Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Shri Gyan Prakash
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श्री:
ज्ञान-प्रकाश
अर्थात्
जीवराज का मुक्ति साधन
चन्दरलाल कुमावत व्यावर निवासी कृत
पं०
प्रहादराय
शर्मा
च्यावर निवासी ने
छपा कर ममाणित किया।
सत्यत्रत शर्मा द्वाग
शान्ति प्रेस, मोतोकटरा, आगरा में मुद्रित
प्रथमावृत्ति १०००] रामनरमी ११८० [ मूल्य ॥-)
मय हक स्वाधीन है।
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भूमिका महानुभाव सज्जनों से मेरा प्रथम नमस्कार। मेरा प्रथम समर्पण आपके करकमलो में है। क्या आप मेरी धृष्टता क्षमा करेंगे? हां ! मुझे पूर्ण आशा है अवश्य क्षमा करेंगे। आज का समर्पण एक मारवाड़ी ख्याल है । ज्ञान प्रकाश के लिए ज्ञान प्रकाश है। इसका पूर्व परिचय इस प्रकार है कि चरित्र तो सम्पूर्ण मन विरचित है परन्तु जहां तक हो सका है अश्लील (बुरे ) वाक्यों की भर- मार छोड़ दी है। अच्छे तथा चरित्र शुद्ध पात्रों के लिये विशेष स्थान है। मैं विशेष न कह कर इतना ही उचित समझता सम्पूर्ण पुस्तक ज्ञान से परिपूरित है। इस पुस्तक में पं० प्रहलादराय जी शर्मा ने सब प्रकार सहायता दी है अतएव मैं इन का कृतज्ञ हूँ। शुभम् । आपका कृपाभिलाषी- चन्दरलाल कुमावत लेखक।
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श्रीगणेशायनेम ।
।
(सपूताn)
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।
ज्ञान प्रकाश
.
14
प्रथम भाग।
.
ख्याल।
स्तुनि गणेश जी की । टेर।
अजी मनाऊँ गणपति श्री गनराज,
सभापति रखो हमारी लाज । दो० । गणपति
जी गोरी के नन्दन, शिव शंकर के लाल ।
मस्तक ऊपर छत्र विराजे, कानन कुण्डल
भाल ॥ अजी मनाऊँ० ॥ १॥ हाथ जोड़
विनती करूं सजी, कृपा करो गनराज ।
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,
रणत भंवर से आओ घूमता, रिध सिध के
सरताज ॥ अजी मनाऊँ० ॥ २॥ मूल मैल
मंजन करे सजी, प्रसन्न होय गनराज । जो
नित मांजे मूल को सजी, होय सिद्ध सव
काज ॥ अजी मनाऊँ०॥ ३॥ शारद! शीश
नमाऊँ तुमको, कण्ठ कमल शुद्ध कीजो।
परा, पसन्ती, मधू बेकरी, ताको भेद मोय
दीजो॥अजी मनाऊँ०॥४॥ सत् गुरु स्वामी
अंतरयामी, देओ ज्ञान भरपूर । शरण पड़यो
प्रभु आपकी सजी करो कुमति न दूर ॥ अजी
मनाऊँ० ॥ ५॥ मात-पिता-और- सत्यसभा
के, चरणों शीश-नमाऊँ । सब ही कृपा करो
सम ऊपर, ख्याल-जान को गाऊँ ॥ अजी
मनाऊँ०-॥ ६ ॥-द्विपञ्चा-शत्-भैरव-सिमरूँ,
चौसठ, योगिनी मात । शनी देव, हनुमान
मनाऊँ, करो मुझे गुण ज्ञात ॥अजी मनाऊँ
॥ ७॥ हमीर-रामजी गुरू हमारेहमको ज्ञान
[३] बताया। करो सुमंगल दंगल अंदर, मैंने तो शीश झुकाया ॥ अज़ी मनाऊँ०॥ ८॥ चन्द्र- लाल की विनती सजी, सुनज्योजी गनराज। मन इच्छा पूरण करो सजी, रखो सभा मे लाज ॥ अजी मनाऊँगणपति श्री गनराज । सभापति रखा हमारी लाज॥९॥ शेर-जीव राजा का। समरूं प्रथम गुरु,चरण रज मुकट मणि ज्यों धार हूँ। करो भवसिन्धु से पार वेड़ा मैं शरण आधार हूँ॥ तुम गुरु दीनदयाल जग में सृष्टि के करतार हो । अजी दास तारण कारणें लीनों मनुज अवतार हो ॥ गुरु विन ज्ञान न पावहि नर जैसे पशू समान हो । पूंछ विन पशुतुल्य है विलकुल, निपट अज्ञान हो ॥ वृथा जीवन जगत् में जिन भज्यो न ईश्वर नाम हो।सुन्दर तन को पाय के कियो [४] सुकृत काम हो । मेरा गुरु जी "राम" के मैं करूँ चरण प्रणाम हो । कहे चन्द्रलाल, देदो दास नै निज ज्ञान हो ॥ १० ॥ . , जीवराजा की रतुति शारदा के प्रति । टेर । शारद ! सुख संपति वाणी दीजिये जी सुण अर्जी हमारी ॥ दोहा०॥ सरस्वती समरूँ शारदा स में धर-चरणन में ध्यान । सरस्वती और गुरु देव सनाऊँ यदा ऊपजे ज्ञान ॥ (झेला) ॥ यदा ऊपजे ज्ञान ध्यान उर में धरूँ। वेड़ा कीजो पार चित्त चरणो धरूँ॥ सुण अर्जी हमारी० ॥ १॥ हे दुर्गे तु आदि भवानी कर घट में उजियाला। अन्धकार को मेट भवानी खोल ज्ञान का [५] लायके । आओ संभा के बीच जी हंस सजाय के ॥ सुण०॥२॥ माता तेरा आसरा सजी, पूर मनोरथ काम। चार कोण के मायने देवी छायो तेरो नाम ॥ (झेला) छायो तेरो नाम कला भरपूर है । निकसी वीच पताल पुजायो चीर है ।। सुण ॥३॥ दुर्गाथाने करूँ विनती मेरी अरज चितलाय । बुद्धि सवायी देवो भवानी कण्ठ शुद्ध कर आय ॥ (झेला) कण्ठ शुद्ध कर आय वालको जानके । कयूँ ज्ञान को ख्याल सभा में गायके ॥ सुण०॥४॥ बलिहारी गुरु देव की सजी में उनका गुण गाऊँादया करो हमीर जीस में नयो तमाशो गाऊँ ॥ (झेला) नयो तमाशो गाऊँ व्यावर इस शहर में । कथ कहे जी चन्द्रलाल गुरु की महर में ॥ सुण अर्जी हमारी ॥५॥१५॥ ।
वार्ता संसार में स्त्रियों के तुल्य सुख 'का साधन नहीं, साथ ही दुःख का भण्डार भी है। सुख तो किसी २ को मिलता है, किन्तु दुःख तो सब के साथ वांह प्रसार कर अवश्य मिलता ही है। ऐसे ही हमारे चरित-नायक जीवराज को दुष्टा स्त्री कुमति के साथ संबंध हो जाने पर अत्यन्त कष्ट उठाने पड़ते हैं। अन्त में दुःखी होकर पश्चात्ताप करते हैं ॥१६॥ जीवराज की त टेर । आया मैं कायागढ़ का राजा जी जीवराज मेरा नाम ॥ दोलख चौरासी मायनै सजी पूरण कष्ट अपार । सब योनी मे जीव सिरै हे नरतन को अवतार ॥ कोई चूक पडी मस माहीं मिलगी कुमता नार । आया'मैंः ॥ १॥ ऐसा सुन्दर तन को पाके
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भज्यो न ईश्वर नाम । वृथा जीवन जगत् में
स जिन कियो न सुकुत कोम ॥ कुमंता नार
पडी मेरे पानै लियो न मुख से राम ॥ आया
में २॥ अव तो दुखी कियो अति भारी
या, जो कुमता, नार । मनुज डाव यो चूकस्यूं
स-फिर-मिलसी नरक द्वार-॥ ऐसा कोई मिले
जी मुझको देवे कुमत निकार ॥ आया
ने०
॥३॥ काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह मुझे कर
दीनो अज्ञान । कुमता राणी परणी जद से
रह्यो न मुझ में ज्ञान ॥ आशा, तृष्णा मुझे
संतावे रखे कुमत को मान ॥ आया मैं०
॥४॥ लोभी, लुच्चा मिले बहुत सा वार २
उलझावे, । उलझा न साचों सुलझावे ऐसा
सत् गुरु पावे ॥ नाव पड़ी मझधार भंवर में
सर्च खेवटियो चावे ॥ आया मै० ॥ ५॥ हो
जी आप दयालू दाता कीजो मो पर महेर ।
मेरा अवगुण माफ करो सव मती लगाओ
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. - [:] देर ॥ चन्द्रलाल कुमावत कहता होसी-सत से खैर । आया मैं० ॥ ६ ॥ २४ ॥ संतोष,का शेर। मैं संतोषी पुरुष हूँ धरूँ ज्ञान को ध्यान जी । ज्ञान मेरो जगत् में पूरण वधायो मान जी ॥ साधू है असली सन्त मुझकों वह लियो पहचान जी । विषय रूपी भोग तज कीयो है अमृत पान जी ॥ २५ ॥ संतोप को। टेर ।, आया संतोष पुरुष सत्यवादी, जी नहीं विकार नहीं हां वादी दो०॥ शील नगर है धाम हमारा कायागढ़ में आया । दया धर्म को देख यहां पर मेरा जीव ललं- चाया ॥ आया संतोष०॥ १॥ दोय मित्र तो मिले हमारे करूँ और की खोज । क्षमा और मिल जाय यहां पर बने वहुतसी मोज । - 7 an [] आया संतोष० ॥ २॥ धीरज को हेरण चलू सजी इस नगरी के मांय । ज्ञान गुरु मिल जाय यहां पर होय सर्व की सहाय ॥ आया संतोष० ॥ ३॥ ज्ञान गुरु मिल गया हमारा होय सिद्ध संव काम । भाव भगत को बेग बुलाया चला आपणे धाम ॥ आया संतोष ॥ ४॥ जो कोई गिरियो अन्धकूप मे वांनै वाहर लावां। कोम हमारो यो ही कहिये जीव राज चेतावां ।। आया संतोष० ॥ ५ ॥ जीव- राज नगरी को राजा उसे चेतावां चाला। सुमता को परणाय के सजी कारज सिद्ध कर चालां ॥ आया स०॥६॥३१॥ + 'ज्ञान | शेर ।। ध्यान से सन्तोष सुन, कर सन्त का तू भेप भी ॥ कायागढ़ फेरी देवो जाकर करो उपदेश भी ॥ जीवराज घबरा रह्यो कुमता को - . [-] देर ॥ चन्द्रलाल कुमावत कहता होसी सत से खैर । आया. मैं० ॥ ६ ॥२४॥r; संतोप का शेर। मैं संतोषी पुरुष हूँ धरूँ ज्ञान को ध्यान जी । ज्ञान मेरों जगत् में पूरण वधायो मान जी ॥ साधू है असली सन्तं मुझको वह लियो पहचान जी । विषय रूपी भोग तज कीयो है अमृत पान जी ॥ २५ ॥ स संतोप की। टेर ।, आया संतोष पुरुष सत्यवादी, जी नही विकार नहीं हां वादी दो॥ शील नगर है धाम हमारा कायोगढ़ में आया । दया धर्म को देख यहां पर मेरा जीव लल- चाया ॥ आया संतोष०॥ १ ॥ दोय मित्र तो मिले हमारे करूँ और की खोज । क्षमा और मिल जाय यहां पर बने बहुतसी मोज ॥ १ आया संतोष० ॥२॥ धीरज को हेरण चलूं सजी इस नगरी के मांय । ज्ञान गुरु मिल जाय यहां पर होय सर्व की सहाय ॥ आया संतोष० ।। ३ ।। ज्ञान गुरु मिल गया हमारा होय सिद्ध सव काम । भाव भगत को वेग बुलाया चलां आपणे धाम ॥ आया संतोष० ॥ ४ ॥ जो कोई गिरियो अन्धकूप मे पाने वाहर लावां। कोम हमारो यो ही कहिये जीव राज चेतावां ॥ आया संतोष० ॥ ५ ॥ जीव- राज नगरी को राजा उसे चेतावां चाला। सुमता को परणाय के सजी कारज सिद्ध कर चाला॥ आया स०॥६॥३१॥ . ज्ञान । शेर । ध्यान से सन्तोष सुन, कर सन्त का तू भेष भी ॥, कायागढ़ फेरी देवो जाकर करो उपदेश भी ॥ जीवराज घबरा रह्यो कुमता को ।
[ १० ] राज विशष भी ॥ राज को समझायः कर सुमता करो प्रवेश भी ।। ३२ ॥ - ...संतोप। शेर। आज्ञा धरी गुरु शीश मैं धारूँ सन्त का जो भेष जी ॥ मोह वश अज्ञान को जाकर करूँ उपदेश जी ॥ दया धर्म और नेम संग मुमत करूं प्रवेश जी । कुमता औः तृष्णा; लोभ, मद इनका छुड़ाऊँ देश जी ॥ ३३ ॥ वाती संतोष के गुरु ज्ञान की आज्ञा मान, साधु का भेष धारण कर और कायागढ़ नगर में फेरी देते हुए गाना.॥ ३४ ॥ - Tr साधु। टेर । आया मैं सन्त बड़ा सन्तोषी जी कोई मिले हमारा देशी ॥ दो० ॥ अमर शहर . [११] हे ग्राम हमारा कायागढ़ में आया।फेरी देवी बहुत देर से नहीं दयालु पाया आया मैं ॥१॥ चारों तरफ मै फिरा नगर के देशी नजर नही आया । कायागढ़ के सिंह द्वार पर क्रोधी द्वारी पाया ॥ आया मैं० ॥ २३६ ।। मोधी टेर । हां २ म्है क्रोधी सेवक थारा जी कांई कहो वाचा जी म्हारा ।। - , साधु। टेर । क्रोधी । जीवराज पर जावीरें मिलकर पाछा आवां ॥ क्रोधी-दो । काम क्रोध, मद, लोभ, मोह सब साधु के विंग आया । कॉई आपके काम वावा जी म्हाने नही फरमाया ॥ हां २ म्हें क्रोधी० ॥ १ ॥ साधु-दो० ।, काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से मेरे कुछ नहीं काम । जीवराज राजा ' - A- . [..] राज विशेष भी ॥ राज को समझाय क सुमता करो प्रवेश भी ॥३२॥ संतोप। शेर । आज्ञा धरी ,गुरु शीश मैं धाः सन्त क जो भेष जी ॥ मोह वश अज्ञान को जाक करूँ उपदेश जी ॥ दया धर्म और नेम संग सुमत करुं प्रवेश जी, । कुसता औ तृष्णा लोभ, मद इनका, छुड़ाऊँ देश जी ॥ ३३ वाती संताप के गुरु ज्ञान की आज्ञा मान साधु का भेष धारण कर और कायागढ़ नग में फेरी देते हुए गाना ॥ ३४ ॥ - A साधु। टेर । आया मैं सन्त बड़ा सन्तोषी १ ] हैग्राम हमारा कायागढ़े में आया । फेरी देवां बहुत देर से नही दयाल पाया आया मैं ॥१॥ चारों तरफ मै 'फिरा नगर के देशी, नजर नहीं आया ।कायागढ़ के सिंह द्वार पर क्रोधी द्वारी पाया । आया मैं० ।। २३६ ।। क्रोधी टेर । हां २ म्हें क्रोधी सेवक थारा जी कांई कहो वाबा जी म्हारा - साधु टेर। क्रोधी । जीवराज पर जावा रे मिलकर पाया आवां ॥ क्रोधी-दो। काम क्रोध, मद, लोभ, मोह सव साधु के लिंग आया। कॉई आपके काम वावा जी म्हांनै नहीं फरमाया ॥ हां २ म्हें क्रोधी० ॥१॥ साधु-दो० । काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से मेरे कुछ नहीं काम । जीवराज राजा
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[ १६ ]
साधु की जीवराज से।
टेर। राजा नहीं सजै लो ज्ञान वो सुमता
चित धारो।
जी०-दो शरणो लीनो आपको स्वामी
कर भवसागर पार । नाव पड़ी मझधार भंवर
में कर खेवटियो तैयार । काम, क्रोध, मद,
लोभ, मोह मुझे छोड़ दियो मझधार ॥ गुरुज्ञान
वताओ० ॥१॥
सा०-ज्ञान ध्यान तेरे से बच्चा नहीं पड़ेलो
पार। सुमता न तू व्याह ले स याहै सारां की
सार ॥ कुमता नै छिटकाय केस तुम करो
सुमता से प्यार ।। सुमता चित धारो० ||२||
जी०-सुमता को स्थान कोन मैं जाणू
नहीं दयाल | आशा तृष्णा आय के मुझे फसा
दियो भव जाल । सुमता न वखसीस दो गुरु
मेटो जीवजंजाल ॥ गुरु ज्ञान वताओ ॥३॥
सा० सुमता नै में वंगस द. स थे रख ज्यों इण को मान । अष्ट प्रहर चोसट घटी स थे पूरण धरज्या ध्यान ॥ आओ सुमता वक्षु थानै हुकमे दियो गुरुज्ञान ॥ सुमता चित'धारो० ॥४॥५३॥ वाती। साधु०-हे राजा मैंने गुरू ज्ञान का हुकुम मान, ये सुमता स्त्री तुझे दी। शव तेरा धर्म यह है कि किसी बुद्धिमान् पंडित को बुलवा कर, इस के साथ वेद की विधि से विवाह करले। इसी काम से तेरा कल्याण होगा ॥ ५४॥ जीवराज-गुरू जी महाराज | जो कुछ आपने हुकुम दिया है सारा काम उसी तरह हो जायगा ॥५५॥ । २ [ १८ ] -- साधु-(स्वयमेव) संसार' की गति बड़ी विचित्र है। बुरे मार्ग से हटाने. वाले को अपना शत्रु समझते हैं । कुमति के वश में पड़े हुए इस जीवराज को मेरा ज्ञान देना कितना बुरा लगा कि, गोला मारने के लिए तैयार हुआ। परन्तु स्त्री के दिखाते ही चरणों में लोटने लगी। इसके लिए लोटना तो ठीक ही है, क्योंकि यह सुमति है,।, परंतु ये मूर्ख; इसके गुण को, क्या जाने, इसे. तो रूप प्यारा है। बहुत से लोग कुलक्षणी-स्त्री के वशीभूत हो जीवन को विगाड़ देते हैं। भाइयो ! समझदारों को तो इतना ही बहुत है। (अन्तर्धान) ॥ ५६ ॥ जीवराज की.जोशी से। :टेर। फेरा करवायो, सुमता नार से -- - - जोशी जी म्हारा॥
क । -- , जोशी की जीवराज से टेर । फेरा करवायें। सुमंता नार संग मुनिराज वगसग्या । जीव०-दो। फेरा करावो नार संग थे मती लगाओ बार । भाग पूरवला - उदय हुया कोई मिल गई सुमता नार ॥ जोशी जी म्हारा ॥१॥ जो०-दो० । फेरा कराऊँ' नार संग कर तोरण-थम्भ तेयार । नेकी धीरज सखियां ल्यावो गावे मंगलाचार ॥ मुनिराज वग; सग्या ॥२॥ जी०-जोशी जी बुद्धि के सागर देखों लंगन शुभ आज । जल्दी फेरा देद्यो जोशी होया सुमता को राज॥ जोशी जी म्हारा ॥३॥ जो०-शुभ घड़ी शुभ लगन आजको आनन्द मंगलचार । आओ जी चालो फेरा mi [ २० ] में मति लगाओ वार ॥ मुनि राज वग- सग्या॥४॥६०॥ S सखियों का गाना A '- (राग जलामारू) टेर । अजी मैं तो थांको बंगलो निर- खण आई जी म्हारी जोड़ी का जिवराज ॥ इस वंगला नै विधना अजव वनायो जी म्हारी जोड़ी का जिवराज । पांच पचीस त्रिगुण संग मिलाया जी म्हारी जोड़ी का जिवराज ॥ में तो थारो बंगलो० ॥१॥ देखी यक इस वंगला की चतुराई जी म्हारी जोड़ी का जिवराज । नीव नहीं है अधर संही ठह- रायों-जी ० ० ॥ में तो थारो० ॥ २॥ इस वंगला के दश दरवाजा दीशे.जी म्हारी जोडी ००००० । तीन अटारी गुप्त सही अतिभारी जी म्हारी जोड़ी ००००० . . . ००० [१] मैं तो थारो० ॥३॥ इस वंगला के पचरंग रंग लगाया जी म्हारी जोडी का जिवराज । नो मासं गर्भ में ताव लगार पकायो जी म्हारी जोडी का जिवंगज । मैं तो थारो० ॥४॥ दर्श इन्द्रियां में पांच इन्द्रिय गुणज्ञानी जी म्हारी जोड़ी का जिवराज । पांच रही सो कर्म इन्द्रिय कहावे जी म्हारी जोड़ी का जिवराज ॥ मैं तो थारो०॥५॥ इस वंगला में अजब वाग लगवायो जी म्हारी जोडी का जिवराज । शाखा साड़ा तीन करोड फलाई जी म्हारी जोडी का जिवराज ॥ मैं तो थारो ॥६॥ अमृत रूपी होद अमी जल 'भरियो जी म्हारी जोडी का जिवराज। सतवादी होय पुरुष बगीचो पायो जी म्हारी जोडी का जि- वराज-। मैं तो थारो० ॥७॥ चेतन माली चो- कस जल फैलायो जी म्हारी जाडी का जिव- राज । सांच पाणतियो फिर २ फेल पायो जी [ २२ म्हारी जोडी का जिवराज ॥ मैं तो.थारो॥८॥ इस बंगला में जीवराज महाराज विराज्या जी म्हारी जोडी का जिवराज । बंगला मांय दया धर्म से रीजो जी म्हारी जोडी का जिवराज ॥ मैं तो थारो० ॥६॥ इस बंगला नै ईश्वर खूब सजायो जी म्हारी जोडी का जिवराज। नेकी धीरज सुमता रै मन भायो जी म्हारी जोडी का-जिवराज ॥ मैं तो थारो० की महिमा वर्णि न जावे जी म्हारी जोडी का जिवराज । चन्द्र मजलिस अन्दर ज्ञान बतायो जी म्हारी जोडी का जिवराज ॥मै तो, थारो० ॥११॥७१ ॥ फिर सखियों का गाना ॥१०॥ इस वंगला . राग-कामण-1 अ देर । तोरण आयो ये रायजादो सखियां चाल २ए । कामण करस्यां ये सहेल्योजल्दी चाल-२.ए.॥
। २३ ] . कामण करस्या जल्दी चालवाने देस्यां सुमता लाल । प्रीतम माल “२ ,ए। तोरण आयो० ॥१॥ तोरण आयो है जिवराजाचालो करस्या पूरण काज । जादू डार २ ए ॥ तोरण आयो० ॥२॥ झिलमिल करां आरतो चाल । वह छः आदि पुरुष का लाल । भरम्यां वार २ ए॥ तोरण आयो० ॥३॥ तोरण दीनो लाड़ो मार । आसी खूब व्याह की भार। जनेती सार २ ए| तोरण आयो० ॥ आया मंडप दरम्यान । धरियों चवरी 'हन्दो ध्यान । सुमता चाल २ ए॥ तोरण आयो०॥५॥७॥ के - सुमता। शेर । सुमरूं में देवी शारदा कर महर मुझ पर आय जी । राखो सभा में लाज सारों काज मोटी माय जी ॥ चार खूट नौ खण्ड में महिमा तेरी भरपूर जी।ज्योति अटल शिर । [२४ ] छत्र है अर्जी करो मञ्जूर जी ॥ करुणाः करूँ चरणां पडू मेरी तरफ चित धार जी। दंगल में मंगल आन कर बेड़ा लगावो पार जी.॥ शक्ति भगत यक दास तेरा जोड़ता है हाथ जी । चन्द्र को चाकर जाण के 'कृपा करो तुम मात जी॥ ७७॥ ,सुमता की सखियों से। राग-हूलरिया । टेर । चालो २ ये सहेलियो ! प्रीतम फेरी आयो छ ॥ चोक । म्हानै हुक्म दियो गुरु ज्ञान । म्हारो संतोष वधायो मान । अव है जीव राज से काम । जाता लाज ही आव छ ॥ चालो २ ये० ॥१॥ नेकी होजा म्हारी लार । करस्या जीवराज की सार । आपां सव मिल करस्या प्यार धीरज | क्यू वार लगावे छ । चालो २. ये० ॥२॥ क्षमा तू कीजो म्हारी सहाय । म्हारे वाप नहीं कोई माय । - [ २५ ] तू तो वन जा म्हारी ,धार्य । जोशी 'वेग बुलावे छ ॥, चालो २ ये० ॥ ३ ॥ अव मैं सजू सोला शृंगार । वस्त्र शील रूप ल्यूं धार। करस्यूं जीवराज से प्यार। म्हां से प्रेम लगावे छ । चालो २ ये०॥ ४॥ होगी पहर ओढ़ तैयार । गहनो मुक्ति रूपी धार । लेस्यूं काम क्रोध न मार । जीव जंजाल छुडावे छ॥ चालो २ ये० ॥५॥ सुमती संग लियो परिवार। कोडयो भाव भगत को तार। आगे हथलेवा की बहार । फेरा प्रेम फिरावे छ । चालो २ ये ॥६॥ फेरा फिरिया सत् का सात । अव कर जोडूं दोनों हाथ-। थे तो हो गया म्हारा नाथ । चन्द्र । समझावे । चालो २ ये० ॥ ७॥ ८४ ॥ वाती। पाठकों को यह शंका अवश्य होगी कि राजा होने पर भी. विवाह में इतनी शीघ्रता 1 [२६] क्यों की । इसके लिए हम यों लिखते हैं कि जीवराज को कुमता के पिता. मोह का बड़ा भय था, यदि उसे मालूम हो जाती, तो विवाह नहीं होने देता। विवाह हो जाने के पीछे अपने कुल की रीति के अनुसार सव काम कर लिया। अब सखियां जीवराज से पहेलियों का अर्थ पूंछती हैं ॥८५॥ सखियों की जीवराज से। टेर। प्यारा जीवराज जी म्हारी-फाली को अर्थ बताय। जीवराज की सखियों से। d t, । , - टैर। सती अति सुन्दरी थान देस्यां अर्थ वताय ॥ सखि०-प्र०-(चोक) पांच चीज निज सार है जिव जी सव जग है आधार ) नित उठ [ २७ ] नेत का चावती जी थे तो शायर करोजी वेचार ॥ प्यारा जीवराज०॥१॥ जी०-(उ०) पांच तत्व ततसार है यारी सुन ज्यो चित्त लगाय। पृथ्वी, जल, पग्नि, भयों प्यारी पवन आकाशा रै मायः ।। तती अति० ॥२॥ , - Aara सखि०-(प्र०). तीन गुण परवाण जैव जी गावे वेद पुराण । नाम स्वभाव तावसी कोई चात्रक चतुर सुजान ॥ प्यारा जीवराज० ॥३॥ जीव०-(उ०) रजोगुण ब्रह्मा हुया जी विष्णु सतोगुण जाण । तमोगुण शंकर हुया न्यारी लीजो आय पिछाण ॥ संती अति० ॥४॥ सखि०-(प्र०) मूल एक फल दोय है जिव जी इण रो करो जी विचार। रचना " १ ॥ म [ २ ] उनसे रच रही जिव जी सारे ही संसार प्यारा जीवराज०॥५॥ जीव०-(उ०) मूल एक फल दोय प्यारी जिसका करूँ मैं वयान | माया ब्रह्मा दोनों हुया प्यारी मूल परमेश्वर जाण ॥ सती अति० ॥६॥ सखि०-(प्र०) सब रंग तो जल से हुआ जिव जी जाणत है सब कोय । जिण रंग से, वो जल हुया जिव जी वो रंग कैसा होय ॥ प्यारा जीवराज ॥७॥ जीव-(उ.) अग्नि से उत्पन्न हुया प्यारी अग्नि में होलीन । जल का वीज़ तो तेज है प्यारी होय 'उसी से उत्पन्न सती अति ॥८॥ साखि०-(प्र०) कोन सुण्यो कुण निर- खियो जिव जी कुण है मिलावण हार'। जल्दी 4 an -- . " . -- [ २ ] अर्थ वतायद्यो जिव जी मती लगाओ वार ॥ प्यारा जीवराज ॥९॥ : जीव-श्रवण ,, सुणे, नेत्र निरखिया प्यारी प्रेम मिलावण हार। सुरत नुरत और प्रेम है प्यारी सुणजे सुन्दर नार ॥ सती अतिः ॥ १० ॥ सखि-(प्र.) चार पुरुष,सोला नार है जिव जी जिसका करो जी विचार। बाहिर मतना डोल ज्यो जिव, जी घट में करो -जी सुमार ।। प्यारा जीवराज ॥ ११ ॥ : जीव (उ०). चार पुरुष अंगूठा हुया अंगुली सोला नार। वाहिर तो मिलता नहीं प्यारी है इस तन' की, लार || सती अति०, ॥ १२॥ ९७॥" सखियों का गाना। टेर । पार थान करे- हो दे दी अमरा- पुरकी सार । : (चोक) कुमता-के संग मायने । : . ,
,
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जीथे तो पायो दुखे अपार । दया करी
गुरू ज्ञान ने जीथानै देदी सुमती नार ।। पार
थानः ॥ १॥ भरम थानः भरमाविया जी
कवरां लख चोरांसी माय । म्हारी सुमता
वाई न देखतां जी थाको भरम ही भाग्यो
जाय ॥ पार थान० ॥ २॥ भाव भोजन
त्यारी करी जी कंवरां कंवर कलेव चाल ।
सत्य जनेती संग ल्यो जी कंवरा तरुण वृद्ध
और बाल ॥ पार थान० ॥ ३ ॥ रुच २. भोजन
जीमल्यो जी थोकी दया करे मनवार ॥
जीवराज जी लाला जी थाने सखियां गावे
गाल "पार थान० ॥ ४॥ जीमजूंठ 'पूरण
भया जी'कवरो साख दिरास्यां आज | जावो'
थांकां ग्राम न जी थांपर रंगराला छां राज।।
पार थान०॥ ५ ॥ १०२] ...
1. वाता
",
जीवराज विवाह से निपट कर अपने
- . ३१] महल में जाते हैं। सखियों का सुमता को पहुंचाने जाना, तथा|गीत,गाना ॥ १०३ ।। .., सखियों का गाना।(रागनी); टेर । सुमता बाई सिध चाली ये आयो राजा जी को पूत लीनी वाई न जीत सुमता वाई सिध चालीये ॥ (चोक ) है मोत्यां मायली लाल । लीनी वाई न टाल सुमता वाई ॥१॥ कीनो चौरासी का काम ।वणग्या वाई रा श्याम ।। सुमता वाई० ॥ २॥ सुकृत कीजो काम । पुगाज्यो निज धाम सुमता वाई॥३॥१६॥ सुमता की जीवराज से टेर। चोपड़ खेलोनी:धणरासाहवा काया- गढ़ माहीं॥ जीवराज की सुमता से । : टेरचोपड़ में खेलूं सुमता आपसे निज सार खिलाज्यो । ॥ : - [ ३२ ] ir सुमता--(दोहा) चोपड़ खेलो , सायवा | कायागढ़ के मांय । पासा देऊ ज्ञान का सजी और सार कछुनायः । अंजी कायागढ़ माहीं ॥१॥ स F जीव-- (दोहा), पासा देओ ज्ञान का स जी कर भवसागर पार । आवागमन मेट. यो म्हारा लीजो निश्चय धार । निज सार खिला- ज्यो॥२॥ सुमता-म्हे धारी थे मान ज्यो स पिव सदा ज्यो राखो याद । थोड़ोसो जीनो दुनियां में छोड़ो वाद विवाद । अजी काया० ॥३॥ जीव थे सुन्दर सांची कही स में मानूं थाकी सीख । कुमता के संग मांय ने स मैं घर २ मांगी भीख । निजसार खिलाजो॥४, ~ , C । ३३ । सुमता-प्रीतम प्यारा नहीं रहांन्यारा है पूरवली प्रीतः । आओ हिल मिल चोपड़ खेलां. ल्यो' चोरासी ' जीतः ॥ अजी काया०॥ ५ ॥ १११ ॥ कुमता का तृष्णा से | शेर । तृष्णा तैयारी झट करोल्यो हुक्म मेरा मानारी। दीपक जले क्यूं रोशनी होती महल दरम्यान री ॥ ल्यावो खबर तुम जाय, के आवे मुझे इमान री । दीखे सुरंगी ढोलणी तड़फे है मेरा प्राणरी॥ आता शुभा कुछ पीव का दुसरीका' धरिया ध्यान री। जल्दी गमन कीजो महल तृष्णा करो पहचानरी ।। ११२॥ तृष्णा का कुमता से । शेर। , राखों सवर ल्याऊ खवर वाई-मैं जाऊं महल जी ढलती जो मांझल रात ना कोई साथ खाऊं दहल जी । राजाजोथारा सेज H ३ [ ३४ ] में है क्रोध, उनकी गैल जी, ताकत नहीं आकर वहां दुसरी करे को सैल जी ॥ श्रवण हारे पोल चौकीदार वहां रह्या टैल जी । तृष्णा तैयारी कर रही लीना हुकम तेरा झेल जी ॥ ११३॥ . "-47 -1 - . कुंमता तृषणा से टेर प्रीतम के महलों रंग कोचीनणो खवयाँ ल्या दासी। -तृष्णा की कुमता से टेर। अजी हुकम उठाऊँ वाई, आपको जल्दी मैं जाऊँ। कुमता--(दोहा) जल्दी जावो महल में से थे खंवर्या देवो, आय.। दखैि क्या को चानणूस म्हारा रंग महलां के मांय ॥-अये खवयाँ ल्या दासी ॥१॥; -
[ ३५ ]
... तृष्णा-मन में थे धीरज धरोस में
जाऊँली प्रभात । ढलती मांझल रात वाई
मैं जाऊँ किन के साथ ॥ अजी जल्दी मैं
जाऊँ ॥२॥
कु०-दिल धीरज म्हारो नहीं धरे -स
उठे
वदन में रीस । अये जल्दी खवर्या ल्यादे
दासी देॐ तनै वक्षीस ।। अये खवय० ॥३॥
तृ०-बार वार थे कहो.वाई जी हुकम
शीश धर लेस्यूं । दिन ऊग्या प्रभातं आप न
होसी जैसी कहस्यूं ॥ अजी जल्दी मै० ॥४॥
कु०-मेह वरसे बिजली खिवें स कोई
वोले
दादुर
मोर । पपैयो पिऊ २ करे स
म्हारे उठे बदन में शोर ॥ अये खवयाँ० ॥५॥
-तृ०-थे वाई जी 'वावला सजी क्याने
करता रोस । जाऊँ. खवर लगाऊँजल्दी मतनां
दीजो दोष ॥ अजी जल्दी० ॥६॥
३
कु०-दासी दोप देऊं नहीं थाने हे कों
के अनुसार । दीख्यो दासी चान" स म्हारे
हुयों कलेजे पार ॥ अये खवाँ ल्या० ॥७॥
तृ-कुमता चिन्ता मत करो स थे
राखो मन उमंग । जीवराज राजा से आपी
करस्यां रलिया रंग ॥ अजी जल्दी० ॥८॥
कु०-दासी देरी मत करे. स तू होजा
अब तैयार । घणो भरोसो थारो म्हांनै क्यूं
करती अवांर ॥ अये खवर्या ल्या दासी ॥९॥
तृ०-ए कुमता बाई जी थारी ड्योढी
देखी वन्द । ऐसो सपनो आयो वाई करम
होगया मन्द ॥ अजी जल्दी० ॥१०॥
. कु०-सपनों काई आयो दासी तिस को
भेद बताओ । सपना हन्दि बातां म्हानै धीर
समझाओ ॥ अये खवर्या ल्या दासी ॥११॥
[-३७ ] तृ०-सपना हन्दि बात वाई जी म्हां से कही न जाय । कॉई जाणूं कॉईं नावड़े स तू दे म्हारी खाल उड़ाय ॥ अज़ी जल्दी०॥१२ कु०-सभी गुना है माफ तुमारा कहो होय सो वात । नहीं चैन पड़े है जीव में कम्पत म्हारो गात। अये खवर्या ल्या०॥१३॥ तृ०-बड़ा घरां की वार्ड परणी ऊचां कुल की ऊँच.। आशा, तृष्णा,. काम क्रोध का डेरा होगया कूच ॥ अजी जल्दी० ॥१४॥ कु०-आशा, तृष्णा, दुवध्या, दुर्मत थे चारों मिल जाओ। जीवराज नै फ़सा, फन्द में म्हांसे आण मिलाओ ॥ अये खवयाँ ल्या दासी ॥ १५॥ तृ०-खवर्या लाणे कारण स म्हें होगी सब तैयार। क्रोध पुरुप पहरायत भेजो मंती लगाओ वार । अजी जल्दी में जाऊं ॥१६॥ . -
।
-
[ ३८ ]
कु०-क्रोध, पुरुष लारै लेवा को इतरो
काई काम । खवाँ लेकर जल्दी आओ में
करस्यूं इन्तजाम ॥अय खवाँ ल्या दासी ॥१७॥
तृ०-मैं जाऊं , खवर लेण न थे राखो
प्रतिपाल । रंग महल के मांय नै स, कोई
दीस है .जंजाल ॥ अजी जल्दी मैं जाऊं ॥१८॥
कु०-श्रवण सुण्यां 'नयन देख्यां विन
आवे नहीं ईमान । कह्यो सुण्यो माने मत
किसको चुगल बड़ा बेईमान ॥ अये खवायाँ
ल्या दासी ॥१९॥
तृ-होनहार सो होसी, वाई, जी
लिख्या पूर्वला लेख । क़ह्यो सुण्यो मानूं नहीं
किस को आऊं निजयाँ देख ॥ अजी-जल्दी
1
-
में जाऊं ॥२०॥१३३॥
.
1
वार्ता
"... तृष्णा
तृष्णा कुमता को इस तरह समझा
कर जीवराज के महल की तरफ गई । वहां
का सारा हाल देखकर वापिस लोट आई।
अब
जो हाल वहां-देखा था उसका वर्णन
कुमता,से करती है ॥ १३४.॥
। तृष्णा की कुमतो से 13;
टेर । प्रीत लगाई परनार ले । बाई
प्रीतम थारा।
ऋमता की तृष्णा से ।
टेर । राजन-तो साजन म्हारा हो रया
ये काई वोल वोलती।
" तृष्णा-प्रीत करी परनार संग वह
सुणज्यो चाईराज । श्रवण द्वारे सुणियां रंग
का बाजा-रया है वाज ना अजी वाई प्रतिम
थारा ॥ १ ॥
[ ४० ]
कुमता-श्रवण द्वारा की जो खिड़की
किण ने दीनी खोल -1, नयन, वैन और
नासिका स जहां पहरा देती -पोल । अये
काई वोल० ॥२॥
तृ०-पोल बोल वा है नहीं स बाई
चोकस चोकीदार । दस इन्द्रिय के द्वारे फिर
गई कोई न बूझी सार ॥ अजी वाई प्रीतम
थारा ॥ ३॥
कु०-ज्ञान इन्द्रिय द्वारे क्यूं जावे है
कर्म इन्द्रिय से काम | विषय रूपी वाने भोग
भुगावां राखों म्हारो श्याम । अये काईं
बोल. ॥४॥
तृ०-हे चाई सांची कहूँ-स थे म्हारी
विात ल्यो 'मांन । काम, क्रोध, मद, लोभ ने
‘स भेजो अपने धाम ॥ अजी वाई प्रतिम
ग
,
थारा ॥ ५ ॥
[४] कु०-आशा, तृष्णा, दुवध्या, दुर्मत सव । मिल चालो साथ । काम, क्रोध मद, लोभ ६ पधारो छुड़ादेओ वी को साथ । अय काई बोल॥६॥ 1- तृ०-एक, समय वाई वावो जी आयो हो सई शाम । आखी रात राज पर रहग्यो उणरा, करिया काम । अजी वाई प्रीतम थारा-1॥७॥ १४१ ॥ 11 -- वाती। कुमता वावा जी के आने की बात सुन कर अपने प्रधान मन से पूछती है । उसके पूछने पर मन का खबर करते हुए लोभी से वार्तालाप करना ॥ १४२ ।। मनका लोभी से। - - रेखता। टेर । लोभी तूं यो काई कीनो जोगी न आवण क्यूं दीनूं। . ; , 4 - A V ne । लोभी का मन से। टेर । जोगी एक जुगती से आय लोभी मैं लोभ में छायो।। '. मन-हाथां कर्या है काम नहीं है दो जो उन में । काया जो गढ़ का द्वार दीन खोल जो दिन में ॥ जल्दी गयो मुनिराज प्रसन्न होक्तो मन में । जाके कियो 'उपदे दी ज्ञान जो छिन में ॥ लोभी तू० ॥ १ ॥ लोभी-असली जो साधू सन्त घर डोलता नाहीं । दख्यिो वनावट भेष कुट पालने ताही ॥ छायो मैं मोह के मांय-जोर्ग देवशी कांई । मैं जो कह्यो मुनिराज जावे महल के मांहीं ॥ जोगी एक जुगती से० ॥ २ । मन-कैसे चलाऊं जोर सुमता संग में ल्याया । नीकी जो धीरजशील मुझको -रखून -- [ ४३ धमकाया ॥ क्षमा गम जो भाव जोशी वेग पण आया सुमता को करियो व्याह मैं तो क्रोध में छाया ॥ लोभी,तू.यो कांई०॥ ३॥ लोभी-चालो जी अव सवः संग जल्दी जीव ने घेरां । गेरां चोरासी, मांय फिरावां खूब जो फेरा ॥ तुम थे वहां प्रधान कुछ नहीं दोप है मेरा' । 'जोगी किया उपदेश चला नहीं जोरं क्या तेरा। जोगी एक जुगती ॥४॥ ।। मन-कुमता तूं सुण ले वात 'तेरा श्याम पे जाओ। उनसे करो तुम प्रेम उनको खूब विलमाओ सजल्यो सभी सिणगार सुन्दर नार वणजाओ । जाके करो तुम प्यार मदन- राज चेताओ। लोभी तू यो काई कीनो० ॥५॥१४७॥ 1 - .
4 - । 7 - [ ४४ ] कुमता की जीवराज,से। । ।.., । राग (मोहनी) रागनी। टेर । छोड़द्यो सुमता को तुम प्यार नार में हाजिर हूँ, दिलदार ॥ जीवराज की कुमता से। टेर । मिली मुझे आज नार निज सार होवस्यां भवसागर से पार ॥ कु०-( दोहा-चलत ) 'पिया मैं 'अर्धा, गिनी थारी, हुकम में हाजिर हूँ प्यारी । पिया मुझे कीनी क्यूं न्यारी,आपने या कांई दिल धारी ॥-पिया मुझे क्यूं छोड़ी-मझधार । नार में हाजिर हूँ दिलदार ॥ १ ॥ जी०-सुमंत नहीं छोडूं हे दिल जान, वधासी दुनियां में म्हारो मान । चली जा 1 [ ४५-] । ॥ - हट यहां से अज्ञान; संग लगे हुयों बहुत हैरान ॥ रह्यो मैं वहुत तेरे आधार ॥ होवस्यां भवसागर से पार ॥२॥ कुं. पिया म्हा से प्रीति पूर्वली पाल, शौक न द्योनी तुरत निकाल । 'भूप तूं चाल हमारी चाल, संग मै हूँ थांकी भोपाल । । कुमति कहे मन में बात विचार ॥ नार में हाजिर हूँ दिलदार ॥ ३ जी० करूँ नहीं तेरा अब मै संग, किया तू मान मेरा सवः भंग । मेरा जी चाहता था सत्संग, चढ़ाती विषय भोग तू रंग ॥ मुझे नहीं तेरी अब दरकार । होवस्यां भवसागर से पार ||४||--- कु०- -विषय का भोग भोग * भोग' से क्यूं होता न्यारा । कामवश है । सव संसारा, कहा तूं मान पीव म्हारा। आपन " प्यारा, - 17 A [६] समझाऊं: हरवार ,। नार में हाजिर दिलदार। ५ ॥१५२ ॥ जीवराज की कुमता से। टेर-1 कुमत नही धारां हे म्हानै मिल गई सुमता नार॥ , कुंमता की जीवराज से। टेर । सुमत मत धारो जी पिव हाजर सुन्दर नार॥ . जी०-(चौक) “पहली- थारी म्हाने पूरी पड़ि नहीं पहिचान। मिठा वचन बोलत वाहर , अन्दर कपटी. खान ॥ थारी प्रति ऐसी है कुमता झाडी वोर समान, । लाली दीखे दूरसे सजी मांही कठिन कृपाण, कुमत नहीं धारां हे ॥१॥ कु० कड़वा - वचन, वोलो मत प्रीतम हो थे म्हारा साथी । कोई समय में दपिक T [४७ ] बंणग्या मैं वणं बैठी वाती॥ क्रोध- रूपी तेल-पूरियो लोभ सदा को साथी । माया रूपी चाज्यो वायरो मैं थामें मिल जाती ॥ सुमत मत धारो जी०॥२॥ जी-माया के वशीभूत रह्यो तूं खूब नचायो नांच ।' झूठा वचन सदा से भाषे कदे न बोले सांच ॥ संपति ने सपने नहीं चावे ज्यों कञ्चन'न काच जिधी, वदि सर्व सहेली में लीनी है जाच ॥ कुमत नहीं धारा हे ॥३॥ कुल-जिद्दी, चदि नहीं आज की रहे सदा साथ । हरदम हुकम उठावे थांको हाजिर रहे दिन रात ॥ काई चूक पड़ी है यों की कहयो सांची बात । हाथ जोड़ हाजिर ख़ड़ी स में चरणां नमाऊ माथ ॥ सुमत मत धारों जी० ॥४॥ A है १ [४] जी०-मत न वात वणावे तेरी मेरे नहीं दरकार । अव में नेह लंगाऊं नाहीं तू है नागिनी नारे ॥ ऐडी से चोटी तक थामें पूर्ण भर्यों विकार । स्पर्श संग करे कोई थारो जावै नरक द्वार । कुमत नहीं धारां हे० ॥ ५ ॥ कु०-स्वर्ग निशानी कठिन पीव जी नहीं आपणो काम । लख चौरासी मायने स सामिल रहस्यां श्याम ॥ मोहराजा को ध्यान लगाओ, मत कहो मुख से राम । चल" है यमराज द्वार नहीं और से काम ।। सुमत मत धारो जी० ॥ ६ ॥ जी०-यमराज राजा के आगे है दुष्टां को काम । खोटा कर्म कुमावे नितका लेवे न हरका नाम । सत्य शास्त्र राम भजन में धरे पलकें नहीं ध्यान । आखिर द्वारे जासी यम के लुच्चा बेईमान ॥ कुमत नहीं धारां हे० ॥७॥ ।
४१.] कु०-थे तो राजन् वात वणाओ में छू भोलीनार । यमराज राजा को म्हारे पूरो ही आधार, काम, क्रोध, मद, लोभ आदि सब राखे म्हारी सार।ऐसोजाल रचूली प्रतिम नहीं छोड्रेली लार ॥ सुमत मत धारो जी० ॥८॥ जी०-जाल रचो जंजाली जीव पर सुण कुमता म्हारी वात । सुमता न: धारण करी स नहीं थारो म्हार साथ ॥ नीच निवास करो थे जाकर उत्तम म्हारी जात । थारे म्हारै वणे न कुमता सांच कही मैं वात ॥ कुमत नहीं धारा हे ॥६॥ कु०-दुत्कारा मत देवो प्रीतम दौड़ लार नहीं आई। भरी सभा मांय न स मैंने पंचा में परणाई ॥ कह तो प्रीतम समझ लेवो स नहीं लेस्यू पंच बुलाई। पंच करे सो होसी प्रीतम नही होवे मन चाही ॥ सुमत मत धारो जी०॥१०॥ । -- --- ४ - [ ५० ] जी०-पंच बुला पंचायती स थारी मन चावे सो कीजे। विजनस थान छोड़ द म्हारी सत्य वात सुण लीजे ॥ करणी थारी देख के स तू दोष कर्म न दीजे । मतना वाद वणावे यहां पर मार्ग जल्दी लीजे ॥ कुमत नहीं धारां हे० ॥११॥ १६३॥ कुमता की जीवराज से। (राग-पणिहारी) टेर । हाथ जोड़ अर्जी 'करूँ जी पिय प्यारा जिवराज । म्हानै करल्योजी अंगीका प्यारा जी॥ जीवराज की अमता से टेर । वहुत, दिनां तक भरमियो प्यारी थारी मे लार। तू होगई कमसल नार प्यारी जी॥ । A - [५१ ] कु०-कमसलन असली करों जी हाजर हूँ मैं तावेदार । त्यागो तो मरूँ खाय कटारें । प्यारा जी ॥१॥ जी-त्यागन मैं बिलकुल करी ये सुणले मेरी बात ! खाय कटार मरे वेगम जात ॥ प्यारी जी ॥२॥ कु.--ईस्क कटारी म्हार मार ज्यो जी म्हानै रहयो है ऊमंग । सेजा में रचायो पिया रंग । प्यारा जी ॥३॥ जी-क्यूं ललचावें थारा जीव नये सुण कुमता ये नार । लेवोनी शील व्रत धारी। प्यारी जी ॥४॥ कु?-शील व्रत तो 'ना नीम्हजी जो- वन छक्यो दिलदार ! म्हारी छत्तीयां पकी ज्यूं अनार । प्यारा जी ॥५॥ ।
१ [ २ ] जी-सेजा न आऊँ थारी कामणी ये त्याग्यो तेरो ये संग । हुयो, म्हार सुमत, को प्रसंग । प्यार जी ॥६॥ कु:-सुमंत का प्रसंग से जी नहीं राचे पिया रंग । चालो सेजां में' लगावो म्हाने अंग । प्यारी जी ॥७॥ जी-वात वणा, कर बोलती ये रेतू भूडी ये नार । करूँ नहिं थांसे प्यार ।प्यारी जी ॥८॥ कु०-समझाया समज्या नहीं जी करूँ और ऊपाय । जाऊँ लेंस्यूं पंच बुलाया प्यारा जी ॥९॥ १७२।। कुमता की निन्दक नाई से। टेर । निन्दक जी नाई ल्यावो पंचा नै वेग बुलाय वो ॥ 1 - -- - , [' ५३.] निन्दक नाई की कुमता से। टेर । काई दुख वीत्यो 'कुमता आप में क्यूं पंच बुलावे ॥ - कु०-(दोहा ) जल्दी पंच वुलाल्या निन्दक मती लगावे वार । जीवराज जी पती है म्हारो परणी दूजी नार । घर के बाहर करदी मुझको किसके रहूँ आधार ।' अरज करूँ छू निन्दक थान जल्दी ज्यावो लारं ।' निन्दक जा नाई० ॥१॥ नि०-मैं नहीं देर , लगाऊं वाई जाऊं अव की स्यात । परणी दूजी नार राज ने कोई उसकी जात ॥ चात्रक चतुर नार में त्यागी वह नहीं सोची 'वात । थांके वांक प्रेम घD हो हरदम देख्या साथ । क्यूं पंच बुलावे ॥२॥ - 7 कु०-मैं भोजन त्यारी करूँ स थे ल्यायो वेग बुलाय। वह । वह जीमे जो भोजन और सीधो लेऊँ सँगाय ॥“करज्यो यतन, जुगत से लाज्यो कहूँ थाने समझाय। हाल हकी- कत समझावाने सुमत,देवो हटाय ॥ निन्दक जा नाई०॥९॥ १८१॥ निन्दक नाई की पंचों से। टेर । कुमता बुलावे थानै वेग हो पंचों सव चालो॥ पंचों की निन्दक नाई से। टेर । कांई कुमता के पडियो काम जी म्हान पेग बुलावे ॥ नि०-(दोहा) कुमता माहीं कष्ट पड्यों, है झट सारा मिल चालो.। देर हुयां से पंचा वा-पीजाय जहर को प्यालो । 'अजी पंचों : सव चालो॥१॥ . ५ ,
14
पं०-क्यूँ पीवे वा प्यालो जहर को जिस
का भेद बताओ ॥ जल्दी हाल सुणादे नाई
काई कारण आयो ॥ क्यू वेग बुलावे ॥२॥
नि०-जीवराज नगरी को राजा परणी
दूजी नार। कुमता में वो ऐसी कीनी छोड दई
मझधार ।। अजी पंचों सव चालो ॥ ३॥
पं०-कुमता की कांई चूक हुई क्यूं परणी
दूजी नार । यो ही अचंभो आयो म्हानै कैसे
टूट्यो प्यार ॥ क्यूं वेग बुलावे ॥४॥
निः--बेग पधारो पंच लोग थे पूरी
करल्यो जांच । कुमता में कोई चूक नहीं
है सुणज्यो म्हारी सांच ॥ अजी पंचों सव
चालो ॥५॥
पं0-कुमता के तो कारणे स म्हे होग्या
सब तैयार। कुंमता को वहां राज जमावां करां
सुमंता न पार ॥ क्यूं वेग बुलावे ॥६॥१८७॥
कुमत थे धरयो थैली आन ॥ वाई म्हे राखां थारो मान ॥ ५ ॥ 1 + कु०-लियां मैं थैली ऊवी त्यार । पेट भर ले ल्यो पांच हजार ॥ देवो थे सुमता तुरत निकार । लोभचंद मैं थींके आधार । वधाओं वेटी बेचको मानः ॥ रोज न सम- झायो सुरज्ञान ॥ ६ ॥ पं-जावो थे धोकादार प्रधान । ल्यावो थे जिवको करके मान । विगाडां पूरी वांकी श्यान । कुमत न करां फेर प्रधान ॥ सूक दी ली। कहणो मान ।। बाई म्हेराखां थारो मान ॥ ७ ॥ कु०--शिकार थे ताजा वनवाओ। अजी मध्य का प्याला जी पाओ। जीव न गहरो विलमाओ चंडू थे पूरण ही पाओ"रचोथे । । ६१ ] जाके जाल सुग्ज्ञान ॥ -राज न समझायो -सुरज्ञान ॥८॥ -- - पं०-नशो म्हे पूरण ही पावां । जिव न खूब ही विलमावां ॥ राक्षसी खाना खुवावां। संग में जीव लेर आवां ॥ रचां म्हे जाकरके तोफान ॥ बाई म्हे राखां थारो मान ॥६॥.१९६॥ धोकादार की जीवराज से। टेर । पधारो,जीवराज-महाराज । आप न पंच बुलावे आज ॥ जीवराज-की-धोकादार से! , .. टेर । पंच म्हांने कांई कहवे आज। पड्यो, है.म्हां सा रूँ काई काज ॥ : 'धो०--(रेखता) मोटो-पडयो है. काम कहूँ मैं आपके ताई ।, जल्दी बुलावे पंच - 4 ।
[ २ ] चालो आप ज्यों वाई ।। मतना लगावो देर होल्यो संग के मांही ॥ पधारो जीवराज० जी०-दूरा खड़ा क्यूँ आप मेरे पास में आओ । कांई पड्यो है काम सब तुम हाल समझाओ ।। कैसा जरूरत काम मुझको भेद वतलाओ ॥ पंच म्हांने कांई क० ॥२॥3॥ धो०-पायो न पूरो भेद सुणल्यो बात जी म्हारी ॥ आप पधार्यां राज होसी हाल वहां जारी ॥सव ही विराज्या पंच देखे वाट जो थारी ॥ पधारो जीवराज महाराज० ॥३॥ जी०-चालो पधारो आप. जरा में देर से आऊँ। नहीं लगाऊं चार हुकम आपका पाऊँ । बेगा सिधाओ आप मैं तो तुरत ही आऊँ । पंच म्हानै कोई० ॥ ४ ॥ ।
[ ६३ ] धो०-चालो जो स्हारी संगजरूरत आप की भारी । देरी का कुछ नहीं काम सुणल्यो अर्ज या म्हारी ।। सब ही विराज्या पंच है अव देर वहां थारी ॥ पधारो जीवराज महा- राज० ॥५॥ जी०-मैं जो हुयो तैयार लारे आपकी चालू ॥ करसी दया गुरू राज कुमता दूर ही टानू ॥ चन्द्र कहे कर जोड़ गुरू नै शीश निवाल्यूँ ॥ पंच म्हाने कांई० ॥६॥२०२॥ जीवराज की पंचों से। टेर । हाजर में उवो तावेदार जी पंचा कोई कहवो। पंचों की जीवराज से। टेर। कांई मस्तानी छाई आपने कुमता क्यूँ स्यागी॥ जी०-(दोहा) नहीं मस्तानी छाई म्हाने सुणो पंच प्रधान । कुमता के माय ने सजी म [ ६४] रह्यो न म्हारो मान II , अजी पंचां कांई कहवो॥ १॥ पं०-कुमता नहीं है आज की स कोई रहे सदा से लार। काई' चूक पड़ी इण मांही घर से दीई निकार ॥ अजी कुंमता क्यूं त्यागी ॥ २॥ जी०-इसका अवगुण सायर जाणे है जो छल की खान । स्पर्श संग करे कोई इण से रहे न उनमें ज्ञान ॥ अजी पंचां कांई कहवो,॥३॥ पं०-कुमता परणी नार आप की इसमें कुछ नहीं चूक.॥ सुमता को संग हुयो आपके गया हो. तन से...सूक.॥ अजी कुमता क्यूं त्यागी॥४॥ जी०-मुमता-कों संग रहो हमारे जव तक- रह्यो विकार सुमता को संग हुयो vn । ६५ ] हमारे दियो ज्ञान। तत्सार । अजी पंचां कांई कहवो ॥ ५॥ पं-मतना वात वणाओ थे,तो वैठो म्हांकी प्रास ॥ मन इच्छा होने सो कहवो पूरी थांकी आस ॥ अजी कुमता क्यूं त्यागी ॥६॥ •जी०-पास खड़ा हूँ आपके सजी कहो 'होय सो वात ॥ या तो विजनस धारली स मैं रखू न कुमता साथ ॥ अजी पंचां कांई कहवो ॥ ७ ॥ पं०--आपस में समझावां थान सुणो हमारी वात । जाय पुकारे राज में स कोई या तिरिया की जात ॥ अजी कुमंता क्यूँ स्यागी-॥८॥ जी इसका लक्षण सा ही जाणे राज सभा दरबार । कुमता है या बुद्विहीन कोई , ५ -- [ ६६ ] ना कोई सुणे पुकार ॥ अजी पंचां कोई कहवो ॥ ९ ॥ 'पं०-धोखादार जी आप पधारो ल्यावे नशो तैयार । घणां दिनां से मिल्या राजर्व खूब 'करां मनवार ॥ अजी 'कुमता व त्यागी ॥१०॥ जी-नशो म्हे कोई करां न पंचा लेली नश आण। ज्यादा झोड़ करो मत पंचां रास्तू थांकी आण ।। जजी पंचां कांई कहवो ॥११॥ पं०-सोगन अपणे ना निभे स थे सुणं राज सुरज्ञान । सबके माही शिरोमणि जाण राखां थांको मान ॥ अजी कुमता क्यूँ त्यागी॥१ः जी-पंचां न्याव करो नहीं सत् के गखो पक्षरुपात । झूठ कपट के मांय न र विगड़गई सब जात॥अजी पंचांकांई कहवो॥ ** [ ६७ ] पं०-पक्षपात की बात नहीं है सुणज्यो चित्त लगाय । कुमता न धारण करो स म्हे करस्यां थांकी साय ॥ अजी कुसता क्यू त्यागी ॥१४॥ जी०-पंचां थांको जगत में स जी दिन २ घट सी आन । सत की बात छोड़ दी जद से होगया थे अज्ञान ।। अजी पंचां कांई कहवो ॥१५॥ पं0-हे तो चांला रीत आगली परा- परी की चाल । परणी तो छूटे नहीं स कहे लोभचन्द का लाल ॥ अजी कुमता क्यू • त्यागी ॥१६॥ जी०-सत न असत करोथे पंचां बुद्धि भ्रष्ट हुई थारी । कुमता लार लगा के जग मे खोवो श्यान क्यूँ म्हारी ॥ अजी पंचां कांई ॥१५ - पं०-लापरचंद जी पंच बोलिया सुणो गपौड़ी वात । समझायो समझे नहीं मूरख . ra . ']. 'करयो कुमता साथ । अजी 'कुमंता को त्यागीरिक जी-खोटा २ न्याव करो थामें भय कपट को मैल। तेली के घांणी फेरो अव वणस्यो वैल॥ अजी पंचां काईं कहवो ॥१६॥ 'पं०-होली सो 'हो जावसी स ल्यो म्हां की मान । मोह पिता कुमंता के 'कहिये पाडै थांकी श्यान ॥ अंजी कुंमता करे त्यागी ॥२॥ जी--पंचां न्याव करो थे संत को मर ओढो शिर पाप । कीट पतंग वणों ला पंच जंगल होस्या सांप ।।अजी पंचां-काई कहो।। पं०-जीवराज जी भोला दीसो कुण जाणे कांई होसी । म्हे पंच प्रधान कहवां वो करल्य "सो सई होसी । अजी कुमता:क्यू त्यागीर [६] जी०-सुमता शीतल चन्द्रमास जी कुमता है खद्योत । पंचां न्याव करो नहीं सत को क्यू करता अनहोत॥ अजी पंचां कांई कहबो।।२३ पं०-कुमता न धारण करो स थे सुमत न द्यो दुहाग-। उसने हुकर देवो थे जाकर उड़ा महल का काग ॥ अजी कुमता क्यू त्यागी ॥२४॥ जी० पंचां हुकम उठा थांको थे होस्यो पाप का भागी । कुमता चाल चले नहीं सत की फेर त्याग द्य आगी ॥ अजी पंचां कांई कहवो ॥२५॥ २२७॥ ज्ञानप्रकाश अर्थात् जीवराज का मुक्तिगमन' प्रथम भाग समाप्त ।
श्रीः
.
ज्ञान-प्रकाश
अर्थात्
जीवराज का मुक्ति गसन ।
दूसरा भाग।
जीवराज का विलाप।
टेर । नाथ ! मेरा वृथा है जीना कहन
में पंचां का कीनां । कुमत मिल जाल जो
रच दीना। पंच मुझे वहका जो लीना ।
नशा के वशीभूत कीना। वचन में मुझे बांध
लीना । (उड़ाण) वचन तज्या में ज्ञान का
झूठ किया आ वास । वचन निभाओ आप
[ ७१. ] में नाहीं दुहाग हरिजी सुमता राखो पास ॥,आपका शरणां मैं लीना । कहन मैं पंचां का कीना ॥१॥ नाथ मेंने अव सुध बुद आई सुमता न कहूँ जार काई, दोष कुछ सुमता की वृथा ठहराई। ( उड़ाण) नशा हरामी जगत में करता है अज्ञान। सायर तो करता नहीं मूरख राखे मान ।। इसी का हे वृथा पीना । कहन में पंचां का कीना ॥२॥ कुमता आ दुख दियो भारी, नाथ वा कमसल है नारी, इसे कोई जो दिल में धारी, बुद्धि सब जावे हैं मारी। ( उंडाण) या कुमता संसार में, है नरकां को मूल। इसकी प्रीत सजो तुम सज्जन, मत करजो थे भूल ।। मेरा तो है यह ही कहणा ॥ कहण में पंचा का कीना -॥३॥ नाथ मेरी करुणा सुण प्लोज्यो, सुमत म्हारे हृदय बसा दीजो, दया प्रभु मेरे पर कीजो, ये ही मेरी अर्जि सुण है
कुमता: निकट रहे
प
[ ७२ ]
लीजो। ( उड़ाण) आप दयालू जगत में
हो सव के प्रतिपाल ।
नहीं मेरे दीनानाथ दयाल | चन्द्र थांके
चरणां चित्त दीना ॥ कहन मैं पंचां का
कीना ॥ ४ ॥ २३१॥
जीवराज का
शेर।
सुमंता तू सुणले सुन्दरी दीनों है थाने
दुहाग जी। जावो हमारे सहल पर ठाड़ी
उड़ावो काग जी॥ पंचां करी पंचायती कुमता
को कीनू आग जी। तेरा नहीं कुछ दोष
सुसता मन्द लेरा भाग,जी ।। २३२ ॥
खुलता का
शेर।
कहती में प्रीतम आप से उदय हुया है
भाग जी । जाऊँ तुम्हारे महल पर कुबुद्धि
उडाय कांग “जी ॥ ऐले. विरोधी पंच जैसे
, स्वान अंसली - काग जी। सोवो क्यूँ मोह
की नींद प्रीतम होश कर अवजाग जी ॥२३॥
- A 4 [ ७३ Ti जीवराज की मुमता से। टेर । जाओ उड़ाओ सुमता काग. ये, सुन्दर महला का॥ सुमता की जीवराज से। . टेर । जाऊँ उड़ाऊँ कुबुधि काग जी प्यारा महलां का ॥ : जीव०-(दोहा) शिखर महल पर सुन्दर थे तो जाय उड़ाओ काग । पंचां का कहना स मैं तो दिन थानै दुहाग ( झेला ) दी। थानै दुहाग झूठ मत जाण ज्यो। कुबुद्धि हेपी काग महल का ताज्यो॥ सुन्दर महलां का ॥१॥ सुमता-त्यागी मत थे सायवा स जी ल्यो निज मन से धार । मैं अर्धाड्गी सत्य की संजी हूँ पतिव्रता नार ( मेला ) हूँ पति- बता नारशरण पिव. की रहूँ) दुख सुख [ ७४] एक समान सत्य थानै कहूँ॥ प्यारा महलां का ॥२॥", - जीव०-पतिव्रता का कैसा लक्षण मुझ को भेद बताओ। पतिव्रता की हाल हकी- कत धारै २ समझाओ। झेला। धीरे धीरे समझाओ झूठ मत बोल ज्यो। सच्चे कांटे तोल वात फिर खोल ज्यो । सुन्दर महलां का ॥३॥ सुमता-उत्तम पतिव्रता का में अब तुम से करूँ वयान । जाग्रत सपना माय ने स जी और पुरुष नहीं जाण ॥ (मेला) ओर पुरुष नहीं जाण ध्यान पति को धरे । ऐसी होय जो नार कारज उनका सरे ॥ प्यारा महलां का ॥४॥ जीव०-मध्यम का थे हाल सुणाओं नीती के अनुसार । रहणी करणी सव सम-
[ ७५ '
मओ कैसा करे विचार । ( झेला') कैस
विचार प्रीत कांई पालती । कैसा उसका
[चाल कांई चालती ॥ सुन्दर महलां
सुमता-मध्यम का जो हाल सुणाऊँ
ज्यो चित्त में ध्यान । आण पुरुष न ऐसे
मझे पिता पुत्र समान ( झेला) पिता
समान चाल सत की चले। और नहीं
ई दोप कर्म गति ना टले ॥ प्यारा महलां
जीव०-कनिष्ठ का थे हाल सुरणाओ
ई उसकी रीत । वो पतिव्रता कैसी कहिये
स विधि जावे जीत (झेला) किस विधि
वे जीत जगत के मांय नै। रहती निच
दास कहो कांई कारणे ॥ सुन्दर महला
॥ ७॥
[७६. ] rसुम--कनिष्ट का मैं हाल सुणाऊँ सुध ज्यो चतुर सुजान । धर्म विचार रहे जग मा राखे कुल की काण । (झेला) - राखे कुल काण लाज के कारण रहति नितउदास मो पद धारणै ॥ प्यारा सहलां का ८॥ ' जीव०-अधम पतिव्रता कैसी कहि उसका हाल सुणाओ। कोई वा व्रत नेभ मि भावे मुझे आप समझायो । (झेला) मु आप समझाओ लघु वा जात है ॥ कैसे पा धर्म सही कोई बात है । सुन्दर महल का। सुमता-अधम पतिव्रता का जों में है को हाल सुणाऊँ । भय विचार रहे दुनियां इसका भेद बताऊँ । (मला) इसका भेद बता रहे जग लाज से । कड़वा बोले बोल रहे न प्यार से ॥.प्यारा महलां का ॥१०॥ जीव०-वो; तिरिया है. कौनसी स. सुणज्यो चात्रक नार । निज पति ने छोड़ - । [1] रे और संग प्यार। (झेला) करे और संग र कुटम्ब नहीं 'धीरती । चाले टेड़ी चाल जारा मारती ॥.सुन्दर महलां का ॥११॥ सुमता-वो नारी व्यभिचारण कहिये णजो चिंत्त लगाय। निज पति नै छोड़ के स 'कुकर्म करती जाय । (झेला) कुकर्म करती गय क कमसल नार है। मात पिता और बहुत धिक्कार है॥प्यारा महलां का ॥१२ जीव०--कहाँ तलक धिक्कार देवोला सी बहुत है नार। अपना पति न मार के स 'सती होणन त्यार (झेला) सती होणन चार दगावा दार है। मन मे रही उमंग मोर संग प्यार है ॥ सुन्दर महलां का ॥१३॥ सुमती-नारिन कांई दोष देवो है मात मैता की भूल । बालपने विद्या नहीं देवे रहा शेभ में झूला (झेला) रहा लोभ में झूल माया ..
. राज शिर पा . [ ७० ] के कारणै । लावे बूढ़ो वींद क अपने वार प्यारा महला का ॥१४॥ जीव०-माता पिता अज्ञान फिर हेर राजा की भूल । वस्ती को इन्तजाम न है रहै मद में झुल (झेला रहे मद में झूल पो की बात है। गिरे अधूरा गर्भ है ॥ सुन्दर महलां का ॥१५॥ समता--राजा खुद विद्वान् होय तो। -प्रजा की सहाय। उसी राज के माय ने कोई होय नहीं, अन्याय (झेला) ह नहीं अन्याय के प्रजा कांपती । सभा नर नार रीत से चालती ॥ प्यारा मह का ॥१६॥ 'जीव०-सतवादी राजा होवे सब (प्रजा ही सत होय । वेदां की सेवा स- जामें ज्ञान सघायो होय । ( झेर - [७४ ] जामें जान सवायो होयं सत से चालतां। प्रजा नै निज वेटा बेटी ज्यूं जाणता ।। सुन्दर महलां का ॥१७॥ सुमता-राजा की या भूल सही है, है पंचां की चूक। सभी जात का पंचां सुणज्यो कन्या की एक कूक ( झेला) कन्या की "एक कूक चित्त में धारज्यो । जोडी को वर देख इसे परणाप ज्यो॥ प्यारा महलां का॥१८॥ जीव०-पंचां का तो न्याव नै समाने राज सभा दरबार । पूरी यांकी भूल है स ये करे न बात विचार ॥( झेला) करेन बात विचार जीमण के कारण । वेटी वेचर खाय जाय जीरे धारणै । सुन्दर महलां 'का ॥१९॥ सुमता हाथ जोड 1 पंचां धर ज्या ध्यान । कन्या थाने अरज - सुपता कहे स थे 1 -[:] करी है राखो उणरो 'मान: (झेला) राखो उणरो मान विद्या चर ल्यावज्यो । घर का लोभी होय वात मत मानन्यो। प्यारा महलां का ॥ २० ॥ जीव-नशो करा कर' पंचां म्हारो डिगा दियों इमानं। सुमता थाने 'दुहाग 'दिरायो खोटी किंना काम ( झेला ) खोटा कीना काम प्रीतं थे पाल ज्यो। कहते चन्द्र- लाल सुमत न धारज्यो ॥ सुन्दर महला का ॥२१॥२४॥ सुमंता की। (लावनी) नशा करो तो करो ज्ञान का और नशा हैराना है। सत्य नाम का नशा करो पिव ये ही हमारा कहना है ॥ (चोक) हे पिव' ऐसी सोचादिवाना सराव-वृथा , पीना है। मूरख पीवे द्रव्य गुमावे-जगत में लोग हंसाना है। :
7 मन में जरा होश नहीं रहता वकता फिरे
-[-]
.
दिवाना है। गिरे धरण पर चक्कर खाकर
र मुख मिट्टी लिपटाना है ॥ जात न्यात ओर
धर्म कर्म का रहता नही ठिकाना है । सत्य
नाम का नशा करो पिव ये ही हमारा कहना
है ॥१॥ अमलदखल करती है अपना खोटा
इस का खाना है । रमे इसी का असर जि-
गर में फिर पीछे पछिताना है ॥'दूखे नश २
करता खश २ खोटा इसका खाना है। नहीं
नींद और झरे नाक विन सोचे दुख उठाना
॥ चात्रक नर छुए नहीं इसको विषधर
वेष ज्यों जाना है। सत्यनाम का नशा करो
व ये ही हमारा कहना है ॥२॥ गांजा सु-
का खांसी खुर्रा दिल के माही जमाना है।
गर जलाना खून सुकाना दम का और
ना है। चंडू.पी कोकीन जगत मे अपनी
ने गुमाना है । सत्य नाम का नशा जगत
a
६
[ २ ] for at - . में रखे .सदा मस्ताना है ॥. चन्द्र कहे हरि भजो पार भवसागर से तिरजाना है.। सत्य नाम का नशा,करो पिव ये ही हमारा कहन है ॥३॥ २५७॥ .. फिर सुमता की धारामांसी । राग-शेखावाटी। टेर ।, पिया सत से चालो सत से थे चाल असत्य मत भाष ज्यो । (चोक) चैत हेत कीनों नहीं हर से पिया पायो दुःख अपार । लख चौरासी भरमत २ पायो मनुष्य अवतार । ( झेला) पायो मनुष्य अवतार डाव.मत चूकज्यो । सत्य गुरां को वचन आप, मत भूल ज्यो । पिया सतसे०॥१॥ वैसाख महिनो लागियो स पिव तज पर: नारी संग। परनारि का संग से सजी होत ज्ञान में भंग ॥ (झेला) होत ज्ञान में भंग ३ . [३] मान जिनका नहीं । लख चौरासी मांय फेर जावे सही॥ पिया सतसे चालो० ॥२॥ जेठ । जुगत कर जीवो जगत में सत को थम्भ आधार । पतिव्रता प्रीतम की प्यारी.रखे पनि संग प्यार ।। (झेला) रखे पीव संग प्यार । ध्यान पिव को धरे। निज मन इच्छा होय कारज उनका सरे ।। पिया सत से० ॥ ३॥ (अपाढ़ आशा लगी हमारे श्याम मिलन के काज । तन मन धन अर्पण करूँ स म्हारी सुध लीज्यो महाराज ॥ (झेला) सुध लीज्यो । महाराज में शरण आपके । नाव पड़ी.मझ- धार पारकर, आय के ॥ पिया सत से०॥४॥ सोवण सुगन हुया शुभ म्हाने कटेचौरासी जाल । सब थे ध्यान,लगाज्यो हरसे तरुण वृद्ध और बाल । ( झेला ) तरुण वृद्ध और • बाल चाल संत की चलो। झूठ कपठ यो : छोड़ होय थांको भलो ॥ पिया सत से -
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चालो० ॥ ५ ॥ भादू भरम मिटायो मनको
संबासुणज्यो , नर नार । दया धर्म और
शीलता स पिव ल्यो. धीरज, नै धार ।। (झेला)
ल्यो धीरज ने धार मारग यो जोग को।
है सूरां को काम नहीं कोई और को पिया
संत से चालो० ॥६॥ आसोज महीने चली
मिलन को सुरतनुरत के पास। हरदम ध्यान
धरे वह पिव को सुमरे सास उसास॥ (झेला)
सुमरे सास उसास मिलाके श्याम से नहीं
और से काम प्रेम म्हारो राम सेः। सत से
चालों ॥७॥काती, साथी हो सत सखियां
खेलां चोसर सार। संसार सागर विषम है
'तिर" किस विध उतरां पार ॥ (झेला)-किस
विध उतरां पार नांव निज सार है। पासा
है निज ज्ञान और जंजाल है ॥ पिया सत
से चालो० ॥ ८॥ मगसर मोक्ष होय इस
जिव की ल्यो सत संगत धार । काम क्रोध
.
({८५)"
मर्दै लोभ 'कुमत और ल्यो ममता नै मार॥
(झेला) ल्यो ममता नै मार शीलता धार
ल्यो। दया धर्म ल्यो संग जगत से तार
ल्यो । पिया सत से चालो० ॥ ९॥ पोष
होश करेल्यो तुम 'सारा क्यूं सूता मोह
की नींद । काल शिराणे यूं खडो स ज्यूं
तोरण आयो बींद (झेला) तोरण आयो
चींद बीनणी मालंसी। जैसे ही जम आय
क फांसी डार सी ॥ पिया 'सत से चालो.
॥ १०॥ माह महीने माता का गर्भ में कीनूं
कोल करार। नीचे शीस पर ऊपर को पायो
कष्ट अपार ॥ (झला) पायो कष्ट अपार उदर
मे झूलियो । मजस्यू वारंवार कोल थे यूं
कियों ॥ पियों सत से चालो० ॥११॥ फागन
फेरा फिर्या घणां पित्र ल्यां चौरासी जीत
आंवो हिल मिल ध्यान लगावां: चालां सत
की रीति ॥( झेली.) चालांसत की रीत प्रीतर
(६ )। थे,पाल ज्यो। कहवे, चन्द्रलाल, मोक्ष पद चार ज्यो ॥ पिया सत से. चालो० ॥१॥२६९॥ वार्ता। 7 ह, सुमता को जीवराज ने-पंचों को वचन- दे दिया था-इस कारण दुहाग दे दिया । : - सुमता का सब तरह विचार कर, लेने पर चोकप्त चारण को अपने पिता के पास भेजते हुए-वार्तालाप करना ॥ २७० ॥ . . .. समता की चारण से । - राग-परवाना टेर । चोकस चारण का दीजे परवानूं म्हारो-जाय वो॥.. चारण की सुमता से। टेर । सुमता सुण वाई देस्यू परवानूं थारो जाय जी. ir सुम०--सिंध श्री सर्वोपमा स जी. शील नगरे है, 'धाम । ज्ञान राज (जी पिता हमारी T (' कह दीज्यो प्रणाम चोकस चारण 4 का० ॥१॥ चा-ले परवाना वाई थारा शील नगर नै जाऊँ । ज्ञान राज राजा जी नै वाई कांई हाल सुणाऊँ ॥ सुमता सुण वाई० ॥२॥ सु०-अरे म्हाने चोकस चारण का दीनूं है. पीव दुहाग ॥ शिखर महल के गोखड़े जी खड़ी उड़ाऊं काग । चोकस चारण का० ॥३॥ चा०--किस कारण थे काग उड़ावो कांई मैं हाल सुणाऊँ । हुकम देवो तो वाई म्हारा लारा लेतो आऊँ ॥ सुमता सुण वाई० ॥४॥ सु०-चारण चिन्ता है नहीं स वो सुक्ष्म की बात । नेम हमारों भाई कहिये लेता आज्यो साथ । चोकस चारण का॥५॥ " 7 । चा०-थे वाई जी हो सुरज्ञानी करी ज्ञान की बात । नेम कंवर और ज्ञान राज.न. लेतो आस्यूं साथ ॥ सुमता सुण वाई० ॥६॥ सु०--भाव भंतीजो म्हारो कहिये फेरो शीस पर हाथ । गम धीरज नै मिलणा कहिजो सारे ही थे साथ ॥ चोकस चारण का० ॥७॥ चा०-संत की चाल सदा थे चालो धन जाई 'थांकी मात। इतरो कष्ट सहन थे कीनो तंज्यो नै पिव को 'साथ'। मुमता सुण . वाई० ।।5:10 3 मु०-वृथा वचन भाइँ नहीं मुख से सही लिखू समचार । जीवराज' काया को राजा धारी कुमता नार । चोकस चारण.का० ॥६॥ चा-सही २ सव जाकर कहस्यू वाई थारा ये समचार ।, वार २१ में मिलणा कहस्यूँ - 1 - (12): वाई थारैः सार ही परवार ॥ सुमता सुण वाई० ॥१०॥ मु०-पंच करी पंचायती जी कीनू कुमत को आग। वेगी सुध थे लीजो वावल खड़ी उड़ाऊं काग ॥ चोकस चारण का०॥११॥२८१॥ चारण को जान से। टेर !, ल्यायो परवातुं सुमत कुमार को काया नगरी से। ज्ञान की चारण से। rri कोई परवा ल्यायो राजको चोकसं चारणका! चा-(दोहा० ) ल्यायो परवानू सुमत को स थे सुपज्यो जी महाराज । सुमंता वाई शिखर महल का काग उड़ावे आज ॥ कायागढ़का राजा वाई पर होय गया नाराजी वाई यांने याद किया है. वेग पधारो राज ॥ अजी, काया नगरी से ॥१॥ - - } (6)} ४ ज्ञा०-चारण चेतन जीव हो स उन या कांई कीनी वात । सायर सुमता त्याग के स वो किण संग कीनो साथ ॥ सीख उसी नै दीजिये सजी जिसका उत्तम गात अज्ञानी नै सीख देवतां अपनी बुद्ध सब जात ॥ अरे चोकस चारण का० ॥ २॥. । 'चा--जीवराज को दोष नहीं है पंच करी अन्याय । सुमता नै वह दुहाग दिरायौ करी कुमत की साय ॥ लापरचन्द गपोडी- संख: धोकादार करी अन्याय । कई पंच वहां ऐसा आया बेटी बेचरै खाय ॥ अजी काया नगरी से ॥ ३॥ ज्ञा०-मुरख मरम जाणे नहीं उनकी चले परायी सीख । आगे कुमता संग में सवीं घर २ मांगी भीख । फेरूँ जीव बने जंजाली चाल वणावां दीक । कुमता हठा कर सुमत .
- - (१५): संग में वांधा पक्की लीक ॥ अरे चोकस धारण का०॥४॥ 1 चा होवो म्हारा संग में स जी मती लगाओ देर । वांका अब गुणमाफ करो थे वाल करो झट महर ॥ आप पधायाँ राज- बीस जी होसी उनकी खैर । अव के कुमता काढयो स, जी नहीं आवेली फेर ॥ अजी काया नगरी से०॥५॥ ज्ञा०-चारण चिन्ता मत करे स में चलूं तुमारे संग । अज्ञानी वी जीव को स जी करी मान चल भंग ॥ कुमता.देख ज्ञान कों स जी लेसी अपणो मंग जीवराज नै नेम' झिलावा सदा जो रहसी संग ॥ अरे चोकस चारण का०॥६॥ २८७ ।। वार्ता। जानराज शीलं नगर से आकर पहले जीवराज को समझाता है क्योंकि समझाने . 1 1- - - ।
1
.
।
से जीवराज कुमता को निकाल देगा और यहें
वात सुनकर सुमता बहुत राजी होगीं ॥२८८
ज्ञानराज की जीवराज से।
'टेर ।' फेरू जंजाली पणियां जीव जी
सुमता क्यू त्यागी।
'जीवराज की ज्ञानराज से।
टेरे । माफ करो, जी तकसीर जी
"
-
अल हमारी।
। ज्ञा-- (, दोहा ) अज्ञानी क्यूँ, छाई
आपने दीनी सुमता त्याग, । वा जो, पाने
पड़ी. आपके : खड़ी उड़ावे काग ..॥ लख
चौरासी कष्ट पावियो अव के.जाग्यो भाग
सत्य कहूं सत मान ल्यो स जी; यो कुमत
न त्याग ॥ अजी सुमता क्यू त्यागी ॥ १
• जीव-हाथ जोड़ अर्जी करूँ सजी गुन
करो सव माफ-1 सरणै आयो आपके.
- नै होवो दयाल आप । अब के ना विसरूँ ला दाता जपू आपका जाप । अव थे नेम झलायो म्हांने मेटो तीनूं तापं ॥ हुई भूल हमारी ॥२॥ ज्ञा०-नेम धर्म झिलाऊँ थान है अग्नि की शाख । सदा सत्य भाषण करो स जी झूठ मती ना भाप ॥ सुमता है या सुन्दरी सथे सदा रौखज्यों साथ । कुमता न धारण मत करज्यो यही सत्य की बात ॥ अजी सुमता क्यू त्यागी ॥३॥ - जी-आजे नेम में झलिया स जी सुणों हमारा नाथ । कदे न त्यागे सुमत नै स जी रहूँ इसी की साथ | हरदम ध्यान 'धरूं हिरदा में ज नाम दिन रात । सुमता है सत्य सुन्दरी मानी सही में वात ॥ अजी हुई भूल हमारी ॥४॥ ।
(१४) - , ज्ञा०-अव थे मतना भूलज्यो स. नेम कंवर भोपाल । अनानी वह मनुष्य स जी वहुत वजावे गाल ॥ जो सतवाद पुरुष है स वह चले नेम सत चाल । अपने गुरु के कृपा सेती कहते चन्द्रलाल ॥ अ सुमता क्यूं त्यागी ॥५॥२९३॥ ज्ञान की सुमंता से। राग-पणिहारी। टेर। कांई उदासी, थानै छा रही सुमता बाई जी वो राज। कहद्यो थारा-मन बात वाई राज॥ सुमता की ज्ञान राजा से। टेर । हाथ जोड: अर्जी करूँजी सु ज्ञानी जी ओ राज। कहता आवे म्हानै ल जानी राज ॥ ... जा, चोक०) चारण संग में आदि ये-सुमता,वाई जी ओ राज । द→ि जीवर समझाय वाई राज॥ काई उदासी थाने। + 1 HT . -- ।
F () सु०-नेम धर्म भक्ति भाव संग करो जीव प्रवेश । वान देवोनी सत 'उपदेश ज्ञानी राज ॥ हाथ जोड़ अर्जी०सा. ज्ञा०-दशों द्वारै पहरा रख्या. ये वाई थारै ये ताय। कुमता नहीं आवे महली मांय वाई राज ॥ कांईं उदासी थाने० ॥ ३ सु०--सुण 'के खुशी भई प्रेम से जी करस्यूं जी में काज। कोई वणूं ली धर्म की में जहाज ज्ञानी राज ॥ हाथ जोड़ अर्जी०४॥ '. - ज्ञा --संत्य पतिवृत पाल ज्यो ए म्हारा बाई जी ओ राज । कोई थारी ईश्वर राखे लाज वाई राज ॥ कांई उदासी थाने ॥५॥ सु०--सुमता को सत ना डिगेजी सुण ज्यो जी म्हारी वात। लज्जा रखे विश्वम्भर नाथ ज्ञानी. राज ।। हाथ जोड़, अर्जी० ॥६ - ।(." ज्ञा०-सती को सतना डिग्यो सु ये दे ध्यान । चाहे डिगे धरणी असमा राज ॥ कांईं उदासी थानै० ॥७॥ -- सु०-सीता कुन्ती द्रोपदी जी-अन ऋपिनार । तारादेमन्दोदर सती ये ज्ञानी राज ॥ हाथ जोड़ अर्जी दा * ज्ञा०-इनमें तूःनिजसार है ये गावे पुराण । तेरी चाल, सदा- ये परवाण १, राज० ॥-काई उदासी थान० ॥९॥" सु०--पुत्री को यो धर्म है वो म्हारा जी वो राजा,राखे कुल दोन्यूं की लाज! राज०॥हाथ जोड अर्जी० ॥१०॥ :: ज्ञा०-मातपिता कल काल में ये ह दुनियां के मांया। कोई पुत्री न वेचर वाई राज । काई उदासी थानै० ॥११॥ 1- - -- [७] सु०-ऐसे मात पिता नै धृकार है जी कहती वारम्बार । जावैला वह जम के द्वार ज्ञानी राज । हाथ जोड़ अर्जी ॥१२॥ ज्ञा०-हे सुमता सांची तू कही लागी म्हारे ये दाय। कहे' चन्द्र चरण चितलाय वाई राज | काई उदासीथान० ॥१३॥३०६॥ कुमता की तृपर्णा से। राग-शेखावाटी। टेर । मैंन छाई ये उदासी राजन् नहीं आसी ये दाप्ती महल में ॥ तृष्णा की क्रुमता से। - टेर। थांको दिल धीरज राखो वृथा क्यूँ भाखों वाई आप,हो । कु०-(चोक) दासी थानैं कहूँ हकी- कत सुण ज्यो : म्हारी वात । सपना माय 4 . 1-- २ ७ । [ ] श्याम क स मैं देखी सुमता साथ. ( झेला) देखी सुमता साथ राज की गेल में । खेले चौपड़ा सार क दौन्यूँ महल में ॥ मैंन छाई ये उदासी० ॥१॥ तृ०-सपना की परतीत नहीं बाई झूठा हो जंजाल ।' सपना मायं तृप वणे मन जागत हो कंगाल ॥ ( झेला) जागत हो कंगाल मिल्यो नहीं रोज हो । सपना को तो झूठा सव साज हो ॥ यांको दिल धीरज० ॥२॥ कु०-दिन नहीं चैन रैन नहीं. निद्रा कांपे म्हारी काया॥ कदकी वैरन हुई सुमत या रची मोहिनी माया ॥ ( झेला) रची मोहिनी माया मन म्हारो दहल में नहीं आसी राजन महल भंग हुयो सैल में | मैंन छाई ये उदासी० ॥३॥ तृ--धीर धरो बाई जी म्हारा क्यू इतरा घबराया। करूँ सुमतान पार अंजी थे करज्यो - [] मन का चाया । (झेला ).करज्यो मन का चाया पिया संग रंग हो । राखो मन उमंग पड़े नहीं भंग हो ॥ थांको दिल धीरज०॥४॥ कु०--सुण कर वात तुम्हारी दासी आई हमारे धीर । रुस्या श्याम मिलादे म्हारा देऊँ अमोलक चीर ॥ (झेला) देऊँ अमोलक चीर रखू तनै संग मे । मन में होय उमंग संग पिव रंग में ॥ मैंन छाई ये उदासी० ॥५॥ तृ०बाई जाऊँ ल्याऊँ राज नै सुणज्यो चित्त लगाय । मन चिन्ता मेटो सव बाई होसी थांकी साय। (झेला) होसी थांकी साय हुकम म्हाने देवो ।सजो सभी शिणगार मान म्हारी लेवो ॥ थांको दिल धीरज०॥६॥३१२॥ कुमता की तृष्णा से। रागिनी। ". टेर । बुलाल्या राजन ये दासी जल्दी महलां जाय। 1 ['१०२ 14 I ., । नेम की दासी से । रेखता। टेर । फिरे क्यूँ सरवण के तू द्वार वता कौन घरां की नार। दासी की नेम से। टेर । हटो तुम छोडो यहां द्वार खड़े में कुण हो राज कुमार ॥ नेम०-( चोक) छोडूं नहीं ये द्वार गले वात जो मेरी । तेरा वता, दे नाम कौन की चेरी। सच्चा कहो बयान यहां में दे रही फेरी ॥ फिरे क्यूं सरवण० ॥१॥ दा०-तुमरा बताओ नाम तुम क्यों र पर ठाड़े जाणे दो अन्दर महल मेरे खड़े आड़े ॥ धीरे कहूं मैं वात तुम क्यूं लते गाडै ॥ हटो तुम छोड़ो० ॥२॥ ।,
[ १०३ ]
ने असली का नहीं है काम चेरी झूठ
क्यों बोले । मेरा नाम है नेम मेरी वात सई
सुणले। तू है बुद्धिहीन कमसल सत्य नहीं
वोले ॥ फिरे क्यूं सरवण ॥३॥
दा०कैसा कहिये नेम तेरा देश दर-
शावो । क्यूं जो खड़े हो द्वार यां से दूर हट
जावो जाने दो अन्दर महल नाहक देर
लगाओ । हटो तुम छोडो० ॥४॥
ने-कहता मैं घारम्वार अन्दर जाय
मत चेरी । कांई नाम और जात बता झट
क्यूं करे देरी॥मतना वणावै चाप्त ड्योढ़ी आन
क्यूं घेरी ॥ फिरे क्यों सरवण० ॥५॥
दा०-मेरा तृष्णा नाम कहूँ में आपके
तांई। मेरे जरूरत काम जाऊं महल के मांहीं।
भेजी हे कुंमता नार बुलाण राज न आई ।।
हटो तुम छोड़ो यहां से० ॥६॥
[ १०४.]. ने०-हुकम नहीं है ज्ञान का चोकी लगे मेरी। कुमता का नहीं है काम सुमता राज ने धारी॥ आया ज्ञान महाराज हुकम, कर गया जारी ॥ फिरे क्यूं सरवण०॥७॥ दा-आया क्यूं म्हारे, महल वो जो ज्ञान,ही-यांपे। म्हाका-राज़ है मोह वानै देख सव कांपे। म्हारा कयो लो. मान जावो धाम थे थांके ॥ हटो, तुम छोड़ो ॥६॥, :: ने-मारूं तुम्हारे ताज़णा क्यूं वात वणावे। हट जा तू यहां से दूर मतना सामने आवे ॥ ल्यावो मोह को जाय जिसका जोर दिखावे । फिरे क्यूं सरवण ॥६॥ दा०-जाऊं मेरे मकान,मारण आप क्यूं धाया। मेरे -भावे महाराज, करो आप: मन चाया-॥-थांका, नहीं है दोष भेज्या ज्ञान, आया । हटो तुम छोडो?-॥१ 1 . 1 - [ १०५ । कुमता की तृष्णा से। रागनी। टेर । मोड़ी क्यूं आई ये दासी खबर्यों काई., ल्याई । ..राज न क्यूं नहीं आया से जी ॥ तृष्णा की कुमता से। टेर । सरवण क : द्वारे बाई जी नेस विराज्या। महलां में किण विध जाऊँ ये जी॥ - कु०-(चोक ) होगी ये दासी तू तो निमक हरामण । खोल जटा हूँ वैरागन ये जी। म्हारा महलों में दासी नेम क्यूं आया। वान तो कोण बुलाल्या ये जी ॥ मोडी क्यूं आई.ये० ॥१॥ तृ०-नेम निमाणे वाई जी धर्म ठिकाणे। कोई जागें । कुण आण्या ये जी-। सुमता । १०६ ] का करिया वो वाई 'जी' करतव दीसे। होगी वैरागन चोड़े दखेि है ये जी॥ सरवण क द्वारै बाई जी ॥२॥ कु०-बूझो तो हो ये दासी नेम राजनै। कुण बुलाया थानै ये जी। दासी दिवानी वाको मर्म न जाणे । सुमता काई पिछाणे ये जी॥ मोड़ी क्यूं आई ये० ॥३॥ तृ०-शील नगर से वाई जी नेम तो आया । सुमता आप बुलाया ये जी। ज्ञान पधार्या वो बाई जी नेम झिलाया । पतिम थारा चितल्याया ये जी ॥ - सरवण क द्वारै बाई जी ॥४॥ कु०-शील नगर नै ये दासी वां कुण जाणे । क्यूं तू वृथा ताणे ये जी । कहदे हकीकत म्हाने हो सो ये दासी । नहीं तर [ १०७ ] द्यं थारै पासी ये जी ॥ मोड़ी क्यूं आई ये० ०॥५॥ तृ-सुमता रो पीहर बाई जी शाल नगर हे । ज्ञान राज वांरो पिता ये जी। नेम कंवर वांरो भाई कहीजे । करणो होव सो करली जे ये जी ॥ सरवण क द्वार बाई जी० ॥६॥ कु०-सुमता तो दोसे ये दासी बड़ा ये घरां की। सांच न मानी मै थांकी ये जी। करम कुमाया ये दासी चोड़े वह आया । सुमता पिव विलमाया ये जी ॥ मोड़ी क्यू आई ये० ॥७॥ तृ-भार्या वासां से बाई म्हारी खाल उड़ाई । जीव बचाय भागी आई ये जी ।। थांके कारण ये वाई में मार ही खाई । दोष १ - - [१८] देवोला अब कांई ये जी ॥ सरवण के बारे वाई जी० ॥ कु०-दासी चालां ये म्हारा मोह पिता पै। राज जिमावां फेरूँ यांपे ये-जी ॥ थाने मार्या ये जांकी खाल उडावां । भीतर निमक भरावा ये जी ॥ मोड़ी,क्यू आई ये० ॥९॥ तृ-हुकम उठाऊँ वाई जी जल्दी से चालां । मोह पिता नै दुख कहाँलो ये जी। जीवराज ने बाई जी वह समझासी । पाछ तो सेल मिलासी ये जी ॥ सरवण के द्वारे वाई जी० ॥१०॥३३९१ 1 मोहराजा की। शेर। अजी मैं मोह बलवान हूँ जाने है खलव तमाम जी कामी क्रोधी कुटंल नर बेर्ट ।
सुणो दे ३ १०१. ] वेच रख मान जी ॥ नकली वनावट भेष जोगी धरत: मेरो ध्यान जी। रचूं जो पूरण जाल.उन पर कर देऊँ. अज्ञान जी कहता सभा में. समझल्यो यह ही हमारा काम जी । चन्द्र कहे मोह का. यह करतव सर्व ध्यान जी॥३४०॥ मोह की। टेर आया म्हे मोह राजा बल कारीजी म्हाने जाणै दुनियां सारी (दोहा) मोह राजा है नाम हमारा सब कोई जग में जाणे। काम क्रोधमद लोभ कुमत सर्व हुकम हमारो माने। आया म्हे मोह० ॥१॥ कुमता पुत्री नाम हमारी जीव जाय वहकावे। लख चोरासी . मायनै स वा फेरा खूब फिरावे ॥ आया म्हे मोह० ॥ २॥ काम क्रोध मंद लोभ संग में पहरा चोकीदार। माया जाल रचा जीव पर जग में कर ख्वार॥ आया म्हे मोह० ॥३॥ - -- [ ११० कुटल कुचाली नाच करां नर चोर जुवारी सारा । ममता तृष्णा, दुवध्या दुर्मत हुर्कम उठावे म्हारा ॥ आया म्हे मोह० ॥ ४॥ सूता सुख नींद महल में कान पड़ी भन कार। कौन खड़ा है द्वारै हमारे उवा के पुकार ॥ आया म्हे मोह० ॥५॥३४५।। वार्ता। कुमता तृष्णा को साथ ले पीहर : गई और लोभी से सारा हाल कह दिय अव लोभी कुमता को साथ ले मोह रा के पास जाता है और कुमता के दुख वर्णन करता है ॥ ३४६ ॥ लोभी की मोहराजा से । टेर । अरज-म्हारी सुणज्यो जी । रूपी राजन रा [ १११ ] मोह की लोभी से। टेर। जगायो आके रे लोभी ऐसो कांई काम। लो०-अरज करूं कर जोड़ राजनै सुण सुरतो मेरा सरदार । जीवराज काया को राजा परणी सुमता नार ॥ आशा तृष्णा दुचच्या दासी करी कुमत ने पार ॥ अरज म्हारी सुण ॥१॥ मो०-कार्ड दोप देवो वीं जिव नै है सव थांकी पोल । अंधकूप में जीव पडयो हो किण दी खिड़की खोल ॥ आयो कोई सन्तराज वां मार्या जीव न बोल ॥ जगाये। आके रे० ॥२॥ लो०-भूल हुई कोई मांकी राजन माफ करो तकशीर वांको जतन करो कोई राजन जद धरसी दिल धीर ।। पूरी मदद 'देवोनी [ ११२ ] म्हांनै मारां मोटो मार ॥“अरज म्हारी सुंणज्यों, जी० ॥३॥, '': मो०--सब पूरा बदमाश होस थे लुच्ची वेईमान-। काम क्रोध मद- लोभ तुम्हारा सब का हरू प्रान ॥ जीवराज विश्नु घर जावे काडूं, थांकी-जान ॥ जगायो आके. रे० ॥४it- लो०--हाथ जोड़ अर्जी' करां स'थे देवो जान वखसीस । जीवराजन ल्यावां पकड़ के पूरणं विश्वा वास । अव के भूल रखां तो द्यो घांणी में पीस ॥ अरज म्हारी सुंण ज्यो, जी० ॥५॥ मो-जागृत विषयं जीव को वासो नेत्र द्वारे जाण । सुखम माय सलानी वसंतो धर- कण्ठा दरम्यान ॥ सुसुति के माय विराजे धर हृदय में ध्यान ॥ जगायो आके i. । रेdir . [ ११३ ] लो०-जातय सुखम सुसुप्ति तुरिया २ अतित कहावे । वहां से परे परा से परे वा गयौ फेर नहीं आवे ॥ ऐसो जतन करो मोह राजा म्हाने छोड़ नहीं जावे ॥ अरज.म्हारी सुण ज्यो जी० ॥७॥ -. मो०-म्हांसे परे परा से परे नहीं ह्य जीव को जागें । जबतक सतगुरु मिले न पूरा तवतक.खैचा ताणूं- ॥ उलटो होय पिछम को ध्यावे सोला सुन म्हारो थाणूं॥ जगायो आके २०॥ लो-आप बड़े मोटे महाराजा : चोदा लोक विस्तारा । यां में जीव बसे जंजाली सोई काल का चारा ॥ विना आपका ध्यान कियां विन रहे जगत् से न्यारा॥ अरज म्हारी सुणज्यो जी० ॥६॥ AN -- .
। [ ११४ ) । मो०-काम, क्रोध मद लोभ दूत सव हो जाओ तैयार । जीवराज की मुश्क बांध कर ल्यावो म्हारे द्वार । पूरी त्रास दिखा कर वान करां कुमत, नै लार ॥ जगायो आके रे॥ १०॥ ३५६॥ " वाता। 41. अपने महल में सूती हुई सुमता को सपना आया कि कुमता मोह राजा की सेना लेकर आरही है इस से चौक पड़ी । अव जीवराज से सपने का हाल कहती है ॥३५७॥ सुमता की जीवराज से। टेर । सपनो मोय आयो साजन राज हो मोह दूत पठाया ॥ जीवराज की सुमता से टेर । सपनो काई आयो सुमता आपने सब हाल सुणावो ॥
सु०-(दोहा० ) सपनो आयो नींद में स जी सुणज्यो म्हारा श्याम । मोह को जोर चले नहीं कोई ऐसी देखो धाम ॥ अजी मोह दूत पठाया ॥१॥ जी०-मूल मैल मजन करूं स म्हाने हुकम दियो गुरुराज । अष्ट कॅवल के माहि विराजे ब्रह्मा जी महाराज ॥ अजी सव हाल सुणावो० ॥२॥ । सु०-सर्गुण नाम जपो निशवासर होसी थारी साय । योतो मारग जोग को स पिव थांसे सजसी नांय ।। अजी मोह दूत पठाया जी०-नाभ 'कॅवल निज मांय विराजे विश्नु श्री भगवान । हृदय ध्यान धरूं संकर का गिरजा को पति जाण ।। अजी सव हाल सुणावो० ॥४॥ 1- ३ 1 [ ११६ ] सु०-यो तो काम कठिन है पीतम नहीं साधन बण आवे । कल्लू मांय आधार नाम को सहजा ही तिर जावे ॥ अजी मोह दूत पठाया ॥५॥ जी-कंठ कॅवल शारद महारानी करे ज्ञान, प्रकाश । अला पिंगला सुखमना स जी सुमरे सासउसास ॥अजीसव हाल सुणावो॥६॥ सु०--यो साधन कोई हरिजन साधे रहे निरंतर आप। ऐसे लोक वसे कोई जोगी जहां पुण्य नहीं पाप ॥ अजी मोह दूत पठाया ॥७॥ जी०-सुन है सोला आठ ही वारा ऊपर आंगल चार । जिणरै ऊपर एक ही विश्वो मोक्षरूप दातार॥अजी सव हाल सुणावो । सु०-कहणी, ज्यू कहणी कहेस रहर्ण रहे न कोय । सतगुरु की रहणी रहे स ते [.११७ ] दुख काहे को होय ॥ अजी मोह दूत पठाया ॥९॥ जी०-थे सुन्दर सांची कही स यो मन है वेईमान । अष्ट पहर चौसट घड़ी स यो धरे पलक नहीं ध्यान ॥ अजी सव हाल सुणावो ॥ १० ॥ सु०-मन की तो मत मानो पतिम ल्यो निज मन नै धार श्री विष्णु को ध्यान लगावो बेड़ा होसी पार ॥ अजी मोह दूत पठाया ॥ ११ ॥ जी०--सन्तोपी सुमरण करूँ स मैं हिये रट्रॅ हरनाम । सङ्कट विपत निवारणहारा साय करे म्हारी राम ॥अजीसव हाल सुणावो ॥१२॥ मुं०-शरणा की परतंज्ञा राखे वे छै दीन दयाल । अपणा जन की साय करे ला कहता 'चन्दरलाल ॥ अजी मोह दूत पठाया ॥१३॥ ॥३७०॥ - . , --
[ १२.]
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कुंमता की सुमता से। .
रागनी-घुमाव।
I
टेर । या कुण सूती ये म्हारी - शोक
म्हारे रंग रै ढोल्यै ॥
सुमता की कुमता से।
टेर । मैं छु ये सुमता नार कांई चोल
बोलती
राग-इन्द्रसभा।
कु०-तू' व्यभिचारण नार है में कहती
वादा साथ । नीचा कुल के मांय नै तू जनम
लियो, कुजात।
चौपाई।
, 'सुमता को क्यू नाम लजावे । तू व्यभि-
चारण नार कहावे ॥,परहि पुरुप से तू प्रीत
लगावे । अये फेर दारी क्यू सुमता कहावे ॥
K-तोड़ ), वोल-वात तू होष । इनै कदसै
करियो दोस्त ॥ अये म्हारे रंग के दोल्यै ॥१॥
1 1 ११४ इन्द्रसभा ।। मुं-असली। सो, असली कहे कमसल कहे कुज्जात । में सुमता सरनाम हूँ जगत मांही विख्यात ॥ चौपाई। दोस्त हमारो है अविनाशी । अमरापुर का किया ये याने वासी ॥आवागमन फेर नहीं आसी। गर्भवास को दुख मिट जासी ॥ ( तोड़) है तू कुमता नार । करी तने पार ॥ अये क्यू बोल बोलती ॥२॥ कु०-स्याणी सुमता तू वनी अये हरण विराणू माल । र जरा. कैसी. करूँ मार उड़ाऊँ खाल ॥ चौपाई। '... अपरापुर के पास नहीं जावां । लख चोरासी में जीव भरमांव । विप रूपी वाने ~ इन्द्रसभा।
[१२२' ] T इन्द्रसभा। कु:-तू कद की भई सुन्दरी ये फिरे और की लार । अपने ही घर धार ले ये नहीं और में,सार ॥ चौपाई-। सार वार सव जाबोनी आगी। पिता हमारा है मोह वड़भागी ॥ दुर्मति देख संग सव लागी। तृष्णा न देख जावोली सब भागी। (तोड़) देखली पोल ।' मचादी रोल ॥ अये म्हारे रंग के ढोल्ये ॥ ७ ॥ इन्द्रसभा। सु०-सत्य कही सत्य मानली सत्य वचन प्रमाण । ल्यावो जल्दी मौह को क्यूँ करती है तोफान ॥ T । चौपाई। ! ", पोल बोल कोई हैं नहीं यहां पे। आशा तृष्णा देख मन कांपे ॥ हरि सतसंग होय - " - । .. M ६. १२३. ] नित जहां पे । मोह निकट नहीं आवे वहां पे. ।। (तोड़) अब तू म्हारी मान । लगाले ध्यान ॥ अये क्यू चोल बोलती ॥८॥ 7 इन्द्रसभा। कु०-वात सही तू मानली तो छोड़ जीव को साथा रस्ते थारे लाग जा जो चावत है कुशलात ॥ चौपाई घणो घमंड छायों है ये थारे ।" जाऊँ फौज ल्याऊँ ये म्हारी लारे ।। बोसा की मार , पड़ाऊँ ये थारे । जीवराज नै ल्यूं संग म्हारे । (तोड़) देखाहमारा काम । उड़ाऊँ चाम ।। अये म्हारे रंग के ढोल्यै ॥९॥ इन्द्रसभा। सु०-उत्तम मेरी जाता है सुमता मेरा नाम । जहां मेरा निवास है वहां नहीं कुमत का काम ।। - v- .. - [ १२४ ] चौपाई। कुमता फौज ल्यावसी मोह की । विघन विनाशन सरणै मैं थांकी ॥ विष्णु भीड़ चड़ आवो म्हांकी । ज्यूं द्रोपत् की लज्जा राखी ॥ (तोड़) चन्दर रह्यो है टेर। करो मत देर । अये क्यूं बोल वोलती ॥ १० ॥३८॥ सुमता की जीवराज से।। लावणी। टेर । कुमता, कुबुध करन की ठानी मोह जाय ल्यावै । अजी हृदय ईश्वर नाम रटो कोई निकट नहीं आवे । । जीवराज की सुमता से। टेर। दशरथ "नन्दन असुर निकंदन करुणा सुण आवे। दिल में धीरज धार कुमत का फन्दा कटजावे ॥ सु-(चोक ) काम क्रोध मद लोभ मोह संग फोज कुमत ल्यासी । लख चोरासी . - १२५ ] मांय आप नै फेरूँगिरवासी॥ आशा तृष्णा दुवघ्या दुर्मत संगलेर आसी।अंध कूप में नाख आपकी मुश्का वंधवासी । 'जाल फन्द में फसा पोल की चोकी बैठावै ॥ हृदय ईश्वर नाम०॥१॥ जी०--भगत'उवारण कष्ट निवारण मदद राम आसी। काम क्रोध मद लोभ मोह सब देख भाग जासी ॥ कुमता आशा तृष्णा ममता देख ही डर जासी । गों विप्र प्रतिपाल भगत की त्रास मेट जाली ॥ चन्द्र चरण धार हिरद गुण ईश्वर का गावे ॥ दिल में धीरज़ धार० ॥ २ ॥ ३८२ ॥ मोहराजा की कृमता से । टेर । पाछी क्यूं आई कुमता आप ये म्हाने भेद बताओ।
[ १२६,17 कुमता की मोहंराजा से, टेर । सुमता जमायो पूरण राज वो थे सुणो. पिता जी॥ " मो०--(दोहा) क्यूं आई तू आज ये स म्हानै कहो सभी समचार। फोज' हमारी सब ही चाई भेजी थारी लार॥ चहरा बहुत, उदास तुम्हारा कांई. कीनू जार ॥, अये, म्हानै भेद, बतावो ॥ १॥ कु०-कांई कहूँ कछु कही न जावे सुमता राज जमाया ! काम क्रोध मद-लोभ आपका कोई काम नहीं आया ॥ दशों द्वारै पहरा म्हाने नेम कंवर का पाया ॥ अजी थे सुणो पिता जी०॥२॥ मो०-सुण कर तेरी वात को स वाई हम करी तैयारी । उठे झाट वदन के मांही चालू लार तुमारी ॥ जीवराजाकी मुश्क बंधा r .
अपने हीथ उठाया॥ मार कोरड़ा तीन खेंच -- कर करस्यां बहुत खुवारी ना. अये सहानै भेद मो०-रूप हमारा देख भयानक जीव- (राज.घवरायांन मुश्क बांध कर कोरड़ा स मैं 1:-हे सुमता तू देख हमारा मोह पिता पलवान जीव बचा कर भाग जास नहीं करूँ बहुत हैरान ॥ 'अजी थे सुणो पिता जी ६॥ ३८॥ -१२ में वताओ ॥३॥ कु-हाथ जोड़ अर्जि करूं स थे अव मत देर लगावो। जीवराज नैं फसा फन्द म्हारै संग खिंदीवों ॥ म्हारो राज जमायो बावल-सुमताचाल हटाओ॥ अजी थे सुणो ॥ पिता जी ! --- . कर अपणै द्वारै- ल्याया ॥ अये म्हाने, भेद चंताओ०॥५॥ . ।
-- - २ टेर । सुमता [१२६ ] कुमता की मोहराजा से, ..., जमायो पूरण राज़ वो थे सुणो पिता जी॥ - मो०--(दोहा) क्यूं आई तू "आज ये स म्हानै कहो सभी समचार । फोज हमारी सब ही वाई भेजी थारी लार ॥ चहरा बहुत उदास तुम्हारा कांई, कानू जार ॥ अये, म्हानै भेद, बतावो ॥ १॥ -कु०--काई कहूँ कछु कही न जावे सुमता राज जमाया । काम क्रोध, मद लोभ आपका, कोई काम नहीं आया ॥ दशों द्वारै पहरा म्हाने नेम कंवर का पाया ॥ अजी थे सुणो पिता जी०॥२॥ मो०-सुण कर तेरी वात को स बाई हम करी तैयारी । उठे झान वदन के मांही चालूं लार तुमारी ॥ जीवराजाकी मुश्क बंधा । - [१२७: ], कर करस्यां बहुत खुवारी ॥ अये म्हानै भेद वताओ ॥३॥ - कु-हाथ जोड़ अर्जि करूंस थे अव मत देर लगावो । जीवराज नैं फसा फन्द में म्हारे संग खिंदावों ॥ म्हारो राज जमायो बावल सुमता चाल हटाओ॥ अजी थे सुणो पिता जी०॥४॥- - : मो-रूप हमारा देख भयानक जीव- राज घबराया । मुश्क बांध कर कोरड़ा स मैं अपने हाथ उठाया ॥ मार कोरड़ा तीन बँच कर'अपणे द्वारै ल्याया ॥ अये म्हाने भेद व्रताओ०॥ ५॥ १ . 'कु० हे मुमता तू देख हमारा मोह पिता वलवान । जीव' वचा कर-भाग जास नहीं लेस्यू थारा प्रान ॥ मार कोरड़ा खाल उड़ाऊँ करूँ बहुत हेरोन ॥ अजी थे सुणो पिता जी० ॥६॥३८॥ . ।"
है T [१२] सुमता की करुणा भगवान से। राग-मोहिनी। टेर। अरज म्हारी सुण ज्यो दीनदयाल कुमत नै रचो मेरे पे जाल ॥ (चोक) कुमर ने दुख पोत दीनां। पिया । कैद मोह कीना पीव विन मुश्किल जग जीना। आपका शरणां मैं लीना। प्रभु म्हारोकप्ट हरो तत्काल कुमत नै रच्यो मेरे पेजाल० ॥१॥ आवचेतायो कुम्हारी । करणा कीनी मिणजारी। सिरियादे आई सरण थारी त्रास प्रहलाद दई भारी बचाया मिणजारी का लाल ॥ अरज म्हारी सुन०॥२ गज्ज और ग्राह लड़े जल में । हार जव मानी गज मन में- ॥ चित्त उन दीनू चरणन में। गज्ज की टेर सुणी छिन में। उवा, गज्ज- राज का वाल ॥ अरज. म्हारी सुण ॥३॥ बृज पे इन्दर कोप कियो भारी। करी उन वरसन की त्यारी । डूबन जब 'लगी वृजः सारी।
[ १२ j गिरवर नख धार्यों गिरधारी । चाया वृज ग्वाल और बाल || अरज म्हारी सुण० ४॥ भारत में भवरी करी पुकार । जाण जन सुध लीनी करतार ! करी अंडा की जुध में सार हरि तुम गज घंटा दी डार । पक्षी पर दया करी नन्द लाल || अरज म्हारी सुण० ५॥ दुसाशन, क्रोध कीयो भारी । खैचयूं चीर कियो जारी। द्रोपद हुई सरणागत थारी आज हरी राख लाज म्हारी । आप हरि भक्तन के प्रतिपाल ॥ अरज म्हारी सुणः ॥६॥ आप हरि कई भक्त तारे । नाम मैं नहीं जाणू सारे । नाव आ अटकी हे मझधार । करो हरि भवसिन्धु से पार । वचाओ म्हाने दुष्टों से गोपाल । अरज म्हारी सुण०॥ ७ ॥ सरण में सुमता हूँ जारी । अव हरि खोल पलक थारी । दुःख गौ कन्या पे भारी । नाथ अव लाज राख म्हारी । वीनती करता चन्द्र- लाल ॥ अरज म्हारी सुण ॥८॥ ३६६ [ १३२ । 1 -- लक्ष्मी जी का । शेर। खमा खमा घणी खमा हो जगत प्रतिपाल जी। जाग्या क्यू काची नींद से इस का कहो प्रभु हाल जी ॥ लक्ष्मी कहे कर जोड़ कर 'सुणज्यो थे दीन दयाल जी.'। सेवा में कांई चूक हुई कोप्या क्यू' श्री गोपाल जी ॥४०८ ।।। भगवान का शेर । मृत्यु लोक में भक्त यक वस कष्ट के सुमिरण किया। कुमंता का कहणा मान मोह ने जाल उस पर रच दिया ॥ तेरा नहीं कुछ दोष लक्ष्मी हर्ष में राखो हिया । खेंचे है उसकी डोर मुझकुंठोर वहां जाना प्रिया ॥४॥ लक्ष्मी जी की भगवान से। राग-शेखावाटी. " , टेर। कोई चूक हमारी निन्द्रा' क्यू दीनदयाल जी। ~ - -- [ १३३ ] भगवान की लक्ष्मी जी से। टेर । भई भीड़ भगत में थरहर सिंगा- सण.धूजे लक्ष्मी ॥ ल०-(चोक) निन्द्रा काची तजी आप क्यूँ चूक हुई कांई म्हारी । प्रभू जी कहो हकीकत सारी । शेष सेज सुख नीद विसारी या काई दिल में धारी ॥ प्रभु जी अरज़ सुणो थे म्हारी ॥ त्रिभुवन के रक्षक प्रतिपालक कांपे काया म्हारी ॥ प्रभू जी मैं अर्धाङ्गि थारी ॥ (झेला ) में अर्धाङ्गि थांरी लाजे म्हारी राख जो। आव मन विश्वास सत्यः प्रभु भाप ज्यो | काई चूक म्हारी० ॥१॥ भ०-भगत भीड़ वश करुणा कीनी सिंगासन थर्रायो।मोह ने उसकूँ आण सतायो। 'कुमता तृष्णा ममता मद ने घेरो आण लगायो। लक्ष्मी भगत वोत घवरायो । करके ।
- . [ १३२ ] लक्ष्मी जी.का । शेर। खमा खमा घणी खमा हो जगत प्रतिपालं जी। जाग्या क्यू काची नींद से इस का कहो प्रभु'हाल जी। लक्ष्मी कहे कर जोड़ कर 'सुणज्यो थे दीन दयाल जी । सेवा में काई चूक हुई कोप्या क्यू श्री गोपाल जी ॥४८॥ भगवान का। शेर। मृत्यु लोक में भक्त यक वस कष्ट के सुमिरण किया । कुमता का कहणा मान मोह ने जाल उस पर रच दिया || तेरा नहीं कुछ दोष लक्ष्मी हर्ष में राखो हिया । खेचे. है उसकी डोर मुझकुंठोर वहां जाना प्रिया ॥ ४० ॥ लक्ष्मी जी की भगवान से। राग- शेखावाटी। टेर । कांई चूक हमारी निन्द्रा क्यू त्यागी दीनदयाल जी।
म कुमता तृप्णा'ममता मद ने घेरों आण [ १३३ ] । भगवान की लक्ष्मी जी से। टेर। भई भीड़ भगत में थरहर सिंगा- सण धूजे लक्ष्मी ॥ ल०-(चोक) निन्द्रा काची तजी आप क्यू चूक हुई कांई म्हारी । प्रभू जी कहो हकीकत सारी । शेष सेज सुख नींद विसारी या काई दिल में धारी ॥ प्रभु जी अरज सुणों थे म्हारी ॥ त्रिभुवन के रक्षक प्रतिपालक कापे काया म्हारी ॥ प्रभू जी में अर्धाङ्गि थारी,॥ ( झेला) में अर्धाङ्गि थारी लाज़ म्हारी राख जो। आव मन विश्वास संत्यप्रभु भाप ज्यो । कांई चूक म्हारी० ॥१॥ भ०-भगत भीड़ वश : करुणाकीनी सिंगासन थर्रायो। मोह ने उसकूँ आण सतायो। लगायो। लक्ष्मी भगत'वोत घबरायो। . a ne . [ १३४ ] करुणा सरणा लीना काची नींद जगायो । खेंच रही डोर जोर म्हानै आयो । ( झेला) जोर म्हानै आयो तेरी कुछ चूक ना। भगत वचावन काज मुझे वहां पूगना ।। भई भीड़ - - भगत० ॥२॥ । लं०- चरण पलोटे लक्ष्मी स थे करो प्रभु आराम । रात मत त्यागो जी निद्रा श्याम । कोन गढ़ां का रहने वाला कौन भगत काई नाम ॥ प्रभू जी जावो तो किसके धाम । जो प्रभु भगत वचावन जाओ भोर होणयो श्याम प्रभू जी थे हो पूरण काम । (झेला) थे हो पूरण काम चन्द्र नित का रटे। सुमर्या होवें सिद्ध संकट सव का हटे ॥ कांई चूक हमारी० ॥३॥ भ०-कायागढ़ का जीवराज है भगत वहोत दुख पावे । लक्ष्मी अब नहीं निद्रा । [ १३५ ] आवे देर लगाकर लक्ष्मी से म्हारो मतना विरद लजावे । नाम म्हारोजग झुटो होजावे। में नहीं मानूं एक तुम्हारी डोरी खेच्या जावे। बचावन, भवत अभी हम जावें ॥ ( झेला) हाजी अभी हम जावें कष्ट जाकर हरां॥ चन्द्र की सुण टेर काज उस का करां ॥ भई भीड़ भगत०॥४॥४१३ ॥ जीवराज की सुमता से ।- रागनी। टेर । डर्या मोह जाल से ये तेस झूठा, हे गोपाल ॥ सुमता की जीवराज से। टेर । धीरज दिल में धरो हो पिव जी आसी दीन दयाल ॥ जी०-(चोक) स्वार्थ की वाके प्रीत है ये सुमता सुण जे चित्त लगाय । विन मतले त 7 मा T ला भगत निद्रा । [ १३६ ] झांके नहीं ये तू तो झूठा जस रही गाय । डर्या मोह जाल० ॥१॥ सु०-जल इवत गज तारियो हो पिर जी गावे वेद पुराण । द्रोपत चीर वधाविया हो अपना पांडु भगत पिछाण,॥ धीरज दिलं में धरो०॥ २ ॥ जी०-गज नै गणपत जाण के ये सुमता ग्राह से लियो बचाय । वहन द्रोपद जाण के ये वाकी साय करी है आय ॥ डर्य मोह जाले० ॥३॥ सु०-मारी पूतना जान से वै तो अंचल हर्या पिरान । मुथरा कंस पछाडियो हो पिक जी भगत देव पहचान ॥ धीरज : दिल में धरो० ॥४॥ : जी०-दासी मारी सुमता नहीं सूरां को कामा ॥ म । ।
[ १३७ ] ये सुमता उगरसेन को नाम ॥ डर्या,मोह जाल०॥५॥ सु०-निर्धन भगत उबार्यों हो- पिव जी विष सुदामा आप। कञ्चन महल बणा दिया हो वाकी हरली. तीन ताप ॥ धीरज दिल में धरो०॥६॥ जी०-वालपना की दोस्ती ये सुमता पढ्या एक पोसाल । पहली चांवल खालिया ये सुमता पाछ कयों निहाल ॥ डर्या मोह जाल०॥७॥ सु०-मीरा विप ने, पी गई हो पिव जी सच्चा ईश्वर जान ॥ पूरण प्रेम पिछाण के हो प्रभु जी अमृत कीनो आन ॥ धीरज दिल में धरो० ॥८॥ ' जी-सत्य नाम रटना रद्दू हे सुमता सत्य वचन परवाण । आणू हो तो आवसी । - [ १३ ] ये, मैं तो सत पर तजूं पिरान ॥ डा मोह जाल०॥९॥ 'सु०-तारन कारण आविया हो प्रभु जी ऊठो नैन निहार । मोह कुमता सव भग गया हो पिव जी देख हरी ओतार ॥ धीरज दिल में धरो० ॥१०॥ जी०-दर्शन कर परसन हुया हो प्रभू के पडयो चरण में आय । चन्दर की विनती सुणो हो प्रभू जी कर भक्तां की साय ॥ डा मोह जाल० ॥११॥४२४॥ विश्नुभगवान की जीवराज से। । (रागनी) टेर। भगत वश मैं फिरूँ वो हूँ मैं भक्तां को आधीन । जीवराज की भगवान से । टेर । कुमत फन्द डारियो हो प्रभु जी मोह से दियों घंधाय ॥ - - --
स
-
[ १३४. ]
विश्नु-(दोहा) भगत भरोसो जाणसी
वो जाका पूरण हो सी काम । निशवासर
बिसरे नहीं वो म्हारो रटे सतसे नाम ॥ भग-
वत वश मैं फिरूँ॥१॥
जी०-(दो०) हरि माया बलवान है जी
प्रभु.जी कोई न पायो पार । नाम विसार्यों
आपको वो प्रभु जी कुमत फन्द दियो डार ॥
कुमत फन्द डारियो० ॥२॥
वि०-गर्भवास बस कष्ट में वो तू तो
की कोल करार । बाहिर सुख में आय के
वो तू तो दीनूं नाम विसार। भगवत, वश में
फिरूँ०॥३॥
जी०काम क्रोध-मद लोभ ने जी प्रभु
जी घेर लियो मोहे आन । कुमता तृष्णा
मोह ने जी प्रभु जी फसा छुडायो ध्यान ॥
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कुमत फन्द डारियो०॥४॥
R . 1 [ १४०. ] वि०-सत्य सुमत धारण करी जी थारी पूरी मन की आस । काम क्रोध मद लोभ मोह वो थोरै कुमता रह न पास ॥ भगवत वश मैं०॥५॥ जी०-चरण कमल, हृदय धरूँ जी प्रभु जी कर जोड करूँ अदास । कुमंता पिता समझाय द्यो जी प्रभु जी आवे,मन विश्वासः॥ कुमत फन्द डारियो० ॥६॥४३०॥ . . , मोर की भगवान से। लावनी। टेर। मुझे लाया पकड़ के दूत त्रास दिखला कर। मैं हाजर हूँ को चाकर। भगवान की मोह से। • टेर । कुमता का कहना मान जाल फैलाया। ले कुटुंम्ब संग आ मेरा भक्त सताया। महाराज चरण ।
[ १४१ ] ' , मो-हरि भक्त आपका में नहीं इस को जाना । इसलिये कुमत का कहा नाथ में माना ॥ मैं त्रास दिखाई जान इसे अज्ञाना। अब मैं प्रभु इसे पूरणं भक्त पिछाना॥ सुमता का बताया नार्थ संग थे आकर । हाजर महाराज चरण को चाकर ॥१॥ Dhco भगवान-सुमता का कीना संग धीरज इन धारी । मैं भेज ज्ञान -को हुकम कराया जारी ॥ संतोपी सन्त उपदेश काज देहधारी। उन नेम धर्म वृत धार कुमतं करी न्यारी ॥ हरि भजन शील संतोष वोल कोल करवाया। ले कुटुंब संग आ मेरा भक्त सताया ॥२॥ • मो-सुमता को वासो भगत 'माय वतायो । मुझे जान कुकर्मी नाथ आप विस- रायो। जमराज हुकम से मृत्युलोक में आयो।' प्रभु वास वतावो दास वहुत घवरायो ॥ थां -- . - [ १४.] वि०-सत्य सुमत धारण करी जी थारी पूरी मन की आस । काम क्रोध मद लोभ मोह वो थोरै कुमता रह न पास॥ भगवंत वश मैं०॥ ५॥ जी०-चरण कमल हृदय धरूँजी प्रभु जी कर जोड करूँ अर्दास । कुमता पिता समझाय द्यो जी,प्रभु जी आवे मन विश्वासः॥ कुमत फन्द डारियो० ॥६॥४३०॥ मोह की भगवान से। लावनी।' टेर । मुझे लाया पकड़ के दिखला कर । मैं हाजर हूँ महाराज चरण को चाकर। भगवान की मोह से। टेर । कुमता का कहना मान जाल फैलाया। ले कुटुंब संग आ मेरा भक्त - . - T दूत त्रास . सताया।
Dhool [ १४१ ] मो-हरि भक्त आपका में नहीं इस को जाना । इसलिये कुमत का कहा नाथ में माना ॥ मैं त्रास दिखाई जान इसे अज्ञाना। अब मैं प्रभु इसे पूरण भक्त पिछाना ।। सुमता का बताया नाथ संग थे आकर । हाजर महाराज चरण को चाकर ॥६॥ भगवान-सुमता का कीना संग,धीरज इन धारी। मैं भेज हुकमः कराया जारी॥ संतोषी सन्त उपदेश काज देहधारी। उन नेम धर्म वृत धार कुमत करी न्यारी । हरि भजन शील संतोप वोल कोल करवाया। ले कुटुंब संग आ मेरा भक्त सताया I मो सुमता को वासो भगत 'मार बतायो । मुझे जान कुकर्मी नाथ आपं विस रायो । जमराज हुकम से मृत्युलोक में आयो प्रभु बास बतावो दास बहुत घवरायो ॥ थ ज्ञान को - [ १४४ ] नाथ दयाल० ॥ ५॥ अचल अभय वर भक्ति वर द्यो हृदय कीजो वास । कलियुग कष्ट पड़े भक्तां मे आ पूरो प्रभु आस ॥ पधार्या दाना- नाथ दद्याल० ॥६॥ माह महीनै वसंत पञ्चमी सोमवार सुद जान । संवत गुन्नीसै गुन्न्यासी विक्रम साल पिछाण ॥ ७॥ लेखक का + . H टेर-। अरच म्हारी सुणज्यो जी सज्जन मजाल्लस के दरम्यान हाजर ख्याल आपके कीनो बुद्धि के अनुसार । जीवराज सुमता राणी को ख्याल सुणायो गार ॥ भूल चूक ज्यो होय हमारी लीजो कवि सुधार । अरज म्हारी सुणज्यो जी० ॥१॥ माफ करो मेरे को आप तकलीफ उठाई भारी । रैन गुजारी नींद विसारी, लीनि सुधि, हमारी ॥ ज्ञान ध्यान और नेम धर्म से रीजो आप सत [ १४५ ] धारी अरज म्हारी सुणज्यो जी० ॥२॥ नेकी धीरज सत सुमता को सज्जन चित में धारो। शील और सन्तोपधारज्योकहवे दास तुमारो॥ परउपकार दया रख मन में हरि को नाम उचारो ॥ अरज म्हारी सुणज्यो जी० ॥३॥ राधामाधो जी का मन्दिर कहिये सेवक कुमा- वत जान । “प्रहलाद" पुजारी पूजा, करता सुत "मंगल" (जी) कान्जान ॥ तन मन सेती सेवा करता धरे प्रेम से ध्यान ॥ अरज म्हारी सुणज्यो जी०॥४॥ नया सहर में बास दास का डिग्गी कनै मुकाम । जात मेरी कुमावत हे जी "चन्दर" मेरा नाम ॥ हाथ जोड़ में करूं वीनती सव झेलो जे राम ॥५॥ इति शुभम् । ज्ञानप्रकाश ख्याल । द्वितीय भाग समाप्त ।
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