Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Shri Shivmahima Stotram

Swami,kashinand · 2012/10

PDF Proofread

Front matter

परिचय गन्धर्वराज पुष्पदन्तविरचित शिवमहिम्नः स्तोत्रका स्मार्त समुदाय में इतना भारी आदर है कि रुद्राभिषेकमे रुद्रपञ्चचमाध्यायके स्थान पर तथा स्वतन्त्ररूपेण भी इसका प्रयोग करते हैं । अर्थात् इसे वेदतुल्य ही मानते हैं । "भारतं पञ्चमो वेदः" जैसी प्रसिद्धि है वैसे महिम्नःस्तोत्रकी द्वितीय रुद्ररूपमें प्रसिद्धि है। इसमें एक कारण विषयगाम्भीर्य है। स्वाध्याय- को द्रोपनिषद भी कहते हैं। उसमें सर्वात्मरूपेण शिव वर्णन है। "रुद्रोपनिषदप्येवं स्तौति सर्वात्मकं शिवम्" । "नमस्ते रुद्र" इत्यादिमें नमस्कारवचन होनेसे वह स्तुतिरूप है । भक्तिपूर्ण है। साथ ही अद्वैतशिव- वर्णनात्मक भी है। वैसे महिम्नःस्तोत्र भी "प्रणिहितनमस्योऽस्मि" "नमो नेदिष्ठाय" इत्यादिसे उक्तार्थको लेकर नमस्कार सहित है। भक्तिपूर्ण है। तथा परमतत्त्ववर्णनात्मक है । द्वितीय रुद्ररूपेण प्रसिद्धिमे विपय गाम्भीर्य जितना सहायक हुमा उतना ही फत्तुं गौरव भी हुआ। महिम्नःस्तोत्ररचयिता इस स्तोत्रके रचयिताके रूपमें गन्धर्वराज पुष्पदन्तको प्रसिद्धि है जो भगवान् शकरके गणोमे एक माने जाते हैं । वहाँ तक तो हमारी पहुँच नही है कि हम यह कह सके कि वे गण कितने विद्वान थे और कैसे थे । किन्तु कथा सरित्सागरके अनुसार ये ही पुष्पदन्त पार्वतीशापसे वररुचि या कात्यायन नामसे भूतलमें अवतीर्ण हुए जो महर्षि पाणिनिके साथ सम्बन्धित थे। अतएव कथासरित्सागरके अनुमार ये पुष्पदन्त वे ही कात्यायत हैं जिहोंने पाणिनीम अष्ट्राध्यायी पर विश्वविश्रुत वार्तिकग्रन्य की रचना की। हरिवंश पुगणमें भी पुष्पदन्त और पाणिनिको एक ही जगह नाम ग्रहण पूर्वक वर्णन किया है। एवं अन्य पुराणोमें तथा महा- भारतमें भी ऐसी ही बात उपलब्ध होती है।

( २ ) महर्षि विश्वामित्रके वंशमै कति नामके एक ऋपि हुए। उन्हीके वशजोको कात्यायन नामसे पुकारने लगे। जनेक कात्यायन होनेसे एक जगह कात्यायनगण भी नाम लिखा है। सभवत उसीको लेकर शकर सबधसे शकरको गणके रूप प्रसिद्धि हुई हो और कथासरित्सागरादिकारोने शकरगणके रूपमे वर्णन किया हो। विश्वामिन वशज कात्यायनने कात्या- यन श्रोतमूत्र कात्यायन गृह्यसून तथा प्रतिहारसूमकी रचना की। शुक्ल यजुर्वेदके आगिरसायन शाखा के प्रवर्तक भी कात्यायन ही है जिसका प्रसार विन्ध्याचलसे दक्षिणमे महाराष्ट्रपर्यन्त है, स्कन्दपुराणमे इस कात्यायनको याज्ञवल्क्यका पुत्र बताया है। परतु याज्ञवल्क्यकी एक पत्नी का नाम कात्यायनी ( सभयत गोत्र नाम ) होनेसे सगोत्र विवाहकी उप- पत्ति कैसे यह शफा हो सकती है। इसका उत्तर यही हो सकता है कि वह गोत्र नाम न होकर कात्यायनस्य स्त्री कात्यायनी ऐसा अर्थवाला नाम हो। याज्ञवल्क्य कात्मायन गोनका हो तो ऐसा अर्थ सभव है। या कात्या- यनीके पितृवशीयको पुत्ररूपेण स्वीकार करनेसे कात्यायन याज्ञवल्क्य पुत्र माने गये हो। कुछ लोग श्रौतसूत्र रचयिता कात्यायन तथा व्याकरण वात्तिव रचयिता कात्यायनको अलग मानते हैं । वात्तिककार कात्यायन सोमदत्त पुत्र वररुचि कात्यायन है। वररुचिको विक्रमादित्यके सभा पण्डित भी बहुतसे लोग मानते है। इस मतका विरोध या समर्थन दोनो ही अनुपयोगी है। क्योकि जब कात्यायन गण ही हो गया तो उसमे अनेक कात्यायन होंगे ही। परतु ईस्वी उत्तरवर्ती किसी विक्रमादित्यके सभा पण्डित इनको नही भान सकते। कारण भाष्यकार महर्षि पतञ्जलिवा ही काल ईस्वी पूर्व है तो वातिककारके विषयमे कहना ही क्या। अतएव कात्यायन पणमे एकका अपना स्वनाम वररुचि रहा हो और वे ही वात्तिक रचयिता हुए हो तो कोई असभव बात नहीं है। हाँ, इन सब बातोको प्रमाणित करनेका अतिरिक्त प्रयास करना होगा। यद्यपि पुष्पदन्तके जन्म स्थानके बारेमे चमत्य आता है। वात्तिक- कार कात्यायनके लिये महाभाप्यमे "प्रियतद्धिता हि दाक्षिणात्या" कह कर उन्हें दाक्षिणात्यफे रूपमें स्वीकार किया है। किन्तु तथा सरित्सागर के पुप्पदन्त या कात्यायन दाक्षिणात्य नहीं है। तब कात्यायनरूपेण अव- तीणं पुष्पदन्त वात्तिककार कात्यायनसे भिन्न है-क्या? यह सशय भी हो सकता है। किन्तु कथा सरित्सागरकारने स्वय पाणिनीय सूत्र व्याख्या- कारके रूपमे पुष्पदन्तावतार कात्यायनको माना है। अत. जन्मस्थान विषयक लेसमात्रको अन्यथा स्वीकार करना उचित होगा। क्योकि कथाये कई जन्मोको जोड जाड़कर लिखी जाती हैं । फिर कथासारित्सागर के बारेमे कहना ही क्या ? जो अतिविलक्षण घटनामोके वर्णनसे भरपूर है । इस असमे महाभाष्योक्त दाक्षिणात्यत्व ही प्रामाणिक है। अनः जन्म स्थानके विवादको लेकर कात्यायन भेद मानना अनुचित है। अतएव प्रसिद्ध व्याकरण वात्तिककार महर्षि कात्यायन ही महिम्न स्तोत्र रचयिता हैं । यह निश्चित होता है। वस्तुत, कात्यायन शाखा का दक्षिण देश मे व्याप्त प्रचार ही उनके दाक्षिणात्यत्व मे एक प्रमाण है जैसे कि हमने ऊपर दिखाया। यद्यपि याज्ञवल्क्य का आश्रम स्वान्द पुराणानुसार गुजरातमे था । ऐतिहासिक लोग इस पर यही कल्पना करते हैं कि जब याज्ञवल्क्य राजा जनक के पास मिथिला मे गये तब उनका पुत्र कात्यायन वहा से दक्षिण की ओर गये होगे । परन्तु हमारी समझमे तो बात यही आती है कि आज भी महा- राष्ट्रादिमे याज्ञवल्क्यप्रवर्तित माध्यन्दिन शाखा का भी प्रचुर प्रचार है तथा वे लोग याज्ञवल्क्य को दाक्षिणात्य होने की ही श्रद्धा रखते हैं। अतः याज्ञवल्क्य दाक्षिणात्य ही रहे । गुजरातको उन्होने अपना प्रचारक्षेत्र बनाया होगा और वहा आश्रम बनाकर रहने लगे होंगे। अतएव कात्यायन गणान्तर्गत वार्तिककार कात्यायन को महाभाष्यकारोक्त दाक्षिणात्यत्व उपपन्न है । सर्वथापि कथासरित्सागर के- अवदच्च चन्द्रमौलिः कौशाम्मोत्यस्ति या महानगरी। तस्यां स 'पुष्पदन्तो वररुचिनामा प्रिये जातः॥

इतने अश पर ध्यान न दिया जाय या पूर्वोक्तरीत्या उसका समाधान किया जाय तो वार्तिकाकार वररुचि कात्यापन और पुष्पदन्तको अभिन्नता मे कोई बाधा उपस्थित नहीं होती। आधुनिक गवेषणानुसार भी इस स्तोगकी प्राचीनता तो बारहवी शताब्दीके शिलालेखमे लिखित महिम्न स्तोत्र पाठ ही सिद्ध करता है। अर्थात् तब तक यह स्तोग इतना लोकप्रिय एव श्रद्धेय बन चुका था कि , उसे अमिट बनाने के लिये गिपर अवित पिया। अतएव बाधक दृढतर प्रमाणान्तर की अनुपस्थितिमे इसे वात्तिककार कात्यायन ऋपिकी रचना मानना अनुचित नहीं माना जा सरता। विषय विषय दृष्टिसे महिम्न स्तोत्र अत्यन्त गम्भीर है। प्रथम नौ श्लोको मे निराकार साकार तथा शाश्वत-अर्वाचीन स्वरूपोको लेकर विशद वर्णन किया। उसके बाद भक्तिप्रवधनार्थ पद्रह इलोकोमे ( "तवैश्ययं यलात्" से "श्मशानेप्वाक्रीडा" तक ) पौराणिक सरल कयाओके द्वारा अर्वाचीन पदका वर्णन किया जो साधन भक्ति के द्वारा परमार्थकी ओर ले जानेमे परम उपयोगी है। अन्तमे छ श्लोकोमे साधन भक्तिगम्य परमपदया ससाधन वर्णन किया। इस प्रकार भगवत महिमा वर्णनरूपी स्तुति भक्ति एव तत्त्वज्ञानका त्रिवेणी संगम यहा उपलब्ध होता है । एक प्रकारसे आदिमे नौ श्लोक और अन्तिम छ श्लोक मिलानेपर पदह श्लोक तत्त्व प्रतिपादन प्रधान है और मध्यमे पदह श्लोक कथाकथनमुखेन भावोद्भावन प्रधान है। ऐसा एक विलक्षण विभाजन यहाँ देखनेमे आता है। इकतीसर्व श्लोकमे वाक्यपुप्पोपहारसमर्पण और बत्तीसवेमे अपना निरभिमान प्रदर्शन के द्वारा प्रथम इलोकार्थस्पष्टीकरण और उपसहार ही है। महिम्नःस्तोत्र पर अन्य व्याख्यायें ऐसे तो इस स्तोत्रपर अनेक व्याख्यामे सस्कृत तथा हिन्दीमे प्रसिद्ध हो चुकी है। उनमे सर्वमूर्धन्वरूपेण श्रीमन्मधुसूदनसरस्वतीको हरिहर- ( ५ ) पक्षीय व्याख्या अत्यन प्रसिद्ध है। उन्होने स्वयमपि लिखा है कि पूर्वाचार्य- कृत व्याख्याओका ही मैं सग्रह करता हूँ। उससे यह अर्थ निकलता है कि श्रीमन्मन्मसूदन सरस्वतीसे पूर्व भी अनेक व्याख्यायें इस पर हो चुकी थी किन्तु हमारे दृष्टिपथमे वैसे विशिष्ट कोई व्याख्या नही आयी। संभव है वे कही छिपी पडी हों या कुछ कालकवलित हो गयी हो। निजप्रयास आजमे लगभग वीस वर्ष पहले एक भक्तके आग्रहपर मैंने मधुसूदनीय हरिहरपक्षीय व्याख्यानुसार उभयपरक शब्दार्थ ध्याख्या तथा टिप्पणी लिखी। सवत् २०२२ मे उसका मुदण निर्णयपागर प्रेसमे हुआ। वह काफी लोकप्रिय मो हुआ। उस व्याख्या लेखन कालमे मुझे ऐसा विचार आया कि इस पर एक विस्तृत व्याख्या होनी चाहिये। हरिपक्षमे व्याख्या ठीक है किन्तु वह रचयिताका हार्द प्रतीत नहीं होता। अत शिवपक्षीय व्याख्यामे ही अपनी अधिक रुचि रही। लम्बे समय के बाद भडोंच मे महिम्न स्तोनपर प्रवचनका अवसर आया तो मैंने उसका सदुपयोग किया और प्राय. प्रवचनोक्त अर्थोको ही श्लोक बद्ध किया। वही यह प्रस्तुत ग्रन्य है । स्पन्दवात्तिक नामक इस व्याख्याके विपयमे चर्चा में अभी प्रस्तुत करना नही चाहूंगा। इस पर विद्वज्जनोको कैसी दृष्टि है। इसे समझ- कर ही फिर आवश्यकता हुई और सभव हुआ तो अन्य सस्करण में विश्लेषण करूंगा। हरिहरपक्षीय व्याख्या प्रथम जो मुद्रित हुआ था उसमे टिप्पणियां स्थान-स्थानपर दी गयी यो। उन सबको छोडकर केवल शब्दार्थमात्रको प्रस्तुत ग्रन्यके अन्तमे निवेशकर दिया गया है। जिससे उभयपक्षीय अर्थके जिज्ञासुओका उपकार हो । जो जिज्ञासुजन महिम्न स्तोत्रक शिवपरके तथा विष्णुपरख दोनो अर्थ ज्ञानके अभिलापी है वे अन्तमे उसका अवलोकन कर सकते हैं। -महामण्डलेश्वर स्वामी धोकाशिकामर

wwhian
Karisir
स्व० सेठ श्री शिवनारायण जी कपूर

10
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
स्पन्दकार्तिकसहित
निष्कलङ्काय निःसीमस्वानन्दज्ञानरोचिपे।
नमः शिवाय शान्ताय कण्ठकालाय मोदुपे ॥१॥
भगवान शकरका स्वरूप लोकोत्तर है। [ एक ओर निष्कलङ्क और
दूसरी ओर कण्ठमे कालकलन है। एक ओर निःसीम आनन्द ज्ञान रूप है,
दूसरी ओर हालाहल कण्ठमे है। ज्ञानसत्त्वरोचि है और काल तमोवणं
है। स्वानन्दयुक्त होनेपर भी मीढ्वान् ( मेह-प्रमेह युक्त) है। और शिव
(कुशल मगल ) विपरीत भी है। अथ च ] भगवान शकर स्वमहिमामे
स्थित, मायाकलकरहित हैं असीम आनन्द एव ज्ञान ज्योति स्वरूप हैं उनी
सीमा ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं पा सके थे। शिव तुरीय तत्त्वस्वम्प हैं।
प्रपञ्चोपशम शान्त हैं। अर्वाचीन पदमे नीलकण्ठ एव सर्वाभीष्टवी हैं ।
ऐसे शकर भगवानको प्रणाम करते हैं ॥१॥
तनोतु विघ्नहरो गणेश्यरो गिरा व देवी सुमतिप्रदायिनी ।
महेश्वरी शक्तिफरी तनोतु श सदाशियश्चय सदाशियप्रदः ।। २॥
विघ्नहरणकारी गणेश भगवान विघ्नहरण से मगल करें। मुबुद्धि
दायिनी सरस्वतीदेवो गुमतिप्रदानसे मगर करें। पत्तिनिर्माणकारिणी
महेश्वरी क्तव्यकार्यशक्तिमवर्धनमे मगल करें। तया सर्वदा मगलवामी
सदाशिय भगवान मोक्षस्प सदामङ्गलयो योग्यता सम्पादनसे मगल
करें ।।२॥
कात्यायनाय मुनये मुनये घोमन्नसिहपतये घ।
सदयाय यतिकुलाप घ शिरोयनाम नमस्यामः॥३॥

२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [प्रथमः भगवान कात्यायन मुनिको भगवान श्री नृसिंह यतिको और दयामय समस्त यतिवृन्दको सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ॥३॥ यां चक्रे शिवतुष्टयेऽनुभजतां मक्तेश्च संपुष्टये, गन्धर्वाधिपतिर्गति भगवतो दिव्यां महिम्नः स्तुतिम् । तस्या गूढरहस्यमाकलयितुं स्पन्दामिधानामिमां फुर्वे सर्वजनोपकारकरणी वृत्ति सतां प्रीतये ॥ ४ ॥ शंकरभगवानकी प्रसन्नताके लिये तथा भक्तजनोंकी भक्तिकी पुष्टिके लिये गन्धर्वाधिपति पुष्पदन्त मुनिने भगवद्वोधकारिणी दिव्य जिस महिम्नः स्तुतिकी रचना की उसके गूढ रहस्यको स्वयं आकलन करनेके लिये तथा अन्य लोगोंको भी करानेके लिये स्व पर सर्वजनोपकारिणी स्पन्द नामक यह वृत्ति संत पुरुषोंकी प्रीतिके लिये बना रहा हूँ। ( भोजननिर्वाह भी वृत्ति है, उससे तुष्टि होती है और पुष्टि होती है यही प्रीतये पुष्टयेका अभिप्राय है ) ॥४॥ ज्ञानादेव तु फेवल्यं श्रुतिर्वदति शाश्वती। भक्तया च भवति ज्ञानमुपास्तिपरिपाकया ॥५॥ अपौरुपेयी श्रुतिका कहना है कि ज्ञानसे ही कैवल्य होता है। और उपासनासे परिपक्व हुई प्रेमलक्षणा भक्तिसे ही ज्ञान होता है ॥५॥ मक्तया मामभिजानाति यावास्यश्चास्मि तत्त्वतः । तता मां तत्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ६ ॥ मक्तया त्यनन्यया लभ्यः अहमेवंविधोर्जुन । इत्यादिवचनवातरेतदेव प्रसिध्यति ॥७॥ गीतामें बताया है-भक्तिसे मैं जैसा हूँ और जो हूँ इस बातका तत्त्वतः ज्ञान होता है और वैसा तत्वतः जानकर बादमें वह ज्ञानी सिन्धुमें विन्दु के समान मुझमें प्रविष्ट होता है। हे अर्जुन ! अनन्य भक्तिसे ही इस प्रकार मेरी प्राप्ति होती है। ऐसे ऐसे अनेक वचनोसे उक्त अर्थकी ही सिद्धि होती है ॥ ६-७ ॥ ननु स्यात्तत्त्वमस्यादिमहावाक्यार्थचिन्तनात् । आत्मसाक्षात्कृतिस्तद्धि प्रमाणत्वेन संमतम् ॥ ८॥ पूर्वपक्षी :-तत्त्वमसि आदि महावाक्योके अर्थचिन्तनसे आत्म- साक्षात्कार होता है। क्योंकि वही प्रमाण है (भक्ति प्रमाणरूप नही है) uat श्लोक ] स्पन्दवार्तिकसहितम् ३ सत्य नैव तु साक्षात्त्व जायते परमात्मन । तत्त्वमस्यादिवाक्याना शतशश्चिन्तने कृते॥९॥ सिद्धान्ती -आपका कहना यथार्थ है। किन्तु तत्वमसि आदि वाक्योका हजार बार चिन्तन करने पर भी परमात्माका साक्षात्कार नही हो पाता, यह भी आपको मान्य होना चाहिये ।।९।। मोक्षसाधनसामग्रया भक्तिरेव गरीयसी। इत्येव भगवत्पादा अपि स्पष्ट समोडिरे ॥१०॥ भगवान शकराचार्यने भी मोक्षसाधनसामग्रीमे भक्तिको ही गुरुतर बताया है ।। १०॥ ननु प्रमाण नो भक्ति , सत्य किं ते व्यया तत । प्रसन्नो भगवानेव वाक्य सस्फुरयेददि ॥ ११॥ पू -पर भक्ति प्रमाण नही है। सि -जी हाँ, माना, एतदर्थ आपको क्लेश क्यो है ? भगवान भक्तिसे प्रसन होकर हृदयमे महावाक्यको स्फुरित कर देंगे ( और उसी वाक्यसे तत्वसाक्षात्कार होगा) ॥११॥ श्रूयता वा गुरुमुखात्तत्त्वमस्यादिक वच । किंतु पु दोषत सद्य साक्षात्कारक्षम न तत ॥ १२ ॥ और ' आचार्यवान पुरुपो वेद के अनुसार मनुष्यरूप आचार्य होनेपर ही ज्ञान होता है ऐसा आग्रह है तो वह भी मान लीजिये, और गुरुमुखसे तत्त्वमस्यादि महावाक्यका श्रवण भी मान लीजिये, फिर भी पुरुषापराधके कारण श्रवण करते ही साक्षात्कार उत्पन नहीं होता यह भी आपको स्वीकार्य होना ही चाहिय ॥ १२ ॥ मत्तया पु दोषविगमे वाक्य बोधयति ध्रुतम । मणिमन्त्रादिविगमे दहत्यगिर्यये धनम् ॥ १३॥ भक्तिसे ही पुरुपापराध निवत्त होता है तो पूर्वश्रुत तत्त्वमस्यादि वाक्य ही बोध करा देगा, जैसे मणि-मन आदि प्रतिबन्धकके निकल जानेपर अग्नि इन्धनको जला डालती है ॥ १३ ॥ अवाक्यमपि चोंकर प्रमाण परम ततो हि सर्ववेदाना प्राकटय जायते यत ॥ १४ ॥ व्यस्तस्य वाक्यरूपत्वमपि चारत्यत्ययापि च । जन्यमेतन्महावाक्य प्रमाण तच्च वक्ष्यते ॥१५॥ यदि महावाक्यसे साक्षात्कार माना तो यहाँ महिम्न स्तोत्रम उसका अभाव होनेसे फिर न्यूनता हुई ऐसी शका भी यहां अस्याने है । मतम।

४ श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [प्रथम कारण यहाँपर ॐकारका वर्णन अन्तमे आया है। वह जपार्थ भी है और प्रमाण भी है। यद्यपि ओकार एक ही अक्षर या शब्द होने से वाक्य नहीं है, अतएव महावाक्य भी नही हो सकता। (वाक्य पदसमूह ऐसा न्याय- शास्त्रकारोका कहना है ) तथापि ओकार परम प्रमाण है। सपूर्ण वेद ओकारसे ही प्रकट हुए हैं तो सपूर्ण वेदोका अर्थ उसमे समाविष्ट है। तब वह प्रमाण क्यो नही होगा? अन्वितार्थबोधकत्वरूपी वाक्यत्व अखण्डार्य- बोधक तत्त्वमसि आदिमे भी नही है । अत सकोच सर्वमतसिद्ध है । दूसरी बात यह है कि ॐकारका समस्तरूप वाक्य न हो, व्यस्तरुप तो वाक्य है। वह पदसमुदायात्मक है यह भी आगे स्पष्ट होगा ।। १४ १५॥ तन च द्विविधा भक्ति साक्षात्कारोपयोगिनी। अर्वाचोनपवस्याद्या नित्यसिद्धस्य चापरा ॥१६॥ इसप्रकार भक्ति साक्षात्कारके प्रति उपयोगी सिद्ध हुई। वह दो प्रकारकी है । एक अर्वाचीन ( नवीन साकार स्वरूप ) की है और दूसरी नित्यसिद्ध निराकार स्वरूपकी है।। १६ ।। साकार करुणासिन्धु पञ्चवक्त्राविरूपिणम् । उपास्यैव तुरीयस्य सामान्य ज्ञानमाप्यते ॥ १७ ॥ वैसे तो अर्वाचीनपदकी उपासनामात्रसे प्रतिवन्धनाशपूर्वक भगव- त्साक्षात्कार महावाक्यसे होता है, यह पूर्व श्लोकमे बताया। परन्तु निराकारोपासनाके लिए आवश्यक तुरीयतत्त्वका सामान्यज्ञान भी उसीसे प्राप्त होता है ॥ १७॥ ओकारालम्बनेनैव तच्चोपास्य परात्परम् । साक्षात्कारमवाप्नोति भवबन्धच्छिदावहम् ॥१८॥ ओकारके आलवनसे ही परात्पररूपकी भी उपासनाकर भवबन्धको मिटानेवाला साक्षात्कार प्राप्त करते हैं ॥१८॥ परम तत्त्वमेवैवमुपास्य स्तुत्यमेव च । साक्षान्नि श्रेयसकर फिन्तु तन्नाजसेयते ॥ १९ ॥ इस प्रकार साक्षात मोक्षकारण होनेसे एक तरहसे परमतत्व ही उपासनीय तथा स्तवनीय है । तथापि वह कार्य इतना आसान नही जैसा कि कहनेम आता है ।। १९ ॥ तूपास्तिर्वोध्यकविषयत्वत । नेदीयसोत्यत प्राज्ञा जुमागं तमथयन् ॥ २०॥ परात्परस्प श्लोक ] स्पन्दवातिकसहितम् ५ परात्पर परमेश्वरकी उपासना फिर क्यो की जाय, जव कि अर्वा- चीनपदोपासनाके बिना वह सभव नही और अर्वाचीन पदोपासनासे साक्षात्कार भी स्वीकार्य है ? कारण यही है कि साक्षात्करणीय परमतत्त्व ही परात्परोपासनाका विषय है अत बह समीपतर मार्ग है। बुद्धिमान ऋजुमार्गको अपनाते हैं। कुटिलमार्गसे चलते हुए मध्यमे ऋजुमार्ग मिल गया तो उसे अपनाना कोई बुरा नही है। कुटिलमार्गाभिनिवेश उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकता ।। २० ॥ अर्वाचीनपद त्वन्ये विक्षेपहरमब्रुवन् । उपास्येतामुभावेव विवादानास्पदत्वतः ॥ २१॥ कुछ लोग मानते हैं कि साकारोपासनासे केवल विक्षेपनिवृति होती है यह बहिरङ्ग साधन है। खैर, इस विवादमे पडना ही क्यो। दोनोकी उपासना करो, जिसमे कोई विवाद ही नही है ।। २१ ।। एतत्सर्वमभिप्रेत्य पुष्पदन्तो महामुनिः। कात्यायनो वररुचिरुमयं सप्रतुष्टुवे ।। २२॥ इसी आशयसे महामुनि पुष्पदन्तने जिनको कात्यायन एव वररुचि भी कहते हैं, दोनोकी साम्यक् स्तुति की ॥ २२ ॥ तदुपक्षिप्यतेऽप्यत्र श्लोकेऽस्मिन् प्रथमे द्वयम् । सोपानक्रमतेः प्राप्तुगन्तव्यं स्यानमुत्तमम् ॥ २३ ॥ इस प्रथम श्लोकमे अर्वाचीन तथा परात्पर दोनो ही की उपासनाका उपक्षेप ( उपक्रम ) गिया है। ताकि सोपानक्रमसे गन्तव्य परम स्थान प्राप्त किया जा सके ।॥ २३ ॥ महिमानमुपस्थाप्य परं प्रस्तूयते परम् । स्वद्धिपरिणामोक्त्या तत्त्व प्रस्तुयतेऽपरम् ॥ २४ ॥ पूर्वार्धमे परम महिमाको उपस्थितकर परात्पर स्वरूपको प्रस्तुत किया । और उत्तरार्धमे "स्वमतिपरिणामावधि गृणन्" कहकर अर्वाचीन पदको प्रस्तुत किया। क्योकि गिराके अविषयमे स्वमतिपरिणामावधि- गिराका प्रश्न ही कहाँ उठता है ।। २४ ॥ किं च स्तुत्यसहफ्त्वोक्तघा लक्ष्यते तत्परात्परम् । एव भङ्गघन्तरेणास्य स्ताव्यत्व च समर्थितम् ॥ २५ ॥ यदि "स्वमतिपरिणामावधि गृणन्" यह वात अर्वाचीन पदकी ही हो, तब परात्परकी स्तुत्यता असिद्ध होनेसे उसका प्रस्तुतीकरण व्यर्थ है

६
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[प्रथमः
ऐसी भी शफा नही उठती। क्योकि "परात्परकी स्तुति असदृशी है" इस
उक्तिसे ही परात्परकी स्तुति लक्षणा द्वारा हो जाती है। अर्थात् मिन्न
तरीकेसे उसकी स्तुत्यता भी समर्थित हो जाती है ॥ २५ ॥
महिम्नः पारं ते परमविदुपो यद्यसदृशो
स्तुतिब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्वयि गिरः ।
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणद
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥१॥
सर्वपापहारी हे हर। आपकी अपरपार महिमाको न जाननेवाले
हम जैसोकी स्तुति यदि आपके अननुरूप है तो ब्रह्मा आदिकी भी वाणी
आपके विषयमे जर्जरित ही है। यदि अपनी बुद्धिके परिपाककी सीमामे
रहकर स्तुति करनेवाले सभी उलाहना देने योग्य नहीं ऐसा मानते है तो
स्तुतिके वारेमे मेरा यह उपक्रम भी आक्षेपयोग्य नही है ॥ १॥
प्रलये विश्वसंहाराद् रुद्रो हर इतीर्यते ।
उपसंहरति स्वस्मिन् सर्व स्थापयति प्रभुः ॥ २६ ॥
संसारदीर्घभ्रमणखेदखिन्नान् हि देहिनः।
स्वस्मिन् विधामयन् देवो हर इत्यभिधीयते ॥ २७ ।।
प्रलय समयमे समस्त विश्वका सहार भगवन रुद्र करते हैं। तद-
नुसार "हरति सहरति विश्व" इस व्युत्पत्तिसे रुद्र हरपदार्थ है । सहारका
मारना अर्थ नही, किन्तु प्रसारित भुवनका उपसहार है। प्रलयकी उपमा
सुपुप्तिसे दी जाती है। बल्कि सुपुप्ति नित्यप्रलय ही है। सुपुप्तिकालमै
सकलविलय होता है । फलत भगवान शकर सबको अपनी गोदमे सुलाते
हैं यही उनका सहार है । ससारकी लम्बी यात्रासे थके प्राणियोको अपनेमे
विश्राम कराते हैं इसलिये भगवान शकर हर है ॥ २६-२७ ॥
पापापहरणाच्चव धर्मरूपवृषध्वजः।
श्रुतिष्वपि श्रुतमिदमघोरापापकाशिनी ॥२८॥
कशतिः शासनार्थो वा ताडनार्थोऽयवा मवेत् ।
पापं कशति तच्छोला तनुः स्यात्पापकाशिनी ॥२९॥
अपापकाशिनीत्यन्ये चिच्छिदुः श्रुतिग पदम् ।
पापं फाशयत्येपाऽदर्शनात्मकनाशनात् ॥ ३०॥

७ श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् प्रसङ्गाद् द्वघक्षरं प्रोक्तमचं हन्ति शिवेति गीः । इत्याह स्म सती तस्मात्पापहारी हरः स्मृतः ॥ ३१ ॥ "हरति अपहरति पाप" इस व्युत्पत्तिके अनुसार हरका पापापहारी अर्थ है । चतुप्पात् धर्मरूपी वृपभपर स्थित शङ्करका पापहारित्व उचित ही है । श्रुतिमें भी "या ते रुद्र शिवा तनूरपोरापापकाशिनी" ऐसा बताया है। पापं कशति शास्ति ताडयति वा तच्छीला ऐसी श्रुतिगत पदकी व्युत्पत्ति है । "कप हिंसायां" धातु शकारान्त भी हो सकता है। कुछ भाष्यकारोने अपापकाशिनी ऐसा पदच्छेद किया है। उस पक्षमे भी "न पाप कारायति प्रकाशयि" पापका दर्शन नही कराता यही अर्थ उचित है। "णश अदर्शने" इस धात्वर्थनिरूपणानुसार अदर्शन नाश या लोप ही है। श्रीमद्भागवतमें "यद् यक्षर नाम गिरेरित नृणा सकृत्प्रसङ्गादघमासु हन्ति तत्" ऐसा वताया है । अर्थात् प्रसङ्गवश भी शिव ये दो अक्षर वोलनेपर तुरत सभी पाप नष्ट होते हैं । अतः हर पापहारी हैं ही ॥ २८-३१।। अज्ञानहरणाच्चव ज्ञानदेहस्त्रिलोचनः। विद्याफामस्तु गिरिशं यजेतेति स्मृतत्वतः ।। ३२॥ विशुद्धज्ञानदेहाय ज्ञानमिच्छेत्तु शङ्करात् । इत्यादिमिश्च सिद्ध स्यादरस्याज्ञानहारिता ॥ ३३ ॥ "हरत्यज्ञानमिति हरः" इस व्युत्पत्तिसे हरका अज्ञानहारी अर्थ निकलता है। ज्ञानशरीर वेदत्रयलोचन शङ्करमे अज्ञानहारित्व उचित हैं। "विद्याकामस्तु गिरिश यजेत" ऐसा स्मृतिमे भी बताया है । "विशुद्धज्ञान- देहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुपे" "ज्ञानमिच्छेत्तु शकरात्" इत्यादि वचनोसे भी हरको अज्ञानहारिता सिद्ध है ।। ३२-३३ ॥ द्वैतसंहरणाच्चैव तुरीय धाम तत् तम्। प्रपञ्चोपशमं शान्तमद्वतं शिवमित्यपि ॥ ३४॥ "हरित द्वैतप्रपञ्चमिति हरः" इस व्युत्पत्तिसे मोक्षरूप तुरीय धाम हरपदार्थ है। श्रुतिमे यह बताया भी है । "प्रपञ्चोपशम शान्त शिवमद्वैत" इत्यादि श्रुति है ।। ३४ ॥ महिम्नस्तस्य ते पारं हे हराऽविदुपोऽसदक् । स्तुतिश्चेदवसन्नाः स्युब्रह्मादीनां च तगिरः ॥ ३५ ॥ हे हर ! ऐसे अनेकविघहरणकारी आपकी महिमाका पार न जानने- वालोंकी स्तुति आपके अननुरूप हो तो ब्रह्मा आदिकी वाणी भी आपके विषयमे अवसन्न गतिशून्य ही मानी जायेगी ॥ ३५ ।।

श्री शिवमहिम्नः स्तोयम् [प्रथमः ८ महिम्नः महिमेति महीयस्त्यबुद्धधुत्पादकमुच्यते । नानाविध वैभवं तछ तिरेतदभापत ॥ ३६॥ गवाश्चमिह 4 हस्तिहिरण्यं दासभार्यकम् । क्षेत्राण्यायतनानीति महिमेति प्रचक्षते ॥ ३७॥ जिससे यह महान है ऐसी प्रतीति हो उसे महिमा कहते हैं। नाना- विध वैभव ही वह है यह बात श्रुतिमे वतायी है। गाय, अश्व, हाथी, सेना, दास, मार्या, क्षेत्र एव गृहादि लोकमे महिमा कहलाते है ॥ ३६-३७ ॥ ईशस्य वैमवं तावत् सर्वमेव जगद् भवेत् । सर्व पुरुष एवेद मूतं भव्य भवच्च यत् ॥ ३८॥ एतावावस्य महिमेत्येय भगवती श्रुतिः। भूतभव्यादिक सर्व महिमानममापत ॥ ३९ ॥ ईश्वरका वैभव तो पूरा जगत् ही है। भूत, वर्तमान, भविष्य सभी पुरुष ही है। इतनी इस पुरुषकी महिमा है इस प्रकार श्रुतिने यह बात कही है ।। ३८-३९॥ कथं पुरषरूपत्वे महिमा तस्य भण्यते । उच्यते तज्जतान् सर्वमतो ब्रह्म न वस्तुतः ॥ ४०॥ तदनन्यत्यत. सर्व ब्रह्मारमणशब्दतः। सज्जन्यत्ववशात् तस्य महिमेत्यप्युदोर्यते ॥४१॥ "पुरुष एवेद सर्व" ऐसा अभेदनिर्देश होनेसे पुरुषको महिमा कैसे कहते है । पष्ठीसे भेदनिर्देश हो रहा है । इस शङ्काका समाधान श्रुतिसे ही प्राप्त हो जाता है। "सर्व खल्विद ब्रह्म तज्जलान्" ऐसी श्रुति है। जगत ब्रह्मरूप है ऐसा प्रथम अभेदकथन किया। फिर वताया जलान् । यह जगत् तज्ज, तल्ल एव तदन् है । ब्रह्मसे उत्पन्न, ब्रह्ममे लीन होनेवाला एव ब्रह्ममे जीवित रहनेवाला यह जगत् है । "तदनन्यनमारम्भणशब्दादिम्य" इस न्यायसे ब्रह्मोपादानक होनेसे अनन्यत्व है। अत "सर्व ब्रह्म" यह अभेद- निर्देश है । जन्यजनकभावको लेकर भेदनिर्देश भी है ।। ४०.४१ ।। पारं तेऽपरं तस्यास्याखिलविश्वस्य महिम्नः पारमिष्यते । अपर परहीन तस्निपाद् ब्रह्म श्रुतीरितम् ॥ ४२ ॥ परमित्येव वा च्छेदो हव्यक्तात्पुरुषः परः। पुरुषान्न परं किञ्चिदित्येवं श्रुतिदर्शनात् ॥ ४३ ।।

श्लोकः]
स्पन्दवार्तिकसहितम्
साराश यही कि सारा विश्व परमेश्वरको महिमा है उसका पार
त्रिपाद ब्रह्म है। वह अपर अर्थात् परहीन है उससे आगे कोई पर श्रेष्ठ
नहीं । अपर पदच्छेद करनेपर उक्त अर्थ है। पर ऐसा च्छेद भी मान सकते
हैं। क्योकि श्रुतिमे उसे पर बताया है । "अव्यक्तात् पुरुष. पर""पुरुषान्न
पर किञ्चित्" ऐसी श्रुति है। इसी श्रुतिसे परहीन अर्थ भी सिद्ध
है ॥४२-४३ ॥
एतावान् महिमा तस्य ततो ज्यायांश्च पूरुषः।
पादोऽस्य सर्वभूतानि त्रिपादस्य स्वयंप्रभम् ॥४४॥
यही बात श्रुतिमे वताया है-भूत भव्यादि जो भी हो इतनी पुरुपकी
ही महिमा है, किन्तु पुरुष इससे अधिक है। समस्त भूत इस पुरुपके एक
पादमे आ जाते हैं। इससे परे त्रिपात् स्वयप्रकाश है। "निपादस्यामृतं
दिवि" यहाँ दिविपदसे स्वयप्रकाशता तथा परता प्राप्त होती है ।। ४४ ।।
अविदुयो
स्वयंप्रमत्वान्न ज्ञेयं तदज्ञा यदि वा वयम् ।
ब्रह्माद्याश्च तदज्ञाः स्युरज्ञेयत्वात्परात्मनः ॥ ४५ ॥
स्वयप्रकाश होनेसे निपादब्रह्म ज्ञेय-ज्ञानविषय नहीं है । तब हम
यदि उम ब्रह्मके बारेमे अज्ञ हैं तो ब्रह्मा आदि भी अज्ञ ही हैं । वह परमात्मा
ज्ञेय ही नही, तो उसका ज्ञान हो किसको ? फलत. अज्ञानसे स्तुतिकी
असदृशता सर्वसमान है ।। ४५ ॥
महिम्नः
महोयमानं रूपं च महिमेति निगद्यते ।
स एप नित्यो महिमा ब्राह्मणस्येति हि अतिः।। ४६ ॥
न वर्धते कर्मणा स न कनीयांस्तथाविधः ।
महिमा ब्रह्मणस्तच्च स्वरप परमं मतम् ॥ ४७॥
महिमा शब्दका दूसरा अर्थ है-महीयमान अतिश्रेष्ठ रूप । श्रुतिमे
उसका वर्णन इस प्रकार आपा है ब्रह्मकी यह महिमा नित्य है, कोसे यह
न घटता है और न बढता है। वह ब्रह्मका पारमार्थिक स्वरूप
ही है ।।४६-४७ ॥
अविदुपः
पूर्ववत्तदवदुष्यं ब्रह्मादेर्या
ममापि वा।
अपरिच्छिन्नस्पो हि पारो न भेयता यजेत ॥४८॥

१०
श्री शिवमहिम्नः स्तोयम्
[प्रथमः
उस ब्रह्मस्वरूप महिमाके पूर्णभावरूप पारका अज्ञान पूर्वोक्त रीतिसे
ब्रह्मादि एवं मुझमें समान ही है । क्योकि अपरिच्छिन्न वह पार ज्ञेय नहीं हो
सकता। वह ज्ञानस्वरूप ही है। स्वप्रकाशरूप ज्ञानमें परप्रकाश्यतारूपी
शेयता नही हो सकती ॥४८॥
नन्वत्र प्रथमे पक्षे द्वितीयश्लोफसङ्गतिः ।
न भवेत्तत्र महिमा प्रोक्तो वाड्मनसातिगः ॥४९॥
जगद्रूपस्तु महिमा नव वागाधगोचरः।
मवं वागाद्यविषयं तं च वक्ष्यामहे ययम् ॥ ५० ॥
कि चोमया श्रुतिपु प्रयोगो दशितो मया।
श्लोकद्वये स्तां भिन्नार्थी ततः कापद्यते क्षतिः॥५१॥
शङ्का होगी कि महिमा शब्दका भूतभव्यादि जगत् अर्थ पक्षमे द्वितीय
श्लोककी सङ्गति नहीं होगी। वहां महिमाको वाणी और मनका अविपय
बताया है और जगतरूपी महिमा तो वाणी और मनका विषय है। उत्तर
है कि जगत् भी अनन्त होनेसे वह भी वाणी और मनका अविषय ही है,
यह बात हम आगे कहेगे । दूसरी बात यह है कि जव श्रुतिमे ही "एतावा-
नस्य महिमा" "एप नित्यो महिमा" इस प्रकार दोनो अर्थोमे प्रयोग किया
गया है । तब प्रथम श्लोकमे महिमा पदका एक अर्थ और दूसरे श्लोक
दूसरा अर्थ लिया जाय तो हर्जा क्या है ? ॥ ४९-५१ ।।
महिमानमविज्ञाय स्तुतिनिन्दासमा भवेत् ।
प्रयं पणशती राजेत्यलम्यद्युम्नगीयथा ॥ ५२॥
वास्तविक महिमाको जाने बिना महिमाका वर्णन करेंगे तो वह
स्तुति न होकर निंदा जैसी होगी। जैसे जिसने धन कभी न पाया हो वह
बोलता है कि यह राजा सौ रुपयेवाला वडा धनी है ।। ५२ ॥
मरदेशी निशन्याह सुहृदं लब्धवैभवम् ।
अयं बहुधनी चैत्स्याद् गुडोष्णोपो भविष्यति । ५३ ।।
मारवाडका ग्रामीण अपने मित्रको वैभव प्राप्त सुनकर कहने लगा-
अव तो वह गुडकी पागडी बाँधेगा (ग्रामीणकी बुद्धि उत्कृष्टतामें गुड़ ही
तक पहुँचती है ) ॥ ५३॥
मण्डूको हि फकार फुक्षिमापूर्य वायुना।
वृषभोदरतुल्यत्वं लभता यत्नतोऽपि च ॥५४॥
परिच्छिन्ना मनोवृत्ति विस्तार्यापि कथं तया ।
अनन्तं ब्रह्म विभयुम्रह्माद्या अपि देवताः ॥ ५५॥

श्लोक:] स्पन्दवार्तिकसहितम् ११ अगृहीतानन्तरूपा वृत्तिस्तुच्छेव निश्चिता। तया गोचरितरथैरनन्तस्य कथं स्तुतिः ।। ५६ ॥ मेंढकीने वृषभको सुना तो अपने पेटमे वायु भरकर पूछा क्या इतना मोटा उसका पेट था? क्या सभव है कि श्वास भरकर मेढकी वृपभतुल्य अपना उदर बना ले ? मनोवृत्तियाँ परिच्छिन्न होती है। क्या उसके विस्तारसे अनन्त ब्रह्मका ग्रहण ब्रह्मादि भी कर पायेंगे? यदि वृत्तियाँ अनन्तरूपको ग्रहण नहीं कर सकती तो परिच्छिन्न होनेसे अवश्य तुच्छ होंगी। उनसे विषयीकृत अर्थोसे अनन्तकी स्तुति कसे सभव है ॥ ५४-५६॥ गगने पुत्तिका का चेद गरुडस्तत्र को वद । वयं चेत्पुत्तिकातुल्या ब्रह्माद्या गरुडोपमाः॥५७॥ गगनमे फतीगा क्या चीज है? ( क्या वह उड़कर गगन पार करेगा? ) ठीक है, तो गगनमे गरुड़का भी कौन-सा अस्तित्व है ? ( वह भी गगनको पार नहीं कर सकता। ) हम सव गगनमें फतीगेके बराबर है तो ब्रह्मादि गरुड़ के बरावर ।। ५७ ॥ को वा अनन्तस्य गुणाननन्तान् गणयेत्पुमान् । भूमे रजांसि गणयेन्न त्वनन्तस्य कोपि तान् ॥ ५८॥ अनन्त भगवानके अनन्त गुणो की गणना कौन कर सकता है ? भूमिमे कितनी रज है उन्हे कोई गिन ले, पर अनन्त भगवानकी गुणगणना सभव नही । “यो वा अनन्तस्य गुणाननन्ताननुक्रमिष्यन् स नु वालवुद्धिः" ऐसा बताया है ॥ ५८॥ अथावाच्यः अथ स्वबुद्धस्तु यथा-परिपाकं शिवं स्तुवन् । सर्वोऽवाच्यो मवेहि मत्स्तुतिः किं न शोभताम् ॥ ५९॥ यदि कहे कि अपनी बुद्धिके परिपाकानुसार शिवस्तुति करनेवाले सभी उपालम्भके अयोग्य है तो मेरी स्तुति भी उपालम्भयोग्य क्यो हो ? ॥ ५९॥ भूमौ निपतमानानां भूमिरेवावलम्बनम् । स्वयि जातापराधानां त्वमेव शरणं मम ।। ६०॥ इत्येव सापराधापि स्तुतिः संशोध्य शंभुना। अङ्गीफरिष्यते नूनमिति यत्नोऽयवान्मम ।। ६१ ॥ भूमिपर चलते समय कोई गिरता है तो उसका अपलयन भूमि ही होगी। भगवान के प्रति अपराध होनेपर शरण भगवान ही होगे।

१२
श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम्
[प्रथम.
इसी प्रकार अपराध सहित भी मेरी स्तुति को स्वय सशोधन कर
अगीकार करेगे । अत मेरा यल तो सफल ही होगा ॥६०६१ ॥
ब्रह्मादीनापि वचोगोचरोऽपाररूपभाक् ।
शिवस्य महिमेत्युक्त्या सुप्तोऽन हरः स्फुटम् ।। ६२ ।।
ब्रह्मा आदिके भी वचन का अविषय है अतएव शिवमहिमा अपार
है, यह कहते हुए शिवकी सुन्दर स्तुति स्तुतिसमर्थनके बहाने ही यहां की
गयी है ॥ ६२॥
धियोऽवधिकथाव्याजात्तस्यानवधिरूपताम्
ध्वनयश्च शिवोत्कोर्पो नमोवद् व्यापकः स्तुतः॥ ६३ ॥
"स्वमतिपरिणामाधि" शब्दसे शिवोत्कर्ष स्वय अवधिशून्य है
यह ध्वनित किया और गगन समान व्यापक ध्वनित करते हुए स्तुति
की गई ।।६३ ॥
तथापि च स्वस्वमतिपरिपाकावधिस्थितम् ।
रूपं स्तुत्यं किमप्यस्तीत्येतच्च ध्यन्यते स्फुटम् ॥ ६४ ॥
ये यथा मा प्रपद्यन्ते तास्तथैव मजाम्यहम् ।
यादृश स्तूयते देवस्तादृक् समुदियात् पुरः॥ ६५ ॥
भगवान निरवधि होने पर भी स्वमतिपरिणामावधि में भी स्थित
कोई स्तुत्यरूप परमेश्वरका स्वरूप है यह भी ध्वनित होता है । अन्यथा
सावधि स्तुति परमेश्वरविषयक ही न होती । गीतामे भी 'जो जैसे मुझे
भजता हैं मैं भी उसे उसी रूप मे आकर अपनाता हूँ' ऐसा कहा है।
जिस रूप से भगवान का भजन करते हैं उसी रूप रो भगवान आविर्भूत
होते हैं ।। ६४-६५ ।।
आलम्बनमुपादाय तदन्तर्यतयो हि यम् ।
निरालम्ब प्रपश्यन्ति महेश तमुपास्महे ।। ६६ ॥
साकार शिवरूपी आलम्बन लेकर उस सालम्बनके अदरसे
निरालम्ब परमेश्वर को यतिगण देखते हैं उस महेश की हम वन्दना
करते हैं ॥६६॥
परिच्छिन्नेऽपि हृत्पद्मेऽपरिच्छिन यथेष्यते।
निरालम्बस्तथालम्बे तमासम्बे महेश्वरम् ॥ ६७ ॥
आलम्बन लेकर निरालम्बका दर्शन कसे ? जैसे दहरपुण्डरी-
कालम्बनमे गगनोपम ब्रह्मका दर्शन होता है । जिसको उपनिपदोमे
बताया है । उस निरालम्र महेश्परफा हम आलम्बन करते ॥ ६७॥

श्लोक.] स्पन्दवार्तिकसहितम् १३ ? सात्त्विक्या माययाच्छन्नस्तामस्याऽविद्ययाप्यसौ । भवनडूकसंलग्नताम्यज्जवनिकामया ॥ ६८॥ वह परमेश्वर सत्वप्रधान मायासे और तम.प्रधान अविद्यासे भी आच्छादित है। जैसे प्रभायुक्त आकाशको प्रथम भवनभित्ति ढक लेती है, फिर भी अदर से काला परदा भी लगा हो तो क्या कहना ।।६८॥ शिवाकाराद्यया कुडरकाचाज्जवनिकोद्धृतो। प्रमापटलितं व्योम शिवाकारं विलोक्यते ॥६९॥ शिवाकृत्या तथा मायाशक्त्याऽविद्यालवोद्धृतौ । स्वप्रभं मासते ब्रह्म शिवाकारं परात्परम् ॥ ७० ।। भवनके दीवारपर शकराकारका रोशनदान काच लगा है। इधर परदा जरा उठ गया तो उस काचसे प्रकाशपटलयुक्त आकाश शिवाकार दिखाई देगा। वैसे अविद्या का कुछ अश निकल जाता है तो भित्ति- स्थानीय मायामे लगे हुए काचस्थानीय अतिनिर्मल शिवाकर दिव्यशक्तिसे शिवाकार स्वयप्रभ ब्रह्म प्रकाशित होता है । अर्थात् भासमान ब्रह्म अपरिच्छिन्न है किन्तु शिवाकारयुक्त शक्तिसे भासित होनेसे शिवाकार भासता है ॥ ६९-७०॥ भक्तमावानुसारेण दिव्या शक्तिः शिवात्मिका। स्यात्तथाकृतिरुक्तं तत्तांस्तयंव मजाम्यहम् ॥७१॥ भक्तभावानुसार मायाभित्तिगत शिवाभिन्न दिव्यशक्ति शिवा- द्याकार हो जाती है। यही "तास्तथव भजाम्यहम्” इस गीतावचन का रहस्यार्थ है ।। ७१ ।। मायामन्ये जवनिकां तनेशाकारकर्तनात् । व्योमवद्ब्रह्मणोपोशाकारता च न्यस्पयन् ।। ७२ ॥ तच्चिन्त्य बाहरेखेव चित्रस्येवोपपद्यताम । त्रिनेत्रमालमस्मादिमध्याकार: कय भवेत् ।। ७३॥ कुछ आचार्योंने ऐसा वर्णन किया है कि माया और अविद्या ये दो नहीं है। एक ही माया परदा है। उसमे शिवादि आकार काट निकालते हैं तो जैसे परदेके अन्दरसे शिवादि आकार मे गगन दीसता है। वैसे माया परदेके अन्दरसे परब्रह्म शिवादि आकारमे दीम्बने लगता है। परन्तु यह मत विचारणीय है। इस प्रकार परदेमे शिवाकार परदा काट निकालनेसे बाहरकी रेसा भले सम्पन्न हो, किन्तु मध्यमे त्रिनेत्र, भाल, भस्म, जटा, गगा, ओष्ठादि आकार कैसे बनेंगे ।। ७२-७३ ॥

१४ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [प्रथमः न च वाच्यं मायया स स्यात्तन्मायामयो भवेत् । तदा चिन्मयतावाचोयुक्तिस्तु घटता फयम् ॥ ७४ ॥ यदि कहें कि भाल भस्मादि मध्याकार मायासे दीखता है तब वह मायामय होगा और आपका चिन्मयतावाद कहां रह जायेगा? ॥ ७४ ।। परास्य शक्तिविविधा श्वेताश्वतरशाखिभिः। भूयमाणा निगदिता सिद्धा सातः परेशितुः ॥७५ ।। "परास्य शक्तिविविधैव श्रूयते" इस श्वेताश्वतरवचनसे परमेश्वरकी पराशक्ति सिद्ध होती है ।। ७५ ।। मायां तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । इत्युक्तत्वाज्जगद्धेतुः सिद्धा माया च धूर्जटेः ।। ७६ ॥ श्वेताश्वतरमें ही "माया तु प्रकृति विद्यात्" इत्यादि मन्त्र में शंकर भगवानकी माया पृथक बतायी है । अतः माया भी सिद्ध है ॥ ७६ ।। वर्तमाना अविद्याया बहुधेत्यादिवाक्यतः । सिद्धा भवत्यविद्यापि यतः स्यान्मूढता नृणाम् ॥ ७७ ॥ "अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः" इत्यादि वाक्यसे मनुष्यको मूढ बनाने- वाली अविद्याकी भी सिद्धि होती है ।। ७७ ।। स्पन्दमाना भवेत्सृष्टिकाले शक्तिस्तु शाश्वती । शिवशक्त्योः सामरस्यं मोक्षे च प्रतिपादितम् ॥ ७८ ॥ सृष्टिकालमें शक्तिका स्पन्दन होता है । मोक्षमें शिवशक्तिका सामरस्य होता है ।। ७८ ॥ शिवः परो यादृशोऽस्ति तादृशाय नमो नमः। भवाय स्पन्दमानाय ययामति नमो नमः ॥ ७९ ॥ परमशिव ज्ञानविपय नही अत जैसे हैं वैसे उनको यह प्रणाम हो । स्पन्दमान अर्वाचीनपदस्थ भगवान भवको यथामति प्रणाम हो ॥ ७९ ॥ इति थी काशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतौ। महिम्नः स्तोत्रविवृतौ वृत्तः स्पन्दोऽयमादिमः ।।

न
द्वितीयः श्लोकः
ब्रह्मादीनामवंदुष्य कर्य
नामोपपद्यते।
सर्वज्ञाः खलु ते प्रोक्ताः सर्वज्ञानां चाज्ञता ॥१॥
'अविद्वानकी स्तुति असदृश है तो ब्रह्मादिकी स्तुति भी अवसन्न है
इस उक्तिसे ब्रह्मादिमे भी अवैदुष्य सूचित होता है । अवसन्नतामे वहीं हेतु
कहा जा रहा है। परन्तु ब्रह्मादि तो सर्वज्ञ हैं। उनमे अज्ञता कैसे मानी
जा सकती है? ॥१॥
मैव वाइमनसातीत शेयं यत्परम पदम् ।
शक्यं तद्धि विज्ञातुममनोगोचरत्वत ॥२॥
उत्तर यह है कि वाणी और मनसे परे जो परम शैव पद है वह
जाना नहीं जा सकता है । क्योकि वह मनोगोचर नहीं है ।। २ ।।
महिमा द्विविधः प्रोक्तो बाह्य आन्तर एव च ।
गवाश्वादिस्तु याद्यः स्याद् वीर्यशोर्यादिरान्तरः ।। ३ ।।
महिमा दो प्रकारकी है। एक वाह्य है, दूसरी आन्तर है । गाय,
अश्न, सुवर्णादि वाह्य महिमा है । वीरता, शूरता आदि आन्तर
महिमा है ॥ ३ ॥
पादोऽस्य सर्वभूतानि महिमा परमात्मनः ।
बाह्य. स्यादान्तरस्तस्य त्रिपादपः स्वयंप्रनः ॥ ४ ॥
परमात्माकी वाह्य महिमा समस्त विश्वरपी पाद है। और आन्तर
महिमा स्वय प्रकाश त्रिपात् ही है ।। ४ ।।
न बाह्य महिमान च प्राप्तुं वाङ्मनसे क्षमे ।
किपानाकाश इति न दक्तुं ज्ञातुं हि शक्यते ।।५।।
परमात्माकी बाह्य महिमावो भी सविषय बनाने वाणी और मन
समर्थ नहीं होते (आन्तर महिमावी वात ही क्या) यह आकाश कितना
बड़ा है यह जानना या बोलना भी यम्भव नहीं है।॥ ५॥

श्री शिवमहिम्न. स्तोत्रम् [द्वितीयः प्रनन्तकोटयस्तन ब्रह्माण्डानि चकासति । असंख्यत्वात् परिच्छित्तिः कयं तेषां हि संख्यया ॥ ६॥ इस आकाशमे अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड विराजमान हैं। अनन्त होने हीसे सख्यापरिच्छेद सभव नही है ।। ६ ।। अतव्यावृत्तिस्पेण याह्योऽपि महिमोच्यते। अनन्तो हन्तद्धिप्नोऽसंख्यः संख्यायुतेतरः॥७॥ परमात्माकी वाह्य महिमाको भी अतद्व्यावृत्तिरो कहना पड़ता है। अनन्तका अर्थ है-जो अन्तवानसे भिन्न है। असख्यका अर्थ है-गणना- विपयसे जो भिन्न है। आकाश अनन्त है, ब्रह्माण्ड असत्य हैं यहां दोनो जगह अतद्व्यावृत्ति है ।। ७ ॥ नन्वविज्ञाय सृजतु ब्रह्माण्डानि कय विधिः। फथ रक्षत्वसंख्यानि विष्णुस्तानीति चेन्न तत् ।। ८॥ प्रतिमह्माण्डमेकैफे ब्रह्मविष्णुहराः स्मृताः। तेपा सृष्टिस्थितिलयफर्ता ह्येको महेश्वरः॥९॥ यदि ब्रह्माको पूरे जगतका ज्ञान न हो तो वे सृष्टि कैसे करते और विष्णु रक्षा कैसे करते ? इस शकाका उत्तर यह है कि अनन्त ब्रह्माण्डोंमे प्रत्येकमे एक-एक ब्रह्मा विष्णु रुद्र है। अपने-अपने ब्रह्माण्डका उन्हे जान है। इन सबके सृष्टिस्थितिलयकर्ता महेश्वर ही एक है ।। ८-९ ।। नन्वण्डानामसंख्यत्वादनन्तत्वाद्विहायसः शकरोऽपि कथ नाम विज्ञातुं मवति प्रभुः ॥१०॥ उच्यते शाकर ज्ञानमायनन्त विदुर्बुधाः। तस्मान्नवाज्ञता तस्य शक्यसभावना भवेत् ॥ ११॥ ब्रह्माण्ड असख्य और अनन्त होने से ब्रह्मादिमे यदि आपेक्षिक सर्व- ज्ञता मान है तो भगवान महेश्वरमे भी वही दोप आयेगा, इस पूर्वपक्षका समाधान यह है कि महेश्वरका ज्ञान भी तो अनन्त है। सख्या या अन्त है ही नहीं, अत उसका ज्ञान न होना उचित ही है। जो है ही नही उसका ज्ञान क्या होगा ॥१०-११॥ नन्वनन्तं कुतो नैवं ब्रह्मादेनिमिप्यताम् । योगाद्युपायतोऽस्माकमप्यनन्तं कुतो न तत् ॥१२॥ तदानन्त्याज्जयमल्प भवेदिति। सूनयामास मगवान् पतञ्जलिरपि स्वयम् ॥ १३॥ । ज्ञानस्य न श्लोकः] स्पन्दवार्तिकसहितम् १७ पूर्वपक्षः-महेश्वरका ज्ञान अनन्त हो सकता है तो वैसे ही ब्रह्मादि- का भी ज्ञान अनन्त क्यो नही हो सकता? "तदा ज्ञानस्यानन्त्याज्ञयमल्पं" इस प्रकार महर्षि पतञ्जलिने भी समाधिजन्य ज्ञानको अनन्त बताया है । १२-१३ ॥ मैवमानन्त्ययुक्तानि विज्ञानानि बहूनि न। सत्यं ज्ञानमनन्तं यदेक एव महेश्वरः ॥ १४ ॥ ज्ञानानि वृत्तिरूपाणि प्रतिविम्बात्मकानि वा । नाना स्युन पुनबिम्बरूपं ब्रह्मात्मकं तथा ॥ १५॥ एककाण्डपरच्छिन्नम्रह्मादेश्चित्तवृत्तयः अपरिच्छन्नरूपा कथंचिदुपपद्यते ॥ १६ ॥ मुक्ता महेश्वरात्मत्वं प्राप्ता ये तशा जगौ। ज्ञानानन्त्यं तथा ज्ञेयस्याल्पतां च पतञ्जलिः॥१७॥ समाधान :-ब्रह्मा आदिमे पृथक्-पृथक् अनन्तरूप नाना ज्ञान नही हो सकते। "सत्य ज्ञानमनन्त ब्रह्म" इस श्रृतिमे उक्त अनन्त ज्ञान जो ब्रह्मरूप है वह एक ही है। वृत्तिरूप ज्ञान या प्रतिबिम्बरूप ज्ञान नाना हो सकता है। परन्तु एक एक ब्रह्माण्डमे ही मीमित ब्रह्मा आदिकी वृत्ति अपरिच्छिन्न नही हो सकती। भगवान पतञ्जलिऋषिने ज्ञानकी अनन्तता एवं ज्ञेयकी अल्पता जो बनायी है वह योगाभ्यासवशात् जो मुक्त या जीवन्मुक्त होता है वह स्वय महेश्वररूप हो जाता है, इस दृष्टिसे है। न कि परिच्छिन्न ज्ञान अपरिच्छिन्न बनेगा इस आशयसे (क्योकि परिच्छिन्न कभी भी अपरिच्छिन्न नहीं बन सकता ।)॥ १४-१७ ॥ तस्मादतद्व्यावृत्त्येव याह्योऽपि महिमोच्यते । प्रान्तरो नितरामेव श्रुत्यापीत्यधुनोच्यते ॥१८॥ अतः वाह्य महिमा भी अतव्यावृत्तिसे कहना पडता है तो आन्तर महिमा सुतरा अतद्व्यावृत्तिसे कहना होगा। और श्रुति भी वैसे ही प्रति- पादन करती है यह वात इस श्लोकमे कही जायेगी ।।१८।। अर्वाचीनपद पतु स्वभावानुविधायि तत्। साक्षात्तच्छषयते स्तोतुमित्यप्यत्र निरप्यते ॥ १९॥ और जो बर्वाचीनपद है वह भक्तके अपने-अपने भावके अनुरूप होता है अत. उसका स्तवन साक्षात हो सकता है यह भी बतायी जा रही है॥ १९॥ . २ ૧૮ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [द्वितीयः अतातः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो- रतस्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि। स फस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः॥२॥ हे हर ! आपकी महिमा वाणी और मनके मार्गको छोड़कर आगे बढ़ गयी है, जिसको श्रुति भी इतरनिपेधके द्वारा, मानो कही गलती न हो जाय, ऐसे भयके साथ कहती है। वे आप किसके लिये स्तोतव्य हैं- स्तुतियोग्य हैं ? अर्थात् किसीके लिये नही । किस गणितसख्यामे आपके गुणोके प्रकार आ सकते हैं ? किसीमे नही-आपके कितने प्रकारके गुण हैं यह भी कोई नहीं कह सकता। कितने गुण है यह कहना तो दूर है। किसके पाप विषय हैं ? मन, वाणी आदि किसीके विषय नही । किन्तु अर्वा- चीन-भक्तानुग्रहार्थ गृहीत नवीन स्वरूप किसका मन आकर्षित नहीं करता? और किसकी वाणीको कुछ बोलनेके लिये विवश नही करता ॥ २ ॥ अतव्यावृत्त्या सदिति ब्रह्म तद्भिन्नमतत् सर्वमिदं जडम् । तघ्यावृत्तिस्तनिषेधस्तेनेशं वदति श्रुतिः ॥२०॥ अतद्व्यावृत्ति शब्दमें तत्पदका बुद्धिस्य ब्रह्म अर्थ है । अतद् माने मासे भिन्न जडरूप समस्त जगत् । उसकी व्यावृत्ति अर्थात् जड़ जगतका निषेध । उस निपेधके द्वारा श्रुति परमेश्वरको कहती है ॥ २० ॥ अशब्दस्पर्शस्पादि चास्यूलाग्वादि चाक्षरम् । मूर्तामूर्तात्मकं विश्वं नेति नेति परं पदम् ॥ २१ ॥ निषिध्ययमतत् सर्व परं बोधयति श्रुतिः । तत्त्वमस्यादिवाक्यं चाप्यतद्व्यावृत्तिलक्षणम् ।। २२ ॥ मागो हतद्रूपः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः । तं व्यावयं श्रुतिः सत्यमखण्डं बोधयेत् पदम् ॥ २३ ॥ "अशब्दमस्पर्शमरूपमव्यय" "अस्थूलमनण्यह्रस्वमदीघं" इस प्रकार अक्षारको श्रुतिने समझाया है । "मूर्त चामूर्त च" "अयात आदेशो नेति नेति" इस प्रकार भी समझाया है । तत्त्वमसि आदि महावाक्य भी अतद्- व्यावृत्तिसे ही बोध कराते हैं। वाच्यार्यका परस्पर विरोध होनेसे चतन्य- भिन्न तत् सर्वशत्व अल्पशत्वादि भागकी व्यावृत्तिकर श्रति बसण्डवोध कराती है।। २१-२३ ॥

श्लोका ]
स्पन्दवातिकसहितम्
अतीतः पन्थानं
सम्बन्धगुणजातीनां क्रियाणा च व्यपेक्षया।
शब्दः प्रवर्तते लोके नैवेशेऽन्यतमोऽपि वा ॥२४॥
अशक्यस्तैन वाच्यार्यविधया वक्तुमीश्वरः।
सम्बन्धादीन् परित्यज्य मागान् श्रुतिरतो वदेत् ॥ २५ ॥
लोकमे शब्द सम्बन्ध, गुण, जाति और क्रियाकी अपेक्षा रखकर
प्रवृत्त होता है ( धनवान, शुक्ल, गाय, पाचक ये क्रमश उदाहरण हैं)
परमेश्वरमे तो सम्बन्धादि कोई नही है। अत वाच्यार्थरूपसे ईश्वरको
कहना अशक्य है । फलन सम्बन्धादि भागका परित्यागकर लक्षणासे श्रुति
ईश्वरको कहेगी ।। २४-२५॥
सम्बन्धादिपरित्यागे स्वप्रभ शिष्यते पदम् ।
न तत्प्रकाश्यं तत्त्वे वा प्रकाश्यत्वाज्जड भवेत् ॥ २६ ॥
लक्ष्यमाणं जडं मा भूतनापि चकिता श्रुतिः।
अखण्डाकारिणी वृत्तिमुद्भाव्यव निवर्तते ॥ २७ ॥
छित्वा वत्तिश्च साऽविद्या तत्कार्य स्वं च नाशयेत् ।
न सा प्रकाशयेद् ब्रह्माविद्याभावात्स्वयं स्फुरेत् ।। २८॥
सम्वन्धादिका परित्याग होनेपर स्वयप्रकाश ब्रह्म ही अवशिष्ट
रहता है । वह भी श्रुतिसे प्रकाश्य नही है। प्रकाश्य होनेपर जड होगा।
लक्ष्यमाण ब्रह्म कही जड न हो ऐसी चकित श्रुति अखण्डाकार वृत्ति
उत्पन्न करते ही निवृत्त हो जाती है। वह वृत्ति भी अविद्याको नष्टकर
अविद्याकार्य स्वयको भी नष्ट करती है। वह भी ब्रह्मको प्रकाशित नहीं
करती। हाँ, अविद्याके नष्ट होनेसे परमेश्वर स्वयमेव स्फुरित होने
लगता है ।। २६-२८॥
अतद्वयावृत्तिरेव हि वाल विध्यात्मिकास्वपि ।
लिपेपणा पनि विषयनियनये ॥२९॥
पूर्वोत्तरीतिसे "सत्य ज्ञान" "तत्वमसि' इत्यादि विधिरूप
श्रुतियोमे भी अतद्व्यावृत्ति ही है । "अशब्दमस्पर्श" इत्यादि विषैध श्रुति
कोई भ्रान्ति न रह जाय एतदर्थ है ।। २९ ॥
सर्वज्ञाल्पज्ञते त्याज्ये
विरुद्धत्वात्पदार्यत।
जत्वं कुतः परित्याग्यमिति शङ्का प्रवर्तते ॥ ३०॥

अत्र
२०
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[द्वितीयः
विपर्यय इस प्रकार हो सकता है कि ठीक है, विरुद्ध होनेसे
तत्त्वंपदार्थोसे सर्वज्ञत्व अल्पज्ञत्व दोनों छोड़ दो, किन्तु शत्व आदि क्यों
छोड़ना चाहिये ? ।। ३०॥
नान्तःप्रज्ञबहिष्प्रज्ञोभयतःप्रज्ञरूपमा
न प्रज्ञाप्रज्ञरूपं चादृष्टं चाव्यवहार्यकम् ॥ ३१॥
एकात्मप्रत्यये सारं प्रपञ्चोपशमं तथा।
शान्तं तुरीयमद्वैतं शिवं धामेति च श्रुतिः॥ ३२ ॥
ज्ञत्वादि सफलं द्वैतं निषिध्य जडलक्षणम् ।
प्रपञ्चोपशमं शान्तमुपस्थापयति स्फुटम् ॥ ३३ ॥
उक्त शंकाका निवारण "नान्त.प्रशं न बहिष्प्रशं" इत्यादि विषेध-
श्रुति ही करती है । जडलक्षण समस्त प्रपञ्चका निपेधकर शुद्ध तत्त्वको
वह श्रुति उपस्थापित करती है ॥ ३१-३३ ।।
मण्डनमिश्राद्या निषेधश्रुतिमानतः।
ज्ञायतेऽवधिरित्याहुः सर्वद्वतविजितः॥ ३४ ॥
आचार्य मण्डनमिश्र प्रभृतिका कहना है कि निषेधश्रुतिसे निपे-
धावधि सर्वद्वैतरहित तत्त्वका ज्ञान होता है ।। ३४ ॥
तदा निषेधः धौतः स्याद् ग्रह्म त्वार्थिकमापतेत् ।
पदार्थशोधनार्या विधोध इतीतरे ।। ३५ ।।
अन्य आचार्योका कहना है कि निषेधश्रुति मुख्य हो तो निपेध
ही श्रुतिप्रमाणगम्य होगा ब्रह्म अर्यापत्तिगम्य होगा। अतः निषेध श्रुति
तत्त्वंपदार्थ शोधनार्थ है । ब्रह्मबोध विधिवाक्य तत्त्वमसि आदिसे
ही होगा ॥ ३५॥
पश्यत्याश्चर्यवस्कश्चिद वदत्याश्चर्यवत् परः ।
श्रुतिश्च चकितं यूयान्मा भूदर्थविपर्ययः ।। ३६ ।।
ब्रह्मको कोई आश्चर्य से देखता है, कोई आश्चर्यसे बोलता है,
वैसे थुति भी कही अर्थविपर्यय न हो इस आशकासे चकित होकर बोलती
है ॥ ३६॥
स फस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः
त्रिपात् फस्य भवेत्स्तुत्यमेकपादपि दुःस्तवम् ।
एकपद्या गुणवियाः स्युः किं गणितगोचराः ॥ ३७ ॥

श्लोक ] स्पन्दवार्तिकसहितम् २१ त्रिपात् ब्रह्म किसके स्तोतव्य हो? बल्कि एकपाद ब्रह्म भी स्तोतव्य नही हो सकता। एकपाद ब्रह्मके गुण प्रकार क्या गणित विषय बन सकते है ? नही ।। ३७ ॥ कस्य विषयः वागाद्याश्चक्षुराद्याश्च मनोबुद्धादयश्च ये। तेषु कस्य भवेदेष विषयोऽविषयात्मक ॥ ३८॥ वागादि कर्मेन्द्रिय, चक्षुरादि ज्ञानेन्द्रिय एव मन आदि अन्त करणमे वह किसका विषय होगा? किसीका नही। क्योकि स्वय वह अविष- यात्मक है ॥ ३८॥ नन्यत्र कस्य विषय इत्युक्त्यव गतार्थता । कस्य स्तोतव्य इत्येतत् किमर्थमभिधीयते ॥ ३९ ॥ स्तुतिवागविषयत्व हि स्तोतव्यत्वमुदोर्यते। तन्निषेधस्तु चरमपर्यायादेव लभ्यते ॥४०॥ "कस्य विषय" इस प्रकार विषयताका सामान्य रूपसे प्रतिक्षेप हो गया तो "कस्य स्तोतव्य " यह कहनेगरी क्या आवश्यकता क्योकि स्तोतव्य का अर्थ है स्तुतिरूपी वाणी का विपय होना। किन्तु इसका प्रतिक्षेप "कस्य विषय" से ही हो जाता है ।। ३९-४०॥ मैव स्तुतिप्रसङ्गन स्तोतव्यत्व निषिध्यते । तद्धेतुविधया चोवं प्रतिक्षेपद्वय मतम् ॥४१॥ स्तूयते विविधैरेव गुण• स्तोतव्यता यदि । गुणाना च विधा नव जायन्ते परमात्मन ॥ ४२ ॥ गुण स्तोतव्यता नाम तच्छन्दविषयीकृति । फयं साऽविषये तस्मिन् स्यादित्येतदिहोच्यते ॥४३॥ उक्त शकावा समाधान यह है कि स्तुतिके प्रसङ्गमें स्तोत- व्यताका ही मुख्य रूपसे प्रतिक्षेप लिया जा रहा है। "कतिविधगुण, "कस्य विपय ये दो प्रतिक्षेप स्तोतव्यताप्रतिक्षेपमे हेतु हैं। नाना प्रकार के गुणोसे स्तुति होती है, किन्तु कितने प्रकारके गुण परमेश्वरमे हैं यह पता नहीं, तब वह स्तोतव्य किस प्रकार? फिर स्तोतव्यताका अर्थ है स्तुतिविषय बनाना। वह किसीका विषय ही नही तो स्तुतिविषय कसे बनेगा? ॥४१-४३ ।। " "

२२
श्री शिवमहिम्न स्तोनम्
[द्वितीय
कस्य स्तोतव्यः
अथवोत्कर्षविषयशब्द. स्तुतिरितोर्यते।
उत्कर्षश्च शिवे फस्माद् यत् स्तोतव्यो भवेदसौ ॥ ४४ ॥
अथवा यहाँ व्याख्या दूसरे ढगसे कीजिये । उत्कर्पको बतानेवाला
शब्द स्तुति कहलाती है। शिवमे किसकी अपेक्षा उत्कर्ष है ? जिसका
वह स्तोतव्य हो ।। ४४ ॥
यस्मानास्ति पर वापर चेति श्रुतत्यत ।
नोत्कर्षवत्त्व विधया स निरूपणमर्हति ॥४५॥
श्रुतिमे बताया है कि उससे उत्कृष्ट भी कोई नही, अपकृष्ट भी
कोई नहीं। वह अद्वैत है। अतएव उत्कर्षवानके रूपमे शिवका निरूपण
सम्भव नही । यही "कस्य स्तोतव्य" का तात्पर्य है ॥ ४५ ॥
कतिविधगुणः
यस्मिन् विश्वात्मके देवे गुणरुत्कर्ष इष्यते ।
कति तन गुणा यहि ज्ञात स्तोतु स शक्यते ।। ४६ ॥
और जिस विश्वरूप सगुण परमात्मामे गुणप्रयुक्त उत्कर्ष अभीष्ट
है उसमे कितने प्रकारके गुण है ? जिनको समझकर स्तुति की जा सके।
यही "कतिविधगुण" का तात्पर्य है ।। ४६ ।।
कस्य विषयः
परो विश्वात्मको वाग्य कस्य वा विपयो भवेत् ।
अनन्तत्वात्परिच्छिन्नवागाद्यविषयो हि यत् ॥ ४७॥
चाहे परमशिव हो, चाहे विश्वात्मक शिव हो, किसका विषय
बनेगा? पर तो अनन्त है ही। ससार अनन्त होनेसे विश्वात्मक शिव भी
अनन्त है। वह परिच्छिन वाणी, मन भादिका विषय कसे हो सकता है।
यह "कस्य विषय" का तात्पर्य है ॥ ४७ ॥
पदे तु अर्वाचीने
नन्येव तु स्तुतिपर्या स्तोतव्यत्वनिराकृत ।
माधीपरिणतिस्तोत्रमित्यप्येवमरागतम्
मय पदे धोने न पतत्कस्य मनो वच ।
यत्पर सुन्दर सत्य शिव सर्वजनप्रियम् ॥ ४९ ।।
॥४८॥

श्लोकः]
स्पन्दवार्तिकसहितम्
२३
यदि स्तोतव्य ही नही तो स्तुति ही व्यर्थ है । स्वमतिपरिणामाव-
धिवाली बात भी स्तोतव्यता हो तबकी है। इसका उत्तर यह है कि शकर
भगवानके अर्वाचीन स्वरूपमे किसका मन और वचन प्रवृत्त नहीं होता
जो कि परमसुन्दर, सत्य, मङ्गलमय तथा सर्वजनप्रिय है ।। ४८-४९ ॥
अर्वाचीनपदद्वारा परं च स्तूयते पदम् ।
तदेव मासते तन तथा लक्षणयोच्यते ॥५०॥
अर्वाचीन आवतारिक पदके द्वारा परशिवतत्त्वकी भी स्तुति होती
है। क्योकि अर्वाचीन पदमे भी वही भासित होता है, तथा लक्षणया
स्तुतिबोध्य भी वही है ॥ ५० ॥
ध्यायेन्नित्य महेशं तं रजताचलसंनिभम् ।
चन्द्रावतंसं सदलभूपोज्ज्वलकलेवरम् ।। ५१ ॥
हस्तर्दधानं परशु मृगं वरमुताभयम्।
पद्मासीनं प्रसन्नास्यं व्याघ्रकृतिघर शिवम् ॥ ५२ ।।
विश्वाचं विश्ववन्धं नोहरणं सुरसंस्तुतम् ।
पञ्चवक्त्र तिनेनं च सर्वो घ्यायेत् स्तुवीत च ।। ५३ ॥
अर्वाचीनपद क्या है ? जो "ध्यायेन्नित्य" इत्यादि ध्यानमन्नादिमे
बताया है वे महेश्वर हैं। चांदीके पर्वतके समान गौरवर्ण हैं। चन्द्रशेखर
हैं। रत्नभूपणभूपितशरीर हैं। परशु, मृग, वर और अभय हायोमे
धारण किये हैं। पद्मासनासीन हैं। प्रसन्नवदन हैं। व्याघ्रचर्मधारी हैं ।
विश्वकारण है। विश्ववन्दनीय हैं । भयहारी हैं । देवस्तुत हैं। पञ्चवक्त्र
तथा मिनेत्र हैं। ऐसे भगवानका सभी ध्यान करते हैं और स्तुति करते
हैं ।। ५१-५३ ॥
सद्योजात प्रपद्येऽहमुत्तराननरूपिणम् ।
जगतः सृष्टिपर्तारमकार न महेश्वरम् ॥ ५४॥
भगवान शकरके उत्तर, पश्चिम, दक्षिण, पूर्व एव ऊर्ध्व इम क्रमसे
पांच मुख हैं। ॐकारकी पांच मात्रा और पञ्चाक्षरमन्त्रके पांच अक्षर
क्रमश उनके वाचक हैं। सद्योजात-वामदेवादि व्रमश नाम हैं । तदनुसार-
उत्तरमुखरूपी जगत्सृष्टिकर्ता कारके अकार और पञ्चाक्षरके नकार-
स्वस्प सद्योजातके हम शरणागत हैं। "सद्यो जात प्रपद्यामि" इत्यादि
मन्त्र है ।। ५४ ॥
यामदेवाय च नमो ज्येष्ठाय ठरूपिणे ।
पश्चिमाननरूपाय रक्षिय उ म आत्मने ॥ ५५॥

२४ श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [द्वितीयः 1 पश्चिमानन, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, ॐकारके उकारस्प और पञ्चाक्षरके 'म' अक्षरात्मा, जगद्रक्षणकर्ता, वामदेवको प्रणाम है । "वामदेवाय च नमो ज्येष्ठाय च नम श्रेष्ठाय च" इत्यादि मन्त्र है ॥ ५५ ॥ अघोरेभ्योऽय घोरेभ्यस्त्वद्रूपेभ्यो नमो नमः। दक्षिणात्याय सहर्ने मशिरूपाय ते नमः ॥ ५६ ।। हे भगवान | आपके अघोर तथा घोर जैसे सभी रूपोको नमस्कार है । तथा दक्षिणास्य, सहारकर्ता, ॐकारके मकाररूप तथा पचाक्षरके शिकाररूप आपको प्रणाम है। "अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्य " इत्यादि मन्न है ॥ ५६ ॥ विमस्तत्पुरुषायास्मै महादेवाय ते नमः। पूर्वास्याय तिरोधात्रे विन्दवे यास्वरूपिणे ॥ ५५ ॥ तत्पुरुषको हम उपासना करते हैं। महादेवका ध्यान नमस्कार करते हैं । पूर्वानन, तिरोधानकर्ता, ॐकारमे विन्दुरूप, पञ्चाक्षरमे वाकार- रूप भगवानको प्रणाम करते हैं । "तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि" इत्यादि मन्न है ।। ५७ ॥ ईशानः सर्वविद्यानामूर्खास्यः परमेश्वरः। नादो योऽनुग्रहीताय.स शिवोऽस्तु सदाशिवोम्।। ५८॥ सर्वविद्याके अधीश्वर ऊर्ध्वमुख परमेश्वर ॐकारमे नादरूप, पचा- क्षरमे यकाररूप जो ईशान है वह हमारे लिये सदा मगलरूप हो। "ईशान सर्वविद्याना" इत्यादि मन्त्र है ।। ५८ ।। नमोऽस्त्वोकारस्पाय नमः पश्चाक्षराय च। नम शिवाय तुर्याय समस्ताय नमो नमः ॥ ५९ ॥ व्यस्त स्पसे सद्योजातादिस्वरूप तथा समस्तरूपसे ॐकारस्वरूप, पञ्चाक्षरस्वरूप तुरीय शिवस्वरूप व समस्तस्वरूप शकरको प्रणाम है ।। ५९॥ इत्य यदव घ्यापश्चापर्वावोनपद शिवम् । परं शिवमयाप्नोति जड़तोकापवायनात् ।। ६० ।। इस प्रकार अर्वाचीनपदवा वाणीसे वथन तया मनसे ध्यान करना हुमा मा जडारानिगारण पर परमशिवपदको मनुष्य प्राप्त करता है।। ६०॥

श्लोक ]
स्पन्दवार्तिकसहितम्
२५
पतति न मनः कस्य न वचः
नन्वन नास्तिकादीना न पतेद वाडमनोऽपि च ।
सामान्यत कथमिय कस्येत्याक्षेपसगति ॥६१॥
पूर्वपक्ष- "पतति न मन कस्य' इस प्रकार सामान्याक्षेप कैसे
सगत है ? नास्तिकादिका मन एव वचन परमेश्वरमे नही लगता
है ।। ६१ ॥
सत्य मुनिरभव्याना रमणीयामशोभनान् ।
विदधीग्न जडधियो व्याक्रोशीमिति वक्ष्यति ॥ ६२ ।।
भव्यस्याऽजडयुद्धेनं कस्य नाम मनो वच ।
पतेन्पदेऽर्वाचीनेऽस्मिन्नित्यर्थोन ततो भवेत् ॥ ६३ ॥
उत्तर-स्वय पुप्पदन्त मुनि आगे कहेगे कि अभव्यो को रमणीय
लगने वाली अशोभन गालियाँ जडमति पुरुप भगवान के प्रति निकालते
रहते हैं ऐसी स्थिति मे यहाँ स्वयमेव अर्थत यह अर्थ निकालेगा कि
अभव्य तथा जडमति को छोडकर अन्य किसका मन एवं वचन अर्वाचीन
पद मे नही लगता ।। ६२ ६३ ॥
तत्रैव जडधोशब्दलक्ष्य वक्ष्यामहे वयम् ।
नास्तिका सन्ति धीमन्तोऽपोति नारायता तत ॥ ६४ ॥
जडधी किसको कहते हैं यह हम उसी श्लोककी व्याख्यामे स्पष्ट
करेंगे। अत नास्तिक भी तेजबुद्धिवाले होते है ऐसी शका यहां मत
करो ।। ६४॥
मध्याना सद्धिया सेव्यमर्वाचीनपद शिवम ।
तदन्त स्थ पर चापि ध्याय ध्याय स्तुवीमहि ॥६५॥
श्लोकका साराश यही हुआ कि भव्य सद्बुद्धि पुरुपोके सेव्य
अवाचीन पद शिवका मनसे ध्यान तथा वाणीसे मैं स्तुति करता हूं और
उस अर्वाचीन पदके अन्त स्थित परमशिवका भी इसके द्वारा ध्यान
एव स्तुति करता हूँ। ६५ ॥
इति श्री काशिकानन्दयोगिन कृतिन कृतौ ।
महिम्न स्तोत्रवियतो द्वितीयस्पन्दस ग्रह ॥६६॥

तृतीयः श्लोकः
स्तुत्यौचित्यं समर्थ्याचे द्वितीये स्तुतिसंभवम् ।
स्तुतिप्रयोजनं प्राह तृतीयेऽस्मिन्नकामिनाम् ॥१॥
प्रथमश्लोकमे स्तुतिके औचित्यका समर्थन किया । द्वितीयमे
स्तुतिकी सभवता बतायी। इस तृतीय श्लोकमे स्तुतिका प्रयोजन कहते
हैं ॥१॥
नन्वीश्वरप्रसादस्य फलत्वं स्पष्टमीरितम्।
पुराणादो कुतस्तस्य
विचारोन विधीयते ॥२॥
न च युक्त्या फलं तत्स्यान्निरास्यमिति साप्रतम् ।
यतो न खण्डनं युक्तं शास्त्रोक्तार्यस्य युक्तिमिः।।३।।
शका-पुराणोमे स्तुतिका फल ईश्वरप्रसाद बताया है। अतः
यहां फलविचार व्यर्थ है। यह कहे कि 'ईश्वरप्रसाद फल है' यह बात
युक्तिसे निरस्त होती है, तो सही नहीं, कारण शास्त्रोक्त अर्थका युक्तियोसे
खण्डन करना अयुक्त है ।। २-३ ।।
उच्यतेपुरपार्थः सन् यो युक्त्यापि विरुध्यते ।
न तत्र शस्त्रतात्पर्य फयंचिद् भवितुं क्षमम् ॥४॥
अपाम सोमममृता अभूमेति श्रुती श्रुतम् ।
जन्यस्यामृतताऽयोगादन्यार्थमुररीकृतम्
उत्तर -जो अपुरुषार्थ तथा युक्तिविरुद्ध हो उसमे शस्मतात्पर्य
नहीं होता। बल्कि मुक्तिविरुद्ध होनेमात्रसे स्वर्गको अमरता आपेक्षिक
ही मानी गयी है । क्योकि उत्पन्न वस्तु अमर नही हो सकती ॥ ४-५॥
तस्मादयुक्तिसिद्ध चेत् पुराणोदीरितं फलम् ।
फलान्तरविचारस्तु कार्यों मीमांसकर पि॥६॥
यहाँ तो वेदोक्त भी नहीं, पुराणोक्त है और युपत्यादिविरुद्ध भी
है तब मीमासकोयो भी अन्यपलके बारेमे मीमास परनी पडेगी ॥६॥
मत्तस्तु लोपसामाग्यहप्टायं सहता फयम् ।
ईगे स्यतच्छता पश्यन्नतोऽयरफलमीयते ॥७॥

?
श्लोक ]
स्पन्दवार्तिकसहितम्
२७
मीमासकोकी भी यह स्थिति है तो भक्तका क्या कहना । साधारण
लोगोमे जो स्तुतिसे प्रसन्नता देखी जाती है क्या भक्त उसे भगवानमे
स्वीकार करेगा ? फिर स्वयको तुच्छ देखनेवाला अपनी स्तुतिकी
करामात क्यो सोचने लगा? वह अपनी अल्पताको ही प्रकट करेगा वैसा
ही फल यहाँ कह रहे हैं ।। ७ ।।
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निमितवत-
स्तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोविस्मयपदम् ।
मम त्वेता वाणी गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिव्यवसिता ॥ ३ ॥
हे ब्रह्मन् । विभु परमेश्वर । मधुमधुर परम अमृत वाणीका
निर्माण करनेवाले आपके समुख सुरगुरु वृहस्पति या ब्रह्माकी भी वाणी क्या
विस्मयकारिणी हो सकती है ? नहीं, मेरे जसोकी तो बात ही क्या
वस्तुत आपके गुणकथनपुण्यसे मैं अपनी ही वाणीको पवित्र करता हूँ
इस उद्देश्यसे मैंने अपनी बुद्धिको स्तुति करनेमे लगाया है ।। ३ ।।
मधुस्फोता. परममृतं
मधुस्फोता समसृजद् याच स परमेश्वर ।
निरमासीच्च परमममृत
वचनात्मकम् ॥८॥
उस परमेश्वरने मधुमधुर वाणी उत्पन्न की। तथा परम अमृत
वचनका भी निर्माण किया ॥८॥
शब्दप्रपञ्चो द्विविध योहेतुरुदीयंत ।
मधुरूपोऽमृतात्मा च तदुक्न विबुधैरपि ॥९॥
सगीतमपि साहित्य सरस्वत्या स्तनद्वयम ।
एकमापादमधुरमन्यदालोचामृतम
दो प्रकारका शब्दप्रपञ्च श्रेया हेतु यताया है। एक मधुस्वरूप
है । दूसरा अमृतस्वरूप है। इस बातको विद्वानोने भी कहा है-गीत
मौर साहित्य सरस्वती देवीवे दो स्तन ( स्तन्य दुग्ध ) हैं । एय' (सगीत)
समूचा मधुर है । दूसरा (साहित्य) विचारोत्तर अमृतम्प है ॥ ९-१०॥
भयरण मधुमापर्य सगीत सर्वदेहिनाम् ।
विचारादमृतस्पन्दि साहित्य तिलक्षणम् ॥११॥
॥१०॥

२८
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[तृतीयः
उक्त वचनका तात्पर्य यह है कि मुननेमानसे ही संगीत सबको
मधुके समान मधुर लगेगा। श्रुतिरूपी साहित्य सुनते ही मधुर नहीं
लगेगा, किन्तु विचार करनेपर मोक्षरूपी अमृतको प्रदान करनावला
होगा ॥११॥
वाचो गोतमधुस्फीता बचश्च परमामृतम् ।
इत्येवं प्रकृतेऽर्थः स्यादन्तर्भावितचार्थके ॥१२॥
प्रकृत श्लोकवाक्य अन्तर्भावित चार्थक है। अर्थात् मधुस्फीताश्च
अमृतं च ऐसा समुच्चय यहाँ विवक्षित है (मधुर सगीत वाणी भी बनायी,
थुतिरूप अमृत वाणी भी वनायी ) ॥१२॥
पञ्चभिः शंकरो वक्त्रः पञ्च रागानवर्तयत् ।
तथा च रागिणी नेत्येवं विद्भिरीयंते ॥ १३ ॥
स्वोयगीतिपरिक्षुण्णा नारदो रागरागिणोः।
वीक्ष्य ता रक्षितु शम्भुमगादिति जनश्रुतिः ॥ १४ ।।
सगीतप्रवर्तकके रूपमे शकरभगवान सगीताचार्योमे प्रसिद्ध हैं।
अपने पाँच मुखोसे शकरने पांच मुख्य रागोको तथा रागिणियोको प्रकट
किया था। एक बार नारदजीने देखा कि हमारे गायनसे इन रागरागि-
णियोका अगभग हो गया तो उन्हे पूर्ववत् करनेके लिये शकरभगवानकी
शरण ली थी।। १३-१४ ॥
विद्याधिष्ठातृरूपेण प्रसिद्धः शंकरस्तत. ।
साहित्य निर्माणकरोऽप्येष एवेति सिध्यति ।। १५ ।।
विद्याके अधिष्ठाताके रूपमे शकर प्रसिद्ध है । अत. साहित्यनिर्माण-
कर्ता भी शकर ही सिद्ध होते हैं ॥ १५ ॥
मधु-अमृतं
सामवेदे तु संगीतं वेदान्ते चामृतं परम् ।
तदेतदुभयं चक्र इति वा योज्यतामिह ॥ १६ ॥
सामवेदमे सगीत है, वेदान्तमे अमृत है। दोनोका निर्माण करने
किया ऐसी भी योजना सम्भव है ।। १६ ॥
मधु-अमृतं
अयवा द्विविधा वाक् स्यात् परा चैवापरापि च ।
ग्वेदादिभवेत्तयाऽपरा वाड् मुण्डके रिता ॥ १७ ॥

श्लोकः]
स्पन्दवातिकसहितम्
परा तु साक्षरं सत्यं यया वाचाधिगम्यते ।
यददृश्य तथाऽग्राह्यमचक्षुःयोनलक्षणम् ॥ १८॥
अथवा दो प्रकारकी वाणी है-परा और अपरा। ऋग्वेदादि अपरा
वाणी है और परा वाणी वह है जिससे अक्षर सत्यकी प्राप्ति हो। जो
अक्षर, अदृश्य, अग्नाश, अचक्षु , अधोनादिरूपसे वर्णित है ॥ १७-१८॥
विधव मुण्डके प्रोक्ता परापरविभागमाग ।
तयापि तद्धेतुरपि परापरविभागमाग ॥ १९ ॥
यद्यपि मुण्डकोपनिषत्मे "वे विद्ये वेदितव्ये..... परा वापरा च"
इस प्रकार विद्याके दो विभाग बताये तथापि विद्याहेतु वाणीके भी ये दो
विभाग सुगम है ।। १९ ॥
अत्राधा तु मधुव्याप्ता स्वर्गादिफलसर्जनात् ।
अमृतं यत्तु तत्रोक्तं भवेदापेक्षिकं हि तत् ॥ २० ॥
आभूतसप्लव स्थानममृतत्वं हि भाष्यते।
इति शास्त्रेषु ततत्त्व स्पष्ट व्यारयातमेव च ॥२१॥
इनमे प्रथम-ऋग्वेदादिरूप वाणी स्वर्गदाता होनेसे मधुव्याप्त है ।
यद्यपि स्वर्गको भी कहीं-कही अमृत बताया है। तथापि वह आपेक्षिक
अमृत ही है। कल्पपर्यन्तस्यायित्व ही अमृतत्व है। इस प्रकार शास्त्रोमै
उसकी स्पष्ट व्याख्या भी उपलब्ध है ।।२०-२१ ।।
अत एवाह मगवान् गोतासु विजयं प्रति ।
यामिमा पुष्पिता वाच प्रवदन्त्यविपश्चितः ॥२२॥
पुष्पे प्रसिद्ध हि मधु मधुस्फीता ततस्तु सा।
इसीलिए गोतामे-"अविद्वान इस सकामकर्मप्रतिपादक पुप्पित
वाणीको कहते हैं" ऐसा बताया है । पुष्पमे मधु प्रसिद्ध है। अत कर्मवोधक
वेदवाणी मधुस्फीत है ।। २२३ ।।
अन्या वेदान्तरूपा तु परमामृतदायिनी ॥ २३ ॥
परा वाणी वेदान्तरूप है। वह परम अमृत मोक्षको देती है। अत
अमृत इस विशेषणके योग्य ही है ॥ २३ ॥
याचः
स्वर्गादौनामनेकत्वाद् बहुत्वेनाह वाश्पदम् ।
अमृतस्थकरूपत्वात् तदेकवचनेन
च ॥ २४॥

३० श्री शिवमहिम्न स्तोनम् [तृतीय. अपरावाणीके फल स्वर्गादि अनेक हैं, अत. वाच ऐसा बहुवचनान्त प्रयोग किया । अमृत-मोक्ष एकरूप है अत अमृत ऐसा एकवचनान्त प्रयोग किया ॥२४॥ अथवा वाच इत्यस्मान् यी विद्याभिधीयते । ॐकारोऽमृतमित्येतत्पदेन विनिगद्यते ॥२५॥ अथवा "वाच" से वेदत्रय ग्राह्य है और "अमृत" से ॐकार ॥२५।। परमं साररूपा. पृथिव्याद्या भूताना पृथिवी रसः। इत्यादिवचनातेषा व्यावृत्त्य परमं पदम् ॥ २६ ॥ "एषा भूताना पृथिवी रस पृथिव्या आपो रस अपामोपधयो रस" इत्यादि कहकर अन्तमे "साम्न उद्गीथो रस" ऐसा छान्दोग्यमे बताया है। उनमे भूतादिकी अपेक्षा पृथिवी आदि सार-अमृतरूप है। उनकी व्यावृत्तिके लिए 'परम' विशेषण है ।। २६ ।। रसाना स्याद्रसतम उद्गीथः परमोऽष्टमः । प्रयोयं वर्तते तेन परमामृतमुच्यते ॥ २७॥ "स एप रसाना रसतम परम परायोऽप्टमो यदुद्गीथ " इस प्रकार पृथिवी आदि रस सख्याने अष्टम उद्गीथ ॐकारको रसोंमे रसतम परम बताया है । उसीसे तीन वेद प्रकट है । अत वह परम अमृत कहलाता है ॥ २७ ॥ अमृतं ओमित्यक्षरमेतद्धि भूत भव्यं मवच्च यत् । रूपाणि नाम्नि लीयन्ते नामान्योकार एव च ॥ २८॥ तया चामृतरूपत्वमोकारस्य स्फुट मतम् । तद् व्याहरन् मृतो मर्पश्चामृतत्व प्रपद्यते ॥ २९ ॥ ॐको विशिष्ट अक्षर बताया है। क्षरणशून्य ही अक्षर है । भूत, भविष्यद्, वर्तमान आदि सभी ॐकार ही है। रूप सभी नाममे लीन होते हैं। नाम ॐकारमे लीन होते हैं । बोवारका लय नहीं होता। इस प्रकार ॐकार अमृत सिद्ध हुआ। उसका उच्चारणवर मरनेवाला मर्त्य अमर होता है इसलिए भी आर अमृत है ।। २८-२९ ।।

श्लोकः]
स्पन्दवार्तिकसहितम्
३१
निमितवतः
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन देहं स याति परमां गतिम् ।। ३०॥
प्रणवः सर्ववेदेस्वित्युक्तेश्च परमं भवेत् ।
तन्निर्माणं व्याहरण वेदव्याहरणं ततः ॥ ३१॥
गीतामें भी यह वात आयो है-"ओकार उच्चारण एवं मेरा
स्मरण कर देह त्यागनेवाला परमगतिको प्राप्त होता है। सब वेदोंमे
प्रणव मैं हूँ" इससे ॐकारकी परमता सिद्ध होती है। उसका निर्माण
प्रथमोच्चारण है । उसके बाद भगवानने वेद प्रकट किया ॥ ३०-३१ ॥
शास्त्रयोनित्वत इति सूत्रकारोऽप्यसूत्रयत् ।
यो वेदा अजायन्त तस्मादित्यागमादपि ॥३२॥
"शास्त्रयोनित्वात्" इस प्रकार सूत्रकार व्यासजीने भी भगवानको
वेदकारण बताया है । स्वय वेदोमे भी यही बात "तस्मात्तपस्तेपानात्
नयो वैदा अजायन्त" इस वचनसे बताया है ।। ३२॥
वैदः शिवः शिवो वेद इत्यन्या श्रुतिरब्रवीत् ।
शिवात्मत्वं तु वेदानां शिवव्याहरणाद् भवेत् ॥ ३३ ॥
वेद ही शिव है शिव ही वेद है इस प्रकार अन्य श्रुती कह रही
है। शिवजीने प्रकट किया अत शिवरूप कहा गया ॥ ३३ ॥
एव सुमधुरा वाचः परमामृतमेव च।
निर्मातुविस्मयपदं कि नु वाग गोप्पतेरपि ॥ ३४ ॥
इस प्रकार सुमधुर तथा परमामृत वाणीका निर्माण करनेवाले भग-
वानके सामने गीपति की भी वाणी विस्मयजनक होगी क्या? ॥ ३४ ॥
अन्ये व्याचक्षते वाचा द्वे इहोक्ते विशेषणे।
मधुस्फीतत्वमेकं तत् परमामृतताऽपरा॥ ३५ ॥
शब्दालकारयुक्तत्वं मधुस्फीतत्वमुच्यते ।
प्रीलङ्कारयुवतत्वममृतत्व
निगद्यते ॥३॥
दूसरे लोग यहाँ ऐसी व्याख्या करते हैं कि वाणीके ही दो विशेषण
मधुस्फीतता और परमामृतता है । शब्दालकार मधुस्फीतता है। अर्था-
लकार परमामृतता है ।। ३५-३६ ॥
केचित्त्वमतमित्येतनिर्माणस्य विशेषणम् ।
क्रियाविशेषणत्वाच्च ग्लोबकत्वे समापयन् ॥ ३७॥

. ३२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [तृतीयः कुछ लोगोने “अमृत" को निर्माण क्रियाका विशेषण माना । क्रियाविशेषण होनेसे नपुसक प्रयोग और एकवचनान्तता है ।। ३७॥ मधुस्फीता ऊर्गकृत्येकवचनं मधुस्फीति केचन । वाच इत्यपि षष्ठ्यन्तमन्यथा व्याचचक्षिरे ॥ ३८॥ वाच प्रस इत्युक्तं छान्दोग्ये तत्र साम च । तत्राप्युक्तो रसतम उद्वीयः परमः पुनः ॥ ३९ ॥ ऋचं वा साम वोद्गीथं वाऽमृतं वाग्नसात्मकम् । कर्तुः किं विस्मयपदं मधुस्फीतापि वाग् विधेः ॥ ४० ॥ कुछ लोग-मधुस्फीता यह एकवचनान्न है ओर "वागपि" का विशेषण है, वाचः यह पष्ठ्यन्त है, ऐसा मानकर व्याख्या करते हैं। वाचः वाणीका, अमृत-रस-ऋक् या साम या ॐकार बनाने वालेको ब्रह्माकी मधुमय वाणी भी विस्मित करा सकती है क्या ? ॥ ३८-४० ।। निमितयतः कि विस्मयपदम् इत्य मळमृतां वाचं निर्मातुः परमेशितुः । चमत्कृति का नु कुर्या स्तुत्याल्पचतुरोऽनया ॥४१॥ इस प्रकार मधुरूप तथा अमृतरूप वाणीके निर्माता शंकरको ब्रह्मा भी चमत्कृत नही कर सकते तो अल्पचतुर मैं इस स्तुतिसे भला कैसे चमत्कृत कर सकता हूँ? ॥४१॥ अस्तु गीतकला स्तुत्यामस्तु साहित्यमेव च । तथाप्येपा चमत्फ क्षमते नैव शंकरम् ।। ४२॥ और माना भी जाय कि इस स्तुतिमे गीतकला भी है साहित्यकला भी है। फिर भी शकरभगवानको यह चमत्कृत नही कर सकती ( क्योकि वाणीमात्रका निर्माण शकरने क्यिा है ) ।। ४२ ।। चीनांशुफापणात क्रीत्वा तत्राण्ड यदि कश्चन । तस्येव थेष्ठिने दत्वा चमत्क क्षमेत किम् ॥ ४३ ।। उद्यानपतये तस्मादाचीयोद्यानतो यदि। द्विग्राणि दद्यात्पुष्पाणि किमतोऽन्यद्विडम्बनम् ।।४।। रेशमी वस्त्रयो दुकानसे एक रेशमी वस्त्र सरोदकर उसका एक टुकड़ा उसी दुवानके मालिक सेठको देकर कोई उसे खुदा कर सकता है

श्लोकः]
स्पन्दवातिकसहितम्
क्या ? उसकी आंखोंको चकाचौंध कर सकता है ? बगीचेके मालिकको
उसी बगीचेसे दो चार फूल तोडकर अपना कहकर कोई देने लगे तो इससे
बटकर क्या विडम्वना होगी?॥ ४३-४४॥
दूरान्मम तु पागेपा फि स्यात्सुरगुरोरपि ।
तव विस्मापनी यस्या निर्मातासि त्वमेव हि ॥ ४५ ॥
मेरी वाणी तो दूर, क्या मुरगुरु वृहस्पति या ब्रह्माकी भी वाणी
आपको विस्मित करने वाली है। जिसके रचयिता स्वय आप है ॥ ४५ ॥
वाचो रसविधातारं रसयेत् कस्य वाऽत्र याक ।
अमृतं प्रणयन्तं हि मधु विस्मापयेत् फिमु. ४६ ।।
अथवा यो कहे-वाणीके अमृतरूपी रसका निर्माण करनेवाले
आपके हृदयमे किसकी वाणी रसोद्भावन कर सकती है ? आपने वाणीमे
अमृत डाला । हमारी वाणीमे तो सिर्फ मधु है। क्या अमृत बनानेवालेको
मधु ( शहद) आश्चर्यमे डालेगा? ॥ ४६ ।।
बदिभिः कविमिश्चव स्तूयमानो महीपतिः ।
वाचा निगुम्फः सतुष्येन त्व तद्वन्महेश्वर । ४७ ।।
बन्दीगण और कविगण स्तुति करने लगते हैं तो राजा आदि
उनकी वाणी चातुरीसे प्रसन्न होते है । परन्तु हे भगवन् उस प्रकार आप
प्रसन्न नहीं होते ॥४७॥
परिच्छिनाः परिच्छिनःप्रसीदन्तु स्तवादिभिः ।
अनन्तग्रह्मरूपस्त्वं फथं तैहि प्रसीदसि ॥४८॥
परिछिन्न राजा आदि परिच्छिन्न उत्कर्षबोधक स्तुति आदिसे भले
प्रसन्न हो। किन्तु हे ब्रह्मन् ! आप अपरिच्छिन्न ब्रह्मस्वरूप उससे कैसे
प्रसन्न सकते है ।। ४८॥
सर्वकर्मा सर्वरसगन्धकामादिमागसि ।
अनादरो नित्यतृप्तेरामा ब्रह्मास्यशेपट्टा ॥ ४९ ।।
आप समस्तजगत्कारक है। सभी रसगन्धकामादि
आपमे है । नित्यतृप्त होनेसे अनादर है । अप्नाप्त प्राप्तिमे आदर होता है।
अप्राप्त कुछ है नहीं। अत स्तुतिसे आप अप्राप्त क्या पायेंगे जिससे आप
हे ब्रह्मन्
प्रसन्न होगे?
पुनामीत्ययें
अहं पुनः स्तवीमि त्वां स्वीया पायितुं गिरम् ।
लौकिकस्तुतिनिन्दाद्यैर्याऽपवित्रा ममामवत् ॥५०॥

श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम्
[तृतीय.
आपको चमत्कृत करनेके लिये नही किन्तु अपनी वाणीको पवित्र
करनेके लिये मैं आपकी स्तुति करता हूँ। लौकिक स्तुतिनिन्दासे जो
( मेरी वाणी ) अपवित्र हो गयी है ।। ५० ॥
पुरमथन
देवैः स्तुत. पुरा हत्वा त्वमेव त्रिपुरासुरम् ।
अपावयो भुव तद्वन्मद्वाणी पावय प्रभो ॥५१॥
आसुर्या सपदा विद्धव्यवहारप्रदूषिताम ।
त्वा चिना पावयेत्को नु पुरान्तक गिर मम ॥५२॥
हे पुरमथन | देवताओकी स्तुति सुनकर आपने निपुरासुरवधकर
पृथिवीको पविन किया वैसे मेरी वाणीको भी पवित्र करो। यह वाणी
आसुरी सपदासे दूषित व्यवहारसे कलकित हो गयी है। आपके विना कौन
मेरी इस वाणीको पवित्र कर सकता है ॥ ५१-५२ ।।
नवस्तुतिभंवद्योगात्पावयिष्यति ता स्वयम् ।
तदर्थ प्रार्थये नाह पृथक् त्वा जगतः प्रभो ॥५३ ।।
परन्तु मेरी वाणी पविन करो ऐसी पृथक् प्रार्थना मैं नही करता।
क्योकि आपकी स्तुति आपसे सयुक्त होनेसे स्वय पवित्र करेगी ॥ ५३ ।।
स्वरस्तुत्या पूतया वाण्या पन्न् वैदान जपन् मनुम् ।
त्वदीय परम लप्स्ये
पद सर्वशिवकर ॥ ५४॥
आपकी स्तुतिसे पवित्र बनी वाणीसे वेदोको पढते हुए मन्नोको
जपते हुए आपके परमपदको मैं अवश्य पाऊँगा ।। ५४ ॥
असद्गिरा महापातः सगिरा च महोम्मतिः।
अतोऽह पावये पाणी त्वरस्तुत्या परमेश्वर ।। ५५ ॥
झूठ बरावर पाप नही, भगवत्स्तुति वरावर पुण्य नहीं अत आपकी
स्तुतिसे वाणीको पविय करना भी बहुत वही सिद्धि है ॥ ५५ ॥
कि च याण्या पवित्राया मनःशुद्धिविनिर्मलम् ।
ज्ञान च सत्यतपसो दृष्ट तच्च भवेन्मम ॥५६॥
वाणीयी पवित्रतासे वेदपाठादिप्रयुक्त सद्गति प्राप्त होगी ही। इतना
ही नहीं। उससे मनकी पवित्रता तथा निर्मलज्ञान ब्रह्मचारी सत्यतपस्को
प्राप्त हो गया था। वह मुझे भी प्राप्त होगा ।। ५६ ।।
निःप्रेयसान्त तदिव यस्य स्याद्गुणीतनम् ।
तात्म नमोऽस्तु सतत ब्रह्मरो पुरमेदिने ॥ ५७॥

श्लोक.] स्पन्दवार्तिकसहितम् ३५ इस प्रकार ज्ञान द्वारा नि.श्रेयसपर्यन्त जिसका गुणकीर्तन फल प्रदान करता है उस ब्रह्मस्वरूप त्रिपुरारि शकर को मैं प्रणाम करता हूँ ।। ५७ ॥ इति श्रीकाशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतौ। महिम्न स्तोनविवृतौ तृतीयस्पन्दसंग्रहः ॥३॥ चतुर्थः श्लोकः अर्वाचीने न पतति मनः कस्य न वा वचः। इत्येतन्नास्ति युक्तायं नास्तिकेष्वनवेक्षणात् ॥१॥ पहले बताया था कि भगवान के अर्वाचीन साकार स्वरूपमे किसका मन नहीं लगता और किसकी वाणी कुछ कहने के लिये आगे नहीं बटती। परन्तु यह वात सङ्गत नही दीखती। कारण कस्य के अन्दर नास्तिक भी आते है, उनमे उक्त बात लागू नहीं होती ॥१॥ न चास्तिकानां तद् दृष्टं युक्त स्यादिति सांप्रतम् । थद्धाजधियां तत् स्यात् किं स्यात्सस्यावतां ततः॥२॥ यदि कहे कि नास्तिकोकी बात छोडो, आस्तिकोका मन वाणी तो लगता है। तो यही कहा जायेगा कि श्रद्धाके कारण जो जडधी हो गये हैं उनके इस वृत्तका सख्यावान् =पण्डितं ( सास्यवेत्ता) के लिये क्या उपयोग? ॥२॥ कि चावचिीनशन्देन ध्यन्यते परमात्मनः। सनातनं पद फिचिदन्यत्तस्यव विद्यते ॥३॥ सदसिद्ध न हि यतःप्राचीनं किंचिदीदृशम् । अर्वाचीनं कुतस्तस्य क्या चय यथा ततः॥४॥ दूसरी बात यह है कि "पदे त्वर्वाचीने" यहाँ अर्वाचीन पदसे सूचित होता है कि परमात्माका प्रचीन कोई सनातन पद भी है। परन्तु ऐसा कोई श्री शिवमहिम्न: स्तोत्रम् [ चतुर्थः प्राचीन पद असिद्ध है। प्राचीन नहीं तो अर्वाचीन कहांसे आया। तव उसकी कथा भी वृथालाप मात्र होगी ।। ३-४ ॥ तथा च तत्स्तुति कृत्वा स्ववाक्पावनताकृतेः । प्रत्याशार्थवती नेति तत्रेदममिधीयते ॥ ५॥ ऐसी स्थितिमे उस अर्वाचीनपदकी स्तुति कर अपनी वाणीको पवित्र करनेकी आशा दुराशा ही है इस पूर्वपक्षपर "तवैश्वर्यं यत्तत्" इत्यादि चतुर्थ श्लोक स्तुतिरूपमे कहा जा रहा है ।। ५ ॥ तवैश्वर्य यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत अयोवस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु । मभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणी विहन्तुं व्याक्रोशी विदधत इहैके जडधियः॥४॥ हे वरद ! आपका ऐश्वर्य ऐसा है जो जगत्की सृप्टि, स्थिति एव संहार करता है, तीन वेदोका प्रतिपाद्य तत्त्व है, सत्त्व, रज, तम ऐसे तीन गुणोसे भिन्न तीन शरीरोमे व्यस्तरूपसे स्थित है । कुछ जड़मति उस ऐश्वर्य- का निरास करनेके लिये ऐसा प्रलाप करते है जो वस्तुत. अशोभनीय है, किन्तु ससारमे अभव्य व्यक्तियोंके लिये रमणीय लगता है ॥ ४ ॥ ऐश्वर्य ऐश्वर्य द्विविघं प्रोक्तं परं चापरमेव च । त्रिपाद्मह्मात्ममहिमा परमैश्वयंमीरितम् ॥ ६॥ ईश्वरः सर्वशक्तः स्यात्सृष्टिस्थितिलयादिकृत् । तस्य भानो यदेश्वर्यमपरं तत्तु कोतितम् ॥७॥ सृष्टिस्थितिलयानुग्रहादिविधायकम् । चैतन्यमेव प्रकृते भवेदैश्वर्यशन्दितम् ॥८॥ ऐधर्य दो प्रकारका होता है । एक पर ऐश्वर्य है। दूसरा अपर ऐश्वर्य है । "त्रिपादस्यामृत दिदि" इस प्रकार पहले उपपादित परम महिमा ही पर ऐश्वर्य है। दूसरा ऐश्वर्य ईश्वर-सर्वसमर्थ :- सृष्टिस्थितिलयादिकारी, उसका भाव इस व्युत्पत्तिसे लभ्य ऐश्वर्य है । वही अपर ऐश्वर्य है। प्रकृतमे भाव-मात्र नहीं समझना। किन्तु सृष्टिस्थितिलय बादि करनेवाला चैतन्य ही ऐश्वर्य शब्दका अर्थ समझना चाहिये ।। ६-८॥

। श्लोकः] स्पन्दवार्तिकसहितम् ३७ ऐश्वर्यमेकमेव प्राक् त्रिपाद्रूपेण संस्थितम् । उपाधिवशतः पश्चात् सृष्टि स्थित्यन्तकृद्भवेत् ॥ ९॥ यद्यपि ऐश्वर्य दो नहीं है। तथापि उपाधिसे भेद है। जो ऐश्वर्य प्रथम त्रिपातरूपसे स्थित है वही उपाधिवशात् वाद सृष्टिस्थितिलयकारी होता है ॥९॥ त्रयोवस्तु तवैश्चयं परं यत्तत त्रयोवस्त्विति योजना। त्रय्यां तत्प्रतिपाद्यत्वविधया वसतीत्यतः॥१०॥ श्लोकमे यथासख्य अन्वय करना चाहिये। तव ऐश्वयं यत् त्रयीवस्तु । तिसुपु गुणभिन्नासु तनुपु जगदुदयरक्षाप्रलयकृत् । ऐसा अन्वय है । आपका पर ऐश्वर्य वेदनयप्रतिपाद्य वस्तु है। वही तीन शरीरोंमे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र शरीरोमे जगतकी उत्पत्ति स्थिति लयकारण होकर अपर हुआ । परन्तु आगे कुछ विशेषता आगमानुसार दिखायेगे। अत. प्रथम इतनी ही योजना कीजिये-भगवान्का पर ऐश्वर्य वेदनयवस्तु है। इसकी व्याख्याकर आगे वढेंगे । तीन वेदोमे प्रतिपाद्यरूपसे वास करता है अत त्रयीवस्तु कहा-त्रय्या वसति ॥१०॥ सर्वे वेदाः पदं पद्धधामनन्तीति ध्रुतेर्वचः। वेदश्च सवर्वेद्योऽहमित्याह भगवानपि ॥११॥ श्रुतिवचन है-"सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति" सभी वेद जिस एक परमपदको ही कहते है । भगवद्गीतामे भी बताया-सभी वेदोमे वेद्य मैं (परमात्मा ) ही हूँ । अत वह वयोवस्तु है ॥ ११॥ सदेव सोम्येति शिवं शान्तमदतमित्यपि। तया तत्त्वमसोत्यादिः श्रुतिः साक्षात्तदाह हि ॥ १२॥ त्रयीप्रतिपाद्यता दो प्रकारसे है। साक्षात् और परम्परया । "सदेव सोम्येदमग्र आसीत्", "शिव शान्तमद्वत चतुर्थ", "तत्वमसि' इत्यादि श्रुति साक्षात् पर ऐश्वर्यका वर्णन करती है ॥ १२ ॥ सर्वा एवोपनिपदस्तात्पर्यविषया आहुरेश्वर्यमिति च पड्लिङ्गदर्शितं युधः ॥ १३ ॥ सभी उपनिपदें तात्पर्यत. परब्रह्मरूपी ऐश्वर्यका ही वर्णन करती हैं यह बात पड्लिङ्गोके द्वारा विद्वानोंने दरशाया है ।। १३ ॥ - परम्।

३८
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[चतुर्थः
प्रवर्तते।
च
त्वंपदार्थविशुद्धययं कर्मकाण्ड
तत्पदार्थयिशुद्धयर्थमुपासाकाण्डमेव च॥१४॥
यह ज्ञानकाण्डकी वात हुई। कर्मकाण्ड और उपसनाकाण्डमे पर
ऐश्वर्यका वर्णन किस प्रकार ? सो कहते है-पूरा कर्मकाण्ड त्वपदार्थशोध-
नार्थ है। और पूरा उपासनाकाण्ड तत्पदार्थशोधनार्थ है। अत. वहाँ भी
परम्परया प्रतिपाद्य ब्रह्म ही है।॥ १४ ॥
नाशरूपं बाघविघं द्विविधं शोधनं मतम् ।
कर्मभिर्मलनाशात्म त्वपदार्यविशोधनम् ॥ १५ ॥
मायातरणरूपं तत्पदार्यविशोधनम्।
उपास्त्या मा प्रपद्यन्ते ये तां मायां तरन्ति ते॥१६॥
ज्ञानकाण्डे पुनस्तत्त्वंपदार्थपरिशोधनम् ।
वापरूपं भवेत्तत्र पूर्वोक्तं तु सहायकम् ॥ १७ ॥
कर्मकाण्ड और उपसानाकाण्डसे तत्त्वपदार्थशोधन कैरो? इसे समझने-
के लिये प्रथम दो प्रकारका शोधन समझिये। एक शोधन नाशात्मक है।
दूसरा वाधात्मक है। कर्मसे त्वपदार्थ जीवात्मास्थित मलनाश होगा तब वह
शुद्ध होगा, शीघ्रस्वरूपवोधयोग्य होगा। उपासनासे मायाऽपसरणरूप तत्प-
दार्थशोधन होता है। "मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेता तरन्ति ते" इस प्रकार
गीतामे यह बात कही गयी है। ज्ञानकाण्डमे तत्त्वपदार्थशोधन वाधात्मक
होता है । उसमे पूर्वोक्त नाशात्मक शोधन सहायक है । अत सकलवेदप्रति-
पाद्य ब्रह्मतत्व है ।। १५-१७ ॥
कि च कर्मोद्धतमलो ध्वस्तविक्षिप्त्युपास्तिकः ।
अधिकारी भवेत् पारम्पर्येण ब्रह्मदर्शने ॥ १८॥
कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड अन्य प्रकारसे भी ब्रह्मदर्शनमे कारण
है। जैसेकि कमसे मलनिवृत्ति जिसकी हो गयी हो, विक्षेपको ध्वस्त
करनेवाली उपासना जो कर चुका हो वही परम्परया ब्रह्मदर्शनमे अधिकारी
होता है।॥ १८॥
स्वर्गादिक फलं यत्र फर्मादेः श्रुतिपूदितम् ।
নবাবি विश्वासोत्पत्तिपारम्पयंमनोप्मितम् ।। १९ ॥
राहा होगी कि "स्वर्गकामो यजेत" से विहित यागका स्वर्गादि फल
एव पश्चात् पतन ही होता है, वहां ज्ञानतात्पर्य कथमपि सभावित नहीं है,
इसका समाधान यह है कि वहाँ भी सत्वार्मप्रवृत्ति एव विश्वासोत्पत्तिम
तात्पर्य है ॥ १९॥

श्लोक ] स्पन्दवार्तिकसहितम् तत यथा प्रवृत्तिदिव्याय मन स्थितिनिबन्धनी। तथा स्वर्गादिसप्राप्तिर्वेदविश्वासकारिणी ॥२०॥ जैसे दिव्यगन्धादिसवित्रूपी प्रकृष्टवृत्ति होनेपर योगशास्नमे विश्वास होता है वैसे स्वर्गादि प्राप्त होनेपर वैदिकविद्याओमे विश्वास उत्पन होता है ॥ २०॥ न च प्रत्यक्षफलतो विश्वासोत्पत्तिरिष्यताम् । स्वर्गाद्यदृष्टफलत कथ तदिति साप्रतम् ।। २१ ।। सर्वथाऽदृष्टरूपत्वे फलत्व नैव युज्यते । अत्यन्ताज्ञेयतत्प्रेप्सा नापि स्यापि जायते ।। २२ ।। स्वर्गाद्यनुभवसस्कारवशत पुमान् । तदिच्छन् वैदिकार्थेषु विश्वास लमते क्रमात् ।। २३ ।। यदि कहे कि प्रत्यक्ष गधादि सवित्से विश्वासोत्पत्ति हो, किन्तु स्वर्गादिरूप अदृप्टफलसे विश्वास कसे होगा? इसका उत्तर यह है कि सर्वथा अदृष्ट हो तो वह फल ही नही हो सकता। अत्यन्त अज्ञातकी प्राप्तीच्छा भी नही हो सकती। अत स्वार्गादिके अनुभवका कुछ सस्कार अनुवर्तित होता है यह मानना होगा। तब वह वैदिवार्थोम विश्वासोत्पादक भी निश्चित है ।। २१-२३ ।। च्या वसति तत् तस्मात्योवस्त्विति भण्यते । वय्या वास्तविकोऽर्थोऽय प्रयोवस्तु ततोऽपि च ॥ २४ ॥ वेदनयीमे वास करता है अत अयोवस्तु है। और वेदत्रयीम यही वास्तविक अर्थ है इसलिये भी योवस्तु है ॥ २४ ॥ जगदुदय० प्रकृत्युपाधिमादाय प्रयोवस्तु तदेव हि। विश्वोत्पत्तिस्थितिलयकारण जायते परम् ॥ २५ ॥ प्रकृति उपाधिको लेकर वही प्रयीवस्तु ब्रह्म बादम विश्वको उत्पत्ति, स्थिति एव लय करनेवाला होता है ।। २५ ।। यतो भूतानि जायन्ते जीवन्त्यमियिश त्यपि । यस्मिन्प्रयन्ति तद् ब्रह्मत्येवमाह धुति स्वयम् ॥ २६ ॥ "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' इत्यादि ध्रुतिमै ब्रह्मको जगत- उत्पत्तिस्थितिलयका कारण बताया, ब्रह्मा, विष्णु आदिसे नहीं ।। २६ ॥

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[चतुर्थः
तिसृषु गुण.
तदेव गुणमिन्नासु ब्रह्मविष्ण्वीशनामसु ।
व्यस्तं पृथक् तनुषु च सृष्टयादिकरमिष्यते ॥ २७ ॥
त्रयीवस्तु जो प्रकृति उपाधिसे सृष्टिस्थितिलयकारी हुआ वही सत्त्व,
रज, तमसे विष्णु, ब्रह्मा, शिवनामवाले शरीरमें व्यस्त ( अलग अलग)
होकर पृथक् सृष्टिकर्ता, रक्षाकर्ता और संहारकर्ता होता है ॥ २७ ।।
तुरीयं पदमद्वैतं परमः शिव उच्यते।
स्पन्दनात् स शिवःप्रोक्तःप्रकृत्येच्छात्मना सह ॥ २८ ॥
स व्यक्षः पञ्चवक्त्तश्च सृष्टिस्थित्यन्तकृत्स हि।
तस्य वामाङ्गतो ब्रह्मा दक्षिणाद्विष्णुरेव च ॥ २९ ॥
हृदयात्वभवद्रुद्रस्ततोऽस्य महिमाधिकः।
व्यक्षत्वादिसमाकारो रुद्रस्यव महेशितुः ॥ ३० ॥
विस्तरेणाखिलमिदमने समभिधास्यते।
पूर्वार्धकथितार्थस्य कमार्थमधुनेरितम् ॥ ३१॥
तुरीय अद्वेतपदको परमशिव कहते हैं । वह अपनी इच्छारूपी प्रकृति-
से स्पन्दन करता है तो शिवसंज्ञावाला होता है। वही विनयन पञ्चमुख
शहर है, वही वास्तवमे सृष्टिस्थितिप्रलय करनेवाला है । उस शिवके वाम
भागसे ब्रह्मा प्रकट हुआ। दक्षिण भागसे विष्णु उत्पन्न हुआ और हृदयसे
रुद्र प्रादुर्भूत हुआ। हृदयसे उत्पन्न होनेके कारण रुद्रकी महिमा अधिक है ।
अतएव कही-कही रुद्रका शिवरूपेण वर्णन और शिवका रुद्र शब्दसे वर्णन
मिलता है। बीचमे एक सदाशिव भी है। परन्तु इन सवका विस्तृत वर्णन हम
आगे करेंगे । यहां तो "तवैश्वयं यत्तत्" इत्यादि पूर्वार्धमें कथित अर्थका क्रम
दिसानेके लिये हमने सक्षेपत. निरूपण किया ॥ २८-३१।।
विहन्तु
तदिद हि तवश्यर्य परापरविभागगम् ।
विहन्तुं फेचिदयुधा प्याक्रोशी संप्रतन्यते ।। ३२।।
इस प्रकार पर-अपरविभागयुक्त आपके उस ऐश्वर्यका निराकरण
करनेके लिये कुछ अज्ञानीजन नाना प्रलाप करते हैं ॥ ३२ ॥
व्याक्रोशी
नास्निशानां प्रवक्ष्यामो स्याक्रोशोमुतस्त्र हि।
ध्याकोशी तिनामग्र प्रवीम्यास्तिकमानिनाम् ॥ ३३ ॥

वचः।
श्लोक ]
स्पन्दवातिकसहितम्
४१
नास्तिकोकी व्याक्रोशी (प्रलाप ) को उत्तर श्लोकमे बतायेंगे।
यहाँ अपनेको आस्तिक बतानेवाले द्वैतवादियोंकी व्याक्रोशीको हम
दिखाते हैं ॥ ३३ ॥
अद्वैते यक्तृवक्तव्यमोक्तृमोक्तव्यतादिकम् ।
गुरुशिष्यादिकं चैव कथंचिनोपपद्यते ॥ ३४॥
ईशमोशः फयं शास्ति ब्रह्म ब्रह्मात्ति वा कथम् ।
गुरौ ज्ञानिनि शिष्योऽपि स्वतो ज्ञानी कथं न ते ॥ ३५ ॥
अद्वैतं शिवमित्येतदनर्थकमतो
स्वस्योपपादकं स्व चेत् सिध्येद् व्योमसुमाद्यपि ॥ ३६॥
द्वैतवादी व्याक्रोश करते है-अद्वैतमे वक्ता और श्रोता एक ही
होगा जो अनुपपन्न है। भोक्ता और भोग्य तथा गुरु शिष्य ये सब एकतामे
असम्भव है। ईश्वर ईश्वरपर कैसे शासन करेगा ब्रह्म ब्रह्मको कैसे
खायेगा ? गुरु ज्ञानी है तो शिष्य भी ज्ञानी क्यो नही ? "अद्वैत शिव" यह
वचन अर्थहीन है । उपपादक और उपपाद्य एक होनेपर गगनकुसुम भी
सिद्ध होगा ।। ३४.३६ ॥
अर्वाचीनपदेऽप्येव व्याक्रोशी ते प्रतन्वते ।
श्मशानौकास्तमस्येपोऽपूज्यो याच्योऽशुचिस्त्विति ॥ ३७॥
अर्वाचीनपद शिवके विषयमे तथा रुद्रके विपयमे भी भेदवादी प्रलाप
करते रहते हैं । श्मशानवासी है, तमोगुणी है, अतएव अशुचि, निन्द्य है,
अपज्य है, शिवनाम भी ग्राह्य नहीं है इत्यादि ।। ३७ ॥
अभव्यानां
अभव्यानामिय वाणी रमणीयाऽसता भवेत् ।
न भव्य भाविकालेऽपि येषां संभाध्यते क्वचित् ।। ३८॥
ऐसी वाणी अभव्योको ही रमणीय लगती है। जिनका भव्य मङ्गल
कभी भी सम्भावित नही वे अभव्य है ॥ ३८ ॥
एतत्प्रतिविधान तु यथास्थान विधास्यते ।
अभव्यत्व यथा तेषा तदन तु निदर्श्यते ॥ ३९ ॥
इन पूर्वपक्षप्रलापोका ययास्थान समाधान होगा। प्रथम उन प्रला.
पियोकी अभव्यताका हम निदर्शन करा देते हैं ।। ३९ ।।
दक्षो निनिन्द गिरिश पूषा हज्जहास च।
विस्फार्याक्षि भगोऽहष्यत् श्मध्वाफम्याऽशृणोभृगुः ॥४०॥

४२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ चतुर्थः सा चाऽरमणी निन्दा रमणीयाऽसतामभूत् । पूषादीनां ततस्तेषामभव्य समपद्यत ॥४१॥ उदाहरणरूपमे दक्षने शङ्करकी निन्दा की। पूषाको आनन्द आया तो खूब हंसा । आँख फाडकर भग खुशीसे देखने लगा। दाढी हिलाकर भृगुने उसका अनुमोदन किया। इस प्रकार अरमणीय निन्दा उन सवको रमणीय लगी। परिणाम अमङ्गल ही हुआ ॥४०-४१ ।। मानदन्तोऽभवत्पूषा रुग्णनेत्रोऽभवद्भगः। मृणुविलुन्धितश्म दक्षो वस्तमुखोऽभवत् ॥ ४२ ॥ परिणाम यह हुआ कि पूपाके दांत टूटे । भगकी आंखें फूटी । भृगुकी डाढी नुच गयी । दक्षका वकरेका मुख हो गया ।। ४२ ॥ कर्मानुरूपं हि फलं पूषादीनां यथाऽभवत् । अभव्यानां तथान्येषु फलं जन्मसु तादृशम् ॥ ४३ ।। कर्मानुरूप फल जैसे पूपा आदिको मिला, वैसे यथोक्त अभव्योको भी जन्मान्तरमे कर्मानुरूप फल मिलता है ॥ ४३ ॥ स्मशानवासीत्युक्त्या येऽपूतमाह सुपावनम् । श्वानो भूत्वा श्मशानेषु शयोरंस्तेऽन्यजन्मनि ॥४४॥ अस्पृश्य ये मिलाऽऽप्यान्ति शकरं परदैवतम् । पुल्कसादिजनुलंध्या तेऽस्पृश्या जन्मजन्मनि ॥ ४५ ॥ येऽग्राह शिवनामाहुः पतितास्तेऽन्यजन्मनि । नणाममाहनामानो मन्ति जनधिषकृताः ।। ४६ ॥ कर्मानुस्प फल इसप्रकार कि जो परमपवित्र शिवको श्मशानवासी होनेके कारण अपवित्र पहनेगी धृष्टता करते हैं वे दूसरे जन्ममे कुत्ते बनकर स्मशानभूमिमे शयन करेंगे। जो सफर यो अस्पृश्य कहते है वे दूसरे जन्मोंमे चाण्डालादि बनकर अस्पृश्य बने रहेंगे। शिवनाम नहीं लेना इमप्रकार बोलनेवाले दूसरे जन्ममे ऐरो पतित होगे कि उनका नाम लेना पाप माना जायेगा, लोग उन्हें घिसारंगे ॥ ४४.४६ ॥ अभव्यानां यदा न मच्यास्तेऽनप्पा भो मलिनचेतसः । सामोशी मुसदा तेषां न मय्यपुरपस्य तु ॥४७॥ जिगरा भव्य मझार भावीमे भी न हो ये अभिव्य ऐमी व्याग्या मरतन मी। दूसरी प्याग्या है, जो भव्य नहीं वे ही अभव्य है अर्थात् श्लोकः] स्सन्दवार्तिकसहितम् ४३ जो मलिनचित्त हैं उनको उक्त व्याक्रोशी सुखद होगी। भद्र पुरुषोको वह सुखद नही होगी ।। ४७॥ घीधरस्वामिनस्तस्मादन्यथा व्याचचक्षिरे । निन्दाध्ययनभीरत्वाद्दक्षप्रकरण स्फुटम् ॥४८॥ अतएव श्रीधरस्वामीने निन्दाध्ययन अच्छा न लगनेसे पूरे दक्ष- प्रकरणको व्यारया ही बदल दी ॥४८॥ जडधियः जडा विमूढा धोर्येषां ते स्युजडधियो नराः । शियतत्त्वानभिज्ञाना विमुखा ज्ञानमूर्तितः ॥ ४९ ॥ जडधीका अर्थ है मूढबुद्धि । अर्थात् शिवतत्त्वको न जाननेवाले । भगवान् ज्ञानमूर्ति हैं-"विशुद्धज्ञानदेहाय" ऐसा शास्त्रने बताया है । ज्ञानाधिष्ठाता हैं । जो ज्ञानसे विमुख हो वह जड होगा ही ।। ४९ ॥ जडधियः गद्वा जडेपु मोग्येषु यद्धोजंडधियो हि ते । धनदारादिविषयमोगमात्रपरायणाः ॥५०॥ अथवा जडधीमे सप्तमी बहुव्रीहि है। अर्थात् जड-भोग्य पदार्थोमे ही जिनकी मति बनी हुई है। धन, दारादि विषयोके भोगमात्रमे जो लगे हुए हैं वे जडधी है ॥ ५० ॥ द्वतिनः सर्व एवेमे भवन्ति जडसेविनः। स्वोपास्यमपि ते हन्त जडमेवामिमन्यते ॥५१॥ पूरे द्वैतवादी जडसेवी होने से जडधी है । उनको अपना उपास्य भी जड ही अभिमत है ।। ५१ ।। आत्ममिन्नमनात्मा स्याद् यदनात्मा जडं हि तत् । এলারি माकपास्पो द्वतिसम्मात ५२." जो आत्मासे भिन्न हो वह अनात्मा ही होगा। जो अनात्मा होगा वह जड ही होगा। द्वैतवादी अपने उपास्य भगवानको आत्मभिन्न मानते हैं । अर्थात् उसे अनात्मा, जड मानते हैं ।। ५२ ॥ एव स्थादनात्मापि महेश्वरः । • पारमात्मेत्यतः सद्भिरुच्यते चित्कलेति चेत् ॥ ५३॥ ननु चेतन श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [चतुर्थ परमात्मा आत्मा न होनेपर भी चेतन है। अतएव चित्कला होनेसे परमात्मा कहा जाता है इस पूर्वपक्षका उत्तर है कि- आत्मभिन्न फयकार परमात्मा भवेत सखे । घृतभिन्न कथ तेल परम घृतमुच्यताम ।। ५४ ॥ परमाक्षश्न दधनश्चन्महाधन । अनात्मा परमात्मा स्यादप्रमा चेन्महाप्रभा ॥५५॥ नेनहीन उत्तम नेत्रवाला हो, निर्धन महासेठ हो,अन्धकार महाप्रकाश होतो अनात्मा भी परमात्मा हो सकता है ।। ५४ ५५ ।। अस्तु वा चेतन श्रीशस्तत कि ते भविष्यति । जडो वा चेतनो वाऽन्यो वैशेष्य तेन कि मवेत् ॥ ५६ ॥ अन्यस्माद्भोगलिप्सव जडाद्वा चेतनाद्धि वा। तदा हानिर्जडत्वेऽपि मोगदत्वे नु फा हरे ॥५७ ॥ स्वार्थसिद्धयथमेवान्य प्रोणन्ति किल देहिन । जडादेव स चेसिध्येत् किं स्यात्ते चेतनाग्रहात् ॥ ५८॥ अत एव च सात्याद्या नेशमिच्छन्ति चेतनम् । प्रकृत्या सर्वभोगसपत्तिशिन ॥ ५९॥ अच्छा, मान भी लो कि भगवान चेतन है। लेकिन उससे तुम्हे क्या मिलेगा ? भगवान जड हो या चेतन उससे तुम्हारा मतलब क्या है अपनेसे अन्यके साथ प्रीति इसलिये होती है कि उससे भोगप्राप्ति होगी। यदि हरि भोगप्रद है ता यह जड ही क्या न हो, नुकसान क्या ? अन्य पर प्रीति स्वार्यके लिये ही होती है। यदि यह स्वार्थ जडसे सिद्ध होता है तो चेतनतापे आग्रह्मा कोई अर्थ नही है। यही कारण है-सात्य एव मीमासादि चेतन ईश्वरको नहीं मानते। क्यापि चे देसते हैं कि जह प्रकृति या वर्मसे ही स्वार्थसिद्धि हो सकती है ।। ५६ ५९ ।। अचेतनो न हि सप्टेत्यादितस्तु निष्फल । अनादिकालससारनियमर्दोषयारणात ॥६०॥ अन्यया नास्तिका यस्तकॉऽप्रे दर्शयिष्यते। लोपदप्टान्तमात्रस्य स तेऽपि स्याद् दुरद्धर ॥६१॥ अत एपेप्सितारोपदाता न नह इत्यपि । तर पराहतोऽनादिनियमालम्यिमिधं ॥६२ ।। जडया

श्लोक ]
स्पन्दवातिरसहितम्
४५
'सास्यादिमत अयुक्त है, क्योवि अचेतन जगत् कर्ता नहीं हो सकता,
इत्यादि तर्फ निष्फल हैं । जीवकृत कर्मसचिव प्रकृति ही जगत् बनाती है।
ऐसा अनादि नियम माननेसे कोई दोष नहीं आता। कुम्भकरादि दृष्टान्त
बलसे यदि आप चेतनको सप्टा मनवाना चाहते हैं तो उसी दृष्टान्तसे मरण-
धर्मा नाना सामग्रीसहित फलाकाक्षी कर्ता है यह भी सिद्ध होगा। तब
"किमीह किंकाय" इत्यादि अग्रिम नास्तिकतर्क दुरुद्धर होगा। अतएव
जो लोग यह कहते हैं कि जड प्रकृति या कर्म हमारे अभीप्सित समस्त
फलोको कैसे दे सकता है इस तर्वको भी सास्यादिने निराधार घोपित
क्यिा । अमुक कर्म या उपासनासे अमुक फल इत्यादि सभी वेदोक्त नियम
अनादिकालसिद्ध है। उसमे चेतनको जोडना व्यर्थ है । जोडते हैं तो फिर
वही "किमीह दियाय" आदि पक्ष भी खडे होंगे ॥ ६०-६१ ।।
नन्याशभक्त्या परया मोक्ष सभवतीति चेत् ।
प्रहत्या सोऽपि लम्येत मोक्षश्चेदीश्वरेण किम् ॥ ६३ ॥
यदि कहो कि परा भगवद्भक्तिसे ही मोक्ष हो सकता है, अत ईश्वर
मान्य है। तो साख्यका यही उत्तर है कि प्रवृति ही मोक्ष भी देती है तो
ईश्वरसे क्या लेना देना ? ॥ ६३ ।।
अन्यस्मिनात्मनि परा मक्तिरित्यप्यसाप्रतम् ।
कचिदपि न ह्यन्य परप्रेमास्पद भवेत् ।। ६४ ॥
मोक्ष वाञ्छन् मगवत. स्वार्थमेवाभिलप्यसि ।
मोक्षप्रिय. कय त्व हि भगवत्प्रिय उच्यसे । ६५ ।।
फलप्रेम्णा भवेत्प्रेम गौण वृक्षलतादिपु ।
मोक्षप्रेम्णा तथा प्रेम गौण ते स्यात्परात्मनि ॥६६॥
अपनेसे भिन आत्मामे परा भक्ति हो यह भी असगत बात है।
क्योकि अपनेसे भिन परमप्रेमास्पद होता ही नहीं है। भगवानसे मोक्ष
चाहनेवाले तुम आखिर अपना स्वार्थ हो तो चाह रहे हो। तुम परमा-
त्माका मोक्ष चाह रहे हो कि अपना ? जब तुम मोक्षप्रेमी हो तो भगवत्प्रेमी
क्यो कहलाते हो? वृक्ष लता आदिपर गौण ही प्रेम होता है मुख्य प्रेम
तो फलपुष्पादि पर है । वैसे तुम्हारा मोक्षप्रेम तो मुख्यप्रेम हो जायेगा और
भगवत्प्रेम गौण होगा। भक्ति परमप्रेमको कहते है। पराभक्तिकी वात
हो क्या ? ॥६४-६६ ॥
भक्तिरेव फल मक्तेनं तु मोक्षादिक मम ।
भक्त्या सजातया मक्त्येत्यादिमागवतान्ननु ॥ ६७ ॥

४६ श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [चतुर्थ सत्य तदा महेशोऽसौ जडो वा चेतनोऽय वा। भवेत् किं तेन भक्तिहि तस्य ते खल्वपेक्षिता ॥ ६८॥ स्वगत प्रेम विषयजडचेतनतायशात् । न जाडय नापि चैतन्य लभते तदयोगत ॥६९॥ पूर्वपक्ष -भक्तिका फल मोक्ष नही, भक्ति ही है । “भक्त्या सजातया भक्त्या" ऐसा भागवतमे भी बताया है। उत्तर र-तुम्हे भक्तिसे मतलब है तो ईश्वर जड हो या चेतन उससे क्या होगा? भक्तिका विषय जड हो या चेतन इससे भक्ति जड या चेतन नहीं बनती। क्योकि प्रेम स्वगत होता है । वह जैसा है वैसा ही रहेगा ।। ६७-६९ ।। देवदत्तो महानक्तस्तस्मिन् मक्तिहि विद्यते । तत कृतार्थता ते न कस्मादिति निगद्यताम् ।। ७० ॥ मक्ते सति स्वसम्बन्धे कस्योत्कर्षों निगद्यताम् । नोत्कर्ष सभवेद भवते स्वत्यैव परिशिष्यते ॥७१॥ तमुत्कर्षमभोप्सस्त्व कथ भो भगवत्प्रिय । कथ भक्तिपियो वापि स्वार्थमात्रपरायण ।।७२।। न स्वार्थो विद्यते कश्चित् प्रस्तर कि न सेव्यताम् । तस्माद्विडम्बनामात्र पराभक्तिहि मेदिनाम् ।। ७३ ।। यदि पदाचित् भक्त और भगवानकी एकता माने या परमेश्वरकी हादिनी शक्तिको भक्ति मानें तो भी प्रश्न यह उठेगा कि देवदत्त एक महा- भक्त है उसमे भक्ति है, उससे तुम्हारी कृतार्थता क्यो नही होती है ? अत भक्तिवा अपने साथ सम्बन्ध अभीष्ट है। किन्तु वैसा सम्बन्ध होनेपर किसका उत्सर्पमानते हो' भक्ति स्वय उत्कृष्ट है। उसका तुम्हारे सम्बन्धसे क्या उत्यपं होनेवाला है ? अत अपना ही उत्पर्प अन्तत मानना होगा अपना ही कुछ उत्कर्प होता है। तब तुम वही अपना उत्व चाह रहे हो, भगवान वो पा मक्तिको चाहनेकी बात कहाँ रह गयी?तुम भगवप्रिय या भक्तिप्रिय किस प्रकार यदि कहते हो कि कोई भी चाह मुझमे नही है, मक्तिली भी चाह नहीं है । भक्ति करनी है इसलिये कर रहा हूँ, तो कोई भी इच्छा न रही तो भगवानपी ही भक्ति परनेका आग्रह पयो? पत्यरपी भक्ति क्यो न कर लें ? जव कि लेना-देना किसीसे कुछ है नही ।। ७०-७३ ।। मनु तियशादोशं चेतन मन्महे घयम् । सत्य सत्यमसोत्ययं तस्य कस्मान्न मन्यसे ।।७४।।

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् न तां श्रुति त्वं निरसितुं कुतकं कुरुप यदि । तन्वतन्यं निरसितुं कुतस्तों न दश्यताम् ॥७५ ॥ नेवाघजरतोयं हि युक्तमाधयितु बुधः । ततो निरीश्वरः सांस्यवादो विजयमाप्नुयात् ॥ ७६ ॥ पूर्वपक्ष :- हम परमात्माको चेतन न तो जगत्कर्ता होनेसे मानते है और न जीवाभिन्न होनेसे । श्रुति बतला रही है वह चेतन है । "तदक्षत" "ईक्षते शब्द" इत्यादि श्रुति न्याय प्रसिद्ध हैं। उत्तर-बात यथार्थ है। तव ध्रुतिप्रामाण्यवादी तुम "तत्त्वमसि' आदि श्रुतिसे बताया हुआ जीवपरक्य क्यों नही मानते हो? उस श्रुतिका निराकरण करनेके लिये तुम यदि कुतर्क करनेका अधिकार रसते हो तो, ईश्वरचंतन्यका निराश करनेवाला सास्यतर्फ भी क्यों नही सामने लाया जा सकता है ? बुद्धिमान अर्धजरतीय न्याय नहीं अपनाते । फलत. निरीश्वर सांख्यवादको ही विजय होगी ।। ७४-७६ ॥ आन्मनः खलु कामाय सर्वमेव प्रियं भवेत् । पुप्रजायादेवादिकामायेत्यनवोच्छ तिः ।। ७७॥ तस्मान्मुत्यं परं प्रेम भवेद् नूनं निजात्मनि । स्थादात्मपरमात्मक्ये परमात्मन्यपि स्वयम् ॥ ७८॥ आत्माके लिये ही सभी प्रिय होता है, पुत्र जायाधर्थ पुत्रादि प्रिय नही, ब्रह्मा, विष्णु आदि देवार्य ब्रह्मा विष्णु आदि प्रिय नहीं इत्यादि रीति श्रुतिमे स्पष्ट ही देवादिविषयक मुख्यप्रेम का निराश किया है। अत: मुख्य प्रेम तो अपने आत्मामे ही होता है यह निश्चय है, और आत्मा तथा परमात्माकी एकता होनेपर स्वयमेव वह प्रेम परमात्मविषयक ही हो जाता है ।। ७७-७८॥ नातो भवत्यर्थमप्यात्मपरमात्माभिदेष्यते । मात्मभिन्न ततः सर्व जडमित्येव निश्चयः ॥७९॥ तस्मिन् भोग्ये जडे येषां धोस्ते जड़धियो जनाः । व्याक्रोशों ते विदयते त्वयि नात्मधियःक्वचित् ।। ८०।। अत. भक्त्यर्थ भी आत्मा और परमात्माका भेद माना नहीं जाता। जिस परमात्माकी जडतापतिभयसे आत्मभिन्नको भी आप आत्मा एवं चेतन मानने जा रहे थे वह जब आत्मस्वरूप ही सिद्ध हुआ तो आत्मभिन्न सभी जड़ है यही सिद्ध होता है । उस भोग्य जडमे जिनकी मति लगी है वे

४८
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ चतुर्थः
ही जडधी कहलाते हैं । वे भगवदैश्वर्यविषयमें प्रलाप करते हैं आत्मधी
कभी नहीं करते ॥ ७९-८० ॥
ननु भोग्ये जडे बुद्धिः सर्वेषामेव जायते।
तददाने महेरो वाड्मनसे पततां कुतः ॥८१ ॥
विरक्त: शंकरो भूतिभूपः कि मे प्रदास्यति ।
मंव प्रतिविधि वक्ष्ये तदाह उरदेति हि ॥ ८२ ॥
शंका :-भोग्य जड़पदार्थोमे बुद्धि किसकी नहीं होती! कोई एकाध
संत तपस्वी वैसा निकले तो अलग बात है, वाकी सभी भोगवस्तु चाहते
हैं । उसे न देनेवाले शकरम वाणी और मन कैसे लगेंगे ? विभूत रमानेवाले
विरक्त शकर हमे क्या देंगे? समाधान-ऐसी शका मत करो आगे
"सुरास्ता तामृद्धि' इत्यादिमे समाधान मिलेगा। इस आशयसे यहाँ पर
"बरद" यह सम्बोधन है ।। ८१-८२ ।।
यद्वा जड़धियो नाम जड़चिन्तनतत्पराः।
सुप्तास्ते परमेशाने तेत निन्दन्त्यसद्धियः ॥ ८३ ।।
अथवा जडचिन्तनपरायण ही जडधी हैं । वे परमेश्वरके वारेमें
सोये हुए हैं। अत. असद्बुद्धि होनेसे व्याक्रोशी करते है ।। ८३ ।।
सर्ववेदैकवेद्याय जगत्सर्गादिफारिणे।
अनन्तैश्वर्यपूर्णाय शिवाय प्रभवे नमः।। ८४ ॥
समस्त वेदोमे एकमात्र वेद्य, जगत्की सृष्टि आदि के कर्ता, अनन्त
ऐश्वयंपूर्ण परमशिव प्रभुको प्रणाम है ।। ८४ ।।
नम शिवाय शान्ताय सर्वशक्तियुजे नमः ।
नमो गुणविभवताय रुद्राय च नमो नमः ॥८५ ॥
सर्ववेदवेद्य शान्त शिवको प्रणाम है। सर्गादिहेतु सर्वशक्तिसम्पन्नको
प्रणाम है। सत्वादिगुणविभक्त सदाशिवको प्रणाम है। अन्तम रुद्रस्प-
स्थित गफरको प्रणाम है ।। ८५ ।।
इति श्री काशिकानन्दपोगिनः कृतिनः कृतौ।
महिम्नस्तीनयिवृतो चतुर्यस्पन्दसंग्रहः ॥४॥

पञ्चमः श्लोकः ध्याक्रोशी द्वतिना मूले सामान्योक्त्यव दशिता। न हि तस्या विशेषेण निरूपणमपेक्षितम् ॥ १॥ उररीकुर्वते वेदप्रामाण्य ये मनीषिणः । आत्मबुद्धिर्भवेदेपा कदाचित्पारमायिकी ॥२॥ प्रतो निरसनीयाः स्युविशेषेणार नास्तिकाः । व्याफ्रोश्यतो विशेषेण तेषामन निरस्यते ॥३॥ मूलमे द्वैतवादियोका प्रलाप सामान्य कथन से ही बता दिया। वेद प्रामाण्य माननेवालोकी बुद्धि कभी जरुर सुधरेगी। अत उसका विशेष निरूपण अनपेक्षित है। विशेषरूपसे तो नास्तिकोका प्रलाप ही निरस्त करना चाहिए । अत उसीका यहां निरुपण किया जा रहा है । ॥ १३ ॥ किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं । किमाधारो पाता सृजति किमुपादान इति च । अतक्र्ये दवय त्वय्यनवसरदु.स्थो हतधियः कुतर्कोऽय काश्चिन्मुखत्यनि मोहाय जगतः ॥ ५॥ वह आपका विधाता त्रिभुवनकी सृष्टि करता है तो उसकी वैसी चेष्टा है ? कौनसा शरीर है ? क्या उसके पास साधन है ? आधार क्या है। उसके पास उपादान कारण क्या है ? इत्यादि कुतर्क तर्कवे अविषय, ऐश्वर्यसे सम्पन्न आपमे अवसर न पानेसे स्थितिरहित होनेपर भी कुछ मूढमति हतबुद्धियोको लोकमोहार्थ मुखरित कर ही लेता है ॥ ५ ॥ किमीहः ईहा चैप्टा हि का तस्य भुवनस्रष्टरोशितु । सेप्टानिष्टप्राप्तिपरि हार व्यापार ईरिता ॥४॥ ध्यापके न क्रिया काचिदिप्टानिप्टे तु दूरतः। प्रयोजनमनुदिप न मन्दोऽपि प्रयतते ।।५।।

५० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पञ्चमः आप आस्तिकके मतमें भुवनका स्रष्टा ईश्वर है। परन्तु परमेश्वरमें कैसी चेष्टा है यह बताइये। चेष्टा कहते हैं इप्टप्राप्ति एवं अनिष्टपरि- हारार्थ क्रियाको। व्यापक तत्त्वमे कोई क्रिया संभव नहीं । तव इष्ट एवं अनिष्टके प्राप्तिपरिहारप्रयोजक विशेष क्रिया कैसे हो? और इष्ट-अनिष्ट भी परमात्मामे क्या हो सकता है ? तब इष्टप्राप्ति एवं अनिष्टपरिहाररूपी प्रयोजन क्या होगा? बिना प्रयोजन अतिमन्द भी किसी कार्यमे प्रवृत्त नहीं होता। आपका सर्ववेत्ता ईश्वर तव विना प्रयोजन कैसे प्रवृत्त होगा ।। ४-५ ॥ किंकायः क. कायस्तस्य भवति नाकायः लप्टुमर्हति । गृहादि सतनुः कुर्यान्न पिशाचोकलेवरः॥६॥ पिशाचादिर्नाशयतीत्येव चेन्मन्यतामपि । न सृजेदेव तद्वद्धि न सुजेदीश्वरोऽतनुः॥७॥ उस ईश्वरका शरीर क्या है ? विना शरीर कोई सृष्टि नहीं करता। सारीर मनुप्यादि गृहादि निर्माण करते हैं। अशरीर पिशाचादि नहीं। यदि कहो कि पिशाच कुछ नाश, कुछ नुकसान कर सकता है। तो भले मानो, पर सृष्टि तो नहीं ही करेगा। वैसे अशरीर ईश्वर भी सृष्टि नहीं कर सकता ॥६-७॥ किमुपायः अस्वीबरोऽस्तु फायोग्य किन्तूपायोऽस्य को भवेत् । तुरीवेमादिविरहे विवः कि करिष्यति ॥८॥ सप्टेः प्राक साधनानि पय व सृष्टिः साधनपिना। अन्योन्याधयदुष्टत्यादीशात सप्टेरसंमयः ॥९॥ अच्छा मान लो ईम्बर है और उसका शरीर भी है। किन्तु उसके पास मृष्टपर्य उपकरण क्या है ? तुरी-वेमा इत्यादि न हो तो जुलाहा या कर सकता है । कोदाल न हो तो सोदेगे कैसे ? सृष्टि करो तो साधन पदा होगा और साधन पहले हो तो मृष्टि की जा सकेगी, इमप्रकार अन्योन्याथय होनेमे ईश्वरसे सृष्टि मानना शक्य नहीं है ।। ८-९ ।। किमाचारः कुसातो भूतले स्थित्या पुच्चफ्राथये घटम् । किमाघारः सृजरयेप भयनं परमेश्वरः ।। १०॥

4 ० FRIDAY-7, श्लोकः] स्पन्दवार्तिकसहितम् 67943 पूर्वमाधारसृष्टिः स्यारातो भुवनसर्जन प्राधारसृष्टेराधारपूर्वस्वे चानवस्थिति. कुम्हार भूतल पर स्थित होकर चक्रादि आश्रयमें घट बनाता है। परमेश्वर का ऐसा कौनसा आधार है जिसपर स्थित होकर वह भुवन निर्माण करे? पहले आधारकी सृष्टि मानी जाय तो उसकी सृष्टिके लिये अन्य आधार चाहिये । ऐसे फिर अनवस्था होगी ॥ १०-११॥ किमुपादानः उपादानं वद तथा जगन्निर्माणकारणम् । नेष्टिकाचूर्णतोयादिविरहे गृहनिर्मितिः ।। १२॥ इसी प्रकार जगत्-निर्माणका कारणस्प उपादान भी बताना चाहिये । ईट, चूना, पानी आदि न हो तो मकान कैसे बन सकता है ? ।। १२ ॥ कुतर्को वाचालयेत् कुतर्कोऽयं मूढान् पण्डितमानिनः । प्राप्नुवन्ति ततो मोहमज्ञाः साधारणा जनाः ॥ १३ ॥ ऐसा ऐसा कुतर्क अपनेको पण्डित माननेवाले मूढ जनोको वाचाल बना देता है। परिणाम यही होता है कि साधारण अज्ञजन भ्रममे पड़ जाते हैं ॥ १३ ॥ तर्कान् नव निपिघ्यामः फुतर्का स्तु प्रधुन्महे । युक्तिः श्रुत्यनुकूला चेत्तक्यंता मा कुतपर्यंताम् ॥ १४ ॥ हम तर्कका निपेध नही करते, केवल कुतर्क निराकरण करते है । श्रुत्यनुकूल हो तो तर्क कीजिये, कुतर्क मत कीजिये ।। १४ ॥ अतक्यश्वर्य न तर्कः प्रतरेद्यत्र कुतर्कस्य तु का कया। अतक्र्पश्चर्यमीशानमामनन्ति थुतेगिरः॥ १५ ॥ नपा तर्केण हि मतिरापनेयेति गोः श्रुतेः। सूनफुच्चागदीत्तोऽप्रतिष्ठानादितोश्वरः॥ १६ ॥ जहाँ तर्कका भी अवकाश नहीं वहां कुतर्ककी तो बात ही क्या ? श्रुति भगवानके ऐश्वर्यको तर्काऽगोचर कहती है । "यह मति तर्कसे प्राप्त नहीं होती, और तर्कसे नष्ट मत करो" ऐसी श्रुति है। सूत्रकार भगवान वेदव्यासने भी तर्ककी अप्रतिष्ठा ही बतायी है ।। १५-१६ ॥

श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम्
[पञ्चम
प्राय
कुतर्कप्रतिषेधाय तथापि मतिवर्धनान् ।
श्रुतिसंवादिनस्तान दर्शयामोऽत्र काश्चन ॥ १७ ॥
फिर भी हम कुतर्क निराकरणार्थ बुद्धिवर्धक श्रुतिसमत कुछ
तर्कोको यहा दिखाते हैं ।। १७ ।।
किमुपादानः
उपादानं किमिति तु भवता तस्य पृच्छयते।
धूमः स्वयं तावदुपादन महेश्वर ॥१८॥
न च कर्तुः पृथक तत्स्यात् सर्वति तु साप्रतम् ।
नियमस्यापवादोऽपि सर्वन होक्ष्यते ॥१९॥
यथोर्णनामि सृजते गृह्णीयाच्चेति वेदगीः ।
अपवादं स्वय तस्य दर्शयामास विस्फटम् ॥२०॥
आपका प्रश्न है कि जगन्निर्माणमे उपादान क्या है ? उत्तर है-
स्वय परमेश्वर उपादान है। कासे उपादान अलग होना चाहिये ऐसा
सर्व नियम नहीं है । उसका अपवाद मकडीमे स्वय श्रुतिने ही दिखाया
है । मकडी अपनेसे स्वयमेव जाल बनाती भी है, खा जाती
भी है ।। १८-२०॥
करीत्मा ननु लूताया उपादान तु ततनु ।
सत्य कुविन्ददेह किं पटोपादानमोक्षित ॥२१॥
न चेनियमभडस्तु जात एव न संशयः ।
भग्ने च नियमे तर्फः पुतर्फः स्पातदाधितः ॥२२॥
पूर्वपक्ष :- मकडीवो आत्मा क्र्ता है और शरीर उपादान है, दोनो
अलग हैं। उत्तर --ठीक है, इसी प्रकार जुलाहाकी आत्मा कर्ता और
उसका शरीर कपडेका उपादान ऐसा देखा गया है क्या? यदि नही, तो
नियमभग हो ही गया । नियमभग हुआ तो उस नियमपर आश्रित तवं मी
कुतरं बन जायेगा । २०-२२।।
कि चोर्णनाभ. कितन्वा मृतया तन्तुवायकः।
तन्तुं शयनीति निर्मात हेतु पत्तनुस्ततः ।। २३ ।।
दूसरी बात .-मरी मपदीये शरीरसे कोई पारीगर तन्तु बना
सकता है क्या ? पहना पडेगा यि जीवित गरीर ही तन्तूपादान है । तर
पर्ता और उपादानयो पृपर पैसे परोगे? ॥ २३ ।।
बेहप्रधाना सूता चेतन्तपादानमिष्यते ।
चित्प्रधाना तथा सूता निमित्त सन्तुजन्मनि ॥ २४ ॥

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् मायाप्रधान ईशोऽस्तु तथोपादानमस्य हि । चित्प्रधानो निमित्तं च ततः का हानिरुच्यताम् ॥ २५ ।। यदि कहे कि देहप्रधान मकड़ी जालका उपादान है और चैतन्य- प्रधान मकडी कर्ता है तो वैसे ही मायाप्रधान ईश्वर जगत्का उपादान और चैतन्यप्रधान ईश्वर कर्ता है, ऐसा हम भी कहे तो उसमें क्या दोप है ? ॥ २४-२५ ।। आरोहन पतितस्तन्तुमत्ति मर्कटको यथा । तथा प्रलयकालेऽत्ति जगदेतन्महेश्वरः ॥ २६ ॥ गिरनेपर चढ़ती हुई मकडी धागेको खा जाती है । वैसे प्रलयकालमें परमेश्वर स्वसृष्ट जगत्को ग्रस लेता है ।। २६ ॥ यस्य ब्रह्म तथा क्षत्रमुमे भवत खोदनः । मृत्युर्यस्योपसेकश्चेत्येवमाह श्रुतिः स्वयम् ॥ २७ ॥ "जिसका ब्राह्मण और क्षत्रिय अर्थात् तदुपलक्षित जगत् भात जैसा है, मृत्यु चटनी समान है" ऐसी श्रुति है ।। २७ ।। किमाधारः किमाघार इति प्रोक्त उत्सर्गश्चाप्यपोद्यते । नहि सर्वत्र साधारनियमो विद्यते यतः॥२८॥ आपने किमाधार. ऐसा जो उत्सर्ग दिखाया उसका भी अपवाद है। क्योकि सर्वत्र आधारका नियम नहीं है ॥२८॥ विष्टरो हि तवाधारो विप्टरस्य गृहं तथा । गुहाधारो महो तस्या आधारस्तु न पश्चन ॥ २९॥ आप ( देवदत्तादि) का आसन आधार है । आसनका गृह आधार है । गृहका पृथिवी आधार है। किन्तु पृथिवीका आधार कोई नहीं। अतः यहीपर आधारनियमका भङ्ग हो गया ॥ २९ ॥ ननु व्योम भवेन्मह्या आधार इति चेन्न तत् । व्योम्न आधारता नोरीक्रियते ताकियतः॥३०॥ नमस्युत्पतितं वस्तु निराधारमितीयते । निराधाराश्चन्द्रतारा व्योम्नीत्येचं प्रतीतितः॥३१॥ यदि कहो कि पृथिवीका आधार आकाश है तो ठीक नहीं । क्योकि आकाशको नैयायिकादि आधार नहीं मानते। आकाशमें फेंकी गयी वस्तु कुछ देर निराधार रहती है, आकाराम चन्द्र, तारा आदि निराधार सते हैं इत्यादि व्यवहार देखनेमे आता है ।। ३०-३१॥

४ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पञ्चमः दिगम्बर इति युक्तिनिरम्बरपरा यथा। गगनाधार इत्युविनिराधारपरा तथा ॥ ३२॥ जैसे दिगम्बरका अर्थ ही निरम्बर होता है वैसे गगनाधार कहनेका अर्थ ही निराधार होता है ॥ ३२ ॥ व्योमाधारा यथा पृथ्वी वृक्षादीन् तनुते निजे । व्योमाधार कथं नैव कुविन्द. कुरुतां पटम् ॥ ३३ ॥ यदि व्योम भी आधार है तो व्योमाधार पृथिवी जैसे अपनेमे वृक्षा- दिको उत्पन्न करती है वैसे व्योमाधार जुलाहा भी वस्त्रादि क्यो नहीं बनाता ? ॥ ३३ ॥ अस्तु खं वसुधाधारः सस्याधारस्तु को वद । अनाधारं यदि नभो नियमो भज्यते तदा ॥ ३४ ॥ अच्छा पृथिवीका आधार आकाश मान भी लो । आकाशका आधार क्या है ? यदि गगन निराधार है तो आपका नियम टूट गया ।। ३४ ।। नन्याधारोन नभसो व्यापकस्येति चेत्तदा। महेशस्य कंपाधारगवेषणा ॥३५॥ पूर्वपक्ष.-आकाश व्यापक है उसका आधार नहीं होता। मूर्तका ही आधार होता है। उत्तर-तव आप व्यापक परमात्माका आधार क्यो ढूंढने लगे ॥ ३५॥ प्रतिष्ठितः स कस्मिन् हि स्वे महिम्नोति हायवीत् । यदि वा न महिम्नोति संप्रबोधयति श्रुति ॥ ३६॥ वह भूमा परमेश्वर किसमे प्रतिष्ठित है ? कहा-अपनी महिमामे। अथवा अपनी महिमामे भी नहीं। स्वय प्रतिष्ठित है। इस प्रकार श्रुति भी समझाती है ॥ ३६॥ प्रत्युत महे व्योम्नोप्याधार भगवत्पदम् । सूत्रे चाक्षरमाधारमम्बरान्तधृतेजगो।। ३७ ॥ प्रत्युत आकाशका भो आधार हम परमात्माको मानते हैं । "कस्मि- माकाश ओतश्च प्रोतश्च" इस प्रश्नके उत्सरमे अक्षर परमात्माको ही याधाररूपेण श्रुतिने बताया। "अक्षरमम्बरान्तधृते." इस प्रकार सूत्र में भी उसका निर्णय किया गया॥३७॥ चैतनस्यष हेतुत्वे साधारत्वं नियम्यते । महपादेर्जनकत्वे तु नियमो नेति चेन्न तत् ॥ ३८॥ व्यपकस्य ? श्लोक ] स्पन्दवार्तिकसहितम् सदेहस्येव हेतुत्वे साधारत्व नियम्यताम् । सकोचाधिकृतिस्ते चेदस्ति, सानास्ति मे नु किम् ॥ ३९॥ कर्तुराधारनियमो हेतुमानस्य नेति चेत् । सदेहक राधारनियमो दृश्यते भुवि ॥ ४०॥ पूर्वपक्ष - चेतन यदि हेतु हो तो उसके लिये आधारनियम है। पृथिवी आदि अचेतन जहा हेतु है वहा उक्तनियम नही है। उत्तर सदेह चेतनके हेतुत्वमे आधारनियम है ऐसा क्यो नही कहते ? नियमसकोच मे आपको ही अधिकार है हमे नही है यह कैसी वात ? पूर्वपक्ष -कर्ताका आधारनियम है । हेतुमानका नही। उत्तर -सदेह कर्ताका आधारनियम देखा गया है । अत दृष्टानुरोधेन नियम वनाइए। ईश्वर सदेह कर्ता नहीं अत वहाँ आधारकी जरूरत नहीं ॥ ३८-४० ॥ किमुपायः उपायनियमोऽप्येव न हि सार्वत्रिको भवेत् । तस्यापि बहुधा लोकेप्वपवादो विलोक्यते ॥४१॥ किमुपाय ---यह उपायनियम भी सार्वत्रिक नही है। उसका भी अपवाद देखनेमे आता है ।। ४१ ॥ केचितु रोटकान् कुयुबलनोपायसयुता । अन्ये तमनपेक्ष्येव हस्तमात्रेण कुर्वते ॥ ४२ ॥ न च तत्राप्युपायोऽस्ति हस्ताविति तु साप्रतम् । बेलने सत्यपि स्तस्तावन्योपायस्त्वपोद्यते ।। ४३ ।। कुछ लोग बेलन उपाय रखकर रोटी बनाते हैं । दूसरे लोग वेलनकी अपेक्षा रखे बिना हाथसे ही बना लेते हैं । क्हो कि वहां भी हाथ उपाय तो है तो क्या बेलन रहनेपर हाथ नहीं रहता अन्य उपायका अपवाद हम बता रहे हैं ।। ४२-४३ ।। सामर्थ्य विरहेऽपेक्षा साधनानामिति स्थिति । सेनासहायो नृपति परान् विजपत्तेऽवल ॥४४॥ चतुर्दशसहस्राणि राक्षसान हि खरादिकान् । प्रजेपोदेकलो राम सामयं तय कारणम् ॥ ४५ ॥ सामर्थ्य न हो तो साधनोको आवश्यक्ता होती है। निर्वल राजा सेनाकी सहायतासे शत्रुओपर विजय पाता है। अकेले रामने चौदह हजार खरादि राक्षसोको मारा तो वहाँ सामर्थ्य ही कारण या ।। ४४.४५ । 7 श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पञ्चमः यन्यादिना सहायेन भार उत्थाप्यते महान् । हस्ती विनव यन्त्रादि महामारं समुढरेत् ॥४६॥ उपनेयसहापत्वमसमर्थस्य चक्षुपि। कि ज्वलज्ज्योतिपोरक्ष्णोरुपनेर फरिप्यति ॥४७॥ यन्त्रादि सहायतासे लोग भारी बोझ उठाते हैं, विना यन्यादि ही हाथी उसे उठा लेता है। चश्मेकी सहायता कमजोर आसवालोको चाहिये । तेज हो तो चश्मेका क्या काम ॥ ४६ ४७ ।। परास्य शक्तिविविधेत्येतच्छोतं थ.तिजंगो। न तस्य फार्य कर समित्यप्याहापर वचः ॥ ४८।। "परास्य शक्तिविविधैव श्रूयते" इस प्रकार परमेश्वरकी अनन्तशक्ति को श्रोतत्वेन श्रुति कहती है। "उसका कार्य और करण नही" इत्यादि वचनोमे करणादि निरपेक्षता वतायी है ।। ४८।। किफायः किफाय इति चायुक्त तडित्सु व्यभिचारतः। प्रकाशयेद्वीजयेच्च शीतयेच्चातनुस्तडित् ॥ ४९॥ धातुतन्तुः शरोरं घन चेप्टादेरभावत.। चेष्टेन्द्रियाश्रियं हि देहं नैयायिका जगुः ॥५०॥ "किं काय यह आक्षेप भी अयुक्त है। बिजलीका कोई शरीर नही है। फिर भी वल्वसे प्रकाशन, पखेसे वायुचालन, फ्रीज आदिसे शीतन करती है। यह कहे कि विजलीका तार आदि उसका शरीर है तो ठीक नही । कारण चेप्टेन्द्रियार्याश्रय शरीर" ऐसा न्यायसूनमे कहा है जिसमे चेष्टा हो, इन्द्रिय हो और सुखादि हो वही शरीर है ॥ ४९-५० ॥ देहो नास्तीश्वरस्येति फस्त्वा चावश्चयत् सखे । ॐदेहः शक्तिदेहश्च पञ्चवक्त्रोऽपि चेश्वरः॥५१॥ ईश्वरका देह नही है ऐसा दिमागमे ठुसाकर किसने तुमको ठगा? शिवका ॐकार शरीर है, शक्ति शरीर है और पचवक्न त्रिनेन शरीर प्रसिद्ध ही है ॥५१॥ किमीहः एतेनैव निरस्तं स्यात् किमोह इति चोदितम् । सति देहे हि कापत्तिरीहासत्त्वे महेशितुः ।। ५२ ॥ शरीर मान लिया अत एव "किमीह" इस प्रश्नका भी अवकाश नहीं रहा ॥५२॥ " -- श्लोक.] स्पन्दवातिकसहितम् किच संकल्पमात्रेण स्वेच्छामात्रेण शंकरः। सृजत्यवति हन्तीदमुत्सर्गोऽत्राप्यपोद्यते ॥ ५३॥ दूसरी वात-भगवानको न चेप्टाकी आवश्यकता है और न शरीर की ही । सकल्पमानसे इच्छामानसे परमेश्वर सृष्टिस्थितिसहार करता है। शरीर चेप्टादियुक्त ही कार्य करता है इस उत्सर्गका यहां भी अपवाद है ॥ ५३॥ मायावी वस्तु निर्माति स्वेच्छया संहरत्यपि । योगी च स्वेच्छया निर्मात्युपसंहरतेऽपि च ॥५४॥ इस उत्सर्गापवादका लौकिक उदाहरण भी है। मायावी स्वेच्छासे निर्माण एव सहार करता है। योगी स्वेच्छामानसे निर्माण और उपसहार करता है, चेष्टाकी कोई जरूरत नहीं है ।। ५४ ॥ ससारनियमः सर्व सापत्रादो विलोकित । ससारनियमे बन्धुनीश मा साहस कुरु ॥ ५५ ॥ ससारके सभी नियम सापवाद देखनेमे आये हैं । अत ससारनियममे परमेश्वरको वांधनेका साहस मत करो॥ ५५ ॥ नन्वेवं सर्वनियमापोदनं विदधासि चेद् । शून्यादेव जगत्कस्मान्नोत्पद्येत निगद्यताम् ॥ ५६ ॥ न चासत. समुत्पन्ने स्यादसत्त्वानुवर्तनम्। क्षीरोत्पन्ने क्व वा दघ्नि क्षीरस्थास्त्यनुवर्तनम् ॥ ५७ ॥ न चासतः समुत्पत्तिः सतो नवावलोकिता। क्षीरध्यसात् समुत्पत्तिय॑तो दधन्यवलोकिता ॥ ५८ ॥ न या दधि क्षीरककणादुत्पद्यतेति साप्रतम् । क्षीराऽध्वसे क्षीरकरणाद्दध्युत्पत्तिप्रसङ्गत ॥ ५९॥ केवलान्नहि विध्वसाद् दप्टोत्पत्ति. सतो यदि । केवलाच्च सतो दृष्टा क्वोत्पत्तिरिति भण्यताम्॥ ६० ॥ असत् सर्वत्र सुलभ सर्व सवंत्र चेद् भवेत् । सच्च सर्वन भवत. सवं सर्वत्र नो फुत ॥६॥ वौद्ध पुर्वपक्ष - सर्व नियमोका अपवाद आपने माना तो शून्यसे जगत्को उत्पत्ति माननेमे क्या दोष? यह कहो कि असत्से घटादि उत्पन्न हो तो असत्को अनुवृति होगी। तब घट है ऐसा न होकर घट नहीं है ऐसी प्रतीति होगी, सो बात गलत है । दूधसे दही उत्पन्न हुआ तो वहाँ दूधको अनुवृत्ति कहाँ होती है ? असत्से सत्की उत्पत्ति नहीं देखी नहीं यह कहना ५८ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम [पञ्चमः भी अनुचित है। क्योकि क्षीरध्यससे दहीकी उत्पत्ति प्रत्यक्षा है। क्षीरध्वंस अभाव ही तो है। इसपर सद्वादी कहेंगे कि धीरध्यससे दहीकी उत्पत्ति नही, किन्तु क्षीरके कणोंसे दहीको उत्पत्ति है। परन्तु उन्होंने यह सोचा नही कि क्षीरनारा न होनेपर भी क्षीरकण है तब क्षीरलाश हुए बिना ही दधि क्यों उत्पन्न नहीं होता? अतः क्षीरध्यस दधिकारण है । सद्वादियोका रामबाण यही माना जाता है कि केवल क्षीरनाशसे दही उत्पन्न नहीं होगा, क्षीरकण भी चाहिये। किन्तु अद्वैतवादियोंसे पूछेगे-केवल सत्से वस्तुको उत्पत्ति भी कहां होती है, बताओ। साधानन्तर तो चाहिये ही । अन्तिम वच यही है कि असत्से सत् पैदा हो तो असत् सर्वत्र है अत. आकारामें भी युसुम पैदा होगा। परन्तु सर्वजगत्कारण आपका ब्रह्म भी तो सर्वत्र है। उससे आकाश- मे पुष्प उत्पन्न क्यो नही होता? ॥ ५६-६१ ॥ अत्र ब्रूमः पुमर्यत्वं शून्यस्य न कथंचन । परिपूर्णपरानन्दो यत्सवः पुम्मिरर्यते ॥६२॥ तर्फेण सदसति निश्चेतु चेन्न शक्यते। पुमर्थत्वं भवेत्ता नियामकमिति स्थितिः ॥ ६३ ॥ असन्नेव स भवति असद् ब्रह्मति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद् वेद सन्तमेन ततो विदुः॥ ६४ ॥ कारण सत् है या असत्, सन्त्यिमे सत् रहेगा या असत् रहेगा इस- पर तकसे कोई निर्णय न होता हो तो वहां पुरुषार्थता ही निर्णायिका होगी। शून्य पुरुषार्थ नहीं होता । परिपूर्ण परमानन्द ही सर्वपुरुषेच्छाविपय है। ब्रह्मको असत् माननेवाला असत् अर्थात् पुरुपार्थरहित हो जाता है। सत् माननेवाला सन्त अर्थात् पुरुषार्थयुक्त होता है ॥ ६२-६४ ।। नन्वनिर्णीततत्वेषु पुरुपेच्छा निरङ्कुशा । कथं निर्णायिका वस्तुविकल्पापादिकेति चेत् ॥ ६५ ।। न च वाज्यं कृपमपि स्यावालाको निमन्मतः । मज्जत्येव तृणालम्बी जलसंतरणाक्षमः॥ ६६ ॥ पूर्वपक्ष-सत् असत्का निर्णय न होनेपर पुरुषेच्छा (पुरुषार्थता) नियामिका कैसे होगी ? क्योकि पुरुषेच्छा निरकुश होती है । चन्द्र-आनयन जैसे असभव अर्थकी भी इच्छा हुआ करती है। पुरुषेच्छानुसार वस्तु सिद्ध हो तो वस्तुविकल्प होने लगेगा। यदि कहें-"डूबतेका तिनका भी सहारा" होगा तो वह ठीक नही। तृणका सहारा लेने वाला तैरना न जानता हो तो डूव ही जायेगा ।। ६५.६६ ॥

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् तन्नानमिभवे बुद्धः सर्वे सत्पक्षपातिताम् । उपयन्त्यन्यया लोका जोवेयुः किंवला इह ॥ ६७ ।। उत्तर :-करणविशेषसे अभिभूत न हो तो बुद्धि सत्यपक्षपाती होती है । इस बातको सभी मानते हैं । बुद्धि पर विश्वास न हो तो जीना भी संभव नहीं होगा । जीनेका आधार ही बुद्धि है ।। ६७ ॥ अशक्यस्थितिके चात्र सत्त्वासत्त्वविनिश्चये। अभिभावकराहित्यात् सत्ये धोः प्रसरेत्स्वयम् ॥ ६८॥ सत्व या असत्त्वका तर्कसे निर्णय असंभव हुआ। अभिभूत करने- वाला रहा नहीं । अव जो वुद्धिका प्रसार होगा वह सत्यमे ही होगा ॥६८॥ परिपूर्णपरानन्दाकाक्षा स्वाभाविको धियः। तत्तादृक्तत्वसिद्धि नाऽपोर्बु विधिरपि क्षमः ॥ ६९ ॥ और परिपूर्णपरानन्दाभिलापा बुद्धिकी स्वाभाविक गति है । अतः ऐसे तत्त्वकी सिद्धिको ब्रह्मा भी निवारण नहीं कर सकते ।। ६९ ।। अनादृत्य श्रुति मोर्खाद बुद्धि चेमे तमस्विनः । प्रापेदिरे निरात्मत्वमनुमानकचक्षुपः ॥ ७० ॥ इन नास्तिकोंने मूर्खताके कारण श्रुतिका अनादर तो किया ही, बुद्धिका भी अनादर किया। केवल तर्कपर ये निरात्मवादी बन गये ॥७॥ अचिन्त्यानन्तशस्तित्वात् क्यच मेऽस्त्यव्य स्थितिः। त्वया शक्त्यम्युपगमात् क्वासद्वार्तावतिष्ठते ॥७१॥ जो पहले दोष कहा कि 'सत्' रूपी कारण सर्वत्र है, सभी कार्य सर्वत्र होगा, वह ठीक नही । अचिन्त्य शक्ति भी हम मानते हैं । अतः अव्यवस्था नही है । नास्तिक शक्तिसत्ता मानते हैं तो असद्वाद नहीं रहेगा ।। ७१ ॥ शक्तिशक्तिमतोनव पृयगस्तित्वमिप्यते। न लोके चरतच्छक्त्योर्जीवितं गण्यते पृथक् ॥ ७२ ।। शक्ति और शक्तिमानकी पृथक सत्ता नही, अतः द्वैतापत्ति भी नही। लोकमें भी चैत्र और उसकी शक्ति ऐसे दो नही गिने जाते ॥ २॥ अतक्यश्वयें तत्त्वं तत् कोदगिति चेत् श्रुति गुरुमुखाच्छणु । न हि तर्कण विज्ञातुं यतस्याऽतर्फगोचरम् ॥ ७३ ।। पृच्छामि त्योपनिषदमित्याह पुरषं युतिः । अंतक्यचर्यरूपेऽतः कुतर्क मा कृया यया ।।७४।"

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पञ्चमः अचिन्त्याः खलु ये मावा न तांस्तण योजयेत् । यदि वा योजयेस्तहि तक श्रुतिमतं नय ॥ ७५ ॥ यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलरनुमातृमिः। अभियुक्ततरैरन्पैरन्यवानुमीयते ॥७६॥ ततोऽनवसरत्वेन दुःस्थस्तों महेश्वरे । कुतर्कस्त्याज्य एवातो मा स्म भूद्धतधोनरः॥७७ ।। स्वयं मूढा हतधियो मोहयन्त्यपरानपि । परात्मघातिनस्तेऽतिपापिनः स्वात्मघातिनः॥७८ ।। वह सत् तत्त्व कैसा है यह जानना हो तो गुरुमुखसे श्रुति सुनो, तर्कसे जाननेका यत्न न करो। वह पुरुष औपनिपद है ऐसी ध्रुति है। अचिन्त्य भावोंपर तर्कको जोडना नही, जोडना ही हो तो श्रुतिमत तक जोड़ो। क्योकि तर्कका प्रतितर्क भी अवश्य होगा । अतः परमेश्वरमे अवकाश न होनेसे जो कुतर्क टिक ही नहीं सकता उसे त्यागना ही उचित है । ये कुतर्की स्वय मूढ होकर आत्मघात करते ही है, दूसरोको मोहमे डालकर परात्मघाती भी होते हैं, फलतः केवल पापजीवन होते है ।। ७३-७८॥ अतक्र्यैश्वर्यमतुलं सन्तं चानन्तशक्तिकम् । पुमांसमोपनिषदं शिवं वन्दे परात्परम् ॥७९॥ जिसका ऐश्चर्य तर्कका अविषय है। क्योकि वह अतुल-उपमान दृष्टान्तरहित है । तथापि सद्प है, अनन्त शक्तिमपन्न है, उस उपपित्मात्र वेद्य परात्पर पुरुष शिवकी हम बन्दना करते हैं ।। ७९ ।। इति श्रीकाशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतौ। महिम्नःस्तोत्रविवृतौ पञ्चमस्पन्दसंग्रहः ॥५॥ ।

पठः श्लोकः
यदन्यथान्यया
ईहाद्ययान्तराक्षेपान्मूलाक्षेपो विवक्षितः।
नास्तोशो यदि वास्त्येप ईहादिः क इतीर्यते ॥१॥
पूर्वश्लोकमें किमीहः इत्यादिसे ईहा आदि जो अवान्तर तत्त्वका
आक्षेप है उससे मूल ईश्वरका ही आक्षेप विवक्षित है । पूर्वपक्षीका
आशय है-ईश्वर नही है, यदि है तो उसकी क्या ईहा, क्या चेप्टा क्या
शरीर इत्यादि कहो ॥१॥
चावान्तराक्षेपः सुसमाधान इत्यत ।
मूलाक्षेपं निराचष्टे सत्तणाधुना स्फुटम् ॥२॥
अवान्तराक्षेपोका समाधान सरल है ( हम दिखा भी चुके हैं ) अतः
कुतर्कविपरीत सत्तर्कसे मूलाओपनिराकरण अव करते है ॥ २॥
अपि चास्तिकमेव स्वं मन्यमाना अपीतरे।
प्रोचस्तानप्युद्धरते मुनिः ।। ३ ॥
और भी वात है । जो अपनेको आस्तिक कहलाते हैं वे भी ईश्वरके
बारेमे तरह-तरहकी बातें करते हैं। जैसे हमने चतुर्थ श्लोककी व्यास्यामे
दरसाया। कुछ बाते मीमासकादिको विलक्षण हैं। उन सवका महर्षि
कात्यायन उद्धार करने जा रहे है ॥ ३ ॥
अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगता-
मधिष्ठातारं कि भवविधिरनादृत्य भवति ।
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥६॥
क्या सावयव लोक भी अजन्मा हो सकते हैं ? जगत्को उत्पत्तिका
सिलसिला अधिष्ठाताकी अपेक्षा किये बिना ही क्या चल सकता है ?
इस भुवनमण्डलके उत्पादनमे ईश्वररी अतिरिक्त भी कोई तैयार हो
सकता है क्या? जिन बातोको लेकर हे देवदेव ! आपके विषयमे ये मन्दबुद्धि
तरह-तरहके सराय करते रहते हैं ॥ ६॥

६ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पष्ठः अजन्मानो हस्ताद्यास्तन्ववयवाः स्कन्धशासादयस्तरोः। गिरिसिन्ध्वादयः पृथ्ख्या घटादीनां मृदादयः॥४॥ अणवो दृश्यकार्याणां तत्संयोगात्तदुद्भवः। अप्राप्तयोस्तु या प्राप्तिः संयोग स तु कीतिमः ॥५॥ उत्पत्तिध्वंसशालित्व संयोगादेरवेक्ष्यते। नादित्वमतस्तेपा शक्यमुत्प्रेक्षित बुधैः ।। ६ ।। संयोगे सति जन्मपां कार्याणां नान्यया तथा । अजन्मानः कथं तस्माल्लोकाः सावयवा इमे ॥७॥ हाथ पाव आदि शरीरके अवयव हैं, डाली पत्ते आदि वृक्ष के अवयव हैं, वैसे गिरिसागरादि पृथिवीके अवयव हैं, घटादिके मृदादि अवयव हैं। त्र्यणुकपर्यन्त सभी दृश्यकार्योके अणु अवयव है। इन अवयवोके सयोगरो इन कार्योकी उत्पत्ति होती है । सयोग भी उत्पन्न होता है। पूर्वमे जो अप्राप्त रहकर वादगे प्राप्त होते हैं उनकी वह प्राप्ति ही सयोग है। और सयोगादिकी उत्पति और विनाश प्रत्यक्ष है। अतएव ये सयोगादि अनादि हैं ऐसी शका नही की जा सकती। इन अवयवोका सयोग होनेपर ही इन शरीर, वृक्ष. पृथिवी आदिका अस्तित्व होता है। तव सावयव ये लोक अजन्मा कैसे हो सकते हैं ? ॥ ४-७॥ ननु वृक्षे स्थिते तस्मिन् शाखापत्रादयो नवाः । उत्पद्यन्ते कयं तेहि जरन्नुत्पद्यता तरुः ॥८॥ जाते मर्ये ततस्तस्य केशश्मश्रुस्तनादयः । जायन्ते न तु तैतिर्जायते पुनरेव सः ॥९॥ व्यज्यन्ते यदि केशाद्या नोत्पद्यन्न इतीर्यते । व्यज्यन्ता नित्यलोकानां कुतो नावयवा अमी।। १०॥ वृक्ष तैयार हुआ उसके बाद भी शाखा, पन आदि नये पैदा होते हैं। उन शाखापत्रादिसे थोडे ही पूर्वभव वृक्ष उत्पन्न हुआ ? मनुष्य पैदा हो गया उसके बाद भी पेश, डाढो, स्तन आदि पैदा होते हैं। तो क्या इनके उत्पन्न होनेपर अवयवोंसे दुवारा वही मनुष्य उत्पन्न होता है ? यदि कहो वि डाली, पत्ता, डाढी, स्तन मादि वादमे केवल प्रकट होते हैं तो वैसे ही लोकोके भी अवयव वादमे प्रकट हो । उन अवयवोंसे लोकोको उत्पति क्यो मानना ? 11 ८-१० ॥

तथा श्लोक स्पन्दवार्तिकसहितम् सत्यं, न्यायमते कार्य सर्वनोत्पद्यते नवम् । सर्व सांख्यमते कार्य व्यज्यते हि घटाद्यपि ॥११॥ घटादेयंजकः किं वा जन्मदाता यथानयम् । अपेक्षित कुलालादिस्तावन्मानमिहेक्ष्यताम् ॥ १२ ॥ उक्त पूर्वपक्षपर हमारा कहना यह है कि न्यायमत और साख्यमत दो पृथक हैं । न्यायमतमे नवीन शाखापनादिसे वृक्षादि भी नवीन उत्पन्न माना ही गया है और साख्यमतमे सभी कार्य कारणमे अभिव्यक्त होते है । घटादि भी मृत्तिकामे अभिव्यक्त होता है । चाहे उत्पत्ति मानलो चाहे अभिव्यक्ति, घटस्थलमे तदर्थ कुलालादि अपेक्षित है ही ( इसी प्रकार लोकोके जन्म या अभिव्यक्तिमे कर्ताको अपेक्षा है ही) इतना ही यहाँ विवक्षित है ॥ ११-१२ ॥ जगज्जन्म कथमधिष्ठातारमन्तरा। अप्राप्तप्रापकेणात्र माव्यं केनापि तद्विदा ॥१३॥ सावयव लोक सजन्मा सिद्ध हुए। वह जगज्जन्म अधिष्ठाता अर्थात् कर्ताके बिना कैसे हो? अप्राप्त अवयवोका प्रापक जोडनेवाला उसका ज्ञाता जरूर कोई होना चाहिये ।। १३ ।। अदन्ते बालके भोक्तुमशक्ते मोदकादिकम् । कोऽतनोज्जननीस्तन्यमनत्युष्णमशीतलम् ॥१४॥ तद्विदा ऐसा पूर्वश्लोकमे कहा । ज्ञाता भी सामान्य ज्ञाता नही किन्तु औचित्यज्ञाता । शिशु दन्तरहित है । लड्डू आदि नही चवा सकता। उसे दूध ही उपयुक्त है । इस वातको समझकर माताके स्तनोमे मुंह जले भी नहीं, ठहोसे पेटमे वायु भरे भी नही वैसा न अधिक गरम न अधिक ठण्डा दूध बनाकर भरनेवाला वह कौन है ।। १४ ॥ न भूम्या नैव बोजे च रङ्गो नैव दलादिषु । रङ्गकारोऽभ्यगारकोऽयं प्रसून येन रस्जितम् ॥ १५ ॥ मिट्टी सामान्य है, बीजमे भी कोई रग नहीं। शाखापत्रादिमे भी सास कुछ नहीं। तब इन पुष्पोपर रग चढानेवाला यह रगरेज कौन है बताओ ।। १५ ।। हिमदेशेऽतिशत्येन मा म्रियेरग्निमे विति। फेन वा धर्मरोमाणि कृतानि पशुपक्षिणाम् ॥ १६ ॥ हिमालयमे जाकर देखो। वहांके पशुपक्षियोके गरम ऊन जैसे रोम होते है । इसलिये कि ये ठण्डीमे न मरें। यह कृपालु कर्ता कोन' ॥ १६ ।।

1
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[पष्ठः
मीमांसक, सांख्य एवं वैष्णवादिका यहाँ क्रमेण विचार है। प्रथम
पादमें मीमांसक, द्वितीय पादमें सांख्य तथा तृतीय पादमें वैष्णवादिकी
यहां आलोचना है ।। २८-२९ ।।
अजन्मानो०
प्रलयं नैव मन्यन्ते जरन्मीमांसकाः किल ।
अनादिसिद्धाः पृथ्व्याधाः कर्तुः किं स्यात्प्रयोजनम् ॥३०॥
न च वृक्षादयोऽध्यक्षोत्पत्तिका इति सांप्रतम् ।
तत्र बीजं तत्र वृक्षः प्रवाहानादिता यतः ॥ ३१ ॥
अनादिनियमादेव बोजवृक्षपरम्परा।
संपद्यते ततो नवापेक्षितोऽस्ति नियामकः ॥ ३२ ॥
पिता तत्पितुरुत्पन्न. स्वपितुः सोऽपि जायते ।
ब्राह्मणक्षत्रियादीनां तथाऽनादिः परम्परा ।। ३३ ।।
ईश्वराज्जायमानत्वे न जातिनियमो भवेत् ।
बीजादुत्पत्तिनियमभङ्गो नैव च युज्यते ॥ ३४॥
प्रथम जीर्ण मीमासकोका मत सुनिये। वे प्रलय नहीं मानते ।
उनके मतमे पृथिवी जलादि सभी अनादिकालसिद्ध हैं। अत: इन सबको
बनानेवाले ईश्वर को माननेका क्या प्रयोजन ? यद्यपि वृक्षलतादि उत्पन्न
होते हैं यह प्रत्यक्ष है । किन्तु बीजसे वृक्ष होगा । वह वीज वृक्षसे। इस प्रकार
वीजवृक्षप्रवाह अनादि है । अनादि नियम है कि अमुक वीजसे अमुक वृक्ष
इत्यादि । अनादि होनेसे ही नियम बनानेवालेको आवश्यकता नही है ।
पिता उसके पितासे, वह पितामह अपने पितासे उत्पन्न हुआ। अतएव
ब्राह्मण क्षत्रियादि जातिभेदपरम्परा रही। यदि ईश्वरसे सब पैदा हुए तो
कौन ब्राह्मण कौन क्षत्रिय ? इसका नियामक कौन होगा ? प्रथम जन्म
ईश्वरसे, बादमे बीजसे यह बीजोत्पत्तिनियमका भग है। वह उचित
नही है ।। ३०-३४॥
मुखतो जायमानस्य माह्मणत्वं पदीष्यते ।
बाहादेः सप्रियादित्वं नाचत्ये तद्विलोक्यते ॥३५॥
तस्माद्विप्रसुतो विप्रः सनियः क्षगियोद्धयः।
मानसाधुयोक्तेश्य प्रास्त्यर्या तया श्रुतिः ॥ ३६॥
यजेत विप्र
इत्यादिरप्रमाणं युतिभयेत् ।
जातिमङ्गे प्रलयतः
प्रतयस्तेन नेष्यते॥३७॥

श्लोक.] स्पन्दवातिकसहितम् यह नियम कहे कि ब्रह्माके मुखसे जो पैदा हुमा वह ब्राह्मण, वाहु आदिसे क्षनियादि । तो ठीक नहीं। क्योकि आजकल ब्रह्माके मुखसे कोई पैदा नही होता । अत. ब्राह्मणपुन ब्राह्मण, क्षनियपुत्र क्षत्रिय, यही नियम मान्य होगा। दूसरी बात-पुराणादिमे वशिष्ठादिको मानसपुत्र माना । ब्रह्माका शरीर द्विधा हो गया तो मनु और शतरूपा हो गये। उनकी ब्राह्मणता क्षत्रियता असिद्ध हुई। उस गोरमे या परम्परामे जो जनमे वे किस जातिके होगे ? अत मुखसे सृष्टि आदि कथन प्रशसार्थ है। यदि ब्राह्मणादि जातिभेद नही मानेंगे तो "ब्राह्मणो यजेत" इत्यादि श्रुति अप्रमाण होगी। प्रलय हो तो जातिभग होगा । अत प्रलयको ही अमान्य करना उचित है ।। ३५-३७ ।। नन्वीश्वरात्समुत्पत्तायपि फर्मवशादिह । जातिभेदो भवेन्मय॑पशुपक्ष्यादिभेदवत् ॥ ३८॥ तदसत्तदसिद्धत्वाद् मङ्गश्चेन्नियमस्य तु। प्रलयस्यैव भङ्गोऽस्तु योऽन्तर्गडुरुपेयते ॥ ३९॥ यदि ईश्वरवादी यह कहे कि ईश्वरसे भले सभी पैदा हो । किन्तु पूर्व- कल्पीय कर्मवशात् कोई ब्राह्मण, कोई क्षनियादि होगा। जैसे ईश्वरसे पैदा होने पर भी मनुष्य, पशु, पक्षी आदि भिन्न-भिन्न जाति कर्मवशात् हुई। तो यह कथन असगत है । केवल कर्मसे जातिभेद असिद्ध है। जन्मभेदसे ही जाति- भेद होता है । जन्मभेदसे जातिभेद इस प्रत्यक्षनियमको तोडनेकी अपेक्षा इस अप्रत्यक्ष निरर्थक प्रलयका ही भग क्यो नहीं करते ॥ ३८-३९ ।। ननु वेदेषु निर्दिष्टा देवा हरिहरादयः । सत्यं तदेवतात्वेन न त्वीशत्वेन चोदिताः॥४०॥ द्रव्यत्यागसमुद्देश्या उद्दिश्य यदि देवताः। यागादि क्रियते चेत् तत्कम स्यात् फलदातृ वः॥४१॥ पूर्वपक्ष:-वेदोमे शिव, विष्णु आदि सबका निर्देश आया है। "विष्णवे शिपिविष्टिाय द्वादशकपाल निर्वपति" इत्यादि वाक्य अर्थवाद नहीं है । उत्तर --ठीक है, किन्तु शिव, विष्णु आदिको देवताके रूप में बताया है। ईश्वरके रूपमे नही । जिसको उद्देश्यकर द्रव्यत्याग (होम) क्यिा जाता है वह देवता है। उसके उद्देश्यसे पागादि करेंगे तो धर्म सफल होगा। इसमें जगत्सृष्टिकतकि रूपमे ईश्वरप्रतिपादन कहा है ? ॥४०-४१॥ अगोच्यते सावयवाः सजन्मानो मयन्त्यमुम् । नियमं हसि नियमपक्षपाती कर स्वयम् ॥ ४२ ॥ -

६४
श्री शिवमहिम्न: स्तोत्रम्
[पष्ठः
अधिष्ठातारं०
ग्लोर्महीं सा रवि सोऽपि सत्यं वम्भ्रम्यते परि ।
ऋणाणवो धनाणूंश्च को स्वयं यन्त्रचालकः ॥१७॥
चन्द्रमा पृथ्वीकी चारों ओर भ्रमण कर रहा है । पृथ्वी सूर्यकी चारों
ओर भ्रमण कर रही है । सूर्य सत्यलोककी परिक्रमा कर रहा है। ऋणाणु
धनाणु की परिक्रमा कर रहे हैं । आखिर इस प्रकार यन्त्र चलानेवाला यह
कौन है ? ॥ १७॥
वुभुक्षोरन्ननिर्माता पिपासोलवर्षणः।
दिनाप्नक्तं दिनमिति को व्यवस्थापको न्वयम् ॥ १८॥
भूखेके लिये अन्ननिर्माण और प्यासे के लिये जल वर्पण करने-
वाला कौन ? दिनके बाद रात फिर दित ऐसी व्यवस्था करनेवाला
कौन है ? ॥ १८॥
भुक्तमन्नं रसं रत्तमिति रीत्या तनु नयन् ।
फोऽयं वैज्ञानिकः फोक्षानन्त्रादीन् रचयन् प्रभुः ।। १९ ।
खाये अन्नको रसरक्तादि क्रमसे शरीर पर्यन्त वनानेवाला यह कौन
है ? कौन यह वैज्ञानिक है जिसने पेटमे अन्नादि निर्माणकर अन्नको अहं
बना डाला? ॥ १९ ॥
कि यात्र बहुनोक्तन जगदेतच्चराचरम् ।
प्रत्यण्वत्यद्भुतं तद्धि सुपिज्ञेन विना कथम् ॥२०॥
सुव्यस्थितसचार नियमाबद्धविपहम् ।
अनन्तमद्भुतं विश्वमधिष्ठापा विना कयम् ॥ २१ ॥
हम अधिक क्या कहे यह चराचर जगतमें अणु-अणुमे आश्चर्य ही
आश्चर्य है । यह किसी सुविनके बिना कैसे पैदा हो ? व्यवस्थित कार्योत्पत्ति
एवं राहार चल रहा है। सभी अपने-अपने नियमोमें आवद्ध हैं। ऐसे
अनन्त असस्य अद्भुत विश्य अधिष्ठाताके बिना कैसे हो? ॥ २०-२१ ।।
जनीशो वा०
न कर्तारोऽस्मदाद्याः स्युरसमर्या अतीय थे।
जगत्कतया शययाः पेग पल्पयितुं हि ते॥२२॥
क्या ऐमे जगतका निर्माता हमारे तुम्हारे जैसा कोई होगा जो
यत्यन्त असमर्थ है? एक सामान्य घरभी अकेले बगाना जिसके लिये
संभव नही उमे जगकर्ता के रप में कौन मोच सकता है ॥ २२ ॥

श्लोक:]
स्पन्दवातिकसहितम्
नकलानां प्रयत्नोऽस्ति मिलितानां न दृश्यते।
तस्मादपर एवासौ सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् ॥ २३ ॥
हम लोगोमे अकेले जगत्को बनानेका प्रयत्न कोई कर नहीं सकता।
सब मिलकर बनावें यह तो देखनेमे नही आता। आगे-पीछे जनमने-मरने
वाले मिलकर कैसे बनायेगे ? अतः दूसरा ही कोई संर्वज्ञ सर्वशक्तिमान्
जगत्कर्ता है ।। २३ ॥
मयावस्याग्निस्तपति भयात्तपति भास्करः।
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्घावति पञ्चमः ॥ २४ ॥
उसी सर्वज्ञ परमात्माके नियन्त्रणसे जगत्का नियमित सवार हो
रहा है। उसीके नियन्त्रणसे अग्नि तप रही है, सूर्य प्रकाशित हो रहा है.
इन्द्र ( मेघ ) तथा वायु स्वकार्य कर रहे हैं । पाचवी यह मृत्यु यथासमय
उपस्थित होती है ॥ २४ ॥
अमरवर
न तस्य मरणं येन जन्मदोऽयिष्यतां परः।
अमराणां घरो नापेक्षिको हमरता यतः ॥ २५ ॥
उस परमात्माका भी जन्मदाता कोई है क्या? नही । क्योकि वह
मरता नही, अमर है। आपेक्षिक कल्पपर्यन्त स्थायित्वरूप अमरता भी
नहीं, किन्तु नित्य शाश्वत अमरता है । अतएव अमरवर है ।। २५ ।।
मन्दास्त्वां०
मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या उपद्धताः ।
संशेरते जगदेतो शिवे हि पतनोन्मुसाः ॥२६॥
मन्द अर्थात् जो मन्दमति या मन्दभाग्य हो अथवा मादा-ससार-
रोगरुग्ण हो वे ही जगत्कर्ता परमेश्वर शिवके विषयमे समय करते हैं
जिनका पतन निकट है ।। २६ ।।
व्याण्यात एवं सामान्यविधया श्लोक एप तु।
विशेषेण ययं कचिद् विचारं पर्तयामहे ।। २७ ।।
हमने यह श्लोकको सामान्य व्यास्या की । अब कुछ विशेष विचार
मीमांसकाय सोरयाच यष्णयादय एय च।
क्रमेणात्र विचार्यन्ते निविधा भेदर्दाशनः ।। २८॥
मीमासवास्तु प्रयमे द्वितीये सांध्यवादिनः ।
घणरायास्तृतीये च पादेश्य सुविचारिताः॥२९॥
प्रस्तुत करते हैं ॥ २७ ॥

श्री शिवमहिम्न. स्तोत्रम् [पष्ठ मीमासक, साख्य एव वैष्णवादिका यहाँ क्रमेण विचार है। प्रथम पादमे मोमासक, द्वितीय पादमे सास्य तथा तृतीय पादमे वैष्णवादिकी यहा आलोचना है ।। २८-२९ ।। अजन्मानो० प्रलय नैव मन्यन्ते जरन्मीमासकाः किल । अनादिसिद्धाः पृथ्व्याधाः कर्तुः किं स्यात्प्रयोजनम् ॥ ३०॥ न च वृक्षादयोऽध्यक्षोत्पत्तिका इति साप्रतम् । तन बीजं तत्र वृक्षः प्रवाहानादिता यत ॥ ३१ ॥ अनाविनियमादेव बोजवृक्षपरम्परा। सपद्यते ततो नवापेक्षितोऽस्ति नियामकः॥३२॥ पिता तत्पितुरुत्पन्न स्वपितु. सोऽपि जायते । ब्राह्मणक्षत्रियादीना तयाऽनादि. परम्परा ॥ ३३ ॥ ईश्वराज्जायमानत्वे न जातिनियमो भवेत् । बीजादुत्पत्तिनियमभङ्गो नंय च युज्यते ॥ ३४ ॥ प्रथम जीर्ण मीमासकोका मत सुनिये । वे प्रलय नही मानते । उनके मतमे पृथिवी जलादि सभी अनादिकालसिद्ध हैं । अत इन सबको बनानेवाले ईश्वर को माननेका क्या प्रयोजन ? यद्यपि वृक्षलतादि उत्पन्न होते हैं यह प्रत्यक्ष है। किन्तु वीजसे वृक्ष होगा। वह बीज वृक्षसे। इस प्रकार बीजवृक्षप्रवाह अनादि है। अनादि नियम है कि अमुक वीजसे अमुक वृक्ष इत्यादि । अनादि होनेसे हो नियम बनानेवालेकी आवश्यकता नहीं है । पिता उसके पितासे, वह पितामह अपने पितासे उत्पन्न हुआ। अतएव ब्राह्मण क्षनियादि जातिभेदपरम्परा रही। यदि ईश्वरसे सब पैदा हुए तो कौन ब्राह्मण कौन क्षत्रिय' इसका नियामक कौन होगा ? प्रथम जन्म ईश्वरसे, बादमे वीजसे यह वीजोत्पत्तिनियमका भग है। वह उचित नहीं है ।। ३०-३४॥ मुखतो जायमानस्य ब्राह्मणत्वं यदीष्यते । वाह्वादे क्षनियादित्व नाद्यत्वे तद्विलोवयते ॥३५॥ तस्माद्विप्रसुतो विप्रः क्षत्रियः क्षत्रियोद्भवः। मानसायुद्भवोक्तेश्च प्रशस्त्यर्या तथा श्रुतिः ॥ ३६॥ पजेत विप्र इत्यादिरप्रमाण ध्रुतिभवेत् । जातिमङ्गे प्रलयस्तेन नेष्यते॥ ३७॥ प्रलयतः

श्लोक ]
स्पन्दवातिकसहितम्
६७
यह नियम कहे कि ब्रह्माके मुख्से जो पैदा हुआ वह ब्राह्मण, बाहु
आदिसे क्षनियादि । तो ठीक नहीं। क्योकि आजकल ब्रह्माके मुखसे कोई
पैदा नहीं होता । अत ब्राह्मणपुत्र ब्राह्मण, क्षत्रियपुन क्षत्रिय, यही नियम
मान्य होगा। दूसरी बात-पुराणादिमे वशिष्ठादिको मानसपुत्र माना ।
ब्रह्माका शरीर द्विधा हो गया तो मनु और शतरूपा हो गये। उनकी
ब्राह्मणता क्षत्रियता असिद्ध हुई। उस गोतमे या परम्परामे जो जनमे वे
किस जातिके होंगे। अत मुखसे सृष्टि आदि कथन प्रशसार्थ है। यदि
ब्राह्मणादि जातिभेद नही मानेंगे तो "ब्राह्मणो यजेत" इत्यादि श्रुति
अप्रमाण होगी। प्रलय हो तो जातिभग होगा । अत प्रलयको ही अमान्य
करना उचित है ।। ३५-३७ ।।
नन्वीश्वरात्समुत्पत्तावपि कर्मवशादिह ।
जातिभेदो भवेन्मय॑पशुपक्ष्यादिभेदवत् ॥ ३८॥
सदसत्तदसिद्धत्वाद् मङ्गश्चेनियमस्य तु।
प्रलयस्यैव भङ्गोऽस्तु योऽन्तर्गडुरुपेयते ॥ ३९ ॥
यदि ईश्वरवादी यह कहे कि ईश्वरसे भले सभी पैदा हो । किन्तु पूर्व-
कल्पीय कर्मवशात् कोई ब्राह्मण, कोई क्षत्रियादि होगा। जैसे ईश्वरसे पैदा होने
पर भी मनुष्य, पशु, पक्षी आदि भिन्न-भिन्न जाति कर्मवशात् हुई। तो यह
कथन असगत है । केवल कर्मसे जातिभेद असिद्ध है । जन्मभेदसे ही जाति-
भेद होता है । जन्मभेदसे जातिभेद इस प्रत्यक्षनियमको तोडनेकी अपेक्षा
इस अप्रत्यक्ष निरर्थक प्रलयका ही भग क्यो नही करते ॥ ३८-३९ ॥
ननु वेदेषु निर्दिष्टा देवा हरिहरादयः ।
सत्य तदेवतात्वेन न त्वीशत्वेन चोदिताः॥४०॥
द्रव्यत्यागसमुद्देश्या उद्दिश्य यदि देवता ।
यागादि क्रियते चेत् तत्कर्म स्यात् फलदातृ वः ॥४१॥
पूर्वपक्ष -वेदोमे शिव, विष्णु आदि सबका निर्देश आया है।
"विष्णवे शिपिविष्टिाय द्वादशकपाल निर्वपति" इत्यादि वाक्य अर्थवाद
नहीं है । उत्तर --ठीक है, किन्तु शिव, विष्णु आदिको देवताके रूपमें
वताया है। ईश्वरके रूपमे नही । जिसको उद्देश्यकर द्रव्यत्याग (होम) किया
जाता है वह देवता है। उसके उद्देश्यसे यागादि करेंगे तो कर्म सफल
होगा। इसमे जगत्सृष्टिकर्ताके रूपमे ईश्वरप्रतिपादन रहा है । ॥४०-४१।।
अत्रोच्यते सावयवा सजन्मानो भवन्त्यमुम् ।
नियम हसि नियमपक्षपाती कय स्वयम् ॥ ४२ ॥

६८ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पष्ठः मीमांसकोंके प्रति उत्तर यह है कि आप इतने भारी नियमपक्षाती हैं तो सावयव सजन्मा होता है इस नियमको क्यों तोड़ने लगे? ॥ ४२ ॥ नियम सापवाद चेत्त्वमप्यन्युपगच्छसि । प्रलयं शास्त्रसंप्रोक्तं त्यक्तुमुत्सहसे कुतः ॥४३॥ ब्राह्मणाद ब्राह्मणोत्पत्तिः कुत एव नियम्यताम् । वीजादेव तरूपत्तिः कुतोऽयं नियमोऽपि ते ॥४४॥ प्रथमा सृष्टिरोशात स्यात् सृष्टात्सृष्टिस्ततःपरम् । सजातीयात् सजातीया द्वितीयादौ नियम्यते ॥ ४५ ॥ दधि स्याद्दधियुकक्षोरात्तच्च दध्यन्तराधि । आद्यं दधि फथं जातं किमनादीप्यते दधि॥ ४६ ।। सावयव सजन्मा होता है इस नियमका अपवाद यदि आप मानते हैं तो शास्त्रोक्त प्रलयका भी खण्डन क्यों करते हैं ? ब्राह्मणसे ही ब्राह्मणकी उत्पत्ति, बीजसे वृक्षोत्पत्ति इत्यादि नियमोंका भी अपवाद हो सकता है। प्रथम सृष्टि विना किसी नियम ईश्वरसे हुई। आगे सजातीयसे सजातीयकी सृष्टिका नियम चला । ऐसा माननमें क्या आपत्ति ? । दूधमें दही जामन डालते हैं तो दही बनेगा परंतु आतंचन दही उससे पूर्व आतंचन दही सहित दूधसे बना। इस नियमको यदि आप मानते हैं तो दहीको भी अनादि पदार्थ मानना पड़ेगा ( किन्तु ऐसा नहीं होता। प्रथम दही उपाया- न्तरसे बन जाता है। फिर दहीसे दही यह नियम चलता है ) ॥ ४३-४६ ।। बृहदारण्यकोक्तं धात्मानमपातयत्। ततः पतिश्च पत्ती च मर्त्य हेतू बभूवतुः॥ ४७ ॥ घडवैकेतरोऽश्वोऽमूदितिरीत्या महेश्वरः। एफ एवाभवन्नाना यिनेषि प्रलयात् कुतः॥४८॥ अध्यापयत् स सर्गादो वेदान् ब्रह्माणमीश्वरः । ततस्तदर्थमपि ते न भयं युज्यते सखे ॥ ४९ ।। यो ब्रह्माणं व्यधात् पूर्व तस्मै वेदांश्च प्राहिणोत् । इत्येवं श्रुतिरप्याह कुतो मीः प्रलयात्तव ॥ ५० ॥ स एव सकलं बीजमकरोद्भगवान शिवः । तस्मिन् परिसमाप्तिः स्यान्नियमानामशेषतः ॥५१॥ वृहदारण्यकवचन है कि उस परमात्माने अपनेको द्वैधा किया। उससे पतिपत्नी हुए। उससे फिर मनुष्यजाति हुई। इधर एक घोड़ी, दूसरा घोड़ा हुआ। उससे यश्वजाति हुई । इसरोनि एक ही परमात्मा नाना हुए।

श्लोक:] स्पन्दवार्तिकसहितम् तव प्रलयसे क्या भय? उसी परमात्माते सर्गादिमे ब्रह्माको वेदोपदेश दिया। अत वेदाध्ययनपरम्परानाशभयसे भी प्रलयको न मानना बेकार है। 'यो ब्रह्माण विदधाति पूर्व" इस श्रुतिमे उक्त अर्थ स्पष्ट भी है। उसी परमेश्वरने सभी वृक्षादि वनाये कहो या सभी बीज बनाये कहो । जैसा भी हो समस्त नियम परमेश्वरमे समाप्त हैं ।। ४७-५१ ॥ अधिष्ठातार कि० साख्याः प्रत्यवतिष्ठन्ते प्रलय मन्महे वयम् । प्रकृतिर्जगतः की सर्वबोजात्मिका हि सा ॥५२॥ विश्व सृजति मोगार्थमपवर्गामाहरेत् । भोगापवर्गदा सैपा सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ।। ५३ ।। अज्ञानात्संसरेज्जीवो ज्ञानाच्चैव विमुच्यते । ईश्वरस्यात्र किंचिच्च नैव कार्यमवेक्ष्यते ॥ ५४॥ प्रथम पादसे मीमासकमतापाकरण हुआ। वहां साख्य खडे हो गये। वे कहने लगे गुणोकी साम्यावस्थारूप प्रलयको हम मानते हैं। जगत्का प्रादुर्भाव भी मानते है । किन्तु प्रकृति ही जगत्को बनायेगी (ईश्वर नहीं)। प्रकृति सर्वजगतवीजरूपिणी है । जीवोके भोगके लिये वह विश्वसर्जन करती है । अपवर्ग ( मोक्ष ) जब देना है तो सृष्टि कार्यसे उपरत होती है। यही प्रकृति भोग तथा अपवर्ग देनेवाली है। यही प्रकृति जगत् सृष्टिस्थितिलय- कारिणी भी है। अज्ञानसे जीव ससारमे पडता है, ज्ञानसे मुक्त होता है। इस प्रक्रियामे ईश्वरका कोई काम देखनेमे नही आता है ।। ५२-५४ ।। अनोच्यते कयं सृष्टिरधिष्ठातारमन्तरा। न चित्रं फर्गले क्वापि प्रकृति कुरुते स्वयम् ॥ ५५॥ सास्यमतका उत्तर दिया "अधिष्ठातार कि" इत्यादि मूलमे । अधिष्ठाताके विना सृष्टि कैसे हो? किसी कागजपर कोई चित्र स्वय प्रकृति बना डालती हो ऐमा देखनेमे नहीं आया। आपने मतके अनुसार तो स्वभावत. रग इधर उधरसे उडकर आते और कागजपर राम, कृष्ण, देवदत्त, यमदतादिषा दिन बन जाता॥५५॥ प्रागट्याख्यातदिशा सय सव्यवस्थं चराचरम् । किमजा प्रकृतिः कुर्यादावश्यस्यधिपं विना ॥ ५६१ हम पहले व्यास्या कर चुके हैं कि जहाँ वालक पैदा हुआ वहाँ स्तन्य तैयार है. हिमालयमे ठठी है तो वहकि पशु आदिके लम्बे घने बाल हैं। इस आवश्यकताके ज्ञानके विना अन्न प्रकृति इस प्रकार व्यवस्थित ससारको कैसे बना सकती है? ।। ५६ ।।

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पष्ठः यथायोग्यविधिज्ञः सन् व्यवस्थितिकरः प्रभुः। फर्ता यो नाम भवति सोऽधिष्ठाता निगद्यते ।। ५७ ॥ एतत्सर्व यदि भवान् प्रकृती मन्यते तदा। ईश्वरं चेतनं ब्रूपे प्रकृति नाममेदतः ॥ ५८॥ नाशब्दमीक्षतेः स्रष्ट्रित्येवमाह स्म सूत्रकृत् । भगवत्पादभाष्ये च तत्तात्पर्य स्फुटीकृतम् ॥ ५९॥ पराकान्तं बुधैरत्र बहुधेति विरम्यते। अधिष्ठाता तत: सिद्धो जगतोऽस्य महेश्वरः।। ६० ।। अधिष्ठाता उसी कर्ताको कहते हैं जो आवश्यकताको समझता हो, व्यवस्था करता हो और समर्थ हो । ये सारी बातें यदि प्रकृतिमें आप मानते हैं तो चेतन ईश्वरका नामान्तरमात्र प्रकृति होगा। "ईक्षतेनशिब्द" इस सूत्रमें और उसके भगवत्पादीय भाष्यमें ये सभी बातें स्पष्ट की गयी हैं । विद्वानोंने इसपर पर्याप्त विचार भी किया है। अतः हम विस्तार नहीं करते। इस जगतका अधिष्ठाता महेश्वर है इतनी बात तो सिद्ध हो ही जाती है ।। ५७-६०॥ अनीशो वा कुर्याद् प्रत्यवास्थिषतान्ये चाप्यास्तिकत्वेन कोतिताः । शववैष्णवशाक्ताद्याः परस्परविरोधिनः॥६१॥ पुराणान्तरमग्राह्यं नेक्ष्यं शास्त्रान्तरं तथा। विष्णुशिवयोरंक्यं कथंचिद् गुणभेदतः ॥ ६२ ॥ एवं परिच्छिन्नविदोऽपरिच्छिन्नेशदूरगाः। अनीशमेव करिं जगदुर्वलात् ।। ६३ ॥ शैव, वैष्णव, शाक्त आदि जो आस्तिक कहलानेवाले हैं. कहते है कि ( स्वपुराणसे ) अन्य पुराणोंको पढ़ना नही चाहिये । शास्त्रान्तर देखना नही चाहिये । शिव और विष्णु कभी भी एक नहीं हो सकते। वे परस्पर विरोधी वातें करते हैं । परिच्छिन्नदर्शी वे अपरच्छिन्न ईश्वरसे दूर रहते हैं । मनीवरको ही बलपूर्वक जगत्कर्ता मानते है ।। ६१-६३ ॥ नन्योरात्वं कथं तेषां भेदमानेण हीयते । उच्यते भेदिनां प्राहानीशत्वं शास्त्रमेव यत् ॥ ६४ ॥ शङ्का होगी-शिव, विष्णु आदिके भेदमात्रसे ईश्वरत्वकी हानि क्यों होगी ? ईश्वरत्वमें प्रयोजक सामर्थ्य है, न कि भेदाभाव । समाधान है कि शास्त्र स्वयं कहता है कि ईश्वर भेदवाला नहीं है । ६४ ॥ जगतः श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् ७१ यत्र पश्यति नैवान्यन्न चवान्यच्छृणोति हि । स भूमा मर्त्यमल्पं यदित्येवं श्रुतिरब्रवीत ॥ ६५ ॥ जहाँ अन्यको नही देखते, अन्यको नही सुनते वही भूमा परमेश्वर है, जो परिच्छिन्न है वह मर्त्य-मरणशील है ऐसा श्रुतिवचन है ।। ६५ ॥ येऽप्यन्यदेवता मक्ता इत्येवं भेदशिनः। उपक्रम्याब्रवीन कृष्णो गीतायाम नं प्रति ।। ६६ ॥ न तु माममिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते। इत्यादिकं ततोऽनीशा विष्ण्वाद्या भेदयोगिनः॥ ६७ ॥ गीतामे भी "येप्यन्यदेवता भक्ता" इस प्रकार भेददर्शियोंका उप- क्रमकर भगवानने कहा है वे मुझे ठीक तरहसे नही जानते अत. वे पतित होते हैं । इससे भेददर्शनके विषय विष्णु मादि अनीश्वर हैं यह सिद्ध होता है ।। ६६-६७ ॥ ईशस्तु शिवमद्वतं शान्तमित्यागमोदितः। देवानेव भजन्त्येते वैष्णवाद्या न संशयः ॥ ६८।। ईश्वर तो "शान्तं शिवमद्वत" इस श्रुतिमे कथित द्वैतभेदजित शिव ही है। वैष्णवादि तो "देवान् देवयजः" इस गीतोक्त देवताओंका ही भजन करते हैं, ईश्वरका नही ।। ६८॥ परिच्छिन्नस्य मर्त्यत्वातदुत्पादयिता नु कः। अपरिच्छिन्न एवासावनवस्थान्यथा भवेत् ॥ ६९ ॥ परिच्छिन्नको श्रुतिने मर्य बताया। मृत्युग्रस्तको उत्पन्न करनेवाला कोई दूसरा मृत्युग्रस्त हो तो अनवस्था होगी। अत अपरिच्छिन्न ही ईश्वर है ॥ ६९ ॥ नन्वीशं व्यापकं घूमो विष्ण्यादिमिति चेत्तदा । नासौ गोलोकवकुण्ठदेशभेदनिरुद्धभूः ॥ ७० ॥ व्यापकस्य न चाकारः कल्पितादन्य इप्यते । शिवादिश्च तथैवेति मेदवार्ता गता तव ।। ७१ ॥ हम विष्णु आदिको व्यापक मानते हैं, परिच्छिन्न नही, ऐसा यदि वे कहते हैं तब इन्हे गोलोकवासी, बैकुण्ठवासी ऐसे देशविशेपस्थित नही कहना चाहिये । व्यापक आकाशका कोई आकार या हाथ पांव नहीं होता। वैसे व्यापक ईश्वरका भी वास्तविक याकार नहीं होगा। कल्पित साकार होगा। तब शिव दुर्गा आदि भी व्यापक हैं, आकार कल्पित हैं तो शिव- विष्णुका भेद कहाँ रहा ? ॥ ७०-७१ ॥

७२
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[पप्ठः
व्यापकानामनेकेपी विष्ण्वादीनां प्रफल्पना।
सर्वशास्तविरुद्धत्वान्मूढानामेव शोभते ॥७२॥
सर्वभूतेषु गूढोऽयमेको देव इति श्रुतेः।
नानात्वकल्पना व्यर्या नानाकारास्तु कल्पिताः ॥७३॥
पदि कहें कि व्यापक ही अनेक देव शिवविष्णु आदि है तो यह सर्व
शास्तविरुद्ध मूढकल्पनामान है । "एको देवः सर्वभूतेषु गूढः" ऐसी श्रुति
है । नानाकार स्वेच्छया कल्पित है ॥ ७२-७३ ।।
असण्डमपरिच्छिन्नं भेदनयविजितम्।
चैतन्यमोशः स शिवो विश्वं जनयतीश्वरः ॥७४ ॥
साराश यही है कि अखण्ड अपरिच्छिन्न विविध भेदवजित चैतन्य
ही ईश है. वही शिव है, वही ईश्वर विश्वका स्रष्टा है ।। ७४ ।।
इमान् सावयवाल्लोकान् जनयन्तं कृपानिधिम् ।
अधिष्ठातारमीशानं नमामस्तं सुनिश्चिताः॥७५॥
इन समस्त सावयव लोकोको उत्पन्न करनेवाले अधिष्ठाता दयामय
ईश भगवानको निश्चितमति होकर हम प्रणाम करते हैं ।। ७५ ।।
इति श्री काशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृती।
महिम्नः स्तोगविवृतो स्पन्दः पप्ठोऽयमुज्ज्वलः ॥७६ ॥
-
सप्तमः श्लोकः
ननु नास्तिकवत् किं नु सारख्यमीमांसकादयः।
वैष्णवाद्यान्न पतनमृच्छन्ति शुभकारिणः ॥१॥
पूर्वश्लोकमे द्वितीय व्यारयाके अनुसार मीमासक, सास्य एव वैष्ण-
वादि सभी मन्दमति ही सिद्ध हुए तो नास्तिकोंके समान वे भी पतनको प्राप्त
होते हैं क्या? यह बात नही जंचती। क्योकि ये सभी शुभकारी माने
जाते हैं ।।१।।
अत्रोच्यते न हि क्वापि वेदमार्गावलम्बिनः ।
ऋच्छन्ति पतनं किचिदपि ध्यत्यस्तबुद्धयः॥२॥

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् उक्त गङ्काका समाधान यह है कि कुछ कुछ मति विभ्रम होनेपर भी वेदमार्गावलम्बी कही पतित नहीं होते ॥ २॥ वेदमार्गावलम्बित्वाच्छुद्धसत्याः क्रमेण ते। विज्ञाय परमं तत्वं विमुच्यन्ते विलम्बतः ॥ ३ ॥ वेदमार्गावलम्बी होनेसे धीरे धीरे वे भी शुद्धान्त करण बनेगे । फिर शास्त्र और आचार्यकृपासे परमतत्वको भी जानेंगे। भले विलम्ब हो लेकिन अन्तमे मुक्त हो ही जायेगे ॥ ३ ॥ तेऽपि मामेव फौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् । इत्युक्तवादोशयजि वैयसिंमवादपि ॥४॥ भगवानने ही बताया कि अन्यदेवताकी उपासना करनेवाला भी अविधिपूर्वक मेरी ही पूजा करता है। तब परिच्छिन्न विष्णु आदि पूजा भी अविधिपूर्वक ईशपूजा ही हुई। ईशपूजाका वैययं तो हो ही नहीं सकता ।।४।। न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गति तात गच्छति । इति चोक्तेः क्रमेणयामप्युद्धारो मवेत्सताम् ॥५॥ "कल्याणकर्मकारीकी दुर्गति नहीं होती" इस वचनसे यदि वे सत् पुरुप है तो अवश्यमेव क्रमश उनका उद्धार होगा ॥ ५॥ तदेतद्दर्शयन्नेव पुष्पदन्तो महानुनिः। अशेषशास्त्रतात्पर्यमपि सूचयतीश्वरे ॥ ६ ॥ इस वातको दिखाते हुए महामुनि पुष्पदन्त समस्त शास्त्रोका तात्पर्य भी ईश्वरमे सूचित करते हैं ॥ ६ ॥ त्रयो सांख्यं योगः पशुपतिमत वैष्णवमिति प्रभिन्ने प्रस्याने परमिदमदः पथ्यमिति च । रुचीनां पैचित्र्याजुकुटिलनानापथजुषां नृगामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥७॥ मीमासा, सात्य. योग, पाशुपत, वैष्णव इस प्रकार मिन्न-भिन्न प्रस्थानो (दर्शनो) मेसे कोई कहता है यह मत ठीक है, दूसरा कहता है यह मत हितकारी है इस प्रकार रुचिवचित्र्य होनेसे सीधे टेढे नाना मासे चलनेवाले लोगोके लिये चाहे वह इनमे कोई भी हो, एकही गन्तव्य स्थान आप है, जैसे सीधे टेढे चलनेवाले नदीनालोके लिये गन्तव्यस्थान एक ही समुद्र है ।। ७॥

७४
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[ सप्तमः
त्रयो
प्रयोति वेदत्रय्युक्ता मोमांसाऽतश्च गम्यते ।
द्विविधा सा च मीमांसा कर्मबह्मार्थमेदतः ॥७॥
त्रयीका तीन वेद अर्थ है। उससे मीमांसा गम्यमान है। मीमांसा
दो है । कर्ममीमांसा और ब्रह्ममीमांसा ॥७॥
द्विधा च कर्ममीमांसा सेश्वरा च निरीश्वरा ।
उभयोरत्र मतयोः संग्रहो मुनिना कृतः ॥ ८॥
कर्ममीमासा भी सेश्वर तथा निरीश्वर भेदसे दो प्रकारको है । दोनों
मतोंका यहां सग्रह है ॥ ८॥
फलदानप्रतिभुवं ये बुद्ध्वा कर्मणीश्वरम् ।
कुर्वन्ति वैदिकं फर्म सेश्वरास्ते प्रकीर्तिताः ॥९॥
ईशकारुण्यमासाद्य कदाचिल्लब्धदेशिकाः।
तत्त्वं विज्ञाय गच्छन्ति शैवं ते परमं पदम् ॥ १० ॥
सेश्वर मीमांसक वे है जो परमेश्वरको कर्मफलदाता समझकर वैदिक
कर्म करते है । कदाचित् भगवत्कृपासे वे सद्गुरु पाकर तत्त्वज्ञ बनते हैं और
शैव परमपदको प्राप्त होते हैं ।। ९-१०॥
यत्करोपोत्यादिवचसामप्टकादिस्मृतेरिय
प्रामाण्यमुररीकृत्य कुर्यु: कपिणं तु ये॥११॥
ते शुद्धमानसाः सन्तः क्रमाज्ज्ञानमवाप्य च ।
गच्छन्ति शिवमत पन्या तेषामृजुर्भवेत् ।। १२ ।।
अयमेव यतः पन्था वेदान्तेषु निरूपितः।
यविविदिपन्तीति पेठुर्वाजसनेयिनः॥१३॥
अष्टकादि स्मृतिके समान “यत्करोपि यदश्नासि" आदि स्मृतिका
प्रामाण्य स्वीकारकर जो कर्मोको भगवदर्पण करते है उनका अन्तःकरण
शुद्ध होता है, क्रमेण ज्ञान प्राप्त होता है और अन्तमें शैव परम पदको वे
प्राप्त होते हैं । यह ऋजुमार्ग ही है। क्योकि वेदान्तमें यही मार्ग बताया
है। "विविदिपन्ति यज्ञेन दानेग" इत्यादि श्रुति है ।। ११-१३ ॥
तस्मात्कुटिलमार्गस्थाः सकामा एव फर्मिणः ।
कादाचित्कगुरुप्राप्त्या येपामुद्धारसंमवः ॥१४॥
इसलिये सकाम कर्मी ही कुटिल मार्गगामी है । कदाचित सदगुरु
प्राप्ति से उनका उद्धार हो सकता है। जैसे कि पहले दरसाया ॥ १४ ॥

७५
श्लोक:]
स्पन्दवार्तिकसहितम्
निरीश्वरापि मीमांसा देवतास्तित्ववादिनी।
कि च सत्कर्मतात्पर्यान्नवैषा पतनोन्मुखी ॥ १५॥
कुसीदाय गतः कश्चित काशी भागीरथीजलम् ।
दृष्ट्या स्पृष्ट्वा परं पुण्यं प्राप्नोत्येव तथात्र च ॥१६॥
निरीश्वर मीमांसामे भी देवताका अस्तित्व माना ही गया है।
मन्त्रात्मक ही देवता इस पक्षमे आखिर सत्कर्म करनेमे तात्पर्य होनेसे वह
पतनाभिमुख तो नही ही है। जैसे कोई उधार दिये धनका व्याज लेनेके
लिये ही काशी गया था। फिर भी उसने गगाका दर्शन और स्पर्श कर
लिया । उसका पुण्य उसको मिलेगा ही। वैसे स्वर्गार्थ कर्म करते हुए भी
वेदोच्चारण स्मरणादि पुण्य यहा भी होगा। १५-१६ ॥
नन्वीश्वरं विधुवतः पापमेव भवेदतः ।
कथमुद्धारशङ्कापि विधातुं शक्यते किल ॥ १७ ॥
सत्यं परं वेदपुण्यं महदेवाभ्युपेयते।
तस्मान्मीमांसकानामस्त्युद्धारसुपिरं स्फुटम् ॥१८॥
ईश्वराऽमानिनोऽप्येवाधीयोरन् स्वर्गकाम्यया ।
वेदानित्येव तात्पर्य तत्प्रवर्तनकारिणाम् ॥ १९॥
पूर्वपक्ष :-ईश्वरका जो खण्डन करते है उन महापापियोकी उद्धार-
शका ही कहां हो सकती है ? उत्तर:-वेदाध्ययनपुण्य भारी माना गया है।
अतः वह भीमासकोंके उद्धारका सुपिर है। निरीश्वर मीमासा मत प्रवर्तक
आचार्योका इतना ही अभिप्राय है कि ईश्वरको न माननेवाले भी कमसे
कम स्वर्गेच्छासे वेद तो पढें ॥ १७-१९ ॥
नन्वनादौ हि संसारे धर्माधर्मप्रवृत्तितः।
जन्ममृत्युसुखादीनां प्राप्तिः सकलसम्मता ॥ २० ॥
वेदाधोतिकृतो धर्मः संसारस्यव कारणम् ।
अनधीतधुति कंचिज्जीवात्मान न मन्महे ॥२१॥
सप्तान्नसर्ग विस्पष्टं जगदुत्पत्तिकारणम् ।
कर्मोपास्ती विनिष्टि ततश्चेतत्समर्थनम् ॥ २२ ॥
कपूययोनिगमनं स्वर्गान्ते कर्मिणामपि।
श्रूयते तेन
सामान्यं वेदाध्ययनमीयते ॥२३॥
संसारे वा तदुद्धारे न काचित्पक्षपातिता।
प्रय्यास्ततः कथ तस्या एको गम्यो महेश्वरः ॥२४॥

श्री शिवमहिम्न. स्तोत्रम् [ सप्तमः पूर्वपक्ष .-अनादि ससारमे धर्म एव अधर्मकी प्रवृत्तिसे ही जन्म, सुख, दुःखादिकी प्राप्ति होती है यह सर्वसम्मत है। तव वेदाध्ययनपूर्वक जो धर्म किया वह ससारका ही कारण सिद्ध हुआ। केवल अधर्मसे नरक- पतन भले हो पर यह प्रत्यक्षससार तो धर्माधर्मजन्य ही है। अतएव अनादिकालसे सर्वथा वेदाध्ययनसे शून्य कोई जीवात्मा ही नहीं है यही हम मानते है ( क्योकि नरक जानेके लिये भी मनुष्यजन्मकृत पाप चाहिये। और मनुष्यजन्म पुण्यपाप उभयसे होगा। ) बृहदारण्यकमै सप्तान्नसर्गप्र- करणमे कर्म और उपासनाको ही ससारकारण वताया भी है। कर्मसे स्वर्ग जानेवालोमे पतनोत्तर कपूययोनि ( सूकरश्वानादि योनि) को प्राप्त होनेवाले भी बहुत हैं, ऐसा थुतिमे कहा है। अत एव वेदोकी ससार या संसारोद्धार दोनोमे सामान्यगति है । तव रयीका एक ही गम्य परमेश्वर है यह बात कैसे ? ॥ २०-२४ ।। सत्य न कारको वेदो ज्ञापकस्तूपगम्यते । धर्मादोन कुर्वतःस्वोक्तान ससृतीस्वं न दोषयुक्॥२५॥ स्वोक्तानधर्मास्त्यजतो धर्माश्वाचरतः सतः। स्वपुण्येन शिवप्राप्तिरिति तस्य सदाशयः ।। २६ ।। उत्तर- वात सत्य है। किन्तु यह स्मरण रहे कि वेद कारक नही, ज्ञापक है। वेदमे धर्म और अधर्म बताया। किसीने दोनोको किया और उससे ससार पाया तो वेदका क्या अपराध? वेदोका यही सदाशय है कि अपनेमे दरसाये अधर्मको छोडकर लोग धर्माचरण करें। कर्म सकाम होने पर भी वेदाध्ययनपुण्य पृथक् है ही। उससे शिवप्राप्ति होगी ॥ २५-२६ ।। द्वितीया ब्रह्ममीमाता भगवद्व्यासदशिता । ऋजुमार्ग. स सप्रोक्तो वेदान्तार्थविचारणा ॥ २७ ।। चव निदिध्यासनमेव च । विचारात्यानि कुर्वद्भिगम्यते परम पदम् ॥ २८॥ अयोपदके अर्थ दो मीमासाओ मे द्वितीय ब्रह्म मीमासा है। भगवान वेदव्यासजीने उसे बनाया। वेदान्तार्थ विचाररूप वह मीमासा जुमार्ग है ऐसा विद्वान मानते है । श्रवण, मनन और निदिध्यासन, जिनको विचार भी कहते है करने वाले परमपद को प्राप्त होते है ।। २७ २८ ॥ यौव परम सत्य विज्ञानानन्दलक्षणम् । दृश्य जडं परिच्छिन्न न जगत् पारमार्थिकम् ॥ २९ ॥ धवण मनन श्लोक ] स्पन्दवातिकसहितम् ७७ घटादिषु सती मृत्स्ना सद् ब्रह्म व जगत्यपि। शिव शान्त तदद्व तमिति वेदन्तडिण्डिम ॥३०॥ ब्रह्म ही परम सत्य है, वह विज्ञान एव आनन्दस्प है । यह दृश्यमान, परिच्छिन्न, जड जगत् पारमार्थिक नही है । घटादिमे यथार्थत मिट्टीको ही सत्ता है वैसे जगत्मे भी ब्रह्म की सत्ता ही है । वही शान्त अद्वैत शिव है ऐसा वेदान्त का उद्घोप है ।। २९-३०॥ न जीवपरयो द स्वतो होपाधिफस्तु स । अनुपाधि पर ब्रह्म जीवेशौ मायया कृतौ ॥ ३१॥ मायाप्टिसमप्टिम्या स्याता प्राज्ञेश्वरौ हि तो। सूक्ष्मव्यष्टिसमष्टिम्या तेजस सनमेव च ॥ ३२ ॥ स्थूलव्यष्टिसमष्टिम्या विश्ववैश्वानरौ मतौ। मायामिथ्यात्वत कार्य स्थूलसूक्ष्मादिक तथा ॥३३॥ तवाधे जगतो बाधादेकमेवावशिष्यते। तत्रवाखिलवेदान्ततात्पर्य नानरे क्वचित् ॥ ३४ ॥ तत्त्वमस्यादिभिर्वाक्यर्भाव त्यागपुर सरम् । श्रुत्वा मत्वा निदिध्यास्य पर ब्रह्माधिगच्छति ॥ ३५ ॥ जीवात्मा और परमात्माका औपाधिक भेद है वास्तविक नहीं। निरुपाधि चित् ब्रह्म है । माया से जीव और ईश्वर हुए। मायाको व्यष्टिसे प्राज्ञ और समप्टिसे ईश्वर हुए। सूक्ष्म जगत्की व्यष्टिसे तैजस समप्टिसे हिरण्यगर्भ हुए । स्थल जगत्को व्यप्टिसे विश्व और समप्टिसे विराट् हुए। मायाके ही सूक्ष्म और स्थूल कार्य हैं। याया मिथ्या होनसे वे भी मिथ्या है । मायाके वाधस जगत्का वाध हुआ तो एक अद्वितीय ही अवशिष्ट रहेगा । उसीमे समस्त वेदातोका तात्पर्य है मिथ्या जगत्मे नहीं। तत्त्वमसि आदि वाक्यस भागत्यागकर श्रवणमनननिदिध्यासन करनेपर परब्रह्मस्पेण स्थितिरूप शिवप्राप्ति होती है ॥ ३१-३५ ।। निर्गुणोपासना या तु वेदान्तेषु निरूपिता। मापि प्रमोपदार्थ म्यानर्जुन कुटिलापि सा॥ ३६॥ नानापदमत प्रोक्त मध्यमार्गररुत्लया। पुष्पदन्तेन मुनिना तारताम्पादनेकधा ॥ ३७॥ निर्गुणोपासना भी नयीपदका अर्थ है। उपनिपदोम उसका प्रति पादन है । वह जु भी नही बहुत कुटिल भी नहीं। मध्यमार्ग है। उसके सग्रहार्थ ही मूलश्लोकमे नानापद है। थोडा सोधा ज्यादा कुटिल, थोडा ।

श्री शिवमहिम्न. स्तोत्रम्
[सप्तमः
कुटिल ज्यादा सीधा इस प्रकार मध्यमार्गमें तारतम्य है। अतः मध्य न
कहकर नाना कहा ॥ ३६.३७॥
जगन्मिथ्यात्वबोधेन विनय परमं शिवम् ।
घ्यायतस्निपुटोभावा निर्गुणोपासना मता ॥ ३८॥
संप्रवाध्य जगत्सर्व ध्यातृध्याने विहाय च ।
ध्यायतोऽद्वैतमा
तु निदिध्यासनमिप्यते ॥ ३९ ।
निर्गुणोपासना और निदिध्यासनमे फरक यह है कि उपासनामे जगत्-
बाध नहीं होता, त्रिपुटीभाव रहता है। निदिध्यासन जगत्वाधपूर्वक होता
है, ध्याता और ध्यानके बिना ध्येयमानविषयक होता है ॥ ३८-३९ ।।
संवादिभ्रमवद् ब्रह्मोपास्त्या कालविलम्बतः।
विज्ञाय तत्वं पुरुषः प्राप्नोति परमं शिवम् ॥ ४० ॥
विचारे स्वपनीयव प्रतिबन्धान् महामतिः।
साक्षादेवर्जुमार्गेण प्राप्नोति परमं शिवम् ।। ४१ ।।
उपासना सवादिभ्रमके समान है, भ्रमसे प्रमापर पहुंचकर कालवि-
लम्बसे उपासक परमशिवको प्राप्त होगा। विचारमे तो प्रतिवन्धोको
हटाते हुए साक्षात् ऋजुमार्गसे परमशिवको प्राप्त होगा ।। ४०-४१ ॥
सांख्यं
अथ सांख्यं द्विधा तच्च सेश्वरं च निरीश्वरम् ।
श्रीमद्भगवतायुक्तं सेश्वरं कापिल मतम् । ४२ ॥
निरीश्वरं पुनध्यक्ताऽव्यक्तप्रज्ञविवेकतः ।
प्रकृत्या फ्रियते मोक्ष इत्यासुरिमुखोदितम् ।। ४३ ॥
अब साख्यमत सुनिये । साख्यमत भी मीमासाके समान सेश्वर तथा
निरीश्वर दो प्रकारका है । श्रीमद्भभागतमे देवहूतिको कपिलने जो तत्वो-
पदेश किया वह सेश्वर साख्य मत है। कपिल भगवानके शिष्य आसुरि
नामके मुनि हुए। उन्होंने निरीश्वर साख्य प्रवर्तित किया । उनका कहना
है कि व्यक्त, अव्यक्त प्रकृति और प्रज्ञ पुरुषका विवेक ज्ञान कराकर प्रकृति
ही मोक्ष दिला देती है ४२-४३ ।।
प्रकृतित्विविकृतिस्तदव्यक्तमितोरितम्
महदाद्यास्तु प्रकृतिविकृत्युमयरूपिणः॥४४॥
महत्तत्वमहंकारस्तन्मात्राः पञ्च सप्त ते।
योडश स्युविकृतयो न ताः प्रकृतपो मताः॥ ४५ ॥

श्लोकः]
स्पन्दवातिकसहितम्
एकादशेन्द्रियाणां
स्यादहंकारात्समुद्भवः।
धोत्रत्वगक्षिरसनाघ्राणाः ज्ञानेन्द्रियाण्यमो॥
वाक्पाणिपादपायूपस्थाः स्युः कर्मेन्द्रियाण्यमी ॥४६ ॥
मनश्च कादशं प्रोक्तमय
तन्मात्रसंभवम् ।
पृथ्व्यप्तेजोमरुद्व्योमसंज्ञकं मूतपञ्चकम् ॥४७॥
एतत्योडशसंख्याकं प्रागुक्त सप्तकं तया ।
व्यक्तमित्युच्यते शास्त्रे पञ्चविंशस्तु पूरुषः ॥४८॥
नायं स्यात्प्रकृतितॊ वा विकृतिश्चेतनः पुमान् ।
असङ्गोऽप्यविवेकेन
संसारवन्धने ॥४९॥
विकृति प्रकृति चैव विविच्यासौ निजं यथा।
जानात्यसङ्गं तहाँव मुक्तो भवति संसृतेः॥५०॥
सांख्यशास्त्रपराम्यासवैराग्याम्यामयं सलु।
स्वरूपस्य विवेकाच्च तत्त्वं पश्यन् विमुच्यते ॥५१॥
व्यक्त-अव्यक्त प्रज्ञका विवेक उन्हीकी गणना आदिरूप साख्य विचारसे
होगा। प्रथम तत्त्व प्रकृति है, वह मूल है अर्थात् विकाररूप नहीं है,
वही अव्यक्त है । बादमे सात प्रकृतिविकृति उभयरूप हैं। महत्तत्व,
अहकार, शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध तन्माना ये सात हैं। इसके बादमे होने
वाले सोलह केवल विकृति हैं। किसीकी प्रकृति नहीं। अहकारसे उत्पन्न
ग्यारह इन्द्रिया और पचतन्मात्रासे उत्पन्न पञ्चमहाभूत ये सोलह है।
श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना, प्राण, ये पाच ज्ञानेन्द्रिय, वाक्, पाणि, पाद,
पायु, उपस्थ ये पाच कर्मेन्द्रिय और ग्यारहवा मन मिलानेपर एकादश
इन्द्रिय होते हैं । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश ये पाच भूत हैं । ये
सोलह विकृति और पूर्वोक्त सात प्रविविकृति ऐसे तेईस व्यक्त पदार्य
हैं । प्रज्ञ पुरुष प्रकृतिविकृति दोनो नही । वह चेतन असग है। अविवेकसे
ससारवधनमे वध गया है। विकृति (व्यक्त ) और प्रकृति ( अव्यक्त ) से
पृथक कर अपने को जब वह असग देखता है तभी मुक्त होता है। एतदर्थ
सास्यतत्त्वका परम अभ्यास और वैराग्य दोनो चाहिये । तव स्वरूपविवेकमे
तत्त्वदर्शन कर मुक्त होगा ।। ४.५१ ॥
ननु सेश्वरसांख्यानां प्रमुमक्तिस्दीरिता ।
ईशकारुण्यतस्तेषां शिवप्राप्तिश्च पूर्वयत् ॥५२॥
निरीश्वराणां नवेशकृपासंभावना मयेत्
न तेषां येदपुण्यं च तेषां गम्पः क्यं शियः॥५३॥

न
असङ्गचेतनात्मा
८०
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[सप्तमः
सत्यं पैराग्यमात्मानुचिन्तनं चेति ययम् ।
पुण्यमेव परं तेन तेषामोशकृपा भवेत् ॥ ५४॥
क्षणिक सफलं विश्व व्यपतमेतन्निरीक्ष्य ते ।
लमन्ते घनदारादिवराग्यं सांख्यकोविदाः॥ ५५ ॥
असङ्गमकलं शुद्धमात्मानं चिन्तयन्ति यत्
मोक्तृत्वेन विपर्यस्य परमात्मानमेव तत् ॥ ५६ ।।
फिच तेऽप्यास्तिकत्वेन निजाम्नायानधीयते ।
वेदपुष्पेन राहित्यमतस्तेषां युज्यते ॥ ५७॥
परमात्मसमीपग.।
ततः कुटिलपद्धत्या तेषां गम्यो महेश्वरः॥५८॥
पूर्वपक्ष –सेश्वर सास्योका सेश्वर मीमासकके समान ईश्वरकृपासे
शिवप्राप्ति हो सकती है। किन्तु निरीश्वर सास्योको शिवप्राप्ति कैसे?
निरीश्वर मोमासक तो वेदमीमासासे वेदपुण्य प्राप्त करेगा। किन्तु
निरीश्वर साख्य तो प्रकृतिपुरुपमीमासा करता रहता है। उसको वेदपुण्य
भी कहासे होगा ? उत्तर --यह कथन यथार्थ है। परतु सारयोमे वैराग्य
और अत्मचिन्तन ये दो पुण्य हैं ही, उससे भी ईश्वरकृपा हो जायेगी।
व्यक्त जगत्को क्षणिक देखते-देखते धनदारादिसे वैराग्य होता है। और
असग अकल शुद्ध आत्माका जो चिन्तन है वह भी आखिर परमात्मचिन्तन
ही है। केवल भोक्तृत्व की उन्हे भ्रान्ति है। फिर साख्य भी तो आस्तिक
है अर्थात् वेदप्रामाण्य मानते है। अत अपनी शाखाका अध्ययन जारी
रखेंगे, तो वेदपुण्य होगा नही ऐसा कैसे कह सकते हैं ? यह असग चेतन
आत्मा परमात्मा के नजदीक पहुँच भी जायेगा अत कुटिलमार्गसे उनको
भी शिव प्राप्य है ।। ५२-५८॥
- योग:-
योगः पातञ्जलः सोऽयं सेशसाख्याप्तम स्मृत ।
क्लेशाद्यसस्पृक पुरुषविशेष वदतीश्वरम् ॥ ५९॥
ईश्वरप्रणिधानेन
लब्धपुण्यः समाहितः।
तत्त्व द्रुतमभिज्ञाय योगी याति शिव परम् ॥६० ॥
यमस्तर्थव नियम
आसन
प्राणसयमः।
प्रत्याहारो धारणा च ध्यानं च ससमाधिकम् ॥ ६१॥
अष्टावङ्गान्यनुष्ठाय समाधि निर्विकल्पकम् ।
प्रविश्य
वासनायुक्तः प्रायः शुद्धमवेक्षते ॥ ६२॥

... श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् धर्ममेघसमाधिस्थः स्फुरद्वेदान्तवाश्यतः। विज्ञाय तत्वं मुच्येत ऋजुप्रायपयस्त्वयम् ॥ ३ ॥ महर्षि पतञ्जलि प्रोक्त योग प्रायः सेश्वर सांख्य मतके बरावर ही है। क्लेशकर्मविपाकआशयोंसे असंस्पृष्ट पुरुषविशेषको ही योगने ईश्वर बताया है। ईश्वर प्रणिधानसे पुण्य सम्पादन कर समाधिस्थ होता हुआ योगी तत्वको शीघ्र जानकर परशिवको प्राप्त होता है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और सविकल्पक समाधिरूपी आठ योगाङ्गोंका अनुष्ठानकर योगी निर्विकल्पक समाधिमे प्रवेश करता है। किञ्चित वासनायुक्त होनेसे वहाँ प्रायः शुद्ध महेश्वरको ही देखता है। धर्ममेघ समाधि लगनेपर उसके महापुण्यसे उसको वेदान्तवाक्योंकी स्फुरणा हो जाती है (स्वतः या गुरुसे ) । उससे परमतत्त्वदर्शन कर वह मुक्त होता है। यह मार्ग प्रायः ऋजु है । प्रायः इसलिये कहते है कि जगत्सत्यत्व वासना होनेसे वाक्यसे उसके वाधनमें विलम्ब होता है। अतएव निर्विकल्पक समाधिमे त्रिपुटीरहित शुद्ध चैतन्यदर्शन होनेपर वह प्रायः शुद्ध ही है। क्योकि जगत्सत्यत्ववासनासे उपहित है ।। ५९-६३ ।। पशुपतिमतं मतं पाशुपतं नाम पदार्यास्तत्र खल्विमे। कार्य च कारणं योगो विपिदुःखान्त एव च ।। ६४ ॥ जडजीवी मवेत्कार्य कारणं तु महेश्वरः। जीवस्येश्वरसंयोगो योगो भक्त्यादयो विधिः॥६५॥ अज्ञानाऽधर्मशक्तीनां नाशो दुःखान्त ईरितः। तदा पशुत्वहानिश्च शिवाह तस्थितिस्तथा ॥ ६६ ॥ पशुपतिमतमे कार्य, कारण, योग, विधि और दुःखान्त ये पांच पदार्थ है । जड जगत् और जीव कार्य हैं । कारण शिव है। जीवेश्वरसंयोग ही योग है। भक्तिआदि विधि है। अनान, अधर्म और आसक्ति इनका नाश दुःखान्त है । तब पशुत्वहानि और शिवाद्वैत होता है ।। ६४.६६ ॥ पाशवन्तो हि पसवः पाशः पञ्चविधो भवेत् । मलं फर्म च माया च रोघशक्तिः सविन्दुफा ॥ ६७ ॥ पशुका पाशयद्ध अर्थ है । मल, कर्म, माया, रोधदाक्ति औरविन्दु ये पांच पाश है।। ६७॥ मसमावरणं प्रोक्तं कर्म पर्मादिलक्षणम् । शक्तिः कलादिफन्माया हे त्वन्ते गियगे मते ॥१८॥ , ६

८२
.
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तमः
रोधशक्तिस्तिरोधानं विन्दुविधेश्वरादिकः।
कध्वंगे पातमयतो विन्द्वन्तः पाश ईरितः।। ६९।।
उनमें ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्तिका भावरण ही मल है, धर्म
अधर्म ये दो कर्म हैं । कला आदि की की शक्ति माया है। अन्तिम दो
शिवगत हैं । तिरोधान रोघशक्ति है । विद्येश्वर आदि विन्दु हैं । वे ऊपर
गये हुए हैं । अतएव पतनभय होने से पाशरूप हैं ।। ६८-६९ ।।
पाता पशूनां फर्मादिफलदाता महेश्वरः ।
स्वतन्यः परमानन्दचितिः पशुपतिः स्मृतः ॥ ७० ॥
पशुओंका (जीवोंका } रक्षक पति कर्मफलदाता स्वतन्त्र परमानन्द
चैतन्यरूप महेश्वर ही पशुपति है ॥७॥
विद्यां फ्रियां च योगं च चर्या चेति चतुष्टयोम् ।
आधितान् पाति जीवान् स ततः पशुपतिमतः ॥७१ ॥
विद्या मन्त्रादिविज्ञानं शिवसाक्षात्कृतिस्तथा ।
साङ्गपूजादिफविधिः क्रिया विद्याप्रयोजिका ॥७२॥
प्राणायामादयो योगाः क्रियासिद्धिप्रयोजकाः।
चर्या विधिनिषेधानुवृत्तिः पूर्वत्रयोपत् ।।७३ ।।
एतैश्च साधनयुक्तो मिथ्याज्ञानादिकं क्रमात् ।
तीर्वा पाशांश्च संछिद्य शिवत्वं प्रतिपद्यते ।। ७४ ।।
विद्या , क्रिया, योग और चर्या इन चारों को अपनाने वाले जीवपशु
की रक्षा करने से पशुपति है । इनमें मंत्रादिज्ञान और शिवसाक्षात्कार
दोनों विद्या हैं। विद्याका हेतु साङ्गपूजाविधि क्रिया है। उस क्रिया की
सिद्धिमें हेतु प्राणायामादि योग है। विद्या, क्रिया, योग इन तीनोंकी
उपकारिणी विधिनिषेधानुवर्तिता (विहितकरण और निपिद्धत्याग ) चर्या
है। इन साधनोंसे युक्त पुरुष मिथ्याज्ञानादिको क्रमेण पारकर, पाशोंको भी
छेदकर शिवभावको प्राप्त होता है ।। ७१-७४ ।।
भेददर्शनयुक्तत्वादिदं पाशुपतं मतम् ।
न मोक्षसाधनं साक्षादृजुनँषा स्मृतिस्ततः ॥७५ ॥
नात्यन्तकुटिलाप्यन्ते
शिवषयप्रतिपादनात् ।
ततो निर्गुणविद्य व मध्यमार्गात्मकं भवेत् ॥७६ ।।
शिवदीक्षां गृहीत्वा च पवाक्षरपरायणः।
शिवकारुण्यमान्नोतीत्येतदेशेध्यमत्र
तु ॥ ७॥

श्लोकः ] स्पन्दवातिकसहितम् ८३ दीयते ज्ञानसद्भावः श्रीयते पशुमावना। दानक्षपणसंयोगाहीक्षेति 'विनिगद्यते ॥ ७८॥ इस पाशुपतमतमें भी भेददर्शन रहता है अतः यह साक्षात् मोक्षसाधन नहीं है । अतएव ऋजुमार्ग नही है । और अत्यन्त कुटिल भी नहीं है। क्योंकि अन्तमें शिवक्यका प्रतिपादन किया है । अतः निर्गुणोपासनाके समान मध्यम मार्ग है । निर्गुणोपासनासे इसमें विशेषता यह है कि शिवदीक्षा लेकर पञ्चा- क्षर जप करते रहने से शिवकृपा प्राप्त होती है। 'दी' माने ज्ञान दिया जाना । और 'क्षा' माने पशुभावका क्षयकरना इन दोनोंके योगसे दीक्षा शब्द बना है ।। ७५-७८ ॥ वैष्णवम् नगवद्विष्णुभक्तानां मतं वैष्णवमुच्यते। तच्च नानाविधं लोके नानासिद्धान्तहेतुतः ॥ ७९ ॥ विशिष्टाद्वतिनः केचिद् द्वैताद्वैतपराः परे । शुद्धाद्वैतपराश्चन्ये तथान्ये द्वतवादिनः ॥८॥ भगवान विष्णुके भक्तोंका मत वैष्णव कहलाता है। सिद्धान्त- भेदसे वह नानाविध है। कोई विशिष्टाद्वैत मानता है, कोई द्वैताद्वैत । कोई शुद्धाद्वैत मानता है और कोई द्वैत ही मानता है ।। ७९-८० ॥ शिवविद्वषिणः प्रायः सांप्रतं वैष्णवा भुवि । नवोद्धारः कथमपि तेषां संभाविता क्वचित् ॥८१ ॥ तयापि शिवभक्तो हि महाविष्णुः कृपानिधिः । समुद्धन्तुं प्रयतते स्वानभीष्टानपीदृशान् ॥ ८२ ॥ बहुजन्मोत्तरं तेऽपि भगवद्विष्णुयलतः। शिवद्वपं परित्यज्य गच्छेयु. परमं पदम् ॥ ८३॥ आजकल अधिकतर वैष्णव शिवद्वेपी होते हैं। उनका कैसे भी उद्धार संभावनीय नही है । तथापि उनके उपास्य महान् विष्णु स्वयं शिवभक्त हैं और दयालु भी हैं। वे अपने अनभीप्ट भी ऐसे शिवद्वेषियोंको गलेपादुकान्यायसे अपनाकर उद्धार करनेका प्रयत्न करते हैं। भगवान विष्णुके अथाह प्रयत्नके परिणाम हजारो जन्मोंके वाद दे कयंचित् शिवद्वैप छोड़कर परमपद शायद प्राप्त कर लें ऐसी संभावनासे भी इनकार नहीं जा सकता ॥८१-८३ ।। - ८४ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तमः मशिवद्वेषिणो ये तु वैष्णवाः शेमुषोजुपः । सत्त्वशुद्धिप्रमेणते शिवं परममाप्नुयुः॥ ८४॥ जो शिवद्वेषी नहीं हैं ऐसे कुछ समझदार वैष्णव हैं। वे अन्तः- करण शुद्धि क्रमसे अन्तमें परमशिवपद प्राप्त करते है ।। ८४ ।। संक्षेपार्शयामोऽत्र यत्किंचिदंष्णवं मतम् । बोधायनादिभिः प्रोक्तं भगवद्भक्तिसिद्धये ॥ ८५॥ वासुदेवः परं ब्रह्म कल्याणगुणसंयुतः। भवनानामुपादानं कर्ता जीवनियामकः ।। ८६ ॥ अन्तर्यामिथुतेर्जीवप्रपञ्ची तत्कलेवरम् । स चार्चाविभवव्यूहसूक्ष्मान्तर्यामिभेदभाक् ॥८॥ अवतारः सर्वार्थ प्रतिमादिः कृपानिधः। रामादयस्तु विभवावतारा ध्यानयोगिनाम् ॥ ८८ ॥ संकर्षणो वासुदेवात्प्रद्युम्नोऽतोऽनिरुद्धकः । व्यूहश्चतुर्विधः पूजामण्डले तस्य सिद्धिदाः॥ ८९ ॥ संपूर्णषड्गुणं सूक्ष्ममुपास्यं ब्रह्म तद्धदि । ततोऽधिकारी भवति हन्तर्यामिणमोक्षितुम् ।। ९० ।। तस्य पञ्चविधोपास्तिस्तत्रामिगमनं तथा। उपादानं तथैवेज्या स्वाध्यायो योग एव च ॥ ११ ॥ संमार्जनोपलेपादिः पूजा संभारसंभृतिः। देवपूजाजपादिश्च श्रोशध्यानं च ताः क्रमात् ॥ ९२ ॥ एतैरुपासिते विष्णौ सत्त्वशुद्धिर्भवेन्नृणाम् । ज्ञानं तत्कृपया लब्ध्वा ते गच्छन्ति शिवं परम् ॥ ९३ ॥ संक्षेपसे कुछ वैष्णवसिद्धान्त हम दिखाते है जिसे बोधायनादि ऋषियोंने भक्तिसिध्ययं बताया। कल्याणगुणगणसम्पन्न परब्रह्म वासुदेव भुवनों के उपादान तथा कर्ता एवं जीवनियामक हैं । अन्तर्यामी श्रुतिके अनुसार जीव और जगत वासुदेवका शरीर हैं। वह अर्चा, विभव, व्यूह, सूक्ष्म तथा अन्तर्यामीरूपसे पञ्चधा स्थित है। अज्ञानीको भी सिद्धि देनेवाला अर्चावतार है । ध्यानादिनिमित्त रामकृष्णादि विभवावतार है। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध ये चार व्यूह है जिनकी मण्डलमें पूजा होती है। पडगुणसपन्न हृदयमे उपास्य ब्रह्म सूक्ष्म है। ध्यान पूजा बादि करने से अन्तर्यामिदर्शनयोग्यता होती है। मन्दिरमार्जनादि अभि- गमन, पूजासमग्री सपादनरूपी उपादान, देवपूजादिरूपी इज्या, जपादिरूप

श्लोक:]
स्पन्दवातिकसहितम्
८५
.
स्वाध्याय, हरियानरूपी योग ये पांच उपासनाप्रकार हैं । इनसे उपासित
वासुदेव अन्तःकरणशुद्धि होनेपर ज्ञान प्रदान करते है। और वे मनुष्य
क्रमशः परमशिवपदको प्राप्त होते हैं ।। ८५-९३ ।।
मोक्षस्तूपास्तिकर्मभ्यां देवदर्शनतो भवेत् ।
इति बोधायनाद्युक्तः पन्या तावत् प्रदर्शितः ॥ ९४ ॥
अन्ये तु प्रेममश्त्येव भगवत्प्राप्तिरिष्यते ।
भक्त्या त्वनन्यया लभ्य इत्यादिस्मृतिदर्शनात् ॥ ९५ ॥
साच्या भक्तिरियं प्रोक्ता परमप्रेमलक्षणा।
साधनं नयधामक्तिबहुधा क्वचिदोरिता ॥ ९६ ॥
श्रवणं कोतनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चन यन्दनं दात्यं सत्पमात्मनिवेदनम् ।। ९७ ॥
महत्सेवादिकं चान्ये योजयित्वा मनीषिणः।
तामेकाशधा प्राहुन्यूनाधिकत्तयापि च ॥ ९८॥
पाचारावादितन्त्रेषु पूजाविधिरुदीरितः।
द्वैताद तादिकं तत्र दर्शनेषु विभिद्यते ॥ ९९॥
बोधायनादि मतानुमार उपासनादिसहित कर्म से देवदर्शन होनेपर
मोक्ष माना गया है। दूसरे लोग प्रेमलक्षणा भक्तिसे भगवत्प्राप्ति मानते
हैं । "भक्त्या त्वनन्यया लभ्य" इसी गीतावचनसे उसका समर्थन होता है ।
प्रेमभक्ति साध्यभक्ति है। साधन नवधा भक्ति है। प्रकारान्तर भी है।
श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन. अर्चन, वन्दन, दास्य, मख्य, आत्मनिवेदन
यह नवधा भक्ति है । महापुरुषसेवादिको जोडकर कोई एकादशधा
भक्ति कहते हैं । न्यून जौर अधिकरूपसे साधनभक्ति तत्रतत्र प्रदिपादित
हुई है । पाश्चरात्रागमादिमें जो पूजाविधि आदि बतायी उसमें विशेष
मतभेद नहीं है। द्वैताद्वैतादि दर्शनभेद अवश्य है ॥ ९४-९९ ॥
इति
इतिशब्दः प्रकारार्य तेनान्ये च संग्रहः।
वैशेषिकाच शात्तात्र गाणपत्यादयस्तया॥१००॥
द्रव्यादितत्त्वविज्ञानान्मोक्षं वैशेषिका जगुः ।
श्रीविद्योपासनादिम्यो मोसं शाक्ताः प्रचस्थिरे॥१०१॥
गाणपत्यादयश्च वं चित्तशुद्धिकरं क्यचित् ।
श्वचिद्विवेकादिकरं शिवं प्रापपति क्रमात् ॥ १०२॥

। ८६ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तमः वैष्णवमिति यहां इति शब्द प्रकारार्थ में है। इस प्रकारके अन्य मत-वैशेषिक, शाक्त, गाणपत्यादि भी ग्राह्य हैं। द्रव्यगुणकर्मादितत्त्वज्ञानसे वैशेपिक मोक्ष मानते है। श्रीविद्योपासना प्रभृतिसे शाक्त मोक्ष मानते है । ऐसे ही गाणपत्यादि मत भी है। ये सब कहीं चित्तशुद्धिमें और कहीं विवेकादिमें उपयोगी है और विवेकादि क्रमसे अन्तमें शिवपदको प्राप्त कराते हैं ॥१००-१०२ ॥ अत्राचायंवराः भोमन्मधुसूदनयोगिनः। प्रष्टादश प्रयोविद्याप्रस्थानानोति संजगुः ॥ १०३ ।। वेदा ऋगाद्याश्चत्वारः षडङ्गज्योतिषान्तिः । शिक्षाकल्पव्याकरणनिरुषतच्छन्द आह्वगः ॥ १०४ ।। पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्ररुपाङ्गका गन्धर्वायुधंनुर्वेदार्यशास्त्रैः सहितास्तथा ॥ १०५ ॥ मीमांसायां हि वेदान्तो न्याय नैशेषिकं तया । सांख्यं योगः पाशुपतं शैष्णवं भारतं तथा ॥ १०६॥ रामायणादिकं धर्मशास्त्रेष्वन्तर्भवन्ति हि। प्रस्थानभेदबोधार्थ सांख्यादीह पृया जगौ ॥ १०७ ॥ इस श्लोकको व्याख्याने आचार्यप्रवर मधुसुदन सरस्वतीने नयीपदसे तदन्तर्गत अठारह विद्याप्रस्थानोंकी विवक्षा होनेसे यहां परि- गणनामें न्यूनता नही है, ऐसा बताया है। चार वेद, छः अंग, चार उपांग और चार उपवेद मिलाकर बारह विद्याप्रस्थान होते है । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ये चार वेद हैं । शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त' छन्द और ज्योतिष ये छः अंग है। पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र ये चार उपांग है। आयुर्वेद, गन्धर्ववेद, धनुर्वेद, अर्थशास्त्र ये चार उपवेद हैं । मीमांसामें ही वेदान्तका अन्तर्भाव है। न्यायमे वैशेपिक और धर्म- शास्त्र में सांख्य, योग, पाशुपत, वैष्णव, महाभारत, रामायणादि अन्तर्भूत होते है । ऐसी स्थितिमें मूलमें त्रयीसे गतार्थ होनेसे साख्ययोगादि पृथक क्यों कहा यह प्रश्न होगा। उत्तर है-उनके उपादानसे ही तो प्रस्थान- भेदका बोध होता है ।। १०३-१०७ ।। प्रग्नेदं चित्यते नास्ति सकलास्तिकसंमते। शिक्षाफल्पादिके काचित्पथ्यापथ्यविचारणा॥१०८॥ विवादास्पदमेवातः पथ्यापथ्यविकल्पितम्। समिपित्सितमत्रास्ति पुष्पदन्तेन योगिना ।। १०९।।

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् ८७ तस्माद्वेदत्रयोक्तार्थः कर्म वा प्रम वा स्फुटम् । शिक्षाकल्पादिमिर्जातुं पर्याप्तुमपि शक्यते ॥ ११ ॥ इत्यतस्ते विनिर्दिष्टा बालव्युत्पत्तिहेतवे । तदुक्त हि बालावां व्युत्पत्तय इति स्वयम् ॥ १११॥ मोमांसद्वयमेवातस्त्रयो शब्दविवक्षितम् । शाक्तादिकं वितिपदसंग्राहमिति युज्यते ॥ ११२॥ मधुसूदनी टीकापर कुछ विचार करना आवश्यक हो गया है। वेद एव शिक्षाकल्पादिको सर्व आस्तिकोंने ऐकमत्येन माना है । वहां पथ्य-अपथ्य विचार है नहीं । तब "परमिदमदः पथ्यमिति च" यह पक्ति कैसे लगेगी ? अतः श्लोकमे विवादास्पद मतविशेष ही जो पथ्य अपथ्यसे विकल्पित है, पुष्पदन्त योगीके विवक्षित हैं । अतः त्रयोपदका मीमांसाद्वय ही अर्थ है । (वह भी कर्म ज्ञानका उपकारी है मानकर । अन्यथा कर्मकाण्डी और ज्ञानकाण्डी दोनोमें भी मतभेद है। कर्मकाण्डी कर्मसे मोक्ष मानता है, श्रेष्ठ मानता है। ज्ञानकाण्डी सकाम कर्मको अपथ्य कहकर ज्ञानसे ही मोक्ष मानता है) साख्ययोगादिमे पथ्यापथ्यविवाद तो लोकप्रसिद्ध ही है । विवादास्पद शाक्त एव नैयायिकादिमतको मूलगत इतिपदसे संगृहीत करना चाहिये, यह हम पहले ही बता आये हैं । तव आचार्य मधुसूदन सरस्वतीका प्रस्थानभेदवर्णनके प्रयासका तात्पर्य इतना ही समझना चाहिए कि नयी पदार्थ कर्म या ब्रह्म सम्यक् तभी जाने जा सकते हैं और कर्मविगेपानुष्ठान तभी संभव है जव शिक्षाकल्पादि प्रस्थानोंका भी अध्ययन हो । अर्थात् एक प्रकारसे त्रीपदार्थोपापादनोपयोगी होनेसे बालकोंकी व्युत्पत्तिके लिये भेदप्रदर्शन है । स्वय मधुसूदन सरस्वतीने भी बीचमें 'बालव्युत्पत्त्यर्थ मैं वर्णन करता हूँ' ऐसा बताया है ।। १०८-११२ ॥ प्रभिन्ने प्रस्थाने प्रस्थीयते यदेतेन परमार्थपरायणः। प्रस्थानं मार्ग इत्येतत् प्रमिन्नः शास्त्रलक्षणः ॥ ११३ ॥ शास्त्रभेदश्च शास्त्रार्थमेदादेव मवेदतः। बुधः शास्त्रोदितार्योऽपि प्रस्थानमिति फय्यते ॥ ११४॥ परमार्थपरायण पुरुष लक्ष्यकी ओर जिससे प्रस्थान करते हैं वही प्रस्थान है । अर्थात् शास्त्ररूपी परामर्थभार्ग ही प्रस्थान शब्दका शर्थ है। शास्त्रभेद प्रतिपाद्य अर्थ के भेद से माना जाता है। अतएव शास्त्रोक्त अर्थ भी प्रस्थान ही कहा जाता है ।। ११३-११४ ॥

.. An ८८ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तम. फलेक्येऽप्येव विषयमेदात्प्रस्थानमेदिता। प्रस्थानयोर्यायवैशेपिफयोहि यथा मिदा ॥ ११५ ॥ विषयेययेऽपि तन्मार्ग भेदात्प्रस्थानमेदिता। प्रस्थानभेदो मामत्या यथा विवरणस्य च ॥११६ ॥ फल एक होनेपर भी विपयभेदसे प्रस्थान भिन्न होता है । जैसे न्याय और वैशेषिकमें दुखध्वंसरूप मोक्षफल सम होनेपर भी प्रतिपाद्य- विषयभेदसे प्रस्थानभेद हुआ। विषय एक होनेपर भी मार्ग भिन्न होनेपर प्रस्थानभेद होता है। जैसे ब्रह्मात्मैक्य विषय एक होनेपर भी भामतीप्रस्थान और विवरणप्रस्थान पृथक् है ।। ११५-११६ ॥ परमिदमदः पथ्यम् मेनिरे मार्गमेनके गन्तव्यस्थानमात्मनः । दोघंयात्रारता बाप्पयानादि गृहवद्यया ॥ ११७॥ विधामस्थानभूतां ये धर्मशाला स्वमन्दिरम् । मन्वीरंस्तहि ते मन्दाः कथं स्वगृहमाप्नुयुः ॥ ११८॥ ब्रह्मलोकोऽपि मार्गो वा विश्रामस्थानमेय वा। अनन्तरं गन्तव्यं परम पदमुच्यते ॥ ११९॥ ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिरांवरे । परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥ १२० ॥ ब्रह्मलोकप्रभेदा हि नैकुण्ठाद्या उदोरिताः । वर्तन्ते सर्व एनेते सौवणे मेरुपर्वते ॥ १२१॥ अन्ये तु ब्रह्मलोकं हि कुण्ठं वैष्णवा जगुः । कैलास शेवमार्गाश्वत्येव सप्रतिपेदिरे ।। १२२।। सर्वथा मार्ग एवाय नौकुण्ठादिकमिष्यते । गम्यस्थानं परं जज्ञः सम्पडनो ष्णवादयः॥ १२३ ।। ततः स्वं स्व मतं धृत्वा प्राहस्ते मन्मतं परम् । मन्मतं पथ्यमित्येवं यादिनो भेदशिनः ॥ १२४ ॥ केवल मार्गभेद है तो पथ्यापथ्य विवाद क्यो है ? सो सुनिये । बहुतसे लोग मार्गको ही गन्तव्यस्थान समझ बैठे हैं। जैसे गाडीमे मासया- प्रादि हो तो धीरे-धीरे गाडीको ही घर समझने लगते हैं और विश्रामस्थान धर्मशालाको ही घर मानने लग जाते हैं, तो ऐसे मन्दमति अपना घर कैसे पहुँडेगे? ब्रह्मलोक भी मार्ग या विश्रामस्थानमात्र है। गन्तव्यस्थान तो परमपद ही है । अतएव कल्पान्तमें ब्रह्माके साथ परमपदमें प्रवेश करते श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् ८९ हैं। ऐसा शास्त्रवाक्य है। वैकुण्ठ, कैलास ये सभी ब्रह्मलोकके ही भेद हैं । ये सब सुवर्णमय सुमेरुपर्वतपर स्थित हैं ऐसा कुछलोग मानते हैं। दूसरोंका कहना है कि पञ्चाग्न्युपासकादि उसीको ब्रह्मलको समझते हैं तथा वैष्णव विष्णुलोक एवं शैव कैलासलोक समझते हैं। लोक एक ही है, भावभेदमात्र है । सर्वथा ये वैकुण्ठादि मार्ग ही हैं। गम्यस्थान परशिव- पदको ये चैष्णव शैयादि बरावर नहीं समझते। अतः अपना-अपना मत लेकर मेरा मत श्रेष्ठ है, मेरा मत वास्तविक है, इत्यादि झगड़ा करते हैं । क्योकि वस्तुतः ये सभी भेददी जो ठहरे ।। ११७-१२४ ॥ मिन्नत्वाच्च परिच्छिन्ना उपास्यास्ता हि देवताः। अनीश्वरास्ताश्च नैव भवनोद्धावनक्षमाः ॥ १२५ ॥ अनीशो वा कथं कुर्यादित्येवमत एव च। भेदवादिमतोपास्य देवताऽस्रष्टतोदिता ॥ १२६॥ ये सब प्रभिन्न प्रस्थान हैं। विष्णु आदि भी भिन्न-भिन्न सबके उपास्य हैं । अतएव परिच्छिन्न होनेसे वे अनीश्वर हैं, भुवनसृष्टिमें अक्षम है। इसीलिये पूर्वश्लोकमें द्वैतवादी आस्तिकमतोंको लेकर ही "अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने" इत्यादिसे इन सबकी सप्टताका प्रतिक्षेप किया ।। १२५-१२६ ।। अनादर्शममर्यादं कृष्णं रामानुयायिनः। अल्पशक्तमसम्पूर्णमाहू रामं च कार्णयः ।। १२७।। भेदशिन एवं ये तदुपास्याः स्वकल्पिताः । अल्पाः कथं भवन्तीशा अनीशा एव ते ततः॥ १२८॥ रामभक्त कहते हैं-श्रीकृष्ण आदर्शरहित हैं, मर्यादारहित हैं। कृष्णभक्त कहते हैं-राम अल्पशक्तिमान है, अपरिपूर्ण है । इन भेददशियोंके उपास्य उन्हीके कल्पित परिच्छिन्न देवता हैं। ये कसे ईश हो सकते हैं । अतएव वे अनीश ही हैं। ।। १२७-१२८॥ रुचीनां ननु तत्तत्पुराणेषु तथा वर्णनदर्शनात् । कयमेतन्मतं सर्वमल्पमित्यभिधीयते ॥ १२९॥ अन्ये त्वंशकलाःपुंसः कृष्णरतु मगवान् स्वयम् इत्यादिकं हि वदनं तत्र तत्र विलोक्यते ॥ १३०॥ सका :-भिन्न-भिन्न पुराणोमें व्यासजीने वैसा वर्णन किया है। अतः इनके मतोंको आप अल्प कैसे कहते हैं ? उदाहरणार्य भागवतमै [सप्तमः ९० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् कहा-रामादि अंशकला है, कृष्ण पूर्णभगवान है। ( ऐसे ही शिव, विष्णु आदिके विषयमें भी कथन है । ) ॥ १२९-१३० ।। उच्यते रुचिवैचित्र्यात्तथा व्यासेन अणितम् । यतो भिन्नचिोष लोक इत्येतदीक्ष्यते ।।.१३१ ।। मर्यादारुचयो रामं वात्सल्यरचयोऽम्बिकाम्। लीलामिरचयः कृष्णं समाधिरुचयो हरम् ॥ १३२ ॥ भजन्तु भक्त्या सिद्धघयं तेषां वाप्यन्यनिन्दनम् । न निन्दा निन्दितु किन्तु विधेयं स्तोतुमुच्यते ॥ १३३ ॥ समाधान::-लोगोंकी रुचि भिन्न होनेसे व्यासजीने वैसा वर्णन किया। लोग भिन्न रुचि वाले होते हैं। मर्यादा रुचिवाले रामवा. वात्सल्य रुचिवाले अम्बाका, लीलारुचिवाले कृष्णका, समाधिचिवा शंकरका.भक्तिसे भजन करं । उनकी सिद्धिके लिये कही अन्यको निन्दा है। वह निन्दार्थ नहीं, किन्तु विधेय स्तुत्यर्थ है ।। १३१-१३३ ।। कला- विज्ञान • गणित प्रभृतौ हि यथारुचि । प्रवतमानाः साफल्यं लभन्ते तद्वदत्र च ॥१३४॥ जैसे छात्र अपनी रुचिके अनुसार कला, विज्ञान, गणित आदि विषय लेते हैं तो सफल होते हैं । वही बात यहा भी है ॥ १३४ ।। विधाय भेदं द्वेषं च शिष्यवित्तापहारकाः। गुष्पयो जडधियो जगन्मोहाय युञ्जते ॥ १३५ ॥ अष्टादशपुराणानि निममी प्रामाणिफानिसर्वाणि किचिनानर्थकं भवेत् ॥ १३६ ॥ परस्पर भेद डालकर द्वैप करानेवाले शिष्यवित्तापहारक गुरुपद- वीधारी विपयपरायण लोग ही जगतको मोहमें डालते हैं । भगवान यादरा- यणने जो अठारह तुराण बनाये सभी प्रामाणिक है। उनमेंसे कोई-कोई पुराण अप्रमाण है ऐसा कहना धृष्टतामात्र है ॥ १३५.१३६ ॥ मया तथापि या विष्णुशिवादीनामुपासनम् । पन्ययाजामिलस्येव पुरनारायणाहपः॥ १३७ ॥ जैसे तैसे विष्णु शिवादिकी उपासना भी मार्ग ही है। जैसे अजामिलका स्वपुत्र नारायण को बुलाना भी उपासना हुमा । १३७ ।। भेद पादिनात् पापा-मा स्म मूवनिमेऽधियः। दविष्ठा भगवद्भावारित्यतरतनिरस्पते ।।१३८।। बादरायणः।

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् भेद एवं उपादिसे भगद्भावसे अत्यन्त दूर न हो एतदर्थ इस भेदभावादिका हम निरास कर रहे हैं । १३८ ।। ऋजु० ऋजवः केऽपि पन्यानः पन्यानः कुटिलाः परे। नानापथजुषो लोका यथारचि यथामति ।। १३९ ।। कोई मार्ग सीधा है। कोई ठेढ़ा है। अपनी समझ एव रुचिके अनुसार लोग नानामार्गसेवी होते हैं ।। १३९ ।। शृण्वन्ति मन्वते नित्यं ध्यायन्त्यपि परं शिवम् । नित्यं विज्ञानमानन्दमृजुमार्गरतास्तु ते॥१४० ॥ नित्य विज्ञान आनन्दस्वरूप परम शिवका श्रवण, मनन, निदि- ध्यासन जो करते हैं वे ऋजुमार्गगामी हैं ॥ १४० ।। सतो विविदिषार्थ ये निष्काम कर्म कुर्वते । देवानुपासते वापि ते चर्जुपथगामिनः ॥ १४१॥ "विविदिपन्ति यज्ञेन" के अनुसार जो निष्काम कर्म करते है और विविदिपार्थ ही देवोपासना करते है वे भी ऋजुमार्गगामी है ॥ १४१ ।। रामकृष्णशिवाम्बादिरूपमाधित्य मताग्रहा मजन्ते कुटिलाध्यायनाच ते ॥ १४२ ॥ न्यायसांस्यादिसिद्धान्तमादित्यैव भजन्ति ये। नित्यमेय भवन्त्येते कुटिलाघ्वपरायणाः॥ १४३ ।। राम, कृष्ण, शिव, अम्बा आदिका आश्रयणकर भेदबुद्धिसे मताग्रह रखकर जो भजन करते हैं वे कुटिलपथगामी हैं । वे ही मताग्रहादि छोड़ें तो पूर्वोक्तरीत्या ऋजुमार्गी होगे । न्याय, साख्य आदि सिद्धान्तको आश्रयणकर जो भजन करते है वे तो नित्य कुटिलमार्गगामी है। अथात् कुछ छोड़नेपर वे भी ऋजुगामी हो ऐसी बात नहीं ॥ १४२-१४३ ।। नमु चर्जु परित्यज्य कुतः कुटिलमाधयेत् । प्रवणादिपरः कस्माद् सर्व ईशस्य नेति चेत् ॥ १४४ ।। उच्तते पर्वतारोहे कुटिला रोचते मृतिः। पातित्यशङ्का भवति ऋजूयंगमने सति ॥१४५ ॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् अव्यक्ता हि गतिर्दुखं देहयद्भिरयाप्यते ॥ १४६ ॥ भेदतः। ।

९ २ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तमः सकामं प्रथमं कृत्वा कर्म सद्वासनः पुमान् । निष्कामभावमासाद्य प्राप्नुयात् परमं पदम् ॥ १४७ ॥ शङ्का:-सीधा मार्ग छोड़कर लोग टेढे मार्गमें जाते क्यों है ? सभी श्रवणमननादि क्यों नहीं करते ? उत्तर-पर्वतपर चढनेवाले टेढे मार्गको ही पसन्द करते हैं । सीधे चढ़ेंगे तो आदमी गिर भी सकते हैं । अतएव गोतामें निर्गुणमार्गको अधिक क्लेशकारी वताया। भोगवासना भरी है तो पहले सकाम ही कर्म करो। उससे भी सद्वासना होगी। पश्चात् निष्काम- भाव प्राप्त कर क्रमश: परमपद पा सकेगे ।। १४४-१४७ ॥ नृणाम् ' सर्वेषां च नृणामेको गम्योऽन्ते परमः शिवः । अनीशोपासनाप्येव क्रमात्तद्वाहनी भवेत् ॥ १४८॥ ग्रामाधिपत्यं प्रथमं कामितं प्राप्य मानवः । चिरज्यति ततोऽतुष्टो राज्यं कामयते भृशम् ॥ १४९ ॥ तत्प्राप्यापि ततोऽतुष्टश्चक्रवतित्वमीप्सति । परिच्छिन्ने नरः पवापि संतुष्यति न वस्तुनि ॥ १५॥ वैकुण्ठादिकमध्येवं प्राप्य भयो न तुष्यति । अपरिच्छिन्नसंप्रेप्सा सर्वेषामन्ततो भवेत् ।। १५१ ।। तत्र शकृपया पुण्पवलाद्वा प्रागुदीरितात् । जायते ग्रहाजिज्ञासा गच्छन्त्यन्ते परं शिवम् ॥ १५२॥ मभी प्रयी आदिके अनुगामी मनुष्योका अन्तम गन्तव्य एक परमेश्वर ही है । अनीश की उपासना भी वहाँ ले जानेवाली है। कैसे ले जायेगी यह देखो-साधारण मनुष्य ग्रामपति जमीदार बनना चाहता है। पर ग्राम मिलनेपर उसमे सन्तोप नहीं होता। उसे राज्यकी इच्छा होती है, ग्रामसे विरक्ति होती है। राज्य मिलनेपर चक्रवर्तित्वकी इच्छा होती है। परि- च्छिन्नमें कभी भी मनुष्यको मन्तोप नहीं होता, यह प्रत्यक्ष मिद्ध है। वैसे वैकुण्ठादि मिलनेपर भी सन्तोप नही होगा। वहाँ भी ऊँच-नीच भाव है। अपरिच्छिन्नको ही अन्ततः इच्छा होगी। विशेषता यही कि आस्तिकोंपर भगवत्कृपा हो जाती है या उनका पुण्य प्रबल होता है तो अपरिच्छिन्न- प्राप्तिहेतु ग्रह्मजिज्ञासा हो जाती है। उमसे फिर अन्नमे परमनिवपदप्राप्ति होती है ।। १४८-१५२ ।।

श्लोकः]
स्पन्दवातिकसहितम्
पयसामर्णव इव
गङ्गा वा यमुना वापि ब्रह्मपुत्राऽयवा परा।
पारम्पर्येण साक्षाद्वा जत्येव महार्णवम् ॥ १५३ ॥
चाहे गङ्गा हो, चाहे यमुना, चाहे ब्रह्मपुत्रा हो या और कोई हो
परम्परया या साक्षात् सागरमें ही पहुंच जाती है। गङ्गा सीधी सागरमें
जाती है। यमुना गङ्गामें मिलकर। ब्रह्मपुत्रा सारे हिमालयको परि-
क्रमाकर ।। १५३॥
गतं पतित्वा यदि या शुध्येतोयं कदाचन ।
पुनर्वाप्पः पुनस्तोयं भूत्वान्ते याति सागरम् ॥१५४ ॥
कदाचित् पानी गड्ढे में पड़ा और सूख गया तो भी भाप वनकर,
फिर पानी बनकर अन्तमें सागर पहुंच ही जायेगा ।। १५४ ।।
सांस्यवैष्णवशैयाद्यस्त्रयोमार्गपररपि
पारम्पर्येण साक्षादा गम्यं वन्दे महेश्वरम् ॥ १५५ ॥
पयसामर्णव इव गतिर्देव त्यमेव मे।
पाहि मां परमेशान सन्ततं ते नमो नमः॥ १५६ ॥
सांख्य, वैष्णव एवं शैवादिके तथा वेदवेदान्तमार्गसे चलनेवालोंके
परम्परया या साक्षात् गन्तव्य महेश्वरको मैं वन्दना करता हूँ। हे भगवन् ।
पानीके लिये परमगति-आधार समुद्र है। वैसे मेरी गति आप ही हैं । मेरी
रक्षा करो। सदा मैं आपको बारम्बार प्रणाम करता हूँ॥१५५-१५६ ।।
इति श्री फाशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृती।
महिम्नः स्तोत्रयिवृतौ गतः स्पन्दस्तु सप्तमः ॥७॥

अष्टमः श्लोकः T ईशस्तुतिः प्रतिज्ञाता सोपपत्ति सहेतुकम् । वाणी पुनामीत्यन्तेन प्रोक्त शस्तुत्यतापि च ॥१॥ तीन श्लोकोंमें प्रथम ईशस्तुतिप्रारम्भप्रतिज्ञाकी तथा युक्ति और फल अहित इसकी स्तुत्यता भी दिखाई ॥ १ ॥ व्याफोरपस्तुत्यताल्याना प्रोक्ता जडधियां ततः। कुतर्फमात्ररूपत्वं व्याक्रोश्याः प्रायोततः॥२॥ स्तुत्यता समर्थन विरोधी अस्तुत्यता विषयक व्याक्रोशीको चतुर्थ श्लोकमें बताया। और वह व्याक्रोशी कुतर्कमात्र है यह पञ्चम श्लोकमें -दरसाया ॥२॥ सुतकं दर्शयामास पष्ठेन च महामुनिः। सर्वशास्त्रंकगम्यत्वात्सर्वस्तुत्यत्वमप्यतः उस कुतर्कके विपरीत सुतकं पप्ठ श्लोकमें बताया। वल्कि सर्वशास्त्र. मतकगम्य होनेसे सर्वस्तुत्य है यह सप्तममे अर्थात् अयी साख्यं इत्यादि पूर्व श्लोकमें बताया ।। ३ ॥ अर्वाचीनपदं स्तोतुमघुनारमते मुनिः। महोक्षाधुपकारत्वमर्वाचीनपदस्य हि ॥४॥ अब अर्वाचीन पदको स्तुतिका आरम्भ करते है। क्योंकि महोक्षादि उपकार अर्वाचीन पदका ही है, निर्गुणका नहीं ॥ ४ ॥ अत्रेवं शखूपते स्तुत्याः सप्तश्लोरया समर्थनम् । कृतं तदेव च लोके नवमेऽपि विलोक्यते ॥५॥ तदेय स्तयनारम्मो विहितः कथमप्टमे । नवमं प्राक् पठित्वष युज्यते पठितुं सतः॥६॥ यहापर मका होती है कि मात शोकोमें स्तुतिका ममपंन किया और यही नवम लोकमे भी है। बीचमे अप्टम श्लोकमे एकाएक स्तुतिरा अरम्म कसे कर दिया ? नवम श्लोक "धुवं कभित्" इत्यादि पहले पड़कर बादमें "महोसः सदाङ्ग" इत्यादि पढ़ना उचित या ॥५-६ ॥

श्लोकः]
स्पन्दवातिकसहितम्
९५
अत्र फेचिद्, द्विधा रूपं महेशस्य प्रदर्शितम् ।
परापरविमागेन व्याख्यातं च तथा स्फुटम् ॥ ७ ॥
तत्रोमयविषस्तोत्रौचित्यं तु प्राइनिरूपितम ।
अर्वाचीनं
पुरस्कृत्य तदौचित्यमयोच्यते ॥८॥
ध्रुवावविचारोऽयमर्वाचीने
प्रवर्तते।
याचामगम्ये तेषां हि विकल्पानामसंभवात् ॥९॥
यद्यप्यपररूपे स्याद् ध्रुवावविचारणा।
तथापि पररूपं प्राक् मुख्यत्वेन निरूपितम् ।। १० ।।
यहा यह उत्तर है कि पहले महेश्वरके तीन रूप सूचित हुए। पर
अपर और अर्वाचीन । उनमे पर और अपर रूपकी व्याख्या पहले की गयी।
(१) वाड्मनसागम्य पररूप (२) जगदुदयरक्षाप्रलयकारी गुणभिन्नतनु व्यस्त
'शिव, सदाशिवादि अपररूप (३) कैलासवासी पार्वतीपति अर्वाचीनरूप
अभी व्याख्यातव्य है ) इनमे परापररूप स्तुतिका औचित्य पहले सिद्ध
किया। अब अष्टमसे अर्वाचीन पद उपस्थित कर उसकी स्तुतिका औचित्य
नवममे बताने जा रहे हैं। क्योकि ध्रुवाध्रुवादि जगत् सम्बन्ध अर्वाचीन
'पदसे है। वाड्मनसातीत परतत्त्वसे नहीं है । यद्यपि अपररूप ध्रुवाध्रुव
विकल्पवाले जगत्के सदृप्त्वादिको लेकर ही है । तथापि पूर्वग्रन्थमे मुख्य तो
पररूप प्रतिपादन ही है ।।७-१०॥
यत्त्वत्र निर्गुणं रूपं प्राग्ग्रन्येन निरूपितम् ।
प्रस्तूपतेऽधुना रूपं सगुणं यत्स्तवोऽग्रतः॥ ११॥
स्तुतिप्रकारफयनं नवमेन विधास्यते।
दशामादो स्तुतिरिति किचित्तत्र तु चिन्त्यते ॥१२॥
कुछ मनीषियोका कहना है कि पूर्वग्रन्थमे निर्गणरूपका वर्णन किया
गया, अब सगुणरूपको प्रस्तुत करते है, जिसको आगे स्तुति करेगे। नवम
श्लोकसे स्तुति प्रकार क्यन है । दशमादिमे स्तुति है। इस व्यास्याका थोडा
विमर्श करना उचित है ।। ११-१२॥
मधुवागादिनिर्माता गुणभिन्नतनुस्थितः।
प्रधिष्ठाता भवविनिर्गुणस्तु कयं भवेत् ।। १३ ॥
प्रतद्व्यावृत्तिनिर्देश्यमनुमेयं कथं
अर्थान्तरन्यासयुतस्तुतिरत्र स्फुटापि
महोबादियुतस्यैव स्तुति ग्रे करिष्यते।
सतः स्तवाचं सगुणप्रस्तावः कममाजसः॥ १५ ॥
तथा।
च॥१४॥

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ अष्टमः "मधुस्फीता वाचः" इस श्लोकमे मधुबानिर्माताके रूपमे, "व्यस्त तितृपु गुणभिन्नासु तनुपु"मे गुणभिन्नशरीरस्थितके रूपमे, "अधिष्ठातार कि" इत्यादिसे ससारनिर्माणाधिष्ठाताके रूपमे जिसका वर्णन पूर्वमे आया वह निर्गुण कसे होगा? "अतव्यावृत्या य" इत्यादिसे जिसको श्रुति भी अन्यव्यावृत्तिद्वारा निर्देश्य बताया वही "अजन्मानो लोका." इत्यादिरूपेण अनुमेय कैसे बन गया? आगे दसवें श्लोकसे महोक्ष खट्वाङ्गादि धारीकी स्तुति है यह भी युक्त नहीं है । "तवश्वयं यत्नात्" मे ही ज्योतिलिंगादि स्वरूप वर्णन है । अत: अग्निम स्तुत्यनुरूप सगुणरूपका यह उपस्थापन है यह बात कैसे सगत होगी ? आगे जैसे अर्थान्तरन्यासके साथ स्तुति है वैसे इस श्लोकमे भी है । अत: यह स्तुत्यरूपका प्रस्ताव नहीं किन्तु स्तुति ही है ॥ १३-१५॥ अग्निहोत्रं जुहोतीति यवागू पचतीति च । श्रुतेऽर्थक्रमद् व्याख्या कार्या व्यत्यस्य वा बुधः ।। १६॥ अथवा "अग्निहोत्र जुहोति", "यवागू पचति" ( अग्निहोत्र करते है, लपसी रांधते हैं) इस वैदिकस्थलमे पाठक्रमसे अर्यक्रम बलवान् होनेसे यवागूपाक पहले और अग्निहोत्र होम वादमे होता है, वैसे यहाँ भी अर्थक्रम वलवान होनेसे प्रथम नवम श्लोक व्याख्या समझो और बादमे अष्टम श्लोक व्याख्या ॥१६॥ वस्तुतस्तु कथं स्तुत्यमर्वाचीनं पर्व हरः। इन्द्रादिवद्धावनीयो यज्ञाद्यर्देवतात्मकः ।। १७॥ न च तत्त्वं परं होवं सोपाधीत्यपि सांप्रतम् । तकिमिन्द्रादयो नैव परतत्त्वमुपाधिमत् ॥१८॥ समानत्वाच्च विष्ण्वायः शङ्करे कत्तयाग्रहः । इत्येवमुत्थितां शां मुनिरत्र परास्यति ॥ १९ ॥ वस्तुतः इस श्लोकका उत्थान बीज यह है कि अर्वाचीनपद शङ्कर स्तुत्य किस प्रकार? शङ्कर भी इन्द्रादिके समान एक देवता है। यज्ञादिसे शङ्करकी भी भावना करना उचित है । यह कहे कि शङ्कर उपाधिविशिष्ट परतत्त्व परब्रह्म ही है, अतः स्तुत्य है,तो क्या इन्द्रादि देवता उपाधिविशिष्ट ब्रह्मरूप नही है ? कुछ आगे भो वढं तो भी शङ्कर तो विष्णु आदिके समान हैं ही। तब शङ्करमे आपका विशेष आग्रह क्यो है ? इस प्रकार उत्पन्न पदाका यहां पुष्पदन्तमुमि निराकरण करते है ।। १७-१९ ।।

श्लोक: ] स्पन्दवार्तिकसहितम् ९७ तथा होन्द्रादयो वद्धा मावनीयाश्च कर्ममिः। परस्परं भावयन्त इति गोतासु चोदितम् ॥ २०॥ अविद्यासंयुताः सर्वे मवन्तोन्द्रादयः सुराः। मायोपाधिहरस्त्वेप नाविद्याबन्धसंयुतः ।। २१॥ आत्मारामो ह्ययं तुच्छतन्त्रोपफरणेङ्गितः । आत्मारामास्तु सस्तुत्याः नराः किमुत शङ्करः ॥ २२ ॥ विष्ण्वादिभ्यश्च वैशेष्यमात्मारामत्यहेतुना। विद्यते सण्डपरशी पक्षपातौचिती ततः॥२३॥ अल्पज्ञोऽत्यल्पशक्तिश्चवात्मारामोऽपि मानवः । अविद्यालेशतो नंव शङ्करस्तु सुरघिदः ॥ २४ ॥ अर्वाचीनपदस्यापि स्तुत्यत्यमत एव हि । तदेतदाह श्लोकन तत्स्तुत्यत्यसमयिना ॥ २५॥ इसी बातको स्पष्ट करते हैं-इन्द्रादि देवता तो बन्धनवाले है। वे यज्ञादि कर्मोसे भावनीय है। "परस्पर भावयन्तः" इत्यादि गब्दोमे गीतामें भी उसका प्रतिपादन है । अतएव इन्द्रादि सभी अविद्यायुक्त है । (अन्यथा इन्द्रादिको मनुष्यवृत्त भावनाकी अपेक्षा क्यो है ? ) भगवान् गवर मागोपाधिक है, अविद्याबन्धन सहरमे नही है, तथा आत्माराम भी है। यही महोश, सट्वाङ्ग आदि नुन्छ तन्त्रोपकरणोसे इगित किया जाता है। आत्मागमन्व ही विष्णु आदिकी अपेक्षा विशिष्टता होने हेतु है । (विष्णु आदि आत्माराम होते तो वैकुण्ठवैभवादिकी अपेक्षा उन्हे भी क्यो होती?) अतएव शङ्करके प्रति पक्षपातका मोनित्य भी है। आत्मा- राम मनुष्य भी स्तवनीय है लोपाइरकी बात ही क्या । गद्वार मनुष्य समान नहीं है। क्योकि मनुष्य मले आत्माराम हो फिर भी उगमे तेशा- विद्या रहती है। अतएव वह प्राग्यशगैरपर्यन्त अल्पत अतिवाला ही रहता है । गद्दरमै अविद्यालेग भी नहीं है। अतएव सर्वा मर्वशक्त है । इसमे प्रमाण है 'मुराम्ना तामृद्धि'। अर्थात देवतालोतरा उचित मद्विपद हैं। फलरा आत्माराम मनुष्यापक्षया गवगवशक्तिमत्ता चार विष्णु आदि- की अपेक्षा आत्मारामता अधिक होनेने अर्वाचीनपद 'गी मदर स्तुत्य है। यही वात स्तुत्य वगमर्थपरक ग श्वोपरी पुष्पदन्तानार्य बता रहे हैं ।। २०-२५ ॥

च श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [अप्टमः महोक्षः खट्याङ्ग परशुरजिनं भस्म फणिनः कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् । सुरास्ता ताम्रद्धि दधति तु भयभ्रू प्रणिहितां न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥८॥ है वरद ! बूढा बैल, सट्वाइग, फरमा, मृगचर्म, भस्म, सर्प और कपाल इतनी ही आपके पास कुटुम्ब चलानेकी सामग्री है। किन्तु देवता आपके इशारे मात्रमे सम्पन्न हुई उन-उन रागृद्धियोके मालिक बने हैं । सत्य है कि आत्माराम पुरुपको विपयस्पी मृगतृष्णा भ्रमित नहीं करती।। ८॥ गृहस्थो मगवान् शम्भुर्लोकसंग्रहतोऽमयत् । विरक्तो गिरिकलावसासी चिनचरित्रवान् ॥ २६ ॥ कैलासस्तु गृहं तस्य पार्वत्यर्धागिनी शिवा । पुत्रावभयतां द्वी पडाननगजाननी ॥ २७ ॥ एवं गार्हस्थ्यसंपन्नो विरज्यनेष तिष्ठति । तपस्यति समाधत्ते कैलासशिखराधितः ।। २८ ।। गृहस्थोऽपि तपः कुर्यात्समादध्याद्विरक्तघीः । अन्येषां कयेत्येतद्दर्शयत्यम्बिकापतिः॥ २९ ॥ लोकसग्रहार्थ ही भगवान् शङ्कर गृहस्थ हुए और विरक्तरूपेण गिरि- कैलासवासी विचित्रचरित्रयुक्त हुए। कैलास उनका गृह है। गृहिणी अर्धागिनी पार्वती है। पडानन, गजानन दो पुत्र हुए। ऐसे गार्हस्थ्यसम्पन्न होकर भी विरागी रहते हैं। कैलासशिसरमे तप करते है, समाधि लगाते है । गृहस्थको मनमे विरक्त हो तप करना चाहिये, समाधि लगाना चाहिये, दूसरोकी बात ही क्या ? यही वे दिसाते है ॥ २६-२९ ॥ स एप फिरा पूर्वेपामप्यमूत् परमो गुरुः । विरागेण मवेत्सिद्धिरिति लोकान् प्रशिक्षयन् ।। ३० ॥ तस्यानुकरण चक्रुः पूर्वजाता महर्षयः। गोत्रप्रवर्तकास्तेपुस्तपो गिरिवनादिषु ॥ ३१॥ लोकसग्रह क्यो करने लगे? इसलिये कि वे ही पूर्वजोके भी परम गुरु थे। विरागसे सिद्धि होती है यह शिक्षा लोगोको दे रहे है । उनका अनुकरण हमारे पूर्वज गोत्रप्रवर्तक महपियोने किया। वे भी जगलो तप करते रहे ।। ३०-३१॥ का

श्लोकः ]
सन्दवार्तिकसहितम्
९९
मार्कण्डेयादयोऽभूवन्नृषयो ब्रह्मचारिणः।
वसिष्ठकश्यपाद्याश्च बभूवुर्गहधर्मिणः ॥ ३२॥
फण्वादयः समभवन् वानप्रस्थाश्रमस्थिताः ।
नारदारुणिदुर्वास सम्याद्या न्यासिनोऽभवन् ॥ ३३ ॥
सर्वेऽपि च तपश्चकः सर्वेऽपि च समादधुः।
जग्मुश्च सिद्धि परमां विरूपाक्षानुशिक्षिताः ॥ ३४ ॥
गृहस्थ भी ता करे, अन्य की क्या बात-इस शिक्षाका ही परिणाम
यह हुआ कि मर्व आश्रमी ऋपि त रस्त्री हुए। मार्कण्डेयादि ब्रह्मचारी,
वशिष्ठ कादि गृहम्य, कत्र आदि वानप्रस्य, नारद, आरणि, दुर्वासा
ऋभु आदि सन्यासी ऋपि हुए। सबने तप किया, ममाधि लगायी और
परमसिद्धि प्राप्त की। ये सभी ज्ञानप्रदाता शकरसे अनुशिक्षित
थे ॥३२-३४॥
नन्वेवं दक्षिणामूर्तिस्यरूपं स कुतोऽबिन ।
कतुं सद् यच्छ तिः प्राह न्यास एवात्यरेचयत् ॥ ३५ ॥
इतनेसे ही शिक्षा सभव थी तो दक्षिणामूर्ति सन्यासी किसलिये बने ?
सन्यास सर्वश्रेष्ठ है इस श्रौत अर्थको सिद्ध करनेके लिये ॥ ३५ ।।
महोक्षः
न पुष्पकविमानादि महोमस्तस्य पाहनम् ।
कदाचिदुपयोगी स्याद् गृहस्थ क्षेत्रकर्षणे ॥ ३६॥
विरक्त है शंकर । वाहन पुष्पक विमानादि नही, बैल है। इसलिये
कि शायद कभी खेतीके काममे भी आ जाय ।। ३६ ।।
खट्वाङ्ग
खट्वाङ्गमायुषं तस्य
शत्रूणामपसारणे।
खट्वापाट्यप्रमङ्ग स्यादुपयोगि कदाचन ॥ ३७ ॥
दाग्रुओको हटानेके लिये यट्वाङ्ग नामका आयुध है । गायद खटियाका
पाव टूटनेपर वहा लगानेके काम भी आ जाय ।। ३७ ॥
परशुः
परशुस्त्यपर
शस्त्रं शणामुपमर्दने।
यदि मोजननिर्माण काष्ठस्फालनकायपि ॥ ३८॥

१०० श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [अष्टमः शत्रुमर्दनार्थ दूमरा शस्त्र फरसा है। शायद भोजननिर्माणकालमें लकड़ी फाड़नेके काममें भी आ जाय ।। ३८ ॥ अजिनं अजिनं वसनं शुद्धं शेत्यवृष्टयादिवारणम् । शय्यायां परिधाने चाप्यासनेऽप्युपयोगि यत् ॥ ३९ ॥ वस्त्र तो मृगमर्च है। नित्य शुद्ध होनेसे धोनेकी झझट नही। ठंढीमे गरम, बारिपसे भी बचावे। लेटनेके विस्तरेके काममे भी आवे, पहननेके काममे भी आवे, आसन भी हो जाय ॥ ३९॥ भस्म पुण्यं शैत्यहरं भस्म पचित्पात्रप्रघावनम् । शरीरगौरतावृद्धि हेतुचूर्णमिदापि यत् ॥४०॥ भस्मका तो कहना ही क्या । तिलक लगाओ। उद्धलन करनेसे ठटी नहीं लगती। कभी बरतन माजनेकै काममे भी आवे। मुखादिको गोरा बनानेवाला पाऊडर भी वह हो सकता है ।। ४० ।। फणिनः फणिभूपः स नागेन्द्रहारो न सुमहारथक् । कटिवस्त्रं स्वय यध्नन् कूपाम्बूद्धरणक्षमः ॥ ४१ ।। लम्बा सर्प भूपण है । पुष्पहार नहीं, जो एक दिनमै मूखकर बेकार होता है। यह नाग तो कटिवस्त्र पाजामा आदिको स्वय वाधकर बेल्टका काम देता है। कभी जरूरत पड़े तो कुँएसे पानी निकालनेके काम भी आ जाय ॥४१॥ कपालं सपरश्चौरमोशून्यो नान्तादिपरिभावमाक् । मस्तके टोपिफातुल्यो पातवृष्टयातपावनः ॥ ४२ ॥ प्वप्परकी तो बात ही क्या? यह ऐमा बरतन है कि चोरका भय नही, खट्ट दही आदिसे कसाता नहीं और मस्तकपर रनो तो टोपी बन जाय और हवा, वृष्टि और धूपसे मम्तकको बचाये ॥ ४२ ।। ऋद्धि० हन्त दारिद्रयमेखि गयं यंराग्यमोशितुः । मुराः समृद्धि दर्घात निजभूस्पन्दनोत्थिताम् ॥ ४३ ।।

7 श्लोकः] स्पन्दवा तिकसहितम् १०१ यह महोक्षादि तो दरिद्रताका लक्षण हुआ। नही । यही प्रभुका वैराग्यलक्षण है। क्योकि अपनी भ्र फुटी चालन मानसे उत्पादित अनेक ऋद्धियोको ही देवता भी धारण करते है ।। ४३ ।। कुबेरस्त्वत्कृपालेशात् कुबेरत्वमपद्यत । अन्येषां किल का वार्ता सर्वसिद्धशिदायिनि ॥ ४४ ।। शकरकी लेशकृपासे ही कुवेर धनपति बना । दूसरोका फिर कहना क्या समस्त ऋद्धिसिद्धि भगवान शकर देते हैं ।। ८४ ॥ नन्वेव न कयं द्युम्नं स्वय नैव दधात्यसौ । मृगतृष्णोपमाः सर्वे यतो हि विषया इमे ॥ ४५ ॥ तन्नोपकरणार्य हि येपामपरिहार्यता। तेषा द्विधोपयोगार्थ प्रियते तु परिग्रहः।। ४६ ॥ तब स्वय धनादि सग्रह क्यो नही किया ? चकि ये सभी विषय मृगतृष्णोपम है । कुटुम्वभरणार्थ जिनकी अपरिहार्यता है उतनेका सग्रह किया जाता है ।। ४५-४६ ।। सत्यां को कि कशिपुना कि बाहावुपबहणः । अञ्जलावन्नपाच्या किं दुकूल कि दिगम्बरे ॥ ४७ ॥ नामस्वर्थी भवेद्यावान् प्रमादो तत्र नो भवेत् । यत्नवांस्तत्र न भवेदन्यथार्थे प्रसिध्यति ॥४८॥ इति भागवतायुक्त लोकान् समनुकारयन् । नि.स्पृहः सन् गृहस्थोऽपि जगत्पतिरवर्तत ॥ ४९ ॥ काम निकलना चाहिये । अतएव भागवतमे कहा कि जमीनपर लेट सकते है तो विस्तरा विसलिये ? बाहुसे काम चलेगा तो तकियेका क्या काम ? अजलिसे काम हो गया तो वरतन क्यो रखे? दिगम्बरसे काम चला तो वस्त्र किसलिये' नामात्मक जगत्मे जितनी उपयोगिता है उनमे प्रमादी मत बनो। सरल प्रकारसे काम चलता है तो इन नामसग्रहके पीछे मत लगो । इसीका अनुकरण कराते हुए शवर गृहस्थ होनेपर भी, जगत्पति होते हुए भी निस्पृह होकर रहे ॥ ४७ ४९ ।। स्वात्माराम आत्मा तु परमानन्दः संप्लुतोदासंनिभः। तदारामो विषयानन्दखाताम्वुलोलुपः ।। ५०॥ न १.२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [अप्टमा विक्रीडतोऽमृताम्भोधो कि क्षुद्रः खातकोदकः। आत्मानन्दस्य किं भोगमृगतृष्णोपमैरिति ॥५१॥ लवलबाते सागर सरोवरादि सदृश आत्मा परमानन्द परिपूर्ण है । उसमे रमनेवाला विषयानन्दरूपी गढ्ढेके जलमे क्यों लोलुप होगा? अमृतसा- गरमें . खेलनेवालेको खातकोदकसे क्या मतलब? आत्मानन्दरतिको मृगतृष्णासदृश भोगोसे क्या सरोकार' ॥५०-५१ ॥ यथाश्रुतार्य तमिममभिधायाधुना वयम् । व्यङ्गवार्थमस्य श्लोकस्य दर्शयामोऽत्र लेशतः॥ ५२ ॥ यह हमने श्लोकका यथाश्रुत अर्थ बताया । अभिव्यङ्गय अर्थ भी अब हम थोड़ा सा दिखाते है ॥ ५२ ।। महोक्षः धर्मो हि भगवान् साक्षाह परूपेण संस्थितः। तपः शोचं दया सत्यं तस्य पादाः कृते स्थिताः ॥५३ ।। अयं तु परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम् । महोक्षत्वं ततः प्राह स्वात्मारामत्यमेव च ।। ५४ ।। भगवान धर्म ही वृषभरपमें स्थित है। उमके तप, शौच, दया और सत्य चार पाद हैं इत्यादि भागवतमे वताया है । यही परमधर्म है जो कि योग द्वारा आत्मदर्शन करते है । उस पर स्थिति महोक्षवाहनता और स्वात्मारामता है ।। ५३-५४ ।। खट्वाङ्ग सवा चतुष्पाद्भवति तदेतत्सावलौकिकम्। चतुष्पादेव च ब्रह्म माण्डूक्यचतिविश्रुतम् ।। ५५ ।। तरङ्ग च तुरीयाख्यं तत्त्यं धारपतीत्यतः। खट्वाङ्गधारी भगवान् गीयते प्रमथाधिपः ॥ ५६ ।। काइक्षघमाणाङ्गताहेतोरप्यर्थोऽयं हि लभ्यते । खटयते पुरयायत्वात् काइक्षयते पुरपेरिति ॥ ५७ ।। पटिया चार पादचाली होती है। ब्रह्म भी चतृप्पात् है। उसके अङ्गसदृश चतुर्थपाद तुरीयतत्वको शकर धारण करते हैं । 'खट काइक्षाया' इस धारवर्यानुगमसे भी पुरुपायंतत्वलाभ होता है। पुरपाथं होने से पुरप द्वारा काक्षित होता है ॥ ५५-५७ ॥

श्लोक:] स्पन्दवातिक सहितम् १०३ परशुः परमन्यं शृणात्येप परशुद्वैतखण्डनः। दृढेनासङ्गशस्त्रेण छिन्तेऽश्वत्थं विरागवान् ॥ ५८ ॥ पर अर्थात् द्वितीयको जो शृणाति-समाप्त करता है वह असग शस्त्र द्वतविवारक है। यही गीतामे 'असङ्गशरण दृढेन छित्वा'से बताया ।।५८॥ अजिनं गजासुराजिनं धत्ते न खल्वसुरमेव सः। आसुरी संपदं मा गा त्वचं वाह्यां तु धारय ।। ५९ ।। जाननपि च मेधावी जडवल्लोकमाचरेत् । अज्ञानीय क्वचित्क्रोधीवाभिमानीव संसृतौ ।। ६०॥ सक्ताः कर्मविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्विको लॊकसंग्रहम् ।। ६१॥ जिनश्चावैदिकत्तस्माद्भिन्न धत्ते महेश्वरः। वैदिकान् मक्तियुक्तांश्च ततोऽजिनधरो हरः ।। ६२ ।। गजासुरकी वाह्य त्वचा धारण करते । आसुरी सपदाको नही, उसके बाह्याकारको धारण करते है । जानते हुए भी मेधावी जड समान बरतते है, अज्ञानी जैसे, क्रोधी जैसे, अभिमानी जैसे । गीतामे भी कहा- अविद्वान आसक्तिपूर्वक कर्म करते हैं। विद्वान् अनासक्त होकर वैसे ही कर्म करते हैं। 'जिन' अवैदिक मत वाला हे । उससे भिन्न वैदिकमतवालो और भक्तोंको धारण करते है इसलिये भी शिव अजिनधर हैं ।। ५९-६२ ।। संसारदाहे सति यः सारो भस्म तदीरितम् । स्पष्टं शेवपुराणादावेतदेव निरूपितम् ॥ ६३ ॥ मुक्तामस्मादिकं तावत् तत्सारो नव संशयः। अस्ति भाति प्रियमिति सारो बाधे हि संसृतेः ॥ ६४ ॥ नामरूपजगदाध दग्धे ज्ञानमहाग्निना। शिष्यते भासनाद्भस्म सच्चिदानन्दलक्षणम् ॥ ६५ ।। ससारदाह होनेपर जो सार बचता है उसे शिवपुराणादिमें भस्म बताया है। जैसे मोतीका भस्म सार ही है वैसे अस्ति, भाति, प्रिय

१०४
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [अप्टमः
ससारवाधोत्तर सार है । ज्ञानाग्निमे नामस्प जगद्वाध होनेपर बचनेवाला
सच्चिदानन्द ही भस्म है ।। ६३-६५ ।।
फणिनः
संसारवाघे सति च शिष्यते शेपसंजितः।
फरणी स सच्चिदानन्दस्निफस्निगतिहि सः ॥६६॥
मद्यप्यर्थसमानत्वं स्याद्भस्मफणिनोरिह।
दाहप्रधान्यतो भस्म शेपप्राधान्यतः फणी ॥ ६७ ॥
ससारयाधोतर जो टोप रहे वही शेषनाग और फणी है । सत्,
चित्, आनन्द ये तीन फण है। "फण गती" । तीन गति है । इस प्रकार
'भस्म और फणीमे भेद नहीं रहता । तथापि दाहकी प्रधानतासे भस्म और
अवशेषकी प्रधानतासे फणी समझना चाहिये ।। ६६-६७ ॥
कपाल
कं सुखं पालयेद्यस्तु कपालः स तु कोतितः ।
आनन्दरक्षाहेतुश्च ह्यद्व प्तृत्वादयो गुणाः ॥ ६८ ।।
उत्पन्नतत्त्वज्ञानस्य ह्याप्दृत्यादयो गुणाः।
अयत्नतो मवन्त्यस्य न तु साधना पिणः ॥ ६९ ।।
कपाल शव्दमे क=मुखका पाल=जो पालन करे ऐसी व्युत्पत्ति
है। "अद्वेष्टा मर्वभूताना" इत्यादिमे कथित अद्वैप्टत्यादि गुण ही कपाल
है। ज्ञानियोके वे स्वत उत्पन्न होते है ।। ६८-६९ ।।
तन्त्रोपकरणम्
तन्नं फुटम्चे ज्ञाने च ज्ञानोपकरणं त्विदम ।
जानोपकरणान्येव ज्ञानं वा शंभुना पृतम् ॥ ७० ॥
तन्त्रका ज्ञान भी अर्थ है । उनका उपकरण या ज्ञान ही शंकरजीने
धारण किया है ।। ७०।।
तां तां नाद्धि
ता तामृद्धि गगत्यस्मिन् दम्युविषयलक्षणाम् ।
तदक्षतेति श्रुत्युक्तायदप्रणिहितां मुराः ।। ७१ ॥
"तरक्षन बढ़ स्या" इस सिणसे उत्पनमोही यहा 'भव प्रणि-
हिना मे यााया। एसी विपपम्प शनिको देवता पाते॥७१ ॥

श्लोक: ] स्पन्दवातिकमहितम् १.५ - पुरुषस्तु महोक्षः सन् खट्याङ्गं प्रकृतिः सती। महत्तत्वं च परशुरहद्धारोऽजिनं तथा ॥७२॥ भस्मैव पञ्चतन्मात्रा फणिनस्त्यिन्द्रियाण्यपि। कपालं पश्चभूतानि भूत्वा हरमुपासते॥७३॥ इत्यागमप्रसिद्धार्थ मधुसूदनयोगिनः। दर्शयामासुरव सकलागमकोविदा ॥७४ ॥ पुरुप, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहकार, पञ्चात-माना, इन्द्रिय और पचमहाभूत ये सात ब्रमश महोक्ष, खट्वाङ्ग, परशु, अजिन, भस्म, फणी और कपाल वनकर गुप्तस्पसे शकरकी उपासना करते है ऐसा सकलागमविशारद श्रीमन्मधुसूदन सरस्वतीने आगमप्रसिद्ध अर्थके रूपमें यहापर व्याख्या की है ।। ७२-७४ ।। महोक्षादिधरं शभु देवानां सकलद्धिदम् । स्वात्माराम च विषयवितृष्णं निर्धमं स्तुवे ॥ ७५ ।। महोक्षादिधारी, देवोके सर्वसपत्प्रदाता, स्वात्माराम, विषयवितृष्ण, शभुकी ( स्तुत्य होनेसे ) में स्तुति करता हूँ ॥ ७५ ॥ इति श्री काशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतौ । महिम्नः स्तोत्रविवृतौ स्पन्दोऽयं निर्गतोऽष्टमः॥८॥ - नवमः श्लोकः स्तुतिः स्तुत्यगतोत्कर्षबोधकं वाक्यमुच्यते । उत्कर्षोऽनुग्रहदया-ज्ञानकामक्रियादिभिः ॥१॥ सर्वे सविषयास्ताव-दनुग्रहदयादयः । दुनिरूपाणि विषयफलादोनि सदात्मना॥२॥ ध्रौव्यानोच्यादिकं तेषां विवादास्पदमीक्ष्यते । ततः कथं स्तुतियुक्ताऽज्ञातरूपैर्दयादिभिः॥३॥ काचमुक्तामणिमिदां यथैवाजानतः स्तुतिः । काचहारसुशोमोति निन्दैवातत्त्ववेदिनः ॥४॥ स्तुत्य व्यक्तिके उत्कर्षको बतलानेवाला वाक्य स्तुति कहलाती है । अनुग्रह, दया, ज्ञान, इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति आदिको लेकर उत्कर्ष होता है । अनुग्रह, दया आदि सभी सविषय होते है। विपय, विषयी एवं फल ये सभी दुनिरूप अनिर्वचनीय हैं। क्योकि ये सब ध्रुव हैं या अध्रुव इत्यादि विवादास्पद है । तव अज्ञातस्वरूप दया आदिको लेकर स्तुति करना कैसे संभव है ? काच और मोतीको एक समझनेवाला कोई आदमी स्तुतिरूपमे बोलता है-अहाँ ! कैसे पाचहारसे यह शोभायमान हो रहा है। किंतु अनभिज्ञकृत यह स्तुति नही निन्दा ही है ।। १-४ ।। कि चोत्कर्षो निहायोऽयमपकपेश फेनचित् । गुरुज्येष्ठपितृत्वाद्याः शिप्यभावादिभिर्यया ॥५॥ दुर्विज्ञेयं जगदिदमपकृष्टतया ध्रुवाध्यादिबहुल-विकल्पपरिकल्पितम् सृजतोशो नम इति श्रुत्या पैशेषिको हसेत् । महेशाज्जगदुत्पन्नं धुत्या सारयो विडम्बयेत् ॥ ७ ॥ अपकर्ष निरूपित होनेपर ही उत्कर्ष ममामे आगेगा । गुरु, ज्येष्ठ, पिता आदि मिष्य, कनिष्ठ और पुनादिसे निम्पित होना है। अपप्टरपसे अभिमत इतर प्रपञ्चको ममसना पहले कठिन है। क्योकि ध्रुव-अध्रुवादि विकल्पपीडित है। ईश्वग्ने आकाश को बनाया सुनार वैगेषिक होगा। परमात्मामे जगत् उगान हो गया गुजार माग्य पहेगा यह वा विडंबना मतम् ।

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् १०७ हो रही है । तब जब अपकर्पज्ञान ही नहीं, तो उत्कपंवोधक स्तुति किस प्रकार? ॥ ५.७॥ अनोच्यते स्तुति कतुं प्रवृत्तस्य निरागसः । जगत्तत्त्वानभिज्ञत्वचिन्ता नास्त्येव मे हृदि ॥८॥ अनि तु समुद्दिश्य तियंगूध्वंमधोऽपि वा। यथाकथंचिदपि या क्षिप्तो भुवि पतेद् हुपत् ॥९॥ तथोत्कर्षवचः कामं यथाकथमपोरितम् । भगवत्येव पतति सर्वोत्कर्षाधये हरे ॥१०॥ सदों याऽसदर्था वा भाषा कि तेग मे भवेत् । उत्कर्षस्तु सदर्थोऽयं महेशस्य विवक्षितः ॥११॥ असदर्थवदाभातु स्ववपोखेदगीरिव। प्रशस्तत्व पुनर्नासत् यत्तावरस्वविवक्षितम् ॥ १२ ॥ उक्त पूर्वपक्षका उत्तर यह है कि मैं तो स्तुति करनेके किये प्रवृत्त हूँ, किसीके खण्डनमण्डन या अपराध करनेके लिये नही । और न पाण्डित्य दिखानेके लिये हो । तव जगत्तत्वको अनभिज्ञताकी चिन्ता मुझे क्यों होगी ? पृथ्वीको लक्ष्य रखकर ऊपर, नीचे अगल, वगल जैसे तैसे भी पत्थर फेको वह पृथ्वीपर ही पडेगा। वैसे स्तुतिवचन जैसा तैसा भी बोले सर्वोत्कश्रिय भगवानमे ही पहुँचेगा। भापा चाहे वाच्यार्थतया सदर्थ हो या असदर्थ । उससे क्या होगा? पर, महेश्वरका उत्कर्ष जो विवक्षितार्थ है वह तो असन् नही है। "प्रजापतिर्वपामुदखिदत्" यह स्ववपोखेदनववन असदर्थ के समान भले भासे, विन्तु विवक्षित याग की प्रशस्तता असन् तो नहीं है। (वैसे शिवस्तुति मुनते समय असभवार्थ किसीको लगे, किन्तु विवक्षित उत्कर्ष तो असत् नहीं है । ८-१२ ।। विवक्षितं तदुत्कर्षमप्यसन्तं परो प्रसाधयेत्तदाप्येव न मे चिन्ता प्रवर्तते ॥१३॥ स्वस्वसिद्धान्तसम्यक्त्वस्यापकाः स्थापयन्तु तत् । न किचित्स्थापनीयं मे स्तुतिमात्रं चिकोर्पत ॥१४॥ परो मामाक्षिपेदत्र तद्विरुद्धार्थकीर्तनांत् । इत्यप्येव न चिन्तास्ति धृष्टस्य मुखरस्य मे ॥ १५ ॥ परस्परविरुद्ध हि नानामतमवेक्ष्यते। विरोधचिन्ता मामेव कुत याविशजिता ॥ १६ ॥ यदि।

१०८ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [नवमा यदि कोई यादी परमेश्वरके विवक्षित उत्कर्पको भी भमत् सिद्ध करना चाहता है तो भी मुझे चिन्ता नहीं है। क्योंकि वे अपना सिद्धान्त स्थापित करनेके फिकरमें हैं। मुझे कुछ स्थापना करनी ही नहीं है । मुझे केवल स्तुति करनी है । स्तुति करते समय कुछ लोग स्वविरुद्ध अर्थ कहनेका आक्षेप मुझपर लगायेंगे यह भी चिन्ता मुझे नहीं है। क्योंकि मैं एक वाचाल हूँ, अतएव धृष्टता भी रखता हूँ। वे अपनी बात करेंगे। मैं अपनी बात करता रहूँगा। वादियोंके नानामत परस्पर विरुद्ध हैं, तव एक दूसरेके विरोधकी चिन्ता क्यो नहीं करते है ? जब उन लोगोंको विरोधकी चिन्ता नहीं है तो यह वलवती पिशाचिनी वनकर मुझमें ही क्यों घुसने लगी? ।। १३-१६ ॥ ध्रुवं कश्चित् सर्व सकालमपरस्त्यध्रुमिदं परो ध्रौव्याधौव्ये जर्गात गति व्यस्तविषये। समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैविस्मित इच स्तुवजिहेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ।। ९ ।। कोई इस प्रपञ्चको शाश्वत सत्य कहता है, दूसरा उससे विपरीत मधूव कहता है । तीसरा कुछ ध्रुव है और कुछ अध्रुव है ऐसा व्यस्तरूपसे कहता है, और समस्त विषयमें ध्रुव-अब्रुव सिद्धान्त भी है। इन सब मतमतान्तरोसे मैं विस्मित सा होकर भी स्तुति करता हुआ लज्जित नहीं होता । पयोकि वाचालता बड़ी ढीठ होती है ॥ ९॥ ध्रुवं कश्चित् तथा हि सकतं कश्चिद् विश्व ध्रुघमवोचत । घुवं नित्यं ध्रुवं सत्यं सांस्या नित्यमचक्षत ।। १७ ॥ सत्कार्यवादिनः सांस्याः कार्य सत्कारणे सदा। अभिव्यक्तिस्तदुत्पत्ति शश्वाभिभवो मत.॥१८॥ वादियोंका परस्पर विरुद्ध मत इस प्रकार है कि कुछ लोग विश्वको सर्वथा ध्रुव कहते है । ध्रुवका नित्य और सत्य दोनो अर्थ हैं। सास्यवाले नित्य कहते हैं, वे सत्कार्यवादी हैं। कारणमे कार्य हमेशा रहता है । उत्पत्ति केवल अभिव्यक्ति है और नाश अभिभवमात्र है यही सत्कार्यवाद है ।।१७-१८ ।।

श्लोकः ] स्पन्दवार्तिकसहितम् तैलं तिनेऽड्कुरो चीजे सपिर्दध्न्यनलोऽरणौ । प्रागेव सद् व्यज्यते तु पश्चान्निष्पीडनादिमिः ॥ १९ ॥ तिलमें तेल पहलेसे ही है। बीजमें अंकुर, दहीमें माखन, अरणि ( लकड़ी ) में अग्नि पहलेसे है। पेलने, उगाने आदिसे केवल प्रकट होते है ॥ १९॥ सुवर्ण कुण्डलं जातं द्रावितं कनकं पुनः। कि तत्र जातं कि नटं व्यजनाभिभवाहते ॥२०॥ सोनेका कुण्डल बनाया, गलानेपर फिर सोना हो गया। यहां अभिव्यक्ति और अभिभवके मिवाय क्या उत्पन्न हुआ क्या नष्ट हुआ।॥ २०॥ न किचित्प्रज्ज्वलसिक्यत्तिकाया विनश्यति । पुनस्तादूप्यमागच्छेत्तद्धमः संघ्रियेत चेत् ॥ २१ ॥ मोमकी बत्ती जलायी तो क्या जलकर नष्ट हुआ? कुछ नहीं । उसका धुआ ( वाप्प ) तरीकेसे पकडा जाय तो फिर वह मोम बनेगा।॥२१॥ श्यथितं सलिलं नश्यदिव लोकः प्रतीयते । याप्पभायागतं तच्च जसमापद्यते पुनः॥२२॥ पानी उबला तो लोगोंको लगेगा कि उबलकर पानी सूख गया, नष्ट हो गया । लेकिन क्या नाट हुआ वह भाप बना । फिरमे वह पानी ही बनेगा ।। २२ ॥ सहस्रवार मियतां काञ्चोकमकुण्डलम् । हेम्नः किं तेन भवति नाशे वा फि तु हीयते ॥ २३ ॥ तयामिव्यज्यते विश्वं बहुधा प्रकृतेरिदम् । तयंचाभिमवस्येतत् फल्पान्ते प्रलये सति ।। २४॥ तथा चाह श्रुतिर्धाता यापूर्वमकल्पयत् । धातेति प्रतिः सा हि प्यनकोर यथा पुरा ।। २५ ।। हगार बार फगन, पन आदि बना लो, गालो उगगे सोनेका क्या बनता विगढ़ता है वैसे ही प्रातिने यह जगा अभिमान होता है, कल्पान्त प्रलयमे अभिभूत होता है। यही "धाता यथापूर्वमवत्पया" हम ध्रुतिमे भी बताया। धाता माने प्रतिने पहले जंगे फिर इन जगतको प्रपट किया ॥२३.२५ ।।

११० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तमः अन्ये ध्रुवं सत्यमिति विशिष्टाद्वैतवादिनः। विश्वं सत्यमिति प्राह श्रुतिभंगवती स्वयम् ॥ २६ ॥ नन्वसत्यं हि शुफ्त्यादो रजतादि प्रतीयते। तदसद् रयमत्रास्ति पञ्चीकरणकारणात् ॥ २७ ॥ मरीचिकायां सलिलं पञ्चीकरणतोऽस्ति हि । वैशेष्याद् व्यवहारस्तु भेवेदेषा मरीचिका ॥२८॥ दोपदूषितष्टेः स्याद् दृश्य रूप्यजलादिकम् । दृश्यते दोषविरहे मुक्तास्फोटातपादिकम् ॥ २९॥ विशिष्टाहतवादी कहते हैं कि ममस्त जगत् ध्रुव अर्थात् सत्य है । "विश्व सत्य" यह श्रुतिवचन है । यया शुक्तिमे रजन दीमे तो वह भी सत्य है ? जी हा । पञ्चीकरण प्रक्रियामे वहा भी रजतावयव है । मरुमरीचिकामे जलाययव है । विगेपता शुक्ति आदि के अवयवो की है । अत उन्हे शुक्ति आदि कहा जाता है। दोषदूषित दृष्टिको रजत, पानी आदि नजर आते है । दोप न हो तो सीप, धूप आदि ॥ २६-२९ ॥ ननु स्थाणी पुमान् कि नु पञ्चीकरणतोऽस्ति ते । यद् बालुकाया कनकं दोषदृष्टया तदीक्ष्यताम् ॥ ३० ॥ पूर्वपक्ष -जहा स्थाणुमे पुरुष दीखता है वहा आपके मतमे पचीक- रणके कारण स्थाणुमे पुरुष भी लिपा होगा। जिस बालूमे सोना है, बाहरसे नही दीराना, वहा आप दोपदूषित दृप्टिसे देख डालिये और सोना निकाल लीजिये ।। ३० ।। मैव भो नातिशडान कार्या तत्त्ववुभुत्सुना। श्रद्धत्स्व सोम्येत्येव हि श्रुतिः शास्ति स्वय यतः ।। ३१ ॥ इस पूर्वपक्षपर कहना यही है कि तत्त्वजिज्ञासुको अतिशका नहीं करनी चाहिये । ध्रुति स्वय कहती है कि जो गुरु बोलते है उसपर श्रद्धा रसाकरो॥३१॥ अपरस्त्वध्रुवं अभुव चाखिल प्राहाऽनित्य वाऽसत्यमेव वा। वैभाषिकोऽसिल बूते प्रत्यक्ष क्षणमा गुरम् ॥ ३२ ।। शतवर्षण जोयदि चर्मवस्त्रग्रहादियाम् । नेकस्मिन् हामने नो वा दिने किन्तु क्षणे क्षणे ॥ ३३ ॥ आत्मापि क्षणिको नास्ति विनिदेव भुवि स्थिरम् । सर्वप्रत्ययपोचरम् ॥ ३४ ॥ जात हत चेति ।

श्लोक ]
स्पन्दवातिकसहितम्
१११
कुछलोग जगत्को अध्रुव मानते हैं। उनमे भी कोई अनित्य और
असत्य मानते हैं। वैभापिर अनित्य मानते हैं। सौ वर्षमे शरीर, वस्त्र,
गृहादि जीर्ण होते हैं तो क्या अन्तिम एक वर्गमे जीर्ण हुए प्रतिदिन
ही नहीं बल्कि प्रतिक्षण जीर्ण होता गया है । आत्मा भी क्षणिक है। ज्ञान
उत्पन्न हो गया नष्ट हो गया ऐसी सबको प्रतीति होती है ॥ ३२-३४ ॥
बुद्धचानुमेय स्यादर्थः सर्वोऽपि क्षणभङ्गुर ।
इति सौत्रान्तिय मतेऽप्यनुवन्ध यथोदितम् ॥ ३५ ॥
सौनान्तिक मतमे फरक इतना ही है कि घटादि ज्ञान हो रहा है
अन विषय अवश्य होना चाहिये इसप्रकार अर्थ अनुमेय होता है। प्रत्यक्ष
नहीं। एमा वे निस्पण करते है। क्षणभगुरतारूपी अध्रुवत्व समान
ही है ।। ३५ ॥
मुरयो माध्यमिक सर्वमसत्य जगदववीत् ।
शून्य तत्व जग न्यवियर्तोऽसत्य एव हि ॥३६॥
बौद्धोमे मुख्य माध्यमिक है । वह सारे जगतको असत्य कहता है ।
शून्य ही तत्त्व है। यह जगत् शून्यका ही विवर्त है। अतएव असत्य है।
यह असत्यतास्पी अध्रुवता है ।। ३६ ।।
योगाचारमते ज्ञानाकृतिग्वार्थ
इप्यते।
ज्ञान सत्यममनर्थस्तथापि क्षणिक तु तत् ॥ ३७॥
यागाचार मतम ज्ञानकी ही जाकृति अर्थ है। ज्ञान उनके मतम
सत्य है । अर्थ असत्य है । फिर भी ज्ञान तो क्षणिक है ही ॥ ३७ ।।
परो ध्रौव्याघ्रीव्ये
वैशेषिकादय किंचिद् ध्रुव किचित्तथाऽध्रुवम् ।
इत्येय व्यस्तविधया जगदेतत् प्रवक्षते ॥ ३८॥
वैशषिकादि ध्रुवाध्रुववादी है । अर्थात् व्यस्तत्पमे कुनो ध्रुव
और कुछको वे अध्रुव मानत हैं ॥ ३८॥
योमाद्या विभयो नित्यास्तथंव परमाणय ।
कार्यात्मशास्तथाऽनित्या नवन्नि द्वयणुरादय ॥ ३९॥
आकाशादि विभुति य हैं । परमाणु नित्य हैं । वार्यस्पी द्वषणुक
त्र्यणुक एव घटादि अनित्य है ॥ ३९ ॥
आकाशात् प्राविमासीद्धा मदाकाश एव प्राः ।
नावकाश क्वचिद्याति नायात्येव च नित्यता ॥ ४०॥

११२ श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [ नवम. आकाशादि कैसे नित्य ? गुनिये। यदि वह जन्य हो तो आकाशसे पहले क्या था? आकाश ही । अवकाश कही न आता है और न जाता है। अत नित्य है ।। ४०॥ नारम्भकाः अवयवाः विभाग फस्य वा भवेत् । नारभ्यन्ते न नश्यन्ति ततश्च गगनादयः ।। ४१॥ अवयवोसे अवयवी द्रव्य उत्पन्न होता है। आकाशके आरभक अवयव नहीं । तब विभाग भी किसका हो। अतएव आकाशादि न उत्पन्न होते है और न नष्ट होते है ॥४१॥ अणवो यदि भज्येरन् भज्येरस्तत्कणा अपि । अनन्तावयवत्वे तु को महान् कोऽणुरुज्यताम् ॥ ४२ ॥ दृश्यतेऽणमहाश्चैव नानन्तावयवास्ततः। योऽनधिः परामणुः स नित्यो नैव विनश्यति ॥ ४३ ॥ आकाशादिके समान परमाणु भी नित्य हैं। परमाणुका यदि विभाग होता तो उसके कणोका भी विभाग होगा। ऐसे टुकड़े यदि अनन्त हो जाय तो वडा-छोटा कोई नहीं रहेगा। किंतु दीखता है बडा- छोटा । अवयवोकी न्यूनता और बहुलतासे ही छोटे-बडे होते है । अणुको टूटनेवाला आप भले माने, किन्तु जहा जाकर फिर नही टूटता, जो अवधि है, वही परमाणु है वह नित्य है, नष्ट नहीं होता ॥ ४२-४३ ॥ सत्यासत्ये परे प्राहु. प्रव्यस्तविषये बुधा. । स्वाप्निकाद्या असत्यार्थाः सत्यार्था जागति स्थिता ४४ ।। वैधाच्च नहि स्वप्नदिवदित्याह सूत्रकृत् । जाग्रत्स्वप्नार्ययोस्तस्मात्सत्यासत्यविवेचना ॥४५॥ व्यस्तविपयमे ही सत्य-असत्यरूप प्रोव्याघ्रोव्य भी कहते है। स्वप्नार्थ अस य है। जाग्रदर्थ सत्य है। "वैधाच्च न स्वप्नादिवत्" इस मनसे अर्थ निकलता है कि स्वाप्नार्य मिथ्या है ।। ८४-४५ ॥ समस्तेऽपि समस्त विषयेऽप्व ध्रौव्याघ्रोव्ये जगुव॒धा. अपर कश्चिदित्यादेरनुक्त स्वमत स्विदम् ॥४६॥ एतसिान्निति दृश्येऽस्मिन्जगतीत्येतदुच्यते । तेन वाटमनतातील या व्यावत्यते स्वयम् ।। ४७ ॥ "समस्तेऽप्यतस्मिन् ' समस्तविषयमे भी विद्वान लोग ध्रौव्य अधोव्य बहते हैं । यहापर कश्चित् अपर, पर आदि न कहने से यह स्वमत प्रतीत श्लोक ] स्पन्दवातिकसहितम् ११३ होता है। "एतस्मिन्" का दश्य जगत अर्थ है। अत वाणी और मनसे परे जो तत्त्व है वह स्वय व्यावृत्त होता है ॥४६-४७ ।। जातिनित्या व्यक्तिरनानित्येत्युमयमेव न । जातिरेकैव सत्ताख्या सा चोपाधेरनेकपा ।। ४८ ॥ सता ब्रह्मस्वरूपेति तस्या नित्यत्वमिष्यते । सत्यासत्यात्मकोऽय च प्रपश्च. सकलोऽप्यत ।। ४९ ॥ जाति नित्य है, व्यक्ति अनित्य है। अत जगत् उभयरूप है । (जातिरूपेण नित्य और व्यक्तिरूपेण अनित्य है) जाति वस्तुत एक ही है । उसे सत्ता कहते हैं। उपाधिवशात् वह नाना है। सत्ता ब्रह्मरूप ही है । अत नित्य है। अतएव प्रपञ्च सत्य-असत्य उभयात्मक है यह भी कह सकते हैं ।। ४८-४९ ॥ सत्यानृते च मियुनीकृत्य व्यवहृतिर्भवेत् । सर्वापि लौकिकीत्येव माष्यकारोऽप्यभाषत ।। ५०॥ अस्ति भाति प्रिय चैव नामरूप च पञ्चकम । आद्य त्रय ब्रह्मस्प मापारूप ततो द्वयम् ॥५१॥ एतत्पश्चकप हि जगदेतत्तया सर्योऽपि व्यवहारोन दृश्यते क्रियतेऽपि च ॥५२॥ समस्तविषये तस्माद् ध्रौव्याप्रौव्यविनिश्चय । सर्वयेदान्तसिद्धान्तस्वीकृतोऽय निज मतम् ।। ५३ ।। समस्त लोकव्यवहार सत्य और अनृतका मिथुनीकरण करके ही होता है एमा भाप्यकारने भी बताया है। अस्ति (है) भाति (भासता है) प्रिय ये तीन और नाम (घट आदि) रूप (पृयुयुध्नोदरादि) य दो मिलाकर पाच । मे तीन ब्रह्मके रूप है। दो मायावे रूप हैं। यह पूरा जगत् उक्त पचस्प है। उसीसे सभी व्यवहार होते दीखते हैं और रिये भी जात हैं। फरत समस्त विपयमे भी ध्रौव्य अधोनिश्चय सर्ववेदान्तसिद्धान्त. समव है। यही पुष्पदन्ताचाय का आना मत है ।। ५०५३ ॥ यसवं खल्विद ब्रह्मत्याधनयविचारणात । नेति नेतोति यच्छास्तमन्त्यद्वयनिवारणात् ॥ ५४ ।। 'सव परिवद ग्रह्म यह जा श्रुति है वह अस्ति भाति प्रियको उपादानकर प्रवृत्त है । और नेति नति यह जो श्रुति है वह नामरूपी निवारणकर प्रवृत्त है ।। ५४ ।। तत। d ११४ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ नवमः सर्वमिथ्यात्ववादस्तु नव संगन्तुमर्हति । अधिष्ठानं विना नवाग्मत्यारोपस्य संभवः ।। ५५॥ निषेधश्च कथंकारं समवेदधि विना। तस्मादवधिसत्यत्यमकामेनाप्युपेष्यते ॥५६॥ सब मिथ्या ही है इस वादको अर्थात् शून्यवादको सगति नही हो सकती । क्योकि बिना अधिष्ठान आरोप संभव नहीं है। और अवधिके बिना निषेध नहीं होगा । अत. अवधि सत्य मानना ही होगा ॥ ५५-५६ ॥ तमतविस्मित इव फयं वस्तुविकल्पना । अनेदमेवमिति हि नहि वस्तु विकल्प्यते ॥ ५७।। इन मतोसे मैं विस्मित मा हो गया हूँ कि यह प्रस्तुविकल्प कैसे ? एक वस्तुमे यह ऐसा नहीं, ऐसा ही, ऐसा विकल्प नहीं होता ।। ५७ ॥ नौलोग्नीलच कलश इनि नैव विकरप्यते । न वा घटोऽघटश्चेति प्रियव हि विफलप्यते ॥५८ ।। यह घट नील १ अनील है, यह घट है अघट है इस प्रकार वस्तु- विकल्प नहीं होता है । नियाविकरप होता है...करी न करो दोनों सभव है ॥५८॥ नाहं विस्मित एवास्मि शिवमाया हि दुर्गमा। तयाभिभूताः सुधियो वर्णयन्त्यन्यथान्यया॥ ५९॥ स्वसिद्धान्तव्यवस्थासु हूँ मिनो निश्चिता दृष्टम् । परस्पर विरुध्यन्तै तेरयं न विध्यते ॥६०॥ अस्पसंयोगो वै नाम सर्वसत्यसुसो हितः । अयिवादोऽपिप्रश्न गौडाचानिरपितम् ॥६१॥ पल्पयन्येय नऽपि प्रौव्याघ्रौव्यादिकं प्रवम् । यतो यस्तुयिफल्मोऽयमसंभव उदीरितः ।। ६२ ।। फल्पनाया लिपल्पस्तु सवकोविदसंमतः। मो मालाम्बुधारेति रज्गौ यकरप्पदर्शनात् ॥ ६ ॥ मिलित्या यादिनो तकल्पनां साधयन्यतः। यियदामो मतः साधमयिवादं नियोधन।।६४॥ शिवमायावशीनूताः कल्पयन्त्याययाव्यया। तपको विस्मयो नाम सा च प्रोसा दुरत्यया ।। ६५ ॥ "पिस्मित " विन्मित जंमा , न पि. निम्मित ही । पयोति निरमाया सुगंम है। उसमें पानी भी अभिभून होते है और अन्यपा वर्णन श्लोक.] स्पन्दवातिकसहितम् ११५ करते हैं (जानिनामपि नेनामि देवी भगवती० ) अपने सिद्धान्तानुसारी व्यवस्थामे द्वैतवादी निश्चित है। अतएव वे परस्पर विरुद्ध हैं। उनके साथ हमारा विरोध नहीं है। "यह मगरहित ब्रह्मपी योग सर्वसुसकारी हित- कारी है । यहा कोई विवाद नही, विरोध नहीं" ऐमे गौडपादाचार्यने वर्णन किया है । ध्रुव अध्रुव यह सब अपनी-अपनी कल्पना है। क्योकि वस्तु- विकल्प नहीं हो सकता यह वता चुके हैं। हा, जमे प्रियामे विकल्प होता है वैसे कल्पना मे भी विकल्प हो सकता है। रज्जुमे यह मर्प है, यह माला है, यह जलधारा है ऐसा कल्पनाविकल्प होता है । फलत पूरे वादी मिलकर द्वैतकी कल्पना ही सिद्ध करते हैं। तब उनसे हम विवाद क्यो करे ' हमारा अविवाद ही है। शिवमायाके वशीभूत होकर लोग अन्यथा अन्यथा कल्पना कर रहे है। इसमे हमे कोई विस्मय नहीं है। क्योकि गिनमायाको पार करना कठिन है ।। ५९-६५ ॥ शिवमायां तु वोक्यवमाश्चर्यचकितोऽस्म्यहम् । अहो कमियं लोकानतंयत्येय यन्त्रयत् ।। ६६ ।। ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि मा। बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।। ६७ ॥ मायिकं त्विदमादाय कय स्तीपीति चेच्छण । मुखरत्वं तत्र हेतु वक्ष्यामोऽनुपदं वयम् ॥ ६८॥ हा, यह वात जरूर है कि ऐसे नानामतविरोधके हेतु शिवमायाको देखकर मैं आश्चर्यचक्ति ही होता हूँ। अहो। यह माया लोगोको कैसे नचा रही है । यह वचन सत्य है जो शास्त्रोमे उक्त है "वह भगवती महामाया ज्ञानियोंके चित्तको भी बलात् पोचकर मोहमे डालनी है।" जगत यदि मायिक है, वास्तविक नही, तो इनसे आप कसे स्तुति करेंगे? इममा उत्तर अभी हम देगे वि में मुसर हूँ।। ६६-६८॥ यद्वा विरुद्धस्पत्वादेतस्मिथ्यात्वनिश्चये। मिथ्यामूहि नः रात्यमुपलक्ष्यास्मि विस्मित ॥ ६९ ॥ कश्चिदाश्वयंयत्पश्यत्याचप्टेऽन्यस्तय शृगोत्याश्चयंवच्चान्य इत्येव स्मृतिपूदितम् ॥ ७० ॥ अथवा 'तविम्मित इव ' साज-तबिरुद्वरत एव मिय्याभूतरुा- लक्षित सन्य वीक्ष्य चिम्मित । अयान् य मन परसर विरद्ध होनेरो जगा मिय्या वपना है यह मिन होता है । तब मय कोई और है ऐगा निश्रय यह मारा

११६
श्री शिवमनिम्न स्तोत्रम्
[नवमः
कर सत्य की खोज हुई। उसे देखा तो आश्चर्य सा लगने लगा। गीतामे
कहा है-कोई उसे आश्चर्यवत देखता है, कोई आश्चर्यवत बोलता है, कोई
आश्चर्यवत् सुनता है ।। ६९-७० ।।
विस्मितोम्यद्भुताकारे नितरां परमेश्वरे ।
सोऽहमेतर्मतः कुर्वे स्तोत्रमित्यन्वयोऽथवा ।। ७१ ॥
नव तात्पर्यमेष्वस्ति शिवतत्परचेतसः।
उदयं च लयं चैव सांत्यवत्प्रनवीम्यहम् ।। ७२॥
फतुध्वंसं वदन् क्यापि वचिम नैयायिका दिवत् ।
न वेधि तत्त्वं यन्न त्वमिति वेदान्तिवद् युवे ॥७३॥
पौराणिककथा वच्मि सर्वसत्यत्ववादिवत् ।
एतैरतो मतैः स्तोत्रं वदामि भवतः प्रभो ।।७४ ।।
विस्मित इव तैमते स्तुवन् ऐगा भी अन्वय हो सकता है । अर्थात्
परमात्माके विषयमे मै विस्मित हूँ। मैं इन्ही पूर्वोक्त विरुद्ध मतोको लेकर
स्तुति करता हूँ। इनमे मेरा कोई तात्पर्य नहीं । 'जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्"
यहा प्रलग शब्दमे माग्यमतानुमार बोलता है। "ऋतुध्वसस्त्वत्त" यहा ध्वस
पदसे नैयायिकमतानुगार बोलता हूँ। 'न विद्मस्तत्तत्त्व वयमिह तु यत्त्वं"
यहा वेदान्तीके शब्दोमे बोलता हूँ। और "तवैश्वर्य यत्नात्" इत्यादि
पौराणिक कथाय्यानमै सर्वरात्यत्ववादी जैमा वोलता हूँ। इस प्रकार इन्ही
मतोको लेकर ही भगवस्तुति कर रहा हूँ॥ ७१ ७४ ॥
एवमन्वयपक्षस्तु सम्यड न घटतेतराम् ।
सफलाऽप्रौव्यपक्षेण स्तुतेरमानवेक्षणात् ॥ ७५ ॥
परन्तु ऐसा अन्वय बहुत ठीक तो नहीं लगता है। क्योकि "सकलम-
परम्पध्रुव' इस बौद्धपक्षको लेकर यहापर स्तुति देखनेमे नहीं आ
रही है ।। ७५॥
समस्तपक्षो यदि च तुरीयो नात्र गण्यते ।
समस्त इति सर्वस्मिन् युक्ता हो ददर्शनात् ।। ७६ ॥
तथापि नाह
जिहमोत्येवमन्वय इप्यते ।
इदंकारास्पद ममध्य श्रुतिसंमतम् ॥ ७७ ॥
न तु चौद्धमता यागमत्र श्लोय तु यिद्यने ।
पत्तीरिवृतीत्यग्रे याधित ततत्परम् ।। ७८॥
एय मननपेणार स्तुति स्पष्टा यिसोपयते ।
इत्युच्यते तदा प्रीतोऽप्यन्वयोऽत्र तु, संमयेत् ॥ ७९॥

" श्लोक ] स्पन्दवार्तिकसहितम् ११७ यदि "समस्तेऽप्येतस्मिन्" यह चतुर्थ पक्ष नहीं है। समस्तेऽप्येतम्मिन् न जिहमि ऐसा अन्वय है । अर्थात् ये सभी मत परस्पर भिन्न हैं, इन सबको लेकर स्तुति करना लज्जास्पद है, पर मुखर होनेसे मैं लज्जाका अनुभव नहीं करता ऐसा मतलब है ( लगभग इसी प्रकार मधुसूदन सर- स्वतीकी व्याख्या है ) सकलमपरस्त्वध्रुवमिद यह वेदान्तपक्षकथन है । इदसे इदकारास्पद दृश्य जगत् लेना चाहिरे । वह अनित्य और असत्य है । (दृक् असत्य नही ) यहा बौद्धमतका वर्णन नहीं है ( आचार्योने वोद्धवर्णन किया है किन्तु वह अग्राह्य है ) सकलाध्रुवमतकी झलक 'अयी तिमो वृत्ती इस श्लोकमे तीर्ण विकृतिसे मिलती है । क्याकि तीण विकृतिका वाधित द्वैत ससार अर्थ है । फलत तीन मतोको लेकर ही पूरी स्तुति है एसी व्याम्या करेंगे तो तैमत स्तुवन् उक्त तीन मतोंसे स्तोत्र करता हूँ यह अन्वय भी यहा सभव है ॥ ७६-७९ ।। अन्यान्यमतबाधेन कल्पित सफल मतम् । तद्वहिर्भावविरहात् कल्पित चासिल जगत् ।। ८० ॥ एतत्स्फुटयितु वौद्धमतमप्यत्र दशितम् । न पुनस्तन्मतेनापि स्तुतिरन विवक्षिता ॥८१ ॥ तरित्यनेन पुनवौं वर्जस्त्रिभिर्मत । स्तुवमिति यदा व्याख्या साप्यत्र घटतेतराम् ।। ८२ ॥ यदि ऐसी व्याख्या की जाय कि परस्पर मतबाध हानेसे सभी मत कल्पित हैं। मत कल्पित है तो मतविपय जगत भी कल्पिन ही है । इस वातको स्पष्टनर करने मानके लिये बोद्धमतोपन्यास किया न कि उस मतसे भी स्तुति यहा विवक्षित है। ते स्तुवन् का बौद्धतर तीन मतासे स्तुति करते हुए ऐमी व्याख्या करो। तब जिस व्यास्यारी मम्मर घटना नहीं है ऐसा पहले बताया वह व्याम्या भी सगत हो जायेगी ।। ८०-८२ ।। ननु सर्व मतमिद वाचैव प्रतिपाद्यते । तदा वाग्विषयस्यैध फल्पितत्य समागतम् ॥ ८३ ॥ तदा च स्तुतिरप्येषा वागू पा फरिपत यदेत् । स्तुतिश्च कल्पितायन लज्जयेत् किन मानयम् ।। ८४ ।। उच्यते नास्ति मेलज्जा मुखरोऽस्मि स्तुती यत । मुखरस्य च पृष्टत्य लग्गा पृष्टस्य का मवेत् ॥ ८५ ॥ पूर्वपक्ष -'जगति गदति के अनुसार य मभी मत याणीत प्रतिपादित होत है। ये सव पल्पित है तो उसका मतलब है धाग्विषयमात्र - ११८ श्री शिवमहिम्न स्तोनम् [ नवमः कल्पित है। तब आपकी यह स्तुति भी वाणी होनेसे उराका विषय भी कल्पित हुआ। कल्पितार्थसे स्तुति करना तो लज्जाका विषय है। (जैसे मूर्खमें विद्याकी कल्पना कर उसे विद्वान कहना ) ममाधान यह है कि मुझे कोई लज्जा नही है । क्योकि मै वाचाल हूँ । वाचाल धृष्ट होता है । धृष्टकी भला क्या लज्जा हो ॥ ८३-८५ ।। दुर्लमो यस्य काचोऽपि स्वबुद्धया स्तोत्यसो नृगम् । काचहारसुशोभोति निन्दा तष्टितो न सा ॥ ८६ ॥ विस्मितः काचदौलम्यान्मुखरो जायते यथा । अविचिन्त्यैव तदोपगुणौ स्तोत्यप्यतो नृपम् ।। ८७ ।। अविचिन्त्य जगध्रौव्याघ्रौव्यादिकमहं तथा । वीक्षितेन महत्त्वेन भगवन्तं स्तवीमि हि ॥ ८८ ॥ जिसके लिये काच भी दुर्लभ है उसकी दृष्टिमे काचकी भी महत्ता है । काचके हारसे यह राजा चमक रहा है वैसा वह कहेगा । उसकी दृष्टिमे वह निन्दा नहीं है । काचको दुर्लभतासे उमे देवनार शुश होकर जो मुखर हो उठता है, वह काचके गुणदोपको क्यो सोचने लगेगा ? वैसे मै भी ध्रौव्य अधोव्यादिकी ओर ध्यान न देकर प्रत्यक्ष महत्त्वसे भगवत्स्तुति करता हूँ ॥ ८६-८८ ॥ अय भायो हरोत्कर्षतात्पर्य केवलं मम । अरूदर्थमुपादायाप्युत्कों वर्णते दुधैः ॥८९॥ वपामुदखिदत्प्रजापतिरितीरितम् । असदर्थमपि उत्कर्षमानयेत् ।। ९० ॥ उत्कर्पश्च महेशान्न भिद्यते तेन सोऽप्यसन् । फुतो नेति तु शडात्र जापते नैव धीमताम् ॥ ९१॥ तस्मात्सर्घ मम वचः स्तुत्यर्थं युज्यतेतराम् । तदेतदाह न खलु जिहेमोत्यादिना मुनिः ॥ ९२ ॥ यहा भावार्थ यह है कि स्तुतिवचनोमे शकर भगवानका उत्कर्षमान तात्पर्य विषय है। पाचार्य असत् होनेपर भी उत्कर्षवर्णन हो मकता है। जैसे "प्रजापतिर्वपामुदग्विदत्" यहा पहले बताया । यह वाका करें कि उत्कर्प भी तो अमन है तो उत्तर है-नहीं। उत्कर्ष महेश्वरसे अभिन्न होनेसे असत् नहीं है। अत उत्कर्षवर्णनार्थ मेरा सभी स्तुतिवचन युक्त ही है। युनमे फिर लज्जाको यात कहा रह जाती है ? यही "स्तुवन्जिह मि त्या न खलु" इत्यादिसे पुप्पदन्त मुनि बता रहे है ।। ८९-९२ ।। यथा स्पष्ट वच

श्लोकः]
स्पन्दवातिकसहितम्
११९
यस्मिन् विकल्पितं लोकः यथाबुद्धघखिलं जगत् ।
तस्मै नमोऽस्तु कस्मैचित् परस्मै परमात्मने ॥ ९३ ॥
अपनी बुद्धिके अनुसार लोगोने जिसमे समस्त जगत्की कल्पना की
उस वाचामगोचर पर परमात्माको मैं प्रणाम करता हूँ ।। ९३ ।।
इति थी काशिफानन्दयोगिनः कृतिनः कृतौ ।
महिम्नः स्तोत्रविवृतो स्पन्दोऽयं नवमो गतः॥4॥
दशमः श्लोकः
नाम
अतव्यावर्तनद्वारा शक्यस्तवन ईश्वरः।
अर्वाचीनपदद्वाराप्येवमेव महेश्वरः॥१॥
अतव्यावृत्ति करते हुए परमेश्वर का स्तवन सभव है । और
अर्वाचीनपदके द्वारा भी भगवानकी स्तुति करना शक्य है।। १॥
अर्वाधीनपदं तस्यैव परमेशितुः।
स्वेच्छाग्रहीतरूपेण युक्तमोपाधिक
पदम् ॥२॥
तदेतत् स्तवनीयं चेत् सुतरां तु निपात्पदम् ।
स्तवनीय भवेत्तेन द्वारा रूपेण निर्गणम् ॥ ३ ॥
अर्वाचीन पदका मतलब है उसी परमेश्वरका स्वेच्छागृहीत औपा-
धिक स्वरूप । वह यदि स्तवनीय है तो उसी स्पके द्वारा निपात रूपी
निर्गुण पद भी सुतरा स्तवनीय होगा ॥ २-३ ॥
यश्चापं महिमाऽर्याधीनपदेऽनादेस्तु स प्रमोः।
तत्स्तवे परमस्यैव स्तुतिः शंभोः स्वभावतः॥४॥
मिष्टान्ने यदि माधुर्य स्यादुरपेण चेत्स्तुतम् ।
शकरायास्तु माधुर्य स्वयमेय स्तुतं भवेत् ॥५॥

१२० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ दशमः और यह भी बात है कि अर्वाचीन पदमें जो महिमा है वह अनादि प्रभुकी ही महिमा है । अत. अर्वाचीनकी स्तुति से अनादि तत्त्वकी स्तुति अपने आप हो जाती है । मिठाईका माधुर्य सरसस्पर्म यदि बखाना गया तो शक्करके माधुर्यकी बखान अपनेआप हो जाती है ।। ४-५ ।। महिमानं प्रययितुं निजं परममङ्गलम्। धते भगवानेतर्वाचीनपद तया ॥६॥ और भी बात यह है कि अपनी परममगलं महिमाको प्रथित करनेके लिये ही परमेश्वर अर्वाचीन पद ग्रहण करते हैं। फलतः अर्वाचीनपद द्वारा मूल महिमाका ज्ञान होता है तो अर्वाचीन पदस्तुतिद्वाग मूलपदस्तुति स्वतःसिद्ध है ।। ६ ॥ यथा ातव्यावृत्त्येपा कथंचित्प्राह मां थुतिः । कथं तथा च जानीयुः सर्वे सुकृतिनो हि माम् ॥७॥ अविज्ञातपदाःसन्तः सन्तोऽपि न च मामियुः । उपासनाद्यैः प्रकृतिलयान्तं तु फलं मतम् ।। ८ ॥ प्रकृतिप्रविलीनाश्च परमानन्दवजिताः। पुरुषार्थच्युता जोवा भविष्यन्ति न संशयः ॥ ९ ॥ पशूनां हन्त जीयानां पतिरेपोऽस्मि पालकः । प्रत पालयितव्यास्त इति व्यवसितो हरः॥ १० ॥ अर्वाचीनपदं धते सन्तस्तद्वीक्ष्य चाद्भुतम् । महिमानं समन्विप्य मूल जानन्ति तत्पदम् ॥ ११॥ इसको कुछ और स्पष्ट समझिये-भगवान शकरने देखा कि मुझे श्रुति भी अतद् व्यावृत्तिसे यथाकथचित रहती है। ऐसी स्थितिमे ये सब पुण्यात्मा कैसे मुझे जान पायेंगे ? मुझे न जाननेपर बड़े-बड़े सन्त भी मुझे प्राप्त नहीं होगे। मामान्य उपासनाओसे वे केवल प्रकृतिलीन होगे। प्रकृतिलीन होनेपर परमानन्दकी प्राप्ति नहीं होगी। इसप्रकार ये जीव पुरुषार्थच्युत होगे। जीवरुपी पशुओका मैं पति ठहरा । अत. इनका पालन मुझे अवश्य करना चाहिये । भगवान शकरका यही निश्चय था । तदनुसार शकरने अर्वाचीन पद धारण किया। सन्त पुरप उस अद्भुत अर्वाचीन पदको देखकर मूल महिमाका अन्वेषण करते हुए उसे भी जानने लगे ॥ ७-११॥

श्लोकः] स्पन्दवातिरसहितम् १२१ अर्वाचीनपदस्यातो मूलपर्यन्तगामिनी। पारम्पर्येण भवति स्तुतिरित्येप निश्चयः॥ १२॥ अत. अर्वाचीन पदकी स्तुति परम्परया मूलपदगामिनी है यह निश्चित होता है ।। १२॥ अतः पौराणिकोमिस्तन्महिमानं प्रभावते । श्मशानश्लोकपर्यन्तमर्वाचीनं कथादिभिः॥१३॥ प्रसङ्गत. क्वचित साक्षादिय चापि न्यारूपयत् । फतुसुप्तिप्रवचनप्रभृताविति बुध्यताम् ॥ १४॥ अत पुष्पदन्ताचार्य 'श्मशानेप्वाक्रीडा' श्लोक्तक पौराणिककथाओसे अर्वाचीनमहिमागान करते हैं। प्रसङ्गत 'जतो सुप्ते' इत्यादिमे साक्षात् जैसा भी मूलमहिमानिरूपण है ॥ १३-१४ ॥ तवैश्वर्य यत्नाद्यदुपरि विरिश्चो हरिरधः परिच्छेतुं यातायनलमनलस्कन्धवपुषः । ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भया गिरिश यत् स्वय तस्थे ताभ्यां तब किमनुवृत्तिन फलति ॥ १० ॥ हे गिरिश ! आपके ऐश्वर्यकी सीमा देखने के लिये यत्नके साथ ब्रह्मा और विष्णु आपके ज्योतिलिङ्गके ऊपर और नीचेकी ओर चले । किन्तु वे असफल हुए। वे फिर अतिशय भक्ति और श्रद्धाके साथ जो स्तुति करने लगे थे, उसीसे फिर आपने उनके समुख अपने स्वस्पको प्रकाशित किया। आपकी ऐसी सेवा क्या क्या फल नहीं देती ॥१०॥ तवैश्वर्य तवैश्वयं यदिति प्राग व समागतम् । तुल्यशब्दद्वयावृत्तिरश्वर्यक्यविवक्षया ॥ १५॥ प्रयोवस्तु यदैश्वयं त्रिपाद्ब्रह्मात्मक परम् । प्राचीनपदद्वारा तदेवान निरूप्यते ॥१६॥ 'तवैश्वर्य यन्तज्जगदुदय' इत्यादि पहले आया है। यहा तवैश्वयं यह समानपद दोनो जगह ऐश्वर्य एक ही है यह बतानेके लिये है। अर्थात् जो त्रयी वस्तु त्रिपाद् ब्रह्मस्प परम ऐश्वर्य है, जिमका प्रतिपादन पहले हुआ, उसीको यहा अर्वाचीनपदके निरूपणवे द्वारा निरूपित किया जा रहा है।। १५-१६ ॥

१२२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ दशमः यदुपरि० सर्वश्वयं परिच्छेतुं जान क्रिययापि च। उपर्यपो ब्रह्मविष्णू जग्मतुः प्रभुमानिनी ।। १७ ।। आपके ऐश्वर्य का ज्ञान और क्रियासे परिच्छेद करनेके लिये अपनेको प्रभु माननेवाले ब्रह्मा और विष्णु ऊपर और नीचे चले ॥ १७ ॥ अनलस्कन्धo रुद्रो वा एप खल्वग्निरित्येयं श्रुतिपु श्रुतम् । स्कायो वृक्षस्य मूलोज़भागो यो दीर्घवर्तुलः ॥ १८॥ स्कन्धाकारं वपुर्दोघं शिवलिङ्गमिहोच्यते । अनलो ज्तीतिरर्थोऽपि ज्योतिलिङ्ग विवक्षितम् ॥ १९॥ "रुद्रो वा एप यदग्निः" ऐसी श्रुति है। उस अग्निका स्कन्ध अनलस्कन्ध है । लबै गोल-गोल वृक्षके थड़को स्कन्ध कहते हैं। स्कन्धा- कारमें प्रज्वलित अग्नि शंकरका शरीर है। अनलका अर्थ ज्योति भी है। अतः ज्योतिलिङ्ग अर्थ विवक्षित है ।। १८-१९ ।। स्कन्धः समुदयेऽपोति फोशात् पुजार्थवाचकः । ज्योतिःपुजवपु.सोऽपिज्योतिलिङ्गस्वरूपधृक् ॥ २० ॥ "स्कन्ध. समुदयेऽपि स्यात्" ऐसा कोशमें बताया है । समुदय: ज्योति.पुञ्जशरीरका मतलव है- ज्योतिलिङ्गस्वरूपधारी ।। २० ।। ज्योतिलिङ्गं पञ्चमुखं शिवतत्त्वमिहोच्यते । कि वा पूर्ण परशिवतत्त्वमेव विवक्षितम् ॥२१॥ ज्योतिलिङ्गका अर्थ है पचमुख शिवतत्त्व। अथवा पूर्ण शिवतत्त्व ही यहा ज्योतिलिङ्गका मतलव है।॥ २१ ।। अनलम अनलं तावपर्याप्तौ परिच्छेत्तु बभूवतुः। न शेकाले परिच्छेत्तु शेवं ब्रह्मविधी पवम् ॥ २२ ॥ किन्तु वे अनल हुए अर्थात् शिवलिङ्ग परिच्छेद करनेमे अपर्याप्त हुए। ब्रह्मा और विष्णु शिवलिङ्गको परिच्छेद नही कर सके ।। २२ ।। समुदाय अर्थात् पुञ्ज ।

श्लोक 1 स्पन्दवातिकसहितम् १२३ ग्रह्मा कदाचिदगमत् क्षीरसागरशायिनम् । शयान त विलोक्याह कस्मात्स्यपिपि पुनक ॥ २३ ।। आगच्छन्नभिन्ध स्यादभ्युत्थानादिभि सुते । गुरुरेपा भवेच्छास्त्रमर्यादा ता स्मरात्मज ।। २४ ॥ एक समय ब्रह्माजी विष्णुके पारा गय । विष्णु क्षीरसागरमे शेप- शय्यापर लेटे हुए थे। वैसे उनको दखकर ब्रह्माजी पोल-वटा, कैसे लेटा हुआ है ? पिता जव आते है तो पुनका कर्तव्य है कि वह उठकर वन्दन करे। यही शास्त्रमर्यादा है। उसको स्मरण कर ।। २३-२४ ।। विष्णु - हन्त पुरा भो ब्रह्मन् वेदान् विस्मरसि स्वयम् । वन्दा वन्दस्य मा तात पादस्पर्शादिभिहरिम् ॥ २५ ॥ स्तब्ध एपि वथ मा त्व प्राज्ञमानी जगत्पतिम् । अशिक्षयमह प्रार त्या स्मर सम्यक् समाहित ॥ २६ ॥ विष्णुन वहा--हाय । पुन ब्रह्मन् । कैस तुम वेदोको ही भूल रहे हो? वन्दनीय मुझ हरिकी चरणस्पर्शादिसे वदना करो। तुम अपनेको पण्डित जैसे समझते हुए स्तब्ध होकर जगत्पति मेरे पास आये हा । यह भला कैसे? मैंन तुमको पहले ही वेदोकी शिक्षा दी थी। समाहितचित्त होकर उसका स्मरण करो। २५ २६ ।। ब्रह्मा -कथ त्व मम तातोऽति तातोह विश्वसृड् यत । विश्व सृजस्त्वा चाह पितामह इतीरित ॥ २७ ॥ जगत्पतिर्भवे काम पालयेथा जगत्त्रयम । फय पालयितुर्नाम सप्तृत्व समुपागतम् ॥ २८॥ ब्रह्मा बोले -तुम मरे पिता कैस हो ? मेरा नाम विश्वमृट् है । सारे विश्व को मैंने बनाया जिस विश्वमे तुम भी आ जाते हो। इसलिये मेरा नाम पितामह भी है। तुम जगत्पति हो उसका कौन निपध करता है ? जगत्का पालन करो। किन्तु पालक सप्टा कहासे बना ॥ २७२८॥ विष्णु-ग्रहो मूढ न जानासि मन्नामेस्त्वत्समुद्भवम् । सृज विश्व पर त्वा तु सृजाम्यहमिति स्थिति ।। २९ ।। अभिवादनशीलस्य नित्य वृद्धोपसेविन । चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुविद्या यशो बलम ॥ ३०॥ नाभिवादयते पस्तु वृतान्नव च चत्वारि तस्य नश्यन्ति आयुर्विद्या यशो बलम् ॥३१॥ सेवते ।

तदध 1 १२४ श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [ दशमः तेऽविनीतस्य गतमायुनिबोध मे। चक्रेणाद्य शिरस्ते तु छिनमोक्षस्व तत्क्षणात ॥ ३२॥ विष्णु बोले- अरे मूढ ! मेरी नाभिसे तुम पैदा हुए यह क्या नहीं जानते ? तुम जगतकी सृष्टि करो चिन्तु तुम्हारी उत्पत्ति करनेवाला मैं है। अभिवादनशील वृद्धसेवारत पुरुपके आयु विद्या, यश और बल ये चार यदि वढते है तो जो अभिवादन और सेवा नहीं करता उमके वे ही चार-आयु विद्या यश-चल नष्ट भी होते है। आज तुम्हारी आयु समाप्त हो गयी समझ लो। इस च से तुम्हार देखत ही सिर काट गिराता हूँ। २९ ३२॥ ब्रह्मा - सप्टा स्वयभुव इति वक्तुबर्वालिशता स्फुटा । कस्ते सावयवस्यास्ति स्रष्टान्यो महते वद ॥३३॥ वेदमार्गविह-तार हन्त हन्तास्मि सप्रति । ब्रह्मास्त्र पश्य मेऽत्युन स्मरणीय स्मराधुना ॥ ३४ ॥ ब्रह्माजी बोले-मेरा नाम स्वयभू है। स्वयभूका स्रष्टा मैं हूँ कहने- वालेकी मूर्खता स्पष्ट है । तुम सावयव हो । सावयव होनेसे उत्पन्न हो। तुम्हारा लप्टा मेरे सिवाय कौन होगा? वेदमागका उल्लघन करनेवाले तुम्हारा आज मैं हनन करूँगा । मेरा यह अत्युग्र ब्रह्मास्न देख लो और अन्त समयमे स्मरणीयका स्मरण कर लो ।। ३३ ३४ ।। इत्येव प्रवदन्ती तावारभेता महारणम् । हाहाकारो महानासीत्तदा देवासुरादिपु ॥ ३५ ॥ ब्रह्मास्त्र प्राक्षिपद् ब्रह्मा चक्र च प्राहिणोद्धरि । तत्सघट्टसमुत्याग्निज्वाला विश्वमजज्वलत् ।। ३६ ॥ इस प्रकार कहते हुए सचमुच दानोने महायुद्ध ही प्रारम्भ किया। देवासुरादिम उम समय बडा हाहाकार मचा । ब्रह्माजीन ब्रह्माम्य छोडा, चक्रपाणि हरिने चक्र छोडा। दोनोको टवकरसे जो अग्निज्याला पैदा हुई वह सारे विश्वको जलाने लगी॥ ३५-३६ ।। देवासुरादय सर्वे निर्भर भयविह्वला । तुष्ट परमेशान रक्षरक्षेति वादित ॥ ३७॥ तदा तयोरन्तराल ज्योतिलिङ्ग परात्परम् । सहसा प्रादुरासीत्प्रयुध्यतो ॥ ३८॥ बाह्ममस्त्र तदा तस्मिन् छष्णव चक्रमेव च। ज्योतिलिङ्गेऽन्यलीयेता तदनुमियाभवत ॥ ३९ ॥ अनाद्यनन्त श्लोक ] स्पन्दवातिकमहितम् १२५ देवामुरादि सभी भयविहर होवर रक्ष रक्ष कहत हुए भगवान शङ्करकी स्तुति करने लगे। तब ब्रह्मा और विष्णु दोनोके मध्यमे अनादि अनन्त ज्योतिलिङ्ग सहसा प्रगट हो गया। और सामने ही देखते देखते ब्रह्मास्त्र और वैष्णव चक्र दोनो ही उस ज्यतिलिङ्गमे लीन हो गये। यह बडा नाश्चर्यकारी रहा ॥ ३७ ३९ ॥ हन्तावयोविवादस्य ज्योतिलिङ्ग निवृत्तये । इदमागातस्य पारद्रप्टा य स गुरु पिता ॥ ४०॥ हसास्वस्तदा ग्रह्मा बराहाकृतिरच्युत । ऊन चाधश्च तत्पार दिहल त्वरित गतौ ॥ ४१॥ अनध्या माधवोचस्तापार ध्वस्तमदस्तत । न्यवृतत् स्वीयशिष्यत्वशङ्कया विमना इव ॥ ४२ ॥ दोनो वोल-देखो, देखो हमारे विवादका निपटारा करने के लिये मध्यमे यह ज्योतिलिङ्ग आया। इसका जो पारद्रप्टा होगा वही गुरु या पिता होगा। ब्रह्मा हसारूढ होकर ऊपरको ओर चले। विष्ण बराहरूप धारणकर नीचेकी ओर चले। विष्णु लम्ब समय तक जाकर नीचे पार न पाकर सप्टगर्व हाकर छोटे बननेकी शड्वासे हताश जैसे वापिस लीटे ।। ४०४२ ।। अष्टपारोऽपि विधि शिष्यत्वभयविह्वल । ऊध्र्व पश्यन्नवैक्षिष्ट केतकी धेनुमेय च ।। ४३ ॥ कृत्वा ते शापभीते स तथव वरलोमिते । अरोत्कूटसाक्षिण्यो तज्ज्योति पारदर्शने ॥ ८४ ॥ ऊपर जात जाते ब्रह्मा भी पार नही पा सके। लेकिन छोट बन जानेके भयसे ऊपर देखते रहे। इतनेमे वहासे केतकी और कामघनुको नीचेकी ओर आते हुए देसा। वो कहा कि तुम दोना मेरे कूट साक्षी वनो । विष्णुमो मैं कहूँगा वि मैंन ज्योतिबा पार देखा । असत्य बोलनेम प्रथम दोनो हिचकिचाने लगी। ब्रह्मान पहा एसा न कहोगी ता में तुम दोनोवो शाप दूगा। मैं ब्रह्मा हूँ। और वैमा करागी ता तुम्ह ममारम सर्वोत्तम होनका वरदान दूगा । आपिर दोनोने मान रिया ॥ ८३ ८४ ।। प्रसन्नमिय त दृष्ट्वा ब्रह्माण घिमना हरि । पप्रच्छ पारमैक्षिाटा Eि साक्षी चानको यद ॥ ४५ ॥ ग्रहमैक्षिषि तत्पार पृच्छेमो ताक्षिणी पुर । द्वयर्थ त्वचालयद्धेनु र सौगन्ध्यतोसरा ॥ ४६ ।।

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [दशमः यावत्प्रणन्तुमुत्तिष्ठत्यच्युतस्तावदेव हि। रुद्र माविमो पारो वीक्ष्य शिप्टेऽन्तं हरः ॥ ४७ ।। नखेन पञ्चमं धातुः शिरोऽच्छत्सीयसत्यया । शशाप धेनुकेतक्यावपूज्यत्वाय शङ्करः॥४८॥ प्रदृश्यमभयग्ज्योतिलिङ्ग सद्योऽतिविस्मयम् । रुद्रः कपाली निरगादटन भिक्षां च काशिकाम् ॥ ४९ ॥ विष्णुने निराश होकर प्रसन्न मुस जैसे ब्रह्माको देखा और पूछा आपने ज्योतिका पार देखा? यदि देसा तो साक्षी कौन ? ब्रह्माने कहा-- हाँ, मैंने देखा, ये दो साक्षी हैं, पूछ लो। पूछने पर कामधेनुने सिर हिलाया जिसका हाँ और नही दोनो अर्थ हो सकते थे। किन्तु विष्णुने समझा-हाँ । केतकोते सुगन्धि लार मानो मूरित किया-हाँ देखा । तब विष्णु अपनेको ब्रह्मासे छोटा समझकर प्रणाम करने उठे। गिप्ट पुरुपमे यह अनृत देखकर भगवान् शङ्कर रुद्ररूपसे प्रकट हुए और झूठ बोलनेवाले ब्रहााके पांचवे मस्तकको नाखूनमे काट गिराया। कामधेनु और केतकी दोनोको माप दिया कि आधी झूठ बोलनेसे दोनो ही अपूज्य बनो । ज्योतिलिङ्ग अदृश्य हो गया। ब्रह्मयधप्रयुक्तपापनिवृत्यर्थ कपालधारी हो भिक्षाटन करते हुए रुद्र भगवान काशी गये। जहाँ ये पापमुक्त हुए ।। ४५-४९ ।। ततो भक्तिश्रद्धा भक्तिश्रद्धाभ्यामगृणोतामुमावपि । पूजायेरन्ववत्तता शिव गलितविस्मयौ ॥ ५० ॥ सेव भक्तिरिति ख्याता यतस्तद् भक्तिलक्षणम् । पूजादिष्वनुराग हि पाराशर्यो जगाद यत् ।। ५१ ॥ मक्तिस्तु परमप्रेमलक्षणा नारदेरिता। तपोपलक्ष्यते पूजाप्रभृतिर्भक्तिलक्षणम् ॥ ५२ ।। तथा च भज सेवायामित्यूचे पाणिनिर्मुनिः। अग्रेऽनुवृत्तिकथनमतः सङ्गच्यते मुनेः ।। ५३ ॥ इसके बाद भक्ति और श्रद्धासे ब्रह्मा और विष्णु दोनोने भगवानकी स्तुति की । गर्व छोडकर पूजा आदिसे शिवकी सेवा की। यही यहाँ भक्ति पदार्थ है । क्योकि पूजादि भक्तिलक्षा है । "पूजादिप्यनुगग इति पारायं" इस प्रकार नारदीय भक्तिमूनम पारनयं ( व्याम ) मतसे पूजादि अनुराग- को भक्तिलक्षण बताया है। भक्ति तो परमप्रेमको बहते है। यहां वह भी ततच ।

श्लोक ] स्पन्दवातिरसहितम् १२७ मानसश्च अर्थ है। उससे पूजादिवा उपलक्षण भी है। अतएव "भज सेवाया" ऐसा पाणिनि ऋषिने सेवा अर्य बताया। इतने श्रमसे पूजादि अर्थ क्यो करना? इसलिये कि आगे इसका अनुवाद अनुवृत्तिपदसे करेंगे-तव किमनुवृत्तिर्न फलति ।। ५०-५३॥ श्रद्धास्वास्तिक्यबुद्धि स्याच्छ्त सत्य धत्त इत्यत । नास्यन्य परमात्मेति पूर्व यौ प्रभुमानिनौ ॥ ५४ ॥ अस्तीति तावमन्येता सा श्रद्धा हरिवेघसो । उत्वर्पवत्त्वबुद्धि शङ्करेऽपारतेजसि ॥ ५५॥ प्रणामादिरन चोत्कर्पधीमव । विवक्षितो मासानुवृत्तिश्चैतेत लभ्यते ।। ५६ ॥ श्रद्धा आस्तिक्यबुद्धिवो कहते है। श्रत् सत्य दधातीति श्रद्धा ऐसा यहाँ विग्रह है। सत्यधारणा ही आस्तिकता है। प्रथम ब्रह्मा और विष्णु अपनेको ही प्रभु मान रहे थे । अन्य परमात्माका अस्तित्व नही मानते रहे। सप्रति वे मानन लगे कि हमस परे परमात्मा है। अयवा उत्कर्पवत्त्वबुद्धि श्रद्धा है। उत्सर्पगोधानुकूर व्यापार प्रणामादि भी यहापर विवक्षित है । कायिक प्रणामादि तो भक्तिसे गतार्थ है । अत मानस प्रणामादि ग्राह्य है । इस मानसानुवृत्तिका भी इससे लाभ है ॥ ५४ ५६ ॥ भरगुरु० यथोक्तभक्तिभद्धान्या भृश गुरु यया तया। सगौरव सुस्थिर चाप्यगणीता महेश्वरम् ॥ ५७ ॥ गिरण स्तुतिरेयान सा सेवा वाचिको मता। अनुवृत्तिरिय चापि भवेद भगयत स्तुति ॥ ५८॥ पूर्वोक्त भक्ति और श्रद्धास मर अयात् अतिशयरूप गुरु भूत अर्यार गौरवम्थिरताके माय दानोो महस्वरसी स्तुति की। ग धातुम गृणदया गब्द है । गिरण स्तुतिमा यत है । स्तुनि वाचिक मवा है । जत यह स्तुति भगवानरी वाचिकी अनुत्ति मानी जायगी ।। ५३५८॥ स्वय तस्थे तत चिर तयाऽगुणोता तो भगयत महेश्वरम् । प्रसन्न सममूदपत्त्या रा च प्रभ ॥५॥ स्थय तस्मै तनातामा प्रीत शिवतनु गिर। प्रकारापनिज पञ्चवक्त्र प्रियम्बकम् ।। ६०॥

[ दशमः
१२०
श्री शिवमहिम्न. स्तोत्रम्
इस प्रकार दीर्घकालतक दोनोने शङ्कर की स्तुति की। उम अनुवृत्ति
से शङ्कर प्रसन्न हुए और भियतनु होकर शिव अपना पञ्चवक्न त्र्यम्बक
स्वरूप प्रकाशित करते हुए उनके सम्मुस स्थित हुए ॥ ५९-६० ।।
प्रेमा कलिलाक्षो चापतता तो प्रभोः पदोः।
उत्याप्य स्थापितात्मानावनुजग्राह शङ्करः ॥ ६१॥
पटेन समपावृत्योपादिशत्कर्णयोस्तयोः।
पञ्चाक्षर
सप्रणवं महामन्त्र
प्रबोधयन् ॥ ६॥
शङ्करके दर्शनसे ब्रह्मा विष्णु दोनोकी आखोमे आसू भर आये ।
दोनो प्रभुके चरणोमे पड गये। इस प्रकार समर्पितात्मा उन दोनोको
उठाकर शङ्करने उनपर अनुग्रह किया। वस्नसे पडदा लगाकर दोनोके
कानोमे प्रणवसहित पञ्चाक्षर महामन्तवा उपदेश किया और प्रबोध
कराया ।। ६१-६२॥
ॐकारः पञ्चमात्रः स्यान्मात्राश्चाकारसयुता।
उकारश्च मकारश्च बिन्दु दश्च पञ्च ताः ॥ ६३ ॥
नमः शिवाय मन्त्रस्थस्ता हि पञ्चभिरक्षरः ।
व्याख्यायन्ते ततः सूक्ष्मस्थूलरूपावुभौ मतो ॥ ६४॥
ॐकार पाँच माना वाला है । अ, उ, म, बिन्दु, नाद ये पांच मानायें
है। नम शिवाय मन्त्रमे स्थित पाँच अक्षरोसे उन्ही मात्राओको व्याख्या
होती है। पांच मानाये सूक्ष्मरूप हैं, पांच अक्षर स्थूलस्प है, यही
फरक है ।। ६३-६४ ॥
उदक प्रत्यायाक् प्राक् च शिरास्यूवं च पञ्चभिः।
उच्च्यन्ते पञ्चकृत्यस्य मम मात्राभिरक्षरैः ॥६५॥
सृष्टिः स्थितिश्च सहारस्तिरोधानमनुग्रह ।
एतानि पञ्चकृत्यानि मम पञ्चमुखैः क्रमात् ।। ६६ ।।
उत्तर, पश्चिम, दक्षिण, पूर्व और ऊर्व इस प्रकार मेरे पाँच मस्तक
है। मै पञ्चवृत्यवाला हूँ। पांच मात्राओमे व अक्षरोसे इन मस्तकोका
निरूपण है । पाँच कृत्य हें मृप्टि, स्थिति, महार, तिगेघान और अनुग्रह।
इन कृत्योरो मैं पांच मुखोसे करता हूँ ॥ ६५६६ ॥
मा कृपाताममिति सृप्टमादौ तु कदाचन ।
तीर्वाभिमान फर्तव्य कुर्वतो न हि बन्धनम् ॥ ६७॥

श्लोक:] स्पन्दवार्तिकसहितम् १२९ सृष्टयामिमतेरेव कलहो युवयोरमूत्। सतस्तां सर्वथा त्यक्त्वा कुरुतं जपमुत्तमम् ॥ ६८॥ नयेनेव हि सिध्येतां युवां नैवास्ति संशयः। मत्स्वरूपं ततो ज्ञात्या विमुक्तौ विहरिष्यथः ॥ ६९ ॥ सृष्टि आदि पांच कृत्य मेरे हैं । अत उनमे तुम अभिमान न करो। अभिमान छोडकर कर्तव्य करनेवालेनो बन्धन नहीं होता। मृष्टि आदिमे अभिमान होनेसे ही आप दोनोमे अभी अभी परस्पर क्लह हुआ। अतः उस अभिमानको छोडकर पञ्चाक्षर मन्त्र जप करो । जपसे आपको सिद्धि प्राप्त होगी। इससे मेरा परमार्थस्वरुप जानकर मुक्त हो विहार करोगे ।। ६७-६९॥ ब्रह्मा पूज्य पुष्करे स्यात् पुच्छे गोः पूजयिष्यते । फेतको स्वतृतीयायां लिथो पूजाहतां ब्रजेत् ॥ ७० ॥ इत्युक्त्वा च हरः प्रोत्या तत्रैवान्तवंधे प्रभः । मुमुदाते परा लब्ध्या सिद्धि द्रुहिणमाधयो ।। ७१ ॥ वर्तते जपतत्पर। फमलसाहसपूजा वक्ष्यामहेऽग्रतः॥७२॥ ईश्वरत्वमपोतारनौ पूज्यावुभावपि । तवानुवृत्तिहि पल कि न दद्याज्जगत्त्रये ।। ७३ ।। ब्रह्मा पुष्करराजमे पूजिन होगे। गायकी पूंछकी पूजा होगी। केवडा तृतीयाको केवडापूजन होगा। रामा कहकर शङ्कर भगवान अन्तर्धान हो गये। परम सिद्धिको प्राप्तकर ब्रह्मा और विष्णु मुदित हुए । अक्षमाला लेकर ब्रह्मा आज भी पञ्चाक्षर जप करते है। विष्णुको कमलसहस्रपूजा आगे बतायेगे। दोनो ईश्वरत्व को प्राप्त हो गये । शङ्करपूजन त्रिलोकमे क्या फल नहीं देता? ।। ७०-७३ ।। विरिञ्चाद्यपरिच्छेद्यमनाचन्तं कृपानिधिम् । प्रशेषफलदातार निदानन्दं शिव भजे ।। ७४॥ जो विरिञ्च आदिके अगम्य है, अनादिअनन्त है, कृपानिधान है, सकल फलदाता है, ऐसे आनन्दस्वस्प ज्योतिम्बम्प शिवत्रा में भजन करता हूँ ॥ ७४ ।। इति श्री काशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतौ। महिम्नःस्तोत्रविवृती स्पन्दोऽय दशमो गतः ॥१०॥ ब्रह्माक्षमालया नित्य

तया
एकादशः श्लोकः
उत्कृष्टाः सात्त्यिका एव विष्ण्वाद्याः यान्ति कि फलम् ।
चेदागदारीनां क्या
भक्तिभविष्यति ॥१॥
मयं दशाननाद्यान तामसा लेभिरे फलम् ।
सुतरां
लम्यमस्माभिः फलमित्युच्यतेऽधुना ॥ २॥
"तव किमनुवृत्तिर्न फति" वताया। उदाहरणरूपेण ब्रह्मा और
विष्णुको प्रस्तुत किया। ता प्रश्न हुआ कि ब्रह्मा विष्णु जैसे उत्कृष्ट, परम
सात्विक उपारा ही फल पाते है क्या ? यदि ऐमा है तो अस्मदादिकी
भक्ति वृथा होगी। इसका समाधान यहाँ दिया जा रहा है कि ब्रह्मादि
एकदेशोदाहरणमात्र है । रावण जैसे तामम व्यक्ति भी भगवद्भक्तिसे फल पा
चुके हैं । हमे तो गुतरा फल प्राप्त होगा। क्योकि हम उतने अधिक तामस
तो नही है, जैसे रावणदि है ॥ १-२ ॥
अयत्नादापाद्य
त्रिभुवनमवरव्यतिकरं
दशास्यो
पवाहूनभृत रणकण्डूपरवशान्।
पभ श्रेणीरचितचरणोम्भोरुहवले:
स्थिरायास्त्वद्भयतेस्त्रिपुरहर विस्फूजितमिदम् ॥११॥
अनायास ही त्रिभुवनको प्रतिद्वन्द्वीरहित बनाकर रावण युद्धकी
खुजलीवाली अपनी बाहुओमे परेशान जो हुआ, वह हे त्रिपुरारी शङ्कर।
आपके चरणोमे पद्मवत् अपने मस्तकसमूह चढ़ाते हुए को हुई उसकी अपनी
स्थिर भक्तिका ही टड्कार था ।। ११ ॥
मातुः शयान
स कोडे विमानं गगनेचरम् ।
किंकिणीरावमधुरमपश्यद्रावणः शिशः॥३॥
किमेतलस्य वा मातरित्युक्ता सा जगाद तम्।
भाता तवास्त्यैडविडो विमानस्तस्य खल्वयम् ।।४।।
पद्मस्तथा महापद्य
शवो मरकच्छपो।
मुकुन्दकुन्दनीलाच सर्वाश्च निधयो नव ॥५॥

श्लोकः]
स्पन्दवानिकमहितम्
१३१
निधीनां पतिरेतेषां स शङ्करकृपावशात् ।
मनाधिपः स भुवने विमानं तस्य पुष्पकम् ॥ ६ ॥
त्वं चैधस्व कृपां तस्य प्राप्य कैलासवासिनः ।
धूनीहि व्यभिताया मे व्ययां तन्मातृसंपदा ॥ ७ ॥
एक दिनकी बात है-शिशु रावण अपनी मांकी गोदमें लेटा था।
ऊपरसे किङ्किणीको आधा नरो युक्त गगनगामी एक विमान उसने देखा।
यह क्या उड रहा है, किमका है। ऐसा रावणने पूछा तो माताने कहा-
तुम्हारे सौतेले भाई कुवेरका यह विमान है । वह शङ्करकृपासे पद्म, महापद्म,
शङ्ख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील, सर्व ऐसे नौ निधियोंका पति है,
ससारमें धनपति है। उसके इसी विमानको पुष्पक विमान कहते है। मेरे
वत्स ! तुम भी कभी गवरकृपा प्राप्त कर आगे बढो और कुबेरकी माताकी
सम्पत्ति देखकर व्यथित मेरे हृदय की व्यथा दूर करो ॥ ३-७॥
मातुगिराऽमयत्तस्य प्रीतिः सा पीविको हरे।
शृङ्गी भृङ्गी रावणश्च कुम्मकरणंश्च यस्मृतौ ॥ ८॥
नारदेन प्रशप्ती तो राक्षसत्यमुपेयतुः।
देवर्षे. कपिबकनत्वं दृष्ट्वा जहसतुहि यो॥९॥
माताके मुखसे शङ्करभगवानकी बात सुनते ही रावणके पूर्वजन्मीय
शङ्करप्रीति जागृत हुई। क्योकि रावण और कुम्भकर्ण पूर्वजन्मके शिवगण
शृङ्गी भृङ्गी ही तो थे। नारदजीके शापसे वे राक्षस बन गये थे। देवपिके
वानरमुखको देखकर जो हँसे थे जिससे उनको गाप मिला था ।। ८-९ ।।
पितामहात् पुलस्त्यात् स लम्ध्वा पञ्चाक्षरं मनुम् ।
तपोऽतिदारुणं तेपे रावणो लोकरावण. ।।१०॥
अपने पितामह पुलस्त्यमे लोक रोदनकारी रावणने पचाक्षर मन्त्र
प्राप्तकर घोर तप किया ॥१०॥
चिरं तप्त्यापि स तपो न लेभे शिवदर्शनम् ।
अतिरुद्रमतो
यज्ञमकरोड वसम्मतम् ॥११॥
यज्ञे कृतेऽपि विधिधनालोक्ष्टि महेश्वरम् ।
ततोऽतिदुःखितश्चिन्नां दुरन्तामाप
कि करोमि शिव किन प्रसादं मयि धास्यति ।
ततो ध्यावस्तवोच्चापूजयच्च मुहमहः ॥ १३ ॥
दीर्घकाल तप करनेपर भी शिवदर्शन नहीं हुआ तो रावणने
अतिरुद्र यज्ञ किया । यज्ञ के बाद भी दर्शन प्राप्त नहीं हुआ। रावण दुमी
रावणः॥१२॥

१३२
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [एकादशः
एव चिन्तित हुआ। क्या भगवान शिव मुझपर प्रसन्न नहीं होंगे ऐसा
सोचकर वारवार ध्यान, स्तुति पूजा आदि को ॥११-१३ ॥
तपो हि हृदयं शंभोः तपः परमसाधनम् ।
तेनापि चेदप्रसन्न शिवो मे जीवनं वृथा ॥ १४ ॥
इत्यालोच्य दशास्योऽपि खङ्ग हस्ते व्यदीपरत् ।
समयं स्वशिरः शम्भु प्रसिपादगिपुटः॥ १५ ॥
निकृत्य शिरस्तस्मिन् कृत्वासो पममायनाम् ।
अग्नी रुद्रपदाम्भोजभावनां चाजुहोददः ॥ १६॥
ततो द्वितीयं संधि तवाग्नावजोहवीत् ।
तृतीयं च चतुयं च पक्षमादि च रावणः ॥ १७ ॥
तप भगवान शंकरका हृदय है । तप परमसाधन है। उससे भी
भगवान प्रसन्न न हुए तो जीवन वृथा है। ऐसा सोचकर रावणने हाथमे
तलवार ली। उसने सोचा कि मस्तक समर्पणकर भगवानको प्रसन्न करूं।
एक मस्तक काटा । उसमे पद्मभावना की और अग्निमे शिवचरण भावना
को और होम किया । इमप्रकार दूसग, तीसरा आदि मस्तक भी काटकर
हवन किया ॥ १४-१७ ॥
अन्तेऽवशिष्टं दशमं वीक्ष्यासो समचिन्तयत् ।
मा मुदस्मिम् भवे प्रीतो भविष्यति भवान्तरे ॥ १८॥
अथ कर्तयितु शीपं दशमं खङ्गमादधात् ।
तावत्प्रसन्नो भगवानभ्येत्यास्य फरेऽग्रहीत् ।। १९॥
मा साहसं भवान् फार्षीत् शीपसंछेदनेऽनघ।
वरं वरय भद्रं ते नादेयं किंचिदस्ति मे ॥२०॥
अन्तमें दसवा सिर अवशिष्ट रहा । रावणने सोचा कि इसे
काटनेपर मैं महगा। भले मरु । दूसरे जन्ममे तो भगवान प्रसन्न होगे
कि इसने पूर्वजन्म में सर्वममर्पण किया था। सिर काटने के लिये ज्योही
तलवार उठायी इतनेमे कर भगवानने प्रगट होकर हाथ पकड लिया
और बोले कि दशम मस्तक काटनेका साहस मत करो। अभीष्ट वरदान
मागो । तुम्हारे निमित्त कुछ भी अदेय मेरे लिये नही रहा ॥ १८-२० ॥
शक्ति लोकाधिका देहि मा देवा मांप्रमीमरन् ।
न मयेन्यो गयं मेऽस्ति विश्यनाय नमोऽस्तु ते ॥ २१ ॥
तयास्त्विति वरं दत्वा कृत्वा शोर्याणि पूर्ववत् ।
तत्रैवान्तर्दधे शंभु. स्वगृहान् रावणोऽभ्यगात् ॥ २२ ॥

श्लोकः] स्पन्दवार्तिकसहितम् १३३ हे भगवन् मुझे लोकोत्तर शक्ति प्रदान करे। देवता मुझे न मारें। मनुप्योसे तो मुझे भय है ही नहीं। आपके चरणोन मेरा प्रणाम हो । शकर भगवानने तथास्तु कहकर वरदान दिया। रावणके मस्तक पूर्ववत् कर दिये और वही अन्तर्धान हो गये । रावण अपना घर वापिस आया । ( क्योकि भक्तिका ताजा प्रभाव था अत सीधे युद्धार्थ नहीं गया) ॥ २१.२२ ॥ एवं भक्त्या शिरःपद्मश्रेणीबल्येशपादयोः। स्थिरया लग्यशक्तिः स त्रिलोकीमजयद् बलात् ॥ २३ ॥ नष्टवरं त्रिभुवनमयत्नादेव सोऽकरोत् । रणकण्डूपरवशान वाहूनभूत विशतिम् ॥ २४॥ इसप्रकार मस्तकरूपी पद्मोकी श्रेणीसे बलिपूजा करना जिस भक्तिका परिणाम है उस स्थिर शभुचरण भक्तिसे महान शक्ति पाकर रावणने तीनो लोकोको जीता। वैरियोको समाप्त किया । तो वैर भी अनायास नष्ट हो गया। बादमे तो युद्ध करनेवालेके न रहनेसे युद्ध करनेकी खुजली उसके हाथोको मानो परेशान करती रही ।। २३-२४ ।। अनेदं चिन्त्यमेतस्याः कथायाः किं प्रयोजनम् । नास्माभिः शक्यते कर्तुं शिरश्छित्वा निवेदनम् ॥ २५ ॥ केचिदग्नि प्रविविशुहरिभक्तिपरायणा.। शिरश्छित्वाऽपरे मक्ता भद्रकाल्यै समार्पयन् ॥ २६ ॥ कृतबाह्वादयश्चार्धदग्घाः केचित्त दुःखिताः। भगवद्दर्शनं नव ाद्यत्ये तेन लम्यते ॥ २७ ॥ रावणादिकृतं कार्य नधान्यः पर्तुमर्हति । ततः कमुतिकन्यायो नान कश्चित्प्रवर्तते ॥२८॥ न लोफसंग्रहः कश्चिच्चरिस्मिस्तु दृश्यते । सामसानुग्रहकया एवात्र निष्फला ॥२९॥ यहा यह विचार उपस्थित होता है कि इस बयाका क्या प्रयोजन है ? कहे कि तामस रावणपर अनुग्रह हुआ, अत हमपर भी हो सकता है। यही प्रपोजन है। किन्तु रावण समान सिर काटकर हम निवेदन रहा कर मरने हैं ? ऐगी ऐसी क्या वाचकर कुछ लोगोने होमकुष्टमे अपनेयो होमा। कुछ लोगोने भद्रकालीपो अपना मिर वाटवर चढाया और मर गये । कुछ लोग आधे जल गये । हापाव वाटपर चढानेवाले अगविक्ल तत - १३४ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ एकादशः हो गये। किन्तु भगवानका दर्शन आजकल किसीको नही मिला । अतएव रावण जैसे नीचपर अनुग्रह हुआ तो मुतरां हम पर भी होगा यह कैमुतिकन्याय भी यहा घटता नहीं है। क्योकि रावणके समान शिरोहोम करे तव नो कमुतिकन्यायकी बात है। विना कार्य ही कमुति- कन्याय लगावे तो रावण जैसा दुप्ट आज कोई नहीं है तो सबको भगवानका दर्शन विना होमादि होना चाहिये । इम चरिममें कोई लोकसंग्रहकी भी बात नही है । अत. तामसोपर अनुग्रहकी यह कथा निष्फल है ।। २५-२९ ॥ न चोमावल्लभोत्कर्षमात्रमात्र विवक्षितम् । उत्कर्षोक्तघंध च स्तोत्रं सम्पद्यतेति सांप्रतम् ॥ ३०॥ शिरोऽपंणोज्ज्वलद्भक्तिफलत्वोक्तिस्तदा था । अशक्मपत्नसाध्यस्यादुत्कर्षश्च कयं स्फुटः ॥३१॥ यदि कहे कि यहापर उमावल्लभ शकरका उत्कर्षमान विवक्षित है। कोई आदर्श प्रस्तुत करना नहीं है। उत्कर्पकथनमासे उत्कपोंक्तिरूप स्तुति सपन्न होती है । तो इसपर हमारा वक्तव्य यही है कि तब शिवोत्कर्ष बतानेके लिये मस्तवसमर्पणसहित उज्ज्वल भक्तिका फल बताना वृथा नहीं होगा ? मानवोके लिये अशक्य मस्तकसमर्पणादि से रावणने उक्त फल पाया इस कथनसे बल्कि रावण का उत्कर्ष ध्वनित होता है । शिवोत्कर्ष यहा स्पष्ट नहीं है ॥३०-३१॥ अनोच्यते कथास्तावल्लोकोत्तर विधा यदि। युगानुरुपं व्याल्येयं तासां तत्पर्य मिष्यते ॥ ३२॥ कृते यद् ध्यायतो विष्णु शेतायां यजतो मखः । द्वापरे परिचर्यायां कलो तरिकीर्तनात् ॥ ३३ ॥ यत्फलं नास्ति तपसा न योगेन समाधिना । तत्फल लमते सम्यक कलौ केशवकीर्तनात् ॥ ३४ ॥ इत्यादिवचनवातरेतदेव हि सूच्यते। कलावनाधिकायासोपलभ्यो भगवानिति ॥ ३५॥ सहलवत्सरतपः शास्त्रेषु बहुधेक्ष्यते । सहस्रदिनसंपाधं व्याख्येयं तत्कलो युगे ॥ ३६ ॥ श्रुतिरप्यस्त्यहोरा संवत्सर इतीदृशी। व्याख्या तावदियं बोध्या शक्तिनान पदरय तु ॥३७ ।।

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् दशवर्षसहस्राणि रामो राज्यमचीकरत् । चतुर्दश च वर्षाणि वनवासं तथाकरोत् ॥ ३८ ॥ आद्यं यथाभूतं वर्ष दिनार्थकमुतेष्यताम् । हायनार्थकमेवान्त्यं व्याख्या तेन यथोचिता ॥ ३९ ॥ इस आक्षेपका समाधान यह है कि अलौविक कथाओकी युगानुरूप व्याख्या करनी चाहिये। क्योकि युगपरिस्थिति पृथक् पृथक होती है। शास्त्रोमे कहा है-सत्ययुगमै ध्यानसे, तामे यजसे और द्वापरमे सेवापूजादिसे जो फल मिलता है कलियुगमे वह केवल हरिकीर्तनसे प्राप्त होता है । जो फल सत्यादि युगमे तप, योग और समाधिसे प्राप्त नहीं होता वह कलियुगमे केशवकीर्तनसे मिलता है। एसे ऐसे वचनोसे सूचित होता है कि कलिमे भगवान अस्पायासलभ्य है । पहले जमानमे हजारो वर्ष तक तप करते थे । कलियुगमे उसकी व्याख्या हजारो दिन करना चाहिये । क्योकि आज कोई हजार वर्ष तर जिंदा ही नहीं रहता। इसीलिये "अहोराने वै मवत्सर " ऐमी श्रुति है । सवत्सरपदकी यह आवश्यक व्याख्या है। न कि वाच्यार्य । रामने दस हजार वर्ष राज्य किया, चौदह वर्ष वनवास किया। यहाँ दस हजार वर्षमे वर्ष माल भी हो सकता है, दिन भी हो सकता है । लेकिन चौदह वर्ष मे तो वर्ष साल ही है, दिन नही ।। ३२-३९ ॥ क्वचिदल्पं क्वचित्तुल्यमिति ज्ञेयमनेकधा । सदन तुल्यविधया च्यारयास्यामोऽधुना वगम् ।। ४० ।। सत्यादि पुगमे दुर्गम तप आदि बताया उमे कलियुगमे कही अल्प- रूपसे और कहीं तत्सदृगस्पसे व्याख्येय है। अन हम तत्ममरूपसे यहां अब व्याख्या दिसाते हैं।॥ ४० ॥ मुहमहुनमस्कारा शिर कृत्वा पदान्जयो । शक्या कत्तुं शिर.पद्मणोलिरम हि नः ॥४१॥ शिर पद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबलि--यह हमारे लिये होगा बार-बार भगवानके चरणोंमे मस्तक रखकर नमस्कार करना । ऐसी बलि हमारे लिये भी शक्य है ॥४१॥ भक्तस्य पररहितं विश्य भक्तिप्रमावतः । तदवरव्यतिकरं पुनर्याहयुद्धतः॥४२॥ भकिके प्रभावसे मारा विश्व भक्तके लिये वररहित हो जाता है यही 'त्रिभुवनमवरव्यतिवर'या अर्थ है । न कि वाहयुद्धमे परास्त कर वैररहित बनाना ।। ४२ ॥

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [एकादशः यस्मान्नोद्विजते लोको लोकानोद्विजते च यः। हमिर्षभयौद्ध गर्नु इत्याह केशवः ।।४३॥ गीतामें भी कहा है-लोग जिससे उद्विग्न नहीं होते और लोगोसे जो उद्विग्न नहीं होता, हर्षादिरहित वहीं भक्त है ।। ४३ ।। न भृता रणकण्डूयें परेशस्य वास्तु तान् । याहूनापाद्य भयतास्तु मोदन्ते शम्भुना मृताः ।। ४४ ॥ "अमृतरणकण्डूपरवगान्" यह एक ही शब्द है । न भृता धारिता रणकण्डूर्यस्ते च ते परस्य परमात्मनो वशास्तान् वाहून ऐसा विग्रह करके 'आपाय' इस क्रियाको अनुवृत्ति कर लेनी चाहिये । अर्थात् युद्धकी खुजली जिन्होंने कभी प्राप्त नहीं किया ऐसे परमात्मवरा वाहुओको बना लिया । 'आपाध' के बाद मोदन्ते या स्थिता इत्यादि क्रियासामान्यका अध्याहार करना चाहिये ।। ४४ ॥ यद्वाऽऽदर्शचरित्रत्वं स्यादनाध्यामिफार्थतः । मनो दशेन्द्रियमुखं मुखं च द्वारमुच्यते ॥ ४५ ॥ वृत्तयस्त्यिन्द्रियरियाः स्युर्दश विधा हि ताः । उच्यन्तेऽय शिरांसोति वृत्तिमन्तीन्द्रियाणि या ॥ ४६ ॥ वृत्तयः प्रतिमासन्ते भगवच्चरणापिताः। पाश्रेणीव कर्णादेः सा पूजा परमा मता ।। ४७ ।। तत्कथाश्रवणे श्रोत्रं तद्भपतस्पर्शने स्वचम् । तन्मादीक्षणे नेत्र रसज्ञा च तदपिते ॥४८॥ घ्राणं प्रसादसौरभ्ये करी मूर्त्यादिपूनने। पादी तत्क्षेत्रगमने याचं तद्गुणकीर्तने ॥ ४९ ।। पुत्रादयोऽपि तत्सेवारताः सन्त्वित्युपस्थफम् । कुण्डल्युत्थापनेनेशध्याने पायु तथैव विनियोजयतः प्रोक्तं दशद्वारसमर्पणम् । एवं विदधतः पूजा बलिः सर्वोत्तमा मवेत् ॥ ५१॥ अथवा आध्यामित्क अर्थ लेकर इस कथाको आदर्श चरित्र बनाया जा सकता है । यह मन प्राय. रावणके समान रुलानेवाला तो है ही । उसके दस मुख दस-द्वार इन्द्रियाँ है । उनके द्वारा वृत्तियां भी दस प्रकारकी होती है। वे वृत्तिया या वृत्तियुक्त इन्द्रिया भी दस प्रकारको होती है। वे वृत्तियां या वृत्तियुक्त इन्द्रिया यहापर दस मस्तक है। भगवच्चरणोमें उन दसको समर्पण करते हैं तो वे कमलसमान शोभायमान होते है। यही श्लोक ] स्पन्दवातिकसहितम् १३७ सामसदु खेऽपि उत्तम पूजा है । यथा-भगवत्क्थाश्रवणम योगको लगाया । भगवद्भक्तचरण- स्पर्शमे त्वगिन्द्रियको लगाया। भगवन्मूर्तिदर्शनादिम नेत्रको लगाया। रसनाको भगवर्पित भोगादि आस्वादनमे लगाया। घ्राणको भगवदर्पित पुष्पादिसौगन्ध्यमे लगाया।हाथोको मूर्तिपूजन मन्दिरमार्जनादिम लगाया। पादोको भगवत्क्षेनादिगमनम लगाया। वाणीको भगवद्गुणकीर्तनमे लगाया । उपस्यको जो पुत्रादि होगे वे भी भगवत्सेवा करें इस निमित्त विनियुक्त किया। पायुको कुण्डलिनी उत्थापनपूर्वक ईशध्यानप्रयोजकतया लगाया। इसप्रकार दस इन्द्रियोका विनियोजन ही दशद्वारसमर्पण है इसप्रकार करनेवालोकी ही वरि-पूजा सर्वोत्तम है ।। ४५-५१ ।। तवृत्तिधारासजातस्थिरभक्तेरिव फलम्। भवेद् वैरव्यतिकररहित भुवनत्रयम् ॥ ५२॥ स्वर्गमूतलपाताललक्षण भुवननयम्। जाग्रत स्वप्न सुषुप्तिर्या निधाम भवन नयम् ॥ ५३ ॥ वैर स्वप्नेऽपि नैवास्य सुषुप्तौ तु कुतस्तराम् । तत्र नास्य उपसमुद्भव ॥५॥ कामक्रोधादयः सर्वे प्रियन्ते कृत्तिवाससि । दामादयो वैरिण स्युस्ते मिनाण्यस्य सर्वथा ॥ ५५ ॥ इन्द्रियोकी वृत्तिधारासे उत्पन्न स्थिर भत्तिया पर है कि विभुवन वैरमिश्रणरहित हुआ । स्वर्ग भूतल, पाताल यह त्रिभुवन है । अथवा जाग्रत, स्वप्न, सुपुत्ति ये तीन धाम त्रिभुवन है। इसे निधाम भी बताया है। स्वप्न में वैर नही तो सुपरितमे नितरा नही। सुपुति कभी तामसी हो तो 'दुखममस्वाप्म एसा भी होता है । यह याग भाप्यादिम बताया है। उससे भी द्वप नहीं। क्योकि भगवान जैसा रस जसीम भक्त राजी है । कामक्रोधादि सभी भगवान प्रति ही मक्त करता है। जिस गीताम शत्रु बताया- जहि शत्रु महाबाहो कामरूप । उसे तो भक्तन मित्र बनाया ॥५२.५५॥ वराग्ये यतमाना च ध्यतिरेका तथैव च। एकेन्द्रिया वशीकारा धतु सना प्रकीर्तिता ।। ५६ ॥ जापतेऽस्त्येचते पूर्णमावमाप्नोति चंकश । सज्ञाम्तराय विपरिणाम प्रतिपद्यते ॥ ५७॥ इत्य पश्वविधास्तासां तथा ता एय विशति । ता एव बाहय इव युध्यत्ति विषयं राह ।। ५८॥

१३८ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [एकादशः वशीकारे पञ्चमे तु परापरविभागतः। प्रपरातः परामायापत्तिरेव निबोध्यताम् ॥ ५९॥ भक्तस्यायनतो वैरिकामादिविजयोत्तरम् । यतमानादिसंज्ञानां रणकण्डूहि शिष्यते ॥६०॥ वैराग्यमें यतमानसज्ञा, व्यतिरेकसज्ञा, एकेन्द्रियसंज्ञा और वशीकार संज्ञा ये चार अवस्थायें है । उत्पत्ति, अस्तिता वृद्धि, पूर्णता और संज्ञान्तरार्थ विपरिणाम ये पाच अवस्थायें एक-एक की हैं। सव मिलाकर वीस होती है। ये ही बीस वाहु है । वशीकारमे उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि, पूर्णता ये चार ठीक हैं, विपरिणाम क्या है ? ऐसा यदि पूछेगे तो उत्तर है, वशीकार संज्ञा अपरा और पराभेदसे दो है । परभावको प्राप्त होना ही विपरिणाम है। इन वैराग्यावस्थारूपी बाहुओसे विपयोके साथ युद्ध होता है। भक्त अनायास ही कामवैरी या विषयवेरियोको जीत लेते है तो यतमानादि सज्ञावे लिये योद्धव्य कोई रह नहीं जाता। तब रणकी खुजली ही अवशेष रहती है ।। ५६-६०॥ यहा मानसपूजायां मुहुः शिपनलिर्भवेत् । नाम नामं हि वस्तुनि भक्तोऽर्पयति शंभवे ॥ ६१॥ सा बलिस्तत्र च श्रेणी नरन्तयं विलोक्यताम् । निरन्तरं नमत्येष शीर्षावनतितो हरम् ॥ ६२ ॥ सा हानिस्तामहच्छिद्रं सा चान्धजडमूकता। यन्मुहूर्त क्षणं वापि महेशानं न चानमेत् ॥ ६३ ॥ अथवा शिर.पद श्रेणी इत्यादिकी व्यास्या ऐसी कीजिये :-मानस- पूजामे बार-बार शिरो मन होता है । प्रणाम करते वर तु अर्पण मानसपूजाम होता है, यही मातय १६ समर्पण है। उसमे श्रेणी का अर्थ है नैरन्तयं । ससार वही हानि है, महान हिद्र है, अधता, जस्ता एव मूढता है कि एक महत्त' या एक क्षण ही भगवतनमनके बिना जो बीत रहा है।। ६१-६३ ॥ मनो रायणरूपं हि यतो रोदनकारि तत् । रावणो नान्यथा जातः क्रियते वन्यथा मनः।। ६४ ॥ यह मन रावण जैसा तो है ही । क्योकि यह रुलाता रहता है । टुस ससारमे डालता है। हा, फरक इतना है कि रावण जीवन भर अन्यथा नही हुआ। विन्तु मनरूपी रावणको अन्यथा करना है। और किया जाता है।। ६४॥

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् १३९ त्रिपुरहर पुरत्रये कोउतीति धुतेस्तज्जाग्रदादिकम् । त्रिपुरं हरते यस्माद्धरश्चिन्तात्र कास्तु नः ।। ६५ ।। "पुनत्रये क्रीडति" ऐसी श्रुति आती है। वहा जाग्रदादि तीन पुर अर्थ है । उस त्रिपुरको हर शकर हर लेते हैं । तब अवस्थात्रयातीत होऊँगा। मनोविजय हो जायेगा । अत हमे किसी प्रकारको चिन्ता नही ।। ६५ ।। विषयासक्तिनिर्मुक्तिः परवैराग्ययेमेव च। यद्भक्तघा जायते नौमि तमीशं कृत्तिवाससम् ॥६६॥ जिस भगवानकी भक्तिसे विषयासक्तिसे मुक्ति और परवैराग्य की प्राप्ति होती है उस भगवान कृत्तिवासा शकरको मै प्रणाम करता हूँ॥६६॥ इति श्रीकाशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृती। महिम्नःस्तोत्रविवृतो स्पन्द एकादशो गतः ॥ ११ ॥ द्वादशः श्लोकः नाम तवैश्वर्यमिति श्लोके ब्रह्मविष्ण्वो. कृपा जगौ। यत्स्वप्रकाशन सृष्टिपालनपारणम् ॥१॥ शास्ति "प्रकाशनस्थेपाल्ययोश्च" स्यात्मनेपदम् । स्वय तस्थे स्वरूपस्याऽरोत्तम्यां प्रफागनम् ॥ २ ॥ 'तवश्वयं यत्नान्' इम श्लोयमे ब्रह्मा और विष्णुपर शायरकी कृपा बतायी। कौनसी कृपा ? अपना ही प्रशासन-जो सृष्टि और पार नवा कारण है। यह अर्थ कसे निकला ' "प्रकाशनस्थेयाम्ययोश्च" इस मूत्रमे म्था धातुसे प्रवाशन अर्थ होनेपर आत्मनेपद बताया है। "स्वय तरये" या अधं है अपने स्वरूपका प्रकाशन ग्रह्मा विष्णु लिये किया। भगवत्मानये बिना मृष्टि और रक्षा करना गमय नहीं है ।। १-२॥

१४० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ द्वादशः पद्यतः॥४॥ नन्वेवमनुगृह्यन्ते विष्ण्वाधा एव फेवलाः। युक्तं चतत् सात्त्विकत्वाविण्यादीनां हि योग्यता ।। ३ ।। मैवं कृपाकटाक्षस्तु शंगोः सर्वेषु देहि । भक्तिस्तग्राहिणीत्युक्तमयत्नादिति तवैश्वयं श्लोकसे लगा कि इस प्रकार विष्णु आदिपर ही शंकर अनुग्रह करते हैं, उचित भी है, सात्त्विक होनेके कारण विष्णु आदिमें ही योग्यता है। उसका उत्तर पूर्वश्लोकमें मिला कि शंभुका कृपाकटाक्ष सर्व- प्राणिसाधारण है। हां, उस कृपाका ग्रहण भक्ति ही कर सकती है। यही अयलादापाद्यसे कहा ।। ३-४ ॥ ननु व्याख्यान्तरं तर विहितं भवतेति चेत् । मेवं यथाश्रुतार्थस्तु कृतादौ गृह्यते बुधैः ॥५॥ प्रय तहशमादाय लप्स्यते तत्फलं कलौ। इत्यत्र दशितं तस्य योग्यं व्याख्यान्तरं मया ॥ ६ ॥ अयत्नादापाद्य श्लोव की व्यास्या आपने बदल दी थी। तब भगवान रावणादि जैसे तामस व्यक्तिपर भी कुपा करते है यह अर्थ कैसे निकलेगा? सुनो । सत्य, त्रेता आदिके अनुसार श्लोकका यथाश्रुत अर्थ ही लिया जायेगा। सत्ययुगमें जैसा फल मिलता है वैसा कलियुगमे कैसे मिलेगा ? इसके लिये योग्य व्यारया हमने दिसाई थी। अर्थात् सत्यादियुगमें मस्तक काटकर समर्पणकी जगह कलियुगमें मस्तक झुकाना ही पर्याप्त और उचित है ।। ५-६ ॥ नन्वेवं सात्त्विकत्यस्य वृथा संपादनं भवेत् । विनापि सात्त्विकं भावं भक्त्यानुग्रहसंभवात् ॥ ७॥ न चोद्भवेत् कथं मक्तिः सत्वहोनेति सांप्रतम् । निर्गुणाया गुणायोगाद् रावणे भयितदर्शनात् ॥ ८॥ सत्त्वादिनिरपेक्षं हि स्वतन्त्रं स्यप्रभं परम् । प्रेमेति प्रह्लादविभीषणशुकादयः ॥ ९॥ सत्यां भक्तो भगवतोऽनुग्रहो दुर्लमः फयम् । सत्यानुसरणं तस्माद् स्पर्थमेवेति चेन्न तत् ॥१०॥ यदि सभी प्राणियोगे भगवाहपावृष्टि है, भक्ति उमकी संग्राहिका है, तो सात्त्विक भावका सपादन व्यर्थ होगा। यह कहे कि मत्यगुणके विना भक्ति होगी ही कैमे तो उवाय यह है कि प्रेमगक्ति निर्गुण होती है। यदि भपता:

श्लोकः] . स्पन्दवातिकमहितम् १४१ सत्त्वगुणसापेक्ष होती तो रावण में भक्ति होती कैसे ? गुणनिरपेक्ष, स्वतन्त्र, स्वयंप्रकाश भक्ति होती है, ऐसा प्रह्लाद, विभीषण, शुकदेव आदिका सिद्धान्त है। भक्ति हो तो भगवदनुग्रह भी अवश्यंभावी है। तब सत्त्वगुणानुसरण व्यर्थ ही होगा। इस पूर्वपक्षपर कहते है ।। ७-१०॥ अनुग्रहप्रकाशो हि मावकाचामिसंहतः । हृदये प्रविशेतन तत्स्यस्पं प्रभिद्यते ॥११॥ सत्वमावाहता त्वेपा कृपादृष्टिप्रमेशितुः । निर्मलद प्रविशति हृदये मङ्गलैककृत् ॥ १२ ॥ अनुग्रहका प्रकाश भावरूपी काचपर अभिहत होकर हृदयमे प्रविष्ट होता है । अत. उमके स्वरूपका भेद हो जाता है। सात्विक भावपर वह प्रकाश अभिहत होता है तो निर्मल ही रहेगा, मगलकारी होगा ॥११-१२।। रजोभावहता संपा नानामोगफलप्रदा। तमोभावहता चैषा गर्वमोहादिपातिनी ॥ १३ ॥ रायणो मोहमापनस्तम स्वित्वात् स्वभावतः । यत्नेन तु वयं क्तुं सत्यमावं मनः क्षमाः ॥ १४ ॥ अतस्तु भावः संपायः सात्विको मङ्गलेप्सुना। रात्यां भवतापपीत्येतदमुप्येत्यादिनोच्यते ॥ १५ ॥ कृपादृष्टिप्रकाश रजोभावाभिहत होनेपर नानाभोग फलदायी होता है। तमोभायाभिहत होनेपर गर्वमोहादिमे गिरा देता है। रावण तमोभाव- वाला होनेसे मोहको प्राप्त हो गया। हग यदि यन्न करें तो सात्त्विकभाव संपादन कर सकते है। अत भक्ति होनेगर भी सत्त्वभाव सपादनार्थ यत्न करना चाहिये यह वात 'मुन्य वत्मेवा' इत्यादि श्लोरमे कहने जा रहे हैं ।। १३-१५॥ अमुष्य त्वत्सेवासमधिगतसारं भूजवनं बल सैलासेऽपि त्वदधिवरती विक्रमयतः । पातालेऽप्यलसालतांगुष्ठशिरसि प्रतिष्ठा त्यरसासोद् ध्रुवमुपषितो मुह्यति खलः ॥१२॥ हे भगवन् ? आपसी मेवाने यलप्राप्त अपनी जगल सदा भुजाओको बलपूर्वक आपके निवागस्थान कंगासमे परामित करनेवाले उम गवगी स्थिति पातालमे भी बदतर तर हो गयी थी जब आपने अगुप्टाग्रहको धीरेसे दवाया था। खलपुरुष सादागे अविवेकी बन जाता है ॥ १२ ॥ अलम्पा ?

१४२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [द्वादशः ? अमुष्य तदस्येत्येव वक्तव्येऽमुप्यति कुत उच्यते। रणफण्डूपरवरावामिन्नत्वमुच्यताम् ॥१६॥ सत्यं खलत्वहेतोस्तं दूरादेवोस्सिसृक्षति । दूरयातमिवाचष्टे रावणं ह्यदसा मुनिः ॥ १७ ॥ शाकटं पश्वहस्तेन दाहस्तेन वाजिनम् । हस्ती हस्तसत्रण देशत्यागेन दुर्जमम् ॥ १८॥ श्लोक में 'अमुप्यके स्थानमें 'तदस्य' ऐसा कहना चाहिये था। अर्थ होगा-रावणका वह रगकण्डुपरवश बाहुरूप भुजवन । ऐसा क्यों नहीं कहा कारण यही कि अदम् शब्द अत्यन्त परोक्षमें कहा जाता है। खल होनेके कारण उसे दूर ही रखना पुष्पदन्ताचार्यने पसंद किया । गाड़ीसे पांच हाय दूर रहो । घोड़ा हो तो दस हाय दूर रहो। हाथी हो तो सौ हाय दूर रहो । दुर्जन हो तो उस देशको ही त्यागो ऐसा नीति वचन है ।।१६-१८॥ समधिगतसारं सारो बलं तदीशस्य सघंप्राणिषु वर्तते । को ह्यधान्यादिति प्राह ततोऽस्याधिगमं धृतिः ॥ १९॥ सत्सेवया किमाधिक्यमत: समुपसर्जनम् । सम्यक् साराधिगमनं तसेवाफलमुच्यते ॥ २०॥ 'समधिगतसारं' में मारका बल अर्थ है। वह बल सब प्राणियोंमे ईश्वरका ही है । 'को ह्येवान्यात्' इस श्रुतिम क्रियाशक्तिरूप उस बलकी प्राप्ति परमेश्वरसे होती है ऐसा बताया है। तब 'त्वत्सेवासमधिगत' कहना निरर्थक हुआ । सेवा विना भी तो परमेश्वरसे ही सार सबको प्राप्त होता है । अतः 'मम' यह उपमर्ग जोड़ा । सम्यक् बल प्राप्ति भगवन्मेवाफल है यह तात्पर्य है ।। १९.२० ॥ गुणमिनायु तिसृषु तनुप ध्यस्तमध्यवः । अनुयत्या विशेषण याविरण्योः प्रकाशितम् ॥ २१॥ तर्थयारमामु यः सारः पारमेश्वर एष सः। विशेषण स्वपिमस्तसेवाफसमिप्यते ॥ २२॥ मरादिगुणमित तीन नगेगमें मार पम्त है ऐमा पहले कहा पा। फिर भी म्फट अभियन नहीं था। जब प्रझा और विष्णु नेअनु- पतिमी भनियो तर उनमे वह गार अभिव्यक्त दया। ऐगा भी पूनित श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् १४३ किया। उसी प्रकार हम मबमे परमेश्वरका ही सार है। तयापि उसकी अभिव्यक्ति पूरी तरहसे भगवत्सेवासे ही होती है ॥ २१-२२ ॥ बलात् कैलासे ० तत्सेवाप्राप्तसारांश्च विशति वनसंनिमान् । कैलासेऽपि तदावासे भुजान व्यक्रमयत् पुरा ॥ २३ ॥ भगवत्सेवासे प्राप्तबल वनोपम बीस भुजाओको रावणने भगवदा. वास कैलासमे विक्रमित किया ।। २३ ॥ रावणः शिरभक्तोऽभूच्छिवपूजनतत्परः। कैलासमगमन्नित्यं पूजार्थ धाम शांकरम् ॥ २४ ॥ प्रातरुत्थाय स द्राह्म मुहूर्त कुनित्यकः। आसूर्योदयमागच्छत् कैलासमतिवेगवान् ॥ २५ ॥ भूकंलासोऽधिवसतिरधिष्ठाय स्थितो यतः। हरस्तर तमेवातः शिवलिङ्ग विदुर्बुधाः ॥ २६ ॥ पद्माकाराश्च गिरयः परि द्वादश दीयते । पनमध्यस्थितं लिङ्गं रावणोऽपूजयत्पुरा ॥ २७ ॥ रावण शिवभक्त था, शिवपूजापरायण था। पूजार्थ रोज कैलास पर्वत जाता था। प्रात उठकर ब्राह्ममुहर्तमे नित्यक्रिया कर सूर्योदय होनेतक अतिवेगसे कैलास पहुच जाता था। भूकैलासमे गकरभगवान अधिष्ठातारूपमे स्थित हैं । अत उसीको विद्वान शिवलिंग मानते है । पद्माकारमे चारो ओर बारह छोटे पर्वन है उसपर मध्यस्थित लिंगकी पूजा रावण करता था ॥२४.२७॥ एकदाऽचिन्तयत् कस्मात्प्रत्यहं या ग्रह गिरिम् । इममुत्पाट्य लया नेप्येऽचियामि तव तम् ॥२८॥ प्रातः प्रातः समुत्थाने निद्रानन्दो विहन्यते । अनन्तकालपर्यन्त तदेतत्तु कयं सहे ॥ २९॥ इत्यं व्यवसित सोऽपि केलासमुपयातवान् । उत्पाट्य रजतादि च स्वपाणावुदतोलयत् ॥३०॥ एकवार रावणने सोचा कि यह रोज रोज यहा क्यो आना पर्वतको उखाडकर लया क्यो न ले जाऊ और पूजा करूं ? मुबह सुबह उठनेमे नीद का आनन्द मारा जाता है । एक दो दिन हो तो वात अलग । अनन्तकालतक इस सुखसे पचित रहना पडे तो कैसे सहन कर गा?

१४४ श्री शिवमहिम्न: स्तोत्रम् [द्वादशः ऐमा सोच कर वह कैलास पहुंच गया और रजतपर्वतको उखाड़कर अपने हाथ में उठाया ।। २८-३०॥ गगां कदाचिसालोक्य पार्वतो हरमस्तके । मानिनी रोषतः प्राह के शीर्ष णि धार्यते ॥ ३१ ॥ कथं जटासु लोनेयं गूढा तिष्ठति मामहो । यञ्चयन्ती चतुरिका स्फुरस्कमललोचना ॥ ३२ ॥ एक बार पर्वती शकरके मस्तकमें गंगाको देखकर मानवती होकर रोपसे बोली कि यह कौन है जिसको सरपर चढा रखे हो? यह कंसी चतुर है कि जटामे छिपकर गूढरूपसे बैठी है और मेरी वंचना कर रही है ? खिले कमल ही इसके सुदर नयन है ॥ ३१-३२ ।। आह शंभुः पुरात्युन तपस्तेपे भगीरयः। पूर्वजोवृतये गङ्गामानेतुं भुवि यलतः ।। ३३ ।। तद्याच्यामुररीकृत्य मूर्नाऽऽवहमहं प्रिये । त्वं च ज्ञानासि तदिदं वृत्तां किमिति कुप्यसि ॥ ३४ ॥ शकरजीने कहा--पहले समयमे भगीरथने अपने पूर्वजोके उद्धरार्थ पृथवीपर गंगा लानेके लिये अत्यन्त यत्नसे तप किया। उसकी प्रार्थनाको स्वीकार कर मैंने हे प्रिये ! गगाको मस्तकसे धारण किया । यह बात तुम भी जानती हो, क्यो कष्ट हो रही हो? ॥ ३३-३४ ।। सत्यं धृता स्यमयं वेगमगाय जाह्नयो । भग्ने वेग कुतो नपा संत्यक्ता रायथा भुवि ।। ३५ ॥ इत्युक्त्योमा गृहं त्यक्तुं यावद् गोपुरमागता । दशवक्त्रस्तायदेत्य फलासमुदतोलयत् ॥ ३६॥ पावती बोली- ठीक है, गगावेगको भग्न करनेके लिये आपने मस्तफसे उसे धारण किया । किन्तु वेग भग हो गया तो फिर इमे सर्वथा भूतलपर क्या नहीं छोड़ा? ऐसा कहकर पार्वती पर छोड़कर अन्यत्र जाने के लिये जय गोपुर पहुची इतनेमे ही रावणने कलामको ऊपर उठाया ।। ३५-३६॥ पुतो भूः फम्पत इति भीता संधाय्य शङ्करम् । यीनमाला समातिप्प घेषमाना व्यपारियत ।। ३७ ।। हाय ' यह भूप पंमा हो रहा है कहकर भयभीत पर्वती मान छोइयर पानी हुई वापिग दौड़ आयी और गंाग्मे लिपट गयी ।। ३७ ।। ।

लोकः]
स्पन्दवार्तिकमहितम्
१४५
अलभ्या पातले०
हात्वा रावणकृत्यं तनहास मगवान् भवः।
मन्दमड्गुष्ठशिरसाऽपोडयच्च शिलोचयम् ॥ ३० ॥
अड्गुष्ठान ह्यलसवदेवं चलयतीश्वरे।
प्रतिष्ठा रावणस्यासीत्पातालेऽपि सुदुर्लभा ॥ ३९ ॥
उत्खातसातपतितः पातालं रावणोऽगमत् ।
बृहच्छिलावृताचंव बहिनिर्गन्तुमप्रभः॥४०॥
इसे रावणकी करतूत जानकर भगवान शकर हँसे और धीरेसे
अगूठे के अग्रभागसे पर्वतको दबाया । अलसवत् अपने चरणागुष्ठको
इसप्रकार हिलाया तो रावणकी स्थिति पातालमे भी गभीर हो गयी।
पर्वतके उसाडनेसे बनी खाईमे पडकर और दवकर रावण पाताल पहुचा ।
यहा चारो ओरसे बडी बडी शिलाओंसे, जिनका पर्वतके बोझके
कारण हटाना शक्य नहीं था, घिर गया, बाहर निकलनेमे असमर्थ
हुआ ॥ ३८-४०॥
एकदा पर्यटस्तत्र देवपिनरिवोऽगमत् ।
फयं भो बन्धनगत इति पृष्टन रावणः ॥ ४१ ॥
सर्वा संघावयमास निजमोठ्यकयां मुनिम् ।
तेन पृष्टस्तथाघष्ट मुक्त्युपायमृषीश्वरः ॥ ४२ ॥
मदत् त्वं क्षणयन् वीणां स्तुवीष्य करुणानिधिम् ।
आशुतोपं शिवं गायग्नेवं मुक्तो मयिष्यसि ॥४३॥
एक समय पर्यटन करते हुए देवर्षि नारदजी वहा पहुचे । अरे, तुम
कसे फस गये हो, पूछनेपर रावणने अपनी वेवकूफीकी सारी कथा सुनायो ।
'यहासे मैं कैसे मुक्त होऊ पूछने पर नारदजी बोले मेरे जैसे वीणा बजाकर
दयालु आशुतोषको गीतयुक्त स्तुति बोलो तो मुक्त होगे ॥ ४१.४३ ।।
मास्ति मे मगवन् पोपा बद्धोऽस्मि कुत आनये।
इत्युक्तः पुनरेवाह नारदो देवदर्शनः॥४४॥
एकं मस्तफमाहृत्य हस्तं तेनंकमायुहि।
हस्तान्तरस्नाविरश्न तन्त्रो. संपादय स्वयम् ।' ४५ ॥
एवं संपादिता वीणां क्षणयन् मुसमाहितः ।
ताण्डव गास्यति यदा तदा सिसिर्भविष्यति ॥४६॥

१४६
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[द्वादशः
'भगवन् । मेरे पाम वीणा नही है । और फैसा हूँ । इमलिये कही
जाकर वीणा लाऊँ भी कैसे ? इस प्रकार रावणके कहनेपर नारदजी
बोले -क्या चिन्ता करते हो तुम्हारे दस दम मिर है । एक मिर निकालो
और एक हाय निकालकर उसपर जोडो तो वीणा ही गयी। दूसरे
हाथकी नाडियोंको उसपर कस दो, तन्त्री (नार ) तैयार । उस वीणाको
बजाने हुए समाहित होकर ताण्डवगीन गाना । तुम्हारा काम पूरा हो
जाएगा। ४४-४६ ।।
नारदे निर्गते सोऽपि सर्पमेय तथाकरोत् ।
अगायद् भक्तितः सोऽपि शिवताण्डवमद्भुतम् ॥ ४७ ।।
नारदजीके जानेपर रावणने सर कुछ वैसा ही किया जैसे नारदजीने
बताया था। वीणा बजाते हुए भक्तिपूर्वक रावण अद्भुत शिवताण्डवस्तोत्र
गाया॥४७॥
जटाकटाहपरिसंभ्रमभ्रमणयेगया
निलिम्पनिझरिण्या संविराजन्तं शिवं भजे ॥ ४८ ।।
इत्येवाकण्र्य
परममङ्गलध्वनिमजुलम् ।
प्रसन्ना चकिता शब्द गङ्गा तुष्यति रावणे ॥ ४९ ।।
जटारूपी कढाईमे चारो ओरसे संभ्रमके साथ भ्रमण करती हुई
स्वर्गगङ्गासे विराजमान शङ्कर भगवानका भजन करता हूँ। इतना ही
परम मङ्गल ध्वनिसे मनोहर शब्द सुनकर चकित एव प्रसन्न गङ्गामाता
रावणपर प्रसन्न हुई। (क्योकि इसमे गङ्गाचरित्र आ जाता है। ॥४८-४९।।
घराघरेन्द्रतनयादगन्तालादिमानसे
कृपाकटाक्षविधुतापदि मेस्तु रतिस्सदा ।। ५० ॥
प्रेष्ठपरप्रेमपरियोतिवचस्तथा।
समाकण्यं भवानी च प्रसन्ना रावणेऽभवत् ॥५१॥
इसके बाद ही "धराधरेन्द्रनन्दिनी' इत्यादिसे पार्वतीके मधुराव-
लोकनसे अह्लादित हृदय एव कृपाकटाक्षसे आपदाओको नष्ट करनेवाले
शङ्करमे मेरी रति हो ऐसी जब स्तुति बोला तो अपने प्रियतम शङ्करको
प्रेमको द्योतित करनेवाले उस वाक्यसे भवानी अम्बा माता भी रावणपर
प्रसन्न हो गयी।। ५०-५१ ॥
निलिम्पझरिणीपूततीरे
षसमहम् ।
ललाललामगिरिजामालमन्त्रं शिवं स्तुवे ॥५२॥

श्लोक:]
स्पन्दवार्तिकसहितम्
१४७
इति श्रुस्या पावनत्वं गाङ्ग स्वीयं च गौरवम् ।
गौरी संत्यक्तविद्वेषा प्रशान्ता प्रासदद् भृशम् ॥ ५३ ।।
अहा ! स्वर्गगङ्गामे पवित्र तीरस्थलमें रहकर ललनाओंमें सिरमौर
गिरिजाके भालगत (मस्तक में निरन्तर जप्यमान ) मन्त्र शिव की स्तुति
कब मैं कर पाऊँगा? इतना सुननेपर गङ्गाकी पवित्रता और अपनी महत्ता-
की बातसे गौरी गङ्गाके प्रति जो पहले अपना विद्वेष था उसे छोड़कर
शान्त हो गयी और अत्यन्त प्रसन्न हो गयी ॥ ५२-५३ ।।
सतालगीतवाधोत्यमधुरध्यनिहर्षितः
गङ्गागौरीमियोहार्दयोक्षणानन्दनन्वितः ॥ ५४॥
ताण्डवस्तुतिसंगीतलहरीप्रमवान्वितः
भगवान् शम्भुरुत्याय चके ताण्डवमद्भुतम् ॥ ५५॥
तदाङ्गुष्ठे विशिथिले किंचित्कलास उद्गतः ।
विमुक्तो रायणस्तस्मात्कृच्छाच्च प्रशमं ययौ ।। ५६ ॥
तालसहित गीतावाद्यसे उत्पन्न मधुर ध्वनिसे हर्षित हुए गङ्गा और
गौरीके परस्पर प्रेमको देखकर आनन्दित हुए और शिवताण्डवस्तुतिलहरीके
आनन्दसे प्रेरित हुए भनवान शङ्कर उस समय उठकर ताण्डवस्तुतिके अनुरूप
ही ताण्डवनृत्य करने लगे। उस समय पहले जो अंगुष्ठ दबा रखा था वह
शिथिल हो गया, कैलास थोड़ा ऊपरको उठा तो रावण भी महासङ्कटसे
छूटकर शान्तमानस हो गया ॥ ५४.५६ ॥
ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः
तामसरवाद्दशास्यस्य मोहोऽयमुदगाच दि।
येनावगणयेन्मयों
मूलमेव
कृतघ्नवत् ॥ ५७॥
खलत्वं
हेयमेवेशकृपासदुपयुक्तये ।
एवान्यया लब्घसंपदोऽपि विधीयते ॥५८॥
तामसी होनेसे रावणके मनमे यह मोह उत्पन्न हुआ। जिस ( मोह)
से मनुष्य कृतघ्नके समान मूलकी ही अवगणना करने लगता है। भगव-
त्कृपाका सदुपयोग होना चाहिये। तदर्थ सलत्व त्यागना परमावश्यक है।
ऐसा न होनेपर, सम्पदा प्राप्त होनेपर भी दण्ड ही मिलता है ।। ५७-५८॥
खलत्वं किञ्चन त्यक्तं रावणेन स्वतो यदा।
तदाभूदुद्ध तिस्तस्य तथा चाह स एव हि ॥ ५९॥

1
१४८
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[द्वादशः
कदा निलिम्पनिमार्या नियरान् कुञ्जकोटरे ।
विमुक्तदुर्मतिमंन्त्रं शियेत्येवं नपाम्यहम् ॥ ६ ॥
स्वदुर्मतिपरित्यागामिसापीदगमगायतः
महासंकटगात् स प्रापोसारं दशाननः ॥ १ ॥
पतनं ते मयेदेवमित्येयं सचिसोऽपि सः।
उपप्रखलमायावात सर्वथा तम संजही ॥२॥
सलत्वपरिणामोऽयं रामेण निहतो पुधि ।
तामसत्यं ततो हेयं यत्नेनैव मुमुक्षणिः ॥ ६३ ॥
जब रावणने थोडा बलत्व त्यागा तब उसका उद्धार हुआ । रावणका
ही वचन देखिये-"कदा निलिम्पनिरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः
'सदा शिरस्थमञ्जलिं वहन् · · · शिवेति मन्त्रमुच्चरनु" इत्यादि । वहाँ
उसने दुर्मतित्यागकी अभिलाषामात्र व्यवत की । उतनेसे वह महासङ्घटसे
बच गया। इस प्रकार शङ्करभगवानने खलभावका परिणाम पतन सूचित
किया। किन्तु भयङ्कर सल होनसे सर्वथा उसे त्याग न सका । परिणाम यही
हुआ कि रामने युद्ध रावणको मारा। अतः प्रपत्नपूर्वक तामसभावको
त्यागना ही चाहिये । भक्तिसे सब कुछ होगा, इस भरोसेपर ही रहनेकी
अपेक्षा तामसभाव त्याग करनेका प्रयत्न करना ही श्रेयस्कर है ।। ५९-६३ ॥
भक्तानां संपदाधात्रे पलानामुपमदिने।
समस्तभूतानां पालयिने कदिने ।। ६४ ॥
भक्तोंकी उन्नति सम्पादन करनेवाले, सलोंका उपमर्दन करनेवाले
समस्त भूतोंका पालन करनेवाले, जटाजूटधारी, शङ्कर भगवानको हम
प्रणाम करते है ।। ६४ ।।
इति श्री काशिफानन्दयोगिनः कृतिनः कृती।
महिम्नःस्तोत्रविवृती स्पन्दोऽयं द्वादशो पतः ॥ १२॥

प्रयोदशः श्लोकः,
विष्ण्वादिभ्यः सात्त्विकेन्यः शक्ति राति यथा तथा।
तामसेभ्योऽप्यसो दाति दशास्याय ययंव हि ॥१॥
किन्त्वृद्धि देवताभ्यो हि सास्विकेम्पो ददात्यसो ।
तथा चोक्त सुरास्ता तामृद्धि पति तावकीम् ॥२॥
मयमृद्धि च गिरिशोऽसात्विकेन्योऽपि यच्छति ।
अनोदाहरणं तायद याणासुर इतीयते ॥३॥
"तवैश्वर्य यत्नात्" में सात्त्विक विष्णु आदिको शकर शक्ति देते
है बताया। "अयत्नादापाद्य" इत्यादि दो श्लोकोमे तामसोको भी शक्ति
देते हैं, जैसे रावणको, यह कहा। परतु ऋद्धि तो सात्त्विक देवताओको ही
देते होगे । "सुरास्ता तामृद्धि" मे यही तो बताया। इस पूर्वपक्षपर
कहते है कि ऐसा नहीं है। ऋद्धि भी शकरभगवान तामसोको भी देते है
( अत. हमे भी प्राप्त हो सकती है ) इसमे उदाहरण बाणासुर है, इस
बातको त्रयोदश श्लोकसे कहते है ॥ १-३ ।।
यदि सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सती-
मधश्चक्रे वाणः परिजन विधेयत्रिभुवनः ।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि स्वच्चरणयो-
नं कस्या उन्नत्य भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥ १३ ॥
हे वरद परमेश्वर । अत्यन्त समुन्नत भी इन्द्रसमृद्धिको बाणासुरने
तीनो भुवनोको सेवक बनाकर जो नीचा दिखाया वह आपके चरण-
कमलसेवी बाणके लिये कोई आश्चर्यकी वात नहीं है । भला आपके चरणोमे
मस्तकावनति किस उन्नतिका कारण नहीं है । सवका कारण है ।। १३ ।।
इन्द्रस्यैरावतो हस्ती वाजी चौच्च.धवा महान् ।
कामधेनु कल्पतरुश्चिन्तामण्यप्सरोगणः ॥४॥
एते सागरसंभूता अमृतं च तथाविधम् ।
एवमृद्धिर्महेन्द्रस्य परमोच्चरुदीरिता ॥५॥

१५०
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[प्रयोददाः
एतामृद्धिमपश्यफे पाणनामासुराधिपः।
एपमानः परिजनविधेयभयनत्रयः॥ ६॥
भृत्यः परिजनस्तद्वविध विनयान्वितम् ।
भुयनप्रितयं यस्य स तथाविधि उच्यते ॥७॥
स्वभृत्यानामपि भवेद्विधेयं
भुवनप्रयम् ।
इत्यप्यन्ये विगह्णन्ति महीयस्त्यविवक्षया ॥८॥
इन्द्रकी समृद्धि अत्यत उनी है-ऐरावत हाथी, उच्चःश्रवा
घोडा, कामधेनु, कल्पवृक्ष, चिन्तमणि, अपरारागण, अगृत ये सभी असा-
धारण है, सागरोद्भूत है। ऐसी परम उन्नत समृद्धिको भी वाणासुरने
नीचा कर दिखाया क्योकि उसने तीन भुवनोको भृत्य समान विनयी
बना दिया था । त्रिभुवन उसके लिये भृत्यवर विनयग्राही या उसके
भृत्योंके भी विनयग्राही थे । ( द्वितीय अर्थमे बाणकी अधिक महत्ता
सूचित होती है ) ।। ४-८।।
भृरयः परिजनस्सस्य घन स्वामिधनं स्मृतम् ।
स्वधनं चाधिकं तेन पाद्धः सकलोतरा॥९॥
परिजन माने भृत्य । भृत्यका जो धन है वह स्वामीका ही धन है,
ऐसा स्मृतियो में बताया है । तब भृत्यरूप त्रिभुवनका धन और अपना
स्वतन्त्र धन दोनो जोडनेपर वाणकी सर्वाधिकता तो होगी ही ॥९॥
तवासोच्छोगितपुर स्वर्गाधिकसमृद्धिमत् ।
प्रधश्वकार शद्धिमिति सामान्ययोजना॥१०॥
तीनो भुवनको जीतकर एकत्रित की हुई सपदासे बाणासुर का
स्थान शोणितपुर उस समय स्वासे अधिक समृद्धिशाली बन गया था।
अतएव उसने इन्द्रसमृद्धिको तुच्छ कर दिया। ऐसा यहापर सामान्य रूपसे
पदयोजना है। (विशेष अर्थ जो पहले दिखाया उसे समझ लेना
चाहिये) ॥१०॥
स जाबालपुरे वाण. पावने नर्मदातटे।
वरिवस्यो व्यधाच्छम्भोविवधत् पार्थिवेश्वरम् ।। ११ ।।
वाणासुर जबलपुरमे पवित्र नर्मदा तटपर पार्थिवेश्वर बनाकर
शकरकी पूजा करता था ॥११॥
नर्मदामृत्तिका धुत्वा कूत्वासो पाथिवेश्वरम् ।
उपचारः पोडशभिरचंयामाप्त नित्यशः ॥ १२॥

लोक:] स्पन्दवातिकसहितम् १५१. आगाहनासने पाद्यमयमाचमनीयकम्। स्नानं वस्त्रं गन्धपुप्पे धूपो दीपस्थय च ॥ १३ ॥ नैवेद्यं दक्षिणा चारात्तिक्यं पुष्पाञ्जलिस्तथा। विसर्जनं चेति सर्वोपचार: पार्थिवेश्वरे ॥ १४ ॥ प्रावाहयामि गिरिशं स्थापयामि नमः प्रभुम् । इत्येवं सनमस्कारा उपचारा निरूपिताः॥१५॥ वाणासुर नर्मदाजीसे मृत्तिका लेकर पार्थिवेश्वर बनाता था। षोडश उपचारोसे नित्य पूजा करता था। आवाहन आसन, पाद्य, अर्ध्य, आचमनीय, स्नान, वस्त्र, गध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, दक्षिणा, आरती, पुप्पाञ्जलि, विसर्जन ये सभी उपचार पार्थिवेश्वरमें होते है। गिरिश प्रभुमावाह्यामि, स्थापयामि, नम इत्यादि रीति नमस्त पूर्वक उपचारोका निरूपण शास्त्रोमे किया गया है।॥ १२-१५॥ सपादलक्षसंख्यानि श्रावणे बलिनन्दनः। पाथिवेश्वर लिङ्गानि नित्यं कृत्वा किलाचंयन् ॥ १६ ॥ श्रावणमासमें बलिपुत्र बाण मवा लाख शिवलिङ्ग नित्य बनाकर पूजता था।॥ १६॥ विसृष्टशिवलिङ्गानि त्वात्मसात्कुरते स्म सा। नर्मदा बाणलिङ्गानि पूतान्यद्यापि तान्यतः ॥ १७ ॥ बाणद्वारा विसर्जित शिवलिङ्गोको नर्मदा माता आत्मसात् कर लेती थी । अतः बाणलिङ्ग आज भी पवित्र माने जाते है ।। १७ ॥ सप्रतिष्ठाप्रतिष्ठानि बाणलिङ्गान्युपावतन् । विना प्रतिष्ठां पूजा स्यात्प्रतिष्ठाप्यायवा भवेत् ॥ १८ ॥ बाणप्रतिष्ठापनतः सप्रतिष्ठानि वा जगुः । रेवातोपविसृष्टत्वादप्रतिष्ठानि या जगुः॥१९॥ बाणलिङ्ग सप्रतिष्ठ तथा अप्रतिष्ठ हैं। अर्थात् बिना प्रतिष्ठा किये पूजा जा सकता है, प्रतिष्ठा करके भी किया जा सकता है। वाणासुरप्रति- ष्ठापित होनसे सप्रतिष्ठ है । रेवाजलमे विसृष्ट होनेसे अप्रतिष्ठ भी हैं ।। १८-१९॥ बाणलिङ्गनैवेद्यनााग्राह्यविचारणा । सर्वाहामगृह्णस्तु नरके पच्यते विरम् ॥ २०॥ शंघदीक्षायुतः सवलिङ्गनवेद्य माहरेत् । अन्यस्तु नर्मदेशस्य ज्योतिलिङ्गस्य चाहरेत् ॥२१॥ न [नयोदशः १५२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् बाणलिङ्गके भोग, ग्राह्य अग्राम विचार नहीं है । सभी उसे ग्रहण करें। और ग्रहण न करें तो शियन वेद्यापगधगे करोडो वर्ष नरकमे पड़ेंगे। शिवदीक्षा प्राप्त व्यक्ति सभी शिवलिङ्गोया प्रसाद ग्रहण करें। दूसरे लोग नर्मदेश्वर और ज्योतिलिङ्गमा भोग ग्रहण गरे । २०२१ ॥ वरिवस्याप्रसनल वरान् वरयितु शिवः । उवाच तदभीष्टं च श्रुत्वा तं समयोचत ।। २२ ।। द्विसहन करास्ते स्युरजेया प्रमराधिपः। असमो! समृद्धि च परमेप्टामवाप्नुहि ॥ २३ ॥ पूजासे प्रसन्न भगवान शयरने वाणामुरपी इच्छाके अनुसार इन्द्रादिसे भी अजेय दो हजार भुजाये और अपार समृद्धि प्रदान की ॥ २२-२३ ।। ववन्ति पोडशप्रन्यप्रभृतो वैष्णवा अपि । सर्वपत्प्रदः गंभूयिष्णोक्षप्रदस्तथा ॥ २४ ॥ धिरतः शंकरो भोग प्राधिपः संप्रयच्छति । लक्षम्यासतो हरिभक्तपनं समपकर्षति ॥ २५ ॥ यस्य यति प्रिय तान परेभ्य. प्रददाति सः। (शाटोप्रिया भी शाटीं याचकाय न वाति हिं॥ कपायामागतां शार्टी प्रसादविधया यतिः। प्रददाति तदाथिम्यै पस्मंचित्कमण्डलुम् ॥ संन्यासी याचमानायाप्पहो दद्यान पुस्तकम् ) अयं च मोहमहिमा नेवामिभवतीश्वरम् ॥ २६ ॥ नच मोक्षप्रियो नेशो दद्यात्तमिति सांप्रतम् । न्योन्याभावाबदेयत्वात्स्वस्वरूपस्थितेरपि ॥२७॥ वैष्णवलोग भी पोडश ग्रन्यादिमे कहते हैं-शकर सर्वसपत्तिसमृद्धि- दाता हैं । विष्णु मोक्षदाता है । क्यो? शकर विरक्त है। अत धनेच्छा न होनेसे प्राधियोको दे देते है । विष्णु लक्ष्मीमे आसक्त हैं । अत उलटा भक्तोका धन भी खीच लेते है। जिसको जो प्रिय है, वह उसे दूसरेको नहीं देता। जैसे जिसको साडी अति प्यारी है वह नारी दूसरेको नयी सुन्दर साडी सहसा नही देती । पर शकरको यह मोह अभिभूत नहीं करता । कहो, फिर शकर मोक्षप्रिय होनेसे क्सिीको मोक्ष नही देते । सो गलत है । मोक्ष दिया तो क्या वह अपने पास घट जायेगा? फिर मोक्ष कोई देनेका पदार्थ नहीं है। वह तो स्वरूपस्थिति है। उसे आवरण- निवृत्तिमे प्राप्त करना है । अपनेसे निकालकर देना नहीं है ॥ २४-२७ ।। न श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् १५३ नन्वेते ब्राह्मणाः कस्माद्दरिद्राः शंभपूजकाः । विष्णपूजापराश्चैव दृश्यन्ते थनिनो विशः ।। २८॥ सत्यं सरस्वतीमेते ब्राह्मणाः परिवण्वते । सरस्वत्याश्च लक्ष्म्याश्च विरोधोऽनादिकालतः॥२९॥ वेदाधीविवेकेन वैराग्याल्लक्ष्म्युपेक्ष्यते। उपेक्षिता न घायाति प्रार्थितापि पुना रमा॥ ३०॥ यदि ऐसी बात है तो शंकरभक्त ये ब्राह्मण दरिद्र क्यों बने ? और विष्णुभक्त वैश्यादि धनी क्यों हुए ? सुनिये । ब्राह्मण सरस्वतीकी उपासना करते है । लक्ष्मी और सरस्वतीका विरोध अनादिकालसे है। वेदाध्ययनसे विवेक होता है । तब कुछ वैराग्य भी हो ही जाता है । उस समय वे लक्ष्मीकी उपेक्षा करते है, और एकवार उपेक्षित होनेपर फिर लक्ष्मी प्रार्थना करने पर भी नही आती ॥ २८-३० ।। यदि शैवा इमे विप्रा हेडित्वा हंसवाहिनीम् । उलूकवाहिनीमीयुः पश्य तद्धनयंभवम् ॥ ३१॥ पूर्वजन्मन्यमी वंश्या माणासुरवदीश्वरम्। शंकरं भेजिरे तेन लेभिरे धनमुत्तमम् ।। ३२ ॥ यदि ये शव ब्राह्मण हसवाहिनी सरस्वतीका तिरस्कार कर उलूक- वाहिनी लक्ष्मीके पीछे लग जायं तो देखो उनका धनवैभव कैसा होता है । पूर्वजन्ममें इन वैश्योंने वाणासुरके समान शकरोपासना की थी। अतः उन्हें इस जन्ममें पुष्कल धन प्राप्त हुआ। ३१-३२ ।। अत्र चार्थान्तरन्यासः चतुर्थे कयिष्यते । पादे न कस्या उन्नत्यं तेनान्याप्युन्नतिमंता ॥ ३३ ॥ वाणे दृष्टा बहुतरा बहुधान्येषु चोन्नतीः । आदाय फस्या उन्नत्या इत्याह मुनितल्लजः ॥ ३८ ॥ अतस्तस्य कथा: किचिद्विस्तराप्रमयोम्यहम् । येन शक्याः परिज्ञातुं वाणस्योन्नतयोऽद्भुताः ॥ ३५॥ यहां इलोको चतुर्धपादमें अर्थान्तरन्याम कहेंगे - "न कस्या उन्नत्यै" इत्यादि । अर्थात् आपके चरणोमे प्रणति किस उन्नतिका कारण नही है ! अतएव केवल देवाधिकमपन्प्राप्तिरूपी उन्नति ही नहीं, अपितु अन्य भी उमति विवक्षित प्रतीत होती है। वाणासुरमे बहुत मारी उन्नतियां दीसी । अन्य भी अनेक उन्नतिया है। उन सबको लेकर अन्तिरन्याम है- "न पस्या उन्नत्यं" । याणागुरंमं कुछ अद्भुत उन्नतियां हई । तर

[प्रयोदयः
१५४
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
प्रश्न हुआ कि क्या इतनी उन्नति शंकरपूजनसे होती है ? उसका
उत्तर है इतनी तो क्या ? किस उन्ननिका कारण शकरपूजन नहीं है ?
यह सर्वोप्नतिकारण है । अतएव याणकी उन मद्भुत उन्नतियोके परिज्ञानार्थ
हम पोड़ा विस्तारकर गणागुरफया प्रस्तुत करते है ॥ ३३-३५ ।
जित्या त्रिभुवनं वाणो राज्यं सर्वसमृद्धिमत् ।
चकार शोणितपुरे भक्तमा भेने पुनहगम् ॥ ३६॥
प्रसन्नं पुरमायात वरदानोद्यतं शिवम् ।
प्राह नित्यं मयने भवदर्शनमस्तु मे ॥ ३७ ।।
रक्षा चास्मान् महादेव स्थितोऽप सदा विनो।
तथास्विति यदा शभुरभवद् द्वारपालयत् ।। ३८॥
कलासाच्छोरिणतपुर नयपालोपवर्तने ।
समीपं तम वसति प्रायोऽभ्येत्य वृषध्वज. ॥ ३९॥
तन्त्र प्रायो भगवती पीडत्यागत्य पार्वती।
उषा याणसुता तां च सखी स्वामकरोत् प्रियाम् ॥ ४०।।
बाणासुरने त्रिभुवन जीतकर शोणितपुरमे अपना सर्वसमृद्धि-
युक्त राज्य क्यिा, और फिर से शकरोपासना की। प्रसन्न होकर पुन शकर
आये और वरदान मागने के लिये बोले, तो बाण बोला-आपका दर्शन
हमारे घरमें हमेशा हो, आप हमारे रक्षक हो। तथास्तु कहकर शंकर
भगवान द्वारपालके समान रक्षक हो गये। नेपालदेशमे स्थित शोणितपुर
कैलास से नजदीक था । अतः प्राय शकर वहा आकर रहने लगे । प्रायः
पार्वती भी शिवजीके साथ आव र क्रीडा करने लगी। उन्हे वाणपुत्री
उपाने अपनी प्रिय सखी बना लिया था ॥ ३६-४०।।
एकदा ताण्डयं नृत्यं कर्तुमिच्छन्महेश्वरः।
पार्वत्याः प्रारिणोद् दूती क्रीडन्या खात ऊपया ॥४१ ।
ज्दात्या सोलाङ्गरपावपरिमार।
जातो विलम्बः शर्वण्यात्तावत्तवाम्यगादुपा ॥ ४२ ॥
निजरूपं समास्थाय नृत्यन्ती शम्भुना सह ।
वीक्ष्योषां कुपिता देवी गौरी तामशपद्रुषा ।। ४३ ।।
सतीत्वं खण्डितं ते स्यादचिराद् दुष्टमानसे।
यमदूपमुपादाय पत्या मे नत्यसोदृशम् ।। ४४ ।।
तच्ट्र स्वातिमयाक्रान्ता पतित्वोमापदान्जयोः।
आह क्षमस्व मा मात. खेलयेवं मया कृतम् ॥ ४५ ॥

। श्लोकः]. स्पन्दवातिकसहितम् १५५ शान्ता प्राहाम्बिका स्वप्ने खण्डितं तद्भविष्यति । सतीत्वं खण्डनस्ते तु पतिः पश्चाद भविष्यति ॥ ४६ ।। एकवार ताण्डव नृत्य करनेके इच्छुक भगवान शङ्करने पार्वतीके पास दूतीको भेजा, जब वे उपाके साथ वावडीमें क्रीडा कर रही थी। वावडीसे बाहर आकर वे नृत्योचित शृङ्गार करने लगी. तो विलम्ब हुआ । इतनेमें पार्वतीका रूप धारणकर उपा वहां पहुंच गयी। अपना रूप धारणकर शङ्करके साथ नृत्य करनेमें सम्बद्ध उपासे देखकर रोपमे पार्वतीने शाप दिया, अरी दुप्टै ! थोड़े समयमें तेग सतीत्व खण्डित होगा । उपाधवरयी, पार्वतीके चरणोंमे पड़ी, और बोली मैंने मजाकमें ऐसा किया था, क्षमा करो। अम्बिका शान्त होकर बोली कि स्वप्नमें तुम्हारा सतीत्व खण्डन होगा और जो वह खण्डित करनेवाला होगा वहीं आगे तुम्हारा पति होगा ।। ४१-४६ ॥ अन्येधुरसुरः शंमोः पादौ संवाहयन् शनैः । माणो जगाद गिरिशमविनीतो विनीतवत् ।। ४७ ।। नाय द्विसहस्रभुनाटवी। कण्डूमें जायते तत्र प्रतियोधुरभावतः ।। ४८ ।। प्रती विधातुमिच्छामि भवतव समं प्रभो । मुष्टियुदं यतः कण्डरियं प्रशममेष्यति ॥ ४९ ।। तच्छ स्वा मगवान् रुद्रःकुद्धोऽप्याधान्न फिश्चन । विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छत्तुमसांप्रतम् ॥ ५० ॥ प्राह चारे दुरात्मस्ते कडू प्रशमयिष्यति । मत्समो ध्वजपातं तु प्रतीक्षस्वास्य सूचकम् ॥ ५१॥ अन्तर्धानगतोऽभूच्च भगवान् प्रमयाधिपः । प्रसन्नोऽसुग्धोध्यंजपात प्रतीक्षते ।। ५२ ॥ एक समय बाणामुर शङ्कर भगवानफे पांच धीरे-धीरे दबाते हुए अविनपके साथ ही विनीत जैसा बोलने लगा-नाथ ! आपने मुझे दो हजार हाथ दिये । किन्तु प्रतियोद्धा न होने से उनमें ग्वुजली मी होने लगी है । उसे मिटानके लिये, आपके साथ मुष्टियुद्ध करना ही उपाय रह गया है। यह मुनकर रुद्र भगवानको क्रोध आया। किन्तु यह सोचकर कुछ किया नहीं कि विषवृक्षको भी उगाकर स्वय काटना उचित नहीं। किन्तु बोले-बरे दुष्ट ! मेरे समान ही कोई होगा जो तुम्हारी इस सुजलीको मिटायेगा। जिस रोज तुम्हारा ध्वज म्वर गिरेगा तो उसके आगमनकी वह गूचना दत्ता मे मवता गणः

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
नियोदशः
समझ लो। भगवान शङ्कर अन्तर्धान हो गये। बाण तो असुर ही था, वह
प्रसन्न हो गया और ध्वजपातकी प्रतीक्षा करने लगा।॥ ४७.५२ ॥
पदाचिद्रममागोया स्वप्ने प्रायुम्निना सह ।
प्रवुद्धा तमनालोक्य विललापाकुला सती ।। ५३ ।।
चित्रलेखा सखी तस्याः कुम्भाण्डतनया प्रिया ।
जाग्रती ज्ञातवृत्तान्ता सान्त्वयन्ती जगाद ताम् ॥ ५४ ॥
यदि ग्रिभुवने सोऽस्ति नूनं त्वामानयामि तम् ।
चिनाणि रचयाम्यद्य स्वयं परिचिनुष्व तम् ॥ ५५ ॥
देवगन्धर्वयशारणां राजन्यानां च लक्षशः।
दृष्ट्वा न्यपेयच्चित्राणि नासो नासाविति ह्यया ।। ५६ ॥
प्रद्युम्नचित्रमालोक्य सलज्जा मुखमप्यधात् ।
तुष्टानिरुद्धमालोक्य प्राह चासाबसाविति ॥ ५७॥
अयं मम सतीत्वं च मनश्चवाऽहरद् बलात् ।
कथं नु धारये प्राणान् विनानेनाध हा हता ॥ ५८॥
एक समयकी बात है-उपाने सपनेमे प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्धको अपने
साथ रतिक्रीडा करते हुए देखा । जगनेपर उसे न देखकर विलाप करने
लगी। मन्त्री कुम्भाण्डकी पुत्री चित्रलेखा उसकी सहेली थी। वह जग
गयी। विलाप करनेका कारण पूछा तो उपाने मभी वृत्तान्त बताया।
चित्रलेखा सान्त्वना देती हुई बोली यदि त्रिभुवनमे वह व्यक्ति है तो उसे
तुझे मैं ला दंगी। मैं चित्र बनाती हूँ, तू पहचान ले । देव, गन्धर्व, यक्षोंमे
और राजाओमे जो मुग्य मुस्य थे उनके लाखो चिन बनाकर उसने
दिखाया। यह नहीं, यह नहीं कहती हुई उपाने सवका निषेध किया । यदु-
वशमै प्रद्युम्नका चित्र बनाया तो उपा लजाकर आँचलमे मुंह ढकने लगी।
अनिरुद्धका चित्र बनाया तो उसे देखकर वह प्रसन्न हो गयी और बोली कि
वस, यही है, यही है । इसीने मेरा सतीत्व और मन दोनोका हरण किया।
हाय ! इसके बिना मैं कैसे प्राण धारण करूं ! आज मैं बुरी तरहसे मारी
जा रही हूँ॥ ५३-५८ ।।
मा भैपोरानयाम्येनं योगिनी योगमार्गत.।
इत्युक्त्वा सा गता चित्रलेखा द्वारायतों पुरीम् ॥ ५९ ।।
तत्र सुप्तं महावीरं रानावन्न पुरे द्रतम् ।
अवतीर्य व्योममार्गादनिन्द्ध निनाय सा॥६॥
अवाप परमं मोदं संप्राप्योपा प्रियं पतिम् ।
जात्या वृत्तम् स चोपां तां रमयामास पावकः ॥ ६॥

तच्छ श्लोक.] स्पन्दवातिकसहितम् घबराओ मत, मैं योगिनी हूँ, योगमार्ग से उसे तुझे ला देती हूँ, कह- कर चिनरेखा द्वारिका गयी। रातको अन्त पुरमे सोये हुए अनिरुद्धको वहाँ उतरकर दूतिगतिसे उपाने उठाया और शोणितपुर पहुँचाया। अपने प्रिय पतिको पाकर उपा परम मुदित हुई। जगनेपर अनिरुद्धने सारा वृत्तान्त जाना और उपाको आनन्दित किया ॥५९-६१॥ लक्षयित्या प्रहरिण कौमाहितिलक्षणम् । राजे निवेदयामासुई हितुर्भयविह्वलाः ॥ ६२॥ छ. त्या कोपताम्राक्षः कन्यान्त.पुरमाययो । तनावक्षत प्राधुम्नि दीव्यन्त प्रियया सह ।। ६३ ।। चकितः कुपितश्चैव वीरं त योक्ष्य सोऽभवत् । उदतिष्ठच्च सहसाऽनिरुद्धः सधनु शरः ।। ६४ ॥ तयो. समभवद्युद्धमन्योन्यं विजय पिणोः। न चामिभवितु प्राभूद् बाणस्तं याणवृष्टिमिः ॥६५॥ नागपाशेन स स्वन्ते बबन्ध यदुपुङ्गवम् । संशयानः कोऽयमिति कारागारे न्यस्थत् ।। ६६ ॥ प्रहरियोने उपाने कौमार्यनाशका लक्षण पाया। उन्होने डरकर राना बाणको निवेदन किया। क्रुद्ध होकर वाण न्यान्त पुरमे आया तो वहां प्रिया उपाके साथ अक्षक्रीडा करते हुए अनिरुद्धको देखा। वह चकित हो रहा था, प्रोधित भी। इतनेमे अनिरुद्ध भी हाथमे धनुषवाण लेकर उठ खडा हो गया। दोनोका वडा भागे युद्ध हुआ। रिन्तु वाण शरवर्षापे भी अनिरुद्धको अभिभूत नही कर सका। अन्लमे उसने अनिरुद्धको नागपाशसे बांधा। आखिर यह वीर कौन है ऐगा मशय करता हुआ उगे कारागारमे अवरुद्ध कर दिया ।। ६२-६६ ।। हारिकावासिनः सर्वे वर्षामासचतुष्टयम् । अनिरुद्धमतरध्यष घ्याकुलत्यं प्रपेदिरे ॥६॥ अपायेगुरुपायातो देवपिर्यासमय। पृष्टः स पदुभि सर्व वृत्तं तेम्पो न्यवेदयत् ॥ ६८॥ वर्षावालके पूरे चार मास अनिरुद्धको न पावर मभी द्वारिकावासी ध्याकुल हो गये। चातुर्मास्यानर देवर्षि नारदजी यहां पहुंचे। द्वारिका. वासियोने उनसे समाचार पृछा तो नारदजीने गोणितपुरमे अनिरुटरे निरुद्ध होनेका सारा वृत्तान्त वह मुनाया ।। ६७.६८ ॥

१५८ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [प्रयोदशः तदा पहायत सेना पवूनां सागरोपमा। तरसा शोणितपुरं भग्नस्तावद् ध्वजः पुरे।। ६९ ।। , शशिन्तो योक्षते याय याणस्तु परितः पुरोम् । स्वपुरी ‘स निरन्धानां च पश्यति यादवोम् ॥ ७० ॥ सस्मार शङ्करं वाणः सगणस्त्वभ्यगावरः। महद् युद्ध प्रयवते उभयोस्तन सैनयोः ॥७१॥ तव सागरोपम यादवसेनाने तुरसजाकर गोगितरको घेरा। इतने में राजधानीका ध्वज टूट गिरा। बाणासुरको शङ्का हो गयी। चारों ओर देखा तो अपनी पुरीको घेरे हुए यादवसेनाको देखा। बाणने भगवान शङ्करका स्मरण किग। भगवान शङ्कर भी अपने गणोके साय उपस्थित हुए और दोनों सेनाओंमें अति महान् युद्ध प्रारम्भ हुआ ॥ ६९-७१ ॥ थोकृष्णः शम्भुना साकं प्रद्युम्नः शरजमना। बाण सात्यकिना सामित्ययुष्यन् क्रमेण ते ॥ ७२ ॥ माहेश्वरी ज्वरोऽन्युग्रस्तत्रोमूतोऽप्ययूयुषत् । वैष्णवेन ज्वरेणेति लोकोतरमभूद्रणम् ॥ ७३ ॥ भूवनन्तकालान्तं रणमीश्वरयोरिदम् । इत्यतो जम्भणास्त्रं श्रीकृष्णः शम्भावुदैरिरत् ॥ ७४ ।। जृम्भमाणे हरे क्षि बाणं प्रतिययौ हरिः । तयोयुद्धममूद् घोरमन्योन्यं परमाद्भुतम् ।। ७५ ।। सुदर्शनेन चक्रेण करानेकैकशो हरिः । अच्छिनत्तस्य बाणस्य हावशिष्टं करद्वयम् ॥ ७६ ।। श्रीकृष्ण शङ्कर भगवानके साथ, प्रद्युम्न कार्तिकस्वामीके साथ, सात्यषिके साथ वाणासुर इस क्रमसे युद्ध आरम्भ हुआ। वहाँपर स्त्पन्न माहेश्वर ज्वर भी वैष्णव ज्वरके साथ भिड पडा । यह युद्ध तो लोकोत्तर हो रहा था । यह ईश्वरोंका युद्ध अनन्तकालतक न चलता रहे इसलिये श्रीकृष्ण ने शङ्करपर जृम्भणास्त छोड़ा। शङ्कर जभाई लेने लगे तो तुरत वे वाणासुर की ओर पहुँचे और मुदर्शनचत्र से एक एक कर उपके हाथ काट गिराने लगे। शेष दो ही हाथ रह गये थे ।। ७२७६ ।। तावदागत्य भगवान् गिरिशो न्यरुणद्धरिम् । मतं मे मा बधीरेवं मा भूयद्धमतः परम् ॥ ७७ ॥ समाधापयदन्योन्यं कृष्णवागो महेश्वरः। उवाच च हरिः शंभुं प्रणमन्नप्रभावतः ।। ७८।। मा श्लोकः] सन्दवातिकसहितम् १५९ . सहारे रुद्ररूपं त्वां नमस्यामो वयं सवा । को नु तिष्ठद्रणे देव त्वचार भुवनत्रये ॥ ७९ ।। भवतय प्रशनोऽय करकण्डू विमर्दनः। उपेष्यतीति ततेऽहमादेश पयपालयम् ॥ ८॥ इतनेमे शङ्करभगवान आ पहुंचे और श्रीकृष्णको रोका। बोले कि मेरे भक्तका वध मत करो। यह युद्ध यहाँ ममाप्त हो । शङ्करजीने श्रीकृष्ण और वाणासुरमे परस्पर समाधान कराया। श्रीकृष्ण शङ्करको प्रणाम करते हुए बोलने लगे, सहारकालमे रुदरूपको धारण करनेवाले आपको हम नमस्कार करते हैं। तीनो भुवनमे ऐसा कौन है जो आपके माथ युद्ध कर मके । तथापि आपने ही इस बाणासुरको शाप दिया था कि तुम्हारे भुजाओ. की खुजली मिटानेवाला आयेगा । सो मैंने आपके ही आदेशका पालन किया ।। ७७-८० ॥ अथ बाणः सुतां स्वीयामनिरुद्वाय सम्मतिः । विधिवत्सरिणीयादात् पारिवह: सहादरात् ॥ ८१॥ इत्यं शङ्करतः प्राप्तशक्तिः संप्राप्तरक्षणः। अवृतच्चोणितपुरे वतिसूनुनिरामयः॥ ८२॥ इसके बाद बाणासुरने अपनी पुत्री उपाको विधिवत् विवाहकर आदरके साथ दहेजके माय अनिरद्धको दिया। इस प्रकार शङ्करसे शक्ति प्राप्तकर और रक्षण प्राप्तकर बलिपुर वाण निरामय हो शोणितपुरमे रहा ।।८१-८२॥ स्वत्पदावननिर्धत्त उन्नति हि विरुद्धयत् । सेयं कस्यै न चोन्नत्यं सर्वस्य नैव संशयः ।। ८३ ।। रक्षत्यसो द्वारपवद् युद्धे रक्षति मृ युतः । सखीव पार्वती पुन्याः किमत परमुन्नतिः ।। ८४ ॥ आपके चरणमे अपननि उन्नति करती है, यह विरुद्ध सा लगता है किन्तु विरुद्ध नहीं है। मह अपनति सि उन्नति का कारण नही ? सभी उन्नतिका कारण है । शड्वर भगवान द्वारपाल जैसे रक्षा करने लगे। युद्ध में मृत्युसे बचाते रहे। पार्वती तो पुत्रीको मसी जैगी हो गयी। इससे बढकर उन्नति क्या हो? ॥ ८३-८४ ।। पूजा नमस्या चितिः सपर्याचहिणाः समाः। वरिवस्या तु शुश्रूषा परिषर्याप्युपासना ॥ ८५ ।।

'१६० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् त्रयोदशः इति कोशोक्तितो व परिवस्या मतिर्भवेत् । अपि चाहामरः श्रीमांस्त्वन्ताधादि न पूर्वमा॥८६॥ सत्यं तयापि मुख्यत्वानुपास्तो तामिहापहीत् । किं च प्रत्युपचारं हि नतिः संशिता मया ॥ ८७ ।। "पूजा नमस्या" इत्यादि कोशश्लोकमें नमस्या और परिवस्याको अलग बताया है । 'यरिवस्या तु' यहाँ 'तु'शब्द पूर्वसे भिन्नताका घोतक है। फिर भी उपासनारूपी वरिवस्यामें नमस्कारको मुख्यता होनेसे अवनति शब्दसे उसका यहाँ ग्रहण किया। और पहले षोडशोपचारदिग्दर्शनमें 'मा- वाहयामि नमः' इत्यादि रीति नमस्कार सहित ही प्रत्येक उपचार होता है यह हमने दिखाया। अतः मभी उपचार नतिसहित होनेसे अवनति पदसे उपचारोपलक्षण समझा जा सकता है ।। ८५-८७॥ अथवा नम्रतामुत्या परिचर्येति विश्रुता। तां जगायिह तन्मुदपशुश्रूषामहणार्यतः॥ ८८॥ अथवा 'वारिवसितरि' में वरिवस्याका शुश्रूषा अर्थ है। शुश्रूपामें नम्रताकी मुख्यता है । उस नम्रताको ही अवनतिपदसे यहांपर कहा। वह भी नम्रता जिसमें मुख्य है उस वरिवस्या ( शुश्रूया) के उपलक्षणार्थ कहा ऐसा समझना चाहिये ।। ८८॥ घुवं मुह्यत्युपषितः खल इत्युपमाथितम् । पूर्वश्लोकादत्र चानुवयं संगतिसत्त्वतः ।। ८९ ।। "ध्रुवमुपचितो मुह्यति खल." इम पूर्वश्लोकोक्त अर्थकी यहां संगति होनेसे उसकी अनुवृत्ति भी यहा कर लेना चाहिये ।। ८९ ।। याणोऽप्यमुह्यत्समुपचितो युद्धाय शंकरम् । यवाह्वयत् परं त्वत्र मुनिन स्पष्टमब्रवीत् ॥ ९ ॥ न सर्वया विनाशोऽमूद् घाणस्य वशववत्रत् । न तद्वत् परदारादिवाञ्छास्यामूत्कदाचन ।। ९१ ।। पूढ होकर बाणासुरने युद्धार्थ शंकरका आवाहन किया। किंतु उसका उल्लेख पुष्पदन्ताचार्यने प्रकटस्पसे नही किया। क्यो? रावणके समान बाणासुरका सर्वथा नाश नहीं हुमा। रावणके समान परदाराभिलापादि वाणासुरको कभी नहीं हुई ।। ९०-९१ ।। सस्मान्यदर्शयत्तस्योन्नतिमानं महामुनिः। अर्थान्तरन्यासतश्च तायन्मानं समर्थितम् ।। १२ ।।

श्लोक] स्पन्दवातिकसहितम् १६१ अतएव महामुनि कात्यायनने यहां वाणकी उन्नतिमात्रको दिखाया। और अर्थान्तरन्याससे भी उन्नतिमात्रका समर्थन किया ॥१२॥ उन्नतिः काच नामेयमृत्पावियपगिता । प्रयम्छन्मोक्षपर्यन्ता तामुमापत्युपासना ॥ ९३ ॥ और पूर्वोक्त उन्नति तो क्या चीज है ? मोक्षपर्यन्त मभी उन्नति उमापति भगवान शकरकी उपासना प्रदान करती है ।। ९३ ।। मोक्षपर्यन्तमसिल अनुपास्तिः प्रयध्यति । नमश्चरणयोस्तस्य कुमो नित्यमुमापतेः॥ ९४ ॥ जिमको उपासना मोक्षपर्यन्त सब कुछ प्रदान करती है ब्रह्मविद्या- स्वरूप उमाके पति उस शकर भगवानके चरणोमे मेरा प्रणाम है ।। ९४ ॥ इति श्री काशिकालन्दयोगिनः कृतिनः कृतौ। महिम्न स्तोत्रविकृतो गतः स्पन्वस्त्रयावत ।। १३ ॥ . चतुर्दशः श्लोकः सुरास्ता तामिति प्रोक्तमुखिदत्वं दिवौकसाम् । वाणोदाहरणाच्चध दर्शितं सत्सुरद्विषाम् ॥१॥ "सुरास्ता तामृद्धि" इत्यादिसे देवताओको ऋद्धि प्रदान करनेवाले शकर हैं यह बताया। और बाणासुरके उदाहरणसे असुरोको भी ऋद्धि प्रदान करते हैं यह दिखाया ॥१॥ इत्य सात्त्विकमात्रेषु कृपादृष्टिः पिनाकिनः । नास्मास्विति चशय निरस्ता मुनिना स्फुटम् ॥२॥ इसप्रकार सात्विकोपर ही शकरकी कृपा दृष्टि होती है, हम जसो. पर नही, इस शकाका निवारण पुष्पदन्ताचार्यने किया ॥२॥ ११ - F १६२ श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [चतुर्दश पृथक् पृषक कृपादृष्टिः प्राणुका देवरस्ययोः।। अधुनंकपवेऽपक्षपातिरयायोच्यते हि सा ॥३॥ पहले देव और दैत्योपर कृपादृष्टि अलग-अलग बतायी । अब पक्ष पाताभावप्रदर्शनार्थ एक साथ उसे दिखाते है ॥ ३ ॥ 'कृपासागरता तस्यासाधरणीयते। लये संहरपि च सृष्टौ संहारतोश्वनम् ॥ ४ ॥ तमोगुणप्रधानत्वं तथा च प्रलये भवेत् । सृष्टी तु परम तस्य सात्त्विकरवं प्रसिध्यति ।।५।। अनितरसाधारण कृपासागरता भी पहा बनायी जा रही है। ( क्योकि विष्णु आदि सभी देव हालाहलसे पीछे हट गये थे। ) इससे यह भी सिद्ध हुआ कि प्रलयकालमे भले सहारकर्ता हो, किन्तु सृष्टिकालमे शकर सहारसे बचाते हैं। अतएव यह भी सिद्ध होता है कि प्रलपार्थ तमोगुण प्रधान भले हो किन्तु सृष्टिालमे अनन्यसाधारण परम सात्त्विकता ही भगवान शकरमे है । ॥ ४-५ ॥ अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचफितदेवासुरकृपा- विधेयस्यासीस्त्रिनयन वि संहृतवतः। सस कल्मापः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमही विकारोऽपि इलाध्यो भुवनभयभगव्यसनिनः ॥१४॥ असमय ही ब्रह्माण्डका क्षय होते देखकर भयभीत हुए देव एव असुरो- पर कृपापरवश आपने हे त्रिनयन ! जो हालाहल विषका भक्षण किया उससे आयी हुई आपके कण्ठकी कालिमा भद्दी दीखने लगी हो, शोभावद्धि न कर रही हो, ऐसी बात नही, उसने शोभावृद्धि हो को। वस्तुत जगत्वे दुस भयादिको नष्ट करने के व्यसनीकी विकृतियां भी श्लाघनीय ही होती हैं ॥ १४ ॥ तिरस्क्रियापि कृतां विस्मरन्नेव शकरः। प्रपन्नान् पाति शरणमित्यर्थे वयह कयाम् ॥६॥ दुर्याससं हि परममृषिमीशाशसमयम् । तिरश्चः सुरास्तस्य फल दुखपरम्परा ॥७॥ शफरेणानुकम्पायर्या कृतायां सास्तमागता। अमृत स्याधिकार चालभन्त धिपोतमाः॥८॥ .

श्रोक:]. स्पन्दवातिकसहितम् १६३ भगवान शंकर इतरकृत तिरस्कारको भी भूकर शरणापत्र की रक्षा करते हैं इस अर्थके लिये प्रतश्लोकसे सम्बद्ध मूलकया मैं कहता हूँ। पांकरके ही अंशसे उत्पन्न महर्षि दुर्वासाका तिरस्कार इन्द्रादि देवोने किया। उसका फल एक के बाद दूसरा दुःख ऐसी दु खपरम्परा हुमा । उसीका अन्त शंकरकृपासे हुआ और ये देवता, अमृत और स्वाधिकारको प्राप्त हो गये ।। ६-८॥ आवाय दिव्यकममहारं वैकुण्ठतः पुरा। प्रसादस्पं सर्वधीकसितं विष्णूनापितम् ॥९॥ दुर्वामा: समयातारोह स्वर्ग भारतमावजन् । जनोपकारो कुण्ठभियास्स्विति च चिन्तयन् ।।१०।। सुरः सार्धमयं शक्रो रामायं सोकपालकः । वास्याम्यस्मा इति मुनिहरिं तस्मै न्यवेदयत् ॥११॥ मत्तः स च मदोन्मत्तहस्तिशीर्वज्यवाहजत् । हस्ती सुगन्धरसिकः भ्रमरैः पर्ययायंत ॥ १२॥ गनाधिपः स हारं तं शुण्डेनोस्याप्य पावयोः । हसनोन्द्रादिकेऽमृद्नावकुप्यवृषिरप्यतः अरे दुष्ट भया मत्तो हारं मां चावहेलसे। सा श्रीस्तयापसरतु मा भूरेषंविधः पुनः॥१४॥ एकबार वैकुण्ठसे विष्णुप्रदत्त सर्वश्रीसम्पन्न प्रमादरूप दिव्य कमल- हार लेकर दुर्वासा ऋपि भारतवर्ष आते हुए स्वर्गमे उतरे। सोच रहे थे वैकुण्ठपीसे जनोपकार कैसे होगा। इतनेमे देवताओ गाय इन्द्र दीरा पड़ा । यह राजा है, लोकपालक है। इसे हार दूगा तो अभीष्ट सिद्ध होगा, सोचकर उसे यह हार दिया। उन्मत इन्द्रने उस हारको मदमत्त हाथीके मस्तकपर डाला। इतनेमे सुगन्धरसिक भ्रमरोने आकर हाथीको घेरा। गुस्से मे हाथीने सूडसे उठाकर हारको पवितले कुचल दिया। इन्द्रादिको हसी आयी। किन्तु अषिको क्रोध आया । बोले अरे दुष्ट ! जिस वैभवश्रीसे रमन्त होकर शरसा और मेरा तिरस्कार कर रहे हो. वह तुम्हारी श्री. नष्ट होगी । आगेके लिये तुम याद करोगे ।। ९.१४ ।। नष्टधीः स्वराज्याच्च भ्रष्टोऽसुरविदितः । इतस्ततः सुरः साध पर्यधाम्यच्चिरं स्वराट् ॥ १५ ॥ अगाद् यहासमां सोऽपि कदाचिदमरैः सह । तस्मै न्यवेदयत्सर्य विष्णुमस्तोत्तदा विधिः॥ १६॥ - [चतुर्दशः -- श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम आगत्य हरिरुचे तानुबन्वन्मायनात् पुनः । लप्स्यध्वेऽमृतमग्यानि रानानि त्रियमेव च ॥१७॥ सत्यध्वममुगः साधं नायथा मन्यनक्षमाः । भविष्यथास्मकृपया यूपं हामतमागिनः ॥ १८ ॥ उसी समय असुरोने देवताओंपर चढ़ाई की। परिणामतः देवताओं- की श्री नष्ट हुई, स्वर्गराज्यसे ये प्रष्ट हो गये । इधर-उधर भटकने लगे। एकरार देवताओं के साय इन्द्रने ग्रह्मसभामें जाकर सब वृत्तान्त कह सुनाया। ब्रह्मानीने विष्णुको स्तुति की। भगवान हरि प्रगट होकर बोले कि समुद्र मन्यन करोगे तो अमृत, अन्य रत्न एवं श्रीको प्राप्त होगे। तदर्थ असुरोंसे सन्धि करो। अकेले समुद्र मन्थन मम्मव नहीं है। हमारी कृपासे तुम अमृतके भागी बनोगे ।। १५-१८ ॥ प्रय देवाः समापाता राजानं सकता बलिम् । सुधामागप्रदानेन संघि चापताऽसुरैः॥१९॥ मन्दरादि समुत्पाटय सोत्साहं ते सुरासुराः। मानिन्पुरम्युधि रज्जु वासुकि समकल्पयन् ॥२०॥ ज्येष्ठा श्रेष्ठान न वयं वासुकेः पुष्यधारिणः । इति वक्त्रमगलस्तेऽसुराः पुच्छं तु देवताः ॥२१॥ तप्यतो वासुकेधववाद्विपधारा यस्पतत् । तया तप्ता दितिसुताः पश्चात्तापं ययुदंशम् ।। २२ ।। मनसु गिरिणामोधि धान्तास्तेऽजिप्तमभ्ययुः। विशालमूतिरजितो ममन्य तरसा स्वयम् ।। २३ ।। कदाचिदजितोऽमनात् कदाचिच्च सुरासुराः । एवं संमव्यमानान्धरुन्मूतं विषमुल्वणम् ।। २४ ।। इसके बाद सभी देवता राजा बलिके पास आये और अमृतके भाग- प्रदानकी शर्तसे असुरोंके साथ सन्धि की। फिर देव और असुर दोनों मिलकर मन्दराचल उखाड़ लाये। वासुकिको रज्जु बनाया। 'हम ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है अतः वासुकिको पूछ नहीं पकड़ेगे' कहकर असुरोने मुंह पकड़ा। पूंछ देवताओने पकड़ी। पर पथते समय वामुकिका शरीर तप गया और मुहसे विषधारा गिरने लगी तो असुर पछताते रह गये । मथते-मयते देव और असुर थके तो अजित भगवान (विष्णु) को शरणमें गये। अकेले विष्णुने विशाल रूप धारणकर स्वयं मंथन किया। कमी अजित कभी - श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् १६५ देवासुर इसप्रकार मंथन कर रहे थे। उसी समय सागरसे भयंकर विष प्रादुर्भूत हुआ । १९-२४ ।। हालाहलं सदुव मूतं ज्वालया व्याप्य रोदसी। प्रदाधुं जगदारेने सर्वे भीतास्तदामवन् ॥ २५ ॥ न देवा नासुरा नवाजितो मान्यच कश्चन । हालाहल शमणितं प्रामवाप्रतिदारुणम् ॥ २६ ॥ सः फेलासमाजग्मुमहेशं गिरिजापतिम् । रक्ष रक्षेति मल्पन्तो विलपन्तश्च भीतितः ॥ २७॥ वह उद्भूत हालाहल अपनी ज्वालासे पृथिवी और आकाशमें व्याप्त हुमा और उमने समस्त जगतको जलाना शुरू किया, सबके सब तब भयभीत हो गये । देव क्या, असुर क्या, अजित क्या, कोई भी उस दारुण 'हालाहलको शान्त नहीं कर सके । सभी कैलासमे पहुंचे और भगवान शंकर से यह बोलते हुए भयसे विलाप करने लगे कि बचाओ ॥२५-२७ ।। विश्वनाथ नमस्तुभ्यं विश्वरूप महेश्वर । मुखमग्निः मितिः पादौ नमो नाभिस्तवेश्वर ॥२८॥ चक्षुषी चन्द्रसूर्यो ते मनः सोमो रिशः श्रुती । द्यौः शिरश्चंय पातालं तव पावतलं प्रभो ॥ २९ ॥ ग्यात्मा हृदयं धर्मः स्वयंज्योतिस्त्वमीश्वर । अष्टमूत जगन्मूर्ते नमस्ते जगदोश्वर।३०।। प्रणश्यत्यखिलं नाम ब्रह्माण्डमधुनाऽचिरात् । विश्वमूर्तिरत्वमेवको विश्वसंरक्षणक्षमः ॥ ३१ ।। स्ववंशश्नादेषा मयपरंपरा। ! महासंकटतो ह्यस्मादस्मान् पाहि दयानिधे ॥ ३२ ॥ सर्व कर्तुमकतुं धान्यथाकतुं भवान् प्रभुः । कुर्वन्नपि जगत्सवं निर्षिकारो विराजसे ॥ ३३ ॥ पासि त्वं शरणापन्नानपि मूरिकृतागसः। इयं हि करुणासिग्धोः करुणासिन्धता तव ॥ ३४ ॥ परमपावन। उमानाथ गिरांनाय विश्वनाय नमो नमः ॥ ३५॥ इत्यं स्तुतः स भगवान् समुद्रान्तिकमाययो। साधं गिरिजया तत्र हालाहलमसोकत ॥ ३६॥ जाता नमः परमकल्याण नमः ૧૬૬ श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [ चतुर्दश हे विश्वनाथ | हे विश्वरूप महेश्वर | आपको हम प्रणाम करते हैं। आपका मुख अग्नि है, पाद क्षिति है, नाभि नभ है, चक्षु चन्द्रसूर्य है, मन सोम है श्रोष दिशायें हैं, सिर धुलोक है, पाद पाताल है, तीन वेद आत्मा है, हृदय धर्म है, आप स्वयज्योतिस्वरूप हैं। हे अप्टमूत, हे जगन्मूते, हे जगदीश्वर | आपको हम प्रणाम करते हैं। सारा ब्रह्माण्ड अभी नष्ट होगा । विश्वमूर्ति आप ही एकमात्र रक्षा है । आपके अशस्वरूप दुर्वासाने तिरस्कारसे ही हमारी यह भयपरपरा प्रारम हुई है । अबकी बार तो मर्वाधिर महासकट उपस्थित हुआ है। इससे रक्षा करो। माप सबकुछ करने या न करने या अन्यथा करने में समर्थ हैं। और मबकुछ करते हुए भी निर्विकार हैं। हम अपराधी हैं । फिर भी शरणागत है । अत हमारी रक्षा करो। यही दयामागर आपकी दयासागरता है। परमकल्याणस्वरूप आपको हम प्रणाम घरते है। परमपवित्र आपको हम प्रणाम करते हैं । हे उमा (ब्रह्मविधा) के नाथ ! हे वाणी (वेदवाणी के नाथ | हे विश्वनाथ । बारबार आपको हम प्रणाम करते हैं। इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान शकर पार्वतीले साथ समुद्रतट पर आये और हालाहलको देखा ।। २८-३६ ॥ अकाण्डब्रह्माण्ड अकाउमेद ब्रह्माण्डक्षयेण चकितान भृशम् । पौक्ष्य देवासुरानीश कृपापरयशोऽभवत् ।। ३७ । विश्वरूप समास्थाय स विशालाम्मलो विषम आधाय आधुमारेभेऽनालोक्पान्यत्र सहुतिम् ॥ ३८॥ तद्विष कण्ठपर्यन्तमागत्यापच्यतोल्वणम् । कल्माष सोऽपि कण्ठस्य नीलरूपो च्यराजत ।। ३९ ॥ घिय म परमा चर्फ प्रस्फुरद्गौरवमण । मोसमास्या सवें तुष्टुपुलिरिश प्रमुम् ॥ ४ ॥ अनवसरमें ही होनेवाले ब्रह्माण्डक्षयसे भयभीत देवासुरोको देखकर शकर कृपापराधीन हुए। विश्वरूप धारण कर अजलिमे उस विषको लिया और पान करना शुरू किया। क्योकि अन्यत्र उसका नारा सभव नहीं था। यह विष कण्ठतक आते ही पच गया और पत्रा शेष नीलस्पमें कण्ठमे शोभित होने लगा। गौर शरीरमें वह नीलिमा चमकने लगी । सभी नीलकण्ठ वोलकर स्तुति करने लगे ।। ५७ ४० ॥

स्पन्दवातिकसहितम्
विकारोऽपि०
प्रयुक्त स्वामिनो युक्त युक्तं नीचस्य दूपणम् ।
अमृतं राहवे मृत्युविषं शंकरभूषणम् ॥ ४१ ॥
लोकाना व्यसन यस्य केवलं मयमजनम् ।
विकारोऽपि मवेत्तस्य श्लाघनीयो मनीषिणाम् ॥ ४२ ॥
महापुरुपके लिये अयुक्त भी युक्त होता है। नीचके लिये युक्त भी
दूषण होता है । अमृत राहुने मृत्युका कारण बना । विष भी शकसा
भूषण बना। लोगोरा भय भजन करना एकमात्र व्यसन है जिसका उस
व्यक्ति की ऐसे व्यसन से होनेवाली विकृति भी श्लाघनीय हो
जाती है ।। ४१.४२ ।।
सरक्ष्य भुवन सदेवासुरपन्नगम् ।
अमृत प्रापयामास रत्नानि च चतुर्दश ॥ ४३ ॥
इम प्रकार देव, असुर पनगादिसहित भुवनकी रक्षावर शारभग.
वानने अमृत एव चौदह रत्न प्राप्त कराया ।। ४३ ॥
एतत्पठन्ति ये स्तोत्रं स्फुरदीश्वरवंमधम् ।
ससारविषमोरेपा कदाचित्प्रजायते ॥ ४४ ।।
शास्त्रान्तरोक्त सक्षेपात्मक पूर्वोक्त स्तोत्रको, जिसमें शकरभगवानकी
विभुता स्पष्ट है, जो पढते है, उनको ससार विषभय कभी नही हा
सकता ॥४४॥
परोक्षविधया चार्थ कश्चिदत्र निरुपित.।
वैग्यासुरोम्यां सपद्भपा ससाराम्मुधिमन्यनम् ॥ ४५ ॥
नात्यन्तसरलर्भाध्य गत्वा पश्य बनस्थलीम् ।
छिधन्ते सरलास्तत्र दुम्जास्तिष्ठन्ति पादपा.॥४६॥
अपेक्षित क्वचित्क्रोधो यालकेषु विमागिपु ।
पादप्यमलसादीनामुत्थापनयिधिक्षमम्
दम्भादिरज्ञजनत सन्मार्गानयनो यदि
सवा तस्याप्यपेक्षा स्यादज्ञान व निशा भवे ॥४८॥
स्वकार्य साधयेद्धीमानासुरीभिर्हि वृतिमि ।
न तु ते सर्वथा प्राह्मास्त्याज्या एवान्ततः स्फुटम् ।। ४९ ॥
यहा कुछ परीक्षार्थनिरूपण भी किया है । देवी सपदा और आसुरी
सपदा मिलनेपर ससारसागर मन्थन होता है। अतिसरलतासे काम नहीं
॥४७॥

पश्चदशः श्लोकः
अतिसात्विकविणादावनुग्रह उदोरितः।
ब्रह्मात्मभूः सुरज्येष्ठः सुरत्वात्सात्त्विको मतः॥१॥
सृष्ट यथं रज आदते नत्वप्तौ राजमो मतः।
यथा रुद्रस्तमो पत्ते प्रलये समुपस्थिते ॥२॥
अतितामसपौलस्त्यरावणादौ
ततः
परम्।
दशितोऽनुग्रहः सर्वानुग्राहित्य विवक्षपा ॥३॥
अत्यन्त सात्विक विष्णु आदि पर प्रथम अनुग्रह बताया। ब्रह्मा
अति सात्त्विक ही है। क्योकि उनके नामो में सुरज्येष्ठ शब्द आता है ।
देवता सात्त्विक हैं तो देवताओमे ज्येष्ठ अत्यन्त सात्त्विक स्वत सिद्ध हैं।
सृप्टिके लिये रजोगुणको गहण करते हैं। किन्तु ब्रह्मा राजस नहीं
हैं। जैसे रुद्रभावान प्रलय-समय उपस्थित होनेपर तमोगुणको धारण
करते हैं, फिर भी तामस नहीं हैं । इसके बाद अत्यन्त तामस पुलस्त्यपुन
रावणादिपर भगवदनुग्रह बताया। इसलिये कि भगवान शकर सर्वानु-
ग्रहकारी है यह दिखाना है ।। १.३ ॥
सामान्यसात्त्विकाना घ देवानामृद्धिदो हरः।
सामान्यतामसानां च बाणादीनां प्रदशितः॥४॥
राक्षसा घोरतमसः सामान्यतमसोऽसुराः।
राक्षसीमामुरों घेति पृथक् प्रकृतिवर्णनात् ॥ ५॥
पूर्वमे सामान्य सात्त्विक देवताओके ऋद्धिप्रदाताके रूपमे भगवान
दाकर को दिखाया। और फिर सामान्य तामस वाणादिके ऋद्धिप्रदाताके
रूपमे । राक्षस घोर तमोगुणी होते हैं। असुर सामान्य तमोगुणी होते
हैं । अतएव गीतामे "राक्षसीमासुरी चैव प्रकृति" इसप्रकार दोनोका
पृथक् वर्णन है ।। ४-५ ॥
देवासुरेटदेकपदे कृपाऽनुपदमीरिता।
प्रतीपर्वातना दण्डप्रदातृत्वमयोच्यते ॥६॥
प्रतोपमाचरत् कामो भगवत्कोपभाजनम् ।
मूस्था नष्टस्ततो नैव तत्प्रतोपं समाचरेत् ॥७॥

. श्लोक.] स्पन्दवातिकसहितम् १७१ देवता तथा असुर दोनोंके प्रति समानरूपसे एक साथ कृपावा वर्णन पूर्वश्लोकमे किया। यहानक अनुवृत्तिवाले अनुकूल वतियोकी बात हुई। अब प्रतीपवतियोंके प्रति दण्डदाताके रूपमे वर्णन करने जा रहे है । कामदेवने भगवान के प्रति प्रतीपाचरण किया। फल यही हुमा कि वह नष्ट हो गया । अत शकर भगवानके प्रति कोई प्रतिकूल आचरण न करें ॥६-७॥ अपि च पवाप्यकामस्य क्रिया काचन नेक्ष्यते । सवें फामवशा लोके सर्व फामस्य चेष्टितन् ॥८॥ विष्ण्वाद्यनुद्यग्रहाचंय किंचित्कामवशादि। तदा तु क्रोधमोहादिक्रमानाशोऽपि शद्यते ॥ ९॥ न कामो विद्यते शभावागतोऽपि स निधुत । अहेतुककृपाहतो कृतो विष्ण्वाद्यनुग्रह ।। १०॥ घशोकृतेन्द्रियो नव पुरुष परिमूयते। जित्या दुरासद काम निष्काम स हि जायते ॥११॥ आप्तकामो भवेदेष बात्मकामन केवल । विमुक्त स पुमाल्लोके भवतीत्यपि सूच्यते ।। १२ ॥ यह भी बात है कि अकाम कोई क्रिया नहीं करता। सभी कामवरा है, सभी चेष्टा कामकी है, तो क्या विष्णु आदिपर शरने जो अनुग्रह किया वह भी किसी स्वार्थकामनासे? यदि एसा ही है, ता फिर काममे क्रोध समोहादिवे क्रमसे नाराकी भी आशका रहती है। इस पर कहा जाता है कि भगवान शपरमे काम नहीं है। उन्होंने आये हुए कामको भी ध्वस्त कर दिया। अतएव विष्णु नादिपर एव समस्त जगत्पर उनका अनुग्रह अहेतुवकृपाप्रयुक्त है । इन्द्रियवशी कभी परिभूत नहीं होता । यह दुई वाणको जीतकर निष्काम होगा। आप्तयाम, होगर श्रात्मकाम, रहेगा । यही पुरुप विमुक्त होता है । यह भी सूचित किया गया है ।।८-१२।। सर्वानभिमपन्तं प पाम निरधुनारप्रभु । उदप्रयोयंता तस्य स्तूयते पात्र मतितः ॥ १३ ॥ सवको अभिभून करनेवाले कामको जिस प्रभुन निधूत विया उमकी नपारपीयंताकी स्तुति भी सभक्ति यहा की जा रही है ।।१३॥

१७२ श्री नियमहिम्नः रसोत्रम [१ असिद्धार्या नेय पयचिदपि सदेगसुरनरे नियतन्ते नित्यं जगात जयिनो यस्य विशिषाः । स पश्यग्रोश स्वामितरसुरसाधारणमभूत स्मरः स्मर्तव्यात्मान हि वशिपु पथ्यः परिभवः ॥१५॥ विजयनील जिसके वाण देय, असुर, नर आदिमें सही भी विफल होगर निवृत्त नही होते यह कामदेव आपको अन्य देवतागोमे समान देसने लगा, परिणाम हुमा यि यह स्मरणावशेष हो गया । उसरो सिद्ध हो गया कि पपी इन्द्रियविजयी महापुरुषोका अनादर हितकारी नही होता है ।। १५॥ ज्योति प्राध्यते कामो मित्ययोगेऽनिशायने । भूनि पा मनस्तदुक्त शान्दियुधिः ॥ १४ ॥ भूमनिन्दामशंसास नित्ययोगेऽतिशायने। सम्बन्धस्तियियक्षायां मर्यात मतुवादयः ॥१५॥ "अमिनो यस्य विशिमाः" यहाँ जय दादसे मतुवर्धमे इन् प्रत्यय है । उसका यहा नित्ययोग, अतिशय या भूमा अर्थ है। बयाकरणाने भूमा, निन्दा, प्रवासा, नित्ययाग, अतिशय, सम्बन्ध और अस्तित्व इनकी विविक्षामें मतुप्, इनि आदि प्रत्ययाको माना है ।। १४-१५ ।। भमत्वं तु चिदपीत्येतेनात्र प्रदर्शितम् । सिदार्या नति तस्य चातिशायममुध्यते ॥ १६ ॥ नित्यमित्युक्तितस्तस्य नित्ययोगो निगद्यते। सदेवेत्यादिना तस्म प्रास्तिश्न प्रतीयते ॥ १७॥ 'क्वचिदपि' से भूमता-व्यापकता बतायी । “असिद्धार्थान से अतिशय जय बताया। 'नित्य" से जयका नित्ययोग बताया। 'सदेवा- सुरनरे" से प्रशस्त जप भी प्रतीत होता है ।। १६-१७ ॥ व्यापकं तस्य साम्राज्य फुण्ठितप्रसरो न सः। कदाचिता पर्वाचदापि नैष तस्य पराजयः ॥१८॥ हतं च हन्ति मदनो वृद्ध व वितुठत्यसो । का रात्रिः किदिनं तस्य का निद्रा जागतिश्न का ॥१९॥ करोति यः प्रतिद्वन्द्व देवो या मानवोऽय वा । समलकापं कंपति पिनष्टि 'प्रणिघर्षति ।।२०।।

स्पन्दवातिकसहितम् १.३ शुष्प्रत्येको दहत्यन्यो जडत्येकोऽभ्रमाम् परः। यायुः किन्वनलः किं नु पृथ्वी किन्वम्युकिं न्वयम् ॥ २१ ॥ कामका माम्राज्य है । उसके प्रसारमें कुन्ठा नही है । कभी कही भी उसकी हार नहीं होती। मरेको भी मारता है, वृद्धको भी बेबस करता है। उसके लिये रात क्या, दिन क्या, नीद क्या, जागृति क्या, सब बराबर है। जो मुकाबला करे वह देव हो, मानव हो उसे मूलसे उसाड देता है. पीस डालता है, घसीटता है । कामसे कोई सूख रहा है, कोई जल रहा है, कोई जड हो रहा है, कोई नेत्रसे पानी बहा रहा है अतएव वह वायु है ? या अग्नि है ? या पृथ्वी है? या जल है ? यह भी कहना कठिन है॥ १८-२१॥ अग्रभागः शिखा येषां विशिष्टा विशिसास्तु ते। विलक्षणास्त्वत्र बोध्या विगता वा स्मरस्य तु ॥ २२॥ विशिख बाणको कहते है। विशिष्ट शिखा-अग्रभाग होनेसे विशिख नाम पड़ा। किन्तु कामबाणमे विलक्षण शिसा या विगतशिक्षा अर्थ समझना होगा ।। २२ ॥ बाणानां पुष्परूपाणां का हि नाम शिक्षा मवेत् । यहवस्तेऽस्य तेनैव बहुत्वोक्तिरिहाञ्जसो ॥ २३ ॥ पुष्परूप वाणोकी क्या नोक होगी ! अतः विगतशिखा अयं उचित है। बाण अनेक होनेसे विशिखाः यह बहुवचन है ।। २३ ।। अरविन्दमशोकं च चूतं च नवमल्लिका । नीलोत्पलं च पश्च ते पञ्चबाणस्य सायकाः ।। २४ ।। अरविन्द, अशोक, आम्र, नवमल्लिका, नीलोत्पल ये पांच कामदेवके बाण हैं ॥ २४॥ प्रमी घाणा निवर्तन्ते प्रहिताः पुष्पधन्वनः । कृतार्था न त्वसिद्धार्था यत्रापि जगतीतले ॥ २५ ॥ सह देवासुरनरवतमाने बलान्वितैः। पशुपक्षिभुजङ्गादिलक्षणे जगतीतले ॥ २६ ॥ कामके ये बाण छोडेनेपर कार्य करके ही निवृत्त होते हैं। बिना कार्य किये नहीं । चाहे जहा भी हो, देव, अगुर, नर एव पशुपक्षीसर्पादियुक्त जगत्मे सर्वत्र सफल ही होते है ।। २५-२६ ।। युक्त तस्य जयित्वं च वजोयस्त्वं च सर्वया। अन्यथा तु कर्यकारं सृष्टिरेषा प्रवतंताम् ।। २७ ॥

१७४. , श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पचदशः सर्वे निवृत्तकामाः स्युभवेयुश्चोवरेतसः । ज्ञानिनस्तत्र मुक्ताः स्युरन्ये लगताः सा ॥ २० ॥ तत्र तत्राजनित्वा चाऽभावा भोगाननेकपा । फर्य कर्मोपशमनं मानुष्यं च कथं भवेत् ॥ २९ ॥ पशुपक्ष्यादिपु ततो युलं कामविजम्मणम् । तथा नरेपुतनो घेउजायन्ता मानवाः कपम् ॥ ३० ॥ ये चानुशायिनो जीवा सन्ति प्रोहियवादिषु । रेत.सिम्योगमाप्यय भवेशेषां समुद्धतिः ॥ ३१ ॥ देयेषु पुण्यक्षपणं कामभोगनियन्धनम् । ततोऽनुशयिनो भूत्वा नरत्वं प्राप्नुपुः सुराः ।। ३२ ।। ब्राह्मी चेन्मानसी सृष्टिा केवलंपा प्रवर्तते । मुध्येरन कतिचिन्माना भवेयुरितरे मवे ॥ ३३ ॥ मानुष्यं प्राप्य पश्चाद्यास्तथा देवासुरादयः। उत्पाथ तनयान्मोक्षमार्गमहन्ति देहिनः ।। ३४ ॥ एव समाचष्ट गोतासु भगवानपि । धर्माविरुद्धो भूतेषु फामोऽस्मि भरतर्षभ ।। ३५ ॥ कुछ अशमे कामदेवकी जयशीलता और बलशालिता उचित भी है। अन्यथा सृष्टि ही कैसे चलेगी? सभी निवृत्तकाम होकर उर्ध्वरेता बनेंगे तो उनमे ज्ञानी मुक्त होंगे, बाकी ससार लयमे पड़े रहेगे । पशुपक्षी आदिमे. जन्म न रेनेपर कर्मशान्ति मे होगी ? मानवजन्म बादमे कैसे प्राप्त होगा? अत पशुपक्षी आदिमे कामप्रसार उचित ही है। और मनुष्यमै काम न हो तो गनु-ससे मनुष्य कैसे पैदा होगे। अनुशयी जीव व्रीहिंयवादिसे तभी ऊपर जाते है जब रेत से काका योग प्राप्त होता है ऐसा ब्रह्मसूत्रमे कहा है। देवताओका धर्मक्षय कामोपभोगसे होगा। तब वे अनुशयी होकर मानव बनेंगे। यदि ब्रह्माकी मानसी सृष्टि ही चलती होती तो थोडेसे जीवात्मा मुक्त होते वाकी भवमागरमे डूबे पड़े रहते । अत देव, पशु आदि सभी मानवजन्म पाकर पुनोत्पादन कर मोक्षमार्गी हो, यही युक्त है। अतएव धर्मसे अविरुद्ध कामको गीतामे भगवान ने अपना रूप कहा ।। २७-३५॥ युक्तमेतापदवधि पञ्चधन्वन'। धर्माविरुद्धमश स किन्तुल्लघ्याऽप्रतोऽययत् ।। ३६ ॥ ज्ञात्वापि तदिद नैन परामावयितुं नराः । प्रामयन् यत्नवन्तोऽपितया चाहयान्तिकामिनः ॥ ३७॥ अत प्रयन

शोक:].
तत्तः
स्पन्दवातिकसहितम्
१७५
पेदशास्त्रपुराणानि यदि सत्यानि भामिनि ।
आवयोस्तहि संयोगः कुम्भोगके भविष्यति ॥ ३८॥
कि चास्तु मानवोत्पत्तिः कामादेवेति निश्चयः ।
मवन्तु पञ्चषाः पुत्राः शेषमोगस्तु किफलः ॥ ३९ ॥
अपुत्रजननो भोगो बन्धनकनिबन्धनम् ।
तस्पौचित्यं समयेत कामिमिः केवलं नभिः॥४०॥
निजायुषि च तावन्तः पञ्चपामिहि रात्रिमिः।
संपद्यन्ने • ततोऽन्यासु मृत्योराह्वयनं हि तत् ॥ ४१ ।।
अपाघ्नन् ब्रह्मतर्येण मृत्युमित्पग्रवीच्छ तिः।
ब्रह्मचर्येण विन्दन्ति ब्रह्मलोकमितीतरा ॥ ४२ ॥
रक्षणीय सर्वह्मवयं प्रयत्नतः ।
किन्तु कामो दुरन्तोऽयं लोकानां तदसुलूप्त् ॥ ४३ ॥
परन्तु यहांतक तो ठीक है-धर्माविरुद्ध स्वीयवारगमनपर्यन्त
उचित है, किन्तु धर्माविरुद्ध अंशको लांघकर काम आगे बढा । जानते हुए
भी लोग उसको पराभूत नहीं कर सके । कामियोका वचन है-( जारस्त्रीके
प्रति ) हे भामिनि शास्त्र यदि सत्य है तो अब हम दोनोका संयोग कुभी-
पाक नरकमें होगा । ( क्योकि राजा प्राणदण्ड देनेवाला है। ) अन्य भी
बात है-माना कि मानवजन्म कामसे होता है । अतः काम प्रशस्त है । परन्तु
एक मनुष्यके पांच छ ही तो पुत्र होते है । उसके लिये जीवनमे आगे-पीछे
छः रात्रियोंमें ही तो कामसेवन आवश्यक है। उससे अतिरिक्त धर्माविरुद्ध
कहलानेवाले कामका भी क्या प्रयोजन है ? बम, मृत्युको आमन्त्रण देना।
श्रुति कहती है--ब्रह्मवयंसे ज्ञानी देवोने मृत्युको मार हटाया। दूसरी श्रुति
कहती है- ब्रह्मचर्यसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। अतः ब्रह्मचर्यपालन
परमधर्म है। ( मृत्युका आमन्त्रक धर्म है या अधर्म स्वय विचार करें)
किन्तु यह काम ऐमा है कि उसने लोगोके ब्रह्मचर्य धनको तो लूट
ही लिया ॥ ३६-४३ ॥
तस्याभिमानो ववृधोऽधर्म लोकानयूयुजत् ।
क्लिश्नतामाखमारिफ्लेशं वीक्ष्य हरानसौ ॥४४॥
विमानयायिनां सर्व नीचर्दश्यं समं पया।
प्रासादो या कुटिर या तर्या तृणमेय या॥४५॥
तमा कामोऽपि सबलं समं दभ्रमयक्षत।
मसुरं था पन्नगं वा नर वा देवमेय वा ॥ ४६॥

हरम् । १७६ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पदा अविधेकोऽयमस्यामूवधिमूल्यो यवर्थतः। समर्पणीयाः सं नाताः प्राणा मूल्यात्मनेकदा ॥ ४ ॥ भवक्षिप्टायमितरदेवसाधारणं स्मर्तव्यात्मामवत्तेनाऽपध्यो पशिपु पिता ॥४८॥ कामफा कहीं प्रतिरोध नहीं हो रहा था। परिणाम यह हुआ कि उसका अभिमान बढ़ा। अधर्ममें लोगोंको जोडने लगा। विल्लीचूहेकी जैमी दशा देखकर उसे आनन्द आने लगा । जैसे विमानमें जानेवाले नीचेकी वस्तु एक बराबर देखते हैं चाहे वह महल हो. झोंपड़ो हो. वृक्ष हो या तृण हो वैसे काम भी अमुर, पन्नग, नर, देव सबको एकबराबर तुच्छ देखने लगा। उमका यह अविवेक एकबार महंगा पड़ा, मूल्यरूप प्राण देना पड़ा । उसने शंकरको अन्य देवके समान देखा और स्मरणावशेष हो गया। महापुरुषोंके सामने दर्प करना पथ्य नहीं है ॥ ४४-४८॥ सुवारणं तपस्तेपे ब्रह्मणस्तारकासुरः। ययाऽभरतां सोऽपि प्रसने हंसवाहने । ४९ ॥ . निमित्तमृत्युतां हि न मत्यंस्य हमत्यंता। इत्युक्तस्तारको मृत्युवञ्चन समचिन्तयत् ।। ५०॥ विरक्तः शङ्करो नास्य पुत्रसंभावना ततः। तत्पुत्रान्मरणं वचमीत्येवमेव स कं जगी।॥५१॥ . लब्ध्वा वरं त्रिभूवनं विजिग्ये तारकासुरः। स्वर्गादेवानपास्यत् स ते चारण्येषु बभ्रमुः॥५२॥ चिक्लिशुश्च सहलाम्दमशक्तास्तत्परासने। शंभूतनयादवृष्ट्वा वधफारिणम् ॥५३॥ कथं स्याच्छंफरमुतः सतो नष्टास्य वल्लमा। नान्यां विरक्तो घृणुते तपस्तपति दारुणम् । ५४॥ तारकासुरने ब्रह्माको घोर तपस्या की। ब्रह्मा प्रसन्न हुए, और वरदान। मांगने कहा, तो उनसे अमरताका वरदान मागा। मर्त्य कभी अमर नहीं हो सकता, अत. निमित्तमृत्यु मांगो कहनेपर तारक मृत्युसे बचनेका उपाय सोचने लगा। शकर भगवान विरक्त हैं। उनके पुत्रको सम्भावना नहीं। उनके पुत्रसे मरण होनेका वर मागूगा तो वच जाऊँगा। ऐसा निश्चय कर वही वरदान मांगा । उसे पाकर उसने त्रिभुवनको जीता। स्वर्गसे देवताओं- को हटाया। देवता जंगलोंमें भटकने लगे। तारकासुर को पराभूत करनेमें असमय होनेसे बड़ा क्लेश उन्होंने पाया। देवताओ ने सोचा-शंकरपुत्रसे अन्यत्र श्लोक ] स्पन्दवातिनमहितम् १७७ अन्य कोई इसे मार नही सकता। पर शकरका पुत्र कैसे हो? उनको प्रियपत्नी सनी तो जल मरी 1 गरी किसीसे ये विवाह नहीं करते । घोर तपश्चर्यामे लगे हुए हैं ।। ४९ ५४ ।। स पश्यन्० अस्त्युत्तरस्या हि विशि देवतात्मा हिमालय । प्रासादोऽप्यस्य तव मानवाफारवर्मण ॥५५॥ तस्य मेना मगवतो वर्ततेऽर्धाङ्गिनी शुमा। जाता तद्गर्भत पूर्वसती सप्रति पार्वती ॥५६॥ वरोष्यति हरोऽनन्यस्पो ता यदि यत्यत । इत्याहूय सुरा काम तत्कार्याय समादिशन् ॥ ५७ ।। कामस्तु सान्त्ययनाह पुरुहूत सुरानपि । मा चिन्तामिद कात्त्विम्ह सर्वजगत्प्रभु ॥ ५८॥ स्मामफापमहल्याय' जार स्मरसि सम्म पिम् । पितामह विधातार तनयामन्यधावया॥५९।। तुलसीजारमपि नारायणमफल्मषम् । समागमयमिन्दु च गुरुपत्नीमह बलात् ।। ६० ॥ को ब्रह्मा पश्च वैकुण्ठ के देवा के च मानवा । अवशिष्ट शङ्करोऽय को वा मदवाणसन्निधौ ॥६१ ॥ उत्तरदिशामे देवतास्वरुप हिमा ठय विद्यमान है । मानवाकारशरीर धारी उस हिमालयका महल भी हिमाग्यपवतम ही है। उनकी अर्धाङ्गिनी मेनाकी पुत्री पावती पूर्वज मनी पती ही है । सतीस्वस्प होनेसे यदि प्रयास करे तो शकर पावतीमे विवाह कर सकते है। ऐसा साचवर देवता और इन्द्रनै कामदेवको बुलाकर उस कायक लिये आदेश दिया। कामदेवन सात्वना देते हुए कहा है इन्द्र आपचिता न करें । मै सारे जगता प्रभु हू मैंने आप ( इद्र) को अहल्यामार बनाया । ब्रह्माको अपनी पुत्रीके पीछ दौडाया। नारायणको तुलसीका जार बनाया। चद्रको गुरुपत्नीगमन कराया। मेरे वाणके सामन ब्रह्मा कौन विष्णु कौन ? यौन मनुष्य कौन देवना? एक अवशिष्ट शकर रह गय ( । य भी मर वाणरे सामन कौन हैं ? ॥ ५५-६१॥ अन्येारदोऽगच्चढिमालयगहे मुनि । पूजयामासतुर्मनाहिमाद्री दम्पती मुदा ।। ६२॥ १२ ।

सेवया हरः।
१७८
थी शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[पञ्चदशः
अपि पाणमयरसुत्रीमाय शुमहेतवे।
नारदो लक्षणं योक्य जगाद गिरिभूपतिम् ॥ ६३ ॥
अस्याः पतिस्तु भविता शङ्करो यस्यपस्पति ।
स्पताज्ये निवसन् पूर्वसतों जानीहि घारमजाम् ।। ६४ ॥
सेवतामियमोशानं प्रसन्न
वरोष्यतोमा नोपायोऽस्त्यन्यस्तस्मिस्तपस्यति ॥६५॥
एकदिन नारदली हिमालय गृहमे गये । मेना और हिमालयने उनकी
पूजाकी और अपनी पुत्रीको बुलाकर नमस्कार करवाया। नारदजीने
लक्षण देखकर कहा-इसका पति तो तपस्वी शंकर ही होंगे, जो आपके
देशमे रह रहे है । यह आपकी पुत्री पूर्वजन्मकी सती है। यह शकरकी
सेवा करे तो उमसे प्रसन्न होकर वे इसका पाणिग्रहण करेंगे। तपस्यारत
शकरके विषय मे अन्य कोई उपाय नहीं है ।। ६२-६५ ।।
निर्गते नारवे भूपः सह पुण्यागमद्धरम् ।
न्यवेदयच्च सेवाय जगाव
घ हरस्तदा।। ६६ ।।
आगन्तव्यं प्रतिदिन कतुं सेवा हिमालय ।
एषा योषा न चानेया भवानेकः समेतु माम् ॥ ६७ ॥
नारदजीके जानेके बाद हिमालय पुत्रीके साथ शंकरके पास गये और
सेवार्थ निवेदन किया। शकर बोले हे हिमालय ! सेवार्थ आप प्रतिदिन
आवे । किन्तु इस नारीको साथमे न लावे।आप अकेले आया करे ॥६६-६७।।
पार्वती-कि नास्त्यात्मा स्त्रियां देव सेवायोग्या न कि वधूः।
पापयोनिरुतस्त्री स्यात् कि निषिध्यप्तिमा प्रभो॥ ६८॥
पार्वती बोली हे देव ! क्या स्त्रियोमे यात्मा नहीं होता? या स्त्री
सेवायोग्य नहीं होती? अथवा स्त्री पापयोनि होती है ? हे प्रभो आप क्यो
मेरा निषेध करते हैं ।। ६८ ॥
शङ्कर:-अस्त्यात्या योग्यता चास्तिन स्त्रिया:पापमोनिता।
तथापि न स्त्रियो योगो युज्यते हि तपस्विनः ।। ६९ ।।
शकर बोले स्त्रीमे आत्मा है, योग्यता भी है और स्त्री पापयोनि
नही है। फिर भी तपस्वियोकालये स्त्रियोका सम्पक युक्त नहीं होता ।।६९।।
पार्वतो-केयं समदशः स्त्रीपमिदा हिं भवतोऽनय ।
कुतः सोमनां भीतिरवलाभ्यो भवादृशाम् ॥ ७० ॥

श्लोकः]
स्पन्दवातिकसहितम्
१७९
प्रमत्तस्य वनेऽपि स्याद् मयं तु सहषडिपोः ।
जितात्मनस्तु सांनिध्य स्त्रियाःकिनु करिष्यति ॥ १॥
एकान्तःकामिनां शान्तोऽप्यतिकामस्य कारणम् ।
अनेकान्तोऽपि यमिनां भवेन्मोक्षस्य कारणम् ॥७२॥
किं न पुण्यं लभेयाहं भवत्सेवापरायणा।
दोनोद्धरणदक्षस्य निरनुक्रोशता कुतः॥ ७३
पार्वती कहने लगी समदर्शी आपकी दृष्टिमे यह स्त्रीपुरुष भेदबुद्धि
कैसी? आप जैसे सयमियोको स्त्रियोंसे भय क्यो होने लगा ? प्रमादीको
वनमे भी भय होता है । क्योकि क शत्रु साथमे हैं । किन्तु जितात्माका
स्त्रीसानिध्य क्या विगाडेगा? कामियोके लिये एकान्त अतिकाम का
कारण होता है। किन्तु सयमीके लिये अनेकान्त भी मोक्षकारण होता है।
आपकी सेवाकर मैं भी पुण्यको भागी क्यो न बनूं ? दीनोद्धार करनेवाले
आपके मनमे यह निरनुकम्पा क्यो हो रही है। ।। ७०-७३ ॥
शंकर :-प्रायाहि तहि त्वमपि सेवित देवि मा खिद.।
यथाकाल तथैवास्तु भद्र ते धरणिनि ॥ ७४ ॥
शकर भगवानने कहा -ऐसा है तो तुम
'यथा काल सेवा करने
आओ। खेद न करो। हे देवि तुम्हारा मगल हो ।। ७४ ॥
संवाद
एवमवृनत्
पार्वतोपरमेशयोः।
प्रत्यहं समुपायाति सा च सेवापरायणा ॥ ७५ ॥
इस प्रकार पार्वती और शकरका सवाद हुआ। सेवापरायण पार्वती
अब प्रतिदिन सेवार्थ आती है ।। ७५ ॥
अथ कामो वसन्तेन सख्या सह समागतः ।
शोर्णानि जीर्णपत्राणि मजयंस्तरुषुदगुः ॥ ७६ ।।
कुसुमानि प्रफुल्लानि ववौ मलयमारतः ।
मदनो मार्गणान स्वीयान प्राहिणोच्च शनैः शने ॥ ७७॥
अब कामदेव ससा बसन्तये साथ धीरे धीरे पहुचा । जीर्ण पत्र पेडोसे
गिरने लगे। नये कोपल आने लग। फूल सिलन लग। मलयानिल चलने
लगा। कामदेव अपने वाण धीरे-धीरे छोड़ने लगा ॥ ७६-७७ ।।
सर्वेऽपि मुनयस्तत्र
काममार्गणविह्वला.
त्यक्त्या तप.प्रधावन्ति विग्नाःसीमन्तिनारमि॥७८॥

१७८
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पञ्चदशः
प्राणमयरपुत्रीमाहूय शुभहेतवे।
नारदो लक्षणं वीक्ष्य जगाद गिरिभूपतिम् ।। ६३ ।।
अस्याः पतिस्तु मयिता शङ्करो यस्यपस्यति ।
स्यद्वाज्ये निवसन पूर्वसती जानीहि चारमजाम् ॥ ६४ ॥
सेवतामियमोशानं प्रसन्नः सेवया
वरीप्यतीमां नोपायोऽस्त्यन्यस्तस्मिस्तपस्पति ।। ६५ ।।
एकदिन नारदजी हिमालय गृहमें गये । मेना और हिमालयने उनकी
पूजाकी और अपनी पुनीको बुलाकर नमस्कार करवाया। नारदजोने
लक्षण देखकर कहा-इसका पति तो तपस्वी शंकर ही होंगे, जो आपके
देशमें रह रहे हैं। यह आपकी पुनी पूर्वजन्मकी सती है। यह शंकरकी
सेवा करे तो उससे प्रसन्न होकर वे इसका पाणिग्रहण करेंगे। तपस्यारत
शंकरके विषयमे अन्य कोई उपाय नही है ।। ६२-६५ ।।
निगते नारदे भूपः सह पुश्याऽगमद्धरम् ।
प्रवेदयच्च सेवाय जगाव
च हरस्तदा ।। ६६ ॥
आगन्तव्यं प्रतिदिनं कर्तु सेवां हिमालय ।
एपा योषा न चानेया भवानेकः समेतु माम् ॥ ६॥
नारदजीके जाने के बाद हिमालय पुत्रीके साथ शंकरके पास गये और
सेवार्थ निवेदन किया। शंकर बोले हे हिमालय ! सेवार्थ आप प्रतिदिन
आवे । किन्तु इस नारीको साथमें न लावे। आप अकेले आया करें॥६६-६७।।
पार्वती-कि नास्त्यात्मा स्त्रियां देव सेवायोग्या न कि वधूः।
पापयोनिरुत स्त्री स्यात् कि निषिध्यसि मां प्रभो ।। ६८॥
पार्वती बोली हे देव ! क्या स्त्रियोंमे आत्मा नहीं होता? या स्त्री
सेवायोग्य नही होती ? अथवा स्त्री पापयोनि होती है ? हे प्रभो आप क्यो
मेरा निषेध करते हैं ।। ६८॥
शङ्करः-अस्त्यात्या योग्यता चास्तिन स्त्रिया:पापयोनिता।
तथापि न स्त्रियो योगो युज्यते हि तपस्विनः ।। ६९ ॥
शकर बोले स्त्रीमे आत्मा है, योग्यता भी है और स्त्री पापयोनि
नही है। फिर भी तपस्वियोम लिये स्त्रियोका सम्पर्क युक्त नही होता ।।६९।।
पार्वतो-फेयं समदृशः स्त्रीमिदा हि भवतोऽनघ ।
कुतः सामना भीतिरबलान्यो मवाहशाम् ॥ ७० ॥

?
श्लोकः]
स्पन्दवातिकसहितम्
१७९
प्रमत्तस्य बनेऽपि स्याद् भयं तु सहपडिपोः ।
जितात्मनस्तु सांनिध्य स्त्रियाः किं नु करिष्यति ॥ १ ॥
एकान्तः कामिनां शान्तोऽप्यतिकामस्य कारणम् ।
अनेकान्तोऽपि यमिनां भवेन्मोक्षस्य कारणम् ॥७२॥
किं न पुण्यं लभेयाहं भवत्सेवापरायणा।
दोनोद्धरणवक्षस्य निरनुक्रोशता
फुतः॥७३॥
पार्वती कहने लगी समदर्शी आपको दृष्टिमे यह स्त्रीपुरुष भेदबुद्धि
कैसी? आप जैसे सयमियोको स्त्रियोंसे भय क्यो होने लगा ? प्रमादीको
वनमे भी भय होता है । क्योकि क शत्रु साथमे हैं । किन्तु जितात्माका
स्त्रीसानिध्य क्या विगाडेगा? कामियोके लिये एकान्त अतिकाम का
कारण होता है। किन्तु सयमीके लिये अनेकान्त भी मोक्षकारण होता है।
आपकी सेवाकर मैं भी पुण्यकी भागी क्यो न बनूं ? दीनोद्धार करनेवाले
आपके मनमे यह निरनुकम्पा क्यो हो रही है । ॥७०-७३ ।।
शंकर :-प्रायाहि तहि त्वमपि सेवितुं देवि मा खिद.।
यथाकाल तथवास्तु भद्र ते घरणिनि ॥७४॥
शकर भगवानने कहा-ऐसा है तो तुम यथा काल सेवा करने
आओ । खेद न करो। हे देवि तुम्हारा मगल हो ।। ७४ ।।
संवाद
एवमवृनत्
पार्यतीपरमेशयोः।
प्रत्यहं समुपायाति सा च सेवापरायणा ॥ ७५ ॥
इस प्रकार पार्वती और गकरका मवाद हुआ । सेवापरायण पार्वती
अब प्रतिदिन सेवार्थ आती है ।। ७५ ।।
अय कामो वसन्तेन सख्या सह समागत.।
शीर्णानि जीर्णपाणि मञ्जर्यस्तरुपूदगुः ॥७६ ॥
कुसमानि प्रफुल्लानि ववौ मलयमारतः।
मदनो मागंणान स्वीयान प्राहिणोच्च शनैःशन ॥७७॥
अब कामदेव सखा बसन्तके साथ धीरे धीरे पहुचा । जीर्ण पत्र पेडोसे
गिरने लगे। नये कोपल आने लग । फूल सिलने लगे। मलयानिल चलने
लगा। कामदेव अपने बाण धीरे-धीरे छोडने लगा ।। ७६-७७ ।।
सर्वेऽपि मुनयस्तत्र
काममार्गणविह्वला.।
त्यक्त्या तप. प्रधावन्ति विग्नाःसीमन्तिनारमि॥७८॥

१८० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पञ्चदशः मृगा मृगीमिः संयुज्य यान्ति तिष्ठन्ति शेरते । हुप्यन्यन्योन्यसश्लिष्टा पतगभ्रमरादयः॥७९॥ कान्ति कोषिताः साधु नत्यन्ति म यहिणः । प्राप्यायर्यादवाङ्गानि शम्भोः सुरमिमारुतः।। ८० ॥ कामदेवके वाणोंसे विद्ध होकर सभी ऋषिमुनि तप छोड कर पलि- योकी खोजमे भागने लगे मृग । मृगियोसे सटकर चल रहे हैं, सड़े हो रहे हैं, लेट रहे हैं । परस्पर जुड़कर पक्षी भ्रमरादि दृष्ट हो रहे हैं। कोयल कूज रही है । गयूर नाच रहे है । सुगन्धित पवन शकरजीके अगोको आप्यापित कर रहा है ।। ७८-८०॥ किमेतदिति ने म समुन्मोत्यायलोकते। सायच्च प्राहिणोन पञ्च बाणानेकशः स्मरः ॥ ८॥ यह क्या हो रहा है-शकरजी नेत्र खोलकर देखने लगे। इनमे एक-एककर पाच बाणोको कामदेवने छोहा ।। ८१ ।। सभाव समलोकिष्ट वामदेवं नागात्मजा। अकालिक विलोक्येदाखल विस्मितो हरः ॥ ८२॥ परितः पर्यचष्टेशस्तावत्पश्वशरः शरान् । पश्चापि युगयत् पौष्पे समधानुषि द्रुतम् ॥ ८३ ॥ उन्मादनं तापनं च शोधणं स्तम्भनं तथा । समोहनं च पश्चापि समधत्तंकदा शरान ॥ ८४ ॥ तादृशे दुविनीताय पावस्थाय महेश्वरः । चुक्रोध भगवान् नेत्रं तृतीयं चोदमोलयत ॥८५॥ चुकुशुर्दवता क्रोध प्रमो सहर संहर । तावमस्मावशेष स नेत्रोत्याग्निः स्मरं व्यधात् ।। ८६ ॥ भावके साथ पार्वती शकरको देखने लगी। असमय इन सबको देसकर शकर विस्मित हुए। चारो ओर देखने लगे। तबतक कामदेवने एकसाथ पाच बाणोको पुष्पधनुपपर चढाया। उन्मादन, तापन, शोपण, स्तभन, समोहन इन पाचो बाणोको एकसाथ सधान किया। बगलमे इस प्रकार अविनय कर रहे कामदेवके प्रति शकरजीका क्रोध उमड गया और उन्होने अपना तीसरा नेत्र खोला। देवसा घबराकर आक्रोश करने लगे- प्रभो। क्रोध न करो, क्रोध न करो। लेकिन तबतक उस नेयोन्पन्न अग्निने कामदेव को भस्मावशेष कर दिया । ८२-८६ ॥

शोकः]
स्पन्दवार्तिकसहितम्
१८१
यनं सर्वमभूत् स्तब्ध मूच्छित्वा पतिता शिवा ।
नौरवं तदमूत् स्थानं शंकरश्न विमिर्गतः ॥८७॥
न वै परिभवः पय्यः वशिष्यद्धा जितात्मसु ।
भगवत्यास्तपस्यां तु वक्ष्यामोऽग्ने तदादिमाम् ॥ ८८॥
पूरा बन स्तब्ध हो गया । पार्वती मूर्छिन हो गिर पडी। वह स्थान
नीरव हो गया। और शकर भी यहासे निकलकर चले गये । जितात्मा
इन्द्रियविजयियोका परिभव हितकारी नहीं होता। भगवती पार्वतीकी
तपस्याके बारेमे, जो एक अभूतपूर्व (मर्वप्रथम ) है हम आगे वर्णन
करेंगे ।। ८७-८८॥
देवदेवाय
कन्दपंदविध्वंसधारिणे।
त्रिलोचनाय शान्तायाप्युग्राय पशिने नमः ॥ ८९ ।
इतरसुरसाधारण नहीं किन्तु जो देवोके भी देव है, जो कामदेव
दर्पको नष्ट करनेवाले हैं, क्योंकि ज्ञानरूपी तृतीयनेत्र सहित हैं, अतएव
त्रिलोचन हैं, तपस्यापरायण होनेसे शान्त होनेपर भी अपराधियोके प्रति
उग्र भी हैं, मूलत वशी जितेन्द्रिय है उन त्रिलोचन उग्र शङ्करको हम प्रणाम
करते है ।।८९॥
इति श्रीकाशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतो।
महिम्नःस्तोत्रविवृतो स्पन्दः पञ्चदशो गतः॥१५॥
षोडशः श्लोकः
समूलोन्मूलमं किं नु जगतोऽस्य चिकीपितम ।
दपक दहतः शंमोमवं तत्परिरक्षणम् ॥१॥
असकुचत्प्रसारे हि मर्यानां पुष्पधन्वनः ।
वणसांकयंतः सर्या लुप्येग्न वैदिकक्रिया ॥२॥
जगद्रक्षणमेवातो धर्मकर्मव्यवस्थितेः।
अभीष्टं गिरिजाजानेरिस्पेतद्विदुषां मतम् ॥ ३ ॥

१८२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पोडशः निगूढमेयमाफूर्त ताण्डयेऽपि विलोकितम् । • जगद्रक्षोकदोक्षस्य ताण्डवं प्रस्तवीत्यतः॥४॥ कामदेव प्राणिजन्मका मूल है। उसे जलानेमे शङ्कारका क्या आशय? क्या जगतका समूल नाश करना? नहीं । जगतकी रक्षा करना ही शङ्करको अभीष्ट है। कामदेवका स्वच्छन्द प्रसार यदि होने लगा तो वर्णसाकर्य होने लगेगा और समस्त वैदिक क्रिया ध्वस्त होगी। कामनियन्त्रणसे धर्मव्यवस्था एवं कर्मव्यवस्था होगी। फल जगतकी रक्षा ही है। अन्यथा पार्वतीके साथ विवाह ( और उस समय कामदेवको वरदानादि) कैसे सगत होता, यही विद्वानोंका मत है। शङ्करजीका यह निगूढ रहस्याभिप्राय ताण्डवमे भी देखनेमे आता है। ताण्डव तो बाहरसे ऐसा लगता था कि प्रलय उपस्थित हो गया। किन्तु उसका आन्तरिक रहस्य जगतरक्षा ही था । अतएव पुष्प दन्ताचार्य अब ताण्डवनृत्यको प्रस्तुत कर रहे है ॥ १-४ ।। प्रतीपतिनां दण्डं साफल्यं चानुवर्तिनाम् । एतावतोपत्वा तस्याय जगद्रक्षणमीयते ॥५॥ सुप्रसन्नो यदा लोकस्तदा नृत्यति गायति । घ सुप्रसन्नत्वं जगदक्षिरिङ्गयते ॥६॥ अण्डसृष्टिस्थितिलयकार्य तस्य महेशितुः। स्थूलसृष्टपादि धात्रादेर्गुणभिन्नतनुस्थिते. ॥७॥ अण्डोध्वं तस्य रक्षा तु स्वकार्यावनतः स्वतः। संहारस्त्वन्तकालेऽतो रुद्रो रिक्त इवाधुना ॥८॥ कृतकार्य: सुप्रसन्नो महेशानो विशेषतः । कुरुते ताण्डवं नत्यं जगद्रक्षाविधानतः॥९॥ प्रतीपचलनेवालोको कामदेवोदाहरणसे दण्डदाता और अनुवतियोको ब्रह्मादि उदाहरणसे सुफलदाता शङ्करको यतिक निरूपित किया । अब शङ्करको जगत रक्षणकर्ता बताने जा रहे है। लोकमें देखा गया है कि जब लोग खूब प्रसन्न होते हैं तब नाचने गाने लगते हैं। जगद्रक्षणहेतु नृत्यादिसे शङ्करकी सुप्रसन्नता सूचित होती है । अण्डसृप्टिस्थितिलय ये शङ्करके कार्य हैं। क्योकि ब्रह्माण्ड उत्पन्न हो तब उसमे ब्रह्माविष्णुरुद्र प्रकट हो। हां, अण्डमृप्टिके बाद लोकादिकी मृष्टि, रक्षा एवं सहार रजोगुण, अत्त्वगुण और तमोगुण युक्त शरीरस्थित ब्रह्माविष्णुरुद्र करेंगे। अतः अण्डोतर सृष्टि आदिका प्रयत्न शङ्करको करना नहीं है । अण्डसृष्टि तो हो गयी। अब मङ्करजीका क्या काम रहा। क्योकि सहार प्रलयकाल आनेपर करना तथा लोक:] स्सन्दवातिकसहितम् १८३ है । यह कहें कि अण्डकी रक्षा करने का काम है। नहीं। अण्डरक्षण तो स्वय होगा। उस अण्डसे प्रकट भूरादिलोकरक्षा होती रहेगी तो अण्डरक्षा भी होगी। तन्तु जल जाय और कपडा सुरक्षित हो ऐसा नहीं होता। अत पाकरजी तो इस ममयमे जो करना है उसमे कृतकार्य होनेसे साली बैठे हैं। कार्य कुछ है नही, प्रसन्नावस्था भी है। तब नाचेंगे नहीं तो क्या करेंगे। हाँ, अण्डरक्षामे प्रयोजक भूरादि कार्यलोकरक्षामे ध्यान जरूर देना चाहिये। परन्तु वह तो इस ताण्डवनृत्य से ही सम्पन्न होगी। जगदक्षणार्थ उम ताण्डवनृत्यका अब वर्णन कर रहे हैं । ५-९॥ महीपादाघाताद् प्रजति सहसा संशयपदं पदं विष्णोर्धाम्यद्भुजपरिघरग्णग्रहगणम् । मुहधास्थ्य यात्यनिभृतजटाताडिततटा जगतक्षाय त्व नटसि ननु वामेव विभुता ।।१६।। ताण्डवमे पैरोकी ठोकरोसे पृथिवी कही फट न जाय ऐसा सराय होने लगता है। घूमते हुए भुजास्पी परिघसे टूटत हुए ग्रहगणयुक्त अन्त- रिक्षकी भी वही स्थिति होने लगती है। सुली जटाके तटताडनसे स्वर्लोन भी बुरी स्थितिको प्राप्त होने लगता है । लगता है सर्वध्वस होगा। किन्तु जगदक्षणार्थ इम प्रकार शङ्करका नृत्य हो रहा है। भगवानकी लीला विलक्षण होती है।॥ १६ ॥ नटसि नटसीति हि सामान्यपदं नाट्यकृदर्थकम् । तौयंत्रिकं नत्यगीतवाद्यं नाटपमिद नयम् ॥ १० ॥ चतुर्थपादमे 'नटसि' ऐमा सामान्य पद आया है। "नटस्यद नाट्य नाट्य करनेवाला ऐसा उसका अर्थ होगा। कोशमे बताया है नृत्य, गीत, वाद्य ये तीन नाटयपदार्थ हैं ।। १०॥ देवरुच्या प्रतीतो यस्तालमानरसाधयः। सविलासोऽङ्गविक्षेपो नत्यमित्युच्यते बुधः॥११॥ ताण्डवं च तथा सास्य विविध नृत्यमुच्यते । पेवलिबहुरूपं च द्विविध मतम् ॥१२॥ अङ्गविक्षेपबाहुल्यं तथामिनयशून्यता। पत्र सा पेलिस्तस्याः कदाचिदुपयोगिता ॥ १३ ॥ ताण्डव १८४ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पोडशः यत्र छेवनं भवनं बहुरूपा मुसावलो। ताण्डवं पहुरूपं तद् वारुणागलमुद्धतम् ॥ १४ ॥ छरितं योयतं चेति लास्यं द्विविधमीरितम् । आधे भावाधिवहलं लीलादिबहुलं परम् ।। १५ ।। देवरुचिसे प्रतीत; ताल, मान एवं रसका आश्रय; विलाससहित अंगविक्षेप नृत्य कहालता हैं । नृत्य दो प्रकारका है। एक ताण्डव और दूसग लास्य । ताण्डव भी पेवलि और बहुरूपभेदसे दो प्रकार का है। अंगविक्षेप अधिक हो, अभिनय न हो तो पेवलि ताण्डव है। कभी उसका उपयोग होता है। छेदन भेदन जहां हो, नानामुखाकृति हो वह बहुरूप ताण्डव है। लास्य भी छुरित यौवतभेदसे दो है। भावादि अधिक हो तो छुरित और लीला अधिक हो तो यौवत है ।। ११-१५ । शंफरस्ताण्डवं नत्यं परोति द्विविधं स्फुटम् । लास्यं तु पार्वती फुर्याचदा प्रेरयतीश्वरः ॥ १६ ॥ भगवान शंकर दोनो प्रकारका ताण्डव नृत्य करते है। और पार्वती शकर ईशारा करते है तो लास्य करती है ॥ १६ ॥ यदि वा मटसीत्येतन्नृत्यमानार्थकं भवेत् । तथापि गीतवाद्यादिरदर्थोऽन लभ्यते ।।१७।। यादुत्तिष्ठते वाद्यं वाद्यावृत्तिष्ठते लयः । लयतालसमारब्धं ततो नृत्यं प्रवर्तते ॥१८॥ इति गान्धर्वशास्त्रेषु स्पष्टमेव समोरितम् । गोतावाचादिकं तस्मान्नत्यादेवाच लभ्यते ॥१९॥ यदि 'नटसि' का नृत्यसि' 'नृत्य करते हो' इतना ही अर्थ है, नाट्य अर्थ नहीं है ऐसा कहोगे तो भी गीतवाद्यादिका लाभ नृत्य कहने से ही होगा। क्योंकि गान्धर्वशास्त्रमे कहा है--गेयसे वाद्य उठता है। वाद्यसे लय होता है। लय और तालसे प्रारभकर नृत्य होता है ।। १७-१९ ।। सौन्यं रौद्रमिति द्वधा ताण्डवं बुधसंमतम् । विलम्बितं द्रुतं चैव गीतं द्वधा यया भवेत् ॥ २० ॥ दाण्डरासादिके चैतल्लोकेप्यपि विलोक्यते । विलम्बिसोम्ये प्रारम्भ द्रुतरोद्रे तथान्ततः ॥२१॥ ताण्डवे सौम्यरौद्र द्वे रूपे चेशस्य संमते। प्रथमं सौम्पत्पं स्याद् विराड़, पं तथान्ततः ॥ २२ ।।

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् १८५ महीपादेति पधेऽस्मिन् विराडरूपं निरूपितम् । सौम्योपलक्षणं तच्च सौम्यपूर्ववनिश्चयात् ॥ २३ ॥ गीतवाद्यादिपूर्वत्वं नृत्यस्येति ,प्रदशितम । नत्यवर्णनतश्चान तदप्यतोपतक्ष्यताम् ॥ २४ ॥ स्थूलं च सूक्ष्मपूर्व स्यादतस्तच्चोपलक्ष्यते । परा वाक् च परिस्पन्दधोनयं गीतनत्यवत् ॥ २५ ॥ आरभ्येते गोतनत्ये सूक्ष्पसूचनपूर्वकम् । तानस्वरेण सर्वन मन्दस्पन्देन लौफिक ॥२६॥ ताण्डव सौम्य तथा रौद्रभेदसे दो प्रकार है। जैसे गीत विलम्बित और द्रुत भेदसे द्विधा होता है । दाडिया रासादिमे यह लोकमे भी देखने में आता है। प्रारभमे गीत विलम्बिन होगा और नृत्य सौम्य होगा। आखिर आखिरमे गीत द्रत होता है और दौड दोडकर रोद्र नृत्य करने लगते हैं । शकरके ताण्डव नृत्यमे एक पिरोपता अधिक है। वह यही कि शकरका रूप भी प्रथम सौम्य तथा आखिर आखिर रोद्र अर्थात् विराट् रूप हो जाता है । "महीपादाघातात्" इस इकोकमे यद्यपि विराटपका वर्णन है। किन्तु वह सौम्यरूपपूर्वक होनेसे सौम्यरूपका भी उपलक्षण है । पहले हम कह आये हैं कि नृत्य गीतवाद्यपूर्वक है। नृत्यका वर्णन किया तो वह गीत और वाद्यका भी उपलक्षण हो जायेगा। स्थूल हमेशा सौम्यपूर्वक होता है । अत स्थूलगीतसे परावाणी और नृत्यसे परिस्पन्दका भी लाभ होता है । अतएव सूक्ष्मके रूपमे लोकमे भी गीत तानस्वरसे और नृत्य मन्दस्पन्दसे प्रारभ किया जाता है ॥ २०-२६ ।। सानस्वरालापमाद्य चकारीकारतो प्रवादयच्च सः॥ २७॥ अव शकरका ताण्डवक्रम देखिये। प्रथम तानस्वरालाप उन्होंने ओकारसे किया। डमरूको तब लेश बजाया और पदका मन्द स्पस्द किया ॥२७॥ तदा प्रमथनाथस्य भैरवाया गहात्मनः । यदनेम्यस्तु पश्चभ्य. पश्चरागाः समुदभः॥ २८ ॥ एको रागस्तु पार्वत्या मुखपद्मादिनि.सृतः। निपितं तदेतच्च रागशास्त्रविशारदः ॥ २९॥ शिवशक्तिसमायोगादागाणां संभवो भवेत् । पश्चास्यात्पञ्च राणाः स्युः पष्ठस्तु गिरिजामुसात् ॥ ३०॥ भवः। पादावस्पन्दयच्च डमद

तत्तः
१८६
धी शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पौडदाः
सखोयक्त्रात्तु थोरागो वामदेवाद्वसन्तकः।
अपोराद्भरयोऽभूत्तत्पुरुषात्पश्चमोऽभवत 1॥३१॥
ईशानास्यान्मेघरागो नाट्यारम्भे शियादमूत्
गिरिजाया मुखाल्लास्ये नमुनारायणोऽभवत् ।। ३२ ॥
उसी समय परमात्मा भगवान शंकरके पांच मुखोंसे पांच राग प्रगट
हो गये । और एक राग पार्वतीके मुखसे । यह बात संगीतशास्त्र में बतायी
है।-शिव शक्ति समायोगसे रागोत्पत्ति हुई, पांच राग शंकर मुखसे छट्ठा
पार्वतीमुखसे । सद्योजात मुखसे श्रीराग, वामदेवमुस्वसे वसन्तराग,
अघोरमे भैरव, तत्पुरपसे पञ्चमराग ईशानसे मेघराग, इस प्रकार ताम्हवके
अरंभमें प्रकट हुए और पार्वतीकै मुखसे नट्टनारायणराग प्रकट
हुआ ॥ २८-३२॥
प्रादौ मालवरागेन्द्रस्ततो मल्लारसंशितः।
श्रीरागश्च
पश्चाद्वसन्तस्तदनन्तरम् ।। ३३ ।।
हिन्दोलश्चाथ फर्णाट एते रागाः पडेय हि।
इत्येवमपरे प्राहू रागनामानि पण्डिताः ।। ३४ ॥
मालय, मल्लार, श्रीराग, वसन्त, हिन्दोल, कर्णाट इस क्रमसे दूसरे
पण्डित रागोंके नाम कहते है ।। ३३-३४ ।।
षट् पट् चैषा हि रागिण्मस्तथा च भगवद्वचः ।
पनिशद्रागिणीस्तत्र क्रमशः करिता मया ॥ ३५ ॥
एक एक रागकी छ: छ: रागिणियां है । इसप्रकार छत्तीस रागिणियां
है, ऐसा भगवद्वचन है ।। ३५ ।।
मालधीः त्रिवणी गौरी पोदारी मधुमाधवी ।
ततः पाहाडिका ज्ञेयाः थोरागस्य वराङ्गनाः ॥ ३६ ।।
देशी देवगिरी चैव बराटी तोडिका तथा।
ललिता चाय हिन्दौली वसन्तस्य वराङ्गनाः ।। ३७ ।।
भैरवी गुर्जरी रामकिरी गुणकिरी तथा ।
वाङ्गाली संन्धवी चैव भैरवस्य वराङ्गनाः ॥ ३८॥
विभाषा नाथ भूपालो कर्णाटी वडहसिका।
मालवी पटमञ्जर्या सहताः पत्रमाङ्गनाः ॥ ३९ ॥
मल्लारी सौरटी चव सावेरी कोशिकी तथा।
गान्धारी हरशृङ्गारा मेघरागस्य योषितः॥ ४० ॥

श्लोकः] स्पन्दवार्तिकसहितम् १८७ कामदी चैव कल्याणी आभोरी नाटिका तथा। नारङ्गी नट्टहम्बीरा नट्टनारायणाङ्गनाः॥४१॥ मालवादिक्रमोक्तेषु रागिण्यो भिन्नवत्मना। गणितास्तस्य विवृतिस्तत्तद्ग्रन्येषु वोक्ष्यते ।। ४२ ।। एतेषां पुत्रपौत्रादिपारम्पति सहस्रशः। रागाणां विस्तरश्च व पूर्वाचार्य निरुपित. ॥४३॥ इत्थं ताण्डववेलाया प्रादुरासीन्महेश्वरात् । सगीतविद्या सकला रमन्ते यत्र देहिनः । ४४ ॥ मालथी, त्रिवेणी, गौरी, केदारी, मधुमाधवी, पाहाडिका ये श्ररागकी रागिणिया हैं। देशी, देवगिरि, वराटी, टोडिका, ललिता, हिदोली ये वसन्तकी रागिणिया हैं। भैरवी, गुर्जरी, रामकिरी, गुणकिरी, वागाली, सैन्धवी ये भैरवकी रागिणिया है। विभापा, भूपाली, कर्णाटी वडह सिका, मालवी, पटमजरी ये पचमकी रागिणिया हैं । मल्लारी, सौरटी, सावेरी, कौशिकी, गाधारी, हर” गारा ये मेघरागकी रागिणिया है। कामोदी, कल्याणी, भाभीरी, नाटिका, नारगी, नट्टहवीरा ये नट्टनारायणकी रागिणिया है। मालव, मल्लार आदि क्रमसे जो छ राग नाम गिनाये उनकी रागिणियो का भिन्न तरीकेसे वर्णन तत्तदग्रन्योम है। इन राग- रागिणियोकी पुत्रपौत्रादिपरम्परासे हजारो रागरागिणियोका वर्णन पूर्वाचार्यो- ने किया है । इसप्रकार ताण्डव समयमे शकरजीसे समग्र सगीतविद्या प्रक्ट हुई, जहा समस्त प्राणी आनन्दानुभव करते हैं ।। ३६-४४ ॥ जगद्रक्षाय तथा स्तुतश्च भगवान प्रसन्न क्रमतो नृणाम् । स्वर्गावर्गफलद इत्येवं शास्त्रणितम् ॥ ४५ ॥ जपफोटिगुण घ्यान ध्यानकोटिगुणो लयः। सयकोटिगुण गानात्परतर न हि ॥ ४६ ।। मागंदेशीविमागेन सगीत द्विविध मतम् । द्रुहिणेन यदन्विष्ट प्रयुक्त भरतेन च॥४७॥ महादेवस्य पुरतस्तन्माल्य विमुक्तिदम् । तत्तद्देशस्यया रोत्या यस्पाल्लोकानुरम्जनम् ॥ ४८ ।। देशे देशे तु सगीत तद्देशोत्यभिधीयते । न स्वर्गो नापवर्गो या तेन लोकानुरञ्जनम् ॥ ४९ ।। गान '१८८ [पोडशः श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् गीतमो यदि गीतेन नाप्नोति परमं पदम् । रद्रस्यानुचरो भूत्या सह तेनय मोदते ॥५०॥ सगीतविद्यामे स्तुति बोलनेपर भगवान प्रसन्न होकर स्वर्ग अपवर्ग प्रदान करते हैं। देखिये शाम्भवचन : • 'जपमे करोड़गुना धेष्ठ ध्यान है, ध्यानसे करोडगुना श्रेष्ठ लय, लयसे करोगुना श्रेष्ठ गान है। गानसे आगे कुछ नहीं।" मार्ग तथा देशी विभागसे सगीत दो प्रकार का है। शकरजीके सामने ब्रह्माजीने और भरनने गो पाया वह मार्ग है। वह मोक्षदायी है। देश देशकी रीतिसे जो गाया जाता है (जैसे सेनमा रागादि ) वह देशी है । केवल लोकानुरजन उसका फल है । स्वर्ग, मोक्षादि नहीं । गीतज्ञ गीतसे कदाचित् मोक्ष न भी पावे तो भी वह शकरानुवर होकर शंकरके साथ प्रमुदित होगा ।।। ४५-५० ।। मृत्यस्यापि फलं शास्त्रप्वेवमेव प्रफोर्तितम् । उक्तं चाग्निपुराणादायेतयेवर्षिणा स्फुटम् ।। ५१॥ दृष्टदा संपूजितं देवं नृत्यमानोऽनुमोदयेत् । असंशयमतिः शुद्धः परं ब्रह्म स गच्छति ।। ५२ ।। यो नत्यति प्रहप्टात्मा भावपंहु सुनक्तितः । स निदहति पापानि जन्मान्तरशतेप्यपि ॥५३ ।। नृत्यं दत्वा तथाप्नोति रुद्रलोफमसंशयम् । स्वयं नृत्येन संपूज्य तस्यैवानुचरो भवेत् ॥ ५४ ।। तस्माद्गीतं च नृत्य च लोकानुपदिशन् हरः। विदधाति जगद्रक्षामित्यस्मिनास्ति संशयः॥५५॥ इसीप्रकार अग्निपुराणादि शास्त्रोमे नृत्यफल भी बताया है। पूजोत्तर भगवद्दर्शन कर मदेह रहित एव शुद्ध होकर नृत्य करते हुए मुदित हो। भाव एव हर्षमे एव भक्तिमे नृत्य करनेसे सैकडो जन्मोके पापोको मनुष्य जला देता है । आजीविकार्थ नृत्य देनेवाला भी रुद्रलोक जाता है। म्वय नृत्य करे तो रदका अनुचर ही बन जाता है। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि शकरने ताण्डव शुरुकर गीत और नृत्यकी शिक्षा देकर स्वर्गापवर्गादिरूप लोकरक्षा सपन की ॥ ५१-५५ ॥ स्वरभङ्गादिक नैव कर्तव्य गातृभिर्बुधः। सतो हि रागरागिण्यः सोयन्तोति जनश्रुतिः ।। ५६।। एकदा नारदो वीणा विरणप्रव्रजन पथि । भग्नपारकरान् देवान् देवाश्चक्षत तादृशीः॥५७ ।।

श्लोक ] स्पन्दवातिकसहितम् १८९ के यूय क्यमेषा च दशेत्युत्तास्तु तेऽग्रवन् । वय हि रागरागिण्यस्त्वामेतत्प्रार्थयामहे ।। ५८॥ यदि क्वचन लम्येत नारदो नाम दुर्मति । भूहि त मा बधी रागान वराको रागिणोरपि ॥ ५९॥ विधाय स्वरभङ्ग स भक्त मन्य प्रगायति । त्वमस्माक रक्षयिता दृप्ट सौम्यवपुमुने ॥६॥ स्वरभगादि न करना चाहिये । उससे रागरागिणी देवताओयो क्लेश होता है। एकवार नारदजी वीणा बजाते हुए जा रहे थे तो रास्तेमे कुछ देवदेवियोको देखा जिनके हाथपाव टूटे हुए थे। तुम कौन हो, तुम्हारी यह दशा कैसे हुई ? पढने पर वे बोले कि हम रागरागिणी हैं आपसे प्रार्थना है कि यदि वह दुर्मति नारद कही मिले तो अवश्य कहें कि बेचारे रागरागिगियो को इस तरह मन मारो। वह अपनेको भक्त जताता है और स्वरमग कर गाता है । मुने | आप सौम्य दीख रहे हैं, अवश्य हमारी रक्षा करेंगे ।। ५६-६०॥ नारद -हा हन्त नारद सोऽहमपराधी भवामि व । फथ स्यादङ्गसाकल्य भवतामनुशिष्ट माम् ॥११॥ नारदजी बोले-हाय | वह अपराधी तो मैं ही हूँ। आपके अगोको सम्पूर्णता अब कैस होगी सो आप ही हमे आदश दें ।। ६१ ॥ राग-भगवन्त महेशान महामते। स ताण्डवे प्रगीयास्मानु द्वरिप्पत्यसरायम् ॥ ६२ ।। आप ज्ञानी महात्मा हैं आप भगवान शकरपी शरण जाय । शकर भगवान ताण्डवमे ठीक गाकर हमारा उद्धार करगे ।। ६२॥ उद्धारमकरासपा नारदप्रार्थित ताण्डवे सवसाकल्यसपादनपुर सरम् । ६३ ।। नारदजीकी प्रार्थनापर शवर भगवानने ताण्डवम गीतोका अगसाकल्य सम्पादनवर उनका उद्धार किया ।। ६३ ॥ मनूषत ताण्डवे रापप्रादुर्भायोऽधुना पुन । प्रागुमूनागसाफल्य ताण्डवे कयमुच्यते ॥ ६४॥ प्रयम त्वल्परागादिप्रादुर्भावो हरादभूत । तदङ्गमङ्गो मध्ये तु तसाफल्य च ताण्डवे ॥६५॥ शिष्टानां चंय सर्यपा प्रादुर्भावोऽत्र ताण्डवे । सगीतविद्यायास्तत्प्रवर्तनसगति ॥६६॥ प्रपद्यस्व प्रभु। इत्य १९० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पोडशः उपवेदाच चेदाश्च चत्वारः कथिताः स्मृती। तत्रोपवेदो गान्धः शिवेनोक्तः स्वयंमुवे ।। ६७ ॥ तेनापि मरतायोक्तस्तेन मत्र्य प्रचारितः। शिवाजयोनिभरतास्तस्मावस्य प्रयोजकाः ।। ६८॥ संगतं संगीतदामोदरवचस्स्विवम् । प्रथमं ा पदेशेन ताण्डवेन ततः परम् ॥ ६९॥ पहले आपने बताया कि ताण्डवमें संगीतका प्रादुर्भाव हुमा। किन्तु नारदकथासे उससे भी पहले रागप्रादुर्भाव प्रतीत होता है। ताण्डवमें उनके टूटे अंगोंका जोडना मात्र सिद्ध होता है। इस प्रश्नका उत्तर यह है कि प्रयम रागोका अल्पप्रादुर्भाव हुआ। फिर अंगभंग। और ताण्डवमें अंग- सावत्य तथा पूर्णप्रदुर्भाव हुआ। इसप्रकार शिवजीके द्वारा संगीतविद्याके प्रवर्तनकी संगति है। अतएव संगीत दामोदर ग्रन्थमें उपवेदोंमे गान्धर्ववेद प्रथम शंकरने ब्रह्माको, ब्रह्माने भरतको और भरतने सभी लोगोंको बताया यह परम्परावर्णन संगत होता है। प्रथम उपदेशसे शकरजीने परीक्षतः प्रादुर्भाव किया। पश्चात् ताण्डवमें प्रत्यक्षतः प्रादुर्भाव किया ॥ ६४-६९ ।। देवीभागवते तूपतं गोलोकेशायदोश्वरः । राधाकृष्णावलीयेतामासातां उधार ततः शंभू राधाकृष्णौ जलान्ततः। शिष्ट जलमभूद्गङ्गा येषा त्रिपथगामिनी ।। ७१ ।। देवी भागवतमें तो ऐसा बताया है कि भगवान शंकरने एकबार गोलोकमे गीत गाया। जिससे राधा और कृष्ण पानी-पानी होकर लीन हो गये और जल से रह गये। बादमे शकरजीने जलसे राधाकृष्णका उद्धार किया। शेषजल त्रिपथगा गङ्गा हुई ।। ७०-७१ ।। अथ क्रमादभूद्रौद्रं ताण्डवं द्रुतगोतफम् । तयास्यास्याभ्यनुपदं वन्युत्तरमायामिह ।। ७२ ॥ प्रथम सौम्य बिलम्बित नृत्यगीत शुरू हुआ यह बताया। क्रमशः ताण्डव रौद्र एव गीत द्रुत होने लगा। उसकी व्याख्या हम बादमे करेगे। ताण्डवके अन्त में जो कया हुई उसे प्रथम कहता हू ।। ७२ ।। जगद्रक्षाय मृत्तायसाने मगवानुत् सनकादिकान् । ढक्का ननाद स चतुर्दशयारं महेश्वरः ।। ७३ ।। जलरूपतः।। ७०॥

श्लोकः । स्पन्दवातिकमहितम् १९१ त्यिमे। ताण्डवके अन्त में भगवान शंकरने सनकादिका उद्धार करनेके लिये चौदह बार डमर बजाया। ("नृतावसाने नटराजगजो ननाद ढक्कां नव- पञ्चवारं" इत्यादि प्रसिद्ध है ) ॥७३॥ प्रादुर्वमूवरेतस्मान्महाविद्याश्चतुर्दश वेदा अङ्गानि शास्त्राणि तान्येतानि चतुर्दश ॥ ७४ ॥ ऋग्यजुःसामनामानो वेदाः साथसंज्ञकाः। डमरोव्यक्तिमापन्ना याद्यमानासि शंभना ॥७५ ।। अपरुषेयताहेतोव्यंज्यन्ते केवलं संजजिरे तूपवेदा गण्यन्ते ते समुद्भवे ॥७६ ॥ गन्धर्वायुर्धनुर्वेदा अर्थशास्त्रं च ते मताः। ग्रथितास्ते पुनर्नानामुनिमिः संप्रदायतः ।। ७७ ॥ शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्त छन्द एव च । ज्योतिषं चाविरमयन् वेदाङ्गानि पराणि पट् ॥ ७८॥ पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राण्युपागतः प्रसिद्धानि ततो विद्याश्चतुवंश निरूपिताः ॥७९॥ भगवान शंकरने चौदह बार जो डमरू बजाया उससे चनुर्दश विद्या प्रकट हुई। वेद, वेदांग शास्त्र मिलाकर चांदह होते है । ऋग्वेद यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ये चार वेद है । ये डमरूके बजानेपर केवल व्यक्त हुए। अपौरुषेय होनेसे उत्पन्न नहीं हुए। उत्पन्न के रूपमे आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद, अर्थशास्त्र ये चार समझना। जिनको बादमे नाना ऋपियोंने ग्रन्यरूपमे ग्रथित किया। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक, छन्द, ज्योतिष ये वेदाङ्ग छ है । पुराण न्याय, मीमासा, धर्मगास्त्र ऐसे शास्त्र चार हैं। मिलनेपर चौदह होते हैं ।। ७४-७९ ।। होत्रं ज्ञानं भवेदक्ष यजुष्याध्वर्यय तथा। औद्गात्र सामवेदे च शेष सर्वमयर्वणि ॥ ८०॥ वेशेक्तो द्विविधो धर्मो जगतः स्थितिकारणम् । प्रवृत्तिश्च निवृतिश्च भाष्यकर प्रदशितः ॥ ८१॥ येदः शिवः शिवो येद इत्येषा च श्रुति. स्वपम् । जगदमयज्ञानयेदर शियं जगो।।८२॥ होतासे सम्बन्धित सबका शान ऋग्वेदरी होता है। अध्वर्यु से सम्बन्धित सभीका ज्ञान यजुर्वेदसे होता है। उद्गातासे सम्बन्धित सबका मान सामवेदसे होता है। शेषका मान अपवंवेदसे होता है । वेदोमे बताये १९२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् पांडपः प्रवृनि और निवृत्तिरूप दो धर्म जगतको स्थिति ( रक्षा ) का कारण है यह भाष्यकार भगवान शंकरचार्यने दिखाया है। वेद ही शिव है इत्यादि श्रुति जगद्रक्षणविज्ञानरूप वेदरूपरो शिवकी स्तुति करती है । ताण्डवमें शिव स्वस्वरूपमें प्रकट हुए । अतः जगद्रक्षाहेतु सिद्ध होते हैं । उस वेदार्थ बोधार्थ ही अन्य चतुर्ददश होने से वे भी जगद्रताहेतु ही हैं ।। ८०-८२ ।। स्वरादिबोधः शिक्षातः विनियोगादि कल्पतः । पदज्ञानं व्याफरणादर्थज्ञानं निवतंतः॥८॥ ज्योतिषात् फालविज्ञानं छन्दसश्छन्द एव च । पडङ्गान्याविरमवन् डमरोधिमानतः ।।८४॥ येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् । कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ।। ८५ ।। इत्यत्र तु विशेषण सूत्राणि तु चतुर्दश । गणितानि तदेतत्तु पश्चाद्धावीति दृश्यताम् ॥ ८६ ॥ स्वरव्यञ्जनाधुच्चारणज्ञान शिक्षासे होता है, विनियोग, क्रम आदिका ज्ञान कल्पमूत्रोसे होता है, पदज्ञान व्याकरणसे होता है। विशेषपदार्थज्ञान निरुक्तसे होता है। कालज्ञान ज्योतिषसे होता है। और छन्दका शान छन्दोप्रन्योंसे होता है "येनाक्षरसमाम्नायं" इत्यादि श्लोकमें अ इ उण्. मट लक् इन्यादि चौदह सूत्रों की निष्पत्ति जो बतायो वह बादकी यात है। क्योंकि पाणिनि बादमें हुए हैं। ( सृष्टिके आरम्भकाल में ताण्डवनृत्य के अन्तमें शंकग्जीने जो चतुर्दशवार डमरू बजाया उसे पाणिनिने तपस्याकृत प्रतिभज्ञानसे देखा तो चौदह सूत्ररूपमें दीख पड़ा, यही व्याकरण प्रसिद्धिकी संगति है।। ८३-८६ ॥ अष्टादशपुराणानि प्रादुर्भूतानि शंकरात् ट्यानीपनिबद्धानि जगत्कल्याणदेतवे ॥ ८७॥ अनवोपपुराणानामन्तर्मावोऽनबुध्यताम् रामायणं भारतं च धर्मशास्त्र परेऽन्न सु । ८८॥ गौतमेन निबद्धं तु न्यायशास्त्रमुदीरितम् । शंकरात्प्रकटीभूतं पदार्या यत्र पोडश ।।८९॥ फाणादं शास्लमत्रव बोध्यमन्तर्गतं बुधैः । पट्पदार्थोवर्णनं हि विशेषणात्र विश्रुतम् ॥१०॥ मीमांसा तु द्विधा प्रोक्ता पूर्वोत्तरविभागतः । तपोपनिनदारों जैमिनिास एव च।। ९१ । ।

श्लोकः] सन्दवार्तिकसहितम् मग्याविकथितान्याहुधर्मशास्त्राण्यनेकशः सांख्ययोगों तु तत्र द्वावन्तर्भावमहंतः॥ ९२ ॥ अयं तु परमो धर्मों यद्योगेनात्मदर्शनम् । इति धर्मविशं श्रेष्ठो याज्ञवल्क्यो निरखवीत् ॥ १३ ॥ तत्र योगस्तु शब्दोक्तः सत्यं स्यावात्मवर्शनम् । निरोश्चरमसत्साख्य सांस्यसाधनमेव वा ।।९४ ॥ योगः पतञ्जलिप्रोक्त सांस्यं कपिलभाषितम् । उभे ते प्रथम तायत् प्रादुर्भूते महेश्वरात् ॥ ९५ ॥ अठारह पुगण प्रथम शकरसे प्रकट हुए । व्यासजीने जगत्कल्याणार्य उन्हे ग्रथित किया । उपपुराणोका इनमे अन्तर्भाव समझना चाहिये। रामायण और महाभारतको कुछ लोग पुराणोमे और कुछ लोग धर्मशास्त्रमे गिनते है। शारसे प्रक्ट पोडशपदार्थयुक्त न्यायशास्त्र को गौतम ऋपिने ग्रथित किया । वैशेषिक दर्शन इसीके अन्तर्गत समझना, जहां पट्पदार्थवर्णन है। पूर्व मीमासा उत्तर मीमासा इस प्रकार मीमासा दो हैं। जैमिनिने और व्यासने उन्हे ग्रथित किया। मन्वादि प्रणीत धर्मशास्त्र अनेक हैं। साख्य और योगका इसीमे अन्तर्भाव है। योगसे आत्मदर्शन करना परमधर्म है ऐसा याज्ञवल्क्यवचन है । अत योग धर्म है ही । आत्मदर्शनसे सास्य विवक्षित है। निरीश्वर साख्य तो असत्सारय है । अथवा वास्तविक साख्यमे आनेका एक साधन है। योगशास्त्रको पतञ्जलिने और सांख्यशास्त्रको कपिलने ग्रथित किया ।। ८७-९५ ॥ आयुर्वेद घरकसपतो। विश्वामित्रो धनुर्वेदं गान्धर्व मरतस्तथा ॥ ९६ ॥ अर्थशास्त्रं यहुविध कौटिल्यानिपितम् । एताश्चतुर्दशोत्पन्ना विद्या उमरवादनात् ॥ ९७ ॥ वेदरूप स्वय शम्भुनिज व्यन्जयति स्वयम् । प्रतश्चतुर्दशवनाः चतुर्दशनिनादतः ॥ ९८॥ बेवायज्ञानबोधाय विद्याः सर्वा अपीतरा.। जगद्रक्षानिदानत्व तेषां चिन्त्य न तत् पृथक् ।। ९९ ॥ वेदोक्ताम्यां हि धर्माभ्या जगतः परिरक्षणम् । स्वयं प्रफाशयामास देवरूप गटन्नसो॥१०॥ ताण्डयाङ्गतया चैय कृत्वा उमरवादनम्। विद्याः प्रकाश्य भगवान् ररक्ष सफस जगत् ॥ १०१।। १३ जग्रन्यतुमुनी १९४ श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [पोडश सनकावीत्याविपवारमरिच्याविश्न गृह्यते। तानुदतुं च तद्वारा जगदुसतु मीश्वरः ॥ १०२॥ चरक और सुश्रुतने आयुर्वेदको ग्रथित किया। विश्वामित्रने धनुर्वेद और भारतने गान्धर्ववेद प्रकट गया। कौटिल्यादिने अर्थशास्त्रका निरूपण किया। चौदह बार इमर बजाकर इन चौदह (छ अग शिक्षादि, चार उपवेद आयुर्वेदादि चार उपाग पुगणादि मिलाकर चौदह) विद्याओको प्रकट किया। शकर स्वय वेदम्प है । यह पहले बताया । स्वस्वरूप वेदोको ताण्डवमे प्रकट विया ही । चतुदशविद्यामात्र डमरूवादनसे प्रादुर्भूत किया । वेदार्थज्ञानप्राप्ति के लिये ही सभी अन्य विद्या है । अत अन्यविद्यासे जगतरक्षा किमप्रकार यह सोचनेकी जरूरत नहीं है । वेदोक्त प्रवृत्ति निवृत्ति दो धोसे जगतकी रक्षा है । और स्वय शिव वेद होनेसे नृत्य करते हुए अपनेरो प्रकाशित किया ही। ताण्डवके अगके रूपमे डमरू बजाकर विद्याप्रकाशन करते हुए भगवान शकरने समस्त जगतकी रक्षा की। "उद्धर्तुकाम सनकादिसिद्धान्" यहापर और "उद्धर्तुं सनकादिकानु" ( श्लो ७३ ) यहापर आदि पदसे मरीचि आदि राभी ग्राह्य हैं। मरीचि आदिको प्रवृत्ति धर्म और सनकादिको निवृनिधर्म भगवान शकरने वेदप्रकाशनके द्वारा किया। उनका उद्धार करनेका मतलब है उनके द्वारा जगतका उद्धार करता ॥ ९६-१०२ ॥ महीपादा""तटा नटनीति सामान्यमुपादायतदीरितम् । विशेषरूपमधुना तस्य व्याख्यायते मया ॥ १.३॥ रोनृत्ये तु भगवान् विराडरूपेण नृत्यति । निधन पादेन पृथिवीं भ्राम्यन् शोर्य करादिकम् ।। १०४ ।। पादाघातेन पृथिवी मिद्यतेत्येति काष्ठमन्चो यथा नृत्ये स्फुटचतेत्युप्रनर्तने ॥ १०५॥ भ्राम्यमाणा भुजा. शम्भोर्दष्टा. परिघनिष्ठराः। तदाघातादन्तरिक्ष भग्नग्रहगण नृत्यन्त्या घर्घरो यद्वच्छनाफारो विपूर्णने । जटास्तच्छम्भोदियमताडयत् ॥ १०७ ॥ असवृत जटाकाण्डताडिसप्रान्तमस्थिरम् । त्रिविष्टपमवापातिदु स्थिति मुहुरीमितु ।। १०८॥ 'नटसि' इस सामान्य वचनसे प्राप्त नृत्य गीत वाधको लेकर यहातक बताया । अव श्लोकमे जो विशेषस्प दरसाया है उसकी व्याख्या करते हैं । सशयः। बभौ ॥१०६॥ चक्राकारा श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् १९५ रौदनृत्यमें भगवानका रूप भी विराट् हो जाता है। पादसे पृथ्वीपर ठोकर लगाते हुए मस्तक; हाय आदि घुमाते हुए नृत्य करते है। पादाघातसे ऐसा लगता था कि पृथिवी फट जायेगी। जैसे काठके मंचपर रौद्रनृत्य से लगता कि अभी यह टूट गिरेगा। भगवान को भुजाये परिपके समान कठोर होकर जब घूमने लगती तो अतरिक्षमे ग्रहगण टूटफूट गये ऐसा लगता था। जटा जब घूमने लगती तो चक्राकार होती थी जैसे नाचते समय घूमनेपर घाघरा छत्राकार होता है । उससे स्वर्गपर जब मार पड़ती थी तो वह चंचल होकर दुरवस्थाको प्राप्त होता था ॥ १०३-१०८ ॥ वामनस्य क्षितिस्थस्य विरारूपं प्रथरियरे । क्षितिस्थत्वेऽपि भर्गस्य विराजमावस्तथेक्ष्यताम् ।। १०९ ।। पृथिवीपर खड़े हैं तो विराट रूप किस प्रकार ? क्योकि विराट्मे पृथिवी आदि अन्तर्भूत होते हैं। इसका उत्तर यही है कि वामन भगवान पृथिवास्थ होकर विराट् स्पधारी हो गये थे। जैसे वहा उपपत्ति वैसे यहा भी.समझना चाहिये ।। १०९ ॥ स्वपादशपरयाधानेन क्षिति रक्षति जर्जराम् । शीर्षगङ्गाजलकणः सागरादि तथंव च ॥ ११०॥ तृतीयाक्षस्फुलिङ्गश्च सशक्तं कुरुऽतेऽनलम् । श्वासप्रश्वासवेगेन वायु शक्तयतीश्वरः॥१११॥ व्योमकेशः किलाकाशं पूर्णशक्ति वधात्यसौ । जर्जरं जगदेवं हि शक्त्या रक्षति शंकरः॥११२ ।। मादौ शक्तिसमाधानात्कल्पान्तं वसुधादिकम् । प्रतितिष्ठति यत्तद्धि प्रमोभुवनरक्षणम् ॥ ११३॥ भगवान शंकर अपनी चरणशक्तिके आधानसे चरणरूप क्षयशील जर्जर क्षितिकी रक्षा करते हैं । शिरस्थ गगाजल कणोसे सागरादिको परिपुष्ट कर रक्षा करते है। तृतीय नेत्र निःसृत अग्निकणोसे अग्निको सशक्त कर रक्षित करते है । नृत्यकालीन ग्वाम प्रश्वासवेगसे वायुको सशक्त कर रक्षण करते है। व्योमकेश तो शकर हैं ही। आकाशमे पूर्णशक्ति आधान करते है । इस प्रकार जर्जर जगतकी शकर भगवान शक्ति आधान से रक्षा करते हैं। सृष्टि होते ही शक्तिका आधान किया इसीलिये पृथिवी आदि कल्प- पर्यन्त प्रतिष्ठित रहता है यही प्रभुका भुवनरक्षण है ।। ११०-११३ ।।

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ षोडशः ननु वामय विभुता वामव विभुता संमोतियाग्निव ताण्डवे। नगदेतद्धि सकलं हन्त रक्षति निर्भरम् ॥ ११४ ॥ भगवान को विभुता बडी विलक्षण है। विपरीत प्रतीत होती है। ताण्डव मे शकर जगतका घात करते हुए प्रतीत होते है । लेकिन वे जगतकी रक्षा करते है।। ११४ ॥ पिविषो मवतीत्यस्मातिमुरित्युच्यते प्रभः । पचित्तोपः क्वचनानुरूपो योक्ष्यते यत ॥ ११५ ।। विविध रूपसे होते है अतप्रभुको विभु बताया। कही अनुरुप और कही प्रतीप (विपरीत ) यही विभुता है ।। ११५ ।। पादन्यासः प्रचिन्वन् क्षितिमनिलमनुप्राणयन् प्राणयेग. रणस्यानिमिजान स्त्रिपरगतिजलंगसमक्षाग्निनाच । स्वर्लोकादीन् जटासंहतिहसिमिरलमापयन् भूतनायो विद्यायिधोतरी जयति घनजटामण्डलस्ताण्डवस्थः ।।११६।। पादविन्याससे क्षयशील क्षितिको उपचित करते हुए, प्राण वेगसे पवनको अनुप्राणित करते हुए, मस्तकगगाकणोंसे सागरादिको पवित्रित करते हुए, तृतीय नेत्राग्निसे अग्निको प्रज्वलित करते हुए, जटाजूटघातसे स्वर्ग- लोकादिको पूर्ण करते हुए तथा समस्त विद्याओको प्रकाशित करते हुए जटाजूटसे विराजमान ताण्डव नृत्यस्थ भूतनाथ भगवान शकरकी जय हो ॥११६॥ नमस्तस्मै मगवते ज्ञानयिशानदायिने । जगप्रक्षकदीशायाऽखण्डताण्डवतापिते ॥११७॥ ज्ञानविज्ञानदायी जगद्रक्षणदीक्षादीक्षित असण्डताण्डवकारी भगवान शकरको हम प्रणाम करते है ।। ११७ ॥ इति धोकाशिशानदयोगिन. कृतिनः कृता । महिम्नः स्तोनविवृतौ गत. स्पन्दस्तु पोडशः ।। १६ ॥

ततः सप्तदशः श्लोकः जगद्रक्षाप्रसडगेन गङ्गयाम्युधिपूरणम् । जीरनं स्मरतोगास्यरूपं तेनैव यंते ॥१॥ "जगद्रक्षायै स्वं" ऐसा जगद्रक्षाका प्रसङ्ग चला । शङ्करजीने गङ्गाके द्वारा समुद्रपूरण किया था। वह भी जगद्रक्षाकारण ही है । क्योकि समुद्रसे ही बाप्पद्वारा मेघोत्पत्ति और वृष्टि होती है जो जीवनकारण है । अतएव पानीका नाम भी जीवन पडा। उक्त ( जगत् रक्षा) प्रसङ्गसे गङ्गायतर- णादि स्मरणपथमे आया तो अब उसके द्वारा उपास्यस्पका वर्णन करने जा रहे हैं ॥१॥ स्वयं तस्थे पदा ताभ्यामल्परूपमभूत्तदा। पूर्वमनायन्त भूमलिगममन्महत् ॥ २ ॥ पूर्यश्लोके सौम्यपूर्व विरारूपं निरूपितम् । तत्र तपास्यता फस्येत्युवपद्यत संशयः ॥ ३ ॥ अर्वाचीनपदं किं या त्रिपाद्र पमुपास्यताम् । इत्येषोऽप्यस्ति सन्देहः एतावश्यधारिते ॥४॥ "स्वय तस्थे तान्या" इस प्रकार जो पहले बताया वह स्वरूप परिच्छिन्न तथा अल्प था। किन्तु उमसे पूर्व "यदुपरि विरिश्चो हरिरघ' से जो सूचित हुमा था यह भूमाका लिङ्ग महान था । क्योंकि उसका आदि अन्त नही था। "महीपादाघातान्' इस पूर्वश्लोकमे यद्यपि विराम्वरुपका इशारा है। फिर भी वह सौम्य अत्पम्वरूपपूर्वक होनेसे उभयका निरूपण था। इसपर सशय यह होता है कि अल्परूप उपास्य है या विराट्स्प उपास्य है। यहांतक वणितस्वस्पर्म मूलत यह भी शङ्का होती है कि अर्वाचीनपद उपास्य है या त्रिपाद प उपास्य है ।। २.४ ।। मूमलिग विराइरपं न त्रिपादुमयं मतम् । परिच्छेददर्शनादेवपात्स्यितेः ॥५॥ ध्यान रखने की बात है कि जो भूमलिङ्ग पहले कहा और जो विराट- रूप पूर्वश्लोकमे आया दोनो त्रिपाद्ब्रह्म नहीं हैं। ये दोनो परिच्छिन्न हैं। भले भूमलिङ्गवा ऊपर नीचे आदि अन्त नमिला हो । फिर भी ब्रह्माविष्णुके " उमयन्त्र १९८ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ सप्तदशः मध्यमात्रमें था अत: परिच्छिन्न है ही । वैसे पूर्वश्लोकोक्त विरारूप भी वड़ा आकार हो सकता है। अपरिच्छिन्न नहीं। अतः यह सब एकपाहू ही है।॥ ५॥ अल्परूपमहालिगविराष्ट्रपत्रिपासु हि। उपास्यं फतम पं तत्रे पूर्वपक्ष्यते ॥ ६ ॥ अल्पस्याल्पफलं नूनं महतव महत फलम् । यत्क्रतुन्यामतः सिद्ध तथा च भगवानपि ॥७॥ अन्तवतु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेघसाम् । देवान देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ ८॥ अल्पे मेधा मतियां ते भवन्त्यल्पमेधसः । परिच्छिन्नाविषयोपासकास्तेन -दशिताः ॥९॥ अल्पस्वरूपस्तवममपि नातिप्रयोजनम् ।। १०॥ न च वाइभमसातीतं स्तोतव्यं न भवेदिति । तां पायान्तरं तत्र समग्विय्य विधीयताम् ।। ११ ॥ चार स्वरूप उपस्थिति हुए हैं। पद्मासनासीनादि अल्परूप, अनाद्य- नन्त ज्योतिलिङ्गा विराट्स्वरूप और त्रिपात्स्वरूप। इनमें उपास्यरूप कौनसा है ? पूर्वपक्ष यह है कि अल्पका अल्पफल होगा, महानका महाफल होगा।यह "यो यत्क्रतुर्भवति" इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध है। भगवान भीगोतामे कहते है कि अल्परूपोपासकोंका फल अन्तवाला होता है । देवपूजक देवोको प्राप्त होगे।मेरे पूजक मुझे प्राप्तहोंगे । अल्पमेघसःमे सप्तमीबहुप्रीहि है । अल्पमें जिसकी मेधा मति-उपासना हो। अत. अल्पस्वरूपकी उपासनोपयोगी स्तुति यहाँ व्यर्थ है। बल्कि विराट्रस्वरूपस्तुति भी उत्तम प्रयोजनयुक्त नहीं है। यदि कहो कि वाङ्मनसासीत त्रिपाद्रप स्तोतव्य नही होता है तो दूसरा उपाय ढूंढकर उसे अपनाइए ॥६-११॥ अनोच्यतेऽत्र नवाल्पमहत्त्वादिविधारणा। अल्पेन महता वापि तुरीयं गम्यते पदम् ।। १२ ।। अस्यूलमनणुथुत्या विनिरूपितमक्षरम् । स्यूलरूपेण न स्थूलमणुना नाणु तद्भवेत् ।। १३ ।। स्यूलरूपाणुरूपाम्यामुपलक्ष्य महेशितुः। महिमा स्तूयते सोऽयं न स्थूलो नाप्यणुमतः ।। १४ ।। मर्याचोनपदं पत्ते तद्वोधाय महेश्वरः । अल्पेऽपि पूर्णमेवेशरूपं तायत्प्रकाशते ।। १५ ॥

श्लोकः स्पन्दवातिकसहितम् १९९ सुपिरावा गवाक्षाद् वा कपाटावा बहिग हाद । दृश्यतां भास्करः किम स्यूलाण्यादिभंवेदतः ॥ १६ ॥ अर्वाचीनपदेनापि द्वारेणेशो विलोक्यते । अल्पेऽपि पूर्णमेवेशरूपं सत्यं प्रकाशते ।। १७ ॥ सिद्धान्त यह है कि यहाँ अल्प या महानका विचार नहीं है। अल्प हो या महान हो उससे तुरीयपाद ही प्राप्य है । ध्रुतिने अक्षरको अस्थूल और अनणु बताया है। वह स्थूलरूपसे स्थूल नहीं होता, सूक्ष्मरूपसे सूक्ष्म नहीं होता। स्थुलरूप हो या अणुरूप, उससे महेश्वरकी पूर्ण महिमा उपलक्षित कर भजा जाता है । वह महिमा स्थूल या अणु नही, किन्तु पूर्ण ही है। इसीके लिये भगवान अर्वाचीनरूप धारण करते हैं। अल्पमे भी पूर्ण ही ईशरूप प्रकासित होता है। चाहे छेदसे देखो, चाहे खिडकीसे देखो, चाहे दरवाजेसे, चाहे घरसे बाहर आकर देखो सूर्य तो सूर्य ही है । वह द्वारभेदसे स्थूल या अणु नहीं होता। वैस अल्प अर्वाचीनपदसे ईशका ही ईक्षण होता है । अल्पमे भी पूर्ण सत्य का प्रकाश होता है ।। १२-१७ ।। नन्यस्य महिमा तादृग घटादायपि विद्यते । उपास्य फुत एवार्वाचीनमात्रमतो भवेत् ।। १८॥ सत्यं सद्दर्शनस्थानमर्वाचीनपदं तदर्थमेव तद्रूपग्रहणस्य निरपणात ।। १९॥ यथव ग्रह्मण सर्वव्यापित्येऽपि घटादिकम् । न वेश्म, पुण्डरीकं हि दहरं हुत्तपोध्यते ॥ २० ॥ रहस्यमेतद् भगवान् प्रतिबोधयितुं प्रभुः। अल्परूपे दो गड़गामणुवद् व्यापिनों दियि ।। २१ ।। शहा होगी कि ऐसी व्यापफ महिमा भगवानको घटादिमे भी है, घटादिद्वारा भी उसको देख सकते है तो अवचिीनपद ही उपास्य क्या ? उत्तर है-महिमादर्शनस्थान अर्वाचीनपद ही है । तदयं ही तो भगवानने उस स्पको धारण किया। जैसे ब्रह्म सर्वव्यापक है, किर मी पटादि वेश्म { उपलब्धि स्थान ) नहीं है। दहर इत्पुण्डरीक ही ग्रह्मोपलब्धिका स्थान है। इस रहस्यवो बोधित करने के लिये व्यापक गङ्गाको अल्पम्पमे अणुः समान ग्रहण किया।॥ १८-२१॥ प्रत्परपेऽपि महिमा पूर्ण एवावतिष्ठते । तपय वोक्ष्यते गङ्गा प्यापिन्यप्यसनिमा ।। २२ ।। मतम् ।

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तदशः परम शिवके अल्परूप पद्मासनासीन शङ्कर में पूर्ण ही महिमा स्थित है । उसी महिमामें अणुवत् व्यापक गङ्गा दीखती है ।। २२ ।। वियद्वयापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः प्रयाहो बारां यः पृपतलघुदृधः शिरसि ते। जगद् द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि- त्यनेनवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ॥१७॥ आकाशमें व्यापक, तारागणोंसे जिसके उद्भूत फेनोंकी कांति कई गुनी बढ़ी हुई है. ऐसा (स्वर्गगङ्गाका जलप्रवाह है भगवन् ! आपके मरतक- में एक बूंदके समान छोटा दीखने लगा, जिससे ही पृथिवी सप्तममुद्रवलयित होकर द्वीपाकार बनी, इतने से ही पुर्णमहिमायुक्त आपके दिव्य शरीरका अनुमान किया जा सकता है ।। १७॥ तदमाह विपद्ध्यापी प्रवाहोऽपां जटासु ते। दृष्टः अपततुल्यो हि महिमोनीयतां ततः ॥ २३ ॥ यही बात यहां बतायी जा रही है कि गगनव्यापक गङ्गाजलप्रवाह आपकी जटाओमें बिन्दुतुल्य दील पड़ा। इतनेसे महिमाका अनुमान लगा लो॥२३॥ भगीरथोत्तपत्पूर्व परमवारणम् । आनेतुकामः पृथिवीं गर्गा निश्चलमानसः ॥ २४ ॥ तुष्टास्य तपसा गगा प्रत्यक्ष समुपागता। पप्रच्छ पुत्र किमति तपो घोरं समास्थितः ॥ २५ ॥ गङ्गाको पिपीपर लाने लिये भगीरपने पोर तप किया। प्रत्यक्ष सामने आकर प्रसन्न गङ्गा पूछने लगी, पुत्र! क्योंतप कर रहे हो ? ॥२४-२५॥ भगीरपः-सद्दिपी लगन्मातः पूर्वनान् दुर्गति गतान् । न हि त्वदीयसंस्पर्श बिना तेपा समुतिः ॥ २६ ।। एसरव फपितः प्राह पूर्यजं भगवानृषिः । ततश्न त्याप्रसादाचं तपो घोरं फरोम्यहम् ।। २७ ॥ पुरा हि सगरो रागा पूर्वजो यतमानसः । शतं संपारयामास तून मोसपरीप्सया ॥२८॥ पजे शततमे मातातपराया। रातो नहार तुरगं पभियं न परे विदुः ।। २९ ।। तपः पाकः - श्लोक:]. स्पन्दवातिकसे हितम् बबन्ध तं समानीय तुरड्गं कपिलाथमे । स्वर्ग चागानिजस्थानाऽच्छेदशाविजित ॥ ३० ॥ भगीरथने कहा-हे माता ! दुर्गतिप्राप्त अपने पूर्वजोका उद्धार करना चाहता हूँ। आपके स्पर्शके बिना उनका उद्धार नहीं होगा। यह बात महर्षि कपिलने हमारे पितामहको कहा था। इसलिये मैं तप कर रहा हूँ। काफी वर्ष पहले की बात है। हमारे पूर्वज राजा सगरने मोक्षार्थ सौ यज्ञ संपादन किया। इन्द्र को भय हुआ कि यह सगर ) शतक्रतु इन्द्र होगा अतः अन्तिम यज्ञमें अश्वापहरणकर कपिलाथममें ले जाकर बांधा । किसीको पता नहीं लगा। स्वर्ग छिन जानेके भयसे मुक्त होकर इन्द्र भी स्वर्ग चला गया ॥२६-३० ।। पुत्रान् पप्टिसहस्राणि सुमत्या जनितान्नृपः । तुरगमपथं ज्ञातुमानेतुं धादिवेश सः॥३१॥ परितोऽनयलोक्याश्वं नीतं पातालमेव तम् । संचिन्त्य घस्नुः पृथियीं वीरा दर्पसमन्विताः ॥ ३२॥ ब्रह्मभारतयोमध्ये गाऽयं सागरोऽभवत् । मृदा घोद्धृतया तस्मात् पर्वताः संप्रणजिरे ॥ ३३ ॥ राजा सगरने सुमति नामकी पत्नीसे उत्पन्न अपने साठ हजार पुत्रोंको घोड़ेके रास्तेका पता लगान और लानका आदश दिया। चारो ओर देखनेपर उन्हें लगा कि अश्वको अवश्य पाताल ही ले गये होंगे । और वे पृथिवी खोदने लगे। बर्मा और भारतको सटी हुई भूमिको खोदकर उन लोगोंने सागर ( बङ्गालको खाड़ी ) बनाया। वहाँसे उठी मृतिकासे पर्वत बन गये ।। ३१-३३॥ चिन्वन्त एवं संप्राप्ता आथम सगरात्मजाः। कापिलं यत्र सेऽपश्यन् बद्ध ताततुरङ्गमम् ॥ ३४ ॥ निमीलिताक्षमालोक्य कपिलं ते परस्परम् । उज्जगुहंयचौरोऽय मोतस्तिष्ठति साधुयत् ॥ ३५ ॥ हन्यतां हन्यतामेष न दयामयमहीत। एवं कोलाहले ने महपिपदमीलयत् ।। ३६ ॥ इसप्रकार ढूढते हुए मगरपुत्र कपिलआश्रम पहुंचे तो वहां पोडेको बधे देखा । आख मुदकर बैठे हुए कपिलको देसकर वे आपस में बोलने लगे-देखो यही चोर है, अय भयके कारण साधु जमा चैठा है। मारो- २०२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तदश मारो इसे। यह दयापान नहीं। उसी कोलाहलमें महपिने आंख खोल कर देखा ॥ ३४.३६॥ तदीयकोपनिष्पन्नो दावोपममहानल। सर्वास्तान मस्मसाच्चके दृप्तान सगरसभवान् ॥ ३७॥ अनाजसमिदं प्राह भगवान् बादरायणिः। यतात्मनां कथं क्रोधो मुक्ताना भवितुं क्षमः ॥ ३८॥ किन्तु पातकचिन्तापि विमुक्तान प्रति पातकम् । तत्पापेनैव ते दग्या स्वयमेवावलेपिनः॥ ३९ ।। भगवान कपिलकी आखोंसे क्रोधदावाग्नि प्रकट हुई । उममे सभी सगरपुत्र भस्मीभूत हुए । शुकदेवजी कहते है कि क्रोधाग्निकी कथा अयुक्त है । जितेन्द्रिय युक्त पुरुषको क्रोध नहीं होता। वास्तविकता यह है कि मुक्तपुरषके प्रति पाप सोचना भी पाप है। उसी पापसे अहकारी सगरपुत्र स्वय जल मरे ।। ३७-३९ ॥ असमञ्जसनामातीत्केशिन्यां सगरात्मजः। बिरग्य शिश्रियेऽरण्य तत्पुप्रस्त्वंशुमान् स्मृतः ।। ४० ।। नाश सगरपुत्राणां पितृष्याणां निशम्य सः पितामहहिवाशसुतोऽन्येायतु राजा सगरके ही केशिनी नामकी दूसरी पत्नीमे असमञ्जस नामप एक पुत्र हुआ था। वह विरक्त होकर जगल गया । उसका पुन अशुमान् हुआ। पितामह (सगर) का हित चाहते हुए अशुमान् पोडा दूढने निकला ॥ ४०-४१॥ पितृम्पसातमागंण सोयगारकपिसाधमम् । महार समालोषम मुनि स प्रणतः पदोः॥ ४२ ॥ नीयतां तुरग शाहृत आपोयतां ममः । दरयुक्त फपिलनेदमसुमागाह सावित् ॥ ४३ ।। यहामि शिरसादेश मवन्त प्रार्थयामि च । एषां मम पितृप्पाणामुद्धाराय दया पुर॥ ८ ॥ एतेषां पुनरवारो गङ्गायाः स्पर्शतो भवेत। परनं तदर्यमाघेहीत्युपरया मौन मुनिः स्थित. ॥ ४५ ॥ अपने पितृव्योंके खोदे गये मागमे अनुमान यपिलाश्रम पहना । महातेजस्वी एपियो प्रणाम दिया। जब पापिलने रहा-पोट को जालो और प्रश पूर्ण मरोतो मारता अशुमान बोला-भाया । आपरा हयम् ।। ४१॥ .

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् आदेश मैं मस्तक पर धारण करता हू, प्रार्थना इतनी है कि मेरे इन पितृव्योके उद्धारके लिये दया करे। इनका उद्धार गगाके स्पर्शसे होगा तदर्थ यत्न करो इतना कहकर ऋपि मौन हो गये ।। ४२-४५ ।। यतमानोऽप्यसिद्धार्थोऽशुमान् कातवशं गतः। तत्पुनो मजनपिता दिलीपोपि तथा गतः ॥ ४५ ॥ अहं तु भवती देवीमानेतुं कृतवान् तपः : अवतीर्य भुव गङ्गे पूर्वजानः समुद्धर ॥ ४७ ॥ प्रयत्न करनेपर भी असफल होकर अशुमान कालकवलित हुए। तथा मेरे पिता दिलीप भी असफल ही रहे। मैंने आपको लानके लिये तप किया । अब हे गगे ! आप हमारे पूर्वजोका उद्धार करो॥ ४६-४७ ।। गङ्गाः-सत्यं राजन् द्वमिदं चिन्तनीयं तु विद्यते। पृथ्वीविदारणं वेगं मन को धारयिष्यति ॥४८॥ कि चामृजन्ति वृजिनं मयि पातकिनो निजम् । तवघं मास्मि फुत्राहं राजन्नेतद्विचिन्तय ॥ ४९ ॥ गगा बोली हे राजन् ! दो बात यहा मोचनेकी है, एक यह कि पृथवीको फाड डालनेवाले मेरे वेगको कौन थामेगा ? दूसरी यह है कि पापी अपना पाप मुझमे धोकर गिरायेंगे उस पापको मैं कहा घोऊगी || ४८-४९ ।। साघवो न्यासिनः शान्ता अमिष्ठा लोकपावनाः । हरन्त्यष तेङ्गसङ्गात्सेप्यास्ते हामिद्धरः ॥५०॥ हर एव परं घोरं वेगं ते धारयिष्यति । इत्युक्त्वा ता तपश्चके हराय स मगौरथ ॥५१॥ शान्त ब्रह्मनिष्ठ सतसन्यासी परमपवित्र होते हैं। अपने अगमससे वे आपके पापको जला देंगे। क्योकि उनमे अघदाकारी हर बैठे हैं । भगवात हर ही आपके घोर वेगको भी धारण करेंगे । इतना पहकर भगीरथने शकरकी तपस्या की ॥५०-५१ ।। तपसा भगवास्तुष्टः प्रायितश्च महीक्षिता। वेगं पारयितुं तस्याः स्वीचकार महेयरः॥५२ ।। तपसे पाकर भगवान सतुष्ट हुए और भगीरथयी प्रार्थनापर गगावेगको धारण करनेके लिये भी राजी हो गये ।। ५२॥

.
-
.
२०४
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तदशः
ज्ञात्वैरद गविता गङ्गा फथं मां धारयत्यसो ।
पृथ्वीमुत्पाटय पास्यामि पातालममुना सह ।। ५३ ।।
इति व्यवसिता घोरं वेगमास्थाय साऽपतत् । .
जटा फटाहसंकाशां विधायातिष्ठदीश्वरः ॥ ५४॥
यह जानकर गंगा गर्वरी बोली:-शंकर मेरे वेगको कैसे धारेंगे ? मैं
पृथवीको फाड़कर शकरके साथ पाताल जाऊगी । ऐसा निश्चय कर
अतिवेगसे वह नीचे की ओर चल पड़ी। शंकरजी भी कढाईके समान जटा
बनाकर खड़े रहे ।। ५३-५४ ॥
वियव्यापी०
सा वियद्व्यापिनी तारागणदिगुणितप्रमा।
फेनोगतज्जटायां लघ्वी पृषतयत् स्थिता ॥ ५५ ॥
संभ्रमेण भ्रमन्ती तरगततिबन्धुरा
नायकाशं विनिमंन्तु गङ्गा लेभे जटान्तरात् ॥ ५६ ।।
आकाशव्यापिनी फेनबुद्दोंके उद्गमसे तारागणोंसे दुगुनी प्रभावाली
वह गंगा शंकरजीकी जटामें एक छोटी वूदके समान रह गयी । बाहर
निकलनेके लिये संभ्रमके साथ जटामें घूम रही थी । लहरोंसे शोभायमान
हो रही थी। किन्तु जटाके अंदरसे बाहर निकलनेके लिये उसे मार्ग
नहीं मिला ।। ५५-५६ ।।
सन् दृष्ट्या हन्त पिप्टोऽहमेतरकलहमध्यगः ।
नालसि गङ्गामिति स पुनरेव तपोऽतपत् ॥ ५७ ॥
तुष्टो भगीरथस्ययं प्रयत्नेन महेयरः ।
का यान्छा तेऽधना पुत्र तद्ददामोत्यवोचत ।। ५८ ॥
यह देखनार भगीरथने कहा-हाय इन दोनोंके कलहके बीचमें
मैं पिस गया। गंगा मुझे प्राप्त नहीं हुई। भगीरघने फिरसे तप किया।
भगवान शंकर भगीरथपर पुनः प्रसप्त हुए। बोले कि हे भगीरथ ! अब
तुम्हारे मनमें क्या इच्छा है उसे मैं देता हूँ ।। ५७.५८ ॥
प्रमो यदर्थ तप्तोऽहं गङ्गा लब्धान सामया।
बिन्दुवस्वग्जटास्वेया सोनेर परिहश्यते॥ ५९॥
तन्मे प्रसीद भगवन् समुदत स्यपूर्यशाग।
इत्युक्तो व्यसृजल्लयामेको धारा महेश्वरः ॥ ६ ॥

श्लोकः] स्सन्दवातिकसहितम् २.५ भगीग्य दोला-प्रभो! जिसके निमित्त मैंने :प किया वह गंगा मुझे प्राप्त नहीं हुई। वह तो बिन्दुके समान आपकी जगमें समायी हुई दीख रही है । अतः आप मा पर प्रसन्न हों जिससे मैं अपने पूर्वजोंका उतार करूं। इस प्रकार कहनेपर शंकर भगवानने अपने मस्तकरो गंगाषी एक छोटी धारा नीचेकी ओर छोडी।। ५९.६०॥ तामादाय ततो गङ्गा गङ्गाद्वारा दिमागतः। फपिलायममागास या दग्धाः स्वपूर्वजाः ॥ ६१॥ प्लायितायां च तद्भ,मौ तरसा सगरात्मजाः । दिध्यान देहान् सामाम्याय स्वर्याता दिव्ययचंसः ॥ १२ ॥ एक धागरूपी उस गंगाको लेकर गंगाद्वार (हरिद्वार) आदि मार्गसे भगीरथ कपिल आश्रम पहुचा, जहा उनके पूर्वज सगरपुत्र जल गये थे। जव वह भूमि गगाजलसे प्लावित हुई उसी वक्त सगरपुत्र दिव्यशरीर धारणकर दिव्य तेजोयुक्त होकर स्वर्ग चले गये ॥ ६१६२ ।। भागीरच्या तया गर्ताः सगरात्मजखानिताः। पूरिताः सफला एवागरस्यपीताश्च यायः ॥ ६३ ॥ उसी भागीरथीगे सगरपुत्रोके सोदे गनं भरकर सागर बने और अगस्त्य के द्वारा पीत जलहीन सभी समुद भी भर गये ।। ६३ ।। जगद् डोपामारं यदीयधारया लघ्या द्वीयाकारमिदं जगत् । कृतं पयोधिवलयं साधारा कीदृशी भवेत् ॥ ६४ ॥ सप्तद्वीपवती पृथ्वी सप्तसागरवेष्टिताः । सप्तसागरतोयानि गङ्गाधारोद्भवानि यत् ॥ ६५ ॥ जिसकी एक छोटी धारासे यह पृथवी द्वीपाकार हुई मानो पृथवीने सागरका वलय पहन लिया, वह धारा कैसी, यह अदाजा म्वय लगा लो। साल सागरोसे वेष्टित होनेमे यह पृथवी सप्तद्वीपवती कहलाती है और मात. मागरका पानी गगाकी उस धारासे उत्पन्न है । इस दृष्टिको रखकर अंदाजा करो ॥ ६४-६५।। यदीया सा लघुर्धारा मूलगङ्गा कियत्यसो । या निनीपति पातालं सप्तद्वीपयती भुयम् ।। ६६ ॥ जिसकी एक छोटी धारा सात समुद्र वनाती है वह मूलगगा क्तिनी बड़ी होगी, यह सोच लो। यह ध्यान रखते हुए कि वही गगा सप्तद्वीपवती श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तदशः पूरी पृथवीको (और . शंकर को भी) पाताल ले जाने को सोच रही थी ।। ६६ ॥ अनुक्तसिद्धा सा हि वियव्यापिनीति मनीषिणाम् । कथं प्लावयितुं पृथ्वों प्रयतेतातथाविधा।। ६७ ॥ विना कहे ही गंगा वियव्यापी है यह बुद्धिमानोंके सामने सिद्ध होता है । अन्यथा वह पृथवीको डुबाने का प्रयत्न ही कैसे करती ? ॥ ७ ॥ साजटायां भगवतः शंभोः पृषतवस्थिता । वियतोऽप्यधिका सिद्धा जटाऽतोऽस्य भविष्यति ॥ ६८॥ वह गंगा शंकर भगवानकी जटामें बिन्दुके समान रह गयी । अत- एक जटा,आकाशसे भी अधिक सिद्ध होती है ।। ६८॥ व्योमकेशो भवो भीम इति कोशेषु दर्शितम् । व्योम्नि गङ्गा जटायां चेज्जटा व्योमेति गम्यते ।। ६९॥ शंकरजीके नामोंमें व्योमकेश नाम भी आता है। व्योम ही जिसका केश हो रही व्योमकेश है। ठीक है। व्योम में गंगा वतायी। इधर जटामें गंगा बतायी । तब व्योम और जटा एक सिद्ध हुए ।। ६९ ॥ ननु च व्योमकेशंक्ये व्योमव्याप्ता सुरापगा। कयं दृष्टा पपतयत् केशे तव्यापिकापि यत् ॥ ७० ॥ उचातेऽनान्तरिक्षं हि वियच्छदविक्षितम् । पृथ्योस्वर्गान्तरातत्यं व्योम तु च्यापफ नमः॥ ७१॥ शका होगी कि व्योम और शंकरकेश एक है तो व्योमव्यापक जो हो वह केशव्यापक होना चाहिये । तव जटारूपी केश विन्दु के समान क्यों कह रहे है ? इसका उत्तर यह है कि वियद्व्यापीमें वियत् का अन्तरिक्ष अर्थ है। पृथवी और स्वर्गके मध्यस्थानको अन्तरिक्ष कहते हैं । व्योम व्यापक आकाशका नाम है ।। ७०.७१॥ शिरो पारयते फेशान् बिभर्तीशशिरो नभः । अम्परान्तपतेाऽतोऽक्षरं कृत्तिवाससः ।। ७२॥ मस्तक केशको धारण करता है। मंकर मस्तक व्योमरूपी केश धारण करता है । "अशरमम्बरान्तधृते " से शिवमस्तक अक्षरग्रहा ही है ॥७२॥ अम्यरान्तपरं कस्मादल्पं स्याद् नगवपुः। सिद्ध ततस्तद्वपुषा परिपूणमुपायत ।। ७३ ॥

श्लोकः]
स्पन्दवातिनसहितम्
२०७
भक्त्यर्थमल्पपद् दृश्यमर्वाचोनप
शिवः।
प्रादुर्भाययते तुर्यप्राप्तये करुणानिधिः ॥ ७४॥
आकारापर्यन्त सबको धारण करनेवाग शकरका शरीर क्यों अल्प
होगा? अतः उस वपुमे परिपूर्णकी ही उपासना होती है। भक्तिके
लिये अल्पवत् साकारवत् अपने को अर्वाचीनरूपेण भगवान प्रादुर्भूत
करते है । वे करुगासागर तुरीयकी प्राप्ति करानेके लिये ही ऐसा
करते है ॥ ७३.७४॥
व्यापक फरणासिन्धुमर्वाचोनपदस्थितम् ।
भक्तोद्धारकनिरतं वन्दे गङ्गाधरं हरम् ।। ७५ ॥
व्यापक होते हुए भी करुणानिधान भक्तोद्धारार्थ अर्वाचीन
अल्परूपमे स्थित दीखते है । ऐसे गगाधर शकर भगवानकी हम वन्दना
करते हैं । ७५ ॥
इति धी काशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतौ ।
महिम्न. स्तोत्रवियतो स्पन्दः सप्तदशो गतः॥ १७ ॥

ग्रदतः ॥१॥ अष्टादशः श्लोकः सर्वव्यापकतेशस्य पूर्वश्लोके प्रमापिता। गङ्गावृत्तान्ततः पुष्पदन्ताचार्येण भूमंय चश्यते प्रारर्वाचीनपवात्मना। ध्यापकर पवे तस्मादर्वाचीनेऽपि गम्यते ।।२।। सर्वाधीश्वरता तस्मिन्नधुना प्रतिपाद्यते। सापि पूर्ववदेयास्मितर्वाचोनेऽपि बुध्यते ॥३॥ पूर्व श्लोकमे गंगावृत्तान्तमे पुष्पदन्ताचार्यने शंकर भगवानको सर्वव्या- पकता प्रतिपादित की । अर्वाचीनरूपसे भूमाका ही दर्शन होता है । अतः अर्वाचीन पदमें भी व्यापकता अनुभूत होती है । अव इस श्लोकमें परमेश्वरकी सर्वाधीश्वरता बतायेंगे। वह भी अर्वाचीन पदमें भी पूर्ववत् ज्ञात होता है ।। १.३ ॥ चके रयादीन् क्षोण्याछः सर्वस्यातो विधेयता। सर्वाधीश्वरता तेन शम्भोनिगवभाषिता ।। ४ ।। रथादिकरण सोण्यादिभियन दृश्यते । यथास्थितेरिति पुनस्तबाप्पाश्चयं मूजितम् ॥५॥ क्षोण्यार्दील्लेशतोऽप्येय देवोऽपरिणमय्य हि। रथादीनिमिणोति स्म किमानयमतः परम् ।।६।। लोतंय तषियं शम्नोस्तच्चाचायण भाषितम् । विधेयः स क्रीडन्त्य इत्येवं यदता स्फुटम् ॥ ७॥ जगनिर्माणमायेवं सीलामा महेशितुः। ययास्थिते प्राह्मणीति तदप्येतेन सूचितम् ॥ ८॥ रयायाफारतो व सोप्याचा परिणमिरे । ग्रामः परिणामित्ययादोऽनेत निराहतः॥९॥ पृपयी आदिको रथ बनाया तो सिद्ध हुआ गै पृथवी आदि सभी गंकरके स्वामीन है, अत. सर्वाधीधरता गप्टोक है। पृथवी यादिंगे रयादि और किसीने नहीं बनाया । उसमें और विशेषता यह है कि स्पादि बननेपर भी पृथिवी आदि जैसे थे घरो ही रहे । भिती आदि लोग श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् रहते थे। उससे कोई परिणामादि नही हुआ और रयादिवन गये। इससे बढ़कर क्या आश्चर्य होना चाहिये। कहना पड़ेगा कि भगवानकी यह लीलामात्र है। यही बात "विधेयः क्रीडन्त्य" से पुष्पदन्ताचार्यने कहा। विधेयपदसे स्वाधीनता सूचित होती है और क्रीडन्त्यःसे लीलामात्रता । वैसे ब्रह्ममें कोई परिणाम नहीं होता यह भी सूचित होता है। रथादिके रूपमें पृथवी आदिका परिणाम नहीं हुआ । अतएव ब्रह्मपरिणामवाद निरस्त होता है ।। ४.८ ।। रथः क्षोणी यन्ता शततिरगेन्द्रो धनुरयो रथाङ्ग चन्द्राको रथवरणपाणिः शर इति । दियक्षोस्ते फोऽयं त्रिपुरतणमाउम्बरविधि- विधेयः क्रीडन्स्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ॥ १८॥ पृथवीको रथ, ब्रह्माको सारथि, सुमेरुको, धनुप, सूर्यचन्द्रको रथचक्र और विष्णुको वाण जो बनाया, त्रिपुरस्पी तृणको जला डालनेका यह आडम्बर मात्र नहीं तो क्या? हाँ, अपने स्वाधीन उपकरणों से लीला करनेवाली ईश्वरेच्छाये पराधीन नहीं होती ॥१८॥ तारफस्य सुतो ज्येष्ठस्तारफाक्षाभिधोऽभवत् । प्रवरी कमलाक्षश्च विद्युन्माली च तत्सुतौ ।। १०॥ तपस्पनो विधिस्तेभ्यो विश्वकर्मविधापितान् । प्रादाद्विमानान् सौवर्णराजतायसलक्षणान् ॥११॥ एते वर्षसहस्र हि संगच्छन्ते परस्परम् । तदैकेनेषुणा भिग्वादसंभवरथस्थितः ॥ १२॥ मध्याह्नाभिजिते काले पुष्यस्येन्दौ पुराणि यः। स मृत्यु पितास्माकं नान्यथेति महासुराः ॥ १३ ॥ सर्व प्रैलोक्यमुत्सार्य प्रविश्य नगराणि ते। कुर्वन्ति स्म महदाज्यं शिवमार्गपरायणाः ॥१४॥ तेषु सन्ति विमानेषु वाप्युधानवनादयः। प्रासादनगरनामा विप्रादींस्ते न्यवासयन् ॥ १५॥ तारकासुरके तीन पुत्र हुए। तारकाक्ष बडा था। कमलाक्ष तथा विद्युन्माली छोटे थे । अमरतारे लिये उन्होने ब्रह्माकी तपस्या की। किन्तु वह दुर्लभ होनेसे ब्रह्माने तीन विमान जो विश्वकर्माके द्वारा निर्मित थे उन्हे दिये । सुवर्णमय, रजतमय और लोहमय ऐसे तीन विमान थे। एक- हजार वर्ष में ये तीनों मिल जाते है (एक लाईनमें आ जाते हैं ) । तब १४ २१० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [अष्टादशः पुनः। मध्याह्नमें अभिजित मुहूर्त में पोपमासमें असंभवरयमें स्थित होकर एक ही बाणरो तीनोको जो तोडेगा वही हमे मारेगा यह वर प्राप्त हुमा । यह सोचकर तीनो लोकोको किनारे कर ( जीतकर ) महान राज्य उन्होंने किया। साथ ही वे शिवपूजन भी करते रहे। उन विमानोमे तलाब, बगीचे, जगल, प्रासाद, नगर, ग्राम आदि सब थे । ब्रह्मणादि वर्णाश्रमवाले भी रहते थे ।। १०-१५॥ तपपूतहृदोऽप्येते प्रथम धर्मतत्परा.। शनैरसुरसामेव प्रायुदेवादिमदिनीम् ॥ १६ ॥ दुर्जनः साधुसां नैति शिक्ष्यमाणोपि सर्वथा। पयोप्तस्नु तो निम्बः कटुकस्यं न मुञ्चति ॥ १७ ॥ अभिभूतस्वभावोऽपि पूर्व भावं मजे उष्णाम्भ. शीततां याति स्वमायो दुरतिशमः ॥१८॥ अन्ययाकारितोऽप्येव याति स्वाभाविकी गतिम् । प्रकृति यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ।। १९ ।।। तसे पवित्र हृदय होनेपर भी त्रिपुर धीरे धीरे असुरताको ही प्राप्त हुए। कितने ही शिक्षित करो फिर भी दुर्जन साधु नहीं हो सकता । दूध, घी सोचनेसे नीम कही मोठी होती है ? हा. कभी स्वभाव अभिभूत होगा। जैसे अग्निपर रखनेसे जलका । किन्तु फिर वह अपने आप ठढा होता है। क्योकि स्वभावका अतिक्रमण नही हो सकता । थोड़ी देरके लिये अन्यथा हो जाय, पर तुनः प्रवृतिको प्राप्त होगा । निग्रह व्यर्थ सा होगा ॥१६-१९॥ आसुरं भावमाभिरय चिक्षिपुस्तेऽसुरा. सुरान् । मवितास्तेऽखिला देया ब्रह्माण शरणं ययुः ॥२०॥ से विष्णमुपसंजग्मुर्देवाः सपः सयेषसः। प्रसामध्यं निजं तेषां भेदने विष्णरयोत ॥ २१ ॥ मिलित्या ते समायाता फैलास घाम शुलिनः । तुष्ट्रयश्चातनादेन रक्ष रक्षेति भाविण ॥२२॥ आसुर भावमे माकर उन लोगोने देवनायोको उखाड़ फेंका। असुरो से मदित देवता ग्रहासी गरणमे गये। वे वहासे विष्णुके पास गये । विष्णने अपनी आसमयंता व्यक्त वो तो शकर भगवानके निवासस्थान कलासग आकर वे स्तुति रिने लगे और मातंनादमे रक्षा रक्ष महने लगे ।। २०.२२। .

लोक] स्पन्दनातिनमहितम् २११ तानाह भगवान् शंभुः सान्त्यपस्थितान मुरान् । इमे सम्पवराः पुण्यसेशाजीवन्ति धानयाः ॥ २३॥ दौरात्म्यं तमेतेपो प्रयाणां च सुरद्विषाम् । तेषां शान्ति परिष्यामि प्रतीशध्वमनेहसम् ॥ २४ ॥ अयं तु त्रिपुराध्यक्षः पुण्यवान् यतंतेश्यना । पत्र पुण्य प्रयतत न हन्तप्पो घुधः पवचित् ॥ २५॥ पदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधषु। धमें मयि च विपः सोऽपमाणु विनश्यति ॥ २६ ॥ भगवान गदर सरिवना देते हुए बोले ये वरदानसे और लेश पुण्यसे जी रहे हैं, इनारी दुरात्मतातो मैं जानता हूँ । शान्ति अवश्य करूंगा । किन्तु समयको प्रतीक्षा करनी होगी। पिपुराध्यक्ष तारकाम अभी पुयान है। जिसमे पुण्य है उमका यध नहीं होता। जय देवताओमे, वेदोंमें, गायोमे, ब्राह्मणणोमें, माधुओमे, धर्म और भगवानमे इनका वेप होगा सब शीघ्र. नारा होगा ॥ २३-२६ ॥ इत्युपरवाहिते शंनो देवा इदमधिग्तयन् । कयं मिपुरपुण्यातो भयेनाशो यतोऽस्य हि ॥ २७॥ विष्णुमासा ते सर्व वृत्तमेन्ययेदयन् । किपिद्विचिरप थिएन तत्रोपायमसापयत् ॥ २८॥ असृजन्मुनिं म्लानवस्त्र गुम्फिसमन्वितम् । दघानं पुस्जिका एस्ते चालयन्तं पदे पदे ॥ २९ ॥ इतना कहकर शङ्करभगवान अन्तर्धान हो गये, देवोंने सोचा त्रिपुरो- का पुण्यनारा कैसे होगा। वे पिणके पास आकर समस्त वृत्तान्त वोले । भगवान विगुने कुछ सोचकर एक व्यक्तिको पैदा किया जो मुण्डी, मलि- नाम्बर, गुम्फीपात्रधारी था। पुन्जिका लेयर पद पदमे उसे हिलाता पा।। २७-२९ ।। समाह भगवान् विष्णररिहलामभाग भय । मोहयेमान् दितिसुतान् सर्या स्त्रिपुरवासिनः ॥ ३०॥ पापभाक् स्यामहमिति मा शधिष्ठा स्वचेतप्ति। हर पापहर नित्य स्मर त्व त्रिपुरान्तकम् ॥ ३१॥ अहिंसा परम धर्म लोकानुपदिशाखिलान् । निहते गिपुरे सर्वलोकश्चव प्रसीदति ।। ३२॥

२१२
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[अष्टादशः
इति धृत्वा हरेराज्ञां स ययौ बेपुरं पुरम् ।
मध्वालापेन तवत्यान् वशीचक्रे निवासिनः ॥ ३३ ॥
कर्णाकणिकया तस्य महित्वं त्रिपुरोऽशृणोत् ।
श्रोतु तस्य का सोऽपि समागच्छत् कदाचन ॥ ३४ ॥
उस पुरुषको भगपान विष्णुने कहा-तुम्हारा नाम अरिहनु होगा।
तुम इन त्रिपुरवासियोंको मोहित करो। मुझे पाप लगेगा ऐसी शंका न
करो। त्रिपुरान्तकरूपमें हरस्मरण करो तुम्हें पाप नहीं लगेगा। अहिंसा
परम धर्म है ऐसा उपदेश दो। त्रिपुरवधसे लोग प्रसन्न होगे । वह भी पुण्य
है। इस प्रकार विष्णुआज्ञा शिरोधार्यकर वह त्रिपुरमें आया। मधुरवचनोरी
सबको वश में किया । उपकी महिमा धीरे धीरे पिपुरके कानमें भी पहुंची।
एकबार वह भी कथा श्रवणार्थ आया ।। ३०.३४ ।।
अहिंसा परमो धर्मो नास्ति किंचित्ततः परम् ।
हिंसां वेदोऽपि चेद् यादधर्मः स परातिदः ।। ३५ ।।
सुधामयययोजालरेवं
प्रत्यपादयत् ।
अधापयच्च सन्देहपदं घेदेषु लेशतः॥ ३६॥
अहिंसा परम धर्म है। उससे बढ़कर कुछ नही । परदुःखकारी
हिसाको वेद भी यदि कहें तो भी अधर्म ही है। अमृतमयी वाणीसे इस
प्रकार भापणकर वेदो में थोड़ा मा राशय उसने कराया ॥ ३५-३६ ।।
प्रभावितो माध्यमिकर्दीक्षां स त्रिपुरोऽग्रहोत् ।
शनैः शनैश्च येदेभ्यो विमुखं विपुरं व्यधात् ।। ३७ ॥
अस्ति हिसा क्यचिदे यज्ञादिफरणोचिता।
सवप्रामाण्यमेव स्यात् प्राणिहिंसातिपातकम् ॥ ३८ ॥
मध्यस्थोके द्वारा त्रिपुरको प्रभावित किया और उससे दीक्षा
लियाया। ब्रमश. निपुरको वेदविमुग किया। बोलने लगा-यशार्थ वेदमें
हिंसाका प्रतिपादन है। अतः वह अश अप्रमाण ही है। पयोगि प्राणिहिंगा
अतिपातक है ।। ३७-३८ ॥
येदोक्तमपिलं फौप्यप्रमाणं
सपानकम्।
वेदोक्तफमस्पत्याद् मया हिंसा तय तत् ॥ ३९ ॥
इसके बाद यह और आगे बढ़ा-वेदोक्त मभी पर्म अप्रमाण है।
नयोकि वेदोक्त है । जमे याहिंसा ॥ ३९॥

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् २१३ येदोक्ताः सकला देया अप्रमाणा असत्समाः। घेदोत्तस्यात् यथा कर्म यहिंसादिलक्षणम् ॥ ४० ॥ न यहा न हरिनय शियः प्रामाण्यमहति । साधुविप्रादयो नंय सप्रमाणाः श्रुतीरिताः ॥४१॥ इत्यादि बहधा तस्य युक्त्याभाससमोरितम् । भूत्या समाषणं गीतमाधुर्यमधुरापितम् ॥ ४२ ॥ *विकं विजहों धर्म या पपरपजवरे। कमेष चापतद् ध्यान्ते गतः श्येताम्यरोऽप्यतः ।। ४३ ।। इसके बाद और आगे बढा-वेदोक्त सभी देय अप्रामाणिक हैं, असत् हैं, क्योकि वेदोक्त हैं। जैसे यज्ञहिमादि फर्म । अतएव ब्रह्मा, विष्णु, शिव, साधु. ग्राह्मण आदि सभी अप्रामाणिक है । इस रीति कुयुक्तियोसे नाना यात और गीतमाधुयंयुक्त भाषण सुनकर त्रिपुरने वैदिक धर्म डोग और शायरमे श्रदा कोडी। फमशः यह घोर अघनारमे पडा और श्वेताम्बर माशु भी वहाँसे चला गया ॥ ४०.४३ ॥ रथः क्षोणी....शर इति प्रय सा देवताः शंभु समुपेत्य प्रणम्य च । अधर्मपरतां तेषां त्रिपुराणां व्यजिशपन् ॥ ४४ ॥ तानूचे विवशानीशो विधेसम्धवरानिमान् । हन्तु विधयः संनाहस्स्यसंभवरपाविके ॥ ४५ ॥ संगच्छन्ते किलामूनि सहने हायने सकृत् । पत्र कुमापि च स्थाने भेद्यानि स्पुस्तदेय हि ॥४६॥ स्यन्दनं नीयते तत्र मुहूर्तः स रलिप्यति । सहस्रवर्षीयप्रतीक्षा पुनरापतेत् ॥ ४॥ तस्मान् क्षोणी मवरवेषा सर्वत्र समुपस्थिता । रथोऽस्माकं दविष्ठं न भवेद्यत् पुरमेलनम् ॥ ४८ ।। दुर्घटा तु रथस्य स्यात्तयाप्यभिमुखोकृतिः। सूपचन्द्रावतस्तस्य रथाङ्गे भवतामुमौ ॥ ४९ ॥ असाध्यमपरेषां स्याद् रथस्य परिवर्तनम् । अतः शतधृतिर्यन्ता भवत्येष चतुर्मुखः॥५०॥ धनुर्दनं न युज्येत कालस्तनयने व्रजेत् । अगेन्द्रोऽतः सुमेरियो धनु? भवत्वयम् ॥ ५१ ।। तदा

२१४
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[अष्टदाः
कः शरः स्यादसंध्याप्तः कथं विध्येत् क्षणे परः।
विष्णब्यापक एषोऽस्तु शरस्तेन महारयः ॥५२॥
जव वे असुर धर्मविपरीत चलने लगे तो देवताओंने शङ्करको
समाचार बताया। भगवान शङ्कर बोले-ब्रह्मासे परप्राप्त इन्हें मारनेके
लिये तैयारी करनी होगी। हजार वर्पोमे एकबार ये तीनों मिलते हैं । तमी
इनका भेदन करना चाहिये। इनका मिलन किसी भी स्थानमें हो सकता
है। वहांतका रथको ले जाते ले जाते मुहूर्त टल जायेगा। तब फिर हजार
वर्षकी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी । अतः यह पृथिवी ही रथ हो । जिससे लाने रे
जानेकी खटपट न हो । वह सर्वत्र उपस्थित ही रहेगी। फिर जहाँ पुरत्रयमेल.
न होगा उस ओर रथको अभिमुख करना पड़े शा। वह साधारण पहियोंसे
सम्भव नहीं । अतः सूर्यचन्द्र ही रवचन हो । फिर इस रथको घुमाना साधारण
व्यक्तिका काम नहीं । अतः ब्रह्मा ही सारथि हो । चतुर्मुख होनेसे झट' उनको
दिखाई पड़ेगा कहां पुरमेलन हो रहा है। छोटा धनुष हो तो फिर वही
बात होगी कि इस किनारेसे उस किनारे ले जाने का विलम्ब-होगा। अतः
यह दीर्घ सुमेरु ही धनुप हो । लेकिन एकदेशस्थ बाण को पिपुर तक पहुँचने-
में देरी हुई तो? अतः व्यापक विष्णु ही बाण ही ।। ४४-५२ ॥
বিমী:০
कोऽपमाडम्बरविधिविधक्षोस्त्रिपुरं
तृणम्।
शतवपमलोफिष्टाप्येफदृष्टिरहो
कुतः॥५३॥
सत्यमेपा
महीवेयःप्रभृतीनां महस्पिनां।
विधेयत्वं प्रवर्य स्वा प्रत्यापयति मूमताम् ॥ ५४॥
प्राप्ते मुहूर्ते त्रिपुरे यायवाणं प्रमुञ्चति ।
तावतृतीयनेमोत्यस्त्रिपुरं पायकोऽदहत् ॥ ५५ ॥
त्रिपुरासुर तो तृण घरावर या उसे जलानेके लिये यह सब आडम्बर
क्यों किया? सौ वर्षतक क्यों एकटक देसते रहे ? वात सही है। किन्तु
महाते नस्वी पृषिवी ब्रह्मा विष्णु आदिको ब्रोडाफे रूपमें रयादि बनाकर
शंकरको अपना उत्कर्ष दूसरोंको जताना था। मृहुतं ज्याही आया
नंकरजीने वाण छोड़ा । उसके पहुंचनेसे पहले ही तृतीयनेत्रोत्य अग्निने
त्रिपुरको भस्म कर डाला था। वाणने दग्धको ही दग्ध किपा ।। ५३-५५ ।।
परोक्षमपरोऽप्यों
पुराद्विपतेऽत्र हि।
जाप्रत्स्यानसुपुप्यार पुरप्रयमुदायते॥५६॥

श्लोक: स्पन्दयातिकहितम् २१५ मायाविरचितत्वेन मयनिर्मितमुच्यते। मासुरीमायमापनो जोयः क्रोडति तेष्वसौ ।। ५७ ।। पुरपये क्रीडति यो जीव एप ततोऽखिलम् । विचिनं सकल जातमिति अतिरवोधत ॥५८॥ विना मिपुरवाहं न जीवमावयिनिहतिः। युगपत्नयनाशः स्पादहकारविनाशतः ॥ ५९॥ लवचिन्तादिकं तत्राहम्बर क्रियते युपं.। विज्ञानेनाग्निना दाहस्तेषामेकपवे मवेत् ।। ६०॥ माम सत्यं जगन्मिप्येत्येतायग्जानमोरितम् । लौकिकास्तायता कि स्थाविति सशेरते जनाः ॥६१ ।। तस्मात्सर्वोऽपि शास्त्राथस्तदर्थमुपयुज्यते। सर्योऽध्याउम्परविधि सूच्यते कृत्तिवाससा ॥२॥ यहा परोक्षरूपसे भी कुछ अर्थ विद्वत्सम्मत है । जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति यह पुरमय है । मयसम्बन्धी मायासे ये निर्मित हैं। असुरभाव (अहबारादि ) से जीव इनम सेलता है। "पुरप्रये कीडति यस्तु जीवस्तत सुजात सकल विचित्र" ऐसी कैवल्य श्रुति है। जब तक तीन पुगेका दाह नहीं होता। तब तक त्रिपुरनारा नहीं होता। तीनोमे एकसाथ अहकार नष्ट होगा तो जीयमान नष्ट होगा। लमचिन्तनादि माडम्बर है। जानाग्निसे तीनोका एकसाथ नाश होता है । 'ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या' इतना ही ज्ञान है। किन्तु इतनेमे कैसे लोगोको विश्वास होगा? अत शास्त्रार्थाडम्बर है । यहा सभी आडम्बर सूचित होता है ।। ५६ ६२ ॥ केचित् निपुरलामानमामनन्त्येकमेय हि । अपरे प्रोजगुर्देत्यान् वर्शिताश्वाय ते प्रयः॥ ६३ ।। जीवमेकं वदन्त्येके वेदशास्त्रार्ययेदिनः। प्राजतंजसविश्वास्यास्त्रीनन्ये प्रतिपेदिरे॥ ६४ ॥ श्रीमद्भागवतादिमे ग्रिपुर नामक एक ही असुरका वर्णन है। शिवपुराणादिमे तीन असुर बताये है । जैसे हमने दिखाया भी है । जीव भी एक ही है ऐसा वेदवेत्ता मानते हैं। फिर भी विश्व तेजस प्राज्ञ भेदसे तीन भी मानते हैं ।। ६३-६४ ॥ सामान्यानामपि धियः प्रमूणा न पराधिताः। परमोऽय स्वतन्त्रस्तु भगवान् भूतभावनः ॥६५॥ ? ॥

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[ एकोनविंशः
अपोह्य जीवभावं स जादुद्धरते प्रभुः।
चोद्यं वा परिहारो वा तत्र नास्त्येय कश्चन ॥ ६६ ॥
सामान्य प्रभुकी भी बुद्धि स्वतन्त्र होती है । भूतभावन भगवान
परम स्वतन्त्र हैं ही। जीवभाव मिटाकर वे जगदुद्धार करते है। उसमे
आक्षेपपरिहारादिकी कोई गुंजाइश नहीं है ।। ६५-६६ ।।
लीलाविलासिनो यस्य ब्रह्माद्या वशतिनः ।
कंवल्यदाय शान्ताय नमस्तस्मै पिनाकिने ।। ६७ ।।
लीलामायकारी जिसके वशमें सभी बह्मादि है उस कैवल्यदायी शान्त
भगवान शंकरको हम प्रणाम करते हैं । ६७ ॥
इति श्रीकाशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतौ।
महिम्नः स्तोत्रविवृती स्पन्दश्चाष्टादशो गतः॥ १८॥
सति
एकोनविंशः श्लोकः
सर्वग्यापकतामूचे वियद्यापीत्यतो
मुनिः।
सर्यापीश्वरसामेवं रथः क्षोणीश्यतः स्फुटम् ॥१॥
सर्वकरणसामर्यावासे
भक्तानुपाहितामाह
परमोवारतामपि ॥२॥
"वियव्यापी तारा" इत्यादिसे भगवानको सर्वव्यापकता बतायी।
"रप. शोणी मन्ता" से सर्वाधीश्वरता कही। तय सवंग सबकुछ मारने
सामयं अवगत हुभा तो अब अति उदारताके माप भक्तोपर अनुग्रह
मरनेकी बात बता रहे हैं ॥१२॥
तपश्वयं परिच्छेत्तमिति मोरे हि पाप ।
निजप्रकारानं प्रोक्त फलं स्वानुमहात्मरम् ॥३॥

श्लोक:] सन्दवातिफसहितम् :२१७ किन्तु सामान्यरूपेण तदुक्तं न विशेषतः। अत्रानुक्तरुत्कर्षात् फवोत्कों निगद्यते ।।४।। यद्यपि "तवश्वयं यत्लात्" इस श्लोक में ही "स्वयं तस्थे" से स्वप्रकाशन रूपी स्वानुग्रह बताया। तथापि सामान्यरूपेण वहांपर कहा । "तव किमनुवृत्तिनं फलति'' यह सामान्यकथन है। निजप्रकाशन भी सामान्य है । अब विशेषरूपसे बताना है । अनुवृत्तिके उत्कर्षसे फलमें भी उत्कर्ष बता रहे हैं ।। ३.४।। प्रपञ्च सृजति ब्रह्मा विष्णुस्तमभिरक्षति । सृष्टिस्तु सरला तस्या रक्षा नामातिदुर्भरा ॥ ५ ॥ पुत्रोत्पावनमाञ्जस्या भवेन्नेव तु रक्षणम् । तदर्थ जीवनं वं जनकविनियोज्यते ॥६॥ कुर्वन्ति पशवोऽप्येव तनयोत्पादनं बहु। इयं तु महती सृष्टिप्रक्रियाऽसंशयं विधेः ॥७॥ ईशितुः प्रकृतौ सस्या सामन्या स्यान्महत्यपि । तथा च यंघसी सृष्टिांसामान्या भवेदियम् ॥८॥ अस्ति हि प्रकृतिस्तावच्छक्तिरूपा महेशितुः । रक्षा तु प्रकृतौ सत्यामप्यसामान्यलक्षणा॥९॥ ब्रह्माजी प्रपंचको रचते है। विष्णुभगवान रक्षा करते हैं । किन्तु सृष्टि सरल है। रक्षा दुर्भर है। सभी आसानीसे पुत्रोत्पादन करते है। किन्तु रक्षार्थ अपना पूरा जीवन लगाना पड़ता है। पशु भी पुनोत्पादन करते है। ब्रह्माजीकी सृष्टिप्रक्रिया बड़ी अवश्य है। किन्तु भगवानकी प्रकृति विद्यमान है। अतः वह भी कोई असामान्य नही मानी जा सकती। प्रकृतिके होनेपर भी रक्षा सामान्य कार्य नहीं होती ॥५-९ ।। तथा हि रक्षणं नाम नेष्यते मृत्युशून्यता। जातानाममृनौ लोकस्थितिरेवाऽघटा भवेत् ॥१०॥ तस्माद्रक्षणमन्यद्धि जगतः स्थितिलक्षणम्। पशवः किन जीवन्तीत्यादि चोद्यमसत्ततः॥११॥ रक्षण मरणाभावको नही कहते । उत्पन्न लोग मरेंगे नहीं तो लोकस्थित कठिन होगी। अत. रक्षण दूसरा है । जगतकी स्थिति रक्षा है। अतः पशु भी जी रहे है । रक्षा भी कौनसा बड़ा काम यह प्रश्न सगत नही है ।। १०-११॥

२१८ श्री शिवमहिम्न: स्तोत्रम् [एकोनविंशः विधावनं जगत्पारम्पयंस्थानमिहादिमम् । तघायातप्ततोऽर्यानां समाभ्यः स्याद्विभाजनात् ।। १२ ।। द्विप्रकारकधर्मस्य स्थापनाजगतः स्थिति. द्वितीयमवनं प्रोक्त कार्यमेतद् द्वयं हरेः ॥१३॥ दो प्रकारसे जगद्रक्षण होता है । एक जगत्के प्रवाहको प्रलयपर्यन्त बनाये रखना। वह तभी सभव है जब सवत्मर प्रजापतियोको यथायोग्य अर्थविभाजन करेंगे। (याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्य समाभ्यः) प्रत्येक समयमे जिस वस्तुको उपस्थिति आवश्यक है वह उपस्थित हो तो ही जगत्परम्परा चल सकती है। दूसरा जगत्रक्षण दो प्रकारके धर्मकी रक्षासे ही सभव है। यही कार्य विष्णुका है । १२-१३ ॥ प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च द्विविधो धर्म इरितः। धमंद्र हां विनाशेन तद्रक्षा स्यात्कथंचन ।। १४ ॥ प्रवृति और निवृत्ति ऐसे दो धर्म है । इस धर्मको रक्षा धर्मद्रोहियोके विनाशनसे कचित होती है ।। १४ ।। इवं धर्मद्वयं विष्णुः सांख्ययोगाभिध - पुरा। यिवस्वतेऽमिधायास्य पारम्पयंमयतयत् ॥ १५ ॥ पारम्पविनाशे चावर्तयत्त पुनः पुनः। अवतारं गृहीत्येय - समये समये. हरिः ॥१६॥ पदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भयति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।। १७ परित्राणाय साधना विनाशाय च दुष्कृताम् । पमंसस्थापनार्थाय संभयामि युगे पुगे॥१८॥ इति गीतासु भगया निवमेव स्फुट जगी। हन्ति धरिपो विष्णुहंननं चापि रक्षणम् ॥ १९ ॥ हतोद्धारश्न भयति पर्मोटारश्य यत्ततः। दुष्कृता हननं तस्माग्मामहे जगतोऽवनम् ॥ २० ॥ इन सास्य-योग नामके दो धमोंको सूर्य के प्रति यहकर विष्णुने इसकी परपरा चलायी । परम्पराका नारा होनपर समय ममयपर वाग्वार अवतार लेकर पुन पुन उसे चलाया। "यदा यदा हि धर्मस्य' इत्यादि गीतारलोमि यह स्पष्ट है। धर्मद्वेपियोया हनन भी रक्षण है। एसानो विष्णुरे हापो मारे जानेगे मृतका उद्धार होता है। दूगरा धर्ममा भी उदार होता है । अत दुप्पोमा हनन जगल्या रक्षण ही है ॥१५-२० ॥ ।

1 - स श्लोकः ] स्पन्दवातिकसहितम् ०३१९ शरीरधारणवलेशो हरेस्तहि भवेदिति। मवं स्वेच्छामयी तस्य न तु भूतमयी तनुः ॥२१॥ तब विष्णुको शरीरधारणादि क्लेश भी तो होता होगा? नहीं, विष्णुका इच्छामय शरीर होता है, साधारणोके समान भूतमय नही ।। २१॥ ननु स्वेच्छामयतनुधारणे धर्मरक्षणे। दुष्पदुद्धरणे चैव कुतो शक्तिहरेरभूत् ।। २२॥ तब इतनी वातें सामने आ जाती है--विष्णु भगवान स्वेछामय शरीर धारण करते हैं, फिर उपदेशोंके द्वारा पराम्पर्यप्रवर्तन कर धर्मरक्षण करते हैं, धर्मद्रोही तथा विश्वद्रोही जो पापी होते हैं उनका विनाश तथा उद्धार करते हुए धर्मको नाशसे बचाते हैं और इसप्रकार विश्वकी रक्षा करते हैं । ऐसी स्थितिमे यह प्रश्न उपस्थित होता है कि इतनी सब शक्ति हरिको कहासे प्राप्त हुई ? ॥ २२ ॥ हरिस्ते साहस्र कमलबलिमाधाय पदयो- यंदेकोने तस्मिन्निजमुदहरनेत्रफमलम् । गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चकरपुषा त्रयाणां रक्षाय त्रिपुरहर जागति जगताम् ॥ १९ ॥ भगवान विष्णु प्रतिदिन जो सहस्रकमलार्चन आपके चरणोमे करते थे एकदिन उनमे एक कमल कम निकला तो अपना नेत्र कमल निकालकर चढाया था। वही भक्तिप्रकर्ष मूर्त होकर सुदर्शनचक्र बना और हे भगवन ! तीनों लोकोकी रक्षाके लिये सजग होकर स्थित हो गया ।। १९ ।। उच्यते हरिरीशस्य सहस्रकमलबंलिम् । पदयोरकरोत्तस्मादीशानुग्रह एय स.॥२३॥ उत्तर यही है कि हरि शकरके चरणोंमे प्रतिदिन हजार कमलोसे पूजा करते रहे अत यह सब शिवानुग्रह ही है ।। २३ ॥ अर्वाचीनमनाद्यन्त ज्योतिलिड्गात् पद पुरा। प्रादुर्भूतं तुष्टुवतविधिविष्णू इतीरितम् ॥ २४ ॥ ततश्च मगवान् शम्भुस्ताम्या प-चाक्षर ददो। तं च सप्रणवं ब्रह्मा जपन् सृष्टिमवर्तयत् ॥ २५ ॥ गोविन्दस्तमुपादाय स्वर्गङ्गातीरमाययो। तन स्थित्वा प्रतिदिनं पूजयामास शकरम् ॥ २६ ॥।

२२. श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [एकोनविंशः अनादि अनन्त ज्योनिलिंगसे अर्वाचीनपद शंकर प्रगट हुए, ब्रह्मा और विष्णुने उनकी स्तुति की यह । बात पहले तवैश्वयं यत्नात् में) बतायी। उसके बाद शकग्जीने दोगोंको पचाक्षरमन्त्र प्रदान किया। उसका जप करते हुए ब्रह्माजीने जगत्की सृष्टि की। भगवान गोविन्द मन्त्र लेकर स्वगंगंगाके तौरपर आये और वही स्थित होकर प्रतिदिन शंकर पूजन करते रहे ॥ २४-२६ ॥ हरिस्ते साहलं सहस्र फमसान्येष चिनोत्युपसि संख्यया। सामग्रोमितरां चापि पूर्व संनयति स्वयम् ॥ २७ ॥ स्नात्वा चाकाशगङ्गायां शिवलिड्गं विधाय च । सषोडशोपचारं प्राक् पूजयामास शंकरम् ॥ २८ ॥ सहस्रनामभिः पश्चात् सहस्र कमलान्यसो। अर्पयामास परया भवस्या भक्तागणीहरिः॥ २९ ॥ श्रीहरि प्रातःकाल गिनकर एकसहन कमल तोड़ लाते थे, अन्य सामग्री भी स्वयं तैयार करते थे। फिर आकाशगंगामे स्नान कर शिवलिंग बनाकर प्रथम पोडशोपचार पूजन करते थे। बादमे सहस्र नाम बोलकर समक्ति कमल शकरको चढाते थे ।। २७-२९॥ एकदा तत्परीक्षार्थमुद्दधारकपङ्कजम् । वेद पूजोपवेशने ॥ ३० ॥ सहस्रनाम्नि चरमसुध्चरन् मन्त्रमच्युतः। करण्ड समलोकिष्ट पुष्पशून्यं महामतिः ॥३१॥ तबंधोदहरन्नेत्रफमलं कमलेक्षणः। पदयोनि निःशङ्कमोशितुः ॥ ३२॥ एकदिन परीक्षार्थ शंकरजीने हजार फूलोमेसे एक उठा लिया और इस बातका पता विष्णुको नहीं लगा। महसनाममे अन्तिम नाम मन्त्र बोलकर टोकरी देखी तो वह पद्मशून्य थी। तुरत कमलनेत्र हरिने नेत्रकमल निकालकर शकरचरणोमे चाया ॥३०-३२ ॥ न न्यूनाधिकमानघं नाधिकं पुष्पमाचिनोत् । नोत्यायापरमानषीद दोषः पक्षेषु यत निषु ॥ ३३ ॥ फमवेसी पुष्पपूजा करते, या कुछ फूल पहलेसे ही ज्यादा तोड़कर रसते या तत्काल उठाकर एक पुष्प तोड़ लाते और चढाते, किन्तु कि तीनों पक्षोंमे दोप है अत. ऐसा नहीं किया ॥ ३३ ॥ भगवान् शंकरस्तन अपयामास श्लोकः] सन्दवातिकसहितम् २१ तथा ोकोनमेवाथ पुष्पं स्मादि नाघयत् । न युक्तं तविवं न्यूनपूजाइगविकता भवेत् ॥ ३४ ॥ कसे दोष ? एक पुष्प कम चढाते तो न्यूनपूजा होनेसे अंगविकल हो जाती ॥ ३४॥ ननु च प्रत्यहं पुष्पाण्यधिकं नार्पयत् कुतः। एफनिःसरणेऽप्येय संख्यापूतिर्यतो भवेत् ।। ३५ ।। तलाइ गाधिकताऽपुक्ता स्याउड्गविकलत्यवत् । पयागयिकला या दूपिताऽगाधिकापि च ॥ ३६ ॥ पूजापराधः फयितो न्यूगधिकविधौ नृणाम् । संकल्पः प्रियते तावत् यत्सहस्रायनादिषु ॥ ३७ ।। उल्लद्धपन। संकल्प कार्य पूजादिकं क्वचित् । विचारितमिदं सर्व जरन्मीमांसकंधः ॥ ३८॥ संशय होगा कि रोज दो चार पुष्प अधिक चढाते । पुष्प कम होनेकी नौबत नही आती । उतर-न्यूनाग ठीक नही तो अधिकाग भी उचित नहीं है । जैसे कोई कन्या अगविकल भद्दी होती है तो अधिक अंग ( हाथ मे छ. अगुलि आदि ) होना भी बुरा है। न्यूनाधिक होनेपर पूजापगध होना है। सहसचनादिमे मकल्प पहले पहा जाता है सकल्प उल्लघन कर पूजादि नहीं रिये जाते । ऐसे वृद्ध मीमांसऊन कहा है ।। ३५-३८॥ श्यापोऽभ्ययहरत्यस्याहुति होतुः किलोदिते। शवलोऽस्याहुति तद्वज्जोत्यनुदिते हि यः॥ ३९ ॥ उदितानुविते श्यावशवलाविति या श्रुतिः । तत्राप्रामाण्यमाशङ्कप संख्यावद्भिः समाहितम् ॥ ४० ॥ संकल्प्यानुदिते होतुमुदिते प्रजुहोति यः। श्यायोऽभ्यवहरेदेवमन्यत्र बुध्यताम् ।। ४१ ॥ श्रुतियोमे लिखा है--उदय होनेपर होम करें नो श्याव नामका राक्षस उस आहुतिको खा जायेगा। उदयपूर्व हवन करे तो शवल नाम का गक्षस उस आहुतिको खा जायेगा। उदयानुदय मे हवन करें तो श्यावशवल दोनो राक्षस खा जायेगे । तब हम होम कब करे ? यह श्रुति अप्रमाणिक होगी। इमपर मिद्धान्त किया कि अनुदयमे होम करने का सकल्पकर उदयोतर होम करे तब श्याव सायेगा। वैसे इतर दोनोमे भी समझें ।। ३९.४१॥ तस्य २२२, श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ एकोनविंशः संकल्प्य · होतुमुदित उदितानुदिते यदि । जुयाहिं का हानिरधिकं हि निविश्यते ।। ४२ ॥ तदसन्नाधिकमपि युक्तमर्धाऽप्रमाणतः।, यथासंकल्पमखिलं तेन कार्य मनीषिभिः॥४३॥ सहस्रार्चनसंकल्पे कार्य तावति पण्डितः। नाधिकं नापि च न्यूनमित्येय व्यवस्थितिः ।। ४४ ।। शका-उदितहोम सकल्पकर उदितानुदित होम करें तो अधिक प्रवेश ही तो हुआ, उत्तर-अधिक भी ठीक नहीं। और अर्घ अप्रामाण्य भी होगा, अन सकल्पनानुसार ही सब कुछ करें । सहस्रार्चन सकल्प हो तो न्यून भी न हो अधिक भी न हो, यही व्यवस्था है ।। ४२-४४ ।। अज्ञानादथवा ज्ञानाद्यन्यूनमधिकं कृतम् । तत्सई क्षम्यतां देव प्रसीद परमेश्वर ।। ४५ ।। अज्ञानाद्विस्मृतेन्त्यिा पन्न्यूनमधिकं कृतम् । तत्सर्व, क्षम्यतां वेवि प्रसीद परमेश्वरि ॥ ४६ ॥ इत्यादिकमविज्ञाना क्षमापणमुदीरितम् । क्षमते परमेशान इति स्वम्या प्यवस्थितिः॥४७॥ सुविज्ञस्तु कथ विष्णुरपराधपरो भवेत् । न न्यून लयण सूपे नाधिकं कुशलः क्षिपेत् ।। ४८ ॥ सर्वत्र सगता नोक्तिरधिकस्याधिकं फलम् । अधिकं भोजनं कुर्वन्नामयावी यगो भवेत् ।। ४९ ॥ अल्पप्रकाशे ग्रन्यस्य वाचनं नेत्ररोगकृत् । कि मध्याह्नातपे फुर्यात् तदेतदधिकत्विषि ॥ ५० ॥ "अज्ञानादथया" इत्यादि मन्त्र न्यूनाधिक होनेपर क्षमायाचनात्मक है । भगवान क्षमा भी करते है। किन्तु अपराध कर क्षमा मागना उचित है या सुविज्ञ अपराधसे दूर रहे यह उचित है ? यह विचार कर लो । दालमे नमक यदि कुदार होगा तो न कम डालेगा और न अधिक । “अधिकस्याधिक फल यह उक्ति सर्वत्र नहीं बैठती। अधिक भोजन करें तो रोगी बनेंगे । अल्प प्रकाशमै पुस्तक वाचते रहे तो नेत्र सराव होगा। तो अधिक प्रकाश मध्याह्न सूर्यकी रोशनीमे पढें तो? ॥ ४५-५० ।। ननुमा मूद्भगवतः पूजा न्यूनाधिका श्यचिन । द्विग्राधिकानि पुष्पाणि संचीयन्तां कुतो नहि ।। ५१॥ -1 लोकः] सन्दवातिकसहितम् 7 यद्यावश्यकता जाना योग्यता गिरिजाने । यद्यावश्यकता नास्ति क्षिप्यन्तां जाह्मवीजले ॥५२।। मयं मा कृदयमेतेषां पुष्पाणां जीयनं पया। मा स्म विय्ययताप्येतान् यथा याततरूनिति ॥ ५३॥ भगवत्पूजनारपुष्प: सफलं तपजीवनम् । कोंकरणं तेषां पातकं विषुधः स्मृतम् ॥ ५४॥ माना कि विधिमें न्यूनाधिकता नही होनी चाहिये। किन्तु दो चार फूल फालतू तोड़कर रखनेमे क्या हर्जा है ' आवश्यकता पड़ी तो उससे पूजा कर लो। नहीं तो गंगाजीमे. फेक दो। नहीं । इसप्रकार पुप्पोका जीवन व्यर्थ मत करो। पेड़ोको क्लेश मत पहुँचाओ । भगवानकी पूजा सम्पन्न हुई तो हो पुष्प और वृक्षारो जीवनको सफलता है। अन्यथा केवल उनको दु.ख देना है ॥ ५१-५४॥ पतिप्यन्ति कियरकासे पुष्पाणि जिनं कुतः। त्यहन्सान पतिप्यन्ति तरमासामान्यं विचिन्तय ॥ ५५ ॥ ये फूल आज नही तो कल गिरेंगे, इन्हें वृथा तोडनेमें पाप क्यों होगा' उत्तर है कि तुम्हारे दात कभी गिरनेवाले हैं तो आज ही मार गिरा दं । तो क्या हो ? यही बात यहां भी सोच लो ।। ५५ ॥ ननु न्यूनाधिका मा भूमा भूच्चाधिकसंचयः । एकोने कुन उत्थाय पुष्पं नानीयतेऽपरम् ॥ ५६ ॥ समुत्तिष्ठेन्मध्येपूर्ण आधार शक्तिपूजादिपवित्रावासनाप्नरः ।। ५७ ।। मापद्ध, क्यचिन्मध्यात्यान सायमन भवेत् । सहस्रार्चनसंकल्पे यतेतानुत्थिती युधः।। ५८॥ अच्छा न्यूनाधिक न हो, अधिक पुष्पसचय भी न हो, लेकिन पुष्प कम हो गया तो गगाजीमे जाकर दूसरा तोड लाना था। नेत्र क्यो उखाडने लगे' सुनो। पूजाके बीचमे उठना नहीं चाहिये। आधारशक्ति- पूजनादिसे पवित्रित, स्थापित आसनसे तभी उठना हो सकता है यदि कोई आपनि आ गयी हो । सहस्रार्चनमे तो वैसे भी नही उठना चाहिये ॥ ५६.५८॥ यिष्टरश्रवसः शिष्टाचारेणय यथोचितम् । सिद्ध सकलमेव स्याद् बुधस्तववसीयताम् ॥ ५९॥ तदसन कदाचन। - .

२२४ ye श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [एकोनविंश श्री हरिके शिष्टाचारसे यथोक्त सभी नियम सिद्ध होते हैं यह ध्यान रखें।। ५९॥ गतो भवत्युनेक:० यदुज्जहार नेप्राज भक्त्युद्धकः स शागिणः । स च चक्रवपुयाः जागति जगतोऽवने ॥ ६ ॥ शंकरः प्राददाञ्च यत्सुदर्शनसमितम् । चक्रात्मना परिणता भक्तिरित्येतदुच्यते ॥ ११ ॥ शंकरपूजनार्थ जो नेत्रोद्धरण किया यही श्री हरिका भक्ति प्रकर्ष है। वही भक्तिप्रकर्ष चक्र बनकर जगद्रक्षणमें सजग रहता है। पूजासे प्रसन्न भगवान शकरने विष्णुको सुदर्शन चक्र दिया था। उनको साहित्यिक भाषामे कह दिया कि भक्ति ही चकरुपमें परिणत हो गयी ।। ६०-६१ ।। इदं तु योध्यं नो नेत्रमुद्धरेत् कश्चनापरः। अपवित्रा भवेत् पूजा रक्तप्लावादिहेतुतः ॥ १२ ॥ समयं प्रासीद् गोविन्दो जगद्रक्षाकरो यतः। तस्य नैवानुकरणं नरेणान्येन शक्यते ॥ ६३ ॥ इतनी बात यहां याद रखें कि कोई दूसरा व्यक्ति नेत्र निकालनेका साहस न करे। खून गिरेगा, पूजा अपवित्र होगी। विष्णु जगतरक्षाकारी वने । अतएव पहलेसे वे काफी समर्थ ही रहे । विष्णुका अनुकरण दूसरोके लिये ठीक नही । वे आपद्धर्मको ही अपनावे ॥ ६२-६३ ॥ ननु स्पा दुष्टसहारश्चक्रेण न पुनस्ततः । मद्या हि धर्मद्वयनियन्धना ।। ६४ ।। सत्य सुदर्शन चक्रं सम्यग्दर्शनमेव तत् । धर्मद्वयास्पदं चैतत् सम्यग् दर्शनमिष्यते ॥६५॥ धर्मजिज्ञासया धर्मविज्ञानमुपजायते। ब्रह्मजिज्ञासया ब्रह्मायिज्ञान चोपजायते ॥६६॥ विज्ञानयहेतु; विज्ञानद्वयमेव सुदर्शनमतस्तेन समञ्जमा11६७॥ भक्तिप्रकर्ष चक्र भले हो और उससे दुष्टसंहार भी भले हो, किन्तु जगदक्षा किस प्रकार वह प्रवृत्तिनिवृत्ति धर्मसे होती है । उत्तर यह है कि सम्यक दर्शन ही सुदर्शन है। धर्म द्वय ही सम्यकदर्शन होता है । अथवा धर्मजिज्ञासासे धर्मविज्ञान और ब्रह्मजिज्ञासासे ग्रह्मज्ञान जो होता है वही सुदर्शन है। उससे धर्मब्रह्मवोधनके द्वारा जगद्रक्षण उपपन्न है ।। ६४.६७ ।। जगद्रक्षा वा। जाद्रक्षा माप्यते। श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् २२५ नेत्रं वृष्टिस्स्यया पस्मादपितं भक्तिपूर्वकम् । सुदर्शनं सुदृष्टिस्तु दीयतेऽतो गया तु ते॥६॥ नेत्र अर्थात् दृष्टि भक्ति पूर्वक समर्पित किया अतः सुदर्शन अर्थात् मुदृष्टि देता हूँ ऐमा भगवराय है ।। ६८।। धर्मचामिद किवा चशम्देन धर्मय प्रतिष्ठाय जगतः श्रुतिरब्रवीत् ॥ ६९ ।। अथवा चक्रकी धमंना व्याख्या कीजिये । श्रुतिने धर्ममे ही इस जगतकी स्थिति बतायी है ।। ६९ ॥ परमानुपहो मवरयुदेकसमुनयः। पवं यच्छति सर्योध्वं तस्मै सर्वात्मने नमः॥७॥ भक्तिप्रकर्षसे उद्भ त आपका परम अनुग्रह सर्योध्वं पदको भी देता है । अतएव सरिमा आपको हम प्रणाम करते हैं ।। ७० ।। इति थी फाशिकानन्दयोगिनः कृतिन कृती। महिम्नः स्तोत्र विवृतो स्पन्दो नयदशो गतः ॥ १९ ॥ यस्य विशः श्लोकः परमध्यापितामुक्त्या परमेश्वरतामपि। परमोदारतां चाह फलकृग्रह्मरूपताम् ॥१॥ परम व्यापकता, परमेश्वरता और परमोदारता इन तीनको तीन श्लोकोमें वर्णन किया। अब यहा फलदाता ब्रह्मक रूपमे वर्णन करने जा रहे हैं ॥१॥ उपपत्तेः फलमत इत्यूचे यावरायणः। फलदातृस्वरूपेण ततः संस्तूयते शिवः॥२॥ १५

[विशः
3.
२२६
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
"फलमत उपपत्तेः" इसप्रकार व्यासजीने ब्रह्मसूत्रमें ब्रह्मको कर्म-
फलदाता बताया। उस रूपसे शिवजीकी स्तुति है ॥ २ ॥
नन्वर्वाचीनरूपस्य
स्तुतिप्रकरणे कथम् ।
त्रिपाद्रूपमिदं तावदप्रासङ्गिकमुच्यते ॥ ३॥
न च वाङ्मनसातीतं फलदायपि नेष्यते ।
नेष्यतां तलि तोगधि नार्याचीनपवं तु तत् ॥ ४ ॥
पूर्वपक्षः-- अर्वाचीन पंदकी स्तुति प्रस्तुत है । उस बीच में यह त्रिपाद्
रूपका वर्णन अप्रासङ्गिक है । यदि कहें कि वाणी और मन से परे जोतत्त्व है
वह फलदाता भी नहीं है । न हो । सोपाधि ( मायोगाधिक ) ब्रह्म फलदाता
है। अर्वाचीन पदरूप पद्मासनासीन चन्द्रशेखर शंकर फलदाता है ऐसा तो
नहीं माना गया है ।। ३-४ ।।
सत्यं ब्रह्मव फलवं तद्रूपेण हरः पुनः ।
अर्वाचीनस्वरूपस्थः स्तूयते चन्द्रशेखरः॥५॥
स्वामेव फलटातारं ज्ञात्वा घद्धाय च थुतौ।
कुर्वन्ति धीराः कर्माणि सफलानीति नूयते ॥ ६॥
उत्तर. ब्रह्म ही फलदाता है यह बात यथार्थ है। और व्यामजीके
सूत्रका भी वही अर्थ है । तथापि ब्रह्मस्ससे यहां अर्वाचीनस्पधारी शंकरकी
ही स्तुति कर रहे है। हे चन्द्रशेखर ! भले ब्रह्म फलदासा हो पर तदभिन्न
होनेसे आपको ही फलदाता समझकर कर्मप्रतिपादक श्रुतिमें श्रद्धा बाधकर
धीर मनीपी कर्म करते है और सफल भी होते हैं इसप्रकार यह
स्तुति है ॥५-६ ॥
नन्वयपि नयास्थ प्रसङ्गो घटतेतराम् ।
विशेषत्पे यक्तव्ये ग्रह्मरूपोफ्त्ययुक्तितः ॥७॥
इसप्रकार सोचातानी करके अर्वाचीनरूपपरक बनानेपर भी प्रसंग
नही बैठता। योकि रावण बाणादिको जो रूप दिखाया, जो ताण्डवमें
रूप धारण किया, ऐसे विशेषरूपसे वर्णनके प्रसंग में एका-एक ब्रह्मरूपसे
वर्णन कसे करने लगे ? ॥ ७ ॥
सत्यं प्रासङ्गिको घोऽयं उत्तरपलोकसंस्थितः ।
तदुपोबलनः श्लोकस्तदुपकमरुप्ययम् ॥ ८॥
सतामनुग्रहोतृत्वं पूर्वरतोयो निरपितम्।
अग्निप्रहकारित्यमुत्तस्मिनिरप्यते
॥९॥

श्लोकः] स्पन्दवातिकमहितम् २२७ भयत्पुत्रे पावशाद्विष्णस्त्रिगगनावृता गतः। अषदातुः पुनर्वक्षः स्वनाशायाप्यकल्पत ॥१०॥ फलदोऽपि फलं दूरे निधाय परमेश्वरः। प्रसन्तं दक्षमघवं न्यगल्लादिति संगतिः ॥११॥ फलदस्पेन ब्रह्माभिन्नतया शियः। कमंसाफरयसिद्धपयं स्तूयते मगवानिति ॥ १२॥ ठीक बात है। किन्तु अगले तोक्मे जो प्रासङ्गिक अयं प्रतिपाद्य है उसे मजबूत करनेके लिये उनीमा उपक्रमरुप यह श्लोक है। पूर्वलोकमे सत्पुरुषोंपर शंकरका अनुग्रह होता है बताया और उत्तर श्लोकमे असत्पुरुषों- का निग्रह भगवान गार करते है यह बताया जायेगा। भक्तिप्रकर्षसे विष्णु जगत्याता बने । अश्रद्धालु होनेमे दक्ष जगद्रक्षण तो दूर, अपना भी रक्षण नहीं कर सका । उल्टा अपना नाग कराया यह निदर्शन है। उसके साय इस श्लोककी मगति है। शकर भगवान कर्मफल देनेवाले हैं। परन्तु फलको वात तो दूर, अश्रद्धालु असत्पुरुष कर्मी दक्षका निग्रह हो कर डाला। इसी वातको प्रतिपादित करनेके लिये फलदाताके स्पमे ब्रह्माभिन्न करके शंगरकी स्तुति कर रहे हैं। इसका स्वतन्त्र फल यह भी है कि लोग सकरमें श्रद्धा रखकर कर्म करे, जिमसे उनका कर्म सफल हो ।। ८.१२॥ प्रथमे फलसामान्यं द्वितीये त्यन्ययाफलम् । अन्त्येऽधर्मफलं दण्ड इति श्लोकप्रये फ्रमः॥१३॥ यहा तीन श्लोकोमे प्रथम फलसामान्यदाता बताया। द्वितीयमे अश्रद्धासे अन्ययाफलदायी कहा । तृतीय श्लोकमै अधर्मफल दण्ड देनेवाला बताया, ऐसा क्रमिक अर्थ भी प्रतिपादित है ।। १३ ।। जापरवमसि फलयोगे ऋतुमतां क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधममृते । अतस्त्वां संप्रेक्ष्य क्रतुप फलदानप्रतिभुवं श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥ २० ॥ यज्ञादि समाप्त हो गये तो पश्चात् यज्ञकर्ताओको फल देनेमे आप ही जागृत रहते हैं। क्योकि समाप्त-ध्वस्त कर्म भला पुरुपाराधनके बिना कहा फल दे सकते हैं। अतएव यज्ञादि कर्मोमे कर्मफलदाताके रूपमे आपको देखकर ही श्रुतियोमे श्रद्धा वाधकर लोग कर्म करनेमे दृढतया तैयार होते हैं ।। २० ।। क्रती सुप्त [[विंशः . वयम् ॥१५॥ न २२० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् मातुशब्दस्तु पशेऽपि संकल्पेऽपि प्रयुज्यते । यो यत्क्रतुर्भवति स तत्कर्म कुरुते पुमान् ॥ १४ ।। इति प्रयुक्तः श्रुतिषु संकल्पपरकः क्रतुः ! । 'व्याख्यास्यामस्तदुमयमवैवानुपदं क्रतु शब्दका यज एवं संकल्प दोनों अर्थों में प्रयोग होता है। "यो यत्क्रतुर्भवति" इत्यादि श्रुतिमें क्रतु शब्द संकल्पार्थमें प्रयुक्त हुआ है। दोनोंकी व्याख्या हम यही आगे करेगे ।। १४-१५ ॥ पाठक्रमाद् मवेदर्थक्रमस्तु बलयानतः। द्वितीयपादः प्रथममत्र व्याख्यायते मया ॥१६॥ पाठक्रमसे अर्थक्रम बलवान है। अतः द्वितीय पादकी व्याख्या हम पहले करते है। प्रथम पाद की यादमें ।।१६।। हो मुनो जैमिनिश्चय बावरायण एव च । फलप्रदत्य विपये मीमांसामासतुः स्फुटम् ॥ १७ ॥ दो महर्षि हो गये। एक जैमिनि और दूसरे बादरायण । कर्म करनेपर कौन फलदाता है इस विषयमे दोनोगे सुन्दर मीमांसा की है ॥१७॥ उपपतेः फलमतो लभ्यते परमेश्वरात् । धर्म जमाद फलवमा एप तु जैमिनिः॥१०॥ हेतुतो व्यपवेशाच्च महेशं भादरायणः । लौकिकास्तूमयं प्राहुः समये समपे स्वतः॥ १९ ॥ युक्तिसे यह वात सिद्ध है कि कर्मफल परमेश्वरसे ही प्राप्त होता है । जैमिनिजी कहते है कि युक्तिसे धर्म ही फलदाता सिद्ध होता है। बादरायण व्यास) कहते हैं-युक्ति और ध्रुति दोनोसे ईश्वर फलदाता है। ससारी लोग दोनोको समय सययपर फलदाता कहते हैं ।। १८-९९ ।। सम्ध धनं सुतो लग्यो भगवत्कृपया मया । एवं धगादिसंप्राप्ति भगवरकत का जगुः॥२०॥ कुतो मां नेय वयसे फयं रुजसि मा प्रभो। इत्येवं दुःससंप्राप्तिमपि तत्कनुको जगुः ।। २१ ॥ भगवानकी कृपामे धन मिला, सुन मिला, भगवानने सब कुछ दिया इसप्रकार धनादिदाता स्पगे लोग भगवानको कहत है। हे प्रभो मुझपर दया क्यो नही करते, इतना दुस यमो दे रहे हो, इस प्रकार दुःसदाताले पपमें भी भगवानको यहते है ।। २०-२१ ।।

श्लोक:] स्पन्दयातिकसहितम् २२९ प्रारब्धं प्रपलं तस्य विरोधिषु महत्स्वपि । लग्धं धनादिक सर्वमित्यप्याचक्षते जनाः ॥ २२ ॥ प्रारब्धं स्फुटितं तस्य पतमानोऽपि सर्वथा । लभते न धनादीति दु खेप्याचसते तया ॥ २३ ॥ इसका प्रारब्ध प्ररल है, इतने विरोधी होनेपर भी देखो उसको धनादि मिला। फलानेका प्रारब्ध फूटा है । यत्न करनेपर भी धनादि उसको नहीं मिलता । इसप्रकार भी लोग कहते है ।। २२-२३ ।। प्रयम तु मतं बादरायणोपमुदीर्यते। द्वितीयं तु मतं लोकजैमिनीयं निगद्यते ॥ २४ ॥ ईश्वरने मयकुछ दिया इत्यादि प्रथम मत बादरायणका लोग कहते है। प्रारब्धसे मिला यह द्वितीय मन जैमिनिका सब कहते हैं ।। २४ ।। समाह जैमिनिस्तावन् विना कर्मेश्वरः फलम् । न दातुमहंसि तदा वैषम्यादिः प्रसज्यते ।। २५ ॥ ननु वैषम्यनेण्ये न स्तः सापेक्षभायतः । कर्मसापेक्ष एवासौ फलदातेति चेन्न तत् ॥ २६ ।। एवं सति हि फर्मेव फलं सर्व प्रदास्यति । कि प्रयोजनमीशेन मध्यानीतेन विद्यते ॥ २७ ॥ इस विषयपर जैमिनीजी कहते हैं-विना कर्म यदि ईश्वर फल देने लगे तो पिसीको सुख किसीको दुख इसप्रकार विषमता, निर्दयता आदि दोप ईश्वरमे आयेगा । यदि कहते हैं-कर्मसापेक्ष होकर कर्मानुसार ईश्वर फल देता है, अत ईश्वरमे विषमता निर्दयता आदि नहीं है, तो कर्म आपको भी मानना पडा, तब वही कर्म फल दे देगा, बीचमे दलालके रूपमे किस- लिये ईश्वरको लाते है ॥ २५-२७ ॥ प्रवाह सम्यगालोच्य भगवान् बादरायणः । हन्त क्य कर्म प्रध्यस्तं फलं वातुं समहति ॥ २८॥ दिनमासादिसमयकृतं थर्म प्रध्वंसते न हि ध्वस्त फलदं फर्न समवेत् ॥ २९॥ पादसंवाहनं यावत् पुत्रादिः कुरुते तदा। सुखं भवति नवास्ति तत्समाप्तौ तु तत्सुखम् ॥३०॥ प्रश्वादिस्ताडयते यावत्तावत्तस्यास्ति वेदना। समाप्ते ताडने नैव वेदना समयान्तरे ॥ ३१॥ तदेव हि।

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [विशः गष्ट न पारणं कार्य क्वचिज्जनयितुं प्रभु। दग्धा न तन्तयः क्वापि जनन्ति पटादिकम् ॥ ३२॥ दशवर्षान्मृतस्तातः पुत्र उत्पद्यतेऽध तु। इत्येतत्स्व नु दृष्टं वा श्रुतं वा तदुदोर्यताम् ॥ ३३ ॥ इसविषयपर खूब विचारकर बादरायण ने बताया-ध्वस्त कर्म फल कैसे देगा? एक दिनमे, एक मासमे ऐसा किया हुआ कर्म उस सावधि समयमे समाप्त होता है। ध्वस्त कर्म फलप्रद कैसे ? पुत्रादि जबतक पांव दबाते रहे तवतक सुखानुभव हुआ। पाव दवाना छोडा तो वह सुख कहा (जो पाव दवाते समय होता था ) ? डडेसे मारा तो बैलको दर्द हुआ थोड़े समयमे दर्द समाप्त । कारण नष्ट होनेपर कार्य नहीं रहता। क्या तन्तु जल गया फिर भी कपड़ा बन जायेगा? दस वर्ष पहले वाप मरा । आज लडका पैदा होने लगा। ऐसा कही देखने में या मुननेमें आया ॥२८-३३ ॥ भृत्यः कश्रिद्धायनान्तं कृत्वा कर्माण्यतः परम् । सहसा गतवान् गेहमप्राप्येव भृति निजाम् ॥ ३४ ॥ पश्चाद् गेहादुपायातो ति स लभते निजाम । श्रेष्ठी या फर्म वा तत्र वदाति फलमुच्यताम् ॥ ३५॥ तनायं कर्मसापेमो दद्या प्ठव तभृतिम् । न तु कमव, न मृते भूतिः श्रेष्ठिनि लभ्यते ॥ ३६॥ न घ पुप्रादयो वास्तवमाये तु फो यद । चेतनाव पुत्राधाः कर्मोदावरणं वद ॥ ३७॥ एवं संस्मृत्य कर्मशः कर्मसापेक्ष एव रान् । फलं दवाति मगयानिति स्लिप्टतरं मतम् ॥ ३८॥ इस प्रकार ध्वस्त कर्म फल नहीं दे सकता यह बताया। कर्मसापेक्ष परमेश्वर फलदाता कैसे सो सुनो। कोई नौकर एक साल काम करके विना तनवा लिये एकाएक पर गया। कुछ महीनेके बाद परसे यापिस आकर वेतन लेता है तो वहा वेतन देनेवाला सेठ है कि कर्म कहना होगा पर्मसापेक्ष सेठ ही तनषा देगा। कम नहीं देगा। गर्म हो फल देगा ऐसा पदि हठ पर तो पहो सेठ मदाचित् भर गया तो या फर्म फल दे देगा? यदि कहें सेठ नही तो उसके लहो देंगे 1 frrतु ये भी न रहे तो? फर्म तो है । फिर लड़के आदि भी तो पतन है। पेयल फर्म फल देता है 7 श्लोक:] स्पन्दवातिकसहितम् इसका उदाहरण बोलो। इसप्रकार कृत कर्मको स्मरणकर परमेश्वर कर्मसातेक्षतासे फल देते है यही उचित है ।। ३४-३८॥ अत्राह जैमिनिमनिरेप लौकिकयोभवेत् । नियमः कर्मफलयोरदृष्टरहितत्वतः ॥ ३९ ।। घौतयोः फर्मफलपोनयं रोतिरुपेयते। तत्रादृष्टं हि भवति कर्मा द्वारकारणम् ॥ ४० ॥ अस्त्यदष्टं तयाभूतं भौतकर्मसमुद्भवम् । द्वारं वा वारि वा पूर्वक्षणेऽवश्यमपेक्षितम् ॥ ४१ ।। अनुभूतिः स्मृतो हेतुधिनप्टाप्यम्युपेयते। द्वारं तयास्ति संस्कारस्तद्वदप्राप्युपेयताम् ॥ ४२ ॥ इसपर जैमिगि मुनिने कहा-नौकर सेठकी बात लौकिक है । वही पर उक्त नियम लागू होगा। क्योकि वहा अदृष्ट नहीं है। श्रुतिकथित यागादिकर्म और उसके फलमें यह रीति नही मानी जा सकती। क्योकि अदृष्ट (पुण्यपाप) द्वारकारण अलग है। श्रोतकर्मोसे अदृष्ट होता है। द्वार या द्वारि दोमे एक भी हो तो भी कार्य होता है। जैसे अनुभव स्मृतिका कारण है। अनुभव एक साल पहले हुआ, आज स्मरण करते है, वह कैसे? वहा बीचमे सस्कार द्वारकारण है। वैसे यहा भी अदृष्ट द्वारकारण है । तव कर्म भले नष्ट हो, अदृष्टसे फल क्यो नहीं होगा? ॥ ३९-४२ ॥ न चावष्टे प्रमाणं न समस्तीत्यपि सांप्रतम् । श्रुत्यादिवचनाल्लोकव्यवहाराच्च सिवितः ।। ४३ ॥ नामुक्त क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतरपि । अनादृष्टात्मकं कर्म वक्तव्य सकलैरपि ।। ४४ ॥ सूक्ष्मकर्माण्यदृष्टानि नष्टत्वात्स्थूलकर्मणाम् । कल्पकोटिशतस्थानि मोगक्षम्पाणि संजगुः॥ ४५ ॥ गण्डकीवाहुतरणात्करतोयातिलङ्घनात् कर्मनाशाजलस्पर्शाद्धर्मः क्षरति कीर्तनात् ।। ४६ ॥ क्षरना नु को धर्मो न स्थूलस्तदसंमवात् । अष्टलक्षण कर्म स्वीफर्तव्यं बलात्तत ॥४७॥ अनुभवोत्तर सस्कार माना। किन्तु कर्मोत्तर अदृष्ट होता है इसमें क्या प्रमाण ' सुनो। स्मृत्यादि एव लौकिक व्यवहार दोनो इसमे प्रमाण हैं। लिखा है--"करोड़ो कल्प बीत जाय लेकिन भोगे बिना कर्म नष्ट [ विशः २३२ श्री शियमहिम्नः स्तोत्रम नहीं होता ॥" कौन-सा कर्म नष्ट नहीं होता? कर्म जब किया तभी खतम हो गया। वह करोड़ पाल्पतका यया, बादमें एक क्षणतक भी नहीं रहता । अतः पुण्यपापरूपी अदृष्ट ही योटिकल्पपर्यन्त रहेगा। यही कहना पड़ेगा। वही भोगसे क्षीण होता है। दूसरा बचन देखिये-गण्डकी में हाथसे तैरनेसे, करतोया नदी लांघनेसे तथा कर्मनाशा नदीको छूनेसे भी धर्म नष्ट होता है और धर्म करके अपनी प्रशसा करनेसे भी वह नष्ट होता है। यहां नष्ट होनेवाला धर्म कौन-सा है ? यागादि जब किया तभी नष्ट हो गया। वह गंडकीतक कहां पहुंचने वाला है ? अतः अदृष्ट को ही कर्मपदार्थ मानना होगा। ४३-४७ ।। अयं स्वपिति धर्मात्मा पापी शेते विमूच्छितः । किंकर्तव्यविमूढः सन् धार्मिकोऽप्येष तिष्ठति ॥ ४८ ।। इत्येवं बहुधा लोका व्यवहारं प्रकुर्वते । धधिमों कीदशौ स्तां सुप्ते संमूच्छिते स्थिते ॥ ४९ ॥ अदृष्टलक्षणौ तस्माल्लौकिकाः स्ययमजसा । धर्माधौ व्यवहतो यथास्थानं प्रयुञ्जते ॥ ५० ॥ यह धर्मात्मा लेटा है, यह पापी मूच्छित पडा है, यह धार्मिक किंकर्तव्यविमूढ होकर खड़ा है इत्यादि लौकिक प्रयोग होते हैं। निद्रा, मूर्छा, स्थिति आदि समयमे कौनसे धर्म और अधर्म है ? स्थूल कोई धर्माधर्म नही । अतः अदृष्ट ही को लोग आसानीसे बोल जाते हैं॥ ४८-५०॥ अनापि च समाधानं बभापे बादरायणः । क्रतो सुप्ते तवा जाग्रत् फलयोगे महेश्वरः।। ५१ ॥ अदृष्टानभ्युपगमे सुप्ति शो विवक्षितः। सदम्युपगमे सुप्तिरदृष्टाभिमवो मतः॥५२॥ अदृष्टलक्षणं कर्म यदि च क्रतुशब्दितम् । प्रसुप्तं तिष्ठति हि तन्न जाग्रत्प्रायशः सदा ॥ ५३ ।। यदि चैतद्भवेज्जाग्रत् सद्यस्तस्य फलं भवेत् । अमिभूतं पुनस्तिष्ठत्फल्पकोटिशतानि तत् ॥ ५४॥ यवा फर्म भवेज्जाग्रत फल तहि प्रयच्छति । किन्तु को जागरयिता स महेशो न संशयः ॥५५॥ जो अभी जैमिनिमत दिखाया उसका भी समाधान वादरायणने किया। समाधान इसप्रकार है कि व्रतु सुप्त होनेपर जगनेवाला ईश्वर .

श्लोकः]
स्पन्दवार्तिकसहितम्
२३३
है । अदृष्ट न माननेके पक्षमें सुप्तवा ध्वस्त अर्थ होगा। तदनुसार क्य कर्म
प्रध्वस्तं कहा। यागादिकमसे अतिरिक्त अदृष्टको मानते हैं तो सुप्तका
अभिभूत अर्थ होगा। कर्मजन्य अदृष्ट प्राय. प्रसुप्त रहना है। जागृत
हो तो तुरत फल देता । अतः कल्पकोटिशत रहनेकी बात प्रसुप्त अवस्थाकी
है । अदृष्ट ज्यों जागृत होगा त्यो फल देगा। किन्तु जगानेवाला कौन ?
वह परमेश्वर ही अगत्या मानना होगा ॥ ५१-५५ ॥
एतदुक्त भवत्यत्र कर्म सवं जडात्मकम् ।
ययाकालं न हि फल स्वयं दातु समर्हति ॥५६॥
अस्तु सुप्तं न तु ध्वस्तं तथापि फलदं न तत् ।
न हि स्यपन हि पुरुषो दाति धावति भापते ॥ ५७ ॥
तस्मात् फर्मानुसारेण ददानि फलमीश्वरः।
न जागरयितृत्वेनाप्येष कल्प्यो यथा धमात् ।। ५८॥
यहा तात्पर्यार्थ यह है कि अदृष्टको जगानेवाले के रूपमे ईश्वरकल्पना
करनी ही पड़ती है तो ऐसा द्रविड प्राणायाम न कर सीधा ही कहो कि
कर्मानुसार परमेश्वर ही फल देता है। कर्म जड़ होनेसे स्वयं फलदाता
नही है । ययासमय फलदानार्थ जागृत होना उसका अपना काम नहीं ।
और सुप्तपुरुप जैसे चलता, फिरता काम करता नही, वेसे कर्म भी मुप्त
हो तो फलदानार्थ आगे बढ नही सकता । अतः उक्त व्यवस्था ही
उचित है ।। ५६.५८ ॥
उमिनीपत्यसौ साधु कारयन् परमेश्वर ।
प्रसाधु कारयश्च पा-यनिनौषति स प्रभुः ॥ ५९॥
इत्येवं श्रुतिरप्याह फलदं परमेश्वरम्।
तस्मादीश्वर एवं स्याद्यथाकालफलप्रदः॥६०॥
श्रुतिमे व्यपदेश भी है - परमेश्वर ही साधु कर्म कराकर ऊपर
उठाता है । असाधु कर्म कराकर नीचे गिरता है इत्यादि ॥ ५९-६० ॥
पतु कालनिवापेक्षा कर्म स्याकालदं नृणाम् ।
कि तन सुप्तजामत्व वृयाचिन्तनखेदतः॥ ६१ ।।
तदसत् कालभेदोऽस्तु फलदः किं नु फर्मणा ।
न क्वचियभिचारोऽरित तत्तद्धेतुत्ववर्णने ॥ ६२ ॥
यदि हेत्वन्तरं तेऽस्ति
कार्यकारणभावतः।
चेतनस्ते कुतो नास्ति कार्यकारणभावतः ॥ ६३ ॥

[विंशः २३४ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् इसपर हठी मीमासफ कहने लगे कि कम (अदृष्ट) अमुक समय आता है तो फल देता है । अर्थात् बालसापेक्ष होकर वह फल देता है। अतएव धर्मोके सोने की बात करना ही बेकार है। उन हठी भीमासकोको यही उत्तर दिया जायेगा कि अमुक समय ही फल दे देगा कर्मको कारण माननेकी यमा जरुरत है ? 'अमुक' शब्द ऐसा है कि फलपूर्वक्षण फा बाध करायेगा । अन्य क्षण का नहीं । यदि कहते हो कि कर्म और फलका पार्यकारणभाव है तो क्या चेतन और फल का कार्यकारणभाव नही है ।। ६१.६३ ॥ ननु कालस्य हेतुत्वमाम्रादिपु विलोकितम् । तन्न ग्रीष्मादियत् कालं वदानुगतमत्र च ।। ६४॥ महाराज | आम समयपर फलता है, फूल समयपर आता है, पैसे कर्म समयपर फल देगा। काल भी कारण है। जी हा! ग्रीप्मादिकाल फलादिमे अनुगत नियत है। वैसे कर्मको फल देनेमे कौनमा अनुगत काल है ? ( पूरा जीवन कर्मका फल है। प्रत्येक क्षण फलदाता होगई। यहा कोई अनुगमक नही। ) ॥ ६४ ।। मत्र प्राहुजैमिनीया नव्याः पण्डितमानिनः । प्रमागं परम तायच्छ, तिरेव न संशयः॥६५॥ पजेत स्वर्गकामो हि ज्योतिप्टोमेन फर्मणा । कर्मणः स्वगहेतुत्वमत्र स्पष्टमुदीरितम् ॥ ६६ ॥ आवश्यकं द्वारमान तत्र फल्पयितुं क्षमम् । तञ्चादृष्टं न च द्वारमधिर्फ फल्प्यते मुधा ।। ६७ ।। देशकालादिभेदश्व सामान्य कारणं भवेत् । तदमावात सुप्तवत्तु फर्म सतिष्ठते चिरम् ।। ६८ । कुसूलस्थं यथा बीज नाइकुराय प्रकल्पते । क्षत्रकालजलाद्यत्य तदेव कुरुतेऽडकुरम् ॥ ६९ ॥ न चाननुगमो दोषः फलाननुगमस्थितेः। सामन्यहेतुमत्त्वं हि तावता नैव हीयते ।। ७० पुत्रशोकेन मृतये शप्तो दशरथः पुरा । तदेव फलं प्रापदन्यहेत्वनुपस्थिते. ।। ७१ देशकालनिमित्तानि प्राप्य शापः स एव च। रामे वनगते सद्यः प्रापयत्तं निजं फलम् ।। ७२ न

श्लोकः]
स्पन्दवातिकसहितम्
२३५
ईशास्तित्वमतेऽप्येव देशकालाद्यपेक्षिता।
तस्याप्यस्ति न हि स्वर्गमीशो दातोह जन्मनि ॥ ७३ ।।
तस्मान्न फलदातान कल्पनीयो महेश्वरः।
कमेव फलदं सिद्धं श्रुतिप्रामाण्यवादिनाम् ।। ७४॥
अपनेको पण्डित समझनेवाले नवीन मीमासक कहते है-प्रमाण वेद
ही है। वेद कहता है 'स्वर्गकामो यजेत'–यागसे स्वर्ग होता है। उसमे
आवश्यक अदृष्ट द्वारमात्र कल्पनीय है। अधिक द्वारके स्पर्म ईश्वरकी
कल्पना व्यर्थ है । देशकालादि सामान्य कारण है । उसके अभावमे सुप्तवत्
कर्म पड़ा रहेगा। जैसे कोठेमे बीज अकुरको उत्पन्न नहीं करता। खेतमे
समयपर पानी आदि मिलनेपर अकुर उत्पन्न करेगा। देशकालका अननुगम
जो पहले वताया वह दोप नही है । क्योकि फल भी तो अननुगत है । उतनेसे
कार्यकारणभावकी हानि नही मानी जाती । पुत्रशोकसे तुम मरोगे ऐसा
शाप दशरथको मिला तो तुरत पुत्रशोकसे वे मर गये क्या ? देशकालादि
प्राप्त होनेपर वही शाप रामवनगमन होते ही फल गया। ईश्वरास्तित्वमतम
भी तो देशकालादिकी अपेक्षा है। क्या याग करनेपर विना मरे यही स्वर्ग
भगवान दे देते है ? इसलिये फलदाताके स्पमे ईश्वरकल्पना करना निरर्थक
है। श्रुतिप्रामाण्यवादियोको कर्म ही फलदाताके रूपमे मान्य है ।। ६५-६४ ।।
अत्रोच्यते कथं घद्धा श्रुतिवाक्येप जायताम् ।
फलदानप्रतिभुयं विनेति विनिगद्यताम् ।। ७५॥
अतस्तमेव संप्रेक्ष्य फले प्रतिनुयं शिवम् ।
घद्धां बद्ध्वा श्रुतो लोको दृढोत्साहः सुकमंसु ।। ७६ ॥
न चेतनं प्रतिभुवमन्तरोत्तरदायिनम् ।
कश्चित्प्रवर्तते लोके क पच्छेदफले सति ।। ७७ ॥
मीमासको के प्रति सीधा जवाव है कि फल देनेमे प्रतिभू (जामीनदार,
मध्यस्थादि) के विना श्रुतिमे कैसे श्रद्धा होगी ? भगवानको प्रनिभू देखकर
ही श्रुतिमे श्रद्धाकर लोग वैदिक कर्मोंने उत्साही होते हैं । चेतन उत्तरदायी
प्रतिभू के बिना कोई कार्यमे प्रवृत नहीं होगा। निष्फलता हुई तो आखिर
किसके पास जाकर पूछेगे? ॥ ७५७७ ॥
शूलारदं करोति स्म माण्डव्यं राजशासनम् ।
अपच्छत् स यम गरवा तत्र हि प्रतिभूयंमः ।। ७८ ॥
धुतिन्डा जडं कर्म पृच्छेद्वा कतर नरः।
घेफल्य बहुधा दृष्टं कारण हि सत्स्वपि ॥ ७९ ॥

२२६ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [विशः महर्षि माण्डव्यको राजशासनसे सुलीपर चटाया । माण्डव्यने यमरानको जाकर पूछा. मुझे क्यो सूलीपर चढाया। क्योंकि वहां प्रतिभू यमराज है। इधर श्रुति भी जड है, कर्म भी जड है। मनुष्य किसको पूछे जाकर ? कारणों के होनेपर भी बहुधा विफलता देखनेमें आती है ।।७८-७९॥ स्वर्गोऽलम्भीति च हि न दृष्टं फेनापि नैरितम् । कथं तत्र हि विश्वासः शक्यः कमनीषिणा ॥ ८ ॥ श्रुतियक्तीति चेत् कस्माद्विश्वास्या मवति श्रुतिः। नास्तिकोऽसीति चेदाधं प्रश्नस्य निगदोत्तरम् ।। ८९॥ अहिधायपत्य द्धा दण्डेन बलतो भवान् । विभीयकया कि या स्वयं यो नास्तिकायते ॥ ८२ ॥ स्वर्ग मिला ऐसा किसीको याद नहीं, देखा नहीं किसी अनुभवीने बताया नही । तव विचारशील उसपर कैसे विश्वास करेगा? पूर्वपक्षी :-- श्रुति कहती है, मानो। उत्तर :-क्यो श्रुतिपर विश्वास करना चाहिये ? पू:-श्रुतिका अनादर करनेवाले तुम नास्तिक हो । उ० -तुम पहले प्रश्नका उत्तर दो फिर आरोप लगाओ। क्या डडेवे बलसे श्रुतिपर श्रद्धा करवाना चाहते हो? या आरोपको विभीपिका दिखाकर ? ईश्वरको न मानते हुए स्वप नास्तिक वन रहे हो और दूसरेको नास्तिक बोल रहे हो। ८०-८२ ।। ननु चेश्वरवादी स्वमीश्वर दृष्टवान् किम् । पृष्टवान् वाऽऽह स त्वां या कय विश्यासपीति चेत् ? ॥ ८३ ॥ दृष्टवानीश्वरमहं गुरुभिरीरितम् । किन्धीपत्तावता जातो गुरुप प्रत्ययो मम ।। ८४ ॥ गुरधः खलु .मामाहूर्वदृशस्ते महेश्वरम् । पूर्वषयस्तु पप्रच्छुस्ताजगो च महेश्वरः ।। ८५ ॥ अप्टकोटि प्रजप्यापि मन्त्रं तु मधुसूदनः । न लेभे तत्फल तत्र कश्चितिरुपागमत् ।। ८६ ॥ पृष्टः स न फल फस्मानियेयाह वृथा थमः । स त्वाह ब्रह्महत्या ते विनष्टतावता यते ।। ८७ ।। पुनयंतस्य भगवद्दर्शन लप्स्यसे यतित्या च यतिः पश्चाल्लेने दर्शनमश्वरम् ॥८८॥ मगवान् यतिस्पेण संगत्य मधुसूदनम्। रहस्यं म्यगदोदेष चेतनः परमेश्वरः।।८९॥ यथा तत ।

श्लोक:]
स्पन्दवातिकसहितम्
२३७
तथा
स्वर्गको किमीने देखा इसका हम प्रतिवन्दी उत्तर देते हैं-क्या
तुमने ईश्वर को देखा ? उनसे कुछ पूछा ? और ईश्वरने तुमको कुछ जवाब
दिय? कैसे तुम ईश्वरके पियमे विश्वास करते हो? सुनो। हमने
ईश्वरको देखा है निसप्रकार गुरु मोने वर्गन किया। हां अल्पदर्शन हुआ।
इनसे हमे विश्वास हो गया है। गुरु मोने अच्छी तरह देखा । पूर्वषियोने
देखा भी. पूछा भी और जवाव भी पाया । श्रीमन्मथुस्दनजीने आठ करोड
जप किया। फल प्राप्त नहीं हुआ। तो आत्महत्या करनेको सोचने लगे।
तत्काल सन्यासी वहा आये और बोले तुम्हारे जपसे पूर्वकत एक ब्रह्महत्या-
पाप सम प्त हो गया। अदुवारा प्रयास करो मधुसुदनजीते वैसा ही किया
और अन्त : सम्यग् दर्शन पाया । कहते है पूर्वमे यतिरूपसे आनेवाले प्रतिभू
भगवान महेश्वर ही थे ।। ८३-८९ ।।
त्वं तु यूहि मपा दृष्टस्त्रिदिवः पूर्वजहन ।
मैव शक्य
वक्तुमदृष्टफलवादिनः॥१०॥
योगिनोऽपि निराकुर्वन् दिवं च ससुमाययन् ।
घेवल दण्डवलताः श्रद्धापयमि कि श्रुतिम् ॥९१ ॥
अब आप मिमासक महोदय ही बताईए कि आपने स्वर्ग देखा या
जापके पूर्वजोने स्वर्ग दसा जिन्होंने आपको बताया । दोनो ही सम्भव नहीं।
क्योकि स्वर्गको आप दृष्टपल ही नही मानते । यहा तक कि आप सर्वज्ञ-
कल्प योगियोवो भी नहीं मानते। क्योकि तर योगियोके द्वारा अधिग-
तार्थका वोधक होनेये वेदोमे प्रमाणता नही रहेगी। तव श्रुतियोमे श्रद्धा
तो डडेके बलमे ही आप कराना चाहेगे ॥ ९०-९१॥
ननु च प्रातलम्भस्त्यां गुरवस्त्वीश्वरेक्षणे।
मौलिताक्षोऽसदालोक्य प्रलय. स्वयमेव च ॥ ९२॥
तन्नाप्तवाक्यप्रामाण्य तदा दत्तनिलाजलि ।
वेदा अध्येत एवेति कय ते निश्चयो वद ॥ १३ ॥
न च वीक्ष्य फलं कारोर्यादेः यहघ्महे वयम् ।
बहुधा तत्फलाटेरन्यतो वृष्टिसमवात् ॥ १४ ॥
येदप्रामाण्यसिद्धौ हि कारीर्याः फलहेतुता।
सिद्धपत्तत्सिद्वितस्तच्चत्यन्योन्याश्रयता स्फुटा ॥ ९५ ॥
गुरुमि प्रोक्तमार्गेण यथाक्त पश्यता सताम् ।
अस्माक तु कुतस्तावविश्वासः प्रसज्यताम् ॥ १६ ॥

२३८ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [विंशः मीमांसक :-अरे! गुरुओंने तुमको ठगा। हमलोगोंने ईश्वर देखा ऐसा कहने लगे। और तुम भी आंख मूदकर बैठे तो कुछ झुठा ही दृश्य देखने लगे तो स्पयं भी ठगे गये। उत्तर:- इसप्रकार ठगोंकी वात चल पड़ेगी तो आप्तवाक्यकी प्रमाणता ही समाप्त हो जायेगी। फिर हम भी कहेंगे कि कुछ गंथ दिखाकर तुमको भी गुरुसोने ठग लिया और वोल दिया ये वेद हैं । तो ये ही वेद हैं ऐसा आपको निश्चय किस प्रकार हुआ? यह कहें कि वेदानुसार करीरी आदि किया, वृष्टिफल हुआ तब निश्चय हुआ ये वेद है, तो बराबर नहीं है। कारीरी आदि किये जानेपर भी फल सामने नहीं आता। और कारणान्तरसे भी वृटि होती है । यह कहना संगत नहीं है कि वेदसे करीरी करनेपर वृष्टि होना बताया गया और फल न हुआ तो कोई प्रतिवन्धक अवश्य रहा होगा, । क्योंकि वेदप्रामाण्य सिद्धिके वादको यह बात है। वेदप्रामाण्य सिद्धिके लिये तो आप कारीरीको प्रस्तुत कर रहे है। तब यह अन्योन्याश्रय दोप हो गया। हमारा तो ऐसा है कि गुरुजीने कहा ऐसी उपासना करो, प्रथम ऐसा अनुभव होगा, बाद में ऐसा । प्रथम वैसा हो गया । तब बादके फलमे क्यों अविश्वास होने लगा ? ॥ ९२-९६ ॥ अर्वाचीनपदं धृत्या समये समये शिवः। प्रतियोधयते लोकांस्ततः प्रजायते ॥ ९७॥ पारम्पर्याज्जायतेऽसा पुराणादौ च पठ्यते। स्वेनानुभूयते चापि विश्वास्यस्तत ईश्वरः ।। ९८॥ तेनोपदिष्टताहेतोस्तस्य प्रतिभून्वतः। श्रद्धां बद्ध्वा श्रुती लोकः कर्मस्वेष प्रवर्तते।। ९९ ॥ समय समयपर अर्वाचीन रूप धारणकर भगवान शिव लोगोंको वोध कराते है। अतः श्रद्धा उत्पन्न होती है । परमेश्वरका अवगम गुहारम्परासे. पुराणवर्णनसे एव स्वानुभूतिसे होता है । तव ईश्वर में विश्वास भी होता है। परमेश्वरोपदिष्ट वेदोक्त होनेसे तथा स्वयं परमेश्वर फल दान- प्रतिभू होनेसे श्रुतिमें श्रद्धा रखकर लोग कर्ममें प्रवृत्त होते हैं ।। ९७-९९ ।। शरीरवाड्मनोमियत्कर्म प्रारमते इत्युक्तस्त्रिविधं कर्म गौतामिमतमोक्ष्यते ॥ १०॥ मुख्यतस्तु द्विघा फर्म बाह्य मानसमेव च । यज्ञस्तवादिक बाह्यमन्यन्मानसपूजनम् ।। १०१॥ बाह्य वा प्रवलं फर्म मानसं येति चेच्छण । लोके वाहां तथा प्रायः प्रायोमुत्र तु मानसम् ॥ १०२॥ - नरः।

गोक]
स्पन्दवातिकसहितम्
२३९
"शरीरवाइमनोभि" इस गीता वचन से शारीरादि तीन कर्म
प्रतीत होते है । मुख्यतया वाह्य और मानस दो ही कर्म हैं। यज्ञ, स्तुति
आदि बाह्य और मानसपूजनादि द्वितीय है। लोकम प्राय बाह्य प्रबल
होता है । परमार्थमे मानस प्राय प्रवल होता है ।। १००-१०२॥
मानस भोजन दत्त्वा मघा न शमयेन्नृणाम् ।
मानस पूजन कृत्वा तोपयेच्छकर जन ॥१०३।।
आसन फल्प्यते रत्न स्नान हिमजलस्तथा।
दिव्याम्बरादिक चव मानस सर्वथोत्तमम ॥ १०४॥
मानस भोजन देनेसे लोगाकी क्षघानिवृत्ति नहीं होती। हा, मानस
पूजन से शकर प्रसन्न होंगे। मानस रत्नासन मानस हिमजलस्नान,
मानस दिव्याम्बरादि उत्तम है । 'रले कल्पितमासन इत्यादि
द्रष्टव्य है ॥ १०३ १०४ ।।
बाह्य वा मानस वापि कर्म नाम भवत्विदम।
फलद परमेशानो नैव तनास्ति सशय ॥१०५।।
अष्टमिप्यता तन विरोधो नो न विद्यते ।
नेष्यता भगवान स्मृत्वा फल दातीत्युपेयताम् ॥ १०६ ।।
फर्मनाशा लस्पर्शप्रभृतौ
परमेश्वर ।
नास्म देष फलमिति चिन्तयेत क्षरण हि तत ॥ १०७॥
सर्वथाप्येव फलदो वाह्यमानसकर्मणो ।
चेतन परमेशानी 7 जडो नास्ति सशय ॥१०८॥
कर्मजन्य अदृष्ट को मानिय तो हमारा विरोध नहीं । यदि न मानें
ती भी कोई बात नहीं। परमेश्र कर्मस्मरण कर फल दे सकते हैं ।
कर्मनाशाजलस्पादि होनपर इसको कर्मका पर नहीं देना है ऐसा
परमेश्वर सोचते हैं । यही कमक्षरण है। जो भी हो, परदाता तो चतन
परमेश्वर ही है ॥ १०५ १०८।।
पुरुषाराधन तावत्फलोत्कर्यप्रयोजकम्।
न तु हेतुविनाप्येय पापकमफलोद्भवात ॥१०९॥
'पुरुपाराधनमृते यहा पुरुपाराधनसे फलोत्वप अभिप्रेत है । वह
हेतु नहीं है। पापी पुरुषाराधन नहीं करता फिर भी पापफल उसको
मिलता है ।। १०९॥
यद्वात्र पुरुषेणति चतनेनत्युदीयते।
आराधन नाम फलप्रापण च विवाक्षतम् ॥ ११०॥

विगः
२४०
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
अथवा पुरुष अर्थात् चेतनके द्वारा आराधन अर्थात् फल प्रदान करे
ती ही कर्म फलवान है ऐसी व्याख्या करना ।। ११०।।
पुरुषागस्तु नो कार्य विपरीतफलप्रदम्।।
एतत्तु यक्ष्यतेऽग्रे तु तथा च्याख्येयमत्र 11 १११॥
हा, पुरुपापराध तो विपरीतफलकारी है यह कहा जायेगा । वेसी
व्यारया यहा करें ।। १११ ॥
विनेश्वर नैव फलसंमवोऽस्तीत्युदीर्यते।
सम्यक फलति
फमतापुरुषाराधनादिति ॥ ११२ ॥
अथवा ऐसी व्याख्या कीजिये-ईश्वरके विना फल तो हो ही नही
सकता । पूर्णफल पुरुषाराधनसे ही होता है ।। ११२ ॥
आराधनं साधने स्यादवाप्नो तोषणेऽपि च ।
सत्कर्मजनितो वृत्तिविशेषस्तोष ईशितुः ॥ ११३ ॥
असत्कर्ममवो वृतिविशेषो रोष उच्यते ।
तोपमुख्य विषनातो रोपो नोदीरितोऽत्र वा ॥ ११४ ॥
कोशोमे आराधनका साधन, प्राप्ति (णिजन्त हो तो प्रापण।, तोपण
ऐसे नानार्थ बताये है । मनुष्यकृत सत्कर्मसे "इसे स्वर्गादि फल दू" ऐसी
जो मायावृति होती है वहीं तोपण है। असत्कर्मसे इसे नरकादि दू ऐसी
वृत्ति भी होती है जोईश्वरका रोप कहलाती है। किन्तु यहा "श्रुती श्रद्धा"
के अनुसार तोषणकी मुरयता होनेरो रोषका वर्णन नहीं किया ऐसी
व्याख्या भी सुगम है ॥ ११३ ११४ ।।
अशेषफलदातारमाराध्य
पुरुष
परम्।
भवबन्धापहं देवं वन्देमहि महेश्वरम् ॥ ११५ ।।
समस्त कर्मफलदाता, आराधनीम परम पुरुष, भवबन्धहारी चिद्र प
महेश्वरको हम वन्दना करते है ।। ११५ ॥
इति श्री काशिकानन्दयोगिनः फूतिनः कृती।
महिम्नः स्तोत्रविवृतो विशः स्पन्दी विनिर्गतः ॥ २० ॥

एकविंशः श्लोकः पुषाराधन कार्य फलोत्कर्षप्रसिद्धये। फलदः पुरुषश्चति व्याख्यया दर्शितं मया॥१॥ पुरुष तु तिरस्कृत्य कृतं सरकर्म चाफलम् । विपरीतफलं चेति सप्रत्येतेन पर्यते ॥२॥ कर्मफलोत्कथं पुरुषाराधन करना चाहिये । कर्मफलदाता भी वही पुरुष परमेश्वर है इत्यादि हम ने व्याख्या मे दिखाया। भगवत्तिरस्कार करनेपर निष्फलता और विपरीतरिणाम दोनो यहा दिखा रहे है ।। १.२ ॥ पदाराधानतः सम्यक् फलं तद्विपरीतत । अशुभ तत्तिरस्कारात स कथ नव सिम्यति ॥ ३॥ न क्वापि शशशृङ्गादितिरस्कारादरादितः । फलभेदोऽस्त्यतो मक्त्या कर्मठाः भजतेश्वरम् ॥४॥ जिसको आराधनासे सम्यक् फल होता है और उससे विपरीत जिसके तिरस्कारसे अशुभ होता है वह परमेश्वर कैसे सिद्ध नहीं है ? शशशृ गके तिरस्कार या आदरका कोई मतलब नही होता । अत है कर्मठो! भक्तिसे शिवभजन करो ।। ३-४ ॥ इत्येतद् वक्तुमधुना वक्षोवाहरणोक्तितः। सत्त्वेन सिद्धस्येशस्य फलदत्व समय्यते ॥५॥ इस बातको बतानेके लिये दक्षोदाहरण प्रस्तुतकर अस्तित्वेन सिद्ध ईश्वरका फलदातृत्व समर्थन करते हैं । अनीशवादी दक्षोऽमूरषदश्व महेश्वरे। महानपि मखस्तस्य स्वविनाशकरोऽभवत् ॥६॥ दक्ष अनीश्वरवादी था। महेश्वरमे श्रद्धा नही रखता था। अतएव उसका विशाल भी यज्ञ स्वनाशकारी सिद्ध हुआ ॥६स ननु दक्षः पर मेने ज्यापास पुरुषोत्तमम् । वर्षीयास च धातार कुतोऽस्यानोशवादिता ॥७॥ न, ज्यायस्वकनीयस्त्वे विद्यते न परेश्वरे। कनीयांसो भयेयुर्देवरानवाः॥८॥ १६ ॥ ज्यायासश्व २४२ श्री शिवमहिम्न. स्तोत्रम् [ एकविंश यस्मानास्ति परं वापरं किचन विद्यते। नाणीयानापि च ज्यायानित्येयं श्रुतिषु श्रुतम् ॥ ९॥ पूर्वपक्ष:- दक्ष पुरुषोत्तम विष्णुको श्रेष्ठ तथा ब्रह्माको पिता मानता था। वह अनीश्वरवादी किस प्रकार ? उत्तर.- बडप्पन या छोटापन परमेश्वरमे नही है। छोटे बड़े तो देवदानवादि होते है । श्रुतिमें कहा है-जिससे पर या अपर, ज्येष्ठ या कनिष्ठ नही है वहीं परमपुरुष है । (उसे दक्ष कहा जानता और मानता था? ) ॥७.९॥ यामिपु गिरिशन्तेति येशं ज्ञात्या तमित्यपि । बेवाहमेतं पुरुषमिति चाम्नाय सुस्फुटम् ॥१०॥ यस्मात्परं नापरं वा नाणीयो ज्याय एवं वा । इति पेतुः क्रमेणय श्वेताश्वतरशासिनः ॥ ११ ॥ तथा च यत्परं तत्वं स ईशः पुरुषः स च । गिरिशन्तः स एवेति निश्चित भयति श्रुतेः॥१२॥ एतेन पौरुषे सूक्त पुरुषो विष्णुरुच्यते । इत्येवं ये हठानिरस्तास्ते त्ववैदिकाः ॥१३॥ विष्णुशब्देन यदि तु भिपाद् ब्रह्म विवक्ष्यते । तदाऽविवादो नः शब्दकलहस्य वृथात्वतः ॥१४॥ तदेव परम तत्वं स ईशः पुरुषः स च । गिरिशस्तः स खलु तं दक्षोऽधज्ञातवान् शिवम् ।। १५ ।। वृक्षवत्स स्थिरस्थानः स्वप्रकाशी विवि स्थितः। एकोऽयमद्वितीयत्वात्तैन पूर्णमिदं जगत् ॥ १६॥ किन्तु ज्यायस्व, कनीयस्त्व रहित तत्त्वका दक्षने अनादर नहीं किया । शकरका किया । इसका उत्तर है कि वही परतत्त्व शकररूप है। श्वेताश्वतरोपनिपत्मे प्रथम 'यामिषु गिरिशन्त हस्ते" इत्यादि शकरमन्न पढा ( उमसे पूर्व "या ते रुद्र शिवा' यह मन्न आया है यह दृष्टव्य है। फिर "तत. पर ब्रह्म "ईश त ज्ञात्वा" इस प्रकार ईशल्पमे उसीका वर्णन आया। एको हि रुद्रो य इमालेलोकानीशते" ऐमा पहले भी आया है) उसके बाद वेदाहमेत पुरुष महान्त" इस प्रकार पुररूपेण वर्णन किया। उसीको फिर "यस्मात्पर नागर" इत्यादिसे निरूपति किया । इससे यह निश्चित है कि जो पर तत्व है वही ईग, पही पुरुष, वहीं गिरिशन्त रुद्र है । अतएव पुरुपमूत्ता में पुरुषपदका विष्णु अर्थ सिद्ध करनेकी कुछ लोगो की कोशिश उनकी अवैदिकताको ही सिद्ध करती है। क्योकि श्वेताश्वतरमे लोक] स्पन्दपातिकमहितम् २४३ इसी एद्वाध्यायमे सहरमी पुरप इत्यादि मन्योको भी शिववर्णनस्पेण स्पप्ट पढा है। अतएव उनकी यह हठवादिता मात्र है। विष्णु शब्दका व्यापक अयं लेकर उसका तात्पर्य यदि विशदब्रह्म में है, ऐसा कहते है तो हमारा कोई विवाद नहीं है। क्योकि हम व्यर्थ शब्दकलहमे पहना नहीं चाहते। उस परमतत्याभिन्न ईश पुरुषादिपदार्थ गिरिरान्तकी दक्षने अवज्ञा की थी। "वृक्ष इव स्तब्ध" इत्यादि गेप श्रुतिका अर्थ हैं वह वृक्षके समान अचल है । "दिवि तिष्ठति ' अर्थात् स्वप्रकाशम्प है । "एको" अर्यात् अद्वितीय है । उससे यह जगत् पूर्ण है -भरा है ॥ १०.१६ ॥ तेनामिनानिमित्तोपादानेन पुष्पात्मना। पूर्ण जगदिदं सर्व घटादोव मृदादिमिः ॥ १७ ॥ यिना मृद कुम्मकारोऽनीश्वरो घटनिमितौ। विना दण्डमनीशच वर्षीयान् गमने नरः ॥१८॥ एवं विना द्वितीयेन जगएकतुम शक्नुयात् । पदोशोऽनीश एवायं तिनामीशानामभृत् ॥ १९ ॥ विष्णये शिपिविष्टायेत्यादिमन्त्रोक्तदेवताः। काम यजन्तु फिन्त्वीशं नेजुर्मीमासकाः परम् ॥२०॥ द्रव्यरयागसमुद्देश्या देवता नेश्वरो मवेत् । किन्तु सर्वसमयं हि मन्महे परमेश्वरम् ॥ २१ ॥ तमिन्नश्च भयति रुद्ररूपो महेश्वरः। वक्षो नवोमय मेने तेनानीश्वरवाद्ययम् ॥ २२ ॥ "येनेद पूर्ण पुरुषेण सर्व" अर्थात् अभिन्ननिमित्तोपादान पुरुषरूप परमात्मासे जगत उसी पवार पूर्ण है जैसे घटादि मृदादिसे पूर्ण है । कुम्हार विना सृत्तिमा घट नहीं बना सकता । अत वह अनीश है । अति- वृद्ध विना डडा चल नही सरता । अत चलनेमे वह अनीश है । इसी प्रकार विना द्वितीय ईश्वर जगनिर्माण करनेमे असमर्थ है तो वह भी अनीश्वर हुआ। असमर्थ, अनीश्वर ये पर्यायवाची हैं। ऐसा अनीश्वर ही द्वैत- वादियोंके यहा ईश्वरनामधारी है। यद्यपि मीमासकादि "विष्णवे शिपि- विष्टाय" इत्यादि मन्त्रोक्त विष्णुदेवताका यजन करते हैं, किन्तु भले वे वैसा यजन करते हो, ईन्वरया यजन तोही दरते । "देवतोद्देश्येन द्रव्यत्यागो याग" ऐसा बताया है। उस यागोद्देश्य देवताको हम ईश्वर नही मान सकते। विन्तु जो सर्वममर्थ होगा उसे ही हम ईश्वर मान सकते हैं, क्योकि ईश्वर शब्दका अर्थ ही है सर्वममर्थ । उस परमेश्वरसे [एकविंश . २४४ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् अभिन्न है रुद्ररूपी महेश्वर । दक्षप्रजापति भेददी होने से न तो पूर्णपुरुष परमशिवको मानते थे और न तदभिन्न उपस्थित रुद्रको ही। अतएव दक्ष अनीश्वरवादी था।॥ १७-२२ ।। अनीशवादी सन्नेप शंकरं परमेश्वरम् । तिरश्चकार तस्यव फलमत्रानुवर्ण्यते ।। २३ ॥ अनीश्वरवादी होकर वक्षने शवरका जो तिरस्कार किया उसीका फलवर्णन यहापर करते हैं ।। २३ ।। क्रियावक्षो क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता- मृषीणामात्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः । कतुभ्रंशस्त्वत्तः ऋतुफल विधानव्यसनिनो ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥२१॥ दक्ष प्रजापति स्वय कमोमे दक्ष थे, प्रजाओके पति थे। ऋषिगण ऋत्विक् थे। सुरगण यज्ञसदस्य थे। आप स्वय यज्ञादिकर्मफल देनेमे उत्साही ठहरे, शरणदाता ठहरे। फिर भी ऐसे व्यक्तियो के यज्ञका ध्वस आपसे ही हुआ। कहना ही होगा कि श्रद्धारहित यज्ञ विनाशका ही कारण होता है । २१ ॥ परमबद्दधानस्य हेडमामस्य पूर्णटिम् । मखोऽपि स्वविनाशाय फल्पतेऽज्ञस्य मानिनः ॥ २४ ॥ परमशिवकी श्रद्धासे रहित होकर शङ्करका जो तिरस्कार करते है ऐसे अज्ञानी अभिमानियोका यज्ञ भी स्वविनाशकारी होता है ।। २४ ।। परतत्त्वं हि परमः शिव इत्यभिधीयते । एव त्र्यम्बकः शम्भुरर्वाचीनपदस्थितः ॥ २५ ॥ परतत्त्व ही, परमशिव है, वही अर्वाचीनपद स्थित होनेपर त्रिनयन शङ्कर कहलात हैं ।। २५ ॥ तमनुत्तरमूर्ति हि जगो परशिव श्रुतिः । कस्माच्चिन्नोत्तरी यस्तु यस्मादन्यन्न चोत्तरम् ॥ २६ ।। स्वेच्छया स च पस्पन्दे स स्पन्दः शिव उच्यते । पत्रच्छाया जगत्सर्व बीजरूपेण तते ॥ २७॥ स स्पन्दः शिवतत्त्वात्मा ध्यक्षः पश्चाननोऽभवत् । तस्य यामागतो ग्रह्मा मुकुन्दो दक्षिणाङ्गतः ॥ २८ ॥ स

श्लोकः]
स्पन्दवातिकसहितम्
२४५
हृदयाच्चाभवद्रुद्रः स सदाशिव उच्यते ।
हृदयोत्यः स्वरूपस्थः शिवामिन्नः सदाशिवः ।। २९ ॥
स विष्णुजलसृष्ट्यूवं भगवान् जलशाययमूत् ।
तस्यैव नामिकमले स महा प्रकटः स्थितः ॥ ३० ॥
एतायन्मानतो ब्रह्मा नामिजामेति भण्यते ।
न त्यस्य नामितो जन्म शिवयामाङ्गजन्मनः ॥ ३१ ।।
ब्रह्मणो भ्रकुटेश्व रुद्रोऽभूत्प्रकटस्ततः ।
भ्रूजन्मा तावता प्रोक्तो वस्तुतः शिवहनयः ॥ ३२ ॥
विधि कुटिनं रुद्रं दक्षो वेदाल्पशेमुषिः ।
नानुत्तरं न च शिवं न सदाशिवमप्यसौ ॥ ३३ ॥
उस परमशिवको अनुत्तरमूर्ति कहते हैं जो किसीसे उत्तर नही,
जिससे कोई उत्तर नहीं, वही अनुत्तर है। वह अनुत्तरमूर्ति परमशिय
स्वेच्छासे स्पन्दित हुआ । वही स्पन्द शिव कहलाया। उस इच्छामे समस्त
जगत बीजरूपेण स्थित है और वह स्पन्द त्रिलोचन पञ्चानन शिवरूपमै
स्थित हुआ। उस शिवके वामाङ्गमे ब्रह्मा, दक्षिणाङ्गसे विष्णु और हृदयसे
रुद्र हुआ । यही रुद्र सदाशिव कहलाया। एक तो शिवके हृदयसे प्रकट
हुए. दूसरे निरन्तर स्वरूप शिवमें लीन रहते हैं । इसलिये सदाशिव हुए।
आकाशादि क्रमसे जलमृष्टिके बाद वही दक्षिणाङ्गोत्पन्न विष्णु जलशायी
बने। उनके नाभिकमलमे वही वामाङ्गज ब्रह्मा प्रकटरूपसे स्थित हुए।
इतनेमानसे ब्रह्माको नाभिजन्मा कहते है । वस्तुत. वे नाभिजन्मा नही,
किन्तु शिववामाङ्गजन्मा हैं । ब्रह्माजीकी मृकुटीसे वे ही हृदयज रुद्र प्रकट
हुए। इतनेको लेकर ब्रह्माकी भ्रूसे उत्पन्न कहते हैं । वस्तुत. शिवके हृदयमे
उत्पन्न हैं। परन्तु दक्षप्रजापति यही समझता था कि शङ्कर ब्रह्माको
भ्रूकुटिसे पैदा हुए अत ब्रह्मपुत्र है । दक्ष न तो अनुत्तर परमशिवको जानता
था, न स्पन्दात्मा शिवको और न हृदयोद्भव सदाशिवको ही ॥ २६.३३ ।।
महाभ्रूजन्मतो नैव रुद्रस्य न्यूनतोोचता।
न हि कृष्णादिषु तथा न्यूनत्वमवलोक्यते ॥ ३४ ॥
ब्रह्मणोऽत्रिस्ततश्चन्द्रस्ततश्चय
बुधादयः।
एवं शततमो जातः श्रीकृष्णो पसुदेवतः॥ ३५ ।।
एतावता क्मुि हरि ब्रह्मणो मन्यसेऽदरम् ।
न चवं मूलतो विष्णुदक्षिणाङ्गसमुद्भवः॥ ३६ ॥

श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम्
[एकविश
अतो ब्रह्मा स्वयं कृष्णमहिमानमवेक्ष्य तम् ।
प्राणमत्तच्च कथितं श्रीमद्भागवतादिषु ॥ ३७॥
उत्यायोत्याय कृष्णस्य चिरस्य पदयोः पतन् ।
आस्ते महित्वं प्राग् दृष्ट स्मृत्या स्मृत्या पुनः पुनः ॥ ३८ ॥
ननु भो परमं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधामधात् ।
किमनेन स जातस्तु वसुदेवान्न संशयः ।। ३९ ।।
ब्रह्माजीको भ्रूकुटिसे उत्पन्न होने मानसे न्यूनता मानना उचित नहीं है।
कमा श्रीकृष्णादिमे न्यूनता थी? ब्रह्मासे अनि, अनिसे चन्द्रमा, उससे बुध
पुरूरवा आदि सौवी पीढी मे आकर वसुदेवसे श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए तो क्या
श्रीकृष्णको ब्रह्मासे न्यून मानते हो ? नहीं । मूलत विष्णु है । वह शिवजीके
दक्षिणागसे उत्पन्न है। इसीलिये ब्रह्माने कृष्णकी अपार महिमा देखकर
स्वय उन्हें प्रणाम किया। यह भागवतादिमे स्पष्ट है । वहा श्लोकमे कहा
है-बार बार उठकर फिर फिर श्रीकृष्णचरणोमे ब्रह्मा पड़ने लगे। उनकी
महिमाको ब्रह्माने देख लिया था। हे महाराज कृष्ण तो साक्षात् परब्रह्म
श्रीकृष्णरूपमे प्रकट हुए है । वे क्यो न्यून होगे ? जी हा, इससे क्या मतलब ?
आखिर वे पैदा वसुदेवसे हुए न। वैसे रुद्रमे भी बात है। अत• रुद्रकी
न्यूनता कहना भी कैसे सगत होगा ? ॥ ३४-३९ ।।
स्पन्दारमकमिदं सर्व जगदेतच्चराचरम् ।
शस्ववियश्च व शिवः स्पन्द इतीरितः॥४०॥
यह सपूर्ण जगत स्पन्दरूप है। चाहे चर हो चाहे अचर। शब्द-
स्पर्शादि सभी स्पन्द ही है ( सभी वायबरेशन मात्र है। ) और शिव ही
स्पन्द है ॥ ४०॥
यो हानुत्तरमूर्तिः स ज्ञानेच्छाद्यविमागतः ।
तिष्ठत्यतः शक्तिशियसामरस्य तदुच्यते ॥ ४१॥
जो अनुतरमूर्ति बताया वह ज्ञानेच्छादिविभागशून्य होकर स्थित
है । अत उसे शिवशक्ति सामरस्य कहते हैं ॥ ४१ ।।
स्पन्दः शिवः प्रकाशारयोविमर्शस्तस्य योऽभवत् ।
सा शिया परमेशानी तदभेदेन तिष्ठति ॥ ४२ ।।
स्पन्द शिव है, वहीं प्रकाश है। उसका जो विमर्श हुआ वह शिवा
अम्बिका है । वह शिवसे अभिन्न होकर रहती है ॥ ४२ ॥

श्लोक:] स्पन्दवातिकसहितम् २४७ सदाशिवोऽतः समभूज्जगदम्बा च साऽभवत् । संव दक्षस्य दुहितृरूपेण समजायत ।। ४३ ॥ शिवसे सदाशिव हुआ। और शक्ति जगदम्बा हुई। फिर वही दक्ष- पुत्री सतोके रूपमे अवतीर्ण हुई ।। ४३ ॥ तां मेने तनयां दक्षो हरं जामातरं तथा। पुत्रस्थानीयमेनं शासनीयममन्यत ॥४४॥ जगदम्बाको दक्षने पुनी समझा और हरको जामाता। पुत्रस्थानीय होनेमे शकरको शासनीय भी मानने लगा ।। ४४ ।। सप्रजापतिभिवः सिद्धऋषिभिरावृताम् । प्रविवेश सभां दक्षो यन ब्रह्मा शिवोऽपि च ।। ४५ ॥ अभ्युत्थितास्तत्प्रवेशे सर्वे विधिशिवो विना। पितेति दक्षश्वरणौ पस्पर्श परमेष्ठिनः ॥ ४६ ।। घूर्णयंश्चक्षुपी रुद्रमवैक्षिष्ट दहनिय। अवोचदपि सर्वेषां सम्याना शृण्वता सताम् ॥ ४७ ।। नासूयया न दर्पण सम्याः प्रतिवदाम्यहम् । अयं हि शिष्यतां यातः शिष्टाचारान् यिलद्धते ॥ ४८॥ अतो अवीम्यहमयमाघारः शोमतेऽस्य किम् । इत्युक्त्वा प्रललापासौ बहुधा पन्मुखागतम् ॥ ४९ ।। दक्ष एक बार एक सभामे पहुँचे । जहाँ प्रजापति, देवता, सिद्ध, ऋषि मुनि आदि विराजमान थे। जहां ब्रह्मा एव शकर भी थे। दक्षके आते ही सब उठ खडे हुए, केवल ब्रह्मा और शकर बेठे रहे। पिता समझकर दक्षने ब्रह्माजीका चरणस्पर्श किया और शिवजीकी और पूरके देखने लगा। भबके मामने दक्षने कहा, मैं असूया या दर्पसे प्रतिवाद नहीं कर रहा-यह (शिव ) मेरा अनुशासनीय बन चुका है। फिर भी शिष्टाचारका लघनकर रहा है। क्या इसको यह आचार शोभा देता है ? ऐसा कहकर दक्षने बहुत कुछ प्रलाप किया ।। ४५-४९ ।। भृगुः श्मभूणि चलयन् यभाये साधु साध्विति । भगो नैङ्गित फुर्वनाह युक्तमुदीर्यते ॥५०॥ पूषा प्रदशंपन् दन्तानहास घ मुहमुंहः। शापान्ते शिवं दक्षो नन्दो प्रत्यशपच्च तान् ॥ ५९॥ भृगुः शास्तदात्युग्रं विपर्यशपदेय कोलाहलो महानासोत्तमायां तत्र निष्टुरः ॥५२ ।। ।

। २४८ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् एकदाः तदेतदखिलं पश्यन् शंकरो मौनमास्थितः। त्यवत्वा सभा निरसरन्मानामानविजितः ॥ ५३ ।। जब दक्ष गाली दे रहा था तो भृगु डाढ़ी हिलाहिलाकर इंगितसे बहुत अच्छा, बहुत अच्छा बोले । भगने नेत्रके इशारेसे कहा ठीक कहते है दक्ष । पूषा दांत निकालकर हंसने लगा। अन्तमें दक्षने शियको शाप भी दिया। नन्दीने प्रतिशाप प्रयुक्त किया। भृगुने शैवोंको घोर शाप दिया । इस प्रकार सभामें भयानक कोलाहल हुआ। सब कुछ देखकर मौन ही भगवान शंकर मानापमानरहित हो सभा छोड़कर यहाँसे निकल गये।।५०-५३ ॥ वक्षस्प हवागतं वरं तावता नैव शाम्यति । अभूत् स शिवविवेपी तथा तदनुयायिनः ।। ५४ ।। इतनेसे भी दक्षका वैरभाव शान्त नहीं होता। वह शिवद्वेषी बन गया । दक्षानुयायी भी शिवद्वेषी हो गये ॥ ५४॥ इष्ट्या स वाजपेपेन बृहस्पतिसवं व्यधात् । निमन्त्रितास्तत्र सर्वे देवाः पशुपति विना ॥ ५५ ॥ कलासोपरितो वोक्ष्य विमानान् गच्छतः सती। कुतः किमिति विज्ञातुं विजया प्रेषयत् सखोम् ॥ ५६ ॥ चन्द्रेण पत्या सहिता भगिनीरपरा अपि । विज्ञायोत्कण्ठिता प्राह समाधिनिरतं शिवम् ।। ५७ ॥ अस्त्युत्सवो मम पितुर्गेहे पत्र सुरा इमे। यान्ति स्त्रीमिरहं चापिगन्तु वश्मि त्वया सह ॥ ५८।। नामन्त्रिता वयमिति नाशययं स्वपितुग है। विनाप्यामात्रणं यान्ति प्रीत्या दुहितरो यतः॥ ५९॥ दक्षप्रजापतिने वाजपेययज्ञपूर्वक बृहस्पतिसव यज्ञ किया। जिसमें शंकरके सिवाय अन्य सभी देवता आमन्त्रित थे। कैलासके ऊपरसे विमान जा रहे थे तो सतीने अपनी सखी विजयासे पता लगवाया। अपनी बहिनोंके साथ उनके पति चन्द्रमा दक्षयशमे जा रहे है, दूसरी भी देवियां जा रही हैं जानकर सती उत्कंठित हुई। समाधिनिरत शंकरसे बोली-हमारे पिताके घरमें महोत्सव हो रहा है । देवता अपनी पत्नियोंके साथ जा रहे हैं। मेरी भी इच्छा है कि आपके साथ वहां जाऊँ । आमन्त्रणके विना कैसे जाएँ यह शंका करने की जरूरत नहीं है। क्योंकि पिताके घर विना आमन्त्रण भी पुनियां जा सकती हैं ।। ५५.५९ ।।

श्लोक:] स्पन्दवातिकसहितम् नास्ति कि भगिनीना ते परमामन्त्रणं सति । विस्मृताविति चेत् फस्मादावामेव हि विस्मृतौ ॥६॥ विद्वषविरहे युक्त गन्तुमामन्त्रणं विना। सहुष्टि नस्ततस्तत्र गन्तुं न खलु युज्यते ॥ ६१ ।। इति शंभः प्रयेते तां मती बोधयितुं प्रभुः। दृष्ट्वा तदाग्रहं देवं बुद्धवाऽन्ते मौनमास्थित ॥ ६२ ॥ एकाकिनी तदा गन्तुमियेषोत्कण्ठिता सती । उपेक्षां गमने बुद्ध वा सतो संतप्तमानसा ॥ ६३ ॥ शकरजी बोले- तो क्या तुम्हारी वहिनोको भी आमन्त्रण नहीं गया था? कहो कि हमे भूल गये होगे, तो हमे ही क्यो भूले ? खैर, यदि द्वेष न होता तो बिना आमन्त्रण भी अपने जाते । किन्तु दक्ष हमसे द्वेष करते हैं । अत वहा जाना उचित नही है। शकरने इस प्रकार समझानेवा प्रयास किया। किन्तु जब देखा इसका हठाग्रह है तो भाग्यका खेल समझ. कर मौन हो गये । जानेके विपयमे शंकरजीकी उपेक्षा देखकर सनप्त सती अकेली जानेको सोचने लगी ।। ६०-६३ ।। निर्गता त कतिपय आनीय वृषवाहनम् । अनुजग्मुरगादेवं दृतं दक्षाध्वरं सती॥ ६४ ॥ अनाहता तत्र पित्रा सुरेषु च तदध्वरे । शमोर्मागमनालोक्य दु.खिता कुपिता च सा ॥ ६५ ।। सती कलाससे निकली। कुछ गणो ने वृषवाहन लाकर अनुगमन किया। जल्दी वह दक्षयज्ञमे पहुँच गयी। वहीं पिता दक्षने अनादर तो किया ही । सतीने देखा कि देवताओंके बीच मे शकरका भाग भी नहीं है। तो वह दुःखित हुई और कुपित भी हुई ।। ६४-६५ ॥ अहो मत्कारणादेय शिष्यं मत्वा महेश्वरम् । विष्टि तं मूलमस्यानर्थस्याहमतः स्फुटम् । ६६ ॥ मास्त्वद्यतोऽस्य घ पितृदुहिग्रुपपिर्वरिता। इति योगाग्निनादावाप्राणान्याता दियं सती॥६७ ॥ हाय ! मेरे कारण ही जामाता मानकर शासनीय मानते हुए ये महेश्वररो द्वेष कर रहे हैं। स्पष्ट ही इस अनर्थ मे मूल में ही हूँ। आजसे इस पितापुत्रीभावके बहाने होनेवाला वर समाप्त हो । ऐमा सोचकर योगा- ग्निसे सती अपना शरीर जलाकर दिवगत हो गयी ।। ६६.६७॥

३५०
श्री शिवमहिम्न: स्तोत्रम्
[एकविंशः
श्रुत्वेदं च हरः ऋद्धो जटामुत्पाटय वेगतः।
अताडयच्छिलाखण्ड वीरभद्रस्तदोदगात् ॥ ६८ ।।
स शूलिना समादिष्टो दक्षाध्वरमुपागतः।
व्यध्वंसात् ऋतु दक्षशीर्ष चाग्नावजोहवीत ॥ ६९ ।।
उल्लुलुश्व भृगुश्मध ण्यभाइलीद्धगलोचने ।
अभिनत्यूषन्तांश्च भग्नाङ्गानकरोत्सुरान् ॥ ७० ॥
अखिल यज्ञशाला चाप्यग्निसादकरोद् गणः ।
दुद्रवभयभीताश्च सर्व एव समागताः॥७१॥
सतीदाह सुनते ही रुद्र क्रुद्ध हो उठे, एक जटा उखाडकर शिलाखण्ड
पर पटकी । वीरभद्र वहीं प्रकट हुए। शकरके आदेशसे गणसहित वीरभद्र
दक्षयज्ञमे पहुंचे और ऋतुको ध्वस्त किया। दक्षका सिर काटकर अग्निमे
होम डाला । भृगुगी डाढी नोचकर फेक दी। भगके नेन फोड दिये । पूपाके
दांत तोड गिराये । देवताओका अगभग किया। यज्ञशालामे आग लगा
दी। भयभीत होकर आये हुए सभी पहासे भागे ॥६८-७१।।
कियादक्षो०
कतुध्यसः पुनरयं
कथंकारमजायत।
यजमाने न्यूनता फि दक्षो दक्ष क्रियासु हि ॥७२॥
सम्यग्यिघिपरिज्ञानाद्वंकल्यायप्रसञ्जनात
योग्यतोत्साहितावत्त्वाद् दक्षो दक्षः क्रियासुसः ॥७३॥
एविधः प्रतुपतियजमानोऽन हि प्रती।
यानपालनमामय॑सत्यात्यातुपतिहि
धनादेन्यूनता नव पजापतिर
ऋत्विजामाता नेव ऋत्विजस्त्वषयो यतः ।। ७५ ।।
साह्मणानाममिजत्यं नाभागेर निराकृतम् ।
विफसत्य तीर्यस्मानपाशत्वं तपिपु॥७६ ।।
पयः
प्रायशो मन्त्रद्रष्टारस्तेप नाजता ।
सनफ्ल्पाः सर्वे ते भृग्याधाः परिकीर्तिताः ।। ७७ ॥
आयाहिता फिन देया सदस्याः स्वयमेव से ।
उपद्रष्टा रास्वप व्यङ्गत्य नय संभयेत् ।। ७८ ॥
कन्तु पो ननु मयेदेष नाम फपालमत् ।
मवं हरः तुफसविधानप्पसनी
सः॥७४।।
यत..
मतः॥ ७९ ॥

श्लोक:] स्पन्दवातिकसहितम् । २५१ यह क्रतुनाश आखिर हुआ कैसे ? क्या यजमान में कोई न्यूनता थी? नहीं। प्रजापति दक्ष तो क्रियामें दक्ष अर्थात् निपुण थे। वैदिकार्थ- परिज्ञान, योग्यता, उत्साहिता सब कुछ होनेसे क्रियामें विकलताकी संभावना नहीं थी। ऋतुपति अर्थात् यजमान सचमुच ऋतुपालक होनेसे ऋतुपति ही थे । धनादिकी भी न्यूनता नहीं थी। क्योकि प्रजापति जो ठहरे। ऋत्विजोंमे कुछ न्यूनता रही हो, नहीं, वहां तो ऋपि ऋत्विज थे । साधारण ब्राह्मणोमें अज्ञता हो सकती थी, जैसे नाभागने व्यामोह दूर किया । ऋषिका अर्थ ही मन्त्रद्रष्टा है। वे प्रायः सर्वज्ञ होते है जैसे भृगु आदि । क्या देवताओंका आवाहनादि नहीं किया ? अरे, देवता तो उपद्रप्टा सदस्य ही थे । साक्षात् सभी वहा आये हुए थे। तब शायद शकर क्रतुके द्वेपी रहे होंगे । नहीं, नहीं । वे तो क्रतुफल देने में व्यसनी हैं ॥ ७२-७९ ॥ ध्रुवं कत्त: प्रवं श्रद्धाविहीनाः स्युरभिचारकरा मताः । अबधानो हि हरं दक्षोऽयं व्यतनोन्मखम् ॥ ८० ।। परं शिवमविज्ञाय तदमिन्नं महेश्वरम् । अवज्ञाय घनो फश्चिदाप्नोति मविकं भुवि ॥ ८१ ॥ अतः यही निश्चय है कि श्रद्धारहित यज्ञ नाशकारी होता है। शंकरपर अश्रद्धा कर दक्षने यज्ञ किया। परमशिवको न जानकर और परमशिवाभिन्न शंकरकी अवज्ञाकर ससारमै कोई सुखी नहीं होता ।। ८०-८१ ॥ नन्ययुक्तमिदं सर्वमनादिश्रुतिचोदितः। सदाभागो यज्ञोऽयं साङ्गोऽरुद्रः कथं मवेत् ।। ८२ ।। ऋष्यात्विज्यादिक नय साङ्गत्वस्य प्रयोजकम् । चोदितानुष्ठितिस्तत्र केवलका प्रयोजिका ॥८३ ॥ रुद्रमागाऽप्रदानाच्च मौदधमृत्यिक्ष विस्फुटम् । दक्षत्वं चापि दक्षस्य मायकल्यकारिणः ॥ ८४॥ पूर्वपक्षः यह क्रियादक्षो दक्षः" इत्यादि सभी अयुक्त है। अनादि श्रुतिविहित भागसहित यज्ञ रुद्रभागके बिना करनेपर सांग कैसे होगा ? ऋषि ऋत्विक हा जाना सागताका प्रयोजक नहीं है। किन्तु विहितार्यका अनुष्ठान ही सांगताका प्रयोजक है। दमाग न देनसे ऋत्विजो में मूढता भी स्पप्ट है। यह दक्षकी कौन-सी दक्षतायुगलता है कि जगविकल यश कर रहा है ॥ ८२-८४ ॥

[एकविक्षः श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् नवान्यथायितुं शक्या श्रुतिदक्षण शापतः। अनादिशाप इति चेच्चोदनव कथं भवेत् ॥८५॥ शापार्थवादतो वापोह्या प्रत्यक्षचोदनां। फतुर्वगुण्यतो युक्तोऽभिचारोऽत इहेति चेत् ।। ८६ ।। दक्ष शाप देकर श्रुतिको अन्यथा नहीं कर सकता। क्योंकि श्रुति अनादि है । कहें कि शाप भी अनादि है दक्षने उसे केवल प्रकट किया। नहीं । शाप स्वतः अनादि नहीं होता। लिखा हुआ हो तो वह अर्थवाद है। वह प्रत्यक्षविधिको वाध नहीं सकता। अतः क्रतुवैगुण्यसे फलवपरीत्य मानना उचित है ।। ८५-८६ ।। सत्यं तदापि महतामनुकम्पादितः स्वचित् । असाङ्ग साङ्गतामेति तांदवं प्राह वामनः ॥ ८७ ।। ब्रह्मन् संतनु शिष्यस्य कर्म चिद्रं वितन्वतः । यत् तत्कर्मसु वैषम्य ब्रह्मदृष्टं समं भयेत् ॥ ८८॥ मन्त्रतस्तन्त्रतश्छिद्रं देशकासाबस्तुतः। सर्व करोति निश्छिवं नामसंकीर्तनं तव ॥ ८९ ।। इत्येवमगीतं च शुक्राचार्योऽपि वामनम् । अकरोचव संपूर्ण मलेर्यहं यमोचितम् ।। ९० ॥ भत्र साक्षार् भृगुरद् ध्यङ्ग साङ्ग दधीत सा। किन्त्व प्रदाकृतं यस्स्यात्तस्य नास्पौषधं भुवि ।। ९१ ।। पूर्वपक्ष उचित है । तथापि कहीं कही महान पुरषोंकी अनुकम्पासे भी जसांग भी साग हा जाता है। यह बात वामन भगवानने भी कहा है- है ग्रान् ! ( शुक्राचार्य ) आप अपने शिष्य राजा बलिके कर्मछिद्रको दूर करो। ग्राह्मणदृष्ट होनेसे सच्छिद्र भी अच्छिद्र हो जाता है। इसपर शुक्राचार्यका कहना था-मन्त्रतन्त्रादिको लेकर जो भी छिद्र ना गया हो सबको भगवप्नामसकीर्तन निश्छिद्र बना देता है। जैसा भी हो शुक्राचार्यने याको पूर्ण बना दिया था। शुक्राचार्य भार्गव थे। यहां तो स्वय भृगु ही हैं । वे पया दक्षयज्ञको सांग नहीं बना सकते थे? लेकिन बात यह है कि अन्यविध छिद्रको ये नष्ट करते । शंकरपर अथदाकर जो गलन काम होता है उसके लिये मंसारमें उपचार नहीं है ।। ८७.९१ ।। प्रथमया दृतं बत्तं तपस्सप्तं पृतं च यत् । असरियुज्यते पायं न प ताप नो ह ।। ९२ ॥

श्लोकः ] स्पन्दनातिकसहितम् २५३ विपरीतफलं चैव हद्रापरराषतः। श्रीयश्च प्रपूज्यश्च फलदः स महेश्वरः ॥ ९३ ।। गीतामे भी कहा है कि अश्रद्धासे किया हुआ हवन, दान, तप एवं अन्य सभी कर्म हे पार्थ अमत् कहलाता है। उसका न तो परलोक कोई फल है और न इस लोकमें ही । इतना ही नही रुद्रापराध होनेपर विपरीत फल भी होगा। अत. फलदाता महेश्वर रुद्रभगवान श्रद्धेय तथा पूज्य हैं ।। ९२-९३ ।। यदवज्ञानतः पूर्णाप्यसती घातिनी किया। यस्मादसत्यपि सती नमामस्तं सतीपतिम् ।। ९४ ॥ जिमकी अवज्ञासे पूर्ण भी क्रिया असती और धातिनी होती है और जिस ( की कृपा ) से असती भी सती होती है उस सतीपति भगवान शंकर- को हम प्रणाम करते हैं ॥ ९४ ॥ इति श्री काशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतो। एकविंशो गतः स्पन्दो महिम्नःस्तोत्रवातिके ॥ २१ ॥ द्वाविंशः श्लोकः सम्यककृतस्य पजादेः भवेत्सुफलदो हरः। अषया कृते यजे स तु कत्रंभिचारकृत॥१॥ एतनिगा लोकपामधुनाऽयमंकारिणाम् । दण्ड विधत्त इत्याह कामं सप्टव किंन सः ॥२॥ यज्ञादि यदि सम्यक् सम्पन्न करें तो भगवान पाकर उसया सुफल प्रदान करते हैं। यह सामान्यरूपसे "व्रती सुप्ते" इस श्लोकमे बताया। अश्रद्धापूर्वक कर्म करने से वह पाया ही नाशक होगा यह "रियादशः" २५४ श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [दाधिश जनः। स इस श्लोक मे बताया । सब अधर्मरतोको भगवान दण्ड देते है, भले वह ब्रह्मा ही क्यो न हो, यह कहने जा रहे हैं ।। १-२ ।। शिष्टाचार पुरस्कृत्य गीतायामनवोदिदम् । लोकसंग्रहमेवापि सपश्यन् कर्तुमर्हसि ॥३॥ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥४॥ उत्सोदेपुरिमे लोका न कुर्या कर्म चेदहम् । संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ ५ ॥ एतत्सर्व जगौ शौरिहृदयस्थो महेश्वरः । यच्छिष्टाचारनिष्ठत्व हरस्यैव विलोक्यते ॥ ६ ॥ ब्रह्मणो न हि ताहफ्त्वमनवाभाववर्णनात् । नापि विष्णो हि वृन्दादिशुद्धिखण्डनदर्शनात् ॥७॥ श्रीमद्भागवते रासे शिष्टाचारविलद्धनम् । समाशङ्कथ हरेरेवं समाधत शुको मुनिः॥८॥ नैतत्समाचरेज्जातु मनसापि हनीश्वरः। विनश्यत्याचरन्मौदयाद् यथा रुद्रोऽविधज विषम् ॥६॥ ईश्वराणा वचः सत्य तथैवाचरितं पवचित् । तेपो यस्ववचोयुक्त बुद्धिमास्तत्समाचरेत् ॥१०॥ तस्माच्छकर एपाह गीतावषहदि स्थितः। प्रतीपाचरणं नव शकरे परिलोक्यते ॥११॥ शिष्टाचारको लेकर गीतामे बताया है कि हे अर्जुन ! लोक सग्रहार्य भी तुम्हे उचित कर्म करना चाहिये। श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है उसे दूसरे लोग प्रमाण मानत है । अत में शिप्टाचारनिष्ठ रहता है। अन्यथा मैं सफरव; और प्रजाघातक होता। ये सारी बातें श्रीकृष्णहृदयस्य शकर बोल रहे हैं। क्योकि शिष्टाचारनिष्ठता शरमे ही है। यह बात ब्रह्मानीमे नहीं थी। यह इसी श्लोकमे पता लगेगा। वृन्दाकी शुद्धिका साउन पनेने विष्णुमे भी यह यात नहीं है। श्रीमद्भागवतमे रासप्रसगमे राजा परीक्षितने श्रीकृष्णपर परदाराभिमान दोप यो शमा की तो शुग- देवजीने उतर यही क्रिया पि ओवर मनसे भी ऐमा यायं न करें। यदि पिया तो उसका नाश होगा। ईश्वरोषा यचन प्रमाण हो । है और वचना- नुकूल आचरण भी । इस प्रसगरी स्पष्ट है कि शिष्टाचारनिप्पना श्रीकृष्णा-

श्लोकः]
सन्दवातिकसहितम्
२५५
दिमें नहीं थी। तब गीतामे अपनेको शिष्टाचारपालनकर्ताके रूपमें कौन
कह रहा है ? श्रीकृष्णहृदयस्थ शंकर ही । शंकरमें अशिष्टाचरण कहीं
देखने में नहीं आया ।। ३-११ ॥
शिष्टाचारं स्वयं रक्षन् दण्डं दाति प्रतीपिनाम् ।
स धर्मसेतुरूपेण शंकरो वय॑तेऽधुना ॥ १२ ॥
शिष्टाचारी स्वयं रक्षा करते हुए विपरीताचारियोंको शंकर दण्ड
देते हैं। धर्मसेतु के रूप में उन शंकरका वर्णन अब करते है ।। १२ ॥
ननु श्मशानाऽक्रीडादिरशिष्टाचरणं स्फुटम् ।
शिवेऽपि धोक्ष्यते मैवं वामस्तत्र कारणम् ॥ १३ ॥
परदाराभिमादि परपातनियन्धनम् ।
नेवाकरोच्च गिरिशस्तस्माद्धर्मगुबेव सः॥१४॥
शंका होगी कि श्मशानक्रीडादि अशिष्टाचरण शंकरने भी तो किया।
किन्तु उसका उत्तर "श्मशानेप्वाक्रीडा" इस श्लोकमे ही हम देंगे। फिर
परपननकारण परदारस्पर्शादि तो शकरके विपयमे है ही नहीं।
अतः शकर धर्मरक्षक ही हैं। (धर्मफलद कहनेके बाद धर्नरक्षक अब
कहते हैं ) ॥ १३-१४॥
प्रजानाथ नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद्भूतां रिरायपुमृप्यस्य वपुषा ।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपनाकृतम
वसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृा व्याघरभसः ॥२२॥
हे नाथ ! ब्रह्माजी अपनी पुत्री सध्यापर मोहित हुए। वह लजासे
हरिणी बनी तो हरिण शरीर धारणकर वलात् रतिके लिये उसके पीछे
पहुचे। इतनेमे धनुपधारी मापके हायसै मृगवेधी वाण छूटा । उसने पुस
सहित ब्रह्माके शरीरमे प्रवेश किया। ब्रह्माजी दिवगत हुए लेकिन आज भी
भयभीत ब्रह्माको मानो वह बाण छोड नहीं रहा ।। २२॥
विष्णोरतु नाभिकमलादावित: पिनामहः ।
भ्रूमध्यात्तस्य रुद्रश्चे युक्त कार्यशाकमात् ॥ १५ ॥
यामदक्षिणमध्येग्यो ब्रह्मदिगमहेश्वराः।
शिवाङ्गभ्यः समुद्भूताः कार्याय पुनरोदशम् ॥ १६ ॥

२५६ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [द्वाविंशः ब्रह्मणा नोदितो रुनः सृष्टये तरसाऽसृजत् । रौद्रानेव हि भूतादीनातुष्यत्तेन विश्वसृट ॥ १५ ॥ विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्मा आविर्भूत हुए, ब्रह्माके भ्रूमध्यसे रुद्र आविर्भूत हुए। वैसे तो शिवके वाम, दक्षिण और मध्य अंगोंसे ब्रह्मा- विष्णु-महेश्वरका जन्म है । तथापि कार्यविशेषार्थ इस क्रमसे पुनः प्रकट हुए, यह हम बता चुके । फिर ब्रह्माजीने सृष्टिके लिये द्रको कहा । रुद्रने रौद्र भूतप्रेतादि सृष्टि की । उससे ब्रह्माको संतोष नहीं हुआ ॥ १५-१७ ॥ ततः प्रशान्तसृष्टयर्थ लोककल्याणकारणात् । -ऋषीणां च कुमाराणां सृष्टि स समचीफ्लुपत् ॥ १८॥ मरीचिङ्गिरा अत्रिः पुलस्त्यः पुल हः कतुः। घसिष्ठश्न ति सप्तैते सप्तर्षय उदाहृताः॥१९॥ कुमारा अपि चत्वारः सनकश्च सनन्दनः । सनातनोऽपि च सनत्कुमार इति वणिताः ॥२०॥ तथैव मयुनों सृष्टि निर्वतयितुमण्डजः । द्वघातपातयवात्मान पतिपत्युद्भवस्ततः ॥२१॥ यः पुमान् स मनुर्या स्त्री शतरूपेति फौतिता। देवहूत्यादयस्ताभ्यां तितः कन्याः प्रजजिरे ॥ २२॥ फर्दमन महायोगी जनितो ब्रह्मणव हि । इत्यावि तूतरं वृत्तं पूर्वमानं प्रवधमहे ॥ २३ ॥ इसके बाद शान्त सृष्टि के लिये लोककल्याणार्थ ब्रह्माजीने सप्तर्षियों- को और चतुपकुमारोंको जन्म दिया। मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रत, वसिष्ठ ये सात ऋषि हैं। सनक, सनन्दन, सनातन, सन कुमार ये चार कुमार हैं। वैसे ही मैथुनो मृष्टिनिर्माणार्थ ग्रहाने अपने शरीर से दो भाग पृथक किया। उमीसे पतिपली का उद्भव हुआ। उसमें पुरुष मनु हुमा । स्त्री शतरूपा कहलायी । देवहूति आदि उनकी कन्यायें हुई । ब्रह्मासे ही कदम प्रजापति हुए । देवहूतिसे विवाह और आगे सृप्टिवृद्धि यह उत्तर- कपा है। हम पूर्वकया पर ही थोड़ा वर्णन करेंगे ।। १८-२३ ।। निनसृष्टान मरीच्यादीन परमेष्ठी पितामहः । प्रवृत्तिलक्षणं धर्म प्रायामास वैदिकम् ।। २४ ।। सनवादीस्तपा ऐयो शानथैराग्यलक्षणम् । नियत्तिलक्षणं धर्म ग्राहयामास विश्वसृट् ॥ २५ ।।

श्लोक:] सन्दवातिकसहितम् २५७ धर्मेण द्विविधनव स्थितिहि जगतो मवेत् । इत्यतो द्विविधं धर्म तेम्प एवमुपाविशत् ॥ २६ ॥ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुगेवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविध्यध्वमेप वोऽस्त्विष्टकामधुः ॥२७॥ देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यय ॥२८॥ इति गोतासु भगवान् लोकरक्षणहेतवे। यजसृष्टघुपदेशादि संक्षेपेण घवर्णयत् ॥ २९॥ अपने उत्पादित मरीचि आदिको ब्रह्माजीने प्रवृत्ति धर्ममें लगाया । तथा सनकादिको ज्ञानवैराग्यरूपी निवृत्ति धर्ममें लगाया। क्योंकि विविध धर्मसे जगतकी स्थिति होती है । अतः मरीचि आदि और सनकादि को द्विविध धर्मोपदेश किया। गीतामें भी बताया-यज्ञसहित प्रजाको सृष्टि कर प्रजापतिने प्रजाको कहा कि इन यज्ञोंसे देवताओंको प्रसन्न करो। देवता तुम्हें प्रसन्न करेंगे। यही तुम्हारी इष्ट कामधेनु है । परस्पर भावनासे परमश्रेय प्राप्त करोगे ।। २४-२९॥ अज्ञात्वा समयं मंव कर्मसंपादनं भवे । आसंस्ते जनलोकादो नात्र सूर्योदयादयः॥ ३० ॥ वराहेणोधता पृथ्वी मनुप्रायनया तदा। ब्रह्मनासोद्भवेनेति पुराणेषु निरूपितम् ॥ ३१॥ अतश्व समयं ज्ञातुं मन्योपारपर्यमेव च। ससर्ज संध्यां सा देवोपिणी सममूतदा ॥ ३२॥ समयके ज्ञानके विना कमरांपादन संभव नही पा। मरीचि आदि तथा मनु आदि सभी उस समय जनलोकादिमे थे। वहां सूर्योदयादि होता नहीं, समर कैसे जानेंगे ? ब्रह्माजीकी नासिकासे उद्भत वराहने मनुप्रापनासे पृथिवीका उद्धार पश्चात् किया इत्यादि कथा पुगणोमे है। जो भी हो। जनलोवादिमें समयनिर्धारण तो नही ही था। अतः समयके शानायं तपा संध्योपासनापं ब्रह्माजीने सध्याकी गृष्टि मी जो देवीस्वरूपिणी पी॥ ३०-३२ ॥ हप्यममवत्तस्याः प्रातःसाध्याक्षणारिमका। गुस्लवर्णा घ माध्याहोसायंसन्ध्यातु मेघका ।। ३३ ॥ पृषिम्युटरणारपश्चात पुन समये वृत्ते। प्रातःकासाचपिष्ठात्री देवी सा समपद्यत ॥ ३४॥ १७ [द्वाविंश स्फुटे ।- १ . 17 1 ૨h૮ श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् सध्या तीन रूप थे। प्रात सध्या अगवर्णा, मध्याह्नसध्या शुक्लवर्णा और सायसध्या चित्रवर्णा हुई। पृथिवीको वराहने उठाया तो सूर्यसे समयनिर्धारण होने लगा तो यह देवी तत्तत्समयकी अधिष्ठात्री बन गयी।।३३-३४ ।। केचित्तु सन्ध्याद्वितयं मन्यन्ते सन्धिसभवम् । अन्यथा मध्यरात्रं च सन्ध्या कि न भवेदिति ॥ ३५ ॥ प्रभातम स्वरूपिण्योदिनराम्योस्तु - पुज्यते । सन्धिपंधन्यथो तहि प्रतिक्षणमयं भवेत ।। ३६ ।। मेवमुत्पतनं चैव पतन च रवे 'तयो सन्धिः कयं नास्ति विरुद्ध ते च समते ॥ ३७॥ 11 रानो न दृश्यते सन्धिरतो नवस गण्यते। न प्रतिक्षणाधिस्तु कि चिच्छिक्षयते जनान् ॥ ३८ ॥ - उदयास्तमयावेषमुन्नत्यवनती अपि दृष्ट्या शिक्षा प्रगलीयुर्मोक्षाय मनुजा इति ॥ ३९ ।। कुछ लोग दो ही सध्या मानते हैं । सधिमे जो हो वहीं 'सध्या । अन्यथा मध्याह्नके ममान मध्यरात्र सध्या क्यो नही ? दिन प्रयाश है रात अधकार है । दोनोकी सधि उचित है। अयथा प्रतिक्षण सधि और सध्या माननी होगी। उनके प्रति हमारा वक्तव्य यह है कि सूर्य का उठना और गिरना भी प्रत्यक्ष है । विरुद्ध उन दोनोको मध्याह्न सधि क्यो नही ? रातम उत्थानपतनादि नही दीसता । अत सध्याकी गणना नहीं है । उदय अस्त- मयकी सधिये समान उत्थानपतनकी राधिसे भी कुछ शिक्षा प्राप्त होती है। वैसे प्रतिक्षणसन्धिसे क्या शिक्षा मिलती है ? ॥ ३५३९ ।। यस्तुतस्तु परा देवो कालाधिष्ठातृएपिणी । तवाधारत एवान्ये पर्मा यशादयो नृणाम् ॥ ४०॥ वस्तुत सधि आदिकी बात मानवृद्धयर्थ है। कालके अधिष्ठात्री देवी हो मध्या आदि है। उसोके आधार पर धर्मकर्मादि होते हैं ।। ४० ॥ ऋषीन सृष्टयोपदिश्यम्योधर्म साध्या विधाय च । बह्मा विचारयामास यधिष्यन्ते कय प्रजा ॥४१॥ सृष्टानामपि चिन्ता चेत्सृष्टिर्वस्पत्यसरायम् । नसष्टममयंपा चिन्ता चेयुज्यतेतराम् ।। ४२ ।। न मे पुत्रो न मे पुत्रो महेश पूजये यजे। इति स्वय यतेरश्वत्प्रजा सृष्टि प्रयत्स्यति ।। ४३ ॥ " श्लोक: ] स्पन्दवातिकसहितम् २५९ ततन मथुनों सृष्टि कर्तुं काममजीजनत् । श्यामागं सुन्दरं सर्वलोकाकर्षणबन्धुरम् ॥४४॥ अस्तु, ऋपियोंकी सृष्टिकर उन्हें धर्मद्वयोपदेश कर तथा संध्याको भी उसन्न कर ब्रह्माने सोचा कि सृष्टिरक्षणोपाय तो हुआ। किन्तु सृष्टि बढ़ेगी कैसे ? मेरे समान मत्सृप्टोको भी यदि चिन्ता होगी तो ही सृष्टि वृद्धि होगी। मेरे अकेलेको चिन्ता ठीक नहीं। लोग मेरे पुत्र नही, पुत्री नहीं, ईश्वरकी पूजा करूं, मनौतियां मनाऊं इसप्रकार स्वयं यल करेंगे तो सृष्टि वृद्धि होगी। ऐसा सोचकर मैयुनी सृष्टिके लिये उन्होने कामदेवको उत्पन्न किया, जो श्यामवर्ण था, सर्वलोकाकर्षक होनेसे सुन्दर था ॥४१-४४।। स पप्रच्छ विधि ब्रह्मन् जन्म मह्यं ददौ भवान् । कि मे नाम तथा धाम कि मे शक्तिश्च का च मे ॥ ४५ ॥ कार्य च कि मे भगवन्नायुधानि च कानि मे। बरहं भयवादिष्टं कार्य निविघ्नमावघे ॥ ४६॥ कामदेवने ब्रह्माको पूछा हे ब्रह्मन् ! आपने मुझे जन्म दिया। मेरा नाम क्या रहेगा ? मेरा धाम कौनसा होगा? शक्ति क्या रहेगी? और आयुध क्या होंगे, जिनसे आपके आदेशका निर्विघ्न पालन कर सकं ।। ४५-४६॥ ब्रह्मा-मवनो मन्मयो मारः प्रद्युम्नो मोनकेतनः। कन्दर्षों दपंकोऽनङ्ग कामः पश्वशरः स्मरः ॥ ४७ ॥ इत्यादीनि तु नामानि प्रसिद्धपन्ति बहूनि ते । हृदयं किल सर्घषां तव धाम भविष्यति ॥४८॥ (अनन्तप्राणिनां हृतं धाम स्यात्सुखदं परम् ।। जगदानं वशीकरणमेव सृष्टिप्रवर्धनं चैव कार्य ते स्यात्प्रवर्तनम् ॥४९॥ अरविन्दमशोकं च चूतं च मधमल्लिका। नीलोत्पलं च पञ्च ते तव स्युः पञ्च सायकाः ॥ ५० ॥ उन्मादनः शोषणश्च तापनः स्तम्भनस्तया। संमोहनश्च पश्चं ते तव स्युः पञ्चसायकाः॥५१॥ अप्रघा भयेच्छक्तिः सरेय न संशयः। पशयः पक्षिणो या स्युदया या किन्नरा उत ।। ५२॥ असुरा मनुजा माहो कोटा या पुत्तिका उत । ब्रह्मा या विष्णुरेवाहो रुद्रो वाप्यपरोऽपि या ॥५३॥ चैय २६० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [द्वाविंश - दिवि वा भुविधा किंवा पातालेये च जन्तवः । सनिवाञ्जसा जेष्यस्येभिर्वाणरसंशयम् ॥ ५४॥ ब्रह्माजी बोले मदन, मन्मथ, कन्दर्प, काम इत्यादि तुम्हारे बहुत नाम होगे । राबका हृदय ही तुम्हारा घर होगा। जगतका आकर्षण, वशीकरण, मृप्टिवृद्धि ये तुम्हारे कार्य होगे। अरविन्द, अशोक, माम, मल्लिका, नीलकमल ये पाच बाण होगे। वे भी उन्मादन, शोपण, तापन, स्तभन, समोहन ऐसे पाच होगे । तुम किसीसे दवोगे नही । पशु, पक्षी, देव, किन्नर, असुर, मनुष्य, कीट, पतंग, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र एव और भी जो हो, स्वर्गमे, भूमिमे पातालमें जो भी जन्तु हो सवको तुम इन वाणोसे आसानीसे जीतोगे ।।४७-५४॥ इति ब्रह्मोदित श्रुत्वा चिन्तयामास मन्मयः । कि नु पुष्पैविजेष्येऽहं परीक्षिष्येऽधुनैव हि ॥ ५५ ॥ ब्रह्मा वा विष्णुरेवोतेत्यधुनैव प्रभाषितम् । ब्रह्मण्येव ततो बाणान् सदधामोत्यचिन्तयत् ॥ ५६ ॥ कृत्या फोदण्डटङ्कारं शरान् संधाय तन च । प्राहिणोल्लाघवाद ब्रह्मण्यष्यादिषु च दर्पकः ॥ ५७ ।। इसप्रकार ब्रह्माका वचन सुनकर मन्मथने सोचा पि क्या इन पुप्प- वाणोसे मैं सबको जीतूगा ? जरूर परीक्षा करनी चाहिये । अभी-अभी बता रहे थे, ब्रह्मा हो विष्णु हो इत्यादि । तो ग्रह्मापर ही वाण राधान करू । कामदेवने कोदडटयार किया। धनुप पर बाण चढाया और ब्रह्मा पर तथा अन्य प्रापि आदि पर मारा ॥५५-५७।। प्रजानाय• • 'ऋष्यस्य वपुषा ब्रह्मा सयामीक्षते स्म मा लज्जामन्वमूत्तदा । भूत्वा च हरिणी सापि प्रोत्प्लुत्य समघायत । ५८ ॥ रोहिदमूना तया सन्ध्यामिच्छू रमयितु विधिः । अमिकः प्रसभं सद्य ऋष्यस्य यपुपान्यगात् ॥५९ ॥ एवं दूपितफर्माणं विश्वमायो महेपरः । ग्रह्माणं योक्ष्य किमिदमित्याश्चर्यादलोकत ।। ६०॥ ब्रह्माजी सन्ध्यासी ओर काम दृष्टिसे देसने लगे। सन्ध्या लज्जित होकर हरिणी बनकर तपावगे भागी। रतीच्य ब्रह्मा हरिण बनकर पीछे -- जनः। श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् २६१ दौड़े । ऐसे दूषित कर्मवाले ब्रह्माको विश्वनाथ महेश्वरने यह क्या हो रहा है ऐसा साश्चर्य देखा ।। ५८-६० ।। दुहितरं नतु फि मैथुनी सृष्टि चिकोर्पोरन दूषणम् । उच्यते सा हि दुहिता तेनंव जनितत्वतः ॥ ६१॥ ब्रह्मानी मैथुनी सृष्टि करना चाह ही रहे थे तो दोष किस प्रकार ? दोष यही कि वह ब्रह्मासे उत्पन्न होनेसे पुत्री थी॥६१ ॥ ननु सा मानसी सृष्टिर्न दोषोऽस्ति मयंकरः। मैवं प्रजानाथ एव श्रेष्ठोऽयं लोकसंग्रही ।। ६२ ॥ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो ज्ञास्यन्ति मानसत्वं न लोकास्तस्या यथायथम् ।। ६३ ।। किं च दत्तकपुत्री च पुश्येव युधसंमता। इयं मानसपुत्रीति पुत्रीत्वे शङ्कयतां कथम् ॥ ६४ ।। यह तो मानमी सृष्टि थी। इसमे क्या भयकर दोप था ? सुनो। ब्रह्माजी प्रजानाथ थे, श्रेष्ठ थे, लोकसग्रही थे । उनके आचरणका अनुकरण अन्य करते । कौन देखता कि यह मानसपुत्री थी कि कैसी थी। फिर दत्तक पुत्रीको भी पुत्री मानते हैं तो यह तो मानसपुत्री थी ॥६२-६४॥ ननु नैव समर्थस्य दोषः कश्चन विद्यते । शतरूपां मनुव्यू हे भगिनी ब्रह्मजामतः ।। ६५ ।। तदसत् सोदरीत्वेन विना तज्जननाद्विधः । कामं सोढुमशक्तन समर्थोऽत्र कयं विधिः॥६६॥ अनिच्छन्ती रमयितुमिच्छति प्रसभं स हि । तस्मादस्त्येय दोषोन सामयंक्षरणाद्विधेः॥ ६७ ॥ सकरस्य च कर्ता स्यादुपहन्यादिमाः प्रजाः। युक्त एव ततः शमोस्तदा तद्दण्डनोधमः ॥ ६८॥ समर्थको दोप होता नहीं है । नही तो शतरूपाको मनुने कैसे व्याहा। ब्रह्मासे दोनो पैदा हुए तो शतरूपा मनुकी बहन हुई। यह शका असती है। क्योकि ब्रह्माजीने सोदरीपनेके विना शतरूपाकी मृष्टि की थी। अन्यथा ब्रह्माजीकी प्रथम सृष्टिमे मभी भाई बहन ही होते। यहा की स्थिति दूसरी है। कामवेगको रोकनेमे ब्रह्मा असमय हुए तो समर्थ महा रहे ? वे तो अनिच्छुक मध्याको बलात् भोगना चाह रहे थे। अत सामयं. क्षरण होनेसे ब्रह्माजीको दोप लगता ही। साथ ही सकरकर्ता होनेगे जनतोपघातक होनेमे और भी पाप लगता ॥६५-६८॥

२६२
श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम्
[ द्वाविंशः
धनुष्याणे:०
पिनाक धनुरादाय भगवांश्चन्द्रशेखरः।
संधाय वाणमहिनोत् सपनाकृतवान् विधिम् ॥ ६९ ।।
दिवं यातस्त्रसंस्तस्मात् स्वरक्षायै प्रजापतिः।
शरीराभिःसृतोऽप्येन त्यजत्यद्यापि नो शरः ॥ ७० ॥
मृगस्य वेधनोत्साहस्तस्मिन्नधापि
विद्यते ।
समृगव्याधरमसरूपो माहेश्वर. शरः।। ७१ ॥
विहायसे मृगशिरोरुपेणाद्यापि पाजः।
वतंते बाणरूपेण त्रितारं च विलोक्यते ।। ७२ ।।
उस अधर्मकृत नाशसे बचानेके लिये शकरजीने पिनाक धनुप लेकर
ब्रह्मापर बाण मारा । जो ब्रह्माके शरीरमे पुखसहित घुसा। भयभीत ब्रह्मा
उससे आत्मरक्षा करने स्वर्ग गये। यद्यपि शर उस शरीरसे अलग हुआ
फिर भी दुबारा ऐसी घटना न हो एतदर्थ यह बाण मृगवेधनोत्साह से
আল ক্ষী ঘূৰি নইকা অলি অাব্দীন্ত বিষাক্ট ফর্ম হ্যামা
पा रहा है ।।६९-७२॥
सध्या मानसदोषेण दुप्टाऽभोग्या सदाभवत् ।
ब्रह्मघ्यान ततः कार्य सन्ध्यायां दोपशान्तये ॥७३॥
सध्या मानसदोपसे दूषित हो गयी । अतएव अभोग्य हो गयी। अत
उस वेलामे भी भोग वर्जित हुमा । उस समय दोपशान्त्यर्थ ब्रह्मध्यान करना
चाहिये ॥७३॥
राप्तः कामय विधिनाऽनङ्गत्वायातिसाहसः ।
सदुक्त प्राग हरक्रोधानलेवस्य हनङ्गता ॥४॥
कामदेवको ब्रह्माने अनङ्ग होनेवा पाप दिया । उसका फल दाफरपी
क्रोधाग्निमे जलकर अनङ्ग होना पहले हम यह आये ॥४॥
पिनाकधारिणे
मोकनियमस्थितिहेतये।
नमो भगवते धर्मसेतो पूर्वतये ।। ७५ ॥
पिमा धारणकर जो लोकको नियन्त्रित स्थितिमे रखते हैं ऐसे धर्म
मेतु भगवान पपेतु शिवको प्रणाम है ॥७॥
इति थी पाशिवानन्दयोगिनः कृतिन तो।
द्वारिशो विगत स्पन्दो महिम्नः स्तोत्रयाति ॥ २२॥

'.
दण्डदश्व
त्रयोविंशः श्लोकः
कर्मणां फलदोऽप्येव दुधियामभिचारण ।
प्रतीपिना
धर्मसेतुर्महेश्वरः॥१॥
श्लोकत्रये कर्मफलदत्वमुदीरितम्।
नंतावता महेशत्वं सुस्फुटं प्रतियुध्यते ॥२॥
भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तव तान् ।
छायेव कर्मसचिवा महेशो दीनवत्सलः ॥ ३॥
यायन दीनकारुण्यं तावत्का नु महेशता।
कर्मानुसारफलदो देवः साधारणो यतः॥४॥
मज्ञादि कर्मोके फलदाता होनेपर भी दुष्टमतियोके अभिचारकारी है,
अधर्मवतियोके दण्डदाता हैं, इस प्रकार महेश्वर धर्मसेतु हैं, यह पूर्व तीन
श्लोकोमे निरूपित किया। परन्तु इससे महेश्वरता स्पष्ट नहीं होती। जैसे
देवोकी उपासना करते है वैसे वे फल देते हैं। देवता छायाके समान मानो
अनुकरणमान करते है। महेश्वर तो दीनवत्सल होते हैं। जबतक दीन
कारुण्य स्पष्ट न दिखाई दे तबतक कैसे महेश्वर? वह तो साधारण देव
होगा ॥१-४॥
सुदीनायां तपस्विन्यां पार्वत्यों भगवान् हर ।
स्त्रंणयत् समयतिप्ट स्फोरयम् स्वां कृपालुताम् ॥५॥
कामदेवदाहीतर पार्वती अतिदीन होकर तप करने लगी। फलत
गकर उनके प्रति स्त्रण जैसे हो गये और अपनी कृपालुताको स्फुट
.
।
।
क्यिा ॥५॥
शया युक्तो जगति घशक्तः प्रमवितुं शिवः ।
प्रस्फुरतिके नय स्फरस्येतरजगरिछवे ॥६॥
दग्धा शिवध्यानपरा शिवे लोनाऽपृथक् सती।
अद्वतशिवशक्त्यवयसामरस्योपमा स्थिता ॥७॥
ध्यापन परं ब्रह्म तदाऽयंन् कार्यमगत्तवत् ।
अवतिष्ट महादेयश्विर देव्युवेपि सा॥८॥

[त्रयोविंशः
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
अतः शक्तियुतः पूर्णो दर्शनीयोऽत्र शंकरः।
अर्वाचीनपदव्याख्यावसरे. समुपास्तये ॥९॥
उपान्तिमस्तुती तेन कात्यायनमहामुनिः।
पूर्ण मग्यन्तरेणात्र - प्रतिपादयतीश्वरम् ॥१०॥
रहस्यार्थ यहां यह है कि शक्तिसे युक्त होनेपर ही जगतके उत्पा-
दनादिमें शंकर प्रभु होते हैं। सामरस्यमें पृथक्शक्तिस्फुरण नहीं है तो जगत् भी
स्फुरित नहीं होता। सतीदाह हुआ। शिवका ध्यान करनेसे सती शिवलीन
हुई तो सामरस्यावस्था जैसी हो गयी। शिवजी भी ग्रह्मध्यान करते हुए
अकर्मा हो गये । पार्वतीका जन्म होने पर भी काफी दिनतक योग नहीं हुआ
था । अर्वाचीनपद व्यास्यामें उपासनार्थ पूर्णरूप वर्णन करना आवश्यक है।
अतः भंग्यन्तर । प्रकारान्तर ) सेपार्वती देवीको लाकर महामुनि कात्यायन
शंकरका पूर्णरूपवर्णन करते हैं ॥६-१०॥
स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि स्त्रणं देवो यमनिरत देहाधंघटना-
ववैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः॥२३ ।।
पार्वतीके स्वयंके सौन्दर्यपर निर्भर होकर कामदेवने धनुषबाण
उठाया था। किन्नु तिनकेके समान क्षणमें ही वह सामने ही भस्म हो
गया। फिर भी हे पुरमथन संयमी वरद भगवन ! आपको देवी पार्वती
शरीरार्धप्रदानसे स्त्रंण समझने लगी तो यही कहना पड़ेगा कि युवतियां
मुग्ध होती हैं ॥२३॥
ऋतुप्वंसविचारे हि परिनं किंचिदीरितम् ।
सत्यास्तत्र वदन्त्येके दग्या योगाग्निना सती॥११॥
अन्ये त्याहुः सती नैव भस्मीनूता मृता तुसा।
यमपूत्यमायातः शंकरस्तामवंत ॥ १२॥
"क्रियादक्षो दक्षः" इत्यादि ऋतुध्वंस विचारमें सतीका कुछ चरित्र
हमने बताया। वहां कुछ लोगोंका कहना है कि योगाग्निसे सती जलकर
भस्म हो गयी। दूसरे कहते है कि सती भस्म नहीं हुई, केवल मृत हो
गयी । यसपूर्वयं आये गकरने उन्हें देसा ॥११-१२॥
सपा हि वोरमण यजध्वंसे कृते सति ।
रसशोणि नित्याग्नौ हते दुघर विमतः ॥ १३ ॥

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् २६५ पोडिता देवताः सर्वा विधिविष्णुपुरोगमाः। शंकर प्रार्थयामासुस्तद्यजपुनरुद्धृतेः ।। १४ ॥ भगवांस्तत्र चागत्य कबन्ध बस्तमस्तकम्। संयोज्य जीवयामास दक्षं यज्ञस्य पूर्तये ॥ १५॥ पश्यत्वेष निजं भागं भगो मित्रस्य चक्षुषा । यजमानस्य दन्तः स्वं पूषा भागं पिनष्ट्विति ॥ १६ ॥ पुनरुदधृत्य सकलं स्वभागसहितं मखम् । कारयामास विधिवत्कारुण्यनिलयो हरः॥ १७ ॥ वीरभद्रने यज्ञध्वस किया, दक्षमस्तकको अग्निमें होम डाला तो पीडित सभी देवोंने शकरके पास जाकर यज्ञके पुनरुसारके लिये प्रार्थना की। वकरेका मस्तक जोड़कर दक्षको शंकर जीने जिलाया। भगको मित्रके चक्षुसे देखनेका और पूषाको यजमानके दातोंसे चबानेका अनुग्रह देकर स्वभाग सहित यज्ञका पुनरुद्धार किया ॥ १३-१७ ।। अथासौ परितोऽपश्यत् पूर्वनष्टमशेषतः। तत्रासौ समलोकिष्ट प्राणशून्यां सतोतनुम् ॥१८॥ सतीवियोगसतप्तो व्यामोहपरिघर्पितः। मृत तदीयं तद् वर्माऽऽलिलिङ्ग तरसा हरः॥ १९ ॥ ततस्तां स्कन्ध आरोग्य विचचार महीतले । दिव्यन्तरिक्षे पाताले न शमं प्रत्यपद्यत । २० । यज्ञोद्धारोत्तर शंकरने चारों ओर देखा। वहापर प्राणशून्य सतीदेह देखा। तव सतीवियोगसे सन्तप्त, व्यामोहसे धर्पित शंकरने सतीके मृत शरीरका आलिंगन किया और कधेपर रखकर पृथिवीमे, स्वर्गमें और पातालमे घूमने लगे, कही भी उन्हें शाति न मिली ॥ १८-२० ॥ एवं व्यामुग्धमालोक्य विचरन्तमितस्ततः । धकर्त विष्णश्चक्रण सत्यास्तम खण्डः ॥ २१॥ यन यत्रापतन् सण्डा भगवत्यास्तु यध्र्मणः। चतु.पष्टिरमूवंस्ते शक्तिपीठा महीतलं ॥२२॥ शकरको इस प्रकार व्यामुग्ध होकर पागल के समान इधर-उधर भटकते देखकर विष्णुने सतीके शारीरको टुकड़े टुकड़े कर गिराया। जहा जहां वह गिरा वही पीठ हो गया। इस प्रकार चौसठ शक्तिपीठ महीतलमै प्रसिद्ध हुए ॥ २१-२२।।

२६६
श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [त्रयोविंशः
अविरोधं वचनयेरेवमन विदध्महे ।
प्राणायामानलेनाम्बा प्राणानेव ददाह सा॥२३ ।।
शरीर तु सतीदेच्या दिव्य निर्दग्धुमक्षमम् ।
प्राणहानेमृ तत्वोक्तिश्चिद्रूप म्रियते न तत् ॥ २४ ॥
अन्यथा शक्तिपीठत्व चैतन्य तन तत्र च ।
पूज्यत्व फलदत्व च कय नामोपपद्यताम् ॥ २५ ॥
च्यामुग्धवदभूच्छम्भुन तु व्यामुग्ध एव स ।
अनैवानुपद सर्वमेतत्स्पष्टीमविष्यति ॥ २६ ॥
एक जगह सती जल गयी वताया, दूसरी जगह न जलनकी बात
आयी। दोनो वचनोका अविरोध इस प्रकार है कि प्राणायामाग्निसे
अम्बिकाने केवल प्राणोको जलाया शरीरको नहीं। सतीदेवीका शरीर
दिव्य है। वह अग्निमें जल ही नहीं सकता। सती मर गयी यह उक्ति भी
प्राणदाहको लेकर है। चिद्रूप देवो मर नहीं सकती। ऐसा न माना जाय
तो मृत शरीर चेतनाहीन होनेसे शक्तिपीठोमे चेतनत्व, पूज्यत्व, फलदातृत्व
आदि कुछ भी न होता । शकर गी व्यामुग्धसे हुए न कि व्यामुग्ध ही हुए ।
ये सारी बातें यही आगे स्पष्ट होगी ।। २३ २६ ।।
प्राणहीनापि चिद्रपा सर्वमेतदलोकत।
खण्डितापि राखण्डपा पूर्णोऽशोऽपीति तूदितम् ॥ २७ ॥
दृष्ट्वतत्सरल स्वस्या मुग्ध शम्भममन्यत ।
सध्या जन्मान्तर नून वरीष्यामीत्यचिन्तयतत् ॥ २८॥
सब स्त्रणमवेयाच्चेद्धय चित्र न तद्भवेत्।
प्लुष्ट दृष्ट्याप्यनग चेदयेयाचित्रमेव सत् ॥ २९ ॥
शरीर प्राणहीन था फिर भी चिद्रूप हानसे अपनेको कंधेपर उठाएर
फिरना आदि सारी बातें देखी। क्याकि यह खण्डित होनेपर भी ममण्ड
ही थी । और अग होनेपर भी पूर्णरूप ही थी । यह चैतन्या विषयम पहले
भी हम यह चुके । यह सब देखकर सतीन शव रयो अपने प्रति मुग्ध माना
और दूसरा जन्म रेकर पुन वरग वरूगी ऐसा साचा । यहातक तो ठोर
है। इतने मात्रसे यदि भाव रयो स्प्रंग समझती रही तो कोई आश्चर्यकी
बात नही थी । वितु यामदवको जलानेपर भी यदि शाखो रण मानती
रही तो आश्चर्यची वात नही तो यया ॥ २७ २९ ।।
दे समाथिता देयी मैनाया तुहिनावलात ।
लेमें जन्मेशसेयास्या भया प्राणेष योगता ॥३०॥

.
.
:
श्लोकः] 1 स्पन्दवातिकसहितम् ।
२६
तपोविनाय विवुधास्तारफासुरपीडिताः।
कन्दपं प्राहिणोच्छम्मो पुत्रोत्पत्तिप्रवृत्तये ॥३१॥
देवताओंकी प्रार्थनासे अम्बिकाने हिमाचलसे मेनामे जन्म ग्रहण
किया। पार्वतीकी शकर सेवाका वर्णन हम पहले कर चुके हैं। शकरजी
तप कर रहे थे। तारकासुरपीड़ित देवताओने शकरको पुत्रोत्पादनमे प्रवृत्त
करानेके लिये तपोविघ्नार्थ कामदेवको भेजा ॥३०-३१।।
स्वलावण्याशंसा
नयास्पदं विना कामः क्षमतेऽसौ प्रतितुम् ।
पुमास्पदो हि स्त्रीकाम पुंस्कामो योपिदास्पदः ॥ ३२ ॥
पार्यतीतनुलाण्याशंसये स्मरोऽधरत।
तस्याः सौन्दयमाधुर्यसोशोल्यादि हलौकिकम् ॥ ३३ ॥
उन्मादनं शोषण घ तापनं स्तम्भन तथा।
समोहनं च युगपत् समधत्त झपध्वजः ॥ ३४ ॥
तद् दृष्ट्वा नयनं शस्तृतीयमुदमोलयत् ।
महाय सणवत्प्लुष्टः कामस्त्रिपुरपरिणा।। ३५ ।।
उद्विग्ना सदिद चौक्ष्य मूच्छिना तुहिनादिगा ।
कोलाहलं निशम्यागात्तत्राश हिमालयः॥ ३६॥
क्लिश्नती रुदती मध्ये मूर्धामाप्नुयती सुताम् ।
दृष्ट्या व्यथितचित्तस्तां निन्ये स्यं भूपतिहम् ॥ ३७ ॥
आश्रयके विना कामको प्रवृत्ति नहीं होती। स्त्रीकाम पुरपारपद
होता है । और पुरुश्याम स्त्री-आरपद होता है। पार्वती के शरीरलावण्यपर
भरोसा रखकर वामदेवने अनुप उठाया। क्योकि पायीका सौन्दर्य,
माधुर्य, सोशीत्यादि अनिलोरोत्तर था। मामदेवने सफरपर उन्मादन,
शोपणादि पाचो वाणोका मधान दिया था। उसे दगार वारने अपना
तृतीय नेत्र सोला और क्षण भरमे तृपये ममान पामदेवो जला
डाला। यह देखकर पार्वती उद्विग्न हो गयी। मूछिन ही गिर परी।
कोलाहल मुनकर हिमालय राजा दौर दोहरर आप । पनामान,
रोती हुई, बीच बीचमे मूछा प्राप्त होती हुई पुत्री मोगर पपिन र
ये अपने पर आये।।३२-३७॥
शोकापारपतिता गगनमुपंपुगे।
निधिराम तपः रग प्राप्तुंठोपमा॥ ३८॥

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[त्रयोविंशः
।
उ मा गास्तपसे सूनो कोदक ते कोमलं वपुः।
मात्र विनिषितापि वनं प्रागादुमा सती ॥ ३९ ॥
चकार सा तपोऽत्युनं तापसरपि दुष्करम् ।
परीक्षितापि बहुधा शंभना या न चाचलत् ॥ ४० ॥
वृष्ट्वा तदीय दृढतां तपस्यां त्यागमेव च ।
प्रसन्नो भगवान शंभुस्तां निन्येऽर्धागिनी निजाम् ॥ ४१॥
शोकसागर निमग्न पार्वतीने शन: धर्य धारण किया। हठमे आ
गयीं। तपस्यासे शंकरको प्राप्त करनेका निश्चय किया। मत जाओ इस
अर्थ में 'उ मा गाः' ऐसा माता बोलती रही। इसीसे उमा नाम पड़ा। माता
के मना करनेपर भी वे तपस्यार्थ निक्ली। बडे बडे तपस्वियों के लिये
दुष्कर तपस्या पार्वतीने को। शंकरजीने एकबार अनेकविध परीक्षा भी
की। लेकिन वे दृढ रही। पार्वतीकी दृढ़ता, तपस्या एवं त्यागको देखकर
शंकर भगवान प्रसन्न हो गये और उन्हें अपनी अर्धाङ्गिनी
बनाया ।।३८-४१॥
मेघश्यामार्धवहार्य कुन्दगौराधंवर्मणे।
नमो नमः शिवायै च शिवाय च नमो नमः ४२॥
चाम्पेयसुमनोगोय कपूरसितवमणे।
नमो नमः
॥४३॥
धम्मिल्सशीर्षशोमिन्ये जटामस्तकशोभिने।
नमो नमः
कस्तूरीचचितागिन्य चिताभस्माचितागिने ।
नमो नमः
विभासितस्मराइगाये मसितेतस्मरागिने।
नमा नमः
॥४६॥
मन्दारहारपारिण्य करोटोहारधारिणे।
नमो नमः
दिव्याम्बरपरीतार्य दिगम्बरपिधारिणे।
नमो नमः
॥१८॥
रत्ननपुरगोमाय फणिन पुरसोमिने।
नमो नमः
॥४९॥
अगदेकजनन्य
जातीजनकाप
नमो नमः
॥५०॥
॥७॥

श्लोक:]
स्पन्दवातिकसहितम् ।
नमस्ते शिवयुक्तायै शिवायुक्ताय ते नमः।
नमो नमः
॥५१॥
अर्धनारीश्वरस्तुत्या
पावंतीपरमेश्वरौ।
स्तुवन्ति ये लमन्ते ते भक्ति मुक्ति च शाश्वतीम् ॥ ५२ ॥
शकरने पार्वतीको अर्धाङ्गिनी बनाया । अर्धनारीश्वररूपमे भगवान
विराजमान हो गये। अम्बाजी काली एव गौरी यथासमय होती हैं।
अर्धमेघश्याम, अर्धकुन्द गौर शिवा एव शिवको बार बार प्राणाम हो।
चम्पापुष्पोपम गौरदेहा शिवा और कर्पुरगौरदेह शिवको बार बार प्रणाम
हो। मुलायम सुन्दर केशयुत शिवा और जटाजूटधारी शिवको बार बार
प्रणाम हो। कस्तूरीचचित देहा शिवा और चिताभस्मचर्चित शिवको बार
बार प्रणाम हो। स्मर काम) को विभासित करनेवाली शिवा और उसे
भस्मीभूत करनेवाले शिवको बार बार प्रणाम हो। मन्दारहारधारिणी
शिवा और कपालमालाधारी शिवको बार बार प्रणाम हो। दिग्यवस्त्र-
धारिणी शिवा और दिगम्बरबाबाशिवको बार बार प्रणाम हो। रत्ननूपुर
शोभितपदा शिवा और फणिनूपुरशोभित शिवको बार बार प्रणाम हो।
जगतकी एकजननी शिवा और जगतके एकपिता शिवको बार बार
प्रणाम हो। अर्धनारीश्वर स्तुतिसे पार्वती और परमेश्वरकी स्तुति
करनेवालेको ऐहिक भोग और पारत्रिक शाश्वत मोक्ष प्राप्त होता
है ॥ ४२-५२॥
विनष्टसकलक्लेशो परमानन्दतुन्दिलौ।
अपारप्रेमकलिलो पार्वतोपरमेश्वरौ । ५३ ॥
समस्तक्लेश नष्ट हो गये। परम आनन्द प्रगट हुए। अपार प्रेममे
निमग्न पार्वती और परमेश्वर विराजमान हैं ॥ ५३ ।।
तादर्श परम प्रेम प्राप्तुमानन्दसप्लवम् ।
आचरन्ति व्रतं दिम्यमद्यापि कुमारिकाः॥ ५४ ।।
पार्वतीपरमेश्वरका जो अपार प्रेम है उस आनन्दसागर स्वरूप परम-
प्रेमको प्राप्त करने के लिये ही तो आज भी बुमारिकायें दिव्य ग्रत धारण
करती हैं ॥५४॥
यदि स्त्रण
स्वपूर्ववेहवहनं सम्मृत्य मधुरं शिवा।
दृष्ट्वा बेहार्यघटन मधुरामपुरं तथा ॥ ५५ ॥

₹७० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [त्रयोविराः विस्मर-तीव कन्दपंदाहं देवी नगात्मजा । 17 यमकमिरतं चापि योगीश्वरमपीश्वरम् ॥ ५६ ॥ स्त्रणं मेने ततश्चैव गगां शिरसि वीक्ष्य सा। मानिनो किल कैलासात् पितृगेहाप नियंयो ॥५७ ॥ पूर्वजन्म के संतदिह को शंकरजी उठाकर जो फिरते रहे उस मधुर घटनाक स्मरणसे तथा मधुगतिमधुर वर्तमानकालीन अर्धदेहघटनाके दर्शनसे मानो पार्वती कामदेवदेहदाहको तो भूल ही गयी, पर्वतपुभी जो ठहरी, फिर यमनियमनिरते योगियोके भी ईश्वर शकरको स्यण मानने लगी। तभी तो मस्तकमे गैंगाको दैवकर मानवती पार्वती कैलास छोडकर पीयर जानेके लिये निकली थी ।। ६५-५७॥ f बत घरद मुग्धा युवतयः मुंग्या युक्तयो ननं स्वरूप विस्मरन्ति ताः। पदीत्येतत्त, शशायामादिशक्ती कयं विवम् ॥ ५८ ॥" तथापि युक्त ,यदेहविशेषे मुग्धता भवेत । दृष्टीश्चाप्ययतारेषु तदेहोचितवृत्तप. ॥ ५९ ॥ पुरुषप्रेम योध्येय स्प्रेणान युक्तयों हि तान् । जानन्ति पूर्वयत्तं च विस्मरन्ति स्वभावतः ।। ६० ॥ युवतिया मुग्ध होती हैं । वे स्वरूपस्मरण नही करतो। "यदि स्त्रण" ऐसा लोक यदि पर है। वह शकार्थक है। आदिशक्ति पार्वती में मुग्धता होनेमे शका है। फिर भी मुग्धता उचित है । क्योकि गरीरविशेषमे आनेपर यह स्वभाव ईश्वरादिम भी आ जाता है । अतएव अवतारमालमे मनुष्यो- चित यात अवतारमे भी देसनेमें माती हैं। स्त्रीया स्वभाव है कि पुरपो मा प्रेम देसपर उन्हे स्त्रण समझने लगती है और पूर्ववत भूत जाती है।॥५८-६०॥ म सतीदेहबहने स्मशस्य कारणम्। या देहाधंघटने शंकरस्य महात्मनः ।। ६१ ॥ सतीदेहवहनमे पा देहापंपटनगे संणता मियपी पारण नहीं है ।।६१॥ यामेतस्ततोऽरण्ये सीताविपरयोहितः। रापरत दूरतो दृष्ट्या संपर: प्रापमापुरा॥१२॥ रातो पद रिमिति मनुष्य गमतीश्वरः। माप विष्ण: गपूग्यो मर्पद विहितः पुरा॥३॥ न । श्लोकः] : स्पन्दवातिकसहितम् २७१ फयं रोदिति विष्णश्वत्पूज्यनं व कयं रुदन् । परीक्षिष्येऽद्य गत्वाहं रामं दशरयात्मजम् ॥ ६४ ॥ . अविश्वस्य वचः शंभोगता व्यासे धितापि सा! सीतारूपं समास्याय रामं वश्वयितुं सती॥ ६५ ॥ सीताविरहपीडित होकर रामचन्द्र जंगलमें भटक रहे थे। दूरसे ही उन्हे देखकर शंकग्ने प्रणाम किया। मतीने पूछा-आप ईश्वर होकर मनुष्य में केमे प्रणाम करते हैं? मकर बोले ये साक्षात् विष्णु हैं। इनको गचे ही पूर्व मे पूज्य बनाया था। सती बोली-ये विष्णु है तो रोते कैसे हैं.? रोनेवाले पूज्य कैसे ? यह दारय पुत्र राम हैं । अस्तु, में जाकर परीक्षा करती हूं। शंकरके वचनार अविश्वास करके सती निषेध करनेपर भी सीताका रूप लेकर रामकी वञ्चना करने के लिये गयी।। ६२-६५ ॥ हन्त मातः फयंकारमेकला समुपागता। पव तावद् भगवान् शंभुर्भाग्यं तद्दशेने न मे ।। ६६ ।। इति रामवचः श्रुत्या संकुचन्ती शियं ययौ । सच तो परितत्याज मनसा भगवान् हरः॥ ६७ ।। उदासीनमु दृष्ट्वा शरा’ दक्षकन्यका । नायोचत पयि किचिद्वा शंकरस्तां यिशपिनीम् ॥ ६८॥ हा माता. आप अवेली कसे आयी? भगवान कर रहा हैं ? हाय ! उनो दर्शनका भाग्य.मुझे प्राप्त नहीं हुआ। इस प्रकार जय राम बोले तो सतीसो वडा गकोच हुआ। वहामे वे जमता शिवजीक पारा पहुंची तरतम पाकर मनसे मतीको छन्ड पुके थे। मकरलो उदास देश कर रातीको शफा हो गयी। रानमे सरजीने उनसे कोई बात नहीं की ।। ६६.६८ ॥ मात्याय स्वपरिरपाममनिक्लिष्टाऽभवत् सतो। तरसारयनाय मगवानुवाव विविधाः पयाः॥१९॥ PARI. यया. सोमरणयाणा। ततश्च विस्मृतश्ता नित्य मलगे जय सतीको अग्ने रयागने बारेमे पता नगा यो उन्हे अति- कोश हुआ। मती के मारपनार्थ शार भगवान नानापमा गुना रहे । तत्र मास्त्र सुनायां, अमरग्या मुनापी। मिमग पपगमे मन मग जानेगे मारी पे.भूल गयी ॥ ६९-७०। थपणतापरा॥७०।।

२७२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [त्रयोविंशः एवं बहुतिथे काले गते दक्षाध्वरे सती। संतरयाज तनुं प्राणायामदग्धप्रदूषणाम् ॥ ७१ ।। प्राक त्यक्तायां स्वमनसा शंभोर्मोहः कथं भवेत् । दग्धदोषामुवाहैष चिद्रूपत्वात हार्दतः॥७२॥ यंचतुःषष्टिपीठाना शक्ति संस्थापनं मतम् । तद्धि तेनैव संपन्नं न स्त्रणः शंकरः क्वचित् ॥७३॥ इस प्रकार बहुत समय बीता तब दक्षयज्ञमें प्राणायामदग्धदूषण शरीरको सतीने त्यागा। पहले मनसे जिन्हें शंकरजीने त्यागा उनमें 'मोह कैसे हो? हां, दोष दग्ध हो गये तो चिद् प होनेसे शुद्ध प्रेमसे उस शरीरका वहन शंकग्ने किया। चतुःपष्टिपीठोंका स्थापन भी अभिमत था। वह भी उसीसे सम्पन्न हुआ । शंकर तो स्त्रण नही ही ।। ७१-७३ ।। देहार्धघटनं चापि नेवास्य स्त्रैणताकृतम् । तत्तपोजातकारुण्यप्रेमप्रावण्यमेष तत् ॥७४॥ देहाघंघटन भी स्त्रंणताप्रयुक्त नहीं है। किन्तु पावंतीके तपके फल- स्वरूप कारुण्यपरिणाम परमप्रेम प्रवणता ही वह है ॥७४॥ यस्तुतः शिवशयत्योहि सामरस्यं परः शिवः । शिवशक्तिस्थितिश्चैव स्पन्दनं परमेशितुः ।। ७५ ।। शयत्या युक्तः शिवो विश्व स्रष्टमीष्टे न चान्यथा । क्या वियोगस्तयोः क्यापि लीलयं सकमा प्रमोः। ७६॥ वस्तुतः शिवशक्ति सामरस्य ही परशिव परब्रह्म है । शिवशक्तिरूपमें स्थिति ही परमशिवका स्पन्दन है। शक्तियुक्त हो तो ही विश्वसृष्टिमें शिव समर्थ हैं अन्यथा नहीं । कहाँ उनका वियोग होता है। यह सब प्रमुकी लीलामात्र है ।।७५-७६।। अकामहतचित्तायाप्युमार्धाङ्गायिधारिणे स्वपस्थाय शान्ताय नमस्त्रिपुरयरिणे ॥ ७७ ।। जो अकामहत होते हुए अर्धाङ्गरूपेण उमाको धारण करते हैं, जो स्वरूपस्य एवं शान्त हैं, त्रिपुरान्तक भगवान् शंकरको हमारा यह प्रणाम है ॥७॥ इति धोकाशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतो। प्रपोषिशो गतः स्पायो महिम्नः स्तोत्रयातिके ।। २३ ।।

- चतुर्विशः श्लोकः सकलब्यापकत्वं च सर्वाग्तर्यामिता तमा। तथैव धर्मसेतुत्वं बोनकारुण्यमेव च ॥१॥ उपत्त्या परममङ्गल्यशीलता संप्रतीर्यते । पतो हि शंकर-शिव-शंभुनामानि संबभुः॥२॥ कारण्यमतिलोकोलमतिदेवोध्यमेव च। अर्वाचीनपदस्याथ वक्तव्यमवशिष्यते ॥ ३ ॥ तदेतद्वस्तुमधुना यरिकलापाततोऽन्यथा । वस्तुतश्चान्यथा सेयं लीला श्माशानिकीयते ॥ ४ ॥ "वियद्व्यापी" श्लोकमें सर्वव्यापकता बतायो। फिर सर्वान्तमर्या- मिता कही। अनन्तर धर्ममेतुत्व बताया। पूर्वश्लोकमें दोनकारुण्य कहा। अव शंकर भगवानको परममङ्गलस्पता बताने जा रहे है जिसको लेकर ही शकर, शिव, शम्भु इत्यादि नाम हो गये। (शं मंगलं करोति इत्यादि व्युत्पति यहां द्रष्टव्य है)। अतिलोकोध्वं तथा अतिदेवोर्ध्व वह कारुण्य बताना अवशिष्ट है। अर्वाचीनपदस्थ परमेश्वरका चरमसीमास्थ, ज्ञातव्य वही तस्व है। वही अब बसाने जा रहे हैं। आपाततः यह लीला विपरीत प्रतीत होगी। किन्तु वस्तुतः वह अन्यया ही है। यह है श्मशानलीला। उसीका अब वहां वर्णन करने जा रहे हैं ।।१-४॥ श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचरा- श्चिताभस्मालेपः स्रगपि नृकरोटोपरिकरः। अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामवमखिलं तयापि स्मणों यरद परमं मङ्गलर्मास ॥२४॥ हे स्मरहर ! श्मशानोमें आपकी ग्रीडा चलती है। पिशाच सापी हैं। चिताभस्मा लेप करते हैं। सोरहियोंका समूह हारके काममें लाने हैं । इसप्रकार आपका समस्त नीलचरित्र अमंगल भले हो फिर भी स्मरण करनेवालोके लिये हे वरद ! आप परम मंगल स्वरूप है ।। २४॥ १८ २७४ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [चतुर्विशः शवा हि शेरते यत्र श्मशानः स लिगयते। श्मशानदृश्यमिति हि युद्धामणमतो जगुः॥५॥ यत्र शेते शवो गेहे तावद् गेहमपावनम् । शवास्तु शेरते नित्यं यत्र का शुचितास्य तु ॥ ६ ॥ एवंविधं श्मशानावं स्थानं शम्भो वेत्प्रियम् । प्रमङ्गल्यं ततः शीलं तस्य स्यादिति शङ्कयते ॥ ७ ॥ जहां शव पड़े रहते हैं (शवा: शेरतेऽत्र) उसे श्मशान कहते है । रण- भूमिको इसलिये, श्मशानदृश्य कहते है । जबतक एक शव ही घरमे पड़ा होगा तब तक वह घर अपवित्र होता है। जहां एकाधिक शव हमेशा पड़े रहते है उसकी क्या पवित्रता होगी? ऐसा श्मशानरूपी स्थान शंकरको प्रिय है तो यह शंका स्वाभाविक है कि शंकरका चरित्र सायद अमंगल हो ॥ ५-७॥ गच्छन्ति बान्धवादीनां मृत्यौ प्रेतवनं जनाः। तिष्ठन्ति तत्र सेवाश्च कुर्वन्ति बहुधा तथा ॥ ८॥ उत्सवे व्यसने प्राप्ते दुनिने शव संकटे । राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥९॥ तथापि तत्र न घिरस्थानं फस्यापि युज्यते । तप्राप्याक्रोडनं माम कयं कस्य हि शोभताम् ।। १० ॥ कन्दुककोडनं फुर्याच्छमशाने को नु पण्डितः । युक्त हास्याद्यपि नाहि यस्मिन् करणयामनि ॥ ११॥ तत्राकोडां विदधत: शंकरस्य महात्मनः। अमइगत्यं भयेच्छोलमित्यत विह शपते ॥ १२॥ बान्धवादि मरणमें वैसे तो लोग श्मशान जाने हैं, कुछ देर रहने हैं, सेवा भी करते हैं । नीनियन है कि उत्सवमें, मलेसमें, भिक्षमें, रात्र राफटमें. राजद्वार और श्मशानमें जो साथ देता है यह पाधय है । पयामि वही अड्डा जमाना उचित तो नहीं है, तिमपर यहा ग्रीडा फरणा पया शोभास्पद है। फोन ऐसा पण्डिन है जो श्मशानमे गंद मेलेगा ? जहा कि रोना-पादना होता है. हाम्यता जहां उनित नही है वहा मोटा करने वाले गंकरके विपममें संदेह होता है कि शील शायद अमंगल हो ॥ ८.१२ ।। ननु तर श्मशानेऽपि कोन्ति किस मालकाः । यासयघनदयः शकरः किम मध्यते ॥ १३ ॥ .

श्लोक:]
स्पन्दवातिकसहितम्
२७५
सत्यं सहचराः प्रतपिशाचास्तस्य निष्ठाः ।
भुत्वापि तावृशान् वाला दुरे पावन्ति विम्यतः ।। १४ ।।
पिशितं मांसमश्नन्तः पिशाचा: शवभक्षिणः ।
प्रत्यपूता अतिकरा येभ्यो विम्यति मानुषाः ॥ १५॥
अपक्रयितु भूतप्रेतादीन् गृहमागसात् ।
पतन्ते सकला लोका नाभिनन्वति कश्चन ।। १६ ।।
विष्णुः स्वनाममात्रेण प्रेतादीन् विनिरस्यति ।
मन्त्रः स्थाने हपोफे शेत्यादिस्तत्र प्रपुरयते ॥ १७ ॥
भूतप्रेतपिशाचाच यमरक्षोविनायकाः।
सर्वे नश्पन्तु ते विष्णोन महणभोरवः ।। १८॥
इति भागवतेऽप्युक्त मूतनायस्वयं पुनः ।
अमङ्गल्यं ततः किं न शोलमस्येति शङ्कयते ।। १९ ॥
पूर्वपक्ष हो सकता है कि श्मशानमें भी जाकर बालक सेलते हैं ।
शंकरको वालकोंके समान शुद्ध हृदय बताया है। उत्तर है कि ऐमा हो
सकता है किन्तु श्मशानक्रीडामे ही समाप्ति होती तो ठीक था। यहां तो
भूत-प्रेत-पिशाचोको साथी बना रखा है शंकरने । जिनको देखना या सुनते
ही बालक भागने लगते हैं । "पिशितमश्नन्तोति पिशाचा:।"जो मांसमक्षण
करें वे पिशाच हैं। वे भावभक्षी होते हैं । अति अपवित्र और अतिक्रूर होते है
जिनसे सभी मनुष्य डरते हैं। भूतप्रेतादिको घरसे भगानेकी सब चेष्टा
करते हैं । कौन उनका अभिनन्दन करे ? विष्णु तो अपने नाममात्रसे भूत.
प्रेतादिको भगाते हैं । "स्थाने हृषीकेश" इत्यादि प्रेतादिको भगानका मन्त्र
है। भागवतमें कहा है-भूतप्रेतपिशाचादि सभी विष्णुके नाम से ही डरते हैं,
सभी नष्ट होते है। इधर तो शकर भगवान् भूतनाय होकर श्मशानमे क्रीडा
कर रहे हैं । अतः उनके चरित्र में अमाल होनेकी भाफा होती है ।।१३-१९॥
मनु धातिशिशुः गुसो न मिनेति कुतश्चन ।
उरगाहा यूनिवादा प्रेताहोत पिशाचतः॥२०॥
सत्यं किन्तु चिताभस्मस्पर्शात्तस्याप्यपूतता ।
मस्पर्शमानं कुरुने सलाटे विन्दुमेव वा ॥ २० ॥
मा समन्ताच्छियो सेपं ममोपलनागिरम्।
करोग्यतः परिवरय न समर्थनसक्षमम् ॥ २२ ॥
संसायनं चिताधमे मभने क्षौरकमणि।
सावद्धपति पाण्डालो यावत्स्नानं न वापरेत् ॥ २३ ॥

- । २७६ श्री शिवमहिम्न. स्तोत्रम् [ चतुविंश. चिताधूमोऽप्यपूतश्चेश्चितामस्मनि का कथा । अमङ्गल्यमतः शीलं तस्य स्यादिति शयते ॥ २४॥ छोटा शिशु तो किपीसे उरता नही, सापके साथ खेलने लगता है, बिच्छको भी पक उने जाता है । भूतप्रेतसे वह क्या डरेगा? अथ च शुद्ध होता है। वैसे शकर भी अतिशिशुके समान पवित्र होनेसे भूतादिसे नहीं डरते। ठीक है। फिर भी चाहे शिशु हो या और कोई, चिताभस्मस्पर्शसे तो अपवित्र होगा ही। केवल स्पर्श ही नही, एकाध बिन्दु माथेपर लगाया तो भी बात थी। ये शकर तो भस्मोद्धूलन-पूरे शरीरमे चिताभस्मलेपन करते है । अत शुद्धनाका समर्थन सभव नहीं है। शास्त्रोमे कहा है-तेल लगानेपर, चिलाधम लगनेपर, मैथुन करनेपर और हजामत बनवाने पर तब तक चाण्डालसमान आवित्र रहता है जबतक स्नान न करें। चिताधूम भी अपवित्र है तो चिताभस्म की क्या बात है । उसे हमेशा लगाये फिरनेसे शकरको अमंगलताकी शंका होती है ॥ २०.२४ ॥ सर्वाधिकाऽपावनत्यं नृकरोटोविधारणम् । तत्स्पर्शमात्रमपि चापायनं स्मृतिषु स्मृतम् ॥ २५ ॥ नारं स्पाट्याऽस्थि सस्नेहं स्नात्वा विप्रो विशुद्धपति। मनुराहापरे त्यातुः सचलं स्नानमाचरेत् ॥ २६ ॥ मितामस्मलवस्पर्क मार्गतः पादधावनात् । शुद्धिः स्यादस्थितस्पर्श प्रतोकारोऽम्बुगाहनम् ।। २७ ।। स्पर्शमान फुरते शंभोरकहारवत् । करोटीहारमापाय प्रसन्नो हन्त नत्यति ॥ २८॥ एतत्सवं पुरस्कृत्य शिवयि षिणो चिनिन्वन्ति महावेयं तत्वतो दूरगामिनः ॥ २९ ॥ संघते आधिपा अपापियरता है नमुण्याती सोपो वारण पाला: उसका स्पर्श भी अपवित्र है । मनुस्मृतिमे वहा है "सस्नेह मनुष्यास्थि स्पर्म करनेपर स्नान से ही शुद्धि होती है।" अन्यत्र सचल स्नानका विधान आया है। चिताभस्म कही चलते समय पायमे लगा तो पाव धोनेसे काम चलेगा। अरिधरपर्श हुमा तो स्नान ही प्रतिकार है । शकरजी नगपालका स्पर्शमात्र नहीं होरेक हारके समान पालहार बनाकर गलेमे डालते हैं और नाचते हैं। इन सब बातोको सामने रराकर शिवद्वपी शिवजीपी निन्दा गरते हैं, जो तत्त्वसे दूर ही रहते हैं ।।२५-२९।। । जनाः।

श्लोकः1
स्पन्दवातिकसहितम्
२७७
सह ॥३१॥
अप्राप्युवाहरिष्यामि मदीयामेव कांधन।
कपामशानयिध्यस्स्य विचारापं मनीषिणाम् ॥ ३० ॥
पचिशंसा प्रत्याहंगशानस्य हि कस्यचित् ।
पतास्तत् पारद्रप्टमन्यभक्तजनः
उद्यानमुच्चवक्षाणां तथा कुसुमयाटिकाम् ।
भट्यान् पपश्च संवीक्ष्य प्रासीद दयं मम ।। ३२ ॥
युक्त यन्युवियोगेन दुःसिनो सान्त्वनप्रदम् ।
इदं सर्व हि भवतीत्येव संतोषमाप्नवम् ॥ ३३ ॥
मध्येश्मशान मध्यानि मन्दिराणि समक्षिपि।
अत्र च स्यापिता पारान् देवा नानाविधायुधाः ।। ३४ ।।
यसिष्ठः कश्यपश्चाधिविश्वामिनः पराशर ।
ग्यासादयतव स्थापिता वीक्षिता मया ॥३५॥
आचार्याः शंकराधान मध्यरामानुजादयः।
भक्ताः पयोरतुलसीमोराद्याश्च विलोकिताः ॥ ३६ ।।
विमनाः किचिवमवं श्मशानेऽस्मिन्नपावने ।
पायनाना कथकार स्थापना पुग्यतेतराम् ।। ३७ ।।
अह इमाशानिक तहि शातुमेतम्यवेदयम् ।
अपपिने श्मशानेऽस्मिते हि स्थापिताः कयम् ॥ ३८ ॥
इस विषयके स्पष्टीकरणार्थ मैं अपनी ही एक कथा कहूगा। एक
श्मशानकी प्रशमा सुनकर उसे देखने भक्तजनोंके साथ मैं गया। ऊचे वृक्षो-
का बगीचा, पुप्पयाटिका, भव्य मार्ग आदि वहा देखकर प्रसन्नता हुई ।
वोला भी कि बन्धुजनवियोगमे दुखियोक सान्त्वनार्थ यह सब उचित है।
आगे बढा तो वहा मारे मन्दिर दीखे, जिनमे नानायुधधारी देवता स्थापित
थे । वसिष्ठ, कश्यपादि ऋषियोकी स्थापना थी। शकराचार्यप्रभृति आचार्य,
कवीर, तुलसी, मीरा आदि भक्त यहाँ स्थापित थे। मैं हैगन था कि इस
अपवित्र श्मशानमें पवित्रोकी स्थापना कैसे? आखिर यह बात मैंने मा-
शानिक से पूछ ही लिया ॥ ३०-३८॥
ययंव शंकराचार्यमन्त्यवेषधरो
प्राह तद्वदयं मां च सक्षेपणाब्रवीद्वचः ।। ३९ ।।
सर्वे समागता अन मा स्म चिन्ता कृया यते।
इत्युक्त्वा निगतः सोपि क्षणादन्तधिमागतः ॥ ४० ॥

२७८ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [चतुर्विशः न दर्शनार्थिनः सन्तः किन्त्यन्ते वासहेतवे । सर्वे श्मशानमायान्ति तस्यषोऽभवदाशयः ॥ ४१ ।। जैसे आद्यशंकराचार्यको अन्त्यजवेप धारणकर शंकरजी ने संक्षेप में कहा वैसे श्माशानिकने भी मुझे ढूंक शब्दोमें कहा-महाराज चिन्ता न करो, ये सब यहां आ गये हैं। इतना कहकर वह निकल गया, क्षणभरमे मानो अन्तर्धान हो गया। उसके कहनेका मतलब था कि दर्शनार्थी होकर नहीं, किन्तु रहनेके लिये सब अन्तमें आये । इसलिये सवके लिये घर बना दिया ।। ३९-४१ ॥ फश्चिद्विप्रो निजधनवश्वकं श्रेष्ठिनं खलम् । अन्विष्य चिरमप्राप्य श्मशाने स्म प्रतीक्षने ॥ ४२ ।। कुतस्तिष्ठसि भो विप्र श्मशान इति चोदितः । प्राह मवश्वकं व्रष्टुमिच्छामि सकृयत्र हि ।। ४३ ॥ अन्यत्र स स्याछोष्ठी तु सत्यं नैव तु लभ्यते । आपास्यत्यत्र स हन्ते किमेतद्वययिष्यति ॥ ४४ ।। एक सेठ किसी पथिक ब्राह्मणको ठगकर हजार रुपये लेकर गायव हो गया। बहुत खोजनेपर भी सेठ न मिला तो अन्ततः यहाण श्मशानमें आ बैठा। पण्डितजी! आप इधर कैसे बैठे हैं ? लोगोने पूछा। ब्राह्मण बोला मुझे ठगनेवाले सेठको एकबार यहां देख लू । पण्डितजी ! वह तो और कहीं छिप गया होगा। जी हां, लेकिन कोई श्मशानकी पंचना नहीं कर सकता । अन्तमें यहाँ तो आना ही पड़ेगा ॥४२-४४॥ हातात्र फिविषयामि शृण्वन्तु यियुपा जनाः। फुर्मों पणां श्मशानेच प्रेतादिभ्यो यिमीमहे ॥ ४५ ।। स्मतव्यं तविवं सपिस्मतव्यं न फेनचित् । पूयं वयं तथान्येऽपि स्याम प्रेताः क्षणान्तरे ।। ४६ ।। तदा युप्मरसुता मोति पुरमन्यं पन्त्यसंरायम् । अपामपितु पुष्मान् पतिप्यन्ते गृहादि यः॥ ४७ ।। अतिधोरा पातना घ तदा प्रेतस्य जायते । स्वमरमन्यस्टिन चया प्रतः सतिष्ठते चिरम् ।। ४८ ।। गङ्गादिपु प्रणोतेऽस्प्नि सद्गतिः स्मयंते हतः । पमा सगरमातानां गङ्गास्परोन सद्गतिः॥४९॥ सबभावे महादुतं प्रतानां जायते विग्म् । इयं सा प सपा जाताना पुरतः स्थिता ।। ५० ॥

. श्लोकः] स्सन्दवातिकसहितम् २७९ इस विषयमे कुछ अपना भी वक्तव्य है । श्मशानसे लोग घृणा करते है, प्रेतादिसे डरते है। पर याद रखें, एक दिन सभी प्रेत होने वाले हैं । उस समय आपके ही पुत्र आपसे डरेंगे । घरसे प्रेतको निकालनेका प्रयास करेंगे। घोर यातना उस समय होगी। अपनी भस्म और अस्थिमे ममता कर वही चिरकाल पडे रहेंगे। हा, कोई गगा आदिमे अस्थिविसर्जन करे तो सभव है सद्गति हो। जैसे सगरपुत्रोकी । तब तक तो अस्थिमे ममत्व कर पडे रहना ही होगा। महान दुख अनुभव करना होगा। यह दशा जो जन्म पा चुके हैं, उन सबके सामने है ।। ४५-५० ।। एवं कष्टस्थितान् युप्यान् युष्मपितृपितामहान् । विष्णुस्त्यजति वेधाश्च देव श्च व त्यजन्ति यः ॥५१॥ त्यजन्ति बान्धवा सर्वे त्यजन्ति तनया अपि । ताई तडं निरस्यन्ति प्रसत्वेन प्रिया अपि ।। ५२ ।। त्यजन्तु सर्वे प्रेतत्वात् स्वय स्वं तु कय त्यजेत् । यादृश तादृशमपि न स्वं त्यजति कश्चन ॥ ५३ ।। हा हन्त सेविता. सर्वे मां त्यजन्त्यतिनिपुणा । इत्येवं रौति विलपत्यसहायोऽतिदुःखितः ॥ ५४॥ भिया धावन्ति पुत्राधा मन्त्रनिम्नन्ति मात्रिकाः। घोर कष्टमसो प्राप्य करवीरे विधीवति ।। ५५॥ सदागत्य फुपसिन्धुस्त्वन्ममत्वारपर्व शिव.। अस्थि मस्मादिकं प्रोत्या ह्यालिड्गपाश्वासयत्यहो॥५६ ।। क्रीडन् स भवता साधं शम गमयति प्रभुः। त्वं मे सहचरोऽसीति अवप्नाथयतीश्वरः ॥ ५७ ।। मा भषोर्मा स्म रोदीस्वमित्येवं सततं वदन् । अनाथनाथो नः सर्वान् स एवोद्धरते तदा ॥ ५८॥ मरणोत्तर इस प्रकार घोर कष्टमे पडे हुए आप समयो तथा आपके पितृपितामहादिको भी विष्णु त्याग देते है । ब्रह्मा त्याग देते है । प्रियजन भी मन्नियोको बुलाकर मार मारकर भगा देते हैं। सभी तुमको उस समय त्यागेंगे। किन्तु स्वय अपनेको तो नही त्यागोगे। चाहे भूत हो, प्रेत हो, अपने आपको तो नही त्याग सकते। सिर्फ उस समय रोमओगे पीटोगे-मैंने जिनकी सेवा की हाय । ये निर्दयी मुझे त्याग रहे हैं । मार भगा रहे हैं । मान्त्रिक पीट रहे हैं । घोर रप्ट पावर इमशानमे जीवात्मा दु सी हो रहा है। तब करुणामिन्धु शकर तुम्हारे ममत्वारपद भरम ६ष्टी आदियो छातीसे यः २८० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [चतुर्दिशा लगाकर आश्वासन देते है, आपके साथ क्रीडाकर शान्ति प्राप्त कराते हैं । तुम मेरे सहचर हो कहकर सनाथ, बनाते हैं। मत डरो, मत रोओ ऐसा कहकर अनाथनाथ भगवान शिव हम सबका उद्धार करते हैं ।। ५१-५८ ॥ एवं हि घोरदिपदि मग्नान् प्रतवनस्थितान् । जोवान् सुखयितुः को वा कृतघ्नोऽपूततां वरेत् ॥ ५९॥ कृतघ्नः स पितृनातृपितामहमुखस्य च । येषां सान्त्वयितारं हि शिवं व्याख्यात्यपावनम् ।। ६०॥ धिक् तं नरं महानीचं कृतात दुरितस्थितम् । पूर्वजससुखरपूतत्वं प्रजल्पति ।। ६१ ॥ इस प्रकार घोर विपत्तिमे पतित श्मशानस्थ जीवात्माओंको सुस पहुंचानेवालेको कौन ऐसा कृतघ्न होगा जो अमङ्गल कहेगा। केवल वह शंकरका ही कृतघ्न नहीं। पिता, पितामह, माता, माता आदिवा भी कृतघ्न है। आखिर मरनेपर उनको भी सान्त्वना शिवजी ही तो दे रहे हैं । उस महानीच कृतघ्न पापीको धिक्कार है जो अपने ही पूर्वजोंके उद्धारकर्ताको अमंगल कहनेका साहस करता है ।। ५९.६१ ।। माममात्रममगल्यं मामगल्यं तु वस्तुतः । समगल्यं हि नामेति ततो मामपदं जगो।। ६२ ।। परमं महगलं गंभुः स्मर्तृगौ तु विशेषतः । प्रतः स्मरत तं नित्यं नमतापीश्वरं प्रमुम् ॥ ६३ ।। "अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नाम" यहां नामपद अर्थयुक्त है। अमंगल्य कैसा है। बोलने के लिये है। वस्तुतः परम मंगल है। सबके लिये परम मंगल है। किन्तु स्मरण करनेवालोक लिये विशेषतः परम मंगल है । अतः शंकरका स्मरण मरो। नित्य प्रणाम करो॥ ६२-६३ ।। शं भवाय नमस्तुभ्यं निमित्ताय चिन्तनात् । मयोमवाप च नमः स्मरणात् सुसमापिने ॥ ६४ ।। शंकराय नमातुन्मं साक्षात् कल्याणकारिणे। मयस्कराय च नमः सासाच्च सुखकारिणे ॥ ६५ ।। शिवाय च नमस्तुभ्यं मगलकर यपिणे। शिवतरापापि पिमश्योपपदस्यसे ॥६६॥ च ममस्तुम्यं भव्यरुनिधये सते। राहावे ५ नमस्तुभ्यं मधुवाणीप्रयोनिने ।। ६७॥ ममः मवाय नमः नमः श्लोकः स्पन्दवातिक महितम् २८१ क्षेम्याय च नमस्तुभ्यं सर्वक्षेमप्रसाधिने । ताराय नमस्तुभ्यं जगत्तारणहेतवे ।। ६८॥ नमः श्मशानयासाय विपन्नशमहेतवे। नमस्ते भूतपतये दुःखितोद्धारकारिणे ॥ ६९ ॥ नमश्चिताभस्मजुपे दग्धहत्तापहारिणे। कपालमालायाप्यपूतपरिपाविने ॥ ७० ॥ नमः पानां पतये सर्वपाशविमोचिने । कल्याणनिधये सयंकल्याणतायिने ।। ७१॥ स्तुवनाश्च स्मरन्तश्च महगल्यैकनिधि शिवम् । साप्टकं प्रणमन्तश्च मङ्गलं प्राप्नुयुर्नराः ।। ७२ ॥ “नम. गंभवाय च मयोभवाय च" इत्यादि याजुप मन्त्र है । शं भवति अस्मानिमित्तात् जिमके चिन्तनादिनिमित्तसे कल्याण हो उस शंभवको प्रणाम है। जिसके चिन्तनादिसे सुखादि संपन्न हो उस मयोभवको प्रणाम है। दिलचस्पीके साथ जो मंगल करत हैं उस शकरको प्रणाम है। वैसे जो सुख करे उस मयस्करके लिये प्रणाम है। स्वय मङ्गलरूप शिवको प्रणाम है। दो या अधिक मंगलोके उपस्थित होनेपर मंगलतररूप शिवतरको प्रणाम है । भन्याश्रय भवको प्रणाम है । मंगलमय वाणीसे सान्त्वना देनेवाले शंगु (शं मङ्गलमयी गौर्यस्य सः) के लिये प्रणाम है । क्षमसाधनापर क्षेम्यको प्रणाम है। जगत्तारणकारी तारको प्रणाम है । महाविपत्तिग्रस्त विपन्न ( मृत) लोगोंको शान्ति देनेवाले श्मशानवासी शंकरको प्रणाम है। दुःखितोद्धारकारी भूतपतिको प्रणाम है । दग्धचित्तोके तापको दूर करनेवाले चिताभस्मधारी भगवानको प्रणाम है। अपूतको भी पवित्र करनेवाले कपालमालाधारी भगवानको प्रणाम है। सर्वपाशबन्धको काटनेवाले पशु- पतिको प्रणाम है। अप्टकके साथ भगवानकी स्तुति करते, स्मरण करते और प्रणाम करते हुए मनुष्य परम मंगल प्राप्त करता है ।। ६४-७२ ।। संसारः सफलोऽप्येव श्मशानोपम ईक्ष्यते । सर्वत्रय गृहे फश्चिच्यवोऽशेत न संशयः ॥७३॥ महाश्मशानं तमिमं पदन्ति सुधियो जनाः। सकलाना जनिमतामवश्यंभाविमृत्युतः ॥ ७४॥ शंफरो पाप्य वसति श्मशानेऽस्मिन् भवात्मके। पिशाचसशानतान् जीवान् सहचरान् मरन् ।। ७५॥ ।

२८२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [चतुर्विशः प्रभुः॥७६॥ परम् । जगत्संहारकरणे सारो भस्मावशिष्यते। सच्चिदानन्दरूपं यत्तदुवलयति नृफरोटी भवेद् बुद्धिवृत्तिस्तस्याः परम्पराम् । हारवर रते यः स परमात्मा परः शिवः ॥ ७७ ॥ शान्तमद्वैतमखिचप्रश्वोपशमं तुरीय शिवतत्त्वं तत् परमं मङ्गलं सोम् ॥ ७८ ।। अध्यात्मपक्षमें अर्थ इसप्रकार है कि यह पूरा संसार ही श्मशानोपम है। कोई घर ऐसा नहीं होगा जहा कोई न मरता हो या न मरा हो । आहिर जन्मवान सबवी मृत्यु तो होगी ही। अतएव ससार तो महाश्मशान ही है । इस भवरूपी श्मशानमे शव र व्याप्त होकर यास करते हैं । ये सभी जीप पिशाच सदा ही तो है। इन सहवरोका भरणपोपण शंकर करते हैं। अनादि ससारमे सभी असस्य वार पिशाच बन चुके हैं । अतः पिशाच बोलने- में बोई हर्जा भी नहीं है। जगतका सहार दाह है। दोप भस्म सत्, चित्, आनन्द अवशिष्ट रहता है । उसीका लेप शंकर करते है (ऐसा शिवपुराणमें बताया है ) नकरोटीका अर्थ है बुद्धिवृत्ति । (भाषामें भी कहा जाता है इसकी खोपड़ी तेज है, विलक्षण है इत्यादि । चुचियत्तिको हाररूपमें धारण करते है । असण्डाकारचित्तवृत्तिप्रवाहविषय किये जाने पर उस पत्तिप्रवाह. फो भगवान् समार हारवत् स्वीकार करते हैं। अतएव अगण्ड ब्रह्मस्वरूप हैं । वह पान्त, अद्वैत, अखिलप्रपञ्चोपशम तुरीय परम सियतत्व परगमंगल है, स्वरूप है ।।७३.७८ ॥ इमामवासने घिरयामस्मपाम्ने कपालिने । विमापसापिने र कृपाधान्ने नमो नमः।। ७९ ।। दमपानयासी चिताभस्मधारी, फपालमाली, विनापसार्थी फारण्य- निधि मारभगवानको प्रणाम हो ।। ७९ ।। रति घी कानिकानन्दयोगिनः पुतिनः पृती। पशिो गतः स्पयो महिम्नः सोयाति ॥२४॥ .

पञ्चविंशः श्लोक.
महोक्ष इत्युपक्षिय तयश्चर्यमिति क्रमात् ।
अर्वाचीनपद प्रोक्त परतत्वावबुद्धये ॥१॥
अत एव तो सुप्ते परतत्व निगद्य तत् ।
क्रियादक्षकयाद्वारा व्यतिरेकात् समर्थितम् ॥ २॥
अर्वाचीनकथा चैव भक्तिदा पुण्यदा स्वयम् ।
तद्वर्णन ततश्चापि पुरुषार्थप्रद मतम् ॥ ३॥
इत्य लीलाकथा शम्मोरचीनपदायिनः ।
उक्त्वा पर पद तस्य प्राप्त्युपायश्च दश्यते ॥४॥
'महोक्ष खट्वाङ्ग" से उपक्षेप कर "तवैश्वर्य यत्नात्" से अर्वाचीन-
पदका परतत्त्ववोधार्थ वर्णन किया । व्रती सुप्ते" मे परतत्त्वोक्ति होनेपर
भी "क्रियादक्ष" इस व्यतिरेकरूप समर्थनसे अर्वाचीनपदवर्णन ही है। स्वत
भी अर्वाचीनपदक्या भक्तिदा एव पुण्यदा होने से उसका वर्णन पुरुषार्थदायी
है। इस प्रकार शकरजीकी अर्वाचीनपदलीलाकथा कहकर अव साक्षात्
परमपद एव तत्प्राप्तिका उपाय कहने ना रहे हैं ।। १-४ ॥
मनः प्रत्यफ चित्ते सविधमवधायात्तमरतः
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमदसलिलोत्सङ्गितदृशः।
यदालोक्याह्लादं हद इव निमज्ज्यामृतमये
दघत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तकिल भयान् ॥२५॥
यमनियमयुक्त यमी आसनादिविधाके साथ प्राणायाम र मनको
प्रत्यक् प्रत्याहृत कर हृदयकमलमे अवधान करते हुए धारणा, ध्यान,
समाधियुक्त होकर जिस तत्वके दर्शनसे अमृतमय सरोवरमे डुबकी लगाये
हुए जैसे रोमाञ्चित तथा आनन्दाचपूर्ण हो किसी याचामगोचर अन्त
आजादको धारण करते हैं, हे महादेव । वह तत्व यस्तुत आप ही हैं ॥२५॥
मर्यक्रमबलीयस्रवारपाटाममनादवत्
ग्याख्यास्माम्यत्र गदित मुनिना योगसाधनम् ॥ ५ ॥

२८४ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पंचविंशः - अर्थक्रम बलवान होनेसे पाठक्रमको न लेकर यहां बताये हुए योग- साधनकी व्याख्या करूगा ।। ५ ।। यमिनः पदं यमिन इत्येतदन कर्तुः प्रबोधकम् । संन्यासी यमिशब्दस्य रूढोऽर्थो यर्धाप स्फुटः॥ ६ ॥ तथाप्यत्र समाधित्य तस्य लक्षितलक्षणाम् । यमशब्दयुतस्याः सयमी नियमोध्यते ॥ ७॥ श्लोकमे कई बोधक "यमिन." यह पद आया है। यद्यपि यमी शब्द- का रूढ अर्थ सन्यासी होता है । तथापि यहालक्षितलक्षणाके द्वारा संयमी और नियमी अर्थ सगझना चाहिये । यम शब्द सयमी नियमी दोनोमे है। उन दोनो पदोको लक्षित कर उसके अर्थको ग्रहण करनेपर लक्षितलक्षणा होती है। जैसे रेफद्वयवान प्रमरपदका अर्थ लेकर द्विरेफका भ्रमर अर्थ होता है ।। ६-७ ॥ संयमो नियमश्चय यतिप्वावश्यको गुणौ । ततो या लक्षणीयौ तौ सर्वथा तो विवक्षितौ ॥८॥ अथवा ममीका अर्थ सन्यासी ही है। सयम और नियम सन्यासीके लिये आवश्यक होनसे यमी पदसे उन दोनोकी लक्षणा समझो। सर्वथा संयम और नियम विवक्षित है ॥८॥ यस्त्वाहारविहारादावति सर्वत्र बर्जयन्। प्रायश्यकमुपादद्यात् संयमोति स मण्यते ॥ ९॥ आहारविहारादिमे सर्वत्र अतिको त्यागकर आवश्यकमान जो ग्रहण करे उसे सयमी यहते हैं ॥९॥ पन्दमूलपसाहारा यद्वा स्युर्यायुभक्षणाः। योगिनस्त्यिति यार्ता तु तादावेय युज्यते ।। १० ॥ योगी सन्यासी कन्दमूल पावर या वायुभक्षण कर रहते हैं यह बात सत्ययुगकी हो सकती है, आजको नहीं ॥१०॥ पृतेऽस्थिपुस्थिताः प्राणास्त्रेतायो यमनियापित मेद.सु मापरे प्राणाः फलायनमयास्तु ते ॥११॥ साययुगमे हड्डीमें प्राण थे। तामे धमनियोमे । द्वापरमे मेदामे और कलियुगमे प्राण अन्नमय होता है ।। ११॥

श्लोक.]
स्पन्दवातिकसहितम्
२८५
वापरान्तेऽप्य भूषन्ने फलेरारम्मयोगतः।
तथा च मगवानाह गोतायाम नं प्रति ॥ १२॥
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य फर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुखहा ।। १३ ॥
न चात्र युक्तताऽत्यन्तमल्पत्वमिति सांप्रतम् ।
यत पूर्वमिदं स्पष्टीचकार भगवान् स्वयम् ॥ १४ ॥
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चंकान्तमनश्नत.।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १५ ॥
केवल कलिमे ही नहीं, द्वापरके अन्तमे भी अनमे प्राण था। कलि-
काल होने जा रहा था। अतएव द्वापरान्तमे भगवानन अर्जुनको कहा-
'सयत आहारविहारवाले सयत कर्मचेष्टावाले, सयत जागरण निद्रावालेका
ही योग दु खनाशक होता है ।' सयत अर्थमे युक्त पद है । कोई यह कहे यि
युक्त पदका अत्यल्प अर्थ क्यो न करें? उत्तर है कि पूर्व श्लोकमे इसका
निराकरण भगवानने किया है। अधिक खानेवालेका भी योग सिद्ध नहीं
होता । अनशन करनेवालेको भी नहीं। अधिक सोनेवाले और जागनेवाले-
का भी योग सिद्ध नहीं होता ।। १२-१५ ।।
योगशास्त्रपु कथित माहारादिपु सयमः ।
विशेयो विधुधरन कुतर्को दुखद्भवेत् । १६॥
सुस्निग्धमधुराहारश्चतुशिविजित.
भुज्यते शियसप्रीत्यं मिताहार स उच्यते ॥ १७ ॥
द्वो मागो पूरयेटनं स्तोयेनेक प्रपूरयेत् ।
वायो सचरणार्याप चतुर्यमवशेषयेत ॥१८॥
योगशास्त्रोमे आहारादिका सयमजोबताया है उसे ही यहा समझ लेना
चाहिये । कुतकं दुख कारी होगा। योगशास्त्रमे कहा है-मिताहार करो।
"स्नेहयुक्त मधुर आहार शिवप्रीतिरे लिये चतुर्थांग छोहवर यरें।' अन्यत्र
विवरण है-"उदरके दो भाग अन्नसे पूरित करें। एक भाग जलसे । यायु-
गचार के लिये चतुर्माश माली छो"॥ १६.१८॥
एव विहारचेप्टादि यथाशास्त्र विघीयताम् ।
अन्यथा सापपन् योग रोगमाप्रमाणुयात् ॥ १९॥
आयश्यक विहरणं पतंय स्थारम्यतये ।
नातिधमो माधमत्र मंस्यपि विधीयते ॥२०॥

२८६ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पञ्चविंशः यस्तूपद्वादशघटी: स्वप्याद्योगं स साधयेत् । अधिके तु तमस्वित्वमल्पे चोन्मादिता यत.।।२१।। प्रनिद्रो दृश्यते यस्तु योगाभ्यासरतो नरः। स गेगी न तु योगी स भोगो निद्रारतस्तु यः ॥ २२ ॥ इसी प्रकार विहारचेष्टा आदि भी योगशास्त्रानुकूल होना चाहिये । अन्यथा योगसाधनाका परिणाम रोग होगा। स्वास्थ्य लाभार्थ आवश्यक विहरण करो। कर्मोमे अतिश्रम भी न हो, अश्रम भी नहीं। प्राय. बारह घडी (पाच घटा) जो निद्रा ग्रहण करे वह योगसाधक बन सकता है । अधिक निद्रामे तमोगुण बढेगा । नीद कम होनेपर उन्माद होने लगेगा । योगाभ्यास करनेवालेको निद्रा न आती हो तो उसे रोगी समझो, योगी नहीं। निद्रारत हो तो भोगी समझो।। १९-२२ ।। सयमं यमनाम्नाह भगवांस्तु पतउजलिः। अहिंसा सत्यमस्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहो ॥ २३ ॥ शरीरसयमोऽहिंसा सत्यं वाक्सयमो भवेत् । मनसः संयमोऽन्तेयं वणित्व कामसयमः ॥ २४ ।। तथाऽपरिग्रहो शेयः क्रोधलोभादिसंयमः । उपलक्षरसमेतत्स्यादन्यत्र दशदर्शनात् ।। २५॥ यग्रामि दश सप्रोक्ता यमास्तच्चोपलक्षणम् । युक्ताहारविहारादि यतो भगवतोदितम् ॥ २६॥ आहारसयमादीनामदृष्टाजनकत्यतः यमत्य नेति चेहि फुत्रान्तर्भाग्यता यव ॥ २७ ।। देशाचरपरिच्छिन्नाः सार्वभौमा महायतम् । अहिंसाद्या इति ततस्ते पृथक्कृस्य दशिताः ॥ २८॥ सयमको ही यम नामसे भगवान पतजलिने कहा । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ये पाच यम है। अहिंसा शरीरसयम है। सत्य वाकमयम है । अस्तेय मन सयम है । ब्रह्मचर्य वामसयम है । अपरिग्रह मोघलोभादिसयम है। ये पाच उपलक्षण हैं। क्योकि अन्यत्र दरा यम बताये है। वह भी उपलक्षण हैं । क्योकि युक्ताहारविहारवादिको भगवानने योगा- ङ्गरूपसे वर्णन किया है। यह कहें कि युक्ताहारविहागदिवा कोई अदृष्ट पल नहीं है अत ये यम नहीं तो आप ही बतायें कि उना अन्तर्भाव फिर पहा है ? अतिसाधारण बात होती तो भगवान गीतामै क्यो बोलते ? प्रश्न श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् २८७ होगा कि तव महर्षि पतंजलिने पांच ही क्यों कहे। उनर है कि देशकाल- समयावच्छिन्नमहाव्रतरूपमे ये पाच आते है, अतः उनको पृथक करके महषिने विशेषरूपसे कहा ।। २३-२८ ॥ नियमो धर्मकार्याणां योगाङ्ग समुदीरितः । प्रातर्जागरणादो स्नानदानादिकर्मसु ॥२९॥ शौचं संतोष एवापि तपः स्वाध्याय एव च । ईश्वरप्रणिधान च नियमाः पञ्च कीर्तिताः॥ ३०॥ शौवं स्नानादिक प्रोक्त प्रातगिरणापि । सतोषो दानहोमादि त्यागेषु नियमो मतः ॥ ३१ ॥ तपश्च नियतं कार्य योग्यं चान्द्रायणादिकम् । स्वाध्यायो वेदशास्त्रादेमन्त्राणां जप एव चा ।। ३२ ।। ईश्वरप्रणिधान तु नियमेनार्चनादिकम् । यमीत्यनेन यमनियमावमिधिस्सिती ॥३३ ।। धर्मगर्योका नियम भी योगाङ्ग है । प्रातर्जागरणादि एव स्नानादि- का नियम होना चाहिये । शौच, संतोप, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान ये पांच नियम है। स्नानादिनियम शौच है। प्रात. जागरणादिको उसीके अन्तर्भूत समझना चाहिये । दानहोमादिनिमित्तक त्यागका नियम सतोष है। कृच्छ, चान्द्रायणादि नियत कर्तव्यकार्य तप है । वेदशास्त्रादिके अध्ययन- का या मन्त्र जपका नियम स्वाध्याय है। नियमन. ईश्वरार्चनादि ईश्वर- प्रणिधान है। यमी पदसे ये ही यमनियम विवक्षित हैं ।। २९-३३ ।। सविधम् विधा प्रकारः पथितः सविध सप्रकारकम् । प्रकारे त्वासनं मुख्य तसिद्धिः सप्रकारता ॥ ३४ ॥ सविध हात्तमरुतो विहितप्राणसयमाः। आसने ससुखे सिद्ध प्राणायामो विधीयते ।। ३५ ।। अथासने दृढे योगी यशी हितमितापनः । गुरूपदिष्टमार्गेण प्राणायामान् समभ्यसेत् ॥ ३६ ॥ विधा प्रकारको कहते हैं । सविधका प्रकारसहिन अयं है। प्राणाया. मार्थ आसन हा मुख्य प्रकार है। सावधग आतमस्त का अर्थ है आसन सहित प्राणायाम करनेवाले। यह बात याग शास्त्रमे आयी है-"आसन दृढ होनपर हितमिताथा यागो गुरुपादष्ट मार्गसे प्राणायाम करें" ॥ ३४-३६ ॥

१
२८८
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[पञ्चविंशः
शुवो देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युनिछुन नानिनोचं चलाजिनकुशोत्तरम् ।। ३७ ॥
तत्र शुद्धासने सम्यगुपविश्य ययासुखम् ।
समं कायशिरोपीवं धारयन्नचलं स्थिरः ॥ ३८ ॥
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं विशश्चानवलोकयन् ।
इत्येवंरोत्यवस्थातुं यदुक्तं सविध तु तत् ॥ ३९ ॥
नापरस्यासने योगस्तवाहासनमात्मनः।
शुचौ देशे प्रतिष्ठास्याघारशक्त्या विधीयते ।। ४० ॥
पवित्र देशमे अपना स्थिर आसन प्रतिष्ठित कर जो ज्यादा ऊँचा
नही, कुश, उसपर अजिन उसपर वस्त्र ऐसे कमसे बिछा हो, उस शुद्धासन
पर सम्यक् यथासुख बैठकर शिरोग्रीवादिको सम रखते हुए दिशाओको
विना देखे योग करें इत्यादि जो बताया है यही विधा=प्रकार है । गीतामे
"आसनमात्मनः" कहा । अतः दूसरे व्यक्तिके आमनपर योग न करो।
"प्रतिष्ठाप्य"में प्रतिष्ठा, 'आधारशक्तये कमलासनाय नम.' इत्यादि रीति
आधारशक्ति आदिसे करे ।। ३७.४० ॥
एतद् बाह्मासन प्रोश्तमान्तरं तु ततः पृथक् ।
सिसस्वस्तिकपधादि शारीरं यहुधोच्यते ॥ ४१॥
यत् स्यात् स्थिरसुखं योगयोग्यं चंय तदामनम् ।
पतञ्जलिः स्थिरमुसमासनं समवर्णयत् ॥ ४२ ॥
उपरोक्त बात वाह्यामनकी हुई । शारीर, आसन, पृयक है। सिद्धा.
सन, पद्मासन, स्वस्तिकामनादि अनेर विध शरीर आसन है । स्थिर सुख
योगयोग्य भागनको ही महर्षि पतञ्जलिने योगासन बताया है ।। ४१-४२ ।।
शेचिरप्राशाः सायमित्यनेनय पवेन तु ।
पमं सनियम पर्यगृहनासनमेय घ।। ४३ ।।
यमिनस्ताहि परमहसास्तच्चोपलक्षणम् ।
योगिनामपरेषां च मोक्षमायामिलाविणाम् ||४||
कुछ मनीपी सविघरो यम नियम आसन तीनोंग ग्रहण मानते है ।
उनके मतमे यमीग सन्यासी मर्य है। और यह मोवाभिलाषी समस्त
योगियोंग उपलक्षप है ॥ ४३.४॥

श्लोकः] स्पन्दवार्तिकसहितम् २८९ आत्तमरुतः चतुर्थमात्सप्त इत्यनेन प्रदशितम्। साधनं चित्तवृत्तीनां निरोधनसहायकम् ॥ ४५ ॥ चले वाते चले चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत् । योगी स्थाणुत्वमप्नोति ततो घायु निरोधयेत् ॥ ४६॥ पवनो बध्यते येन मनस्तेनव बध्यते । मनश्च बध्यते येन पवनस्तेन बध्यते ॥४७॥ "आतमरुतः" से चतुर्थ साधन प्राणायाम बताया। प्राणायाम चित्तवृत्तिनिरोधमें साधन है यह योगशास्त्रस मत है । "प्राण चञ्चल हो तो चिन चञ्चल है, प्राण निश्वल होता है तब योगी स्थिर होता है। पवनको जिसने बांधा वही मनको बांधता है, मनको बांधनेवाला पवनको बांधता है" ॥ ४५-४७ ॥ आसने संस्थितो योगी प्राणं चन्द्रेण पूरयेत् । धारयित्वा यथाशक्ति भूयः सूर्येण रेचयेत् ।। ४८ ॥ वैपरीत्येन च ततः सूर्येणाकृष्य सं शनैः । विधियरस्तम्भनं कृत्वा पुनश्चन्द्रण रेचयेत् ।। ४९ ॥ पूरकः कुम्भकश्चय रेचकश्चेति ते त्रयः। एक चतुर्गुणं चैव द्विगुणं चेति मात्रया ॥५०॥ अधमे द्वादश प्रोक्ता मध्यमे द्विगुणा स्मृताः। उसमे त्रिगुणा माया प्राणायामे द्विजोत्तमैः ॥५१॥ कि च स्वेद. कनिष्ठे स्याकम्पो भवति मध्यमे । उसमे स्यानमाप्नोति प्राणायामस्तथा प्रिया ॥५२॥ बाह्यकुम्मक एकापि कर्तव्यो रेचकोतरम् । फिचित्कालं न तनास्ति मात्राया नियमः किल ॥ ५३ ।। आसनपर स्थित होकर बायी नाकसे यदि वायु पूरण करते हैं तो कुम्भकोत्तर दाहिनीसे वायु छोडे । फिर विपरीत दाहिनीसे सोचकर कुम्भक कर बायींसे छोड़े। पूरक कुम्भक रेचक में तीन प्राणायाम है । एफ. वार, दो इसी प्रकार मात्राक्रम रहेगा। अधम प्राणायाममे द्वादश मात्रा, मध्यममे चौबीस मात्रा, उत्तममे छत्तीम मात्रा होगी। प्रकारानरसे अधम प्राणा. याममें पसाना होगा। मध्यममे साम्प होगा। उत्तममें स्थानप्राप्ति होगी। बाहकुम्भक भी करना चाहिये उसमे मात्रानियम नहीं है ।। ४८-५३ ॥ १९ [पञ्चविश. २९० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् पूरफान्ते तु कर्तव्यो बन्यो जालन्धराभिधः । आकुश्य कण्ठं चिबुकं यक्ष स्थाने निवेशयेत् ॥ ५४॥ किंचित्कुम्मकशेपत्ये उड्डियातो - विधीयते। पष्टतो नाभिदेशस्य परनादाकर्षणं तु तत् ।। ५५ ।। जालन्धरानन्तरं हि मूलयन्यो विधीयते। आधाराकुश्चनं तद्धि , लेशात्सम्यगयुध्यतः ॥ ५६ ।। वायुको खीचनेके बाद ही जालन्धर वन्ध करना चाहिये । गर्दन झुकाकर ठुड्ढीको छानोतक लगाना जालन्धर बन्ध है। कुम्भक पूरा होते होते उड्डियान बन्ध फरो। नाभि (पेट) पीछे की ओर सींचना (चिप- काना ) उडियानबन्ध है । जालन्धरके तुरत बाद मूलबन्ध करो। मूलाधार (गुदा ) को ऊपरकी ओर आकर्षण करना मूल बन्ध है। किन्तु उसका पूरा परिज्ञान न हो तो अल्प ही करें ।। ५४-५६ ॥ यावरवलसिद्धिः स्यात् सहितंता वदन्यसेत् । रेचक पूरकं मुक्त्या सुखं पद्वायुधारणम् ॥ ५७ ।। केवल कुम्भकसिद्धि पर्यन्त तीनो करें। रेचक और पूरक न हो तब केवल कुम्भक माना जाता है ।। ५७ ।। अगर्भश्च सगर्भश्च प्राणायामो द्विधा मतः। अमन्त्रको मयेदाद्यो द्वितीयस्तु समस्त्रकः॥ ५८॥ इत्यं बाह्यानि चत्वारि प्रोक्तान्यड्गानि योगिनः । अन्तरगाणि चत्वारि प्रदर्श्यन्ते ततः परम् ॥ ५९ ।। फिर प्राणायाम दो प्रकारसे है-अगर्भ और सगर्भ । मन्यरहित अगर्भ और मन्त्रसहित सगभं है। इस प्रकार चार बाह अग बताये । अव चार अन्तरङ्गसाधन आगे कहते हैं ॥५८-५९ ॥ मनः प्रत्यक प्रत्यक् प्रतीपमञ्चद्यद् बहिर्गमनजितम् । प्रतोपमन्तरात्मानं प्रति गच्छति तन्मनः।। ६० ।। प्रत्याहारस्त्वयं प्रोक्तो विषयासंप्रयोगतः। चित्तरूपानुकरणादिन्द्रियाणा महपिमिः॥६१॥ श्लोकमे प्रत्यक्का बहिर्गमनरहित प्रतीप अन्तरात्माकी ओर जाने. वाला मन अर्थ है । विपयसप्रयोग न होनेसे इन्द्रिया चितस्पानुकारी होती हैं। अतः यही प्रत्याहार है ।। ६०-६१॥

श्लोकः] स्पन्दवार्तिकसहितम् २९१ नन्विन्द्रियाणां प्रत्यक्त्वं पतञ्चलिमुनिर्जगौ । कथं मनः प्रत्यगिति मनसस्तदुदीर्यते ॥ ६२ ॥ सत्यमिन्द्रियप्रत्यक्त्वं मनःप्रत्यक्त्वपूर्वकम् । मन प्रत्यक्त्वमपि चेन्द्रियप्रत्यक्त्वपूर्वकम् ।। ६३ ॥ इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । इत्याह भगवानन परस्परसमाधयम् ॥ ६४ ।। नाक्षिसंमोलनादेव खानां प्रत्यक्त्वसंभवः। कः बोने कश्च नासायामुपायः करच या त्वचि ॥६५॥ प्रोत्रं पिघीयतां तले साङगुल्यापिधोयताम् । ' त्यक् तु येन पिधोयेत तेनैव स्पर्शमाप्नुयात् ।। ६६ ॥ "इन्द्रियाणा प्रत्याहार " इसप्रकार सूत्रोमे इन्द्रियोका प्रत्याहार बताया, आप मनका प्रत्यक्त्व क्यो कह रहे हैं ? सुनिये । मनको प्रत्यक किये विना इन्द्रियप्रत्यक्त्व नहीं होता। मन प्रत्यक्त्व इन्द्रियप्रत्यक्त्व पूर्वक होता है ऐमी परस्पराश्रयता है। "इन्द्रिया ररती हैं तो मन पीछे चलता है" ऐसा गीतामे कहा है । कहो कि इन्द्रियोको रोकें तो मन रुकेगा। किन्तु रोकोगे कैसे ? आग्य मूदकर ? कानमे रुई डालकर भले यह सब करो। नाकके लिये क्या उपाय ? त्वगिन्द्रियको जिससे ढकोगे उसीका स्पर्श होता रहेगा। अतः इन्द्रियप्रतीपता मन प्रत्यक्ताके विना नही है ।। ६२-६६ ॥ नेत्रसंमोग्नपि वस्तुतो विधीयते। संप्रेक्ष्य नासिकाग्न स्वमित्येवं हरिणेरणात् ॥ ६७ ।। न त्वत्र नासिकाग्रस्य तात्पर्य दर्शने हरेः। समयतेऽग्रे वक्तव्यं दिशश्चानवलोकयन् ॥ ६८ ॥ मनः प्रत्यक्त्यमावेन सयं सम्पद्यतेऽजसा। ततस्तदीयं प्रत्यक्त्यं प्रत्याहार इहेरितः ।। ६९ ॥ आख मूदना भी जरूरी नही है । "सप्रेक्ष्य नासिकाग्र स्व" ऐसा गीतामे नामिकान दर्शन बताया। यद्यपि नासिकाग्रदर्शनमै तात्पर्य नही है। "दिशश्चानवलोकयन्" इस अग्रिमोति का वह उपायमात्र है। इतना तो निश्चत है कि अक्षिनिमीलन को विवक्षा नही है । मन को प्रत्यक बनाया तो इन्द्रियप्रत्याहार सपन्न होगा। अत महर्षि कात्यायनने मन का प्रत्यक्त्वा. रमा प्रत्याहार कहा ।। ६७.६९ ।। सभव न २९२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पञ्चविंश . चित्ते वित इत्युदितो देशो पारणाया पदास्पदम् । तद्देशबन्धचित्तस्य धारणेत्याह सूनकृत् ॥ ७० ॥ तत्र भाष्यकृता नाभीचकाया वित्यभाप्यत । नामियक हत्कमले कण्ठे भाले शिरस्यपि ॥ ७१॥ मूलाधारे नैव मता स्वाधिष्ठाने च धारणा। ध्वान्तयुक्त तविश्या हुरघश्वकद्वय बुधाः ।। ७२॥ "चित्ते" यह देशवाचक है। धारणाका आश्रय है। "देशबन्ध- निनस्य धारणा" ऐसा योगसूत्र है। वहां भाष्यकार भगवान् व्यासने व्याख्या में कहा-देशे नाभीचक्रादौ । अर्थात् नाभिवक्र, हृदयकमल, विशुद्ध (कण्ठ), आज्ञा, सहस्रार इनमें कही भी धारणा करो। मूलाधार और स्वाधिष्ठान इन दोमें धारणा नहीं होती। क्योकि ये दो चक्र तमोयुक्त माने जाते है।॥ ७०-७२ ॥ हत्पंकजस्य मुख्यत्वादुक्त' चित्तपदेन तत् । तव जीयो क्सति यो दोपलिकाकृतिः॥७३॥ दहरं पुण्डरीकं च वेश्मेति श्रुतिवाक्यतः। परमारमापि तत्रैव वीक्ष्यः स्यादिति गम्यते ।। ७४ ।। "चित्ते से हृदयकमलका विशेषोपादान हृदयको मुख्य नाके कारण किया ।वही दीपकलिकाकार जीवका वास है । "दहरं पुण्डरीक वेश्म" इस श्रुतिसे परमात्माका भी दर्शन वहा करनेको बताया ॥ ७३-७४ ।। इवमप्यत्र बोद्धव्यं कुलफुण्डलिनी शिवाम् । प्राणायामाञ्चिन्तनाद्वा प्रोस्थाप्याधारतः पराम् ॥ ७५ ॥ मूसाधारमपिष्ठान मणिपुरमनाहतम् । विशुद्धिमाशां संभेद्य सहवारे निवेशयेत् ।। ७६ ।। शिवेन तत्र सयोज्य तदुत्यामृतधारया। प्रपञ्च लावयन मूलं व्युत्मामेण निवेशयेत् ॥ ७७ ॥ एवं नित्यं विदधत्तो धारणा लघु सिध्यति । सुमगोदयटीकादौ मयंतच्च पश्चितम् ॥७८॥ यहा थोड़ा यह भी समझे। प्राणायामद्वारा या चिन्तनद्वारा कुल- कुण्डलिनी परा शिवाको उत्थापित करना चाहये। फिर मूलाधार, स्वा धिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा इन छ: चक्रोका भेदन कर श्लोक.] स्पन्दवातिकसहितम् २९३ कुण्डलिनीको सहस्रार कमलमे पहुचाये । वहा शिवके साथ सयोजित कर उसमे उत्पन्न अमृतधारा से प्रपञ्च सेचन करते हुए फिर व्युत्क्रमसे कुण्ड- लिनीको मूलाधारमे पहुचायें । इसप्रकार नित्य करनेपर धारणा शीघ्र सिद्ध होती है । इन सबका विस्तृत विवरण हमने सुभगोदयकी व्याख्या, योगसूत्र- प्रवचनादिमे किया है । ७५-७८ ॥ अवधाय अवधायेतिवचनं यमिवद् द्वयर्थक भवेत् । प्रणिधानसमाधाने संगृीते उभे ततः॥७९॥ श्लोकमे "अवधाय" यह शब्द यमी शब्दके समान ही दो अर्यका सग्राहक है । प्रणिधान तथा समाधान दोनो ही उससे (अवधानसे) सगृहीत हो जाते हैं ॥७९॥ प्रणिधानमिति ध्यान समाधिरपर भवेत् । स्यात्प्रत्ययकतानत्वं ध्यानं ध्येयार्थगोचरम् ।। ८० ॥ प्रणिधानसे ध्यान विवक्षित है। समाधानसे समाधि विवक्षित है । इनमे ध्येयार्थविषयक प्रत्ययो की जो एकतानता ( एकाकर प्रवाह ) है वह ध्यान है ॥ ८० ॥ नि.स्वरूपमिवार्थकनिर्भास भवेत् ॥ ध्यातृध्यानपरित्यागात् समाधिरमिधीयते ।। ८१॥ ध्यानमे घ्याता, ध्यान, ध्येय त्रिपुटीका भान होता है। इनमे ध्याता और ध्यान दोनोके परित्याग होनेपर केवल ध्येयका भान रहेगा। उस समय मानो ध्यान स्वरूपरहिन होगा, ध्येयमात्र भासित होगा। जैसे जपाकुसुम- सानिध्यमे स्फटिक्मणि नि स्वरूपसी हो जाती है। ऐसी अवस्थाको समाधि कहते हैं ॥ ८१॥ प्रहृष्यद अष्टाङ्गयोगः प्रथमपादेव निरूपित । प्रहप्यदित्यादिना च मक्तिः पादेन यण्यते ॥ ८२ ।। इसप्रकार प्रथमपादसे अप्टागयोगका निरूपण हुआ। नव द्वितीय- दसे भक्तिका वर्णन है ।। ८२ ॥ प्रेम्णा प्रहप्टरोमा स्थावानन्दाधुकलेक्षणः। घ भगवद्भक्तिरभाम्यामत्र गम्यते ।। ८३ ॥ तद्यदा तथा [पञ्चविंशः २९४ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् नानन्दानुभवस्यंध परिणामः स युज्यते । मोगेऽस्पादर्शनात्पुत्रचिरवीक्षादिपूदयात् ॥८४ ॥ प्रेमसे रोमाञ्च होता है, आनन्दाश्रुपात होता है । अत. इन दो लिङ्गो से भगवद्भक्ति यहां अवगत होती है। तृतीय पादोक्त आनन्दानुभवका यह परिणाम नहीं माना जा सकता। क्योकि मिप्टानभोजनादिके समय न रोमहर्ष होता है और न किसीकी आखसे अघ्र गिरता है। हा चिर- वियुक्त पुत्रादि मिलते हैं तो ये दोनो ही बातें आती है ।। ८३.८४ ।। कथं विना रोमहर्ष फथमश्रुफला दिना। विशुध्न्येद हृदय प्रेम्णा विनेति हि सतां वचः।। ८५ ।। "कथ विना रोमहर्ष द्रवता चेतसा विनो" इत्यादि भागवतश्लोकमे उक्त बात स्पष्ट है। रोमहर्ष, चित्तद्रवीभाव, आनन्दाश्रुकला, इनसे उप- लक्षित भक्तिके बिना चित्तशुद्धि कैसे हो सकती है ।। ८५ ।। यदालोक्य यवालोक्येति पादेन ज्ञानमन्त्र निगद्यते। स्वयप्रकाशरूपेण तदालोफनमिष्यते ॥ ८६ ।। न ह्मणा दर्शन नान्तः प्रवृत्तिस्तस्य विद्यते । न चापि मनसा योगे मनोवृत्तिनिरोधतः ।। ८७ ।। तस्मात्तद्दर्शन तदावरणमड्गतः। स्वप्रकाशतया भानमेवाभिधीयते ॥८८।। - "यदालोक्यालाद" इस पादसे ज्ञानका कथन है। उसका आलोकन स्वयप्रकाशरूपसे ही माना जाता है। आखोंसे अन्तस्तत्त्व परमात्माका दर्शन सभव नहीं है। क्योकि आखोकी अन्दरकी ओर प्रवृत्ति नही है । यह कहे कि मनसे ब्रह्मदर्शन होगा तो भी ठीक नहीं। क्योकि "मन प्रत्यक्" इसमे मोगकथन हुआ। योगमे मनोवृत्तिका ही निरोध हो गया तो वृत्तिरूप दर्शनका सवाल बहा रह जाता है। इसलिये अन्तस्तत्त्वदर्शनका अर्थ है ब्रह्मावरणका भग होनेसे स्वयप्रकाशतया ब्रह्म भासित होना ।। ८६-८८॥ ननु वृत्ति यिना नव भगः स्यादवृतेः क्वचित् । तथा थयणतः साक्षात्कारो घेदेपु कोर्तितः ॥ ८९ ॥ श्रवणोत्पन्नवृत्त्यवाऽऽवृतिमड़ी स्थिते सति । कथं स्याद्योगक्तिम्यां साक्षात्कारात्मवीक्षणम् ॥ ९० ॥ नाम तस्प प्रज्ञा श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् २९५ मैवं न श्रवण दीनां निषेधं कुर्महे ययम् । योगात्प्राग योगमध्ये वाश्रवणाचं न किं भवेत् ॥ ९१ ।। तथवर्तमरा सविकल्पसमाधितः। जायतेऽत्र महावाक्यस्फुरणं कि न संभवेत् ॥ ९२ ॥ केचिनिदिध्यासनोप-योगित्वविषयोदितम अप्टागयोग विस्पष्टं वेदान्तेषु बमापिरे ॥ ९३ ।। पूर्वपक्ष उठता है कि योगमे यदि वृत्ति नहीं है तो आवरण भंग नहीं होगा तो तत्त्वसाक्षात्कार कैसे? इतना ही नही, श्रवणजन्यवृत्तिसे साक्षा- त्कार बताया गया है। इस प्रकार वेदान्तमहावाक्य श्रवणजन्य वृत्तिसे आवरण भंग एव तत्त्वसाक्षात्कार निश्चित हुआ तो योग और भक्तिसे साक्षात्कारस्प ज्ञानकी बात कहा रह जाती है ? इसका समाधान यह है कि तृतीयपाद जानपरक है, योगसे मनोवृत्तिरूप साक्षात्कार नहीं होगा इतना ही हमने बताया। श्रवणादिका निषेध हमने कब किया? योगसे पहले या योगके मध्य जो श्रवणादि है उसोसे साक्षात्कार होगा, योगसे नहीं । अतएव तृतायपाद योगपरक नहीं है, यही हम कह रहे हैं। फिर. मविकल्पक समाधिमे ऋतभरा प्रज्ञा होती है। उसीसे महावाक्यस्फुरण भी हो सकता है। कुल महात्मा लोग अप्टागयोगको निदिध्यासनोपयोगी भी मानते है। जो भी हो तृतीय पाद वृत्तिसहित दर्शनवर्णनात्मक ही है इसमे कोई वाधा नही है ।। ८९-९३ ॥ सति योगे चित्तवृतरकाध्यमुपजायते। ईश्वरप्रणिधानादि योगान्तर्मावि शितम् ॥ ९४ ॥ तया सति परं प्रेम जायते परमेश्वरे। योगं कुर्वन भक्तियुक्त. धवरणादियशात् पुमान् ॥ ९५ ॥ साक्षात्कारं भगयतो लमते नात्र संशयः। तदेतदाह भगयान् गौतायाम प्रति ॥१६॥ मय्यासक्तमनाः पायं गेग पुञ्जन मदाश्रयः। असंशयं समन मा पया मास्यसि तस्य ।। ९७ ।। इत्यादिशमशेर्याय परापरविभागतः। थायामास परमं सत्यं मुस्यं ततोऽसिलम् ॥ १८ ॥ यहा क्रम यह बताया गया फि प्रपम योग द्वारा चित्तरी एकाप्रता गम्पादन करो। योगमे ईस्वरप्रणिधान आ भी गया । उमगे फिर परमात्मा में परम प्रेमलक्षण भनि होती है । ( पिता विना परमप्रेम दुर्लभ [पञ्चविंशः श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् ही है। फिर योग करते हुए और भक्ति करते हुए श्रवणादिसे साक्षात्कारकी प्राप्ति होगी। यह बात सातवें अध्यायमें गीतामें स्पष्ट है । "मय्यासक्त- मनाः" इस इलोकमें पप्ठाध्यायोक्त योगसे और भक्तिसे परमेश्वरका पूर्णज्ञान जैसे होता है. वैसे सुनो कहकर फिर श्रवण कराया। "भूमिरापोनलः" इत्यादिसे अपर, पर, परापर तत्वोंको समझाया। वहीं बात यहां भी है ॥ ९४-९८ ॥ आह्लादं ...दधत्यन्तः पदालोक्य बुधास्तत्त्वं निमज्ज्येयामृतहदे । दधत्यालादमित्यन मुक्तरूपं च वणितम् ॥ ९९ ॥ परतत्त्वावलोन परमान्दलक्षणः। आलाय आविर्भवति जीवन्मुक्तिहि सा मता ॥ १०॥ "जिस परमत्त्वको देखकर विद्वान् अमृतसरोवरमे गोता लगानेका भाह्लाद पाता है" कहकर जीवनमुक्तिका भी वर्णन किया। परतत्त्वाव- लोकनसे परमानन्दरूप आह्लादकी जो प्राप्ति होती है वही तो जीवन्मुक्ति है ।। ९९-१०० ॥ तवं. तदद्वैतं परं तत्वं स एव परमः शिवः । प्रपञ्चोपशम शान्तं तुरीयं परमुच्यते ॥ १०१॥ विदेहमुपस्यवस्थायां यत्तत्त्वमवशिष्यते। वृत्त्यादिरहितत्वेन तदप्यत्र निरूपितम् ॥ १०२ ॥ "तत् किल भवान्" में 'किल'का प्रसिद्ध अर्थ है । माण्डूक्य श्रुतिमें "शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते' इत्यादि प्रसिद्धवचनको ओर यह इगित करता है। अर्थ यह है-वह अद्वैततत्त्व ही परम शिव है, प्रपञ्चोपशम शिव तुरीय वही आप है। यहां "आलोक्य" से पृथक् करके व्याख्या होनेसे विदेहमुक्तिअवस्थाका भी वर्णन हो जाता है। वृत्त्यादिरहित शुद्ध तुरीय शान्त भगवत्तत्त्व ही तो विदेहमुक्ति है ।। १०१-१०२ ।। किमपोति च शब्दोऽयमवाङ्मनसगोचरम् । वस्तूपस्यापयत्यत्र पुरुषार्थ परो हि यः॥ १०३ ॥ "किमपि यमिनः" यहां मन वाणीका अविषय वस्तुको किमपि' यह शब्द उपस्थित करता है । वही परमपुरुपस्वरूप है जिसको द्वितीय श्लोकमें "अतीतः पन्थान" इत्यादिसे कहा ॥ १०३ । किल भवान स्पन्दवातिकसहितम् अष्टाङ्गयोगलक्ष्याय भक्तिलन्याय मीढुषे । अनन्तानन्दबोधाय चिद्रूयाय सते नमः ॥ १०४॥ अष्टांगयोगका जो लक्ष्य है जो भक्तिके द्वारा प्राप्य है ऐसे अनन्ता. नन्दस्वरूप चिद्रूप आनन्दवर्षा करनेवाले मीढ्वान् शंकरको प्रणाम है ।। १०४॥ इति धोकाशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतौ । पञ्चविंशो गतः स्पन्दो महिम्नः स्तोत्रवातिके ॥ २५ ॥ पविंशः श्लोकः उक्तं वाङ्मनसातीतं निर्विकल्पसमाधिगम् । स्वप्रकाशकनिर्मा सर्वद्व तविजितम् ॥१॥ तदेव गन्तुं विविधाः शास्त्रेपूक्ता उपास्तयः । अष्टमूर्तित्व विषया शिवोपास्तिरवेक्ष्यते॥२॥ व्यस्तरूपतया कैश्चिदुपास्यन्तेऽष्टमूर्तयः। अष्टमूर्तिस्वरूपेण समस्तविघया परः॥३॥ पूर्व श्लोकमे और प्रारम्भमे निर्विकल्पसमाधिगम्य वाइमनमातीत तत्त्वका वर्णन किया। निर्विकल्पसमाधिसम्य इमलिये कि अखण्डाकार वृतिसे आवरण भंग होनेपर स्वप्रकाशरूपेण भासित होता है। तब मनो. वृत्ति आदिका काम ही नहीं रहता। दूसरी यात, वह मर्वद्वतवजित है। वृत्तिसाल में वृत्तिको लेकर ही द्वत होगा। उसी परमतत्त्वको प्राप्त करनेके लिये शास्त्रोमें उपासनाका वर्णन है। उनमें अष्टमूनिके रूपमें शियो. पामना आती है। अप्टमूर्ति उपासना भी दो प्रकारमे होती है। व्यस्त- स्पसे तथा समस्तस्पमे। सूर्यचन्द्रादिकी शिवरूपेण जो उपासना

२९८
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
पिडविधाः
की जाती है वह व्यस्त उपासना है। आठों मूर्तियो के रूपमें
एक ही शिवकी उपासना हो तो वह समस्तरूपसे उपासना मानी
जाती है ।। १-३॥
मन्दानामुभयो तावदप्टमर्तेरुपासना।
कुशलानां पुनः प्रोक्ता विश्वमूर्तरुपासना ॥४॥
सर्व हि खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्तहृत् ।
उपासीतेत्युपासोक्ता विश्वमूतः श्रुतो स्फुटम् ॥ ५ ॥
সনাম্বাইন্নান विश्वमूतिश्च शंकरः।
सर्ववान परमतत्त्वबोधाय वर्यते ॥६॥
मन्दबुद्धियोके लिए व्यस्त तथा समस्त दोनों प्रकारको अष्टमूर्ति
उपासना होती है । जो कुशल बुद्धि होगे उनके लिये विश्वमूतिको उपासना
होती है । “सर्व खरिवद ब्रह्म" इत्यादि श्रुतिम बताया है - समस्त जगत
ब्रह्मरूप और ब्रह्मजलान् है। (ब्रह्मजब्रह्मोत्पन्न ब्रह्मल =ब्रह्ममे लीन
होनेवाला ब्रह्मान् - ब्रह्ममे जीवित रहनेवाला) इस प्रकार शान्तहृदय हो
उपासना करे। यह विश्वमूर्तिकी उपासना है। जिसे शिवलिंगमे शिव
भावना की जाती है वैसे विश्वमे शिव भावना करना विश्वमूत्युपासना है ।
सूर्यादिम शिव भावना अष्टमूर्युपासना है। इसलिये वहा भगवान शकरका
अष्टमूर्तिरूपसे तथा विश्वमूर्तिरूपसे वर्णन किया जा रहा है। उपासना
परिपक्न होनेपर उपाधिबाधसे चतन्यवोध होगा। उपाधि विश्व हुमा तो
सर्वबाध होगा और अद्वितीय परमतत्त्वका बोध होगा ॥४-६ ।।
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवह-
स्त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्यमिति च ।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता विभ्रतु गिरं
न विमस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत्त्वं न भवसि ॥ २६ ॥
हे भगवन् ! तुम ही सूर्य हो, तुम ही चन्द्रमा हो, तुम ही वायु हो, तुम
ही अग्नि हो, तुम ही जल हो, तुम ही पृथिवी हो, तुम ही आत्मा हो, इस
प्रकार बुद्धिपाकवाले परिच्छन्न वाणी भले कहे, किन्तु हम उस तत्वको नहीं
जानते जो आप न हो ॥२६॥
अम्पासात्कर्ममेदोन तथा घोवाच मिनिः।
अश्शेिषादन स्यादेकस्ययं पुनः अतिः॥७॥

लौक: 1
स्पन्दवातिकसहितम्
यहां त्वपदकी आवत्तिसे उपासना भेद सिद्ध होता है। "एकस्यवं
पुन श्रुतिरविशेपादनर्थक स्थात्" ऐसा जैमिनीय सूत्र है। "समिधो यजति,
तनूनपात यजति" इत्यादिमे 'यजति' पदकी आत्ति होनेसे कर्मभेद हे।
एक ही यजतिसे काम चलता, द्वितीयादि यजतिमे अविशेष होता तो
द्वितीयादि यजति पद अनर्थक होता ॥७॥
स्वमर्थोपासना मात्र त्वकंसोमादिमिर्गुण ।
उत्कर्षाद ब्रह्मदृष्टिः स्यादिति व्यासेन निर्णयात् ॥ ८॥
यदि कहे कि यहा अर्कत्व, सोमत्वादि अष्टगुण विशिष्ट एक
त्वपदार्थ शकरकी उपासनाका विधान क्यो न माना जाय ' तो उसका उत्तर
है-ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् इस न्यायसे उत्कृष्ट शिवमे अकादि गुणदृष्टि नहीं
किन्तु अर्कादिमे शिवदृष्टि ही उचित मानी जाती है ।। ८ ॥
नन्वेवमष्ट सिध्यन्ति व्यस्तोपास्तय एव नः।
समस्तोपास्तिसितिस्तु नास्माक भवतीति चेत् ॥९॥
तन्नाप्टमूर्तिसंनास्ति शकरस्य
महात्मनः।
अष्टमूतित्वस्पेण तेन सिध्यत्युपासना ॥ १० ॥
न च डित्थडवित्यादिसंज्ञावदिति साप्रतम् ।
योगदौ सभवन्त्यां ढमात्राप्रतीतितः॥ ११ ॥
अष्टौ सूर्यादयो यस्य म्तयः स तयाविषः ।
- अप्टमूतिर्महेशान इत्पयंस्य प्रसिद्धितः॥१२॥
इस प्रकार फिर ब्नस्तरूपसे आठ उपासनाये सिद्ध होगी। आपने
पहले समष्टि व्यरिट दोनो उपासनाये बतायी, उसकी उपपत्ति कसे सुनो।
अष्टमूर्ति यह शकरका एक नाम ही है। अत अप्टभूतित्वेन उपासना
सिद्ध है। यह कहे कि यह डित्थ डवित्य जैसा रूढ शब्द है, उससे आट
मूर्यादि मूर्तिरूपसे उपासना सिद्ध नहीं होगी तो यही हम कहेंगे कि जहा
लोक्वेदप्रसिद्ध योगरूडि है वहा केवल रूढि नहीं ली जा सकती। आठ-
मूर्यचन्द्रादि जिसकी मूति ऐसा अर्थ वहा स्तप्ट है ।। ९-१२ ।।
मङ्गपन्तरेण कथिता विश्वमूरपासना ।
चतुर्यपादे तत्तत्र
प्याख्याय विवरीप्यते ॥१३॥
विश्वमूर्तिकी उपासना प्रकारान्तरसे चतुर्थ पादम सत्तायी है । उसका
विवरण वहीपर घ्याम्याम देखें ॥ १३ ॥

३०.
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [षड्विंशः
शिवलिङ्ग त्रिधा दृष्टं गोलाकार क्वचिद्भवेत् ।
अण्डाकारं क्वचिद् दोघंचतुंलाकारकं यवचित् ।। १४ ॥
शिवलिंग तीन प्रकारका देखने में आता है। कहीं गोलाकार (या
अर्ध गोलाकार) कहीं अण्डाकार और कहीं लम्बा ॥ १४ ॥
त्यमर्कः
अस्तु शिवलिङ्ग स्याद्गोलाकारं स्फुरच्छवि ।
ज्योतिलिङ्ग ततस्तद्धि तदुपास्यं शिवात्मना ॥ १५ ॥
अर्क-सूर्य गोलाकार छवियुक्त शिवलिङ्ग है। वह ज्योतिलिंग है ।
शिवरूपसे उसकी उपासना करें॥ १५॥
ताम्रोऽरुणोऽथ बभ्रश्न सुमङ्गलपदः शिवः ।
स गोपेरुदहारीमिष्टो
मृडयन प्रभुः॥१६॥
"असौ यस्ताम्रो अरुणः" इत्यादि मन्त्रमें प्रार्थना की गयी है कि
अरुण बघ्र मङ्गलपद जिसे गोप और पनिहारिन भी देखते है, हमारे दृष्ट-
उपासित होकर हमें आनन्द प्रदान करें। १६ ।।
गायश्या भगंगायच्या तमुपासीत पण्डितः।
तथा च तन गदितं मर्गो वेवस्य धीमहि ॥ १७ ॥
हरः स्मरहरी मर्गस्त्र्यम्बकस्म्रिपुरान्तकः ।
इति कोशेपु कथितो भगस्त्यम्बकसंज्ञया ॥१८॥
गायत्री मन्त्रसे कदकी उपासना करें। "भर्गो देवस्य धीमहि" इस
प्रकार गायनी में भर्गका ध्यान कहा है। कोशमे भर्गको, शंकर
बताया है।॥१७-१८॥
ननु रुद्राको मर्गः पुंसि योऽयं नपुंसके ।
स सान्तोन शिवाय: स्यात्तेजोऽयक उपेयते ॥ १९॥
ततछनेव तेजोऽई वापि लोके सोपाते।
रुद्रस्तेजःस्वरूपत्वात् तेजस्त्वेनास्य वर्णनम् ॥ २०॥
अकारान्तोऽपि शब्दोऽयं तेजोऽयक उपयते ।
अकारान्तसकारान्तमावोऽकिचित्करस्ततः ॥२१॥
आदित्यान्ततिं वर्षो मर्गास्यं तन्मुमुक्षुभिः ।
जन्ममृत्युविनाशाय दुःखस्य वितयस्य च ॥२२॥
ध्यानेन पुरुषो या द्रष्टव्यः सूर्यमण्डले
इत्यान्तता पुष्पता तेजस्ता चोदितालिके ॥ २३ ॥

लोकः]
स्पन्दवार्तिकसहितम्
३०१
ध्यानेन पुरुषर्यच्च द्रष्टव्यं सुर्यमण्डले ।
इति पाठान्तरोप्येव स एवार्थः स्थितो मवेत् ॥ २४ ॥
पूर्वपक्ष-रुद्रार्थक भगंशब्द अकारान्त पुलिंग है। नपुसको सका.
रान्त भर्गस् शब्द तेज अर्थ मे है। उत्तर :-- यह सब बातें मनि तुच्छ हैं।
वयोकि लोकमे तेजअर्थ में भर्ग शब्दका प्रयोग कहीं नहीं है। सा तेजोल्प
होनेसे नपुगकमे भी प्रयोग मसगत नही है। और अकारान्त भर्गशब्द भी
उसी तेज अर्थमे योगी याज्ञवल्क्यने आह्निक तत्त्वमें प्रयोग किया है।
"आदित्य का भख्य वेन मोक्षार्थ उपासनीय है" ऐसा वहा बनाया है ।
सान्त होता तो "भर्म आस्य" ऐसा लिखते । वही उसे पुरुप-चेतन भी
बताया । (पुरुष शब्दको श्वेताश्वतरमे रुद्र अर्यमै प्रयोग हुआ यह अविस्म-
रणीय हैं) पुरुष ऐसे पाठान्तरमे भी वही बात है ।। १९-२४ ।।
लोके प्रसिदभर्गो हि भगंस्त्वेन धृतोरितः ।
अलोफतिवमादाय हन्याग्या कल्पना भवेत् ॥ २५ ॥
अकारान्तको सकारान्त नपुसकरूपेण वेदमे प्रयोग किया इतना
समझमे आ सकता है। यदि लोकसिद्ध भर्गशब्द न हो तो वह वैदिकमान
भर्ग क्या है ? अतिरिमार्थ कल्पना अन्याय्य है। नवीन भर्गसंशब्दको
कल्पना भी मीमासाविरुद्ध है ।। २५ ॥
ननु नाराष्ण. सूर्यमण्डले स्मयंते युधः ।
स्मयंता नाष्टमूत्मिा स्मयंते शारः किम् ॥ २६ ॥
हिरण्यगर्भस्तत्रय श्रुतिपु श्रूयते न किम् ।
असौ यस्ताम्र इत्यादि मन्त्री विस्मयंता फुत. ॥ २७॥
नास्माकं कश्विदीशानयकुण्डकतही मत ।
माँ हिरण्यगमत्वयिष्णुत्वाधरपास्पताम् ।। २८ ।।
"ध्येय. सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायण " इत्यादिसे भर्म नारायण
ही प्रतीत होता है, ऐसे पूर्वपक्षमे हमारा कहना है कि भले किन्तु हिरण्यगर्म
का एव अष्टमूर्तिरूपमे शिवका भी तो वर्णन है। हमारा कोई शिवविष्ण.
कलह नहीं है । जो आदित्यमै भर्ग है उसे हिरण्यगर्भपमे या विष्णुरूपमे मी
उपासना करें।।२६-२८।।
घोप्रवोदयिकृत्यं च तस्य मारेश्वरत्यतः ।
पुराणादौ तदुक्त च ज्ञानमिच्धेत शरात् ।। २९ ॥
असो यस्तानमन्त्रेण गायत्र्मा या हर मजेत् ।
शः सूपति निमान्तो मनुमतः ॥ ३०॥

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पशि "धियो चो न. प्रचोदयात्" वह अश भी "ज्ञानमिच्छेत्तु शंकरात्" के अनुसार शकर ज्ञानप्रदाता होनेसे सुसंगत है। शकरकी उपासना ' असौ यस्ताम्रो अरुण उत वसु सुमङ्गल ।" इत्यादि मन्त्रसे कर सकते हैं । असौ यह सर्वनाममात्र होनेसे अपूर्ण वाक्य हैं । शकर शब्द भी उसमे नही है अत. "नमस्ते रुद्र" इत्यादि पूरा बोलना चाहिये ऐसा भी मत है। किन्तु 'मृड्यात'से शकर अर्थ स्फुट है । 'असो' यह पद धुलोकस्थ होनेसे भी उपपन्न है। गायत्री मन्त्र से भी अर्कस्थ शिवोपासना की जाती है "ईशानाय सूर्यमूर्तये नम" इस मन्त्रका भी सप्रणव जप हो सकता है ।। २९-३० ।। त्वं सोमः सोमश्च शिवलिङ्ग स्यात् गोलाकार स्फुरत्प्रभम् । उमया सहितः सोम सौम्यमतिमहेश्वरः॥ ३१॥ सोम-चन्द्रमा भी ज्योति.स्वरूप गोलाकार शिवलिंग है। सोमका अर्थ ही उमासहित शकर है । उमासहित महेश्वर सौम्यमूर्ति होता है ॥ ३१॥ पूज्यते भगवान् शंभूयिशेषात् सोमवासरे। घोरा सूर्यतनुः शभोः शिवा सोमतनुस्तथा ।। ३२ ॥ शकरजीकी उपासना विशेतया इसी कारण सोमवारको होती है। सूर्यरूपी शरीर शकरजीको घोर तनु है और चन्द्रशरीर शिव ( सौम्य ) तनु है ।। ३२॥ उपासकास्तु सूर्येऽपि विलोकन्ते शिवां तनम् । रसमीन समूह तदपावृश्यित्र भ्रतीक्षणात् ॥ ३३ ॥ चन्द्रविम्बसम तहिं सूर्य विम्बमवेक्ष्यते। इत्येयं माप्यकारश्च व्याख्यात तर विस्फुटम् ।। ३४ ।। शिवा गिरित्र तां कुरित्येयं तत्प्रार्थना ततः । पुग्यते पन्द्ररपा तु शिवध सतत तनुः ॥ ३५ ॥ उपासक तो मूर्यमे भी शिवतनु दर्शन करते हैं। अतएव उनिपदमे रश्मीन् समूह. तत्व पूषनपावृणु इत्यादि कहा है। भाप्यारोने विरश्मि चन्द्रमण्डल मिय बताया। इसलिये "शिवा गिरिश ता पुरु' इस प्रकार रश्मिस्पी इपुओयो शिव बनानेको प्रार्थना भी उपपन्न है। घोर रही हो तव हो तो शिव बनाना यावश्यक है ॥ ३३-३५ ।।

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् - बुद्धिप्रदो यथा सूर्यरूपेणोपासितो हरः। तया प्रेमप्रदश्चन्द्ररूपेणोपासितः शिवः ॥ ३६॥ प्रकाशो जीवने बुद्धघा सौरस्यं प्रेमतो भवेत् । अर्धनारीश्वरः सौम्यमाविर्भावयतीश्वरः ॥ ३७॥ सूर्यरूपेण उपासित शंकर भगवान जिस प्रकार बुद्धिप्रद हैं बसे चन्द्ररूपसे उपामित शिव प्रेमप्रद है। जीवनमें प्रकाश बुद्धिमे होता है तो सरसता प्रेमसे होती है । अर्धनारीश्वर यह प्रेमका स्वरूप है ही। अतएव सौम्य भाव उससे प्रकट होता है ।। ३६-६७ ॥ नमः सोमाय रुद्राय ताम्रायेति श्रुतो मनुः । महादेवः सोममूतिनमोऽन्ती भवेन्मनुः ॥ ३८ ॥ 'नमः सोमाय च रुद्राय च' इत्यादिमे श्रुत 'सोमाय नमः' यह मन्त्र है । 'महादेवाय सोममूर्तये नमः' यह भी मन्त्र है ।। ३८ ॥ त्वमसि पवनः पवनः शिवलिङ्ग स्याद् गोलाकारं च यद्भवेत् । पृथिवीं परितो वायुमण्डल गोलकाकृति ॥ ३९ ॥ किं च प्राणो हृदिस्योऽय शिवलिङ्गं निगद्यते । प्राणिनः प्राणवन्तः स्युरिति शाकुन्तले कविः ॥ ४०॥ हृदि प्राणायो मांसपिण्डस्त्वण्डाकृतिर्भवेत् । अण्डाकारमिदं तस्माच्छिलिङ्ग निगद्यते ॥ ४१॥ पवन भी शिवलिङ्ग है । पृथिवीवी चारो और वायुमण्डल है। यह गोलाकार ही होगा। दूसरा हृदयमे प्राण भी शिवलिङ्ग है। महाकवि कालिदासने शाकुन्तलमे "यया प्राणिन. प्राणवन्त " कहकर उसे शिवविग्रह बताया। हृदयमे प्राणाश्रय मांसपिण्ड अण्डाकार है । अतः यह अण्डाकार शिवलिंग है ।। ३९.४१॥ यापु संवर्ग इत्याह प्राण; मंगुर्ग इत्यपि। तयंवोपासना वायो प्राणे चंय विधीमते॥४२॥ "वायुवि सवर्ग," "प्राणो वाव संवर्ग" इस प्रकार शिवारमक संवर्गरूपसे उपासना वायु और प्राणमे विहित है ॥ ४२ ॥ ज्येष्ठं श्रेष्ठ च यो वेद ज्येष्ठः श्रेप्टोऽप्यसो भयेत् । ज्येष्ठः अप्ठय भपति प्राण एयेति च पुतिः॥४३ ॥ -

३०४
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पद्विशः
"यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च" इत्यादि श्रुतिमें ज्येष्ठ और श्रेष्ठरूपसे
प्राणकी उपासना तथा उसका ज्येष्ठत्व श्रेष्ठत्व फल बताया है ।। ४३ ।।
नमस्ते वायविल्याह प्रत्यक्षब्रह्मरूपिणम् ।
श्रुतिस्तथा स्वरूपेणाप्युपास्तिः संमता सताम् ॥४४॥
"नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि" इत्यादि श्रुतिसे वायुरूपेण
ब्रह्मोपासना भी विद्वत्संमत है ॥ ४४ ॥
उग्रश्च वायुमूतिश्च उनमोऽस्तो मनुः स्मृतः ।
वायुमंतिस्वरूपेण चिन्त्यता
परमेश्वरः ॥ ४५ ॥
"ॐ उग्राय वायुमूर्नये नमः" ऐसा मन्त्र समझो। और वायुमूर्तिरूपेण
शिवचिन्तन करो ॥ ४५ ॥
त्वं हतबहः
अग्निश्व शिवलिङ्ग स्याद्दीघंवतु सलक्षणम् ।
स्पष्ट तद्दीपकलिकाप्रभृतायग्निरूपिणि ।। ४६ ॥
अग्नि दीर्घवर्नुलाकार शिवलिङ्ग है। दीपकलिका आदिमें वह रूप
प्रत्यक्षसिद्ध है ।। ४६ ।।
रुद्रो या एप यद्धपग्निरित्येवं अतिपु श्रुतम् ।
तन्मुखा इति तन्मूलाः सर्वे देवाः प्रकीर्तिताः ॥ ४७ ॥
"रुद्र अग्नि है" ऐसे श्रुतियोंमें बताया है। "अग्निमुखा हि देवा."
ऐसा श्रुतियोंमें कहा है । अग्निमुखका अग्निमूल अर्थ है ।। ४७ ।।
कृत्स्न शाखादिकं सिक्तं स्यातरोमूलसेचनात् ।
सय देवाः पूजिताः स्युरग्निरूपेशपूजनात् ।। ४८।।
वृक्षके मूलका सेचन हुआ तो पूरी शाखा आदि सिंचित हो जाती
हैं। वैसे अग्निरूप शंकरको पूजासे सभी देवता पूजित होते हैं ।। ४८ ॥
तस्प घेवः किलोपास्तिमग्निमोडे पुरोहितम् ।
इत्यादिना समाचप्टे तस्मादीन प्रपूजयेत् ॥ ४९ ॥
अग्निरूप शंकरकी उपासना वेदों में यतिप्रसिद्ध है । ऋग्वेदका प्रारंभ
ही "बग्निमीडे पुरोहित" इस प्रकार मान्युपारानासे किया गया है ॥४९।।
सवें दोपा विनश्येयुरन्युपासनपा नृणाम् ।
सेजोयस्त्वं भवेतन दोपत्तेजोमसा नच॥५०॥

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् ३०५ अग्नि उपासनासे सर्वदोपनाश होता है। क्योकि अग्निउपासनासे तेजस्विता आती है। तेजस्वियोंको दोप नही होते, यह शास्त्र प्रसिद्ध है ।। ५०॥ रुद्राग्निमूर्ती डेन्ती च नमोन्तौ च मनुर्भवेत् । वेदोक्ताश्चैव बहवः संगृह्यन्तां यथोचितम् ।। ५१ ।। "रुद्राय अग्निमूर्तये नम." इस प्रकार मन्त्र है। और वेदोक्त असख्य मन्त्र तो यथोचित समझना चाहिये ॥५१॥ त्वमापः आपश्च शिवलिङ्गं स्यस्तच्च नानाविध मतम । गोलाकार क्वचिद्दीर्घयतुंलाकारमेव च ॥५२॥ रत्नाकरोऽभितो भूमि लिङ्गं गोलाकृतीप्यते । तथा चामरनाथस्य गुहायां दीर्घवर्तुलम् ॥ ५३॥ जल भी शिवलिङ्ग है । वह नाना प्रकार है । वह समुद्र पृथिवीकी चारो ओर गोलाकार है। अमरनाथकी मूर्ति दीर्घवर्तुलाकार होती है ।। ५२-५३ ॥ पञ्चानामपि भूतानामधिष्ठाता महेश्वरः। तथाप्यदाच्चतुभ्यंस्तु चत्वारि भगवान् हरः॥५४॥ पुठ्या गणेशोऽधिष्ठाता चित्रभानुश्च तेजस । मरुतो जगदम्बा च गगनस्य च माधवः॥ ५५ ॥ असाधारणरूपेरंग भगवानधितिष्ठति। सलिल तापहारी सन्नन्नदाता महेश्वरः ॥ ५६ ॥ यद्यपि पांचो भूतोके अधिष्ठाता महेश्वर हैं। तथापि भगवान शकरने चार भूत अन्य चार देवोको दिया । पृथिवीका अधिष्ठाता गणेशजी को बनाया, तेजका सूर्यको, वायुका अम्बामाताको और आकाशका अधिष्ठाता विष्णुको बनाया। स्वय असाधारण अधिष्ठाताके रूपमे जरमे रहे । तापहारी तथा अनदाता जलमे महेश्वर ही है ॥ ५४-५६॥ फुल्यायापि सरस्याय नादेगाय नमोनमः। इति देयेषु ताप्य यहपद निरूपितम् ॥ ५७ ॥ मवश्च उलमूर्तिश्च उनमोऽन्ती मनुमंतः। तापत्रयोपशान्तिः स्यादुपास्ते फपमा ।। ५८ ।। २०

३०६
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पड्विंशः
नहरों में स्थित शंकरको प्रणाम, सरोवरमें स्थित शंकरको प्रमाम,
नदी में स्थित शंकरको प्रणाम इत्यादिरूपमे जलरूपेण शंकरकी उपामना
नानाविध होती है। "भवाय जलमूर्तये नमः" ऐसा मन्त्र होगा। उपा-
सनाका फल है तीनों तापोंकी शान्ति ।। ५० ५८ ।।
त्वं ज्योम
व्योमापि भगवल्लिङ्ग यद्यप्येतदरूपकम् ।
तथापि दशंकरेतद् वर्तुलाकारमोक्ष्यते ॥ ५९॥
तया च यतुंलाकारं शिवलिङ्गं तदिष्यते ।
शिवलिङ्गं नमेद् व्योम प्रातस्थाप नित्यशः ॥ ६ ॥
यश्चास्य नीलिमा वृष्टः पोश एप महेशितुः ।
व्योमकोश इति प्रोक्तं तेन नाम महेशितुः ।। ६१॥
नीलं गगनमित्येवं भवति प्रत्ययो नणाम् ।
व्योम्न एव ततस्तावत्केशत्यमुररीकृतम् ॥ ६२ ॥
भोमश्चाकाशमूतिश्च इनमोन्तो मनुः स्मृतः ।
विशालहृद् व्यापकात्ममावश्योपासको भवेत् ।। ६३ ।।
आकाश भी शिवलिङ्ग है। यद्यपि आकाशका कोई स्प नहीं है ।
तथापि दर्शकोंको अर्धगोलाकार दीखता है। (बीचमें आसमानमें कोई
पहुंचेगा तो गोलाकार दीगेगा। ) अतः यह वर्तुलाकार शिवलिङ्ग माना
गया है। प्रातः उठकर प्रतिदिन आकाशमे शिवभावना कर प्रणाम करो।
जो आकारामें नीलिमा दीखती है यह शंकरका केश है। अतः शंकरका
नाम भी व्योमकेश पडा । नील गगन ऐसी सामानाधिकारण्य प्रतीति होती
है। अतः गगनको ही केश स्वीकार किया। ( मायना होनेसे इसमें कोई
अनुपपत्ति नहीं है । ) "भीमाय आकाशमूर्तये नमः" ऐसा मन्त्र है । उपासक
विशालहृदय बनेगा और व्यापकारमभावयुक्त होगा ॥ ५९-६३ ॥
त्यमु घरणिः
धरणिः शिवलिङ्गः स्यात्तदिदं वतुंलाकृति ।
नूगोलमिति हि प्राहगोलाकृतिमिमा क्षितिम् ॥ ६४ ।।
फलासपर्वतः फस्न: शिलिङ्गं पयोच्यते ।
तया फुत्स्नय पथिवो सियसिङ्ग निगद्यते ।। ६५ ।।
स्फाटिक पायियं वापि नार्मदेश्वरमेय या।
पापियाम्यवलिङ्गानि पुरस्ना च पृथिको तया ॥६६॥

श्लोकः ] स्पन्दवातिकसहितम् ३०७ पार्थिवेश्वरपूजा च भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी। वारिद्रयदु खहरणी पुनपौत्रधनप्रदा ॥ ६७ ॥ पृथिवी भी गोलाकार शिवलिङ्ग है । भूगोल आदि शब्दमे भूमिको गोलक कहा है। जैसे कैलासपर्वत पूरा शिवलिङ्ग है वैसे पूरी पृथिवी शिव- लिङ्ग ही है । स्फटिकलिङ्ग, नर्मदेश्वर लिङ्ग तथा पार्थिवलिङ्ग ये सभी पृथिवीलिङ्ग ही है । पाथिवेश्वर पूजा भुक्ति-मुक्ति दोनो देती है । पुत्र, पौत्र, धनादि समृद्धिकारिणी भी है ।। ६४.६७ ।। सर्वश्च क्षितिमूर्तिश्च डेनमोन्तौ मनुमंतः। सर्वसम्पत्समृद्धः स्यादुपासोनो महेश्वरम् ॥ ६८॥ "पृथिवीमूर्तये शर्वाय नम " ऐमा मन्त्र है । इससे उपासना जो करता है वह समस्त समृद्धियोसे सपन्न होता है ।। ६८॥ आत्मा श्वमिति च आत्मा च शिवलिङ्ग स्याहोघंवतु ललक्षणम् । त दीपालिकाकार हृदिस्य पण्डिता विदुः ।। ६९ ।। अगुष्ठमात्रः पुरुष इत्येतच्च श्रुतेर्वच । शिवलिङ्गाकृतिन णामड्गुष्ठो दृश्यते म्फुटम् ।। ७० ॥ पुण्डरीकसमाकार हृत्पद्ममिति फोत्यंते । शिवलिङ्गाकृतिः पद्ममुकुलस्योपलभ्यते ।। ७१ ॥ आत्मा भी दीर्घवर्तुलाकार शिवलिङ्ग है। क्योकि जीवात्माको दीपकलिकाकार बनाया है। 'अगुष्ठमात्र पुरुष इस श्रुतिसे भी वही अर्थ निकलता है। क्योकि अगुप्ठ शिवलिङ्गाकार होता है । पुण्डरीकाकार होनेसे हृदयकमल कहा जाता है। पयमुदुलको आकृति शिवलिङ्ग जैसी होती है ।। ६९७१ ॥ में नमोन्तात् पशुपते त्यंन्तयजमानतः। मनुरात्मप्रसादेन भवेत्तद्दर्शन हृदि ॥७२॥ "यजमानमूर्तये पशुपतये नम" मन्त्र है। इससे परमात्मप्रसाद एव उनका दर्शन होता है ।। ७२ ॥ नन्वात्मा परमात्मैव जीव एय शिवो मतः। जीधे शियत्वद्धिश्चज्जीयत्य याथ्यते तदा ।। ७३ ॥ तदा प्रतीकविरहापास्तिहि क्पं भवेत् । मेव शियमति परीक्षा नोवमाधिका ।।७४।। " तया श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पड्विंशः आत्मा ही परमात्मा है, जीप ही शिव है, तब आत्मामें शिवत्वबुद्धि करनेपर जीवत्व बाधिता होगा। तब प्रतीक न होनेसे उपासना ही नहीं बनेगी इम पूर्वपक्षका उत्तर है शिवत्वारोप परोक्षात्मक होनेसे वह जीवत्व- बाधक नहीं है ।।७३-७४ ।। न वैष्णवा गाणपत्याः शाक्ता सौराश्च सूरिणः। परिहप्य शिवं क्यापि स्थातुमर्हन्ति संसृतो॥७५ ।। पृथ्वीमूर्तिशिवस्पृष्टाः पृथिवीवासिनो जनाः । अन्तःकुक्षिशिवाः जोवाः सर्वे सलिलपापिनः ॥ ७६ ॥ प्रग्निपषवं मक्तशाकायदनकारिणः । शिवोपमुक्त नवेद्यं भुमते चष्णया अपि ।। ७७॥ वायुस्तु प्राणरूपेण शिवोऽयं वर्तते हृदि । सनिर्गमेऽशियो देहः पापिष्ठतर उच्यते ॥७८॥ आकाशं दूररास्त्यक्त्या कुत्र गन्तुं च शक्यते । एभिविना जीवनं च मूतैः सम्पद्यतां कयम् ॥ ७९ ॥ सूर्याचन्द्रमसौ नित्यं प्रकाशं वः प्रयच्छतः । तथा पोषयतः सर्व रश्मिमिश्चामृतैरपि ॥ ८० ॥ दश्चयन्तोऽपि तान् सर्वानात्मानं कायमेय वा। शिवरूपं वश्चयेयुः तस्माद् मजत भो शिवम् ॥ ८१ ॥ चाहे अपनेको वैष्णव मानलो, गाणपत्य,गाक्त, सौरादि मानलो किन्तु शिवजीको छोडकर कोई कही भी नहीं रह सकता । पृथिवीपर रहते हो तो पृथिवीमूर्ति शिवाधित हुए। जल पीते तो जलमूति शिव पेटमें गया। भातरोटी साते हो तो वह अग्निपक्व होनेसे शिवमुक्त हो गया। शिवनैवेद्य ही वैष्णवलोग भी खाते है। प्राण हृदयमें है तो ठीक है। नही तो शरीर पापिष्ठतर कहा है । वायुमूति शिव ही है । और आकाशको छोडकर भागोगे सहा इन पाच भूतोके बिना जीवन किस प्रकार हो । मूर्य चन्द्रसे प्रकाश होता है। सूर्यरश्मि और चन्द्रामृतमे पोषण होता है । मान लो कि इन सबसे जैसे तमे वर जाय. उदाहरणार्थ मरणोतर पिनाच या देव जो भी यन, भूतोका अधिक उपयोग नहीं आयेगा तो भी अपनी आत्मारो केमे बचोगे? अतः बचनेशी कोशिश करनेवी अपेक्षा शिक्का प्रेममे भजन करो, कल्याण होगा ।। ७५-८५ ।।

श्लोकः] स्पन्दवार्तिकसहितम् परिच्छिन्नागिरं इत्थं परिणता वृद्धा अष्टमूर्ति शिवं जगुः । संख्यया वस्तुमिश्च व परिच्छिन्नतया परम् ॥ ८२ ।। उपास्तिदृष्टया वृद्धानामेतत्कथनमिप्यते। परिच्छिन्नवपुः शम्भुरुपास्यः प्रथमं भवेत् ॥ ८३॥ पूर्वोत्तरीति परिणत अर्थात् वृद्धजन शिवजीको अष्टमूतिके रूप सख्या एवं वस्तुसे परिच्छिन्न कहते हैं । उपासनाकी दृष्टिसे उनका वह कथन ठीक ही है। परिच्छिन्न शरीररूपेण शकरजीकी उपासना प्रथम की जाती है। (जैसे हम वणन कर आये ) ।। ८२-८३ ।। वस्तुतः सर्वमेवेद शिवलिङ्गतया जगत् । दृश्यते चिन्त्यने चैव शियलिङ्गमतोऽखिलम् ।। ८४ ।। तथा ह्यनन्त आशः शिवलिङ्गात्मनेष्यते। चक्षुर्गतिस्तद्विधया प्रत्यक्षमुपलभ्यते ॥ ८५ ॥ मनोगतिश्च धमेव शिवलिङ्गात्मना भवेत् । शिवलिङ्ग ततः सर्व दृश्यते यच्च चिन्त्यते ॥ ८६ ॥ वस्तुतः सभी जगत शिवलिङ्गरूपमे देखा और सोचा जाता है । अतः सभी शिवलिङ्ग ही है। जैसे आकाश अनन्त है लेकिन देखते समय शिवलिङ्गरूपसे दीखता है। क्योकि चक्षुकी गति ही ऐसी है। इसीप्रकार मनकी गति भी शिवलिङ्गाकारमे ही होती है। अतः जो भी कुछ दीखता है या सोचा जाता है सभी शिवलिङ्ग ही है ॥ ८४-८६ ।। अण्डाकारमिदं सर्व ब्रह्माण्ड लिङ्गलक्षणम् । ब्रह्माण्डे शिवबुद्धचा च शिधापस्तिरतो भवेत् ।। ८७ ।। यह ब्रह्माण्ड भी आखिर• अण्डाकार शिवलिङ्गलक्षणयुक्त है । अत. ब्रह्माण्डमें शिवबुद्धि कर शिवोपासना की जाती है ।। ८७॥ न विद्यः ननु शास्त्रेषु सूर्यादेतोपास्ति. शिवारमना। ब्रह्माण्डादौ न तु तथा घरोक्तिहमंचिता तत ॥८८॥ मंव पुरुष एवेद सर्यमित्यामनन् स्फुटम्। सर्यशं श्वेताश्वतरशासिनः।।८।। ततः सर्वमुपास्य जगदिष्यते। तथा च दृश्यचिन्त्यादेः शिवत्योपासना मयेत् ।। ९०॥ रुद्रं प्रकृत्य रद्रात्मना ३१० श्रीशिवमहिम्नः स्तोत्रम् [पविंशः ननु ब्रहोदमखिलमित्यप्याह श्रुतेर्वचः। मनो प्रीत्युपासीतेत्यस्ति तत्र पृथग्विधि, ३९१ ॥ सत्यं तद्वदिहाप्यस्ति दशिता चाष्टमतिता। विश्वमूर्तरुपास्तिहि कोशीति विचिन्त्यते ॥ ९२॥ असर्वज्ञन नो विश्वं ज्ञातुं शक्येत कृत्स्नशः। व्यर्थो विधिः प्रसज्येत तथाऽप्रामाण्यमापतेत् ।। ९३ ॥ यावद् दृश्यं च चिन्त्यं च तावदादाय तत्र च । कृत्या शिवमति कार्योपास्तिः प्रामाण्यहेतवे ॥ ९४ ॥ यावद् दृश्यं च चिन्त्यं च शिवलिङ्गस्वरूपभाक् । तदित्युक्तं ततः सर्व भवेदत्र समन्जसम् ।। ९५ ।। पूर्व पक्ष है कि दशास्त्र में सूर्यचन्द्रादिमूर्ति शिपको बतलाकर उस रूपसे उपासना कही है। अतः अप्टमूर्युपासना उचित है। ब्रह्माण्डको शिव व हा बताया है ? यावदृश्य या यावच्चिन्त्यको शिव यहां कहा है ? तब विना- वचन ही उपासना कैसे होगी? इसका उत्तर है श्वेताश्वतरोपनिषदमे रुद्रका उपक्रम कर उसका "सहनशी पुरुष." से पुरुषरूपेण वर्णनोत्तर "पुरुष एवेदं सर्व" इसप्रकार सबको पुरुषात्मक रद्ररूपेण वर्णन किया। अतः जगतकी सदस्पेण उपासना श्रुतिमिद्ध है । तब यावदृश्य याव- च्चिन्त्यकी शिवरम्पोपासना युक्त है । यह गका करें कि "सर्व खल्विदं ब्रह्म" इस प्रकार ब्रह्मरूपेण सर्वोपासनाविधान होनेपर भी "मनो ब्रह्मेत्युपासीत," "आदित्यो ग्रह्मेत्युपासीत" इस प्रकार तत्तद् व्यक्तिमे पृथक् उपासनाविधान इस बात का निश्चायक है कि "सर्व ब्रह्म" यह उपासना समूचे जगतमे ही मभव है, एकदेशमे नही। अतएव पृथिवी आदि माठमे शियोपासनाको विधिवी भी संगति है; तो इस शकाका समाधान यह है कि सर्व जगतका मंपूर्णतया ज्ञान सर्वजो बिना अन्यको सभव नहीं है । तब उक्त वाक्यमे अननुष्ठापकत्वलक्षण अप्रामाण्य आयेगा। अत. उसकी प्रमाणिकता के लिये दृष्टिमे जितना आवे या बुद्धिमे जितना आये उनी विश्वात्मक प्रतीक बनायर उगमें ब्रह्मबुद्धि या शिवयुद्धि कर यही सिद्ध होगा 1 याय दृस्य और पायच्चिन्रय गिवलिनाकार ही है यह हम पहले वर्णन कर बाये । अतः मर्वोपपत्ति है ।। ८८.९५ ॥ विश्वं च शियलिगं रपादनाघन्तायहेतुतः । ब्रह्मविष्णू यवतता सदान्तानयेमिरणो ॥ ९६ ।।

सतविंशः श्लोकः प्रस्तुतोपासना पूर्वमष्टमूतितयेशितः। सर्वमूर्तितया चोक्ता परतत्त्वावबुद्धये ॥१॥ सकलं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्तपीः। उपासीतेति विस्पष्टं द्वितीयान्नायते श्रुतौ ॥२॥ रूपोपास्ति निरूप्याय नामोपास्तिरदीर्यते। श्लोकभ्यां प्रथमं तत्र त्वोंकारः प्रतिपाद्यते ॥३॥ उपासना प्रस्तुत हुई। प्रथम अष्टमूर्तिरूपेण उपासना बतायी । फिर सर्वमूर्युपासना भी परतत्त्वज्ञानार्भ वतायी । “सवं खल्विदं ब्रह्म" इत्यादि श्रुतिमें सर्वमूर्युपासना बतायी है। इस प्रकार रूपोपास्तिनिरूपणोत्तर अव नामोपासना दो श्लोकोंमे कहते है। प्रथम ॐकारका प्रतिपादन है ।।१-३॥ प्रों तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा- नकारायणस्विभिरभिदधत्तीर्णविकृति । तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवहन्धानमणुभिः समस्तं व्यस्तं त्यां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥२७॥ हे शरणद ! तीन वेदोंको, जाग्रदादि तीन वृत्तियोंको, ब्रह्मा आदि तीन देयोंको, अ, उ, म इन तीन वर्णोसे बतलानेवाला और सर्वविकाररहित तुरीय आपके धामको सूक्ष्म ध्वनियोसे प्रतिपादन करनेवाला व्यस्त एवं रामस्त कार आपका वर्णन करता है ॥२७॥ फारो द्विविधः प्रोक्तः समस्तो व्यस्त एव च। समस्तः कृत्स्न ओंकारो सध्वनिस्टयक्षरोऽपरः ।। ४ ।। ॐकार दो प्रकारका है। एक समस्त है दूसरा व्यस्त है। पूरे स्कारको समस्त कहते है। ध्वनिसहित तीन अक्षरोंको व्यस्त कहते हैं ॥४॥ समस्तमन्ते व्यायास्ये व्यस्तः पूर्वमुदोर्यते । पौगिको व्यस्त इत्युक्तः समस्तो रद उच्यते ॥५॥ प्रतो यौगिकरदोऽय पायंश्येनार्यवर्णनात्। पुनर्योगपढोऽयमिति प्रपतीभयिष्यति ॥ ६॥ -

श्लोकः]
स्पन्दवार्तिकसहितम्
समस्तकी व्याख्या अन्तमे करेंगे। प्रथम व्यस्तकी व्याख्या करते है।
यौगिक कार व्यस्त कहलाता है। रूढ ओकार समस्त कहलाता है।
इसलिये यह योगरूढ शब्द नहीं, अपितु यौगिकरूढ शब्द है। यह भी आगे
स्पष्ट होगा ॥५-६ ॥
तत्राकार ভাস্ত্র मकारश्चाक्षरत्रयम्।
ध्वनयो नादसंज्ञाश्चत्योकारो व्यस्तलक्षणः॥७॥
एकीकृत्य समाचल्यो मादबिन्दू महामुनिः ।
ध्यनिशब्देन सक्षेपादित्याप व्ययिष्यते ॥८॥
अ-उ-म ये तीन अक्षर, नाद शब्दसे प्रसिद्ध ध्वनि, ये मिलाकर व्यस्त
ॐकार होता है । ध्वनिशब्दसे नाद एव विन्दु दोनो ग्राह्य है। सक्षेपसे
ध्वनि कह दिया। यह भी आगे स्पष्ट होगा ।। ७-८ ॥
अवते रक्षणाद्यान्मनिन्यूहि च यो भवेत् ।
ॐकारः स समस्तः स्यात्सनादः सोऽपि संमतः॥९॥
रक्षणादि अर्थमे 'अव' धातु है उससे मनिन् प्रत्यय करके वकारको
ऊ आदेशसे जो ॐ होता है वह समस्त माना जाता है। वह भी नाद सहित
ही समत है।॥९॥
असमासे मवेद् व्यस्त समस्त तु समासतः ।
इति ध्यख्या तु नो युक्ता व्यस्तं न स्यात्तदा पदम् ॥ १० ॥
कुछ व्याख्याकार समास न करनेपर अ उ म और ध्वनि मिलाकर
व्यस्त माना जायेगा, समास करनेपर समस्त होगा ऐसी व्याख्या करत है
जो सँगत प्रतीत नही होना। व्यस्त फिर लौकिक क्या पारिभाषिक भी
पद नहीं होगा। वह वाक्य हो जायेगा ।। १०॥
त्रयों
प्रयोति च निवेद्युक्ता ऋग्यज.सामलक्षणा।
ऋगकाराटुकाराच्च यजुः साम मकारतः॥ ११॥
जवीका ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, ये वीन वेद अर्थ है । अपारमे
ऋक्, उकारसे यजु, और मकारसे साम होता है ।। ११ ॥
वस्तुतस्तु
प्रयीत्येतदृष्यजु सामवोधनम् ।
अन्यथाथर्ववेदस्याऽसंग्रहापत्तिरीक्ष्यते
॥१२॥
ऋक पादाक्षरनंपत्यात्तदनयत्यती
यजः।
गोत्या साम च तेनानायवंणोऽप्यस्ति संग्रहः ॥ १३ ॥

॥१७॥ श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [ सप्तविश. वेदशब्दप्रयोगोऽस्ति यत्र तत्रापि न क्षतिः । अस्त्येव फिल मन्त्राणामृगदीनां हि वेदता ।। १४ ॥ वस्तुत गयी का वाग्वेद यजुर्वेद, गामवेद ऐमा अर्थ मत करो । तव अथर्ववेद ग असग्रह होगा। किन्तु गाया यजु और साम यही अर्थ करो। नियतपादाक्षार बार है । अनियन पादाक्षर यजु है । गोतियुक्त साम है। इस लक्षणमे अथर्ववेदका भी मग्रह हो जाता है। जहा वेद शब्द लिखा है वहा ऋगमन्यादिमे वेदत्व होनेसे वैसा प्रयोग किया गया है ।। १२-१४ ।। नन्याह जैमिनिमुनिदो या प्रायदर्शनात् । यो वेदा असृज्यन्तेत्युपक्रममुपाश्रितः ॥ १५ ॥ ऋग्वेदादिपदं तस्मातत्तद्वेदार्थक भवेत् । वेदशब्दप्रयोगे केवलर्गादिसग्रहः ।। १६ ।। उच्यते गुणवाद' स वेदाना सृष्ट्यसभवात् । अन्यथाऽथर्ववेदस्याऽसृष्टेन्यू नित्वमापतेत् यदि ऋग्वेदादि शब्दसे ऋगात्मक वेद ऐसा भी अर्थ किया जा सकता है तो वेदो वा प्रायदर्शनात ' इस अधिकरणके माथ विरोध होगा। "त्रयो वेदा असृज्य त । अग्ननर ग्वेद वायोर्यजुर्वेद । आदित्यात् सामवेद उच्च- चा क्रियते उपाशु यजुपा । उच्च साम्ना" ऐसा मन्न है। प्रथम ऋग्वे दादि पदप्रयोग किया । बादमे केवल ऋग् यनु इत्यादि कहा। तो यजुर्वेदमे जो नग् मन्न है उसे भी ऊचे स्वरमे वोलना है क्या इस शकामे जैमिनि ने कहा--नही। उपक्रममे ऋग्वेदादि कहा । अत यजुर्वेदमे आया हुआ म भी यजुर्वेद ही है । उसका उपाशुपाठ ही होगा ऐसा सिद्धान्त किया। आपके मतम ऋग्वेद यजुर्वेद आदिका ऋगात्मा वेद इत्यादि अर्थ होनेसे यजुर्वेदगे जायी हुई ऋचा भी गात्मक वेद है ही। तब ऊ चा प्रयोग क्यो नहीं होगा? अत ऋग्वेदादि शब्द योगस्थलमे ऋगात्मक वेद ऐसा अर्थ है ही नहीं। इस पूर्वपक्षका समाधान यह है कि "यो वेदा अजायन्त" इत्यादि गुणवाद है। भूताथवाद नहीं। क्योकि वेदोकी सृष्टि ही नही हाती। अन्यथा वहीपर अथर्ववेदका असग्रह होगा। अत. वहा ऋग्वेदादि गुणवानकद्वारा उपक्रममात्र है। वह भी उच्चनचा क्रियते इत्यादि विधानार्थ । किन्तु जहा वस्तुकथन स्थलमे निवेदीपदका प्रयोग है वहा अथर्ववेदका असग्रदाप होनसे ऋगात्मकवेद इत्यादि अर्थ करना ही पडेगा। १५-१७॥ 7 श्लोक ] स्पन्दवातिकसहितम् प्रकृते वस्तुकथनाल्यूनतापत्यपास्तये । ऋगादिपरकः शब्दो न त्वग्वेदादितत्परः॥ १८ ॥ प्रकृतमे वस्तुकथन है 'अकारादिका अर्थ क्या है यह कह रहे हैं) तव अथर्ववेदकी असग्रहापत्तिनिवारणार्थ त्रयीपदसे ऋग्वेदादि न लेकर ऋगादि ही लेना चाहिये ।। १८॥ वेदः शिवः शिवो वेद इत्याहोपनिषद्वचः। विशेषं तत्र चाह सम भट्टाचार्यः कुमारिलः ॥ १९ ॥ विशुद्धगानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुपे। धेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे ।। २० ॥ वेदाश्वशंषि विज्ञानं देहश्चति विभज्यते । जानकाण्डं अयोत्युक्तं ज्ञान त्रय्यन्तलक्षणम् ॥२१॥ यो सारयमिति श्लोकेऽप्येवमर्थ प्रयोपदम् । ज्ञानकाण्ड पृथक तस्मादाचार्यस्यापि संमतम् ॥ २२ ॥ "वेद. शिव शिवो वेद इस प्रकार उपनिषदमे शिवको वेदरूप बताया है। अतएव वेदबोधक ओकार व्यस्त शिवबोधक है। इसमे कुछ विशेपता कुमाग्लिभट्टने दिखाई है। वे कहते हैं-शकर विशुद्ध ज्ञानशरीर है। तीन वेद उनकी तीन चक्ष है, इत्यादि । वहां त्रिवेदीपदसे कर्मकाण्डप्रति- पादक वेद तथा विशुद्धज्ञानपदसे विशुद्धज्ञानबोधक वेदान्त विवक्षित है । यह भेद पुष्पदन्ताचार्यको भी अभिमत है। "त्रयो मास्य" यहाँ त्रयोपदसे कर्मकाण्ड विवभित है। अत ज्ञानकाण्ड पृथक आचार्याभिमत है ।।१९-२२॥ नन्वर्यज्ञापत्य हि त्रयीत्रय्यन्तयोः समम् । कुतो विभाग क्रियते वेदत्वेनैकरूपयो. ॥ २३ ॥ विषयाणां विभागाच्चेदुपास्तिश्च विमज्यताम् । प्रतिप्रकरण चंतदापद्यतेति चेन्न तत् ।। २४॥ व्यावहारिकनामात्यवोधिका भवति प्रयो। पारमाथिकमेकत्ल प्यन्तो विनिवेदयेत् ॥ २५॥ अप्रत्यभिज्ञायमानकर्मणां भेद शाखामेदादितोऽगाड़िगभावः सानिध्यतो भवेत् ॥ २६ ॥ शाखाभेदे विधूर्यव त्रग्यन्तेप्वखिलेप्वपि । एक ब्रह्मात्मक तत्वं विस्पटं प्रतिपाद्यते ॥ २७॥ विषया अपि नानव कर्तृकर्मादयस्तया। त्रमन्तेषु न कोऽप्यस्ति सर्वेष्वपि मिदालवः ।। २८॥ इष्यते।

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तविंशः तया च सवेदान्तयोध्यं नानात्वजिनम् । विशुद्धमेव विज्ञानं पृथवकृत्य प्रदर्श्यते ॥ २९॥ शका होगी कि नयीका ही अन्त अय्यन्त-वेदान्त है। पृथक् कर बतानेका क्या मतलब ? जबकि अर्थज्ञापकत्व दोनोमे समान है। (विषय भेदसे पृथक्करण हो तो अग्निहोत्र दर्शपूर्णमासादि विषयभेदसे भी पृथ- क्करण क्यों नहीं ?) इसका उतर है फि त्रयी व्यावहारिक नानात्वका प्रतिपादक है। अय्यन्त पारमार्थिक एकत्वमा प्रतिपादक है। श्रयीमे शाखा भेदमे अप्रत्यभिज्ञात कर्मोका भेद है। एक शाखामे भी सानिध्यमें अङ्गाङ्गि भाव है। वेदान्तमे तो शासाभेदादिप्रयुक्त कोई भेद नहीं। शाखाभेदको किनारे रखकर सर्वत्र एक ब्रह्मतत्त्वका ही प्रतिपादन है। प्रयोमे विषय नाना है । कर्ता कर्म आदि नाना है। समस्त वेदान्तमे देख लो भेदका नामो- निशाना नहीं मिलेगा। अत. सर्ववेदान्तबोध्य भेदवजित विशुद्धविज्ञानको पृथक्कर दिखाना उचित ही है ॥ २३-२९ ।। अत एवात्र हि ब्रह्मविद्याया ऐक्यदर्शनात् । सर्वासुपनिषत्स्येक केचित् प्रकरणं विदुः ।। ३० ।। यद्यप्युपासनाभेदस्वय्यन्तेष्वपि तथापि मुस्यस्त्रय्यन्तो ब्रहातत्यावबोधकः ।। ३१ ।। इसलिये ब्रह्मविद्याकी एकताको देखकर कई विद्वानोने समस्त उप- निषदोमे एक ब्रह्मविद्याप्रकरण माना। उपासना भिन्न होनेपर भी मुस्य वेदान्त ब्रह्मतत्वप्रतिपादक ही है। उसमे तो भेद है नही यह निश्चित है ।। ३०-३१ ।। ननु वेदः शिवस्तर विमागस्तु कथं शृणु। विशुशानदेहोऽय त्रिवेदोदित्यलोचनः॥ ३२ ॥ यदि प्रयी और त्रय्यन्त इस प्रकार विभक्त है तो वेदरूपी शिवम भी यह विभाग होना चाहिये । है ही । सुनो-विशुद्ध ज्ञान शिवका देह है। त्रयी तीन नेत्र हैं ।। ३२॥ ननु नय्यन्तविज्ञानानुत्तो न्योन्यमिहेति चेत् । मंव तुरीयविज्ञानं ध्वनिमिहीवरुध्यते ॥ ३३ ॥ यदि यो और अय्यन्तको पृथक किया तो "नयी तिस्रः" श्लोकमे त्रग्यन्तका अग्रहण होनेसे न्यूनता क्यो नही ? सुनो, प्रयोसे ज्ञान लेना आगे बतायेंगे । अस्यन्तसे ब्रह्म विज्ञान लिया जाता है। वही तो तुरीय तत्व है। उसको तो ध्वनिया सगृहीत करेगी । तब न्यूनता कहा है ? ॥ ३३ ॥ विद्यते।

श्लोक:] स्पन्दवातिकसहितम् ३१७ - त्रयी वर्णनयेणोक्ता अय्यन्तो ज्ञानलक्षणः। तुरोयरूपो ध्वनिर्मित इत्याशयो मुनेः ।। ३४ ॥ तीन वर्ण अ-उ-म से तीन वेद लिये । और ज्ञानरूपी वेदान्त तुरीयरुप है। उसे ध्वनियोंने अवरुद्ध किया यह मुनिका आशय है ।। ३४ ॥ अयोधर्म प्रपन्ना ये लभन्ते ते गतागतम् । अय्यन्तार्थप्रतिष्ठाश्च मुच्यन्ते भवबन्धनात् ।। ३५ ॥ जो त्रयीधर्मनिष्ठ है वे संसारके आवागमन में पड़ते हैं ऐसा गीतामें कहा है । अय्यन्तार्थनिष्ठ भवबन्धमुक्त होते हैं ।। ३५ ॥ विज्ञानं तीर्णविकृति विकृतिस्तु त्रयी मता। मनोवत्यात्मता त्रय्या भाष्यकारश्च दर्शिता ॥ ३६॥ विज्ञान तीर्णविकृति है । यो विकृतिरूप है। क्योकि वेदोंको तैत्तिरीय भाष्य में मनोवृत्तिरूप बताया ॥ ३६ ॥ ननु वृत्तिस्वरूपत्वं अय्याश्वे दुच्यते तदा। कथं शम्भोव्यंस्तरूपं त्रयो स्यादिति चेप्न तत् ॥ ३७॥ वृत्त्ययच्छिन्नचैतन्यं वेद इत्युच्यते ततः। परमेशस्वरूपत्वं वेदानां घटसेतगम् ॥ ३८॥ यदि वेद मनोवृत्तिरूप है तो शिवजीका व्यस्तरूप किस प्रकार? सुनो । वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य ही वेद है । अत वेद परमेश्वररूप और परमेश्वर वेदरूप हो सकता है ।। ३७-३८ ।। नन्वेय शिवचपि वेद स्थान शिवः स्वपम् । कृत्स्नः शिवो वेदतया नोररीक्रियते यतः॥ ३९ ॥ मयं प्रागेव निर्णीतं प्रत्यङ्ग पूर्ण एव स.। अखण्डत्यान्महेशस्य कृरस्नोऽतः कथिता हरः॥ ४० ॥ फिर भी वेद केवल शिवचक्षु हुए। स्वय शिव नहीं। क्योकि सपूर्ण शिवको वेदत्वेन स्वीकार नहीं कर रहे। यह भी बात नही। क्याक हम पहले कह चुके हैं कि भगवान अखण्ड होनेस प्रत्यङ्ग पूर्ण ही है । अतएव चक्षुमात्र कहनेपर भी पूरा शिव ही उक्त हो जाता ॥ ३९-४० ॥ उपास्योपाध्यवच्छिन्न निगद्यते । चैतन्य तेन सकलमुपपन्न मवेदिति ॥४१॥ व्यस्तरुप २१८ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तविंशः फिर एक आंख कहनेसे भी पूर्णशिव आ जाता है। तीन आंख आदिका क्यो वर्णन है ? सुनो। उपास्य उपाधिविशेषसे अवच्छिन्न चैतन्य व्यस्तरूप बनाया गया है । अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ॥ ४१ ॥ नन्वेवं सति वेदान्तः शिषरूपो न सिध्यति । निवेदो खलु चपि वेदान्तस्तु किमात्मकः ॥ ४२ ॥ न च विज्ञानरूपो यो देहस्त्रय्यन्तताऽस्य हि । उपतेति वाच्यं तद्बोधवचनादर्शनादिह ॥ ४३ ।। अणुभिवनिमिनि तुरोयमवरुध्यते । न हि ध्वनय एव स्युर्वेदान्तोऽवाचकत्वत. ।। ४४ ॥ अफारादिस्त्रयीं ब्रूयाद् वेदान्तं न ध्वनिर्वदेत् । वेदान्तसंग्रहस्तेन भवतां दुर्घटो भवेत् ॥ ४५ ॥ सत्यमत्राभिदामूरोकृत्य वेदान्ततुर्पयोः । पृथग्वेदान्तरूपत्व ज्ञानदेहस्य नोदितम् ॥ ४६ ॥ पूर्वपक्ष-यदि तीन वर्णोसे कर्मकाण्डात्मक प्रयी विवक्षित है तो वेदान्तका असग्रह होगा। तीन वेद तो तीन चक्षु हुए। अब वेदान्त क्या है बताइए । यह कहना सगत नही कि विशुद्धज्ञानरूप शरीर ही वेदान्त है। क्योकि इस बात को बताने के लिये कारमे कोई अक्षरादि नहीं है। आशा यह थी कि जो सूक्ष्म ध्वनि है वह वेदान्तको कहेगी। परन्तु वह वाचक नही, केवल तुरीयका अबरोधमान करेगी। आकारादि ऋग्वेदादिके वाचक हैं। वैसे ध्वनि वेदान्तका वाचक नही है। इस पूर्वपक्षका उत्तर यह है कि वेदान्तको और विज्ञानको एक मानकर यहा वेदान्तको ज्ञानदेहरूपता नही बतायी। अर्थात् ध्वनियोसे तुरीयज्ञान अवरुद्ध हुआ तो बेदान्तशास्त्र भी अवरुद्ध ही समझना चाहिये ।। ४२-४६ ।। वस्तुतस्तु ध्वनिवेच विशेष मन्महे वयम् । प्रभिपन्जन्ति के चित्तु वर्णान् केचिद्वदन्ति च ।। ४७ ।। व्यञ्जयन्ति ककारादोन ध्यानपः प्रायशोनणाम् । ॐकारातरमवा असामान्यास्तु ते मताः ॥४८॥ ध्वनयः सर्वेवरुन्धोरस्तुरोयकम् । विशेषोऽनो ध्यनीना स्यादोकारार्धतिनाम् ।। ४९।। समुश्स्थापयत्यय येदान्तान् ध्वनयस्ततः । शियदेहय वेदान्ता इति सर्व समञ्जसम् ।। ५०॥ अन्यया श्लोक.] स्पन्दवातिकसहितम् ३१९ वस्तुत हम ध्वनियोमे ह कुछ विशेषता मानने है। कुछ ध्वनि वर्णाभिव्यञ्जक है । कुछ उगस्थापक है। प्राय ध्वनि कक रादिवर्ण व्यन्जक मानी जाती है । किन्तु आकारादि मन्नोत्तर भावी ध्वनि असामान्य है। अन्यथा उनसे तुरीयका अवरोध से होता। यदि सभी ध्वनिमे यह विशेषता होती तो घगदि पदकी ध्वनिमे भी तुरीयावरोध क्यो नही होता? अत ॐकाराद्य नर ध्वनियोमे विशेषता माननी ही पडेगी। ओकारोतर ध्वनि वेदान्नोको उपस्थित करायेगी ही। वह शिवजीका शरीर है । अत सर्वसामञ्जस्य है ।। ४७ ५० ।। वाचकत्व ध्वनीना न वैयाकरणगेतित । तथाप्युपस्थापयेयुरथं शक्तिविशेषतः ॥५१॥ सच्चामिप्रेत्य मुनिनावरुन्धानमितोरितम् । अचिन्त्यशक्तिबोधायमवरोधोक्तिराजसी ॥५२॥ वयाकरणरीतिसे ध्वनिवाचक नही है। फिर भी हमारे मतमे ध्यान भी विलक्षण शक्ति ( वाचकता शक्ति नही किन्नु अचिन्त्य शक्ति ) से अर्योपास्थापन करेगी ही। इसे भी हृदय मे रसकर अभिदधत्' से पृथक् 'अवरुन्धान' ऐसा मूलमे कहा । अचिन्त्यशक्तियोधनार्थ जवरोधाक्तिकी ग्पपत्ति है ।। ५१५२॥ परे यीपदेनैव अय्यन्तोऽप्युपगृह्यते । तेन न न्यूनापत्तिस्त्रय्यन्तोनिवन्धना ॥ ५३ ॥ न चैय ध्वनिमि कस्मात्तुरीयमवरुभ्यताम् । वेदान्तशब्दवृत्तिहि मानसी गहते यत ॥ ५४॥ तदवच्छिनचैतन्य गेच्यतामक्षरस्तिमि । शुद्ध परमचैतन्य ध्वनिमिध्वरुध्यते ॥ ५५ ॥ वेदान्तजन्यवृत्त्यन्तग्रहणेऽप्युध्यतेऽक्षर तदवच्छिनचिन्नैप तदमियडग्यचेतन ॥५६॥ अन्य परम मनीपी कहत है कि नयीसे त्रय्यन्त ( वेदान्त ) भी सगृहीत होता है। अत वेदातका छोडनेसे जो न्यूनतापति हो रही थी उसका भय नहीं है । तर प्रश्न होगा कि फिर यिोसे तुरीयके अवरोधकी क्या जरूरत रही। उत्तर है कि अकारादि वणामे वेदाकार मानसवृत्ति सगृहित होनेसे वदान्तवाक्याकार वृत्तिका ही उपग्रहण होता है तुरीयका नहीं । वदाकारवृत्त्यवच्छिन चैतन्य वद है ऐमा मानापर तुरीय चैतन्य ३२० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तविंशः नहीं आता। अधिकसे अधिक वेदान्त जन्यवृत्ति पर्यन्त वेदपदसे आप ग्रहण कर सकेगे। तो भी तुरीय चैतन्य नहीं आता। क्योंकि अखण्डाकारवृत्त्य वच्छिन्न चैतन्य अलग है, अखण्डाकारवृत्यभिव्यक्तचैतन्य अलग है । अबण्डा• कारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य तो परिच्छिन्न ही होगा। वहींतक अक्षरों (अ उम) की गति हो सकती है। किन्तु तुरीय चैतन्य तदवच्छिन्न नहीं तदभिव्यङ्ग्य है ।। ५३-५६ ।। तिस्रो वृत्तोः तिना वृत्तीत्तयस्तु जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तयः । वृस्यवच्छिन्नचैतन्य बोज्यमत्रापि पूर्ववत् ॥ ५७ ॥ न तिरेव भगवद्व्यस्तरूपं मवेदतः। चैतन्यरूपो गिरिशो व्याख्येयोऽनूक्तरोतितः ॥५८॥ त्रयी के बाद तिस्रो वृत्ती: कहा है। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति ये तीन वृत्तियां हैं। यहां भी पूर्ववत् वृत्तिसे वृत्त्यवच्छिन्त चैतन्य समझना चाहिये । क्योंकि भगवानका व्यस्तरूप वृत्ति नहीं हो सकता । अतः चैतन्यरूप शंकर अर्थ उक्तरीत्या लाना पड़ेगा ।। ५७-५८॥ अकारो विश्वरूपः स्यादुकारस्तंजसो मतः । मकारस्तु भवेत्प्राज्ञ इत्याचार्योक्तितोऽपि च ॥ ५९ ।। वैश्वानरो जागरितस्यानो मात्राऽऽदिमा मवेत् । स्वप्नस्थानस्तंजमश्च द्वितीयोकारलक्षणा ।। ६० ॥ प्राज्ञस्तृतीयमात्रा स्यात्सुषुप्तिस्थान उच्यते । इत्येव स्पष्टमाचप्टे माययथुतिरेव च ॥११॥ आकार विश्व है, 3 वैजस है, म प्राज्ञ है ऐसा आचार्य वचन भी है। भाण्डूयोमें भी यह स्पष्ट कहा है-प्रथम मात्रा (अकार ) वैश्वानर है द्वितीय मात्रा ( उकार ) तंजस है, तृतीयमात्रा | मकार ) प्राश है इस प्रकार श्रुतियोंमें भी अकारादिका अर्थ अवस्यामात्र नहीं किन्तु जाग्रदादि अवस्थास्थानीय चतन अर्थ बताया है ।। ५९-६१।। त्रिभुवनम् भयनयपमप्येयमोंफाराय: प्रपोतितम् । स्वर्गो मूमिश्च पातालमकाराविभंबेरक्रमात् ।। ६२ ।। स्वर्गों नाम पडूय ये भुवः स्वश्च महो जनः । तपः सत्यमिमाल्लोकान् पिण्डीकृत्य निगद्यते॥ ६३ ॥ .

श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् ३२१ - एते सत्वप्रधानाः स्युलोको भूमिरच्यते । अयं रजःप्रधानः स्याद्रजोमुख्या हि मानवाः ॥ ६४ ॥ असलं विततं घंव सुतलं घ रसातलम्। तलातलं महातलं पातालं चेति सप्तकम् ॥ ६५ ॥ पातालरास्वितं सच्च तमोमुख्यं भवेविति । गुणत्रयप्रधानत्वाद् भवनययमुच्यते ॥६६॥ कध्यलोकाः स्वपच्यन्ते सत्त्वस्य श्रेष्ठता यतः। मध्यलोको भवेद् भूस्तु रजसो मध्यता यतः ॥ ६७ ॥ प्रपोलोकाश्च पाताला याप्यत्वं तमसो यतः। भुवनत्रयमेतच्च शम्मोरङ्गत्रयं भवेत् ।। ६८॥ प्रानामि शिरसः स्वर्गः कटपन्तं भूस्ततो भवेत् । मापावं चैव जद्धायाः शम्भोःपातालसप्तकम् ॥ ६९ ॥ भुवनत्रय-स्वर्ग, भूमि, पाताल क्रमशः अकार, उकार, मकार का अर्थ है । भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य ये ऊपरके छः लोक मिलाकर स्वर्ग कहलाता है । ये सत्त्वप्रधान लोक हैं । भूलोक भूमिको कहते हैं । यह रजः- प्रधान होता है । अतल वितल सुतल रसातल तलातल महातल पाताल ये सात पाताल है। ये तमःप्रधान हैं । इसप्रकार चौदह लोकोंका तीनमें पिण्डीकरण गुणत्रयको यथाक्रम प्रधानतासे है। प्रकारान्तरसे इन्हें उर्व, मध्य और अधः भी कहते हैं । उपर नीचे होनेसे नही किन्तु स्वर्गलोक सत्त्वगुणयुक्त होनेसे श्रेष्ठ है, रजोगुणयुक्त होनेसे भूर्लोक मध्यम है तमोगुणयुक्त होनेसे पाताल कनिष्ठ है । इसकारणसे ऊर्ध्व, मध्य, अध विभाग है । ये तीन भुवन शंकरके तीन अंग है। सिरसे नाभितक स्वर्ग है। वहासे कटितक भूर्लोक है। जांघसे पाद तक पाताल है ।। ६२ ६९ ॥ ननु पादौ मही पावतलं पातालमोशितुः। इत्युक्त प्राक् कयं मह्याः कटित्यमधुनोच्यते ॥ ७० ॥ तन्नोपास्तिप्रभेदेन मिना भवति कल्पना । ततोऽन्ययान्यथाप्युक्तमन्यत्र न विसंगतम् ।। ७१॥ पहले आपने शंकरका पाद पृथिवी, पदतल पाताल बताया। अभी कह रहे हैं कटि पृथिवी है, यह कैसे' उपासनाके भेदसे भिन्न कल्पना होती है। अतएव अन्यान्य स्थलों में और भी भेद कर के बताया है तो भी कोई विसंगति नहीं है ।।७०-७१ ।। २१ . दर श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तविंशः ननु वमतापे ताप्यारोप एव सः। मैवं तदुत्थं तबूपं नातेदूपमतो भगत् ॥७२॥ प्रगत्वकल्पनामात्र तत्र नानाविधं भवेत् । उपास्तीनां प्रभिन्नत्वाप्नातद्रूपमतो नगत् ।। ७३ ।। अभंवः स्वरिमाल्लोकानन्ये तु भुवनत्रयम् । व्याचरियरे तन्मतेऽपिरोतिरेषा पथोविता ।। ७४ ॥ यदि पादादि पाताल है इत्यादि उपासना मात्र है तो अतद्रूपमै सदूप कल्पना हुई। वस्तुत. पातालादि शकरका व्यस्तरूप नहीं हुआ। जैसे मूर्तिमे भगवदारोप किया तो स्वयं मूर्ति भगवानका रूप नही हो जाती। इसका उत्तर यह है कि जगत् भगवदुत्पन्न होनेसे भगवद्रूप ही है। हां उसमे पादत्व कटित्वादिकल्पना उपासनार्थ होनी है ॥ ७२-७४ ।। लोकायच्छिन्नचैतन्यं व्यस्तस्पं सु वस्तुतः। अङ्गानि पूर्णरूपाणीत्येतच्च प्राग्यवीक्ष्यताम् ।।७५ ।। वस्तुत भुवनावच्छिन्न चैतन्य ही व्यस्तरूप है । जैसे पातालावच्छिन्न बैतन्य पाद इत्यादि। और पादादि अग पूर्ण परमेश्वर ही है यह हम पहले कह आये । ७५ ।। 1 श्रीनपि सुराद सुरास्त्रयस्तपोकारस्ताकारो विधिर्भवेत् । उकारस्तु भवेद्विष्णर्मकारश्च महेश्वरः ।।७६ ॥ बह्मा गांभीर्वाममागाद्विष्णुदक्षिणमागतः। हवयाचव ः स्यादिति तद्रूपता स्फुटा ।। ७७ ।। तोन देय भी ओकाराणं है। अकार ब्रह्मा, उकार विष्णु, मकारें महेश्वर है। शिवके वामभागसे ब्रह्मा, दक्षिण भागसे विष्णु, हृदयरो रुद्र उत्पन्न हुए। अतएव तीनोकी शिवरूपता स्पष्ट ही है।। ७६-७७ ॥ संहारकार्य प्रतये मायेत्येतेन हेतुना। शिवोऽहमिति रुद्रः स्वं समायापायतिष्ठते ।।७८॥ मत एवं प्रधानत्यं शिवस्पत्यमेव च। हदुद्भयस्य हेतोरच रुद्रस्याभ्युपगम्यते ॥७९ । महारारा तो प्रलयमे होगा । आन दफा दूसरा कोई काम नहीं । अत अपनेको शियोद समझते हुए समाधि सगापे पार पेठे है। अतएप . श्लोक] स्पन्दवातिकसहितम् ३२३ शंकरकी प्रधानता है। शिवोऽह इस वृत्तिके कारण शिवरूपता भी है। हृदयोत्पन्न होनेसे भी प्रधानता आदि है ।। ७८-७९ ॥ ननु सृष्टिस्थितिलया रजःसत्त्वतमोगुणाः। इत्यादीनि त्रिकान्यत्र न प्रोक्तानि कयं न्विति ॥ ८॥ अत्रास्तानि चात्रोपलक्षणीयानि सर्वशः। न्यूनतापरिहाराममोंकारापंविचारणे ॥८१ ॥ वस्तुतो मगवग्यस्तरूपमाप्रमिहोच्यते । गता थापरं सर्व भुक्तत्रयकीर्तनात् ॥ ८२॥ सृष्टि स्थिति लय, रज सत्व तम इत्यादि कि कई हैं उन सबको यहा क्यो नही बताया ? इस विषयपर कुछ मनीषियोका कहना है कि उनका भी यहा उपलक्षण समझना चाहिये । कारार्थ विचारमे न्यूनता न हो एतदर्थ उपलक्षण आवश्यक है । वस्तुत: भगवानका व्यस्तरूप मात्र यहा कहना है। भुवनत्रय कह दिया तो उसीमे अन्य सभी जडतत्त्व समाविष्ट हो जाते हैं जिससे अवच्छिन्न चैतन्मको व्यस्तरूपमे ग्रहण करना है ।। ४०-४२॥ अकारायः सन्धिवर्णो कारोकारयोरोकारतां ब्रजेत् । ओष्ठाच्छादनतश्चौष्ठपोमकारो नि सृतो मवेत् ।। ४३ ॥ ततः परं ध्वनिः कण्ठानासामार्गाद्विनिःसरेत् । स च बिन्दुरिति प्रोक्तो विद्भिस्तन्त्रयेदिमिः ।। ८४ ॥ विन्द्रयानन्तरं च भवेद् ध्वनिपरम्परा। घण्टानादवदेवाय इत्यप्पुदीर्यते ॥ ८५॥ किन्तु भेदः कृतो नात्र संक्षेपाद बिन्दुनादयोः । तुर्य च तुर्यातीत च धक्तव्यं स्यात्पृयक तदा ॥८६॥ नेवास्त्यत्युपयोगोऽस्य तुरीये वागगोचरे। कुतस्तु कल्प्यता मेद इत्याचार्यास्तु मन्यते ॥ ८७ ॥ अ, उ की सधि करने पर ओ बनता है । ओठको बद करते हुए मकार नि सृत होगा। उसके बाद कठसे नासिका द्वारा ध्वनि निकलेगी। वह बिन्दु है । फिर घटानादके समान ध्वनिपरपरा चलती है वही नाद है। परन्तु यहा बिन्दु और नादका भेद नही किया गया। वसा करनेपर उसका - नाव श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [सप्तविंशः अर्थ तुरीय और तुरीयातीत करना पड़ेगा। परन्तु उसका कोई विशेष उपयोग सिद्ध नहीं होगा। तब भेदकल्पना क्यों करें ? ऐसी आचार्यकी मान्यता है ।। ८३-८७ ॥ अकारादिषु वर्णत्वाद्वाचकत्वमुपेयते । सकाराद्यरतो वर्णरित्वं मुनिनोदितम् ॥ ८॥ तथाभिवदिस्युक्तं वाचकत्वावबुद्धये। अभिषा शक्तिपर्यायः शक्तं वाचकमुच्यते ॥ ८९ ॥ अ, उ, म में वर्णत्व और वाचकत्व दोनों हैं । अतः "अकाराद्यर्वर्णैः" कहा "त्रिभिरभिदधत्" यहां अभिधा शक्तिको कहते है। शक्तिमान ही वाचक माना जाता है ।। ८८-८९ ॥ नादस्य वर्णरूपत्वं नेति तानगदी ध्वनीन् । अवरूधानमित्याह न चामिददित्यपि ॥९०।। नाद वर्णरूप नहीं है । अत. उसे ध्वनि कहा। वाचक भी नही अतः अभिदधत् न कहकर "अवरुधानं" कहा ।। ९० ॥ तीर्णविकृति प्रय्यादयस्तु सर्वेऽपि प्रोक्ता विकृतिरूपिणः । पादोऽस्य सर्यास्तानीत्येतद्विकृतिमब्रवीत् ॥ ९१॥ पत्नस्तीर्णविकृति त्रिपाद् ब्रह्म स्वयंप्रभम् । अपरन्धे तदोंफारो ध्वनिभिः परमं पदम् ॥ १२॥ जयी, तीन वृत्ति मादि सभी विकृति है। एक पाद विकृतिरूप है । जो त्रिपात्ग्रहा है वह स्वप्रकाश तथा विकृतिसे परे है। उस पद को ॐकार ध्वनियोंसे अवरुद्ध ( सगृहीत ) करता है ।। ९१-९२ ॥ ननु च प्रकृतिस्तीणविकृतिः सांत्यसंमता। कि तदेव निपाद् ब्रह्म मंय विकृतिरेय सा ।। ९३ ॥ सृष्टिकाले हि विषमा विकृतिः प्रकृनभवेत् । प्रलये स्वस्वरपेण प्रकृतेविकृतियेत् ॥ ९४ ।। सत्यं हि सत्यस्पेण रजोस्पेण वे रजः। समोरपेण च तमो पिपुर्यात्प्रलयऽपि च ॥९५ ॥ सांस्य शंका करते हैं कि-"मूलप्रतिः" के अनुसार प्रति तीर्ण- विपति है । क्या वही आपका त्रिपाद् ब्रह्म है ? उत्तर है प्रकृति भी विकृति-

न
स्पन्दवातिकमहितम्
३२५
रूप है, तीर्णविकृति नहीं। सृष्टिकाल में प्रकृतिसे महत्तत्त्व इत्यादि विषय
विकार होता है। प्रलयमें प्रकृतिसे प्रकृति ही होगी। सत्त्व सत्वरूपसे, रज
रजोरूपसे, तम तमोरूपसे विकारको प्राप्त होते रहते हैं ॥ ९३-९५ ।।
सांख्याः समविकारं तु परिणाम प्रचक्षते ।
कि नामभेदतस्तावद् विकारो हि स संमतः॥१६॥
सांख्यवाले समधिकारको परिणाम कहते हैं। लेकिन नाम बदलनेसे
क्या ? विकार तो हो ही गया ॥ ९६ ॥
क्वचित स्वाकारतोगङ्गा विकरोति शिलोच्चये ।
क्वचिद्विकसिताकारा विकरोत्यधिसंनिधौ ॥ ९७ ॥
तथापि गङ्गा गङ्गव जल च जलमेव तत् ।
तैलतामेति समा विकृतिरेव सा ॥ ९८॥
विकरोत्येव सलिलं समरूपं न संशयः ।
विषमं तु विकुर्वीत दुग्धं दध्यात्मना यया ।। ९९ ॥
मा विकार्षाद् विषमतः प्रलये प्रकृतिः खलु।
विकरोति समं तस्मान्न तीर्णविकृतिहि सा ॥१०॥
विकरोत्यनिशं मयों न पुनमहिपो भवेत् ।
विकुर्वन्ति च बीजानि कुसूलादौ हि नित्यशः ॥ १०१॥
क्षेत्रे त्वडकुरभावेन विषमं तु विकुर्वते ।
समो वा विषमो वास्तु विकारत्वं न होयते ॥ १०२ ॥
गंगोत्तरी आदि पहाड़ी स्थलोमें स्वाकारसे गगा विकारित होती है ।
गंगासागर दिमे विशालरूपसे । उससे क्या? गगा-गगा ही है। जल-जल ही
है । जल तेल नहीं होता। फिर भी समविकार है । विषम विकार है दूधका
दही बनना । विषम विकार न हो किन्तु प्रलयमें प्रकृतिका समविकार है।
अतः वह तीर्णविकृति नहीं हो सकती। मनुष्य शरीर निरन्तर विकारको
प्राप्त होता है। तो क्या वह मनुष्यसे भैसा बनता है ? कोठेमें बीज नित्य
विकारित होता है। हां, खेतमे अंकुररूपेण विषमविकार होता है। चाहे
सम हो चाहे विषम । विकार तो विकार ही है ।। ९७-१०२॥
सृष्टौ सूर्यपरिस्पन्दाद्भवेन कालस्य कल्पना।
प्रकृतिस्पन्दत प्रलये
कालकल्पना ॥ १०३॥
कल्प्यन्ते तद्विकारेण क्षणमासादयो लये।
विकार एव स्पन्दोऽयं सोऽङ्गीकार्योऽखिसरपि ॥ १०४ ॥

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ सप्तविंशः अन्यथा तु कियान कालः प्रालयोऽयं भवेदिति । निश्चयामायतः शास्त्रमप्रामाण्यं भजेदिति ॥ १०५ ।। । सूर्यपरिस्पन्दसे सृष्टिमें कालकल्पना है । प्रलयमें सूर्य है नहीं। वहां प्रकृतिस्पन्द से कालकल्पना है। प्रकृतिस्पन्दसे वहां क्षणमासादि कल्पना है । यह स्पन्द आखिर विकार ही हुआ। यदि स्पन्द नहीं मानेंगे तो कितने समयतक प्रलय है यह अनिश्चित होगा और कालावधिबोधक शास्त्र अप्रमाण होगा। (तात्पर्य यह है कि कोई सांख्य या अन्य मतावलम्बी यह कहें कि प्रलयमें प्रकृति प्रकृतिरूपेण परिणत होती है ऐसा हम नहीं मानेगे तब प्रकृति भी तीणविकृति क्यों नहीं ? इसका उत्तर है-कालपरिमाणसंपादनार्थ अगत्या सवको प्रकृतिस्पन्द प्रलयमे मानना ही होगा। "रात्रि युगनान्तां" यह शास्त्र है ।। १०३.१०५॥ इन्द्रियेभ्यः परा हर्या अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिबुद्धरात्मा महान् परः॥ १०६॥ महतः परमव्यक्तमव्यक्तात पुरुषः पुरुषान परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गतिः॥१०७ ॥ व्यक्तान्तेन्द्रियादीनि सर्विकाराणि सर्वशः। मत एव परस्तीर्णविकृतिः पुरषः श्रुतः ।। १०८॥ भुतिमें कहा है--इन्द्रियसे परे अर्थ, उससे परे मन, फिर महत्तत्व. उससे परे अव्यक्त और अव्यक्तसे परे पुरुष है। पुरुषसे आगे कोई नहीं, यही सीमा है, वही परमगति है। परन्तु अव्यक्तपर्यन्त परता कारण होनेसे युक्त है । अव्यक्तसे पुरुष पर क्यो है ? अव्यक्त अनादि होनेसे उसको कारण तो पुरुष नहीं है । तब यही मानना होगा कि अव्यक्त सविकृति है, पुरुष तीर्ण- विकृति है, इसलिये पुरुष पर है ।।१०६-१०८ ॥ तुरीयं ते धाम नन्तःप्रज्ञयहि प्रजोमयतःप्रजरूपमाक् न प्रजं नापि घातप्रज्ञ तुरीयं धाम तत्प्रभोः ॥ १०९ ॥ अहष्टाव्यवहार्यात्मप्रपञ्चोपशमं शिवम् । प्रवतं परमं शान्तं चतुर्थ पाम शाम्भवम् ।।११०॥ तुरीय धाम क्या है ? जो विश्व तेजसादि नहीं, अन्तःप्रज्ञ, बहिष्प्रज्ञ, उभयतः प्रश, प्रज्ञ और अप्रज्ञमें कोई नहीं। वह प्रत्यक्षका विषय नहीं, व्यवहार विषय नहीं। प्रपञ्चोपशम शिव मद्धत परम शान्त है ।। १०९-११०॥

स्पन्दवातिकसहितम् - परम्। ध्वनिभिरवल्यानं नेवास्य वाचकः शब्दो व्यज्यते ध्वनिभिहि तत् । निरन्तरोडारजप निव्यग्य स्वयंप्रमम् ।। १११॥ तस्यैव च जपं कुर्यात्तदर्थ भावयेदपि । तत्पुण्यतश्च ध्वनिमिय॑ज्यते परमः शिवः ॥ ११२ ॥ एतदालम्बन श्रेष्ठमेतदालम्बन एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ ११३ ।। उस तुरीय धामका वाचक कोई शब्द नहीं है। केवल ध्वनियोसे यह अभिव्यक्त होता है। निरन्तर ओकार जप करनेपर ध्वनियोसे अभिव्यक्त होनेवाला वह स्वयप्रकाश तत्त्व है। उसका जप करें और अर्थकी भावना करें तो उस पुण्यसे ध्वनियोंसे धामाभिव्यक्ति होगी। श्रुतिमे इसे श्रेष्ठ आलम्बन, परम मालम्बन बताया । उस आलम्बनकी उपासनासे ब्रह्मलोक- प्राप्ति बतायी ।। १११-११३॥ बाहोच्चारणतो व्यक्त मानसोचारणादुत । ओंकारं संयमी कुर्यादुपास्त्यालम्बनं परम् ॥ १४॥ वाह्य उच्चारणसे या मानस उच्चारणसे अभिव्यक्त ओकारको आलम्बनकर सयमी पुरुष उपासना करें ।। ११४ ॥ ननु च ध्वनिमिस्तुयं तत्त्व तद् व्यज्यतां कयम् ।। शब्दशक्त रचिन्त्यत्वादिति पातिककृज्जगौ ॥ ११५॥ सुप्त बोधयितु तस्य देवदत्तेति नामतः। सम्बोध्यते ततः सुप्तपुरुषस्तु प्रबुध्यते ॥११॥ भत्वा प्रबुध्यतेऽसौ वा प्रयुध्यासौ शृणोति था। | Ft. 'सगच्छते न झमय शम्दशक्तिरतो मता ॥ ११७ ॥ प्रियनामष घोंकार. भूपते परमात्मनः । ॐकारपूयध्यमितो भासते ब्रह्म निर्मलम् ।। ११८॥ सस्मार याचकरवेन ध्यनयो योषयन्ति तत् । शब्दशक्त रचिन्त्यत्वात्स्यशक्त्या बोधयन्ति तु ।।११९ ।। याका-ध्वनियोसे तुर्य तत्त्वको अभिव्यक्ति कैसे हो ? उत्तर वातिर. कारने दिया है कि दादशक्ति अचिन्त्य होती है। सोयेयो जगानेरे लिये 'देवदत्त आदि नाम पुकारते है । नाम सुनवर जगता है या जागकर सुनता . -- - ३२८ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [संप्तविंशः है ? सुनकर जगा तो जगनेसे पूर्व सुना कैसे ? जगकर सुना तो पहले ही जगा है, जगानेकी क्या जरूरत ? अतः कहना होगा यह शब्द शक्तिकी ही कोई विशेषता है। ॐकार भी परमात्माका प्रिय नाम है । ॐकार पूर्वक ध्वनिसे आत्मा जागृत होकर निर्मल ब्रह्मरूपमें भासित होता है। इसलिये वाचकके रूपमें ध्वनियां बोधित नहीं करती। वस्तुतः शब्दशक्ति अचिन्त्य होनेसे उसीसे ब्रह्मबोध होता है ॥ ११५-११९ ।। नग्वेवं निमिस्तुर्यबोधे व्यर्याऽक्षरार्थता। न चादृष्टफलं व्यर्थकल्पनायाः प्रसक्तितः॥१२०॥ मेवं प्रयोजन तस्य लयचिन्तनमिष्यते। प्रकारमर्थसहितमुकारे प्रविलापयेत् ॥ १२१॥ उकारमयंसहितं मकारे प्रविलापयेत्। मकारं चार्थसहितं ध्वनिबोध्ये महेश्वरे ।। १२२ ॥ ध्वनयश्च विलीयन्ते बाध्यन्ते वा महेश्वरे । तज्जन्यवृत्त्यमिव्ययता चित् तान् वृत्तीश्व बाधते ॥ १२३ ।। पूर्वपक्ष:- यदि ध्वनियोंसे तुर्यबोध होता है तो अकारादि वर्णोके अर्थका क्या प्रयोजन ? यदि कहें कि अक्षरार्थ चिन्तनसे अदृष्ट होगा तो व्यर्थकल्पनामात्र है। *कारके उच्चारणसे जो अदृष्ट है उससे ही काम चलेगा। अक्षरार्थ चिन्तनके अतिरिक्त अदृष्टको कल्पना नयों करें ? इस पूर्वपक्षका समाधान यह है कि लयचिन्तनार्थ अक्षरार्थ आवश्यक है। स्थूलप्रपञ्चरूप अर्थसहित अकारका सूक्ष्मप्रपञ्चार्थक उकारमें विलयन किया जाता है। और अर्थसहित उकारका कारणप्रपञ्चायं मकारमें विलय किया जाता है। कारणप्रपञ्चसहित मकारका ध्वनिबोध महेश्वरमें विलय किया जाता है। फिर ध्वनिको शुद्ध महेश्वर में विलीन या बाधित किया जाता है। ध्वनिजन्य वृत्तिसे ध्वनि तथा वृत्ति दोनोंका बाघ होता है ।। १२०-१२३ ॥ परेतु ध्वनिमिः शुद्धं ब्रह्म यद्यपि योध्यते । तपापि तत्र शुद्धत्वमुपाधिसते स्फुटम् ॥ १२४ ॥ शुखत्वं स्यूलसम्मादिराहित्यं स्याद्विशेषणम् । मागत्यागस्ततश्चंय चतुवंप्युररीकृतः ।। १२५॥ न धेषपयोषकास्यादि तत्त्वमस्यादिषात घेत् । क्यं सक्षणया योपो भागत्यागादिहेति चेत् ॥ १२६ ॥ दिनापि शम्दमस्यारि प्रज्ञान महावारपतः। सामानाधिकरप्पेन सोधो यहत्तपा भवेत् ।। १२७ ।।

. सन्दवातिकसहितम् अन्य संत पुरुषोंका कहना है कि ध्वनिसे शुद्ध ब्रह्मका बोध भले हो। किन्तु उसमें शुद्धत्व उपाधि है। शुद्धत्वका अर्थ है स्थूल-सूक्ष्म-कारण उपाधिरहितत्व । वह विशेषण है । चारोमें भाग त्याग करनेसे बोध होगा। किन्तु तत्वमसिमे एकता बोधक "असि" के समान यहा एकताबोधक पद नहीं है, तब कसे ऐक्यवोध होगा? सुनो। "प्रज्ञान ब्रह्म" मे कहां असि आदि पद है ? फिर भी वहाँ बोध होता है या नहीं? वैसे यहां भी समझ लो ।। १२४-१२७ ॥ नन्वाकाक्षाविरहतः कयं स्याद्वाक्यताऽस्य तु । क्रियाकारकमावादिराकाङ्क्षा परिकीर्तिता ।। १२८ ॥ प्रज्ञानं ब्रह्म वाक्ये तु विधयोद्देश्यमावतः । आकाइ क्षा विद्यते संपा नंवोंकारे विलोक्यते ॥ १२९ ।। मेवमत्रापि यार्यान् समुद्दिश्य विधीयताम् । ध्वन्यर्थ इति नाकाक्षाराहित्यमिह दूषणम् ॥ १३० ॥ परन्तु ॐकारमें आकाक्षा न होनेसे वह वाक्य कसे हो' क्रिया. कारक भावादि आकाक्षा है "प्राज्ञान ब्रह्म" यहा उद्देश्यविधेयभाव आकाडक्षा है। ॐकारमे न क्रियाकारकभाव है और न उद्देश्यविधेयभाव ही। तब आकाक्षा न होनेसे वाक्य नहीं है। अत. बोध कैसे होगा? इसका उत्तर सुनिये। यहांपर भी अ-उ-म के अर्थको उद्देश्य एव त्रनिके अर्थको विधेय मानकर आकाङ्क्षा संपादन एव वाक्यार्थबोध हो सकता है ॥ १२८-१३०॥ समस्तं व्यस्तं० एवं रोत्या व्यस्तमेतदोपदं व्यञ्जयेत् परम् । समस्तं बोषयेदेतत् कथमित्युच्यतेऽधुना ।। १३१॥ अयं यौगिकरूढोऽस्ति शम्व इत्युदितं पुरा। यौगिकोऽर्यों मवेद व्यस्तः समस्तो रूढ एव च ॥ १३२ ।। महासमष्टधयन्छिन्नं चैतन्यं ब्रह्मसंजितम् । समस्तोंकारवाच्यार्थों स्पा निर्गादतो बुधः ॥ १३३ ॥ उक्तरीति व्यस्त पद परतत्त्वको व्यजित करता है। अब समस्त ॐ पद किस प्रकार व्यजित करता है सो कहते हैं । यह यौगिक रूढ शब्द है ऐसा हमने पहले ही बताया। यौगिकार्य ही व्यस्त है और रूपढयं ही ? श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम (सप्तविधी भत्र केचिद यथोक्तार्थ वाच्यमोंपदमीरयेत् । अचिन्त्यस्वीयशक्त्या च शुद्धब्रह्मापि मोघयेत् ।। १३१ ।। एतद्धघेवाक्षरं ब्रह्म एतद्वषाक्षरं परम् । एतदघेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ।। १५२ ॥ यदिच्छति तदेव स्यादित्युक्तेनस्त्यिसंभवः । तस्मादकपदेनापि लक्षणयेयते ॥ १५३॥ ओंकारका वाच्या तत्तदवच्छिन्न चैतन्य और लक्ष्यार्थ शुद्ध चैतन्य इत्यादि कथन अयुक्त है। क्योंकि यहां वाक्य नहीं है, वाच्यार्थ ग्रहणमें विरोध नहीं है, तात्पर्यानुपपत्त्यादि भी नहीं है । तब लक्षणा किस प्रकार (गङ्गायां घोपः कहनेपर गङ्गापदकी तीरमें लक्षणा होगी। केवल गङ्गा कहनेसे क्यों लक्षणा करने लगे ) यदि कहें कि ओंकार वाक्य है. तो भी ठीक नहीं। क्योंकि मूलकार स्वयं कहते हैं- 'ओमिति पदम्'। और अपूर्व बोधक वाक्य होता है, पद नहीं। इसलिये यह लक्ष्यार्थकल्पना असंगत है। अन्यथा ब्रह्मपदसे लक्षणासे शुद्धग्रह्मबोध हो सकता है, तो अहं ब्रह्मास्मि इसप्रकार तीन चार पद बोलनेकी क्या जरूरत थी? इस पूर्वपक्षका उत्तर कुछ लोग यह देते हैं कि वाच्यार्थ तो वाचकता शक्तिसे प्राप्त होगा। और लक्ष्यार्थ अचिन्त्य शब्दशक्तिसे प्राप्त होगा। यही ओंकारको विशेषता है । अतएव कठोपनिषदमे बताया यही अक्षर ब्रह्म है, यही पर अक्षर है। इसी अक्षरको जाननेपर जिसको जो अभीप्ट है वही प्राप्त होता है। "जो अभीष्ट सो प्राप्त होगा" इस कथनसे कुछ भी यहाँ भसंभव नहीं है। अतः एकपद होनेपर भी लक्षणासे शुद्धबा अर्थ प्राप्त होगा। अथवा ध्वनिमिस्तावलं ग्रहाभिधीयते । न पावाचकता तेषामोंकारे तदुपायनात् ॥ १५४ ।। पदोपस्थाप्य एवार्षः परपनावपं व्रजेत् । इत्यप्यन्यत्र नियमो यो परिच्छेदिति श्रुतेः ॥ १५५ ॥ अयवा गोम्से विशिष्ट ग्रहा और ध्यनिये पुद्रग्रह्य उपस्थित हुआ। अयं विरोध होनेसे लक्षणा हो जायेगी। ध्वनिमे बाचन्ता नहीं है यह नियम कारातिरिक्त स्पलके लिये है। पदार्म: पदानान्येति यह नियम भी अन्यत्र लिये है।। १५४-१५५।।

श्लोकः] स्पदन्दवातिकशहितम् मपास्मद्गुरुमिः सम्यगुपदिष्टं निरूपितम् । गूढ़ रहस्यमधुना किंचिद् व्याधमहे वयम् ॥ १५६ ॥ कडो वा यौगिको वाऽसावकारो यस्त्रिमात्रकः। उपदशित एवार्यस्तस्य संपरिणह्यते ॥ १५॥ प्रवनयस्त्वधंमात्रा स्युर्याऽनुच्चार्या विशेषतः। अत एव पवत्वं वैयाकरणरीतितः।। १५८॥ तथापि मायारूपरवावाचकत्वं न हीयते। सस्पार्थस्तु तुरीयं स्पाटाम शैवं परात्परम् ।। १५९ ।। उपाध्यमाववत्त्वं हि तुरीयत्वं निगद्यते । सोऽप्यमवारमकोपाघिरेष घामगतो भवेत् ॥ ९६०॥ नन्यापधेत बदतोव्याघात इति चेन्न तत् । सत् स्यूलसुक्ष्मबीजोपाध्यमावोऽय विवक्षितः ॥१६१ ।। सोपाधित्वानुपापित्वे विरुध्येते ततोऽत्र च। मागत्यागो मवेत्तेन शुद्धं ब्रह्मावबुध्यते ॥ १६२॥ शाग्दिकरयमोंकारः सूक्ष्मो न व्यञ्जनक्षमः । गुरुपदिष्टमार्गेण बोम्योऽयं भवेद् बुधः ॥ १६३ ॥ इतोऽप्यतिरहस्यं यत तद्विवणमो वयम् । पदावन्तोऽनसूयन्तो गुरुभ्यः प्रतियन्तु तत् ॥ १६४ ॥ अब हम श्री गुरुचरणद्वारा जो उपदिष्ट हुआ तथा व्याख्यासहित निरूपित हुआ उस गूढ रहस्यका कुछ अश लोककल्याण हेतु यहां बताते हैं । चाहे यौगिक हो चाहे रूढ, त्रिमात्रक ओकारका अर्थ जो पहले बताया गया वही है। ध्वनिसे यहां अर्धमात्रा अभिप्रेत है। जिसका विशेषरूपेण उच्चारण नहीं होता। केवल ॐकारोत्तर ध्वनिसे अभिव्यक्ति होती है। अतएव वैयाकरणरीतिसे वह पद नही है। फिर भी मात्रा है, अत वाचकत्व कही नही जाता। उसका अर्थ परात्पर तुरीय शव धाम ही है। तुरीयका अर्थ है उपाध्यभाववान् चैतन्य । उपाध्यभाव भी अमावात्मक उपाधि है। शका होगी कि यह तो वदतोव्याघात है। उपाध्यभाव हो तो फिर उपाधि कैसे हो ? नही । उपाध्यभावका अर्थ है स्यूलसूक्ष्मकारणरूप उपाधि जयनिषेध । न कि अभावरूपी उपाधिका भी निषेध । ओम् सोपाधि ब्रह्मको कहेगा, अर्ममात्रा निरूपाधि ब्रह्मको। तब दोनोके अभेदमे विरोध आ जाता है । तब अन्वयानुपपत्ति या तात्पर्यानुपपत्तिसे लक्षणा होगी।

7 .. ६ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ सप्तविंशः समस्त है । महासमष्टयवच्छिन्नचैनन्यै, जिसको ब्रह्म कहते हैं, वही रूढितः ‘समस्त ओकारका वाच्यार्य है ।। १३१-१३३ ॥ सर्व घ खल्विद ब्रह्मेत्येतच्छु त्या पुरस्कृतम् । वाच्यार्थविधया यत्तद्' ब्रह्म सर्वात्मक परम् ।। १३४ ।। "सर्व खल्विद ब्रह्म" इस श्रुतिमे वाच्यार्थरूपेण जो उपस्थित होता है वही सर्वात्मक पर ब्रह्म है ।। १३४ ॥ शतगर्तपु सलिलं समीपस्थेषु दृश्यते । पर्वतोपरितो लोकरेको वीक्ष्येत स हदः ।। १३५ ॥ किंचित्रे तयैव स्याच्छतगर्तेषु चोदकम् । द्वितीयो हद इत्येव पर्वतोपरितो भवेत् ॥ १३६ ।। शौलात्रिचतुरान् दृष्टान् हदान् वैमानिको जनः । विशालं सागरं पश्येदेकमेवातिदूरत ॥ १३७ ॥ ध्यष्टयस्तन एताः स्युः समिष्टिस्तु ह्रदो भवेत् । महासमष्टिस्तु पुनः सागरस्तन घुध्यताम् ।। १३८॥ विश्वाश्च तेजसाश्चव प्राज्ञाश्च ध्यप्टयो मताः। विराट् हिरण्यगर्भश्चेश्वरश्चेति समष्टयः ॥ १३९ ।। तेपो महासमष्टिर्या तवन्छिनचेतनः। ॐकारस्यामिधेपार्यः सयं ब्रह्म तेरपि ॥ १४० ।। सैकडो नजदीक नजदीक खष्टोमे पानी पृथक पृथफ समीपस्थको दीखता है। लेकिन पर्वतके ऊपरसे देखो तो एक ह्रद मालूम पड़ेगा। कुछ दूरमे वैसे सैक्डो गौमे पानी है । पर्यतपरसे वह दूसरा हृद दीसेगा। इसप्रकार पर्वतके ऊपरसे जो तीन चार ह्रद दीखते हैं वे ही दूर विमानसे देखेंगे तो एर सागर दीसेगा। उनमें गतं व्यष्टि है। हद समष्टि है। सागर महा- समष्टि है। इसी प्रकार असम्य विश्व, असस्य तेजस असख्य प्राज्ञ ये व्यष्टि हैं। विराट्, हिरण्यगर्भ, ईश्वर ये तीन समष्टि है। तीनोको मिलानेपर महा- समष्टि है। तदवच्छिन्न चैतन्यो ग्रह्म कहते हैं। वारवा वहीं महा. समप्टपवच्छिन्न चैतन्य वाच्यार्य है। "सवं खल्विद ब्रह्म" इस श्रुतिया भी वही वाच्यार्य है ।। १३५-१४ः ।। पक्षा. पृथप पृयक सन्ति दूरादेकं पनं हि सत् । यनान्येयं यहूनि स्युमंहारथ्य पिदूरतः ॥१४१ ।। F + . - । :

: श्लोकः ] 1 सन्दवातिकसहितम् महासमष्टिरेवं वा वाच्यार्थीया नियुध्यताम् । आभासपादोऽवच्छेदवादो वा गृह्यतामिह ॥ १४२ ॥ सर्वथाप्येव .वच्यार्यों ब्रह्म विश्वात्मकं भवेत् । गुरुपदिष्टमार्गेण लक्ष्यार्थस्तस्य बुध्यताम् ॥ १४३ ॥ वृक्ष एक एक अलग है। दूरसे वन दीखेगा। अतिदूरसे ऐसे अनेक वन महारण्य दीखेगा । इस रीति भी महासमष्टि समझ सकते हैं । आभास- वाद या अवच्छंदवाद कोई भी अपनाईए ( जलप्रतिविम्बित आकाश, वृक्षावच्छिन्न आकाश निदर्शन है ) सर्वथापि वाच्यार्थ तो विश्वरूपी ब्रह्म ही है । गुरूपदिष्ट मार्गसे उसका लदयार्थ समझना चाहिये ।। १४१-१४३।। गृणात्योमिति पर्व वाच्यार्यविधया ज्ञेयः शिवः शूली महेश्वरः। लदर्याय विधया नेयः परमः शिव -एव च ॥ १४४ ।। पचवक्त्र शिव या महेश्वर पाध्याय है। पुद्ध चैतन्यरूपी परमशिव लक्ष्या है।। १४४॥ शिवं ध्यस्तारमक व्रया ध्यस्तलक्षणमोपदम् । विगढिरण्यगर्मादिभ्यस्तः शिव इतीरितम् ॥ १४५ ॥ समस्तमोपदवं सर्वाविच्छन्नमीश्वरम् । 5 वाच्यार्यविधया व्याल्लल्या शुद्धचितियोः ॥ १४६ ॥ ' व्यस्त रूप यौगिक ओफार ध्यस्तशिवको बतायेगा । विराट, हिरण्यगर्भ, ईश्वरादि व्यस्त शिव है यह "यी तिम्रो वृत्ती" इत्यादिको ध्याख्यामे हम कह आये। समस्तरूप हर ओकार समस्त शिव अर्यान सर्वावच्छिन्न ईश्वरको क्हेगा। यह वाघ्यायं हुआ। लक्ष्याम तो दोनों (समस्त और व्यस्त) शुद्धचतन्यको ही बताते हैं ।। १४५-१४६ ॥ . मन्यत्र पापयविरहाद विरोपादेरमायतः । तत्पार्यानुपपस्यादिविग्हाल्लक्षणा कथम् ॥ १४७॥ मवेद्वाक्य पदरखेनोपर्णनात् । अंपूर्वयोषक वाक्यं न पदं चक्ष्यंत क्वचित् ।। १४८।। तस्मादसंगतमिद सक्ष्यायपरिकल्पनम् । तात्पनुपपत्यावेरियेष्वेवावलोकमात ॥ १४९।। 7 अन्यया प्रसंशम्देन पोधे 'साक्षापरे ते । अहमारिपर तत्र न क। मिष्पल मयत् ॥ १५॥ न चौकारो ।

। सप्तविंशः ? श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् अत्र केचिद् यथोक्तार्य वाच्यमोपदमीरपेत् । अचिन्त्यस्वीयशक्त्या च शुद्धब्रह्मापि बोधयेत् ॥ १३१ ।। एतद्धघेवाक्षरं ब्रह्म एतद्धषाक्षरं परम् । एतद्धवाक्षरं नारवा यो यदिच्छति तस्य तत् ।। १५२।। यदिच्छति तदेय स्यादित्युक्ते स्त्यसंभवः । तस्मादेकपदेनापि लक्षणयेयते ।। १५३॥ ओंकारका पाच्या तत्तदवच्छिन्न चैतन्य और लक्ष्यार्थ शुद्ध चैतन्य इत्यादि कथन अयुक्त है। क्योंकि यहां वाक्य नहीं है, वाच्यार्थ ग्रहणमें विरोध नहीं है, तात्पर्यानुपपत्यादि भी नहीं है । तव लक्षणा किस प्रकार (गङ्गायां घोषः कहनेपर गङ्गापदकी तीरमें लक्षणा होगी। केवल गङ्गा कहनेसे क्यों लक्षणा करने लगे) यदि कहें कि ओकार वाक्य है. तो भी ठीक नहीं। क्योंकि मूलकार स्वयं कहते हैं- 'ओमिति पदम्'। और अपूर्व बोधक वाक्य होता है, पद नहीं। इसलिये यह लक्ष्यार्थकल्पना असंगत है। अन्यथा ब्रह्मपदसे लक्षणासे शुद्धग्रह्मबोध हो सकता है, सो अहं ब्रह्मास्मि इसप्रकार तीन चार पद बोलनेकी क्या जरूरत थी? इस पूर्वपक्षका उत्तर कुछ लोग यह देते हैं कि वाच्यार्थ तो वाचकता शक्तिसे प्राप्त होगा। और लक्ष्यार्थ अचिन्त्य शब्दशक्तिसे प्राप्त होगा। यही ओंकारकी विशेषता है । अतएव कठोपनिषदमे बताया यही अक्षर ब्रह्म है, यही पर अक्षर है। इसी अक्षरको जाननेपर जिसको जो अभीप्ट है वही प्राप्त होता है । "जो अभीष्ट सो प्राप्त होगा" इस कपनसे कुछ भी यहाँ असंभव नहीं है। अतः एकपद होनेपर भी लक्षणासे शुद्धग्रह्म अर्थ प्राप्त होगा ।। १४७-१५३॥ अथवा ध्यानिमित्तावच्छुई ग्रह्माभिधीयते । न चावाचकता तेषामोंकारे तदुपायनात् ॥ १५४ ।। पदोपस्याप्प एवार्षः परयनान्वयं प्रजेत् । इत्यप्यन्यात नियमो यो यविच्छेदिति पतेः ॥ १५५ ॥ अयया ओमसे विशिष्ट ग्रह्म और ध्वनिसे शुद्रग्रह्य उपस्थित हुआ। अविरोध होनेसे लक्षणा हो जायेगी। ध्वनिमे वाचकता नहीं है यह नियम बोकारातिरित स्थलके लिये है। पदार्पः पदानान्वेति मह नियम भी अन्यत्रके लिये है।। १५४-१५५।।

श्लोकः] सदन्दवातिकशहितम् भयास्मगुरुमिः सम्यगुपदिप्टं निरूपितम् । गूढ़ रहस्यमघमा किंचिद् व्याचक्महे वयम् ॥ १५६ ॥ हडोवा पौगिको वाऽमावॉकारो यस्त्रिमात्रकः। उपदशित एवार्यस्तस्य संपरिगृह्यते ॥ १५७॥ पनयस्त्वर्धमात्रा स्युर्याऽनुच्चार्या विशेषतः । अत एव पदत्वं म वैयाकरणरीतितः ॥ १५८ ।। तथापि मानारूपरवावाचकत्वं न होयते । सस्थार्थस्तु तुरीयं स्यादाम शेवं परात्परम् ॥ १५९ ।। उपाध्यमायवत्त्वं हि तुरीयत्वं निगद्यते । सोऽप्यमवारमकोपाघिरेव घामगतो भवेत् ।। ९६०॥ नन्यापधेत वदतोव्याघात इति चेन्न तत् । सत् स्थूलसूक्ष्मयोजोपाध्यमायोज्न विवक्षितः ॥ ११ ॥ सोपाधित्वानुपापित्वे विरुध्येते ततोऽत्र च। मागत्यागो भवेत्तेन शुद्धं ब्रह्मावबुध्यते ॥ १६२ ।। शाग्दिकरयमोकारः सूक्ष्मो न व्यञ्जनक्षमः । गुरूपविष्टमार्गेण बोदव्योऽयं मयेद् बुधः॥ १६३ ॥ इतोऽप्यतिरहस्यं यन्न तद्वियणमो षयम् । बढावन्तोऽनसूयन्तो गुरुभ्यः प्रतियन्तु तत् ॥ १६४ ॥ अब हम श्री गुरुचरणद्वारा जो उपदिष्ट हुआ तया ध्यास्यासहित निरूपित हुआ उस गूढ रहस्यका कुछ अश लोककल्याण हेतु यहाँ बताते हैं। चाहे यौगिक हो चाहे रूढ. त्रिमात्रक ओकारका अर्थ जो पहले बताया गया वही है । ध्वनिसे यहां अर्धमात्रा अभिप्रेत है। जिसका विशेषरूपेण उच्चारण नहीं होता। केवल ॐकारोत्तर ध्वनिसे अभिव्यक्ति होती है। अतएव वैयाकरणरीनिसे वह पद नहीं है । फिर भी मात्रा है, अत वाचक्त्व कही नही जाता। उसका अर्थ परात्पर तुरीय शंव धाम ही है। तुरीयका अर्थ है उपाध्यमाववान् चैतन्य । उपाध्यभाव भी अमावात्मक उपाधि है। शका होगी कि यह तो वदतोव्याघात है । उपाध्यभाव हो तो फिर उपाधि कसे हो? नहीं । उपाध्यभावका अर्थ है स्यूलसूक्ष्मकारणरूप उपाधि यनिषेध । न कि अभावरूपी उपाधिका भी निषेध । ओम् सोपाधि ब्रह्मको कहेगा, अर्ममाना निरूपाधि ब्रह्मफो। तब दोनोंके अभेदमे विरोध आ जाता है। तब अन्वयानुपपत्ति या तात्पर्यानुपपतिसे लक्षणा होगी।

श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् [सप्तविंशः- भाग याग कर अखण्उचैतन्यबोध होगा। इस सूक्ष्म भोकारको वैयाकरण व्यजित नहीं कर सकते । गुरूपदिष्ट मार्गसे ही इसका अवबोध होगा । इससे भी अत्यन्त गूढ रहस्य जो गुरुओने बताया उसकी व्याख्या हम यहाँ नहीं करते । धद्धा एव निर्दोष भावनासे उस रहस्यको गुस्ओसे ही जानने- का सन्त पुरुष प्रयास करें।। १५६-१६४ ॥ माण्डूक्य वणिनोऽमात्रः सोधमात्राविलक्षण। तलाष्यविवृतौ तस्य रहस्य स्फोरितं मया ॥ १५ ॥ माण्डूक्यं मे जो अमात्र बताया वह, अर्धमात्रा नहीं है। उसका रहस्य वहीं भाष्य विवरण मे हमने स्पष्ट किया है । उसे वही देखें ॥१६५।। यावञ्चोक्त रहाय तनिध्य प्रणवाश्रयः। उपासीत परं ब्रह्म योलिम्सुरिति स्थितम् ॥ १६६ ॥ जितना रहस्य यहाँ बताया उतना भी गुरुमुखसे जानकर प्रणया- श्रित हो परब्रह्मोपासना करें। उससे भी श्रेयकी प्राप्ति होगी यही सिद्धान्त है ।। १६६॥ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यकसाक्षिणे परमात्मने । तुरीयाय महेशाय नमोऽस्तु प्रणवात्मने ॥ १६७ ।। जाग्रत, स्वप्न तथा सुषिप्तिके एकमात्र साक्षी प्रणवशरीर तुरीय महेश्वरको प्रणाम है ।। १६७ ।। इति प्रोकाशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतौ । सप्तषिशो गत. स्परदो महिम्न स्तोत्रयातिके ।। २७ ॥

43
.
अष्टाविंशः श्लोकः
ॐकार. परमं नाम प्रियं भगवतोऽधिकम् ।
निरूपितः सम्यगिह जगतीमुट्टियोपुणा ॥१॥
'तस्वमस्यादिवण्यानामिद स्यादुपलक्षणम् ।
केचिदिहावड्युस्तत्त्वज्ञानपरायणाः ॥२॥
'स्तुतेपास्तिमार्गण प्रबोधनपरत्यतः।
उपास्तो मुख्यमोंकारं समाचल्यो मुनीश्चरः॥ ३ ॥
परंतु संयमो तस्य जपादि कर्तुमर्हति ।
सवें नाधिक्रियन्तेऽम वेदादौ प्रणवे मनो॥ ४ ॥
तस्मादष्ट निगद्यन्ते नामान्यन्यान्यपोशितुः ।
सर्वेषां धेयसे नी मुनिना करुणावता ॥ ५॥
भगवानके सर्वाधिक प्रिय सर्वोत्तम नामका जगदुद्धारार्थ निरूपण
किया। इसे तत्वमसि आदि महावाक्योका भी उपलक्षण ज्ञानी लोग मानते
हैं। परन्तु स्तुति उपासना मार्गको मुख्य रखकर प्रबोध कराती है।
उपासनामे मुख्य होनेसे कार मात्र निरूपण महर्षिने किया। जैसा भी
हो ॐकारका जपादि केवल सयमी पुरुष कर सकता है। वेदादि होनेसे
प्रणव मन्त्रमे सव अधिकारी भी नहीं है । अत समस्त मनुष्योंके श्रेयके
लिये दयालु मुनि सर्वसाधारण अन्य आठ नामोको कहते हैं ।। १-५॥
भवः शर्वो रुद्रः पशुतिरथोग्रः सहमहां-
स्तया भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ।
अमुमन्प्रत्येकं प्रपिचरति देय श्रुतिरपि
प्रियायास्मधाम्ने प्रणिहितनमस्योऽस्मि भवते ॥२८॥
हे भगवन् । भव शर्व, रुद्र पशुपति उग्र, महादेव, भीम, और
ईशान ये जो आपने आठ नाम हैं इनमें प्रत्येर के साथ युति विद्यमान है।
इस प्रकार संस्तुत परमप्रिय स्वयज्योति आपके चरणोम में नत-
मस्तक हूँ ॥२८॥

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम
[अष्टारिंशः
भवः
भवः शम्मोरिदं नाम भवत्यस्मारजगग्रतः।
भवतीति प्रपञ्चोऽयं तहेतुत्वाद्भवः शिवः॥६॥
भवः यह शंकरका नाम है। भवति अस्माज्जगदिति भवः । जिससे
जगत् उत्पन्न हो वह भव है। अथवा उत्पन्न होता है इसलिये भव संसार-
का ही वाचक है । संसारहेतु होनेसे शिवको भी भव कहा ॥ ६ ॥
मवतीति भव' शंभयंः प्रपश्चात्मना भवेत् ।
यो भवल्लभतेऽस्तित्वं न शम्भोभियते हिसः॥७॥
जो होता है--प्रपञ्चरूपसे होता है वह भव है। जो होकर अस्ति-
त्वलाभ करता है वह शंकरसे भिन्न नहीं ।। ७ ।।
भम्यं भवे साधु भवेद् भव्यं कल्याणवाचकम् ।
भव्यधानत एवासो भवो मङ्गलदायकः ॥८॥
मंगल अर्थमें भव्य शब्द आता है । भवमें साधु भव्य है। अर्थात्
भव्यदायी ही भव है ॥८॥
यत् सत्यं सुन्दरं चैव तद्भव्यमिति गीयते ।
रलवद्भासता काचो न भव्यः स उदोर्यते ॥९॥
पतो वास्तविकं तत्र रलत्वं नव विद्यते ।
तस्माधयास्ति सत्पत्वं सव्यं भवितुमर्हति ॥ १० ॥
जो सत्य और सुन्दर हो वही भव्य है । रत्नके समान कांच चमकता
है। तो क्या वह भव्य है ? वास्तविक रत्नत्व उसमें नहीं है। जहाँ सत्यत्व
हो वही भव्य है।। ९-१०॥
पस्तुतो होरकोऽप्येवायप्टो भन्यो म भग्यते।
सौन्दर्यविहात् सत्यं सुन्दरं भव्यमुच्यते ॥ ११ ॥
वास्तविक हीरा है। फिर भी न घिसनेपर भव्य नहीं होता। क्यों ?
सौन्दर्य नहीं है । जो सत्य हो, साथ ही सुन्दर भी हो यही भव्य है ॥११॥
कल्याणयानकत्वाच्च शियत्वमपि
सम्पते ।
सत्यः शिवः मुन्वरन मवो भवति शंकरः।। १२ ।।
भश्ययाना कल्याणरूप होनेमे शिपभी निश्चित है। अतः सत्य,
शिव, सुन्दर यही भव है। शकर से ही हैं ॥ १२ ॥

श्लोक:] स्पन्दवार्तिकसहितम् संज्ञायां पुंसि घः प्रायेणेति पाणिनिनोदितम् । यथोक्तार्यवती संज्ञा शंकरस्य च युज्यते ॥ १३ ॥ संज्ञामें पुलिंगमें घ प्रत्यय व्याकरणमें बताया है। अतः पूर्वोक्त अर्थ- युक्त भवसंज्ञा गंकरके लिये युक्त ही है ॥ १३ ॥ धुतिर्भवाय रुद्राय शर्वाय च नमोस्त्विति । भवाय नम इत्येष मन्त्रः प्रणवपूवकः ॥ १४ ॥ लम्यते मव्यता सत्यशिवसुन्दरलक्षणा। एतन्मनूपासनया ज्ञानं मोक्षोपि च क्रमात् ॥ १५ ॥ श्रुतिका प्रविचरण देखिये-"भवाय च रुद्राय च नमः शर्वाय च" इत्तादि। "ॐ भवाय नमः" यह मन्त्र है। इसके जपसे सत्य-शिव: सुन्दररूपी भव्यता प्राप्त होगी। ज्ञान तथा मोक्ष भी क्रमशः प्राप्त होगा ।। १४-१५ ॥ शर्वः शर्वः शम्भोरिदं नामाविद्यामेप शृणाति यत् । ज्ञानरूपत्वतस्तस्याऽविद्यानाशकता स्थिता ॥ १६ ॥ 'शर्वः' यह शंकरजीका नाम अविद्याका विशरण-विनाश करनेसे हुआ। शंकर ज्ञानरूप होनेसे अविद्यानाशक है ही ।। १६ ।। शृणायिनि पा श. स्याच्छरणार्थकमस्ति तत् । शर वाति प्रापयति शर्वः शरणदो मतः॥१७॥ शृणात्यविद्या पात्येष ब्रह्म शर्यस्ततोऽप्यसो । एतेन रक्षणं तावत् लोकानां सूचितं भवेत् ॥१८॥ यो लब्ध्या मानवं जन्म मुक्तये न प्रयस्यति । स आरमहा निजं हन्ति मनुजोऽयमसद्ग्रहात् ॥ ९९॥ अविद्याया विशरणादात्मनः शरणागतेः। मह्मप्रापणतश्चय स्यादत्मिघाततः ॥ २०॥ पापान्यसो शृणातीति ततोऽपोशस्य सर्वता। नश्यन्ति पापिनस्तामाद्रमत्येष ततस्तथा ।। २१॥ श्रु धातुसे विन् प्रत्यय करनेपर र शब्द शरणार्यमें होगा। पर शरण जो प्राप्त कगये ये दार्य है। शृणाति च वाति च-अविद्याको नष्ट करें, ब्रह्म प्राप्त करावे भी इसलिये भी शव हैं। इससे लोकरक्षण मूचित २२ रक्षा ३३८ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [अष्टाविंशः होता है। मानवजन्म पाकर मुक्त्यर्थ प्रयास न करनेवाला आत्मघाती है। भसद्ग्राही है। इस आत्मघातसे रक्षा, अविद्यानाश ओर आत्मशरणतासे ही होगी। पापविशरणकारी होनेसे भी रक्षक शर्व है ।। १७.२१ ॥ श्रुतिरत्रापि पूर्वोक्ता शर्वाय नम इत्यसौ । ओंकारपूर्वको मन्त्रस्तज्जपादिश्च पूर्ववत् ॥ २२॥ भगवच्छरणप्राप्तिरविद्याहतिरेव ज्ञानप्राप्तिस्तयोपास्तैः फलमाया भवेन्नणाम् ॥ २३ ॥ "भवाय च रुद्राय च नमः शय च" इत्यादि पूर्वोक्त श्रुति है । "ॐ शर्वाय नमः" यह मन्त्र है । भगवत्शरणप्राप्ति, अविद्यानिवृत्ति और ज्ञानप्राप्ति उवासनाका फल है ।। २२-२३ ।। चा रुद्रः रुद्रः शम्भौरिदं नाम प्रलयार्थावबोधकम् । व्युत्पत्तयस्तु विद्यन्ते बहवोऽस्य बुधोदिताः ॥ २४ ॥ 'रुद्र' यह शंकरजीका प्रलयार्थबोधक नाम है । इसकी व्युत्पत्ति तो विद्वानोंने अनेकधा दिखाई है।॥ २४ ॥ रोचयत्यसतो जन्तून् पापिनो मन्युनेपुणा । बाहुभ्यां चेति रुद्रत्वं रुद्रस्य श्रुतियिश्रुतम् ॥ २५ ॥ नमस्ते मन्यये रुद्र तथा तेऽस्त्विपवे नमः। बाहुभ्यां च नमस्तेऽस्तु तदेयं धृतिषु धृतम् ॥ २६ ।। मन्युरागस्कृता दण्डविषया वृत्तिरुध्यते । अतिप्टिमहामारीप्रतिस्तदिपुः धुतः ॥२७॥ नमोऽस्तु तेभ्यो रुद्रेभ्यो दिवि व्याम्नि तथा भुयि । भयन्ति येषामिपवः वर्षवातामलक्षणाः ।। २८ ।। संवत्सरारमायमयने दक्षिणोत्तरे। तस्य बाहू निगद्यते कालात्मानौ महाबली ॥ २९ ॥ एतेषां प्रतिकूलत्वे रद्रोऽयं रोदयत्यतः । नमस्तरातुल्यायं नित्य सद्भिषिधीयते ॥ ३० ॥ असत् पुरुषोको पापियोको मन्युरो, इघुसे, और बाहुओसे ताड़नकर सानेवाला हानस रुद्र कहलाया। धृतिम इसालये याहा है रुद्र आएको प्रणाम, आपक मन्युको प्रणाम, आपक पुा । चाणो) को प्रणाम और श्लोक:] स्पन्दवातिकसहितम् ३३९ वाहुओंको प्रणाम । मन्युका अर्थ वैसे तो क्रोध है, किन्तु यहाँपर अपराधियों के प्रति 'यह दण्डनीय है' इस प्रकार जो वृत्ति है वही कद्रका मन्यु है। और रुद्रका इषु ( वाण ) अतिवृष्टि, महामारी आदि है। "नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि येपा वर्पमिपद, येऽन्तरिझे येपा वात इपवः, ये दिवि येपामन्नमिपव" इस प्रकार मन्त्रमे ही कहा गया है। इद्र भी असलमे सवत्सररूप है। उसके दो बाहु उत्तरायण और दक्षिणायन हैं । वे भी काल. स्वरूप हैं । विशेष शतपथ ब्राह्मणादिमे द्रष्टव्य है) ये अयनादि प्रतिकूल हो तो रुद्र सवत्सर रुलाता है। ये अनुकूल बन जाय एतदर्थ "नमस्ते रुद्र मन्यवे' इत्यादि रीति मत्पुरुष नमस्कार करते हैं ।। २५-३० ॥ अरोदीदिति वा रुद्रो रूप्यं जातं तदप मिः । बहिर्याग ततो नैव दीयते रजतं बुधैः ।। ३१॥ तयापि रजतं घेष्ठमन्यत्रास्तोति लौकिकम् । सुवर्णस्यापि निष्पत्तिः रुद्रादन्यत्र वशितम् ॥ ३२ ॥ रुद्र भी प्रकट होते समय अन्य शिशुके समान रो लिये, किन्तु उससे चादी उत्पन्न हुई। वहियागमे उसका उपयोग भले न हो फिर भी वह धन है ही। सुवर्ण भी रुद्रसे उत्पन्न हुआ ऐसा अन्यत्र कहा है । अरोदीदिति रुद्रः ।। ३१-३२॥ रुदं दुःखं द्रावयति तस्माद्वा रुद्र ईर्यते। सुषुप्तौ न यथा दुखं प्रलयेऽपि तथैव तत् ॥ ३३ ॥ सुप्वाप्य प्रलये सर्वान् प्राणिनः परमेश्वरः । उद्विग्नचित्तानिव हि दुखान्मोचयति प्रभुः ॥ ३४ ॥ भवभ्रमणतः थानान् सुवापयति मातृवत् । प्राणिनः प्रलये रुद्रो न तु हन्ति कृपानिधिः ॥ ३५ ॥ रुद्र-दु सको जो द्रावित-नष्ट करे वह रुद्र है। जैसे सुपुप्तिमे दुःख नही वैसे प्रलयमे भी दुख नहीं होता। जैस उद्विग्न चिन्तित दुखी व्यक्तियोको सुलानेसे उनका दुस मिटता है वैसे ससार भ्रमणसे धान्त व्यक्तियोको प्रलयम सुलाकर भगवान प्राणियोको दुससे मुक्त करते हैं। प्रलयमे मारते नहीं है ।। ३३-३५ ॥ भवशयंपदाम्या प्रदोत्पत्तिरक्षणे। रद्रशम्देन कथितः प्रलयो हपढेकः॥ ३६॥ शवताति दद रातोत्यादयो विग्रहास्ततः। विशवानुपयोगस्वात्तमपि न दयिताः ।। ३७ ।। स श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [भष्टाविंशः " तथा 'भवशब्दसे सृष्टि और शर्व शब्दसे स्थिति सूचित कर द्रशब्दसे प्रलय सूचित किया। अतएव "शर्व हिंसायां," शवंतीति शर्वः, रुदं रातीति रुद्रः इत्यादि अनेक अन्य विग्रहोंके संभव होनेपर भी विशेष उपयोगी न होनेसे यहांपर नहीं दिखाया गया'॥३६-३७ ।। पूर्वप्रदर्शिताऽप्रापि. अतिविचरतीश्वरे। मन्त्रश्च- पूर्ववत्तस्यों रुद्राय नम इत्ययम् ॥ ३॥ "भवाय च रुद्राय च नमः" इत्यादि श्रुति-ही यहां भी चलती है।। "ॐ रुद्राय नमः" यह जप्यमन्त्र है ।। ३८।। पशुपतिः पशुपतिनाम तदनुग्रहयोधकः। पाशबद्धास्तु पशयस्तेषां पतिरयं प्रभुः ॥ ३९ ॥ तिर्यग्जाती पशुः प्रोक्तः सर्वप्राणिषु पुंस्ययम् । पश बन्धे चुरादिः स ततः पशुपदं भवेत् ॥ ४० ॥ अष्टपाशा निगदितास्तंबंद्धान् भगवान् शिवः । पाति पाशनिरासेन प्राणिनः शरणागतान् ॥ ४१ ॥ पशुपति: यह गंकरका अनुग्रहयोधक नाम है। पाशबद्ध ही पशु हैं । उनके पनि शंकर हैं। कोशमें पशुगव्दका पशुजाति तथा प्राणीमान दोनों अर्थ बताया है। "पश बन्धे" चुरादि धातृ है। उससे पशुपद बनता है । आठ पाशोसे बद्ध अथ च भरणागत प्राणियोंकी रक्षा करनेसे पशुपति कहलाया ॥३९-४१।। ग्रह्माद्याः स्थावरान्ताश्च पशवः परिकीर्तिताः। तेषां पतिमहादेयः स्मृतः पशुपतिः श्रुतौ ॥ ४२ ॥ ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सभी पाशबद्ध होनेसे पशु हैं। उन सबके पतिको श्रुतिम पशुपति बताया, ऐसा स्मृति वाक्य है ।। ४२ ।। प्रासापाशशतवंडाः कामक्रोधपरायणाः। आरायोत्पद्यते फामस्तद्रोधात् क्रोधसभः ।। ४३ ॥ पंराग्यानाश भाशापास्ततः फामादिनिई मिः। हरो पैराग्यदः पुंसां निज शरणमीयुपाम् ॥ ४४ ॥ "आशापामागताः गामोधपरायणा." इत्यादि गीता वचन है। भाषासे काम उत्पन्न होता है। याम सावट आनेपर क्रोध होता है।

- उक्त (श्लोक 1 स्पन्दवातिकसहितम् वैराग्यसे आशानाश होगा। तब कामादि नष्ट होंगे ! शकर वैराग्य प्रदाता तो हैं ही । जो शरणागत है उनके रक्षक भी है ॥ ४३ ४४ ॥ चतुर्थ्य त पशुपतिरोनम पूर्वको मनु । श्रुति प्राग दर्शिता तर नामंतच्च श्रुत यत ॥ ४५ ॥ 'ॐ वशुपतये नम यह मन्त्र है । "भवाय च इत्यादि पूर्व दर्शित मन्त्रमे 'पशुपतये च नम' भी आया है ।। ४५ ।। उग्रः श्रुतौ चतुर्णामेकत्र नाम्नामेषा थुतत्वत । पशुपति सार्धमुग्न पश्चाग्निगद्यते ।। ४६ ।। अथत पूर्वमुप्र स्यालश्चात् पशुपतिर्भवेत् । अनुग्रह पञ्चम हि कृत्य शम्भानिरूपितम् ॥ ४७ ।। "भवाय च रुद्राय च नम शर्वाय च पशुपतये च नम यहा एकसाथ चार नाम पढे । अत श्लोकमे पशुपति पहले आ गया, उग्र बादम । अथक्रमसे तिरोधानकर्ता उन पहले और बादम अनुग्रहकर्ता पशुपति समझना चाहिये ।। ४६-४७ ।। उपस्तिरोधि कुरुभजता मरणोतरम् । यातना बहुधा प्राप्य यान्ति जन्मान्तर हि ते ॥ ४८॥ नम उपाय भीमायेत्येव हि पठित धुप्तौ । अतएव पूर्वमन्त्रोऽत्रोकारपूर्वक ॥ ४९ ।। अदशन तिरोधान स पाश इति कम्यते । तस्माद्र युपासोना-मन्त्रणानेन शकर ॥५०॥ उग्र अभक्तोका तिराधान करता है। मरणात्तर व अनेक यातना प्राप्तकर जमान्तर पाते हैं। नम उग्राय च भीमाप च इत्यादि श्रुति है। अतएव नम पूवक मत्र : ॐ नम उग्राय ऐसा होगा। तिराधानका अर्थ है अदशन । अदशनका अथ है-नाग। ‘णश अदर्शन । उपासना करें उसे कर उस नाशसे बचाते हैं ॥ ४८-५० ॥ सहमहान् महदम्देन सहित शम्द सहमहान् मवेत् । महादेवो महमानो महतोऽय महेश्वर ॥५१॥ नम इस मग जा [अष्टाविंशः ३४२ धी शिवमहिम्नः स्तोत्रम् एष मुल्यो महादेवः कोशेष्वस्य विशेषणात् । विशेषाऽग्रहरणात्सर्वनामान्यति केचन ॥५२॥ सह महान् का अर्थ है महानके सहित शब्द महादेव । यद्यपि महादेव, महेशान, महेश, महेश्वर ये सभी संभव हैं । तथापि मुख्य नाम महादेव है । "ईश्वरः शर्व ईशानः' इत्यादि कोशमें केवल महादेव ही महापूर्वक आता है। दूसरों का कहना है कि विगेपाग्रहण होनेसे महेश महेश्वर आदि सभी ग्राह्य हैं ।। ५१-५२॥ लक्ष्मीनारायणो देवः सत्यनारायणस्तथा । सूयदेवो गणपतिदेव इत्युच्यते जनः ॥ ५३ ॥ शिवदेवो न भवति महादेवो यतः स हि । श्रु तावपि श्रुतं नाम महादेवाय धीमहि ॥ ५४॥ बहादीतो सुराणां च मुनीनां ब्रह्मवादिनाम् । तेषां च महतां देवो महादेवः प्रकीर्तितः ॥ ५५ ॥ महती पूजिता विश्वे मूलप्रकृतिरीश्वरी । तस्या वेयः पूजितन महादेयः स ध स्मृतः ॥५६॥ लक्ष्मीनारायणदेव कहते हैं । सत्यनारायण देव, सूर्यदेव, गणपतिदेव आदि भी कहते हैं । शिवदेव नही कहते। क्योंकि वह महादेव है। श्रुतिमे भी 'महादेवाय धीमहि आया है। पुराणकथित व्युत्पत्ति देखिये-ब्रह्मादि, देव, मुनि, ब्रह्मचारी ये सब महान हैं । उनका देव (पूज्य महादेय है । मूल. प्रकृति महादेवी ससारमे पूजित है । वह महादेवी है । उसके भी जो पूजित है वर सुतरा महादेव है ।। ५३-५६ ॥ मनुश्चोंपूर्वफनमो महादेयाय जप्यताम् । पहा पुरषगायच्या यजतां सर्वसिद्धिदम् ।। ५७ ॥ "ॐ महादेवाय नम" मन्त्र जपें । "पुरपस्य विध सहस्राक्षस्य महा- देवस्य धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्" इत्यादि दो गायनी भी जप्य हैं ।।५७॥ भोमः मोमनामाप्युमानायो बिरयामाज्जगद्यतः। भीमायेत्युत्तात्र तिनियेदितः ॥५८॥ मपावस्याग्निस्तपति मपातपति मारकरः । भयादिन्द्रश्न यापुन मृत्युपविति पञ्चमः ।। ५९ ॥ नम श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् ३४३ नियमेन प्रवर्तन्ते स्वे स्वे कार्येऽनलादयः । यस्यैव भयत. थेष्ठिभयाद् भृत्यादयो यथा ॥ ६॥ भीम यह भी शंकरका नाम है। जिससे सब डरे वह भीम है। "नम उग्राय च भीमाय च" ऐसी ध्रुति है । उसीके भयसे अग्नि जलती है, सूर्य तपता है, इन्द्र वायु मृत्यु आदि स्वकार्य में लगे रहते हैं ऐसा श्रुतिवचन है । जैसे सेठके भयसे ही भृत्यादि स्व स्व कार्यनिरत रहते है ।। ५८-६० ।। एतस्य वा अक्षरस्य विद्धि गागि प्रशासने । विधृतौ तिष्ठतः स्वर्ग सूर्याचन्द्रमसावुमौ । ६१॥ नमो मोमाय मन्नोऽयं जप्य कारपूर्वकः । ज्ञातयो बिभ्यति ह्यस्माद्वर्तन्ते नियमेन च ॥ ६२ ॥ इसी अक्षरके शासनमे विधुत होकर मूर्यचन्द्रादि कार्य करते हैं इत्यादि श्रुति है । "ॐ नमो भीमाय" यह मन्त्र है। ज्ञातिवाले उससे डरेंगे नियमसे काम करेंगे ।। ६१.३२॥ ईशानः ईशान इति नामेदमप्टमं स्यात् पिनाकिनः । ईशानः सर्वविद्यानामनुसन्धीयतां मनुः ॥ ६३ ॥ नम आदिर्नमोऽन्तो वा डेन्तेशानमनुर्भवेत् । सर्वविद्यापरिप्राप्तिर्जपस्य फलमुच्यते ॥ ६४॥ ईशान यह आठवा नाम है "ईशान सर्वविद्याना" यह श्रूति हैं। "ॐ नम ईशानाय" मन्त्र है । सर्वविद्याप्राप्ति फल है ।। ६३-६४ ।। पञ्चानामाननानां स्युःपञ्चसृष्टयादिकारिणाम् । नामानि हि भवादोनि महादेयो मुखो भवेत् ।। ६५ ।। इदं तात्पुरपे मन्ने ययप्यस्ति तयापि तत् । महादेवामेदबोधहेतोस्तु पठितो मनौ ।। ६६ ।। सदाशिवः पञ्चवक्त्रो महादेव इतीर्यते । ग्रह्मविष्ण्वादयोयस्माज्जाताः प्रादशिता इह ॥ ६७ ॥ मृष्टि, स्थिति, लय, तिरोधान, अनुग्रहस्पी पाच कृत्योंके करनेवाले पाच मुखोको लेकर भव, वं, रुद्र, उग्न, पशुपति ये पाच नाम हैं । मुस वाला महादेव है। यद्यपि तत्पुरुष मन्त्रमे महादवको पढा है। तथापि वह अभेदवोधनाथं है। केवल तत्पुरुष मुम ही महादेव नहीं है। जो मदाभिव श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् बिस्टाविंशः ईशानशब्देन पुनः है पञ्चवक्त्र है वही महादेव है, जिससे ब्रह्मा, विष्णु आदिकी उत्पत्ति हम पहले बता आये हैं ।। ६५-६७ ।। भीमः सर्वनियन्तायमतर्यामी शिवो भवेत् । परमः शिव उच्यते ।। ६८॥ तच्च लक्षणमा शपत्या त्वन्तर्याम्येव गद्यते । भीमशब्दगतार्थत्वाल्लक्षणाधीयते ततः ॥ ६९॥ भीमका सर्वनियन्ता अन्तर्यामी अर्थ हम सूचित कर चुके है और वही शिव है। परिशेप्यात् ईशान शब्दका परमशिव अर्थ होगा। वह भी लक्षणासे समझना चाहिये । शक्तिवृत्तिसे ईशानका अन्तर्यामी ही अर्थ है । किन्तु भीम शब्दसे गतार्थ होनेसे लक्षणासे ईशानपद परमशिवबोधक होगा ॥ ६८-६९ ॥ देव थुतिरपि सम्युद्धी वेयशब्दोऽयं हे देव स्वप्रम प्रमो । समस्तमन्ये मन्यन्ते देवम तिपदं बुधाः ।। ७० ॥ देवानां हि अतिः थोत्रमतिमाधुर्यनामसु । प्रकर्षाद् विचरत्यत्रेत्येवं व्यावस्युरेव च ।। ७१ ॥ देव यह स्वप्रकाशार्थक सम्बोधनपद है । देवश्रुतिको कुछ लोग समस्त भी मानते हैं। देवताओंके कान (श्रुति ) भी आपके नामोमे साव- धानतासे प्रवृत्त हैं । क्योकि ये नाम अति मधुर है ॥ ७०-७१।। प्रियायास्मै प्रियायास्मायिति प्रोक्तो भयादिपदयोधितः। संनिकृष्टः परामृश्यः सर्वनाम्नेवमा हरः ॥७२॥ "प्रियायास्मै" यहां सर्वनाम इदं पदसै सनिवृष्ट भवादिशब्दयोध्य हरका परामर्श होता है ॥७२॥ अमिधानाष्टकं परस्यादमुम्मिश्चरति मतिः। इत्यत्यय यददसोः समानार्थत्यतस्त्यिदम् ॥७३ ।। यस्यामिपानाष्टकमिन्येयं पप्ठीसमासगम्। मापदार्थ महेशानमपयेदं परामृशेत् ॥ ७४॥ विनापि परपदं पूर्वपरामाश भवेदवः । ममुस्मिग्निति पूर्योक्त प्रत्येक घरति श्रुतिः ॥ ७५ ।।

शोकः ]
स्पन्दवातिकसहितम्
३४५
"यत् अभिधानाष्टकं" ऐसे दो पृथक् पद हो तब अमुष्मिन् से
यत्पदार्थ परामर्श होगा। "यस्याभिधानाष्टक" ऐसा पष्ठी समास करेगे
तो यत् पदार्थका परामर्श अस्मै इस इद पदसे होगा। यत्पदके विना भी
अमुमिन् यह "अदस् पूर्वपरामर्शी होकर पूर्वोक्त आठ नामोमे श्रुति भी
विद्यमान है यह अर्थ वोध करा सकेगा ।। ७३-७५ ॥
वस्तुतः स्तुत्यविधया ग्रन्थेनंतावता मुनिः ।
प्रस्तुत्य भगवन्तं हि नमस्यत्यधुना शिवम् ।। ७६ ।।
महिम्नः पारमित्यादि स्तुत्यत्वेन समथितः ।
तपश्चर्यादिना चार्वाचीनरूपेण दशितः॥७७ ॥
मनः प्रत्यगिति स्पष्ट स्यप्रभत्वेन वगितः।
ततोऽव्यवहितस्तस्मायस्मायेतद्विवक्षितम् ॥ ७८॥
वस्तुतः 'यस्य अिभधानाष्टक' इस पष्ठीसमासपक्षमे भी यत्पार्थ क्या है
यहनिर्णेय होगा । अतः सीधा यही अर्थ है कि स्तुत्यके रूपमे यहातक भगवान
का वर्णन कर अव प्रस्तुत भगवानको प्रणाम करते हैं—प्रियायास्मै इत्यादि.
से । अर्थात्-"महिम्नः पार' इत्यादिसे जो स्तुत्यतया समर्थित हुआ,
"तवैश्वयं यत्नात्" से जो अर्वाचीनरूपसे दरसाया और "मन प्रत्यक्"
इत्यादिमे त्रिपात् तुरीय धामरूपेण जो वर्णित हुआ अतएव अव्यवहितस्पेण
जो उपस्थित है उस परमात्माका 'अस्मै' से परामर्श है ।। ७६-७८ ॥
अत्यन्ताऽव्ययधान च शिवस्यात्मत्वतो भवेत् ।
अतएव प्रियत्वं च सर्वस्यात्मा प्रियो यतः॥ ७९ ॥
पुत्राद्वित्तात्तथान्यस्मात् प्रेयोऽन्तरतर परम् ।
योऽयमात्मेति हि प्रोक्तं बृहदारण्यक्थु तो ।। ८० ॥
'अस्मै' से अव्यवधानरूपेण पहनेका अभिप्राय यह भी है कि शिव
आत्मा ही है । और आत्माका अत्यन्त अव्यवधान है ही। आत्मा होने ही
से प्रिय भी है । क्योकि आत्मा सवको प्रिय है। पुरसे, वित्तसे अन्य सबसे
प्रियतर परम अन्तरतर कोन? यही आत्मा, इस प्रकार बृहदारण्यक
श्रुतिमे भी बताया है।) ७९-८० ॥
प्रेयः प्रियतरं तत विभागे स्माद् द्वितीयतः।
कल्पितं तु तदादाय धृतो प्रत्यय ईयसुन् ॥ ८१॥
वस्तुतः प्रिय आत्मैव तवयं घापरे प्रियाः ।
तस्मान्नय प्रियोस्स्यायो विभज्येत यतस्त्ययम्॥ ८२॥

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [बष्टाविंशः - आत्मनः खलु कामाय सर्व प्रियमिति श्रुतौ। स्फुटोकृतमिद तस्मात्प्रेयान् मुख्यपियो मतः ॥ ८३ ।। अत्राप्येतदभिप्रेत्य मुनिरीयसुनं विना। निजगाद प्रिणयेति स च मुख्यप्रियार्थकः ॥ ८४ ॥ श्रुतिमे 'प्रेय' आया है। उसका प्रियतर अर्थ होता है। द्वितीयसे जहा विभाग करना हो वहा 'ईयस्' 'तर' आदि पत्यय होते है। यहा कल्पित द्वितीयको लेकर ईयमकी उपपत्ति करनी होगी। वस्तुतः आत्मा ही प्रिय है । तदर्थ ही अन्य सव प्रिय हैं । अत कल्पितको लेकर भी विभाग उचित नहीं है । इसी आशयसे "आत्मनस्तु कामाय मर्व प्रिय भवति" ऐसी अन्य श्रुति है । अत. 'प्रेय' इस श्रुतिका मुख्य प्रिय अर्थ है । इसी अभिप्रायसे यहा भी प्रियाय' कहा, 'प्रयसे' ऐसा नही । हाँ, उसका अर्थ मुख्य प्रिय ही है।। ८१-८४ ॥ धाम्ने धाम्ने शरणायेति स्याद्धाम शरणं गृहम् । तेजसे स्वप्रकाशायेत्यपि व्याख्या सुसगता ।। ८५ ।। धामका शरण अर्थ है । कोशमे "स्याद्धाम धारण गृह" लिखा है। धामका तेज अर्थ भी है। तव स्वयप्रकाश तात्पर्यार्थ है ।। ८५ ।। प्रणिहितनमस्पोस्मि प्रणिधानयुता नाम घरणध्यानसंयुताम् । नतिमाह प्रणिहितनमस्योरमोत्यनेन हि ।। ८६ ॥ "प्राणिहितनमस्योस्मि" में प्रणिधान-चरणध्यानसहित नमस्कार बताया गया है।॥८६॥ चयचिदा प्रविहितनमस्योऽस्मोति पठपते । यायेन याचा मनसा विहितत्वात्प्रपिता ॥ ८ ॥ प्रविहित नमस्य" इम पाठमे प्रकण नमनविधानसरा अर्थ है- गरीर, वाणी एव मनसे प्रगाम करना (मस्तक झुगाना, नमरयामि पहला और मनमे भगवानी शरण्यताचिन्तन परता) ॥ ८७ ॥ परिपपरा का स्पातप्तस्य यापस्य से । निज पुनामीति हेतोनमामीति तदारयः ।।८८॥

श्लोक:]
स्पन्दवातिकसहितम्
भगवान् स्वयं तृप्त हैं पूर्ण हैं। उनकी अन्य परिचर्या क्या हो ?
अपने आपको पवित्र करनेके लिये केवल प्रणाम करता हूं यह
आशय है ।। ८८॥
जप्त्वा भवादि यन्नाम नराः सिध्यन्ति भक्तितः।
प्रियायास्तु नमस्तस्मै आत्मने परमात्मने ।। ८९ ॥
जिस भगवानके भव सर्व आदि नाम भक्तिपूर्वक जपकर मनुष्य
सिद्धि प्राप्त करते हैं उस प्रिय अतएव आत्मारूपी परमात्माको हम प्रणाम
करते हैं ।। ८९॥
इति धोकाशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतौ ।
अष्टाविंशो गतः स्पन्दो महिम्नः स्तोत्रवातिके ॥२८॥
तथा।
एकोनविंशः श्लोकः
अनादिसिद्धसत्तत्यमर्याधीनपदं
प्रस्तुत्याय प्रणिहितनमयोऽस्मीति भापितम् ॥१॥
पूर्वकृता
निष्ठाप्रत्ययान्नतिरीरिता।
साक्षादेवाधुना द्वाम्यां नमस्थति महेश्वरम् ॥ २ ॥
अनादि त्रिपाद ब्रह्म तथा अर्वाचीनपदको प्रस्तुत कर अपनी
वृतनमस्कारता बतायी। प्रीणिहितमे भूतार्थ प्रत्ययसे पूर्वकृत नमन यहा
गया । साक्षात् ही प्रणाम दो दलोकोसे अब करते हैं ।। १२॥
प्रणिधानात्प्रकर्षाद्वा विशिष्टा दशिता नति ।
अप्रेत्येतद्दर्शयितुं प्रार तथाकथनं मुनेः॥३॥
परंतु सर्वज्ञ भगवानको पूर्ववृत प्रणाम पाद दिलाना विसलिये ?
यह तो प्रणिहित या प्रविहित विशिष्ट नमस्कार ही अगले पलीकॉमे है यह
गुचनामात्रार्य है ॥ ३ ॥

श्री शिवमहिम्नः रतोत्रम् [एकोनविंशा -अस्मायिति च पूर्वोक्तस्वरूपापेति संगतेः । प्रणम्यस्य पुरोक्तेन दर्शनाय हिं तत्तथा ।। ४ ।। अस्मैका पूर्वोक्तस्त्ररूपाय अर्थ है। उससे आगे प्रणम्य शिवका पूर्वोक्तके साथ ऐक्य दिखाया पूर्वोक्तरूप शंकरको प्रणाम करते हैं ॥ ४ ॥ तत्र वाङ्मनसातीतं यत्तत्त्वं प्रस्तुतं पुरा । विरोधाभासमाधाऽऽदो स्पष्टयंस्तन्नमस्यति ।। ५॥ प्रैगुण्ययत्त्व संदर्य तदपोह्य द्वितीयतः । अध्यारोपापवादभ्यां स्वष्टयंस्तन्नमस्यति ।। ६॥ वाणी और मनसे अतीत तत्त्वको प्रथम प्रस्तुत किया, नेदिष्ठ- दविष्ठादि विरोधाभाससे उसीका स्पष्टीकरण कर प्रथम श्लोकमें प्रणाम किया। द्वितीयमें त्रिगुणता दिखाकर उसका अपोहन किया । अर्थात् अध्यारोप और अपवादसे उस वाङ्मनसातीत तत्त्वको स्पष्ट कर प्रणाम किया ।। ५-६ ॥ नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो नमः क्षोदिष्टाय रमरहर महिण्ठाय च नमः । नमो वषिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमो नमः सर्वस्मै तेतदिमितिसर्याय च नमः ॥२६॥ हे दावप्रिय ! समीपतम और दूरतम आपको प्रणाम करता हूँ। हे स्मरहर ! अणुतम और महत्तम आपको प्रणाम करता है। हे त्रिनयन ! अतिवृद्ध और अतिशिशु आपको प्रणाम करता हूं। सर्वस्वरूप तथा वह यह इत्यादि सर्वके आश्रय आपको प्रणाम करता हूँ ॥ २९ ॥ नमो नेष्ठिदाय० नेदिष्ठाय दयिष्ठाय महेशाप नमो नमः। दाबदग्यसदेकान्तप्रियाय सततं रद्रो वा अग्निरित्युक्ते रुद्रः प्रोक्तोऽग्निविग्रहः । महाग्निन भवेद्दावो महेशोतो दवप्रियः॥ ८ ॥ दयदायो वनारण्यायही इति च फोशतः । दयो यनं तत्प्रियश्च तपस्वित्वामहेश्वरः।। ९ ।। अति समीप तथा दूरस्थ महेश्वरको प्रणाम । दावानलरो दग्ध एकान्तस्थानप्रिय दयारको प्रणाम । 'अनि रुद्र है" ऐसी अति है। अर्थात् नमः।।७।।

श्लोकः'] स्पन्दवातिकसहितम् । रुद्ध अग्निशरीर है अन अग्निगरीरग्यि ऐसा भी अर्थ है । कोशमे मामान्य जगलको भी दव बनाया है। अत वनप्रिय ऐसा भी अर्य है। शकरजी तपस्वी होनेसे वनप्रियता उचित ही है ॥ ७९ ॥ ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते ततः । एकमेवान्ततः शुद्धमवशेषयतीश्वरम ॥१०॥ एव शियो ज्ञानप्रतीकोनदव प्रियः। एकीकृत्योमयं रूपं सम्बोधनविशेषणे ॥ ११॥ गीतामे ज्ञानको अग्निम्पकसे वर्णन किया है। मर्वकर्म भस्मीकरणका द्वैतभस्मीकरणमे पर्यवमान होने से अद्वितीय अवशेषण अर्थ निालता है। शकर ज्ञा प्रतीकाग्निप्रिय हैं। प्रियदव यह सबोधन अर्वाचीन स्पका है । नेदिष्ठाय इत्यादि व्यापक रूपका है। सबोपन और विशेषण उन दोनोकी एकताको लेकर है।॥ १०-११ ।। नेदिष्ठः स्वात्मरूपत्वान्न च नेदिष्ठतान्यथा। अल्पमप्यन्तर चेत् स्यान्नेदिष्ठो मध्य गो भवेत् ॥ १२ ॥ सयुक्तेऽपि शिवे दोषतादयस्थ्यं भवेद् ध्रुवम् । सयोगः खलु नेदीयान् स्याच्छिवापेक्षया यतः॥ १३ ॥ ध्रुतिश्चावोचदुदरमन्तर कुरुतेऽस्य भय तस्य भवेनस्मादात्मैव भगवान् शिवः ।। १४ ।। आत्मस्वरूप होनेसे शकरभगवान समीपतम है। वीचमे थोडा भी अन्तर होगा तो यह अन्तरभाग ही जीवना समीपतम होगा, शिव नहीं । कहे कि जीव और शिव सयुक्त है अत ममीपतम हैं | नही । जीव और शिवके वीचमे जो सयोग है वह जीवसे समीपतम होगा, शिव कुछ दूर ही होगा। श्रुति भी कहती है जो थोडा भी भेद करे, अन्तर करे तो उसे भयरूप ससार अवश्य होगा ॥ १२-१४ ॥ दूरे पदार्या ये ततश्चाप्यतिदूरतः। शिवस्तस्मात्तदन्त.स्थं जगदुच्यते ॥ १५॥ स भूमि विश्वतो वृत्वा हत्यतिष्ठद्दशाइगुलम् । इति श्रुतौ च विस्पष्ट दविष्टत्वमुदीरितम् ॥ १६ ॥ दूर दूर भी जिनने पदार्थ हैं उनसे भी दूर शिव है इसीरिये शिव के अन्दर ही जगत आता है। श्रुतिमे लिया है वि मारे विश्वयो घेरकर पिर दस अगुल आगे तर ब्रह्म स्थित है। इसम विश्वपदार्थम भी दूर परमेश्वरको व ताया॥१५-१६॥ य.। सकल श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [एकोगनिशा ननु मध्ये स कि नास्ति तद्दूरे तनु चान्तिके । निरन्तरं चेति ततो भष्यकारा बमापिरे ।। १७ ॥ अतिममीप और अतिदूर है तो क्या मध्यमें नहीं है ? क्यों नही । अतएव भाष्यकारोने निरन्तर भी बताया ॥ १७॥ नन्वेनं व्यापकरवे हि वक्तव्ये किमिदं महत् । विरोधाभासवचन प्रत्युपस्याप्यत मुघा ॥ १८॥ आत्राहुभंगवत्पादा रहस्यं सर्ववेदिनः। ईशावास्योपनिषदि माध्ये तुल्याथताजुपि ॥ १९ ॥ ये शुद्धमनसः सन्तः स्वात्मबुद्धया महेश्वरम् । उपासते महीयांसस्तेषामोशः समोपतः।। २० ॥ न प्राप्योऽशुद्धमनसां सुदृढं मेदशिनाम् । जन्मकोटिसहलणाप्यतो बूरतरश्च सः॥२१॥ समीप, दूर और निरन्तर भी है तो सीधे व्यापक कहना था, यह बड़ा विरोधाभासका घटाटोप व्यर्थमे क्यो किया? यहा सर्वज्ञ भाज्यकारने रहस्य स प्रकार सोला है कि शुद्धचित्त होकर आत्मैक्यभावनारो उपासना करनेवालोके लिये समीप है। जो भेददर्शी अशुद्धचित्त हैं उनको करोडो जन्मोमे भी प्राप्य नही अतः दूरतर है। (ऐसा भावार्थ 'व्यापक' इतना कहनेसे प्राप्त नही होता ।। १८-२१॥ कश्विनी नमो नीलस्फुरज्जयनिकायितम् । पर्वतोपरिसंलग्न स्वर्गलोकसमाधितम् ॥२२॥ स गियु परि यातस्तु व्योम गिर्यन्तरोपरि । लग्नं दृष्टं तत्र गतस्ततो नियन्तरोपरि ॥ २३ ॥ नकेन न शतेनापि जन्मभिः फोटिकोटिमः। विमानगोऽपि गगनं प्राप्तु रप्रप्टु स शयात् ॥ २४ ।। यात्रां पुर्यन समुद्रे समम्पिलानमुदायते । तेन कि गगनं ला मृत्तरोत्तरमृच्छता ॥ २५ ॥ चन्द्रलोक गता लोश ध्यलोकतातिमश्गुलाम् । सम्बमानां क्षिति योनि नीलवर्ण महेन्यत् ।। २६॥ मोलपणे हि पृथियो सम्यते योनि, नदि। प्राप्तमेव नमो नौल नेदिष्ठ तस्य तरपतः ॥ २७ ॥ विमी व्यकिने समामि आनीला पडदा जमा है। पहाटके कार लगा हुआ है । स्वर्गका वह आश्रय है। उसने सोचा पहाइपर पड़ी तो श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् ३५१ गगन पकड़ आयेगा और स्वर्गमे चह जायेंगे । वह पहाडपर चढा तो देखता है कि दूसरे पर्वतसे आकाश लगा है। वह एक पहाडमे दूसरे पहाइपर ऐमा पूरा जन्म क्या सौ जन्म, करोड जन्म तक भी भटकता रहेगा तो भी आकाश हाथ लगनवाला नहीं है। भले विमानसे पकड़ने की ही कोशिश कर ले। जसे समुद्रमे याना करते समय लगेगा कि कुछ ही दूरमे आकाश समुद्रसे मिल गया है । पर आगे बढते जाओ, आकाश न छनेको मिलेगा न उसके अन्दर घुसा ही जायेगा । जो चन्द्र लोक गये वे वहासे देख रहे थे कि नील आकाशमे पूरी पृथिवी महाचन्द्रमाके रूपमे लटकी है । अर्थात् पूरी पृथिवी नील गगनमे ही हैं। यह जिसने जान लिया उसको यहा बैठे बैठे ही नील गगन प्राप्त है उसके लिये नील गगन समीपतम है ॥ २२ २७ ॥ भगवन्तममन्यन्त केवल देवमन्दिरे। ये ते तत्र गता जजः कदारादौ शिलोच्चये ॥२८॥ कदारादो गतास्ते च शिवतत्त्वमनुत्तमम् । कैलासादावबुध्यन्त गन्तव्ये मरणोत्तरम् ॥ २९ ॥ मृत्वा तन गताश्चापि लेमिरे न परेश्वरम् । सर्वेषामेव लोकाना पुनरावृत्तिमत्त्वत ॥ ३०॥ प्राब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावतिनोऽर्जुन। इत्यत्र ग्रह्मभुवनं सर्वलोकोपलक्षणम् ॥ ३१ ॥ परे तु ब्रह्मलोक हि स्वस्वभक्त्यनुसारत.। वैकुण्ठादिस्वरूपेण पश्यन्तीति प्रचक्षते ।। ३२॥ जो भगवानो केवल देवमन्दिरमे ही मानते हैं, मन्दिरमे जानेपर उनको पता लगा कि केदार वदरी आदिमे भगवान हैं । ( क्यो'क मन्दिरमै सर्वाभीष्ट सिद्धि नहीं हुई ) केदार बदरी पहुचे तो पता लगा कि मरनके बाद भगवान कैलासादिमे उपलब्ध होगे। ( क्योकि केदारादि जानेपर भी सर्वाभीष्ट सिद्धि नही हुई। और भगवान है सर्वाभीष्टप्रद ) मरने के बाद कैलासादि पहुँचे तो वहा भी भगवान नहीं मिले । क्योकि यहासे पुनरावृत्ति होती है "ब्रह्मलोकपयन्त पुनरावृत्तिवाले हैं" एसा गीताम रहा है। बह्मलोक यह सर्वलोकापलक्षण है। ब्रह्मलोकका ही शववैष्णवादि वासवगुण्ादि- रूपसे देखते हैं ऐसा भी मत है ।। २८.३२ ।। ये तु जज स भगवानात्मा सर्वहृदि स्थित.।। नविष्ठः प्राप्त एयासौ तेषां प्राग दूरवत्याप ।। ३३ ।।

३५२ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [एकोनत्रिंशः अणुमात्रान्तरमपि ये कुर्वन्ति दुराग्रहात । तदन्तरं जन्मफोटेरनन्तरमपि स्थिरम् ॥ ३४॥ भयं च तस्य नितरामुदरान्तरकारिणः । एतत्प्रादर्शय दिह विरोधाभासतो मुनिः ॥ ३५ ॥ जिन्होंने सपझा कि वह भगवान सबके हृदय में स्थित है उनके लिये पहले ( अज्ञानकालमें । दूरस्थित भी भगवान ममीपतम हो जाता है। जो दुराग्रहसे अणुमार भी अन्तर करता है वह अन्तर करोडों जन्मों तक भी स्थिर रहेगा, उसको भय भी बना रहेगा, इस बातको यहां विरोधाभाससे दिखाया ।। ३३-३५॥ नमः क्षोदिष्ठाय० क्षोदिष्ठाय महिण्ठाय महेशाय नमो नमः । स्मरं भवोद्भवकर हरते च नमो नमः ॥ ३६॥ यद्यद्धि फुरुते जन्तुस्तत्तत्कामस्य चेष्टितम् । कर्मणा बध्यते जन्तुस्तद्धराय नमो नमः ॥ ३७ ॥ क्रोधादिप्रामतः कामाद् द्धिनाशात्प्रणश्यति । प्रणाशाद्रक्षते कामहरायास्तु नमो नसः ॥ ३८॥ अणुनम तथा मह नम महेश्वरको प्रणाम । ससारोत्पत्तिकारण स्मरका नाश करनेवाले महेश्वरको प्रणाम । कामसे ही सभी चेष्टा है। चेष्टारूप कर्म से जन्तु वन्धनमे परता है। उस वन्धनहारी शिवको प्रणाम । कामसे "कामात्त्रोधोऽभिजायते'' इस क्रमसे अन्ततः बुद्धिनाशरो प्रणाश होता है। उस विनाशसे बचानेवाले कामहर शकरको प्रणाम है ।। ३६-३८ ।। अणोरणीयान् महतो महीयानिति च श्रुतिः । अणोयस्त्वमहीयस्त्वे प्रनयोति महेशितुः ॥ ३९ ॥ अणीयान् योऽपि भुवने महीयानपि यो भवेत् । सर्वोऽपि परमेशोऽसौ मध्यमोऽपि स एव च ॥ ४० ।। नेदिष्ठित्वादितः पूर्व सर्वव्यापकतोदिता। अपिष्ठावादिनेदानों सवात्मत्वमुदीर्यते ॥४१॥ "अणोरगोयान्" इत्यादि श्रुतिमे परमात्माको अणुतर और महत्तर बताया है। उसका मतलब यही है कि ससारमे अणुमे अणतर जो है यह भी परमात्मा है, महानमे महत्तर जो है वह भी परमात्मा हैं। और श्लोकः] द्विधा। स्पदन्दवातिकशहितम् मध्यमपरिणाम भी परमेश्वर ही है । नेदिष्ठ दविष्ठ कहकर सर्वव्यापकता बतायी। क्षोदिष्ठ महिष्ठ कहकर सर्वात्मता सिद्ध की । यहां यह अर्थ नहीं है कि परमात्मा कभी अणु बन जाता है और कभी महान बन जाता है। किन्तु अणु महान जो भी संसारमें है सब परमात्मा ही है यही अर्थ है। ) ॥ ३९-४१॥ विरोधाभासवचनं बोधयिषया द्विधा हि बोध्यतेऽणुत्वमहत्वाम्यां महेश्वरः ।। ४२ ॥ अणुत्वं नाम सूक्ष्मत्वं सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरो हरः। महत्त्वं महिमा तत्वादनन्तमहिमा शिवः॥ ४३ ।। सर्वात्मा ही कहना था तो विरोधाभास वचन क्यों ? इसका उत्तर है कि यहां दो प्रकारसे शिवज्ञान प्राप्त करना है । अणुत्वसे और महत्त्वसे अणु वका सूक्ष्मत्व भी अर्थ है । सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर है। महत्त्वका महिमा- प्राप्तत्व अर्थ है । भगवान अनन्तमहिमासे युक्त है ।। ४२-४३ ।। सर्वेरेवेन्द्रियग्राह्य स्थूलमन्नमयं भवेत् । तत्पूर्व पुरुष ज्ञात्वा पश्येत्सूक्ष्मतया शिवम् ॥ ४४ ॥ सूक्ष्मः प्राणमयो देहः स्पर्शग्राह्यो हि केवलः। अन्यश्चान्तर आत्मासी योयं प्राणमयात्मकः ॥ ४५ ॥ ततोऽपि सूक्ष्म आत्मैप मनोमय उदीरितः। न घासायिन्द्रियग्राह्यो वुद्धिग्राह्यो मवेदयम् ॥ ४६ ॥ ततः सूक्ष्मतरश्चत्मा विज्ञानमय उच्यते। यज स तनुते फर्ता फर्माणि कुरतेऽपि च ॥४७॥ युद्धिस्पत्वतो व बुद्धिग्राह्यो भवेदयम् । अहंकारेण तु गाह्म. कर्ताहामति मन्यते ॥४८॥ सक्ष्मतरस्तावदानन्दमय उच्यते। प्रविद्यावृत्तितो ग्राह्य आनन्दप्रतिविम्बपुक् ।। ४९ ।। ततः सूक्ष्मतमः शुद्ध आत्मा यावामगोचरः। ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठति विरोधाभासदर्दोशतः॥५०॥ सूक्ष्मतमका क्रम इस प्रकार है कि समस्त इन्द्रियोसे ग्राह्य स्थल अन्नमयकोश है। उसे प्रथम आत्मा समझकर फिर सूक्ष्मकमसे जाना है। अन्नमयसे सूक्ष्म प्राणमय है । पेयर पन्द्रिय ग्राह्य है । वह अन्नमयका अन्तरात्मा है । उरासे मूक्ष्म मनोमय अन्तरात्मा है। यह इन्द्रियग्राह्य नहीं ततः ३५४ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [उनत्रिंशः बुद्धिग्राह्य है। उससे सुक्ष्म विज्ञानमय है। वह स्वयं बुद्धिरूप होनेसे वुद्धि- ग्राह्य भी नहीं है । वह कर्ता है । अहंकार माह्य है । "कर्ताहमिति मन्यते" ऐसा बताया है । वही यज्ञकर्ता कर्मकर्ता है। उससे सूक्ष्मतर आनन्दमय है। वह अविद्यावृत्तिग्राह्य है। आनन्दप्रतिविम्बसमन्वित है। सबसे सूक्ष्मतम शुद्ध आत्मा है। वह वाणीका अविषय है । "ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा" इसप्रकार श्रुतिमे बताया हुआ है । यहां विरोधाभासे उसीको दरसाया ॥ ४४-५० ।। स्थूलं स्यूलमपोष क्रमादन्नमयादिकम् । स्वप्रकाशतया शुद्ध भासते तेन वर्मना ।। ५१॥ स्थूल स्थूल अन्नमयादिको क्रमशः त्यागनेसे उस मार्गसे स्वप्रकाश शुद्धब्रह्मका प्रकाश होता है ॥५१॥ सूक्ष्मत्वे कि परिच्छिन्नः स आत्मा हृदयादिना । नेत्याह स महिप्ठोऽपि महीयान् महतोऽपि यत् ॥५२॥ एतावानस्य महिमा ततो ज्यायोश्च पूरुषः । तथा चानन्त एवासावम्बरान्तधतेः शिवः ॥ ५३ ॥ अन्नमय प्राणमयादिके भी आन्तर सूक्ष्म वह हृदयादि परिच्छिन्न है क्या? यह शंया हुई उसका उत्तर है-नही, वह महिप्ठ भी है। महानरो भी महान है। 'पूरा विश्व परमात्माकी महिमामान है। परमात्मा तो इस विश्वसे भी महान है'। इन धृतिके अनुसार भी वह परिच्छिन्न नही, अनन्त है। आकाशपर्यन्त सबको वह धारण करता है, फिर कहना ही क्या है ? ॥ ५२.५३ ॥ क्षोदिष्ठत्वमहिष्ठरवे प्रस्थूलमनणुश्रुतेः । परित्यज्य परं तत्त्वमनन्तमिह बुध्यताम् ॥ ५४॥ सूक्ष्मोपाधिमुपादाय सूक्ष्महानात्स युध्यताम् । अणोरणीयानित्येवं श्रुतेस्तात्पर्यमत्र हि ॥ १५ ॥ स्थलोपाधिमुपादाय स्यूलोज़त्वेन बुध्यताम् । महतश्च महीयानित्येतच्छ त्याशयो ह्ययम् ॥५६॥ फस्पिता: सफलास्तयोपाधयः परमेश्वरे । सर्योपाधिपरित्यागे निर्मलो ज्ञायते शिवः ॥ ५॥ शोदिष्ट महिप्प विरुद्धकायनका तात्पर्य है कि विरुद्धार्थ क्षोदिप्रत्य और महिष्टत्यको छोडकर अगन्ततत्त्यको समझो। छोडना ही है तो कहा क्यों ? इमलिये कि सूक्ष्मोपाधि लेकर आगे बढो फिर यूक्ष्मीपाधि छोड़कर श्लोक:] स्पन्दवातिकमहितम् ३५५ शुद्ध समझो। यही 'अणोरणीयान्' इस श्रुतिका भी आशय है । तथा स्थूलो- पाधिको लेकर आगे बढो । अन्तमे स्थूलोपाधिको छोड़कर शुद्ध समझो। यही 'महतो महीयान्' इस श्रुतिका भी तात्पर्य है ! सभी उपाधि परमेश्वरमें कल्पित है । उन सर्व उपाधियोको त्यागनेपर निर्मल शिवका बोध होता है ।। ५४-५७ ॥ ये पुनर्न शिवः किन्तु विष्णुहि भगवान् भवेत् । न विष्णुः किन्तु स शिव इत्येवं भेददर्शिनः ॥ ५८॥ ते तवे तत्वदूरस्या मध्यमे दुःखमूसि । क्लिश्मन्तोऽस्मिन भवे नैव लमन्ते निर्वृति क्वचित् ॥ ५९ ।। जो लोग शिव नही, विष्णु भगवान है, विष्णु नही शिव भगवान है ऐसे भेददर्शी हैं वे तत्त्वसे कोसो दूर है, दुखमय मध्यम ससारमे क्लेशभागी होकर कही भी कभी भी शान्ति नही पाते ।। ५८-५९ ॥ नमो वषिष्ठाय० पिष्ठाय यविष्ठात महेशाय नमो नमः । त्रिवेदीचक्षुषे तस्मै त्रिनेत्राय नमो नमः॥ ६०॥ सत्त्वादीनां स्वरादीनां विनियन्त्रे नमो नमः । फर्मभक्तिप्रबोधास्तीन प्रापयित्रे नमो नमः॥६१॥ वृद्धतम तथा नवीनतम महेशको प्रणाम। त्रिनयन-तीन वेदरूपी नेत्रोसे युक्त शंकरको प्रणाम । सत्त्व, रज, तम और स्वर्ग, भूमि पातालके । कर्म भक्तिज्ञान तीनको प्राप्त करानेवाले भगवानको प्रणाम ॥ ६०-६१ ।। यादवद्धतरश्चवायरजाच्चावरावरः पुरातनतमो नूनतमश्चय महेश्वरः ॥ २॥ हृदयग्रन्थिभिन्मन्त्रे धुतो यस्तु भवेद् वृद्धतमः सोऽय सद्योजातोऽवरस्तथा ॥६३ ॥ वृद्धसे वृद्धतर. अवरजसे अवरतर अर्थात् महेश्वर पुरातनतम और नवीनतम है। "भिद्यते हयग्रन्थि '' इस मन्त्रमे जो परावर बताया- "परोऽपि ब्रह्मादिरवरो यस्मात्' वृद्ध बह्मादि भी जिससे छोटे वही यहा वृद्धतम है और "सद्योजात प्रपद्यामि" मन्त्रोक्त अवरतम है ॥ ६२-६३ ॥ पितामहः पितुरंदस्ततश्व प्रपितामहः। गोत्रप्रयतबध्यन्तमेन सचिन्त्य वृद्धताम् ॥ ६४॥ नियन्ताको प्रणाम परावरः।

[अननिमः श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् ततो ज्ञायेत वर्षीयान् ब्रह्मा लोकपितामहः । तस्यापि जनकत्वेन वषिष्ठः परमेश्वरः॥६५॥ पितामे पितामह पृद्ध, उससे प्रपितामह, इस प्रकार गोत्रप्रवर्तक ऋषिपर्यन्त पहुंचनेके बाद उनसे वृद्धतर ब्रह्मा और ब्रह्माके भी जनक होनेसे परमेश्वर वृद्धतम है ।। ६४-६५ ।। वपिष्ठोऽप्यधुना जातः सद्योजात इतीरितः। सर्वम्योऽपि कनिष्ठः स्यात्तत्कयं तूपपद्यते ॥ ६६ ॥ उच्यते कल्पितः कालस्तस्मिन्नेव महेश्वरे। वधिष्ठश्च यविष्ठश्च तेनासावुपपद्यते ॥६॥ वृद्धतम होनेपर भी अभी अभी पैदा हुआ इसलिये सद्योजान बनाया गया । वह सबसे कनिष्ठ है। परन्तु यह सभव कैसे ? क्या जो अमी पैदा है वह वृद्धनम होगा ? उत्तर है कि इसीसे पता लगता है कि काल उस परमात्मामे कल्पित है ।। ६६.६७ ।। सद्योजातोऽपि पिष्ठः स्वप्ने मर्यादिरीक्षतः। रयादीन तत्र सृजतोत्येवमाह श्रुतेर्नचः ॥ ६८ ॥ स्वप्नमे एक अतिवृद्ध दीसा। वस्तुतः उसी समय कल्पनासे उत्पन्न होनेसे सद्योजान है। फिर भी पपिष्ठ हुआ। श्रुतिमे "रथान् रथयोगान् पथ सृजते" ऐमी तत्कालसृष्टि वतायी है। वस्तुतः स्वप्नमे तत्काल पुरा. काल दोनो ही कल्पित हैं ।। ६८।। फालः पचति भूताति कालः संहरते प्रजाः । फालः सुप्तेषु जागति कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ६९ ॥ यद्वीयण भवेद् वालस्तद्वीयं स्वकलेवरे। स्थित्या स्वदेहं बालं न करोत्याश्चर्यमेव तत् ।। ७० ॥ लीला देवस्य कापीयं कालस्यातिविलक्षणा। जरयत्येव नन स जीर्ण नूतनयेन्न सः॥७१॥ परं न परमेशान जरयेत फाल एव हि । यदि कुन्नूतनपेग्नित्यनूनो हि शकरः ।। ७२ ॥ पुरापि नय एवासी पुराण इति पठ्यते । पुरामवोऽप्यसो नत्न इत्येपास्य पुराणता॥ ७३ ।। नैव कालेन रा क्रोडीफियते नूतनत्यतः तमेतमर्थमाह विरोथामासयाक्यतः ।। ७४ ।।

श्लोक.] स्पन्दवातिकसहितम् ३५७ काल सभी भूतोको जर्जरित करता है, सबका सहार करता है । सब सो जाय भले किन्तु काल अपने जर्जरण और सहरणमे लगा रहता है । वह दरतिक्रम है । पुरुषगरीरस्थ वीर्य से बालक पैदा होता है । किन्तु जिम शरीर मे वह वीर्य था,या है उसको वालक नही वनाता । यही तो कालकी लीला है। नूतनको जीर्ण करता है । जीर्णको नूतन नहीं करता। हां एक परमेश्वरको वह जीर्ण नही करता यदि करता है तो नूतन करता है। परमेश्वर पुराण है । अर्थात् पुराभव भी नवीन है। (पुरा पुराभवोऽपि नवीन । परमेश्वर कालके लपेटमे नहीं आता। यही वपिष्ठ यविष्ठ इस विरोधाभासोक्तिका तात्पर्य है।। ६९-७४॥ अत्र देशाऽपरिच्छिन्नः प्रथमे पाद ईरित । तथा वस्त्वरिच्छिन्नो द्वितीये विनिवेदितः ॥७५ ॥ एवं कालापरिच्छिन्नस्तृतीये दर्शितः शिवः। परिच्वेदत्रयाभावः सिद्धस्तेन महेशितु ॥७॥ प्रथम पादमे देशपरिच्छेदाभाव, द्वितीयमे वस्तुपरिच्छेदाभाव और तृतीयपादमे कालपरिच्छेदाभाव बताया। अतएव विविधपरिच्छेद शून्य परमेश्वर है यह बात सिद्ध हुई ।। ७५-७६ ।। नमः सर्वस्मं० सर्वस्म कि च तदिदमितिसर्वाय ते नमः। सर्वस्मं सर्वनामेद सर्वाभिन्नत्वमाह हि ॥ ७७॥ बहुप्रीही सर्वनामाभावात् सर्वाय मण्यते । तत्र चान्यपदार्थत्वात् सर्वभिन्नत्वमुच्यते ।। ७८॥ सर्वाऽभिन्न पथ सर्वभिन्नो भवितुमर्हति । विरोधामासताऽत्रापि मुनिना दर्शिता तत. ॥ ७९ ॥ "सर्वस्मै" "इतिसर्वाय" इसमे, प्रथम सर्वनाम सज्ञायुक्त है। उसका सर्वाभिन्न परमेश्वरको प्रणाम करना अर्थ है। द्वितीयमे बहुव्रीहि है। बहु- ब्रीहिमे सर्वनामसज्ञा का निपेघ है। वहुव्रीहि अन्यपदाथप्रधान है । अत सर्वभिन्न ऐसा अर्थ होगा। सर्वाभिन सर्वभिन्न कसे होगा? यहा भी विरोधाभास दिखाया है ॥ ७७७९॥ पश्य नोलं नम इति न नील नम इत्यपि। पया तयेशः सर्यश्च न सर्वांचे युदोर्यते ।। ८०॥

146
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[ उनत्रिंशः
-
सर्व च खल्विदं ब्रह्म नेति नेतीति च श्रुती।
आचक्षाते ययोक्ताभ्यां रूपान्यां परमं शिवम् ॥ ८१॥
'नील आकाश देखो', 'आकाश नील नहीं है। ऐसी दोनों बात जिस
प्रकार होती है वैसे शिव सर्व है, सर्व नहीं है, दोनों बात कही जाती है ।
"सर्व खल्विदं ब्रह्म' "द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्त चामूर्त च नेति नेति" ऐसी
दो श्रुति भी यही बात कहती है ।। ८०-८१॥
सर्पतादात्म्यवद्रज्जी सर्पाभावान्मृघोरगः ।
सर्वतादात्म्यवच्छम्भौ सर्वाभावान्मृषाखिलम् ॥ ८२ ॥
सर्पतादात्म्यवाली रस्सीमे सर्पाभाव होनेसे वहां सर्प मिथ्या है । वैसे
सर्वतादात्म्यापन्न शंकरमें सर्वाभाव होनेसे सर्व जगत मिथ्या है ।। ८२ ॥
रज्जुरेव यथा सर्पः शर्व एव तथाखिलः ।
शर्वरूपाय सर्वस्मै नित्यमेव नमो नमः ॥ ८३ ।।
न रज्जो विद्यते सर्मः सा हसा यथा तया ।
अप्रपश्चः शिवस्तस्मै शिवाय च नमो नमः ।। ८४ ॥
सर्वाधिष्ठानरूपाय निर्मलाय पिनाकिने।
भद्वितीयाय शान्ताय महेशाय नमो नमः॥८५ ।।
सर्ववेदफवेद्याय
निरस्तगुणवृत्तये।
तुरीयाय महेशाय शिवायारतु नमो नमः ।। ८६ ।।
जेसे रज्जु ही सर्प है वैसे शंकर ही जगत है। शंकर सर्वको नित्य ही
प्रणाम है । रज्जुमें सर्प नहीं है। रज्जु असर्प है वैसे शिव भी अप्रपश्च है।
उस शिवको प्रणाम । सर्वाधिष्ठान भगवान शंकर है। अतएव निर्मल है ।
अद्वितीय एवं शान्त है। उस महेश्वरसो प्रणाम । सर्ववेदेकवेद्य सत्त्वादि-
गुणवृत्तिरहित तुरीय शिवको प्रणाम ।। ८३-८६ ।।
इति यो काशिफानन्दयोगिनः कृतिनः कृती।
कप्रिंसो गतः स्पन्दो महिम्नःस्तोत्रयातिके ॥ २९॥

. त्रिंशः श्लोकः समस्तस्तोत्रतात्पर्यविषयार्थमयाधुना संक्षेपादुपसंहृत्य स्तवीति भगवान् मुनिः॥१॥ अब इस तीसवें श्लोकमें संपूर्ण स्त्रोत्रके तात्पर्यार्थका संक्षेपसे उप- संहार करते हुए भगवान कात्यायनमुनि शंकरकी स्तुति करते हैं ॥१॥ अर्वाचीनपदस्या रहस्यमभिधीयते । तथा धाड्मनसातीतस्वरूपमुपदश्यते ॥२॥ इस श्लोकमें शकर भगवानके अर्वाचीन स्वरूपका रहस्य संक्षेपमें कहा जायेगा । तथा वाणी और मनके अविषय जो परमस्वरूप है उसको भी दिखाया जायेगा ॥२॥ उच्यते परम नामोपास्ने मचतुष्टयम् । समपंणनतिश्चेति शास्त्रार्थः सल्वियानिह ॥ ३ ॥ नामोपासनाके लिये उपयोगी मुख्य चार नामोको भी यहां पर बताया जायेगा। और समपंणार्थक नमस्कार भी बताया जायेगा। इस स्तोमके अदर मुख्यरूपेण ये ही शास्त्रीय अर्थ हैं ।। ३ ॥ जपेत् शिव शिवेत्याहो मजेद् हर हरेति था। स्मरेद्धप भवेत्याहो रटेग्मृड मृडेति वा ॥४॥ एसावता कृतं सर्व देवश्च समुपासितः । जातं च परमं तत्त्वं किमन्यदवशिष्यते ॥५॥ "शिव शिवेति शिवेति वा" इत्यादि भक्तोद्गारमें बताया शिव शिव जपो, हर हर भजो, भव भव स्मरण करो, मृड मृड रटो, इतने में सब कर्म आ गया, देवोपासना हो गयी, परमतत्वका ज्ञान भी हुआ ( भविष्यवृत्या ) अब वाकी क्या रह जाता है ? ।। ४.५ ॥

६०
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[त्रिंशः
वहलरजसे विश्वोत्पत्ती भवाय नमो नमः
प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः।
जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥३०॥
विश्वको उत्पन्न करने के लिये विशेषरूपेण रजोगुण धारण करनेवाले
भव शंकरको बार बार प्रणाम । विश्वसंहार करने के लिये प्रवल तमको
धारण करनेवाले हरको बार बार प्रणाम । जब विशेष सत्त्वगुण ही रहता
है तब जनताको सुख पहुंचाने वाले जगत्स्थितिकारी मृडको बार वार
प्रणाम । त्रिगुणातीत परमज्योतिस्प स्वस्पसे स्थित होनेपर मङ्गलरूपधारी
शिवको बार बार प्रणाम है ।। ३० ।।
भवत्यस्माज्जगदिति भव इत्युच्यते शिवः ।
हरति प्रलये सर्व हर इत्युच्यते तथा ॥ ६॥
मृडयेत् सुखदेय मृउस्तेन निगद्यते।
पूर्णमङ्गलरूपत्वात् शिव इत्युच्यते स हि ॥७॥
जगदुत्पत्तिकारण होनेसे भव नाम शंकरका हुआ ।प्रलयमें जगत्संहार
करनेसे हर नाम पड़ा। शंकर सबको सुख पहुचाकर स्थितिकारण
होते हैं अतः मृड नाम पड़ा और पूर्णमङ्गल मोक्षस्वरूप होनेसे शिव
नाम हुमा ॥ ६-७॥
ननु संहतॄताहेतोयुज्यते
हरनामता।
प्रसिद्धिवशतस्तस्य शिवनामत्वमेव
भवेति तु फयं युक्त मृडत्यपि च नामनी ।
स्रष्टत्वं रक्षितृत्वं च ब्रह्मविष्ण्योमंतो मतम् ॥ ९॥
न च प्राग्दर्शितयुत्या तया न मृड जीवसे ।
इति श्रुत्या च ते सिद्ध नामनी इति सांप्रतम् ॥ १० ॥
अर्यान्तरमशादेव तच्छ त्योरुपपत्तितः।
स्रष्टत्वरक्षितत्वान्यांन शिवः सिध्यतीति चेत् ॥११॥
न, ब्रह्मविष्णुरद्राणां सृष्टिस्थित्यन्तफारयाः ।
को भवेदिति वक्तव्यमस्ति तेषां हि तत्तयम् ॥ १२ ॥
तान् सृष्ट्यावंच तरेय जगरसृष्टपादिकं शियः ।
कृत्वान्ते सफलानेव, सह सहरति प्रभुः ॥ १३ ॥
च॥८॥

लोरः]
स्सन्दयातिनहितम्
पूर्यपक्षः-राहारपारी होनेमे हर नाम ठीक है । या रुढिरो शिव नाम
भी उचित है। परंतु भव नाम और मृर नाम करमे वैसे उपपन्न हैं ?
पर्योकि सप्टा और रक्षाको पमे ब्रह्मा और विष्णु प्रमिल हैं। यदि पहें
कि पहले जो धुनि दिसाई-"भयाय च धाय च नमः" और दूसरी श्रुति
"तपा नो मृट जीवसे" उगसे सप्टा और रक्षय सिद्ध होता है तो उसका
उत्तर है कि यहां अपं मरा है। मामलमारी होने से भव कहा, भक्तजन
सुराकारीत्वको लोर मृडन प्रार्थना है । उससे शिवमे सप्टप और पालकत्व
सिद्ध नहीं होगा। उत्तर-ग्रह्मा, विष्णु, रुद्र इन तीनोको गृष्टि, स्थिति
और संहार कौन करता है ? ये भी उत्पत्ति आदि युक्त है। वास्तविकता
यह है कि इन तीनोकी गृष्टि और स्थिति कर गिर इनके द्वारा जगत्-
गृष्टि आदि कराने हुए अन्तम इन तीनोके सहित समस्त ससारका सहार
करता है।। ८-१३॥
बेयाना प्रमयो यस्तु रद्रो विश्वाधिपः प्रभुः ।
हिरण्यगर्भ जनया-मास पूर्वमिति पुतिः ॥ १४ ॥
सहययुगपर्यन्तमहर्य ग्रह्मणो विदुः।
राणि पुगसहयान्ता मामवर्षादिकारणम् ।। १५ ॥
एवं शतायुयापि तया विष्ण्वादयोऽपि च ।
फिघनपशो ग्रह्मविष्ण्वाधाः किन्यसंश्यकाः ॥१६॥
ब्रह्माण्डमेतत्सकलं यह्मणः क्षेत्रमुच्यते।
क्षेनमश्च स एवोक्तो विरिश्चिश्व प्रजापतिः॥१७॥
ब्रह्माणो हरयो रुद्रास्तत्र तत्र व्ययस्थिताः ।
आगया देवदेवस्य महादेयस्य शूलिनः ॥१८॥
ब्रह्माण्डानामसत्यानां ब्रह्मविष्णहरात्मनाम् ।
उद्भवे प्रलपे हेतुमहादेय इति ध्रुतिः ।। १९॥
इति सौरे निगदितं संङ्गोक्तमधुना शृण ।
कोटिकोट्यपुतानीशे चाण्डानि कथितानि तु ॥२०॥
तत्र तत्र चतुर्यक्या ब्रह्माणो हरयो भवा ।
मृष्टाः प्रधानेन तथा प्राप्य शमोस्तु सनिधिम् ॥ २१॥
असंख्यातान रुद्राख्या असख्याताः पितामहाः ।
हरयश्चाप्यसस्याता एक एव महेश्वरः॥२२॥
ब्रोन्द्र विष्णदाचरपि
देवरगोचरम् ।
आदिमध्यान्तरहित भेषजं भवरोगिणाम् ॥ २३ ॥

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
िित्रश
।"
श्वेताश्वतरमें समस्तदेवजनक और हिरण्यगर्भोत्पादक शिवको बताया
है। गीतामें ब्रह्माजीके दिनरात्रिका वर्णन है। उससे मासवर्षादि होंगे।
शतवर्ष में ब्रह्माजी समाप्त होंगे। वल्कि असंख्य ब्रह्माण्ड और उनमें असंख्य
ब्रह्माविष्णुरुवादि है । सबकी उत्पत्ति स्थिनिलय कारण महादेव है ऐसा और
पुराणमें तथा विशेषतः लिंगपुराणमे कहा गया है ॥ १४-२३ ॥
पद्मभूर्जलशायी च गिरिशश्न यो मताः ।
पद्मादीनां च विलये तेषां च विलयो ध्रुवः ॥ २४ ॥
तथा चोक्तं पुगणादौ पृथिव्यप्सु प्रलीयते ।
आपस्तेजति वायो तद्वायुर्नभसि लीयते ॥ २५॥
नभ एतदहंकारे महत्तत्त्वे स लीयते ।
प्रकृती तस्य च लयो मयति प्रतिसंचरे ।। २६॥
नासदासीना सदासोत्तम आसीदिति श्रुतिः।
प्रलयं शून्यमाचष्टे क्व तदाऽबब्जपर्वताः ॥ २७॥
ब्रह्मादि तीनमें एक पद्मन है । दूसरा जलशायी है। तीसग कलास-
पर्वतवासी है। प्रलयमें पद्मादि विलय होनेपर ब्रह्मादिका भी विलय होगा।
पुराणों में कहा है--प्रलय में पृथिवी जलमें लीन होती है। जल तेजमें, तेज
वायुमें, वायु आकाशमें, माकाश अहकारमें, अहंकार महत्तत्त्वमै और महत्तत्त्व
प्रकृतिमें विलीन होते हैं। उस समय पानी, कमल, पर्वतादि कहां रह
जाते हैं । श्रुति भी सुनिये-'उस प्रलयमें न असत् था न मत् था केवल तम
(प्रकृति) ऐसी शून्यावस्था में जलादि कहां रह जाते है ॥ २४-२७ ॥
वक्तव्यमितरत् प्रायः प्रागेवास्माभिरीरितम् ।
फिचिद्विशेषयत्त्वात्तदुत्याप्य पुनरीयंते ॥ २८ ॥
यागतोऽभूद्विधिः शंभोयिष्णुदक्षिणतोऽभवत् ।
हृदयादभवद्रो मूलमन
सदाशिकः ॥ २९॥
अन्य वक्तव्य प्राय. पहले ही कहा जा चुका है। कुछ विशेष वक्तव्य
जो रह गया है सदथं उसका पुनरत्यापन करते हैं। भगवान पाकरके वाम-
भागसे ब्रह्मा, दक्षिण भागसे विष्णु और हृदयरो रुद्र हुए। तीनोंका मूल
सदाशिव है ।। २८-२९॥
तत्कायाप पयोगोनि
पञ्चोफरणपूर्वकम् ।
ग्रह्माण्डान्तानि भूतानि सृजतीशः सदाशियः ।। ३० ।।
समस्तं यदभूत् पूर्व सृष्टिस्थिरपन्तकारकम् ।
ऐसयमजद व्यस्त त्रियिस्तेन्योऽशतो हरः॥३१॥

श्लोक:]
स्पदयातिकसहितम्
ब्रह्मा, विष्णु आदिके शरीरादिके उपयोगी तन्माना, पचीकृत भूत एव
ब्रह्माण्डपर्यन्त सबको भगवान् सदाशिव पहले सृष्टि कर लेते हैं । फिर जो
समस्तरूपसे सृष्टिस्थितिलयकारी शक्ति महेश्वरमे थी उसे अशत ब्रह्मा
विष्णु रुद्रमे व्यस्तरूप से विभक्त किया । ३० ३१ ॥
ज्ञानशक्तिफ्रियाशक्ती उमे भगवति स्थिते ।
अंशतो व्यस्यतः सर्वप्राणिषु स्वेच्छयेशितुः ॥ ३२ ॥
परिपक्वमलान् शिष्यान् शक्तिपातेन दोक्षया।
आचार्य मूर्तिगस्तत्त्वे परे योजयतीश्वरः ॥ ३३ ॥
ज्ञानशक्तियंथेशस्य सर्वत्रव प्रवर्तते ।
तथा क्रियाशक्तिरपि शिवस्यैव प्रवर्तते ॥ ३४ ॥
सद्वाऽसद्वाऽखिल फर्म स च पारयति प्रभुः।
सृष्ट्यादिफंच विध्यायः कारमत्यात्मशक्तितः ॥ ३५ ॥
ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्ति दोनो परमेश्वरमे ही स्थित हैं । परमेश्वर
की इच्छासे दोनो समस्त प्राणियोमे व्यस्तरूपसे आती है। स्मृतिवचनमे
कहा है-परिपक्व शिष्योमे दीक्षासे शक्तिपातकर परतत्त्वमे जोडनेवाला
आचार्यदेहस्थ ईश्वर ही है। ज्ञानशक्ति इस प्रकार जैसे भगवानकी है वैसे
क्रियाशक्ति भी है। सत् असत् जो भी कर्म करते हैं सो भगवतीय क्रिया-
शक्तिसे ही है। कढेका तात्पर्य है कि ब्रह्मा आदिसे सृष्टि आदि कार्य
स्वशक्ति आधानके द्वारा परमेश्वर ही कराते है ॥ ३२-३५ ।।
अत एव च सर्वेषा देवाना ज्ञानिनामपि ।
ज्योतिलिङ्ग पृष्ठतःस्यात् पृष्ठतो वतयेद्धि स ॥ ३६ ॥
वर्तुंलाकारक ज्योतिज्योतिलिङ्गं निगद्यते ।
व्याख्यात सर्वमेवैतद्विस्तरेण मया पुरा ।। ३७ ॥
यही कारण है कि सभी देवताओके और नानी, सिद्ध सन्तोके पीछे
ज्योतिलिंग देखनेमे आता है। क्योकि वही पीछे रहकर कार्य करता है।
वर्तुलाकार ज्योति ज्यतिलिंग है इस बातको हम पहले ही कह
आये हैं ॥ ३६-३७ ॥
ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठेति पुच्छवत्पृष्ठतः स्थितेः ।
प्रवननाद्धासनाच्च ज्योतिलिङ्ग श्रुतिर्जगो॥ ३८ ॥
श्रुतिमे 'ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा' बताया। पूछके समान पृष्ठत स्थित है
इसलिये। अर्थात् पृष्ठस्थित समान प्रवर्तक तथा भासक है ऐसे ज्योति-
लिङ्गात्मक ब्रह्मको श्रुति कहती है ॥ ३८॥

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[निशः
परमः
वामन हृदयं चैव दक्षिणश्च क्रमोदितः ।
भवो हरो मृडश्चेति श्लोकेनः फ्रमसंगतिः ॥ ३९ ॥
वामभाग, हृदय मध्यभाग और दक्षिण भाग इस क्रमके अनुसार
भव, हर, मृड इन तीनका कथन हैं। अतः श्लोल में दर्शित क्रम
युक्त ही है ।। ३९ ।।
स्पष्टभिगुणवस्वशक्तियुक्तः सदाशियः।
अव्यक्तगुणमेदस्वशक्तियुक्तः शिवस्तथा ॥४०॥
शत्त्या समरसो यस्यां गुण्यं नोपलभ्यते।
स शियः प्रोक्तस्तुर्यपादेन दर्शितः॥४१॥
तीन गुणों का भेद जहां स्पष्ट है उस शक्तिसे युक्त 'सदाशिव' होता
है। जहां त्रिगुण भेद अस्पष्ट है उस शक्तिसे युक्त 'शिव' होता है । जिस
शक्तिमे गुण्य उपलब्ध नहीं, उस शक्तिसे समरस 'परमशिव' है । वही
'प्रमहसि पदे निस्त्रं गुण्ये' इस चतुथंपादमें बताया है ॥ ४०-४१ ।।
शिवशक्त्योः सामरस्ये गुण्यं नैव विद्यते ।
भेदाभेदो यदा तहि ततस्त्रगुण्यमुद्भवेत् ॥ ४२ ॥
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसमवाः।
इत्याह भगवान् कृष्णो गीतायाम नं प्रति ॥ ४३ ॥
प्रकृतेः संभवन्तीति ततः प्रकृतिसंभवाः।
संभवान्न हि पूर्व ते शक्तिनिस्त्रिगुणा ततः॥४४॥
न चंयमसदुत्पत्तिः शद्धपतां यियुधरिह।
अनिर्याच्यत्वतस्तेन सामग्स्यं च संगतम् ॥ ४५ ॥
शिव और शक्तिके सामरस्य में त्रिगुण नहीं होते। शिव और भक्ति
में भेदाभेद होने लगता है तब गुष्पोत्पत्ति है। इसीलिये गोतामें कहा-
सत्य रज तम ये तीन गुण प्रतिसभव हैं। सभवका उत्पत्ति अयं है । तब
उत्पत्ति से पूर्व प्रकृतिम त्रिगुण नही रहे यह भी मानना पड़ेगा। पांका
होगी-तब अरात्को उत्पत्ति माननी होगी। नहीं । अनिर्वाच्य सिद्धान्तमें
यह दोष नहीं है । अतएव सामरस्य भी सगत है ।। ४२.४५॥
शियस्य मा भयेच्यक्तिस्त्रिगुणोडायनोसी।
उत्पन्नत्रिगुणा सा घशक्तिः सादाशियो भयेत् ॥ ४६ ।।
एकंकन गुणो यस्तो मिनासु तनुपु स्थितः ।
पदा मवति तईव ग्रामयिस्Yमहेश्वराः ॥४७॥

श्लोक:] स्पन्दवातिकसहितम् परमशिवशक्ति विगुगरहित है। त्रिगुणोत्सत्यमिमुख शक्ति शिवकी है। उत्पन्नतिगुण शक्ति सदाशिव है । एक-एक गुण भिन्न शरीरोमे जब व्यस्त होता है तव ब्रह्मा विष्णु रुद्र होते है ॥ ४६-४७ ।। इदं स्यनाववोद्धप्प रजोमानं न वेघसि । समोमात्र न गद्रे च सत्वमा हरौ च न॥४८॥ सत्वप्रधानाः सकला देवा नैवात्र संशयः । अन्यया नेर देश्य कविराय ॥४१ ॥ रजःप्रधानतायां स्थादसुरत्वं रुजादि वा। तम.प्रधानतायां स्याद्राक्षसत्वं विमूडना ॥५०॥ रज.प्रधानो येघार घेद वेदवित्वं कथं भवेत् । तम प्रधानाचेदीशो जानाधिष्ठातता कथम् ॥५१॥ सत्यरतो ब्रह्माय रजो पतेऽस्प सृष्टये । तादृशश्च हरो धते संहाराय वहिस्तमः ॥ ५२ ॥ सत्त्वप्रधानो विष्णुश्च सत्त्वं घतेऽधनार्थतः। यथा कोटिपति किचित्पण हस्ते व्ययार्थत.॥५३ ॥ यह बात यहा ध्यानमे रसना चहिये कि केवल रज ही ब्रह्मामे नही, केवल तम ही रुद्रमे नही और केवल सत्त्व ही विष्णुम नी। सभी देव सत्त्वगुणप्रधान ही हैं । अन्यथा वे देव ही नहीं होगे। रजोमान हो तो वह असुर होगा या नित्य दुखी होगा। येवल तम हो तो राक्षस होगा या नित्यमूढ होगा। तर ब्रह्मा वेदवेना कैसे शार ज्ञानाधिष्ठाता कैसे? ययार्थ ब त यह है कि सत्वप्रधान ही ब्रह्मा सृष्चर्थ रजोगुण धारण करते हैं। सत्वप्रधान ही विष्णु रक्षणार्थ अलग थोडा सत्त्व रखते हैं। जैसे कोई करोडपति है। किन्तु खर्चके लिये थोडा धन जेवमे डालकर चलता है ।। ४८५३ ॥ सत्त्वशुदयविशुद्धिभ्यां मायाग्द्यि च ते गते । इत्युक्त्वा मायिन ग्राहुः सामान्येनेश्वर बुधा ॥ ५४ । रह्मादेरीधरस्वाञ्च मिद्धा सत्वप्रधानता। ज्ञानानन्दाभिव्यक्तिस्तेष्वत शास्त्रतमता ।। ५५॥ पञ्चदशी आदिमे सत्त्वकी शुद्धि और अशुद्धिसे प्रकृतिकै माया और अविद्या ऐसे दो विभाग किये। मायायुक्त हो ईश्वर है। अत शुद्धसत्त्व.

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[त्रिंशः
प्रधानता निश्चित है। ब्रह्मा आदिमें ज्ञान, आनन्दादिकी अभिव्यक्ति शास्त्र-
संमत होनेसे भी यह बात निश्चित होती है ।। ५४-५५ ।।
प्रकृत्युपाधयो धा स्युर्वलयिष्णुमहेश्वराः ।
सदाशियांशाः सत्यरजस्तमोयहिरुपाययः ॥ ५६ ।।
अथवा ब्रह्मा आदि तीनोंकी उपाधि प्रकृति ही है। क्योंकि वे सदा-
शिवके ही अंश हैं। कार्यार्थ बाहरसे सत्त्व, रज और तमको उपाधिरूपसे
ग्रहण करते हैं, इतना ही फरक है ।। ५६ ॥
कार्य तु सकलं नित्यमुपादाने प्रकल्पितम् ।
मृन्मयं मृदि यद्धि तदेतच्छ तिबोधितम् ॥ ५७॥
गुण्यं प्रकृतावेव कल्पितं स्यात्तदुद्भवात् ।
निस्त्रगुण्या भवेच्छक्तिः शिवकरसता गता ॥ ५८॥
न शक्तिशिवयोस्तहि प्रभेदः कश्चिदिप्यते ।
गुपोद्भवमार्गेण तयोभद इव स्थितः ॥ ५९ ।।
यह सिद्धान्त है कि कार्य सभी उपादानकारणमें कल्लित हैं । जैसे
मृन्मय पदार्थ मृत्तिकामे कल्पित है। यह बात श्रुतिमें भी कही गयी है ----
"यथा मोम्यकेन मृत्पिण्डेन सर्व मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वावारम्भणं विकारो
नामधेयं मृत्तिकेत्येव मत्यम्"। मृत्मे घट भिन्नत्व, अभिन्नत्व, भिन्नाभिन्न-
त्वादिसे निर्वाच्य नहीं है। तत्र प्रकृतिसे उत्पन्न त्रिगुण भी प्रकृतिमें कल्पित
सिद्ध हुआ। फलतः शक्तिरूपा प्रकृति निस्त्रगुपय सिद्ध होगी। वहीं शिव-
करसताको प्राप्त प्रकृति है। वैसे शिव और शक्तिमे कोई भेद नहीं है।
वैगुण्य के उद्भवको लेकर भेद किया जाता है ।। ५७-५९ ॥
अंगुण्यबाघे विमलं तत्वं यदवशिष्यते।
स शिवः परमः प्रोक्तस्तुरीयं तदितीर्यते ।। ६० ।।
त्रिगुणका वाघ होनेपर जो शुद्धशक्तिरूप शिवतत्त्व अवशिष्ट रस्ता
है वही परमशिव है। वहीं तुरीयपद है ।। ६० ॥
प्रकृष्टं मह एतद्धि मायात्रगुण्यवर्जनात् ।
दिविस्थित त्रिपाद् ब्रह्म तदेयोक्तं स्वयंप्रभम् ॥ ६१ ।'
वही 'प्रमहस्' प्रकृष्ट ज्योति है। प्रकर्ष इसलिये कि उसमें मायाके
बैगुण्यका सम्बन्ध नहीं है। "त्रिपादस्यामृत दिवि" श्रुतिमे प्रोक्त दिविस्थ
त्रिपाद ब्रह्म भी वही स्वयप्रकाश तत्व है ॥ ६१॥

लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् ३६७ सृष्टयेऽनल्परजसे भवायास्तु नमो नमः । संहृत्य मूरितमसे हरायास्तु नमो नमः ।। ६२ ।। स्थितये शुद्धसत्वाय मृडायास्तु नमो नमः । निस्त्रं गुण्यप्रमहसे शिवापास्तु नमो नमः ॥ ६३ । सृष्टयर्थ विगेपरजोधारी भवको प्रणाम । संहारार्थ विमेप तमोगुण- धारी हरको प्रणाम । रक्षार्य शुद्धसत्त्वगुणधारी मृडको प्रणाम । त्रिगुणातीत प्रकृष्ट ज्योतिस्वरूप शिवको प्रणाम ॥ ६२-६३ ।। नम भवं जगदुद्भवकारणं स्मर हरं मवदुःखविदारणम् । जप सृडं सुखदं स्थितिधारणं मज शिवं परमं भवमोक्षणम् ॥ ६४ ।। जगदुत्पत्तिकारण भवको नमन करो। संसार दुःखहारी हरका स्मरण करो। जगत्स्थितिकारण सुखदायी मृडका जप करो। भवमोक्षदायी परमशिवका भजन करो ॥ ६४।। इति श्री काशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृतौ । महिम्नःस्तोत्र विवृतौ त्रिंशः स्पन्दो विनिर्गतः ॥ ३०॥ एकत्रिंशः श्लोकः शास्त्रार्थः सकलोऽप्येव पूर्वस्मिन्नुपसंहृतः । असदृक्त्यं स्तुतेः प्रोक्तमुपसंहियतेऽन्यथा ॥१॥ शास्त्रार्थका समग्रतया पूर्वश्लोकमें उपसहार किया गया। "अविदुषो यद्यसदृशी" इस प्रकार जो स्तुतिकी अननुरूपता बतायी थी उसका प्रकारान्तरसे यहां उपसंहार करते हैं ॥१॥ अब ३६० श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [एकत्रिंशः असदर स्तुमेरुमा प्रागौद्धयं निराकृतम् । निजं तदुच्यते युक्या स्वाहंकारावधोरणम् ।।२।। ध्यज्यते महिमा चैत्र प्रमोः स्रष्टतया ततः । उपक्रमोपसंहारसारूप्यादेनं क्षतिः॥३॥ स्तुतिको अननुरूपता करकर पहले स्वीय औद्धत्य निराकरण किया उसको अहंकारनिरासार्य युक्तिसे कहते हैं। फिर भी यहां महिमा की भी अभिव्यक्ति है। अत: उपक्रमोपसंहारको सरूपताकी क्षति भी नहीं है ।। २-३ ॥ कृशपरिणति चेतः क्लेशवश्यं क्म चेवं कर च तव गुणसोमोल्लङ्घनी शश्वदृद्धिः । इति चकितममन्दोकृत्य मां भक्तिराधाद् चरणयोस्ते वाक्यपुष्पोपहारम् ॥ ३१॥ अल्परिपाक अविद्यादि क्लेशोंके वशीभूत मेरा यह चित्त कहां ? और गुणातीत शाश्वत आपको महिमा कहां? इस कारण यद्यपि मैं चकित था नथापि मेरी भक्तिने मुझे स्कूति देकर है वरद ! आपके चरणोंमें यह वाक्यपुष्पोपहार चढ़वाया ॥ ३१ ॥ परिणामः परिणतिराद्यश्लोकोक्त एव उच्यते परिपाकोऽयमधोत्यादिसमुद्भवः॥ ४ ॥ परिणामावधि समे स्तुवन्ति स्वमतेः शिवम् । एवं काममावाच्योऽस्मि तयापि न्यूनता मम ।। ५ ।। कृशा मे सा परिणतिर्न ब्रह्मादेरिवोजिता। अल्पश्रुतोऽल्पमननोऽस्म्यल्पाभ्यासस्तयास्म्यहम् ॥ ६॥ यहा परिणति शब्दसे स्वमतिपरिणामवधिमें कहा गपा परिणाम ही बताया है । अध्ययनादिजन्यपरिपाक ही परिणति है। स्वमतिके परिपाका- नुसार सभी स्तुति करते हैं । इस प्रकार मैं अवाच्य भले हू. फिर भी मुझमें न्यूनता तो है ही। क्योकि मेरी अल्पपरिपाकवाली मति है । ब्रह्मादिकी बहुपरिपाकवाली है। मेरा श्रवण मनन निदिध्यासन अल्प है अतः परिपाक भी अल्प है ।। ४.६ ॥ पूर्णस्तु केवलः स्थाणुरपूर्णा इतरेऽखिलाः । अतो बहुग्यो मत्य॑म्योऽप्यहं न्यूनो न संशयः ।। ७ ।।

मत श्लोकः ] सन्दवार्तिकसहितम् सभन्ते न्यूनतां सर्वे महान्तोऽपि भुवस्तले। यो महान् ज्ञायते तस्मादस्ति कश्चिन्महत्तरः ॥ ८॥ न चयमनवस्था स्यादिष्टत्वादनवस्थितेः। अनन्तः खलु संसारः सोऽनवस्थित एव यत् ॥ ९॥ परिच्छिन्नाद् भवत्येव परिच्छिन्नान्तरं महत् । एय ह्मनन्तत्वं संसारस्योपपद्यते ॥१०॥ पूर्ण केवल शिव है। अन्य सभी अपूर्ण हैं। अतः ब्रह्मादि पया, बहुत मनुष्योंसे भी मैं न्यून हूं। महान कहलानेवाले सभी किसीकी अपेक्षा न्यून ही हैं। जो महान है उससे महत्तर भी है। क्या इस प्रकार फिर अनवस्था नहीं होगी ? होगी। अनन्य ससारमे वह इष्ट है। परि- च्छिन्नसे वडा दूसरा परिच्छिन्न अवश्य होगा। अतएव अनन्तताफी उपपत्ति है ।। ७.१०॥ न्यूनत्वं यदि मे फश्चिद्दर्शयिष्यति पण्डितः । आत्महत्यां फरिष्यामोत्याह काश्या पुराऽग्लकः ॥ ११ ॥ महाविद्यालयगृहं देववाण्या अनूनकम् । स मेने किन्तु नीचस्त्वं कुट्टिमस्यावदत् परः॥ १२ ॥ काशीमें सस्कृत महाविद्यालयका भवन किसी अग्रेज इजिनीयरने बनाया। उसने कहा इसमें कोई न्यूनता दिखायेगा तो मै आत्महत्या करूंगा। तुरत एक भारतीय इजिनीयरने कहा फरश नीचा हो गया है । कमसे कम दो फूट ऊपर होना चाहिये था। (अग्रेजने माना, सचमुच उसने आत्महत्या की।) ॥ ११-१२ ।। अस्तु या कश्चनकस्मिन्नन्यूतो विषये सुधीः । अन्यस्मिन् विषये नूनमून एव भविष्यति ॥ १३ ॥ न्यायशास्त्रे महाविद्वान् मट्टाचार्यों गदाधरः। मोमासायामभूददज्ञस्तं हसन्ति परे ततः ॥ १४ ॥ उपसद्भिश्चरित्वेति यागभेदान् थुतीरितान । व्युत्पत्तिवादे स जगौ तिलमिश्रिततण्डुलान् ॥ १५ ॥ और भी मान लीजिये कि एक विषयमें दूसरेसे अन्यून है। किन्तु अन्य विषयोमें न्यून होगा ही। न्यायशास्त्रके बडे विद्वान् गदाधर भट्टाचार्य मीमासामें अज्ञ रहे। "उपसद्भिश्चरित्वा मासमग्निहोन जुहोति" इस - ३७० श्री शिवमहिम्नः स्तोगम [एकत्रिंशः विधिवाक्यमें उपसद यागविशेपका नाम है। और भट्टाचार्यजीने व्युत्पत्ति- वादमे उसका अर्थ लिखा-तिल मिश्रित तण्डुल ॥ १३-१५ ॥ अनन्ताश्च गुणाः स्तुत्या विषयाः परमेशितुः । घोषयेत्स्वस्य पूर्णत्व को नु तत्प्रतिपादने ॥ १६॥ स्तवनीय गुण जो विषय है वह तो शकर के अनन्त हैं। उनके प्रतिपादन करने में अपनी पूर्णताको कोन घोषत कर सकता है ? ॥ १६ ॥ तनापि चेतसस्तावत् कृशा परिणतिर्मम । एकमप्येव न गुणं फारस्न्येन वदितुं क्षमम् ॥ १७ ॥ गुणातीतस्वरूपे तु तत्प्रवेशकथा पृथा। उपहासास्पदमिक क्षमो भवति में ततः॥१४॥ फिर तिमपर बुद्धिपरिपाककी अल्पता। एक गुण भी पूर्णरूपसे वर्णन करनेमें असमर्थ है। गुणातीत स्वरूपमे तो प्रवेशकी बात भी व्यर्थ है । अत मेरा थम उपहासास्पद जैसा ही है ।। १७-१८॥ कृशा परिणतिः फस्मात्यलेशवश्यं मनो यतः। तत् साविद्यास्मितारागद्वपं चामनिवेशि च ॥ १९ ॥ कृशपरिणाम क्यो है ? इसलिये कि मन क्लेशोंके वशीभूत है। अविद्या अस्मिता राग द्वेप अभिनिवेशरूपी पाच क्लेशोंसे युक्त है ।। १९ ॥ अविद्या भावरूपा सान त्यभावात्मिका मता। ततश्च तस्या चेत इत्युपपद्यते ॥ २० ॥ अशानेनायुतं ज्ञानमित्याह भगवान् हरिः। अमावो नावृणोत्यग्य माया पात्रादयस्तथा ॥ २१ ॥ फिन्तु विद्याविरोधित्वना निर्दिश्यते तु या! तरकायंत्याभ्रान्तिरपि स्यादयिद्यापदास्पदम् ॥ २२ ॥ अनित्याशु चटु रोपु चानात्मसु ध या मतिः । नित्य शुचि. सुस गत्मेत्यायद्या सा निगद्यते ।। २३ ॥ समारफ्लेशमूलत्वाविद्या भ्रान्तिरेय उच्यत बलशशब्देन मुरया भ्रान्तियधोदिता ।। २४ ॥ पाच यलगाम प्रथम अविद्या विद्याया अभाव नहीं, पिन्तु भावा. स्मर तत्व है। इमलिय चित्त उस वश हो गया, अभावक घसमें मौन होगा? गीता ज्ञानको जमानसे आवृत बताया है। भावपदार्थ ही भाग वशग

श्लोकः]
सन्दवातिकसहितम्
३७१
रण कर सकता है, जैसे वस्त्रादि । न कि अमाव । तब अविद्या ऐसा
निर्देश कसे ? विद्याविरोधी होनेसे । अविद्याकार्य होनेसे भ्रान्तिको भी
अविद्या कह देते हैं। अनित्य, अशुचि, दुःख एवं अनात्मामें नित्य, शुचि,
सुख, आत्मा ऐमा ज्ञान अविद्या है। गंमारक्लेशका मूल होनेसे उसे क्लेश
भी कहते हैं । २०-२४ ॥
अस्मिता स्यादहंकारो गर्वोऽहंत स्वमेव था।
मात्मानं सा परिच्छिन्याच्यापेद्वपापकत्वतः ।। २५ ।।
यतमानो महत्त्वापाऽहंकारमकरोत् कुधीः ।
विच्छेद्यात्मानमन्येभ्यश्शाल्पीयांसमसो ध्यधात् ।। २६ ॥
अस्मिता अहंकारको कहते हैं। वह गवं या अहंतत्त्व है। वह
आत्माको परिच्छिन्न कर व्यापकतामे च्युत करती है । गर्वार्थमे भी महत्त्व
के लिये गवं किया और दूसरोसे अपनेको अलगकर बहुत छोटा बना
दिया।॥ २५-२६ ॥
नयाल्पे सुखमम्तीति श्रुतिराह सनातनी।
एवं विलश्नात्यस्मितेति सापि क्लेश उदाहता ॥ २७ ॥
श्रुनि कहती हैं -अल्पमें सुख नहीं है. इस प्रकार, यह अस्मिता भी
क्लेश देती है, अतः क्लेश कहलायी ॥ २७ ॥
रागस्तु रञ्जनात्प्रोक्तो विषयरभिरज्यति।
चित्तमेतत्तद्विपय-प्राप्ती तस्य भवेत्सुखम् ॥ २८॥
दुःखं स्याद्विषयाप्राप्ती प्राप्ते भोगोत्यरागतः ।
पुनर्वासनया रागपारंपर्योद्भवादपि ॥ २९ ॥
रागो पत्नः सुखं दुःख वासनेत्यादिचक्रवत् ।
प्रवर्तमान. खल्वेप क्लिश्नाति पुरुषं मुहः॥ ३० ॥
रजित करता है इसलिये राग कहलाया। वह विषयोके रगमे चित्त
को रजित करता है। विषय प्राप्त होनपर सुस होता है। न प्राप्त होनेपर
राग दुख दायी होता है । प्राप्त होने पर भी पुन, राग वामनाको परम्परा
चलती है । रागसे विपयार्थ यत्न, कभी सुष कभी दु.ख, फिर वासना इस
चक्रमे डालकर वह भी मनुष्यको क्लेशमे डालता है ।। २८-३० ॥
स्वामीष्टविषयप्राप्ति प्रतिबन्यविधायिनम् ।
ईस्पिदं दु.खदं च दुखं च द्वेष्टयसज्जनः ॥३१॥

રૂર
श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[एकत्रिंशः
द्वपः प्रज्वलनात्मायं चित्तन्द्रियकलेवरम् ।
दहन जर्जरयंश्चैव पिलश्नाति बहुधा नरम् ।। ३२ ।।
पो महान् प्रज्वलनो उपः प्रतिभयो रिपुः ।
सर्वपापकरी देपो द्वैपः पलेशो भयंकरः ॥३३॥
अपने अभीष्टको प्राप्तिमें जो प्रतिवन्ध करता है, जो ईर्ष्यापद है,
जो दुःखदायी है और जो दुःस है इन सबके प्रति असत् पुरुष द्वेष करता
है। द्वेष अग्निरूप है । मनको, इन्द्रियोंको और शरीरको जलाता हुमा,
जर्जरित करता हुआ मनुष्यको अनेक प्रकारसे क्लेशमें डालता है। देष
महान अग्नि है। द्वेष भयानक शत्र है। द्वेष सर्वपापकारी है। मतः द्वेष
ही भयंकर (संसारभयकारी) क्लेश है ।। ३१-३३ ॥
मृतिमीराग्रहो याऽमि निवेशः स पुनस्तनुम् ।
नणां स्वरसवाही सन्ननुबध्नाति निर्भरम् ॥ ३४ ॥
यावत्तन्यनुवन्धः स्याद् दृढस्तावन्निजात्मतः।
अपरिच्छिन्नरूपत्वं न स्फुरेदिति निश्चयः ॥ ३५ ॥
तनना पलेशभूयस्त्वादनुपिलश्नात्ययं सदा।
यावत्तद्वासना तावन्नव मोक्षश्च संमवी ॥ ३६ ।।
मरणभय या विशेष आग्रह अभिनिवेश है। वह सबके अन्दर स्वाभा.
विक रूपसे रहता है और शरीरके साथ अनुबद्ध रहता है। जबतक यह
तनु-अनुबन्ध दृढ़ होगा तबतक कितना ही शास्त्र पढ़ लें फिर भी अपरि-
छिन्न अपने स्वल्पकी स्फुरणा नही ही होगी। साथ ही शरीर यशवहुल
होनेसे उसके पीछे सदा क्लेशयुक्त भी मनुष्य रहेगा। जबतक-जन्मज-मा-
न्तरपर्यन्ततक भी अभिनिवेशन वासना रहेगी तबतक मोक्षवार्ता सम्भव
नही ।। ३४-३६ ।।
क्लेशहानि बिना नात्मावरणं विनिवर्तते ।
अनिवृत्ताऽवृतेनिपरिपाकश्न
दूरतः ॥ ३७॥
एतत्तत्त्वं च भगवान् पतञ्जलिरवोचत ।
स्पष्टं विधिमुसेनय सूत्रोगानुशासने ॥ ३० ॥
लशकर्मनिवृत्त्येव सर्वावरणसंशयः।
ज्ञानानन्त्यं ततस्तस्माज्जयमापं भवेदिति ॥ ३९ ।।
पलेशकर्मनिवृत्तिश्च घर्ममेघसमाधितः ।
समाधिः सर्वया जातविवेकरयातितः स तु॥ ४०॥

श्लोक: सन्दवार्तिकसहितम् ननु संया प्रसंख्यानेऽप्यकुमीदस्य जायते । अकुसोदस्त्वरागः स्यादन्योन्याश्रयता ततः ॥ ४१ ।। सत्य क्लेशेष्वविद्यैव मुख्यावरणकारणम् । तनिवृत्ती विशेषण रागादिविनिवर्तते ॥ ४२ ॥ विनिवृत्तिपदं तस्मात् सूत्रे पाठो विलोक्यते । सवासनोच्छेद एव सर्वथापि विवक्षितः ॥ ४३ ॥ क्लेशनिवृत्तिके बिना आत्मावरणकी निवृत्ति नहीं होगी। आवरण निवृत्त न हुआ तो ज्ञानपरिपाक दूर ही रह जायेगा। इस तत्त्वको भगवान पतञ्जलिने विधिमुखेन योगसूत्रमे समझाया है । "तत क्लेशकर्मवि- निवृनि.।" "तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ञयमल्पम्" ऐसे वहा मूत्र है । अर्थ - उससे क्लेश एव उसके मूल कर्मको विनिवृत्ति होती है। तब सर्व आवरणमल दूर होगा तो ज्ञान अनन्त होगा और ज्ञेय अल्प हो जायेगा । क्लेशकर्मनिवृत्ति धर्ममेघ समाधिसे होती है और धर्ममेघ समाधि सर्वथा विवेकच्यातिसे होगी। परन्तु शका होगी कि वह सर्वथा विवेक- ख्याति वैराग्यसे होगी। फलत अन्योन्याश्रय होगा। इस प्रकार पूर्वमे सून है :-- "प्रसरयानेऽप्यकुमीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेधर्ममेघ समाधि ।" इसके बादका सूत्र है- 'ततः क्लेशमविनिवृत्ति ।" अर्थ इस प्रकार है-सर्वा- धिष्ठातृत्वादि प्रयोजक विवेकसाक्षात्कारमे भी जो निस्पृह हो उसको सर्वथा विवेकख्याति और उमसे धर्ममेघसमाधि होगी। उसके बाद क्लेशकम निवृत्ति होगी । क्लेगोमे राग आता है। राग पूरा निकले तब धर्ममेघसमाधि होगी धर्ममेघममाधि हो तब क्लेश तदन्तर्गत रागनिवृत्ति होगी। यह अन्योन्याश्रय दोप है । उत्तर है-विनिवृत्तिका विशेपेण निवृत्ति अर्थ है । पहले सामान्यत रागनिवृत्ति होनेपर धर्ममेघ समाधि होगी। उससे फिर विशेपेण निवृत्ति होगी। जहा वि" उपसर्गपाठ नहीं है वहा भी यही भयं करना चाहिये । विशेपनिवृत्तिका अर्थ है-रागादिवासनासहित रागाधुन्छेद यह धर्ममेघसमाधिके बाद ही होगा ॥ ३७.४३ ॥ फ्लेशसत्त्वेऽपि विज्ञानं न सम्यगुपजायते । किं पुनः पलेरावश्यत्वे इलेशयस्य ध मे मनः ।।४४ जायमानमपि सम्यगुपजायते। ज्ञानानन्त्यफया तत्र निरस्ता दूरतो भवेत् ।। ४५॥ सामान्यरूपमे क्लेरा रह जाता है तो भी विज्ञान बरावर उत्सन नहीं होता। फिर यदि क्लेशवशीभूत हो तो बात ही यया ? मेरा चित्त है क्रेस- शान न

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
[एकत्रिंशः
वशीभूत । मैं तो सम्यक् ज्ञानको आशा भी नहीं कर सकता। और क्लेश-
युक्त चित्तमें यदि ज्ञान सम्यक उत्पन्न ही नहीं होता तव "ज्ञानस्यानन्त्यात्"
यह बात तो स्वप्नमात्र होकर रहेगी ॥ ४४-४५ ॥
ज्ञानानन्त्यं भवेत् कामं यस्य कस्यापि योगिनः।
तस्यापि ज्ञेयमेयाल्पं न पुनः परमः शिवः ।। ४६ ॥
अप्रमेयः शिय मोक्तस्तस्याल्पत्वं न संभवेत् ।
अन्यं ज्ञानं पुरस्तस्य त्वल्पमेवासिलं पतः ।। ४७ ॥
अल्पमेवासरे ब्रह्मण्यनन्तमपि
चाम्वरम् ।
तथानन्तमपि ज्ञानमल्पमेव महेश्वरे ॥ ४८ ॥
और अनन्तज्ञान किसी योगीका माना जाय तो भी उसके ज्ञेय पदार्थ
ही ज्ञानापेक्षया अल्प होगा। न कि परमशिव । क्योंकि वह अप्रमेय है--
अज्ञेय है। उसकी अल्पता हो ही नहीं सकती। परमशिवके सामने जन्य
ज्ञान तो सभी अल्प ही रहेगा। अनन्तशान अल्प किस प्रकार? जैसे अनन्त
आकाश ग्रहके सामने अल्प होता है। क्योंकि उसका भी जनक ब्रह्म है ।
वैसे अनन्त ज्ञान भी परमशिवके संमुख अल्प ही रहेगा ।। ४६-४८ ।। :
सत्त्वात् संजायते ज्ञानं गुणवृत्तिहि सा ततः ।
गुणसीमोल्लविनी च शश्वदृद्धिमहेशितुः॥४९॥
ज्ञान सत्त्वगुणसे उत्पन्न होता है। वह गुणवृत्ति है। परमेश्वरकी
महिमा गुणसीमाको लांधकर आगे बढ़ी हुई है ।। ४९ ॥
पारोऽस्य विश्वभूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।
पादान्तयति सस्वादिगुणश्च सहितं जगत् ॥ ५० ॥
गुणात्मकमिदं सर्व गुणः पादे च सीमितः।
गुणसीमोल्लद्धि तत्त्वं त्रिपाद् ब्रह्मात्मकं ततः॥५१॥
अनन्तमपि ज्ञानं तदेतत्पादसीमितम् ।
पादमुल्लङ्घघ ने शिवतत्त्वं तत्प्रष्टुमर्हति ॥५२॥
न चैवं तदनन्तत्यं प्रमज्येतेति सांप्रतम् ।
व्यावहारिकमात्र तदनन्तत्वं न वास्तवम् ॥ ५३॥
स्वप्ने हनन्त आकाशो दृश्यते प्रातिभासिकः।
फिन्तु कण्ठे सीमितः स जाप्रत्कालेज्नुभूयते ।। ५४ ।।
एवं हनन्तरूपेण क्षेयं या ज्ञानमेव था।
परमार्यवशायां स्यात् सकलं पासीमितम् ॥ ५५ ॥

सत्यं लोक स्पन्दवातिरसहितम् न चानन्तं सप्तीमं चेत स्यात्स्वाप्नव्योमवन्मृषा। इष्टापत्तनव दृश्यमन्युपगम्यते ॥५६॥ गुणसीमोल्लवी किस प्रकार ? सुनो। श्रुतिमे समस्त भूत (उत्पन) को ब्रह्मका पादमात्र बताया। निपात् ब्रह्म स्वयप्रभ है । वहा न ज्ञान है और न जेय ही। क्योकि गुणो सहित जगत् पादा तर्वर्ती है । गुणात्मक ही सारा जगत् है। गुण पादवर्ती है। तब गुणसीमोल्लवी निपाद् ब्रह्म मिद्ध होता है ज्ञान भले अनन्त हो फिर भी वह पादमे ही सीमित है। एक्पाद- का उल्लघन कर त्रिपात्रूपी शिवतत्वका वह स्पर्श नहीं कर सकता । यदि सीमा हो गयी तो वही अन्त है तब अनन्तता किस प्रकर होगी? उत्तर है व्यावहारिक अनन्तता है वास्तविक नही। जैसे स्वप्नमें अनन्त आकाशको देखा । परन्तु जाग्रत होनेपर पता लगा कि वह कठमे ही सीमित था। इसी प्रकार ज्ञान हो, ज्ञेय हो सभी परमार्थदशामे पादमात्रमे सीमित है। शका होगी कि अनन्त यदि सीमित है तो मिथ्या होगा। जैसे स्वप्नका आकाश कण्ठसीमित होनेसे मिथ्या है। इसका समाधान यही है कि इसमे हमारी उष्टापत्ति है । हम दृश्य प्रपन्चको पारमार्थिक नहीं मानते ॥ ५०.५६ ।। ननु यथं तदा ज्ञान स्पृशेद्यन्न पर शियम् । मैयमावृतिमङ्गार्थ ज्ञान भवति सार्थकम् ।। ५७ ।। यदाऽऽधरणभङ्ग स्याम् परमानन्दलक्षणम् । स्वप्रकाश प्रकाशेत शिवतत्य तवा परम् ॥ ५८॥ यदि ज्ञान परमशिवका स्पर्श नहीं करता है तो वह व्यर्थ क्यो नही होगा ? इसलिये कि आवरणभङ्ग करनेमे उसकी सार्थकता है। जय आवरण भग होता है तब परमानन्द स्वय प्रकाश शिवतत्य प्रकाशित होगा ॥५७५८॥ नन्वावरणमङ्गेन स्वप्रकाशप्रकाशनम्। यत् स्यात् स एय तस्पशॉ ज्ञामगोचरतापि सा॥ ५९॥ ब्रह्मान्य ज्ञेयमल्प स्यान ब्रह्माल्पमुदीर्यते । नाल्प या नाधिक या तद् ज्ञानगोचरता स्वत ॥६॥ मंव कृत्स्नावृतेभंग ज्ञानमेय न तिष्ठति। शानामा कय नाम ज्ञानगोचरता भवेत् ॥ ६१॥ यदि चावरण किंचिद् ध्यायधान तदा स्फुटम् । ज्ञानेन तस्पयस्तदा भवितुमहति ।। ६२॥

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [एकत्रिंशः तथा हि ज्ञानमप्येतदविधकार्यमेव नः । उपादाने विनष्ट न कार्य तिष्ठेत् कथंचन ॥ ६३ ॥ अविद्या यदि विद्यत तदाऽऽवृतिरपि ध्रुवा । ज्ञानकाले फथं तस्मादावृतेर्भङ्ग इप्यताम् ॥ ६४ ॥ पूर्वपक्ष:-आवरण भङ्गसे स्वप्रकाश ब्रह्मका प्रकाशन जो हुमा यही तो ज्ञानस्पर्श है। तव ज्ञानगोचरता भी ब्रह्ममें निश्चित है। शेयमल्पं जो बताया वह ब्रह्मातिरिक्त ज्ञेयको अल्प बताता है न कि ब्रह्म भी अल्प हो जाता है । ब्रह्मन अल्प है न अधिक है। अतः ज्ञानगोचर होनमें क्या अनुपपत्ति ? उत्तर यह है कि पूरे आवरणका भग हुआ तो ज्ञान ही नही रह जायेगा। ज्ञान नहीं रहा तो ज्ञानगोचरता किस प्रकार? यदि थोड़ा आवरण मानेगे तो उस आवरणसे व्यवधान होनेके कारण ज्ञानका ब्रह्मस्पर्श किस प्रकार ? इसीको और थोडा स्पष्ट समझिये। यह जो ज्ञान है यह भी अविद्याका कार्य है। अविद्या नही रही तो उपादान न होनेसे उपादेव कार्य शान भी नहीं रहेगा । यदि उपादान अविद्या मान लेते हैं तो उसीसे आवरण होगा। तब शुद्ध ब्रह्मस्पर्श ज्ञानका किस प्रकार ? ज्ञान हो तो तदुपादान भविद्या निश्चित है ॥ ५९-६४ ।। नन्वेवं सति सूत्रेण विरोधस्ते प्रसज्यते । सकलावरणापायः सून खलु निवेदितः ।। ६५॥ मैवं सूत्र स्थूलमानावरापाय ईरितः । तवाह सर्वावरणमलापतेति सूत्रकृत् ॥६६॥ अत्रायं मलशब्दस्तु स्थूलत्यमवबोधयेत् । मलात्मकं स्यूलरूपमपत्यावरणं कवेः॥ ६७॥ स्थलाविद्याविनाशेऽपि लेशाविद्याऽवतिष्ठते। ततो ज्ञेयं जगत्तिष्ठेत् सावृति ब्रह्म भासते ॥ ६८॥ इत्यमभ्यस्यतो ज्ञानपरिपाको यदा मवेत् । लेशाविद्याविनाशेन ज्ञानं चापि विनश्यति ॥ ६९ ।। भासते परमं शुद्ध शिवतत्त्वं तदा परम् । तदा ज्ञानस्य विरहान्न तत्स्याज्जानगोचरम् ॥ ७० ॥ अज्ञेयत्वमतः सिद्धं ज्ञानास्गोचरतात्मकम् । प्रज्ञेयं च फयंकारं शिवं तं प्रस्तुवीमहि ॥ ७१ ॥ यदि ज्ञानकालमें आवरण मानते हैं तो सूत्र विरोध स्पष्ट है। सर्वा- परणापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्यात्" यहा सर्वारणापाय और ज्ञानास्तित्व श्लोकः] स्पन्दवातिक सहितम् ६७७ स्पष्टोक्त है। इसका उत्तर यह है कि सूत्र में स्थूलावरणमात्रका उपाय बताया है। सूत्रमें मलपद आया है। "तदा सर्वावरणमलापेतस्थ" ऐसा वहाका पाठ है। मलपद स्थूलत्वका बोधक है। मलरूप स्थूल आवरण ज्ञानीका नष्ट होता है यही सूत्रार्थ है। स्थूलाविद्या भले नष्ट हो, लेशाविद्या तो रहेगी। यह सर्ववेदान्त्यभिमत है। अतएव इस जगत्की स्थिति है- जगत् दीखता है। अतएव सावरण ब्रह्म ही भासित होगा । (सावरण ब्रह्म माने ईपदावृत ब्रह्म) इतनी बात अवश्य है कि उसी ज्ञान का अभ्यास करते रहनेपर अन्तमे ज्ञानपरिपाक होगा। तव लेशाविद्या भी नष्ट होगी। किन्तु साथ ही ज्ञान भी नष्ट होगा। तब शुद्ध ब्रह्म भासित होगा। किन्तु शान न रहने से ज्ञानगोचरता तो शुद्ध ब्रह्ममे नही ही आयेगी। अतः ब्रह्म अज्ञेय ही है। अज्ञेयका अज्ञानगोचर अर्थ न करना ज्ञानका अगोचर ऐसा अर्थ समझना चाहिये। जो ब्रह्म ज्ञानग विषय ही नही होता भला उस ब्रह्मपी शिवतत्त्वको हम अपनी स्तुतिरप वाणासे कैसे प्रस्तुत कर सकते हैं ? ।। ६५-७१॥ शरदनपरिच्छिन्नचन्द्रविम्वमिवेश्वरम् स्थूलावरणमङ्गन पश्यन्ति किल योगिनः॥७२॥ स्थूल मलावरणके हटनेपर योगी ईश्वरको उसी प्रकार देखते हैं जैसे शरत्काल में सफेद हल्के वादलसे आच्छन्न चन्द्रमाको लोग देखने हैं ॥७२॥ संपापि सर्वावरणमलापेतस्थितिर्न क्लेशवश्यं यतश्चित्तं पव चैतत्वव च सा स्थितिः॥७३॥ परन्तु वह स्थूलावरणापायकी जो स्थिति है वह भी तो हमारी नही है कि ईपदावरण के अन्दरसे परमात्माको देख ले। कहा क्लेशवशीभूत चित्तता है और कहां सर्वमलावरणक्षयस्थिति है ।। ७३ ॥ जानाम्यहमिमां स्वीयां दुहरामज्ञता स्वयम् । ततोऽयुक्तार्थकथन भीतोऽप्येषोऽस्मि यद्यपि ॥ ७४॥ तथापि भक्तिरिह माममन्दीफुरते बलात् । प्रयोजयति च स्तोतुमनौचित्यं विधूय माम् ।। ७५ ॥ मै अपनी दुहर अज्ञताको जानता हूँ । अत अयुक्त अर्थ कहने के लिये डरता भी है। फिर भी यह भक्ति मुझे स्तुति के लिये आगे बढा रही है और प्रेरित कर रही है। अनौचित्य चिन्ताको भी छुडा रही है । (उचित अनुचित सोचे बिना ही स्तुति कर रहा हू) ।।७४-७५ ।। न मे मन्दाक्षता काचित् स्तुतिप्रस्तुतये प्रमोः। उद्गायामि वितज्जः सन्नत्यामि च विरोमि च ॥७६ ॥ न..

"16a श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [एकत्रिशः मन्दाक्षता (लज्जा रूपी मन्दता भी मुझमें नहीं है । मैं धडल्लेसे कुछ भी स्तुतिरूपसे बोल जाता हूं, निलंज्ल होकर गाता हूं, नाचता हूं, भगवानके सामने रोता हू ।। ७६ ।। रामायणादिशास्त्राणां तन्त्रापामयशेषतः। प्रवक्ता सर्वविद्यानाधिष्ठाता महेश्वरः ॥ ७७ ॥ वेदः शिवः शिवो वेदो विशुद्धज्ञानविग्रहः । तस्याने कि मम ज्ञान का स्तुतिः फा च दक्षता ।। ७८।। तथाप्यमन्दीकृत्यंव भक्तिराधापयन् मया। वाक्यमुप्पोपहारं तत्पदयोः सच्चिदामनो ॥ ७९ ॥ रामायणादि शास्त्रोके, समस्त तन्त्रोके प्रवक्ता, सम्पूर्ण विद्याओके अधिष्ठाता महेश्वर हैं। अधिक क्या वेद ही शिव है, शिव ही वेद है। उस भगवान के सामने मेरा क्या ज्ञान, क्या स्तुति और कौनसी दक्षता है ? फिर भी भक्तिने मुझे निर्लज्ज बनाकर, अग्रसरकर सच्चिदात्मा शकर भगवानके चरणो में वाक्यरूपी पुप्पोका उपहार चढवाया।।७७७९ ॥ मां च मन्दमति भक्तिरमन्वं सुसमादधात् । भक्त्या मामभिजानातीत्युक्ति विदधती सतीम् ॥ ८॥ तथा च भक्तिलधन ज्ञानेन परमार्थत । स्तुतियथार्थमेवार्थ धोतयन्ती प्रवर्तते ॥ ८१॥ पाक्यपुष्पोपहार तमिममडघ्रपोस्तवार्पये। घरदस्त्वममोप्टार्थ मोक्षास्यं देहि मे वरम् ।। ८२ । मैं मन्दमति हू, भक्तिने मुझे अमन्द बनाया और "भक्त्या मामभिजा- नारित" इस उक्तिको सार्थक किया । उस भक्तिलब्ध परमात्मज्ञानसे यथार्थ अर्थका ही द्योतन करती हुई यह स्तुति प्रवृत्त हुई है। इस वाक्पपुप्पो- हारको आपके चरणोमे मैं समर्पित करता है। आप वरद हैं । अभीष्ट मोक्षाय बर देकर हमे हतार्थ करे।८०-८२।। परमवल्याए सनाथयोररीकृत्य वाक्यपुष्पाञ्जलि जनम् ।। ८३ ।। है परमकल्याण ! परमपावन | इस वाक्यपुष्पाञ्जलिको स्वीकारकर हमे सनाथ करो ॥ ८३ ॥ इति धी काशिकानन्दयोगिनः कृतिनः कृती। महिन्न. स्तोत्रयतो वृत्तः स्पन्द उपान्तिमः ॥ ३१॥ नम. परमपावन।

द्वात्रिंशः श्लोकः बाझोपि महिमेशाय दुनिष्प इतीरितम् । फस्य स्तुत्यः कतिविध गुण इत्यादिना पुरा ॥१॥ स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः" इत्यादिमें परमेश्वरकी औपा- धिक बाह्य महिमा का भी निरूपण अशक्य है यह बताया ॥१॥ तच्चोपपादयन्नेव सवारापि महामुनिः । महिमानं भगवत उपसंहरतेऽधुना ॥२॥ उसका भी उत्पादन करते हुए उसके द्वारा भी भगवानकी महिमा का उपसंहार अब महामुनि कात्यायन कर रहे हैं ॥२॥ असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिन्धुपाने सुरतरवरशाखा लेखनी पत्रमुर्ती। लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥ ३२ ॥ नीलाञ्जन पर्वतके समान स्याही हो, सागर समूचा दावात हो, कल्पवृक्ष शाखा कलम हो और कागज पूरी पृथिवी हो, तथा साक्षात् सरस्वती उस कलमसे अनन्तकाल तक लिखती रहे तो भी हे भगवन् ! आपके गुणों का पार पाया नही जा सकता ॥ ३२ ॥ शारदा ब्रह्मा तु जगतः सृष्टिकायें व्यस्तमनाः भवेत् । पौरोहित्ये च देवानां गुरस्तावद् बृहस्पतिः ॥ ३ ॥ अतस्त्यवत्वा सुरगुरू शारदां गुणवर्णने । वाग्वादिनी भगवतीमावाद् विद्यास्वरूपिणीम् ॥ ४ ॥ "f वागपि सुरपुरोविस्मयपदं" इस प्रकार यद्यपि पहले सुरगुरु वृहस्पति या ब्रह्माका उपादान किया। किन्तु ब्रह्माजी सृष्टिमे व्यस्त हो सकते है, और बृहस्पति जी देवताओ के गुरु जो टहरे. उन्हीं के पौरोहित्यमे लगे रह सकते हैं, अतः गुणोंको पार नहीं कर सकने मे हेत्वन्तर हो सकता [ द्वात्रिंशः श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम् है । अत उन दोनोको छोडकर भगवद्गुण लेखनमे शारदाकी कल्पना की जा रही है जिसका दूसरा कोई काम प्रति धरूपसे सम्भावित नहीं है। वह वाग्वादिनी है विद्यास्वरूपिणी है, और भगवती भी है ।। ३-४ ।। सवकाल असितादायवसिते सर्वकालमितीरणात् । असिताय तर सद्यः समुत्पन्न प्रकल्प्यताम् ॥५॥ एव चानन्तनीलाद्रिसमकज्जलकल्पना। कर्तव्यव सिन्धुपात्रमुर्वोपत्र च बुध्यताम् ॥ ६॥ असित गिरि परिच्छिन्न होनेसे समाप्त होगा । इधर सर्ववाल कहकर अनन्त काल तक लिखनकी बात वतायी जा रहा है। अत यही समझना चाहिये कि एक नीलाद्रि समाप्त होते ही दूसरा नीलाद्रि उत्पन्न होकर स्याही के लिये आ जाता है । फलत यहा अनन्त नीलाचलोके सदृश स्याही की कल्पना समझना चाहिये । वैसे सिन्धुपान आदिमे भी समझना चाहिये । एक सिन्यु समाप्त हुआ तो दूसरा सिन्धु आ गया । एक पृथिवी. पत्र समाप्त हुआ लिखते लिखते तो दूसरा पृथिवीपन तैयार इत्यादि । कल्पतरुशाखा भी यदि घिसती हो तो अनन्त कल्पतरशाखा भी कल्पनीय है ।। ५-६॥ तव गुणानामीश याचामगोचरपद मनसोऽपि यदीग्तिम्। तदेवोपाधिवशत सगुणत्व प्रपद्यते ॥७॥ सगुणमादाया-प्युपसहरताऽर्थत । लिलक्षयिपित तत्वमखण्ड परषिणा ॥८॥ जो वाणी और मनका अविषय बताया गया वही उपाधिवशत सगुण होकर वाइमनसविषय होता है अत सगुणके उपसहारसे भी अर्थत अखण्डतत्व ही महर्षि कात्यायन लक्षित करते हैं ॥ ७८ । स्वयप्रकाशमद्वैत-मवाड्मनसगोचरम् लक्ष्य सगुणवाक्यस्तदिति वेदान्तनिश्चय ॥९॥ मक्तिश्च परमेशान-विषया सत्यवत्मम् । लक्ष्यसप्राप्ताविनि वेदान्तनिर्णय.॥१०॥ क्यो अखण्डतत्त्व लि लक्षायपित है? इसलिये कि स्वय प्रकाश अद्वैत- तत्त्व वाणी और मनका विषय नहीं है। सगुणवाक्योसे ही उसको लक्षित ततः सम्बल श्लोकः] स्पन्दवातिकसहितम् ३८१ करता पड़ता है। आ मगुगवर्गनका उमीपे तात्पर्य है। यहां एक दूसरी बात यह है कि इस ग्रोको तया रे प्र-यमे भो भकि स्पष्ट है। परमेश्वर विषयक भक्ति सत्पमागियोके लिये सवल 'सम्यक बल और रास्तेका भोजन) है । लक्ष्यप्राप्ति के लिये वह भो आवश्यक है। यह "परो भक्ति वश पुमान्""यस्य देवे परा भक्ति " इत्यादि वेदान्तवाक्यनिर्णीतार्थ है ॥९-१०॥ पारं न याति यस्या विद्यात्मविधया वाग् यपुर्विघया स्थिता। सा शारदा गुणाना न पार याति महेशितुः॥११॥ तत्र वाणी च विद्या च प्रक्रमेतां कथ प्रमो। असद्धियामसद्वाचां माशी परमात्मनि ॥१२॥ साक्षात् विद्यादेवी वाग्देवी शारदा जिसके गुणोका पार नहीं पा सकती उस प्रभु परमात्मामे असद्धि, असद्वचन हमारी विद्या और वाणी कैसे प्रवेश कर सकती है ।। ११-१२ ।। नेदिष्ठाय दविष्ठाय नम इत्यादितस्ततः। भूयिष्ठा नमक्ति ते वयं हि विदधीमहि ॥१३॥ इसलिये अन्तत हम नमो नेदिष्ठाय, नमो दविष्ठाय इत्यादि रीति आपको बहुवार नमस्कारवचन कहकर ही सन्तोष करते हैं ।। १३ ।। याचामगोचरापार गुणयोगमुपेयुपे सदानन्दजुषे शानावपुपे मोपे नमः॥१४॥ वागदेवता एव अस्मदादिवाणीके अविषय अपारगुणोसे युक्त, सतत आनन्द स्वरूप शान्तवपु भगवान् शारको हम प्रणाम करते हैं ।। १४ ॥ इति षी पाशिकानन्दयोगिन' पृतिन, कृती। महिम्नः स्तोत्रविपतौ वृत्तः स्पन्दोऽयमन्तिम. ।। ३२ ।।

असुरसुरमुनीन्द्ररचितस्येन्दुमौले- ग्रंथितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य । सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो रुचिरमलघुवृत्तः स्तोत्रमेतत्तचकार ॥ ३३ ॥ असुर, देवता और मुनिवर जिसकी अर्चना करते हैं, गुण महिमाका प्रथन करते हैं उस चन्द्रशे वर अय च निर्गुण परमेश्वरकी सकलगुणसम्पन्न पुष्पदन्तनामा आचार्यने बडे छन्दोमे यह सुन्दर स्तुति बनायी ॥ ३३ ।। अहरहरनवा धूर्जटेः स्तोत्रमेतत् पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः । स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथान प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च ॥ ३४ ॥ भगवान शकरके निर्दोष इस स्तोत्रको शुद्धचित्त होकर जो मनुष्य परमभक्तिमे प्रतिदिन पढता है वह शिवलोकमे रुद्र के सामरूप्यको प्राप्त होगा और यहा भी प्रचुरधन तथा दीर्घायुको प्राप्त होगा, पुनवान होगा, कीर्तिमान होगा ॥३४॥ दीक्षा दानं तपस्तीयं-स्नानं यागादिकाः क्रियाः । महिम्नःस्तवपाठस्य कलां नाहन्ति पोडशीम् ॥ ३५॥ दीक्षा, दान, तप, तीर्थस्नान, याग इत्यादि क्रियायें महिम्नःस्तोत्र पाठके सोलहवी कलाके भी योग्य नही ।। ३५ ।। आसमाप्तमिदं स्तोत्रं सर्वमीश्वरवर्णनम् । अनौपम्यं मनाहारि पुण्यं गन्धवंभाषितम् ॥ ३६ ।। पुष्पदन्तोक्त समाप्तिपर्यन्त ईश्वरवर्णनात्मक ममूचा यह स्तोत्र अनुपम, मनोहर एव पुण्यस्वरूप है ।। ३६ ।।

३७-४० श्लोकः स्पन्दवातिकमहितम् ३४३ महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः । अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥ ३७॥ महेशसे बढकर दूसरा कोई देव नहीं है, महिम्नसे बढकर कोई स्तुनि नही, अघोरसे बढकर कोई मन्त्र नहीं, गुरुसे बढकर कोई तत्त्व नही ।। ३७॥ कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः शशिधरवरमोलेर्देवदेवस्य दासः। स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोपात् स्तवनमिदमकाव्यिदिव्य महिम्नः ॥ ३८॥ चन्द्रकलाधारी भव्य पस्तकसे शोभायमान महादेव भगवान शकरके पुष्पदन्त नामक गन्धर्वराजने शकररोपसे नष्टमहिमा होनेसे इस दिव्य दिव्य महिम्न स्तोत्रकी रचना की ॥ ३८ ॥ सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षफहेतुम पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलि न्यचेताः । व्रजति शिवसमीप किनरैः स्तूयमानः स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥ ३६॥ बडे बडे एव मुनियोके सम्माननीय स्वर्गमोक्षदाता पुष्पदन्तप्रणीत अमोघ इस स्तोत्रको अनन्यमनस्क एव प्राजलि होकर यदि मनुष्य पाठ करता है तो वह विनरोसे स्तूयमान हो शिवसामीप्यको प्राप्त होगा ॥ ३९ ॥ श्रीपुष्पदन्तमुखवजनिर्गतेन स्तोत्रेण किल्बिषहरेण हरप्रियेण । कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन सुप्रीणितो भवति भूतपतिमहेशः ॥ ४० ॥ श्रीपुष्पदन्तके मुखपकजसे निर्गत पापहारी, शकरसा प्रिय यह स्तोत्र कण्ठस्थ कर समाहितचित्त होकर पढ़ें तो भूताति शकर भगवान परम प्रसन्न होते हैं ।। ४० ॥

श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् [ श्लोकः ४१-५२ इत्येषा वाङ्मयो पूजा श्रीमच्छंकरपादयोः । आपिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥ ४१ ।। इस प्रकार यह बाड्मयी पूजा भगवान शंकरके चरणोमें मैं अर्पण करता हूं। उससे महादेव सदाशिव मुझपर प्रसन्न हों॥४१॥ यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् । तत्सर्व क्षम्यतां देव प्रसीद परमेश्वर ॥४२॥ हे देव ! जो अक्षर या पद छूट गया और कही मात्रा छूट गयी तो सब क्षमा करो और हे परमेश्वर ! हमपर प्रसन्न हों ।। ४२ ॥ ॥ इति श्री पुष्पदन्तविरचितं शिवमहिम्नः स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।। .. फल श्रुतिस्तथा ग्रन्यप्रशस्तिश्च प्रकाश्यते । ग्रन्थकृष्नाम च श्लोकैरसुरेत्यादिमिः शिवम् ॥ १॥ "असुरसुरमुनीन्द्र." इत्यादि श्लोक मे फलश्रुति का एव ग्रन्थप्रशस्तिका प्रकाशन किया गया है । तथा ग्रन्थकारका नाम-निर्देश एव अन्य विशेषताओ का वर्णन भी किया गया है। ।। इस प्रकार यह व्याख्या यहाँ समाप्त होती है ।

प्रवचनसंदर्भ यद् व्याख्यात विस्तरेण तद्धि मया। लोकानामनुवयं श्लोकः सक्षिप्य संदृब्धम् ॥१॥ कथाप्रवचनके सदर्भमे मैंने विस्तारसे जो बताया था, लोग उसका अनुवर्तन कर सकें एतदर्थ लोकसेवार्थ इसे सक्षेप कर श्लोकोमे सगृहीत किया ॥१॥ सकल श्लोकरहस्य वस्तु कात्यायनस्य कः प्रभवेत् । शेषो वक्त्रसहस्राचप्टे यस्य किल वाक्यम् ॥ २॥ कात्यायनमुनिके श्लोकोका सपूर्ण रहस्य भला कौन कह सकता है ? जिनके वाक्य ( वातिक ) की शेप भगवान (पतञ्जलि ) हजारो मुखोसे व्याख्या करते है ॥२॥ कात्यायनाय मुनये वररुचये नौमि पुष्पदन्ताय । येन विचितं रुचिरं परमं स्तोन शिवमहिम्नः ॥ ३ ॥ कत्यायन, वररुचि आदि नामवाले पुष्पदन्तको हम नमन करते हैं जिन्होंने सुन्दर उत्तम शिव महिम्न स्तोत्र की रचना की ॥३॥ पाणिनिरनेन निकृतः शिवमाराध्याप परमविज्ञानम् । व्याकरणशास्त्रमकरोत् पुनरपि निकृतः क्वचिदनेन ।। ४ ।। तहि महेश्वररोषाद् म्रष्टोऽयं वररुचिनिजमहिम्नः। स्तवनं महिन्न ईशितुरकरोत्किल दिव्यदिव्यमिदम् ॥ ५॥ पाणिनिने मूढ होनेसे इनसे तिरस्कृत होकर शिवजीकी तपस्याकी थी और महान ज्ञान प्राप्त किया। फिर अष्टाध्यायी व्याकरण शास्त्रकी रचना की । लेकिन फिर भी एक बार शास्त्रार्थम कात्यायनने उन्हे परास्त किया था। तब भगवान् शकर रुष्ट हो गये और हुकार किया तो कात्यायन अपनी महिमासे भ्रष्ट हो गये। उस महिमाको पुन प्राप्त करनेके लिये शकरका दिव्यातिदिव्य यह महिम्न स्तोत्र बनाया ॥४५॥ सततकृतनुतितुष्टाल्लब्ध्वा ज्ञान महेश्वरादिव्यम् । तेनादिष्टश्चक्र व्याकरणे यातिकप्रन्यम् ॥६॥ २५ ३०६ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् " काचान्वेषीकी मणिप्राप्तिवत् महिम्नस्तुतितुष्ट शंकरसे कात्यायनने दिव्यज्ञान प्राप्त किया। निरपेक्ष होनेपर भी शंकरादेश पाकर अष्टाध्यायी पर वातिकग्रन्थरचना की।॥ ६ ॥ तस्यास्य शिवमहिम्नः स्तोत्रस्यात्यन्तदिव्य दिव्यस्य । अकरोदतिसंक्षेपाद त्ति जयमङ्गलाचार्यः ।।७॥ इस अत्यन्त दिव्य महिम्नः स्तोगकी अत्यन्त संक्षेपसे यह वृत्ति जय- मंगलाचार्य ने लिखी । ( कथाओंका विस्तार पुराणोमें होनेसे श्लोकमूचित कथाओंका संक्षिप्त वर्णन ही यहांपर है ) ॥ ७ ॥ अनया तुप्यतु भगवान् वृत्त्या निजपादपङ्कजापितया। अनुगहात्यपि सकलान् प्रसादतः स्वान् महेश इति ॥ ८ ॥ इस वृत्तिसे जो उनके संमुस समर्पित है, शंकर भगवान् संतुष्ट हों और प्रसादसे स्वजन परअनुग्रह करें।।८॥ इति श्री जयमङ्गलाचार्य ( महामण्डलेश्वर काशिकानन्दयति )- विरचितं महिनःस्तोत्रस्पन्दवातिकम् ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।। ॐ तत्सत २ थोपुष्पदन्ताचार्यविरचितम् महिम्नःस्तोत्रम् महामण्डलेश्वर स्वामी श्रीकाशिकानन्दगिरि कृतसक्षिप्तानुवादसमेतम् गजाननं भूतगणाघिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारभक्षणम् । उमासुतं शोकविनाशकारक नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम् ।। गजाननं -गजवदन (हाथी के समान मुखवाले); भूतगणाधिसेवितं- भूतगणो के द्वारा अत्यन्त सन्तत सेवित कपित्यजम्बूफलधारुमक्षणं कथ तथा जामुन के फलों को सानद खानेवाले शोकविनाशकारकं शोकहारी उमासुतं = पार्वतीपुत्र विघ्नेश्वरपादपङ्कज परमपूज्यविघ्नेश भगवान् को (गणेशजीको ) नमामि=मैं प्रणाम करता हूं। श्री पुष्पदन्त उवाच महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी स्तुतिय ह्मादीनामपि तदयसम्मास्त्वयि गिरः। अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिफरः।। १॥ शिवपक्ष हर-सकलतापहारी हे शकर ! ते-आपकी महिन्न महिमा की पारं- सीमाको अविदुषः = न जानने वाले (हम जैसो) की स्तुतिः स्तुति यदि- यदि ते महिम्न. असदृशो = आपकी महिमा के अनुरूप न हो तत्-तो ब्रह्मादीनां ब्रह्मा आदि की अपि भी गिरः वाणी स्तुति त्वयि-आपके विषय मे अवसना:-अयोग्य ही है अथ-यदि यह कहे कि स्वमतिपरिणा- मावधि-अपनी बुद्धि के परिपाक के अनुसार गृणन् =स्तुति करते हुए सर्व. सभी अवाच्यः = अनुपालम्भनीय है, आक्षेप योग्य या अपवादयोग्य नही हैं तो मम अपि-मेरा भी स्तोने =स्तुति विषयक ( स्तुति करनेका) ३८८ महिम्नः स्तोत्रम् - एप:-यह परिकर: आरम्भ-प्रयल निरपवादः-अपवादयोग्य नहीं है उचित ही है ॥१॥ विष्णुपक्ष अयि हे पर- मलक्ष्मीवति भगवान् ! ब्रह्मादीनां ब्रह्मा आदि की गिरः वाणी का पारंपार विदुपः-जानने वाले ते=आपकी महिम्न. महिमा की यदि यदि स्तुति.-स्तुति हो तत-तो वह ते महिन आप की महिमाके असदृशो-अननुत्प एव अयसन्नाः =अतितुच्छ अपि = भी अस्तु=भले हो; वह भी सार्थक ही है । क्योकि अथ इस के बाद-ऐसी स्तुति के फलस्वरूप अतिपरिणामावधि अतिमात्र ( अग्नी शतिसे भी अधिक ) स्वं=अपनी (भगवान् की ) गृणन =स्तुति करनेवाले (पूर्वोक्त) सर्वः सभी ( चाहे ब्रह्मा हो चाहे मूट) ते आप के लिये प्रावाच्यः - अभिमुख संभापणीय हो जाते हैं ( जैसे प्रह्लाद नाग्दादि से आप वात- चीत सभी करते थे ) ऐसे स्लो स्तुति करने वाले के लिये अपि= भी मम-मेरा अह ( अह) सदा एप.=यह अनिरपवाद =निःशेप अपवाद-दूपण रहित परिफरः स्तुति नमस्कारादि है ( आप के लिये तो सदा है ही)॥१॥ प्रतीतः पन्थान तय च महिमा चाइमनसयो- रतद्ध्यावृत्त्या यं चफित्तमभिपत्ते श्रुतिरपि । स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः फस्य न वचः ।।२।। शिवपक्ष तब आपकी महिमा महिमा वाड्मनसयो -वाणी और मन का पन्यान-मार्ग को अतीत च-अतिक्रमण किये हुए ही है । अर्थात् वाणी और मन का अविषय है यह निश्चित हैं । अतघ्यावृत्त्या = अनात्मा के निषेध द्वारा या भागत्याग द्वारा य=जिमको चकित भीत से श्रुतिः अपि-वेद भी प्रभिधत्ते कहते हैं स ऐसे आप कस्य पिम के स्तोतव्यः स्तोतव्य हैं, अर्थात् ऐसे वाणी और मन के अविषय आप की स्तुति कौन कर सकता है ? कोई नहीं । कतिविधगुण =कितने ही प्रक र के गुण वाले आप हैं ? अर्थात् अनन्त गुण है या निर्गुण है। जिस के शियय::विषय आप हैं ? अर्थात् किसी के विषय नही हो सकते । तुम्हा, किन्तु अर्वाचीने (लीलोपात) नवीन साकार पदे स्वरूप में कस्य गनः-किस वा मन हरिहरपक्षीयानुवादसहितम् ३८९ न पतति-नहीं लगेगा ? अति मर का लगेगा फस्य नचा=किसकी वाणी न पति नहीं पवृत्त होगी? अथात् राव की प्रवृत्त होगी॥२॥ - दूसरा र्थ तय-आप की महिमा महिमा वादमनसयोः वाणी और मन के पन्यानं अतीतः अगोचर है । अतव्यावत्या कार्यप्रञ्चके भेदसे फितं= मानो कि भीत हो ऐसे में जिस ( आप ) को धृति अपि =वेद भी अभिधत्ते-पहते हैं। अर्थात् भगयान् भी भयभीत है कि ये अज्ञानी जन मुझ से अलग कर के जगत् को देख न ले तभी तो यक्ष के रूप मे देवताओं के सामने आये। स-वह आप फस्प स्तोतव्यः-किम के लिये स्तुति विषय हो सस्ते है ? कौन आप की स्तुति कर साता है कोई नहीं । कति विधगुणः कितने ही आप के गुण है ? अर्थात् अनन्त है । फस्य= किस के विषय विषय आप हो सकते हैं ? किसी के नहीं। तु=किन्तु अर्वाचीने नवीन अर्थात् भक्तानुग्नहार्थ अवतागदि स्पसे गृहीत पदे-रूप मे कस्यविस का मन -मन अप-ततिवादविपयो से सकुचित अर्थात् विमुख न ( मवति न होगा ? और कस्य- किसकी वच. वाणी अप-तति - इतर विषयों को छोडकर भगवन्मान मे सकुचित न (मपति )=न होगी? ॥२॥ मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः तव ब्रह्मन् कि यागपि सुरगुरोयिस्मयपदम् । मम त्येतां वाणी गुणकथनपुण्येन भवत. पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन युद्धिव्यवसिता ॥ ३ ॥ शिवपक्ष ब्रह्मन-हे भगवन् । मधुस्फीता -माधुर्यादिशब्दालकारयुक्त परमं अमृतं मोक्षरूपी अमृत के हेतु होने से अर्थालकारपूर्ण वाच वेदवाणी को निमितवत =नि श्वास से प्रकट करनेवाले तव = आप को सुरगुगे.- ब्रह्मा की अपि=भी वार-वाणी विस्मयपदं विस्मय उत्पन्न करनेवाली कि होगी क्या? कदापि नही। मेरे जैसो की तो बात ही क्या ? अतः आप को विस्मय कराने के लिये नहीं तु किन्तु पुरमथन-हे त्रिपुरारी! भवतः= आप के गुणकयनपुण्येन गुणगान के पुण्यसे मम एतां वाणी मेरी इस वाणी को पुनामि-पविन करूँ इति=इस अभिप्राय से अस्मिन् = अर्थ स्तुति कार्य मे मम=मेरी बुद्धिः बुद्धि व्यवसिता=प्रवृत्त

!
महिम्नः स्तोत्रम्
विष्णुपक्ष
पुरमयन=जिसका मन्थन हुआ है ऐसा क्षीर सागर, अथवा जहां
दधिमन्थन होता है ऐसा गोकुल जिसका आवास स्थान है ऐसे है भगवन् !
ब्रह्मन् -हे परमेश्वर ! वाचः समस्त वाणी का परमं निरतिशय । गहरे
से गहरा ) अमृतं सार निर्मितवतः=(निर+मितवतः ) जाननेवाले
सुरगुरोः-हिरण्यगर्भादि सभी देवो के आचार्य तव -आपको मधुस्फीता-
माधुर्य से व्याप्त,अत्यन्त मधुर वाक् अपि सरस्वती देवी भी विस्मयपदं -
आश्चर्य चकित करानेवाली कि हो सकती है क्या ? जब सरस्वती देवी
स्वय आप को आश्चर्यचकित नहीं करा सक्ती तो हमारी बात ही क्या ?
इस लिये मैं स्वयं स्तुति करने मे प्रवृत्त नहीं हुआ हूं। मैं तो यहि समझता
हूं कि,- ममत्वे ममता मोह में पड़ी हुई ( मेरी ) तांउस वाणों -
वाणी को गुण कयन-पुण्येन अपने गुणानुवाद के पुण्य से पुनामि-पवित्र
किये देता हूं इति अस्मिन = इस अर्थ प्रयोजन को लक्ष्य रखकर भवतः-
आप की बुद्धिः-बुद्धि (मायोपाधिवृत्ति) व्यवासिता=(हम से स्तुति कराने के
लिये प्रवृत्त हुई है । अर्थात् भगयान यह सोच कर कि मेरे भक्त की वाणी
को पवित्र करा दू, हमारे से खुद स्तुति कराते है। यह भगवान् की अहैतुकी
कृपा है ।। ३॥
तवैश्वयं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुपु ।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणी
विहन्तुं व्याक्रोशी विदधत इहैके जडधियः ॥ ४॥
परद-सकलाभीप्टप्रद हे भगवन् ! यत्-जो तव=आपका जग-
दुदयरक्षाप्रलयकृत् जगत् की सृष्टि रक्षा एव सहार करने वाला त्रयीवस्तु =
तीनो वेदो का परम तात्पर्यार्थस्वरूप एव तिसृषु-तीन गुणभिन्नासु=
सत्त्वादिगुणविभक्त तनुपु-शरीरो में वह्मा, विष्णु, महेश्वर के रूपमे
ध्यस्तं विभक्त ऐश्वयं-ऐश्वर्य है तत=उस को विहन्तुं
'-खण्डन करने के
लिये एफे कुछ जडधियः जडबुद्धि-मूढ अस्मिन्-इस जगत में भी
अमन्याना-जिनका कल्याण न होना हो ऐसे लोगो को रमणीया=अच्छा
लगने वाला किन्तु अमरणी अशोभन व्याक्रोशी आक्षेपवचन इह-इस
संसार में विवधते=हते रहते है ॥४॥

हरिहरपक्षीयानुवादसहितम् दूसरा अर्थ वरद सकलामीप्टप्रद है भगवन ! यत्-जो तब आप का जगदुदयरक्षाप्रलयकृत =जगत की उत्पत्ति, रक्षा और प्रलय करनेवाला अयोवस्तु ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा मामवेदरूपी तीनो वेदो मे परम तात्पर्य से पतिपाद्य वस्तु एव गुणभिन्माणु =सत्यगुण, रजोगुण और तमोगुण से भिन्न तिसृष-तीन तनुप =शरीरो में व्यस्तविभक्त अर्थात् ब्रह्मा विष्णु और शिव के रूप में स्थित तत् =यह प्रसिद्ध ऐश्वर्य - ऐश्वर्य है अस्मिन् = उस ऐश्वर्य के बारे में अभयाना-जिन का कल्याण कभी नही होना है उन मे भी जडधियः जो जइमति है उनी अरमणी-अशोभन व्याक्रोशी -आक्षेपवचन ( वनवास ) को विहन्तुं सण्डन करने के लिये इह-इस संसार में एके कुछ महान् लोग रमणीया शोभन व्याक्रोशी शास्त्रार्थ विवधते -करते है। फिमोहः फिफायः स पलु फिमुपायस्निभुवनं विमाधारो धाता सृजति फिमुपादान इति च । प्रतक्यैश्वर्यं त्वरयनवसादुःस्थो हतधियः कुतर्कोऽयं काश्चिमुखरयति मोहाय जगतः ॥५॥ सः खलु वह [जिस यो तुम मानते हो] पाता=परमेश्वर पिमीहः कैसी क्रिया करता है कि काय - उस का शरीर कौनसा है किमुपाय.. कोन उपकरण सामग्री उममे पाम है विमाधार. आधार उस का क्या है घऔर किमुपादानः= :=उपादान वस्तु उसके पास क्या हैं जिन से कि वह त्रिभुवन-तीनो लोको की सृजति - सृष्टि करता है इनि-इम प्रकार का त्वयि आप के बारे मे अतक्यश्वर्य-जिन का ऐश्वर्य कि तर्क का विषय नही है, अनवसरदुःस्थ अवकाशशून्य अत एव दु स्थित अय-यह कुतर्कः-कुतर्क जगतः लोगो को मोहाय-भ्रान्ति में डालने के लिये काश्चित् =कुछ हतधियः =मदबुद्धियो को या दुर्बुद्धियो को मुखरयति = वाचाल बना देता है ।। ५ ।। मजन्मानो लोकाः किमवयवग्न्तोऽपि जगता- मधिष्ठतार कि भवविधिरनादृत्य भवति । अनोशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो यतो मन्दास्त्वा प्रत्यमरवर सशेरत इमे ॥६॥ अमर-वर-हे महादेव ! प्रत्यक्वन्तःसावयव अपि भी लोका- जगत् कि क्या अजन्मान जन्मरहित हो सकता है ? जगतां जगत की G ३९२ महिम्नः स्तोत्रम् भव-विधि:--उत्पत्ति क्रिया अधिष्ठातार = कर्ता की अनाहत्य- अपेक्षा किये विना किं भवति = क्या हो सकती है ? वा-और यदि अनीश ईश्वर से अन्य कोई कुर्यात् - बनावे तो भुवन-जननेजगत् को उत्पन्न करने मे क परिकर:-क्या सामग्री हो सकती है ? यत:-इस लिये मन्दाः = मूढ ही त्वां प्रति = आप के बारे मे ( भगवान के बारे मे ) इमे-ये संशेरते सशय करते हैं ( ईश्वर है या नहीं इत्यादि सराय करते है ।। ६ ।। त्रयी सांख्य योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति प्रमिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च । रुचीनां वैचित्र्याजुकुटिलगानापथजुषां नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णय इव ।।७।। त्रयी-तीन वेद सांख्य साख्यगास्न योग योगशास्न पशुपति- मतं पाशुपतशास्त्र । शैवागम ) वैष्णव-वणशास्त्र ( पाचरान ) इति = इत्यादि प्रभिन्न भिन्न भिन्न प्रस्थाने सिद्धान्तप्रतिपादकशास्त्रोमे इद= यह परं श्रेष्ठ है पथ्य = हितकारी है अदः पर पथ्य-वह श्रेष्ठ है, हित. कारी है इति च=ऐसे ऐसे रुचीनां रुचि वैचित्र्यात् =विचित्र होने से ऋजु कुटिल नाना पयजुपा-सीधे और टेढे नाना पथोषा सेवन करने वाले अपनाने वाले नृणालोगो के लिये वास्तव मे त्व=आप एकाएक ही गम्यःप्राप्य है इव-जैसे ऋजुकुटिलनाना पथ जुषा-सीधे टेढे नाना मार्ग में चलने वाले पयसा=गगा यमुना आदि जलके लिये अणवः समुद्र ही एक-एक गम्यः -प्राप्य है ॥७॥ महोक्षः खट्वाङ्गं परशरजिनं भस्म फणिन कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपरकाणम् । सुरास्ता तामृद्धि दधति तु भवद्भूप्रणिहिता नहि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥८॥ शिवपक्ष वरद-सकलाभीष्टप्रद हे भगवान् । महोक्ष =बूढा बैल खट्वा-अङ्ग खटिया का अग ( एकशस्त्र ) परशु परशु अजिनमृगचर्म भस्म=भस्म फणिन =सर्प च और कपाल खोपडी इति इयत-इतनी तव=आप की तन्त्र उपकरण-कुटुबभरण की सामग्री है । तु-कि तु सुरा -देवता भवभ्रूप्रणिहिता-यापको भ्रूकुटि के चालग से ही प्राप्त ता ता- उस उस ऋद्धि-समृद्धि को दधति-धारण करते हैं हि= यह यथार्थ है कि स्वात्मा-

%
3D
हरिहरपक्षीयानुवादसहितम्
राम=अपने आप में रमण करनेवाले को विषयमृगतृष्णाविषयरूपी
मृगमरीचिका न भ्रमयति = भ्रान्ति मे नही डाल सकती ॥ ८॥
विष्णुपक्ष
वरद = सर्वाभीष्टप्रद भगन् । मह = तेजस्वरूप अक्ष = चक्र, क-
पालं =जल से पलने वाले शख और पद्म भरम फणिन
=भस्म सदृश शुभ
वर्ण शेषनाग के अनिनं चर्म तथा- अङ्ग अङ्गरूपी खना- शय्या
(बिस्तग), परशु = परशुरामावतार में परशु इति इयत्-इतनी ही तव =
आप की तन्त्रोपरकरण-निर्वाह सामग्री है तु-विन्तु सुरा =देवता
भवत्-5 प्रणिहितां =आप के ध्रुवुटि चालन से सपादित ता ता उस उस
ऋद्धि-सपति-समृद्धि को दधति = धारण करते है हि-यह सच है कि
राम-जिन मे योगी रमण करते है ऐसे आनदस्वरूप राम अर्थात् भगवान्
को स्वात्मा-जिस की आत्मा स्वय भगवान है वह विषयमृगतृष्णा-माया
मरीचिका न भ्रमयति=भ्रमित नहीं करा सक्ती ।। ८॥
ध्रुवं कश्चित् सर्व सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो प्रोव्याघ्रौव्ये जगति गति व्यस्तविषये।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तेविस्मित इव
स्तुवजिमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ॥९॥
पुरमथन हे त्रिपुगरी । फश्चित कोई ( साख्यमतानुयायी ) सव
इदं = समस्त इस जगत को ध्रुवं नित्य-सत् गति= कहता है। अपरः
तु-दूसरे ( वौद्धादि ) तो सकलं-सवको अध्रुव= अनित्य-असत् गदति -
कहते है । परः- अन्य (नैयायिकादि ) समस्ते अपि=सारे ही एतस्मिन् =
इस जर्गात जगत में प्रौव्य-अनौध्ये-नित्यता और अनित्यता व्यस्त-
विषये- अलग अलग वस्तुओ मे गति=कहते है । अह में विस्मित इव =
अश्चर्यचकित सात =इन सब वादो के द्वारा ही त्वा=आपकी स्तुवन्-
स्तुति करता हुआ जिमि न खलु = लज्जित नहीं होता। ननु = क्यो कि
मुखरता=वाचालता धृष्टा=ढीठ होती है ॥ ९॥
तवंश्वयं यत्नाद्यदुपरि विरिश्चो हरिरथ
परिच्छेत्तुं यातावनलमनलस्कन्धवपुष ।
ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगणयां गिरिश यत्
स्वयं तस्थे ताभ्या तव विमनुत्तिनं फलति ॥ १० ॥

महिम्नः स्तोत्रम् १०॥ शिवपक्ष गिरिश- कैलामवासी हे शंकर ! अनल-स्कन्ध वपुषः- तेज.पुज- पारीरधारी तव=आप के ऐश्वयं-स्थूलस्वरूपस्पी ऐश्वर्य को परिच्छेत्तु मापने के लिये यत्नात प्रयत्न से विरिश्चः ब्रह्माजी उपरि ऊपर और हरि = विष्णु भगवान् अध: नीचे यातौ गये यत् अनल-किन्तु असमर्थ जो हुए ततः=उम से अन्य उपाय छोड कर यत्-चूकि भक्ति श्रद्धा-मर- गुरुगृणम्या= भक्ति और श्रद्धा के अतिशय से गौरवपूर्ण स्तुति करते हुए वे रहे अत. ताभ्यां उन दोनो को दर्शन देने के लिये स्वयं = स्वय ही आप तस्थे प्रगट हो गये। सच है कि तव-आपकी अनुपत्ति =सेवा भक्ति कि न फलति - क्या फल नहीं देती। दर्शन पर्यन्त सभी फल देने वाली है विष्णुपक्ष गिरिश-गोवर्धन पर्वत पर लीलाशयन करनेवाले या समुद्रमथन के समय मदराचल को पतला बनाने वाले हे भगवन् । अनलस्कन्धवपुषः%3D तेज पुजात्मक शरीरधारी तव=आपके ऐश्वयं =ऐश्वर्य को परिच्छेत्तुं-मानो मापने के लिये विरिश्वः ब्रह्माजी उपरि ऊपर ब्रह्मलोक मे हरिः सर्प- शेषनाग अधः नीचे पाताल मे यातो-पहुचे । यत् किन्तु अनल= असफल हुए। यत् ततः=इसलिये भक्ति-श्रद्धा-भर-गुरु-गृणधा- भक्ति और श्रद्धाके अतिशयसे बड़ी स्तुति करते हुए स्व य ताम्या= वे अपने आप तस्थे स्थित हुए, ब्रह्मलोक से ऊपर और पाताल से नीचे जाने का पुन: साहस नहीं किया कि क्या तव-आपकी अनुवृत्ति = सेवा न फलतिफलित नहीं होती? अवश्य होती है ।। १०॥ अयत्नादापाद्य त्रिभुयनमवरव्यतिकर दशास्यो यद् वाहूनभृत रणवण्डूपरवशान् । सिर-हाक्षेपारनिता पम्माहवले: स्थिरायास्त्वद्भवतास्त्रपुरहर विस्फूजितमिदम् ॥ ११ ॥ शिवपक्ष त्रिपुरहर-हे त्रिपुरान्तक शकर । दश-आस्यः-रावण त्रिभुवन तीनों भुवनो को अपनात्अनायास ही अवरव्यतिफर-वैरकारणरहित बापाच-बनाकर अपने वाहून् = वाहुओ को रणकण्डूपरवशान युद्ध करने मी खुजली से परेशान रो यत् = जो अभूत-पिया इद-यह तो शिरः D हरिहरपक्षीयानुवादसहितम् पद्मश्रेणी-रचित-चरणा-म्भोरुहबले अपने नौ शिगेको कमल समान आपके चरणकमलो मे चढा कर की गयी स्थिराया::स्थिर त्वद्भवते: आपकी भक्ति का ही विस्फूजितः =प्रभाव है ॥ ११ ॥ विष्णु पक्ष निपुरहर रजाप्रत् स्वप्न एव सुपुप्तिस्पी तीनो पुरी को हर कर मोक्ष प्रदान करने वाले हे भगवन् विष्णो । दशास्य =रावण निभुवन = तीनो भुवनो को अयत्नात् = अनायास ही अवैरव्यतिकर- वैरकारण रहित आपाद्य बनार बाहून् = अपन बाहुओ को रणकण्डूपरवशान् = रण की खुजली से हैरान पत्-जो अभृत=बनाया [ तत् = वह स्थिराया = जन्मजन्मान्तरस्थायी त्वद्भक्ने =आपकी भक्ति का ही रिफूजितं- प्रभाव है [ तथा और ] बले बलि के शिर पन-धेणी-रचित-चरणाम्भो. रहकमल समान शिर रूपी नि श्रेणिका पर अपने चरण कमलको रसने वाले हे परमात्मन् । इद- यह (च-भी-] अर्थात् वलि के याग मे जाना, तीन पग जमीन मागना, दो पगमे सारे जगत्को मापना और अन्तमे तीसरा पग वलि के सिरमे रसना यह सभी बले = बलि को को हुई स्थिराया सुदृढ त्वद्भवते =आपकी भक्ति का ही विस्फूजित-प्रभाव है ।। ११ ॥ अमुष्य त्वत्सेवासमधिगतसार भुजवन बलात् फैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः। अलभ्या पातालेऽप्यलसचलिताडगुष्ठशिरसि प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्वमुपचितो मुह्यनि खल' ॥ १२ ॥ शिवपक्ष स्थत्-सेवा-आपकी सेवा से समधिगत-सार-वल यो प्राप्त हुए भुज-वन-जगलके सदृश बीस हाथो को बलात-बलपूर्वक त्वदधिवसतो आपके वासस्थान लागे अपि-कैलास पर्वत में भी विक्रमयत - विक्रमण कराते हुए अयात् इस बैलास पर्वत को ही उसाड वर लका ले जाऊ इस उद्देश्य से हाथों से कैलास को उसाइते हुए अमुष्य उम रावण की प्रतिष्ठा-स्थिति स्वयि जय आप भलस-धीमे से घलिनाडगुष्ठशिरशि- अगूठे ये अग्रभाग को चलाया अर्यात् धीमेसे पाव के जगूठे से पलाम पर्वत को दवाया, तब पाताले अपि-पाताल में भी अलभ्या मामात दुर्लभ होने लगी अर्थात् रावण पाताल मे जागर दय गया। प्रगम्यह बात सत्य है है कि उपचित सल सपन्न हुआ मल मुहाति विवरहीन हो जाता है ।। १२ ।।

महिम्नः स्तोत्रम् विष्णुपक्ष फैलासे = येलि अर्थात् केवल क्रीडाके निमित्त असि-नन्दकखग धारण करनेवाले है भगवान् ! त्वत्-आपके मधि-- अधिकृत वसतो अपिबासस्थानके भी निमित भगवद्वासस्थान त्रिलोक के निमित बलात= बलपूर्वक अनधिकृतरूपसे भूजयन-हम्तोदक त्यासेा समधिगत सार=जो कि आपके करसमर की सेवा से वस्तुनः सौभाग्यतिशय प्राप्त हो रहा था विक्रमयतः= देते हुए अमुप्य= उस राजा बलि की अलम्या प्रतिष्ठा = अलभ्य प्रतिष्ठा महती प्रतिष्ठा पाताले अपि-पाताल में भी आसीत् =हो गयी थी त्वयि जब आप ने अलसालताडगुप्ठशिरसि - तीसरा पग मापने के लिये धीमे से राजा बलि के सिर मे पाव का अगूठा रखा। वलि की त्रैलोक्य सम्पत्ति इस लिये छीनी कि.--बल:-असुर उपचित.=अधिकार सम्पन्न होने पर 5 व=निश्चित मुह्यति-विवेक खो देता है ।। १२ ।। यद्धि सुनाम्णो वरद परमोच्चरपि सतो- मपश्चक बाणः परिजनविधेतत्रिभुवनः । नतचित्र तस्मिन् वरिवसितरित्वच्चरणयो. नं फस्या सन्नत्यं भवति शिरसस्त्वय्यधनतिः।। १३॥ शिवपक्ष वरदसर्वाभीष्टप्रद भगवन् । परिजन-सेवको के समान या अपने सेवको के ही विधेय= अधीन त्रिभुवन:= जिसका त्रिभुवन हो गया ऐरो बाणः = वाणासुर ने सुत्राम्णः=इन्द्र की परम-उच्चैः अत्यन्त उन्नत सतीम् अपि होनी हुई भी ऋद्धि-सम्पत्ति समृद्धिको यत=जो अधश्चके - नीचा दिखाया तत= बह त्वच्चरणयो - आपके चरणो मे वरिवसितरि- नमस्कार करने वाले तास्मन - उस बाणासुर मे न चित्र = कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योकि पिपिआपके सामने शिरस: शिर अवनतिः नवाना कस्य-किस उन्नत्यं =उन्नति के लिये न भवति= समर्थ नहीं है ? ॥ १३ ॥ विष्णुपक्ष वरद = सर्वाभीष्टप्रद परम-लक्ष्मीपते ! सुत्राम्णः-इन्द्र पा परिजन विधेय त्रिभुवनः-निभुवन को सेवकके समान वशवर्ती बनानेवाला हरिहरपक्षीयानुवादसहितम् ३९७ वाण =शर गध सती अपि देयो के कारण नीचे गयी हुई भी ऋद्धि- राज्यादि सम्पत्ति को यत = जो उच्च = ऊंची चक्रे किया तत-वह त्वच्चरणयो = आप वे चरणा में परिवसितरि = प्रणाम करने वाले तस्मिन = उस इन्द्र मे न चित्र = कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योकि स्वयि आपके सामने शिरस अवनति =सिर झुकाना कस्य उन्नत्ये - किस उन्नति के प्रति न भवति - कारण नहीं होता ॥ १३ ॥ अकाण्डब्रह्माण्डक्षयक्तिदेवासुरकृपा- विधेयस्यासीद्यस्त्रिनयन विष सहृतवत । स फल्माप कण्टे तय न फुरुते थियमहो विकारोऽपि श्लाध्यो भुवनमयमगव्यसनिन ॥ १४ ॥ शिवपक्ष त्रिनयन=प्रिनेनधारी भगवन् ! प्रकाण्ड-असमयमे ही ब्रह्माण्ड-क्षय= ब्रह्माण्ड का नाश होते देखकर रक्ति= भयभीत हुए देव असुर-कृपा- देवता और अमुगे के प्रति उत्पन हुई कृपा के विधेयस्य वशीभूत (होकर) विष={ अमृतमथन के समय । जहर को सहतवत तव=पीनवाले आपके फण्ठे-कण्ठ मे च वल्माष = जो कारिमा पासोत हो गयी स पल्माप - वह कलिमा तब कण्ठे --आपसे गले मे धिय न कुरुते म-शाभा न वढाये ऐसी बात नही है अहो ओह । यह एक निश्चित यथ्य है कि भुवन-भय- भङ्ग - जगत् का भय नष्ट करना ही व्यसनिन =जिसका व्यसन है उसके लिये विकार अपि= विकार भी, भद्दा रग भी श्लाध्य = प्रशसनीय हो जाता है ।। १४॥ विष्णुपक्ष अकाण्ड-ब्रह्माण्ड-क्षय-असामयिक ब्रह्माण्डप्रलय से चकितदेवासुर- कृपा=भयभीतदेवादि के प्रति कृपा-विधयस्य परवश हुए विप सहत- वत =यज्ञवाराह के रूप मे जल को सोखने वाले तव आपके गरीर मे य कहनाप -जो कीचड लगा स -वह कण्ठे श्रोताओ के कण्ठ में श्रिय न कुरुते न शोभा न कर एसी बात नही । यह निश्चित है कि भवन मयमङ्ग यसनिन = जगत् का दुख दूर करना जिसका व्यसन है उसका विकार अपि-विकार भी श्लाघ्य -स्तुतियाग्य हाता है ।। १४ ।।

- ३९4 महिम्नः स्तोत्रम् प्रसिद्वार्था नेय क्वचिदपि सदेवासुरनरे निवर्तन्ते निस्पं जगनि जपिनो यस्य विशिखाः। सपनोश स्वामितरसुरसाधारणमभूत् स्मरः स्मर्तव्यात्मा नहि वशियु पथ्यः परिमयः ॥ १५ ॥ शिवपक्ष ईश-हे परमेश्वर जयिनः%विजयशील यस्य-जिसके विशिखा:- बाण जगति= =जगत में सदेयासुरनरे=जहां कि देवता, असुर, या मनुष्य कोई भी हो परनिद् अपि कहीं भी नित्यं कभी भी असिद्धार्याः अपना कार्य सिद्ध किये विना नैव-नही ही निवर्तन्ते लौटते नहीं-विफल नहीं होते सः वह स्मरः = कामदेव त्वां आपको इतरसुगसाधारणं अन्य देवताओं के बरावर पश्यन् = देखने लगा, और फल यह हुआ कि वह स्मर्तव्यात्माः स्मरगीयमात्र अभूत्रह गया। अर्थात् भगवान् शंकर उसे भस्म कर स्मरणावप कर दिया। हि=यह वात निश्चित है कि पशिषु-जिते- न्द्रियो का परिभवः-तिरस्कार न पश्यः =हितकारी नहीं होता ॥१५॥ विष्णुपक्ष इतरसुर=सर्वविलक्षण हे देव ईश-हे भगवन् ! जयिनः यस्य विजयशील जिसके विशिखाः वाण जाति-जगत में सदेवासुरनरे- देवता, असुर, और मनुष्य इनमे पचिदपि नत्यं कही भी हमेशा ही असिद्धार्याः स्वकार्य सिद्ध किये बिना नैव निवर्तन्ते-नही ही लौटते स्मर्तव्यात्मा भगवान् शकर से नष्ट हुआ भी सः स्मर:= वह कामदेव त्वां पश्यन् =आपको देखकर साधारण=आपके समानरूप से अभूत्- (प्रद्युम्न के रूप मे। प्रगट हुआ। हां इतनी कमी जरूर थी कि परिमयः = सबको परिभूत करनेवाला काम वशिषु न हि पथ्यः-जितेन्द्रियो में प्रिय न रहा ।। १५ ॥ मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं पद विष्णो म्यद्भुजपरिघरुग्णण्हाणम् । मुह द्यो दौ स्यं यानिभृतजाताडितटा जगद्रक्षाय त्व नरसि ननु वामैव विभुता ॥ १६ ॥ शिवपक्ष पादाघातात-पांव की टक्कर से महो-पृथिवी सहसा एका एक संशयपद = ( कही फट न जाय ऐसे । सशय को व्रजति प्राप्त होती है - हरिहरपक्षीयानुवादसहितम् विष्णोः पदं विष्णुपद-अन्तरिक्ष भ्राम्यत् भुज-घूमते हुए भुजारूपी परिघ परिघा से रुग्णपीडित प्रहगणं नक्षत्र समूहों से युक्त होकर संशयपदं व्रजनि- संदेहास्पद होने लगता है अनिभृत=बिखरी हुई जटा- ताडित जटाओं से ताडित नटा=जिसका प्रान्त प्रदेश हो ऐसा द्यो:= स्वर्गलोक दौस्प्यं =टिका कठिन हो जाय ऐसी स्थिति याति प्राप्त होने लगती है। त्वं = आप जगत-रक्षापं जगत की रक्षा के लिये नटसि= नृत्य करते है ननु आश्चर्य है कि विभुता-प्रमुपना घामा एव%3 विलक्षण हो होता है ॥ १६॥ विष्णुपक्ष आघातात् आघात करने वाले दुष्ट महोपात-राजाओ से जब सा=वह महो-पृथ्वी सह साथ साथ ( आघात के साथ ) सशयपदं: संकट को अति प्राप्त होती है भ्राम्यद्भजपरिघरुग्णग्रहगणं घुमने हुए राक्षसादि के हस्तपरिघ से सोमपात्रादि ग्रहगण का तोडफोड जहां हो ऐसा जब विष्णोः पद - यनस्थान होने लगता है प्रनिभृतजट-पाखण्डववेषधारी आताडिततटा-जिसका खण्डन करें ऐसा द्यो.= स्वर्गलोक जव मुहा-बार वार दौस्थ्यं याति-संशयास्पद होता है तब त्व-आप जगदक्षायै= जगत् की रक्षा के लिये नटसि =नट के समान अवतार लेकर आते है। यद्यपि अवतार लिये विना भी रक्षा भगवान् कर सकते थे। बात यह है कि ननु यामय विभुता-प्रभु की लीला विलक्षण ही होती है ॥ १६ ॥ वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः प्रवाहो वारा य. पृषतलघुदष्टः शिरसि ते । जगद् द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि- त्यनेनवोन्नेय धृतमहिम दिव्यं तय यपु ॥ १७ ॥ शिवपक्ष वियत् व्यापी= आकाश में व्याप्त तारागण = नक्षत्रगणो से गुणित : सौगुनी हजारगुनी वढी हुई फन-उद्गम-रुचि = फेन के उद्गम का शोभा से युक्त वारा=जलका य प्रवाह =जो प्रवाह-त्रिपथगामिनी गङ्गा का प्रवाह ते=आपके शिरसि शिर मे पृषत लघु-दृष्ट.-विन्दु के समान छाटा देखा गया तेन=उस (गमा प्रवाहा ने ही जलधि-वलयं अपने जल से पूरित समुद्र को वलय वना कर जगत्-पृथिवी को द्वोपाकार-द्वीप के आकार मे कृत=बनाया । इति अनेन एव- इसी से तव वपु =आपका ४०० महिम्नः स्तोत्रम् शरीर फैमी तपहिम-महिमा युक्त और दिव्य-दिव्य है यह उन्नयं- अनुमान कर सकते हैं ॥१७॥ विष्णुपक्ष तारा-गण-गुणितफेना-तागगणों से जिसमें फेन अधिक हो गये वैसी गंगा की उद्गमचिः- उत्पत्ति से शोभा पूर्ण, वियव्यापी आकाश व्यापी, शिरसि ब्रह्मलोकस्थित य: वारा प्रवाहः-जो जल प्रवाह ते आपने पृपतलघुदृष्टः-विन्दु से भी छोटा देखा था तेन-उस ( जल प्रवाह ) ने जलविधलयं-समुद्ररूपी वलय बनाकर जगत् द्वीपाकारं कृतं-पृथिवी को द्वीपाकार बनाया इति अनेन एव = इससे ही दिव्यं-आकाश में आविर्भा- वित तव धृतमहिम आपका महिमापूर्ण वपुः शरीर त्रिविकम शरीर कैसा है यह उन्नेयं =अन्दाजा किया जा सकता है ॥ १७ ॥ रथः क्षेरणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो रथाने चन्द्राको रथचरणपाणिःशर इति । दिधक्षोस्ते कोऽयं विपुरतृणमाडम्बरविधि- विधेयः क्रीडन्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधिय. ॥१८॥ शिवपक्ष क्षोणी--पृथिवी को रथः रथ बनाया। शतधृति. = ब्रह्मा को यन्ता r=सारथि, अगेन्द्रः - मेरुपर्वत को धनु:-धनुप, चन्द्राको -चन्द्र और सूर्य को रथाङ्गे रथ के दो चक्र अयोऔर रथचरणपाणिः-चक्रपाणि भगवान् विष्णु को शर -वाण वनाया 1 त्रिपुरतृणं-त्रिपुरस्पी तिनके को दिघक्षी :-भस्म करने की इच्छावाले ते=आप इति आडम्बरविधि:- इस प्रकार का आडम्बर करना प्रय= यह = क्या है ? सकल्पमात्र से ही जब कि त्रिपुरनाश कर सकते थे खतृ-हां यह निश्चित है कि विधेय स्वाधीन वस्तुओ से क्लो डन्त्यः- कीला करने वाली प्रभुपिय प्रभुओं की मी न परतन्त्रा =पराधीन नहीं होती ॥ १८॥ विष्णुपक्ष रथ. इन्द्रादि का भेजा गया वह रथ क्षीणीमानो पृथिवी ही था इतना विशाल या । यन्ता-सारथि तो शततिः ब्रह्मा ही था। धनुः धनुष तो अगेन्द्र = मेरुपर्वत ही था । रथाङ्ग -चक्र तो चन्द्राको चन्द्र और सूर्य ही ये शरः-वैष्णवास्त्र तो रथचरणपाणिः-स्वयं विष्णु ही ठहरे ।

हरिहरपक्षीयानुवादसहितम्
४०१
त्रियुरतणं-त्रिकूटशिस राश्रित लंकारूपी तृण को दियोः ते = जलाने के
इच्छुक आप के लिये इति अयं आडम्बरविधिः फ. यह सव आडम्बर करना
क्या है ? क्या इन्द्र रथ न भेजता, सुगीवसस्यादि न होते तो आप रावणादि
को नहीं मार सकते थे? खलु हां यह निश्चित है कि विधेयः क्रीडन्त्य.-
स्वाधीन वस्तुओं से लीला करने वाली प्रभुधियः-प्रभु इच्छायें न परतन्त्राः-
पराधीन नही होती ॥ १८॥
हरिस्ते साहस्र कमलबलिमाधाय पदयो-
यंदेकोने तस्मिनिजमुदहरनेग्रकमलम् ।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसो चक्रवपुषा
त्रयाणां रक्षाय त्रिपुरहर जागति जगताम् ॥ १९ ॥
शिवपक्ष
त्रिपुरहर-त्रिपुरनाशक भगवन् ! हरि. विष्णु भगवान ने ते-
आप के पदयोः= चरणो मे साहस्र-एक हजार कमलबलि = कमलों का
उपहार आघाय-समर्पण कर (पूजा करते थे) एक दिन तस्मिन् उन
हजार कमलों में से एक-ऊने-एक कम पड़ गया तो निज = अपने नेत्र-
फललं-नेत्ररूपी कमल को ही यत्-जो उदहरत निकाल कर चढाया
असो-वही भक्ति-उद्रेक:-अतिशय भक्ति भाव चक्रवपुषा= चक्र के रूप मे
परिणत गतः परिणत होकर अर्थात् वही भक्तिभाव चक्र बन कर त्रयाणां-
तीनों जगतां-लोको की रक्षा रक्षा के लिये जागति आज भी जागृत
हो रहा है ।। १९॥
विष्णपक्ष
त्रिपुरहर जाग्नत्, स्वप्न एव सुषुप्ति रूपी तीनो को हर कर तुरीय
अवस्था को प्राप्त करानेवाले भगवन ! हरिः इन्द्र ने ते-आप के पदयोः=
चरणों मे साहस्र - अपने एक हजार नेत्रकमल-नेत्रकमलरूपी कमललिः
कमलोपहार को यत- जो आधाय=समर्पण कर अर्थात् एक हजार अपने
नेत्रो से भगवच्चरणो का निरन्तर दर्शन कर एकः= अकेला ही अनेतस्मिन-
परलोक मे-स्वर्ग में निज-अपने को उदहरत-ऊपर उठाया-अपना
उतप बढाया असी= यही भक्ति-उद्रेक = भक्ति का प्रभाव चक्रवपुषा-
ऐरावत उच्च.श्रवा आदि संन्यचक्र के रूप मे परिणति गतः = परिणत होकर
प्रयाणां तीनो जगतां लोको की रक्षाय-रक्षा के लिये जागति जागृत हो
रहा है ॥ १९॥

४०२ महिम्नः स्तोत्रम् क्रती सुप्ते जाग्रत् त्वमप्ति फलयोगे तुमतां षय कर्म प्रध्यस्तं फनति पुरुषारापनमते । अतस्त्वां संप्रेक्ष्य क्रतुपु फलदानप्रतिभुवं श्रुतौ श्रद्धा बघ्या दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥ २० ॥ क्रतो म्यागादि कर्म सु-समाप्त होते हैं-नष्ट होते हैं तो भी तुमन-यज्ञ करने वालों को कनयोग स्वादि फल प्रानि कराने के निमित त्यं-आप स्वयं जाग्रत् असिजागृत रहते हैं । पुरुष-आराधनं ऋो भगवान की आराधना बिना प्रध्यस्त आशुविनाशी कर्म-कर्म क्य फलति-भला करो फल दे सकते हैं। अतः इस लिये प्रतुपु-यागादिकर्मों में त्वांआप को फलशतप्रतिभुवं फल देने में जिम्मेदार संप्रे-समझ कर जनः लोग श्रुनी श्रुति में श्रद्धा-श्रद्वा बाबांध कर-रव कर कमन कम करने में कृतपरिकरः प्रवृत्त होते हैं ॥ २० ॥ क्रियादक्षो दक्षः तुपतिरधीशस्तनुभृता- मृषीणामातिाज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः । ऋतुभ्रंशस्त्वत्तः फतुफल विधानव्यसनिनो ध्रुवं कर्तुः यद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥ २१ ॥ शिवपक्ष शरणद-भक्तों को शरण देने वाले हे भगवन् ! क्रियादक्षः यज्ञादिक्रिया में निपुग तुरा गरीर धारियों के प्रयोगः अधिाति-अर्थात् प्रजापति वक्ष: दक्ष स्वयं क्रतुपतिः यजमान, ऋषीणां भृगु आदि ऋषियों की आत्विज्यं ऋत्विक् के रूपमें उपस्थिति, सुरगणा-देवतागण सदस्याः- सदस्य, इन सब बातों के होते हुए भी अथ च ऋतुफलविधान-यागादि क्रिया का फल देने में ध्यसनिनः स्वयमेव चिन्ता करनेवाले त्वत्तः आप से ही क्रतुद्मशः यागध्वंस हो गया । ध्रुवं यह निश्चित है कि श्रद्धाविधरं श्रद्धा के बिना किये गये मखाः यज्ञादि कर्तुः हि-यजमान के ही अभिचाराय नाश का कारण बनते हैं ।। २१॥ विष्णुपक्ष शरणद-शरणागत को शरण देने वाले भगवन् ! क्रिया-दक्ष-उदक्षा क्रियानिपुण तथा उत्तम इन्द्रिययुक्त तनुभृतां शरीरमात्रपोपी दैत्यों के या दीनजनपोपी दानियों के अपोशः अधिपति राजा बलि ऋतुपनिः यजमान, ऋषाणां मात्त्विज्य-ऋपि लोग ऋत्विक और सुरगणाः देवताओं में

हरिहर जीयानुवादसहित
गणनायोग्य महापुरुष सदस्या-सदस्य, फिर भी क-कन-निधान-व्यसनिनः
-यनादि क्रिया के फल देने में व्यसनी हात्तः-आप से ही धंश: यज्ञ
विनाश हुआ। यह निश्चित है कि यद्वाविधुरं श्रद्धा विना किये गये
मला: यज्ञ कर्तुः यजमान की अभिवाराप हि-अधोगतिका ही कारण
होता है ।। २१॥
प्रजानायं नाय प्रसममभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिदभूतां रिरमयिपुमृप्यस्य वपुषा ।
पमुष्पाणेर्यात रिवमपि सपत्राकृतमम
प्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरमसः॥२२॥
शिवपक्ष
नारनगनियामक विश्वनाथ! मनानायं ब्रह्माजी को-जो कि
अमिकं अति कामुक होकर स्यां अपनी दुहितरं पुत्री सन्ध्या के साथ जो
लज्जा से रोहि तां संध्याशरीर छोड़ कर हरिणी वनी, ऋष्यस्य हरिण
के वपुषा शरीर से रिरायपुं-रति करने के इच्छुक होकर प्रसभंवला-
त्कार से गत-गमन करने लगे-घनुप्पाणे:-पिनाक पाणी ते आपका
मृगव्याधरमसः-मृगको वेधने का साक्षात् उत्साहस्वरूप वाण दिन स्वर्ग
मैं यातं अपि पहुंचे हुए भी सपनाकृतं शरीर में प्रविष्ट होने से अत्यन्त
व्यथित किये गये भी वसन्तं एवं भयभीत हुए भी अमु=उनको (ब्रह्माजी
को। अघ अपि-आज भी न त्यजति-नही छोड़ रहा है ॥ २२ ।।
विष्णुपक्ष
नाय = हे जगन्नाथ ! प्रसभं = शूरवीर से युक्त प्रकृष्टसभावाले
अमिक चारों ओर सिरवाले प्रजानाथ राजा रावण को रिरायपुर
रमण कराने के इच्छुक एव ऋष्यस्य = मायामृग के वपुषा = स्वरूप से स्वा
दुहितरं अयोनिजा सीता को रिरमयिषु = रमण कराने के इच्छुक
रोहिङ्ग-तां- हरिण बालपन को गतप्राप्त हुए-हरिण बालक बने
प्रजानाय-प्रजासतापक-मारीच को जो कि सपत्राकृत-वाण प्रवेश से
व्यथित वसन्तं भयभीत होकर दियं यातं-स्वर्ग पहुचा अपि-फिर भी अमु-
उसको धनुष्पाणे धनुर्धारी तेआपका मृगव्याधरमस. मृगवधोत्साह
अद्य अपि =आज भी न त्यजति-नहीं छोड़ रहा रामायण के अध्येताओ की।
दृष्ट मे नही छोड़ रहा ॥ २२ ॥

४०४
1
i, महिम्नः स्तोत्रम् .
स्वलावण्याशंमाधृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्तुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि स्त्रणं देवी यमनिरत देहाधंघटना-
दति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युक्तयः ॥ २३ ॥
।
शिवपक्ष
-
पुरमयन-त्रिपुरारी! यमनिरत= यमनियमपरायण हे भगवन् !
स्वलावण्य = अपने ही सौन्दर्य की आशंसा-धृत-धनुषं- आशा पर धनुप
उठाने वाले अर्थात् पार्वती के सौन्दर्य से ही शंकरजी को वश में करेंगे इस
आशा से सनुप उठाने वाले पुष्पायुध कामदेव को प्रहाय-क्षण भर में
ही तृणगत्-तिनके के रामान पुरः सामने ही प्लुष्टं-नेयानल से दग्ध
दृष्ट्वा अपि-देख कर भी यदि यदि देवी देवी पार्वती देहार्धघटनात-
अर्धाङ्गिनी बनाने से स्ना आप को स्त्रैणं-स्त्रीवश अगैति =समझती है
अद्धा तो वह ठीक ही है। क्योंकि मरद = हे वरद बत अहो मुग्धाः
युवतयः= युवतियां तत्वविवेक हीन होती हैं ॥ २३ ॥
विष्णुपक्ष
अर्धघटनादय =संभोग तथा विप्रलम्भ-रूपी शृगाररसघटना के अर्ध
अर्थात् विप्रलंभ को दावाग्नि के समान मिटाकर संभोग प्रदान करने वाले
(सीता के विप्रलंभवियोग संताप मिटानेवाले ) हे भगवन् ! स्वला-
वण्याशं क्षत्रियकुलजात अपने शत्रुविनाशनादि लावण्य-शोभा की एकमात्र
आशा रखते हुए धृतधनुपं धनुप धारण किये त्वां आपको यदि यदि
महाय अल्प समय में ही पुरः = लका पूरी का प्लुप्ट दाह अपि तथा
युधं युद्ध को दृष्ट्वा देख कर पुरमथनपुष्पा - पुप्पसे भी अधिक सुकुमार
(जिस के शरीर को पुप्प भी मन्यन कर डाले । यम-निरत-देहा = अत्यन्त
पतिव्रता ( वैसे ही शरीर को नियममें निरत कराने वाली । सा- बही
देवी भगवती सीता स्त्रीणं - स्त्रीवश एति समझने लगती है अद्धा तो
कोई आश्चर्य की बात नहीं। क्योंकि वरद-हे वरद युवतयः= युवतियां -
वत-अहो मुग्धा =मुग्ध ही तो होती हैं ॥ २३ ॥
श्मशानेप्यागोडा स्मरहर पिशाचाः सहचरा-
श्चितामस्मालेपः स्रगपि नकरोटीपरिकरः।
प्रमङ्गल्यं शोलं तय भयतु
नामवमखिलं
तथापि स्मतणां घरद परमं मङ्गलमसि ॥ २४॥

हरिहरपक्षीयानुवादसहितम् ४०५ शिवपक्ष स्मरहर = कामान्तक वरद = वरद हे भगवन् ! श्मशानेपु = श्म- शानों में आक्रोडा = केलि क्रीडा, पिशाचा सहचराः-प्रेतपिशाच साथी, चितामस्म-आलेप =विनाभम्म लेपना अपि = और न-फरोटी-परिकरः - मनुष्यों की खोपडी-ममूह की प्रमाला धारण करना एवं= इस प्रकार तव=आप का अखिल शील - सभी रयभाव अमङ्गल्य = अमगल भवतु नाम = भले हो, तथापि = तथा व स्मतृणां = आप का स्मरण करने वालों के लिये परमं = परम मङ्गलं = मङ्गल स्वस्प असि = आप है ॥२४।। विष्णुपक्ष यरद = हे वरद ! श्मशानेषु = स्वाहास्वधाकारविवर्जितानि श्मशा- नतुल्यानि ग्रहाणि तानि के अनुमार श्मशाननुल्य गृहो मे आझाडा=क्षणिक सुख भोग करते हैं। स्मरहरपिशाचाः = हरिम्मरणको हरने वाले पिशाच- सदृश पुत्रवन्या वान्धवादि राहचरा = साथी बनाये हुये है । चिताभस्मालेपः- चिताभस्म होने जो जा रहा है ऐसे शरीरो मे लिपायमान हो रहे हैं। खग अपि = मालाचन्दनादि भी नफरोटीपरिकरः = भगवदर्थ नही, किन्तु पिशाचतुल्य कान्तापुनाद्यर्थ होने से मुर्दो की सोपड़ी सजानेवाला बन यया है । तब आप का अखिलं परम फल हेतु नामस्मत गां= नाम स्मरण करने वालों का एवं अमङ्गल्यं उपरोक्तरीति अमगल ही शील भवतु = शील हो तथापि तो भी उन नामस्मरण करने वालो के लिये परम मङ्गल असि = आप परम मगल दाता हो । ( जैसे अजामिलादि के लिये ) ।। २४ ।। प्रत्यक चित्ते सविधमवधायात्तमरुतः प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमदलिलोसङ्गितदृशः। यदालोक्यालाद हद इव निमज्ज्यामृतमये दधत्यन्तस्तत्त्व किमपि यमिनस्तत् किल मवान् ।। २५ ।। यमिन. - सयमी पुरुप सविध = यमनियमादि शास्त्रीय विधि प्रकार के साथ आतमरुत = प्राणामय से प्राणा को रोक कर मनः प्रत्यक् - प्रत्याहार द्वारा अन्तर्मुख बनाकर एव चित्ते - हृदयकमलादि देश विशेष मे धारणापूर्वक अवधाय = ध्यान और समाधि से निश्चल बनाकर प्रहृष्यद्रोमाणः = रोमाञ्चयुक्त एव प्रमदसलिल-उत्सङ्गितहशः - आनन्दाश्रु पूर्ण नेत्रपाले हुए यत् किमपि = जिस वाचामगोचर तत्त्वां = तत्त्व को आलोक्य - देख कर अमृतमये = अमृतमय हरे - सरोवर मे निमज्य इव - मनः मन को - .. ४०६ महिम्न स्तोत्रम् डुबकी लगाये हुए जैसे अन्तः - बाह्य सुखविलक्षण आन्तरिक आह्लादं आनन्दको दधति = प्राप्त होते है तद् मवान् किल - वह तत्त्व आप ही हैं ।। २५ ॥ त्वमर्फस्त्व सोमस्त्वमसि पवनस्त्व हुतवह स्त्वमापस्व व्योम त्यमु घर्राणरात्मा त्वमिति च । परिच्छिन्नामेष त्वयि पणिता विभ्रतु गिर न विद्मस्तत्तत्व वयमिह तु यत्ता न मयसि ॥ २६ ॥ शिवपक्ष त्वं भर्फः असि = तुम सूर्य हो, (व सोमः असि= तुम चन्द्रमा हो, त्वं पवनः असि - तुम वायु हो, त्वं हतबह. प्रसि-तुम अग्नि हो, स्व भापः मसि तुम जल हो, त्व व्योम असि = तुम आमाश हो, स्व धरणि. असि तुम पृथिवी हो च = और य उ प्रारमा असि तुम ही आत्मा (यजमान ) हो इति = बस, यह भगवान का स्वस्प हुआ एवं इस प्रकार परिणता = वुद्धिपरिपाकवाले त्ययि=आप के बारे से परिच्छिन्ना गिर परिच्छिामरूप बतलानेवाली वाणी विनतु - बोला करे तु वय=पर हम तो इह तत् तत्व इस जगत मे उस वस्तु को न विन्म = नहीं जानते यत्: जो स्य न भवति = आप नही हैं- आप से भिन्न है ॥ २६ ॥ विष्णुपक्ष त्य अर्पः असि = तुम आदित्य में स्थित पुरुप हो त्व सोम असि तुम चन्द्रमामे स्थित पुरष हो त्व पयन अति - तुम यायु मे स्थित पुरुष हो त्य इतवह असि-तुम मग्निमे स्थित पुरुष हो त्य मापः सति तुम जाल में स्थित पुरुप हो त्य प्योम असि = तुम आकाश में स्थित पुरुष होत्य धरणि. प्रसि - तुम पृथिवी मे स्थित पुरुप हो त्व प्रात्मा हासि = तुम विज्ञानात्मा में रिधत पुरप हो इति च - और भी विद्युत आदि मे स्थित पुरुप हो एना इस प्रकार इतकालाकि के समान गि:- बुद्धिपरिसफफाले स्थाय - भाप पे बारे में परिच्छिना गिर विनतु = परिच्छिन्न पाणी चोला पर तुपय पर, हम तो वह तत् तत्त्व न विप्रः = इस जगत् में उग तत्त्वो नहीं जानते यत् त न भास-जो तुम न हो ॥२६ ।। नयी तिम्रो पतीस्त्रिभुवनमयो बोनपि मुरा- महारायणस्त्रिभिरभिरपत्तीविषति सुरोप ते घाम ध्यनिभिरयरन्धानमामिः समस्त प्यरतं त्या गारपद गणात्योमिति पयम् ।। २७ ।।

हरिहरपक्षीयानुवादसहितम् ४०७ शरणद - पारणागतों को शरण देनेवाले है भगवान् ! त्रयों = तीन वेदो को तिखः वृत्ती. = जाप्रत्, स्वप्न सुषुप्ति स्पी तीन वृत्तियो को अयो=और निभवन स्वर्ग, भुमि. पाताल इन तीनो लोको को श्रीन् सुरान् अपि ब्रह्मा विष्णु और शिव इन तीनो देवो को प्रकारायः = अकार उकार और मकाररूपी शिभितीन वणवों से अभिदधदम्बतलाने वाला और तोविकृति = सर्व विकागतीत तुीय- चतुर्थ ते धाम = आप के धाम को प्रमः = मूदम ध्यान भि =ऽवनियो से अवरन्धान = प्रतिपादन करने वाला व्यस्तंअ-उ-म ये व्यस्त और समस्तं ॐ ऐसा समस्त ॐ इति पद-ॐ यह पद त्यांआप को गणाति-प्रतिपादन करता है ॥ २७ ॥ भयः शर्यो रद्र. पशुपतिरयोगः सहमहाँ- स्तया नीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् । अमुस्मिन् प्रत्येक प्रविचरति देव श्रुतिरपि प्रियायस्मै धाम्ने प्रणिहितनमस्योऽस्मि मवते ॥ २८ ॥ देवन्हे भगवान् । मरः शर्वः, रद्रः, पशुपति =भव, शर्व रुद्र पशुपति अय उग्र : और उग्र सह महान-महादेव तथा भीम-ईशानौ = तथा भीम और ईशान इति = इस प्रकार इदं यत् अमिधानाष्टकं ये जो आठ नाम हैं ममुस्मिन् - इन में प्रत्येक = हरेक के साथ श्रुतिः अपि = श्रुति भी प्रविचरति प्रमाणरूप मे आती है-प्रतिपादन करती है। अस्म = उस प्रियाय = सर्वप्रिय धाम्ने = तेज. स्वरूप भवते = आपको प्रणिहितनमस्य:- अस्मि = मैं प्रणाम करता हूँ ॥२८॥ विष्णुपक्ष देव = हे भगवन् भव जगत् को उत्पन्न करने वाला शर्व. = सहार करने वाला रुद्र - रुगनेवाला-असाधु कर्म कराने वाला पशुपति : दीनानाथ माधुकर्म कराने वाला राक्षमादि के लिये उग्ररूप सह = साथ साथ महान = शिष्टरक्षक होने से महान तथा भीमेशानी भयकारी तथा सर्वाधिपति इति यत् अभिधानप्टक इदं ये जो आठ यौगिक नाम हैं अमुष्मिन् प्रत्येक = इन मे प्रत्येक के लिये धुतिरपि. प्रधिचरति = श्रुति भी प्रमाण है अस्मै प्रियाय धाम्ने = उस प्रिय धाम मवते = आप को प्रणिहितनमस्योऽस्मि = प्रणाम करता हू ।। २० ॥

महिम्नः स्तोत्रम् .: . नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिप्ठाय च नमः । नमो वषिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमो नमः सर्वस्मै ते तदिदमितिसर्वाय च नमः ॥ २९ ।। शिवपक्ष प्रियदव = निर्जनवन प्रिय भगवन् ! नेदिष्ठाय = अत्यन्त समीपवर्ती च = और दविष्ठाय = अति दूरवर्ती ते नमो नमः = आप को बार बार प्रणाम । स्मरहर = मान्तक हे भगवन् क्षोतिष्ठाय च = अत्यन्त छोटे और महिष्ठाय ते % अति महान् आपको नमो नमः = बार वार प्रणाम । धिनयन = त्रिनेत्रधारी परमेश्वर ! वषिष्ठाय च = अतिवृद्ध और यविष्ठाय ते अति युवा आपको नमो नमः = बार बार प्रणाम । हे परमात्मन् ! सर्वस्मै सर्वस्वरूप च = और तदिदगिति सर्वाय 'तत्' कर के परोक्ष रूप से जिसको कहा जाय और 'इदं' करके अपरोक्षस्वरूप से जिस को कहा जाय उन सब के अधिष्ठान स्वरूप ते आपको नमो नमः - बार बार प्रणाम।। २९ ।। विष्णुपक्ष तीन सम्बोधनों की व्याख्यामात्र बदल लेना चाहिये । प्रियदध-प्रिय अर्थात् वैपयिक सुखों को वैराग्योद्भावन से नष्ट करनेवाले । रमरहर वासनाओ को हरने वाले। बिनयन = तीनों लोकों के नयनवत् सर्वार्थायमासक। वहलरजसे विश्वोत्पत्ती भवाय नमो नमः प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः। जनसुखकृते सत्वोदितो मृडाय नमो नमः प्रमहसि पदे निस्त्रगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥ ३० ॥ विश्वोत्पत्ती-विश्व की उत्पत्ति के निमिस बहतरज से-उद्विक्त रजो. गुणधारी भयाय = सृष्टिहेतु ब्रह्ममूति भव भगवान.को नमो नमः = बार बार प्रणाम । तत्संहारे विश्व के सहार निमित्त प्रबलतम उद्रित तमो. गुणधारी हराय = रद्रमूर्ति हर भगवान को नमो नमः- बार बार प्रणाम जनसुसफुते = सफलजन सुख के निमित्त सत्त्वोदिक्ती = रात्वोद्रेयकाल में डाय = विष्णमूर्ति मृड भगवान को नमो नमः = बार बार प्रणाम मा.

घरद
-
हरिहरपक्षीयानुवादसहितम्
गुष्पे त्रिगुणातीत अवस्था में प्रमहसि पदे = मायानभिभूत ज्ञानतेज-
स्वरूप शिवाय नमो नमः = परब्रह्मस्वरूप शिव को बार बार प्रणाम ॥३०॥
कृशपरिणति चेत: पलेशवयं क्व चेदं
यय च तय गुणसीमोल्लडिनी शश्वदृद्धिः।
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधात्
चरणयोस्ते वाक्यपुप्पोपहारम् ॥ ३१ ॥
वरद सर्वाभीष्टप्रद भगवन् । कृशपरिणति = अल्प परिपाक वाला
(अपरिपक्व) पलेशवश्यं अविद्या अस्मिता आदि क्लेशो के पराधीन या
क्लेश मे वश करने योग्य इदं - यह । मेरा । चेत = चित्त च = तो पव %
कहा ? च = और तव = आपकी गुणसीमोल्लविनी = गुणो की सीमा को,
पार करने वाली शश्वत् = शाश्वत ऋद्धिः = महिमा क्व = कहा? इति -
इस प्रकार चक्तिं = भीत मा- मुझे अमन्दीकृत्य = भीतिहित एव निर-
लस बनाकर भक्ति = { मेरी भक्ति ने ते चरणयोः = आपके चरणो मे
वाययपुष्पोपहारं = महिम्नस्तुतिवाक्यरूपी पुष्पो की भेंट प्राधात् =
चढवायी ।। ३१॥
असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपाने
सुरतरुवरशाखा लेखनी परमुरू।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामोश पार न याति ॥ ३२ ॥
ईश- हे परमेश्वर । यदि = यदि असितगिरिसम = नीलाञ्जन
पर्वत के बरावरा कज्जल = स्याही स्यात् - हो, सिन्धुपाये = सागर दावात
हो, सुरतरुवरशाखा = कल्पवृक्ष की शाखा लेखती = लेखनी ( कलम ) हो,
उर्वी - पृथिवी पत्र - पन ( कागज ) हो और सर्वकालं - अनादि अनन्त
काल तक शारदा = सरस्वती गृहीत्वा = उसे लेकर लिखति = लिखती रहे
तत् = तो अपि = भी तव आपके गुणानां = गुणों को पार = पार न
याति = नहीं पा सकती अथवा तव गुणाना पार = आपके गुणातीत रूप को
न याति = नही पा सकती ।। ३२ ॥
असुरमुरमुनीन्द्ररचितस्येन्दुमोले-
ग्रंथितगुरगमहिम्नो निगुणस्येवरस्य ।
सकलगुणवरिष्ठ. पुष्पदन्ताभिधानो
रुचिरमलधुवृत्तः स्तोत्रमेतच्चकार ॥३३॥

४१० महिम्नः स्तोत्रम् शिवपक्ष असुरसुरमुनीन्द्रः ₹ = असुर, देवता और महामुनियों द्वारा अचिनस्य - पूजित इन्दुमालेः - चन्द्रशेखर ग्रथितगुणमहिम्नः = गुण महिमायुक्त निगुणस्य अथ च निर्गुण ईश्वरस्य भगवान् शंकर का सकलगुणव- रिष्ठः समस्त गुणो से महत्त्वप्राप्त पुष्पदन्ताभिधानः = पुष्पदन्त नाम के गन्धर्वराज अलघवृत्तः - बड़े बड़े छन्दों मे एतत्- यह रुचिर स्तो सुन्दर स्तुति चकार-वनायी ।। ३३ ।। विष्णुपक्ष असुरसुरमुनीन्द्रः = असुर, देवता एव मुनीन्द्रों से अचितस्प पूजित इन्दुमोलेः शंकर भगवान के भी ईश्वरस्य मालिक प्रथित गुण- महिम्नः = अनन्त गुणयुक्त निगुणस्य-फिर भी गुणातीत परब्रह्म स्वरूप भगवान् विष्णु का सकल गुणवरिष्ठः समस्त गुण जिनमे हैं उनमे भी श्रेष्ठ पुष्पदन्ताभिधानः पुष्पदन्त नाम के गन्धर्व राज ने अलघवतः उत्तम चरित्रो से युक्त एतत्=यह रुचिरं-सुन्दर स्तोशं-स्तुति चकार- की ।। ३३ ॥ अहरहरनवा धूर्जटेः स्तोत्रमेतत् पठति परममत्या शुद्धचित्तः पुमान् यः। स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथान प्रचरतरधनायुः पुनवान् कोतिमांश्च ।। ३४॥ शिवपक्ष धूर्जटेः-शंकर भगवान का एतत् यह अनवयं-निर्दोष स्तोत्र शुद्ध- चित्ताशुद्धचित्त होकर परमभक्त्या परम भक्ति से अहरहः प्रतिदिन यः पुमान् पठति जो मनुष्य पढेगा स-यह शिवलोफे-शिवलोक मे रदतुल्यः नवति - शिवसास्थ्य को प्राप्त होगा तथा-और प्रत्र-इस लोक में प्रचुर- तरधनायु =महान धनी एव दीर्घायु पुनयान च-पुपयाला और कीर्तिमान भवति-कीतिशाली होगा ॥ २४ ॥ विष्णपक्ष इदं अनय स्तोत्र-यह विष्णु या निॉप स्तोत्र धूर्जटेः परम- भवत्यानाकर पी भी परम भवित से सुचित. यः पुमान् = शुद्धचित जो

हरिहरपक्षीयानुवादसहितम्
४११
मनुष्य अहरहः पठति = प्रतिदिन पढता है सः= वह यो यो यां यां तनु
भक्त ""म तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमोरते लभते च तत. कामान
मयैव विहितान् के अनुमार शियलो = शिवलोक मे रुद्रतुल्या-रुद्र समान
भवति = होगा तथा और अन = यहा प्रचुरतरधनाय = धनी एव दीर्घायु
पुत्रवान् घ कीतिमान् पुत्रवान् और कीर्तिमान भवति होगा ।। ३४ ।।
दीक्षा दानं तपस्तीर्थ-स्नान यागादिकाः क्रियाः।
महिम्नस्तवपाठस्य कला नाहन्ति घोडशीम् ॥ ३५ ॥
आसमाप्तमिवं स्तोमं सर्वमीश्वरवर्णनम् ।
अनौपन्यं मनोहारि पुण्य गन्धर्यमापितम् ॥ ३६॥
महेशानापरो देयो महिम्नो नापरा स्तुतिः ।
प्रघोराप्तापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ।। ३७ ॥
कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः
शशिधरवरमौलेदेय देयस्य दासः।
स पलु निजगहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोपात्
स्तवमिदमकाव्यिदिव्यं महिम्नः ॥ ३८॥
सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षकहेतु
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिन्पिचेताः।
ग्रजति शिवसमीपं किन्नरः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघ पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥ ३९ ॥
श्रीपुष्पदन्तमुखपद्धजनिर्गतेन
स्तोत्रेण फिस्विषहरेण हरप्रियेण ।
फण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन
सुप्रीणितो भवति भूतपतिमहेशः ।। ४० ॥
इत्येषा वाड्मयो पूजा थीमच्छङ्करपादयोः ।
अपिता तेन देवेश. प्रीयतां मे सदाशिवः ।। ४१ ॥
यदक्षर पदं भ्रष्टं मात्राहीन च यद्भवेत् ।
तत्सर्व क्षम्यता वेव प्रसीद परमेश्वर ॥ ४२ ॥

४१२
महिम्नः स्तोत्रम्
ॐ पूर्णमदं पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य मुर्णमादाय मुर्णमिवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
(अनुवादका अन्तिम पद्य)
इयं घोकाशिकानन्दयतेविजयते कृतिः ।
चन्द्रिफेव सतां नित्य चेतः कुमुदिनीवने ॥
समाप्त मिद सानुवाद महिम्न. स्तोत्रम्
शुभ भूयात् ॥

Shri Shivmahima Stotram

Author
Swami,kashinand
Title
Shri Shivmahima Stotram
File name
Shri Shivmahima Stotram
Text
OCR done
Citation
1983
Published
2012/10
Publisher
Bombay.,shri Kashikanand Trust Anandvan Ashram
Language
Sanskrit
Pages
421
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313509
Barcode
99999990322189.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
jzP0qNU8ntu
Download PDF

Shri Shivmahima Stotram