Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Vichitra Veer

Chaturvedi,jaganath Prasad · 2011/01

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याल विनोद-बाटिफा का मोलहयाँ पुष्य
विचित्र वीर
अर्थात्
डौन किनोटका सक्षिप्त वृत्तांत
.
लेगक
जगन्नाथप्रमाद चतुर्वेदी
प्रकाशक
गगा-पुस्तकमाला-कार्यालय
प्रकाशक और विनता
लखनऊ
प्रथमावृत्ति
सजिएर ] स. १६८ पि. [ अजिएद ।)

न
प्रकाशक
श्रीदुलारेलाल भार्गव
अध्यक्ष गगा-पुस्तकमाला-कार्यालय
लग्वनऊ
मुद्रक
श्रीदुलारेलाल भार्गव
अध्यक्ष गगा-फाइनआर्ट-प्रेम
लखनऊ

श्रीयुत घनश्यामदासजी बिडला
कलकत्ता
प्रिय बिड़लाजी,
आप हास्यप्रिय हैं और सदा हँसना पसंद करते हैं,
इसलिये हँसानेके लिये यह आपके कर-कमलोंमें
रखता हूँ।
शुभैपी
पूस सुदी५
जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी
सं० १९८३

किचिन कीर
५० जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदो
for Fine Astress, Lucknow

:
।
लेखकका वक्तव्य
हिंदीससारमें आजकल हास्यरसका बाजार घेतरह गर्म है।
इसके लेखकों और पाठकोंकी संख्या दिन पर दिन बढती
जाती है, यह आनदकी बात है। पर हास्यरसकी अवस्था
कैसी हास्यजनक हो रही है, इमपर किसी 'हास्यप्रेमीका
ध्यान नहीं, यह सेदकी बात है। हास, परिहास हँसी सेल
नही कि जो चाहे वही इसमें सफलता प्राप्त कर ले । इसमे वही
सफल हो सकता है, जो अनुभवी, सहृदय, सुरसिक, सदानद है
और जिसका अपनी भापापर पूर्ण अधिकार है। हिंदीमें
जिस शैलीका हाम परिहोस होता है, वह अधिकाश दूपित,
घृणित और कुरुचिपूर्ण है। गाली गलौज या अश्लील
आक्षेप या आक्रमण परिहास नहीं है । यह उससे कोसो दूर
है। हास्यरसका उद्देश्य बडा मधुर और ऊँचा है । पर अनधि-
कारियोंके हाथ पडकर इसकी मिट्टी पलीद हो रही है।
खैर, इन सब बातोंको आलोचना अलग ही एक स्वतत्र
पुस्तकमें करनेका विचार है, जो समय सापेक्ष है।
अभी तो यही कहना है कि प्रस्तुत पुस्तक सर वेनटिसके

डौन किक्जोटका साराश है। हिंदीके पाठकोंको सुरुचिपूर्ण
हास-परिहासका रसास्वादन करानेके उद्देश्यसे ही इसका
इन्न अँगरेजीसे हिदीमें निकाला है, इससे यह भी मालूम
हो जायगा कि योरपवाले कैसा हास परिहास करते हैं। इसमें
कुरुचिपूर्ण, अश्लील और उद्वेगजनक भाव नहीं है और न
किसीपर घृणित आक्षेप ही है । जो कुछ है वह अत्यत निरीह,
निर्दोष और निर्मल है।
डीन स्वीफ्ट भी अँगरेजी भाषाका सुप्रसिद्ध हास्यरसाचार्य
माना जाता है। उसके विख्यात 'गलीवर्स ट्रेवल्स'का उल्था
मैंने विचित्र-विचरणके नामसे किया है। उसका द्वितीय
सस्करण भी हो चुका है । उसमे व्यक्तिगत आक्षेपों और
फटाक्षोंकी भरमार है, पर इसमें वह सब बातें नहीं हैं। इसीसे
स्पेनिश भाषा के सिवा अँगरेजीमें भी इसका बडा आदर
है। इसके छोटे बडे कई सस्करण हो चुके हैं, बस यही इसके
लोकप्रिय होनेका पुष्ट प्रमाण है।
यह बहुत बडी पुस्तक है । पूरा उल्था करने में बहुत समय
लगता । इसलिये यह साराश ही पाठकोंके आगे रखता हूँ।
आशा है, इससे पाठकोंका मनोरजन तथा रुचिपरिवर्तन
होगा । रुचिकर होनेसे पूरी पुस्तक भी भापातरित हो
सकती है।

पाठकोंके सुबीतेके लिये स्पेनिश नामोंका हिंदी रूपातर
कर दिया है। यथा-
Don Quxotas
किज्योति
Sancho Panza
सनकूराव
Dulcinea
दर्शनीया
Dorothia
दुरतिया
Rosinante
वायुवेग
मलेपुर ( मुगेर)
पूस सुदी ५, स० १९८३
मिनीत
जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी

बाल विनोद-वाटिका की कुछ पुस्तकें - । गधे की कहानी लेखक ने यह 'गधे की कहानी, लिपकर याल-साहित्य के एक मुख्य अग की पूर्ति की है । गधे ने अपनी कथा बडे रोचक ढग से कहो हे । भाषा खूप सरल और मुहाविरेदार है । गधे ने अपनी भाषा में मानव-समाज पर केसी हास्य जनक भालोचनाएँ की है, यह देसने ही योग्य है । पुस्तक सचित्र है । मूल्य ॥), सजिल्द 1) नटखट पाँडे एक नटखट लड़के की आत्म कथा । श्रादि से शत तक एक भी पृष्ठ ऐसा नहीं, जो नीरस और रूखा हो। एक-एक शब्द में हास्य रस भरा हुआ है। सारी कहानी इतनी अनूठी और दिलचस्प है कि जिस लड़के ने किनाय सोलने की कसम खा ली हो, भी इसे समाल झिए विना नहीं रह सकता। कितने ही प्रसग सो ऐसे हैं, जहां मारे हँसी के पेट में बल पड़ जायेंगे । पुस्तक में कुल १४ सिरगे हामटोन चित्र है, जिनसे उसकी सुदरता और भी बढ़ गई है। मूल्य 19, २) परोपकारी हातिम भारत में जेसे कर्ण और हरिश्चद्र दानवीर और वचन के सच्चे महारमा हुए हैं, वैसे ही दानी और सत्यवादी पुरप ईरान में हातिम हुआ है। उसकी कथा इतनी मनोरजक है कि ससार की ऐसी कोई भापा नहीं, जिसमें उसका अनुवाद न हो चुका हो। उसी हातिम का यह चरित्र बालकों के लिये बहुत ही सरल और सुबोध भाषा में लिखा गया है । कथा इतनी रोचक है कि अलिन- लैला भी इसके सामने मात है । इसके साथ ही चरित्र पर उसका पहुत अच्छा असर पड़ता है। मूल्य 19, मजिल्द ) सचालक-गंगा-पुस्तकमाला-कार्यालय, लखनऊ , प्रणेताका परिचय डौन फिक्जोटका प्रणेता स्पेनका निवासी और अपने समयका वडा प्रतिभाशाली पुरुप था । दिल्लीका मुगल सम्राट अकबर और वह दोनों समसामयिक कहे जासकते हैं । स्पेनकी विजय वैजयंती उस समय अमेरिकातक फहरा रही थी। इसका बाप सफरी डॉक्टर था, पर उसकी आर्थिक अवस्था अच्छी न थी। इसलिये अपने पुत्रको विश्वविद्यालयमे न पढा सका। परसर वेनटिसको लडकपनसे ही पुस्तकें पढनेका रोगथा। जो पुस्तक हाथ लगती, उसे ही पढ डालता। वह वीरगाथाएँ और वीरोंके दुस्साहसिक कार्यो का वर्णन बडे ही चावसे पढता था। उसने अपने पिताके साथ सारे स्पेन तथा और और देशोंकी खूब सैर की थी। इससे उसे ससारका अच्छा अनुभव हो गयाथा । देहात और देहाती सरायोंकी तो कोई बात उससे छिपी न थी। फौजमें भर्ती हो लिपातोकी लडाईमे इसने खासा नाम पाया। सेनापतिने स्वय जाकर इसे बधाई दी थी, पाँच वर्ष बाद यह स्पेन लौट रहा था, पर मृरोने रास्तेमें ही इसे पकड़ कैद कर लिया। उस समय उत्तर आफ्रिकामें मुसलमानोंकी हुकूमत (१०) थी। वह लोग क्रिस्तानोंको पाते ही पकडकर गुलाम बना लेते थे। सर वेनटिस भी अलजीरियामे गुलाम बना रखा गया। पांच साल बाद कुछ दे लेकर वह छूटा और स्पेन पहुँचा । वहाँ उसने नाटक लिसकर गुजारा करना चाहा, पर सफलता। न हुई। और भी बहुतेरे फाम किये, पर कही कुछ लाभ न हुआ। अतमें टैक्स कलक्टरके पदपर नियुक्त हुश्रा, पर वहाँ भी भाग्यने साथ न दिया । बात यह हुई कि वहाँ के प्रभाव. शाली मनुष्य टैक्स देना पसद नहीं करते, पर यह सबसे पाई- पाई वसूल कर लेता था, इससे वह लोग चिढ़ गये । नतीजा यह हुआ कि यह चेकुसूर किसी बहाने जेल भेज दिया गया। यह बड़ा दबग और साहसी था। आफतोंसे कभी घबराता न था । उस समय इसकी उम्र पचास सालकी थी । पास एक कौडी नही, उसपर जेल, वह भी विना अपराध । ऐसी ही अवस्थामें उसने "डौन किक्जोट"लिखना आरभ कर दिया। सन् १६०५ ई० मे पहलेपहल यह छपा और छपते ही लोकप्रिय हो गया। इसके बाद कविता, उपन्यास जो कुछ लिखासबमे उसे पूरी सफलता हुई। उन दिनों बहादुरोंकी फालतू मनगढत कहानियाँ पढनेकी। बढी चाल थी । नवयुवकोंपर इनका बडा बुरा प्रभाव पडता या । इनका प्रचार रोकनेके लिये ही इसने डौन किक्जोटकी रचना की। इसमें हास परिहास, व्यग्यके अतिरिक्त स्पेनवालोंके ( ११ ) चरित्र, दिनचर्या तथा मनुष्य स्वभावका सुदर वर्णन है। अपना अनुभव शब्दों द्वारा कैसी उत्तमतासे प्रकट किया है कि देखकर आश्चर्य होता है । हास परिहासको अत तक बड़ी चतुरतासे निवाहा है । इसमे विशेषता यही है कि कहीं किसी पर न व्यक्तिगत आक्रमण है और न श्राप । जो कुछ है वह मीठी चुटकियाँ हैं-चोटें नहीं। इसके पात्रोंपर भी प्रेम हुए विना नहीं रहता । बहादुर सवार, पादडी, डोरोथिया सबके ऊपर सनकोपजा इसका पुष्ट प्रमाण है। पिछलेका चरित्र चित्रण करने मे सर वेनटिसने गजब कर डाला है। दुष्ट पात्रोपर भी घृणा न हो आप ही आप दयाका उद्रेक हो उठता है । वह उनकी कमजोरियाँ छिपाता नही,पर प्राय सब मनुष्योंके हृदयमें जो अच्छा भाव रहता है उसे वह अनुभव करा देता है। डौन किम्जोटमे हास परिहासकी पूर्ण मात्रा होने पर भी वह ज्ञानका भडार है। इसीसे अँगरेज लोग बाइबिलका जितना आदर करते, उतना ही स्पेन वासी इसका करते हैं। बातचीतमें यह कहावतोंकी तरह वहाँ उद्धृत किया जाता है। इसकी उपयोगिता देसकर ही स्पेनकी सरकारने स्पेन वासी बालकोंके लिये डौन किक्जोटका पढना अनिवार्य कर दिया है । यस इसीसे समझ लेना चाहिये कि इसका कितना महत्त्व है।

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पहला परिच्छेद ३ दय से सूर्यास्त तक और सूर्यास्त से सूर्योदय तक पढा करता था। हाँ गाँव के हज्जाम और पादडियोंसे जब इसी विषय पर तर्क-वितर्क होता तब पढना अवश्य ही छूट जाता था। इस तरह किताबें पढने के कारण उसे सोने और आराम करने का मौका बहुत कम मिलता था। नतीजा यह हुआ कि थोडे ही दिनों- में उसका दिमाग बिगड गया। जो कुछ वह पढता वही दिन-रात सोचता था। उसके दिमागमें वही जादूगरी, युद्ध, द्वद्वयुद्ध, लल- कारें, घाव, राजकुमारियोंका प्रेम, तूफान और असभव फालतू बातें चधार काटा करती थी। यह सब वाते उसके मनमें ऐसी बैठ गयीं कि वह इन्हें बिलकुल सत्य मानने लग गया था। वह समझता था कि इन किताबोंके सिवा ससारमें ऐसा कोई इतिहास ही नही जिस पर इतना विश्वास किया जा सके। मुख्तसर हाल यह है कि उस पर ऐसी सनक सवार हुई कि वह खुद ही वहादुर सवार बनना ठानकर जल्द ही सफरके लिये तैयार हो गया। हथियारों और घोडेकी कमी उसके पास थी ही नहीं । उसने कितागोमें जैसा जो कुत्र पढा उसके अनुसार ही सब काम करनेका पका इरादा कर लिया। सब विपत्तियोंको झेलने और सबके कष्टोंको दूर करने का मसूवा फर डाला । उस बेचाग्ने यह भी समझ लिया कि मैं अपने वाहुयलसे अरवका बादशाह हो गया हैं।

२
विचित्र धीर
पीसवें चर्पमें भी पाँव नहीं रखा था। इन दोनोंके सिवा एक
छोकरा भी था जो सेतों और चाचारका काम करता था।
वह घोड़की साईसी भी करवा और घास भी खोदता था।
हमारा चरित्रनायक अपनी उम्रके पचास वर्ष पूरे कर रहा
था। इसके शरीर की बनावट बड़ी मजबूत थी। देह पर
कहीं एक छटाँक फालतू मास न था । मुँह लंवा तथा पतला
था। वह तेज सिलाडी था और खूब सवेरे सोकर उठता था ।
उसके नाम जानने की अभी ऐसी कुछ जरूरत नहीं । भागे
चलकर आपही मालूम हो जायगा।
हमाग चरित्रनायक अवकाश मिलने पर ऐसी ही पुस्तकें
पढता जिनमे शूरता और दुस्साहसिक कार्यों का वर्णन
होता था। उसे प्राय अवकाश ही रहता और इन पुस्तकोंको
बडे उत्साह और चावसे पढता था। इनमें वह ऐसा गड
जाता कि शिकार सेलना क्या, घरका काम काज भी
भूल जाता था। अपनी बहुत-सी जमीन जायदाद बेचकर
उसने बहादुर सवारोंकी कहानियोंकी किताबें खरीदी थीं !
ऐसी किताबें जहाँ मिलती, वहाँ से घर ले आता था ) बहादुर
सवार से मतलब उन सूरमाओं से है, जो शानदार लडाइयों और
गौरवयुक्त दुस्साहसिक कार्योंकी सोजमें तमाम घूमा करते
थे। ऐसे ही अश्वारोही वीरोंकी कल्पित कहानियों यह सूर्यो-
,

, पहला परिच्छेद ३ दय से सूर्यास्त तक और सूर्यास्त से सूर्योदय तक पढ़ा करता था। हाँ गाँव के हज्जाम और पादडियोंसे जब इसी विषय पर तर्क-वितर्क होता तब पढना अवश्य ही छूट जाता था। इस तरह कितावें पढने के कारण उसे सोने और आराम करने का मौका बहुत कम मिलता था। नतीजा यह हुआ कि थोडे ही दिनों- में उसका दिमाग विगड गया। जो कुछ वह पढता वही दिन-रात सोचता था। उसके दिमागमें वही जादूगरी, युद्ध, द्वद्वयुद्ध, लल- कारें, घाव, राजकुमारियोंका प्रेम, तूफान और असभव फालतू बातें चकर काटा करती थी। यह सब बातें उसके मनमें ऐसी बैठ गयीं कि वह इन्हें विलकुल सत्य मानने लग गया था। वह समझता था कि इन किताबोंके सिवा ससारमें ऐसा कोई इतिहास ही नहीं जिस पर इतना विश्वास किया जा सके । मुख्तसर हाल यह है कि उस पर ऐसी सनक सवार हुई कि वह खुद ही वहादुर सवार बनना ठानकर जल्द ही सफरके लिये तैयार हो गया। हथियारों और घोडेकी कमी उसके पास थी ही नहीं। उसने कितावोंमें जैसा जो कुछ पढा उसके अनुसार ही सय काम करनेका पका इरादा कर लिया। सय विपत्तियोंको झेलने और सबके कष्टोंको दूर करने का मसूवा कर डाला | उस बेचाग्ने यह भी समझ लिया कि मैं अपने पाहुवलसे अरयका बादशाह हो गया हूँ।

विचित्र वीर
पहला काम उसने बस यही किया कि अपने लकड़दादेके
समयका जग लगा हुआ एक वस्तर ढूंढ निकाला । जहाँ तक
हो सका उसे साफ फर डाला । फिर अपने घोड़ेरामका मुला-
हिजा किया । उसकी हड़ियों अलग-अलग गिनी जा सकती थी,
पर उसने समझ लिया कि इंद्र का श्यामकर्ण भी इसके आगे
कुछ नहीं है । इस घोडेका क्या उपयुक्त नाम हो सकता है
इसी विचारमें चार दिन बीत गये । वह सोचता था कि ऐसे
सुदर घोडेका नाम भी सुदर ही होना चाहिए, जिसमें नामसे
ही मालूम हो जाय कि उसका नया जीवन कैसा गौरवमय है।
बहुत काट-छॉट के बाद घोडेका नाम हुया "वायुवेग" । इस
नाममें मधुरता और भयकरता दोनोंका क्या ही अच्छा
मेल है।
घोडेका नाम रस उसने अपने नामकरणका विचार
किया। इसमे भी पाठ दिन लग गये । बहुत सोच विचारके
बाद उसने अपना नाम रखा "किज्योति" जिसमे मालूम
हो कि वह किस उत्तम देशका है और जिस देशका वह है
उसका भी गौरव बढे, इसलिये उसने अपना पूरा नाम रखा
"यहादुर किंज्योति लामनचावाला ।"
वस्तर की सफाई हो गयी, अपना तथा घोड़ेका नाम
भी रखा जा चुका । अव कसर रही एक राजकुमारीकी
N

पहला परिच्छेद जिस पर वह आशिक हो जाता । क्योंकि बहादुर सवार, राजकुमारी के विना वैसा ही होता है जैसा विना पत्तो और फलोंका वृक्ष । उसने सोचा कि अगर मेरी भेंट किसी दैत्यसे हो गयी जैसा कि बहादुर सवारोंकी अकसर हो जाया करती है और मैंने युद्धमे उसे जीत भी लिया तो राजकुमारी न हुई तो तोहफे की तरह उस दैत्यको किसके पास भेजूंगा' राजकुमारीके सामने वह घुटने टेककर कहता "राजकुमारी मैं फाराकुलियवो नामका दैत्य हूँ जिसे बहादुर "किंज्योति लामनचावाले ने" पहले ही युद्धमें परास्त किया और जिनकी यथेष्ट प्रशसा कभी होही नहीं सकती है। ऐसी ही वाते उसके दिमागमे उठा करती थी। अतमें उसने अपनी कल्पित प्रेमिका- का नामकरण भी "राजकुमारी दर्शनीया टोबोसोवाली" कर डाला । टोवोसो पासका ही एक शहर था । यह नाम बडा कर्णमधुर और सुदर है।

दूसरा परिच्छेद
वहादुर किंज्योतिको लोगोंके इतने दुख दूर करने, इतनी
भूलें सुधारनी, इतना अत्याचार रोकना और इतनी बुराइयाँ
हटानी थी कि उसने अब एक पल भी विलय करना उचित न
समझा । उसने अपने मनकी बात किसी से न कही । एक
दिन सूरज निकलने के पहले ही वह सिरसे पैर तक हर्के हथि-
यारोंसे लैस हो वायुवेग पर चढ किसी से मिले-जुले विना
ही पिछवाडे के द्वारसे निकल पडा।
अपनी यात्राके बडे-बडे उद्देश्योंका विचार कर उसे
बड़ा आनद और सतोष हुआ, पर मैदान की हवा लगते
ही उसका विचार बदल गया। वह घर लौटने का इरादा करने
लगा। उसे अकस्मात् स्मरण हो आया कि मैं अभी तक
वीरके पद पर तो अभिषिक्त ही नहीं हुआ, फिर नियमानुसार
किसी वीरसे कैसे लड सकूँगा। प्राचीन कालमें वहाँ
प्रथा थी कि गजा या उसका सेनापति जिस वीरके कधेको
तलवारकी नोकसे छू देता वही पका वीर समझा जाता था।
किंज्योति बडे असमजस में पड़ गया । अतमें उसकी सनकने

७
दूसरा
परिच्छेद
उसकी अक्ल को जीत लिया। उसने निश्चय कर डाला
कि जो पहले मिल जायगा उसीसे वहादुरीका टीका करा लूँगा
क्योंकि पुस्तकोंमें ऐसा भी लिसा है । बस वह उधर ही चल
पडा जिधर उसका घोडा ले गया । क्योंकि उसका विश्वास
था कि सफलता की कुजी इसीमें है ।
इस तरह खयाली पुलाव पकाता वह चला जाता था
पर रास्तेमें कोई न मिला । इससे वह निराश सा हो गया ।
दिन चढ आया । सूरज तेज होगया । पर वह धूपकी परवा
न कर चला ही जाता था। शामको भूख-प्यास और थका-
वटसे अधमरा-सा हो गया । वह बडी उत्सुकतासे किसी
गडरियेका झोपडा ढूँढने लगा।
इतने में कुछ दूर पर एक सराय दीख पड़ी जिसके द्वार पर
किसानोंको दो लड़कियों सड़ी थीं । वह जो कुछ देखता उसे
यही समझ लेता था कि पुस्तकोंमें जैसा कुछ पढा है वही
सामने आ रहा है । वस सराय देसते ही उसने समझ लिया
कि यह कोई किला है जिसमें चार गुवज, चॉदी को चमकती
हुई शहरपनाह, खुलनेवाला पुल तथा साई है । पास पहुँचा
तो किसानकी लडकियोंको किले की राजकुमारियाँ समझ
लिया।
लड़कियोन इस विचित्र वेशधारीको देखा तो डरफर

विचित्र वीर
घरमें घुसने लगी । किंज्योतिने उन्हें भयभीत हो भागते
देख बडी नम्रता और गभीरता से कहा-"राजकुमारियो
भागो मत और न डरो, मैं अशिष्टता न करूँगा । जिस वीर
पद पर मैं हूँ उसके विचार से मैं तुम्हारी श्रेणीको किसी
महिलाका अनिष्ट न करूंगा।"
लडकियाँ फिरी और उसकी बातें सुन खिलखिला उठीं।
इस पर वह गर्म हो बोला-"स्त्रियोंकी शोभा लज्जा ही है ।
साधारण बातों पर इतना हँसना मूर्सताका लक्षण है।"
बहादुर किज्योति जितना गर्म होता उतना ही उनका हँसना
बढता जाता था। इतने में सरायका मालिक वहाँ आ पहुँचा।
वह भी हँसे विना न रह सका । बोला-"जनाब वहादुर साहब,
अगर आप ठहरने की जगह ढूँढते हो तो मजे में ठहर सकते
हैं । सव सामान इफरात से मिलेगे लेकिन सिर्फ पलंग और
विछावन की यहॉ कमी है।"
किंज्योतिने तो सरायके मालिकको किलेदार, समझ
लिया था। इनकार करने से अनादर होगा यह समझ वह
बोला-"जनाब किलेदार साहब, जो कुछ मिल जायगा
वही काफी है।" इतना कह वह वडी कठिनता और कष्टसे
घोडेसे उतरा क्योंकि दिन भर का भूखा प्यासा और थका था।
फिर किलेदार से घोड़ेको अच्छी तरह रसनेकी प्रार्थना कर

दूसरा परिच्छेद बोला-"ऐसा अच्छाघोडा आज तक पैदा नहीं हुआ।" सराय- के मालिकने घोडेकी ओर ध्यानसे देसा पर उसे किंज्योतिकी वात पूरी क्या आधी भी सच मालूम न हुई । वह घोड़ेको तबेले में बाँध अपने मेहमान के पास आया । आकर क्या देखता है कि दोनों छोकरियाँ किंज्योतिके कपडे निर्भय हो खोल रही हैं । उन दोनों ने बख्तरके अगले और पिछले हिस्से तो ग्योल डाले पर टोप सोलने में उलझ रही थी । टोप' हरे फीते से ऐसा बंधा था कि किसी तरह नही खुलता था। उन्होंने फीता काटना चाहा पर किज्योति राजी न हुआ। लाचार टोप रात भर उसके सिरपर ही रह गया। इससे उसकी सूरत बडी बेहूदा मालूम होती थी। किंज्योतिने उनकी मेवाओंके लिये बडी साधुभाषा मे कृतज्ञता प्रकट की। उन्होंने भोजन के लिये पूछा तो आप बड़ी खुशी से तैयार होगये । दरवाजेके पासही मेज़ लगाई गयी । सरायके मालिकने कुछ रोटियाँ और सूखी मछलियाँ उसपर ला रसी। आप साने को बैठे पर सिर पर दोप रहने के कारण हाथ आसानी से मुंह तक न पहुँच सका। तब छोकरियाँ खिलाने लगी । पानी पीना और भी कठिन था। भठियारेने घाँसुरी लाकर उसका एक सिरा तो किंज्योतिके मुंहमें डाल दिया और दूसरे में शराय भर दी। तब आपने ।

विचित्र वीर
फीता कटवाना
शराब पी। किंज्योतिने यह सब तकलीफे सही पर टोपका
मजूर
न किया।
इधर सरायमें एक गडरिया भी टिका था। वह मौज में
श्रा बाँसुरी बजाने लगा। अब किंज्योतिको निश्चय हो गया
कि यह कोई मशहूर किला है। उसने सोचा कि फिलेवाले
मेरी खातिरदारी में बाजे बजा रहे हैं। उसने काली रोटियों
और सूसी मछलियोंको ही न्यामत समझा। छोकरियोंको
फिलेकी राजकुमारियाँ और भठियारेको किलेका अध्यक्ष
समझा । यह समझ उसने सोचा कि यह यात्रा तो बडी सफल
हुई । पर कसर यही है कि अब तक मुझे वीरपद न मिला । यह
पद नियमानुसार पाये विना किसी दुस्साहसिक कार्य के लिये
यात्रा भी नहीं कर सकता।

तीसरा परिच्छेद
नियमानुसार वीरपद पर आरूढ अब तक न हुआ इस
'चिंता ने उसे इतना तग किया कि उसने खानेसे हाथ सैंच
लिया । भठियारेको बुला उसे साथ ले तवेले में चला गया
दरवाजे बदकर घुटने टेक किंज्योतिने कहा "ऐ साहसी वीर,
जब तक आप मेरी प्रार्थना स्वीकार न करेंगे तब तक मैं न
उलूंगा । इससे आपका गौरव बढेगा और मानव-जातिका
लाभ होगा।"
भठियारा किंज्योतिको अपने पैरों पर गिरा और उसके
विचित्र वाक्य सुन हका-बक्का हो उसकी ओर देसता रह गया।
कुछ स्थिर न कर सका कि क्या करना और क्या कहना
चाहिये। उसने किंज्योतिको उठानेकी कोशिश की पर वह
न उठा । लाचार उसने वादा किया कि आप जो कहेंगे
करूंगा।
किंज्योति बोला "श्रीमान से मुझे पूरी आशा है । आपकी
उदारताका पूरा भरोसा है। मेरी प्रार्थना यही है कि श्रीमान्
मुझे वीरपद प्रदान करने की कृपा करें। आपके किले के

विचित्र वीर
गिरजेमें प्राचीन प्रणाली के अनुसार रात भर मैं शस्त्रोकी
रक्षा करूँगा। कल प्रात काल श्रीमान् मेरी लालसा पूर्ण
करदें। फिर मैं सारे ससारमें एक छोर से दूसरे छोर तक
दुस्साहसिक कार्यो की सोजमे घूमने और लोगोंके दुख
दूर करने का पूर्ण अधिकारी हो जाऊँगा । अश्वारोही वीरोंका
यही कर्तव्य है और उनका मन भी मेरे मनको तरह
ऐसे-ऐसे कामोंमें ही लगा रहता है।"
भठियाराभी बडा चालाक था। किंज्योतिके पागल होनेका
पहले उसे सदेह ही था, पर अव तो पूरा विश्वास हो गया।
उसने दिल्लगी के लिये कोग जवाब न दे कहा "आपका कहना
बहुत ठीक और वाजिव है। जब मैं जवान था तव मै भी
मुहीमकी तलाश मे सारे स्पेनकी खाक छान चुका हूँ।
( यहाँ पर उसने ऐसे स्थानोंके नाम लिये जो चोरों, गुडो
और डाकुओ के अहे थे।) अब मैं इस किलेमें आकर वहादुर
सवारोंकी खातिरदारी करता और वह लोग जो कुछ
कमाते
उसमें हिस्से ले लेता हूँ। लेकिन इस किलेमें गिरजा नहीं है ।
नया बनेगा इसलिये पुराना तोड़ दिया गया । जरूरत पड़ने
पर आदमी जहाँ चाहता वहीं रस्में अदा कर लेता है। आप
चाहें तो इस चौक में ही हथियारों की हिफाजत की रस्म
पूरी कर सकते हैं। सबेरा होते ही आप बाजाप्ता बहादुर

तीसरा परिच्छेद
।
सवार बना दिए जायँगे । अच्छा, यह तो बताइए आपके
"पास क्या कुछ रुपये भी हैं ?"
किंज्योति-फूटी कौडी भी मेरे पास नहीं है। क्योंकि किसी
'इतिहासमे नहीं पढ़ा कि वहादुर सवार अपने पास रुपये पैसे
भी रसते हैं। भठियारा बोला-"आप भूलते हैं। माना कि
इतिहासमें ऐसा नहीं लिखा है। लेकिन इससे यह कैसे माना
जाय कि वह नहीं रखते थे। असल बात यह है कि रुपये पैसे
और साफ कमीज वगैरह ऐसी जरूरी चीजें हैं जिनका रसना
बहादुर सवारोंके लिये लाजमी है । इसीसे तवारीखोंमें
'इनका जिक्र नहीं है। आप यह जानते ही हैं कि बहादुर
सवार अपने साथ अकसर एक मुसाहव जरूर रसते थे ।
मुसाहव न हो तो रुपये से भरा एक बटुश्रा और मरहम की
एक डविया तो जरूर साथ रखते थे।"
किज्योतिने आगे यह सब चीजे जरूर साथ रसने की प्रतिज्ञा
शस्त्र रक्षा का समय आगया । इसलिये उसने बख्तरके
टुकडे हौजके सिरे पर रख दिए । दाये हाथमे भाला, वायें
कधे पर ढाल ले धीरे-धीरे होजके आगे टहलने लगा । ज्यों-
ज्यों रात भीगने लगी त्यो त्यों यह गश्त लगाने लगा।
इधर भठियारेने किज्योतिये पागलपनका हाल सरायके
सप लोगोंसे कह दिया, तो वह लोग भी इस विचित्र ढंगके
.

१४
विचित्र वीर
पागलपन पर आश्चर्य करने लगे और अलग से तमाशा
देखने के लिये बाहर निकल आये। उन्होंने देखा किंज्योति
कभी तो बड़ी अफड के साथ चहलकदमी फरता और फभी
बहुत देर तक स्थिर हो बड़े चावसे वख्तरकी ओर देखता
है । इस समय रात एक पहरसे कुछ प्यादा चीत चुकी थी।
चाँदनी भी ऐसी खिली थी कि वह जो कुछ करता सय साझ
दिसाई देता था।
कुछ गाडीवान भी सरायमें ठहरे थे। एक को खञ्चरोंके
लिये पानोकी जरूरत हुई । पर हौजसे धख्तर हटाये
विना सञ्चरोंको पानी पिलाना कठिन था। किंज्योतिने
गाडीवानको होजके पास जाते देस चिल्लाकर कहा-
"कौन
है ? बडी बेफ़िक्रीसे मेरा बस्तर कौन छूना चाहता है ?
खबरदार, जान दिये विना तू उसे नहीं छू सकता, चाहे
कोई हो।"
गाडीवानने इसकी कुछ परवा न कर बस्तर उठाकर
फेक दिया।
किंज्योतिने ज्योंही यह देखा त्योही वह आकाशकी श्रो
देख और राजकुमारी दर्शनीयाका ध्यान कर उच्चस्वर से
बोला-"राजकुमारी, इस अपमानका बदला लेने में मेरै
सहायता कीजिए।" इतना कह उसने भाला उठाया और एक

तीसरा परिच्छेद हाथ गाड़ीवानके सिर पर ऐसा मारा कि वह जमीन पर चित्त गिर पड़ा। अगर एक हाथ और लगता तो डॉक्टर बुलानेकी भी जरूरत न पड़ती । इसके बाद वह होज पर बख्तर रख फिर घडी अकड के साथ पहले की तरह चहलकदमी करने लगा। थोडी देर बाद दूसरा गाडीवान सञ्चरको पानी पिलाने आया पर पहले गाड़ीवान पर क्या गुजरी, उसे मालूम न था। पहला अब तक वेहोश पडा था । ज्योंही वह हौजसे घख्तर हटाने लगा त्योंही किंज्योतिने कुछ कहे विना फिर भाला तानकर उसका सिर भी तोड डाला। इस पर सब सरायवाले वहाँ इकट्ठे होगये । उनमें भठियारा भी था। किंज्योतिने इन सबको देखते ही ढाल ले तलवार सैंच ली। राजकुमारी दर्शनीया का ध्यान कर वह दुनियाके सब गाडीवानों से मुकाबला करने के लिये तैयार होगया। सराय- में जितने गाडीवान थे सबने अपने दोनों साथियोंकी दशा देस किंज्योति पर पत्थर फेकना शुरू कर दिया। किंज्योति भी अपने तई ढालसे बचाता हुआ वहीं डटा रहा, जिसमें कोई यह न कहे कि बख्तर छोड भागा । इधर भठियारा गाडीवानसे बार-बार कह रहा था-"छोडदो छोड़दो, पागल है।" इसपर किंज्योति और भी जोर से चीख उठा "तुम विचित्र वीर सव दगावाज और नामर्द हो । किलेदार भी कमीना है जिसने यहादुर सवारके साथ ऐसा बुरा सुलूक किया " उसकी चिल्लाहटने सचमुच सबको ऐसा डरा दिया कि वह लोग दोनों जखमियों को उठा सरायके भीतर घुस गये। किंज्योति निश्चित हो पहलेकी तरह फिर वख्तरकी निग- रानी करने लगा। भठियारेको अपने मेहमानका सेल अव और देखना मजूर न था। इसलिये उसने वहादुरीकी खिलअत अताकर बखेडा दूर करने का इरादा कर लिया । वह किंज्योतिसे गाडीवानोकी गुस्ताखो के लिये माफी माँग बोला "वख्तरकी निगरानी दो घटे से ज्यादा करने की जरूरत नहीं । मैं अब फौरन आपको वहादुर सवार बना दूंगा।" किंज्योति बोला-"तो अब देर न कीजिए । बना ही दीजिए। अगर वह लोग फिर धावा करेंगे तो मैं किलेमे एक को भी जीता न छोडूंगा।" भठियारा एक वही उठा लाया, जिसमें उसने गाडीवानो के घास-दाने का हिसाब लिखा था । उसे ही उसने प्रार्थना की तरह पढ दिया। किंज्योति बराबर घुटना टेके खडा रहा । भठियारेने उसके कधेको उसीकी तलवारसे अच्छी तरह ठोंक दिया। फिर उसने छोकरियोंसे कहा कि बहादुर किंज्योतिकी कमरसे तलवार बाँध दो । एक आकर

तीसरा परिच्छेद
तलवार पाँधने लगी पर हँसीके मारे हैरान थी। तलवार
पाँध देने पर बोली "भगवान तुम्हें भाग्यवान् वीर बनावे
और लडाईमें तुम्हारी जीत हो।"
किंज्योतिने कृतज्ञता प्रफटकर कहा-"कृपाकर अपना नाम
भी यता दीजिये जिसमें मुझे मालूम हो जाय कि मैं किसका
कृतज्ञ हुआ।" छोकरीने कहा "मेरा नाम" "टोलोसा" है।
किंज्योति बोला-"नहीं, श्रीमतीका नाम राजकुमारी टोलोसा
होना चाहिये । उसने कहा "बहुत अच्छा ।"
इस अदृष्ट पूर्व कृत्योके पश्चात् किंज्योति दुस्साहसिक
कार्यकी यात्राके लिये ऐसा उत्सुक हो रहा था कि चटपट
वायुवेग पर जा बैठा । फिर किलेदारको उसकी कृपाओं के
लिये धन्यवाद दिया। भठियारा भी उससे जल्द पिंड छुडाना
चाहता था। इसलिये खाने पीनेका खर्च माँगे विना ही
धन्यवाद दे उसे विदा किया।

२० विचित्र वीर । । रुपये हैं। लेकिन मैं ख़ुदाको फसम साकर कहता हूँ कि यह झूला है और मेरे मुँह पर झूठ बोलता है ।" किंज्योति बोला "कमीना पाजी, सूरजकी कसम साकर कहता हूँ कि मनमें तो आती है कि यह भाला तेरी देहमें घुसेड दूँ। फौरन उसकी तनख्वाह चुका दे, नही तो तुझे मार डालूंगा । सोलदे उसे ।" किसानने सिर झुका छोकरेको खोल दिया । किंज्योतिने छोकरेसे पूछा-"तेरा इसके यहाँ क्या वाकी है ?" छोकरा घोला-"सात रुपये महीनेके हिसाबसे नौ महीनेकी तन- ख्वाह ।" किंज्योतिने हिसाब लगाकर देखा कि ६३) होते हैं । फिर उसने किसानसे कहा-"वस ६३) रुपये दे हीदो नही तो जानपर बन आवेगी ।" किसान बहुत डरकर बोला "इतना नहीं है। मैं मरणसेजकी फ़सम साकर कहता हूँ कि तीन जोडे जूतेका दाम और एक रुपया डॉक्टरकी फीस काटकर जो निकलेगा दे दूंगा।" किंज्योतिने कहा-"ठीक है पर तुमने जो कोडे लगाये उसमें यह वसूल हो गया। उसने तुम्हारे जूते फाडे और तुमने उसका चमडा । जर्राहने उसका खून निकाला जब वह बीमार था और तुमने खून निकाला जब वह अच्छा हो गया । इस हिसावसे तुम्हारा उसके पास अब कुछ न चाहिये।" किसान बोला-"मुश्किल तो यह है कि इस वक्त मेरे पास रुपये नहीं हैं। अगर यह मेरे साथ घर चौथा परिच्छेद २१ चले तो एक कानी कौडी भी न रयूँगा।" छोकरा बोल उठा "दुहाई सरकार, मैं इसके साथ कभी न जाऊँगा । वह मुझे अकेला पानेगा तो जीता ही चवा जायगा ।" किंज्योति बोला-"वह कभी ऐसा न करेगा। मेरा हुक्म ही काफी है। बहादुरीके जिस श्रोहदे पर वह है अगर उसकी कसम खाकर कहे तो मैं उसे छोड दूंगा।" छोकरा फिर बोल उठा--"आर क्या कह रहे हैं । यह बहादुरीके ओहदेपर नही है । यह तो मामूली किसान है।" पात खतम करनेके लिये किसान चीचमें ही बोल उठा--"मैं दुनियाके सब बहादुरों की कसम साकर कहता हूँ कि तेरा जो कुछ बाकी है सब दे दूंगा।" किज्योति बोला--"देसना क़सम पूरी करना नहीं तो मैं भी वही कसम खाकर कहता हूँ कि मैं फिर आऊँगा और तुमे पातालसे भी ढूंढ निकालूँगा । अगर यह जानना चाहता है कि यह हुक्म देनेवाला कौन है तो जान ले कि बुराइयाँ और तकलीफे दूर करनेवाला शेरदिल मैं वहादुर किज्योति हूँ।" इतना कह उसने वायुवेगको एड लगायी और वह हवासे बाते करने लगा। किसान बरावर किंज्योतिकी तरफ देसता रहा । जब यह आँखोंसे ओझल हो गया तब किसान छोकरसे कहने लगा-"ले तेरी पूरी तन- ख्वाह चुकाये देता हूँ। क्योंकि तेरे हिमायतीका यही १ २० विचित्र वीर हैं। लेकिन मैं खुदाकी फसम साकर कहता हूँ कि यह भूठा है और मेरे मुँह पर झूठ बोलता है।" किंज्योति बोला “कमीना पाजी, सूरजकी कसम खाकर कहता हूँ कि मनमें तो आती है कि यह भाला तेरी देहमें घुसेड़ दूँ। फौरन उसकी तनख्वाह चुका दे, नहीं तो तुझे मार डालूँगा । खोलदे उसे ।" किसानने सिर झुका छोकरेको सोल दिया । किंज्योतिने छोकरेसे पूछा-'तेरा इसके यहाँ क्या वाक़ी है १" छोकरा घोला--"सात रुपये महीनेके हिसाबसे नौ महीनेकी तन- ख्वाह ।" किंज्योतिने हिसाब लगाकर देखा कि ६३) रुपये होते हैं । फिर उसने किसानसे कहा-"वस ६३) रुपये दे हीदो नही तो जानपर बन श्रावेगी ।" किसान बहुत डरकर बोला "इतना नहीं है। मैं मरणसेजकी कसम साकर कहता हूँ कि तीन जोडे जूतेका दाम और एक रुपया डॉक्टरकी फीस काटकर जो निकलेगा दे दूंगा।" किंज्योतिने कहा-"ठीक है पर तुमने जो कोडे लगाये उसमें यह वसूल हो गया। उसने तुम्हारे जूते फाड़े और तुमने उसका चमडा । जर्राहने उसका खून निकाला जब वह बीमार था और तुमने खून निकाला जब वह अच्छा हो गया । इस हिसाबसे तुम्हारा उसके पास अब कुछ न चाहिये।" किसान बोला-"मुश्किल तो यह है कि इस वक्त मेरे पास रुपये नहीं हैं। अगर यह मेरे साथ घर ।

चौथा परिच्छेद
२१
चले तो एक कानी कौडी भी न रखूगा।" छोकरा बोल उठा
"दुहाई सरकार, में इसके साथ कभी न जाऊँगा। वह मुझे
अकेला पावेगा तो जीता ही चबा जायगा ।" किंज्योति
बोला-"वह कभी ऐसा न करेगा । मेरा हुक्म ही काफी है।
बहादुरीके जिस श्रोहदे पर वह है अगर उसकी क़सम
साकर कहे तो मैं उसे छोड दूंगा।" छोकरा फिर घोल
उठा-"आप क्या कह रहे हैं । यह वहादुरीके ओहदेपर
नहीं है । यह तो मामूली किसान है।" बात खतम करनेके
लिये किसान वीचमें ही बोल उठा--"मैं दुनियाके सब
चहादुरों की कसम साकर कहता हूँ कि तेरा जो कुछ बाकी है
सब दे दूंगा।" किंज्योति बोला-"देखना कसम पूरी करना
नहीं तो में भी वही कसम साकर कहता हूँ कि मैं फिर
'पाऊँगा और तुमे पातालसे भी ढूंढ निकालूंगा । अगर यह
जानना चाहता है कि यह हुक्म देनेवाला कौन है तो जान
ले कि बुराइयाँ और तकलीफें दूर करनेवाला शेरदिल मैं
यहादुर किंज्योति हूँ ।" इतना कह उसने वायुवेगको एड
लगायो और वह हवासे बाते करने लगा। किसान वरावर
सिंन्योतिकी तरफ देसता रहा । जब वह आँसोंसे ओमल हो
गया तन किसान छोकरेसे कहने लगा-"ले तेरी पूरी
ज्वाह चुकाये देता हूँ। क्योंकि तेरे हिमायतीका यही

-
२२
विचित्र वीर
है।" छोकरा बोला-"लाइये वह भलामानुस हजार वर्ष
जिये ।" किसानने जवाब दिया-"देख, मैं तुझे कितना
चाहता हूँ । कर्ज वढाकर वसूली बढानेकी मैं भी कसम खाता
हूँ।" इतना कह उसने छोकरको फिर पेडसे बाँध दिया और
इतने कोडे लगाये कि वह अधमरा-सा हो गया। किसान बोला-
"अब बुला अपने हिमायतीको ।" इतना कह छोकरको भी
सोल दिया । वह छोकरा भी गुस्सेमें कसम खा यह कहता हुआ
चला गया कि मैं उस हिम्मती वहादुरको सोज निकालूंगा
और तुमसे सतगुना वसूल करूँगा। इतना होते हुए भी
छोकरा तो रोता हुआ भागा और उसका मालिक हँसता
हुआ सडा रहा।
किंज्योति सुशी-खुशी मोचता जाता था कि आज मैंने बड़ी
भारी बुराई दूरकर राजकुमारी दर्शनीयाका गौरव बढाया
है । इतनेमें वह एक चौरास्तेपर जा पहुँचा । उसे याद आया
कि वहादुर सवार जब दुराहेपर पहुँचते, तब सोचते हैं कि
किधर जाना चाहिये । इसलिये वह भी ठहर गया और
सोचने लगा कि अब किधर चलूँ । कुछ देर बाद उसने वायु-
येगकी लगाम ढीली करदी और निश्चय किया कि जिघर
यह ले जायगा उधर ही जाऊँगा । घोडेगमने लगाम ढीली
पाते ही तबेलेकी राह लो।

चौथा परिच्छेद २३ . लगभग दो मील जानेके बाद किंज्योतिको प्रादमियोंका एक मुंड दिखाई दिया। वह टोलेडोके सौदागर थे और रेशमी कपडे खरीदने दूसरे सूबेमें जा रहे थे। उनमें छः छाते लगाये, घोडोंपर चार नौकर और तीन साईस पैदल थे। उन पर नजर पडते ही, किंज्योति ने समझा कि यह भी कोई नयी मुहीम है । बस वह रिकाबोंपर पैर जमा अकड बैठा । भाला तान और ढाल छातीसे लगा उनकी राह देसने लगा। इसने उन्हें भी वहादुर ही समझ लिया था । जब वह इतने निकट आगये कि बात सुन सके तव किंज्योति घमडके साथ बोला “तुम लोग सव मजूर कर लो कि राज- कुमारी दर्शनीयासे सुदर इस जगतमें कोई नहीं है।" सौदा- गर यह सुन ठहर गये और उसकी अजीव सूरत देखने लगे। पीछे उन्हे उसका पागलपन मालूम हो गया। उनमें एक दिलगी- बाज था। वह बोला-"जनाव, हमने राजकुमारीको नहीं देसा है। पहले दिसाइये। अगर वह ऐमी मुंदर होंगी तो जरूर मजूर कर लूँगा ।' किंज्योति बोला-"अगर मैंने दिसला ही दिया तो तुम्हारी अक्लमदी क्या हुई ? तुम्हारी तारीफ तो तब है जव तुम देसे विना ही विश्वास करो, मुबूल करो--मजूर करो, कसम खाओ ।और इसपर कायम रहो। अगर नहीं करोगे तो मैं लड़ाई लिये

२४
विचित्र वीर
.
तुम घमडियोंसे कहता हूँ कि एक-एक कर आश्रो या सव
मिलकर आओ।" यह कह वह बरछी तान ऐसे गुस्सेसे
झपटा कि अगर वायुवेग ठोकर खा गिर न पड़ता तो उस
बेचारेका कामही तमाम हो जाता ।
वायुवेगके गिरते ही उसका सवार भी जमीनपर लोट-पोट
करने लगा । वह वरछा, ढाल, महमेज और वख्तरसे ऐसा
लदा हुआ था कि कोशिश करनेपर भी न उठ सका । पडा.
पडा वह कहता था-"फसादियो। भागो मत । गुलामके बच्चो,
ठहरो। यह घोडेका कसूर है, मेरा नहीं, जो यहाँ लोट रहा
हूँ।" एक साईसका स्वभाव ऐसा अच्छा न था कि गालियाँ
सुन चुप रह जाता । वह जवाब देनेके लिये किंज्योतिके
निकट आया । बरछा छीनकर टुकडे-टुकडे कर डाला और
फिर एक टुकडेसे बेचारे बहादुर सवारको पीटते-पीटते
बेदम कर दिया । वस्त्रतर उसे न वचा सका । सौदागरोंने
बहुतेरा मना किया पर उसने एक न सुनी । जव थक गया तव
छोडा । सबके चले जाने पर किंज्योतिने फिर उठना चाहा,
पर वह ऐसा जख्मी हो रहा था कि टस-से-मस न हो सका।
किंज्योति जव न उठ सका, तब शौर्य सवधी जो पुस्तकें वह
पढ चुका था उन्हें सोचने लगा। फिर जो वहादुर लडाई के
मैदानमें जख्मी हो रह जाते थे, उनके बारेमें सोचने लगा।

चौथा परिच्छेद २५ इस प्रकार थानदकी कल्पनामें यह लोट-पोट हो रहा था। पर उसके गाँवके एक मजदूरने श्राफर उसके आनदमें बाधा डाल दी, नहीं तो अभी वह न जाने और क्या-क्या सोचता । मजदूरने जमीनमें पड़ा एक आदमीको देस निकट आकर पूछा "कौन है और क्या माजरा है ?" किंग्योति अपनी पुस्तकोंके ध्यानमें था । प्रश्नोंका उत्तर न दे यहादुर सवारोंके विचित्र युद्धादिका वर्णन करने लगा । आखिर मजदूग्ने टोप हटा, मुँह पोछकर देखा तो पहचान लिया। किंज्योतिका ऐसी दशा देख उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने मिलम सोलकर देखा तो खून नहीं था । उसने किंज्योतिको सड़ा किया और बड़ी कठिनाईसे अपने गधे पर निठाया । मिलमके टुकडे इकट्ठे कर वायुवेग पर लाद दिये । फिर दोनों जान- वरोंको गाँवकी तरफ ले चला । पर किज्योति चुप न था। अपनेको बहादुरोंकी अवस्थामें समझ बोलता जाता था, जिसे सुन बेचारा आश्चर्यान्वित हो रहा था। मजदूर सूर्यास्तके समय यह प्रामके समीप पहुँचा तो थोडी देर ठहर गया । जव जय अधेरा हुआ तव गाँव में गया जिसमें किंज्योतिको गधे पर चढा और फुटा-पिटा कोई न देख ले। किंज्योतिके घर पहुंचा तो देखा फुहराम मचा हुआ है। किंज्योतिको भनोजी, गृह-रक्षिका, गाँवके पादड़ी,

।
२६
विचिन्न वीर
इनाम सब-के-सब उसके गुम होजाने की चर्चा कर रहे
गृह-रतिका इसी बात पर जोर दे रही थी कि यह फसाद
बिलल्ली किताबोका है। भतीजी कह रही थी इन्हें जल
खाक कर देना था।
किंज्योतिको देखते ही सब-के-सब मिलनेके लिये
आये । लेकिन किंज्योतिने चिल्लाकर कहा-"अलग रहो
घेतरह जख्मी हो रहा हूँ। घोडेके कुसूरसे ही ऐसा हुआ
मुझे पलॅग पर लिटा दो।" सब उसे सोनेके कमरेमे लेग
उसकी देहपर जनमोंकी तलाश हुई पर एक न मिल
किंज्योतिने कहा-"जब मै ससारके दस वडे-बडे वीर
लड रहा था तब वायुवेगसे गिर पडनेके कारण आहत
गया।" उन लोगोंने कई सवाल किये पर किंज्योतिने कु
जवाब न दे, कुछ सानेके लिये मांगा और कहा कि मु
आराम करने दो। उन लोगोंने वही किया जो उसने का
था। इस प्रकार वीर किज्योतिकी पहली चढाई पूरी हुई ।
.

पाँचवाँ परिच्छेद
किज्योति जब न्र्राटे ले रहा था तव पाठीने निम यम में
सब फसादोंकी जड़ कितारें रपी या उपकी पादी माँगी।
भतीजीने रडी खुशीसे चानी दे दी। मय लोग रम फमा
में गये । गृहरक्षिका भी माय थी । यहाँ एक सौम अधिक
बडी-बढी सुदर जिन्ददार पुम्नकार मिया छोटी-छोटी भी
बहुत थीं। पादडीने हजाममे एक-ग पर, सय किताय लाने
लिये कहा । उसका इरादा था कि मय नलाया जाय।
पर भतीजीने कहा-"नहीं, एक भी मामानी। मय नीचे
फेंक दो । यही चौकमें जला दी जायेगी। ग्रासिकाने भी
यही बात कही।
पादड़ी और हजाम जन्लाने योग्य पुग्न चुना लगे, पर
गृहरतिका जलानेके लिये चन हो रही थी। उसने पुत्रको
छोड वाली सर-की-सर अग्निदेवको मर्पित कर दी । पादड़ी
और हजामने किंज्योति को बीमार्गकी एक दवा और भी
बतायी । वह यह कि पुस्तकालयका द्वार ईटो मे चिन दिया
जाय और कह दिया जाय कि जादूगर पुस्तक-महित
उठा ले गये।
।

- छठा परिच्छेद इस प्रकार वह दोनों जव बातें कर रहे थे तब उन्हें तीस- चालीस पनचकियां सामने दिखाई दी। किंज्योतिने देखते ही कहा-"हमलोग जैसा चाहते हैं, उससे अधिक हुआ चाहता है । दोस्त सनकूराव, जरा उधर देखो, वह जो तीस-चालीस महादैत्य दिखाई देते हैं उन्हें अभी जाकर मारता हूँ। उनका मालमता लूटकर हम लोग धनी हो जायेंगे । यह नीतिका युद्ध है । ऐसे दुष्टात्माओंको ससारसे दूर कर देना भगवान्की अच्छी सेवा है।" सनकू दैत्य-~-कहाँ? किंज्योति-वही जो सामने दिखाई देते हैं, जिनकी बडी-- वडी मुजाएँ हैं। किसी-किसीकी भुजाएँ तो छाछ मील लवी होती हैं। सनकू-लेकिन यह तो पनचकियाँ हैं । दैत्य कहाँ हैं। जिन्हें आप भुजाएँ कह रहे हैं, वह तो उनके पहिये हैं। जब हवासे यह घूमते हैं तब पनचकियों चलती हैं। किंज्योति-तुम अद्भुत् कर्मों का मर्म नही समझते इसीसे ऐसा कहते हो । अरे यह दैत्य हैं। अगर डरते हो तो 4 छठा परिच्छेद । हटकर परमात्मासे प्रार्थना करो और मैं उनसे अद्वितीय भयानक युद्ध करने जाता हूँ । इतना कह उसने वायुवेगको ऍड लगायी और अपने मुसाहबकी एक न सुनी । समीप पहुँचकर भी अपनी सनकमे चिल्ला-चिल्लाकर कहता जाता था-"नामर्दो, ठहरो भागो मत | मैं बहादुर अकेला ही तुम सबपर आक्रमण करता हूँ।" हवा जरा तेज होगयी थी। इससे वह पहिये भी चकर काटने लगे थे। किंज्योतिने फिर ललकारकर कहा-"तुम्हें कितनी भुजाएँ हैं इसकी मैं परवा नहीं करता । तुम्हें इसका मजा चखातो हूँ।" इतना कह उसने राजकुमारी दर्शनीयासे इस विपत्तिमें सहायताके लिये प्रार्थनाकी । फिर ढालसे अपनेको वचा बरछा तान इतनी तेजीसे चला जितनीसे वायुवेग उसे ले जा सकता था। पहले जो पनचक्की मिली उस- पर उसने भालेसे वार किया । भाला तो पहियों में घुसतेही टुकडे-टुकडे हो गया और सवार घोडे सहित जमीनपर सिरके बल गिर पड़ा। इधर गधेने भी अपनी पूरी ताकत खर्चकर सनकूरावको बहादुर किंज्योतिके पास मदद के लिये पहुंचा ही दिया। सनकूने पहुँचकर देखा कि बहादुर सवार घोड़ेके साथ भूमिमें शयन कर रहा है। ऐसी पटक लगी कि उठना हराम . 1 ३४ विचित्र वीर रहा है। सनकू वोला-"क्या मैने नहीं कहा था कि यह पनच- कियाँ हैं, दैत्य नहीं । जिसने कभी पनचकियाँ देखी होंगी वह कभी ऐसी भूल नहीं कर सकता।" किज्योति-शात मित्र सनकू शात सुनो युद्धकी गति जैसी बदलती है वैसी किसीकी नहीं बदलती । मैं समझता हूँ क्या, बिलकुल ठीक है कि जिन जादूगरोंने मेरा कमरा और पुस्तकें चुराली हैं उन्होंने इन्हें चट-पट पनचकियाँ बना दिया है, जिसमें मैं इन्हें न जीत सकूँ। वह मुझसे बडी शत्रुता रखते हैं। वह चाहे जितनी बुराइयाँ करें लेकिन उनका जादू मेरी तलवारपर नहीं चल सकता है। सनकू शक नहीं चल सकता है। ' इसके बाद सनकूने अपने बहादुर मालिकको उठा वायुवेग- पर लादा पर बेचारा जानवर भी बेतरह घायल हो रहा था।

सातवाँ परिच्छेद इस नयी मुहीमकी चर्चा करते दोनों एक घाटीकी तरफ चले । किंज्योति कहता जाता था कि घाटीकी ओर दुस्साहसिक कर्मों का अभाव न होगा। यही उनकी सीधी सडक है। मन- कूने छूटते ही कहा-"आप एक ओर झुके जाते हैं। जीनपर जरा सीधे पैठिये । मालूम होता है, गिरनेसे चोट प्यादा लगी है।" किंज्योति-निश्चय यही बात है । बहादुर सवार कभी तकलीफकी कोई बात नहीं कहते । इसीसे मैं भी नहीं कहता हूँ। सनकू-अगर ऐसा है तो मैं क्या कहूँ। लेकिन मुझेतो जरा सी भी तकलीफ होगी तो मैं कहे विना न रहूँगा । क्या मुसाहबोंको भी न कहना चाहिये ? किंज्योति सनकूकी सरलतापर हँसे विना न रह सका । बोला-"तुम मजे में कह सकते हो क्योकि शौर्य-शास्त्र में तुम्हारे लिये निषेध नहीं है।" वह घाटीके पास पहुंचे तो उन्हें सेंटवेनीडिक्ट के मता .

विचित्र चीर नुयायी दो मठवासी दिखाई दिये । वह खच्चरोंपर सवार और छाते लगाये थे । उनके पीछे एक सेजगाड़ी थी जिसके साथ पाँच-छः सवार और दो सईस थे । सेजगाडी में बिस्केकी चेगम थी । वह अपने पतिके पास सेविल जारही थी। वह किसी बडे पदपर अमेरिका जानेवाला था। मठवासियोंसे उसका कोई सवध न था। दोनों अपने-अपने कामसे जा रहे थे। किंज्योति उन्हें देखते ही अपने मुसाहब से चोला-"अगर मेरो भूल न हो तो मैं कह सकता हूँ कि यह मुहीम सबसे जवर- दस्त होगी । यह जो काली पोशाक पहने नजर आते हैं बेशक जादूगर हैं और किसी बेगमको चुराये गाडीपर लिये जाते यह अत्याचार नहीं देख सकता।" सनकू-"यह पनचकियोंसे भी खराब निकलेगी। यह जादू गर नही, मठवासी हैं । यह गाडी भी मुसाफिरो की है।" किज्योति-"मैं कह चुका हूँ, तुम मुहीमके बारेमे कुछ नहीं जानते । मैं कहता हूँ, वह ठीक है या नहीं यह अभी दिखाये देता हूँ। इतना कह किंज्योति आगे बढा और सडकके बीचमें डट गया । मठवासी पास आये तो वह उपटकर बोला-"पापी पिशाचो, जिस बेगमको भगाये लिये जाते हो उसे छोड़ दो नहीं तो भरनेके लिये तैयार हो जाओ।" मठवासी खबर

सातवाँ परिच्छेद
३७
रोक ठहर गये और उसकी सूरत और बातोंपर आश्चर्य
कर कहने लगे । “वीरवर, हम न पापी हैं और न पिशाच,
हम तो मठवासी हैं। उस गाडीमें बेराम है या कौन यह भी
हम नहीं जानते ।" किंज्योतिने कहा "इन मीठी बातोंसे काम
न चलेगा।" यह कह वह वायुवेग को ऍड लगा, भाला तान
'अगले मठवासी पर ऐसा झपटा कि अगर वह सचरसे
'उतरन पडता तो मरता नहीं, तो धराशायी अवश्य हो जाता।
दूसरा मठवासी अपने साथीकी दशा देस सच्चर समेत
रफूचक्कर हुआ। किंज्योति दौडकर गाडीपर जा चढा । सनकू
मठवासी को जमीन चूमते देख गधेसे कूद पड़ा और उसके
कपड़े उतारने लगा । मठवासियोंके दोनो साईसोंने आकर
पूछा-"मेरे मालिकके कपडे क्यों उतारे ?" सनकू बोला-
"क्यों न उतारूँगा? मेरे मालिकने लडाई जीती है। यह
लूटका माल है । इसपर मेरा हक है।" साईसोंने लूट, लडाई
आदि का मतलब कुछ न समझा ! किंज्योतिको कुछ दूरपर
गाडीवालोंसे बातें करते देख उन्होंने सनकूको जमीनपर दे
मारा और इतना ठोंका कि उसे अम्माजानका दूध याद आ
गया । मठवासी इधर-उधर न देख खवरपर जा चढा और
सरपट भागा।
इधर धीर किंज्योति धेगमसे कहने लगा -"श्रीमतीको

३८ विचित्र वीर गिरफ्तार फरनेवाला मेरे हथियारके जोरसे पामीनपर पड़ा आसमान देस रहा है। श्रीमतीको मेरा नाम शायद मालूम न हो इसीलिये बताये देताहूँ कि मेरा नाम वीर किंज्योति लामनचावाला है । और मैं परम सुदरी राजकुमारी दर्शनीया टोवोसोवालीका प्रेमी हूँ। बस मैं एकही इनाम चाहता हूँ । वह यह कि श्रीमती इसी गाडीपर टोवोसो चली जाये और मेरी हृदयेश्वरीसे अपने छूटनेका सारा वृत्तात कहदें।" विस्केके एक रईस भी बेगमके साथ थे। उन्होंने किंज्योतिकी बाते सुन उसके पास आ भाला पकडकर कहा-"हट- जाइये, अगर गाडी न छोडेगे तो मैं कस्म खाकर कहता हूँ, आपकी जानपर बन आवेगी। मैं भी विस्केका रहनेवाला हूँ। चलिये हटिये।" किंज्योति बोला-"अगर तुम भलेमानस' होते तो मैं तुम्हारी बेवकूफीका जवाब देता ।" बिस्केवालेने कहा-"मैं भलामानस नहीं। मैं कस्म साकर कहता हूँ, तू झूठा है । अगर भाला फेक दे तो मैं वही कर डालूंगा जो बिल्ली चूहेके साथ करती है।" किंज्योति भाला फेंक ढाल लगा उसका करनेके लिये उसपर टूट पडा । विस्केवालेको इतनी मुह- लत न थी कि खच्चरसे उतरता । वह केवल तलवार सेंच और गाड़ीकी गद्दी .ले ढाल बना सका । बेगमने दोनोंको . काम तमाम सातयाँ परिच्छेद मिढ़ते देखा तो कोचवानको एक तरफ गाड़ी हटा लेनेके लिये हुक्म दिया । कोचवानने गाडी एक तरफ करली और यह पहोंसे युद्ध देसने लगी। निस्केवालेने एक भरपूर हाय किंज्योतिके, फैधेपर मारा । अगर मिलम न होता तो उसके दो टुकड़े हो जाते । अव किंज्योति चोट सा राजकुमारी दर्शनी- याका स्मरण कर जानपर सेलनेको तैयार हो गया । विस्केवा- लेने गद्दीसे अपनेको पचा पैतरा बदला । किंज्योतिका वार ऐसे जोरका हुआ कि उसके मुँह और नाफसे खूनका फौवारा चलने लगा। खच्चर भागनेके लिये ऐसा घबराया कि विस्केवाला जमीन पर जा रहा। वीर किंज्योति शातिपूर्वक डटा रहा । जव उसने देखा कि शत्रु भूमिपर गिर पड़ा तब घोडेसे उतर उसके समीप गया। तलवारकी नोंक उसकी आँसोंसे लगाकर उसने कहा-"हार मानों नहीं तो धडसे सिर अलग फरदूंगा।" बिस्केवालेकी दशा ऐसी न थी कि कुछ जवाब दे सकता । किंज्योंति उस समय क्रोधसे उन्मत्त-सा हो रहा था। उसका चुप रहजाना और भी गजव ढाता पर बेगमने आकर प्राण- दान की भिक्षा माँगी । किंज्योति ने कहा-"मैं प्राणदान देता हूँ पर एक शर्तपर । यह बहादुर राजकुमारी दर्शनीयाके निकट टोवोसो जाफर प्रार्थना करे । यह जैसा उचित सम-

४०
विचित्र वीर
मेंगी करेंगी।" बेगमने डरके मारे यह भी न पूछा कि दर्शनीया
कौन है और किंज्योति क्या चाहता है। उसने कुछ समझे
विना ही तुरंत वादा कर पिंड छुडाया । और किंज्योतिने मी
छोड़ दिया।

आठवाँ परिच्छेद
पिछले परिच्छेदकी घटनाके बाद किंज्योति अश्वारूढ होचला
और मुसाहव सनराव भी साथ होलिया । कुछ दूर जानेके वाद
किंज्योतिने पूछा-"सनकू, थैलेमें कुछ सानेकी भी चीजें हैं ?"
सनकू- हुजूर हाँ, एक प्याज, पनीरको एक टुकडा, कुछ टुकड़े
रोटियोंके भी हैं लेकिन यह हुजूर जैसे बहादुरके साने लायक नहीं हैं।
किंज्योति-इस बारेमें तुम्हारा ज्ञान कितना थोडा है । तुम
यह जान रसो कि बहादुर सवारोंके लिये यह कितने
गौरवकी बात है कि वह लोग महीनेमें एक बार ही खायें ।
और वह भी क्या ? जो कुछ मिल जाय । अगर तुम मेरे
जितना इतिहास पढे होते तो यह सब जानते। उनके लिये
जब कभी तैयारी से खाना पकाया जाता था तब-ही वह लोग
उमदा-उमदा साना साया करते नहीं तो सूंघ कर ही रह जाते
थे। यह भी अनुमान किया जाता है कि वह लोग कुछ खाये
विना नहीं जी सकते थे और उन्हें सदा जगलों और पहा-
डोंमें भटकना पड़ता था, तो ऐसी दशाम वह वैसा ही खाना
खाते होंगे जैसा तुम अभी मुझे देते हो।

४२
विचित्र वीर
सनकू-क्षमा कीजियेगा । मैं न लिसना जानता हूँ और
न पढ़ना। वहादुरोंकी वातोंसे मैं बिलकुल जानकार नहीं ।
पर अबसे मैं अपने थैलेमें सूग्वे फल हुजूरके लिये रखा
करूँगा क्योंकि हुजूर बहादुर हैं। और मैं तो वहादुर नहीं
इसलिये अपने लिये अच्छी-अच्छी चीजें रगूंगा।
इतना कह उसने थैलेमें जो कुछ था निकाला और दोनोंने
बड़े अनद और प्रेम से खाया।
कुछ दूर जानेके बाद एक जगल मिला । किंज्योति विश्राम
करनेके लिये यहाँ घोड़ेसे उतर पड़ा । घोडा पास ही चरनेके,
लिये छोड दिया और आप एक पेड़के नीचे आरामसे लेट
गया । वायुवेग चरता-चरता जरा दूर निकल गया । फिर
जहाँ कुछ घोदियाँ चर रही थी वहाँ जा पहुंचा। घोड़ि-
योका स्वभाव अच्छा नही था । वह दुलत्तियाँ झाडने लगी,
जिससे वायुवेगका, तग टूट गया और वह जमीनपर जा
लेटा। यगुयासके रहनेवाले मजदूरोंकी यह घोडियाँ थीं।
यह लोग इधर-उधर आराम कर रहे थे। गडबड देख
चारों ओरसे दौड आये और लगे। वायुवेगकी घेतरह खबर
लेने।
-
। किंज्योति और सनाने वायुवेगको पिटते देखा तो दौडते-
हाँफते उसके निकट पहुँचे । किंज्योतिने कहा-"सनकू, यह सब

आठयाँ परिच्छेद
४३
यहादुर नहीं मालूम होते । यह कमीने बदमाश है। यह
इसलिये कहता हूँ जिसमें तुम इन्हें ठीक करनेमें मेरी सहा-
यता करो।" सनकू योला-"हम क्या ठीक करेंगे? यह पीस
और हम दोही हैं।"
किंज्योति-"अकेला मैं सौके परावर हूँ।" फह तलवार ले
यागसियों पर झपटा । मनकूने भी उसका साथ दिया।
किंज्योतिने पहुँचकर तलवारका एक भरपूर हाथ एक मजदूरके
कॅधे पर मारा । मजदूरोंने भी दोद्दीको धावा करते देख इकट्ठे
हो लट्ट चलाना शुरू कर दिया। फिर क्या था ? सनक जमीन
पर लेट गया और किंज्योति भी अपने सय दाव पेंच भूल
वायुवेगके पैरोंके पास लोट गया । मजदूरोंने दोनोंको गिरते
देखा तो चटपट घोडियों पर बोझ लाद नौ दो ग्यारह होगये ।
जिसे पहले होश हुआ वह सनकू था ! उसने अपनेको
मालिकके निकट पडा देस आह भरी । रोनी-सी धीमी आगाजमें
पुकारा-"बहादुर किंज्योति प्राह " किंज्योति भी उसी
सुरमें बोला--"क्या है भाई सनकू ?"
सनकू-हम लोग चलने-फिरने लायक कितने दिनों में
होजायेंगे ?
किंज्योति-अपने बारेमें तो मैं कुछ नहीं कह सकता।
लेकिन यह अपना ही दोष है । जिन्हें मेरी तरह बहादुरीका

विचित्र वीर - टीका नहीं लगा उनपर तलवार नहीं चलानी थी। नियम तोडनेका यह दण्ड है । मेरे प्यारे सनकू। मैं जो कुछ कहता हूँ उसे ध्यानसे सुन । इसमें दोनोका फायदा है। अब जब कभी ऐसे कमीनोंसे मुकाबला हो, तो मेरे भरोसे मत रहना । मैं तो अब कभी ऐसा न करूँगा । तू दिल खोलकर भिड जाया करना । हाँ अगर कोई बहादुर उनकी मदद करेगा, तो मैं भी तेरी करूँगा । तूने हजारों बार देखा होगा कि मेरे हथि- यार कैसे जबरदस्त हैं । विस्केवालेपर विजय पानेके कारण किंज्योति अभिमानके मारे फूला न समाता था। लेकिन सन रावको यह वेवक्त को सहनाई पसद न आयी । वह बोला- “हुजूर, मैं सीधा-सादा झगडे से दूर रहनेवाला आदमी हूँ। कैसी भी हानि हो उसे सह सकता हूँ। क्योंकि मैं बाल बच्चे- वाला हूँ। अब आप मुझे छुट्टी दे दें। हुकूमत करना मेरा काम नहीं ।मैं किसी तरह भी किसानों और बहादुरोंपर तलवार न उठाऊँगा । यह में सलाहकी तरह कहता हूँ। जिन्होंने मेरा कुछ नुकसान किया उन्हें मैं छमा कर देता हूँ और आगे भी बनी या दरिद्र, सवल या निर्वल चाहे जो मुझे सतायेगा उसे भी क्षमा करता हूँ।" किंज्योति-सनकू, अगर पसुलियोंका दर्द कम होजाता और बोलनेकी ताकत होती तो मैं तेरी भूल तुझे अच्छी

श्राठयाँ परिच्छेद
24
,
सरह समझा देता । मूर्ख मुन । भाग्यकी जो हवा अभी हमारे
विरुद्ध चल रही है, अगर अनुकूल चलने लगे और
हमारी कामनाओंके प्यालेको भर दे और फिर हम लोग जिन
द्वीपोंके बारेमे तुमसे फह चुका हूँ कहीं उनमें पहुँच जायँ
तो, सनफू बता तू क्या करेगा? अगर मैंने एक द्वीप जीत लिया
और तुझे उसका शासक बना दिया तो तू मेरा सारा परिश्रम
व्यर्थ कर देगा क्योंकि न तो तू बहादुर है और न बनना ही
चाहता है। अपने हानिकरनेवालोंसे बदला लेनेका न तो
साहस है और न अपने राज्यको बचानेका कलेजा ही है।
यह तू जान रख कि नये जीते हुए राज्योंके रहनेवालोंका
मन कभी ऐसा शात नहीं होता और न अपने नये स्वामीकी
ओरमे साफ ही रहता है। उस नये स्वामीको यह डर जरूर
रहता है कि यह लोग परिस्थिति बदल डालनेका प्रयत्न
अवश्य करेंगे।
सनकू-आपने जिस साहस और समझकी घात कही है
चाहता हूँ कि वह मुझमें हो जायँ । पर मैं इस वर्तमान
विपत्तिमें गरीबोंकी ईमानदारीकी कसम साकर कहता हूँ
कि इस समय मेरे लिये उपदेशमे अधिक मरहमपट्टीकी
जरूरत है।
किंज्योति-सचमुच ऐसी ही बात है । पर मैं जानता हूँ

विचित्र वीर
'कि यह सव असुविधाएँ ही वीरताका अंग हैं। अगर ऐसा
न होता तो अब तक मैं घबराकर मर गया होता ।
सनकू-हूजूर, अगर यह सब विपत्तियाँ केवल वीरताका
ही फल हैं तो क्या ऐसा अक्सर होता है ? मैं सोचता हूँ कि
ऐसे दो फल और मिले तो तीसरेके योग्य हम लोग न रहेंगे।
इमपर किंज्योतिने एक मशहूर वहादुरका लवा किस्सा
कह सुनाया जिसे उसने पुस्तकोंमे पढा था ।
किस्सा पूरा होने पर सनकू कराहकर उठा। बडी मुश्किलसे
अपने गधेपर काठी रसी । फिर वायुवेगको खडा किया । अगर
वायुवेग वोलता तो कहता कि तुम दोनोंसे मेरी हालत खराब है।
सनकूने किंज्योतिको गधेपर बिठाया और वायु-वेगकी गर्दन गधेकी
दुमसे बॉधदी। फिर जिधर रास्ता मिला उधरही उन्हें ले चला।
मुश्किलसे वह लोग तीन मील गये होंगे कि एक सराय
नजर आयी पर किंज्योतिने उसे किला ही बताया । सनको
इस पर बड़ा अफसोस हुआ । वह दृढतासे कहता था कि
सराय है, पर किंज्योति अपनी बात पर ही डटा रहा । इसी
तरह सराय और मिलेका झगडा करते वह लोग सरायके
नजदीक जा पहुँचे । सन कुछ कहे-सुने विनाही मवेशियोकी
बरात लिये उसमें घुस गया।
है

नवा परिच्छेद भठियारे ने किंज्योतिको गधेपर आड़ा पडा देख सनसे पूछा कि माजरा क्या है ? उसने कहा--"कुछ नहीं, जरा पहाडीसे गिर पडे इससे पसलियोमें चोट आगयी है। भठि- यारिनका स्वभाव जरा और ढग का था। भठियारिनोंका जैसा होता है वैसा नहीं । उसके चित्तमें दया थी और दूसरोंके दुससे वह शीघ्र पिघल जाती थी । वह तुरत किंज्योतिकी सेवा शुश्रूषा करने लगी । उसके एक बडी सुदर बेटी थी। एक काली-कलूटी नाटी मोटी दाई भी थी। पर थी बडी चालाक । दोनोंने सेवा शुश्रूपामें हाथ वटाया । ऊपर- वाले कमरेमें किंज्योतिके सोनेके लिये मामूली-सा बिछावन बिछाया गया । यह कमरा बहुत दिनों तक घास रखनेके काममें लाया गया है यह साफ मालूम होता था । चार खुरदरे तखते दो मेंजोंके छोटे-बडे ढाँचों पर रसकर पलँग बनाया गया और तोशक लिहाफ से ज्यादा मोटी न थी। उसमें जो कुछ भरा था यह पत्थरमे भी कहा था। चादरे चमडेको भी मात करती थी। कम्मलके सूत तो अलग-अलग गिने जा सकते थे।

४८ विचित्र वीर इस फरमायशी विस्तरपर किज्योति लेट गया और भर- हम पट्टी होने लगी। भठियारिनने कहा, यह गिरनेकी चोट नही मारकी है । सनळू बोला-"यह जहॉ गिरे वहाँ जमीन जरा पथरीली थी इसीसे ऐसी चोट है। जरा मिहरवानी कर कुछ मरहमपट्टियाँ मेरे वास्ते भी रख छोडो । मेरी पसुलियोंमें भी दर्द है।" भठियारिनने पूछा क्या तुम भी गिर पडे थे? सनकू बोला-"नही । मैं गिरा तो नहीं पर मालिकको गिरते देख मेरे भी दर्द हो आया।" भठियारिनकी बेटीने कहा-"हाँ ऐसा होसकता है । मैं सपनेमें जब कभी किसी ऊँचे गुबजसे गिरती हूँ तो नीद खुलने पर मालूम होता है मानों सचमुच चोट लगी है।" मुख्तसर यह कि सनकूकी भी मरहमपट्टी हुई। किंज्योति अव भी अपनेको किसी क्लेिमें और इन औरतोंको किलेक राजकुमारियाँ समझ रहा था । वह और चुप न रह सका लगा बहादुराना लेक्चर झाडने । पर उन औरतोंमें एक भी उसके औपन्यासिक व्याख्यानका एक शब्द भी न समझा उन्होंने जाना कि यह धन्यवाद दे रहा है । वह भी बदलेक धन्यवाद दे चली गयी । लेकिन किज्योतिको दर्दके मा अच्छी नींद न आयी। सवेरे एक कीमती दवा खानेके कारण किंज्योतिका 1

नवाँ परिच्छेद
४९
सचमुच मचलाने लगा। तबीयत जरा ठीक हुई तो फिर वही
मुहीमकी सनक सवार हो गयी। चट घोडेपर जा चढा और
सरायके एक कोनेसे लोहे की छड उठा लाया, उस समय वहाँ
चीस पच्चीस आदमीथे। सबके सब उसे देसने बाहर निकल
आये । किंज्योतिने भठियारेको सवोधन कर बडी गभीरतासे
कहा-"किलेदार साहब, आपके किलेमें मेरी बडी खातिर
हुई । अगर किसी दुष्टने आपका कुछ बिगाडा हो तो वताइए
उसे ठीक कर आपके अहसानका बदला चुका हूँ। मैं सेवाके
लिये सब तरहसे तैयार हूँ।"
भठियारेने भी उसी गभीरतासे जवाब दिया--"जनाय
बहादुर माहव, आपको तकलीफ करने की ज़रूरत नहीं, मैं अपने
दुश्मनोंसे आप ही निवट लूँगा । मैं हुजूरसे सिर्फ घास, जई
और आपके सानेका दाम और कमरेका भाडा चाहता हूँ।"
किंज्योतिने साश्चर्य कहा-"तो क्या यह सराय है "
भठियारा-हुजूर हाँ और बडी सासवाली है।
किंज्योति तो अब तक मैं बडे भ्रममें था। मैं तो इसे
एक अच्छा किला समझे हुआ था । अगर यह सराय
है तो तुम मुझसे दाम मत लो। क्योंकि मैं बहादुरीका
नियम नहीं तोड सकता । मैंने ऐसा किसी किताबमें नहीं पढ़ा
कि बहादुर सवार सरायमें ठहरनेका या खाने-पीनेका दाम
.

।
विचित्र वीर
देते है। इसका सबब यह है कि वह लोग मुहीमकी खोजमें
क्या जाडा, क्या गर्मी, क्या पैदल, क्या घोडेपर, दिन-रात
भूखे-प्यासे सव तरहके कष्ट झेलते घूमते हैं। इसीके बदले
उन्हें अच्छी-मे-अच्छी जगह ठहरनेके लिये दी जाती है ।
भठियारा-मैं यह सब कुछ नहीं जानता । मेरा पावना है सो
दे दीजिये । मैं बहादुर सवारोंकी कहानियॉ नहीं सुना चाहता।
मैं
अपना रुपया चाहता हूँ और कुछ नही ।
किज्योति-तू वेवकूफ कमीना भठियारा है ।
यह कह वायुवेगको ऍड लगा अपना नया भाला घुमाता
हुआ चल दिया और कोई कुछ न बोला । उसने फिरकर भी
न देखा कि उसका मुसाहब कहाँ है ।
भठियारेने देखा कि वह दाम दिये विना चल दिया तो उसने
दौडकर सनकूरावको पकडा । सनकूने कहा-"मेरे मालिकने
ही न दिया तो मैं क्यों देने लगा। मैं बहादुर सवारका मुसाहब
हूँ। मैं भी उसी नियमके अनुसार सरायमे ठहरने वगैरहका
भाड़ा न दूंगा।"
इसपर भठियारेराम बहुत विगडे । कहने लगे-"नहीं दोगे
तो पीछे पछताओगे।" सनकूराव अपने मालिककी बहादुरीकी
कसम सा बोला कि चाहे जान चली जाय पर एक कौडी न
दूंगा । मैं ऐमे सुदर पुराने दस्तूरको नही तोड सकता ।
।

नवों परिच्छेद
सनकूके दुर्भाग्यसे उस समय सरायमें चार जुलाहे, तीन
सुईबनानेवाले और दो कसाई मौजूद थे। वह सबके सब
घडे बेपरवा और मस्त खिलाडी थे । इन नओं खिलाडियोंने
सनकूको गधेसे उतार लिया । एक
भठियारेका लाल
कम्मल ले आया। सनको कम्मल में वाँध बाहर मैदानमे
ले आये क्योंकि कमरेकी छत नीची थी और वहाँ पूरा मजा
न पाता । वह लोग सनको कम्मल के बीचमै रस लगे
ऊपर उठालने मानों पिल्ला उछालते हों।
सनक इतने जोरसे रोया चिल्लाया कि उसकी आवाज
किंज्योतिके कानों तक पहुँचही गयी। वह किसी नयी मुहीमकी
उम्मीदसे ठहर गया और इधर-उधर देखने लगा तो मालूम
हुआ कि सनकूकी आवाज़ है । वह लौटकर सरायके फाटकपर
आया पर उसे बद पाया। वह दरवाजेकी तलाशमे चारों
ओर चकर काटने लगा। आँगन की चहारदीवारीके पास पहुंचते
ही उसने अपने मुसाहब की दशा देखली क्योकि चहारदीवारी
बहुत ऊँची न थी । अपने मुसाहवको ऐसी खूबी और फुर्वीसे
'ऊपर नीचे जाते देखा कि अगर गुस्से में न होता तो जरूर
हँसता।वह घोडेकी पीठपर से ही दीवार पर कूदना चाहता था
पर कलकी चोटके सवव न कूद सका । न कूद सका तो उछालने.
चालों पर गालियोंकी झडी बाँध दी जिसफा वर्णन व्यर्थही है।

५२
विचित्र वीर
से
वह नों खिलाडी सनकूको उछालते और हँसते थे । सनकून
कभी धमकाता और कभी खुशामद करता पर कोई न सुनता
था । अतमे वह लोग थक गये तब छोडा । फिर उसे कोटमें
लपेट गधेपर रख दिया । दाई दयाकर एक गिलास ठढा पानी
ले आयी । पर सनकूने एक ही पूँट पी शराबकी फरमायश
कर दी। उसने शराब ला दी पर उसका दाम
अपने पास
दे दिया।
शराब पीनेके बाद सनकू गधेपर लेट गया। फाटक खुल
गया और वह बाहर होगया। लेकिन मनमे वह इस बातसे
खुश था कि चाहे जो हो दाम नहीं दिया और मेरी ही
बात रही । भठियारेको सनकूका बटुआ हाथ लग गया था
जिससे उसके रुपये वसूल हो जाते लेकिन वह जाने के वक्त
इतनी घबराहटमें भी बटुआ लेना न भूला ।
सनकूके चले जाने पर भठियारेने बहुतेरा चाहा कि फाटक
बद करदे पर कम्मलकाडियों ने न करने दिया । वह बोले,
अगर किज्योति सचमुच बहादुर हो तो भी हम उसकी जरा
भी परवा नही करते हैं।

दसवाँ परिच्छेद सनकू अपने मालिकसे आकर मिला तव उसका रंग फक था। ऐसा सुस्त हो रहा था कि गधेपर बैठनेकी भी ताब उसमें न थी। किंज्योतिने उसकी ऐसी हालत देखकर कहा- "सचे सनक, अब मुझे पूरा विश्वास होगया कि वह किला या सराय चाहे जो कहो निश्चय ही जादूका खेल था। जिन लोगोंने तेरे साथ ऐसी बेरहमी की है वह दैत्योको छोड और क्या हो सकते हैं । इमका विश्वास मुझे तब और भी हो गया जब मैं वायुवेगसे न उतर सका । अगर उतर सकता तो उन नीच हत्यारोंको ऐसीसवर लेता कि वह भी जन्म भर याद रसते।" सनक-अगर ले सकता तो मैं ही ले लेता लेकिन क्या करूँ न ले सका, पर वह दैत्य नही हमारे जैसे हाड चामके आदमी ही थे । उछालते समय. मैंने सुना कि उनके अलग- अलग नाम थे। मैंने यह भी समझ लिया है कि अगर हम लोग इसी तरह मुहीम ढूँढते फिरेगे तो हम आफतों मे फँसते ही चले जायेंगे और अपना दायाँ पैर भी न पहचान सकेंगे मेरी राय नाक्रिस में तो यही आता है कि हम लोग घर लौट -

थोंही धूल
विचित्र वीर
चले और अपना-अपना काम-काज देसें । सीकेसे मक्के तक
फांकते हुए एक आमत से छूट दूसरी में न फसें।
किंज्योति-बहादुरीके बारेमें तू कुछ नहीं जानता। चुप
रह और सन फर । एक दिन ऐसा आवेगा जब तू जानेगा
कि यह पेशा कैसे फलूका है। अच्छा पता तो सही इस
ससार में युद्ध जीतने से जितना भानद तथा सतोप होता है
उतना किससे होता है ? मैं कहूँगा निस्सदेह किसी से नहीं।
सनकू-हो सकता है-चाहे मुझे न मालूम होता हो। पर
मैं इतना जरूर जानता हूँ कि जबसे हम लोग वहादुर
सवार बने-नहीं श्राप हुए हैं तबसे आज तक एक लड़ाई
भी न जीती । हॉ, बिस्केवाले को आपने जरूर हरा दिया था।
लेकिन वहाँ भी आपने आधा फान और आधा टोप गँवाया
था । तवसे आज तक मार-पर-मार ही खाते चले आ रहे हैं ।
इसके सिवा मेरा कम्मल पर उछाला जाना।
भी
ऐसे जादूगरोंने किया जिनका हम कुछ नहीं कर सकते ।
किंज्योति और सनकू जब इस तरह बाते करते जा रहे थे
तब सामने सडक पर गर्द गुवार दिखाई दिया। यह देख उन
दोनो में फिर बातचीत होने लगी।
® स्पेन के कारडोवा प्रदेश में सीका मुसलमानों की पाक जगह है ।
सीका से मके का अर्थ पेशावर से रगून है यानी बहुत दूर ।
और
वह

दसर्वा परिच्छेद
किंज्योति--सनकू, देख आजही हम लोगोंका भाग्य
खुलेगा। आज तू मेरा बाहुवल देखना । आज मैं ऐसी वीरता
दिखाऊँगा जिसका वर्णन पुस्तकोंमें होगा और युगों तक
रहेगा । सनकू, क्या यह गर्द गुवार तू देखता है ? यह
कई राष्ट्रों की अनगिनती सेनाओं के पैरों से उड़ी हुई धूल है।
यह इधर ही पा रही है।
सन-अगर ऐसा है तो दोनों प्रोर से सेनाएँ आ रही
हैं, क्योंकि वह देखिये दूसरी और भी ऐसी ही धूल उड
किंज्योतिने फिरकर देखा तो बात सच निकली। वह तव
और भी खुश हुआ । उसने समझ लिया कि दोनों ओरसे
दो सेनाएँ इस मैदानमें आ रही हैं। वह युद्ध, दुस्साहसिक
कर्म, माया आदिकी जो बाते पुस्तकोंमें पढी थी उन्हीकी
कल्पना करने लगा।
उन दोनोंने जो गर्द गुवार देखा था वह असलमें
भेडोंके कारण उठा था पहले तो कुछ नही दिखाई दिया पर
पीछे भेद सुल गया । किंज्योतिने सेनाओं के विषयमें ऐसी
दृढ़तासे कहा कि सनकूको भी विश्वास हो गया। उसने पूछा-
"अब हमें क्या करना चाहिये। किंज्योतिने सेनाओंका
नेवा कौन-कौन है, दोनों राजाओं में किस बातकी लड़ाई

५६
विचित्र वीर
है इत्यादि बाते सनकूको बता दी। फिर वहाँसे एक पहाड़ी-
पर चला गया । वहाँसे अच्छी तरह दिखाई देता था।
उसने सेनाके सब बहादुरोंकी कहानियां सुना सनकूको
आश्चर्य में डाल दिया। उसने यह भी कह डाला कि दुश्म
नोंके अस्त्र-शस्त्र स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे हैं। दोनों राष्ट्रोंके
नाम भी बता दिये । एक में तो काले नुमिडियावासी,
धनुर्विद्यामें सुप्रसिद्ध, परसियावासी और परथियावासी हैं
जो वैसा ही लडते जैसा भागते हैं। दूसरे में योरपके सब
हैं
सनकूने आँसे फाड-फाडकर इधर-उधर बहुत देसा पर कुछ
दिसाई न दिया तो बोला-"आपने जिन जिनके नाम बताये
उनमे मैं किसीको नहीं देख पाता हूँ।"
किंज्योति बोला-"क्या घोड़ोकी हिनहिनाहट, तुरहियों और
ढोलोंके शब्द नही सुनाई देते हैं ?" सनकू बोला-"मुझे तो
में में भे-भेके सिवा कुछ नहीं सुनाई देता।"
वात भी यही थी क्योंकि भेडें पास चुकी थीं।
"तू इतना डर गया कि सुधबुध खो बैठा । डरता है तो हट जा।
देख मेरी भुजाओंमें कितना बल है। मैं जिधर हो जाऊँगा
उधर ही जीत होगी।" यह कह किंज्योति भाला तान बिजली
की तरह घोडा दौडा पहाडीके नीचे उतर गया। सनकू पुकार
।

दसवाँ परिच्छेद पुकारकर कहने लगा-"ठहरिये ठहरिये, चले आइये । जिन- पर आप चढाई करने जाते हैं वह सब भेड़ें और मेमने हैं।" पर वह न फिरा । गरजता हुआ भेडोंके मुंडोंमें पहुँच इस फुर्तीसे उनपर हाथ साफ करने लगा मानों वह सब उसके जानी दुश्मन हों। गडरियोंने बहुत समझाया पर किंज्योति क्यों मानने लगा ? जब समझानेसे कोई फायदा न देसा तब लाचार हो वह लोग भी गोफन निकाल बड़े-बड़े पत्थर उसके कानों पर मारने \ लगे। किंज्योति इसकी कुछ परवा न कर राजाको लडाईके लिये ललकारने लगा। इतने में एक पत्थर उसके पजर मे ऐसा लगा कि हड्डियाँ भीतर घुस गयी । ऐसा दुर्व्यवहार होता देख उसने कल्पना कर ली कि मैं मारा गया या सख्त घायल होगया हूँ । यस गिलास निकाल पानी पीने के लिये मुँहसे लगाया । एक घुट भी न पी सका होगा कि एक पत्थर आकर हाथ में लगा जिससे गिलास चूर-चूर हो गया । दो तीन दाँत टूट गये और दो उंगलियों में सख्त चोट लगी । येचारा बहादुर जमीन पर गिर पड़ा। गडरिये उसके पास दौड आये। उसे मरा समझ जल्दी-जल्दी भेडें इकट्ठी कर और सात मरी उठा कुछ पूछे-ताछे विना ही लये होगये । सन अव तक पहाड़ीपर खड़ा अपने मालिफका पागल- उसके भेडाको

विचित्र वीर
पन देख रहा था। मनमें अपनेको कोस रहा था कि न मालूम
किस बुरी घड़ीमें इसके साथ आया । गडरियोंके चले
जाने पर वह नीचे उतरा । किंज्योतिकी धुरी दशा थी । पर
होश हवास दुरुस्त था । सनकूने आफर कहा-"क्या मैंने नहीं
कहा था कि यह फौज नहीं भेडे और मेमने हैं ?" किंज्योति
बोला-"मेरा दुश्मन चोर जादूगर कितनी जल्दी चीजें गायब
कर देता और फिर ले आता है। मेरी जीतसे जलकर उसने
आदमियोंकी फौज को भेड़े और मेमनेकी शकलमें बदल
दिया।"
-

पगनादी पढेर
1
ग्यारहवाँ परिच्छेद
पिछले अध्याय के दुस्साहसिक कर्मके पश्चात् वह दानी
फिर चले । कुछ मील जाने के बाद सनकूके प्यास लगी।
उसने सडकसे कुछ दूर जा गडरियो से दूध मांगा जो मे
दुह रहे थे। सनफू उधर गया और इधर उसके मालिक्ने
जो उसी तरफ आ रही थी जिधर किंयोति पाउमने कोई
नयी मुहीम समझ सनकूको पुकारा और अपना टोप माँगा।
रहा था । मालिककी आवाजसे घबराकर वह निश्चय न
कर सका कि दही कहाँ रखू । श्रार वह दस छोदना मीन
चाहता था क्योंकि दाम दे चुका था। यम यह टोपने ही दही
यात्रा-दोस्त लामो
टोप देदो। मैं नहीं जानता क्याहे पर लाइ दमदास
यही मालूम होता है कि मुझे हरियार
सनकूमाडेदार गाडीको बाद आरसन देख कर
किंज्योति
एक गाडी देखी जिस पर सरकारी मडा उठ रहा था और
पहुंचा।
सनक आवाज सुनते ही तुरत आ
किंज्योतिने जब आवाज दी थी तब सना दही मरीद
ले चला आया। आने पर
है

। ६२ विचित्र वीर जा रहे हो? यह किसकी गाडी है ? इसमें क्या है ? यह मडा किसका है " गाडीवान-गाडी तो मेरी है। इसमें दो सिंह हैं जिसे ओर- नके जेनरल ने तोहफे के बतौर महाराजके पास भेजा है । यह मडा सरकारी है जिससे मालूम हो कि यह माल सरकारी है। किंज्योति-क्या यह बडे-बडे सिंह हैं ? जो गाडीके आगे बैठा था वोल उठा-"इतने बडे हैं कि ऐसे आफ्रिकासे स्पेन कभी आये ही नहीं । मैं उनका रक्षक हूँ। मैं बहुतेरे सिहोंकी रखवाली कर चुका पर इतने बडे सिंह कभी नही देसे । यह नर-मादा दोनों हैं। नर तो अगले पिंजरेमे हैं और मादा पिछले में। अभी वह बडे भूखे हैं। दिनभर खानेके लिये उन्हें कुछ नहीं मिला है। आप कृपा कर हट जाइये मुझे जल्दी ठिकाने पर पहुँच इन्हे कुछ सिलाना है।" इसपर किंज्योतिने जरा हँसकर कहा-"तुम्हारे सिंह मेरे लिये पिल्लेके वरावर हैं । सचमुच पिल्ले हैं। और बराबर ऐमे ही रहेंगे। जिसने इन्हें भेजा है वह देखले मैं सिहोंसे डरने- चाला नहीं हूँ । उतर पडो मेरे सच्चे दोस्त, तुमरक्षक हो इसलिये इन्हें पिंजरेसे याहर निकाल दो । मैं उन्हें खुले मैदान में बता दूंगा कि बहादुर किंज्योति लामनचावाला कौन है।" गाडीवान इस हथियारबन्द भूतकी दृढता देख बोला- ।

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नहीं देसे । यह नर-मादा दोनों हैं। नर तो अगले पिंजरेमे हैं और मादा पिछले मे। अभी वह बडे भूसे हैं। दिनभर खानेके ऐसे ही रहेंगे। जिसने इन्हें भेजा है वह देसले मैं सिंहोंसे डरने- चाला नहीं हूँ। उतर पडो मेरे सच्चे दोस्त, तुमरक्षक हो इसलिए ६२ विचित्र वीर जा रहे हो ? यह किसकी गाडी है ? इसमें क्या है ? यह महा किसका है" गाडीवान-गाडी तो मेरी है। इसमें दो सिंह हैं जिसे ओर- नके जेनरल ने तोहफे के बतौर महाराजके पास भेजा है। यह झडा सरकारी है जिससे मालूम हो कि यह माल सरकारी है । किंज्योति-क्या यह बडे-बडे सिंह हैं । जो गाडीके श्रागे बैठा था बोल उठा--"इतने वडे हैं कि ऐसे आफ्रिकासे स्पेन कभी आये ही नहीं । मैं उनका रक्षक हूँ । मैं बहुतेरे सिहोंकी रखवाली कर चुका पर इतने वडे सिंह कभी लिये उन्हें कुछ नहीं मिला है। आप कृपा कर हट जाइये मुझे जल्दी ठिकाने पर पहुँच इन्हे कुछ खिलाना है।" इसपर किंज्योतिने जग हँसकर कहा-"तुम्हारे सिह मे लिये पिल्लेके बराबर हैं। सचमुच पिल्ले हैं। और बरावर इन्हें पिंजरेसे बाहर निकाल दो। मैं उन्हें खुले मैदान मे धत दूंगा कि वहादुर किंज्योति लामनवावाला कौन है।" गाडीवान इस हथियारबन्द भूतको दृढता देख बोला- ope 4

६५
ग्यारहवाँ परिच्छेद
सिंहने पहले तो पिंजरे में चक्कर लगाये, एक पजा फैलाया
और फिर पूरे तौरसे अपने शरीरको तान दिया । फिर जम्हाई
लेने के लिये धीरे-धीरे मुँह फैलाया। आध गज लबी जीभ
निकाल मुँह और आँसें चाटकर साफ की । इसके बाद
पिजरेके बाहर मिर निकाल चमकती हुई ऑसोंसे चारों
ओर देसने लगा । वडे-बडे दिलेरोंके दिल दहलाने के लिये
यह नजारा काफी भयावना था।
किज्योति बडे ध्यानसे उसे देख रहा था । वह इसी
ताकर्म था कि सिंह पिजरसे निकले और मैं दो टुकडे
। उसके पागलपनने तो यहाँ तक सोच डाला
था, पर वह उदार सिंह घमडी होने के बदले पूरा भला
मानस ही निकला । उसने किज्योतिकी जरा भी परवा न
को । उसकी ओर देख मुँह फेर लिया और बडी बेपरवाई से
पिंजरेमें जा लेटा। किंज्योतिने यह देस रतफसे उसे खींचकर
बाहर निकालने के लिये कहा। उसने कहा-"मैं ऐसा नहीं करने
का अगर मैं कोचूंगा तो वह पहले मुझे ही सा जायगा । यहादुर
साहय, आप इतने से ही सतोप कर लीजिये हिम्मत दिसाने के
लिये यही बहुत है। अब ज्यादा किस्मत मत आजमाइये।
यह तो सिंहकी मरजी है थाहर आवे पाहे नहीं । जय श्रय
वक नहीं निकला तय आज और नहीं निकलेगा।"
कर दूँ

गाडीवान भी सच्चरोंको ले पहलेही भाग चुका था। सिंहोंके
रक्षक सिंहोंको छोडनेके लिये तैयार हो गया। किंज्योतिने
६४
विचित्र वीर
किंज्योत चोला-"चाहे जितना बडा हो मैं डरता नहीं । तू
तो डरके मारे उन्हें आसमानसे भी वडा समझता है । सनकू, तू
चला जा । अगर मैं मर गया तो पुराने कौल-करार के मुता-
विक राजकुमारी दर्शनीयाके पास चला जाना-बस अब कुछ।
न कहूँगा।"
सनकूने देखा कि किंज्योति मानता नही तो गधेपर चढ भागा।
निकलनेके पहले जिससे जितनी दूर जाते बना चला गया।
सन अपने मालिकके लिये रोता था। उसे विश्वास था कि
किंज्योति जीता न बच सकेगा । वह अपने नसीव और उस
कुघडी को दोप देता था, जिसमें इसकी नौकरी करनेका इरादा
किया । चाहे वह जितनाही ऑसू गिराता हो पर उसने गाडीके
पाससे निकल जाने में कसर न की।
पैदलही मुकाबला करना अच्छा समझा,
क्योकि इसमें वायु-
वेगके भडक जानेका भय न था । बस भाला फेक वह घोडेसे
कूद पडा । ढाल लगा तलवार निकाल ली। फिर धीरे-धीर
अजीब बहादुरी और दिलेरीसे राजकुमारी दर्शनीयापर अपनेक
श्रद्धा-पूर्वक उत्सर्ग करता, पिंजरों तक चला गया। रक्षकने पहरे
पिंजरेका फाटक खोल दिया। इसमें बहुत बडाभयानक सिंह था
,
।

बारहवाँ परिच्छेद
मैत्रिनों सारासीसका मशहूर बादशाह था । पेनके
किसी वहादुरने उनका ताज छीन लिया था। किज्योति
जिन किस्सोंको बरावर याद रखता था उनमे यह भी
एक था।
किंज्योति फिर वोला-"सनकू, क्या तू अब तक घोड़ेपर
सवार उस आदमीको नही देखता, जिसके सिर सोनेका
ताज है ?"
सन-हाँ देखता तो हूँ कि एक आदमी मेरी तरह भूरे
गधेपर सवार है और उसके सिरपर कोई चीज चमक
किंज्योति-वह चमकनेवाली चीज़ मेनिनोका ताज ही है।
यह गधा नहीं घोडा है। खैर तू हट जा और मुझे उससे
भिड़ने दे । देखना कैसी फुर्ती से मैं उस ताज पर कब्जा
जमाता हूँ, जिसके लिये इतने दिनोंसे तरस रहा था।
किंज्योतिने जिस आदमीको घोडेपर सवार और ताज
पहने देखा था, उसका किस्सा भी सुन लीजिये। वहाँ दो छोटे-
छोटे गांव थे, एक इतना छोटा था कि वहां न दुकान थी
और न हजाम । लेकिन दूसरेमें दोनों थे। बड़े गाँवसे ही
छोटे गांवका काम चलता था। हज्जाम हजामत भी बनाता
और घही भी करता था। इलाम प्रोटे गांव जा रहा था।

.
बारहवाँ परिच्छेद
दूसरे दिन किंज्योति और सनराव वहादुरोंकी रीतके
अनुसार जो रास्ता पसद आ गया उसी से चल पडे । कुछ
दूर जानेके बाद किंज्योतिको एक आदमी घोड़ेपर उसकी
तरफ आता दिसाई दिया। उसके सिर पर ऐसी कोई चीज
थी, जो सूर्यकी किरणोंसे सोनेकी भाँति चमक रही थी।
उसने देखते ही सनकूसे कहा-कोई कहावत झूठ नहीं है,
क्योंकि कहावतें वह वाक्य हैं, जो अनुभव से बने हैं । और
यही सब विज्ञानों की जड है। विशेषकर यह कहावत
तो
विलकुल ठीक है कि एक द्वार बद हुआ तो दूसरा खुल गया।
यह मैं इसलिये कहता हूँ कि कल भाग्य ने भेडों के झुड
धोखा दे दियो, तो आज निश्चित रूप से दूसरा बडा द्वार खोल
दिया। अगर यहाँ मैं चूक गया तो यह मेरा ही दोष होगा।
अगर मेरी भूल न हो, तो मैं कह सकता हूँ कि उस आदमी के
सिरळपर मेंब्रिनों का टोप है जो इधर ही आ रहा है ।
* मुसलमान योद्धा जो किस्तानों से पलेस्टाइन और एशिया माइनरमें
।
दिखा
लदे थे।

पहने देखा था, उसका किस्सा भी सुन लीजिये।वहाँ दो छोटे-
छोटे गाँव थे, एक इतना छोटा था कि पदोन दुकान थी
और न हज्जाम । लेकिन दूसरेमें दोनों थे। बड़े गांवसे ही
छोटे गाँवका काम पलता था। जाम हजामत भी यनावा
बारहवां परिच्छेद
मेनिनों सारासीसका मशहुर बादशाह था । पेनके
किसी बहादुरने उनका ताज छीन लिया था। किज्योति
जिन किस्सोंको बरावर याद रखता था उनमे यह भी
एक था।
,
किंज्योति फिर बोला-"सनकू, क्या तू अब तक घोडेपर
सवार उस आदमीको नही देसता, जिसके सिर सोनेका
नाज है ?"
सनकू-हाँ देसता तो हूँ कि एक आदमी मेरी तरह भूगे
गधेपर सवार है और उसके सिरपर कोई चीज़ चमक
किंज्योति--चह चमकनेवाली चीज़ मेनिनोका ताज ही है।
वह गधा नहीं घोडा है। सैर तू हट जा और मुझे उससे
भिड़ने दे । देखना कैसी फुर्ती से मैं उस ताज पर कब्जा
जमाता हूँ, जिसके लिये इतने दिनोंसे तरस रहा था।
किंज्योतिने जिस आदमीको घोड़ेपर सवार और ताज
और वही भी करता था। हमाम मोटे गांव जा रहा था।

।
उसके पास पोतल को चिलमचो थो। रास्तेमें बूंदे पड़ने लगी
इसलिये उसने उसे सिर पर रख लिया था। बरसा बद होने
पर भी वह सिरपर रखे ही चलता रहा। वह चिलमची नई
और साफ होनेके कारण दूरसे चमकती थी । सनकूने
ठीक ही कहा था कि वह भूरे गधे पर सवार है। लेकिन किंज्योति-
ने हज्जामको बहादुर, गधेको अबलक घोडा और चिलमचीको
ताज समझ लिया था। क्योंकि वह जो कुछ देखता-सुनता
उसे अपनी कल्पना के अनुसार हो अनुमान कर लेता था।
किंज्योति उस हज्जामकी तरफ बड़ी तेजी से बढा । उसने
निश्चय कर लिया था कि पहुँचते ही उसे मार गिराऊँगा।
ललकारकर कहा-"मेरी चीज मुझे दे दे या मरने को तैयार हो
ज।" हजामको सपनेमें भी इस आफत का खयाल न था।
वह हका-बका हो गया । समझा कि भूतने घेर लिया है
कोई उपाय न देस गधेसे कूद पडा। उसके पैरोंने
जमीन छुई, त्योंही वह मिरपर पैर रख ऐसा भागा
कि हवा भी उसका पीछा न कर सकी।
हज्जाम जानके डरसे चिलमची फेंककर भागा था ।
किंज्योति इससे वडा प्रसन्न हुआ। सनकसे उठा लाने के
कहा । सारमा लाया, तो उसने सिरपर रख लिए,
है, जाननेके लिये उसे
चाव

बारहवाँ परिच्छेद घुमाता-घुमाता बोला-"जिस राजाके लिये यह बना था उसका सिर वेतरह वडा होगा। सबसे बुरी बात तो यह है कि इस ताजके तीन हिस्से गायव हैं।" सनकू ने देखा कि चिलमची ही ताज बन रही है, तो उसे हँसी आ गयी पर किंज्योति का क्रोध स्मरण कर उसने हँसी रोक ली। किंज्योति ने पूछा--"सनकू, क्या हँसता है " सनकू-कुछ नहीं । जिस राजा का यह टोप है, उसका सिर कितना बड़ा होगा, यही सोचकर हंसी आ गयी। यह देखने में ता जासी चिलमची मालूम होती है। किज्योति--इसका कारण क्या है मैंने जान लिया। सुनो। वह मशहूर ताज जिसके हाथ लगा उसने पक्का सोना समाफ गला दिया । डेढ हिस्सा तो साद निकल गयी और बानीका उसने ताज बनवा लिया, जिसे तू चिलमची कहता है। कुछ हर्ज नहीं । मैं इसे ठीक करलूँगा। सनकू-अच्छा यह तो बताइये, इस अबलक घोड़ेका क्या करें, जो गधे-सा मालूम होता है और जिसे वह कमीना हुजूर से हारकर छोड गया है। जिस तेजीसे वह भागा है इससे तो मालूम होता है कि लौटनेका नहीं । मैं दादीकी कसम खाकर कहता हूँ कि अवलक अव्वल दरजेका जान- घर

ज ।" हज्जामको सपनेमें भी इस आफत का खयाल न था।
निश्चय कर लिया था कि पहुँचते ही उसे मार गिराऊँगा।
किधर है, जाननेके लिये उसे धुमाने लगा।
विचित्र वीर
उसके पास पोतल को चिलमचो यो । रास्तेमें बूंदें पड़ने लगी
इसलिये उसने उसे सिर पर रख लिया था। वरसा बद हाने
पर भी वह सिरपर रखे ही चलता रहा। वह चिलमची नई
और माफ होनेके कारण दूरसे चमकती थी । सनरूने
ठीक ही कहा था कि वहभूरेगधे पर सवार है। लेकिन किंज्योति-
ने हजामको बहादुर, गधेको अवलक घोड़ा और चिलमचीको
ताज ममम लिया था। क्योंकि वह जो कुछ देखता-सुनना
उमे अपनी कल्पना के अनुसार हो अनुमान कर लेता था।
किंज्योति उस हजामकी तरफ बडी तेजी से बढ़ा।
ललकारकर कहा--"मेरी चीज़ मुझे दे दे या मरने को तैयार हो
वह हक्का-बक्का हो गया । समझा कि भूतने घेर लिया है
बचावका कोई उपाय न देख गधेसे कूद पडा। उसके पैरोंने
ज्योंही जमीन छुई, त्योंही वह मिरपर पैर रस ऐसा भागी
कि हवा भी उसका पीछा न कर सकी।
जानके डरसे चिलमची फेंककर भागा था।
बड़ा प्रसन्न हुआ । सनकूसे उठा लाने के लिये
उठा लाया, तो उसने सिरपर रख लिया। इसका
उसने
-
-

वारहवों परिच्छेद ७१ - घुमाता-धुमाता योला--"जिस राजाके लिये यह बना था उसका सिर बेतरह बड़ा होगा। सबसे बुरी बात तो यह है कि इस ताजके तीन हिस्से गायब हैं।" सनकू ने देखा कि चिलमची ही ताज बन रही है, तो उसे हँसी आ गयी पर किज्योति का क्रोध स्मरण कर उसने हँसी रोक ली । किंज्योति ने पूछा-"सनकू, क्या हँसता है ?" सनकू-कुछ नहीं। जिस राजा का यह टोप है, उमका सिर कितना बड़ा होगा, यही सोचकर हँसी आ गयी । यह देसने में ता खासी चिलमची मालूम होती है। किंज्योति--इसका कारण क्या है मैंने जान लिया। सुनो। वह मशहूर ताज जिसके हाथ लगा उसने पका सोना समझ गला दिया । डेढ हिस्सा तो साद निकल गयी और पातीका उसने ताज वनवा लिया, जिसे तू चिलमची कहता है। कुछ हर्ज नहीं। मैं इसे ठीक करलूँगा। सन-अच्छा यह तो यताइये, इस अबलक घोडेका क्या करें, जो गधे-सा मालूम होता है और जिसे वह कमीना हुजूर से हारकर छोड गया है। जिस तेजीसे वह भागा है इससे तो मालूम होता है कि लौटनेफा नहीं। मैं दादीकी असम स्थाकर कहता हूँ कि अयलक अव्वल दरजेका जान- पर है।

अगला हिस्सा किधर है, जाननेके लिये उसे धुमाने लगा।
७०
कहा । सन उठा लाया, तो उसने सिरपर रख लिया। इसका
विचित्र वीर
उसके पास पोतल को चिलमचो थो । रास्तेमें बूंदें पड़ने लगी
इसलिये उसने उसे सिर पर रख लिया था। बरसा वद होने
पर भी वह सिरपर रखे ही चलता रहा। वह चिलमची नई
और साफ होनेके कारण दूरसे चमकती थी। सनकूने
ठीक ही कहा था कि वह भूरे गधे पर सवार है। लेकिन किंज्योति-
ने हज्जामको बहादुर, गधेको अबलक घोडा और चिलमचीको
ताज समझ लिया था। क्योंकि वह जो कुछ देखता-सुनता
उमे अपनी कल्पना के अनुसार हो अनुमान कर लेता था।
किंज्योति उस हज्जामकी तरफ बड़ी तेजी से बढा । उसने
निश्चय कर लिया था कि पहुंचते ही उसे मार गिराऊँगा।
ललकारकर कहा-"मेरी चीज मुझे दे दे या मरने को तैयार हो
ज।" हजामको सपनेमें भी इस आफत का खयाल न था।
वह हक्का-बक्का हो गया । समझा कि भूतने घेर लिया है
बचावका कोई उपाय न देस गधेसे कूद पडा । उसके पैरोंने
ज्योंही अमीन छुई, त्योंही वह मिरपर पैर रख ऐसा भागा
कि हवा भी उसका पीछा न कर सकी।
हजाम जानके डरमे चिलमची फेंककर भागा था ।
किंज्योति इससे बडा प्रसन्न हुआ । सनकसे उठा लाने के लिये

। ने वारहवा परिच्छेद घुमाता-घुमाता बोला-"जिस राजाके लिये यह बना था उसका सिर बेतरह वडा होगा। सबसे बुरी बात तो यह है कि इस ताजके तीन हिस्से गायब हैं।" सनकू ने देखा कि चिलमची ही ताज वन रही है, तो उसे हँसी आ गयी पर किंज्योति का क्रोध स्मरण कर उसने हँसी रोक ली । किंज्योति पूछा--"सनकू, क्या हँसता है ?" सना कुछ नहीं । जिस राजा का यह टोप है, उमका सिर कितना बड़ा होगा, यही सोचकर हँसी आ गयी। यह देखने मे तो खासी चिलमची मालूम होती है। किज्योति-इसका कारण क्या है मैंने जान लिया। सुनो। वह मशहूर ताज जिसके हाथ लगा उसने पफा सोना समझ गला दिया। डेढ हिस्सा तो साद निकल गयी और यातीका उसने ताज वनवा लिया, जिसे तू चिलमची कहता है । कुछ दर्ज नहीं । मैं इसे ठीक करलूँगा। सनकू-अच्छा यह तो धताइये, इस अपलक घोड़ेफा क्या करें, जो गधे-सा मालूम होता है और जिसे वह फमीना हुजूर से हारकर छोड़ गया है। जिस तेजीसे यह भागा है इसमें तो मालूम होता है फि लौटनेफा नहीं। मैं दादीकी कसम खाकर फहता हूँ कि अपलक अम्या परजेका जान- पर है। 1 ।

१२
विचित्र वीर
किज्योति-यह मेरी आदत नहीं कि जिसे जीतूं उसे लूट लूँ।
और ऐसा नियम भी नहीं है। हारनेवालों के घोड़े छीनकर
उन्हें पैदल चलाना अनुचित है। हाँ, अगर मेरा घोडा मर
जाता, तो मैं उसका जरूर ले लेता। सनकू जिसे तू
घोडा
कह, गधा कह, या जो मनमें आवे सो कह उसे यहीं छोड दे
हम लोग जब दूर निकल जायेंगे, तव उसका मालिक उसे ले
,
जायगा।
सनकूराम जाने वह ले जायगा या नहीं। पर क्या मेरे
लिये यह अच्छा नहीं है कि मैं अपने गधे से उसे बदल
लूँ, क्योंकि मेरा गधा वैसा अच्छा नही है ? बहादुरीका
दस्तूर तो बडा कडा है। क्या घोडेसे घोड़ा बदलनेकी
चाल नहीं है ? क्या घोडेका सामान बदलना भी नाजा-
यज है?
किंज्योति-इस बारे में साफ तौर से कुछ नहीं कह
सकता । जव तक कोई दूसरी सूचना न मिले तव तक के लिये
कहता हूँ कि अगर तुमे इसकी सख्त जरूरत हो, तो बदल
सकता है।
सनर-चरूरत तो इतनी है कि क्या बताऊँ ? हाँ, खास
मेरे बदन के लिये ऐसी कुछ जरूरत नहीं है। इतना कह वह
मामान पदलने लगा। उसने सोचा कि और कुछ नहीं, तो इस

. बारहवाँ परिच्छेद नये साज से अपने गधेकी सूरत और कीमत तो बढ ही जायगी। हज्जामके गधे पर खाने-पीनेका जो सामान था उसे पेटमे रख वह लोग फिर आगे चले । सनकूने बोलनेकी आज्ञो मांगी और वह उसे मिल गयी। सनकूकुछ दिनों से मैं यही सोच रहा हूँ कि इधर-उधर रेगिस्तान, जगल, मैदानमें भटकनेसे क्या फायदा है ? हाँ, यह बात जरूर है कि आपने बहुत-सी विपत्तियाँ झेल डाली पर इसका जाननेवाला और देखनेवाला कोई न मिला । इसलिये मेरी राय नाकिस है कि अगर हम लोग किसी ऐसे बड़े वादशाह या शाहजादे के यहाँ काम करें जो लडाई झगडेमें फँसे हा तो बहुत अच्छा हो। आपकी रायकी मैं पूरी इज्जत करता हूँ। शाही काममें आप अपना साहस और बुद्धि मजे में दिखला सकते हैं। बादशाह हम लोगोंके हुनर देखेंगे, तो इनाम दिये विना न रहेंगे। फिर आप भी अपना इतिहास लिखवानेसे पाज न भावेंगे। मैं अपने यारेमें कुछ नहीं कहा चाहता, पर इतना जरूर कहूँगा कि अगर मुसाहयोंके कामों का जिक्र कर देना यहादुरोंके दस्तूरके खिलाफ न हो तो मेरी बात भी उसमें लिखी ही जायगी। किंज्योति-तेरा कहना सरासर गलत नहीं है । लेकिन दर- ।

विचित्र वोर
बारमें दाखिल होनेके पहले यहादुर सवारको देश-विदेश
घूमना और मुहीम जीतना चाहिये, जिसमें इतना नाम हाजाय
कि वह जिस दरवारमे पहुँचे, वहीं सब लोग उसे पहचान ले ।
इस तरह वह नगरमें प्रवेश करेगा, तो लडके उसका नाम ले-
लेकर शोर करेंगे । यह शोर-गुल सुनकर बादशाह अपने महलके
झरोखेमें जा बहादुर सवारको उसके वख्तरसे पहचान, बोल
उठेगा--"यही मेरा बहादुर है। इस वीर रत्नका स्वागत
करो।" उसके हुक्म से स्वागत करने सब लोग जायेंगे और
खुद वादशाह दो सीढियाँ उतर उसे गलेसे लगा लेगा, सलाम
करेगा और चुबन करेगा। फिर हाथ पकड उसे महल
में
लेजायगा । जहाँ मलिका अपनी खूबसूरत शाहजादियोंके साथ
रहेंगी।
किंज्योतिने इस तरह दरबार और अपने कल्पित स्वागतका
वर्णन कर डाला, पर सनकूको कुछ पसद न आया।
लेकिन जब किंज्योतिने कहा कि मेरा व्याह शाहजादीसे
होगा और शाहजादी अपनी सहेली की शादी मुसाहबसे करा
उसे रावराजा बना देगी, तो सनकू बोल उठा-"यही तो मेरी
लालसा है और घरावर रहेगी । मैं बहुत जल्द अपनेको राव
राजा के योग्य बना लँगा।"
किंज्योति-इसकी जरूरत नहीं । मैं शाहजादा बनूँगा तो

बारहवाँ परिच्छेद
तुझे आसानीसे रावराजा बना सकूँगा । फिर चाहे कोई कितना
भी मनमें कुढता रहे पर मुँह पर तो तुमे सय जनाब और
हुजूर ही कहेंगे।
सनक-क्या आप समझते हैं कि मैं उस पदकी मर्यादा
न रख सकूँगा।
किंज्योति-क्यों न रख सकेगा, पर तुझे अफमर दाढी
छटानी पडेगी क्योंकि तेरी दाढी ऐसी रूसी और उलझी हुई
है कि अगर रोज न बनवावेगा तो लोग दूरसे ही समझ लेंगे
कि यह रावराजा नहीं है।
सनकूयह कौन भारी काम है । एक हज्जाम रख लूँग।
जरूरत होगी, तो वह भी घोडेपर साथ चलेगा। एक बार मैं
एक शहर गया था। वहाँ एक बडे नवावको दिखाकर लोगोंने
कहा कि यह घोडेपर कभी आगे कभी पीछे बराबर जाता
है । उसके पीछे एक सवार भी रहता है, जो नवाब के
पीछे-पीछे घूमता है । इसी से वह नवाब को दुम कहलाता है ।
मैं भी हजामको अपनी दुम बना लूँगा ।
किंज्योति-अच्छी बात है, तू भी अपने पीछे एक नाई ले
चला करना । आज तक किसी ने ऐसा नहीं किया है। तू ही
महला नाईदार रावराजा होगा। सचमुच घोड़ेपर जीन रसनेसे
बादी मूड़ना पड़े महत्त्व का काम है।

विचित्र वीर
सनकू-खैर नाईका काम मेरे ऊपर छोडिये । आप
अपनेको राजा और मुझे रावराजा बनानेका अब उपाय
कीजिये
किंज्योति-बहुत अच्छा।
इतना कह उसने नज़र उठा जो कुछ देखा उसका वर्णन
आगे किया जायगा।
-

तेरहवाँ परिच्छेद
किंज्योतिने नजर उठायी तो क्या देखा कि दस यारह
श्रादमी पैदल आ रहे हैं, जिनकी गर्दनें एक लबी जजीरसे
मालाकी तरह बँधी है, और हथकडियोंसे जकडे हैं। उनके
साथ दो सवार और दो पैदल सिपाही हैं। सवारोंके पास वदूकें
और सिपाहियोंके पास तलवारे और बरछे हैं । सनकू चिल्ला
उठा-"यह तो जहाजमें काम करनेवाने गुलामों का गिरोह है।
इन्हें बादशाहने जहाजपर फाम करनेके लिये जबरदस्ती
भेजा है।" किंज्योति यह सुनकर घोला-"यह कैसी जबरदस्ती
है ? वादशाहका किसी के साथ जबरदस्ती करना क्या
सभव है ?
यह नहीं कहता । मेरे कहने का मतलब यह है
कि यह लोग कानूनको रूसे झैदी हैं और जहाजमें काम
सनकू-
करने के लिये पावद हैं।
किंज्योति-तो इसका यही मतलब है न कि यह लोग
अपनी खुशीसे नहीं जपरदस्ती भेजे जाते हैं।
सनकू-जी हाँ, यही बात है।

विचित्र वीर . मदद करनेकी ठान ली। जो काम गुडसे निकलता हो उस- में विष न डालना चाहिये । इसलिये मैं तुम्हारे सवारोंसे अर्ज करता हूँ कि वह तुम्हें छोड दे और जाने दें। बादशाहकी गुलामी के लिये बहुतेरे आदमी हैं। जिन्हे भगवान् और प्रकृति ने स्वाधीन बनाया है, उन्हें गुलाम बनाना बडी बेरहमी है। अपने-अपने कमों का उत्तर लोग परलोकमें आप ही दे लेगे। यह ठीक नहीं कि ईमानदार आदमी दूसरोंकी हत्या व्यर्थ ही करें । सवारो । मैं शातिपूर्वक यह प्रार्थना करता हूँ, आशा है, आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करेगे। अगर नहीं करेंगे, तो मेरी तलवार आपको इसके लिये लाचार करेगी।" बडे सवारने कहा-"अच्छी दिल्लगी है । मैं भला कैदियों- को कैसे छोड सकता हूँ । न मुझे छोडनेका अखत्यार है और न आपको छुडानेका । जनाब, अपना रास्ता लीजिये और अनधिकार चर्चा छोडिये। किंज्योति "पाजी, कमीने" कह उसपर टूट पडा । सवारको सम्हलनेका भी मौका न मिला। वह किंज्योतिके भालेसे बेतरह घायल हो जमीन पर गिर पड़ा। इस अचानक मुठभेडसे सब घबरा गये । सिपाही तलवारे सेंच-सेंचकर दौडे किंज्योति भी इनकी ताक में धीरतापूर्वक खडा था। सब फैदी भागनेका अच्छा मौका देख जंजीर न तोड डालते तो बेचा

और
तेरहवाँ परिच्छेद
किंज्योति की बुरी हालत हो जाती । पर ऐसी गड़बड हुई कि
दोनों सिपाही किंज्योतिको छोड कैदियोंकी ओर झुके, पर
नतीजा कुछ और ही निकला।
इधर सनकूने सबसे निडर कैदीको सोल दिया । उसका
नाम पसामोंटी था। उसने तुरत घायल सवारकी तलवार
बदूक छीन ली। फिर दूसरे सवारपर बदूक तान,
वाकी कैदियों को निकल भागने दिया । कैदी सव ईट पत्थर
फेंकते भागते जाते थे। पसामोंटी घरावर वदूकसे धमकाता
नहा पर छोडी नहीं।
सन बहुत घायल हो गया था। उसने किज्योतिसे जहाँ
नफ हो, जल्द भाग चलने के लिये कहा । पर वहादुरने उसकी
बात पर ध्यान न दे, कैदियोंको इकट्ठा कर कहा-"उपकारोंके
-लये कृतज्ञता प्रकट करना अच्छे कुलमे जन्म लेनेवालो-
का स्वभाव है। कृतघ्नता वडा भारी पाप है । सज्जनो । मैं
इसलिये यह कहता हूँ कि मैंने तुम्हारा वडा उपकार किया है।
इसके बदले मैं बस यही चाहता हूँ कि मैंने जो जजीर तुम्हारी
रदनोंसे, सोली है, उसे ले टोवोसो चले जाओ और वहाँ
नाकर परम सुदरी राजकुमारी दर्शनीयाके सामने उपस्थित
हो, कहो कि हम किंज्योतिके भेजे आये हैं। यहाँका सारा
इत्तात सुनाकर जहाँ मन हो यहाँ चले जाना ।"
ܕ ܕ ܟ

विचित्र वीर
मैं
इस पर पसामोंटी बोला-"हम लोगोंका एक साथ
रहना फिर अपनेको कैदी बनाना है। आपकी जीतके लिये
हम लोग भगवानमे प्रार्थना करेगे लेकिन टोबोसो जाना हमें
मजूर नहीं है।"
यह सुन किंज्योति विगडकर बोला-"तो सुनले पाजी,
कसम खाकर कहता हूँ कि तुझे दोनों पैरोके बीच दुम लटकाये
और अकेला सारी जजीर पीठ पर लादे टोवोसो जाना
पडेगा।"
पसामोंटी उतावला सा हो रहा था और यह भी समझ ।
चुका था कि किंज्योति जरा सनकी है। बस उसने किज्योतिकी
वाते सुन साथियोंको इशारा किया। वह लोग जरा पीछे हट
ईट पत्थरोंकी ऐसी घोर वर्षा करने लगे कि किंज्योति न
अपनी ढाल निकाल सका, और न एड लगा वायुवेगको आगे
ही वढ़ा सका । पर सन अपने गधेके पीछे खडा हो मजेमें
घच गया था।
किंज्योति चोट सा गिर पड़ा। उसके गिरते ही पसामोंटीने
उस पर हमला किया। उसके सिरसे चिलमची उतार
जमीन पर दे मारा, जिससे वह टुकड़े टुकड़े हो गयी। वहा-
दुरको अच्छी तरह कुदी कर लबादा उतार लिया। पाजामा
भी ले लेता, पर मिलम से उलझ वह बच गया ।

तेरहवाँ परिच्छेद
८३
उसने सनका भी लावादा न छोडा । वह बिचारा सिर्फ
फुर्ता पहने रह गया । आपस में हिस्सा वाँटकर पकड़े जानेके
डरसे सबके सब इधर उधर चपत हो गये ।
गधा, घोडा, सनकू और किंज्योति बस यही चार प्राणी
वहाँ रह गये । गधा चितासे मूड झुकाये, कभी कभी कान
हिलाता और। समझता था कि अभी पत्थरोंकी वर्षा समाप्त
नहीं हुई है। घोड़ा पाँव फैलाये मालिकके पास पडा था। वह
भी पत्थरोंकी राह देख रहा था। "एकवना" सनक सवारों के
डरसे पानी हो रहा था । किंज्योतिकी तबीयत भी इस वातसे
खट्टी हो रही थी, कि जिनका मैंने उपकार किया वही इस तरह
पेश आये।
-

। चौदहवाँ परिच्छेद फिंज्योतिने अपनी दशा देस सनकूसे कहा-"अकसर लोगोंको कहते सुना है कि नीचोंके साथ नेकी करना साँपोंको दूध पिलाना है। अगर तेरा कहा मान लेता, तो यह श्राफत न आती। लेकिन अब तो जो होना था हो चुका । अव मुझे सतोप कर आगेके लिये सावधान हो जाना चाहिये।" सनकू-हुजूर, तो मेरी बात ही नहीं मानते मानों मैं आपका दुश्मन हूँ। लेकिन मेरी मानेगे तो बडी बडी आफतोंसे अब भी बच जायेंगे । अच्छा सुनिये । बहादुर भी पुलिसके चगुल- से नही बच सकते । वह उनकी कुछ भी परवा नहीं करती है, मेरे कानों में पुलिसके तीरोकी आवाज सुनाई दे रही है । सनकू यह सोचकर भयभीत हो रहा था कि कैदियोंके रक्षक जल्दी ही ज्यादा सिपाही लेकर आते होंगे। किंज्योति--सनकू, तू स्वभावसे ही नामर्द है। लेकिन जिसमें तू मुझे जिद्दी न समझे और मैं तेरी यात नहीं मानता हैं, यह भी तू न कहे, इसलिये अबके तेरी बात मान लूँगा और जिस यातका तुझे हर है, उससे बचनेके लिये तैयार हैं।

चौदहवां परिच्छेद पर एक शर्त है । वह यह कि तू किसीसे यह न कहे कि मैं गया । मैं तो तेरी वात रसनेको ऐसा करता हूँ, कुछ डरसे डर नहीं। सनकू- हुजूर, वचना भागना नहीं है । और जहाँ अदाजसे ज्यादा जोखिम हो वहाँ ठहरना भी अलमदी नहीं। वस किंज्योति सनरावका अनुयायी बन, काले पहाड पर चला गया। वह बहुत दूर न था । सनकूने वहीं छिपकर दो चार रोज रहना विचारा था। पहाडके ऐसे स्थानमे वह दोनों ना पहुंचे, जो सुनसान और उजाड सा था । किंज्योतिने अपनी प्रेयसी राजकुमारी दर्श- नीयाके निमित्त व्रत और प्रायश्चित्तका सकल्प फर डाला। फिर राजकुमारी के नाम एक ऐसी चिट्ठी लिसनेका विचार किया जिसमें आज तकके दुस्साहसिक कर्मो का वर्णन हो । उसने सनको चिट्टी ले जानेके लिये कहा । वह बड़ी खुशीसे तैयार हो गया, क्योंकि वह ऐसी ही जगह जाना पसद करता था, जहाँ पेटपूजाका अच्छा प्रवध हो। यह सच है कि दर्शनीया नामकी कोई राजकुमारी इस धराधाम पर न थी, पर तो भी इसकी चिंता न यहादुरको और न मुमादबको ही हुई। सनाव वायुवेगपरसवार हो चल दिया और अपने मालिकको प्रत और प्रायश्चित्त करनेके लिये वापिस पाने तक यहीं छोड़ गया।

८८
विचित्र वीर
कैसे लगता ? वह तो किंज्योतिके पास ही रह गयी थी।
न उसे देनेकी याद रही.और न इसे लेनेकी ।
पाकेटबुक न मिलनेसे सनरूका अजव हाल था। उसने
सारा वदन टटोल डाला, दाढी नोंच डाली और मुंह पीट
डाला, जिससे खून निकल आया, पर नोटबुक न मिली। पादडीने
समझा बुझाकर शात किया और कहा कि तुझे बातें याद हों
तो कह जा मैं लिख दूंगा।
सन चिट्ठीका मजमून याद करनेके लिये सिर खुजलाने
लगा। पहले एक पैरसे खड़ा हो गया, फिर दोनोंसे । कभी
जमीनकी तरफादेखता, कभी आसमानकी तरफ । कभी दाँतोंसे
उँगलियोके नाखून काटता । वह दोनों उसके मुँहकी और
देख रहे थे। बहुत देरके बाद सनकूने मुँह सोला-"में चिट्ठी
याद कर सकूँ तो फाँसी पहुँ-जेकिन शुरू में लिखा था-"सरी-
मती महलासरमनी-हजाम बीचमें ही बोल उठा--"सरी-
मती महलासरमनी नहीं "श्रीमती महिलाशिरोमणि।" सनक
वोला--"हाँ हाँ यही है।" इसके बाद वह फिर कहने लगा--
"पाहत और दडित वीर श्रीमतीका कर चुम्मन करता है, वन
हृदया अकृत्तज्ञा सुदरी" इसके बाद याद नहीं क्या है, पर
अंतमें है-"आजीवन तेरा दुसी व्याकुल चीर-"
मनकी ऐसी तीत्र स्मरणशक्ति देस उन दोनोंने प्रसन्न हो
-

पंद्रहवाँ परिच्छेद
T काले पहाडपर पहुंचे तो क्या देखते हैं कि
'नों के बीच बैठा है। कपडे पहने है, पर पूरे हथि-
है । सनफूने दूरसे ही दुरतियाको घता दिया,
हैं, तो उसने घोडेको एड लगायी। उसके साथ
ये हज्जामराम भी थे। किंज्योतिके पास पाए
हज्जामने दुरतियाको घोड़ेसे उतारा । यह उतरते
ज्योतिके पैरोके पास दो जाने हो थैठ गयी ।
उठानेकी कोशिश की पर पद न उठी । कहने
वीर, मैं यहाँने तब तफ न उलूंगी, जप
प्रार्थना स्वीकार न करेंगे । गेरी प्रार्थना स्वीकार

समझता है कि किज्योति कभी नाकभी अवश्य सम्राट हो,
-
पादडी इनका नाम मिकोमिकोना है, क्योकि इनके राज्यका :
सन सुनकर सतुष्ट हो गया। पादड़ी भी उसकी सरलता
से प्रसन्न हुआ। उसने मनमें कहा कि किंज्योतिकी तरह
इसका दमाग भी असभव बातोंसे भर गया है। इसलिये.
९२
विचित्र वीर
इन्हें सताया है । तुम्हारे स्वामीका नाम सुनकर सहायता मॉगरे
बहुत दूरसे आयी हैं।"
सनफू-"जिन खोजा तिन पाइयाँ" वडा अच्छा हो अग
वह उस दैत्यको मार सकें। मिल जाय तो वह विना मार।
छोडें । मालिकको इनसे ब्याह करनेके लिये राजी करदें,तो था
अच्छा हो । इनका नाम क्या है ?
नाम मिकोमिकन है । और ऐसा होना ही चाहिये ।
।
जायगा।

-
पंद्रहवाँ परिच्छेद
वह लोग काले पहाडपर पहुँचे तो क्या देखते हैं कि
- किंज्योति चट्टानों के बीच बैठा है । कपड़े पहने है, पर पूरे हथि-
यार नहीं बांधे है । सनकूने दूरसे ही दुरतियाको बता दिया,
यही मेरे स्वामी हैं, तो उसने घोडेको एड लगायी । उसके साथ
नकली दाढी लगाये इजामराम भी थे । किंज्योतिके पास वह
लोग पहुँचे, तो हजामने दुरतियाको घोड़ेसे उतारा । वह उतरते
ही दौड़कर किंज्योतिके पैरोंके पास दो जाने हो बैठ गयी ।
किंज्योतिने उसे उठानेकी कोशिश की पर वह न उठी । कहने
लगी-"साहसी वीर, में यहाँसे तब तक न उठेंगी, जब
तक आप मेरी प्रार्थना स्वीकार न करेंगे। मेरी प्रार्थना स्वीकार
करनेसे आपका बड़ा गौरव बढ़ेगा और एक दुखिया कुमारी
कन्याकी रक्षा होगी। यदि आपकी भुजाओंमें उतना ही पल हो
जितना आपका नाम है, तो आप मेरी सहायता किये विना न
रहेंगे । मैं आपकी कीर्ति सुन, दूर देशसे यहां तक पहुँची हूँ।"
किंज्योति-जय तफ तुम न उठोगी वय तक में कुछ जवाय
पूँगा और न तुम्दारी घात ही सुनूंगा ।

पादडी-इनका नाम मिकोमिकोना है, क्योंकि इनके राज्यका
सनकू सुनकर संतुष्ट हो गया। पादड़ी भी उसकी सरलता
से प्रसन्न हुआ। उसने मनमे कहा कि किंज्योतिकी तरह
९२
विचिन्न वीर
इन्हे सताया है । तुम्हारे स्वामीका नाम सुनकर सहायता मांगने
बहुत दूरसे पायी हैं।"
सनकू-"जिन खोजा तिन पाइयाँ" बड़ा अच्छा हो अगर
वह उस दैत्यको मार सकें। मिल जाय तो वह विना मारे न
छोडें । मालिकको इनसे व्याह करने के लिये राजी कर दें,तो बडा
अच्छा हो । इनका नाम क्या है ?
नाम मिकोमिकन है । और ऐसा होना ही चाहिये ।
इसका दमाग भी असभव बातोंसे भर गया है। इसलिये
समझता है कि किज्योति कभी नाकभी अवश्य सम्राट् हो
जायगा।

किंज्योतिने उसे उठानेकी कोशिश की पर वह न उठी । कहने
पंद्रहवाँ परिच्छेद
वह लोग काले पहाडपर पहुंचे तो क्या देखते हैं कि
किंज्योति चट्टानों के बीच बैठा है । कपड़े पहने है, पर पूरे हथि-
यार नहीं बांधे है । सनकूने दूरसे ही दुरतियाको धता दिया,
यही मेरे स्वामी है, तो उसने घोडेको एड लगायी । उसके साथ
नकली दाढी लगाये हजामराम भी थे। किज्योतिके पास वह
लोग पहुँचे, तो हज्जामने दुरतियाको घोडेसे उतारा । वह उतरते
ही दौड़कर किंज्योतिके पैरोंके पास दो जाने हो बैठ गयी ।
लगी-"साहसी वीर, मैं यहाँसे तब तक न उलूंगी, जब
तक श्राप मेरी प्रार्थना स्वीकार न करेंगे। मेरी प्रार्थना स्वीकार
करनेसे आपका बड़ा गौरव बढेगा और एक दुखिया कुमारी
कन्याफी रक्षा होगी। यदि आपकी भुजाओंमे उतना ही पल हो
जितना आपका नाम है, तो आप मेरी सहायता किये विना न
रहेगे । मैं आपकी कीर्ति सुन, दूर देशसे यहाँ तक पहुँची हूँ।"
किंज्योति-जब तक तुम न उठोगी तब तक
मैं
न दूंगा और न तुम्हारी पात ही सुनूंगा।
पुछ जवाब

.९४
विचित्र वीर
दुरतिया-और जब तक मेरी प्रार्थना स्वीकार न होगी
तब तक मैं भी न उलूंगी।
किज्योति-अच्छा मैं स्वीकार करता हूँ। पर शर्त यह है
कि वह मेरे राजाके विरुद्ध, मेरे देशके विरुद्ध और जो महिला
मेरे दिलकी चाबी रखती है, उसके भी विरुद्ध न हो ।
दुरतिया- इनमें किसीके भी विरुद्ध नहीं है ।
इधर सनकृने धीरेसे किंज्योतिके कानमें कहा-"प्रार्थना
श्राप मजेमें स्वीकार कर सकते हैं। क्योंकि यह तुच्छ वात
है। केवल एक दुष्ट दैत्यको मारना है । यह इथोपियाके मिनको-
मिफन राज्यकी रानी मिकोमिकोना है।"
किंज्योति यह सुन बोला-"चाहे जो हो, मेरी आत्मा जो
कहेगी वही मैं करूँगा, और जो शौर्यशास्त्र के नियमोके अनु-
कूल होगा वही करूँगा ।" दुरतियाकी और फिरकर उसने
कहा-"सुदरि, उठो । जो कुछ तुम माँगती हो मैं दूंगा।"
दुरतिया-मेरा निवेदन तो यही है कि जहाँ मैं ले चलूँ
वहाँ श्राप चलें, और जिस कृतन ने मेरा राज्य हडप लिया
है, उसे जब तक ठीक न कर लें तब तक किसी दूसरे काममें
हाथ न डालें।
किंज्योति-मै फिर कहता हूँ कि तुम्हारी बात
छोडो । सुदरि, तुम बहुत जल्द अपनी
,
1
i

।
मैं जीजानसे तुम्हारी मदद कंदेह कद"
उठो जल्द चलो।
किंज्योतिन बहे दाम नाम
अर
तैयार करने और इनिर लान्यो च्या।
इसके बाद चारों यादी पहाद नत्र !
पादडीसे मेंट हो गई। इन दन्च किन्नाति शारिदिन
गया। पादडीने माय चलनेकी अनुमति दी नाम
मांगी। उसने अनुमति दे कहा कि मुन्ने विश्वाम हि.
मतीका सहेला (यानी हवान ) इन्हें अपने पीटे प्रहार
सानद निठा लेगा । हजाम तुरंत उतर पड़ा और पाहता
अपने आगे बैठनेको बुलाग । दुर्भाग्यवश यचर जग ग्रीश्रा।
वह लगा दुलत्तियाँ माडने । अगर यह इनामी मारती
या सीनेमें लगतों वो वह वही ढेर हो जाता, पर प्रेमा नही
हुआ । तो भी वह ऐमा उय कि सपकी पीटतं यदने
जमीनर लुढक पड़ा । उम समय उमे अपनी नगन्ती यादीकी
याद न रही। वह भी गिर पड़ी। उसने दादी जमीन में
पड़ी देसी, तो याद आयी। हाथोंसे मुँह मूंद यह यह ग्रेन
लगा--"हाय जबड़े की हड्डी टूट गयी।" किंज्योति दादी
जमीन पर देस बोला-"ओहो इतनी सफाई मे तो हटनाम भी
न मृड़ता।" पादड़ी ने देसा कि भेद खुला
।
-तो तुरंत

९६
विचित्र वीर
दौडकर उसका सिर सीनेसे लगा लिया। फिर कुछ गुन
गुनाने लगा, मानो मत्र पढता हो और सटसे दाढी फिर
हजामके मुँहपर।लगा दी। यह देख किंज्योतिके आश्चर्यका
ठिकाना न रहा।
कुछ दूर जानेके। बाद किंज्योतिने पादडीसे पूछा-"आप
इधर जगल में अकेले कैसे आ पहुँचे ?" पादडीने कहा- मैं
सेविलसे आ रहा था। रास्ते मे डाकुओंने सब रुपये पैसे
छीन लिये । मैं सहायता मांगने आपके पास चला आया।"
किंज्योति ने फिर दुरतियासे कहा-"अब आपभी अपनी
कहानी सुनाइये।"
दुरतिया-मैं वडी खुशी से सुनाऊँगी पर, आप मेरी दुख
भरी बाते सुन कही ऊब न जायें ।
किंज्योति-कभी नही प्यारी महिला।
दुरतिया-अगर ऐसी बात है, तो सुनिये ।
पादड़ी और हजाम दुरतिया के दाये वाये यह देखनेको खडे
हो गये कि वह क्या कहती है । सनकू भी पास जा खडा हुआ
किज्योतिकी तरह वह भी धोखे में ही था । दुरतिया जीनपर
आसन जमा एक दो चार साँसकर यों कहने लगी-"सजनो,
पहले आप यह जान लें कि मेरा नाम" इतना कह वह रुक
गयी क्योंकि पादडीने जो नाम यताया था, सो वह भूल
गयी।

।
-
।
पद्रहवाँ परिच्छेद
डीने तुरत साथ लिया और कहा-"यह कुछ आश्चर्यकी
बात नही कि जो श्रीमती अपनी विपत्तियोको वर्णन करने में
मो धवरा जायें । विपत्ति ही ऐसी है कि आपकी स्मरण-शक्ति
भी लोप होगयी। यहाँ तक कि आप अपना नाम भी भूल
गयी । आप मिकोमिकोनाकी राजकुमारी और मिकोमिकोना
राय की उत्तराधिकारिणी हैं।" दुरतिया फिर कहने लगी-
"हो ठीक कहते हो अब तुम्हारे सहारे की जरूरत नहीं । मैं
आपही अपनी राम कहानी कह सुनाऊँगी। अच्छा सुनिये ।
मरे माता-पिता मुझे अनाधकर चल बसे, तो एक दुष्ट दैत्य
मेरे राज्य पर चढ आया। मैं अबला कुछ न कर सकी। कोई
उपाय न सूझा, तो वहादुर किंज्योतिकी तलाश मे समुद्र पार
कर चली आयी । मैंने उनका नाम वही ईथोपिया मे सुना था ।
जितने आदमी मेरे साथ आये थे, उनमे बस यही दढियल
(हजामकी ओर इशारा कर) बच रहा है। बाकी सब
तूफान आ जानेसे, समुद्रमे ही डूब मरे। हम दोनो एक तखतेके
सहारे किसी तरह किनारे पहुंचे। बस यही मेरी यम
कहानी है।"
किंज्योति पर इसका बड़ा प्रभाव पडा । उसने झट प्रतिज्ञा
कर ली कि मैं, अवश्य उस दुष्ट दैत्यका सिर काटूंगा।
इसी प्रकार बातें करते सव जा रहे थे । निकोलस हजाम

१८ विचित्र वीर । . पानीका झरना देर कहा-"यहीं ठहर जाइये और चरद- खुरद कर लीजिये।" इस पर सब ठहर गये । पादडी सराय से जो थोडा सामान लाया था, उससे हो सब पेटकी आग ठढी करने लगे। इतनेमें एक छोकरा उधरसे श्रा निकला। उसने सबको ध्यानसे देसा, फिर किंज्योतिकी ओर दौडा । उसके पैर पकड और रोकर बोला, "हुजूर क्या मुझे भूल गये? मैं वही एड्रीज़ हूँ जिसे हुजूरने बलूतके पेडसे खोला था । किज्योतिने पहचान लिया। सबकी तरफ रुखकर कहा- "दुष्टोंकी दुष्टता रोकने के लिये वहादुर सवारोंकी कितनी जरूरत है, इसका सबूत यह छोकरा है । बहुत दिन हुए, मैं एक जगल- से जा रहा था । किसी दुखियाकी दुख भरी आवाज कानों में पहुँची । जिधरसे आवाज आती थी, उधर ही चला गया, तो क्या देखता हूँ कि यह छोकरा नगा बलूतके पेडसे बंधा है, और इस पर कोडे पड रहे हैं। मारनेवाला इसका मालिक एक किसान था। मैंने इसे बचाया, और इसका जो कुछ पावना था दे देनेका वचन उससे ले लिया । एड्रीज, क्या यह सच नहीं है ? उस किसानने भी कैसी दीनतासे मेरा हुक्म मान लिया था।डर मत । इन भलेमानसोसेसब बातें कह दे।" एडीज़-हुजूरने जो कुछ कहा सब ठीक है लेकिन जैसा आपने सोचा, वैसा न हो,ठीक उसका उलटा हुआ। -

कि
पद्रहवाँ परिच्छेद
९९
किंज्योति-उलटा
हुआ ? क्या उसने तेरी तनख्वाह
नहीं दी?
एडीज-नहीं, बिलकुल नहीं । इसके सिवा हुजूरके चले
जाने पर उसने फिर मुझे पेडसे बाँध, पहले से ज्यादा कोडे
लगाये । हर कोडेके साथ हुजूरकी ऐसी दिल्लगी उडाता था
अगर उस समय मारसे मैं व्याकुल न होता, तो
हसे विना न रहता । खैर तबसे अब तक मैं काखानेमें
ही था । यह सारा दोप आपका ही है। अगर हुजूर अपनी
राह चले जाते, और दूसरोंके कामों मे दखल न देते, तो मेरा
मालिक दस-बीस कोडे मारकर ही सतुष्ट हो जाता,
लेकिन
आपकी छेडछाडसे उसने आग बगूला हो, आपका बदला
मुझसे ले लिया। अब मैं जन्म भरके लिये निकम्मा हो गया।
किंज्योति—मैं वहाँसे चला आया, इसीसे यह खराबी हुई।
लवे तजर्वेसे मालूम हुआ कि किसान हानि सहकर कभी
अपना, वचन पूरा नही करते हैं। अगर उसने तेरा पावना
न चुकाया हो, तो कसम साता हूँ, मैं उसे सोजकर
,
सता दंगा।
यह कह वह उछल पडा और वायुवेग पर जा चढा । यह
देख दुरतिया बोल उठी-"याद कीजिये । आप पहले मेरा
काम करनेका वचन दे चुके हैं।"

१००
विचित्र वीर
मैं
किंज्योति-आपने अच्छी याद दिलायी । अब जब तक
आपका काम पूरा न करलूँ तब तक एडीज़ को ठहराना होगा।
मैं, फिर कसम साकर कहता हूँ कि किसानको दड दिये
विना विश्राम न करूंगा।
एड्रोज-मैं ऐसी कसमों के भरोसे नहीं ठहर सकता ।
आप मुझे खर्च दे, सेविल पहुँचा दीजिये, बस यही बडी भारी
सज्जा है। आपके पास कुछ हो, तो खाने को दीजिये और कुछ
साथ ले जाने को भी। लाइये, भगवान् आपका
और वहादुर
सवारोंका भला करे ।
सनकूने एक टुकडा रोटी और पनीर देकर कहा-"लो एड्रीज
भाई । तुम्हारे लिये मैं भी दुख सहता हूँ।" एड्रीज बोला-
"इसमें तुमने क्या दुख सहा?" सनकूने जवाब दिया-"रोटीका
यह टुकडा तुम्हे, मैं दे रहा हूँ, पर थोडी देर में इसकी सख्त
जरूरत मुझे होगी। मैं वहादुर सवारका मुसाहब हूँ,
भूख-प्यास मालूम
कहाँ तक कहूँ, यह खुद ही सोच लो।"
एंट्रीजने रोटी पनीर ले लिया। और किसीको कुछ
देते न देख, सलामकर चल दिया। जाते-जाते किंज्योतिसे
कह गया-"हुजूर अब कमी पिटते क्या कटते भी देखें,
तो मुझे न छुड़ावे । यस भाग्यके भरोसे छोड दें।
और न
कितने तरह
मुझे
के कष्ट सहने पड़ते हैं।
,

मोलहवां परिच्छेद
बहाई आज तक मैने नहीं देसी ।उन्होंने मुली-गाजर को तरह
उसका सिर एक ही हाथ में उड़ा दिया।"
इसी समय ऊपर भी शोरगुल होता सुनाई दिया। किंज्योति
गर्म-गर्जकर किसीमेमानो कह रहा था-"ठहर जा नामर्द, चोर,
लुटेरा ठहर जा " दीवार पर तलवार पडनेकी सटाखट भी
-
सुनाई दी।
मनकू चिल्लाया-"खडे-सडे सुनते हो और जाते नहीं श्रय
जाहीकर क्या करोगे? दैत्य क्या अब तक जीता होगा ? मैंन
अपनी आँखों देखा कि गचपर खूनकी नदी वह रही है और
इसका कुप्पे का-सा सिर अलग पड़ा है।"
यह सुन भठियाग बोल उठा-"मैं फाँमी पर्दू लो किंज्योतिने
शराबके कुप्पे न तोडहाले हो । उसके पलँगके पाम ही तो
वह रखे थे। उनसे जो शराब वही है, उसे ही यह हजरत
खून समझ रहे हैं।"
इतना कह वह ऊपर दौड गया। उसके पीछे और लोग
भी दौडे । सबने जाकर किंज्योतिको विचित्र अवस्था में देखा।
देह में मिः कमीज और सिरपर रातकी टोपी थी। बायें
हाथमें कन्मल लिपटा और दामें तलवार थी। आँसें बद, पर
।

जिसमें
.
सोलहवाँ परिच्छेद
दूसरे दिन वह लोग फिर उसी सरायमें जा पहुंचे,
जानेसे सनकू राव हिचकता था । भठियारा, भठियारो, उसकी
बेटी, दाई सबके सब' किंज्योति और सनकूको देख स्वागतके
लिये सानद बाहर निकल आये। किंज्योति भी इससे प्रसन्न
मालूम होता था। वह बडी गभीरतासे सबसे मिला और
बोला-"अबके पहलेसे अच्छा विस्तर देना।" भठियारी बोली-
"पहलेसे अच्छा दाम मिलेगा, तो वह भी अच्छा हो जायगा
किंज्योति बोला-"अच्छा दाम दूंगा।" इसपर भठियारा ने उसी
पहलेवाले कमरे मे विस्तर लगाया, पर यह पहलेसे कुछ अच्छा
था। किंज्योति उसपर जाकर लेटा और लेटते ही सो गया।
क्योंकि उसका शरीर और दमाग दोनों थके हुए थे।
किंज्योति जिस समय वेखवर सो रहा था, उस समय उसके
साथी नीचेके कमरे में, पेट-पूजा कर रहे थे। पेट-पूजो
हो
जाने पर किंज्योतिकी चर्चा चली ही थी कि सनकू दौडता-
हाँपता आयो और बोला-"दौडो, दौडो मालिक की मदद
करो। वह राजकुमारी के बैरी से भिड रहे हैं। ऐसी भयंकर

सोलहवाँ परिच्छेद
१०३
लढाई अाज तक मैंने नहीं देसी उन्होंने मूली-गाजर की तरह
उसका सिर एक ही हाथ मे उड़ा दिया।"
इसी समय अपर भी शोरगुल होता सुनाई दिया। किज्योति
गर्ज-गर्जकर किसीसे मानो कह रहा था-"ठहरजा नामर्द, चोर,
दीवार पर तलवार पडनेकी सटासट भी
।
लुटेरा ठहर जा
सुनाई दी।
सनकू चिल्लाया--"खडे-खडे सुनते हो और जाते नही। अव
जाहीकर क्या करोगे? दैत्य क्या अब तक जीता होगा ? मैंने
अपनी आँसों देखा कि गचपर खूनकी नदी बह रही है और
उसका कुप्पे का-सा सिर अलग पडा है।"
यह सुन भठियाग वोल उठा-"मैं फाँसी पहूँ जो किज्योतिने
शराबके कुप्पे न तोडडाले हो । उसके पलँगके पास ही तो
वह रसे थे। उनसे जो शराव बही है, उसे ही यह हजरत
जून समझ रहे हैं।"
इतना कह यह उपर दौड गया। उसके पीछे और लोग
भी दौडे । सबने जाकर किज्योतिको विचित्र अवस्था में देखा।
देह में सिर्फ कमीज और सिरपर रातकी टोपी थी। बायें
हाथमे कम्मल लिपटा और दायेमें तलवार थी। आँसें बद, पर
मुंह गुला था । वह इस ढगसे सड़ा हो बोल रहा था मानों
सचमुच लडता हो । उसने दैत्यको मार डालनेके
दैत्यस

१०४ विचित्र वीर ध्यानमे शराबके कुप्पेपर इतने वार किये, कि कुप्पेकी धज्जियाँ उड गयीं, और तमाम शराब-ही-शराब नजर आती थी। भठियारेने यह देखा तो श्राग बगुला हो गया। किंज्योतिको पकड़ घुसेपर घूसे मारने लगा। नाई और पादडी न बचाते, तो किज्योतिका कामही तमामहो जाता। इतनी मरम्मत हो जाने पर भी,वह होशमें न आया। एक बोलटी पानी उसके सिंरपर डाला गया, तब कुछ होश हुआ। इधर सनक दैत्यका मूंड खोजनेमें ही हैरान था । बहुत ढूँढनेपर भी न मिला, तो निराश हो बोल, उठा-"अफसोस, सिरके साथ मेरा राज्य भी गायब हो गया।" बात यह थी कि किज्योतिकी बातों और वादोका ऐसा असर पड़ा कि वह जागता हुआ भी सोते हुए किंज्योतिसे ज्यादा पागल हो गया था। भठियारा सनककी सनक और किज्योतिके हस्त-कौशलसे मन- ही-मन विगड रहा था। उसने निश्चय कर लिया कि अबके पूरा दाम वसूल किये विना न छोडूंगा। पादढीने किंज्योतिका हाथ पकडा तो उसने राजकुमारी दुरतिया समझकर कहा- "मैंने दैत्यको मार डालो । आप घेखटके राज्य करें।" यह सुन सनकसे न रहा गया । वह बोल उठा-"क्या मैंने - १

?
अब मेरे
सोलहवाँ परिच्छेद
१०५
नही कहा था कि मालिकने दैत्यको मार डाला
राव-राजा बननेमें कोई विघ्न नहीं है।"
भठियारेको छोड, सबके सव खिलसिला उठे । सयने
किंज्योतिको उठा, सहज ही पलँगपर लिटा दिया। वह भी
खुर्राटे लेने लगा। सब लोग फिर बडे कमरेमें आ गये।
वहाँ भठियारी तो यह बड़वडा रही थी कि इस निपूते
बहादुरके मारे हमारा सफाया हो गया । और सनकू
दैत्यका सिर न मिलनेके कारण मन मारे बैठा था ।
पादडीने तो भठियारीको यह कह शात किया कि तेरा
जो कुछ नुकसान हुआ है, मैं दूंगा और ।दुरतियाने सनकूको
अपने यहाँ रावराजा बनानेका वचन दे सतुष्ट किया। पर वह
विचारा बहुत देर सतुष्ट न रह सका । क्योंकि जब वह लोग
आपसमे वात-चीत कर रहे थे, तब एक अजनयी आदमी
सरायमें आ पहुँचा । दुर्भाग्यवश वह दुरतियाका पति निकला।
वह घर छोड कहीं चला गया था। आज अक्स्मात् यहुत
दिनोंके वाद दुरतियाको पतिके दर्शन मिल गये । उमके
आनदका क्या पूछना था । उसके पानदसे सभी आनदित
थे । ऐसे आनदके समय केवल सनकही उदास और दुसी
या। क्योंकि उसफा बना बनाया सेल बिगड गया। उसने
पड़े दुसके साथ मुना कि दुरतिया है, मिफोमिनाको

१०६
विचित्र वीर
राजकुमारी नहीं, साधारण स्त्री और आगतुक नवयुवककी
पत्नी है। उसने सोचा कि अब न किज्योतिको साम्राज्य मिल
सकता है और न सुमे राज्य ही । वह ऐसा दुसी हुआ कि
चुपचाप उठकर अपने मालिकके पास चला गया। उसने
जाकर किंज्योतिके कान में कहा-"हुजूर, सब गुड मिट्टी हो
गया । अब मजेंमे सोइये । राजकुमारीके लिये तकलीफ
उठानेकी या दैत्यसे लडनेकी जरूरत नही रही।"
किंज्योति-क्या बकता है ? दैत्यको तो मैं मार चुका।
एक ही हाथमें उसका सिर उडा दिया । लहूकी धार पानीकी
तरह बहती थी।
सनकू-पानी नहीं लाल शराबकी तरह कहिये । हुजूग्ने
जिसे माय वह शराबका कुप्पा था,
और
लहू अठारह
गैलन
शराव था।
किंज्योति-घेवकूफोकी तरह क्या बक रहा है । तू बेहोश
है या होशमे ?
सनक-उठिये तो मालूम हो कौन बेहोश है ? अभी क्या
जब दारूका दाम देना पडेगा, तव मालूम होगा। लेकिन अभी तो
आपकी राजकुमारी साधारण महिला दुरतिया बन गयी हैं
किंज्योति-इसमें आश्चर्यकी कौन-सी बात है ? क्या तू
भूल गया, कि पिछली बार जब हम यहाँ आये थे, तब सब
.

सोलहवाँ परिच्छेद चीजोंपर जादू हो गया था। इस बार भी हो गया हो, तो क्या ताजुध है। सनकू-ताजुब कुछ नही । अगर मेरा कम्मलमे उछाला जाना भी जादूका खेल हो, तो यह भी हो सकता है। लेकिन ऐसा नही है। मैंने उस बारभी भठियारेको देखा था। कम्मलका एक कोना, उसके भी हाथमे था, यह सुझे खूब याद है । आज भी वह यही है । मैं जानता हूँ भठियारे बडे पाजी होते हैं। यह जादू नहीं उसकी शैतानी थी। किंज्योति-अच्छा। मेरे कपडे ला । मैं स्वय चलकर इस उलटफेरको देदूंगा। सनकूने कपडे लाकर दिये । ऊपर वह कपडे पहनता था और नीचे पादडी दुरतियाके पतिसे कह रहा था-"किंज्योति सनक गया है। मैं उसे घर ले जाने के लिये, कोई नया उपाय सोच रहा हूँ। दुरतिया आपके साथ नहीं जा सकती, उससे अभी बहुत काम लेना है।" फरनदूने कहा-"अगर ऐस बात है, तो मैं उसे न ले जाऊँगा।” फरनदू दुरतियाके स्वामीका नाम था। इतनेमें किंज्योति हवे हथियारोंसे लैस हो, सिरपर चिल- मिचीका टोप रसे आ पहुँचा । आते ही उसने दुरनिया- से कहा-"मुसाहघसे सुना है कि आपकी शान-शौकत

विचित्र वीर
चली गयी, और आप राजकुमारीसे एक साधारण स्त्री होगयी।
अगर आपके बापने यह समझकर, आपपर जादू किया हो
कि मैं सहायता करना छोड़ दें. तो मैं कहता हूँ कि वह
इस बारेमें कुछ नहीं जानता है। वहादुर लोग इससे बडी-बडी
कठिनाइयाँ दूर कर सकते हैं।" दुरतिया बोली- मैंतो जैसी
थी वैसीही हूँ। कुछ भी नही बदली। कलही यहाँसे कूच
कम्गी।"
इस पर किज्योति सनकी तरफ फिरा, और क्रोधकर
बोला-"तू स्पेन-भरमें सबसे बडा पाजी शैतान है । क्या तूने
नहीं कहा कि राजकुमारी दुरतिया बन गयी, और दैत्यका
मूंड कुप्पा बन गया ? मनमें तो आती है कि तेरी खोपडीमें
अक्ल ठूस ,"
सनक छमा कीजिये । राजकुमारीके बारेमें मेरी भूल
हो सकती है, लेकिन दैत्यके सिरके बारेमें नहीं । भठियारा जब
बिल पेश करेगा, तब आपही मालूम हो जायगा कि मेरा कहना
ठीक है या नहीं, और मैं तो इस बात से खुश हूँ कि यह अब
तक राजकुमारी बनी हुई है। इनके राजकुमारी बने रहनेसे
ही अपना फायदा है।
इतना सुन किंज्योति शात हो गया । आमोद-प्रमोदके
पश्चात् सब सोने चले गये। किंज्योतिने किलेकी रक्षाका भार

सत्रहवाँ परिच्छेद १११ और भी न जाने क्या-क्या वहावकने लगा। इसी समय भठियारेको घेटी भी आहिस्तेसे बोल उठी--"जनाब जरा इधर भी तशरीफ लाइये।" यह सुन किंज्योतिने सिर घुमाया, तो चाँदनी में उसे साफ दिखाई दिया कि कोई दीवारके सूराखसे बुला रहा है । वह सरायको मिला समझ रहा था, इसलिये उस सूरासको भी फिलेका जालीदार झरोसा समझ लेना कौन बड़ी बात थी। उसने समझा कि किलेदारकी बेटी मुझपर आशिक हो वात-चीत करने आयी है । वस उसने वायुवेगका मुँह फेरा और सूराखके पास जा पहुंचा। छोकरियोंको देख वह बोला--"सुदरियो, तुमने मुझसे प्रेम कर लिया पर मैं इसका बदला नहीं दे सकता, क्योंकि राजकुमारी दर्शनीयाका मेम मुझे दूसरे से प्रेम करनेमे रोकता है ।प्रेमके सिवा जो मांगो मैं देनेको तैयार हूँ। दाई बोली-"और कुछ नही सिर्फ आपका हाथ चाहती हूँ।" इतना कह वह नीचे चली गयी, और मनफूके गधेकी वाग- डोर उठा लायी । किंयोनि महिलाओंको असतुष्ट करना अनुचित जान, सूराख तक पहुँचनेके लिये सडा हो गया और हाथ बढाकर बोला-"सुइरी, यह हाथ लो और देखो कि इममे कितनी ताकत है।"

- सत्रहवॉ परिच्छेद सरायके सब लोगतो सो गये परतु भठियाकी घेटी और दाईको नीद न आयी। किंज्योतिको घोडेपर सवार फाटककी रक्षा करते देस उन्हें दिल्लगीकी सूझी । उन्होंने सोचा, और कुछ नही तो 'उसकी बेसिर पैर की लच्छेदार बातें ही सुनने में आवेंगी। सरायमे सडककी ओर खिडकी न थी। सिर्फ एक सूराख था, जिससे सूखी घास और लीद फेंकी जाती थी। इन दोनोंने सूराख्नसे देखा कि किंज्योति घोडे पर चढा, भालेके सहारे आगे झुका कलेजेको टुकडे-टुकडे करनेवाली आहें भरता धीरे-धीरे बड- रहा है-“परम सुदरी, चतुराईकी खान, हास-परिहासका भडार, लज्जाशीला, दोवोसोकी राजकुमारी इस समय क्या करती होगी ? शायद् अपने प्यारे बहादुर किज्योतिकी याद करती होगी, जो उसके लिये अनेक प्रकारकी विपदाओंमें फँसा है, ऐ चद्र । तू उसकी खबर ले श्रा। तू क्या लावेगा ? तू तो उससे कुढता है, वह अपने महल के झरोखेसे झांकती है। तो तू देसकर जल जाता है ।" इसी तरह

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११२ विचित्र वीर "अच्छा देखती हूँ।" कह दाईने वागडोरका फदा उसकी कलाईमे डाल, उसका दूसरा छोर ऊपरके किवाडकी जजीरसे बाँध दिया। किंज्योति कलाईमें रस्सी बँधी जान चोला- "सुदरिया हाथ देखनेके बदले दुःख दे रही हो। ऐसी घेर- हमी मत करो। हाथको क्यों दुस देवी हो ? उसका क्या - कुसूर है " पर किसीने एक शब्दभी न सुना । क्योकि वह दोनों तो अपना काम कर पहलेही चलदी थी। किज्योति वायुवेग पर सीधा सडा था और उसकी कलाई सूगसमे बँधी थी। वायुवेग जराभी इधर-उधर हुआ, तो मैं लटकता ही रह जाऊँगा, यही चिंता अव उसे मताने लगी । उसने सोचा कि यह भी जादूका ही सेल है । वह अपनी मूर्खता पर अफसोस करता था कि नाहक ही यहाँ फिर आया । उसने हाथ छुडानेकी बडी-बड़ी कोशिशें की पर कुछ फायदा न हुआ । लाचार घोडे पर बैठ गया, पर बैठा न रह सका। उसने सोचा कि यहाँ जादूमे जन्म-भर जकडे रहनेसे ससारको बडी हानि होगी । उसने सनकूको बहुत पुकारा, पर वह तो मजेमे सुर्राटे ले रहा था । जवाब कौन देता । आखिर सवेरा हुधा उसने सोचा जादूका यह असर तो बराबर रहेगा और दिनको भी छुटकारा न होगा। वायुवेगभी टससे मस न हुआ, सत्रहवाँ परिच्छेद ११३ तो उसे इसका पूरा विश्वास हो गया। उसने सोचा कि मै और वायुवेग दोनों ही दाना पानी विना यों ही तडपते रह जायेंगे । जब तक कोई होशियार जादूगर आकर न छुडावेगा, तब तक जादूका असर न जायगा । यह सब सोच वह बेतरह चिल्लाने लगा।। - मवेरा होते ही कुछ मुमाफिर घोडोंपर सगयों टिकनेके लिये आये, पर फाटक बद था। उन्होंने जोरसे फाटक खद- सटाया, तो किज्योतिकी नजर उनपर जा पडी । वह डपटकर योला--"बहादुर हो चाहे मुसाहब, तुम्हे यों इस फिलेका फाटक खटखटानेकी जरूरत नहीं । इस वक्त फिलेवाले सो रहे हैं जब तक सूरज न उग जाय तव तक फाटक खोलनेका यहाँ दस्तूर नहीं है। अभी चले जाओ । जब दिन चढेगा, तब फाटक सुलने या नखुलनेका विचार होगा।" उनमें से एक बोला--"कैसा किला और कैसा दस्तूर | अगर तुम भठियारे हो, तो किसीसे फाटक खुलवा दो। हम लोग मुसाफिर हैं और जल्दीमे हैं। घोडोको सिर्फ दाना खिलाकर चल देंगे।" किंज्योति-मैं क्या भठियारा मालूम होता हूँ? मुसाफिर-मैं नहीं जानता तुम क्या मालूम होते हो। पर पागल जरूर हो, जो सरायको किला फहते हो।

११४
विचित्र वीर
किंज्योति-यह फिला है और अच्छा किला है। इसके रहने-
वालोंके मिरोंपर ताज और हाथोंमें शाही आमे हैं।
मुसाफिर नही, हाथोंमें ताज और सिरोपर से कहो।
इस बातचीतसे और मुसाफिर ऊब से गये थे। उन्होंने
फाटकपर और भी जोरसे धका मारा। इससे भठियारा तथा
दूसरे लोग भी जाग उठे।
इधर मुसाफिरोंका एक घोडा सूंघता हुआ वायुवेगके
निकट जा पहुंचा। वह विचारा कान झुकाये, पीठपर अपने
मालिकको लादे उदास सडा था। यद्यपि वह काठका सा मालूम
होता था तथापि था हड्डी मासका ही। वह भी उसे सूंघने
चला । ज्यो ही वह एक कदम आगे वढा त्यों ही किंज्योति
जमीनपर आ जाता पर हाथ बँधा रहनेके कारण बीचमे
ही झूलता रह गया। उसे ऐसा मालूम होने लगा मानो कलाई
कटी या धडसे बॉह अलग हो रही है । वह जमीनके इतने
पास था कि पैरोके अँगूठोसे उसे छूने के लिये छटपटाने लगा।
इससे उसकी तकलीफ और भी बढ गयी।
सुलासा यह कि वह इतने जोरसे चीसा कि
घबराकर फाटक सोल दिया। मरायके और लो.
उठे । इस चीससे दाईकी भी नीद खुल गयी ।
चुपकेसे रस्सी खोल दी। यस किंज्योति

।
सत्रहवाँ परिच्छेद
११५
भठियारेके आगे धडामसे गिर पडा। सब लोग उसके पास
दौड गये और बात क्या है, पूछने लगे। किज्योति कोई जवाब
न दे कलाईसे फदा निकाल वायुवेगपर चढ, ढाल लगा, भाला
तान मैदानमें पैंतरे बदलता हुआ बोला-"मुझपर जादू नहीं
हुआ, ऐसा जो कहे वह झूठा है। मिकोमिकोनाकी राजकुमारी
हुक्म दें, तो द्वद्व युद्धके लिये मैं उसे ललकार सफता हूँ।"
नये मुसाफिर किज्योतिको वातोंसे चकित हो गये लेकिन
भठियारेने उन्हे सारा भेद बता दिया, तो वह निडर हो सरायमे
दासिल हुए । ललकारका कोई जवाब न पा वह गुस्सेसे और भी
पागल हो उठा था लेकिन शौर्यशास्त्र के नियमानुसार राजकुमारी-
का काम किये विना किसी नयी मुहीमपर जाना मुनासिब
समझ चुप हो रहा, कुछ न बोला ।

अठारहवाँ परिच्छेद
सब लोगोंने वह दिन सरायमें बड़े आनदसे बिताया ।
किज्योति पिछली रातकी थकावटके कारण जव बेसबर सो रहा
था, तब उसके साथी लोग उसका पागलपन'छुडाने के लिये
उसे घर ले जानेका उपाय सोच रहे थे। सब बातें तै हो गयी तो
उन्होंने एक गाडीवानको ठीक कर लिया, जो सयोगवश एक
जोडा बैल लिये उधरही आ निकला था । बाँसका एक पिजरा
बनाया गया। वह इतना बडा था कि किंज्योति मजेमें उसमे
रह सकता । पादडीके कहने पर फरनदू हजाम, भठियारे
और कुछ मुसाफिरोंने अपने अपने मुँह पर नकाबे डाल ली
जिसमे वह किसी को न पहचान सके ।
सब ठोक हो जाने पर वह लोग चुपचाप दबे पाँव किंज्योतिके
कमरेमें घुस गये। वह बेसुध पड़ा था। उन लोगोने उसके
हाथ
पैर
सूब कसकर बाँध दिये। वह जागनेपर इधर उधर
देखने लगा। उठना चाहा पर न उठ सका । अपने चारों ओर
विचित्र मनुष्योको देख श्राश्चर्य करने लगा। कुछ समझमें
न आया, तो अभ्यासानुसार उन्हे जादूके किलेके भूत समझ

दूंगा । उसे क्या मिलेगा, यह मैने अपने विलमें साफतौरसे अठारहवाँ परिच्छेद लिया । अपने ऊपर भी जादूका ही असर समझा । पादडीने जैसा सोचा था ठीक वैसा ही हुआ । अकेला सनक हो अपनी असली सूरत और होशहवासमे था। वह भूतोंको जन गया तो भी उस समय बोलनेकी हिम्मत न हुई। पीछे सारा भेद उसे आपही मालूम हो गया । पिंजरा ऊपर आया, तो किज्योति उठाकर उसमें रखा गया। फिर कोल मार दी गयी जिसमें वह न सुल सके । सब लोग कधों पर पिंजरा उठा बाहर ले आये । हज्जाम आवाज बदल- कर बोला--"लामनचाके बहादुर | धवराना नहीं । ठिकाने पर जल्द पहुँचानेके लिये ही यह उपाय किया गया है। आपकी शादी राजकुमारी दर्शनीयामे होगी और सनकूको भी सूब किंज्योति यह सुन बडा खुश हुआ और बोला--"अगर ऐसा हुआ, तो मैं इस कैदको अपना गौरव और बेडीको सुस समगा । सनकको अपने वचन अनुसार किसी टापूका गवराजा न बना सका, तो पूरा वेतन तो कम से कम अवश्य ही दौलत मिलेगी। लिख दिया है। उसने जैसी सेवा की है उसके अनुसार तो बद कुछ नहीं । है परतु मेरी दरिद्रताके विचारसे यह पटुत पछ है।" सनाने घड़े श्रदयसे सलाम फर अपने मालिफफा हाय विचित्र वीर चूम लिया। फिर पिंजरा उठाकर गाड़ी पर रस दिया गया। किज्योतिने अपनेको गाडीपर टापेमे इस प्रकार बद देख कहा-"मैंने वहादुरोके बहुतेरे इतिहास पढे पर जादूमें फँसे वहादुरोंको इस तरह इतना धीरे धीरे जाते हुए न कहीं देखा, न सुना और न पढ़ा है । वहादुर तो बडी तेजीसे ले जाये जाते हैं। वह वादलोंमे लिपटकर या भागके रथपर या परदार घोडेपर या ऐसे ही किसी जानवरपर चलते हैं । वैलगाडीपर चलना बिलकुल नयी बात है। तलवारकी कसम मेरी समझमे कुछ नहीं आता है। आजकलके जादू और बहादुरी- की शायद यही चाल हो । डौन फरनदूको डर था कि कहीं सनकू सारा भेद न खोल दे इसलिये उसने भठियारेको वायुवेग और गधेपर साज रख तुरत भेजने के लिये ताकीद की। भठियारेने भी फौरन हुस्मकी तामील कर दी। पादडीने वायुवेगके एक ओर ढाल और दूसरी ओर चिल- मची लटका सनकको गधेपर चढ जाने और वायुवेगकी लगाम पकड चलने के लिये इशारा किया। दोनों छोकड़ियाँ और भठियारी कूचका डका बजने के पहले किज्योतिको सलाम करने निकल उसके दुर्भाग्यपर टिसवे बहाने लगीं। इसपर

अठारहवों परिच्छेद
वह बोला-"कृपालु महिलाओ रोश्रो मत । प्रत्येक वीरको
ऐसी-ऐसी घटनाओंका सामना करना पड़ता है। यदि ऐसा न
होता, तो मैं अपनेको किसी कामका ही वीर न समझता । ऐसी-
ऐसी विपत्तियाँ छोटे-मोटे वीरोंपर आती ही नहीं। क्योंकि
उनकी कोई परवा नहीं करता है । साहसी वीरोसे लोग ईर्पा
करते, और उनसे पिड छुडाना चाहते हैं। बस यही कारण
है जिससे उनपर विपत्तियोंका पहाड टूट पडता है। खैर,
तुम परमात्मासे प्रार्थना करो कि मैं जल्द इस जादूसे छुटकारा
पाजाऊँ । यदि मैं कभी स्वाधीन हुआ, तो तुम्हारी कृपाओको
कभी न भूलूँगा।"
उधर तो किंज्योति उन्हें समझा रहा था और इधर पादडी
और
हजाम
डौन फरनदू और दुरतियासे विदा हो रहे थे।
वह सब परस्पर मिले और बिछुडे । दुरतियाने कहा- "इसका
क्या नतीजा निकलता है, इसकी सवर जरूर दीजियेगा।"
पादुडी और हजाम 'बहुत अच्छा' कह सच्चरो पर सवार हो
गाडीके पीछे हो गये। दोनोंने मुँहोपर नकाबे डाली ली थी,
जिसमे किंज्योति न पहचान सके । इस प्रकार यात्रा प्रारम
हुई । सबसे आगे बैलगाडी पर किंज्योतिका पिंजरा था। उसके
पीछे सनक गधेपर घोडेकी लगाम पकडे हुए चला । उसके
पीछे पादडी और हजाम अपने-अपने सञ्चरपर बडी गभीरता-

१२० विचित्र वीर से चलने लगे। किज्योति पिजरमे पैर फैलाये डडोंके सहारे झुका हुआ बैठा था। दोनों हाथ बँधे थे। वह चुपचाप था, मानो पत्थरका पुतला हो। इस तरह धीरे धीरे चुपचाप वह लोग अंदाज दस मील चले गये। गाडीवानने बैलोंको चारा देनेका सुवीता देख ठहरना चाहा पर हज्जामने कहा-"यहाँ नहीं, आगे चलो। वहाँ पहाडीके पीछे सव बातोंका सुबीता है।" बस फिर सब आगे बढे। पादडीने मुँह फेरा, तो देखा कि छ सात सवार आ रहे हैं। वह लोग दोपहर बितानेके विचारसे किसी सराय- की तलाशमें जल्दी-जल्दी डग उठाते चले आ रहे थे। पास पहुँचे तो उन्होंने विनयपूर्वक अभिवादन किया । उनमे एक मुखिया सा मालूम हुआ । वह वास्तव में टोलेडोके गिरजेका व्यवस्थापक था । यह विचित्र मडली देस उससे न रहा गया। किंज्योतिकी ओर सकेत कर पूछ ही बैठा--"इस मनुष्यको इस तरह क्यों ले जा रहे हैं ? मैं समझता हूँ, यह कोई मशहूर डाकू या बदमाश है।" किंज्योति- ने यह सुन लिया था । उसने कहा-"यदि आप शौर्यशास्त्रके ज्ञाता हों, तो मैं अपनी दु खगाथाएँ सुना सकता हूँ। न हो तो मैं कष्ट करना नहीं चाहता।"

अठारहवाँ परिच्छेद
व्यवस्थापक मैंने शौर्यशास्त्र सवधी अनेकों पुस्तकें पढी
हैं।आप सुनावे, तो सानद आपकी इतिवृत्ति मुनूंगा।
किंज्योति-अच्छा सुनिये। यह तो आप समझ ही गये होंगे
कि मायावियोंने द्वेषभावसे मुझे इस पिंजरे में फँसा रखा
है । सज्जन सद्गुणका जितना आदर नहीं करते, दुष्ट उससे
अधिक उसका निरादर करते हैं। मैं अश्वारोही वीर
हैं। मैं अमरत्वके मदिरमे अपना नाम लिखाऊँगा और
मेरा आचरण भावी सतानोंके लिये आदर्श तथा दर्पण
होगा।
कही बात न बिगड जाय, इसलिये पादती बोल उठा-
"लामनचाका वीर किंज्योति सच कहता है । मायावियोंकी
मायामे ही इसकी यह दशा हुई है। इसमे इमका कुछ दोप
नही। दोष है उन ईर्षालुओ का जो साहसादि सद्गुणोंसे सदा
घृणा करते हैं।"
व्यवस्थापकने दोनों को एक ही प्रकार की बाते कहते सुना, तो
उसे बडा आश्चर्य हुआ। वह कुछ निश्चय न कर सका कि
वास्तव में बात क्या है। उसके साथियोंकी समझमें भी कुछ न
आया । पर सनकू क्यों चुप रहने लगा था। वह भी योल उठा-
"आप चाहे जो सममें, पर असहा यात यह है कि मेरे मालिक
किंज्योतिपर जादू का उतना दो असर है जितना मेरी नानोपर

.
,
१२२
विचित्र वीर
है। इनका होसहवाम दुरुस्त है । इस पिजरे में वद होने के
पहले जैसे साते पीते थे, वैसे ही अब भी खाते पीते हैं । फिर
आप ही कहिये, कैसे मालूम हो कि इनपर जादू हुआ है ? सुना है,
जिसपर जादू होता है वह न खाता है, न पीता है और न बोलता
ही है। अगर कोई न रोके, तो मेरेमालिक अयभी तीन वैरिस्टरों
बराबर बोलेगे।"
फिर पादडीकी ओर मुँहकर उसने कहा-"क्यों पादडीजी
क्या आप समझते हैं कि मैं आपको न पहचान सका और
आपकी चालें ही समझ सका | आप लोग अपने को चा
जितना छिपाये रहे, पर मै सब ताड गया हूँ। इसमें शक नही नि
आप बडी उस्तादी से सब काम कर रहे हैं, पर मेरी आँसो
धृल नहीं झोंक सकते । मै सब जानता और समझता हूँ। आ
थोडेमें समझ ले कि जहाँ ईप द्वेप है वहाँ सद्गुण नही ठE
सकता । आपके मारे न तो मेरे मालिकका ब्याह मिकोमिकोना
राजकुमारीमे हो पाया, और न में ही रावराजा बन सक
अपनी सेवा और मालिककी उदारताके देसते इससे कम
आशा ही न थी। लेकिन क्या करूं। 'बदलता है रंग आस
कैसे कैसे' जो कल अर्स पर थे आज फर्श पर आ गये हैं।
अपनी जोडू और बचोंकी फिक्र है। वह सोचती होगी
मेरा पति और लडके सोचते होगे कि हमारा बाप किसी

१२३ यह अठारहवा परिच्छेद किमी टापृका लाट या गजा बनकर आता ही होगा, लेकिन यदा मोचीका मोची ही घर जा रहा है। पाटडीजी । इसलिये कहा है, जिममें आपको मालूम हो जाय कि मेरे मालिकके दुर्भाग्यके धुलानेवाले आप ही हैं।" हजामने कहा-"मनकू, मैं कसम साकर कहता हूँ कि तू भी वैसा ही पागल है, जैसा तेय मालिक ) मैं समझता हूँ तुझे भी उमी पिंजरेमें रहनेकी जरूरत है । उसपर जैसा जादू है वैसाही तुझपर भी है । न मालूम किस बुरी घड़ीमें उसने द्वीप और टापूकी बातें तेरे सिरमे भर दी है। सन बोला-"मैं गरीब है सही, पर ईमानदार हूँ। मैं किसीका कुछ धारता नहीं । अगर मुझे टापूका लालच है, तो दूसरोको इससे भी बुरी चीजोका है। मनुष्य होने के कारण में किसी टापूका राजा सहज ही हो सकता हूँ, विशेष कर इस- लिये कि मेरे स्वामी इतने टापू जीतेगे कि वह अकेले सँभाल ने सकेंगे । हजाम साहब आप भी होशियार हो जायँ । दाढी बनाना ही सब कुछ नही है। एक आदमीसे दूसरेमें कुछ न कुछ फर्क होता ही है । मैं यह इमलिये कहता हूँ कि हम लोग परस्पर एक दूसरेको जानते हैं। तुम मुझे धोखा नहीं दे - सकते।"

१२४
विचित्र वीर
हज्जाम चुप रह गया। कुछ नहीं बोला । उसने देसा
कि जवाब देने से यह कहीं सारा भेद ही न सोल दे। पादडी-
ने भी यही समझ व्यवस्थापकसे कहा कि चलिये मैं सब
बाते बता दूंगा।

उन्नीसवाँ परिच्छेद पादडीने अलग लेजाकर किज्योतिके पागलपनकी सारी कहानी व्यवस्थापकसे कह सुनायी । व्यवस्थापक विद्वान् था। उसे इन बातोसे बडा अनुराग हो गया । वह दोनो बातें करते, जहाँ हज्जामने ठहरनेकी जगह बतायी थी वहाँ जा पहुंचे। वह दोनो वहीं ठहर गये । इतनेमें किंज्योतिकी गाडी भी श्रा पहुंची। गाडीवानने बैल सोल दिये, और सब लोग झरनेके किनारे बैठ- कर साने पीनेकी तैयारी करने लगे । सनकूने पादडीसे कहा कि मालिकको भी थोडी देर मैदानकी हवा साने दीजिये । पादडी--अगर वह भाग न जाय, तो मैं तुम्हारी बात मान सकता हूँ । अबके निकल भागा, तो पता लगाना कठिन होगा। सनक-नहीं भागेंगे। मैं जमानत करता हूँ। व्यवस्थापक-यदि वह वीरोंकी तरह प्रतिज्ञा करे कि मैं न भागूंगा तो मैं भी जमानत करता हूँ। किंज्योति-मैं इस नातकी प्रतिज्ञा करता हूँ, और बडी जानता हूँ कि जिसपर मेरी तरह जादू होता है, वह जहाँ चाहे वहाँ नही जा सकता। तत्परतासे करता हूँ।

,
गया।
जैसे यह सममाना कि सूरजसे रोशनी नही होती, पालेसे
१२६
विचित्र वीर
इमपर वह पिंजडेसे निकाला गया। उसने निकलते ही अँग
डाई की, फिर वायुवेगके पास जा उसे थपथपाया और
कहा-"सुश रहो । हम तुम फिर सडकपर साथ चलेगे।"
इसके बाद जहाँ सब लोग साने बैठे थे वहाँ आकर वह बैठ
व्यवस्थापकने किंज्योतिके शौर्य सबधी विश्वासपर
आक्षेप कर पूछा-"आप इन फालतू मनगढत बातो पर क्यो
विश्वास करते हैं ? आपसे प्रार्थना है, आप अच्छी अच्छी
पुस्तके पढे और योग्यता प्राप्त करे।"
किंज्योति बडे ध्यानसे व्यवस्थापककी वाते सुन कुछ देर
उसके मुँहकी ओर देखता रहा । फिर बोला-"महाशय,
आपने जो कुछ कहा, उसका निचोड यही है न कि पहले बहादुर
सवार नहीं होते थे और शौर्य सवधी पुस्तके कपोलकल्पित,
हानिकारक, व्यर्थ और असत्य वातोसे परिपूर्ण हैं। मैंने
उन्हें पढकर बुरा किया और उनपर विश्वास कर और भी
चुरा किया। उनका अनुकरण कर अत्यत बुरा किया ।
व्यवस्थापक-जी हाँ, मेरी तो ऐसी ही धारणा है ।
किंज्योति-तो मैं समझता हूँ, आप पागल हैं । जिसे
सारा संसार सच मानता है, उसे आप नहीं मानते । किसीको
,

उन्नीसवाँ परिच्छेद १२७ सर्दी नहीं होती और पृथ्वीसे अन्न नहीं होता है, वैसे ही आपका यह कहना है कि वीरोंने कभी कोई दुस्साहसिक कर्म नही किया । किंतु इतिहास इन बातोंसे भरे हुए हैं। इसके बाद किंज्योतिने बड़े बडे महाकाव्योंके वीरों और इंगलैंड, फ्रास, जरमनीके प्रसिद्ध प्रसिद्ध शूर महाराजोंका वर्णन कर व्यवस्थापकको आश्चर्य चकित कर दिया। वह उसकी जानकारी देखकर दॉतो उँगलो काट रह गया । किंज्योतिने उपन्यासों और इतिहासोके वीरोकी खिचडी पका डाली,तो वह और भी घबराया। किज्योतिकी बातोंमें सत्याश है, यह व्यवस्थापकको भी मानना पड़ा। किंज्योति फिर कहने लगा-"मैं अपने बारेमे कहता हूँ, जबसे मैं बहादुर सवार हुआ, तबसे मैं साहसी, उदार, सुशि- तित, विनम्र, सुशील, वीर, निर्भय, सतोषी और सहनशील हो गया हूँ। कैद और आफतोंकी परवा नहीं है। इसके सिवा मुझे अव भी सम्राट् हो जानेको आशा है । सम्राट् हुए विना कृतज्ञता प्रकट न कर सकूँगा । मैं सच कहता हूँ, दरिद्र चाहे कितना भी उदार क्यो न हो उदारता नहीं दिखा सकता है। इसलिये मैं सम्राट बनना चाहता हूँ। फिर मैं मजेमें अपने मित्रोंका, विशेषकर सनकूका, हित कर सकूँगा। यह विचारा वडा ही ईमानदार है। मैं इसे रावराजा बनाया चाहता हूँ। मैं इस घातकी है १२८ विचित्र वीर प्रतिज्ञा कर चुका हूँ। पर इसे शासन करनेकी योग्यता नहीं है।" सन अपने मालिकका अतिम वाक्य सुन बोला उठा- "आप किसी तरह मुझे रावराजा बना दे, फिर योग्यताका अभाव न होगा। मान लीजिये, मुझमें योग्यता नहीं है, पर ऐसे आदमी भी तो हैं, जिन्हें राज्यका इजारा दे दिया जाता है, और वह राजाको सालाना कुछ दे देते हैं। और राज्यका सब भार अपने ऊपर ले लेते हैं। राजा मजेमे पैर फैलाकर सोता और जो कुछ सालमे पाता उससे मौज उडाता, पर सिर नही थकाता है । मै भी यही करूँगा । सालाना लगान पा रईसकी तरह मजा उडाऊँगा और दुनियाको जरा भी परवा न करूँगा।" व्यवस्थापक-सनकू भैया । यह तो लगानका मजा हुआ पर राजाओंको न्याय शासन भी स्वय ही देसना पडता है। इसके लिये बडी समझ और विशेषकर सदिच्छाकी, आव- श्यकता होती है । यदि भारभमें ही इनका अभाव हुआ, तो बस श्रत भी सदा त्रुटिपूर्ण ही होगा। सनकू-मैं आपका सिद्धात नहीं समझता । मैं तो बस राजा होना चाहता हूँ। इसलिये जो पसद आता है, वही करता हूँ और करूँगा । और कुछ नहीं जानता, जो चाहता हूँ वह होना । -

उन्नीसवौं परिच्छेद
१२९
चाहिये । बस उतने सेही मैं सतुष्ट हो जाऊँगा। सतुष्ट होजाने पर
फिर कोई चाह नहीं रहती। जब चाह न रही तो बस उसका
अत हो गया।
व्यवस्थापक-कोई सिद्वात बुरा नहीं है, सनकू | परतु
राज्यके सवधमें और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है ।
इतनेमें साना तैयार हो गया। बस बातचीत भी बद होगयी।
व्यवस्थापक पर सनकूकी सरलताका जितना प्रभाव पडा
उतना ही किंज्योतिके पागलपनका भी पडा।
भोजन और विश्रामके बाद व्यवस्थापकने अपनी राह ली
और किज्योतिने भी पिजरे में फिर प्रवेश कियो । बस फिर
गाडी भी चल पडी।
छठे दिन सब लोगोंने दोपहरके समय किज्योतिके प्राममे
प्रवेश किया। उस दिन रविवार था। इसलिये ठलुआपथी
बाजार में इधर उधर सडे थे। उनके ही वीचसे उसकी गाडी
निकली । तमाशाइयों की भीड़ लग गयी । किंज्योतिको विचित्र
अवस्थामे देख, सब हैरान थे। एक लौंडा किंज्योतिकी भतीजी-
को खबर देने चेतहाशा दौड गया । घर पर कुहराम मच
गया । इतने में गाडी भी आ पहुंची।
किज्योतिकी अवाई सुन सनकूकी स्त्री भी आ धमकी ।
उसे मालूम था कि वह किज्योतिके साथ गया है । उसने
।

१३० विचित्र वीर सनकूको देखते ही पूछा-"कहो गधा तो मजे में है न ?" सनकू बोला-"वह मुझसे भी अच्छा है।" सनकूकी स्त्रीभगवान की कृपा है, जो वह अच्छा है। पर यह तो बताओ मुसाहबी में क्या क्या पाया ? मेरे लिये कैसी चोली लाये ? यद्योंके लिये कैसे जूते लाये ? सनक-मेरी प्यारी । यह सब तो कुछ नहीं लाया । हाँ इनमे बढ़कर चीजें लाया हूँ। स्त्री-तो दिसा दो । मैं तुम्हारे विना बडी दुखी हो रही थी । दिसा दो तो सुश हो जाऊँगी। सनकू-अभी ठहरो । घर पर दिसाऊँगा । मैं जल्दी ही दूसरे सफर में जानेवाला हूँ। अगर गया, तो टापूका राजा होकर आऊँगा। ऐसे वैसे टापूका नहीं बड़े भारी टापूका । थोड़े ही दिनों में तुम्हे लोग हुजूर और सरकार कहेगे। स्त्री-प्यारे । हुजूर, सरकार, टापूका क्या मतलब है । सनक- -मेरी प्यारी । थाडे ही दिनोंमे सबका मतलब आप ही समझ जाओगी । मैं सच कहता हूँ। ईमानदारोके लिये बहादुरोंकी मुंसाहबीसे बढकर कुछ नही है । यह सच है कि कुछ ऐसी मुहीमें हैं, जो मनके मुसाफिक नहीं होती। सौ में निन्नानवे अच्छे कैंडे नही उतरतीं। यह मैं तजर्वे से जानता हूँ । फभी कम्मल पर उछाला गया। कभी डडे खाये ।

उन्नीसवाँ परिच्छेद
१३१
.
तो भी उसकी आशा धनी ही है। बडा आनद है। कभी
पहाडोको लाँपना, फभी जगलो की साक छानना, फभी
चट्टानोंपर चलना, कभी किलो को जाँचना, कभी सरायों में
दाम दिये विना मन आवे सो करना ।
इधर सनकू दोनों प्राणी वातें कर रहे थे, उधर भतीजी और
गृहरतिका ने किंज्योतिका स्वागत कर कपडे उतारे और उसके
पुराने कमरेमें उसे लिटा दिया। वह तिरछी नजर से उन्हें
देसता, पर वोलता कुछ नही। उसकी समझमें न आता था
कि मैं कहाँ हूँ और यह दोनों कौन हैं ।
पादडीने भतीजी से कहा-"सावधान रहना। देखना
फिर न निकल जाय । न मालूम किस कठिनाई से अवके फँसा
लाया हूँ।"
हम भी अब किंज्योतिको यहीं छोड देते हैं।
इति ।

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Vichitra Veer

Author
Chaturvedi,jaganath Prasad
Title
Vichitra Veer
File name
Vichitra Veer
Text
OCR done
Citation
1915
Published
2011/01
Publisher
Ganga Pushtak Mala Karyalaya Lucknow
Language
Sanskrit
Pages
139
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546602
Barcode
4990010025061.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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