकर तो जैसे बुद्ध भगत की आखें ही खुल गयी। उस दिन से बुद्ध भगत ने लडाई-झगडा बद कर दिया और जनहित के काम मे लग गये। बुटू भगत ने कसी को भी तिलाजलि दे दी और मानवतावादी हो गये। वह लोगो का निशुल्क इलाज करने लगे। सही मापना में तब ही से उनका नाम बुटू भगत पडा। स्वस्थ होने के बाद मुशीराम, अपने पिता नानक चद के साथ 16 बुद भगत के घर रामायण सुनन जान लगे। जिस कारण वालक मुगा राम का लगाव रामायण स बढन लगा। वे रामायण पढन के साथ साथ उमसे अच्छा तरह शिक्षा भी ग्रहण करन लगे। जिस कारण मुशाराम के मन म मानव प्रम, सहयोग और सच्चाई के प्रति अनुराग जागन लगा। वादा के समीप ही चित्रकूट नामक धम स्पल है । जहा अपने बन वास के समय भगवान राम ने काफी लम्बा समय गुजारा था। यहीं राजापुर नामक ग्राम म गोस्वामी तुलसीदास ने जन्म लिया और पित्र- कूट म रहबर ही रामायण को रचना को भी। मुशीराम के पिता नानक चद एक बार सपरिवार इसी चित्रकूट की यात्रा पर आये। चित्रकूट में उस समय राम लक्ष्मण और साता की क्टी सुरक्षित थी। चित्रकूट म यति नामक एक पहाडी थी जिसकी चट्टान को कुछ पडा ने लक्ष्मण जी की आखेट स्थलीबतलाया जिसके प्रमाणस्वरूप उहाने चट्टाना पर पडे निशानो को लक्ष्मण के तीरो का निशान बतलाया। यह निशान चट्टानो पर थे और नीचे की ओर चले गये थे। मुशीराम को चट्टानो के सम्बन्ध म पेडो का यह प्रचार विश्वास लायक नहीं लगा । कुछ दिन बाद जव अग्रेजो ने उस चट्टान की खुदाई वराई तो वहा कुछ भी नहीं निकला। मुशीराम के धार्मिर सास्वारिक मन पर इस घटना से कठार चोट लगी। धम के प्रति उनकी आस्था ज्यो ज्यो बढ रही थी त्या त्या पाखड के प्रति उनक मन मे घृणा जाग रही थी। जो आगे चलकर उनके व्यक्तित्व का एक विशेष हिस्सा बनी। जिसने उन्हें महात्मा और स्वामी जसा आदरणीय स्थान दिया। वादा से अबकी बार नानक च द की बदली मिजापुर हो गयी। जहा फिर सार परिवार सहित नानक चद जा पहुंचे। मिर्जापुर १ बच्चे फिर पाठशालाओ मे पढने लगे। पिता का जीवन अपनी नौकरी दी और पूरी तरह समर्पित था। मा अपन बच्चा "पढाई लिखाई और सम्कारों के प्रति बहुत सजग थी । वह अपने बच्चो को ईमानदार, नक धमजागरूक देखना चाहती थी। साथ ही साथ उनके बच्चो में सात्विक प्रवृत्तिया हों । यह उनकी कामना थी। सबसे छोट होने के कारण मुशीराम उनके स्नेह, लाड प्यार के प्रमुख द्रये वि याचल म नवरात्र के समय विशाल मेले का आयोजन होता है । जिसमे दूर दूर से भक्तगण आकर दुर्गा जी का आवाहन करत है। मिर्जापुर मे वसा नानक चद का धमभीरु परिवार इस आयोजन से कैस दूर रहता। चत्र के नवरात्र म लाला नानक चद सपरिवार देवी विध्यवासिनी की पूजा अचना करने विव्याचल जा पहुचे । मुशीराम भी उनके साथ थे । वह भी मेने मे आये साधुओ वरागियो का देख रह थे और धामिक स्थलो के दशन कर रहे थे। मु शोराम अव वाल से किशोर अवस्था को पहुच रहे थे और तालालिर बुद्धि के प्रभाव से कुछ अधिक विद्वान थे । उहें यह ला वि देवी देवता तो अपनी जगह महान हैं। पर कुछ पाखडी लोगा ने स्वाथवश धम के नाम पर अनक वेकार बातें फला दी हैं । जिससे मुशीराम के मन में जहा धम के नाम पर सहिष्णुता थी वही पाखड स घृणा पदा हो गई। लेकिन विंध्यवासिनी इसी मेले में कुछ कम्युनिस्ट विचारधारा के कायक्ता भी मुशीराम के सम्पब मे आये । पर उनकी विचारधारा और कर्मों मे मुशीराम का जमीन आसमान का अतर महमूस हुआ। इस मेले में घटी एक छोटी सी घटना न मुशीराम को एक नयी दिशा की ओर मोड दिया। यो तो घटना बहुत ही मामूली थी। एक स्थान पर एक ब्राह्मण का भोजन पा रहा था। एक नौकर ने चूल्हे से भाग निकाल ली। जिस पर ब्राह्मण देवता कुपित हो गये। होन उस भोजन को लात मार दी। नौकर का ता अनेक शाप दे ही डाले। जन पाह्मण देवता के अनुसार उनका धम भष्ट हो गया। मुशीराम को यह जानकर बहुन आश्चर्य हुआ कि उन प्रामा देवता का धम इतना सचित पा। जो जलती आग को छू जान 18 ही नष्ट हो गया। इसी तरह उनके घर के नौकर जोखू मिश्र का भोजन जिस चूल्हे पर पक रहा था। उस चूल्हे से थोडी सी आग वह भी एक चिमट द्वारा एक अय व्यक्ति ने ले ली जिस पर जोखू मिश्र न बहुत बावला मचाया। उनका भी धम भ्रष्ट हो गया था। यह सुनकर मुशीराम को इस धर्म नाम से सख्त घृणा हो गई। जोखू मिश्र गाजा शराव तम्बाकू जसी नशीली चीजा का सेवन करत थे। ऐसे व्यक्तियो का धम, इन दुष्कर्मों से नष्ट नहीं होता । पर इस तरह किसी व्यक्ति के चूल्हे की आग छु जान से घम भ्रष्ट हो जाता है । क्या धम इतना सस्ता और इतनी हल्की वस्तु है, जो यक्ति के स्पश से भी नष्ट हो रहा है । इस तरह के धम से मुशीराम को बुरी तरह नफरत हो रही थी। धम क पाखड से पदा हुई नफरत ने ही उनके मन में एक नय धम, एक नय समाज के बीज वा दिए थे। जो आगे चलकर एक एसा धम बना जिसन लाखा भारतवासिया को एक नयी दिशा दी।

3 जिनसे प्रभावित हुए । मुशीराम की पढ़ाई लिखाई स्थान स्थान विचरते रहने के कारण कभी व्यवस्थित रूप से नहीं हो पायो थी। पर उन्हें धूमने फिरने के कारण जीवन की बहुत सी कठिन परिस्थितियो का सामना करना पडा, पई बहुत ही क्ड ए अनुभवो का सामना करला पड़ा । जीवन के इन पड ए मीठे अनुभवो ने उनके बीच एक जीवन का नया आधार तय कर दिया था। सन् 1871 ई० मे नाना च द को पदोनति शहर कोतवाल बनारस के पद पर हो गयी । नाना चद दोबारा सपरिवार बनारस जा पहुचे। अबकी बार मुशीराम को कण घटा सरल म पढन के लिए भरती कराया गया था। इसके अलावा घर पर फारसी जोर अग्रेजी पढने की व्यवस्था भी की गयी। नियमित रूप से स्कूल जाने के कारण मुशीराम नियमित रूप से वहन सुबह उठ जाते । दैनिक कार्यों से निवटर गगाजी जाते, वहा कसरत कुश्ती का अभ्यास करते, उसके बाद गमा-स्नान पर भगवान विश्वनाथ के दशन कर घर आते और अपनी पढाई लिखाई मे जुट जाते। वहा से स्कूल जात थे । वह एक बुद्धिमान और अध्ययनशोल छात्र थे। इसलिए शीघ्र ही अपने स्कूल म उनका व्यक्तित्व अलग उभरकर सामने आया। बनारस मे ही मुशाराम की मुलाकात डाकू सग्राम सिंह से हुई थी, जो बहुत देशभक्त था। संग्राम सिंह बनारस गहर पास स्थित एक गाव का साधारण क्सिान था। वह अपनी महनत और जमीन के बल पर अपना व परिवार 20 का भरण पापण परता था। उसका जीवन सीधे साद ढग स गुजर रहा था । एक दिन किसी सदह पर पुलिस न उसके घर का तमागील डाली । तलाशी म जब पुलिस को कुछ नहीं मिला तो उहा। उसका पत्नी के साथ बलात्कार किया। पुलिस के दुक्म स गाय वाला को मग्राम सिंह का सिल्ली उडान का मौका मिल गया । सग्राम सिंह के घर आने पर गाव याला न मारा किस्सा नमक मिच लगाकर सुनाया। जिससे सग्राम मिह बहुत ही आदोलित हुआ। उसने इस घटना की शिकायत पुलिस के उच्चाधि- कारियो से की । पर उसकी फरियाद पर किसी व्यक्ति ने ध्यान नहीं दिया। निराश सग्राम सिंह जब अपन घर जाया तब उसका हृदय प्रति- गाध की आग से दुरी तरह जल रग था। बाद मे जलते हुए उसन जपनी वर्षों पुरानी तलवार निकाली और सबसे पहले अपनी पत्नी के टुक्ट टुकड कर डाले । अब अपनी पत्नी के सतीत्व को भग करने वालो का मौत की नीद सुलान का सकल्प लेकर वह सदा सदा के लिए अपना घर छाटकर जगल मजा छिपा। वहा उसे एक और राजपूत मिला जो उसी की तरह सनाया हुआ इसान था। उसका नाम हाथी सिंह या । वह एक बहुत ही अच्छा निगानबाज था। दोनो न मिलकर आसपास के इलाके म आतक फला दिया। उनक कारनाम सुनकर जनक अग्रेती सरकार के जुल्मा सितम के शिकार भी उनके साथ इकटठे होन लग व एक अच्छा खासा गिराह बन गया । संग्राम सिंह उम गिरोह का सरदार बन गया था। सग्राम सिंह न अमोरा का लूटना र गराबो का भला करना प्रारम्भ कर दिया था। बनारस जौनपुर और आजमगढ म संग्राम सिंह न अपनी सफलता और उदारता के झड गाड दिय । पुलिस ने कई बार सशस्त्र बारमण कर उन गिरोह के छक्के छुडान का प्रयास किया। परतु उहें सफलता हासिल नही हुई । अग्रेज मुपरिटेंडेंट पुलिस को माम सिंह ने पकड लिया और चेतावनी देवर जिंदा छोड दिया।

21 बनारस शहर भी उसके आक्रमण होते रहते थे । आलम सिंह नामक एक पुलिस अधिकारी न सग्राम सिंह को पकडने के अनेक प्रयत्न किए पर सब व्यथ ही रहे । सग्राम सिंह सारे हमलो को धत्ता बतला पर निकल भागता । तग आकर तान जिला की पुलिस ने मिलकर संग्राम सिंह को पकडने का बीड़ा उठाया । हजारा पुलिस के जवाना ने सारे इलाके का बुरी तरह घर लिया। संग्राम सिंह के लिए अब छुपना कठिन हो गया। पुलिस का सामना करना उससे भी कठिन बाय था। हजारो जवाना न सारे रास्ता की नाकाबन्दी कर दी थी। जिसमे संग्राम सिंह के गिरोह को भोजन जोर पानी के लाले पड़ गए। पाच छह दिन अपन साथिया के साथ इधर- उधर भूखे प्यासे धमत रहन के बाद संग्राम सिंह का गिरोह भोजन की तलाश म निक्ला । उनका एक जादी नानक च द के हाथ आ गया । उससे पूछताछ करने के बाद सारा पुलिस दल, संग्राम सिंह को गिरफ्तार करने के लिए उम आदमी द्वारा बतलाए हुए माग पर चला। संग्राम सिंह पुलिस का आता देखकर एक चमार के घर मे घुस गया। पुलिस न मग्राम सिंह को इस थापडी में छुपता देख लिया था। उहान उस मापडी म जाग लगा दी। पानी की नमी के कारण बारूद अपना काम न दिखला सकी। उपकी बदूक पानी में कार सिद्ध हुई। तलवार भी म्यान म फस गयो । मग्राम सिंह यापडी स बाहर जाया तो उसे पुलिस ने चारा आर से घर लिया । संग्राम सिंह ने ब दूक के कुदे से प्रहार करना चाहा, परतु तव तक पुलिस ने उसे चारा ओर से घेर लिया और सग्राम सिंह को गालिया से भेद दिया। पुलिग ने मग्राम सिंह को घायल अवस्था म ही रस्मियो से बाध दिया और बनारप के अस्पताल में पहुंचा दिया। नाना चदन ही समान सिंह को पराया। इसलिए उसने बदी बनाए जान पर मुशीराम उनको देखन वे लिए बनारस के अस्पताल म गय । उम देशभक्त वीर पुस्प की यह हालत देखकर मुशीराम का हृदय दुस स भर गया । स्वय जयेज पुलिस कप्तान सग्राम सिंह की बहादुरी और देश प्रेम से बहुत प्रभारित हुआ।

22 वाद में स्वस्थ हो जाने पर संग्राम सिंह को फासी पर लटका दिया गया। मशीराम को सग्राम सिंह वे देश प्रम न वहुत ज्यादा प्रभावित क्यिा । अग्रेजा के प्रति संग्राम सिंह न उनके मन में बहुत गहरी पणा की भावना भर दी । यही भावनाए आगे चलकर मुशाराम व व्यक्तित्व का एक ऐसा लश वनी जिसने उनको सच्चा देशभक्त और गरीवा का सच्चा मदद और हितचिंतक बनाया। दूसरा व्यक्तित्व स्वामी दयान द का था। जिसन मुशीराम के जीवन का बित्युल मोड दिया। उनकी माता उनका व उ7 वड भाई को ज्यादा देर घर से बाहर नहीं रहने दती थी। उनके मन में यह भय था कि यह जादूगर और नास्तिम स्वामा दयान द उनके बच्चो को बिगाड देगा य उ हे पथभ्रष्ट कर पाप का गलत राह पर ले जाएगा । जब भी उनको पता लगता, स्वामी दयानन्द' वनारस आए हुए है, वह अपन बच्चो को घर के अदर छिपा लती। वैचारी माता को क्या पना या, इही स्वामी दयानद की कृपा से उनरा बेटा मुशीराम एक दिन महान आय नता स्वामी श्रद्धानद बनगा जिसके नासपास वाकई थक्षा और प्रेम की अनोसी गगा बहगा, जो साला सूखेगी नही। मुगीराम के मन म धार्मिक म विश्वास पाखड के प्रति तात्र घणा की भावना थी। बारस में घटी एक घटना न इस घणा का और अधिन वढा दिया। नारम से कुछ दूर गगा पिनार सोधिया घाट नामर एक स्थान है। मुनीराम उस निजन स्थान पर ध्यान मग्न थ । बा- स गगा का वह रिनारा बहुत बुरी तरह दुष्प्रभावित हुआ था। उस इलाके म एक गपा मी बन गयी थी। उस गुण में एक नागा साधु आर रहा लगा। इम नागा साधु का एक विचित्र नियम था। यह साधु जो पहले भाजन लाता उरया भोजन स्वीकार कर लेता, वानी लाने वाला को हाटकर गा दना । सलिए हर भक्त पहले भोजन स्वीार हो जाये यह साच पर जल्द से जल्दी जा पहुंचना । एर दिन मगीराम सुबह-सुबह अपने एक नौपर व साथ घूमन SOrvina निकले । पाट पर गुफा के पाप पहुचते ही उनके कानो मोजणी कर चीस की आवाज सुनाई पड़ी। मुशीराम दौडकर गुफा के द्वार पर गये तो उहान एक स्त्री को गुफा के द्वार को दोनो हाथा स पकड हुए देखा । स्त्री बुरी तरह चोख रही थी। ऐसा लगता था जैम कोई उसे बुरी तरह पीछे की आर घसीट रहा है। वह स्त्रा बुरी तरह बाहर निगलन का प्रयास कर रही थी। मुशीराम और उनके नौकर ने उस स्त्री को, हाय परडकर अपनी भार घमीटना चाहा किंतु यह असफल रहे । अन्दर से स्त्री को अपनी ओर घमीटन वाला भी कम ताकनवर नहीं था। उनके नौकर विदामिह और मुशीराम ने साधु को डराया धमकाया, तर उस साधु ने बड़ी मुश्किला से उस अबला स्त्री को छोडा । इस पीचतान भरे जपमान से, कुछ डर से, वह स्लो मूछित हो गयी। तभा एक अग्रेड उम्र की स्त्री सामन आई । उसन अपना शाल उस मूछित स्त्री का ओढा दिया । इहोन उस नागा साधु को बहुत डाटा। मुशीराम जी उस अधड स्त्री को पहचान गये । वह उनके घर के पास रहन वाले एक समन खटी परिवार की महिला थी। मुशीराम न उस महिला से उस घटना के सम्बध में पूछा तो उस प्रौढ महिला न बतलाया कि वह उस बेहो। स्त्री की जेठानी है। उसकी देवरानी जो बेहोश पड़ी थी निसतान थी जिसे दिखलान क लिए वह साधु के पास लायी थी नि साधु के आशीर्वाद से उसकी देवरानी को भी पुत्र प्राप्त हो। उस रोज अपनी देवरानी के साथ वह सब प्रथम साधु के लिए भाजन लेकर आई था । साधु की नियति उसकी देवरानी को देखकर खराब हो गयी जिनके साथ उसने बलात्कार करने की चेष्टा की। जिससे उसके शरीर पर खरोचें आयी और कपडे तार-तार हो गय। उहाा और उनके नौकर न उस नागा साधु की अच्छी खासी पिटाई कर दी । जब उस साधु न सबके सामने नाक रगडकर माफी मागी और यह वायदा किया कि वह आइ दामी बनारस नहीं आयेगा तय उसे छोड़ दिया।

24
मुशीराम ने स्वयं उस बेहोश स्त्री को व उसरी जेठानी का उसक घर
पहचा दिया और उस स्त्री के घर वाला को मारी घटना बतला दो व
भविष्य के लिए सचेत कर दिया ।
उह इस घटना स धम के नाम पर फले २ धकार से बहुत चाट
पहुंची।
एक दिन जब वह पुन मोधिया घाट पर पहुंचे, उ होने उस प्रष्ट
नाम साध को फिर घाट पर घनी रमाय वैठे देखा। लोग उस साधु
को बडे ही भक्ति भाव से भट दे रहे थे।
भ्रष्ट साधु को मिलता हुआ यह सम्मान मुशीराम को फूटी आखा
नहीं सुहाया।
बनारस की इन घटनाआ ने मुशीराम के जीवन को एक नया मोड
दिया। वह बडी असमजस की स्थिति में फम गये । कहा जायें, क्या
करें? उनकी ममझ म कुछ नहीं आ रहा था।
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4 सगाई एक साल बाद नानक चद का तबादला फिर वलिया हो गया। हमशा की तरह मुशीराम उनकी मा, बहन, भाई सभी लोग बलिया जा पहुचे । जहा मुशीराम को एक ऐसे स्कूल मे भरती कराया गया, जहा अन्य विषयो के अलावा अग्रेजी भी पढनी पडती थी। अब तक मुशी राम अपने घर पर रहकर ही अलग से अंग्रेजी का अध्ययन करत थे । उत स्कूल के हेडमास्टर एक बगाली सज्जन मुकर्जी महाशय थे जो विद्वान एव अनुभवी व्यक्ति थे। मुकर्जी महाशय ने कुछ ही समय म मुगाराम की प्रतिमा को पहचान लिया। इस स्कूल में आकर मुशीराम को दो बार पुरस्कार मिला। मुशीराम को बनारस से ही कसरत कुश्ती का शौक लग गया था। बनारस के खुले वातावरण में शारीरिक सौष्ठव के बाद बलिया के उ मुक्त इला में उह व्यायाम और शहरी बनाने के नये नय आयाम मिले । उहोने गदा चलाना, कुश्ती लडना जसे शारीरिक व्यायाम करने आरम्पर दिय । य उनके गोदिया कम थे। उनके पिता नानक चद उनसे बहुत प्रभावित । उहोने मुशी राम का उच्च शिक्षा दिलवाने का दढ निश्चय कर लिया। सन 1973 के दिनो में बलिया में उच्च शिक्षा का कोई केन्द्र नही या । इस कारण उनको बनारस के क्वीस कालेज मे भरती कराया गया । बनारम उस समय उच्च शिक्षा का केंद्र था। जहा दूर दूर से विद्यार्थी पढन पाते थे। बनारस का वीस कालेज पढाई लिखाई और सुव्यवस्था के लिए सारे शिक्षा जगत मे प्रसिद्ध था।

20 इस बार मुशीराम अकेले पिता की आग पर पढन लिए आप थे। इससे पूर्व भी दो बार वह वनारस म निवास पर गय थ । पर इस जीवन में उम जीवन से जमीन आसमान का अतर है। तव व अल्हड विशार थे। अपरिपपव विचारो के थे। तर हर चीत से व' शीघ्र प्रभावित हो जाते थे। अब रह पढ लिसे विचारशील व्यक्ति या सयमित जीरन, पढाइ लिखाई मे उनके सोचने समझन का ढग वदल गया था। मुगीराम वा स्वास्थ्य निखर आया था। उनके विचारों में ता शनि आ गई थी। मनन और अध्ययन द्वारा यह किसी भी विषय म उनके गुण दोषा को पहचानन लग थे। उनके सोचन समयन मे परिमाजन साप सुनढता भी आ गई थी। बनारस का वातावरण अनेक विचिनताओ से भरा हुआ धारो आर धार्मिक वातावरण के साय साथ पाखण्ड और बईमानी का राज्य था। धम की आड में अनेक सामाजिक तत्व सत्रिय था चाक धुरो से लैस रहते थे। अनेक विद्यार्थी भी इस तरह के सामाजिक तत्त्वो के साथ मिले हुए थे । मुशीराम को यह सब देकर बहुत क्रोध आया और उनका मन दुख से भर गया। ५ भी अपने आप को किमी से कम नहीं समझते थे। बलि विद्यार्थी समाज म और उनक अध्यापको तक की निगाह मे उनका एक विशेष स्थान था । वह एक उच्च पुलिस अधिकारी के पुत्र थे । मुनीराम न भी औरा के तरह अपन पास एक बडा-सा छुरा रखना शुरु कर दिया। वह शरीर से बलिष्ठ थे ही, नौजवान दोस्तो की फौज साप रहती। वह मोर्चे दनाकर असामाजिक तत्त्वा स भिड जात व जपन दोस्तो को रक्षा परते। उनके पास डर या भय नाम की कोई भावना नहीं थी। बल्कि समाज के लिए कुछ न कुछ करत रहना ही उनका स्वभाव बन गया था। उनकी यही आदतें आगे चल पर उह महात्मा बनाने म काम नायी। उन दिना मुनीराम ने अपने अनक दो तो कोडा के चगुल से छाया था । कई छद्मवेशी साधुओ, यभिचारियो को परहा था। कई । - अमलाओ को इन दुष्टा के पजे मे छुडाया था । एसे अवसरोपर वह अपन माथिया महिन भिड जान थे। उनके ऊपर इस समय सवर्ष सिखलाने की नावना रहती थी। यह भावना परोपकार से ज्यादा कुछ कर गुजरन की भावना थी। अपने मा-बाप में दूर रहकर वह एकात जीवन बिता रहे थे। उह रोकने टोक्न वाला काई या नहीं। इस त ह म्वावलम्बन स्वाभि- मान व उत्तरदायित्व के प्रति सजगता की भावना उनम पूरी तरह जाग्रत हो गयी थी। जो आगे चलकर उनक सरल जीवन का एक बहुत बडा सद्गुण बनी। जिन दिनों मुशीराम नवी श्रेणी मे पट रह थे परीक्षा क ही दिनो मे उह अपने पिता का बलिया से पर मिला । पर मे लिया था परीमा देते ही अपन पतक पर तलवन पहुच जाना । मुगीराम न बड उत्साह से तलवन जान और परीक्षा देने की तयारा कर डाली। पर अचानक एक बाधा आ गयी । उनका अन्तिम प्रश्नपन अंग्रेजी का था जो किसी तरह लीक हो गया । हड मास्टर ने इस प्रश्नपत्र को दो दिन बाद लेने की घोषणा की। पर मुगीराम तो अपन घर जान को तयार वठ हुए थ। इसलिए उन्होन दा दिन बाद होने वाला अग्रेजा का इम्तहान छोड दिया और बिना अग्रेजी की परीक्षा दिए तलवन चल | उस समय भावनावश उहान यह नहीं सोचा कि इस उतावलेपन को भावना के कारण उनका पूरा साल बेकार हा गएगा। किंतु युवा- वस्था मे शादीम्याह के मामले में जो उनावलापन होता है मुशाराम की भी वही स्थिति थी। उस समय तलवन म उनकी सगाई हान वाली थी। इस कारण बिना परिणाम की परवाह क्यि वह तनवन जा पहुंचे। तलवन म मुगीराम की सगाई की बात पक्ती हो गयी थी। नालघर के रम साहूकार राय शालिगराम की सुपुत्री शिव देवी से मुशीराम का विवाह निश्चित हुआ। राय शालिगराम का परिवार उस समय पूरे पजाब में प्रतिष्ठित परिवार था। राय शालिगराम के एक पुत्र बैरिस्टर रायजादा भक्तराम 28 सारे पजाब मे प्रसिद्ध फौजदारी के वकील थे। इसके अलावा पजाब में पहली + या पाठशाला सालने वाले लाला देवराज भी उना पुत्र थे। जा आगे चलकर स्वामी श्रद्धानद के बहुत काम आय व हमशा उनका साथ दिया। लाला शालिगराम का परिवार अत्यधिक सम्पन था। उनके कुल चार लड़के थे। जो एक से एक बढकर लायक थे । सबमे बड वालकराम, प्रसिद्ध बैरिस्टर भगतगम, लाला देवराज और लाला हसराज थे। लाला हसराज डी० ए० वी० कॉलेज के सस्थापक थे । दिल्ली म हसराज कालेज भी उनकी ही देन है । इस प्रकार एक बहुत ही सम्पन्न और प्रतिष्ठित परिवार में उत्पन्न हुई व या शिव दवी में उनका विवाह सम्पन्न हुआ था। लडका वाले कई सालो से यह चाहते थे कि नानन च द सगाई पक्की कर ले। विवाह तो जब वह चाहेंगे तब कर दिया जायेगा । इसीलिए नानक चन न मुशाराम का तलवन बुलाया था। तलवन मे माता पिता के आशीर्वाद से मुशीराम की सगाई सम्प ने हुई थी। गाव मे दस पद्रह दिन पर अपन पिता के साथ बलिया जा पहुवे । कुछ दिन बलिया म रहकर फिर वनारम के अपन छात्रावास मे जा पहुंचे। अग्रजी या प्रश्नपत्र छोडवर जा पहचान का परिणाम अब सामने आया । परीक्षाफल असतोपजनक आया। विवाह मगाई की उतावली युवा उम्न म हरएप के मन मे हाती है । मुशीराम भी इसमे अछूते नी।

5 मोतीलाल नेहरू से भेट परीक्षा में असफल रह जान के कारण, मुशीराम को छोडकर उनके सब साथी आगे की कक्षाओ में जा पहुचे । इस कारण अब मुशीराम का मन पुरान स्कूल म न लगा । फिर भी अध्ययन जारी था। मुशीराम पुरानी कितानो मे मन लगान वे स्थान पर कबाडा या पुस्तक विक्रेतानो के पास से अग्रेजी क पुरान व नय उज्यास पढन लगे। मन बहलान का यह अच्छा साधन ता था ही साथ ही साथ अग्रेजी भाषा पर उनका अधिकार बढन लगा । नतीजा यह हुआ जा विद्यालय का सत्र समाप्त हुना ता मुशीराम न पुन परीक्षा दी। इस वार उ ह सफल होन की पूरी उम्मीद थी । परीक्षा देकर वह पुन अपन पिता के घर बलिया जा पहुचे । जहा वे अपने माथ ढेरो अग्रेजी के उप यास ले गय थे। सारा रात चाद की रोशनी में वह पयास पढत रहते थे। इस तरह पाठय पुस्तका के अलावा इस तरह के अध्ययन से उनको जीवन के विभिन्न स्पो का नान मिला। मटिक की परीक्षा उहोन जयनारायण द्रिस्चियन विद्यालय से उत्तीण का। क्वीस कालेज बनारस से उ हान फिर इट्रेम में दाखिला ले लिया । ८स ममम क्वीस कालज के प्रधानाचाय मपरा प्रसाद थे। जो अपन दृढ अनुशासन और विद्वत्ता के लिए बहुत विख्यात थे। उनकी देख रेख म मुगीराम न इट्रेस पास कर लिया। उस समय तक मुशीराम अपन विचारो से काफी परिपकर हो चुवे थ, शरीर से स्वस्प थे। मन स, विधारा से वह बहुत विचारशील थे। सन् 1875 ई० मे मुशीराम न इट्रेस की परीक्षा पास की। उसी साल उन पर बचाघात हो गया। अचानक ही उनकी माता का स्वग- वास हो गया । माता के निधन का मुशीराम पर बहुत बुरा असर पड़ा, ३ 30 अपनी माता से उहँ सरसे ज्यादा लगाव था। उनके कपर मा का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था। जिस मा वीपीतल छाया मे उहान अपना युवावस्था, वपन गुजारा था, उसका बचानक साय छट जाना उनको बहुत गहरा घाव दे गया। इट्रेम पास करन के बाद मुशीराम न क्वीस कालेज म आगे पढना प्रारम्भ कर दिया। उस क्वीम कालज के प्राचाय श्री गिपय थ। उहान भारतीय दशन ऋग्वेर, रामायण पर छा काम किया था। साथ ही वह सहृदय और विद्वान व्यक्ति थे । उनकी प्रसिद्धि दूर दूर तक पली हुई थी। मुशीराम उस समय अजार मन स्थिति से गुजर रहे थे । कभा अ ययनरत होते, कभी कवितायें लिखते, सभी उपायास लिखते, कभा फक्कड मस्ती मे समय गुजारते । उसी समय क्वीस कालज म पडिन मोतीलाल नहरू ने प्रवेश लिया, जा मुशीराम के गुणा से प्रभावित होक उनके परम मित्र बन गए । उनका यह मित्रता जीवन पयत बनी रही। आगे सन 1919 के रौलट एक्ट आदोलन के समय मुशीराम और मोतीलाल नहरू एक साथ कूद पड़ थे। अपने कालेज के दिनो में भी मुशीराम के दनिक जीवन में कोई परिवतन नहीं आया था। वही पहले की तरह नियत समय उठना, गगा किनार व्यायाम करके गगा स्नान करना। फिर भगवान के दशन के लिए जाना । उनके दैनिक नियमित कार्य थे। एक दिन एक ऐसी घटना घटी जिसने उ हैं एक बार फिर पुछ सोचन पर मजबूर कर पिया। घटना इस प्रकार हुई-एक दिन मुशीराम को विश्वनाथ जी के मदिर मे दशना को जान मे दर हो गयी। समय गुजर चुका था फिर भी मुशीराम नियम के पक्के थै। सीधे विश्वनाथ मदिर जा पहचे। पर द्वारपाल ने उहें प्रवेश करने से रोक दिया । पता चला, इस समय काशी नरेश को महारानी विश्वनाथ की पूजा कर रही हैं इसलिए किसी को भी प्रवेश नहीं करने दिया जायगा । जब महारानी की पूजा समाप्त हो जाय तभी किसी को प्रवेश करन दिया जायेगा।

Hal vिatsar- भगवान के मदिर मे बडे छोटे के बीच इस प्रक की वात देखकर मुशीराम को बहुत बाध आया। उ भक्ति पर बहुत ब्रोध जाया । उनके विचारशील मन मे इस भेदभावना को हमेशा के लिए समाप्त करन की बात घर कर गयी। इसका नतीजा यह हुआ कि मूर्ति पूजा के प्रति उनके मन मविद्रोह की भावनायें जाग गयी। उनके मन में अन तक वितक उठन लगे। मूर्ति-पूजा के सम्म ध मे ईसाई धम की कई उक्तियो की और उनका ध्यान गया। वे सोचते रोज ही तो कारीगर मूर्तिया बनाते हैं। ये मूर्तिया टूट- फूट जाती है, चोरी चली जाती हैं । आसिर मूर्ति की पूजा के पीछे भक्ति की भावना ही तो है । भक्ति भावना बडी या मूर्ति बडी यही तक उसे परशान करता रहा। यद्यपि काशी विश्वनाथ मदिर के द्वारपालो के दुव्यवहार ने उनके मन को बहुत ठेस पहुचायी थी। इसके बावजूद उनका मन ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार नहीं कर पा रहा था। मूर्ति-पूजा के विरोध में बाद भी उहें ईश्वरीय शक्ति पर पूरा-पूरा भरोसा था।

6 धार्मिक पाखड का दिग्दर्शन अपने मन म उटते तक वितर्कों से मुगीराम बहुत उद्विग्न । जब उह कोई रास्ता सुभाई नहीं दिया तो उहोन अपा पुरान स्कूल नय नारायण कालेज के प्रधानाचाम ल्यूथेल्ट स मति पूजा पर वातवीत करत के लिए उन पास गए । दोनाक वाच काफी लम्बी बातचीत हुई। ल्यूथेल्ट महागय न उनक उद्धरणो के बल पर ईसाई धम की विशेषता बतलाई व जना बाना क सहारे मूर्ति पूजा के विरोध म जपन तक प्रस्तुत किय । पर मुशाराम का मन पूरी तरह सतुष्ट नहीं हो सका । वे अपनी खोजबीन में लग मन्दिरो से जलगाव होन का यह नतीजा अवश्य हुआ कि उनकी ध्यान अव ईसाई धम और पादरियो की ओर जाषित हुआ। एवं दिन उनकी भेंट बनारस छावनी के रास्ते मे एक रोमन क्यालिक पादरी लोफू से हुई । दाना एक दूसरे की ओर आकर्षित हुए। पादरी लीफू से अक्सर उनकी मुलाकात होने लगी। उन दिन ईसाई पादरियो का काम अपने धम की रक्षा करने से अधिक धमक प्रचार करना था। इसके अलावा पादरी हिंदू मुसलमान जनता वीर इसाई धर्म का प्रचार प्रसार करते थे। पादरी लीफू के साथ मुगारा के खब त वितक होते थे, विचार विमश हुआ करते थे । परतु मुशीराम का कोई सतोपजनक उत्तर प्राप्त नही हो पाता था। हा, यह वान जरूर है पादरी लीफू रे सदयवहार और विनय शीलता से मुशीराम इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि वह ईसाई धर स्वीकार करन का तयार हो गए। उनका लगभग रोज ही चच ओ पादरिया के पास माना जाना होने लगा। एक दिन जर मुगीराम लीफू से मिलन उनके घर गए, घर के 33 दरवाजा खुला था । वह निसकोच उनके घर के अंदर चले गये। पर्दा उठाया तो लीफू महाशय तो वहा नही थे। उनके स्थान पर एक नन नग्न अवस्था में सभोगरत थी। मजे की बात यह है कि नन यानि भिक्षुणिया वह कुमारी कयायें होती हैं जो आजीवन कुमारी रहकर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करती हैं। इन्ही ननो मे से एक को, नग्न अवस्था मे मुशीराम ने पादरी के साथ देखा था। जो पादरी यानी फादर कहलाते है। इस दुर्घटना से मुशीराम के मन मे पादरियो नना और ईमाई धम के प्रति सख्त नफरत हो गई । उनका ईसाई धर्म और पादरियो और नना के प्रति विश्वास समाप्त हो गया। अब तक वह यह समझते थ, पादरा जो अपना जवान से कहते हैं वसे सदकम भी करते हैं वमे ही शुद्ध आचरण व विचार होते हैं । पर अब उह महसूस हुआ कि सभी धर्मों में मात्र धर्माधता माजूद है और व्यथ का यूठा आडम्बर है । कोई भी धम कोई भी समाज उतना शुद्ध और सात्विर नहीं है जितना वह दिखलाई पडता है या प्रचारित करता है। इस दुर्घटना से ईसाई धम के प्रति वनी श्रद्धा और आपण सदा- सदा के लिए छूट गया । इसाई धम ही नहीं हिन्दू धम के आडम्बरा से भी उह सस्त नफरत हो गयी। किसी भी धम के प्रति मुगीराम के मन में कोई आस्था शेप नहीं रही और उनका मन नास्तिक विचार- धारा की ओर झुक्न लगा। धम मुशीराम को मायाजाल के सिवाय कुछ नहीं लगता। इस अन्तरद्वन्द्व के कारण मुशीराम का मन पूजा-पाठ से विमुख हो गया। उनके दैनिक जीवन मे मदिरो के दशन करने का नियम टूट गया। इसके विपरीत व्यायाम और शरीर सौष्ठव के प्रति उना भारपण ज्यो वा त्यो रहा। मन 1875 के दौरान क्वींस कालेज मे उच्च शिक्षा में अध्ययन करते समय मुशीराम का ध्यान रागात्मक प्रकृतियो की ओर हुआ।

बजे मुह नाचते गाते ना पहने। आत ही उहान भगकी फरमाइश
34
अध्ययन के साथ कवितायें करन का शौक उह लगा। प्रति रवि
बार घर मे ही कवि सम्मेलन होने लगा। उनकी मित्र मण्डला जो
गाढी कम्पनी के नाम से प्रसिद्ध हुई। आपकी बातचीत म भी सापतिक
गब्दो का व्यवहार करने लगी।
मुशीराम तब भी पढने लिखने मे कुशल थे। अच्छे अक लाकर
पास हो जाते ।
तभी उनके पिता का स्थानातरण मथुरा हो गया । सपरिवार नानक
चद मथुरा पहुचे जहा मुगीराम भी उनके साथ थे ।
मथुरा का तीन लोक से यारी नगरी कहा जाता है । यह भगवान
श्रीकृष्ण की जन्मस्थली, लीलाभूमि है। महान तीथ है । बनारस की
भाति यहा भी बन छदमवेशी घूम रहे थ जा धम की आड म अबोध
जनता को बेवकूफ बना रहे थे ।
पिना नानक चद ने मथुरा के चौवो को भोजन परान का विचार
किया । चौपा के पास जान पर उ होने कहा, "मन के दम को निमत्रित
किया जाय या मन के चार।"
चौधो की इस बात का यह मतलब नही था कि मन की इच्छा
नुसार दम चौबे खुलाए जायें या चार चौबे बुलाए जाए । उनका
मतलब था । एक मन पक्के भोजन को करने वाले दम चौवे बुलाए जाए
मुशीराम के पिता नाना चद ने चार चौवा को भोजन के लिए
आमनित किया। जिनके नाम थे सोटा, मोटा, लोटा व लगोटा।
निमयण के साथ ही यह तय हो गया कि प्रत्यक के लिए धाक
एटा भर भग का प्रयघभी किया जायगा। सभी चौवे ठार आठ
याचार।
यो।
डेढ पाव के करीब भीगी हुई भग रसा हुई थी। चौवो न इस भाग
का मित्र पर गूब रगहा लगारर पीसा IIरसमे बादाम और इलायची
पीसगर गली और पूर्व रगहा लगाार इम भग का पिर पिसाई ।।
निमे दूध और पानी मिलारर फिर भंग का पय पाय तयार हुआ।

35 भगवान द्वारकाधीश को भग का प्रसाद लगाने के बाद प्रसाद स्वरूप मुशीराम, नानक चद को एक एक कटोरा भाग मिली। भाग पीने के बाद चारो चौब ग्यारह बजे भोजन के लिए आसन 'पर आ बठे। पहले उनके पर पसारे गये । इसके बाद चारो के सामन डेढ़-डेढ सेर लच्छेदार मलाई परोसी गयी। फिर पके पकवान चौबो के साममे रखे गए। दो दो सेर पड उन पर भाजी, पकोडी आदि के साथ-साथ तीस तीस पूरियो की तह । फिर उतनी ही पूरियो की तह । फिर मलाई और फिर पूरियों की तह । फिर हलुआ और आखिरी मे भरपट मलाई । चौवो को एक एक रुपया दक्षिणा भी दी गयी जिसे लेने के बाद "चौबा ने फिर भाग की माग की। स्तन भोजन के बाद भाग की माग को देखकर मशीराम को लगा नही चौवो का पेट न फट जाए, ब्रह्महत्या का पाप न लग जाये। सारा दिन मुशीराम इस उधेडवुन म लगे रहे। शाम को मन न माना तो विधामघाट पर गय । उहें आश्चय हुआ मोटा, मोटा, लोटा, 'लगोटा जीवित ही नहीं बल्कि लगोट बाघ अखाड मे कुश्ती लड रह थे। चौबो का जीवित देखकर जहा उनक मन म सतोष हुआ। वही उनके मन में इन भोजनभट्ट चौवा के प्रति तीव्र घृणा उत्पन हो गयी। मान भोजन के लिए इतना लाइम्बर और 25 30 सेर खाकर भी इम शरीर से किसी व्यक्ति या समाज की सवा हो सकती है । सिफ जिह्वा के स्वा के लिए इतना पाखड, उनका मन घृणा से भर गया। मपुरा की ही दूसरी घटना गोसाइयो की लीला की है । दक्षिण के एक डिप्टी कलेक्टर जपनी पत्नी और बच्चों के साथ तीय भूमि मथुरा की यात्रा पर आय। उनका लन्या छ मात वप का था व लडकी चौदह-पद्रह साल की थी। उनका परिचय मुशीराम से हा गया क्योकि इससे पूर्व कासा भी यह मुजीराम के साथ वाशी के मदिरा और घाटो के दान 36 चुके थे। एक दिन गोपाल मन्दिर मे याकी लगी हुई थी। मुशीराम भा उस झाकी का दखने निकले । पाच बजे के आसपास का समय था। मुशीराम के साथ एक हेड कास्टेबिल भी था। वह कास्टविन एक गुसाइ का परिचित था । उमन मुशीराम को मदिर के अदर का पर कोटा व मन्दिर का भीतरी भाग दिखलाने की बात कही। अदर जाकर वह मदिर का परकोटा देख रहे थे तब यह एक चीख सुनाई दी। ये दोनो पास वाले कमरे का दरवाजा तोडकर भर घुसे तो उह एक लडकी एक गुसाइ से गुथी हुई दिखलाई पड़ी। गुसाई जी लडकी को जबरदस्ती अपन काबू में कर रह थे। उपर लडको गुसाईं जी को धक्यिा क्यिार अपना पीछा छुड़ाना चाहती थी। मुशीराम और कास्टेविल को देखकर उस गुसाइ न उक्त कन्या को छोड दिया और यह बहाना बनाने लगा कि वह लडकी भगवान कृष्ण की मूर्ति देखकर घबरा गयी थी । वह तो उसे समया रहा था। वह कुमारी लडकी कोई और नही उही परिचित डिप्टी कलेकर की लडकी थी । उसन मुशीराम को बतलाया कि उक्त गुसाइ के साथ की एक अघड स्त्री उसे कृष्ण भगवान के दशन कराने के नाम पर मदिर के भीतरी भाग म लायी थी। उमे अदर कर वह अधेड स्सी सुर बाहर भाग गई। गुसाइ जो अदर छिपे हुए थे जिहोने उसके साथ बलात्कार की चप्टा की थी। सयोग से मुशीराम पहुच गय वरना उस विशोरी नया का सताल कौमाय भग हो जाता। मुगीराम उस क्या को अपने साथ अपन घर ले गए जहा उहोंने लडकी के पिता को पूरी घटना विस्तार से सुनाई । मपुरा जैसी नगरी म इस तरह की कुटनी स्त्रिया और पुजारिया नाम पर लम्पटो को दसकर उन डिप्टी कलेक्टर महोदय को पृणा हो गयी। रहान अपनी वीष यात्रा वही समाप्त कर दी । उनका मन योपसी मूर्ति पूजा ये आहार से भर गया था। वह तुरन अपन पतिक मधुरा

37
स्थान दक्षिण भारत की ओर चले गए।
मुशीराम का मन तो इन लपट पुजारिया, पडा व गुसाइया से वैसे
भी खिन्न था।
मूर्तिपू-जा व्यर्थ का आडम्बर और धम के नाम पर हो रही लूट
खसोट से वे किसी प्रकार भी स तुष्ट नहीं थे।
मथुरा में धम के नाम पर भाग और भोजन भट्ट पडो का उ माद
और स्त्रियो द्वारा अबलाओ के साथ कुटनी पशा होता देखकर वह भी
पिता से आना लेकर अपने घर तलवन चले गए।

39 यात्रा पर आये। अग्रेजी शास के दिन लगभग सारे विश्व में ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज चमक रहा था। इसलिए ब्रिटिश युवराज अपने माम्राज्य की शान देखन और दिखलान के लिए हिंदुस्तान आये थे। ताकि भारत म भी अग्रजा के प्रति राजभक्ति की भावना उदय हो जाय । इसलिए ब्रिटिश राजकुमार सारे भारत का दौरा कर रहे थे । उसमें बनारस भी एक स्थान था। बनारम म भी प्रिंस आफ वेल्स का स्वागत बडी ही धूमधाम से दिया गया। बनारस के अलादा आस पास के नगरा और कस्बो से हजारो की संख्या में लोग प्रिंस ऑफ वे स के दशन करने आय थे । अग्रेज सरकार ने जगह जगह युवराज का बडा ही जोरदार स्वागत किया। बनारस के इस स्वागत समारोह में आस पास राजा महाराजा भी सम्मिलित हुए। मुशीराम भी अपने विद्यार्थी साथियो के साथ इन स्वागत समारोहो मे जाय । पर उह इस बात से बडा दुख हुआ, जब उन्होने छोट छोट अग्रेज अधिकारियो को राजा महाराजाआ को डाटन पटकारते हुए देखा था। इससे ज्यादा दुख का विषय यह या कि वह राजा महाराजा भी अपनी सभी मर्यादा को ताक पर रखकर सिर झुकाय उनकी डाट सुन रहे थ । मनीगम के स्वाभिमानी हृदय का बहुत चोट पहुचा । अप्रेज शासका करिया कनाप देखकर उन्हें यह महसूस होन लगा कि यह लाग शामक नही बलि पापक हैं। इसके साथ पाय उनको भारतीय राजानो के स्वाभिमान और झूठे अभिमान रेव दाब से सस्त घृणा हो गयी। उमी दिन से भारत को जग्रेनो स मुक्त कराने का सकल्प उहोन ले लिया। हर भारतरामी को स्वतत्रता का मूलमत्र सिखलान का उमी दिन उहान कठोर व्रत ले लिया । सन 1878 का साल मुशीराम के लिए हर प्रकार से महत्त्वपूर्ण पा । पिता नानक चद माहवस उह अपने पास वरली रखना चाहत थे। मुगीराम वनारस छाडकर इलाहाबाद मे आग की शिक्षा ग्रहण करन चले गय थ । उहा इलाहबाद के म्योर सेंट्रल कालेज म उहान प्रवेश ले लिया।

40 म्योर सेंट्रल कालेज म मनोविज्ञान मानन्द लन लगे । साथ ही साप रसायनशास्त्र भी उनका प्रिय विषय था। ग्रीष्म कालान अब काम म भी मुगीराम का अध्ययन जारी रहा। मुशीराम के दाना बड़े भाई मूलराज और आत्माराम पुलिस विभाग म सब इ १पक्टर थे। मूलराज हमीरपुर और आत्माराम मिर्जापुर म था-दार थे। मुशीराम छुट्टी के दिना म अपने दोनो भाइया क पास चले जात थे। पढन में मन लगाते थे। इस कठिन परिश्रम का नतीजा यह हुआ कि परीक्षा के दिनो मे मुशीराम बहुत बीमार पड गय। तकशास्त्र के पर्चे के दिनो म वह बुखार से बुरी तरह बीमार पड़ गय। रसायनशास्त्र के पर्चे के दिन तो वह कॉलेज तक पहुच ही नहीं सके । इस वारण मुशीराम परीक्षा म असफल सिद्ध हुए। बाद में बहुत घरलू कारणो से कुछ पिता के प्रेमवा मुशीरान की पढाई वद हो गयी। पिता नानक चन्द उन दिना बरेली क गहर कोतवाल थे। अभी तक मुशीराम को अपने व्यक्तिगत जीवन में जो अनुभव हुए थे उससे उनके धार्मिक विश्वास व आस्था को बहुत गहरा आघात लगा था। तभी प्रयाग म घटी एक घटना ने उनकी धार्मिक भावनाना का सही दिशा दी। मुशीराम उस समय तक पूरी तरह नास्तिक हो गये थे । उह हिंदू धम म फली अनेक धामिक कुरीतियो के प्रति घार श्रद्धा हो गई थी। धम के सम्बध अनेक वातें वे सुना करते थे। पर मुशीराम जब तक जनुभव न कर लेते तब तक विश्वास नहीं करत थ । इस तरह चमत्कारो को गह कोरी कल्पना या गप्प समझते थे। मुगीराम का उस समय योगाभ्यास पर अगाध श्रद्धा थी। वह स्वय नियम पूवर यौगिक क्रियाजो का नियमित अभ्यास करते थे। स्वय व्यायाम के साथ दढ धार्मिक प्रक्रियामा का पालन करत थ । वरेला स इलाहाबाद जान पर मुशीराम न कुछ अधिक योगाभ्यास किया । कि तु कुपथ्य के कारण वह बहुत वीमार पड गय थे। इसी 41 अवस्थ्य में पूर्ण स्वास्थ लाभ करने की इच्छा के कारण मुशीराम की यह इच्छा हुई कि उहें किसी महान योगी के दशन हो जायें। ताकि उनका आगे का जीवन सफल सिद्ध हो जाये। मुशीराम ने इस सम्व ध म अपन आस-पास किसी महान योगी की खोज की । जब मुशीराम स्वय इस काय म सफल सिद्ध नहीं हुए तो उहोन अपन मिनो से इस सम्बन्ध में जिक्र किया। मुशीराम को पता चला कि गगा के किनारे यूसी के समीप एक घन जगल म एक ऐसे महात्मा रहते हैं, जिनके वश में एक शेर है । मुशीराम को पता चला कि महात्मा दिन म अदृश्य रहत है केवल रात को ही उनके दशन किये जा सकते है । हम सबने इलाहावाद म निवेणी के पार झूसी का इलाका देखा है जो आज महानगरीय चमक दमक से ओत प्रोत एक साधारण कम्वा है । आज से सौ साल से पूर्व इलाहाबाद नगर भी इतना फला हुआ नहीं था। इलाहाबाद नगर के आगे, झूसी का इलाका भी तब घनधार जगल से भरा हुआ था । रात मे वहा जाने की बात तो बहुत दूर थी। फिर भी मुगीराम अपने एक मिन बुद्ध सेन तिवारी के साथ शाम के समय निवेणी पार कर जगल की राह ली। दोना ही मित्रा न रात्रि का भोजन पहले ही कर लिया था। दोनो ही मित्र शाम से रात तक इधर उधर घूमते रहे । सुनसान बियावान जगल मे उस समय चारा और सनाटा छाया हुआ था। डर के मारे काई अच्छा भला आदमी उस जगल मे कदम नही रख सकता था। पर मुशीराम और बुद्ध सेन महात्मा और शेर दोना के ही दशना चा दढ निश्चय कर आय 2। निरयक इयर उधर घूमते रहन के पश्चात करीव रात दस बजे वह दोनो व्यक्ति उस महात्मा के निवास स्थान पर जा पहुचे । मुशी- राम और वुद्ध न एक स्थान पर छिपकर बैठ गये। उहोन वहा महात्मा को केवल लगोटी पहन समाधि लगाय बठे देखा । दोनो व्यक्ति रात भर इसी तरह रिप रह। रात भर न को 4.

42 । महात्मा की समावि टूटी और न ही इन दोनो को ही नीद आई या पलक तक वपकी हा। तीन वजे के पास पास शेर की गजना हुई। दोना हो यानि मशा राम और वुद्ध सन चौक्कर सतक होकर वठ गये । शेर की गजना का आवाज जिस दिशा से आई थी, उसी ओर देखने लगे । शेर चलता हुआ सीधा महात्मा के पास आया । महात्मा के परा के पास जाकर पर चाटने लगा। शेर क आगमन के साथ ही महात्मा की समाधि भग हुइ । कुछ दर तक वह स्नह से शेर का सिर थपथपाते रहे । पिर शेर को जाने को कहा। शेर का एसा लगा जसे महात्मा की आना सुनी। अपना मिर महात्मा के चरणा म रखा। और धीरे धीरे जगल की राह चला गया ! मुशीराम और बुद्ध सेन यह देखकर बहुत प्रभावित हुए । उन दोनो ने उठकर महात्मा के परा म अपना सिर रख लिया। जब उन दाना न महात्मा से उस शेर क सम्बच म पूछा तो उ होन बनलाया कि यह कोई चमत्कार नहीं था। इस शेर को किसी शिकारी न गोली मार दा थी। यह घायल अवस्था मे तडफ रहा था। मैंने इस शर का दद से तडपता दखा तो जगल म जो ओषधि थी उससे शेर के घाव का उप चार दिया । शेर बहुत प्यासा था। मैंने उसको जगल स लाकर पानी पिलाया। शेर को जब तक दद से छुटकारा नहीं मिला था यह कृतनता स मरे पर चाट रहा था। जब तक शेर का घाव भर नहीं गया। मैं रोज इसको जगल की ओपधिया लगाता रहा। जव जब यह पूर्ण रूप स स्वस्य भी हा गया है। कृतनता को अपनी आदत नही भूला है। राजाना महात्मा की समाधि के पाम जपन जाप चला जाता है । यह पोई चमसार नहीं है । बल्कि सेवा उपासना, परोपकार व अहिंसा का पल है जो कभा व्यय नहीं जाता है। प्रत्यक्षत मुगाराम गेर को इस तरह महात्मा से हिलामिला दस परत प्रभावित हुए घ । उह सच्चे दिल से योगी के प्रति श्रद्धा हो -- गई थी। पर महात्मा ने उनके विचारा को धूल,धूसरित कर दिया महात्मा न उनको हठयोग छाडकर सबसे सहयोग जार सका पात्रत लेने की सलाह दी। महात्मा मे उहें यह शिक्षा मिली कि सच्चे दिल से किसी के साथ पकार करने स वडा सत्कम कोई नहीं है। जीव सेवा ही मानवता का सच्चा ५म है । दीन दुखिया, निबल और असहाय प्राणियो की सेवा ही सच्चा धम है। जिसका मनुष्य का प्रतिफल अवश्य मिलता है। मुगीराम को इस प्ररणा न ही जागे चलकर महात्मा मुशाराम और स्वामी श्रद्धानन्द बनने की प्रेरणा दा, जिसके फलस्वरूप उहान अछूनोद्धार समाज सवा, परोपकार के लिए अपना जीवन लगाया। पर यह सब तो बहुत वाद म हुना। इतना अच्छा बनना उतना आसान नहीं है जितना समया जाता है । मनुष्य मे दुव्यसन, लोम, पाप, मद वडा हा जल्दा जाता है। मुशीराम भी इन प्रलोभनो स वच नहीं सक क्यानि वह सहज रूप म एक मनुष्य ही तो थ। अपनी पर क्षाओ मे वीमारियो के कारण वह जनुत्ताण हो गय । छुट्टियो म वह अपन पिता के पास वरली चल गय जहा उनके पिता नानक चदकोतवाल थ। उनका साप ऐस युवका सहा गया जा रोज शराव पान के आदी थे। मुशीराम भी उन युवको क साय TT पान ली। कभ- कभी जय के पद पर वठन लग। सरीर इन दुम यना से गिरन लगा। अनक रान हें घेर लिया । लम्बा चौडा हृष्ट पुष्ट शरीर नूसकर काटा हा गया। उही के एक मित्र जुपवाज लल्ला हमाम के पास जान पर कुछ आपधिया और कुछ सयमित जीवन से उनरा स्वास्थ्य कुछ सुधरा । बंब पढाइ लिखाई उहान बिलकुल छाड दिया। पिता क पास हा बरली म रहने लगे। जत

8 स्वामी दयानन्द से भेट
जिम समय मु गीराम वरेली पहुंचे, यह पूरी तरह नास्तिक हो
चुर थे। उस समय यूरोप म अनक नास्तिक मत को मानन वाल य,
जिहोन नास्तिकता पर अनेक ग्रथो की रचना की है।
मुर्श राम न नास्तिकतावाद पर उपलब्ध इन पुस्तका का
बहुत अच्छी तरह अध्ययन किया था। इन पुस्तका के पारायण में वह
पूरी तरह दवी दवताआ पर अविश्वास करते थे।
पिता नानक चद पर पुत्र की इस मनोस्थिति का बुरा प्रभाव
पडा । वह मुशीराम की इस अवस्था से अत्यधिक चितित रहन लगे।
उ है महसस हो रहा था कि उनका पुन मुशीराम कही भटक गया
है । वह मु शीराम को इस भटकाव स अलग निकालने का काइ रास्ता
दूढ रहे थे।
अचानक ही उन्हें नपि न्यानद के बरेली आगमन का खबर
लगी। उनकी प्रस नता का पारावार न रहा। मुशीराम को शायद
कोई दिशा मिल जाय यही सोचकर नानक चद कापी प्रसनता और
मतोप अनुभव कर रहे थे।
महपि दयान द सरस्वती वदिक धम के प्रचार के लिए वरली
आ रह थ । नानक चद को शहर कोतवाल होन के कारण कानून व
व्यवस्था की सारी स्थिति सम्हालनी थी।
14 श्रावण मास सम्वत 1936 अर्थात अगस्त सन 1879 ई०
को महपि दयान द सरस्वती का बरेली में पदापण हुआ। बरेली के
विमि न स्थानो पर महर्षि दयानद के व्याख्यान हुए । जग्रेज सरकार
यह नहीं चाहती थी कि किसी कारणवश स्वामी दयानद की सभा में
क्सिी प्रकार का झगडा या दगा फमाद उठ खडा हो।
.

45 इस कारण नानक चद स्वय और उनके वरिष्ठ सहयोगी स्वामी दयानन्द की हर सभा मे खुद मौजूद होते । मर्षि दयानद के भाषण सुनकर नानक चद स्वय इतन ज्यादा प्रभावित हुए कि उहोन मुशीराम को भी स्वामी दयानन्द के व्याख्यान में ले जान का निश्चय किया । उहें पूरा विश्वास था कि उनका पुत्र मुशीराम ऋपि दयान द की ओजस्वी वाणी सुनकर अवश्य आस्तिक हा जायेगा । इसी आशा और विश्वास से उ होने मुशीराम को महर्षि दयानद सरस्वती का व्यारयान मुनने की आना दी। मुशाराम बनारस के महात्माओ वेदपाठियो, उपदेश का, मथुरा के पडो जार गुसाइया के कुकृत्यो को अभी तक नही भूले थे । उनके मन में कुछ इस प्रकार की धारणा वन गई। सस्कृत क य तथाकथित पडित पाखडी और ढोगी होते है। इसलिए उनकी इच्छा स्वामी दयानद सरस्वती का व्याख्यान सुनन की कदापि नही थी। मुशीराम यह सोच रहे थे कि यह महपि भी अ य लपट साधुना की भाति ही लपट हागा। परतु पिता की आना टालना उनके कत यो को श्रेणी में नहीं भाता था। इसलिए वह अपने पिता नानक चन्द के साथ वेगम वाग कोठी जा पहुचे, जहा महर्षि दयान द सरस्वतो उन दिनो निवास कर - महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती के दशन मात्र से ही मुशीराम बहुत ज्यादा प्रभावित हुए। मुगीराम के मन म स्वामी दयान द के दशन से जगाध श्रद्धा और भक्ति भाव जान लगा। स्वामी जी नियम, सयम, त्याग, तपस्या की साक्षात मूर्ति थे। स्वामी दयानन्द के इस रूप को देखकर मुशीराम को मपि जीवन की स्पष्ट छवि दिखलाई पड़ी। मुशीराम सकुचाय, से वठे रहे। उहोने आस-पास जय दृष्टि डाली तो चक्ति रह गय। टी० जे. स्काट नामक प्रख्यात पादरो, अनेक उच्च कोटि के अग्रेज विद्वान और उच्च पदस्थ राज अधिकारी गण, स्वामी दयानद का व्याख्यान सुनने के लिए उपस्थित थे और 46 जानुर भाव से स्वामी दयान द के नग्न रूपी व्याख्यान सुनने को लालायित थे। इतन परिष्ठ अधिकारी विद्वानो को महर्षि दयान द का भाषण मम्मान पूर्वक मुनन को आया देखकर मुशीराम और अधिक प्रभारित हए । इस दिन महपि का प्रवचन 'भाडम' पर पा। ज्या ही स्वाना दयान द न ओटम शब्द का उच्चारण किया मुशीराम के हृदय-तत्र के तार झनझना उठे । उ होंन उस अमर वाणा को सुना तो त मय हो गय । आस्तिक जाह्वाद का आन द सीधा उनक मन मस्तिष्क म समान लगा। स्वामी श्रद्धान द न अपनी आत्म कथा मे यह स्वाकार दिया है कि वह पहले दिन का नास्तिक आह्लाद या, नास्तिक रहते हुए ना आह्वाद से विनम्र कर देना ऋपि जात्मा का हा काय है।' अभी तक मुशीराम के अनुभवो मे स्वार्थों मदिर क्मचारिया, न चरित्रहान गुमाइयो, भोजन भट्ट चौवो और अनाचारिया, पादरिया उनक हृदय को इतनी चोट पहुचायी थी जिसके कारण वह निराश होकर नास्तिक बन गय थे। निराश मुशीराम के हृदय म ऋषि दयानन के प्रवचनो न फिर से वामिक भावना का पवित्र स्रोत प्रवाहित कर दिया। सभा स्थल पर ही दडी स्वामा को मूचित किया गया कि पाकि लिए याख्यान क लिए टाउन हाल मिल गया है । दूसरे दिन स नापि के लिए प्रवचन टाउन हाल में होन लगे। गउन हाल म जब तक महर्षि दयान द क व्याख्यान धार्मिक परिभाषा पर हाते रह तव ठक कोतवाल नानक च द वरावर महाप दयानद के प्रवचनों को सुनते रहे । कि तु जब उहोन अपने प्रवचनो म मूर्ति-पूजा क विरोध म कहना शुरू किया तो नानक च द को यह अच्छा नहीं लगा। उसके बाद से उ हान जपन स्थान पर एक भय सब इस्पेक्टर को व्यवम्या के लिए भेजना प्रारम्भ कर दिया। जहा एर जोर पिता को ऋषि दयानद व ईश्वर के अवतार मूर्ति पूजा-उडन के विचार गच्छ नही लग, वहा पुत्र मुगीराम का उनन " अपार आनन्द आन लगा व उनके मन में अपार शाति मिलन लगी। मुशीराम का यह नियम वन गया था कि दिन का भोजन करके दोपहर को ही व्याख्यान स्थल पर पहुच जाते थे । सभा म प्रश्नोत्तर होते रहत, व उसका आनद लेते रहते । 25, 26 और 27 अगस्त सन् 1879 ई० को महर्षि दयानन्द के साथ पादरी स्काट के तीन शास्लाथ सपन्न हुए। पहले दिन का विपय था, पुनजम, इश्वरावतार और तीसरे दिन मनुष्य के पाप विना फल भुगते क्षमा किए जाते है या नहीं।" मुशीराम पहले दो दिनो मे सभा स्थल पर उपस्थित थे। किंतु तामरे दिन वे नहीं जा सके कारण 27 अगस्त को उह सन्निपात हो गया था और फिर उस समय वे आचाय दयानन्द के दशन कर सके य। ऋपि दयानन्द की पार तक शक्ति, नान भण्डार और निर्भाक्ता को दसकर मुशाराम पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा था। स्वामी श्रद्धानन्द 1 अपनी आत्म कया में इस विषय में कई सस्मरण लिखे हैं जो उनकी नजरो के सामने घूमते रहते थे। मु शाराम ऋषि दयान द से अत्यधिक प्रभावित हो गये थे फिर भी वे उनके विषय में सब कुछ जान लेना चाहते य । जिसस उनके मन म महर्षि दयान द को लेकर कोई शका शेष नही रहे । मुशीराम को नात हुआ कि स्वामी दयान द मुबह मुह म धेरे शौचादि से निवत होकर अपना लट्ठ लेकर सुवह ठीक साठे तीन बजे कहीं चले जाते हैं। मुशीराम ने निश्चित किया कि उनका पीछा करके देखना चाहिए कि वह कहा जाते हैं और क्या करते हैं । इस काय के लिए मुशीराम ने अपने साथ केसरी सबार के सपादक को भी साथ ले गये। रात को ठीक साढ़े तीन बजे महर्षि दयानन्द अपन घर से निकले, मुगीराम और उनके मित्र ने उनका पोछा करना शुरू कर दिया। महर्षि दयान द कुछ दूर तक तो धीमे धीम चलते रहे, फिर उहोन कंपनी चाल तेज कर दी। मुशाराम और उनके मित्र स्वामी जी का 48 । कुछ दूर तक इस पीछा नहीं कर पाय । कुछ आगे चलकर एक चौराह था, जहा से तीन माग बय ताना दिगाआ की जार जात थे। स्वामी जी वहीं से जाखो से बोपल हो गय और मुशीराम जान भी न सके कि पि किधर चले गय । अव हताश व उस दिन लौट जाय । कि तु दूसर दिन मुशीराम, सम्पादक महोदय के साथ पहले ही उस चौराहे पर छिपकर वठ गय जहा से ऋषि दयान द एक दिन पूर्व गायब हो गय थे। कुछ ही दर बाद अपि दयान द की विशालकाय प्राकृति सामने से जाती दिखलाइ दी। व ज्यो ही आगे निकले कि दोतो जनो न महर्षि दयान द का पीछा करना शुरू कर दिया। स्वामी दयान द वहुत तेजी से चल रहे थे और मुमाराम व सपादक जी हाफत कापत उनका पीछा कर रहे तरह चलत्त रहन के बाद स्वामी दयान द को चाल कुछ धामी हुइ फिर स्वामी दयानद धीम धीम चलते हुए एक पीपल के पड के नाच का गये । बठते ही समाविस्थ हो गये। मुशीराम न घडी मे समय दक्षा और समाधि टूटन की प्रतीक्षा करन लगे। प्राणायाम करत वे दिख नहीं बल्कि सीधे आसन लगात ही समाधि लग गयो । ठीक डेढ घण्टै वाद स्वामी जी को समाधि टूटी। समाधि स 5 कर उहान एक-दो अगडाइया ली और टहलते हुए पुन अपने आश्रम की घोर लौट गय। शीराम भी अपने सपादक मित्र के साथ वापिस लौट गई। उनके मन मे ऋपि दयानद के प्रति जो शकाए थी उनका समाधान हो गया था। महर्षि दयानद के ब्रह्मचय और तेजस्वी शरीर क रहस्य, समाधि स वै परिचित हो गय थे। महर्षि दयानद उस समय वरेली म खजाची श्री लक्ष्मी नारायण के पहा ठहरे हुए थे। लक्ष्मी नारायण उस समय पाच सरकारी खजाना क अधिनाये। और उस समय करोडपति समझे जाते थे। एक प्रवचन के दौरान ऋषि दयानद पौराणिक तथा आधार भ्रष्ट 49 कहानिया का सहन कर रहे थे। उस समय उस सभा मे पादरी स्काट, बरेली कमिश्नरी के अप्रेज कमिश्नर मिस्टर एडवड स कलेक्टर मिस्टर रोड, पद्रह वीस अग्रेज अधिकारी, व अनक भारतीय उच्चा- धिकारी मौजूद थे। महर्षि दयानद ने पहले हिंदू धर्म मे फैली अनक उन पौराणिक कथाको का खडन किया, जिनम अनक असामाजिक व जसगत बातें थी। जस वहु विवाह आदि। फिर इसके बाद वे ईसाई धम की बुराइयो की ओर आय व उनकी भी अशुद्धता का बहुत विस्तार स वणन किया। ईसाइ धम की इतनी खुली आलोचना सुनकर, अग्रेज कमिश्नर बार कलेक्टर क्रोधित हो गए। उस समय सावजनिक रूप से तो वह कुछ नही वृने पर सभा की समाप्ति के बाद उहोने खचाची लक्ष्मी नारायण/यो को अपन बगले पर बुलाया और उहें ऋपि दयान द तक यह सडे। पहुचा देने के लिए कहा कि वह ईसाई धम या अन्य धर्मों को इानी खुली आलोचना न करे, जिससे किसी भी व्यक्ति को धार्मिक भानाओ को ठेस लगे। लक्ष्मी नारायण ने साह्य से उनका सदेश पि तक पहुचा देन का वचन दिया और कोठी से बाहर निकले। रास्ते भर वह इसी उधेड बुन में रहे कि किस प्रकार महर्षि को कमिश्नर साहब का सदेश सुनाया जाय । यदि नही कहते ह तो साहब नाराज होते हैं और कहते हैं तो कही स्वामी जी क्रोधित न हो जायें। पहले तो वह यही सोचते रहे कि यदि कोई अन्य व्यक्ति उक्त सदेश को पहुचा दे। पर कोई भी व्यक्ति इस काय को करन को तयार नही हुआ। किसी तरह मुशीराम लक्ष्मी नारायण के इस दुष्कर कार्य के लिए तयार हो गये। पर मुशीराम भी दयानन्द के तेज के सामने टिकन सके । उन्हाने केवल यही कहा कि लक्ष्मी नारायण कुछ कहना चाहते थे। ऋषि दयानद ने तुरन्त लक्ष्मी नारायण जी को बुलाया जो अत्यन्त लज्जा आर आतरिक भय के साथ अटक-अटक कर किसी तरह अपनी वात कह पाय।

50 ऋपि दयानद सारी बात सुनकर मुस्करा कर बाल, ' इतना-सा बात के लिए इतना गिडगिडान की क्या जरूरत है। जो बात उन दोना अग्रज अफसरो न कहो, वह सीधी बात कहत, तो तुम्हारा और मेरा दोनो का समय क्म नष्ट हाता।' इस बात म महर्षि दयानद कुछ गभीर तो अवश्य हुए पर भयभान होना उनके स्वभाव के विपरीत पा। उसी नाम उहान बहुत हा महत्त्वपूण ओजस्वी और सारगभिन मापण दिया । उस दिन उन्होने आत्मा के स्वरूप पर भाषण दिया। उन दिन भी सभी जग्रज अफसर उपस्थित थे। स्वामी दयानद ने उस दिन भगवतगीता का श्लोर सुनाते हुए भगवान श्री कृष्ण का आत्मा के सम्मम दिया आरयान दोहराया, "जात्मा तो अमर है इस न कोई रास्त्र नेद सकता है न जाग जला सकती है न इमे पानी ही गला सकता है, न इस हव हा सुखा सनी है। अर्थात शरार नश्वर हे आत्मा अजर और अमर है। शरार तो चलायमान है आज है क्ल नही होगा।" उस सभा में उपस्थित अग्रज अधिकारिया को सबोधित करते हुए ऋपि दयानन्द ने कहा, 'यह शरीर तो अनित्य है, इसका रक्षा में प्रवत होकर अधम करना व्यथ है। मुषे तो कोई ऐसा शूरवार नजर नही नाता जो मेरी नात्मा का नाश कर दे। इसलिए मैं जात्मा की जावाज सत्य को कभी नहीं छुपाता हू जोर न करूगा । स्वामी दयानद के इस भाषण के दौरान सारे सभा स्थल म स नाटा छा गया। सब स्तब्ध भाव से ऋषि दयानद का सारगर्भित भाषण सुन रहे थे। व्यास्या समाप्त होते होत स्वामी जी ने इधर उधर देखकर पूछा, आज हमारे भक्त पादरी स्काट दिखलायी नहीं पड़ रहे हैं।' सभा मे किसी व्यक्ति ने खडे होकर बतलाया कि यही पास गिरजे मे आज उनका व्याख्यान है। पादरी स्काट कभी भी ऋपि दयानद के व्याख्यानो से अनुपस्थित नही रहते थ । इसलिए स्वामी जी को पादरा स्काट से बहुत स्नह हो । के 51 गया था। समीप के गिरजे में ही उनके व्याख्यान की बात सुनकर स्वामी जा सना से उठ खड हुए और अपन अनुचरा से बोले, "चलो, आज मन स्काट का गिरजा देख जायें।" महर्षि दयानद के पीछे पीछे सारी भीड समीप के गिरजे में जा पहुचा। स्वामी दयानद को गिरजे म आया देखकर पादरी स्काट गदगद हा गया । प्रायना स्थल के ऊचे भाग से नीचे उतर कर स्काट ने महर्षि का अभिनदन किया। उ ह अपने समीप ऊचे स्थान पर विठलाया। इसके बाद उन्होन महपि स कुछ उपदेश देन को कहा। महर्षि दयान द न उस समय वहा व्यक्ति पूजा या देव पूजा का जोरदार शब्दो मे खडन करते हुए निराकार इश्वर की उपासना व परोपकार का उपदश दिया। इन दिना के सतमग से ही मुशोराम स्वामी दयान द के अन्वत निकर आ गये । फिर भी उनके नास्तिक विचार उनके मन मे उपादेय का स्थिति वनाप रह । मुशीराम नास्तिक होते हुए भी ईश्वर के अस्तित्व पर अविश्वास नहीं कर पा रहे थे । महर्षि दयान द न उहें आकर्षित तो अवश्य किया था किंतु उहें ईश्वर के अस्तित्व में अब भा सदेह बना रहा। यही नहीं, उ हे इश्वर और वेद दोनो ही आडम्बर से भर हुए लगे। एक दिन उन्होन महर्षि दयानन्द से इस विषय में अनेक प्रश्न पूछ डाले। पाच मिनट के ही प्रश्नात्तर से मु शाराम निरत्तर हो गय किंतु उनकी शका अब भी बनी रही। दूसरी वार भी उलाने महर्षि दयानद से शका समाधान के लिए अनेक प्रश्न किये किंतु इस वार भी उन्हें महर्षि के तर्को के सामन चुप हो जाना पड़ा। इसके बाद तीसरी बार भी यही घटना दोहराई गई। प्रश्नातर हुए और मुगीराम निरुत्तर रह गए । पर उनकी शकानो का समाधान अब भी नहीं हुआ। मुशाराम स रहा नही गया होने महात्मा दयानद से कहा, 52 महाराज यद्यपि अव की तक शक्ति वडी प्रबल है, जापन मुप चा तो करा दिया है। परतु र तप यह विश्वास नहीं दिलवाया है कि परमश्वर का कोई अस्तित्व है।" महर्षि दयानद हस और इसके बाद उपनिषद स एक श्लोक सुनाया और कहा, "देसो तुमन मुपसे प्रश्न किए और मैंन उनका उत्तर दिया, यह तो युक्ति को वात थी। पर मैंन यह प्रतिना कब का था कि मैं तुम्हारा ध्यान परमश्वर की ओर लगा दूगा । तुम्हारा परमवर पर विश्वास उस समय ही कायम होगा। जब वह प्रभु स्वय ही तुम्हें अपना विश्वासी बना लेंगे।" मुशीराम दयानद की युक्ति सुनकर चुप रह गये । वह बहुन अभि- भूत हो गए । उहोन मन ही मन उस महान तेजस्वी अभिनता स्वामी दयानद को हाथ जोडकर प्रणाम किया। उस ससय से ही वह स्वामी दयानद के साथ एक ऐसी डोर से वध गए जिससे वह आजीवन जुड़ रह । उसी श्रद्धा और विश्वास के बल पर वह आगे चल मुशीराम से स्वामी श्रद्धानद कहलायें । 27 अगस्त 1879 ई० को मुशीराम सन्निपात ज्वर से पाडित हो गये । वे अभी स्वस्य भी नही हो पाये थे कि स्वामी दयानद बरेली से प्रस्थान कर गये थे।

9 गृहस्थ-जीवन । मुशाराम की तबियत दिन प्रति दिन विगडती ही गयी । पिता नानक चद न बरेली शहर म उपलब्ध सभी वद्य हकीमा को बुलाया पर मुशीराम की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ। बरेली के तत्कालीन अग्रेज सिवित मजन का भी नानक चद न मुशाराम के इलाज के लिए बुलाया | पर पूरे छ घटे तक अपनी सभी चिकित्मा विद्या का उपयोग कर भी वह मुशीराम को स्वस्थ नही कर पाया । इसके बावजूद अपनी डेढ सौ रुपये की फीस लेकर चला गया। तव किमी न नानक चद को मुशीराम के इलाज के लिए लल्ला हकीम का बुलान की सलाह दी, लल्ला हकीम नम्बर एक का जुआरी आवारागद इमान था। इसलिए मुशीराम के इलाज के लिए नानकचंद उसे बुलाने को इयार नहीं थे। इसस पूर्व भी मुशीराम का ज्वर लल्ला हकीम की दवाना स ही ठीक हुआ था। मजबूर होकर नानक चद को लल्ला हकीम की शरण लेनी पड़ी। उन्हाने लल्ला हकीम का मुशीराम के इलाज के लिए तत्काल बुलवाया। लल्ला हकीम न एक कटारी म मिश्री घोली और तीन मासे की एक लाल दवा की पुडिया मिलाकर पूरा एक गिलास बनाकर पिला दिया। फिर लल्ला हकीम न मुशीराम की नाभि म एक रोगन मला व उनके हायो और परो म मक्खन लगाकर कासे के कटोरे से मालिश की फिर तीन तीन घटे बाद एक हरी दवा की पुडिया को मिलाकर शबत पिलाया । बारह घटे म मुशीराम का बुखार उतर गया और उन्हें खूब गहरी नीद आ गयी। उमके वाद जरा सा स्वस्थ होते ही मुशीराम न स्वामी दयानद के दशनो को अभिलाषा जाहिर की। किन्तु जब उहें यह बतलाया 54 न कि स्वामी जी तो इस समय शाहजहापुर को यात्रा पर चले गए हैं तो मुशीराम अपना मन मारकर रह गये। लल्ला हकीम ने पहले की तरह मुशीराम को इस बार भा जापनि- युक्त चटनी खाने को दी। तीसरे ही दिन मुशीराम पहले से कुछ स्वस्थ हो गए । सुवह उठकर काफी दूर तक टहलन चले गए। अब वह पूरी तरह स्वस्थ थे। मुशीराम के पिता नानक चद को उन घटनाआ के वार में जरा भी पता नहीं था। जिनके कारण मुशीराम का मन नाच और राग रग को महफिल से बिलकुल उसड गया। जिनके कारण मुशाराम शराब पीना बिलकुल ही छोड दिया था। पिता नानक चद को पूरा विश्वास था कि पुत्र मुशीराम की य मनी खराब आदतें स्वामी दयानद सरस्वती के प्रभाव से ही छूटी हैं । वह स्वामी दयानद के बहुत कृतन थे जो उन्होन मुशीराम की बुरा आदर्ते छुड़ा दी थी। इसके बावजूद वह स्वामी दयानद सरस्वती द्वारा मूर्ति पूजा की बुराइया करने के कारण सस्त नाराज थे-या तो नानक चद न स्वामी दयानद सरस्वती की हर प्रकार से नभ्यथना की थी। नानक चद ने मुशीराम को स्वस्य दखकर यह आना दा कि वह तुरन्त जाकर अपनी पत्नी शिवदेवी को मायके स जपन घर ल आय मुशीराम पिता को आना से अपनी ससुराल रवाना हो गय । जहा अपन माले लाला देवराज से उनकी बहुत गादी मिनता थी । कालातर म यही मित्रता जाय समाज के उदभव विकास म दहुत काम आई। या तो मुशीराम का विवाह हुए काफी समय हा गया था । फिर भी उन समय की प्रया के अनुसार उनकी पत्नी उस समय मायक में हा रह रहा थी। इमस पूर्व मुशीराम दो बार अपनी मसुगल जा चुक थे । उना माता का निधन हो गया था। सब भाइ अपना अपनी पत्नियो और घर गृहस्थी म रम हुए । सिफ मुशीराम और उनके पिता स्ला- विह न पर म अपना समय गुजार रहय। सनी पला शिवदया को लेकर मुगाराम वरती पन पर भी 55 गये। बरेली आन से पूर्व कुछ समय वह अपने घर तलवन भी रुके थे । जहा उन्हें अपनी पत्नी शिवदवी के साथ काफी खुलकर या कहना चाहिए खुलकर वातचीत की ! मुशीराम ने पुरानी परिपाटी को छोडकर अपनी पत्नी से व्यावहारिक व यथार्थवादी सम्बध बनाए । जभी तक उनके मन मे अपनी पत्नी को लेकर जो कौतूहल था, वह समाप्त हो गया था। उनके मन में पति पत्नी के गूढ सवधो का नान भी हुआ। इन शारीरिक और मानसिक सम्बधो के कारण ही अपनी पत्नी के प्रति मुशीराम के मन मे प्रेम की और समपण की भावना उत्प न हुइ । उहोन यह महसूस कर लिया कि जब उनके ऊपर अपनी पत्नी शिवदेवी का उत्तरदायित्व है । जिसे हर हाल मे उ है सारे जीवन भर निवाहना ही है । उसी समय से ही मुशीराम के मन में नारी की विवशता उसकी असहाय स्थिति को समझने की बात आई। सचमुच नारी अबला है आर सुरक्षा सम्मानित जीवन और सफल दाम्पत्य जीवन के लिए पूरा तरह पति पर ही नाश्रित है। मुशीराम के मन म नारी के प्रति पूरी तरह दया और रक्षा की भावना उदय हो गई जो जीवन प्रयत कायम हो गइ। यही नारी रक्षा और नारी के प्रति दया की भावना आय समाज मे भी उत्पन्न हुई जो जाज भी कायम है। आय समाज न जान क्तिनी अवला, उत्पीडित नारियो, बाल विधवाओ का कल्याण किया है। इन सारी भूमिका के पीछे निश्चित रूप से मु शीराम जसे व्यक्तियो के सिद्धात थे। बरेली जान पर मशीराम की पत्नी शिवदेवी का यह नियम था कि दिन का भोजन तो हरहाल मे वह पति मुशीराम चद के भोजन करने के उपरात ही करती थी। बाय सस्कृति और आय सभ्यता में पली पुषी शिवदेवी पूरी तरह क्तव्यनिष्ठ और पति परायण स्त्रो यो । एक पति-परायण स्त्री के क्या क्तव्य होने चाहिए, यह वह बहुत अच्छी नरह से जानती थी। पति की सेवा के अतिरिक्त के काम-नाज, ससुर व पूरे कुटुम्न ससुर नानक ३० पी निष्ठापूपर सपा पर यह मा या तरह से जानता था। र माधन-सम्पन, धनी परिवार म म सनर वा मा यह बहुत विनम्र र सुगीत स्वभार रा महिला पा। सोमग सरियत हान : बावजूद यह पापी गर्मोस स्वाय TT महिना यो। विवी के इन गुणा स मुशीराम बहुत प्रसन चित रहन मग । दिन म तो यह तय हो पाfr यह मनोराम को भोजन करानक वाद स्पय भोजन करतीं । रारा मुशीराम । अफगर पर लौटने में देर हो जाती। इस सारण पिवदवा रात का नानर पद को समय से भोजन करा दती। इसके बाद अपना और मनीराम का भोजन न्हा पर अपन यमर म स आती। जब मुशाराम तिनी भा रात का तोट कर पर आत । वह गोठी पर उनमा साना गम पर उन्हें मिलाता। इसके बाद ही पद भोजन करती। एक दिन की पात है। मुशीराम रात के आठ बज पर वापित लोट । ज्या ही यह गाडी से उतरे कि मनी त्रिवदी सहाय न उह रोक दिया। टन मकान के समीप हो बरेली के युग रईस मुगा जोवन महाय का मकान था । उही के वह लह मुशी प्रियदी सहाय ५ । जो मुगीराम के बहुत अच्छे दोस्त थे। धन सम्पदा स यह परिवार सम्पन पा जिसके कारण मुशी त्रिवेदा मद्यपान ये बड प्रमी थे । मुशीराम को मुशी त्रिवेदी अपन साप अपन कमरे म ल गय । जहा शराब पी बोतल उनका इंतजार कर रही थी। मुशीराम ने पहल ता शराव पोन से मना कर दिया, परतु बाद मे अपने मित्र मुशी त्रिवेदो के बहुत जोर देन पर वह गराव पाने यो तयार हो गय । उहोने भी शराब का गिलास हाप में ले लिया । मुगी त्रिवेदी से उनके बहुत पुरान घरेलू सवध य । यद्यपि त्रिवेदी सहास के छोट भाई उनके मित्र थे फिर भी मुशीराम को अपना वडा भाई मानते उन दोनो के पी पिलान के सवध थे। शराब के गिलास के साथ गपशप भी चलन लगी। मुशीराम ने पहला गिलास तो बडी शीघ्र चढ़ा लिया, एसा होन जल्द ही उठन की वजह स क्यिा था। परतु बातचीत चल रही थी और शराब भी भी - 57 नशीली व अच्छे किस्म की थी। जव उह शराब पीकर जपन घर जाने की याद आई, तब तक वह चार गिलास चढा चुके थे। घर जान के लिए उठत ही उहें नशे का अनुभव हुआ । मुशीराम के उठते हा उनके दो मिन भी उनके साथ उठकर चल दिए। उनमे से एक ने क्सिी वेश्या के घर चलकर मुजरा सुनन की इच्छा प्रकट की। यद्यपि मुशीराम ने कई नाच रग की महफिलो मे वेश्याा का मुजरा अवश्य सुना था क्योकि उन दिनो यह बहुत प्रचलित था पर वे अब तक किसी वेश्या के कोठे पर नही गये थे। न ही आज तक उहाने किसी वेश्या को अपने घर आमनित किया था। शराब के नशे और मिनो के साथ की वजह से वे अव एक वश्या के काठे पर जा पहुचे । नानक चन्द कोतवाल साहब के पुन मुशीराम को देखकर वैश्या की वाछे खिल गयी। सारी वेश्यायें झुक झुककर मुशीराम को सलाम करने लगी। कोठे की गपिका को हुक्म सुनाया गया कि वह खुद मुजरा पेश करे, पर वेश्यायें हिचकिचा रही थी। इसका कारण यह था कि कोई जय पसे वाला रइस मुजरा सुनने आने वाला था। इस कारण वे श्यायें मुजरा पेश करने में हिचकिचा रही थी। क्योकि इन लोगो से पसे मिलन की उम्मीद नहीं थी। नशे के आधिक्य के बावजूद मुशीराम को वेश्याआ का अपना और अपने दोस्तो का जोरदार स्वागत और फिर वेश्या द्वारा मुजरे म हो रही देर वरदाश्त नहीं हुई। उन्हाने उठकर वेश्या से बुरा भला कहना शुरू कर दिया । जिमको सुनते ही वश्या का पूरा घर काप गया। एक वेश्या हाथ बढाकर मुशीराम के पर छूना ही चाहती थी, कि मुशीराम जोर से चिल्लाये नापाक और उठकर उस कोठे से तुरत नीचे आ गये । नशे क जाविषय से मुशीराम को कुछ याद भा नहीं था। बल्कि यह सब किस्सा बाद में उनके दोस्तो ने उन्हें सुनाया । मुशीराम गिरते-पडत अपनी गाड़ी में सवार होकर अपने घर जा पहुचे । किसी तरह अपनो बठक मे पहुच कर विस्तर पर गिर पड़ 58 वे सो गया और पर सामने की ओर पसार दिये। घर के नौकर ने मुशीराम के जूते खोले । तब उन्होने अपने कमरे मे जाना चाहा । परतु वह अकेले अपना सतुलन नही सम्हाल पा रह थे । तव नौकर न उहें सहारा देकर ऊपर पहुचाया । जहा दोमजिले पर वह जपनी पत्नी के साथ रहते थे। छत पर पहुचते ही उनका मिर चक्रान लगा और उ हे बडे ही जोर की उल्टी हुई। उनकी पत्नी शिवदेवी उठकर उनके पास आई व उन्हें उठकर सम्हालन लगी। पत्नी ने मुशीराम का पानी दिया, हाथ मुह धुनाकर गद कपड़े उतरवाय और साफ कपड़े पहनाय । इसके बाद उन्हें सहारा दकर अदर अपन कमरे में ले गयी। जहा उहें विस्तर पर लिटाया। फिर शिवदेवी न मुशीराम को चादर ओढाकर उनका माथा और सिर दवाती रही। कुछ देर बाद मुशीराम को आराम अनुभव हुआ और रात के कराव एक बजे मुशीराम की नीद खली तब भा उनका पत्नी उनके पर दवा रही थी। उन्होने पानी मागा तो निवदवा ने उठकर मुशीराम को पानी पिलाया और अगीठी से गम दूध पिलाया। दूध पीकर मुगीराम की कमजोरी काफी हद तक दूर हा गयी। मगीराम न उठकर कहा, 'दवी, तुम रात भर जागती रही, भोजन भी नहीं किया। चला जब उठकर भोजन कर ला। 'आपक विना मैं कस भोजन करती। अव भोजन करन म कसी रुचि।" इस उत्तर न मुशीराम के हृदय को बुरी तरह झक्झार दिया म्याकुलता में भी स्नेह और सफलता का इस अनासी मूर्ति को मगीराम का हृदय आत्मग्लानि से भर गया और उहान नाज के पन आचरण का पूरा पा अपनी पत्नी को मुना इसने गद जर मुगीराम न अपना पत्नी से क्षमा मागा, तर तियदया न रहा मा मरे स्वामी हैं, यह मना पर क्यो मुन पार में गमना पाहत है। मुझे तो यही निभा मिली है कि मैं हमपा नापका । मेवाहा 59 उस रात दोनो ही पति पत्नी विना भोजन किय सो गय । दोना के भोजन न करने के कारण भले ही अलग थे पर दोनो पति पत्नी के वाच एक अनोखी समपण की भावना थी। उस रात पत्नी शिवदेवी की सेवा मुशीराम को आजीवन याद रही, जिसके कारण उनका सपूण जीवन ही बदल गया । इसके बावजूद मुशीराम की शराब पीन की लत नही छूटी। उनके दोस्त उह शराब पिलान अपने साथ ले जात । मुशीराम क पास अक्सर शराब पीने को पसे नहीं होते। इसलिए सब लोग वरली छावनी के एक शराब विक्रेता से उधार शराव खरीद लिया करत । फिर पूरी मित्र मण्डली बठकर शराब पीती। इस तरह शराब का उधार बढता गया । सच के लिए मुशीराम अपने पिता नानक चद से पसे मागा करते पर शराब के लिए पसे कसे मागें । एक दिन गराव विजेता न शराव का विल उनके घर भेज दिया। विल भी पूर तीन सौ रुपये का था। अब यह विल कैस चुकाया जाय। इसकी चिंता मुशीराम को लग गयी । उनका स्वाभाविक रहन सहन फीका पडन लगा। एक दिन जब भोजन करात समप शिवदवी न मुगीराम स उनका इस उद्विग्नता का कारण पूछा तो उहोन सारी बात सच सच तिला दी । यद्यपि उनके मन म बहुत सकार था। पली शिवदवी न भोजनोपरात हाथ धोकर मुशीराम का अपन कमरे में बुला लिया और उहान अपन हाय मे पहने नोन क षड उतार दिए और पति की ओर बढ़ाकर इह बेचकर सराव का बिल चुकाने की सलाह दी। मुसीराम न हाप हिलाकर मना करते हुए कहा, ' नहीं दरी, यह +से हो सकता है। तुम्ह आज तक मैंन कोई आभूपण दिया नहीं जन्टा तुम्हारा नवर वेचकर अपना शराब का उघार का दिल चुकाज इस पर शिवदेवी ने तनिक चितित हो पति के मुह को बार दसा और रहा, 'इनम से एक जोर पिता ने बोर दूसरी ससुर जा नदी पो। इनम एक चोडी कगन व्यय ही पड़ी थी। अब यह तन 7 60 जारका है तो यह कगन भी आपके ही हैं । इह मैं आपके काम के लिए ही दे रही है।" मुशीराम निरुत्तर हो गय। उह सस्कृत साहित्य का वह श्लोक याद जाया, जिसका अर्थ है देवी पतिव्रता स्त्री के रूप मे पति की स्वास्य रक्षा के समय, माता विपत्ति के समय, भगनी और सतान सख पहुचाने के लिए धमपत्नी का रूप धारण करती है। लाचार होकर शिवदेवी की बात माननी पडी। कड बेचकर उ हान अपनी शराब का उधार चुका दिया। परतु उमी क्षण मन में सकल्प किया कि जब वे कमाने लायक वन जायेगे तो सबसे पहले पत्नी को कड़े खरीद कर वापस कर देंगे। मुशीराम का मन बब कुछ कमाने धमान की ओर लग गया। उनके मन में अपनी पत्नी के अपरिमित त्याग ने पतिव्रता स्त्रियो के प्रति अगाध श्रद्धा की भावना भर दी थी। वे अपने दिल में भारतीय स्त्रियो का पूरा पूरा सम्मान करने लगे। इसका श्रय निश्चित रूप से उनकी पत्नी शिवदेवी को ही है।

10 सरकारी नौकरी मुशीराम को पढाई छूट चुकी थी। अब उनके पिता नानक चद को उनके लिए कही नौकरी की चिंता हुई। मुशीराम के सभी भाई पहले से ही नौकरी कर रहे थे । मुशीराम भी गृहस्थ जीवन मे काफी समय पूर्व प्रवेश कर चुके थे। उनके अपने व्यक्तिगत खर्चे थे। उनकी पत्नी के भी अलग व्यक्तिगत खर्चे थे। उनके लिए धन की बहुत आवश्यकता थी। जो हमेशा पिता नानक चद से नही मागा जा सकता था। मुशीराम स्वय भी स्वावलम्बन के सिद्धात मे विश्वास करते थे। अब उनकी पढाई भी छूट ही बुकी थी। इसलिए जीवन यापन के लिए और समय काटन के लिए भी नौकरी की बहुत आवश्यकता थी। मुशी के पिता पुलिस विभाग मे शहर कोतवाल थे। वाकी दाना लाई भी थानेदार ५ । इसलिए नानक चन्द मुशीराम को भी पुलिस विभाग में या किसी अय सम्मानित विभाग मे किसी सम्मानित पद पर नियुक्त कराना चाहते थे। उन दिनो आज की तरह सघ लोक सेवा बायोग, या प्रा-शिक सेवा आयोग नही थे । बल्कि कमिश्नर, कलेक्टर, पुलिस सुपरिडेंट, आदि सब इस्पेक्टर या नायब तहसीलदार, तहसील दार आदि नियुक्त कर सकते थे । बरेली के कमिशनर एडवर्ड की, मुशीराम के पिता नानक चन्द पर बहुत ज्यादा कृपादृष्टि थी। अत एक दिन उपयुक्त समय देखकर नानक चद ने बरेली शहर के तत्कालीन कमिश्नर एडवर्ड से मुशीराम के लिए किसी अच्छी नौकरी के लिए कहा। कमिश्नर साहब ने मुशीराम का नाम तहसीलदार पद के लिए भेजन का पक्का आश्वासन नानक चद को दे दिया। नानकचद की प्राथना के चद दिनो वाद ही एक नायब तहसीलदार दार उट्टी पर चले गये। कमिश्नर साहब ने तुरत ही मुशीराम की नियुक्ति नायव तहसीलदार पद पर कर दी। इस प्रकार मुगीराम अपने पिता नानक्चर के प्रभाव से नायब तहसीलदार के सम्मानित पद पर जा पहुचे। अब वह भी अपने परि वार में स्वावलम्बी या सीधे शब्दो म कहा जाय तो जपने परो पर खड हो गये थे। उस समय इस तरह के सम्मानित पद उन व्यक्तियो को ही दिये जात थे जिन पर जग्रेज सरकार का अगार विश्वास हो । कमिश्नर एडवर्ड को नानक चद और मुशीराम पर जगाध विश्वास था । इसलिए मुशीराम को नाया तहसीलदार नियुक्त किया था । मुशीराम न भी वडी ही योग्यता, कुशलता और जिम्मदारी से यह महत्त्वपूर्ण पद सम्भाला । उनको नीति, विवेक और तात्कालिक निणय क्षमता न उनको अपन पद का निर्वाह करन मे विशेष मदद दी। भाग्यवा उही दिनो तहमीलदार छुट्टी पर गये। इन दिनो कमिश्नर साहब मुशीराम के कार्यों से बहुत प्रस नचित्त थे। इस कारण कमिश्नर साहव न मुशीराम की नियुक्ति तहनीलदार के पद पर कर दी। कुछ दिनों तक मुशीराम न तहसीलदार जस जिम्मदारी क पर का बहुत अच्छी तरह निवाह किया। अब यह निश्चित हान लगा कि कमिश्नर साहव उनकी काय कुशलता के आधार पर उह स्थाई स से तहमीलदार के पद पर नियुक्त कर देंगे। पर तु मुशीराम के भाग्य म मात्र तहसीलदार जसा तुच्छ पद नहीं था। भाग्य देवता न उह भगवान मुशीराम जोर स्वामी श्रद्धानन्द बनने के लिए भेजा था। जिसस वह लाखा पद दलिता, विधवामा का कल्याण करें और सनातन हिदू परिवार को पाखड, विवेक स मुक्त करें रेली शहर पास-पास जाठ दस मील के फामले पर उन समय संग्रजी पोज न अपना डेरा डाल रखा था। उन समय नी सना को सम्मानित समझा जाता था। सेना का रसद पहुचाने पी सारी जिम्मदारी जग्रज कमिन्नर न तहसीलदार मुमाराम रो सोपा था। पहले तो मुमाराम ने बग्रेज फौज को रसद पहचान की निम्म । आज की 63 बारा खुद सम्हाली। फिर उन्होन कुछ दुकानदारो को सामान पहुचाने का जिम्मेदारी सौप दी। जो वही यानी फौजी डेरा के पाम जपना मामान रख कर वठने लगे । छावनी के फौजी अफसर उन दुकाना से सामान लेन लगे। एक दिन गोरे सिपाहियो ने वही एक जडे वाले से उसके अडे बिना दाम दिय छीन लिये । बहुत मागन पर नी जण्डे वाले को फौजी अफसरो न अण्डे के पसे नही दिय । यह अण्डे वाला भी मुशीराम तहमीलदार के आदेश पर ही अपन अण्ड वेचने वहा जाता था। अण्ड वाले न अग्रजी फौज की इस ज्यादती की शिकायत तहमील दार मुशीराम से की। मुशीराम न उन फौजियो से गरीव जण्डे वाले का पने देने को कहा। किंतु अग्नेत फौजी अधिकारियो ने उनकी बात हसी में टाल दी। इस वदतमीजी से चिढ कर मुशीराम ने अंग्रेजी फौज के कनल से इस घटना की शिकायत की। जिसे सुनकर अंग्रेज कनल न मुशीराम से कहा, "उन फौजिया ने अण्डे वाले को पस न देकर विल्कुल ठीक किया।" मुशीराम ने कहा कि यह दुकानें उनके कहने से फौजी छावनी के समीप लगाइ गई है। अगर अण्डे वाले के पसे फौजिया द्वारा नहीं दिलवाय जायेंगे तो वह सारी दुकानें वहा से उसी समय हटवा देंगे। अग्रेज कर्नल मुशीराम के इम उत्तर से और ज्यादा चिढ गया। उसे यह वान वडी अजीव सी लगी कि एक मामूली अफसर फौज के अफसर को य जवाव दे । उसे नहीं पता था कि मुशीराम किस मिट्टी के बत हुए हैं। उसन क्रोध म जापे से बाहर होते हुए कहा, 'अगर तुमने में दुकानें हटवायी तो तुम नुकसान उठा जालोगे।' इसके बावजूद अग्रज बनल ने एक भी पसा नहीं दिया । मुमाराम भी क्रोध में आ गये उ होने साफ शब्दो में कह दिया, बिना अण्ड वाले को पसे दिय वह और दुकानदारो को दुकान चलाने की इजाजत नहीं देंगे। मुशीराम के इस जवाव से चिढ़ कर बग्रज क्नल क्रोध में मुशी- राम की ओर बढा, मुशीराम न भी अपने घोड का चाबुक कस 64 कर हाय म पकड लिया । अग्रज कनल हैरानी से हक्का बक्का रहे गया । कोई अदना हिंदुस्तानी एक अंग्रेज कनल को मारने को तारू हो सकता है । एसा व्यक्ति बहुत खतरनाक हो सकता है । वह तत्काल वहीं खडा रह गया र हक्का बक्का सा मुशीराम का मुह देखता हा रह गया । मुशीराम उसी घोडे पर वठकर फौजी छावना से चले गय । उसी दिन उस अग्रेज कनल न, कमिश्नर साहब से शिकायत का। कनल की शिकायत की वात मुशीराम के कान में भी पड़ गया। उ हान कमिश्नर के पूछन पर सारी घटना सुना दी। सब कुछ सुनकर कमिश्नर ने मुशीगम को समझाया कि उन्हें धय स काम लेना चाहिए। अभी उन्हें तहसीलदार के पद पर स्याई हाना है। इन छोटी छोटी बातो से उनको व्यक्तिगत रूप से कुछ भी लाम नही होगा । कमिश्नर को यह बातें सुनकर मुशीराम को विश्वास हो गया कि कमिश्नर न सारी बातो को सत्यता पूण समय लिया था। इसके बावजूद कमिश्नर ने उल्टा उह ही समझाना उचित समया। सत्य असत्य, याय अयाय की उस अंग्रेज कमिश्नर न न तो कोई परख की और ना ही कोई परवाह उहान अच्छी तरह समझ लिया कि अग्रज अपने को शासक समझते हैं । इस लिए जायज नाजायज कुछ भी करन से नहीं हिचकते है । अग्रजो के प्रति मुशीराम के मन मे यह धारणा पहले से थी जो अव और पक्की हो गयी । मुशीराम को लगन लगा कि इस स्थिति म नग्रजो के साथ सारी जिंदगी निभाना मुश्किल हो सकता है। मुशीराम का स्वतन और स्वाभिमानी मन इस वधन को कदापि स्वीकार न कर मका । उहाने नौकरी से तुरत इस्तीफा दे दिया । मुशीराम के मन मे अव स्वतत्र और आत्मनिभर रहने का निश्चय जोर पकडने लगा। तभी नानक चन्द का स्थानातरण सबडिवीजनल आफिसर खुर्जा के पद पर हो गया । मुशाराम मा सपरिवार पिता के साथ खुर्जा चले गये । उहान अपनी कमाई के 200 रुपय नानक चद को दे दिव । जिसे वह मुगीराम से बहुत प्रसन्न हुए। -

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उस समय कमिश्नर पद पर एक अन्य अपेज माइकल साहब आ
गय थे जो कि मुगीराम से बहुत प्रसन्नचित्त थे। जब वह एक
सरकारो दौरे पर खुजा आय तो । नानकचन्द न मुशीराम के सम्बध
में उनको पूरी बात बतलाई और उह कही अन्य नौकरी दिलवान की
प्राथना की।
पर मुशीराम न साफ शब्दा म अपन पिता से कह दिया कि वह
अग्रेज सरकार की या किसी को भी नौकरी स्वीकार नहीं करेंगे ।
उनका अग्रेज शासक या शासको से कोई भी व्यक्तिगत विराज
नहीं है। बल्कि वह जब कोई स्वतत्र व्यवसाय करना चाहत हैं ।
जहा स्वाभिमान, अपन मन की शाति और स्वत नता हो ।
मुशीराम के इस उत्तर स पिता स नहीं रहा गया । उनको समझ
म एसा कोन-सा स्वतन व्यवसाय था।
तब मुशीराम न वकालत पढन की बात की। कुछ विचार विमश
करने के बाद नानक च द मुशीराम को वकालत की पढ़ाई करान का
तयार हो गय।

11 लाहौर में अध्ययन तहसीलदारी जसे सम्मानजनक प्रशासनिक पद को त्याग कर सन 1880 ई० मे लाहौर कानून पढने पहुचे । लाहौर का वातावरण मुगीराम को बहुत अच्छा लगने लगा। उन समय वहा का गतावरण बहुत स्वस्थ था। प्राकृतिक रूप से भी लाहौर बहुत ही सम्पन था । मुशीराम लाहौर में एक ही दिन सोय, दूसरे दिन सुबह उटत ही उ हे अपने व्यक्तित्व मे जनोखा परिवतन जा गया । एसा लगा जसे उनके मन मे उत्साह और शरीर म स्फूति थी। प्रात उठकर वह मुबह सुबह घूमने गए। उम समय तक मुशीराम का त्मिक और नतिक चिंतन काफी बढ गया था । सुवह घूमते हुए वे प्रकृति और सक रचियता ईश्वर के बारे में सोचते रहे थे। स्थूल दष्टि से ऊपर उठकर वे ईश्वर और ईश्वरत्व पर विचार करत थे। इस बार मुशीराम कानून का अध्ययन करन आय थे। इसलिए बहुत ही मन लगाकर पढाई मे मन लगान लगे। दिन म कक्षा म ध्यान पूवक पढते और रात के समय अपने कमरे म बहुत रात तक नियमपूर्वक अययन करते। प्रथम रविवार के दिन मुशीराम नहा धोकर आय समाज मतिर गय । जहा हरिकीतन चल रहा था। आय समाज मदिर म सुबह कठिन भजन और उसके बाद व्याख्यान होत थे जिनम पौराणिक हिन्दू गायाशी का सठन, समाज-सुधार, यानि विधवा विवाह सती प्रथा और बाल विवाह पर चर्चा हाती। आय समाज के अतिरिक्त लाहौर में ब्रह्म समाज या ब्रह्म मदिर भी पा । मुगीराम एक दिन सुबह में समय वहा भी गय । बम मदिर म भजन कीतन तरान और उसके बाद व्याख्यान हात, 67 उम दिन वहा शिवनाय शास्त्री का व्याख्यान धा! शिवनाय शास्त्री ने 'भक्ति के महत्व पर प्रकाश डाला। मुशीराम ने बड़े ही ध्यानपूर्वक पूरा व्याख्यान सुना आर यह उसमे बहुत ज्यादा प्रभावित हुए। उन्होंने उसी दिन ब्रह्म समाज में सबधित पुस्तकें सरोदी। उन दिन सारी रात मुशीराम ने ब्रह्म समाज से सम्बंधित पुस्तकें पढ डाली । एक पुस्तक तो उहोने पूरी समाप्त कर ली। पाच छ दिन मुशीराम उन पुस्तका को अच्छी तरह पढते रहे । उन पर मन ही मन विचार विमश करते रहे । उस समय लाहार हर म लाला काशीराम नामक एक सज्जन नव विद्या ममाज के मुखिया घे । उन्होन एक पुस्तक पुनजन्म का खण्डन करते हुए लिखी थी। जो बहुत ही चर्चित हुई थी। परतु ब्रह्म समाज * जीवात्मा का उत्पत्ति को लेकर उनकी अनत उन्नति का विस्तृत जध्ययन किया गया था । दोना ही समाज यानी मतावलम्प की पुस्तको म विपरीत बातें कही गयी थी। जिस कारण मुगाराम के मन म अनेक शकाएं उठ रही थी। मुशीगम एक दिन सुबह लाला काशीराम के घर जा पहुचे ताकि इन शकामा का काई नमाधान निकाला जा सके । लाला काशाराम से मुशीराम की मुलाकात हुई और उहोने अपनी सभी शकायें लाला मुशीराम के सामने रवी । पाशीराम न मुशीगम की शकाला का पूरी तरह समाधान करन का प्रयास किया। पर वह तो नान व विवेक से हर शका का समाधान चाहते थे । साथ ही ज्ञान के वह नघट प्यासे थे। लाला काशीराम ने मुशीराम को पनी एक और पुस्तक दी ताकि उनमी काबा का समाधान हो सके। मुशीराम न सार दिन मे उस पुस्तक को जाद्योपात पढ डाला था। फिर भी उनकी शकाय वढतो गयो । शाम को जब मुशीराम लाला काशीराम के घर गए तो वह वहा मिले नहीं। सारी रात मुशीराम वचन रह और मारी रात चितन करते रहे। दूसरे दिन सुबह मुगाराम लाला काशीराम के घर जा पहुचे । उत लाला 68 समय लाला काशीराम घर पर ही थे। मुशीराम न अपनी सभी शकायें उनके सामने रखी। जिसके उत्तर म लाला काशीराम कुछ नहीं वोले उन्होने मुशीराम को, केशव चद्र सेन और बाबू प्रताप च' मजूमदार लिखित पुस्तकें पढन की राय दी । मुशीराम इन दोनो ही पुस्तको को काफी पहले पढ चुक थे । लाला काशीराम मुशीराम के तक सुनते रहे । ब्रह्म समाज के तक मुशीराम को बहुत प्रभावशाला या तक-संगत नही लग । जिनसे मुशीराम की पूरी तरह तसल्ली नही हुई। इसके विपरीत मुशीराम पुनज म और कमफल पर यकीन करत को मजबूर हो गए। उस समय अचानक उह वरली मे स्वामी दयानद और पादरा स्वाट के व्याख्याना की याद आ गयी । ऋपि दयानद न भी उस समय क्म के फलाफल की बात की थी। मुशीराम को उसी दौरान स्वामी दयानद की पुस्तक सत्याय प्रकाश पढन की इच्छा हुई ताकि वे अपना सभी शकायें मिटा लें। मुशीराम उसी समय सीधे आय समाज मा दर जा पहुच और पुस्तकाध्यक्ष लाला केशवराम को ढढने लगे। लाला केशवराम उस समय जाय समाज पुस्तकालय म उपस्थित नही थे । अत उहें बडी दा की प्रतीक्षा के बाद भी सत्याच प्रकाश प्राप्त नहीं हुई। अपनी अघट उत्कठा को मुशीराम रोक न सके । उहोन बाजार खुलते ही सत्याथ प्रकाश को खरीदा और उसी समय पढने वठ गए और तब हो उठे जब पुस्तक पूरी समाप्त कर ली। नाहौर में मुगीराम के निवास स्थान के समीप ही सहितकारिणी सभा का दफ्तर था। जहा मुशीराम यदा-क्दा चले जाते थे। वहा आते जात रहन स मुशीराम के मन म दश प्रेम का भावना का उदय हुमा । नाय समाज और ब्रह्म समाज दोना म ही वह बान लग। मनोविज्ञान और तक शास्त्र के विद्वान होने के कारण वह पुस्तको या क्विावो मान से संतुष्ट नहीं हो पात ये। हर वात यो त की कसौटी पर कस क दसत 4 । केवल पुस्तका तक ही उनका जावद बधा हुआ नहीं था। वलि वह अपनी धुन के पक और अपन हा

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विचार विवेक से चलने वाले बन गए थे।
इस तरह लाहौर म उनका जीवन सावजनिक धम सभामा की
जोर मुड गया। जिसने एक बार फिर उनकी पढाई पर अपना प्रभाव
डाना।
सना सोसायटी म पूमन, घर के काम काज के चक्कर म उनकी
कानून की पढाई चौपट हो गयी । वह अपन कालेज तक भी नही जा
पात । जिसके कारण उनकी उपस्थिति बहुत कम हो गयी। जिसके
कारण वह कानून की परीक्षा म हो नही वठ सकते थे ।
जर मुशीराम ने देखा कि वे कानून की परीक्षा दे ही नहीं पायेंगे
तो उन्हान मुख्तारी की परीक्षा के लिए अपना नाम लिखवा लिया।
मुन्नारी की परीक्षा के लिए उन्हाने जमकर तयारी की और
परीक्षा दे डाली। भाग्यवश मुलारी की परीक्षा में बहुत अच्छे अका
सहित उत्तीण हो गये।

12 आर्य समाज मे प्रवेश लाहौर म मुख्तारी की परीक्षा पास कर मुशीराम लाहौर से कि जालधर आ गए। जहा वह मुख्तार बनकर अपनी वकालत का का करने लगे। मुशीराम तेज दिमाग, लगनशील और घोर परिश्रमी घ जिस कारण उनकी वकालत चल निकली। अदालत में वकालत के साथ मुशीराम अपन अय सामाजिक क्रिया कलापा मे भाग लेन के कारण शेरो शायरी मुशायरो में भाग लेन लग ऐसे समय म भा मुशीराम हमेशा मुखिया वन रहत और हमेगा लामो?- प्रमोदा म जी सोलकर हिस्सा लेते । पर भगवान को उनका चन त बठना ज्यादा दिन अच्छा नहीं लगता था। इसी कारण विश्वविद्यालय से यह नया नियम निकला कि अब एक वप वाद जो विद्यार्थी स्नातक परीक्षा में उत्तीण नही हागा से आगे कानून की परीक्षा म शामिल नही किया जायगा । मुगीराम यह नियम देखकर चिंतित हो गए । क्योकि उह हर हाल में वकालत पास करनी थी। अत जालधर म चल रही मुख्तारी छाडकर पुन लाहौर जा पहुचे और फिर कानून की कक्षा म अध्ययन करन लगे। पर यह अध्ययन ज्यादा दिन चलन वाला नहीं था। मुगीरान पहले ही नियमित रूप से आप समाज और ब्रह्म समाज क मन्दिरो में जान लगे। उन दिना ब्रह्म समाज मधी विश्वनाय नास्त्री क भक्ति भावपूर्ण व्याख्यान होते । जिनसे मुशीराम वउ ही प्रभावित हुए । परन्तु कम के सिद्धात और पनजम के संबंध म वह ब्रह्म समाज से मल नहीं सात पं । अपनी इस जिनासा क कारण मुशीराम न सत्याच प्रकार को कई बार आद्योपात पढ डाला, जिसमे पुनजम के विषय में पड़ कर उनके मन वो बहुत शाति मिली। साय-साय ही अय समुल्लामो - को पढ़ने के कारण उनका युकाव पूरी तरह आय समाज की दिशा मे हो गया। सन 1884 ई० (सवत 1941) के माघ माह का महीना था । उस दिन रविवार का दिन था । मुशीराम पर अब तक आय समाज का रा पूरी तरह चढ चुका था। धम विषयक अनेक शकालो को दूर करन क लिए वह सत्याय प्रकाश का अध्ययन दिन मे तीन-चार घटे करते थे। पनारकली मोहल्ले मे रहमत खा मोहल्ले के अहाते मे एक तीन कमरे वाली काठी के वायी ओर वाले कमरे मे मुशीराम रहने लगे थे। उस दिन वे प्रात काल एक कुर्सी पर वठे हुए थे । सत्याथ प्रकाश का आठवा समुल्लास उनके सामन खुला हुना था। उम समय मुशीराम दोनो हथेलिया खोले उन पर सिर टिकाय किसी गम्भीर चिंतन मे लीन थे कि तभी वहा सुदरदास जी ने प्रवेश किया । सुन्दरदास, लाला आलोक राम के छोटे भाई थे । लाला नालोक राम व्यवसाय से तो वकील थे पर उन दिनो अग्रज मरकार के खिलाफ चल रहे रावलपिंडी आन्दोलन के सक्रिय कायकर्ता थे । सुदरदास जी ने मुशीराम से पूछा "कहिए किस चिता म फस हुए हैं । कुछ निश्चित कर पाए या नहीं। मुगीराम बोले, "पुनजम के सिद्धात पर फसला कर लिया है आज मैं सच्चे विश्वास के साथ आय समाज का सभासद बन सकता हूं।' सुदरदास जी मुशीराम के इम उत्तर को सुनकर बहुत ज्यादा प्रम न हुए। उनके चेहर पर उल्लास की आभा उतर आइ । वे खुद एक बहुत कमठ आय समाजी कायकर्ता थे। उहें सब भाई सुदरदास कहकर पुकारते थे । सुदरदास जी उसी घ्रात भावना से सबका काम करते। उनकी इस सेवा भावना न उनका हृदय पूरी तरह पवित्र कर रखा था। उनके इस वर्ताव के कारण सारे लोग सचमुच ही उनके भाई बन गए थे। सुन्दरदास जी उस दिन मुशीराम के पास जमकर वठ गए। वही पानि मुसीराम के घर से सुन्दरदास जी और मुशीराम नहा धोकर बाप समाज की ओर गए।

72 मुशीराम जौर भाई सुसरदास उस दिन गाह ए आलमी दरवाजे के रास्ते से लाहौर महर के अदर होत हुए लाहौर शहर का प्रसिद्ध वच्छो वाली गली म पहुंच गए जहा उस ममय नाय समाज मदिर था। वच्छो वाली गली का यह मदिर ही आप ममाज मदिर कहलाता था। द्वार के समीप जदर जाते ही, बायी मोर व आगन क पाम वाले दालान म एक मज थी। उसके नीचे जागन मबह तख्त पर उपासना करन वालो के लिए स्थान था। उसके सामन पर होकर दखन पर वारी दिशा म छोटा मा पुस्तकालय दिखाई पता था । जिस समय भाई सुदरदाम और मुभाराम आप समाज मन्दिर पहुचे उस समय जाय समाज मदिर की शोभा निराली थी। दानो पहले वाले गायक जो हर सप्ताह भजन गाया करते थे, उस समय भी सुमधुर भजा गा रह थे । श्रोतागण वठ हुए बड ही भक्ति भाव से सुन्दर भजना का रस्वास्दन कर रहे थे । सगीत का यह कायम चल ही रहा था। मुशीराम सामने वाली दीवार के समीप जा वठे। उसी समय माई सुदरदास जी न लाहौर आय समाज के प्राणदाता लाला माइदास कान में यह बतला दिया कि आज मुशीराम जसे तेजस्वी व्यक्ति आय समाज के सदस्य बनने आए हैं। भाई मुदरदास की यह बात सुनते ही लाला साइदास खुशी से यूम उठे । उ होन दो-तीन मिनट तक भरी भी आखो से मुशीराम को देखा और अपन पास बुलाकर मुशीराम की पीठ थपथपाई। उसी समय लाहौर आय समाज के एक अन्य कायकर्ता भाई दित्तामिह न खडे होकर मुशीराम के आय समाज में विधिवत प्रवेश की घोषणा कर दी। इस तरह मुशीराम विधिवत आर्य समाज के सभासद हो गए। लाला साइदास उस समय बहुत प्रभावशाली नाय समाज के नता थे। इसक जलावा साइदास का व्यक्तित्व बहुत ज्यादा प्रभावशाली था। उस समय भारत के चारो ओर विदेशी सस्कृति और सभ्यता का उदय हो रहा था । पढे लिखे तथा शिक्षित कहलाय जान वाले लोग अग्रेजी साहवियत और सस्कृति मे बुरी तरह रगे हुए थे। ऋषि दयानद ने अपने 73 उपदय से स्वदेशी को अपनाने पर जोर दिया था। नाला साइदाम मिर से पर तक स्वदेशी रग म रगे हुए थे। उनके मिर पर सदा लुधियान की बनी हुई लुगी वधी होती, गले मे सादा गवरून का कुर्ता, स्वदेशी माटी धोती और परा म सादा पजाची जूना होता था। वे उस समय पगार हाई कोट म हिंदी अनुवादक के पद पर काय कर रहे थे। परतु इसके बावजूद सदा दशी कपड पहनते थे। उस दौरान माई दित्तासिंह के बाद लाहौर नार्य समाज के नता यानि मनी पद पर जवाहर सिंह जाये। एक अधिवेशन के दौरान पहाने मुशीराम के आय समाज में प्रवेश करने पर बहुत प्रसन्नता व्यक्त की। इसके बाद उन्होने यह घोषणा कर दी कि जब मुशीराम उपस्थित सज्जना के समक्ष कुछ कहेंगे । मुशीराम यह घोषणा मुनकर चकरा गये । क्याकि उहाने साव जनिक रूप से कभी कोई भाषण नहीं दिया था। इसके पहले विद्यार्थी या मुख्तार बन जान पर अदालता म उहान तक-वितक अवश्य किया था। किन्तु मवसाधारण के सामन, वह भी धम के मामले में कुछ पहन का उहें कोई अवसर नही आया था। फिर भी मुशीराम उठे और अपने मन म, घम, पाखड पुनज म आदि विषयो पर थोडी देर बोले, अत मे उहोन यह भी कहा, "हम सबके तय और मतव्य एक होन चाहिए और इसी कारण जो वदिक घम के सिद्धाता के अनुकूल जीवन न ढाल रहा हो उसे उपदेशक बनने का साहस नही करना चाहिए । भाडे के इन टटटुओ से धम का प्रचार नहीं हो सकता है । इस महान पवित्र काय के लिए निस्वार्थी त्यागी पुरुषो को आवश्यक्ता होगो । अपनी आत्मकथा में स्वामी श्रद्धा ने एक स्थान पर लिखा है। मुपे अपने अग्यसमाज म प्रवेश से पहले का हाल नही मालूम या। पर यह अवश्य मालूम था कि उस समय सिवाय एक वनिक उपदेशक के और कोई भी उपदेशक का काय नही करता था । और सिवाय मुसलमानो खावियो के लाहोर आय समाज का कोई भी सभासद तक भी स्वय ईश्वर की स्तुति, प्राथना और उपासना के भजन 74 गायन नहीं किया करता था।" इस उपदश के बाद स मुशीराम ने पहले आय समाज का हो नुवा करन का दृढ निश्चय किया। लाहोर के जीवन म, मुगीराम द्वारा आय समाज के प्रवर दौरान जनक परिवतन आये । मुशीराम का व्यक्तिगत जीवन भी बार धीरे बदलन लगा । उनके विचारो म, भावनाओ मे खान पान म धारे धीरे परिवतन जान लगे । वास्तव म अब मुशीराम को अपन जीवन के उपयोगिता का पता चला। लाहौर में विद्यार्थी काल से ही मुशीराम दोनो समय प्रात का और साय काल कार्फ दूर तक घूमने जाया करते थे। साय काल के अपन कानून के सहपाठिया के साथ मुन्शीराम बात चात करत हुए बम धीरे धीरे टहलते फिर थोडी दूर दौड लगाते । एक दिन होली स चार पाच दिन पून को घटना ह । मुगीराम लगभग पाच बजे के आस पास अनारकली पहुचे । जहा पर मुशीराम एक स्थान पर खड होकर, वाटिकाओ से आती सुगधित हवा का आना लेते हुए पुष्पो स खिली वाग की छटा दख रहय कि उसी तमय उहोने एक आदमी को मिर पर एक मास का टोकरा उठाय जाते देखा। टोकरी को ले जान वाला व्यक्ति जल्दी जल्दी मास से छुटकारा पाना चाहता था। इसलिए बडी ही तेजी से भागता हुआ जा रहा था। मुशीराम न दवा टोकरे मे नेड बकरियो की टार्गे उघडा हुइ साल मास बार मास के टुकड़े पर हुए थे। मुशीराम, जो थोडा पहल बाग के मुदर फून दख रह थ बाग का नुवासित हा ले मन जहा इन प्राकृतिक सपदास नुवातित हो गया था, वही मास के टोकरे से मन घणा से भर गया। या तो मुशीराम खुद मास खान तरह के माम क टारे उघनी हुई टागें और उघडी हुई खाले दपत रहते थ। किन्नु उस समय ही उन्हें मास से इस तरह की विर हुइ मुशाराम के परिवार म वाल्यकाल में मास साया जाता था। रात्री धे बहुत शौकीन थ और इन था।

75 समाज म ज म लेन के कारण मुशीराम, उनके पिता नानक चद सव मात साया करते थे। मास खाना उनके समाज मे प्रतिष्ठा का सूचक था। इस कारण उनके घर मे नियमित रूप से मास वनता था और घर का हर प्राणी मास खाता था । उस दिन उस मास के टोकरे को देखकर मुशीराम का मन बहुत खिन्न हुआ और वे चिंतित मुद्रा में अपने घर की ओर चल दिए । स्नानादि से निवृत्त होकर उहाने सत्याथ प्रकाश को पढन को उठाया। सत्याय प्रकाश के दशम समुल्लास मे मस भक्षण के दोपा का वणन था। उसके अध्ययन तक शाम हो गयी। मुगीराम हाय मुह धाकर भोजन करने पहुचे तो हमशा की तरह उस दिन भी खान की थाली म मास की कटारी थी। उस दिन से हो उहें मास खाने से घृणा हुई, जिस कारण उहोन मास की कटारी को उछाल कर फेंक दिया । उस दिन से उन्हान जीवन पयत मास नहीं खाया। कुछ दिन तक उन्हें हमेशा की तरह मास खाने को इच्छा हाती थी। पर धीरे धीरे मासाहार के प्रति घणा हो गयी। तत्पश्चात उ हान अपन मन त मासाहार को निकाल फेंका। यह सत्य अहिमा का वह रास्ता था जिस पर मुशीराम जब चल रहे थे । विद्यार्थी जीवन म ही मुशीराम का कई दुरी लतें लग गयी थी जिसमे शराब पीन की भी आदत पड गयी थी। मुगीराम एक मपन और प्रतिष्ठित परिवार के रोशन चिराग थे । उन दिनो शराब पीना या वेश्यागमन कोई बुरा काम नही माना जाता था। बल्कि यह उच्च कुन प्रतिष्ठा की वस्तु मानी जाती थी। मुशीराम मुख्तार हो चुके, वकालत का पशा कर रहे थे । इनके साथ हो वकालत की परीक्षा लाहौर से दे रह थे । एक दिन शाम को मुगीराम अपने एक वकील मित्र के साथ वठ कर शराब पी रह घे। कासी देर तक दोनो मित्र शराव के गिनास पर गिलास चहा रहे प। उना मित्र वकील साहब को कुछ ज्यादा नशा चढ़ गया तब वह 76 - तो अपने कमरे में सोने को चले गये । मुशीराम का नशा नभी कुछ कम था अत वह बची हुई शराब को ठिकान लगाने लगे। तभी उ हान एक चीख की आवाज सुनी, जो निश्चित रूप से किसी स्त्री की थी। मुगीराम को अभी होश वाकी था वह गिरते-पडते उठकर बाहर आये तो देखा उनक वकील मित शराब के नशे म एक स्त्री को निवस्न किये दे रहे थे। स्त्री अपनी इज्जत बचाने के लिए ही जोर से चिल्ला रही थी। मित्र नशे में जापे से वाहर था उसे इस समय अच्छे बुरे का काइ ज्ञान नहीं था। मुशीराम ने बलपूर्वक उस मित्र को खीचकर जलग हटाया और उत्त युवती की उस कामी पुरुप से रक्षा की । इस घटना स मु पोराम को एक नयी दिशा मिली । उनके नान चक्षु खुल गए। उ हें शराव और नशीले पदार्थों का दुष्प्रभाव आज मालूम पडा । उसी दिन से या उसी समय से मु शोराम न शराव का परित्याग कर दिया। उप मुगीराम नियमित रूप से आर्य समाज म याख्यान सुनने जात जहा उन व्याख्याना को सुनते और उन पर मनन करते चिनन परते थे। एक दिन भाय समाज मदिर म पडित गुरुदत्त का व्याख्यान था। मुशीराम उनके प्रवचना को सुनन का बहुत उत्सुक रहते थे। उसका कारण यह था कि महर्षि दयानद क बाद पडित गुरुदत्त के व्याख्यान म मुशीराम अत्यधिक प्रभावित हुए हुए थे। उस दिन पडित गुरुदत्त । तम्बाकू के गुण अवगुणो पर प्रकाश डाला । तम्बाकू से शरीर पर होन वाल नुकमाना की व्याख्या का। तम्बार के दुष्प्रभावो का विस्तृत वणन किया । जिसे सुनकर मुशाराम वहन प्रभावित हो गए और उसी दिन से उ हान तम्बाकू और हुम पाना आड दिया । अपन इस निश्चय पर गायु पय त टिक रहे । कुछ दिना वाद मु चौराम न यह महसूस पिया कि उनर तम्बाक परित्याग म उनर शरीर को बालस स भी छपारा मिला है । उनका म पहर म स गयी जिसक कारण उना स्वास्थर पहन तार बाडा हो गया।

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13 काग्रेस सस्थापक ह्यूम से भेट - उनी समय जब मुगोराम लाहार म जपन वकालत के अध्ययन को छाटकर आय समाज के समानद के रूप में अपना जीवन प्रारम्भ पर चुके थे। काग्रेस के सस्थापक मिस्टर ह्य म लाहौर की यात्रा पर आय । मिस्टर य म को यह यात्रा काग्रस की स्थापना को लेकर था। काग्रस का ज म तव तक हो चुका था। काग्रेस नादालन का उद्दश्य ही जग्रेजी शासन की नामाजिक भूमिका को और सुदट करना और भारतीय जन मानस म सरकार ममयक पदा करना था। मुशीराम को सर ा म के आगमन का यह उद्दश्य बहुत अच्छी तरह मालूम था । सर ह्य म उन दिनो वहुन श्रष्ठ व्यक्तियो म गिन जाते थे। वह पढे लिखे भारतीय व्यक्तिया ने ही सम्पक रखना पम द करते थे। उस समय के लगभग सभी व्यक्ति सर ह्यम को स देह की दृष्टि से देखते 4 । शिक्षित वग म यह धारणा अच्छी तरह वठ गयी थी कि सर ह्य म ब्रिटिश शासन के गुप्नचर के रूप म जग्रजी शासन के हितपी हैं । जो भारतीय समाज लोगा को राजनीतिक उद्देश्या के तहत फसान के लिए आये है। सर ह्य म न लाहौर मे काग्रसी उद्देश्या को लेकर आय समाज के स्तम्भ लाला साईदास से सम्पक स्थापित किया था । मुशीराम उस समय लाला साईदास के सम्पक में थे जत उह भी मिस्टर ह्य म के काय कलापा का पूरी जानकारी थी। 28 दिसम्बर, सन् 1888 ई० की घटना है पडित गुरुदत्त जा लाला वालकराम को साय लिये हुए मुशीराम के घर आये जहा तरह ह की बातें हुई। इसके बाद तीना व्यक्ति जनारकली बाजार की 79 दुग्ध पान करने गये । जहा लाला देवराज का घर भी था। पजाव में उस समय नक इडियन नशनत काग्रम की स्थापना हो पाइ थी, अभी बात चीत ही चल रही थी। या तो काग्रेस स्थापना ।ई कसर बाकी भी नही थी। कारण लाहौर म पढ़ लिखे लोगो में लोगा की सख्या अधिक थी जो अंग्रेज सरकार के साथ सहयोग भावना रखना पसन्द करत थे। लाहौर के आय समाजी नेता काग्रेस पार्टी को केवल एक सरकार थित दोलन के रूप म ही दखते थे जिसका काम सरकार का यन करना था। वह भी कानून की दृष्टि के अन्तगत ही। पटित गुरुदत्त का मुशीराम पर अत्यधिक प्रभाव था । इस कारण लोग काग्रेम के बारे में कोई अच्छी भावना नहीं रखते थे । मुशीराम बालकराम जस अन्य आय समाज के नेता मो पडित गुरुदत्त के गाव म काग्रस को एक सरकार समर्थित दल समझन लगे । मुगीराम निमय काग्रेस आदोलन की अपेक्षा आय समान की और अधिक इन सा व आय समाज मे ही सक्रिय रूप से काय करन लगे । मुशीराम के जीवन मे यह स्थिति कितनी महत्त्वपूर्ण थी, यह वह म समय नही समझ पाये। यदि वह उस समय कानस में चले गये ने तान उनका क्या रूप होता। इसकी कल्पना नहीं की जा पता है । या तो कुछ समय मुशीराम काग्रस मे आय भी पर तव भी ह एक समाज सुधारक का भूमिका ही अदा कर रहे थे । मुशीराम की वकालत की पढाई छोड़कर जार्य समाज में सक्रिय ज्ञान को खवर नानक चद को लग गयी थी। इससे नानक च द का मन बहुत दुखी हुआ । अब भी उनके मन में यह भीण बाशा थी कि समझा बुया कर रास्ते पर ले जायेंगे। उन दिनो मुगीराम छुट्टिया म घर पाय थे। उस दिन निजला एकादशी का व्रत या। नानक चन्द बहुत कट्टर धार्मिक विचारो के थे, इस कारण उ होने कारखा पा । उन्होन मुशीराम को एकादशी के अवसर पर दान का भाल लेन को कहा, परन्तु मुशीराम तो इन धार्मिक मान्यताओं के कट्टर विरोपा थे। उन्हाने पिता से स्पष्ट इनकार कर दिया। इस पर वह मुगाराम 80 - पिता बहुत दुवा हुए जिसकी मुशीराम ने उस समय कोइ परवाह नहीं की। छुट्टिया समाप्त होन के बाद जब मुशीराम घर से चलन सा ता पिता ने अपन पुन स घर से जाते समय भगवान को नमस्कार करने का कहा। पर मुशीराम न भगवान को प्रणाम करने से स्पष्ट इनकार कर दिया क्याकि व मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी थे। पिता को मुशारान को इन सभी हरकता से बहुत दुख पहुचा । पर तु जवान विवाहित पुन से अब क्या कहा जा सकता था। घर से चलत ममय नानक च द न हमशा की तरह खर्चे के लिए रुपय दिय जिस मुशीराम ने उस समय तो चुपचाप ले लिय पर वार में पिता क एक मिन का रुपय लौटाते हुए यह कहा कि, जब मैं पिता के विचारो के अनुसार नही चल सकता व उह प्रस न नहीं रख सक्ता, ता मैं उनकी आर्थिक सहायता ही क्यो लू ।" नानक चन्द को मुशीराम की इस धृष्टता से सबसे ज्यादा दुख पहुचा । पर जाखिर वाप का दिल था। जानते थे कि बिना रुपय के मुशीराम का गुजारा कस होगा? इसलिए उहोने एक आय व्यक्ति से मुगाराम को लाहौर म रुपय भिजवा दिय। मुशीराम ने उस समय चुपचाप रुपय रख लिय। पिता के इस तरह के आर्थिक मतभेदो के बावजूद भी मुशासन अपन पिता से बहुव स्नह रखत थे व बहुत इज्जत करत थे। लाहौर लौटकर मुगीराम न पुन बोर शोर से जाय समाज के काय क्लापा म नाग लेना शुरू कर दिया। लाहौर आय समान उन दिना उत्साही नवयुवका का येद्र था। मुशीराम बड बार शार 1 आय ममाज कार्यो म जुट गय । लाला नानक चन्द जपनी सरकारी नौकरा से अवकाश प्राप्त करन की आयु पर आ चुक ५। उनके दो पुत्र सम्मानपूवर पुतिन का नौररिया कर रह ५ । वासी यच मुशाराम हा नौकरा छाडर मालत परन लगये। और धार धीर वकालत छोडकर आर समान फ सप्रिय नना बन गये।

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लाला नाप घन रिटायर होकर अपन पत्र पर तलपन म रहन
तापजब उनका पेंशन मिला लगा यी । इसलिए अपना गाता
वह मानाना स चला हा सक्त य।
पर नानक नट के भाग्य में आराम नहीं लिया था। कुछ दिन
लवकाश प्राप्त कर रहट मय ज्यादा दिन धन स नहीं विना पार।
माराम पिता की बीमारी सुनकर तलयन नाय । पिता की यह
दादपकर उह बहुत दुग हुवा । उहान पिता का जी जान से सेवा
तग इलाज कराया । लाहौर स समय मिलत हो वह तलवन चले आग
करत ये । पुत्र की भक्ति मायना और सवा स नानक चन्द क मन को
बहन सोप मिलता । धौर धीरे मुशीराम के प्रभाव से नानक च द को
भा नाय उमाज के ऊपर था और विश्वास हो गया । वह धीर धार
बाय ममान के सिद्धातो को समझने लगे। उनरा भी जाय समाज
सपार स्नह हा गया था।
मुगाराम उन मनय एक साथ कई काम देसत ५ । आय समाज के
कार्यों के बलाया जालघर म उनको यकालत, सालन का परीक्षा की
पारी के साथ माय माय समाज रे सावनिक अधिवसन भी चलत
रहत थे। इन कारणा स जहा उनका सामाजिक जीवन व्यस्त था।
वही उनके पिता नानक चद अपने घर तलवन पर बीमारी नोग रह
पजहा सप्ताह में एक बार जाना पड़ता था।
पहले आय समाज का शास्त्राथ सम्बची काय लाहोर में ही
सम्पन होता था, जिस कारण जालधर जाय समाज वाला का कुछ
सुविधा होती था। मुशीराम न जालधर आर्य समाज सभा को भी
स्वत न कर लिया था। व्याख्यान आदि दन का काम मुशीराम स्वय
करते। उ हान सस्कृत जानन वाले पडिता की भी व्यवस्था कर ली
थी, जो समय पड़न पर विरोधिया का सामना करने को तैयार रहते थे।
पिता नानक च द का जोंग फिर ठीक नहीं हुआ और एक दिन
इम रोग के कारण नाना च द का दहा त हो गया। पिता की मत्यु से
जहा मुशाराम दुखा थ। उस अवस्था म भी जाति बिरादरी और
मुशीराम के बीच वाद विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गयी। जाति-

82 - विरादरी वाले और मुशीराम के दोनो वड भाइ नानर च द का जतिम सम्बार पौराणिक रीति से करना चाहत थे, वही मुशीराम वदिक रीति से सस्कार करने पर उतारू थे। काफी वाद विवाद के बाद जात मुशीराम की हुई और उ होन वदिक रीति से ही अपन पिता नानक चद का अन्तिम सस्कार किया। अपनी इस जिद्द का नतीजा उहें जल्दी ही भुगतना पड़ा। उनके पिता नानक च द का साया उसके सिर स उठ हा चुका था। जालवर शहर के लोग नानक चन्द के जीवित रहते यह विश्वान करते थे कि नानक चद मुशीराम को अपने लाड प्यार और दबाव में सनातन धर्म मे वापस ले आयेंगे। इस कारण मुशीराम का विरोध नहीं हुआ था । पर पिता के निधन क बाद मुशीराम की जाति म हा उनका तीव्र विरोध होन लगा। पौराणिक पडिता ने और मस्ति-पूजा क समयको न मुशीराम को शास्त्राथ क लिए ललकारा । मुशीराम न दृढतापूर्वक शास्त्राथ दिया और अपने विरोधिया को हर जिनासा का जवाब दिया। पर तु इसके बावजूद विराधी शान नही हुए और उहान इसक वावजूद विरादरी की पचायत बुला कर मुशीराम को जाति बहिष्कार करन की आना दी। मुशीराम इस जाति बहिष्कार की धमकी स डरन वाले नहीं थे । लाला शराज ने इस समय उनका पूरी तरह साथ दिया और विरोधियो को धमका दिया कि वह मुशीराम को जाति से बाहर करक दख लें वह उन सबके ढोगा जीवन को अच्छी तरह पोल खोल डालेंगे । विरोधी मुशीराम क अडिग विश्वास और दढ निश्चय को दखकर घबरा गए । उनको बिरादरी की पचायत के प्रमुख व्यक्ति उस दिन विरादरी की पचायत म आय ही नही बल्कि उस दिन जालघर शहर क बाहर ही चले गये। शेष बचे व्यक्ति अकेले क्या करते । इसलिए वह भी निराश होकर अपने अपने घर मे चले आय । इस प्रकार मुशी राम को जाति से बाहर निकालने की धमकी झूठी पड गयी। इस घटना से मुशीराम की हिम्मत और सृत गयी। अब वह সী बलपर आय समाज के पाय करने लगे। ।

14 आर्य समाज मे कार्य दाहरे के शुभ अवसर पर उन दिना ईसाई पादरी अपना धम का काय प्रारम्भ करते और भोली गरीब जनता का लालच देकर ईसाई बना डालते। मुशीराम के कान म जब यह बात आई कि उहान उसी समय जालघर और जय स्थाना पर आय समाज के अधिवेशनो का आयोजन किया। जिसम भोली भाली जनता को पादरियो द्वारा ईसामसीह के मूठे प्रचार की निंदा की गयी जार यूठे प्रलोभन देकर ईसाई बनाने के काय का बहुत जवरदस्त निंदा की गयी । जिसका नतीजा यह हुआ कि ईसाई धम के प्रचारको का प्रचार सफल नहीं हो पाया। जालघर मे मुशीराम और लाला देवराज जा न आय समाज के काम को आगे बढान के लिएऔर आग ममाज के लिए धन जुटान के लिए आटा और रद्दी इक्टठा करने की योजना बनाई । जिसमें वह हर परिवार से कहत, अपन घर मे एक घडा रख ले जिसम राज भाजन बनान से पूर्व अपनी इच्छानुसार आटा डाल दें। इसी तरह आय समाज फै सभा मभासदा, सदस्या से यह अपील की गयी कि वे अपने घर के रद्दी पााज या अखबार न फेंके । माय समाज का चपरासी हर घर से रद्दी चााज इकटठे कर लाता और इन रद्दी अखवारो को वेचकर उस धन को आर्य समाज कोप म इकट्ठा कर लिया जाता । प्रतिदिन इकट्ठे हुए आटे को भी चपरासी ले आता और उसे भी बेचकर धन इकट्ठा कर काष म जमा कर दिया जाता। यह योजना काफी सफल सिद्ध हुई जिम आगे चलकर दयानद एग्लो वदिक कालेज वालो ने भी अपनाया और एक वडा कोष इक्ट्ठा कर लिया। मुशीराम जी नाय नेता के अलावा एक सफल वकील भी सिद्ध 84 उसन अदालतम कई वकील को वकील बन गए - हुए । उनकी वाक्चातुरी तक-वितक करन की क्षमता भी प्रशननाप थी। अपन मुकदमा म वह वडी महनत और लगन से काय करत थे । इस कारण उनकी वकालत अच्छी तरह चलन लगी। उही दिना एक सरदार को एक मुक्दमे के लिए किसी योग्य वकाल का आवश्यक्ता थी। जत योग्य वकीर की तलाश लोगो को वहस करते हुए देखा । इन सार वकालो म वहन के आधार पर उसे मुशीराम हो याग्य वकील नजर अग्य । उस सरदार ने अपने सारे मुकदमा की बागडोर मुगाराम सौप दो। इस तरह मुशीराम को दिन दुगुनी, रात चौगुनी उनति हो रही थी। उस समय जालवर म वीची साहब फौजीदार के जान-माने वकार थे । उहोन मुगीराम को उनकी योग्यता त प्रसन्न होकर अपना एक सहायक बना लिया। इस कारण शीघ्र ही मुशीराम जालधर के नामो थे उन दिना ही मुशीराम की वकालत की परीक्षा भी नजदीक था। इसके अलावा लाहोर आय समाज उत्सव की तयारिया भी पूर पर चल रही थी। आय समाज का उत्सव वडी शान स सम्पन्न हुआ। उसी समय किसी जय कारण परीक्षा की तिथि दो मास आगे के लिए स्थगित हो गयी थी। इस बीच मुगीराम न जालधर माय ममाज का वार्षिक उत्सव भो शानदार तरीके से सम्पन करा दिया। तत्पाश्चात वे कानून की परीक्षा देन लाहोर गय और परीभा में शामिल हुए । इस वार क्योकि पूरी लगन से तयारी का भी इस कारण परिणाम भी बहुत अच्छा निकला । मुशीराम न आखिर वकालत या पराक्षा भी पास की। पर इस परीक्षा में उत्तीण होने का सुख नाना चद र साम्य म नहीं था। जिनका बहुत इच्छा थी कि मुगीराम पिता प्रतिष्ठित पद पर पहुच जाए। जब मनाराम को भी पढ़ाई लिखाई और परीक्षा र चार स मुक्ति मिल गयी थी। मुशीराम का पारिवारिक जायन ना बाही गाति स बर रहा पा। उनी पली शिवदवी बडी हा पति परायण और सती सा की जारा 85 स्त्री थी । उ हान कभी अपने पति से पूर्व भोजन नही किया था । एक आदश भारतीय नारी की तरह वह पति सवा और पति भका म अपना और अपने परिवार का कल्याण समझती थी। वह राज नियमित रूप से पति के चरण दवाती और उनकी सेवा में कभी मुह नही मोडनी था । यौवनावस्था में मुशीराम कुसगतिवश शराव, मास और धूम्रपान ताना म हो लिप्त थे । उहोन न कभी पति की आलोचना की और न ही इन चीजा को लेकर कभी कोई कलह ही की। शिवदवी हमेगा पति द्वारा पढ़े गए ग्रेजी उप यामा के प्रभाव म आयी । गेमास की भावनाओ को ना हमशा उचित व सात्विक रास्ता दिखलाया । हान धीर धीरे मुशीराम स बिना किसी कलह के सारी ग्दो आदते छुडवा दी। इससे उनकी ही बदौलत मुशीराम के मन म ती जाति के प्रति सम्मान की व दया की भावना उत्पन्न हुई । उहान हमा अपन पति के समक्ष एक आदश भारतीय नारी का चरिन प्रस्तुत किया। जिससे मुशीराम अत्यधिक प्रसन्न हुए और आगे चलकर जिमका बदौलत उहोन मारतीय नारी के प्रति बहुत बडा उद्धार का गुस्तर नार -ठाया और उसे परा भी किया। उस समर लडकियो को पढाया लिखाया जाना आवश्यक नही था। जिस कारण शिवदवी मी ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी। मुगाराम ने स्वय उह हिंदी पढना और लिखना सिखाया । उहान अपनी पत्नी को परदा प्रथा से भी मुक्ति दिलवाई और शिवदेवी को एक लच्छी गृहिणी वनन म पूरी मदद दी। जब तक नानकचद जीवित रह शिवदेवी ने उनकी भरपूर सवा की। नानक चद अपनी कुलगहू स बहुत प्रसन थे। मुशीराम जहा भी जाते, अपन वच्चा को हमेगा अपन साथ ले जाते। जालधर म जब उनकी वकालत चलने लगी उहान अपन कमाये धन में एक सुदर कोठी बनवाइ । वह उसी मे रहने लगे। मुशीराम के चार मतानें हुई जिनम दो लडके थे और दो लडक्यिा थी। इनकी पुरियो क नाम वेदकुमारो और अमृतकला था और पुत्री के नाम रिपचद और इद्रजीथा।

86 एक बार इसा मुशाराम ने अपन चारा वच्चा को समुचित शिक्षा दन का निश्चय किया। उनकी दोना लडकिया लडका स उन म वडा पी इस कारण उह उनकी शिक्षा की चिन्ता हुई। उन दिना कुलान हिन्दू परिवारो म लडकिया का पढन का प्रचलन नहीं था। इस कारण लडकिया के लिए कोई पाठशाला नहीं थी। इस कारण मुशीराम न निश्चयन मिशन स्कूल म दोना लडक्यिा को भरता करवा दिया । एक दिन एक बेटी स्कूल से पढकर घर आई और मा को उत्साह से बतलान लगी कि उसन आज एक नया गात सीखा है, पूछन पर वह सस्वर म गान लगी ईसा बोल तरा क्या लगेगा मोल, ईसा मरा राम रमया ईसा मेरा कृष्ण कन्हैया मुगीराम अपनी बटी के मुह से इस तरह का गीत सीव कर हतप्रभ रह गये । ईसाई स्कूल में इस तरह का शिक्षण कराया जायगा । इसकी उहें आशा भी नहीं थी। इसाई स्कूल शिक्षा का आड में धम का प्रचार कर रहे हैं । उसी समय उन्होंने वहा स अपनी बेटियो को हटान का निश्चय कर लिया । जस ही लडकी वदवती को मुशीराम ने यह निश्चय वतलाया, उसन तुरन्त कहा, 'मर लिए कोई दूसरा स्कूल है । जहा मैं पढ सकू ? मुशीराम उस समर निरुतर हो गये। पर जल्दी ही उन्होन कया पाठशाला खाल डालन का दढ निश्चय कर डाला। उन्होन क या पाठशाला खोलन के लिए जनता और वैदिक प्रेमियो से नम्र निवेदन किया। जनता ने भी उनक इत विचार का स्वागत किया और कन्या पाठशाला के लिए रुपया आने लगा। मुशीराम के अथक प्रयासा से सन 1890 ई० मे जालंधर क या महाविद्यालय की स्थापना हुई। मुगीराम पहल व्यक्ति थे जिहाने भारत म स्त्री शिक्षा पर सबत पहले ध्यान दिया और इस विषय में कोई ठोस कदम उठाया । उहोन ही सारे भारत म धीरे धीरे कया विद्यालया की स्थापना पर जार दिया। वे ही स्त्री शिक्षा के जमदाता बन । आज भारत में उन्ही के दिखाय रास्ते पर चलत हुए आय कया पाठशालाना की स्थापना हुई।

. जो आज भी उमी तरह चल रही हैं। मुशीराम का जपनी पत्नी से अटूट संबध था । उन्होने कभी अपनी पन्ना से अलग हान का विचार नहीं किया था। उनका विश्वास या कि पदिक संस्कारों के अनुसार पति पत्नी का सबध अटूट होता है । उनका पारिवारिक जावन बहुत ज्यादा सुखी जोर सम्पन्न पा! मितु जावन ता भा नगर है, न कोई साथ आता है और न ही साय जाता है । सव इश्वर की इच्छा पर निभर करता है और उसके माग किसी का नहीं चलती। मुगाराम का एमशाना के आय समाज ने अपन सालाना जलस म निमवित किया था। उन्होन सपरिवार घमशाला जान का निश्चय किया था। पर इश्वर का कुछ और ही मजूर था। शिवदेवी उन दिना कुछ अस्वस्थ चल रही थी। उह बुखार जा रहा था और भी छोटी मोटी बीमारिया थी। कि तु बीमारिया कुछ ज्यादा खतरनाक नहीं थी न ही कोई घबराने जसी बात थी। अचानक शिवदेवी का वियत ज्यादा घबरा गयी । उन्होने डाक्टर से अपनी परीक्षा करवाई । मुशीराम और डॉक्टर बाहर बातचीत कर रह थे कि अचाना शिवदेवी ने धवरा कर मुशीराम को अपने पास बुलवाया मुगाराम तत्काल कमरे में आ गये और उन्होंने झुककर पली का हाथ पकडावनकी नाडी दखन लगे । शिवदेवी की दशा अचानक - হীনা ও যন্ত। शिवबंधी क ओठ कुछ कहने को काप रहे थे यह कुछ वालना चाहती थीं। तभी एक बार 'ओउम' का उच्चारण हुना तब तक परिवार के सब व्यक्ति उनक आस पास इकट्ठे हो गय । शिवदेवी श माग न उनका मिर अपनो गोद में ले लिया, शिवदेवी ने एक पथराई दधि से पनि पुशीराम को देखा, और माता को गोद म हा सुद्धक पर्यो । मन् 1991 इ० म मुशीराम को पनी भी अल्पायु मे संग लोड पर बना भयो । मुशीराम न वैदिक रीति मे शिवदवी मा अतिम सम्कार कर दिया।

88 - - दूसरे दिन जब वह दुखी मन से नपनी पत्नी का सामान बगेर रह थे तभी उनकी पुत्री वेदकुमारी ने मा के कलमदान के नाच रखा कागज निकाल कर मुशाराम को सौपा । मुशीराम न उस कागज को खोला, वह उनकी पत्नी का उनके नाम लिखा पत्र था पन मे लिखा था 'वाबूजी अब मैं चली। मरे अपराध क्षमा करना आपको मुबसे अधिक रूपवती, बुद्धिमती सेविका मिल जायगी। परतु इन बच्चो को कभी मत भूलना। मरा अतिम प्रणाम स्वाकार करो।" मुशीराम का हृदय फट गया । उहोन हृदय से अपनी पत्ना का आना स्वीकार कर ली । आजीवन उसका पालन किया। बालको के पालन पोषण का सारा दायित्व मुशीराम के बड़े भाई जात्माराम और उनकी पत्नी ने ले लिया। पनी पत्नी की मत्यु के समय मुगीराम मान 35 साल के थे। भरपूर जवानी एश्वय, धनधाय मान-सम्मान होने के बावजूद फिर मुशीराम ने विवाह नहीं किया। महर्षि दयाद के आदश और उपदेशो और वदिक धर्मों के आदर्शों का ही यह पल था कि मुशीराम न आजीवन एक पत्नीव्रत का पालन किया। जबकि उनके मित्र सवधी हितचिंतक परिशराजन दूसरे विवाह की सलाह दे रह थे। कई प्रकार के प्रलोभन सामने आय परतु सब निष्फल ही सिद्ध हुए। वास्तव म शिवदवी के अतिम सदेश न मणीराम का बुरी तरह झनझोर दिया था। जिसके कारण उनम पौरप के साथ मातृभाव जगा दिया था। जिसके बल पर कमवार की माति जीवन के महान उद्देश्यो स वे जूझ गय। मुशीराम के समय धर्मा धता और पुराणपणी विचारधारा बहुत जोरा पर थी । एक सच आय समाजी के रूप म जपने विचारा को सबसे पहन अपन घर परिवार और अपन जीवन म पूरी तरह अपना ~ ---

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लिया । उन्होने समाज मे एक अदर्श प्रस्तुत कर अपने परिवार मे
अतिम संस्कार, विवाह आदि जाति पाति के बधन तोड कर वैदिक
राति से सम्पन्न किये। इस प्रकार उस समय में भी आदश और साहस
का परिचय देकर अपने सिद्धातो का पूरा परिचय दिया ।
मुगीराम ने इस प्रकार और अधिक जोश और खरोश से सामा-
जिक आदोलनो मे भाग लेना जारी रखा। इसके अलावा जालघर
शहर मे अपनो वकालत भी करते रहे। जहा वे अपन क्षेत्र के प्रमुख
और प्रसिद्ध वकील थे । जहा सन् 1898 तक मुशीराम जोर शोर से
वकालत करते रहे।

15 आर्य समाज प्रधान मुशीराम ने आय समाज के सामाजिक उद्देश्यो का जोर अधिक सफल बनान के लिए एक साप्ताहिक पन निकालने की योजना बनाई। इस सबध मे आय समाज के और नेताओ के साथ विचार विमश कर सन् 1890 ई० म उहोन अपना समाचार पत्र निकालना प्रारभ कर दिया। इस समाचार पत्र का नाम 'सद्धम प्रचारक' था। पजाव प्रात में इस ममय उदू भाषा का प्रचार था। इस कारण इस समाचार पत्र को भाषा भी उदू ही थी। मु गीराम न इस समाचार पत्र को सावजनिक बनान के लिए उसम हिस्सेदारी को भी मम्मिलित किया । उहोने पच्चीस-पच्चीस रुपय के कई हिस्सदार आमत्रित किये। उनके जाह्वान पर कई एक हिस्सेदार मिल गय । प्रेस का प्रवध भी हो गया। मुशीराम और लाला दवराज इस पत्र के संपादक बन । कई साल तक यह पत्र चलता रहा पर व्यावसायिक दृष्टि से भी लाभदायक साबित नहीं हुआ। लत में मुशीराम ने सारे हिस्सेदारी का रुपया वापिस लौटा दिया । प्रेस और पन को सारी जिम्मदारी अपने ऊपर ले लो और पत्र को जोर शोर से चगान लगे थे। समाचार पत्र की लिपि उन अवश्य थी, परन्तु पत्र की भाषा धीरे घोर उ सिपि म हो हिदोबना दी गई व उनम सस्कृत के भी शामिल कर लिय जान । अनक आय समाजी नेताओं ने इस बात का विरोध भी किया कि पत्र को बढ़ती हुइ मांग के कारण उनका विरोध हा पर गया। पत्र का काम सुचारू रूप स चलन सगा। पर की भापा को जाम लोग मार समाजी उदू भी कहत थे 1 इस समाचार पत्र का उद्देश्य बार्य संस्कृति सभ्यता और हि दी भाषा का प्रचार करके देश को जागरूक करना था। पत्र के माध्यम से मुशीराम ने आय समाज के सिद्धातो का विधिवत पालन किया । बाद म जनता की बढ़ती माग पर 'सद्धम प्रचारक' का हिदी देव- नागरी सस्करण भी प्रकाशित होने लगा। जालघर में मुशीराम द्वारा आय कया पाठशाला और महाविद्यालय भी दिन दुगुनी रात चौगुनी उनति कर रह थे। इस तरह समाचार पत्र व अय माध्यमो स आर्य समाज के सिद्धातो को आम जनता तक पहुचाया । मुशीराम ने जब जालधर शहर मे स्त्री जगत को शिक्षित करन क लिए आय क या महाविद्यालय की शुरुआत को अनेको असहिष्णु और प्राचीन प्रयाओ को मानने वाले समाज के व्यक्तियो ने उनका धार विरोध किया। किंतु लाला देवराज और मुशीराम किसी प्रकार भी घबराये नही और डटकर उन्होने अपने विरोधियो का मुकाबला किया। मुशीराम न घर घर जाकर अपने उद्दश्यो और प्रचार काय को समाज के सामने प्रस्तुत किया और शीघ्र ही उनके कार्यों को जनता समथन प्राप्त होने लगा। मुनीराय ऋषि दयान द के सिद्धातो के कट्टर समथरु थ । महर्षि दयानद सरस्वती भारत को इन सडीग ली मायनाओ को तोडकर धर्मा और अव्यवहारिक मा यतामा का समाप्त कर पुन आर्य सम्कृति को ओर ले जाना चाहत थे। वे व्यक्तियो में समानता की भावना और पवित्रता पर विश्वास करत थे व स्त्री-मिया छुवाछूत को समाप्त कर देश की एक भापा एक लाचार विचार कायम करना चाहत थ । वह इस तरह लोगो म राष्ट्र प्रम और स्वतत्रता की भावन' कायम करना चाहते ५ । चरित्र की शुद्धता मन को एकाग्रता और वदिक धम की मा यता इसके मूल म र य । मुशोराम न तो ऋषि दयान द क सिसाता का अक्षरश पालन करन का दृढ निश्चय कर डाला था। सरम प्रचारक पत्र द्वारा बहा लाला देवगज बौर मुशाराम ने आय सिद्धाता का प्रति गदन किया वहीं हिन्दी को और देवनागरी लिपि को प्रोत्साहित करके हि दो को भारत की राष्ट्र भाषा बनाने का सदप्रयास 92 भी किया। मुशीराम न केवल समाचार पत्र निकालकर ही सगप नहीं किया। बल्कि उहोंन आय समाज का लगभग सारा प्रचार अग्न हाशम ले लिया। जालधर व उसक आसगस कोई ऐसा महर, गाव या वस्था नहीं होगा, जहां मुशीगम आय ममाज के प्रचार के लिए सर न गय हो व जहा रहेन कि म कृनि की नीव न डाली हो। उनके साथ उनका एक महान सहायक चिरजीलाल पहलवान हमगा साथ रहता था। चिरी लाल पहलवान की याद आत ही एक मनोरजन घटना का स्मरण हो पाता है। जिसकी बदौलत उनका व चिरजीलाल पहलवान का मल मिलाप हुआ। चिरजीलाल पहलवान लुधियान का रहने वाला ए सीधा सादा शक्ति था। पर इमक साय वह वार्य समाज का कट्टर समथक और प्रचारक था। इसी कारण उसे जानन वाले उस पहलवान कहत । विरजीलाल पहलवान अपनी धुन के पके व्यक्ति थ । वह अपन बाय समाज के प्रचार की धुन मे इतने उस्माहित रहते थ कि वे सावजनिक स्थाना पर रास्तो म सड होकर धम का प्रचार करत थ । उनक इस प्रकार के प्रचार से उस इलाके के कट्टर पयो ब्राह्मण उनसे बहुत अप्रसन थ । एक दिन चिरजीलाल रास्ते में खड र हू केतू का खनन कर रहे थ कि तमी एक ब्राह्मण न आकर उनसे तक करने को कहा और पौराणिक कयाआ व वण व्यवस्था के अनुसार कम और धम का सही मानन की ब त कही। चिरजीलाल न उस ब्राह्मण की बात का खडन किया और पारा णि हास्यानो व वण व्यस्था का पूरी तरह खडन किया। इस पर ब्रह्मण ने चिरजीलाल पहलवान को ब्राह्मण के कम करन का ललकारा और अपन जजमान स उ ह दान लेने को कहा। चिरजीवाल भी कुछ वम नही थ उहोने तुर त दान स्वीकार कर लिया। जिस पर वह ब्राह्मण बहुत कुपित हो गया । उसका कहना था कि दान लेन का अधि- कार सिफ ब्राह्मणो का है, ज4 किसी भी जाति का व्यक्ति दान नही ल सक्ता है । उस ग्राह्मण के अनुसार चिरजीलाल ने दान लेकर ब्राह्मणों के ज मजात दान लेन के अधिकार पर कुठाराघात पिया है जो कि 93 एक सामाजिक अधिकार है। उस ब्राह्मण ने चिरजीलाल द्वारा दान लेन की वात जय ब्राह्मगों से की। जिस पर सब ब्राह्मणो ने मिलकर अपन दान लेन के अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए यायालय में मुकदमा दायर कर दिया। न्यायालय न भी ब्राह्मणो की बात का समर्थन किया और चिरजीलाल को आराधी घोषित कर लिया। चिरजीलाल को इस अपराध की सजा भी सुना दी गई। मुशीराम को जब चिरजीलाल से इस सारे मामले का पता चला तो उहोने तत्काल इस मामले की अपील न्यायालय मे करने का फसला किया। उन दिनो लुधियान की अपील जालघर हुआ करती थी। मुशीराम ने स्वय सारे मामले की अच्छी तरह छानबीन की और अपील जालघर म कर दी। उदोन खुद ही मामले की परवी की और चिरजी लाल को बरी करा लिया। इससे चिरजीलाल मुशीलाल का पक्का भवन बन गया। उसने लुधियाना महर ही छोड़ दिया। वह जालघर आकर मुशीराम के पास ही रहन लगा। कई सालो तक उमन मुगी- रम के साथ जायं समाज का प्रचार किया। पर मुशीराम केवल आर्य समाज के प्रचार काय से ही सतुष्ट नहीं होन थे, वह आय समाज के अ दरूनी मामलो और शुद्धता व सच्वाई पर भी यकीन करते थे। ऐसा ही दूसरा से चाहत थे। उनका यह विचार था कि कार्य समाज की व्यवस्था सगठन और उसके कायकर्ता सच्चे और ईमानदार व्यक्ति होन चाहिए। इस कारण वह वरिष्ठ से वरिष्ठ पवाधिकारियो की भी आलोचना करने से जरा भी नही घबराते थ। पण्डित गुरुदत्त और शहीद लेखराम से मुशीराम की काफी घनिष्ठ मित्रता थी। पण्डित गुरुदत्त ने उनमे स्वाध्याम की ओर अधिक रुचि विकसित की। इसी प्रकार माय धम के प्रचार म लेखराम ने उनका पूरा पूरा साथ व सहयोग दिया । पण्डित लेखराम के साथ तो मुशीराम न जालघर शहर के बाहर भी पर्याप्त प्रचार किया । इस तरह आय समाज के विभिन कार्यों और प्रचार में अनुभव होने के कारण मुशीराम को सन 1892 ई० मे आ" - 94 प्रतिनिधि सभा का प्रधान चुना गया । मुशीराम ने अपन इस दयित्व को बखूबी निभाया । इस प्रकार आय समाज व अय सामाजिक जीवन म भो मुशीराम का प्रभाव बढ़ता गया । उनका सम्मान और अधिक होन लगा। आने उच्च पद को मर्यादा के अनुकूल नान के लिए मुशीराम ने अपने वदिक धार्मिक प्रथा का, ऋगवेद भाष्य, भूमिका सस्कार विधि, पच महायन विधि, आदि ग्रयो को मुशीराम न अच्छी तरह पढ़ा और आय मिद्धातो को अच्छी तरह समय कर उनका पालन किया। जिस कारण वह अच्छे व्याख्याता बन गए। इस तरह मुशीराम ने आय प्रतिनिधि सभा पजाव के प्रगन पद पर रहते हुए उस शक्तिशाली बनाया और आय समाज का प्रचार काय पूरे पजाब प्रात म किया व उसे वाहर तक भी फ्लाया। पजाब प्रात में उस समय मासाहार का रिवाज घर घर मे फला हुआ था। महर्षि दया न द द्वारा मास खाने का विरोध किए जाने के बावजूद बहुत से लाय समाज के सभासद और पदाधिकारी अपनी निवलता के कारग मास खाना नहा छोड पाए थे। पर तु मुशीराम काफी पहल मासाहार का त्याग कर चुके थ । इस कारण उहोने सबसे माम साना त्यागने को प्राथना को। उ होन अपने समाचार पत्र सदम प्रचारक के माध्यम से व अपने भाषणो मे मास खाने के विरुद्ध प्रचार का काय किया। इससे काफी सख्या मे आय समाज के प्रचार व सभासदो ने मास खाना छाड छोड दिया । परतु बहुत से आय समाजी ऐसे भी थे। जो मास खाना नहीं छोड़ना चाहते थे। उ हाने मुशीराम का कडा विरोध किया, एमे लोगों का समाज मे एक काफी बड़ा विरोधी ग्रुप बन गया। जिसने हमशा उनका विरोध किया। परतु वे ऐस विरोधियो से घबराने वालो म से नहीं थे। वह अपने गिद्धातो पर डटे रहे। उ होने इन विरोधियो का डटकर मुकाबला किया। आय प्रतिनिधि सभा म अपने समपको क चल पर वह प्रधान पद पर अवश्य वन रहे । जालघर शहर मे सन् 1989 ई० तक बाय समाज के प्रकार पाय और शास्त्रार्यों को बडी धूम थी। इन सारे कार्यों के पीछे मुशीराम का बडा हाय पा।

16 सनातन धर्म से टक्कर मु शीराम के सुपुत्र इद्र विद्या वाचस्पति ने अपनी पुस्तक स्वामी श्रद्धानद मेरे पिता' में स्वामी जी यानी अपने पिता मुशीराम के जीवन को एक घटना उल्लिखित की है । जिसमे उनका भगवाकृपा पर भरोसा ण इसकी पुष्टि होती है। यह घटना मुशीराम ने स्वयं अपने बेटे को सुनाई थी। 'घटना इस प्रकार थी आय समाज के मुख पत्र सद्धम प्रचारक मे सनातन धम सभा पनाव के उपदेशक पण्डित गोपीनाथ के चरित्र पर एक मम्पादकीय नोट प्रकाशित हो गया। जिसमे पण्डित गोपीनाथ के चरित्र पर कीचड उछाला गया था। जिस समय सद्धम प्रचारक म यह नोट छपा उस समय मुशीराम जालधर शहर में नहीं थे। सहायक सम्पादक लाला वजीर च द न यह नोट लिखा था। पण्डित गोपीनाथ पर एक अग्रेजी अखबार ने भी आक्षप लगाया था जिस पर उहोने मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया था और जीत भी लिया था । इस कारण उनका उत्साह कुछ अधिक ही बढा हुआ था। सफलता के नशे मे उहोने सद्धम प्रचारक पर भी मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया। जिस समय मुशीराम को अदालत का सम्मन मिला, वह बीमार अवस्था में थे। दौरे घर लोटे थे, इस कारण इस मामले को उहें पूरी जानकारी भी नहीं थी। सम्मन पाकर मुशीराम लाहौर जा पहुचे । जहा उनके साले लाला गयजादा भगतराम वकालत करते । लाला रायजादा भगतराम मुभी राम के सबसे नजदीकी प्रेमी थे। जीवन पयन्त दोनो ही व्यक्तियो मे पैसा ही प्रेम भाव बना रहा। जब पारिवारिक सब कडवे हो गये 96 तव मी राजाना भगतरान मुशीराम के मस नजदीक घ । सयास लेन की अपस्याम भी रायजादा भगतराम मुशीराम आय स्गमा श्रदानद के नजदीक वन रह । परि त गोपीनाथ द्वारा दायर मानहानि का यह मुमतमा असन प्रारम्म म ही व्यक्तिगत न सामाजिक मर पर जा पहुचा । यह मुरमा आय समाज और स तिन धम का मुकरमा बन गया। पजाव मलम्ब समय स सनातन धम और पाय समाज को लेकर जो पिचार सघप चल रहा था, उसके प्रतिरूप ही यह मुकरमा कायम हुआ था। जालघर म मुक'मा प्रारम्भ हुआ। गरजादा भगतराम न पहला पेशी के दौरान मुशीराम स पूछा 'कोई मसाला हे मी या नहीं, जिरह म क्या पूछा जाएगा' उस समय तक मसाला कुछ पास था नहीं। पर फिर भी मुशीराम का भगवान का भरासा था। इसलिए उ हान रायजादा भगतराम से कहा 'मसाला at कुछ नहीं था। इसलिए ईश्वर पर ही पक्का भरोसा है वह ही कुछ न कुछ रास्ता निकालें ।' दानो ही व्यक्ति खाली हाथ नदालत मे जा पहुचे । पण्डिन गोपी- नाथ को अपनी जीत पर दृढ विश्वास था । वे शेर की तरह छाती ताने आए और अपना स्पष्ट बघान पिया। इनन में ही लच का समय हा वया । अदालत उठने को तयारी हो गई। रायजादा भगाराम इस्तगास पर निगाह डाल कर देख रहे थे कि आगे किन नुक्तो पर जिरह का जाए। तभी मुशीराम जो अपने हाथ पीछे किए बठ हुए थे निसा न उह पीछे में कुछ कागज हाथ में थमाये, जब तक उहोने उन कागजो को पकड़न का हाथ बढाया । काज पकडान वाला हाय म पुल । सौप कर गायब हो गया। मुशीराम वेध्यानी मे हाथ म कागज पकड पकडे अदालत से बाहर आ गए। वह इस बात से बहुत चितित थे कि बिना सबूतो के आधार पर मुकदमा कसा लडा जाएगा। वाहर आकर भगतराम के साथ विचार विमस कर ही रहे किये अनाना हो उ हैं इन कागजा का ध्यान आया। उन कागजो को देधन

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पर उहें पता चला कि ये तो वेश्याग्रो के नाम पण्डित गोपीनाथ के
लिखे पतो का बडल था। उन पत्रो मे अन्क रहस्य भरे हुए थ, जिनका
किसी को वहम भी नहीं था।
जब इस बडल को रायजादा भगतराम के मामने रखा गया तो वे
चौंक पड । कहा सबूतो के लिए तरस रहे थ, यहां सबूत हो सबूत सामने
थे।
उस वडल के बल पर ही पण्डित गापोनाथ का मानहानि का
मुकदमा एक ही पेशी मे समाप्त हो गया। पण्डत गोपीनाय को बहुत
बेइज्जती हुई।
मुशीराम को इस विजय से यह पक्का विश्वास हो गया कि साच
मे आच नहीं होती। सस्य के रक्षक परमात्मा का हाथ मनुष्य से बहुत
लम्बा है।

17 गुरुकुल का जन्म महर्षि दयानद सच्चे अर्थों म भारत म वदिक सस्कृति और सच्चे अर्थो मे गुरुकुल आश्रम पद्धति के समथक थे ! महपि का यह दृढ़ मत्त था कि अच्छी शिक्षा और चरितवान विद्यार्थियो के निर्माण के लिए प्रत्येक विद्यार्थी को पच्चीस साल की आयु तक ब्रह्मचय व्रत का पालन करना चाहिए। उसे पूरे समय गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए । बनेक आय समाजी गुरुकुल प्रणाली के अनुसार अपने बच्चो को शिक्षा दन को तयार तो अवश्य थे। किंतु उस समय देश में कही भी गुरुकुल पद्धति का शिक्षा संस्थाए नही थी। साथ ही गुरुकुल पद्धति म छोटी उम्र के ही विद्यार्थी को बचपन से ही रखा जाता है ताकि उसमे बालपन स ही धार्मिक सस्कार और आस्था जगाई जा सके । पर हर कोई अपने बच्चो को इतनी कम उम्र में गुरुकुल में नहीं भेज सकता है । इस वजह से ऋषि दयान द सरस्वती के वतलाय रास्ते पर चलते हुए लाहौर व जय कई स्थानो पर दयानद एग्लो वदिक कालेज खोले गये। इस काय के पीछे लाला हसराज प्रमुख थे, जो मुशीराम के सगे साले थे। पर इन सस्थानो में सस्कृत अय विपयो के अतिरिक्त काय वदिक पद्धति पर न हो सका। इसलिए दयानद एग्ला वदिक कालेज सस्थाए ता खुल गयी। किंतु उनम ऋषि दयानन्द जी द्वारा प्रतिपादित गुरुकुल प्रणाली का उद्देश्य भी पूरा नहीं हो सका । मुशी का हमेशा यही चिंता रहती थी कि वेद के प्रचार का काय खुब चले। उन्हाने इसके लिए योग्य उपदेशक रखकर धम का प्रचार 99 काय करवाया । पडित लेखराम और स्वामी पूर्णानद इस काय के प्रमुख बाधार थे। इस प्रकार चार साल तक वेद का प्रचार किया जाता रहा। पर मुशीराम केवल इतने से ही सतुष्ट नहीं हुए। उन्हाने वदित विद्यालय खोलने का दृढ निश्चय कर लिया। जिसमे आश्रम पद्धति से पुरानी परिपाटी से गुरु-शिष्य सबधो को पुनर्जीवित कर गुरुकुल स्थापित किया जाये । जिसम हर विद्यार्थी सयमित जीवन विताते हुए गुरु आश्रम मे ही रहकर शिक्षा ग्रहण करे। ऋषि दयानद और अन्य प्राचीन ऋपियो के अनुसार गुरुकुल आश्रम सामाजिक वस्तिया से दूर रहने चाहिए जहा कम से कम 25 साल तक ब्रह्मचारी सादा जीवन विता कर वदों का अध्ययन करें। विद्यार्थी भाग विलास से दूर रह, ऐश आराम तथा पाश्चात्य सस्कृति की चमक-दमक से बचकर रह व शुद्ध भारतीय जीवन दशन को जपनाए। सन् 1898 ई० तक आते आते मुशीराम ने गुरुकुल खोलन का दृढ निश्चय कर लिया। यो तो महर्षि दयान द सरस्वती न भारतीय संस्कृति के अनेक क्षना व कतव्यो का निर्देश जपन ग्रन्था और प्रवचनो किया है जिनम वण आश्रम व्यवस्था, (जिनम ब्रह्मचय जाथम, गृहस्थ जाश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और स यास आश्रम) बतलाई है । इनम ही गुरुकुल मिपा प्रणाली, जाय भाषा आन्दोलन राजाओ का सुधार व राजनीतिक विचारो, राष्ट्रीयता व भारतीयता को प्राथमिकता दी मुशीराम ने करीव करीव हर क्षत्रो मे अपनी पूरी पूरी ताकत आजमायी थी। गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का गुरुकुल स्थापित करना भी उतना आसान नही था । एक दिन अचानक ही मुशीराम जालधर से अपने घर तलवन जव पचे तो सामान उनके घर पहुच गया पर वे स्वय नहीं पहुवे। उनके परिवारी जन जव वहा पहुंचे तो मुशीराम ने साफ साफ शब्दा मे कहा, हा जब तक गुरुकुल की स्थापना नही हो जाती तव तक वह अपने घर में प्रवेश नहीं करेंगे । गयो है ।

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गुरुकुल की स्थापना के लिए तीस हजार रुपये की नाव पकर
थी। मुशीराम के गुरुकुल स्थापना की बात सुनकर उनक सभ
परिचित हसने और उ हे मूख ठहराने लगे। पर मुशीराम अडि-
रहे । ऋपि दयानद ने उनकी आखें खोल दी थी। वह आय =
वदिक संस्कृति पर अधिक विश्वास करते थे। उनके हृदय के सा
सशय और डर दूर हो गये थे। वास्तव मे मुगीराम सत्या
प्रकाा म वणित गुरुकुल की स्थापना कर महर्षि दयानन्द का स्मारक
बनाना चाहते थे।
लगभग छह माह तक उ होने अपन घर में कदम नहीं रखा।
घर घर, मडक सडक मागकर उहोने छह मास मे ही तीस हजार
रुपय इक्टठे कर लिये । जो 1899 म तो निचित रूप से बहुत
भारी रकम थी।
गुरुकुल के लिए जर तीस हजार रुपया एकत्र हो गया तो
गुरुकुल चलान के लिए त्यागी और कमठ कायकर्ताओ की आवश्यकता
पड़ी। उस समय यह प्रश्न उत्पन हो गया कि कहा से त्यागी और
वानप्रस्थी विद्वान इक्टठे क्येि जायें।
सबसे पहले मुशीरम ने स्वय वानप्रस्थ आश्रम म प्रवेश किया
ताकि वे स्वयं सेवा करन के लिए गृहस्थ आश्रम से छुटकारा पा जायें।
उनके त्याग और तप के कारण उनका नाम अव महात्मा मुगीराम
हो गया।
जालधर के लाला शालिगराम भी जो, आजम व्रत लेकर पक्के
आप समाज के सेवक थे, उहाने भी मुशी राम का साथ दिया ।
साथ ही उनके दो मित्र-परित गगा दत और विष्णु न भा महात्मा
मुशीराम के साथ सहयोग करन का वचन दिया।
जब गुरुकुल आश्रम के लिए बच्चो की बावश्यक्ता पी। महात्मा
मुगीराम ने सबसे पहले अपन दानों पुत्रो हरिश्चन्द्र और इद्रको
सवप्रथम गुरुकुल म प्रवेश दिला दिया।
जारम्भ म गुजरावाला म इन दस-पद्रह बालका से लेकर
मिण आरम्भ हुआ। परन्तु यह स्थान गएकस क अनुरूप नहीं था।

101 गत मुसी राम व शालिगराम गुरुकुल के लिए स्थान की खोज म निक्ले। गुरुकुल जैसी सस्या के लिए शात प्राकृतिक वातावरण, प्राकृतिक सौंदय से भरपूर सुरम्य स्थान को आवश्यक्ता थी। महात्मा मुगो राम और उनके सहयोगी पविन गगा तट पर शिवालिक हिमालय का पहाडिया में वन हरिद्वार के समाप गगा तट के ठीक पीछे कागडी ग्राम पहुचे। यह जगह गुरुकुल के लिए मुगीर म न बहुत पसद की उहान इस स्पान को खरीदन के लिए जमीन के मालिक की खान की तो पता चला कि कागडी ग्राम की यह जमीन सौभाग्य स बिजनौर के मुगी अमन सिंह का घी, जो उस इलाके के जागीरदार ५ । महात्मा मुगी राम को वहा गुरुकुल बनाने की इच्छा सुनकर मुगी अमन सिंह ने सारा जमीन पुरुकुल के लिए दान द दी । उस समय कागडी के जासपास घना जगल था। इस कारण हमा जगली जानवरा की मग्मार रहती। खूखार जानवर, जिनम र चीत बाप और हायी भी थ उम समय गुरुकुल के जासपास घूमते रहत, जिससे गुरुकल मे प्रारभ में बडा भय छाया रहता । महात्मा मुशी राम अपने छब्बीस शिप्यो सहित सन 1899 ई० म इस स्थान पर आय । जहा उहाने निकटवर्ती जगल को साफ कराक वहा ब्रह्मचारियो के रहने के लिए नाश्रम बनाया। महात्मा मुगोराम का यह विचार था कि अधिष्ठाता गौर नाचार्यों का काय अनुभवो और वानप्रस्था ग्यक्ति ही करें। इस कारण वह गुरुकुल के प्रमुख बन । जय पक्षो के लिए भी वस ही व्यक्तिया की आवश्यकता थी। उस समय ऐसे व्यक्तियो का मिलना कठिन था । इसलिए उ हान मनाचारी सौम्म राष्ट्र और समाज की सेवा करन वाले व्यक्तियो को गुरुकुल के काय म ला दिया, जो सादा जावन व्यतीत कर गुरुकुल के उद्दश्या को गुरुतुल के ब्रह्मचारिया तक पहुचा सकते थे। महात्मा मु शो राम बडे विचारशील और वास्तविकता को जानने समयने वाले व्यक्ति थे। उन्हें गुरुकुल में पढ़न वाला का भविष्य 102 भी देखना था व पदिक शिक्षण पद्धति के साथ उ समाज की आवश्यकताआ के अनुरूप भी बनाना था। इसलिए कुछ समय उपरात पाठन विधि म पाश्चात्य विमान और अग्रेजी को भा सम्मिलित कर लिया गया । गुरुकुल की स्थापना करके मुशीराम न अनुभव क्यिा कि गुरुकुल को उनकी नितात आवश्यकता थी क्याकि कवल दुनिया रखकर उसे आरम्भ कर देन मात्र से उनका उद्देश्य पूरा नहीं हुआ था। अपितु उहे उस सस्था को चिरस्थाई भी वनाना था। इसलिए उहोने वकालत का अपना व्यवसाय तो पहले ही छोड दिया था। अपना पूरा जीवन गुरुकुल के लिए अपण कर दिया। या तो गुरुकुल का प्रवध आय प्रतिनिधि सभा के पास था। परतु अपनी विशिष्ट शिक्षण पद्धति के कारण गुरुकुल एक राष्ट्रीय सस्था के रूप म उमरकर सामन आ गयो थी। वह अपने म एक विशिष्ट वदिक शिक्षा सत्था थी। जो सफलतापूर्वक एक पवित्र वातावरण में चल रहा थी। इस सस्था की तारीफ सुनकर बनक राष्ट्रीय नता, सामाजिक कायकर्ता और विज्ञान मान लगे। महात्मा मुनीराम के कनिष्ठ पुत्र इद्र विद्यावाचस्पति गुरुकुल की सस्था के बारे में वणन करते हैं । गान तु के प्रारन म सायकाल हम कोई एक दजन वच्न गुरुकुल पहुचे। जहा उदघाटन के पश्चात एफ वप के बदर ही कच्ची दीवारा और टोन का छता वाले शेड बनन प्रारम्भ हो गय ५ । हमार रहन का स्थान पर एक बेर के पों से घिरा हुआ था। बीच-बीच में रही विल्य के पड थे। फास के सुप्रसिद्ध लेखक सत सेम्पासरा गुरुकुल कागडी को प्रशसा करते हुए लिखते हैं, "गुरुकुल जाश्रम महात्मा मुनीरामक घोर परिश्रम, लगन और दृढ़ निश्चय का मधुकोश है। इस सस्पा न राष्ट्रीय आय शिक्षा का केद्र बनकर भारतीय जाति की उनति के विकास और समुत्पान में बहुमूल्य योगदान रिया है। इस सस्था ने आय सस्कृति के नान विमान में प्रचार प्रसार के साप माप पाचाल बोरिस एव नौद्यापिक सफ्नताओ का भी उपयोग किया है ! " 18 दूसरो की दृष्टि मे गुरुकुल गुरुकुल की प्रशसा देश से बाहर फास, जमनी, व इग्लड तक जा पहची । इग्लैड की गोरी सरकार तक जा पहुची। इग्लैंड के लेवर दल के नता रोनाल्ड मकडोनाल्ड, जो बाद मे इग्लड के प्रधानमत्री बने, मुक्त प्रात के गवनर लाड मेस्टन, (जो उस समय सर जेम्स मस्टन थे), थी पियसन, जो विजनौर के कलेक्टर ये दीनबधु सी० एफ० एड ज, अमरिका के सुप्रसिद्ध पत्रकार फल्प्स, और भी न जाने कितने देगी- विदेशी सज्जन गुरुकुल की शिक्षा पद्धति के दिग्दशन करने अपने अपने घरा से आए। सन् 1914 की गर्मिया म इग्लंड की लेबर पार्टी के ससदीय नेता रेमजे मेक्डोनाल्ड भारत यात्रा पर आये हुए थे। वह उन दिनो ही गुरुकुल कागडी भी आए। जहा की प्राकृतिक छटा, वामिक और सात्विक पातावरण उ ह इतना भाया कि इग्लैंड पहुचकर उहोने वहा के सुप्रसिद्ध दनिक 'डेली मिरर' मे अपने सस्मरण लिखे । मर रमजे डोनाल्ड ने लिखा-"ईसाई धम के प्रवतक जीसस प्राइस्ट के मुस पर जो निमल मुस्कान दिखलाई पडती है, ठीक वसी ही मुस्कराहट महात्मा मुशीराम के मुखमण्डल पर विराजमान है। जिस दौरान मेकडोनाल्ड गरुकुल मे आये थे, उस समय महात्मा मुशीराम के साथ उनक अनेक फोटो खीचे गये थे जो आज भी गुरुकुल म सुरक्षित हैं । इस फोटो मे महात्मा मुशीराम की देदीप्यमान देह जिसे ब्रह्मचारी गण घेरे हुए है। उस समय महात्मा जी के मन म लहर उठ रही थी कि भारत पुन विश्व का सावभौम गुरु बन जाए । उमा लक्ष्य को क्रिया रूप में लाने के लिए, शिक्षा का स्वरूप प्राचीन सस्कृति के आधार पर देने के लिए जगह-जगह गुरुकुलो की स्थापना कर दी 104 । जाए । उसी गुरुकुल के बारे मे रमजे मेकहोनाल्ड माग लिखत ह · रात रेल मे कटी और प्रभात वेला म हरिद्वार पहुंचा, जहा गगा नदी पवतो की गोद छोडकर न चे मदानो की आर उतरती है। रेलव स्टेशन तीथ यात्रियों से भरा पड़ा था। स्पप्ट लग रहा था, इनमें से बहुत स लोग दूर दूर स्थानो से आए हुए हैं। वक्षो से ढकी हुई ये पवत शृखलाए शीश उठाए खड़ी हुई थी। पवन इग्लैंड के शिशिर काल के झोको के समान वह रही थी। हमन गुरुकुल तक की यात्रा पदल ही करन का निश्चय किया। नदी तट पर पहुचते ही एक से एक सु दर प्राकृतिक दृश्य सामन जाते गए । समीप की पहाडिया महान हिमालय के हिम मडित चोटियो को जस प्रणाम कर रही थी। गगा नदी की एक एक तरग और हिमालय पवत का एक एक हिस्सा सूय की किरणो से सोन की तरह चमक रहा था। गगा नदी मे पोपो का पुल था। जहा से हम गगा के पार पहुचे । सुदूर उन्नत वास के एक सिरे पर ध्वज लहरा रहा था। जो गुरुकुल का प्रवेश द्वार था। गुरुकुल, गुलाव और चमली के फूलो से मुगधित मार्गो से भरा हुआ था, एक ओर भाजनशाला थी व दूसरी ओर गुरुकुल की मुख्य इमारत । चारो ओर क्रीडा क्षय है । मध्य में वर्गाकार छात्रावास है। सिंह द्वार यानि प्रवेश द्वार पर ही वेदा के सनातन मून पवित्र 'जोउम की ध्वजा लहराती है। उस समय वहा 300 क लगभग वालक शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। प्रवा के समय अनिवायत आयु छह से दस वप के अदर रहना चाहिए या। ये चालक 25 वर्ष की आयु तक शिक्षा प्राप्त करते है । उहें महात्मा मुगीराम के सरक्षण म यहा छोडा गया है । वहा इस समय उनके पिता है। प्रात चार बजे वे बालक अपनी कठोर चीड की वनो शय्याओ से उठते । उठकर शौचादि से मुक्ति पाकर व्यायाम करत, इसके बाद गगा के शीतल जल म स्नान करत हैं। इसके बाद प्रारम्भिक सध्या (प्राथना) होती । उष्ण ऋतु म यह 105 बच्चे नगे पर ही चलते। उहे कठोर जीवन व्यतीत करना पड, इसी बात को ध्यान में रखकर प्रारम्भ से ही ऐसा अभ्यास कराया जाता मभी बच्चे पीताम्बर पहनकर शिक्षा ग्रहण करते। यही गुरुकुल का गणवेश है । यहा रहते हुए बच्चे अपने माता पिता के दशन वार्षिक मले में ही कर पाते । सहस्रा तीथयानी यहा आते । विशेप रूप में पापडिया बनाई जाती। पुरान अंग्रेजो के मेलो के समान भीड इकटठी होती। दीर्थावकाश मे बालको को उनक अध्यापक भारत के प्रसिद्ध व एतिहासिक स्थानो मे ले जाते। इन यात्राओ में बच्चे का मीर से कयाकुमारी तक स्थाना की यानाए कर चुके थे। शासक वग के मानस और दृष्टि के लिए यह सब एक अशाति- जनक समस्या थी। क्योकि अध्यापको मे न कोई अग्रेज था और न ही अग्रेजी भाषा की पढाई वहा होती थी। पढ़ाई का माध्यम हि दी भाषा थी। इसके अलावा पजाव विश्वविद्यालय द्वारा भारतीया की उच्च शिक्षा के मूल स्तम्भ अग्रेजी साहित्य की पुस्तके वहा प्रयोग नहीं की जानी थी। विद्यार्थी सरकारी विश्वविद्यालय की परीक्षा म नहीं भेजे जाते थे। महाविद्यालय अपनी ही डिग्रिया देता था। सच बात तो यह थी कि यहा बानून भग हो रहा था । आश्चय से स्तब्ध अधिकारियो का इमे एक ही सास मे राजद्रोह कहा जा सकता था पर तु यह नियम गुरुकुल पर लागू हो सकते थे, यह नहीं कहा जा सकता था । भारत मे अग्रजी शिक्षा के जनक लाड मकाले ने सन् 1835 में सरकारी पन में अपने जो विचार प्रस्तुत किये थे, उनको देखते हुए गुरुकुल की स्थापना एक महत्त्वपूण कदम थी । गुरुकुल को छोडकर अन्य किसी शिक्षा संस्था ने इन नियमो का विरोध नहीं किया या । महात्मा मुशीराम ने इन नियमो के विपरीत चलकर गुरुकुल की स्थापना की थी। सन् 1901 मे मुशीराम ने जालधर मे इस शिक्षा प्रणाली का स्पष्ट विरोध किया था । उहोन इस विषय में एक परचा भी प्रकाशित किया था, जिसमें ग्रेजी भाषा प्रणाली व जग्रेजी शिक्षा प्रणाली को दूपित ठहराया गया था।

106 अग्रेज सरकार मुशीराम के इस प्रकार के विचारो से सरन नाराज यो । गुरुकुल को तलाशी लकर गुरुकुल को बन्द करा तर तयार घुम रही थी । पर महात्मा मुशीराम कलेक्टर मिस्टर फोड से मिल आए, जिससे कलेक्टर फोर्ड उनसे बहुत ज्यादा प्रभावित हए । बहुत से सरकारी अफमर गुरुकुल आए और महामा मुगाराम का विद्वता और गुरुकुल के शुद्ध वातावरण से बहुत प्रभावित हुए । उनका गुरुकुल के विषय म फलाई जाती रही मारी फवाह मूठी सावित नतीजा यह हुना कि अग्रज सरकारी अधिकारी महात्मा मुमाराम को हर तरह का सहयोग देने का तयार हो गय । कुछ दिन बाद हो जग्रज सरकार न गुरुकुल विश्वविद्यालय को 'चाटर प्राप्त यूनिवसिटी' मानन को तयार हो गई। इस सम्व ध म काफी स्पष्ट रूप से एक बहुत ऊचे अधिकारी न महात्मा मुशीराम को हर प्रकार का सहयाग दन को कहा। लाड चम्स फोड की गुरुकुल यात्रा के बाद सरकारी अधिकारिया का ताता धीरे वार समाप्त हो गया। पर गुरुकुल की छवि व धीरे धीरे विवादासद हो गई। पहले सरकार द्राही संस्था कही जाती थी। अब धीर धीरे इमे सरकार समर्थित सरकारी जाथम कहा जान लगा। इस काय में गुरुकुल के एक दो असन्तुष्ट अध्यापक और मुशीराम के कट्टर विरोधी भा शामिल थे।

19 गुरुकुल के साये मे जगल के बीचोबीच वृक्षो की सघन छाया म गुरुकुल के आचाय मुशीराम वठे हुए थे। उनके साथ उनके शिष्य भी मौजूद थे । वामिक चर्चाए हो रही थी । स्नेह, सौहार्द, त्याग और लगन के प्रतीक आचाय मुगीराम अपने शिष्या का भविष्य सुधारन के लिए व उह भात्री राष्ट्र के मच्चे सपूत वनान म दत्तचित्त थ तभी समीप के जगल में एक शेर के की जावाज जाई और वह शेर गुरु और शिष्यो की ओर लपका। शिप्य शेर को देखकर घबरा गए, भय से चीखने लगे। परतु कुल मिता मुगीराम तनिक भी नही घबराए । उनके चेहरे पर वही निश्चितता और निर्भीकता थी। अपन प्राणो की जरा भी परवाह किय बिना उहोने अपन क्तव्य पालन में जरा भा देर नहीं की। अपने सिर की पगडी खोलकर उनम एक पत्थर वाधा और उसे घुमाते हुए शेर के पास जा पहुचे । शेर न एक दृष्टि से ऐसे वीर और साहसी व्यक्ति को देखा और पलटकर वापिस जाल म चला गया। जिन दिनो महात्मा मुशीराम गुरुकुल की स्थापना कागडी शहर में कर चुके थे, उही दिना विजनोर कनखल सहारनपुर कागडी आदि मे सुल्ताना डाकू का बहुत जातक या । एक बार इस इलाके म मुलाना डाकू न गुरुकुल को लूटने की सूचना दी। महात्मा मुशीराम सुल्ताना डाकू के जाने की सूचना से बिलकुल नही डर । उहान सुल्लाना डाकू को गरकुल पर डाका डालन की खुली चुनौती देने की सूचना दे दी। कुलपति महात्मा मुशाराम जपन पद्र बोस स्नातको के साथ उसी तिथि से गुरुकुल म पहरा दन लगे। बीच बीच में आध्यात्मिक चर्चाए चलती थी। तभी वहुत से घुडसवार अपन अपने हथियारो से लस वहा ।

108 आकर रुके डाकुओ के नायक ने आगे बढकर स्वामी जी से पूछा, "तुम कोन हो? महात्मा मुगीराम ने कहा, "आज हम सुल्ताना डाकू लूटन ला रहा है । इसलिए हम लोग उसका इतजार कर रहे है। हम लोग अपने जीवन के अतिम क्षण तक जपन इस गुरुकुल को रक्षा करेंगे।" उत्तर सुनकर वह व्यक्ति घोड से उतरा और महात्मा मुशीराम के चरणा से युकवर प्रणाम किया। वही मुलाना डार था। महात्मा मुगीराम के निभय तज आर स्माT को देखकर उस पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि वह बाजीवन महा मा मुगीराम का भक्त बन गया। आज भी कागडी गाव के लोग इस घटना को भूले नहीं हैं। आर्य समाज के प्रबल प्रचारक और वीर शिरोमणि स्व०प० लेखराम को जब एक विधर्मी ने धोखे स उनके पेट म छुरा भोक दिया, मुगीराम के मुख स अनायास य शब्द निकले थे -- लेसराज तू तो धय है । जो नये ऐसी मौत मिली। काश, मुझे भी एसी नीन मिले । उस समय यह कौन जानता था । सचमुच इश्वर न महात्मा मुगीराम के लिए उनको इच्छानुसार एमी मौत निश्चित की थी। लाड कजन भारत के वायसराय । सन् 1905 इ० म वगाल को दो भागा म विभक्त किया था। अग्रजा की इस नीति से मारे भारत म तहलका मच गया। सारे दा म अग्रेज सरकार के खिलाफ आदोलन फल गया। पजाव मनाला लाजपत राय और आय समाज के नेताओ न इस जादोलन म मयि रूप से भाग लिया। जिसस सरकार की नजर आय समाज के ऊपर पडन लगी। गुरुकुल कागडा भी जाय समाज स सम्बद्ध एक सस्या थी। इस कारण गुरुकुल पर भी जग्रेज सरकार की काप दष्टि पड़ने लगी। गुरुकुल की आर्थिक सहायता बद हो गई। सरकार की कोप दप्टि के सहायता पहुचान वाले सज्जना न भी आर्थिक सहायता बद कर दा । तव गुरुकुल को जिदा रवन के लिए महात्मा मुगाराम ने अपना सवस्व गुरुकुल को दान म द दिया। जालधर मे स्थित अपनी समस्त मरस सम्मति को देवर र उहाने गुस्न का मारी धनराशि अपण कर गुरुकुल को आयिक 109 दी। इस तरह महात्मा मुशीराम ने अपने त्याग और लगन से गुरुकुल को जीवित वनाय रखा। सन 1916 ई० की बात है। रात के करीब साढ़े बारह वा थे। कुलपिता महात्मा मुशीराम एक रागी ब्रह्मचारी के पास खड़े हुए थे। ब्रह्मचारी के कर रहा था और मुशीराम उसका सिर सहला रह थ । रोगी बालक के क करने के बाद महात्मा न उसे कुल्ला करावा और स्वय उस स्थान की सफाई की। फिर उस बालक का मिर सहलाने लगे। जब वह बालक के पास गये थे तब वह किला बीमारी स तडप रहा था। उसके साय का बाल उसकी बीमारा देखकर किसी को वुलाने गया था। पर महारमा मुशीराम तो बिना वुलाच ही दुखियो के पास पहुच जाते थे। मन् 1915 16 की एक घटना है-एक ब्रह्मचारी की जाघ पर एक गिल्दी निकली। दद जसह्य हो रहा था, मुशाराम ने हरिद्वार से सरकारी डॉक्टर को बुलाया। उसने आते ही गिल्टी को परीक्षा की और आपरेशन की तयारी करने लगा, जिससे ब्रह्मचारी घबरा गया । मुशीराम न उसके सिर पर हाथ रखकर कहा 'पुत्र घराला नहीं, डरी नही तुम इस गुस्कुल के छात्र हो । अमी शीन ही ठोक हो जानोगे।' ब्रह्मचारी को घबराहट वही थम गई। उसने बिना वेहोश हुए, वड ही साहस स अपना पूरा आपरेशन कराया। ऐसे थे महात्मा मुगीराम जिनके पश से घबराया हुआ इसान भी साहत की प्रतिमूर्ति बन - जाता था। महात्मा मुशीराम हमेशा कहत थे, राम को राजा उनके गुरु वशिष्ठ ने बनाया। कृष्ण को उनके गुरु गरिस ने, अजुन को आचाप द्रोणाचाय ने और ऋपि दयानन्द को उनके गुरु विरजान द न । इसीलिए इस देश म गुक्ला को आवश्यकता है तापि यहा वशिष्ठ व द्रोण समान गुरु हो व भारतवासी राम, कृष्ण और अजुन की भाति साहसी हो। गुरुवल के छात्रा को घुडसवारी, धनुर्विद्या, व्यायाम, आसन व 110 शारीरिक अभ्यास कराये जाते थे। साथ ही वौद्धिक स्तर पर इन छात्रो को देश प्रम स्वतत्रता और आय सस्कृति के सम्बध मे बतलाया जाता था। इन कार्यों को देखकर अग्रज सरकार गुरुकुल को वागियो का अडडा समझने लगी। इस तरह अग्रेज सरकार ने गुरुकुल की निगरानी प्रारम्भ कर दी। सन 1905 के वग भग के आ दोलन के बाद आय समाज सहित सारे देश में अग्रजी शासन के विरुद्ध विद्रोह का आग फल रही थी। गुरुकुल भी इससे अछूता नही था । सन 1906 और 1907 मे सरकार न जाय समाज पर कडी दप्टि रखी। लाला लाजपत राय, बाल गगाधर तिलक व विपिन चद्रपाल ने सारे देश में ओजस्वी मापण दकर जनता को एक होकर जग्रेजो के विरुद्ध ललकारा । अग्रजो न लाला लाजपत राय को निष्कासित कर दिया। बहुत से आय समाजा अग्रजो से डरकर यह कहन लगे कि आय समाज का देश की राजनीति से कोई सम्ब ध नहीं है । परतु मुशाराम इतने कायर नही थे। उहान आर्य समाज के वार्षिक उत्सव मे लाता लाजपत राय की नीतियो पर अपना विश्वास प्रकट किया और अग्रजो को धमकियो से जरा भी नही ठरे । महात्मा मुशीराम दश में कार्य संस्कृति की पुनस्थापना के साथ दा का स्वतत्र देखना चाहते थे।

20 आर्यसमाज के लिए आदोलन सन् 1900 ई० से 1912 ई. तक का समय आय समाज के लिए कठिन परीक्षा का समय था। आय समाज पर अग्रेजो की कडी दृष्टि थी। अग्रेज सरवार, आय समाज को एक सरकार विरोधी मस्था मयती थी। इस आय समाज का दमन होन लगा। देशी रियास भी अग्रेजो की शह पाकर आय समाज के पीछे लग गयी। मन 1909 में पटियाला रियासत, जो अग्रेज सरकार समर्थित रियासत थी, मे एक साथ एक सौ चौरासी बाय समाज कायकर्तामा को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया । उनको वदी बनाकर उन पर तरह-तरह के अत्याचार हुए, मुशी- राम को इस समाचार से बहुत दुख हुना और क्रोध भी जाया। परतु उन्होने इस स्थिति मे न तो अपना साहस छोडा और न धर्य ही छोडा । पहले तो उहोने इस विषय मे अखबारा म लेख लिखे, सरकार को पत्र लिखे। परन्तु जर सरकार व रियासत नहीं मानो तो वह पटियाला जाकर उन गिरफ्तार आय समाज के कायकर्नाओ के लिए मुकदमा लडन को तयार हो गय । यो तो महात्मा मुशीराम आचार्य और कुलपति के रूप मे गुरु कुल का काम सम्हाले थे। पर उहाने पीडित आय समाजियो के लिए पुन वकालत की आज्ञा ले रखी थी। इसी आना के कारण वह पटियाला वकालत करने जा पहुचे । सरकार का अग्रज वकील ने था और आय समाजियो के वकील महात्मा मुशीराम । परवी करते हुए मुभीराम ने सरकारी वकील की धज्जिया उडा दी। अग्रेज वकील के छक्के छूट गये। सरकारी अभियोग के सारे आरोप झूठे साबित हो गये जिस कारण अदालत ने सभी विद्रोहियो को रिहा कर दिया। पर उसके साथ हो 112 पटियाला रियासत ने राजद्रोहियो को पटियाला रियासत से बाहर कर दिया । जिस कारण सभी व्यक्ति को पटियाला शहर छोडना पड़ा। मुगीराम न इन सभी व्यक्तियो को गुरुकुल मे स्थान दे दिया। जिससे रियासत का आय समाजियो को कष्ट पहुचाने का इरादा पूग न हो सका। हारकर उन्होन अपना यह जादेश वापिस ले लिया। उस समय अग्रज सरकार के विरद्ध आर्य समाज की वकालत करना आसान नहीं था। मुशीराम का यह मुकदमा चिर स्मरणीय माना जाता है। पटियाला की देखा देखी धौलपुर रियासत म आय समाज पर अत्याचार प्रारम्भ हो गये। वहा की पुलिस न आयसमाज मदिर पर से 'ओ३म का झडा उतार लिया । इस पर मुगीराम न झडा फिर अपने स्थान पर लगा दिया। इससे क्रुद्ध हाकर मदिर का वह हिस्सा तोड कर गिरा दिया गया। उम स्थान पर राज्य की ओर से शौचालय बनान की तयारी होने लगा। जिसका सारे रियासत के आयसमाज ने विरोध दिया। किंतु रियासत पर कुछ असर नहीं पडा। यहां तक कि सारे भारत में इस बात पर विरोध हान लगा पर सब बेकार हो गया । अत में महात्मा मुशीराम इस मोर्चे पर भी सामन जाय । उहाने इस आदेश के खिलाफ रियासत के अदर सत्याग्रह की घोषणा कर दी। सार दश से आपसमाज के कायकर्ता जव धौलपुर पहुच गये तब रियासत वे राजा पयरा गये। उसे हार मानकर मुशीराम क सामन झुकना पड़ा। उसन आदा वापिस ले लिया। सम्पूण भारत को आयसमाज की केन्द्रीय सभा, जो सावदेशिक आय प्रतिनिधि सभा कहलाती है, न सन् 1909 ई० म महात्मा मुगीराम को समा का प्रधान चुना। इस तरह महात्मा जी का काय क्षत्र अव सम्पूण भारत बन गया। सन् 1909 म ही भागलपुर म हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष महात्मा मुशीराम हुए। इस तरह मुगाराम का बहमुणे विमा क दान हर कार क्षेत्र म हो रहे थे। म 21 सन्यास और स्वामी श्रद्धानन्द के रूप में मुशीराम स्वामी दयान द की आश्रम व्यवस्था के कट्टर समथक थे। उन्होने 1902 में गुरुकुल की स्थापना की और लगातार पद्रह सालो तक गुरुकुल कागडी के आचाय, कुलपति या कुलपिता रहे । सन 1917 ई० की 12 अप्रल को उ होने स यास लेकर अव सन्यास आश्रम में जान का निश्चय कर लिया। अपनी सारी सम्पत्ति, जो कुछ उन्होने जाल घर म अजित की थी, वह और अपनी काठी जाय प्रतिनिधि सभा को दान दे दी। सयास आश्रम अनुसार इर्ष्याआ से मुक्त होकर अपना सारा देश ही अपना काय क्षेत्र बनाया। तव से जीवन की अतिम सास तक सारे देश, समज और धर्म की सेवा मे रत रहे। जिस गुरुकुल मे उहान अपना तन, मन और ध्यान लगाया था वह भी उ होने त्याग दिया। सच्चे स्वामी की तरह वीतरागी बनकर अपनी इच्छाओ पर नियंत्रण कर वह स्वामी श्रद्धानन्द वनकर स्वामी दयानन्द सरस्वती की राह चल पड़े। जिस समय महात्मा गाधी दक्षिण अफ्रीका मे गोरी सरकार के खिलाफ आदोलन कर रहे थे। उस समय स्वामी श्रद्धान द ने उनका समथन किया और उह आर्थिक सहायता भेजी । भारत आने पर स्वामी श्रद्धान द व महात्मा गाधी मे अटूट मत्री हुई जो मृत्यु पर्यन्त बनी रही । महात्मा गाधी की ही आज्ञा पर वह काग्रेस म शामिल हो गये। सन् 1918 मे गढवाल में अकाल पड़ा । जिसके लिए स्वामी श्रदानद न जनता के दुख दद को दूर करने के लिए सारे देश स अनाज, कपडा, आर्थिक सहायता ली और गढवाल चले गये। जहा 114 उसे घूम घूम कर वाटा। वद्धावस्था होने के बावजूद वे एक एक दिन में अठारह वीस मील पैदल चलते । पीडित जनता की सेवा करते। उहाने इस काय म अपने ब्रह्मचारियो को भी लगा दिया। इस तरह उन्होने अपने अतुलनीय प्रयास से, परिश्रम से व सेवा से गढवाल की पीडित जनता की सेवा की । आय समाज मे युवा हिदू वग को सुगठित और शिक्षित करने के लिए आय कुमार सभा का विधिवत गठन स्वामी श्रद्धानन्द के महायोगदान के कारण ही सभव हुआ। उनका यह विश्वास था कि आय समाज के कार्या को आगे बढान के लिए नौजवानो की वडी भारी मख्या मे आवश्यकता है। उनका यह भी उद्देश्य था कि य युवक व युवतिया सगठित होकर देश व राष्ट्र की सेवा कर । सन् 1919 मे मरठ में आयकुमार सभा के वार्षिक सम्मलन में स्वामी श्रद्धान द न देश और समाज की सेवा का जमर सदश दिया । स्वामी श्रद्धानद खिलाफत न आदोलन मे मुसलमानों का पूरा साथ दिया व उनके आन्दोलन में अप्रेजो के खिलाफ पूरी तरह भाग लिया । स्वामी जी ने इस आदोलन मे मुसलमाना की बडी सवा की । पहले महायुद्ध के समय अग्रजा न तुर्की के वादशाह, जिस मुस्लिम खलीफा या धम गुरु मानते, को उसकी गद्दी स उनार दिया और तुर्की के बादशाह की बादशाहत हमेशा के लिए समाप्त कर दी। बाद म तुर्को के सावजनिक नेता मुस्तफा कमाल पागा न टर्की के खलीफा का पद हमशा के लिए समाप्त किया था। परतु भारत के मुसलमानो न उस समय टर्की 2 वादगाह के खिलाफ सलीम को पुन गद्दी पर बिठलान क लिए आदोलन छह डाला। जिस खिलाफ्त आदालन नाम दिया गया। गाधीजा और ग्रेस न इस आदोलन म मुसलमाना का पूरा साथ दिया। गाधाजी और काग्रेस के इस आदोलन म काग्रेस क जाह्वान पर श्रमानन्द भी सिलाफ्त आन्दोलन म पूरी तरह कूद पड़ । दिल्ली को जामा मस्जिद स स्वामी श्रद्धानन्द ने मुमलमाना का सम्बाधित किया। सिलाफत आदोलन कायकर्ता स्वामा श्रदानद 115 की सवारी उस दरवाजे से ले गये, जहा से कभी शहशाह आलमगीर नमाज पढन को प्रवेश करते थे। जिस मव से तब तक कोई मुसलमान धार्मिक नेता भी भापण नहीं दे पाया था। उस मच से 4 प्रल 1919 को स्वामी श्रद्धानद ने 'बो३मत्र हि न पिता वसो, त्व माता शतक्रतो वभूविथ जयाते सुम्नमी मह' इम वेद मत्र द्वारा हिन्दू मुसलमाना का एक सून मे वाध लिया। उहोने अपने ओजस्वी भापण के जरिए हिन्दू मुस्लिम एकता पर जोर दिया ओम शानि, शाति शान्ति के माथ उनका भाषण समाप्त हुआ । स्वामी श्रद्वान द दोना ही सप्रदाया से एकता चाहते थे। वाद म टी म जब स्वय मुस्तफा कमाल पाशा ने खिलाफ्त को ममाप्त कर दिया तो खिलाफत आदोलन स्वत ही समाप्त हो गया। पर हिदू मुसलमानो में एकता की एक डोर वन गती। प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति पर सारे देश मे एक बार फिर स्वतत्रता की माग जोर पकडन लगी। धीरे धीरे सारे देश मे आदोलन जोर सत्याग्रह होने लगे। इस पर जनता की भावनाओ का दमन करने के लिए अग्रेज सरकार के रोलर एक्ट द्वारा मत्याग्रहा व नान्दोलनो पर दमन की शुरुआत हो गयी। सन् 1919 ई० में महात्मा गावी के ननत्व “पूरे देश में इस रोलर एक्ट के विरुद्ध आन्दोलन छिड गया । माच 1919 ई० मे दिल्ली के चादनी चौक में एक विशाल जुलूस निकल रहा था जिसका नेतत्व स्वामी श्रद्धानद कर रहे थे। जुलूम के आगे आगे भगवे कपडो मे स्वामी श्रद्धानद चल रहे थे। जव यह जुलूस घटाघर के पास पहुचा तो पुलिस ने जुलूम को रोकना चाहा तो स्वामी श्रद्धान द ने ललकारा-' यह जलूस नहीं रुकेगा ।' तब अग्रेज अधिकारिया ने चेतावनी दी यदि यह जुलूस नही रुका तो उस पर गोली चलाई जायेगी। जुलस आगे बढा तो सिपाहियो ने सगीने तान ली। उस समय स्वामी श्रद्धानन्द ने अनुपम साहस धय और कतव्य- परायणता का परिचय देते हुए, अपनी छाती खोलकर सामने कर दी व सिंहा की भाति गरजते हुए वोले 'पहले मेरे सीने में गोलो दागो, जुलूस नही रुकेगा। स्वामी श्रद्धान द की निर्भीकता, देखकर अप्रेज सिपाहिया 116 की सगीनें शम से नीचे झुक गयी। सिपाही एक ओर हट गय और जुलूस धडधडाता हुआ माग वढ गया। यह स्वामी श्रद्धानद के नेतत्व की विजय थी। इस अदभुत घटना को हमेशा याद दिलाने के लिए इस स्थान पर आय सावदशिक प्रतिनिधि सभा ने स्वामी श्रद्धानद की मूर्ति स्थापित की । जिस स्थान पर दिल्ली नगर निगम ने स्मारक बनवा दिया है। अमृतसर मे जालियावाग ये 6 अप्रल सन् 1919 ई० को अग्रेज सनिक अधिकारी जनरल डायर ने पजाब के तत्कालीन गवनर सर ओडायर का आना स एक शातियूवक चल रही सभा पर गोलियां बरसा कर सकडो लोगो को मौत के घाट उतार दिया। इस तरह की अमानुपिक घटना आज तक नही हुई है। जिस कारण अमनसर, पजाव और सारे पश्चिमी प्रातो में अग्रज सरकार का आतक फल गया । महात्मा गाधीजी व अ य काग्रेसी नेताओ ने अमृतसर के लोगो के मन से भय निकालने के लिए अमतसर मे हो काग्रस का अधिवेशन करने का फैसला किया। पर तु उस समय मात्र पजाव म ही नहीं अपितु सारदेश में ही आतक का वातावरण था। कोई भी आदमी कांग्रेस के अधिवेशन म भाग लेने तक को तयार नहीं था। न ही कोई प्रबंध सचालन करने को तयार था। काग्रेस के सामने यह बड़ी समस्या थी। एक आर उह जनता के मनोरल को बढाना या व इसक साथ साथ सरकार का विरोध भी करना था। पजाब के वह बड़े नेता इस समय नेतृत्व करा से डरकर घर वठे हुए थे। ऐसे कठिन समय मे एक्वार स्वामी श्रद्धानद सामने आये व उहोन काग्रेस अधिवेशन का भार, और स्वतत्रता के नाम पर अपने कंधो पर ले लिया। स्वामी श्रद्धानद अमतसर काग्रस अधिवेशन को स्वागत समिति के अध्यक्ष थ। उन्हान बडी ही निर्भीकता से इस अधिवेश- का प्राध अपने हाथ म ल लिया। उसी दिलरी स व कुशलता स उहाने काग्रेस अधिवशन का प्रबधनी क्यिा। पजाब की जेलो में उस समय हजारा का सख्या में काप्रेस सत्याग्रही कायकर्ता बदी थे। अंग्रेजी की दमनकारी ।

117 आतक से जनता इतनी भयभीत व आतकित थी कि लोग तब तक कात्र का नाम लेने से भी घबराते थे। किंतु स्वामी श्रद्धान द न बडी ही बहादुरी से काग्रेस अधिवेशन का आयोजन किया। स्वामी श्रद्धानद ने स्वागताध्यक्ष के रूप में काग्रेस के इतिहास मे पहली बार वेद मनो से अधिवेशन का भारम्भ किया। आयसमाजी हिदी मे अपना स्वागत भाषण पढा। स्वामीजी काग्रेस को विशुद्ध भारतीय रूप देने में सक्षम सिद्ध हुए। काग्रस इतिहास में यह अधिवेशन इसलिए भी मह वपूण है कि ने पूरे अधिवेशन का नतत्व एक स यासी ने सफलतापूर्वक किया था। सन 1921 ई० में काम का अधिवेशन जहमदाबाद में हुआ था । अहमगबाट में तिलकनगर में अधिवेशन हुआ। स्वामी श्रद्धानन्द भी 'इम अधिवेशन में भाग लेने गये हुए थे। उस समय काग्रेस अधिवेशन के दौरान महात्मागाधी को स्वामी श्रद्धानद ने यह आश्वासन रिया कि वह देश की स्वतनता तक काग्रेस के हमेशा साथ रहेंगे । अधिवेशन में स्वामी श्रद्धानन्द ने भारत की पूण बाजादो के सपने देखे थे। सन् 1921-22 में स्वामीजी ने काग्रेस के लिए सक्रिय रूप से काय किया। बारदौलो अधिवेशन के दौरान जब सत्याग्रह आरम्भ हुआ तो सार देश के साथ स्वामी श्रद्धानन्द भी इस अधिवेशन में शामिल हुए थे पितु वीच में ही कुछ हिंसात्मक घटनाओ के कारण जब महात्मागाधी ने बारदोली का सत्याग्रह स्थागित किया था तब स्वामी श्रद्धानद ने उनमे इस विषय में अपनी असहमति जतलाई। स्वामी श्रद्धानद जी का कहना था कि यदि सावदेशिक अहिंमा सत्याग्रह में रखी जायेगी तो सत्याग्रह हो हो नहीं सकता । सावदेशिक हिंसा सारे देश सत्यापहियों के लिए असम्भव है और राजनीतिक मिशा के अनुकूल भी नहीं है। किंतु महात्मा गाधी अपनी बातो पर अडिग रहे और वही से स्वामीजी व महात्मागांधो में मतभेद होने लगे। बाद में अछूतोद्धार चे प्रश्न पर स्वामी श्रद्धान र काग्रेस से असतुष्ट हो गये और सक्रिय राजनीति स हटकर मामाजिक कार्यों को ओर मुड गये।

118 11 फरवरी सन् 1920 स सन 1922 तक पूरे दो वप पुन स्वामी श्रद्धान द को न गुरुकुल के काय भार सम्भाल लिया। पूण रूप से व्यवस्थित कर गुरुकुल को वह आधुनिक रूप दिया, जिसक कारण आज गुरुकुल कागडी हरिद्वार विश्व में प्रसिद्ध है सन् 1920 में हामी श्रद्धानद ने 'श्रक्षा पत्र का प्रकाशन भी आरम्भ किया जिसक द्वारा उन्होन अपने राजनतिक सामाजिक एव धार्मिक विचारो को जनता तक पहुचाया। सन् 1922 ई० मे पजाब म सिखा न अपनी धार्मिक व अय मागें लेकर आदोलन शुरू किया, सिखो न सारे पजाव म सत्याग्रह करना आरम्भ कर दिया। अमतसर में गुरु का वाग नाम का धार्मिक स्थान था, जहा पर सिखो न सम्मिलित होकर एक सभा आयोजित की । सभी सिख सत्याग्रही निहत्ये थे। अग्रेज सरकार उनके इस आगेलन के खिलाफ थी । जग्रेज सिपाहियो न सभी आ दोलनकारा सिक्खो क ऊपर लाठियो से हमला किया व सत्याग्रहियो पर जनक अत्याचार किए। सिक्ख फिर भी अपने निश्चय पर अडिग थ। स्वामी श्रद्धानद जो उस समय दिल्ली में मौजूद थे। उह जब सिक्व सत्याग्रहियो की कठिनाइया का पता चला तो वह तुर त उनका साथ टन क लिए अमतसर जा पहुचे। अमतसर पहुचकर स्वामी श्रद्धान द न अमतसर के स्वणमदिर मे अकालतस्त के पास खड होकर सारी सिख जाति को ओजस्वी भाषण दिया। उहोने उनको यह भी आश्वासन दिया कि उनकी धार्मिक मागो के साथ भारत के सभी हि दू उनके साथ हैं। अग्रेज सरकार भला यह बात से सहन कर सकती पी वह तो 'फूट डालो और राज्य करों' की राजनीति में विश्वास करत च। उहोने तुरन्त हिदू सिख एक्ता म दरार डालने के लिए 10 सितम्बर 1922 ई० को स्वामी श्रद्धानद को गिरफ्तार कर लिया। मुक्दम का स्वाग रच डाला और उहें जेल भेज दिया गया। इस मुकदम म स्वामीजी को सत्रह महीन को सजा सुना दी गयी। स्वामी के जेल जाने से सारे देश में तहलका मच गया। यायसमा सत्याग्रह करने पर उतारू हो गया। अपना न भा सारा 119 अकालियो के साथ नरमी बरतने का आश्वासन दिया व इस डर से कि कही स्थिति और खराब न हो जाये, अग्रेज सरकार ने स्वामी श्रद्धान द को 26 दिसम्बर 1922 को रिहा कर दिया। सन 1921 म देश भर मे जब साम्प्रदायिक दगे हुए थे, तब महात्मा गाधी न उहे शात करने के लिए दिल्ली में 21 दिन का उपासव रखा था। देश के सामाजिक व साम्प्रदायिक एकता बनाये रखने के लिए स्वामी श्रद्धानद न हकीम अजमल खा, और मौलाना मुहम्म अली ने दिल्ली मे एकता सम्मेलन बुलाया था। एकता सम्मेलन की अध्यक्षता पडित मोतीलाल नेहरू ने की थी जो स्वामी श्रद्धानन्द के वचपन के मित्र और क्लासफैलो थे । यह अधिवेशन तीन दिन तक चला। स्वामी श्रद्धान्न ने अधिवेशन को सफल बनान का पूरा प्रबंध किया। इस तरह स्वामी श्रद्धानन्द ने हिन्दू मुस्लिम, सिक्ख सभी सम्प्रदाय के लोगो को मिला के रखने का प्रयन किया।

22 स्वामी श्रद्धानन्द के अन्य सामाजिक कार्य अग्रेजो की हमेशा से यह रणनीति थी कि 'झूट डालो और राज्य करो।' स्वामी श्रद्धानद अप्रेजो की इस कूटनीति को बहुत जच्छी तरह समझते थे। हि दू जाति के ही निम्न वग यानि चमारो, मेहतरों को छत कह कर उनसे भेदभाव करने की नीति को स्वामी श्रद्धानाद धम विरोधी मानते थे । मानवता की दृष्टि से भी यह अच्छी वात नहीं थी । स्वामी श्रद्धान द ने दिल्ली म अछूतोद्धार का काम करना शुरू कर दिया। इससे पहले भी स्वामी श्रद्धानद ने कांग्रेस के अमतसर अधिवेशन म अपने स्वागत अध्यक्षीय भाषण मे दलिता के उद्धार के महत्त्व पर बहुत जोर दिया। स्वामी श्रद्धानद काग्रेस के कलकत्ता, नागपुर और वारदौली के अधिवेशनो मे भी गये व वहा भी दलित वर्ग के उद्धार के लिए काग्रेस में कई प्रस्ताव श्री रखे व उहे पारित भी कराया। श्रद्धानद जी ने काग्रेस के मत्री श्री विटटल भाई पटेल और श्री मोतीलाल नेहरू से भी यह आग्रह किया कि काग्रेस दलित वर्ग के लिए कोई ठोस सक्रिय कायक्रम बनाय। पर काग्रेस ता एक विशुद्ध राज- नीतिक सस्था थी। इस कारण काग्रेस मे अछूतोद्धार का काय उतना ज्यादा न हो सका जितना स्वामी जी चाहत थे। स्वामी जी ने इस बात से खफा होकर काग्रस द्वारा वनो दलितोद्धार समिति से त्यागपत्र दे दिया। दिल्ली में 13 फरवरी 1923 को अखिल भारतीय दलिताद्धार समिति बना ली गई। इस प्रकार स्वामी जी काग्रस से अलग हा गय। 23 जुलाई सन् 1923 को तलालीन काग्रेस महामनी या माती 121 नाल नेहरू को स्वामी श्रद्धानद ने अपने पत्र में लिखा कि, "मैं ऋपि दयानद के बताये हुए वदिक धम के माग ही का अवलम्वन कर अपना काम करूगा । अब में ब्रह्मचय पद्धति की पुरातन शिक्षा प्रणाली का पुनरुद्धार करूगा, ज मगत जात पात को मिटाते हुए अछूत कही जाने वाली जाति में सम्मिश्रण करके हि दी को राष्ट्रभाषा बनाने का यत्न करते हुए नाहिसा का क्रियात्मक प्रचार करूगा ।" नत्पश्चात स्वामी श्रद्धानन्द ने अपनी सम्पूण शक्ति हरिजना को आय जाति का सम्मिलित अग बनाने में लगा दी। अछूतो के सारे भेदभावा को उहाने उठा लिया। आय समाज के सभी वार्षिक सम्मेलनो मे हरिजना के साथ सवर्णा के प्रीतिभोज आयोजित किए जाने लगे। स्वामी जी ने हरिजनो के बच्चो को गुरुकुल मे निशुल्क शिक्षा प्रदान की। उ हे वेदो और सस्कृति की शिक्षा दी। उहे आय समाज के मदिरा के पुरोहित पडितो के रूप में विराजमान किया। इसके अलावा ऐसे प्रीतिभोज आयोजित किए जाते, जिनमें बाना बनान वाले और परोसने वाले हरिजन होते थे। म्वामी जी 'कृण्वतो निश्चमायम' को वदिक धम का लक्ष्य मानते हुए ससार भर को आय बनाना वदिक धम का अनिवाय अग समयते थे। इस प्रकार स्वामी जी का धम विश्वव्यापी धम था । गुरुकुल प्रणाली और हरिजनोद्धार द्वारा स्वामी जी चाहते थे कि भारत के युवा तेजस्वी बीर और विद्वान बनें । इसके द्वारा नात्म नियोजन परिवार नियोजन, ममृद्धिशाली राष्ट्र निर्माण के लिए एक राष्ट्र होना उसके नागरिका को एक सूत्र मे वधा होना यह स्वामी जी का स्वप्न था । महात्मा गाधी ने भी बाद मे अछूतोद्धार की आवश्यकता को अच्छी तरह समझा । पर इसकी पूर्व भूमिका स्वामी श्रद्धान द द्वारा तय की गई थी। अखिल भारतीय दलितोद्धार सभा के द्वारा स्वामी जी ने हरिजनो की नौर समाज की बहुमूल्य सेवा की। उहोने भय धार्मिक संगठनो द्वारा हरिजनो को धर्म परिवतन करने की योजना से राका और हिन्दू जाति के संगठन का बीडा उठाया। उहाने सामाजिक छुआछन को - 122 हटाया सामाजिक असमानता को दूर किया। सवका धम और सामाजिक मानला म समान अधिकार दिए जोर पुन प्राचीन आय - वदिक समाज का रचना की ओर कदम बढ़ाया। बागरा के आस पास रहन वाले मलकाना राजपूत जो कभा विधर्मी बन गए ये पुन हिदू धम को अपनाना चाहत थ । उनकी आवादी पाच लाख थी । भरतपुर, मथुरा व आगरा जिला में य लाग वस हुए थे। आगरा क आय समाज द्वारा इस विषय म विचार विभश चल रहा था। स्वामी श्रद्धान द की अध्यक्षता में एक सम्मेलन आयोजित हुआ। जिसमे स्वामी जी न उन सव मलकाना राजपूतो स विचार विमश किया जिससे उह यह विश्वास हो गया कि यह लोग सच्चे मन से हिंदू धम ग्रहण करना चाहत हैं। तव स्वामी जी न उन लिए गुद्धि का जायोजन किया। गाव के गाव स्वामी श्रद्धान द की विशाल हृदयता से प्रभावित होकर पुन हिदू धम ग्रहण करने लगे, जिसका अन्य राजपूत भाइया ने दिल खोलकर स्वागत किया। अपने बिछड हुए हिदू भाइयो को गल लगाकर उनका स्वागत किया। इस घटना से प्रभावित होकर सारे हि दू समाज मे अदभुत चेतना जाग गई । केवल गगाजल को बूद से ही शुद्धि होने लगी। आय समाज ने सबको अपने धम म शामिल करने क लिए अपन द्वार खोल लिय । शुद्धि के द्वार हर व्यक्ति के लिए खुल गए । जिस कारण सामी श्रद्धान द न अखिल भारतीय हिंदू गुद्धि सभा की स्थापना की। स्वामी श्रद्धान द अपन राजनीतिक जीवन में यह महसूस कर लिया था कि हिंदू जाति वर्षों की राजनीतिक गुलामी के कारण शिक्षित सम्पन्न व बहुसख्या मे होन के कारण ही विखरी हुई थी। धार्मिक और जातीय रूप स असगठित है। अग्रेज सरकार भी इसी कारण हिन्दुआ को ही हमशा दवाती थी। इसी कारण स्वामी श्रद्धानन्द न बिखरी सुसगठित हिदू जाति को संगठित कर एक सून म वाध लिया ।

123 उही दिनो मालावार मे हिदुओ पर अत्याचार हो रह थ । हि दुआ पर जबरदस्ती धम परिवतन करने के लिए दवाव डाला जा रहा था। वहा हिदू अल्पसख्यक थे इस कारण उह अपनी सम्पत्ति और जान माल का भय बना हुआ था। स्वामी जी को यह बात पता लगी तो उह बहुत ही दुख पहुचा। उह यह विश्वास हो गया कि अव आत्मरक्षा के लिए हि दुआ को साठित करना बहुत आवश्यक है । उहान स्थान स्थान पर महावीर दल की स्थापना की। जिससे भयभीत हिदू मानस मे आत्मविश्वास और आत्मचेतना की भावनाए भरी । स्वामी जी के इस महान काय म महामना मालवीयजी व लाला लाजपत राय का अमूल्य सहयोग था। इस प्रकार सन 1923 24 इ० तक स्वामी जी ने अपना हिदू संगठन और अस्पश्यता निवारण आदोलन चलाया था। सन् 1924 म गुरुकुल क या पाठशाला की स्थापना हरादून म की जो स्त्री शिक्षा की दशा में एक अपूर्व कदम था। आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयान द की जन्म शताब्दी माच, 1925 ई० मे मथुरा में महर्षि दयानद शताब्दी महोत्सव के रूप में मनाई गई। भारत के प्रत्यक हिस्स स लाखो की सरया म जाय समाज के सदस्य इस सम्मलन में भाग लेने आए। इस अवसर पर ऋषि दयान द के कार्यों व साहित्य पर एक विशाल प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। स्वामी श्रद्धानद एक विशेष रेलगाडी से मथुरा पधारे । स्टेशन से लेकर अधिवेशन स्थल तक स्वामी जी की विशेष सवारी वडी गान और श्रद्धा स निक्ली। इस सम्मेलन के अध्यक्ष स्वामी श्रद्धानन्द थे जोर कायकारी अध्यक्ष स्वामी नारायण, इसके अलावा महात्मा हसराज, श्री अयोध्या प्रसाद, स्वामी सचिदान द, स्वामी वदानन्द आदि नेता उपस्थित थे। यह सम्मेलन एक द्वितीय उत्सव कहा जाएगा । यहा जगह से आए सकडो प्रतिनिधि इकटठे हुए थे । हर डरे और सम्म 124 पर 'ओउम स्वय ब्रह्म' का पाठ होता रहता। यह समारोह इतने व्यापक रूप मे हुआ कि इस समारोह ने सारे राजनीतिक और धार्मिक सम्मलना की छवि को फीका कर दिया । सन 1926 ई० को असगरी वेगम नाम की एक महिला अपन दो तडके व एक भतीजे के साथ दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरी । वह स्वय सेशन से उतरकर आय ममाज गयी व वहा उसने अपना नाम शाति देवी रख लिया। साथ ही उसने अपन बड पुत्र का नाम धमराज रख लिया जिमको जायु चार साल थी। गोद के एक पुत्र का नाम अजुन रखा तथा जपन भतीजे का नाम अमरसिंह रखा । तत्पश्चात शाति देवी, वहा से वनिता विश्राम जाश्रम चली गई। तीन महीने पश्चात् जून के अन्त तक असगरी बेगम के पिता एक नम्युवक के साथ दिल्ली आए । कुछ दिन बाद उसका पूर्व पति दुल हलीम भी दिल्ली पहुच गया । उस समय शाति देवी वनिता आथम म थी। जिसके मनी सुखदेव थे । डा सुखदव स्वामी श्रद्धानद के दामाद थे । स्वामी श्रद्धानद ने अपनी पुनी अमत कला का विवाह डा० सुखदेर से किया था। असगरी बेगम के पूर्व पति उसके मौलवी व पिता स्वामी श्रद्धानन्द और सुखदव स मिले जिहान उहें शाति देवी से मिलन की पूरी छूट दी। तीनान गाति देवी को बहुत समझाया, डराया धमकाया, परतु हर प्रकार के प्रयास के बाद भी वह वापिस लौटने के लिए नहीं माना। अन्त मे उन लोगा न स्वामी श्रद्धानद के ऊपर मुकद्दमा कायम कर दिया । यायाय न सभी पक्षो को मुना व गवाहो से जिरह को शाति देवी का बयान लिया, जिसक आधार पर यायालय को सामी श्रद्धानद और सारा आप समाज निर्दोष मगा। यह फसला अग्रज यायाधीश का था। जिसन अपने फसले म कहा, हामी श्रद्धानन्द न कभी किसी के धार्मिक क्षण म कोई हस्तक्षप नही किया है । वह बलात घम का काय नहीं करत बल्कि सामी श्रद्धानद तो असिल हिदू जाति को एक सूत्र म बाधना चाहते थे। समी जा न तज' और 'अजुन', नामक दो समाचार पत्र निकाले ।

125 जो हिन्दी और उर्दू भाषा मे थे। अप्रैल सन 1926 में स्मामी जी न 'लिवेटर' नामक अग्रेजी समाचार पन का प्रकाशन भी क्यिा । इन समाचार पनो के माध्यम से स्वामी जी निर्भीकता पूर्वक अपने विचार व्यक्त करते थे। सन 1924 ई० मे दिल्ली में अखिल भारतीय हिदी साहित्य सम्मलन का आयोजन हुआ। जिसमे स्वामी श्रद्धान द को उनका अव तक की हिदी सेवाओ के कारण अधिवेशन की स्वागत कारिणी सभा का अध्यक्ष बनाया गया । स्वामी श्रद्धानन्द हिंदी साहित्य सम्मेलन भागलपुर अधिवशन के इससे पहले भी सभापति चुने गए थे । स्वामी जी ने ही इसस पूर्व अपने प्रारम्भिक भाषण मे हि दी का राष्ट्रभाषा कहकर सम्बोधित किया था। हिदी को राष्ट्र भाषा का सम्बोधन दने वाले और राष्ट्र भाषा के रूप म हिदी के लिए प्रयत्न करने वालो म सबसे पहले स्वामी श्रद्धानन्द का ही नाम लिया जाएगा।

23 मृत्यु दिसम्बर सन् 1926 ई० के बारम्भ की वात थी, बनारस के दौरे से स्वामी श्रद्वान द वापिस दिल्ली लौटे। सर्दी का मौसम था, वृद्ध शरीर और फिर सफर की टोट धूप से थकान बढ गई। इससे स्वामी जी के गले और फेडो पर सर्दी का असर हो गया और उ ह खासी और जुकाम ने भी बुरी तरह जकड लिया । छह दिसम्बर को स्वामी श्रद्धानद को उसी हालत में मोटर से गुरुकुल इद्रप्रस्थ, के लिए रहा के मुख्याधिष्ठाता के साथ रवाना हुए। 12 मील के मोटर सफर ते स्वामीजी की हालत और ज्यादा ही खराव हो गई जिसके कारण वह उसी शाम को वापिस दिल्ली लौट आए । दिल्ली पहुचत ही स्वामी श्रद्धानद को डाक्टर सुखदेश न आकर देखा । उहोन मित्र डाक्टर जसारी को भी बुला नेजा। डाक्टर सारी न स्वामी श्रद्धानद की परीक्षा कर उ ह दवाइया दी । स्वामी जी का डाक्टर असारी पर अगाध विश्वास था। तीन दिन तक इताज कराने के बाद डाक्टर असारी रामपुर चले गए । उन तीन चार दिनो के जदर ही स्वामी जा की तबियत दिन प्रतिदिन विगडती ही गई। पुन डाक्टर असारी के आन पर इलाज चला । स्वामी जी के प्रधान व विश्वसनीय चिकित्सक डासर असारी के अलावा डा. सुखदेव, स्नातफ धमपाल और स्नातक धमसिंह न उनकी बहुत सेभ की। रोगमुक्त होने पर स्वामी जी की मानसिक विचारधारा म अदभुत परिवतन दिखाई देन लगा। जब तक रोगी थे तब तो वह स्वस्य हाना चाहते थे। रोगमुक्त हुए तो दिल की अवस्था दूसरी हो गई थी। अब उनको यह महसूस हो रहा था कि उनका अतिम समय नजदाका गया है । जिस दिन पहले पहल प्रात काल उनका बुखार उतरा, स्वामी जी न अपन सचिव धमपाल को भेजकर, पडित इद्र जी, लाला दावध 127 गुप्त स्वामी रामान द और सुखदेव को बुलाया व इन सबके सामने अपनी वसीयत लिखने की घोषणा की। 22 दिसम्बर के प्रात काल का यह दिन था। सभी लोगो ने स्वामी जी को समवाया कि वह जव चिंता न करे वह पूरी तरह स्वस्थ हो गए हैं। पर स्वामी श्रद्धानद का जवाब था कि ओषधि के बल पर सास तो चलाई जा सकती है। पर अदर से यह आवाज उठनी हैं इसलिए मैं अब उठकर खडा न हो सकूगा । वसीयत लिख दी जाए, यही अच्छा है । दिन के समय जब उनके पुत्र इद्र जी पिता से मिलने गय, तव भी उ होने इद्र को पास विठला कर कहा, "इम शरीर का अव कुछ ठिकाना नहीं है। मैं शायद ही उठू । तुम एक काम जरूर करना । मर कमर म आय समाज के इतिहास की सामग्री पड़ी है। उसे सम्भाल लेना और समय निकालकर इतिहास जरूर लिख लेना । एक बात और कहना चाहता हू, इतिहास के लिखते समय मुझे माफ मत कर दना, मैंने बहुत बडी बडी भूलें की हैं। तुम्ह तो मालूम है मैं क्या करना चाहता था और किधर पड गया। तेज और अजुन पत्र भरी भावना के अनुसार चलते रहे । गुरुकुल की सदा रक्षा की जाय ।' डा० सुखदेव ने हसकर कहा, "स्वामी जी आपकी तबीयत अच्छी हो रही है । थोडे ही दिनो में आपको भोजन मिलने लगेगा, आप उठन वठन लगगे। स्गमी जी के उत्तर दिया, 'डाक्टर साहब आप लोग तो ऐसा हो कहते है पर तु मरा शरीर तो अब सेवा के योग्य नहीं रहा । इस रोगी शारीर से दश का कोई कल्याण नहीं हो सकेगा । बब तो हृदय म एक ही इच्छा है कि दूसरा जम लेकर नये शरीर से इस जीवन के काय को पूरा करूगा।" 21 दिसम्बर की बात है, म्वामी जी से व्याख्यान वाचस्पति पडित दानदयाल गर्मा कुशलता पूछने आए। उस समय स्वामी जी के लिए उठना मुस्किल था। बातचीत के लिए स्वामी को सहारा दकर बिठला दिया गया । शर्मा जी ने स्वामी जी से कहा, 'मालवीय जी मुपसे एवं साल वह हैं । उनसे आप एक वप वड हैं। अभी हम लोगो को बहुत सा करना है। आप इतनी जल्दो मोक्ष की तयारी क्यो कर रहे हैं ?' स्वामी काचर या-'पडित जी, इस युग में मोक्ष कहा । मैं तो कंवल चोली बदलकर दूसरा शरीर धारण करना चाहता हू । अब इस शरीर से सवा सम्भव नहीं है। इच्छा है कि फिर इसी देश में उत्पन हाने का सौभाग्य प्राप्त हो। 22 दिसम्बर को लाला देशर धु गुप्त आये । उनसे भी कुशल क्षम के बाद स्वामी श्रद्धान द न यही कहा, "डाक्टर लोग कुछ भी कह पर मुझे आत्मा का यही शब्द सुनाई देता है कि अब यह गरीर किसी काम का नही है । मैं इस समय जान के लिए बिलकुल तयार हू ।" स्वामी जी को लग रहा था कि उनका अन्त सा नकट है । 23 दिसम्बर सन 1926 को एक दुष्ट व्यक्ति न जब वह बिस्तर पर लेटे थे उह गालिया दागकर मौत के घाट उतार दिया । डा० असारा, आदि न तत्काल स्वामी श्रद्धानद की पराक्षा की पर जब तो सिवाय शरीर क कुछ शेष नही था। स्वामी जी का सेवक धमसिंह भी जाघ में गोली लगने से घायल हो गया । परन्तु स्वामी जी के निजी चिकित्सक आ गए पर अब कुछ शेप नहीं था। हत्यारे को स्वामी जी के निजा सचिव धमपाल न पकड भी लिया था। पुलिस ने उसे हिरासत म ले लिया। जो होना था वह तो हा गया। स्वामी जी की मृत्यु हो गई, यह जानकर बुरी तरह भीड टूट पड़ी। दूसरे दिन स्वामी श्रद्धानन्द का शव लाखो श्रद्धालुओं के साथ निगम बाध घाट पर पहुंचा। जहा स्वामी जी का उनके पुत्र इद्र न वदिक रीति से अतिम सस्कार किया। इस प्रकार स्वामी श्रद्धानन्द को जीवन-लीला सम प्त हो गइ। पर उनके काय आज भी जीवित हैं। ०००

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Swami Shraddhanand

Author
Uma Chaturvedi
Title
Swami Shraddhanand
File name
Swami Shraddhanand
Text
OCR done
Citation
1953
Published
2011/03
Publisher
Anil Prakashan Nayi Sarak Dehli
Language
Sanskrit
Pages
131
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551042
Barcode
4990010031822.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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