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Ramayan Sundar Kand

Pandit, Sitaram · 2009/10

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श्रीमद्गोस्वामि
तुलसीदासकृत रामायण
सुन्दरकाण्ड ५.
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ferorpuso RAVश्रीः ग.२५५२. गोस्वामी तुलसीदासकृत रामायण Sakasamay ra aaracacakastaraacarce: 02.. * सुन्दरकाण्ड lus aaa (संतजीवनी टीका सहित) महालाचरण श्लोक-शान्तंशाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाण शान्तिप्रदम् । ब्रह्माशंभु फणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्य'विभुम् ॥ रामाख्यंजगदीश्वरंसुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं । वन्देहं करुणाकरं रघुवरं भूपाल चूड़ामणिम् ॥ शान्ति युक्त नित्य ( सदा रहनेवाले ) प्रत्यक्षप्रादि प्रमाणों से नहीं जानने योग्य, निर्दोष मुक्ति के द्वारा शान्ति के देनेवाले, ब्रह्मा शिव और शेषजी करके सेवित, निरन्तर वेदान्त ( उपनिषद आदि सदग्रन्थों ) से जानने योग्य, सर्वव्यापक ब्रह्म अथवा अत्यन्त समर्थ; देवताओं के गुरु अथवा देवताओं में प्रधान, माया से मनुष्यरूपधारी, कृपानिधान, रघुवंश में श्रेष्ठ, राजाओं के शिरोमणि राम नाम धारी जगत के ईश्वर हरि भगवान् नारायण को मैं प्रणाम करता हूं ॥१॥ श्लोक-नान्यास्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये। आHary सत्यं वदामि व भवानखिलान्तरात्मा । भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे। कामादिदोषरहितं कुरुमानसं च ॥२॥ है रघुनाथजी ! मैं सच कहता हूँ कि मेरे हृदय में और कोई अभिलाषा नहीं १. 'गावांणशान्तिप्रदम् ऐसा भी पाठ है अर्थात् देवताओं को शान्ति देनेवाले । AAAARRARNANANANANANANAS aaaaa PowerecN8RScarcasteAENDRSS Ravi batmelanmassabse [७९६] * तुलसीकृत रामायण है और श्राप तो सबके अन्तर्याप्ती हो । अर्यात घट घट की जानते हैं रघुवंश में श्रेष्ठ समन्न्द्रजी ! मुझे अपनी पूर्ण भक्ति दीजिये, और मेरे ननकोलाम को शादि शेषों ने रहित कीजिये । २॥ श्लोक -अतुलितबलधामं स्वर्णशैलाभदेह . . इनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामनायम् ॥ सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं । रघुपतिवरदतं वातजातं नमामि ॥३॥ अनुलघल के स्थान प्रांत अत्पन्त बलवान, सुमेरु पर्वतके समान देदीप्यमान दिन्य देह वाले, राक्षसरूपी धन को भस्म करने के लिये अग्नि के समान, ज्ञानियों में आगे गिने जाने वाले, सम्पूर्ण गुगों की खान, वानरों के स्वामी, रामचन्द्रजीके श्रेषदूत पवन के पुत्र ऐसे श्रीहनुमान्नो को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ३ ॥ जामवन्त के वचन वचन सुहाये सुनि हनुमान हृदय अति भाये ॥ तब लगि मोहिं परखियहु भाई सहि दुःख कन्द मूल फल खाई ॥२॥ विविधाकांड के अन्त में हनुमान जी के प्रश्न के उत्तर में जानवन्तजी ने जो शिक्षा युक्त वचन कहे थे वे सुहादने वचन सुन र हनुमानजी के मन को पतुत पारे लगे अर्थात् हनुमानजी बहुत प्रसन्न हुये और बोले हे भाइयों ! तुम सब सायो दुःख सह कर और कंद मूल फल खाकर तब तक मेरी राय देना ॥२॥ जब लगि श्रावौं सीतहि देखी होइ काज मन हर्ष विशेखो nau अस कहि नाइ सबन कहं माया चलेउ हरपि हिय थरि रघुनाथा IA जब तक मैं सीताजीको देख कर होट माऊँ कार्य अश्य सिद्ध होगा क्योंकि मेरे मन में विशेष श्रानन्द हो रहा है ॥ ६॥ इस प्रकार कह का सुनाव, जामवन्त श्रादि सह साथियों को मस्तक नवा प्रसन्नता पूर्वक रामचन्द्रगी मा हृदय में ध्यान धर कर हनुमानजी चले ॥५॥ सिंधुतीर इक सुंदर भूधर कौतुक कूदि चढ़े तेहि ऊपर ५५ वार बार रघुशेर सँभारी तरकेर पवन तनय बलमारी समुदळे तट पर एक सुन्दर पर्वतथा उसकेजारचण्यास सदर हनुमानजी चढ़ गये ||५१ पर्वत पर चड़ कर पचनने पुत्र महा बलवान् हनुमान्जीने वारंवार रामचन्द्रनी का स्मरण कर गर्जना की और छलांग भरी प्रात् उस पर से उठ कर उड़े ॥६॥ जेहि गिरि चरण देह हनुमन्ता छ सो चलि गयउ पताल तुरन्ता 194 जिमि अमोघ रघुपति कर बाना छ ताहि भाँति चला हनुमाना ॥८॥ RRAGastaraaaRasranasrastamas -RAKANI. EGMEAGLESS MASERATUSASU S050see । See9930 SOR59 *सुन्दरकांड सटीक [७६७] जल निधि रघुपति दूत विचारी कह मैनाक होउ श्रम हारी ॥९॥ जिप्स पर्वत पर पाँव रख कर हनुमानजी कूदे वह तुरन्त पाताल में चला गया जिस प्रकार रामचन्द्रजीका अमोघ बाण छूटता है उसी प्रकार हनुमानजी घले । रामचन्द्र जी का अमोघ बाग तीन प्रकार का है। एक यह कि कार्य सिद्ध करके लौटता है, दूपरे इच्छा के अनुसार वेग से जाता है, तीसरे उसकी गति को कोई नहीं रोक सकता ॥ ८॥ समुद् ने हनुमानजी को रामचन्दजी का दूत जान कर कहां, हे मैनाक ! तुम इनकी थकावट को दूर करनेवाले बन जानो अर्थात् सहायक हो जाओ।॥९॥ सोरठा-सिन्धु बचन सुनि कान, तुरत उठेउ मैनाक तव । कपि कह कीन्ह प्रणाम, वार बार कर जोरि कै॥१॥ समुद्र का बचन कानों से सुना तब मैनाक पर्वत उठा और वारम्बार हाय जोड़ कर हनुमानजी को प्रणाम किया ॥१॥ दोहा-हनुमान् तेहि परसि कर, पुनि तेहि कीन्ह प्रणाम । राम काज कीन्हे बिना, मोहि कहाँ विश्राम ॥१॥ हनुमानजी ने उसे हाथ से छु कर फिर उसको प्रणाम किया और कहने लगे कि रामचन्द्रजी का कार्य किये बिना मुझे विश्राम कहाँ है ॥ १ ॥ , जात पवन सुत देवन देखा जाना चह बल बुद्धि बिशेखा ॥१॥ सुरसा नाम श्रहिन की माता ® पठयउ आइ कही तेहि बाता ॥२॥ हनुमानजी को जाते हुए देवताओं ने देखा और उनके विशेष बल और बुद्धि को देखना चाहा ॥ १॥ तब सुरसा नामवाली साँपों की माता को भेजा उसने हनु. मानजी के पास आकर यह बात कही ॥२॥ आजु सुरन मोहि दीन्ह अहारा सुनि हसि बोला पवन कुमारा ॥३॥ राम काज करि फिरि मैं आवौं ७ सीता की सुधि प्रभुहि सुनावौं ॥ell अाज तो देवताओं ने मुझे अच्छा भोजन दिया; यह सुन हनुमाननी हंस कर बोले ॥३॥ रामचन्द्रजी का कार्य कर मैं लौट कर पाऊँ और सीताजी की खबर प्रभु (रामचन्द्रजी ) को सुनाऊँ ॥७॥ तब तुव बदन पैठिहौं भाई सत्य कहाँ मोहिं जान दे माई ॥५॥ कवनिहु यतन देइ नहिं जाना प्रससि न मोहिं कहा हनुमानां ॥६ ता पाकर तुम्हारे सुख में पैगा, हे माता ! मैं यह बात सच कहता हूं मुझे जाने दो॥५॥ किसी भी उपाय से जाने नहीं देती तब हनुमानजी ने कहा कि saanRananay MaanasalHasnasura &050.se esensies iseseisvuse sprogesterone [७९८] तुलसीकृत रामायण मुझे खा क्यों नहीं लेती ॥६॥ योजन भरि तेहि बदन पसारा कपि तनु कीन्ह द्विगुण विस्तारा ॥७॥ ? सोरह योजन मुख तेइ ठयऊ तुरत पवन सुत बत्तिस भयऊ ८॥ यह सुनते ही उस सुरसा ने योजन भर ( चार कोस तक) मुंह फैलाया तव हनुमान जी ने अपने शरीर को दुना ( पाठ कोस तक ) बढ़ा दिया ७ ॥ फिर सुरसा ने सोरह योजन (६४ कोस तक ) अपना मुंह बढ़ाया तब तुरन्त हनुमानजी बत्तिस 5 योजन (१२८ कोस ) के हो गये ॥ ८॥ जस जस सुरसा बदन बढ़ावा 8 तासु द्विगुण कपि रूप दिखावा in शत योजन तेइ भानन कीन्हा अति लघुरूप पवन सुत नीन्हा ॥१०॥ सुरसा ने जितना जितना अपना यदन बढ़ाया उससे दुना रूप हनुमानजी ने दिखाया ॥ ९ ॥ जब सुरसा ने सो योजन (९०० कोस ) का अपना मुख कर लिया , तब हनुमानजी ने बहुत छोटा सा रूप धारण कर लिया ॥ १० ॥ बदन पैठि पुनि बाहर श्रावा मांगी विदा ताहि शिरनावा ॥११॥ मोहिं सुरन जेहि लागि पठाचा ७ बुधि वल मर्म तोर मैं पावा ॥१२॥ और सुरसा के मुख में घुस गये फिर बाहर आये और सिर नवा कर विदा मांगी ॥११|| तब सुरसा बोली मुझे देवताओं ने जिस लिये भेजा था सो मैंने तुम्हारी बुद्धि और बल का भेद जान लिया ॥ १२ ॥ दोहा--राम काज सब करिहहु, तुम बल बुद्धि निधान । आशिष दै सुरसा चली, हर्षि चले हनुमान् ॥२॥ तुम बड़े बलवान और बुद्धिमान् हो रामचन्द्रजी के सब कार्य सिद्ध करोगे यह आशीर्वाद देकर सुरसा चली गई तब हनुमानजी भी प्रसन्न होकर आगे चले ॥२॥ निशिचरि एक सिन्धु मह रहई छ करि माया नभ के खग गहई ॥३॥ जीव जन्तु जे गगन उड़ाहीं जल बिलोकि तिनकी परछाहीं ॥४॥ सिंहिका नामवाली एक राक्षसी समुद्र में रहती थी वह माया (कपट ) करके आकाश में उड़ते हुए पक्षियों को पकड़ लेती थी॥ ३ ॥ जो जीवन्तु आकाश में 5 उड़ने लगते तो उनकी परछाहीं जल में देख कर ॥ ४ ॥ गहै छाँह सक सो न उड़ाई 8 इहि विधि सदा गमन चर खाई ॥३॥ सोइ छल हनूमान ते कीन्हा ७ तासु कपट कपि तुरतहिं चीन्हा nein ताहि मारि मारुत' सुत बीरावारिधि पार गयउ मति धीरा ॥५॥ उस छाया को पकड़ लेती थी तब वह प्राकाशचारी जीव उड़ नहीं सकता था Aarashastraanasashanaaashana.

min MUSEUue S15 Preces cerca WERSE सुन्दरकांड सटीक [७९९] इस प्रकार से वह सदैव आकाशमारियों को खाया करती थी॥३॥ वही कपट हनुमान्जी से भी किया। उसके कपट को हनुमान् ती ने तुरन्त पहिवान लिया था और उसे मार कर पवन के पुत्र मति धीर महावीरजो समुद्र पार जा पहुंचे ॥५॥ तहाँ जाय देखी धन शोमा ४ गुञ्जन चंवरीक मधु लोमा ॥६॥ नाना तरु फल फूल सुहाये खग मृग वृन्द देखि मन भाये जा वहाँ पहुँचकर वन की शोभा देखी जहाँ शहद के लोभ से भौंरे गुन्नार रहे हैं ॥ ६ ॥ नाना प्रकार के वृक्ष फल और फूलों से सुहावने हो रहे पक्षी और.मृग आदि । पशुनों के झुण्ड विचर रहे सो देखकर हनुमानजी को बहुत प्यारे लगे ॥ ॥ शैल विशाल देखि इक भागे तापर धाइ चढ़ेउ भय त्यागे ॥८॥ उमा न कछु कपि की अधिकाई । प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥९॥ भागे चल कर एक बड़ा भारी पर्वत देख उस पर वेबढ़क हनुमानजी कूदकर चढ़ गये ॥ ॥ महादेवजी कहते हैं मि हे पार्वती ! इसमें कुछ हनुमान् नी की बड़ाई नहीं या प्रमु रामचन्द्र जी का प्रताप है जो काल को भी खा लेता है ॥ ९॥ गिरि पर चढ़ि लंका कपि देखी कहि नजाय अति दुर्ग विशेखो ॥१०॥ अति उतंग जल निधि चहुँपासा कनक कोट कर परम प्रकासा ॥ इस पर्वत की चोटी पर चढ़ कर हनुमान जी ने लंका देखी उसके बहुत बड़े किले का वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ १०॥ बहुतही ऊंचो वह लंका जिसके चारो ओर। समुद्र भरा हुआ है सोने के किले के कगरे बहुत ही चमकीले हैं ॥११॥ छन्द-कनके कोट विचित्र मणि कृत सुन्दरायत अति घना । चौहट्ट हाट सुहे? वीथी चारु पुर बहु बिधि बना ॥ गज बाजि खच्चर निकर पद चर रथ बरूथनि को गने। बहु रूप निशिचर यूथ अति वल सेन बरणत नहिं बने । सोने का कोट (शिला ) रंग विरंगी मणियों से जड़ा हुमा बहुत सुन्दर लंका चौड़ा बना हुआ है । चौराहे चौक पाजार, अच्छी सड़कों और गलियों से सुशोभित नगर बहुत उत्तम रीति से बसा हुआ है, और हाथी घोड़े खचर इनके झुण्ड तथा पैदल और अंगणित रयों को कौन गिन सकता है, एवं बहुत प्रकार के रूपवाले महा पली राक्षत्रों को सेना का वर्णन करते नहीं बनता ॥३॥ छन्द-वन बाग उपवन बाटिका सर कूप वापी सोहहीं। नर नाग सुर गन्धर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥ कहुँ मल्ल देह विशाल शैल समान अति बल गर्जहीं। स AnakalakatanamarakGanaraatee -Contras [८००] * तुलसीकृत रामायण नाना अखारन भिरहिं बहु विधि एक एक न तर्जहीं ॥२॥ धन, वाग, बागीचे, फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ, और वावली शोभायमान है, मनुष्य, नाग, देव और गन्धर्व कन्यायें अपनी रूप माधुरीसे मुनियोंके चित्तको मोहित कर रहे हैं, कहीं पर्वत के समान पड़े देह वाले महायलवान् मल्ल गरज रहे हैं, तथा अनेक अखामि बहुत भांतिसे लड़ रहे हैं और एक दुसरेको पछाड़ रहे हैं ॥२॥ छन्द करि यतन भट कोटिन विकटतनु नगर चहुँदिशि रक्षहीं। कहुँ महिप मानुष धेनुखर अज खग निशाचर भक्षहीं। इहि लागि तुलसीदास इनकी कथा संक्षेपहि कही। रघुवीर शर तीरथ सरित तनु त्यागि गति पैहें लही ॥३॥ मयानक शरीर वाले योद्धाओंके दरके दर बड़ी सावधानीके साथ नगरके धारी भोर पहरा दे रहे हैं, कहीं राक्षसगण भैंसे, मनुष्य, गायें, गधे बकरे, और क्षियोंको नक्षण कर रहे हैं, तुलसीदासजी कहते है कि इसीलिये मैंने इनज्ञो कथा बहुत थोड़ी सी कही है क्योंकि ये भी रामचन्द्रजीले बाणरूपी तीर्थ की नदी में शरीर छोड़ कर अवश्य उनमगति (मोक्ष) पावेंगे ॥ ३ ॥ दोहा-पुर रखवारे देखि बहु, कपि मन कीन्ह विचार । अति लघुरूप धरौं निशि, नगर करौं पैसार. ॥३॥ लंकापुरी में बहुत से पहर दारों को देखकर हनुमान्जी ने अपने मन में विचार किया कि बहुत छोटा सा अपना रूप धारण कर रात्रि के समय इस नगर में प्रवेश करूं तो ठीक है ॥३॥ मशक समान रूप कपि धरी लंका चले सुमिरि नरहरी ॥६॥ नाम लंकिनी एक निशिचरी सो कह चलेसि मोहिं निन्दरी ॥२॥ हनुमान्जी मच्छड़के बरार रूप धारण कर मनुष्यों में नर हरी सिंह रूप रामचन्द्रजीका स्मरण करके लंकामें चले वहाँ लेकिनो नामवाली एक राक्षसी यो वह कहने लगी, तू मुझे निदर कर कहाँ चला जाता है ॥ २ ॥ जानसि नाहि मर्म शठ मोरा मोर अहार लंक कर चोरा ॥३॥ मुष्टिक . एक ताहि कपि हनी रुधिर वमत धरणी ठनमनी well रेशठ ! क्या तू मेरा भेद नहीं जानता कि लंकाका चोरही मेरा बाहार है ॥३॥ 'यह सुनते ही हनुमानजीने उसको मुक चूंसा मारा जिससे वह लोहू वसन करती हुई धरती पर लुढ़क गई ॥४॥ पुनि संभारि . उठी ‘सो लंका जोरि पाणि कर विनय सशंका ५॥ ansas RAHal R MoreerSeres सुन्दरकांड सटीक [८०९] जब रावणहिं ब्रह्म वर दीन्हा चलत विरवि कहा मोहिं चीन्हा ॥६॥ फिर सम्हल कर वह लंकिनी उठी और हाथ जोड़ शंकासहित प्रार्थना करने लगी, शंका यह कि दूसरा ॥ सा लग जायगा तो मेरे प्राण निकल जायंगे ॥ ५ ॥ वह बोली कि जब रावणको ब्रह्माजीने परदान दिया था तब चलते समय उन्होंने मुझे यह लक्षण बतलाया था कि ॥६॥ विकल होसि जब कपि के मारे * तब जानेसि निशिवर संहारे ॥७॥ तात मोर अति पुण्य बहता देखेउ नयन राम कर दूता ॥८॥ जब तू एक बन्दर की मार खानेसे विकल हो जायगी तब जान लेना कि अब राक्षसोंका संहार होनेवाला है ॥ ७ ॥ हे प्यारे ! 'आज' मेरा बहुतही प्रबल पुण्य उदय हुआ है, जो मैंने अपने नेत्रोंसे श्रीरामचन्द्र जीके दत्तके दर्शन किये ॥ ८ ॥ दोहा -तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिय तुला इक अंग। तुलै न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सतसंग ॥४॥ हे प्यारे । स्वर्ग और मोक्षका सुख एक और तराजूते पलड़े में रखा जाय और जो पल भरके सतसंगका सुख है वह दूसरे पलड़े में रक्खा जाय तो सब मिल कर के सत्संगके परापर नहीं तुल सकते अर्थात स्वर्ग सुख और मोक्ष सुख मिलकर लवमान के सत्संगके बराबर नहीं हो सकते ॥ ४ ॥ प्रविशि नगर कीजे सब काजा हृदय राखि कोशलपुर राजा ॥१॥ गरल सुधा रिपु करे मिताई गोपद सिंधु .अनल शितलाई ॥२ गरुन सुमेरु रेणु सम ताही राम कृपा करि चितवहिं जाही || हृदयमें कोशलाधीश रामचन्द्रजीका स्मरण कर नगरमें प्रवेश कीजिये और वहाँ जाकर सब कार्य कीजिये ॥ १ ॥ लंकिनो कहती है हे हनुमान जी ! उस 'भक्त' को विप अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता कर लेता है, समुद्र गौ के खुरके तुल्य होजाता है, भाग ढंढो हो जाती है ॥२॥ मारो सुमेरु पर्वत उसको धलके समान हो जाता है । जिसको रामचन्द्रजी दयादृष्टि से देखते हैं ॥ ३ ॥ अति लघु रूप धरेउ हनुमानास पैठेउ नगर सुमिरि भगवाना MER मन्दिर मन्दिर प्रति करि शोधा छ देखे जहँ तहं श्रगणित योधा ॥५॥ बहुत छोटा रूप धर कर हनुमानजी भगवानका स्मरण कर नगरमें घुसे ॥ ४ ॥ घर घर प्रति खोजकी अर्थात्-हर एक घर हूँदा, उनमें जहां तहां अनगिनत योद्धाओं को उन्होंने देखा ॥ ५॥ गयउ दशानन मन्दिर माहीं अति विचित्र कहि जात सोनाहीं ॥ iamadanananesamanarthanimanavr स BUS INSERERE See Freservoiserie seunseres [८०२] तुलसीकृत रामायण शयन किये देखा कपि तेही मन्दिर मह न दीख वैदेही ॥on • फिर रावणके मन्दिर में गये, वह राजमंदिर बहुतही विचित्र था, उसकी शोभा कही नहीं जा सकती ॥६॥ वहाँ हनुमानजीने रावणको सोते देखा पर उस मन्दिरमें जानकीनी नहीं देख पड़ीं ॥ ७ ॥ भवन एक पुनि दीख सुहावा हरि मन्दिर तह भिन्न बनावा ॥८॥ फिर एक सुहावना मन्दिर देखा वहाँ हरिभगवानका मन्दिर अलग बना हुआ था दोहा-राम नाम अंकित सुगृह, शोभा वरणि न जाय । नव तुलसी के वृन्द बहु, देखि हर्प कपिराय ॥५॥ राम नाम लिखे हुए ऐसे उस सुन्दर मन्दिरझी शोभाका वर्णन नहीं किका जा सकता, वहाँ तुलसीके नवीन वृक्षोंके मुंडके नुड देखकर हनुमान जी बहुत प्रसन्न हुए लंका निशिचर निकर निवासा यहाँ कहाँ सज्जन कर वासा ॥१॥ मनमहं तर्क करन कपि लागे ताही समय विभीषण जागे ॥२॥ इस लंकापुरीमें तो राक्षस गणोंका निवास है, यहाँ सजनका वास कहाँ, इस प्रकार ||१॥ हनुमान्जी अपने मन में विचार करने लगे, उसी समय विभीपणजी जागे राम नाम तेहि सुमिरन कीन्हा हृदय हर्ष कपि सज्जन चीन्हा ॥३॥ इहि सन हठि करिहौं पहिचानी 8 साधुते होइ न कारज हानी ॥४॥ जागतेही विभीपणने राम नाम स्मरण किया सुनतेही हनुमानजी बहुत प्रसन्न हुए और पहचान लिया कि ये सज्जन हैं ।। ३ ॥ इनसे हठ करके पहचान करूंगा, साधुजन से कार्य की हानि नहीं होती है ॥ ४ ॥ विप्ररूप धरि वचन सुनाना सुनत विभीषण उठि तह श्रावा ॥ करि प्रणाम पूछी कुशलाई विप्र कहहु निज कथा वुझाई ॥६॥ ब्राह्मण का रूप धारण कर हनुमानजी ने 'हरिभक्त की जय हो' यह वचन सुनाया, सुनतेही विमीपणजी उठ कर वहाँ पाये ||५|| विभीपणजीने आतेही प्रणाम कर कुशल पूछा और कहा हे विप्र ! अपनी कथा समझा कर मुझसे कहिये ॥ ६ ॥ की तुम हरि दासन महं कोई छ मोरे हृदय प्रीति अति होई ॥७॥ की तुम राम चरण अनुरागी प्रायहु मोहिं करन बड़ भागी क्या आप कोई हरिभक्तों में से है क्योंकि मेरे हृदय में बहुत प्रीति उत्पन्न हो रही है ॥णाअथवा श्राप रामचन्दजीके चरणोंके प्रेमी हैं, जो मुझे बड़ भागी करने आये हैं दोहा-तब हनुमन्त कही सष, राम कथा निज नाम । सुनत युगल तन पुलक अति मगन सुमिरि गुण ग्राम ॥६॥ ananrismashaaanihasranaaaaai . Se/S0tresset806 SNepalSS सुन्दरकांड सटीक [८०३] तब हनुमानजी ने,श्रीरामचन्दजी की सब कथा कह सुनाई और अपना नाम भी बतलाया, सुनतेही दोनों के शरीर पुलकित हो गये और रामचन्दजीके गुण समूह स्मरण कर बहुत ही मगन हो गये ॥६॥ सुनहु पवनसुत रहनि हमारी जिमि दशनन मह जीम विचारी ॥१॥ तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ॥२॥ हे पवनपुत्र हनुमानजी ! सुनो यहाँ हमारा रहना ऐसा है जैसे दाँतोंमें विचारी जीभ रहती है ॥ १ ॥ हे तात! मुझे श्रनाथ समझ कर श्री रामचन्दजी कभी मुझ. पर कृपा करेंगे ॥२॥ तामस तनु कछु साधन नाही छ प्रीति न पद-सरोज मन माहीं ॥३॥ अब मोहि भा भरोस हनुमन्ता बिन हरिकृपामिलहिं नहिं सन्ता ॥४॥ मेरा तमोगुणी ( राक्षसी ) शरीर' है, साधन भी नहीं है, मन में रामः चन्द्रजी के चरण कमलों से प्रीति भी नहीं है ॥ ३ ॥ परन्तु हे हनुमान्जी ! अब मुझे विश्वास हुआ कि हरि भगवान की कृपा के बिना सन्तजन नहीं मिलते हैं॥४॥ जो रघुवीर अनुग्रह कीन्हा छ तो तुम मोहिं दरश हठि दीन्हा ॥५॥ सुनहु विभीषण प्रभु की रीती करहिं सदा सेवक पर प्रीती ॥६॥ जब रामचन्द्रजी ने मुझपर कृपा की है इसीसे तो आपने हठ करके मुझको दर्शन दिये हैं ॥ ५ ॥ यह सुन हनुमान्जी बोले सुनो विभीषण ! प्रभु रामचन्द्रजी की यह रीति है कि अपने भक पर सदैव प्रीति करते हैं ॥ ६ ॥ कहहु कवन मैं परम कुलीना ® कपि चंचल सबही विधि हीना ॥७॥ पात लेइ जो नाम हमारा, तादिन ताहि न मिले अहारा ॥८॥ विभीपणजी के कथन के उत्तर में हनुमानजी उसी अनुसार कहते हैं कि हे विभी पण ! कहो मैं कौन बड़ा कुलीन हूँ. जाति का बन्दर चंचल, सबही प्रकार से हीन हूं Fण यहाँ तक कि प्रात: समय जो मेरा नाम लेवे तो उस दिन उसे भोजन नहीं मिले दोहा-अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुधीर । कीन्ही कृपा सुमिरि गुण, अरे बिलोचन नीर॥७॥ है मित्र विभीषण ! सुनो ऐसा तो मैं अधम हूँ, ऐसे मुझपर भी रामचन्द्रजी ने कृपा की है सो रामचन्द्रजी के कृपालु होने के गुण को स्मरण कर दोनों की आँखों । में आँसू भर पाये ॥ ७॥ जानतहू अस स्वामि बिसारी ते नर काहे न होहिं दुखारी-॥३॥ यहि बिधि कहत राम गुण प्रामा ® पावा श्रवण सुखद विश्रामा ॥२॥ ! S sasraastainB४४७000-aan 4. [४] तुलसीकृत रामायण जो लोग जान बूझ कर ऐसे स्थामीको भूल जाते हैं वे मनुष्य क्यों न दुःखी होवें ||३॥ इस मांति रामचन्द्रजी के गुणों को कहते हुए दोनों ने कानों को सुख देने वाला , विनाम पाया अर्थात् सत्संग का परम आनन्द दोनों को प्राप्त हुआ ॥२॥ पुनि सव कथा विभीपण कही 8 जेहि विधि जनकसुता तह रही ॥३॥ तब हनुमन्त कहा सुनु भ्राता देखा वहाँ जानकी साता ॥धा फिर विभीषणजी ने वह सब कथा कही जिस भांति वहाँ सीताजी रहती थीं। ॥३॥ तव हनुमानजी ने कहा सुनो भाई ! मैं माता जानकोजी को देखना चाहता हूं। युक्ति विभीषण सकल सुनाई ४ चला पवनसुत बिदा कराई ॥५॥ धरि सोइ रूप गयउ पुनि तहवा बन अशोक सीता रह जहवा ॥६॥ यह सुन विभीषण जी ने सव युक्ति सुनाई तव हनुमान्जी बिदा मांग कर वहाँ से चले । फिर वही पहले जैसा बहुत छोटा रूप धर कर कर वहाँ गये जहाँ अशोक वन में सीताजी रहती थीं ॥ ६॥ देखि मनहिं मन कीन्ह प्रणामा छ बैठे वीति गई निशि यामा ॥३॥ कश तनु शीश जटा इक वेणी जपति हृदय रघुपति गुण श्रेणी ॥८॥ हनुमान जी ने सीताजी को देख कर मनही मन में 'प्रणाम किया और वहां बैठे चैठे पहर भा रात बीत गई ॥ ७ ॥ सीताजी का शरीर दुबला हो रहा था शिर के केश जटा हो कर इकठे चिपट कर एक वेणी बन गये थे और हृदय में श्रीरामचन्दजी के गुण-गणों को जप रही थीं ॥ ८ ॥ दोहा-निज पद नयन दिये मन, राम चरण लवलीन । परम दुखी भा पवननुत, निरखि जानकी दीन ॥ ८॥ सीताजी अपने चरणों की ओर टकटकी लगाकर देख रही थीं और मन श्रीराम- चन्दजी के चरणों में लग रहा था ऐसी जानकीजी को दीन दशा में देख कर हनुमान जी बहुतही दुःखी हुए ॥ 611, तरु पल्लव मह रहा लुकाई छ करे विचार करों का भाई ॥१॥ तेहि अवसर रावण तह पावा संग नारि बहु किये बनाया ॥२॥ हनुमानजी वृक्ष के पत्तों में छिप रहे और विचार करने लगे कि अरे भाई! अब क्या करना चाहिये, यहाँ माई कहमा साधारण बात है॥1॥ उसी समय वहां रावण आ पहुँचा उसके संग में शृगार किये हुए बहुत सी स्त्रियां थीं ॥२॥ बहु विधि खल सीतहिंसमुझावा, साम दाम भय भेद दिखावा ॥३॥ दुष्ट रावण ने सीताजी को बहुत भाँति से साम दाम भय भेद दिखलाया, साम rastrastraecseas ananjaardesai REPietri २ Prem............ मुन्दरकांट सटीमा । नोन (धन ऐश्वर्य पिताया ) भय (इंच श्रादि की ममी : म ( भारत में विगार मग देन की बान ) और दूसरों पर प्रेम श्रादि कॉiarममाया॥ Com सुन न त पानी इ. मन्दोदरी श्रादि गय रानी 180 गय अनुगरी परी प्रण मारा एक बार पिला मन श्रीरा ॥५॥ गार मुपपानी मागी! नुनी, मन्दोदरी धादि famil मिया ॥ ४ ॥ गमयों में तुम्हारी दासी पनागा, पह मेरी Farent म बार मेरी धीर देणारा नृण धरि श्रोट फति चंदेही । लुमिरि अयधपति परम सनही दा নন্ত হয় না। যথাঃ ললিনাকাংঘিক্ষায় all पनपने परमनंदी राम का स्मरण र शाह में तिनका न कर सोमो कदन भयो । ६ परे दामुप रायन ! सुम, रया जुगुन के प्रकाश से रमतिमी मोहिनी है, अर्धान र सगुन में मेरी और मैं नहीं देन सकतो, राम सुद के मासे फलिनीका विकाश होता है उन्हीके श्रीमुचके मकाए मिनी निलंगी मनांत की और में पगी ॥ ७ ॥ अस मन समुझि पाहति जानकी पत सुधि नहि रघुवीर यान की॥८॥ शशु प्रानेसि मोही श्रधा निलजलास नहिं तोही ॥५॥ PATRA समय ले, फिर rinी महतो हर दुष्ट ! तुझे रघुशेरके पाणी मुधि नहीं है | ॥रे मुर्सत मुझे सने में ( रामचन्द्रगी के यहां न मना पाकर) पारे अधम ! निलंग! नुमे लाज नहीं पाती। दोना-प्रारी: मुनि पोत सम, रामहिं भानु समान । पर वचन मुनि फाढि असि, याला अति खिसियान ॥९॥ अनेजर के समाग और रामचन्द्रजी को सूर्य के समान मुनकर तथा चौरमा पार वा निकाय पाटोर पचन सुनकर रानियों के सामने रावण या गया और बांध कर पानी पन्द्रहास तलयार निकाल कर योला ॥९॥ लीना ने. रात अपमाना. काौं तय शिर याटिन रूपाना ॥१॥ नामिन नदि मानु मम वानी ७ सुमुखि होत नतु जीवन हानी ॥२॥ मनाने माग पिया है, तरा शिर इस पनी तलवार से काटता है| malni मेरी यात मान ले, हे सुमुखी : नहीं मानेगो तो जीवन- शनि tit प्रधान मार दागा ॥२॥ AAPRIN0002Rasmasasans है ErgosianananBRARNARBAR * तुलसीकृत रामायण श्याम सरोज 'दाम सम सुन्दर * प्रभु भुज करिकर सम दशकन्धर॥३॥ सो भुज कंठ कि तव असि घोरा सुनु शठ अस प्रमाण प्रण मोरा ॥४॥ यह सुन कर सीताजी रावणसे कहने लगी कि हे मूर्ख ! सुन या तो नीले कमल की मालाके सामान और हाथी के सूट के समान सुन्दर श्रीरामचन्दनी की भुजा अथवा तेरी यह पैनी तलवार ही मेरे कंठ में पड़ेगी, ऐसा मेरा भी दृढ़ निश्चय इसके अतिरिक्त कोई मुझे स्पर्श न कर सकेगा ॥४॥ चंद्रहास हरु मम परितापा रघुपति विरह अनल संतापा ॥५॥ शीतल निशि तर असिवर धारा कह सीता हरु मम दुख भारा ॥६॥ सीताजी चन्द्रहास तवार से कह रही हैं कि हे चन्द्रहास ! तू श्रीरामचन्दजी के विरहरूपी अग्नि से उत्पन्न हुए मेरे इस दुःखको हर ले ॥५॥ क्योंकि तेरी धार शीतल रात्रि रूप है जिस प्रकार शीतल रात्रि अग्निको नाश कर देती है इसी प्रकार तूं मुझे मार कर मेरे वियोगरूपी दुःखं को शांत कर दे॥ ६ ॥ सुनतं वचन पुनि मारन धावा मयतनया कहि नीति वुझावा ||GN: कहेसि सकल निशिचरिन्ह बुलाई छ सीतहिं बहु विधि त्रासहु जाई ॥८॥ मास दिवस मह कहा न माना तो मैं मारव कठिन कृपाना ॥९॥ रावण सीताजी के ऐसे वचन सुन मारने के लिये दौड़ा परन्तु मंदोदरीने नीति- युक्त वचन कह कर समझाया कि स्त्री का वध करना उचित नहीं ॥७॥ तब गवण वहाँ की सब निशाचारियों को बुला कर इस प्रकार कहने लगा कि सीता को बहुत कारसे भय दिखाम्रो ॥ ८ ॥ और फिर कहा कि यदि यह एक महीने में मेरा कहना नहीं मानेगी तो मैं इसे कठोर तलवारसे मारडालूंगा। दोहा-गयउ भवन दशकंध तब, इहाँ निशाचरि वृन्द । सीतहि त्रास दिखावहीं, धरहि रूप बहु मंद ॥ १० ॥ ऐसा कह कर रावण तो घर को चला गया और यहाँ राक्षसिया नाना प्रकार के भयंकर रूप धारण करके सीता को डर दिखाने लगीं ॥ १० ॥ त्रिजटा नाम राक्षसी । एका राम चरण रति निपुण विवेका ॥१॥ सबहिं बुलाय सुनायलि सपना सीतहि सेइ करौं हित अपना ॥२॥ जब कि राक्षसियों को इस प्रकार भय दिखा रही थीं उसी समय एक त्रिजटा नाम की राक्षसी जो बड़ी चतुर और ज्ञानी थी जिसे रामचन्द्रजी के चरणों में प्रीति भी थी सोते से उठ कर आई॥१॥ और सबको बुला कर अपना सपना सुनाया और कहने लगी कि यदि अपना भला चाहो तो सीताजी की सेवा करो ॥२॥ Na5050902 ATANANARAANANTA . - Me सपने बानर en eurenesearerssereyeriyenager सुन्दरकांड सटोक [८०७] लंका जारी यातुधान सेना सब मारी ॥३॥ खर श्रारूढ़ नगन दश शीशा मुडित शिरखंडित भुज वीशा ॥४॥ त्रिजटा कहने लगी कि सपने में मैंने देखा कि एक बार आया है जिसने लंका को जला दिया और जितनी निशाघरों की सेना उसे मारने गई उस सब सेना को । उसने मार डाला ॥३॥ और रावण नंगे गरीर गधे पर सवार था जिसके दसो शिर मुंहे और घीसौ भुजायें फटी हुई थीं ॥ ४ ॥ यहि विधि सो दक्षिण दिशि जाई - लंका मनहुँ विभीषण पाई. ॥५|| नगर फिरी. रघुवीर दोहाई छ तव प्रभु सीतहि वोलि पठाई ॥६॥ और इसी प्रकार रावण तो दक्षिण दिशा को चला गया और लंका का राज्य मानो विभीषण को मिल गया ॥ ५॥ और नगर भर में श्रीरामचन्द्रजी की दुहाई फिर गयी अर्थात् रामचन्द्रजी का अधिकार हो गया तब उन्होंने सीताको बुला भेजा ॥६॥ यह सपना मैं कहीं विचारी होइहि सत्य गये दिन चारी 136 तासु वचन सुनते सव डरी छ जनक सुता के चरणन परी ॥८॥ त्रिजटा कहती है कि यह सपना मैं वियर कर कहती हूँ कि चार दिन के बाद सब हो जायगा ॥ ७ ॥ उस निजटा के वचन सुन सब राक्ष सियाँ डर गई और सोताजी के चरणों पर गिरी और विनय करने लगीं ॥ ४ ॥ दोहा-जह तह गई सकल मिलि, सीता के मन शोच । मास दिवश बीते मोहि, मारिहि निशिचर प्रोच ॥ ११ ॥ सब राक्षसियाँ मिल कर इधर उधर चली गई परन्तु सीताजी के मनमें बड़ी चिन्ता उत्पन्न हुई कि एक महीने के बाद यह नीच राक्षस मुझे मार डालेगा 10 त्रिजटा सन बोली कर जोरी मातु विपति संगिनि ते मोरी ॥१॥ तजौं देह करु बेगि उपाई दुसह विरह अब नहिं सहिजाई॥२॥ सीताजी त्रिजटासे हाथ जोड़कर कहने लगी कि हे माता ! विपतिमें मेरा साथ देनेवाली तुम्हीं हो। इससे हे माता! कोई ऐसाधपाय शीघ्र करो जिससे मैं अपना शरीर छोड़ इं, क्योंकि अब मुझसे यह विरहका कठिन दुःख सहा नहीं जाता ॥२॥ प्रानि काठ रचि चिता बनाई ® मातु अनल तुम देहु लगाई ॥३॥ सत्य करहु मम प्रीति सयानी सुनइ को श्रवण शूल सम पानीmen हे माता! तुम लकड़ी लाकर चिता बना दो और फिर मुझे जलाने के लिये उसमें आग लगा दो॥३॥ और मेरे ऊपर जो श्रापकी प्रीति है उसे सत्य करके दिखा दो क्योंकि अब यह कानोंसे शूलके समान बचन कौन सुने ॥ ४॥ nararararanaRNARARARIRAR .

- mveersereerer herewosc0665. १८०८] * तुलसीकृत रामायण 15 सुनत वचन पद गहि समुझाचा प्रभु प्रताप बल सुयश सुनावा ॥५|| निशि न अनल मिलु राजकुमारी अस कहि सोनिजभवन सिधारीदा त्रिजटाने सीताके ऐसे वचनोंको सुनकर उनके भरण पकड़कर उन्हें समझाया और श्रीरामचन्द्रजी बल प्रताप और सुयश कह सुनाया ||५|| और कहने लगी कि हे राजकुमारी रातमें अग्नि नहीं मिल सकी, ऐसा कहकर अपने वर चली गई ॥६॥ कह सीता विधि भा प्रतिकूला मिले न पाकक मिट न शूला not देखियत प्रगट गगन अंगारा अवनि न श्रावत एको तारा CH त्रिजटाके चले जानेपर सीताजी अलो वैठो हुई विचारकर रही हैं कि देवही मेरे प्रतिकूल होगया, न तो अग्नि ही मिलती है न मेरा दुख ही दूर होता है । प्रकाशम बड़े बड़े अंगारे (तार) दिखाई दे रहे हैं परन्तु पृथ्वी पर एकभी नहीं गिरता १८ पावक मय शशि सूक्त न भागी छ सानहुँ मोहिं जानि हतभागी ॥९॥ सुनहु विनय मम विटप अशोका से सत्य नाम करहरु मम शोका ॥१०॥ पन्द्रमा विरहानलको उत्तेजित करता है अतएव सीताजी चन्द्रमाको देख कर कहती हैं कि चन्द्रमा भी अग्निसे भरा हुआ दिखाई देता है परन्तु मुझे भाग्यहीन जानकर यह भी भाग नहीं बरसrar ॥९॥ हे अशोक वृक्ष ! मेरी विनयको सुनो और अपने नामको सत्य करो तथा मेरे शोको दर झn १० ॥ नूतन किसलय अनल समाना छ देहु अगिनि मम करहु निदाना ॥१९॥ देखि परम विरहाकुल सीतासाक्षण कविहि कल्प सम पीतामा २६ हे अशोक वृक्ष ! तुम्हारे नवीन पत्ते अनिके समान लाई हैं लो तुम मुझे अग्नि देकर मेरा अन्त करो अर्थात मुझे भस्म करदो ॥ ११॥ सीताजी को अत्यन्त घिरह से व्याकुल देख कर वह क्षण हनूमान्नो को करा के समान दौता ॥ १२ ॥ सोसा--कपि करि हृदय विदार, दीन्ह मुद्रिका डारित । जनु अशोक अङ्गार, दीन्ह हर्षि उठि कर गह्यो ॥१२॥ तब श्री हनुमानजी ने विचार कर वह मुदिया (जो श्रीरामचादजी ने चलने समय दी थी) डाल दो सीताजी को क्या लालूम हुआ कि मेरी बिनय सुन प्रशोक ने कृपा कर अंगार दिया है सो प्रसर हो कर उसे उठा लिया ॥१२॥ तव देखी मुद्रिका मनोहर ७ राम नाम अंकित अति सुन्दर ॥१॥ चकित चितै मुंदरी पहिचानो छ हर्ष विपाद हृदय अकुलानी ॥२॥ ता सीताजी ने उस मनोहर सुद्रिका को देखा जिस पर मुन्दर राम नाम खुदा हुआ था ॥ १ ॥ सीताजी चकित हो र उस सुन्दरी को देखने लगी और उसे पहचान RASAAARARARARRÁARARA MION tantan HTTER -- - FeriesentsBAS ERESSE ५१ सुन्दरकांड सटीक [८०९] कर हर्ष और दुःख से घबरा गई ॥ २ ॥ जीति को सकै अजय रघुराई माया ते अस रची न जाई ॥३॥ सीता मन विचार कर नाना मधुर बचन बोले हनुमाना ॥७॥ सीता जी मुद्रिका को देख विचार करतो हैं कि या तो कोई ( रामचन्द्रजी को) जीत कर मुद्रिका लाया होगा या माया से बनाई गई होगी परन्तु ! यह दोनों बात असंभव है क्योंकि रामचन्द्रजी अजय है अर्थात् उन्हें कोई जोत नहीं सकता और मायासे ऐसीमुद्रिका बन नहीं सकती॥३॥ इपी प्रकार सोताजी नाना प्रकारके विचार कर रही थीं कि उसी समय श्री हनुमान जो मधुर पवन घोले ॥ ४ ॥ रामचन्द्र गुण वर्णन लागे छ सुनतहिं सोता कर दुख भागे ॥५॥ लागी सुनै श्रवण मन लाई आदिहिं ते सब कथा सुनाई ॥६॥ और श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंको वर्णन करने लगे जिसे सुन सीताके सब दुख दूर हो गये ॥५॥ और वह मन और कान लगा कर सुनने लगी, हनुमान्जी ने शुरू से सब कथा कह सुनाई ॥६॥ श्रवणामृत ज्यहि कथा सुनाई - काहे न प्रगट होत सो आई ॥७॥ तब हनुमन्त निकट चलि गयऊ फिरि बैठी मन विस्मय भयऊ in तब सीताजी कहने लगी कि जिसने मेरे कानों को यह अमृत रूपी कथा सुनाई वह सन्मुख क्यों नहीं आता ॥ ७ ॥ तब हनुमान्नी सीताजी के निकट गये, जिन्हें देख सीताजी ने मुँह फेर लिया कारण कि उन्हें संदेह उत्सन्न हुआ कि यह बन्दर रूप धारी रावण अथवा कोई राक्षस तो नहीं है॥८॥ राम दूत मैं मातु जानकी 8 सत्य शपथ करुणा निधान की ॥६॥ यह मुद्रिका मातु में पानी छ दीन्ह राम तुम कह सहिदानी ॥१०॥ नर, वानरहिं संग कहु कैले कही कथा संगति भइ ॥११॥ तब हनुमानजी ने सीताजी से कहा कि हे माता ! श्रीरामचन्द्रजी की कसम खा कर कहता हूँ कि मैं उनका दूत हूँ॥९॥ और यह अंगूठी मैं ही लाया हूँ, श्रीराम- चन्द्रजी ने पहचान के लिये यह आपको चिन्ह स्वरूप दी है और यही मेरे दूत होने का सच्चा प्रमाण है ॥ १०॥ तब सीताजी ने कहा कि मनुष्य और बन्दर का साथ कैसे हुआ, वह सब कथा हनुमानजी ने कह कर समझाई ॥११॥ दोहा-कपि के बचन सप्रेम सुनि, उपजा मन विश्वास । जाना मन क्रम बचन यह, कृपासिंधु कर दास ॥ १३ ॥ हनुमान्जी के ऐसे प्रेम भरे बचनों को सुन कर सीताजी के हृदय में विश्वास yenananananasARARARARAAD i umrutNDI Her seisuresoreses seresses des assoon 2 [८१०]. * तुलसीकृत रामायण गया और उन्होंने जान लिया कि यह मन वचन और बागी से (अर्थात् सच्चा) रामचन्द्रजी का सेवक है ॥ १३ ॥ हरिजन जानि प्रीति अति बाढ़ो छ सजल नयन पुलकावलि ठाढ़ी ॥१५ वूड़त विरह जलधि हनुमाना ® भयउ तात मो कह जलयाना ॥२॥ हनुमानजी को हरिभक जान कर सोताजी के मन में बढ़ी, प्रीति बढ़ी, नेत्रों में जल भर पाया और शरीर के रोये खड़े हो गये ॥ १ ॥ सीताजी कहने लगी है तात! मैं वियोगरूरी समुद्र में गोते खा रही थी, मेरे बचाने के लिये तुम नाव रूप होकर आ गये ॥३॥ अब कहु कुशल जाउं बलिहारी अनुजसहित सुख भवन खरारी ॥३॥ कोमलचित कृपालु रघुराई छ कपि केहि हेतु धरी निठुराई ॥४॥ हे हनुमान ! अब उनकी कुशल बताओ, मैं तुम्हारी बलैया लेती हूँ कहो क्या लक्ष्मणजी के सहित रामचन्द्रजी कुशल और सुखपूर्वक तो है ॥ १॥ श्रीरामचन्द्रजी तो बड़े हो कोमल वित्त और दयालु थे, फिर हे तात! यह निकुरता किस कारण धारण की- ४॥ सहज बानि सेवक सुखदायक कवहुँक सुरति करत रघुनायक ॥५॥ कबहुँ नयन मम शोतल ताता हुइहैं निरखि श्याम मृदु गाता ॥६॥ श्रीरामचन्द्र जी की तो यह स्वाभाविक आदत है कि वे सेवक को सुख दिया। करते हैं, क्या वे कभी मेरो याद करते हैं ॥ ५॥ हे तात! क्या कमी उस कोमल श्यामले शरीरको देख कर मेरे नेत्र शीतल होंगे ॥६॥ पचन न आव नयन भरि वारी अहो नाथ मोहि निपट विसारी॥७॥ देखि विरह व्याकुल अति सोता बोले कपि मृदु वचन विनीता ॥८॥ 'सोताजी प्रेममें विह्वल हो गई', नेत्रों में जल, भर आया और बोलना बन्द हो गया, फिर धीरज धर कहने लगी हे नाथ ! आपने मुझे बिलकुल भुला दिया ॥७॥ इस प्रकार सीताजोको बिरह में अत्यन्त व्याकुल देख कर हनुमानजी विनयसे भरे हुए मीठे वचन बोले ॥ ८॥ मातु कुशल प्रभु अनुज समेता .तव दुख दुखी सो कृपानिकेता ॥९॥ जननो ज़नि मानहु जिय ऊना छ तुमते प्रेम राम कह दूना ॥१०॥ हे माता ! श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणसहित कुशलपूर्वक है परन्तु वे केवल भापके वियोगसे अवश्य दुखी हैं ॥ ९॥ हे माता! आप अपने हृदयको छोटा मत करो (दुख न करो ) आपसे उनके हृदयमें इना प्रेम है ॥ १०॥ . tanaaantmanaRananay 2506060655006 SEFERENCERTENCER RSRPM *सुन्दरकांड सटीक [१९] . दोहा-रघुपति के संदेश अव, सुनु जननी धरि धीर । अस कहि कपि गद्गद भयउ, भरे विलोचन नीन ॥१४॥ हनुमान् नी कहने लगे हे माता! श्रीरामचन्द्रजी का संदेश धैर्यपूर्वक सुनिये ऐसा कहकर हनुमानजी गद्गद कंठ होगये और प्रांखोंमें प्रेमा भर पये ॥१४॥ राम वियोग कहा सुनु सीता मो कह सकल भयो विपरीता ॥१॥ नूतन किसलय मनहुँ कशानू छ काल निशा सम निशिशशि भानू॥२॥ 3. फिर धीरज घर हनुमानजी कहने लगे कि हे माता! प्रभुने कहा है कि तुम्हारे वियोगमें मुझे सब वस्तुयें विपरीत हो गई ॥१॥ अर्थात् नये पत्ते अग्निके समान, रात्री कालरात्रि के समान और चन्द्रमा सूर्य के समान दुखदाई हो गया ॥२॥ कुवलय विपिन कुन्त वन सरिसा ७ वारिद तप्त तेल जनु बरिसा ॥३॥ जेहि तह रही करत सोइ पीरा डाग, श्वास सम त्रिविध समीगा और कमल का पन मुझे भागोको बनो समान छेदता है, बादलों का जल गर्म तेलके समान' यरसता हुआ ज्ञात होता है ॥ ३ ॥ जिस वृक्ष के नीचे रहता हूँ वहीं दुखाई प्रतीत होता है और शीतलं, मन्द, सुगन्ध घायु साँप की फुफकार के समान विषभरी प्रतीत होतो है ॥४॥ !! कहे ते कछु दुख घटि नहि होई छ काहि कहाँ यह जान न कोई ॥५॥ ॥ तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा जानत प्रिया एक मन मोरा ॥६॥ कहनेसे कुछ दुख कम नहीं होगा प्रतएव किससे कहूँ यह कोई जान वहीं • सकता ॥ मेरे और तुम्हारे प्रेम का त केवल एक मेरा ही मन जानता है Ji सो मन रहत सदा तोहिं पाहीं जानु प्रीति रस इतनेहि माहीं ॥१॥ प्रभु संदेश सुनत वैदेही छ मग्न प्रेम तनु सुधि नहिं तेही ॥८॥ सों वह मेरा मन सदा तुम्हारे पास रहता है, सम प्रीति रस'इतने ही में जान लेना ॥७॥ ऐसा श्रीरामचन्द्रजी का संदेश सुन सीताजी ऐसी प्रेममें मग्न हुई कि उन्हें अपने शरीर कुछ भी ध्यान न रहा ॥८॥ कह कपि दृश्य धीर धरु माता सुमिरि राम सेवक सुखदाता ॥६॥ । उर भानहु रघुपति प्रभुताई सुनि मम वचन तजहु विज्ञलाई ॥१०॥ उस समय हनुमानजी कहने लगे कि हे माता ! सेवकों को सुख देनेवाले श्रीराम चन्द्रजीका स्मरण करके हृदय में धीरज धरो ॥९॥ और उनकी प्रभुता को हृदय में रस है, मेरे वचनों को सुन व्याकुलता छोड़ दो ॥१०॥ । दोहा-निशिचर निकर पतंग सम, रघुपति बाण कृशानु। allianRamananasaRangtanAMAR na -- 트 SARRRRRAAARRanaSRARSE SEDA [१] * तुलसीकृत रामायण aam जननि हृदय निज धीर धरु, जरे निशाचर जानु ॥१५॥ निशाचरोंका समूह पतंगके समान है और उनके जलानेके लिये रामचन्द्रजीके पाण अग्निरूप है, इसलिये हे माता! इन निशाचरों को भस्म हुश्रा समझ कर हुदपमें धीरज धरो॥१५॥ जो रघुवीर होत सुधि पाई 8 करते नहिं विलम्ब रघुराई ॥१॥ रास बाण रवि उदय जानकी तम वरूथ कह यातुधान की ॥२॥ हे माता! यदि श्रीरामचन्द्रजीको प्रारकी खबर मिल गई होती तो वह कदापि देर न करते ॥ १॥ श्रीरामचन्द्र जीके बाण उदय हुए सूर्यके समान हैं जिनके आगे राक्षसोंकी अंधकार रूपी सेना कहाँ ठहर सकती है अर्थात् नाश हो जायगी ॥२॥ अवहिं मातु मैं जाऊँ लिवाई ७ प्रभु आयसु नहिं गम दुहाई ॥३॥ कछुक दिवस जननी धरु धीरा पिन सहित ऐहैं रघुवीरा ॥४॥ निशिचर मारि तुम्हें लै जैहैं तिहुँ पुर नारदादि यश गैहें ॥५॥ हनुमानजी कहते हैं कि हे माता ! मैं तुम्हें अभी लिवा लेच्यूँ परन्तु श्रीराम- चन्द्रजी की शपथ बाकर कहता हूं कि उनकी ऐसी आज्ञा, नहीं है ॥ ३॥ इसलिये हे माता ! कुछ दिन और धैर्य रखो, कपियोंके सहित श्रीरामचन्द्रजी प्रावगे || और निशाचरोंको मार कर तुम्हें ले जायेंगे तब उनका यश नारद श्रादि मुनि लोग तीनों लोकों में वर्णन करेंगे॥ ५ ॥ सुत कपि सव तुमहिं समाना * यातुधान भट अति बलवाना || मोरे हृदय परम संदेहा *सुनिकपि प्रकट कीन्ह निजदेहा॥७॥ सीताजी हनुमानजीसे कहती हैं कि हे पुत्र सब बंदर तुम्हारेही समान छोटे होंगे धौर राक्षस लोग बड़े ही बलवान हैं। इस कारण मेरे मनमें बड़ी भारी शंका हो रही है ऐसा वचन सुन हनुमानजी ने अपना यथार्थ स्वरूप जानकीजी के सालले प्रकट किया !! ७॥ 'फनक अधराकार शरीरा* समर भयंकर अति रणधीरा RAR सीता मन भरोस तव भयऊ * अति लघुरूप पवनसुत लयऊ । वह हनुमान्जीका स्वरूप सुवर्णके पर्वतके समान युद्ध के लिये बड़ाही डरावना । और धैर्ययुक्त था | उस स्वरूपको देख कर सीताजीके मनमें भरोसा हुआ, फिर, हनुमान्जीने वही अपना अत्यन्त छोटा रूप धारण कर लिया ॥ ९ ॥ दोहा-सुनु माता शाखामृगहि, नहिं वल बुद्धि विशाल । प्रभु प्रताप ते गरुड़ ही, खाइ परम लघु व्याल ॥१६॥... Samastismatamamal हैं fYSHMASE vie ser user user user useres seases सुन्दरकांड सटीक [८१०] फिर हनुमानजी कहने लगे है माता! बंदरोंको कोई बड़ी विशाल बुद्धिं या बल नहीं होता परन्तु जिस प्रकार प्रमुके प्रतापसे छोटासा सापभी गरुड़को खा सकता है उसी प्रकार उनके प्रतापसे हमभी राक्षसोंको मार सकते हैं यह भावार्थ हुआ। मन संतोष सुनत कपि वानी - भक्ति प्रताप तेज घल सानी ॥१॥ अाशिष दीन्ह राम प्रिय जाना , होहु तात बल बुद्धि निधाना ॥२॥ ऐसे हनुमान्जीके भक्ति, प्रताप, म और बलसे भरे हुए वचनों को सुनकर सीताजीके मनमें संतोप हुआ और हनुमान जी को रामचन्द्रका प्यारा जानकर यह आशीर्वाद दिया कि हे तात ! तुम बल और बुद्धि के निधान होश्रो ॥ २ ॥ अजर अमर गुणनिधि सुत होहू 8 करहिं सदा रघुनायक छोहू ॥३॥ करहिं कृपा प्रभु अस सुनि काना निर्भर प्रेम मगन हनुमाना Mein तुम्हें बुढ़ापा न श्रावे और अमर और गुण के निधान होमो और श्रीरामचन्दजी सदा कृग करें ॥१॥ श्रीरामचन्दजी कृपा करें ऐसे माताके वचन सुन हनुमान्जी प्रेम में अत्यन्त मग्न हो गये ॥४॥ बारवार नायउ पद शीशा बोलेउ वचन जोरि कर कीशा ॥५॥ अब कृत्यकृत्य भयउ मैं माता ® आशिष तव अमोघ विख्याता ॥६॥ और हनुमान जी बार बार सीताजी के चरणों को शीश नवा हाथ जोड़ कर बोले ॥५॥ कि हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया, क्योंकि आपका आशीर्वाद अटल है। कभी निष्फल नहीं होता यह पात प्रसिद्ध है॥६॥ सुनिय मातु मोहिं अतिशय भूखा छ लागि देखि सुन्दर फल रूखा ॥७॥ सुनु सुत करहिं विपिन रखवारी , परम सुभट रजनीचर भारी ॥८॥ तिन कर भय माता मोहिं नाहीं , जो तुम सुख मानहु मन माहीं ॥९॥ हे माता ! वृक्षों में सुन्दर फल लगे देखकर मुझे बड़ी भूख लगी है ॥५॥ तब सीताजी ने कहा कि हे पुत्र ! इस फुरुवारी की रक्षा बड़े राक्षस योधा करते है 1140 तब हनुमान जी ने कहा कि यदि भाप अपने चित्त में प्रसन्नता लावे तो मुझे बन राक्षसों का कुछ भी डर नहीं है ॥ ९ ॥ दोहा-देखि बुद्धि वल निपुण कपि, कहे जानेको जाहु । रघुपति चरण हृदय धरि, तात मधुर फल खाहु ॥१७॥ सीताजी ने हनुमान्नी को बुद्धि और बल में निपुण देखकर कहा कि हे पुत्र! जाओ और श्रीरघुनाथजी के चरणों को हृदय में रख मीठे फल खाम्रो ॥१७॥ चलेउ नाइ शिर पैठे. बागा फल खाये तरु तोरन लागा॥४ - Mayawadastasadaanamrat ASPS testeras ARRARARARAAN [१४] . * तुलसीकृत रामायण manel रहे तहाँ वहु भट रखवारे । कछु मारे कछु जाइ पुकारे ॥२॥ हनुमान्जी जानकोजीके चरणों को शीश नवा कर बाग में घुसे और फलों को खाकर वृक्षों को तोड़ने लगे ॥१॥ यहां बहुत बड़े यौधा रक्षा के लिये रहते थे, उनमें से कुछ तो हनुमान्जीने मार डाले कुछ रावण के यहां जाकर कहने लगे ॥२॥ नाथ एक आवा काप भारी त्यहि अशोकवाटिका उजारो ॥३॥ सायसि फल अरु विटप उपारे रक्षक मदि मदि महि डारे ॥४॥ रखवारे जाकर रावण से कहने लगे कि हे नाय! एक बड़ा भारी बन्दर आया है और उसने सारी अशोकवाटिका उजाड़ दी॥३॥ उसने फल खाये.और पेड़ों को। सखाड़ ाला और रखवारों को मसल मसल कर धरती पर डाल दिया ॥en , सुनि रावण पठये भट नानातिनहिं देखि गर्जा हनुमाना ॥५॥ सद रजनीचर कपि संहारे गये पुकारत कछु अध मारे ॥६॥ यह सुन कर रावण ने बड़े २ योधा भेजे जिन्हें देखकर हनुमानजी गर्जे ॥४॥ और उसी समय युद्ध में बहुत से राक्षसों को मार डाला जो कुछ अधमरे प्रांत घायल बच गये वे जाकर रावण के यहाँ फिर पुकारे ॥६॥ पुनि पठवा तेहिं अक्षयकुमारा चला संग लै सुभद अपारा ॥७॥ प्राक्त देखि विटप गहि तर्जा छ ताहि निपाति महाधुनि गर्जा ॥८॥ शिर रावण ने अक्षयकुमार को भेना, वह अपने साय में बड़े २ योधाओं की पपार सेना लेकर चला |॥ ७ ॥ उसको आते देखकर हनुमान्जी. वृक्ष उखाड़ कर इस पर प्रहार किया और उसे मार कर बढ़े जोर से गर्जे ॥८॥ दोहा-कछु मारेसि कंछु मर्देसि, कछुक मिलायसि धूरि। कछु पुनि जाइ पुकारेऊ, प्रभु. मर्कट वल भूरि॥ १८॥ और उन योधात्रों से कुछ तो हनुमानजीने मार डाले, कुछ मीज डाले कुछ धूलमें मिला दिये कुछ भागकर फिर रावण से कहने लगे कि हे नाथ बन्दर बड़ा बलवान है सुनि सुत-वध लंकेश रिशाना पठवा मेघनाद बलवाना ॥१॥ मारेसि जनि सुत बांधेसि ताही छ देखहुँ कोश कहाँ कर ाही ॥ २ ॥ अक्षयकुमारके मारे जानेका हाल सुन गवण बड़ा क्रोधित हुआ और उसने बल. वान मेघनादको भेजा ॥१॥ और उससे यह कह दिया कि हे पुत्र ! उस वानरको मार न ढालना, घाँध कर लाना जिससे मैं यह देख कि वह कहाँ का बन्दर है ॥२॥ चला इंद्रजित अतलित योधा बंधु वधन सुनि उपजा क्रोधा ॥३॥ श्रावा- कटकटाइ गर्जा अरुः धावा ॥४॥ Ramaia कपि देखा दारुण भट, .

da-SM CGSORSRISEASE SOSMS *सुन्दरकांड सटीक [१५] पड़ा बलवान योधा मेवनाद चला परन्तु भाई अक्षयकुमार का मारा जाना सुन र उसके हृदय में पड़ा क्रोध उत्पन्न हा ॥३॥ हनुमान्जीने देखा कि यह कोई बड़ा । ही बलवान योधा आया है इससे बड़े जोरसे गरजे और दौड़े ॥ ४ ॥ अति विशाल तरु एक उपारा विरथ कीन्ह लंकेश कुमारा ॥६॥ रहे महामट ताके संगा गहिर कपि मर्देसि निज अंगा।६) और एक पड़ा भारी वृक्षा उखाड़ कर मेवत्रादके ऊपर प्रहार कर उसका रथ तोड़ से रथसे होन कर दिया ॥५॥ और जो उसके साथ बढ़े२ वीर योधा थे उन्हें अपने शौरसे मल २ कर माल दिये ॥६॥ तिनहिं निपाति ताहि सन बाजा समिरे युगल मानहुँ गजराजा ७॥ मुष्टिक मारि चढ़ा तरु जाई ताहि एक क्षण मूर्छा आई ॥८॥ उन योद्धाओंको मार कर हनुमानजी मेघनादसे लड़ने के लिये जा भिड़े, उस समय ऐसा ज्ञात होता था कि दो गजराज परस्पर युद्ध कर रहे हैं ॥७॥ मेघनादको एक मुष्टिक (घसा) मार कर हनुमान्जी पेड़ पर जा चढ़े और मेघनादकों क्षण भरके लिये मूळ भागई ॥८॥ उठि वहोरि कीन्हेसि बहु माया जीति न जाइ प्रभंजन जाया ॥६॥ पिर मेघनाद चैतन्य होकर उठा श्रीर बहुत प्रकारको माया करने लगा परन्तु फिर भी पवनपुत्र हनुमानजीको जीत न मका ॥९॥ दोहा -ब्रह्म अस्त्र तेहि साधेऊ, कपि मन कीन्ह विचार। "जो न ब्रह्म शर मानऊँ, महिमा मिटै अपार ॥६॥ जब मेवनादने हनुमानजीके वांधनेके लिय प्रशास्त्र लिया तो हनुमानजी मनमें विचार करने लगे कि यदि मैं इस ब्रह्म अस्त्रको भी निष्फल करता हूँ तो इसकी भनोखी महिमा जो संसारमें फैल रही है नष्ट हो जायगी ॥ १९ ॥ ब्रह्म याण तेहिं कपि कह मारा * परतिहुँ चार कटक संहारा॥१॥ तेहिं जाना कपि मूच्छित भयऊ * नागपाश बाँधेसि लै गयऊ ॥ २ ॥ मेघनाद ने हनुमानजी के अपर ब्रह्म अस्त्र चलाया जिससे हनुमान्नी गिर गये और गिरते समय भी बहुत सी सेना का नाश किया ॥१॥ जब उसने जाना कि । हनुमान्जी मूर्छित हो गये तो वह उन्हें नागफांस में बांध कर ले गया ॥ २ ॥ जासु नाम जपि सुनहु भवानी * भवबंधन काहिं नर ज्ञानी ॥३॥ तासु दूत वन्धन तर श्रावा प्रभु कारज लगि आपु बंधावा ॥४॥ धीशिवजी कहते हैं कि हे पार्वती ! सुनो जिसका नाम जप कर ज्ञानी मनुष्य । टा ASE ma BraRaranarde SoupOSOVA BOSPROSESLEDUGUses * तुलसीकृत रामायण संसार के बंधन से छूट जाते हैं ॥३॥ उन्हीं प्रभु का दूत बंध गया ( परन्तु यह कोई शंका की बात नहीं है ) क्योंकि उन्हीं स्वामी के कार्य के लिये हनुमान्जी ने अपने को बंधा लिया ॥४॥ कपि बंधन सुनि निशिचर धाये कौतुक लागि सभा लै भाये ॥५॥ दशमुख सभा दीख कपि जाई ७ कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ॥६॥ हनुमानजी बंध गये इस समाचार को सुन कर राक्षस लोग दौड़े और तमाशा करने के हेतु उसे रावण की सभा में ले गये ॥ ५॥ हनुमानजीने रावण की सभा को जाकर देखा, एस की श्रेष्ठता का वर्णन कुछ किया नहीं जाता ॥ ६ ॥ कर जोरे सुर दिशिप विनीता भृकुटि विलोकहिंसालसभीता॥७॥ देखि प्रताप न कपि मन शंका ७ जिमिअहिगण महंगरुड़ अशंका ॥८॥ दिग्पाल हाथ जोड़े हुए नम भावले खड़े हैं और डरते हुए सब रावणको भृकुटी की ओर देख रहे हैं ॥७॥ ऐसे बड़े विभवको भी देख कर हनुपान्जीके हृदयमें तनिक । भी शंका न हुई जैसे सपों के मध्यमें गाड़ निःशंक होकर चला जाता है।।८।। दोहा-कपिहिं विलोकि दशानन, · विहंसा कहि दुर्वाद । सुत बध सुरति कीन्ह पुनि, उपजा हृदय विषाद ॥ २० ॥ हनुमान जीको देख कर रावण कुछ दुर्वचन कह कर हंसा परन्तु अक्षयकुमार का सरण याद करके उसके हृदयमें बड़ा दु:ख उत्पन्न हुभा ॥ २० ॥ कह लंकेश कवन तें कीशा केहि केवल घालेसिवन खीशा ॥१॥ सीधौं श्रवण सुनेसि नहिं मोही । देखेउँ अति प्रशंक शठ तोहीं ॥२॥ रावण हनुमान् नीसे कहता है कि तू कौन बन्दर है और किसके बलसे तूने मेरी बाटिका का नाश किया है ॥४॥श्या तू ने मेरा नाम कमी कानों नहीं सुना मूर्ख ! बन्दर तू मुझे बढ़ा निडर दिखाई देता है ॥ २ ॥ मारेसि निशिवर केहि अपराधा छ कहु शठतोहिनप्राण की बाधा ॥३॥ रावण ब्रह्मांड-निकाया पाइ जासुबल विरचित माया Ran और तू ने किस अपराधके कारण मेरे राक्षसोंको मार डाला है ? हे मूर्ख ! क्या तुझे अपने प्राणोंका तनिक भी मय नहीं है ॥३॥ तब हनुमानजी कहने लगे कि हे रावण! सुन, जिस परब्रह्मकेबलसे माया अनेको ब्रह्मांड-समूहोंको रचना कर डालती है जाके वल विरंचि हरि ईशा छ पालत हरत सृजत दशशीशा ॥५॥ जा बल शीश · घरे सहसानन अंड कोश समेत गिरि कानन ॥॥ मौर जिसके बलसे ब्रह्मा विष्णु और महादेव तीनों देवता संसारको रचते, पालन । Anaaaaamananamaanindia.in data ! AR aramaiaaaaaaana ANASI EUR USD Genuiserner Steuer *सुन्दरकांड सटीक [८१७] करते और नाश करते है।५॥ और जिसके बलसे शेष नागजी जंगलों और पर्वतों सहित इस पृथ्वीको धारण किये हैं ॥ ६ ॥ धरे जो निविध देह सुर त्राता 8 तुमसे शठ न सिखावन दाता ॥७॥ हर कोदण्ड कठिन जेहि भंजा तोहिं समेत नृप-दल मद-मांजा ॥८॥ खरदूषण त्रिशिरा अरु पाली वधे सकल अतुलित बलशाली ॥९॥ और जो ईश्वर देवताओं की रक्षा के लिये और तुम्हारे ऐसे दुष्टोंको शिक्षा (दंड) देने के लिये नाना प्रकारके रूप धारण करता है ॥७॥ और जिसने महादेवजी के कठोर धनुपको तोड़ा और तुम्हारे समेत सब राजाओं के घमण्डको नाश कर दिया, अथवा इस शिव धनुपकी कि जिसने तुम्हारे समेत सब राजाओंके गर्वको नाश कर दिया था तोड़ डाला ॥ ८॥ और जिसने खर-दूपण विराध-प्रालि आदि बड़े बड़े बलवान् योधाओं का वध कर डाला ॥ ९ ॥ दोहा-जाके बल लवलेश ते, जितेउ चराचर झारि। तासु दूत हो जाहि की, हरि आनेहु प्रिय नारि ॥२१॥ और जिसके लवलेश मात्र बलके अंश से तू ने संसारके सब घर अचर प्राणियों को जीत लिया है, और जिनकी प्यारी स्त्री (सीता) को तू चुरा लाया है हे रावण मैं उन्हीं का इत हूँ ॥२१॥ जानौं मैं तुम्हारि प्रभुनाई ७ सहसबाहु सन परी लराई ॥१॥ समर बालि सन करि यश पाव सुनिकपि वचन विहसि बहलावा॥२॥ हनुमानजीने कहा हाँ तुपारी प्रमुना तो मैं उसी समयसे जानता हूँ जबसे तुम सहसाबाहुसे लड़े थे ॥ ॥ और मालिके साथ युद्ध करके तो तुम्हें बड़ा ही यश प्राप्त हुआ। ऐसे हनुमानके वचन सुन कर रावणने हंस कर टाल दिया ॥२॥ खायउँ फल मोहि लागी भूखा कपि स्वभाव ते तोरेउँ रूखा ॥३॥ सबके देह परम प्रिय स्वामी मारहि मोहिं कुमारग-गामी ॥४॥ हनुमानजी कहते है हे रावण! मुझे भूख लगी थी इस कारण मैंने फळ खाये और वानरी भाइतके अनुसार वृक्षों को भी तोड़ा ॥ ३ ॥ हे दैत्यराज ! अपना शरीर तो सवको प्यारा होता है अतएव मैंनेभी फल खाकर अपने शरीरका पालन किया, तिस पर कुमागी राक्षस मुझे मारने लगे ॥ ४ ॥ जिन्ह मोहिं मारा सिन्ह में मारा तेहि पर बांधे तनय तुम्हारा ॥५॥ मोहिं न कछु बांधे कर लाजा कीन्ह चहाँनिज प्रभुकर काजा ॥६॥ जिन राक्षसोंने मुझे मारा उन्हींको मैंने भी मारा, इस पर भी तुम्हारा लड़का ॥ TROrdedyasatarashatarnatanasa vast Everduifpupugeuseisseuses [८१०] * तुलसीकृत रामायण ( मेघनाद । मुझे बांध लिया ॥५॥ सुझको अपने बाँधे जानेकी कुछ राज्जा नहीं है, मैं अपने स्वामीका कार्य करना चाहता हूँ॥ ६ ॥ विनती करौं जोरि कर रावन सुनहु मान तजि मोरसिखावन १७॥ देखहु तुम निज कुलहिं विचारी भ्रम तजिभजहु भक्त भय हारी | हे रावण ! मैं दोनों हाथ जोड़ कर तुमसे विनती करता हूँ धमिमानको छोड़ कर मेरी इस शिक्षा को सुनो ॥ ७ ॥ और तुम अपने कुटुम्ब की ओर विचार करके देखो कि पुलस्त्य मुनि और विश्वनवा ऋषि तुम्हारे पिता और दादा कैसे भक्त पुरुष हैं इसलिये तुमभी अपने इस भूळे भम को छोड़ कर भक्तोंके दुख दूर करनेवाले भगवान का मजन करो ॥८॥ जाके डर अति काल डराई , जो 'सुर असुर चराचर खाई ॥३॥ तासो बैर कबहुँ नहिं कीजै छ मोरे. कहे जानकी दीजै ॥१०॥ और हे रावण ! वह काल देवता जो संसारके सम पर अचर देव दानव आदि को खा जाता है सो भी जिसके डरसे डराता है ॥ ९ ॥ उस परमात्मासे कभी शत्रता नहीं करनी चाहिये और तुम मेरे कहनेले जानकीजीको लौटा दो ॥१०॥ दोहा- -प्रणत पाल रघुवंशमणि, करुणासिंधु खरारि । गये शरण प्रभु राखिहैं, सब अपराध विसारि ॥ २२ ॥ : हे रावण ! खर के नाश करने वाले रघुवंशियों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी प्राणकी, पालना करने वाले और दया के समुद्र हैं, अगर तुम उनकी शरण में जानोगे तो वे.तुम्हारे सब अपराधों को भूल कर तुमको अपनी शरण में ले रक्षा करेंगे ॥२२॥ रामचरण पंकज उर धरहू लंका अचल राज्य तुम करहू ॥१॥ ऋषि पुलस्त्य यश विमल मयंका छ तेहि कुल मह जनि होसिकलंका ॥२॥ हे रावण! तुम रामचन्द्रजी के कमलरूपी चरणों को हृदय में धारण करो और लंका में अटल राज्य किये जात्रो ॥ पुलस्त्य ऋषि का यश उज्वल चंद्रमारूप संसार में विदित है, उसमें हे रावण! तुम कलंक रूप होकर उसे न बिगाड़ो ॥२॥ राम नाम विनु गिरा न सोहा * देखु विचारि त्यागि मद मोहा ॥३॥ सव भूषण भूषित वर नारी बसन हीन नहिं सोह सुरारी ॥ हे रावण! तू अहंकार और प्रज्ञान को छोड़ कर अपने हृदय में विचार कर देख कि बिना राम नाम के वाणी भी शोभित नहीं होती ॥ ३ ॥ जैसे कोई परम सुन्दर स्त्री नाना प्रकार के प्राभूषणों से सुसज्जित हो परन्तु बिना वस्त्रके वह शोमा को प्राप्त नहीं होती ॥८॥ irrinSAEbvARAananana dari FObe Hase . ॥ executus egesenge*** * सुन्दरकांड सटीक [८१६) राम विमुख सम्पति प्रभुताई ७ गई रही पाई विनु पाई ॥५॥ सजल मूल जिन सरितन नाहीं ७ वरपि गये पनि तवहिं सुखाहीं ॥६॥ और रामचन्द्रसे विमुख होकर यह ऐश्वर्य और सम्पत्ति पाई हुई भी जाती रहेगी अथवा न पाने के समान है ॥ ५॥ जिस प्रकार से जिन नदियों में सोता नहीं है उनका जल वर्षा हो जाने के पश्चात सूख जाता है ॥ ६ ॥ सुनु दशकंठ कहाँ प्रण रोपी राम विमुख त्राता नहिं कोपी ॥७॥ शंकर सहस विष्णु अज तोही सकहिं न राखि राम कर द्रोही nen हनुमानजी कहते हैं कि हे रावण ! मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामचन्द्रसे विमुख पुरुष की रक्षा करनेवाला कोई नहीं है ॥ ७ ॥ हजारों शंकर-विष्णु और मसाजी भी तुझसे रामचन्द्रके बेरी की रक्षा न करेंगे॥॥ दोहा-मोह मूल बहु शूलप्रद, त्यागहु तुम अभिमान । भजहु राम रघुनायकहिं, कृपासिंधु भगवान ॥ २३ ॥ हे रावण! जो अभिमान मोह की जड़ और बहुत से दुःखों का देने वाला उसे तुम त्याग दो, कृपासिंधु रघुकुलनायक श्रीरामचन्द्रजी का भजन करो ॥२३॥ यद्यपि कह कपि अति हित वानी छ भक्ति-विवेक-धर्म-नय-सानी ॥२॥ चोला विहसि अधम अभिमानी मिला हमहिं कपि गुरु वड़शानी ॥२॥ यद्यपि हनुमानजी बड़ी भलाई की बात कह रहे हैं जो भक्ति, ज्ञान और धर्म से भरी हुई है ॥ १॥ परन्तु ऐसी सुन्दर वाणी को सुनकर भी अभिमानी रावण हँसकर कहने लगा कि यह बन्दर तो मुझे बड़ाही ज्ञानी गुरु मिला ॥२॥ मृत्यु निकट आई खल खल तोही लागेसि अधम सिखावन मोहीं ॥३॥ उल्टा होइ कहा हनुमाना मतिभ्रम तोरि प्रगट मैं जाना ॥४॥ हे दुष्ट यन्दर! तेरी मौत निकट आगई है इसी लिये तो तू मुझे उपदेश देने लगा ॥ ३ ॥ इसे सुन हनुमानजी ने कहा कि इसका उलटा होगा अर्थात तेरी मौत निकट पाई है। तुझे मतिभ्रम हो गया है ऐसा मझे ज्ञात होता है ॥ ४ ॥ सुनि कपि वचन बहुत रिसियाना ® वेगि न हरहु मूढ़ कर पाना ॥५॥ सुनत: निशाचर मारन धाये इसचिवन सहित विभीषण पाये ॥ ऐसे हनुमान्जीके वचन सुन रावण बहुत शर्मा गया और क्रोधमें आकर निशा- घरोंसे कहने लगा कि इस मूर्ख बन्दरका प्राण शीघ्र ले लो (इसे मार डालो) यह सुन कर निशाचर लोग मारनेके लिये दौड़े, इसी समय मंत्रियों के साथ विभीषण प्रांगये। नाइ शीश करि विनय बहूता नीति विरोध न मारिय दूता॥७॥ aasarastrastamasarasaadimana SERRES fosse certificarse [८२० तुलसीकृत रामायण भान दंड कछु करिय गुसाई सही कहा मंत्र भल भाई ॥८॥ बड़े पादर के साथ शीश नवा कर और बहुत विनय कर विभीषण ने रावणसे । कहा कि हे महाराज ! यह दूत है इसे मारना उचित नहीं, क्योंकि यह बात नीतिके विरुद्ध है ॥णा इस कारण इसे मौतके अतिरिक कोई और दण्ड दीजिये,सब राक्षसों ने कहा यह सलाह ठीक है। ॥ सुनत विहसि बोला दशकंधर अंग भंग करि पठवहु वन्दर ॥९॥ विभीषण का यह वचन सुन रावण हंस कर कहने लगा कि अच्छा इस बन्दर को किसी भासे हीन करके जाने दो ॥ ९ ॥ दोहा-कपि कर ममता पुंछ पर, सवहि कहा समुझाइ । तेल बोरि पट बांधि पुनि, पावक देहु लगाइ ॥२४॥ और फिर रावण सब निशाचरों से समझा कर यों कहने लगा कि बन्दर की प्रीति पूंछ पर अधिक रहती है सो उनीको तेल में डुवा कर कपड़ा बांध दो और फिर आग लगा दो ॥४॥ पूंछहीन चंदर जव जाइदिछ तव शठ निजनाथहिलै पाइहाण जिनकी कीन्हेसि अमित बड़ाई देखौं धौं तिनकी प्रभुनाई ॥२॥ जब यह बन्दर पूंछहोन (वाडा) होकर जायगा तब यह अपने स्वामीको ले मा. 5 वेगा और जिनकी इसने अधिक बड़ाई की है मैं उसकी प्रभुताई देखना चाहता हूँ। वचन सुनत कपि मन मुसुकाना छ भइ सहाय शारद मैं जाना ॥३॥ यातुधान सुनि रावण वचना लागे रचन मूढ़ सोइ रचना neu रावणके उपर कहे हुए वचन सुन कर हनुमान्जी मनमें प्रसन्न हुए और कहने लगे कि ज्ञात होता है सरस्वतीजीने सहायता की ॥३॥ रावणके ऐसे वचन सुन मूर्ख निशावर लोग वही रचना करने लगे अर्थात् पूछ जलानेका सामान करने लगे n४॥ रहा न नगर वसन घृत तेला बाढ़ी पूंछ कीन्ह कपि खेला ॥५॥ कौतुक क कह प्राये पुरवासी मारहिं चरण करहिं बहु हाँसी ॥६॥ उस समय लंका में बसन ( वस्त्र ) दी, तेल नहीं रहा और हनुमान जीने यह खेल किया कि अपनी इतनो पूंछ लन्धो बढ़ा दी जिसमें पेटते २ घी,तेल और कपड़े सब खतम होपये ॥५॥ नगरके लोग तमाशा देखने आये, हनुमान्जीको लात मारते हैं । और नाना प्रकारको हंसी करते हैं ॥६॥ वाजहिं ढोल देहिं सव तारी नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी On ढोल बज रहे हैं, लोग तालियां पीट रहे हैं इस प्रकार हनुमान्जीको सारीलंका १ PRAKRastianitaarata . reserevere Ramang अथ क्षेपक ENUBH0GBOSS serisposueretso *सुन्दरकांड सटीक [८२१] में घुमा फिरा कर फिर पूछमें भाग लगा दी॥ ७ ॥ पावक जरत देखि हनुमंता छ भयउ परम लघु रूप तुरंता ॥८॥ नियुकि चढ़ेउ पुनि कनक अटारी भई सभीत निशाचर नारी ॥६॥ "पूछमें आग लगी हुई देखकर तुरन्त हनुमान्जीने छोटा रूप धारण कर लिया ॥4॥ और फिर कूदकर सोनेकी अटारियों पर चढ़ गये जिसे देख निशाचरोंकी स्त्रियाँ मारे रके कांपने लगीं ॥ ९॥ दोहा-हरि प्रेरित तेहि अवसर, वहे पवन उन्चास । अट्टहास करि गर्जेऊ, कपि वढिलाग अकास ॥ २५॥ भगवान की प्रेरणासे उस समय अघासों पवन चलने लगे ऐसी सहायता देख हनुमान्जी खिलखिला कर हंसे और बड़े जोर से गर्जे और शरीरको इतना बढ़ाया कि वह भामाशले जा लगा ॥ २५ ॥ चढ्यो फलागि धाम राम लामको उठायज मनों प्रकाश ते नदी कृशानुकी बहायज कि लंक लीलनेको काल जाहसी पसार हू किधौ अनी महान शूर सैफसी निकारहू किधौं सुरेश चापकी कलाप दामिनी महैं विलोकि यातुधान ते परात मे जहै तहैं फिराय लाय लाय ऐन मैनसे लगे बरे गयन्द छोरि वाजि छोरि ऊँट छोरिये खरै अनेक वाल बालकी सुतात मात बोलहीं बचाय नीजिये हमैं समय समान डोलहीं अनेक नारि मारिरिम डिम कादि लावहीं अनेक डारि डारि वस्तु वारि लेन धावहीं । अनेक कंत वीर वीर ते पुकारि यों कहैं के उठाय लेहु लाल माल जाल दे परो तहैं बिलोकि देव यों कहैं कपीश यज्ञसी उनी सुरारि सौंजलंक कुण्ठ हाँस्वाहसीभनी गिरे कंगूर दूर ते तबै कहै मंदोदरी विहाय लोकलाज कानि भागतीन क्योंभरी अरे अकंप नातिकाय कंटकी सहोदरं लेवाह लेउ अर्द्ध गाति पूत नाति सोदरं अनेक यार मैं कही बुझायहू विभीषणं 8 नमामि दाढ़ि जार ने कुठार वंश तीक्षणं । बधू जो कुम्भकर्णको पलारिपाणि भाषिये दुहाइ रामचन्द्र केरि मोर कंत राखिये इ. अनेक धाय धाय जाय रामणौ सुनाया विद्यारि वीर मेघनाद से बली पाहू अनेक अस्त्रशस्त्र लाय पाय मारने लगे घुमाय दीन बालधी पुकारि कर से भगे सुमंत्र जाय यों कही बड़ोबलाय कीश है निशंक बंकहू वड़ो सुनो न ऐस दीश है विशालज्वालजानिकोपि मेघवोलियोंकही छ बुताइ देहु ागि रे बहाइ जंतुको सही भले पुनाय मेघ प्राय पाय पुज छाँदे यथा सनेह पाय चौगुनो कृशानु बाढ़े। लगी जु अंग अंग बाण प्राण है भगे सबै निहारिरीति माल्यवान स्थान बोलियोत नाहियाहिअग्नि!आहिईशकीजुवामता , समीर स्वांस सीयको जु रामरोप मामता rashORastmasnastasmaaResmarriatnagar 4 maanden Seruise heterogeneo [८२२] * तुलसीकृत रामायण विडौल ब्रह्म विष्णु रुद्र श्रादिदेवजौन है दरात मोहिं सर्व वंग ईश और कौन है बुलाय कालते को लंगूर लाउ मारिकै बटोरि भूत प्रेत यक्ष दण्ड चण्ड धारिक विलोकि बात ज्ञात घात कोन सैन तासुको ठाय गालमें धखो परसो खंभार जासुको समेत शंभु मास रामदास पास श्रायज सभीत पंकजासनादि बीनती सुनायज दोहा-देहु छोड़ि यमराज कह, यह विनती यक मोरि। परवश पायो लरन सुनि, दीन्ह गाल ते छोरि॥ इति क्षेपक देह विशाल परम हरुवाई मंदिर ते मंदिर चढ़ि जाई ॥१॥ जरा नगर, भये लोग विहाला लपट झपट बहु कोटि कराला ॥२॥ महावीरजी का शरीर बहुत बड़ा पर हलका था, वे इस मकानसे उस मकान पर दौड़ कर चढ़ जाते थे॥ १ ॥ लंका जल रही थी और उसमें से करोड़ों काल लपटें निकल रही थीं जिससे पुरवासी बहुत व्याकुल हो रहे थे ॥ २ ॥ तात मात सब करहिं पुकारा यहि अवसर को हमहि उवारा ॥३॥ हम जो कहा यह कपि नहिं होई छ वानर रूप धरे सुर कोई ||en सब अपने २ माता पिता श्रादि को पुकार रहे हैं और कहते हैं कि इस समय हमें इस सं से कौन बचावेगा ॥३॥ हमने पहले ही कहा था कि यह बन्दर नहीं है, देवता बन्दाका रूप धारण करके आया है तो वही बात प्रत्यक्ष दिखाई देरही है साधु अवज्ञा कर फल ऐसा, जरइ नगर अनाथ कर जैसा ॥m जारा नगर निमिप इकमाही एक विभीषण कर गृह नाहीं ॥१॥ महात्मानों के अपमान करने का फल ऐसा हो होता है, इस प्रकार नगर जला जैसे विना मालिक का हो॥ ५ ॥ महावीरजी ने एक क्षण मात्र में सारा नगर जला दिया, केवल एक विभीषण का मन्दिर नहीं जलाया ॥ ६ ॥ पावती ताकर दूत अनल जेहिं सिरजा जरा न सो तेहि कारण गिरजा ॥७॥ उलटि पलटि लंकाकपि जारी छ कूदि परा पुनि सिंधु मझारी ॥८ महादेवजी कहते हैं कि हनुमान्जी तो उसी प्रभु के दूत थे जिन्होंने अग्नि को बनाया था (इस कारण हनुमानजी को अग्नि कुछ बापान पहुंचा सकी) हनुमान्नी ने लंका को उलट पलट कर अर्थात् बार बार घूम कर जलाया और फिर समुद्र के अन्दर कूद पड़े दोहा-पूंछ वुझाई खोइ श्रम, धरि लघु रूप बहोरि। जनकसुता के आगे, ठाढ़ भयो कर जोरि ॥२६॥ फिर हनुमानजी पूड घुमा थकांवट दूर कर और छोटा सा रूप बना श्रीजान- फीजीके भागे हाथ जोड़ कर खड़े हुए ॥ २६ ॥ Atenanananananan ARAFARA - Meera twereexsveerecenesHOKES *सुन्दरकांड सटीक [८२३] मातु मोहिं दी। कछु चीन्हा छ जैसे रघुनायक मोहिं दीन्हा ॥१॥ चूड़ामणि उतारि तब दयऊ हर्ष समेत पवनसुत लयऊ ॥२॥ और सोता नीसे कहने लगे हे माता! मुझे कुछ निशानी पहिचानके हेतु दोजिस ! प्रकार श्रीरामचन्द्रजोने (मुनिका ) दी थी॥१॥ तब सीताजीने चूडामणि (शीशफूल) उतार कर देदिया जिसे हनूमान्जीने प्रसन्नता के साथ ले लिया ॥ २ ॥ कहेउ तात अस मोर प्रणामा सब प्रकार प्रभु पूरण-कामा ॥३॥ दीनदयालु विरद संभारी हरहु नाथ मम संकट भारी ॥४॥ हे तात ! प्रभुपे मेरा प्रणाम कह कर ऐसा कहना कि भार तो सब प्रकारसे पूर्ण धाम हैं आपको किसी प्रकार की इच्छा नहीं है ॥ ३॥ परन्तु आप अपने इस (दीनदयालु):प्रण की रक्षा कर मेरे इस भारी संकटको दूर करो ॥ ४ ॥ तात शकस्त कथा सुनायहु वाण प्रताप प्रभुहि समुझायहु ॥५॥ मास दिवस महँ नाथ न पावहिं छतौ पुनिमोहिं जियत नहिं पावहिं॥६॥ हे तात ! इन्द्र के पुत्र जयंत की कथाका स्मरण दिलाना और प्रभुको वाण का प्रताप समझा कर कहना कि आपने तिनके के बाणसे जयंत को परास्त किया था ॥५॥ सो यदि हे नाथ! आप महीने भरमें न पावेंगे तो मुझे जीवित नहीं पावगे। कहु कपि केहि विधि राखौं प्राना तुमहूँ तात कहत अब जाना ॥७॥ तुमहिं देखि शीतल भइ छाती पुनि मोकह सोइदिन सोइराती॥८॥ हे कपि! मैं किस तरहसे अपने प्राण रक्खू, तुमभी तो अब यहांसे जानेके लिये कहते हो ॥७॥ तुम्हें देख कर कुछ मेरी छाती ठंढो हुई थी, अब फिर मेरे लिये दिन और रात दोनों बाबर हैं॥6॥ दोहा-जनक सुतहिं समुझाइ करि, बहु विधि धीरज दीन्ह । चरण कमल शिर नाइ कपि, गमन राम पहं कीन्ह ॥२७॥ हनुमान्जी सीताजीको बहुत प्रकारसे समझा बुझा धीरज दे और उनके चरण कमलोंको शीश नवा श्रीरामचन्द्रजीके पास चल दिये ॥ २७ ॥ चलत महा धुनि गर्जेउ भारी छ गर्भ सुवेउ सुनि निशिचर नारी ॥१॥ लांघि सिंधु यहि पारहिं पावा ® शब्द किलकिला कपिन्ह सुनावा ॥२॥ हनुमान्जीने चलते समय बड़े जोर की गर्जना की जिसे सुन निशाचरों की स्त्रियों के गर्भ गिर गये । और समुद्र लांघ इस पार आ वानरोंको बड़े जोर की भानंद ध्वनि सुनाई॥२॥ राका दिन पहुँचेउः हनुमंता धाय धाय कपि मिले तुरन्ता ॥३॥ NAARANNARRARANARastlastanas Fasnaseka ܛܽ Frisur DISEASES ASSISTEwetens ? [८२४] * तुलसीकृत रामायण inn हर्षे सव विलोकि हनुमाना नूतन जन्म कपिन्ह तव जाना nen. कार्तिकी पूर्णिमाके दिन लंकासे लौट का बाये और उन्हें देख दौड़ कर वंदर । तुरंत मिलने लगे हनुमान जीकोदेख सब बड़े प्रसन्न हुये और अपना नयाजन्म समझा मुख प्रसन्न तनु तेज विराजा * कोन्हेसि रामचन्द्र कर काजा ॥५॥ मिले सकल अति भये सुखारी तलफत मोन पाव जिमि वारी mel हनुमान्जीका मुख प्रसन्न था, शरीर में तेज विराजमान था जिसे देखकर बानर गण समझ गये कि यह श्रीरामचन्द्रजीका कार्य पूर्ण करके आये हैं ॥५॥ इस कारण सब वानर बड़ी प्रसन्नता से सुखी होकर इस प्रकार मिले जैसे तड़फती हुई मछली को पानी मिल जावे ॥६॥ चले हर्षि रघुनायक पासा पूछत कहत नवल इतिहासा ॥७॥ सब वानर प्रसन्नताले नाना प्रकार की कयायें कहते धौर पूछते हुये श्री राम- चन्द्रजीके पास चल दिये ॥ ७॥ तव मधुवन भीतर लव आये अंगद सहित मधुर फल खाये ॥८॥ तब सब वानर मधुवनके भीतर आये और युवराज अंगदके सहित मीठे मीठे फल खाने लगे॥८. रखवारे जय वरजन लागे मुष्टि प्रहार करत सव भागे ॥en मार्ग पञ्चमी अरु भृगु चारा मधुवन के रक्षक संहारा ॥१॥ जब मधुबनके रखवारे उन्हें मना करने लगे तो मारे मुक्कोंके उन भगा दिया ॥९॥ गहन बड़ी पंचमी शुक्रवार के दिन मधुवन राक्षसों को मारा ॥१०॥ दोहा-जाइ पुकारे सकल ते, वन उजार युवराज । सुनि सुग्रीवहिं हर्ष अति, करि आये प्रभु काज ॥२८॥ वह सब रखवारे भाग कर सुप्रीवके पास जा पुकार का कहने लगे कि युवराज अंगदजीने सब फुलवाड़ी उजाड़ दी। जिसे सुन सुग्रीवको बड़ा आनंद हुआ कि ज्ञात होता है यह सब रामचन्द्रजीका कार्य कर आये हैं ॥२८॥ जो न होत सीता सुधि पाई ७ मधुवन केफलसकहिं कि खाई ॥१॥ यहि विधि मन विचार कर राजा आइ गये कपि सहित समाजा ॥२॥ यदि इन लोगोंको सीताजीको खबर न मिली होती तो मधुवन फल कैसे खा सकते थे ॥॥ राजा सुग्रीव इस प्रकार अपने मन में विचार कर ही रहे थे कि सम्पूर्ण वानरोंका समाज वहाँ भागया ॥२॥ आइ सवन नाये पद शीशा मिले सहि अति प्रेम कपीशा शो PoanaanamaAhananaanent 5 13542 SMS Stowych ५२ * सुन्दरकांड सटीक.. [८२५ पूछी कुशल कुशल पद देखी ७ राम कृपा मा काज विशेखी ॥४॥ सब बानरोंने आकर सुग्रीवके चरणों में शीश नवाया और सुग्रीव भी मम्पूर्ण पानरोंसे बड़े प्रेमके साथ मिले ॥ ३ ॥ सुग्रीवने पूछा कि कहो सब कुशल तो है ! वानरोंने उत्तर दिया महाराज! आपके चरणोंके देखनेसे सब कुशल है, श्रीरामजीकी कपासे कार्य उत्तम रीतिसे पूर्ण हुमा ॥ ४ ॥ नाथ काज कीन्हेउ हनुमाना राखे सकल कपिन्ह कर पाना ॥५॥ सुनि सुग्रीव बहुरि उठि मिलेऊ कपिन्हसहितरघुपतिपहचलेऊ ॥६॥ हे नाथ! हनुमान्जीने कार्य पूरा किया और सम्पूर्ण बानरोंकी प्राण रक्षा की nा ऐसा वन सुन पानरराज सुग्रीव फिर उठ कर हनुमानजीसे मिले और सम्पूर्ण बन्दरों सहित श्रीरामचन्द्रजीके पाल चले ॥ ६ ॥ राम कपिन कह श्रावत देखा किये काज मन हर्ष विशेखा ॥७ फटिक शिला बैठे दोउ भाई परे सकल कपि चरणन जाई ॥८ श्रीरामचन्द्रजोने वानरों को प्राते हुए देखा जो कि कार्य पूर्ण किये हुए बड़े प्रसन्न वित ये॥८॥ दोनों माई स्फटिक मणिको चट्टान पर बैठे हुए थे, वहीं संपूर्ण बानरगण आकर धरणों पर गिरे ॥ ८॥ दोहा-षष्ठी दिन कपिपतिहिं मिलि, मुदित कहा सव हाल । सप्तमि दिन भाये सकल, जहं रघुनाथ कृपाल ॥ छठके दिन सुप्रीवसे मिलकर प्रसन्नतापूर्वक सब हाल कह सप्तमी के दिन सब बानर श्रीरामचन्द्रजीके पास आये । दोहा-प्रीति सहित भेटे सकल, रघुपति करुणापुख। पूंछेउ कुशल नाथ अय, कुशल देखि पद का ॥ दयासागर श्रीरामचन्द्रजी सम्पूर्ण वानरोंसे प्रीति पूर्वक मिले और सबसे इशल पूछी जिसे सुन सब वानरोंने कहा हे नाथ ! आपके कमल रूपी घरसों के देखने से सब प्रकार भागन्द है ॥२९॥ जामवंत कह सुनु रघुराया 8 जापर लाथ करहु तुम दाया 10 ताहि सदा शुभ कुशल निरन्तर ® सुर नर मुनि प्रसन्न तेहि ऊपर तब जामवन्त कहने लगे हे रघुनाथजी सुनो! हे नाव ! जिसके अपर आप कृपा करते हो ॥ उसका सदैव भला होता है और सदा कुशल बनी रहती है, सुर नर मुनि सब उस पर प्रसन्न रहते हैं.॥२॥ सो विजयी बिनयी. गुण सागर तासु सुयश तिहुँ लोक उजागर ॥३॥ SRAgraas AsestrAABAAE servisorse servesterse Sensores ८२६] * तुलसीकृतरामायण प्रभु की कृपा भयउ सब काजू जन्म हमार सफल भा भाजू ॥४॥ मौर वही संसार में विजय प्राप्त कर सकता है, ममतारूपी भूपण और गुणों का सागर हो सकता है और उसी का उजाल यश तीनों लोक में प्रसिद हो सकता है ॥ ३॥ हे नाय! भापकी कृपा से सब काम पूर्ण होगया और हमारा जन्म भी आज ही सफल हुआ ॥ ४॥ नाथ पवनसुत कीन्ह जो करणी छ सो मुख लाखहु जाइ न वरणी ५' पवन तनय के चरित सुहाये छ जामवन्त रघुपतिहिं सुनाये ६॥ हे नाथ ! हनुमान्जोने जो कार्य किया है वह लाखों मुख होने पर भी वर्णन नहीं किया जासकता ॥ ४॥ ऐसा कह जामवन्त ने हनुमानजी के मनोहर परित्र श्रीरा. पन्द्रजी को सुनाये ॥६॥ सुनत कृपानिधि मन अति भाये ७. पुनि हनुमान हरपि हिय लाये H1 कहहु तात केहि भांति जानकी रहत करत रक्षा स्व-प्रान की || जामवन्तकै वचन श्रीरामचन्द्रनीको बहुत प्यारे लगे और उन्होंने हनुमानजीको प्रसन्नतापूर्व हृदयसे. लगा लिया ॥ ७ ॥ फिर हनुमानजीसे पूछने लगे कि वाव! जानकी किस प्रकार अपने प्राणों की रक्षा करती है॥८॥ दोहा-नाम पाहरू दिवस निशि, ध्यान तुम्हार कपाट। लोचन निज पद यंत्रिका, प्राण जाहि केहि बाट ॥३०॥ तब हनुमानजी कहते हैं कि रात दिन आपका नाम रूपी द्वाररक्षक पहरा देता है, और आपके ध्यानरूपी किवाड़ बन्द रहते है । नेत्रों में श्रापके चरणोंका ध्यानरूपी. दाला सदा बन्द रहता है, इस कारण यदि प्राण निकलें तो किस राहसे होकर जायें अर्थात उनके लिये कोई मार्ग नहीं है ॥३०॥ चलती वार को मोहि टेरी सुरति कराय शक-सुत केरी १५ चलत मोहिं चूड़ामणि दीन्हीं - रघुपति हृदय लाय तेहि लीन्हीं ॥२॥ और चलते समय मुझे बुलाकर कहा कि प्रभुको इन्दके पुत्र जयंतके पराजित होनेका स्मरस दिलाना ॥ ॥ फिर मुझे यह चूड़ामणि मी चिन्ह स्वरूप दिया है, से श्रीरामचन्द्रजीने लेफर हृदयसे लगा लिया ॥२॥ नाथ युगल लोचन भरि वारी छ वचन कहो कछु जनककुमारी ॥३॥ अनुज समेत गहेहु प्रभु चरणा दीन बन्धु प्रपतारति हरणा Rea हे नाप ! दोनों नेत्रोंमें भासू भर सीताजीने कुछ पीन बचन कहे थे ॥३॥ सो .पह कि लक्ष्मणजीके समेत प्रमुळे चरण मेरी ओरसे पकड़ कर विनय करना कि भाप 13952 manat ASEAFARNARASTAR t GS SE Sear सुन्दरकांड-सटीक [0 तो दुखियों के दुःख दूर करने वाले, प्रण की रक्षा करने वाले हैं, फिर मेस दु:ख स्यों नहीं दूर करते ॥ ४॥ मन क्रम वचन चरण अनुरागी केहि अपराध नाथ मोहित्यागी अवगुण एक मोर में माना बिछुरत प्राण न कीन्ह पयाना BET और यहभी कहना कि मैं तो मन, वचन और कर्मसे आपहीके चरणोंकी प्रीति रखने वाली दासी हूँ सो आपने किस अपराधके कारण मुझे त्याग दिया। परन्तु हो ! मुझमें एक भारी अवगुण विद्यमान है और उसे मै स्वीकार भी करती है कि आपके बिछुरतेहो मेरे प्राण शरीरसे क्यों न निकल गये ॥६॥ नाथ सो नयनन कर अपराधा निसरत प्राण फरहि हठ बाधा विरह अनल तन तूल समीरा स्वांस जरे क्षण माहि शरीरा सो हे नाथ ! यह अपराध केवल नेत्रोंका है, क्योंकि जब प्राण निकलने सामने है तो यह हठ करके इसे रोक देते है क्योंकि नेत्रों में अभी आपके दर्शनोंकी माता- लगी हुई है ॥७॥ और आपका वियोग अग्निरूप मेरा शरीर रुईरूप स्वांस वायु रूप विद्यमान है जो कि क्षण भरमें शरीरको जला दे !! नयन सवै जल निज हित लागी जरै न पाव देह विरहागी। सीता की अति विपति विशाला बिनहिं कहे भल दीन झ्याला tel परन्तु नेत्र अपने हितके कारण अल बरसा देते हैं जिसके कारण विरहरूपी अग्नि शांत होजाती है और शरीर जलनेसे पच जाता है ॥९॥ सो हे वीनों पर दया करनेवाले प्रभु, सीताको उस विपत्ति का न कहना ही अच्छा है ॥ १० ॥ दोहा-निमिष निमष करुणायतन, जाहि कल्प शत बीति । वेगि चलिय प्रभु श्रानिये, भुजबल खलदल जीति ॥३१॥ हे दयानिधान ! सोताजी को एक एक क्षण सैफड़ों कापके समान म्मतीत होता है, सो हे प्रभो! आप जल्दी चल कर अपनी भुजाओंके बलसे जन दुष्टोंके एक का नाय करके सीताजी को ले आइये ॥३॥ सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना भरि श्राय जल राजिवू नयना वचन काय मन मम गति जाही सपनेहु विपति किचाहियताही॥२॥ ऐसा सीताजीका दुख सुनकर सुखके मंदिर श्रीरामचन्द्रजीके करलरूपी नेत्रों में आँसू आगये ॥१॥ कारण कि भक्तको दुखी देख प्रभु दुखी होजाते हैं सो जिनका प्रेम मन, वाणी और कर्म से श्रीरघुनाथजी के चरणों में लगा है उन्हें स्वप्न में भी दुख न होना चाहिये ॥२॥ ParanARNARARKARNAMARAAN THITENINGree [८२८] * तुलसीकृत रामायण कह हनुमान विपति प्रभु सोई जव तव सुमिरन भजन न होई ॥३॥ कितक घात प्रभु यातुधानकी रिपुहिं जीति पानिये जानकी ॥४॥ हनुमानजी कहते है कि हे नाथ ! विपत्ति तभी तक है जब तक आपका सुमिरण भजन म हो अथवा विपित्ति उसी मनुप्यको हो सकती है जिससे आपका सुमिरन मजन नहीं किया जा सकता ॥३॥ और राक्षसों के लिये क्या चिन्ता है, शत्रुको जीत कर सीताको ऐ आये ॥ सुंनु कपि तोहिं समान उपकारी नहिं कोउसुर नर मुनि तनुधारी॥m प्रति-उपकार करौं का तोरा छ सन्मुख होइ न सकत मन मोरा ॥ - रघुनाथजी कहते है कि हनुमान ! सुनो तुम्हारे समान मेराउपकार करनेवाला कोई देवता, मुनि, मनुष्य अपवा देहधारियों में नहीं है ।५ ॥ मैं नुमको इसका क्या पाका ई! तुम्हारे इस उपकार के कारण मेरा मन तुम्हारे सामने नहीं हो सकता। सुतु कपि तोहिं उनण मैं नाहीं देखेउँ करि विचार मन माहीं nsn पुनि २ कपिहिं चितव सुरवाता लोचन नीर पुलकि अति गाता ten है हनुमान ! सुनो मैं तुम्हारे इस उपकार के ऋण से उऋण नहीं हो सकता, मैंने अपने मनः विचार कर देख लिया है ॥ ॥ ऐसा कह बारमार रघुनाथजी हनुमानजीकी ओर देखने लगे और उनका शरीर पुलकित होगया,नेत्रोंमें प्रासू आगये और शरीर की सुधि न रहो ॥ ८॥ दोहा-सुनि.प्रभु बचन विलोकि मुख, हृदय हर्ष हनुमन्त । प्रेमाकुल,त्राहित्राहिभगवन्त ॥ ३२॥ ऐसे भगवान के पचन सुन और उनका मुख देख कर हनुमानजी अपने मन में बहुत प्रसन्न हुये और यह कहते हुए चरणों पर गिर पड़े कि हे भगवन् ! मैं आपकी शरण है! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो ॥ ३२ ॥ बार बार प्रभु चहत उठावा प्रेम मगन तेहि उठव न भावा ॥१॥ प्रल पद पंकज कपिकर शीशा सुमिरि सो दशा मगन गौरीशा ॥२॥ पारम्बार भीरघुनाथपी हनुमानजी को ठाना चाहते हैं परन्तु हनुमानजी प्रेम में ऐसे मग्न है, उन्हें घठना अच्छा नहीं लगता ||१॥ भगवान के कमलरूपी धरणों पर हनुमानजी का शीश या सो उस दशा को स्मरण कर भगवान शंकर भी कया करते २ प्रेम में मग्न हो गये ॥२॥. सावधान मन करि पुनि शंकर लागे कहन कथा अति सुन्दर ॥३॥ कपि उठाय प्रभु हृदय लगावा कर गहि परम निकट बैठावा ॥ HASHAaraeema ne सुन्दरकांड सटीक [८२९]. फिर महादेवजी अपने मन को सावधान कर इस अति सुन्दर कया को पार्वती. जी से इस प्रकार वर्णन करने लगे ॥ ३ ॥ कि हनुमानजी को उठाकर रामचन्द्रजी ने छाती से लगाया और हाथ पकड़ बहुत ही पास बिठा लिया ॥ ४॥ कटु कपि रावण पालित लङ्का छ केहि विधि दहेज दुर्ग अति पक्षा ५ प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना बोले वचन विगत अभिमाना रघुनाथजी पूछने लगे कि हे पीर हनुमान ! यह तो यतामो कि रावण से रक्षित इस लंका के दृढ़ किले को तुमने किस प्रकार जलाया ॥ ५ ॥ श्रीरामचन्द्रजी को प्रसन्न जानकर हनुमानजी अभिमानरहित पचन घोले ॥६॥ शाखा मृग की बडि मनुसाई शाखा ते शाखा पर जाई ॥७॥ लांघि सिन्धु हाटक पुर जारा निशिवरगण वधिविपिन उजारा RN सो सव तव प्रताप रघुराई छ नाथ न कछुक मोरि प्रभुताई REL कि हे नाय!बन्दर को फेवल इतना ही बल होता है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर कूद सके॥ ७॥ और मैंने जो समुद्र लांघ कर सुवर्ण को पनी हुई लंका को जलाया और निशारों को नार कर फुलवाड़ी मजाड़ दो ॥ ८ ॥ सो के स्वामी राम- चन्द्रजी या कुछ मेरी प्रभुता नहीं थी, यह सवतो मैंने आपके प्रतापसे किया है। दोहा-ता कह प्रभु कछु अगम नहि, जा पर तुम अनुकूल । प्रताप बड़वानलहि, जारि सबै खल तूल ॥ ३३ ॥ हे नाथ! जिसके अपर आप प्रसन्न हो अथवा पाप की दया हो उसके लिये यह कार्य कुछ कठिन नहीं, क्योंकि आपके प्रताप से.हई मी अग्नि को भस्म कर सकती है ॥३३॥ सुनत बचन प्रभु बहु सुख माना , मन क्रम बचन दास निज जाना॥ मांगु पवनसुत वर अनुकूला छ देउँ श्राजु तुम कह सुख मूला ॥२॥ ऐसे हनुमानजी के बचन सुन रामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुये और मसा-वाचा- कर्मणा से उन्हें अपना दास जाना ॥ १॥ तब भगवान बोले-हे पवन पुत्र! जो तुम्हारी इच्छा हो वही वर मांगों, आज मैं तुझे सब सुखों का मूल रूप र मी देने को तैयार हूं ॥२॥ नाथ भक्ति तव सब सुखदाइनि छ देहु कृपा करि सो अनपानि ॥३॥ सुनि प्रभु परम सरल कपि वानी एवमस्तु तब कह्यो भवानो ren या सुनहमान कहने लगे कि हे नाथ! आपकी भक्ति जो सद, पुलों को देने वाली है और जो कठिनता से प्राप्त होती है उसे दीजिये ॥ ३ ॥ महादेवजी कहते तव aadaradimanataravsanapark Hviser seuferngesetogoscentes ta.] * तुलसीकृत रामायण हैकि हे पार्वती । ऐसी सरल पाणी हनुमानजी की सुन :रामचन्द्रमी ने एवमस्तु (ऐसा ही हो ) कह दिया ॥४॥ उमा राम सुभाव जिन जाना , ताहि भजन तजि भाव न आना ५॥ यह संबाद जास्तु उर धावा 8 रघुपति चरण भक्ति तेहिं पावा , महादेवजी कहते हैं कि हे पार्वती ! जिन्होंने रामचन्द्रजी के स्वमा को जाग लिया पन्हें भजन छोड़ कर दूसरी कोई वस्तु अच्छी नहीं लगती ॥ ५ ॥ यह कथा बर्वाद महावीर और रामचन्द्र का संबाद जिसके हृदय में दृढ़ रीति से स्थिर हो पाता है वह रामचन्दजी के चरणों की भक्ति को अवश्य पा जाता है। सुनि प्रभु बचन कहैं कपि वृन्दा जय जय जय कृपालु सुखकंदा ॥७॥ तब रघुपति कपिपतिहिं बुलावा कहा चलै कर कर करहु बनाना ॥८॥ ऐसे श्रीरामचन्दजी के वचन सुन वानरों के समूह कहते है कि हे दयालु ! हे सुयजन्द श्रीरामचन्द्रजी, आपकी जय हो, जय हो ॥ ७॥ तब रघुनायजी ने सुग्रीव को बुलाया और कहा कि अब चलने को तैयारी करो ॥ ८॥. अब बिलंब केहि कारण कीजै छ तुरत कपिन कह आयतु दीजै ॥९॥ कौतुक देखि सुमन बहु वर्षे नभ ते भवन चले सुर हर्षे ॥१०॥ अब देर किस लिये करते हो, शीघ्र ही वानरों को श्राज्ञा दो ॥ ९ ॥ यह कौतुक देव बाकाय से देवता फूल बरसाने लगे, फिर सब देवना प्रसन्न हो होकर अपने २ बर को चल दिये। दोहा-कपिपति वेगि बुलायऊ, प्राये यूथप यूथ । नाना वरण अतुल बल, वानर मालु वरुथ ॥ ३४॥ सुप्रीव ने शीघ्र ही सबको बुलाश! आज्ञा पाते ही सेनापतियों के मुण्ड के मुख मा उपस्थित हुये जिवमें नाना प्रकारके रंग है, अतुलित बल है, ऐसे ही बानर और डों के कुण्ड पाये ॥ ३४ ॥ प्रमु पद पंकज नावहिं शीशा गरजहिं भालु महाबल कीशा ॥१॥ देखी राम सकल कपि सैना चितव कृपा करि राजिव नैना ॥२ और सब घलवान बन्दर और रीछ प्राकर श्रीरामचन्दजी के कमलरूपी रणों को भीष नवाते और गर्जना करते हैं । ॥ श्रीरामचन्द्रजी ने यन्दरों की सारी सेना को अपने कमलरूपी नेत्रों से कृपादृष्टिपूर्वक अवलोकन किया ॥२॥ राम कृपा बल पाइ कपिन्दा ७ भये पक्षयुत मनहुँ गिरिन्दा ॥३॥ 'मार्ग रुष वसुतिथि जब भाई 8 उत्तर फाल्गुनि नखत सोहाई ॥४॥ AastanarasunananAAAAN 04 . WEBSITESTvNCE *सुन्दरकांड सटीक [१] श्रीरामजी की कृपा का बल पाकर बानर ऐसे बली हो गये कि मानों वे पंख सहित बड़े २ पहाड़ हों और रहने की मार्काशा कर रहे हों ॥ ३ ॥ और जब मगहन बदी अष्टमी को सुन्दर उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र का योग था॥१॥ जब अपयोग एक नहिं श्रान शुचि शुभ योग मध्य दिन भानू ॥५॥ हर्षि राम तब कीन्ह पयाना शकुन भये सुन्दर शुभ नाना IN और जिस समय किसी प्रकार का भी कुपोग न था, सुन्दर अच्छे योग में दो पहर के समय ॥ ५॥ श्रीरामचन्द्र जी ने प्रसन्न होकर गमन किया, उस समय बड़े बड़े सुन्दर शुम शकुन हुये ॥६॥ जासु सकल मंगल मय नीती तासु पयान शकुन यह रीती Un प्रभु पयान जाना वैदेही २ फरके वाम अंग शुभ तेही nen जिसके सफल कार्य मंगलमय और नीति से भरे हुए होते हैं उसके गमन के समय शान भी शुभ हुये ॥ ७॥ जो रामचन्द्रजी के गमन के समय ही लंका में श्रीजानकीजी के बायें अंग जो कि मंगळसूचक हैं फरकने लगे, इससे सीताजी ने प्रमु का पयान जान लियाne जो जो शकुन जानकिहि होई ४ अशकुन भयो रावणहि सोई ॥९॥ चला कटक को घरणै पारा गर्जहिं बानर भालु अपारा॥१०॥ नो जो शकुन जानकीजीको हुए उसके विरुद्ध वही अशकुन रापणको हुए पर्याद एसके भी बाम अंग फड़ो, जो मनुष्य के लिये अशुभसूचक है ॥ ९॥ श्रीरामचन्द्रजी की सेना का विस्तार इतना था कि कोई उसका पार नहीं पालकता और उसमें वानर और भाल गर्जना कर रहे थे ॥१०॥ नख आयुध गिरि पादप धारी.चले गगन महं इच्छाचारी AR केहरि, नाद मालु कपि करहीं डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं ॥१२॥ और उन बानर और भालुओं के केवल नखही हथियार हैं, उनमें से कोई वृक्ष कोई पर्वत धारण किये हुए पृथ्वी अथवा प्रकाश में इच्छानुसार जारहे हैं ॥ ॥1 और उन बाना भालुअोंके नादसे दिशाचोंके हापोडगमगाते और चिंधारते है जिससे ऐसा शोर हुमा १२॥ छन्द-विक्करहि दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे। मन हर्ष दिनकर सोम सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे । फटकटहि मर्कट विकट भट बहु कोटि कोटिन धावहीं। जय राम प्रबल प्रताप कौशलनाथ गुण गण गावहीं ॥ ४ ॥ AmadaraswaRREY asASNARSA Borisoseessesesiseseisvuse esan [-३२.] * तुलसीकृत रामायब श्रीरामचन्द्रजी के गमन समय पृथ्वी कांपने लगी, दिग्गज चिंधारने लगे, पहाड़ काप ठे और समुद्र में खलबली मच गई । सूर्य चन्द्रमा मनसे बड़े प्रसन्न हुए और देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब दुखोंसे छूट गये और करोड़ों बलवान बन्दर इधर उधर गर्जना करते हुए दौड़ने लंगे सब है प्रबल प्रतापवाले कौशलमाय श्रीरामचन्द्र जी! आपकी जय हो ऐसा कह कह कर गुणानुवाद गाने लगे॥ ४ ॥ सहि सकन भार अपार अहिपति बार वार विमोहई। गहि दशन पुनि २ कमठ पीठ कठोर सो किमि सोहई ।। रघुवीर रुचिर पयान प्रस्थिति जानि परम सोहावनी। जनु कमठ खप्पर सर्पराज सो लिखत अविचल पावनी ॥५॥ शेषनागजी उस अपार भार को सहन नहीं कर सकते, इस कारण बार बार मोहित हो जाते हैं और इसी कारण कछुएकी कठोर पीठको बार बार अपने दांतोंसे पकड़कर इस प्रकार शोभित होते हैं जैसे रामचन्द्रजीके गमन समयको सुन्दर शोमा- यमान जानकर मनों सर्पराज उस तिथिको अटल करने के लिये कछुएकी पीठ पर दांतों से खोद रहे है ॥५॥ दोहा-यहि विधि जाय कृपानिधि, उतरे सागर तीर। जह तह लागे खान फल, भालु विपुल कपि वीर ॥३५॥ इस प्रकारसे कृपाके ससुन श्रीरामचन्द्रजी जाकर समुदके किनारे उतरे और वळवान बानर और रोछ योधा इधर उधर फल आदि खाने लगे ॥ ३५ ॥ उहाँ निशाचर रहहिं सशंका छ जव ते जारि गयो कपि लंका॥ निज निज गृह सब करें विचारा नहिं निशिचर कुल केर उबारा ॥२॥ और अब वहाँ अर्थात् लंकामें जबसे हनुमान जी उसे जलाकर आये हैं नियावर । लोग हर समय बढ़े भयभीत रहते हैं सब अपने २ घरों में बैठकर यही. विचार किया करते हैं कि प्रव निशाचरवंशके बचनेका कोई उशय नहीं है ॥ जानु दूत वल परणि न जाई 8 तेहि पाये (पुर कवन भलाई ॥३॥ दूतिन सन सुनि पुरजन बानी छ मंदोदरी हृदय अकुलानी ॥ क्योंकि हे माई ! जिसके एक इतका बल वर्णन नहीं किया जाता उसके आने एर नगरकी कौनसी मलाई होगी अर्थात कोई भलाई न होगो क्योंकि वह न जाने कितना बढी होगा ॥३॥ दृतियोंके मुख से नगर निवासियोंके ऐसे भयभीत वचन सुन मन्दोदरी अपने हृदय में बहुत घबराने लगी | रही जोरि कर पति पद लागी बोली बचन नीति रस पागी ५॥ HasranamaanAmal .

सुन्दरकांड सटीक [८३३] कन्त कर्ष हरि सन परिहरहर मोर कहा अतिहित चित घरहा मन्दोदरी पतिके धरण हा हाय जोड़ मोतियुक यमन इस प्रकार कहने लगी। ॥५॥ हे माय ! श्रीरामचन्द्रजी से पैर छोड़ दो और मेरे इन प्रति हितकारी । वानों को पित्तम धारण करो ॥६॥ समुझत जाउ दूत की करनी वह गर्भ रजनीचर घरनी nan तानु नारि निज सचिव युलाई ७ पठवटु फंत जी चहदु भलाई ॥८॥ देश जिनके इतके कार्यको स्मरण करनेसे निशाचरियोंके गर्भ गिर जाते हैं unt पदि अपनी भलाई पाहो तो ससको स्त्रीको अपना मंत्री कुमार इनके पास भेज दो तय कुल कमल विपिन दुम्मदाई ७ सीता शीत निशा सम आई ॥९॥ सुनहु नाथ सोता पिनु दीन्द हितन तुम्हार शंभु अज कीन्हें ॥१०॥ हे गाय! आपके कमरुपी कुलके लिये सीता शीतकालकी राग्निरूप दुखदाई । अपांत जिस प्रकार शकाल की रात्रि कमल का नाश कर देती है इसी प्रकार यह मोता तुम्हारे कमहरूपी कुलका मारा कर देगी ॥ ९ || इस कारण हे नाथ ! सुनो गिना सांता को लौटा दिये महादेव चौर प्रमागी के सहायता करने पर तुम्हारी मलाई नहीं हो सकतो ॥10॥ दोहा-राम धारण अहिगण सरिस. निफर निशाचर भेक जयलगि प्रसतन तरहि लगि, यतन करहु तजि टेक ॥ रामचन्द्र के घाण कराल सपों के समान है भो निशायरों के समूह मेंदको समान है सो जब तक यह सर्परूप पाण इन मेहकरूप निशाचरका संहार नहीं करते मतही तुम अपनाहट छोड़कर इसका उपाय करलो अर्थात श्रीरामचन्द्रजीसे जा मिलो श्रवण सुनत शठ ताकी याणी विहंसाजगत विदित अभिमानी ॥१॥ समय स्वभाष नारि कर सांचा मंगल माहि अमंगल रांचा ॥२॥ ऐसे मन्दोदरीके शुभ वपन कानों से सुन संसारमें प्रसिद अभिमानी रावण ईसा और कहने लगा n समुच स्त्रियों का स्वभाव पाही डरपोक होता है, जिसके कारण.तू इस मंगल समयमें भी अमंगल रच रही है ।। २ ॥ जो श्राचे मर्फट फटकाई जियहिं विचारे निशिचर खाई ॥३॥ कंपहिं लेकर जाके प्रासा तासु नारि समीत वड़ि हासा IA यदि यहां वानरों को सेना भावे तो धारे निणवर असे खाकर अपना पेट पालेंगे अंगवा यदि मानर सेना यहाँ आयेगी तो क्या बंधारी जीवित रहेगी, उसे तो मिगारसा नायगे ॥३॥ और हे प्रिये ! देखो जिसके उसके कारण दिग्पाल भर यर । के SAR PLE] Swan 055555RBHOGSPOperi * तुलसीकृत रामायब कारते हैं उसकी स्त्री डर जाय, यह बढ़ी इसी और लाजा को बात है। अस कहि विहसि ताहि उर लाईवलेउ समा ममता अधिकाई १॥ मंदोदरी हृदय कर चीता भयो कंन पर विधि विपरीता ॥६॥ रावण ऐसा कह कर मन्दोदरीको हृदयसे लगा हंस कर बो अभिमान के साथ समाको चला गया । ५॥ मन्दोदरी हृदय में विचार करने लगी कि अब पति पर विधाता उलटा होगया है। बैठेउ सभा खबरि अस पाईसिंधु पार सेना सब भाई HOR बूझेसि सचिव उचित मत कहहू 8 ते सर हंले मष्ट करि रहहू RC] रावण समामें पाकर बैठा ही था कि उसे यह खबर मिली कि बन्दरोंकी सारी सेना समुद्रके उस पार (किनारे) तक आ गई है. तब मंत्रियोंसे पूछने लगा कि जो योग्य सलाह हो सो कहो, तब सब मंत्रीगण हंसे और कहने लगे कि चुप होरहो जितेउ सुरासुर तव श्रम नाही नर वानर केहि लेखे माहीं ॥९॥ ' · जब अपने देवता और दैत्योंको बरामें कर लिया तो कुछ क्लेश ही नहीं हुआ, अव यह मनुष्य और बन्दा किप गिनती में हैं जो इनके लिये सलाह की जाय ॥९॥ दोहा-सचिव वैद्य गुरु तोनि जो, प्रिय बोलहिं भय प्राश । राज धर्म तन तीनि कर, होइ वेगही नाश ॥ ३७॥ श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि मंत्री, वैद्य, गुरू, यदि ये तीनों भय अथवा किसी लोमके वश होकर मनमावनी ( ठकुर सोहाती ) कहें तो राज्य, शरीर और धर्म इन तीनोंका शीघ्रही नाश हो जाता है ॥३७॥ सोइ रावण कह बनी सहाई अस्तुति कहिं सुनाइ सुनाई ॥१॥ अवर जानि विभीषण आवा भ्राता चरण शोश- तेहि नावा ॥२॥ वही उर सोहानी रावणके यहाँ सहायता कर रही है अर्थात् मन्त्री गण मंत्र पूलने पर सुना सुना कर रावण की स्तुति करते है ॥ ॥ ऐसा समय जानकर वहाँ विभीषण जी आये और रावणके चरणोंको शीश नवा कर प्रणाम किया || पुनि शिर नाइ वैठि निज श्रासन बोला वचन पाइ अनुशासन ॥३॥ जो कृपालु पूउहु मोहिं बाता मति अनुरूप कहाँ मैं ताता.net विमीपण शीश नवा कर अपने श्रासन पर बैठ गया और रावणकी आज्ञा पाकर वचन कहने लगा ॥३॥ कि हे दयालु भ्राता, जो पाप मुझसे पूछते हैं तो हे तात मैं अपनी बुद्धिके अनुकूल कहता हूं ॥ ४ ॥ जो आपन चाहौ. फल्याना ® सुयश नुमति शुभगति सुखनाना ॥५॥ PaseARArordere raat - suur UPEORGEMESsese erredeveRSESeet *सुन्दरकांड सटीक [८३५] तौ पर-नारि लिलार गोसाई तजौ चौथि चन्दा की नाई ॥६ जो आप अपना कल्याण,सुंदर यग,अच्छी मति और अच्छी गति और नाना प्रकार के सुख चाहो तो पराई स्त्रीको भादौंको चौथ के कलंकी चन्द्रमा के समान त्याग दो। चौदह भुश्न एक पति होई 8 भूत द्रोह तिष्टै नहिं सोई ॥७॥ गुण सागर नागर नर जो अल्प लोभ भान कहै न कोऊ । आहे चौदहों भुवनका मालिक हो परन्तु प्राणीमात्रसे वैर करने पर वह ठहर नहीं समता अथवा जो चौदहों भुवन का मालिक है उससे वैर करने पर कोई बच नहीं सस्ता ॥७॥ जो मनुष्य बढ़ाही गुणी और चतुर हो परन्तु यदि वह थोड़ा भी होम करे तो उसे कोई अच्छा नहीं कहता ॥6॥ दोहा-काम क्रोध मद लोभ सब, नाथ नरक कर पंथ । सब परिहरि रघुवीर पद, भजहु कहहिं सद्ग्रन्थ ॥ ३८ ॥ हे नाथ! काम, क्रोध, घमंड, लोभ ये सब नरकके देनेवाले मार्ग है इस कारण इन्हें छोड़ कर श्रीरामचन्द्रजी के चरणोंका भजन करो जैसा कि अच्छे अच्छे मन्थ, वेद, शास्त्र शादिक कह रहे हैं ॥ ३८॥ तात' राम नहिं नर भूपाला भुवनेश्वर कालहु के काला ॥१॥ ब्रह्म अनामय अज भगवन्ता व्यापक अजित अनादि अनन्ता ॥२॥ हे तात! राम सांसारिक मनुष्य अथवा राजा नहीं है, वे तो संसारके मालिक और कालके भी काल हैं । परग्रहा है रोगरहित हैं जन्ममरणसे परे हैं सर्वव्यापक अजित है और उनका श्रादि अंत नहीं है ॥२॥ गो द्विज धेनु देव हितकारी कृपासिन्धु मानुष तनु धारी ॥३॥ जन. रंजन भंजन खल वाता, वेद धर्म रक्षक सुर त्राता MER वे गज, ग्राह्मण, पृथ्वी और देवताओं के हितकारी दयाके समुद्र मनुष्यका रूप धारण किये है ॥३॥वे भक्कोको आनन्द देनेवाले, दुष्टोंके दलका नाश करनेवाले, वेद और धर्मके बचानेवाले और देवताओंकी रक्षा करनेवाले हैं in ताहि बैर तजि नाइय माथा ७ प्रणतारति भंजन रघुनाथा ॥५॥ देहु नाथ प्रभु कह वैदेही भजहु राम विनु काम सनेही ॥६॥ ऐसे 'कृपालु रघुनाथजीको बैर त्याग कर गाथा नवाइये, क्योंकि वे शरणागत की रक्षा करनेवाले है॥ ५॥ सो हे नाथ! उनकी सीता उन्हें लौटा दो और जो राम- चन्द्र विना मतलब ही दूसरों पर दया करनेवाले हैं उनका भजन करो ॥६॥ शरण गये प्रभु काहु न त्यागा , विश्वद्रोह कृत अध जेहि लागा NGN AAARakeaaananastastrasnAnanal RARMANA .

SRCessner [३६] तुलसीकृत रामायण जासु नाम श्यताप नशावन सोइप्रभुप्रगट समुझिजियरावन RA शरण जाने पर श्रीरामचन्द्र ऐसे मनुष्य भी त्याग नहीं करते जिसको सारे संसारसे बैर करने का पाप लगा हो ॥ ७॥ और जिसका नाम दैहिक, दैविक, भौतिक तोनों पापोंका नाश करनेवाला है हे भाई रावण ! वही प्रभु पृथ्वी पर प्रकट है, इसको हृदयमें विचार करके देखो | दोहा-बार बार पद लागऊँ, विनय करौं दशशीश । परिहरि मान मोह मद, भजहु कोशलाधीश ॥३९॥ .! हे भाई रावण! मैं बारम्बार आपके चरणों र शिर रखके विनय करता हूं कि भाप प्रतिष्ठा, मोह और अहंकारको छोड़ कर श्रीरामचन्द्रजीका भजन करो ॥ ३९ ॥ दोहा-मुनि पुलस्त्य निज शिष्य सन, कहि पठई यह वात । तुरत सा में तुम सन कही, पाइ सुअवसर तात ॥ ४० ॥ पुलस्त्यमुनि प्रांत (बाबा) ने अपने शिष्य द्वारा यही बात कहला भेजी है। सो हे भाई ! अच्छा समय पाकर मैंने शोष ही आपसे कह सुनाई ॥४०॥ माल्यवन्त यक सचिव सयाना तालु वचन सुनि अति सुख माना ॥१॥ तात अनुज तव नीति विभूषण व सोइ उर धरहु जो कहत विभीषण ॥२॥ वहाँ एक माल्यवंत नाम बड़ा चतुर और बुद्धिमान मंत्री बैठा था, वह विमी- पग के वचन सुन बहुत ही प्रसन्न हुआ और हृदय सुख माना ॥७॥ और रावणसे । कहने लगा कि हं तात ! तुम्हारा भाई बड़ा नीति-शिरोमणि है, आप उसी वातको हृदयमें धारण करो जो विभीषण कहता है ॥२॥ रिपु उत्कर्ष कहत शठ दोऊ दूरि न करहु इहाँ है कोऊ ॥३॥ माल्यवन्त गृह गयउ वहोरी कहेउ विभीषण पुनि फर जोरी ऐसी बात सुन कर रावण शोधयुक्त होकर कहने लगा कि ये दोनों मूर्ख है, बैरी लड़ाई कर रहे हैं अरे कोई यहाँ है ! इनको निकाल कर दूर क्यों नहीं कर देते ५३. ऐसा रावणका क्रोधयुक्त वचन सुन माल्यबन्त तो उठ कर अपने घर चला गया परन्तु विभीषण फिर हाथ जोड़ कर कहने लगा ॥४॥ सुमति कुमति सबके उर रहई - नाथ पुराण निगम अस कहई ॥५॥ जहाँ सुमति तह संपति नाना * जहाँ कुमति तह विपति निदाना ॥६॥ कि हे तात ! वेद पुराण शास्त्र ऐसा कहये हैं कि सुमति और कुमति सभी के इइयमें वास करती है । परन्तु जहाँ सुमति होती है वहां नाना प्रकारकी संपत्ति एकत्र होती है और जहाँ कुमति रहती है वहां अंतमें विपत्ति हो पाता है। Arnarsaxaftaran sastansari ! - ॥ SHEOREMISMA * सुन्दरकांड सटीफ [८३014 तब उर कुमति बसी विपरीती सहित अनहित मानहुँ-रिपु प्रीती ॥७॥ काल रात्रि निशिचर कुल फेरी नेहि सीता पर प्रीति घनेरी ॥८॥ प्रापदप तो उलटी इमति प्रसी है जिसके कारण प्राप मित्रको शत्रु और शाको मित्र समझते है ॥ ७॥ क्योंकि पा सीता निशापरवंश के लिये प्रलयरूप रामि, उमी मीता पर भारी पड़ी प्रीति है ॥ ८ ॥ दादा-तात चरण गहि मांगऊ, राखहु मोर दुलार। सीता दीजिय रामकई, अति हित होइ तुम्हार ॥४१॥ सात में थाप पर पड़ कर यह मांगा हूँ श्राप मेरे दुलार () को रनिये कि सीता रामचन्द्र जीको लौटा दीजिये, इसमें आपका बहुतही भला होगा दुध पुराण श्रुति सम्मत पानो छ काही विभीषण नीति वखानी ॥१॥ सुनन दशानन उठा रिसाई ७ खल तोहिं मृत्यु निकट चलि आई॥२॥ यपि विमोपणने येद पुराण के अनुकूल चतुर पंडितोंके समान नीति आदिक वर्णन को | परन्तु इन पानीको मुन कर रावण कोधित हो उठा और कहने लगा कि मर्य! जात होता है कि तेरी मौत अप समीप भागई है ॥ २ ॥ जियसि सदा शठ मोर जियावास रिपुकर पक्ष सदा तोहिं भावा ॥३॥ कहसिनल असको जग माहीं ७ भुज वल जेहि जीते हम नाहीं ॥R रे! सदा ही नुझे जिलाता रहा और तुझे वैरीका पक्ष अच्छा मालूम होता है रे दुष्ट ! या. यात प्यो नहीं कहता कि संसारमें ऐसा कौन बली है जिसको मैंने अपनी भुगामा बहसे नहीं जीत लिया है ॥४॥ मम पुर पसि तपसिन सन मोती , शठ मिल जाइ तिनहि कहु नीती॥५॥ अस कहि कीन्हसि चरण प्रहारा , अनुज गहे पद बारहि वारा ॥६ रे मन! न मेरे नगर में रह कर उन तपस्वियोंसे प्रीति रखता है। पछा धम बन्दोंसे जाकर मिल और वन्हीं को यह नोति सिखाना ॥ ५॥ ऐसा कह कर रायणने विभीषण हामारी परन्तु इतने पर भी पुदिमान विभीषण नसक चरण ही पदे ॥६॥ उमा सन्त की यह बड़ाई मन्द करत जो करै भलाई NOR तुम पितु सरिस भले मोहिमारा राम भजे हित होइ तुम्हारा nen शंकरजी कहते है कि हे पार्वती ! संत मनुष्यों की यही बड़ाई है कि जो मनुष्य बनके साथ बुराई भी करें तो वे उसके साथ मलाई ही करते हैं ॥ ७॥ विभीषण ने कहा हे तात! पाप हमारे पिता के समान है, आपने मुझे मारा तो अच्छा ही TOMAananaparaasannapraaaaaaas.

POSUGur SEANIHERCENESeriaee १८३८] तुलसीकृत रामायण किया परन्तु रामचन्द्रजी भजनखे ही भापका महा होगा अन्यथा नहीं ॥८॥ सचिव संग लै नभ पथ गयऊ सबहिं सुनाय कहत अस भयका : ऐसा कहन विभीषण अपने मंत्री को साथ लेकर प्राकाप मार्ग द्वारा चला गया और जाते समय इस प्रकार कह गया ॥ ९ ॥ दोहा-राम सत्य संकल्प प्रभु, समा कालवश तोरि । मैं रघुनायक शरण अब, जाउँ देहु जनि खोरि ४२|| कि श्रीरामचन्दजी सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाके है और तुमारी सभा काल के वश में है तो घबमें रामसन्दजीको परपमें जाता हूं, अब मुझे कोई दोष न देना ॥५२ अस कहि चला विभीषण जवहीं प्रायुहीन मे निशिवर तवहीं ॥१॥ साधु अवज्ञा तुरत भवानी । कर कल्याण अखिल कर हानी ॥२॥ ऐसा वचन कह कर जिस समय विमीपण यहाँसे चला उसी समय सारे निशाचर श्रायुसे हीन हो गये ( उनकी मृत्यु का समय निकट आ गया) | ॥ श्री महादेवजी कहते हैं कि हे पावती ! साधु पुरुषों का अनादर करना समकक्यायों का नाश करनेवाला है ॥२॥ रावण:जवहिं विभीषण त्यागा भयो विमव बिनु तर्हि प्रभागा चलेउ हर्षि रघुनायक पाही करत मनोरथ बहु मनमाहीम जिस समय रावपने विभीषण को इस प्रकार त्याग दिया उसी समय वह तेजहीन हो गया ३३॥ विभीषण प्रसन्न होकन और नाना प्रकार के मनोय अपने हृदय में करता हुआ भोरामचन्दनीके पास चल दिया । ४ ॥ देखिहाँ जाइ चरण जल जाता अरुण मृदुल सेवक सुखदाता ॥५H ले पद परसि तरी अपि नारी दण्डक पावन कानन चारी ॥६॥ विभीषण अपने हृदय में विचार करता है कि मैं आज उन कमलरूपी चरणों को देखू गा जो लाल काल के समान कोमल है और मतोंको सुख देनवाले है ॥५६ जिन चरणों का पर्श करनेसे गौतम ऋषि की स्त्री अहिल्या तर गई और जिन शरणों से दंढक यन के रहने वाले पवित्र हो गये ॥६॥ जे पद जनक सुता उर लाये छ कपट कुरंग संग धरिः धाये। हर उर सर सरोज पद जोई अहो भाग्य में देखव सोई ॥८॥ और जिन चरणोंका ध्यान श्रीजानकीजी किया करती हैं और जो घरण कपटरूपी सृगके साथ दौड़े ये जा और जो धरण श्रीमहादेवजीके हृदयरूपी तासापके कमल- रूप है महा ! मेरे बढ़े माग्य हैं क्योंकि आज मैं जान उन्ही धरणों को देखू गा) Asta AAAAANAAA A Autwas set SE serta serious *सुन्दरकांड सटीक [३] दोहा-जिन पायन कर पादुका, भरत रहे मन लाय। ते पद श्राजु विलोकिहौं, इन नयनन अब जाय ४३॥ और जिन कमलरूपी चरणों की खड़ा की सेवा भरतजी मन लगा र किया करते है मथवा मन लगाये रहते हैं भाज मैं इन्हीं नेत्रोंसे उन चरणों को देखू गा३॥ यहि विधि करत सप्रेम विचारा प्राय: सूपदि सिन्धु के पारा॥ कपिन विभीपण भावत देखा जानेउ कोड रिपु दूत विशेषा ॥ २ ॥ इस प्रकारसे विभीषण प्रेम के साथ विचार करता हुआ शीघ्रता से समुद्र के पार भा गया॥1॥ बन्दरों ने विभीषण को भाने देख कर यह जाना कि कोई बैरी। का विशेष दूत भा रहा है॥२॥ ताहि राखि कपिपति पहं आये समाचार सब जाइ सुनाये ॥३॥ कह सुग्रीव सुनिय रघुराई , पावा मिलन दशानन भाई॥४॥ पानर लोग उसे वहीं ठहरा कर सुग्रीव के पास गये और इसका सब समाचार कह सुनाया ॥३॥ तब सुग्रीव रामचन्दजीके पास जाकर कहने लगे कि हे नाथ ! रावण का भाई आपसे मिलने पाया है ॥ ४ ॥ कह प्रभु सखा दूझिये काहा छ कहै कपीश सुनहु नरनाहा ॥ ५ ॥ जानि न जाय निशाचर माया छ कामरूप केहि कारण पाया दक्ष श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव से कहने गे कि हे मित्र! इस विषय में तुम्हारी क्या सलाह है? तब सुग्रीव कहने लगे कि हे नाथ! सुनिये ॥ ५॥ निशाचरों को माया कुछ समझ में नहीं पाती, न जाने यह इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला राक्षस यहाँ किस कारण से आया है।६॥ भेद हमार लेन शठ आवा राखिय बांधि मोहि अस भावा NGA सखा नीति तुम नीकि विचारी मम प्रण शरणागत भयहारी ॥८॥ मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है इस कारण इसे पाँध रखना चाहिये । यह सुन श्रीरामचन्द्रजी ने कहा कि हे मित्र! तुमने यह नीति' तो ठीक हो विचारी है परन्तु मेरा तो प्रण यह है कि शरणागतों का दुख दूर करता हूँ ॥८॥ सुनि प्रभु बचन हर्ष हनुमाना शरणागत वत्सल भगवाना ॥९॥ ऐसे श्रीरामचन्द्रनी के बधन सुन हनुमानजी बहुत प्रसन्न हुये और यह कहने लगे कि भगवान पड़े ही दयालु और शरणागत की रक्षा करनेवाले हैं ॥९॥ दोहा-शरणागत कहँ जे तजहि, निज अनहित अनुमानि । tannaHANNNANANANanasanAna) . sense serve FROIRSUSE [८१०] तुलसीकृत रामायण ते नर पामर .पापमय, तिनहिं विलोकत हानि जो मनुष्य अपने अहित को विचार करके शरण पाये हुए मनुष्य को त्याग देते है वे मनुष्य पड़े ही नीच और पापों से भरे हुये हैं, उनके देखने से भी पाप लगने की संभावना है...... :. कोटि विप्र वध लागहिं जाही पाये शरण तजौं नहिं ताही In सन्मुख होइ जीव मोहिं जवहीं जन्म कोटि अघ नाशौं तपहीं ॥२॥ श्रीरामजी कहते हैं कि हे मित्र सुग्रीव ! यदि किसी मनुष्य को करोड़ों प्रम- हत्याओं का पाप लगा हो, यदि ऐसा मनुष्य भी मेरी शरण में प्रावे तो मैं उसे त्याग नहीं सकता है। क्योंकि ऐसे पापात्मा जीव जिस समय मेरे सन्मुख पाते हैं पसी समय मैं उनके करोड़ों जन्म के पातक दूर कर देता हूँ॥ २ ॥ पापवन्त कर सहज स्वभाऊ भजन मोर तेहि भाव न. काऊ ॥ जो पै दुष्ट हृदय सो. होई छ मोरे सन्मुख श्राव कि सोई Hend पापी मनुष्यों का सहज ही यह स्वभाव होता है कि उनको मेरा भजन अच्छा नहीं लगता ॥ ३ ॥ और हे मित्र! जो मनुष्य दुष्टहृदय होते हैं क्या वे मेरे सन्मुख मा सकते है ? कदापि नहीं, अतएव यदि विभीषण भी दुरात्मा होता तो वह मेरे सन्मुख कदापि न प्राताn. निर्मल मन जन सो मोहि पावा मोहि कपट छल छिद्र न भावा । भेद लेन पठवा दशशीशा तबहुँ न कछु भय हानि कपीशा ॥६ जो मनुष्य शुद्ध और सच्चे हृदय के हैं वही मुझे मिय हैं। मुझे कपटी और द्वेषी मनुष्य अच्छे नहीं लगते ॥ ५॥ हे सुग्रीव ! यदि रावण ने उसे मेद लेने को भी भेजा है तब भी कुछ मय और हानि की बात नहीं है ॥६॥ जग महं सखा निशाचर जेते लक्ष्मण हाह निमिष मह तेते ॥७॥ जो सभीत श्रावा शरणाई व रखिहाँ ताहि प्राण की नाई ॥ क्योंकि संसार में जितने राक्षस हैं लक्ष्मणजी उन्हें पल भर में मार सकते है ॥ और यदि वह डर के कारण मेरी शरण में आया है तो मैं उसे अपने प्राणों के समान प्यारा समदूंगा ॥6॥ दोहा-उभय भांति लै: श्रावहू, हँसि कह कृपा निधान । जय कृपालु कहि. कपि चले, अंगदादि हनुमान ॥४५॥ सो चाहे वह भेद लेने आया हो अथवा शरण में पाया हो दोनों ही प्रकार से से ले आमो, ऐसा बचन हंस कर श्रीरामचन्द्रजी ने कहा । तब अंगद और हनुमान anannaanakARSTKAAR naastensman --- ।

r- 4 राम्दरका सटीक [८४१ पादिगार प्रसन्न होकर ऐसा करते हुए पाले मिपा wereी की आप हो। पूस पदी भगा दिगस, लाये फरि रामाग । फीदास पाहि काति, प्रशुलपिसि जमान॥ ४६ ॥ पूस पक्षी पाशी को गागरण समाग सहित foreign tीरामजी के पास ले गागे, यसो भागको देखतेही कयाकि में एपी शरणा और प्रयाग किया और भगवान को देखकर का Fen at गया ॥ १५ ॥ सायर हि मागे करि पानर सेनले आ रघुपति फरणागर ॥१॥ रिति ते से पीउ भाला गयनान्द पाण ो पाता ॥२॥ समार से सादर के साथ भागे परके घसरणाग को मा गहा गागर भीगी fotगमागे सरदी से गेमको भागगरूपी भाग देवास दोनों भाइयों को देता ॥९॥ पार राम विधाम रिलोकी ठिकि पल रोकी । भुग प्रणंप पांगारा लोग श्यामलगात गुणा भयगोपन ॥४॥ फिर शोमाभागीरामको देख कर दोगमा शौरी गा कर उगको शोमा देखो गा nilek रागगा कि मी गाय है, हाल new Hit forna मेम है श्यामल निगमा शरीर है शोर शरणागत राम दुप को र मरपाले हैं ॥४॥ सिंद कंप झायरा उर सोदा २० अानन मिस मदत कपि गोहा॥ गयन नीर पुलकित पति गासा उर परिधीर तास माता ॥६॥ For mer मीर ATARIA पर शोमा दगारो कामदेयोंको गोदिश करोगास है ॥५॥ ऐसी भूरि को पंज frimur eng भोर रोमांति हो यो भीरमर इस पार भाग का mir ho निशिशर पंश जगम सुर भासा नाथ पशाम र IT IN सदा पाप जिय सागस हा यथा उमहिं नाम पर हा ॥ देवयामोगी वाले पाए पोमेरा नाम निसार शमा सौरभ रापण गा मा ७॥ मेरस Areी शरीरको माग हीसे पाप गारामार rail ivane frm alertan दोघा-यण सुयश सुनि साय, मनु मैजन आप भीर। প্ন স্বাদ গ্রা, মাথা ব্যায় || संगारो हुल पूष गरोगाले भारगामी 1 में भागा भाषणा पश' . , shuka kitan with his that all the latternshtruar hapte ikada kuku 4 kwin the ringan dan kan SCENErsansfer { ૮૧૨ * तुलसीकृत रामायण साया हूँ कि आप शरणागत रक्षा करनेवाले और सुख देनेवाले है अतएव हे दुखोंने दूर रनेवाले कृगलु श्राप मेरी रक्षा कीजिये ! रक्षा कीजिये ! ॥१७॥ अस कहि करत दंडवत देखा तुरत उडे प्रभु हर्ष विशेग्वा ॥ दोन वचन सुनि प्रभु मन भाव भुज विशाल गहि हदप लगावा २॥ ऐसा कह कर विभोपणको इंडवत करते हुए देख रामचन्द्रजी तुरन्त उठे और उनके हृदय में कुछ विशेष हवं गन्त इना ॥ १ ॥ विभीषण के शेन वदन प्रभु के मन थे बड़े अच्छे लगे इस कारण उन्होंने विभीषणको अपनो विशाल मुबाओं से हुप में लगा लिया ॥३॥ अनुज सहित मिल ढिग ठारी , वोले वचन भका-भय-हारी ॥३॥ कहु लंकेश सहित परिवाग कुशल कुछोहर वास तुम्हारा ME अपने भाई लक सहित मिलकर वे नीप-मको पास बैठा कर भक्तों के भय को दूर करनेगले भोलचन्द्रज्ञा इस प्रकार वचन बोले ॥३॥ हे लंका के राजाकहो तुम अपने परिवार सहितकुशल से तो हो क्योंकि तुम्हारा बासस्थान बरा है।। १ ।। खल मंडली बसहु दिन राती सवा धर्म निबह केहि माती ५ मैं जानौं तुम्हरी सब रीती छ अनि नय निपुण नभाव अनीता लात! तुम रात दिन दुष्टों साथ निशस करते हो तुम्हारे धर्मा निवाह शिस प्रसर होता है ॥५॥ मैं तुम्हारी स्य रीति जानता हूँ तुम नीतिने बड़े चतुर हो तुम्हारा नाव अन्याय का नहीं है ।।।। घरु मल वास नरक का ताता छ दुष्ट लंग जनि देइ विधाता IIGA अव पद देखि कुशल रघुराम जो तुमकीन्ह जानि जन दाया 1 हे मित्र ' नररमा रहना अच्छा है परन्तु विधाता का दुष्ट मनुष्य का साथ न देवे इमीन कुगल है । 1 से बचन सुन विम पण कहने लगे कि हे नाय !अब आपके इन क्षणारबंद दम्नेहोस सब कुशल है जो धापने दाम जानकर दशका दोहा-तब लगि कुशल न जीव कह, सपनेहु मन विश्राम । जब लगि भजतन राम कह, शोक शाम तजि काम ६५८॥ है नाय!स समय तक जीव को कुशमी कशालता प्राप्त नहीं होती और सन में भी श्रागन नहीं मिलता जब तक वह शंकर विषय दासनाओं को छोड़कर शाप भजन नहीं करता। १८५ :: जब लगि वसत हुदय खल नाना लोभ मोह सत्र मद माना जब लगि उर न बसत रघुनाथा घरे बाप शायक कटि भाधा २० ! - itsAdastisekastashastra . -- antenegssennive सुन्दरकांड सटीक [८४३] और उस समय तह नाना प्रकार खल, के लोभ, मोह, अभिमान, अपमान प्रादित्य में निप करते हैं। जब तक आप धनुष वाण भर कठि में सर्कस धारण यि हुपे हृदय में वास ना करते ॥ २ ॥ ममता तिमिर तरुण अंधियारो राग द्वेष लूक सुखकारी uan, तब लगि यमत जीव उरमाहीं जब लगि प्रभु प्रतापरवि नाहीं ॥४॥ और यह ममनाहा अधकार और जवानीरूप रात्रि रागद्वेषी उल्लुओं को मुख देनवानी ॥३॥ उसी समय तक हृदयमें बात करता है प्रगत श्राका प्रतापरूपी सूप हदसमें उदय नहीं होता अर्थात् पाके मतापसे ये सब नष्ट हो जाते हैं अब भइ कुशल मिटे भय भारं # देखि रामपद काल तुम्हारे ॥५॥ तुम कालु जार अनुकूला * ताहि न व्याप त्रिविधभव शूल'In हे नाय! अब पाप कमल स्वरूपो चाणों के देखने से सब प्रकार कुशल है और सब भय दूर होगयं ॥ ५ ॥ आर जिसके ऊपर दया करने है उसे यह सांसारिक तीनों प्रकार के शून अर्थात दैहिक भौतिक पाप नहीं सताते ॥ ६ ॥ मैं निशिवर प्रति अधम स्वभाऊ शभ प्रावण कोन्ह नहिं काऊ nan जासु रूप मुनि ध्यान न आवा सो प्रभु हर्षि हृदय मोहिं लाTTI मैं निशचा हूँ और मेरा समायड़ाहो नोच है मैंने कोई शुभ कर्म भी कमो नहीं किया ॥ ७ ॥ परन्तु जिम प्रभु का रूप ने लोगों के ध्यान में भी नहीं आता उसी प्रभु ने प्रसन्ननापूर्वक मुझं हृदय से लगा लिया ॥ ८ ॥ दोहा-श्रो भाग्य मम अमिन अति, राम कृ॥ सुख पुज।। देखेउँ नयन चिरवि शिव संव्य युगल पद कंज ॥ ४६॥ सुख को पशि ढे) भरघुनागजो को कृपासे आग मेरा भाग्य बड़ाहा अपार है क्योंकि भाज मैंने उन चरणों को देखा जिसको सेवा ब्रह्मा और महादेव जो किया करते हैं सुनहु सखा निज कहहुँ समाऊ जान भुशुडि शंभु गिरिजा जो नर होय चरावर दोहोछ श्रावै समय शरण तकि माहीं॥२॥ रामचन्दजी कहते हैं कि हे मित्र विभौपण ! सुनो, अपना स्वभाव तुम्हें बताता हूँ जिसे भागभुशुण्ड और महादेव पार्वतोजी अच्छी तरह जानते हैं ॥१॥कि जो मनुष्य सारे संसारके प्राण पत्र का वैरो हो और वह उनसे डर कर मेरी शरण में भावे ।। तजि मद मोह कपट छठ नाना करौं सखा तेहि साधु समाना || जननी जनक बंधु सुत दारा नन धन भवन सुहर परिवारा.in हो मैं उपके मद मोह, अपर और छत्रको दूर कर हे मित्र! असे साधु के समान भिGayeragessmandutobyasustoostssreadsexisadh 3GESssveews I] तुलसीत रामायण शुदकर देता हूँ॥३॥ और जो मनुष्य, माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, अब पर और अच्छे मित्र व परिवार शादि ॥ ४॥ सबके ममता ताग बटोरी मम पद मनहिं बांधि वर डोरी ||५|| समदर्शी इच्छा कछु नाहीं हर्ष शोक भय नहिं मनमाहीं ॥६॥ इन सबके ममता (प्रेम ) रूपी सूते को बट कर रस्सी बनावे और उससे मेरे सालों में मन को बांध दे अर्थात सबसे प्रेम तोड़ मेरा ध्यान करें ॥ ५ ॥ और जो समदर्शी है, जिन्हें किसी प्रकार की इच्छा नहीं है, निनके हृदय में हर्ष शोकं भय कुछ भी नहीं है ॥ ६॥ अस सज्जन मम उर वस कैसे लोभी हृदय बसत धन जैसे ॥७॥ तुम सारिखे संत प्रिय मोरे धरौं देह नहिं आन निहोरे ॥८॥ ऐसे सज्जन मेरे हृदय में किप्त प्रकार बास करते हैं जैसे लोभी पुरुष के हृदय में धन वास करता है ॥ ७॥ और हे मित्र! तुम्हारे ऐसे संत मुझे सदैव प्यारे भगवे है, मैं और किसी के लिये देह धारण नहीं करता हूँ अर्थात् उन्हीं सन्तों के लिये अवतार लेता हूँ ॥८॥ दोहा-सगुण उपासक परमहित, निरत नीति दृढ़ नेम । ते नर माण समान मोहि, जिनके द्विज पद प्रेम ॥ ५० ॥ और जो मनुष्य प्रेम के साथ सगुण रूप की उपासना करनेवाले हैं। नीति में अनुर और नियम में दृढ़ है और जिनका बामणों के चरणों में प्रेम है वे मुझे प्राणों के समान प्यारे हैं। ५०॥ सुनु लेकेश सकल गुण तोरे ताते तुम अतिशय प्रिय मोरे ॥२॥ राम वचन सुनि वानर यूथा छ सकल कहहिं जय कृपा वस्था ॥२॥ श्रीरामचन्द्रनी कहते हैं कि है विमीपण, तुम्हारे अन्दर उपरोक सर्वगुण विद्य- मान है इससे तुम मुझे बहुत प्यारे लगते हो॥ १॥ ऐसें रामचन्द्रजी के बचन सुनकर सथ वानरगण कहने लगे कि हे कृपानिधान ! भगान आपकी जय हो ॥२॥ हुनन विभीषण प्रभु की पाणी व नहिं अघांत श्रवणामृत जानी ॥३॥ पद अंबुज गह चारहि वारा हृन्य समात न प्रेम अपारा in विमीपण एसी रामचन्द्रजी की वाणी जो कानों को अमृत के समान है. सुनकर सूस नहीं हुये ॥ ३ ॥ और बार बार रामचन्द्रजी के चरणकमलों को छूते हैं परन्तु बम मारी प्रेय हृदय में नहीं लगता है।। ४ ॥ सुनहु देव सवरावर स्वामी प्रसपाल Roardsriessest अंतर्यामी १५ PAPravy ramrememRSESRece सुन्दरकांड सटीक [४] उर कछु प्रथम वासना रही प्रभु पद प्रीति सरित सो वही mes विभीषण करते हैं कि हे घर भघर के स्वामो ! प्रण के पालन करनेवाले, हृदय की बात जाननेवाले भगवान ! सुनिये ॥ ५॥ पहले कुछ मेरे हृदय में इच्छा थी सो आपके चरणों की प्रीतिरूपी नदी में यह गई ॥३॥ अव कृपालु निज भक्ति जो पावनि छ देहु दया करि शिव मन भावनि | एवमस्तु कहि प्रभु रणधीरा मांगा तुरत सिंधु कर नीरा Rea अब हे फूपाल रामचन्द्रजी ! अपनी यह पवित्र भकि जो शिवजी के मन को मच्छी लगती है सो कृपा करके दीजिथे ॥ ७ ॥ रणधार बोरामचन्द्रजी ने एवमस्त कह कर समुद्र का पानी मंगवाया ॥ ८ ॥ यदपि सखा ताहि इच्छा नाहीं मा दर्शन अमोघ जगमाहीं ॥९॥ अस कहि राम तिलकतेहि सारा सुमन वृष्टि नम भई अपारा RTOR और कहा कि हे मित्र ! यद्यपि तुम्हें इसकी इच्छा नहीं है परन्तु मेरा दर्शन । संसार में निष्फल नहीं होता ॥९॥ एसा इह रामचन्द्रजी ने विभीषण को राजतिलक कर दिया, तब अाकाश से देवता लोग फूल बरसाने लगे॥ १० ॥ दोहा-रावण क्रोध जु अनल सम, स्वांस समीर प्रचण्ड । जरत विभीषण राखेऊ, दीन्हेउ राज अखंड ॥ ११ ॥ रावण का क्रोध अग्नि के समान था, स्वास प्रचंड वायुरूप था उस अग्नि से जलते हुए विभीषण को बचा कर श्रारामचन्द्रजी ने उसे अटल राज्य दे दिया ॥1॥ दोहा-जो सम्पति शिव रावणहिं, दीन्ह दिये दश माथ । सो संपदा विभीपहि, सकुचिदीन्हरघुनाथ ॥ ५२ : जो सम्पदा महादेवजी ने रावण का दशो शिरों का बलिदान करने पर दी थी। वही सम्पदा श्रीरामचन्दजी ने विभीषण को थोड़ीसी भक्ति के लिये सकृय के सार द। अर्थात इस भक्ति के बदले यह सम्पत्ति थोड़ी है ।। १२ । अस . प्रभु छाडि भजहिं जे श्राना 8 ते नर पशु बिनु पूंछ विषाना " निज जनजानि ताहि अपनावा 8 प्रभु स्वभाव कपिकुल मनभावा ऐसे दयालु प्रभु को छोड़ कर जो मनुष्य इसरों का भजन करते हैं वेति सींग पूंछ के पशु है, अर्थात् उनमें और पशुषों में कोई अन्तर नहीं ॥३॥ विमी. पण को अपना मक्त जाग का रामचन्दजीने अपना लिया सो प्रभु का यह स्वमाप बामरकुल को बहुत ही प्यारा मालूम हुआ .२॥ पनि सर्वज्ञ सर्व. उरवासी सर्व रूप सब रहित उदाली Hn isuaacassaAREMAINSTABReerta , में SEARSEASECSREAL [४] * तुलसीकृत रामायण प्रात पंचमी दिवस खगरी * सचिन लियो बुलाय पुकारी ॥४॥ बोले वचन नीति प्रति पालक कारण मनुज दनुज कुल घालक:५॥ फिर सब जाननेवाले, सबके हृदय में काम करनेवाले, सर्वरूप, सबसे रहित, । उदासीन ऐसे रामचन्दजी ने ॥ ३ ॥ सबो पञ्चमी के दिन अपने मन्त्रियों को बुला लिया ॥ ४ ॥ और नीति का पालन करनेवाले राक्षस कुल के नाश करने के लिये मनुष्य रूप धारण करनेवाले रामनाजो बोल ॥५॥ मुनु कपीश लंकापति वीरा केहिविधि उतरियजलधिगमीरा॥६ संकुल उरग .मकर झष जाती अति अगाध दुस्तर सष भांती ॥७॥ कि हे सुग्रीव ! हे विभीषण! हे वीर धानर योधागों! सुना, यह प्रथाह समुद्र किस प्रकार से उता जाय ॥ ॥ क्योंकि यह सर्प, मगर और नाना प्रकार की मछलियों से भरा है और सब प्रकार से बहुम्ही गहराऔर दुसर मालूम होता है॥४॥ कह लंकेश सुनहु रघुनायक छ काटि सिंधु शापक तव शायक IICA यपि तदपि नीति अस गाई बिनय करिय सागर पहजाई ॥९॥ सब विभीषण कहने लगे कि हे रामचन्द्र जी ! यद्यपि काड़ों समुद्रों को सुखाने वाले तो आपके वाणही है ॥ ८॥ तो भी नीति-शास्त्र में ऐप कहा है कि पहले ममता से काम लेवे. इस कारण समुदके पास चर कर विनय करना उचित है ॥९॥ दोहा, -प्रभु तुम्हार कुलगुरु जलधि, कहिहि उपाय विचारि। बिनु श्यास सागर तरहि, सकल भालु कपि झारि ॥ ५३॥ हे नाथ ! अमुब श्रापका कुलगुरू है क्योंकि वह आपके ही सूयवंश के राजा सगाके पुत्रों च खोदा है, अतएव सगरवंश में होने के कारण श्रापका वंशज और शुरु है सो वह कुछ न कुछ उपाय बतावेही जिमसे बिना परिश्रमके ही सब रीछ, भानरों की सेना समुद्र पार उतर जायगी ॥ ३ ॥ सखा कहेउ तुम नीक उपाई ® करिय देव जो होइ सहाई ॥१॥ मंत्र न यह लबिमन मन भावा रामबचन सुनि अति दुख पावा ॥२॥ घट सुन रामचन्द्रजी ने कहा हे मित्र ! तुमने उपाय तो अच्छा बताया, यदि ईश्वर सहायता करे तो सफल होगा ॥१॥रन्तु यह सलाह लक्ष्मणी को अच्छी नहीं लगी, वह रामचन्द्रजी के वचन सुन कर बड़े दुःखी हुए ॥ २ ॥ नाथ देव कर कवन भरोसा ॐ शापिय सिंधु करिय मन रोसा ॥३॥ कादर मन कर एक अधाग, दैव देव आलसी पुकारा , और कहने लगे कि हे नाथ ! ईश्वर का कौन भरोसा ! मनमें क्रोध कर समुद्र Homamitmmminarianservashnasraemiarasnadi

* सुन्दरकांड सटीक
[८४७]
को सुखा दीजिये। फायर पुरुषों के लिए ईश्वर एक सहारा मात्र है क्योंकि
जो भान्सी पुस्प है वे ईश्वर ईशाग काते हैं कि भाग्यमें होगा तो काम पूर्ण
हो जायगा प्रन्या नहीं, परन्तु प्रानो गति से काम नहीं लेते ॥४॥
सुनर विहंस बोले रघुबीरा ऐपेइ करव धरहु मन धीरा १५॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई छरिधु समीप गये रघुराई ॥६॥
सहमणनी का यह वचन सन श्रगमचन्द्र जो हंस का कहने लगे कि हे भाई!
ऐसाही कगा. मनमें धीरज रक्यो ॥ ५ ॥ ऐसा कह र लक्ष्मणजीको समझा कर
श्रीरायनन्दनी प्रमुद्र के पास गये ॥ ६ ॥
प्रथम प्रणाम कान्ह रघुराई बडे पुनि तट दर्भ डमाई ॥ ७ ॥
जबर्हि विभीषण प्रभ पहं आये पाछे रावण दून पठाये ॥ ८ ॥
पहले तो प्रभुने मार समुदको प्रणाम किया फिर किनारे पर कुश विद्या
कर बैठ गरे । जब विभीषण अरेरापचन्दमोके पास म ाये उसो समय पीछे
रावणने दूत भेजे ॥८॥
दाहा -मकल चरित निन देखेऊ, धरे काट कपि देह । .
प्रभु गुण हृदय सराहि अनि, शरणागत पर नेह १५४॥
उन दुनों ने प्राकर और बनावटी यन्दा का देह धारण अपक्ष हाल देखा
और
शरणागत पर ऐसा स्नेह देख कर श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की बड़ाई मनही मन
काने लगे॥५॥
प्रगट बखानन गम सुभाऊ अनि सप्रेम गा विमरि दुराऊ ॥१॥
रिपु के दूत कपिन जस नं 9 निन्हें बाँधि कपिति पहं श्रान ॥२॥
मिर रामचन्द्रजी का गुणानुगद सष्ट रूप से करने लगे, मारं प्रेम के अपने को
हिपाना गये। तब नो बन्दों ने उन्हें पहचान लिया कि यह तो पैरी
इत हैं और उन्हें गर का सुप्रीव के पाप ले पाये ॥ ३ ॥
कह ग्रोव सुनहु सब वनवा श्रग भंग करि पठबहु निशिवर ॥३॥
सुनि सुग्रीव बचन करि धाये बांध कटक चहुँ ओर फिराये Neu
सा सुनो कहने लगे कि हे मब बन्दरो! इन निशाचरों को किसी न किसी
अंग से ह न के भेजो ॥ ३ ॥ सुग्रीव के ऐसे बचन सुन बन्दर लोग दौड़ पड़े और ।
नई बांध का सेना के चारो ओर घुमाया ॥ ४ ॥
या प्रकार मारन कपि लागे छ दीन पुकारत तापि न त्यागे ॥५॥
जो हमार हर नासा काना हि कोशलाधीश कर पाना ॥६॥

. PRIMARGESESEGMERESTMERIKANER [८४८] तुलसीकृत रामायण और उन निशाचरों को वन्दर लोगबहुत प्रकार से मारने लगे यदि वे दीनवाणी कह कर चिल्लाते थे परन्तु बानरं तब भी उन्हें नहीं छोड़ते ॥५॥ अन्त में वे घबड़ा कर कहने लगे कि जो हमारे नाक कान काटे उसे श्रीरघुनाथजी की कलम है। सुनि लक्ष्मण तिन निकट बुलाई ४ दया लागि हलि दीन्ह छुड़ाई MOR रावण कर दीन्हेउ यह पाती लछिमन बचन वांचु कुलघाती ॥८॥ लक्ष्मणजीने यह सुन उन दूतोंको पास बुलाया, उनकी दशा देख लक्ष्मणजी को दया आगई इस कारण उन्होंने हँस कर उन्हें छुड़ा दिया ॥ ७ ॥ और कहा कि यह चिट्ठी रावणके हाथमें देना और उस कुलनाशकसे कहना कि यह लक्ष्मणके हित वचन है. इन्हें बाँधोn ॥ दोहा-- कहेउ मुखागर मूढ़ सन, मम संदेश उदार । सीता देइ मिलहु न तु, आवाकाल तुम्हार ॥ ५५॥ . और उस मूर्ख रावणसे मेरा यह हितकारी मंदेशा जवानीमी कह देना कि सीता को देकर जा मिलो. नहीं तो अब तुम्हारी मौत निकट भागई है ।-५॥ तुरत नाय लछिमन पद माथा चले दूत वर्णत गुण गाथा ॥३॥ कहत राम यश लंका श्राये रावण चरण शीश तिन नाये ४२॥ इत इलो समय लक्ष्मण नीके चाणोंको शीश नवा कर रामचन्द्रजीके गुणानुबाद वर्णन करते हुए चल दिये ॥१॥ और रामचन्द्रजी का यश रास्ते में बखान करते हुए लंका में आये और रावण के चरणोंको प्रणाम डिया ॥२॥ विहंसि दशानन पूछी बाता कहसिनशुक श्रापनि कुशलाता॥३॥ पुनि कहु कुशल विभीषण केरी जासु मृत्यु भाई अति नेरी ॥४ तब हंस कर रावण पूंछने लगा कि शुरू! तू अपनी कुशल क्यों नहीं बत. लाता ॥३॥ और विभीषगका हाल कहो जिसकी मौत अब प्रति निकट आ गई है। करत राज लंका शठ त्यागा होइहि जव कर कीट श्रपागा ॥५ पुनि कहु भालु श्रीश कटकाई कठिन काल प्रेरित चलि आई ॥६ उस मूर्खने राज्य करते हुए लंकाको छोड़ दिया अब वह अभागा जी का घुन होकर रीछ और बन्दरों के साथ शारा जायगा ॥ ५॥ फिर उस बन्दर और रीडो की सेनाका हाल कहो जो कठिन बालके भेजनेसे यहां मरनेके लिये आई है ॥६॥ जिनके जीवन कर रखवारा भयो मदुलचिन सिंधु बिचारा ॥७॥ कहु तपसिन • कर वात बहोरी जिनके हृदय त्रास अति मोरी ॥८ और जिनके प्राणोंका वक्षनेवाला केवल दयाल समुद्र है, यदि वह अन्तर्गत:न 20vDayegateAsraerestdHAT. MA.. ५.

NPNSH *सुन्दरकांड सटीक [८४९] होता तो अब तक राक्षगण उन्हें भक्षण कर चुके होते ॥ ७॥ फिर इन दोनों तप. सियोका हाल कहो जिनके हृदय में मेरा बड़ा भारी उर लगा रहता है ॥ ८ ॥ दोहा--भई भेंट की फिरि गये, श्रवण सुयश सुनि मोर । फहसि न रिपु दल तेज बल, फस चकित चित तोर 1१६॥ अरे उनसे भेंट हुई अथवा वे मेरा यश सुन कर लौट गये, तू तो वैरी की सेना का कुछ पल, तेज, प्रसार भी वर्णन नहीं करता । इस प्रकार तेरा चित्त चकितसा क्यों होरहा है ॥ ५६ ॥ नाथ कृपा करि बेहु जैसे ७ मानहु कहा क्रोध तजि तैसे ॥१॥ मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा जातहिं राम तिलक तेहि सारा ॥२ तर शुक इत कहने लगा कि हे नाय ! जिस तरह माप कृपा करके मुझसे पूछते है पैसेही श्राप क्रोध दूर करके मेरे इन वचनों को मान॥॥जिस समय आपका छोटा भाई विमीपण जाकर मिना सो समय रामचन्द्रनीने उसे राजतिलक कर दिया ॥२॥ रावण दूत हमहिं सुनि काना कपिन बांधि दीन्हें दुख नाना ॥३॥ भवण नासिका काटन लागेराम शरथ दीन्हीं तब त्यागे 18n और पन्दरोंने मुझे रावण का दूत समझ कर बांध दिया और नाना प्रकार के कष्ट दिये ३॥ जब मेरी नाक और कान काटने लगे तब मैंने उन्हें रामचन्द्रजी की कसम दी तब मुझे छोड़ा ॥४॥ पूछदु नाथ कीश कटकाई बदन कोटिशत वरणि न जाई ५॥ नाना वरण भालु कपि धारी विकटानन विशाल भयकारी ॥६॥ और है नाय ! जो श्राप बन्दरोंकी सेनाका समाचार पूछते हैं सो वह सौ करोड़ मुखोंसे भी वर्णन नहीं की जासकती ॥ ५ ॥ बन्दर और रीछ नाना प्रकार के रूपवाले है जिनके पड़े विष्ट मुख हैं, बही विशाल और भयको उत्पन्न करने वाले हैं ॥३॥ जेहि पर दह्या हतेउ सुत तोरा सकल फपिन मह तेहि वल थोरात अमित नाम भट कठिन कराला विपुल वर्ण तन तेज विशाला ॥८॥ भौर जिस बंदर ने लंका जलाई अक्षयकुमार का वध किया वह बन्दर सबसे कम बलवानं है ॥ ७॥ और बहुत से बड़े बड़े नामी योधा हैं जिनके नाना रूप है और यही विशाल तेजस्वी शरीर हैं ॥ ८ ॥ दोहा-द्विविद मयंदर नील नल, अंगदादि विकटाशि। V दधिमुख केहरि कुमुद गव, जामवंत ... वलराशि ॥७॥ उनमें से मैं कुछ योधाओं के नाम वर्णन करता हूँ वे ये हैं-द्विविद, मयंद, nashesnisasti satandasesasroastale ASSISessivel101444Marg 1 ८५.] * तुलसीकृत रामायण नील नल. अंगद विकास्य, दधिमुन्न, केहरि, कुमर गव भोर बल की राश जामवन्त इत्यादि । ५७॥ ये हरि सब सुग्रीव समाना इन समकोटिन गर्न को पाना ॥१॥ राम कृग अतुलित बल तिनहीं छ तृण ममान त्रयलोकहिं गिनहीं ॥२॥ यह सब बन्दा राजा हुंग्रोबके समान बनवान हैं इनके समान और भी करोड़ो बन्दर हैं जिनकी गिनती नहीं हो सकती ॥७॥ श्रीरामचन्द वीकी कृगमे (न बन्दरों में अतुल्ल बल है और यह सब बन्दर तीनों लोकोशी तिनके के मान समझने हैं ॥२॥ अस मैं श्रवण सुना दसकंधर पद्म अठारह यूथप वर ॥३॥ नाथ कटक मह सो कपि नाही छ जो न नुमहिं जीते रण माहों ॥४॥ और हे नाय ! मैंने कानोंसे ऐसा सुना था कि अठाह दुप बन्दरोंके सेनापति ॥३॥ और उस सेनामें ऐसा कोई बन्दर नहीं जो तुम्हें युद्ध में न जीत सके प्रति स बन्दर आपको हरा सकते हैं। परम क्रोध मीजहिं सब हाथा छ अायलु न देहि रघुनाथा ॥५॥ शोपहिं सिंधु सहित झपव्याला फारहिं नख धरि कुधर विशाला॥६॥ वे सब वानर मारेकध के हाथ मल रहे हैं। पछता रहे हैं । परन्तु श्रीम: चन्द्रजीनं अमी आज्ञा नहीं दी है ॥५॥ ओर वे पमुदको सगें और मछलियों सहित सुखा सकते हैं और अपने नखोंसे बड़े बड़े विशाल पर्वतको फाड़ सस्ते हैं ॥६॥ मादि गर्द मिलवहिं दशशीशा ऐम वचन कहहिं सब की 9 'गजंहिं तर्जहिं सहज अशंका छ मानहुँ प्रपन चहन श्रबलंगा सव वन्दर ऐया कह रहे हैं कि उम समणके दशों सिरोंको मल कर धूलमें मिल दंगे ॥७॥ और सहज हा में प्रशंक बानर गजग तजना करते हैं, ऐसा मालूम होता है कि अब लंकाका प्रसना चाहते हैं ॥6॥ दोहा-सहज शूर कपि भालु मव, पनि शिर पर श्रीराम । रावण काटिन काल कहजीति सकहिं संग्राम ॥८॥ हे रावण ! सब रीछ वन्दा सस.वहीमे बलवान् है परन्तु यह और भी अधिक बलवान् होनेका कारण है कि उनके सहायक श्रीरामचन्दजी साय हैं, वे ता है रावण! करोड़ों छालको संग्राममें जीत सकते हैं ॥ ५० ॥ राम तेज वल बुधि विपलाई छ शेष सहस शत सहहिं न गाई ॥१॥ सक शर एक शोषि सत सागर नव भ्रातहिं पूछेर नयनागर | रामचन्द नोके तेज, बल और बुद्धि की बड़ाईको तो लाखों शेषनागजीभी वर्णन wws RS-8

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*सुन्दरकांड सटीक
[८५११
नहीं कर सकते ॥१॥ और श्रारामचन्द जी एक बाण १०० समुद्र मी सुखा सकते
है परन्तु नोति जाननेवाले भावान् रामचन्द नीने आपके भाई से सलाह पूछी ॥२॥
ताशु वचन सुनि सागर पाहीं ७ मांगत पंथ कृपा मन माहीं ॥३॥
सुनत बचन बिहंसा दशशीशा छ जो अस मति सहान कृन कीशा 158
लो तुमारे भाई की सलाह मान पहले श्रोगमनन्दनी समुद्र पास बैठे
विनापूर गस्ता मांग रहे हैं क्योंकि ये बड़े दयालु हैं ॥७॥ शुरु दैत्यके ऐ वचन
सुन रावण यात सा और कहने लगा कि जब ऐसी युछि है तभी तो बन्दरोंको
अपना सहायक बनाया है ॥ ४ ॥
सहज भोर का वचन दृढ़ाई छ सागर सन ठानी मनलाई ॥५॥
मढ़ मृपा का कासि बड़ाई छ रिप बल बुद्धि थाह में पाई ॥६॥
सहमहो दरपोक विभाषण के वचन मान कर समुदसे बालकोंक सी हठ करके
रामचन्द राह मांग रह हैं ! ॥५॥ अरे मूख ! तू व्ययं बड़ाई क्या करता है. बैरी के
पुद्धि बलका हाल मुझे मालूम हो गया ॥ ६ ॥
समिव मभीन विभीषण जाके छ विजय विभूति कहाँ लग ताके 194
सुनि मल वरन दून रिम बाढ़ा छ समय बिचारि पत्रिका काढ़ो॥
जिपके विभ पण सरीखे डाग मन्त्री हैं उम्इं जीतका यश कहाँ तक प्रहा
सकता है । मणके ऐपे नचन पन दूसा बड़ा लोध श्रागया, तब उसने अनुः
फूष समय जान कर लक्ष्मण नीकी चिट्ठा निशाना ॥ ॥
गम अनुज दोन्ही यह पाती नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती ॥९॥
विहल वाम कर लोन्हेसि रावन मभित्र बालिशठलागवगवन ||
और कहा कि हे नाय! रामचन्द्र जी के छठे गईने यह चिन्छा दी है सो इसे
आप पाकर अपने हृदयको शीतर कीजिये ||९. रावण ने हंसकर पत्र बायें हाथमें
ले लिया और मन्त्र का युगाकर उसे पढ़वाने लगा ॥10॥
दोहा --बातम मनहि रेझाय शठ, जनि घालरि कुल खांश ।
राम विरोध न उपरिहहु. शरण विष्णु श्री ईश ५९॥
चिट्ठी में लिखा था कि हे मुख! तू
! तू बातों से अपने मनको प्रपन्न करके कुछ
का सत्यानाश न कर रामचन्द्रजी से विरोध करने पर ब्रह्मा विष्णु और महादेव की ।
भो शरण जाने पर तुम बद नहीं सम्ते ॥ ९ ॥
दोहा-होउ मान तजि अनुज इव प्रभु पद पंकज भृग।
हासि राम शर अनल खल. जनि कुल सहत पतंग ॥१०॥

NEPSMESer were [२] * तुलसीकृत रामायण इस कारण तुम भी अभिमानको छोड़कर अपने भाई विभीषण की तरह भौंरारूप होकर श्रीरामचन्द्रजीले कमल स्वरूपीचरणों में प्रेम करो,हे दुष्ट ! रामचन्द्र जीके अनि रूप वाणसे तुम अपने कुल सहित पतंग रूप होकर नाश हो जानेका इरादा न करो सुन्त समय मन मह मुलुकाई * कहत दशानन सबहिं सुनाई ॥५॥ भूमि परा कर महत प्रकाशा लघु तापस कर वाग विलासा ॥२॥ पत्र सुनकर रावण मनमें तो डरा परन्तु हँसकर सबको सुनाकर इस प्रकार कहने 'लगा ॥१॥ कि उस छोटे तपस्वीके वचनोंकी चतुरता तो देखो.अरे!वह तो ऐसी आशा कर रहा जैसे कोई मनुष्य पृथ्वीपर पड़ा हुआ हो और श्राकाश छूलेनेकी श्राशा करे कह शुक नाथ सत्य सव बानी छ समुझहु छाँड़ि प्रकृति अभिमानी॥३॥ सुनहु पचन मम परिहरि क्रोधा नाथ राम सन तजहु विरोधा ॥४॥ तव शुक्र कहने लगा कि हे नाथ ! पत्रकी सब बात ठीक हैं, जरा आप अपने अभिमानी स्वभाव को छोड़ कर विचार तो करिये ॥ ३॥ क्रोध को छोड़ कर मेरा बच्न सुनो । हे नाथ ! रामचन्दजी से वैर त्याग दो ॥ ४ ॥ अति कोमल रघुवीर सुभाऊ यद्यपि अखिल लोककर राऊ ॥५॥ मिलत कृपा प्रभु तुम पर फरिहैं उर अपराध न एको धरिहैं ॥६॥ यद्यपि श्रीरामचन्दजी सब लोकों के स्वामी हैं तब भी उनका स्वभाव बड़ाही कोमल है ॥ ५ ॥ वे मिलते ही तुम्हारे ऊपर बढ़ी कृपा करेंगे और तुम्हारा कोई अपराध थप हृदय में नहीं रक्खेंगे अर्थात तुम्हें क्षमा कर देंगे ॥ ६ ॥ जनक-सुता रघुनाहिं दीजै छ इतना कहा मोर प्रभु कीजै ॥७॥ जब तेहि देन कह्यो वैदेही चरण प्रहार कीन्ह शठ तेही ॥ इसलिये हे. नाथ! बाप मेरा इतना कहना मानिये कि जानकीजी को श्रीराम चन्दशी को लौटा दीजिये ॥७॥ जब शुक्ने जानकी को लौटा देने की बात कही तो रावण ने उसके लात मारी॥८॥ चरण नाइ शिर चला तो तहवा - कृपासिंधु रघुनायक जहंवा ॥९॥ करि प्रणाम निज कथा सुनाई 8 राम कृपा अपनी गति पाई ॥१०॥ जब रावण ने लात मारी तो शुक भी उसे प्रणाम कर श्रीरामचन्दजा के पास चल दिया। और वहाँ पहुँच प्रभु को प्रणाम कर अपनी समस्त कथा कह सुनाई और गमचन्दजी की कृपा से अपनी गती को प्राप्त हुआ. ॥१०॥ ऋषि अगस्त्य कर शाप: भवानी राक्षस भयउ रहा मुनि ज्ञानी ॥१७॥ वंदि राम पद चारहिं · वारा पुनि निजाश्रमकहपगुधारा ॥१२॥ . 1 sts . सुन्दरकांड सटीक 1८५३ महादेवजी कहते है हे प्रिये ! यह शुक दैत्य बड़ाही. ज्ञानो मुनि था परन्तु अगस्त्यपि के शाप के कारण राक्षस हो गया था ॥११॥ सो वह मुनि शरीर को प्राप्त होने पर रामचन्दजीके चरणों की पारम्पार वंदना करके फिर वह अपने भाश्रम को चला गया ||२|| दोहा-विनय न मानत जलधि जड़, गये तीनि दिन बीति । बोले राम सकोप तय, भय विनु होइ न प्रीति ॥६॥ ! श्रीरामचन्दजी को प्रार्थना करते हुये तीन दिन बीत गये परन्तु सूखं समुद्र ने एं उस प्रार्थना पर कुछ ध्यान न दिया तब तो श्रीरामचन्द्रजी क्रोध में होकर बोले कि विना भय के किसीको प्रीति नहीं उत्पन्न होती॥ ६॥ लक्ष्मण बाण शरासन श्रान शीखें वारिधि विशिप कशान ॥२॥ शठ सन विनय कुटिल सन प्रीती 8 सहज कृपण सन सुन्दर नीती ॥२॥ हे लक्ष्मण ! धनुप और वाण लाश्रो, मैं इस समुद्र को वाण की अग्निसे सुना डालूंगा ॥ ३ ॥ क्योंकि मूर्ख मनुष्य से विनती करना, छली मनुष्य से प्रीति करना । और स्वभाव ही से कंजूस मनुष्य से सुन्दर नीति वर्णन करना ॥ २ ॥ ममता रत सन ज्ञान कहानी छ अतिलोभी सन विरति बखानो ॥३॥ कोधिहि सम कामिहिं हरि कथा ® ऊसर बीज बये फल यथा ॥ng और मोह में फंसे हुए मनुष्य से ज्ञान की बात करना और बहे भारी लोभी से वैराग्य ( त्याग ) को क्या कहना ॥ ३ ॥ क्रोधी मनुष्य को शान्ति का पाठ पढ़ाना कामी पुरुष से ईश्वरका गुणानुवाद गाना और असर भूमिमें बीज बोना इन सबका फल व्यर्थ ही जाता है॥४॥ अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा ® यह मत लक्ष्मण के मन भावा ॥५॥ संधानेउ धतु विशिष कराला उठी उदधि उर अन्तर ज्वाला || ऐसा कह कर श्रीरामचन्दजी ने धनुप चढ़ाया यह मत श्रीलक्ष्मणनी को अच्छा मालूम हुआ ! ५ ॥ और धनुष पर बड़ा कराल वाण संधान किया जिससे समुद के हृदय में बड़ी ज्याला उत्पन्न हुई ॥ ६ ॥ मकर उरण झप गण अकुलाने जरत जन्तु जलनिधिजब जाने ॥७॥ कनक थार भरि मणि गणनाना चित्र रूप श्रायो तजि माना और मगर साँप, मछलियाँ इत्यादि बहुत घबड़ाने लगी, जब समुद्र ने इन जीवों को जलता हुआ देवा ॥ ७॥ तब सोने के थार में नामा प्रकार के मणि मादिक रत्न लेकर और अभिमान को छोड़ श्रीरामचन्दजी के पास पाहाण - 38 SALFASPSNESoffer तुलसीकृत रामायण रूप धरकर आया ॥८॥ PHORANIKHABARRRRReature- दोहा-काटे पै कदली फरै, कोटि यतन कोइ सोंच। विनय न माग भगेश सुनु, डाटेहि पै नव नीव ॥६२ ॥ कागभुशुडजी कहते हैं कि हे गरुड़जी ! के काटने ही से फरता है चाहे कोई करोड़ों यत्न करके सींचे परन्तु नहीं फलता, इसी प्रकार नीच मनुष्य डाटनेही से दवता है विनय करने से नहीं ॥ ६२॥ समय सिन्धु पद गहि प्रभु केरे ७ छमहु नाथ सब अवगुण मेरे ॥१॥ गगन समीर अनल जल धरणी इनकी नाथ सहज जड़ करणी ॥२॥ समुदुने भयसहित श्रीरामचन्दनीके चरण पकड़ कर विनती की कि हे नाथ! मेरे सब अवगुण क्षमा करो ॥ ॥ क्योंकि गगन, अग्नि, पवन, जल, पृथ्वी इनके तो कार्य स्वभावतः जड़ होते ही हैं ॥ २ ॥ तव प्रेरित माया उपजाये छ सृष्टि हेतु सब अन्यन गाये ॥३॥ प्रभु श्रायसु जेहि हैं जस अहई छ सो तेहि भांति रहे सुख लहई।४॥ हे नाथ ? सब ग्रन्थों में ऐसा प्रसिद्ध है कि भापको प्रेरणाले ये रस्तुयै मायाने सृष्टिके हेतु सत्पन्न की हैं ॥ ३ ॥ और जिसको आपकी जैसी श्राज्ञा है वह सी प्रकार रह से सुख पा सकता है अन्यया नहीं ॥४॥ प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दोन्ही मर्यादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं ॥५॥ ढोल गंवार शूद्र पशु नारी ® ये सब ताड़न के अधिकारी नाथ ! आपने जो मुझे शिक्षा दो सा तो अच्छाही क्रिया परन्तु यह मर्यादा आपही की गांधी हुई है ॥ ५ !! ढोल, गवार शद, पशु और स्त्री ये सर ताड़ना ही के अधिकारी हैं अर्थात् ताड़नेही एर ठीक रहते हैं ॥ ६ ॥ प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई छ उनरहि अटक न मोरि बड़ाई ७५ प्रभु आज्ञा अपेन्त श्रुति गाई ४ करहु बेगि जो तुमहि सुहाई ॥८॥ हे नाथ ! यदि मैं श्राप के प्रताप से सूख जाऊँ और आपकी सेना पार उत्तर नावे तो इसमें मेरी मर्यादा जाती रहेगी ॥ ७॥ और वेदों में कहा है कि आपकी आज्ञा घटल हैइस कारण जो आपको अच्छा लगे तो शॉन कीजिये ॥ ८॥ दोहा-सुनतहि वचन दिनीत अति, कह कृपालु मुलुकाय । जेहि बिधि उतरहि कपि कटक,तात सो कहहु उपाय ॥ ६३ ॥ ऐसे नम्ता से भरे हुए वचन सुन श्रीरामचन्दनो ने हंस कर समुद्र से कहा कि हे वात ! जिस प्रकारसं यह बन्दरोंकी सेना समुदके पार जाय यह उपाय बतलानो Prima है Piroine a *सुन्दरकांड सटीक [५५] नाथ नील नल कपि दोउ भाई लरिकाई ऋषि आशिश पाई ॥ तर समुद्र कहने लगा कि हे नाथ ! मल नील जो दो भाई है उन्होंने लड़कपन में ऋषि का माशीर्वाद पाया है सो इस प्रकार है ।। श्रथ क्षेपक सरिता निकट रहे मुनि छाई ७ करहिं उपद्रव तह दोउ भाई ॥१॥ आँख मदि मुनि ध्यान लगा छ तव ए ठकुर को ले जावै ॥२॥ किसानहरीके किनारे कोई मनि रहते थे, वहां यह दोनों भाई नल और नील बदा उपाव करते थे। ॥ सा इस प्रकार कि जब वे श्राख बन्द कर अपने इष्टदेर का ध्यान लगाते थे उसी समय ये ठाकाजीको चुरा ले जाने थे ॥ २॥ सो जल में सप देहिं . यहाई ७ तय मुनि शाप दियो रिसिमाई ॥३॥ वस्तु तुम्हारि छुई जो हाई ७ पानी पै उतगवै सोई nu स्थिर तह रहे चलै सो नाहीं छ तब ये कछु समुझ मन माहीं ॥५॥ भोर उन्हें जामें डाल देते थे जिससे मुनि लोगों को पढ़ा कर पहुँचता था, सब गुमने क्राधित होकर श्रार दे दिया . १॥ कि जो वस्तु तुम्हारी छुई होगो वह पानी पर स्तरायगी ॥५॥ ओर स्थिर रहेगा चलेगी भी नहीं. तब इनके हृदय हो कुछ घेत हुभा ॥५॥ इति क्षेत्रका तिनके परस किये गिरि भारे तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ॥२॥ उन न नील छूपे हुए बड़े बड़े मारी पर्वत आपके प्रताप से समुद्र पर तैरनेलगंगे में पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई से करिहौं वल अनुमान सहाई ॥३॥ यहि विधि नाथ पयोधि बधाइय जेहि यह सुयश लाक तिहुँ गाया। ओर मैं भी आपके प्रताप का हश्य में धारण कर अपनं बल के अनुवार सहायता करूंगा ॥३॥ मोहे काय ! इस प्रकार से शाप समुद्र में पुल बँधवाइ जिम और की यह सुकीर्ति तीनों लोकों में विदित हो और गाई जाय ॥४॥ यहि शर मम उत्तर तर वासी हतहु नाथ खल गण अघरासी ॥५॥ सुनि कृप लु सागर मन पीग तुरतहि हरी नाम रण धारा ॥६॥ और इस बाण से (जो कि भार धनुष पर चढ़ाया है) मेर उत्तर दिशा के निरासी जो कि दुष्ट और पापों की शसि हैं इनका संहार कीजिये ॥५॥ कृपालु श्रो- रामचन्द्र जी ने यह सुन कर समुद्र के हृदय की पीड़ा उसी समय दूर करदी १९ देखि राम वल अतुलित भारी हर्षि पयोनिधि भया सुखारी 193 ल SHREATENaarak

RERNSmarware
terapeseta Manado suena manente
सकल चरित कर
धं सिघावा ॥
समुन्द्र श्रीरामचन्द्रजी के ऐस अतुल पराक्रम को देखकर बड़ा ही प्रसन्न और
सुखी हुश्रां ॥ ७ ॥ श्रीगमचन्द्रजी को सर हाल सुनाकर और चरणों की वंदना
कर समुद्र चला गया ॥८॥
छन्द-निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहिं यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मन हरण जस मति दास तुलसी गायऊ ।।
सुख भवन संशय दमन शमन विषाद रघुपति गुन गना।
तजि श्रास सकल भरोस गावहिं सुनहि सन्नन शुचिमना ॥
समुद्र अपने स्थान को चला गया और रामचन्द्रजी को यह मत बहुत अच्छा
लगा । सुख के घर संशय के दूर करने वाले दुख के नाश करने वाले कलिकाल के
मल को दूर करने वाले श्रीरामचन्द्रजी के इन गुणानुवादों को श्री गोस्वामी तुलसी-
दासजी ने अपनी मतिके अनुसार वर्णन किया सो जोसज्जन सप आसानों को त्याग
कर इन गुणानुवादों को गाते अथवा सुनते रहते हैं तो वे बड़े सुख को प्राप्त होते है
दोहा -सकल सुमंगल दायक, रघुनायक गुण गान ।
सादर सुनहि ते तरहिं भव, सिंधुविना जलयान ॥४॥
श्रीरामचन्द्रजी का गुणानुवाद सब सुखोंको देनेवाला है जो लोग श्रादर सहित
इसे सुनते हैं वे सब भवसागर से बिना नौका के पार हो जाते हैं ॥६४ ॥
इति श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासकृत रामचरितमानसे (रामायणे)
कलिकलुषविध्वंसने विमल वैराग्यसंतोष
संपार्दनीनाम सुन्दरकांड पंचमः सोपानः समासः ॥५॥
THRASESEGMERICASTE
सकल
.
दोहा-जीरी जिला लखीमपुर, सीताराम सुधाम ।
सुंदर की टीका लिखी, संतजीवनो नाम ॥५॥

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लीजिये! लीजिये !! लीजिये!! * श्रीमदोस्वामी तुलसीदासजी की रामायण २) रामायण सूल मध्यम गोस्वामी तुलसीदास जी के हस्नोलग्विन प्रति से यह छपी है। सचित्र पक्की जिल्द का-- रामायण टीका मध्यम यह सुन्दर चित्रों के महित. मरल हिन्दी भाषा युक्त. सुन्दर कागज पर छपी पुस्तक बहुत ही शुद्ध है । रामायण गुटका उपहारी, गोस्वामी तुलसीदास जी नंगेज के पाठ करने की विधि जो पृथकर बताया है उसीको मैंने बड़े परिश्रम तथा व्यय से प्राप्तकर, बहुनही शुद्ध प्रकाशित किया है। मूल्य ग्नेज कागज को पुस्तक का केवल- ५) १) HERITAL पुस्तक मिलने का पता- बाबू बैजनाथ प्रसाद बुक्सेलर राजा दरवाजा बनारस सिटी। aine

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Ramayan Sundar Kand

Author
Pandit, Sitaram
Title
Ramayan Sundar Kand
File name
Ramayan Sundar Kand
Text
OCR done
Published
2009/10
Publisher
Benares, Bishweshwar Press Kashi
Language
Sanskrit
Pages
68
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Sundar kand
DLI number
345566
Barcode
99999990233901.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
jmSgG4lndtL
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