Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Nandisuttam Vol - Ix
Front matter
N AN DI SU
T TAM
by
DEVAVĀCAKA
with the CŪRNI by
JINADĀSA GANI MAHATTARA
Edited by
MUNI SHRI PUNYAVIJAYAJI
General Editors :
Dr V S. AGRAWALA
Pandit DALSUKH MALVANIA
PRAKRIT TEXT SOCIETY
VARANASI-3
AHMEDABAD-9
1966
Published by
DALSUAK HALYAXIA
Secretary,
PRAKRIT TEXT SOCIETY
VARAXASI-5
Price Rs 101-
Arailable from 1
1 MOTILAL BANARASIDASS NEPALI KUATRA Post Box 75 VARANASI
2 CHAUKHAMBA VIDYABHAVAN CHAWK VARANASI
3 GURJAR GRANTHARATNA KARYALAYA GANDNI ROAD AHMEDABAD-1
SARASWATI PUSTAK BHANDAR RATANFOLE HATILIKHAYA AHMEDABAD-1
5 MUNSHI RAM NANOHARLAL NAI SARAK DELHI
Prated by -
JAYANTI DALAL
Vuant P Prest
Gbeekuata Ghalabhala Wadi,
AHMEDABAD-1
माकृतग्रन्थपरिषद् अन्याङ्क ९ सिरिदेववायगविरइयं नंदीसुत्तं सिरिजिणदासगणिमहत्तरविरदयाए चुण्णीए संजुयं संशोधकः सम्पादकश्च मुनिपुण्यविजयः जिनागमरहस्यवेदिजैनाचार्यश्रीमद्विजयानन्दसूरिवर(प्रसिद्धनाम-आत्मारामजीमहाराज )शिष्यरत्न- प्राचीनजनभाण्डागारोद्धारकप्रवर्तकश्रीमत्कान्तिविजयान्तेवासिना श्रीजैनआत्मानन्दग्रन्थमालासम्पादकानां मुनिप्रवरश्रीचतुरविजयानां विनेयः प्राकृत अन्य परिषद्, वाराणसी-५ अहमदावाद-९, वीरसंवत् २४९२ विक्रमसंवत् २०२२ इस्वीसन् १९६६
प्राक
दलसुख मालणिया
सेक्टरो प्राकृत टेक्स सोसायटी
वाराणसी-
-
जयति दलाल
पसंत प्रिन्टोग प्रस
धोकांटा लामाईकी वाही
बहमदाबाद-१
गंथसमप्पणं
.
वरसुयसायरवीईतरतमण-वयण-कायजोगाणं ।
वरजिणआगमपयडणकरणे अपमत्तजोगाण ॥ १ ॥
जोगाजोगविहन्नूण नूग गंभीग्मिाए गरिमाणं ।
आगमउद्वारय 'वरउवाहिमंताण सताणं ॥ २ ॥
आयरियपुगवाण सागरआणंदमूरिणामाणं ।
महणायसदसच्चावयाण दुसमम्मि कालम्मि ॥ ३ ॥
करकमलकोसमझे ताग सपइ दिवंगयाण मए ।
अप्पिज्जइ गंथोऽय विणएण पुण्णविजएणं ॥ ४ ॥
ग्रन्थसमर्पण जिनका मन वचन-काययोग श्रेष्ठ श्रुतसागरको तरगोंमें तैरता था, जो श्रेष्ठ जिनागमके प्रकाशनमें अप्रमत्तयोगसे प्रवृत्त थे, योग- अयोग के विवेक में कुशल थे, गाम्भीर्यगुणको गरिमासे अन्वित थे, 'आगमोद्धारक 'की श्रेष्ठ पदवीसे विपित सत थे, और दुषमकालमें जिन्होंने अपने आपमें 'महानाद' शब्दको सत्य सिद्ध किया था ऐसे साम्प्रत कालमें दिवगत आचार्यश्रेष्ठ श्रीसागरानन्दसरिजीके पवित्र करकमल रूप कोषमें यह ग्रन्थ विनयपूर्वक समर्पित करता हूँ। पुग्यविजय प्रकाशकीय निवेदन जैन आगम ग्रन्थों के प्रकाशनके लिए अब तक अनेक व्यक्ति और संस्थाओंने प्रयत्न किया है। ई. १८४८ में सर्व प्रथम स्टिवेन्सन ने कल्पसूत्रका अनुवाद प्रकाशित किया किन्तु वह क्षतिपूर्ण था। वस्तुतः वेबर ही सर्वप्रथम विद्वान माने जायंगे जिन्होंने इस दिशामें नया प्रस्थान शुरू किया । उन्होंने ई. १८६५-६६ में भगवती सूत्रके कुछ अंशो का संपादन किया और उन पर टिप्पणीरूप अपना अध्ययन भी लिखा । राय धनपतसिंह बहादुरने आगमोका प्रकाशन १८७४ में शुरू किया और कई आगम प्रकाशित किये किन्तु उनका मूल्य हस्तप्रतो की मुद्रित आवृत्तिसे कुछ अधिक था । फिर भी- विद्वानों को दुर्लभ वस्तु सुलभ बनानेका श्रेय उन्हें है ही। जेकोबीका कल्पसूत्र (ई. १८७९), और आचारांग (ई. १८८२), ल्युमनका औपपातिक (ई. १८८३) और आवश्यक (ई. १८९७), स्टेइन्थलका ज्ञाताधर्मकथा का कुछ अंश (ई. १८८१), होर्नलका उपासकदशा (ई. १८९० ), शुकिंगके आचारांग (ई. १९१०) इत्यादि ग्रन्थ आगमों के संपादनकी कला में आधुनिक विद्वानों को संमत ऐसी पद्धति को अपनाकर प्रकाशित हुए थे। फिर भी लाला सुखदेव सहायद्वारा ऋषि अमोलककृत हिन्दी अनुवाद के साथ (ई. १९१४-२०) जो ३२ आगम प्रकाशित हुए तथा आगमोदय समिति द्वारा समग्र सटीक आगमों का ई. १९१५में जो मुद्रण प्रारंभ हुआ उनमें उस पद्धति की उपेक्षा ही हुई । आचार्य सागरानन्दसूरि द्वारा संपादित संस्करण शुद्धिकी और मुद्रण की दृष्टिसे राय धनपतसिंहके सस्करणसे आगे बढा हुआ है और विद्वानोंके लिये उपयोगी भी सिद्ध हुआ है। इस संस्करणके प्रकाशनके बाद जैनधर्म और दर्शनके अध्ययन और संशोधन में जो प्रगति हुई उसका श्रेय आचार्य सागरानन्दसूरिको है। किन्तु इतना होने पर भी आगमों को आधुनिक पद्धतिसे समीक्षित वाचना की आवश्यकता तो बनी ही रही थी। पाटनमें ई.१९४३ में आगम प्रकाशनके लिए जिनागम प्रकाशिनी ससदकी स्थापना की गई किन्तु उससे अब तक कुछ भी प्रकाशन हुआ नहीं। पू. पा. मुनिश्री पुण्यविजयजी लगातार चालीससे भी अधिक वर्ष से इस प्रयत्नमें है कि आगमोंका सुसपादित सस्करण प्रकाशित हो । उन्होंने इस दृष्टिसे प्राचीन प्रतों की शोध करके कई मूल आगमों और उनकी प्राकृत-सस्कृत टीकाओ के पाठ संशोधित किए हैं। इतना ही नहीं उन्होंने टीकाओं में या अन्य ग्रन्थों में आगमोके जो अवतरण आये हैं उनका आधार लेकर भी पाठशुद्धिका प्रयत्न किया है। उनके इस प्रयत्नको ही मुख्यरूपसे नजर समक्ष रख कर स्वतन्त्र भारतके प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्रप्रसादने ई. १९५३ में प्राकृत ग्रन्थ परिषद्की स्थापना की । अबतक इस परिषद् के द्वारा प्राकृत भाषाके कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ सुसंपादित होकर प्रकाशित हुए है। तथा पं. हरगोविंददासका सुप्रसिद्ध पाइयसदमहण्णवो भी पुनः मुद्रित हुआ है । प्राकृत ग्रन्थपरिषद् के द्वारा सटीक आगमों का प्रकाशन होना है यह जानकर केवल मूल आगमो के प्रकाशनके लिए बंबईके महावीर जैन विद्या- लयने ई. १९६० में योजना बनाई और पू. मुनिश्री का सहकार मांगा जो सहर्ष दिया गया । यह परम हर्षका विषय है कि प्राकृत ग्रन्थ परिषद् अब अपने मुख्य ध्येय के अनुसार आगमप्रकाशनके क्षेत्रमें भी प्रवेश कर रही है और समग्र आगमके मगलभूत नन्दीसूत्र आ० जिनदास महत्तर कृत चूर्णि और आचार्य हरिभद्रकृत वृत्ति आदिके साथ नवम और दशम ग्रन्थके रूपमें प्रकाशित कर रही है । इसका श्रेय पू. पा. मुनिराज श्री पुण्यविजयजी को है निन्होंने बढे परिश्रम से इनका संपादन दीर्घकालीन अध्यवसायसे अनेक हस्तप्रतो और टीकाओंके आश्रयसे किया है। इसके लिए प्राकृत प्रन्थ परिषद् और विद्वज्जगत उनका ऋणी रहेगा। ता. २९-६-६६ दलमुख मालवणिया मंत्री प्राकृतग्रन्थपरिषद् ग्रन्थाङ्क ९ নিরাময় एमालगायाधरणा नायिन्यायावर REETसाभरापमाननाम्नमः यरका नाममा inकसरमाहाशात्यामनियारसरमणियनयानयामाधमन्सवसाय inामयारागारम्किामाविम्यागराध्यागमगरयाबारामतयाणमफ्यमय रूसागरणापापपरवरदिनसमायण्मयकायदयालयएफय ल भरत्ययापनमा मारव्यागासखाया समविरमकागजया सशस्थपरकायाभिमन्यम्भावएगगनगमmge यसममियायलयफास्यचिसापायवारयण्यगाथासायनरमाया पदमासगरमायनशासम्मन्ययायाम पापपासायाभिमननयनियमापनारायण पाहण्याससंख्यामा यमास्या राग सिमानामा नन्दिसुत्रमूलको ‘जे.' सज्ञकप्रतिके प्रथम पत्रकी प्रथम पृष्ठि और अतिम ( २६वा) पत्रकी द्वितीय पृष्ठि । WHATIयाजयजगजीवानालावियागTEST framera रायण मारयलारपदमणामारगयामनातागरतनसा धागारमरजत CRIRT सातयपिगरयोगा पमरामायणकमगसम्मन्यायातिय राममायबर यामप्रपनरदामधारमामन बनायारायभामरयागंसगरमा रमाना तिरालमा न्यायग्राचीरस्यास्सियसन्स्यगणरमनपारामाउगरानमा TERRISशय समागलायम सहसपटना टायगाल्ल्याबरोबर 7 धारमा 2 गराध्ययरिययाश्यापाoin मागण्यानमगाटा पावापानावर. SSSRETIREभमान) यापेगावकामारामागभारसम पगिmyricसारम TwiCRIRISTRICE मिसाANTEREST AFTERT मशाल पापा targe MAMETERT nिymwMART ramirarmannewmmmmmRTश्यों IT, UTTARD AADITail नन्दिसूत्रम्ल की 'ख०' सज्ञक प्रतिके प्रथम और अतिम (१९वा) पत्रकी द्वितीय पृष्ठि । N स्मानरमामा-मासनकोगादाएमासयकासमिनियमन RRIAास्म वासरस्मानापमानामध्यमासकडेराबस्सा उमरगनारोनभरपारसमसमाचारमगामामामायाममयरस एसपपसरगमाभायमानापमनाएषामाकाशमानसानामय बारामासानायरामानिमाकविटाविसाधान RRHORTANTRAनगमायामिनिस्क्यानवय मानिरामयनिशपायामामासंदाणान्यानरमयबाविस्टार साकादतनिलिमात्सायनालामावास्यास्सस्मानावयापाविसमाना माराप्रवाशिणयमधमनम्मेgaविदमनात्मायनसुनावमा Pneसनिश्यिाधिदिमयसमाययमादासप्रावधयानिमत्यमाएका सभाममविवागधरवाना सर्वामिवियाशाननवाननाकवतनाणमामबाबमालाविससवासात ESSAIRTELEAmमamareamsnावसामानवियम Feerमय विवरणसवगणाशियलचस्मामागामसूतजनमाने देवमामालिकानानानामय कम्यनिमयसमाधानतिरसनात्रा माणिमामालिनवाजधानमितिलमिलानमक शिवकालगवियागangeवाममनोधम्मापासामग्ररणाकावनिमन। विस्थापिनसतिगुरुमिनिममामलायसनमनगवानदारुकामाता ENTमागसपनपतिसरगासारसावागविकसनवारपसवOM साम्गयस्ता कामSITERATIOमयशसवस्याला rearraniResunामासाशमजिताधामनारतिरकर द्वारा सम्मासिसवनाकालाmanarai समलमनिम्नानण्यटनमा দয়ালজ্ঞিযব নবাবগ্রামবাসটি लक्षशन निवाधिनत्यविधाननिर्ममाणायामदेवकाजममनोति समयलयसमामातिब्ध नन्दिसूत्रचूर्णिकी 'जे.' सज्ञकप्रतिका जिस पत्रसे प्रारभ होता है उस १८वे पत्रकी और अतिम (२२३वा) पत्रकी द्वितीय पृष्ठि ।
प्रस्तावना ॥ जयन्तु वीतरागाः ॥ चूर्णिसहित नन्दीसूत्रके सशोधनके लिये मूलसूत्रकी आठ और चूर्णिकी चार, एवं सब मिलकर बारह प्रतियां सामने रक्खी गई है। इनमें से मूलसूत्रकी तीन और चूर्णीकी एक, ये चार ताडपत्रीय प्रतियाँ है । इन सबोका परिचय इस प्रकार है जे० प्रति—यह प्रति जेसलमेरके किलेमे स्थित खरतरगच्छीय युगप्रधान आचार्य श्रीजिनभद्रसूरि ताडपत्रीय ज्ञान- भंडारकी ताडपत्रीय प्रति है । सूचीमें इस प्रतिका क्रमाङ्क ७७ है। इसमें पत्र १ से २६ में नन्दीसूत्र मूल है और पत्र १ से २९७ में श्रीमलयगिरिसूरिकृत वृत्ति है । प्रतिकी लबाई-चौडाई ३३॥४२॥ इंच है । प्रतिपत्रमें पत्रकी चौडाईके अनुसार चार या पांच पंक्तियां लिखी है। प्रति तीन विभागमें लिखी गई है। प्रति शुद्धतम है । पुष्पिकाके लेखानुसार इस प्रति का सशोधन खरतरगच्छीय आचार्य श्रीजिनभद्रसूरिने स्वयं किया है । अनेक स्थानपर आपने उपयोगी टिप्पनीयाँ भी की है, जो हमने हमारे मुद्रणमें तत्तत् स्थान पर दे दी है । प्रतिकी लिपि सुन्दरतम है । अन्तमें लेखककी पुष्पिका इस प्रकार है- स्वस्ति । सवत् १४८८ वर्षे श्रीसत्यपुरे पौष वदि १० दिने श्रीपाचदेवजन्मकल्याणके श्रीखरतरगणाधिपः श्रीजिनराजसूरिपट्टालंकारसारैः प्रभुश्रीमज्जिनभद्रसूरिसूर्यावतारै श्रीनन्दिसिद्धान्तपुस्तकं स्वहस्तेन शोधित पाठितं च । तच्च श्रीश्रमणसद्धेन वाच्यमानं चिर नन्दतु ॥ सामान्यतया श्रीजिनभद्रमूरिक उपदेशसे लिखाई गई प्रतियाँ स्तम्भतीर्थ(खंभात)निवासी खरतरगच्छीय श्रावक परीक्षित धरणाशाह या श्रीमालिज्ञातीय () बलिराज-उदयराजकी पाई गई है । किन्तु इस प्रतिमें इन तीनोंमेंसे किसीके नामका उल्लेख नहीं है । यहां यह भी स्पष्ट होता है कि अपने विहारगत क्षेत्रोंमें भी आचार्य श्रोजिनभद्रसुरिको अन्य मुख्य कार्यों के साथ साथ पुस्तकलेखन-सशोधन-अध्यापनादि कार्य भी था । सं० प्रति—यह प्रति पाटन-सघवीपाडाके लघुपोशालिक ताडपत्रीय जैन ज्ञानभंडारकी ताडपत्रीय प्रति है। इसके पत्र ८२ है । प्रतिपत्रमें तीन या चार पंक्ति लीखी है । प्रतिपंक्तिमें ४० से ४३ अक्षर लिखे है । प्रति दो विभागमें लिखी है। इसकी लंबाई-चौडाई १४४१॥ इचकी है। प्रतिकी लिपि सामान्यतया अच्छी है । अन्तमें लेखक की पुष्पिका नहीं है। इसके अन्तमें अनुज्ञानन्दी नहीं है। खं० प्रति-यह प्रति खंभातके श्रीशान्तिनाथताडपत्रीय जैनज्ञानभंडारकी ताडपत्रीय प्रति है। प्राच्यविद्यामंदिर- बडौदासे प्रकाशित इस भंडारकी सूचीमें इसका क्रमाङ्क, ३८ है । इसमें पत्र १ से १८ में नन्दीसूत्र मूल है, पत्र १८-१९ में अनुज्ञानन्दी है और पुन पत्र १ से २४७ में नन्दीसूत्रकी मलयगिरीया वृत्ति है । प्रतिकी लंबाई-चौडाई ३१॥४२॥ इंच है। ताडपत्रकी चौडाईके अनुसार तीनसे पाँच पंक्तियाँ लिखी हुई हैं । प्रतिपंक्तिमें १०१ से ११९ अक्षर लिखे पाये जाते है। प्रति शुद्धप्राय है और लिपि सुन्दरतम है । प्रति तोन विभागमें लीखी गई है । अन्तमें इस प्रकारको पुष्पिका है स० १२९२ वर्षे वैशाख शुदि १३ अयेह वीजापुरे श्रावकपौषधशालायां श्रीदेवभद्रगणि प० मलय- कीर्ति पं० अजितप्रभगणिप्रमृतीनां व्याख्यानत ससारासारतां विचिन्त्य सर्वज्ञोक्तं शास्त्र प्रमाणमिति मनसि ज्ञात्वा सा० धणपालसुत सा० रत्नपाल ठ० गजमुत ठ० विजयपाल श्रे० देल्हामुत श्रे० वील्हण महं० जिणदेव मह० वीकलसुत ठ० आसपाल श्रे० साल्हा ठ० सहजासुन ठ० अरसीह सा० राइडमुत सा० लाहडप्रभृतिसमस्तश्रावकै मोक्षफलप्रार्थक समस्तचतुर्विवसवन्य पठनार्थ वाचनार्थं च समर्पणाय लिग्वापितम् ॥छ। इन्हीं विजापुरके श्रावकोंकी लिखाई हुई अन्य कड नाडपत्रीय प्रतिया खंभातके इस भाण्डागारमें विद्यमान हैं। से से से the - २ है० मति-यह प्रति अहमदाबादके डेला उपाश्रयके ज्ञानभडारको है। इसमें मलयगिरीया टीका भी पचपाठरूपसे लिखित है । साथमें अनुज्ञानन्दी भी है । कागज पर लिखी हुई यह प्रति अनुमान सत्रहवीं सदीमें लिखी मालम होती है। ल० प्रति—यह प्रति अहमदाबाद लवारकी पोलके उपाश्रयके ज्ञानमडारकी है । इसकी पत्रसख्या ३५ हैं। हरेक पत्रमें नव पक्तियाँ हैं । हरेक पंकिम ३१ से १२ अक्षर लिखे हैं । प्रतिको लिपि सुन्दरतम है । अक्षर मोटे हैं । कागज पर लिखी हुइ इस प्रतिकै अतमें लेखकको पुष्पिका इस प्रकार है- नन्दी सम्मत्ता ॥७॥ स ११८५ वर्षे फाल्गुन सुदि ७ शनी श्रीभीमपल्लीय [मक्षर वीगाड दिये हैं। श्रीगा शुभं भवतु ॥गा इस पुष्पिकामें जो अक्षर बिगाड दिये हैं उनके स्थानमें बहार इस प्रकार नये अक्षर लिखे है- साह श्रीवच्छामृत साह सहिंसकस्य स्वपुण्यार्थ पुस्तकभडारे कारापिता सुत वर्धमानपुस्तकपरिपालनार्थ ॥ छ । मो० प्रति—यह प्रति पाटन-श्रीहेमचद्राचार्यजैनज्ञानमदिरमें स्थित मोदी ज्ञानभडारकी है। यह प्रति विक्रमकी सोलहवीं सदीमें लिखी हुई है। शु० प्रति—यह प्रति पाटन-श्रीहेमचन्द्राचार्यजैनज्ञानमदिरमें स्थित शुमवीरजैनज्ञानमडारकी है । प्रति प्राय शुद्ध है । प्रति अनुमान सत्रहवीं सदीके उत्तरार्द्धमें लिखी प्रतीत होती है । मु० प्रति—यह प्रति आगमोद्धारफ श्रीसागरान दरिवरसम्पादित श्रीमलयगिरिकृतटीकायुक्त है । जो आपने आगम वाचनाके समय सम्पादित की है। यह भावृत्ति वि स १९७३में आगमोदयसमिति-पुरतकी ओरसे प्रकाशित हुई है। चूर्णीकी मतियाँ जे० प्रति—यह प्रति जैसलमेर किलेमें स्थित श्रीजिनमद्राय ताडपत्रीय जैन ज्ञानमडारको ताडपत्रीय प्रति है। इसका क्रमाङ्क ११० है। इस क्रमाकमें तीन ग्रन्थ हैं-१ दशवैकालिक अगस्यसिंहीया चूर्णी पत्र १८१ । २ नदीसूत्रचूणी पत्र १८५-२२३ । ३ अनुयोगद्वारसूत्रचूर्णी पत्र १२४-२७५ । इनमसे नदीचूगी और अनुयोगद्वारचूणीं ये दोनों चूायाँ किसी गीतार्थकी सशोधित हैं । प्रतिको लवाई-चौडाई २५४२॥ इंचकी है । प्रतिके अतमें लेखनसवत् या लेखककीपुष्पिका नहीं है । तथापि प्रतिका रंग-ढग देखनेसे प्रतीत होता है कि यह प्रति तेरहवीं सदीमें लिखित है । प्रति शुद्धप्राय है। आ० प्रति—यह प्रति मागमोद्धारकजी श्रीसागरान दसूरिमहाराजसम्पादित मुदित प्रति है । जिसका प्रकाशन श्रीपमदेवजी केशरीमलजी श्वेताम्बरसस्था-रतलामकी ओरसे हुमा है। पूज्यश्रीको इसकी कोई अच्छी प्रति न मीलनेके कारण यह बहुत भशुद्ध यी है । फिर मी एक प्रत्य तरकी तोरसे हमारे सशोधनमें यह आवृत्ति काममें ही आई है। दा० प्रति—यह प्रति जिनागमज्ञ पूज्य श्रीविजयदानप्रिमहाराजससम्पादित मुद्रित प्रति है । जो माई हीरालालके द्वारा प्रकाशित है। इसमें भी काफी मशुद्धियाँ हैं । तथापि पुण्य सागरान दरिम०की आवृत्तिको अपेक्षा यह कुछ अच्छी भावृत्ति है। चूर्णिके सम्पादन और सशोधनके समय पाटन-श्रीहेमचन्द्राचार्यजैनज्ञानमदिरकी एक प्रति और श्रीलालमाई दलपतभाई भारतीय सत्यति विधामदिरको प्रतिको भी सामने रखती थी। ये दोनों प्रतियाँ क्रमश सोलहवीं और सत्रहवीं सदीमें लिखी हुई प्रतियां हैं और अशुद्धिभरपूर प्रतियां हैं । तथापि शुद्ध पाठोंके निर्णयमें ये भी सहायक हुई है। इस पूर्णाक सशोधनमें हमारे लिये मुख्य आधारस्तम्म जे० प्रति ही है, जो अतीव शुद्ध प्रति है। सूत्रमतियोंकी विशेषता स० दे० मो०, ये तीन प्रतियों का प्रतिठेखनके बाद किसी विद्वानने सशोधन नहीं किया है।
३ जो जे० ख० ल० शु०, ये चार प्रतियाँ सशोधित प्रतियाँ है । इनमें भी जे० प्रतिका सशोधन खरतरगच्छीय गीतार्थ आचार्य श्रीजिनभद्रमरिने किया है, जिसमें आपने नन्दीसूत्रके प्रक्षिप्त पाठादिके विषयमें स्थान स्थान पर टिप्पणीयां की है, जो हमने हमारे इस प्रकाशनमें दी है, देखो पृ. ५ टि. १०, पृ. ८ टि. १०, पृ. १० टि. ७, पृ. ११ टि. ११, पृ. १२ टि. ५ इत्यादि। शु० प्रति अधिकतर अंशमें खं० प्रतिसे मीलतीझुलती होने पर भी जुदा कुलको मालुम होती है । इसमें स्थविरावलिकी प्रक्षिप्त मानी जानेवाली गाथाये नहीं है, देखो पृ. ८ टि. १०, पृ. १० टि. ७, पृ. ११ टि. ११ । छटे परिषत्सूत्रमें जो तीन गाथायें प्रक्षिप्त है वे भी इस प्रतिमें नहीं है, देखो पृ १२ टि ५। इसी प्रकार मनःपर्यवज्ञानके द्रव्यक्षेत्रादिविषयक सूत्रपाठमें सूत्रपाठ चूर्णीकार एवं हरिभद्रसूरिको अभिप्रेत है वह इस प्रतिसे पाया गया है, देखो पृ. २३ टि. ३ । ऐसी जो जो अन्यान्य विशेषतायें इस प्रतिकी हैं उनका पादटिप्पणीयोंमें उल्लेख कर दिया है। यहां पर परीक्षण एवं अभ्यासकी दृष्टिसे पाठभेदोंका निरीक्षण करनेवाले विद्वानोसे प्रार्थना है कि इस मुद्रणमें पृ. १० टि. ७, पृ. ११ टि. ११ आदि दो-चार स्थानोंमें P प्रतिका निर्देश किया है वह P प्रति कौनसी है और किस भंडारकी थी? यह मेरी स्मृतिसे चला गया है। फिर भी यहाँ इतनी सूचना कर देता हूँ कि-शु० प्रति कुछ अंशमें इस P प्रतिसे मीलतीझुलती प्रति है । अर्थात् जैसे- गोविंदाणं पि णमो० तथा तत्तो य भूयदिन्ने० ये दो गाथायें P प्रतिमें नहीं हैं इसी तरह शु० प्रतिमें भी उपलब्ध नहीं हैं, देखो पृ. १० टि. ७ । यद्यपि प्रस्तुत मुद्रणमें इस स्थानमें P प्रतिके साथ शु० प्रतिका उल्लेख छुट गया है किन्तु भंडारमें जा कर शु० प्रतिको पुन देखके निश्चित किया है कि गोविंदाणं पि णमो० तथा तत्तो य भूयदिन्ने० ये दोनों गाथायें शु० प्रतिमें भी नहीं है । एवं-चंदामि अजधम्म० तथा बंदामि अजरक्खिय० ये दो गाथायें शु० प्रतिमें नहीं हैं, देखो पृ० ८ टि. १० । चूर्णी एव टीकाओमें इन चार गाथाओका उल्लेख या व्याख्यान नहीं है । नन्दीसूत्रकी ऐसी और भी प्रति मेरे देखनेमें आई है, जिसमें ये गाथाये नहीं है। फिर भी नन्दीसूत्रकी प्राचीन ताडपत्रीय प्रतियोंमें और दूसरी बहुतसी पंद्रहवीं-सोलहवीं शती में लिखित कागजकी प्रतियोंमें ये गाथाये अवश्य ही उपलब्ध हैं। यहां प्रश्न होता है कि-चूर्णिकार और टीकाकारोंने इन गाथाओंका स्पर्श तक क्यो नहीं किया है ।। जे० और मो० प्रतिकी विशेषता यह है कि इसमें प्रायः लुप्तव्यञ्जनके स्थानमें अस्पष्ट यश्रुतिके प्रयोग न होकर केवल अ और आ की श्रुतिवाले प्रयोग ही हैं, जो पूज्य श्रीसागरानन्दसूरिमहाराजके मुद्रणमें नजर आते है। ये दो प्रतियाँ उस परम्पराकी है, जिसमें अस्पष्ट यश्रुतिके प्रयोग कम है । आदि ण प्रयोगके स्थानमें नका प्रयोग मुख्य है । जैसे कि- नाण नाह नर्मसिय नियम नदिघोस निग्गय नाल निम्मल सुयनिस्सिय आदि । हे०शु० प्रतियां नप्रयोगके विषयमें जे०मो० प्रतियोके समान है, किन्तु इन प्रतियोंमें अस्पष्ट यश्रुतिके प्रयोग ही प्रयुक्त हैं। खं०स० प्रतियोमें णप्रयोगकी प्रधानता है। किन्तु सं० प्रतिमें फुरन्त महन्त समन्ता आदि परसवर्णके प्रयोग नजर आते है, इतना खं० और स० प्रतिका भेद है। इसी तरह स० और खं० प्रतिका अन्तर यह है कि खं० प्रतिमें चडुलियम्वा पदीवम्बा आदि जैसे प्रयोग भी प्रयुक्त दिखाई देते है देखो पृ. १६ टि० ३ । उपर आठ प्रतियोंका परिचय दिया गया है, जो आज उपलब्ध प्रतियोंमें प्राचीन प्रतियाँ है। इतनी प्रतियां एकत्र करने पर भी चूर्णिकार एवं वृत्तिकारसम्मत ऐसे अनेक पाठ है जो इन इतनी प्रतियोंसे भी प्राप्त नहीं हुए है। इनका सूचन पादटिप्पणियोमें यथास्थान किया है। इस नन्दीसूत्रके सनोधन, पाठ, पाठभेद, पाठोकी कमीवेगीके निर्णयके लिये चूणि. हरिभद्रवृत्ति, मलयगिरिवृत्ति, श्रीचन्द्रीय डे० प्रति-यह प्रति अहमदाबादके डेला उपाश्रयके ज्ञानमहारको है। इसमें मलयगिरीया टीका भी पचपाठरूपसे लिखित है । साथमें अनुज्ञानन्दी भी है । कागज पर लिखी हुई यह प्रति अनुमान सत्रहवीं सदीमें लिखी मालम होती है। ल० प्रति-यह प्रति अहमदाबाद लवारकी पोलके उपाश्रयके ज्ञानभडारकी है। इसकी पत्रसख्या ३५ हैं। हरेक पत्रमें नव पक्तियाँ हैं । हरेक पक्तिौ ३१ से ४२ अक्षर लिखे हैं । प्रतिको लिपि सुन्दरतम है। अक्षर मोटे हैं । कागज पर लिखी हुई इस प्रतिके अतमें लेखककी पुष्पिका इस प्रकार है- नन्दी सम्मत्ता ।। स १४८५ वर्षे फाल्गुन सुदि ७ शनी श्रीमीमपल्लीय [भक्षर धीगाड दिये हैं। श्री ॥ शुभ भवतु || इस पुष्पिकामें जो अक्षर बिगाड दिये हैं उनके स्थानमें बहार इस प्रकार नये अक्षर लिखे हैं- साह श्रीवच्छासुत साह सहिसकस्य स्वपुण्यार्थ पुस्तकमडारे कारापिता सुत वर्धमानपुस्तकपरिपालनार्थ ।। छ । मो० प्रति—यह प्रति पाटन-श्रीहेमचद्राचार्यजैनज्ञानमदिरमें स्थित मोदी ज्ञानभडारकी है। यह प्रति विक्रमकी सोलहवीं सदीमें लिखी हुई है। शु० प्रति-यह प्रति पाटन–श्रीहेमचन्द्राचार्यजैनज्ञानमदिरमें स्थित शुभवीरजैनज्ञानमारकी है। प्रति प्राय शुद्ध है । प्रति अनुमान सत्रहवीं सदीके उत्तरार्द्धमें लिखी प्रतीत होती है। मु० प्रति--यह प्रति आगमोद्धारक श्रीसागरान दश्विरसम्पादित श्रीमळ्यगिरिकृतटीकायुक्त है। जो आपने आगम वाचनाके समय सम्पादित की है। यह आवृत्ति वि स १९७३में आगमोदयसमिति-सुरतकी ओरसे प्रकाशित हुई है। चूर्णीकी पतियों जे० प्रति—यह प्रति जेसलमेर किलेमें स्थित श्रीजिनमद्राय ताडपत्रीय जैन ज्ञानमहारकी ताडपत्रीय प्रति है । इसका कमाइ ११० है । इस क्रमाकमें तीन प्रत्थ है-१ दशवकालिक अगस्यसिंहीया चूर्णी पत्र १८४ । २ नन्दीस्त्रचूर्णा पत्र १८५-२२३ । ३ अनुयोगद्वारसूत्रचूर्णी पत्र १२४-२७५। इनमें से नन्दीचूर्णी और अनुयोगद्वारचूणीं ये दोनों चूर्णीयाँ किसी गीतार्थकी सशोधित है । प्रतिको लवाई-चौडाई २५४२।। ईंचकी है । प्रतिके अतमें लेखनसवत् या लेखककीपुष्पिका नहीं है । तथापि प्रतिका रंग-ढग देखनेसे प्रतीत होता है कि यह प्रति तेरहवीं सदीमें लिखित है । प्रति शुद्धप्राय है। आ० प्रति-यह प्रति भागमोद्धारकजी श्रीसागरान दरिमहाराजसम्पादित मुद्रित प्रति है । जिसका प्रकाशन श्रीलपमदेवजी केशरीमलजी वेताम्बरसस्था-रतलामको ओरसे हुआ है। पूज्यश्रीको इसकी कोई अच्छी प्रति न मीलनेके कारण यह बहुत मशुद्ध छपी है । फिर भी एक प्रत्य तरको खोरसे हमारे सशोधनमें यह आवृत्ति काममें ही आई है। दा० मति- यह प्रति जिनागमज्ञ प्य श्रीविजयदानसूरिमहाराजससम्पादित मुद्रित प्रति है। जो माई हीरालालके द्वारा प्रकाशित है। इसमें भी काफी अशुद्धियाँ हैं । तथापि पूज्य सागरान दरिम० की आवृत्तिको अपेक्षा यह कुछ अच्छी आवृत्ति है। पूर्णिके सम्पादन और सशोधन के समय पाटन-श्रीहेमचन्द्राचार्यजैनज्ञानमदिरकी एक प्रति और श्रीलालमाई दलपतमाई भारतीय संस्कृति विघामदिरको प्रतिको मी सामने रखी थी। ये दोनों प्रतियाँ क्रमश सोलहवीं और सत्रहवीं सदीमें लिखी हुई प्रतियां हैं और अशुद्धिभरपूर प्रतियाँ हैं । तथापि शुद्ध पाठोंके निर्णयमें ये मी सहायक हुई है। इस पूर्णांक सशोधनमें हमारे लिये मुख्य आधारस्तम्म जे० प्रति ही है जो अतीव शुद्ध प्रति है। स्त्रप्रतियोकी विशेषता स. ३० मो०, ये तीन प्रतियोंका प्रतिलेखनके बाद किसी विद्वानने सशोधन नहीं किया है ।
३ जे० खं० ल० शु०, ये चार प्रतियाँ सशोधित प्रतियाँ है। इनमें भी जे० प्रतिका सशोधन खरतरगच्छीय गीतार्थ आचार्य श्रीजिनभद्रसरिने किया है, जिसमें आपने नन्दीसूत्रके प्रक्षिप्त पाठादिके विषयमें स्थान स्थान पर टिप्पणीयां की है, जो हमने हमारे इस प्रकाशनमें दी है, देखो पृ. ५ टि. १०, पृ. ८ टि. १०, पृ. १० टि. ७, पृ. ११ टि. ११, पृ. १२ टि. ५ इत्यादि । शु० प्रति अधिकतर अंगमे खं० प्रतिसे मोलतीझुलती होने पर भी जुदा कुलको मालुम होती है । इसमें स्थविरावलिकी प्रक्षिप्त मानी जानेवाली गाथाये नहीं है, देखो पृ. ८ टि. १०, पृ. १० टि. ७, पृ. ११ टि. ११ । छद्रे परिषत्सूत्रमें जो तीन गाथायें प्रक्षिप्त है वे भी इस प्रतिमें नहीं है, देखो पृ. १२ टि. ५। इसी प्रकार मनःपर्यवज्ञानके द्रव्यक्षेत्रादिविषयक सूत्रपाठमें जो सूत्रपाठ चूर्णीकार एवं हरिभद्रसूरिको अभिप्रेत है वह इस प्रतिसे पाया गया है, देखो पृ. २३ टि. ३ । ऐसी जो जो अन्यान्य विशेषतायें इस प्रतिकी हैं उनका पादटिप्पणीयोंमें उल्लेख कर दिया है। यहां पर परीक्षण एवं अभ्यासकी दृष्टि से पाठभेदोका निरीक्षण करनेवाले विद्वानोसे प्रार्थना है कि इस मुद्रणमें पृ. १० टि. ७, पृ. ११ टि. ११ आदि दो-चार स्थानोंमें P प्रतिका निर्देश किया है वह P प्रति कौनसी ? और क्रिस भडारकी थी? यह मेरी स्मृतिसे चला गया है । फिर भी यहाँ इतनी सूचना कर देता हूँ कि-शु० प्रति कुछ अंशमें इस P प्रतिसे मीलतीझुलती प्रति है। अर्थात् जैसे- गोविंदाणं पि णमो० तथा तत्तो य भूयदिन्ने० ये दो गाथायें P प्रतिमें नहीं हैं इसी तरह शु० प्रतिमें भी उपलब्ध नहीं हैं, देखो पृ. १० टि ७ । यद्यपि प्रस्तुत मुद्रणमें इस स्थानमें P प्रतिके साथ शु० प्रतिका उल्लेख छुट गया है किन्तु भंडारमें जा कर शु० प्रतिको पुनः देखके निश्चित किया है कि गोविंदाणं पि णमो० तथा तत्तो य भूयदिन्ने० ये दोनों गाथाये शु० प्रतिमें भी नहीं है । एवं-चंदामि अजधम्म० तथा बंदामि अजरक्खिय० ये दो गाथाये शु० प्रतिमें नहीं हैं, देखो पृ० ८ टि १० । चूर्णी एव टीकाओमें इन चार गाथाओका उल्लेख या व्याख्यान नहीं है । नन्दीसूत्रकी ऐसी और भी प्रति मेरे देखनेमें आई है, जिसमें ये गाथायें नहीं है। फिर भी नन्दीसूत्रकी प्राचीन ताडपत्रीय प्रतियोमें और दूसरी बहुतसी पंद्रहवीं-सोलहवीं शती में लिखित कागजको प्रतियोंमें ये गाथाये अवश्य ही उपलब्ध हैं। यहां प्रश्न होता है कि-चूर्णिकार और टीकाकारोंने इन गाथाओंका स्पर्श तक क्यो नहीं किया है । जे० और मो० प्रतिको विशेषता यह है कि इसमें प्रायः लुप्तव्यञ्जनके स्थानमें अस्पष्ट यश्रुतिके प्रयोग न होकर केवल अ और आ की श्रुतिवाले प्रयोग ही हैं, जो पूज्य श्रीसागरानन्दसूरिमहाराजके मुद्रणमें नजर आते है। ये दो प्रतियाँ उस परम्पराकी है, जिसमें अस्पष्ट यश्रुतिके प्रयोग कम है । आदि ण प्रयोगके स्थानमें नका प्रयोग मुख्य है । जैसे कि- नाण नाह नमंसिय नियम नदिघोस निग्गय नाल निम्मल सुयनिस्सिय आदि । हे०४० प्रतियां नप्रयोगके विषयमें जे०मो० प्रतियोंके समान है, किन्तु इन प्रतियोंमें अस्पष्ट यश्रुतिके प्रयोग ही - प्रयुक्त हैं। खं०स० प्रतियोंमें णप्रयोगकी प्रधानता है । किन्तु स० प्रतिमें फुरन्त महन्त समन्ता आदि परसवर्णके प्रयोग नजर आते है, इतना खं० और स० प्रतिका भेद है । इसी तरह स० और खं० प्रतिका अन्तर यह है कि ख० प्रतिमें चडुलियम्वा पदीवम्वा आदि जैसे प्रयोग भी प्रयुक्त दिखाई देते है देखो पृ. १६ टि० ३ । उपर आठ प्रतियोंका परिचय दिया गया है, जो आज उपलब्ध प्रतियोंमें प्राचीन प्रतियां है। इतनी प्रतियाँ एकत्र करने पर भी चूर्णिकार एवं वृत्तिकारसम्मत ऐसे अनेक पाठ है जो इन इतनी प्रतियोंसे भी प्राप्त नहीं हुए है। इनका सूचन पादटिप्पणियोमें यथास्थान किया है। इस नन्दीसूत्रके समोधन, पाठ, पाठभेठ, पाठोकी कमीवेशीके निर्णयके लिये चूर्णि. हरिभद्रवृत्ति, मलयगिग्वृित्ति, श्रीचन्द्रीय ४ - टिप्पन, इन चारोंका समप्रभावसे उपयोग किया गया है, इतना ही नहीं, कितु जहाँ जहाँ नदीसूत्रके उदरण, व्याख्यान आदि आये हैं ऐसे द्वादशारनयचक्र, समवायाङ्गसूत्र एव भगवतीसूत्रको अभयदेवीया वृत्ति, विशेषावश्यकमलधारीया वृत्ति, पाक्षिकसूत्रवृत्ति आदि अनेक शास्त्रोंका उपयोग भी किया है, जिसकी प्रतीति इस सम्पादनकी पादटिप्पणियोंको देखनेसे होगी। नदीसूत्रकी चूर्णिके सशोधनके लिये मेरा आधारस्तम्भ जैसलमेरको प्रति ही है। अगर यह प्रति प्राप्त न होती तो इसका जो गौरवपूर्ण सम्पादन हुआ है, वह शक्य न बनता । संस्कृत टीका निर्माणके बाद चूर्णियोका अध्ययन कम हो बानेसे प्राय आज ज्ञानमडारोंमें जो जो आगमिक या आगमेतर शास्त्रकि चूर्णिम थोकी हस्तप्रतियां हैं, वे सभी अशुद्धि भाण्डागारस्वरूप हो हो गई हैं। इतनी बात जरूर है कि-ज्यो ग्यो प्रति प्राचीन त्यो त्यों अशुद्धियाँ कम रहती है। किन्तु एक ही युगको प्रतियोंके लिये यह अनुभव हुआ है कि अगर वह प्रति प्राचीन प्रतिको या भिन्न प्रदेशस्थित प्रतिको नकल न हो कर, उसी युगकी या प्रदेशकी उत्तरोत्तर नकलकी नकल हो, तब तो उत्तरोत्तर अशुद्धियोंकी वृद्धि ही होती रही है, इतना ही नहीं पक्कियाँकी पक्तियाँ और सन्दर्भ के सन्दर्भ गायब हो गये हैं । अस्तु, मेरेको जैसलमेरकी प्रति मोली, यह मैं सिर्फ अपना ही नहीं, साथमें सब शास्त्रपाठी जैन गौतार्थ मुनिगण एव विद्वानों का भी सौमाग्य समझता है । अनेक आगमोंकी चूर्णि, वृत्ति आदिके अवलोफनसे प्रतीत हुआ है कि अगर प्राचीन एव अलग अलग कुलकी प्रतियाँ प्राप्त न हो तो मुद्रणादिमें प्राय सैंकडों अशुद्धियाँ पाठपरावृत्तियाँ आदि रहनेका सम्भव रहता है, इतना ही नहीं सन्दर्भक सन्दर्भ छूट जाते है । विद्वान् सशोधकोंके ध्यान में लाने के लिये मै यहाँ एक बातको उद्धृत करता है- अनुयोगद्वास्सूत्रको चूर्णिका सशोधन मैने पाटन ज्ञानमडारको दो प्राचीन ताडपनीय हस्तप्रतियां और खमातके श्रीशान्तिनाथ ज्ञानमडारको दो ताडपत्रीय प्रतियां, एव चार प्रतियों के आधारसे सुचारुतया कर लिया। कुछ शकास्थान होने पर भी दिलमें विश्वास हो गया था कि-एकदर सशोधन अच्छा हो गया है। किन्तु जब जैसलमेर जानेका मोका मिला, और वहाँक ज्ञानभडारकी प्राचीन ताडपत्रीय प्रतिसे तुलना की तो कितने ही शङ्कास्थान दूर हुए, इतना ही नहीं, परन्तु अलग अलग स्थानमें हो कर दश-बारह पक्कियां जितना दूसरे कुलकी प्रतियोंमें छूट गया हुआ नया पाठ प्राप्त हुमा और अनेकानेक अशुद्धियां भी दूर हुई । यह प्राचीन प्राचीनतम एव अलग अलग कुलकी प्रतियोंके उपयोगका साफल्य है। प्रसगवश यहाँ यह कहना भी उचित है कि इस नदीसूत्रचूर्णकि सशोधन एव सम्पादनमें साधन्त उपयोगमें लाई गई प्रतियोंके अलावा दूसरी अनेक प्रतियाँ मैने समय समय पर देखी हैं, इससे ज्ञात हुआ है कि जैसलमेरकी प्रतिको अपेक्षा इन प्रतियोंमें त द य आदि वर्णकि प्रयोग विपुल प्रमाणमें नजर आये हैं। नन्दीसत्रके प्रणेता नदीसूत्रकारने नदीसूत्र में कहीं भी अपने नामका निर्देश नहीं किया है, किन्तु चूर्णिकार श्रीजिनदासगणि महत्तरने अपनी पूर्णिमें सूत्रकारका नाम निर्दिष्ट किया है, जो इस प्रकार है- एवं कतमगलोवयारो घेरावलिकमे य देसिए अरिहेसु य दसितेसु दूसगणिसीसो देववायगो साहुजण हितद्वाए इणमाह" [पत्र १३] इस उल्लेम्वद्वारा चूर्णिकारने नन्दीसूत्रप्रणेता स्थविर श्रीदेववाचक है-ऐसा बतलाया है। आचार्य श्रीहरिभद्रसूरि एवं आचार्य श्रीमलयगिरित्रिने भी इसी आशयका उल्लेख अपनी अपनी टीकामें किया है, किन्तु इनका मूल आधार चूर्णिकारका उल्लेख ही है। चूर्णिकारके उल्लेखसे ही जात होता है कि नदीसूत्रके प्रणेता नन्दिसूत्रस्थविरावलिगत अंतिमस्थविर श्रीदुष्यगणिके शिष्य श्रीदेववाचक है।
पंन्यासजी श्रीकल्याणविजयजीमहाराजने अपने 'वीरनिर्वाणसवत् और जैन कालगणना' निबन्धमें (नागरीप्रचारिणी भाग १० अंक ४) अनेकानेक प्रमाण और युक्ति द्वारा नन्दीसूत्रप्रणेता स्थविर देववाचक और जैन आगमोकी माथुरी एवं वाल्लभी वाचनाओको सवादित करनेवाले श्रीदेवर्द्धिगणि क्षमाश्रमणको एक बतलाया है । नन्यकर्मग्रन्थकार आचार्य श्रीदेवेन्द्रसरि महाराजने अपनी स्वोपज्ञ वृत्तिमे देवर्द्धिवाचक, देवर्द्धिक्षमाश्रमण नामके उल्लेखपूर्वक अनेकवार नन्दीसूत्रपाठके उद्धरण दिये है, यह भी उन्होने देववाचक और देवर्द्धिक्षमाश्रमणको एक व्यक्ति मानके ही दिये है। यह भी श्रीकल्याणविजयजी महाराजकी मान्यताको पुष्ट करनेवाला सबूत है। तथापि नन्दीकी स्थविरावलीमें अंतिम स्थविर दुष्यगणि है, जिनको नन्दीचूर्णिकारने देववाचकके गुरु दरशाये है। तब कल्पसूत्रकी वि. स० १२४६ में लिखित प्रतिसे ले कर आज पर्यन्तकी प्राचीन-अर्वाचीन ताडपत्रीय एवं कागजकी प्रतियोमें स्थविरावलिके पाठोंकी कमी बेशीके कारण कोई एक स्थविरका नाम व्यवस्थितरूपसे पाया नहीं जाता है । इस कारण इन दोनो स्थविरोको एक मानना यह कहां तक उचित है, यह तज्ज्ञ विद्वानों के लिये विचारणीय है । देववाचक और देवर्द्धिक्षमाश्रमण इन नाम और विशेषण- उपाधिमें भी अंतर है। साथमें यह भी देखना जरूरी है कि नन्दीसूत्रकी स्थविरावलीमें वायगवंस, वायगपय, वायग, इस प्रकार वायग शब्दका ही प्रयोग मिलता है, दूसरे कोई वादी, क्षमाश्रमण, दिवाकर जैसे पदका प्रयोग नजर नहीं आता है। अगर देववाचकको क्षमाश्रमणकी भी उपाधि होती तो नन्दीचूर्णिकार जरूर लिखते ही। जैसे द्वादशारनयचक्रटीकाके प्रणेता सिंहवादी गणि क्षमाश्रमण, विशेषावश्यककी अपूर्ण स्वोपज्ञ टीकाको पूरी करनेवाले कोट्टार्यवादी गणि महत्तर, सन्मतितर्कके प्रणेता वादी सिद्धसेनगणी दिवाकर आदि नामोके साथ दो विशेषण-उपाधियाँ जुडी हुई मिलती है इसी तरह देववाचकके लिये भी दो उपाधियोंका निर्देश जरूर मिलता । अतः देववाचक और देवर्द्धिक्षमाश्रमण, ये दोनो एक ही व्यक्ति या भिन्न, यह प्रश्न अब भी विचारणीय प्रतीत होता है । कल्पसूत्रकी स्थविरावली और नन्दीसूत्रकी स्थविरावलीका मेलझोल कैसे, कितना और कहां तक हो सकता है, यह भी विचारार्ह है । वाचकपदकी अपेक्षाकृत प्राचीनता होने पर भी कल्पसूत्रकी समयसमय पर परिवर्धित स्थविरावलीमें थेर और खमासमण पदका ही निर्देश नजर आता है, यह भी दोनो स्थविर और स्थविरावलीको विशेषता एव भिन्नताके विचारका साधन है । यहाँ पर प्रसगोपात्त एक बात स्पष्ट करना उचित है कि-भद्रेश्वरसूरिकी कहावलीमें एक गाथा निम्नप्रकारकी नजर आती है- वाई य खमासमणे दिवायरे वायगे ति एगट्ठा । पुन्वगयं जस्सेस जिणागमे तम्मिमे नामा ॥ अर्थात्-यादी, क्षमाश्रमण, दिवाकर और वाचक, ये एकार्थक-समानार्थक शब्द है। जिनागममें जो पूर्वगत शास्त्र हैं उनके शेष अर्थात् अंशोंका पारम्परिक ज्ञान जिनके पास है उनके लिये ये पद है । इस गाथासे यह स्पष्ट है कि-इन उपाधियोंवाले आचार्योंके पास पूर्वगतज्ञानकी परंपरा थी। किन्तु आज जैन परम्परामें जो ऐसी मान्यता प्रचलित है कि-इन पदधारक आचार्योंको एक पूर्वआदिका ज्ञान था, यह मान्यता भ्रान्त एवं गलत प्रतीत होती है । कारण यह है कि-अगर आचाराङ्गादि प्राथमिक अंगआगम शीर्णविगीर्ण हो चूके थे, इस दशामें पूर्वश्रुतके अखंड रहनेको सभावना ही कैसे हो सकती है ।। स्थविर श्रीदेववाचककी नन्दीसूत्रके सिवा दूसरी कोई कृति उपलब्ध नहीं है । चूर्णिकार नन्दीसूत्रचूर्णिके प्रणेता आचार्य श्रीजिनदास गणि महत्तर है । सामान्यतया आज यह मान्यता प्रचलित है कि- जैन भागम उपरके भाप्योंके प्रणेता श्रीजिनभद्र गणि क्षमाश्रमण और चूर्णियोंके रचयिता श्रीजिनदास गणि महत्तर -- - ही है, और ऐसे प्राचीन उल्लेख पदावली आदिमें पाये भी जाते हैं, किन्तु भाष्य-चूर्णियोंके अवगाहन बाद ये दोनों मान्यताए गलत प्रतीत हुई हैं। यहाँ पर भाष्यकारोंका विचार अप्रस्तुत है, अत' सिर्फ यहाँ पर जैन आगमोके उपर जो प्राचीन चूर्णियाँ उपलब्ध हैं उन्हीं के विषयमें ही विचार किया जाता है। आज जैन आगमोके दपर जो चूर्णिनामक प्राकृतभाषाप्रधान व्याख्याप्रथ प्राप्त हैं उनके नाम क्रमश ये हैं-- १ आचाङ्गचणि २ सूत्रकृतागचूर्णि ३ मगवतीचूर्णि ४ जीवाभिगमचूर्णि ५ प्रज्ञापनासूत्रशरीस्पदपूर्णि ६ बम्बूद्वीप- करणचूर्णि ७ दशाकल्पचूर्णि ८ कपचूर्णि ९ कल्पविशेषचूर्णि १० व्यवहारसूत्रचूर्णि ११ निशीथसूत्रविशेषचूर्णि १२ पशकल्पचूर्णि १३ जीतकल्पबृहपूर्णि १४ आवश्यकचूर्णि १५ दशकालिकचूर्णि श्रीमगल्यसिंहफ्ता १६ दशकालिकचूर्णि वृद्धविवरणाख्या १७ उत्तराध्ययनचूर्णि १८ नन्दीमूत्रणि १९ अनुयोगद्वारचूर्णि २० पाक्षिकचूर्णि । उपर जिन बौस चूर्णियों के नाम दिये है उनका और इनके प्रणेताओंके विषयमें विचार करने के पूर्व एतद्विषयक चूर्णि- प्रत्योंके प्राप्त उल्लेखोंको मैं एकसाथ यहाँ उद्धृत कर देता हूँ, बो भविष्य में विद्वानों के लिये कायमको विचारसामग्री बनी रहे । (१) आचाराचूणीं । अन्त से हु निरालंबणमम्पतिद्वितो। शेष तदेव ॥ इति आचारचूणी परिसमाप्ता ॥ नमो सुयदेवयाए भगवईए ॥ प्रथानम् ८३०० ॥ (२) सूत्रकृताचूर्णी । अन्त - सदहामि जय सूत्रेति णेतब्य समिति || नम सर्वविदे वीराय विगतमोहाय ।। समाप्त चेद सूत्रकृतामिघ द्वितीयमङ्गमिति । भद्र भवतु श्रीजिनशासनाय । सूगडागचूर्णि समाप्त ॥ अथानम् ९५०० ॥ (३) मगवतीचूर्णि- श्रीमगवतीचूर्णि परिसमातेति ॥ इसि भद्र ॥ सुमदेवय तु वदे जीइ पसाएग सिक्खिय नाण । विदय पि वतव (बमोदेवि पसन्नवाणि पगिवयामि ।। प्रथान ६७०७ ॥श्रीli (४) जीवामिगमचूर्णि- इस चूर्णांकी प्रति भयावधि ज्ञात किसी भडारमें देखने में नहीं आई है। (५) मझापनाशरीरपदचूणि । अन्त जमिह समयविरुद्ध बद्ध बुद्धिविकलेण होना हि । त जिणययणनिहन्नू समिऊण मे पसोहिंतु ॥ १ ॥ ॥ सरीरपदरस चुग्गी जिणभदखमासमकिचिया समत्ता ॥ अनुयोगद्वारचूर्णि पत्र ७४ । याकिनीमहत्तराखनु भाचार्य श्रीहरिभद्रसरिकृत अनुयोगदारलघुवृत्ति पत्र ९९ में भी यही उल्लेख है। (६) जम्बूद्वीपकरणचूणि । अन्त - एव उवरिष्ठभागस्त तेरासिय पउजियञ्च । विरु वेड्डीमो आगेयवाओ। जबुदीवपण्यत्तिकरणाणं चुण्णी समता ॥ (७) दशाभुतस्कन्धणि । अन्त जाव णया वि । जाव करणमओ-सन्वेसि पि णयाण० गाथा ॥ दशाना चूर्णी समाप्ता ।। (८) फत्पचूर्णी- माउयवजा उ० गाहा ९९ । विथरेण जहा पिसेसावस्सगमासे । सामित्तं चेव पगडोग को केवतिय यह सवेह वा फेचिय को उति जहा कम्मपगडीए । एत पसगेण गत ! - ७ - तओ य आराहणातो छिण्णससारी भवति ससारसतति छेत्तुं मोक्ख पावतीति ॥ कल्पचूणी समाप्ता ॥ ग्रन्थानम्-५३०० प्रत्यक्षरगणनया निर्णीतम् ॥ [ सर्वग्रन्थानम्-१४७८४ ] || (९) कल्पविशेषचूर्णि- कप्पविसेसचुण्णी समत्तेति ॥ (१०) व्यवहारचूणि । अन्त:- व्यवहारस्य भगवतः अर्थविवक्षाप्रवर्तने दक्षम् । विवरणमिदं समाप्तं श्रमणगणानाममृतभूतम् ॥१॥ (११) निशीथविशेषचूणि । आदि:- नमिऊगरहंताण, सिद्धाण य कम्मचक्कमुक्काणं । सयणसिणेहविमुक्काण सव्वसाहूग भावेण ॥१॥ सविसेसायरजुत्तं काउ पणाम च अत्थदायिस्स । पज्जुण्णखमासमणस्स चरण-करणाणुपालस्स ॥२॥ एवं कयप्पणामो पकप्पणामस्स विवरणं वन्ने । पुवायरियकयं चिय अहं पि तं चेव उ विसेसे ॥३॥ भणिया विमुत्तिचूला अहुणाऽवसरो णिसीहचूलाए । को सबंधो तिस्सा ? भण्णइ, इगमो निसामेहि ॥४॥ तेरहवा उद्देशके अन्तमें- संकरजडमउडविभूसणस्स तण्णामसरिसणामस्स । तस्स सुतेणेस कता विसेसचुण्गी णिसीहस्स ॥ पद्रहवा उद्देशके अन्तमें- रैविकरममिधाणक्खरसत्तमवग्गतअक्खरजुएणं । णामं जस्सित्थीए सुतेण तिस्से कया चुण्णी ॥ सोलहवा उद्देशके अन्तमें- देहंडो सीह थोरा य ततो जेवा सहोयरा । कणिद्वा देउलो णण्णो सत्तमो य तिइन्जिओ। एतेसि मज्झिमो जो उ मंदेवी(मंदधी) तेण वित्तिता(चिन्तिता) ॥ अन्त:- जो गाहासुत्तत्थो चेवविधपागडो फुडपदस्थो । रइओ परिभासाए साहूण अणुग्गहढाए ॥१॥ ति-चउ-पण-ऽटुमवग्गे ति-पण-ति-तिगक्खरा ठवे तेसिं । पढम-ततिएहि णिट्ठइ सरजुएहिं णामं कयं जस्स ॥२॥ गुरुदिण्णं च गणितं महत्तरत्तं च तस्स तुद्रेण । तेण कतेसा चुण्णी विसेसणामा णिसीहस्स ॥३॥ णमो सुयदेवयाए भगवतीए ॥ जिणदासगणिमहत्तरेण रइया णिसीहचुण्णी समत्ता ॥ (१२) पञ्चकल्पचूगि । अन्तः- कप्पपणयस्स भेओ परूविओ मोक्खसाहणट्ठाए । जं चरिऊण सुविहिया करेंति दुक्खक्खयं धीरा ।। पञ्चकल्पचूर्णिः समाप्ता ।। ग्रन्थप्रमाणं सहस्रत्रयं शतमेक पञ्चविंशत्युत्तरम् ३१२५ ॥ (१३) जीतकल्पबृहचूर्णी । अन्तः- इति जेण जीयदाणं साहूणऽड्यारपंकपरिसुद्धिकरं । गाहाहिं फुडं रइयं महुरपयत्थाहिं पावणं परमहियं ॥ १ ॥ १. इस गाथासे ज्ञात होता है कि चूर्णिकार श्रीजिनदासगणिमहत्तरके पिता का नाम नाग अथवा तो चन्द्र होगा। २. इस गाथाके अर्थका विचार करनेसे चूर्णिकार श्रीजिनदासगणि महत्तरको माताका नाम प्राकृत गोवा संस्कृत गोपा अधिक सभवित है। ३. इस गाथामें उल्लिखित देहड आदि, चूर्णिकार श्रीजिनदासगणि महत्तरके सहोदर भाई हैं । .
८ जिणभदखमासमण निच्छियमुत्तऽव्यदायगामलचरण । तमह वदे पयो परम परमोवगारकारिण महायं ॥२॥ ॥ नीतफेल्पचूर्णि समाता | सिद्धसेन कनिषा ।। (१४) आवश्यकचूणीं । अन्त करणनयो-सवेसि पि नयाण० गाथा ॥ इति आवस्सगनिज्जुचिचुष्णी समाप्ता | मगल महाश्री ॥ (१५) दशकालिकसूत्रअगस्त्यसिंहचूणीं । अन्त एवमेत धम्मसमुक्तिमादिचरण करणागेगपरूनणागम नेम्वाणगमणफगवसाणं भवियजणाणदिकरं चुणि समासवयणेण दसगलिय परिसमत्त ।। नम ॥ वीरवरस मगवतो तित्ये कोडीगणे मुविपुलम्मि । गुणगणवइरामस्सा रसामिस्स साहाए ॥१॥ महरिसिसरिससमावा भावाऽमावाण मुगितपरमत्या । रिसियत्तखमासमणा खमा समाण निधी आसि ॥ २॥ तेसि सीसेण इमा कलसमवमइदणामधे जेग । दसकालियस्स चुण्णी पयाण रयणातो उवणत्या रुपिरपद सधिणियता उहियपुणरुचनित्थरपसगा । वखाणमतरेणावि सिरसमतिबोधणसमत्या ॥ ४ ॥ ससमय परसमयणयाण ज य ण समाधित पमादेण । त खमह पसाहेह य इय विष्णची पवयणीण ॥५॥ ॥ इसकालियचुण्णी परिसमत्ता ॥ (१६) दशकालिकसनचूर्णि विवरणारया । अन्त - अझयणाणतर 'कालगो समाधीए' जीवणकालो जस्स गतो समाहाए ति । जहा तेण एत्तिएण चेव भाराहगा भवति चि ॥ दशवकालिकचूगी सम्मत्ता | ग्रन्थामय ७४०० ॥ (१७) उत्तराध्ययनचूर्णि । अन्त वाणिजकुलसमूतो कोडियगणितो य बन्जसाहीतो । गोवालियमहतरओ विक्खातो आसि लोगम्मि ॥ १ ॥ ससमय-परसमयविक मओयस्सी देहिम सुगमारी । सीसगणसपरिवुडो वक्वाणरतिम्पियो मासी ॥२॥ तेसि सीसेण इम उत्तरायणाण चुण्णिखड तु । रहय अगुग्गहत्य सीसाण मदबुद्धीणं ॥ ३ ॥ न एत्य उत्सुत्त भयाणमाणेण विरतित होजा । त अणुओगधरा मे मचिंतेउ समारंतु ॥ १॥ ॥ पत्रिंशोत्तराध्ययनचूणी समाप्ता ॥ प्रभाम प्रत्यक्षरगणनया ५८५० ॥ (१८) नन्दीखत्रचूर्णि । बत- णि रे ण ग म त ण ह स दा जि या () पसुपतिसलगजद्विताकुला । फमद्विता धीमतचिंतियक्सरा फुड कहेयतऽभिघाण कत्तुणो ॥१॥ शराजो पञ्चसु वर्षशतषु व्यतिकातेपु अष्टनवतेषु नन्ध ययनचूर्णी समाप्ता इति ।। प्रथानम् १५०० ॥ (१९) अनुयोगद्वारसत्रचूर्णि । अन्त - चरणमेव गुणो चरणगुणो । अहवा चग्ण चारित्रम्, गुणा समादिया अणेगविधा तेसु जो जहविमो साधू सो सम्वगयसम्मतो भवताति ॥ । कृति श्रीश्वेताम्बराचार्यश्रीजिनासगणिमात्तरपूण्यपादानामनुयोगद्वाराणा चूर्णि ॥ १ इस पूर्णि पर टिप्पन रचनेवाले श्रीश्रीचदरिजी प्रस्तुतपूर्णिका बच्चूर्णिके नामसे उलख करते हैं। .
९ (२०) पाक्षिकसूत्रचूणि । अन्तः- अनुष्टुप्मेदेन छंदसां ग्रंथाग्रं चत्वारि शतानि ४०० ॥ पाक्षिकप्रतिक्रमणचूर्णी समातेति ॥ शुभं भवतु सकल संघस्य | मंगलं महाश्रीः ॥ १. उपर जिन बीस चूर्णियोके आदि-अन्तादि अंशोके उल्लेख दिये है. इनके अवलोकनसे प्रतीत होता है कि-प्रज्ञापना- सूत्रके बारहवे शरीरपदकी चूर्णि श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमण कृत है। आज इसकी कोई स्वतन्त्र हस्तप्रति ज्ञानभडारोमें उपलब्ध नहीं है, किन्तु श्रीजिनदासगणि महत्तर और आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिने क्रमशः अपनी अनुयोगद्वारसूत्र उपरकी चूणि और लघुवृत्तिमें इस चूर्णिको समग्र भावसे उद्धृत कर दी है, इससे इसका पता चलता है। श्रीजिनभद्रगणि क्षमा- श्रमणने प्रज्ञापनासूत्र उपर सम्पूर्ण चूर्णी की हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता है । इसका कारण यह है कि प्राचीन जैन ज्ञानभंडारोमे प्रज्ञापनासूत्रचूर्णांकी कोई हाथपोथी प्राप्त नहीं है। दूसरा यह भी कारण है कि-आचार्य श्रीमलयगिरिने अपनी प्रज्ञपनावृत्तिमें सिर्फ शरीरपदकी वृत्तिके सिवा और कहीं भी चूर्णीपाठका उल्लेख नहीं किया है। अतः ज्ञात होता है कि श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमणने सिर्फ प्रज्ञापनासूत्रके बारहवें शरीरपद पद पर ही चूर्णी की होगी। आचार्य मलयगिरिने अपनी वृत्तिों इस चूर्णीका छ स्थान पर उल्लेख किया है । २. नन्दीसूत्रचूर्णी, अनुयोगद्वारचूर्णी और निशीथसूत्रचूर्णीके प्रणेता श्रीजिनदासगणि महत्तर है । जो इन चूर्णीयोके अन्तिम उल्लेखसे निर्विवाद रूपसे ज्ञात होता है। निशीथचूर्णिके प्रारम्भमें आपने अपने विद्यागुरुका शुभनाम श्रीप्रद्युम्न क्षमाश्रमण बतलाया है। सभव है कि आपके दीक्षागुरु भी ये ही हो । इन चूर्णियोंकी रचना जिनभद्र गणि क्षमाश्रमणके बादकी है। इसका कारण यह है कि-नन्दीचूर्णिमें चूर्गिकारने केवलज्ञान-केवलदर्शनविषयक युगपदुपयोग- एकोपयोग-क्रमोपयोगकी चर्चा की है एवं स्थान स्थान पर जिनभद्रगणिके विशेषावश्यक भाष्यकी गाथाओका उल्लेख भी किया है। अनुयोगद्वारचूर्णीमें तो आपने श्रीजिनभद्रगणिकी शरीरपदचूर्गीको सायन्त उद्धृत कर दी है। अतः ये तीनों रचनायें श्रीजिनभद्रगणिके बादकी ही निर्विवाद सिद्ध है । ३. दशवैकालिकचूर्णीक कत्तौ श्रीअगस्त्यसिंहगगी है । ये आचार्य कौटिकगगान्तर्गत श्रीवज्रस्वामीकी शाखामें हुए श्रीऋषिगुप्त क्षमाश्रमणके शिष्य है । इन दोनो गुरु-शिष्योके नाम शाखान्तरवर्ति होने के कारण पट्टावलीयोंमें पाये नहीं जाते है । कल्पसूत्रकी पट्टावल्लीमें जो श्रीऋषिगुप्तका नाम है वे स्थविर आर्यसुस्तिके शिष्य होनेके कारण एवं खुद वज्रस्वामीसे भी पूर्ववर्ती होनेसे श्रीअगत्यसिंहगणिके गुरु ऋषिगुप्तसे भिन्न है । कल्पसूत्रकी स्थविरावलीका उल्लेख इस प्रकार है- थेरस्स ण अन्जसुहत्थिस्स वासिट्ठसगुत्तस्स इमे दुवालस थेरा अंतेवासी अहावच्चा अभिण्णाया होत्था । तं जहा- थेरे य अजरोहण १ जसभद्दे २ मेहगणी ३ य कामिड्ढी ४ । सुट्ठिय ५ सुप्पडिबुद्धे ६ रक्खिय ७ तह रोहगुत्ते ८ य ॥ १ ॥ इसिगुत्ते ९ सिरिगुत्ते १० गणी य बंभे ११ गणी य तह सोमे १२ । दस दो य गणहरा खलु एए सीसा सुहत्थिस्स ॥२॥ स्थविर आर्यमुहस्ति श्रीवज्रस्वामीसे पूर्ववर्ती होनेसे ये ऋपिगुप्त स्थविर दशकालिकचूर्णिप्रणेता श्रीअगस्यसिंहके गुरु श्रीऋषिगुप्त क्षमाश्रमणसे जुदा है, यह स्पष्ट है । आवश्यकचूर्णी, जिसके प्रणेताके नामका कोई पता नहीं है, उसमें तपसयमके वर्णनप्रसगमें आवश्यकचर्णिकारने इस प्रकार दशवैकालिकचीका उल्लेख किया है- न. चू-२
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तवो दुविहो-वो अन्भतरो य। जघा दसवेतालियचुण्णीए चाउलोदणत ( चालणेदाणत) अलद्धण
णिजरद साधूसु पडिवायणीय ८ । [आवस्थकचूर्णी विभाग २ पत्र ११७]
आवश्यकचूर्णिके इस उद्धरणम दशवकालिकचर्णीका नाम नजर आता है । दशवकालिकसनके उपर दो घूर्णीयाँ
भाज प्राप्त है-एक स्थविर अगस्यसिंहप्रणीत और दूसरी जो आगमोद्धारक श्रीसागरान दसूरि महाराजने रतलामकी श्री-
अपमदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर सस्थाकी भोरसे सम्पादित की है, जिसके कत्ताक नामका पता नहीं मीला है और
जिसके अनेक उद्धरण याकिनीमहत्तरापुत्र आचार्य श्रीहरिभद्रमुरिने अपनी दशवकालिकसूत्रकी शिष्यहितावृत्तिमें स्थान स्थान
पर वृद्धविवरणके नामसे दिये हैं। इन दो चूर्णियोंमेंसे आवश्यकचूर्णिकारको कौनसी चूर्णि अभिप्रेत है, यह एक कठिनसी
समस्या है। फिर भी आवश्यकचूकि उपर उल्लिखित उद्धरणको गौरसे देखनेसे अपन निर्णयके समीप पहुच सकते है। इस
उद्धरणमें "बाउलोदणत" यह पाठ गलत हो गया है । यास्तवमें "चाउलोदणत" के स्थानमें मूलपाठ "चालणेदाणत" ऐसा
पाठ होगा । परतु मूलस्थानको विना देखे ऐसे पाठोंके मूल आशयका पता न चलने पर केवल शाब्दिक शुद्धि करके सख्या
बन्ध पाठोंको विद्वानों ने गलत बनाने के सख्यावध उदाहरण मेरे सामने है । दशवैकालिकास्त्रको प्राप्त दोनों चूर्णियोको मैंने
बराबर देखी है, किंतु "चाउलोदणतं"का कोई उल्लेख उनमें नहीं पाया है और इसका कोई सार्थक सम्बन्ध भी नहीं है। दश
वैकालिकसूत्रकी अगत्यसिंहीया चूर्णिमें तपके निरूपणको समाप्तिके बाद "चालणेदाणि' [पत्र १९] ऐसा चूर्णिकारने लिखा
है, जिसको आवश्यकर्णिकारने "चालणेदाणत" वाक्यद्वारा सूचित किया है । इस पाठको बादके विद्वानोंने मूल स्थानस्थित
पाठको विना देखे गलत शाब्दिक सुधारा कर बिगाड दिया ऐसा निश्चितरूपसे प्रतीत होता है । अत मैं इस निर्णय पर माया
इगि आवश्यकचूर्णिकारनिर्दिष्ट दशवैकालिकधूर्णि अगत्यसिंहीया चूर्णी ही है। और इसी कारण अगरूपसिंहीया चूर्णी
आवश्यकचूर्णिक पूर्वकी रचना है।
आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिने अपनी शिष्यहितावृत्तिमें इस चूर्णीका खास तौरसे निर्देश नहीं किया है । सिर्फ रइवका
स रतिवाक्या नामक दशवकालिकसूत्रको प्रथम चूलिकाकी व्याख्यामें [पत्र २७३-२] "अये तु ब्याचक्षते" ऐसा निर्देश करके
अगस्यसिंहीया चूर्णीका मतान्तर दिया है । इसके सिवा कहीं पर भी इस चर्णिके नामका उल्लेख नहीं किया है ।
इस अगस्यसिंहीया चूर्णिमें तत्कालवी सख्याबघ वाचनातर-पाठभेद, अर्थमेद एव सूत्रपाठोंकी कमी-बेशीका काफी
निर्देश है, जो अतिमहत्वके हैं।
यहाँ पर ध्यान देने जैसी एक बात यह है कि दोनों चूर्णिकारोंने अपनी चूर्णमि दशवकालिकसूत्र उपर एक प्राचीन
चूर्णी या वृत्तिका समान रूपसे उल्लेख रइवक्काचूलिका को चूमें किया है । जो इस प्रकार है-
"पाथ इमातो वृत्तिगतातो पदुईसमेत्तगाधाओ । जहा--
दुक्ख च दुस्समाए जीविउ १ लहुमगा पुणो कामा २ ।
सातिबहुला मगुस्सा ३ मचिरटाण चिम दुक्ख १ ॥१॥
मोमजणम्मि य खिसा ५ वत च पुणो निसेविय भवति ६ ।
महरोवसपया वि य ७ दुलभो घम्मो गिहे गिहिणो ८ ॥२॥
निवयति परिकिलेसा ९ बधो ११ सायनजोग गिहिवासो १३ ।
एते तिष्णि वि दोसा न हाँति अणगारवासम्मि १० १२१४ ॥ ३॥
साधारणा य भोगा १५ पत्तेय पुण्ण पावफलमेव १६ ।
नीयमवि माणवाण कुसग्गजलबचलमणिच १७ ॥३॥
णत्थि य अवेदयित्ता मोक्खो कम्मरस निच्छओ एसो १८ । पदमट्ठारसमेतं वीरवयणसासणे भणितं ।। ५ ।।" अगस्त्यसिहीया चूर्णी दूसरी मुद्रित चूर्णीमें पत्र ३५८] "एत्थ इमाओ वृत्तिगाधाओ । उक्तं च” ऐसा लिखकर उपर दी हुई गाथायें उद्धृत कर दी है। - इन उल्लेखोसे यह निर्विवाद है कि-दशवैकालिकसूत्र के उपर इन दो चूर्णियोंसे पूर्ववर्ती एक प्राचीन चूणीं भी थी, जिसका दोनों चूणीकारोने वृत्ति नामसे उल्लेख किया है। इससे यह भी कहा जा सकता है कि-आगमोंके उपर पद्य और गद्यमें व्याख्याग्रन्थ लिखनेकी प्रणालि अधिक पुराणी है । और इससे हिमवंतस्थविरावलीमें उल्लिखित निम्न उल्लेख सत्यके समीप पहुंचता है- "तेषामार्यसिंहानां स्थविराणां मधुमित्रा-ऽयंस्कन्दिलाचार्यनामानौ द्वौ शिष्याबभूताम् । आर्यमधुमित्राणां शिष्या आर्यगन्धहस्तिनोऽतीवविद्वांस प्रभावकाश्चाभवन् । तैश्च पूर्वधरस्थविरोत्तंसोमास्वातिवाचकरचित- तत्त्वार्थोपरि अशीतिसहस्रश्लोकप्रमाणं महाभाष्यं रचितम् । एकादशाङ्गोपरि चाऽऽयस्कन्दिलस्थविरा- णामुपरोधतस्तैर्विवरणानि रचितानि । यदुक्तं तद्रचिताऽऽचारागविवरणान्ते यथा- थेरस्स महुमित्तस्स सेहेहिं तिपुञ्वनाणजुत्तेहिं । मुणिगणविवदिएहिं ववगयरायाइदोसेहि ।। १ ।। वंमदीवियसाहामउडेहिं गंधहत्थिविबुहेहिं । विवरणमेय रइय दोसयवासेसु विक्कमओ ॥२॥ आचारागसूत्रके इस गन्धहस्तिविवरणका उल्लेख आचार्य श्रीशीलाङ्कने अपनी आचारावृत्तिके उपोद्घातमें भी किया है। कुछ भी हो, जैन आगमोके उपर व्याख्या लिखनेकी प्रणाली अधिक प्राचीन है । ४. उत्तराध्यनसूत्रचूर्णिके प्रणेता कौटिकगणीय, वज्रशाखीय एव वाणिजकुलीय स्थविर गोपालिक महत्तरके शिष्य थे । इस चूर्णिकारने चूर्णिमें अपने नामका निर्देश नहीं किया है। इनका निश्चित समयका पता लगाना मुश्किल है । तथापि इस चूर्णिमें विशेषावश्यकभाष्यकी स्त्रोपज्ञ टीकाका सन्दर्भ उल्लिखित होनेके कारण इसकी रचना जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणके स्वर्गवासके बादकी है। विशेषावश्यक भाष्य की स्वोपज्ञ टीका, यह श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमणको अन्तिम रचना है । छटे गणधरवाद तक इस टीकाका निर्माण होने पर आपका देहान्त हो जानेके कारण बादके समग्र ग्रंथको टीकाको श्रीकोट्टार्यवादी गणी महत्तरने पूर्ण की है। ५. जीतकल्पवृहचूीके प्रणेता श्रीसिद्धसेनगगी है। इस चूर्णिके अन्तमें आपने सिर्फ अपने नामके अतिरिक्त और कोई उल्लेख नहीं किया है। श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमणकृत ग्रन्थके उपर यह चूर्णी होनेके कारण इसकी रचना श्रीजिनभद्रगणिके बादकी स्वयंसिद्ध है। इस चूर्णिको टिप्पनककार श्रीश्रीचन्द्रमूरिने बृहचूर्णीनामसे दरशाई है- नत्वा श्रीमन्महावीर परोपकृतिहेतवे । जीतकल्पवृहच्चू»ाख्या काचित् प्रकाश्यते ॥ १ ॥ उपरनिदिष्ट सात चूगीयोके अतिरिक्त तेरह चूर्णीयोके रचयिताके नामका पता नहीं मिलना है । तथापि इन चूर्णीयोके अवलोकनसे जो हकीकत व्यानमे आई है इसका यहाँ उल्लख कर देता है। यद्यपि आचाराचूगी और मूत्रकृताङ्गचूगीके रचयिताके नाम का पता नहीं मिला है तो भी आचारागचूर्णीम चूर्णि- कारने पढ़ह स्थान पर नागार्जुनीय वाचनाका उन्लेख किया है, उनमसे सात स्थान पर “महंतनागज्जुणिया" इस प्रकार बहुमानदर्शक ‘भदन्त'भन्डका प्रयोग किया है, इससे अनुनान होता है कि ये चूर्णिकार नागार्जुनसन्तानीय कोई स्थविर होने चाहिए। मूत्रकृताङ्गवृमि जहा जहा नागार्जुनीय वाचनाका उन्मुख चूर्णिकारने किया है वहां सामान्यतया नागणिया इतना ही लिखा है । अत ये दोनों चूर्णिकार अलग अलग ज्ञात होते हैं। सूत्रकृताङ्गचूमि जिनमदगणीक विशेषावश्यकभाष्यकी गाथायें एव खोपज टीकाके सन्दभ अनेक स्थान पर उद्धृत किये गये हैं, इससे इस चूर्णिकी रचना श्रीजिनमद्रगणिके बादक है, तब आचाराङ्गचूनामें जिनमद्रगणिके कोई प्रथका उल्लेख नहीं हैं, इस कारण इस चूर्णीको रचना श्रीजिनमदगणिके पूर्वको होनेका सम्भव अधिक है। भगवतीमत्रचूर्णिमें श्रीजिनभद्रगणीके विशेषणवतीग्रन्थको गाथाओंके उद्धरण होनेसे, और कल्पचूर्णीमें साक्षात् विसेसावस्सगमासका नाम उल्लिखित होनेसे इन दोनों चूर्णियोंकी रचना निश्चित रूपसे श्रीजिनभद्रगणीके बादकी है। दशावत्रचूमि केवलज्ञान-केवलदर्शनविषयक युगपदुपयोगादिवादका निर्देश होनेसे यह चूणां भी श्रीजिनभद्रगणीक बादकी है। आवश्यकणिक प्रणताका नाम चूर्णीको कोई प्रतिमें प्राप्त नहीं है । श्रीसागरान दसूरि महाराजने अपने सम्पादनमें इसको जिनदासगणिमहत्वरकृत बतलाई है। प्रतीत होता है कि आपका यह निर्देश श्रीधर्मसागरोपाध्यायकृत तपागच्छीय पहावलीके उल्लेखको देख कर है, किन्तु वास्तवमें यह सत्य नहीं है। अगर इसके प्रणेता जिनदासगणि होते तो आप इस प्रासादभूत महती चूर्णिमें जिनभद्र गणिके नामका या विशेषावश्यकभाष्यकी गाथाओंका जरूर उल्लेख करते । मुझे तो यही प्रतीत होता है कि इस चूर्णांकी रचना जिनभद्रगणिके पूर्वकी और नन्दीसूत्ररचनाके यादकी है। दशवकालिकचूर्णी (वृद्धविवरणमें और व्यवहारचूमि श्रीनिनभद्रगणिकी कोइ कृतिका उद्धरण नहीं है, अत ये चीयाँ भी जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणके पूर्वको होनी चाहिए। जम्बूद्वीपकरणचूर्णी, यह जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति की चूणी मानी जाती है किन्तु वास्तवमें यह जम्बूद्वीपके परिधि जीवा धनु पृष्ठ आदि आठ प्रकारके गणितको स्पष्ट करनेवाल किसी प्रकरणको चूर्णी है। वर्तमान इस चूर्नामें मूल प्रकरणको गाथाओं के प्रतिक मात्र चूर्णिकारने दिये हैं, मत कुछ गाथामोका पता जिनभद्रीय बृहत्क्षेत्रसमासप्रकरणसे लगा है, किन्तु कितनीक गाथाओंका पता नहीं चला है। इस चूमि जिनमदीय बृहक्षेत्रसमासकी गाथायें भी उद्धृत नजर भाती हैं, मत यह चूर्णी उनके यादकी है। यहा पर चूर्णियोंके विविध उन्लेखोंको लक्ष्यमें रख कर चूर्णिकारोके विषयमें जो कुछ निवेदन करनेका था, वह करने बाद अतमें यह लिखना प्राप्त है कि-प्रकास्यमान इस नन्दीसूत्रचूकि प्रणेता श्रीजिनदासगणि महत्चर हैं, जिसका रचनासमय स्पष्टतया प्राप्त नहीं है, फिर भी आज नन्दीसूत्रचूर्णाकी जो प्रतियाँ प्राप्त है उनके अन्तमें सवतका उल्लेख नजर आता है, जो चूणारचनाका सवत् होनेकी संभावना अधिक है । यह उन्लेख इस प्रकार शकर'ज्ञ पञ्चस वर्षशतेषु अतिका तेषु अष्टनवतेषु नन्यध्ययनचूणीं समाता इति । अर्थात् शाके १९८ (वि स ७३३) वर्षमें नन्यध्ययनचूर्णी समाप्त हुई। इस उलेखको कितनेक विद्वान् प्रतिका टेसनसमय मानते हैं, किन्तु यह उलेख नन्यध्ययनचूर्णिकी समाप्तिका अर्थात् रचनासमाप्तिका ही निर्देश करता है, लेखनकालका नहीं। अगर प्रतिका लेवनकाल होता तो 'समाप्ता' ऐसा न लिख कर लिखिता' ऐसा ही लिखा होता । इस प्रकार गयसन्दर्भ में रचनासवत् लिम्बनेकी प्रथा प्राचीन युगमें थी ही, जिसका उदाहरण आचार्य श्रीशीलाइकी आचाराप्रवृत्तिमें प्राप्त है। १ श्रावोरात । ५५ दि. ५८५ वर्षे याकिनीस्नु श्रीहरिमारि स्वगमाइ । निीय बृहत्कन्पमाल्याऽऽवश्यकादि- चूर्णिमा प्रोजिनदासमहत्चरादयः पूर्वगतमुतधरणीप्रशुम्नक्षमणाविशिष्यत्वेन श्रीहरिभद्रसूरित प्राचीना एष यथा फालमायिनो पोया। 11१५ श्रीजिनमनगणियुगज्यान । अय च जिनमदीयथ्यानातककाराद् मिन' सम्माम्यते। इलियन एटवेरी ! १३५३ ॥
१३ । सूत्र और चूणिकी भाषा नन्दीसूत्र और इसकी चूर्णिकी भाषाका स्वरूप क्या है । इस विषयमें अभी यहॉ पर अधिक कुछ मै नहीं लिखता हू । सामान्यतया व्यापकरूपसे मेरेको इस विषयमें जो कुछ कहना था, यह मैने अखिलभारतीयप्राच्यविद्यापरिषत्-श्रीनगर के लिये तैयार किये हुए मेरे “जैन आगमधर और प्राकृत वाड्मय " नामक निबन्धमें कह दिया है, जो 'श्रीहजारीमल स्मृतिग्रन्थ में प्रसिद्ध किया गया है, उसको देखनेकी विद्वानोको सूचना है। परिशिष्टादि चूर्णिके अन्तमें पांच परिशिष्ट और शुद्धिपत्र दिये गये है। पहले परिशिष्टमें मूल नन्दीसूत्रमें जो गाथाये है उनको अकारादिक्रममें दी गई है । दूसरे परिशिष्टमें नन्दीचूर्णिमें चूर्णिकारने उद्धृत किये उद्धरणोंको अकारादिक्रमसे दिये है। तीसरा परिशिष्ट चूर्णिगत पाठान्तर और मतान्तरोंका है। चौथे परिशिष्टमें नन्दीसूत्र और 'चूर्णिमें आनेवाले ग्रन्थ, ग्रन्थकार, स्थविर, नृप, श्रेष्ठी, नगर, पर्वत आदि विशेषनामोका अनुक्रम है । पाँचवे परिशिष्टमें सूत्र और चूर्णि आनेवाले विषयद्योतक एवं व्युत्पत्ति- द्योतक शब्दोंका अनुक्रम दिया गया है । इन परिशिष्टोके बादमें शुद्धिपत्रक दिया गया है । वाचक और अव्येता विद्वानोसे नम्र निवेदन हैं कि इस ग्रन्थको शुद्धिपत्रके अनुसार शुद्ध करके पढ़ें । संशोधन और सम्पादन इस ग्रन्थके सशोधनमें अनेक महानुभाव विद्वान् व्यक्तियोंका परिश्रम है । खास तोरसे पं. भाई अमृतलाल मोहनलाल भोजकका इस सम्पादनमें महत्वका साहाय्य है। जिसने चूर्णि और मूल सूत्रकी प्रामाणिक प्राण्डुलिपि (प्रेसकॉपी) तैयार की है, साद्यन्त प्रुफपत्र देखे है और इस प्रन्थके महत्त्वपूर्ण परिशिष्ट भी किये है । भाई श्री दलसुखभाई मालवणिया-मुख्यनियामक ला. द भारतीय संस्कृतिविद्यामंदिर-अहमदाबाद तथा पंडित बेचरदासभाई दोसीने मुद्रणके बादमें साधन्त देखकर अशुद्धियोका परिमार्जन किया है, जिसके फलस्वरूप शुद्धिपत्र दिया है। भाई श्रीदलसुख मालवणिया का आगमोंके संगोधनमें शाश्वत साहाय्य प्राप्त है, यह परम सौभाग्यकी बात है। वसत प्रिन्टींग प्रेसके सचालक श्री जयति दलाल और मेनेजर श्री शांतिलाल शाह प्रमुख प्रेसके सर्व भाईओका प्रस्तुत मुद्रणकार्यमें आंतरिक सहयोग भी हमारे लिए चिरस्मरणीय है। चूर्णिमहित नन्दीसूत्रके संशोधनमें मात्र ग्रन्थको प्रतियोंका ही आधार रखा गया है, एसा नहीं है, किन्तु मूलसूत्र एवं चूर्णिके उद्धरण प्राचीन व्याख्याग्रन्थोमें जहाँ जहाँ भी देखने में आये उनसे भी तुलना की गई है । इस प्रकार प्राचीन प्रतियां, प्राचीन उद्धरणोंके साथ तुलना एवं अनेक विद्वानोंके बौद्धिक परिश्रमके द्वारा इस नन्दीमूत्र एवं चूर्णिका संशोधन और सम्पादन किया गया है । मै तो सिर्फ इस सशोधन एवं सम्पादनमें साक्षीभूत ही रहा है । अतः इस ग्रन्थके महत्त्वपूर्ण सगोधन एवं सम्पादन का यश हम सभीको एकसमान है । अन्तमें गीतार्थ मुनिप्रवर एवं विद्वानोसे मेरी नम्र प्रार्थना है कि मेरे इस सशोधनमें जो भी छोटी मोटी क्षति प्रतीत हो, इसकी मुझे सूचना दी जायगी तो जरूर अतिरिक्त शुद्धिपत्रकी तोरसे उसको आदर दिया जायगा । स. २०२२ माघ शुक्ल पूर्णिमा अहमदाबाद मुनि पुण्यविजय चूर्णियुक्त नन्दीसूत्रका विषयानुक्रम स्त्र प्र. १ १० १५ १५ १५ ५ विषय ट জুলিঙ্কাকো লগালে माया "महलसुनलाया २-३ महावीरपरमात्माकी स्तुति गया ५-१० सशस्तुतिस्म-श्रीसंघको रथ चक, नपा १७ र सूर्य समुद्र और मन्दागिरिक रूपको द्वारा स्तुति -६ गया१८-१९ जिनावलीसूत्र- चोवीस जिनोंको नमस्कार गाया १०-२१ गणघरावलीस्त्र- भगवान महावीरके ११ गणपरोकी स्तुति . गाथा ११-१२ स्थविरावलीसूत्र- भूतस्थविरोंकी स्तुति मा २२ सुधर्मा जम्बूखामि प्रभवस्वामि, सम्पमा गा २३ यशोभद्र सम्भूताय मनपा स्थूलभद्र मा २५ महागिरि मुहस्ती बहुल मा २५ स्वाति, श्यामाय, शाण्डिल्य जीवघर गा २१ आयसमुद्र मा २० भायमा, गा २८ आयनन्दित गा २९ वाचक आयनागहस्ती, गा. रेवतिनक्षत्र पाचन मा ३७ सिंहवाचक गा ३२ स्कदिलावाय मा । हिमवन्त गा ३१-३५ नागाजुन वाचक या ३६-१८ भूतदिनाथाय गा ३९ शैहिस्य 1-18 दुष्यगणि गा ४२ सामान्यरूपसे सर्व स्थविराकी स्तुति गा। पर्पदसूध-भुवज्ञानके-शास्त्र अधिकारि-अनाधिकारी शिष्यों की परीक्षाके लिये शेलयन इन चारनी, परिपूर्णक हस आदिक साणिक उदाहरण और सद् अक्षयद् एव दुर्विदापत् १२ शनिव-पांच शानके नाम ३ मत्यादि पोच ज्ञानकी व्युत्पत्ति कम भादिका निरूपण सम विषय १ प्रत्यक्षशामके इन्द्रिय प्रत्यक्ष मोन्द्रियन्त्यक्ष हो भेद इंद्रिययक्षके पांच मैद " मोइजियप्रत्यक्षके सीन भेद १२ अवधिश्यक्षके दो मैद-क्षायोपशमिक और भवप्रत्यायिक १३ স্বাৰীলিঙ্ক বখা যুলমযি অমি शनका स्वरूप ११ अवधिज्ञानके भानुगामिकादि छ भेद १५-२१ १ आणमिक भवषिशानका स्वरल उसके अन्तगत और मध्यगत मेद तथा पुरतो मतगत मागतो मतगत, पावतो मन्त्र गातादि प्रभेदों का खल्ल उन में प्रतिविशेष आदिका निरूपण २ अनानुगामिक अवविज्ञान २३ ३ वर्षमानक भवभिशान गाथा ॥१-१५ ঘদিৱসা জম জী কয় গদি क्षेत्र मा १६-१५ द्रव्य क्षेत्र काल भावकी अपेक्षा अवधिज्ञानकी पद्धिका सम गा ५व्य क्षेत्र काल-भावका पारस्परिक पतिका स्वरूप गा ५१ क्षेत्र-कालकी सूक्ष्मवाका निरूपण ' हीयमान अवधिज्ञान २५ ५ प्रतिपाति अवधिज्ञान २६ ६ प्रतिपाति अवधिज्ञान द्रव्य क्षेत्र काल भाव आची अवधिज्ञानका ९ १९ १७ - गा ५२ अवविज्ञानका उपसंहार मन पयवज्ञानका अधिकारी ३. मन पर्यवज्ञानके ऋमिति विपुलमति होमेद १२ ३१-१२ द्रव्य क्षेत्र काल माव आधी ऋजुमति विपुलमतिमन पर्यवज्ञानका स्पा और गा ५३ मन पर्यशानका उपसंहार २३ चूर्णिमें-- अष्ट रचप्रदेश और उप रिम अपस्तन सुखकावरका स्वस मत्यादिसनोका पक्ष परोक्ष रूपमै विमानन ॥
- चूणियुक्त नन्दीसूत्रका विषयानुक्रम पृष्ठ पृष्ठ २५ पत्र विषय केवलज्ञानके भवस्य और सिद्धकेवलज्ञान दो मेद ३४-३६ भवस्थकेवलज्ञानके भेद और स्वरूप ३७ सिद्धकेवलज्ञानके अनन्तरसिद्ध परम्परसिद्ध दो भेद २५ २६ ३८ अनन्तरसिद्धके तीर्थसिद्ध, अतीर्थसिद्ध आदि पद्रह मेद ३९ २७ ४० ११ ४३ ३१ चूर्णिमें-पद्रह भेदोंका विस्तृत स्वरूप २६ परम्परसिद्ध केवलज्ञान द्रव्य क्षेत्र काल भाव आश्री केवलज्ञानका स्वरूप २८ चूर्णिमें-केवलज्ञान-केवलदशनविषयक युग- पदुपयोग-एकोपयोग-क्रमोपयोगवादकी चर्चा २८-३० गा ५४-५५ केवलज्ञानका उपसहार ३० परोक्षज्ञानके आभिनिबोधिक श्रुतज्ञान दो भेद ३१ आभिनिबोविकज्ञान और श्रुतज्ञानकी सदैव सहभाविता चूर्णिमें-मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका प्रयकरण मतिज्ञान और मतिअज्ञान तथा श्रुतज्ञान और श्रुतअज्ञानका तात्विक विवेक आभिनिबोधिक ज्ञानके श्रुतनिश्रित अश्रुत- निश्रित दो मेद अश्रुतनिश्रित आभिनिवोधिकज्ञानके मेद, स्वरूप और उदाहरण ३३ गा ५६ अश्रुतनिश्रित आभिनिवोधिकके औत्पत्तिकी आदि चार मेद गा ५७-६० औत्पत्तिको मतिका स्वरूप और उदाहरण गा ६१-६३ वैनयिको मतिका स्वरूप और उदाहरण, गा ६४-६५ कर्मजा मतिका स्वरूप और उदाहरण, गा. ६६-६९ पारिणामिक मतिका स्वरूप और उदाहरण श्रुतनिश्रित मतिज्ञानके अवग्रह, ईहा आदि सूत्र विषय ५२ अपायके भेद और एकाथिक शब्द ३५ ५३ धारणाके भेद और एकार्थिक शब्द ३६ ५४ ५६ २८ प्रकारके मतिज्ञानका और व्यञ्जनाव- ग्रहका प्रतिबोधक और मल्लक दृष्टान्त द्वारा स्वरूपनिरूपण ३७-३९ द्रव्यक्षेत्र काल भाव आश्री आभिनिबोधिक ज्ञानका स्वरूप ४२ ५८ गा. ७०-७५ आभिनिबोधिक ज्ञानके भेद, अर्थ, कालमान, शब्दश्रवणका स्वरूप, एकार्थिक शब्द और उपसहार ४३ ५९ श्रुतज्ञानके चौदह भेद ६०-६३ १ अक्षरश्रुतके सज्ञाक्षर, व्यञ्जनाक्षर और लब्ध्यक्षर, तीन भेद और स्वरूप ४५ ६४ २ गा ७६ अनक्षरश्रुत ४५ ६५-६८ ३ सज्ञिश्रुतके कालिक्युपदेश, हेतूपदेश और दृष्टिवादोपदेश तीन प्रकार, स्वरूप और ४ असजिश्रुत ४५-१७ चूर्णिमें-ईहा, अपोह, मार्गणा, गवेषणा, चिन्ता, विमर्श इन शब्दोंके अर्थका स्पष्टीकरण ५ सम्यक्श्रुत-द्वादशाङ्गीके नाम ६ मिथ्याश्रुत-भारत, रामायण हभी मासु- रुक्ख आदि प्राचीन अनेक जैनेतर शास्त्रोंके और सम्यक्श्रुत-मिथ्याश्रुतका तात्विक विवेक ४९-५० ७१-७३ ७-८ सादि-अनादि ९-१० सपर्यवसित अपर्यवसित श्रुतज्ञान, और उनका द्रव्य क्षेत्र काल भाव आश्री स्वरूप ५१ ७१-७५ पर्यवाग्राक्षरका निरूपण और अतिगाढ- कर्मावृत दशामें भी जीवको अक्षरके अन- न्तमें भाग जितने ज्ञानका शाश्वतिक सद्भाव ५२ चूर्णिमें- अक्षरपटलका विस्तृत निरूपण ५२-५६ ७६ ११-१२ गमिक अगमिक श्रुतज्ञान ५६ १३-१४ अङ्गप्रविष्ट और अगवाह्यश्रुत अङ्गबाह्यश्रुतके आवश्यक और आवश्यक- व्यतिरिक दो प्रकार आवश्यकश्रुत आवश्यकश्रुतके कालिक और उत्कालिक ३ ९ ३२ ३२ नाम १६ चार भेद ७८ ४८ अवग्रहके अर्थावग्रह व्यञ्जनावग्रह दो भेद ३१ न्यजनावग्रहके मेद और स्वरूप । ३५ अर्थावप्रहके भेद और एकाथिक शब्द ३५ ईहाके मेद और एकार्थिक शब्द ८० दो प्रकार १६ चूर्णियुक्त नन्दीसूत्रका विषयानुक्रम सूत्र 61 विषय सत्कालिकयुत के २९ नाम चूर्णिमें- ३९ उरकालिकश्रुतके नामोंका भ्युत्पत्यविवरण कालिकधुतके २९ नाम चूर्णिमें कालिक धुतके नामोका व्युत्प स्वर्यविवरण। टिप्पणी में नामोंकी कमी- बेशीका निर्देश आवश्यकम्पतिरिकभुतका उपसंहार माविष्टद्युतके १२ नाम 40 ३ १६ ६१ १ आचाराधका स्वरूप १ ६ ६२ २ तास्त्रका स्वरूप ३ स्थानाससका स्वरूप विषय पृष्ठ १०४-1. अनुयोगदष्टिवादके मूलप्रयमानुयोग और गरिकानुयोग दो प्रकार तथा इनका स्वरूप ७६ चूर्णिमें-सिण्डिकाका वणन १११ चूलिका राष्टिवाद ११२-१३ दृष्टिवादका परिमाण और विषय ११४ द्वादशाङ्गीके विराषकोंको हानि ១។ द्वादशाजीके भाराधकोंको लाम - द्वादशाहीको शाश्वतिकता ११७ द्रव्य क्षेत्र काल भाव आश्रीश्रुवज्ञानकावा २ ११८ गा ८१ युवज्ञानके चौदहमेद गा ४१ श्रुतशामका लाम गा ३ बुद्धिके पाठ गुण गा ८५ सूत्राश्रवणविधि गा ८५ सत्रव्याख्यान विधि और उपसंहार-नी सनकी समाप्ति प्रथम परिशिष्ट-मदीस्त्रगत गाथाओंका मकारादिक्रम द्वितीय परिशिए-नन्दीचूर्णिगत उद्ध रणोंका अकारादिकम तृतीय परिशिय- नन्दीचूणीगत पाठान्तर और मवान्वरोका निर्देश चतुर्थ परिशिष्ट- नन्दीस्त्र और चूर्णिगत अथ प्रथकार, स्थविर सुप श्रेष्ठी नगर आदि के विशेषनामोंका अचारादिकम पञ्चम परिशिष्ट-नस्त्र और चूर्णिगत विषयविभाग और व्युत्पत्तिदधक शब्दोंका अकारादिक्रम ६१ ६७ १ समायाजस्त्रका रूप ५ विवाहप्रज्ञप्तिबास्त्रका स्वरूप ६ साताधमक्यास्त्रका स्वरूप १ ७ उपासकदशाजदत्रका स्वरूप ९१ अन्तरसदनका स्वस हा ९ अनुत्तरीपपातिकदशास्त्रका स्वरूप “ • प्रयव्याकरणशास्त्रका स्वरूप ११ विपाकसूत्रके दुःखविपाक सुखविपाक दो प्रकार उनका वर्णन और स्वस . ११ दृष्टिवाद भेगके व मेद ९-१०५ परिकमदृष्टिवादकेसात प्रकार और इनके मेद " १. सूत्राष्टिवादके २२ प्रकार ७३ पूर्वगतदस्लिाद-चौदह पूर्व ७५ प्राचार्य श्री विनयचन्द्र शान भण्मार, जयपुर ॥ णमो त्यु णं समणस्स भगवओ महइ-महावीर-चद्धमाणसामिस्स ॥ णमो अणुओगधराणं थेराणं। सिरिदेववायगबिरइय नंदीमुत्तं। सिरिजिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं । 444 ॥ नमो भगवते वर्द्धमानाय ॥ सव्वमुतखंधगादीणं मंगलाधिकारे गंदि त्ति वत्तव्या । गंदणं णंदी, गंदेति वा अणयेति गंदी, गति वा गंदी, पमोदो हरिसो कंदप्पो इत्यर्थः । तस्स य चतुन्विहो निक्खेवो । गतासु णाम-हवणासु दवणंदी जाणगो अणुवउत्तो । अहवा जाणग-भवियसरीरवतिरित्तो बारसविधो तूरसंघातो इमो- भंमा १ मकुंद २ मद्दल ३ कडंब ४ झल्लरि ५ हुडुक्क ६ कंसाला ७ । काहल ८ तलिमा ९ वंसो १० पणयो ११ संखो १२ य बारसमो॥१॥ 5 ] 15 भावणंदी णंदिसद्दोवयुत्तभावो । अहवा इमं पंचविहणाणपरूवगं णंदि त्ति अज्झयणं, तं च सुतंसेण सव्वसुत- भंतरभूतं । तं च सव्वसुतारंभेलु विग्धोवसमणत्यमादीए मंगलं पयुज्जति । तस्स य मंगलट्ठाणावसरपत्तस्स गुरखो विणेयस्स अत्य-सुतगोरवुप्पादणत्थं अविच्छेदसंताणागतसुतप्पदरिसणत्यं च इमं थेरावलिं कहेत्ता ततो से 10 अत्थं कहयंति । सव्वसुतत्था य जतो तित्थगरप्पभवा, अतो भत्तीए पंण्णवग-सावग-पढग-चिंतगा य पढमताए णमोकारं करेता भणंति- [सुत्तं १] जयइ जगजीवजोणीवियाणओ जगगुरू जगाणंदो । जंगणाहो जगबंधू जयइ जगपियामहो भयवं ॥१॥ जयति गाहा । सोतिदियादिविसय-कसाय-परीसहोवसग्ग-चउघातिकम्म-ऽटुप्पगारं वा परप्पवादिणो य जिणमाणो जितेंसु वा जयति त्ति भण्णति । जगं ति-खेत्तलोगो तम्मि जे जीवा तेसिं जाओ जोणीओ-सञ्चित्त-सीत- संबुडादियाओ चउरासीतिलक्खविहाणा वा विविहपगारेहिं जाणमागो वियाणओ । अहवा जो जहा जेहिं कम्मेहि जाए जोणीए उववज्जति तं तहा जाणति त्ति विसिट्ठो जागगो वियाणगो । अहवा जगग्गहणातो धम्मा-ऽधम्मा- ऽऽगास-पुग्गलग्गहणं, जीव त्ति सम्बजीवग्गहणं, जोणि त्ति-जीवा-ऽजीवुप्पत्तिठाणं, जहा य ज उप्पज्जति विग- 20 छति धुवं वा तं तहा सव्वं जाणइ ति बियाणगो । अनेन वचनेन केवलनाणसामत्थतो सव्वभावे सबहा जाणति १ खंधतादीणं आ• दा० ॥ २ अणाए त्ति आ० । अणेण त्ति दा० ॥ ३ गयाओ णाम-ढवणामओ । दच मा० दा० ॥ ४ मादीय मंगलटुं पयु आ० ॥ ५ वलिय कहेत्ता आ० दा० ॥ ६ कथयति आ० दा० ॥ ७ पण्णावग' आ० दा० ॥ ८ जिणवसभो सललियवसभविक्कमगती महावीरो इत्युत्तरार्धपाठमेदश्चूणौँ । नाय पाठभेदः कस्मिंश्चिदपि स्त्रादर्श उपलभ्यते ॥ ९ सग्गावघाति आ० । 'सरगुवधाति दा० ॥ १० खेत्तभावो तम्मि आ० दा० ॥
२ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुप्पीए सजुय [सु० १-२ गा २-८ त्ति ख्यापित भवति । 'जगगुरु' चि जग ति-सम्बसणिलोगो, तस्स मंगवानेव गुरुः । कथम् ? उच्यते- जि० १८६ प्र०] गृणाति शास्त्रार्थमिति गुरु, ब्रवीतीत्यर्थ , तिरिय मणुयं देवा मुराए परिसाए धम्ममक्खाति । जो वा न पुच्छति त सच कहयति त्ति तेग गुरू, अनेन वचनेन परोपकारित्व प्रदर्शित भवति । जगा-सचा ताण आणदकारी जगाणदो। कह? उच्यते-सव्वेसि सत्ताण अन्नावादणोवदेसकरणतातो। जतो भणित-"सम्वे सत्ताण 5 इतन्ना ण परियावेतम्या ण परिघेत्तन्या ण अन्जावेतन्व" [आचा० श्रु१म ४ उ२सू शुचि। विसेसतो सणीण धम्मकहणतातो आणदकारी, ततो वि विसेसतो भन्नसचाण ति । अनेन वचनेन हितोपदेशकर्तृत्व दर्शित भवति । जगा-सचा ते अग्णेहिं परिभबिजमाणे रक्वइ ति जगपाहो। कही उच्यते-मणो वयण-काएहिं कत-कारिता ऽणुमतेहि रक्खतो जगणाहो भवति । अनेन वचनेन सम्बपाणीण सणाहता दसिता भवति। 'नगवधु' ति जगा-सचा तेर्सि वधू जगवधू । कह ? उच्यते-जो अप्पणो परस्स वा आवतीए विण परिचयति सो बा, भगव च मुठ्ठ वि 10 परीसहोवसम्गादिस वाहिज्जमाणो वि सचेसु वधुच अपरिचयतो ण विराहेति ति अतो जगध, अनेन वचनेन सव्यसनेसु सवधुता दसिता भवति । पितामहो ति जो पितुपिता स पितामहो, सो य भगव चैव । सम्बसचाण पितामहो कह ? उच्यते-सबसचाण अहिंसादिलक्खणो धम्मो पिता कखणचातो, सो य धम्मो भगवता पणीतो अतो भगव धम्मपिता, एव च सन्चसत्ताण भगव पितामहो चि । अनेन वचनेन धम्म पहुच्च आदिपुरिसत ख्यापित भवति । एतीए गाहाए पछद्धरस पाढतर इम-"जिणवसभो सललिययसभविक्कम जि० १८६ द्वि०] गती महावीरो।" जिण 15 एव वसमो जिणवसभी । वसभो ति सनममारुबदणे । चकमतो सुभा गायसचालणक्रिया सललित मष्णति । चामन्दादिणाण वा पुरिम-पच्छिमचलणाण न कमुक्खेवकरण स विक्रमो मणति, दुपदस्स पुण एगचलणुक्खेवो चेर विकमो । सेस कठ॥१॥ किंच- जयइ सुयाण पमवो तिर्थयराण अपच्छिमो जयइ । जयइ गुरू लोगाण जयइ महप्पा महावीरो ॥२॥ जयति सुताण० गाहा। राग-दोसादिगरी जिणतो जितेंसु वा जयति ति। [मुताण'] सचमुताण ति, मुतांगत्यो भगवतातो पभवो। 'पभवो' ति परती । अणिढवयणपरिहारातो पच्छिमो वि अपछिमो भग्णाति, अहवा पच्यणुपुम्चीए अपच्छिमो, रिसमो पच्छिमो। अविसिहजीवलोगस्स विसिद्वसणिजीवलोगस्स वा, अहवा सम्मदिद्विमादिसनतासनतलोगस्स गुरू। मह आता जस्स सो य अकम्मवीरियसामत्यतो महात्मा, केवलादि विसिहलदिसामत्यतो वा महात्मा ॥२॥ किंच- भह सव्वजगुज्जोयगस्स मद्द जिणस्स वीरस्स । भइ सुरा ऽसुरणमसियस्स भद धुयरयस्स ॥३॥ भइ सञ्च० गाडा । मायते माति वा मदम्, न मगवतो महतु ति। सम्बनग ति लोगो। अवविहो वि लोगनिक्खयो माणितनो [आव० नि० गा० १०५७] । सेस क3 ॥३॥ इम सघस्स रहस्वग- १ पसदेषा जे दा ॥ २ ए एपमक्खा जे ॥ ३ सम्ले पाणा सम्बे भूया सव्वे बीवा सव्वे सत्ता म इंतम्मा म मगादेयम्मा ग परियायैषम्या ग परिपेतम्या ग उरवेयव्वा इतिरूप सूत्रमापारा॥ ४ विसंयर बा ॥ ५ महो भवति । अनेन भा० ॥ ६ स्यारा ॥७ माणत्याण मग आ. ॥ ८ छिमो पीरो, रिसमो मा• ॥ 20 25 मंगलं सघरथुई य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुतं । my - [सुत्तं २] भई सीलपडागूसियस तव-णियमतुरगजुत्तस्स । संघरहस्स भगवओ सज्झायसुणंदिघोसस्स ॥४॥ भई सील० गाहा। रहो सामण्णतो पंचमहन्वतमइओ। उस्सितो त्ति तस्सष्टारससीलंगसहस्वासिता जतपंडागा । वारसविहो तवो इंदिय-गोइंदियो य णियमो एते अस्सा। सज्झायसदो दिघोसो। सेस कंठं ॥४॥ संघस्सेव इमं चक्करूवर्ग- संजम-तवतुंबा-ऽस्यस्स णमो सम्मत्तपारियल्लस्स । अपडिचक्कस्स जओ होउ सया संघचक्कस्स ॥५॥ संजम० गाहा । विसुद्धभावचकस्स सत्तरसविधो संजमो तुंबं । तस्स वारसविहतवोमता अरगा। पारियल्लं ति-जा वाहिरपुट्ठयस्स वाहिरव्भमी, सा से सम्मत्तं कतं, जम्हा अण्णेहिं चरगादिएहिं जेतुं [जे० १८७ प्र० ] ण 10 सकति तम्हा एवं जयति, अप्पडिचकं च एतं । णमो एरिसस्स [सघ]चक्कस्सेति ॥५॥ इमं संघस्सेव णगररूवग- गुणभवणगहण ! सुयरयणभरिय ! दंसणविसुद्धरच्छागा!। संघणगर! भदं ते अक्खंडचरितपागारा ! ॥६॥ गुणभवणगहण० गाहा । तम्मि पुरिससंघणगरे इमे गुणा-पिडविसुद्धि-समिति-गुत्ति-दवादिअभिग्गह- मासादिपडिमा-गोयरे य चरगादिया, एमादिउत्तरगुणा तम्मि सधणगरे भवणा कता, भवण त्ति घरा, तेहिं 15 गहणं ति-निरंतरं संठिता घणा । तं च संघपुरिसणगरं अंगा-ऽणंगादिविचित्तशुतरयणभरितं । खयोवसमितादि- सम्मत्तमइयरच्छाओ य, मिच्छत्तादिकयारवज्जितत्तणतो विसुद्धाओ । मूलगुणचरित्तं च से पागारो, सो य अखंडो त्ति-अविराधितो निरतिचार इत्यर्थः । सेसं कंठं ॥६॥ इमं पि संघस्सेत्र पर्दैमरूवर्ग- कम्मरयजलोहविणिग्गयस्स सुयरयणदीहणालस्स । पंचमहव्वयथिरकण्णियस्स गुणकेसरालस्स ॥७॥ सावगजणमहुयैरिपरिखुडस्स जिणसूरतेयबुद्धस्स । संघपउमस्स भद्द समणगणसहस्सपत्तस्म ॥८॥ [ जुम्मं] कम्मरय० गाहा । कम्म एव रयो कम्मरयो । अहवा जं पुचवद्धं तं कम्म, वज्झमाणं रयो, तं सव्वं पि 20 " १ भदं सील० इति संजमतव० इति गुणभवण० इति च सूत्रगावात्रिक श्रीहरिभद्रसूग्यित्ती श्रीमलयगिरिपादवृत्तौ च पक्षानुपूर्ध्या व्याख्यातमस्ति ॥ २ हरि०वृत्तौ मलयवृत्तौ च 'सुणेमियोसम्ल टति पाठमेटो निर्दिष्टोऽस्ति । अंगविजागानेऽपि- तत्य मरसपने हिरन नेप-दुदुभि-पनम-गय-सीह-मद्ल-भमर-रधणेमिणिग्योल-मारम-कोश्लि-उदोस-कोंच-चबाक-हम-कुर-बरिहिण- ततीसर-गीत-वादत-तलतालधोम-उर-रेरित-शोदित-विकिणिमहुग्घोमगादुभावे मम्मपण्ण बूया। इत्यत्र मिणिग्योस इति पट वत्तंते ।। ३ पडाता मा० ॥ ४ व० मो० आदर्शयो केनापि विदुषा बारयस्स साने बारस्म इति सशोषित वनंत। एतत्याठानुमायें मलयगिरिपादव्याख्यान वर्तते ॥ ५ तवो महामरगा जे० दा० ॥ ६ अखंडचारित्त मु० ॥ ७°च्छाया य आ० दा० ॥ ८कतवर' मा. दा० ॥ ९णिरइचार आ० ॥ १० पउम आ० दा० ॥ ११ यरपरि दे० ल० ॥
२ - जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए सजुय [सु०१-२ गा २-८ ति ख्यापित भवति । 'जगगुरु' ति जग ति-सम्बसणिलोगो, तस्स भगवानेव गुरु । कयम् ! उच्यते- वि० १८६ प्र०] गृणाति शास्त्रार्थमिति गुरु, ब्रवीतीत्यर्थ , तिरिय-मणुर्य देवाऽमुराए परिसाए घम्ममक्वाति । जो वा न पुच्छति त सच कहयति ति तेग गुरू, अनेन वचनेन परोपकारित्व प्रदर्शितं भवति । जगा-सत्ता वाण आणदकारी जगागदो। कह! उच्यते-सब्वेसि सचाण अब्बावादणोबदेसकरणचानो। जतो भणित-"सब्वे सत्ताण 5 हतया परियावेतन्वा ग परिवेत्तन्वा ण अजावेतन्व" [आचा श्रु १४४३२२ ति। विसेसतो सण्णीण धम्मकडणचातो आणदकारी, ततो वि विसेसतो भव्नसचाण ति । अनेन वचनेन हितोपदेशकर्तृत्व दर्शित भवति । जगा-सत्ता ते अण्णेहि परिभविजमाणे रक्खइ ति जगणाहो। कह उच्यते-मणो चयण-काएहि कत-कारिता ऽणुमतेहि रक्खतो जगणाहो भवति । अनेन बचनेन सन्चपाणीण सणाहता दसिता भवति। 'जगषधु' ति जगा-सत्ता बेसि वधू जगवधू । यह ' उच्यते-जो अपणो परस्स वा आरतीए वि प परिचयति सो वधू, भगव च सुट्ट वि 10 परीसहोवसन्गादिस वाहिज्जमाणो वि सत्तेसु वधुत्त अपरिचयतो ण विराहेति चि अतो जगवधु, अनेन वचनेन सबसनेस सवधुता दसिता भवति । पितामहो ति जो पिपिता स पितामहो, सो य भगव चेव । सन्यसत्ताण पितामहो कह । उच्यते-सव्वसचाण अहिंसादिलक्खणो धम्मो पिता रकखणनातो, सो य धम्मो भगवता पणीतो अतो भगव धम्मपिता, एव च सम्बसचाण मगव पितामहो चि । अनेन वचनेन धम्म पडच आदिपुरिसंत ख्यापित भवति । एतीए गाहाए पछद्धस्स पाढतर इम-"जिणवसमो सललियवसभविक्कम जि० १८६ दि.] गती महाबीरो।" जिण 18 एव वसभो जिणवसमो । वसभो चि सजममारुबदणे । चकमतो मुभा गायसवालणक्रिया सललित भण्पति । वाम-दाहिणाण या पुरिम-पजिमचलणाण न कमुक्खेवकरण स विक्रमो भण्पति, दुपदस्स पुण एगचलणुक्खेवो क्षेत्र विकमो । सेस कठ॥१॥ किंव- जयइ सुयाण पभवो तित्ययराण अपच्छिमो जयइ । जयइ गुरू लोगाण जयइ महप्पा महावीरो ॥२॥ जयति सुताण० गाहा। रागदोसादिअरी जिणतो जितेसु वा जयति ति। मताण] सन्वमुताण ति, मुताणत्यो भगवतातो पमबी। 'पभवो' ति पाती। अणिदुदयपपरिहारातो पछिमो वि अपच्छिमो भग्णाति, अहवा पाणुपुनीए अपर्छिमो, रिसभो पच्छिमो। अविसिहजीवलोगस्स विसिहसष्णिजीवलोगस वा, अहवा सम्मदिद्विमादिसनता ऽसजतलोगस्स गुरू। मह आता जस्स सो य अकम्मबीरियसामत्यतो महात्मा, केवलादि विसिद्धलदिसामत्यतो वा महात्मा ॥२॥ किंच- भव सव्वजगुज्जोयगस्स मह जिणस्स वीरस्स। भइ सुरा ऽसुरणमसियस भइ धुयरयस ॥३॥ भइ सम्ब० गाहा । मायते माति वा मद्रम्, त भगवतो भवतु ति। सधनग ति-लोगो। अद्वविहीं वि लोगनिरखयो माणितब्यो [भार० नि० गा० १०५७] । सेस कठ॥३॥ इम सघस्स रहरूवग-- १ पसऐया जे दा ॥ २ ५ पक्षमक्खा जे० ॥ ३ सम्वे पाणा सम्बे भूया सम्वे जीवा सम्वे सत्ता म हवल्या ग भगवेयम्या ण परियावयमा ण परियेतव्या ण उडवेयवा इतिरूपं सूत्रमावाय॥ ४ पिसोड मा ॥ ५ महो भवति । मनेन मा ॥६ त्यगरा सं ॥७ जाणत्याण मग आ. ॥ छिमो धीरो, रिसमो भा•॥ 20 . 5 10 संघत्थुई] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । सम्मइंसेणवइरदहरूढगाढावगाढंपेढस्स। धम्मवरस्यणमंडियचामीयरमेहलीगस्स ॥ १२ ॥ णियमूसियकणयसिलायलुज्जलजलंतचित्तकूडस्स । गंदणवणमणहरसुरभिसीलगंधुंधुमायस्स ।। १३ ॥ जीवदयासुंदरकंदरुद्दरियमुणिवरमइंदइण्णस्स । देउसयधाउपगलंतरत्तदित्तोसहिगुहस्स ॥ १४ ॥ संवरवरजलपगलियउज्झरपविरायमाणहारस्स । सावगजणपउरवंतमोरणचंतकुहरस्स ॥ १५ ॥ विणयमयपवरमुणिवरफुरतविजुज्जलंतसिहरस्स । विविहकुलकप्परुक्खगणयभरकुसुमियकुलवणस्स ॥ १६ ॥ णाणवरस्यणदिप्पंतकंतवेरुलियविमलचूलस्स । वंदामि विणयपणओ संघमहामंदरगिरिस्स ॥ १७॥" [छहिं कुलयं ] सम्मइंसण० गाहा। णियमू० गाहा । जीवदया० गाहा। संवर० गाहा । विणय० गाहा। गाणवर गाहा । संघपवतस्स सम्मईसणं चेव वरं । तं च संकादिसल्लरहियत्तणयो दढं ति" रूढं ति-चड्ढितं, कहं ? विसुज्झमाणतणयो । गाढं ति-अतीव, अवगाहँ ति-ओगाढ़, सहाणतणतो जीवादिपदत्थेसु अतीवोगाढं 15 ति वुत्तं भवति । एतं पदं । धम्मो दुविहो मूलुत्तरगुणेसु । सो य दुविहो वि वरो त्ति-पधाणो। तत्युत्तरगुणधम्मो रयणा, तेहिं मंडिता जे मूलगुणा ते चामीकरं ति, तं च सुवणं, तम्मयी मेहला, तया जुत्तस्स मेहलागस्स ॥१२॥ नियमो त्ति इंदिय-गोइंदिएसु अणेगविधो, सो य णियमो सिलातला तेहिं चेव उस्सितो, असुभअवसाण- विरहितत्तणतो कम्मविसुज्झमाणतणतो वा उज्जलमुत्त-ऽत्थाणुसरणतणतो मैं जलति चित्तं, चिंतिज्जइ जेण तं चित्तं, तं चेव कूडं ति चित्तकूडं तस्स। [जे० १८८ प्र०] गंदंति जेण वणयर-जोतिस-भवण-वेमाणिया विजाहर-मणुया य 20 तेण गंदणं, वणं ति-चणसंडं । तं च लता-बल्लि-वितोणाणेगोसहिसतेहिं गडणं, पत्त-पल्लव-पुप्फ-फलोवेतेहिं मण- १ सणवरवहरदढरूढ डे० शु० ल० मु० । 'सणओयरहरूढ स० ॥ २ 'ढपीढ स० ॥ ३ लायस्स स० ॥ ४ यलज शु० ॥ ५ गंधुद्धमा सर्वास्वपि सूत्रप्रतिषु । गधद्धमा हरि० वृत्तौ ॥ ६ मयंदइंधस्स डे० । मइदइंदस्स ल० ॥ ७ 'तरयणदित्तों मो० मु० । 'तरित्थदित्तों डे० ॥ ८ विणयणयपवर मसूप्र० । चूर्णिकृत्सम्मत सूत्रपाठ कुत्राप्यादर्श नोपलभ्यते ॥ ९ विविहगुणक परुषखगफलभरकुसुमाउलवणस्स सम्प्र० । चूर्णिकृत्सम्मत सूत्रपाठ कुत्राप्यादर्श नोपलभ्यते ॥ १० सप्तदशगाथानन्तर चूणिकदादिभिग्व्याख्यात गाथायुगलमिदमधिक मस्विपि सूत्रप्रतिषूपलभ्यते- गुणरयणुजलकडयं सीलसुयंचतवमंडिउद्देसं । सुयवारसगसिहरं संघमहामंदरं चंदे ॥१॥ नगर रह चक्क पउमे चंदे सूरे समुह मेरुम्मि । जो उवमिजइ सयय तं संघ गुणायरं वदे ॥२॥ अत्रार्थे जे० आटगे इय टिप्पणी वत्तते-"गुणेत्यादि गाथा २ वृत्तावव्याख्यातम् " ॥ ११ णाणावरण० गाहा जे० दा० । अशुद्धोऽय पाठभेदः ॥ १२ इंसणं से बइर जे० ॥ १३ ति चिरवढितं आ० ॥ १४ य उज्जलं-दित्तिमं चितिजइ तेण दित्तं, तं चेव आ० । अनातोऽशुद्धश्चाय पाठः ॥ १५ विताणणेगसंठाणसंठि- तेहि गहणं जे० दा० ॥ १६ 'लोचतेहि आ० ॥
ur 5 जिणदासगणिमहत्चरविरइयाए चुण्णीए संजय [सु० ३-५ गा १८-२९ हारितणतो मणहर, गधतो मुरभिगध। सीलवणसडे वि जम्हा साधवो गदति भमोदति रमतीत्यर्थः। विविहलदि- विसेसतो य मणहर सीलवण, विमुद्धभावचणतो य मुगध, जहा दबवणसडे गषेण उदुमात्र ति-व्याप्त तश सीलगघेण सघस्स गधुटुमायस्स ॥१३॥ किंच- नपन्यतासष्ण सिलारुक्खगहण व बदर ति । भावे जीवेस दयाकरणमुदरत कदर ति । तत्थ य 5 उ-पावले, दरितो त्ति-दप्पितो, जीवदयाकरणदपितो ति वुत्त भवति । को य सो? मुणिगणो। सो चेव मुषिगणो मइदो परम्पवादिसासणसवमयाण इदो। कह ! सितवादउँसमभावतणतो । हेतु ति-पक्खधम्मो कारण वा, वे सवगसो मुत्ते सभवति । ते य हेतवो धातू, ते य पगलति परूषणगुहाए । सा य परूषणगुहा गाणादिर- तणादिरहिं दित्ता, खेलोसहिमादिओसहीहि वा दित्ता ॥१४॥ एव दित्तोसहिगुहस्स सघस्स सवरो ति-पचक्खाण, त चेव सलिल, किंचि पन्चतग्गातो ओसरित उज्झर, 10 इहावि खाइगभावातो खयोरसमिय उज्वर, ततो पलविता खतोचसमितसंघरदगधारा, स क्षेत्र धारा हारो, तेण विरायते-सोमति ति । सावगनणो पउरो चि-चेहू प्रचुर सो य गीतद्धणीए खति तिरडती, ते चेव मोरा पाडगादीहि य पचति । ज पनतस्स अंडे समापदेस रुक्खाकुल [जे०१८८ दि०] च त कहर । एव सधपन्वतस्स पहरणमडवादी कुइर ति ॥ १५॥ विणयकरणत्तातो विणयमतो मुणी । सो य विणयकरणचेण फुरते, त चेव फुरित विज्जुत ति-कोरित, 15 त च उज्जल ति-निम्मल, तेण उज्जलतेण सघसिहर जलितमित्र लक्खिजति । सघसिहर च पावयणिषुरिसा दट्ठना । तत्य य विविहकुलुप्पण्या साहवो कप्परुक्खा, खीरासवादिलद्धिफलेहि ये गयमरा, लद्धिदेवद्विता साहको कुसुमिता कुलबग ति दट्टया ॥१६॥ मति-सुवादिनाणा वर ति-पहागा, ते चेव पाणावेरुलियादिरतणा इत्र कता, कता इति-कतिजुत्ता । कतिजुत्तणतो चेव सविसतेण जीवादिपदत्यसरूवोवलमतो दिप्पति । नाणस य मलो पाणावरण, सचिगमाती 20 य विगतमल । चूलामणिरिव सिहरोवरि चूला, सा य पाणातिसपगुणेहि जुत्ता, जुगप्पहाणो परिसो चूला इति । एव संघपञ्चतस्स पेढादिचूलपज्जवसाणकप्पियस्स वदामि विणयपणतो चि छह विगाहाण एत क्रियापद ति ॥१७॥ एवं चरमतित्यगरस्स सधस्स य पणामे कते इमा अबसरप्पत्ता आवली भष्मति-सा तिविहा तित्यकर? गणहर २ घेरावली ३ य । तत्य तिथगरावलिदसणत्य इम भण्यति- [सुत्त ३] वंदे उसभ अजिअ समवममिणदण सुमति सुप्पम सुपास । ससि पुष्फदत सीयल सिजस वासुपुज्ज च ॥१८॥ १ स किया । ज आ० ॥ २ रत्- प्रावल्पे इत्यर्थ । ३ उत्तिम आ• ॥ ४ावि आ ॥ ५बहु • ६ गीतगणीप आ० ॥ ७ अहे आ० ॥ ८ पहाण आ ॥ ९ यणतो आ. दा० ॥ १० य फलभरा आ. दा० ॥ ११ ता गुणयण ति आ॥ १२ कादिजुत्त ॥ १३ सो य णाणातिसपस्यसलवावलमगुणोहनुया जुगप्पदाणा पुरिसा चूला आ मा० ॥ ५ सरापण्णा मा आ० ॥ १६ सेन्जर्स से शु। सेयंसं ख.। 25 d ७ 5 - 10 तत्थयर-गणहर-थेरावलीमो] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । विमलमणतेइ धम्म संति कुंथु अरं च मलिं च । मुणिसुव्यय णमि णेमी पास तह वद्धमाणं च ॥ १९ ॥ [ जुम्मं ] वंदे उसभ० गाहा। [विमल गाहा य] कंठा ॥१८॥१९॥ चरमतित्थगरस्स इमा गणहरावली- [सुत्तं ४ ] पंढमेत्य इंदभूती बितिए पुण होति अग्गिभूति त्ति । ततिए य वाउभूती ततो वितत्ते सुहम्मे य ॥ २० ॥ मंडिय-मोरियपुत्ते अकंपिते चेव अयलभाता य । मेतज्जे य पभासे य गणहरा होंति वीरस ॥ २१ ॥ [जुम्मं ] एत्थ गणहरावली ॥२०॥२१॥ तो सुधम्मातो थेरावली पवत्ता, जतो [जे०१८९ प्र०] भण्णति- [ सुत्तं ५] सुहम्मं अग्गिवेसाणं जंबूणामं च कासवं । पभवं कच्चायणं वंदे वच्छं से ज्जंभवं तहा ॥ २२ ॥ सुहम्मं अग्गिवेसाणं० सिलोगो। समणस्स पं० महावीरस्स कासवगोत्तस्स सुधम्मे अंतेवासी अग्गिवेसायण- सगोत्ते । सुहम्मस्स अंतवासी जंबुणामे कासवे गोत्तेणं। जंबुणामस्स अंतेवासी पभवे कच्चायणसगोत्ते । पभवस्स अंतेवासी सेज्जंभवे वच्छसगोत्ते ॥२२ ।। जसभई तुंगियं वंदे संभूयं चेव माढरं । भद्दबाहुं च पाइण्णं थूलभदं च गोयमं ॥ २३ ॥ जसभ६० गाहा । सेजंभवस्स अंतेवासी जसमद्दे तुंगियायणे वग्धावच्चसगोत्ते । जसभहस्स अंतेवासी इमे दो थेरा- भदबाइ पायीणग्गिसगोत्ते, सभूतविजए य माढरसगोत्ते । सभूतविजयस्स अंतेवासी थूलभद्दे गोतमसगोत्ते ॥२३॥ एलावैच्चसगोत्त" वदामि महागिरि सुहत्थिं च । तत्तो कासवगोत्तं बहुलस्स सरिब्वयं वंदे ॥ २४ ॥ १ °मणतय डे० ल० मु० ॥ २ मि खं० जे० मु० ॥ ३ इद गाथायुगल चूर्णिकृता चूर्णौ स्वयमेवेत्थमुल्लिखितमस्ति । पदमित्थ इंदभूई बीए पुण होइ अग्गिभूइ ति । तइए य वाउभूई तओ वियत्ते सुहम्मे य ॥ मंडिय-मोरियपुचे अकपिए चेव अयलभाया य । मेयज्जे य स० डे० शु० मो० ॥ ४ वायभूई डे० ल० ॥ ५ तहा मो० ॥ ६ एकविंशति-द्वाविंशतिगाथयोरन्तराले चूर्णिकृताऽव्याख्याताऽपि श्रीहरिभद्रसूरिश्रीमलयगिरिपादाभ्यां स्वस्ववृत्तौ व्याख्याता जिनशासनस्तुतिरूपा इयमेका गाथाऽधिका सर्वेष्वपि सूत्रादर्शेषु वर्तते- णेव्वुइपहसासणयं जयइ सया सम्वभावदेसणयं । कुसमयमयणासणयं जिणिंदवरवीरसासणयं ॥ जयति शु० । जयउ डे. ल० । जिणंद ल० ॥ ७ जंवुणाम स० ॥ ८ सिज्जंभवं ल• मो० ॥ ९ पायनं डे० ल० ॥ १० वाईणतिसगोते आ०॥ ११ वच्छस स० दे० उ० । वत्सस शु० ॥ १२ 'गुत्तं शु० उ० ॥ १३ कोसियगोत्तं ससूप्र० । श्रीहरिभद्र-मलयगिरिपादाभ्यामेतत्पाठानु- मारणव व्याख्यातमस्ति । चूणिकृत्सम्मतः स्त्रपाठो नोपलभ्यते कुत्राप्यादर्श ॥ 15 20 ८ 5 जिगदासमणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजय [सु०५ मा २५-३२ एलावच० गापा । यूळमदस अंतेवासी इमे दो घेरा-महागिरी एलावचसगोचे, मुहत्यी य वासिद्धसगोते। मुहन्थिस्स मुद्रित सुपडिबुद्धादयो आवलीते जहा दसासु [भ० ८ सूत्र २१०] तहा माणितन्या, इह तेहि अहिगारो गस्थि, महागिरिस्स आवलीए अधिकारो । महागिरिस्स अवेवासी बहुलो बलिसहो य दो जमलमातरो कासवस गोचा। तत्य बलिरसहो पावयणी जातो, तस्स युतिकरणे मणति-बहुलप्स सरिचय वदे " । 'सरिचय' ति सरिसवयो, वयो य जम्मकाल पहुंच जा जा सरीरपरिवटिअवस्था सा सा बतो भणति ॥२४॥ हारियगोत साइ च वदिमो हारिय च सामज्ज। वदे कोसियगोत सडिल्ल अज्जजीयेघर ॥ २५॥ हारिय० गाहा । बलिप्सहस्स अतेवासी साती हारियसगोत्तो। सातिस्स अतेवासी सामन्नो हारितसगोचो चेर । सामजस्स अतेवासी सडिलो कोसियसगोत्तो, सो य अजजीतघरो ति अज ति-आर्य आध वा जीत ति-मुचे धरति, मुत्तत्थस्स अविश्रुतिधरणचातो, चदे त्ति बकसेस । पाढंतर वा “जीवधर" ति, आर्यत्वात् जीव घरेति-सती 10 सर्थ । अण्णे पुण मणति-सडिटस्स अवेवासी जीवधरो अणगारो, सो य अजसगोची ॥२५॥ संडिलस्स सीसो- तिसमुहखायकित्ति दीव समुद्देसु गहियपेयाल । वदे अज्जसमुह अक्खुमियसमुहगमीर ।। २६ ॥ तिसमुह० गाहा । पुव्यदक्षिणा ऽपरा ततो समुदा, उच्चरतो चेतड्ढो, एततरे खातकिती । सेस करें ॥२६॥ तस्स सीसो जि० १८९ वि०] मो- भणग करग झरग पभावग णाण दसणगुणाण । वदामि अज्जमगु सुयसागरपारंग धीर ।। २७॥ भणग० गापा । कालियपुरमुत्तत्थ भणतीति मणको । चरण करणक्रिया करोतीति कारक । मुचत्ये य मणसा शायतो सरको । परप्पयादिजयेण पश्यणप्पमात्रको नाणदसण-चरणगुणाण च पमावको आधारो य। सेस कठ ॥२७॥ तस्स सीसो- णाणम्मि दसणम्मि य तव विणए णिचकालमुन्जुत्त । अजाणदिलखमण सिरसा वदे पसण्णमण || २८॥ १ पत्र चूर्णिकता हरिमद्पादेय सुहस्ती भगवान् वासुतस्कन्धाधमाध्ययनस्थविरावल्यामिव पाखिगोत्रीय ख्यापित कि मलयगिरिवरिवागरम स्मगायानुलोम्पाद् ऐलापत्यसगोत्रीय स्थापित' तदन तज्ज्ञा एव प्रमाणम् ॥ १ कोलियगोता दा० ॥ ३ मणिय आ ॥ ४ यात साय च है शु० ल ॥ ५ जीवघरं इति घूणों पाठान्तरम् ॥ ६ तेषां शाण्डिल्या धार्याण मापजीतधर आयसमुद्राख्यौ दो शिष्यावभूताम् । आर्यसमुद्रस्याऽऽर्यमानामान प्रभावका शिष्या जाता ' इति दिमय तस्यपिरावस्याम् पत्र ॥ ७ खाइफित्ति छ । ८ पत्थतरे था ॥ ९ अन्नमगू ल• ॥ १० अष्टाविंशतितम पाशानन्तरं न प्रति विहाय सामु स्वप्रतिषु गापायुपमिदमधिकमुपलभ्यते- पदामि अजधम्म घदे तत्तो य महगुप्त छ । तचो य भबधदर तब नियमगुणेहिषयरसम । पदामि अजरविनयक्षमणे रफ्यिपरित्तसपस्से । रयणकरंगभूमो अणुमोगो रक्सिओ जेहिं ॥ पतझापायुगलरिएये बेस प्रातिय टिपणी- यशमि अजधम्म० एतदपि गाभादम न धुत्ची विकृतम् आवशिकान्तर- सम्मभिन्नादिति पम्मामते । ११ मझानदिल र ॥ 20 थेरावली] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । ९ 10 णाणम्मि दं० गाहा । कंठा ॥२८॥ तस्स सीसो~~ वड्ढउ वायगवंसो जसवंसो अज्जणागहत्थीणं । वागरण-करण-भंगी-कम्मप्पयडीपहाणाणं ॥ २९ ॥ वड्ढतु० गाहा । 'वड्ढनु' त्ति वृद्धिं यातु । को य सो ? वायगवंसो' वायेंति सिस्साणं कालिय-पुत्रसुतं ति वातगा-आचार्या इत्यर्थः, गुरुसणिहाणे वा सिस्समावेण वाइतं सुतं जेहिं ते वायगा, बंसो त्ति-पुरिसपन्च- 5 परंपरेण ठितो वसो भण्यति । सो चेव जसोवज्जणतो संजमोवज्जणतो वा जसवंसो भण्पति, सो य अणागतवंसो इत्यर्थः । कस्स सो एरिसो वंसो ? भण्णति, अज्जणागहत्थीणं ति । केरिसाणं ? ति पुच्छा, भण्णति-जीवादिपदत्य- पुच्छासु वाकरणे सद्दपाहुडे वा पहाणाणं, एवं चरणकरणे कालकरणेसु वा सव्वभंगविकप्पणामु य तप्परूवणे य तहा कम्मप्पगडिपरूषणाए पधाणाणं पुरिसाणं वड्ढतु वायगवंसो ।।२९।। तस्स सीसो- जचंजणधाउसमप्पहाण मुद्दीय-कुवलयनिहाणं । वड्ढउ वायगवंसो रबैइणक्खत्तणामाणं ॥ ३०॥ जचंजण० गाहा । जचंजणग्गहणं कित्तिमवुदासत्यं, सरीरवण्णेण तन्निभो। तहा सरस-पक्कमुदियफलसण्णिभो य। कुच्छितो उवलो कुवलयो, सो य कण्हकायो, कुवलयं वा-णीलुप्पलं, कुवलयं वा-रयणविसेसो। रेवतिवायगो त्ति । सेसं कंठं ॥३०॥ तस्स सीसो- अयलपुरा णिक्खंते कालियसुयआणुओगिए धीरे । भद्दीवग सीहे वायगपयमुत्तमं पत्ते ॥ ३१ अयलपुरा गाहा । बंभदीवगसाहीणं आयरियाणं समीवे निक्खंतो सीहवायको, उत्तमवायकत्तणं च तका- लसुतसंभवं पडुच्छ । सेसं कंठं ॥३१ ।। तस्स सीसो- जेसि इमो अणुओगो पयरइ अज्जावि अड्ढभरहम्मि । बहुनगरनिग्गयजसे ते वंदे खंदिलायरिए ॥३२॥ जेसि इमो० गाहा । कई पुण तेसिं अणुओगो ? उच्यते-बारससंवच्छरिए महंते दुभिक्खकाले भत्तद्वा अण्णण्णतो फिडिताणं गहण-गुणणा-ऽणुप्पेहाभावातो मुते विष्पणढे पुणो मुभिक्खकाले जाते मधुराए महंते साहु- समुदए खंदिलायरियप्पमुहसंघेण 'जो जं संभरति ' त्ति एवं संघडितं [जे० १९० प्र०] कालियसुतं । जम्हा य एतं मधुराए कतं तम्हा माधुरा वायणा भण्णति । सा य खंदिलायरियसम्मय त्ति कातुं तस्संतियो अणुओगो भण्णति । सेसं कंठं ! अण्णे भणेति जहा-सुतं ण णहूँ, तम्मि दुभिक्खकाले जे अण्णे पहाणा अणुशोगधरा ते 25 विणहा, एगे खंदिलायरिए संधरे, तेण मधुराए अणुयोगो पुणो साधूणं पवत्तितो ति गाधुरा चायणा भण्णति, तस्संतितो य अणियोगो मण्याति ॥३२॥ 15 20 १ भंगिय-कम्म स० मो० विना । हारि० वृत्ती अयमेव पाठ आहतोऽस्ति ॥ २ सण्णिधे वा आ० ॥ ३ रेवयण" ३० २०॥ ४ कुच्छितो चलयो कुवलयो आ० ॥ ५ जेसि तिमो ल० ॥ ६ अणुयोगो दा० ॥
10 जिणदासगगिमहतरविरइयाए चुण्णीए सजुय [सु० ५ मा ३३-११ तत्तो हिमवतमहतविकमे धिइपरकममेहते। सज्झायमणतघरे हिमवते वदिमो सिरसा ॥ ३३ ॥ तसो हिम० गाहा । हिमवतपयवेण महतपण तुल जस्स सो हिमवतमहतो, इह मरहे गत्यि अण्णो तजुलौ चि, एस धुतिवादो । उत्तरतो वा हिमवतेण सेसदिसामु य समुद्देण निवारितो जसो, हिमवतनिवारणो जसो महसो ति अतो हिमवतमहतो । महतविकमो कह ? उच्यते-सामस्थतो, महते वि कुल-गण-सपप्पयोपणे वरति ति, परम्पवादिजएण वा विसेसलद्धिसपथ्णतणतो वा महतविकमी । अहवा परीसहोवसग्गे तबविसेसे वा पितिवलेण परकमतो महतो । अणतगम-पाजवतणतो अणतघरो त, महत हिमवतणाम वदे । सेस कठ ॥ ३३ ॥ किंव- कालियसुयअणुंओगस्स धारए धारए य पुव्वाण । हिमवतखमासणे वदे णागज्जुणायरिए ॥ ३४ ॥ कालिय० गाहा । हिमवतो व हिमवतखमासमणो। तस्स सीसो णागज्जुणायरितो ॥३४॥ तस्स इमा गुणकिवणा- मिर्दु-मद्दवसपणे अणुपुट्विं वायगत्तण पत्ते । ओहसुयसमायारे णागज्जुणवायए वदे ॥३५॥ मिदु-मय० गाहा । 'अणुपुत्री' सामादियादिमुतन्गहणेण, कालतो य पुरिमपरियायतणेण पुरिसाणु पुलितो य वायगवण पत्तो, ओहसत च उस्सम्यो, त च आयरति । सेस कठ ॥ ३५ ॥ गागजुणवायगरस सीसो भूतदिण्णो आपरितो । तस्सिमा गुणकित्तणा तिर्हि गाहाहि- तेवियवरकणग चपय विमउलवस्कमलगम्भसरिखण्णे । मवियजणहिययदइए दयागुणविसारए धीरे ॥३६॥ अड्दभरहप्पहाणे बहुविहसज्झायसुमुणियपहाणे । अणुओगियववसहे गाइलकुलवसणंदिकरे ॥ ३७ ।। १ मणते स..। जेसू प्रतौ महवे इति पारस्योपरि रिप्पणी यथा- मणते इति युत्यै व्याख्यातम् । ' इति ॥ २ सुतियादा मा ॥ ३जसो हिमवतो चि, मतो हिमवते महतधिकमो, कहा-॥ ४ पतो मणत पा सुत महतं भा ॥ ५ शुजोग स० ॥ ६ मिय म. ॥ ७ पक्षत्रिंशत्तमगायानन्तरं P प्रति विहाय सर्वातपि स्त्रप्रतिधूपलभ्यत इद गाथायुगलमधिकम् -- गोविदाण पि मो अणुओगे विउलधारणिंदाण | निच्च अति दयाण पावणे दुलमिवाण ॥ तत्तो य भूयदि निच तव-सजमे अनिचिन्न । परियजणसामनं वदामी संजमविहन्न । एउदाथायुगरिषय इदमाप गाथाद्वय न वृत्तो कुतश्चित् इति जैसू• प्रवौ टिप्पणी ॥ ८ पूरिमपरि आ। पूरपरि ने । ९ यथास्वपि स्त्रप्रतिषु घरफणगतवियचपय इति पाठ उपरभ्यते । भगवता हरिभद्राचार्यय "घरकणग० गाहा" इति प्रतीक- मेष पाठ खीनोऽस्ति । पूणी पुन तयिय० गाहा" इति प्रतीक शनात चूर्णिता तषियवरणावपय० इति पाठ भारत गम्भाव्यत् । श्रीमत्यगिरिमारस्तु "यरतवियेत्यादि गाथाश्रयम्" इति प्रतीकनिष्टानेन परतषियकणापय इति पालो पात । न बल्देतपूर्णिकद-मध्यगिरिपादनिर्दिष्ट पाठ्मेदयुगल स्वादशेषु प्यते ॥ १० मसिरिय स । "मसमव है १११ गुमोपिय | गुमोहय मुः। श्रीहरिमद मरयगिरिभ्यामयमेव पा. स्वस्तपदी स्वीकृतोऽस्ति । 15 20 5 10 घेरावली] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । ११ भूयहिययप्पगन्मे वंदे हं भूयदिण्णमायरिए । भवभयवोच्छेयकरे सीसे णागज्जुणरिसीणं ॥ ३८॥ [ विसेसयं] तेविय० गाहा । गम्भो त्ति-पोमकेसरा । सेसं कंठं ॥३६॥ अड्ढभरह० गाहा । वहुविहो सज्झायो त्ति-अंगपविट्ठो वारसविधो, अणंगपविट्ठो य कालिय-उकालितो अणेगविहो । सो य पधाणो त्ति, मुगुणितत्तणेण निस्संको त्ति कातुं । सेसं कंठं ॥३७॥ भूतहितय० गाहा । भूतहितं ति अहिंसा । [जे०१९० द्वि०] पगभं ति-धारिटुं । अहिंसाभावे पाग- मता, अतीवअप्पमत्तताए अहिंसाभावपरिणता इत्यर्थः । सेसं कंठं ॥ ३८॥ भूतांदण्णस्स सीसो लोहिच्चो । तस्स इमा थुती- सुमुणियणिचा-ऽणिचं सुमुणियसुत्त-ऽस्थधारयं णिचं । वंदे हं लोहिचं सब्भावुभावणातचं ॥ ३९ ॥ सुमुणित० गाहा । मुठ्ठ मुणितं मुमुणितं । किं तं ? भण्णति-जीवो जीवत्तणेण निच्चो, गतिमादिरहि अणिचो । परमाणू अजीवत्तणेण मुत्तत्तेण य निचो, दुष्पदेसादिएहिं वण्णादिपज्जवेहि य अणिचो । सुठु त मुणितं मुत्त-इत्थं धरेति । णिचकालं पि स्वे भावे ठितो सम्भावो, स-सोभणो वा भावो सम्भावो, स-विज्जमाणो वा भावो सम्भावो, ते उन्भासए तच्चत्तेण, तथ्यत्वेन इत्यर्थः । तं च लोहिचणामं आयरियं वंदे । सेसं कंठं ॥ ३९ ॥ तस्स लोभिच्चस्स सीसो दूसगणी । तस्स इमा थुती- अस्थ महत्थक्खाणि सुसमणवक्खाणकहणणेवाणिं । पयतीए महखाणि पयओ पणमामि दूसगैणिं ॥ ४० ॥ सुकुमाल-कोमलतले तेसिं पणमामि लक्खणपसत्थे । पादे पावयणीणं पांडिच्छगसएहि पणिवइए ॥ ११ ॥ अत्थ-महत्य० गाहा । खाणि त्ति-आगरो। सा य अत्थस्स खाणी। किंविसिगुस्स ? महत्थस्स। महत्थो य 20 अणेगपज्जायभेदभिण्णो । अहवा मासगरूबो अत्थो, विभासग-सव्वपज्जववत्तीकरो य महत्थो । एरिसस्स अत्थस्स खाणी । का सा ? 'वाणि' ति संवज्ञति । सुभो समण(गो) सुस्समण(णो), तस्स सुस्समणस्स वक्खाणिकह]] ति-अत्थकहणं, तम्मि अत्थकहणे सोताराण करेति वाणी णेवाणी । अहवा वक्खाणं ति-अणुयोगपरूवणं, १ घरकणग० गाहा आ० । वरकणगतविय० गाहा दा० ॥ २ घारेयध्वं । अहिंसा आ० । धारेवं मो० ॥ ३ धारयं वंदे । सम्भावुभावणया, तत्थ लोहिचनामाणं ॥ इति मु० पाठ । नाय पाठश्चणि-वृत्तिकृतां सम्मत , नापि च स्त्रप्रतिषूपलभ्यते ॥ ४ सन्-शोभनो वा भाव सद्भाव, सन्-विद्यमानो वा भाव सद्भाव इत्यर्थ ॥ ५ संघेजमाणो आ० ॥ ६ पत्राणी डे० ल० ॥ ७ सुसवण चूर्णों पाठान्तरम् ॥ ८ वाणी डे० ल० ॥९ वाणी डे० ल० ॥ १० गणी हे० ल० ॥ ११ चत्वारिंशत्तमगाथानन्तर P प्रति विहाय सर्वामु सूत्रप्रतिषु गाथेयमविकोपलभ्यते-- तव-नियम-सच्च-संजम-विणय-जव-वंति-मद्दवरयाण | सीलगुणगहियाणं अणुभोगजुगप्पहाणाणं ॥ अत्र " गहियाण' इति ‘गर्दिताना' ख्यातानाम्" इति आवश्यकदीपिकाकृना व्याख्यातमस्ति । एतद्गायाविषये जेसू० प्रतौ " एपाऽपि गाथा न वृत्तौ कुतश्चित् " इति टिप्पणी वत्तते ॥ १२ पडि मु० ॥ १३ खाणी, दूसगणि ति संबं आ० ॥ - 15 ११ 5 10 १२ जिणदासगणिमहतरविरइयाए चुण्णीए सजुय [सु०६-७ गा १२-१३ कहण वि-अवखेवमादियाहि कहाहि धम्मकहण । तत्य कुद्धाण वि आगताण तस्स वाणी गेवाणि जणेति, किमग पुण धम्मस्सवणढमागताण ? । अहवा पानो-"मुसयण" ति तत्य सवण ति-कग्णा, तेस मुह गणेइ ति मुस्सवणा, एवं हकारलोबातो भणति । अहवा सुस्सवणा मुहलवा इत्यर्थः। सेस कठ॥४०॥ इमा वि दुस्सगगिणो चेव चलणधुती- सुकुमाल० गाहा । पदयण-दुवालसग गणिपिडग जस्स अत्यि सो पावयणी, गुरखो चि कातु बहुषपण भणित । सेस कठ ॥४१॥ एस णमोकारो आयरिययुगप्पहाणपुरिसाण विसेसग्गवणातो कतो। इमा पुण [ने० १९१ प्र० ] सामण्णतो मुतविसिहाण फेजइ- जे अण्णे भगवते कालियसुयआणुओगिए धीरे । ते पणमिऊण सिरसा णाणस्स पैरूवण वोच्छ ॥ १२ ॥ ॥ थेरावलिया सम्मत्ता ॥ जे अण्णे गाहा। कठा॥४२॥ एत च नाणपरूषणज्झयण अरिहस्स देजति, णो अणरिहस्स देज्जा । जतो भणित- [सुत्त ६] सेलघण १ कुडग २ चालणि ३ परिपूणग ४ हस ५महिस ६ मेसे ७ य । मसग ८ जलूग ९ बिराली १० जाग ११ गो १२ मेरि १३ आभीरे ॥१३॥ सा समासओ तिविहा पण्णता, त जहा-जाणिया १ अनाणिया २ दुब्बियड्दा ३ ।' ६ सेलधण० गाहा । एत्य अरिहा इमे कुडेसु-अप्पसत्यवम्मसारिच्छा, पसत्यभावितेस य अवम्मसा रिण। तहा इस मेस-नलग-नाहगसारिच्छा अरिहा, गो मेरी-भाभीरेनु य पसत्योपणतोवणीता अरिहा । सेसा भणरिहा ॥४३॥ इमस्स य नाणपखणज्झयणस्स परूषणे परिसा जाणिगाइ तिविडा जाणितम्या । तत्य जाणिया- गुणदोसविसेसण अणभिगहिता य कुस्सुइ मतेमु । सा खलु जाणगपरिसा गुणतचिल्ला अगुणवजा ||१|| [कल्पमा गा ३६५] १ किजादा ॥ २ पविजण सादितण P॥ ३ पक्ष्यण ॥ ४ आमीरी सस्विपि स्त्रप्रतिषु । एष एक पार धौरिभद्र मलयगिरिभ्यां व्याख्यातोऽस्ति ॥ ५ एतस्मानन्तरं जे है. मोशुसं० मु० प्रतिषु घृणि-वृत्तिद्भिरण्याख्यातोऽधिकोऽय प्रति त्रामास- पाठ उपलभ्यते- माणिमा जादा- सीरमिय जदा हसा जे पुति इद गुग्गुणसमिक्षा । दोसे य विवज्जती त माणसु जाणिय परिस। माणिमा अदा- जाहोर पगामहुरा मियछापयशीह-शडगमया । रयणमिव मसंडविया प्रमाणिया सा मवे परिसा । दुम्यिपदता जहा- म य करया निम्मामो न प पुछा परिमयस्स पोसेण । पत्यि प्य पायपुग्णो फुटर गामेजयविषलो ॥ एवरमाविषये अस् प्रतारिय पिणी केनापि विदुषा रिणिता स्यते- 'जाणियेसारभ्य एतद् गामात्रय वृत्तौ न पासावम् मोऽन्याना सम्भाव्यते । इति ॥ ६ मामीरी मा० ॥ 15 20 10 परिसा णाणपखवणा य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुतं । १३ इमा अजाणिया- पगतीमुंद्धमजाणिय मियछावय-सीह-कुकुरंगभूता । रयणमिव असंठविता सुदृसण्णप्पा गुणसमिद्धा ॥२॥ [कल्पभा. गा. ३६७ इमा दुनियड्ढा- किंचिम्मत्तग्गाही पल्लवगाही य तंरियगाही य । दुवितड्ढिया उ एसा भणिता तिबिहा भवे परिसा ॥३॥ 5 [कल्पमा. गा. ३६९] एत्थ जाणिया अजाणिया य अरिहा ॥ एवं कतमंगलोवयारो थेरावलिकमे य दंसिए अरिहेसु य दंसितेनु दुस्सगणिसीसा देववायगो साहुजणहितद्वाए इणमाह - ७. णाणं पंचविहं पण्णत्तं, तं जहा-आमिणिबोहियणाणं १ सुयणाणं २ ओहिणाणं ३ मणपज्जवणाणं ४ केवलणाणं ५) ७. नाणं पंचविहं० इत्यादि । अस्य व्याख्या गाती गाणं-अवबोहमेत्तं, भावसाधणो। अहवा गज्जइ अणेणेति नाणं, खयोवसमिय-खाइएण वा भावेण जीवादिपदत्था गजंति इति णाण, करणसाधणो। अहवा गज्जति एतम्हि त्ति णाणं, नाणभावे जीवो त्ति, अधिकरणसाहणो। पंच इति संखा। विधिरिति भेदो। पणतं पण्णवितं प्ररूपितमित्यनर्थान्तरम् , अस्थतो तित्थकरेहि, मुत्ततो गणधरेहिं । अहवा पण्णा-बुद्धी, पहाणपण्णेण अवाप्तं पण्णत्तं, सम्मदिविणा लद्धमित्यर्थः । अहवा पहाणपण्णातो अवाप्तं पण्णत्तं, तित्थकरसमीवातो गणधरेहिं 15 लद्धं ति वुत्तं भवति । अहवा पण्णा-बुद्धी, तीए अवाप्तं पण्णत्तं, तित्थकर गणधरा-ऽऽयरिएहिं कहिज्जंतं [जे० १९१ द्वि०] बुद्धीए पणत्तमिति । तदित्तणेण अधिकतत्थं नाणं संबज्झति । जे पुज्जमुवष्णत्था पंच णाणभेदा तेषां प्रतिपद- मभ्युपगमे जहासदो। अत्थाभिमुहो णियतो बोधो अभिनिबोधः, स एव स्वार्थिकप्रत्ययोपादानादाभिनिवो- धिकम् । अइवा अभिनिवोधे भवं, तेण निव्वतं, तम्मतं तप्पयोयणं वाऽऽभिणिवोधिक। अहवा आता तदभिनिबुज्झए, तेण वाऽभिणिबुझते, तम्हा वाऽभिणि वुज्झते, तम्हि वाभिनिबुज्झए इत्ततो आभिनिवोधिकः । स एवाऽऽभि- 20 णिवोधिकोपयोगातो अनन्यवादाभिनियोधिकम् १ । तहा तच्छृणोति, तेण वा सुणेति, तम्हा वा मुणेति, तम्हि वा सुणेतीति सुतं । आत्मैव वा श्रुतोपयोगपरिणामादनन्यत्वाच्छृणोतीति श्रुतम् २ । अवधिः, तेण वाऽवधीयते, तम्हि वाऽवधीयते, अवधाणं वा अवधिः, मर्यादेत्यर्थः। ताए परंपरोपणिवंधणातो दबादतो अवधीय(य)त इति अवधी ३ । परि-सव्वतोभावेण गमणं पज्जवणं पज्जवः, मणसि मणसो वा पज्जयो मणपज्जबो, स एव नाणं मणपज्जवनाणं । तहा पज्जयणं पज्जयः, मणसि मणसो वा पज्जयः मनापर्ययः, स 25 एव नाणं मणपज्जयणाणं । तहा आयो पावणं लाभो इत्यनान्तरम् , सव्वतो आतो पज्जातो, मणसि मणसो वा पज्जायो मणपज्जायो, स एव नाणं मणपज्जव(?पज्जाय)णाणं । अहवा मणसि मणसो वा पज्जवा मणपज्जवा, तेसिं तेमु वा नाणं मणपज्जवनाणं । तहा मणसि मणसो वा पज्जया [मणपज्जया], तेसिं तेसु वा नाणं मणपज्जयनाणं । गमणपरावत्तेगो लाभो भेदा य बहुपरावत्ता । मणपज्जवम्मि नाणे णित्तवयणऽत्य पंचते ॥१॥ ४ । ] 30 १ जे होति पगयमुद्धा मिग' इति कल्पभाष्ये ॥ २ तुरिय' आ० द्वा० ॥ ३ सतदिद्विणा आ० ॥ ४ तदित्यनेन अधिकृतार्यम् इत्यर्थ । “ त जहा' इति सूत्राशे विद्यमान 'तद्' इति पदमनुलक्ष्येट वचनम् ॥ ५ इत्यतः इत्यर्थः ।। अवधीयते इति १४ जिणदासगणिमहत्चरविरझ्याए चुण्णीए संजय [सु. ८-११ "कवलमेग मुद्ध सफलमसाधारण अणत च।" [विशेषा गा० ८५] इत्यर्थ ५। नाणसदो य सम्बत्या- मिनिवाधिकादीण समाणाधिकरणो [जे० १९२ प्र०] दहन्यो, त जहा-आमिनियोधिक च त नाण च आमिनि पोधिरनाण । एव सम्वेनु देव । पुच्छा य-किमेस मतिनाणादियो कमो ? एत्य उत्तर मण्णति-एस सकारणो उवणासो । इमे य ते कारणा-नूरसामिचणतो सन्चकालाविच्छेददितत्तणतो इदिया ऽणिदियणिमिच- 5 तणता तुल्लक्खतोबसमकारणतणतो सन्नचादिविसयसामण्णतणतो परुक्खसामनत्तणो य तन्मावे य सेसणाण- समवातो अतो आदीए मति मुताइ कताइ । तेस वि य "मतिपुचत मुत" [सुच ४३] ति पुन मतिणाण कत, तस्स य पिद्वतो मुत ति । अहवा इदियाणिदियनिमित्तत्तणमविसिढे वि मति-मतेमु परोवदेसतणमेत्तभेदातो अरिहतवयणकारणतणतो य मतिविसेसत्तणतो व मुतस्स मतिमणतर मत ति । मति-मयसमाणकालवणतो मिच्छ- इसणपरिग्मदत्तणतो तचिवजयसाहम्मत्तणतो सामिसाइम्मतणतो य कत्यइ काछेगलामतणतो य मति-भूताणतर 10 अवधि ति मणितो । ततो य छउमत्थसामिसामष्णतणतो य पुम्मलविसयसामण्णतणतो य खयोवसमभावसाम- प्णतणतोय पञ्चक्समावसामणतणतो य अवहिसमणवर मणपजवनाण ति। सन्चनाणुचमचणतो सन्नविमुद्धचणतो य विरतसामिसामण्णतणतो य सव्यावसाणलाभत्तणतो य सव्वुत्तमलद्वित्तणो य तदते केवल मणित ॥ ८ त समासओ दुविह पणत, त जहा-पञ्चक्ख च परोक्ख च । ८ सम्म पेत समासतो दुविध-पचक्ख च परोक्ख च० इत्यादि । इह अप्पवत्तव्वत्तणतो पुन्य पचक्ख 15 पम्गविजति । इह जीवो अक्खो । कह ? उच्यते-" अशू व्याप्तौ " इति, पाणप्पणताए अत्थे असइ चि इच्चेव जीवो अक्खो, गाणभावेण वावेति ति मणित भवति । अहवा "अश भोजने " इचेतस्स वा सनत्ये असइ त्ति अक्खो, पालयति भुते चेत्यथ । अक्ख पति वदृति चि पञ्चक्ख, अणिदिय ति बुच भवति । चसदाओ य से अवधिमादि- भेदा इट्ठव्या । अक्खातो [जे० १९२ वि०] परेमु ज णाण उप्पजति त परोक्ख समेद चसदाओ इदिय-मणो- निमिच दट्टब्यमिति । ९ से किं त पञ्चक्ख पचक्ख दुविह पण्णत्त, त जहा-इदियपञ्चकख च णोइ- दियपञ्चक्ख च । १० से कि त इदियपञ्चक्ख । इदियपचाख पचविह पण्णत्त, तं जहा-सोइदिय- पचास चक्खिदियपञ्चक्ख घाणिदियपञ्चक्ख सदियपञ्चक्ख फार्सिदियपञ्चक्ख । से त इदियपञ्चक्स। ९ से कि त पञ्चरख ? पुच्छा । 'से' ति स पञ्चक्खनाणभेदो । 'कित' ति परिपदे, कतिभेद ति घुत्त भवति। न च सिस्व नि आयरियो पभेदमुबष्णसितु तस्सरूपकडणेण पञ्चक्पसरूव कहितुकामो आइ-पचक्ख दुविर पण्णत्त ति। १० इदिय ति-पुग्गलेडि सठाणणिब्यत्तिरूप दन्विदिय, सोइदियमादिइदियाण सव्वातप्पदेसेहिं स्वा- वरणासोसमातो जा लदी त माविदिय, तस्स पचक्ख ति इदियपञ्चक्ख । त पचविह । पर आह-गणु १ यचयं मो० ॥ ३ द्वितित' आ० ॥ ३ पत्तण भयिसिद्धे वि सति सुते वि परो ०॥ ४ णतो सम्मता- इकाले भा• ॥ ५ घेत्यथ आ. ॥ ६ परोश्व, त थे, यस मा ॥ ७ पक्वंदिय ॥ ८ जिभिदिय मो मु० ॥ 20 25 10 १५ आणुगामियं अणाणुगामियं च ओहिणाणं] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुतं । दबिंदियावत्थियपदेसमेत्तम्महणतो सेसप्पदेसेसु अणुवलद्धी खयोवसमनिरत्थता वा भवति । आयरिय आह-ग एवं, पदीबदिद्रुतसामत्थतो, जहा चतुसालभवणेगदेसजालितो पदीवो सब्वं भवणमुजोवेति तहा दबिंदियमेत्तप- देसविसयपडिबोधो सव्वातप्पदेसोवयोगत्थपरिच्छेययो खयोपसमसाफल्या य भवति ति ण दोसो। भाबिंदियो- वयारपञ्चक्खत्तणतो एतं पञ्चक्खं, परमत्थओ पुण चिंतमाणं एतं परोक्वं । कम्हा? जम्हा परा दबिंदिया, भाबिंदियस्स य तदायत्तप्पणतो॥ ११. से किं तं णोइंदियपच्चखं? णोइंदियपञ्चक्खं तिविहं पण्णत्तं, तं जहा-ओहि- गाणपञ्चक्खं १ मणपज्जवणाणपञ्चक्खं २ केवलणाणपचक्खं ३ । १२. से किं तं ओहिणाणपञ्चकखं ? ओहिणाणपचक्खं दुविहं पणतं, तं जहा- भवपचतियं च खयोवसमियं च । दोन्हं भवपञ्चतियं, तं जहा-देवाणं च णेरतियाणं च । दोन्हं खयोवसमियं, तं जहा-मणुस्साणं च पंचेंदियतिरिक्खजोणियाणं च । ११-१२. णोइंदियपचक्खं ति इंदियातिरित्त । तं तिविहं ओहिमादी । अबहि त्ति-मज्जाया, सा य रूविदव्वेसु त्ति, "रूविस्सऽवधे" [तत्त्वा. अ. १ सू. २८] त्ति वयणातो, तेसु णाणं ओहिनाणं । 'भवपञ्चईतो' त्ति भणिते भण्णति-णणु ओधी वयोवसमिते भावे, गरगादिभवो से उदइए भावे, कहं भवपञ्चइतो भण्णति ? ति, उच्यते-सो वि खयोवसमितो चेव, किंतु सो चेव खयोसमो णरग-देवभवेमु अवस्स भवति त्ति, ढेितो पक्खीणं आगासगमणं , एवं भवपञ्चइतो भण्णति । खयोवसमियं पुण णर-तिरियाणं, तेमु णावस्सं उप्पन्नति 15 त्ति खयोवसममवेक्खति॥ खयोवसमसरूवं च सुत्तेणेव [जे० १९३ प्र० ] भणितं- १३. को हेऊ खायोवसमियं ? खायोवसमियं तयावरणिज्जाणं कम्माणं उदिण्णाणं खएणं अणुदिणाणं उनसमेणं ओहिणाणं समुपज्जति । अहवा गुणपडिवण्णस्स अणगारस्स ओहिणाणं समुपज्जति। १३. को हेतु त्ति इचादि । सो य खयोवसमो गुणमंतरेण गुणपडिवत्तितो वा भवति । गुणमंतरेण जहा 20 गगणभच्छादिते अहापवत्तितो छिदेणं दिणकरकिरण व विणिस्सिता दवमुज्जोवंति तहाऽवधिआवरण- खयोवसमे अवधिलंमो अधापत्तितो विष्णेतो गुणपडिवत्तितो- गुणपडिवण्ण० इत्यादि । उत्तरुत्तर- चरणगुणविसुज्झमाणमवेक्खातो अवधिणाण-दसणावरणाण खयोवसमो भवति । तक्खयोवसमे य अवधी उप्पज्जति ॥ १४. तं समासओ छव्विहं पण्णत्तं, तं जहा-आणुगामियं १ अणाणुगामियं २ 25 चड्ढमाणयं ३ हायमाणयं ४ पडिवाति ५ अपडिवाति ६ । १४. आणुगामियं ति । अणुगमणसीलो अणुगामितो, तटावरणखयोवसमाऽऽतप्पदेसविसुद्धगमणतातो लोयणं व ॥ १ स्त्रमिद प्रश्न निर्वचनात्मकमपि उपलभ्यते-से किं तं भवपञ्चायं १ २ दुण्हं, तं जहा-देवाण य रहयाण य । किं तं खयोवसमियं ? २ दुण्हं, तं जहा-मणूसाण य पंचेंद्रियतिरिक्खजोणियाण य । जे० मो० डे० मु० । किञ्च- चूणि-वृत्तिता नेद पश्नोत्तरात्मक सूत्र सम्मतम् ॥ २ इये ति आ० दा० ॥ ३ दियाणं ख० ॥
१६ जिणदासगणिमहत्तरविरहयाए चुण्णीए संजय [सु०१५-२३ १५ से कि त आणुगामिय ओहिणाण? आणुगामिय ओहिणाण दुविह पण्णत, त जहा-अतगय च मज्झगय च। १० अतगय ति। जहा जलत वणत पन्नतत, अविसिहो अतसदो। एव ओरालियसरीरते ठित गत ति एगढ़, त च आतपदेसफहपावहि, एगदिसोवलमाओ य अतगतमोधिष्णाण मष्णति । अहवा सव्वातप्पदेसविसुद्धेन वि 5 ओरालियसरीरंगतेण एगदिसिपासणगत ति अतगत भण्णति । अहवा फुडतरमत्यो भण्णति-पगदिसावधिउवलद्ध- खेतातो सो अवधिपुरिसो अतगतो ति जम्हा तम्हा अतगत भणति । मझगत पुग ओरालियसरीरमज्झे फडणविसद्धीतो सव्वातप्पदेसविमुद्रीतो मा सबदिसोवलमत्तणतो मझगतो ति भणति । अहवाऽवधिउवल- खेत्तस्स वा अवधिपुरिसो मझगतो ति अतो वा मझगतो भण्णति ॥ १६ से किंत अंगिय ' अतगय तिविह पण्णत्त, त जहा-पुरओ अतगय ? 10 मगओ अतगय २ पासतो अतगय ३ । १७ से कि त पुरतो अतगय? पुरतो अतगय से जहानामए केइ पुरिसे उक्क वा चुडलिअ वा अलाय वा मणि वा जोइ वा पदीव वा पुरओ काउ पणोलेमाणे पणाल्लेमाणे गच्छेज्जा । से च पुरओ अतगय। १८ से कि त मग्गओ अतगय? मगओ अंतगय से जहाणामए केइ पुरिसे 18 उक वा चुडलिय वा अलाय वा मणिं वा जोइ वा पईव वा मग्गओ काउ अणुकड्ढेमाणे अणुकड्ढेमाणे गच्छेज्जा । से त मग्गओ अतगय २ । १९ से कि त पासओ अंतगय ? पासओ अतगय से जहाणामए केइ पुरिसे उक्क वा चुडलिय वा अलाय वा मणिं वा जोइ वा पईव वा पासओ काउ परिकड्ढेमाणे परिकढेमाणे गच्छेज्जा । से च पासओ अतगय ३ । से च अतगय । २० से किंत मझगय? से जहानामए केइ पुरिसे उक वा चुडलिय वा अलाय वा मणि वा जोइ वा पईव वा मत्थए काउ गच्छेज्जा । से त मज्झगय । १६-२० उक्क त्ति-दीविया । चुडलि ति-तणपिंडी अग्गे पनलिता । अलात ति-दारुय नलत । मणि वा जस्त । जोड चि-मलगादिठित आणि जरत । पदीयो नि-दीवतो । 'पुरतो' ति अम्गतो 'पणोलण ति १० प्रती १६-18 स्ना सन अतगय इति परसवर्णान्दित' पाठो दृश्यते ॥ २१७१५ सूत्रषु चलिम इति पाठ जे मो० ॥ ३ मत्र 10-15 समधु चहुलिमम्वा अलायम्या पदीयम्या मणिम्वा जोतिम्वा इतिरूम पाठ प्रतौ वर्तते ॥ ४ 10-15 Rs अलाय वा पदीय या मणि था जोति या पुरतो इति पाठ' सस्विपि स्त्रप्रतिषु श्यते । न राउ पणि-चिकत्सम्मतः पाठ साप्यादर्श उपलभ्यत तथापि व्याख्यान्मतानुसारेगाम्मामि' परावरय मुळे पाठ उतोऽस्ति । मलाय पा मणि या पदीय या जोति या पुरमो इति मु पाठस्तु नास्मात्समीपस्थेषु आदर्शपु हस्यते । ५ काठ समुबमाणे समुण्यहमाणे गउिचान भो । 90 - un 10 भणाणुगामियं वड्ढमागय च ओहिणाणं ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । १७ "णुद प्रेरणे" इत्यगहितस्स दंडग्गहितस्स वा परंपरेण नयनमित्यर्थः । 'मग्गतो' ति पिट्ठतो 'अणुकड्ढणं' ति इत्थगहितस्स दंडग्गहितस्स वा अणु-पच्छयो कड्ढणं ति । 'पासतो ति दाहिणे वामे वा पासे सा(दो)पा- सय जे० १९३ वि० )जमलहितं । परिकड्दियं ति-हत्थ-डंडगहितं वा परि-पासतो द्वितस्स कड्ढणं परिकड्ढणं ।। सीसो पुच्छति- २१. अंतगयस्स मज्झगयस्स य को पइविसेसो ? पुरओ अंतगएणं ओहिनाणेणं । पुरओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाणि जाणइ पासइ, मैग्गओ अंतगएणं ओहिनाणेणं मग्गओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाणि जाणइ पासइ, पासओ अंतगएणं ओहिणाणेणं पासओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ, मझगएणं ओहिणाणेणं सव्वओ समंता संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ । से तं आणुगामियं ओहिणाणं । २१. अंतगतस्स० इञ्चादि। आयरियाऽऽह-पुरतो० इञ्चादि। 'सव्वतो त्ति सव्वास वि दिसि-विदिसाम्ल 'समंता' इति सव्वातप्पदेसेसु सम्वेस वा विसुद्धफडगेम। अहवा 'सव्वतो तिसव्वानु दिसि-विदिसासु सव्वातप्प- देसफड्डगेमु य । 'से' इति निद्देसे अवधिपुरिसस्स, ‘मंता' इति गाता । अहवा "समत्ता" इति सम-दव्यादयो तुल्ला अत्ता इति-प्राप्ता इत्यर्थः ॥ २२. से कि तं अणाणुगामियं ओहिणाण ? अणाणुगामियं ओहिणं से जहा. 15 णामए केइ पुरिसे एगं महंत जोइट्ठाणं काउं तस्सेव जोइट्ठाणस्स परिपेरतेहिं परिपेरंतेहि परिघोलेमाणे परिघोलेमाणे तमेव जोईट्ठाणं पासइ, अण्णस्थ गए ण पासइ, ऍवमेव अणाणुगामियं ओहिणांणं जत्थेव समुपज्जइ तत्थेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा संबद्धाणि वा असंबद्धाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ, अण्णत्थ गए ण पासइ । से चं अणाणुगामियं ओहिणाणं। २२. णो गच्छंतमणुगच्छति त्ति अणाणुगामिकं, संकलापडिबद्धहितप्पदीवो व्व, तस्स य खेतावेक्खखयो- वसमलाभत्तणतो अणाणुगामित्तं । परंतं ति-समंततो अंगणिमासणं, तस्स य जोइस्स सब्बतो दिसि-विदिसामु समंता परिघोलणं ति-पुणो पुणो इतो इतो परिसक्कणं ॥ २३. से किं तं वड्डमाणयं ओहिणाणं ? वड्डमाणयं ओहिणाणं पैसत्थेसु अज्झ- 20 १ पासे दोसु वा सयं जम आ० दा० ॥ २ मग्गओ अंतगपणं० इत्यादिसूत्राश पासओ अंतगएणं० इत्यादिसूत्राशश्च न० स० प्रत्यो पूर्वापरक्रमव्यत्यासेन वर्तते ॥ ३ समत्ता इति पाठभेदश्र्णों निर्दिष्टोऽस्ति ।। ४ “सव्यायप्पएसेसु इत्यादौ तृतीया सप्तमी " इति नन्दिवृत्तौ श्रीमलयगिरिपादरेतत्पाठोद्धरणे व्याख्यातमस्ति पत्र ८५-२ ॥ ५-६-११ ओहिन्नाणं . ल० ॥ ७-८ अगणिट्ठा ख० स० ल० शु० ॥ ९ सर्वामु सूत्रप्रतिषु अत्र जोइट्ठाण इत्येव पाठो वर्त्तते ॥ १० एवामेव मु० ॥ १२ अगणि- पासेणं, तस्स आ० । अगणिपासणं, तस्स दा. ॥ १३ पसत्येहिं अज्झवसाणहाणेहिं ख० मो० ॥ चु०३ १८ 10 जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजय [सु० २३-२७ गा १४-५१ वसोणहाणेसु वट्टमाणस्स बट्टमाणचरितस्स विसुज्झमाणस विसुज्झमाणचरितस्स सब्बओ समता ओही वड्डइ । जावतिया तिसमयाहारगस्स सुहुमस्स पणगजीवस्स । ओगाहणा जहन्ना ओहीखेत्त जहन्न तु ॥४४॥ सब्बबहुअगणिजीवा णिरतर जत्तिय भरेज्जसु । खेत्त सम्वदिसाग परमोही खेचनिदिहो ॥ १५ ॥ अगुलमावलियाण भागमसखेज दोसु सखेज्जा । अगुलमावलियतो आवलिया अगुलपुहत्तं ॥ १६ ॥ हत्यम्मि मुहुत्ततो दिवसतो गाउयम्मि बोद्धब्बो । जोयण दिवसपुहत्त पक्खतो पण्णवीसाओ॥४७॥ भरहम्मि अद्धमासो जबुद्दीवम्मि साहिओ मासो । वास च मणुयलोए वासपुहत्त च स्यगम्मि ॥१८॥ सखेज्जम्मि उ काले दीव-समुद्दा वि होति सखेज्जा । कालम्मि असखेज्जे दीव-समुद्दा उ भइयव्वा ॥ १९॥ राले चउण्ह बुडी कालो भइयन्बु खेतबुडीए । बुट्टीए दब्ब-पज्जव मइयब्बा खेत-काला उ ॥ ५० ॥ सुहुमो य होइ कालो तत्तो सुहुमयस्य हवइ खेत्त । अंगुलसेटीमेत्ते ओसप्पिणिमो असखेज्जा ॥ ५ ॥ से न वड्डमाणय ओहिणाण। २३ वर्धन बड्ढी, पुन्नावत्यातो उवरुवरि वड्ढमाण ति, व च उसण्ण चरणगुणविमुद्धिमपेक्ख, ततो पसत्यज्यवसाणहाणा तेआदिपसत्यठेसाणुगता मरति, पसत्यदव्यसाहि अणुरजित चित्त पसत्यज्झवसाणो भणति, पसत्यज्झरसाणातो र चरणा ऽतविसुद्धी, चरणाऽतविमुद्रीतो य चरणपञ्चतलवीण बड्डी भवति । माओ य जहणुकांस विमजिसमाधिवविदसणगाहाओ जहा पेढियाँए ॥४४-५१ ॥ 1 साया ॥२ पदमाण छ ॥ ३ पीस तु । बोसतो ३० ॥ ४ पिय मो•॥५ पाणय से ॥६ सतणतो पसत्य मा दा ॥ ७ आर पकनियुकिपीठिकापां गाथा 10-10 ॥ 15 90 5 वड्ढमाणयाइ ओहिणाणं तब्मेया य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । १९ २४. से कि तं हायमाणयं ओहिणाणं हायमाणयं ओहिणाणं अप्पसत्थेहि अज्झवसायट्ठाणेहिं वट्टमाणस्स वट्टमाणचरित्तस्स संकिलिस्समाणस्स संकिलिस्समाणच- रित्तस्स सव्वओ समंता ओही परिहायति । से तं हायमाणयं ओहिणाणं । २४. हाणि त्ति-इस्समाणं, पुव्यावत्थातो अधोऽधो इस्समागं । तं च वड्ढमाणविपक्वतो भाणितव्वं । अप्प- सत्यलेस्सोवरंजितं चित्तं अणेगासुभत्थचिंतणपरं चित्तं संकिलिलु भण्णति ॥ २५. से किंतं पडिवाति ओहिणाणं ? पडिवाति ओहिणाणं जणं जहणेणं अंगुलस्स असंखेजतिभागं वा संखेज्जतिभागं वा वालग्ग वा वालग्ग'हत्तं वा लिक्खं वा लिक्खपुहत्तं वा जूयं वा जूयपुहत्तं वा जवं वा जवपुहत्तं वा अंगुलं वा अंगुलपुहत्तं वा पायं वा पायपुहत्तं वा वियंत्थिं वा वियत्थिपुहत्तं वा स्यणिं वा स्यणिपुहत्तं वा कुच्छि वा कुच्छिपुहत्तं वा घणुयं वा धणुयपुहत्तं वा गाउयं वा गाउयपुहत्तं वा जोयणं वा जोयणपुहत्तं वा जोयणसयं वा जोयणसय- 10 पुहत्तं वा जोयणसहस्सं वा जोयणसहस्सपुहत्तं वा जोर्यणसतसहस्सं वा जोयणसतसहस्सपुहत्तं वा जोयणकोडिं वा जोयणकोडिपुहत्तं वा - जोयणकोडाकोडिं वा जोयणकोडाकोडिपुहत्तं वा उकोसेण लोगं वा पासित्ता णं पडिवएज्जा । से तं पडिवाति ओहिणाणं । २५. उप्पण्णोहिनाणस्स पुणो पातो ति पडिवाती, नाशेत्यर्थः । तं च खेत्तविसेसोवलंमेणं भण्णति । ते य इमे-असंखेयंगुलभागादिया । दुप्पभिति जाव णव त्ति अंगुलपुहत्तं भष्णति । दो हत्था कुच्छी । पडिवातिणो 15 जान उक्कोसो लोगमेत्तै एव ॥ २६. से किं तं अपडिवाति ओहिणाणं ? अपडिवाति ओहिणाणं जेणं अलोगस्स एगमवि आगासपैदेसं पासेज्जा तेण परं अपडिवाति ओहिणाणं । से तं अपडिवाति ओहिणाणं । २६. अपडिवाति त्ति, सो वि क्खेत्तविसेसोवलंभातो चेव णज्जति, अतो भण्णति अलोगस्स एगमवि ति। 20 'अवि' पदस्थसंभावणे, किमुत दुपदेसादिउपलंभे ? इत्यर्थः । [जे० १९४ प्र०] ॥ २७. तं समासओ चउन्विहं पण्णत्तं, तं जहा-दव्वओ खेत्तओ कालओ भावओ । तत्थ दव्वओ णं ओहिणाणी जहणेणं अणंताणि रूविदव्वाई जाणइ पासइ, उक्कोसेणं १ अप्पसत्येसु अध्झवसायट्ठाणेसुं स० ॥ २ ओही हायति ख० स० जे० मो० ॥ ३ गासुतत्थं जे० ॥ ४-५ 'जयभा जे० मु० ॥ ६ पुहुत्त पुहत्त पहुत्त शब्दाः सर्वास्वपि सूत्रप्रतिषु क्रमपरिहारेण आवृत्त्या दृश्यन्ते ॥ ७ विहत्यि वा विहत्थिं मो० मु० ॥ ८ घणुं वा धणुपु जे० मो० मु० ॥ ९ जोयणलक्खं वा जोयणलक्खपुहत्तं जे० मो० मु० ॥ १० →4- एतचिहमध्यगत पाठ २० स० नास्ति ॥ ११ मेत्तर वा आ० दा० ॥ १२ स० विनाऽन्यत्र-पदेसं पासति तेण स० शु० । 'पदेस जाणइ पासइ तेण जे० डे० ल. मो० ॥ १३ अविपदत्थो संभा आ• दा० ॥ १४ तत्थ इति स. स. ल. शु० नास्ति ।।
पासइ २॥ २० जिणदासगणिमहत्तरविरड्याए चुण्णीए संजय [सु० २८-२९ गा ५२ सव्वाइ रुविदब्वाइ जाणइ पासइ १॥ खेत्तओ ण ओहिणाणी जहण्णेण अगुलस्स असखेजतिभाग जाणइ पासइ, उक्कोसेण असखेज्जाइ अलोए लोयमेत्ताइ खंडाइ जाणइ कालओ ण ओहिणाणी जहण्णेणं आवलियाए असखेज्जतिभाग जाणइ पासइ, उकोसेण असखेज्जाओ उस्सप्पिणीओ अवसप्पिणीओ अतीत च अणागत च काल जाणइ पासइ३। भावओ ण ओहिणाणी जहण्णेण अणते मावे जाणइ पासइ, उक्कोसेण वि अणते भावे जाणइ पासइ, सव्वभावाणमणतमांग जाणइ पांसह ४। २७ वित्थरेण खयोवसमविसेसतो असखेजविघमोधिष्णाण, औधिमोदिगतिपज्जवसाण वा चनुद्दसविध वित्यरो, ते पडुच इम चतुविह समासतो भण्णति दन्वादि । दरओ ओधिग्णाणी जहण्णेण तेयामासतरे अणवे दवे उवलमति, उक्कोसतो सन्नरूविदन्चाइ । जागइ ति नाण, त च ज विसेसग्गाहग त गाग, सागारमित्यर्थः। 40 पासति ति दसण, न च ज सामण्णग्गाहग त दसण, अणागारमित्पर्य । खेत्त-कालतो य मुत्तसिद्ध । भावतो ओपिण्णाणी जइण्णेण अणते भावे उपलभति, उकोसतो वि अणते, जहण्णपदातो उकोसपद अग्रतगुण । उकोसपदे वि जे भावा ते सबभावाण अणतमागे वति ।। २८ ओही भवपञ्चतिओ, गुणपचतिओ य वैणिओ एसो। तस्स य बहू वियप्पा, दव्वे खेत्ते य काले यं ।। ५२ ॥ सेच ओहिणाण। २८ ओधी भव० गावा। दन्नतो बहू विगप्पा परमाणुमादिदचविसेसातो । खेत्ततो वि अशुलभस खेयभागरिकप्पादिया । कालतो वि आवलियअसखेज्जमागादिया । भावतो वि वण्णापज्जवादिया ॥५२ ॥ भणपञ्जवनाणमिदाणि । तस्स सरूव वष्णितमादीए [पत्रम् १३]। इदाणि सामी विसेसिज्जइ पुच्छुत्तरेह- २९ [१] से कि त मणपज्जवणाणं १ मणपज्जवणणे ण भते । किं मर्गुस्साण 20 उप्पंज्जइ अमणुस्साण गोयमा । मणुस्साण, णो अमणुस्साण । [२] जइ मणु ससाण किं सम्मुच्छिममणुस्साण गमवकतियमणुस्साण १ गोयमा । णो सम्मुच्छिम मणुस्साण, गम्भवकतियमणुस्साण। [३] जइ गम्भवकतियमणुस्साण किं कैम्मभूम- १ लोपपमाणमेसाइ रा० से बिना ॥२ मोसप्पिणीओ उस्सप्पिणीमो से सं•॥ ३ सेण पि अणते ॥ " भागो ग० । चणिकता हरिमनपादानां चायमेन पाठः सम्मत ॥ ५ ओही खेत्त परिमाणे• इत्याद्यावश्यकनियुक्तिर७-२८ गाषायुगजनि चतुदरा द्वाराष्यत्रापयोदयानि ॥ ६ अणिमो दुम्बिो इति प्रतिको निर्दिष्ट. पाठभेद ॥ ७ वस्सेय म । ८ धारयायतनगापानन्तरं मर्यधपि साधु हरिमवरिपाद मलयगिरिचरणव्याख्याता एका गाथाऽधिका उपलभ्यते- रतिय देय तित्यारा य मोहिस्सयाहिरा होति । पालति सन्धमो खलु सेसा देसेण पातति । ९ सम्मत मोहि ग ॥ १० णापथक्य मु० ॥ ११ पुषसुत्तेहिं आ० ॥ १२ जाण मते ! जे मो० ॥ १३ मणूसाणं • । एमरि मस्मिन् एव (११) सत्र हेयम् । १४ उप्पचा इमि सं•सं• नास्ति ॥ १५ कम्मभूमिम मो• मु. । एमपत्र मलिन स्त्र (१७) देयम् ॥ 15 ओहिण्णाणस्स भेया मणपज्जवगाणं च ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । २१ गगम्भवकंतियमणुस्साणं अकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं अंतरदीवगगम्भवकंतियमणु- स्साणं? गोयमा! कम्मभूमगगब्भवकंतियमणुस्साणं, णो अकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं, णो अंतरदीवगगमवकंतियमणुस्साणं । [४] जइ कम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं किं संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं असंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भ- वकंतियमणुस्साणं ? गोयमा ! संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगभवतियमणुस्साणं, णो । असंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं। [५] जइ संखेज्जवासाउयकम्म- भूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं किं पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं अपज्जत्तगसंखेज्जवासांउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं ? गोयमा ! पज्जत्तगसंखेज्ज- वासाउयकम्मभूमगगब्भवकंतियमणुस्साणं, णो अपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगन्भ- वकंतियमणुस्साणं। [६] जइ पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भकंतियमणुस्साणं 10 किं सम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंनियमणुस्साणं मिच्छदिद्विपज्ज- लगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं सम्मामिच्छदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवा- साउयकम्मभूमगगब्भवकंतियमणुस्साणं ? गोयमा ! सम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयक- म्मभूमगगम्भवऋतियमणुस्साणं, णो मिच्छद्दिपिज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भव- कंतियमणुस्साणं, णो सम्मामिच्छदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणु- 13 स्साणं। [७] जइ सम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणु- स्साणं किं संजयसम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं असंज- यसम्मद्दिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं संजयासंजयसम्मदि- द्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं ? गोयमा ! संजयसम्मदिट्ठि- पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं, जो असंजयसम्मदिद्विपज्जत्तग- 20 संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवकंतियमणुस्साणं, णो संजयासंजयसम्मदिद्विपज्जत्तगसंखे- ज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं । [८] जेइ संजयसम्मदिद्विपज्जत्तग- संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं किं पमत्तसंजयसम्मद्दिद्विपज्जत्तगसंखेज्ज- वासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं अपमत्तसंजयसम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाज्य- कम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं ? गोयमा! अपमत्तसंजयसम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासा- 25 उयकम्मभूमगगन्भवतियमणुस्साणं, णो पमत्तसंजयसम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयक- १ जति ख० । जदि स० ॥
२२ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए सजुय [सु० ३०-३२ म्मभूमगगम्भवक्कतियमणुस्साण । [१] जइ अपमत्तसंजयसम्मदिद्विपज्जतगसखे- ज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भववतियमणुस्साण किं इडिपत्तअपमत्तसजयसम्मदिद्विपज्जत्तग- सखेज्जवासासाउयकम्मभूमगगम्भवकतियमणुस्साण अणिड्डिपत्तअपमत्तसजयसम्मबिटि- पज्जतगसखेज्जवासाउयकम्मभूमगगभवतियमणुस्साण ? गोयमा। इड्डिपत्तअपमत्तसजय- 5 सम्मदिद्विपज्जत्तगसखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकतियमणुस्साण, णो अणिडिपत्तअपम- नसजयसम्मदिद्विपज्जत्तगसखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भववतियमणुस्साणं मणपज्जवणाणं समुपज्जा। २९ किं मणुस्सा इत्यादि । सम्मुच्छिममणुस्सा गम्भवक्कतियमणुस्साण चेव चत पिचादिमु सभवति । कम्मभूमगा पचम भरहेस पचम एरवदेव पचमु महाविदेहेस य । हेमवतादिमु मिधुणा ते अकर्मभूमगा। तिष्णि 10 जोयणशते लवणनलमोगाहिता चुल्लहिमवतसिहरिसादपतिहिता एगुरुगादि छप्पण्ण अतस्दीवगा । किं पज्जत्ताण अपज्नत्ताण ? ति । पज्जती णाम-सत्ती सामत्य । सा य पुग्गलदनोवचया उप्पज्जति । ताओ य छ पज्जचीतो- आहार-सरीरददिय आणापाणु भासा-मणपज्जत्ती चेति । तत्य एगिदियाण चउरो, विगलिंदियाण पच, अस्सणीण सवबहारतो पच चेव, सणीण च छ। तत्य आहारपज्जत्ती नाम खल-रसपरिणामणसची आहारपज्जची। सत्तधातुतया परिणामणसत्ती सरीरपज्जत्ती । पंचण्डमिदियाण [जे० १९४ द्वि०] जोग्गा पोग्गला चियित्तु अणाभोगनिन्वत्तित ॐ विरियकरणेण तेब्मावणयणसत्ती इदियपज्जती। [उस्सास]पोग्गलजोगाणापाण गहण णिसिरणसत्ती आणा- पाणुपज्जती। बइजोग्गे पोग्गले चेतूण भासचाए परिणामेता वजोगचाए निसिरणसची भासापज्जती। मण- जोग्गे पोग्गले घेतूण मणत्ताए परिणामेता मणजोगत्ताए निसिरणसत्ती मणपज्जत्ती । एताओ पज्जतीओ पज्ज- तयणामसम्मोदएण णिजतिजति, वा जेसिं अत्यि ते पज्जत्तया । अपज्जतयणामकम्मोदएण अणिवत्तातो जेसि ते अपज्जतया । अप्पमत्सजता जिणकप्पिया परिहारविमुद्धिया अहालदिया पडिमापडिवष्णगा य, एते 20 सततांत्रयोगोषउत्तवणतो अप्पमत्ता । गच्छवासिणो पुण पमत्ता, कण्हुइ अणुवयोगसमवतातो । अहवा गच्छवासी णिम्गता यपमचा वि अप्पमत्ता वि भवति परिणामवसभो। 'इड्ढिप्पत्तरसेति आमोसहिमादिअण्णतरहड्डिपत्तरस मणपन्जानाण उप्पज्जइ ति । अहवा 'ओहिनाणिणो मणपज्जवनाण उप्पज्जति' ति अण्णे नियम भणति ॥ ३० ते च दुविह उप्पज्जइ त जहा-उज्जुमती य विजेलमती य । ३० रिजू मती उज्जुमई, सामण्णग्गाहिणि ति भणित होति । एस मणोपज्जायविसेसो ति । औसष्ण 25 विसेसविमुह उवलमति, गातीवबहुविसेसविसिद्ध अत्य उबलमइ चि भणित होति, घडो गेण चितिभो त्ति जाणति । विपुला मती विपुलमती, बहुविसेसपाहिणि ति मणित भवति । मणोपज्जायविसेसे जाणति, दिद्वतो जहाणेण घडो चिंतितो, न च देसकालादिअणेगपज्जायविसेसविसिह जाणति ॥ अहवा रिजु विपुलमतीण इम दगादीहिं विसससरुव भगति- १ सामायता य आ ॥ २ विचिणि अणा भा० ॥ ३ तमाघापायण आ• दा० ॥ ४ मणिहिता ता जेसि मा ॥ ५ त स दुयिह उपना इति स से मास्ति ॥ ६ उपजा इति शु० नास्ति ॥ ७ विमलमती ।
२३ मगपज्जवणाणं तस्सामी तब्भेया य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । ३१. तं समासओ चउन्विहं पण्णत्तं, तं जहा-देवओ खेत्तओ कालओ भावओ। तत्थ दब्बओ णं उज्जुमती अणंते अणंतपदेसिए खंधे जाणइ पासइ, ते चेव विउलमती अब्भहियतराए जाणति पासति। खेत्तओ णं उज्जुमती अहे जाव इसीसे स्थणयभाए पुढवीए उवरिमहेट्ठिलाई खुड्डागपयराई उडेजाव जोतिसस्स उवस्मितले तिरियं जाव अंतोमणु- स्सखित्ते अड्डाइज्जेसु दीव-संमुद्देसु सण्णीणं पंचेंदियाणं पज्जत्तगाणं मणोगते भावे जाणइ : पासइ, तं चेव विउलमती अड्डाइजेहिं अंगुलेहिं अमहियतरागं विउलतरागं विसुद्धतरागं वितिमिरतरागं "खेत्तं जाणति पासति । कालओ णं उज्जुमती जहण्णेणं पलिओ- वमस्स असंखेज्जतिभागं उक्कोसेणं पि पलिओवमस्स असंखेज्जतिभागं अतीयमणागय वी कालं जाणति पासति, तं चेव विउलमती अमहियतरागं विउलनरागं विसुद्धतरागं विति- मिरतरागं जाणइ पासइ। भावओ णं उज्जुमती अणते भावे जाणइ पासइ सव्वमा- 10 वाणं अणंतभागं जाणइ पासइ, तं चेव विउलमती अभहियतरागं विउलतरागं विसुद्धत- रागं वितिमिरतरागं जाणइ पासइ । ३२. मणपज्जवणाणं पुण जणमणपरिचितियत्थपायडणं । माणुसखेतणिबद्धं गुणपञ्चइयं चरितवओ ॥ ५३॥ से तं मणपज्जवणाणं। 15 १ दवओ ४ । दव्वओ ल० ॥ २ तत्थ इति सं० स० ल० नास्ति ॥ ३ अब्भहियतराए विउलतराए विसुद्धतराए वितिमिरतराए जाणति जे० डे० मो० ल० । अन्भहियतराए विसुद्धतराप वितिमिरतराए जाणति य० स० । एतयो पाठभेदयो प्रथमः सूत्रपाठभेद श्रीमलयगिरिपाट स्ववृत्तावाढतोऽस्ति । द्वितीय पुनः पाठभेदो भगवता श्रीअभयदेवसूरिणा भगवत्या- मष्टमशतकद्वितीयोदेशके मनःपर्यवज्ञानविषयकसूत्रव्याख्यानावमरे जहा नंदीए इति सूत्रनिर्दिष्टनन्दिसूत्रपाठोद्धरणे तद्वयाख्याने चाहनोऽस्ति । चूर्णि-हरिभद्रवृत्तिसम्मतस्तु सूत्रपाठ' शु० आदर्श एव उपलभ्यते ॥ ४ उज्जुमती जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेज्जभागं उकोसेण अहे जाव मु० । नोपलभ्यते कस्मिंश्चिदप्यादर्शऽय पाठः, नापि चूर्णिकृता वृत्तिद्भयां वाध्य पाठ स्वीकृतो व्याख्यातो या वर्तते । अपि च श्रीअभयदेवाचायणापि भगवत्या अष्टमशतकद्वितीयोद्देशके नन्दीपाठोद्धग्णे नाय पाठ उल्लिपितो व्याख्याता वाऽस्ति । नापि विशेषावश्यकादौ तटीकादिषु वा मन पर्यवज्ञानक्षेत्रवर्णनाधिबारे जघन्योत्कृष्टस्थानचिन्ता दम्यते ॥ ५ इमीए ल० ॥ ६ उचरि- महेहिलेसु खुडागपयरेसु उड्ढं स० स० । उवरिमट्टिले खुडागपयरे उन्हूँ य० स० विना मलयगिरिवृत्तौ च ॥ ७ निलो ५० स० शु० ॥ ८ समुहेसु पण्णरससु कम्मभूमीतु तीसाए अकम्मभूमीसु छप्पण्णाप अतरदीवगेमु मगाणं है। शु० मो० मु०। श्रीमभियदेवाचार्यभगवत्यामष्टमगतकद्वितीयो गरे नन्दीसूचगाठोदग्ण पप य मूत्रपाल आटनोऽस्ति ।। ९ जेहिमंगु मो० मु० ॥ १० अब्भहियतरं बिउलतर विसुद्रतरं वितिमिस्नर खेत्त इनि हरिभद्र-मलयगिग्वृित्तिमम्मन सूत्रपाठ जे० मो० मु० ॥ ११ खेत्तं इति जे० स० ३० गु० नास्ति । भगवत्यामभयदेवाचार्योदने नन्दीगटेऽपि नास्ति । १२ च भगवत्या श ८, नन्दीपाठोद्धरणे ॥ १३ अभहियनरागं विउलनरागं पति पदद्वय २० म० एम० नास्ति । भगवान्यामात नन्दीगठोद्धरणे एतत् पदद्वय नास्ति ॥ १४ अत्र अम्भहियतरागं विउदनरागं वितिमिरतगर्ग टनि पाय - भगवत्यां नन्दीसूत्रपाठोदरणे च नास्ति, केवल विमुद्धतराग परमेव पर बने ।
२४ जिणदासगणिमहत्तरविरइमाए चुण्णीर संजय [सु०१३-३६ ३१-३२ सणिणा मणतेण मणिते मणोखधे अणते अणतपदेसिए दन्धद्ववाए तम्गते य वण्णादिए भाषे मणपजवनाणेण पचक्ख पेक्खमाणो जाणाति चि भणित । मणितमत्य पुण पञ्चक्ख ण पेक्खति, जेण मगालवण मुत्तममुत्त वा, सो य छदुमत्यो त अणुमाणतो [जे० १९५ प्र०] पेक्खति ति अतो पासणता मणिता । अहवा छदुमत्यस्स एगविहसयोवसमलमे वि विविधोपयोगसमयो भवति, जहेत्येव रिजु विपुलमतीर्ण उपयोगो, अतो विसेस-सामणत्येमु उवउज्जती माणति पासइ चि मणित, ण दोसो। विपुलमती पुण दवद्धताए वणादिरहि य अधिगतर जाणतीत्यर्थ । उपरिमहेविल्लाह खडागपतराइ ति इमस्स भावणस्य इम पाणविमति-तिरिय- लोगस्स उड्डाऽइलद्वारसजोयणसइयस्स बहुमज्झे एत्य असखेयशुलभागमेत्ता लोगागासप्पयरा अलोगेण संहिता सम्बखुडलतरा खुडागपतर चि भणिता, ते य सव्वतो रज्जुष्पमाणा। तेसिं जे बहुमझे दो खुट्टागपतरा वेसि पि बहुमझे जबुद्दीवे रतणप्पमपुतचिबहुसमभूमिभागे मदरस्स बहुमञ्झे एत्य अदुष्पदेसो रुपगो, नचो दिसि विदि- 10 सिविभागो पत्तो,-एत तिरियलोगमज्झ । एतातो तिरियलोगमज्झातो रज्जुप्पमाणसुहागपतरेहितो उपरि तिरिय असखेयगुलमागअसखेयगुलभागवड्ढी, उबरिहुचो वि अगुलअसखेपमागारोहो चेव, एव तिरियसवरिं च अगुलभसखेपमागवड्ढोए ताव लोगवड्दी णेतव्वा नाव उड्ढलोगमन्झ, तातो पुणो तेणेव कमेण सबट्टो कावन्यो उपरिलोगतो रजुपमाणो । ततो य उड्ढलोगमझातो उत्ररिं हेवा य कमेण खुधागपतरा माणिवन्ना जाप जाव रज्जुष्पमाणा सुहागपतर ति। तिरियलोगमज्झरजुप्पमाणखुट्टागप्पतरेहितो पि हेवा अगुलबसखेयभागवड्दी ॐ तिरिय, अहोवगाहेण वि अगुलस्सअसखमागो चेब, एव अहेलोगो वड्डेतन्नो भाव अहेलोगतो सत्त रनो। सत्तरज्जूपयरेहिती उपरुपरि क्मेण खुडागपतरा माणितन्ना जाव तिरियलोगमन्झरज्जुप्पमाणा खुट्टागपतर ति । एव सुहागपरूषणे कते इम भण्णति-उवरिम ति-तिरियलोगमज्झातो [जे० १९५ वि.] अहो जात्रणव जोयण सता वाव इमीए रयणप्पभपुटवीए उपरिमखुट्टागपतर ति भण्णति । तदहो अहेलोगे जाव अहेलोइयगामवत्तिणो ते देहिमखहागप्पतर ति भणति, रिजुमती अधो ताव पश्यतीत्यर्थ । अहवा अहेलोगस्स उवरिमा खुट्टागपतरा 20 तिरियलोगस य हेडिमा सुहागपतरा ते जाव पश्यतीत्यर्थ । अण्णे मणति-उपरिम ति-अधोलोगोपरिद्विता जे ते उपरिमा। के य ते ? उच्यते--सन्चतिरियलोग- बत्तिणो तिरियलोगस्स वा अहो णवजोतणसतवत्तिणो ताण घेव जे देहिमा ते जाव पश्यतीत्यर्थ , इम ण घडति, अहेलोइयगाममणपजवणाणसभक्पाहण्णचणतो । उक्त च- इहाघोलौकिका ग्रामा न तिर्यन्लोकवनि | मनोगतास्त्वसौ भावान् चेति तद्वचिनामपि ॥१॥ 25 ] अहातियगुलमगहण उस्सेहगुलमाणतो। कह गन्नति १ उच्यते--"उस्सेहपमाणतो मिणे देह" बृहत्संग्रहणी गा ३३५] ति वयणातो । अगुलादिया य जे पमाणा ते सव्वे देहनिष्फण्णा इति, गाणविसयत्तणतो यण स्स। रिजमतिखेचोवलमप्पमाणातो विपुलमती अम्मतियतराग खेत उनलमइ ति। एगदिसि पि अन्मतियसमवो भवति त्ति समततो जम्हा अव्मइय ति तम्हा विपुल्तराग भणति । यहवा जहा घडो घडातो जलाहारचणतो अभतितो 30 सो पुण नियमा घडागासखतेण विडलतरो भवति एव विउलमती अमतियतराग मणोलद्धिजीवदयापार खेत्त जापति, त च नियमा पिपुलतर इत्यय । अहवा आयाम विक्खमेण अमइयतराग वाहलेण विडलतर खेच १ असेलोगोपरिहितो जे॥२ समयमालवणतो आ.दा. हरिमायतौ च ॥ दोसो। रिजु दार मनमानी घाम दो सा रिजु आ० ॥ ४ आ. दा० आइस्यो एतत्सत्रणा सपत्र अभविय स्थाने अमहिय इति बताते - केवलणाणं तव्मेया य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुतं । २५ उपलभत इत्यर्थः। अहवा दो वि पदा एगट्ठा । विसिट्ठविमुद्धिविसेसदंसगो तरसहो त्ति, यथा शुक्लः शुक्लतर इति। किंच-जहा पगासगदबविसेसातो खेतविमुद्धि(दी) विसेसेणऽक्खिज्जति तहा मणपज्जवनाण-चरणविसेसातो रिजुमणपज्जवणाणिसमी जे० १९६ प्र० ]वातो विपुलमणपज्जवणाणी विसुद्धतरागं जाणति, मणपज्जवनाणाव- रणखयोवसमुत्तमलंभत्तणतो वा वितिमिरतराग ति भण्णति । अहवा पुग्ववद्धमणपज्जवनाणावरणखयोवसमुत्तमलंभ- तणतो विसुद्धं ति भणितं तस्सेवाऽऽवरणवज्झमाणस्सऽभावत्तणतो पुन्यबद्धस्स य अणुदयत्तणतो वितिमिरतराग-ति । भण्णति । अहवा दो वि एते एट्ठिया पदा। मणपज्जवनाणस्स सेसं कंठं । इदाणिं केवलनाणं भण्णति, मण- पज्जवनाणाणतरं सुत्तकमुद्वित्तणतो विशुद्धिलाभुत्तमयो य केवलं भण्यति- ३३. से किं तं केवलणाणं ? केवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-भवत्थकेवलणाणं च सिद्धकेवलणाणं च ३३. से किं तं केवलेत्यादि सूत्रम् । केवलनाणमभेदे वि भेदो भव-सिद्धावस्थादिएहिं अणेगधा इमो 10 कज्जति-मणुस्सभवद्वितस्स जे केबलनाणं तं भवत्थकेवलनाणं । चसद्दो उस्सष्णं भेददंसणे । सव्वकम्मविप्पमुको सिद्धो, तस्स जं गाणं तं सिद्धकेवलनाणं ॥ ३४. से किं तं भवस्थकेवलणाणं ? भवत्थकेवलणाणं दुविहं पणतं, तं जहा-सजो- गिभवत्थकेवलणाणं च अजोगिभवत्थकेवलनाणं च । ३४. मणादितो जोगो, सो य जहासंभवातो, तेण सह जोगेण सजोगी, तस्स जं नाणं तं सजोगिभवत्थ- 15 केवलणाणं । अजोगी-सव्वजोगनिरुद्धो सइलेसभावद्वितो, तस्स जं गाणं तं अयोगिभवत्थकेवलनाणं ।। ३५. से किं तं सजोगिभवत्थकेवलणाणं ? सजोगिभवत्थकेवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-पढमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च अपढमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च, अहवा चरिमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च अचरिमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च । से तं सजोगिभवत्थकेवलणाणं । ३६. से किं तं अजोगिभवस्थकेवलणाणं ? अजोगिभवत्थकेवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-पढमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं च अपढमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं च, अहवा चरिमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं च अचरिमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं च । से अजोगिभवत्थकेवलणाणं । ३५-३६. पढमसमयो केवलणाणुप्पत्तिसमयो चेव, अपढमो वितियाढिसमयो-जाव सजोगित्तस्स चरमसम- 25 एत्यर्थः । अहवा एसेवऽत्यो समयविकप्पेण अण्णहा दंसिज्जति-सजोगिकालचरिमसमए चरिमोति-पच्छिमो, ततो परं अयोगी भविप्यतीत्यर्थः । अचरिमो त्ति-चरिमो न भवति, चरिमस्स आदिसमयातो आरम ओमत्यगं जाव पढमसमयो ताव अचरमसमया भण्णंति, एतेमुजं णाणं तं अचरमसमयभवत्थकेवलनाणं । सेसं कंठं ।।। १ 'विसुद्धिविसेसो लक्खि आ० दा० ॥ २ 'त्तरमयो आ० दा० ॥ 20 बु०४ २६ 3 ३ 0 जिणदासगणिमहचरविरइयाए चुण्गीए संजय [सु० ३७-३९ ३७ से त कि सिद्धकेवलणाण? सिद्धकेवलणाणं दुविहं पण्णतं, त जहा-अणतरसिद्ध- केवलणाणं च परपरसिद्ध केवलणाण च । ३७ से कि त सिद्धकेवलनाणेत्यादि सत्रम् । तत्य सिद्धकेवलणाण दुविइ-अणतर परपर । तत्य अगतर णो समयतर पत्त, सिद्धत्वमथमसमयवर्तिन इत्यर्थ ॥ ३८ से कि त अणतरसिद्धकेवलणाण, अणतरसिद्धकेवलणाणं पण्णरसविह पणतं, त जहा-तित्थसिद्धा १ अतित्यसिद्धा २ तित्थगरसिद्धा ३ अतित्थगरसिद्धा ४ सयबुद्ध- सिद्धा ५ पत्तेयबुद्धसिद्धा ६ बुद्धवोहियसिद्धा ७ इथिलिंगसिद्धा ८ पुरिसलिंगसिद्धा ९ णपुसलिंगसिद्धा १० सलिंगसिद्धा ११ अण्णलिंगसिद्धा १२ गिहिलिंगसिद्धा १३ एगसिद्धा १४ अणेगसिद्धा १५ । सेत्त अणतरसिद्धकेवलणाण | ३८ ते पचदसविधा तित्यसिद्धाइया । 'तित्थसिद्धा' इति जे विल्ये सिद्धा ते तित्यसिद्धा, तित्य च- चातुनष्णो समणसपो पढमादिगणधरा वा, भणित च आरिसे-"तित्थ भते ! तित्थ ? [जे० १९६ दि०] अरहादि तित्य? गोवमा! अरहा नाव तित्यारे, तित्य पुण चातुबष्णो समणसयो" [मग श २० उ० ८ सू ६८२] तम्मि तित्यकालमावे उप्पग्णे ततो वा तित्यकालभावतो जे सिद्धा ते तित्यसिद्धा १ । अतित्य चानुवष्णसघस्स अमावो तित्यकालमावस वा अमायो। तम्मि अतित्यकालमावे अतित्यकालमावातो वा जे सिद्धा ते अतित्थसिद्धा। तच 15 अतित्य तित्यतरे तित्ये या अणुप्पण्णे जहा मरुदैयिसामिणिप्पमितयो २१ रिसमादयो तित्थारा, ते जम्हा तित्यकर णामयम्मुदयमाने द्विता तित्यकरमावातो वा सिद्धा तम्हा ते तित्यकरसिद्धा ३ । अतित्यारा सामण्णकेबलियो गोतमादि, तम्मि अतित्यकरमावे द्विता अतित्यारभावातो वा सिद्धा अतिस्थकरसिद्धा ४ । स्वयमेव धुदा स्वय बुद्धा, सब अप्पणिज्न वा जाइसरणादि कारण पडुच्च युद्धा सतबुद्धा । स्फुटवरमुच्यते-चाममत्ययमन्तरेण ये प्रतिषु दास्ते सयबुद्धा । ते य दुविहा-तिस्थगरा तित्यगरवतिरिचा वा । इह वहरिचेहि अधिकारो । किंच-सययुद्धस्स 20 वारसविही वि उवही भवति, पुन्वाधीत से मुत भवति वा ग वा । जति से नयि तो लिंग नियमा गुरुसणिहे पडिवजा, गच्छे य विहरति । अह पुन्नाधीतमुतसमवो अत्यि तो से लिंग देवता पयच्छति, गुरुसम्णिहे वा पडिवज्नति । जइ य एगनिहारविहरणजोग्गो, इच्छा व से तो एको चेव विहरति, अण्णहा गच्छे विहरतीत्यर्थ । एवम्मि भावे द्विता सिद्धा एतातो वा भावातो सिद्धा सयबुद्धसिद्धा५। पत्तेययुद्धा' पचेय-याह्य पभादि कारणम मिसमीक्ष्य बुद्धा प्रत्येसुद्धा । पहि मत्ययप्रतिबुद्धाना च पत्तेय नियमा विधारो जम्हा वम्हा य ते पत्तेयबुद्धा, नहा करकंदुमादयो। किंच-पचेयबुद्धाण जहण्णेण दुविहो उकोसेण गवविधो उपही नियमा पाउरणवज्जो भवति । किर-पत्तेययुद्धाण पुयाधीत मुत णियमा भवति, जहणेण एकारसगा, उकोसेण मिण्णदसपुच्चा । लिंग च से दरवा पपन्छति, निगवजितो या भवति । नतो [जे० १९७ प्र०] मणित-"रुप्य पत्तेयबुद्धा" [आव गा ११३९] इति । एतम्मि मावे एतातो चा सिद्धा पत्तेययुद्धसिद्धा ६। बुद्धबोधिता-जे सतयुद्धेहि तित्यकरादिएहि वोहिता, पत्तेपघुदेहिं या कविलादिपति गोषिता ते बुद्धयाधिता । अहवा बुद्धयोधिएहि वोषिता धुद्धपोषिता, एव मुहम्मा 30 दिएहि जवुणामादयो भवति । अहवा युद्ध इति-प्रतिबुद्धा, तेहि प्रतिगोधिता बुद्धबोषिता, प्रमवादिमिराचार्य । १ मप्पणा जे या आर भा.दा. || २णितमा मो० ॥ ३ पगयिधारयिधरणजोगो मा ॥ ४ विहार' इत्ययः ॥
10 केवलणाणं तन्भेया य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । २७ एतभावे द्विता एतातो वा सिद्धा युद्धबोधितसिद्धा ७ । 'सलिंगसिद्धा' दवलिंग प्रति रजोहरण-मुहपोति-पडिग्गह- धारण सलिंग, एतम्मि दबलिगे द्विता एतातो वा सिद्धा सलिंगसिद्धा ८ । 'अण्णलिंगसिद्धा' तावस-परिवाय- गादिवकल-कासायमादिदब्बलिंगठिता सिद्धा अण्णलिंगसिद्धा ९। एवं गिहिलिंगे वि-केसादिअलंकरणादिए दन्य- लिंगे द्विता सिद्धा गिहिलिंगसिद्धा १० । इथिलिगं ति-इत्थीए लिंग इथिलिंग, इत्थीए उवलक्षणं ति बुत्तं भवति । तं तिविह-वेदो सरीरनिव्वत्ती णेवच्छं च, इह सरीरनिवत्तीए अधिकारी, ण वेद-णेवच्छेहि । तत्थ वेदे 5 कारणं-जम्हा खीणवेदो जहण्णेणं अंतोमुहुत्तातो उकोसेण देखणपुष्चकोडीतो सिज्झति, णेवच्छस्स य अणियत- तणतो, तम्हा ण तेहिं अहिकारो । सरीराकारणिवत्ती पुण णियमा वेदुदयातो णामकम्मुदयाओ य भवति तम्मि सरीरनिव्वत्तिलिंगे ठिता सिद्धा तातो वा सिद्धा इथिलिंगसिद्धा ११ । एवं पुरिस-णपुंसकलिंगा वि भाणितव्वा १२-१३ । एकसिद्ध त्ति-एकम्मि समए एको चेव सिद्धो १४ । अणेगसिद्ध त्ति-एकम्मि समए अणेगे सिद्धा, दुगादि जाव असतं ति । भणितं च- बत्तीसा अडयाला सट्ठी बावत्तरी य वोधव्वा । चुलसीती छण्णउती दुरहित अद्रुत्तरसतं च ॥१॥१५॥ [बृहत्स. गा. ३३३] चोदक आह-गणु एते पण्णरस भेदी छभेदहिताअण्णोण्णनिरवेक्खा ण भवंति कहं पंचदसभेद ति पणता ? आचार्य आह-णणु तित्थाऽतित्थपुरिसवि जे० १९७ द्वि० ]भागुप्पण्णा-ऽणुप्पण्णकालभेदतो वा दो भेदा परोप्प- रविरुद्धा १, तहा तित्थगरणामकम्मुदयातो अभावतो य दो भेदा परोप्परविरुद्धा २, तहा लिंगादिया दवलिंग- 15 पडिवत्तिभेदा परोप्परविरुदा ३, तहा मोहुत्तरपगडिवेदभेदोदयतो त्थिमादिसरीरलिंगणिवत्ती परोप्परविरुद्धा ४, एगा-उणेगा वि एककालसहचरिता-ऽचरितत्तणतो भिण्णा ५, सयबुद्धादयो वि णाणावरणक्खओवसमविसेसपडि- बोधविसेसत्तणतो प्रतिविसिवा ६, एवं तित्थादियाण अण्णोष्णलक्खणसभाबविताणं पंचदस भेदा पण्णता, किंच- जहा मतिणाणे गैचादियाण चरिमपज्जवसाणाणं अण्णोण्णाणुवेधत्तणे वि भेदो इहं पि जइ तहा तो को दोसो ?, किंच-नाणाणयाभिप्पायत्तणतो सुत्तस्स य अणेगगम-पज्जायत्तणतो अभिधाणभेदत्तणतो य पंचदसभेदकरणं ति ण 20 दोसो ।। इदाणिं तं चेव सिद्धकेवलणाणं समतभेदतो अणेगधा विसेसिज्जति- ३९. से किं तं परंपरसिद्धकेवलणाणं? परंपरसिद्ध केवलणाणं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा-अपढमसमयसिद्धा दुसमयसिंद्धा तिसमयसिंद्धा चउसमयसिद्धा जाव दससमयसिद्धा संखेज्जसमयसिद्धा असंखेज्जसमयसिद्धा अणंतसमयसिद्धा, से तं परंपरसिद्धकेवलणाणं । से तं सिद्धकेवलणाणं। ३९. पढमसमयसिद्धस्स जो वितियसमयसिद्धो सो परो, तस्स वि य अण्णो, एवं परंपरसिद्धकेव उनाणं भाणितव्वं । तं च 'अपहमसमय' इत्यादि । नास्य प्रथमः समयो विद्यत इत्यप्रथमः, द्वितीयसमयसिद्ध इलार्थः, स च परंपरसिद्धविसेसणस्स प्रथमः, तस्स परतो वितियादिसमया भाणितन्वा ॥ १ मेदा विमेद आ० दा० । अत्रेदमवधेयम्-श्रीमद्भिहरिभद्रपादै मलयगिरिचरणश्च स्वस्ववृत्तौ तीर्थसिद्धा-ऽतीर्थसिद्धरूपमे- दद्वयान्त पञ्चदशमेदान्तर्भाव सङ्कल्प्य॑व चालना-प्रत्यवस्थाने उपन्यस्ते स्त. तदनुसारी पाठमेदोऽपि चूदिशेपु दृश्यते । किञ्च-चूर्णी- सत्कप्राचीनतम आदर्श पड्मेदान्त पञ्चदशमेदान्तर्भावावेदक छम्मेदहिता० इत्यादि पाठो वरीवृत्यते, आचार्यप्रतिविधानमपि पविभागा- वेदकने विद्यते इत्यस्माभि छम्मेदहिता० इति पाठ एव मूले आइतोऽस्ति । अत्रायें तद्विद एव प्रमाणमिति ॥ २ गत्यादिकाना चरमपययमानानाम् “ गइ इदिए य० " तथा "भासग परित्त०" इनि आवश्यकनियुक्तिगाया १४-१५ निर्दिष्टाना द्वाराणाम् इत्यर्थ. ॥ ३ 'गुवेरसंताण वि आ० दा० ॥ ४-५-६-७ सिद्धकेवलणाणं ल० ॥ ८ समयो तम्मि सिद्धो आ० दा०॥ 25 - ૨૮ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजय [मु०१० ४० त समासमो चउन्विह पणत, त जहा-देव्वओ खेतओ कालओ भावओ। तत्य दवओण केवलणाणी सव्वदव्वाइ जाणइ पासइ । खेत्तओण केवलणाणी सव्व खेत जाणइ पासइ । कालओ ण केवलणाणी सव्व काल जाणइ पासइ । भावओ ण केवलणाणी सव्वे भावे जाणइ पासइ । ४० त सब पि चतुनिह दवादिय । 'सव्वदच' ति यम्मा ऽयम्मा गासावयो, वेहितो जीवदव्वा अणवगुणा, तेहिंतो वि पुग्गलदचा अणतगुणा, एते सव्ये सरूवतो जाणति । खेच पि लोगाऽलोगभेदभिण्णम गत सरूवतो जाणति । काल पि समयाजालियादिय तीयमणागतसम्बद्ध वा सरूवतो सच जाणति । भाषा वि दुविधा मावा-जीवभावा अनीवभावा य । तत्य जीवमावा कम्मुदयसतत्तपरिणामितलक्खणा गति-कसाया दिया कम्मुदयलक्खणा अणेगविधा, उपसमा जे० १९८ प्र० लय-खयोवसमजीवसतचलक्खणा अणेगविहा, 10 पारिणामित्रा य जीव मव्वाऽभव्वत्तादिया, अजीवाऽमुत्तदम्वेमु धम्मा धम्माऽऽगासा गति द्विति-अवगाहलक्खणा, अगुरुलहुगा य अणता, पुग्गलदन्ना य मुहुम-चादर विस्ससापरिणता अभिदधणुमादिया अणेगविषा । परमाणु मादीण य वग्णादिपज्जत्रा एगादिया अणता । एते दयादिया सवे सन्वधा सम्वत्य सन्चकाल उपयुत्तो सागारा Sणागारलक्खणेहि जाण-दसणेहिं जाणति पासति य । एत्य केवलणाण-दसणोवयोगेहि बहुधा समयसन्माव आयबुद्धीए पकप्पेता इम भणति- केयी भणति जुगव जाणइ पासति य केवली नियमा। अण्णे एगतरिय इच्छति सुतोवदेसेण ॥ १॥ अपणे ण चेव चीसु दसणमिच्छति जिणवरिदस्स। ज चिय केवलनाण त चिय से दसण घेति ॥२॥ [विशेषण गा १५३५१] तत्य जे ते भणति 'जुगव नाणति पासति य' ते इम उववत्ति उपदिसति- ज केवलाई सादी-अपजवसिताइ दो वि भणिताई। तो पति केइ जुगव जाणति पासति य सवण्णू ॥३॥ किंच- इहराऽऽयी णिहणत्त मिच्छाऽऽवरणक्खयोति व जिणस्त । इतरतरावरणया अहवा णिकारणावरण ॥४॥ तह य असवण्णुत्त असव्वदरिसित्तणप्पसगोय। एगतरोपयोगे जिणस्स दोसा पहुविधीता ॥५॥[विशेषण गा १९३१९५] एव परेण बहुधा मणिते आगमवादी उचर इम आह- भषणति, भिण्णमुहत्तोवयोगकाले वि तो तिनाणिस्स। मिच्छा छावट्ठी सागरोयमाइ ग्वयोवसमो ॥६॥ [विशेषण गा २०२] १ दप्यमो पदप्यमो० ॥ २ तत्य इति व सं... मास्ति ।। ३ पातिमा सावमा ० ॥ ५ शुकुमशुगादीण भा. दा. । 15 20 24 दुविधुवयोगाभाचे जिणम्म जुगवं? नि चदिति ॥ १३ ॥ णत्यि जुगबोवोगा मञ्चम, नहेच कचनिया ॥ १५ ॥ जं जाणती ण पामनि नं अणुग्नणयमाद्राणि ॥१६॥ केवलणाण-दसणोवओगवायत्थलं] सिरिदैववायगविरइयं णंदीसुतं । जहा छउमत्थस्स मति-मुताऽवधिणाणेमु अंतमुहुत्तकालोवयोगसंभवे उपयोगाऽणज्य से ठितिकालो दिहो, तहा जति जिणस्स गाणसगा सादिअपज्जावसाणा उपयोगा-प्रणा दोसो ? । जति एतं ते णाणुमतं तो इमं ते कई अणुमतं भविस्सइ ?- अह ण वि एतं तो सुण, जहेव खीणंतराइओ अरहा। संते वि अंतरायक्वयम्मि पंचप्पगारम्मि ॥७ सततं ण देइ [०१९.८ हि० ] लभइ व मुंजड़ उवभुजई य मर कन्जम्मि देइ लभड़ व मुंजइ व नहेब इहयं पि ॥ ८ ॥ किंच- दितस्म लभंतस्म व मुंजनस्म व जिणस्स एम गुणो। खीणंतराइयत्ते जं से विग्यं ण मंभवति ॥ ५॥ उवउत्तस्सेमेव य णाणम्मि व दमणम्मि व जिणस्म । लोणावरणगुणोऽयं, जं कमिणं मुणह पामनि वा ॥ १० ॥ पुणो पर आह- पासनो वि न जाणह, जाणं व ण पामती जति जिणिदो । एवं ण कदाह वि मो मचष्णू मब्बदरिसी य ॥ ११ ॥ उत्तरं आचार्य आह- जुगवमजाणतो वि हु चतुईि बि नाणेहिं जह चतुण्णाणी। भण्णह, नहेब अग्हा मन्वाणू मन्चदग्सिी च ॥ १२ ॥ पर एवाऽऽह- तुल्ले उभयावरणत्रयम्मि पुच्चयग्मुन्मवी कस्म । उत्तरं आचार्य आह- भण्णनि, ण पम निग्रमो जुगयुष्पपणेमु जुगवमेवेह । होयब्वं उचआंगण, पन्य मुण नाव दिट्टन ॥ १४ ॥ जह जुगचुप्पत्तीय वि मुत्त मम्मन-मनि-मुनादीणं । किंच- ग्र - , भणितं पि य पणनी- पात्रगादी, जन जिणी ममयं । १ पुच्वं समुष्मयो आ• दा० ॥
३० 5 किंच- 10 15 जिगदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजय [सु०११-१३ गा ५१-५५, जे भगति केवलगाण दसणाण एगचं वे इस हेतुति भणति- जह किर खीणावरणे देसन्नाणाण सभवोण जिणे। उभयावरणातीते तह केवलदसणसावि ॥ १७ ॥ एस ते हेतुजुत्ती जहा अत्यसाधण ण ससहइ तहा उत्तर(र) हेतुजुत्तीए चेव भण्णति- देसण्णाणोवरमे जह केवलनाणसमवो भणितो। देसइसणविगमे तह केवलदसण होतु ॥ १८ ॥ अह देसनाण-दसणविगमे तव केवल मत नाण । णमत केवलदसणमिच्छामेत गणु तवेद ।। १९ ॥ [विशेषण गा १५५-५७ ] भण्णति जहोहिणाणी जाणति पासति य भासित सुते । णय णाम ओहिदसण नाणेगत्त तह इम पि ॥ २० ॥ [ विशेषण गा १७४] एर पराभिप्पाये पडिसिद्धे एगतरोबयोगता सिद्धा तह विम भणति- जह पासतु तह पासतु, पासति सो जेण दसण त से। जाणइ य जेण अरहा त से णाण ति घेत्तन्च ॥ २१॥ [विशेषण गा १९२] चि-सिद्धधिकारे एगंतरोजे० १९९ प्र० वयोगदसिगा इमा फुडा गाहा- नाणम्मि दसणस्मि य पत्तो गतरयम्मि उवउत्ता। सवस्स केवलिस्सा जुगव दो पत्थि उवयोगा ।। २२ ॥ [ विशेषण गा २२९] किंच भगवतीए- उवयोगो पगतरो पणुबीसतिमे सते सिणायस्स । भणितो बिगडत्यो चिय छट्टुरेसे विसेसेतु ॥ २३ ॥ [विशेषण गा २३२ ] किंच- कस्स व गाणुमतमिण जिणस्स जति होज दो वि उपयोगा। गृण ण होति जुगव जतो णिसिद्धा सुते पासो ॥ २४ ॥ [ विशेषण गा २४६ ] ४१ अह सव्वदचपरिणामभावविण्णत्तिकारणमणत | सासयमप्पडिवाती एगविह केवल जाण ॥ ५४॥ केलणाणेणऽत्ये णाउ जे तत्थ पण्णवणजोगे। ते भासइ तित्थयरो, वेइजोग तय हबइ सेस ॥ ५५ ॥ से त्त केलणाण । से त पञ्चकखणाण । १ यामोग मुष यह तसि इत्पर्य पाठ- पतियां पाठान्तरत्वेन निर्दियोऽस्ति । तथाहि- अन्ये खेव पठन्ति पाजोग मुय ह स वाग्योग थुा मानि वर्ग भ्रातृणाम् । इति हारि० वृत्तौ । 'अये स्खे पठन्ति-बहजोग सुर्य हवइ देसि नापमय - भो माथागरणवान् म वाग्योग धुतं भवति, श्रुतमिति व्यवडिमते इस्त्यर्थः ।" इति मलयगिरया ॥ २ मवे • ॥ ३ अत्र मितिला से पपस्येय पास सम्मत 1 नोपलव्योऽय कस्यचिदपि नौ ॥ 20 - . 5 परोक्षज्ञानं तद्भदौ च] सिरिदैववायगविरइयं गंदीसुत्तं । ३१ ४१. अह सव्वक्व० गाहा। केवलनाणेण० गाहा । एताओ जहा पेढियाए ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ सेसं कंठं ॥ इदाणि कमागतं बहुवत्तव्वं पारोक्खं भष्णति- ४२. से किं तं परोक्खणाणं ? परोक्खणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-आभिणिवोहि- यणाणपरोक्खं च सुयणाणपरोक्खं च । ४२. अक्खस्स इंदिय-मणा परा, तेसु जं गाणं तं परोक्खं । मति-श्रुते परोक्षमात्मनः, परनिमित्तवात् , 5 अनुमानवत् । णणु सुत्ते इंदियपञ्चक्खं भणितं ? उच्यते-सबमिणं, एत्थं जं इंदिय-मणेहिं बहिलिंगपञ्चयमुप्पज्जति तमेगंतेणेव इंदियाण अत्तणो य परोक्खं, अणुमाणतणतो, धूमाओ अम्गिणाणं व । जं पुण सक्खा इंदिय-मणो- निमित्तं तं तेसिं चेव पञ्चक्ख, अलिंगत्तणतो, अत्तणो अवधिमादि ब्व, अत्तणो तु तं एगंतेणेव परोक्ख । इंदियाणं पि तं संववहारतो पञ्चक्वं, ण परमत्थतो । कम्हा? जम्हा दबिंदिया अचेतणा इति । तं दुविहं-मतिणाणं सुतनाणं च । इह मति-सुताणमुवण्णासकमे कारणं पुच्चुत्तं दट्टव्वं ॥ मति-सुताण य अभेदसामिणिरूवणत्थं इमं सुत्तं-- 10 ४३. जत्थाऽभिणिबोहियणाणं तत्थ सुयणाणं, जत्थ सुयणाणं तत्थाऽऽभिणिवोहिय- णाणं । दो वि एयाइं अण्णमण्णमणुगयाइं तह वि पुण ऍत्थाऽऽयरिया णाणतं पण्णवेति- अंभिणिबुज्झइ त्ति आभिणिबोहिये, सुंणतीति सुतं । “मतिपुर्वयं सुयं, ण मती सुयपुब्विया ।" ४३. जत्थ मतिनाणेत्यादि । 'जत्थ' ति पुरिसे जत्थ व इंदिय-नोइंदियखयोवसमे मतिणाणमथि 15 तत्थेव सुतनाणं पि । अहवा जत्थाभिनियोधियसरूवं तत्थेव सुतं पि नियमा, अण्णोण्णाणुगता भवंतेते । आह- मति-सुताणं अण्णोण्णाणुगतत्तणतो सामि-काल-कारण[जे० १९९ द्वि०]-खयोवसमतुल्लत्तणतो य एगत्तं पावति, जो दुगपरिकप्पणं ति, अत्रोच्यते, मति-सुताणं अण्णोणाणुगताण वि आयरिया भेदमाह दिद्वंतसामत्थतो, जहा आगासपइद्विताणं धम्मा-ऽधम्माण अण्णोण्णाणुगताणं लक्खणभेदा भेदो दिट्ठो तहा मति-सुताण वि सामि-काला- दिअभेदे वि भेदो भण्णति--- अभिणिवुज्झतीत्यादि । एवं लक्खणाऽभिधाणभेदा भेदो तेसिं । अहवा इमो 20 मति-सुतविसेसो-"मतिपुव्वयं सुतं, ण मती सुतपुब्बिया" इति, जतो मुतस्स मतिरेव पुज्वं कारणं । कहं ? उच्यते-मतीए सुतं पाविज्जति, ण मतिमंतरेण भापयितुं शक्यते, गहितं च मतीए पालिजति, परिवत्तयतो णो पणस्सइ त्ति" जतो, मतिरेवं सुतपुब्वा ण भवति । णणु सुतं पि सोतुं मती भवति ? उच्यते-तं दबसुतं, न भावश्रुतादित्यर्थः । अहवा मति-सुताण भेदकतो विसेसो, मतिणाणं अट्ठावीसइभेदभिष्णं, मुतणाणं पुण अंगा- १ चूर्णि-वृत्तिकृता से किं तं परोक्खं ? परोक्ख दुविहं इति पाठोऽत्र मम्मत, परोक्षजानोपसहारेऽपि त' से तं परोक्वं रत्येव पाठ स्वीकृतोऽस्ति किन सर्वेष्वपि सूत्रादर्शपु उभयत्रापि परोक्खणाणं इत्येव पाठ उपलभ्यते ॥ २ चूर्णि-वृत्तिकृद्धि किल जत्य मतिनाणं तत्थ सुतनाणं, जत्थ सुतनाणं तत्थ मतिनाणं इतिस्प सूत्र मौलभावेनाङ्गीकृतमस्ति । किञ्च-श्रीचूर्णिकदादिभि मोलभावेनाशीकृतमेतद् जत्थ मतिनाणं इत्यादि सूत्र साम्प्रतीने पादर्श' नोपलभ्यत ।' अपि च चूर्ण्यवलोकनेनंतदपि ज्ञायते यत् चूर्णि- फत्तमयभाविप्वादर्शपु पाठभेदयुगलमप्यासीदिति ॥ ३ तत्थ आमि स० स० ॥ ४ इत्य आय मो० मु० ॥ ५ पण्णचंति शु० । पण्णविति दे० ल० । पण्णवयंति मो० नु० ॥ ६ अभिणियोज्झतीति ख० । अभिणित्रुज्झतीति स० शु० । अभिणिबुज्झईइ लः ॥ ७ 'द्वियं णाणं, सुन० स० विना ॥ ८ सुणेइ त्ति मो० नु० ॥ ९ 'पुवं जेण सुयं ब० डे० । चूर्णी वृत्त्योश्च जेण इति प नास्ति । पुष्यं सुर्य रा० उ. विना ॥ १० ण-विधाण दा० ॥ ११ चि, जतो मतिमेव सुतं पवण्णो भवति आ० ॥
३२ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुय [सु०१४-४६ गा ५६-६५ गगाइभेदमिष्ण अणेगहा। अहवा मति-मुताण इदियोवलद्धिविभागतो भेदो इमो-सोर्तिदियोवलद्धी० गाहा [विशमा गा १२२] पूर्ववद् व्याख्येया। अहवा मति-सुतभेद मणति-बुद्धीदिवेगाहा। विशेषा गा १२८] एतीए गाहाए अत्यो मति-मुतविसेसोय जहा विसेसावस्सगे तहा माणितन्नो। अण्णे वागसम मतिणाण सुवसम च मुतणाण भणति त च ण घडति, जम्हा वाग सुवदिहण मइनाणस्सेव सुत परिणामो दसिज्जति, तम्हा त 5 जुजते इत्यय । अहवऽष्णो मतिमुतभेदो-अक्सराणुगत मुत, अणक्खर मतिनाण ति। अहवाऽऽत्पमत्सायक मतिणाण, स्व-परमत्यायक मुतनाण । अहवा मति मुताण आवरणमेदातो [जे० २०० प्र०] भेदो दिहो। तक्खतो वसमविसेसाती चेव मति-मुताण भेदो भवति ॥ भणितो मति-सुतविसेसो। इदाणि जहा मति सुतणाणाण कन कारणभेदेहि मेदो दिवो तहा मतीए मुतस्स य सम्म मिच्छबिसेसो दसणपरिगहातो भवइ चि भतो पुत्त मग्णति- ४४ अविसेसिया मती मतिणाण च मतिअण्णाण च । विसेसिया मती सम्मदिद्विस्स 10 मती मतिणाण, मिच्छादिद्विस्स मती मतिअण्णाण । अविसेसिय सुय सुपणाण च सुय- अण्णाण च । विसेसिय सुय सम्मदिहिस्स सुय सुयणाण, मिच्छदिद्विस्स सुय सुयअण्णाण। ४४ अविसेसिता मतीत्यादि । सामिणा अविसेसिता मती इम वचन्ना-आमिणिबोधिकेत्यादि । चसदो समुच्चये। विससिता मतीत्यादि । जता पुण इमेण सामिणा विसेसिता मती भवति तदा इम वतन्या- सम्मादहिस्स मीत्यादि सूत्रसिद्ध । अविसेसित मुतमित्यादि एत पि उपउजिउ एव चेव वत्तव्य । अहवा जाब 1. विसेसणेण अविसेसिता मती ताव मती चेव वत्तव्वा । सच्चेव मती पाण ऽण्णाणसविसेसणातो इम वचन्या- आमिनियोधिकत्पादि सूत्रसिद्ध । णाणऽण्णागसविसेसण कह? भण्णति-समच मिच्छसामिगुणतणतो सम्मदिहि- स मतीत्यादि सुत्तसिद्ध । सुते वि एव चेव वत्तव्य । पर आह-सुलखयोवसमत्तणतो घडाइवत्थूण य सम्मपरि छेदतणतो सदादिविसयाण य समुवलमातो कह मिच्छदिहिस्स मति मुता अग्माण ति मणिता ? उच्यते- सदसदविसेसणातो भवहेतु जतिच्छितोवलमातो। नाणफलामावातो मिच्छघिडिस्स अण्णाण ॥१॥ मतिपुन्न मुत्र ति कालु मतिणाण चेव पुल भणामि- ४५ से कि त आभिणिवोहियणाण' आमिणिबोहियणाण दुविह पणत, त जहा- सुपणिस्सिय च असुयणिस्सिय च। ४५ से कि त आभिनियोधिकेत्यादि मुत्त । तत्य 'मुतनिस्सित ति मत ति-मुत्त, न च सामादियादि बिंदुसारपन्नवसाग । एत दन्नमुत गहित । त अणुसरतो ज मतिणाणमुप्पजति त मुतमिस्साए उप्पण्ण ति सुतातो 25 वा पिसत त मुतणिसित भण्गति । त च उगईहा बाय धारणाठित चतुम्मेद । 'अस्मुनिस्सित व तिज पुण दल भावमुताणिरवेक्ख आभिणियोधिप्रमुपज्जति त असुयभाषातो समुप्पण्ण ति अमुवनिस्सित भणति । तच उप्पत्तियादिबुद्धिचउप | म- १ जम्दा । दा. ॥ २ विसेसदसण आ दा० ॥ ३ अय मूले स्थापित सूत्रपाठः सं० मो. विशेषामदयकमलधारीयवृत्ती १९५ पत्र नसाटोदाणे उपलभ्यत । श्रीहरिमनपरिणापि स्पवृत्तापयमय सूत्रपाटा व्याख्यातोऽस्ति । विससिया सम्मदिहिस्स मती मतिणाण मिच्छादिहिस्स मतो मतिमण्णाण । एव अविससिय सुप सुषणाण च मुयमण्णाण च। विसेसिय सम्मादिहिम्म मुप सुपणाण मिदिहिस्स सुप सुयमण्णाण । ० है. शु । अयमेव सूत्रपाः श्रीमता मलय गिरिमा मिना स्याख्यातथाप्यस्ति । पिसेसिया मती साहिहिस्स मतिणाण मिच्छदिहिस्स मतिमण्णाण । अयिसेसिय सुप सुपपाणं सुपमण्णाण च । यिसेसिय सुर्य समदिहिस्स सुयणाण, मच्छद्दिहिस्स सुयमण्णाण । .॥ 20 .
5 ३ 10 असुयणिस्सियं मइणाणं उप्पत्तियाइवुद्धीओ य] सिरिदेववायगविरइय णंदीयुत्तं । ३३ ४६. से किं तं असुयणिस्सियं ? असुयणिस्सियं चउज्विहं पण्णत्तं, तं जहा- उप्पत्तिया १ वेणइया २ कम्मया ३ पारिणामिया ४ । बुद्धी चउन्विहा वुत्ता पंचमा नोवलब्भइ ॥ ५६ ॥ पुव्वं अदिट्ठमसुयमवेइयतक्खणविसुद्धगहियत्था । अव्वाहयफलजोगा बुद्धी उप्पत्तिया णाम ॥ ५७ ॥ भैरहसिल १ पणिय २ रुक्खे ३ खंडग ४ पड ५ सरड ६ काय ७ उच्चारे । गय ९ घयण १० गोल ११ खंभे १२ खुड्डग १३ मग्गि १४ स्थि १५ पंति १६ पुत्ते १७ ॥ ५८ ॥ भरह सिल १ मिंढ २ कुकुड ३ वालुय ४ हस्थी ५ [य] अगढ ६ वणसंडे ७ । पायस ८ अइया ९ पत्ते १० खाडहिला ११ पंच पियरो १२ य ॥ ५९॥ महुसित्थ १८ मुद्दि १९ यंके २० य णाणए २१ भिक्खु २२ चेडगणिहाणे २३ । सिक्खा २४ य अत्थसत्थे २५ इच्छा य महं २६ सतसहस्से २७॥ ६०॥१॥ भरणित्थरणसमत्था तिवग्गसुत्तत्थगहियपेयाला । उभयोलोगफलवती विणयसमुत्था हवति बुद्धी ॥ ६१ ॥ णिमित्ते १ अस्थसत्थे २ य लेहे ३ गणिए ४ य कूब ५ अस्से ६ य । गद्दभ ७ लक्खण ८ गंठी ९ अंगए १० रहिए य गणिया य ११ ॥ ६ ॥ सीया साडी दीहं च तणं अवसव्वयं च कुंचस्स १२ । निव्वोदएँ १३ य गोणे घोडग पडणं च रुक्खाओ १४ ॥६३॥ २ । उवओगदिवसारा कम्मपसंगपरिघोलणविसाला । साहुकारफलवती कम्मसमुत्था हवति बुद्धी ॥ ६४ ।। हेरण्णिए १ करिसए २ कोलिय ३ डोएँ ४ य मुत्ति ५ घय ६ पवए ७। तुण्णाग ८ वड्डती ९ पूतिए १० य घड ११ चित्तकारे १२ य ॥६५॥३॥ १ वेणयिया स० शु० । वेणतिया स० ॥ २५८-५९ गाथे प० शु० ३० ल० प्रतिषु पूपिरव्यन्यामन वनतं ॥ ३ गंडग स० ॥ ४ पय ल० ॥ ५ कुझड ३ तिल ४ वालुय ५ हन्थि ६ अगड ७ टनिका मूत्रपाल मर्याम्पपि सूत्रप्रतिपूप- लभ्यते । आवश्यकनियुक्त्यादावपीत्यम्भूत एव पाठ उपरभ्यते, तस्य च नत्र संगपि चूर्ण-निटाटिभि व्याग्न्यानोऽनि । निशान एतत्स्त्रचूादायव्यात्यानाद् मलयगिरिपादवृत्त्यनु तागे पाठो मुन्छे आइतोऽस्ति ॥ ६ पायस ८ पत्ते ९ अदया १० इति पाठानुसारेण मत्यगिरिणा व्यात्यानमस्ति, न चोपर म्यतेऽय पाठ पुत्राप्याद ॥ ७ २० पणय २. भिम्बू २२ य चेढग' प्रन्यन्तरे ॥ ८ आसे २० ॥ ९ अगए १० गणिया य रहिए य ११ मांन्यपि मुत्रप्रतिषु । आरम्याग्निमुनयादी नद्यृत्त्यादी व मूलगत एक पाठ उपलभ्यते ॥ १० निम्बोदएण १३ गोणे शु० ॥ ३१ टोबे मो. ९० ॥ ३ 15 20 चु०५ ३ CO ६ 5 10 जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजय [सु०१६-५० गा ६६-६९ अणुमाण हेउ दिद्वतसाहिया वयविवागपरिणामा । हिय णीसेसफलवती बुद्धी परिणामिया णाम ॥ ६६ ॥ अभए १ सेहि २ कुमारे ३ देवी (वे) ४ उदिओदए हवति राया ५। साहू य णदिसेणे ६ घणदत्ते ७ साव(वि)ग ८ अमच्चे ९ ॥ ७॥ संमए १० अमञ्चपुत्ते ११ चाणके १२ चेव थूलभद्दे १३ य । णासिकसुदरीनदे १४ वहरे १५ परिणामिया बुद्धी ॥६॥ चलणाहण १६ आमडे १७ मणी १८ य सप्पे १९ य खग्गि २० थूमि २१ दे २२ । परिणामियबुद्धीए एवमादी उदाहरणा ॥ ६९॥४। से च असुयनिस्सिय । ४६ पुब्व० गाहा। भरहसिल० गाहा]। भरह गाहा । मधु गाहा।। ५७ ॥ ५८ ॥ ५९॥ ६ ॥ उम्पत्तिया गता १ । इमा वेणतिया- भरणि० गाहा। निमित्ते० गाहा। सीता० गाहा ॥ ६१ ॥ १२ ॥ १३॥ विण जे० २०० वि० ] यस मुत्या गता २।इमा कम्मइया- उवओग० गाहा। हेरण्णि० गाहा ॥ ६४॥६५॥ कम्मइया गता ३।इमा पारिणामिया- 15 अणु० गाहा। अभए गाहा। खमए गाहा। चलणा गाहा । एताओसवाओ जहा णमोकारे (आव०नि० गा. ९३८-५१) तहा दहन्याओ॥६६॥६७॥६८॥६९॥ ४॥ इदाणि सुतणिसित गहाइय सवित्थर भण्णति- ४७ से कि त सुयणिस्सिय मतिणाण' सुयणिस्सिय मतिणाण चउन्विह पणतं, त जहा-उग्गहे १ ईहा २ अवाए ३ धारणा है। ४७ इह सामण्णस्स स्वादिअत्यस्स य विसेसनिरवेक्खस्स अणिदेसस अवग्रहणमवग्रह । तस्सेवऽत्यस्स 20 विचारणविसेसण्णेसणमीहा । तस्स विसेसणविसिहस्सऽत्यस व्यवसातोऽवाय , तन्विसेसावर्गतमित्यर्थ । तब्धि सेसावगतऽस्थस्स धरण-अविद्युती धारणा इत्यथ ॥ तत्थ- ४८ से किं त उग्गहे ? उग्गहे दुविहे पण्णते, त जहा-अत्योग्गहे य वजणोग्गहे या ४८ ओग्गहो दुविहो—अत्योमगहो वनणओमाहो य॥ एत्य वजणोम्गहस्स पच्छाणुपुचितो 'अत्यो महातो वा पुच्च वजणओग्गहो मवइ' ति वजणोग्गहमेव पुष्व भणामि- १"धिवकपरि स स डे लशु ॥२ णिस्सेस शु मो मु ॥ ३ खबगे मो ॥ ४ णामबुद्धीप छ मु ॥ ५ स्वादिअसेसविसेसनिर आ दा । श्रीमलयगिरिपादस्तु माघश्यावृत्तौ मन्दिवृत्तौ चाय चूर्णिपाठ एवरूप उद्धृतोऽस्विर बदाह चूर्णित- सामभस्स रूनादिविसेसणरहियस्स अनिदेस्सरस अवग्गणमवरगाह इति। [आव टीका पत्र २१-१ नन्दियति ६ णविसेसे हणमीहा था दा॥ ७ स भवसातो मा दा ॥ सम्धिसेवावगमस्स घरण मा• दा ॥ पत्र १६८-1]n ८ गम इत्पर्य ३५ ३ सुयणिस्सियं मइणाणं वंजणोग्गहाई य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । ४९. से किं तं वंजणोग्गहे ? वंजणोग्गहे चउन्विहे पण्णते, तं जहा-सोतिदियवंज- जोगहे १ घाणेंदियवंजणोग्गहे २ जिभिदियवंजणोग्गहे ३ फासेंदियवंजणोग्गहे ४ । से तं वंजणोग्गहे। ४९. बंजणाणं अवग्गहो बंजणावग्गहो, एत्थ वंजणग्गहणेण सहाइपरिणता दव्या घेत्तव्वा । वंजणे अवगहो बंजणावग्गहो, एत्य बंजणगहणेण दबिंदियं घेत्तच्वं । एतेसिं दोण्ह वि समासाणं इमो अत्थो-जेण करणभूतेण 5 अत्यो बंजिज्जइ तं बंजणं, जहा पदीवेण घडो। एवं सदादिपरिणतेहिं दव्वेहिं उवकरणिदियपत्तेहिं चित्तेहिं संबद्धेहि संपसत्तेहिं जम्हा अत्थो वजिज्जइ ति तम्हा ते दया वंजणावगहो भण्णति। एस वंजणावगहो सुत्तसिद्धो चतुन्विहो। ५०. [१] से किं तं अत्थोग्गहे ? अत्थोग्गहे छब्बिहे पण्णते, तं जहा-सोईदिय- अत्थोग्गहे १ चखिदियअत्थोग्गहे २ घाणिदियअत्थोग्गहे ३ जिभिदियअत्थोग्गहे ४ फासिदियअत्थोग्गहे ५ णोइंदियअत्थोग्गहे ६। [२] तस्स णं इमे एगहिया णाणा- 10 घोसा गाणावंजणा पंच णामधेया भवंति, तं जहा-ओगिण्हणया १ उँवधारणया २ सवणता ३ अवलंबणता ४ मेहा ५) से तं उग्गहे। ५०. [१] से किं तं अत्थोग्गहेत्यादि सूत्रम् । अत्थस्स ओग्गहों अत्थोग्गहो । सो य वंजणावगहातो चरिमसमयाणंतर एकसमयं अविसिटिदियविसयं गेण्हतो अत्थावगहो भवति । चक्खिदियस्स मणसो य वंजणाभावे पढमं चेव जं अविसिद्धमत्थग्गहणं कालयो एगसमयं सो अत्थोग्गहो भाणितव्यो । सव्वो वेस विभागेण छविहो 15 देसिज्जति, ण पुण तस्सोग्गहस्स काले सद्दादिविसेसबुद्धी अत्यि । गोइंदियो त्ति-मणो । सो य दध्वमणो भावमणो य। तत्थ मणपज्जत्तिणामकम्मुदयातो जोग्गे मणोदब्बे घेत्तुं मणजोग(ग)परिणामिता दव्या दव्यमणो भण्णति । जीवो पुण मणणपरिणामक्रियावण्णो भावमणो । एस उभयरूको मणदवालंबणो जीवस्स नाणवावारो भावमणो भण्णति । तस्स जो उवकरणिदियदुवारनिरवेक्खो घडाइअत्थसरूवचिंतणपरो बोधो उप्पज्जति सो णोइंदिय- स्थावगहो भवति । [२] घोस त्ति-उदत्तादिया सरविसेसा [जे० २०१ प्र० ] घोसा भणति । वंजणं ति-अभिलावक्खरा । ते इमे एगढ़िया पंच-ओगिण्हणता इत्यादि। एते ओग्गहसामण्णतो पंच वि णियमा एगठिता। उम्गह- विभागे पुण कज्जमाणे उग्गहविभागंसेण भिण्णत्था भवंति । सो य उग्गहो तिविहो-वजणोग्गहो सामण्णत्थावगहो विसेससामण्णत्थावग्गहो य। एगट्ठियाण इमो भिण्णत्थो-वंजणोग्गहस्स पढमसमयपविठ्ठपोग्गलाण गहणता ओगिण्डणता भण्णति, 'उ-प्पावल्ले' त्ति कातुं १ । वितियादिसमयादिसु जाब वंजणोग्गहो ताव उवधारणता 25 भण्णति २। एगसामइगसामण्णत्थावग्गहकाले सवणता भण्णति ३। विसेसलामण्णत्थावग्गहकाले अवलंबणता १ चस्बुदि ख० स० ॥ २ घेजा मो० मु० ॥ ३ ओगेण्ह मो० मु० ॥ ४ अवर्धा जे० ॥ ५ अवि सञ्चिदिय आ० । अविसिहसम्बिदिय दा० ॥ ६ बुद्धिमत्थ जे० ॥ ७ विसेसावरगहो सामण्ण आ० दा० । हारि० वृत्ती "निविधवावग्रह - सामान्यावग्रह विशेषावग्रहः विशेपसामान्यार्थावग्रहश्च" इति आ० दा० प्रतिगतचूर्णिपाठमेदानुसारि भेटनामत्रय दृश्यते । कि जेसलमेरुदुर्गपप्राचीनतमे ताडपत्रीयाद” विसेसावग्गहो इति त्यानं वंजणोग्गहो इति पाठो वर्तते । मलयगिरिपाईरपि नन्दिवृत्ती व्यवनावग्रह दति जे. प्रत्यनुमारि नाम निष्टविनमस्ति । तयाहि-" इहावग्रहन्निधा, तद्यथा-व्यञ्जनावग्रह सामान्याविग्रह विशेषलगन्यायापहश।" पत्र १७४-२ ॥ ८ भण्णति, आपल्ले आ० दा० ॥ 20 - ।
त ३६ जिणदासगणिमहत्चरविरड्याए चुण्गीए सजुय [सु०५१-५५ भण्णति ४ । उत्तरुत्तरविसेससामण्णत्यावगहेसु जाव मेरया धावइ वाव मेघा मण्णइ ५। जत्य वनणावग्गहो नत्यि तत्य सवणादिया तिणि एगद्विता भवति । आह-णणु मिणत्यदसणे एगठित त्ति विरुद्ध ? उच्यते, ण विरुद्ध, जतो सम्पविकप्पे उग्गहस्सेव सरुव दसिजति ॥ इदाणि उग्गहसमणवर ईहा- ५१ [ से कि त ईहा ईहा छब्बिहा पण्णता, त जहा-सोतेंदियईहा १ चक्ति ४ दियईहा २ घाणेंदियईहा ३ जिभिदियईहा ४ फासेंदियईहा ५ णोइदियईहा ६। [२] तीसे ण इमे एगडिया णाणाघोसा गाणावजणा पच णामयाँ भवति, त जहा- आभोगणया १ मग्गणया २ गवेसणया ३ चिंता ४ वीमसा ५1 से त ईहा । ५१ [१] सा छबिहा मुत्तसिद्धा। २] इमे तस्सेगट्ठिया, ते वि ईहासामन्यतो एगड़िता चेव, अत्यविकप्पणातो पुण मिष्णात्या । इमेण 10 विधिणा-आमोयणता इत्यादि । ओम्गहसमयाणतर सम्भूतविसेसत्याभिमुहमालोयण आभोगणता भण्णति ११ बरसेव विसेसत्यस्स अण्णय वइरेगधम्मसमालोयण मम्गणा भणति २ । तस्सेवऽत्यस वारेगधम्म परिचाओ अण्णयधम्मसमालोगण च गवेसणता भण्णति ३। तस्सेव तद्धम्माणुगतत्यस्स पुणो पुणो समालोयणतेण चिंता मण्णति ४ । तमेवत्य णिचाऽणिचादिएहिं दन मावेहिं विमरिसतो वीमसा मण्यति ५। एव बहुषा अत्यमालोयतस्स उक्कोसतो अतमुहुत्तकाल सव्वा ईहा भवति ॥ ईहाणवर अवादो- ५२ [१] से किं त अवाए ' अवाए छबिहे पण्णते, त जहा-सोइदियावाए ? चखिदियावाए २ घाणेंदियांवाए ३ जिभिदियावाए ४ फासेंदियाँवाए ५ णोइदियावाए। [२] तस्स ण इमे एगहिया गाणाघोसा णाणावजणा पच णामधेयौं भवति त जहा- आउट्टणया १ पचाउट्टणया २ अवाए ३ बुद्धी ४ विणाणे ५। से त अवाए । ५२ [१] सो छविहो मुत्तसिद्धो। [२] तस्सेगडिता इमे पच, ते य अवायसामण्णचणतो णियमा एगद्विता चेव, अभिधाणमिष्णतणतो पुण भिण्णत्या । [जे० २०१ द्वि.] इमेण विपिणा-आउहणता इत्यादि । ईहणभावनियत्तस्स अत्यसरूवपडिबोध घुद्धस्स य परिच्छेदमुप्पादतस्स आउहणता भण्णति १ । ईहणभावनियस्स वि तमत्यमालोयतस्स पुणो पुणो णियहण पञ्चाउद्दण मणति २ । सव्वहा ईहार अत्रणयण कातु अवधारणावधारितत्थस्स अधारयतो अबातो त्ति मण्णइ ३ । पुणो पुणो तमत्थावधारणावधारित बुझतो बुद्धी भवइ ४ । तम्मि चेवावधारितमत्थे विसेसे पेक्खतो 25 अवधारयतो य विण्णाणे ति मण्यति ५॥ अवायाणतर धारणा- १ स्थताओ पग आ• ॥२ विधिक से ॥ ३ चक्युदि स ॥ ४ धेजा मो मु ॥ ५ पहिं ददमावेहि जे । विमर्षण विमर्ष क्षयोपशमविशेषादेवोर्थ सतरावबोधत' सदभूतार्थविशेषाभिमुखमेष व्यतिरेकधर्मपरित्यागतोऽन्वयधर्मालोचन विमर्ष, इति हारि वृत्तौ। तत ऊध क्षयोपशमविशेषात् सटवर सद्भतार्थविशेषाभिमुखमेव व्यतिरेकधमपरित्यागतोऽन्वमधर्मापरित्यागतोऽन्वयधमनिमशन विमश' इति मलयगिरिवृत्तौ ॥ ६ यमवाए है ॥ ७ चालुदिय स. ॥ ८-९-१०-११-१२ यमवाए है ॥ १३ घिजा मो• मु ॥ १४ भाषणया पथापट्टणया ख शु हारि मख्य. पत्योच । माउंटणया पचाउटपया स स ॥ १५विण्णाण ख से ॥ 15 20 नित्या निलादिदव्य-भावालोचनमित्यन्ये ।
३७ ३ 5 ईहावायधारणाओ पडिवोहगतिद्वंतो य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । ५३. [१] से किं तं धारणा ? धारणा छब्विहा पण्णत्ता, तं जहा-सोइंदियधारणा ? चखिदियधारणा २ घाणिदियधारणा ३ जिभिदियधारणा ४ फासदियधारणा ५ णोइंदिय- धारणा ६॥ [२] तीसे णं इमे एगट्ठिया णाणाघोसा णाणावंजणा पंच णामधेया भवंति, तं जहा-धरणा १ धारणा २ ठवणा ३ पतिद्वा ४ कोटे ५। से तं धारणा । ५३. [१] सा य छबिहा सुत्तसिद्धा । [२] तस्सेगडिता पंच । ते य सामण्णधारणं पडुच्च णियमा एगठिया, धारणत्थविकप्पणताए भिण्णत्था । इमेण विधिणा-धरणा इत्यादि । अआयाणंतरं तमत्थं अविचुतीए जहण्णुकोसेणं अंतमुहुत्वं धरेतस्स धरणा भण्णति १ । तमेव अत्थं अणुवयोगत्तणतो विच्चुतं जहण्णेणं अंतमुहुत्तातो परतो दिवसादिकालविभागेसु संभरतो य धारणा भण्णति २ । 'ठवण' ति ठावणा, सा य अबायावधारियमत्थं पुन्यावरमालोइयं हियतम्मि ठाक्यंतस्स ठवणा भण्णति, पूर्णघटस्थापनावत् ३ । 'पति' त्ति सो चित अधारितत्थो हितयम्मि प्रभेदेन पइहातमाणो 10 पतिद्वा भण्णति, जले उपलप्रक्षेपप्रतिष्ठावत् ४ । 'कोटे' त्ति जहा कोट्ठगे सालिमादिबीया पक्खित्ता अविणट्ठा धारिजति तहा अवातावधारितमत्थं गुरूवदिलु मुत्तमत्थं वा अविणहं धारयतो धारणा कोटगसम ति कातुं कोहे त्ति वत्तव्या ५॥ ५४. ईंचेतस्स अट्ठावीसतिविहस्स आभिणियोहियणाणस्स वंजणोग्गहस्स परूवणं करि- स्सामि पडिबोहगदिद्वंतेण मल्लगदिद्वंतेण य । ५४. इचेतस्सेत्यादि सुत्तं । 'इति' उपप्रदर्शने । एतस्स ' त्ति जं अतिको अट्ठावीसतिभेदं । ते य के अट्ठादीसं भेदा ? उच्यते-चउनिहो बंजणावग्गहो, छविहो अत्थावग्गो, छबिहा ईहा, छबिहो अवायो, छविधा धारणा, एते सव्वे अट्ठावीसं । एत्थ अट्ठावीसइविहस्स मझातो जो वंजणावग्णहो चउबिहो तस्स दिटुंतदुगेण परूवणा॥ ५५. से किं तं पडिबोहगदिद्वंतेणं ? पडिबोहगदिढतेणं से जहाणामए केई पुरिसे कंचि पुरिसं सुत्तं पडिबोहेज्जा 'अमुगा! अमुग!' त्ति, तत्थ य चोयगे पन्नवर्ग एवं वयासी- किं एगसमयपविठ्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति? दुसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति?जाव दससमयपविठ्ठा पोग्गला गहणमागच्छति? संखेज्जसमयपविठ्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति ? असंखेज्जलमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति ? । एवं वदंतं चोयगं पण्णवगे एवं वंया- सी-णो एगसमयपविठ्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति, णो दुसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमा- 25 १ घिजा मो० मु० ॥ २ त्रिपञ्चाशत्तमसूत्रानन्तर श्रीहरिभद्र-श्रीमलयगिरिभ्या व्याख्यात सर्वेष्वपि सूत्रादर्शेषु एक सूत्र- मधिक वर्तते । तचत्रम् - उग्गहे एकसामइए, अंतोमुहुत्तिया ईहा, अंतोमुहुत्तिए अवाए, धारणा संखेनं वा कालं असंखेज वा कालं । ण्व यहा स० डे. मो० शु० । उग्गहे एकं समय, ईहा-ऽवाया मुहुत्तमद्धं ति, धारणा संखेज्ज वा कालं असंखेज वा कालं । एवं अट्ठा ल० । उग्गह एकं समयं, ईहा-वाया मुहुत्तमेत्त तु | कालमसंखं संखं च धारणा होति णायया ॥ १॥ एवं अट्ठा ख० ॥ ३ एवं अट्ठा मासु सूत्रप्रतिषु वृत्त्योश्च ॥ ४ पयस्स अ आ. मा० ॥ ५ से ण जहा मो० ॥ ६ केयि शु० ॥ ७ एवं इति ख० स० नास्ति ॥ ८ चोदगं सं० ॥ ९ वदासी ख० ॥ 15 20 - ३८ निणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए सजुय [सु० ५६ गच्छति, जाव णो दससमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छति, णो सखेज्जसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छति, असखेज्जसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छति । से त पडि- बोहगदिद्वतेण। १५ से जहाणामयेत्यादि । 'से' ति पडियोषकस्स णिसे । 'जहाणामये ति जहाणा [जे० । २०२ प्र०]म, समत्रत आत्मामिमायकृतादित्यर्थः । सव्यण्णुप्पणीयमत्य तदणुसारि सुत्त वा अप्पयुद्धिविण्णाण- तणयो अणवगच्छमाणो सीसो पुच्छाचोदणातो चोदको, अहवा तमेव मुत्तमत्य मा 'अघडमाण' ति मष्णमायो तदोसचोदयो य चोदगो भण्णति । पदयणमविरुद्ध निदोस मुचत्य पण्णवेतो पण्णवगो, विरुद्ध-पुणरुतमुत्त वा अस्थतो अविरुद्ध दरिसेतो पण्णवेति जो सो वा पण्णवगो भण्णति, यथावत् सशयच्छेदीत्यर्थ । चोदको ससय- मावण्णो पण्णवग पुच्छति--'मि एगसमयादिपविद्या' इत्यादि कठ । एव चोदक पुच्छामिप्पायण बदत पण- 10 वगाह-'यो एगसमयपविद्या' इत्यादि । जो एस पडिसेहो कतो एस सगाइफुडरिण्माणजणगत्तेण ति णो गहणमागच्छति, इहरा पोग्गला गहणमागच्छत्येवेत्यर्थ । एव एगादिसमयपविद्वपोगालपडिसिद्धेसु इमा अणुष्णा- 'असंखेजसमयपविद्या पोग्गला गहणमागच्छति' ति । इमस्स अणणुयोगत्यो अणुयोगत्यो य । तत्य अणणु- योगी इमो-जहा पयासी सागिहमेंतो अद्धाण पचाइण दसाहेण का वीतीचतिता सगिह पनिटो ति, एव असखे- जेहि समयेहि आगवा पविद्वा कण्णविलेस पोग्गला गेण्हति ति, एव अणणुयोगो भवति । इमो अणुयोगत्यो- 15 पदमसमयादारम पतिसमय पविसमाणेमु असखेजइमे समए जे पविद्या ते गहणमागच्छति, ते य सदादिवि- णाणजणग ति कातु, अतो तेसि गहणमुत्रदिह । सो य असखेज्जइसमयो किंपमाणे असखेजए भवति ? उच्यते-नहाणेण आवलियाए असखेजइभागमेतेनु समयेमु गतेी ति, उक्कोसेण [जे० २०२ दि.] सखेजामु आवलिया आणापाणुकालपुहचे वा, उमयघा वि अविरुद्धं ॥ गतो पडियोधकदिद्रुतो । इदाणि औवागदिद्रुतो- ५६ [१] से कि त मलगदिद्वतेण मलगदिद्वतण से जहाणामए केई पुरिसे आवाग- 0 सीसाओ मल्लग गहाय तत्थेग उदगबिंदु पक्खिवेज्जा से णडे, अण्णे परिखते से वि गढे, एव पक्खिप्पमाणेसु पक्खिप्पमाणेसु होही से उदगबिंदू जे ण त मल्लग शवेहिति, होही से उदगविंदू जे ण तसि मल्लगसि गहिति, होही" से उदगबिंदू जे" ण त मल्लग भैरे- हिति, होही से उदगविंदू 0" ण त मल्लग पवाहेहिति, एवामेवं पक्खिप्पमाणेहिं पक्खि- प्पमाणेहि अणतेहिं पोग्गलेहिं जाहे त वजण पूरित होति ताहे हु" ति करेति गो" चेव १ गहरथमा जे ॥ २ आवागदिद्वतो इति मल्लकदृष्यन्तस्य नामान्तरम् ॥ ३ ण जहा को दिहतो' से जहाँ सं ॥ ४ केयि शु ॥ ५ अण्णे विप से विना ॥ ६ माणे पक्खिप्पमाणे होही दे ॥ ७-९-२१ दोहिति शु। होहिह . हे ॥ ८ रावेहि सं० शु । रवेशिजे ॥ १० मल्लगे . स ॥ १३-१४ जो जस (अण्ण हारिवृत्तौ ॥ १३ मरेहिति इत्यनन्तरं विशेषावश्यकमहामाप्यमलधारीयटीकाया १४८ पर नन्दीपाठोपरणे होही से उदगर्षि जे ण तसि मगसि न हाहिहिति इत्यधिक न पाहिहिति सत्रमुपलभ्यते नोपलभ्यते हर स्त्र सांस्वपि सूनप्रतिषु ॥ १५ पवमेव स । एमेव शु ॥ १६ मेव पक्खिप्पमाणेहि मणतेहिं पोग्ग विआमवृत्तौ १ नन्दीमत्रपाठोदरणे । मेव पक्विपमाणेहि पोग्ग से । मेव पक्खिष्पमाणेहि पविखप्पमाणेहि पोग्ग सं ॥ १७ हो ति स ॥१८ण उणमा • ॥
10 मल्लगदिद्वतो] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । ३९ णं जाणति के वेसं सद्दाइ ?, तओ ईहं पविसति तओ जाणइ असुगे एस सदाइ ?, तओ अवायं पविसइ तओ से उवगयं हवइ, तओ णं धारणं पविसइ तओ णं धारेइ संखेज वा कालं असंखेज्जं वा कालं। [२] से जहाणामए केई पुरिसे अव्वत्तं सदं सुणेज्जा तेणं सहे त्ति उग्गहिए, णो चेवणं जाणइ के वेस सद्दे ति, तओ ईहे अणुपविसइ ततो जाणति अमुगे एस सहे, ततो 5 णं अवायं विसइ ततो से उवगयं हवति, ततो धारणं पैविसइ तओ णं धारेड संखेज्ज वा कालं असंखेज्ज वा कालं। एवं अव्वत्तं रूवं, अव्वत्तं गंध, अव्वत्तं रस, अब्वत्तं फास पडिसंवेदेज्जा। [३] से जहाणामए केई पुरिसे अव्वत्तं सुमिणं पंडिसंवेदेज्जा, तेणं सुमिणे त्ति उग्गहिएँ ण पुण जाणति के वेस सुमिणे ति, तओ ईहं पविसइ तओ जाणति अमुगे एस सुमिणे ति, ततो अवायं विसइ ततो से उवगयं हवइ, ततो धारणं विसइ तओ णं धारेइ संखेज्ज वा कालं असंखेज वा कालं । से तं मल्लगदिद्वैतेणं । १ के वि एस मो० मु० ॥ २ सद्दे त्ति ख० । सद्द त्ति स० ॥ ३ तओ उवयाणं गच्छति, तओ से उवग्गहो हवइ ख० ॥ ४ गच्छति खं० स० शु० ल. ॥ ५ संखेजकालं असंखेजकालं ल. ॥ ६ केयि शु० ॥ ७ सुणेइ तेणं हे० ल० ॥ ८ सद्द त्ति ख० शु० । सहो त्ति जे० डे० ल० मो० ॥ ९ सहाइ, तओ ई पविसइ सर्वासु सूत्रप्रतिषु हारि० मलय० वृत्त्योश्च ॥ १० गच्छति ख० स० शु० ल० ॥ ११ पडिवज्जेति संखेज ख० स० ॥ १२ → एतचिह्नमध्यवर्तिसूत्रस्याने जे० मो० मु० प्रतिषु रूप-गन्ध-रस-सर्शविषयाणि चत्वारि सूत्राण्युपलभ्यन्ते । तानि चेमानि- से जहानामए केई पुरिसे अवत्तं रूवं पासिजा, तेणं भवेत्ति उग्गहिए, नो चेव णं जाणइ के वेस रूवे त्ति, तओ ईह पविसइ तओ जाणइ अमुगे एस रूवे ति, तओ अवायं पविसइ तओ से उवगयं हवइ, तओ धारणं पविसइ तओ गं धारेइ संखिज्जं वा काल असंखिज्ज वा कालं । से जहानामए केई पुरिसे अव्वत्त गं, अग्धाइजा, तेणं गंधे ति उग्गहिए, नो चेव णं जाणइ के वेस गंधे त्ति. तओ ईहं पविसइ तओ जाणइ अमुगे एस गंधे, तो अवायं पविसइ तओ से उवगयं हवइ, तओ धारणं पविसइ तओणं धारेइ संखिज्ज वा कालं असंखिज्ज वा कालं । से जहानामए केई पुरिसे अब्वत्तं रसं आसाइजा, तेणं रसे ति उग्गहिए, नो चेव णं जाणइ के वेस रसे त्ति. तो ईहं पविसइ तओ जाणइ असुगे एस रसे, तओ अवायं पविसइ तओ से उचगयं हवइ, तओ धारणं पविसह तभो णं धारेइ संखिज्जं वा काल असंखिज्ज वा काल । से जहानामण केई पुरिसे अवत्तं फासं पडिसंवेइजा, तेणं फासे ति उग्गहिए, नो चेव णं जाणइ के वेस फाले ति, तओ ईई पविसह तओ जाणइ अमुगे एस फाले, तओ अवायं पविसइ तओ से उवगयं हवइ, तओ धारण पविसेइ तथोणं धारे संखिज्ज वा कालं असंखिज्ज वा कालं ॥ १३ फेयि शु० ॥ १४ पासिन्ना मो० ल० शु० ॥ १५ सुमिणो त्ति डे० ल० । सुविणो ति मलयगिरिटीकायाम् ॥ १६ ५ नो चेय गंजा मो० नु० ॥ १७ के वि सु डे० ल० ॥ १८ गच्छति ख० स० शु० ल० ॥ १९ पडिवजति . " ४० जिणदासगणिमहत्तरविरड्याए चुण्णीए संजय [सु० ५६ ६६ [१] तत्य आवागसीसग ति[]पागठाणमेव, अहवा आपागहाणस्स आसष्ण समता परिपेरत, अहवा आपागमुत्तारियाण जठाण तापागसीसय मण्णति। 'अगतेहि ति प्रयमसमयादारभ्य प्रतिसमय अणता प्रविशती- त्यतो अणता । 'जाहे त वनण पूरित भवति' चि, एत्य वजणगाहणेण सदाइपुग्गलदचा दनिदिय वा उभयसक्यो वा घेतच, तिथा विण विरोधो। वजण पूरिय ति कह ? उच्यते-जदा पुग्गलदव्या वजण तदा पूरिय ति पभूता ते 5 पोग्गलदव्या जाता, स्त्र प्रमागमागता सविसयपडिवोधसमत्या जाता इत्यर्थ १। जदा पुंण दबिदिय वमण तदा पूरिय ति कह ? उच्यते-जाहे तेहिं पोग्गलेहिं त दविदिय आकृत भरित वावित तदा पूरिय ति भणति २। जदा तु उभयसवधो वजण तया पूरिय ति कह ? उच्यते-दनिदियस्स पुग्गला अगीमाषमागता, पुग्गला य दबिदिए अनुपक्ता , एस उभयभावो, एतम्मि उभयभावे पुग्गलेहि इदिय पूरित, इदिएण वि सविसयपडिवोपकप्पमाणा पुम्गला गहिवा, एव उभयसामत्यतो विष्णाणभावो भवतीत्यर्थ ३। 'हु ति करेई ति वनणे पूरिते त अत्य गेण्डर 10 चि धुत्त भवति । एस एकसमयिओ अत्यावरगहो। त पुग किपंगार गेहति ? उच्यते-'नो चेव ण जाणति के वि एससदादी' तकाछे सामष्णमणिदेस, सदादिविसेस ण जाणइति वृत्त भवति। किंच-सरूव-गाम जोति-गुण किरिया विकप्पविमुह अनाख्येय गणातीत्यर्थ । एत्य पडिवोधकालावो [जे० २०३ प्र० ] पुन्व वनणोम्गहो से भवति । एसा एव वजणोन्गहस्स परूषणा कता । वनणोम्गहस्स परतो 'हुति करेति' ति एतम्मि पडिवोधकाले एग- समइयो अत्यावगहो से भवति, ततो से कमेण ईहा वाय धारणाओ ति। एत्य पडिवोहमालगदिद्वतेहि वजणो- 15 गहस्स अत्योगहस्स य मिष्णकालता फूड दसिता । पर आइ-साधु मे पडिवोध-मल्लगदिट्टतेहि धजण त्यावमा- हाण मेदो दसितो, जागरओ पुण सहाइवत्थे पडुप्पण्णे ण वयोमाहो लक्खिज्जति, जवो पुन्नामेव सद्दाइअत्य- विष्णाणमुप्पजते, भणित व मुत्ते से जहाणामये केपि पुरिसे'त्यादि । अहवा इमस्स मुत्तस्स इमो सवयो-पर आह-यदुक्त भवता सरूव-णाम-नोति गुण क्रियाविकल्पविमुख अनाख्येय गृहणातीत्येतद् विरुष्यते, कुत ? यत सूत्रेऽभिहित से जहाणामतेत्यादि । अहवा इमो सवधो प्रमुप्तमतिबोधक-मल्लगदिहतेहिं वनण इत्यावगहाण मेदो 20 दसितो, इह पुण मुत्ते मल्लगदिद्वतेणेव वजण त्यावम्गहाण भेदो दसिज्जति- २] 'से जहाणामते 'त्यादि । मुत्तुचारणसवणाणतरमेव पर आह-एत्यमुत्ते वजण ऽत्यावग्गहेहा ण लक्सि- जति,जतो 'अन्चत्त सह मुणेई' ति भणित, सहमेचेऽवधारित पढमतो अवाय एव लक्खिजति ति। आयरिय आह-ग तुम मचामिप्पाय जाणसि, पाणु अव्वत्तसहसवणातीअत्यावगहगहण कत, जतो अवचमणिहेस सामण विकप्परहिय ति भण्णति, तस्स य पुच्च वजणावगहेण भवितब्ध, जैतो एतग्गारिणो सोतादिइदियरस अत्योम्गहो वनणोग्गहमतरेण 25 ण भवति चि नियमेसो, सो य कालमुहुमत्तणतो उप्पलसतपत्तछेजदिद्वततो ण लक्खिज्जति । चोदक आह-जति एव तो न मुत्ते भणित "तेण सद्देति ओम्गहिसे" त कह १ उच्यते-इइत "तेण सद्देति ओग्गहिते" ति वक्खा- सूत्रकारोऽभिधत्ते इति करणनिदेसातो सव्वविसेसविमुहं शब्दमात्रमुक्तं [जे० २०३ द्वि०] मवति, णो चेव ग जाणति के वेस सद्दे १ चि, ण तु शब्दोऽयमित्येव बुध्यते, कम्हा' उच्यते-एकसमयत्तातो अत्यावम्गहस्स, किंच पण्णवेतो य पण्णगो सववहाराभिमायतो " तेण सद्दे ति ओम्गहिते " चि ब्रूते, ण दोसो। जति वा “सदोऽय" 30 मिति बुद्धी मवे तो अवातो चेव भवे, तच्च न, कह ? उच्यते-गो जतो अस्थावग्गहसमयमेत्ते काले "स" इति १ पुण उवगरणिदियं मलय नदिधृत्तौ चूर्णिपाठोद्धरणे ॥ २ आफुण्ण मरित आ० । "आभूत" इति हारि० वृक्षौ । ३ मभिपता इत्यर्य, तदा पूरिय ति भण्णा इति मलय नन्दियती चूर्णिपाठोद्धरणे ॥ ४ पतार बा ॥ ५ भाति किरियां जे ॥६जतो पचग्गाहिणो जे दा ॥
- मल्लगदिद्रुतो] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । ४१ विसेसणाणमत्थि, अह तम्मि वि समए सद्दोऽयमिति बुद्धी हवेज्ज तो फुडं अबाय एव भवेज, णो य तकाले अवातो इच्छिज्जति, जतो अत्यपरिच्छेदो असंखेज्जसमयकालिओ भवइ त्ति । अण्णे पुण आयरिया एतं मुत्तं - विसेसत्थाव- गहे भणति-'अव्वत्तं सई सुणेज' त्ति एस विसेसत्थावग्गहो, 'तेण सद्दे ति उग्गहिते ति, एतं सुत्तखंड सामण्ण- सइत्थावग्गहदंसर्ग, कहं ? उच्यते-जतो भण्णति “णो चेव णं जाणति के वि एस सद्दे "त्ति संख-संग-गालि-करय- लादिको त्ति, एसो वि अविरुद्धो मुत्तत्थो । 'ततो' अत्थावग्गहसमयागंतरं पढमसमयादिसु 'ईहं अणुपविसति' 5 'इह ति केइ संसयं मण्यंते, तं ण भवति, संसयस्स अण्णाणभावत्तणतो, मतिणाणंसो य ईह त्ति । आह-को पुण संसयेहाण विसेसो ? उच्यते-इह ज थाणु-पुरिसादिअत्थेसुं पेहितं चित्तं तदत्थपडिवोहत्तेण पडिहतं सुत्त इव चेतो संसयो भण्णति, तं च अण्णाणं, जे पुण हेतूववत्ति-साधणेहिं सब्भूतमत्थस्स विसेसधम्माभिमुहालोयणं तस्सेवऽत्थ- स्स अधम्मविमुह असम्मोहमविफलमत्यपरिच्छेदकं चिचं जंत ईहा भण्णति । अणु त्ति-अवमाहातो पच्छाभावे असं- खेजसमइयं परिमाणतो ईहोवयोग अविच्छेयत्तणतो अंतमुहुत्तकालं ईहति, ततो विसिद्रुमतिनाणखयोवसमभाव- 10 तणतो अंतमुहृत्तकालभंतर एव जाणति 'अमुते एस सद्दे' संख-संगादिए ति। दुरववोधत्तणतो पुण अस्थस्स अवि- सिट्ठमइण्णाणखयोवसमतणतो बा ईहोपयोगअंतमुहुत्तचुतो अणवगतत्थो पुणो वि अण्णं अंतमुहुत्वं ईहति, [जे० २०४ प्र०] [एवं] ईहोवयोगाविच्छेदसंताणतो वहुए वि अंतमुहुत्ते ईहेज्जा, ण दोसो । ततो ईहाणंतरं अवातो । सो य सहाइअत्थपडप्पण्णस्स जे परधम्मा तेसु विमुहस्स सधम्मे य अवधारयतो 'ण एस संगसहो, गिद्ध-मधुर- गंभीरतणतो संखसदोऽयमित्येवमवगतत्थो [जहण्यातो] असंखेज्जसमयितो उकोसतो णियमा एर्गतमुहुत्तिओ जो 15 अवबोधो अत्यपरिच्छेदो सो अवातो भवति । ततो अवायाणंतरं धारणं पविसइ ति । सा य धारणा जहणतो असंखेजसमते अविच्चुतीए तमत्थं धरेति, उक्कोसतो अंतमुहुत्तं, अणुवयोगतो पुण तमत्थं विस्मृतं पुणो वि संभरइ त्ति धारणा । एवं सा संखेजवासाउयाणं मुहुत्त-दिवसादिकालसंखाए संखेनं कालं भवेज्ज, असंखेज्जवासाउयाणं पुण असंखेनं कालं। एवं चक्विंदिए वि रूवं भाणितव्वं, वंजणोग्गहवज्जं । घाण-रस-फासिदिएम वि जहा सोइंदिते तहा सव्वं 20 भाणितव्यं । 'संवेदेज' ति एते सदादिइंदियत्थे पडुप्पण्णे इंदियं स्वं स्त्र इंदियत्थं आयखयोवसममणुरूवं सुभम- मुभं वा वेदेज त्ति । अहवा फरिसिंदयवज्जं सेसिदिएहिं पत्तमिदियत्थं प्रायसो इट्टमणिढं वा स्वं आत्मानुगतं वेदनं वेदते, न शरीरेण अनुपलक्ष वा वेदयतीत्यर्थः । फासिंदियमत्थं पुण स्वं अनुगतं शरीरानुगतं च दुहा वि फुडं वेदइ त्ति संवेदेज त्ति अतो भणितं । एवं मणसो वि मुविणे सद्दादिविसएमु अवग्गहादयो णेया, अण्णत्य वा इंदियवावारअभावे मणेमाणस्स त्ति । इह मुत्तेण निदरिसणं मणे- [३] से जहाणामतेत्यादि सुत्तं । कंठं । मुविणो मे दिवो त्ति मुविणदिढं अव्वत्तं सुमरइ । तच्च प्रतिवो- धप्रथमसमये मुविणमिति संभरतो अत्यावग्गहो, तस्य प्रथमावस्थायां व्यञ्जनावग्रहः, परतो ईहादि । सेसं पूर्ववत् । जन्गतो अणिदियस्थवावारे वि मणसो जुज्जते बंजणावग्गहो, उवयोगस्स असंखेजसमयत्तणयो, [जे० २०४ द्वि०] उपयोगराए य प्रतिसमयमणोदव्बन्गहणतो, मणोदव्वाणं च वंजणववदेसतो समए य असंखेज्जतिमे मनसो नियमा- 30 १ → एतस्मिान्तर्वती पाठ ३० नास्ति ॥ २ ‘पणस्सऽस्था आ० दा० ॥ ३ गादिकर आ० दा० ॥ ४ 'सु पवि चित्तं आ० ॥ ५ वेदेज ति। पते सहाई चक्खुइदियवज्जं सेसिदिहिं आ० दा० ॥ ६ नुपलंमं वा आ० दा० ॥ ७ तस्य पूर्वमवस्था जे. दा० ॥ 25 ३ - 5 १२ जिगदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजय [सु०५७-५८ गा० ७०-७५ थग्रहण भवेत् । तस्य च मयमसमयार्थमतिबोधकालेऽर्याचग्रह , तस्य पूर्वमसख्येपसमयेषु व्यञ्जनावग्रह । शेषमी हादि पूर्ववत् । सीसो पुच्छति-उमगहादीण उ कमातिकमे एगवरअमावे चा कि सदादिवत्युपरिच्छेदो ण भवति । आचार्याह-आम, ग भवति, अत एव च क्रमे नियम , जम्हा गो अगहित ईहति वम्हा पुच उग्गहो, जम्हा य अणीहित णो अवगच्छति ईहाणतर तम्हा अवायो, जम्हा य अणावात ण धारिजति वत्यु अवायाणतर तम्हा 5 धारणा । जम्हा य एस क्रमनियमो तम्हा सन्नो आभिणिवोधियनाणावगमो नियमा एव भवति, अत एव च कारणा सन्चे अवगहादयो मतिनाणभेदा भवतीत्यर्थ ॥ ५७ त समासओ चउन्विह पण्णत्त, त जहा-देव्वओ खेत्तओ कालओ भावओ। तत्य दब्बओ ण आमिणिवोहियणाणी आएसेण सव्वदव्वाइ जाणति ण पासति १ । खेतओ ण आभिणियोहियणाणी आएसेण सव्व खेत जाणइ ण पासइ २ । कालओ ण 10 आमिणिलोहियणाणी आएसेण सव्व काल जाणइ न पासइ ३ । भावो ण आमिणि बोहियणाणी आएसेणं सव्वे भावे जाणइ ण पासइ ४ । ५७ त समासतो चतुम्विइत्यादि मुत्त । 'तच' मतिनाण खयोवसमरूवतो एगविह पि होतु णेयभेद तणतो नाणामेदा दन्वादिया से भवति । 'दन्नतो ण ति दन्यतो वचव्वे 'ण' ति वयणालकारे, देसीवयणतो वा 'ग' अहवा, अपादानान्ते पञ्चमी विभक्तिः, तत्थ पायतवयणसेलीतो दबतो ण एव आमिनियोधियनाणी लभति- 15 आदेसेगमित्यादि, हादेसो नाम-प्रकारो । सो य सामण्णतो विसेसतो य । तत्य दबजातिसामण्णादेसेण सव्वदवाणि धम्मत्थिकायादियाणि जाणति, विसेसदश्वे वि जहा धम्मत्यिकाये धम्मत्यिकायस्स देसे धम्मत्यि कायस्स पदेसेत्यादि केयी जाणति, सम्वे ण याणति, जहा मुहुमपरिणता अविसतत्या अप्पष्णवणादिया या 'ग पस्सई' ति सव्वे सामय विसेसादेसहित धम्मादिए, चक्खु-अवक्रोदसणेण रूप-सदाइते केपि पासति ति वचन्छ । अहवाऽऽदेसी-पुत्त, तस्सादेसतो सव्वदव्वे जाणतीत्यादि । चोदक आह-जति मुत्त कह मतिनाण ? ति, उच्यते- 20 सुतोवलद्धमत्येसु अणुसरतो तन्मावणधुद्धिसामस्थतो [जे० २०५ प्र०] मुतोवयोगणिरवेक्खा वि मती पचड़ ति ण मुत्तादेसो विरुज्झते १ । खेत्त पि सामष्ण विसेसादेसतो । तस्य सामणतो खेचमागास, सचेग सव्यग १ ध्वमो ४ । दवमो छ ॥२ तत्थ इति पद स से है. ल. नास्ति बेशु मो मु• विआमलवृत्तौ न धुसरणे २३. पत्रे पुनर्वर्तते ॥ ३-४-५ ६ अत्र द्रव्य-क्षेत्र-काल भावविषयकेषु चतुपि स्नाशेषु आणति पासति इति पाठी माणति ण पासति इति पाठभेदेन सह भगवत्या अष्टमशतकद्वितीयोदशके ३५६ २ पत्र वत्तते । अनामयदेवरेटीका- दवयो ण निद्रव्यमा श्रित्य मामिनियोधिकविषयाव्य पाऽभित्य यद् भामिनिबोधिकज्ञान तत्र आएसेण ति आदेश-प्रकार सामान्य विशेषरूप उन च थादे शेन ओघतो द्रव्यमानतया न तु ततसवविशेषापेक्षयेति भाव' अथवा आदेशेन श्रुतपरिकमिततया सर्पद्रव्याणि धर्मास्तिकायादीनि जानाति अवाय-धारणापेक्षयाऽवबुध्यते ज्ञानस्यायाय-धारणारूपत्वात् पासह ति पश्यति अवमहेहापेक्षयाऽवधुच्यते अवप्रहेहयोर्दर्शनत्वात् । 'खेतो ति क्षेत्रमाश्रित्य आमिनियोधिवज्ञानविषय क्षेत्र वाऽऽश्रित्य यद् आमिनियोधिवज्ञान तत्र आदेखेप' ति आषत ध्रुवपरिकमणया या सव्व शेत ति लोका- लोकरूपम् । एव कारतो भावतश्चति । इदं च सूत्र नन्या इहैव च वाचनान्तरे 'न पासा' ति पाठान्तरेणाधीतम् । एव च नन्दिदीकाहता [हरिद्रमरिणा] व्याख्यातम्-- आदेश:-प्रकार सच सामान्यतो विशेषतच । वन द्रव्यजातिसामान्यादेशेन 'सवैद्रव्याणि धर्मास्तिकायादीनि आनाति विशेषतोऽपि यथा धर्मास्तिकायो धर्मास्तिकायस्स देश इत्यादि न पश्यति' सर्वान् धर्मास्तिकायादोन शब्दादीस्तु योग्यदेशालस्थितान् पश्यत्यपीति । ३५८ पत्र ॥ ७ अधि सतत्या उप्पण्णवणादिया आ दा । अधिशदार्था अशापनादिका इत्यर्थः ॥ ८ सेसा सविहे धम्मादिए आ हा ॥
10 आभिणिबोहियणाणस दवाइभेयाइ ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । ४३ तममुत्तं अवगाहलक्खणं सव्वं जाणति। विसेसतो वि लोगा-ऽलोगुड्ढ-ऽह-तिरियादिविसेसखेत्ते जाणति, ण जाणइ य केयी, क्षेत्र न पश्यत्येव २। काले विआदेसो सामण्ण-विसेसतो। तत्थ सामण्णतो इमं भण्णति, ण य दरिसणतो, णिचमणिचं वा मुत्तममुत्तं वा कलासमूहं सव्वदवाणि वा कलेइ त्ति कलणं वा कालो, तमेवंविहं सामण्णतो सन्य- कालं जाणति। विसेसादेसो-समयाऽऽवलिगादि उस्सप्पिणीमादि वा विसेसकाले केयि जाणति, ण जाणति केयिं, कालं ण पश्यत्येव ३। भाव इति भवनं भूतिर्वा भावः, एवं सव्वभावे भावजातिमेत्तसामण्णतो जाणति। विसेसादेसतो 5 जीवा-जीवभावे। तत्थ नाण-कसायादिया जीवे, अजीवे वण्णपज्जवादिए अणेगहा वीसस-पयोगपरिणते, एत्य मति- णाणविसयत्थे जे ते जाणति, सेसे ण याणति, सयभावे ण पासइ त्ति, मतिणाणस्स असवण्णेयविसयत्तणयो । ५८. उग्गह ईहाऽवाओ य धारणा एव होति चत्तारि। आमिणिबोहियणाणस्स भेयवत्थू समासेणं ॥ ७० ॥ अस्थाणं उग्गहणं तु उग्गहो, तह वियालणं ईह । ववसायं तु अवायं, धरणं पुण धारणं बिंति ॥ ७१ ॥ उग्गह एक समयं, ईहा-वाया मुहुत्तमद्धं तु। कालमसंखं संखं च धारणा होति णायव्वा ॥७२॥ पुढे सुणेति सइं, रूवं पुण पासती अपुढे तु । गंध रसं च फासं च बद्ध-पुढे वियागरे ॥ ७३ ॥ भासासमसेढीओ सहं जं सुणइ मीसयं सुणइ । वीसेढी पुण सई सुणेति णियमा पराघाए ॥ ७४ ॥ ईहा अपोह वोमंसा मम्गणा य गवेसणा। सण्णा सती मती पण्णा सव्वं आभिणिवोहियं ॥ ७५॥ से तं आमिणिबोहियणाणपरोक्खं । १ ईह अवाओ स० शु० ल० मो० ॥ २ अत्थाणं उग्गहणम्मि उग्गहो तह वियालणे ईहा । ववसायम्मि अवाओ, धरणं पुण धारणं विति ॥ मो० डे० ल० मु० । हरिभद्रपादै मलयगिरिपादैश्वायमेव पाठमेद. निर्दिष्टो व्याख्यातश्चापि वत्तते ॥ ३ 'तमतं तु हरिभद्रम्रि मलयगिरिवृत्त्यो निर्दिष्टोऽय पाठभेद' ॥ ४ मीसियं डे० मो० मु० ॥ ५ ख० स० शु० मो० प्रतिपु से तं आभिणियोहियनाणपरोक्ख इति एकमेव निगमनवाक्यम् , जे० दे० ल० मु० प्रतिपु पुन से तं आभिणियोहियणाणपरोक्न, से तं मतिणाणं इति निगमनवाक्यद्वय दृश्यते । किञ्च हरिभद्रसूरि-मलयगिरिवृत्त्यो प्रथम निगमनवाक्य व्याख्यातमस्ति, चूर्णिकृता द्वितीय निगमनवाक्य व्याख्यात वर्तते इति वृत्ति-चूर्णिकृतामेकतरदेव निगमनवाक्यमभिमतम् । अपि च चूर्णिकृता चूर्णा- “से कि मतिमाग ?" ति एस आदीए जा पुछा तस्स सव्वहा सरुवे वणिते इम परिसमत्तिदमग णिगमणवाक्यम् --" से त मतिणाण ति" इत्यादि [पत्र ४१ ५० ५] यन्निगमनवाक्यव्याख्यानावसरे निष्टसितमस्ति तत्रतत् क्लि चिन्त्यमस्ति यत्-चूर्णावपि से किं तं आभिणियोधिकेत्यादि सुत्तं [ मुत्त ४५ पत्र ३२ ] इति आदिवाक्यनुपक्षिप्त वत्तते तत् किमिति चूणा निगमनवाक्यव्याख्यानावसरे " से कि तं मतिणाण' ति (स भागेए जा पुजा " इत्यादि चूर्णिता निरदेशि ? इत्यत्रा तद्विद एवं प्रमाणमिति ॥ 15 य 20 त १४ ७ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए सजुय [सु० ५९-६५ गा० ७६ ५८ उग्गह ईहा गाहा । अत्याण गाहा । उग्गह एक० गाहा । पुढ सुणेइ० गाहा । भासा सम० गाहा। ईहा० गाहा। एताओगाहाओजहा पेढियाए [आव०नि० गा०२-६ तथा गा० १२] वहा माणितम्या इति 100||७||७||७३||७४/७५|| "से कि त मतिणाण ?"[मुत्त ४५] ति एस आदीए जा पुच्छा तस्स सन्नहा सरूवे वणिते इम परिसमत्ति 5 दसग णिगमणवाक्यम्-"से त मतिणाण" ति। अहवा सीसो पुच्छति-जो एस वष्णियसरूवेण ठितो माणविसेसो सो किंवत्तन्नो' आचार्य आह-'से' इति निदेसे, 'त' ति पुन्नपण्डामरिसणे, त एतद् 'मतिणाण ति स्वनामाख्यान मित्यर्थ । अहवा से त्ति अस्य व्यञ्जनलोपे कृते एत मतिगाण ति भवति, एतावद् मतिज्ञानमित्यर्थ ॥ इदाणि सव्वचरण करणक्रियाधार नधुटि कमप्यत्त मुतणाण भण्णति- ५९ से कि त सुयणाणपरोक्ख सुयणाणपरोक्ख चोईसविह पण्णत्त त जहा- 10 अक्खस्सुत १ अणखस्सुत २ सण्णिसुय ३ असण्णिसुय ४ सम्मसुय ५ मिच्छसुय ६ सादीय अगादीय ८ सपज्जवसिय ९ अपज्जवसिय १० गमियं ११ अगमिय १२ अगपविठ्ठा १३ अणगपविट्ठ १४॥ ६९ से किं [जे० २०१ वि०] त सुतनाणेत्यादि । त च मुवावरणखयोवसमत्तणतो एगविह पित अक्खरादिमा पहुच जाव अगवाहिर ति चोइसविध मष्यति । तत्य अक्खर तिविह-नाणक्खर अभिलावक्खर 15 वष्णक्खर च । तत्य नाणक्खर "सर सवरणे" नक्षरतीत्यक्षरम्, न प्रच्यवने अनुपयोगेपीत्यर्थ , आतभावतणतो, व च गाण अविसेसतो चेतनेत्यर्थ । आह-एव सबमविसेसतो णाणमक्खर कम्हा मुत अक्सरमिति मणति ? उच्यते-रूढिविसेसतो १ । अमिलाववष्णा अक्खर मणिवा, पङ्कभवन, एव ताव अमिलावहेतुम्गहणतो मुतविग्णा गस्स अक्खरता मणिता २॥ इदाणिं षण्णक्खर-चणिज्जति अणेणामिहेतो अत्यो इति वण्णो, स चार्थस्य, कुडये चित्रवर्णकवन् , अहवा द्रव्ये गुणविशेषवर्णकवन । वर्ण्यते-अमिलप्यतेऽनेनेति वर्णाक्षरम् ३॥ एत्य मुच- ६० से किं त अक्खस्सुत ? अक्खरसुत तिविह पण्णत्त त जहा-सण्णक्खर १ वजण क्खर २ लद्धिअस्खर ३॥ ६० से कि त अक्खरसुत इत्यादि । अक्सरसह मुणतो भासतो वा अक्खरभुत । वस्थऽक्सरलमो अमिलायो वा दवमुत, खयोबसमलद्धी भावसुत । तच्च वर्णाक्षर त्रिविध सणक्खरादि । तत्य- ६१ से किंत सण्णक्खर ? सण्णखर अक्खरस्स सगणा ऽगिती।से त सण्णक्खर । ६१ 'साणक्खर' अक्खरागारविसेसो । सो य ब्रह्मादिलिविविषाणो अणेगविधो आगारो। तेस आ(अ)- कारादिआगारेसु जम्हा अकारे अकारसण्णा एव भवति, एव सेसेस वि, तम्हा ते सणक्खरा भणिता, जहा वट्ट घडागार दछ ठकारसण्णा उप्पज्जतीत्यथ १॥ 20 - 28 १ चउद्दस भो ॥ २ अक्खर ति दुविई-नाणक्खरं अमिलापवण्णक्खर च । सत्य नाण ३ लावणा अक्सर मा०॥ ती साणक्सर । सेनख संरे लघु ॥
४५ 5 अखरा-ऽणक्खराइ सुयणाणं] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । ६२, से किं तं वंजणक्खरं ? वंजणक्खरं अक्खरस्स वंजणाभिलीवो। से तं वंजणक्खरं । ६२. व्यक्तीकरणं वंजणं, व्यज्यते अनेनार्थ इति वा व्यञ्जनम् , यथा प्रदीपेन घटः, व्यञ्जनं च तदक्षरं चेति व्यञ्जनाक्षरम् , तच्चेह सर्वमेव भाष्यमाणं अकारादि हकारान्तम् ,अर्थाभिव्यञ्जकत्वाच्छब्दस्य । तमेवं अक्खरं अत्याभिव्यंजकं वंजणखरं भवति, जहा घटः पटः इत्यादि २॥ ६३. से किं तं लद्धिअक्खरं ? लद्धिअक्खरं अक्सरलद्धियस्स लद्धिअक्खरं समुप्पज्जइ, 5 तं जहा-सोइंदियलद्धिअखरं १ चाखिदियलद्धिअक्खरं २ घागेदियलद्धिअक्खरं ३ रसणि- दियलद्धिअक्खरं ४ फासेंदियलद्धिअक्खरं ५ णोइंदियलद्धिअक्खरं ६ । सेत्तं लद्धिअक्सरं । से तं अक्खरसुयं । ६३. 'लद्धक्खर ति अक्खरलद्वी जस्सऽत्थि तस्स इंदिय-मणोभयविणाणतो इह जो अक्सरलाभो उप्प- ज्जति तं लद्धिभक्खरं । तं च पंचविहं सोइंदियादि । जहा सोइंदियलदिओ सई सोतुं संख इति अक्खरदुयलामो 10 भ[जे० २०६ प्र०] वति, एवं सम्बत्थ लद्धिअक्खरं भाणितव्यं ३ । इह सण्णा-वंजणक्खरे दो वि दव्वसुतं गहितं, सुतविण्णाणकारणचातो, लद्धक्खरं भावसुत, लदीए विष्णाणमयत्तणतो भयणा वा १।। इदाणि अणक्खरसुतं- ६४. से किं तं अणक्खरसुयं ? अणक्खरसुयं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा- ऊससियं णीससियं णिच्छदं खासियं च छीयं च । णिसिंघियमणुसारं अणखरं छेलियादीयं ।। ७६ ।। से तं अणक्खस्सुयं । ६४. अणक्खरसदसवणतो करतो [? वा] अणक्खरसुतं भवति । तं च अणेगविहं इम- अससितं० गाहा । पूर्ववत् कंठा [आव० नि० गा० २०] ७६॥ २ । इदाणि सण्णिमसण्णिसुतं- ६५. से किं तं सण्णिसुतं ? सण्णिसुतं तिविहं पणतं, तं जहा-कालिओवएसेणं १ हेऊवएसेणं २ दिद्विवादोवदेसेणं ३॥ ६५. सण्णिस्स सुतं सण्णिमुतं । असणिस्स सुतं असष्णिमुतं । तत्र संज्ञाऽस्याऽस्तीति संज्ञी । सो य सण्णी तिविहो–'कालिओवदेसेण' इत्यादि । चोदक आह-जड़ सण्णासंबंधयो सण्णी तो सब्वे जीवा सण्णी, जतो एगिढियाण वि दस आहारादिसण्यातो पढिजंति ? आचार्याह-रहोहसण्णा थोवत्तणतो णाधिक्रियते, जहा णो करिसावणेण धणवं भवइ त्ति, सेसाहारादिसणाओ वि भूयिष्ठतरा वि णाधिक्रियंते, अणिद्वत्तणतो, जहेह हुंड- संठितो ण मुत्तित्तणतो रूववं भण्णति । एते अधिकतसण्णाए अणुवणयविद्वंता । इमे उवणयदिटुंता-जहा बहुधणो 25 धणवं. पसत्थणिन्यत्ति-देहमुत्तित्तणतो य रूववं भण्णति, तहेव महती सुभा य संज्ञाऽधिक्रियते । सा य संगानं संज्ञा- मनोविज्ञानम् . तत्सम्बन्धात् सन्नीत्यर्थः । उक्तः प्रयङ्गः । प्रकृतमुच्यते- १ लायो वंजणखरं । से तंग० ० ल. शु० ॥ २ अस्मिन् सूत्र सर्वत्र लडियक्खरं इति स० शु० मो० ॥ ३ 'तो कारणतो वा सा. दा० । सन् शब्दभवात 'वंतो वा' मापन इत्ययं ॥ ४ कापिणेन । 15 20 १६ जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याए चुण्णीए संजुर्य [सु०६६-६८ ६६ से किं त कालिओवएसेण ? कालिओवएसेणं जस्से ण अस्थि ईहा अंपोहो मग्गणा गवसणा चिंता वीमसा से ण सैणि चि लभइ, जस्स णत्थि ईहा अपोहो मग्गणा गवेसणा चिंता वीमसा से ण असण्णीति लन्मइ । से त कालिओवएसेण १। ६६ कालितोबदेसेण' ति इहाऽदिपदलोबो दद्वब्यो, तस्मुच्चरणे 'दीदफालितोवदेसेण ति वत्तव्य दीह- 5 आयत, कालितो चिविसेसण । कस्स ? उच्यते-उवदेसस्स, जहा जिणभवणे मुहुत्तकालितोदीहकालितीचा पूयामडयो कतो तहा दीहकालितोवदेसेण ति माणितव्यो । उदिसणमुवदेसो,उपदेसो चि वा आदेसो ति वा पण्णवण तिवा परूषण ति वा एगहा। दीहकालिओ उपदेसो दीहकालियोवदेसो, तेण दीहकालितोवदेसेण जस्स सण्णा भवति सो आदिपदलोपातो कालिओवदेसेण सष्णीत्यथ । अहवा कालिय-आयारादि मुत्त तदुवदेसेण सणी भणति । सोय इमेरिसो-जो य अतीतकाले मुदीहे वि [जे० २०६ द्वि०] इद तदिति कृतमणुभूत वा समरति, घट्टमाणे य इदिय 10 णोइदिएण वा अण्णतर सदाइअत्यमुबलद अण्णत बहरेगधम्मेहि ईहा चि ईहा । वस्सेव परथम्मपरिचागे सधम्माणु- गतावधारणे य 'अबोहो' ति अबातो। विसेसधम्मण्णेसणा मम्गणा, जहा मधुर गभीरतणतो एस सखसह इति। वीसस-प्पयोगुन्मवणिचमणिञ्च चेत्यादि गवेसणा । जो यणागते य चिंतयति 'कह वा त तत्य कातन्व ?" इति अण्णोणालवणाणुगत चित्त चिता। आत-पर इह-परत्ययहिता हितविमरिसो बीमसा। हवा 'किमेय" ति ईहा! णिच्छयावधारितो अत्यो अबोधो । अभिलसियत्यस्स मणो-चयण-काहिं जायणा मग्गणा । अमिलसितत्ये चेव 16 अपड्डपजमाणे गवेसणा । अणेगडा सकप्पकरण चिंता । द्वन्द्वमपु वीमसा, जहा णिचमणिच हितमहित घर कुश थोव बहु इत्यादि । अहवा सकप्पतो चेव विविधा आमरिसणा वीमसा । अहवा 'अबोहो ति अबातो। सेसा ईहाएगडिया । जस्सेव अण्णयरविकप्पेण मणोदव्यमणुगत चित्त धापति एस कालिओषदेसेण सणि ति । सो य अणते मणोजोगे खघे घेत्तु मणेति, एतरूद्धिसपणो मणविष्णाणावरणखयोचसमजुचत्तणतो य जहा चक्खुमतो पदीवादिप्पगासेण फुडा स्वोवलद्धी भवति तहा मणखयोवसमलदिमतो मणोदव्यपगासेण मणोछडेहि इदिएहि 20 फुडमत्थ उबलमतीत्यर्थ । कालिखोबदेससणीविनवखे असणी, जईह अविसद्धचक्खुमतो मदमदप्पगोसे रूखोवलदी अमुद्धा एव सम्मच्छिमपचेंदियअसणिस, उक्कोसखयोवसमे वि अप्पमणोदयगइणसामत्थे मदपरिणामत्तणतो य असणिणो अविशुद्धमप्पा य अोंपलब्धीत्यर्थ । ततो वि अविमुद्धा चतुरिदियाण, ततो तेइदियाण, ततो वि अविमुद्धा बेइदियाण अत्युवलद्धी । जस्स य जइ इदिया स तदा तेमु अवगहादिस पबचते । विगलिंदियाण वि आदेसवरतो मणोदव्य[ जे० २०७ प्र० गहण अमुद्धमप्पत्तणतो य माणितव्व । सो य मणो तेसि अमणो चेव 25 टन्नो, अमुद्धचणतो, असीलबद् अज्ञानवद्वा । त्यो बेइदियेहितो वि समीवातो अन्यत्ततर विष्णाण एगिदियाण, जहा मत् मुच्छिय विसमाविवस्स य वहा एगिदियाण सम्बया मणाभावे विण्णाण सम्बजहष्ण। कालितोवदेससणिणो एते सम्मुच्छिमादयो सब्वे असणी भवतीत्पर्य १॥ इदाणि- ६७ से किं त हेऊवएसेण? हेऊवएसेण जैस्स ण अस्थि अभिसधारणपुब्विया १ स्सऽस्थिर से शु ॥२ अघोहो जे मो मु ॥ ३ सण्णोति जे मो•मु ॥ १ स त्यि व संश २. ॥ ५ अघोहो जे० मो० मु० ॥ ६ प्णी स ० है. शु.॥ ७ वात्म-परेह-परत्रहिता ऽहितविमर्म इत्यर्थ ॥ ८ हुप्पण्णमाणे दा । हुमागे मा० ॥९ वा पचति पस जे आ दा. धावति इति पाठरत मो० पूर्णादशगतो हेयः ।। १० महेतुणतो पा० दा ॥ ११ गासा रूची मा० ॥ १२ मघनवता आ ॥ १३ जस्सऽत्यि • • • ॥
सण्णि-असण्णिसुयणाणं ] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । करणसत्ती से णं संण्णीति लम्भइ, जस्स णं णत्थि अभिसंधारणपुब्बिया करणसत्ती से णं असणि त्ति लन्भइ । से तं हेऊवएसेणं २! ६७. 'हतूबदेसेणं ति हेतुः कारणं निमित्तमित्यनर्थान्तरम् , 'उनदेसेणं' ति पूर्ववत् । हेतूतो संग्णा भवति त्ति जेण तेण सो हेतुउवदेसेण सण्णी भवति । 'जस्स' त्ति जीवस्स, 'ग' वाक्यालंकारे देसीवयणो वा आत्म- स्वरूपमदर्शनवचनोपन्यासे वा, अव्यक्तेन विज्ञानेन अभिसन्धार्य पूर्व ततः विज्ञानस्यैव 'करणशक्ति' करणं-क्रिया 5 शक्तिः-सामर्थ्य, अथवा करणे शक्तिः करणशक्तिः, अथवा करण एव शक्तिः करणशक्तिः। तच्च अभिसंधारण संचित्य संचिंत्य इडेसु विसयवत्थूसु आहारादिसु प्रवर्तते, अणिहेसु य णियत्तंते । एवं सदेहपरिपालणहेतो पव- चैति । ते य पायं पड्डुप्पणकाले, ण तीता-ऽणागतकालावलंबिणो भवंति, उस्सन्णमेवं, केयिं तु तीता-ऽणागतकाला- वलंबिणो वि भवंति, ते पुण ण दीहकालाणुसारिणो। किंच-तेसु वि आगतो सुहुमो संताणचोदको अविस्सरणहेतू दट्टन्यो । ऐवं ते विकलेंदिया सम्मुच्छिमपंचेंदिया या(य) हेतुबायसण्णी भणिता, ते पडुच्च असण्णी जे णिचेट्ठा 10 इटाणिविस विणियट्टवावारा मत्त-मुच्छिय-विसोवयुत्तादिसारिच्छचेतणहिता पुढवादिएगिदिया इत्यर्थः २॥ इदाणि ६८. से किं तं दिद्विवाओवएसेणं ? दिद्विवाओवएसेणं सण्णिसुयस्स खओवसमेणं सण्णी लभति, असण्णिसुयस्स खओवसमेणं असण्णी लमति । से तं दिद्विवाओवएसे- णं ३। से तं सण्णिसुतं ३ । से तं असण्णिसुतं ४ | ६८. दिद्विवाओवदेसेणं ति दृष्टिः-दर्शनम् , वदनं वादः, उपदेशनमुपदेश इति, अनेन दृष्टिवादोपदेशेन संज्ञीत्यभिधीयते । सो य सम्मविट्ठी सम्णी, तस्स सम्मदिद्विणो सण्णिस्स जं सुतं तं सण्णिमुतं, तेण सण्णिमुत- खयोवसमभावेण जुत्तत्तणतो दिद्विवातसण्णी लब्भति । अहवा दिटिवायसण्णि त्ति मिच्छत्तस्स [जे० २०७ द्वि०] सुतावरणस्स य खयोवसमेणं कतेणं सण्णिसुतस्स लंभो भवति, एवं सो दिद्विवातसण्णी लभति, तस्स मुतं दिति- वातसण्णिसुतमित्यर्थः । तं खयोवसमियभावत्थं समद्दिढि सणि पडुच्च मिच्छद्दिट्ठी असण्णी भणितो । सो य मिच्छ- 20 तस्सुदयतो अस्सण्णी भवति, तस्स सुतं असण्णिसुतं । तं च मुतअण्णाणावरणखयोवसमेणं लब्मति, एवं दिटिवातम- सणीत्यर्थः, तस्स मुतं दिडिवातअसण्णिमुतं । एवं दिदिबाते सण्णि असण्णिासु मुतखयोवसमभावो(वा) मुतं घेतब्वं इति । पर आह-खयोवसमभावद्वित(तो) लणितणतो लक्खिजति खाइगभावहितो केवली किण्ण सण्णि ? त्ति, उच्यते- अतीतभावसरणतणतो पडुप्पण्णभावाण य वुझणतो अणागतभावचिंतणतो य सण्णि त्ति, तं तहा जिणे अणुसरणं णत्थि, जेण सो सजदा सव्वधा सव्वत्थ सव्वभावे जाणतीत्यर्थः, तम्हा केवली णोसणीणोअसण्णी भवति । 25 पुनरप्याह परः-रह मिच्छादिद्विणो वि केयिं हिताऽहितनाणवावारसण्णासंजुत्ता दीसंति किं ते असण्णिणो भणिता ? उच्यते-तस्स जा सण्णा सा जतो कुच्छिता, जहेह कुच्छितवयणमवयणं शुच्छितसीलमसीलं वा, तहा तस्य सण्णा कुच्छितत्तणतो असंवैव दृढव्वा, अण्णं च तस्स मिच्छत्तपरिग्गहातो नाणमनाणमेव दट्टव्वं । भणितं च- १ सण्णि तिल ३० शु० । सण्णी ल ख० स० जे० ॥ २ असण्णी ल ख० स० डे० ल० शु० ॥ ३ हेतु- चाओवदेसण आ० ० ॥ ४ सण्णी भवति आ० दा० ॥ ५ एवं तेर्सि विकलेंदियाणं सम्मुच्छिमपंचेंदियाण या हेतुयारसण्णा भणिता आ० दा० ॥ ६-७ वादो स० । वातोव स० ॥ ८ 'स्नुययतो जे० ॥ ९ भावसुतं आ० दा० ॥ 15 - ४८ 10 जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुये [सु० ६९-७० "सदसदविसेसणातो०" विशेषा० गा० ११५] गाहा । कंठा। एच पि ते असण्णी । आह-एगिदियाण ओह- सण्णा चेव अतो वे असणी चेव, वेहितो बेइदियाइ जाव सम्मुच्छिमपचंदी एते विसिहतरसण्याए हेतुवायसष्णी मणिता, कालितोवदेस पुण पडुच्च ते वि असण्णी, विष्णाणअविसिद्वत्तणतो, दिद्विवातोवदेस पुग पडुच्च कालि- कोपदेसा वि असणी अविसिद्वत्तणतो चेव, अतो गज्जति दिडियावसण्णी सव्युत्तमो, मुत्ते य ईवरि ठवितो, जुत्त 5 मेतं, कालिय हेतुसष्णीण पुण उकमकरण कम्हा ? उच्यते-सव्वत्य मुत्ते सण्णिगहण ज कत त कालितोवदेस सब्णिस, अत सर्वत्र तत्सव्यवहारशापनार्थ आदौ कालि जे० २०८ स०]कग्रहण कृतमित्यर्थ । किंच-सणि असण्णीण समनस्काऽमनस्का इति क्रमश्च दर्शितो भवति, अत्र विकलेन्द्रिया अमनस्का इति अल्पमनोदव्यग्रहण- सामर्थ्यम्, प्रतिविद्यते पूनर्मनस्तेषाम् । यस्मादुक्तम्- कमि-कीट-पतझाया समनस्का जङ्गमावतुमदा । अमनस्का पञ्चविधा पृथिवीकायादयो जीवा ॥१॥ ] इति ॥ भणित सम्णि-असण्णिमुत्र ३।४। इदाणि सम्म मिच्छामुत । तस्य मुत्त- ६९ [१] से किं त सम्मसुत' सम्मसुत ज इम अरहतेहिं भगवतेहिं उप्पण्णणाण- दसणधरेहिं तेलोकंचहित-महिय पूइएहि तीय-पचुप्पण्ण मणागयजाणएहिं सव्वष्णूहि सव्व- दरिसीहि पणीय दुवालसंग गणिपिडग, त जहा-आयारो १ सूयगडो २ ठाण ३ समवाओ 15 ४ विवाहपण्णत्ती ५ णायाधम्मकहाओ ६ उवासगदसाओ ७ अतगडदसाओ अणुचरो- ववाइयदसाओ ९ पण्हावागरणाइ १० विवागसुत ११ दिद्विवाओ १२ । [२] इच्छेय दुवालसगं गणिपिडग चोईसपुस्विस्स सम्मसुत, अभिष्णदसपुस्विस सम्मसुत, वेण पर मिण्णेसु भयणा । से त सम्मसुत ५। ६९ [१] से कि त सम्मसुतेत्यादि । 'ज' इति अणिटिस्स गहण, 'इम' ति पचक्खभावे । वदण- 20 नमसण-पूयणादि अरहतीति अरहता, अरिणो वा इता अरिहता । तेसिं गुणसपदाए विसेसण-भगवतेहि धम्म- जस अत्य-लच्छी-पयत्त विभवा एते छ पदत्या भगसण्णा, ते जेसि अस्थि ते भगवतो । केवलनाण-दसणाण आ- रणक्खते केवलणाण दसणा उप्पज्जति, ते य जुगवमुप्पण्णे सचमणागतद्ध मधुप्पण्णसरूवे गिरावरणे सव्वदव्य- गुण-पज्जव विसेस-सामण्णौविसए वि जुगवपत्ते गाण-दसणघरे ते तेहिं नाण-दसणेहि तीयद्धार सम्बदन्च-गुण- मावे जाणति, वहा पहुप्पण्णे अणागते य जाणति, तिकालजे दन्च भावे य पडुप्पण्णे काले जाणतीत्यर्थ । हिंशब्दो 25 सर्ववचनेषु करणार्थे बहुवचनमतिपादक । तेलोक ति-तिष्णि लोगा तेलोक, वे य ऊर्ध्वाऽवस्तिर्यक् , अत्र तमि- वासिग्रहणम् । मवनवासिनो अहेलोगनिवासी, वणयस्जोति-तिरियच-मणुस्सा तिरियलोकनिवासी, ऊध्र्व वैमानिका। १ पणा तदप्पचातो से असणो आ० दा ॥ २ पतेसि दूरतरसप्पीए हेतुया आ० ॥ ३ अवर जे ॥ ४ रपयापनार्थ था ॥ ५ तत्थ सम्ममुत आ दा० ॥ ६ कनिरिक्षित महित-पूहएहिं सर्वासु सूत्रप्रतिषु हरिमा- मलयगिरिवरियत्योश। चूर्णिकत्सम्मत स्त्रपाठी नोपलभ्यते याप्याद” । केवल मनुयोगद्वारेम्पलभ्यते चूर्णिकृत्सम्मत सूत्रपाल [पत्रे ३५-१] ॥ ७ पदुष्प मो मु.॥ ८ दसीहि • ॥ ९ पउदस ल• ॥ १. णे में है. ल. ॥ १५ प्णमणि- पिसप बे॥
एपपिर नाम ० ॥ १३ वतिले • ॥१४ तेसि. २००० तेगामि ॥१५ काबिलियं तु. ल. गु० । काविल अनु॥ १६ जागायतं . ॥ २७ पाराणं॥ ८ यागरणं अनि नामानन्तर भागवतं पायंजली ४९ सम्म-मिच्छसुयणाणं] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । एवं पायोवृत्त्या अहेलोइयग्रामसंभवाद् वाच्यम् । 'चहित' ति चाँहितं प्रेक्षितं निरीक्षितं दृष्टमित्यनर्थान्तरम् , त्रैलो- क्येन [जे० २०८ द्वि०] चहिता-मनोरथदृष्टिदृष्टा, अथवा गोशीपचन्दनादिना चर्चिता । त्रैलोक्यस्य मनोहिता महिता, अथवा महिमाकरणेन महिता, सा च महिमा महाजनसमुदयेन गीत-नृत्य-नाटकाद्यनेकप्रेक्षणकरण- विधानैः । अणलिय-मणवज-सन्भूतत्थ-विसारयवयणेहिं थुता पूइया । अथवा अन्योन्यविषयप्रसिद्धा ह्येते एकार्थ- वचना । 'पणीतं ति तिसततिसढपवादिमते अभूतत्थरूवे बजेऊण इमं जहत्थं दुबालसंग पणीतं, जह णवणीतं 5 दहियातो, भूतत्थेण वा जुत्तं प्रकरिसेण णीतं प्रणीतं । 'दुवालसंग' इत्यादि कंठं । इहंगगतं आयारादि, अणंगगतं च आवस्सगादि । एतं सव्यं दधद्वितणयमतेण सामिणा असंबद्धं पंचत्थि- काया इव णिचं सम्ममुतं भण्णति । अहवा एतं चेत्र दुवालसंगादि सामिणा संवद्धं भयणिजं सम्मसुतं मिच्छमुतं वा उच्यते-सम्मदिहिस्स सम्ममुतं, मिद्दिहिस्स मिच्छसुतं । इमं चेव सुतपरिमाणतो णियमिज्जति- [२] जो चोहसपुव्वी तस्स सामादियादि बिंदुसारपज्जवसाणं सव्वं नियमा सम्मसुतं, ततो ओमत्थगप- 10 रिहाणीए जाव अभिण्णदसपुची एताण वि सामाइयादि सव्वं सम्ममुतं सम्मगुणतणतो चेव भवति । मिच्छद्दिवी पुण मिच्छणुभावतणतो अभिन्नदसपुब्वे ण पावति, दिर्सेतो जहा अभब्यो अभब्वाणुभावतणतो ण सिज्झतीत्यर्थः । 'तेण पर ति अभिण्णदसपुव्वेहितो हेट्ठा ओमत्थगपरिहाणीए जाव सामादितं ताव सव्वे सुतढाणा सामिसम्मगुण- तणतो सम्ममुतं भवति, ते चेत्र सुतडाणा सामिमिच्छगुणतणतो मिच्छसुतं भवति ५॥ इदाणि मिच्छसुतं- ७०. [१] से किं तं मिच्छसुतं ? मिच्छसुतं जे इमं अण्णाणिएहि मिच्छद्दिहिएहिं 15 सच्छंदबुद्धि-मतिविर्यप्पियं, तं जहा-भारहं रामायणं हमीमासुरक्खं कोर्डलयं संगभदियाओ खोडेंमुहं कप्पासिय नौमसुहुम कैंणगसत्तरी वइसेसियं बुद्धवयणं "वेसितं कविलं लोगायतं सद्वितंतं माढरं पुराणं वागरणं णाडगादी, अहवा बावत्तरिकलाओ चत्तारि य वेदा संगोवंगा। १ वा । कहं तं चेव सम्मसुयं मिच्छसुयं वा ? उच्यते आ० दा० । वा | कहं ? उच्यते जे० ॥ २-३ मिच्छा- सुयं डे० ल० मो० मु० ॥ ४ इत आरभ्य चत्तारि य वेदा संगोवगापर्यन्त सूत्रमिढ समग्रमपि अनुयोगद्वारेषु वर्तते [सू० ४१] ॥ ५ मिच्छविट्ठीहिं जे० मो० मु० विना ॥ ६ विगप्पि ० मो० मु० ॥ ७ हंभीमासुरुक्ख स० ३० शु० । दंभीमासुरुक्ख मो० । भीमासुरुक्खं जे० मु० । “भंभीयमासुरुक्खे माटर कोडिगदडनीतिमु । अस्य व्यवहारभाष्यगाथावस्य मलयगिरिकता व्याख्या-" भम्भ्याम् आसुवृक्षे माढरे नीतिशास्त्रे कौटिल्यप्रणीतासु च दण्डनीतिषु ये कुशला इति गम्यते । ” [ व्यवहार० भाग ३ पत्र १३२ ], अत्र प्राचीनासु व्यवहारभाष्यप्रतिषु “हंभीयमासुरक्वं” इति पाठो यत्तते । “आभीयमासुरक्ख भारह-रामायणादि- उपएमा । तुच्छा असाहणीया नुयअण्णाण ति ण वेति ॥ ३० ॥ [ सस्कृतच्छाया-] आभीतमासुरक्षं भारत-रामायणायुपदेशा । तुच्छा अनाधनीया श्रुताज्ञानमिति इद ब्रुवन्ति ॥ ३०३ ॥ [ भाषार्थ--] चौग्शास्त्र तथा हिंसाशास्त्र, भाग्न, गमायण आदिके परमार्थशून्य अत एव अनादरणीय उपदेशोंको मिथ्याश्रुतज्ञान कहते हैं ।" [ गोमटमार-जापकाउट पत्र ११.] । “निर्यण्टे निगमे पुराणे इतिहासे वेटे व्याकरणे निरुक्ले शिक्षाया छन्दस्विन्या यजरल्पे ज्योतिषे सान्ये योगे क्रियारचे पंशिक संशपिके अर्थविद्याया वाहपत्ये आम्भि आसुर्य मृगपक्षिरुते हेतुविद्यायाम्” इत्यादि [ ललिनविस्तरे परि० १२ १३ पनानन्तम पत्र १०८] ॥ ८ कोडिल्लयं मो० मु० ॥ ९ सयभ हे० ल० । सहभ गु० । सगडभ मु० ! अनुयोगद्वारेणु नगभदियायो मनभदियायो इत्येत नामान्तरे अप प्रत्यन्तरेषु रम्येते ॥ १० घोडमुहं शु० । १० ८० प्रन्योरेन्टमय नास्ति । अनुयोगद्वारेषु पुनः घोडगमुई, घोट्यसुह, घोडयसह, घोज्यसुर्य इति नामान्तराज्यपि प्रन्यन्तरेषु दृश्यन्ते ॥ ११ नागमुटुमं ३० ४० अनु० ॥ ३२ कणगमत्तगे नामानन्तर रयणाव पुस्सदेवयं लेदं गणियं त्वदर पा ०० ०, नाय पाउनुयोगद्वारपार ॥ चु०७ 5 जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजय [मु०७१-७२ [२] ईचेताइ सम्महिद्विस्स सम्मत्तपरिगहियाइ सम्मसुय । ईचेयाइ मिच्छद्दिद्विस्स मिच्छत्तपरिगहियाई मिच्छंसुत। [२] अहवा मिच्छद्दिद्विस्स वि ऐयाइ चेव सम्मसुय, कम्हा सम्मत्तहेउत्तणओ, जम्हा ते मिच्छदिद्विणो तेहिं चेव समएहिं चोइया समाणा केइ सपखदिट्ठीओ मेति । से च 5 मिच्छेसुय ६। ७० [१] से किं तमिच्छसुत इत्यादि। अण्णाण इतेहि[जे० २०९:०] अण्णाणितेहि। अण्णाण-अबोधो विवरीयस्थयोधो वा तेण इतो-अणुगतेत्यर्थ । मिच्छदिदि इवेहि मिच्छादिहितेहि, मिच्छ ति-अनृत, दिहि चि- दरिसण, मिच्छादिहिणा अणुगतेहिं ति भणित भवति । स-इत्यात्मनिर्देश , छन्द'-अभिमाय , तत्थमवत्येण वा अत्यस्स जो घोहो स बुद्धि अवग्रहमात्रम् , उत्चरत्र ईहादिविकप्पा सम्वे मती । अहवा नाणावरणखयोवसममानो 10 बुद्धी, सो चेव जदा मणोदवणुसारतो पबचा तदा मती भण्णति । एव आत्माभिमायबुद्धि-मतिमि. यच्छूत विविधकल्पनाविकल्पितमिति रचित, तच्च भारषादि जाव चत्वारि य वेदा संगोषगा, सम्वेते लोगसिद्धा, लोगतो चेवेतेसि सरून जाणितच । एत सन्च मिच्छभावटित ति कातु मिच्छमुत माणितव्च । एतम्मि सम्म मिच्छमुत विकप्पे चतुरो विकप्पा माणितव्या इमेण विधिणा- [२] सम्ममुत सम्मदिहिणो सम्ममृत चेव १, सम्ममृत मिच्छदिद्विणो मिच्छमुर्व २, मिच्छमुत सम्मदिद्विणो 15 सम्ममुत ३, मिच्छसुत मिच्छदिद्विणो मिच्छसुत चेत्र ४ । 'इचेताइ सम्मदिद्विस्स सम्मत्परिगहिवाइ सम्ममुत' एत्य मुत्ते परम-तइयविकप्पा दद्वन्या । इच्चेयाइ' ति सम्म मिच्छमुताइ, अहबा मिच्छमुताइ चेत्र । सेस कठ । 'मिच्छदिहिस्स' इचादिमुत्ते बितिय-चतुत्यविकणा दट्टन्या । तत्थ पढमविकप सम्ममृत सम्मत्तगुणेण सम्म परिणामयतो सम्मत चेव भवति १ वितियविकप्पे वि जहा खडसजुत खीर पित्तजरोदयतो ण सम्म मवइ तहा मिच्छत्तुदयतो सम्ममुते मिच्छामिणिवेसतो मिच्छमुत भवति २ ततियविकप्पे तिफलादिमणिद्व पि उवउत्त उबका 20 रकारितणतो सम्म भवति तदा मिच्छमुते मिच्छभावोवलभातो सम्ममुते दढतस्मायुप्पायकरणतणतो त से सम्ममुत भवति ३ चरिमविकप्पे मिच्छमुत, त चेव मिच्छामिणिवेसतो मिच्छमुत चेव भवति ।। [३] तस्स वा मिच्छपिद्विणो त चेव मिच्छमुत सम्ममुत भवति । कम्हा एव भण्णति ? उच्यते परिणाम विसेसतो, जम्हा ते मिच्छदिद्विणो 'तेहिं [जे० २०९ द्वि०] चेत्र' पुन्नावरविरुद्धेहि मिच्छमुतभणितेहिं 'चोदिवा' भणिता समाणा' इति सन्त , चोदणाणतर आत्मेकालावस्थाया सन्त इत्यर्थ । पुन्छ न सासण पडिवण्णो "त से 29 सपक्खो, तम्मि ना दिट्टी त 'वमेति' परिचयति, छति ति युत्त भवति । जम्हा एव तम्हा व पुन्वमिच्छमुत सम्ममुत से भवति । पर आह-तचावगमसमावसामण्णे सम्मत्त मुताण को पतिविसेसो जेण भष्मति सम्मच परिग्गहिताइ सम्ममुत' ? उच्यते-जहा गाणदसणाण अवबोधसामण्णे भेदो तहा सम्म मुताण पि भविस्सति । १ पयाणि चेष सम्म सर्वासु स्त्रप्रतिषु । वृत्तिकोरगमेव स्त्रपाठः सम्मतोऽस्ति ॥ २ पयाइ मिच्छ सर्वासु सूत्रप्रतिषु । प्रतिकृतोरयमेव सुमपाल सम्मत ॥ ३ च्छहिद्विपरि ख ॥ ४ मिजासय हे मो- म । अपि च सम्यवधुत-मिष्याभुतविवेचकोऽय स्नाश सामु स्त्रप्रतिषु वृत्योरपि च क्रमव्यत्यासेन पत्तते ॥५याचे इतिवं नास्ति बाहरिमायायैरपि नात्यय पाठ स्वीकृतः ॥ ६ द्विया वेदि है ल विना ॥ ७ ससमपहिजे ॥ यति जे. भो । श्रीमळयगिरिपादरे उत्पादानुसारेणय व्याख्यातमस्ति ॥ ९ मिच्छासुर्य है. मा. मु ॥ १० तस्य भावत्येण चा अत्यल्स मा दा ॥ ११ स्मकलायस्थाया सा•॥१२ तस्सेख पक्खो ॥१३ सम्भाव प्रा.दा । ३ 5 सादि-सपज्जवसियादिसुयणाणं] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । ५१ कहं ? उच्यते-जहा विसेसाणं वोधमवात-धारणे नाणं, अवग्रहेहाबोधे च देसणं तहा इमं । तत्ते जा रुती तं सम्मत्तं, तत्थेव जं रोचकं तं मुतं । एवं मिच्छत्तपरिगहे वि वत्तव्यं ६ ।। इदाणि सादि-सपज्जवसाणे- ७१. से किं तं सादीयं सपज्जवसियं ? अणादीयं अपज्जवसियं च ? ईचेयं दुवालसंग गणिपिडगं विउच्छित्तिणयट्ठयाए सादीयं सपज्जवसियं, अविउच्छित्तिणयट्ठयाए अणादीयं अपज्जवसियं। ७१. से किं तं सादीयं इत्यादि । इह पज्जातहितो वोच्छित्तिणतो, तस्स मतेणं दुवालसंगं पि सादि सपज्जवसाणं । कहं ? जहा परगादिभवमवेक्खातो जीवो व्य । दवहितो पुण अब्बोच्छित्तिणतो, तस्स मयेणं दुवा- लसंग पि 'अणादि अपज्जवसाणं च' त्रिकालवत्थायी, जहा पंचत्थिकाय च ॥ एसेवऽत्थो दव्यादिचतुकं पडुच्च चितिज्जति । तत्थ- ७२. तं समासओ चउन्विहं पण्णत्तं, तं जहा-दव्वओ खेत्तओ कालओ भावओ | 10 तत्य दव्वओणं सम्मसुयं एगंपुरिसं पडुच्च सादीयं सपज्जवसियं, बहवे पुरिसे पडुच्च अणादीयं अपज्जवसियं १ । खेत्तओ णं पंच भरहाई पंच एखयाई पडुच्च सादीयं सपज्जवसियं, पंच महाविदेहाइं पडुच्च अणादीयं अपज्जवसिय २। कालओ ण ओसप्पिणिं उस्सप्पिणिं च पडुच्च सादीयं सपज्जवसियं, णोउस्सप्पिणिं णोओसप्पिणिं च पडुच्च अणादीयं अपज्जवसियं ३। भावओ णं जे जया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जंति पण्णविज्जंति परूविज्जंति 15 दंसिज्जति णिदेसिज्जंति उवदंसिज्जंति ते" तहा पडुच्च सादीयं सपज्जवसियं, खाओवस- मियं पुण भावं पडच अणादीयं अपज्जवसियं ४ । ७२. दन्यतो सम्मसुतं एगपुरिसे सादि जं पढमताए पढति; सपज्जवसाणं देवलोगगमणातो, गेलण्णतो वा गहे, पमादेण वा, केवलणाणुप्पत्तितो वा, मिच्छादसणगमणतो वा सपज्जवसाणं, अहवा एगपुरिसस्सेव सादिसपज्जवसाणतणतो। दबतो चेव वहवे पुरिसे पडुच्च अणादि अपज्जवसाणं, अण्णोण्णहितसंताणाविच्छेयत्तणतो, 20 मणुयत्तणं व जहा । खेत्ततो भरहेरवएसु तित्थगर-धम्म-संघातियाण उप्पाद-चोच्छेदत्तणतो सादि सपज्जवसाणं, महाविटेहेमु अनुच्छेदत्तणतो [अणादि अपज्जवसाणं]। कालतो ओसप्पिणीए [जे० २१० प्र०] तिसु, उस्स- प्पिणीए दोनु सायंतं, णोओसप्पिणिणोउस्सप्पिणिततियं महाविदेहकालपलिभागं पडच्च तिमु वि कालेमु अव- द्वितत्तणतो अणादि अपज्जवसाणं । इटाणि भावतः-'जे' इति अणिहिटस्स णिहेसो । 'जदा' इति काले पुचण्हे अवरण्हे वा. दिया रातो वा पुचि जिणेहिं पणत्ता भावा, पच्छा त एव गौतमादिभिः 'आघविजंती'त्यादि, 25 १ साणं अयोधिप्रवातकरणे णाण आ० मो० ॥ २ इच्चेइयं मो० मु० ॥ ३ वुच्छि मो० मु० ॥ ४ अवुच्छि मो० • ॥ ५ तत्य रति पद स० स० ३० लशु० नास्ति ॥ ६ एराव स० शु० ॥ ७ पंच विदेहाई ल० ॥ ८णं उस्सप्पिणि पोसपिणि च ३० मो० न० 1 नाय पाठणि वृत्तिकृतां सम्मत ॥ ९ णोओसप्पिणि णोउस्सप्पिणि च ल० । हारि०वृत्तौ मनुसार पारयात्मस्ति ॥ १० ते तया भावे पहुच्च जे० दे० मो० । ते भावे पहुच ल० । चूर्णिकृता ते तदा पच्च परि पाटनरनिटोन सह ते तहा पदुच इति पाठ आदतोऽस्ति । वृत्तिद्भया पुन ते तया पहुच इत्येव पाटोझीकृतोऽस्ति ।
५२ 10 जिणदासगणिमहत्तरविरड्याए चुण्णीए संजय [सु०७३-७४ 'आधविज्जति आख्यायन्ते सामण्णतो [विसेसतो] विसेससामष्णवो वा, पप्णविज्जति भेदाभेदेहि, तेसि भेदन भेदाण सरूवमक्खाण परूषणा, दसिजति उवमामेत्तेण महा गो तहा गवय इति, णिदसण हेतु दिद्रुतेहि, उपदसणा उवणयोवसघारेहि सधणएहि वा। हवा एगहिता एते। 'ते' इति पण्णवणिज्जाण णिहेसो। 'वहा' इति पण्णवग पण्णवणिजे या पडुच्च सादि सपजवसाण भवति । तत्य पण्णवग पडुच्च उपयोगतो सरविसेसतो पयत्यो आसण 5 विसेसतो य सादि सपज्जवसाण । पण्णवणिज्जे पडच्च गतीतो ठाणतो दुपदेसादिभेदतो रहेगपदेसादिमवणाइतो एगसमयादिमवत्थाणतो वण्णादिपज्जवे य आसज्ज सादि सपज्जवसाण । पाढतर वा "ते तदा पहु" 'त्या' इति काल अनाद्यपर्यवसितम् । भावतः श्रुतज्ञान क्षायोपशमिके भावे नित्य वर्तते स्वामित्वसम्बन्ध इति । ७३ अहवा भवसिद्धीयस्स सुय साईय सपज्जवसिय, अभवसिद्धीयस्स सुय अणा- दीय अपज्जवसिय। ७३ अहवा सादि सपज्जवसाण सपडिपक्खपदेस भगवतुके पदमभंगे सम्मसहितमुतभानो चिंतेययो, अणेगविह वा खयोवसमभाव पडच्च दन्वादिउवयोग वा पडुच्च पदमभगो भवति । वितियमगो मुष्णो, अहवा अभन्वाण अणागतद्भसनोगेण सुतमावो माणितब्बो। चरिम-ततियभगेसु अविसिद्धमुतमावो अभव्य भव्वे पहुंच जोएवम्यो। अभवसिद्धीयस्स इत्यादि मुतसिद्ध । इह चरिम-सतियमगेस अगादिसतमावो दिवो मुताधि कारतो, इधरा मतिभावो वि दद्वन्यो, मति-मताण अण्णोष्णाणुगतत्तणतो। सो य अगादिणाणभावो जहण्णो 15 अजहणजे० २१० वि० मणुकोसो पा इवेज, उकोसो ण भवति, कम्हा? जम्हा उक्कोसनाणमावो केवलियो भवति ॥ तस्स य मुत्ते इम पमाण पढिज्जति- ७४ सव्वागासपदेसग्ग सव्वागासपदेसेहिं अणतगुणिय पज्जवग्गाखर णिष्फज्जाइ । ७४ सव्वागासपदेस इत्यादि स्त्र । सम्वमिति-अपरिसेससव्वग्ग अधिकिचेव भण्णति, सव्व आकास सब्याकास, सम्बागासस्स पदेसा सव्यागासपदेसा, ज एतेसि अग्ग-ज परिमाणं ति बुत् भवति, एत सव्वागासप्प 20 देसरासियग्ग अणतेण रासिणा अण्णेण गुणित ताहे न रासिपमाण लभति त सन्दपज्जवाण अग्ग भवति । पजाया णाम एकेकस्साऽऽगासपदेसस्स जापतो अगरुलडुयादी पज्जवा पण्णाए सम्बे सपिंडिता, तेर्सि सपिडिताण ज अग एतप्पमाण अक्खर लम्मति । [अक्खरपडल] इह अक्सर ति दुविह-गाण अकारादिदममवक्सर च। तत्य नाणमक्खर ति अविसेसतो सम्बनाणमक्सर, 25 जम्हा त जीवातो उप्पण्ण अणष्णभावतणतो णो क्खरति चि, इह पुण सध्यपज्जायतुलत्तणतो केवलणाग घेत्तव्य, जम्हा केवल सव्वदव्यपज्जायविण्णत्तिसमत्थ भवति । तच केवल ये पत्ताइ, तस्स वि परिमाण इमेण चैव विधिणा माणितव्य-सव्यागासपदेसग्ग' इत्यादि पूर्ववत् । ते य सव्वदचपज्जाया समासतो तीस इमेण विषिणा-गुरू लहू गुरुलहू शुरुलहू एते चतुरो, पच वण्णा, दो गधा, पच रसा, अटु फासा, अणित्यत्व सठाणसहिता छ सठाणा, एवे झुत्तदच्चे सव्वे समवति । अमुचदम्बेसु अगुगलहू चेव एको पज्जायो सभवइ । १ भापविजति' ति प्राकृतल्या याख्याय ते सामान्य विशेषाभ्यां कथ्यन्त इत्यर्थः इति हारिनन्दिवृत्तौ । 'भग्धविचति' ति प्राकृतत्वाद् आख्यायन्ते सामान्यरूपवया विशेषरूपतया या कप्यन्ते इत्यर्थः इति मलयादिवृत्ती ॥ २ सापि सप है । साई सप • ॥३ पजपक्चर वे मो म पिआमलातौ २६८ पत्रे मन्दिात्रपाठोदरणे । माय पाठभूणि वृत्तिका सम्मतः ॥
पज्जवग्गक्खरं अक्खरपडलं च] सिरिदैववायगविरइयं णंदीसुत्तं । ५३ एत्थ य एकेके भेदे अणंता भेदा संभवति । किंच मुत्तदव्वेमु णतविसेसतो अणियोगधरा अट्ठावीसं मूलपज्जाए भणति । कई ? उच्यते-ते चेव तीसं सब्बगुरु-लहुपज्जाएहि विहणा । जतो भणितं- निच्छयतो सव्वगुरुं सव्वलहुं वा ण विज्जते दव्वं । ववहारतो तु जुज्जति वादरवधेमु णण्णेसु ॥ १॥ [कल्पमा. गा. ६५ ] णिच्छयणयमतेण सबधा गुरुं लहुं वा नत्थि दव्वं । जदि हवेज तो तस्स पडमाणस्स ण विरोधो केणइ 5 हवेज, सव्वलहुस्स वा उप्पयमाणस्स, जतो य णिचपडणं उप्पयणं वा ण विज्जति तम्हा जि० २११ प्र०] सव्वधा गुरुं लहुं वा दव्वं नस्थि । वबहारणयादेसेणं पुण दो वि अस्थि, जहा-सव्वगुरु कोडिसिला वज्जं वा, सव्वलहुं च धूम-उलुगपत्तादी। एवं ववहारणयादेसतो वादरपरिणामपरिणतेसु खंधेमु गुरुभावो लहुभावो य भवति । 'णऽण्णेसु' त्ति ण सुहुमपरिणामेसु त्ति वुत्तं भवति ।। के पुण मुहुमपरिणता दन्वा ? के बा बादरपरिणता ? उच्यते-परमाणूतो आरद्धं एगुत्तरवढितेसु ठाणेसु 10 जाब मुहुमो अणंतपदेसिओ खंधो, एतेमु ठाणेसु मुहुमपरिणता दवा लम्भंति, एतेसिं च अगरुलहुपज्जाया भवति । वादरो पुण परमाणतो आरब्भ जाव असंखेजपदेसितो खंधो ताव ण लब्भति, परतो बादरपरिणामो खंधो लब्भति, सो य जहण्यो वि अणंतपदेसिओ नियमा भवति, तातो एगुत्तरवदिया अणंता अर्णताणावडिया वादा संधा। ते य ओराल-विउव्वा-ऽऽहार-तेयवग्गणासु भवंति, णियमा य ते गुरुलहुपेजाई भवंति । सीसो . पुच्छति-जे रूविगुरुलहू दन्या अगुरुलहू य तेसिं के थोवा बहू वा ? उच्यते-थोवाणि गुरुलहुदवाणि, तेहितो 15 रूबीअगलहुयदव्या अणंतगुणा । कहं पुण ते अणंतगुणा भवंति ? उच्यते-धूराणं अणंतपदेसिताण खंधाणं सटाणे अणंतातो वग्गणातो, मुहुमाणं पि अणंतातो वग्गणातो, थूरवग्गणठाणेहिंतो उवरि भासादिवग्गणट्ठाणेसु एकेके अणंतातो चम्गणातो, हेद्वतो वि शूरवगणहाणाणं परमाणूणं एका वग्गणा, एवं जाब दसपदेसियाणं संखेजपदे- सियाणं संखेजातो बग्गणातो, असंखेजपदेसिताणं असंखेजाओ बग्गणाओ, एतेणं कारणेणं गुरुलहुदब्वेहितो स्वीअगरुलहुदव्याणि अणंतगुणाणि भवंति । आदेसतरेण वा वादरठाणेसु वि मुहुमपरिणामो अविरुद्धो त्ति 20 माणितव्यो । उक्तं च- गुरुलहुदव्वेहितो अगरुलहूपज्जया अणंतगुणा । उभयपडिसेहिता पुण अणंतकप्पा [जे० २११ द्वि०] बहुविकप्पा ॥ २॥ [ कल्पमा. गा. ६७] गुरुलहुपज्जायजुत्ता जे दन्या तेसिं चेव जे गुरुलहुपजाया देहितो रूविगलहुयदव्याण जे अगरुल- हुयपज्जाया ते आधारभणंतगुणतणतो अणंतगुणा एव भवतीत्यर्थः । 'उभयपडिसेधिता णाम' अगरुयलहुया । 25 'पुण' विसेसणे । किं विसेसेति ? उच्यते-अरूविदम्बाधारा इत्यर्थः । अहवा 'उभयपडिसेधिता णाम' वादर- मुहमभाववज्जिता जे दव्या, अरुविण इत्यर्थः । तेग्मु 'अणंतकप्पा णाम अणंतप्रकारा। कहं ? उच्यते-आकासत्थि- काए देस-पदेसपरिकप्पणाए, एवं धम्मादिमु वि । 'बहुविकप्प' त्ति तेसिं अणंतकप्पाणं एकेको अणंतप्रकारो । कहं पुण ? उच्यते-जम्हा एकेके आगासप्पदेसे अणंता अगरुलहुयपज्जाया भवंति तम्हा ते वहुविकप त्ति । ते य मन्नण्णुश्यणतो मद्धेया इति ॥ १ ‘पजाया भवंति आ० दा० ॥ २ अस्या गायाया एतदुत्तरादमेव कल्पमाप्ये वर्तते ॥ ३ यविरुविण जे० । अदायिण दा० ॥ ४ णाम' पोका अणंत आ० दा० ॥ 30 ५४ 5 १ 15 जिणदासगणिमहचरविरइयाए चुण्णीए सजुय [ ជួប ១ रूवि-अरूविदच्चाण य पजायअप्पबहु इम भण्णति-रूविदवाण जे य अगलहुपज्जाया ते पाणाछेदेण पिडिता, एतेहितो एकरस चेव अनुत्तदवस जे अगस्यलहुपजाया ते अणतगुणा भवतीत्यर्थ । एत्य सीसो भणति-केत्रतिवेहि पुण मागेहि मुत्तदव्वाण पिंडितपन्जाएहितो अमुत्तदघाण अगुरुलहुपज्जाया अणतगुणा भवति ? उच्यते-नास्त्यत्र परिमाण, बहुधा वि अणतएण गुणिजमाणे अमुत्तदयपज्जाएर गत्यि परिमाण ।। एवगते परिमाणाथै इम मण्णति- केण हवेज निरोधो गरुलहूपज्जयाण तु अमुचे ?। अचेतमसजोगो जहित पुण तन्निवक्खस्स ॥३॥ [कल्पमा गा ६९] जतो अमुत्तदव्याण बहुमा वि अणतरण गुणिज्जमाणे पंजायण ण भवति । ततो 'केनेति नान्येन प्रकारेण 'हवेज' ति भवे 'गिरोहो णाम' परिमाण परिच्छेदेत्यर्थ , कि मुत्तदव्वेहितो अमुत्तदवाण अगरुपल- 10 हुपज्जायपरिमाण भविस्सति ? चि, नेत्युच्यते, 'अवतमसजोगो' 'अचत' अतीच अयुजमाणो जम्हा सजोगी। [जे० २१२ ० ] 'जहिय' ति यत्र । 'पुण' विसेसणे। किं विसेसयति ? रूविदव्वे । तदित्यनेन अमुत्तदवपक्खो, वस्स विवक्खो-मुत्तदव्यपगारो, तेस पज्जाययोवत्तणतो अमुत्तदव्वेस य पजायाण अतीवबहुयत्तणतो, अतो मुत्त- दम्वेहितो अमुत्तदन्यपजायाण परिमाणकरणसजोगो एगतेणेव ण जुजते, ण घटतेत्यर्थ ॥ एव तु अणतेहि गरुलहपज्जएहिं सजुत्त । होति अमुच दन्च अरूविकायाण तु चतुण्ह ॥ ४॥ [कल्पमा गा ७०] 'एवमिति' यथेदमुक्तं । सेस कठ । परि 'अरूविकावाण तु चतुष्ह' ति धम्माऽधम्मागास-जीवाण एतेसिं चतुण्ड वि नियमा पत्तेय अणता गरुपलहुयपज्जाया भवति । कह ? उच्यते-जम्हा एतेसिं एकेको पदेसो अणतेहिं अगरुयलहुयपज्जाएहिं सजुत्तो तम्हा धम्मा ऽयम्मेगजीवस्स य असखेजपदेसत्तणतो असखेजमणता पत्तेय भवति । आगासपदेसअपरिमाणतणतो पुण तस्स नत्यि परिमाण, तहा वि सववहारतो अणता उक्ता इत्यर्थ ॥ एव ताव ज्ञेयमनतमुक्तम् । अथेदानी तत् केवलज्ञान यथाऽनन्त तपेदमुच्यते- उवलद्धी० गाहा । [कल्पमा गा ७१] सन्वे रूविदव्या ऽसविदन्वाण य जावतिया गुरुलहुपज्जाता सब्वे अरूविदव्याण य जे अगलहुपजाया एते सव्वे जुगव जाणति पासति य जतो, एवमणतं केवलनाणमक्खर ति समसगमभिहितम् । इदाणि 'अकारादिदव्यमुतमक्खर ति जति अविसेसतो गाणमक्खरमुक्त णेय वा तहा वि रूढिवसतो जहा 25 पकय वहा सरक्खर बजणक्खर वष्णक्खर वा मण्णति । तत्य 'सरक्खर' अक्खर अक्खर सरति-च्छति सरति वा इत्यतो सरक्खर अकारादि, वजणस्स वा फुडममिधाण सरति, ण वा सरक्खरमतरेण अत्यो समरिजइ चि सरक्खरं। ककारादि वजणक्सरा, व्यज्यते तेनार्थ इति प्रदीपेन घटादिवद् व्यजनातरम् । तेहिं चेव सर-चजणक्खरेहि जदा अत्यो वणिजति अमिलप्यते वा तदा ते वणक्वर मण्णति । इह एककस्स अकारादिहकामिक्खरस्स स-परप- जायमेदा इमे-अकारस्स य पन्जाया जहा दीह इस्व-प्लुतात्रय , तत्य दीहो [जे० २१२ वि०] उदाचा ऽनुदाच-स्व- 30 रितभेद , एव इस्व-प्लुतावपि, पुनरप्येकैको सानुनासिको निरनुनासिकब, इत्येव अष्टादशभेदः । एव सेसक्खराण वि जहासमव भेदा भावितव्या । अहवा सरविसेसतो एकमक्खरस्स अणवा सपजया । एत्य अकारस्स १ पज्जायग जे दा ॥२ अपुजमाणो आ• ॥ ३ तसरक्सरस्स मा दा ॥ ४ तलिमेदा, जे दा ॥ 20 ५५ " अक्खरपडलं] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । अकारजातीसामण्णतो सपज्जाया अट्ठारस, सेसा परपज्जाया, एवं संखेज्जा पन्जाया । अहवा अकारादिसरा कका- रादिवंजणा केवला अण्णसहिता वा जं अभिलावं लभे स तस्स सपज्जायो, सेसा तस्स परपज्जाया, ते य सम्वे वि अणंता । जतो सुते भणितं-"अणता गमा अणता पज्जया"। [सू० ८५ तः ९४ आदि] भणितं च- पण्णवणिज्जा० गाहा [कल्पभा. गा. ९६४] । अक्खरलंभेण गाहा [विशेषा. गा. १४३] । अणभिलप्पाण अभिलप्पा अणंतभागो, तेसि पि अणंतभागो सुतनिबद्धो इति । अहवा अकारादिअक्खराण पज्जाया सम्बदन्य- 5 पज्जायरासिप्पमाणमेत्ता भवंति । कहं ? उच्यते-जे अभिलावतो संजुत्ता-ऽसंजुत्तेहिं अक्सरेहिं उदत्ता-ऽणुदत्तेहि य सरेहि जावतिए अभिलावे अभिलप्पे य लभति ते सव्वे तस्स सपज्जया, सेसा सवे तस्सेव परपज्जया। आकासं मोत्तुं सव्यस्स सपज्जएहितो परपज्जया अणंतगुणा । आकासस्स सपज्जएहितो परपज्जया अणंतभागे। पर आह-कहं तस्सेव परपज्जया य? गणु विरुद्धं, उच्यते-सव्वक्खराण घडाइवत्थुणो वा दुविहा पज्जया चिंतिज्जंति- संवद्धा असंबद्धा य । तत्थ अकारस्स अकारपज्जया अकारभावत्तणतो अत्थित्वेण संबद्धा, घडागारावस्थायां 10 घटपर्यायवत् । ते चेत्र पत्थित्तेणं असंबद्धा, नत्थित्तस्स अभावत्तगतो, जहा घटाकारावस्थायां मृत्पर्यायवत् । अकारे इकारादिपर्याया णत्थित्तेण संबद्धा, अकारे पत्थित्तभावतणतो, जहा मृदवस्थायां पिंडाकारपर्यायवतः ते चेत्र अत्थित्तेण असंबद्धा, अस्थित्तअभावत्तणतो, घटाद्यवस्थायां पटपर्यायवत् । एवं अक्खरेसु घडाइपज्जाया विचिंतणिज्जा, घडादिसु य अका(? क्ख)रपज्जाया, इच्चेवं एक्कमक्खरं सव्वपज्जीयमं ॥ [जे० २१३ प्र०] एवं सर्वात्मकाः सर्वपर्यायाः, अतो भण्णति-सव्वागासपदेसग्गं अणंतगुणितं पज्जवग्गं अक्खरं निष्फजति ।। 15 एवं नाणक्खरं अकारादिअक्खरं णेयअक्खरं च तिण्णि वि अणंताऽभिहिता । एत्य नाणक्खरं जं तं जीवस्स संसारत्थस्स ण कताइ ण भवति त्ति । जतो भणितं ७५, सव्वजीवाणं पि य णं अक्सरस्स अणंतभागो णिबुग्घाडियओ, जति पुण सो वि आवरिज्जा तेणं जीवो अजीवत्तं पावेजा। सुठ्ठ वि मेहसमुदए होति पभा चंद-सूराणं । से तं सौदीयं सपज्जवसियं । से तं अणादीतं अपज्जवसितं ७।८।९।१०। ७५. सव्वजीवाणं पि य णं इत्यादि सुत्तं । सव्वजीवग्गहणे वि सति 'अवि' पदत्थसंभावणे, किं संभाव- यति ? उम-सिद्धे मोत्तुं, चसदतो य भवत्थकेवली मोत्तुं । 'ण'कारो वाक्यालंकारे। अक्खरं ति-नाणं, तस्स अणं- १ रेसु णत्थित्तभावत्तणतो घडाइपज्जाया आ० दा० । रेसु घडेसु घड इव पज्जाया मो० ॥ २'जायमयं । पवं आ० दा० । 'जायमयं । एवं सर्वत्रकाः सर्व मो० ॥ ३ द्वादगारनयचक्रवृत्तौ इद सूत्रमित्य वर्तते-सव्वजीवाणं पिय गं अक्सरस्स अणंततमो भागो णिच्चुग्याडितमओ । तं पि जदि आवरिजिन तेण जोवा यजीवतं पावे । सुछ वि मेहसमुदये होइ पभा चंद-सुराणं ॥१॥ सना च नयचा प्रन्यन्तरे अणंतभागो रति जीवो अजीवनं इति च पाठमेदोऽप्युपलभ्यते ॥ ४ "डिओ स० चूर्णि च विना ॥ ५ बन जूनिता चूनी जति पुण सो वि वरिजेज इत्यादि गाथवोल्लिखिताऽस्ति, नयचकोद्धरणेऽपि पाठमेटेन गार्थव दृश्यते, जन्मास्वागृतसूनप्रतिषु ये विविधा पाटनेटा वनन्ते, यच पाटस्य स्वरूपमीक्ष्यते, एतत्सर्वविचारणेन सम्भाव्यते यदत्र सूत्रे गायव भ्रष्टता माल । तिलोराचायो पुनरत्र गिय गाया वा मान्याऽस्ति । इति न मन्यगवगम्यते, तथापि वृत्तिस्वरूपावलोकनेन गायव तेषा गम्मानि ममापते ॥ ६ सो वि परिजेजा ० ० । सो वाऽऽवरिज्जेज स० ॥ ७ तेणं जे० मो० मु० ॥ ८ अलीवतं २० ॥ ९ पावेज त० ॥ १० सादि सर्प ० ० । समादि सप २० ॥ 20 H 5 ५६ जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याए चुण्णीए संजुयं [मु०७६-८१ तभागो निबुग्याडियतो, सो केवलम्स न समवति, केवलस्स अविभागसपुग्णचणतो य, ओपीए वि ण समवति, अणतमागस्स अभावतणतो, अवधे' असख्येयप्रकृतिसमवादित्यर्थ , मणपज्जवनाणे वि रिजु विपुलदुमेदसमवतो अणवभागो ण भवति, किंच अवधिमणपज्जवाण णिचुग्याडअभावतणतो इह अणधिकारो, परिसिढे मतिमते ति 'अक्खरस्स अणवभागो निचुग्याडिययो अधिकतमुतस्स चा अक्खरस्स अणतमागो निचुम्याडियतो। जत्य मुत तत्य मतिणाण पि घेत्तन्न । 'णि ति सबकाल । 'उग्याडिततो ति णाऽऽधरिजति । सो य अणतमागो पुढवादिएगिदियाण वि पचण्ह निचुन्याडो, अइवा सम्बजहण्णो अगवभागो निशुग्याडो पुढविकाइए, चैतन्यमान- मात्मन । त च उकोसयीणिदिसहितनाण-दसणावरणोदए वि णो आबरिज्जति । नति पुण सो विपरिजेज तेण जीवो अजीवय पावे । मुछवि मेहसमुदए होति पहा चद-मुराण ॥१॥ [कल्पमाष्ये गा ७४] 10 जम्हा सो णाऽवरिजति तम्हा जीवो जीवत्त ण परिचयति । सो य कम्हा गावरिजति उच्यते-दव्य- सभावसरूवतणतो। इह दिहतो नहा-मुद्द वि मेहच्यादिए णमे चद खरप्पहा मेहपेडले मेत्तु दव्वे ओमासति, तहा अगदेहिं णाण-दसणावरणकम्मपुग्गलेहिं एकेको आतपदेसो आवेदियपरिवेडितो ते कम्मावरणपडले भेत्तु नाणस अणतभागो उम्बरति, [जे० २१३ द्वि.] ततो य से अन्वत नाणमक्खर सवजहष्ण भवति । ततो पुदविकाइ- हितो आउकातियाण अणतमागेण विसद्धतर नाणमक्खर, एव कमेण तेउबाउ-चणस्सति वेइदिय तेइदिय-चतुरि- 15 दिय-असष्णिपदिय-सणिपदियाण य विमुदतर भवतीत्यर्थ । ७।८।९।१० ॥ भणित सादि सपज्जवसित अणादि अपज्जवसित च । एत्येव प्रसगतो अक्खरपडल भणित । एव बहुवचन्च अक्सरसडल समासतोऽभिहित । वित्यरतो से अस्थ जिण-चोदसपुनिया कहए ॥१॥ [॥ अक्खरपडल सम्मत्त॥] इदार्णि गमियाऽगमिय- ७६ से किं त गमिय' गमिय दिद्विवाओ। अगमिय कालित सुय। से च गमिय। से न अगमिय ११ ॥ १२॥ ७६ गमबहुलवणतो गमिय । तस्स लक्खण-आदि-मज्झ ऽवसाणे वा किंचिविसेसजुत्त मुत्त दुगादिस- तम्गसो तमेव पढिजमाण गमिय मण्णति, त च एवविहमुस्सण दिडिवातो। अण्णोणक्खराभिषाणहित ज पदिजति त अगमिय, त च प्रायसो आयारादि कालियसुत ११ ॥१२॥ उक्त गमिया ऽगमिय । इदाणि अगाणग-पविद्धन च गमिया गमिय चेव समासतो अगाऽणगपवित मण्णति । कह ? उच्यते-सवमवस्स तन्मावतगतवणतो। ७७ अहवा त समासओ दुविह पण्णत, त जहा-अगपविट्ठ अगेबाहिर च । ७७ अहवा अरिहतमम्गोवदिवाणुसारि मृत ज त समासतो दुविह इत्यादि मुत्त । १ पडलं था. दा. ॥ २ पत्थ यहु का दा ॥ ३ महवा इति सं० ० ० ० नास्ति ॥ ४ व अंग' वे.॥ ५ अणगपविच स.सं २ क शु.॥ 20 25 .
गमियाऽगामियंगवाहिरुकालियाइसुयणाणं ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुतं । पायदुर्ग जंघोरू गातदुगद्धं तु दो य वाहूयो । गीवा सिरं च पुरिसो वारसअंगो सुतविसिट्ठो ॥ १ ॥ इच्चेतस्स सुतपुरिसस्स जं मुतं अंगभावभागट्टितं तं अंगपविलु भण्णति । जं पुण एतस्सेव सुतपुरिसस्स बहरे- गद्वितं तं अंगवाहिरं ति भण्णति । अहवा- गणहरकतमगगतं जंकत थेरेहिं वाहिरं तं च । णियतं वंगपविट्ठ अणियत सुत बाहिरं भणितं ॥१॥ 5 لا 15 ७८. से किं तं अंगबाहिरं ? अंगबाहिरं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-आवस्सगं च आव- स्सगवइरित्तं च । ७९. से किं तं आवस्सगं? आवस्सगं छव्विहं पण्णत्तं, तं जहा-सामायियं १ चउ- वीसत्थओ २ वंदैणयं ३ पडिक्कमणं ४ काउस्सग्गो ५ पञ्चक्खाणं ६। से तं आवस्सयं । ७८-७९. से कितं अंगबाहिरमित्यादि । कंठं ॥ ८०. से किं तं आवस्सयवइरितं ? आवस्सयवइरितं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-कालियं च उकालियं च। ८०. आवस्तगवतिरित्तं दुविहं-कालियं उक्कालियं च । तत्थ 'कालियं जं दिण-रातीणं पढम- चरिमपोरिसीमु पढिज्जति । जं पुण कालवेलवजं पढिज्जति तं उकालियं ॥ तत्थ- ८१. से कि त उकालियं ? उक्कालियं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा-दसवेयालियं १ कप्पियाकप्षियं २ चुलकप्पसुतं ३ महाकप्पसुतं ४ ओवाइयं ५ रायपसेणियं ६ जीवाभिगमो ७ पण्णवणा ८ महापण्णवणा ९ पमायप्पमादं १० नंदी ११ अणुओगदाराई १२ देविदत्थओ १३ तंदुलवेयालियं १४ चंदावेन्झयं १५ सुरपण्णत्ती १६ पोरिसिमंडलं १७ मंडलप्पवेसो १८ विज्जाचरणविणिच्छओ १९ गणिविज्जा २० झाणविभत्ती २१ मरणविभत्ती २२ आयवि- 20 सोही २३ वीयरायसुतं २४ संलेहणासुतं २५ विहारकप्पो २६ चरणविही २७ आउरपञ्चखाणं २८ महापच्चक्खाणं २९ । से तं उकालियं । ८१. उकालियं अणेगविहं दसवेयालियादि । कप्पमकप्पं च जत्थ मुते वणिजति तं कप्पियाकप्पियं २। कप्पं जत्य मुते वणितं तं कप्पसुतं, अणेगविहचरणकप्पणाकप्पयं [जे० २१४ प्र० ] च कप्पमुतं । तं दुविद-चुल्लं महंतं च । चुलं ति-बहुतरं अवित्थरत्यं अप्पगंध च चुल्लकप्पमुनं ३ । महत्थं महागडं च महा- 25 १-२ अगंगपविट्ठ २० स डे० ल० शु० ॥ ३ बंदणं २० स० दे० ल० शु० ॥ ४ काओसग्गो मु० ॥ ५ "ओवाटयति भाद परेपे औपचारिकम्” इति पाक्षिकसूत्रवृत्तौ । उववाइयं शु०म० ॥ ६ रायपलेणीयं प० । रायपसेणडयं हैं। २.5• || ७ 'पाण २९ पचमाइ । से तं जे मो० नु० । एवमाइ ति मूत्रपट चूर्णि-वृत्तिकदिनास्ति व्याग्न्यातम् । अपि ब-भग "रायामिद न दयते" इति विपरमपि वनंते ॥
जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्गीए संजय [सु०८२ कप्पसुत ४ । एमेव [पण्णवणा] पष्णपणत्यो सवित्यरो ८ । अण्णे य सविस्थरत्या जत्य भणिता सा महा पण्णवणा ९ । मज्जादियो पचविही पमातो, तेस चेव आभोगपुब्धिया उपरती अप्पमातो, एते मत्य सवित्यरत्या दसिजति तमज्झयण पमादप्पमा १० । रचरित पणविज्जते जत्य सा सूरपण्णत्ती १६ । पुरिसो चि-सकू पुरिससरीर वा, ततो पुरिसातो निष्फण्णा पोरिसी, एव सव्वस्स वत्पुणो जदा स्वप्रमाणा च्छाया भवति तदा 5 पोरिसी भवति, एत पोरिसिप्रमाण उत्तरायणस्स अते दक्षिणायणस्स य आदीए एक दिण भवति, अतो पर अब एकसहिमागा आलस्स दक्खिणायणे बड्डति, उत्तरायणे य इस्सति, एव मडले मडले अण्णोष्णा पोरिसी नत्य अज्झयणे दसिजति तमझयण पोरिसिमडल १७ । चदस्स पुरस्स य दाहिणुत्तरेसु मडलेस जहा मडलावो मडछे पवेसो तहा वणिज्जति जत्थज्झयणे तमज्झयण मडलप्पवेसो १८ । विज ति-नाण, चरण चारित्त, विविषो विसिहो वा णिच्छयो-सन्मावो स्वरूपमित्यर्थ , फल वा निच्छयो, त जत्यज्झयणे वणिजति तमज्झयण विजा 10 चरणविणिच्छयो १९ । सवाल-वुड्डाउलो गच्छो गणो, सो जस्स अत्यि सो गणी, विज ति-गाण, त च जोइसनिमिचगत गातु पसत्येस इमे कज्जे करेति, त जहा-पन्नावणा १ सामाइयारोवण २ उवठ्ठावणा ३ सतस्स उद्देस-समुद्देसा ऽणुण्यातो ४ गणारोवणं ५ दिसाणुग्णा ६ खेतेमु य णिन्गम पवेसा ७, एमाझ्या कजा जेम्स तिहि करण-णक्खत्त-मूहुन-जोगेस य जे जत्य करणिज्जा [जे० २१४ द्वि०] ते जत्यऽज्झयणे वणिज्जति तममायण गणिविना २० । पिरमज्झक्साण झाण, विभयण विभची, सभेद झाण जत्य वणिजति अज्झयणे तमझयण 15 झाणविमत्ती २१ । मरण-पाणपरिचागो, विमयण-विमती, पसत्यमपसत्याणि समेदाणि मरणाणि जत्य वणिज्जति अझयणे तमझयण मरणविभत्ती २२ । आत ति-आत्मा, तस्स विसोही तवेण चरणगुणेहिं य आलोयणाविहाणेण य जहा भवति तदा जत्य अन्झयणे वणिज्जति तमन्झयण भातविसोही २३ । सरागो वीतरागो य एतेसि जत्य सरूवकहणा, विसेसतो वीतरागस, तमज्झयण वीतरागसुत २४ । बाधादो निव्वापानो वा भवसलेहो कसायादिमावसलेहो य जो जहा कातन्नो तहा वणिजते जत्यऽज्झयणे तमायण सलेहणासुत 20 २५ । विहरण विहारो, तस्स कप्पो-विधि त्ति वृत्त भवति, सो निणकप्पे थेरकप्पे वा, निणकप्पे पडिम-अहारूद परिहारिया य ददुवा, एतेसि सवित्थरो विधी जत्य अज्झयणे [वणिजति] वमज्झयण विहारकप्पो २६ । चरण-पारित, तस्स विही चरणविही, सभेदो चरणविही वणिज्जति जत्य अझयणे तमझयण चरणविही २७ । आउरो-गिलाणो, त किरियातीत गातु गीतत्या पञ्चक्खाति, दिणे दिणे दज्वहास करेंता अते य सब्बवदात गवाए भचे वेरग जणेता मचे निचण्हस्स भवचरिमपञ्चक्खाण कारेंति, एत जत्यऽझयणे सवित्थर वणिजइ 2 तमझयण आउरपचक्खाण २८ । पेरकप्पेण जिणकप्पेण वा वितरिता अते थेरकप्पिया वारस वासे सैलेड करेचा, जिणकप्पिया पुण विहारेणेव [जे० २१५ प्र०] सलीना वहा वि जहाजुचे सलेह करेचा निवाघात सचेद्वा चेव भवचरिम पञ्चक्षति, एत सवित्थर जत्यज्मयणे वणिजति तमज्ययण महापच्चक्खाण २९ । एते अन्झयणा जहाभिधाणत्या मणिया॥ उक्त उकालिय । इदाणि कालिय- ८२ से कि त कालिय' कालिय अणेगविहं पण्णत, त जहा-उत्तरज्झयणाई ? दसाओ २ कप्पो ३ ववहारो ४ णिसीह ५ महाणिसीह ६ इसिभासियाइ ७ जबुद्दीवषण्णत्ती १ "जीवादीनां प्रमापन प्रशापना इति हारिण्यचौ ॥ २ कालिय अणयपषिद्ध कालिय मणगपविलु भणेय . से शु• । नाय पाठचूणि धृतिकवां सम्मतोऽस्ति ॥ 300 १ 5 10 कालियसुर्य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीयुत्तं । ५९ ८ दीवसागरपण्णत्ती ९ चंदपण्णत्ती १० खुड्डियाविमाणपविभत्ती ११ महलियाविमाणपविभत्ती १२ अंगचूलिया १३ वैग्गचूलिया १४ विवाहचूलिया १५ अरुणोववाए १६ गरुलोववाए १७ धरणोववाए १८ वेसमणोववाए १९ देविदोववाए २० वेलंधरोववाए २१ उट्ठाणसुर्य २२ समु- ट्ठाणसुयं २३ नागपरियाणियाओ २४ निरयावलियाओ २५ कप्पवडिसियाओ २६ पुफियाओ २७ पुष्पचूलियाओ २८ वण्हीदसाओ २९ । ८२. से किं तं कालिय इत्यादि मुत्तं । जं इमस्स निसीहस्स मुत्तत्थेहिं वित्थिण्णतरं तं महाणिसीह ६। सोहम्मादिसु जे चिमणा ते आवलितेतरहिते पतिविभागेण विभयइ जमज्झयणं तं विमाणपविभत्ती भण्णति । ते य दो अज्झयणा-तत्थेगं सुत्तत्थेहिं संखित्ततरं खुडं ति ११, वितियं मुत्त्येहिं विस्थिण्णतरं महल्लं ति १२ । अंगस्स चूलिता जहा-आयारस्स पंच चूलातो, दिडिवातस्स वा चूला १३ । वग्गो ति विवक्खाव- सातो अज्झयणादिसमूहो चग्गो, जहा अंतकडदसाणं अट्ठ वग्गा, अणुत्तरोववातियदसाणं तिण्णि वग्गा, तेसिं चूला वग्गचूला १४ । वियाहो भगवती, तीए चूला वियाहचूला, पुनभणितो अभणिओ य समासतो चूलाए अर्थों भण्यतेत्यर्थः १५। अरुणे णाम देवे तस्समयनिवद्धे अज्झयणे, जाहे तं अज्झयण उवउत्ते समाणे अणगारे परियट्रेति ताहे से अरुणे देवे समयनिवद्धत्तणतो चलितासणे जेणेव से समणे तेणेव आगच्छित्ता ओवयति, ताहे समणस्स पुरतो अंतद्धिते कतंजली उवउत्ते मुणेमाणे चिट्ठति, समत्ते य भणति-सुभासितं, बरेह बरं ति, इहलोगणिप्पिवासे से समणे पडिभणति-ण मे वरेण अट्ठो त्ति, ताहे से पदाहिणं करेत्ता णमंसित्ता य पडिगच्छति १६ । एवं गरुले 15 १ वंगचू ख० स० ल० शु० ॥ २ वियाह शु० ल० ॥ ३ उववाएपदान्तानि सूत्रनामानि अस्मदादृतास्वष्टासु सूत्रप्रतिषु चूादशेषु हारिवृत्तौ मलयगिरिवृत्तौ पाक्षिकसूत्रयशोदेवीयवृत्तौ च क्रमव्यत्यासेन न्यूनाधिकभावेन च वर्तन्ते । तथाहि- अरुणोववाए वरुणोववाए गरुलोववाए धरणोववाए वेसमणोववाए वेलंघरोववार देविंदोववाए उहाण जेसू० मोसू० मुसू० । अरुणोववाए वरुणोववाए गरुलोववाए धरणोववाए वेलंघरोववाए देविंदोववाए वेसमणोववाए उहाण ३० । अरुणोववाए वरुणोववाए गरुलोववाए वेलंघरोववाए देविंदोववाए वेसमणोववाए उहाण स० शु० । अरुणोववाए वरुणोववाए गरुलोववाए वेलंधरोववाए देविदोववाए उट्ठाण ख० । अरुणोववाए वेलंघरोववाए देविंदोववाए वेस- मणोववाए उट्ठाण ल० । अथ च-अरुणोववाए इति सूत्रनामव्याख्यानानन्तर हरिभद्रवृत्तौ "एव वरुणोववादादिसु वि भाणियन्व" इति, मलयगिरिवृत्तौ च “एव गरुडोपपातादिष्वपि भावना कार्या” इति, पाक्षिकसूत्रवृत्तौ च “एव वरुणोपपात-गरुडोपपात- वैश्रमणोपपात-वेलन्धरोपपात-देवेन्द्रोपपातेष्वपि वाच्यम्” इति निर्दिष्ट दृश्यते । चूादर्शेषु पुन' पाठभेदत्रय दृश्यते-१ श्री- सागरानन्दरिमुद्रिते चूर्णादर्श (पत्र ४९] “एव गरुले वरुणे वेसमणे सक्क देविंदे वेलंधरे यत्ति” इति, २ श्रीविजयदान- रिम्पादित मुद्रितचूण्ादर्श [पत्र ९०-१] ‘एव वरुणे गरुले घरणे वेसमणे वेलधरे सके-देविदे यत्ति" इति, ३ अस्मा- भिरारते शुद्धतमे जेसलमेरुसत्के तालपत्रीयप्राचीनतमचूार्श च "एव गरुले घरणे वेसमणे सक्के देविंदे वेलधरे यत्ति" इति च । श्रीसागरानन्दसुरीयो वाचनाभेद आदर्शान्तरेषु प्राप्यते, श्रीदानसूरीयो वाचनामेदस्तु नोपलभ्यते कस्मिंश्चिदष्यादर्श इत्यत सम्भा- न्यते-श्रीमगिनिरिभिः मुद्रितमुत्रादग-चूादर्शान्तर-हारि०वृत्ति-पाक्षिकवृत्त्याद्यवलोकनेन पाठगलनमम्भावनया सूत्रनामप्रक्षेप क्रममेद- भापि पिहिलोऽस्तीनि । अस्माभिस्तु जेसलमेरीयचूर्णिप्रत्यनुसारेण सूत्रपाठो मूले स्थापितोऽस्तीति ॥ ४ परियावणियाओ जे० स० डे० शु० । परियापलियाओ ० मो० ल० ॥ ५ याओ कप्पियानो कप्पबडि मासु स्त्रप्रतिपु । श्रीमता चूर्णिकृता कप्पियाओ इति नाम : नाम्नि ! किस-मास्वपि नन्दिसूत्रप्रतिषु एतन्नाम दृश्यते, श्रीहरिभद्रसूरि-मलयगिरिवृत्त्योः पाक्षिकसूत्रटीकायां चापाग्यान पनते । त्याहि-"कप्पियाओ' ति मौवमांटिकल्पगतवतव्यतागोचग प्रन्यपद्धतय कल्पिका उच्यन्ते ।" मन्दीहारित्ति । दिल्लमान्व व्याल्या मलयगिरिवृत्तौ पाक्षिकटीकायां च वर्तते ॥ ६ वण्हीटसाओ इति नाम्न प्राक् पदोपालो इत्यधिर नाम ० । नंद नाम चूर्णि-वृत्त्यादिपु व्यायात निर्दिष्ट वाऽस्ति ॥ ७ एवं गरुले वरुणे वेसमणे सक्के- देहि बेरघरे पतिा. मो० । एवं वरणे गरुले धरणे वेसमणे वेलंघरे सक्के देविदे यत्ति दा० ॥
६० जिणदासगणिमहत्तरविल्याए मुण्णीए सजुय [सु०८३-८५ १७ घरणे १८ वेसमणे १९ सके देवेंदे २० वेलघरे २१ य ति। 'उहाणसुत' ति अझयण सिंगणाइयकज्जे जस्स ण गामस्स वा जाव रायहाणीए वा एगकुलस्स वा समणे आमुरुचे रुढे उवउत्ते त उहाणसुते ति अझयण परियडेति एक दो तिष्णि वा धारे ताहे से गामे वा जाब रायपाणी वा कुल वा उद्वेति, उध्वसइ ति वुत्त भवति २२ । से चेव समणे [जे० २१५ द्वि० ] तस्स गामस्स वा जाव रायवाणीए वा तुढे समाणे पसग्णे पसष्णलेस्से 5 मुहासणत्ये उपउत्ते समुद्राणमुत परियटेइ एक दो तिष्णि वा वारे वाहे से गामे वा जाव रायहाणी था आवासेति समुवढाणसुये त्ति वत्तव्वे वगारलोवातो समुट्ठाणसुये त्ति भणिव । अप्पणा पुबुद्विय पि कतसकप्पस आवासेति २३। 'णागपरियाणिय' ति अज्झयणे णाग ति-नागकुमारे, तेस समयनिवद्ध अन्झयण, त जदा समणे उपयुचे परियटेति तया अकतसकप्पस्स वि ते णागकुमारा तत्थत्या चेव परियाणति, वदति गमसति भत्तिवहुमाण च करेंति, सिंगणाइयकज्जेस य वरया भवतीत्यर्थ २४ । निरयावलियासु आवलियपविद्वेतरे य निरया तग्गामिनो 10 य पर तिरिया पसगतो वणिजति २५ । सोहम्मीसाणकप्पेस जे कप्पविमाणा ते कप्पबढ्सया ते वणिता, तेमु य देवीओ जा जेण तवोविसेसेण उववण्णा वा वणिता, वाओ य कप्पवडेंसिया भणिया २६ । सजममाव विगसितो पुष्फितो, सजमभावविचुतोऽवपुष्फितो, अगारभाव परिद्ववेचा पयजाभावेण विगसितो पच्छा सीयह जो, तस्स इहमवे परभवे य विलवणा दसिजइ जत्य ता पुफिया २७ । एसेवऽत्यो सविसेसो पुष्फलाए दसिज्जति २८ । अघगवण्डिगो जे कुले ते अधगसइलोवातो वण्हिणो भणिया, तेसिं चरिय गती सिझणा य 15 जत्य भणिता ता पण्हिदसातो। दस त्ति-अवस्था अन्झपणा था २९ ॥ ८३ एक्माईयाई चउरासीतीपइण्णगसहस्साइ भगवतो अरहो उसहस्स आइवित्यय रस्स, तहा सखेज्जाणि पइण्णगसहस्साणि मज्झिमगाण जिणवराण, चोइस पइण्णगसह- स्साणि भगवओ वद्धमाणसामिस्स । अहवा जस्स जचिया सिरसा उप्पत्तियाए वेणतियाए कम्मयाए पारिणामियाए चउबिहाए बुद्धीए उववेया तस्स तत्तियाइ पइण्णगसहस्साइ, पत्तेय 20 बुद्धा वि तत्तिया चेव । से त कालिय । से त आवस्सयवइस्ति । से त अणगपविट्ठ। ८३ भगवो उसमस्स चउरासीतिसमणसाहस्सीतो होत्या, पइण्णगझयणा वि सम्वे कालिय-उकालिया चतुरासीतिसहस्सा । कह ? जतो ते चतुरासीति समणसहस्सा अरहतमम्गउपदिढे न मुतमणुसरिता किंचि णिजूहते ते सव्वे पहणग्गा, अहवा मुतमणुस्सरतो अप्पणो क्यणकोसल्लेण ज धम्मदेसणादिस भासते त सन्न पइण्णगं, जम्हाअणवगमपन्जय मुत्त दिव। तच वयण नियमा अण्णतरगमायुपाती भवति तम्हा त [जे० २१६ प्र०] 25 पइण्णग । एव चतुरासीती पइण्णगसहस्सा भवतीत्यर्थ । एतेण विधिणा मज्झिमतित्यगराण सखेजा पडण्णगस इस्सा । समणस्स वि भगवतो जम्हा चोइस समणसाइस्सीतो उकोसिया समणसपदा तम्हा चोइस पइणगज्झय १ याति ॥ २ भगवनो अरहमो सिरिउसहसामिस्स, मजिसमगाण जिणाण संखेजाणि पाण्णगसह स्साणि चोइस • है । भगयो अरहो उसहरस समणाण, मशिमगाण इत्यादि शुः । भगवमो उसहरिसि (सिरिस्स समणस्स मझिमगाण इत्यादि स २० । त्रयाणामप्येषां पाठमैदाना मझिमगाण इत्यायुत्तराशेन समानत्वेऽपि नकारोऽपि पाठो चिहतो सम्मत' । प्रतिया तु मूळे आइत एव पाठो गृहीतोऽस्ति । चूणिकता पुन से है पाठानुसारेण व्याख्यातमस्तीति सम्भाव्यते ॥ ३ सिरिसहसामिस आइ । अत्र पूर्णिकता उसास इति हरिमारिणा सिरिउ सहस्त इति मलयगिरिमा च सिरिउसहसामिस्स इति पाठोशीकतोऽस्ति ॥ ४ सीसा ख•सं• चूर्णि विना ।।
5 अंगपबिटुमुयणाणं आयारे य सिरिदेववायगविरड्यं णंदीमुत्तं । ६१ णसहस्सा भवंति । अहवा 'जत्तिया सिम्सा' इत्यादि मुत्तं । इह मुत्ते अपरिमाणा पइण्णगा पडण्णगसामिअपरिमाण- तणतो, किंच इह मुत्ते पत्तेयबुद्धप्पणीतं पइण्णगं भाणितव्वं । कम्हा? जम्हा पइण्णगपरिमाणेण चेव पत्तेयबुद्धपरि- माण कीरइ ति भणितं 'पत्तेयबुद्धा वेत्तिया चेव' त्ति । चोदक आह-गणु पत्तेयबुद्धा सिस्सभावो य विरुझते ? आचार्याइ-तित्थगरपणीयसासणापडिवन्नत्तणतो तस्सीसा भवतीत्यर्थः ।। भणितं कालितमुतं अंगवाहिर च । इटाणि अंगपविटं- ८४. से किं तं अंगपविलु ? अंगपविट्ठ दुवालसविहं पण्णत्तं, तं जहा-आयारो १ सूर्य- गडो २ ठाणं ३ समवाओ ४ वियाहपण्णत्ती ५ णायाधम्मकहाओ६ उवासगदमाओ७ अंतगड- दसाओ ८ अणुत्तरोववाइयदसाओ ९ पण्हावागरणाई १० विवागसुतं ११ दिद्विवाओ १२ । ८४. से किं तं अंगपविटं इत्यादि सूत्रम् ॥ ८५. से किं तं आयारे?आयारेणं समणाणं गिरगंथाणं आयार-गोयर-विणय वेणइय- सिक्खा-भासा-अभासा-चरण-करण-जाया-माया-वित्तीओ आधविज्जति । से समासओ पंच- विहे पण्णत्ते, तं जहा–णाणायारे १ दसणायारे २ चरिचायारे ३ तवायारे ४ वीरियायारे ५। आयारे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ । से णं अंगठ्ठयाए पढमे अंगे, दो सुयक्खंधा, पणुवीसं अज्झयणा, पंचासीती उद्देसणकाला, पंचामोती समुद्देसणकाला, अट्ठा- 18 रस पयसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा । सासत-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आधविज्जति पण्ण- विज्जति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंमिज्जंति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवेणा आघविज्जइ । से तं आयारे १ । ८५. [से किं तं आयारे इत्यादि मुत्त] । आयरणं आयारो । गोयरो-भिक्खागबणविधाणं । विणयो- 20 गरणातियो तिविहो बाबण्णविधाणो वा । वेणडया-सीसा, तेसिं जहा आसेवणसिक्खा । भासा सच्चा असच्चामोसा य। अभासा-मांसा सच्चामोसा य । चरणं-"वतसमिति०" गाहा ] 1 करणं-"पिंडस्स जा १ इह तित्ये अपरिमाणा इति पाठो मलयगिरिसूयुद्धतचूण्युद्धरण । ३ विवाह ब. विना ॥ ४ वाइणा ल० ॥ ५ चूर्णा संखेजाओ पडिवत्तीओ, संखेजाओ णिज्जुत्तीओ, इति पाठो व्यत्यासेन व्याख्यातोऽस्ति । ६-७ सीई ल० ॥ ८ साति शु० । स्साणि मो० मु० ॥ ९ चूर्गिकृता पवनाया इति पाठो न गृहीतो न च व्याग्न्यानोऽस्ति, किन्तु श्रीहरिभद्रसूरिणा श्रीमलयगिरिणा च एप पाठो गृहीनोऽस्ति, साम्प्रत व प्राप्तासु सास्वपि नन्दीसूत्रमू प्रनिषु एप पालो दृश्यते । समवायाङ्गसूत्रवृत्तावमयदेवगिभि पाया इति पाठी नन्दीसूत्रत्वनाऽऽटतो व्यास्त्र्यानश्चापि दृट्यते । नरेव च नत्र स्पष्ट निर्दिष्ट यद्-अनौ पाठो न समवायागसूत्रप्रनिघु वतन इति । एतच्चर सूचयति यन-चूर्णिकारप्राप्तप्रतिभ्यो भिन्ना एव नन्दीसूत्रप्रनयो हरिभद्रादीना समक्षमासन् , तयाऽभयंदेवसूरिप्रामानु समवायाङ्गसूत्रप्रनिषु ण्य पाठो नासीत् । मन्प्रति प्राप्यमागासु व समत्रा- याद्गस्त्रस्य रतिपयामु प्रतिषु दृश्यमान एप पाठोऽभयदेवसूरिनिक्षिप्त-व्याग्व्यानराठानुरोधनाऽऽयात टनि सम्भाव्यते ॥ १० वणया आस० ० ॥ ११ आचारे ल• ॥ २ सयगड सु० ॥
६२ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजय [सु०८६-८७ विसोहो०" गाहा [व्यव मा उ १ गा २८९] । जाय ति-सजमजचा, तस्स साइणत्य आहारोमात त्ति-मात्राजुची घेत्तव्यो । वर्तन वृत्त । एत सब आयारे 'आधविजई' ति आख्यायते । सुचमत्यस्स य पदाण वायणा सा परिचा, अणताण भवति, आदि-अतोवलमत्तणतो । अहवा ओसप्पिणि उस्सप्पिणिकाल वा पड्डुच परित्ता, तीताऽणागत- सम्बद्ध च पडुच्च अणता । उवकमादि णामादिणिक्खेवकरण च अणियोगदारा, ते आयारे सखेजा, तेसि पण्णा- 5 गवयणगोयरतणतो । वेढो-उदनाती । 'पडिवत्तीओ' ति दन्वादिपदत्यम्भुवगमो पडिमा ऽभिमाहविसेसा य पढिवधीओ, ते समासतो मुत्पडिबद्धा सखेजा । तिविशा लेग निक्खेवमादिनिजुची तेण सखेज्जा । पर बमचेरा पिंडेसणा सेन्जा इरिया भासजाया वस्पेसणा पातेसणा [जे० २१६ द्वि.] ओमाहपडिमा सत्तसत्तिकया मावणा विमोती, एते एव णिसीहवज्जा पशुवीस अझयणा । पचासीती उद्देसणकाला। कह ? उच्यते-अगस्त मृतक्ख- घस्स अन्झयणस्स उद्देसगस्स, एते चउरो वि एको उद्देसणकालो । एव सत्यपरिणाए सत्त उद्देसणकाला, लोग- 10 विजयस छ, सीतोसणिज्जस्स चतुरो, समत्स्स चतुरो, लोगसारस्स छ, धुयस्स पच, महापरिणाए सत्त, विमो- हातवणस्स अट्ट, उवधाणसुतस्स चतुरो, पिंडेसणार एकारस, सेज्जाए तिष्णि, इरियाए तिष्णि, मासज्जाताए दो, वस्थेसणाए दो, पातेसणाए दो, उग्गहपडिमाए दो, सत्तिकयाण सत्त, मावणाए एको, विमोत्तीए एको, एते सम्धे पचासीति ।चोदक आह-जदि दो मुतक्सधा पणुवीस अन्झयणा य अद्वारस पदसहस्सा पदग्गेण भवति तो जमणित "गरमचेरमहओ अद्यारसपदसहस्सितो वेदो।" [आचा०नि० गा०११] ति एत विरुज्झति आचार्य आह-गाणु । एत्य वि भणित 'सपचचूलो अट्ठारसपदसदस्सितो वेदो' ति, इह मृत्तालावयपदेहि सहितो वह बहुतरो य पक्क- व्येत्यर्थः । अहवा दो मुतखया पशुवीस अज्झयणा य, एत आयारम्पसहितस्स आयारस पमाण भणित । अहारस पदसहस्सा पुण पढमसुतखधस्स णववमचेरमयस्स पमाण । विचित्तत्यवद्धा य मुता, गुरूनदेसतो सिं अत्यो माणितव्यो । अक्सररयणाए सखेजा अखरा । अमिषाणामिरेयसतो गमा भवति, ते य अणता इमेण विषिणा-सुत मे आउस तेग भगवता, तमुत मे आउस, तहिं सुत मे आ०, आ मुत मे आ०, तमुव मया आ, 20 तदा सुत मदा आ०, तर्हि मृत मदा आ०, एवमादिगमेहि भण्णमाण अणतगम । अक्खरपजएहिं अस्थपन्जपहि य अणत । परिचा तसा, अणता ण भवति । अणता यावरा वणप्फइसहिता । सासतति पचत्यिकाइयाइया । कड ति-फित्तिमा, पयोगतो वीससापरिणामतो [जे० २१७ प्र० ] वा जहा अम्मा अमरुक्खादी । एते सव्वे आयारे मुत्तेण निवद्धा । निजुचि-सगइणि हेतृदाहरणादिएहि य णिकाइया । किंच एते अण्णे य 'जिणपण्णचा' जिण- प्पणीया भावा 'आधविज्जति' जाव उवदसिजति' एवेसि पदाण पूर्ववद् व्याख्या । एवविहमायार अहिन्जितु से 5 पुरिसे 'एव' ति जहा आयारे निबद्धा परूविता यता सम्बदन्न भावण माता भवति । विवि चि-अणेगधा जाणमाणो विष्णाता भवति । अण्णपावाद्गेहिती वा विसिहतरे विसिद्वयर वा जाणमाणो विष्णाता भवति । सेस निगमणमुत्त कठ । से च आयारे १॥ ८६ से किं त सुयगडे " सूयगडे ण लोए सइज्जइ, अलोए सूइज्जइ, लोया ऽलोए सूइज्जइ, जीवा सूइज्जति, अजीवा सूइज्जति, जीवा जीवा सूइज्जति, ससमए सूइज्जइ, 30 परसमए सूइज्जइ, ससमय परसमए सूइज्जइ । सूयगडे ण आसीतस्स किरियावादिसयस्स, चउरासीईए अकिरियवादीण, सत्तट्टीए अण्णाणियवादीण, बत्तीसाए वेणइयवादीणं, तिण्ड १जवि.सं ॥२ज्जतिरे शु०॥३मसीयस्स.. दिना ॥ सीप या५ यावा . ० मो मु०॥
६३ सूयगडे ठाणे य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । तेसेट्ठाणं पावादुयसयाणं वूहं किचा ससमए ठाविज्जइ । सूयगडे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए बिईए अंगे, दो सुयक्खंधा, तेवीसं अज्झयणा, तेत्तीस उद्देसणकाला, तेत्तीसं समुद्देसणकाला, छत्तीसं पदसहस्साणि पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासय-कड-णिबद्ध-णिकाइया । जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविजंति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जंति उव- देसिज्जति। से एवंआया, एवं गाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आधविज्जइ । से तं सूयगडे २। ८६. से किं तं सूयगडेत्यादि सुत्तं । 'सइज्जइ' त्ति जधा गहा मई तंतुणा सूइज्जइ, उवलब्भतेत्यर्थः । अहवा जहा सूयी पडं सतेइ तहा सूयगडे जीवादिपदत्या सूइज्जति । 'व्हे' किच त्ति प्रतिव्यूह, तेण प्रतिव्यूहेन ते 10 परप्पवादी णिप्पट-पसिणे कातुं ससमयस्स सम्भावे द्वाविज्जति । उद्देसयपरिमाणं नातुं उद्देसणकाला जाणेजा। सेसं कंठं । सेत्तं सूयगडे २ ॥ ८७. से कि तं गणे? ठाणे णं जीवा गविज्जति, अजीवा ठाविजंति, जीवा-जीवा गविजंति, लोए विज्जइ, अलोए गविज्जइ, लोया-लोए गविज्जइ, ससमए अविज्जइ, परसमए गविज्जइ, ससमय-परसमए विज्जइ । अणे णं टंका कूडा सेला 1 सिहरिणो पन्भारा कुंडाई गुहाओ आगरा दहा णदीओ आघविज्जति । ठाणे णं ऍगाइयाए एगुत्तरियाए वुड्डीए दसट्ठाणगविवड्डियाणं भावाणं पर्वणया आघविज्जति । ठाणे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगों, संखेज्जाओ निज्जु- त्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए तइए अंगे, एगे सुयक्खंधे, दस अज्झयणा, एकवीसं उद्देसणकाला, एकवीसं समुद्देसणकाला, बावत्तरि 20 पदसहस्साई पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णता भावा आघविज्जति पण्णविज्जंति १ तेवढाणं ख० स० जे० डे० ल० । हारि०वृत्तौ समवायाङ्गसूत्रादिषु च तेसहाणं इति पाठो वर्तते ॥ २ पासंडिय सयाणं जे० डे० मो० मु० । श्रीमलयगिरिभिरयमेव पाठ आदृतोऽस्ति । ३ बिदिए शु० । बिईए ल० ॥ ४ जति खं० शु० ल. ३० ॥ ५ →- एतचिह्नमध्यवर्ती पाठ' जे० मो० मु० प्रतिषु ससमय-परसमए ठाविजइ इति पाठानन्तर वर्तते ॥ ६ ठाणे गं इति ख० स० ल० शु० नास्ति ॥ ७ एगाइयाणं एगुत्तरियाणं दसठाण स० डे० ल० शु० ॥ ८°वणा जे० मो० ॥ ९ जति ख० डे० शु० ॥१० जे० डे० विनाऽन्यत्र सिलोगा, संखेजाओ संगहणीओ से णं ख० स० ल० शु० समवायाङ्गसूत्रे च । सिलोगा, संखेजाओ निजुत्तीओ, संखेजाओ पडिवत्तीओ। से णं मो० मु० ॥११ ख० स० ल० शु० प्रतिषु अणंता गमा अणंता पजवा इति नास्ति ॥
६४ ४ जिणदासगणिमहत्वरविरहयाए चुण्णीए संजय [सु. ८०-९० परूविज्जति दसिज्जति गिदसिज्जति उवदसिजति । से एवआया, एव गाया, एव विण्णाया, एव चरण करणपरूवंणा आधविज्जइ । से त ठाणे ३ । ८७ से कि त ठाणेत्यादि मुच । 'ठाविज्जति चि स्वरूपत. स्थाप्यते, प्रज्ञाप्यतेत्यर्थ । छिण तड टक। कूड ति-जहा वेतड्दस्सोपरि णव सिद्धायतणाइया कूडा । हिमवतादिया सेला । सिहरेण सिहरी, जहा 5 वेतो । ज कूड उवरि अवखुजय त पम्भार, ज वा पचयस्स उपरिमागे इत्यिकभागिई कुहुह निम्गय त पन्भार । गगादिया कुडा । तिमिसादिया गुहा । रुप सुवण्ण रतणादिया आगरा । पोडरीयादिया दया । गगा- सिंधुमादियाओ णदीओ । सेस कठ । से च ठाणे ३ ।। ८८ से कि त समवाए ' समवाए ण जीवा समासिज्जति, अजीवा समासिज्जति, जीवा-ज्जीवा समासिज्जति, लोए समासिज्जति, अलोए समासिज्जति, लोया-लोए 10 समासिज्जति, ससमए समासिज्जति, परसमए समासिज्जति, ससमय परसमए समासि- ज्जति । समवाए ण एगाइयाण एगुत्तरियाण ठाणगसयविवडियाण भावाणं परूवणा आघ- विज्जति । दुवालेसगस्स य गणिपिडगस्स पेलवग्गे समासिज्जति । समाए ण परित्ता वायणा, सखेज्जा अणुओगदारा, सखेज्जा वेढा, सखेज्जा सिलोगा, सखेज्जाओ णिज्जु- तीओ, सखेज्जाओ पडिवत्तीओ, सखेज्जाओ सगहणीओ। से ण अगट्टयाए चउत्थे 5 अगे, एगे सुयक्खधे, एगे अन्झयणे एगे उद्देसणकाले, एगे समुद्देसणकाले, एगे चोयाले पदसयसहस्से पदग्गेण, संखेज्जा अक्खरा, अणता गमा, अणता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णता मावा आपविजति पण्णविज्जति परूविज्जति दसिज्जति णिदसिज्जति उवदसिज्जात | से एवआया, एव णाया, एव विष्णाया, एव चरण करणपरूवणी आधविज्जति । से त्त समवाए । ८८ से किं त समवाए इत्यादि । समवाए निक्खेयो चतुन्विहो । दवे सचित्तादिदवसमवातो, भाव- समवाती इस चैव था । अहवा जस्य वा एगत्थ ओदइयाइ बहू भावा सण्णिवादियसजोगा वा भावसमवातो । भावसमवाए वा इम णिरत्त-जीवा 'समासिज्जति' सम आसइज्जति । सम ति-ण विसम, जहावस्थित अनूनाति रिक्त इत्यर्थ । आसइज्जति-आधीयते, बुद्धया ज्ञानेन गृह्यतेत्यर्थ । अहवा समास चि-नमग्गेऽमिहित(ले० २१७ द्वि० सव्वपदत्याण समासतो विमरिसो ति । सेस कठ । उक्त समवाय ४॥ १ पणया स स ल ॥ २ ज्जति स्वस . ० ॥ ३ हा इत्यर्थ ॥ ४ लसविहस्स मो है ॥ ५ पळयग्गे से । पल्लवग्गे इत्यस्याएं - तथा द्वादशाशस्य च गणिपिटकस्य पालो ति पयवपरिमाण अभिधेयादितवमसंख्यानम् यथा 'परिता वसा इत्यादि । पयवशब्दस्य च 'पालव' ति निर्देश प्राकृतस्यात् पया पल्याड इत्यादिवदिति । अथवा पल्लवा इन पालवा-अवयवास्तित्परिमाणम् । इति समयायात्रवृत्तिः ११३-२ पत्रे || ६ घायरस जे मो० ॥ ७ जेसे है। पिनाऽन्यत्र-सिलोगा, संखेजामो संगहणीमो । सेय. स. सिलोगा, संखेनामो निन्जुसीमो, संप्रेजामो पडियचीमओ। से ण मो••॥ ८ पया ल.॥ ९ जति ख..॥ 20 4 समवाए वियाहे णायाधम्मकहाओं य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं। ८९. से किं तं वियाहे ? वियाहेणं जीवा वियाहिज्जति, अजीवा वियाहिज्जंति, जीवा-ऽजीवा वियाहिज्जति, लोए वियाहिज्जति, अलोए वियाहिज्जति, लोया-ऽलोए वियाहिज्जति, ससमए वियाहिज्जति, परसमए वियाहिज्जति, ससमय-परसमए वियाहि- जति । वियाहे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगों, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ।। से णं अंगठ्ठयाए पंचमे अंगे, एगे सुयक्वंधे, एगे सातिरेगे अज्झयणसते, दस उद्देसग- सहस्साई, दस समुद्देसगसहस्साई, छत्तीसं वागरणसहस्साई, दो लक्खा अट्ठासीति पयसह- स्साई पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परू- विज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, 10 एवं चरणकरणपरूवेणा आघविज्जइ । से तं वियाहे ५। ८९. से किं तं वियाहेत्यादि । 'वियाहे' ति व्याख्या, इह जीवादयो व्याख्यायंते। इह सतं चेव अन्झ- यणसण्णं । गोतमादिएहि पुढे अपुढे वा जो पहो तव्यागरणं [च] । सेसं कंठं । से तं वियाहे ५ ॥ ९०. से किं तं णायाधम्मकहाओ ! णायाधम्मकहासु णं णायाणं णगराई उज्जाणाई चेइयाई वणसंडाई समोसरणाई रायाणो अम्मा-पियंरो धम्मकहाओ धम्मायरिया इहलोग-पर- 15 लोगिया रिद्धिविसेसा भोगपरिचागा पैवज्जाओ परियागा सुयपरिग्गहा तवोवहाणाई संले- हणाओ भत्तपचक्खाणाई पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुकुलपञ्चायाईओ पुणबोहिलामा अंतकिरियाओ य आघविज्जति । दस धम्मकहाणं वग्गा। तत्थ णं एगमेगाए धम्मकहाए पंच पंच अक्खाइयासयाई, एगमेगाए अक्खाइयाए पंच पंच उवक्खाइयासयाई, एगमेगाए उवक्खाइयाए पंच पंच अक्खाइओवक्खाइयासयाई, एवमेव सपुव्वावरेणं अद्भुट्ठाओ कहाण- 20 गकोडीओ भवंति त्ति मक्खायं । णायाधम्मकहाणं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, १-२ विवाहे जे० मो० मु० ॥ ३ विवाहस्स णं जे० डे० मो० मु० ॥ ४ डे० विनाऽन्यत्र-सिलोगा, संखेजाओ संगहणीओ । से णं ख० स० ल० शु० । सिलोगा, संखेजाओ निजुत्तीओ, संखेजाओ पडिवत्तीओ । से ण जे. मो० ॥ ५ 'साई, चउरासीई पयसहस्साई पयग्गेणं, इति समवायाङ्गसूत्रे पाठ । अत्राभयदेवीया टीका-"चतुरशीतिः पदसहस्राणि पदाणेति, समवायापेक्षया द्विगुणताया इहानाश्रयणात् , अन्यथा द्वे लक्षे अष्टाशीति सहस्राणि च भवन्तीति ।” इति ११६-१ पत्रे । तर्थतदर्थसमर्थक' 'विवाहपण्णत्तीए ण भगवतीए चउरासीइ पदसहस्सा पदग्गेण” इति समवायाङ्गे ८४ स्थानके सूत्रपाठोऽपि वर्तते ॥ ६ वणया ल० ॥ ७ जंति खं० स० ल० ॥ ८ विवाहे ख० स० विना ॥ ९ चेतियाति वणसंडाति शु० ॥ १० पियरो धम्मायरिया धम्मकहाओ इह-पारलोइया इढिविसेसा जे० मो० मु० । 'यम्मायरिया धम्मकहाओ इहलोइय-परलोइयइड्डी- विसेसा" इति समवायाङ्गे ॥ ११ पवजापरियागा ख० स० डे० ल० शु० । “पव्वज्जाओ सुयपरिग्गहा तवोत्रहाणाइ परियागा सलेहणाओ" इति समवायाङ्गे ॥ १२ वग्गा पण्णत्ता । तत्थ स० ॥ . चु०९ । जिणदासगणिमहतरविरइयाए बुण्गीए संजय [सु० ९१-९२ संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, सखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेनाओ संगहणीओ, सखेजाओ पडिवत्तीओ। से ण अगट्टयाए छठे अगे, दो सुरक्खधा, एगृणवीस णात ज्झयणा, एग्णवीस उद्देसणकाला, एगणवीसं समुद्देसणकाला, सखेज्जाइ पयसहस्साइ पय- ग्गेण, सखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अर्णता पज्जवा, परिता तसा, अणता थावरा, 5 सासत-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णता भावा आधविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दसिज्जति णिदसिज्जति उवदसिज्जति । से एवआया, एवं गाया, एव विण्णाया, एव चरण करणपर्वणा आधविज्जति । से च णायाधम्मकहाओ ६। ९० से कि त णायाधम्मकहेत्यादि मुत्त । एकूणवीस णातज्झयणा, गाय ति-आहरणा, दिद्वतियो वा गजति जेहऽत्यो ते गाता, एते पढममुतखधे । अहिंसादिलक्सणस्स धम्मस्स कहा धम्मकहा, धम्मियाओ 10 वा कहाओ धम्मकहाओ, अक्खाणग ति युत्त भवति, एते वितियमुतखधे । पदम बितियमुतखधे भणिताण णाता धम्मकहाण गगरादिया भण्णति । वितिये मुतक्खधे दस धम्मकहाण वगा। वग्गो त्ति-समूहो, तध्विसे सणविसिद्वा दस अज्झयणा चेव ते दम्या । पगूणवीस णाता, दस य धम्मकहानी । तत्य गातेस आदिमा दस णावा चेन, ण तेसु अक्खादियादिसभयो । सेसा णव गाता, तेसु एकेके गाते चत्तालीस चत्तालीस अक्सा इयायो भवति, तत्य वि एकेकाए अक्खाइयाए पच पच उवक्साइयासताइ भवति, ते वि एकेकाए उपक्खा 15 इयाए पच पच अक्खाइओवक्खाइयसताइ भवति, एच एते णन कोडीओ। एताओ पम्मकहास सोहेतव्व चि कानु एकोणवीसाए गाताण दसव्ह य धम्मकहाण विसेसो कज्जति दस गाता देस पत्र य धम्मकहाती दसहि परोप्पर मुद्धा एवं विसेसे कते सेसा मव णावा, ते णव चत्तालीसाए गणिता जाता तिणि सता सहा अक्खाइयाण, एते अक्खाइयपघसहिंतो सोधिता, तत्थ सेस चत्ताल सतं, त उवक्खाइपपचसतेहि गुणित जावा उवक्खाइवाण सचरि सहस्सा, वे पचर्दि अक्खाइतोक्क्खाइयसतेहिं गणिता एव जावा अदुद्धातो अक्खाइयकोडीतो । 'पदग्गेण ति 20 उत्सग्गपद गिवातपद गामियपद अक्खातपद मिस्सपद च, एते पदे अहिकिच पचला जे० २१८ प्र० रखा छावरिं च सहस्सा पदग्गेण भवति, अहया सत्तालावयपदग्गेण सखेजाइ पदसहस्साइ भवति । अहवा आहचरा हियसहस्सपवलक्खा वि सखेजपदसहस्सेहिं ण विरुध्झति । सेस फठ । से त णाताधम्मकहाओ६ ६॥ ९१ से किं त उवासगदसाओ उवासगदसासु ण समणोवासगाण गगराइ उज्जा' णाइ चेइयाइ वैणसडाइ समोसरणाइ रायाणो अम्मा पियरो धम्मकहाओ धम्मायरिया 2 ईहलोग-परलोइया रिद्धिविसेसा भोगपरिचाया परियागा सुयपरिगहा तवोवहाणाइ सील व्वय-गुण-वेरमण-पञ्चक्खाण-पोसहोववासपडिवज्जणया पडिमाओ उवसम्गा सलेहणाओ १३. मो म. विनाऽन्यम-सिलोगा, संखेजामो संगहणीमो। से पशु । सिलोमा, संखेजाओ निजुचीयो, संखेजामो पडिवत्तीमो। सेजे ॥२ वीस मज्मयणा है लामो समघायाझे च चूणिकता मलयगिरिणा च मूले स्वीकृत एव पाली व्याख्यातोऽस्ति । ३-४ पणतीसं ० ॥ ५संखेजा पयसारखा ३. मो००६ पयसयसह समामाहे ॥७ वणया ... ॥ ८ अति से है. पु. ॥ ९ाय बम ३।१०पेतियाति ॥ १९ वणसंडा - मास्ति ॥ १९ पियधम्मायरिया धमकहामो . मो.30 १३ दलोय-परलोया इढिपि • मो• मु• ॥ १४ या पम्वनामो परि ने • • • ॥
उवासगदसाओ अंतगडदसाओ य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । ६७ भचपञ्चक्खाणाई पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुकुलपञ्चायाईओ पुणवोहिलामा अंत- किरियाओ य आघविज्जति । उवासगदसासु णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए सत्तमे अंगे, एगे सुयक्वंधे, दस अज्झयणा, दस उद्देसणकाला, दस समुद्देसणकाला, संखेज्जाई पदसहस्साई पयग्गेणं । संखेज्जा : अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासय-कड-णिबद्ध- णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पाणविज्जति परूविज्जति दंसिज्जति णिदं- सिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूणा आघविज्जति । से तं उवासगदसाओ ७ । ९१. से किं तं उवासगदसातो इत्यादि सुत्तं । उवासक ति-सावता । तेसिं अणुब्बत-गुण-सीलब्बतोव- 10 देसणा दससु अज्झयणेसु अक्खात त्ति उवासगदसा भणिता । तासु मुत्तपदग्ग एक्कारस लक्खा बावणं च सह- स्सा पदग्गेणं । सुत्तालावयपदेहिं संखेज्जाणि वा पदसहस्साई पदग्गेणं । सेसं कंठं । से तं उवासगदसाओ ७ ॥ ९२. से कितं अंतगडदसाओ ? अंतगडदसासुणं अंतगडाणं णगराई उज्जाणाइं चेतियाई चणसंडाइं समोसरणाई रायाणो अम्मा-पियंरो धम्मकहाओ धम्मायरिया इहलोग-परलोगिया रिद्धिविसेसा भोगेपरिचागा पैवज्जाओ परियागा सुतपरिग्गहा तवोवहाणाई संलेहणाओ 15 भत्तपञ्चक्खाणाई पाओवगमणाई - देवलोगगमणाई सुकुलपञ्चायाईओ, पुणवोहिलामा अंतकिरियाओ य आघविज्जति । अंतगडदसासु णं परित्ता वायणा, संखेंज्जा अणुयोग- दारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगह- णीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए अट्ठमें अंगे, एंगे सुयक्खंधे, अट्ठ १ संखेजाओ संगहणीमओ जे० मो० नास्ति ॥ २ संखेजाओ पडिवत्तीओ ख० डे० ल• शु० नास्ति ॥ ३ संखेजा पदसहस्सा जे० मो० मु० ॥ ४ पदसयसहस्साई समवायाङ्गे ॥ ५ वणया ल० ॥ ६ जति ख० सं० डे० ल० ॥ ७ अक्खाइज्जति त्ति आ० दा० ॥ ८ वणसंडाई इति ख० स० ३० ल० शु० नास्ति ॥ ९ पियरो धम्मायरिया धम्मकहाओ जे० ल० मो० मु० ॥ १० लोइय-पारलोइया इढिवि मो० । लोइय-परलोइया इड्ढिविजे० मु० ॥ ११ भोगपरिभोगा ख० ल० शु० ॥ १२ पध्वजा परियागा सुत ख० । पव्वज्जा सुत' ल०॥ १३ → एतचिह्नमध्यवर्ती पाठ मो० मु० नास्ति ॥ १४ 'दसाणं जे० स० ॥ १५ संखेज्जाओ संगहणीओ इति जे० मो० मु० नास्ति ॥ १६ सखेज्जाओ पडिवत्तीओ इति खं० स० ल० शु० नास्ति ॥ १७ एगे सुयक्खंधे, दस अज्झयणा, सत्त वग्गा, दस उद्देसणकाला, दस समुद्देसणकाला, संखेजाई पद- [सत]सहस्साई पयग्गेणं इति समवायाङ्गसूत्रे पाठः । अत्राभयदेवीया टोका- "नवर 'दस अज्झयण' त्ति प्रथमवर्गापेक्षयैव घटन्ते, नन्द्यां तथैव व्याख्यातत्वात् । यच्चेह पठ्यते सत्त वग्ग' त्ति तत् प्रथमवर्गादन्यवर्गा- मेक्षया, यतोऽत्र सर्वेऽप्यष्ट वर्गा, नन्द्यामपि तथापठितत्वात् । तद्वृत्तिश्चेयम् –'अट्ठ वग' त्ति अत्र वर्ग. समूह , स चान्तकृतानामध्यम- नाना वा । सर्वाणि चैकवर्गगतानि युगपदुद्दिश्यन्ते ततो भणित 'अट्ठ उद्देसणकाला' इत्यादि " । इह च दश उद्देशनकाला अभिवीयन्ते इति नास्याभिप्रायमवगच्छामः । तथा सख्यातानि पदशतसहस्राणि पदाणेति, तानि च किल त्रयोविंशतिर्लक्षाणि चत्वारि च सहस्रा- . णीति । १९१-२ पत्रे ॥
६८ जिणदासगणिमहत्तरविझ्याए चुण्णीए संजय [सु० ९३-९४ वग्गा, अट्ठ उद्देसणकाला, अट्ठ समुद्देसणकाला, सखेज्जाइ पयसहस्साई पदग्गेण, सखेज्जा अक्खरा, अणता गमा, अणता पज्जवा, परिता तसा, अणता थावरा, सासत-कड णिबद्ध णिकाइया जिणपण्णता मावा आधविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दसिज्जति णिदंसि ज्जति उवदसिज्जति । से एवआया, एव गाया, एवं विण्णाया, एव चरण करणपरूवेणा 5 आघविज्जति । से त अतगडदसाओ । ९२ से किंत मतगडदसातो इत्यादि मुत्त । अतकडदस चि-कम्मणो ससारस वा अतो कडो जेहि ते अतकडा, ते य तित्यकरादी, दस ति-पढमबग्गे दस अज्झयण ति तस्सक्खतो अतकडदस ति । अहवा दस ति-अवत्या, तदते जा अपत्या सा वणिजति ति अतो अतकडदसा । सरीराऽऽयुदसाण वा दसह अतकडो चि अतकडदसा । पवर 'अतकडकिरियाओ' ति अस्य व्याख्या-अतुकडाण किरिया अतकडकिरिया, बहूण ता 10 अतकडकिरियाओ ति मणिता । किरिय त्ति-क्रिया, चर्या इत्यथ । अहवा किरिय त्ति-कर्मसपणक्रिया, सा य सेलेसिअवस्थाए । अहवा किरिय चि-सहमकिरियज्झाण । अहवा घातिकम्मेसु अतकडेसु किरिय निकम्मवधो, सो य इरियावहितो ति भणित होति । एत च आविज्जति । बन्यो ति-समूहो, सो य अतकडाण अझयणाण वा। सम्वे अन्झयणा जुगव उदिसति । तास मुत्तपदग्ग तेवीस लक्खा चतुरो य सहस्सा पदग्गेण । सखेजाणि वा पदसहस्साणि मुत्तालावगपदग्गेण । सेस कठ । से च अतगडदसा ८॥ ९३ से कि त अणुत्तरोववाइयदसाओ' अणुत्तरोववाइयदसासु ण अणुत्तरोवाइयाणं णगराइ उज्जाणाइ चेइयाइ बॅणसडाई समोसरणाइ रायाणो अम्मा पियरो धेम्मकहाओ धम्मा यरिया इहलोग-परलोगिया रिद्धिविसेसा भोगपरिवागा पव्वज्जपरियागा सुतपरिगहा तवोवहाणाइ पडिमाओ उपसग्गा सलेहणाओ भत्तपञ्चक्खाणाइ पाओवगमणाइ अणुत्तरो ववाइयत्वे उववत्ती सुकुलपञ्चायादीओ पुणवोहिलामा अतकिरियाओ य आधविज्जति । 0 अणुत्तरोववाइपर्दसासु ण परित्ता वायणा, सखेज्जा अणुयोगदारा, सखेज्जा वेढा, सखेज्जा सिलोगा, सखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, सखेज्जाओ सगहणीओ, सखेजाओ पडिवत्तीओ। से ण अगट्ठयाए णवमे अगे, एंगे सुयक्खये, तिण्णि वग्गा, तिण्णि उद्देसणकाला, तिणि समुद्देसणकाला, सखेज्जाइ पयसहस्साइ पयग्गेण सखेज्जा अक्खरा, अणता गमा, अणता पज्जवा, परित्ता तसा, अणता थावरा, सासय कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा १ घणया र ल ॥२ विज्जति से ल शु.॥ ३ सत्साक्ष्यत इत्यर्थ ॥ ४ घणसंडाई इति मो मु एव यत्तते ॥ ५ धम्मायरिया धम्मकदामो मो मु ॥ ६ लोय-परलोइया ने मो. मु० ॥ ७ अणुचरोषवसी । । अणुतपेयपाय ति सं ॥ ८ साण जे मो ॥ ९ घाणा ॥ १० संबेनामो णिचीमो इतिक नास्ति ॥ ११ संखेजामो संगहणीमो जे मो. नास्ति ॥ १२ सलामो पडिवत्तीमोख स. ल. ४० नास्ति ॥ १३ पणे मुपक्षधे, इस अन्झयणा, विणि घग्गा, इस उदेसणकाला, यस समुहेसणकाला, सजाइ पयसयसास्सा पयग्गेण ५० इति समयायाले। अत्रामयदेवपादा इह अध्ययनसमूहो वर्ग: वर्गे देशाध्ययनानि वर्गच पुगपदेवोदिसते स्वताय एवोरेशन ग्राला भवन्ति एवमेव च नन्दापमिधीयते इह तु श्यते दशेति अत्रामिप्रायो न शायत इति । १२३-२ पत्र । 15 - -- । ६९ अणुत्तरोववाइयदसाओ पण्हावागरणाई च] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । आघविज्जति पण्णविनंति परूविज्जति, दंसिज्जति गिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवंणा आधविज्जइ । से तं अणु- त्तरोववाइयदसाओ ९) ९३. से किं तं अणुत्तरोववातियदसा इत्यादि सुत्तं । णत्थि जस्सुत्रं सो अणुत्तरो, उववज्जणमुववातो.. उप्पत्तीत्यर्थः, अणुत्तरो उववातो जस्स सो अणुत्तरोवबाइओ, तेसि बहुवयणातो [जे० २१८ द्वि० ] अणुत्तरोब- 5 वाइय त्ति, वग्गे बग्गे य दसऽज्झयण त्ति अतो अणुत्तरोववातियदसा भणिता । संसारे सुभभावं पडुच्च अणुत्तरः, अहवा गतिचतुकं पड्डुच्च अणुत्तरः, अहवा देवगतीए चेव अणुत्तरः । अणुत्तरदेवेसु जेसिं उचवातो तेसिं गगरादिया कहिज्जति । इह वग्गो त्ति-समूहो, सो य अज्झयणाणं, वग्गे वग्गे दस अध्ययना इत्यर्थः। तेसिं पदग्गं छातालीसं लक्खा अट्ठ य सहस्सा, संखेजाणि वा पदसहस्साणि । सेसं कंठं । से तं अणुतरोववाइयदसा ९ ।। ९४. से किं तं पण्हावागरणाई ? पण्हावागरणेसु णं अठुत्तरं पसिणसयं, अठ्ठत्तरं 10 अपसिणसयं, अछुत्तरं पसिणा-ऽपसिणसँयं, अण्णे वि विविधा दिव्वा विजा- तिसया नाग-सुवण्णेहि य सद्धिं दिव्वा संवाया आघविज्जंति । पण्हावागरणाणं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जु- तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेजाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए दसमे अंगे, एगे सुयक्वंधे, पणयालीस अज्झयणा, पणयालीसं उद्देसणकाला, पणयालीसं समुद्देसण- 45 काला, संखेज्जाई पदसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परिचा तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आधविज्जति पण्णविज्जंति परूविज्जति दंसिज्जति गिदंसिज्जति उवदंसिज्जंति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जइ । से तं पण्हावागरणाई १० । ९४. से किं तं पण्हावागरणाई इत्यादि सुत्तं । पण्हो त्ति-पुच्छा, पडिवयणं चागरणं, प्रत्युत्तर- 20 मित्यर्थः । तम्हि पण्हावागरणे अंगे पंचासवदाराइदा व्याख्येयाः परप्पवादिणो य । अंगुहबाहुपसिणादियाणं च पसिणाणं अछुत्तरं सतं । किंच-जे विज्ज-मंता विधीए जबिजमाणा अपुच्छिता चेत्र सुभासुभं कहयति तारिसाणं अपसिणाणं अठ्ठत्तरं सतं । अंगुहादिपसिणभावं अपसिणभावं च वाकरेंति तारिसाणं पसिणा-ऽपसिणविज्जाणं अछुत्तरं सतं । अहवा अणंतरा जे कहेंति ते पसिणा, परंपरे पसिणापसिणा, तं पुण विज्जाकहितं कहेंतस्स परंपरं १ वणया ल० ॥ २ विज्जति ख० स० डे० ल० शु० ॥ ३ सय, तं जहा-अंगुट्टपसिणाई, बाहुपसिणाई अहागपसिणाई, अण्णे वि जे० हे० ल० मो० मु० । नाय पाठथूर्णि-वृत्तिकृद्धिगृहीतो व्याख्यातो वा विद्यते ॥ ४ विविचित्ता दिवा सर्वासु सूत्रप्रतिषु । हारि० वृत्ता एप एव पाठो व्याख्यातोऽस्ति । मलयगिरिपादा पुन चूर्णिकारमनुस्मृताः सन्ति । ५ दिवा शु० स० एव वर्तते ॥ ६ दिव्या संघाणा संघणंति इति चूर्णिकृनिर्दिष्ट, पाठभेदः, दिव्याः सन्धानाः सन्ध्धनान्त इत्यर्थ ॥ ७ संखेजाओ संगहणीओ इति जे० मो० नास्ति ॥ ८ संखेज्जाओ पडिवत्तीओ ख० स० ल० शु० समवाया। च नास्ति ॥ ९ 'विजंति ख० स० डे० ल० शु० ॥
७० 5 जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए सजुय [सु० ९५-१०१ भवति । अण्णे य विविधा विज्जातिसता कहिज्जति । किंच गागा मुवण्णा अण्णे य भवणवासिणो ते विजमता- गरिसिता आगता साहुणा सह सवदति-जल्प करेंति । पाढतर वा "दिवा सघाणा सघणति" तदु मुखा भवति, वरदाय गनितादि वा कुर्चति । दसममगस्स पदम्ग बागउति लक्खा सोलस य सहस्सा पदग्गेण, सखेजाणिवा पदसहस्साणि । सेस कठ । से च पण्हावागरणाइ १० ॥ ९५ से किं त विवागसुत' विवागसुते ण सुकड-दुक्कडाण कम्माण फल विवागा आधविज्जति । तत्थ ण दस दुहविवागा, दस सुहविवागा। से किं त दुहविवागा' दुहविवागेसु ण दुहविवागाण णगराइ उज्जाणाइ वणसडाइ चेइयाई समोसरणाइ रायाणो अम्मा-पियरो धम्मकहाओ धम्मायरिया इहलोइय-परलोइया 'रिद्धिविसेसा निस्यगमणाइ दुइपरपराओ ससारभवपवचा दुकुलपञ्चायाईओ दुलहबोहियत्तं 10 आधविज्जति । से च दुहविवागा। से किं तं सुहविवागा' सुहविवागेसु ण सुहविवागाण णगराइ उज्जाणाइ वणसडाइ चेझ्याइ समोसरणाइ रायाणो अम्मा-पियरो धर्मकहाओ धम्मायरिया इहलोइअ-परलोइया रिद्धिविसेसा भोगपस्थिागा पव्वजाओ परियागा सुतपरिगहा तवोवहाणाइ सलेहणाओ भत्तपञ्चक्खाणाइ पाओवगमणाइ देवलोगगमणाइ सुहपरपराओ सुकुलपञ्चायादीओ पुणवो- 1 हिलामा अतकिरियाओ य आघविज्जति । विवागसुते ण परित्ता वायणा. सखेज्जा अणुयोगदारा, सखेज्जा वेढा, सखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, सखेज्जाओ सगहणीओ, सखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से ण अगट्टयाए एक्कारसमे अगे, दो सुयक्खधा, वीस अन्झयणा, वीस उद्देसणकाला, वीर्स समुद्देसणकाला, सखेज्जाइ पैदेसहस्साइ पदग्गेण, सखेज्जा अक्खरा, अणता गमा, अणता 20 पज्जवा, परित्ता तसा, अणता थावरा, सासय कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णता भावा आघ- विज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दसिज्जति णिदसिज्जति उवदसिज्जति। से एवआया. एव णाया, एव विण्णाया, एव चरण-करणपवणा आघविन्जति । से त्त विवागसुत ११ । ९५ से कि त विवांगसुत इत्यादि । विविधो पाक विपचन वा विपाक, कर्मणा सुभमसुमो वा १ पियागे आपविजा • मो• मु० ॥ २ से कि त विषागा इति स० शुनास्ति । समवायाङ्के प्रभवाक्य घसते ॥ ३ धम्मायरिया धम्मकहामो सं० ले है. ल. मो० ॥ ४ लोग-परलोगिया • ॥ ५ इद्धिधि मोर १ ॥ ६ गमग य ॥ ७ भयपवधा से छ० समवायाहे च ॥ ८ से च दुइविवागा। सेवि सुविधागा' इति • शु नास्ति। समपायाझे तु वतते ॥ ९ घम्मायरिया धम्माज्ञामो लोग पारोगिया इढिवितेसा जे. मो• मु० ॥ ११ मा परि प. ॥ १२ विवागमयस्स ण जे मो• . । विषागेसु • ॥१३ परसवसई समवायाः ॥ १४ बिज्जति • •है छ• शु०॥
७१ विवागसुयं दिद्विवाओ य परिकम्मे सुत्ताई च ] सिरिदेववायगविरइयं णंदीयुतं । जम्मि मुत्ते विपाको कहिज्जति तं विपाकसुतं । विपाकसुतस्स मुत्तपदग्गं एगा पदकोडी चुलसीतिं च लक्खा बत्तीसं च सहस्सा पदग्गेणं, संखेज्जाणि वा पदसहस्साई पदग्गेणं [जे० २१९ प्र०] । सेस कंठं । से तं विवागसुतं ११॥ ९६. से किं तं दिडिवाए ? दिद्विवाए णं सव्वभावपरूवणा आघविज्जति । से समा- सओ पंचविहे पण्णते, तं जहा-परिकम्मे १ सुत्ताई २ पुव्वगए ३ अणुओगे ४ चूलिया ५। 5 ९६. से किं तं दिडिवाते ति । दृष्टिदर्शनम्, बदनं बादः, दृष्टीनां वादो दृष्टिवादः, तत्र वा दृष्टीनां पातः दृष्टिपातः, सभेदभिण्णाओ सव्वणतदिट्ठीओ तत्थ वदंति पतंति व ति अतो दिद्विवातो । सो य पंचभेदो- परिकम्मादि ॥ ९७. से किं तं परिकम्मे ? परिकम्मे सत्तविहे पण्णते, तं जहा-सिद्धसेणियापरिकम्मे १ मणुस्ससेणियापरिकम्मे २ पुट्ठसेणियापरिकम्मे ३ ओगाढसेणियापरिकम्मे ४ उपसंपज्जण- 10 सेणियापरिकम्मे ५ विष्पंजहणसेणियापरिकम्मे ६ चुतअचुतसेणियापरिकम्मे ७। ९८. से किं तं सिद्धसेणियापरिकम्मे ? सिद्धसेणियापरिकम्मे चोदसविहे पण्णत्ते, तं जहा-माउगापयाई १ एगट्ठियपयाई २ अट्ठापयाई ३ पाढो ४ आमासपयाई ५ केउभ्यं ६ रासिबद्धं ७ एगगुणं ८ दुगुणं ९ तिगुणं १० केउभूयपंडिग्गहो ११ संसारपंडिग्गहो १२ नंदा- वत्तं १३ सिद्धावत्तं १४ । से तं सिद्धसेणियापरिकम्मे १ । ९९. से किं तं मणुस्ससेणियापरिकम्मे ? मणुस्ससेणियापरिकम्मे चोदसविहे पणत्ते, तं जहा-माउगापयाई १ एगट्ठियपयाई २ अट्ठापयाई ३ पाढो ४ आमासपयाई ५ केउभूयं ६ रासिबद्धं ७ एगगुणं ८ दुगुणं ९ तिगुणं १० केउभूयपडिग्गहो ११ संसारपेंडिग्गहो १२ गंदावत्तं १३ मणुस्सावत्तं १४ । से तं मणुस्ससेणियापरिकम्मे २। १००. से किं तं पुट्ठसेणियापरिकम्मे ? पुट्ठसेणियापरिकम्मे एकारसविहे पण्णत्ते, तं ॥ जहा-पाढो १ आमासपैयाई २ केउभूयं ३ रासिबद्धं ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ तिगुणं ७ केउ- भूयपडिग्गहो ८ संसारपंडिग्गहो ९ णंदावत्तं १० पुट्ठावत्तं १९ । से तं पुट्ठसेणियापरिकम्मे ३। १०१. से किं तं ओगाढसेणियापरिकम्मे ? ओगाढसेणियापरिकम्मे एकारसविहे १ विज्जति ख० स० हे. ल० ॥२ परिकम्मं जे० मो० मु० विना ॥ ३ सुयाई ख० ॥ ४ ओगाहणसें समवायाङ्गे ॥ ५ विजहणसें ख० स० ल० शु० । विप्पजहसें समवायाझे ॥ ६ चुयमचुयल० शु० । चुयाचुयं डे० ॥ ७ अट्ठप स० ॥ ८-९ परिग्गहो ल० ॥ १० सिद्धाद8 स० । सिद्धवद्ध समवायाङ्गे ॥ ११ परिगहो जे० ॥ १२ स्लादढ स० । मणुस्स- बद्धं समवायाः ॥ १३ पयाई पवमादि । से तं पुढ ख० सं० । पयाई २ इचाह । से तं पुढल• ॥ १४ परिग्गहो । 15 ७२ ५ 5 10 जिणदासगणिमहत्चरविरझ्याए चुण्णीए संजय [सु० १०२-६ पण्णते, त जहा-पाढो १ आमासपयाइ २ केठभूय ३ रासिबद्ध ४ एगगुण ५ दुगुण ६ तिगुण ७ केउभूयपडिग्गहो ८ ससारपडिग्गहो ९ णदावत्त १० ओगाढावत्त ११ । से त ओगाढसेणियापरिकम्मे ।। १०२ से कि त उवसपज्जणसेणियापरिकम्मे ' उवसपज्जणसेणियापरिकम्मे एकार- सविहे पण्णत्ते, त जहा-पाढो १ आमासपयाइ २ केउभूय ३ रासिबद्ध ४ एगगुण ५ दुगुण ६ तिगुण ७ केउभूयपडिग्गहो ८ ससारपडिग्गहो ९ णदावत्त १० उवसपज्जणावत्त ११ । से त उक्सपज्जणसेणियापरिकम्मे ५। १०३ से कि त विप्पंजहणसेणियापरिकम्मे ! विप्पेजहणसेणियापरिकम्मे एगारस विहे पणते, त जहा-पाढो १ आमासपयाइ २ केउभूय ३ गसिबद्ध ४ एगगुण ५ दुगुण ६ तिगुण ७ केउभूयपडिग्गहो ८ ससारपडिग्गहो ९ णदावत्त १० विप्पजहणावत्त ११ । से त विष्णजहणसेणियापरिकम्मे ६॥ १०४ से कि त चुयमचुयसेणियापरिकम्मे चुयमचुयसेणियापरिकम्मे एगारसविहे पण्णत्ते, त जहा-पाढो १ आमासफ्याइ २ केभूय ३ रासिबद्ध ४ एगगुण ५ दुगुण ६ तिगुण ७ केउभूयपडिग्गहो ८ ससारपडिग्गहो ९ णदावत्त १० चुयमचुयावत्त ११ । से त्त 18 चुयमचुयसेणियापरिकग्मे । ९७-१०४ तत्य परिकम्मे चि जोगकरण, जहा गणितस्स सोलस परिक्रम्मा, तग्गहितमुत्तत्यो सेस- गणितस्स भोग्गो भवति । एव गहितपरिकम्ममुचत्यो सेसमुत्तादिदिद्विवातमुतस्स जोमगो भवति । न च परिक म्ममुत सिद्धसेणियापरिकम्मादिमूलमेदयो सत्तविह, उत्तरभेदतो तेसीतिविह मानुषपदादी । न च सव्व समूल चरमेद मुनत्यतो वोच्छिण्ण, जहागतसपदात वा वच्च ।। किंच- १०५ [ईचेइयाइ सत्त परिकम्माइ, छ ससमइयाइ, सत्त आजीवियाइ,1छ चउकणा- याइ, सत्त तेरासियाइ । सेत परिकम्मे ।। १०५ एतेसिं सत्तण्ड परिकम्माण छ आदिमा परिकम्मा ससमका, स्वसिद्धातप्रज्ञापना एवेत्यर्थ । आनीविकापासडत्या गोसालपवत्तिता, वेसि सिद्धतमतेण चुता ऽचुतसहिता सत्त परिकम्मा पण्णविज्जति । इदाणि परिकम्मे णतचिंता-गमो दुरिहो-सगहितो असगहितो य, सगहितो सगह पविठो, असगहितो ववहार तम्हा १ फेउभूय क्षणदि । ले च ओगाढ प्र० स० है. ७० ॥२ परिगहो जे ॥३पादो स्यादि । से च उप स से है ॥ ४-५ विजहण स.सं लशु ॥ ६ पाढो १ इचादि । से संविनहण से है क . ७८ पुयमचुप ने रे ल. ॥ ९ पाढाए । से च य स. स. ३० ॥ १० चुयअघुय है . । चुयाय ने । ११ एतत् चतुरसबोधकान्तवत्तिं सूत्र सूत्रप्रतिषु न वति । वृणि-वृत्तिन्नि पुनराहत इयत इति समवायाबाद सूत्राशोऽयमन्त्री ५ 20 स्तोऽस्ति ॥ १२ या नाया। सेव ॥
- दिद्विवाओ परिकम्मे सुत्ताइंच सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । ७३ संगहो ववहारो रिजुसतो सदाइया य एको, एवं चतुरो णया । एतेहिं चतुहिं णएहि छ ससमइकाई परिकम्माई चिंतिज्जति त्ति अतो भणितं-'छ चतुक्कणइयाई ति । ते चेव आजीविका तेरासिया भणिता । कम्हा? उच्यते- जम्हा ते सर्व जगं व्यात्मकं इच्छंति, जहा-जीवो अजीवो जीवाजीवश्च, लोए अलोए लोयालोए, संते असते संतासंते एवमादि । गयचिंताए वि ते तिविई णयमिच्छंति, तं जहा-दनद्वितो पज्जवद्वितो उभयद्वितो, अतो [जे० २१९ द्वि० ] भणियं-'सत्त तेरासियाई ति सत्त परिकम्माई तेरासियपासंडत्या तिविधाए णयचिंताए । चिंतयंतीत्यर्थः १ ॥ १०६. से कि तं सुत्ताई? सुताई बावीस पण्णत्ताई, तं जहा-उज्जुसुतं १ परिणयापरि- णयं २ बहुभंगियं ३ विजयचरियं ४ अणंतरं ५ परंपरं ६ मासाणं ७ संजूहं ८ संभिण्णं ९ आयचायं १० सोवत्थिप्पणं ११ णंदावत्तं १२ बहुलं १३ पुट्ठापुढे १४ वेयावचं १५ एवंभूयं १६ भूयावत्तं १७ वत्तमाणुप्पयं १८ समभिरुढं १९ सव्वओभई २० पण्णासं २१ दुष्परिग्गहं २२ | 10 १ सुत्ताई बावीसाई पपणत्ताई, तं जहा ख० स० । सुत्ताई अट्ठासीति अवंतीति मक्खायाई, तं जहा सम० ॥ २ द्वाविंशतिसूत्रनाम्ना नन्दिसूत्रप्रत्यन्तरेषु पाठमेदोऽधउल्लिखितकोष्ठकाद् ज्ञातव्यः- ख. प्रति स० प्रतिः जे० प्रतिः डे० प्रतिः ल. प्रति मो० प्रति शु० प्रति . 0 . . १ उज्जुसुत २ परिणयापरिणय ३ वहुभगिय ४ विज्झवियच्चिय विज्झायवाविय . . . बहुभगीय विजयविधत्त बहुभगीय विजयविधत्त विजयचरिय विजयचरिय वियच्चवियत्त ५ अणतर . . 0 . . . . ६ परपर . ७ समाण मासाण समाणस सामाण मासाण संजूह समाणस जूह सभिण्ण समाएस जूह सजूह जूह सभिण्ण . है ८ सजूह सजूह ९ भिण्ण १० आयचाइ आयच्चाय ११ सावद्विपत्त सोवत्थिप्पण्ण १२ णदावत्त आहवाय सोमत्थिप्पन्न मंदावत्त आहन्वय सोवत्थियवत्त आहव्वय सोमच्छिप्पन्न आहव्वाय सोवत्थिअ घट आहबाय सोवस्थिप्पन 0 ० . . . ० १३ बहुल १४ पुट्ठापुट्ठ . . . वियावतं वियावत्त . . दुयावत्त वत्तमाणुप्पत्तं दुयावत्त वत्तमाणपय दुयावतं वत्तमाणुप्पत्त १८ ?. पुच्छापुच्छ १५ वेयावध वियावत्त वियावत्त १६ एवभूय १७ भूयावत्त दूयात्रत्त दूयावत्त यावत्त वत्तमाणय वत्तमाणप्पय वत्तमाणुप्पत्त १९ समभिरूढ २० सवओभद्द २१ पपगास २२ दुपरिग्गह दुप्पडिग्गह परिग्गह अत्र शून्येन पाठभेदाभावो ज्ञातव्य', न तु पागभाव इति ।। . 0 0 . . . . . . 0 . . . दुप्पडिग्गह दुप्पडिग्गह चु०१० ७२ ३ ५ त 5 जिणदासगणिमहत्तरविरश्याए चुण्णीए संजय [सु० १०२-६ पण्णत्ते, त जहा-पाढो १ आमासपयाइ २ केभूय ३ रासिबद्ध ४ एगगुण ५ दुगुण ६ तिगुण ७ केउभूयपडिगहो । संसारपैडिग्गहो ९ गदावत्त १० ओगाढावत्त ११ । से च ओगाढसेणियापरिकम्मे ।। १०२ से किं त उवसपज्जणसेणियापरिकम्मे ? उक्सपज्जणसेणियापरिकम्मे एकार- सविहे पण्णते, त जहा-पाढो १ आमासपयाइ २ केउभूय ३ रासिबद्ध ४ एगगुण ५ दुगुण ६ तिगुण ७ केउभूयपडिग्गहो ८ ससारपडिग्गहो ९ गदावत्त १० उवसपज्जणावत्त ११ । से तं उबसपज्जणसेणियापरिकम्मे ५॥ १०३ से कि त विजहणसेणियापरिकम्मे ? विप्पेजहणसेणियापरिकम्मे एगारस- विहे पणत्ते, त जहा पाढो १ आमासपयाइ २ केभूय ३ रासिबद्धं ४ एगगुण ५ दुगुण ६ 10 तिगुण ७ केउभूयपडिग्गहो ८ ससारपडिग्गहो ९ गदावत्त १० विप्पजहणावत् ११ । से स विपजहणसेणियापरिकम्मे । १०४ से कि त चुयमचुयसेणियापरिकम्मे ' चुयमचुयसेणियापरिकम्मे एगारसविहे पण्णत्ते, त जहा-पाढो १ आमासपयाइ २ केउभूय ३ रासिबद्ध ४ एगगुण ५ दुगुण तिगुण ७ केउभूयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ णदावत्त १० चुयमचुयावत्त ११ । से च 1 चुयमचुयसेणियापरिकम्मे । ९७-३०४ तत्य परिकम्मे चि जोगकरण, जहा गणितस्स सोलस परिकम्मा, तम्महितमुत्तत्यो सेस- गणितस्स जोगो भवति । एवं गहितपरिकम्ममुत्तत्थो सेसमुत्तादिदिद्विवातमुतस्स जोन्गो भवति । त च परिक म्ममुत सिद्धसेणियापरिकम्मादिमूलभेदयो सत्चविह, उत्तरभेदतो तेसीतिविह मानुयपदादी । त च सव्व समूल चरभेद मुतत्थतो बोच्छिण, जहागतसमदात या वच्च ॥ किंच- १०५ [ईचेइयाइ सत्त परिकम्माइ, छ ससमइयाइ, सत्त आजीवियाइ,छ चउकणा- याइ, सत्त तेरासियोइ । से त परिकम्मे ।। १०५ एतेसिं सत्तण्ड परिकम्माण छ आदिमा परिकम्मा ससमइका, स्वसिद्धातप्रमापना एवेत्यर्थ । आनीविकापासडत्या गोसालपत्तिता, वेसि सिद्धतमतेण चुता ऽचुतसहिता सत्त परिकम्मा पण्णविज्जति । इदाणि परिकम्मे णतचिंता–णेगमो दुविहो-सगहितो असगहितो य, सगहितो सगह पविडो, असगहितो ववहार, तम्हा १ फेउभूय ३श्यादि । से न ओगाढ ख० स० है. ॥२ परिगहो जे ॥ ३ पाढोरयादि। से न उव स . . ५ पिजहण संपादोयादि । सेत विजहण स० सं रे ॥ ७ ८ घुपमघुप ३० है स. ॥ ९ पाढाइ । से च चुय सं० स० है. ॥ १० चुयअनुय है. ० । घुयाच्य थे। ११ एतत् चतुरसग्रेष्ठकान्तवति सूत्र सुमप्रतिषु न बत्तते । चूर्णि-वृत्तिन्नि पुनराहत इयत इति समवायामसूत्राव सूत्रांशोऽयमन्त्री- दृतोऽस्ति ॥ १२ या नाया। सेचसे ॥ 20 - ७३ दिद्विवाओ परिकम्मे सुताई च] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । संगहो ववहारो रिजुसुतो सदाइया य एको, एवं चतुरो णया । एतेहिं चतुर्हि गएहि छ ससमइकाई परिकम्माई चिंतिज्जति त्ति अतो भणितं-'छ चतुकणइयाई ति । ते चेव आजीविका तेरासिया भणिता । कम्हा? उच्यते- जम्हा ते सर्व जगं च्यात्मकं इच्छंति, जहा-जीवो अजीवो जीवाजीवश्च, लोए अलोए लोयालोए, संते असते संतासंते एवमादि । णयचिंताए वि ते तिविहं णयमिच्छंति, तं जहा-दवहितो पज्जवद्वितो उभयद्वितो, अतो [जे० २१९ द्वि० ] भणियं-'सत्त तेरासियाई ति सत्त परिकम्माई तेरासियपासंडत्या तिविधाए णयचिंताए । चिंतयंतीत्यर्थः १॥ १०६. से कि त सुताई? सुताई बावीसं पण्णत्ताई, तं जहा-उज्जुसुतं १ परिणयापरि- णयं २ बहुभंगियं ३ विजयचरियं ४ अणंतरं ५ परंपरं ६ मासाणं ७ संजूहं ८ संभिण्णं ९ आयचायं १० सोवत्थिप्पण्णं ११ णंदावत्तं १२ बहुलं १३ पुट्ठापुढे १४ वेयावचं १५ एवंभूयं १६ भूयावत्तं १७ वत्तमाणुप्पयं १८ समभिरूढं १९ सव्वओभई २० पण्णासं २१ दुष्परिग्गहं २२ | 10 १ सुत्ताई बावीसाइं पाणचाई, सं जहा ख० स० । सुत्ताई अट्ठासीतिं भवतीति मक्खायाई, तं जहा सम० ॥ २ द्वाविंशतिसूत्रनाम्ना नन्दिसूत्रप्रत्यन्तरेषु पाठमेदोऽधउल्लिखितकोष्ठकाद् ज्ञातव्यः-- - ख. प्रति स० प्रति जे० प्रति. डे० प्रतिः ल. प्रति मो० प्रति शु० प्रति . . . . . . ० बहुभगीय विजयविधत्त विजयचरिय वियच्चवियत्त ० 0 . . . 0 समाणस सामाण समाएस जूह सजूह ९ भिण्ण 0 . 0 जूह सभिण्ण आहब्बय सोमच्छिप्पन्न - आहवान सोवत्यिअ घट आहबाय सोवत्थिप्पन . १ उज्जुसुत २ परिणयापरिणय ३ बहुभगिय बहुभगीय ४ विज्झवियच्चिय विज्झायव्वाविय विजयचरिय विजयविधत्त ५ अणतर ६ परंपर ७ समाण मासाण मासाण समाणस ८ सह सजूह सजूह सभिण्ण १० आयचाई आयचाय आहञ्चाय आहन्वय ११ सावद्विपत्त , सोवत्थिप्पण्ण सोमरियप्पन्न सोवत्थियवत्त १२ णदावत्त मंदावत्त १३ बहुल १४ पुढापुट्ठ पुच्छापुच्छ १५ वेयावच वियावत्त वियावत्त १६ एवभूय १७ भूयावत्त दूयारत्त टूयावत्त दुयावत्त वत्तमाणय वत्तमाणप्पय वत्तमाणुप्पत्त १९ समभिरूड २० सव्वओभद्द २१ पृण्णास २२ दुपरिग्गह दुप्पडिग्गह टुप्पडिग्गह परिग्गह अत्र शून्येन पाठभेदाभावो ज्ञातव्य , न तु पाठाभाव इति ॥ . 0 . . D . 0 . . वियावतं वियावत्त . . . . 0 दुयावत्त वत्तमाणुप्पत्त दुयावत्त वत्तमाणप्पय दुयावत्तं वत्तमाणुण्यत्त १८ ? . . . 0 . . . . . 0 ० . दुप्पटिगह चु०१० जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए सजुय [सु० १०७ गा० ७७-७९ ईचेयाइ वावीस सुत्ताइ छिण्णच्छेषणझ्याइ ससमयसुत्तपखिाडीए सुताइ १, ईंचेयाइ वावीस सुत्ताइ अच्छिण्णच्छेयणइयाइ आजीवियसुत्तपखिाडीए सुँचाइ २, इंचेयाई बावीस सुताइ तिगणइयाइ तेरासियसुत्तपरिखाडीए सुत्ताइ ३, इंचेयाइ वावीस सुत्ताइ चउकणइयाइ ससमयसुत्तपरिखाडीए सुत्ताइ ४, एवामेव सपुत्वावरेण अट्ठासीति सुत्ताइ भवतीति मक्खाय । 5 से त सुत्ताइ । 5 १०६ 'सुचाई' ति उज्जुमुताइयाइ वावीस मुत्ताइ । ताणिय सुनाइ सव्वदव्वाण सम्बपजवाण सवणताण सयमगविकप्पाण य दसगाणि, सव्यस्स य पुच्वगतमुतस्स अत्यास य सूयग त्ति, अतो ते स्यणतातो सुता मणिता जहामिधाणत्याते। ते य इदाणि मुत्त त्यतो वोच्छिण्णा, जहागतसमदायतो वा बच्चा ते चेत्र वावीस मुत्ता विभागतो अहासीति मुत्ता भवति इमेण विधिणा-बावीस गुत्ता छिण्णच्छेदणतामिप्पायतो। कह छिण्णच्छेदणतो ति मणति 10 उच्यते-जो गयो मुत छिण्ण छेदेण इच्छति, जहा-"धम्मो मगलमुकट०" ति सिलोगो दशव अ १ मा १]|एस सिलोगो मुत ऽत्यतो पत्तेय छेदेण ठितो, गोवितियादिसिलोगे अवेक्तइत्ति वुत्त भवति । छिष्णो छेदोजस्स स भवति छिष्णच्छेद , प्रत्येक कल्पितपर्यतेत्यर्थ । एते एव वादीस ससमतमुत्तपरिवाडीए सत्ता ठिता । एते चेव बावीस अच्छिष्णच्छेदणताभिप्पायतोआजीवियसुत्तपरिवाडीए ठिता अच्छिण्णच्छेदणतो जहा-एसेव दुमपुष्फियपदमसिलोगो अत्यतो वितियाइसिलोगे अवेक्खमाणो, वितियादिया य पदम अच्छिण्णच्छेदणवामिप्पाययो भवति । एवपि वानीस 15 मुत्ताअक्सररयणविभागविता वि अत्ययो अण्णोष्णमक्खमाणा अच्छिण्णच्छेदणयद्वित चि मष्यति । णयनिताए वि वाचीस चेच मुत्ता, 'तरासियाण तिकणइयाइ' ति त्रिकनयाभिमायतो चित्यतेत्यर्थ । तता ससमये विषयचिंताए बावीस चेव मुत्ता चउक्णइया । एव चतुरो [जे० २२० प्र० ] वाचीसातो अह्रासीति मुचा भवति । से च मुत्ताइ २॥ २ ३ ५ १०७ से कि त पुबगते । पुषगते चोदसविहे पण्णते, त जहा-उप्पादपुर १ 20 अग्गेणीय २ वीरिय ३ अस्थिणत्थिपवात ४ नाणप्पवात ५ सच्चप्पवाद ६ आयप्पवाद ७ कम्मप्पवाद ८ पञ्चक्खाण ९ विजणुप्पवाद १० अवझ ११ पौणायु १२ किरियाविसालं १३ लोगबिंदुसार १४ । उपायस्स ण पुवस्स दस वत्थू चत्तारि चैलयवत्थू पणत्वा १। अग्गेणीयस्स ण पुवस्स चोदस वत्थू दुवालस चैलवत्थू पण्णत्ता २ । वौरियस्स ण पुवस्स अट्ठ वत्थू अट्ठ चुलवत्थू पण्णत्ता ३ । अस्थिणत्थिप्पवायस्स ण पुवस्स अट्ठारस १-३-५-७ इमेहयाई मो• मु० ॥ २-४-६-८ सुत्ताह इति पद १० स एव वसते नान्यत्र समवायाङ्गेऽपि नास्ति ॥ ९ मपति इसमक्खाय न. ॥ १० अग्गेणिय स ॥ ११ क्वाणप्पवाद सास विना ॥ १२ विजाणु जेल मो मु ॥ १३ पागाउज । पापाउ हे ल मो छ ॥ १४ अस्मिन् छो उम्पायरस ण पुण्वस्स, भग्गेणीयस्स पुष्पस पीरियस्स ण पुवस्स इत्यादिकेषु चतुदरास्वपि पूर्वनामस्थानेषु उपायपुश्वस्त ण, अग्गेणीयपुग्यस्त थे, पीरियपुषसण इत्यानि पाठभेदो मो• मु इम्यते ॥ १५ चूलपत्यू गु । चूलियावत्यू जे. ३० मो० मु० ॥ १६ अग्गेणायस्सर १ ॥ १७ चूलवत्यू २• • । चूलिभापत्य् ज . मा• मु ॥ १८ चूलब शु । चूलिभाष जे रे यो मु० ॥
७५ 10 M दिद्विवाओ पुव्वगयसुयं च] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्ते । वत्थू दस चुलवत्थू पण्णता ४ । णाणप्पवादस्स णं पुव्वस्स बारस वत्थू पण्णत्ता ५। सच्च- प्पवायस्स णं पुव्वस्स दोण्णि वत्थू पण्णत्ता ६ । आयप्पवायरस णं पुवस्स सोलस वत्थू पण्णता ७ । कम्मष्पवायरस णं पुव्वस्स तीसं वत्थू पण्णत्ता ८ । पञ्चक्खाणस्स णं पुव्वस्स वीसं वत्थू पण्णता ९ । विजणुप्पवादस्स णं पुवस्स पणरस वत्थू पण्णत्ता १० । अवंझस्स णं पुव्वस्स बारस वत्थू पण्णचा ११ । पाणायस्स णं पुवस्स तेरस वत्थू पण्णत्ता १२ । । किरियाविसालस्स णं पुवस्स तीसं वत्थू पण्णता १३ । लोगबिंदुसारस्स णं पुवस्स पणु- वीसं वत्थू पण्णत्ता १४ । दस १ चोदस २ अट्ठ ३ ऽद्वारसेव ४ बारस ५ दुवे ६ य वत्थूणि । सोलस ७ तीसा ८ वीसा ९, पण्णरस १० अणुप्पवायम्मि ॥ ७७ ॥ वास्स एकारसमे ११, वारसमे तेरसेव वत्थूणि १२ । तीसा पुण तेस्समे १३, चोहसमे पण्णवीसा उ १४ ॥ ७८ ॥ चत्तारि १ दुवालस २ अट्ठ ३ चेव दस ४ चेव चुलवत्थूणि। आइलाण चउण्हं, सेसाणं चुल्लया णत्थि ॥ ७९ ॥ से तं पुव्वगते ३ ॥ १०७. से किंत पुव्वगतं ? ति, उच्यते-जम्हा तित्थकरो तित्थपबत्तणकाले गणधराण सव्वसुताधारत्तणतो 13 पुच्वं पुवगतमुतत्थं भासति तम्हा पुन ति भणिता, गणधरा पुण सुत्तरयणं करेन्ता आयाराइकमेण यति वेति य । अण्णायरियमतेणं पुण पुन्वगतमुत्तत्थो पुन्छ अरहता भासितो, गणहरेहि वि पुष्वगतमुतं चेत्र पुग्वं रहतं पच्छा आयाराइ । एवमुक्ते चोदक आह-णणु पुवावरविरुद्धं, कम्हा ? जम्हा आयारनिज्जुत्तीए भणित-"सव्वेसि आयारो०"गाहा[आचाराङ्गनि गा ८]।आचार्याऽऽह-सत्यमुक्तम्, किंतु सा ठवणा, इमं पुण अक्खररयणं पडुच्च भणितं, पुग्वं पुन्ना कता इत्यर्थः। ते य उप्पायपुव्वादिया चोदस पुन्या पण्णचा । पढमं उप्पायपुव्वं ति, तत्थ सव्वदचाणं 20 पज्जवाण य उप्पायभावमंगीकाउं पण्णवणा कता, तस्स पदपरिमाणं एका पदकोडी १ । बितियं अग्गेणीयं, तत्थ वि सव्वदघाण पज्जवाण य सब्वजीवविसेसाण य अग्गं-परिमाणं वणिजइ त्ति अग्गेणीतं, तस्स पदपरिमाणं छण्यउतिं पदसतसहस्सा २ । ततियं वीरियप्पवाय, तत्थ वि अजीवाणं जीवाण य सम्मेतराण वीरियं वदति त्ति वीरियप्पवाद, तस्स वि सत्तरि पदसतसहस्सा ३ । चउत्थं अत्थिणस्थिप्पवाद, ज लोये जहा अस्थि जहा वा पत्थि, अहवा सितवादाभिप्पादतो तदेवास्ति नास्तीत्येवं प्रवदतीति अस्थिणत्थिप्पवाद भणितं, तं पि पदपरि- 25 माणतो सहि पदसतसहस्साणि ४ । पंचमं णाणप्पवादं ति, तम्मि मतिणाणाइपंचकस्स सप्रभेदं प्ररूवणा जम्हा कता तरहा णाणप्पवाद, तम्मि पदपरिमाणं एका पदकोडी एगपणा ५। छठं सञ्चप्पवाद, सच-संजमो सच्च- १ चूलवत्थू ल° शु० ! चूलियावत्थू जे० डे० मो० मु० ॥ २ विजाणु जे० ल० मु० ॥ ३ पाणायुस्ल स० । पाणाउस्स जे० डे० सें. मो० मु० ॥ ४ चुलब मो० शु० सम० ॥ ५ चुलिया स० विना ॥ ६ स्याद्वादाभिप्रायत ॥ .
15 ७६ जिणदासगगिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए सजुय [सु०१०८-१० वयण वा, त सञ्च जत्य समेद सपडिवक्ख च वणिजति त सञ्चप्पवाद, तस्स पदपरिमाण एगा पदकोडी छप्प दाधिया ६। सत्तम आयप्पवात, आय त्ति-आत्मा, [जे० २२० वि० ] सो गहा जत्य णयदरिसणेहिं वणि जति त आयप्पवाद, तस्स वि पदपरिमाण छन्नीस पदकोडीओ ७ । अट्ठम कम्मप्पवाद, गाणावरगाइय अट्ठ विध कम्म पगति द्विति-अणुभाग पदेसादिएहि मेदेहि अग्णेहि य उत्तरुचरभेदेहि जत्य वणिज्जति त कम्मप्प 5 वाद, तस्स वि पदपरिमाण एगा पदकोडी असीतिं च पदसहस्साणि भवति ८। पवम पञ्चक्खाण, तम्मि सम्पचक्खाणसरूव वणिजति ति अतो पचक्खाणप्पवाद, तस्स य पदपरिमाण चतुरासीतिं पदसतसहस्साणि भवति ९ । दसम विजणुप्पवात, तत्य य अणेगे विजातिसया वण्णिता, तस्स पदपरिमाग एगा पदकोडी दस य पदसतसहस्साणि १० । एगाइसम अवझ ति, वझ णाम-णिफल, ण वंझमवझ, सफलेत्यर्थ , सन्चे णाण-तव-सजमजोगा सफला वणिज्जति, अप्पसत्या य पमादादिया सन्वे अनुभफला वणिता, अतो अवझ, 10 तस्स वि पदपरिमाण छब्बीस पदकोडीओ ११ । वारसम पाणायु, तत्य आयु-मागविधाण सच सभेद अण्णे य माणा वण्णिता, तस्स पदपरिमाण एगा पदकोडी छप्पण्ण च पदसतसहस्सा १२। तेरसम किरियाविसाल, तत्य कापकिरियादियाओ विसाल ति-सभेदा, सनमकिरियाओ य छदकिरियविदाणा य, तस्स वि पदपरिमाण पत्र कोडीयो १३ । चोइसम लोगपिंदुसार, तच इमम्मि लोए मुतलोए वा बिंदुमिव अक्खरस्स [सार-] सव्युत्तम सव्वक्खरसण्णिवातपदितत्तणतो लोगविंदुसार, तस्स पदपरिमाण अड्ढतेरस पदकोडीओ १४ ॥३॥ इदाणि अणिोगो त्ति- १०८ से कि त अणुओगे ? अणुओगे दुविहे पण्णत्ते, त जहा-मूलपढमाणुआगे य गडियाणुओगे य । १०८ अनुयोग इत्येतद् अनुरुपो योग अनुयोग इति । एव सर्व एव सूत्राओं वाच्य । इह जन्म भत्र पर्याय शिष्यादियोगविवक्षातोऽनुयोगो वाच्य । स च द्विविध-मूलपदमाणुयोगो गडिकाविशिष्टश्च ॥ तत्य- १०९ से कि त मूलपढमाणुओगे " मूलपढमाणुओगे थे अरहताण भगवताण पुन्न भवा देवलोगगमणाई आउ चवणाइ जम्मणाणि य अभिसेया रायवरसिरीओ पव्वज्जाओ, तवा य उग्गा, केवलनाणुप्पयाओ तित्थपवत्तणाणि य सीसा गणा गणधरा य अज्जा य पवत्तिणीओ य, सघस्स चउन्विहस्स जच परिमाण, जिण-मणपज्जव ओहिणाणि-समतसुय गाणिणो य वादी य अणुत्तरगती य उत्तरवेउब्विणो य मुणिणो जतिया, जचिया सिद्धा, ॐ सिद्धिपहो जह य देसिओ,जच्चिर च काल पादोवगओ, जो जहिं जत्तियाइ भत्ताइ छेइत्ता अतगडो मुणिवरुत्तमो तमरओघविप्पमुको मुक्खसुहमणुत्तर च पत्तो, एते अन्ने य एवमादी भावा मूलपढमाणुओगे कहिया | से त्त मूलपढमाणुओगे। १ छत्तीस ॥२ व किरिय चे चिना ॥ ३ देवगम है. ० तु. मो मु ॥ ४ माय सं ॥ ५ उत्तर पेउविणा यमुणिणो इति से सम. नास्ति । तमो. ० ।। ७ रसुंध ई ॥ ८ पुई मणुचर पदो से है ॥९ पवमन्ने जे.मु ॥ 20 अणुओगसुयं मूलपढमाणुओगो गंडियाणुओगोय] सिरिदेववायगविरइय गंदीसुतं । १०९. 'मूलपढमाणुयोगो' त्ति, इह मूलभावस्तु-तीर्थकरः, तस्य प्रथम-पूर्वभत्रादि, अहवा जे० २२१ प्र० ] मूल एव प्रथमः मूलपढमाणुयोगो । एत्य तित्थगरस्स अतीतभवभावा बद्दमाणभवे य जम्मादिया भावा कहिज्जति। अहवा मूलस्स जे पढमा भावा ते मूलपहमाणुयोगो भण्यति । एत्थ तित्थकरस्स जे भावा प्रस्तास्ते परियाय- मुत-सिंस्साइया भाणितव्वा ॥ ११०. से किं तं गंडियाणुओगे? गंडियाणुओगेणं कुलगरगंडियाओ तित्थगरगंडियाओ चक्कवट्टिगंडियाओ दसारंगंडियाओ बलदेवगंडियाओ वासुदेवगंडियाओ गणधरगंडियाओ भद्दबाहुगंडियाओ तवोकम्मगंडियाओ हरिवंसगंडियाओ ओसप्पिणिगंडियाओ उस्सपिणि- गंडियाओ चित्तंतरगंडियाओ अमर-गर-तिरिय-निस्यगइगमणविविहपरियट्टणेसु एवमाइयाओ गंडियाओ आघविज्जति । से तं गंडियाणुओगे । से तं अणुओगे ४ । .११०. गंडियाणुओगो त्ति इक्खुमादिपर्वगंडिकावत् एकाहिकारत्तणतो गंडियाणुओगो भणितो । ता य 10 कुलकरादियाओ, विमलवाहणादिकुलकराणं "पुन्वभव जम्म णाम प्पमाण० याहा [ आव. नि. गा. १४९ ] एवमादि जं किंचि कुलकरस्स वत्तव्वं तं सव्वं कुलकरगंडियाए भणितं । एवं तित्थकरादिगंडियासु वि । 'चित्तंतर- गंडिय' ति चित्रा इति-अनेकार्था, अंतरे इति-उसभ-अजियतरे ता दिवा, गंडिका इति-खंडं, अतो चित्ततरगंडिका मणिता । तासि परूषणे पुन्वायरिएहिं इमा विधी दिहा- आदिचजसादीणं उसमस्स पयोपदे णरवतीणं । सगरमुताण सुबुद्धी इणमो संख परिकहेति ॥१॥ चोद्दस लक्खा सिद्धा णिवईणेको य होति सबढे । एवेकेकटाणे पुरिसजुगा होतऽसंखेना ॥२॥ पुणरवि चोदस लक्खा सिद्धा निवतीण दोणि सबढे । दुगठाणे त्रि असंवा पुरिसजुगा होति णातव्या ॥३॥ जाव य लक्खा चोइस सिद्धा पण्णास होति सबढे । पण्णासटाणे वि तु पुरिसजुगा होतऽसंखेज्जा ॥४॥ ऐगुत्तरा तु लक्खा संवढे णेय जाव पण्णासा । एक्के कुत्तरठाणे पुरिसजुगा होतऽसंखेजा ॥५॥ १। विवरीयं सन्नद्वे चोइस लक्खाई निबुतो एगो । स चेव य परिवाडी पण्णासा जाव सिद्धीए ॥६॥ २ । तेण पर दुलक्खादी दो दो ठाणा य समग वचंति । सिवगति-सबहिं इणमो तासि विही होइ ॥७॥ दो लक्खा सिद्धीए दो लक्खा णरवतीण सवढे । एवं तिलक्ख चतु पंच जाव लक्खा असंखेजा ॥८॥३। सिवगति-सन्चटेहिं चित्ततरगंडिया ततो चउरो । एगादेगुत्तरिया एगादिविउत्तरा वितिया ॥९॥ ततिएगादितिउत्तर तिगमादिबिउत्तरा चतुत्थेवं। [जे०२२१ द्वि०] पढमाए सिद्धेको दोण्णि य सव्वट्ठसिद्धम्मि॥१०॥ तत्तो तिणि णरिंदा सिद्धा चत्तारि होति सबढे । इय जाव असंखेज्जा सिवगति-सव्वसिद्धेहि १ ॥११॥ ताहे विउत्तराए सिद्धेको तिष्णि हौति सबढे । एवं पंच य सत्त य जाव असंखेज दो वि त्ति २ ॥१२॥ एग चतु सत्त दसगं जाव असंखेज होति दो वि त्ति । सिवगति-सबढेहि तिउत्तराए तु णेतव्वा ३ ॥१३।। १ पावणा पुवायरिएहि इमा दिवा आ० दा० ॥ २ एगुत्तरा उं ठाणा सवढे चेव जाव पण्णाला । एक्केक- तरठाणे दा० ॥ ३ सन्वट्ठाणे य आ० ॥ ४ तेसिं हारि०वृत्तौ ॥ ५ दोण्णि त्ति दा० ॥ ६ रा एत्थ यव्वा आ० । 15 23 25 ३ 'राए मुणेयन्वा दा० ॥
5 10 -- ८ जिणदासगणिमहत्तरविरहयाए चुण्णीए संजय [सु०१११-१२ वाहे-वियगादिबिउत्तराए अउणचीस तु तियग ठावेतु । पढमे त्यि तु खेवो सेसेस ईमो भवे खेवो ॥१४॥ दुग पण णवग तेरस सत्तरस दुवीस छ च अटेव । वारस चोइस तह अटवीस छब्बीस पणुचीसा ॥१५॥ एकारस तेवीसा सीताला सतरि सत्तसचरि या । इग दुग सचासीती एगचरिमेव वावट्ठी ॥१६ अउणत्तरि चवीसा छावाल सत तदेव छच्चीसा । एते रासीखेवा तिगमतता महाकमसो ॥१७॥ सिवगति-सव्व हिं दो दो ठाण विसमुत्तरा णेया । जाप उणवीसठाणे उणवीस पुण छबीसाए ॥१८॥ विसमुत्तरा य पढमा एवमसख विसमुत्तरा णेया । सम्वत्य वि अतिल्ल अण्णाए आदिम ठाण ॥१९॥ गत ॥ अउणचीस वारा ठावेतु गत्थि पढमए खेलो। सेसे अडवीसाए सव्वत्य दुगादियो खेवो ॥२०॥ सिवगति पढमादीए वितियाए तह य होति सबढे । इय एगतरिताइ सिगति सनद्वठाणाइ ॥२१॥ एवमसखेजाओ चित्ततरगडियाओ णेतना । जाब जितसत्तुराया अजिताजणपिता समुप्पण्णो ४ ॥२२॥ एव गाहाहि चिचतरगडिया समचा । इमा एतासि ठवणा- सिद्धा लक्खा | १४ | १४ | १४| १४ | १४ | १४ | १४ | १४ | १४ | १४ | १४ सबढे लक्खा | १२ | ३/४ | ५ | ६ | ७ १०/५० एव जाव असखेजा पुरिसजुगा सिद्धा । अतो पर- सिद्धा लक्खा | १ | २ | ३ | ४ ५ ६ ७ ८ ९ १०/५० सबढे लक्खा | १४|१४|१४|१४|१४|१४|१४|१४|१४|१४| १४ एव पि असखेजा पुरिसजुगा सिद्धा । एते वि लक्खा- सिद्धा लक्सा | २३ ८ ९ १० ११ १२ सबढे लक्खा | २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ | ९ १० ११ १२ एव नाव असखेज्जा आवलिया दुगादिएगुत्तरा दो [जे. २२२ प्र० ] विगच्छति ॥ सिद्धा १|३|५७ | ९ | ११ | १३. १५/१७/ १९ सबढे २|४|६८|१०|१२|१४|१६|१८/२० एव असखेजा। एगादेगुत्तरा पमा चित्ततरगडिया णेया॥ सिद्धा १|५| ९ |१३| १७/२१/२५/२९ ३३/३७ ४१ सबढे ३ | ७ | ११ |१५|१९|२३|२७|३१/३५/३९.४३ एव असखेजा। एगादिविउत्तरा रितिया चित्ततरगडिया ॥ र मे भये सेवा मा० ॥२ चित्रान्तरगण्डिका-तान्त्रकदम्बकविशेषजिल्हामुभिदृष्टव्या अस्मत्सम्पादितनन्दिसत्रहारिमद्रीवस्यनन्तर- मुहिनदुगपदम्यारयामा १६७ तमे पत्र टिप्पणी ॥ 15 20 25 दिविवाओ चूलियाओ य] सिरिदेववायगविरइयं णदीसुत्त । ७९ सिद्धा | १७ १७ | १३ | १९ २५ ३१ ३७ ४३ ४९ ५५ सबढे ४ | १० | १६ २२ २८ ३४ ४० ४६ ५२ ५८ एवं जाव असंखेज्जा । एगादितिउत्तरा ततिया चित्तंतरगंडिया ॥ सिवगति ३८१६|२५/ ११ / १७ / २९ १४ ५० ८० | ५ |७४ | ७२ ४९ २९ सबढे ५ १२ २०| ९ |१५/३१ २८/२६/७३ ४ ९०/६५ २७ १०३ ३ 5 10 सबढे २९ ३४ | ४२ ५१ ३७ ४३ ५५ ४० |७६ १०६/३१ १००/९८ ७५ ५५ सिवगति ३१ ३८ ४६ ३५ ४१ ५७ ५४ / ५२ ९९ ३० ११६/ ९१ | ५३ १२९ सेसं गाहाणुसारेण णेतव्वं जाव असंखेज्जा ४ ॥ १११. से किं तं चूलियाओ? चूलियाओ आइलाणं चउण्हें पुव्वाणं चूलिया, अव- सेसा पुब्बा अचूलिया । से तं चूलियाओ ५। १११. 'चूल' त्ति सिहरं। दिडिवाते ज परिकम्म-मुत्त-पुन्च-अणुयोगे यण भणितं तं चूलासु भणितं । ताओ य चूलाओ आदिल्लपुव्वाण चतुण्हं जे चूलवत्थू भणिता ते चेव सव्वुवरि ढविता पढिज्जति य, अतो ते सुयपचय- चूला इब चूला । तेसि जहक्कमेण संखा चतु बारस अट्ठ दस य भवंति ५ ॥ ११२. दिद्विवायरस णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ 15 संगहणीओ । से णं अगट्ठयाए दुवालसमे अंगे, एगे सुयक्खंधे, चोइस पुव्वा, संखेज्जा बत्थू, संखेज्जा चुल्लवस्थू, संखेज्जा पाहुडा, संखेज्जा पाहुडपाहुडा, संखेज्जाओ पाहुडि- याओ, संखेज्जाओ पाहुडपाहुडियाओ, संखेज्जाई पैंदसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दसिज्जति गिदंसिज्जति उव- 20 दंसिज्जंति । से एवंआया, एवंणाया, एवंविण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज- ति । से तं दिद्विवाए १२ । ११२. संखेजा बत्थू पशुवीसुत्तरा दो सता । 'संखेजा चूलवत्थु' त्ति चतुत्तीसं ।। १-२ चूलिया ख० स० ल० शु० ॥ ३ चूलिया, सेसाई पुवाई अचूलियाई, से तं जे० मो० मु० ॥ ४ चूलिया व० सं० २० शु० ॥ ५ दिहिवाए णं ख० स० ल० शु० ॥ ६ अंगहाए स० शु० ॥ ७ वारसमे जे० मो० मु० ॥ ८ पुवाई २० मो० मु० ॥ ९ चूलवत्यू ख० स० सम० विना ॥ १० पदसतसह सम० ॥ ११ विनंति स० जे० ॥ , , .
5 - जिणदासगगिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए सजुय [सु० ११३-१६ गा०८० ११३ इंचेइमम्मि दुवालसंगे गणिपिडगे अणता भावा अणता अभावा अणंता हेऊ अणता अहेऊ अणता कारणा अणता अकारणा अणता जीवा अणंता अजीवा अणता भवसिद्धिया अणंता अभवसिद्धिया अणता सिद्धा अणता असिद्धा पण्णता सगइणिगाहा- भावममावा हेउमहेऊ कारणमकारणा चेव । जीवाज्जीवा भवियमभविया सिद्धा असिद्धा य॥ ८ ॥ ११३ अणता भाव चि मान भूतिर्वा भाव , ते य जीवा जीवात्मका अणता प्रतिबद्धा । 'अणना अभाव' त्ति अभवन अभाव अभूतिया । जहा जीवो अजीवत्तेण अभावो, अजीवा य जीवतेण, घडो पडचेण, पडो य घडत्तेण, एमादि अणता अमावा प्रतिवद्धा । अहवा जे जहा जावइया भावा तेसि पडिपक्खतो तावइया चेव अणता अमावा भवति । 'अणता हेतु' चि पच-दसावयवर्वयणेसु पक्खधम्मत्त सपक्खसत्त अभिलसितमत्यसाधक 10 वयण हेतू भणति, अहवा सम्वचिजुत्त वयण हेतू मष्णति, अहवा सव्वे जिणवयणपहा हेतू , मतिपतिकतणतो, णियोसहेतुवयण क, मुत्तस्स य अणता जे० २२२ दि० गमत्तगतो, एव अणता हेतू । भणितपडिवखतो य अणता चेव अहेतू । 'अणता कारण' ति कजसाधय कारण ति, ते य पयोग-चीससातो अणता माणितया । जब जस्स असाधक ततस्स अकारण, जहा चकन्दडादयो पडस्स, एव अणता अकारणा। 'अणता जीवा' इत्यादि कठ॥ ११४ ईचेइय दुवालसग गणिपिडगं तीए काले अणंता जीवा आणाए विराहेना 5 चाउरत ससारकतार अणुपरियटिंसु । इञ्चेश्य दुवालसग गणिपिडग पडुप्पण्णकाले परित्ता जीवा आणाए विराहेत्ता चाउरत ससारकतारं अणुपरियति । इचेइय दुवालसंग गणिपिडगं अणागते काले अणता जीवा आणाए विराहेत्ता चाउरत ससारकतार अणुपरियट्टिस्सति । ११४ इचय दुवालसगं गणिपिडर्ग तीते काले अणता जीवा आणाए विराहेता इत्यादि । 'दुवालसग गणिपिडग' ति तिविह पण्णत-मुत्ततो अत्यतो तदुभयतो या एमेव आणा तिविहा-सुत्ताणा अत्याणा १ शेयम्मि स० ॥ २ कारणा जीग । मजीव मवियज्मविया, तत्तो सिधा सं० शु॥ ३ पचावयप दशा वयवज्ञानार्थमनोविल्यमानो दण्वकालिकसूचनियुक पूर्णि-वृद्धविवरण-वृत्यादिगतो प्रथस दोऽवधारणीय - पण्णा-हेट दिद्वतोपसंहार निगमणेहि या निरूपिबति आगमवयण पचहि दसहि वा ।' या "पतिण्णा पढमो अवयवो पतिण्णासुदी र हेऊ ३ हेउसुदी दिसतो ५ दिवैतविसुदी ६ उपसंहारो ७ उपसहारपिसुद्धी ८ पियमण र नियमणविमुदी दसमो , 1 इति । स्थति पचावय" इति दशकालिकरानियुकिंगाथा १३ अगस्त्यसिंहचूणा पत्र २० ]। काइ आगम हेउ दिद्वतोवसंधार णिगमणावसाणेण पच्चत्रयवेण कहिबा, बदाइ पुष दसावयदेण । तया-"इदाणि दसावयवाण पल्वम काहामि त-पतिग्गा पढमो अवयवो १ पाण्णाविसुद्धी ३ एष हेऊ तइओ अायवो ३ हेउविमुद्री चढत्यो अपयको १ विद्वतो पचमो अवयवो ५ दिहतविसुद्धी छट्ठो ६ उपसंहारो ७ उपसंहारविसुद्धी अनुमो ८ पिगमणे णमो : णिगमणविमुद्धी दसमो १० । इति वृद्धविपरणे पत्र ३८-३९ । प्रतिपादय' यथोकम् -- प्रतिक्षा हेतूदाहरणोपनय निगमनानीत्यायवा' [न्यायदः 1-1-२१] दशवकालिकहरिमत्ति पत्र ३१ तया- वे उ पइन । विमती र हेड ३ विमत्ती । विवक्त ५ परिसेहो । दिद्वतो भाका र तप्पडिसेहो । निगमण . १३७॥ दशकालिकनियुक्ति । अस्या व्याख्या हारिभद्री वृत्तिरवलोकनीया । एपखेषु दशावयववैविध्यमपि न विस्मरणीयम् ॥ ४ पपणे सपायम्मत सपक्वत्त अमिलसितमसाधक भा ॥ ५ पादकत्तणतो आ दा ॥ ६ाय से शु एवमप्रऽपि सर्वत्र सेयम् । १ ३ 1 सुयणाणविराहणा-ऽऽराहणाण फलाई] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । ८१ तदुभयआणा य ऐवं एगहिता तहा वि अभिधाणतो विसेसो कजति-यदा आज्ञाप्यते एभिः तदा आज्ञा भवति, तंतुंपटव्यपदेशवत् । आज्ञाप्यते यया हितोपदेशत्वेन सा आशा इति । इदाणि एतेसिं विराहणा चिंतिज्जति-ज मुत्ततो दुवालसंगं गणिपिडगं तं अस्थतो अभिनिवेसेण अण्णहा पण्णवेतो ताए अत्थाणाए सुत्तं विराहेत्ता तीते काले अणंता जीवा संसारं भमितपुब्बा, गोट्ठामाहिलवत् । अहया जं अस्थतो दुवालसंगं गणिपिडगं तं श्रुत्ततो अभिणिवेसेण अण्णहा पदंतो ताए मुत्ताणाए अत्थं विराहेत्ता तीते काले अणंता जीवा संसारं भमितपुन्या 5 जमालिवत् । अहवा आणं ति-पंचविहायारायरणसीलस्स गुरुगो हितोवदेसवयणं आणा, तमण्णधा आयरंतेण गणिपिडगं विराधितं भवति, एवं तीए काले अणंता जीवा संसार भमितपुमा, एसो अक्खरसमो अत्थो। इमो अणक्खरसमो-आणाए विराधेत्ता इति जहा छायाए मुंजित्ता गो, गो छायाए करणभूयाए मुंजित्ता, किंतु च्छायायां भुक्त्वा गतेति, एवं आज्ञायां विराधनं कृत्वा । सा य आणा इमा-'इचेयं दुबालसंगं गणिपिडगंआणाए विराहेत्ता'। सेसं पूर्ववत् । पडुप्पण्ण-अणागतेनु वि मुत्तेमु एवं चेव वत्तव्वं, गवरं पडुप्पण्णे काले परित्ता जीवा 10 इति, अणंता असंखेज्जा य [जे० २२३ प्र०] ण भवंति, सण्णिमणुयाणं संखेज्जत्तणतो ॥ ११५. इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं अतीतकाले अणंता जीवा आणाए आराहेत्ता चाउरतं संसारकतारं वितिवइंसु । इचेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं पडुप्पण्णकाले परित्ता जीवा आणाए आराहेत्ता चाउरतं संसारकंतारं वितिवेयंति । इचेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं अणागए काले अणंता जीवा आणाए आराहेत्ता चाउरतं संसारकतारं वितिर्वतिस्संति । ११५. तिसु वि आराधणसुत्तेसु एवं चेव वत्तव्ये ।। ११६. इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं ण कयाइ णाऽऽसी ण कयाइ ण भवति ण कयाइ ण भविस्सति, भुवि च भवति य भविस्सति य, धुवे णिअएं सासते अक्खए अव्वए अव- हिए णिच्चे। से जहाणांमए पंचत्थिकाए ण कयाति णाऽऽसी ण कयाति गत्थि ण कयाइ ण भविस्सति, भुर्वि च भवति य भविस्सति य, धुवा णीया सासता अक्खया अव्वया 20 अवडिया णिचा, एवामेव दुवालसंगे गणिपिडगे ण कयाइ णाऽऽसी ण कयाइ णत्थि ण कयाइ ण भविस्सति, भुवि च भवति य भविस्सति य, धुवे णिोंए सासते अक्खए अव्वए अवहिए णिच्चे। ११६. ण कताइ गाऽऽसीत्यादि । त्रिकाले नास्तिवभावप्रतिषेधकं सूत्रम् । 'भुवि च' इत्यादि त्रिकाले अस्तिखभावप्रतिपादकं सूत्रम् । त्रिकालभावितणतो चेव अचलभावखाद् ध्रुवं मेर्वादिवत् । धुवत्तणतो चेव जीवादि- 25 १ एए एग दा० ॥ २ तंतुभिः पटं व्यय, देवदत्तवत् आ० दा० ॥ ३ तीए काले जे० मु० ॥ ४-५-६ वीइच जे० मो० । वीतीव शु० ॥ ७ णीते ख० ल० शु० ॥ ८णामे ख० ॥ ९ काया ख० डे० ल० शु० ॥ १० ण भति ण कयाइ ण भविस्संति, भुविं च भवंति च भविस्संति य, धुवा णीया सासता अक्खया अन्वया अवडिया णिञ्चा, 15 7. ल. शु० ॥ ११ णीते व. ल. शु० ॥
८२ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीर संजय [सु. ११७-११८ गा० ८१-८५ णवपदत्येसु नियुक्त नियत जहालोकवचन पचास्तिकायेष्विव । मियतत्तणतो चेव 'सासत' शश्वद् भवतीतिशाश्वतम्, प्रतिसमयावलिक मुहूर्त दिनादिष्विव काल । सासतत्तणतो चेव वायणादिसु 'अक्खय' नास्य क्षयो अक्षयम्, गगा सिंधुभवाहेष्वपि पोंडरीकइदचत् । अक्खयतणतो चेव 'अन्वय' नास्य व्ययो अव्ययम्, मानुषोत्तराद बहिसमुद्रवत् । अन्वयत्तणतो चेव स्वममाणे अवहित जबूढीपादिवत् । अवहितत्तणतो चेव सन्चहा चिंतिन्जमाण 'निच' आकाशवद् 3 अविनाशीत्यर्थ । अहवा एते धुवादिया एगट्टिता । चोदक आइ-सेयं दुबालसग घुवादिपदपरूवित किमाणागेजस दिद्वततो वा सज्म? आचार्याऽह-जम्हा जिणा अणण्णहावादिणी तम्हा वेसिं वयणं सच आणाते चेत्र राज्य, कहिचि दिद्वततो वि गज्झ । इह दुवालसगस धुवादिपरुवितत्यस्स साधको इमो दिद्वतो-से जहानामते'त्यादि कळ ॥ ११७ से समासतो चउन्विहे पण्णते, तं जहा-दव्वओ खेचओ कालओ मावो। तत्य दव्वओ ण सुयणाणी उवउत्ते सव्वदन्वाइ जाणइ पासइ । खेतओ ण सुपणाणी उवउत्ते 10 सव्वं खेत्तं जाणइ पासइ । कालओ ण सुयणाणी उवउत्ते सव्व कालं जाणइ पासइ । भावओ ण सुयणाणी उवउत्ते सव्वे भावे जाणइ पासइ । १९७ तच दुवालसगमत चतुन्विह दन्यादि । अमिष्णदसपुच्चादियाण भाव भुतनाणकेवली ने पढच्च भणितं । दन्नतो ण मुतनाणी मुतनाणेणोपयुत्तो मुत्तविण्यसीए सचदन्यादि जाणति पासति य । गणु पासइ त्ति विरोहो ? उच्यते-जम्हा अदिवाण वि मेरुमादियाण सुतणाणपासणताए आगारमालिहइ, यादिव लिखा, 15 पण्णवणाए य मणिता सुतणागपासणत ति, ण विरोधी । भारतो पुण जे मुतनाणी ते सव्वदचनाण-पासणताह भइता । सा य भयणा मतिबिसेसतो जाणितन्या । एव खेत-काल-भाचेच वि [० २२३ वि०] माणितम्या ।। मुतनागदसणत्य मण्णति-- ११८ अक्खर १ सण्णी २ सम्म ३ सादीय ४ खलु सपज्जवसिय ५ च । गमिय ६ अगपविट्ठ ७ सत्त वि एए सपडिवक्खा ॥ ८॥ [आव०नि० गा० १९] आगमसत्यग्गहण ज बुद्धिगुणेहिं अहहि दिछ । विति सुयणाणलभ त पुन्वविसारया धीरा ॥२॥ सुस्सूसइ १ पडिपुच्छइ २ सुणेइ ३ गिण्हह ४ य ईहए ५ यौवि । ततो अपोहए ६ वा धारेइ ७ करेइ वा सम्म ॥३॥ मूय १ हुंकारं २ वा वाढकार ३ पडिपुच्छ ४ वीमंसा ५। तत्तो पसगपारायण ६ व परिणिट्ठ ७ सत्तमए ।। ८४ ॥ १ जिणा णण्णा आ॥ २ तस्य इति ख. है न.शु विमान पुररणे ३० पत्रे भास्ति ॥ ३९५९ हाटोपा ॥ ४-६-८ सव्य र विभानन्युरणे ३.. पत्रे ॥ १० अहि वि विट्ठ जे. ० ॥ ११ आवि । घा 20 २ जे ॥ १२ पास.॥
5 सुयणाणलाभ-सवण-वस्त्राणविहिमाइ] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्त । ८३ सुत्त्थो खलु पढमो, बीओ णिज्जुत्तिमीसिओ भणिओ। तइओ य णिखसेसो, एस विही होइ अणुओगे ॥ ५॥ [आव०नि० गा० २१-२४] से तं अंगपविढं । से तं सुयणाणं । से तं परोक्खणाणं । ॥ से तं गंदी सम्मत्ता॥ ११८. अक्खर० गाहा । एसा चोदसविहसुतभावपरूवणा कता ॥८१॥ एत्थं आयारादिगणधरागम- पणीतस्स पत्तेगबुद्धभासितस्स वा तहाकालाणुभावतो वल-बुद्धि-मेधा-ऽऽयुहाणिं जाणिऊण जे य मुतभावा आयरिएहि निज्जूढा तेसु गहणविही दंसिज्जइ- आगम० गाहा ।।८२॥ इमे ते अट्ठ बुद्धिगुणा- सुस्सूसति० गाहा ।।८३॥ विणेतस्स अत्थसवणे इमा विही- मूयं हुंकार० गाहा ॥८४॥ गुरुणो अणुयोगकहणे इमा विही- सुत्तत्यो खलु गाहा ॥८५॥ जंण भणितमूणं वा अतिरित्तं वा वि अहव विवरीतं । तं सम्मऽणुयोगधरा कहेंतु कातुं मम खंति ॥१॥ णिरेणेगम चण ह सदा जि या पसुपतिसंखगजद्विताकुला । कमद्विता धीमतचिंतियक्खरा, फुडं कहेयंतऽभिधाण कत्तुणो ॥ छ । शंकराज्ञो पंचसु वर्षशतेषु व्यतिक्रांतेषु अष्टनवतेषु नंद्यध्ययनचूर्णी समाप्ता इति ॥छ॥छ॥ ग्रन्थानम् १५००|| 10 15 .. १ गणधरपणीतस्स आ० दा० ॥ २ णिरेणगामेत्तमहासहाजिता पस्यती संखजगद्विता आ० ॥ ३ सकराजतो पंचसु वर्षशतेषु नन्द्यध्ययन आ० ॥
गाथा गाथा गाथा ३ ro . २ ६६ काले चउण्ह वुड्ढी ४० केवलगाणेणऽत्थे अयलपुरा शिक्खते ५ २ प्रथमं परिशिष्टम् नन्दीसूत्रान्तर्गतानां सूत्रगाथानामकारादिवर्णक्रमेण अनुक्रमणिका सूत्राङ्क गाथाङ्क सूत्राङ्क गाथाङ्क सूत्राङ्क गाथाङ्क अक्खर सण्णी सम्म ११८ ८१ ओही भवपञ्चतियो २८ ५२ जेसि इमो अणुओगो ५ ३२ [आव नि. गा. १९] कम्मरयजलोहविणि ७ णाणम्मि दंसणम्मि य ५ २८ अड्ढभरहप्पहाणे ५ ३७ कालियसुयअणुओग- ३४ णाणवररयणदिप्पंत- १७ अणुमाणहेउदिद्रुत- ४६ २३ ५० णिमित्ते अस्थसत्थे य ४६ ६२ [ आव नि. गा. ९४८] [आव नि गा ३६] [आव. नि गा ९४४] अस्थमहत्थवखाणिं ५ ४१ ५५ गियमूसियकणयसिला- २ १३ अस्थाणं उग्गहणं ५८ ७१ [आव नि गा ७८ रतियदेवतित्थंकरा पत्र-२० टि०८ [आव. नि गा. ३] खमए अमच्चपुत्ते ४६ ६८ [टीकाद्वयसम्मता गाथा, अभए सेटूि कुमारे ४६ ६७ [आव नि गा ९५०] आव नि. गा. ६६] [आव नि. गा ९४९] खीरमिव जहा हंसा पत्र-१२ टि०५ गेवुइपहसासणयं ३१ पत्र-७ टि०६ [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा] [टीकाद्वयसम्मता गाथा] अह सव्वदव्यपरिणाम- ४१ [आव. नि गा. ७७]] गुणभवणगहण ! सुय ६ तत्तो य भूयदिन्नं पत्र-१० टि०७ अंगुलमावलियाणं गुणरयणुजलकडयं पत्र-५ टि०१० २३ ४६ [ चूर्णि-टीकाद्वयानाद्दता गाथा] [आव. नि गा. ३२] [चूर्णि-टीकाद्वयानास्ता गाथा] तत्तो हिमवंतमहंत ५ ३३ आगमसत्थरगहणं गोविंदाणं पि णमो पत्र-१० टि०७ १२८ ८२ तवनियमसच्चसजम- पत्र-११ टि०११ [आव नि गा. २१] [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा] [चूर्णि-टीकाद्वयानादृत्ता गाया] ईहा अपोह वीमंसा चत्तारि दुवालस अ- १०७ ७९ तवसंजममयलंछण! ९ [आव. नि गा १२] ४६ ६९ तवियवरकणगचंपय- उग्गह ईहाऽवाओ [आव नि. गा. ९५१] ५८ ७० [आव नि गा २] जचजणधाउसम ५ २६ उग्गह एक समय १ दस चोदस अदुष्ठा- १०७ ७७ ५८ [आव. नि गा ४] जयइ सुयाणं पभवो २ नगर रह चक्क पउमे पत्र-५ टि०१० उप्पत्तिया वेणइया ४६ । ५६ जसमदं तुंगियं वंदे [चूर्णि-टीकाद्वयानास्ता गाथा] ५ २३ [आव. नि गा ९३८] जावतिया तिसमया २३ न य कत्थइ निम्माओ पत्र-१२ दि०५ ४६ ६४ आव. नि. गा. ३०] [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा] [आव नि गा ९४६] जा होइ पगइमहुरा पत्र-१२ टि०५ पढमेत्थ इंदभूती २० ऊससियं नीससियं ६४ ७६ [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा ] परतिस्थियगहपह- १० [आव नि. गा २०] जीवदयासुंदरकंद १४ पुढे सुणेति सद ५८ एलावच्चसगोतं ७३ २४ जे अण्णे भगवते ५ ४२ [आव. नि. गा ५] । २ चलणाहण आमंडे ५ ३० तिसमुदखायकित्ति ५ ७२ जयइ जगजीवजोणी- १ ४४ उवओगदिदुसारा २ २ ५ ८६ नदीसूत्रगाथानामकारादिक्रमेणानुक्रमणिका गाथा गाथा २ ८ २१ सावगजणमहुवरिपरि ३५ सीया साडी दीह च ५ ५ भद सीलपडागू ५ २ ४ वड्उ वायगवसो सवाद गाथा माथा सलाई गाथा सत्राई गाथा पुञ्च अदिद्रुममय १६ ५७ महुसिन्थ मुदियके ६० सजमतवतुबार ५ [भार नि गा ९५५] [आव नि गा ९१२] सवरवरजलपगलियउझ २ १५ वारस एकारसमे १०७ ७८ मडिय मोरियपुत्ते ४ भणणं फरग शरण २७ मिउमइयासपणे १६ ६३ मद पिइवेलापरि ११ भूय हुकार या ११८ [आव नि या ९१५] मा सम्वगुजो ३ [आव नि गा २३] सुकुमालकोमलतले ११ २९ सुत्तत्थो खल्ल पढमो ११८ भरगिथरणसमस्था १६ ६१ वदामि अजधम्म पत्र ८ टि०१० [भाव नि गा २५] (आव नि गा ९५३] [णि टीकादयानारता माथा] सुमुणियणिचाणिध भरहम्मि अदमासो वदामि अजरक्खिय पत्र ८ टि०१० सुस्तूसइ पडिपुच्छह २३ ४८ ११८ ८३ [आय नि गा ३०] [चूर्णि-टीकाद्वयानास्ता गाथा] [भाष निगा २३] भरह सिल पणिय रुखे १६ ५८ वदे उसभ अजिय १८ मुहम्म अम्भिवेसाण २२ [आव निगा ९१ ] विणयणयपवरमुणिवर पत्र ५ टि०८ मुहुमो य होइ कालो २३ ५१ भरह सिल मिड कुकुड १६ ५९ [१६ गापाप्रथमचरणपाठमेद] [आप नि गा ३५] [भार नि ९५१] विगयमयपवरमुणिवर १६ सेलघण कुडग चालगि ६ ४३ भावममावा हेउम ११३ ८० विमलमणतइधम्म १९ [आव नि मा १३५] मासासमसेनीओ ५८ ७४ सम्मदसणवइरदढ- १२ हत्थम्मि मुहुचतो २३ १७ भाव नि गा] सञ्चबहुमगणिजीवा २३ ४५ [आव नि या ] भूयहिययप्पगमे ५ [भाव नि मा ३१] २५ मणपनवारण पुणे ३२ ५३ सखे जम्मि उ काले २३ १९ हेरगिए फरिसए १६ ६५ भाष नि] [आप नि गा ३५] [भाव नि मा 0 ३ २ سم २ हारियगोत्त साइ ५ २ तीसं वारा रिलंभेण समा ३० ७७ ] ] णुद प्रेरणे द्वितीयं परिशिष्टम् नन्दीसूत्रचूय॑न्तर्गतानामुद्धरणानामकारादिवर्णक्रमेण अनुक्रमणिका गाथादि पत्रात गाथादि पत्राङ्क गायादि पनाक त्तरि चउवीसा ७८ एवमसखेज्जाओ ७८ जह जुगवुप्पत्तीय वि २९ ७८ एवं तु अणंतेहि ५४ विशेषणवती गा. २१९] ५५ [कल्पभाष्य गा ७०] जह पासतु तह पासतु ३० शेषावश्यक गा १४३] एवं बहुवत्तव्यं ५६ [विशेपणवती गा. १९२] ण चेव वीसुं २८ [नन्दीचूर्णी] जं केवलाई सादी- २८ शेषणवती गा. १५४] कस्स व णाणुमतमिणं [विशेषणवती गा. १९३] भोजने १४ [विशेषणवती गा २४६] जाव य लक्खा चोइस णि. धातु. १५२४] किचिम्मत्तग्गाही १३ जुगवमजाणंतो वि हु २९ व्याप्ती १४ [ कल्पभाष्य गा. ३६९] [विशेषणवती गा २१६] णि धातु १२६५] कृमिकीटपतङ्गायाः ४८ णववंभचेरमइओ ६२ ण वि एतं तो सुण २९ [आचाराङ्ग नि गा. ११] शेषणवती गा. २०३] केण हवेज निरोधो ५४ १७ देसणाणदंसण ३० [कल्पभाष्य गा. ६९] [पाणि धातु १२८३] शेषणवती गा १५७] केयी भणंति जुगवं २८ ततिएगादि तिउत्तर दिचजसादीणं [विशेषणवती गा. १५३] तत्तो तिण्णि गरिंदा Tऽऽयोणिहणत्तं २८ केवलमेग सुद्धं १४ तह य असञ्चगुत्तं वशेषणवती गा. १९१] [विशेषावश्यक गा. ८१] [विशेषणवती गा १९५] २४ गगहरकतमंगगतं ५७ ताह विउत्तराए नित्य मंन ! तिथं ? २६ २९ गमणपरावत्तेगो १३ विशेषणवती गा. २०६] [मगवती श २० ८ ८ स. ६८२] नियगादिविउत्तगप ३० गुणदोसविमंस १२ तुले उमयावग्ण- २१ [कल्पभाप्य गा. ३६५] ५४ गुरुलहुदहितो ५३ [विशेषगवती गा...] कल्पभाष्य गा. ७१] नंग पर दुलवादी [कल्पमाप्य गा. ६७] २४ चोहम लम्बा सिद्धा बृहत्सङ्ग्रहणी गा ३३५]] ५६ जनि पुण मो वि परिजन [वियगगनी गा. २..] कारस तेवीसा [ल्पमाप्य गा." ग चतु सत्त दसगं ३० [विपणनी गा. १५५] [पिपानी गा..] ७७ घोलौकिका प्रामा [ --- उत्तरसेमेव य لا योगो एगतरो वशेषणवती गा २३२] "लद्वी अगुरुलहू स्सेहपमाणतो मिणे देहं ७७ दिनम्म लमतन्न व २१ 1 दुग पण णवर्ग नग्न ३० दमण्णाणीवन जह किन बीणावग्ण गुत्तरा तु लक्खा ७७ ८६ नन्दीसूत्रगाथानामकारादिक्रमेणानुक्रमणिका गाथा गाथा वारस एकारसमे ४ ५ ८ २१ सावगजणमहुवरिपरि ३५ सीया साडी दीह च २ ५ २ २ ४ वड्दउ वायगवसो सवाड गाथाइ गाथा सलाई गाथा सूत्राह गाथा पुञ्च अदिद्रुमसुय ४६ ५७ महुसिथ मुदियके ६० सजमतवतुबार ५ [भाव नि गा १९] [आव निगा ११२] सबरवरजलपगलियउज्झ १५ १०७ ७८ मडिय मोरियपुते भणगं करग रग २७ मिउमइवसपणे ४६ ६३ भद पिइवेलापरि ११ मूय हुकार वा ११८ ८४ [आव नि गा ५१५] मा सञ्चजगुजो ३ [आइ नि गा २३] सुकुमालकोमलतले ५ ११ मद सीलपडागू २९ सुत्तत्थो खल पढमो ११८ भरगित्थरणसमत्या १६ ६१ वदामि मज्जधम्म पत्र ८ टि०१० भाव नि मा २५] [आव निगा ९३] [र्षि-टीकाद्वयानाइता गाथा] सुमुगियणिचाणि ३९ भरहम्मि अदमासो २३ वदामि अग्जरखिय पत्र ८ टि०१० सुस्सूसइ पडिपुच्छ। ११८ ८३ ४८ [भाष नि गा ३५] [चूर्णि-टोकादयानादता गाथा] [भाष नि गा १२] भरह सिल पणिय स्खे १६ वदे उसम मजिय १८ २२ [आव नि गा ११.] विणयणयपवरमुणिवर पत्र ५ टि०८ सुहुमो य होइ कालो २३ ५१ भरह सिल मिंड कुकुड १६ ५९ [१६ गाभाप्रथमचरणपाठमेद] [भाष निगा ३७] [भाव नि गा ९५] विणयमयपवरमुणिवर १६ सेलघण कुडग चालणि भावममावा हेउम ८० विमलमणतइधम्म १९ [भाव नि गा १३६]] भासासमसेटीओ ७४ सम्मदसणवइरदढ १२ हत्यम्मि मुहुत्ततो २३ [भाव निगा ६] सन्चबहुअगणिजीवा ૨૨ ४५ [आव नि मा ३३] म्यहिययप्पगमे ३८ [भाव नि मा ३१] हारियगोत्त साह २५ मणपजवणाण पुण ३२ ५३ सखे जम्मि उकाले २३ ४९ हेरगिए करिसए १६ [आब नि] [आव नि गा ३५] [भाव नि मा ९४७] ३ सुहम्म अम्भिवेसाण ५ ३ २ ५८ ५ ५ २ ७८ ७८ ३० अश भोजने अशू व्याप्ती गुद प्रेरणे द्वितीयं परिशिष्टम् नन्दीसूत्रचूर्ण्यन्तर्गतानामुद्धरणानामकारादिवर्णक्रमेण अनुक्रमणिका गाथादि पत्राङ्क गाथादि पत्राङ्क गाथादि पत्राङ्क अउणत्तरि चउवीसा एवमसखेज्जाओ जह जुगवुप्पत्तीय वि २९ अउगत्तीस वारा एवं तु अणंतेहिं ५४ [विशेषणवती गा. २१९] अक्खरलंभेण समा [कल्पभाष्य गा. ७० जह पासतु तह पासतु [विशेषावश्यक गा १४३]] एवं बहुवत्तव्वं ५६ [विशेषणवती गा. १९२] जं केवलाई सादी- [नन्दीचूर्णी] २८ अण्णे ण चेव वीसुं २८ [विशेपणवती गा. १९३] [विशेषणवती गा. १५४] कस्स व णाणुमतमिणं ३० १४ [विशेषणवती गा. २१६] जाव य लक्खा चोइस [पाणि. धातु. १५२४] किचिम्मत्तग्गाही १३ जुगवमजाणंतो वि हु २९ १४ [ कल्पभाष्य गा. ३६९] [विशेषणवती गा २१६] [पाणि. धातु १२६५] कृमिकीटपतङ्गाद्याः ४८ णववंभचेरमइओ ६२ अह ण वि एतं तो सुण २९ [आचाराङ्ग नि गा. ११] [विशेषणवती गा. २०३] केण हवेज्ज निरोधो ५४ १७ अह देसणाणदंसण ३० [कल्पभाग्य गा. ६९] [पाणि धातु १२८३] [विशेषणवती गा १५७] केयी भणंति जुगवं २८ ततिएगादि तिउत्तर आदिचजसादीणं [विशेषणवती गा. १५३] तत्तो तिण्णि णरिंदा इहराऽऽयोगिहण १४ तह य असव्वगुत्तं २८ [विशेषणवती गा. १९४] [विशेषावश्यक गा ८४] [विशेषणवती गा १९५] इहाऽधोलौकिका ग्रामा २४ गणहरकतमंगगतं ताहे बिउत्तराए उवउत्तरसेमेव य तित्थं भंते ! तित्थं ? २९ गमणपरावत्तेगो २६ १३ [विशेषणवती गा. २०६] [भगवती श. २० उ ८ सू. ६८२] उपयोगो एगतरो ३० गुणदोसविसेसण्णू तियगादिबिउत्तराए १२ [विशेषणवती गा २३२]] [कल्पभाष्य गा. ३६५] तुल्ले उभयावरण- २९ ५४ गुरुलहुदब्वेहितो ५३ [विशेषणवती गा. २१७] [कल्पभाष्य गा. ७१] [कल्पभाष्य गा ६७] तेण पर दुलक्खादी उस्सेहपमाणतो मिणे देहं २४ चोदस लक्खा सिद्धा ७७ दितस्स लभंतस्स व २९ [बृहत्सङ्ग्रहणी गा. ३३५] जति पुण सो वि वरिजेन ५६ [विशेषणवती गा. २०५] [कल्पभाष्य गा ७४] दुग पण णवग तेरस एग चतु सत्त दसगं जह किर खीणावरणे ३० देसण्णाणोवरमें एगुत्तरातु लक्खा [विशेषणवती गा. १५५] [विशेषणवती गा. १५६] ७७ ७७ ७७ २८ केवलमेग सुद्धं ५७ ৩৩ [ ३ لا ७८ उवलद्वी अगुरुलहू ७७ एकारस तेवीसा ७८ ७७ ३० ७७ ८८ नन्दीसूनचूर्णिगतानामुद्धरणानामकारादिक्रम गावाति गाथादि पत्रात ७७ तसमिति पना ६१ दालमा सिद्धी धम्मो मग मुटु [ ११ गा १] नागम्मि दमणम्मिय [रिणती गा २२९] ७८ २९ मिन्ज्यतो सम्यगुरु पत्रात गायादि ७७ पुगगी चोदस लासा ७४ पुबमव जन्म णाण [आयत्यानि गा ११९] ३० मगित पि य पण्णत्ती [विशेषगवती गा २२०] ५३ भगति जहोहिणागी [विशेषणवती गा १५४] १३ भण्गति ण पस णियमो [विरोपणपती गा २१०] ५५ भण्णति भिषगमुटुत्तो [विशपणवती गा २.२] ५७ ममा मकुद महल ३० १८ [पपमाप्य गा १५] पगतीमुद्रमजागिय [पलगाध्य पा १६५] पण्णाणिना मावा (पम्पमाप गा १९५] २ विवरीय सब्बद्रे २९ विसमुत्तरा य परमा सतत ण देह लभइ [विशेषणयती गा ३५] सदसदविसेसगातो २९ [विशेषावश्यक गा ११५] सब्बे सना ण हतबा २८ [आचारा १ उ १२३] सम्वेसि आयारो [भाचारा निगा २६ सिवगति परमादीए १५ सिवगति सचद्वेहिं घि सिवगति सयट्रेहिं दो पायदुग जयोग ७५ पासतो विण जाणा [विशेषणनी गा ११५] पिटरस जा चिसोहा [प्याहारगाय 3 १ गा २८५] २९ रुप पत्तेययुद्धा (मापश्यानि गा 25] ६१ सरिरसयध [तरा म १५२०] ७८ ३ उतीय परिशिष्टम् नन्दीमूत्रचूर्णिगतानि पाठान्तर-मतान्तरनिदर्शकानि स्थानानि पथ परिक पन्न पति अहया महया पाटो अण्गायरियमतेग अग्गे मागे पुग माग पुरा गायरिया गग भगति ७५१७ २२२२, ३२३ ८११ ४१२ ९२५, २१२१ केह १७१३ १२२ ४१६ २१५ ८११,५२६,७०२ पादतरे इम पाढतर ४ चतुर्थं परिशिष्टम् नन्दीसूत्र-तचूर्ण्यन्तर्गतानां ग्रन्थ-ग्रन्थकार-स्थविर-नृप-प्रेष्टि-नगर-पर्वतादीना- मकारादिवर्णक्रमेणानुक्रमणिका [अस्मिन् परिशिष्टे * एतादृक्पुष्पिकायुतानि नामानि नन्दीसूत्रमूलगतानि ज्ञेयानि, ० एतादृक्शून्ययुतानि नामानि उद्ररणस्थानत्वेनास्माभिनिर्दिष्टानि ज्ञेयानि, शेषाणि च नामानि चूर्णि-टिप्पणिसत्कानि ज्ञेयानि ] 4-0* किम् ? किम् ? किम् ? ७ ७ " . ७ *आउरपञ्चक्खाण [जैनागम ५७ " ७४ ४९टि० " ७५ " ७८ " ur ७७ " विशेषनाम पत्रम् विशेषनाम पत्रम् विशेषनाम पत्रम् *अकंपित [निर्ग्रन्थ-गणधर] अणुत्तरोववाइयदसा [ जैनागम] ६९ अंगविज्जा [जैनागम] ३टि० अगस्त्यसिंह [ निम्रन्थ-स्थविर] ८०टि० *अणुत्तरोववाइयदसाओ ,, ४८,६१, *अंतगडदसाओ ४८,६१,६७ *अग्गिभूति [निम्रन्थ-पाणधर] ६८,७० अंतगडदसातो ६८ * अग्गिवेस [ गोत्र] *अस्थिणत्थिप्पवात [ जैनपूर्वागम] ७४ अंधगवण्ही [राजा] ६० अग्गिवेस अस्थिणत्थिप्पवाद ७५ *अग्गेणिय [जैनपूर्वागम] ७४टि० ०अनुयोगद्वार [जैनागम] ४८टि०, आउरपच्चक्वाण ५८ *अग्गेणीय ०आचाराग २,२टि० अग्गेणीय *अभय [ राजपुत्र] ३४ आचारागनियुक्ति ६२,७५ अजितजिण [तीर्थकर ] अभयदेव [निर्ग्रन्थ-आचार्य ] २३टि०, आजीविक [दर्शन] ७२,७३,७४ *अजिय ४२टि०,६५टि०, *आजीविय ७२,७४ अजिय ६७टि०,६८टि० आतविसोही [जैनागम] अज. [गोत्र] ८ *अभिणदण [तीर्थकर]] आदिच्चजस [राजा] *अजणागहत्थि [ निर्ग्रन्थ-स्थविर] *अमरगइगमण- आभीयमासुरुक्ख [शास्त्र] ४९टि० अज्जणागहत्थि गडियाओ [दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ आम्भिर्य ४९टि० अजधम्म ८टि० *अयलभाता [निम्रन्थ-गणधर] आयप्पवात [ जैनपूर्वागम] *अजमगू *अर [तीर्थकर] *आयप्पवाद ७४,७५ अजरक्खिय ८टि० अरुण [देव] ५९ *आयविसोही [जैनागम] अजवइर ८टि० *अरुणोववाए [जैनागम] ५९ *आयार ४८,६१ *अजसमुद ०अर्थविद्या [शास्त्र] ४९टि० आयार ॥ ४६,४९,६२, *अजाणंदिल ८ *अवंझ ७५,८३ अझाणदिल ८टिक अवझ ७६ आयारनिजुत्ती ७५ *अणतइ [ तीर्थकर] अंगचूलिता [जैनागम] ५९ आरिस *अणुओगदाराई [जैनागम] २६ .५७ *अंगचूलिया ५९ आर्थजीतधर [निम्रन्थ-स्थविर] टि. wr ७७ ९ " " ७ ७६ ८ " " " ८ " [जैनपूर्वागम] ७४,७५ ७ " किम् । टटिल एलायच " ४७,५१ .ऐलापत्य ७७ *कुलगरगडियामो ५७ *कुयु ३४टि । ७७ " ७ कोसिय 11 ८ ५८ *क्रियाकल्प १९टिल or " नन्दीमूत्र-तच्चूर्णि टिप्पणीगताना ग्रन्थ-प्रथकार-स्थविर नृपादिनानामनुक्रम विशेषनाम किम्। पत्रम् विशेषनाम पत्रम् विशेषनाम किम् । परम् आर्यमछु [भिप्राय स्थविर] टि० एरवय [क्षेत्र] ५१ कासव [गोत्र] ७८ आर्यसमुद्र [गोत्र] ७ किरियाविसाल (जैनपूर्वागम] ७४,७५ मावस्यकदीपिका जिनागम] ११टि० एलावच किरियाविसाल [जैनपूर्वागम] ७६ मावश्यकनियुक्ति , २,२६,४६, एलावच्छ टिक कुलगरगडिया ( दृष्टिवादप्रविमाग] ७७ ८टिल भावस्थकनियुक्ति [ जैनागम] २०टि०, ओवाइय [जैनागम] [ तीर्थका) २७टि०,३टि० ओसप्पिणिगडियाओ *कोडल्लय (शास्त्र] ४९ मावस्यकवृत्ति [रष्टिवादप्रविमाग] *क्रोविलय ४९टि० oमावरसग *कचायण [गोत्र] कोडिटदडणीइ [शास्त्र] १९टि० अमावस्सग ५७ कचायण [गोत्र] ८,७टि० *आसुरुक्स [शास्त्र] १९टि. *कणगसत्तरि [शान] १९ कोसिय आमुर्य ४९टिल *रुप्प [जैनागम] [शास्त्र] १९टि. मामुवृक्ष *कम्पवर्डिसियामो ५९ खदिलायरिय [ निर्मथ-स्पविर] इतिहास ४९टिल फप्पयडेंसिया ६० खदिलायरिय *हसिमासियाइ {जनागम] ५८ कप्पसुत ५७ शुद्धियाविमाणपविभत्ति [जनागम] ५९ *इदमति [मिपन्य गणधर] कपासिय [शास्त्र] ४९ खुद्धियाविमाणपविभत्ति *उठाणमुय [जैनागम] ५९ *कप्पियाओ (जैनागम] ५९टि. खोडमुड [शास्त्र] उढाणमुत ६० *कप्पियाकप्पिय *उत्तरायणाइ ५८ कप्पियाकप्पिय ५७ गगधरगडियाको [इष्टिवादप्रविमाग]७७ उपादपुच [जनपूर्वागम] ७१ कम्मप्पगडि [जनशास्त्र] ९ गणिय [शास्त्र ४९० उपायपुञ्च *कम्मापवाद [जैनपूर्वागम] ७१,७५ गणिविना [जैनागम] [पान] कम्मप्पवाद ७६ गगिबिज्जा *उपसाइय करकडु गल [व] *उपासगदसामो १८,६१, [नाणकविशेष) १५ गरलेषवाए [जैनागम] ६६.६७ कल्पमा गंगा [मही] ६१,८२ उवासगदसामो ប ५३,५४, गडिक्राणुओग [रष्टिवादप्रविभाग] ७६ *उसमद ५५,५६ गाडियामोग ७६,७७ उसम ॥ ७,६०,७७ कविल [ऋषि] अउरसमिगिडियाओ २६ गडियाशुमोग *झविल [शास्त्र] १९ गोदामाहिल [नित्यनिहत] ८१ ४९० गोतम निमय गणपर] २६,६५ पगरुग [अन्तरोष] २२ काविलिय ४९टिल गोतम [गोत्र] परपदन्य [गोत्र] ७ गोमटसार [जैनशान] १९टि० ७ ५९ १९ १९४० ५७ घोडमुह ७५ मम्मप्पवाद ४ ५८ [जैनागम] ५७टि [निन प-प्रत्येकबुद्ध] २६ ५९ ५९ [नागम] १२,१३, [तीर्थर] ६,६० [पटाविभाग] ७७ काविल क्षेत्र] २२,५१ कासर नन्दीसूत्र-तच्चर्णि-टिप्पणीगतानां ग्रन्थ-ग्रन्थकार-स्थविर-नृपादिनाम्नामनुक्रमः ९१ किम् । ७ ४ *जसभइ निम्रन्थ-स्थपिर] ७ जंबु " *खोडमुह ७ ५७ *जंबुद्दीवपण्णत्ति [जैनागम] ४ ওও " ७७ " ७ *चुल्लकप्पसुत [जैनागम] ५७ विशेषनाम किम् ? पत्रम् विशेषनाम किम् ? पत्रम् विशेषनाम पत्रम् गोयम [गोत्र] छन्दस्विनी [शास्त्र] ४९टि० *णायाधम्मकहाओ [जैनागम ] ४८,६१, गोविंद [निग्रन्थ-स्थविर ] १०टि० जमाली [निर्ग्रन्थनिहव] ८१ ६५,६६ गोसाल [आजीवकदर्शनप्रणेना] ७२ णायाधम्मकहाओ ६६ गौतम [निम्रन्थ-गणधर] ५१ जसमद्द ७ *णासिक्कसुंदरी-नंद [श्रेष्ठिदम्पती] ३४ *घोडमुह [ शास्त्र] ४९टि० ७,२६ णिसीह [जैनागम] *णेमी [तीर्थकर] ४९ *जंबू *चकवट्टिगडियाओ [दृष्टिवादप्रविभाग) ७७ जंबुद्दीव [द्वीप] १८,२४ तत्त्वार्थाधिगमसूत्र [जैनशास्त्र] १५ चरग [श्रमणविशेष] ३,४ जंबुद्दीव २४ तवोकमगडियाओ दृष्टिवादप्रविभाग]७७ *चरणविही [जैनागम] ५८ *तंदुलवेयालिय [जैनागम] ५७ चरणविही जंबूद्वीप [द्वीप] ५८ ८२ तावस [श्रमणविशेष] *चंदपण्णत्ति ५९ जिणदासगणि- [नन्दिचूर्णिकार] ८३ तित्थगरगंडियाओ [दृष्टिवाद- *चंदावेज्झय ५७ महत्तर प्रविभाग] *चाणक [अमात्य] ३४ जितसत्तु [राजा] ७८ *तिरियगइगमणगंडियाओ चित्तंतरगंडिया [दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ जीवधर [निर्ग्रन्थ-स्थविर] ८ *तुंगिय [गोत्र] *जीवाभिगम [जैनागम तुंगियायण वग्घावच्च चुल्लकप्पसुत ५७ जेसलमेरु [नगर] ३५टि०,५९टि. चुल्लहिमवंत [गिरि] २२ ज्योतिष [शास्त्र] ४९टि० *तेरासिय ०चूर्णि [नन्दीसूत्रचूर्णि] १टि०,७टि०, तेरासिय ७३,७४ १०टि०,११टि०,१७टि०, झाणविभत्ति ५८ *तेरासिय-तेसिय [शास्त्र] ४९टि० २७टि०,३३टि०,३४टि०, *ठाण ॥ ४८,६१,६३ *थूलभद्द [निर्ग्रन्थ-स्थविर] ३५टि०,४०टि०,४३टि०, *णमी [ तीर्थकर] ७,३४ ५५टि०,५९टि०,६१टि० णमोकार [जैनागम]] ३४ दशवैकालिक [जैनागम] ०चूर्णिकृत्- [जिनदासगणि- ४टि०, दशवकालिक ८०टिक महत्तर] ५टि०,७टि०, गंडियाओ प्रविभाग] चूर्णि ८०टि० [निग्रन्थ] ३४ नियुक्ति १५टि०,१६टि०,२०टि०, गंदी [जैनागम] ८०टि० २३टि०,३१टि०,३३टि०, *णाइलकुलवंस [ निर्ग्रन्थवश १० ०दशाश्रुतस्कन्ध ८टि० ३४टि०,४८टि०,५१टि०, णाग [देव] *दसवेयालिय ५७ ५२टि०,५७टि०,५८टि०, *णागजुण [निम्रन्थ-स्थविर ]१०,११ दसा ५९टि०,६०टि०,६१टि०, णागजुण १० *दमाओ ५८ ६६टि०,६७टि०,६९टि०, णागपरियाणिया [ जैनागम] ६० *इसारगंडियाओ [ दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ ७२टि० णाणप्पवाद [जैनपूर्वागम] ७५ ०दानसूरि [ निग्रन्थ-आचार्य ] ५९टि० [दर्शन] ७२,७४ *झाणविभत्ति [जैनागम] " " ७४ *णरगइगमण- [दृष्टिवाद- " ७७ ८टि०, ११टि०, १२टिंग, अणंदिसेण ८०टि० " , वृद्धविवरण " " ७० " " ८ " नन्दीसूत्र-तचर्णि टिप्पणीगताना प्रथ-ग्रन्थकार-स्थविर-नृपादिनानामनुक्रम किम् । ६ " " ४९टि० निसीह ५९ *पुस्सदेवय " [जैनागम १८२६, दृष्टिपात " ८ দ্বিয়ম্বনাথ पनम् विशेषनाम किम् । पत्रम् विशेषनाम पत्र *दिद्विवाम [जैनपूर्वागमसमूह ] १८,६१, निगम शास] १९टिक पुष्पचूला [जैनागम] ६० ७१,७९ निरयगइगमण- *पुष्पचूलियामो ५९ दिद्विवात ॥ ७१,७२,७९ गडियामो [दृष्टिादप्रविमाग] ७७ *पुम्फदत [वीर्यकर] दीवसागरपग्णत्ति जनागम] निरयावलिया [जैनागम] ६० पुफिया [जैनागम] ६० दुमपुफिय ७१ निरयावलियामो ५९ *पुफियाओ ५९ दुस्सगांग] [निमय-स्थविर] ११,१२ निरुक्त [शान] १९टि० *पुराण [शास्त्र] १९ दूसगणि १३ निष्ट १९टिल पुराण दूसगणि ११ [जैनागम] १९टि. दृष्टिवाद) जिनपूर्वागमसमूह] ७१ पञ्चक्खाण [जनपूर्वागम] ७१,७५ पेडिया पचरखाण ७६ आवश्यकपीठिका] ३१,१४ देवगायग निन्दीस्वकार] १३ *पञ्चक्खाणप्पवाद ७४रि० पोरिसिमडल [जैनागम] ५७ *देविंदस्था [जैनागम] ५७ पत्ति [जैनागम] २९ पोरिसिमडल ५८ *देविंदोववाए ५९ पण्णवणा ॥ २९,५८,८२ पोंडरीय [बह] ६४ द्वादशानिय [जैनशास्त्र] ५०टि० *पण्णवगा ५७ वलदेवगडियामो[दृष्टिवादपविभाग] ७७ चक्रवृत्ति *पण्हावागरगाइ ॥ ४८,६१,६९ बलिरसह [निमय-स्थविर]] *यणदत्त [अष्टौ] पाहायागरगाइ *धम्म [वीर्यकर] *पमव [निमय-स्थविर] धरण [देव] ६० पमय ७ बहुलसब्विय धरणोववाए [जैनागम ५९ अपमास [निप्रन्य गणघर] (बलिरसह) नन्दिवृत्ति ॥ ३४टि०,३५टि० *पमादपमाद [नागम] २७ बमहीवग [निप्रन्यशासा] नदी-सूत्र ॥२३टि०,३२टि, पमादप्पमाद ५८ बभद्दीवग ३८टि०,४२टि, *पाहण्ण [गोत्र] ७ बार्हस्पत्य [शास्त्र] १९टि० ६१टि०,६७टि०, पाक्षिकमूनटाका [ जैनागम] ५९टि. बिंदुसार [जैनपूर्वागम] ३२,१९ ६८टि०,८२टि० वृत्ति ५७टि० ०बृहत्सङ्ग्रहणी ( जैनशाक्ष] २४ नयचरु [शान] ५०टि० पाणा-उ-यु (जनपूर्वागम] ७४टिक, अली [लिपि] नदी [अनागम] भगवती जैनागम] २३टि०,२६ *नागपरियागियामओ ५९ पागाय ७४,७५ भगवती ३० गपरियावगियागो ५९टिक पाणायु ७६ नागरियावलियामो, ५९टि० ०पाणिनीयधातुपाठ [शान] १४,१७ *मदबाहुगडियाओ इग्विादप्रपिभाग]७७ नागमुहुन [शान] १९० पायजली ४९टि० *मबाहु न उनपूशंगम] ७४ पायीगग्गि [पोत्र] भदबाहु লাগল m] ४९ *पास [वीकर] मम्मी ६९,७० *बहुल ७ " ७ ८ : ७ " । ४४ ५७ ७५टि० भगवती " " " मगुत्त [निग्रन्थ-स्थविर] टि. [निग्रन्थ-स्थविर] [शास्त्र] १९० नन्दीसूत्र-तच्चर्णि-टिप्पणीगतानां ग्रन्थ-ग्रन्थकार-स्थविर-नृपादिनानामनुक्रमः ९३ पत्रम् " " " " or ९ " " १०दि० " २२,५१ *लेह *लोगायत " " [गिरि] विशेषनाम किम् । पत्रम् विशेषनाम किम् ? पत्रम् विशेषनाम किम् ? भरह [क्षेत्र] १८,५१ *महाणिसीह [जैनागम] ५८ *रायपसेणिय-सेणीय-सेणइय मरह २२,५१ महाणिसीह ५९ [जैनागम ] ५७,५७टि० भागवत [शास्त्र] ४९टि० [तीर्थकर] रिसम *महापचक्खाण २,२६ |भारध ५० महापच्चक्खाण ५८ *रुयग [गिरि] १८ भारह *महापण्णवणा ५७ रुयग २४ भूतदिण्ण [निर्ग्रन्थ-स्थविर] १०,११ महापण्णवणा ५८ रेवइणक्खत्त [निग्रन्थ-स्थविर ] भूयदिण्ण १ *महाविदेह [क्षेत्र] ५१ रेवतिवायग भूयदिन्न महाविदेह [शास्त्र] ४९टि० मधुरा नगरी] ९ *महावीर [ तीर्थकर] १टि०,२ लोगबिंदुसार [जैनपूर्वागम] ७४,७५,७६ *मरणविभत्ति [जेनागम] ५७ महावीर [शास्त्र] ४९,४९टि० मरणविभत्ति ५८ मंडलप्पवेस [जैनागम ५७ णागायत मलयगिरि [ निम्रन्थ-आचार्य] ३टि०, मंडलप्पवेस ५८ लोहिच्च-लोमिच्च [ निर्ग्रन्थ-स्थविर] ११ ४टि०७टि०८टि०, मंडिय [निग्रन्ध-गणधर] *लोहिच ११ १०टि०,१७टि०, मंदर २४ *वइसेसिय-वति० [शास्त्र] ४९,४९टि० २०टि०,२३टि०, माढर [गोत्र] ७ *वग्गचूलिया-वंग० [जैनागम] ५९, २७टि०,३२टि०, माढर ३३टि०,३४टि०, [शास्त्र ४९ *वाधावच्च [गोत्र] ३५टि०,३७टि०, माधुरा वायणा [जनागमवाचना] ९ *तुंगिय ४३,टि०,४८टि०, मानुषोत्तर [गिरि] ८२ ५०टि०,६०टि०, *मुणिसुव्वय [तीर्थकर ] वच्छ ६३टि०,६६टि०, *मूलपढमाणुओग [दृष्टिवादप्रविभाग] ७६ श्वण्हिदसातो [जैनागम ] ६० मूलपढमाणुयोग ७६,७७ वण्हीदसाओ ५९ ०मलयगिरिवृत्ति [ नन्दीसूत्रटीका ] ३टि०, मृगपक्षिरुत [शास्त्र] ४९टि० *वण्हीयाओ ३६टि०,३९टि०, मेतज-यज्ज [ निर्ग्रन्थ-गणधर] ७,७टि० *वद्धमाण+सामी [ तीर्थकर] ७,६० मेरु [गिरि] ४,८१,८२ वरुणोववाए [जैनागम] ५९टि० ५८टि०,५९टि० *मोरियपुत्त [निग्रन्थ-गणधर ] *ववहार मल्लि [तीर्थकर ] ०यज्ञकल्प [शास्त्र] ४९टि० *वाउभूति [निम्रन्य-गणधर ] *महल्लियाविमाणपविभत्ती [जैनागम ] ५९ योग ४९टिल वागरण ४९ महल्लियाविमाणपविभत्ती रतणप्पभा *वायगवस [निर्ग्रन्थवश] यणप्पभा २३ वायगवंस *महागिरि [निम्रन्थ-स्थविर] ७ *रयगावली [शास्त्र] ४९टि० *वायभूइ [निर्ग्रन्थ-गणधर ] टि० थामायण वासिट्ठ [गोत्र] ७ ५९टि० ७ " *वच्छ " ७ ६७टि० " ५९टि० " ४०टि०,५२टि०, ७ [शास्त्र] " [नरक] २४,२९ ९ *महाकप्पसुत " ९ महागिरि " ८ ८ नन्दीसूत्र तथर्णि टिप्पणांगताना ग्रन्थ-प्रन्थकार-स्थविर-पादिनानामनुक्रम सहपाहुड [जैनशान] ९ ६ " " वेद ७ वेद ४९टि० समुट्ठाणसुय ७७ our ५९ सडिल ८ ८ विशेषनाम किम् । परम् विशेषनाम किम् । पनम् विशेषनाम किम् । पत्रम् वासिष्ठ [गोत्र] टि० वृत्तिकृत् कर्तृ निन्दी ११टि०,१२टि०, सद्वितत [शान] १९ *वासुदेवगडियामो [दृष्टिवादप्रतिभाग] ७७ टीकाकारी-१५टि०,१६टि० रामपुन [तीर्थकर] श्रीहरिमन- २३टि०,३००, *समवाम [जैनागम] १८,६१,६१ निजगुपयात [जैनपूर्वागम] ७६ मलयगिर्या ३१टि०,३२टि, समवाय ६४ *विजणुप्पयाद ७४,७५ चार्यो] ५०टि०,५२टि०, समवाया ६३टि०,६५टि० विनाचरणविगिच्छम (जैनागम] ५७ ५टि०,५८टि० ६६टि०,६७टिक विनाचरणविणिच्छ्य ५८ ६०टि०,६७टि० ६८टि०,६९टि निजाणुप्पवाद [जैनपूर्वागम] ७४टिक, ६९टि०,७२टि० ७०टि०,७१० ७५टि० घेतड्ट [गिरि] ६४ ७२टि०,७४टि० वितत्त [निप्रय-गणपर] [शास्त्र] १९ समवायागसूत्रवृत्ति ७५टि० रिमल [तीर्थकर] ५९ विमलयाहग [कुलकर] वेद ५० समुदाणसुय ६० *वियाह [जिनागम] ६५ वेलधरे [देव] ६० *ससि [तीर्थकर] वियाहचूला ५९ *वेलधरोववाए [जैनागम] [निअन्य स्थविर] विवागमुत ७०,७१ वेसमगे [देव] ६० सडिल्ल करियागमय " १८,६१,७० वेसमगोववाए [जैनागम] [तीर्थकर] मिाह ६५टि० अधेसिय शान] ४९ *समव *विवाहचूलिया रियाह ,५९,५९टि० तेसिय ४९टि० *सभ्य [निअन्य स्थविर] *तेरासिय विशेषगवती [जैनशास्त्र] २८,२९,३० १९टिक सभ्य विशेषावस्यक (जैनागम] २टि, वैशिक १९टि० वैशेषिक ४९टि० ८२टि० *साई [निप्राय-स्थविर] विशपावत्यक ०व्यवहारमाध्य [जैनागम] ४९टि०,६१ सागरानन्दसूर्ति निग्रन्थ आचार्य]५९टि० महाभाष्यमलया ३८टि०,१२० याकरण [शात्र] १९टि० साती [निग्रन्थ-स्थविर] रीयीका-वृत्ति ५२टि० शकराज [राजा] ८३ सामज विससायरसग ३२ शाण्डिल्य [निग्रन्थ स्थविर] टटिक सामन पिहारस्य ५७ शिक्षा [m] १९टिक सामादिय जैनागम] ३२,१९ विहारकप्प सम [श्रमणविशेष] ०साख्य बानरागमुन ५८ सगमन्यिाओ सयम० [शाब] ४९, सिजस [वीर्यकर] चीयरायमुन सगम-सहभ०-सगडम० ४९टिक सिंधु [नदी] ६५,८२ और [तीर्थर] सगर [चक्राती] [धिकर] धरिय ७४,७५ सणवाद (जनपूर्वागम] ७१,७५ सीह [निमय-स्थविर] योग्यसवाय सधन्यवाद साहयायक ५९ असती " *सलेहणासुत (जैनागम] ८ " ३२टि० ८ ८ ८ " " " [ धात्र] १९टि ६ " U २ ६ ७७ सीयल जिनपूर्वायम] ७४,७५ किम् ? ८ ८ ८ ४ ८ ६ ४ ওও नन्दीसूत्र-तचूर्णि-टिप्पणीगतानां ग्रन्थ-ग्रन्थकार-स्थविर-नृपादिनानामनुक्रमः ९५ विशेषनाम किम् । पत्रम् विशेषनाम पत्रम् विशेषनाम किम् ? पत्रम् सुद्वित [निग्रन्थ-स्थविर ] सेजभव [निम्रन्थ-स्थविर] ७ *हारिय [गोत्र] सुपडिबद्ध हर (देवविशेष] हारिय सुपास [तीर्थकर] हरि सुप्पम ६ हरिभद्रसूरि [ निर्ग्रन्थ-आचार्य] ३टि०, हारि०वृत्ति [ हरिभद्रसूरिकृत- टि०, सुबुद्धि [अमात्य] नन्दीसूत्रवृत्ति ] ५टि०,९टि०, ४टि०,७टि०,८टि०, सुमति [तीर्थकर ] १०,टि०,२०टि० ३६टि०,३९टि०, सुवण्ण [ देव] २३टि०,२७टि०, ४०टि०,५२टि०, भमुहन्थि (निर्गन्ध-स्थविर ७ ३२टि०,३७टि० सहत्थि ४२टि०,४३टि०, हिमवन्तस्थविरावली [जैनशास्त्र] टटि० सुहम्म [निर्ग्रन्थ-गणधर] ४८टि०,५०टि० हिमवंत सुहम्म-धम्म ७,७टि० ६०टि०,८०टि० सुहस्ती [निग्रन्थ-स्थविर ] ८टि० हरिवसगंडियाओ [दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ *हिमवंत+खमासमण सूयगड [जैनागम] ४८,६१, *हंभीमासुरक्ख-रुक्ख ) [शास्त्र] ४९, [निग्रन्थ-स्थविर] १० ६२,६३ हिमवत खमासमण *सूरपण्यत्ति १० ५७ *भीमासुरुक्ख ४९टि० सूरपण्णत्ति ० हेतुविधा [शास्त्र]] ५८ मंभीयमासुरुक्ख ४९टि० *सेजंभव [निग्रन्थ-स्थविर] ७ हंभीयमासुरुक्ख ४९टि० हेमवत [क्षेत्र] २२ ५९टि० ८ ७ [गिरि] १०,६४ ४९टि० " ४९टि० -- पञ्चम परिशिष्टम् नन्दीमप्रसपूर्ण्यन्नर्गताना विषय-व्युत्पत्त्याठियोतकाना शब्दानानकारादिवर्णक्रमेणानुक्रमणिका [অলিৰ দৰশিষ্ট #লাবিষ্টার্লিনা গল নমুন্ত্র দুই লয় আম্মান बैया, + एता चनुचिकाचिद्रादिता गला चूर्णिकता ग्रन्थमन्दर्ने न्वय प्रयोनिता झेया , "राश्च मान्दा मुशतर्गता चूर्गिस्ता व्याख्याता मनवोदश्या । ८०-१३ अगागामिक पत्र-पति शुद पत्र-पति ब +अभियोग ७६-१५ লবিদ্যালয় 22-10 माग १७-२१ अगहन १८-२० अकिग्यि [गरिययवा] ४-९ अगुड्ग १७-२ मगन [छ दास] १६-२२ अस्व [ अरू व्यासा मागमा मगुचर ६९-४ जवाद ताए अस्य अनइति इचव जीची नमुखगेवराइय ६९-१ पद अश्या पाणमावेश वाति ति भगेगमिद्र २७-९ अवधि १३-२३,२१ भमिन मववि। अहवा का अणता २६-३ अजयण विच्छता] 20-30 भाजन दास वा सम्बत्ये अाणलिगसिद्ध अमह ति अण्डो पालयति मवलवणता ३५- मुकत चामपं । १४-१५,१६ बाण ५०-६ नयहि १५-२१ नवम्बर [m] ५५-२३ मणाणित [अर्गत सवात 38-23,११-१६ मख- [भविरापित निरविचार] ३-१७ माणित ५०-७ मचाय ३१-२० अगमिय [अग्गोग्गवरामिपट्टिन লবিশ্ব २६-१३ वाय बपरिनित अगमर] ६-४ অদিরিঃ अति ५२-१९। मनिमसिद्ध २६-२५ अबोह [परमम्मलिने ७१-७ मथ ११-२॥ ঘলাদিয়া এ मम्मान ७५-२ अधियिमवाद ७५-74 बद्रोही' नि] १६-१९९५ अचामसमयमवयकेवगागर५-२८ अयोगह ३५-१३,१४१ अवह अचरिम २५-२७ अनुयोग [अनुस्यो योगः अमगित अजोगिमव धरेचछाग २५-१६ अनुपयोग] ७६-१८ असल [इचिन्मील) भजोगी [प्रयोगनिदा अपनत्य २२-१९ নম্বরলিমিনুর आपबिट्ट मन्त्र (भाय आय वा] अभिनिव १३-१८ मावाहिर ५५-२ ममा परिमार] UE- १५५ १७.२० ३२.२६ मल्लसमावद्विनौ ! १५-१६ अभाव ५७-१९ ९७ नन्दीसूत्र-तर्प्यन्तर्गतानां विषय-व्युत्पत्यादियोतकानां शब्दानामनुक्रमः । पत्र-पकि पत्र-पक्ति आघविजइ [ आख्यायते] ओमत्थग [कित्तिम] ६२-२१ शन्द पत्र-पति शब्द शब्द उववात अंगुलपुहत्त ६९-४ १९-१५ १४-२८ इंदिय अंतकड उवासग ६७-१० ६८-७ इंदियपञ्चक्ख १४-२९ अंतकडदसा इंदियपज्जत्ति उवासगदसा ६८-८,९ २२-१५ ६७-११ ईहा [१ ज पुण हेतूववत्ति- ३४-२०, उस्सण्ण अंतगतमोधिण्णाण १८-२० साधणेहिं सन्भूतमत्यस्स ४१-९; आ विसेसधम्माभिमुहालोयण ४६-१०, आउदृणता ३६-२२ एक्कसिद्ध २७-९ तस्सेवऽत्यस्स अधम्मविमुह आउर ५८-२३ १३ ओ असम्मोहमविफलमत्थपरिच्छेदक आउरपच्चक्खाण ५८-२५ चित्त ज त ईहा (पत्र ४१), ओगिण्हणता ३५-२५ ६२-२ २ अतीतकाले मुदीहे वि इद २५-२७ आणा-ज्ञा ८१-२,६ तदिति कृतमणुभूत वा सुमरति, ओसण्ण २२-२४ आणापाणुपजत्ति २२-१५ वमाणे य इदिय-णोइदिएण वा आणुगामिय १५-२७ अण्णतरं सद्दाइअत्थमुवलद्धं अण्णत- क वडरेगधम्मेहि ईइ ति ईहा (पत्र आतविसोही ५८-१७ ४६), 'किमेय ' ति ईहा (पत्र कड आता ५८-१६ ४६)]] कणिया बाहिरपत्ता] ४-२ आदेश [१-प्रकार , २-सुत्त] ईहा ४३-१० +कण्हुइ २२-२० ४२-१५,१९ कप्प ५८-२० आमिणिबोधिक १३-१८,१९, उद् ६-५ कप्पचडेसिया ६०-११ .२०,२१ उक्का [ दीविया ] . १६-२२ कप्पसुत ५७-२४ आभोयणता ३६-१० उकालिय ५७-१५ कप्पिया ५९टि०५ आय १३-२६ *उग्गह ४३-१० कप्पियाकप्पिय ५७-२३ आयप्पवात ७६-३ उग्घाडितत [उद्घाटितक] ५६-५ कम्म ३-२३ आयार ६१-२० उज्जल ६-१५ कम्मप्पवाद ७६-४ आल [अधिकयोगयुक्त ] ४-३ उज्जुमई २२-२४ +कयार [देश्य स कचवर] ३-१७ आवागसीसग आवागसीसगति४०-१,२ उट्ठाणसुत ६०-१ करणशक्ति ४७-५,६ आपागट्ठाणमेव, अहवा आपाग उप्पायपुन्छ ७५-२० कल्पिका ५९टि०५ ट्ठाणस्स आसण्ण समता परिपेरत, उवउज्जत २४-५ अहवा आपागमुत्तारियाण ज ठाण कहण १२-१ उवदेस [ उवदिसणमुवदेसो, ४६-६ त आपागसीसय भण्णति] कंत ६-१८ आसइळति [आश्रीयन्ते ] . ६४-२३ उपदेसो त्ति वा आदेसो कारण त्ति वा पण्णवण तिवा ८०-१२ आहारपज्जत्ति २२-१३ परूवण त्ति वा एगट्ठा] कालिओवएससण्णी ४६-१७,२० उवदंसणा ५२-२ कालिय ४६-८,५७-१४ इढिप्पत्त २२-२१ उवधारणता ३५-२५ किरिया ६८-१०,११,१२ २७-८ उवरिमखुडागपतर २४-१८ किरियाविसाल ७६-११,१२ चु०१३ उ - ५ ho इथिलिंगसिद्ध .
९ ८ [संजमजता] ६२-१ कोट ट ग गण ho नन्दीसूत्र-तचूर्ण्यन्तर्गताना विषय-व्युत्पत्यादिघोतकाना शब्दानामनुक्रम । पत्र-पकि पत्र-पति कुच्छी [दो हत्या (विहस्त १९-१५ च जाया प्रमाणम्)] चरण ५८-८,२२ जीत [मुत]] कुवलय [१ कुच्छितो उपलो ९-१३ चरणविही ५८-२२ जीव १-२० कुवलयो सो य कण्हकायो चरिम २५-२६ जीवभाव २८-८ १ णीलप्पलं ३ रयमविसेसो] चहित दि०)[मनोरथदृष्टिदृष्ट] १९-१ जोई [मलादिठितो जसतो १६-२३ कूड ६४-४ चित्त [चितिजइ जेग त चित्त] ५-१९ अगणी] ३७-११ चित्ततरगडिका जोणि ७७-१३ १-१७ चित्र खाणी ७७-१३ ११-२० चिंता [जो यणागतेय ३६-१३, झाण ५९-८ चित्यति कई पात ४६-१३, झाणविमची ५८-१५ खुशगपतर २४-८ तत्य कातव्य ! इति १५ अण्णोणालबणाणुगत चित टक ६१-१ ५८-१० चिता २ अणेगहा गणिविजा ५८-१४ संकपकरण रिता (पत्र -६)] ठवणा ३७-१ गदियदि०) [ख्यात] ११टि०११ चुडली [अग्गे पलिता १६-२२ प तणपिटरी] गम [पोमकेसरा] ११-३ ण ४२१३,११, ५७-२५ गमिय ५६-२३ १७-४,५, चुलकप्पसुत ५७-२५ गवेसणा [१ बौसममयोग-३६-१२, ५५२३ चूला ७९-११ दिघोस ३-५ गवेसणा, अमिलसितत्ये ३८६७ १५ णदी १-२८ चोदित चेव अपहपजमापे घाममा ५०-२३ जाग ६०-७ गदेखणा (पत्र )] णागपरियाणिय गटिका ७७-१३ छदुमत्य २४-३ णाण-नाण १३-११,१२,१३, गाढ ५-१५ छन्द ५०-८ २०-९ गिहिलिंगसिद्ध २७-१ ज णाणपवाद ७५-२७ गुण ४-३ बग [१ खेतलोगो १-१७,२-१,३ गाय गुणपश्चतिम इय २०-१३, (पत्र 11 १ सबसणि- लोगो ३ सर-प्राणी णिच २३-१४ (पत्र २)] णिध -१० गुणपडिवण्ण १५-१८ जतपडागा [संजयपताका] ३-५ जोइदिय १७-३ गोइदियत्वावगह गोयर जयति १-१७,२२० जोइदियपञ्चक्स जलोह योस ३५-२१ मसवस २५-१ भवणिचमणिय घेत्यादि १६-१२ चोदक ६६-८ ५६-५ गुरु [पणाति शावमिति गुरु] २-२ बमलद्वित ६१-२० ३५-१९ १५-११ EERE त จะ नन्दीसूत्र-तच्य॑न्तर्गतानां विषय-व्युत्पत्यादियोतकाना शब्दानामनुक्रमः । ९९ पत्र-पक्ति प थ थिर दचिदिय दस-सा शन्द शब्द पत्र-पति शब्द पत्र-पक्ति तवोमता-तपोमयाः ३-९ पमादप्पमाद ५८-२,३ २६-११,१२ पइण्णग ६०-२३,२४ परंपरसिद्धकेवलणाणं २६-२,२७-२२ तस्थकरसिद्ध २६-१६ पटर ६-११ परिकड्ढिय १७-३ तत्थसिद्ध २६-१० पगब्भ ११-६ परिकम्म ७२-१६ तेरियलोगमझ २४-१० पच्चक्ख १४-१७:३१-८ परिघोलण १७-२३ तेसमयाहारग १८-३ पञ्चक्खाणप्पवाद ७६-६ परिबुड ४-५,२० दूरसंघात १-४ पच्चाउट्टण+ता ३६-२३ परोक्खणाण ३१-५ तेलोक ४८-२५ पजत्तय २२-१८ पल्लव ६४ टि०५ पजत्ती २२-११ पसत्थज्झवसाण १८-२१ ४-२ पजय १३-२५ पसिण ६९-२४ पजव दरित १३-२४ पसिणापसिण ६९-२४ ६-५ पजात १३-२६ पंक दन्चमण ४-१ ३५-१७ पडिवत्ती ६२-५ पाणायु ७६-१० १४-२८ पडिवाती १९-१४ पारियल ६८-७,८ पढमसमयसजोगिभवत्थ- पावयणी १२-५ दसा ६०-१५ केवलणाण २५-१८ पासओ अंतगय दसण १६-१० २०-१० दसिर्जति पढमसमयअजोगिभवत्थ- पासणता २४-३ ५२-२ केवलणाण २५-२२ पासतो दिद्विवाओवदेस १७-२ ४७-१६ पणगजीव १८-३ दिद्विवातअसण्णी पुष्पचूला ६०-१३ ४९-५ पुफिया ६०-१३ ४७-१९ पणोल्लण १६-२३ पुरतो १६-२३ ४-१० पण्णत्त १३-१३,१४,१५,१६,१७ १६-९,११, १७–५ ७१-७ पण्णवग ३८-७,८ पुव ७५-१६ ७१-६ पण्णवणा ५८-१ पूइय ४९-४ घ पण्णविनंति ५२-१ परंत ६६-९,१० १७-२२ पण्णा ३७-७ पण्ह ६९-२० ३४-२१३७-९, पोरिसी ४१-१८ ३७-१० पतिद्वा प्रज्ञापना ५८ टि०१ पत्तेयबुद्ध २६-२३ फ ४३-११ पत्तेयबुद्धसिद्ध २६-२८ फडग न १७-१२ २०-९ पदीव १६-२३ २-९ ४४-१५ पन्भार २६-२८ ६०-९ पभव ४७-२० पणीत । दुआधरिस, दृष्टिपात दृष्टिवाद पुरतो अंतगय धम्मकहा धरणा १३-१४,१६ पोरिसिमंडल . धारणा 4 *धारणा नाण व नाणक्वर निरियावलिया ६४-५ बंधु २-२१ वुद्धबोधित दान देशपकिन इदन्न्नु। पर- Ir(-१९-३ ܬ݁ܰܟ݂ܝ : मुगलादाने ९-१३ मा पाक मंत्र . चंद : में " [. 1-58 Sane न ܦܨܢ तु चिदाद- १५-११ चित्र ७-२३ ច -१६ ११-२० निकर ३-३ न न इदन्ती 1-3 :1-38 3 14 २१-८ i 10 १८-२० . परित द नापार-t)] १६-२ [] न [ बन्द tires N) [] १९०१ [i] १९-३ કરે 13-३०-२ मा ११-१२ मरन दिक ७९-११ १८-10 2:-२२ नदेन ग्दो १२ حالتوحد (ल) "- २९-३ दुर ७७-१३ १३-१२१ २०-६ न ९१-० २४-2 १-२२-१३ 5 ( दिल २०-१३ २५-12 (1] ५-१८ मार मा ३-२ इंदर htra सन्देश 10-३ दिया F- ५१--- १.२० मेदिल E १५-१ z न ९९ प २६-१६ पउर २६-१० पगभ २४-१० पञ्चक्ख द ४-१ नन्दीसूत्र-तथूय॑न्तर्गतानां विषय-व्युत्पत्यादिद्योतकानां शब्दानामनुक्रमः । पत्र-पंक्ति पत्र-पति शब्द पत्र-पकि । शन्द शन्द +तवोमता तपोमयाः ३-९ पमादप्पमाद ५८-२,३ तित्थ २६-११,१२ पइण्णग ६०-२३,२४ परंपरसिद्धकेवलणाणं २६-२,२७-२२ तित्थकरसिद्ध ६-११ परिकड्ढिय १७-३ तित्थसिद्ध ११-६ परिकम्म ७२-१६ तिरियलोगमझ १४-१७:३१-८ परिघोलण १७-२३ तिसमयाहारग १८-३ पञ्चक्खाणप्पवाद ७६-६ परिवुड ४-५,२० १-४ ३६-२३ पच्चाउण+ता तूरसंघात परोक्खणाण ३१-५ तेलोक ४८-२५ पज्जत्तय २२-१८ पल्लव ६४ टि०५ थ पजत्ती २२-११ पसत्थज्झवसाण १८-२१ थिर ४-२ पज्जय १३-२५ पसिण ६९-२४ पज्जव १३-२४ पसिणापसिण ६९-२४ दरित पजात १३-२६ पंक दन्वमण ३५-१७ पडिवत्ती ६२-५ पाणायु ७६-१० दविदिय १४-२८ पडिवाती १९-१४ पारियल्ल ३-९ दस-सा ६८-७,८ पढमसमयसजोगिभवत्थ- पावयणी १२-५ दसा ६०-१५ केवलणाण २५-१८ पासओ अंतगय १६-१० दसण २०-१० पढमसमयअजोगिभवत्थ- पासणता २४-३ दंसिर्जति ५२-२ केवलणाण २५-२२ पासतो १७-२ दिहिवामोबदेस १८-३ दिद्विबातअसण्णी पुष्फचूला ६०-१३ ४९-५ दिद्विवातसण्णी पुफिया ६०-१३ ४७-१९ पणोल्लण दुआधरिस १६-२३ ४-१० पण्णत्त १३-१३,१४,१५,१६,१७ दृष्टिपात पुरतो अंतगय १६-९,११, १७–५ ७१-७ पृष्णव ३८-७,८ दृष्टिवाद ७१-६ पुव ७५-१६ पण्णवणा ५८-१ ध पूइय ४९-४ पण्णविनंति ५२-१ ६६-९,१० परंत १७-२२ पण्णा घरणा ३७-७ ५८-७ धारणा पण्ह ६९-२० ३४-२१, ,३७-९, पोरिसी ५८-४ ४१-१८ पतिट्ठा ३७-१० प्रज्ञापना ५८ टि०१ ४३-११ पत्तेयबुद्ध २६-२३ फ न पत्तेयबुद्धसिद्ध २६-२८ फडग १७-१२ नाण २०-९ पदीव १६-२३ नाणक्खर ४४-१५ पदभार ६४-५ बंधु २-९ ६०-९ पभव २-२१ बुद्धबोधित २६-२८ ४७-१६ पणगजीव .४७-२० पणीत १६-२३ पुरतो धम्मकहा १३-१४,१६ पोरिसिमंडल, *धारणा ब निरियावलिया १०० नन्दीसूत्र तय॑न्तर्गताना विषय-व्युत्परयादियोतकाना शब्दानामनुक्रम । or ५-२ ५० ५८-२७ वर्मति ४ ४ पत्र-पक्कि बन्द पत्र-पक्षि रान बुद्धबोषितसिद्ध २७-१ मरण ५८-१५ वमाजूला ५९-२ बुद्धि ५०-९,१० मरणविमची ५८-१६ वढ्तु बुद्धी ३६-२४ महत्य ११-२०२१ वड्डी १८-२ महल ५९-८ वण भगवत १८-२१ महाकप्पसुत ११-2 ५७-२५ वणक्खर भद्रम् २-२७ महात्मा २-२३ वहिदसामो भवत्थकेवलणाण २५-११ महापञ्चक्खाण ८ भवपुश्चतिम २०-१३ महापण्णवणा ५८-१ वय भाव ८०-६ महित १९-२,३ वर ५-१६६-६ भावमण ३५-१८ मडलप्पवेस ५८-८ वजण ३५- भाविदिय १४-२९ मता १७-१३ ग्वजणावर मासापजत्ति २२-१६ माता ६२-१ बजगावर म माधुरा वायगा ९-२४ वजणोग्गह-गावगह ३५-१,५,६ मिच्छा ५०-७ बस मग्गणा [ विसेसत्यस्त ३६-११, मिच्छादिद्वित ५०-७ वागरण अण्णय-बहरेगधम्मसमा १६-११,११ ९ लोमणे मागणामपति (पत्र) मुडिया ९-१०,१२ वातगा-यगा विसेसपम्मणेसणा मम्गणा २१ मूलपढमाणुयोग ७७-२,३ वायकना ९-२, मिलसियस्थरस मयोदयणकाहि ३६-१ विउलतराग २३-६,९,११,२४-२ जायणा मग्गणा (पत्र )] ३९,३१ मागमो अतगय १६-१०,११,१७-६ रय ३-२३ विक्रम २- मगतो १७-१ स्वति ६-११ विजणुप्पवात ७६ मझागत-य १६-२,७,८,२०, स्यग [अट्ठप्पदेसो रुपणे, २१-१ विजा ५८-८ १७-९ तिरियलोगमा] विनाचरणविणिच्छ्य ५८-1 मणपति २२-२७ रुट ६-१ मणपजयणाण-नाण १३-२६,२८ & विणिष्ट्य मणपजव १३-२७ लखिमक्सर ३६- मणपनव+नाण १३-२५,२८ लेस्सा १-१५ वितिमिरतराग २३-७,९१ मगपाय+णाण ७६-१४ २५-१,५ मणित २४-२ व विधि मति ११-२२ दिपाक मतिमण्माण ११-२२ विपाकसुत मविणाण ५९-१०,६६-११, विपुलमती २२-२ मन पर्यय १३-२५ ६८-१२,६९-८ विमची ५८-११ मेघा ५-१४ विजुत १५-२० विण्णाण १३-२७ लोगबिंदुसार ५०-९,१० वक्ताण ३२-९,१० वक्ताणकण ३२-९,१० धमा नन्दीसूत्र-तरूय॑न्तर्गतानां विषय-व्युत्पत्यादियोतकानां शब्दानामनुक्रमः । १०१ पत्र-पति ७६-१ संज्ञा शब्द पत्र-पक्ति शब्द पत्र-पक्ति बमाणपविभत्ती ५९-७ सव्वजग २-२७ वियाण १-१८,१९ श्रुतम् १३-२२ सम्बबहुअगणिजीव १८-५ वियाह ६५-१२ सम्वतो १७-११,१२ स वियाहचूला ५९-११ सइलेसभाव २५-१६ संकिलिद्ध १९-५ वि-रायते ६-११ सच्चप्पवाद ४५-२६ विविध +सताणचोदक ४७-९ ६२-२५ सजोगिभवत्थकेवलणाण २५-१५ विसाल ७६-१२ सजोगी सधरे २५-१५ ९-२६ विसुद्धतराग २३-६,९,११; सज्झाय ११-४ सलेहणासुत ५८-१९ २५-३,५ *सण्णक्खर ४४-२४ सिवट्ट [घन] २४-१२ विहार ५८-२० सण्णवर ४४-२६ सवर ६-९ विहारकप्प ५८-२१ सण्णिसुत १५-२१,२६ ससय ४१-८ चीतरागसुत ५८-१८ सण्णी-सज्ञी ४५-२१,२६ सिद्धकेवलणाण २५-१२, २६-१ बीमंसा [१ णिञ्चा-ऽणिञ्चादि- ३६-१३ सितत्त [स स्वतत्त्व] २८-८ सुत १३-२२ एहि दन-भावेहि विमरिसतो ४६-१३, सतंबुद्ध २६-१८ . सुतणित्सित ३२-२५ ७४-७ वीमसा भण्मति (पत्र ३६), १५,१६ सम्भाव ११-१३,१४ सुत्त २ आत-पर-इह-परत्ययहिता- ६४-२२ सुयअण्णाण ३२-१०,११ ऽहितविमरिसो वीमसा (पत्र समत्ता १७-१३ सुयणाण ३२-१०,११ १६), ३ अहवा सकप्पतो ५०-२४ सुसवण चेव विविधा ' आमरिसणा समाण १२-२,३ वीमसा (पत्र ४६)] समुट्ठाणसुय ६०-६ सुस्सवण चीरियप्पवाद १७-१२ सूरपणती ५८-३ ६३-१० सम्मत्त ५१-२ वृत्ती ६२-२ सयंबुद्धसिद्ध २६-२३ वेला २२-१४ हायमाण-हस्समाण १९-४ वेढ २-१५ हेद्विमखुड्डागपतर २४-१९ २७-१ हेतू ८०-१० १२-२ हेतूवदेसअसण्णी हेतुवायम°४७-१०,११ ४५-२ सवण ३५-२६ हेतूवदेससण्णी-हेतुवायस ४७-४,१० ७५-२३ समंता har ४-१९ सरीरपजत्ती ६२-५ सललित ६१-२१ सलिंगसिद्ध वेणइय व्यञ्जन व्यञ्जनाक्षर ४५-३ सवणता > PRAKRIT TEXT SERIES PUBLISHED WORKS 1 ANGAVIJJA -Demy Quarto size Pages -8+91+372 Price Rs 217- Argarıyji is published for the first time by the Praknt Text Society It is crtically edited by Yuni Sbn Pangarajaraj!, with English Introduction by Dr Moticbandra and Hindi Introduction by DE I S Agarwal Adgarijji 15 an avaient Prakrit Text relating to prognostication on the basis of bodily signs The work is of mkonn anthorship but was considered to be of high antiquity and great sanctity haying been delivered by Vabāsira himself Its internal evidence points to its having been finally compiled at the end of the Rusban period about 4th Century AD It is highly important document firstly for the history of Praknt language and secondly for the cultural history of India. It contains hundreds of lists of all descriptions for example seats postures utensil containers flowers trees personal Dames food and drots bed steads conveyances textiles ortaments jepellery coins birds animals artows Feapons boats gods goddesses etc. 2 PRĀKRITA PAINGALAL, Part I Demy Octero size Page - 700 Price -Rs 16)- Prakntapaingalam is a text on Praknt and Apabhramsa Metres It 13 antically edited with three Sansknt commentaries on the basis of the two earlier editions and further available manuscript material by Dr Bholashankar Vyas a distinguished member of the Hindi Department of the Banaras Hunda Varersity Hc bas also added Hindi translation with philological notes and glossary of Praknt and Apabhranila tords. 3 CAUPPANNAMAHAPURIŞACARIYAM, -Demy Quarto size Pages-8+68+384 Price Rs 21/- Cauppandamahapursacanyam is a great biographical work by Acharya Sulanka of the 9th Century A D It is entically edited by Pt Amnitial Wohanlal Research scholar of Prakrit Text Society Its Introduction 25 written by Dr L Bruhn It gives the lives of 34 great men revered by the Jains viz. 24 Tirthadkaras 12 Chakravartins 9 Baladeras and 9 Vasuderas $ PRAKRITAPALGALAN Part II -Demy Octaro size Pages 16+16+592 +12 Price Rs 15/- The Part I of this work on Praknt metres is published as the Second Volume of the Prakrit Text Series. Part II contains the editor's comprebebsite Introduction dealing with the problems of the PikpitaPalagalah together with a critical and comparatire study of the metres that for the subject matter as well as the exact datore of the language of the ongioal text and also a literary assessment of the portion wbich the author intended to serve as illustrations to the Matrika and Vartuka metres dealt with by hum. 5 ANH ANAKAMANTROSA. -Dems Quarto size Pages &+16+23+422 Price Rs 21/- Akupinakamaniko a us criticalls edited for the first time by Vani Shri Punjavijayajl It us kntten by Aemachandra and is commented upon by Amradeva of the 12th Century AD This book is a mire of histonal and legendary stories an Praknt and Apabhramsa 6 PAUMACARIA Part 1 -Dems Quarto size Pages 8+40+370 Rs. 18– This # the earliest Pralnit rersion of the story of Rama. It was wntten in about the thud Century A D by liimala. The work is printed with Hindi translation. It as edited by Hans Shri Ponzavijayajı and treslated by Prof $ 1 vorz, A. Jamadarsanichasya. Its Introduction is written by Dr V L. Kolkar *