Hindi Sahataya Samalayan

Prathimalankar Nirupan

PDF Proofread

Front matter

प्रथमालङ्कार-निरूपण
हिन्दी-साहित्य-सम्प्रेलन की प्रथमा परीक्षा के
विद्यार्थियों के लिए परीक्षासमिति से
स्वीकृत
लेखक
पण्डित श्रीचन्द्रशेखर शास्त्री
Hamamar
प्रकाशक
हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग
वि० सं० १९८१
द्वितीय संस्करण]
[ मृत्य २ श्राने

विषय-सूची
१-जानने योग्य कुछ बातें
२-अनुप्रास
७--८
...
...
...
४-उपमा
५-उत्प्रेक्षा
६-रूपक
७-अपन्हुति
८-श्लेष
१-अतिशयोक्ति
१०-विभावना
१५-अर्थान्तरन्यास...
E--१२
१२.-१५
१५-१९
१९-२५
२५.
२५-३०
६०--३२
३२-३४
...
...
...
...

प्रथमालङ्कार निरूपण
200000
अनुप्रास
अनुप्रास शब्द का अर्थ है रसों के अनुरूप सहश व
का विन्यास | स्वरों के बिना भी केवल व्यञ्जनों की समता
होने पर यह अलङ्कार होता है । इसके प्रधान तीन भेद
छेकानुप्रास, वृत्यनुप्रास, और लाटानुप्रास ।
लक्षण
स्वर समेत अच्छर पदनि आवत सदृश प्रकाश ।
भिन्न अभिन्न पदन सों छेक लाट अनुप्रास ॥
स्वर सहित अक्षरों की जहाँ समता हो उसे छेकानुप्रास
कहते हैं, और स्वरसहित जहाँ पदों की समता हो उसे लाटा-
नुप्राप्त कहते हैं । पद चाहे भिन्न हों या अमिन्न, अर्थात् वे
दूसरे अर्थ के वाचक हो, या समान ।
यह लक्षण भूषण कवि का है। दूसरे पण्डितों की राय
कि व्यञ्जनों की समता होनी चाहिए, स्वरों की कोई बात नहीं,
भनेक वणों की जहाँ एक बार समता हो वहाँ छेकानुप्रास
समझना चाहिए । एक या अनेक वर्णो की जहाँ भनेक बार
समता हो वहाँ वृत्यनुप्रास होता है । लाटानुप्रास वहाँ होता.
है जहाँ एक ही पद दो बार श्रावे, और केवल तात्पर्य उनका
भिन्न हो।

.
।
( २ )
३-उभयालङ्कार-शब्द और अर्थ दोनों में रहने वाला
अलङ्कार उभयालङ्कार कहा जाता है।
यह कहा गया है कि अलङ्कारों के प्राश्रय हैं शब्द और
अर्थ । इसलिए इनके विषय में थोड़ा लिख देना आवश्यक
प्रतीत होता है
शब्द-नाम और क्रिया । इन दोनों के योग से वाक्य बनते
हैं। वाक्य ही से अर्थ बोध होता है और ये ही ग्स के भी
आश्रय हैं।
वाक्य के लिए तीन बातों का होना आवश्यक है। वय
है-(१) योग्यता (२) श्राकाङ्क्षा (३) आसत्ति ।
योग्यता-पदों का परस्पर सम्बन्ध होने की शक्ति । "घी
पीता है। यह वाक्य तो ठीक है, पर "पत्थर से नहाता है। यह
वाक्य'ठीक नहीं, इसमें प्रेग्यता नहीं। द्रवपदार्थ से नहाय
जाता है, पत्थर द्रव पदार्थ नहीं है, अतएव “पत्थर से नहात
है" यह वाक्य योग्यता न होने से ठीक नही माना जाता।
आकाक्षा-वाय य में ऐसे शब्दों का रखना जो आपस में
साकाङ्क्ष हैं।। मैं जाता हूं' इस वाक्य में “मैं " यह पद
"जाता हूं" इस पद की अशेप रखता है, पर यदि कोई कहे-
"घोड़ा, ऊँट, पत्थर, पेड़" इन शब्दों के साथ और कुछ न कहें
तो ये शब्द वाक्य न होंगे और इनका कुछ अर्थ न होगा।
आसत्ति-एक वाक्य में आने वाले पदों के उच्चारण में
व्यवधान न होना भासत्ति है । एक वाक्य का उच्चारण ऐसा
करना चाहिए जिससे उस वाक्य के सब पदों के पारस्परिक
सम्बन्ध का ज्ञान हो सके
.

( ३ )
शब्दों के अथं तीन प्रकार के होते हैं । १ अभिधेय: २ लक्ष्य
३व्यङ्ग्य।
अभिधेय-अभिधा के द्वारा जो अर्थ बोधित हो उसे
अभिधेय कहते हैं। शब्दों का स्वाभाविक अर्थं अभिधेय कहा
जाता है।
लक्षय-लक्षण के द्वारा कहे जाने वाले अर्थ लक्ष्य है। मुख्य
अर्थ के बोध होने पर मुख्य अर्थ से मिलते जुलते जिस दुसरे
अर्थ का बोध हो वह लक्ष्य कहा जाता
व्यङ्ग्य-ध्याना के द्वारा जिस अर्थ का वोत्र हो वह
व्यङ्ग्य है । लक्ष्य औरअभिधेय अर्थ से भिन्न अर्थ व्यङ्ग्य है
है

जानने योग्य कुछ बातें
सोने चांदी के गहनों से शरीर की शोभा हाती है और
उस शोभा से गहने पहनने वाला आदमी भी खूबसूरत मालूम
होने लगता है। अलङ्कारशाल के विद्वानों ने काव्य की भी
एक शरीरधारी पुरुष से तुलना की है। काव्यपुरुष की प्रात्मा
रस है, और शब्द तथा अर्थ शरीर। अलङ्कार शरीर में (शच
और अर्थ में) धारण किये जाते हैं और ये अलङ्कार शब्द अर्थ
के द्वारा अर्थात् शरीर के द्वारा आत्मा-रस-की भी शोभा
बढ़ाते हैं। इस कारण ये रस के भी अलङ्कार कहे जाते हैं।
रस
नौ हैं उनके नाम ये हैं, शृङ्गार, वीर, करुण, अद्भुत, हास्य,
भयानक, वीभत्स, रौद्र और शान्त |
अलङ्कार
तीन प्रकार के होते हैं, २-शब्दालङ्कार,
जो केवल शब्द
में ही रहे, अर्थात् एक शब्द के विन्यास करने पर जो अलङ्कार
रहे, यदि वह शब्द बदल दिया जाय और उसके स्थान पर
उसी शब्द के अर्थ कहने वाला दूसरा शब्द लाकर रखा जाव
तो वह मलङ्कार न रहे उसे शब्दालङ्कार कहते हैं।
२-अलङ्कार-यह अलङ्कार अर्थ में होता है। शब्दों के
उलट फेर होने पर भी मालङ्कार ज्यो का त्यों बना रहता है।
-

. उदाहरण नरदेव सम्भव वीर वह रणमध्य जाने के लिए, बोला बचन निज सारथी से रथ सजाने के लिए। यह विकट साहस देख उसका सूत विस्मित हो गया, कहने लगा इस भाँति फिर वह देख उसका वय नया । (जयद्रथवध) अर्थ स्पष्ट है। इस पद्य के पहिले पाद । इस पद्य के पहिले पाद में वह, औरर की समता है, दूसरे पाद में व, र, थ और स की समता है, तीसरे पाद में स की समता है, और चौथे पाद में ह की। इसलिए यहाँ 'छेकानुप्रास' अलङ्कार हुआ। वृत्यनुप्रास का उदाहरण बानर वरार बाघ वैहर विलार बिग बगरे बराह जानवरन के जोम है, भारे भालुक भयानक हैं भीतर भवन भरे लीलगऊ लाम हैं। ऐडायल गजगन गैंडा गररात गनि गेहन में गोहन गरूर गह गौम है, सिवाजी की धाक मिलें खलकुल खाक बस खलन के खेरन खबीसन के खाम हैं। ब, भ, ग, और ख, क्रम से पहिले, दूसरे, तीसरे और बौथे पाद में कई बार आये हैं, इसलिए यह वृत्य नुप्रास हुा । वृत्तिगत अनुप्रास को वृत्यनुप्रास कहते हैं। काव्यशास्त्र में तीन प्रकार की वृत्तियाँ हैं-उपनागरिका, परुषा और कोमला। इनके लक्षण ये हैं :- भूपत भनत , -

( ७ )
उपनागरिका-पदों के जिस गठन में माधुर्यव्यञ्जक वर्णो
की अधिकता हो।
परुषा-जिसमें भोजाप्रकाशक कठोर वर्गों की अधिकता
हो।
कोमला-जिसमें माधुर्य और प्रोजःप्रकाशक वर्णों से
भिन्न अर्थात् प्रसादगुणयुक्त वर्ण हों।
लाटानुप्रास का उदाहरण
औरन के जाँच कहा नहि जाँच्यो शिवराज ।
औरन के जाँचे कहा जो जाँच्यो शिवराज ॥
औरों के जाँचने से क्या, यदि शिवराज से नहीं जाँचा,
यदि शिवराज से जाँचा तो फिर औरों से जाँचने की ज़रूरत
ही क्या
यहाँ पक ही पद तात्पर्य के भेद से दो बार आया है। यह
लाटानुप्रास है।
यमक
भिन्न अरथ फिरि फिरि जहाँ ओई अक्षर वृन्द ।
आवत हैं सों जमक करि बरनत बुद्धि विलन्द ॥
अर्थ भिन्न हो या अर्थ न भी हो, पर आकार भिन्न न हो
ऐसा पद दो बार या कई बार जहाँ श्रावे वहाँ यमकालङ्कार
समझा जाता है।
उदाहरण
पूनावारी सुनि के अमीरन की गति लई,
नागिवे को मीरन समीरन की गति है

( ८ )
मारयो जुरि जंग जसवन्त जसवन्त जाके
संग के ते रजपूत रजपूत पति हैं।
भूषन भने यो कुल भूषन भुसिल शिवराज
तोहि दीन्हीं शिवराज बरकति हैं।
नौह खंड दीप भूप भूतल के दीप प्राजु
समै के दिलीप दिलीपति को सिदति हैं ।
मीरन, जसवन्त, रजपूत, भूषन, सिवराज, दिलीप आदि
पद दो बार आये हैं। इसलिये यह यमक अलङ्कार ।
ये दोनों शब्दालङ्कार हैं।
उपमा
जहाँ दुहन की देखिए सोभा बनत समान.
उपमा भूषन ताहि को भूषन कहत सुजान ।।
जहाँ दोनों-उपमान की शोभा-धर्म समान हो वहाँ
उपमालङ्कार समझना चाहिए।
उपमान आर उपमेय का लक्षण
जा को बरनन कीजिए सो उपमेय प्रमान
जाकी सरवरि कीजिए ताहि कहत उपमान ।।
जिसका वर्णन किया जाय वह उपमेय है और उपमय की
जिससे तुल्यता बतलाई जाय वह उपमान है।
उपमा के प्रधानतः दो भेद हैं, पूर्ण और लुप्ता। पूर्णा
उपमा वह है, जहाँ उपमेय उपमान इन दोनों का साधारण

( )
धर्म और उपमावाचक शब्द वर्तमान हो। जहाँ इनमें से कोई
न हो वहाँ जुता उपमा कही जाती है।
उदाहरण
मासताखाँ दुर्योधन सो ौ दुसासनसो जसवन्त निहार्यो।
द्रोन सो भाउ करन्न करन्न सो और सबै दल सो दल भार्यो ।
नाहि विगोय सिवा सरजा भनि भूषण श्री निछतायो पछारयो।
पारथ के पुरुषारथ भारत जैसे जगाय जयद्रथ मारयो।
इस पद्य में शिवाजी की तुलना अर्जुन से की गई है।
दोनों के साधारण धर्म पुरुषार्थ का भी यहाँ उल्लेख है और
उपमावाचक शब्द है "जैसे"।
लुप्ता उपमा
उपमा वाचकपद धरम उपमेयो उपमान ।
जामें सो पूर्णापमा लुप्त घटतलौं मान ॥
इसका अर्थ ऊपर लिखा गया है।
उदाहरण
पावक तुल्य अमित्रन को भयो मीतन को भयो धाम सुधा को।
भानन्द भो गहिरो समुदै कुमुदावलि तारन को बहुधा
भूतल माहि बली शिवराज भो भूषन भाखत शत्रु मुधा को।
वन्दन तेज त्यों चन्दन कीरति सांधे सिंगार वधू वसुधा को ।।
इस पद्य में अमित्रों के पावक तुल्य और मित्रों के लिए
सुधा का धाम बतलाया गया है। दाहक और भानन्ददायक
इन साधारण धर्मों का उल्लेख नहीं है। अतएव यह लुप्तो.
पमा है।
को।

. लुप्तोपमा के और भी कई भेद होते हैं। धर्मलुप्ता, वाचक- धर्मलुता, उपमानधर्मलुप्ता आदि । जहाँ केवल साधारण धर्म का लोप हो वह धर्मलुप्ता, जहाँ वाचक और धर्म का लोप हो वह वाचकधर्मलुप्ता, जहाँ उपमान और धर्म का लोप हो वह उपमानधर्मलुप्ता। उपमेयोपमा जहाँ परस्पर होत है उपमेयो उपमान भूषन उपमेयोपमा ताहि बखानत जान ॥ जहाँ उपमेय और उपमान परस्पर. उपमेय और उपमान बन जायँ, वह उपमेयोपमा अलङ्कार कहा जाता है। उदाहरण तेरा तंज सरजा समत्थ दिनकर सो है, दिनकर सोहे तर तेज के निकर सो। भौसिला भुवाल तेरो जस हिमकर सा है, हिमकर साह तेरे. जसको अकरमी। भूषन भनत तेरो हियो रतनाकर सो, रतनाकरी है तेरे हिय सखकरसो। साहि के सपूत सिव साहि दानि तेरो कर, सुरतरु साहै सुरतरु तेरे करनी॥ इस पद्य में शिवाजी का तेज दिनकर के समान और दिन- कर शिवाजी के तेज के समान । चन्द्रमा यश के समान और. यश चन्द्रमा के समान । हृदय समुद्र के समान और. समुद्र हृदय

के
( ११ )
के समान, हाथ कल्पतरु के समान और कल्पलरु हाथ
समान बतलाया गया है। इसमें उपमेय का उपमान बनना
और उपमान का उपमेय बनना स्पष्ट है। इसलिए यहां
उपमेयोपमा अलङ्कार समझा जाता है
मालोपमा
जहां एक उपमेय के होत बहुत उपमान ।
ताहि कहत मालोपमा भूषन सुकवि सुजान ॥
जिस पद्य में एक उपमेय के अनेक उपमान हो वहाँ मालो-
पमा अलङ्कार समझना चाहिए।
उदाहरण
इन्द्र जिमि जम्भ पर बाडव सुभम्भ पर,
रावन सदम्भ पर रघुकुलराज है ।
पौन वारिवाह पर सम्भु रतिनाह पर
ज्यां सहसबाह पर राम द्विजराज हैं ।
दावा द्रुमदण्ड पर चीता मृगझुंड पर
भूषन वितुंड पर जैसे मृगयज है
तेज तमअंस पर कान्ह जिमि कंस पर
त्यों मलेच्छ वंश पर शेर शिवराज है॥
इस पद्य में एक ही शिवराज के उपमान बहुत से बतलाये
गये हैं जिससे उपमानों की एक माला बन गयी है। इसलिए
इस अलङ्कार का नाम मालोपमा है।

( १२ )
ललितोपमा
जहँ समता को दुहनकी लीलादिक पद होत ।
ताहि कहत ललितोपमा सकलकविन के गोत॥
कवियों का समूह उस अलवार को ललितोपमा कहता है
जहाँ उपमेय और उपमान की समता बतलाने के लिए लीला
वहसत, निदरत, हसत, छवि अनुहरत, शत्रु, मित्र प्रादि पदों
का प्रयोग किया जाय ।
उदाहरण
साहि तनै सरजा सिवा की सभा जामधि है
मेरुवारी सुर की सभा को निदगति है,
भूषन भनत जाके एक एक सिखरते
केतेधा नदी नद को रेल उतरति है।
जोन्ह को हँसत जोति हीरा मनि मन्दिरन
कन्दरन छवि कुहू को उछाति है,
ऐसो ऊँचो दुरग महाबली को जामें
नखताधली मो बहस दिपावली करति है
निदरति और बहस श्रादि शब्दों के आने से यह
ललितोपमा है।
उत्प्रेक्षा
आन बात को आन में जहँ सम्भावन होय ।
वस्तु, हेतु, फल युत कहत उत्प्रेक्षा हैसोय ॥

उपमेय को उपमान के रूप में सम्भावना करना उत्प्रेक्षा-
लङ्कार है। वह वस्तु, हेतु और फल भेद से तीन प्रकार
की है।
वस्तूत्प्रेक्षा का उदाहरण
दानव प्रायो दगा करि जाबली दीह भयारों महामद मारयो।
भूषन बाहु बली सरजा तेहि भेदिवे को निरसंक पधार्यो ।
बीलू के घाव गिरे अफजल्लही ऊपर ही सिवराज निहारयो।
दाबि यो बैठो नरिन्द अरिन्द हि मानो मयन्द गयन्द पछार्यो॥
शिवाजी ने अफ़जल को पछारा, मानो सिंह ने हाथी को
पछारा,
है। यहां वस्तूत्प्रेक्षा है क्योंकि उपमेय की सम्भावना
उपमान के रूप में की गयी है और वह समभावना वस्तु विषयक
है। यह उक्त और अनुक्त भेद से दो प्रकार की होती है।
हेतू-प्रेक्षा का उदाहरण
लूट्यो खानदौरा जोरावर सफजंग अरु
लह्यो मार तलवखाँ मानहु अमाल है।
भूषन भनत लूट्यो पूना में सइस्तखान
गढ़न में लूट्यो त्यों गढ़ो इनको जाल है।
हेरिहेरि कूटि सलहेरि बीच सरदार
घेरिघरि लूट्यो सब कटक कराल है।
मानो हय हाथी उमराव करि साथी
अवरंग डरि शिवाजी पं भेजत रिसाल है।
यह हेतूत्प्रेक्षा का उदाहरण है । डरने के कारण रिसाला
भेजने की यहाँ सम्भावना की गयी है। इस के दो भेद हैं।
एक का नाम सिद्ध और दुसरे का नाम प्रसिद्ध है।

( १४ )
फलोत्प्रेक्षा का उदाहरण
जाहि पास जात सोतौ राखि ना सकत याते
तेरे पास अचल सुप्रीति नाधियतु है।
भूषन भनत सिवराज तब कीत्तिसम
भौर की न कीत्ति कहियो को कांधियतु है।
कौ
अनुज
ते उपेन्द्र अवतार याते
तेरो बाहुबल लै सलाह माधियतु है।
पायतर आप नित निडर बसायवे को
कोट बाँधियतु मानों पाग बाँधियतु है
इस पद्य में कोट का बांधना पाग बांधने के समान बत-.
लाया गया है और वह सम्भावना निडर बसाने के लिये की
गयी है, इसलिए यह फलोत्प्रेक्षा है।
गम्योत्प्रेक्षा
मानो इत्यादिक वचन पावत नहि जेहि गर ।
उत्प्रेक्षागम
गुप्त
मा
भूपन कहत अमार ॥
मानो, जनु, ममझता ह, यह सन्देह हो रहा है, आदि
उत्प्रेक्षा के वाचक हैं। जहां ये शब्द न हो, पर उत्प्रेक्षा की
गयी हो वहाँ गम्योत्प्रेक्षा समभाना चाहिए।
उदाहरण
और गढाई नदी नद, सिव गढ़पाल दग्याव ।
दौरि दौरि चहुँ ओर ते मिलत मानि यह भाव ।

(१५ ) समान गढ़, नदी नद आदि के समान है, शिवाजी समुद्र के हैं, इसी भाव से प्रेरित होकर चारों ओर से दौड़ दौड़ गढ़ शिवाजी के पास आते हैं। इस पद्य में यदि 'मानो' होता तो वह गम्योत्प्रेक्षा का उदाहरण न होता। पर वह नहीं है, इसलिए यह गम्यात्प्रेक्षा का उदाहरण हुश्रा । गम्योत्प्रेक्षा का अर्थ यह है कि यह उत्प्रेक्षा गम्य है, उत्प्रेक्षा वाचक शब्दों के द्वारा बिना कहे जाने पर भी यह जानी जाती है। रूपक अलङ्कार का लणक्ष जहां दुहन को भेद नहिं बरनत सुकवि सुजान। रूपक भूषन ताहि को भूषन करत बखान । अर्थ-जिस वाक्य में सुजान कवि उपमेय और उपमान के भेद को नहीं प्रकट करते, किन्तु उसको छिपा लेते हैं उसी वाक्य में रूपक भूषन, अर्थात् रूपक अलङ्कार है यह बात भूषन कवि कहते हैं। उपमान और उपमेय ये दोनों भिन्न वस्तु हैं। उपमालङ्कार में इनकी भिन्नता पूरी पूरी प्रतीत होती है। उत्प्रेक्षा में वह थोड़ा कम हो जाती है, पर रूपक में वह बिलकुल नहीं रहती। “चन्द्रमा सा मुख" यह उपमा है, आकाश से मानो अञ्जन की वृष्टि हो रही है यह उत्प्रेक्षा है। “चन्द्रमा सा मुख" इस उपमा के वाक्य का अर्थ समझा जाता है। मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है, इस अलङ्कार में मुख का भेद वर्तमान रहा । आकाश से मानों अञ्जन की वृष्टि हो रही है। इस उत्प्रेक्षा के वाक्य में भी वह भेद थोड़ा दुर हुआ सही, पर पूरा पूरा नहीं है। इस वाक्य का अर्थ यही समझा जाता चन्द्रमा और

१६ )
है कि इतना अन्धकार फैला है कि मालूम होता है अञ्जन की
वृष्टि हो रही है। यहाँ उपमान और उपमेय दोनों का भेद
छिपाने का प्रयत्न किया गया है. पर छिपा नहीं है। यहां केवल
"उपमान" के रूप में ''उपमेये'' का वर्णन किया गया है।
रूपक में यह बात नहीं, यहाँ दोनों का भेद मिटा ही दिया
जाता है और इस भेद के मिटाने का प्रधान कारण है अत्यन्त
सादृश्य, यह बत उदाहरण से स्पष्ट होगी।
उदाहरण
कलि युग जलधि अपार उद्ध अधरम्म उमिमय ।
लच्छनि लच्छ मलिच्छ कच्छ अरु मच्छ मगरचय॥
नृपति नदी नद वृन्द होत जासो मिलि नीरस ।
मनि भूषण सब युक्ति घेरि किन्नियसुअप्पवश ।।
हिन्दुवान पुन्य गाहक बनिक हास निवाहक साहिसब
वर वादवान किरबान घरि जस जहाज सिवराज जब ।।
अर्थ-कलियुग अपार समुद्र है, उसमे अर्धम की लहर
उठ रही हैं । लाखो म्लेच्छ उस समुद्र के कच्छ मच्छ और मगर
हैं। राजा लोग नदी नद के समान हैं, जो उस समुद्र से मिलने
के कारण नीरस हो गये हैं, उन्होंने सब भूमि को घेर कर अपने
वश में कर लिया। हिन्दू पुण्य के ग्राहक व्यापारी हैं और उनको
निर्वाह करने वाले साहितनय शिवराज हैं। शिवराज का यश
जहाज़ है, उस पर उत्तम पाल और कृपाण है।
शिवराज के यश को जहाज़ बनाया गया है। जहाज़ के
लिए समुद्र चाहिए, इसलिए कलियुग समुद्र बनाया गया,
उसमें अधर्म की लहरें उठायी गयीं, लाखो म्लेच्छ कच्छ मच्छ

( १७ )
और मगर बनाये गये, समुद्र में नद नदियाँ मिल कर अपने
जल को नीरस बनाती हैं अतएव राजा लोग नद नदी बने और
समुद्र में मिलकर नीरस बन गये । मापारी व्यापार करने के
लिए समुद्र में भाते जाते हैं हिन्दू पुख्य के व्यापारी बनाये
गये, शिवराज उनके निवाहक । इस उदाहरण में उपमान और
उपमेय की कितनी समता है। राजा लोग नदी बन गये और
नीरस भी होने लगे आदि ।
न्यून और अधिक रूपक के लक्षण
घटि बढ़ि जहं बरनन करै, करिकै दुहुन अभेद ।
भूषन कवि औरो कहर, द्वै रूपक भेर ।
अर्थ-जहाँ उपमान और उपमेय का शुभेद, धूनता था
अधिकता के द्वारा दिखाया जाय ! पर सी
हैं। उनका नाम न्यून रूपक और गाजिक रूपक है।
अधिक रूपक का समाहरण
साहितनै सिवराज भूपन #ik
विगिरि कलङ्कचन्दार प्रापितु है।
पञ्चानन एक ही बदन गति
गजानन गजबपिना पश्यायितु है
एक सीस ही सहस सीसा करिव को
दुहुँ दूगसो सहसमानिया
दुहूँ करसों सहसकर मामिगतु मोहि
सो सहस बाहु जानियतु है।
दुहुँ बाहु

.
( १८ )
अर्थ-हे साहितनय शिवराज, तुम्हारे यश को भूषन कवि
बिना कलङ्कका चन्द्रमा अपने हृदय में समझता है। तुमको एक
मुख वाला जानकर भी तुम्हें पश्चानन और गजमुख के बिना
भी गजानन कहता है। एक सीस होने पर भी सहन शीर्ष
और दो आखें होने पर भी सहस्राक्ष समझता है, तुम्हारे दोही
कर (हाथ) हैं, पर भूपन तुमको सहस्रकर (हज़ार हाथ वाला)
या सूर्य समझता है, तुम्हारे दोही बाहु है, फिर भी भूपन
तुमको सहस्रबाहु जानता है।
व्याख्या-कलक न होने पर भी चन्द्रमा, एक मुख होने पर
भी पश्चानन-पञ्चमुख, गजवदन के बिना भा गजानन आदि का
कहना अधिक रूपक है। अधिकता के द्वारा यहाँ उपमान और .
उपमेय में अभेद बतलाया गया है।
न्यून रूपक का उदाहरण
जेते हैं पहार भुव पारावार माहि तिनि
सुनि के अपार कृपा गहे सुख फैल है।
भूषन भनत साहितनै सरजा के पास
प्राइवे को चढ़ी उर होसनि की ऐल है।
किरवान वज्रसों विपच्छ करिबे के उर
भानि के कितेक आये सरन की गैल हैं।
मघवा मही में तेजवान शिवराज वीर
कोट करि सकल सपच्छ किये सैल हैं।
अर्थ-शिवाजी पालु है । यह बात सुन कर पृथ्वी और
समुद्र के सब पहाड़ बड़े सुखी हुए हैं। शिवाजी के पास आने
के लिये उनके हृदय में बड़ी उमङ्गे उठ रही हैं । तलवार रूपी
वज से विपच्छ-पक्ष रहित करने के डर से कई शरण के मार्ग
-

( १९ )
पर भाये हैं। पृथ्वी के इन्द्र शिवाजी ने किले बनवा कर
पहाड़ों को सपच्छ ( पांखवाले ) बना दिया। यह न्यून रूपक
का उदाहरण है। महाकवि भूषण का रूपकालङ्कार के विषय
में यही मत है।
अन्य पण्डितों का यह मत है कि रूपक दो प्रकार का होता
है, साङ्ग और निरङ्ग। साङ्ग भी दो प्रकार का है, सीङ्ग और
एकदेशविवर्ति । निरङ्ग एक ही प्रकार का है। मालारूपक भी
निरङ्ग रूपक का ही भेद है। इनके अतिरिक्त एक परम्परित
रूपक भी है। इनके लक्षण ये हैं:-
साङ्ग-उपमेय और उपमान के समस्त भङ्गो का अभेद रूप
से जहां वर्णन किया जाय ।
एकदेशविवर्ति-उपमेय और उपमान के कुछ अङ्गो का
अभेद, शब्द से बतलाया जाय और कुछ का केवल समझा
.
-
जाय।
निरङ्ग-अङ्गों को छोड़ कर केवल उपमान और उपमे का
ही अभेद रूप से वर्णन किया जाय।
माला-एक उपमेय का अनेक उपमानों के साथ अभेद रूप
से वर्णन किया जाय।
परम्परित-एक उपमेय का उपमान में अमेद रूप से
आरोप, दुसरे उपमेय के अपने उपमान में आरोपण करने के
लिए किया जाय।
अपन्हुति (शुद्ध)
आन बात आरोपिए, साँची बात दुराय ।
शुद्धापन्हुति कहत हैं, भूषन सुकवि बनाय ॥

( २० )
के डरन
अर्थ-सच्ची बात का निषेध कर जहाँ दूसरी बात बतलाई
जाय, वहाँ अपन्हुति अलङ्कार समझना चाहिए | अपन्हुति शब्द
का अर्थ है छिपाव । इस अलङ्कार में उपमेय असत्य बतलाया
जाता है और उपमान सत्य ।
उदाहरण
चमकती चपला न, फेरत फिरंगें भट,
इन्द्रको न चाप रूप वैरष समाज को।
धाए धुरवा न, छाये धूरिके पटल,
मेघ गाजिवो न बाजिवौ है दुन्दुभि दराज को।
भौसिला डरानी रिपुरानी कहैं,
पिय भजौ देखि उौ पावस के साज को।
घन की घटान गज घटनि सनाह साज,
भूषन भनत आयो सेन शिवराज को।
अर्थ-यह चपला नहीं चमकती. किन्तु भट तलवार फेर
रहे हैं। यह इन्द्र धनुष नहीं है किन्तु सेना का झंडा है। ये
बादल नहीं है, किन्तु धूलि पटल है । यह मंघ का गर्ज नहीं है,
किन्तु नमाड़े का शब्द है, भौसिला के डर से डरो शत्रु की
स्त्रियां वर्षा ऋतु के आगमन को देख कर कहती है कि हे प्रिय,
चलो। यह मेघ को घटा नहीं है ; किन्तु हाथियों का झुंड सजा
कर शिवराज की सेना आ रही है।
व्याख्य!-इस उदाहरण में उपमेय चपला आदि का निषेध
करके उपमान को हा सत्यता स्थापित की गई है। इसलिए यह
शुद्ध अपन्हुति अलङ्कार है।
।

( २१ ) . अपन्हुति (२ हेतु) जहाँ जुगुतिसों ान को, कहिए आन छपाय । हेतु अपन्हुति कहत हैं, ता कहं कवि समुदाय ॥ अर्थ-जहाँ युक्तिपूर्वक उपमेय को छिपा कर उपमान कहा जाता है, वहां हेतु अपन्हुति नामक अलङ्कार समझना चाहिए। उदाहरण सिव सरजा के कर लहो सो न होय किरवान । भुज भुजगेश भुजंगिनो भखत पौन अरिपान ॥ अर्थ-शिवराज के कर में शोभित होने वाली वस्तु कर- वाल-तलवार नहीं है, किन्तु भुज रूपी सर्पराज की सर्पिणी है, क्योंकि वह शत्रुओं के प्राणरूपी पवन खातो है । व्याख्या-सर्प वायु खाते हैं, यह बात प्रसिद्ध है। शिवाजी को तलवार को सर्पिणी बतलाया है और इसमें युक्ति হাম্ব के प्राणरूपी वायु का खाना । अपन्हुति (३ पर्यस्त) वस्तु गोय ताको धरम, आन वस्तु में रोपि । पर्यस्तापन्हुति कहत, कवि भूषन मति वोषि ॥ अर्थ-वस्तु-उपमेय को छिपाकर उसके धर्म को उपमान में वर्णन करना पर्यस्तापन्हुति है। है ( २२ ) उदाहरण काल करत कलिकाल में नहि तुरकन को काल । काल करत तुरकान को शिव सरजा करवाल ॥ अर्थ -काल (यमराज) कलिकाल में तुरकों को काल नहीं करता, अर्थात् नहीं मारता, कलिकाल में शिवराज का कर- वाल-( तलवार ) तुरको का काल करता है। उपमेय काल के मारने रूप धर्म का सम्बन्ध शिवराज के करवाल से बतलाया गया है, इसलिए यहां पर्यस्तापन्हुति अलकार हुआ। अपन्हुति (४ भ्रान्त) संक आन को होत ही, जहं भ्रम कीजै दूरि । भ्रान्तापन्हुति कहत हैं, तह भूषन कवि अर्थ-जहाँ उपमेय में उपमान की शङ्का हो जाय और वह शब्दों द्वारा दूर की जाय, वहां भ्रान्तापन्हुति अलकार समझना चाहिये। उदाहरण एक समय तजिके सब सैन सिकार को पालमगीर सिधाए । "श्रावत है सरजा सम्हरौ' इक ओर ते लोगन बोलि जनाए । भूषन मो भ्रम औरंग के सिव भोसिला भूप की धाक धुकाए । भूरि ॥

( २३ )
धाय के सिंह कह्यो समुझाय
करौलनि प्राय अचेत उठाए ।
अर्थ स्पष्ट है।
इस पद्य में सरजा शब्द के सुनने से औरंगजेब को शिवाजी
के आने का भ्रम हो गया और वह घबरा गया । उसी
समय सिंह के आने की बात कही गयो, जिससे उसका भ्रम
दूर हुआ।
अपन्हुति (५ छेक)
जहाँ और
को संक करि,
साँच छिपावत बात ।
छेकान्पति कहत हैं, भूषन कवि अवदात ॥
अर्थ-जहां उपमान को शङ्का कर उपमेय छिपाया जाय,
वहां छकापन्हुति अलङ्कार समझा जाता
है
उदाहरण
तिमिर वंसहर अरुनकर आयो सजनी भोर ।
सिव सरजा चुप रह सखी सूरजकुल सिरमौर ।।
अर्थ-तिमिर अन्धकार या तैमूर लंग उसका वंश नाश
करने वाला और लाल हाथोंवाला हे सजनी, प्रातःकाल
आया। क्या शिवराज ? नहीं, चुप रहो, सूरजकुल-सिर-मौर
माया।
इस पद्य में शिवराज-विषयक शङ्का दूर कर सूर्यकुल शिरो-
मणि बताया गया है। छेक का अर्थ है विद्वान् । यह अपन्हुति
विद्वानों को प्रिय है इस कारण इसको छेकापन्हुति कहते हैं।

( २४ ) अपन्दुति (६ कैतव) जहं कैतव, छल, व्याज, मिस, इनसो होत दुराव । कैतव पन्हुति ताहिसों, भूषन कहि सतिभाव ॥ अर्थ-जिस वाक्य में कैतव, छल, व्याज, मिस इन शब्दों के निषेध किया जाय, वहां कैतवापन्हुति अलङ्कार समझना चाहिए। उदाहरण साहिन के सिच्छक सिपाहिन के पातसाह संगर में सिंह कैसे जिनके सुभाव हैं। भूषन भनत शिवसरजा की धाक ते वै काँपत रहत चित गहत न चाव हैं। अफजाल की अगति सासता को अपगति बहलोल बिपति सों डरे उमराव हैं। पाको मतो करिक मलिच्छ मन सेब छोडि मका ही के मिस उतरत दरिआव हैं। अर्थ-राजाओं के शिक्षक, सिपाहियों के बादशाह और रण में जिसका स्वभाव सिंह के समान है, भूषन कहते हैं,। उस शिवराज के भय से वे कांपते रहते हैं और चित्त में धैर्य नहीं धरते । अफजल की बुरी दशा; शाइस्ता की दुर्गति, बह- लोल की विपत्ति देख और उमराव डर गये हैं, अतएव अपना मत पका कर बे मक्का जाने के मिस दरियाव. पार कर रहे हैं।

( २५ )
ani
--
इस वाक्य में मिस शब्द के प्रयोग से भय छिपाया गया
। अतएव यहाँ कैतवापन्हुति अलङ्कार हुआ।
इस अलङ्कार के छ भेद हुए. शुद्ध, हेतु, पर्यस्त, भ्रान्त, छेक
और कैतव
श्लेष अलङ्कार
एक बचन में होत जहँ, बहु अर्थन को ज्ञान।
श्लेष कहत हैं ताहि को, भूषन सुकवि सुजान।।
अर्थ-सुजान सुकवि उसको श्लेष अलंकार कहते हैं, जहां
एक शब्द में अनेक अर्थ की प्रतीति हो।
सत्यासक्त दयाल द्विज प्रिय अघहर सुग्वकन्द ।
जनहित कमलातजन जय, शिव नृप कवि हरिचन्द ॥
जो सत्य में आसक्त हैं, द्विजों पर दया करनेवाले हैं, सब
को प्रिय हैं, पापों को नाश करने वाले हैं, और लोकाराधन के
हित कमला को त्याग करने वाले हैं उन सब सुखों के देने-
हारे शिव, नृप, कवि हरि ओर चन्द्र की जय हो।
इस पद्य से कवि ने शिव, राजा हरिश्चन्द्र, कवि हरिचन्द,
हरि और चन्द्र इन पांचों का वर्णन किया है। इस पद्य में "सत्या-
सक्त, जनहित कमलातजत” इन दो पदों के कई अर्थ हैं
सत्य में ओसक्त यह अर्थ शिव, राजा कवि और चन्द्रमा के पक्ष
में है। हरि पक्ष में सत्यभामा नाम की स्त्री में आसक्त यह
अर्थ है । जनहित के लिए कमला-लक्ष्मी या धन का त्याग करने
वाला, यह अर्थ समझा जाता है। इसलिए यह श्लेषाक
उदाहरण है।

( २६ )
श्लेष सभङ्ग और अभङ्ग दो प्रकार का होता है। सभङ्ग
श्लेष वह है जिसमें पदों के टुकड़े करने से उनके अर्थ में भेद
हो और अभङ्ग श्लेष वह है जिसमें पदों के टुकड़े करने में
पड़ें। स्वभाव से ही पद दो अर्थों के वाचक हों।
अतिशयोक्ति रूपकातिशयोक्ति
ज्ञान करत उपमेय को, जहँ केवल उपमान।
रूपकातिशय उक्ति सी, भूषन कहत सुजान।
अर्थ-जहां उपमेय बिलकुल छिपा लिया जाता है, उसका
ज्ञान केवल उपमान के द्वारा होता है वहां रूपकातिशयोक्ति
अलङ्कार समझना चाहिए ।
उदाहरण
वोसव से विसरत विक्रम की कहा चली
बिक्रम लखत वीर बखत बलन्द के।
जागे तेजवृन्द सिबजी नरिन्द मसनन्द
माल मकरन्द कुल चन्द साहिनन्द के।
भूषन भनत देश देश वैरिनारिमें
होत अचरज घर घर दुख दंद के।
कनक लतानि इन्दु, इन्दुमाँहि अरविन्द
झरें अरविन्दनते बुन्द मकरन्द के।
अर्थ-चीर भाग्यवान् शिवाजी के विक्रम को देख कर
इन्द्र भी अपने विक्रम को बिसर जाते हैं, विक्रमादित्य की तो
बात ही क्या ? मालमकरन्द कुल के चन्द साहिनन्द सिंहा-
सनासीन नरेन्द्र शिवाजी का तेज जाग रहा है, देश देश की

लता में और कमल ( २७ ) वैरि-त्रियों के घर आश्चर्य की बात हो रही है, सुवर्ण की में चन्द्रमा है, चन्द्रमा कमल, से मकरन्द भर रहा है। व्याख्या-इस पद्य के चौथे पाद में शत्रु स्त्रियों का उल्लेख न कर केवल कनकलता का ही उल्लेख किया है, और वह डपमान है । इसी प्रकार और समझना चाहिए। भेदकातिशयोक्ति (२) जेहि थर आनहिं भांति की, बरनत बात कछूक । भेदकातिशय उक्ति सा, भूषन कहत अचूक ॥ अर्थ-जिस स्थान पर "यह और ही बात है" भादि शब्दों के द्वारा किसी बात का वर्णन किया जाय उसको भेदकाति- शयोक्ति कहते हैं। उदाहरण श्रीनगर नयपाल जुमिला के छितिपाल भेजत रिसाल चौरगढ़ कुही बाज की । मेवार ढुंढार मारवाड़ और बुन्देलखंड झारखंड बांधो धगी चाकरी इलाज की। भूषन जे पूरब पछांह नरनाह ते वै ताकत पनाह दिलीपति सिरताज की । जागत को जैतवार जीत्यो अवरंगजेब न्यारी रीत भूतल निहारी शिवराज की । अर्थ स्पष्ट है। भूतल में शिवराज की रीति निराली निहारी गयी. इससे यहाँ भेदकातिशयोक्ति अलङ्कार हुआ। इस अलङ्कार में भेद

( २८ )
न रहने पर भी भेद बतलाया जाता है। "यह बात ही कुछ
और है" अादि वाक्य इस अलङ्कार के बोधक हैं।
अक्रमातिशयोक्ति
जहाँ हेतु अरु काज मिलि, होत एकही साथ ।
अक्रमातिशय उक्ति सो, कहि भूषन कविनाथ ॥
अर्थ-जहाँ कारण और कार्य एक ही साथ हो, वहाँ
अक्रमातिशयोक्ति अलङ्कार समझा जाता है । साधारण नियम
है कि पहले कारण होता है तव कार्य, पर इस अलङ्कार में कार्य
कारण का एक ही साथ वर्णन किया जाता है
उदाहरण
उद्धत अपार तब दुन्दुभी धुकार साथ
लंधै पारावार बालबन्द रिपुगन के ।
तेरे चतुरंग के तुरंगन के रंगे रज
साथही उड़ात रजपुंज है परन के।
दच्छिन के नाथ शिवराज, तेरे हाथ चढें
धनुष के साथ गढ़ कोट दुरजन के।
भूषन असीसें तो ही करत कसीसै पुनि
बानन के साथ छूटै प्रान तुरकन के।
अर्थ स्पष्ट है।
इधर दुन्दुभि का धुकार हुआ और उसके साथ ही बाल
बच्चों के साथ शत्रुगण समुद्र पर चले गये, घोड़ों के टापों
से धल उड़ने के साथ ही शत्रुओं की राजश्री उड़ ज ती है.

( २८ )
शत्रुओं के हज़ारों किले धनुष के साथ ही शिवाजी के हाथ
चढ़ जाते हैं और उनके हाथों से इधर बौण छूटते हैं और
उधरः शत्रुओं के प्राण । बाण छूटने के बाद और उससे शत्रुओं
के आहत होने पर श ओं के प्राण छूटने चाहिये, यही क्रम
है, पर यहां इस क्रम का पालन नहीं किया गया, इसलिये इसे
अक्रमातिशयोक्ति कहते हैं।
चञ्चलातिशयोक्ति (४)
जहाँ हेतु चरचाहि, में काज होत ततकाल ।
चञ्चलातिशयक्ति सेा, भूषन कहत रसाल ॥
अर्थ-अक्रमातिशयोक्ति में कारण और कार्य दोनों एक ही
बार होते हैं, पर इस अलङ्कार में उससे भी बढ़ कर बात होती
है। कारण की चर्चा होते ही कार्य उत्पन्न हो जाता है और बह
चञ्चलातिशयोक्ति कहा जाता है।
उदाहरण
आयो आयो सुनत
ही शिव सरजा तुव नाम ।
वैरि नारि हग जलन सो बूड़ि जात अरि गाम ।।
अर्थ -आया आया इस प्रकार शिवराज का नाम सुनतेही
शत्रुस्त्रियों की भांखों से इतना जल गिरता है कि शत्रुओं के
गांव डूब जाते हैं। खूब, अभी आया भी नहीं, फिर लड़ाई
और उसमें अपने पति भादि के मारे जाने की बात दूर ही है
सिर्फ आने की खबर सुनाई पड़ती है और इतने ही में शत्रु-
त्रियों की आंखों सं इतना जल गिरता है कि उनके गांव डूब

( ३० )
जाते हैं। इसे ही कहते हैं कारण की चर्चा होते ही कार्य का
त्पन्न होना ओर इसोसे यह चञ्चलातिशयोक्ति अलङ्कार
अत्यन्तातिशयोक्ति (५)
जहाँ हेतु ते प्रथम ही, प्रगट होत है काज ।
अत्यन्तातिशयोक्ति सो, कहि मूषन कविराज ॥
अर्थ-जहां कारण की चर्चा भी नहीं तभी कार्य उत्पन्न
हो जाय वहाँ अत्यन्तातिशयोक्ति अलङ्कार कहा जाता है
उदाहरण (२)
कवितरुबर सिव सुभ सरस सीचे अचरज मूल ।
सुफल होत है प्रथम ही पीछे प्रगटत फूल ।।
अर्थ-कविरूपी वृक्ष का मूल शिबाजी के सुयश जल से
सींचा गया, पर आश्चर्य तो यह है कि फल पहले उत्पन्न हुआ
और फूल पीछे । दुनिया में पहले फूल होता है तब फल, पर
यह ठहरा अत्यन्तातिशयाक्ति का उदाहरण । यहाँ उलटी बातें
बतलानी ही चाहिए।
विभावना
भयौ काज बिन हेतही, बरनत है जेहि ठौर ।
तहँ विभावना होत है, कविमर
मूषन
सिरमौर ॥
अर्थ-जिस स्थान पर कारण के बिना ही कार्य का होना
बतलाया जाय, वहां विभावना अलकार समझना चाहिए।

)
उदाहरण
साहितनै सिवराज की सहज टेव वह ऐन ।
अनरीझे दारिद हो, अनस्वीझे रिपुसैन ॥
शिवराज का स्वमाव है कि वह बिना क्रोध किये ही शत्रु-
सेना को मार डालता है और बिना प्रसन्न हुए ही दरिद्रता
हर लेता है। अर्थात् प्रसन्न होने के पहले दरिद्रता हर लेता है,
और क्रोध करने के पहले हो शत्रुसेना का नाश कर देता है ।
यहाँ कारण से पहले ही कार्य उत्पन्न हुआ, इससे यह विभावना
अलङ्कार है।
विभावना (२-३ अपूर्ण कारण से कार्योत्पत्ति)
जहाँ हेतु पूरन नहीं, उपजत हैं परकाज ।
कै अहेतु ते और यों, दवै विभावना साज ॥
विभावना के दो भेद और हैं १-जहां कारण पूरे न हों
पर कार्य हो २-कारण के अभाव में कार्योत्पत्ति ।
उदाहरण (१)
दच्छिन को दाबि करि बैठो है सइस्तखान
पूना मांहि दूना करि जोर करचार को।
हिन्दुवान खम्भ गढपति दल थम्भमनि
भूपन भरैया कियो सुजस अपार को
मनसबदार चौकीदारन गजाय मह।
लन में मवाय महाभारत के भार को।
तोसो को सिवाजी जेहि दोसो आदमी सों जीत्यो
जंग सरदार सौ हजार असवार को ।

( ३२ )
अर्थ स्पष्ट है। सौ हज़ार आदमियों को जीतने के लिए
उतने ही आदमियों की ज़रूरत होती है । पर दो सौ आदमियों
को लेकर शिवाजी ने सौ हज़ार आदमियों को जीता । यह
अपूर्ण कारण के द्वारा कार्य की उत्पत्ति है, अतएव विभावना
अलङ्कार है।
उदाहरण (२)
तादिन अखिल खल भलै खल खलक मैं
जादिन शिवाजी गाजी नेक करखत हैं।
सुनत नगारन अगार तजि अरिन की
दारगन भाजत न वार परखत हैं
छूट वार वार छूटे वारन ते लाल देखि
भूषन सुकवि
वरनत हरखत हैं।
क्यों न उतपात होहि वैरिन के झंडन में
कारे घन उडि अंगारे वरखत हैं।
अंगारे बरसाने का काम मेघों का नहीं है, पर इस
पद्य में वही बार बतलायी गयी है, इसलिए यह विभावना का
दूसरा उदाहण है।
विभावना (३)
जहाँ प्रगट भूषन भनत हेतु काज ते होय ।
सो विभावना औरऊ कहत सयाने लोय ॥
जहां कार्य से कारण उत्पन्न हो, वहां तीसरी विभावना
समझनी चाहिए।

उदाहरण
अचरज भूषन मन पख्यो श्री शिवराज खुमान।
तव कृपान धुव धूम ते भयो प्रताप कृसान ।।
यहाँ धुश्रा से अग्नि का होना बतलाया गया है, यह तीसरी
विभावना है।
अर्थान्तरन्यास
जहाँ कहे अर्थ का समर्थन दूसरी बात से किया जाय, वहाँ
अथान्तरन्यास अलङ्कार होता है। वह कहीं सामान्य अर्थ से
विशेष का समर्थन, और कहीं विशेष से सामान्य का समर्थन
रूप दो प्रकार का होता है । साधर्म्य वैधर्म्य भेद से इसके
और भी भेद हो सकते हैं।
उदाहरण
विना चतुरंग संग वानरन लेकै बांधि
वारिध को लेकर रघुन्दन जराई है ।
पारथ अकेले द्रोन भीषम से लाख भट
जीति लीन्हों नगरी विराट में बड़ाई है।
भूषन भनत है गुसलखाने में खुमान
अवरंगसाहि को हथ्याय हरि लाई है।
अचम्भो महाराज शिवराज
सदा
पीरन के हिम्मते हश्यार होत भाई है।
तो कहा

सेना की सहायता के बिना बानरों की सहायता से राम- चन्द्र ने समुद्र बांध कर लङ्का जराई, अकेले अर्जुन ने द्रोण- भीष्म जैसे हज़ारों वीरों का सामना किया और विराट के नगर में उनकी प्रतिष्ठा छा गई। महाराज शिवराज ने ज़बर- दुस्ती औरंगजेब की प्रतिष्ठा छीन ली, इसमें आश्चर्य कुछ भी नहीं क्योंकि वीरों का उत्साह उनके अस्त्र है। इस पद्य में पहले विशेष बातें कही गयी है, चौथे पाद में "वीरों का उत्साह उनके शस्त्र है" इस सामान्य बात से पहले की विशेष बातों का समर्थन किया गया है। उदाहरण (२) साहितनै सरजा समरथ करो करनी धरनी पर नीकी, भूलिगे भोज से विक्रम से औ भई बलि बेनु की कोरति फीकी, भूषन भिच्छुक भूप भये भलि भीक लै केवल भौंसिलाही की, तेसुक रीझि धनेस करै लखि ऐसिये रीति सदा शिवजी की। अर्थ-साहितनय शिवाजी ने पृथ्वी पर अच्छो करनी की जिससे भोज और विक्रम के समान राजाओं को लोग भूल गये और बलि वेणु आदि राजाओं की कीर्ति फीकी पड़ गई। भौसिला भूप की भीख पाकर कई भिक्षुक राजा हो गये। शिवाजी की यही रीति है कि वह थोड़े ही प्रसन्न होकर अपने याचकों को कुबेर बना देते हैं। इस पद्य में विशेष से सामान्य का समर्थन किया है। इस अलङ्कार के और भी भेद हो सकते हैं। सामान्य से सामान्य का समर्थन, विशेष का समर्थन प्रादि ।

Prathimalankar Nirupan

Title
Prathimalankar Nirupan
File name
Prathimalankar Nirupan
Text
OCR done
Citation
1924
Publisher
Hindi Sahataya Samalayan
Language
Sanskrit
Pages
35
Library
Hindi Sahataya Samalayan
Classification
Literature
DLI number
486456
Barcode
5990010113733.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
VMLT id
k8bzBhgQJDR
Download PDF

Prathimalankar Nirupan