Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Prekshadhyan [ Yoagik Kriyayan ]

Muni Kishanlal · 2011/01

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प्रेक्षाध्यानः यौगिक क्रियाएं
मुनि किशनलाल
-
तुलसी अध्यात्म नीडम्
जैन विश्व भारती लाडनू (राजस्थान)

जीवन विज्ञान ग्रन्थमाला-५२
प्रकाशक- तुलसी अध्यात्म नीडम्
जैन विश्वभारती लाडनू ३४१३०६
प्रथम संस्करण - १९८४ प्रति - ७०००
द्वितीय सस्करण: 1988
अर्थ-सौजन्य श्री लाभ चन्द-श्री चन्द गेल्डा (बोरावड)
डी-१४, ग्रीन पार्क,
नई दिल्ली-१६
मूल्य:- ४०० चार रुपये
मुद्रक.
जे.जे ऑफसेट प्रिन्टर्स,6964, मुलतानी डाण्डा, नबी करीम नई दिल्ली-110055
Ph 514948

विषयानुक्रम पृष्ठाक विषयानुक्रम प्रकाशकीय स्वकथ्य ३ १ ५ यौगिक शरीरिक क्रियाए वर्तमान युग के सदर्भ मे क्रियाओ का प्रभाव ६ २ यौगिक शारीरिक क्रियाओ की प्रविधि अर्ह वन्दन- पहली क्रिया-मस्तक के लिए दूसरी क्रिया-आँख के लिए तीसरी क्रिया-कान के लिए चौथी क्रिया-मुख एव स्वर-यन्त्र के लिए पाचवी क्रिया-गर्दन के लिए छठी क्रिया-स्कन्ध के लिए सातवी क्रिया-हाथ के लिए आठवी क्रिया-सीने और फेफडे के लिए नवमी क्रिया-पेट के लिए दसवी क्रिया-क्मर के लिए ग्यारवी क्रिया-पैर के लिए बारहवी क्रिया-घुटने एव पजे के लिए तेरहवी क्रिया-कायोत्सर्ग ९ ११ १८ २० २१ २५ २७ २८ २९ ३२ 6

३. स्वभाव परिष्कार के लिए मेरुदण्ड की क्रियाए
पहली क्रिया से आठवी क्रिया (४२ से ४९)
४. कायोत्सर्ग की मुद्रा
५
पेट एव श्वास की क्रियाए
पहली से दसवी क्रिया (५२ से ५७)
६. सकल्प सूत्र

प्रकाशकीय प्रेक्षा-साधना सर्वागीण पद्धति है। जिसमे अध्यात्म की अतल गहराइयो मे प्रवेश कर जहाँ चित्त को निर्मल एव कषाय को उपशान्त करने का प्ररिक्षण दिया जाता है वहा स्वास्थ्य को प्राप्त करने के लिए आसन, प्राणायाम, तनाव-मुक्ति एव मानसिक शान्ति के लिए कायोत्सर्ग एव भावना का प्रयोग भी किया जाता है। व्यक्तित्व विकास एव भाव-परिवर्तन के लिये चैतन्य-केन्द्र-प्रेक्षा, लेश्या-ध्यान एव अनुप्रेक्षाओ का प्रयोग प्रेक्षा-ध्यान की अपनी विशिष्टता है। प्रेक्षा-ध्यान के प्रयोगिक प्रशिक्षण के द्वारा सहस्रो व्यक्तियो ने शारीरिक स्वास्थ्य एव मानसिक शान्ति प्राप्त की है, तथा भावनात्मक आवेगो में रूपान्तरण द्वारा स्वस्थ, शान्त और निर्मल चित्त का निर्माण किया गया है। प्रस्तुत पुष्प यौगिक शारीरिक क्रिया मे सम्पूर्ण शरीर को स्वल्प समय मे सक्रिय और शक्तिशाली बनाने की प्रविधि है। योगो की ये क्रियाए अपने आप मे परिपूर्ण है। सम्यक् श्वास और पेट की सक्रियता के लिए दस क्रियाए पर्याप्त हैं। मेरुदण्ड को सुदृढ़, लचीला और प्राणवान् बनाने मे मेरुदण्ड की क्रियाओ का महत्त्वपूर्ण उपयोग है। सिर से लेकर पैर तक प्रत्येक अवयव को सक्रिय और शक्ति-सम्पन्न बनाने मे तेरह क्रियाए सहज है। जिन्हे आराम से प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है।

२
इस पुष्प के लेखक है अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री
तुलसी के अन्तेवासी शिष्य मुनि श्री किशनलालजी, जो
योग-साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ योग
पद्धतियो के प्रयोग एवं प्रशिक्षण मे संलग्न है। युवाचार्य श्री
महाप्रज्ञजी के निर्देशन में लगने वाले प्रेक्षा-ध्यान शिविरों,
प्रेक्षा-प्रशिक्षण शिविरो तथा जीवन-विज्ञान-प्रशिक्षण शिविरो
में आसन, प्राणायाम, कायोत्सर्ग ध्यान आदि के प्रशिक्षण का
दायित्व आप कुशलता से सभाल रहे है।
युग-प्रधान आचार्य श्री तुलसी एव उनके उत्तराधिकारी
युवाचार्य श्री महाप्रज्ञ के सतत मार्ग-दर्शन एवं परिश्रम का ही
यह परिणाम है कि आज सहस्र-सहस्र लोग इस आध्यात्मिक
साधना के मार्ग पर चलकर समस्याओ से मुक्त शान्त जीवन
जीने का आनन्द प्राप्त कर रहे है। प्रेक्षा पद्धति के रूप मे मानव
जाति को इन दो महान् अध्यात्म मनीषियो का अनुपम वरदान
प्राप्त है। हमे द्रढ़ विश्वास है कि यह सर्वागीण साधना-पद्धति
सर्वजन-हिताय सर्वजन-सुखाय सिद्ध होगी।
शारीरिक क्रियाओ को स्पष्टता से समझने एव प्रयोग
करने हेतु सबधित चित्र भी पुस्तक मे प्रस्तुत किए गए है। इस
के लिए श्री कैलाश मेहता का सहयोग मिला। साधक श्री
रसिक मेहता के परिश्रम से यह उपयोगी एव सुन्दर प्रकाशन
नीडम् को शीध उपलब्ध हो सका।
आशा है पुप्पो के क्रम मे यह प्रकाशन भी पाठको की
रुचि के अनुरूप सिद्ध होगा।
शकरलाल मेहता
निर्देशक तुलसी अध्यात्म नीडम्
जैन विश्व भारती लाडनं

स्वकथ्य
प्रेक्षा-ध्यान साधना की सरल और वैज्ञानिक विधि है।
इसमे प्राचीन दार्शनिक पद्धतियो की जटिलता का निरसन है;
तो आधुनिक विज्ञान की नवीनतम उपलब्धियो का उपयोग है।
साधना की कोई ऐसी शाखा नही जिसमे अनुसधान का
अवकाश नही हो। पूर्णता से पूर्ण विकास की सभावना सदैव
बनी रहती है। प्रेक्षा-साधना प्रद्धति का यह स्पष्ट ऋजु
दृष्टिकोण है कि प्राचीन उपलब्धियो का भरपूर उपयोग करते
हुए आधुनिक खोजो से यदि जीवन विकास में सहयोग मिलता
हो तो उसका उपयोग उपादेय है। योग परम्परा नही, अपितु
एक विधि है। जिसे योगियो ने दीर्घ साधना और अनुभवो से
खोजा है।
प्रेक्षा साधना मे कायोत्सर्ग ध्यान, अनुप्रेक्षा, भावना और
स्वाध्याय के साथ आसन-प्राणायाम को भी समुचित स्थान दिया
गया है। प्रेक्षा-ध्यान पद्धति का मतव्य है कि साधना के विकास
के लिए शरीर का स्वस्थ होना आवश्यक है। स्वस्थ शरीर के
बिना साधना की अभिव्यक्ति शरीर पर कैसे उतर सकती है।
जैन, परम्परा मे आसनो को 'स्थान' कहा गया है। भगवान
महावीर स्वय ध्यान मे विभिन्न आसनो का उपयोग करते थे।
केवल ज्ञान अथवा विशेष उपलब्धि के लिए वज्रऋषभ नाराच
सहनन होना अनिवार्य है। शरीर के सहनन से शरीर की
सुदृढ़ता से ध्यान आदि दीर्घकालीन साधना अभिव्यक्ति पा
सकती है।

शारीरिक यौगिक क्रियाए हर एक व्यक्ति कर सकता है।
इन क्रियाओ से शरीर के प्रत्येक अग को सक्रियता और शक्ति
मिलती है। प्रेक्षा-ध्यान शिविरो मे आसन प्राणायाम के प्रयोग
कराते समय यह अनुभव हुआ कि वृद्ध या अस्वस्थ व्यक्ति जो
पूरी तरह आसन नही कर पाते है, वे यौगिक शारीरिक क्रियाओ
को सरलता से कर सकते है तथा उन्हे इनके द्वारा अपने अगो मे
शक्ति और सक्रियता के विकास का अनुभव करवाया जा सकता
है। यौगिक शारीरिक क्रियाए साधना एव ध्यान की दृष्टि से
महत्त्वपूर्ण है। श्वास-प्रश्वास का सतुलन साधना की भूमिका
है। मेरुदण्ड की क्रियाए शक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाने में तथा
स्वास्थ्य मे सहयोगी बनती है। साधना के विकास के लिए
मेरुदण्ड का स्वस्थ, लचीला और सक्रिय होना आवश्यक है।
यौगिक शारीरिक क्रियाए सम्पूर्ण शरीर को सक्रिय और
तेजस्वी बनाने मे सहयोगी बनती है। शरीर के प्रत्येक अग को
इससे दृढता एव शक्ति मिलती है।
प्रेक्षा-ध्यान के अभ्यासी साधक-माधिकाए इन योगिक
शारीरिक क्रियाओ से अपने आपको लाभान्वित करेगे। मुनि
धर्मेन्द्र कमारजी एव नीडम् के सयोजक धर्मचन्द जैन के
सुझावो ने इसकी उपयोगिता को बढ़ाया है। आशा हे
प्रेक्षा-ध्यान
के साधक यौगिक क्रियाओ के अभ्यास
से साधना मे
शक्तिशाली बनेगे।
मुनि किशनलाल

यौगिक शारीरिक क्रियाएं :
वर्तमान युग के संदर्भ में
।
विश्व का श्रेष्ठतम और जटिलतम यदि कोई यत्र हो
सकता है तो वह मानव का शरीर है। मानव शरीर की सरचना
इस प्रकार से निर्मित हुई है कि जिसे निरन्तर सक्रिय एव
व्यवस्थित बनाए रखना अत्यन्त आवश्यक है। उसकी सपूर्ति
यौगिक क्रिया करती है शरीर की इस सक्रियता एव स्वस्थता
को बनाए रखकर ही साधना के परिणामो को प्राप्त कर सकते
है। शरीर को सक्रिय और व्यवस्थित बनाने की दृष्टि से
यौगिक शारीरिक क्रियाए प्रेक्षा प्रविधि का महत्त्वपूर्ण अग है।
देश, काल और समाज की परिस्थितियो से गुजरते व्यक्ति के
लिए यह कठिन होता जा रहा है कि वह योगासन और व्यायाम
मे अधिक समय लगा सके। किसी के पास समय का अभाव
नही होता, तो उसे स्थान की कठिनाइयो का सामना करना
पडता है। बढती शहरी सभ्यता ने मनुष्य के जीवन को प्रकृति
से दूर कर दिया है। उसके पास शारीरिक श्रम करने के लिए न
खेत है और न घूमने के लिए खुला मैदान है कि जहा शुद्ध
प्राणवायु को ग्रहण कर वह स्वस्थता को उपलब्ध कर सके।
उसे तग बस्तियो मे भीड भरे रास्तो से गुजरना होता है।
आवास के लिए उसे छोटे-छोटे फ्लेटो मे पूरे परिवार का
गुजारा करना होता है। इससे भी अधिक आज व्यक्ति इतना
अनियमित जीवन जीने लगा है कि चाहने के बावजूद भी
योगासन. प्रेक्षा-ध्यान एव ऐसी कोई अन्य प्रविधि के लिए अपने
समय को लगा नही पाता।
-
।

६
क्रियाओं का प्रभाव
शारीरिक, मानसिक पीडाओ से ग्रस्त कुछ लोग इस
अभ्यास क्रम की ओर प्रवृत्त होते है, किन्तु निरन्तरता बनाए
रखना उनके लिए कठिन हो जाता है। समय के अभाव
आसनो के लाभ से वचित न रहे, उनके लिए सक्ष्म क्रियाए
आवश्यक है। यौगिक शारीरिक क्रियाए शरीर और मन दोनो
को स्वस्थ बनाती है। जो व्यक्ति शरीर की दृष्टि से रुग्ण वृद्ध
अथवा अशक्त है, उसके लिए भी यौगिक शारीरिक क्रियाए
उपयोगी एव शक्ति सवर्धक है। यौगिक शारीरिक क्रियाओ से
सम्पूर्ण शरीर के सन्धिस्थलों मे लचीलापन एव कर्मजा शक्ति
का विकास होता है। मासपेशियो मे स्फूर्ति तथा स्नायु-संस्थान
मे सक्रियता बढती है। रक्त सचार सुव्यवस्थित होने लगता है।
मन प्रसन्न और चित्त प्रशान्त होने लगता है। जिससे प्रज्ञा
प्रगट होती है। स्वस्थे चित्ते बुद्धय प्रस्फुरन्ति-स्वस्थ चित्त मे
प्रज्ञा प्रगट होती है।
यौगिक शारीरिक क्रियाओं की प्रविधि
यौगिक शारीरिक क्रिया की इस प्रवधि को प्रयोग मे लाने
के लिये कोई विशेष स्थान एव व्यवस्था की अपेक्षा नहीं होती।
केवल स्वच्छ और हवादार स्थान पर्याप्त होता है। इस परे
प्रयोग को एक साथ करने मे लगभग १५ मिनट लगते है।
समयाभाव मे इस प्रयोग को खण्डो मे विभाजित किया जा
सकता है। यह अभ्यास मस्तक से लेकर पैर तक विभिन्न
अवयवो पर क्रमश. तेरह क्रियाओ मे पूर्ण होता है।

७
।
।
-
अहं वन्दन
यौगिक क्रियाओ को प्रारम्भ करने से पूर्व अपने इष्ट को
नमन करे। प्रेक्षा-ध्यान साधक का ईष्ट है "अह" अर्थात अनंत
शक्ति संपन्न चैतन्य। अर्ह वन्दन के लिये वन्दना आसन मे
पजो के बल ठहरे। विनमता से हाथ जोडे। श्वास भरे। वन्दे
कहते समय मेरुदण्ड सीधा रखे।
।

-17
५
अहम- बोलते
समय नीचे भूमि तल पर मस्तक लगाएँ। श्वास का पूर्ण रेचन
करे धीरे-धीरे पूरक करते हुए पूर्व अवस्था मे आ जाए। इस
क्रिया को तीन बार करे। इससे स्मृति विकसित होती है।
इससे स्मृति विकसति होती है। दीर्घश्वास का अभ्यास बढ़ता
है।

पहली क्रिया-मस्तक के लिए
+
-
।
-
fro
-
मस्तक से शरभ होने वाली यह प्रथम क्रिया है। पैर के
दोनो पंजे मिलाकर खडे हो। दृष्टि सम्मुख रखे।
हाथ साथलो से सटे हुए रहे। चित्त को मस्तक पर
केन्द्रित करे।

नौ बार श्वास-प्रश्वास करे।
अनुभव करे कि मस्तिष्क के स्नायु सक्रिय एव प्राणमय
वन रहे हैं। मेधा शक्ति बढ रही है।
ललाट, कनपटी और मस्तिष्क के स्नायओ का सिचाव
देकर शिथिल छोड दें। यह मस्तिष्क की क्रिया है।
इससे मस्तिष्क के दोषो का निरोध होता है। स्मृति एवं मस्तिप्प
की शक्ति का विकास होता है।

११ दूसरी क्रिया-आंख के लिए आखो की इस क्रिया मे गर्दन सीधी और स्थिर रखे। क्रिया के समय गर्दन को किसी प्रकार की गति न दे। आखो की इन क्रियाओ को सात भागो मे विभाजित किया गया है- -- u- १ पूरक करते हुए आखो के गोलको को ललाट की ओर ले जाते हुए आकाश को देखे। रेचन करते हुए आखो के गोलको को नीचे की ओर लाते हुए पजे की ओर देखे। इसकी पाच आवृत्ति करे।

१२
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स
pe
२ पूरक करते हुए आखो के गोलक को दायी ओर ले जाए।
रेचन करते हुए गोलक को बायी ओर ले जाए। जितना पीछे
की ओर देख सके, देखे। इसकी पाच आवृत्ति करे।
७
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१३
+
--
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३
पूरक कर दोनो गोलको को दाहिने कोण मे ऊपर ले
जाए। रेचन करते हुए गोलको को बाए कोण मे ले जाए। यह
तिरछी कोणात्मक क्रिया है। इसे पाच बार दुहराए।

१६
mi-A
६. रेचन कर कुम्भक करे। आखो को तेजी से टिमटिमाए।
पूरक करें तथा पुन रेचन कर कुम्भक करे। तीव्रता से आखो
को टिमटिमाए।
दोनो हथेलियो को परस्पर घर्षण कर गर्म करे। हल्के

१७ स्पर्श से हथेलियो द्वारा आँखो पर मालिश करे। हथेलियो का सपुट बनाकर आँखो को हथेलियो से ऐसे ढके, जिससे अन्दर सघन अधेरा हो जाए। आँखो को खुली रखकर अन्धेरे मे तेजी से टिमटिमाए। अगुलियो के छिद्रो से आते हुए प्रकाश को देखे। धीरे-धीरे अगुलियो को ऐसे खोलते जाए जिससे पूरा प्रकाश हो जाए। लाभ-आखो के रोग दूर होते हैं। ज्योति बढती है। मोतिया बिद नही हो सकता है। आखो की रोशनी बराबर बनी रहती है। ऐनक के नम्बर नही बढ़ते अथवा ऐनक की जरूरत नही रहती। ar1

१८
तीसरी क्रिया-कान के लिए
कानो में तर्जनी (अगुठे के पास वाली) अगुली डालकर
दाएँ बाएँ घुमाए। कानो के बाहरी भाग को चारो तरफ से
मालिश करे ऊपर-नीचे खीचे। हथेलियों से दोनो कानों को
दबाकर अन्तर-ध्वनि सुने। श्वास-प्रश्वास सामान्य रहेगा।
लाभ-कान संपूर्ण शरीर का प्रतिनिधि है गर्भावस्था में इसी
आकार में सब रहते हैं। कान की इस क्रिया से अनेक रोग शान्त
होते हैं। कान बहना ठीक होता है, सुनने की शक्ति का विकास
होता है। आलस्य दूर होता है। विवेक स्फुरित होता है।
Modena

१९.
म
त
al
-
.
.

२०
चौथी क्रिया-मुख एवं स्वरयन्त्र के लिए
मुख मे श्वास को पूरा भरे। जिससे कपोल (गाल) फूल
जाएँ। दो-तीन बार इस क्रिया को दोहराए। दोनो तरफ से
दांतो और जबडो को परस्पर सटाकर दबाएँ। मुख को खोले
दाहिने हाथ की तीन अगुलियों को दातों के बीच से भीतर गले
की ओर ले जाए। आ...... आ.. आ..... आ की ध्वनि
करे।
लाभ-कपोलों पर झुर्रियां नहीं उभरती। दांत की बीमारियां
दूर होती है आवाज़ साफ़ होती है।
-rx.

२१
पांचवी क्रिया-गर्दन के लिए
(अ) श्वास को भरे। गर्दन को पीछे पीठ की ओर ले
जाए।
आकाश की ओर देखे। श्वास को छोडते हुए ठुड्डी को सीने से
लगाए। इस क्रिया को पाच बार दोहराए।
---

२२
(ब) रेचन करते हुए गर्दन को दाएं कधे की तरफ मोडे।
दृष्टि पीछे की ओर ले जाएं। पूरक करे। फिर रेचन करते हुए
बाएँ कंधे की ओर मोडे। इस क्रिया को पाच बार दोहराए।

२३
(स) गर्दन को दाये-बाये दोनो ओर से गोल घुमाएं
विधिः- पूरक
.
-
करते हुए ठुड्डी को कठ-कूप मे लगाए, आखे
बन्द रहे, दाहिने कधे की ओर ठुड्डी का स्पर्श करते हुए पीठ की
ओर गर्दन ले जाए, बाए कान को बाए कधे से छुते हुए ठुड्डी को
कठ-कूप मे लगाए, आखे बन्द कर ले। इस क्रिया को वायी
ओर भी दोहराए। तीन-तीन आवृत्तियो करे
(द) श्वास को भर कर सिर और गर्दन को दाहिनी ओर
झुकाए, कान कन्धे को स्पर्श करेंगे। सिर को सीधा कर रेचन
करे। पूरक कर बायी ओर सिर को झुकाए, कान कन्धे को
स्पर्श करेगे। सिर और गर्दन को सीधा कर रेचन करे। तीन
आवृत्ति करे।
लाभ-गर्दन का दर्द दूर होता है। आंखे और मस्तिष्क की
शक्ति बढती है।

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२५ छठी क्रिया-रकन्ध के लिए (अ) पूरक करते हुए कधो को ऊपर उठाए। रेचन करते हुए कधो को नीचे ले जाए। मुट्ठी बन्द रखे। हाथ सीधे रहें। क्रिया को नौ बार दोहराए। Sand - (ब) हाथो को मोडकर अगुलियो को कन्धे पर रखे। करे। तीन बार हाथो को आगे-पीछे की ओर गोल घम फिर रेचन करते हुए तीन बार हाथो को पीछे से आगे की घुमाएं। लाभ-कन्धों की शक्ति बढती है। जोडो का दर्द दूर होता है।

२७ सातवीं क्रिया-हाथों के लिए -- (अ) हाथो को सामने की ओर सीधा फैलाए। पूरक करते हुए छोटी अगुली से एक-एक अगुली को सक्रिय करे। (ब) रेचन करके फिर पूरक करे। हथेली एव कलाई तक के भाग को पाच बार ऊपर नीचे करे तथा कलाई को गोल घुमाए हाथ सीधा रखे। (स) पाच बार कुहनियो को मोडे और सीधा करे। (द) अन्त मे पूरे हाथ को सीधा करके गति से दाए-वाएं घुमाए। प्रत्येक क्रिया की पांच आवृत्ति करे। लाभ-हाथो, अगुलियो की शक्ति बढती है।

२८ आठवीं क्रिया-सीने और फेफडे के लिए श्वास को भरे। हाथो को शेर के पजे की तरह सामने की ओर झटके के साथ रेचन करते हुए फैलाए। हाथो को पूरक करते हुए सीने की तरफ ऐसे लाए जैसे कि पूरी ताकत से कोर्ट रस्सा खीच रहे हो। फिर हाथो को सीने से कधे तक फैलाए तीन बार करे। लाभ-सीने और फेफडे की शक्ति बढ़ती है २९ नवी क्रिया-पेट के लिए D कटि तक के भाग को लगभग ३० डिग्री कोण मे झकाए। पेट को अन्दर ले जाए। रेचन करे, कम्भक की स्थिति मे पेट को पीठ की ओर लगाते हुए ऊपर खीचे. पेट को तेजी से अन्दर बाहर करे। इस क्रिया को पाच बार दोहराए। एक बार मे पेट १५ से २० बार बाहर-अन्दर गतिशील बनेगा लाभ-पेट के दोष दूर होते हैं।

३० दसवीं क्रिया-कमर के लिए NTITY) . (अ) श्वास को भरे। हाथो को ऊपर ले जाए। पेट को आगे की ओर तथा कधो को पीछे ले जाए। रेचन करते हुए आगे झुके। ललाट से घुटनो का स्पर्श करने की कोशिश करे। हाथ-पैर के पजो को स्पर्श करे या पैर के पाव में रहे। श्वास भरते हुए हाथ ऊपर उठे एव पीछे झुकें। रेचन कर फिर आगे झके। तीन बार इस क्रिया को दोहराएं।

३१ i (व) रेचन करते हुए कटि भाग को बायी ओर झकाए । वाया हाथ वारा घटने की ओर नीच ल जाए दाग हाथ को सिर पर होने हा बायी आर लाए। इस क्रिया को दायी और भव कर करे। इसकी नीन आत्ति करे। लाभ-कमर के दोष दूर होते हैं।

३२ ग्यारहवीं क्रिया-पैरों के लिए PAT m पूरक करते हुए पैर के पजो पर खडे रहे। फिर रेचन करते हुए एडी को जमीन पर रख दे। पूरक करते हुए एडी पर खडे रहे। पजे जमीन से ऊपर रहेगे। रेचन करते हुए पजो को भूमि पर रखे। प्रत्येक क्रिया को पाच बार दोहराए। लाभ-ऐडी का दर्द एवं पंजे के दोष का परिहार होता है।

बारहवीं क्रिया-घुटने एवं पंजो के लिए m -- (अ) दाए घुटने को मोडकर एडी से नितम्ब को पाच बार ताडित करे। ऐसा ही वाए घुटने को मोडकर करे ३४ (ब) फिर घुटनो की ढक्कनियो को पांच बार ऊपर नीचे करे 17 ܟ ܀ - 14 4. finit M (स) कटि पर हाथ रखे। दोनो पैरो के बीच एक फुट का अन्तर रखे। धीरे-धीरे घुटनो को आगे सामने की ओर मोडे। रेचन करे परक कर ऊपर आए। कमर, धड़, सिर सीधा रहे। इस क्रिया को पाच बार करे ३५ (द) घुटनो को दायी ओर मोडे रेचन करे। कमर को मीधा रखते हुए झुके। फिर पूरक करे। घुटनो को बायी ओर मोडे। रेचन करे। कमर को सीधा रखे। इसे तीन बार करे।

4 5 ارریہ (इ) दोनो पजो को मिलाकर खडे रहे। रेचन कर घुटनो मोडे और दाए-वाए गोलाकार पाच वार घुमाए।

३७ ५ ལབས། (ई) दाहिने पैर को पिडली की ओर नीचे की ओर लाकर के पजे को भूमि से थोडा ऊपर कर नीचे मोडे। ऐसा ही दूसरे पैर से करे ३८ (फ) पैर की एक-एक अगुली को सक्रिय करे। फिर दाए से वाए और बाए से दाए पैर को गोलाकार घुमाए। ऐसा ही दूसरे पैर से करे। इसे तीन बार करे ५ 17 ५ लाभ-घुटनें, पिण्डली, पजे तथा अंगुलियो का दर्द दूर होता है शक्ति का संचार होता है।

३९ तेरहवीं क्रिया-कायोत्सर्ग - . to खडे-खडे शरीर के प्रत्येक अवयव, मासपेशी, स्नायु को शिथिल करे। आखे बद रखे।

४० चित्त को पूरे शरीर मे फैला दे। पूरे शरीर को तनाव-मुक्ति का सुझाव दे एवं शरीर मे शिथिलता का अनुभव करें। शरीर शिथिल रहे, लेकिन चैतन्य के प्रति पूर्ण जागरूक रहे। तीन-चार दीर्घश्वास के पश्चात् कायोत्सर्ग को सम्पन्न करें। लाभ-तनाव मुक्ति, मानसिक शान्ति, जागरुकता, ममत्व का परिहार होता है। स्वभाव परिष्कार के लिए मेरुदण्ड की क्रियाएं- मेरुदण्ड शरीर मे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अग है। मेरुदण्ड का लचीलापन स्वस्थता का लक्षण है। स्वस्थ व्यक्ति क मेरुदण्ड सीधा और लचकदार होता है। मेरुदण्ड के पार्श्व में ईडा, पिगला आदि सहस्रो नाडिया होती है। मेरुदण्ड सुदृढ होने से व्यक्ति की चेतना को विकसित होने का अवसर मिलता है। मेरुदण्ड की लचक केवल स्वास्थ्य के लिए ही वरदान नही है, अपितु वह सुन्दर स्वभाव और साधना की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। ये क्रियाए सरल सहज लगती है। सहज लगने वाली क्रियाए ही जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करती है। मेरुदण्ड की सुघडता को लक्ष्य कर इन क्रियाओ का चयन किया गया है। मेरुदण्ड की स्वस्थता स्मृति, विचार, चितन, और स्वभाव को प्रभावित करती है। स्वभाव, विचार और चितन के परिष्कार के लिये मेरुदण्ड की क्रियाओ पर ध्यान देना आवश्यक है। मेरुदण्ड के अन्तिम छोर पर शक्ति केन्द्र है और मस्तक की चोटी के (ऊपर) स्थान पर ज्ञान केन्द्र है। शक्ति और ज्ञान के विकास के लिए मेरुदण्ड की स्वस्थता सक्रियता अपेक्षित है। ईडा, पिगला और सुषुम्ना मे प्राण का प्रवाह सम्यक रूप से होने ४१ लगता है। प्राण का प्रवाह सम्यक् प्रकार होने से व्यक्तित्व के विकास मे अपेक्षित सहयोग मिलता है मेरुदण्ड का सीधा रहना ध्यान के लिए आवश्यक है। मेरुदण्ड सीधा रहता है तो प्राण का प्रवाह सुषुम्ना मे सहजता से होने लगता है। मेरुदण्ड की क्रियाए पेट, गर्दन व कटि मे ठहरे हुए विष को निकालने मे सहयोगी बनती है। मेरुदण्ड क्रियाओ को सरलता से सब आबाल वृद्ध कर सकते है। मेरुदण्ड की क्रियाएं शरीर की स्थिति भूमि पर पीठ के बल लेटे। दोनो पैर सीधे रखे। हाथो को कन्धे के समानान्तर सीधे फैलाए। हथेलिया भूमि को स्पर्श करे। -- ४२ पहली क्रिया स्थिति-दोनो पैरो के मध्य अपने पाव तल की लवाई जितनी दूरी रखे (१) पूरक करते हुए बाए पैर के अगूठे को दायी एडी से स्पर्श करे। दायी ओर करवट ले। गर्दन बायी ओर घुमाए। श्वास का रेचन करते हुए पूर्व स्थिति में आ जाएं। (२) पूरक कर दाए पैर के अगूठे को बायी एडी से स्पर्श करते हुए बायी ओर करवट ले। गर्दन दायी ओर घुमाए। श्वास का रेचन करते हुए मूल स्थिति मे आ जाएं।

४३ दूसरी क्रिया शरीर की स्थिति-पूर्ववत् रहेगी, दूसरी क्रिया की स्थिति दाहिने पैर को सीधा ऊपर उठाकर एडी को बाए पैर के अगूठे और पास वाली अगुलियो के बीच स्थापित करे (१) पूरक कर दोनो पैरो के पजो को दाहिनी ओर ले जाकर भूमि को स्पेश करे। शरीर दाहिनी ओर करवट लेगा गर्दन बायी ओर घुमाए। रेचन करते हुए पूर्व स्थिति मे आ जाए। (२) पूरक कर दोनो पैर बायी ओर ले जाकर भूमि को स्पर्श । शरीर बायी ओर करवट लेगा। गर्दन को दाहिनी ओर घुमाए. रेचन करते हुए मूल स्थिति मे आ जाए। । - नोट-इस क्रिया को पैर बदलकर भी दोहराये।

४४ तीसरी क्रिया शरीर की स्थिति-पूर्ववत रहेगी। तीसरी क्रिया की स्थिति-वाए पैर के टखने पर दाए पैर के टखने को स्थापित करे (१) पूरक कर दोनो पैरो को बायी ओर घुमाकर पैर को भूमि से स्पर्श कराए। शरीर बायी ओर करवट लेगा। गर्दन को दाहिनी ओर घुमाए। रेचन करते हुए पूर्व स्थिति मे आ जाए। (२) पूरक कर पैर को दाहिनी ओर भूमि से स्पर्श कराए। पूरा शरीर दाहिनी ओर करवट लेगा। गर्दन बायी ओर घुमाए। रेचन करते हुए मूल स्थिति मे आ जाए। नोट-इस क्रिया को दूसरे पैर से भी दोहराए।

४५ चौथी क्रिया शरीर की स्थिति-पूर्ववत् रहेगी चौथी क्रिया की स्थिति-बाए पैर को सीधा रखे दाहिने पैर को मोडकर पाव तल को घुटने के पास स्थापित करे (१) पूरक कर बाए पैर के ऊपर से दाए घुटने को बायी ओर भूमि से स्पर्श कराए। दाहिना कन्धा बाई ओर करवट लेगा। गर्दन को दाहिनी ओर घुमाए। रेचन करते हुए पूर्व स्थिति मे आ जाए। दाये पैर को सीधा रखे। बाये पैर को पूरक करते हुए दाहिने पैर के ऊपर से बाये पैर के घुटने को भूमि से स्पर्श कराये। रेचन करते हुए मूल स्थिति मे आ जाए। ।

४६ पांचवी क्रिया स्थिति-दोनो पैरो के घुटनो को मोडे। दोनो पैरो के बीच इतना फासला रहे कि एक पैर का घुटना दूसरे पैर की तली मे ला सके। (१) पूरक करते हुए दाये पैर के घुटने को बाये पैर की तली मे लगाए। शरीर बायी ओर करवट लेगा। गर्दन दायी ओर घुमाए। फिर श्वास छोडते हुए पूर्व स्थिति मे आ जाए। (२) अब पूरक करते हुए बाये पैर के घुटने को दाये पैर के तली मे लगाए। शरीर दायी ओर करवट लेगा जबकि गर्दन बायीं ओर घुमाए। वापिस श्वास छोडते हुए पूर्व स्थिति मे आ जाएं।

४७ छठी क्रिया शरीर की स्थिति पूर्ववत् रहेगी। छठी क्रिया की स्थिति-दोनो पैर के घुटनो को मोड कर पाव तल भूमि पर सीधा रखे, ध्यान रहे पैर नितम्बो से सटे रहे (१) पूरक कर दोनो घुटनो को बाई ओर भूमितल की ओर ले जाए, शरीर भी बायी ओर करवट लेगा। गर्दन दाई ओर घुमाए। रेचन करते हुए पूर्व स्थिति मे आ जाए। (२) पूरक कर दोनो घुटनो को दाहिनी ओर भूमि से स्पर्श कराए, शरीर दाहिनी ओर करवट लेगा। गर्दन बाई ओर घुमाए, रेचन करते हुए मूल स्थिति मे आ जाए।

४८ सातवीं क्रिया शरीर की स्थिति-पूर्ववत् रहेगी पूरक कर कमर की ओर नितम्ब के भाग को भूमि से ऊपर उठाकर त्वरित गति से भूमि पर गिराए। रेचन करे। इस क्रिया को तीन बार दोहराए, फिर कायोत्सर्ग की मुद्रा में आ जाए। एडी में लेकर कन्धे तक शरीर को ऊपर उठाए। एक साथ त्वरित गति से भूमि पर गिराये।

४९ आठवीं क्रिया पीठ के बल लेटे। हाथो को सिर की ओर फैलाकर श्वास भरे। बाये ओर शरीर को गोलाकार घुमाए। श्वास छोडकर पीठ के बल सीधे हो जाए। श्वास भर कर दाए ओर शरीर को :: गोलाकार बैलन की तरह धुमाए। श्वास कर रेचन कर पीठ के बल लेटे। शरीर शिथिल छोड दे। क्रिया की पाच आवृति । करे। सम्पूर्ण शरीर की इससे मालिश हो जाती है। पेट सीने एव कमर की विकृतियाँ दूर होती है। । 04 लाभ-सम्पूर्ण शरीर की इससे मालिश हो जाती है। पेट सीने एवं कमर की विकृतियाँ दूर होती हैं। -- कायोत्सर्ग की मुद्रा पीठ के बल सीधे लेटे। चित्त को श्वास पर केन्द्रित करें। मद-मद श्वास-प्रश्वास ले। शरीर को शिथिल छोड दे। आखे कोमलता से मुद ले। दोनो पाव के बीच एक फुट का फासला रखे। हथेलिया आकाश की ओर शरीर के समानातर फैला दे। प्रत्येक अवयव मे शिथिलता का अनुभव करे।

५१ पेट और श्वास की क्रियाएं सम्यक् श्वास की आवश्यकता प्रेक्षा-ध्यान मे श्वास की क्रिया का सम्यक् होना आवश्यक है। प्रेक्षा का प्रारभ श्वास से होता है। श्वास की क्रिया ठीक होने से साधना मे शीध और व्यवस्थित गति होती है। सामान्यत श्वास-प्रश्वास की क्रिया को अधिकतर लोग उल्टा करने लगते है। जो तनाव-ग्रस्त है उनका श्वास-प्रश्वास उल्टा चलने लगता है। पेट की दस क्रियाओ में जहां श्वास की क्रिया ठीक होती है वहा पाचन-सस्थान भी ठीक होने लगता है। छोटा बालक सहज रूप से श्वास-प्रश्वास करता है। जब वह श्वास ग्रहण करता है तो पेट फूलता है प्रश्वास करता है तव पेट सिकुडता है। सम्यक श्वास-प्रश्वास के लिए श्वास ले तब पेट फूले, प्रश्वास करे तब सिकुडे। इससे श्वास-प्रश्वास सहज ही दीर्घ होने लगता है। इन क्रियाओ के लिए तनाव रहित होकर खडे रहे। चित्त को क्रिया मे सलग्न करे। श्वास-प्रश्वास के साथ पेट का सचालन होगा श्वास अन्दर आ जाए तब पेट फूलेगा। श्वास बाहर जाए तब पेट सिकुडेगा। पेट की क्रियाओ मे श्वास-प्रश्वास की स्थिति सम्यक् रहेगी।

५२ पेट एवं श्वास की दस क्रियाएं पहली क्रिया गर्दन को सीधा रखे। दृष्टि सामने रखते हुए धीरे धीरे १० वार श्वास-प्रश्वास की क्रिया करे .

५३ ३ दूसरी क्रिया पूर्व आकृति मे १० बार श्वास-प्रश्वास की गति तीव्र करे। तीसरी क्रिया ऊपर आकाश की ओर अपलक देखकर १० बार श्वास-प्रश्वास तीव्र गति से करे।

५४ चौथी क्रिया गर्दन सीधी-दृष्टि को सम्मुख शरीर से पाच फुट की दूरी पर रखे। १० वार श्वास-प्रश्वास को तीव्रता से करे। ५ ५५ । पाचवीं क्रिया प्रश्वास बाहर निकालकर मुह को कौवे की चोच सदृश बनाकर श्वास को भरे। पेट, फेफडे, गला एव कपोलो (गालो) को फूलाकर आख बन्द करे। ठोडी को कठ-कूप मे लगाए। मूलबन्ध लगाकर कुम्भक करे। फिर गर्दन ऊपर कर नाक से श्वास छोडे। इससे उष्णता बढ़ती है। गर्मी के समय मे इसे न करे। सर्दी मे तीन चार आवृत्तिया की जा सकती है। छठी क्रिया हाथो को कमर पर रखे। अगलिया पीछे और अगुप्ठक आगे की ओर रखे। दृष्टि सम्मुख रहे। ३० डिग्री का कोण बनाकर शरीर को स्थिर रखे। १० बार श्वास-प्रश्वास करे सातवीं क्रिया छठी क्रिया की तरह ही हाथ कमर पर रखकर डिग्री तक झुके तेजी से श्वास-प्रश्वास करे। १० आवृत्ति करे। -- ५७ आठवी क्रिया छठी क्रिया की तरह शरीर आगे की ओर झकाएँ श्वास बाहर निकालकर बाहय कुम्भक करे । पेट को भीतर वाहर पाच से दस बार सचालित करे। I- -- नवमी क्रिया ९० डिग्री मे शरीर को झुकाकर हाथो को कमर पर रखे। बाह्य कुम्भक की स्थिति मे पेट को तेजी से दस से बीस बार सचालित करे। दृष्टि सम्मुख रखे। दसवीं क्रिया दोनो पैरो को कुर्सी की तरह मोडे। दोनो पावो के वीच डेढ फुट का फासला रखे। हथेलिया घुटनो पर स्थापित करे। श्वास का रेचन करे। पेट को पीठ की ओर खीचकर उड्डियान करे इस अभ्यास की परिपक्वता से नौली क्रिया होने लगेगी। लाभ श्वास की क्रिया सहज होने लगती है। कब्ज दूर, फेफडे स्वस्थ, रक्त का शोधन, पेट के रोगो से मुक्ति, पाचन-क्रिया व्यवस्थित, अपान-वायु की शुद्धि, प्राण सक्रिय एव सभी ग्रन्थिया प्रभावित होती है। जिससे उनका स्राव व्यवस्थित होने लगता है।

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५९ संकल्प सूत्र सकल्प प्रयोग के समय मन, वाणी और शरीर को स्थिर करे। विशुद्ध भावो से चित्त को भाविन करे। पद्मासन या सुखासन में सकल्प सूत्र को दोहराये। दोनो हाथ जोडकर आनद केन्द्र पर स्थापित करे। मै चैतन्यमय हूँ मै आनदसय हूँ मै शक्तिमय मेरे भीतर अनंत चैतन्य का अनत आनद का, अनत शक्ति का सागर लहरा रहा है। उसका साक्षात्कार करना मेरे जीवन का लक्ष्य है। ॐ शान्ति- -शान्ति- शान्ति-- - ॐ अहम् अहम् नम. .

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- है . मुनि किशनलाल आचार्य तुलसी के विद्वान शिष्य प्रेक्षाध्यान, जीवनविज्ञान, अध्यात्म योग एवं नैतिक शिक्षा के शिविरो के निदेशक, व्याख्याकार एव साधनाशील जन्म-कार्तिक कृष्णा चतुर्थी २ नवम्बर-१९३६ दीक्षा-माध कृष्ण, तृतीया विक्रम संवत २००९ लेखक की अन्य रचनाए.- १ प्रेक्षाध्यान आसन प्राणायाम २. योगासन प्राणायाम ४ समाधि का ससार ५ नमस्कार महामन्त्र ६. हियेरी, आख ७ आसुओ का दान प्रज्ञा की परिक्रमा ९. साधना प्रयोग और परिणाम ३ जोवन-विज्ञान ग्रन्थमाला-५२ प्रेक्षा-ध्यान : प्राण चिकित्सा साध्वी राजीमती

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जीवन-विज्ञान ग्रन्थमाला-५२ प्रेक्षा-ध्यान : प्राण चिकित्सा साध्वी राजीमती तुलसी अध्यात्म नोडर जैन विश्व भारती, लाडनूं (राजस्थान) जीयन विज्ञान ग्रन्थमाला-५२ संपादक : समणी स्थितप्रज्ञा © प्रकाशक : तुलसी अध्यात्म नीडम्, जैन विश्व भारती, लाडनू-३४१३०६ मूल्य : ३.५० (साढ़े तीन रुपये) द्वितीय संस्करण : १९८५ मुद्रक : मित्र परिषद्, कलकत्ता के आर्थिक सौजन्य से स्थापित जैन विश्व भारती प्रेस, लाडनूं-३४१३०६ प्रकाशकीय पर भी हम निरन्तर अपने शरीर के साथ रहते है। उसके रख-रखाव बहुत ध्यान देते है, पर यह शरीर रूपी यन्त्र किन शक्तियो से संचालित होता है, हम मे से कुछेक व्यक्ति ही उन शक्तियो को जानते । शरीर जिन शक्तियो से सचालित होता है, उनमे से एक महत्त्वपूर्ण शक्ति है प्राण । हमारा सारा जीवन प्राण रूपी इंधन से ही संचालित हो रहा है। प्राण शक्ति के विकास से शरीर तो स्वस्थ बनता ही है पर हम आध्यात्मिक स्वास्थ्य जो कि हमारा मूल साध्य है, को भी प्राप्त कर सकते है। प्रेक्षा-ध्यान साधना मे प्राण-शक्ति के विकास पर बल दिया गया है । दीर्घ-श्वास-प्रेक्षा, समवृत्ति श्वास-प्रेक्षा, कायोत्सर्ग, प्राणायाम आदि- आदि प्रेक्षा-ध्यान के प्रयोग प्राणो के समुचित विकास मे सफल सिद्ध हुए है । हमारा स्वास्थ्य प्राणशक्ति (Vital Force) पर ही निर्भर है। प्राण-चिकित्सा योगियो की महत्त्वपूर्ण देन है। प्राण के बिना अन्य चिकित्सा पद्धतिया भी उपयोगी नहीं बन पाती। तुलसी अध्यात्म नीडम् विगत कई वर्षों मे प्रेक्षा-ध्यान एव योग विषयक साहित्य का निरन्तर प्रकाशन करता आ रहा है। युगप्रधान आचार्य श्री तुलसी एव युवाचार्य श्री महाप्रज्ञ ने साहित्यिक जगत् को प्रेक्षा-ध्यान साधना के विविध आयामो को प्रस्तुत करने के लिए अपनी लेखनी द्वारा महत्त्वपूर्ण अवदान दिया है। आपको सद्प्रेरणा से सघ के अनेक साधु-साध्वियो ने भी योग-साधना विषयक साहित्य सृजन मे अपनी लेखनी उठाई है।

चार प्रस्तुत पुष्प मे आचार्यश्री तुलसी की सुशिष्या साध्वीश्री राजी- मती जो कि स्वयं योग साधना मे अपूर्व रुचि रखती है तथा योग साधना के विभिन्न प्रयोग करने वाली हैं, ने अपने अनुभव के आधार पर प्राण चिकित्सा के महत्त्वपूर्ण प्रयोग वताए हैं । चिकित्सा जगत् मे. भी योग द्वारा निरोग होने की चर्चा चल रही है। आज औषधियो से स्वास्थ्य लाभ सन्देहास्पद है । ध्यान, आसन, प्राणायाम, पट्कर्म आदि के द्वारा रोगो से मुक्ति के प्रयत्न पूरे विश्व मे चल रहे हैं । अत: इस प्रयारा मे प्रस्तुत पुष्प उपयोगी सिद्ध होगा ही इसके साथ ही आचार्यश्री फे प्रेक्षा-ध्यान-प्राण विज्ञान पुष्प मे प्रायोगिक पक्ष की दृष्टि से भी सहायक होगा। हमे पूर्ण विश्वास है कि प्रस्तुत पुष्प चिकित्मा जगत् मे योग द्वारा रोगो के निवारण के रूप मे सिद्ध होगा तथा व्यक्ति की आध्या- त्मिक चेतना जागृत करने में भी एक सशक्त साधन बनेगा। आशा पाठजन इस पुष्प से लाभ उठाएगे, यही हमारी मंगल कामना है। धर्मानंद निदेशक दिनाक-~-१० जुलाई, १९८४ तुलसी अध्यात्म नीडम् जैन विश्व भारती, लाडनू है आशीर्वचन -- - T प्राण मानवीय शक्ति का महत्त्वपूर्ण स्रोत है । उससे अनेक शक्ति- धाराए निकलती है। उसका विभिन्न क्षेत्रो मे उपयोग होता है । स्वास्थ्य का मूल हेतु भी प्राण और अस्वास्थ्य को स्वास्थ्य मे वदलने का हेतु भी प्राण है। इसलिए उसे जीवन भी कहा जा सकता है, । चिकित्सा भी कहा जा सकता है। चिकित्सा की अनेक पद्धतिया है । कुछ औपधीय और कुछ अनौपधीय । आयुर्वेदी, एलोपेथी, होम्योपेथी, ६. यूनानी आदि औपधीय चिकित्सा पद्धतिया है । चुम्बक चिकित्सा, सूर्य Bi' रश्मि चिकित्सा, रत्न चिकित्सा, मन्त्र चिकित्सा, प्राण चिकित्सा, , आध्यात्मिक चिकित्सा ये सब अनौपधीय चिकित्सा पद्धतिया है। दोनो का अपना-अपना मूल्य है और उपयोग है । पर यह कहना सर्वथा निरा- पद है कि सब चिकित्साओ का मूल आधार प्राण चिकित्सा है। प्राण का भडार पर्याप्त होता है तो चिकित्सा के प्रयोग काम आते है । यदि प्राण विद्युत् क्षीण हो जाती है तो कोई भी औपधि काम नहीं करती। - साध्वी राजीमती ने प्राण की शक्ति और इसके प्रयोग बताकर इसी मर्म ४ को अभिव्यक्ति देने का प्रयत्न किया है। यह लघुकाय पुस्तिका प्राण का मूल्याकन करने मे उपयोगी होगी -ऐमा मैं मानता हू। आचार्यश्री तुलसी ने अपने साधु-साध्वियो को साहित्य सृजन की जिस प्रेरणा से अभिप्रेरित किया है उसी प्रेरणा का यह एक प्रतिफलन है। इससे पाठक लाभान्वित होगा। युवाचार्य महाप्रज्ञ अरटिया बडा दिनाक २६-६-८४

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स्वकथ्य मन, वाणी और कर्म की सम्पादन शक्ति का नाम है प्राण । प्राण हमारे शरीर की रीढ, मन की सवेदना और आत्मा की चेतना का पर्याय है । हमारे आस-पास जो शक्ति, ऊर्जा, प्रकाश और चुबकीय धाराए गुजरती रहती हैं वे सब प्राण शक्ति के प्रमाण है। भोजन, पानी और हवा से भी ज्यादा जीने के लिए प्राणशक्ति की जरूरत है। प्राणधारा यदि स्वस्थ, शुद्ध, सन्तुलित और लयवद्ध है तो रहन-सहन, चिन्तन-मनन और व्यवहार-आचरण भी स्वस्थ, शुद्ध, सन्तुलित और सगीत से भरा होगा । अनुभव की बात है कि जब-जब मन पर अनुकूल- पतिकूल भावसंवेदनाओ का प्रभाव पड़ता है, हमारी प्राणधारा अस्त- भ्यस्त हो जाती है और प्राणधारा के अस्त-व्यस्त होते ही हम पारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक तनावो से घिर जाते है। इसलिए राधना के क्षेत्र मे प्राणधारा पर सयम करने की बात विशेष महत्त्व रखती है। योगाचार्यों ने महाप्राण साधना का उल्लेख किया है। प्राण गाधना द्वारा सम्पूर्ण चेतना का स्पर्श किया जा सकता है। यह प्राण चिकित्सा जीवन को बदलाव देती है। यदि हम प्राण की ऊर्जा को ही ढग से समझे, उसका सदुपयोग करे तो निश्चित रूप से जीने की देशाए बदल सकती है। आवश्यकता है-साधक प्राण की, श्वास-प्रश्वास की गति पर ध्यान देना सीख जाए । श्वास जितना सूक्ष्म, गहरा, तीर्घ तथा लयबद्ध होगा, जीने का स्तर भी सत्यं शिव सुन्दरं का रूप लेगा।

आठ श्रद्धेय आचार्य प्रवर, युवाचार्य प्रवर ने योग साधना के सन्दर्भ मे अनेक आध्यात्मिक प्रयोग प्रस्तुत किए है उनमे प्राण साधना का प्रयोग भी एक है। आशा है इस प्राण योग साधना के प्रथम पुप्प की सौरभ पाठक के तन-मन को अनुप्राणित कर आगे बढने के लिए प्रेरित करती रहेगी। -साध्वी-राजीमती अनुक्रमणिका १. प्राण साधना : योग कुछ चमत्कारी घटनाए mr ५-७ २. प्राणायाम और आहार भोजन कैसा हो? ५ निपिद्ध आहार ६ ८-१६ & ११ १२ ३. प्राणरूपान्तरण : चैतन्य केन्द्र जागरण प्राण की गति अधोमुखी या ऊर्ध्वमुखी प्राण का रूपान्तरण कैसे ? प्राण रूपान्तरण की बाधा और सुविधा प्राण रूपान्तरण की वाधा प्राण रूपान्तरण की सुविधा अन्तर्मुखी और वहिर्मुखी पहचान रगीन प्राणघारा और मनोवृत्तिया कौन कितना प्राणवान् शरीर प्रकृति की पहचान और प्राणचिकित्मा ४. महर्षि अरविंद :प्राणायाम जीवन मे प्राण की उपयोगिता श्वास के विविध रूप ताल युक्त श्वास का अभ्यास १२ १२ १३ ? ३ १४ १७-२० १८ ५. प्राणायाम-विधि और प्रयोग २१-२३ मूलवन्ध २२ जालधर-वन्ध २२ २२ उड्डियान-बन्ध अभ्याम प्रारम्भ २२ २३ आठ प्राणायाम ६. आचार्य हेमचंद्र : प्राणायाम २४-२६ २५ प्रत्याहार प्राणायाम २५ शान्त प्राणायाम २५ उत्तर प्राणायाम २५ अघर प्राणायाम २५ २७ . २८-३२ ३० ३० दीर्घ जीवन श्वास क्रिया ७. प्राणायाम और बुढ़ापा ८. युग-समस्याएं : प्राणायाम प्राणायाम का शरीर एवं मन पर प्रभाव प्राणायाम के मौलिक लाभ ६. प्राण शरीर ही आभामण्डल १०. प्राणायाम रोग चिकित्सा प्राण संप्रेपण क्रिया नाडी शोधन प्राणायाम आयुवर्धक प्राणायाम पाचन वर्धक प्राणायाम उदर शक्ति वर्धक प्राणायाम कब्ज निवारक प्राणायाम ३५-४८ ३६ ३७ ३७ ३० ३६ ग्यारह मोटापा घटाने वाला प्राणायाम ३६ ४० ४० रक्तचाप शामक प्राणायाम कफ निवारक प्राणायाम जुखाम निवारक प्राणायाम कण्ठ रोग निवारक प्राणायाम ४१ ४१ ४२ तनाव-नाशक प्राणायाम शीत-शामक प्राणायाम ४३ ४३ ४४ ४४ ४६ क्षुधा-शामक प्राणायाम कुण्डलिनी जागरक प्राणायाम सदेश प्रेपक प्राणायाम वासना शोधक प्राणायाम इच्छित सफलत्ता दायक प्राणायाम पर-रोग निवारक प्राणायाम ११. प्राणायाम साधक : आवश्यक जानकारी प्राणायाम करने का अधिकारी ४७ ४८ ४९-५०

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प्राण साधना : योग प्राण उस शक्ति का नाम है जिसके द्वारा मानव सोचता है, वोलता है, तथा भान्ति-भान्ति की क्रियाय करता है । आत्मानुभूति के पूर्व जो कुछ हमारे पास महत्त्वपूर्ण है वह प्राण शक्ति है । यह शक्ति हमारे स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर दोनो की सक्रियता का एक मात्र हेतु है । योगी लोगो का कथन है, प्राण तेजस् और वायु इन दो तत्त्वो के मिश्रण से बनता है। तेजस् के विना । तैजस् के बिना शक्ति का जन्म नहीं होता और वायु के बिना उस शक्ति का सचार, सम्प्रेषण नही होता । भौतिक जगत् का एक सिद्धान्त है कि तेजस् तत्त्व विकिरण-धर्मा होता है। इस परिभापा के अनुसार प्राण-विद्युत् मनो-सचार, विचार-प्रेषण, सम्मोहन तथा सूक्ष्म शरीर यात्रा मे निमित्त बनती है । प्राण विद्युत्, विद्युत्-परमाणु से भी सूक्ष्म है, क्योकि यह मन के स्पर्श से भी उत्पन्न होता है और स्थूल शरीर से अलग होकर भी अपना कार्य करता है । अमरिकी अणु वैज्ञानिकी श्रीमती जे० सी० ट्रस्ट ने प्राण शरीर के बारे मे अनेक प्रयोग किए है । कहते है कि कर्नल टाउन रोड ने वैज्ञानिको के सामने प्राण शरीर के अस्तित्व का प्रदर्शन ब्लेक बोर्ड पर खडी वान्धकर किया। वे दूर बैठे-बैठे उस पर उत्तर लिखते रहे और बीच-बीच मे शरीर में आते जाते भी रहे। मानवी-विकास के साथ इस विद्या का आविष्कार हुआ। हवाई द्वीप के लोग कहा करते थे कि हमारे मे एक ऐसी शक्ति होती है जिसके बाहर होते ही मनुष्य मर जाता है। इस प्राण ऊर्जा को 'न्यूमा' भी कहा जाता है। मनुष्य ने सबसे पहले विश्व में २ प्रेक्षा-ध्यान: किया वह यही प्राण है । कुछ वैज्ञानिक प्राण की परिभाषा मे कहते हैं, नलिका विहीन ग्रन्थियो से जो जीवनरस तैयार होता है वही हमारा प्राण तत्त्व है । कुछ लोगो का कहना है, वायु मे व्याप्त रासायनिक परमाणु विशेष का रूपान्तरण प्राण है । हेमोग्लोविन जो सूर्य से निकलकर हवा, पानी तथा अन्न के साथ हमारे शरीर मे जाता है वही तत्त्व प्राण है। ज्योतिषी लोगों का अभिमत है, आइनोस्वगेटिक प्लाजमा जो हमारे चारों ओर आकाश गंगा के घर्षण से उत्पन्न होकर छाया रहता है वही प्राण तत्त्व है। गुरुत्वाकर्पण के साथ यही शक्ति होती है । साधको का अपना अनुभव है कि प्राण वह ऊर्जा-विद्युत है जिसे चित्र से दिखाया नहीं जा सकता और शब्दो से बताया नही जा सकता। उनके अनुभव मे यह प्राण प्रकाशात्मक है। इसे इन्द्रियो से नही, केवल मनु भावना के द्वारा ही पकड़ा जा सकता है, स्पर्श किया जा सकता है, क्योकि इसकी गति अल्ट्रा वायलेट रेज से भी तेज है । इसका रंग पैरा-बैगनी माना गया है । हमारे चारो ओर जो शक्ति, ऊर्जा, हीट, लाईट तया जो चुम्बकीय धारायें विखरी हैं वे सब प्राण शक्ति के प्रमाण हैं । योगानु- भव के अनुसार प्राण मन से सम्बन्धित है, मन इच्छाशक्ति से इच्छाशक्ति आत्मा से और आत्मा क्रमशः सर्वोच्च चेतना से । प्राण का क्षेत्र मन से बहुत व्यापक, विशाल है । मन कभी सोता है, निष्क्रिय होता है, किन्तु प्राण का प्रवाह अविरल बहता रहता है । प्रत्येक प्राणी के शरीर मे प्राण-विद्युत् विद्यमान है किन्तु प्रति- कूल आहार, विहार तथा दुर्बल इच्छाशक्ति के लोग इमे जागृत नहीं कर पाते । योग साधना के द्वारा पूरे शरीर की ऊर्जा को सत्रिय करके अद्भुत कार्य सम्पादित किये जा सकते है। शरीर विज्ञान के अनुसार मानव शरीर मे ६० प्रतिशत भाग जलीय होता है। उसे जलाने के लिए ४००० डिग्री 'फारेन हाइट' चाहिए। बहुत बार हम सुनते हैं।

प्राण-चिकित्सा ३ बढी हुई अपने ही शरीर की ऊर्जा से कुछ लोग खडे-खडे जल गये, क्योकि मनुष्य का शरीर जिन तत्त्वो से बना है उनमे मूल है सेल । प्रत्येक सेल मे 'माइट्रोकोन्ड्रिया' नामक एक विशेष प्रकार का विभाग होता है, जिसे हम सैल का पावर स्टेशन' कह सकते है। इस सम्पूर्ण शरीर के संचालन के लिए जो विद्युत् चाहिए वह सब इस विभाग मे उत्पन्न होती है। इसी ऊर्जा का नाम प्राण है कभी-कभी यह ऊर्जा कोशिका की पतली झिल्ली को चीर कर बाहर निकलने लग जाती है । तव ऊर्जा क्षरण (लिकेज) होती है। अग्नि की तरह वह बाहर दिखाई देने लगती है। स्वामी विवेकानन्द 'साइकिक फोर्स' के नाम से इस ऊर्जा की व्याख्या करते थे। येल विश्वविद्यालय, न्यूरो अकादमी के प्रोफेसर डॉ० हेराल्ड ने बताया-प्रत्येक प्राणी इलेक्ट्रोडायनेमिक क्षेत्र से आवृत होता है। वैज्ञानिको के अनुसार इस क्षेत्र को मस्तिष्क विद्युत् से प्रभा- वित किया जा सकता है। हमारे शरीर मे जो चुम्बकीय शक्ति है वह सपूर्ण पृथ्वी से भी अधिक है, किन्तु इसका जागरण सकल्पशक्ति से किया जा सकता है । सम्मोहन, प्लेचिट पर आत्माओ को बुलाना, विचार प्रेषण, तत्क्षण रोग चिकित्मा तथा असधारण चमत्कार ये सब हमारी जागृत प्राणशक्ति के ही परिणाम है कुछ चमत्कारी घटनाएं अमेरिका की जैनी मोरन एक आश्चर्य थी। अधेरे मे उमका शरीर चमकता था। और तो क्या साथ वालो को वैटरी और लालटेन भी नही रखना पडता था । वैज्ञानिको ने कहा, इसके शरीर मे १०० वाट का बल्व जलाया जा सकता है । इन शक्तियो का शोध करने वाले जोन्स . कहलाते थे । भूगर्भ के अनेक धातु खदानो की - । went man ४ प्रेक्षा-ध्यान: माइलो तक चलकर की। उनके पद स्पर्ण से धातुएं खिलौनो की तरह उछलने लग जाती थी। जर्मन की एक औरत हैण्ड पम्प से पानी निकाल रही थी। हाथ के स्पर्श से आग निकलने लगी। लोगो ने समझा सभव है पम्प मे आग लग गई हो, करेन्ट आ गया हो, किन्तु अन्त मे ज्ञात हुआ कि औरत का पूरा शरीर करेन्ट फेक रहा है। झटके मार रहा थियोसोफिकल सोसायटी की जन्मदात्री मेडम ब्लावटस्की अपने बन्द कमरे से बाहर सूक्ष्म शरीर को भेज कर दर्शन दिया करती थी। वह कहती थी कि सूक्ष्म शरीर का विकास निर्भर करता है मस्तिष्क पर । चतुर्दश पूर्वो के ज्ञाता जैनाचार्य भद्रवाहु महाप्राण की साधना के द्वारा अपनी सम्पूर्ण प्राण चेतना को शरीर के विशिष्ट सवेदन केन्द्र पैर के अगूठे पर केन्द्रित करके ऐसी अवस्था मे पहुंच जाया करते थे कि महीनो तक शरीर के सुख-दुःख का उन्हे भान नही होता था। मृत शरीर की तरह निष्क्रिय, निष्कम्प स्थिति मे स्थिर रहते थे। आवश्यकता वश अगूठे का बटन दबाते ही ऐसे उठते थे जैसे कभी सोये ही नहीं थे। आप अपनी जागृत इच्छा शक्ति के द्वारा एक पल मे वटन को ऑन आफ कर सकते है, यह सब आपकी प्राणशक्ति का ही चमत्कार है । आणविक ऊर्जा की तरह इस प्राण शक्ति के सहारे किसी का भला भी किया जा सकता है और किसी का बुरा भी। भगवान् महावीर ने जिस तेजोलब्धि के द्वारा गोशालक को बचाया था, उसी तेजोलब्धि-प्राणशक्ति के द्वारा दो सन्तों को गोशालक ने भस्म किया था। इस प्रकार के सहस्रो उदाहरण शास्त्रो मे प्राण सग्रह की साधना के है। जो लोग दुर्बल, विकृत मन तथा विकृत विचार वाले होते हैं वे सूक्ष्म शरीर का प्रयोग नही कर सकते।

२ प्राणायाम और आहार -- प्राणायाम-कर्ता के लिए आहार पर ध्यान देना नितान्त अपे- क्षित है । असन्तुलित, अनियमित तथा अत्यधिक आहार की स्थिति मे किसी भी प्रकार की साधना सफल नही हो सकती। मानव शरीर की आयु, स्वास्थ्य, सौन्दर्य तथा सन्तुलन एक- मात्र हमारे खाद्य मयम पर निर्भर करने वाली बात है। साधारणतया हम भोजन मे लेते है वसा, प्रोटीन, कार्वोहाइड्रेड और विटामिन तथा वाटर । इनमे वसा, कार्वोहाइड्रेड और प्रोटीन तीन तत्त्व ऐसे है जो ज्यादा कैलोरी उत्पन्न करते है अर्थात् शरीर मशीन के सचालन के लिए ऊर्जा-इंधन पैदा करते है जबकि वाटर, मिनरल और विटामिन भूख को पैदा नही करके केवल उसे बढाते है। यदि कैलोरी-जनिक तत्त्व शरीर मे अधिक मात्रा मे पहुचने लगते हैं, तो वे वजन बढाकर रक्त-धमनियो (बल्ड बेसलस) तथा हार्ट को नुकसान पहुचाते है । सामान्यतया वयस्क लोगो के लिए प्रतिदिन १५०० से १८०० कैलोरी आवश्यक मानी गई है। प्राणायाम करने वाले साधक के लिए प्रोटीन विटामिन घो तथा सब्जियो से मिलने वाली कैलोरी अधिक उपयुक्त मानी गयी है । जिस खुराक से पेट पर कम से कम भार आये और जो पोषक तत्त्वो से भरा हो वह उत्तम भोजन है । भोजन कैसा हो? इस प्रश्न के समाधान मे निम्न वाते ध्यान देने योग्य है- (१) जिस भोजन से कब्ज न बढे ।

प्रेक्षा-ध्यान: (२) जिस भोजन से शरीर का वजन नियत्रित रहे । (३) जिस भोजन से शारीरिक सौन्दर्य-चमक बनी रहे । (४) जो भोजन गहरी नीद ला सके । (५) जो भोजन शरीर मे स्फूति मन मे प्रसन्नता तथा दिमाग को ठण्डा बनाये रख सके। निषिद्ध आहार -- (१) कडवी तीखी वस्तुएं । (२) इमली, अम्लयुक्त वस्तुएं । (३) सरसो का तेल, तली सब्जिया । (४) नमक, प्याज, लहसुन । (५) बासी, वदवूदार-चीजे । (६) अधिक पके या कच्चे फल । (७) खट्टा दही पुराना मेवा । (८) अधिक गर्म वस्तुए (चाय दूध भी नहीं) नीद और भूख मानव-जीवन की दो अनियवार्य अपेक्षाए है। क्योकि गहरी नीद और गहरी भूख मानव मन की गहराइयो के द्वार खोलने तक का कार्य करती है, जबकि कृत्रिम नीद और कृत्रिम भूख मानव मन को अशान्त, विक्षुब्ध और उत्तेजित बनाती है। सचाई यह है कि आज आदमी जैसे-जैसे सभ्य और विकसित होता जा रहा है वैसे-वैसे उसकी नीद और भूख गडबड होती जा रही है। आदमी बीमार क्यो होता है, इसके प्रत्युत्तर मे भगवान् जिन कारणो का उल्लेख करते है उनमे अधिकाश कारण भोजन से सम्बन्धित हैं। सामान्यतया मनुष्य वीमार होता है-~- (१) भारी भोजन, मिर्च मसाले खाने से । (२) सुबह चाय (बैड टी) लेने से ।

प्राण चिकित्सा (३) एक बैठक मे लम्बे समय तक वैठने से । (४) नशा करने से व बार-बार खाने से । (५) साय भोजन के तुरन्त वाद सोने से । (६) गहरी नीद नही आने से । (७) दिन भर चिन्तित रहने से । (८) अति आहार तथा अल्पाहार से ।

३ "प्राणरूपान्तर : चैतन्य केन्द्र जागरण" शरीरगत अर्थात् प्राणशरीरगत् चैतन्य केन्द्रो को जागृत तथा प्राणवान् बनाने के लिए स्थूल और सूक्ष्म दोनो ही प्रकार के प्राणा- याम अपेक्षित है । स्थूलप्राणायाम करते समय केवल श्वास-प्रश्वास की गति पर ध्यान रखा जाता है। जबकि सूक्ष्म प्राणायाम करते समय श्वास-प्रश्वास को सधि, स्पन्दनो एव अवचेतन के सूक्ष्म-मवेगो पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है । मुख्य सात चैतन्य केन्द्र है, जिन पर प्राण की धारणा करके अपूर्व लाभ उठाये जा सकते है। सर्व प्रथम इन सभी केन्द्रो का ध्यान निर्धारित करे, फिर उन स्थानो पर श्वास पहुचाये, रोके और धीरे- धीरे छोडे । लेने मे-दस सेकिण्ड रोकने मे-बीस सेकिण्ड छोडने मे~दस सेकिण्ड बाहर रोकने मे-दस सेकिण्ड इस प्रकार एक प्राणायाम मे ५० सेकिण्ड का समय कम से कम लगाना चाहिए । प्रत्येक केन्द्र पर धीरे-धीरे ऐसी २५ आवृतिया अनिवार्य है । यदि किसी एक ही केन्द्र पर विशेप अभ्यास करना आवश्यक समझे तो शेप केन्द्रो पर तीन-तीन आवृतिया अवश्य कर लें। केन्द्र-स्थान १ ज्ञान केन्द्र शिखाभाग २. शान्ति केन्द्र केन्द्र-नाम तालु भाग प्राण चिकित्सा & कठ भाग हृदय भाग - ३ दर्शन केन्द्र भृकुटी भाग ४ विशुद्धि केन्द्र ५ आनन्द केन्द्र ६ तेजस केन्द्र नाभि भाग ७ शक्ति केन्द्र गुदा भाग इस क्रम में निम्नोक्त तीन अवयवो पर विशेष ध्यान दे- गर्दनभाग, कर्णभाग, उदरभाग । १. ठुड्डी-दबाकर गर्दन के ठीक पीछे के भाग पर ध्यान केन्द्रित करे। फिर वहा के स्पन्दनो को देखे स्पन्दन अनुभूत हो या नही, प्राणायाम प्रारम्भ कर दे। प्राणायाम करने के बाद पुन वहा ही रहे स्पन्दनो की प्रेक्षा करे । तीव्रता का अनुभव करे । २. कर्णभाग-कानो के दोनो छिद्रो पर ध्यान केन्द्रित करके प्राण की धारा को प्रवाहित करे । दोनो अगूठो से श्वान निरोध करके प्राण के स्पन्दनो का अनुभव करते हुए छोड दे। ३ उदरभाग-उदर मक्रियता के लिए लम्बा श्वास पेट मे भरे, रोके, छोडे और फिर बाहर रोके । "प्राण की गति अधोमुखी या अर्ध्वमुखी" हमारे शरीर मे जो मुख्य भाग हैं, उन सभी भागो पर प्राण अपने ढग से गति करता है, किन्तु जब तक प्राण की गति पर हमारा नियत्रण नही हो जाता तब तक वह न शुद्ध हो सकता है और न स्वेच्छा से मचालित । प्राणसप्रेपण के लिए प्राण शुद्धि और प्राण मत्रह इन दोनो की अत्यन्त अपेक्षा है। किस केन्द्र पर प्राण की सक्रियता क्या फल लाती है, पहले इस पर ध्यान दे। पाण के मुख्य दो प्रकार . देहस्थ प्राण और मानसिक प्राण । देहस्थ प्राण के दो प्रकार हैं १० प्रेक्षा-ध्यान। निम्नप्राण और उच्चप्राण । शरीर के अधोवर्ती भाग मे जो प्राण विचरता है वह निम्नवृत्तियो को जन्म देता है और नाभि से ऊपर जो प्राण विचरता है, वह उच्चभागस्थ होने के कारण उच्चवृत्तियो का जनक है। प्राण का सर्वश्रेष्ठ भाग है-मनोमय प्राण क्रमश भावनात्मक प्राण, केन्द्रीय प्राण और निम्नप्राण । प्राणायाम करते समय (कुम्भक मे) साधक का ध्यान मनोमय-प्राण के स्थान (मस्तिष्क से गले तक) पर रहे अथवा भावनात्मक प्राण के स्थान (गले से हृदय तक) पर । विशुद्धमनोमय प्राण के फलित है कला, कल्पना उच्चस्तरीय-सकल्प एकाग्र विचार एव सरलसवेग । अजागृत दशा मे इसके विपरीत भाव प्रकट होते है । भावनात्मक प्राण जो मुख्यत हृदय मे कार्य करता है । इस केन्द्रवर्ती प्राण के शुद्ध होने पर चैत्य पुरुप का अनुभव, अन्तरात्मा के दर्शन, प्रेम, सौजन्य तथा मैत्री जैसी निर्मलभावनाओ का उत्थान एवं अन्तर्नाद का श्रवण प्रारम्भ होता है । अशुद्धता मे इसके विपरीत घृणा, दुर्भाव तथा विभिन्न प्रकार की विकृत भावनाए पनपती हैं । केन्द्रीयप्राण-जिसका स्थान है, हृदय से नाभि, इस प्राण की अनादि कालीन अशुद्धता का प्रमाण है आकाक्षा, आकर्पण, भय प्रतिशोध जैसी जघन्य वृत्तियो का उदय । इस प्राण की शुद्धि के बाद ही प्राण रूपान्तरण की दिव्य अनुभूतिया की जा सकती है। निम्नप्राण जो चेतना की सर्वसाधारण स्थिति का सूचक है । जब तक प्राण की गति कामकेन्द्र के आस-पास रहती है। तब तक जघन्य स्तरीय कामनाए तीन-आग्रहभाव, निन्दा, वैमनस्य, स्वार्थपूर्ण लडाइया तथा भाति-भांति के मनोवेग प्रकट होते है। इस स्थिति के लोग न जीवन का भला करते है और न जगत् का। अतः स्वस्थजीवन मे विश्वास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए जरूरी है कि वह शुद्धप्राण, उच्चप्राण एवं शान्तप्राण की पवित्र दिव्यशक्ति से परिचित हो । -- प्राण चिकित्सा प्राण का रूपान्तरण कैसे ? हम अनुशासन, व्यवस्था एवं नियत्रण के जितने अभ्यासी हैं उतने रूपान्तरण के नही । रूपान्तरण का तात्पर्य है-प्राण का हल्का होना, शुद्ध होना, दीर्घ होना, चमकीला होना तथा उजला होना। जिसके प्राण की गति एव कलर बदल गया है, जिसके प्राण की गति भीतर ज्यादा और बाहर कम हो गई है, जो एक मिनिट मे एक श्वास लेता है तथा जिसके श्वास मे सुगध आने लगी है, इससे आप समझे कि अब प्राण रूपान्तरित होने लगा है, किन्तु प्राण रूपान्तरण की सबसे बडी पहचान यह है कि । १ वृत्तियो का निर्जरण शोधन शुरू हुआ या नहीं? २ इच्छाओ का तथा वासनाओ का दवाव हल्का हुआ या नहीं ? ३ वाह्य परिस्थितियो का प्रभाव तथा चेतना का अधोमुखी बहाव रुका या नहीं? ४. उतावल, यसतुलन, ईर्ष्या, अहभाव निम्न भावनाए तथा आवेग-उपवेग जैसी दुर्बलताओ पर सहज नियत्रण का सामर्थ्य पंदा हुआ या नहीं? "प्राण रूपान्तरण की बाधा और सुविधा" प्राण का एक प्रकार है मनोवैज्ञानिक प्राण अर्थात् मानसिक प्राण, इस प्राण का सम्बन्ध मात्र मन की गति के साथ होता है । प्राण-विक्षोभ का वास्तविक कारण यह मनोवैज्ञानिक प्राण है । भोजन की भूख से प्राण विक्षुब्ध, अशुद्ध नहीं होता, किन्तु मन की भूख से प्राण चचल हो उठता है, अत अत्यन्त अनिर्वायना है कि मन को किसी उच्च लक्ष्य के साथ नियोजित रखा जाये । ताकि प्राण- के अर्ध्वगमन मे कोई बाधा न आये ।

१२ प्रेक्षा-ध्यान. प्राण रूपान्तरण की बाधा १ तामसिक भोजन । २. अमुक पदार्थ के लिए मन की लिप्सा । ३. ज्योति, शक्ति तथा शाति जैसे किसी विराट् उद्देश्य का अभाव । ४. सबसे अधिक प्राण ऊर्जा होती है-नेत्र, अगुलिया एव इच्छाशक्ति के साथ, अत. इन्हे दुर्वल होने से बचायें । प्राण रूपांतरण की सुविधा प्राण रूपान्तरण मे सबसे बडी अनुकूलता है-अन्तर्मुखता अन्तर्मुख चेतन की स्थिति मे प्राण का ऊर्ध्वगमन, प्राण का रुपान्तर स्वत सभावी है । जव चेतना का झुकाव किसी उच्च चेतना, विराट प्रकृति या किसी अन्तर्मुख-आलम्बन के प्रति होता है तो स्वत प्राण धारा संयत और नियमित होकर साधक का यथेष्ट पथ प्रदर्श करती है। अन्तर्मुखी और बहिर्मुखी पहचान बहिर्मुखी अन्तर्मुखी अपनी ओर विचार प्रधान शीघ्र निर्णय ओरो की ओर सन्मुख || भाव प्रधान व्यवहार कुशल विचार से अधिक कार्य पसद देर निर्णय व्यवहार-अकुशल कार्य से अधिक चिन्त यथार्थवादी समाज प्रिय वस्तुगत दृष्टि ।।। पसद आदर्शवादी एकान्त प्रिय आत्मगत दृष्टि प्राण चिकित्सा १३ "रंगीन प्राणधारा और मनोवृत्तियां" चिन्तन और भावधारा के आधार पर हमारे शरीर के आस- पास घूमने वाले तेजो वलय मे परिवर्तन आता है। विज्ञान कहता है कि शाति और प्रसन्नता की स्थिति मे हमारे चारो ओर नीले रंग की किरणें दिखाई देती है। १ व्यवहार कुशलता एव विनोद प्रियता की स्थिति मे वही किरणे पीले रग मे दिखाई देती हैं। २ क्रूर आग्रही तथा स्वार्थपूर्ण मनोभाव की अवस्था मे लाल रग का तेजोवल निर्मित हो जाता है । ३ हरा रग सृजनशीलता का द्योतक है । ४ गहरा बैगनी रग अस्थिरता तथा मन की चपलता को प्रमाणित करता है। ५ गहरे केशरिया रग का तेजोवल सदा धार्मिक लोगो के चारो ओर छाया रहता है। इसी तेजोवलय का नाम है प्राण, प्राणधारा-आभामण्डल जो भावो की स्थिरता के साथ स्थिर रहता है और अस्थिरता के साथ अस्थिर । "कौन कितना प्राणवान ?" १. चेहरे का तेजोवलय सबसे ज्यादा प्रभावक होता है क्योकि सम्पूर्ण ज्ञानकेन्द्र ज्ञानेन्द्रियो का आश्रय मस्तिष्क होता है। २ जिसके मस्तिष्क मे जितना ग्रेमेटर होता है । ३. जिसका व्यक्तित्व अखण्ड होता है। जिसमे वाकमधुरता और वाक्शक्ति होती है। ५. जो पवित्र विचारो मे घुला रहता है । ६. जो खुले प्रकाश के बीच योगाभ्यासी बनकर रहता है। 6.

१४ प्रेक्षा-ध्यान : " "शरीर प्रकृति की पहचान और प्राणचिकित्सा" प्राणायाम वहुत उपयोगी तत्त्व है तथापि वह किसी के लिए घातक हो सकता है। आज जो प्रयोग अपने लिए हितकर है वही कल अहितकर हो सकता है अत. यह अत्यन्त आवश्यक हो जाता है कि हम अपनी प्रकृति-स्वभाव की पहचान के साथ प्राण चिकित्सा करे। हा, कुछ ऐसे भी प्राणायाम है जिनसे हम बिना प्रकृति पहचान के भी लाभ उठा सकते है। विशेष परिस्थिति में अपनी प्रकृति का ज्ञान अनिवार्य है। पित्त प्रकोप की पहचान- जिह्वारग - विशेष लाल कडवा भूख अधिक कडा पेशाबरंग पेशाब मात्रा कममात्रा आंख रंग लाल स्वाद मल गहरा पीला त्वचा नरम पित्त प्रकृति-उष्ण स्वभाव वालो के लिए निम्नोक्त प्राणायाम नीलेरग की धारणा के साथ किये जाये तो विशेष लाभदायक होते हैं- अनुलोम विलोम शीतली प्राणायाम सीत्कारी प्राणायाम चन्द्रभेदी प्राणायाम - वात प्रकोप की पहचान- जिह्वारंग मटमैला प्राण चिकित्सा ५ स्वाद विकृत-खराव प्यास अल्प भूख अल्प मल कब्ज, पेशाव रग पेशाव मात्रा नेत्र रग अनियमित गुदला कष्ट मैला कम, पसीना बहुत कम त्वचा रूक्ष वायु-प्रधान प्रकृति के लोगो को पीले रग, हरेरग तथा नारगी रग की धारणा के साथ अनुलोम-विलोम तथा भस्रिका प्राणायाम करना चाहिये । वायुवृद्धि मे कुभक प्राणायाम का समय एक साथ नही बढाकर धीरे-धीरे बढाना चाहिए । कफ प्रकोप की पहचान- जिह्वारग स्वाद सफेद फीका प्यास अल्प अल्प भूख मल पेशाव रग पेशाव मात्रा नेत्र रंग पतला सफेद अधिक सफेद पसीना अल्प चमडी ठही त्वचा कफ प्रकोप की दशा मे लाल और नारगी धारणा १६ प्रेक्षा-ध्यान: करते हुए सूर्य भेदी प्राणायाम जैसे शरीर मे गर्मी पैदा करने वाले विशप प्रकार के प्राणायाम करने चाहिए। इस प्रकार प्रकृति पहचान रखने वाले लोग प्राणचिकित्सा से टिकाऊ एव सन्तोष जनक लाभ उठा सकते हैं ।

४ महर्षि अरविंद : प्राणायाम महर्षि अरविंद ने प्राण को चार भागो मे विभाजित किया, निम्न प्राण, निम्नतर प्राण, उच्च प्राण, उच्चतर प्राण | कुछ योगा- चार्यों ने मन्द, मध्यम और गहन ये तीन भेद बताये है। मन्द प्राण वाले व्यक्ति के विचार सतुलित, स्पष्ट नही होकर बिखरे और उलझे होते है । वह आत्म-विश्वासी नहीं होता। मन्द प्राण वाला किसी को प्रभावित नहीं कर पाता । मध्यम प्राण वाला मन्द प्राण वालो की तुलना में अधिक स्पष्ट और शिष्ट व्यवहार वाला होता है । मध्यम प्राण वाला चाहे तो प्राणायाम द्वारा एकाग्रता मे अपूर्व विकास कर सकता है । गहन प्राण के लोग सूक्ष्म विचारक, स्थिरमति तथा प्रभावी होते है । ऐसे लोगो का परिवार समाज तथा देश मे बहुसख्यक होना सम्पूर्ण विश्व के लिए कल्याणकारी होता है । जीवन मे प्राण की उपयोगिता मानव जीवन मे आहार, पानी और वायु तीनो परम आव- श्यक तत्त्व है । आहार के बिना अधिक दिन जीया जा सकता है, पानी के विना कुछ दिन, किन्तु वायु के बिना कुछ क्षण भी नहीं जिया जा सकता। हार्ट में जैसे ही "ऑक्मिनाइटेड ब्लड" वहना वन्द होता है उसके कुछ ही मिनटो के बाद रोगी को मृतक घोषित कर दिया जाता है । मनुष्य को कम से कम १ सेर हवा खाने के लिए जरूर चाहिए । सामान्यतया हम श्वास के द्वारा जो वायु ग्रह्ण करते हैं उममे ७६ प्रतिशत नाइट्रोजन ६६ प्रतिशत ऑक्सीजन ४० प्रतिशत '. होती है, किन्तु श्वास के द्वारा ग्रहीत नाइट्रोजन प्र५५ निप: ।

१८ प्रेक्षा-ध्यान . जाता है, ऑक्सीजन का ४ प्रतिशत भाग भीतर ठहरता है। वैज्ञानिकों की दृष्टि मे प्राणायाम इसीलिए आवश्यक माना गया है कि इस विधि से प्राण को अधिक से अधिक अवशोषित किया जा सके । कुछ वैज्ञा- निको का कहना है कि हम दीर्घश्वास के साथ कार्वन हाइड्रोक्लोरिक, केल्शियम, फासफोरस, सल्फर, सोडियम, मेग्नीशियम, लोहा तथा प्रोटीन जैसे सभी पोषक तत्त्वो को ग्रहण करते हैं, अत. दीर्घश्वास के लिये प्राणायाम जरूरी है। हम जो श्वास लेते हैं वह प्राण का स्थूल आकार है । इस स्थूल श्वास पर नियन्त्रण करते-करते हम भीतरी सूक्ष्म प्राण तक पहु- चते हैं । यहा पहुचते ही 'कन्ट्रोल ऑफ माइण्ड" की स्थिति प्राप्त होती है । आसनो के द्वारा हम स्थूल शरीर पर अपना नियन्त्रण प्राप्त करते है और प्राणायाम के द्वारा सूक्ष्म शरीर-एस्ट्रल बॉडी पर । श्वास और स्नायु प्रवाह (नर्व करेन्ट) मे परस्पर गहरा सम्बन्ध है। प्राणायाम करने से धीरे-धीरे आन्तरिक शक्ति केन्द्रो पर सयम होता है, नमक उससे मन पर और फिर सम्पूर्ण विश्व-ऊर्जा (कोस्मोस) पर । यही कारण है कि प्राण-विजयी सिद्ध-योगी-साधक पर-पीडा को अपनी पीडा अनुभव करता है, तब शरीर-प्राण और विश्व-प्राण की धारा के बीच कोई व्यवधान नहीं रह जाता। श्वास के विविध रूप आत्मा को शरीर से वाधे रखने वाली डोर सास है, सामान्य तया धरती का प्रत्येक प्राणी सास लेता है। कोई छोटी सास कोई बड़ी सास, कोई गहरी सास तथा कोई उखडी सास । कई सख्या में बहुत कम सास लेते हैं और कई उतने ही समय मे बहुत ज्यादा। श्वास की गति हमारे मानसिक-विकास-एकाग्रता, धैर्य तथा मन्तुलित जीवन की परिचायक है। तेज या विपम सांस, काम, क्रोध तथा भय जैसे भावावेगो की जनक है । कहा जाता है, एक चचल बन्दर ३२ की प्राण चिकित्सा १६ श्वास के मुख्य तीन गति से श्वास लेता है जबकि मनुष्य के श्वास-प्रश्वास की औसतन गति १८ वार मानी गई है। कछुआ अपने दीर्घ जीवन के लिए प्रख्यात है। क्योकि वह एक मिनिट मे केवल ४ सास लेता है। इस स्थूल गरीर की सवलता और निर्वलता का हेतु एक मात्र दीर्घश्वास है ऐसा सिद्ध योगियो का अनुभव है। श्वास कौन नहीं लेता ? जैसे-तैसे उल्टे सीधे सभी लोग श्वास लेते हैं, परन्तु खाना, और कैसे खाना, बोलना और कैसे बोलना जैसे ये दो बाते है वैसे श्वास लेना और कैसे लेना, यह स्वतन्त्र ध्यान देने की बात है। प्रकार होते है दीर्घश्वाम, समश्वास एव नन्द श्वास । तीनो के अपने स्वतत्र प्रभाव है, किन्तु प्रभावोत्पादकता का आधार तीनो का एक ही है, वह है श्वास की ताल बद्धता लय- द्धता । तालवद्ध-श्वास के साथ जो प्रकम्पन पैदा होते हैं वे क्या नहीं र सकते ? वर्तमान वैज्ञानिक शोध के अनुसार श्रवणातीत ध्वनियो मे ल्य चिकित्सा, रोगाणु-सहार, ऋतु परिवर्तन तथा मोटे धातु खण्डो को गला देने जैसे कार्य किये जा सकते है । स्वर सबके पास होता है किन्तु आलाप किसी के पाम । चलते व हैं किन्तु चलने मे एकलयता किसी-किसी के साथ । वोलते मव है न्तुि आत्मा की आवाज किसी-किसी में ही होती है । प्राणायाम करने हमारी सास मे एकलय (आलाप) तालबद्धता आती है। एक सगीन श होता है । जिसके परिणाम स्वरूप शरीर मे स्फूति आती है और राशा, आलस्य, कुण्ठा तथा घृणा जैसी निम्न-भावनाए मन में हर हो जाती है। मत्र साधना के साथ होने वाले सभी चमत्कार ती तालबद्ध सांस के साथ किये गपे जप के परिणाम है । सामान्य लोग सोच सकते हैं कि ध्वनि की एकलयता से क्या हो सकता है, परन्तु अक्षर की चोट हथोडे की चोट २० प्रेक्षा-ध्यान : जाती है तालबद्धता के कारण । एक फौजी सेना लेफ्ट राइट करती हुई एक पुल को पार कर रही थी। यकायक पुल टूट गया। कप्तान ने कहा, सब एक साथ नही चलेगे, बोलना बन्द कर दे। हर टुकडी आगे पीछे बढे वैसा ही किया, विनाश हो गया। जैन दर्शन के अनुसार पूरा ब्रह्माण्ड प्रकम्पनो से भरा है। जब ये प्रकम्पन एकत्रित हो जाते है तब वहा आणविक ऊर्जा उत्पन्न हो जाती है। उस ऊर्जा का स्टोर करके हम कठोर से कठोर कार्य भी सम्पन्न कर सकते हैं । श्वास की सामान्य तीन स्थितिया- (रेचक) (पूरक) (कुभक) (१) रेचक मे उदर स्थित वायु को निकाला जाता है । (२) पूरक मे बाहर से श्वास को भीतर लिया जाता है । (३) कुभक मे श्वास-प्रश्वास दोनो की गति वन्द हो जाती - किसी भी प्रणायाम के प्रारम्भ करने से पूर्व कोष्ठ-स्थित वायु का रेचन किया जाता है, इसके तुरन्त बाद विना बाह्य-कुभक किये नई सास को भीतर खीचा जाता है । ताल युक्त श्वास का अभ्यास श्वास मे दीर्घता, नियमितता तथा ताललयता लाने के लिए सख्या, हृदय की धडकन और नाडी-स्पन्दन को समझना होगा। हृदय की धड़कने सवकी समान नही होती अत: अपनी धडकन को ही ताल- युक्त श्वास के लिए मापना चाहिए। साधारणतया एक श्वास मे ६ धडकन होनी चाहिए । दूसरा अनुभव हृदय पर हाथ रखकर किया जा सकता है और मन की एकाग्रता से भी। कुछ दिनो तक श्वास-गति का अनुभव करे, जब श्वास मे एकरूपता, नियमितता और सहजता अनुभव होने लगे, धड़कन देखने का अभ्यास चालू कर दें।

५ प्राणायाम-विधि और प्रयोग प्राणायाम का अर्थ है-प्राण वायु का सयम, नियत्रण एव अनु- शासन । वश किया हुआ प्राण जीवन प्रगति मे महान् सहयोगी वनता है, क्योकि वह श्वसन क्रिया के नियमन एव नियोजन के साथ-साथ चैतन्य जागरण की सम्भावनाए प्रकट करता है। आत्मा का सबसे निकटवर्ती पडोसी प्राण है। अत. प्राणायाम से प्राण-साधना प्रारम्भ करे। प्राणायाम की मुख्य तीन क्रियाए है-रेचक, पूरक और कुभक । श्वास कभी इड़ा से चलता है कभी पिंगला से और कभी सुपुम्ना से, कुल मिलाकर साधक तीनो का साधन करता है । वाया स्वर शीतलता का सतुलन बनाए रखने मे जिम्मेदार है और दाया स्वर उष्णता का । सामान्यतया मनुष्य १६ से १६ तक श्वसन करता है जैसे-जैसे श्वासगति को बहिर्मुखता घटती है वैसे-वैसे अन्तर्मुखता बढती जाती है । यही अन्तर्मुखी गति चित्त और प्राण के विलयन का कारण बनती है। योग ग्रथो मे मुख्य आठ प्रकार के प्राणायाम बताये गये हैं - जिन्हे करते समय रेचक, पूरक की कालावधि और बन्धो का विशेष ख्याल रखना चाहिए। पूरक कुभक रेचक सख्या ८ ४ प्राणायाम करने वाले साधक को प्राणायाम से पूर्व अभ्यास कर लेना चाहिए । बन्धो की साधना के प्रेक्षा-ध्यान : २२ विशेष फलदायी नही होता। १. मूलबंध मलद्वार और मूत्रेन्द्रिय स्थान को एक साथ धीरे-धीरे ऊपर की ओर खीचना । यह आदि से अन्त तक प्राणायाम के साथ रहता है। २. जालंधर बंध पूरा श्वास भर कर ठुड्डी को कठ कूप मे लगाकर श्वास की गति को रोकना । इस बंध के अभ्यास मे इडा, पिंगला का प्रवाह बद होकर प्राण सुपुम्ना-वाही बनने लगता है। यह है अन्तर कुभक को स्थिति में रहने वाला बंध । ३. उड्डियान बंध श्वास का पूर्ण रेचन करने के बाद पेट को मेरुदंड की ओर खीचकर रखना। यह वाह्य कुभक की स्थिति उदर संबंधी सभी विकारो को दूर करती है । अभ्यास प्रारम्भ समय, स्थान, आसन, वध एव श्वास लेने, छोडने तथा रोकने की अवधि की जानकारी के पश्चात् निम्त विधि से प्राणायाम प्रारम्भ किया जाता है । शास्त्रोक्त प्राणायाम आठ हैं, किन्तु उन सबकी सफ- लता के लिए जरूरी है "नाड़ी शोधक प्राणायाम" । १ किसी एक ध्यानासन में बैठकर एक नथुने को वद रत्वते हुए दूसरे से लम्बा श्वास ग्रहण करे फिर विना रोके धीरे-धीरे दूसरे नथुने से श्वास को छोड़ दें, रेचन कर दें। इस प्रकार १०-१५ वार से प्रारम्भ करके धीरे-धीरे अभ्यास को बढ़ाते जायें। २. पूर्वोक्त विधि से श्वास का पूरक करे फिर कुभक, भीतर रोके और अत मे धीरे-धीरे श्वास का रेचन कर दे। प्रारम्भ वाये से प्राण चिकित्सा २३ करना ज्यादा लाभदायक है । आठ प्राणायाम १ अनुलोम विलोम २. सूर्य भेदी ३. उज्जायी ४. शीतकारी ५ शीतली ६ भस्त्रिका ७. भ्रामरी ८ मूर्छा इनका विस्तृत वर्णन योग की प्रथम किरण मे देखे ।

६ आचार्य हेमचन्द्र : प्राणायाम । श्वास-प्रश्वास क्रिया पर आवश्यक नियन्त्रण करने से शारीरिक, बौद्धिक तथा मानसिक तीनो प्रकार की स्वस्थता, निर्मलता तथा समृद्धता प्राप्त होती है । प्राणो की अधिकता और मदता के कारण ही मानव समाज उन्नत और अवनत होता देखा गया है। प्राणवान् व्यक्ति ही सदाचारी, आत्म-निश्चयी तथा प्रसन्नमुख हो सकता है । सामान्यतः प्राण दो प्रकार से गति करता है-अन्तर्मुखी और वहिर्मुखी। जो प्राण सुषुम्ना मे प्रवाहित होता हुआ शरीर मे सचित होकर स्थूल शरीर की मशीन को सचालित करता है, वह अन्तर्मुखी प्राण कहलाता है। यही प्राण-शरीर मानव शरीर की सभी मशीनो को विजली सप्लाई करता है, यही प्राण सम्पूर्ण मानसिक जगत् की सक्रियता का आधार बनता है। प्राणायाम के साधक के लिए सबसे ज्यादा ध्यान देने की जो वात है वह है श्वास की दीर्घता और तालयुक्तता । हमे हारमोनियम, पियानो, तवला तथा आलाप सहित सगीत इसीलिए मनोहारी लगता है कि उनके साथ तालबद्धता होती है। तालमय श्वास लेने वाला जीवन और जगत् दोनो के साथ एकता स्थापित करता है । तालमय श्वास जहा आयु को बढाता है, रोग मिटाता है, चमत्कार दिखाता है वहा वह मन की एकाग्रता और आत्म-साक्षात्कार का हेतु भी बनता है। यद्यपि जैनाचार्यों ने प्राणायाम को मुक्ति के लिए एकान्त साधन के रूप मे स्वीकार नही किया है। उनका कहना है कि सामान्य प्राण चिकित्सा २५ - साधक श्वासोच्छ्वास को रोक नहीं सकता। विशिष्ट अभ्याम के अभाव मे वह समाधि तक नही पहुच कर वाच मे ही असमाधिस्थ हो जाता है। अतः इसकी शास्त्रीय सूक्ष्म विधाओ को वैसे ही जानकर आगे बढना उचित है जैसे यात्रा के पूर्व यात्रा-पथ को समझना । हा, कुछ विशिष्ट-क्षमता के लोगो के लिये प्राणायाम की साधना सभव हो सकती है। प्राणायाम की उपयोगिता, नीरोगता मन स्थिरता तथा काल-ज्ञान के लिए विशेष है। आचार्य हेमचद्र कृत योग शास्त्र मे कुछ भेदो का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है १. प्रत्याहार प्राणायाम नाभि आदि स्थानो से पवन को खीचकर दूसरे स्थान (हृदय आदि) पर ले जाना प्रत्याहार है । २. शांत प्राणायाम तालु, नासिका तथा मुख के द्वारो से वायु का निरोध करना शान्त प्राणायाम है। ३. उत्तर प्राणायाम बाहर के वायु का पान करके उसे 'ऊपर के स्थानो मे खीच करके रोकना उत्तर प्राणायाम है। ४. अधर प्राणायाम पुन उसी वायु को ऊपर से नीचे की ओर ले जाना अधर प्राणायाम है। ५-६-७ शेप रेचक, पूरक और कुम्भक इन तीनो को मिलाने से सात प्रकार बनते है। दीर्घ जीवन : श्वास किया भारतीय योगियो का अभिमत है कि प्राणिम - प्रेक्षा-ध्यान : । क्रिया के अनुपात पर हमारा जीवन, स्वास्थ्य, सकल्प एव एकाग्रता २६ अनुपात श्वास-प्रश्वास की गति पर निर्भर करता है। उनका कहना है कि जो प्राणी एक निश्चित समय मे जितनी कम सास लेता है उसकी उतनी ही लम्बी आयु होती है और जो उतने ही समय में अधिक श्वास लेता है उसकी उतनी ही आयु कम होती है, किन्तु जैनाचार्यों ने आयु की दीर्घता मे श्वास-प्रश्वास क्रिया को मात्र निमित्त माना है, उपादान नही। कभी-कभी प्राण-साधक व्यक्ति भी अल्पायु होते देखे गये है । अतः लगता यह है कि प्राण-साधक दीर्घ जीवन के सभी अवरोधो को दूर करके स्वस्थ और दीर्घ जीवी बना रहता है । सच यह है कि दीर्घ जीवन के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन चाहिये जो दीर्घ-श्वास क्रिया के द्वारा प्राप्त होता है। शरीर विज्ञान के अनुसार यदि मानव मस्तिष्क को दो मिनिट ऑक्सीजन नहीं मिले तो मृत्यु हो जाती है अर्थात् डॉक्टर तुरन्त उस व्यक्ति को मृत घोषित कर देते है। कौन कितनी सास लेता है ? प्राणी सांस १. कछुआ ४-५ २. सर्प ३. ११-१२ ४. मनुष्य १६-१८ ५. घोडी २०-२२ ६ वकरा २३-२४ कुत्ता २८-३० वन्दर ३१-३२ उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि श्वास-प्रश्वास क० सं० हाथी' आयु १५०-१५५ १२०-१२२ १००-१२० १००-१५० ४५-५० १२.१३ १३-१४ २०-२१ निर्भर करती है।

७ प्राणायाम और बुढ़ापा -- जिन पाच कारणो से बुढापा आता है उनमे एक है-प्राण तत्त्व की कमी । प्राण तत्त्व की पूर्णता से शरीर मे स्फूर्ति, मन मे उत्साह और चेहरे पर तेज तो रहता ही है, किन्तु इसके अतिरिक्त प्राण सयम के द्वारा बुढापे को रोक कर मृत्यु तक को जाना जा सकता है निम्नलिखित पाच कारणो से बुढापे का सीधा सम्बन्ध है- १ कोशिकाओ का अधिक क्षय एव कठोरता । २. आहार का अपाचन एव कुपोषण । ३ मेरु दण्ड की कठोरता । ४ मानसिक तनाव । ५ प्राणतत्त्व की कमी। इन पाचो मे जिसे मुख्यता दी जाये वह है-प्राणतत्त्व । यदि प्रात और सायं दो बार पूरक और रेचक क्रिया नियमित करली जाय तो हमे अतिरिक्त एव आकस्मिक बुढापे से ग्रस्त होना नही पडेगा । जो बुढापे के करीव है, उन्हे विशेप श्रम, चिन्तन मनन तथा आवश्यक शक्ति क्षरण से बचना चाहिये । यदि बचे रहने की अनुकूल स्थितिया नही हो तो कम से कम पूर्ण पूरक और पूर्ण रेचन के महत्त्व को न लोग पूरक को ठीक ढग से कर लेते है, परन्तु रेचक-क्रिया ठीक नही कर पाते, वे निम्नोक्त विधि मे अभ्यास को आगे बटाये । मुह से लम्बी सास खीचकर फेफडो को खाली करते हुए धीरे- धीरे नाक से रेचन कर दे। सम्भव है इस विधि ने समस्त दूपित वायु बाहर निकल कर नये मऑक्सीजन के लिए भीतर अवकाश कर दे। शेष आवश्यक जानकारी प्राणायाम प्रकरण से करे । भूले। कुछ ८ युग-समस्यायें : प्राणायाम आज के युग की सबसे बडी बीमारी है तनाव । तनाव का अर्थ है-खिंचाव, कडापन और दबाद । आज देखा गया है, मन का कडापन शरीर मे गाठे पैदा करता है और मन के दुर्भाव शरीर मे घाव । वर्तमान युग के सन्दर्भ मे जीने वाले लगभग सभी व्यापारियो को चिताओ से लडना पडता है । फलत कुछ लोगो को प्रेशर, डायबिटीज, हार्ट तथा अल्सर जैसी भयानक बीमारियो से ग्रस्त होने के पश्चात् मानसिक कुण्ठा, निराशा तथा अनिद्रा की बीमारी हो जाती है । दिन भर सोचते रहने और रात भर स्वप्न देखने वालो की हालत एक अनाथ बालक से कम दयनीय नही होती । ऐसे लोगो के लिए प्राणा- याम परम उपयोगी चिकित्सा है । आज के प्रत्येक मानव-मस्तिष्क मे महत्त्वाकाक्षा का जहर घुलता रहता है । वह किसी न किसी दौड मे स्वय को खडा देखना चाहता है । इस महत्त्वाकाक्षा की दौड़ तथा सामाजिक मूल्य मानको की सुरक्षा मे भले चगे लोग चरमरा जाते हैं । इस प्रतियोगिता मे यथार्थ को समझ कर स्वय मे सन्तुष्ट रहने की स्थिति प्राणायाम से तैयार की जा सकती है । जो लोग बौद्धिक क्षेत्र मे काम करते है उनके लिये प्राणायाम "जीवन रस बूटी" है और मन्द बुद्धि लोगो के लिये यह जडी" है। प्राण शक्ति सबल होने से एक डॉक्टर को रोग निदान तथा औषधि का चुनाव करने मे आन्तरिक सहायता मिलती है । यही बात "मोमरम A प्राण चिकित्सा २९ । एक ज्योतिपी तथा वकील के लिये लागू होती है। अमुक देश की वारीकी तथा मुकदमे की सचाई पकडने मे प्राणऊर्जा एक सच्चे "असिस्टेट" का काम करती है। लेखक की लेखनी तथा वक्ता की वाणी मे जान इसी प्राण शक्ति के द्वारा आती है। मानसिक थकान मिटाने के लिए लम्बी तया गहरी धीमी सास वाला प्राणायाम ट्रेक्युलाइजर गोली का काम करता है। आज प्रत्येक व्यक्ति की एक दूसरे से परस्पर शिकायत है। बदलाहट की भारी अपेक्षाए महसूस की जा रही हैं । स्वय को बदलने के लिए कोई राजी नही है, सब ओरो के सुधार मे लगे हैं। पत्नी पति को शराब मुक्ति के लिये शपथ दिलाना चाहती है और उनके जुआरो रूप को बदलना । मा पुत्र को स्वस्थ और अनुशासित देखना चाहती है तथा अपने नौकर को शान्त और ईमानदार । यदि पत्नी और मा चाहे तो बहुत जल्दी अपनी प्राण विद्युत् तथा सकल्प शक्ति को वढाकर उन्हें बदल सकती है । प्राणायाम करने वाला शारीरिक तथा मानसिक दोनो प्रकार का स्वास्थ्य प्राप्त करता है । सामान्यतया हर एक को बुढापे मे झरिया जोड दर्द, स्नायविक कठोरता तथा मानसिक थकान की अनुभूति होती है, किन्तु प्राणायाम करने वाला बूढा अपने मे मदा नयी स्फूर्ति नथा ताजगी को देखता है । वर्तमान युग के छात्र और छात्राओ का शागे- रिक तथा मानसिक सन्तुलित विकास नहीं होकर एकागी विकास हो रहा है । प्राणायाम उन सभी का अपनी सरल विधियों द्वारा मस्तिष्क के दोनो भागो का सतुलित विकास करके समाधान देता है । अपेक्षा वर्तमान शिक्षण संस्थाये इस और ध्यान दे । बीमारियो का एक बहुत बड़ा कारण है रक्त विकार बी विकार का एक कारण है "ब्लड वेसल्स" मे पर्याप्त न प्रेक्षा-ध्यान: चारो ओर (भीतर-वाहर) एक ऐसा नही पहुचना । प्राणायाम से फेफडो मे पर्याप्त ऑक्सीजन पहुचता है। रक्त शुद्ध होता है, मस्तिष्क भारहीन होता है तथा वन्द पड़े चैतन्य के द्वार खुलने लग जाते है। प्राणायाम का शरीर एवं मन पर प्रभाव प्राणायाम दीखने मे एक विशुद्ध शारीरिक क्रिया है, किन्तु यही शारीरिक क्रिया कुछ समय के पश्चात् सभी प्रमुख शक्तियो के जागरण की अनुकूलता बढ़ाकर उनसे परिचय करा देती है । विशुद्ध एव वश मे किया गया प्राण बहुत शीघ्र इन्द्रियो की निरकुशता तथा मन की चपलता को कम करके विसगत-खडित व्यक्तित्व की सभी रेखामो मे एकता उत्पन्न करता है। आदमी जैसा सोचता है वैसा कर नही पाता और जैसा करता है उससे उसे पर्याप्त सतोष नहीं मिलता । इस प्रकार वह स्वयं मे अन्तर्द्वन्ट उत्पन्न कर लेता है। इस द्वन्द्व की स्थिति से निपटने का यदि कोई सही मार्ग है तो यही कि हम स्वयं को शक्तिशाली बनायें, आत्मवल को वढाएं । उसका साधन है--प्राणायाम, सकल्प और प्राणायाम के सौलिक लाभ (१) प्रत्येक विकट परिस्थिति के साथ हम अपना समजन विठा सकते है। (२) प्राणायाम की नियमित साधना से अचिकित्स्य (इन्क्यूरेबल) बीमारियो को मिटा सकते है । (३) प्राणायाम से प्राण और अपान दोनो को शुद्ध करके कुण्डलिनी स्थान को भावनायोग से प्रवाहित करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है। ध्यान ।

१ प्राण चिकित्सा "सुरक्षा-वच" निर्मित कर लेता है जिसके कारण वह किसी घातक-कुशक्ति से आहत नहीं होकर निर्भय विचरता है। (५) प्राणायाम का साधक बहुत जल्दी अपनी असफलता को सफ- लता मे बदल लेता है। (६) स्वर्ण शुद्धि के लिये सुनार जसे होठफरनिस मे वायु देकर उसे शुद्ध करता है उसी प्रकार साधक श्वास की वायु से स्थूल और सूक्ष्म शरीरगत मल-दोपो को दूर करता है । (७) बैटरी मे जैसे विजली स्टोर की जाती है उसी प्रकार योगी प्राणायाम से प्राण विद्युत् को मस्तिष्क और तेजस-सूर्य चक्र मे स्टोर करके उसे आवश्यकतानुसार यथा स्थान भेजकर उपयोग करते है। (८) प्राणवायु के निरोध से मन का निरोध होता है फलत. साधक प्राणविजेता और मनोविजेता बनता है। (६) महर्षि वशिष्ठ राम से कहते है, जैसे पखे के वन्द होने पर हवा की गति बन्द हो जाती है वैसे ही प्राण वायु के बन्द होने पर मन परम शान्ति को प्राप्त होता है, निरुद्ध हो जाता है। (१०) वायु तथा कफ जनित रोगो का एक मात्र इलाज प्राणायाम बन सकता है यदि स्थिरता से उसका अभ्यास किया जाये । (११) प्राणो को वश करने से राज्य प्राप्ति से लेकर मोक्ष तक का सुख पाया जा सकता है । (१२) प्राणायाम करने वाला अपनी जीर्ण-शीर्ण विकृत आदतो के परिवर्तन का भीतरी सामर्थ्य पा लेता है। (१३) प्राणायाम करने वाला सम्पूर्ण विश्व की घर बैठे एक सफल चिकित्सक की तरह सेवाये कर सकता है। वह शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तीनो प्रकार की आधि, व्याधि और उपाधि का शमन करने में सक्षम होता है ।

३२ प्रेक्षा-ध्यान : (१४) प्राण संग्रह करते-करते साधक दृश्य जगत् के पार जो है, उससे सम्पर्क बनाने की क्षमता पा लेता है। (१५) प्राण विजयी होने पर हिचकी, श्वास और दर्द जैसी व्याधियो का सर्वनाश हो जाता है। फलत आरोग्य, वाग्मधुरता, शीघ्रगति, बल, वर्ण तथा मन की प्रसन्नता प्राप्त होती है। (१६) महर्षि पतजलि ने प्राणायाम को स्वास्थ्यसुधार एव रोग निवारण के साथ-साथ आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का सर्वोच्च साधन बताया है। (१७) योगी गोरखनाथ के अनुसार पारीरस्थ जीवन का आधार ही प्राण है। (१८) रक्त चाप और स्नायु रोग पीडित लोगो को चिन्ता अधिक पकडती है फलत वे हर सामान्य घटना पर असतुलित हो जाते है, तथा जो रात को स्वप्न विशेप देखते है उनके लिये प्राणायाम एक सफल चिकित्सा वन सकती है। (१६) प्राणायाम का फलित है-~-शरीर पुष्ट, कातिमान, रक्त कणो में आवश्यक वृद्धि, फेफडो मे ऑक्सीशन-अवकाश, पाचन, लीवर तथा गुर्दे की स्वस्थता, कार्य मे उत्साह, क्रमश अन्तर्मुखी भावनाओ का उदय ।

है प्राण शरीर ही आभामण्डल मशीन के प्रत्येक कलपुर्जे की अपनी शक्ति होती है। यदि उससे अधिक काम लिया जाता है अथवा अविधि से लिया जाता है तो वह समय से पूर्व खराव हो जाता है। हमारा यह शरीर कोशिकाओ से बना है । एक इच मे ६ हजार कोशिकाये होती है। प्रत्येक कोशिका के बीच में एक तरल चिकना पदार्थ होता है जिसे प्रोटोप्लाज्मा कहते है । यही तत्त्व कोशिकाओ का निर्माण करता है । बचपन में कोशिकाये बनती है और विनष्ट भी बहुत होती है, जबकि बुढापे मे बनती कम है और विनष्ट ज्यादा होती है । क्रमश न्यूक्लियस के निर्वल होने पर प्रोटोप्लाज्मा सूख जाता है । मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। - - हमारे स्थूल शरीर के चारो ओर एक चमकदार महीन चादर जैसा "वायोप्लाज्मा तत्त्व" छाया रहता है जिसका चित्र "रेडिएशन- फिल्ड फोटोग्राफी" से लिया गया तव ज्ञात हुआ कि यह वायोप्लाज्मा सबसे ज्यादा मस्तिष्क और सुषुम्ना नाडी मे होता है । उमसे कम यह अगुलियो के छोर, सूर्यचक्र की पीठ और स्नायुओ के केन्द्र मे होता है। यही वायोप्जाल्मा-प्राण रूप सूक्ष्म शरीर को बनाता है । एक उच्च- चेतना मे बैठे व्यक्ति का "कोरोना" प्रकाशमय होता है जबकि एक तनावगस्त व्यक्ति का पतला, धब्बेदार कोरोना होता है। यही वायो- प्लाज्मा "आभामण्डल" का निर्माण करता है । यदि हम शुद्ध प्राण तत्त्व के संग्रह का आयोजन तथा ऑक्नी- घट जन का पर्याप्त सयम नही करते है तो यह पापोल प्रक्षा-ध्यात. जीवन-शक्ति विहीन हो जाता है । मेरीमेन ने एक दिन वताया कि मैं अपने चारो ओर नीली व लाल रग की छाया देख रही है। यह प्रकाश मेरे इस भौतिक शरीर से दूर हो रहा है । मैं इससे स्वयं को एक गज के फासले पर पा रही हूं । दोनो शरीरो के बीच एक पतली-सी विद्युत् धारा वह रही है जो दोनो को वाधे हुए है। एक रोगी जिसकी मृत्यु का कोई सकेत डॉक्टर को नहीं मिला, केवल ७ इच की दूरी पर फैला आभामण्डल मद होता हुआ दिखाई दिया। सबके देखते देखते रोगी मर गया। अमेरिका के कुछ वैज्ञानिको ने एक प्रयोग करके देखा है, अगर चेम्बर से भीतरी हवा निकालकर रासायनिक कुहरा उत्पन्न कर दिया जाये तो अन्दर के अणुओ की हलचलो की फोट ली जा सकती है। चेम्बर मे एक चूहे को छोटी पेटी मे रख, विजली से मारकर उसका फोट लेते समय पाया कि अन्तरिक्ष मे आणविक चूहे उड रहे हैं । मरणोत्तर अनेक जीवो को उसी आकृति मे देखा गया । यह वह सूक्ष्म शरीर है, जो हमारा पीछा करता है । अभी वैज्ञानिक इलेक्ट्रोनिक मैगनेटिक सत्ता के रूप मे आत्मा को मानते है, किन्तु ये सारी अनु. भूतिया प्राण शरीर की हैं। योग ग्रन्थो मे प्राण के विविध प्रयोगो का वर्णन मिलता है। तक कुछ १० प्राणायाम से रोग चिकित्सा - वीमारी मानव शरीर का स्वभाव नही, विभाव है। अव तक जितनी चिकित्सा पद्धतिया प्रचलित हुई है उन सभी पद्धतियो का मूल आधार यही विजातीय भाव है। प्राकृतिक चिकित्सा जो मानव समाज के लिए सर्वोपयोगी है उसके अनुसार आहार-व्यवहार और विचारो के प्रकार मे विकार उत्पन्न होने से हमारे शरीर में विजातीय तत्त्व इकट्ठे होते है। ये फोरेन तत्त्व (विजातीय) जमा होकर हमारे शरीर मे भाति-भाति की व्याधिया पैदा करते एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति जीवाणुओ को रोग का कारण मानती है, जबकि आयुर्वेद आम (अपक्व) भोजन से निष्पन्न रस को सम्पूर्ण बीमारियो का कारण मानता है। किन्तु योगाचायों के अभिमत के अनुसार प्राणतन्त्र की अल्पता ही शारीरिक और मानसिक निर्वगता का कारण है । वर्तमान शरीर विज्ञान भी इस सत्य को स्वीकारता है कि जिनके शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति (लाईफ एनर्जी) कम है, उन्हे रोगाणु जल्दी प्रभावित करते है । दवा भी उन्ही व्यक्तियो पर अपना असर लाती है जो प्राणावान् होते है । अल्प प्राण वालो की चिकित्सा लम्बा समय लेती है। वैज्ञानिक हिपोक्रेट्स कहता है असल मे रोगनाशक शक्ति हमारे शरीर मे अविरल प्रवाहित होती रहती है । इस प्राणप्रवाह असतुलित आहार तथा विचार से जो अवरोध आता रोध को हटा दिया जाये तो रोगी बहुत शीघ्र - प्रक्षा-ध्यान: स्वीटजरलैण्ड का एक विशेषज्ञ पेरासेल्स मैन कहता है, हमारे दोनो शरीर (मांस का शरीर, भावना का शरीर) एक साथ वीमार होते हैं। छाया-चित्रण रुसी प्रणाली ने इस प्राणमय शरीर की तस्वीरें तक ली है, मेस्मर की प्राण चुम्बकीय चिकित्सा पहले ब्रह्माण्ड मे फैली सूक्ष्म शक्ति को अपने मे आकर्षित करके की जाती थी। आज वही चिकित्सा शरीरस्थ चुम्बकत्व को धातु चुम्बक मे आकर्षित करके सफ- लता पा रही है । "क्वी" ने आज जिस चिकित्सा विधि का श्रीगणेश किया है, वह प्राणायाम और मनोमय शरीर के वीच की प्रणाली है। जिसका आरम्भ होता है रोग के खिलाफ सोचने से। वह "क्रिश्चियन साइस" के नाम से आज प्रख्यात है। प्राण संप्रेषण क्रिया रोग निवारण के लिये सबसे प्रथम अपेक्षा है--स्वस्थ मानसि- कता की । जिस रुग्ण अग पर हमे अपने प्राणो को भेजना है उसके लिये सकल्प बल और प्रवल भावना योग का होना परम आवश्यक है । जव प्रयोग के लिये वैठे तब इस बात का पहले ध्यान करे पर्याप्त प्राण-ऊर्जा अपने पास है या नहीं यदि कुछ कम है तो १० मिनिट लम्बी गहरी सास के द्वारा सूर्य चक्र मे प्राण सग्रह करें। इसके बाद अपनी सुविधानुसार वैठकर या सोकर जिस अवयव मे दर्द हो, सूजन हो. शून्यता तथा तनाव हो उस अवयव पर तीव्र गति से प्राणो को प्रेषित करे । श्वास की गति तालयुक्त, सहज होने पर पूर्ण प्राणायाम का प्रयोग चालू किया जाये। विधि दोनो नाक से लम्बी सास खीचकर पूरक करे । समय पूरक -१० -- 1- प्राण चिकित्सा ३ L अतरकुभक-४ रेचक-४ वाह्यकुभक-४ इस क्रिया को १० वार करने के बाद यह भावना करें कि मेरा प्राण प्रवाह यथा-स्थान पहुच रहा है । रेचक मे विकार कीटाणु निकल रहे है, यह भावना करें तथा कुम्भक मे मै स्वस्थ हो रहा हू यह अनु-- भव करे । समय आधा घण्टा तक बढाया जा सकता है। दिन मे कम से कम 8-६ घन्टे के बाद तीन बार दोहराने का विधान है । साधारण रोगो की ३ दिन के बाद समाप्ति होती देखी गई है, किन्तु जीर्ण रोगो को निवृत्ति समय सापेक्ष है । ऐसे प्रयोगो से होने वाला स्वास्थ्य लाभ जीवन मे विशेष महत्त्वपूर्ण होता है जैसे (१) बार-बार उस रोग का आक्रमण नहीं होना । (२) रुग्ण दशा मे मानसिक प्रसन्नता । (३) व्यक्तित्व विकास । (४) स्वभाव परिवर्तन की सहज क्षमताये । नाड़ी शोधक प्राणायाम योग ग्रथो के अनुसार जो प्राणायाम नाडी शोधन के पूर्व किया जाता है वह साधक को लाभान्वित नहीं कर पाता अत इसे सर्वप्रथम समझे विधि प्रात सुखासन मे बैठकर वाये से सास भरें व दाये से छोड दे। रेचक और पूरक दोनो का समय समान होना चाहिये । पुन दाये से भरे एव वाये से छोड दें। आयु वर्धक प्राणायाम धरती का हर इन्सान दीर्घ जीवन की कामना करता है ।

AL प्रक्षा-ध्यान चाहता है, मै अपनी जिन्दगी का पूर्ण भोग कर सकू । इस दिशा में सिद्ध योगियो का अनुभव ध्यान देने लायक है। जो योगी २०० वर्ष तक सानन्द जीवित रहते है उनके दीर्घ जीवन का कारण यही प्राग- साधना है । प्राणायाम का अभ्यास आप और हम सब कर सकते हैं। अपेक्षा है नियमित क्रमिक अभ्यास की। योग ग्रन्थो मे केवली प्राणा- याम का प्रयोग दीर्घ जीवन के लिये बताया गया है। विधि - इस प्राणायाम मे रेचक पूरक की अपेक्षा नही होकर मात्र कुम्भक की आवश्यकता होती है। जब-तब, जहां-तहा, इस कुम्भक प्राणायाम को किया जा सकता है । खडे-बैठे, सोये जव भी इच्छा हो चालू श्वास प्रवाह को यथा-सामर्थ्य रोक ले । इस प्रकार सहसा प्राण- निरोध करना ही "केवली प्राणायाम' है । रोकने का समय एक माय नही बढ़ाकर धीरे-धीरे योग्य व्यक्ति के मार्गदर्शन मे बढाना चाहिये। पाचन-वर्धक प्राणायाम स्वस्थ एव सुडौल शरीर के लिए पाचन संस्थान, श्वास-सस्थान, हृदय सस्थान तथा मस्तिष्क क्रिया को सुव्यवस्थित रखना अत्यन्त आवश्यक है, यदि सच कहा जाये तो इन सभी विभागो की स्वस्थता निर्भर करती है पाचन विभाग की सवलता, सक्रियता पर । विधि सुखासन या पद्मासन जैसे किसी आरामदायक आसन मे बैठ- कर दोनो नथुनो से दीर्घ श्वास ग्रहण करें और दोनो से छोडें । इसमें केवल रेचक, पूरक होता है, कुम्भक नही । इस प्राणायाम को ३०,४० तक बढ़ाया जा सकता है। - । प्राण चिकित्सा उदर-शक्ति वर्धक प्राणायाम उकडू आसन मे बैठकर नाभि तक भरी सास का एक साथ रेचन करके उड्डियान बन्ध मे पेट को खीच कर रोक लें। यह वाह्य कुम्भक की अवस्था उदर शक्तियो के विकास मे विशेष लाभ करती है । इसका अभ्यास एक साथ नही वढाकर धीरे-धीरे वढाना चाहिये । प्रारम्भ ५ से करके क्रमश २१ तक वढाये । आतो के सभी रोग इससे दूर होते है । ध्यान जमता है । कब्ज निवारक प्राणायाम नाक से मसक की तरह पेट को पूरा भरकर यथाशक्ति वायु को रोके रहे । अन्त मे धीरे-धीरे दोनो नथुनो से रेचन कर दे। इस प्रकार कई आवृत्तिया की जानी चाहिए । मोटापा घटाने वाला प्राणायाम , चर्वी कोष गर्मी से पिघलते है, जलते है अत स्थूलता कम करने के लिए अल्पाहार, गरिष्ठ आहार का वर्जन, उपवास, भ्रमण तथा भस्रिका जैसे प्राणायाम का अभ्यास लाभप्रद होता है। विधि :- खड़ी-बैठी किसी एक मुद्रा मे स्थिर होकर सावधानी से इसका अभ्यास प्रारभ करे । (क) बायी नाक को वद करके दायी नाक मे श्वास को वेग से बाहर फेके और तुरन्त भीतर खीचें । २०-२५ वार ऐसा करने के तुरन्त बाद श्वास को रोककर कुम्भक करें। उनी कम को दूसरी नाक से दोहराये । प्रारम्भ ३ से करे, धीरे-धीरे १:-२० तक वढाया जा सकता है। (ख) दोनो नथुनो मे वेगपूर्वक वाम- प्रश्वास क्रिया करके अन्त मे कुम्भक करे । इस प्राणायाम के बाद शवासन अवश्य करना चाहिए । भोजन का विशेष ख्याल रखें।

प्रेक्षा-ध्यान। ४० रक्तचाप शामक प्राणायाम हाईप्रेशर की स्थिति मे भस्रिका, सूर्यभेदी प्राणायाम तथा केवली कुम्भक जैसे प्राणायाम नहीं करने चाहिये । रक्तचाप-शमन मे शीतली कुम्भक का प्रयोग विशेष लाभकारी सिद्ध हुआ है। कफ प्रकृति वाले लोग सर्दी मे इनका प्रयोग नही करे। यह प्राणायाम गर्मी मे तथा पित्त प्रकृति वालो के लिए विशेष उपयोगी है। विधि :- पूर्वोक्त किसी एक आसन मे बैठकर सीने को उठाते हुये मुख से सास भरे। कुछ क्षणो तक श्वास को फेफडो मे रोककर धीरे-धीरे दोनो नथुनो से निकाल दे। इस प्राणायाम को करते समय अधिक से अधिक प्राणवायु को भीतर खीचने की भावना करे, किन्तु रोकने मे जबरदस्ती न करे। कफ निवारक प्राणायाम (क) कपालभाति पद्मासन या सिद्धासन मे बैठकर दोनो नथुनो से श्वास का तेजी से रेचन करते रहे। पूरक पर ध्यान नही देगे। धोकनी की तरह सास छोड़ते रहे। इस अभ्यास को धीरे-धीरे बढाये। उपमा एक साथ नही बढे इसका विशेष ख्याल रखे । ख) सूर्य भेदी प्राणायाम मानव शरीर की रचना मे सर्दी और गर्मी दोनो का समान उपयोग है । मनुष्य हर निश्चित समय के बाद अपने शरीर मे बारी- वारी मे ईडा और पिंगला नाड़ी के द्वारा सर्दी और गर्मी पहुनाता रहता है । कफ शोधन के लिए सूर्य भेदी प्राणायाम विशेप लाभकारी सिद्ध हुआ है। इससे चक्र और कुण्डलिनी जागरण की भी सुविधा . । - --- प्राण चिकित्सा ४१ मे - होती है। विधि मीधे खडे होकर या सिद्धासन, पद्मासन जैसे किसी आसन मे बैठकर दाये नथुने से श्वास का पूरक करे, कुम्भक पूरक से चार गुना अधिक समय दे, रेचन का समय कुम्भक से आधा होता है । पूरक समय-४ वध-मूलबंध कुम्भक-१६ म्लवध, जालधरवध, उड्डियानवध रेचक-८ मूलवध जुखाम निवारक प्राणायाम अनुलोम विलोम प्राणायाम पद्मासन मे बैठकर दायी नासिका को वद करके बायी से रेचन करें और पुन उसी से श्वास भर ले। अब बायी नाक को बन्द करके उस श्वास को दायी नाक से निकाले और उसी नथुने से पुन श्वास भर लें। इस प्रकार दाये वाये क्रम से प्रतिदिन दो बार १५-१५ प्राणायाम करे । अभ्याम एक साथ नही बढाकर क्रमश बढायें। वह प्राणायाम सामान्य और विशेष दोनो प्रकार की स्वास्थ्य सुरक्षा का कारण है । च्यवनप्राश की तरह इसे किसी भी मौसम मे माधा जा सकता है । एकाग्रतावर्धन मे तथा स्वस्थ व्यक्तियो के लिए यह गर्वोत्तम प्राणायाम है। कण्ठ रोग निवारक प्राणायाम चतुर्मुखी प्राणायाम यह कण्ठ की नलियो को शक्तिशाली बनाने के लिए किया जाता है। विधि सुखासन में बैठकर मुख को बायें कन्धे की ओर करवे दोनों ४२ प्रेक्षा-ध्यान । - नथुनो से आवाज करते हुये श्वास ग्रहण करे और विना गेले उमे तुरन्त बाये से छोड़ दे । ध्यान रखे, अगूठे से बिना दवाये ही वायें से प्रश्वास करना है। इसी प्रकार मुख को दायी ओर मोडकर क्रम को दोहराये । अंगूठे से विना दवाये श्वास को दाये नथुने से निकालने का अभ्यास बढाये । इसी क्रम से मुख को ऊपर और नीचे करके आवाज के साथ रेचक पूरक करने का विधान भी है। इस प्रकार कम से कम ५ से प्रारम्भ करे, क्रमश बढ़ाये । इसमे नुकसान को कम सम्भावना तनाव-नाशक-प्राणायाम मुख रेचक प्राणायाम तनाव निवारण मे सबसे मुख्य बात यह है, जिस कारण से टेसन--तनाव पैदा हुआ है उसकी खोज करके दूर करे । शारीरिक तनावो का जहा तक प्रश्न है वे कायोत्सर्ग तथा विविध प्रकार के आसनो के प्रयोगो से मिटाये जा सकते है। किन्तु जो तनाव मानसिक तथा मनोदेहिक होते है उनकी निवृत्ति के लिये प्राणायाम एवं ध्यान की आवश्यकता है। विधि सुखपूर्वक किसी आसन मे बैठकर दोनो नथुनो से लम्बी साम ग्रहण करे । कुछ सैकिण्ड तक (सुविधाजनक) श्वास को रोके रहे। अन्त मे होठो को चोच की तरह सिकोड कर आवाज के माथ दो-तीन बार मे कोष्ठ स्थित सम्पूर्ण वायु का मुख से रेचन कर दे। पुन, नथुनो से श्वास का पूरक करके इस क्रिया को दोहराये, बार-बार इस प्राणायाम के करने से भीतरी कार्वन निकलकर ऑक्सीजन के लिये पर्याप्त अवकाश पैदा कर देता है। लम्बी और गहरी श्वास के परिणाम स्वरूप मन पुलकित और मस्तिष्क भारहीन, हल्का हो जाता है।

प्राण चिकित्सा ४३ शीत-शामक प्राणायाम ठण्डक को कम करने के लिये जैसे अग्नि का सहारा लिया जाता है उसी प्रकार प्राचीन युग के सन्त महात्मा निम्नोक्त प्राणायाम का अभ्यास किया करते थे। पर्वतीय स्थानो मे एकमात्र हीटर का कार्य करने वाला प्राणायाम- विधि पद्मासन जैसे किसी आसन में बैठकर इसे प्रारम्भ किया जाता है। दाये नथुने को दवाकर वाये नथुने से श्वास का पूरक करे। यह पूर्ण क्रिया तब तक चालू रहे जब तक भीतर खालीपन अनुभव होता रहे । श्वास को तब तक रोकना है जब तक आपका मुखमण्डल गर्म न हो जाये । जव घबराहट होने लगे तो दूसरी नाक से धीरे-धीरे छोड़ दें। पुन दायी से भरकर पूर्ववत रोकने की चेष्टा करे, परन्तु कुम्भक क्रिया का अभ्यास एक साथ न वढायें। यह प्राणायाम शरीर गर्म ही नही, किन्तु पसीना भी बहाना प्रारम्भ कर देता है। क्षुधा-शामक प्राणायाम बार-बार भोजन-पानी की व्यवस्था करने मे जब साधको को अपनी साधना में कठिनाई अनुभव हुई तब भूख को कम करने के लिए कुछ प्रयोगो का आविष्कार किया। विधि । सिंहासन मे बैठ कर दोनो हाथ घुटनो पर रख दे। मुख को वन्द करके गले से वायु को खीच कर कण्ठ से उसका पान करे । श्वास भरते समय आवाज उत्पन्न होनी चाहिए और उस श्वास वायु का पान करते समय भी घूट जैसी ध्वनि सुनायी देनी चाहिए। पेट मे वायु भरने के बाद वह फूलने लगता है। आफरा जैसा भी कभी-कभी हो ४४ प्रेक्षाध्यान। जाता है, परन्तु यह सब लम्बे अभ्यास के बाद होता है तथापि ऐसे प्राणायाम मार्ग-दर्शन के बिना करने नही चाहिये । पेट ज्यादा फलने पर उसकी निवृत्ति के लिये मयूरासन, शीर्षासन जैसे कुछ प्रयोग अविलम्व करने का विधान है। अन्यथा 'लाभं वांछतो मूलक्षति- रायाता' वाली बात हो जाती है। कुण्डलिनी जागरक प्राणायाम कुण्डलिनी शब्द का अर्थ है, कुण्डल की तरह गोलाकार घेरे में सुप्त नागिन, जिसका मुह पूछ के ऊपर टिका होता है। विधि सिद्धासन या पद्मासन मे स्थिरतापूर्वक बैठकर सम्पूर्ण मेरुदण्ड तथा मूलाधार पर ध्यान केन्द्रित करे। दायें नथुने को दाये हाथ के अगूठे से बन्द करके बाये से श्वास का पूरक करे। श्वास भरते समय यह मानसिक कल्पना करे कि मैं अपने प्राण प्रवाह को सुप्त कुण्डलिनी पर छोड रहा हूं। कुम्भक मे इस कल्पना को और अधिक प्राणवान् बनाकर मूलाधार पर ध्यान केन्द्रित करे । दाये नथुने से श्वास का रेचन करते समय सोचे कि मेरुदण्ड मार्ग से शक्ति प्रवाह मस्तिष्क की ओर जा रहा है । मस्तिष्क हमारे शरीर में सबसे अधिक महत्वपूर्ण यंत्र है। दम अरव न्यूरोन से निर्मित मस्तिष्क में सामान्यतया २० वोल्ट विद्युत् होती है। लघु मस्तिष्क जहा अवचेतन कार्यों के लिये विद्युत् सग्रह होता है । इस प्राणायाम से सुपुम्ना-शीर्ष और सुपुम्ना- छोर दोनो जागृत होते है। दोनो नथुनो से वारी-वारो इस प्राणायाम को करते हुए समय और आवृत्ति को बढाये । संदेश प्रेषक प्राणायाम यह सदेश प्रेषण की प्रक्रिया हजारो वर्षों पुरानी है, आज जिसे प्राण चिकित्सा - - . टेलीपैथी कहकर पुकारा जाता है । हमारे प्रत्येक विचार के साथ शब्द- तरगें जुडी रहती है, क्योकि चिन्तन, भाषा पूर्वक उत्पन्न होता है । भापा से ध्वनि वनती है और ध्वनि से तरंगे, जो इच्छा के माध्यम से यथेप्सित स्थान तक पहुचायी जा सकती है। ऐतिहासिक तथ्यो के अनुसार इस टेलीपैथी का आविष्कार भारत के ऋपि महर्षियो के द्वारा ही हुआ था। जब टेलीफोन, टेली- ग्राम तथा रेडियो जैसी व्यवस्थाए नही थी, उन दिनो भारत के योगी सुदूर जगलो तथा घाटियो से अपनी बात अपने शिष्यो को इसी विधि से भेजा करते थे। कहते हैं कि आज ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का परा- मनोविज्ञान विभाग बड़ी तेजी से अपने छात्रो के बीच इसका प्रयोग कर रहा है। इस विचार सप्रेषण प्रयोग द्वारा हम अपने विचारो को जहा- तहा भेजकर अपने आवश्यक कार्य की सूचना दे सकते हैं। नई प्रेरणा ले सकते हैं। इस प्रयोग मे अपेक्षाए- (१) सन्देश भेजने के लिए शान्त एकान्त वातावरण एव स्वय का मन पूर्ण शान्त होना चाहिए । (२) आखें वन्द, मेरुदण्ड सीधा, कोई एक सुखासन । (३) सर्वप्रथम अपने इष्टदेव का तन्मयता से ध्यान । (४) प्रयोग के पूर्व तालबद्ध प्राणायाम (जितना समय सांस लेने मे लगे उतना ही छोडने मे) दो तीन माह तक तालयुक्त प्राणा- याम का अभ्यास करने के पश्चात् श्वास की ताल बनाने के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता। प्रारम्भ मे ६ घडकन प्रमाण पूरक का समय होता है, किन्तु धीरे-धीरे अभ्यास को बढाते- बढाते १६ धडकन प्रमाण पूरक और रेचक का समय तया आठ घडकन प्रमाण रोकने का समय हो जाना चाहिए ।

स्वास्थ्य रहेगा या नही कहा नहीं जा सकता। हर आदमी अपने (५) जिसे सन्देश भेजना है उसका मानसिक चित्र तैयार करें, उसके साथ सद्भवानापूर्ण वार्तालाप प्रारम्भ करे । मुझे तुम्हारे से या आपसे कोई शिकायत नही है। मैं तुम्हे अपनी वस्तुस्थिति से अवगत करा रहा हू । अपने विचार, प्राण की धाराओ के साथ प्रेक्षा-ध्यान भेज रहा हू (६) अपने वाक्यो को बार-बार नही बदलना चाहिए । (७) वर्तमान परामनोविज्ञान के अनुसार दोनो का एक साथ बैठकर प्रयोग करना जरूरी है, किन्तु भारतीय प्राचीन पद्धति के अनुसार दोनो का एक साथ बैठना अनिवार्य नही है यदि आप अत्यधिक प्राणो का सचय करने में सक्षम है तो आपका प्रयोग अविलम्ब सिद्ध होता हुआ दिखाई देगा। चाहे सामने वाला उत्सुक है या नहीं। वासना शोधक प्राणायाम वर्तमान युग के मानव की महत्त्वकांक्षाए क्रमश बढती जा रही है। इस महत्त्वाकाक्षा के जहर को पीते-पीते आदमी का जिगर खराब हो चुका है। फेफडा जल गया है। निकट भविष्य मे उसका ऊपर वाले को देखता है, आगे वाले को देखता है, औरो की कमजोरियो को देखता है। बढती हुई काम, क्रोध जैसी वासनाओ पर नियन्त्रण नही पा सकने के कारण मनुष्य दिन प्रतिदिन वेचैन होता जा रहा है, इन सभी समस्याओ का समाधान प्राणायाम देता है। वह कौन-सा प्राणायाम है पढिए, समझिए । विधि पीठ के बल श्वासन की मुद्रा मे सोकर मन को श्वास की गति पर केन्द्रित करे नाक से गहरी सांस भरकर यथाशक्ति उसे रोके । ...?

प्राण चिकित्सा ४७ रहे । आवश्यकता होने पर धीरे-धीरे पूर्ण प्रवास को बाहर निकाल दे । कुछ समय तक बहिर्कुम्भक की स्थिति मे रहे। (१) श्वाम भरते समय मोचे, शक्ति प्रवाह मेरुदण्ड मार्ग से मस्तिष्क की ओर जा रहा है। निकालते समय सोचे, तन मन के विचार बाहर निकल रहे है। (२) कुम्भक मे सोचें, जिस कार्य को प्रारम्भ किया है वह कार्य सम्पन्न हो रहा है, ऐसा तन्मयता से ध्यान करे । आवश्यक जानकारी . इस प्राणायाम के अभ्यास में मलबध करना न भूलें। मूलवध के साथ ही प्राण का अर्ध्वगमन सम्भव है (मास भीतर खीचते समय गुदा तथा मूत्रेन्द्रिय का भीतर से सकोच) । प्रतिदिन दो वार इस क्रिया की आवृत्ति अवश्य करें। यदि दो वार सम्भव नही हो तो एक वार करना नही भूलें। इन श्वासन की मुद्रा मे किए गए प्राणायाम से मूर्य चक्र का आसानी से जागरण तथा उममे पर्याप्त प्राण मग्रह किया जा सकता है। करते समय कुछ दिनो तक दोनो हायो की अगुलिया हथेली महित पसलियो पर रखी जा सकती है । इच्छित सफलतादायक प्राणायाम प्रत्येक मनुष्य के भिन्न-भिन्न शारीरिक व मानसिक रोग होते । जिस रोग व विकार को जिसे दूर करना है वह उसके अनुकूल कल्पना करते हुए अपने प्राणो को आज्ञाचक्र की ओर प्रवाहित करें। श्वास भरते समय मेरी मकल्प शक्ति बढ रही है, मेरी स्मृति प्रबल हो रही है, मेरे प्राण नस नस मे फड़क रहे है, इस प्रकार मोचें। सास छोडते समय, मन की अपवित्रता प्रश्वान के साथ निकल रही है, सोचे। भावना जितनी प्राणवान् होगी, ध्यान जितना गहरा . .

प्रेक्षा-ध्यान । - होगा, लाभ उसी अनुपात मे मिलने वाला है । विधि सामान्यतया अनुलोम विलोम प्राणायाम तथा वासना रोवर प्राणायाम करे । प्राण की प्रबलता और सबलता दोनो निर्भर करती है, भावना की निर्मलता और चित्त की स्पष्टता पर। यह स्पष्ट है कि चित्त प्राण के साथ बधा है, जैसे रज्जु से पक्षी । अत प्राणायाम करते समय श्वास और मन, चित्त और प्राण साथ-साथ यात्रा करे इसी में ध्येय की सार्थकता है। पर-रोग निवारक प्राणायाम प्रत्येक मनुष्य की एक दूसरे के प्रति एक न एक शिकायत होती है। हर एक चाहता है कि मैं उसे समझाकर अपने अनुकूल कर लू । उस अनुकूलता का सर्वोपयोगी साधन है, अपने निर्मल प्राणो से उसे प्रभावित करना । विधि प्रयोक्ता को एक सप्ताह पूर्व 'प्राण संग्रह' की साधना करनी चाहिए। स्व्य पर दृढ विश्वास होना जरूरी है। रोग । रोग को कभी असाध्य नही बताए । वातावरण स्वच्छ तथा शात हो । रोगी से वार्ता- लाप करते हुए उसे गुरु कृपा का स्मरण कराएं। कुर्सी पर या पलग पर लेटा हो । उस पर अगुलियो के द्वारा प्राण भेजे, क्योकि अगुलियो की ऊर्जा तीव्रता से प्रवाहित होती है। इसलिए नाखून बटे हुए नही होने चाहिए। अन्त मे हाथ आकाश मे छिटक दिया जाता है। "F ११ प्राणायाम साधक : आवश्यक जानकारी प्राणायाम साधक के लिए योग-विधियो की सामान्य जानकारी अत्यन्त आवश्यक है क्योकि विना इमके आगन्तुक कठिनाइयो का समा- धान कर पाना असम्भ है। पद्मासन जैसे किमी ध्यानासन मे एक घण्टा तक बंठने का स्थिर अभ्यास होने के पश्चात् प्राणायाम साधना प्रारम्भ करने का विधान है। विना आसन अभ्यास के नस नाडिया लचीली और तनाव मुक्त नही हो सकती। (१) प्राणायाम प्रारम्भ के लिए बसन्त और मर्दी का मौसम अत्यन्त उपयुक्त माना गया है। (२) तेज हवादार स्थान में बैठकर नही करें, इसने पसीने मे अवरोध आता है तथा श्वास की गति पकड मे नही आती। दर्शन की धारा टूट जाती है । (३) प्राणायाम करने का सर्वोत्तम समय सूर्योदय से पूर्व तथा शाम को, दो घण्टे रात बीतने के बाद समझा जाता है । (४) भोजन किए चार घण्टे पहले प्राणायाम नही करना चाहिए तथा भूख-प्यास की व्याकुलता मे भी नहीं। (५) यथा-सम्भव वाए नथुने से रेचक करके प्राणायाम प्रारम्भ करना चाहिए। (६) शीघ्र सिद्धि के लिए प्राणायाम के चार बार करने का विधान है। किन्तु वर्तमान परिस्थितियो मे २ वार हो करना पर्याप्त है। श्वास प्रेक्षा-ध्यान . (६) पूरक (७) तीव्र नजला तथा तीव्र वायु वेग मे प्राणायाम नहीं करना चाहिए। (८) अत्यधिक थकान, अनिद्रा तथा भयंकर चिन्ता मे कुम्भक नहीं करके दीर्घ रेचक और पूरक किया जा सकता है। से गर्मी बढती है तथा अन्तर कुम्भक से पित्त उत्पन्न होता है । वात और कफ प्रकृति वालो के लिए ये दोनो अनु- कूल हैं और रेचक सबके लिए, सब ऋतुओ मे उपयोगी है । लगभग सभी शारीरिक स्थितियो मे किया जा सकता है। (१०) सदियो मे सीत्कारी, शीतली तथा चन्द्र भेदी प्राणायाम नहीं करे तथा गर्मी मे सूर्य भेदन, भस्त्रिका, नाडी अवरोधक तथा अग्नि उत्तेजक । (११) प्राणायाम कर्ता के लिए जरूरी हे धीरे-धीरे बोलना, ताकि मन एव मस्तिष्क मे गर्मी न बढे। प्राणायाम करने का अधिकारी (१) जिसका मन शान्त है । (२) जिसे अतीन्द्रिय शक्तियो की खोज मे निष्ठा है। (३) जिसका खाना-पीना, सोना एवं बोलना विवेकपूर्ण है। (४) जिसे इन्द्रियो पर आवश्यक नियत्रण प्राप्त है । (५) जिसे तीव्र क्रोध नहीं आता है । (६) जो मद्य मांस तथा तम्बाकू से परहेज करता (७) जो सूर्य ताप मे नगे वदन ज्यादा नहीं घूमता है । (८) जो नैतिक दृष्टि से पतित दुराचारी तथा झगडालू नहीं । क्रूर नहीं है। (६) जो बहुत चालाक और (१०) जो व्यापारिक उलझने न बढाकर घटाने की चेष्टा में है। (११) यथासम्भव बाहर तथा साथ मे नही साने वाला।

Prekshadhyan [ Yoagik Kriyayan ]

Author
Muni Kishanlal
Title
Prekshadhyan [ Yoagik Kriyayan ]
File name
Prekshadhyan [ Yoagik Kriyayan ]
Text
OCR done
Citation
1984
Published
2011/01
Publisher
Tulshi Aadhyatma Needam Jain Vishva Bharati Rajasthan
Language
Sanskrit
Pages
129
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Science
DLI number
548793
Barcode
4990010028885.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
kA0l1O2IbT4
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Prekshadhyan [ Yoagik Kriyayan ]