Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Sati Jasma
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भारतीय श्रादर्शनारं सती जसमा जिसको भारतीय समारियों के हितार्थ श्रीमती स्वर्गीया राजकुँचर वाई की पुण्यस्मृति म श्रीमती सेठाणी प्रानन्दकॅनर राई की तरफ से सम्पादक- बालचन्दजी श्रीश्रीमाल प्रकाशक सेठ बदीचदजी वरदभानजी पितलिया कर्म रतलाम स्थमावृति १००० म्य सदुपयोग वीर निर्वाण सं०२५७२ प्राप्तिस्थान- श्री मा० जनपूज्य श्रीहुक्मीचदजीमहाराज की मम्प्रदायका हितेन्छु आवक मडल रतलाम पोस्टचार्ज के लिये ) दो पाने के टिकिट पाने पर भेजी जावेगी। riyar वायू चिम्मनलाल जैन द्वारा श्रादर्श प्रिटिंग प्रेस, अजमेर
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--.0. art4 Co .. ५.०० - Oavan- जिनकी पुण्य स्मृति में यह पुस्तक भेट दी गई है. ०७० 10 श्रीमती सीमाग्यवती रानबरनाई जामसं० १९६१ निधन म.3000 धमास पृप्या ३ पाल्गुन शुला। रन साल २० D-Reature - विन परिचय मालवान्तर्गत रतलाम शहर में सेठ अमरचन्दजी साक्ष्य पितलिया प्रसिद्ध पुरुष हो गये हैं आपकी रयाति समाज में व्याप्त है। आप ससार पक्ष में श्रीमन्त लक्षाधिपति एव राज्यमान्य पुरुप थे। रतलाम ,नरेश महुर्म महाराजा श्री रणजितसिहजी साहब बहादूरने आपको सेठ, पदवी व दो घोड़ों को धगगी एनायत की थी तथा पालखी आदि अन्य लवाजमा भी घक्षा था जो कि साधारण लोगों को रियासतों में नहीं दिया जाता। श्रीमान् सेठ साहय राज्य मान्य होने के साथ ही साथ प्रना में भी गण मान्य पुरुष थे। रतलाम के साहूकारों में आपको दुकान प्रतिष्ठा पान मानी जाती है। सार्वजनिक कार्यों में विशेष भाग लेते थे इमसे जनता श्रापको सम्मान की द्रष्टि से देखती थी। धर्म पक्ष में भी प्रापघद्धावान एव विशेपक्षधे घड़े प्राचार्योध सन्तमतियों की सेवा की यी व उनकी पाणो अपण करके मनन करते थे जिससे आपकी प्रज्ञा पाहव तेज यन गयी थी जल में वेल तीवरह पारका शान सुविस्त बन गया था निससे शास्त्रीय -- [] गात काममाधान धाप उत्तम गैलीम करतय यही फारए हैपि वार मे जिमुमों के प्रश्न पाया दो परते थे। मोरपी का फ्रेम के समय रानकोट पियामी राव महादूर भीमजी मार मोरानी सो आपकी प्रहरय वेप में साधु फ सम्बो धा से पहचान कराते थे। और आपको गुरु स्था। पर माफर सम्मान करते थे। सनर रत की पांगी थाइराज दुवर का यह पित्र है। मेठ अमरपन्दपी के मुपुत्र सेठ घरदमागमो माइप को स्थानक घासी 37 समान में कौन ऐमा होगा पो नहीं मानता हो थापफा स्वर्गवास हुए स्वल्प समय ही हुआ है परन्तु समाज पापको पार पार याद करती है। आपके वियोग का दुख पदवी है। आप भी अपने पिता की तरह समान म पमक्ते सितारे धे ससार पक्ष पर्म होता में भाप प्रतिधिन मान जाते थे। श्रीमती रानपर याईमिका थिन प्रापक ममत है स्वर्गीय सेठ यर भागनी माय की पुत्री थी सुसस्कारों के कारण बचपन में ही धार्मिक य व्यापहारीफ शिक्षा प्राप्त हो गई थी। स्वभाव से हंसमुख न मिलनसार प्रकृति की थी। इनका विवाह मन्द- सौर निवासी भीमान् सेठ पतामी तिलोकच दजी की फम के वारिशान म से बुयरजी श्री सूरजमल नी साहय महेता के साथ म. १६६६ मे हुरा था। विषाह होने के ढाई वर्ष याद श्रापको एक पुत्र का प्रमय हुषा था उसी अरशे में मठ वरद माणनी साहब का * [३] स्वर्गवास हो जाने से इनको पिता श्री को अन्तिम भेंट न होने के कारण गहरा आघात पहुंचा। शारिरिक निर्यलता में यह मान सिक आघात लगने से इनके शरीर में बिमारी ने जड घाल दी जो कुछ समय बाद भगकर रूप धारण कर गई। सेठ वरद भाणजी साहब की सन्तानो में पुन न होने से बाई की विधवा माता ने सभी शक्य उपचार किये परन्तु सफलता प्राप्त न होकर निराशा ही साम्हने प्रायी तय श्रापकी माता ने हिम्मत धारण कर आलोचना व त्याग प्रत्याख्या कराके धर्म श्रवणादि साज दिया । पाई ने भी अपने जीवन की यह दशा देख- फर सबसे क्षमा याचना करते हुए परमात्मा के शरण में अपना जीवन समर्पण कर दिया। इनकी पुण्य स्मृति में रूपे पदरहमो श्रीमान् सेठ सूरजमलजी साहय महेता ने और रूपे एक हजार श्रीमती सेठाणीजी प्रानन्द कुधर बाई (इनकी माताजी) ने निकाले उनमें से कुछ रकम तो छुट कर जन हितकारी कार्या व सस्था ओंको दी है और यह पुस्तक बाई की "पुण्यस्मृति में आपके कर कमलों में पहुँचाई नाती है। भवदीय चालचन्दवीधीमाल
मकाहाक.का निवेदन
या क्रान्दियुगस नेक मनुष्य अपन्न उन्नति के
दिय प्रयन कर रहा है किन्तु हमारे प्रद्धाइ नियों का एइस हम
माफ बढ़न कम दिखाई देता है । ये अपने मात्र मृगर और
पौर मार्या में हा पत्रकारा नहीं पाती हैं न इनकी ममुचित
शिला काही प्रमय है न इनऊ माग्ने बम आश ही है।
श्री माधुमार्गी जैनपूज्यश्री हुकमीच दनी महापत्र की सम्प्रदाय
कागु भारगडल के अवैतनिक मत्री श्रीयुत यासचदजी
श्री श्रीमान न यह पुस्तक तैयार की थी किन्नु वर्तमान युगंपिय
महायुद्ध के कारण मायन मामग्री का अत्यधिक महगाई के
कारण प्रकाशित नहीं करपारे।
इधर सियाई रामघर या अमामयिक वियोग होनाने से
उसमी लौकिक क्रियाओं में विशेष व्यय न करते हुए उसकी पुण्य
स्मृनि म को मियोपयोगी कार्य करन की मेरी इच्छा हो रही थी
कि यह पुस्तक मेरे निगाह में भागयो देखने से स्त्री जाति के
उत्थान म, ननको अपनी वास्तविक स्थिती का मान कराने में
यथा अपना धम फम समझने समझाने म अत्युपयोगी मालुम
हुई इसलिये यह पुस्तक धाइ की पुण्य स्मृति में प्रकाशित करता है।
यहां यह प्रकट करना भी उचित प्रतीत होता है कि उक्त
पुग्नक का मेटर श्रीयुत पालचन्दनी ने सह निःशुल्क दे दिया है
एतदर्य में उनका श्रामार मानता हूँ।
प्रकाशक
अाभार प्रदर्शन -- कोई भी लेसक साहित्य तैयार करता है तो उस किसी न किसी प्रमाण भूतसाहित्य या वक्ता का आधार लेना ही पड़ता है विगेर आधार लिये तो अतिशय नानी ही स्वतन्त्र प्रति पादन कर सकते है। श्री मज्जौनाचार्य स्वर्गाय पुज्य श्री १००८ श्री जवाहिर लालनी महाराज साहन के सुशिष्य श्री श्रीमलजी महाराज स० १६६० में दक्षिण पधारते समय यहा विराज ये उस समय भावना धिकार में यह कथा गरी सहित गायन करके फरमाई थी तय मेरे हृदय में यह सूरणा हुई थी कि ऐसी कथा ओं को साहित्य के रूप में जनता के समक्ष रखी जाय तो ससार का थोर सास कर स्त्री जाति को अधिक लाभ हो सकता है क्यो कि हिन्दु जाति में से हलकी मानी जाने वाली ओड जाति में भी ऐमी २ घोराग नाए हुइ है जिहोने अपूर्व त्याग का उच्चादर्श रख कर अपने पति प्रत धर्म की रक्षा की है तब आज उच्च हिन्दु जाति में उत्पन्न हुई स्त्रियों को क्या करना चाहिये और क्या कर रही है इसका बोच पाठ मिले । परन्तु उछ ममय तक तो वह स्फूरणा यों हो रही याद भाष नगर से प्रकाशित होते हुए जैन पत्र के भेंट स्वरूप "शान्तु महेता" के भाग आये उनको देखने पर तीसरे भाग में कुछ प्रकरण "सती जसमा के पढने में आये वे पढते हो इसे नित करने की मेरी इन्चा बलवती शुद्धिपत्रक अफ सशोधन करते हुए भी असावधानी से धुध २ भूलें रह गई है सो सुधार कर पढ़ें। पृष्ठ पक्ति . शुद्ध प्रण पत्ति २ ६ परन्तु तटार ३ . नरीक्षक निरीक्षक ३ सन्दश्यता सन्दाता ३ ७ जाति जाता ५ १६ एवं . मनोने ५२ १५ स्मृतिपरम स्मृतिपट मनोन विकत विकृत १२ १० देते हुए देती हुई पिछा पिछला ७५ १८ १६ १० पालद मान भान घलद ३ प्रत्युर प्रत्युत्तर ११ छोड़ाना छोडना मीर १२ छोडना छोडाना १८ लोगों का लोगों की १४ भोनलदेवी मीनलदेवी ५ जाते हैं हो जाते हैं । ११ स्तसाधु स्तध इसके सिवाय सबसे बड़ी भूलें तो कई जगह पैरा पदलने, तथा वाक्यों को टीक रूप में जमाने की है जिससे भाव समझने म गरपड हो जाती है। परन्तु वह शुद्धि में नहीं दी जा सकती। मार सनव्यय सम्पादक कविता शासी- महेम पड़े मन्दिर पड़े, पड नाम नठाम ।। एक पड़े नहीं जगत मे, यश कीर्ति अभिराम ॥१॥ (पूनमपान्दमो का पाल में) गरवी-गाजे पाटणपुरमा गरवी गुपरनो धणारे, सांचो सबलो पेलो सोलकी मिद्धरान, जैनी कौति व्यापीरहो छ अाजगमाघणीर ॥१॥ तणे लोको काने धाव फुवायधावीयारे मोटा मान सरोवर देवल धाम विशाल, पोपी सब प्रना ने शनु सर भावीया ||२|| शास्त्री- धैर्यवान गुणवान थे, शूरवीर नीतिमान् । सोलंकी सिद्धरान ए गिरवागुण नी खाण ।। गरवी- तेणे पाटणपास एक सगेवर बादपुर खोदे साडात्यातो मालवी प्रोड धनक, श्रोडणो पालेनासे सारी माटी टोपलारे ॥ ३॥ शाखी-- थोडकेरी नारीश्रो, ज्याकरतीनानारंग। हसती पुदती दोड़ती, रेलती प्रेम अभंग ॥ गरवी- पाले वडनी डाले भूले बालक पारणेरे, माटी लेता जसमा अलाये निजबाल,- बलतां मुखड पेसों जाय वा नेपाom . [.] शाग्मी-प्रेम नाजाय जममाणो दिमाशमोन हायभूभाय पालन, हिरमोहनमोर ।। गरवी-मात्यात गारो पर सात पानी रंगीशी परम था, पासमानराजारमुखत् मुन्दरीरे ॥५॥ शासी-जसमाने यावर्ग,रामामूल्यो भार। अपविधापारने कोणमादधाण ॥ सिद्धरा-माटीवरेवान पाकोमलकायाकरीनधी, पाजस्मीने सरींजव सारो पाल, योनी प्रोडणी काम करें तारी वसीर ॥६॥ शास्त्री~ नाममुहालोदे, सोदनेतू कर माय ॥ साहायलाइबालन, मारवेणी साप । जसमा- जम्मा कई सपना, काम करो सायुगमेरे मुगने येसोरहता धाध अगेरोग मारानयराबहाडा येठेनयोजाएदीरे॥७॥ शाखी-दायमारोबाराछे उरमापतिभाव हेयु मुहाल होयत्या, शु कायानु काम ॥ सिद्ध- समा जंगलमा बसवाने तू सरजीनथीर भारानगर तणो तू प्राचीने जो नोक, पारण पुरनीशोभा हु तुजनेशीक्रे॥८॥ शासी- बसे जगलमाइरणिया, वमे वाघने नाग ।
जसमा पनमासिदने धमेनी सुदर बाग जसमा- रावा अन्धारी शेरी ने अंची मडियोरे, तेमा माणसमाटे चाल्यानोनदीमार्ग, जाणे उनाले उभराती देखु कीडीओरे ।। ६ ।। शाखी- सेव्हालनीवापणो घसेसिही सुनाण ।। शुषसोजाणेजगले योरणनरनादान ॥ सिद्ध- जसमामाणसबहुदेखीतू घेलीयनेरे ताराहलकामनमाऊठे हलफाघाट नफले खासरानी खिस कोली शाकररबादनेरे ॥१०॥ शासी- शहरीजनना सुररानी कोडीने शुभान ।। सर शाफरने अवगणे सुणेन मीठमान ।। जसमा- राजामेलामन माणमना मेला शहेर नारे, मेली गलियोमा बहुमारे छे दुगन्ध ॥ मेला जहरतणाजीयो छे जीवेजहर मारे ॥१॥ शासी-निर्मल सीमकोलीहा टेडकने न सुहार ॥ फादव भोगी थापड़ी कादयमामलकाय ।। सिद्ध- जसमा राजाना दरयारो तें जोया नधोरे, तेमा याग बगीचे खोल्या छे बहु फूल, जलना होज कृ धारा उडे आवीजो सहीरे ॥१२॥ शाखी- उचो गढ़ दरयारनो, गोसे गोरी गाय, जाणो स्वर्गनी सुन्दरी, रही श्रही लोभाय ॥ जसमा- - जगल पागल नाग बगीचा धूल छेरे, [४] यो सूरत पागल तारानो चिलफाट, मारा जंगलनी मोतृतो मोघे मूल्य छेरे ॥१॥ शापी- सोना फदि पाउरे, मेना जो पुराय ।। साता पीता भखती जगल नी बनराय ॥ सिद्ध- जममा जगलनी वावो तू बाज विशारजैरे, मीठा नरघाने सारगो केरासुर, गायन सुणवान याने तू म्हेले भावजेर ॥१४॥ शासी- महले महले माननी, ये गाने गुलतान ।। तेने नयण निरसवा, भूलो जगल भान ।। जसमा- राजा नय रो नरपा मारमी सूरधीरे, 'मेना मोर पपैये टेव्या छे मुमकान, वातो कोयलनाटहुकानी तो हुँकहेवी नवीरे ॥१५॥ साखी- जड माराचे जह धोया, चेतन घेतन दान ।। मुम भावे छे कोकिला परती पथम गान ।। सिद्ध- प्रोडण श्रावो तो उतारू मन्दिर मालियेरे, रहनो मित्र सहोदर सर्व सम्बन्धों साथ, तमोने प्रियजनो मानीने निशदिन पालशु रे ॥१६॥ साखी-- राज्य भुवने भावीपसो, पननीछोड़ी पाश ।। हेमहिंडोले डियनो, माणो दिव्य विलाश ।। जसमा-श्रोडण ने स्तरवाजोइये मण्डारे, मेहीमाले मुभने श्रावेर, चढ़ता [+] पहतां पगभांगेने फाया थई जाय कुबडीरे, ॥१७॥ सासी-बडवड़ाई पहलातणी, ममहिंडोलासाट । पृक्षवेली प्रायास , शु कहुँवननी पाव।। सिद्ध- श्रोहण पावो तो पिरसा मेवा चूरमारे, मुने हाथी घोड़ा गुजरपतिने द्वार, तेने पेखीने होशो 'प्रोहण अरमारे ॥१८॥ मासी- सोना केरा थाल ने, रत्न जडित याजोट ।। समो रमो जसमाप्रिये, मुकीमननी छोत ।। समा- राजा श्रोडण ने व्यालु नोइये घेसनारे, राजा शुझे मारे ह्य हाथी नु काम, नहीं ने दुध मजेना मारे भुरी भेंसना रे ॥१६॥ सासी- पागीपीपणनीरनु फूलथी घेला अवाय ।। पामीपोपणक्षीरनु, तेजपले करमाय ॥ मिद्ध- श्रोडण मांगोल्योने श्राधाशालु ओहनारे, हीरा माणेक मोती सोनाना सिणगार, श्रावी कचन वरणी काया पर शोभेघणारे ॥२०॥ सासो- हीरा क्सी जरियन तणा रेशमी चोली चोक ।। श्रोहण ओडोहोंसथी ते विन जीव्यु फोक ।। जसमा- राजा नाडाटक्से श्राछाती फाटीजसेरेफो नाखु घास पोठी गठीकठे हार, होरा मोतीने सोना मा तस्कर भयवशेरे ॥२१॥ . न साम्नी- मीणावाशिम हायना, जाड़ा और ओहण । पतियों का पालनपी, रेशमी जरीपनमेन ॥ सिद्ध- जसमा फहे सू मुम्ने फेबोरे तापे पति रे, सारा जेको समनु नारी जेन पेर।। एना जेपो मुखियो भागमा पोजीरे IRE सासी- तुजवाशिमनीयातही, मुकी माल । प्रेमी युगली प्रांगणे, ऐसदारंग रेल । जसमा- पालो केष्ठ प्रसी काम परे मारो पति रे, आमोलीडामांव्दक थे पहा ॥ जेनी कोदालो ना पायी धरती धूमसारे ॥२३॥ लासी- पास कहूँ शुम्हालनी, मुख थी कही न माय ।। सग होतो सभग शो, प्रा नयण परसाय।। मि-- जोने कामकरंता जुएए बारामतीरे। ऐनामनमा तारो पुरो नहीं विश्याम ।। वारी धुम नजाणे जसमाए तारो पति रे ॥२॥ सानी- गामटियो गुण पोर ते, शुजाणेप्रेमजी रीत ।। व्हेमीए के मेलो शु चाहे तुज चित ।। जसमा राना साधाने भय लेश नधी संसार मारे। मारा पति ने मारो पुरण छे विशवास ।। हुँ तो अन्य जनो ने भाई गणी रहुँ भारमारे ॥२५॥ पारसी- चिवडुतो में आपियु गामडिया ने हाथ ।।
मुज उर गगने गा दिस, एयिणदुओनाथ ।। । राजा- जसमा राजा अरू राहा नहुँ सावकारे, मोटा महारथी पण सामान प्राव गोल, तोपण तारा उपर हुक्म फदी नहीं प्रारू रे ॥२६॥ साखी- जसमा यसमा रायने कही दे दिलनी यात ॥ जोर नथी तारामने नहीं करतो उत्पात ।। जसमा- राजा पायाने माया पर मल नृपतु पस्युरे, प्रभूए जीव घरपो छे जूदो काया माय ॥ मारे भूप सण या तेपर नव चाले कशु रे ॥२७॥ सानी- मनडुमा तनमा नथी, मन थी दूरे नृ॥ मारा पालिम ऊरमां, बसे सदारसपुर ।। सिद्ध- जसमा द्रढता तारी देखी विस्मय थाय छेरे।। थाया दम्पतिने पण अाखिर होय वियोग ।। मिथ्या प्राजगना सुम्प मारे मन मुजायघरे ॥२८॥ साखी- नेकटकेधारी सती धन्य • अवतार ।। दम्पति केरा दिलमा सत्य प्रेम प्रचार ॥ जसमा- राजा कोई न जाणे फाले मारू शु थसेरे, एपी अल्प जिन्दगी माणे प्रा सौ लोक, रुदी रेणी सुख परलोके पूरण प्रापशेरे ॥५६ । साखी- भुठो था संसारछे, झुठो जग व्यवहार ।। सांची स्वामि सेव छ, सत्यएज संमार || [-] सिद्धराज-जसमा पहेलु के श्रापीजु परणित ताहररे, घोडणधो मारो म्यामि प्रये प्रेम ॥ मारा महेल थी सुग्म फेQतारे में पढेरे ।।३०|| समा-राना पालोके पग्लो मारोये पतिरे प्रितेपरएया माटे छोटू माग प्राण एना शत्रुनु हुँ मुख फटी जोनोनधारे ॥३१॥ पव॑ फहीने जसमा टोपल लेदपाचीफरीरे, राय लीधोवलतो पाटण मेरो पथ, घाछ जसमा ना पतिव्रत नी मातगैरे ॥३२॥ राजा जममानीरस्मी थी विहल तो थयोरे,.. निसदिन श्राये मनमा जसमाना विचार, पनी मुख तरमा निद्रा महुँ उद्धी गयारे ।। ३३ ।। लालचई जसमा ने रश फरया उतारे, यस्त थी करपी मारे पने मुनाधीन, एधो पापी निश्चय राना छ मनमा क्यारे ।। ३४॥ अहिश्रा कममा पण पात घीपतिने फरीरे, कलियुग यासियो छे था राजाना उरमाय, पाव टकाणे त रहेव लानिम जरीतहीरे ॥३५ ।। बीना श्रोडलोगो सटु आवाते टुग्घिया थयारे, आध्यो त मरेनो राना पर रोश [] मोटापरोहमा सहु पाटण बोडी निसार ।। ३३ ।। राजा बीज दहाडे जसमा ने जीवा गयोरे, कीधु जसमा साटे असमानु दर्शन, एने शोधाग्नि नो जोर सांग व्यापियोरे ॥ ३७॥ राजा दुर्वद्धि थी जममानी पुठ पड्योरे, साथे सर्वे सजेला लीधा घाडेश्वार अधपचरस्ते राजा श्रोडो ने जाई अड्योर ।। ३८|| . रूड़ा श्रोडो शुरा टेकी माला देशनारे, इलका मन छता जातिनो अभिमान जसमा सातर मौए पाव्या मरण पावशमारे ।। ३६ ।। आपणे जीवता राजा जसमा ने शु लईनशेरे, इज्जत जाता जीवतर विकमन्यु गिणाय परहित मरता प्रभू स्वर्ग सणां सुरस पापशेरें ।। ४०॥ जसमा अड़ग उभी रही राजा ने विनति करेरे, राजा रकननोने सित्सताप श्राम हूँतो पूज्य भाव थी पितागणी ने ऊपरे ।। ४१।। राजा रक्षक थइ शीद भक्षक थाए अमतमोरे, नयी नयी घटतो नृप ने प्रावो अत्याचार । तारी उज्वल कीर्ति जोतामा माग्नीधारे ।। ४२ ।। म्हारे तो राजा के महाराना आ मारो पतिर, ।
मालवान्तर्गत डूगर प्रा से थोड लोगों को बुलवाया था
उनमे 'टीम' श्रोड और उसको पल्लो जसमा प्रोडण भी थी।
जसमा युवति होने के साथ २ सुन्दराकृति मी थी। जिस
तालाब की पाल पर मिट्टी डाल कर आती हुई गुर समाद
महागा सिद्धराज ने देसी दिखते ही उस पर मोहित होकर उसकी
अपन महलों में लेजा कर रानी बनाने के लिये महाराजा ने थाई
प्रकार से अनुनय ररते हुए अनेक प्रलोभन दिये परन्तु जसमा उस
प्रलोमन में जरा भी न फसी सती का जवाब सुनकर महाराज
को भी दग रह जाना पहा । अब कोई दूसरा उपाय शेप न रहा
तो सता ने अपने नैतिक धर्म पर अडिग रहकर द्रिय सयम
और धीरता का परिचय देते हुये अपना बलिदान देकर समार
के सामने स्त्री धर्म का उच्च आदर्श उपस्थित किया है।
जसमा का जीवन सो पवित्र था ही परन्तु उसमें इन्द्रिय
सयम और मनीपल भी उच्च कोटि का था। क्योंकि महाराजा
मिडराज ने उसे लुमाने के लिये पान पान, वस्त्राभूषण, ma
नान, मइल मन्दिर आदि पदार्थों का श्रामण किया था।
इतना ही नहीं प्रत्यारह भी दिया था परन्तु वह जीवन
पवित्र बनाये रखने के लिये कामदायों को विघ्न रूप समझती
थी इसलिये उस एन्ही भोग्योपभोग्य पदार्था को ५ जगन
रहवाम को महत्व दिया जिनसे कि अपना जीवन पवित्र ना
रहा प्राज उत्तम उत्तम घराने की स्त्रिया ने अपना मान पान
PEARED TRat famx दिया है कि यद्यपि व पवित्र जीपन
है
--
[१३] बिताती हागी परन्तु लोक व्यवहार में उनका जीवन शका शील ही माना जायेगा। धर्म रक्षा प फर्त्तव्य पालन सादा येष भूपा और सादगीपूर्ण रहन सहन से हो पा पाता है नसरे वाली पोशाक से नहीं। अब तो अनेक उत्तम जाति कुलकी अङ्गनाए अपने सान पान, मोज शोक तथा पेशो पाराम के पीछे अपने धम फर्म को ही भून रही हैं। और अपनी जाति, समाज और देश को कलकित कर रही है। इतना ही नहीं मोका पड़ने पर फायरता का परिचय दर गुडाओं की शिकार बन जाती हैं। जरामा विकट प्रसग देखते ही वे खुद तो घबराचे द्दी पर पुटुम्ब के मनुष्यों को भी घयग कर उन्हे हिम्मतहार बना देती हैं। उनके लिये जसमा का यह चरित्र बोघ पाठम्मरूप बनेगा। जसमा महाराजा के डराने धमकाने पर भी नुभित होकर अपना आपा न भूली परन्तु द्रढता के साथ जैसा का जैसा जवाब दिया जिससे महाराजा भो आगे बढ़ने का साहस न पर समें पोर न बजाकार ही। माय हो साथ इस चरित में गुजरात फे महामनी शान्तु महेता की विवेक शोलता, दूरदर्शिता,एने प्रत्येक घात की सावधानी आश्चर्योत्पादक है। महाराजा के कृपा पात्र होने पर भी हो में हा न मिलाते हुए महाराना के पने में मी हुई जसमा यो मुक्त कराने के लिये निर्भीकता पूर्ण सत्य • सुना देना कम महत्व की यात नहीं है। ऐसे मत्री जिस राज्य में हो वह राज्य, वह देश समार में उन्नत क्यों न हो। यद्यपि उस समय भारत में यवन बादशाहों का प्रवेश हो चुका था फिर भी भारत के लोग परतन्त्र और पगधान नहीं बने थे प प्रपो दश प धर्म की रमा कान में फटिपद थे। गुटायों से घर कर जान पचा ले। पस नही परते थे भापितु योरता पूर्वक मुकाबला करके हमले २ प्राण दे दना अपना फर्नय माते थे। 'शान्तुमहता' भनिय नहीं अपितु पणिप कौम का था और जैन धर्मी थायर था पापार्य श्री श्वचद्र सूरि फा उपासा था यह दोनों समय प्रति प्रमण तथा धर्माराथन करता था धोर देश रक्षा के लिये प्रसग उपस्थित होने पर शस्त्रों से मुसग्निस होकर युद्ध में भी उतर जाता था उत्तर में काश्मीर तक जाकर जिसा सलवार यजाई थी और गुजरात को महागुनराव यनाने की चष्टा की थी। मे २ पुरुष व ऐसी २ लिये ही देश और धर्म की रक्षा पर सरत हैं जय धोद जैसी सामा य हिंदु जाति में भी इस प्रकार का धर्माभिमान या तो उस समय की भारतीय उच्च जातियों में धर्माभिमान और सत्व रक्षा किस सीमा तक पहुँची हुइ होनी चाहिय यही विचारणीय है। धन्त मे भारत क मपूनों और सनारियों से पाम करता हूं कि वे क्सन की फासी को फाटे और अपने धर्म की रक्षा के लिये इस आदर्श चरित्र को पढे और वे भाव अपने में भरे निस मे अपने धर्म फर्म की रक्षा करने में समर्थ पनमके । इत्यलम् -लेखक यह वीक से मतलव वणीया बाल का नहीं परन्तु बाणिक का भय हरएक उचनीच स्थिति में बना रहे उन्नति के समय महकार में भाकर फूले नहीं और अयम्नत में अधीर मही पने यही सवानिक है।
भारतीय प्रादर्श नारी
अर्थात्
सती जसमा
सहसलिंग तालाब
प्रथिव्यां त्रीणि रत्लानि, जलमन्न सुभापितम् ।
भूदै पापाण खण्डेपु, रत्नसख्या विधियते ॥
सही समा
-
विद्वानों ने इस पृथ्वी पर तीन प्रकार के पदार्थों को रन
माने हैं यथा--जल, अन्न और सुभापित (वाक्य) क्योंकि इनके
द्वाराससारका फल्णण हो सकता है, प्राण धारण किये जा सकते
है, और जीवन धानदमय धनाया जा सकता है। परन्तु मूद
लोगों ने इन रत्नों को भूल कर पाषाण के टुकड़ों को ही यानी
होरा, पन्ना, माणिक आदि को ही रत्न सल्या दे रखी है। परन्तु
ये रत्न तो जीवन को सुखी पनाने के बदले कई दफा महा दुसी
यता देते हैं।पर जल अन्न और हितकर वचन का प्रयोग तो महा
पुरूप भी करते हैं इसलिये पूर्वकाल के नृपति (राजा) प्रजा के
कल्याणार्थ ऐसे स्थानों की अपने राज्य में सुविधा करते रहते थे
जो इस प्रकरण में दिसाई देंगे।
फामजल्दी और फुर्ती से करो
निरीक्षक ने कहा।
जल्दी फैसे करें यापू।
मेलदार बोला।
कुदाली के दो प्रहार ज्यादा मारो और दो टोकरी ज्यादा
उठवाओ।
येष्ठदार ने प्रश्न छिपा
यदि ऐसा न हो तो?
पैसे कट जायेंगे।
निरीक्षक मे खाई का प्रदर्शन किया।
हम दिन (दाहस्री) मजदूरी नहीं करते हैं यापु ? काम (उधड़ा)
और ठेके में लिया है। मेलदार ने वास्तविक्ता को मामने रखी।
सहलिंगा तालाव
हाँ उघडा लिया इससे अपनी मरजी मूजिर फरना क्या ऐसा
नहीं चलेगा, मजदूरी नहीं मिलेगी।
नरीक्षक ने कहा
नहीं मिलेगी वो हम लोग पाएंगे क्या यापु? ऐसा, कहते
कहते बेलदार ने कुदालीका एक प्रहार जमीन पर किया । मिट्टी का
एक यड़ा ढेफा उखडामाया । उस पर प्राडी कुदाली मारने से ढेफा
मिट्टी के रूप में परिणित हो गया और चारों ओर रजकण उठे।
हाँ! काम ऐसे होता है। तुम फाम जल्दी करोगे तो पैसे भी
जल्दी मिलेंगे और उतने ही मिलेंगे परन्तु खोदने वालों को इतनी
बात सुनने का भी अवकाश कहा था और जरूरत भी क्या थी।
वेलदार ने पास में मिट्टी का देर पड़ा हुश्रा देख फर वुम मारी
अरे । कहां गये सम?
यह रही। पीछे से एक युवती की आवाज आयो। तूही इस
तरह दील करेगी तो दूसरे वो काम करेंगे ही कैसे ? बेलदार मोड
ने कहा।
छोकरा रोता हो तो उसे (हींचा) झूला भीनदू युवति ने
शान्ति के साथ जवाब दिया।
खोदने वाले श्रोड (बेलदार) के समक्ष युवति को उन बोपी
थी। दोनों के रूप और सौन्दर्य में जमीन आसमान जितना अतर
था। परन्तु दोनों का प्रेम घनिष्ट था। दोनों परस्पर सतुष्ट थे । श्रोड
ने धुदाली को एक हाथ में पकड़ कर एक हाथ युवति के कन्ये
६ । - मप साप साय हो धारे थे। हमसे फाम स्पधापूर्यप करने में किन्तु वेगारी की सरह ही | प्रोड लोगों का मरवार शेषम बुन भी पाम करया या इससे दूमर सायी लोग भी काम पित्त मगा पर घण्ट्री सरह करते थे। प्रहण करने योग्य शिक्षा - हम प्रकरण में यह निम्माया गया हसरपारी मुसहरी लोग पधारे गरीय मजूर वर्ग पर अपना रोप गालिय परने लिये किम प्रकार घोंस और साट रपट देते हैं तथा जो अनुपिन रीति से ठग करते हैं । २-पूर्व पाल के महाराजा राग्य कोप को अपनी निजि सम्पत्ति नहीं मार पर पतौर दृस्टी के रक्षा करते थे तथा उसे प्रता के हित में ही सर्च परते थे और इस सरह राजा एवं प्रना का सम्बन्ध प्रविदित पनिष्ट होकर एक दूसरे के सुस दुप के संविभागीयनते थे। आज महीनों और पर्ण तफ मना को राजा लोर्गा के दर्शन ही नहीं होते, न एक दूसरे के वास्तविक मुख दुर को जान ही सकते। अपितु पर्मचारी लोग उलटी सुली कह कर राजा और प्रजा में किस प्रकार मनमुटाव परादेते हैं । जहां राजा और प्रजा या सीधा सम्बध है वहां दोनों तरफ का कुशन है और उसी राज्य की उन्नति है।
२
पूर्व स्कृति और मोह का उदय
-
मनुष्य सभी तक नीतिमान,धर्मपरायण और धर्मात्मा पना रहता
है जब तक कि वह किसी सुन्दराति वाली मनमोहनी स्त्री को
नहीं देख पाता । परन्तु जब कभी ऐसी नव-यौवना सुदरी अपा
नक देसने में आ जाय और फिर भी उसके प्रति वह ध्यान नहीं
दे, उसके लिये कवि कहता है कि,
पन्यास्तएप तरलायत लोचनाना ।
तारूएपसा पयपीनपयोधराणाम् ॥,
-
मठी जसमा ज्ञामौदरापरिलस सिवलीलताशाम्, द्रष्ट्वा फति विकृति मेति मनोने येपाम् ॥ १॥ (পূৰি সুৰ ঘ) भावार्थ -यह पुरुष वास्तव म धयवाद का पान है जो चपल व बड़े बड़े नेत्रवाली, यौवन में मद-मस्त, रद एवं पुष्ट स्तनों वाली तथा निस दुबले घ पतले घर पर निपली लवा शोभ रही है ऐसी स्त्रियों की प्राकृति देग्यकर भी जिस पुरुप का मन यिस्त नहीं होता है। शेप तो इस प्रकार का भाकर्षण सामने आते ही सिंच जाते हैं और अपने गौरव को भूल जाते हैं मो इस प्रकरण में ही दिखाई देगा। घेलदार ! तुम खुद काम न करते हुए केवल ध्यान ही रखते रहो न निरीक्षक दुधम ने कहा। यदि रोया करने लगे तो ये मेरे हाड हराम के न हो जायें ? बेलदार ने स्पा उत्तर दिमा। दिन भर वडा रहना और दूसरों से काम लेना यह भी एक जात की मेहनत ही कहलाती है । दुधमन ने कहा । सदा रहना और पैठना यह तो श्राप लोगों को हो शोभे यापु ? हमारे तो कुदाली भली और धरती भली, पावड़ा भला और मिट्टी भली। दिन के समय धरती माता को घण घणाना और रात को इसी की गोदी पूर्व मति भीर माई का समय में पाराम करना । मैं जय स्वय पाग नही करू और पंचल हुक्म ही चलाता है तो साथ पाले पप फाम करें। जितना फाम हम स्वय परें उतनाघो हमारे लाम में है। प्रोड लोगों के मुखिये टीकम बेलदार ने जवाय दिया। दुधमल चावड़ा यात करता करता धागे वदा कि उस की दृष्टि एक दम मामने की तरफ पड़ी जिधर से महाराजा मिद्धराज मुजाल गहेता पे साथ तालाब पर पधार रहे थे। महारान को पाते देय फर यह कुछ दूरी तक सामने या और राजसी ठाठ से उमो महाराज का अभिवादन किया धक तरफ सड़ा हो गया। महाराजा सिद्धराज ने सरोवर पर रष्टि डाली तो अर्ध भाग खुद गया था। फाम परापर चलता है न? महाराजा ने पूछा। जी दुधमल ने श्रदय से जबार दिया। श्रर कितने दिन और लगेंगे? महाराजा ने प्रश्न किया। प्रोड लोगों के नायक घेलदार को पई दुधमता घोला । पलो, कह कर महाराजा प्रागे घढे । दुधमल महा राजा के पीछे पीछे हो लिया। दोनों श्रोड लोगों के नायक टीकम श्रोड जहा काम करता था, वहाँ आये। प्रात काल जैसी ही ताफत और ताजगी से सायकाल हो जाने पर भी काम हो रहा था। श्रोड लोगो की कुदालिये जमीन को भेद रही थी। उपरा उपरी प्रहारों से पृथ्वी धम धमा रही थी और उन श्रोड लोगों के 'शिशकारों के साथ ही मिले के हेफे निकल थाते थे । प्रस्ट के सती बलमा पिदुयों से उन घोड लोगोंके बदन तरबतर हो रहे थे। ऊपरसे मिट्टी के रजकण 6 उड़ कर उनके घदन को रग रहे थे। प्रोड लोगों का स्त्रिय टोकरिये भर भर कर सरोवर की पाल पर व्यवस्थितरूप से डाल रही थाक्रमी २ हास्यवश थोड़ी मिट्टी लेकर अपने पति पर सकाल कर विनोद भी करती जाती थीं। इस प्रकार की मजूरी करते हुए भी श्रान दानुभव कर लेते थे। जितना सुखी और निश्चित जीवन मजदूरी करनेवाले लोगों का होता है। उतना साखों करोड़ों का पधा करने वाले श्रीमन्तों का भी नहीं होता। कारण येराव दिन किसी न किसी चिन्ता में घिरे ही रहते हैं। समय पर न खाते, न पीते, न सोते, न आनन्द ही परते। रात को सोते हुए स्वप्न भी वैसे हो देखते रहते हैं। जैसी कि उनको कार्य की चिन्ता होती है। इसी से नीतिकार ने कहा है कि- सन्तोषामृततृप्ताना, यतसुखशान्तिरेवच ॥ मयतद्धनलन्धाना, मितश्चेतभधापताम् ॥ (पागक्यनीतिदर्पण) भावार्थ-स तोप रूपी अम्त का सेवन करने वालों को जो सुख और शान्ति का अनुभव होता है। यह धन के लोभियों को नहीं कारण ये इधर से उधर भटकत ही रहते हैं। महाराना को पाते हुए देख कर उन प्रोड लोगों ने भी कुदा- लिये उसालना सन्द कर दो और एक हाथ म बुदालिये थाम कर
पूर्व स्मृति और मोह। उद्भव
F
दूसरे हाथ से महाराना का अभियादन किया। महाराजा भी
सबका मुजरा लेते हुए खडे रहे।
अमी क्तिने दिन और लगेंगे? महाराजा ने मान किया।
अब अधिक दिन नहीं लगेंगे परन्तु जितने दिन लगे हैं उतने
तो लगेंगे ही। और जमीन को साफ तथा एकसी करने में कुछ
दिन विशेष भी लगे। श्रोडों के नायक ने जवाब दिया।
-
नहर तरफ खुदाया? महाराज ने दूसरा प्रश्न किया।
नहीं बापु । यह तो सबसे पीछे लिया जायगा।
अच्छा-कह कर महाराजा भागे यढे। जाते समय सामने
माती हुई एक युवति को देखी जिसके हाथ में साली टोकरी थी
और वह तालाब के किनारे पर से पा रही थी देखते ही महाराजा
सिद्धराज चमके। पार बार उसको देख कर पहचान गये कि
यह वो वही है जिसको राजगढ की छत पर से उत रोज मैंने
देखी थी। युपति ने अभी यौवन की सपारी पर पैर रखा ही है
अर्थात् विशोरावस्था पार करके पुरयौवनास्वथा को प्राप्त की है।
जथ महाराजा सिद्धराज और राज्यमाता मीनलदेवी सोम
नाथ महादेय की याना से पधारे थे। तय प्रजाने घहुत ठाठे
के साथ श्रापको नगर में प्रवेश कराया था। जगह जगह
महाराजा को हार तोरादि अर्पण करके सत्कार किया था। यह
प्रोडग भी इस रोज सवारी देखने के लिये राज्य दुर्ग की छत पर
सती जसमा चट गइ थी और वहां में महाराजा को अध्य अर्पित करन की सद्भावना में इसन भी महाराना पर पुष्प वृष्टि की थी। उस ममय महाराजा ने उपर दृष्टि फैलाते हुए इसे देखी थी यही स्मररा महाराजा को इस ममय हो पाया। घर यह युयति (घोडनी) टोकरी में मिट्टी भर कर उठा रही थी उस समय फिर दसी उस समय उसके देह के निभग में महाराजा कोसौर्य का पूर्व प्राधि भारनिवाइ दिया। इस समय जो हाथ मिट्टी खूद रहे थे, इन्हा कोमल हाथों ने मेर पर पुष्प वपाये थे। अर्थात् जो हाथ कठिन थे, उनमें भी महाराना को कोमलवा दिखलाई दी। मिट्टी से भरा हुआ उसका शरीर होली खेलने के घार मदोन्मत दिखाई हत हुये नवयौवनासा मोहक दिखाई देने लगा। ओडली (जसमा) मिट्टी डालने के लिये सरोवर के काठा सरफ चली निमके साथ २ महाराना का मन भी सिंचता चला। दुधमल ? महाराजा ने पुकारा। जी, कह कर दुधमल प्रामा की प्रतीक्षा करने लगा। ओड लोगों के नायक को कहना कि काम जल्दी से करें यह फरमाकर महाराजा मु जाल महेता के साथ आगे बढे । खुदे हुए तालाब के चारों ओर चक्कर लगा पर देखा । परन्तु सय देखते हुए भी महाराना की दृष्टि उस प्रोड युवति के प्रति सिंच रहा थी। पासिर घूमते धामते महाराजा और महेता दोनों एक बरगद के माड़ के नीचे पाकर सडे होगये। योडण मिट्टी डालकर उसी माद के नीचे आई जहाँ महा पूष स्मृति और मोह उद्भव राजा और मु जाल महेता सड़े थे। महाराजा और महेता को सड़े देखकर यह शर्मागई और पीछी फिरफर जहा श्रोह लोग सोद रहे थे वहां थाकर बोली। श्राज तो पालक ने मुझे बहुत हैरान किया नींद तो लेता ही नहीं । जाती या पाती थार मृला दे पाना अच्चा ही तो ठहरा श्रोड वेलदार ने कहा। परन्तु महाराजा पड़े हैं। प्रोडण ने अपनी कठिनाई प्रदर्शित की । कहा ? कह कर बेलदार ने एडी उठाकर खडे बड़े नजर टाली । महाराजा माड नीचे सडे ये और मुजाल तालाब के काठे सहा हुन्ना कुछ मालूम कर रहा था। पचे ने अपने बाल स्वभावानुसार मोली में कुदाघुद को और रुदन फरने लगा। में, किस तरह यहा जाऊ। प्रोडण युवति न कहा। इसमे अपने को कैसी शर्म ? श्रोडने जपाय दिया। लज्जा नहीं पारे लज्जा तो स्त्री का भूपण है न । तुम मी अजर आदमी हो-कह कर मिट्टी से भरी हुई दोक्री युववि ने माथे पर उठाई और तालाय के काठे डालकर माड़के नीचे रोते हुए बालक को झूला देने के वास्ते सकुचाती हुई आई। आखिर हिम्मत करके श्रागे पढ़ी और बच्चे को भूला देकर टोकरी हाथ में लेती हुई महाराजा की तरफ तिरछी नजर डाल पीछे लौट चली। श्रागे जाकर फिर एक नजर डाली । महाराजा यहा थे पहा ही पड़े हुए टकटकी लगाये सय देर रहे थे। 4 --
सती जसमा
ग्रहण करने योग्य शिक्षा-
-
।
१--इस प्रकरण में टीकम श्रोड और दुधमल पावडा के
सम्वाद में यह दिखाया गया है कि उस जमाने के लोग काम
करने में ही अपना महत्व मानते थे, खाली बैठे रहने और दूसरों
के ऊपर हुक्म चलाने में नहीं। इमी से उन लोगों के शरीर तन्दु
रुस्त एव घलवान होते थे।२-जीवन का जो थानन्द सामान्य
मनुष्य ले सकते हैं वह श्रीमत और राजसी ठाठ वाले दम्पत्ति
नहीं ले सस्ते, कारण उनका जीवन अनेक मझटों में फसा हुवा
रहता है इसलिये समय पर जय दम्पत्ति मिलते हैं तो उनमें विकार
का प्रादुर्भाव शीघ्र हो जाता है किन्तु शुद्ध प्रेम का तो प्रभाव मा
ही रहता है। ३--खी का परिचय और स्मृति एक ऐसी पलाय
है कि बडे बडे ऋपि मुनियो को भी अपने स्थान से गिरा देती है
तो सामान्य मनुष्य का कहना ही क्या । इसीलिये प्राचारी को
स्त्री परिचय सहवास और पूर्व स्मरण से सदा बचते रहना
चाहिये अयथा उसका ब्रह्मचर्य खतरे में श्रा पड़ता है और
कई साधु नाम घराकर पतित होगये हैं। ४-सजा सकुचाना
और टेती होकर चलना स्त्री के भूपण हैं पर ये ही क्रिया कामी
के लिये शूल है। भरि ने भी इसे प्रमाणित किया है।
३ कर्तव्य पथ के साथ ही साथ लालसा का समाध , , . भधमाघनमिच्छन्ति, धनमानचमध्यमा॥ उत्तमामानामचन्ति, मानोहिमहवाधनम् ॥१॥ (चाणक्य मोति पण) भावार्य- ---अधम जन धन को ही चाहते हैं। मध्यम जन धन और मान दोनों को पाहते हैं। परन्तु उत्तम जन हैं वे मान ही चाहते हैं क्योंकि मान ही उनका उत्कृष्ट धन है।
सोडामा
जहाँ माा है, प्रविष्ठा वही ये सब कुरा देखते हैं परन्तु
जहाँ प्रतिष्ठा को पापाय प?यता हो, वहाँ येन धा फी परवाह
परत है, न सन को ही कितु प्राणों की यानी लगाकर भी थे
ससार में स्वप्रतिष्ठा पी र परा पाहते हैं।
महाराना सिरान, भी उन पुरुषों में से जो उत्तम जन
में मनाते हैं इसलिये ये गालय पति के उनकी सोमे पर की
यात्र गमन समय दिये हुए धाममण पा महात्मात्य शान्तु
महता ने ममयाउयूल समाधान किया।से भी अपनी प्रतिष्ठा में
पलक मानकर उसे भूसने पे लिये क्या करते है सो इस प्रकरण
में दिखाई देगा।
-
पाटण के अन्दर बाज महाराना सिद्धरान का दरयार भरा
हुआ है। बड़े बड़े सरदार, यो योर मनी मडल विद्यमान है।
वातावरण उम धन राई महाराणा के साथ ही साथ सब सभा
सद्गण जोश में आय हुए हैं और किसी विशेष हुक्म की प्रतीक्षा
कर रहे हैं फेल अन्तिम निर्णय होकर हुक्म होना ही शेप है।
-
महाराना सिद्धरात और राज्य माता मिनलदेवी जिस
समय सोमेश्वर की यात्रा को गये थे। उस समय मौका देखकर
मालप नरेश ने पाटण पर धावा बोल दिया था। बहुत सैन्ययल
महाराजा के साथ गया हुआ था इसलिये पाटण में सैन्यबल
पहुत ही कम रह गया था।
कम्प पय के साथ ही साथ लारसा का प्रभाव
महाऽमात्य शान्तुमहेता ने महाराजा की गैर मौजूदगी में
इतने अल्प सरयक सैन्य से मालधपति के माथ युद्ध करने में
प्रजा की कुशल न देसी । इसलिये हर्जाने की कुछ रकम देकर प्रजा
को कष्ट से पचाने के लिये मालवपति से सन्धि करली थी।
परन्तु यह सन्धि कर लेना और दण्ड की रफम देना महाराजा
हृदय मे फांट की तरह चुना करती थी। अत इस विषय में
महाराजा ने आस पास के लोगों के घरगलाने से महाऽमात्य
महेताजी पर नाराज होकर महाऽमात्य पद ले लेने की चेष्टा की
थी। परन्तु राज्य माता मिनल देवी ने बीच में पड़कर वह मामला
शान्त कर दिया था। तो भी मालवा पर चढाई करके बदलालेने
की सर्व सम्मति से तय करके तैयारी की गई। लाव लश्कर
मालवा की तरफ रवाना कर दिया गया। महाराजा कल रयाने
होंगे क्योंकि कितनेक गैर मौजूद सरदारों व प्रधान मनीयों को
धुलवाये गये और उन्हें महाराणा के साथ जाना होगा ऐसा
तय हुवा था।
y
१॥
इघर पन्द्रह रोज हुए जय से महाराजा ने जसमा को वालाब
पर देती थी। महाराजा का चित्त हमेशा व्यन रहा करता था
उन्हें जरा भी चैन नहीं पड़ता था। बात करते करते भी व्यप्रपन
जाते थे । परन्तु सथ कोई ये ही समझते थे कि मालेप नरेश को
जीतने की धुन सवार हो रही है। जिससे ये इतने व्यप्र बने हुए हैं।
महाऽमात्य शा तुमहेता और राज्यमाता मीनदेयी भी सास
सतीसमा पास को न जान सके । राज्य माता वो उलटी इसे पुत्र का उत्साह मान कर पुलकित हो उठती थी। महाराना को जब भी जसमा याद थावी कि ये तालाय पर पधार जाते और उसे देखकर कोई न कोई चेष्टा करते ही रहते । इन पन्द्रह दिन में एक भी दिन ऐसा नहीं निकला होगा जिस रोन महाराजा सरोवर पर नहीं पधारे हों । सरोवर पर जाकर श्रोड़ लोगों से तथा उनके नायक से पातें करते तथा निस माद के नीचे जसमा के पञ्चे की झोली घन्धती थी, उसी माड़ के नीचे जाकर विश्राम लेते थे। पचे को झूला देने पाती जातो हुई उस प्रोडण युवती को देखा करते और मौका लगे तो बातचीत करने का भी प्रयत्न करते । पहले तो महाराजा तालाब पधारते, तय मत्री मडल में से किसी न किसी को साथ लाते किन्तु धीरे २ उन लोगों को साथ लाना मी पन्द कर दिया था। इतना ही नहीं, यहाँ फाम की देखरेख करने वाले श्रावड़ और भु जाल महेता की भी नजर चुकाने का प्रयत्न करते रहते थे। पर उन पतुर मुसदियों ने पाव को भापली और मर्म को पहुँच गये। इमलिये चे खुद टाला ले लेते थे। जय मनुष्य के हृदय में कामानि प्रवेश कर जाती है, तब यह अपना मान भूल जाता है और अपनी प्रेयसी को प्राप्त करने की हर घरद चेष्टा करता है। परन्तु कोई तो बिना सोचे समझे एक दम कूद पड़ता है और कोई पतुराई से काम लेता है। यह शने शने पर -
कम्य पथ के साथ ही साथ लाता का प्रभाव
आगे घढवा है। महाराजा सिद्धराज भी चतुर थे। इससे उन्होंने
युक्ति से काम लेना पसद किया था।
एक रोज महाराजा कुछ जल्दी श्रागये थे। यद्यपि मध्याह
धीत चूका था परन्तु समय अभी बहुत बाकी था। धूप कड़ाके की
पड़ रही थी। दुधमल चावड़ा और महाराजा दोनों सरोवर के
कांठे काठे फिर रहे थे। काम भइपसें चल रहा था । फुदालियों
के प्रहार से धरती धणधणा रही थी। ओड लोगो की निये
मिट्टी की टोकरीयें भर भर कर सरोवर की पाल पर डाल रही थीं।
महाराजा को ऐसी धूप में पधारते हुए देखकर लोग पाश्चर्या
वित हुये । नजदीक पधारने पर प्रोड लोगों ने व श्रोटके नायक
ने कुदाली को हाथ में दाब कर महाराजा का अभियादन किया।
श्रोट सरदार पोला महाराज आज ऐसी तेज धूप में।
यक्त मिले तब आया जाय न महारामा ने उत्तर दिया।
सूर्य का ताप यद्यपि प्रसर था, परन्तु यह मोह लोगों को असाध्य
नही होवाथा । पसीने पसीने होजाने पर भी उनका काम तो चालू
ही था। फिरते फिरते महाराजा तालाब के फाठे पाये और गर्मी
से पपरा कर दुधमल से कहने लगे।
दुधमल-पानी चाहिये
महाराज-उमी को बुलवालें। दुधमल ने कहा किसको ?
महाराजा में प्रश्न किया।
२०
तोगा
यही प्रोट की स्त्री तमगा दो। दुरमली गहराना से हमने
ये पदा।
मुशामदियं लोग अपनी पूद दोन तथा स्यार्प मापन के
लिय अपने स्वामी को उप्ति अर्ज न धरते हुए पतन के माग में
भागे हात पो गददगार हो जाते हैं। इतने में जसमा मिट्टी
डालकर जाने लगी। सियो युनयार दुधमान महाराना के
लिये पानी लान को कहा।
जसमा जहाँ परोपी मोली पधी दुः था यहां पाई। धनी
डालियां य कारण गाड़ ये नी धूप नहीं थी। इससे यही ठरडक
यो । जसमा ने गटफी म से ठटा पानी भरफर शरमाते हुए पानी
का प्याला लाकर महाराजा क मामने ग्यड़ी हुई। 'लेड' कह कर
जसमा क हाय म स पानी का प्याला लते हुए दुधमल की वरफ
देखकर महाराजान प्रश्न फिया । जसमा चुप रही।
प्याले में से पानी पीते २, तुम्हारा ही नाम जसमा है।
महाराजा मे पिर दूसरा प्रश्न किया।
अपना नाम महाराजा के मुह से सुन कर जसमा एक दम
शरमा गई और लज्जा की रेसा उमफे मुम्ब पर पड़ते ही
उसया सौन्दर्य अधिक रियल उठा। जसमा ने महाराजा पो तीन
चार बार इसी भाड के नीचे देखा था और एक यार घोलने का
भी प्रमग वन आया था। इमसे उसने टूफ में हो जयार दिया
कम्य पथ के साथ ही साय लालसा का प्रभाव
'जी' राजा पानी पी गया और फिर दूसरी बार मांगा।
जसमा तू ऐसी पड़ी धूप कैसे सहती होगी?
महाराजा ने प्रश्न किया।
क्या करें, महाराज ' हमारे क्या राज्य है। मजदूरी करते हैं
और गुनारा चलाते हैं। जसमा पानी का पान दूसरी धार देते
हुए नजर दूमरी सरफ रसकर जवाब दिया ।
परन्तु ऐसी धूप में? महाराजा ने पिर प्रत किया।
नहीं तो कैसे पूरा पड़े ? बोलते घोलते देरी अधिक हो जाने
से जसमा ने खोदाती हुई जमीन की तरफ नजर डाली और अपने
पति को काम करता हुश्रा देखकर झोली में सोते हुये पालक को
झूला देनी हुई वहाँ से चली गई।
महाराजा देखते ही रह गये परन्तु महाराजा की इच्छा
उसे प्राप्त करने के लिये चढने लगी।
ग्रहण करने योग्य शिक्षा:-
१-जिस मनुष्य के हदय म किसी स्त्री को देखकर विकार
प्रज्वलित हो उठता है उसे यही धुन लग जाती है कि इसे मैं
कैसे प्राप्त करु और अपनी प्रेयसी पनाऊ उस लालसा के धेग
में भाकर वह अपना आपा व भूल जाता है। अपनी एव अपने
पूर्वजों की इज्जत का जरा भी खयाल नहीं रखता हुश्रा ऐसे २
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सहीनतमा प्रपंच रचता है। ऐसा माया जाल फैलाता है जिसे समझना बड़ी ही कठिन समस्या है। २-इस फंद म पसा हुया मनुष्य अकृत्य एप सभी कुकृत्य कर डालता है और अपना इहलोक परलोक दोनों निगाह डालता है। इसीलिये शास्त्रकारों ने स्त्री ससर्ग से पचते रहने के लिये खूप सावधानी रखने का कहा है।३-अपने माक्षिक को ऐसे चुगल में फंसे हुए देखकर आसपास के लोग उनका पतन फरने में किस प्रकार मददगार हो जाते हैं। और किसी निर्दोष मनुष्य को कैसा फैमा देते हैं यह दुधमन की युक्ति से प्रक्ट है। ४-कामी लोग घी के श्रागे कैसे नम्र होकर प्रेम दर्शाते है और उसे अपनी तरफ पारष्ट करने के लिये कैसी युक्ति से काम लेते हैं यह भी इसमें बताया गया है।
प्रलोभन निरखिनेनवयौवना, नेहन आणेलगार ॥ गणेकाष्टकीपुतली, ते भगवान समान ॥१॥ (बीमवरामचन्द्र के उद्गार) ये मनुष्य यास्तव में पूज्य है जो साक्षात् काम सरूपा. सौदर्य मूर्ति, नव यौवना स्त्री को देखकर भी विचलित नहीं होते किन्तु अपने निज स्वरूप में ही स्थित रहते हैं । उनको पवि ने तो भगवान की उपमा देदी है। किन्तु विचार करते हुए यह उपमा अतिशयोक्ति नहीं है क्योंकि इन्द्र पर नागेन्द्र और नरेन्द्र भी ma THI .
मती बसमा
जिसकी चॉपशार पर पत रहने हैं उम मनोहरा ची को
देखकर जो सुध नहीं होते। च माध्य तो क्या देयों के भी पूज्य हैं
ऐसे महापुरुष तो बहुत ही कम है।सारामसार ही इमोपदे में
फेस फर उसे पायाधीश परन के लिये भाषाश पाताल एक
फर बालते हैं और चित श्रचित मभी उपाय काम में लेते हैं।
न पोलो जमे वचन भी बोलते हैं और नी फे दास होकर रहना
भी स्वीकार करते हुए ही मचाने । गुर्जर सम्राट महाराजा
सिखरान भी एक मजदूरी र सौन्दर्य पर मुग्ध हुए क्या २
घेष्टा परत है सो दिसाया जाता है।
जय से महाराजा जसमा को सरोवर पर काम करती हुई
देवी है और उसक हाथ से पानी पीकर पावचीत की है। उसके
याद तो प्रति दिन सरोवर पर जाना और प्रसग पाकर यातचीत
फरके उसे अपनाना महाराजा सिद्धराज का ध्येय बन चुका
या। इससे ये टाइम वे टाइम जर माती हो तभी सरोवर पर
पहुँच जाते थे। एक दिन फिर सरोवर की पाल पर खड़े हुये
महाराजा को विचार मान देख पर
दुबम
क्यों महाराज
-
क्यों क्या?
-
महाराजा
ने
क्या विचार करते थे?
दुधमळ ने पूछा
पुल नहीं। जिस रोज से महाराजाने पानी पिया था। दुध
मल के साथ निकट मैत्री सी होगई थी। आज प्रात फाल ही महा.
अकोमन
२५
--
राज सरोवर पर पधार गए थे। सुदाई का काम पूरी तेजी से चल
रहा था । श्राज सरोवर पर इधर उधर नहीं फिरते हुए उसी माड़
के नीचे खडे होगये थे।जहा बच्चे की झोली वन्धी हुई थी दुधमल
भी सडा खडा पातें कर रहा था। जसमा को भूला देने के लिये
श्वाती हुई देख कर दुधमल जरा दूर हट गया। सकुचाती
हुई जसमा भूला देकर रवाना हुई। पीछे से धीमी भावान भाई
असमा । जसमा ने रुककर पोछे देखा तो महागला थे। जसमा
स्थिर सडी रही। फिर थायाज आई जसमा । वह फिर भी
चुपचाप सडी ही रहीं।
जसमा! ऐसी महेनत करने के लिये तेरा सर्जन हुधा हो यह
मैं नहीं मानता। फिर क्यों तू इस तरह अपना जीवन बरबाद फर
महापा ने यात मागे पढ़ाई।
क्या करें, महाराज हमारा धन्धा ही ऐसा है । जसमा ने
धीरे से मकुचाते हुए महाराजा को उत्तर दिश।
में तुम्हारे लिये यह सुविधा किये देता हूँ कि तुम आज से
चालाय की पाल पर बैठी हुई अपने बच्चे का पालन किया करो।
मिट्टी मत उठाया करो। मिट्टी उठाने वाली तो बहुत हैं महाराजा
ने अपना प्रस्ताव रक्खा।
श्राप मालिक हैं । इसलिये ऐसी कृपा दशति है। परन्तु मैं बिना
मेहनत किये हराम का साना नहीं चाहती मेहनत करना मैं अच्छा
समझती हूँ। मेरा स्वभाव दूसरी ही तरह का हे।
नसमा ने बहुत मदद के साप सा दिया ।
सोसमा जसमा । तेरा शरीर सुमारवा का पर है। इससे मिट्टी उठाए सुवर्ण के थाल में धूल भरो जैसा है। इसकी कदर को कोई पदरदाा ही कर सकता है। सम पोई नहीं कर सकते।तू मिट्टी दोकर इमका नाश मय पर | BIRTA म प्रदर्शित कर महाराज । यिता महेनत किये भेटे | सा से पई प्रकार के रोग होजाते हैं। मुझे भी कोई रोग होजाये और डाक्टर लोग फीस मार्गे तो हग मनदूर लोग कहां से लायें ? हम मजदूरों के पास धन कहां है। हिस्ट्रीया का रोग जिसे पुराणोत्रिय भेट्टा पड़ा रहती है और जिसके होताने पर अक्सर देवी देवताथों पीरों के स्थार पर ले जाना पड़ता है यह प्राय परिमम न करते हुये पैठे बैठे खाने से दी हो जाता है। यह रोग जितना गरीय नियों को नहीं होता, उतना धनपान स्त्रियों को अधिक होता है । जहा थालस्य है परिश्रम नहीं किया जाता वहाँ यह रोग जल्दी लागू होता है फिर डाक्टरों की बाजरी और देवी देवताओं की मिन्नतें करनी पड़ती है। महाराज मैं ऐसा करना नहीं चाहती 1 मरा पाम अच्छी तरह पल रहा है परि मम करने से मेरा शरीर स्वस्थ रहता है श्राप फिकर न करें। बसमा ने महाराज से कहा। जसमा । मैं फिर भी कहता हूँ कि तू जगल में घसने के लिये नहीं है। देस तो यह तेरा सुकोमल बदन जगलों में भटकने के का बिल नहीं है । चल मेरे शहर में, पाटण शहर इस समय बिलकुल स्वर्ग बन रहा है तुमे शहर में अच्छी जगह रहने को दिला दूगा। कृण भाव दशासे हुए महाराज ने कहा। जसमा समझ गई कि राजा का पहला दाव न चलने से दूसरा पासा फेंका और मुझे लोम दे रहा है। महाराज कहा तो यह आनन्ददायक जगल और कहा गन्दा नगर ? जिस प्रकार गर्मी के मारे कीड़े मकोडे भूमि में से निकल फर रेंगते हैं उसी प्रकार शहरों के तंग मार्ग में मनुष्य फिरते हैं। वहा अच्छी तरह चलने को मार्ग भी पूरा नहीं मिलता और जगल में तो सदा ही मगल है। ऐसी शुद्ध स्वच्छ वायु और विस्मृत स्थान शहरों में कहा है। जसमा अत्तर दिया। राजा सोचने लगा कि यह तो इस पोसे में भी नहीं पसी अब क्या करना चाहिये । तुरन्त ही बात परने के ढग को बदल कर महाराजा ने कहा। जसमा। तेरी बुद्धि बिगडी हुई है। गिवारों को गिवारपना ही अच्छा लगता है । इसी से तू ऐसी बातें कर रही है । अधिक मनुष्यों के बीच में रहना घड़े माग्य से ही मिलता है। शहरों का वास देवषास होने से बड़ा ही अच्छा है। तू हलके मगज की ठहरी। खांखरे की मोकोली (ता) - २८ सप्ती जसमा क्या जाने । इसी तरह तृ जगल की रहने वाली शहर के मने को क्या समझे, चल में तुमो शहर में रहने पे लिये अच्छा स्थान दूगा। महाराजा ने टाट उपट कर फिर सालय दिपाया। चाइमेरी ढिठाइ या गियारपा सममें। मची वात सो यह है कि प्रापको जैसा नगर प्रिय है वैसा मुझे जगल प्रिय है। ময় फे श्रागी जैसे मैले मन के होते हैं वैसे जगल के रहने वाले नहीं। घड़े • शहर थान पाप के किल्ले पा रहे हैं। चोर, जुधारी ज्यभिचारी, नशेबान, भगेडी, गनेडी प्रानि सभी तरह के विकार मनुष्य शहरों में ही होते हैं। शहरों के यहुत से लोग तो सत्सगरे (धर्म स्थान में ) भी विकास से भरे हुए घाते हैं और अपन विकार पोपण करते हैं। देहातों में ये पाते अधिकाश नहीं होती यह सोना चादी काजेवर भी किसी कापड़ा रह जावे तो देहाती लोग उसके मालिक को ढढकर उसे पहुँचाने की चेष्टा करेंगे। यह बात शहरों में नहीं है । शहरों में नो छोटी से छोटी वस्तु के लिये भी परस्पर हत्या करो को नहीं चूकते है नथा शहरों में रोग भी अधिक होते है। इस लिये डाक्टर लोग उहे शहर मे पाहिर जगल में रहो की सलाह देते हैं ।समा ने निकिता से उतर दिया। परन्तु तेरा रुप और सौन्दर्य तो महलों को शोभा ऐमा है। महाराजा ने उसेलचाने के लिये कहा। जसमा अभी तक नहों की तहाँ खड़ी थी। प्रात काम का समय होने पर भी मिहनत और परिश्रम से प्रस्वेद के विदु ललाट पर
M
.
मखोमन
२९
मोतियों को दमक दे रहे थे। अपनी साडी के पल्ले से ललाट को
पोलती हुई उमने राजा की तरफ देखा । परन्तु महाराज को
अपने इस प्रश्न का कुछ भी प्रत्युर न मिलने से उन्होंने तुरन्त हो
बात को बदल दी।
तेरा पति कहा है ? निस पर तू इतना गर्न कर रही है। मैं
भी तो उसे देसू यह कैसा है।
यह जो कमर कस कर काम कर रहा है और जिस के शिर
पर फ्ल का गुच्छा है । अगली के इशारे स जसमा ने बतागा।
क्या तालार में ही है?
महाराज ने पूछा।
हो । कहकर जसमा झूले की तरफ गई और बच्चे को झूला देकर
अपने काम में लगने के लिये चली परन्तु पीच प्रोडणी का
पल्ला सेवा गया-
महाराज यह क्या १ पीछे से महाराज ने पल्ला पकड रसा था
जिसे देख कर जसमा बोली।
क्या वही तेरा पति है। कहो तू और कहा वह कौए के गले में
रत्नों की माला ? उस मिट्टी खोदने वाले के पीछे इतनी इतरा
रही है ? और मेरा निरादर कर रही है। हसनी कौए के पास नहीं
शोमती । इसलिये हंसनीयो कौर के पास रहने ऐना ठीक नहीं है।
तू महल को पल । तू तो महलों में हो शोभेगी। दस तरे ऊपर तेरे
पति को विश्वास ही नहीं है। यह मेरी तरफ टेडा
-
मसी जसमा उसया देसो का दग ही यह स्पष्ट पतला रहा है कि तेरे परम छो उसका विश्वास ही है 7 प्रेम ही ऐसा प्रादमी मेरी क्या कदर जा ? से अविश्वासी पवि के पास रहना प तुझे उचित है । टीकमोद ने उस समय राना की सरफ इसलिये देखा था कि रीपनी से क्या पातें कर रहे है? महाराप सधे को समार में जरा भी भय नहीं है। मेरे पति का मेरे प्रति पूर्ण विश्वास है। मैं अपने पति के सिवाय अन्य पुरुषों को भाई मानती हैं। यह अविश्वास तो थाप लोगों में होता हमारे में दो आज तक ही अविश्वास का काम नहीं। मेरे मन में यदि पति के प्रति अविश्वास हो सो पति को मेरे प्रति थविश्वास हो। मेरा पति मुझे नहीं देख रहा है। परन्तु थापकी बिगड़ी हुई दृस्टि को। जसमा ने पैसा निमीता से घसर दिया। जसमा । तू मिट्टी उठा उठा फर डाले यह मुझ से देखा नदी जाता।तेरे सीनाजुक स्त्री इस तरह अपने मानव देह फाहास करे यह मुमे प्रसह्य हो रहा है। इमलिये तू मेरे महलों में चल । उल्टी सुस्टी बातें धोद कर महारान में मुझे की बात कही। गुर्जर समाट को इस तरह या करते हुये देस र जसमा से न रहा गया। यद्यपि सिद्ध राज एक बड़ा राजा या परन्तु जसमा को इससे भी अपना स्वमान थधिक अभीष्ट था। इसलिये राजा के कथन की परवाह करते हुए जसमा ने कहा
प्रयोमन
-
पसन्द है।
महाराज हम तो मजदूर है। मिट्टी उठाये बिना फाम कैसे
चले । परन्तु श्रापके महलों में रानियों की क्या कमी है ?
परन्तु तू एक घार महल तो देस आ। महाराजा ने कहा।
महाराज | पाटण के महलों में रहने की अपेक्षा में अपने गरीयो
मोपड़े को किसी तरह कम नहीं समझती हु । राजा की रानी
होने के बदले एक ग्रामीण श्रोड की स्त्री कहलाना मुझे अधिक
बसमा ने स्पष्ट उत्तर दिपा।
किन्तु तेरे रूप और हुस्न पास,
महाना भागे बोलना ही चाहते थे। इतने में ही जसमा
कहा।
महाराजा यह बात जाने दो। मेरे रूप की श्रापने कदर की वो
भले ही की। परन्तु यह शरीर तो झोपडी में ही रहने को है।
श्रव मुझे जाने दीजिये । श्राप राना है, मैं रैयत ह । गुजरात के
महाराजा होकर आपको ऐसा काम और ऐसी याचना करना
नहीं शोमती । जरा सयाल रखिये।
मैं कहता हूँ उसे भान इतने में ही जसमा महाराज के
बीच में ही घोल उठी।-
PH
आज आपने मेरे साथ ऐसी यात फो। फल आपकी नजर
दुसरी तरफ ढलेगी। यही गती रही वो पाटण फे नरेश पर कौन
विश्वास करेगा। इसलिये यहाँ से पधारिये और महलों में रहकर
आपकी को ही आपके महल के सुख और वैभर दीजिये।
A
सती बसमा
-
गुजरात के बदरस मी राना लोग होते हैं इसीमयर बात
ही पडी। यह कहो के माय ही पक्षा छुटाकर जममा एक दम
आगे रही। पिछाडी या गोली मेरो रहा था। उसकी भी मुनाई
नहा की जाती हुई जगगा को राजा देखता ही रह गया पर एक
शद भी सके मुह से नहीं मिला।
मिट्टी से प्लावित मादीपेशन्दर दया हुश्रा उमया गौर वर्ण
सूर्य की किरणों को पीटे हटा कर अजय दमक दे रहा था। उसको
चाल (यद्यपि यह जमीन सोदो धाशी जाति की थी विन्त) इतनी
मृदु थी कि कहीं चलते हुए धरती माता को किसी प्रकार कष्ट न
होन पाये । महाराजा उसको पाल को देखते ही रह गये और
अपने मन ही मन में उसकी प्रशंसा करने लगे।
महाराना भाप मासे। माड़ के पीछे से आवाज आई।
महाराज सिद्धराज ने पीछे फिरकर देखा तो पूछने वाला
श्रीपड था। यह भी महाराज के मंत्रीमहल में का एक सभासद
था तथा प्रधान मत्री शान्तु महेता का साम विश्वासपात्र था।
आपातू यहाँ पहाँ से?
महाराणा में प्रश्न किया
महाराज ! मैं वो दिन में दो तीन यार काम देखने को आया
करता है। ऐसा घोलते हुए श्राम्पर की नजर माइकी हाली के
नीचे लटकती हुई मोली की तरफ और वहा से सिसफ कर जाती
हुई श्रोहण युवती की तरफ गई और उसके हृदय में एक प्रश्न
पैदा हुवा कि, क्या महाराजा इससे मिलने के लिये यहां आते हैं ?
-
.
है
प्रलोमन --- - ग्रहण करने योग्य शिक्षा- १ इम प्रकरण में दिखाया गया है कि जो मनुष्य कामान्ध हो जाता है वह यह नहीं सोचता कि मैं कौन हूँ। किस फुल में उत्पन्न हुआ हूँ। मेरी व मेरे सान दान की कैसी प्रतिष्ठा है और में यह क्या कर रहा हूँ | मैंने जब विवाह किया था तब मेरी पत्नी को मैने क्या अधिकार दिये थे । उमे क्या र विश्वास दिया था और श्रव उसका इक उसका अधिकार दूसरी को देन का मुझे क्या हक है। २ यह उचित और अनुचित रीति से उसे लालच विश्वाम देकर अपनी तरफ रजू करने की पूरी चेष्टा करता है। हर तरह लाचारी और भाजीजी भी करता है परन्तु जो चतुर स्त्री होती है वह उसके दम्म (झांसे में नहीं आती और अपने शील धर्म एव पतिव्रत धर्म को ही आदर्श मान कर उन लालच भरे वचनों को ठुकरा देती है। किंतु जो मूर्स स्त्रियें होती है वे दम्भ में श्राफर भ्रष्ट हो जाती है, वे न घर को रहती न घाट की। t सखियों का विनोद संसार के अदर मनुष्य को अपने हदय का भार हलका और असमंजस में पढ़े हुए को मार्ग का प्रदर्शन करने के । यदि कोई स्थान है वो यह फेवा मित्र ही है। मित्र हो पिम्प गर्मी से सूखते हुए इदय रूपी बगीचे को सिंपन करो रिम सहायक है। कहा है कि- पापानिवारयति योजयते हिताय, गुपचगुहतिगुणान् प्रकटीकरोति ॥ बापगतच म जहाति ददातिकाले, सन्मित्रलक्षणमिद प्रवदन्तिसन्तः॥१॥ (भतृहरिनीति र
सखियों का विनोद
भावार्थ-पाप फरते हुए को रोके और उसके हित का उपदेश
फरे, गुप्त यात को छिपा और गुणों को प्रकट करे, श्रापत्ति काल
में साथ न छोड़े और समय पड़ने पर यथा शक्ति द्रव्यादि से
सहायता करे । इस प्रकार संत पुरुषों ने उत्तम मित्रों के ये लक्षण
यताये हैं । जसमा भी अपनी ससि के यहाँ जाकर किस प्रकार
बातचीत करके अपना हृदय खाली करती है सो दिसाया
जाता है।
रम्भा बहन
जसमा मे मीचे से भायाज़ दी।
कौन।
उपर से भावाज बायो।
यह तो मैं हूँ।
मासमा ने अपनी पहचान कराई।
रम्भाने नीचे उतर कर किवाड़ खोले और आगन्तुक को
पहचान फर फोन! जसमा पहन ?
हा। बहन
जप्तमा ने कहा।
इस समय फेसे!
रम्मा ने आने का कारण पूछा।
लो, क्या मिलने को भी न पाऊँ ? पाँच दिन पहले मिल
गई थी। श्राज फिर तबीयत हुई कि मिल पाऊँ । जसमा ने जवाब
दिया।
आओ बहन कहकर रम्भा जसमा को अपने कमरे में ले गई।
जसमा और रम्भा यद्यपि यहनें तो नहीं थी परन्तु जसमा के
पाटण पाने के बाद इन दोनों की परम्पर घनिष्टता बढ थी।
दोनों ही एक गोहल्ले में रहती थी। नजदीक होने से आने
मोसमा
को मुगममा थी। जसमा रम्मा के यहाँ फई यारानी और मुम्प
दुमका प्रेम भरी या फर जाता यो।हामेना में गाद गम्यप
दोर का यह भी कारण या फि मा अषय मा नाराय ती परंग
करने को दिरा में दो वीन पार पावसात ये और रम्मा इनकी
पसी होवाली थी। इसका समय हो गया या रम्मा के द्वारा
करयाजसमा यो राम्य अपंप कीजाको मिनी धीम्मा
और जसमा दोनों मिलनगार, य ईस मुम थी। इस पारण इनको
प्रीति प्रतिक्षिा पदवी ही जाती थी। कोई कोई या पाता फे रग में
पाती मगर दूसरी पीईसी मसमरी मी पर लेनी धी।
हागिनो प्राय भाई सालार पर ही पधारते ? मतमागे पूमा।
गये दो कोड मरिमारने को। रम्भा न पा मिफोड़ते हुए कहा।
माम होता है कि तुमन भी नको नहीं देना है ? और
फे जाने यी सयर तुम्ह भी नहीं है। जममा ने रम्भा की यात
में से सार भांग सौंप फर सामा रमा।
क्या ममी हर रोग देसती ही रहती होगी।
यहत, मैं तो हर रोग ही देसवी ए सेवा करती रहती हैं।
जसमा ने कहा।
तुम लोगों का पात दी है। रम्मा - जवाब दिया।
हा। मेरा तो लग्न भी हो गया है
पसमा ने कहा।
और पुत्र की माता भी तो हो चुकी हो।
रम्मा ने इसते हुए कहा
रग्मा कहा।
।
सप्रिमों का रिनोद
-
लो, इममें क्या? यह तो मंसार यो रीशि है सममा ने
हास्य को रोकत हुए पहा
मैं तो पर देश में जाने का विचार कर रही है।
समान की शुभात की।
तुम या तुम्हारे पर पाले ? सपा मे मा में पूजा
में और ये क्या अलग हैं।
मतमा मे पवाय दिपा।
सरोवर पूरा खुद चुका ?
रम्माम शिपा।
नहीं।
जसमा मे उपर दिया।
वय?
रम्मा ने फिर मन किया।
"अधूरा छोड़ कर ही जायेंगे।
नसमा नेकदा
काम पूरा करने से पहले राज्य मजूरी दे देवेगा?
नहीं देवे तो कुछ परवाह नहीं दमतो मजदूर हैं। और कही
मजदूरी करेंगे। ऐसे अनीति के पैसे नहीं चाहिये । जसमा मूल
यात पर आई।
अनीति, किस यात की बहा रम्भा को इसका रहस्य मालूम
नहीं पड़ा इमलिये प्रश्न किया।
दूसरा क्या बहन! अय यह घरती (भूमि) भारी पड़ती
जाती है और मेरी जन्मभूमि आवाज दे रही है कि भाती रह
मालया में । जसमा ने व्यंग में कहा ।
परन्तु क्या बात हुई, यह तो कह । रम्मा ने उत्सुकता प्रकट की।
हुई क्या ? मन उध गया । जसमा ने बात को छिपाते हुए कहा।
7
1
३८
सता असमा
पर कुछ कारण तो होगा?
पम्मा ने कारण मानने की भातुरता प्रकट की।
कारण कारण क्या कहूँ बहन कहते हुए जवान नहीं उठती।
ससमा ने उसी माह माते हुये कहा।
श्रासिर कुछ फहोगी भी नाम ठाम भी बवाोगी।
रम्मा ने शरिवना दिखाते हुए मामुकता दाई ।
यहन क्या पहूँ-सुद महाराजा सिद्धरान गुतरसम्राट की
मेरे पर नियत बिगड़ी हुई है।
बसमा मे धीरे से वास्तविष्याका मामात कराया।
क्या कहती हो बहन!
रम्भा सुनकर स्तब्ध होगई।
सशी बात है बहन? असमा ने विश्वास दिखाते हुए कहा।
तुम्हारे पतिदेव इस बात को जानते हैं। स्मा ने प्रश्न किरा।
नहीं, मैंने अभी उनके आगे बात नहीं की है यदि कहूँ तोषाव
बिगड़ जावे और परिणाम न जाने क्या हो।
असमा ने गम्भीरता से कहा।
परन्तु अपन महाराजा के सामने ही नहीं देखें तो?
रम्मा मे प्रश्न ब्जिा।
अपन नहीं देखें परन्तु महाराजा देखें इसका क्या उपाय ।
और राजा है रूठे या तूठे । रूठे तो पायमाल हो जायें यह वो
जाहिरा बात है। यहन! जसमा ने भविष्य विचार कर कहा।
तुम्हारा भाइ आवेगा वय में उनके आगे बात छेड़ कर
पृछूगी 1 रम्मा ने अघिड के बायत में कहा।
"
सस्त्रियों का विनोद
३९
क्यों पहन?
नहीं नहीं | उनको क्या कहना । नको हुा तोक्लाही रवाना
हो जायेंगे।
जसमा ने कहा।
ऐसी क्या जल्दी है ? अभी तो हरने जैसी कोई बात नहीं है।
रम्मा ने कहा।
असमाने परसुकता से पूजन।
फल प्रात काल ही महाराजा
मालवा पर चढाई करने
जा रहे हैं।
एम्मा ने कहा।
पीछे फय श्रावेंगे?
जसमा ने आतुरता से पूछा।
विजय मिलेगी तप । कम से कम दो महीना तो लगेगा ही।
पहा तक क्या वालाय की खुदाई का काम पूरा नहीं हो सकता ?
एम्मा ने पूछा।
जल्दी करें तो डेढ महीने में भी हो सकता है।
नसमा ने कहा।
फिर की हुई मेहनत के ऊपर पानी क्यों फेरती हो। परन्तु
महाराजा ऐसे दिखते तो नहीं हैं।
मासे फिर पाने स्पष्ट करने के लिये यो।
यही बात है न वहन । किसी को कहें तो अपने को ही झूठा
माने । समार में तो प्रविष्टा एक बड़ी वस्तु है ।इसलिए उनके लिये
सामान्य मनुष्य सथी पात करे तो भी कोई नहीं मानता है। यह
दुनिया का स्वभाव ही है।
जसमा ने कहा।
दूरदर्शिता एवं हितशिक्षा पद्माकर दिकरो विकची करोति, चन्द्रोविकाशपति नाभ्यर्थितो जलपरोपि जलददाति, सन्तास्वय परहिते सुकृताभियोगाः ॥१॥ करवचक्रमालम् (मर्तृहरि नीतिमतक) भावार्थ-सूय्य यिना यांचे ही स्वत कमल के समूह को विक सित फरता है। चन्द्रमा बिना याँ । कुमुदिनी को प्रफुल्लिव करता है और मेघ निना यांचेही ता। ऐसे ही सन्वजन थिना याचे ही पराये हित के लिये स्व उद्योग करते हैं। F
दूरदर्शिता एव हितशिक्षा
यद्यपि स्वार्थ में श्रन्या मनुष्य उपकारी का भी अपकार
करने की चेष्टा करता है । परन्तु उत्तम जन उस अपकार को भूलकर
अपकार करने वाले का भी हित ही करते हैं और उसे नेक
सलाह ही देते हैं, जो इस प्रकरण में दिसाई देगा।
लगभग एक महिने से महाराजा सिद्धराज उज्नैन को चारों
तरफ से घेरे हुये हैं । परन्तु शनु लोग जरा भी दाद नहीं देते । इधर
पाटण में तहसलिंग तालाष का काम पूरा होने पाया ।
गत दिन काम चलाया जाता था और पन्द्रह दिन में वो काम
पूरा करके मेहनवाना और लोगों को चुका दिया जायगा। ऐसे
आसार दिखाई देते थे।
मुजाल महेता को महाराजा सिद्धराज ने अपने पास मालवे
खुलवाया।
मु जाल शान्तु महेता के पास रहकर हरएक राज्यकीय
कार्य में कुशला धन गया था, परन्तु महामात्य शान्तुमहेता जितनी
दूरदर्शिता इसम नहीं आई थी। तो भी महामात्य बनने को
उत्सुक था और किसी न किसी प्रसग की खोज में था। उसने मालवा
जाने से पहले सरोवर पर थाकर यहा की देख भाल की और
दूधमल को बुलवा कर पूछा।
दूधमल ? क्या समाचार है।
तालाय का काम पूरा होने को है। दूधमल मे जवाप दिपा।
घहुत तेजी से काम हुवा है ।क्यो मुनाल ने यात स्पष्ट करने को
.
४४
दोनो 110) मा वायन मोहिमहामात्याने गों
रात काम पा कर पाग पूरा परने का परमा नि दिया
परन्तु में अप पदा ममममम और मुस्किार में भा पड़ा है।
समय बोला।
गुंगाना
ani
महाराजा पपारम ममय मुमे परमा गये कि मी थापा
यिना पोट लोगों को पगार मत युकाना । यह यार में महाडमा
त्यत्री को किम सादरें-
दूधम में मपनी अनिता वकी।
महारामा रिम लिय मा फरमा गये?
मुजाखबारकाम मानने ।
या तो मुझे क्या गपर?
तप मा मायफाश को मैं मालये आता । महाराना को
पुछ अर्ज फराणी।
गुमाउ मेहता कहा।
क्या कशाना है। महाराजा मुदभाकर काम सपास हों।
दूधमा मेरा
दूधम में कहा
मशाल मे प्रश्न किया।
परतु इममें तो ममय चाहिये।
अभी पद्रह दिन का अवकाश हो भी मेरा सन्देश तो
महाराजा को पहुँचा देना। थागे ननकी इच्छा । दुधमझ मे कहा।
अच्छा । में महामात्य मेहताजी को भी कहूँगा। ऐसा पह
फर मुनान वहाँ से रवाने हुआ और दुपहर के समय यह महार
मात्य को हवेली श्राया । महामात्यनी उस समय सोये
.
तैयारी कर ली।
दूरदर्शिता ण्य हिस शिक्षा
४५
युक्ति पूर्वक उनको जगा कर के सुखधानी में ही बैठ गया ?
आज सायकाल को जाना हैन ? महामान्य ने पूछा।
जी।
मुंजाल ने सक्षेप में जवाब दिया।
मेहताजी ने पूछा।
स्या तैयारी करनी थी। एक सौ सवार साथ में ले जाता हूँ।
मुंजाल ने उत्तर दिया।
अच्छा कह कर महामात्य शान्त रहे।
आपको नींद में से जगाने का कारण यह था कि महाराजा
पधारते समय फरमा गये थे कि मरोवर खुद जाय तब मुझे
सर दे । मैं देख कर मेहनताना चुकान का हुक्म देदू गा।
महाराजा देखें तभी हो-वे न देखें तो क्या नहीं चले ?
महामात्य ने कहा।
मुझे हुक्म हुआ। वह मेंने श्रापसे अर्ज क्यिा । मु जाल फा
व्यक्तित्व महामात्य के थागे दबता था । इसलिये परवारी
ढोलदी। अपने ही सोचने की बात है कि महाराजा पीछे कर
फिरेंगे इसका तो निश्चय नहीं । यहा तक प्रोड लोगों को रोक
रखना और सर्च सिलाना यह ठीक है?
महामात्य ने रोय से कहा।
नहीं।
तय?
ऐसा हो सकता है कि योड के नायक टीकम को रोक लिया
जाय। शेप लोगों को मेहनताना चुरा दिया जाय । मुंजाल ने कहा
सती असा
छो
मुनाल मे का।
ऐसा मे हो ?
महामाराय ने कहा।
यह थाप ही विचार सकते हैं। अगर मैं और कुछ कहू
महाराजा को भी बुरा लगे और श्राप को भी।
या ! मेरे को बुरा लगने न लगने की क्या बात है । महाराजा
को बुरा न लगे यहां तक कहता तो ठीक था। यह दाल में काला
मालूम होता है कि महाराजा तुझे फरमायें और मुझे न परमा?
मैं तेरी घाव का विश्वास नहीं करता ?
महामात्य ने कहा
तब मैं क्या झूठ बोलता है?
मुनाल को मखरा।
नहीं । झूठ नहीं तो अध सत्य होगा
महामात्यमे कहा।
मेरे ऐसा कहने और परने का कारण क्या?
मुंघास सफाई दिखाने लगा।
कारण है तभी तो तू इतनी सफाई पेश करता है। इस आवाज
में महामात्यपन की खुमारी नहीं परन्तु तेजी अवश्य थी।
फिर बोले-तू मालवे जाता है तो महाराजा को अर्ज करना
कि जसमा से भी अधिकाधिक रूपवती स्त्रिये थापको मिल
जावेंगी। गुर्जर सम्राटपाटण के महाराजा को ऐसी मनोवृति
शोभा नहीं देती। मगर मुजाल यह तेरे लिये भी अच्छा नही
कि अपने स्वार्थ वश होकर महाराज को ऐसे नीच कार्यों में सह
योग देकर गड्ढे में ढकेले । राना महाराजा तो राय
में
शोभा के स्थान रूप है । और सिर्फ राज्य के भूषण हे । राज्य
सूरदर्शिता एव हित शिक्षा सगेगी महाराजा को वो चाहिय कि यह प्रजा का पुश्या पालन को व्यवस्था का कार्यभार अपन लोगों पर ही है! पाय तोप्रपा लोगोंके ही करने का होता है। उस पर मुहर गार फर फायदा पा रूप देना महाराजा का काम है। तेरे से मंत्री जो अपने स्वार्थ के मातिर ऐसे हलके कार्य में माय ऐन मागंगे यो पट्टस परिश्रमसे पनाया हया महागुजरातफे टफ होते पुछ भी मेरी ग करे। राजा को प्रज्ञा का पालक प साक्ष दोना चाहिये। मतक होने में तू ही जय मददगार हो जायेगा तो गुजगस को मदा गुजरात पनाने का स्वप्न धूल में मिल जायेगा। इस प्रकार कहते गए अपने बोलने का असर जाज पर फैसा हो, यह महाऽमात्य देखते जाते थे और पहले जाते थे- r मुजाल तू ये मत समगा कि मैं मूर्ख हूं। फल नहीं जानता हैं। महामात्य पद प्राप्त करने के लिये गय तक तने क्या २ पासे -फ्या २ पाइन्ट रचे हैं। और क्या २ वटपटें सड़ी की हैं। वेमय मैं जानता। परन्तु मैं दर गुजर फरता हूँ। मैं तुमे छोटे भाई की तरह मानता हूँ और राजनैतिक कार्य में धागे पदाया है तथा-अय भी पाहता हूँ कि मेरी शक्ति सम्पूर्ण विकसित हो मेरे से भी तू सपाया हो । इसमें मुझे थानद है। गुजरात का एफर मनुष्य नन्नतय ने यही मेरी कामना है। परन्तु यह गुजरात का रक्षक होना चाहिये, घातक नहीं। उसके हृदय में महागुजरात की भाषा रमती रहे दूसरी नहीं। मेरे में गजरातको 'सतो जसमा रचने की मावना हो तो कह । मैं स्वयं तुझे महाऽमात्य पद सौंप देने को तैयार हूँ। में तो श्राज ह और कल नहीं अधिक से अधिक तो दो चार वर्ष निकाले या नहीं। में तो दण्ड नायक हो चुका मत्री भी हो चुका और महामनील की काचली भी पहन कर उसकी जोखमनारी भी स्वीकार कर रसी है। मनुष्य को जो वह दूर से अच्छी व सुन्दर लगती है वही निकट आने का और प्राप्त करने के बाद जटिल सी बन जाती है। उसकी विप मता व कठिनाइयों का अनुभव होने लगता है। महाऽमात्य को पद फोई मोहक वस्तु या सम्मान का विषय नहीं है । परन्तु काटों का ताज है। सु वाली सेन नहीं परन्तु सड़ बचडी जगह है। जो सावधान न रहे तो माग जाय और अपना राज्य का व प्रजा का अहित कर बैठे । मुजाल ? तेरे से मैंने कई अाशाए मान रखी हैं तू ग्लट पुलट चल कर उनका उच्छेद मत कर । मु जाल के पास जवान देने की शक्ति नहीं थी। न वैयारी ही की हुई थी यह आया तो रजा लने को था परन्तु गहाऽमात्य के स्पष्ट षक य के आगे वह बहुत दप गया। बारीक २ घातों पर महाऽमात्यनी अथत घरायर ध्यान रसते हैं । और मेरी सदपटों से ये पुरे वाकिर हैं यह जानकर तो यह लजित होगया महाऽमा स्यका कहना उसे अखरा । उसने कहा कि 1- आपने यह फैमे जान लिया कि महाराजा जसमा को पैसके पहाने रोक्ने यो सूचित कर गये है? । - .
महामाय ने उता दिया।
-
मुजाल लिम्बी यात घढाने में मजा नहीं त महाराजा को
मानता हूँ तो भी तेरी मुराद पार पाडने के लिये तू जसमा को
मुजाल चूपचाप सुन रहा था जो पात कोई लान नहीं सके
ऐसी सबर महाऽमात्य को कहां से मिल गई यह उसकी पह
मुजाल ? तू जा और काये फतह करक माना। मरी तुझे
सहन करना चाहिये। मैंने तो कुछ नही किया है रिमी सब
दर गुजर फरक आशिष देता हूँ कि जा और नहर मुजा
थोड़ा अधिकार मिल जाने पर याम्पस
एवनिता एवं हित शिक्षा
तो दूसरा क्या समझा जाय ?
आप चाहे सो माने परन्तु मैं महाराजा को ऐसे कार्य में
मदद करू यह कैसे मानते हो।
मे
नहीं-
वय।
ऐसे कार्य में कभी मदद नहीं करे विरोध हो फरे, यह मैं भी
सतरज कि सोगटी बनाना चाहता है।
मथल का विषय बन गया।
माशिप है घड़ो को अधिक से अधिक
चूपचाप बाहर हो चला।
ग्रहण करने योग्य शिक्षा-
१ इस प्रकरण में यह दिसलाया।
सुनना, समन्ना, और
ने अचानक दोनों हाथ जोडकर शिर मिया मार
सतो बसमा
-
दुरुपयोग करते है और आगे बढ़ने की उनकी महत्वाकांक्षा
कितनी बढ जाती है। यह मुजाल महता के वर्णन से स्पष्ट
होता है। उदाधिकारी योग्यता के कारण च्याधिसर पार भी
भान नहीं भूलते परन्तु वे उस पाटे के ताज समाा मानते हुए
अपनी जगायदारी को सगम र मदा सजग रहते हैं और
सब तरफ निगाह रसते हैं तथा अपने विरुद्ध प्रयत्न करने वालों
फो दमन से नहीं किन्तु उसकी हरकतों को हजम करके उसके
ऊपर कृपा भाव दर्शाते हुए उसे अपने श्राधीन करते हैं यह
शातु महता के वर्णन से दिसाई देता है।३-उत्तम मनुष्य
अपने मामी को गैर रास्ते जाते हुए देस पर उसमें उनके
सहायक नहीं होते हैं परन्तु उनको मन्मार्ग पर लाने का ही
प्रयत्न करते हैं और दूसरों को भी यही शिक्षा देते हैं जो शातु
महेना ने मुजाल को समझाया है। ४ प्रपची लोगो का प्रपच
उन्हीं लोगों के पाम कामयाय होता है जो साधारण समझके
या बुदु है किन्तु जो चतुर है उनके आगे नहीं चलता। वे
उसका भएडा फोड करके उसे लज्जित कर देते हैं।
स्वार्थ का केय भातिर्यातुरसातलगुणगण, स्तस्याऽप्योगच्छता, शालशेलतरात्पतत्वभिमन, सदस्यतावहिना ॥ शौयवैरिणीवनमासुनिपत, स्वथास्तुनकपल, येनकेन विनागुणस्तृणलव, प्रायाममस्ताइमे ॥१॥ (मतृहरि मोतिशत) भावार्थ-जाति चाहे रसावल में चली जाये, गुणों का समुह और भी उससे नीचे चले जायें, शील (सदाचार) पर्वत के शिखर से गिर कर उसके टुकड़े होजाये, इष्ट मिन कुटुम्न परिवार के लोक न मतोमा चाहे श्रमि म जल जायें और शार्यता पर बाद मनपात हो परनु मेरा अर्थ (47) कायम रहे उममें कोई विघ्न नहीं था क्योंकि इस एफ प यि मय गुण नृण के समान है। स्यार्य सधते हुए ये रहे तो रा और न रहे सो इनफी मुमे अपेक्षा नहीं है ! से स्वार्य मावना से मने हुए दिल पर मिमी प्रकार के हितोपदश का असर नहा पढ़ता यह प्रमाय ग्या भावना जागृत होते हो फापुर हो जाती है और यही जहरिले विचार अपना अमल जमा लेते है सो इस प्रकरण में दिखाई देगा। पाटण से निकल कर मुनाल सीधा मालया में पाया महाड मात्य यो चातुर्यसा एत्र यचा प्रहार की शक्ति के धागेषा निर्यल पन गया था सो पाटण की मीमा तक तो मीष्टिये समक्ष महामात्य का व्यक्तित्व कायम रहा परन्तु धीरे इदय के फौने में दवा हुइ महत्वायाला ने अपना आक्रमण करना प्रारम्भ किया इससे उसमा चित्त हावासोल हो उठा । यद्यपि महाऽमात्य के उपकार -मये स्मृति परम पर अपित्त अयश्य थे। परतु महाऽ- मात्य पद की महत्वासंता न उनको अधिक समय तक न टीकने देकर दूर किये। यह विचारने लगा कि उपकार है तो क्या हुवा ? अपा भी महामात्य पद प्राप्त करो के बाद उपकार का बदला प्रत्युपकार से दे देंगे, थोड़ी देर में फिर विचार धारा पलटी चाहे कुछ भी हो क्षेत्र घताने वाले तो येही है अब क्तिनेक बैठे रहेंगे ? पुरे युद्ध हो
स्वा'का अंग
चूके हैं दो पार या पाच वर्ष बाद भी महाऽमात्य पद मुझे हो
माप्त होगा क्यों प्रपच करू परन्तु फिर विचार पाया कि बीच में
कोई नयी आफत निकल श्रावे तो?
स्वार्थ ऐमा चिकना पदार्थ है जिस पर कोई भी अच्छे
विचार ठहर ही नहीं सक्ते चट से फिमल जाते हैं। इस प्रकार
विचारों की घड़मथल में मार्ग तय फरके महाराज की छावणी में
यह प्राय पहुचा और मौका पाकर माहामात्य को मात करने
की ठान ली। महाराजा को पाटण की व आसपास की परिस्थिति
का परिचय कराते हुए उसने कहा कि-
महाराज । दुधमल न कहलाया है कि प्रोड लोग रात और
दिन नहीं गिनते हुए काम कर रहे हैं छे सात रोज में काय पूर्ण
हो जावेगा। उसने मेरा हुक्म महाऽमात्य को विदित किया
कि नहीं?
महापामा मे प्रश्न किया
समी ने मुझसे कहा और में उ कहे बिार ? परन्तु महेता
जी ने कहा कि महाराज को जो हुक्म करना था मुझे ही क्यों
न फरमाया ? अभी पाटण फे राज्य की जवाप दारी तो मेरे शिर
पर हैन?
मुंजाल ने मार को मा कर कही
ऐसा अगिमान पदया जा रहा है। गहाराजा मा में हो घुध
चाते हुए प्रोध में पाकर धोने-मरे गम्य में ऐसा महापात्य नहीं
पाहिये चाहे राज्य की दिने मिन क्यों न हो जाये मुनाल त
अभी का अभी पागा जा और में हम देता हूँ कि मेहता सहा
५४
मती जप्समा
ऽमात्य पद छोड़ कर तेरे सुपु कर दें।
महाराज ने भाषेश में बदा
महारान | रतावल मत करो मालया जीत रोन के बाद जो
परना हो वह करना।
भूजाल
ने घात को समारते हुए
और अभी कुछ नहीं विगडा है अपम पाटण पधार
सकते हैं । जो कल सायकाल को निकल सको तो भी जिस रोज
मेहनताना चूकाने का है उस रोज पाटण पहुँच सकते है था उससे
पहले भी । अभी तालाब का फाम घुछ याकी है । मूमाल ने मर्ज की
मालवा की राज्यधानी रज्जा को महाराजा सिद्धराज
ने घेर रक्सा था पौर मालय पति को घबराने का
प्रयत्न कर रहा था परन्तु मालवपति युद्ध में खुल्ले श्राम
नहीं उतरता था गुजरात का सैन्य शहर के प्रकोटा के पास
डेरा तम्यू डाल कर पड़ा हुआ था कोन जीतेगा और कौन
हारेगा यह निश्चित नहीं था इसलिये घेरा उठा पर पाटण
जाने में तो नामोशी थी तन उसी रोज रानि म महाराजा
मिद्धराज मानद पृथ्वीपाल दादक ओर पागमट
फो अपने डेरे मयानगी बुलाये और सलाह की, दूसरे ही दिन
क्सिी को मालुम न पड़े इस तरह महाराजा सिद्धरान मजाल प
भट्टरात को साथ लेकर गुप्त रूप से पादण तरफ निकल पडे।
रास्ते में पुरा प्राराम भी न लेते हुए जल्दी ही पाटण पहुँचा
जाय ऐसी प्रवृत्ति धारण की हुई थी।
चार दिन के बाद गुजरात की मरहद में पहुँचने की ताकिद
फरते ये इतने में ही अचानम् वे किमी व्यूह से घिर गये महाराजा
स्वाथ का वेग और मुजाल को घुछ भी समझ नहीं पड़ी कि यह यया मामला है। अक्ला कर महाराजा के साथ सलाह कर के पीछे हटते हटते युद्ध करने का निश्चय किया मुजाल महेता ने शीघ्र ही हुक्म छोड़ा थोर एक हजार अश्व का सेन्य तैयार हो गया महा राजा को धीच म लिये और मुजाल सैन्य के अगले मोरचे पर जा सटफा । परस्पर दोनो सैन्य में जय मोमनाथ फा धावाज होते ही युद्ध प्रारम्भ हो गया अब मुजान को ज्ञात हुया कि शत्रुओं को हमारे विदा होने की सपर मिलने से उन्होंने पुरी तयारी के साथ हमारे उपर श्रारमण किया है। क्सिी मा तरह गुजरात की सरहद में प्रवेश करने का इनका इरादा था क्यो कि महाराना के दिल में एक दिन की ढील मी एक भर जितनी थी परन्तु शनु लोग इनकी युक्ति को जान गये और पारगण उसी रोज से चालु रसा। तीन दिन यहाँ बीत गये घमसाा युद्ध हुवा मुनात गहेता ने देसा कि आधे मनुष्य तो फट चुके हैं मदद के लिये पाटण सन्दे श पहुँच सके ऐसी अय स्थिती रही नहीं इसलिये अब तोहारे पिना छुटकारा नहीं। चौथे दिन उन्होंने मरणीये होकर लडने का निश्चय किया परन्तु गुजरात का सैन्य पिछड़ गया साज पड़ते पडते महाराना और मुजाल महेता दोनो घिर गये श्रथ पकडाये बिठा दुसरा उपाय ही क्या था ? परन्तु महाराना सिद्धराज क हाथ से अभी बहुत सती असमा काम होना शेष हैं इसलिए प्रति भी कुछ काम करती है। सामन कुछ दुरी पर से धूल उडती हुइ दिसाई दी। और शत्रु दल एक दम धमका सूपदेव नजर से बाहर हो गए ये जिस स स्पष्ट कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता या फेरल गुजरात की तरफ से धूल उड़ती हुई जोर से दिसाई दी विचार करते हैं इतने में तो जय सोमनाथ की ध्वनी चारो और से सुनाई दी इससे सिद्धराज और मुनाल को छोड कर शत्रु सैय में से उनके साथी मील लोग लस्कर सहित भाग गये और शत्रुओं का सरदार भी इस नवीन परस्थि ती से घबराया उमने भी मौका देख कर एफ दिशा पकड़ी महाराजा और मजाल ने इस मुधरी हुई परिस्थिती का लाभ लेकर अपना रहा सहा बल एकत्रित कर के शत्रुओं का पिछा पकड़ा परन्तु थोडे पागे घढे कि एकदम चमके। ? कौन। दुधमल जी। तू कहा से बाया ? पाटण से। पाटण से। महाराजा मेछा। दुधमह ने जवाब दिया। महाराणाने प्रश्न किया। दुधमलने जवाब दिया। महारापा ने कारण जानना चाहा। जी। महेताजी महाऽमात्यजीने हुक्म दिया जिसे तामिल फरना पडे 11 दुधमन ने कहा। सा? मदेवानी का नाम सुनकर मुनाल ने भाश्चयग्य किया।
स्वाथ का येग 1 महेता पहा है? मजा सिबरानापूर सैन्य क पोधे। दुधमछने कहा। और पाटणा में? महाराजा ने प्रश्न किया। पाटण में राज्यमाता और बहभाई हैं। दुधमझने का। सोरठ म से पाटण पर अणपिता फोई हन्ता को तो? महाराजा ने सशकित बन कर पूछा। तो राज्यमाता लडेगी। पीच में ही मुबार पोश उठा। माताजी को लड़ो जैसी परिस्थिति ही ना मिले तो? महाराजा ने फिर प्रश्न किया पाटण की रक्षा कर सके इतना सैन्य वहा रसा सुषमा ने मार दिया। महाराजा की समझ में नहीं पाया कि सैन्य तो महेता साथ साये हैं दूसरा मालवा में घेरा डाल रक्खा है तब पाटण में कहा से रहे १ महाराजा ने शंकाव्यक्त की इतने में तो मसालें जली प्रकाश में महाराजा और मु जाल मेहताने सैन्य को देग्या तो महाराजा सिद्धराज के यार्भय का पार ही 7 रहा । दुधमल यह क्या? ने पूछा। महाराज सैन्य? दुधमन्ने जवाब दिया। ऐसा सैन्य ? महाराना ने फिर साश्चर्य पूछा। महारान इस सैन्य से तो आप छूट ही सके हैं। यहा परन्तु महाराजा ने इस व्या को aimm महाराना
सनी माग
।
घो गमालों के प्रभार में से दो मापदी मी।सैनिश की सरया
यदेम पर फो परावरी परेशानी थी, इस म घोडे मवार मी
थे नांदी यार मीथे। और पैदल भीधे भी हाथ में सलवार
नहीं लाई ऐप भीगे और तालाब सोक्ने पारी और
मी थे सब यो गुनरास के बीगे की पोशाक में सजेए थे।
महाराजा धागे पोयते इतने में महाराण,
इसिवाय दुसरा पाय ही नहीं था पाटण की रलिये मी
सो मेय चाहिये, आधा से अधिक तो मालया क धेरे में है पिर
लाना कह से ? इसलिये महाऽमात्यती नानी 1 युनि उपार्जन
की और पाटण से निकलने याद था सफा इता टोला पट्ठा
• पिया अपन शत्रुथों को फेवल मरया दिगगनी हाम लड़ने
पाला या मरने पाला पोई भी नहीं है। हमने थाने थे थे तो शत्रु
के पीछे पड़े हैं। कितनीफ पार वीरता काम देवी है कितनीक वार
माया और स्तिनी धार युद्धि का कौशल्य भी।
तुम पो हमारी पवर वहा से पड़ी?
महारामा मे पूर
इसी तो मुझे गातुम नहा महामात्यनी ने फरमात निकाला
दुधमठ में सत्य याम को सामने रखी
महेता यहां ? महता का नाम या थाते हा महारा17 पूछा
शन के पी पडे
मालुम होते हैं फहकर दुधमल पला । मुनाल
चलो देसेंबहार सिद्धरान महेता की तरफ चल। महाराजा नील
चार मवार को तेकर आगे निकल गये।
तभी ग्यवर पड़ा
है
स्वार्थ का धैग ५९ महेना को सा? किसी सैनिक से महारान। जो। वे तो प्रात काल पाटण पहुच जावेंगें। एक सैनिक मे दिया जाते रहे। महाराजा ने साधयपूछा हा। न्हाने देखा कि जीत अपनी ही होगी कि तुरत बिदा हो गये? सैनिक ने उत्तर दिया कहे विना हो? महाराजा फिर कहा। परन्तु वरत चाहिये न? पाटण पर 7 मातुम किस समय भाफ्त या जावे राय सेंगार लाग देख रहा है। सैनिक सवाय दिया ठीक । कहकर सिद्धराज 1 अश्व पीछा फेरा मैनिको भी अपना अश्व पीछे पीछे ही रसा। अब निश्चन्तता थी इससे महाराजा को सोचने का समय मिला । मजाल महता और महामात्य शातु मेहता दोनों गहा राजा ये मगर में तूफान का विषय बन गये, महामात्य गद्देवा महाराजा के हृदय पर विजय प्राप्त करे इमक पहले ही मुमाल मामने अाता एवा दियाई दिया। महाराज? गया पता मिला। वे तो पाटण गये। महाराजा विराम मे पहt सिदाम ये पौधा गुंगाल म पूमा जल सतो जसमा . मुजाल की द्रष्टि पीछे पाने वाले सैनिा पर पड़ी और वह "चमका अपने अश्व को एक तरफ लेकर सैनिक के पास जाकर आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा। सरयू ? तू कहा मे ? सरयू ने कुछ जगाव न देते हुए ऊगला उठाकर नाक पर स्थिा की इस अगुली में इतनी तायत थी कि मुजाल को चुप रहना पडा एक शब्द भी यह नहीं बोल सका। ग्रहण करने योग्ये शिक्षा १ इस प्रकरण में स्वार्थ पटुओं की प्रपच कला का पाबेहुए परिचय होता है लालमा क्या नही कराती मनुष्य को ऐमा उलट देती है कि वह कुछ भी नहीं सोच सक्ता जो मुजाल घणन से समझ में श्रावेगा २ उच्चाधिकारी कैसे कार्य कुशल एक दूरदर्शा होते हैं और ये स्वामिभक्त कैसे होते हैं यह शा तु महेता के कार्य से स्पष्ट है। यदि महामात्य चौतरफी खबरदारी नहीं रखते और महाराज को मदद नहीं भेजते तो महाराजा का गुन- रात सही सलामन पहुचना कठिन था पर यह महेताजी की कार्य फुशलता थी जो अपने मालिक को घालबाल बचालिया किन्तु यह सब प्रच्छन्न रह कर ही किया है बाज तो कार्य घुछ भी फरे या नहीं करे सामि को इतना स्थूल रूप दिसाये कि हमारे जैसा खैरग्धा शायद ही कोई हो इतना ही नहीं कोई कर्मचारी पर से पफादारी दिखाव और अन्दर से जड़ सोम्बली करते हैं। महेता के पड्यन्ना एकसत्पुरूषाः परार्थघटका स्वार्थ परित्यज्यये । सामान्यतस्तु परार्थमुघममृतः स्वार्थानविरोधेनये ॥ तेऽमिमानुपरावसापरहित स्वार्यायनिध्नातिय, यीनति निरर्थक परहित तेकेनजानिमहे ॥१॥ (मतृहरिनीतिशतक) भावार्थ~सत्यपुरुष थे हैं जो दूसरो के हित के लिये अपने स्वार्थ को छोड़ देते हैं। सामाय पुरुप ये हैं जो परहित भी करे और साथ ही अपना स्वार्थ भी साधे । रक्षस पुरुप वे हैं जो अपने स्वार्थ के लिये परहित को नष्ट कर डालें । परन्तु जो अपना ।
मदीनामा
स्वार्थ नत हुए भी पराये हित में व्यापाठ करें, उमे क्या पना
दीशाय?
जगमा सकिनी का युद्ध नहीं शिगादा है जो दग विरुद्ध
किमी को प्रपंच रपा पट्टे परन्तु सार्थी लोग अपना स्वार्थ
माधन और गदाराना या कृपापात्र पनो के लिये फैगे २ पद्
यत्र रचते हैं वह इस प्रकरण में दिखाई देगा।
अर्द्ध रात्रि धीत गई थी, गुजरात पी मरहद में प्रवेश कर
के मय भाराम ले रहे थे अम के कारण सैरिफ लोग नोंद में
सर्राटे भर रहे थे, म समय मुजाल महेता महारान में बम्बू
खुधमनार कर रहा था।
मद्देवा कसे जाता रहा होगा?
मुछ पता चलया
सो अथ क्या करना।
महाराम मे अपनी कठिनता प्रदर्शित की
श्राप पाटण पधारो।
महाराजा नेहा
मुनाल मे शाप दिया
और तू?
मंगाकमेका
महारापाने प्रश्न किया
मैने सो मापसे अर्ज की है कि मुझे सो मालये पाना ही पड़ेगा
इसका कारण यह है कि शत्रुओं को हिल घाल से पुरा सावधान
रहने की जररत है
पाह। यह ठीक, तू इन्कार करता था सो तो मैने आप्रह
करके साथ आने को कहा और अय पीच में छोड़कर जावेगा।
मुजास ने कारण पतापा
महारामा मे भत्या प्रह किया
यों नहीं । शत्रु अपनी हिल चाल से पुरे पाकिफ हैं। नहीं
तो वे अपने को बीच में घेरते नहीं मुजाल ने मुद्दा पताया।
परन्तु यहाँ तो दादक वगैरा हैन ?
महाराजा पोले
यह बात सच्ची है परन्तु एक से दो अच्छे। आपको भी तो
काम बनाकर पोछा फिरना है न?
मुजाक्ष ने स्कोर का
तो फिर पाटण में मेरा क्या काम है?
सिदराज ने पास को पाने के लिये पलटी
दूसरा तो क्या है ? महेता पहा है ही राज्य माता भी है
परन्तु पाप खुद नजर रखो उसमें पहत फरक पड़ता है। तालाब
फा फाम भी कितना हुआ है कितना नहीं किस तरह होता
है इसकी संभाल सबने रसी ही होगी। परन्तु श्राप देखलें यह
सब से अच्छा है।
मुजान ने यात को पना कर कही
ठीक । तू कहे वैसा करूं, परन्तु यहाँ की (मालवे को)नई
पुरानी सपर देते रहना।
महाराजाने इमायत दी।
ती फह फर मुजाल सड़ा हुआ और तम्यू के पार
निफला परन्तु निकलते २ १६ पोल उठा।
और महाराज
सिद्धराज का ध्याा आफर्पित हुआ और पूछा क्या? मुजाम
की जयान पर रायू का नाम धाया परन्तु अदृश्य रह फर रोष
.
सतो मासमा
?
गालिय करते हुए सैनिक ने इशारा किया इससे यह चूप हुआ और
पात बदल कर चोला । मेरे जाने की बात याहर न पडे ?
अरगुप्त क्या रहा? महाराजा ने प्रश्न किया।
जितना रहा उतना तो रखना कह कर हसता हसता बाहर
निकला और तैयार रहे हुए अश्व पर बैठे कर बाहर चला
मुजाल में जाने बाद महाराजा ने पहरे वाले को बुलाया
पहरेवाला हाजिर हुश्रा और हुक्म की प्रतिक्षा करने लगा। दुधमल
पावडा को बुलवायो । महाराना ने हुक्म दिया दुधमल हाजिर
हुश्रा और पूछा क्या हुक्म है १
दुधमल क्या समस्या है।
महाराजा ने पूछा
महाराज महेता जी गये इम में मुझे बहम पाता है
दुधमल ने कहा
क्या?
महाराणा
मे फिर पूछा
जसमा को आज की आन रवाने कर देगा । दुधमक मे
तुझे क्या सर?
महासमा ने कारण पूछा
आपसे मिले विना महेता जी जाते नहीं ? दुधम ने मनु
मान से कारण बताया।
पर अभी पहुँचेगा करेगा इतने में अपन भी पहुंचते हैं महा--
राजाने घात को भागे पढाई।
एडमन्त्र
६५
किस तरह
यह सब ठीक परन्तु प्रपा पहुँचगे यहा तक तो ये सब ठीक
ठाक कर देंगे महाऽमात्य जी की कला को कोई नहीं पहुँचता दुध
मल ने विचारणिय यात कही।
वो अब क्या करना चाहिये।
महाराणा पूरा
फरना क्या? मैं अभी का प्रमो जाऊ
दुधमल ने कहा।
फिर
महाराजाने पूछा।
महेता पुन्छ (घडमथल) परे उस सय पर पानो पर टू
दुधमल
ने भी युक्ति र
की
महारामा ने पूरा
कोई न जाने उस तरह । दुधमल ने महाराजा के पास
खिसकते हुए कहा कि आपका दिवान साना है यहा थोड़ी दूर पर
दाई तरफ एक कमरा है उसमें केद थोदी चार अटक कर
बोला और पूछा ठीक है न ।
हा ठीक है।
महाराजा ने स्वीकार किया।
आप पधाराा दुधगल ने अपनी योजना की सफ्लता मान
कर कहा और कभी परियाद हो तो घोलकर पी जाना आपको
आता ही है श्राप सभाल लेना। और महाराजा के पास पाकर
कोई न सुन सके इस तरह दुधमल न पाच सात वाक्य कह डाले।
भरे तू तो गरेला है इम तरह भूल जाते होंगे। महाराजा के
मुह से इस तरह के वचन निकल पडे ।
दुधमल चावड़ा उठा बाहर निकला और तम्बू के बाहर
मठो अपना
परीय दश
टहलने लगा मैदियों की नजर घुसपर र नाके तैयार रहे
हा अश्व पर चर पारण की तरफ चल दिया।
स्वार्थी लोग अपना स्वार्थ मायोय महाराजा कृपा पात्र
पाने के लिय येमे प्रयो
गे तैयार हो जाते हैं और
अपन स्वामी को क मलाइग्नेय अदा कैमे २ जान रचाते हैं
और उममें निपि सद्गुणो मनुग्यो यो फरार ये अपना स्वार्थ
किस प्रकार माधने हैं यह दरारही महापुरप मसार से विरत
होकर सुख की साममियों को मारामार फिर निकल जाते हैं और
अन्य भव्यजीयों को मयोध द्वारा बचाने की चेष्टा करते हैं।
दुधमल
कोस
पहुचा होगा कि अचानक पिछे से
एक्दम टोरी का पासा उस पर ऐसा पदाकि डोरी सिंचते ही
उसके दोनों हाथ शरीर से मस्त मध गये पद जाता हुवा
अनेक प्रकार के विचारों में ऐसा उलग रहा था कि इधर उधर
पास पास धागे पिछे फौन पा रहा है उस पात का मान हो
ही रहा।
फांसा पड़कर पन्धने पर उसो पोझे फिर फर देखा तो एक
सवार घोडे पर वहां खड़ा था परन्तु हाथ जकड़ा जाने से सलवार
तक नहीं पहुँच सक्वा था अश्व पर से उतरने के लिये छलाग
मारने लगा तो डोरो खींचकर वह नीचे गिर पड़ा। दुधमल धैठा
हो रहाया कि इतने में तो आग'तुम छलाग मारकर घोड़े से
उतर कर उसे पकड़ में ले लिया और सैनिक के पैर भी बाध
दिये गीचे पटक पर कहा कि-
-
६७
-
हा सरय
नेकदा
पहचाना?
कौन
दुधमन ने पूछा
फिर पूछता है कौन ? गावाज से नहीं पहचान सका
सैनिक ने रोप से कहा।
हा हा पहचान गया सरयू ? दुधमक्ष ने भावाज पहचान कर कदा
सैनिक ने कहा।
यावने का कारण ?
दुधमल ने पूछा
कारण तो महाराजा को पूछना
सरयू मे कहा।
ठीक ठीक समझ गया
दुधमक
समझने की वात तो पीछे परन्तु सयाल रखना कि जसमा
जो काम नहीं कर सकती यह में कर सकती हू चावड़ा । जसमा
यों नहीं मिलेगी। जब तक सरयू जीवित है।
मैं भी देखता हू।
दुधमर पक्ष खाका पोछा
मैं भी देखती हूँ। महाराजा को दिलासा तो तूने बहुत दी है
परन्तु वह तेरी पाशा किस तरह फनी भूत होगी यह न समझना
कि यहाँ महता है और महेता के माफिक ठएडी तापत से काम
लिया जायगा यहां तो तुरत फुरत मजा घसा दिया जाता है।
इतना यह कर ऊपर से एक लात मारी और यहीं यन्धा हुया
छोड़ कर सरयू अपने अश्वपर पके पाटण की तरफ पलदी
सरयु एक क्षत्रिय फन्या हे यह पड़ी हो हिम्मत वाली है।
पहले तो यह और इसका पड़ा भाई धनपाल दोनो हो शा'
६८
सतो नममा
महेता के पक्षे शनु थे इसके भाई धापाल को तो महेतानी ने
मारा था यह भी मौका देस पर महेता का खून करने के प्रयत्न में
थी परन्तु महेता नी के दीर्घायु एव तप तेज के प्रागे वैसा न कर
सकी यानि इमकी हिम्मत नहीं पड़ी । धापाल के मरने के पार
यह अकेली रह गई थी। एक समय सरयू भरूप में मदनपाल
ठाकूर के चू गल में पर गई थी घह अपनी दुर्भावना इमसे
पूरी करना चाहता था यह से नहीं चाहती थी अत में
महेताजी की मदद स छुटकारा पाई तय से उनक पास ही उन
की धफादार होकर रहती है और महामात्य के कई अगत्य के
कार्य करती थी सरयू महाऽमात्य को विश्वास पात्री थी। महाऽ
मात्य इसे पिछली सयर लाने को छोड़ गये थे सो दुसरे गेन
मायकाल होते होते पाटण पहुँच तो गई परन्तु अधिक थकने के
वारण कमर में जाकर सोगई-जसमा को उस बात की सूचना
करना भूल गइ : परिश्रम के कारण ऐमी नींद आई कि प्रात
पाल हो गया और महाऽमात्य के पुत्र पुत्री चयन एन देवल हाहु
करते सगे कि बडी बहन आगइ बड़ी बहन श्रागई तय शोर गुल
से नींद सुली। सरयू के आगमन के समाचार महाऽमात्य
को मिलते ही व तुरत श्राये और सरयू से पिछा मब वृताव
जान लिया।
मापन जसमा को सूचना करा दी है 7? सरयू ने पूछा
फ्ल सम व्यवस्था परके ही पाया हूँ। महामाय ने जवाब दिया
पक्ष्य सरयू ने पूछा। क्या यवस्था की है? सायू में पूछा पल के कल रात ढलने पर चूपचाप विदा होनाय सो व लोग खो रवाने हो गये होंगे और स्तिनी ही दूर निकल गये होंगे। महेता भी कहा। पास कराई। मैंन श्रीपड को कह रसा है अभी श्राता ही होगा। मदाऽमारथ ने कहा इतने में प्रांबड आया और महेता नी ने पूछा क्यां गयेन ? जवाब नही मिला क्यों। महेना जी ने पून जसमा गुम है भौयर ने उत्तर दिया क्या कहता है? महेवा जी ने भारचय प्रार किया कल रात्रि में ये लोग तैयारी नहीं कर सके फनर में निकलने की तैयारी करते थे कि अचार कोई जसमा को उड़ा कर न गया रोड़ लोगा ने अभी ही मुझे पता सप तो बाजी हाथ से गई ? परन्तु ठीक है। सरयू चापड़ा को तो यांध ही पायी है इस लिये नदला ले मकेंगे। महेता का सपना विचार प्रकट किया। पर तु दुधमल चावड़ा तो यहाँ ही है। मे सरयू योच में ही पोल उठी पढ़ी कमर ही मैं ने गन्यमद में उसे देखा है। भाषा । आपद का क्या कहा?
-
सही नक्षमा
राध नो में ही भाउ ? फइ पर महामात्य जाने को तेयार
हुए और दिवान स्वारे याहर पैर रसा इतने में तो ओड लोगों
ने पाकर महेता जी को घेर लिया और श्रोडलोगों का नायक
रीस्म श्रोट बोला---
माँ पाप । श्रापका कहना नहीं माना रात को तैयार नहीं हो
सके देरी हो गई दिन उगते २ रम्भा पहन के नाम से कोई
छल करके उसे ले गया। यह भी रम्भा बहन के नाम से धोसे में
प्रागई और साथ हांगई। वहाँ तपास कराई तो सबर मिक्षी कि
यहा तो किसी ने नहीं बुलाया और न पहाइ ।
महता जी और थायह माई सप परिस्थिति को भाप गये
पार उनी विश्वास देवर दरवार गढ में गये
प्रहण करने योग्य शिक्षा
१ राजकीय प्रश्नि ऐसी है निममें प्रोक प्रकार की सावधानी
रखनी पडती है और ऐस मनुप्य रसने पड़ते हैं जिससे वास्त
विक्ता का पता चल जायें। २ प्रपची लोगइम घात की प्रतिक्षा
परते रहत है कि कोई मोका मिले और हम अपना पासा सीधा
करें इससे चाहे किसी का अहित ही क्यों न होता हो। ३ जो लोग
माइमिक ओर हिम्मत बहादुर हैं वे किसी को प्रपची के प्रपच का
शिकार नही होने देते थे अपनी शक्ति भर छुड़ाने और प्रपची को
शिक्षा करने में पीछे नहीं हटते पर अपनी जान जोखिम में डालकर
। भी निर्दोष की सहायता करते हैं
-गो सके वर्णन से ज्ञात
हुवा होगा ४ किसी हितैषी के चपन पर ध्यान न देकर गफलय
करने का प विपम वातावरण म किमी पर विश्वास करने का
कैसा दुश्परिणाम होता है वह प्रोड लोगों और जसमा के वर्णन
ये बात हुधा होगा ऐसे समय में पुरी मावधानी रखनी चाहिये ।
कसोटी और मुकति
मतेम्मपुम्भदल नेभूरिसन्तिशुराः
केषित्प्रचण्डमृगराजवपिदक्षाः ।।
कितमवामिवलिनापुरत प्रसह्य
क दर्पदंपैदलनेपिरलामनुष्या. ॥
(भर्तृहरि शृगार शतक)
- उन्मत्त हाथी क मम्तक को विदारने वाले शूर इस
पृथ्वी पर अनेक हे और प्राएड सिंह क माग्ने में दक्ष योद्धा भी
कितने ही हैं परन्तु हम घलगानों के प्रागे हठ करके कहते हैं कि
--
फसोगे और मुक्ति
होगा।
हैं। और
पडे योद्धा मी समर्थ नहीं है। चे भो नी के स्वाभाविक हाव भाव
मिद्धराज मी जसमा के श्राकरण से सीचे हुवे पाटण था पहुँचे
कामदेव के मद का दान करते पाला कोई बिरला ही मनुष्य
मदन का का इतना बलवान है कि इसे रोकने के लिये घड़े
से प्राकर्पित होकर रणभूमि से वापिम घने आते हैं । महाराज
हर उपाय से उसे अपनी बनाने के लिये क्या क्या
प्रयत्न करते है और अन्त में वह कैसे छुटकारा पाता है
सो इस प्रकरण में दिखाई देगा।
आज पाटण का वातावरण उग्र बन रहा है महाराजा सिद्ध
বীজ থায়ে গা শব ই স্পী গাল মান কাল ী মামা ।
दरबार के अन्दर आते ही महामात्य का अपमान किया मालधा
के राजा के सामने युद्ध का मोरचा न लेकर दंड की रकम देने के
अभियोग में महेताजी को महामात्य पद के अयोग्य ठहराये ।
महना न हो तो भी में अपना राज्य सभान सा ऐसा जाहिर
किया । इस प्रवृत्ति से पाटण की जैन और जैनेतर मना धावेश
मेंथा गई थी परन्तु मिद्धराज को पाटण की प्रजा की इस समय
+ दरकार नहीं थी। तुरत हो दरपार से निवृत होकर यह सीधा
राज्यगढ म थाये। और भोजन फरफे तुरन्त हो दिनासा में
--
पहुँचे।
पहरेसर को दुम्म दिया कि मेरे से प... .
६
सतो असमा
साना दें फिर भी यह उममें प्रसन्नता का अनुभव नहीं करवी, यह
तो जगल म म्यतन रह कर ही रहेगी पिजरे में नहीं।
जसमा ने निर्माता से नवाम दिया।
जसमा पू से मोटे कपडे (जाडे पढे) पहने को नहीं
जन्मी है तेरा यदन तो ये रानशाही रगीले व चमकीले और महीन
कपडे की पोशाक व हीरे जवाहिरात या मोती के दागिनों से ही
सुशोभित होता है । मुझे तेरे इस सुकुमाल बदन पर ऐसे दाटले
देखकर दुप होता है तू महल में चलकर वहा की छटा तो देख।
महाराज ने पिर साकी पासा पंका।
महाराज ! मुझे न तो बारीक रगीले चमकीले कपडे ही
चाहिये । हीरा मोती हो ये तो पापकी रानियों के बदन पर ही
अच्छे लगते हैं। मेरे को तो ये मोटे जाडे कपडे और जगल में
पैदा हुए घास की माला व प्रेस ही अगली आभूपण पसद
जिसमें मरा धर्म फर्म कायम रहे और मरे पतिदेव भी मुझ पर
प्रम न रहें । मुमे हीरा मोती के दागिने और बारीक वस्त्रों की
साबरत नहीं है।
ससमा मिश्तिा से तर दिया।
जसमा कहा सूपी लूसी रोटी खाने और बदन को गिगाड़ने
में पड़ी है जरा विचार तोर मेरे महलों में चलपर देस पहा तेरे
लिये प्रोक तरह के मेवामिष्टान और सवती (भोजन) तैयार
है जिससे कि तेरा यह शरीर दोप रठे। वहां बहुत स दास दासी
कसौटी और मुक्ति
७७
तेरे हुक्म मे हानिर रहेंगे और तू राजरानी
महाराजा को श्रटकाकर बीच में ही जममा घोल उठी
महाराज । थाप जरा विचार करके बोरों महल और वहा को
सुस सायबी तो पापको रानियो के लिये ही है ओडराणी के
लिये तो मोपडी भलो और धरती । महाराज मेंन तो घाट सारसी
है मेरे पेट में पकान पच भी नहीं सकते मरे लिये तो राप व
दलिया ही अच्छा है। मेरे को रिसी दास दासी की जरूरत नहीं
है मैं तो सुद दासी बनकर मेरे पति देव को सवा करती हूँ और
प्रसन्न रहती है।
जसमा ने स्पष्ट सुना दिया
तब तू नहीं मानगी ? साम दाम उपाय का प्रयोग पर ये
महाराजा ने देख लिया कि यह यों नहीं मानेगी इम लिये दड
नीति अपत्यार करने का निश्चय किया इतने में महाराज ?
भाप पिता तुत्य है प्रजा के रक्षक हे गुर्जर सम्राट को ऐमा करना
पाचही जसमा को भाकाकर
जरामा-यह सुराने का गुझे अयकाम नहीं ऐसा तो मी
थाहर यहुत सुन रा है यदि तू हा कहे तो आनद से महल के
अादर रसो को मैं तैयार हैं और इन्कार करे तो मेरा विचार
तो फिरने का है नहीं तू सीची तरह स्वीकार नहीं करे तो यता
से तुझे स्वीकार करना हीपड़ेगा
महाराज दो
अपना पल पाप पारमा लीजिये मैं भी देखती हैं कि श्राप
पराते हैं नसमा में मी हिम्मत से मार
पल द्वारा
Rो जसमा
इसका परिणाम क्या भायेगा ? तुझे पपर है?
महाराम मे ग में बदा।
अधिर सपधिप तो रसपार
मासमा ने भी रूसाई समाप दिया।
सपात नहीं पर तु तरा पात ।
महारानामे ठोस मारा।
महाराज । यह विचार अमल में लाते तो आपको
श्राकाश पाताल एक करना पड़ेगा हग लोग गरीब हैं इससे
क्या हुआ ? मनुष्य तो हैं। आप जितने मानापमान फा भ्या
रखते हैं उतना हो हम रखते हैं आप जितनी ही इन्जत श्राप
न धर्म फी भावना हमारे में भी है। मापने यह मोच रखा है
कि गरीयों का क्या मुफ पशु है नय चाहा तप मन माना उपयोग
फर सकते हैं परतु इसमें आप भूलते हैं में आपसे प्रार्थना
करती हूँ कि आप समझे, नहीं तो आपकी भूल राज्य को हानि
प्रद बनेगी।
जसमा म धीरता पूरक भपना मन्तयमुनापा।
सममूगा तय तकतो
न पाटण की पटरानी बननायगी।
महाराजा ने भी प्यंग मेंहो कहा।
महाराज । इस विचार को तो आप अपो हदय में ही रहने
दीजिये पाटण पी पटरानी तो श्रापको दूसरी ही सोधना पड़ेगा
पहफर जसमा उखानों की तरफ जाने लगी है मिद्धराज ने
कमरे के बाहर सर डालते हुए कहा तू सीधी सरह नहीं
मानेगीन
कसौटी भौर मुक्ति
७९
सीधी या बाकी किसी भी तरह नहीं।
नसमा ने स्पष्ट कहा।
तय मैं देखता हू
महाराजा पोके।
और मैं भी देखती हूँ।
मसमा गे भी वैसा ही उत्तर दिया।
तुमे सपर है कि तू नि शस्त्र है।
महाराजा ने उसका यह देखने के लिये कहा।
परन्तु मेरे पास भी बड़ा शत्र है और वह मनोयल का
जसमा में यह प्रकट किया।
तब तेरे मनोबल को मुझे देसना पड़ेगा ? महाराजा कहा।
देसो । काह कर जममा सिद्धराज से एफ तरफ होकर भागे
बढी।
पस यही तेरा मनोबल है न १ कहते हुए भागे माफर
महाराजा ने जसमा का हाथ पकड़ लिया ।
जसमा एकदम घमराई और धुममारी तथा सिद्धराज को
धक्का देकर भागे घढी परन्तु पीछे से उसका हाथ खिंधा गया
इतने में आवाज आई । महाराज इसे गत पा।
कौन सिद्धराज आवाज की दिशा की तरफ देखकर पमका
और कहा मेहता?
जी
महेताती जवाब दिया।
महाराज ने करा
पिना इजाजत के ही।
८०
सती जसमा
-
-
मेहता जी बिलकुल सिद्धरा के पास ही श्राफर सड़े होगये
जसमा एक तरफ सिसक कर सडी होगई।
महेता के अचानक आ जाने से महाराजा एकदम लज्जित
से होगय । प्रधिर घोलने की हिम्मत न रहो हाथ पैरों में धूजर्ण
छुटगई कोई हिम्मत वधावे ऐमा वहां था भी नहीं।
जसमा जल्दी बाहर निकल
महामाय ने कहा
जममा न महेता जी के मामने देखा और महाराज के
सामने भी नजर पड गई वह कांपने लगी
डरेमत । मैं हू वहाँ तक तेरे सामने कोई प्रास उठा कर भी
नहीं देख सक्ता जा बाहर तेरी राह देस रहे हैं।
महामात्यने पसमा को हिम्मत दी
असमा पागे वढी महेता जी भी पीछे पीछे चले । सिंह गाजे
इतनी शक्ति सिद्धरान की जीभ उपर पाई परन्तु यह उसी समय
विलीन होगइ । मुँह बिलकुल सी गया। जीभ तालबे से निकलती
ही नहीं।
चममा वाहर आई-महेता जी उसको राजगढ की ड्योढी चक
'ग्राकर पहुँचा गये श्रार पीछे दिवानसाना में आकर सडे होगये
थे। अब उनकी आँखें वहा मु जाल महेता को देसने के तिय
उत्सुक थी पर तु वह कहीं भी नहा मिला यदि यह मिल गया
होता तो महाऽमात्य उसे अच्छी तरह फटकारे मिना न रहते ।
कसोगे और मुक्ति
निस समय महाऽमात्य गुजरात को सरहद पर से एक्दम
वापिम लौट गये थे उसी समय भुपाल मगम गया था कि महेता
जी मैय को छोड़ कर महारान से पिना मिने ही लोट गये हैं
मो पानी फेर देंगे और हमने जो महाराजा को पाटण ले जाने
का प्रयत्न किया है यह निष्फल हो जावेगा इससे महाराजा को
सो मालया जाने का मममा कर रयाने हुआ था परन्तु मालवा
न जाते हुए यह भी दूसरे रास्ते से पाटण का तरफ रवाने हो
गया था दुधमल पापडा भी महाराजा से पाटण पाने को विदा
हुधा था वह यह समझता था कि मेरे पाटण की तरफ रवाने
होने की खबर किसी को नहीं है परन्तु तन्त्र के पोछे छिपी हुई
सरयू ने महाराजा और दुधमल को मरणाए सुनती थी इससे पद
भी गुम रीति से पहले ही रवाने हो गई थी और मौका पाकर दुध
मल को रास्ते में ही पार कर पटक के पाटणा पहुँ1 गई थी पान्तु
जसमा को मायचेत करना भूल कर थकी हुई अपने शयर
मे जाकर मो गई थी मजाल महेता थोड़ी दूर सा सो माया
रास्ते पर गया पर तु विचार अल जाने से यद आप्टे रार पदा
था फारण महाराजा की छावणी मे पचना था और किसी।
मिल जाने का भी भय था । दूसरे गेज धमल जहाँ पर पपा एमा
था वहीं पर आनिकला धमल वो पापा पर पथ पर ITAL
परफे कटार से उसके पन्ध फाटे और दोनों पी पोरे पर पार
होकर जल्दी से उसी रात पो पाटणा पालैप गये RHIT Im
श्राफर माउप विया तो प्राप्त हुया कि पोष्टलोग मारेकी या
६
८२
मतो असमा
।
कर रहे हैं पर अभी गये नहीं। दुधमल ने शीतही योड लोग जाने
लगे उस से पहले हो जसमा की बहन रम्भा के नौकर को बनाकर
तुम्ह रम्भा यहन युलाती है ऐसा उमे भेज कर यह लाया और
लममा को पाते ही करने में परके दिवानसाने के कमरे में यर
कर दी थी।
महाराज सिद्धरान भी थाराम किये बिना ही एक दम
पाटण पहुँच गय थे और थाते ही प्रात काल दरवार करके
पहले तो महाऽमात्य महेताजी का अपमान किया था और बाद
दरपार घरसान्त कर के दिवानसाना में पाये ये महाऽमात्य
महेताजी चाहते तो उसी समय दरसार मे ही महाराजा को
जैसा का तसा जवाब दे सकते थे परन्तु उस समय उहोंने कुछ
नहीं किया मघ मानापमान को पी गये कारण उनको जसमा
का उद्धार करना वाकी या मो स जगह महाराजा के पजे से
छुडा कर उमरा उद्धार रिया।
जसमा पाटण शहर को अन्तिम भेंट परत पाटण से भागे
घद रही थी। श्राड मरयू औड़ रम्भा उसे दूर तक पहुचा कर
यापिस लौट आये। श्रोड लोग उसके साथ श्रागे यढे जा रहे थे।
ग्रहण करने योग्य शिक्षा-
१ जन मनुष्य कामाध हो जाता है और वैमे ही अनुकूल
माधन या सय मिल जाते है नया क्या अनर्थ नहीं करता
और उममें विघ्न पड़ता दिखाई देने पर उन नेक नियत, खैर
कसौटी और मुक्ति खाह और गुरुजनों के माथ भी वैसा दुर्व्यवहार करता हे सो महाऽमात्य का महाराजा के दरबार मे किये हुए अपमान से स्पष्ट होता है । २ कामान्ध मनुष्यो को अपना हित चाहने पाले सज्जन भी शत्रु से लगते है और लुन्चे पदमाश आफन में फसाने वाले दुर्जन लोग अत्यधिक प्रिय लगते हैं इममे वह मजमों का निरा दर और दुर्जनो का श्रादर करता है और अपन श्रापको पतन के गव्हर में डालता है ३ कामान्ध मनुष्य अपनी लालसा पूरी करने के लिये साम दाम दड भेद से सती परिवारमा बिया को कैसे २ कष्ट में डालकर उनको प्रलोभन व भय दिखाता है परन्तु जो धर्म तत्व को समझने वाली पवित्रामा स्त्रिय होती हे पसे समय मे भी निडर होकर अपने धर्म पर अडिग रहता हुई उन कामा मनुष्या में नहीं पाती और अपने यात्म बल का परिचय दती है यह महाराजा सिद्वराज एव जसमा के सवाल जवाब में स्पष्ट है। ४ जो लोग नीतिमा एष परोपसर्ग होते हैं ये अपने माना पमान तथा पद रक्षा की परवाह न करते हुए अपने प्राणो को जोखिम में डालकर भी निर्यलों की रक्षा करने के लिये पहुँच जाते हैं और वहां से उनका उद्धार कर उन्हें सहिसलात उस धापत्ति में से हुहा लेते है या महाऽमात्य शातुमहता को साहसिक्ता सष्ट फरसी है ५ स्वाभिं लोग अपना स्वार्थ माधने एव अपन गामि फ कृपा पान यनने क लिय यैस धन परते हैं और निर्दोष मनुष्यों को माने की चेमा करत हे यह मुनान महेता एव दुधमल क वणन मे परित होता है। 4 जकाक्दारी और पद त्याग यद् चैतनोपिपाद, प्रष्टप्रबलतिसवितुरिनका त: तत्तेजस्वी पुरुप परकृत विकृतिकथसहते ॥१॥ (मतृहरि नीतिशत) भाग-मूर्य का तमणि सूर्य के पादस्वरूप किरणों के लगते ही जल उठती है इसी तरह तेजस्वी स्वाभिमानी पुरुप भी परकृन विकृति को पैसे सहन कर सकते हैं ? अर्थात् कभी नहीं। महाराजासिद्धराज ने अपने स्वार्थ में घाधक बनने के कारण पूर्व के सय उपकारा और सेवाओं को भूल कर गुर्जर महामन्त्री
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सतापमा
हुकम दिया
श्रर यह नहा हो सकता। महामारय ने मी वैसा ही मावून
बाप दिया।
मेवा की कदर करके मुहत तक एक की एक जगह ही जवाय
दारी सौंप रसो इसका लालच लगा है क्यों ? कहकर महाराना
ने पहरेदार को अावाज दी।
जी कहता हुमा पहरेदार हाजिर हुआ।
महेता को गिरफ्तार करलो महाराजा ने हुकम
पहरेदार कुन आगे पढ़ा किन्तु तुरन्त ही दो पांव पीछे हठ
गया महेताजी के मुह पर से निकलते हुए अपूर्व तेज पुज
के श्रागे बिचारे पहरदार की क्या वाकत ? जो श्रागे पढे
महाराज । महेताजी के बदले मुझे बन्दी बना लीजिये ।
पहरेदारने की
अन तो सिद्धराज का क्रोध अधिक महक उठा और पावाज
दी कोई है हाजिर?
आवाज सुनते ही अनेक मनुष्य हाजिर हो गय और राज्य
गढ की गढी पर का नायक (कप्तान) भी हाजिर हुआ दास
दासी मा आ गय और पहरा देने वाले अनेक सैनिक भी सड़े
हो गये महेता को पकड कर महामात्य सूचक राज्य चिन्ह इसके
पास मे लेलो।
महाराजा ने उमना पूर्ण हुक्म सुमाया
सुनपर सब के सबस्त घ रह गये कोई भी हिला या चला
नहीं राज्यगद के अन्दर कोलाहल मच गया वातावरण ही बदल
गया और कोई उत्कापात होता हो वैसा भयंकर दृश्य सब को
अवायदारी और पद स्पाग
८९
।
लगा जिस का निवारण करना किसी में भी शक्य नहीं था किमी
में कोई भी रास्ता ह द निकालने की सामथ्य नही थी सबको
अपनो बुद्धि अल्प लगती थी।
इतना अधिक जोर ? कह कर सिद्धराज खुद हो आगे बढ़ा
अब तो मुझे ही हाथ उठाना पड़ेगा।
महाराजा यही सडे रहिये महामात्य ने मी गोश में भाकर कहा
तू मुझ पर हुक्म नहीं करे तो फिर करेगा ही कौन ? कहते
हुचे महाराजा महेता के बिलकुल निकट पहुँच गये ।
महाराज फिर भी कहता हूँ कि यही खडे रहो महेताजी
ने कहा और सिद्धराज के पाव एकदम थम गये महेताजी की
किसी अद्रश्य शक्ति ने महाराजा को वहीं पर स्थिर कर दिया
जहां खड़े थे।
अचानक वातावरण पलटा खागया सभा में शान्ति छा गयी
राज्य माता भोनलदेवो एकदम दौड़ते २ दिवान साना में श्राफर
सडी होगई और पूना मिद्धराज यह क्या कर रहा है ?
पखाई भरे जवाब से माता का सत्कार हुमा
जब मनुष्य गुस्से में आ जाता है और पापा भूल जाता है
तब उसे कुछ नहीं सुझता वह चाह सो बोल देता है।
रायमाता ने सवाल किया
हो मुझे महेता नहीं चाहिये
महाराजा मे माता
राज्यमाता मे मा किया
में किसी भी मोघ लेगा
रमत।
रमत?
तय?
महारामा में
पता मसमा
समाना में पूछा
मरामा मेरा
मातानादो-वामहे
राज्य माता बोली
?
गरा अपमान
अपमान मेग फि तुम्हारा?
महता जी ? शान्त होवो यह यालक है
बालक ना परतु राना, महारामा न मासा सुनाए।
गाथमाता मे महता को कहा
शात हार का होता थम टुमर भ म मरेताजी ने राय
माता को जगाय दिया परन्तु तुमयो देखना है और मेरा मन
सरकापान पर पहुधा हो तो भी शात हो जाता है पहन
तुम न आई होती तो पारण का पुण्य श्राज परवार गया होता
'प्रान महाराजा योगयर पड जाती कि पाटण की गद्दी पर इनकी
जरूरन केवल शोभा पूर्ति है यानी राज्य तो जयावदार व्यक्तियों
से ही चलता है।
बहन । तुम्हें पता है और स्वर्गीय महारारा पर्ण याद
आते हैं और उनके अनिम शद भी याद पाते हैं तथा तुम्हारी
वह करणात मूर्ति भी भाइ को पाधते वस्त की याद भाती है
यह महाऽमात्य पद के सूचक राज्यांचाह तुम्हारे चरणों में भेंट
करता है पाटण का महाऽमात्य पद अघ्र मुझको नहीं चाहिये।
महेताजी ने उमी गम्भीरता से राज्यविह राज्य माता के सामने
रग दिय पर है क्या?
कुछ नहीं। मानापमान को तो निगल गया हूँ और फिर भी
हरम कर पाता हूँ स्वगम्य महाराजा कर्ण के नाम के नीचे फिर
उपमाता प्रश्न किया
" जबाबदारी और पद त्याग ९१ भी में महाराजा को कह जाता है कि "जसमा" यो नहीं मिल सफेगी पाटण की प्रजा या समझती है कि आज महाराना ने जसमा श्रोडण को आवरू लेने का इरादा किया है तो क्या क्ल पाटण की प्रना की ही पहन बेटियों की आबरू नहा लें इसकी सातरी क्या? इसलिये पाटण पर राज्य करना हो तो अब भविष्य में से मनोरथ कभी न करें। कौन जसमा ? मीनलदेवी स्तसाध हो गई। हा थभी ही उसे महाराजा के पजे से छुडाकर यहा से उस के देश को तरफ मेंने रवाने की है। उसी के लिये तो युद्ध में गये हु महाराजा यहाँ प्राये हैं। महेता जी ने सष्टी करण किया परन्तु इस बात की अय मुझे क्या दरकार है। यहन मैंने तो क्ल का हो निश्चय कर रखा था कि यह महाऽमात्यपद की जोखम दारी भय मुझे नहीं चाहिये । और प्रभात-तक तो पारण में मेरी उपस्थिती भी नही रहेगी ! महेताजी ने पीठ फेर कर ही यह वाक्य पुरा किया था पार आगे घढे मो सबके देसते २ ही चले गये। मोनलदेवी ने आयाज दी महता? परतु महेता ने जरा भी ध्यानही दिया युमें मारने पर मी पीछे तर तक नहीं पी से एर परिप्रधारी व्यक्ति अपरिग्रही होकर जगल में जाता हो । महेता जी ने भी पारण ही नहीं पान्नु पाटण और सारी गुर्जर भूमि को त्याग दो होइम प्रहार पार में होते हुए भी पेक्षित धन गये । उई अपने निश्चय में हिाने कोको ममर्थ नहा हुना और दुसरे रोग ममान ने सती जसमा ९२ हो पाटण से विदा होगय राज्यमाता व पाटण की प्रजाके आगे थाना न बहुत कुछ कदा परन्तु महेता जी ने अपन निश्चय को बदला ही नहीं अन्त में सय हार थक कर कुछ दूर तक पहुँचाक धापिस आ गये। ग्रहण करने योग्य शिक्षा- १ राज्य कारोबार में राजा का मत्रियों का सैनिक का और प्रजा का क्या सम्बध है और महाराजा किस हद तक प्रजा पर या मत्रियों पर अपना हुक्म चला सकता है, और सत्यप्रिय न्याय- परायण मनुध्य महाराजा की भी अनुचित हा में हा न मिलाते हुए नग्न सत्थ सुना देते हैं और समय पाने पर प्रजा के धर्म कर्म का रक्षण करने के लिय कहा तक श्रामबल पर डटकर अपनी जान को श्राफत में डाल देते हैं यह महता जी के वर्णन से स्पष्ट ममझ में आ जाता है-२ श्रात्मनल एक अपूध बल है, जब यह चल पूर्ण रूपेण प्रकट हो जाता है, तब इसके श्रागे सत्र बल व्यर्थ हो जाते हैं । बडे २ शम्य व अनाधारी भी श्रात्म वलो का कुछ नहीं निमाड सक्ते आत्मरली राना महाराजाश्री को भी फ्टु सत्य सुना सकता हे उसको किसी की अपेक्षा नहीं रहती वह महान शक्तिशाली का भी मामना कर लेता है, यह महाऽमात्य महता जी क नएन मे दिरसेगा। ३ सहा मनुष्य आयेश में श्रा जाता है यहा यह भान भूल जाता है उसे अपने पूयों का भी ख्याल नहीं रहता है उनके थागे भी यद्वतद्वा योल जाता
जबाबदारी और पद त्याग
९३
है, और उा अपमान कर बैठता है। महाराजा सिद्धराज भी
'अपनी माता के समक्ष किस प्रकार पेश 'प्राया है, यह देखिये
४ सत्य और न्याय प्रिय मनुप्या को अपन पनाधिकार का
जरा भी मोह नहीं होता वे तुरन्त छोड़ देते हैं, परतु उसका
दुरपयोग भी नहीं होने देते हैं, और छोडे बाद उसके मामने भी
नहा देखते हैं।
पलिदान ताप महत्व पाडित्य, कुलीनत्व विवेफिता ॥ यावज्वलतिनागेप, हत पचेपु पावकः ॥ १॥ (भतृहरि शृगार शतक) भावार्थ-या, पडिताई, विवेस्ता और कुलीनता ये सर मनुष्य क हदय में वहतिर ही कायम रहत हैं जबकि उसके शरीर में कामाग्नेि प्रज्वलिप्त न हो इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य कामा ग्नि क प्रदीन होने पर सभ्यता युद्धिमत्ता विवेक और कृत्याऽकृत्य
गाडायों में भागे थदी। गाई मोटर
के पहले तो ये मोदेरा पहुँच गये । सामान मरे हुए गारे दाम
भागे पढते जा रहे थे। गाड़ाओं पर बेठे हुए शहर
दस बारह घोड़े सवारों को पीछे से श्रावे
देशहीद
चमके चलते हुए गाड़े रुपा दिये गये ।किर में
हो ओडलोग उतर पडे शेप योगेन र रस
बालगन
का मानभूल जाता है फिर तो वह उसीके पीछे बड़े पड़े मन भी
कर बैठता है और जगत में बदनाम भी होता है।
महाराजा सिद्धराज ने भी जसमा को येन प्रकारेण मा
फरने के लिये कहाँ तक प्रयत्न किया और अन्त में या पाया
यह इस प्रकरण में दिखाई देगा।
जसमा को मुक्त करा कर अपना राज्य पिद सौंप के गहता
राज्यगढ से चले गय तर महाराजा सिद्धराज आप लोगों की
तपाम कराई तो मालुम हुआ कि मोढेरा यी तरफ आगे बढ रदै
हैं। जिमको जिसकी लगनी लग जाती है उसको यही सुमता
दूसरा कुछ भी नहीं मंध्या हुई थोड़ी रानि गइ वि महाराजा रिट
राज थाडे मनुष्यों (अगरक्षकों) को साथ लेकर किसी की म
म पडन देते हुए गुम गति से गोढेरा की तरफ चल निरी
से उतरतो प्रोट स्त्री मे गालुम पडती यो
सपने परस्पर सलाह कर रखी हो इस
नाई
यहो रहे हुए प्रोडलोगों ने मकान
मतोमसमा
एक यूह रच दिया और व्यूह के शोध मरूप को अपसरा नसमा
कोयडा की।
महाराजा भिरार श्रग रक्षकों सहित थोड़ी देर म यहाँ पा
पहुँच श्रीडलो यो रा पाल हुए देसे जो बीच में जसमा को लिये
Pए बड ये पोटलोगों के पास भी शस्त्र आदि थे परतु वे नाम मात्र
फे-लेकिन य मुसजित थे। एफ श्रार्य महिला की प्रतिष्टा के सातिर
उहोंने अपने मरन का मय और जीवन की पाश छोडरसी थी।
महाराना सिद्धरान ने ननदीक आकर पहा--तुम लोग
नैयार तो हुए हो परन्तु जो जीना चाहते हो तो जसमा को सौंप दो
और चले जाश्रो किसी का थाल भी वाया नहीं होगा।
प्रोड लोगों का नायक टीम प्रोड पहले तो धूना मि तु शीघ्र
हो सचेत होकर उसने महागजा का तिरस्कार किया ।
मिद्धरान बाधित हो गये और श्रारमण करने को हुक्म
दिया टपाटपनि शस्त्र और रिना तालिम के योड लोग घरती
चाटने लगे। कितने ही साथी मरे कितने • भाग छूटे और अन्त
में प्रोटलोगों का नायक रोस्म भी मारा गया। जीवित रही
पघल जसमा।
सिद्धराज ने तुरत हुक्म दिया और शस्त म्यान हुए।
रक्त रजित भूमि पर जसमा सड़ी थी । सिद्धराज अश्व से
उतर कर उसके सामने आ सड़े हुवे और बोले- क्यों अभी और
चत्मकार देखना है।
हो जसमा ने निडरता से कहा।
।
बलिदान
९७
।
अच्छा । सिद्धराज ने चिड़कर पहा-और सैनिका की तरफ
मुह कर के योले तुम दूर खडे रहो ।
सैनिक लोग सब दूर जाफर गोल चक्कर के श्रागार में पड़े
रहे, सिद्धराज बिलकुल जसमा के पास श्राये और बोले-
अब ? कोई है पचाने वाला महेता घहता ?
महाराज दूर रहना
जसमा ने जवाब दिया
कारण ?
महाराजा ने पूछा
में पाटण चलने को तैयार हूँ जसमाने युक्ति का प्रयोग किया
६ । सिद्धराजाश्चर्य मुग्ध बन गया और कहो लगा पहल
से हो समझगई होती तो?
रएडाये बाद उहापण पावे उसका उपाय दी क्या?
जसमा ने मन में कहा
परन्तु मुझे पाटण मे ले जाकर करोगे क्या?
गुर्जर देश को महारानी? सिवराज ने अपने भाव प्रकट किये
महारानी ? महारानी तो बनाना तुम्हारी राना को में महारानी
बन क्या करूगी ? जसमा ने अपनी आँखों को स्थिर करते हुए
कहा और साथ ही महाराजा को असावधान देय कर छलाग मार
के महाराजा के हाथ से कदार छुड़ाने के लिये अपना हाथ मारा ।
महाराजा सिद्धराज उसके हाथ को दूर करना चाहत हैं।
उससे पहले ही जसमा क्टार ले लेती है। अब तक जो कटार
महाराजा सिद्धराज के हाथ में शोभ रही थी वही कटार जसमा
हाथ में शोमने लगी। और यह गर्नर कर बोली । महाराज!
मोसमा
TET रिया और न्यूटर योष में पामरा उममा
महाराजाभिमाग रसको महित थोड़ी देर में यहाँ प्रा
पहुँच घोटलोगों का पाल हुए मम्मे जो योच में जममा को लिये
ए यह थे बालोगों के पास भी शस्त्र प्रादिथे परतु नाम मात्र
ये लकिन य सुसजिाये। एक आर्य महिला की प्रतिष्टा के मातिर
उसो अपने मरतका भय धीर जीवन की धारा छोड़ती थी।
महाराना सिद्धराज ने नजदीक श्राकर कहा-तुम लोग
नैयार तो हुए हो परतु जोजीना चाहते हो तो जममा को सौंप दो
और चले जाथो किमी पापा भी बांका नहीं होगा।
श्रोड लोगों का नायर टीपम यो पहले सो पूजा विन्तु शीघ्र
हा मत होकर उसने महाराजा का तिरस्कार किया।
सिद्धान प्रोधित हो गये और धाममण करने को हुक्म
दिया टपा-टप निशस्त्र और बिना सालिम के प्रोड लोग धरती
पाटने लगे। कितने ही साथी मरे क्तिने • भाग छूटे और अत
में ओलोगों का नायक टीकम भी मारा गया। जीवित रही
घल जसमा।
सिद्धरान न तुरन्त हुक्म दिया और शस्त्र म्यान हुए।
रक्त निन भूमि पर जसमा खड़ी थी। सिद्धरान अश्ष से
उतर पर उमवे सामने आ पड़े हुये और बोले-क्या अभी और
चत्मकार देसा है।
हाँ जसमा ने निडरता से कहा।
- जसमा ने जवाब दिया महाराजा ने पटा -ओर सेनिको की नाका रहे, सिद्धरान बिलकुल जसमा के पास आये और मोजे- मैं पाटण चलने को तैयार हूँ जसमाने युक्ति का प्रयोग किया महारानी? महारानी तोयनाना तुम्हारी रानाको में महारानी बनके क्या करूंगी? जसमा ने अपना यक्षिाको स्थिर करते हुए कहा और साथ ही महाराजा को थसावधानस कर छलाग मार के महाराजा के हाथ से कटार टुड़ाने के लिये अपना हाथ मारा। महाराजा सिराज उसके हाथ दूर करना चाहै। महाराजा सिसराज के हाथ में रोभायी वोकार बलिदान अच्छा । सिद्धराज ने चिडकर कहा- मुह कर के बोले तुम दूर खडे रहो। सैनिक लोग सब दूर जाकर गोल चक्कर के आकार में मार T अव ? कोई है वचाने वाला महेता रहेता? महारान दूर रहना कारण? '६ । सिद्धराजाश्चर्य मुग्ध बन गया और कहने लगा पहले से ही समझाई होती सो? रएडाये बाद उहापण श्रावे उसका उपाय ही क्या ? जसमा ने मन में कहा सिराज ने अपने भाव प्रकट किय उससे पहले ही जसमा क्टार ले रही है। अब तक T 2 परन्तु मुझे पाटण में ले जाकर करोगे क्या ? गुर्जर देश की महारानी ? ----में शोभने लगी। और हम 7...
मतो नसमा ९८ चमकना मत तुम्हारे सैनिका के देखते दखते तुम्हारा सून पी सयनी हैं। इतनी में हिम्मत रखनी हूँ। और तुम्हारे किये का बदला अभी का अभी ले सकती हैं। परन्तु मैं ऐसा करना नहीं चाहती । म राण्ड हुई तो भन्ने हो हुई। परन्तु गुर्जर भूमि को राण्ड यनाना नहीं चाहती। यह कहने के साथ ही जसमा ने पटार श्राकाश म ऊँची उठाई और बोली। लो निस रूप के कारण मेरा परिवार तुमने नष्ट किया है वह म्प का यह सोखा समालो। महाराना सका हाथ परड़ने को अपना हाथ पैलाते हैं।' इतने में तो फ्टार जसमा की छाती में पहुँच जाती हैं। जसमा के गिरते हुए शरीर को महाराना ने मभाला। आँस खुलते ही जसमा ने महाराना सिद्धराज को अपने पास बैठा देखा। धक्का मारकर तिरस्कार पूर्वक अपना मुह फेर लिया। प्रामपास महाराना सिद्धरान के श्रग रक्षक अपना मलीन मुह किये हुए पडे थे। श्रीर महाराजा सिद्धराज उस पुम्हलाते हुए पुष्प पासडी का सौरभ सिंचने को ठण्डी मास लेते हुव, पाखों से मोतियों की वर्षा कर रहे थे। और अपन किये हुये का पश्चाताप पर रहे। कहा भी है कि बिना विचारे जो करे, सो पीछे पडिताय । काम बिगारे आपनो, जग में होत हसाय ॥ १ ॥ कोई२ कहानी व गरवी में ऐसा भी कहा जाता है कि क्टार राकर मरने मरत नममा ने महाराजा मिरान को श्राप दिया
३
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सिद्धराज के पश्चाताप से सिद्ध है।४मिका दिई
न विचारते हुए जो उसमें आगे बढदादी
सिवाय पश्चाताप के और क्या मिहान
যভির
था कि-"तेरा तालाम भरे नहीं और तेरा वश निश जाय याद
कहा तक मत्य है सो तत्व केवली गम्य है, यह भी कहा
कि सती श्राप देती नहीं।
टिप्पणी-
१ जो मनुष्य काम के वशीभूत हो जाता है उसको वरी
दिसता है और उसी को प्राप्त करने के लिये विवेक को नौकर
ऐसा पीछे पड़ता है कि चाहे कितना ही भयकर पाप करना पड़े
वह जरा भी नहीं हिचकिचाता उसके लिये मनुष्यों का मार
करने को भी तैयार हो जाता है जो महाराजा सिद्धगल में प्रयाग
वर्ण म दिपाया है। २ सत्वशाली श्रात्मा अपने ग्रामीय न
का संहार हो जाने और निराधार स्थिती में थानाने
को नहीं त्यागते और मौका पाकर अपने प्राणों का पालन
देते हैं, परन्तु किसी का अकल्याण नहीं करते जो उममा माइम
से दिखाई देगा । ३ शत्रु को दवाकर या नाश का
को नष्ट नहीं कर सकता किन्तु अपना वशिनने में
दिल से भी शत्रुता नष्ट हो जाती है और ना ऋष्य
का पश्चाताप करता है, यह जसमा के पनि म
1
जाना जा
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