Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Pratishtha Kalp Adi Atiupyogi Bhag-2

Somchandbhai · 2011/02

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ॐ अहम्
।। श्री शखेश्वर पार्श्वनाथाय नम ।।
प्रतिष्ठा कल्पः-
आदि अतिउपयोगि विधिओ भाग २ जो
सयोजक अने प्रकाशक - श्री सोमचदभाई हरगोविंददास छाणी.
तथा- छयीलदास केशरीचद, सघवी.
(दानवीर शेठ बुलासीदास नानचद सस्थापित श्री स्याद्वाद सस्कृत पाठशाळा अने
श्री भट्टीवाई जैन श्राविकाशाळाना प्रधानाध्यापक-खंभात.)
मूल्र-प्रथम द्वितीय भाग साथे रु ११
भा २ जो अलग रु ५]
श्री वीर सवत् २९८३ ]
पोट-पी. पी खर्च अलग
| विक्रम सवत् २०१३

प्र.क.
भा. चीजो
॥२॥
माप्तिस्थान- १ श्री सोमचंदभाइ हरगोविंददास
छाणी
२ पं. छबीलदास केसरीचंद संघवी. दादासाहेबनी पोळ खंभात.
३ श्री सरस्वती पुस्तकभंडार-रतनपोळ हाथीखाना अमदावाद.
४ श्री मेघराज जैन पुस्तकभंडार-पायधुनी गोडीजी वील्डींग मुंबई २
५ श्री सोमचंदभाइ डी. शाह कल्याणप्रकाशन मंदिर पालीताणा.
聚號踪器鉴器路器继继器器鉴器錄器錄器踪器聽器第密
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मुद्रक :- पं. मफतलाल झवेरचंद गांधी. नयन मिन्टींग प्रेस, रीचीरोड पुल नीचे ढोंकवावाडी अमदावाद.
॥२॥

सपादकीय
म.क
भा. वीनो
॥६॥
दीधु पण पाउळयी पू आचार्यादि मुनिपरो तथा विद्वानोनु खास सूचन यनाथी अमोए आ विभागमा घटतो सुधारो
खास कर्यो छे छता अमारी मतिदोष के प्रेसदोपना-जगे रहेवा पामेली भूलचुक माटे विविध क्षमा मागना साये हार्दिक
सद्भाग्नी आशा रासीए छीए,
कळशनि ने फुलथी शणगारखा एम दरेक हस्तप्रतिओमां ते ते विधिओमा सूचवेल छे छता अदयुगीन केटलाफ
रिधिकारो प्रभुना दरवारमा फुलमाळ-गजरा वि श्रावकोना गळामा पहेरावे छे ते उचित नधी केमके शास्त्रोमां पण ते
चायतनो निषेध सास तान्यो छे भाष्यमा गाथा छ-'सचित्तदब्बमुज्झण' तो सचित्तना त्यागरुप अभिगम खास साच-
ववो श्रापको तो सोना-झवेरात पि. उचित शणगार करी शके छे
आ प्रतिमा दाखल करेल श्री प्रसाद अभिपेरु विधि ते पू जिनेन्द्रसूरिजीनु ज सौजन्य छे.
आ प्रतिमा सलाह सूचन, गुरुशोधन वि माटे पूज्यपादागममभाकर पुण्यविजयजी महाराज साहेना अमो अतीन ऋणी छीए.
अंतमा सई श्री श्रमणप्रधान सपनो हार्दिक सद्भार इच्छी चिरमीए छीए.
लि आपना विश्वासु :-
१ श्री सोमचद् हरगोविंददास पाणी
२ प. छवीलदास केशरीचद सघवी
(दानवीर शेठ गुलासीदास नानचंद सस्थापित
श्री स्याद्वाद सस्कृत पाठाशाळा अने
श्री भट्टीपाई जैन श्राविकाशाळाना
प्रधानाध्यापक) खभात
HTTENNIERRENTERTAINEERIES
॥६॥

प्र. क. भा. बीजो ॥५॥ संपादकीय बिंघ प्रवेश विधिनी वायतमा विवप्रवेश विधिनी १८-१९ सदीनी जेटली हस्तातो मळी ते बधी एक कोपीना उतारारुप ज जणाय छे आ वायत श्री पोपटभाइ साकरचंदे पोते छपावेल त्रिप्रवेश विधिमां लीधी छे खरी पण तेमां क्रम आगळ पाछळ छे तेम ज केटलांकनां हेडींग पण फरे छे. जेथी अमोए तेनो ज उतारो नहिं आपतां हस्तलिखित प्रतो तथा विधिकारकोना सूचनना आधारे घटतो सुधारो को छे. श्री पोपटभाइए छपावेल प्रत अमने घणी उपयोगी थइ पडी छे अमे ए कहीए तो खोटुं नथी. हालतुं विधि-विधान लगभग तेना आधारे थाय छे आम तेओए मार्गमा रहेला कांटा-कांकरा साफ करी आपेला ते मार्ग उपर ज अमोए मात्र सडक बांधवानुं काम कयु छे अने पानामांज रही गयेली केटलीक जरूरी नवी विधिओ पण विधिकारकोनी तकली- फने ध्यानमा लइ अहिं प्रसिद्ध करी छे, प्रतिष्ठा कल्प भा. १ ला मां आपवामां आवेल नंद्यान विधि लगभग घणीखरी विधिओमां जरुरी छे जेथी मोटा खर्च पण ब्लोक तैयार करावी तेनो पट आ साथे आपवामां आवेल छे तेमज विशस्थानक विधिनो पण पट आपवामां आवेल छे. शुद्धि अशुद्विनी बावतमां- लोको अने स्तुतिओमा केटलीक जग्याए व्याकरणदृष्टिए घणी अशुद्धिओ जणाय छे पहेला भागमा ज अमोने सुधारो करवो जरुरी लागेलो पण ए स्तुतिओ-लोको नंदिक्रिया तथा व्रतादिविधिमां चपराती हती अने तेमां पू. आचार्यादि मुनिवरो परंपरागत आवतुं होय तेमने तेमज बोलता आव्या हता जेथी अमोए पण तेमने तेमज रहेवा

सपादकीर
मा. बीजो
॥४॥
法治游杀空部张张张
张学强强望路湖
संपादकीय निवेदन-
एक सडेरने पण प्रवेशद्वार होय छे त्यारे आ तो विधि-विधाननी इमारत ! एने तो प्रवेशद्वार होय ज प्रवेशद्वार
विना इमारतनी मुदरता ने भव्यतानो ख्याल कठिन छे चलके असभवित छ प्रत्तारना ए तो पुस्तकको मर्म छे पण ते
विश्वतम्ये प्रतिष्ठा करप भा. १ लामा आगी जाप छै छ। द्वार रुपे सामान्यमार जणावयु उचित मानीए छीए
मस्ताना पछी बीजं स्थान आये छै अनुक्रमणिकानु आ प्रथमा सगृहीत थयेली विधिओनु प्रतिबिन अनुक्रमणिका.
मा पडे छे. या निधिओ माटे खास जगारवान के वी विधिभो पूज्यपाद उपा० श्री सकलचद्रजी गणिरचित नथी पण
जुदा जुदा ग्रथोमाथी उधृत करेल छे अने वर्तमानमा अतिमचलित छे.
शरुआतमा आरती कुमस्थापन-ग्रहदिक्पालपूजन विधिो लगभग सर्व जग्या उपयोगि होपाधी मतिप्याकल्प
भा. १ लामां आपेली होवा छता विधिकारकनी सरळता खातर फरी आपनामा आवे छे
ग्रह दिक्पाल पूजननी बायतमा
वधा प्राचीन विधिप्रयोमा दिसालपूनन पहेलु जोगामा आवे छ तेमन कोड पण विधि-विधान दिवपालने नौती
बाद ज करवानु होरायी दिकपालपूजन पहेलु करवु उचित छे जेथी अमोए वर्तमानमा ग्रहपूजा पहेल करसानी प्रति
होवा छा आ प्रतिमा दिकपालपूनमने आगळ स्थान आप्यु छे,
वळी एकनी एक बारत फी फरी लखी रहु लमाण न करता व्यवस्थित रीते कोठाबद्ध तरार करी नहदिक्पाल
पूजन आप्यु छे जे विधिकारकने घणु सरळ यह पडशे.
॥४॥

म.क. भा. बीजो ॥३॥ HTTER प्रतिष्ठा कल्प भा. २ जाना अगाउथी ग्राहक श्रयेल सहायकोनी नामावलि, १०१ श्री छाणी जैन संघ हा. मंगलदास १०१ शा. नेमचंद जीवणजी बाजीपुरा १०१ श्री मनमोहन शेरी-जैन संघ पाटण हा. शेठ चिमनलाल छोटालाल बडोदरावाला. ५१ श्री मांडवी जैन संघ-मांडवी ( सुरत) ५१ श्री कालंद्री जैन संघ-कालंद्री (मारवाड) शुभं भूयात् श्रीगतुविधसंघस्य ना. का शुद्धिपत्रक जोइ प्रत सुधारी पछी उपयोगमा लेबा खास विनंति ले, ||३|| पृष्ठ अनुक्रम णिका प्र.क मा.धीजो ८॥ १०७ १२७ विषय गुरुमूर्वि अगर स्तूप पतिष्ठा मत्र-पट्ट प्रतिष्ठा कूर्म मतिष्ठा (शिलास्थापन विधि) खातमुहूर्तविधि जीर्णोद्धार (रिसर्जन विधि) वर्धमान विधा परिशिष्टो विप्रवेश-अथेचरी के शान्तिस्नानमा जोइता सामाननी यादी कुभस्थापन, दीपस्थापन तथा जुगारा पाववानी विधिना सामाननी यादी जळयात्राना सामाननी यादी पाणी लावराना सामाननी यादी अह-दिक्पाल अने अष्टमगलना सामाननी यादी विषय घंटारर्णना सामाननी यादी १२६ भगवाननी गादी नीचे मकानो सामान १२७ यक्षक ईमनी १० वस्तुओं १२७ अप्टगंधनी ८ वस्तुओ १२७ पचामृतनी ५ वस्तुओ १२७ पचगव्य १२७ सोळ तया चार पानी यादी त्रण रेखा, आठ जावनी माटी १२७ पाटला आलेखननो सामान १२८ प्रतिष्ठानो सामान १२८ प्रिपेशवसते सामयानासामाननी यादी १२८ कूर्ममतिष्ठानो सामान १२९ विसर्जनविधिनो १२९ गुरुमूर्तिप्रतिष्ठानो सामान १२९ पासक्षेपनी २५ वस्तुभो पट्टप्प्रतिष्ठानो सामान १२१ १२२ १२३ ॥८॥ १३० १२४ १३० प्र.क. अनुक्रम णिका । भा. बीजो ||७|| - पृष्ठ २७ ३२ my ४ ३३ ५ 器端端器器端鹽验發器凝器瓷器瓷器瓷器雞雞器器器整器器 ८ अनुक्रमणिका विषय पृष्ठ कुंभस्थापन विधि दीपस्थापन विधि जुवारा वाक्वानो विधि २ जलयात्राविधि ३ ग्रहदिक्पालपूजन वज्रपंजर दिक्पालाह्वान १० दिक्पाल, ग्रह तथा अष्टमंगलस्थापन मंत्र ११ दिक्पालपूजन उपकरण मंत्र नवग्रहपूजन तथा उपकरण मंत्र २० ग्रहशान्तिस्तोत्र २४ अष्टमंगलस्थापन विधि २५ ९ विषय ४ दशदिक्पाल आह्वान (बृहद्) विधि- ५ जिनबियमवेश विधि नित्यकार्यविधि चैत्यप्रतिष्ठाविधि जिनविप्रवेशविधि श्री समवसरणस्तव ६ प्रासाद अभिषेकविधि ७ श्री मंडप-पीठस्थापन विधि ८ श्री अष्टोत्तरशतस्नात्रविधि ९ श्री शान्तिस्नात्रविधि विसर्जन मंत्र देवीप्रतिष्ठाविधि ३५ ३८ ४७ ५० ५३ ५८ ६९ ॥७॥ ९१ शुद्धि पत्रक शुद्धिपत्र ला मा पीजी १० अशुद्ध जमणा सागहर शिंगो १६ ॥९॥ www .0mmmmmmmm विस्तार आ हूँ वना जनाय तिष्ठ गृह गृह . 亲亲密亲密亲密亲密法密宗贤强送客路客密密宗张强強強 धतिनाथ क्षीरोदधे, मवा कदवो जमणी सगहर शिंग ॐ घोतिनाय क्षीरोदधे महा करतो नमो ब्रह्मणे नम आगच्छ गृहण दक्षिणार्ध गृह चितार आ है वजा जनाथ विष्ट गृहाण गृहाण श्रू शक पतये सपस्य शक्रः १० १० पतये इन्द्र १६ १६ सघस्य हाँ वायु ४ ४ ब्राह्मणे नम. आगञ्छ गृहाण दक्षिणा गृहाण १२ १२ ૨૨ १२ १२ ॥९॥ १९ २० २४ पूजग धाणीना दक्षि पूजन धाणीनो दक्षिणा ११ - ल ला. प्र.क. पृ. २७ २७ शुद्धिपत्रक मा, बीजो १३ १३ ॥१०॥ ९ १४ चोक्खु ८ १२ ८ ११ ५ अशुद्ध शुद्र तार्था तीर्था विधि (वृहद्) विधि जा जो निधूम निधूम चोखु तना तेना पुरवणां पुंखणां पुण्याह पुण्याई संपूण संपूर्ण अ....ड अखड रीझदइ रीझवी छिद्यन्ते च्छियन्ते ब्रह्मचय ब्रह्मचर्य पछी घेर आवी पाताना पोताना पृ. ५० ५१ ५१ ५२ ૧૨ ५३ ५४ ५८ ६० ६१ ६१ ३६ ३६ ३९ ४१ ४३ ४४ ४४ ४४ ४६ ४७ अशुद्ध महात्सवे करात्व भात प्रसर , कोरा आवाहन आ अनाद्य मंत्र बालवू केसरना सूरिभि विदुम संन्निह पूईय १० যুক্ত महोत्सवे करोत्व भूति प्रसरति कोरु आह्वान आं ऽनाद्य मन्त्र बोलवू केसरना सरिभिः विप सन्निह पूईय PRERNMEHENREE**BEHARE or ११ २ ny ४ ११ १० ar ६२ ६३ ॥१०॥ . ६३ ५० ६३ ९ प्र.क. ला. ला. शुद्धिपत्र मा. वीजो १० १ सति बाजु याजिनो ब्रह्मचारी नाणु पायु ८ १४ अमृद्ध सति बजु वामित्रो ब्रह्मगरी नाणु काप क्षु पाटलो भाज्य बारनार ******BERRIER शुद्ध लोकस्य वसग्ग नमोऽहंद लोगस्स नेमि कही आह्वान ३ অথ लारस्य वसम्म नमोऽईव लागस नेमी कहा आह्वान कडानो घान्यथी निर्दोप प्राधिता मदाक्षणा वैराया कुरुवे १ ६७ ६९ ७२ ७३ ७४ ७६ ७ राफडानी ९२ ९२ १२ १ध ४ तश पोटली भोज्य बोलनार स पाटातर सति धान्यथी निपि पारिता प्रदक्षिणा १४ पाठातर संति ९४ ९५ ९६ १३ १ ४ * कुरवे ॥११॥ १ १२ ला. १४ शुद्धिपत्र म.क. ९८ १०३ w w भा. बीजो or | १०३ ॥१२॥ ८ ४ १०५ १०६ १०६ १०७ को नीचेनो नितये सापारी विर प्रतिष्टा ताघ्रगे करी- ख्याति निर्गतये क्रों नीचेना नैऋतये सीपारी बिंब प्रतिष्ठा ताद्ध्ये कही- ख्याति नऋतये PETERMITTEESENTER অযুর मंत्री नमा भगवआ सापारी ११ ककोल शर ग्रहना वाळेला पातनी १३ ७ मंत्रो नमो भगवओ सोपारी * ११० कंकोल शेर ग्रहनो चाळेला पानी ९ पृ. ११४ ११५ ११५ ११६ ११६ ११६ ११६ १२३ १२५ १२७ १२८ १२१ १२९ १३० १३० 18 | १०८ १० ५ १७ ४ १५ " १ १०८ ११२ ११३ ११२ ११ ११३ ११३ ११४ ५ २ फोण ईशान दिशा नैऋतकोण वधे कोण ऊध्ये अधो बधे -- ७ विसजन पसा फ्रान्ता (घरो) विसर्जन पैसा कान्ता (धरो) ॥१२॥ ३ प्रतिष्ठा कल्प भा. वीजो श्री कुम प्रम. स्थापन रिषि १ श्री कुभस्थापन विधि प्रथम कुम पर माटोना-चाग 37 रहित, अएमगल चितरेलो धोइ पीने कठे ग्रीगन बाधी पडी अडानी लेगगी हुंम उपर-"ह्रीं श्रीं मर्योपद्रवान् नाशय नाशय साहा" मा मन मरधी ठानी कुपनी अदर मरनो पापियो खो धूप देशो समाजलीयी वधावनो पाना डांटा नासा तुमनी अंदर चोग्या. गोपाग, रूपियो भने पचाननी पाटली स्थापी पछी उभा थइ नवकार गणतां अनोट जळनी अखड धाराए जुम परिस भरो. पी नागरवेन्ना पान चार स्ठे भूगे, उपर श्रीफल मूफी, लीलो-गतो रेशमी काडो गर समा बाँकी ग्रीवायाधी' शो पी उपर कार अने एलपी पूजा सवी सोना रूपाना वरख छापरा फूल्नो हार पहरामो पठी ठेका मुभ स्थापो दोष त्यो कानो माथियों की चोग्या मोपारी पूरी उपर गोहिगेर मबानो सावित्रो पराग •पमा मरेको नापी १ळ, मरदारोगी, घरो, दाम 1 नाई ॥२चिव जे म्याने हार नेनो नमणा बाजुना नया परि पाना होय तेनो मी बाजुमा कुम स्थापयों 空拍张*孙涉%少许染恐总站功始对物 कुंभस्थापन विधि मा. वीजो ॥२॥ 器器發器茶鉴茶幾客 पछी देरासर फरती त्रण प्रदक्षिणा दई कुंभने गाजते वाजते " ॐ ह्रीं ठः ठः ठः स्वाहा" ए मंत्र सात चार भणी, श्वास स्थिर राखी, कुंभने स्वस्तिक उपर स्थापनो. कुंभस्थानके दीप अखंड राखयो, धूप त्रण काळ करवो. कुंभने वास- क्षेपथी पूजी कुसुमांजलि लई काव्य वोलवू. पूर्ण येन सुमेकशंगसदृशं चैत्यं सुदेदीप्यते, यः कीर्ति यजमानधर्मकथनप्रस्फूजितां भापते । यः स्पर्धी कुरुते जगत्त्रयमहादीपेन दोषारिणा, सोऽयं मंगलरूपमुख्यगणनः कुम्भश्चिर नन्दतात्॥१॥ आ काव्य बोली .कुंभने वधाववो, पछी कुंभ आगळ व्रण टंक सौभाग्यवती स्त्री पासे गहुँली करावी. विलाडी विगेरे हिंसक जीवने त्यां आश्वा देवा नहीं. रजस्वला प्रमुख मलिन स्त्रीनी दृष्टि पडवा देवी नहीं. सुवासण स्वीओ पासे उत्तम धवळ मंगल गीत गवरोववा- गानारी स्त्रीओने तंबोलादि देवां. श्रावक तथा श्राविकाओए त्यां नरकादि दुःखगर्भित, जिन मुनिना उपसर्गगर्भित, आलो- यणना स्तवन, राजिमती प्रमुखना विलापगर्भित गीत, अने अनित्य अशरण भावनानां गीत वर्जवा. कुंभ पासे त्रण टंक सात स्मरण धूप दीप सहित गणवां. ॥ इति कुंभस्थापन विधि ॥ १ सात स्मरण आ प्रमाणे समजवां सवार बपोर:-नवकार, उपसागहरं, संतिकर, तिजयपहुच, अजिशांति, भक्तामर अने मोटीशांति. सांजना:- नमिऊण NEETEERINEETIREMEDIES ॥२॥ - मा बीजो दीपस्थापन विधि अथ दीपस्थापन विधि प्रथम वागनु दीपपात्र शेर सा घी माय तेवु, जीमवालं, घोड धूपी, ककुथी पूजी कुसुमाजलि अने चोसायी वधावी तेमा सोपारी रूपियो अने पचरत्ननी पोटली की मांढळ मरडाशिंगो पापी १०८ अथवा २७ तारनी दीवेट मूकी घृत- मत्र मणवां सौभाग्यवती स्त्री पासे घृत पूरागीए तेनो मत्र- ॐ घृतमायुर्वृद्विकर, भवति पर जैनदृष्टिसम्पात् । तत्सयुक्तः प्रदीपः, पातु सदा भावदु खेभ्यः ।।१ ॥ स्वाहा । ए मंत्र तण वार कही घृत पूरावीए पछी दीप प्रगटावको तेनो मा- • अहं पञ्चज्ञानमहाज्योतिर्मयोऽय ध्वान्तघातने। धोतनाथ प्रतिमाया, दीपो भूयात् सदाऽर्हतः ॥१॥ ए मत्र ण पार कही दीप प्रगटारगो. पछी कुमनी जमणी बाजुए ज्या दीपने स्थापयो छे त्या फंकुनो साधिओ करी उपर पलाळेली माटीनु स्थान करी ते उपर दीप स्थापी वासक्षेप लइ मा वोलीए- "ॐ अग्नयोऽग्निकाया एकेन्द्रिया जीवा निरवद्या अर्हत्पूजायाम् निर्व्यथाः सन्तु, निष्पापाः सन्तु सद्गतय सन्तु न मे सघनहिंसाईदर्चने ॥ ए मत्र त्रण वार मणी दीप तथा अनि शुद्ध करीए. ॥ इति दीपस्थापन विधि। PERMANENTERTAINMENT

भ.क.
मा. बीजो
॥४॥
जुवारा
वावधानो
जलयात्रा
विषि
茶验券落落落落晓晓路器容器瓷器鉴器整器器蒸發強路
जुवारा वाववानो विधि
जुवारीया चार' तथा शरावलां चार२ आठ ३ अथवा बार काळा डाघ विनानां धोळावी ते मध्ये पैसो सोपारी मूकी
काची माटी अने अडाया छाणांनो भूको पूरी तेमां चार धान्य ववरावीए. ते आ प्रमाणे-१ जव, २ जुनार, ३ डांगर अने
४ घउं. तेमांना शरावलां चार कुंभनी चार वाजुए मूकवा. तेमां जोइए ते प्रमाणे पाणी सिंचवू.
२ जलयात्राविधि
प्रथम महोत्सवपूर्वक चतुर्विध संघ सहित पवित्र जलाशये जवू. त्यां विधिपूर्वक स्नात्र भणाव, शान्तिकलश भणयो.
पछी मालोद्घाटन करवू.
पछी गंध, पुष्प, धूप तथा नैवेद्य, बलिदान विगेरेथी प्रतिमा, दिक्पाल तथा नवग्रहोर्नु पूजन करवू. त्यारवाद
दर्शन-ज्ञान-चारित्रनुं पूजन करी आरति-मंगलदीवो करवो.
त्यारवाद चैत्यवंदन करते नीचे प्रमाणे:-
१ वासना जगारीमा चार सात सात खानांबाळा ।। २ मात्र कुंभस्थापन शांतिस्नानादि विधि प्रसंगे रवानुं दोय त्यारे चार
शरावलामा जवारा चाववा ।। ३ शांतिम्नानादिनी साये ध्वजादंड पूजन होय तो आठ शरावलामां जवारा वाचवा ॥ ४ जो प्रतिष्ठाविधि
विवप्रवेशविधि अने चैत्यप्रतिष्ठा होय त्यारे बार शरावलामां जवारा ववराववा ॥
॥४॥

म.क मा पीजो जलयात्रा विधि मी खरतरगच्छीय ज्ञान मन्दिर, जयपुर मथम चैत्यवदन करी श्री शान्तिनाथ आराधनाथ करेमि काउस्सग्ग वदणवत्तियाए-अन्नत्य १ नवकारनो काउस्सग्ग करी नमो० कहो नीचेनी स्तुति बोलली'- ओशान्तिः श्रुतशान्ति प्रशान्तिकोऽसावशान्तिमुपशान्तिम् । नयतु सदा यस्य पदाः, सुशान्तिदाः सन्तु सन्ति जने ॥१॥ पछी श्री द्वादशाङ्गी आराधनार्थ करेमि काउ० चदण अन्नस्थ कही १ नकारनो काउस्सग करी पारी नमो० कही नीनी स्तुति कहेवी- सकलार्थसिद्विसाधन-बीजोपागासदा स्फुरदुपांगा। भातादनुपहतमहा-तमोपहा द्वादशाङ्गी वः॥२॥ पछी " श्री शान्तिदेवयाए करेमि काउ० "विगेरे कही- श्री चतुर्विधसदस्य, शासनोन्नतिकारिणी। शिवशान्तिकरी भूयात्, श्रीमती शान्तिदेवता ॥३॥ पछी " शासन देवयाए करेमि काउ" वि कही- या पति शासन जैन, सयः प्रत्यूहनाशिनी। साभिप्रेतसमृध्ध्यर्थ, भूयाच्छासनदेवता ॥ ४ ॥ पछी" सिन्देश्याए करेमि काउ वि. कही:- पस्याः क्षेत्र समाश्रित्य, साधुभि साध्यते क्रिया। सा क्षेत्रदेवता नित्य, भूयान्नः सुखदायिनी ॥५॥ पछी अच्छुत्तादेवीए करेमि काउ. वि कहीः- -

प्र. क.
जलयात्रा
विधि
मा. बीजो
॥६॥
चतुर्भूजा तडिद्वर्णा, कमलाक्षी वरानना । भद्रं करोतु संघस्यो-च्छुप्ता तुरगवाहना ॥ ६ ॥
पछी समस्तवेयावच्चगराणां इत्यादि पाठ कही करेमि काउ. वि. कही:-
संवेऽत्र ये गुरुगुणौघनिधौ सुवैया-वृत्यादिकृत्यकरणकनिवडकक्षाः ।
ते शान्तये सह भवन्तु सुराः सुरीभिः, सदृष्टयो निखिलविघ्नविघातदक्षाः॥७॥
पछी जलदेवयाए करेमि काउ० वि. कही:-
मकरासनसमासीनः, कुलिशाइशचक्रपाशपाणिशयः।
आशामाशापालो, विकिरतु दुरितानि वरुणो वः ॥ ८॥ पछी-
करोतु शान्ति जलदेवताऽसौ, मम प्रतिष्ठाविधिमाचरिष्यतः।
आदास्यतो वा मम वारि तत्कृते, प्रसन्नचित्ता प्रदिशत्वनुज्ञाम् ॥ ९॥
ए श्लोक बोलवो पछी १ नवकार कही नमुत्थुणं थी जयवीयराय सुधी कहे.
पछी कुवाकांठे जइ करवानो विधिः-
मंत्र युक्त वास कुंकुम अने चंदनना छांटा नाखवा त्यार बाद नीचेना मंत्रथी त्रणवार आचमन करवू.
ॐ गुरुतचाय नमः, ॐ ( अहै ) आत्मतत्त्वाय स्वाहा, ही विद्यातचाय स्वाहा, हूँ। पार्वतत्वाय स्वाहा.
ॐ मुक्तितत्त्वाय स्वाहा।
HERE THERE ARRESTERIYAR
॥६॥

जलयात्रा
विधि
मा, बीजो
॥७॥
त्यारनाद करन्याम करवा--
.
त्यारवाद अङ्गन्यास करपा ते नीचे प्रमाणे-
ॐ ही नमो अरिहताण हा शीर्ष रक्ष रक्ष स्वाहा, ॐ ही नमो सिद्धाणं ही वदन रक्ष रस स्वाहा, ही नमो
आयरियाण हूँ हृदय रक्ष रस स्वाहा, ॐ ह्रीं नमो उवज्दायाण हूँ नाभिं रक्ष रक्ष स्वाहा, अ ही नमो लोए सव्वसाहणं
हौं पादौ रस रस साहा, ॐ ह्री नमो ज्ञानदर्शन-चारित्रान् । सर्वांग रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ ही अहं अङ्गुष्ठाभ्या नमः । ॐ ही सिद्धाः तर्जनीभ्या नमः । ॐ ही आचार्या मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ ही उपाध्याया अनामिकाभ्या नमः । ॐ ही सर्वसाधव. कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ ह्रा ही हूँ हूँ है।
सम्यग्ज्ञानदर्शनचारिनान् धर्म करतलकरपृष्ठाभ्यो नमः । पछी-
क्षीरोदधे स्वयभूश्च, सरस्पद्ममहारदे । सीते सीतोदके कुण्ड, जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥१॥
गङ्गे च यमुने चैव, गोदावरि सरस्वति । कारि नर्मदे सिन्धो, जलेऽस्मिन् सन्निधि कुरु ॥२॥
ए प्रमाणे श्लोको कही अकुश मुद्राए जल खेच.
त्यारवाद ॐही अमृते अमृतोद्भवे अमृवार्षिणि अमृत स्रावय सावप स स क्लीं क्लों ब्लु ब्लु द्रा द्रां दी हो
द्रावय द्रावय ही जलदेवीदेवान् अत्र आगच्छ आगच्छ स्वाहा ।
ए पाठ प्रणगार चोली कूर्ममुद्राए अथवा मत्स्यमुद्राए जल स्थापयु पछी-
॥७॥

प्र.क. भा. बीजो ॥८॥ जलयात्रा विधि ग्रहादिक्पाल पूजन - 'ॐ ही क्ली ब्लु जलचंदनपुष्पाक्षतफलनैवेद्यदीपधूपं समर्पयामि' एम बोली बलीदान पुष्प नाळियेर अथवा बीजां फलो वि. पाणीमां पधराववा ते वखते ॐ आं ही क्रौ जलदेवि पूजाबलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा । ए पाठ बोलवो। पछी ४ अथवा ८ कलशो भरवा तथा त्यां लाडु वि. नैवेद्य मूकवा. पछी नीचेनो पाठ बोलयो : ॐ ही ऋपभाजितसंभवाभिनंदनसुमतिपद्मप्रभसुपार्थचन्द्रप्रभसुविधिशीतलश्रेयांसवासुपूज्यविमलानन्तधर्मशान्तिकुन्थ्वर- मल्लिमुनिसुव्रतनमिनेमिपाचवद्धमानादितीर्थकराः परमदेवाः तस्य अधिष्ठायकाः देवाः शान्ति पुष्टिं ऋद्धिं वृद्धि जयमंगलं कुरु कुरु पां पांवां वां नमः स्वाहा । ए रीते कलशो भरी चन्दन पुष्पथी सुशोभित करी धवल मंगल अने वाजिंत्रना नाद पूर्वक कुमारिका अथवा सौभाग्य- वती स्त्रीओ पासे लेवडावी चैत्य अथवा घरमा प्रदक्षिणा दइने पवित्र स्थाने पधरावी मंगल गीत तथा वाजिंत्रनो घोप करवो । ।। इति जलयात्रा विधि । ३ अथ नवग्रह-दशदिक्पालपूजन तथा अष्टमंगलस्थापन विधि स्नात्रना दिवसे अगर तेना पहेले दिवसे वृद्ध श्रावक नवग्रह चीतरेलो सेवननो पाटलो धोइ, वामफुले वासित करी धूपे अघेडानी तथा सरेडानी लेखणे सुखड, केशर. कस्तुरी, कपूर, हींगळोक वडे दिवपाल तथा ग्रहोने आळेखे. आचार्य 答整器器鉴染器器器鉴端染器端绕懿器器娶樂器樂際聯盟 ॥८॥ . Avh

ग्रहदिक्पा
लपूजन
प्र.क.
भा. वीजो
॥९॥
पासे पहले दिवसे प्रतिष्ठावे. वीजे दिवसे प्रमाते वृद्ध धारक विधिपूर्वक स्नात्र करी भगवाननी जमणी बाजु ग्रहनो अने
डाची वाजु दिक्पालनो पाटलो, स्थापन करे सर्वपूजोपकरण पासे राग्वी धूप, दीप समीपे करी वज्रपजर करे ने आ प्रमाणे:-
अध वज्रपक्षरस्तोत्रम्
परमेष्ठिनमस्कार, सार नवपदात्मकम् । आत्मरक्षाकर वज्र-पक्षराम स्मराम्यहम् ॥१॥
ॐ नमो अरिहंताण, शिरस्क शिरसि स्थितम् । ॐ नमो सिद्धाणं, मुखे मुग्वपटाम्बरम् ॥२॥
ॐ नमो आयरियाण, अगरक्षातिशायिनी। ॐ नमो उवज्झायाण, आयुध हस्तयोर्दृढम् ||३||
ॐ नमो लोए सब्यसाण, मोचके पादयोः शुभे । एमो पचनमुकारो, शिला बजमयी तले ॥३॥
सयपावप्पणासणो, वमो वज्रमयो पहिः । मगलाण च सव्वेसि, खादिराङ्गारखातिका । ५॥
स्वाहान्त च पद ज्ञेय, पदम रवइ मगलम् । वनोपरि यजमय, पिधान देहरक्षणे ॥६॥
मवामभाग रक्षेप, क्षुद्रोपद्रवनाशिनी । परमेष्ठिपदोद्भूता, कधिता पूर्वसूरिभिः ॥७॥
यश्चैव कुस्ते रक्षा, परमेष्ठिपदै सदा । तस्य न स्याद् भय व्याधि-राविश्चापि कदाचन ॥८॥
। इति चञपञ्जरकवच ।
सूचना-ग्रह दिक्पाल पूजननी यासतमा हालमा ग्रहपूजन पछी दिक्पालपूनन करवानी प्रवृत्ति छे पण लगभग
१ आ म्लोन बोलता जे जे अगनु नाम आवे ते ते अगने हस्त-डे स्पर्श कदवो २ शरीरजा पाठातर
॥९॥

दिक्पाला
ह्वान
म.क.
मा. बीजो
घणीखरी हस्तलिखित प्रतीमा पहेलां दिक्पालपूजन अने पछी ग्रहपूजन छे, तेथी अहिं अमोए पहेला दिक्पालपूजन
आपेल छे.
तेमां पहेलां दिक्पालतुं संक्षिप्त आह्वान करे ते आ प्रमाणे:-
वे वृद्ध श्रावक वे थाळमां कोरा वलि लई "ॐ वी सर्वोपद्रवाद् बलिं रक्ष रक्ष स्वाहा" ए मंत्रथी २१ वार
बलि मंत्रवो पछी अगासीमां आधी छ लघुश्रावक पाणी,, चंदन, धूप, दीप, पुष्प अने घंटथी ज्यारे ज्यारे जे जे
दिक्पालने कोरा बलि आपे ते वरखते उपरोक्त छ वस्तुथी पूजन करे.
॥१०॥
आह्वान मंत्रो-
दिशाओ
मंत्र
१ पूर्व- "ॐ नम इन्द्राय स्वाहा
३ दक्षिण-
यमाय
५ पश्चिम-
वरुणाय
७ उत्तर-
९ ऊर्ध्व-
ब्राह्मणे
, नैताय
दिशाओ
मंत्र
२ अग्निकोण - "ॐ नमोऽग्नये स्वाहा
४ नैत्रत-
६ वायव्य-
वायवे
८ ईशान-
१. अधो-
नागाय
-
धनदाय "
" ईशानाय
"
॥१०॥

दिक्पाल ग्रह तथा अष्टमंगल स्थापन यंत्र
नवग्रहो
दशदिक्पाल
दिक्पाला
दि यत्रो
मा पाजो
॥११॥
८
२
ॐ नमश्चन्द्राय
ॐनम शुक्राय
१ॐ नम इन्द्राय
ॐ नमोबुधाय
ॐ नमोऽग्नि
मूर्तये
९ ॐ नमो ब्रह्मणे
ॐ नम
ॐ नमो भौमाय
वृहस्पतये
ॐ नमो यमाय
HEROENINEERIENTISEMBER
ॐ नम तवे
आदित्याय
७
नम
বাবঞ্জাব
ॐ नमो राहवे
धनदाय
१० ॐ नमो नागाय
६
ॐ नमो वायवे ५ नमो वरुणाय
ट
नमो
नेताथ
स्वस्तिक
२
श्रीवत्स
४
मद्रासन
नद्यायचे
वर्धमान
दपेण
८
मत्स्ययुगल
॥११॥

.
म.क.
दिक्पाल-
पूजन
भा. बीजो
॥१२॥
FERE
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दिक्पालपूजन
दिक्पालना स्थापेला पवित्र पाटला उपर कोष्टकमा आप्या प्रमाणे अनुक्रम मंत्रपूर्वक पहेलां मंडलने वधावी आलेख
करवो पछी आह्वानमुद्राथी आह्वान, स्थापनीय मुद्राथी स्थापन अने अंजलिमुद्राथी निमंत्रण करवू ते त्रणे माटे मंत्रो
सरखा ज छे मात्र आह्वान वखते "अत्र आगज्छ २ स्वाहा" स्थापन वखते "अत्र तिष्ठ २ स्वाहा" अने निमंत्रण वखते
"अत्र पूजाबलिं गृहाण २ स्वाहा" बोलg मंत्र नीचे प्रमाणे-
ॐ नम इन्द्राय सवाहनाय सपरिजनाय सायुधाय अमुकगृहे (अस्मिन् जंबूद्वीपे भरतक्षेत्रे दक्षिणाधभरते मध्यखंडे
अमुकदेशे अमुकनगरे अमुकप्रासादे ) वृद्धस्नात्रमहोत्सवे आगच्छ २ स्वाहा । तिष्ठ २ स्वाहा । पूजावलिं गृहाण २ स्वाहा ।
पछी सायुधाय सुधीनो मंत्र बोलवापूर्वक-चंदन, पुष्प, वस्त्र, फल, धूप, दीप, नैवेद्य अने अक्षतादि सर्वोपचारथी अष्ट-
मकारी पूजा करवी, पछी वधावाना मत्रथी ज नवकारवाली गणी तेज मंत्रथी वास चोखा, फुल, पाणी पसलीमां लई
त्रणवार अर्ध्य आपत्रो पछी हाथ साफ करी अंजली मस्तके लगाडी प्रार्थना श्लोकथी प्रार्थना करवी. आ प्रमाणे आ
बधुं कोप्टकमां आप्या प्रमाणे समजीने करवू अनुभव खातर इंद्र दिक्पालनो विधि उपर कह्या प्रमाणे वितारथी आप-
वामां आवेल छे ते प्रमाणे बाकीना दिक्पाल अने ग्रहोर पुजनमां समजी लेवू.
१ अथ इन्द्र पूजा
एक दक्ष श्रावक सर्व पूजोपकरण पासे राखी ज्यां दिक्पालनो पट्टक स्थाप्यो छे त्यां पवित्र पाटला उपर स्थिर
॥१२॥

दिक्पाल
पूजन विधि
मा.बीजो
॥१३॥
-
आसन करी पूजा प्रारभे:-
प्रथम चोखा, वासपुष्प पसलीमा लइ पूर्वदिगधिपति इन्द्रना मडलने वधावे, तेनो मत्रा-
ॐही आ हा हू हा हूँ क्षः वज्राधिपतये इन्द्र सवौषट् (स्वाहा)।
पछी गोरोचदनवडे इंद्रनुं मडळे तथा मत्र आळेखना पछी आह्वान मुद्राए आह्वान करवु, तेनो मंत्र-
ॐनम इन्द्राय पूर्वदिगधिष्ठायकाय ऐरावणवाहनाय सहस्रनेत्राय वज्रायुधाय सपरिजनाथ अमुक-
गृहे' [ अस्मिन् जंबूद्वीपे दक्षिणार्धभरते मध्यविण्डे अमुकदेशे अमुकनगरे अमुकमासादे ] वृद्धस्मात्रम-
महोत्सवेर आगच्छ आगच्छ स्वाहा ।
पछी ए ज मंत्र वोली स्थापन मुद्रावडे छेक्टे "अत्र तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा” एम बोली स्थापन करतु.
पछी ए ज मत्र वोली अंजलि मुद्रा बडे छेवटे "पूजायलिं गृहाण गृहाण स्वाहा" एम वोली निमंत्रण करणे
१ आ पूजनमा तथा आगळ उपर आवता दरेक पूजन वखते आ 'अमुकगृहे' शव्दने ठेकाणे उपर कौंसमा आपेल { अस्मिन्
जवृद्वीपे वगेरे ] आखो पाठ बोलवो अने एमा ज्या ज्या 'अमुक' शब्द मूकेल छे त्या त्या ते ते देश, नगर अने स्थलनु नाम बोलवु,
२ आ ठेकाणे जुदा जुदा महो सवना प्रसगे ते ते प्रसगने अनुलक्षीने जुनां जुदा नामो बोलवा, जेमके- निंबप्रवेशमहोत्सवे,
अथवा 'शातिस्नात्रमहोत्सवे' इत्यादि जो वे तण महोत्सवो एकी साथे करवाना होय तो ते दरेकना नामो बोलवा, जेमके-विवप्रवेशमहो
त्सवे शातिस्नात्रमहोत्सवे कलशप्रतिष्ठानिधिमहोसवे' इत्यादि
४ आ जग्याए 'गृहाण गृहाण पाठ पण बोलाय छे
,
॥१३॥

म. क.
दिक्पाल-
पूजन विधि
भा. वीजो
॥१४॥
पछी ते न मंत्र "सपरिजनाय" मुधी बोली अष्टप्रकारी पूजा करवी.
१ चन्दनं समर्पयामि स्वाहा ।
२ पुष्पं समर्पयामि स्वाहा।
३ वस्त्रं समर्पयामि स्वाहा।
४ फलं समर्पयामि स्वाहा।
५ धूपमाघापयामि स्वाहा ।
६ दीपं दर्शयामि स्वाहा।
७ नैवेद्यं समर्पयामि स्वाहा ।
८ अक्षतं ताम्बूलं द्रव्यं सर्वोपचारान् समर्पयामि स्वाहा ।
पछी नीचेना मंने +नयकारवाळी एक गणवी:-
ॐ ही आ हा हूँ हा अँ हूँ क्षः वनाधिपतये इन्द्र संचौपट (स्वाहा )।
पछी फूल वासचोखा, पाणी पसलीमा लइ उपरना मंत्रे प्रणवार अर्घ्य देवां. पछी वे हाथ जोडी नीचे प्रमाणे
प्रार्थना करवी:-
ऐरावतसमारूढः, शक्रः पूर्वदिशि स्थितः । संघस्य शान्तये सोऽस्तु, बलिपूजां प्रयच्छतः॥१॥
। इति इन्द्रपूजा १
+ दिक्पाल पूजनमा नयकारवाली गणवानी पद्धति वर्तमानमा प्रचरित नधी, अहोमां गणवानी प्रथा छे.
॥१४॥

दशदिक्पाल-पूजन उपकरण यंत्र दिक्पाल- पूजन विधि मा. पीनो नैवेद्य द्रव्यादि वस्त्र धूप दीप फूल २ दिकपाल| आलेख पूजन १ फुल माला दिशा ४ ७ ८ ४ गोरोचन केसर चणे जवीर पीलं वस्त्र अक्षत,पाना मोतियो लाड, सोपारी, चायानाणु केरवो पूर्वदिशा 绝密密密密整绕路發發發發路终将晓部总经盜器密密密资 अग्नि रकच दन राती जासुद सोपारी, रातुं वस्त्र चुरमानो लाड परवाला अग्निकोण कस्तुरी चुमी कर दमणो-काली मरुओ सोपारी कालुं चन अडदनो लाड अकल्बेर दक्षिण- दिशा चुओ नेत । कस्तुरी मालती योल- सीरी दाडिम उदु यत्र तलवटनो ला नत्यकोण

दिक्पाल
वधावो-आलेख माळा अने अय॑नो मंत्र
प्रार्थना श्लोक
दिक्पाल-
पूजन विधि
भा. बीजो
नाम
॥१६॥
इन्द्र
ऐरावतसमारूढः, शक पूर्वदिशि स्थितः ।
संघस्य शान्तये सोऽस्तु, वलिपूजां प्रयच्छतः ॥
अग्नि
ॐ ह्रीं आ हा हूँ हूँ। थू क्षः
वज्राधिपतये संवौषट् ( स्वाहा
ॐ ह्रीं ₹ रॉ रु रे रों रः
अग्नि संवौषट् (स्वाहा)
ॐ शू हू हूँ। क्षः यम संवौपट
(स्वाहा)
सदा वहिदिशो नेता, पावको मेपवाहनः। संघस्थ०
दक्षिणस्यां दिशि स्वामी, यमो महिपाहनः। सघस्य०
हा नैर्ऋत संवौपद
नैर्ऋत
यमापरान्तरालोऽसौ, नैऋतः शिववाहनः । संघस्य०
(स्वाहा)
॥१६॥

परुण | कस्तुरी चुओ घुओ सुखड दमणो योल मिथित सीरी अक्षत पान, दाडिम, आस्मानी मगदब्नो सोपारी, धावा- केरयो वस्त्र नाणु पश्चिम दिशा दिक्पाल- पूजन विधि मा पीजो ॥१७॥ सुखड केसर वास चुयो कस्तुरी कस्तुरी घायु च पक दमणो नारगी केला चाव्यकोण नील पत्र| घेसीदल कुबेर | सुखडवरास सुखडबरास जाइ अथवा मिथ सेवना वीजोर / श्वेतवस्त्र स्फटिक उत्तरदिशा " सुखड सुखड सेलडी इशानकोण ब्रह्मा सुखड कपूर सेवन्त्रा बीजोत घेवर " उर्वलोक "" " " उज्ज्वल उज्ज्वल सुखडू दूध मिथित नाग ॥१७॥ मोगरो पेडा अघोलोक " " " IA

वरुण
म.क.
भा. बीजो
॥१८॥
ॐ श्री हों वरुण संवौषट् ( स्वाहा )
यः प्रतीचीदिशो नाथो, वरुणो मकरस्थितः। सवस्यक
दिक्पाल
पूजन विधि
वायु
ॐ क्ली हो सवौषट् ( स्वाहा )
हरिणो वाहनं यस्य, वायव्याधिपतिर्मरुत् । संघस्यक
कुबेर
ॐ क्लौं हौं कुबेर संवौषट् ( स्वाहा )
निधाननवकारूढ, उत्तरस्यां दिशि प्रभुः । संघस्य०
ईशान ) ॐ हा हूँ हो हः ईशान संवौषट् (स्वाहा)
सिते वृपेऽधिरूइश्च, ऐशान्याश्च दिशो प्रभुः। संस्था
ब्रह्मा
ॐ ह्रीं हूँ क्लू चॅ द्रः ब्रह्मन् संवौषट् (स्वाहा) | ब्रह्मलोकविभुर्यस्तु, राजहंससमाश्रितः । संघस्य.
ॐ आ ही को ऐ हो पावती सहित-
धरणेन्द्र संवीपट् ( स्वाहा )
पानालाधिपतिर्यस्तु, सर्वदा पमवाहनः । संघस्य.
॥१८॥

श्री नवग्रह-पूजन तथा उपकरण यन्त्र
धूप-दीप-नैवेद्य द्रव्यादि
माला
प्रह आलेख पूजन
वक्ष
नवग्रह
(पूजन विधि
मुख
मंडलाकृति मंडलदिर
PRESEARNER
म.क
मा. पीनो
॥२०॥
२
४
७
७
पूर्व
रवि
चूरमानो लाडवा
गोलधाणीना
केसर कणेर रातु यख द्राक्षा
परवाळा
वृत्ताकार | पटमध्य
चदन
路路路路發路路学晓晓晓张密密宗李晓晓张家兴路三
चन्द्र सुखड युक्त कुमुद । श्वेत वन सेलडी
ममरानो लाड
घेसीदल
स्फटिक पश्चिम चतुरना
फार
अग्नि
अक्षत, पान, सोपारी प्रायानाणु
राती गोलधाणीनो लाड
मगल चदन वा केसर जासुद रातु वर सोपारी या कसार
कसर
परवाळा पूर्व
निकोणा
कृति
दक्षिण
उघ केसर वास चपकवानोलु वर
नारंगी
कस्तुरी चूर्ण मरको (नीलीछोट)
या सी
ताफल
मगनी दाळनो या
मगदळोयो लाडु
करवो वा
नीलमणि
उत्तर
घाणसह
शाति
ईशान
|॥२०॥

दिवपाल-
पूजन विधि
.
प्र. क.
भा. वीजो
॥१९॥
सर्वसाधारण अर्ध्य देवानो विधि
पछी पूजक श्रावक एक थाळमां श्रीफल, अक्षत, बहुवर्णी पुप्पो, रूपियो एक, पीत वस तथा धीनां फलो राखी
उमो रही आ मंत्र बोले-
ॐ इन्द्राग्नियमनतवरूणवायुकुवेरेशानब्रह्मनागेति दश दिक्पाला जिनपतिपुरतोऽवतिष्ठन्तु स्वाहा।
एम बोली श्रीफळ वगेरे पट्टक उपर मूकवां पछी ते पट्टकने एक गज पीला रेशमी वस्खे ढांकतो. अने ते पट्टकने
वस्त्र सहित नाडावडे बांधी प्रभुनी सन्मुख अथवा दक्षिण बाजु स्थापवो.
+पछी पूजक श्रावक ग्रह पट्टक अने दिक्पाल पट्टकनी वच्चे उभो रही वे हाथ जोडी कोश मुद्राए नीचे प्रमाणे प्रार्थना करे:-
ॐ भो भो इन्द्रादयो दिक्पाला स्वस्वदिशि स्थिता विघ्नशान्तिकरा भवत भवत स्वाहा ।
मुहूर्तथी पूर्व दिवपाल, ग्रह प्रतिष्ठा होय तो पहेलां देरासरे व्रण दिवस सुर्धा पूजवा मुहूर्तने दिवसे प्रभाते वासयी
पूजवा. प्रतिमा पासे स्थापना. पछो उक्त विधिए पूजवा.
॥ इति दशदिक्पाल पूजन विधि ॥
+ आ विधि ग्रहदिक्पाल बनेनुं पूजग थया पछी करवो.
PRESENTEREDEEPRESENTERNER
॥९९॥

भा.बीजो
॥२१॥
पघावो, आलेख, मान अने अय॑नो मत्र
प्राथना श्लोक
ग्रहपदन
विधि
प्रयत्न
ॐ ह्री रत्नाकर्याय सहस्त्रकिरणाय नमो नम
स्वाहा ।
पद्मप्रभजिनेन्द्रस्य, नामोच्चारेण भास्कर ।
शान्ति तुष्टि पुटिं च, रक्षा कुरु जयश्रियम् ॥
ॐ रोहिणीपतये चन्द्राय ॐही हूँदी
चन्द्राय नम स्वाहा ।
चन्द्रमभजिनेन्द्रस्य नाम्ना तारागणाधिप ।
प्रसन्नो भय शान्ति च, रक्षा०
INTERNITINEERINNER
मगल
ॐ नमो भूमिपुत्राय भूभृकुटिलनेवाय धफवदनाय सर्पदा वासुपूज्यस्य, नाम्ना शान्ति जयश्रियम् ।
द्र स मगलाय स्वाहा। रक्षा फुरु धरासूनो, अशुभोऽपि शुमो भव ॥
युध
30 नमो बुधाय श्री श्री श्र द्र स्वाहा ।
विमलानन्तधर्मारा, शान्ति कुन्थुमिस्तथा।
महावीरश्च तन्नाम्ना, शुभो भव सदा बुध ।
॥२१॥

गुरु
सेवंत्र
गोरो-वास तथा
चंदन चूर्ण सोवन
चंबली
पील वस्त्र जवीर
चणानी दालनो
वा मोतीयोलाई
सुवर्ण वा
केरवों
उत्तर पटिकाकार, उत्तर
मा. बीजो
ग्रहपूजन-
विधि
॥२२॥
जाई वा श्वत वन बीजोक
शुक्र सुखड सुखड़ा मोगरो
घेसीदल वा
ममरानो लाड
स्फटिक पंचकोणा
वा रूप
दक्षिण
पूर्व
चुओ
वोरसली
आस्मानी
शनि कस्तुरी कंकु वा
मिश्र दमणो
उर्दु वस्त्र
खारेक
अडदनी दालनो
तथा तलवटना
अक्षत, पान, सोपारी प्रांयानाj
पश्चिम चतुरस्ता-
बेर
पश्चिम
मचकुंद कालु वस्त्र श्रीफल अडदनी वालनो वा
दक्षिण सूर्पाकार नैर्ऋत्य
पचव
अकलबेर
केतु
अडदनी दालनो
पुष्प
श्याम
सोसनी
रंगनुं चन
ध्वजाकार
वायव्य
गोमेदक
॥२२॥

घघावो आलेख, माला अने अर्घ्यनो मत्र प्रार्थना श्लोक ग्रहपूजन- विधि प्रवच मा. वीनो ऋषभाजितसुपावा-शामिन दनशतलो। सुमति सभव स्वामी, श्रेयासश्च जिनोतमा ॥१॥ एतत्तीर्थराता नाम्ना पूजया च शुभो भव । शाति तुष्टि च पुष्टि च, कुरु देवगणाचित ॥२॥ ॐग्रा प्री ३ वृहस्पतये सुरपूज्याय नम ॥२३॥ स्थाहा। ॐ य. अमृताय अमृतवर्षणाय दैत्यगुरवे नम स्वाहा। पुष्पदन्त जिनेन्द्रस्य, नाम्ना दैत्यगणाचित । प्रसन्नो भव शाति च, रक्षा कुरु जयश्रियम् । शुक्र शनि ॐ शनैश्चराय ऑको हूँ जोडाय नम स्वाहा। श्रीसुवतजिनेन्द्रस्य, नाम्ना सूर्याङ्गसमय । प्रसन्नो पहु ॐ हूँधा श्रीव्र व्रम पिंगलनेवाय कृष्णरूपाय राहवे नम स्वाहा । श्रीनेमिनाथतीर्थेश, नाम्ना त्वं सिंहिकासुत। प्रसन्नो ॥२३॥ ॐ का की के ट छत्ररूपाय राहुतनवे | राहो सप्तमराशिस्था, कारणे दृश्यतेऽम्बरे । केतवे नम स्वाहा । श्रीमल्लिपाश्वयोर्नाम्ना केतो शान्ति धिय कुरु ॥

प्र.क.
ग्रहशान्ति
स्तोत्रम्
मा. बीजो
||२४||
पछी एक थाळमां रातुं वस्त्र, श्रीफळ १, रू० १, सर्व जातनां फूलो, फळो अने चोखा तथा पंचरत्ननी पोटली मीढळ
नाई वगेरे लइ उभा थइ नीचे प्रमाणे ग्रहशांतिस्तोत्र भण:-
अथ ग्रहशान्तिस्तोत्रम्
जगद्गुरुं नमस्कृत्य, जुत्वा सद्गुरुभाषितम् । ग्रहशान्ति प्रवक्ष्यामि, भव्यानर सुखहेतवे ॥१॥
जिनेन्द्रैः खेचरा ज्ञेयाः, पूजनीया विधिकमात् । पुष्पैविलेपनधूप-नैवेद्यैस्तुष्टिहेतवे ॥२॥
पभप्रभस्य मातण्ड-श्चन्द्रश्चन्द्रप्रभस्य च । वासुपूज्यस्य भूपुत्रो, घुधस्याष्टौ जिनेश्वराः ॥३॥
विमलानन्तधर्माराः, शान्तिः कुन्थु मिस्तथा । वर्धमानो जिनेन्द्राणां, पादपो धुधं न्यसेत् ॥ ४॥
ऋषभाजितसुपार्धा-श्वाभिनन्दनशीतलौ । सुमतिः संभवस्वामी, श्रेयांसश्च वृहस्पतिः ॥५॥
सुविधेः कथितः शुक्रः, सुव्रतस्य शनैश्चरः । नेमिनायो भवेद्राहोः, केतुः श्रीमल्लिपार्श्वयोः ॥ ६ ॥
जन्मलग्ने च राशौच, यदा पीडन्ति खेचराः । तदा संपूजयेद् धीमान ,खेचर सहितान जिनान् ॥७॥
पुष्पगन्धादिभिधूपैः, फलनैवेद्यसंयुतैः । वर्णसदृशदानेश्व, वस्त्रैश्च दक्षिणान्वितैः ॥८॥
ॐ आदित्यसोममङ्गल-युधगुरुशुक्राः शनैश्चरो राहुः। केतुसहिताः खेटा जिनपतिपुरतोऽवतिष्ठंतु ॥९॥
आ प्रमाणे कहीने पंचवर्ण कुसुमांजलि उछाळवी.
लोकानां पाठान्तर ।
॥२४॥

मा. पीजो 1॥२५॥ जिनानामग्रतः स्थित्वा, ग्रहाणा तुष्टिहेतवे । नमस्कारस्तव भात्या, अपेदष्टोत्तर शतम् ॥१०॥ मनापाचर्य, पञ्चमः श्रुतफेरली । विधाप्रपादतः पूद्,ि ग्रहशान्तिपिघिरतवम् ॥ ११ अष्टमगल । इति ग्रहशातिस्तोत्रम् । स्थापन पछी नीनो लोक पोतो:- रिधि जिनेन्द्रभक्त्या जिनभक्तिभाजा, येपा च पूजायलिपुष्पधूपान् । ग्रहा गता ये प्रतिकूलता च, ते सानुकूला परदा भवन्तु ॥ १॥ आ प्रमाणे मणी श्रीफल बगेर पाटलापर मूक ने पाटला उपर पाच पटानु रेशमी वस्त्र तथा सृतराउ यस पाथरी नेने मोहोळ सहित नाडु बीटी सोना स्पाना वरग छापी प्रभुनी आगळ अथवा दक्षिग नाजु स्थापनो ॥ इति न रग्रहपूजन विधि। अथ अष्टमंगल स्थापन विधि मुहूर्तने दिवसे प्रभाते एक दश श्राफ एक चीजा शेवनना पाटला उपर यक्षमाडे अएमगळ आळेसे. ते दरेक मगठ उपर एक एक पान, ते उपर गोखानी दगली, एक एक सोपारी तथा एक एक पैगो मूझयो पछी नौने प्रमाणे मागलिकनी आठ गाथा मोलगी. FR२५॥ १निधि शुम पाठातर ।

अमंगल
यापन
विधि
म.क.
भा. वीजो
॥२६॥
MARATREATREETTER
मंगलं श्रीमदहनो, मंगलं जिनशासनम् । मंगलं गालः सया, मंगलं पूजका अमो ||१||
आ लोक बोलीने पीठ पर अपवा ग्चेली भूमि उलनी अंजनी नाती, पडी नीना कपमर नोक गोली
एकेक मंगल प्रतिमा आगळ आलेगा.
बस्ति भगगननामपिटपे-पूदितं जिनवरोदय क्षणात् ।
स्वग्नि नानुमाननो जिन-स्थानो बुधजनमिलिन्यते ॥१॥
विश्वत्रये न वाले जिनगो, यायायते औकलगायमानः !
अनोऽा पूर्ण कलशं लिग्नितता, मिनाचनासमनापामः ||२||
पुगं गया: मनमः प्रभुना महत्व, मौभाग्यगोविनयशर्ममनोरया।
बान्त नायक ते प्रसादा-नवर्धमानयुगलम्पुरमायामः ॥३॥
न्यदध्यपाशतनभावल्लभ, कतै मुभा नुतननाय! निजापराधम् ।
मेना ननानि पुग्नस्तर मीनयुग्म, आदि पुरोपिलिखिनिजागयुक्त्या ||४||
त्वत्सेवकानां जिननाय दिनु, सामुमो निधयः फरन्ति ।
अनातुर्मा नरकोनया-वन: सनां पते पता गुग्गानि ||
जिनेन्द्रपादः परिपूज्य प्रारतिप्रभारभि(नि) मनिकृष्टन् ।
॥२६॥

मा चीनो
दशदिक्पा
॥२७॥
aveलआह्वान
विधि
भद्रासनं भद्रकरं जिनेद्र-पुरो लिखेन्मगलसत्प्रयोगम् ॥६॥
अन्तः परमजान, यद् माति जिनाधिनाथहृदयस्य । तच्छ्रोव तव्याजात्, प्रकटोभूत, हिन्दे ॥७॥
आत्मालोकविधौ जनोऽपि सकलस्तीन तपो दुश्चर, दान ब्रह्म परोपकारकरण कुर्वन् परिस्फूति ।
सोऽय यत्र सुसेन राजति स तीर्थाधिपस्पायनो, निर्मय' परमार्थवृत्तिविदुर सज्ञानिभिदर्पणः 11८॥
पछी पूना पारक एक थाळमां श्रीफळ, पचार्गी फूल, (फा, रूपियो एक) वगेरे राखो उभो थइ आ प्रमाणे बोले:-
नामजिणा जिणनामा, ठवणजिणा पुण जिणिदपडिमाओ।
नजिणा जिगजीवा, भावजिणा समवसरणत्या ॥
आ प्रमाणे गाथा बोली श्रीफळ वगेरे सने पाटला पर मूका, पछो ते पाटलाने उज्वळ बस्ने ढोकी नरग्रह अने
दश दिवपाळनी बच्चे मूरुको पछी वासक्षेप हाथमा लइ अमंगळ स्थापन मा आ प्रमाणे बोलयो:-
ॐ अर्ह स्वस्तिक-श्रीवत्स-कुम्भ-भद्रासन-नद्यावर्त-वर्द्धमान-दर्पण-मत्स्ययुग्माना अत्र अहंदू-
विम्यप्रवेशमहोत्सवे सुस्थापितानि सुप्रतिष्ठिनानि अधिवासितानि ल ल ल ॐ हो नमः स्वाहा ।
।। इति अष्टमगलपूजन विधि ।।
४ अथ दशदिक्पालआह्वानविधि
ग्रह दिक्पालनो पट्टा स्थापी, प्रार्थना करी, चार शिखाघ पावक चोटली छुटी मूकी करे जो चोटी होय तो
१ विध्यतरे वस्त्रथी ढाक्ता नथी
॥२७॥

म.क.
मा. बीजो
दशदिक्पा-
लआहान-
विधि
॥२८॥
गेवासत्र कंकणमंत्र मंत्री चोटी बांधे-लांबी शिखा करे, तथा वीजा आठ श्रावक एम बार निर्दोष श्रावक मळी उत्तम,
निर्दोप, पुत्रवती स्त्री पासे बलि रंधाव्यो होय ते:-खीर १, लापसी २, गळ्या मोळा पुडला ३, वडा ४, कूर(भात) ५,
| करंबो पुरी रोटलि चडा ( अडदना ) वेत्रण जातनां शाक, पापड फूलवडी, सोपारी सेन खारेक अथवा विध्यंतरे
खीचडो, पोकी, बाकुला, ए सर्व मळीने शेर एकवीसनो एक मोटी कथरोटमा एकठो करी हलायी भेगो करवो. पछी
तेने मंडप मध्ये लापी बाजोठ उपर मूकीने शिखावध दक्ष श्रावक पूर्व अथवा उत्तर सन्मुख बेसी घी शेर सवा गायर्नु
तेमां फरतुं सपळे रेडे. बुरु-खांड शेर सवा ते उपर भभरावे. चंदनना छांटा दे. उपर कणेरनां तथा बीजां पण फूल
वेरे. पछी वासमुष्टि लइ नीचे प्रमाणेनो मंत्र गणी वाममुष्टि बलि उपर घेरे. आ प्रमाणे दरेक बखते वणवार मंत्र गणीने
चासमुष्टि वलि उपर नांखे, मंत्र:-
"ॐ नमो अरिहंताणं । ॐ नमो सिद्धाणं । ॐ नमो आयरियाणं । ॐ नमो उचज्झायाणं । ॐ
नमो लोए सम्बासाहणं । ॐ नमो आगासगामीणं । ॐ नमो चारणाइन्टद्वीणं । जे इमे किन्नरपुिरिस-
महोरगगालसिहगंधब्वजक्खरक्खसपिसायभूपेयसाइणिडाइणिपभिइणो जिणघरनिवासिणो निय-
नियनिलयट्ठिया पबियारिणो सन्निहिया असन्निहिया य ते सव्वे इमं विलेनमधूवपुकफलपईन.
सणाई बलिं पडिच्छता तुहिकरा भवंतु सिवंकरा भवंतु संतिकरा भवंतु सुत्थं जण कुणंतु सब्बंजिणाण
.
॥२८॥

मा पीजो ॥२९॥ सन्निहाणप्पभावओ पसन्नभावत्तणेण सव्यस्थ रक्स कुणतु सव्वत्य दुरियाणि नासंतु सम्वासिव-10 मुवसमतु सतितुद्विपुद्विसिवसुत्थयकारिणो भवतु, स्वाहा।" ॥ इति भूतमलि मत्र ॥ दिपा- लशाहान- पही ते यलिनो अडधो भाग वीना वासगमा लेगो. नाकी रहेलो अडधो भाग पनि स्थाने ढाकीने मूको पछी विधि । शिखारथ श्रावक वै हाथे पलि-भाजन ग्रहण करे. अने वीना श्रापक अनुक्रमे फूलछाबडी, चामर, घट, आरिसो, थाळी, वेलण, अक्षत, फलादि, ग्रहण करे एक बलियाकुलनी पोस भरे अने दक्ष शिखाघ पावक शुद्ध मनपाठ उपरे । ममाणे पार श्राफ तथा वीजा पण स्नारियाओ वाजिंदादि ग्रही स्नानगृहने आगले भागे अने स्नान महपथी उंचे स्थानक अगासे रहे प्रथम पूर्व सन्मुख उभा म्हो पलि-पोश मरी पाठ-क्या उचा स्परे दिक्पाठ आह्वान पलिदानपाट कहे ते का प्रमाणे:-- १"ॐ नम इन्द्राय पूर्व दिगधिष्ठायकाय ऐरावणवाहनाय महस्रनेत्राय पनायुधाय सपरिजनाय अस्मिन् जबूद्वीपे दक्षिणार्धभरते मध्यपण्डे अमुकदेशेर अमुफनगरे अमुकजिनप्रामादे अमुरूगृहे वृद्ध- स्नात्रमहोत्सवे ओगच्छ आगच्छ बलिपूजा गृहाण गृहाण ( गृह २) स्वाहा ।" [आ मत्रांनी सपरिज is नायथी लइने स्वाहा सुधीनो समय पाठ दरेक पखते एक सरग्यो बोलयो.] + सूचना -यलिपाठ उच्चरता वधा साथे वोल्रा लागे. यानिन सर्व छाना रासे, यो पति उठानी परत पाजित गैरे वगा। १ ज्या ज्या 'अमुक' शब्द आये त्या त्या ते ते देश नगर, प्रासाद अने घरनु पिपिष्ट नाम वोट्यु (॥२९॥ २. आ ठेकाणे जे महोसव होय ते महोत्सपनु नाम गोखु जेमके 'दातिस्नात्रमहोत्मचे विरेशमदो मरे । गरे,

म.क.
भा. वीजो
दशदिक्पा-
लाहान-
विधि
॥३०॥
ए पाठ कहीने बलि पूर्व दिशा सामे १उछाळे. ते वखते जेणे चंदन ग्रहण कर्यु होय ते चंदनना छांटा नाखे.
जळवाळो जळनी अंजलि आपे. फूलबाळो फूल उछाले. धूपवाळो धूप उखेवे. दीपकवाळो दीप देखाडे. चामरयाको चामर
चीझे. घंटवाको घंट वगाडे, आरीसायाळो आरीमो बतावे. थाळीवाळो थाळी वगाडे. अक्षतफलादिवाको ते चढावे. एम
सर्व पोतपोताना उपकरणे पूजा करे [ दरेक दिक्पाल वखते आ प्रमाणे पूजन करवु.]
पछी अग्निखूणा सन्मुख उभा रही नीचेनो पाठ कहे:-
(२) " ॐ नमो अग्निमूर्तये शक्तिहस्ताय मेयवाहनाय सपरिजनाय " वगेरे समग्र पाठ बोली बलि
उछाळे-पूजन वगेरे करे. एम दरेक वखो पाठ बोली बलि उछाळरी तथा पूजन करवू.
पछी दक्षिण दिशा सन्मुख उभा रही नीचेनो पाठ कहे:-
(३) " ॐ नमो यमाय दक्षिणदिगधिष्ठायकाय महिपवाहनाय दंडायुधाय कृष्णमूर्तये सपरिजनाय"
वगेरे. पछी नैऋत्य खुणा सन्मुख उभा रही नीचेनो पाठ कहे:-
(४) " ॐ नमो नैर्ऋताय वजहस्ताय सपरिजनाय " इत्यादि.
१. अहीं कोइक गाममां बलि-पिंडनो पूर्वसन्मुख ढगलो (पुंज] करे छे. जलादिक पण त्यां ज रेडे छे, ते देशमां मिथ्यात्वी लोको
बहु होवाना कारणे ते लोको रांधे का बलिने अभडावनार वस्तु (छोती) तरीके गगे छे अने घरगां जा बलि पडे तो तेने एंठ समान गणी
शासन उपर द्वेष धरे. आटला माटे पुंज करवो, बाको मूळ विधि ते प्रमाणे न समजबो,
॥३०॥

प्र.क.
मा.वीमो
दशदिक्या-
लआह्वान
विधि
॥३१॥
TRENTERTAINMENTER
पछी पश्चिम समुस उभा रही नीचेनो पाठ कहे:-
(५) ॐ नमो वरुणाय पश्चिमदिगधिष्ठायकाय मकरवाहनाय पाशहस्ताय सपरिजनाय " वगेरे
पछी गायव्यसुणा सामे उभा रही नीचेनो पाठ वोले:-
(६) "ॐ नमो वायवे वायवीपतये ध्वजहस्ताय हरिणवाहनाय सपरिजनाय" वगेरे.
पछी उत्तर दिशा स मुख उभा रही निचेनो पाठ कहे:-
(७) " ॐ नमो धनदाय उत्तरदिगधिष्ठायकाय गदाहस्ताय नरवाहनाय सपरिजनाय " वगेरे.
पछी ईशान पूणा सन्मुख उभा रही नोचेनो पाठ कहे -
(८) "ॐ नम ईशानाय ऐशानीपतये त्रिशूलहस्ताय वृपभवाहनाय सपरिजनाय" वगेरे.
पछी ऊर्चमुख रासी नीनो पाठ कहे:-
(९) " ॐ नमो ब्राह्मणे ऊलोकाधिष्ठायफाय राजहसवाहनाय सपरिजनाय " वगेरे.
पडी अधोमुस रासी नीचेनो पाठ कहः-
(१०) "ॐ नमो नागाय पातालाधिष्ठायकाय पद्मवाहनाय सपरिजनाय" विगेरे.
इति वृहद् दिवपाल आह्वान विधि
उपरोक्त अगर वीजा कोई पण देवोनु विसर्जन कर होय त्यारे आह्वान करता जे पाठ पोल्या हता तेज प्रमाणे
शान मंदिर 47
-
॥३१॥

जिनवित्र.
प्रवेशविधि
प्र.क.
भा. वीजो
॥३२॥
" बलिं गृहाण गृहाण" सुधी बोलवू ते उपरांत " स्वस्थानं गच्छ गन्छ स्वाहा” एटलो पाठ वधारे बोलनो.
अथ जिनविवप्रवेशविधि
प्रथम उत्तम ग्रह-वळ युक्त स्थिर लग्न ठगती वधावीए,
लमदायकनो-अक्षत, श्रीफळ आदि द्रव्य तथा वसादिक बडे यथाशक्ति सत्कार करतो. पछी ठराव्या प्रमाणना लग-
दिन पहेलां १०, ७, ५ के व्रण दिवस पहेलां घर तथा बहार जपन्यधी १०० हाथ भूमि शुद्ध करवी, कलेवरादिक दूर
करवां अने ज्यांधी जिनवित्र लाव होय ते स्शने पण भूमि शृद्ध करावे अने कलेवरादिक दर करावे. पन्ने ठेकाणे मांडवा
बंधावे. बन्ने ठेकाणे सांझ सवार प्रभातीयां गवरावां. संघमां अथवा घरमा जे उत्तम, दक्ष, निदो पुरुष होय ते दश
दिवस सुधी एकासणां करे, ब्रह्मचर्य पाळे, सनितनो त्याग करे, मलिन अशुचि व्यापारनो न्याग करे, भूमि शयन करे,
प्रसन्न चित्ते वर्ते. जे देरासरे प्रभु स्थापनाना छे ते स्थानके भावी क्रियाकारत पुरुष प्रण टंक दीप, धूप महित सात
स्मरण गणे.
पछी एक नवी कोरी रूपानी अथवा वानी नटलोइमां अनोट पाणी भरी सोनावाणी करो सानदार नवकार गणी
"ॐ ही श्री जिरावलापार्श्वनाथ रक्षां कुरु कुरु स्वाहा" ए मन्ने देरासरे सगले छांटगुं, उनम धृप उसेवो. पली
ते दिवसे अथवा सात अथवा पांच दिवस बाकी रहे त्यारे शुभ दिन जोइ, कुंभ-स्थापन ना होय ते दिवसे देहरामध्ये ज्यां
॥३२॥

जिनविम्ब- मा पीजो प्रवेशविधि ॥३३॥ NEHATREPRETRINARIES वित्र स्थापवाना होय त्याची जमणी दिशाए ब्रह्मचारी अथवा ब्राह्मण पासे चार कोरां शरावला मध्ये जवारा वारावीए सधया स्त्री पासे बीहि शेर सानो स्वस्तिक करावीए, पछी विधिपूर्वक कुभस्थापना करीए कुम स्थानके दीप अखंड राखयो निकाल धूप करवो जवारा स्थानके पीलाडी प्रमुख हिंसक माणीने आववा देना नहीं. रजस्वला प्रमुख मलिन स्त्रीनी दृष्टि पडना देवी नहीं. कुम आगळ पण टक अविधवा स्त्री पासे गहुली करावपी. सौभाग्यवती स्त्रीओ मळी oid उत्तम पाळमंगळ गीत गाय गानारी स्त्रीओने तपोळ आदि देवा. श्रावक तथा श्राविकाओए नरकादि दु.ख गर्भित, जिन मुनिना उपसर्ग गर्मित, आलोयण स्तवन, तथा राजीमती प्रमुखना विलाप गर्भित गीत गावा नही. अनित्य-अशरण भावनानां गीत वर्जयां. हवे स्थापनीय निंग जेने घेर होय त्या दश दिवस विधिपूर्वक स्नान करवु. त्या स्नात्रिया चार पुरुप, मन शुद्धि पूर्वक वीजा स्नात्रियाओने शुद्ध करी स्नात्र करे. तेने दतधापनादि नित्यकार्यविधि करवो. नित्यकार्यविधि जळ शुद्वि मन्त्र ॐ हीं अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृत नाक्य स्रावय स्वाहा ।" आ मंन सात बार बोली जळ शुद्ध फरवु. ते पाणी मुखशुद्धि माटे पापरतु. दावण शुद्धि मन:-"ॐही यक्षसेनाधिपतये नम ए मा सात बार बोली दातण करीए, मुख धापन मन:-"ॐ ही श्रीली कामदेवाधिपतये ममाभीप्सित पूरय पूरय स्वाहा । - ॥३३॥ आ मंत्र म.क. भा. बीजो ॥३४॥ वोली मुख धावन करवू ( मोढुं धोवू ). स्नान मंत्र:-" ॐ ही अमले विमले विमलोद्भवे सर्वतीर्थजलोद्भवे पां पां वां वां अशुचिः शुचि- जिनविम्ब- भवामि स्वाहा" ए मंत्र सातवार बोली स्नान करवू. प्रवेशविधि वस्त्र शुद्धि मंत्र:-" ॐ ही आ जाँ नमः । ए मंत्र सातबार भणी वस्त्र पहेरवां- तिलक मंत्र:- तिलकनु केसर हाथमां लइ " ॐ औ हो क्लौं अर्हते नमः।" ए मंत्रे सातवार केसर मंत्री तिलक कर. ग्रीवासूत्र मीढळ आदि बंधन मंत्र:-" ॐ ही अवतर अवतर सोमे सोमे कुरु कुरु चल्गु चल्गु निवल्गु निवल्गु सुमणे सोमणसे महु महुरे ॐ कवली का क्षः स्वाहा ।" ए मंत्रे सातवार मंत्री सर्व स्नात्रियाओने हाथे मीढळ मरडाशिंगी सहित नाडु बांधे. तथा कुंभने मांढळ ऋद्धि वृद्धि प्रमुख पण आ ज मंत्र मंत्रीने बांधे. भूमि शुद्धि मंत्र:-"ॐ ही अहं भूर्भुवः स्वधाय स्वाहा।" ए मंत्र सातबार बोली फूल वास मंत्री स्नात्र- भूमि उपर जळ, पुष्प, वासर्नु आच्छोटन करी भूमि शुद्ध करे. अभिषेक जळ शुद्धि मंत्र:- "क्षीरोदधे स्वयंभूश्च, सरःपद्ममहारुद । सीते सीतादके कुण्ड, जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥१॥ गंगे च यमुने चैव, गोदावरि सरस्वति । कावेरि नर्मदे सिन्धो, जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥२॥" 'ॐ ही अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावय स्रावय स्वाहा ।" ए मंत्रयी सातबार जळ ॥३४॥ ---

जिनपिन-
प्रवेशनिधि
मा.बीजो
॥३५॥
-
नर
मनी कळश धोइ धूपीने मरवा
पछी “ॐ ही श्री परमात्मने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्रीमते जिनेन्द्राय
जलं यजामहे स्वाहा।
आ मन्त्रथी जळ, चदन, पुष्प, दीप, धूप, अक्षत, नैरेव अने फळ, ए अष्टमकारी पूजा उपर कहेला मने करवी. [जे
उखते जेद्र पयो पूना करनी होय ते रयते 'जर' ना स्थाने ते द्रव्यनु नाम बोल] आ प्रमाणे दस दिवस सुधी स्नात्र
भने अष्टमझारी पूजा शुद्ध रीते करे. दशे दिवसमा कोइ साये क्रोध करतो नही, काबु नहीं, अपशब्द पोलमा नही, पारणे
आवेला भिक्षुक के याचकने खाली हाये पाछा कावा नहीं, तेमने ययाशक्ति दान आपीने प्रमन्न करना
चैत्यप्रतिष्ठाविधि
मुहूर्तने आगले दिवसे लापसी १, चणा २, करंगो ३ अने पाणी ४ ए चार वस्तु पवित्रपणे करी, चार कोरा
शुरापळामा भरी वासनिक्षेप करो, पारने धूपी, सध्या समये घरने तथा देराने आगले पडाले क्रियाकारक पुरुप दरेक पान
हायमा लइ नीचेनी गाथा वणवार भणी अगासे मूके.
ॐ भवणवचाणमतर-जोइसवासी विमाणवासो य ।
जे केवि दुहृदेवा, ते सव्ये उवसमतु मम स्वाहा ॥
ए गाथा भणी चार पान मूकवा पान आगळ धूप करी नीचे उतरां, पछो जेने घरे स्थापनीय रिंग होय त्यां रात्रि
-
॥३५॥

म. क. मा.बीजो ॥३६॥ जागरण कर. वळी ते ज रात्रे एक प्रहर गया पछी 'उक्सग्गहरे नी एक नवकारवाळी देवगृहना मध्य भागमा उभा म्ही तथा 'संतिकरं लोगस्स' अने मूलनायकना नामनी एकेक नवकारवाली वेसीने अगरना धूप पूर्वक गणवी. जिननिम्ब- पछी पूर्ण मध्यरात्रि समये निधूम अंगाराथी एक पात्र भरी अगासे मूकी तेमां दशांग धूप करे. अने वे घडी पर्यंत प्रवेशविधि * सर्व क्षेत्रदेवता मुजने सानुकूळ होजो ” एम कही घरमा आव मुहूर्त्तना त्रण अथवा १ दिवस बाकी रहे त्यारे विशेपे धूप करवो अने रात्रिजागरण करवु अने प्रतिमा सार्या पहेला त्रण अगर एक दिवस रहे त्यारे एक पहोर रात्रि जतां देराना रंगमंडपमा नैवेद्य मूल्यु. प्रभु बेठा पछी पण व्रण अगर १ दिवस सुधी नैवेद्यनां सोळ+ सरावला कोरां माटीनां मूकवा. नैवेद्यनी वधी वस्तुओ जुदा जुदा पात्रमा मूकवी. एक पात्रमा चोवऱ्या पाणी आभुपो दइने मूक. धूप उखेवयो. "ॐ ग्रहाश्चन्द्र १ सूर्य २ अंगारक ४ बुध ४ वृहस्पति ५ शुक्र ६ शनैश्चर ७ राहु ८ केतु ९ सहिताः सलोकपालाः सोमघमवरुणकुवेरचासवादित्यस्कन्दविनायकोपेना ये चान्येऽपि ग्रामनगरक्षेत्रदेवताद-150 यस्ते सर्वे प्रीयन्तां प्रीयन्ताम् स्वाहा । आ मंत्र भणी, +सोळपावनां नाम-लापसी, दही, भात, करंयो, चोठाना पुडला, खीर, अउदनां वटा, गोळाना याकळा, चणाना बाकला, मगना बाकळा, कंकु, हळदर, सोपारीना ककडा, पान, पाणी, फुलनो हार आ प्रमाणे सोळ पार भरखा. दरेक पान उपर गार होसवाला कणीना ॥३६॥ नाना दीवडा वासनी सळी उपर मूकवा. तेमां चार खूणे एकेक दीनेट मूकी, घी पूरी, दीपा प्रगावना. पछी---- ६

म क.
मा. नीनो
जिनवि-
प्रवेश विधि
॥३७॥
दरेक पान हापमा लइ मूकच त्यारपछी ककु हळदरतु पाणी करी सौभाग्यवती स्त्री पासे अदर अने यहार छंटावयु.
फूल चौतरफ विरोरखा, तवा पचरौँ ग्रीपासूत्रना २१ तार लइ दवगृहने वोटे, द्वारने टोटे अथवा थामले वींटवु.
रण दिवस अगाउ पा प्रमाणे पात्र मुसमानु न वने तो एक दिवस पहेला अने एक दिवस पड़ी मृावा.
आगली रात्रिए शुभ लग्ने अखड चोखा शेर पाचना नख्याणा पांच जुदा जुदा थाळमा लेवा अने तेमा पाच श्रीफळ
मूकना तथा स्थापनामा एक रूपियो मूवी. पछी शेवनने पाटले कम मूर्ति भाळेखी, ज्या जिनपीठ होय त्या चार खूणे
चार अने एक आगळ एम पांच अख्याणां स्थापीए पछी भूमिशुद्धि मत्रे पीठ उपर वास निक्षेप करे. ते उपर समूळो दर्भ,
सरसर, धरो, चारुनी माटी, पृपभगनी माटी प्रमुख मगळ द्रव्य मूकी ते उपर कूर्मनी मूर्तिनो पट्टक कूर्म मन्त्र स्थापे
कूर्म मन आ प्रमाणे :-
"ॐ कूर्माय धात्रीधरणक्षमाय शेषचक्रपतिष्ठिताय ॐक्षा क्षों या यी ला लीरारी नमः
स्याहा कृम शर्म निजपृष्ठे पासाद धारय धारय स्वाहा ॐक्षा क्षी या यों ला ली"रारी नमः स्वाहा
Panशर्म निजपृष्ठे प्रासाद रक्ष रक्ष धारय धारय स्वाहा।"
आ मंत्र सातभार मत्रित करी स्थापनीय मुद्राए कूर्म स्थापे त्यारपछी उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख चैत्यवदन
करयु पछी गाजिननाद पूर्वक मोटा स्वरे गीतगान कर पछी गुरु वर्धमान विद्यावडे यासाधिरोपण करे. नास नवो
उत्तम केसर, मुखड ने चरामनो करचो पछी चैत्यादन करे. पछी गुरु धर्मदेशना आपे, प्रासादनिर्माणनु फळ कहे.
॥३७॥

म.क.
मा. वीजो
॥३८॥
जिनबिम्ब-
प्रवेशविधि
पछी गृहस्थ सुतार, कडिया, सलाट वगेरेने सन्मान पूर्वक प्रसन्न करे. सङ्घने पहेरामणी करे. पछी लघु स्नात्र करे पछी
एक कोरा कुंभमां पांचशेर अखण्ड चोखा, श्रीफळ रूपियो मूकी, वाजिंत्र गाजते वाजते, गंधर्वने दान देते ए कुंभ ज्यां
मूळ गभारो होय त्यां लावी पधरावे. पछी जे स्थाने देव बेसाडवा होय त्यां विशेष धूप करे. संतिकरं स्तवन अणे.
पछी प्रासादने चारे खुणे उभा रहीने दरेक खूणे पूरु तिजयपहुत्तः स्तोत्र भणे. कंकु मन्त्री सर्वत्र छांटे.
जिनविंचने लेवा जता पहेलां जो समय होय तो प्रतिष्ठाना मुहूर्त्तने दिवसे अने ते दिवसे समय न होय तो आगले
दिवसे नवग्रह, दश दिकपाळ, अष्ट मंगलनुं विस्तारथी पूजन करवं. पछी जिनविंवने प्रवेश कराववो.
जिनबिंब प्रवेश विधि
मुहूर्त्तने दिवसे प्रभाते जे चतुर्विध संघने आगले दिवसे नोतर्यो होय ते पोताना घरे एकठो थाय. पछी उत्तम ब्रह्म-
चारी पुरुप मंत्रपूर्वक स्नान करे. नवां उत्तम वस्त्र अने अलंकार पहेरे. पछी श्रीजिनचैत्यमांथो अंग-अवयवे परिपूर्ण पंच-
तीर्थी प्रतिमा आणी एक शुद्ध थालमां केसर चंदननो साथियो करी, उपर सवाशेर अखंड अक्षतनो साथियो करी,
माहे सात सोपारी मूके. पछी तेमां पंचतीर्थी प्रतिमाने पधरावी. ते थाळ हाथमा लइ उत्तम ब्रह्मचारी पुरुष उभो रहे. पछी
एक बीजो थाल लइ तेमां तेर शेर अख्याणु, शाळी तथा चोखा लइ तेमा रूपानाणु मूको भक्त पुरुष जिनविम्न आगल
उभो रहे. पछी चार हांसनो चार वाटनो घीथी भरेलो माणीक्य दीप लइ तेमा रूपानाणुं मूकी ते प्रगटाची एक बीजा
थाळमां मूके. अने ते थाळ लइने जिनविंचनी पासे जमणे पउखे उभो रहे. पछी एक चोथा थाळमां अखंड अक्षतथी
SASTERESTERE
॥३८॥

जिननिम्ब-
प्रवेशविधि
मा पीजो
॥३९॥
NROENERARANSINE
अष्टमगल आळेसी, चामपुष्पे पूजी, श्री जिनविच आगळ भक्त पुरुष उभो रहे त्यारपछी एक पाचमा थाळमा वे अग
लुछणा रड, ते उपर केसरनो नद्यावर्त करी, ते थाळ लइने एक भव्य पुरुष जिनपिंग आगळ उभो रहे
पछी सचिन नाना पडावे लइ तेमा एक पाली अखड चोखा अने सात सोपारी मूकी, ते उपर नीलो अथवा पीळो
तास्तो अथवा पसुवी वस्त्र आच्छादन करी, ग्रीवास्न वाधी, पुष्पमाळा पहेरावी, उपर श्रीफळ एक मूफी सौभाग्यवती,
उभय पक्ष पूरी, पुनवती, शोळ शृगारे शोभित ये स्त्रीओना माये ए चे नाना कुभ स्थापन करता ते स्त्रीओ जिनपिंगनी
ये बाजुए उभी रहे त्यारपछी सघने ताबूल आपे श्रीफळ, मीठाइना पडा प्रमुखनी यथाशक्ति प्रभावना करे. आगळ
चतुर्विध सघ, पाच शन्द नगारा नोरत वाजते गाजते, अनेक खेल प्रमुख नाचते, गज अश्वने शणगारी, सावेला आगळ
चालते, याचा विरुदायली पोलते, पाछळ सौभाग्यवती स्त्रीओनां वृद अनेक धालमगळ गीत गाता, अनेक ऋद्धिना
विस्तार सहित, याचक जनने अबारित दान देतां घरधी नीळे, मार्गे अपशब्द, क्रूर दुर्भापित वचन काढनु नही
गिनगासननी उन्नति वधारवी ज्या स्थापनीय वित्र होय त्या-ते धरना द्वार-तोरणे आवे त्यारे घरनो धणी सौभाग्यवती
खी पासे श्रीफळ अख्याणु ढोपरावे. सोनु, रूप, पुष्प, मुक्ताफळ अने अक्षतथी वधावे रूपानाणु जिनविग्ने लूछणु करी
याचकने आपे. निनपिने नमस्कार करी सघ सहित घरमा आवे नपीन निंब पासे जिनघरना विंचने स्थापे अने तना
घरना द्वारे ककुना थापा दे नवीन नि आगळ पाचशेर अक्षतनो साथियो करी ते उपर सोपारी तथा रूपियो मूके पछी
साळसघ प्रण समाममण दइ प्रभुने गद पछी त्या लघु स्नाा भणारे पछी घरनो मालिक तेना परिवारने पहेरामणी
श्री परतरगन्द्रीय
मान मन्दिर, जयपुर
॥३९॥

प्र.क. जिनविम्बः प्रवेशविधि मा. बीजो ॥४०॥ करे. बदलामा ते गृहस्थ पण घरघणीने पहेरामणी करे, विशेष यथाशक्ति पहेरामणी करी माहोमांहे रंगरोळो करे. पछी सकळ संघने तांबूल दई पूर्वे थापेला मंगळकुंभने, हार कापडे परिपूजित स्वर्णपतरे मढेला श्रीफळ युक्त करे. सौभाग्यवती ते कुंभने मस्तके लइने आगळ थाय, पछी घरधणी चंद्रस्वर बहेते, श्वाम स्थिर करी प्रतिमाजीने उपाडे, प्रतिमा लेनार पण श्वास स्थिर करी के हाथे थाळ धरी उभो रहे. तेमां प्रभु पधगये. जे प्रतिमा लईने आव्या हता ते प्रनिगाने जोडे राखे. पछी घरधणी मनोरथ सिद्ध फल थजो. आ प्रमाणे आशीष दे. प्रतिग्राहक ॐ हूँ। श्री जिरावलापार्श्वनाथाय नमः । आ प्रमाणे सात वार कहे. पछी प्रतिमानानक सात नवकार गणे. जो चंद्रावर बहेतो होय तो पहेला चार पगली डासा पगनां भरे अने जो सूर्यस्वर बहेतो होय तो पहेलां पांच पगला जमणा पगनां भरे. पछी अष्टमंगलिकना शालवाला, तेनी आगळ घंटने धरनार, तेनी आगळ झालरने धरनार, तेनी आगळ जठने धारण करनार, तेनी आगळ पुष्प चगेरी धरनार, तेनी आगळ कोरां बलिपान घरनार, तेनी आगळ वन धारण करनार अने तेनी आगळ पांचशब्द पाजित निशान प्रमुख सर्व ऋद्धि विस्तार सहित चाले. पाछळ सौभाग्यवती शी अनेक धवळमंगळ गीत गाती बल्लाग सहित चाले. मार्ग--" ॐ गुण्याई पुण्याहं प्रीयन्तां प्रीयन्नां" ए शब्द उच्चरतां कोरा बलियाका उछालना जाय. दश दिपालने बोलावना जाय ते आ प्रमाणे:- ॐ इन्द्राग १, अग्नये २, यमाय ३, नैननाय ४, वरुणाय ५, वागन्याय ६, वेशाय ८ ईशानाय ८, ब्रहाणे ९, नागाय १० समस्तक्षेत्रदेवीदेवाय सायुधाय सपरिकराव श्रीजिनपिंयप्रवेशमहोत्सयविधी ४०॥

जिनवि- प्रवेशविधि मा. वीजो ॥४१॥ मिच्छामि दुपट आगच्छ आगच्छ स्वाहा । आ प्रमाणे वोरता कोरा पनि उछामा पाणीना छांदा देश बच्चे बच्चे जिनसिंच उपर लूछणु करी याचरने आप एम महामहोत्सव क घर नजीक आवे त्यारे चे अथवा चार सधवा स्त्रीओ अथवा कुमारिकामो पूर्ण कळा भी सामे आवे त्यापकी प्रधान पुरुष आगो ककुना छाटा नारखी सतोरण द्वार कर पछी घरनो वणी श्रीफळ तथा अखियाणानो याळ भरी प्रतिमा मन्मुख आवी अखियाणु आगळ धरी प्रतिमाने नमस्कार करे. पछी अरिधि आशावना पद होय तेमाटे "दयाको रहेला बलि बाळा उछाळे पछी घरधणी कहे "स्वामी, पधारो" एम कही आभुपो दे एटले प्रतिमाने धारणकरनार तोरण नजीक आवे, त्यारे सधमा खो घाटडी (बुंदडी) अने मोडियो ओही हर्प पूर्वक पुखणानो सामान२ लइ जिनपिने पुसे. पुखवा देवद्रव्यनी जे वृद्धि करे तेनी पासे पुखाये ३ पछी प्रतिमाधरना पगनीचे सपुट चपापी घरमध्ये आरे मुहूर्वने वार होय तो वाजोठे वेसाडे स्यार पछी उत्तम स्वीए पवित्रपणे तैयार करेल क्षीर, लापसी, गळया मोळा पुडला, वडा, कूर, करयो, चाकुळा (चणा, मग, चोळा, अडद, उ, जवार अने जब ए साते धान्य १ फोरा बाल आ प्रमाणे घउ १, चणा २, जुवार ३, मग ४, चोळा ५, जव ६, अइद, अने सरसर ७, द्राक्ष बदाम प्रमुख मेवो टोपराना नाना काडा २ पुग्वणानो सामान -बाजोठ, सरिया, इटीपांडी, वरवडा, धूसरु, मुशळ, त्राक, स्वेयो, ककुनी वाटको ए सर्व नवा करेला जोइए. नर्वा न कर्या होय तो नकरो मूकमो जोइए ३ पुस्खनार स्त्रियो निर्दोष जोइये, पुस्खणानां गीत माटे जुमओ प्रतिष्ठा मा १लो HTS RESERTRESENTER ॥४१॥ PA

म.क.
भा. वीजो
॥४२॥
सर्व मळी शेर एकवीसना बाकला बनावया ) एक मोटी कथरोटने आखलिया उपर थापी तेमां नैवेद्य, बलि वाकळा ए
सर्व एकटुं करी गायतुं घृत शेर सवा फरतुं रेडी, उपर बुरु-खांउ सवाशेर भभरावी, ते उपर श्वेत अने रक्त कणेर तथा जिनविम्ब-
पंचवर्णी फूल मूफी, चासमुष्टि भरी भूतबलिमंत्र त्रणवार भणी वासमुष्टि निक्षेप करीए. एम वणवार वास निक्षेप करीए.
प्रवेशविधि
भूतालिमंत्र आ प्रमाणे बोलबो:-
ॐ नमो अरिहंताणं । ॐ नमो सिद्धाण। ॐ नमो आयरियाणं । ॐ नमोउवझायाणं । ॐ नमो लोए
सव्वसाहणं । ॐ नमो आगासगामीणं । ॐ नमो चारणाइलद्धीणं । जे इमे किन्नरकिंपुरिसमहोरगग-
फलसिद्धगंधब्वजक्खरखसपिसायभूयपेयसाइणि डाइणिपभिइणो जिणघरनिवासिणो नियनियनिल-
यट्ठिया पवियारिणो सन्निहिया अमन्निहिया य ते सच्चे इमं बिलेवणधूबपुष्फफलपईवसणाई वलिं*
पडिच्छता तुढिकरा भवंतु सिवंकरा भवंतु संनिकरा भवंतु सुत्थं जणं कुणतु सब्बजिणाण सन्निहाण-*
प्पभावओ पसन्नभावत्तणेण सचत्य रक्खं कुणंतु सव्वत्य दुरियाणि नासंतु सव्वासिवमुवसमंतु
संतितुढिपुट्ठिसिवमुत्ययकारिणो भवतु । स्वाहा ।
पछी ते बलियाकुळा अइया बीजा भाजनमा गखी, आयलिया उपर मूकी एकांते पवित्र स्थानके मूकीए. बाकोनो
अडधो बलि लइ परना तथा चैत्यना आगले भागे जिनपीठथी उंचे स्थानके, डाम प्रमुख लांछने रहित शुद्र होय ते स्ना-
त्रियामांनो एक शिखाबंध श्रावक मुक्त केश करो वलिनाकुलानी पोश भरे, वीनो केसरनु कनोलं, बीजो फूल चंगेरी,
॥४२॥

प्र.क. जिनविम्ब- भवेशविधि मा. वीगो ॥४३॥ चोयो प्रारीसो, पाचमो थाळी वेलण, छटो धूप, सातमो दीप, आठमो अक्षत फळादि, नवमो चामर, दसमो घट, अगि- यारमो पाणी या लइ पूर्व सन्मुख उभा रहे, बलियाकुळावाळो श्रावक (दशदिपाळनु आह्वान पान २८ जुओ) वीजा वधा ते प्रमाणे गोले पछी बलि उछाळे (विध्यतरे कोइ प्रयरामी पछी दिपाळने पलि दे छे.) पछी मुहूर्त वेळाए पतिमा लइ रगमडपमा आगीने उभा रहे त्या लागे चदनना छांटा दे १पछी जे पीठ स्थाने प्रभु स्थापवाना ते स्थानके फरता चक्रनी माटी, ऋषभशृगनी माटो, गनदतनी माटी, समूळो दर्भ, श्वेत सरसम, दूर्वा, जव, असंड तडुल अथवा नीहि, ए आठ वाना मूके बच्चे चोखुणो रूपिणे मूके तेनी उपर सेनननो पाटलो के. पछी यक्षकर्दम सोना- रूपाना कचोळामा राखी सेवनना पाटला उपर दक्षिणावर्ते सस्तिक स्फार आकारे करे ते साथियाने चारे पाखडीए एक श्वासे कर्ममा खे कूर्ममत्र:-"ॐ कूर्म निजपृष्ठे जिनयिन धारय धारय स्वाहा ।" पछी गुरु दिगमधमने दिशि- वध करे. दिग्पधमन. "ॐ ही वी सर्वोपद्रवाद् बिंव रक्ष रक्ष स्वाहा । " पनी केसर कपूरादि मिश्रित पासक्षेप करे, पछी मुहूर्त वेळाए सरोदय साधी शुद्ध वेळाए "ॐ ही श्री जिरावलापार्श्वनाथाय नमः" एम सात वार कही सात नवकार कहो, ॐ पुण्याह पुण्याह प्रोयन्ता प्रोयन्ता । एवो शब्द उच्चरी पछी ॐ कूर्म निजपृष्ठे जिनयिंव धारय धारय स्वाहा । एम कही श्वास स्थिर करी श्री जिनवित्र स्थापन करे. त्यारपडी प्रभुने जमणे पडखे मंगळ १ यने मूकेला एफडानी बचलो विधि जिनविप्रशविधिनो शरुपातमा करीने पण प्रवेश करावी शफाय छे, ॐ यक्षकदम बनानवानी वस्तुओ-सुम्वड, केशर, उस्तूरी, वरास, अर, हिंगलोक, रताजलि, अगर, मरचककोल अने सुवर्णरज ॥४३॥ MOTHER

म.क.
भा. बीजो
॥४४॥
जिनविश्व-
प्रवेशविधि
REDY RETREETIREMENT
कुंभ थापे. पछी १०८ तांतणानी दीवेट करी, दीपपात्र संपूण गायना धी वडे भरो, तेमां चार खुणावाळु रूपाना| मूकी
पूर्व करेला माणिक्य दीप बडे दीवो प्रगटावे. ते दीप जिनविंच आगळ मूके. ते दीवो २४ प्रहर सुधी अड राखवो
जोइए. पछी सचित्र घडा विच आगळ मृके. प्रतिमा आगळ एक लाख अखंड चोखानो साथियो करे. पछी खमासमण
दइ प्रणाम करे. देरासरना वनावनार कडिया, सुतार. सलाट प्रमुखने रीझ दइ प्रसन्न करे.
पछी मुहपत्ति लइने आठ थोयवडे देव वांदे [ विध्यंतरे संघसहित गुरु वांदे ] पछी आचार्य, उपाध्याय तथा सुविहित
गीतार्थ गुरु प्रदत्त वर्धमान विद्याए सघळी करणी करी प्रतिमाना मस्तके वास निक्षेप करे. अने जो ते गुरुनो जोग न
मळे तो त्रण नवकार भणी ब्रह्मचारी श्रावक वास निक्षेप करे. पछी पांच शेर सुखडी प्रभु आगळ मूके. पजी गुरु उभा
थई संतिकरं० तथा वृहत्शांति० कहे. पछी ॐ विवस्थापकाय गृहाधिपतये सौख्यं कुरु कुरु स्वाहा । आ
मंत्रे मन्त्रीने कंकुना छांटा नाखे. पछी संघसहित गुरु बेसे.
पछी १०८ कूबानां पाणी मुहूर्त पहेलो शुभ दिवसे जळयात्रा विधिए, यथाशक्ति करी, लान्यां होय ते पाणी गंगा.
जल युक्त करी, पंचामृत भेळवी स्नात्र भणावे. विधि प्रमाणे आरति मंगल दीयो उतारे. पछी नैवेद्य मूके. तेमां पांच
जातनी सुखडी, लापसी, सोपारी १०८, श्रीफल ९, अनेक जातना उत्तम फळ २४, सर्व जातना मेवा २४ ए संख्याए
मूके. सिद्धचक्रनी पूजा करे. गुरुनी नवांग पूजा करे. यथाशक्ति समस्त संघने पहेरामणी करे. नहींतर दश दिक्पाल आदि
कनी आह्वानादि क्रिया करनारने पहेरामणी करे. अथवा जघन्यथी चारने तो बस्त्र पंचांग पसाय आभरण मुद्रिका प्रमुख आपी
TA
॥४४॥

मा. पीजो
जिननिम्ब-
प्रवेशविधि
भक्ति नणारे पछी गुम उन्च स्वर अजितशाति० स्तपन भणे पछी घणा धारक स्नान करी जिन पूजे प्रभुमुग्व जोइ
THEME- यथाशक्ति द्रय भेट करे. त्या निधि साचता घणो वेळा धड़ जाय ते कारणे मुहर्त वळाए प्रभु थाप्या पछी अनतर म्हों
जोपणा करे पछी गुरु, संघसहित प्रण खमासमण दई इरियारही० पडिक्कमे चार थोप देव वादे थोय जे मूळनायक
याप्या होय ते प्रमुनी रहे. पछी येसी नमुत्युण जयवीयराय पर्यन्त कहे. स्तवने मोटी शाति बोले पछी गुरु उभा
घइ क्षेत्रदेवता आरापनार्थ करेमि काउस्लग अन्नत्थ० कही एक लोगस्सनो काउस्सग्ग सागरवरगभीरा
लगी करी-पारी नमोऽईत कही नीचेनी स्तुति पोले:-
यस्या क्षेत्र समाश्रित्य, साधुभिः साध्यते दिया। सा क्षेत्रदेवता नित्य, भूयान्नः सुग्वदायिनी ॥१॥
पछी एक प्रगट नवकार कही भवणदेवयाए करेमि काउस्सग्ग अन्नत्थ० यही एक लोगस्सनो काउत्सग्ग
सागर रगभीरा लगी करी-पारी नमोऽईत कही नीचेनी स्तुति बोले:-
ज्ञानादिगुणयुताना, नित्य स्वाध्यायसयमरतानाम् । विदधातु भवनदेवी, शिव सदा सर्वसाधूनाम् ।।
पछी एक प्रगट नाकार कही खमासमण दइ क्षुद्रोपद्रवसमावणी करेमि काउस्सग्ग अन्नत्थ० कही एक
नाकारनो काउस्सग करी (विध्यतरे उपसग्गहरनो काउस्सग्ग चिंतपी) पारी नमोर्शत कही नीचेनी स्तुति बोले:--
सर्व यक्षाम्बिकाया ये, वैयावृत्यकरा जिने । क्षुद्रोपद्रवसघात, ते द्रुत द्राचयन्तु मे ॥ ३ ॥
पछी एक प्रगट नवकार कही नीचेनी गाथाओ बोले-
॥४५॥

भा. वीजो
॥४६॥
जिनविम्ब-
प्रवेशविधि
उपसर्गाः क्षयं यान्ति, छिद्यन्ते विघ्नवल्लयः । मनः प्रसन्नतामेति, पूज्यमाने जिनेश्वरे ॥ १ ॥
सर्वमंगलमांगल्यं, सर्वकल्याणकारणम् । प्रधानं सर्वधर्माणां, जैनं जयति शासनम् ॥ २॥
एम कही नवकार० उवसग्गहरं अने लोगस्स० फूल गुंथणीए सातवार कही नीचे वेसे. विस्थापन महिमानो
उपदेश दे.
पछी शेप अर्ध बलियाकुळा राखेला छे ते लइ देवता विसर्जन पूर्वोक्त रीते करे. जुओ पान २८
पछी विसर्जन मुद्राए हाथ जोडी नीचेनो श्लोक बोले:-
देवदेवार्चनार्थाय, पुराऽऽहता हि ये सुराः । ते विधायार्हतां पूजां, यान्तु सर्वे यथाऽऽगतम् ॥ २ ॥
एम कही नमस्कार करे.
पछी प्रभावना करे. संघ सहित गुरुने घेर तेडीने अन्न-वस्त्रथी पडिलाभे. स्वामिवात्सल्य करे. संघने केसरना छांटणां
करे. श्रीफळ तंबोळ दइने विसर्जन करे. दश दिवस सुधी नित्य स्नात्र भणावे. नित्य सांझ सवार प्रभातियां-गीत सधवा
स्त्रीओ गाय. तेमने तंवोळ देवा. दशे दिवस रात्रिजागरण करे. तेम हमेशां न बने तो बीजे, पांचमे, नवमे दिवसे तो
अवश्य करे. दश दिवस सुधी एकभक्त आयंविल प्रमुख तप करे. न थाय तो अन्य पासे करावे. नवमे दिवसे कुटुंबमां
सर्वने आयंबिल करावे. दिन दशमां जो शक्ति होय तो अष्टोत्तरी स्नान करावे, तो ते घणु श्रेयस्कर जाणवू. दश दिवस
सुधी नित्य १०८ नवकार अने १०८ उपसग्गहरं फूलगुंथणीए गणे. दश दिवस लगी मूळनायकनी नवकारवाळी गणे.
-
॥४६॥

दशमे दिवसे सध्या रखते असड चोखा एक पाली एटले सवा ये शेर, गुरु-खांड एक शेर, गायनु घी शेर १, ए सर्व उत्तम पानमा मेळवी, गुरुनो योग मळे तो गुरु आदिक सहित, निनगृह मडपमा उभा रहे. गुरनो योग न होय तो नझचयनो धारक दक्ष श्रावक मडपमा रही पात्रमाथी चोखा-धी-खाडनी पोश भरी समवसरणस्तर, सन्तिारं तथा श्रीसमक्स- रण स्तर मा पीजो ॥४७॥ वृहद शाति कहे। श्रीसमवसरण स्तर। युणिमो केवलिवस्थ, वरविज्जाणदधम्मकित्तिऽत्य । देविंदनयपयत्य, तित्थयरं समवसरणस्थ ॥१॥ पयदिअसमत्तभावो, केवलिभावो जिणाण जत्थ भये । सोहं ति सव्यओतहि, महिमाजोयणमनिलकुमरा। वरिसति मेहकुमरा, सुरहिजल उउसुरा कुसुमपसरं । विरयति वणा मणिकणग रयणचित्तमहिअलं तो। अभितर मज्झ पहि, तिचप्पमणिरयणकणयकविसीसारयणज्जुणाप्पमया, वेमाणिअजोइभवणकया। वहम्मि दुतीसगुल, तित्तीसधणुपिल पणसयधणुचा। उधणुसय इगकोस-तरा य रयणमयचउद्दारा। चउरसे इगणुसय, पिहु वप्पा सड्ढकोसअतरिआ। पढमविआ यिअतइमा, कोसंतर पुन्वमिव सेसं सोचाण सहसदसकर-पिटुच्च गंतु भुवो पढमवप्पो। तो पन्ना धणु पयरो, तओ असोवाण पण सहसा ॥७॥ पी परतरगच्छीय TIन मदिर जयपुर ४७ जिनविम्ब- प्रवेश विधि म.क. तो विय वप्पो पन्ना-धणु पयर सोवाण सहस पण तत्तो। तइओ वप्पो छस्सय-धणु इगकोसेहिं तो पीढं। चउदार तिसोवाणं, मज्झे मणिपीढयं जिणतणुच्चं । दोधणुसय पिहुदीहं, सइदुकोसेहिं धरणिअला॥ भा. बीजो जिणतणुवारगुणुच्चो, समहिअजोअणपिह असोगतरू । तयहो य देवछन्दो, चउसीहासण सपयपीटा। ॥४८॥ तदुवरि चउ छत्ततिआ, पडिरूवतिगं तहह चमरधरा। पुरओ कणयकुसेसय-ठिअ फालिअ धम्मचक्कचउ । झयछत्तमयरमङ्गल-पंचालीदामवेइबरकलसे । पइदारं मणितोरण-तिअ धूवघडी कुणंति वणा ॥१२॥ जोयणसहस्त दंडा, चउज्झया धम्ममाणगयसीहा । ककुभाइजुया सव्वं, माणमिणं जिणनिअकरेण । पविसि पुवाइ पडू, पयाहिणं पुयआसणनिविट्ठो। पयपोहठवियपाओ, पणमिअनित्थो कहइ धम्म । मुणि वेमाणिणि समणो, सभवणजोडवणदेवि देवतिअं। कप्पसुरनरिस्थितिअं, ठंति ग्गेयाइ विदिसासु ॥ १५ ॥ चउदेवि समणी उद्वडिआ, निचिट्ठा नरनरित्थिसुरसमणा । इय पण सग परिस सुणन्ति, देसणं पढमयप्पंतो॥ इय आवस्सयवित्ती, बुत्तं चुन्नीइ पुण मुणि निविट्ठा । वेमाणिणि समणी दो, उहा सेसा ठिा उ नव । बीअन्तो तिरि ईसाणि, देवछन्दो अजाण तइअन्तो। तह चउरंसे दु दु वावी, कोणओ वदि इकिका । पोअसिअरत्तसामा, सुरचणजोइभवणारयणवप्पे । घणुदंडपासगयहत्य, सोमजमवरुणधणयक्खो। ॥४८॥ -- प्रक तड निनविन प्रवेश निधि मा, वीतो १॥४९॥ जपवित्रगाजिअअपरा-जिअ तिमिभअरणपोअनीलाभा । योग देवीजुभला, अभयकुसपासमगरकरा॥ सुरा तुमन, मगि कपाल जदमउडधारी । पुवाइदारवाला, तुबम्देवो अ पडिहारो॥ सामन्नसमोसरणे, एम पिहो एइ जइ मरिहिढसुरो। सव्वमिण एगोऽवि हु, स कुणइ भयणेयरसुरेसु॥ पुरमजाय जत्थ उ, जत्येइ सुरो महि हिमघवाई । तत्थोसरण नियमा, सयय पुण पाडिहेराई ॥ २३ ॥ दुत्विअसमयअथिअ-जणपस्थिअअस्थमत्थसुसमत्यो। दत्य युओ लहु जण, तित्ययरो कुणउ सुपयत्थ ॥ २४ ॥ ए णनो पाठ कहो मडर गध्ये वृष्टि करे जा प्रमाणे रण पार गोलवापूर्वक वृष्टि करवी. पछी हाथ जोडी आ प्रमाणे फह'- या पाति शासन जैन, मन्य' प्रत्यहनाशिनो । साऽभिप्रेतसमृद्धपर्थ, भूयारासनदेवता ॥१॥ आदचान व जानामि, न जानामि विसर्जनम् । पूजाचा नैव जानामि, त्व गतिः परमेश्वरि ।। २॥ आजाहीन प्रियाहीन, मन्त्री च यत् कृतम् । तत् म कृपया टैवि, क्षमस्व परमेश्वरि ॥ ३ ॥ राम नही दीप मधे घी पूरी पाछे पग नवकार बोलता बोलता बहार आये जिनगृहद्वार ध करे. नालु साचवे ते द्वार प्रमात लगे उघाडया नहीं पछी आसी रानि रात्रिजागरण रे प्रभाते घरधणी श्रीफळ रूपियो रइ देगृह उघाडे *श्रीफळ सपियो भेट करे तदुल वृष्टि जे करी छे ते जयणापूर्वक लदने ओळगार नही तेवे ठेकाणे पग्ठये पछी घेर आपी - ॥४९॥ 7.

न्हाइ धोइ अष्टप्रकारी पूजा करे. पछी घेर आवी पाताना कुटुम्बने हर्ष-जमण दे. फरी वर्ष दिवसे ते दिवस आवे त्यारे
विशेष प्रकारे पूजा, रात्रिजागरण वगेरे करे.
प्रासाद
अभिषेक
विधि
म.क.
भा. वीजो
*TE
TRENEUTENE NEVEEREYE TEETHERE
॥५०॥
६ प्रासाद अभिषेक विधि.
प्रथम भूमिशुद्धिमंत्रधी आछोटनः-
ॐ भूरसि भूतधात्रि सर्वभूतहिते देवि भूमिशुद्धिं कुरु कुरु स्वाहा ।
हाथमा सुवर्णजळ, पुष्प लई छांटवू. ग्रहदिक्पालादि स्थापना नीचे प्रमाणे बोली करवी.
कुसुमांजलि हाथमां लइः-ॐ नमः क्षेत्रदेवाय शिवाय सा भी शूक्षौ क्षः इह प्रासादाभिषेकमहोत्सवे आगच्छ
स्वाहा...तिष्ठ २ स्वाहा...इमं पूजावलिं गृहाण २ भोग देहि २ सुख देहि २ यशो देहि २ संतति देहि २ ऋद्धि वृद्धि
बुद्धिं सर्वसमीहितं देहि २ स्वाहा ॥
त्यार पछी पुष्पांजलि लइ नीचे प्रमाणे श्लोकथी प्रासाद उपर वधावया ।
अभिनवसुगन्धिवासित-पुप्पोधभृता सुधूपगन्धाढ्या । चैत्योपरि निपतन्ती, सुखानि पुषाअलिः कुरुताम् ॥
हूँी)ी. ....प्रभोः प्रतिनिधये चैत्याय पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि स्वाहा । दरेक अभिषेके वधावया.
॥५०॥

प्र.क प्रासाद अभिषेक विधि मा. नो 紧器紧张露警器系瓷茶盛基務器学费多数要整器器發器 (१) सुपर्ण नळ-स्वर्णचूर्णयुत वारि, स्नायराले करात्वलम् । तेनोद्भुत नवे चैत्ये, भूरिभूति च धार्मिके ।। सग उमानदिव्यश्रीघृमृणातिमानिन । चत्य स्नपयताद्वारिपूर राश्चनचूर्णभृत् ॥ समर्पयामि स्वाहा। (२) पचरत्नपूर्ण:-शुचिपञ्चरत्नचूर्ण-पूर्ण पय पतच्चैत्ये । भव्यननानामाचार-पञ्चक निर्मल कुर्यात् ।। नानारत्नक्षोहाविता, पवत्वम्धुसन्ततिथैत्ये । तत्कालसङ्गलालस-माहात्म्यश्रीफटाक्षनिभा ।। ॐ हूँ। श्री समर्पयामि स्वाहा ॥ (३) मगलमृत्तिका'-चैत्येऽस्तरतु तीर्थ-मृत्तिकामिश्रित पयः । प्रारोहयन् महच्छाय पूनातिशयपादपम् ।। अर्हन्त्ये न्यस्त, स्नात्राय पवित्रमृत्तिकासलिलम् । पारोहयतु प्रीत्यै, स्फुरदतिशयशालि शालिवनम् ।। ॐ श्री समर्पयामि स्वाहा ।। (४) सदोषधि -कुन्ति जलै स्नपन, सहदेवीप्रमुसमूलिकामित्रैः । चैत्ये भवताच्छोभन-सौभाग्यस्थापनार्थमिति॥ ॐ हूँी श्री समर्पयामि स्वाहा ॥ (५) सोपपि-सर्वोषधयः स्नात्रे, नियोजिता स्वसमहिमसम्भारम् । सम्भाश्यन्तु चैत्ये, सतिशयद्विसपूर्णे ॥ सर्वोपरिनिर्मव्यै-जिनविम्ब स्नप्यते प्रतिष्ठायाम् । भाति यथास्पदमेतत्सर्रासामतिशयश्रीणाम् ॥ ॐ हूँ। श्री समर्पयामि स्वाहा ॥

प्रासाद
अभिषेक
विधि
प्र.क.
भा. बीजो
॥५२॥
音器器縣器警器聚器验器器蒸蒸發器密步器器瓷器器幾晓
(६) सुगंधचूर्णः-गन्धाङ्गस्नानिकया, स्नपिते चैत्ये विभाति लोकानाम् । सहजाङ्गपरिमलयुतो, विहरजिन एव सदसि गतः।
चैत्ये सुगन्धिगन्ध-विधीयते स्नात्रमादितोपि यथा । लुब्धय॑न्तरदेवैः, साधिष्ठायकमिदं भवतु ॥
ॐही श्री
....समर्पयामि स्वाहा ॥
(७) तीथोंदकः-तीर्थाम्भोभिश्चैत्य मङ्गल्यैः स्नाप्यते प्रतिष्ठायाम् । दुरितरहितं पवित्र, यथा विभत्ते सकलसंघम् ।।
अभिमन्त्रितैः पवित्रैस्तीर्थजलैः स्नप्यते सुचैत्यमिदम् । कुरुते यथा नराणां, सन्ततमपि मङ्गलशतानि ॥
ॐ हूँी श्री
.समर्पयामि स्वाहा ।
(८) कर्पूर:-कपूरचूर्णपरिपूर्णमुवर्णकुम्भ-चैत्यं जिनस्य मुदिताः स्नपयन्तु सन्तः ।
कर्पूरपूरधवलाम्बरमालिकां च, कण्ठे यथा लिपति निर्वृतिकन्यकेयम् ॥
कर्पूरपूरधवलं प्रसरति सलिलं यथा यथा चैत्ये । स्नात्रकृतोऽपि प्रसरनि, तथा तथा शुभयशापुञ्जम् ।।
ॐ ह्री श्री
.समर्पयामि स्वाहा।
(९) पंचामृत:--स्नात्रं विधीयमान, सुगन्धिपञ्चामृतेन नवचैत्ये । भक्तिप्रवजनानां, प्रमादपञ्च विपं हरतात् ॥
एकत्र मिलितैस्तैः पञ्चभिरमृतैः सुगन्धिभिः स्नपनम् । क्रियमाण नवचैत्ये, हरगाद्विपपञ्चकं नृणाम् ॥
ॐ श्री.
समर्पयामि स्वाहा।
पछी रांधेलु तथा कोरु नैवेद्य थाळमां लई नीचेनो लोक बोली पधराव.
॥५२॥

भा. वीनो
॥५३॥
मडप-स्था
पनविधि
*ER
-
सर्वप्राणाम साधारण सजीवनम् । अजीवजीवदानाय भावन्न महार्चने ॥
त्यार पछी भारती नीनो रोक बोली उतारवी-
दुष्टमुरासुररचित, कृतदृष्टिदोषज विमम् । तद् गच्छत्यत्तिदूर भविककृतारानिरनिधान ।
त्यार पछी धूप सो
ऊर्घगतिदर्शनाल्लोक-दर्शितान वरोर्धगतिदानः । धूपो बनस्पतिरसामीणयतु समस्तसुररन्दम् ॥
आठ थोयना देवदन आवाहन करेलानु विसर्जन ॐ आज्ञाहीन
" इति मासादाभिषेकविधि ।"
७ श्री मंडप-पीठस्थापन विधि
स्नातकारकने चद्रपळयुक्त पचागशुद्धदिवमे-लमयुक्त जे दिवस ठराव्यो होय तेनाथी ७-५-३ के १ दिवस पहेला
स्नात्र भणामाना स्थाने उपरोक्त मापधी १००-१०० डगला दरेक दिशाए शुद्धि जोगा पूर्वक पीठिका बनानची.
पोठिकानु माप
पूर्वने
खोळे अने पश्चिम सन्मुख
लवाई पहोळाइ गज आंगळ
(ममचोरस)
१३
-
१
॥५३॥

मंडप-स्था " (जमणु नक्षत्र) १ पनविधि १ १ " उत्तर पूर्व ग. दक्षिणने पश्चिमने २ Pagraat प्र.क. سع 1. बीजो ग. आ आ. उत्तरने दक्षिण लंबाइ १-१५ १पहोलाइ १३ दरेक दिशामां उंचाई गज १ अने आंगळ १ नी करवी एटले ध्वज आय आपवी. पछी एक न्हाना संपुटमा-सोपारी, चोखा, तांबाना', रूपानाणुं पंचरत्ननी पोटली अने पंचवस्तुयुक्त संपुट करी ॐ कूम निजपृष्ठे जिनबिम्बं धारय धारय स्वाहा” ए मंत्रथी ७ वार मंत्री संपुट बीडी उपर शुद्ध मृत्तिका पुरी सम करवी. पीठिकानुं माप काढवानी रीतः- लंबाइ पहोलाइनो गुणाकार करी आठे गुणो सत्तावीशे भाग देतां जे शेष रहे ते सन्मुख नक्षत्र देव गगर्नु मळवू ॥५४॥ ४ 器樂器器器蹤器弟戀器端端张继张懿跪器端器器器器家 ॥५४॥ जोइए.

पटश महप-स्था पनविधि मा पीतो पीदिशा 28 पीठिकानो आकार-पीठिका उपर परनाळीया बानोटने स्वमने मत्री मद्धि वृद्धि मदनफळ पुक्त ग्रीपासून पापो स्थापना श्रीरेधी पत्री मृत्तिका उपर गहुली नीचैना मनयी ७ पगार मनी करवी. मना- "ॐ नमो भगति विश्वव्यापिनि हूँ। सिंहासने सस्तिक पूरयामीति स्वाहा ।" पीठिकानी चारे पाजु चोखानो चोक पुरायो. तेना उपर कापूनित १ श्रीफळ मूस्यु पछी सुखड, केसर अने कुकुम ए प्रण रेसार्नु चोग्म मडळ आलेखा पछी नीवेना माथी पीठस्थापन कर मत्र. "ॐ भूमि भूतधानि रिच धारय धारय सर्वभूतहिते भूमिशुद्धिं कुरु विश्वाधारे नमः स्वाहा ।" ए मत्र सात उसत बोली वास फुल मत्री मडलभूमि तथा पीठिका पूनी धूप करतो, मडळ उपर पहेलेपी चदरखो बांधयो वे घना वनावी पछी मुहतदिने मडप म पेत्रण टक धूप-दीप सहित शुद्ध रीते सात स्मरण गणा मडपमध्ये- SENTINENTERTAINRITER

मंडप-स्था
पनविधि
म.क.
भा, वीजो
॥५६॥
रजस्वला स्त्री, सुतकी माणस, विलाडी वि. हिंसक प्राणीओनो संचार थवा देवो नहीं. वंने संध्याए सधवा स्त्रीओ मंगळ गान
करे ते सीओने तंबोल आपवां-रात्रिजागरण करवू-अमारी पळावी.
पछी वृद्ध स्नात्रीया श्रावक परनाळीओ बाजोठ थोई शुद्ध करी धूपी पूर्व के उत्तर दिशि पुंठे मांडे ते उपर चंदनना
चार साथीया करवा पछी-" ॐ है। श्री अर्हत्पीठाय नमः।" ए मंत्री सातबार मंत्री वासपुष्पे पीठ-पूजन करवु उत्तम
कुसुम-अक्षते पास भरी त्रण वार वधावबुं.
शुद्धिपूर्वक गोळपापडी शेर-५। (गामने अनुलक्षीने जरुरीयात प्रमाणे) पीठ आगळ घंटाकर्ण मंत्रे १०८ वार मंत्री
पीठने नैवेद्य करी वाळको वि. ने बची आपवी. घंटाकर्ण मंत्र:-
" ॐ ही घण्टाकर्ण महावीर, सर्वव्याधिविनाशक । विस्फोटकभये प्राप्ते, रक्ष रक्ष महावल ॥१॥
+घंटाकर्ण मंत्र गणवानो विधिः-घंटाकर्ण मंत्र लखेली थाळीने पंचामृतथी स्नान करी शुद्ध जलथी स्नात्र करी शुद्ध वलथी
लूछी तेनी चंदन वि. थी पूजा करवी पछी एक शुद्ध ज्ञाता बाजोठ उपर ते थालीने पधरावी पुष्प चढावी तथा अगरना धूप साथे
१०८ बार गणे.
एम १०८ वार थइ ग्या पछी ते थालीमा श्रीफल, पंचरलनी पोटली तथा रूपियो मूके अने एक कांसानी थालीमा सुखडीना
पांच ककडा मूके तेना उपर कसुनो नाडाछडीवडे बांधे, तेना उपर सोना रूपाना बरख चौटाडे, चंदन, पुष्प, वासक्षेपथी पूजा करी
फुलनी माला पहेरावी.
॥५६॥

मा पीजो ॥५७॥ मडप स्था पननिधि MERRENTSENTERNMENT यन व तिष्टसे देव, लिखितोऽक्षरपक्तिमि । रोगास्तत्र प्रणश्यन्ति, वातपित्तकफोद्भवाः ॥२॥ तत्र रानमय नाम्ति, यान्ति कर्णनपा क्षयम् । शाकिनीभूतवेताल-राक्षसाः प्रभवति न ॥३॥ नाफाले मरण तस्य, न च सर्पण दश्यते । अग्निचोरभय नास्ति, ही घण्टाकर्ण नमोऽस्तु ते ठः ठः स्वाहा ॥४॥ " इति मडपपीठस्थापनविधिः ॥" x हालमा गणातो घटाकर्णमत्र कोइपण प्रतिष्ठा रत्पमा जोवामा आरतो नयी सत्तरमी सदीमा लखायलो वृद्धस्नातनी प्रतमा पण नथी पण ओगणीशमी सदीमा डभोइमा रसायेल वृद्धम्नाननी प्रतिओमा पीठस्थपन मत्र तरीके घटाकर्ण मत्र गणवा सूचवेल है आम पहेल्थी नथी, पाछन्थी क्या कारणे दाखल ५यु तेमा कइ प्रमाण जणातु नथी अने हालमा पण घणा पू आचार्योद्वारा तथा विद्वान पडितो द्वारा एम जाणमा मन्यु छ के-घतारण कोइ सम्यग्दृष्टि देव यी तो तेनी जग्याए- क्षेत्र देवताना बग्दिान माटे माणिभद्र अगर तो क्षेत्रपालना मत्रोयी १०८ बार सुखडी मत्री पीठस्थापन कराय तो ते बहु समत गणाशे. मत्रो आ प्रमाणे- माणिभद्र मत्र-"ॐ हूँी श्री वली की क्रौ श्रीमाणिभद्रवीराय चतुर्भुजाय हस्तियाहनाय मम कामार्थसिद्धि कुरु कुरु स्वाहा ।" क्षेत्रपाल मा -"ॐ सा भी क्ष क्षौशः क्षेत्रपालाय नमः स्वाहा ।" ||५७॥

म.क. मा. बीजो अष्टोत्तरी शत स्नान विधि ॥५८॥ ८ श्री अष्टोत्तरी शत स्नात्र (बृहत् स्नात्र) विधि मुहूर्तने दिवसे प्रभाते अंग अवयवे करी पूर्ण, चक्षु प्रमुख खोड रहित, डांम प्रमुख लांछन विनाना १०८ स्नात्रिया मेळववा. तेमांथो चार अति निपुण, स्पष्ट वक्ता, अखंड शिखा (चोटली ) युक्त एवा वृद्ध श्रावके विव प्रवेशमां कह्या | प्रमाणेना मंत्रो पूर्वक स्नान वि. थी परवारी पीठ उपर नीचे आपेला मंत्रपूर्वक प्रतिमा स्थापन करवी. तेमां चार वृद्ध स्नात्रिया श्रीआदिदेव अजितनाथ शान्तिनाथ पार्श्वनाथ प्रमुखनी चार प्रतिमाने देरासरे राखी होय त्यां सामान्ये पूजी एक एक प्रतिमा थाळमां लइ ज्यां पीठस्थानक छे त्यां ॐ नमो अर्हत्परमेश्वराय चतुर्मुखाय परमेष्ठिने दिक्कुमारीपरिपूजिताय देवाधिदेवाय त्रैलोक्यमहिताय अत्र पीठे तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा । ए मंत्र त्रण बार भणी एक एक प्रतिमा अनुक्रमे थापे. उपरोक्त चारमांनी प्रतिमा न मळे तो नीचेना मंत्री तेनी कल्पना करवी:- ॐ नमोऽहयः तीर्थकरेभ्यो जिनेभ्यो अनायनन्तेभ्यः समवलेभ्यः समश्रुतेभ्यः समप्रभावेभ्यः सम- केवलेभ्यः समतत्वोपदेशकेभ्यः समपूजनेभ्यः समजल्पनेभ्यः समस्ततीर्थकरनामपञ्चदशकर्मभूमिभवस्तीर्थ- करो यो यत्राराध्यते सोऽत्र प्रतिमायां सन्निहितोऽस्तु । पछी माटीना अथवा त्रांवाना शरावला (रामपातर ) वे कोरां लेषां अने ते दीपपात्रमा सधवा स्त्री पासे गायतुं घी 1:५८||

मक.
मा.पीजो
अष्टोत्तरी
शत स्नान
विध
पूरावयु अने पहेला रावेली गेरासूत्रनी वाट (दिवेट ) तेमा मूफावधी. तेनी पासे दीगा अपाळा. पठी ते वे दीवाने
वृद्ध स्नातीया धारक-
ॐघृतमायुर्वदिकर, भवति पर जनदृष्टिसपर्कात्।तत्सयुतःप्रदीप., पातु सदाभावदुःखेभ्यः ॥१॥ स्वाहा।
आ भत्र दरेक वसते प्रणयार भणीने स्थापना करे. पडी ते वे दीप एक सधया स्त्री पासे, एक जिनपिना जमणे
पडखे अने एक डाये पडसे दीवी पा कापीए. पछी केसर छटापी दीपपूजन करीए
पछी वृद्ध पाक अन्य स्मानिया ने करुणादिक राधे. देवद्व्यनी वृद्धि करावे. धी भरेली बाही हाथमा आपे ते
मेधारक डाग तथा जमणा दोरा पासे उभा रहे. स्नाननी क्षणे क्षणे ती पूरता जाय एम जे जे उपकरण श्रावकना
हायमा आपरा ते ते पार पासे देशद्रव्यनी वृद्धि करावीने आपवा । इति घृतदीपस्थापन विधि ।
पछी युद्ध श्रापक भगतना जमणे पासे पाटला उपर वेसी, माटली धोइ पी माटली वीजा श्रावक पासे झाली रखाये.
परी तेमा वृद्ध श्रापक सुसह-केसरनो साथियो करे. ते उपर ॐ ही श्री सर्योपद्रवान् नाशय नाशय स्वाहा ।
ए मर लखे पछी सुगध जळ, पुष्प, चदनथी अधिसित स्नाणु अथना पचाननी पोटली नीचेना माथी मोला
पासवडे पूनीने मादलीमा मूफरी. मत्र--
ॐ ही नानारत्नौधयुत, सुगधिपुष्पाधिवासित नीर । पतताद्विचित्रवर्ण, मंत्रादय स्थापनाविंबे ॥१॥
स्वाहा।
॥५९॥

1
।
अष्टोत्तरी
शत स्नात्र
विधि
म.क.
भा.बीजो
॥६॥
.
PRESENTERTENSEENERATOR
पछी माटली आडणी अथवा पछेडीनी इंढोणी करीने ते उपर मूकवी. त्यारपछी ॐ हूँी ठः ठः ठः स्वाहा । ए
मंत्र सात वार भणी स्थापनीय मुद्राए गोळीने प्रतिमाजीना जमणे पडखे स्थापन करे. तथा वासफूले स्थापन मंत्र भणी पूजे.
पछी पंचामृत एकठा करी नीचेनो मंत्र बोले:--
ॐ ही जिनविंयोपरि निपतद्-घृतद्धिदुग्धादिद्रव्यपरिपूता।
गंधोदकसंमिश्रा, पंचसुधा हरतु दुरितानि ।।
आ मंत्रे त्रणवार मंत्रीने पंचामृत माटलीमां पधरावg [ तथा विध्यंतरे तांबाकुंडीमा सधवा सी पासे पंचामृत एकटुं
करावी पछी माटलीमां पधरावे ].
पछी-ॐही सवौंपधिसंयुक्त्या, सुगंधया घर्पितं सुगतिहेतोः । स्नपयामि जैनर्वियं, मंत्रिततन्नीरनिवहेन ।
ए मंत्र मंत्री, वास वडे पूजी, सर्वोपधि माटलीमा मूके. पछी १०८ तीर्थनां जळ मंत्रित करवानो मंत्र:-
ॐ ही भः (भूः) जलधिनदीद्रहकुंडेपु, यानि तीर्थोदकानि शुद्धानि ।
तैमैत्रसंस्कृतरिह, विवं स्लपयामि शुन्हयर्थम् ।। स्वाहा ।
आ मंत्रे सात वार मंत्री वृद्ध श्रावक पोते अथवा सधवा स्त्री पासे माटलीमा पूरावे. पछी समूळो डाभ, मोहळ,
मरडाशिंगो, ऋद्विद्धि साथे, गेवासूत्र बडे कंकणमंत्रे मंत्री माटलीने कोठे बांधीए. पछी ते माटली उपर पान श्रीफळ
मूकीने माटलीने दरीयाइ तास्ते ढांकीए. पछी ते माटलीने चंदननडे पूजीए, फूल माळा पहेरावीए. १०७ नवाणर्नु पाणी
॥६०॥

जे वध्यु होय ते, लघु मगळभने पूजी तेमा भरी अणवरनी पेठे पडखे स्थापीए. पछी दक्ष श्रावक सात (नकार, उन
सग्गहर, सतिकर, तिजयपहुत्त, नमिउण, अजियसति अने भक्तामर) स्मरण गणे अने बीजो श्रावक पासे वेसी अगरनो
धूप करे सात स्मरण गणना वन्चे बोल नहीं. स्थिर चित्ते गणा । इति मगल कलश स्थापन विधि ।
आ पछी नव ग्रह, दश दिक्षान, अएमगळ अने घटाकर्णना पाटलाओ, जे पूर्व पूज्या छे ते, पीठ सन्मुख लावी
मुहर्नने दिपसे प्रभाते वासफूले पूजी प्रतिमा पासे ऊचे आसने स्थापीए पछी दश दिक्पाळनु विस्तारथी आह्वान पूर्वोक्त
अष्टोत्तरी
शित स्नान
विधि
मा. बीजो
॥६॥
विधियी कर
资些话虽然紫端路路路路路路路安路等级经验张亲密
पजी वृद्ध मारक स्नात्रिया शुद्ध पुस्प सर्वे मुहपत्ति लइ हरियापही० पडिक्कमे. चैत्यवदन करी चार थोयथी देव वादे
| पछी नमुत्युण कही सामने ठेकाणे रघुशाति कहे पछी जयवीयराय० कहे. त्यारपछी एक नांगकुडी लइ पवित्र
जळे धोइ चूपी गेपासून वार्धा तेमा यक्षपदम बडे अथवा केसरवडे " ॐ ही नमः ए मर रसवो ते उपर कुकुम अने
वासफूले पूनित नारियेळ मूक पछी नापाकुडी परनाळियानी पीठ आगळ मूरची पछी स्नातीयाओने आमरण पहेरा-
यवा, आभरण न होय तो केसरना करना पछी आठ दक्ष श्रावस्ने शकलीकरण कर. ते आ प्रमाणे:-
"ॐ नमो अरिहताण हृदयाय नम " एम कही हृदयने स्पर्श करसे “ॐ नमो सिद्धाण शिरसे नमः
स्वाहा एम कही मस्तके स्पर्श करतो "ॐ नमो आयरियाण शिखायै वौषट् ।' एम कही शिखा (चोटली ने
* स्पर्श करो।"ॐ नमो उवज्झायाण कवचाय हु एम ही सौगने स्पर्श करी करव करीए. "ॐ नमो
॥३१॥

अष्टोत्तरी
शत नात्र
विधि
म.क.
भा. बीजो
।'६२॥
" एम कही अस मुद्राए अन्न धारण करीए. पछी एक दक्ष श्रावक उंचे स्वरे वन-
लोए सब्बसाहणं अस्त्राय फट्
पंजर स्तोत्र कहे अने बीना सांभके.
अथ वनपक्षरस्तोत्रम्
"ॐ परमेष्ठिनमस्कारं, सारं नवपदात्मकम् । आत्मरक्षाकरं बज-पञ्चराभं स्मराम्यहम् ॥ १ ॥
ॐ नमो अरिहंताणं, शिररकं शिरसि स्थितम् । ॐ नमो भव्य सिद्धाण, मुखे मुखपटं बरम् ॥२॥
ॐ नमो आयरियाणं, अगरक्षातिशायिनी । ॐ नमो उबज्शायाणं, आयुधं हस्तयो<ढम् ॥३॥
ॐ नमो लोए सब्बसाहणं, मोचके पादयोः शुभे। एसो पंच नजुझारो, शिला पत्रमयी तले ॥४॥
सव्वपावप्पणासणो, वो वज्रमयो बहिः। मङ्गलाणं च सब्वेसिं, ग्वादिराझारखातिका ॥५॥
स्वाहान्तं च पदं ज्ञेयं, पढम हवइ मङ्गलम् । वप्रोपरि वनमयं, पिधानं देहरक्षणे ॥६॥
महापभावा रक्षेयं, क्षुद्रोपद्रवनाशिनी । परमेष्ठिपदोद्भूता, कथिता पूर्वपरिभि ॥७॥
यश्चैवं कुरुते रक्षा, परमेछिपदैः सदा । तस्य न स्याद् भयं व्याधि-राधिश्चापि कदाचन ॥८॥"
। इति वज्रपचारकवच ।
१ आ स्तोत्र बोलता जे जे अंगनुं नाम आवे ते ते अंगने हाताडे रपर्श करवो.
२ गरीरजा । पाठांतर,
॥६२॥

मा बोजो
'६३॥
अष्टोत्तरी
शत स्नान
विधि
आ प्रमाणे शालीकरण करी मोंढळ करण स्वमने मत्री बाधे पछी एक श्रापक केसर, पुष्प हाथमा लइ दिशिनध
करे तेमा प्रथम 'अ आ पूर्वस्यां' एम कही पूर्व स मुख केसरना छाटा नाखमा पुप्पो उडाइवा. ( आ प्रमाणे दरेक
दिशा रसते पर)" इ ई दक्षिणस्या । उ ऊ पश्चिमे । ए ऐ उत्तरे । ओ औ ऊर्चे । अ अ अधः।"
पडी ग्रीवासूत्र लइ "ॐ हूँोदवी सर्वोपद्रवाद विष रक्ष रक्ष स्वाहा।" ए मो सातवार मत्री चारे दिशाना
धाभले अथवा पीठना चार पाये वाधीए पछी दीवाने केसर तथा पुप्पपडे पूनीए, पछी अग्रेसर चार पुरुषो हाथमा चार
लघु कळश लइ धोइ धूपी चदने पूजी, ककण पाधी फूलमाळ पहेरावी, तेमा रूपामहोर मूकी, एक जण मगल माटली-
माथी पाणी रागी चार कळस भरे. नमोऽहत् कहीने नीचेनी चार गाथाओ योले:-
"ॐ वरफणयसग्वविदुम-मरगयघणसन्निहं विगयमोह ।
सत्तरीसय जिणाण, सव्वामरपूईयं वदे स्वाहा ॥१॥
ॐ त ति सतिकर, सतिपण सम्पभया । सतिं गुणामि जिण, सति विहेउ मे स्वाहा ॥२॥
ॐ रोगजलजलणविसहर-चोरारिमउदगयरणभयाइ ।
पासजिणनामसकित्तणेण पसमति, सघाइ स्वाहा ॥ ३ ॥
ॐ भवणपइवाणमतर-जोइसवासिविमाणवासि य । जे केवि दुहृदेवा, ते सव्वे उसमन्तु मम स्वाहा ॥
आ चार गाथा भणी चारे ग्राफ चारे कळशे चारे प्रतिमाने सघाते अभिषेक करे.
श्री परसरगष्ट्रीय
मान मन्दिर, जयपुर
॥६॥

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भा. पीजो
॥६५॥
अष्टोत्तरी
शत स्नात्र
विधि
路路路路路路路路路路路路路路路路路路路路器
घट वगाडे. वीजा बाजियो वगाडे. पाठ कहेता छाना रहे. पाठ पूरो चोलाइ रहे एटले अभिषेक करे. ते पछी नीजा चार
श्रावक चारे प्रतिमाने अगल उणा करे चार वृद्ध श्रावक पूजा करे. वे याजु राखेरा दीपमा बे श्रावक घी पूरे. एक
श्रारक धूप करे. वीजा चार पावक, एक मोटा बाजोठ उपर रातु वस्त्र पाथरी ते उपर अखड चोखानी ढगली करे, ते
उपर पान मूके ते उपर सोपारी तथा नापानाणु मूके बीजो शुद्ध वस्त्र पाथरी, फळ मोदक एक एक सर्व जातनु मूके.
तथा जे जातनु, सुसडी तथा मेवो वगेरे जे मेळव्यु होय तेनु एक एक नग चढावे तथा एक श्रावक दरेक अभिषेक
वखते यथाशक्ति लू छणु करी जैन याचाने आपे आ प्रमाणे दरेक स्नान वखते कर
पछी चदन चढावी चार सेवनाना फूल प्रतिमाने माथे मूके स्नात्र समये पण शिरमदेश फूले शून्य न राखतो. आ
१०८ बार दरेक अभिषेके जुदी जुदी पूना करवी
एम १०८ पूरा थया पछी जो माटलीमा पाणी वध्यु होय तो वीजा स्नाप्रिया पासे तथा १०८ नालाबाला कळशे
स्नानधणी पासे पखाळ करानीए पछी साड तथा उना पाणीवडे प्रतिमा शुद्ध करीए. पछी सक्षेपे पूजी स्नात्रकार चैत्य
वदन करे. स्तवननी जग्याए "अजियमति" कहे. (विध्यंतरे आठ थोयवडे देव वादे )
त्यारपती अभिषेकना चार अथवा आठ कळश उगटी, धोइ, धूपी शुद्ध करीए पछी तेमा सुगधो पाणी भरी उत्तम
फूल मूके केसरना डाटा नाखे अगल छणे ढाके वृद्ध श्रावक कुसुमाजलि सात भणावे. पछी आदिनाथ, अजितनाथ,
शातिनाथ अने पार्श्वनाथना चार कळश क्रमसर भणावे, अथवा वे स्नात्र भणाची सुगधी जळगी भरेला कळशथी स्नान
॥६५॥

अष्टोत्तरी
शत स्नात्र
विधि
म.क.
भा. वीजो
॥६॥
BED ENTERTREENERY
स्तोत्र कहे, पछी संघभक्ति करवी. प्रभावना करवी. याचकने वस्त्रादिक आपत्रां. नैवेद्यनी रांधनारी बाइओने पटकूलादिक
आपवां. ते वखते स्नात्रकारकना सगा-संबंधी होय ते स्त्री-भरथारने पहेराप्रणी करे. पछी गुरुसहित. संघ साथे, पीठ
आगळ आवी, हाथ जोडी, नीचे प्रमाणे बोले:-
ॐ आह्वानं नैव जानामि, न जानामि विसर्जनम् । पूजारौं नैव जानामि, त्वं गतिः परमेश्वरि ॥१॥
ॐ आज्ञाहीनं क्रियाहीनं, मंत्रहीनं च यत्कृतम् । तत्सर्व क्षमतां देवि, प्रसोद परमेश्वरि ॥२॥
सर्वमङ्गलमांगल्यं, सर्वकल्याणकारणम् । प्रधानं सर्वधर्माणां, जैनं जयति शासनम् ॥३॥
एम कही प्रणाम करे. पछी संघ सहित गुरुने घरे तेडी अशन-वसादिक बडे पडिलाभे. साधर्मी बंधुओने जमाडे.+
संवद्युगेन्दुनागेन्दु-प्रमिते माधवोज्ज्वले । पक्षे हि कविपंचम्यां, दर्भावत्यां पुरि स्थिते ॥१॥
पुण्यानुवन्धिपुण्याढ्य-पुण्यादिसिंधुसरीणाम् । राज्ये माज्ञः सुज्ञानादि-सागराणां हि शिष्यकः ॥२॥
तेनेदं मंदमतिना, समुच्चितोऽष्टोत्तरीस्नात्र विधिमार्गः । ज्ञात्वा गुरुतोऽत्र यद्यदशुद्धं शोध्यं बुद्धिवरैः ।।
॥ इति श्री अष्टोत्तरशतस्नान विधि ।।
+ [ अहीं समाचार। विशेष क्रियांतर घणां छे. ते देखीने व्यामोह न करखो. श्राविधि, प्रतिष्टाकल्प. जीर्णनात्रकल्प, सामाचारी
प्रमुख ग्रन्थोनु अवलोकन करीने आ विधि योग्य रीते लग्दो छे. कोइ अरिहंन भक्ति साध्ये मियांतर होय तो साध्य शुभ होवायी ते
सफळ छे. गणधरसामाचारीमां पण धणो फेर छे. पण साध्य एक होवाथी सर्व सकळ छे. एम सर्व धर्मकृ.गगां जाणवू बळी विशेष एटलु
के बीजपल्लव गुरुपरपराथी जाणवा. ]
॥६॥

शान्तिस्नान
विधि
भा. वीगो
॥६९॥
९ अथ श्री शान्तिस्नात्र विधि
अथ प्रतिष्ठाया वा यात्राया वा क्षुद्रोपद्रवशमनार्थमष्टाह्निकादौ शान्तिधारा कार्या ।
प्रतिष्ठाने अवसरे, तीर्थयात्राने अपसरे अथमा अट्ठाइ प्रसंगे . उपद्ररनी शांतिने माटे शातिस्नान करबु.
शुभ दिवसे विधिपूर्वक जळयाना करपी (जळयात्रानो विधि पूर्व क्या प्रमाणे करवो ) पछी मुहर्तने दिवसे प्रभाते
स्नारफारक गृहस्थ अने डाम प्रमुग्व लाउन रहित एवा स्नानिया जघन्यथी ४ सिप्रवेश रिधिमा कह्या प्रमाणेना विधि
पूर्वक स्नान पि करे अने अष्टप्रभारी पूजा करे
पछी वृद्ध श्रावक अधिपूर्वक भूमिपीठे, गृहे वा चैत्य पासे पनि जळ-सोनाराणीए [ सोनाना रख सहित पाणी ]
भूमि शुद्ध करे, तेनो मन'-ॐ ही श्री जीराउला पार्श्वनाथ रक्षा कुरु कुरु स्वाहा ।
नाकार अने आ मा फुलगुथणीए (पाराकरती) सात बार गणी मर्वत्र सोनागाणी छाट.
पछी गास चोसा अने पुप्प लइ नीचेना मरे भूमि शुद्ध करवी:-*ही श्री अहं भूर्भुवः स्वधाय स्वाहा।
पड़ी पूर्व दिशाए अथमा उत्तर दिशाए पीठ मांडीए अने ॐ ही अत्पोठाय नमः । ए मने सात पार मत्री
पीटनी पूना करीए पछी श्रीशातिनाथ भगवाननी पचतीर्थी प्रतिमा नीचेनो मर रणगर भणी स्थापयो:-
"ॐ नमोऽहत्परमेश्वराय चतुर्मुपाय परमेप्लिने दिक्कुमारीपरिपूजिताय देवाधिदेवाप त्रैलोक्यम-
॥६९॥

म.क. मा. बीजो ॥७०॥ हिताय अत्र पोठे तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा ।" श्री शांतिनाथ भगवाननी प्रतिमाना अभावमां वीजा भगवाननी प्रतिमामां नीनो मंत्र वणवार भणी श्री शांतिनाथ शान्तिस्नात्र विधि भगवाननी कल्पना करवी, तेनो मंत्र:- "ॐ नमोऽर्हद्भ्यस्तीर्थकरेभ्यो जिनेभ्योऽनाद्यनंतेभ्यः समयलेभ्यः समश्रुतेभ्यः समप्रभावेभ्यः समके- ke वलेभ्यः समतावोपदेशकेभ्यः समपूजितेभ्यः समकल्पनेभ्यः समस्ततीर्थकरनामपंचदशकर्मभूमिमवस्तीर्थ- करो यो यत्राराध्यते सोऽत्र प्रतिमायां सन्निहितोऽस्तु । पछी कोरा शराालामा सधवा स्त्रो पासे गोघृत पूरावीए, तेनो मंत्र:- "ॐ घृतमायुर्वृद्धिकरं, भवति परं जैनदृष्टिसंपत् ि। तत्संयुतः प्रदीपः पातु सदा भावदुःखेभ्य । स्वाहा आ मंत्र वणवार भणी पी पूरीए. पछी दीप प्रगट करीए तेनो मंत्र:- ॐ अर्ह पंचज्ञानमहाज्योतिर्मयाय ध्वान्तघातिने । द्योतनाय प्रतिमाया, दीपो भूयात् सदाऽर्हतः ॥" ए मंत्र त्रण वार बोली दीप प्रगटावतो. पछी एक तांवानी माटली धोइ धूपी ते मध्ये केसर सुखडनो साथियो करी ते उपर नीचेनो मंत्र लखः- "ॐ ह्रीं श्रीं सर्वोपद्रवान् नाशय नाशय स्वाहा। ॥७॥ ए मंत्र लखी तेना कंठे ग्रीवामूत्र, मांढळ, मरडाशींगी, समूल डाम यांचीए. तेमा रूपियो एफ तथा पंचरत्ननी शान्तिस्नत्र मा वीनो ॥७१॥ 密密宗染染談談榮路蹤影迷学学张学鸟游资染染染器张密 पाटली नीना मंथी मूकीए. मन " ॐ ही श्री नानारत्नौधयुत, सुगन्धि पुष्पाधिवासित नीरम् । पतताविचित्रवर्ण, मनाढय स्थापनाविबे ॥ १ ॥ स्वाहा ।" पछी “ॐ होठ ठ ठ स्वाहा।" ए मो सात वार मनी ते माटरी प्रभुजीने जमणे पासे स्थापीए. पछी आसपुष्पे पूजीए पछी पचामृत-घून १, दूध २, दहीं ३, साकर ४, पाणी ५, ए पाच एकठा करी- ॐही जिनपियोपरि निपतद्-घृतदधिदुग्धादिद्रव्यपरिपूता। गन्धोदकसमिश्रा, पचसुधा हरतु दुरितानि ॥ १ ॥ स्वाहा ।। ए मने त्रण चार मत्री माटली मध्ये पचामृत रेडीए पछी तेमा तीर्थनळ तथा कानां पाणी नाखीए तेनो मत्र:- ॐ ही भू (भ ) जलधिनदीदर कुण्डे-पु यानि तीर्थोदकानि शुद्धानि । तमत्रसस्कृतैरिद, पिम्य स्नपयामि शुढयर्थम् ।। १ । साहा। ए मने सात चार मनी माटली मध्ये जल रेडोए. पछी तेमा सौंपधि नाखीए, तेनो मता- ॐ ही सर्वोपधिसयुक्त्या, सुगन्धया घर्पित सुगतिहेतोः । स्नपयामि जैनविम्ब, मत्रिततन्नीरनिवहेन ||१|| स्वाहा ।। ए मो मत्री माटली मध्ये सौंपधि नाखीए, चदनना छाटा नाखीए. पुष्प नाखीए. लाल रेशमी वस्त्र ढाकीए - ७१॥

म. के.
मा. बीजो
॥७२॥
पछी दक्ष श्रावक धूप दीप सहित, माटलीपर हाथ राखी नवकार १, उपसग्गहरं २, संतिकरं ३, विजयाहुत्त ४, नमिऊण
५, अजितशांति ६, भक्तामर ७, ए सात स्मरण शुद्ध पाठे गणे.
शान्तिस्नान
पछी विधियी स्नाप्रपीठ उपर श्री शांतिनाथ तथा श्री कपभदेवनी पंचतीर्थी मूर्ति, सिद्धचक्रयुक्त स्थापची. पछी
विधि
सुवर्णना, रूपाना तथा अन्य धातुना कळा धोइ धृषी पंचामृत भरी श्री गांतिनागनुं स्नान भणानीए. तेमां चार कुमार
कुमारिका पवित्र श्वेत बम आभरणादिक पहेरे. पछी अष्ट प्रकारी पूजा भणावे-
स्नान करतां जगतगुरु शरीरे, सकल देव विमल कलग नीरे आपणा कममळ दूर कीधा, तिणे ते विनुध ग्रंथे प्रसिद्धा ।।१।।
हर्ष धरी अप्सराबंद आवे, स्नात्र करी एम आशीरा भाने; जिहांलगे सुरगिरि जंवदीयो, अमनणा नाव जीतानुजीवो । २॥
" श्रीमन्मंदरमस्तके शुचिजलधौते सदर्भाक्षतः, पीटे मुक्तिवरं विधाय रनितं नत्मादपुष्पसाजा।
इन्द्रोऽहं निजभूषणार्थममलं गज्ञोपवीतं दधे, मुद्राकंकणशेग्यराण्यपि तथा जैनाभिपेकोत्सते ॥१॥
विश्वेश्चयकवास्त्रिदशपतिशिरःशेग्नरम्पृष्टपादाः, प्रक्षीणाशेपा दोपाः सकलगुणगणग्रामघामान एव ।
जायन्ते जन्तवो गरचरणमरसिजवळपूजान्यिताः श्री-अर्हन्तं न्नात्रकाले कलशजलभुनैरेभिराप्लावयेत्तम् ।
ॐ ह्रीं श्रीं परमपुरुषाय ॐ हा ही हूँ है ही ना अईते तीर्थोदकेन अष्टोत्तरशतीपधिना सह पष्टि
लक्षकोटयकप्रमाणकलश स्नपयामि, शान्ति तुष्टिं पुष्टिं कुरु कुरु स्वाहा ।" आ मंत्र उन्चरते स्नान करीए.
७२॥
इति जलपूजा ॥१॥

शान्तिस्नान
विधि
प्र.क.
मा. चीजो
॥७३॥
.
REETERTAINEERINIRE
जिनतनु चर्चता सकल नाकी कहे, कुग्रह उष्णता आज याकी,
सफल अनिमेपता आज माकी, भव्यता अमतणी आज पाकी ३॥ इति चन्दनपूजा ॥२॥
जगधणी पूजता विविध फूले, सुरसरा ते गणे खिण अमूले,
खंत धरी माना निनप पूजे, तस तणा पाप संताप धूजे ।४। इति पुरुषपूजा ॥३॥
जिनगृहे वामतां धूप पूरे, मिच्छत्त दुर्गधता जाय दूरे,
धूप जिम सहज ऊरध (गति) सभावे, कारका उच्चगतिमाव पावे. 1५1 इति धूपपूजा ॥४॥
जे जना दीपमाला प्रकाशे, तेहथी तिमिर अज्ञान नासे,
निज घटे ज्ञानजोती विकासे, जेहथी जगतना भाव भासे ।। इति दीपपूजा ।।५।।
सस्तिक पुरता निनपआगे, सचेतसि भद्र कल्याण जागे,
जन्मजरा मरणादि अशुभ भागे, नियत शिवशर्म रहे तास आगे ॥७॥ इति अक्षतपूजा ॥६॥
ढोकता भोज्य परभाव त्यागे, भविनना निजगुण भोज्य मागे,
हम भणी हम तणु स्वरूप भोज्य, आपजो तातजी जगतपूज्य 1८1 इति नैवेद्यपूजा ॥७॥
फलभर पूनता जगतस्वामी, मनुजगति वेल होय सफळ पामी,
सकरमुनि ध्येयगति भेदरगे, ध्यायता फल समाप्ति प्रसगे ।९। इति फलपूजा ॥८॥
॥७३॥

प्र.क. भा.वा वीजो ॥७४॥ SENTENTREATREENA अष्टप्रकारी पूजा करी, पछी प्रभुने जमणे पडसे श्री शांतिदेवीनो कुंभ स्थापीए (कुंभ स्थापननी पेठे ). पछी ग्रहस्थापन, दिक्पाल स्थापन तथा नंद्यावर्त साथिया प्रमुख अष्ट मंगलनो स्थापना करवी. पछी दश दिक्पाल अने ग्रहोने शान्तिस्नात्र पवित्र बलियाकुला देवा-खीर १, लापसी २, वडा ३, भात ४, करंदो ५, गळ्या-मोळा पुडला ६, खीचडो ७ सप्त विधि धान्यनो-(चणा १, घउं २, जा ३, जार ४, मग ५, चोळा ६, अडद ७,) गोघृत शेर सवा, गुरु-खांड शेर सवार ए सर्व एकठा करी वासमुठी भरी:- ॐ नमो अरिहंताणं, ॐ नमो सिद्धाणं, ॐ नमो आयरियाणं, ॐ नमो उवज्झायाणं, ॐ नमो लोए सब्वसाहर्ण, ॐ नमो आगासगामीण, ॐ नमो चारणाइलद्धीणं, जे इमे किन्नर किंपुरिस महोरग गरुल सिद्ध गंधव्य जक्ख रक्खस पिसाय भूय पेय सायणी डायणी पभियओ जिणघरणिवासिणो निय निय निलयडिया वियारिणो संनिहिया असन्निहिया ते सव्वे इमं विलेवण धूव पुष्फ पईव सणारं बलिं पडिच्छता तुहिकरा भवंतु, पुद्धिकरा भवन्तु खेमं (सिव) करा भवन्तु, संतिकरा भवन्तु, सुत्थयण कुणंतु, मवजिणाणं संनिहाणप्पहावप्पसण्णभावत्तणेणं सम्वत्थ रकवं कुणतु, सव्वत्य दुरिआणि नासंतु, सव्वासिवमुवसमंतु, संति तुहि पुट्ठि सिच सुत्थयणकारिणो भवंतु स्वाहा । इति भूतबलि मंत्र। आ मंत्र त्रणवार भणी वासमुठी बलि उपर वेरोए, करेणना फूल वेरोए. कळश १, नंदन २, फूल ३, धूप ४, दीप ||७४॥ ५, वासचोखा ६, सोपारी ७, अरीसो ८, चामर ९, घंट १०, थाळोवेलण ११ वळिभाजन १२ तथा पाठ चालनार जुदा -- शान्तिस्नात्र प्र.क. भा पीजो ॥७५) " " होय तो १३ ए १२-१३ जण उंची भूमि उपर अगासे जईने शुद्ध आह्वान करे. (दिक्पाल आह्वान जुभो पानु २८) प्रयम शान्तिस्नान भणावे-तेमा सोनावाणी १, फूल २, ककु ३, चदन ४ हाथ मध्ये राखी गाजते वाजते ॐक्षा क्षेत्रपालाय नमः"। आ प्रमाणे कही पूर्व दिशा तरफ उठाळबु "ॐ ही दिक्पालाय नमः । भा प्रमाणे कही दक्षिण दिशा तरफ उछाळयु "ॐही" ग्रहाय नमः । आ प्रमाणे कही ऊर्व दिशा तरफ उडाळनु "ॐ ही पोडशमहादेवीभ्यो नमः " । आ प्रमाणे ही पश्चिम दिशा तरफ उडाळबु. "ॐ ही जिनशासनदेवदेवीम्यो नमः" । आ प्रमाणे कही उत्तर दिशा तरफ उछाळचु . आ प्रमाणे क्षेत्रपालादिक पूजीए पछी चार कलश सोनावाणी पाणीए क्षीरोदक भरो, पचामृते शातिधोपणा पूर्वक स्नान करीए गाथा यथा- रोगशोकादिभिर्पि-रजिताय जितारये । नमः श्रीशान्तये तस्मै, विहिताशिवशान्तये ॥१॥ श्रीशान्तिजिनभक्ताय, भव्याय सुग्वसम्पदाम् । श्रीशान्तिदेवता देया-दशान्तिमपनीयताम् ॥२॥ अम्मा निहितडिम्भा मे, सिद्विद्विसमन्विता । सिते मिहे स्थिता गौरी, वितनोतु समोहितम् ॥३॥ धराधिपतिपत्नी या, देवी पद्मावती सदा । क्षुद्रोपद्रवत सा मा, पातु फुलाफगावलो ॥४॥ १ विहितानन्तशातये । पाटतिर ।७५॥

भ.क.
शान्तिस्ना
विधि
भा. वीजो
॥७६॥
चंचच्चक्रधरा चारु-प्रवालदलदीधितिः । चिरं चक्रेश्वरी देवी, नन्दताद्वताच्च माम् ॥५॥
खड्गखेटककोदण्ड-बाणपाणिस्तडिद्युतिः । तुरंगगमनाऽच्छुप्ता, कल्याणानि करोतु मे ॥६॥
मथुरायां सुपार्थ श्रीसुपार्श्वस्तृपरक्षिका । श्रीकुवेरा नराख्ढा, सुताङ्काऽवतु वो भयात् ॥७॥
ब्रह्मशांतिः स मां पाया-दपायाद् वीरसेवकः । श्रीमत्सत्यपुरे सत्या, येन कोतिः कृता निजा॥८॥
श्रीशक्रप्रमुखा यक्षा, जिनशासनसंस्थिताः । देवीदेवास्तदन्येऽपि, संघ रक्षन्त्वपायतः ।।९।।
श्रीमद्विमानमारूढा, मातंगयक्षसंगता । सा मां सिहायिका पातु चक्रचापेषुधारिणी ॥१०॥
पछी ग्रीवासूत्रना २१ तारनो दडो हाथमा लइने फुलगुंथणोए नवकार ?, उपसग्गहरं २, लोगस्स .३, सात वार
गणी मंत्रीए. दोरो घर उपर वींटीए. तथा गामकोटे वीटोए, पछी वनपंजर करते आ प्रमाणेः
अथ वज्रपक्षरस्तोत्रम्
"ॐ परमेष्ठिनमस्कारं, सारं नवपदात्मकम् । आत्मरक्षाकरं वज्र-पक्षराभं स्मराम्यहम् ॥१॥
ॐ नमो अरिहंताणं, शिरस्कं शिरसि स्थितम् । ॐ नमो सव्वसिद्धाणं, मुखे मुखपदं वरम् ॥२॥
ॐ नमो आयरियाण, अङ्गरक्षातिशायिनी । ॐ नमो उवज्झायाणं, आयुधं हस्तयोर्दृढम् ॥३॥
ॐ नमो लोए सब्यसाहणं, मोचके पादयोः शुभे । एसो पंच नमुकारो, शिला वज्रमयी तले ॥४॥
१ आ स्तोत्र बोलतां जे जे अंगनुं नाम आवे ते ते अंगने हातवडे स्पर्श करखो.
*TERESENTREPRENERNETHER
॥७६॥

मा. बीजो ||७७॥ शांतिस्नाः विधि 全盛游:给条纹路的说说经竞岛圣经学经验等密密密签 सयपावप्पणासणो, वमो वनमयो पहि. मगलाणं च मवेसिं, ग्वादिराङ्गारगातिका ॥५॥ स्वाहान्त च पद ज्ञेय, पदम हवइ मगलम् । वनोपरि वज्रमय, पिधान देहरक्षणे ॥६॥ महामभावा रक्षेप, क्षुद्रोपद्रवनाशिनी। परमेष्ठिपदोद्भूता, कथिता पूर्वमरिभिः ॥७॥ यश्चैवं कुम्तै रक्षा, परमेष्ठिपद सदा। तस्य न स्याद् भय व्याधि-राधिश्चापि कदाचन ॥८॥ । इति वजपक्षरकवच । पछी अप्टप्रकारी पूजानो सामान मेळवी शुभ श्रावक १०८ नाळचावाळो कळश अथरा चार के आठ कळश क्षीरोदके पचामृते भरी, नीचेनी गाथा भणीने स्नात्र करीए नमोऽईसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः। ॐ शान्ति शान्तिनिशात, शात शांताशिव नमस्कृत्य । स्तोतुः शान्तिनिमित, मत्रपदैः शान्तये स्तौमि ॥१॥ीं स्वाहा । ॐ नमो जिणाण सरणाण मगलाण लोगुत्तमाण हो ही है हैं हो हः असिआउसा त्रैलोक्यललाम भूताय क्षुद्रौपद्रवशमनाय अर्हते नमः स्वाहा। ॐ त सति सतिकर, सतिषण सयभया ।मति थुणामि जिण, सतिं विहेज मे ॥१॥ स्वाहा । ॐ रोगजलजलणविसहर-चोरारिमइदगयरणभयाइ । १ शरीरजा पाठातर 加強强的游游游游游游游游游游$強強強強強 ७७ प्र.क. मा. बीजो ।'७८॥ INTERE शांतिस्नान विधि पासजिणनामसंकि-तणेण पसमंति सव्वाइं ॥२॥ स्वाहा ॥ ॐ वरकणयसंखविदुम-मरगयघणसंनिहं विगयमोहं । सत्तरिसयं जिणाणं, सव्वामरपूइयं वंदे ॥३॥स्वाहा। ॐ भवणवइवाणमंतर, जोइसवासो विमाणवासी य । जे केवि दुहृदेवा, ते सव्वे उवसमंतु ममं ॥४॥ स्वाहा । एम भणी अभिषेक करवो? (२) नमोऽहत्० कही ॐ ओमिति निश्चितवचसे, नमो नमो भगवतेऽहते पूजाम् । शान्तिजिनाय जयवते, यशस्विने स्वामिने दमिनाम् ॥१॥ ही स्वाहा । ॐ नमो जिणाणं० । ॐ तं संतिं संतिकरं इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो. २ (३) नमोऽहत्० कही नीचेनो गाथा बोलवीः- ॐ सकलातिशेषकमहा-सम्पत्तिसमन्विताय शस्याय । त्रैलोक्यपूजिताय च, नमो नमः शांतिदेवाय ॥१॥ ही स्वाहा। १ आ नीचे आपेलो पाठ कोइ पूजन वखते बोलावामां आने ले: " ॐ नमोऽईत्परमेश्वराय चतुर्मुखाय परमेष्ठिने दिक्कुमा- रीपरिपूजिताय त्रैलोक्य महिताय दिव्यशरीराय देवाधिदेवाय अस्मिन् जंगीपे दक्षिणाधभरते गध्यसंडे अमुकदेशे अमुकामे अमुकजिनप्रासादे अमुरुगृहे शान्तिस्नात्रमहोत्सवे स्नात्रस्य कर्तुः कारयितुश्च बद्धिं वृद्धि कल्याणं कुरु कुरु स्वाहा । ७८॥

भा पीनो
शांतिस्नात्र
विधि
॥७९॥
NROERY
ॐ नमो जिणाण | ॐ त ति संतिकर इत्यादि चार गाया भणी अभिषेक करवो. ३
(४) नमोऽहत् कही.
ॐ सर्वामरसुसमूह-स्वाभिकसपूजिताय निजिताय ।
भुवनजनपालनोधन-तमाय सतत नमस्तस्मै ॥ १॥ ही स्वारा।
ॐनमो जिणाण | ॐ त सतिं सतिकर इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो. ४
(५) नमोऽहत् कहो
ॐ सर्वदुरितोषनाशन-कराय सर्वाशिवप्रशमनाय ।
दुष्टग्रहभूतपिशाच-शाकिनीना प्रमथनाय ॥१॥ ही स्वाहा ।
ॐ नमो जिणाण | ॐ तं सति सतिसरं इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो ५
(६) नमोऽर्हत. कही
ॐ यस्येति नाममत्र-प्रधानवास्योपयोगकृततोपा।
विजया कुरुते जनहितमिति च नुता नमत तं शान्तिम् ।।१।। ही स्वाहा ।
ॐ नमो जिणाण। ॐ त सतिं सतिकर इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो ६
(७) नमोऽहंत्० कही:
॥७९॥

शांतिस्नात्र
विधि
प्र.क.
मा. बीजो
॥८॥
REPORTERREENNEPERHITE
ॐ भवतु नमस्ते भगवति, विजये सुजये परापरैरजिते ।
अपराजिते जगत्यां, जयतीति जयावहे भवति ॥१॥ ही स्वाहा
ॐ नमो जिणाणं० । ॐ तं संतिं संतिकरं इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो. ७.
(८) नमोऽहत्० कढीः
ॐ सर्वस्यापि च संघस्य, भद्रकल्याणमंगलप्रददे ।
साधूनां च सदा शिव-सुतुष्टिपुष्टिप्रद जीयाः ॥१॥ ही स्वाहा।
ॐ नमो जिणाणं० । ॐ तं संति संर्तिकरं इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो. ८
(९) नमोऽहंत कही।
ॐ भव्यानां कृतसिद्धे, निर्वृतिनिर्वाणजननि सत्त्वानाम् ।
अभयप्रदाननिरते, नमोऽस्तु स्वस्तिपदे तुभ्यम् ॥१॥ ही स्वाहा ।
ॐ नमो जिणाणं० । ॐ तं संति संतिकरं इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो.
(१०) नमोऽहंत कही
ॐ भक्तानां जन्तृनां, शुभावहे नित्यमुद्यते देवि ।
सम्यग्दृष्टीनां धृति-रतिमतिबुद्धिप्रदानाय ॥१॥ ही स्वाहा ।
NEERINEERIERRENERA
९.
॥८॥

मा चीजो
शातिस्नात्र
विधि।
॥८॥
晚安路盛路的發盈盈济学院党总经络条路災经绝密
ॐ नमो जिणाण 1 ॐ त सति मतिकर इत्यादि चार गाया भणी अभिषेक करलो. १०
(११) नमोहंत कही
ॐ जिनशासननिरताना, शान्तिनताना च जगति जनतानाम् ।
श्रीसपत्कीर्तियशो-वर्दिनि जयदेवि विजयस्व ॥१॥ ही स्वाहा।।
ॐ नमो जिणाण.1 ॐ त सति सतिफर इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो. ११.
(१२) नमोर्रत कही
*सल्लिामलविपविषधर-दुग्टग्रहराजरोगरणभयतः।
राक्षसरिपुगणमारी-चौरेतिश्चापदादिभ्यः ॥१॥ ही स्वाहा ॥
ॐ नमो जिणाण | ॐ त सति इत्पादि चार गाथा भणी अभिपेक करवो. १२,
(१३) नमोहंत कही.
ॐ अथ रक्ष रक्ष सुशिव, कुरु कुरु शान्ति च कुरु कुरु मदेति ।
तुष्टिं कुरु कुरु पुष्टि कुरु कुरु स्वस्ति च कुरु कुरु त्वम् ॥१॥ ही स्वाहा ।
ॐ नमो जिणाण 1ॐत सतिं इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करो १३
(१४) नमोऽर्हत् कही:
॥८॥

प्र.क.
शांतिस्नाव
विधि
भा. वीजो
||८२॥
NEETTER: REEN HERE
ॐ भगवति गुणवति शिवशान्ति-तुष्टिपुष्टिस्वस्तीह कुरु कुरु जनानाम् ।
ओमिति नमो नमो हा ही हूँ हः यः क्षाही फुट् फुट् स्वाहा ॥१॥ ही स्वाहा ।
ॐ नमो जिणाणं० । ॐ तं संति इत्यादि चोर गाथा भणी अभिषेक करवो. १४.
(१५) नमोऽहंत्० कही
ॐ एवं यन्नामाक्षर-पुरस्सरं संस्तुता जया देवी।
कुरुते शातिं नमतां, नमो नमः शान्तये तस्मै ॥१॥ स्वाहा ॥
ॐ नमो जिणाणं० । ॐ तं संति इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो. १५.
(१६) नमोऽहत्० कही:
ॐ इति पूर्वसूरिदर्शित-मंत्रपदविदर्भितः स्तवः शान्तेः ।
सलिलादिभयविनाशी, शान्त्यादिकरश्च भक्तिमताम् ॥ १ ॥ हों स्वाहा ।
ॐ नमो जिणाणं० । ॐ तं संति इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो. १६.
(१७) नमोऽहत्० कही।
ॐ यश्चैनं पठति सदा, श्रृणोति भावयति वा यथायोगम् ।
स हि शान्तिपदं यायात्, सूरिः श्रीमानदेवश्च ।।१।। हो स्वाहा ।।
॥८२॥

मा.पीजो
1८३॥
गतिस्मात्र
निधि ।
-
ॐ नमो जिणाण।*त सति इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करचो १७.
(१८) नमोत् कहो
ॐ सनमो विप्पोसहि-पत्ताण संतिसामिपायाण |
झों स्वाहा मन्तेण, सध्यासिवदुरियहरणाण ॥१॥ ही स्वाहा।।
ॐ नमो जिणाण । ॐ त सतिं इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो. १८
(१२) नमोर्चत् कही
ॐ सतिनमुकारो, खेलोसहिमाइलद्धिपत्ताण ।
सों ही नमो सवोसहि-पत्ताण च देइ मिरि ॥१॥ ही स्वाहा ॥
ॐ नमो जिणाण । ॐत सतिं इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो १९.
(२०) नमोऽहत् कही:
ॐ पणीसा य असीया, पनरस पन्नास जिणपरसमूहो।
मासेउ सयलदुरिय, भवियाण भत्तिजुत्ताण ॥१॥ ही स्वाहा ॥
ॐ नमो जिणाण । ॐ त सति इत्यादि गाथा चार भणी अभिषेक करवो १९.
(२१) नमोऽहत्० कही
INENERATINENTERTNERATEST
॥८३॥

म.क.
मा.बीजो
॥८४॥
शांतिस्नान
विधि
.
號盟费路器部認證邻燃鹅洗張够治
ॐ वोसा पणयाला वि य, तीसा पन्नत्तरी जिणवरिंदा ।
गहभूअरक्खसाइणी, घोकवसग्गं पणासंतु ॥१॥ ही स्वाहा ॥
ॐ नमो जिणाणं । ॐ तं संति इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करचो. २१.
(२२) नमोऽहत् कही
ॐ सत्तरि पणतीसा विय, सट्ठी पंचेच जिणगणो एसो।
वाहिजलजलमहरिकरि-चोरारिमहाभयं हरउ ॥१॥ ही स्वाहा ॥
ॐ नमो जिगाणं० । ॐ तं संनि इत्यादि चार गाथा भणो अभिषेक करतो. २२.
(२३) नमोऽहत्० कहीः
ॐ पणपन्ना य दसेच य, पनट्ठी तह य चेव चालीसा।
रक्खन्तु मे मरीरं, देवासुरपणमिया सिन्डा ॥१॥ ही स्वाहा ॥
ॐ नमो जिणाणं.। ॐ तं संति इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक कराो. २३.
(२४) नमोऽहत् । कही:
ॐ श्रीमते शांतिनाथाय नमः शांतिविधायिने
त्रैलोक्यस्यामराधोश-मुकुवाभ्यर्चितहिये ॥१॥ ही स्वाहा ।।
॥८४॥

शान्तिस्नात्र
-
मा वीजो
॥८५)
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ॐनमो जिणाग। ॐत सति इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करयो २४.
(२५) नमोऽहत् कही-
ॐ शाति शातिकर. श्रीमान्, शातिं दिशतु मे गुरु ।
शातिरेव सदा तेपा, येपा शातिगृहे गृहे ॥१॥ हो स्वाहा ।।
ॐ नमो जिणाणं 1 ॐत मति इ यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो २५
(२६) नमोऽहत्० कही
ॐ उन्मृष्टरिष्टदुष्ट-ग्रहगतिदु स्वादुनिमित्तादि।
सपादितहितसप-नामग्रहण जयति शान्तेः ॥१॥ हीं स्वाहा ॥
ॐ नमो जिणाण. 1 ॐ त सतिं इत्यादि चार गाथा भणी अभिषेक करवो २६.
(२७) नमोहंत कहो
ॐ श्रीमघजगज्जनपद-राजाधिपराजमनिवेशानाम् ।
गोष्ठिकपुरमुख्याणा, व्याहरणाहरेच्छान्तिम् ॥१॥ ही स्वाहा ।।
ॐ श्रीश्रमणसघस्य शान्तिर्भवतु । ॐ श्रीजनपदाना शान्तिर्भवतु ।
ॐ श्रीराजाधिपाना शातिर्भवतु। ॐ श्रीराजसन्निवेशाना शातिर्भवतु ।
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॥८५॥

भा. वीजो
शांतिस्नात्र
विधि
॥८६॥
ॐ स्वाहा
-
ॐ श्रीगोष्टिकानां शान्तिर्भवतु । ॐ श्रीपौरमुख्याणां शांतिर्भवतु ।
ॐ श्रीपौरजनस्य शान्तिर्भवतु । ॐ श्रीब्रह्मलोकस्य शांतिर्भवतु । ह्रीं स्वाहा ।
ॐ स्वाहा ॐ श्रीपाश्वनाथाय स्वाहा।
ॐ नमो तुह दसणेण सामिय, पणासए रोगसोगदोहग्गं
कप्पटुमेव जायइ, तुह दसणमसमफलहेउ ॥१॥ ही स्वाहा ॥
ॐ नम एवं पणवसहियं, मायावीएण धरणनागिंदं ।
सिरिकामराजकलियं, पासजिणंद नमसामि ॥१॥ ही स्वाहा ॥
ॐ अद्वेव य अट्ठ सया, अट्ठ सहस्सा य अट्ट कोडीओ।
रक्खन्तु मे सरीरं, देवासुरपणमिया सिट्टा ॥२॥ ही स्वाहा ॥
ॐ थंभेई जलजलणं, चिंतियमित्तो वि पंचनवकारो।
अरिमारिचोरराउल-घोरुवसग्ग निवारेइ ॥१॥ ही स्वाहा ।।
ॐ क्षेमं भवतु सुभिक्षं, सस्यं निष्पद्यतां जयतु धर्मः।
शाम्यन्तु सर्वरोगा, ये केचिदुपद्रवा लोके ॥१॥ ही स्वाहा ॥
ॐ नमो जिणाणं । ॐ तं संति इत्यादि चार गाथा भणी चारे कलशे अभिषेक करवो. २७,
益強弟樂器器器器器端器盖器器帶器器器器器繼器器器
॥८६॥

मा. बीजो शातिस्नात्र विधि ॥८७॥ पछी स्नायजा परी अष्टयकारी पूजा विशेष मकारे करे. आरति, मङ्गळदी करे नैवेद्य ढोके पछी मुखपत्रिका लई नीचे प्रमाणे देश नादे:-- प्रथम इरियावहि । इच्छाकारेण सदिमह भगवन् चैत्यवदन करु ? इन्छ कही चेत्यपदन करे. नमु. त्यु ण. अरिहतयाण. अन्नत्य यही एक नकारनो काउस्सग्ग वरी-पारी नमोऽहंत कही नीचेनी गाथा बोली- "अईस्तनोतु स श्रेय.-थ्रिय ययानतो नरै । अप्पैन्द्री मकलाऽहि, रहसा सहसौच्यत ॥१॥" पछी लोगस्स० । सव्वलोए। वदणवत्तिाए । अन्नत्य. कही एक नवकारनो काउस्सग्ग करी-पारी नमोहत. ही नोवेनी गाथा गोलपी:- ओमिति मता यच्छा-सनस्य नन्ता सदा यदहीश्च । आधीयते श्रिया ते, भवतो भवतो जिनाः पान्तु ॥ पड़ी पुस्मरवरदी० ॥ दणवत्तिआए । अन्नस्थल कहो एक नकारनो काउस्मग्ग करी-पारी नमोऽहत. कहो नीचेनी गाया बोलयो - "नवतत्वयुता त्रिपदी-श्रिता चिज्ञानपुण्यक्तिमता । वरधर्मकोतिविद्या नन्दास्था जैनगीर्जीयात् ।। पछी सिद्धाण युद्धाण। श्रीशातिनाथभाराधनार्य करेमि काउस्सग्ग बदणवत्तिआए। अन्नत्य० कहो एक लोगम्सनो काउस्सग करी-पारी नमोऽहत्० कही नीचेनी गाथा गोलपी " 11८७॥

GAR शान्तिस्नात्र विधि " श्रोशांतिः श्रुतशान्तिः, प्रशान्तिकोऽसावशान्तिमुपशान्तिम् । म.क. नयतु सदा यस्य पदाः, सुशान्तिदाः सन्तुसन्ति जने ॥४॥ मा. वीजो पछी श्रोद्वादशांगीआराधनार्थं करेमि काउस्सग्गं वंदणवत्तिाए० अन्नत्थ० कही एक नवकारनो 11८८॥ काउस्सग्ग करी-पारी नमोऽहत् कही नीचेनी गाथा बोलवी:- "सकलार्थसिद्धिसाधन-बीजोपांगा सदा स्फुरदुपांगा। भवतादनुपह्तमहा तमोऽपहा द्वादशांगी वः।" पछी श्रुतदेवताआराधनाथ करेमि काउस्सग्ग अन्नत्थ० कही एक नवकारनो काउस्सग्ग करी-पारी नमोऽर्हत्० कही नीचेनी गाथा बोलवीः- "वद् वदति न वाग्वादिनि, भगवति कः श्रुतसरस्वतिगमेच्छुः। रंगत्तरंगमतिवर-तरणिस्तुभ्यं नम इतीह" पछी शासनदेवताआराधनार्थ करेमि काउस्सग्गं अन्नत्य कही एक नवकारनो काउस्सग्ग करी-पारी नमोऽहत् कही नीचेनी गाथा बोलबी:- उपसर्गवलयविलयन-निरता जिनशासनावनैकरताः । द्रुतमिह समीहितकृते, स्युः शासनदेवता भवताम् । पछी समस्तवेयावच्चगराणं संतिगराणं सम्मदिद्विसमाहिगराणं करेमि काउस्सग्गं अन्नत्थ० कही एक नवकारनो काउस्सग्ग करी-पारी नमोऽहत्० कही नीवेनी गाथा वोलवीः-- संवेऽत्र ये गुरुगुणोधनिये सुवैया-वृत्यादिकृत्यकरणैकनिबादकक्षाः । ॥८८॥ ज

मा. वीजो
शांतिस्नान
विधि
1८९॥
ते शान्तये सह मवन्तु सुरा' सुरीभिः, सदृष्टयो निखिलविनविघातदक्षाः ॥८॥
पडी प्रगट एक नकार बोली नमुत्यु धा जावति चेडयाइ। जावत केवि साह० नमोऽर्हत् वही स्तवनने
स्थाने अजियसति अथवा सतिकर कही जय वीयराय० बोलवा
पछी छेटे पलियाफला राग्या छ ते उडाया पछी पहेला स्थापन करेला शातिदेवीना कुभ आगळ वीजा चार
कुभ डाघ रहित घाटयता रहने ते दरेकमा चोखा शेर समा, रूपानाणु, सोपारी ५ मुकी, श्रीफळ एक लीला पीन
उगडावडे ढाकी ग्रीगसूत्र वाधी फूलमाळे पूतीने शुभ श्रावक कुमारिकाना माथे स्थापी वाजते गाजते गीत गाते शाति
कुम पासे भावी स्थापे पछी शाति देवीने योग्य नेवेद्य धरीए ते आ प्रमाणे -स्वीर, करयो, बाट-लापसी, सुवाळी २१,
वडा २१, पचधारी-लापसी, लाडवा मगदळना ९, गळ्या-मोळा पुडला रोटली भात दही एक पात्रमा नाखी ढोकीए.
पछी त्या मगळदीयो उतारीए. पछी शाति उद्योपणा पूर्वक क्षेत्रदेवी देवता पूजिए पछी नीचे प्रमाणे देव यादीए:-
इरियावहि अन्नत्य कही एक लोगस्मनो काउस्सग्ग करी प्रगट लोगस्स कही पछी चत्यवदन नमुत्थु ण.
वगेरे कही मतिकरनु स्तपन कही जय वीयरायः पहेवा पछी अरिहत चेझ्याण कही अन्नत्थ० कही एक नव-
कारनो काउस्सग करी-पारी नमोऽईत कही नीचेनी स्तुति कहेगी.-
कल्लाणकद पढम जिणिद, सति तओ नेमिजिण मुणिद ।
पास पयास सुगुणिकठाण, भत्तीइ वदे सिरिद्धिमाणं ॥१॥
MEENEATREENETICE
॥८९॥

-
म.क.
मा. वीजो
शान्तिस्नात्र
विधि
॥९॥
RREENNERNET
पछी इच्छाकारेण संदिसह भगवन् , क्षेत्रदेवताआराधनाथ करेमि काउस्सग्गं अन्ना० कही एक
लोगस्स० नो काउस्सग्ग करी-पारी नमोऽर्हत्० कही नीचेनी स्तुति बोलवी:-
यस्याः क्षेत्रं समाश्रित्य, साधुभिः साध्यते क्रिया । सा क्षेत्रदेवता नित्यं, भूयान्नः सुखदायिनो ॥
पछी भवणदेवयाए करेमि काउस्तग्गं अन्नत्थ. कही एक लोगस्सनो काउस्सग्ग करी पारी नमोऽहत्.
कही नीचेनी स्तुति बोलवी:-
" ज्ञानादिगुणयुताना, नित्यं स्वाध्यायसंयमरतानाम् । विदधातु भवनदेवी, शिवं सदा सर्वसाधूनाम् ।"
पछी श्रीशांतिदेवयाए करेमि काउस्सग्गं अन्नत्य कही एक नवकारनो काउस्सग्ग करी-पारी नमोऽहत्
कही नीचेनी गाथा बोलवी:-
श्रीचतुर्विधसंघस्य, शासनोन्नतिकारिणो । शिवशांतिकरी भूपा-च्छीमतो शांतिदेवता ॥४॥
पछी शुद्रोपद्रवोपशमावणी करेमि काउस्सगं अन्नत्य कहां एक नवकार, एक उपसग्गहरं, एक लोगस्स
ए त्रणेनो भेको काउस्सग करी-पारी नमोऽईत्० कही नीवेनी स्तुति घोलनोः-
" सर्वे यक्षाम्बिकाद्या ये, वैयावृत्यकरा जिने । क्षुद्रोपद्रवसंघानं ते द्रुतं द्रावयंतु नः ||५||"
पछी प्रगट एक नवकार कहेवो. पछी नवणना पाणीप वृहत्शांतिनो पाठ उच्चरते शांतिळश भरवो. ते उपर
नाळियेर मूकी तास्तो बोटी सौभाग्यवती स्त्री तेने माथे ले अने गाजते वाजते यास्यने पर पधरावे. पछी विसर्जन करे.
HTTERESTERNETTEREDEEMBER
॥९०॥

शान्तिस्नान प्र.क. भा. पी ॥९॥ नगणनु पाणी मचित कळममा भरी घरमा, घर फरती अथना गाम फरती तेनी धारापाडी गाजते वानते देवी ॥ इति श्रीशातिस्नात्र विधि ।। (सकलभद्रगणिकृत) विसर्जन मत्र नीचेना मनयी सर्व स्थापननु विसर्जन करतु मा-'ॐ पिमर विमर संस्थान गन्छ गन्छ स्वाहा ।" पछी दरेनी क्षमा मागवी. देवदेवार्चनार्थाय (नार्थ तु), पुराऽऽहता हि ये सुराः । ते विधायाहता पूजा, यान्तु सर्वे यथागनम् ।। या पाति शासन जैन, सय मत्यूहनाशिनी । सा ह्यभिप्रेतमिद्वयर्थ, भूयाच्छासनदेवता। आह्वान नैव जानामि, न जानामि विसर्जनम् । पूजाचा नैव जानामि, त्व गति' परमेश्वरि ॥ आजाहोन क्रियाहीन, मत्रहीन च यत् कृतम् । तत्सर्व क्षम्यता देवि, प्रसीद परमेश्वरि ।। सर्वमगलमागल्य, सर्वकल्याणकारणम् । प्रधान सर्वधर्माणा, जैन जपति शासनम् ।। । इति विसर्जन विधि। देवीप्रतिष्ठा (आचारदिनकरना आधारे) देवीओ त्रण प्रभारनी होय छे १ प्रासाददेवी, २ सपदायदेवी अने ३ कुलदेवी पासाददेवी -पोठ, उपपीठ, क्षेत्र अने उपक्षेत्रमा बनावेली गुफामा रहेली, लिंगरूप, स्वयभूतरूप अने मनुष्यरचित , ॥९शा

म.क.
मा. बीजो
शांतिस्नात्र
विधि
॥९२॥
रूपवाली होय छे.
संप्रदायदेवी:--अंबा, सरस्वती, त्रिपुरा अने नारा विगेरे गुरुए उपदेशेल मंत्रोपासनावाली होय छे.
कुलदेवी:-- चंडी, चामुंडा, कंटेश्वरी, सत्यका, मुशयना अने व्याघराजी विगेरे.
उपरोक्त दरेक देवीओनी प्रतिष्ठा सरखीज होय छे. देवीप्रतिष्ठा करावनारना घेर प्रथम ग्रहशान्ति अने पौष्टिककर्म
करवु. पछी प्रासाद होय के घर होय तेमां बृहत्स्नान करवू.
देवीना प्रासादां ग्रहमतिमा लावीने ग्रहशान्ति करवी.
पछी भूमिशुद्धि करी, पंचरत्ननी पोटली मूकी तेना उपर कदम्बना कडानो पाटलो मूकी तेना उपर देवीनी
प्रतिमा पधराववी.
स्थिर प्रासाद देवीप्रतिमाने कुलपीठ उपर पंचरत्न मूकी स्थापन करवी.
पछी कुडव कुडव प्रमाणनां सर्वे जातनां धान्यथी नीचेनो मंत्र बोली देवीप्रतिमाने वधाववी.
मंत्र- "ॐओ मन्नपूर्ण सर्वान्ने स्वाहा
पछी आचार्य तथा ४ स्नात्रीयाओए नींदी, कंकण अने सदशवत धारण करी नीचेना मंत्रोथी ते ते अंग उपर
वणवार अंगरक्षा करवी-
मंत्र:-'ॐ हैंी नमो ब्रह्माणि' (हृदय उपर ) 'ॐ हूँ नमो वैष्णवि ( वे भुना उपर)
TREATREATRE
"
॥९२॥

- म.क. भा पीजो शातिस्नात्र विधि ॥९३॥ - 激路宏路器张密器 卷张談杂费务發器密歇惡器鉴瓷器器身 ॐ ही नम सरस्पति' (कठ उपर) 'ॐ हूँ नम • परमभूपणे' (मुख उपर) ॐ ही नम सुगन्धे' ( नासिका उपर) ॐ हो नमः श्रपणे' (वे कान उपर) हैं। नम सु-र्शने' (वे आंख उपर) 'ॐ ही नमो भ्रामरि' (वे भवा उपर) ॐ हो नमो महालक्ष्मि (कपाल उपर)'ॐ हूँ नम प्रियकारिणि' (मस्तक उपर) नमो भुवनस्वामिनि ' (चोटली उपर) 'ॐ ही नमो विश्वरूपे' (पेट उपर) की नम पासे' । नाभि उपर)'ॐ हूँ नम कामेश्वरि' (गुह्यभाग पर) नमो विश्वोचमे' (वे साथल उपर) • ॐ है। नम स्तभिनि' ( जानु उपर) नम. सुगमने ' (बे जघा उपर) 'ॐ हूँ नम' परमपूज्ये ' (वे चरण उपर) नम सर्वगामिनि' (कवच) 'ॐ ही नमः परमरौद्रि' (आयुध) एम गुरु पोतानी अने स्नातीयाओनी रक्षा करे पछी पचगव्यथी नीचेनो श्लोक बोली देवीनु स्नान करवु- विश्वस्यापि पवित्रता भगवती पौढानुभावनिजे., सघने कुशलानुवन्धकरिता मर्यामरोपासिता । तस्या स्नातमिहाधिशासनविधौ सत्पचगव्यै मृत, नो दोपाय महाजनागमकृत पथा. प्रमाण परम् ॥१॥ पछी नीचेनो एकेक लोक बोली एकेक एम आठ पुप्पाजलि नारखी- श्री सरतरगच्छीय सान मन्दिर, जयपुर - १९३॥

प्र.क.
भा. वीजो
१९४॥
शांतिस्नान
विधि
MARRINTERNET
सर्वाशापरिपूरिणि, निजमभावैर्यशोभिरपि देवि । आराधनकर्तृणां, कर्त्तय सर्वाणि दुःखानि ॥१॥
फरी नोचेनो लोक बोली पुष्पांजलि नाखवी-
यस्याः प्रौढप्रभावविभवेचियमाः संयम, निर्दोपे परिपालयन्ति कलयन्त्यन्यत्कलाकौशलम् ।
तस्यै नम्रसुरासुरेश्वरशिरकोटीरतेजश्छटा-कोटिस्पृष्टशुभाशये त्रिजगतां माने नमः सर्वदा ।।२।।
जीजी पुप्पांजलि-
न व्याधयो न विपदो न महान्तराया, नैवायशांसि न वियोगविचेष्टितानि ।
यस्याः प्रसादवशतो बहुभक्तिभाजा-माविर्भवन्ति हि कदाचन सास्तु लक्ष्म्यै ॥३॥
चोथी-दत्यच्छेदोद्यतायां परमपरमतकोधबोधप्रबोध-क्रीडानिर्दीडपीडाकरणमशरणं वेगतो धारयन्त्या ।
लीलाकर्पूरकीलाजनितनिजनिज पिपासाविनाशः, ऋज्यादामास यस्यां विजयमविरत सेश्वरा यस्तनोतु ॥४॥
पांचमी कुसुमांजलि-
लुलायदनुजक्षयं क्षितितले विधातुं सुखं, चकार रभसेन या सुरगणैरतिप्रार्थिता ।
चकार रभसेन या सुरगणरतिमाथिता, तनोतु शुभमुत्तमं भगवती प्रसादेन सा ||५||
छट्ठी-सा कगेतु सुख माता, बलिजित्तापवारिणी । प्राप्यते यत्प्रसादेन, बलिजित्तापवारिणी ॥६॥
सातमी-जयन्ति देव्याः प्रभुतामतानि, निरस्तनिःसंचरतामतानि ।
॥९४॥

प्रक, मा बोजो ॥९५॥ शातिस्नात्र विधि PRINT****** निराकृता' शत्रुगणाः सदैव, सप्राप्य या मा यजे सदैव ॥७॥ आठमीसा जयति यमनिरोधनकी सपत्करी सुभक्तानाम् । सिद्धिर्यत्सेवाया-मत्यागेऽपि हि सुभक्तानाम् ॥८॥ एम आठ पुप्पाजलि चढावी देवी आगळ भगरतीनु मडल कम्यु मडलनो विधि- पहेला छ सूणारा चक्र बनाव. तेनी मध्यमा-हजार हाथराली, अनेकविध शस्त्रने धारण करनारी, श्वेतवसाळी अने सिंहना वाहनवाळी देवीने चीतरीने स्थापन करवी अथा कल्पपी पठी छ खूगामा पहेलेची प्रदक्षिणाक्रमे छएमा नीचे प्रमाणे लखा १ ॐही जम्भे नम । २ ॐ हूँी जन्भिन्य नमः । ३ ॐ हूँी स्तम्भे नम । ४ ॐ हूँ। स्तम्भिन्यै नमः १५ ॐ हैं। मोहे नमः । ६ ॐो मोदिन्य नमः । पछी रहारना भागमा बाजु पलय आठ दलवाळा चक्ररूप कर अने तेमा प्रदक्षिणाना क्रमे नीचे प्रमाणे लखा १४ी श्री ब्रह्माण्य नम । २ हूँ। श्री माहेश्वर्य नम । ३ ही श्री कौमार्य नम । ४ ही श्री वैष्णव्यै नमः। ही श्री बारायै नमः । ६ हूँ। श्री इन्द्राय नमः । ७ हूँ। श्री चामुण्डायै नम । ८ हूँ श्री कालिकायै नमः ।। वळी तेनी यहारना भागमा नीजु लय सोळ दळवाळा चक्ररूप करखु अने तेमा प्रदाक्षगाना क्रमथो नीचे प्रमाणे लखयु- प्र.क. १ हूँी श्री रोहिण्यै नमः । २ हूँी श्री प्रज्ञप्त्यै नमः । ३ हूँी श्री वज्रशङ्खलायै नमः । ४ हूँ। श्री वांकुश्यै नमः। ही श्री अंप्रतिचक्राय नमः । ६ ही श्री पुरुपदत्तायै नमः । ७ हूँ। श्री काल्यै नमः। ८ हैं। श्री महाकाल्यै नमः। ९ शांतिस्नात्र ही श्री गौर्यै नमः । १० हूँ। श्री गान्धाय नमः । ११ ह्री श्री महाज्वालायै नमः । १२ ही श्री मानव्यै नमः । विधि १३ ह्री श्री वैरोटयायै नमः । १४ हूँ। श्री अन्छुप्तायै नमः। १५ हूँी श्री मानस्यै नमः । १६ ही श्री महामानस्यै नमः।। फरी चोसठ दलवाछं वलय करी प्रदक्षिणाना क्रमे अनुक्रमे आ प्रमाणे देवीओ लखवी- १ ॐ ब्रह्माण्यै नमः । २ ॐ कौमार्यै नमः । ३ ॐ वारायै नमः । ४ ॐ शाङ्कर्यै नमः । ५. ॐ इन्द्राण्यै नमः। ६ ॐ कंकाल्यै नमः । ७ ॐ कराल्यै नमः । ८ ॐ काल्यै नमः । ९ ॐ महाकाल्यै नमः । १० ॐ चामुडायै नमः । ॐ ११ ॐ ज्वालामुख्यै नमः । १२ ॐ कामाख्यायै नमः । १३ ॐ कापालिन्यै नमः । १४ ॐ भद्रकाल्यै नमः। १५ ॐ दुर्गायै नमः । १६ ॐ अंशिकायै नमः । १७ ॐ ललितायै नमः । १८ ॐ गौर्यै नमः। १९ ॐ सुमंगलायै नमः । २० ॐ रोहिण्यै नमः । २१ ॐ कपिलायै नमः । २२ ॐ शूलकटायै नमः । २३ ॐ कुण्डलिन्यै नमः । २४ ॐ त्रिपुरायै नमः २५ ॐ कुरुकुल्लायै नमः । २६ ॐ भैरव्यै नमः । २७ ॐ भद्रायै नमः । २८ ॐ चन्द्रावत्यै नमः। २९ ॐ नारसिंह्ये नमः । ३० ॐ निरअनायै नमः । ३१ हेमकात्यै नमः । ३२ ॐ प्रेतासन्यै नमः । ३३ ॐ ईश्वर्यै नमः । ३४ ॐ माहे- श्वर्यै नमः । ३५ ॐ वैष्णव्यै नमः । ३६ ॐ वैनावक्यै नमः । ३७ ॐ यमघण्टायै नमः । ३८ ॐ हरसिद्धथै नमः । ।।९६॥ ३९ ॐ सरस्वत्यै नमः । ४० ॐ तातलायै नमः । ४१ ॐ चण्डयै नमः। ४२ शखिन्यै नमः । ४३ ॐ पमिन्यै नमः। भा. बीजो ॥९६॥ REPRESENSEENETWEREDEEN -

क
भा. वीनो
देवीप्रतिष्ठा
विधि
॥९७||
४४ पिमिण्यै नमः । ४५ ॐ शाकिन्यै नम । ४६ ॐ नारायण्यै नमः । ४७ * पलादिन्यै नम । १८ ॐ यमम
गियै नमः । ४९ ॐ सूर्यपुत्र्यै नमः। ५० ॐ शितलायै नमः १५१ ॐ कृष्णपाशायै नमः । ५२ ॐ रक्ताक्ष्यै नमः। ५३
ॐ कालराज्य नम ! ५४ ॐ आकाक्ष्यै नम । ५५ ॐ सृष्टिन्यै नमः । ५६ ॐ जयायै नमः । ५७ ॐ विजयायै
नमः । ५८ ॐ धूम्रपण्यै नम ।५१ ॐ वेगेवर्य नमः । ६० ॐ कात्यायन्ये नमः । ६१ ॐ अग्निहोम्यै नमः । ६२ ॐ
चक्रेश्वर्य नम । ६३ ॐ महाम्बिकायै नम । ६४ ॐ ईश्वरायै नमः।
फरीयी तेनी करतु वलय करीने पावन दल करीने तेमा अनुक्रमे प्रदक्षिणाक्रमे नीचे प्रमाणेना देवो स्थापवा-
१ ॐ क्रॉ क्षेत्रपालाय नमः । २ ॐको रुपिलाय नमः । ३ ॐ क्रो बटुकाय नमः। ४ ॐको नारसिंहाय
नमः१५ ॐ को गोपालाय नमः । ६ ॐ को भैरवाय नमः । ७ ॐ को गरुडाय नमः। ८ ॐको रक्तमुवर्णाय
मः। ९ ॐको देवसेनाय नमः । १० ॐकों रुद्राय नमः। ११ ॐ क्रो वरुणाय नमः। १२ ॐको भद्राय
नमः । १३ ॐों बनाय नमः । १४ ॐ को वजजधाय नम । १५ ॐ को स्कन्दाय नम । १६ ॐ क्रौं कुरुवे
नम । १७ ॐ क्रों प्रियकराय नम । १८ ॐ को नियमिनाय नमः। १९ ॐ को वह्वये नमः । २० ॐ क्रों
काय नम । २१ ॐ क्रॉ हसाय नम । २२ ॐ को एकजयाय नमः । २३ ॐ क्रो घटापथाय नमः । २४ ॐ
क्रो दनकाय नम । २५ ॐ को कालाय नमः । २६ ॐ क्रों महाकालाय नमः । २७ ॐ क्रों मेघनादाय नम ।
२८ ॐ क्रों भीमाय नमः । २९ ॐ क्रों महाभीमाय नमः । ३० ॐ को तुगभद्राय नमः । ३१ ॐ को विद्याधराय
॥९७॥

म.क.
भा. बीजो
॥९८॥
देवीप्रतिष्ठा
विधि
नमः । ३२ ॐ को वसुमित्राय नमः । ३३ ॐ को विश्वसेनाय नमः । ३४ ॐ क्रो नागाय नमः । ३५ ॐ
नागहस्ताय नमः । ३६ । ॐ क्रों प्रद्युम्नाय नमः । ३७ ॐ क्रों कंपिलाय नमः । ३८ ॐ को नकुलाय नमः । ३९ ॐ
कों
आह्लादाय नमः। ४० ॐ क्रों त्रिमुखाय नमः । ४१ ॐ क्रों पिशाचाय नमः । ४२ ॐ क्रों भृतभैरवाय नमः।
४३ ॐ क्रो महापिशाचाय नमः । ४४ ॐ क्रों कालमुखाय नमः । ४५ ॐ क्रो शुनकाय नमः । ४६ ॐ क्रों अस्थि-
मुखाय नमः । ४७ ॐनों रेतोवेधाय नमः । ४८ ॐ क्रां ममानचराय नमः । ४९ ॐ क्रों केलिकिलाय नमः। ५०
ॐ क्रों ,गाय नमः । ५१ ॐ क्रों कंटकाय नमः । ५२ ॐ को विभीपणाय नमः ।
फरीथी वलय करी तेमां अष्टदलो करवां, अने तेमां प्रदक्षिणा क्रमे नीचे प्रमाणे देवो स्थापवाः-
१ ॐ श्री भैरवाय नमः । २ ॐ श्री महाभैरवाय नमः । ३ ॐ श्री चण्डभैरवाय नमः । ४ ॐ श्री रुद्रभैरवाय
नमः । ५ ॐ श्री कपालभैरवाय नमः । ६ ॐ श्री आनन्दभैरवाय नमः । ७ ॐ श्री कंकालभैरवाय नमः । ८ ॐ श्री
भैरवभैरवाय नमः।
फरीथी तेना उपर वलय करीने-
“ॐ हूँ श्री सर्वाभ्यो देवीभ्यः सर्वस्थाननिवासिनीभ्यः सर्वविघ्नविनाशिनीभ्यः सर्वदिव्यधारिणीभ्यः सर्वशास्त्रकरी-
भ्यः सर्ववर्णाभ्यः सर्वमंत्रमयीभ्यः सर्वतेजोमयीभ्यः सर्वचिद्यामयीभ्यः सर्वमन्त्राक्षरमयीभ्यः सर्वद्धिदाभ्यः सर्वसिद्धिदाभ्यो
भगवत्यः पूजां प्रतीच्छन्तु स्वाहा ।
继器染樂器端暴露券绕绕绕绕路器部落
॥९८॥

मा. पीजो विधि । ॥९९॥ NRNATANTRIES RABINE आ प्रमाणे उपरना मनाक्षरे वलय आकारे लखवा, तेनी उपर फरीथी वलय करी दश दल करी प्रदक्षिणा क्रमे आ देवीप्रतिष्ठा प्रमाणे दश दिक्पाल स्थापन करवा- १ ॐ इन्द्राय नमः । २ ॐ अमये नमः । ३ ॐ यमाय नम ! ४ ॐ नितये नमः । ५ॐ वरुणाय नमः । ६ ॐ वायवे नमः । ७ ॐ कुमेराय नमः । ८ ॐ ईशानाय नमः। ९ ॐ प्रमणे नमः। १० ॐ नागेभ्यो नमः । फरीथी वलय करीने दशदल करीने तेमा प्रदक्षिणा झमे आ प्रमाणे ग्रहादिक स्थापना १ ॐ आदित्याय नमः । २ ॐ चन्द्राय नम । ३ ॐ मगलाय नमः । ४ ॐ बुधाय नमः । ॐ गुरवे नमः । शुक्राय नमः । ॐ शनैश्चराय नमः । ८ ॐ राहवे नमः।९ ॐ केतवे नमः । १० ॐ क्षेत्रपालाय नमः । त्यार पछी तेनी बहारना भागमा चार सुणावाल भूमिपुर करयु. तेना ईशान खुणामा गणपति, पूर्व दिशामा अम्बा, अनिपुणामा कार्तिकेय, दक्षिण दिशामा यमुना, नैत्य सुणामा क्षेत्रपाल, पश्चिम दिशामा महाभैरव, वायव्य खुणामां गुरु, अने उत्तर दिशामा गगानु स्थापन कर ए प्रमाणे भगरती मडकनु स्थापन करी पूजन करवु- ॐ नमः अमुकदेव्यै, अमुकभैरवाय, अमुकवोराय, अमुकयोगिन्य, अमुकदिक्पालाय, अमुकग्रहाय, एवं भगवन् ! अमुक ! अमुक! आगच्छ आगच्छ, इदमध्ये पाय, पलिं, चरु, आचमनीय गृहाण गृहाण सनिहिता मर भर स्वाहा, जल गृहाण गृहाण, गध, पुष्प, अक्षतान्, फल, मुद्रा, धूप, दीप, नैवेद्य, गृहाण गृहाण सर्वोपचारान् गृहाण गृहाण, शान्ति ॥९॥ कुरु कुरु तुष्टिं पुष्टि ऋद्धिं वृद्धि सर्वसमोहित कुरु कुरु स्वाहा ।

देवीमतिष्ठा
विधि
भा. बीजो
||१००॥
आ मंत्र बडे प्रत्येक देवदेवीनी अनुक्रमे सर्व वस्तुओ, तथा सर्व उपचारो वडे पूजा करवी. अने त्रणखुणावाला कुंडने
विषे घी, मध, अने गूगल वडे तेटली संख्यामां होम करवो, होमनो मंत्र आ प्रमाणे :-
ॐ रा अमुको देवः देवी वा संतर्पिताऽस्तु स्वाहा ।
उपरोक्त विधि करीने देवीमतिमाने दशीवाळा वस्त्रनु आच्छादन करवू अने तेना उपर चंदन, अक्षत अने फुलथी
पूजन करवु.
। जिनमतमा देवीप्रतिष्ठा माटे वेदिका करवानी होती नथी.
त्यारवाद लग्नवेला आवतां गुरु एकान्तमा प्रतिष्ठा करे.
सौभाग्यमुद्रा करी जे देवी होय ते देवीना मंत्रथी श्यासक्षेप मंत्रचो. त्यारवाद वामक्षेप करवा पूर्वक देवोना सर्व
अंगोमां मंत्रपाठ बोलवा पूर्वक माया चीज स्थापयु. पछी वस्ख दूर करी सर्वजनसमक्ष गंध अने अक्षत विगेरेथी पूजन करी
नीना लोको बोलवा पूर्वक पहेला ५ स्नात्रो अने पछी त्रण प्रमार्जन करवां-
स्नात्र १ लु दूधनो कळश+ लइने-
क्षाराम्बुधेः सुराधीशरानीतं शीरमुत्तमम् । अस्मिन् भगवतीस्नात्रं, दुरितानि निकृन्ततु ॥१॥
वासक्षेप २५ यातुओनो बनाववो तेनु लिष्ट जुओ परिशिष्ट नं-
+ दरेक वखते लोक बोली म्नान कर
A-
॥१०॥

मा.बोलो
देवीप्रतिष्ठा
रिषि
M
॥१०॥
स्नान वीजु-दहीनो फळश लई-
धन धनबलाचार, स्नेहपीचरमुज्ज्वलम् । सदधातु दपि श्रेष्ठ, देवीस्नाने सतां सुखम् ॥२॥
स्नात्र नीजु-धीनो कलश लइ-
स्नेहेषु मुख्यमायुप्य, परिन पापनापहत् । घृत भगवतीस्नाने, भूयादमृतमनसा ॥३॥
स्नात्र ४ यु-मधनो कळश लइ--
सर्वोपधिरस सर्व-रोगहृत्सर्वरञ्जनम् । क्षौद्र क्षुद्रोपद्रवाणा, हन्तु देव्यमिपेचनात् ॥४॥
स्नात्र ५ मु सौंपधिमिश्रित जल कळश लइ-
सौंपधिमय नीर, नीर सद्गुणसयुतम् । भगवत्यभिषेकेऽस्मि-ग्नुपयुक्त श्रियेऽस्तु नः ॥५॥
स्नान ६ छु जटामासीनु चूर्ण+ लइ-
मुगन्ध रोगशमन, सौभाग्यगुणकारणम् । इह प्रशस्त मास्यास्तु, मार्जन हन्तु दुष्कृतम् ॥६॥
स्नान ७ मु-चदननु चूर्ण लइ-
शीतल शुभ्रममल, धूवतापरजोहरम् । निहन्तु सर्वप्रत्यूह, चन्दनेनागमार्जनम् ॥७॥
स्नान ८ मु केसरनु चूर्ण लइ-
x चूर्ण लेवाना कहा छे त्या ते चूर्णथी देवीनु प्रमार्जन करणे
INTERPRETARINEERINAR
॥१०॥

म.क.
देवीप्रतिष्ठा
विधि
SE
काश्मीरजन्मजैश्चूर्णैः, स्वभावेन सुगन्धिभिः । प्रमार्जयाम्यहं देव्याः, मतिमां चिनहानये ||८||
ए रीते ५ स्नात्र अने ३ प्रमार्जन करी देवी पासे वधांज स्त्रीने लगतां वस्त्र, आभूपण, गंध, माला, मंडनलायक
मा. बीजो वस्तुओ अने अनेक प्रकारनां नैवेद्य मूकवां.
॥१०२॥ आम प्रतिष्ठा पूर्ण थतां मंडलनु विसर्जन ( नंद्यावर्तना विसर्जननी जेम ) करवू. पछी कन्यापूजन, गुरुदान, महोत्सव
अने संघपूजा मोटी प्रतिष्ठानी माफक करे.
आ प्रतिष्ठा-प्रासाददेवी, संप्रदायदेवी अने कुलदेवी एम प्रणेयनी जाणवी. तेनुपूजन गुरु आगम के कुलाचारथी जाणवू.
अहीं अमे ग्रंथ विस्तारना भयथी अने खास करीने केटलीक आगमनी चावतो अप्रगट रहे तेज सारु ए उदेशथी
बताव्युं नथी ते संबंधमां कह्यु पण छे के-
$ " इदमागमसर्वस्वं, गोपनीयं प्रयत्नतः । गोपनाज्जायते सिद्धिः, संशयश्व प्रकाशनात् ॥१॥
तथा सर्वदेवीनी प्रतिष्ठा ते ते कल्पमा कहेला अथवा गुरुए बतावेला ते ते देवीना मंत्र वडे करवी. बाकीर्नु वधु
देवीप्रतिष्ठानी जेम समजवु. जे देवीओ अमसिद्ध होय, तेनो कल्प जणातो न होय के गुरुए बतावेल पण न होय के
तेना नामनो मंत्र न होय त्यां ते देवीओनी प्रतिष्ठा अंबादेवी, चंडीदेवी के त्रिपुरादेवीना मंत्रथी करवी.
देवी प्रतिष्ठामां-शासनदेवी, गच्छदेवी, कुलदेवी, नगरदेवी, भवनदेवी, क्षेत्रदेवी अने दुर्गादेवी ए वधी देवीओनो
प्रतिष्ठाविधि एक ज छे.
॥ इति देवीप्रतिष्ठाविधि समाप्त ।।
*आ आगम रहस्य प्रयत्नपूर्वक गुप्त राखवू. कारण के गुप्त राखनामां सिद्धि छे. प्रगट करवायी संशयरूप पण वनी जाय छे.
॥१०२॥

मा पीजो-
॥१०३॥
गुरुमूर्तिपा-
दुकामविष्टा
विधि
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गुरुमूत्ति अगर स्तूपमतिष्ठा
शुभदिन-शुमनक्षत्र अने शुभमेलाए गुरुनी पादुका के प्रतिमानी प्रतिष्ठा करवी
राविजागरण तथा महोत्सवपूर्वक प्रभातमा सघसमक्ष स्त्रो पुन वि सहित सिंग प्रवेशमा आप्या प्रमाणे स्नान करी
उज्ज्वल रख पहेरी ४ श्रावको आये तेमना हाये ४ सधवा श्राविकाओ (चुदडी ओहेली) ककण बाधे करुनु तिलक करे.
ते चारे श्रावको उत्कृष्टथी १०८ अथवा २१ तीर्थजल औपधिधी भरेला कळशोने लइने उमा रहे.
त्यार पछी दशदिक्पालोने नीचेनो मरथी स्थापना:-
१ "ॐ ही इन्द्राय सायुधाय सवाहनाय सपरिजनाय इह प्रतिष्ठाया आगच्छ आगच्छ बलिं गृहाण गृहाण उदयम्
अभ्युदय च कुरु कुरु स्वाहा।।"
एज रीते २ अग्नये ३ यमाय ४ नितये ५ वरुणाय ६ वायवे ७ कुरेराय ८ ईशानाय ९ ब्रह्मणे १० नागाय इति ।।
एज रीते नवग्रहनी पण स्थापना करवी ते बधा उपर बलि-माकुला तथा लापसी मूकी वामक्षेप करवो.
स्यार पछी दो दिशामा बलि-याकुला उछालना.
पछी ते पुरुपोए मूर्वि अगर पादुकाने-पचामृत, सौंपधि तथा तीर्थजल मिश्रित स्नान नीचेर्नु काव्य भणी करवु:-
यतिमूत्युपरिच निपततु घृतदधिदुग्नादिद्रव्यपरिपूतम् । दर्भोदकसम्मिश्र, पंचगव्य हरतु दुरितानि ॥१॥
वरपुष्पचन्दनथ, मधुरै कृतनिःस्वनैः । दधिदुग्धघृतमित्रै, स्नपयामि यतीश्वरम् ॥२॥
॥१०३॥

प्र. क. भा. बीजो गुरुमूर्तिपा- दुकाप्रतिष्ठा विधि ॥१०४॥ त्यारपछी स्तूप पूजा कग्बी एटले स्तूपने केसर वि. नां छांटणां करवां अने मूर्तिनी गादी नीचे पंचरत्ननी पोटली तथा रूपियो वि. नाखी डगली बंध करवी. पछी सधवा स्त्रीओए कंकुना थापा देवा. त्यारपछी कपूर अने कस्तूरी मिश्रित चंदनथी पादुकान पूजन करवू. त्यार पछी गुरुए वर्धमानविद्याथी वासक्षेप करवो. एज बखते आचारदिनकरमा कह्या प्रमाणे त्रणवार बोली वासनिक्षेप करवो. गुरुमृतिप्रतिष्ठा (आचारदिनकरना आधारे) आचार्यमूर्ति अगर स्तृप प्रतिष्ठाः- मूर्ति के चरणपादुकाने पंचामृतथी पखाली शुद्ध जलथी धोई लूछी धूप उसेययो अने मुहूर्त्तनो समय आवतां मूर्ति अगर स्तूप उपर- "ॐ नमो आयरियाणं भगवंताणं णाणीणं पंचविहायारसुट्टियाण इह आयरिया भगवंतो अवयरंतु साहुसाहुणीमावयसावियाकयं पूअं पडिच्छन्तु सम्पसिद्धिं दिसन्तु स्वाहा।" ए मंत्रथो त्रणवार बासक्षेप प्रतिष्ठा करवी:- उपाध्यायमूर्ति अगर स्तूप प्रतिष्ठा:- "ॐ नमो उवज्झायाणं भगवंताणं बारसंगपढगपाठगाणं सुअहराणं सज्झायज्झाणसत्ताणं इह उव- १०४॥ कि

गुरुमूर्तिपा-
दुकाप्रतिष्ठा
विधि
माधीजो
॥१०॥
माया भगवतो अक्यरतु साहुसाहुणीसावयसावियाकय पूअ पडिच्छन्तु सव्वसिद्धि दिसतु स्वाहा।"
ए मनधी वणवार पामक्षेप करी प्रतिष्ठा करवी.
साधुनी मूर्ति अगर स्तूप प्रतिष्ठा'-
"ॐ नमो सवसाहण भगवताण पचमहव्वयधराण, पचसमियाणं, तिगुत्ताण, तवनियमनाणदस
णजुत्ताण मुस्खमाहगाण इह साहुणो भगवतो अवयरतु साहुसाहुणीसावयसावियाकय पूअ पडिच्छ-
न्तु सव्वसिहि दिसतु स्वाहा।"
ए मत्रथी प्रणवार वासक्षेप करी मतिष्ठा करवी ।।
त्यारपछी तेनी आगळ चोखानी वण ढगली करी तेना उपर त्रण सापारी मूकवी. चारे दिशामा चार नाळीएर
वरी सर्वने व्हेंची आपवु धूप करवो. सधवा स्वीओ गाय. वार्जिन वगडाववां दान आफ्धु गुरुभक्ति अने साधर्मिक-
वात्सल्य विस्तारथी करवु. त्यारपछी गाजते वाजते सपे उपाश्रयमा आवी गुरु पासे प्रतिष्ठालाभनो उपदेश साभळी
सर्वेए पोतपोताना स्थानके जयु
पछी दश दिवस सुधी स्तूपपूजा करवी नैवेद्य मुकवा धूप-दीप वि. करवा.
प्रतिष्ठाकारके दश दिवस एकाशणा करवां अने शीलात पाळबु
इति गुरुमूर्तिप्रतिष्ठा विधि
श्री सरतरगच्छीय
मान मदिर जयपुर
॥१०५॥

मंत्रपट्ट-
प्रतिष्ठा
विधि
भा. चीजो
॥१०६॥
मंत्र-पप्रतिष्ठा विधि (आचारदिनकरना आधारे )
सोनुं रू' तांबु स्फटिक काष्ठ वस आदिथी बनावेला आम अनेक प्रकारना पट्टो होय छै.
वस्खमय पह सिवायना दरेक पट्टोनो पहेलां जिनना स्नात्रथी युक्त पंचामृतथी पखाल करवो. पछी सुगंधी जलथी
पखाल करवो पछी शुद्ध जलथी पखाल करी तेना उपर यक्षकर्दमर्नु विलेपन करवू. पछी २५ वस्तुओथी बनावेल वास-
क्षेपथो तेनी प्रतिष्ठा करवी.
पट्टनो मंत्र प्रतिमा के मंत्रपट्टमा लखेल मंत्रज समजतो. ते मंत्रथी ७ नार वासक्षेप नाखवाथी प्रतिष्ठा थाय छे.
पट्ट वस्खनो होय अगर पस्त्र उपर मंत्र यंत्र के मूर्ति चीतरेल होय तो तेनुं मारिसामा प्रतिविष पाडी ते उपर
उपरोक्त रीते पहेला अभिषेक-पखाल करवो पछी तेगां लखेल मंत्रबडे वासक्षेप करी प्रतिष्ठा करवी.
मखमल विगेरे उपर जरी आदिथी भरेल मूर्तिओनी तथा नवकारवाली वि. नी प्रतिष्ठा पण एज विधिथी करवी.
पट्टमा कोइ देवनी मत्ति कोतरेली अगर चीतरेली होय तो पूर्वोक्त रीते पहेला तेनो अभिषेक करी-
" ॐ ही अपुकदेवाय नमः, ॐ ही अमुकदेव्यै नम
ए रीते जे देन के देनीनी मूर्ति होय तेना नामना मंथी वासक्षेप करी तेनी प्रतिष्ठा करवी.
इति पट्टपतिष्ठाविधिः
*अभिषेक-स्नपन न भइ शके तेम होय त्यां दर्पणमा प्रतिलिंग पाडीने पण रनपन कर. रनपन निनानी प्रतिष्टा प्रमाणभूत नशी.
॥१०६॥

-
म का
मा. पीजो
।।१०७11/
कूर्मटतिष्ठा
विधि
धनाथ
*弦
弹性段位分张x水冷路路路路路路
कर्ममतिष्ठा विधि (विधिमार्गप्रपाना आधारे)
शिलास्थापनविधि
ज्या कर्म स्थापन फरसो होय त्या मुहूत्तना दिपसे प्रथम पूर्वप्रतिष्ठित प्रतिमा सिंहासन उपर पधरावी स्नार पूजा
भणाधी, आरति मगल्टी उतारना पछो त्या चैत्यमदन कर ते पण स्तुति सुधी कर्या पछी श्रीशान्तिनाथआरा-
काउस्सग करु ? इच्छ, श्रीशान्तिनाथआराधना करमि काउस्सग्ग, वदणरत्तियाए अन्नत्य करी एक नफा-
रनो काउ० करी पारी नमो० कही-
श्रीमते शान्तिनाथाय, नमः शान्तिविधायिने । त्रैलोक्यस्यामराधीश-मुकुटाभ्यर्चिताडनये ॥१॥
ए स्तुति कहेगी पछी अदेवयाए क. का अनत्य १ नर० नमो.
यस्याः प्रसादमतुल, समाप्य भवन्ति भव्यजननिवहा । अनुयोगवेदिनस्ता, प्रयत श्रुतदेवता वन्दे ।।
ए स्तुति कही, श्रीशान्तिदेवया क० का० अन्नत्य १ नव० नमो कही-
उन्मृष्टरिष्टदुष्ट-ग्रहगतिदु'स्वप्नदुनिमित्तादि । सपादितहितसम्पन्नामग्रहण जयति शान्ते ॥३॥
ए स्तुति करी, श्रीशासनदेश्याए क० का० अन्नत्य १ नव० नमो कही-
१ वस्तुओ माटे जुओ परिशिष्ट न १
ER जे जिनना नाम कूर्मप्रतिष्ठा होय ते जिननु चैय० वोल्वु, ते न आवडे तो ॐ नम पार्श्वनाथाय ।
कछु
.
॥१०७॥

म.क.
मा. वीजो
॥१०८॥
कूर्मप्रतिष्ठा
विधि
BHASHATRAPATTERNETEETHERY
या पाति शासनं जैन, सद्यः प्रत्यूहनाशिनी । साभिप्रेतसमृध्ध्यर्थं भूयाच्छासनदेवता ॥४॥
ए स्तुति करी अम्बादेवीए क० का. अन्नत्थ १ नव० नमो० करी-
अम्बा बालाङ्किताङ्कासी, सौख्यख्याति ददातु नः। माणिक्यरत्नालङ्कार-चित्रसिंहासनस्थिता॥५॥
ए स्तुति करी, खित्तदेवयाए क० का० अन्नत्थ १ नव० नमो० कही-
यस्याः क्षेत्रं समाश्रित्य, साधुभिः साध्यते क्रिया। सा क्षेत्रदेवता नित्यं, भूयान्नः सुखदायिनी ॥६॥
पछी अधिवासनादेवीए क० का० अन्नत्थ १ नव० नमो० कही-
पातालमन्तरिक्ष, भवनं वा या समाश्रिता नित्यम् । साऽत्रावतरतु जैने, कूर्म ह्यधिवासनादेवी ।।७।।
पछी, समस्तवेयावच्चगराणं संति० सम्म० क० का० अन्नत्थ १ नव० नमो०
सर्वे यक्षाम्बिकाद्या थे, वैयावृत्यकराः सुराः । क्षुद्रोपद्रवसंघातं, ते द्रुतं द्रावयन्तु नः ॥८॥
पछी १ नवकार गणी बेसी नमुत्थुगं० जावंति० जावंत० नमो० स्तवन लघुशान्ति करी जयवीयराय पुरा कहेवा.
पछी वास्तुभूमिमां स्नात्रनुं जल छांट. दश दिक्पालन आह्वान करी बलि-बाकला नाखवा. पछी *शिलासंपुट
तैयार करवा अने वास्तुभूमिना ४ खुणाओमा ४ अने १ मध्यमां एम ५ खाडा शिलाओ करतां कंडक मोटा खोदावीने
राखवा अने ते खाडाओनी नीचे मध्यमां नाना खाडा करावी तेमां एकेक माटीनो कळश (कुलड्डु) सात धान्य अने
* जो प्रासाद पापाणनो बनाववो होय तो शिलाओ पाषाणनी अने इंटोनो बनाववो होय तो शिलाओ इंटोनी तैयार करवी.
॥१०८॥

-
मा. बीजो
कूर्ममतिष्ठा
विधि
॥१०९॥
प
BREARNER
पचरत्न सहित मूक. तेना उपर प्रादीनु ढाकणु ढोक अने ते उपर लग्न समय आवतां १शिलामपुटो स्थापना. तेने
प्रथम स्नान जल्दी पखाली शुद्धनन्याला कळशोथी अभिषेक करी केसर चदननु विलेपन करवु अने जे शिलासपुट जे
२खाडामा स्थापवानो होय ते त्या लइ जा आ शिलामपुगेना नाम-~
१ नदा २ भद्रा, ३ जया, ४ विजया अने ५ पूर्णा अने तेनी स्थापना अनुक्रमे १ अग्निकोण २ नै मत ३ वायव्य
र ईशान अने ५ मध्यमा करी मध्यमा स्थापवानी 'पूर्णा' शिला उपर नीचा मुग्वयाको सुपर्णनो कूर्म३ अने त्रणरेखा-
चाळी श्रेष्ठ कोडी आ वे वस्तुप्रो स्थापनी लगनो समय थता उपरोक्त क्रमथी ज वधी शिलाओवासक्षेप-नावी प्रति
ष्ठित करवी मध्य शिला उपर कूर्म स्थापन करता---
"ॐ हीं श्री कृर्म तिष्ठ तिष्ठ देवगृह धारय धारय स्वाहा।"
- 3 आ 45
ए मन बोली उपर वामक्षेप नाखको
१ शिलासपुर एटले उपर नीचेनी ने वे शिलामा रासवी,
२ सपुट वधारे भारे होय अने मुहूर्त टाइमे तेने स्थिर करता टाइम न पहोंचे तेम होय तो नीचे डाभनी सळी मुकीसपुगे पोन-
पोताना बाडामा स्थिर करी देवा अने स्थापनाना समये नीचेथी सळीओ काढी लेगी
३ कूर्मो ग्थापना पहेला पचामृतथी अभिषेक करखो
१४ जे जातना वास्तुमा कूर्मप्रतिष्ठा करसो होय ते वास्तुनु अहीं नाम चोच.
गपुर
.
*॥१०९॥

कूर्मप्रतिष्ठा विधि म.क. भा. वीजो ॥११० (कूर्मप्रतिष्ठा-देवगृह, प्रासाद, रथशाला, गृह आदि दरेक वास्तुना निर्माणमा यी जोइए.) पछी सौभाग्य १, सुरभि २, प्रवचन ३, कृतांजलि ४ अने गरुड ५ ए पांच मुद्राओ वतावी. पछी इरियावही करी पूर्वोक्त विधिए चैत्यवंदन छट्ठी स्तुति सुधी करवू. पछी प्रतिष्ठादेवतायै करेमि का अन्नत्य कही १ लोगल्स सागरवरगंभीरा सुधीनो काउस्सग्ग करी पारी नमो० कही. यदधिष्ठिताः प्रतिष्ठाः सर्वाः सर्वास्पदेषु नन्दन्ति । जैनं कूम सा विशतु, देवता सुप्रतिष्ठमिदम् ॥७॥ पछीनो गधो चैत्यवंदन विधि उपरोक्त विधि प्रमाणे करवो. चैत्यवंदन समाप्त थया बाद अक्षतांजलि भरी नीचेनी मंगल गाथाओ बोली कर्म उपर नाखवी. स्नात्रीभाओए अक्षतांजलि उपरांत पुष्पांजलि पण नाखवी. मंगलगाथाओ- जह सिद्धाण पइट्ठा, तिलोकचूडामणिम्मि सिद्धिपए । आचंदररियं तह, होउ इमा सुप्पइट्ट ति ॥१॥ समस्थलोयस्स मझयारम्मि। मेरुस्म दीपसमुदाण ॥३॥ जंबुस्स जंबुद्दीवस्स समत्यउदहीण ॥५॥ पछी कूर्म उपर वस्त्र ढांकी चारे बाजु इंटो चणी उपर शिला अगर पत्थरनु पाटीयु ढांकी देवडावQ के जेथो कूर्म उपर शिला आदिनु दवाण न आवे. ।। इति कूर्मप्रतिष्ठारिधिः ॥ ॥२॥ " सग्गस्म 號路器端游路路路路路路撒然%認燃都继帶 ॥४॥ लवणस्स ११०॥

खावमूहर्त
निधि
"
*HRINEETINENTED
खातमुहूर्त्तविधि
भा पीजो प्रथम भूमि शुद्ध री म्नान भगानी अष्टमकारी पूजा करी सतिप्त ग्रह, दिक्पाल, अष्टमगलना पाटला पूजी नैवेद्य
॥११॥ परावबु पछी शान्तिस्नात्रमा आपेली शान्ति उद्घोषणानी १० गाथा कहो आरति मागळदीवो उतारनो.
पछी सलाट नि. कारीगर मजूरोने स्नानादि करानी शुद्ध वस्त्र पहेराची फका तिलक करवा अने हथीयार (कोश,
पावडा, तगारो, गज, डोल) विगेरेने शुद्ध करो तिला करी करुण वाधा पछी कारीगर सहित स्नानकारकोए अगरक्षा
( वजपजरस्तोत्रयो ) करवी पछी ५ कळश सपुट सहित करवा. तेमा वचला कळशमा पचरत्न, अधोमुख कूर्म, पारो,
कोडीओ, सात धान, गायनु पी, साकरनी चासगी मूकना, तेना पर ॐ कूर्म निजपृष्ठे मासाद धारय धारय
स्वाहा।" ए मा यक्षकर्दमथी लखी माथीया वि को ढाणु ढाकी कळशनी पूजा करवी अने तेना उपर सपुट पधरा-
या दरेक सपुटमां पचरत्न तथा रूपानाणु मूकना मुहूर्व जन्वते-" ही प्रो कूर्म जिनगृह धारय धारय स्वाहा ।"
एमा कही वामक्षेप करो
घउना पाममा री गोळ कोपरा नासी मोने यह चबा मगळपाठ भणयो पुष्पाञ्जली करवी.
इति खातमुहून विधि
जीर्णोद्धार (विसर्जन) विधि (निर्वाणलिकाना आधारे)
खडित थयेट, फाटो गयेल, भागी गयेल, वाकी धयेल, जीर्णशीर्ण थयेल, वळेल, घा लागेल, प्रमाणहीन, प्रमागथी
॥११॥

प्र. क. विसर्जन विधि भा. बीजो ॥११२॥ स्वाहा गमाय वरुणाय अधिक, विकराल आकारवाळी, मंत्रना अभावथी पिशाच आदियी अधिष्ठित थयेली प्रतिमाने रठाडीने तेना स्थाने वीजी प्रतिमाने प्रतिष्ठित करवी. प्रतिष्ठाचार्य प्रभातमा उठी, नित्य नियमथी परवारी सकलीकरण करे. पछी खंडित स्फुटित लग्नादि कारणे बीजा विवने स्थापन करवानी इच्छाथी शान्ति निमित्ते बहार दिक्पालोने बलिदान आपे ते आ प्रमाणे- पूर्व इन्द्राय प्रतिगृह अग्निकोण ॐ अग्नये प्रतिगृह स्वाहा। दक्षिण ॐ नातकोण ॐ निक्रतये पश्चिम वायव्यकोण ॐ वायवे उत्तर कुबेराय ईशानफोण ॐ ईशानाय ऊच ॐ ब्रह्मणे अधो ॐ एम बलि आपी वायव्यकोगमां-'ॐ क्षा क्षेत्रपालाय स्वाहा' ए मंत्रथी क्षेत्रपालने बलिदान आपी "ॐ सर्वभूतेभ्यो वपट् स्वाहा" ए मंत्रशी भूनादिनुं सतर्पण करी पछी चैत्यवंदन करी मंडल पासे आवी 'ॐ' कारथी आसन पूजी वेमी भूतशुद्धि अने सकलीकरण करी विशेष अवपात्रनी विशेष शुद्धि करवी. पछी आसनपूजाथी मांडी आवाहन सुधीनुं कृत्य करी अर्धपाय आचमनीय विगेरे दइने हमेशनी विधि मुजर वर्धा जातनी भगवंतनी पूजा करवी. पछी आयुध सहित लोकपालोनी पूजा करवी ते आ प्रमाणे- नागाय ॥११२१

विसर्जन
म.क.
भा पीनो
॥११॥
"
वरुणाय
"
"
॥ गदायै
"
"
"
पदायि
"
पूर्वदिशा-ॐ इन्द्राय स्वाहा, ॐ बन्नाय स्वाहा। अग्निकोण ॐ अग्नये स्वाहा ॐ शक्तये स्वाहा।
दक्षिणदिशा , यमाय
ॐ दण्डाय
। नेतकोण निस्तये ॐ खगाय स्वाहा
पश्चिमदिशा
ॐ पाशाय । वायव्यकोण वायवे
ध्वजाय
उत्तरदिशा कुवेराय
। ईशानकोण ईशानाय शूलाय
स ईशान दिशा , ब्रह्मणे
नैतकोण नागाय
उत्तराय
पछी लोपालोने नीचेरा मगोपी पोतपोताना कार्यमा सावधान करवा-
भो भो शक त्वया स्वस्या दिशि चिनप्रशान्तयेमावधानेन शान्तिकन्तिं यावद्भगवदाज्ञयास्थातव्यम्
एज रीते 'भो भो अग्ने वया' इत्यादि प्रत्येक लोकपालनु नाम आपी कहेत,
पडी अस्त्रमर अने मुद्रापडे पोताना शरीरनी किल्लेबद्दी करी मडपमा बधे अर्घजल छाटाद्वारा विन निवारण करी
देवनी पासे जइ देवनी विपरीत क्रमथी पूना करी विसर्जन निमित्ते दबने अर्घ आपी नीचे प्रमाणे विज्ञप्ति करे-
भगयन् विम्ममिदमशेपदोपावहम् , अस्य चोहारे सति शान्ति' स्यादिति भगवतोक्तम् अतोऽस्य
समुद्वाराय समुत्यत्त मामानिष्ठ एच कुरु
आम विज्ञप्तिपूर्वक आजा मेकरो गाळेना पाणीथी एक सुवर्णनी कळा भरी तेने चदन पुष्प अक्षत वि. थी. पूजी
मूलमायी अभित्रित करी मुद्रा देखाडी तेज जलकळशथी भगाननो अभिषेक करवो.
॥११३॥

विसर्जन
विधि
म.क.
भा. बीजो
॥११४॥
पछी विंचने ने स्थानमाथी दूर करवा मूलमंत्रनो १ हजार जाप करयो अने १०८ सुवर्णनां पुष्पोथी विचनी पूजा
करवी. पछी प्रतिमानी पासे आवी प्रतिमाना शरीरमा रहेल सत्वने नीचे प्रमाणे संभळावे--
प्रतिमारूपमास्थाय, येनादौ समधिष्ठिता । स शीघ्र प्रतिमा त्यत्तवा, गातु स्थानं समीहितम् ।
एम कही " ॐ विसर विसर स्वस्थानं गच्छ गच्छ॥
ए मंत्र बोली अर्धे आपी प्रतिमाधिष्ठायक देनविशेपर्नु विसर्जन कर. पछी मुवर्णनां ओजारने अभिमंत्रित करो
तेनाथी उत्थापन करी सुवर्णना पाशपाली दोरीथी गिखामा गांधी हाथी उपर सवारी करावी सर्व लोकोनी साये " शान्ति-
भवतु " एम बोलता बोलता देने बहार लइ जाय. हवे जो विंग पापाणर्नु होय ना वगा उंडा जळमां अगवा मोटा
पर्वतमा भंडार. मार्टीनी अगर रत्नमयी होवा छतां अग्नि वि. मा दाजबाथी तेजहीन अने स्थानभ्र थइ गइ होय तो
तेने पण उपरोक्त रीने परठरवी.
सुवर्णादि धातुमय बिवने सुधारी पार्छ त्यो म्यापन करी दे.
एज विधिथी-चूलक, ध्वज, मासाद विगेरे जे दोषयुक्त होय नेनु मिर्जन करवं.
प्रासादना विसर्जनमां नीचे प्रमाणे विशेषता समजयो-
प्रासादना जीर्णोद्धारमा मंत्रो अंगमा जोडी विसने राखी प्रासाद नगो तपार चाय त्यां मुधी पगर्नु पूनन करतुं.
प्रासाद ज्यारे तैयार थह जाय त्यारे पडंगयोजित मंत्री त्यायो संहरी पाछा प्रासादनां अंगोगां यथास्थान ते मंत्रोनो
॥११४॥

मा पी
॥११५॥
वर्धमान
विद्या
***************
न्याम सो प प्रमाणे जीर्णन दा की प्रायश्चित्त निमित्ते जाप करतो
पछी आवायने दक्षिणा आपी, खमानी, विदाय करवा
उपर प्रमाणे जीर्ण विवि ने दूर करी तेन प्रकार अने परिमाणपाडा गीत विंध आदिने विधिपूर्वक प्रतिष्ठित करमा.
इति जीर्णोद्धार (सिर्जन) रिधिः
वर्धमान विन्या
"ॐ नमो अरिहताण, ॐ नमो सिद्धाण, ॐ नमो आयरियाण, ॐ नमो उपज्झायाण, ॐ नमो लोए सब-
साहूण, ॐ नमो अरहओ भगवा महईमहावीरवद्धमाणसामिस्स सिज्झउ मे भगवई महईमहाविना ॐ वीरे वीरे
महातीरे जयवीरे सेणवीरे वद्धमाणवीरे जये विजये जयते अपराजिए अणिहिए ॐ हूँ। ठ ठ ठ साहा।"
(जाप १०८ अथवा २१ वार करवो)
॥११५॥

प्र.क. भा. बीजो परिशिष्ट ॥११६॥ गुलाल तोला ५) कपूर तोला ४ परिशिष्ट [विवप्रवेश, अष्टोत्तरीस्नात्र के शांतिस्नात्रमा जोईता सामाननी यादी.] [ आ यादीमां नवग्रह, दशदिक्पाळ, ध्वजापूजन, कुंभस्थापन वगेरे क्रियाओमा जीईती चीजोनो समावेश थई जाय छे. ] गांधीनी दुकानेथी मळतो सेवर्धती सापारी शेर ३॥ पीठी शेर १) गोळ शेर १०) टोपराना गोळा नंग ११८ आंवळा शेर १) सामान- कंकु शेर । पिस्ता शेर १॥ ककोडी शेर | सिंदूर तोला ५) ग्रीवासूत्र शेर १॥ चारोळो शेर १॥ खडी शेर १) अखरोट नंग १४१ रतांजली नवटांक (पीठ घोळवा माटे) श्रीफल नग. ११ तल शेर १॥ मरचककोळ दाणा १० खारेक शेर ५) जटामांसी लविंग शेर ॥ टोपगं शेर ५) खांड-बुरु शर १०) सरैयानी दुकानेथी तथा सुकी द्राक्ष शेर १॥ एलची शेर ०॥ किंद्रप धूप शेर १०) विद्याशाळामांथी मळतो जावंत्री शेर ०॥ मीठ शेर ११ जायफल नग १४१ रोठो सोपारी शेर १०) हळदर शेर । सामान:- राती सोपारी नग १५ कमळफाकडी शेर ॥ धाणाजीरुं शेर 1 अगरनो चुवो तोलो । क.को सोपारी नंग ७ बदाम शेर १) राई नवटांक सुखडना तेलनी शीशी नं० २ मीढळ-मरडाशींगी नंग १५१ । बदामना गोळा शेर ११ मेथी पाकुं तेल शेर १) ।।११६॥

परिशिष्ट
यगरनु रामशेर
|| याचो हिंगळाक तोलो १)
मा पीनो
रास उचो तोला )
॥११७॥
घरास हरमे तोग १०)
केसर तोला १०)
सुपडना फन्डा नग २
(वशेर बशेरा)
! गोरुचदन ये बाल
असर बाल
कस्तूरी चार वाल
दशाग धूप शेर ५)
अगरवाट शेर १)
घासक्षेप
अचर तोला के
पुजणी गये
मोरपीछो नग के
याळाकुवी नगरे
रूपाना वरख योकडी २०
सोनाना घरस पाच घाल
कामढी नग ४
सावधि
पायचूर्ण
सदापधि
शतमूलिका
अष्टग पहेलो
बीजो
आठ जातनी माटी
गुलायजळ
शेठना घरेयी मळतो
सामान:-
सोनानी नवकारवाळी
रूपानी
स्फटिक्नी
केरवानी
अकलग्नी नवकारवाळी
परवाळ नी
गोमेदकनी
नरग्रहनो पाटलो
दश दिकपाळनो पाटलो
अष्टमगळनो पाटलो
रूपाना पुषणा
सोनानी बाटकी
वोरानी दुकानेथी मळतो
सामान'-
फानस मोटा नगरे
फानस नानां नगर
कशेवटी नग १
वेलण नग४
चाकु नग १
कातर मग-१
कागल तथा पेसील
दीपासळीनी पेटी नग६
वीणा नग-२
ताचाना खीला नग.
(छ इवना)
लोढानी सोली नवटाक
(बे प्रण इचनी)
सोनीने त्याची मळतो
सामान
सोनाना फूल बाल २
रूपाना फूल याल ८
रूपानी समाणी नग-१
आगी रवया माटे)
झवेरीनी दुकानेथी मळतो
सामान:-
पचरत्ननी पोटली नग ३०
अणवींध्यु मोती नग १
#NITINERAREER RAPE
-
॥११७॥

परिशिष्ट प्र.क. भा. बीजो क्वानुं नैवेद्यः ॥११८॥ #TREENERY TEENSE कापडियाने त्यांथी मळतो । पंचियां नंग ५ अंगलूछणां झोणी खादीना सामान:- पाघडीयो (सरपाव माटे) पांचपटो गज १॥ साडीयो (सरपाव माटे) लीलो रेजो गज ५॥ पोळो रेजो गज ७) कुंभारने त्यांथी मळतो जांवली रेजो गज 1 सामान:- काळो रेजो गज, on माटलां मोटां नंग १५ आसमानी रेजो गज ॥ माटली नानो नग १५ लीली छींट गज on लोटी नंग २५ धोळं रेशमी गज ३) घडा नग १० लाल रेशमी गज ५n कुडी नग १० तास कसवी (ध्वजामाट) गज १ काची इंटो नंग ४०० लाल कसुबानो ताको १ दीवाढांकणी नंग ५२ नेनसुखनो ताको १ शरावलो नंग ५१ गरणां खादीनां नंग ( डाघ विनानां ) धोतियां नग १२ कोडियां नग ३० खेस नग १२ अष्टमंगळचीतरेला घडानंग ७ चीतरेला सादा घडा नंग १० । टोपरापाक माटी मगज अडाया छाणानो भूको सुतरफेणी मोहनथाळ कदोइ पासे घरे तैयार करा- मेसुर पतासा शेर १० +कणसाइना लाडु नंग १५१ माणेकलाडु लाकडशी लाडु शेर १०) फळबाळाने त्यांथी लाववानो सामान* खाजा वीजोरा नंग ३ वरफी शेरडीना सांठा नंग ५ खारी पुरी + पोतानी शक्ति प्रमाणे एक + नैवेद्य माटे एक प्रकारथी जातिथी मांडीने अनेक प्रकारना वधारे पोतानी शक्ति होय तेटली फळो धरी शकाय. अष्टोत्तरी स्ना. जातनां नवेद्य धरी शकाय छे ने बदले शांतिस्नान होय तो अष्टोत्तरी स्नानने वदले शांतिस्नान फळो न. ४१ समजवां. प्रभुनी प्रति- होय तो नैवेद्य न. ४१ नाणवा प्ठा पराते धरवाना जुदा समजवा. PARTNERNE RETRENTINENERATE पंडा घेवर ॥११८॥ 28 प्रक परिशिष्ट मा बोजो ॥११॥ जामफळ " केळा नग १५० अनाज भेळा करसानी गित (फोतरावाळी) सुतर शेर १३ तरच चणानो रोट शेर २ सुतरनी आटी नग पोपया चोखा मण २) घउनो लोट शेर १५) ळिश रूपाना नगर चणा ) अडदनो लोट शेर । मग शेर ७) सोनानो नग। चोळानो रोट शेर) नाळचानो नग नारगी चोळा शेर ७) चोयानो लोट शेर .) वाटकी नानी नग २५ मुसरी अडद शेर ७) पउना फाडा शेर ४) जय शेर ७) रूपानी चाटकी नग १ जुधार शेर १२) अपड चोखा गणेला राख रूपानी रकावी नगर फणस मोहि बरी शेर २) घउ शेर १०॥ रसायो नग ५ माळीने त्याची लाबानो धोळा सरसय नरटाक अगर शेर १) थाळनग ५१ कपासिया शेर ९) सामान तल काळा शेर मोटा थाळ नग ७ याल शेर १) अघेडानी सोटी नग २ सरसर शेर । सादा पाटला (खीरा आसोपालवना तोरण मारा शेर परचुरण सामान:- विनाना) नग २० फुल दरेक ज्ञातना (रोजचणानी दाळ शेर गायनु धी मण) बाजोठी नग १० जोईए तेरला) मगनी दाळ शेर । भेंसनु घी मण or जीभचाळा कोडीया नग ४ (फोतरायाळी) कोलसा शेर) रामणदीगो नग१ अडदनी दाळ शेर ॥ कुमारी कन्याए कातेलु मोड BRTNERSHEETHINNERY - ॥११९॥ धरो 1 / बी वेलण " २ ४ परिशिष्ट २ 3. ૨ म.क. भा. वीजो चीपिया तपेलीओनानीमोटी, १० तावेथा झारो तावडी मोटी तावडी नानी वाटका थाळी १ or ॥१२०॥ , २५ घाटडी सरपोस आरती मंगळदीवो चंदरवा नग ५ तोरण नंग ५ छत्र जोडी४ चामर नंग छडी नग २ परनाळियो वाजेठ नंग १ नळो नंग १ नळानां अडधियां नंग २ घंटडी नग २ २ १ " १ गुगळ शेर ५ यक्ष यक्षिणीनां रेशमी वस्त्रो कांसानी थाळी झालर वांसना जवेरिया सुतरनी जाडी दोरी (पाणी | तीर्थनां पाणी सिंचवा माटे) छोडिया ( होम माटे :-- दीवीओ नंग.२ पींपळना तांबाकुंडी ,२ आंवाना कोठाना जाजम उमराना चदनी आसोपालवना कनात पुंठियु नंद्यावर्तनो पट नंग १ सोनानी सळी पंखा २ चोखडा रूपिया नंग २ देवीनो पट नागरवेलनां पान सेवननी पाटली (रोज जोइप तेटलां) गंगाजळ अब्दागीरी वीजां वासणनी विगतः-- घटाकर्णनी थाळी नंग १ तांवानी गोळी नंग १ ओरसिया २ कडछी १० , १ ૨ REPSEENERRORE or वाढी तपेढं मोटुं तपेलु नानु पाणीना देगडा कथरोट लोटा तळवानो सोयो १ १ २ " */ दर्पण ૨ ॥१२०॥ १ सिंहासन " २ २ इंद्रध्वजा" १ परिशिष्ट मा वीजो वासना जवारिया नग४ तावानो खीलो छ इचनो चदरवो (कुभ उपर वायवा) अगरवाट कद्रुप धूप पाच फळ ॥१२१॥ पाच नैवेध कुम स्थापन, दीपस्थापन तथा श्रीफळ (जव, जुवार, यरी, चणा, जुगारा वापवानी विधिमा मदिळ છે ૧૨ मग, सरसव घ3) जोईता सामाननी यादी- डाभ अने धरोयाळु ग्रीगसूत्र स्लाधनो सामान (बाजोठ चीतरेलले फूम्हार नगर वगेरे) केसर (घसेल) तोलो सामान्य रीते अष्टप्रकारी नाडाछडी दडो १ अघेडानी लेपण मीही शेर । पूजानो सामान दशामधुप नवटाक वासक्षेप नवटाक सोनाना वरप थोकडी १ धुपचाण जीभवाळु मोटु कोडियु नग१ ककोडी कुसुमाजलि माटे वासचोखा १०८ के २७ तारनी दीवेट आपळा पकु नस्टाक पलाळेली माटी चोखा शेर १॥ सरावला (काळा डाघा रूपेरी वरग थोकडी सोपारी शेर) वगरना) ४,८ के १२ रुपिया रोकडा ३ खातर अडाया छाणानो भूको मोटु फानस छुटा पैसा एक रुपियाना तथा कोरी माटो लीलो पीळो तास्तो एक रूपियानु परचुरण गरम पाणी छुटा फूल पवरत्ननी पोटली नग २ बाढी नागरवेलना पान १० सात धान्य शेर थाळी वेलण पतासा साफर PRESENTERTAINMENTREPRENTIN घट दर्पण गायनु घी चामर पखो कळश अगलुछणा ॥१२॥ दूध शेर -- भातु शेर १) परिशिष्ट : म.क. भा. वीजो ॥१२४॥ " १ ककु नक्टांक कपूर तोलोग दशांग धूप शेर । मेसूर ककडा ५ लाडवा नंग २ रतांजलीनु लाकडं नवटांक घेवर नग ५ (पम के त्रण जातनां नैवेद्यना पुरी ૨ अम्बर वाल ॥ घशीदळ (चोखाना लोटना)। पांच पांच कफडा) खाजा २ मरचकंकोल दाणा ८ नंग ५ नागरवेलनां पान नंग ५१ चीपियो चासक्षेप शेर ॥ पेंडा नंग ५ नवग्रहना पाटलो कळश २ जुरमाना लाहु नंग ४ दशदिनमालनो पाटलो देगडो अगरनो चुवो तोलो 1 ममराना लाड नंग ४ अष्टमंगळनो पाटलो नवग्रह, दशदिक्पाल अने सुखानु तेल तोलो १) गोळधाणीना लागु नंग ३१ सीला वगरना पाटलानंग१० अगरनु लाकडं मगनी दाळना लाइ नंग १ लीलो द्राक्ष नवटांक अष्टमंगल पूजननो दूध शेर १) चणानी दाळना लाडु ॥ ४१ ४१ । शेरडी धोळी नंग ५ सामानः दहीं नवटांक पुरी ५ राती सोपारी नंग १५ केसर तोलो १) नाडाछडी जण वडा ५ काळी सोपारी कस्तूरी चाल २ मांढनंग १० अउदनी दाळना लाउ ५/नारंगी सुखडना ककडा न. २ मराशीगी २ पीर वरास तोलो ॥ सोनेरी रख थोकडी ? काळा तलना लान શરૂ मोसंबी काचो हिंगळोक तोलो ०॥ रूपेरी वरप थोकडी १ » ५० बोजोर गोरोचन्दन चाल २ फोनस प्याला साथे नंग ३ गलेफां ५ श्रीराळ " मोतया लाइ GWGGC ॥१२४॥ " परिशिष्ट . " DI " भा. चीजो ॥१२५॥ 01 " " " दाडम वेळा उजली पदाम खारेक मोपारी अपरोट जायफ कमलकाकडी तिज रडा रवींग परवी " " सफेद मोगरो काळा शीगोडानग३ गज | मोरसडी जाउद गुहार आसमानी, २ रानी सरल अघेडानी फ्रम नग २ लीला सात धान्यना याक्ळा शेर समूळो डाभ जामली भारती धरो लीली छीट १ मङ्गलदीको राती छोळी कणेर रेशमी धोल सुनराऊ घोछ २ घटडी घोतिया नग १२ दपण यहुवर्णा फूल (सर्वजातना फूल खेस फानस मारती, जाई मचकुद वगेरे) पचिया फळश नग४ पाचपटो गज १ थाळोवेलण पोळ रेशमी कामळी ૨ धोलु रेशमी सुतराऊ धोळा सवा गजना केरवानी माळा पीळाशीगोडा नगर गज ॥ फकडा नग३ अफर येरनी माळा "३ , on[पाटलाना जस्तर माटे स्फटिकनी माळा ४ शीगोला एटले शीगोडाना अहलुछगा नग २ सोनानी माळा आकारे ऋण गुणावाळी गेड बाटेरा हाथ लुछयाना पकडा नग ३ | रूपानी माना कापडना वडा समजता ओसियो (चदन घसवानो) । गोमेदकनी माळा " कानु राता रुपिया तथा पैसा चपणे उमरो

doo
प्र.क.
परिशिष्ट
भा. बीजो
॥१२६॥
सफेद फूल
पंचरत्ननी पोटली न. ३
[सोनु, रूप, मोती, माणेक
अने प्रवाल]
कडली
झारो
तावेथो
ओरसियो
देगडा नं. २
तावडी न. २
मोटुं तपेलु
नानी तपेलीओ
वाटका न. २५
थाळी
न. १०
चिपिया
२
ढांकणावाळी वाढी नं. ३
पीत्तळनी गोळी , १
नवणनी कुंडी
कथरोट
मोटा थाळ
करवानुं पात्र
वाटर्नु पात्र
खीरनु पात्र
भातनु पात्र
घंटाकर्णपूजननो सामानः-
घंटाकर्णनी थाळी
अगरना ककड़ा नंग १०८
१०८
धूप
दीप
रूपियो
श्रीफळ
सुखडी शेर ।
[कांसानी थाळीमां]
रेशमी ककडो (बांधवा माटे)
वरख
यक्षकदम
कपूर
शिखरमा मूकवानो सामान
मीढळ
सोनाना इन्द्र
मरडाशींगी
रूपानी इंद्राणी
फूल (सर्व जातनां)
ढोलीओ
पंचरत्ननी पोटली
गादी तकीओ
पान
रेशमनी दोरी
सोपारी
तांबार्नु तपेलु
पतासां
खांड
वासक्षेप
घी
वाकला कोरा (सात धान्यना) शिखर उपरनी पाघडी
शेर १
पंचरत्ननी पोटली
जवेरा वावेलां शरावला सोनावाणी
पुंखणा
याकळा
(धूसरू, सांबेलु, प्राक, रवैयो, | धूप
सरैया)
दीप
नैवेद्य
संपुट
१
" २०
॥१२६॥

पचामृतनी पाच वस्तुओ फरसे चणाना वाकळा पाणी रूपानी हासडी परिशिष्ट मा चीजो ॥१२७॥ दहीं घी सार पाणी सोळ पातनी यादी क्सार भगवाननी गादी नीचे मूपानो सामान:- फरता चाफ्नी मारी पभगनी माटी गनदतनी माटी समूळो डाम अने धरो पचरत्ननी पोटली सफे। सरसर RRENTIRRRRRRRRRRRI अगर वरास कस्तूरी गोरोचदन रतानली काचो हिंगळोक मरवक्कोल सोनानो चरख अष्टगधनी आठ वस्तुओ घरास केसर कस्तूरी सुखड अगर रक्षापोटली सरसवनी % % %%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%88%E पचगव्य गायनु छाण मून " करवो मालपुडा चोखाना पुला खीर अडदना वडा रोटली घणाना बाकळा मगना याकळा ककु फाचो (चादीनो) चोखो रूपियो अखड चोखा दहीं सम्पर ॥१२७॥ यक्षपदमनी दश वस्तुप्रो । मरचककोळ फेसर काचो हिंगळोक मुखड चार पाननी यादी कसार

*
परिशिष्ट
म.क.
नाणा साधे
भा. बीजो
||१२८॥
वाकळा
केसर
राजदरबारनी
सुखडी शेर सवापांच
सोपारीना ककडा
३ थाळ-चार हांसवाळो मा.
फरता चकनी
श्रीफळ नंग ९
णिक्य दीवो रूपा.
पाणी
सोपारी, १०८
[साथे चार हांसवाळा दीवडा] पाटला आलेखननो सामान फलो शक्ति प्रमाणे (२४-२४
४ थाळ-अएमङ्गळ साथे
वांसनी सळियो त्रीस, हळदर
केसर
नग)
५ थाळ-नंद्यावर्त आलेखेला
कंकुनो घोळ
सुखड
सर्व जातना मेवा (२४-२४ अने वासे पूजेला
त्रण रेखा
कस्तूरी
नंग)
अगलुंछणांनगर साथे
हिंगळोक
कंसार शेर १५
६ थाळ-वे वरगडा, चोखा
कपूर
शेर २१, रूपाना',
ककु
प्रतिष्ठानो सामान
विषप्रवेश बखते सामैयाना
सोपारी नंग ७
आठ जातनी माटी
७ थाळ-चोखा शेर सवा
गादी नीचे भूकवानो सामान सामाननी यादी
नदीसंगमनी
(जुमो पा १२७)
पांच, श्रीफळ, रूपा.
१ थाळ-चोखा शेर २। सात
गजतनी
सेवननो कूर्मवालो पाटलो सोपारी, एक रूपियो ८ संपुट
पासरोवरनी
यक्षकर्दम
गंगानदीनी
अमंगळनो घडो
रोकडो अने पंच-१ पुंखणां
तीर्थनी प्रतिमा साये १० वरघोडानो बधो सामान
उधेइनी
वृषभशगनी
(चोखा शेर ६॥ सोपारी नंग २ थाळ-डांगरतु अख्या' ११ प्रभुने तेडवा जाय त्यां
७ युक्त)
शेर १३ रूपानाणा स्नान भणाववानो सामान
पर्वतशिखरनी
महळकुम
॥१२८॥

परियिष्ट नेवेद्य मा.बीजो ॥१२९।। (शिलाओना अभिषेक माटे) रोण्डारूपिया ५ कूमप्रतिप्पामा जोइती सोताना फुल १०८ वस्तुओनी यादी- जीर्णोद्वार (क्सिजन बामनी सलो ५ सोनानो तार (५ हाथ) सोनानो काचयो विधि)मा जोइती जलश्लश १ दायी (सवारी माटे) पंचाननो पोटली वस्तुओनी यादी- कळशा नाना ४ थीफळ ५ माटीना कुरा स्नात्र अने अष्टप्रकारी पूजानो | चोसा शे ५ अगलूछणा ३ माटीना ढाकणा५ सामान रू २)ना पसातथा परचुरण धर्मने अदाढवानु वस्त्र हाथर उपशिला सिंहासन १ सात धान्य (याकळा माटे) गुरमूर्तिप्रतिष्ठामा जोदती (शिलासपुट) ५ सोपारी शे , पचतीर्थी प्रतिमा १ कोप सात धान्य वस्तुओनी यादी- खारेक शे ol, (कळशमा नाखवा तथा या. आरीसो कोपरा शे पंचामृत फळा माटे) फानस दीयो १ पतासा गे ) दीवासळीनी पेटी भारती-मगलदी साकर शे 01, मूर्ति अगर पादुका प्रक्षालनो फुडी नाबाछडी ददोर नागरवेलना पान २५ धूप घी चोखा गुरघोल स्नात्रपूजानो सामान स्नात्रीया ४ याकळा (सात धान्य) पच मृ वालाकुची १ फळ १० सारेक, कोपरा पतासा, मोटो पाट १ नैवेद्य १ साकर सोपारी वि ५। शेर $然珍然崇弟弟绕资杂费然密密密密密密密举密第 डाम घरो ॥१२९॥ पचवर्णी फुल ३ ककोल म.क. ४ कपूर परिशिष्ट भा. बीजो ॥१३०॥ ५। शर नागरवेलनां पान २५ बेत्रण जातना नवेद्य पंचरत्ननी पोटली १ स्नान तथा अष्टपकारी पूजनो सामान सुखड शे. ५१ श्रीफल न. ५ पच्चीश यस्तुना वासक्षेपमा आरती पच्चीस वस्तुओ- २ चदन २ केशर ५ विष्णुकान्ता ६ शतावरी ७ वालो ८ दुर्वा (घरो) ९ प्रियंगु (घउला) १० उशीर (सुगंधीवाळो) ११ तगर १२ सहदेवी १५ जटामांसी १६ शिलारस १७ कमुंबो १८ लोध्र १९ बला २० तज २२ कदंव २२ उबर २३ पीपलो २४ घन २५ आन्न पट्टमतिष्ठामा जोइती वस्तुओनी यादी- स्नात्र अने अष्टप्रकारी पूजानो सामान अभिषेकनी औषधिओ रु. ५) रोकडा रु. ५) नु परचुरण तथा छुटा पैसा फल नैनेय तथा सत्तरभेदी पूजाने लायक सामग्री. Final १३ कठ १४ कचूरो ॥ इति श्रीनतिष्ठाकला द्वितीय भाग समाप्त । ।।१३०॥ भी तरतरगावीर साल मन्दिर, जगप

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च
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155
॥ इतिश्री प्रतिष्ठाकल्प वीजो भाग समाप्त ॥
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15555
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5555555555555555555555555
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Pratishtha Kalp Adi Atiupyogi Bhag-2

Author
Somchandbhai
Title
Pratishtha Kalp Adi Atiupyogi Bhag-2
File name
Pratishtha Kalp Adi Atiupyogi Bhag-2
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2011/02
Publisher
Khambhat, Sheth Bulakhidas Nanchand Shri Bhatibai Jain
Language
Sanskrit
Pages
142
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
549879
Barcode
99999990030723.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
kD1d29jRHc3
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Pratishtha Kalp Adi Atiupyogi Bhag-2