Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Shri Gurugunaratnavali
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अनुक्रमणिका।
૨
जय २ मगल धान, गोतम मुग स्तरन
फरणा पत्तीमी
मुगल गुरु देव के दर्शन.
कुराल सूरिंद गुर पूजो भवि हित त
आज करोरे उछाह श्रीजिन दुराल मू०
में निरख्या गुरु महागज छतिया हर्ष भरी
गुरु पूज रचौरे मुनानी, होरी
सद्गुरु के चरण चित लाय २, होग
गाया भक्ति से पर रहोरे, होरी
जिन कुशल सूरीद गुर सदा नमो
सदा सहाई कुशल सरी- गुर
सद्गुरु जी मुणो मोरी अग्जी
छत्रपती थारे पायन में जी
श्री जिनदत्तसूर्गंदा परम गुर
मणि मस्तक पर दीपे जिन के
सदगुर मणिधारी महाराज
सद्गुर करणानिधान राखो लाज मेरी
कुशल गुर ध्याइये कुशल मगल करन
कुरान गुरु अव मोहि नाशण दाज
१२
૨
१३
मृष्ट . tar- १० १० २० २१ कुशल गुरु कुशल करो फुशल गुर दरशन दीजे हो गुरु देवजी का ध्यान सदा, चित्र में लाइये कैसे कैसे अवसर में गुरु रक्खा लाज हमारी श्री गणधर गुरु कुशल सूरीद के चरण क० चारी जाऊ गुरु राय चरण की, सद्गुरु पूनन जानस्या गदा निरजीवो, मेस जग मुसलाई गाने जिन कुशत गडाले सदगुरुनी चे साभलो, श्री जिनदत्त मूरीरा हो ह तो प्ररज करू कर जोडने जी, म्हारी स० सागार विराने आयो आयोरे समरता दागे जी श्रायो बिलसे शुद्धि समृद्धि मिली थायो सहु श्री सघ आराधरे कामित काम गनी पाटोधर गुरु गदपती सद्गुरनी हो कुशल गुरु की निरसण दो असमारी दरशन दो दु स भाजे दादा दर० जय गणनायक जय वरदायक श्री गुरु दे. मोफू शरण तिहारा कुशल गुरु मो० मुगुरु सुखदायरे गुरु बदन आये मिचुधपती २३ २३ २४ - m २४ २६ 1 २७ २८ २८ २९ २९ सेवो पृष्ट. ३३ ३३ कुशल सूरीद गुरु ध्यान धरोहिये जिनदत्त सुगुरु वलिहारी, सुसकारी., मन बवित पण जगा चावो. थरे लाला श्री जिन कुशल सरीसरू.' + दादा कुशल सूरींद, तुम दरशन से परमानद. , नित नमिये कुशत सूर्गदजी.. पित कुशल सूगैसर ध्याइये. दीपे वडली में गुरु थाहरो देहरो देरावर थारो देहरो हो साहिन. गणधर सेवो गुरु कुशल मूरी तिहारे दरश की चाह रही, मोरी अरज०.. पूजो भोरे भाई. ' अरज सुनो गुरु एक हमारी. आज हमारे आनन्द भयो, मै भेटमा श्री गुरु०. सद्गुरु नी शोभा सवाई ए. भै बलिहारी गुरु चरना. वीनतड़ी सुन लीजिये सदगुरु जी मोरी सद्गुरु जी महारे मन भाया. सद्गुरु तू ही प्यारा है, । नित चरणा में चित लीनो हे, सद्गुरु ने पकडी बाह नहीं तर वह जाते, तुझ सूरत सुसकारी मै वारी जाऊ, सुणियो अरज हमारी सुगुरजी सु०, . ४ है . . ३१ म है . - . ४० - "
पृष्ट
०.
१२
४
कुशल करण मेरे परम गुरु की वेर १ लि.
श्री जिन कुशल सूरीसर सद्गुरु
श्रीजिन कुशल सूरीद गुरु साहिब
श्रीजिन कुशन सूरीश्वर साहिब
तू हे दाता मेरो कुगन गुरु
कुशल सूरींद सहाई हमारे
आज तो श्रानद मेरे भाई भली भावना
कुशल सूरीद सुखकारी हो सुगुरू मेगे.
मेरे होउ सहाई सदगुरु
हम कू शरण तिहारी हो दादा राखो श.
श्री सद्गुरु महाराज दुल गुरु
श्री सदगुरु जिन कुशल सूरीश्वर साचो.
बुशल करण गुरु पुशल सूरीश्वर साचा स.
बुराल करोरे महाराज कुशल गुरु
मोकू शरण तिहारा कुशल गुरु
आशा सफल पली मै पायो परमानद
गपति सरतर गद सिणगार.
सतगुरु श्री जिन पुरान सूरीन
पूजो रे जो पूजो दादे सम देव न जोरे.
रिसह सिमा सोजयो
दादोजी परतिष देवता
जमु हम कमल गुरु नाम बसे.
दागनी दीठा बोलत थापा
४८
५२
५३ ५४ ५५ पृष्ट चलो सखी पूजवा जइये कुशल गुरुजी अरज सुणीजे दरराण दीजै, ५३ श्रीजिन कुशल सूरीश्वरू श्री जिनदत्त सूरीसरू रेलो. श्री जिन कुशलसूरीसम्रे राजे श्री महा. सहाई मेरे श्री जिन कुशल गुर. दादा पूर हो चरित मोरा. हेली हे सद्गुरु जात मनास्या हे. जी हो धन बेला धन सा घडी. कीजे के कर जोडने दादाजी. - पूजवा चालारे सुगुरने थलवट देश सुहावयो. नइया मेरी दादा तुम ही सेवइया. सद्गुरु का ध्यान हृदय मेरे, हारी. ६२ बलिहारी इ कुगल सूरीसर की होरी. ६३ हा रे लाला श्री जिनदत्त सूरीश्वरू. ६३ जय २ जग जन दयाल सद्गुरु मणिधारी. अथ संस्कृत स्तुति। दासानुदासा, चिन्तामाणि कल्पतरु, नो योगी न च. ६५ यो दृष्ट स्मरण गतोपि, जिनदत्त गुरोरष्टकम् । ६५ ' नमाम्यह श्री जिनदत्त सूरि, द्वितीयाष्टकम् , सुरकिन्नरवदितपकमल, तृतीयाष्टकम् - , 5 पृष्ट - । ७१ , नतनावरमालिमणिप्रभा, कुशल गुगेरटरम्, ।। ६८ मुख सर्वासपन्, कुशलगुरोहितीयाटस्म् पद्मारियाणविद्या, कुशल गुराम्तृतीयाप्टपम्. देवराजपुग्मटण, उशन्न गुगेधतुभीष्टकम् । ७१ दायक ऋद्धि सिद्धा, घग्घर नीसाणी. ૨ सद्गुरु गदनायक, दूसरी घग्घर निसाणी. खरतरगड जाणे खलक, घट प्रथम, समरू माता सरस्वती, छढ दृसग परतिस परदा पुग्ने, घद तीसरा वदन कमल वाणी विमल, छद चोथा. ८१ वरदायक इस वाहनी, दत्त गुर घद पाचमा प्रेम मन धार, कुशल गुरु फर्विच प्रथम वावन वीर रिये अपने यस, कवित्त दृमरा. राजे थूम ठोर टोर, कवित्त तीसरा. कुशल अंग उधरग, कवित्त चौथा, कुशल बड़ो ससार, कवित पाचमा मिश्री घृत क्षीर रलाय मिलाय, कवित्त छठवा.. मसूर पठाण गरन्य फियो, कवित्त सातमा, चन्द्र गुरु १० सबै मृगनयणं चले गुरु वदन, कवित्त पाठमा, चन्द्रगुरु २१ संतन की मुख वाणी मुरणी, चन्द्र गुरु छदा नवमा २१ अष्ट प्रकारी लघु पूजा भाषा, संस्कृत. १२ जय २ सद्गुरु श्रारती, दत्त गुरु की मणिधारी जिन बद्र, कुरान गुरु आरती - १० - (द) 1 , 1 M आज आप चालो सरिया, सिन्द्रगिरि प्रथम स्तवन २६ नमो रे नमो सेत्रुज गिरी रे, स्तरन दूमग श्री मिद्धाचल मडण स्वागीरे, स्तमा तीसरा सेनुजानो वासी प्यागे लागे मोग० स्तवन चोधा २९ याना निनाणु करिये निगल गिरि, स्तवन पाचमा. २६ उपाध्याय श्रीरामलाल गणिः कृत गुरु स्तवनम् । श्री सदगुरु का दरश सरस चेत नर क्यू भूला अन्नान. टेरया में दरश तिहारा १०१ सद्गुरु दीनदयाल. ' सुगुरु मेरी नइया पार उतारो. १०२ सद्गुरुनी का पूजन कररे, होरी, । होरी खेलो भविक सद्गुरु के संग, १०४ सद्गुरुजी के द्वार मची होग. दचगुरु दरश दिखादोजी, १०५ श्राज रंग बरसेरे.- । दादा महिर निजर कर जोय । “चालो २ हे सहेल्या सद्गुरु पूजवा ए कुशल छोगालो लाडलो चाल २ म्हारा मित्र प्रालीजा १०० श्री सद्गुरुजी से वीनतीरे दरशन देजोजी 1 . - wer -- 11 f सद॥ क सृष्ट, १२ ११० ११९ मेरे कुशल गुर सुग्षकारा गाऊ २ में सुयश गुरू तारनारे म्हारा प्राण पियारा मोहना गुरु उत्त कुशल गुर सुरतर चाल २ म्हाग मुगुणा श्रावक. 'पूज्य पूज जिन चन्द्र सुश्विर जाय फमा उगुर के में तरराण देनाजी गुरुगज, भक्त के मै शीस नमाऊ थाने, परम गुरु दीजो तारो तारो कुशल गुरु रसिया प्रावो सनन करो गुरु का भजन, म्हारे हाय लिम्या गुरु नाम हतो थारा दरशन करवा आयोजी. भर्मक अधिक दीपायाजी, आज यापे चालो पहिनी म्हेतो'सेवरा चढाय आई आज मुजानी लाल चरणा सू चित लागो छाजेड उलरो सेहरो छ माय क्यलों कह गुरु दु ख की मैं बतिया कोई देख्यारे सुपने में सद्गुरु. कुराल सूरिंद गुर साहिवा जा अयन उदयकार प्रशस्ति १२० १२१ १२२ १२३ १२३ २२५ १२। १२६ १२७ १२८ सर्वारिष्टप्रणाशाय सर्वाभीष्टार्थदायिने सर्वलाब्धानधानाय, 'गोतम म्वामिने नम ॥ otostosto one of thesed गुरुगुणरत्नावली 2009 20989RDCla अथ गोतम प्रभाती स्तवनम् । , . जय २ मगलनिधान गोतम जयकारी ॥ ज० रे ।। पृथ्वीकुतिरत्नहीर, विश्वभूति पितु सधीर, चार वेद चतुर धीर, मन्मथ अवतारी ॥ ज०१॥ यज्ञ रग विप्र सग, तृष्णासुर- लोकगग, करत धरत छात्र पात्र, विरुद विवुधचारी, ॥ ज० २ ॥ विचरत प्रभु आये चग, वाणी गुण सप्त भग, पर्द्धमान जित अनग, सराय तमहारी ॥ ज० ॥ ३ ॥ देवागम त्रिगद देख, इद्रजाल शकरेख, वीतराग पचनपेख, मिश्या मति टारी ज० ४ ॥ त्रिपदीपाय अगवार, रचनाकृत अति अपार, बोधन जग जीवसार, भये गुरु गणधारी॥०॥ ५ ॥ केवल चिद सरस पीन, मुक्ति लक्ष्मी धर्म लीन, मुझ मन जल चरन मीन, युदनपुति- सारी ॥ ज० ॥६॥ सिद्धियोगनदचद, कात्तिक सित सघ युद, फूलत घर कल्प कन्द, दूजकुमतिहारी, ॥ ज०॥ ७॥ गुलशिवपुर देवमणी, इद्र भूति जगधरणी, कुराल निधान सुखभणी, पाठक प्रद्धि सारी ॥ ज०॥८॥ इति पदम् ।
गुरगुरणरकारली । करुणा बत्तीसी। . माना मुगिये माल गर जीय के "याल प्रभु श्रादि अपर ई-स श्री प्रापर चित ध्याय । यस राशी को श्रादि परमेधा को गा के निर्माह कारण या माये, भरत सादगी श्राप योग गर्ग नीनो गागा के शरमा श्रीगाय काय हो गर देवी7 द फाट सफत शनाय नाय शरण तेयाये है॥१॥ अजाकीटे गुणी त्यरित फैलास श्यायो रावगा से रागा टक विधि वाग्यो है, माद नरपत्ति मुग्ग पी जय गिरि पर मानुष पर आरयो है, यामा दिन 1 केवल पद मज दीनो गाली अर सुदरी के हाथ से सुधारयों है, शवर पलारामासी तोफ गेरी करत हामी श्रव तो उद्धार गुमराज को रक्षाग्यो । ॥ २॥ फोहयकतो मासा तुम गाम का उच्चार करे कोत्यक शिव विष्णु लेत नाम भी पो, कोइयफ रमा अरु पादम करतार कहे जगत धीच महग नाम पगरया है वणी का, नमि अरु विनमी को सकट से मेट गानो खेचरपति गेगा से नागरायभणी पो, गेरी सुध नाथ तने पैसे पिमार दी। भलू नही पला नाम प्रमु चितामणी को ॥ ३ ॥ केशरियानाथ तने सगरम पदाज तारी, ऋषभदाम गर्ष की हुदी शिकारी सिंधिया की मीन जर पान के दिन कानो पडे या बड़ी नायवरित तोद बारी है भग्य अगवानी होग भगगगगन यान मनि निदागे वह लहनी हाग है, करणा बत्तीमा। - . कलियुग में परचा प्रभू प्रगढ़ है प्रभाव तेरो राममृद्धिसार यह अरजी गुजारी है।॥ ४ ॥ पचम चक्रोश पुन शोलम तार्थशनाथ रथनापुर म्वामी मृगलबन के धारी हे, गज के चौरासी लाख चौमठ हजार रामा गन प्रमित अध नर निधान अधिकारी है, मुकट बद्ध राजन बत्तीम सहस सेवा में पायक के दिन कोडि हद अव- तारी है, गते सब त्याग के तुम सजम समाधि धार ऐसे जिग राज को वदन हमारी है ॥ ५ ॥ अचग के व जर आपने अवतार लीनो नगरी में आगेयो रोग हेजा मरी को, विश्वमेन राजा शोच में गलतान था के कोइयफ मिदावे रोग लोकन के जरी को, दीन के दयाल प्रभु अर्हन् तिन दीनबंधु धन हे प्रताप नाम शाति सुबकरी को, शातिक फैलाय के मय जीग्न को कष्ट काट्यो मै तो गरीबदास प्रगट भक्त हरी को ॥ ६ ॥ पूरय भर बीच आप शुरणागत विन्द धारयो गफ समय सुरपति ने शोभा बग्वानी है, डिगे नही काहुमै दया के सधीर राजा शिरा अर पारापत भागत अगवानी है, आन के कनतर जर पध्यो है उछग बीच मुख से यू फहत राजा तू तो बडदानी है, दीनो निज वपुदान शरणागत गन्यो मान ऐसो विरुदार तेरो करत आनाकानी है ॥७॥ वेद में पुराण में आलम में कुरान मे ऐसी जो जगा सो शाति सब पाट में, व्याह. अरु पूजा में शत्रु के धृतन में ऐमो नहीं रोकचार मो त वही वाढ में, शाति पर 'मगल को तोडे श्रमगन को ऐसो प्रभास नाम मुक्ति के म्यार में, विप्न, को विटारी सर सतन सुखकारी यूं रामद्धिमार तेरी रहता नित याद मे ॥ ८॥ बाल ब्रह्मचारी प्रभु राजुल तारी
-
४
गुरगुहारतावली।
7
गणी मै कर कहा करुणानिधान हो, पशुधन पुकारे त्वरित
"ही उपारे पधन छुड़ाय तुम दोनो अभयदान हो, यादव कुल
महन हो मदन के विहढन हो, गिरनारगढ़ जाय के धरमो
अचल ध्यान हो, ऐसे तुम काम कीने मोहकू विसार दीने मेरे
तो कृपा सिंधु जीवन तुम पाण हो ।। ६ ॥ जगमध कटक ले
भायो जब द्वारका पर हलघर और गिरधर ने गर घजाधारी
है, कर भयो युद्ध जामें अपणी फौज हटी जान जरामध यादव
दल ऊपर जरा डारी है, बलभद्र आदि ले सब ही अचेत
भये कृष्ण कू सहाय दे जरा को निवारी है, मारत आप झेल
लीनो तीन दिन युद्ध कीनो ऐसे तुम कृपासिंधु सब के उपकारी
हो.१०॥ सारग धर पनुप चान्यो राखह को शब्द फाट्यो फेरयो
मुदर्शन चक्र पृथ्वी परराई है, शेष सज्ज्या खोल डारी ऐसे
पलयत भारी प्रगट दूजो नारायण य कृष्ण खबर पाई है, ताकत
पतबान लागे माह लम्बी करी आगे कृष्ण की बाह कू कमल
औ नमाई है, हरि चिंता करे मन में छीन लेगो राज्य दिन में
हलधरजी कहे कृष्ण नेमतो गुसाई है ॥ ११॥ चिंता सब मेट
दीनी गिरवर की राष्ट्र लीनी द्वारका के बचवे की कही राह
कान्ह , भक्ति से तार दीनों ईश्वर पद योग कीनो ऐसे स्वयम्
आप श्रीधर महरान क्, करतें पुकारू नाथ मेरी बेर देर
कहो गुनहा सब माफ कर कह दो गुरु ज्ञान कू, मेरे तो प्रमु
नेम साचे मन धरू प्रेम रामऋद्धिसार नित ध्यावे भगवान् कू
॥ १२॥ काशी के भूप पर रूप है अनूप जामें वामा के नदन
सोहे पदे सुरेश है, जाणे तोहे जगत् लोक मेया से सर्व थोक
करूणा बत्तीसी । ५ चितामणि कल्पवृक्ष कमलाकर पेस है, दर्शन तुमारो पाय फमणा घर रहे नाहिं पारस प्रभाव तें लोहा कनकेश है, नाम के प्रताप से उन पत्थर को बध्यो मान धन है नर नार तोहे ध्यावें हमेश है ॥१३॥रामचन्द्ररघुपति ने दरिया पर पाज बाधी थभनपुर स्वामी तुम साधे सब काज हो, यादव की जरा मेटी गुण के हो रत्न पेटी नागार्जुन योगी को दीनो कनक साज हो, मै तो निराधार मेरी पारस करोगे मार अरजी चित धार तुम दीन के निवाज हो, अठारा दोषण में निद्रा से रहित भये मेरी वख्त नींद कहा लीनी महाराज हो ॥ १४ ॥ खरतर गणाधीश्वर श्री अभयदेव सूरि को सेदी नाम नदी तट प्रगटे तुम पास हो, जयतिहुश्रण बीसी स्तवना एकाम करी शातिक के जल से तुम कियो कुष्ट नारा हो, गोडीमल श्रावक और मेघा नाम गोठी ने हालाहलः जहर स्वायो तुमारो विश्वास हो, प्रतिमा तुम्हारी प्रभु वसुधा फाड़ प्रगटत है होवे फिर लोप तुम गौड़ी गुण रास हो ॥ १५ ॥ फमठ को तुम हग्यो मान पन्नग क मत्रदान तुमारे दरस से नाग घरणेंद्र अवतारी है, धन्वन्तर नाम तेरो फर्म रोग काट मेरो मेरे तो पारगत तेरी विगतिवारी है, पद्मावती करे सेव तुम हो देवाधिदेव बद्रीनाथ जगन्नाथ मूरती तिहारी है, रामऋद्धिसार पर सु निजर की महर करो दशों अवतार धार कर्म के विदारी है ॥ १६ ॥ शासन के स्वामी अभिरामी प्रभु वर्धमान तेरो जत्त पारावार मुनि गण कहाई है, ऋषभदत्त ब्राह्मण अरु देवानन्दी ब्रामणी कू अपणे पूर्व पूज्य जाण मुक्ति को पठाई है, त्रिशला महतारी के ऊपर अनुकम्पा आन एक टेश लीन भये गर्भ के
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६
गुरुगणनापती।
गु माही है, यही यहवीर मरी तुग हरो पीर नदिमाना
के भाई मा हमारे सहाई है ।। १७ ॥ जन्म समय सुरपति सम ।
शाति के कारण गगा अरु मागध फे गरे फार नार के,
सौधर्मा गना के गाद में रािजमान काल व 7 मईया
जाय जोर सीर के, अभिशेष को हुकम शचिपति तय देत नाहि
कपायो मेरुगिरि ऐसे बलधौर के, आमल की भीड़ा में असुन
क् पधार डारयो देवन मिल नाम दीनों भगवत महावीर के
॥ १८॥ हामी पे कर सवार सोले सिणगार फार गजा अरु
राणी ने पढ़वे पठाये है, सिंहासा इन्द्र को तर ही थग्गण
लागो वृद्ध श्रामण रूपहरि पण्डित पास थाये है, पृछे जो
সপ্ন ব লাষ্টি মান দামী ফল লাখ ৪
बताये है, इद्र फहे पुणे लोक सर्वदा वीर कोक जैन इन्द्र
याफ्रण तब ही बनाये है ॥१॥ वर्ष एम दियो दाा याचक
को.रज्यो मान पृथ्वी को ऋणभार आपो उतारयो है, सवत्सर
भाई को जग में प्रसिद्ध कीनो श्राप निरहकार योग प्रात्मकाज
सारया है, दैवत अरु मानुप के कते उपमर्ग महे शलपाणी
यक्ष दर्शन उचारयो हे, चडनाग डा दीनो श्राप वाक तार
लीनो मुद्रा तिहारी देख स्वर्ग व सिधारयो है ॥२०॥ सिहासन
छत्रधारी दुन्दुभि को नाद भारी ऊपर ओक वृक्ष छाया फैलाई
है, देवन को कोटा काटि श्रावत तुमारे पाय मन का तो ये
पाणी मुनपाई है, या तिहा परन लागे गोता दिन छान सागे
इद्र जाली कहत मायो का चित ठाई है, वेद को तुम अर्म
भाग्नी अपनो कपीर गरी तहा बुखारनार प्रगट्यो मलाई है
कमणा उत्तीसी ।
से
--
॥ २१॥ योग की सर फिया त्याग वेश्या सग रहो ताग वारे
वर्ष मग्न भयो भोगे सुख काम को, नविमेन आयो पास उनकी
फिर पूरी प्राश आपके विश्वास उन पायो अमर धाम को,
गोशालो गुनहगार मुस से बोल्यो कुफार वेच लोक भेग्यो प्रमु
हराम को, मैं तो प्रभु भक्तिवान मेरी टेर सुनों कान मै तो
रद्र वीर धीर सुबे और सामो ॥ २२ ॥ श्रेणिकनारद और
बेलना मुख चद देग साधु और साधपिया भई रूपलीनता.
मुनिगण को डिगे जान सब कृ ठिकाने श्रान अपने फरमान से
सन टाल दई हीनता, मेघ कुमर मुनि राज सजमकी छोडी
लाज श्राप से पुकारयो दिखलाई बहु दीनता, पूरब मन यात
कही ढया विर थाप दई मेरे तो जिनाधीश तेरी श्राधीनता
॥ २३ ॥ श्राइमर राजपूत मनिपद की लई
मृत
कर्म
सयोग फिर श्रीमती कृ परणी है, घरमें चौवीस वरम रागरग
पर सरस पीछे पछताय पुन लीनी आचरणी है, ताक् शिव
वधू दीनी जमाली उत्थाप कीनी केते भव टाल के बताई शुद्ध
करणी है, मुमत ना पले योग स्वान पान सरस भोग ऐसे को
तारो तो तुमारे हाथ तरणी है ।। २४ ।। पिरती जिन ग्रहीनाह
चरणन की लई बाह विषय भोग लपट उन श्रेणिक नरिंद कों,
आप शम प्राप कीनो पद्मनाभ नाम दीनो धन है करतूत तेरी
मचायो चमरन्द कों, प्रय मचे बालक की नान आप पार कीनी
सूरिया मनाटक कर गाया गुण छद कों, दशार्ण भद्र भपत को
मधयाों हरयो मान ताके शिर हाथ धर नमायो सुरेन्द कों
1॥ २५ ॥ मनार से तरकी मेरे चिन चाह भई ऐसी अभिलाष
मुरगुणरमाचली। . भर गयो देव द्वार पै, केते देव सुरापानी फेते सात तानी केते तो मुदर सग में सेज जार पै, काह को शीश पुन दूसरे ने काट तीनो फेते घरदान देत मारे हजार पं, राग द्वेष त्यागे जिन मुक्ति किमी की नाहिं ऐसो देवाधिदेव तू ही समार पै ॥२६॥ माह के आधार प्रभु राजा थरु सेठन को काहू के आधार सेवा खेत विरतवारी को, काह के आधार प्रमु जोतप और चैदक को काह के आधार जड़ी बूटी मणिधारी को, फेते रसानी मत्र साधे अभिलापा घर केते पास दन्य है लाखन हजारी को, मैं तो निराधार मेरी पीर प्रभु को सार मोह तो भरोसो भारी केवल- पदधारी को ॥ २७ ॥ नैया यक सास्यमती श्रद्वत ब्रा जगत् भाने केते वैशेषिक जगत्स्वासो पखाने है, पते पुन नाम्निक वह अस्तिभाव करे खड केते समाजी काजी ईसा को मनावे है, ऐसे एकात वाणी जिमके मन जिसी मानी अपणो हठ वाद कर लोकन भरमावे है, मैं तो स्याद्वाद चासू दूजो नहीं धर्म राखू साचो हुकम वीर फो सो मेरे चित्त चावे है ॥ २८॥ चौदे हजार मुनि दीक्षित निज हाय तेरे प्रार्या छचीस सहस सेवे नित चरण को, आनन्द अरु कामदेव प्रमुखन ग्रहस्थ तेरे बक्ति से पूर भये दुरमति के हरणकों, चोसठ सूरिंद तेरी सेवामें खबरदार सिद्धानाम देवी सो सघ रक्षाकरण कों, स्वामी श्रीपर्द्धमान जग में तोद सच जान भक्तन के वत्सल नाय मही तेरे शरण को ॥ २६ ॥ चौवीसौं पुरप सिंह अतुलीपल भरनहार अल्प बुद्धि मेरी सो गाये जिन गुगनकू, पोचो ही तीर्थंकर दुनिया में माहिर है याही ते रचे धन्द भक्तजन मुणनक, पिंगल की भाषा सदगुरु ग्तपन । नहीं कविता पो मुझे भान भारत में मन होय लायो गुण सुगनक, मेरी तो हुदी प्रमु यापही सिकारोगे ऐसो दयाल देरा लयो गुण शुगणना ॥ ३० ॥ पाणी घर दावानल सर्प मिह हती पो गेग शोक पुन दरिद्र भय मिटे नाग सें, लन्मी घर संप करे गूपति मिर हुपम घरे घ्यावे एकात मन माठों दी याम से बचन फटजाय और जगत बीच वधे मान इच्चा सम पूर्ण होय महावीर धाम से, मेरे तो तुम धनी दीन देय अरन सुनी तेरी पर पाया में रहता आराम से ।। ३१ ।। कोटिक गणचन्द्र चुल शाषा वा स्वामी की आपके पाटापाट पड़े यस धारी सो, दादा जिन युशल सूर मेरे हाजर हनर पाठक वर क्षेम कीर्ति शासा के कारी सो, गाधु गुण मये लीन धर्म शील गुरु प्रवी उरात के धान आप जा के उपकारी सो, करुणायचीसी या रची रामलिमार पाठक पद विरत धार विप्न के विटारी सो ॥३२॥ इति श्री उपाध्याय युक्तिवारिधि रामलालजी रचित करुणा पचीमी सम्पूर्णम् ॥ " अथ सद्गुरु स्तवन। राग रेपता-गुराल गुरु देव के दर्शन, मेरा दित होत है परशा, जगत में या समो कोई 1 देखा नयण भर जोई ॥१॥ विरुद भू गडले गाजे, फरस ते पाप सब भाजै, पूनते सम्पदा पाने, अचिंती लच्च घर पावे ॥ २ ॥ एक मुख गुण कह केता,
गुरुगुणतायती।
-
,
4
"
मुझ हिये ज्ञान नहीं एता, लाल की अरज सुण लोने, चरण की
सेव मोहे दीजे ॥३॥ इति पदम् ॥
राग करो-शल सूदि गुरु पूजो भार टितनु तुम
टेर । केसर चन्दन पपूर अरगजा, मार धी को पूजा हितगु ।।
कु०॥ मांगरा लाल गुलार मालती, मन सुध मात करी भरि
राचि सु ।। ० ॥ १॥ अशरण शरण परम गुर मेरो, धम्म
भ्यान धरो मातम चित सु ॥ १०॥ सेफ जन प्रतिपाल
जगत गुरु, पारा पूरे गुरु घणु दत्त सु ।। कु० ॥२॥ ध्यान
सुधारे ज्ञान वधारे, रूप रग देवे चित हिल मति मु।। कु०॥
सुशन सूरीन्द गुरु साधिकारी, परतिख परचा पूरे मतम् ॥ कु.
॥३॥ श्री तिन हूं सदा सुरिलाशी, सत्य रत्न मुम्ब पही
छतमु । कु०॥ इति पदम् ।।
राग देव श्री चलन।
पान करो रे उच्चार श्रीजिनशल सूरीन्द भागे ।।3।।
या आधी बेला ने श्री नाथो दान, इन साठी येना क्यू करो
लाज ॥ या०॥ १॥ विविध प्राार पूजो मन रंग, हितमिल
गावो साजन सग, प्रा० धूप दीप कगे नैवेद्यमार, फुलपारी
नो नहीं जिहा पार ॥ श्रा० ॥२॥ अक्षत श्री फल होने
नेह, पुन क्लर पामें सपदा तह, श्रा० सुरनर नारी ऊभा
कर जोड़, कोण करे म्हारे दादाजी नी होड़ ॥ श्रा०॥३॥ श्री
सर तर गच्छपति सिरदार, रावल राणा ने ये इकतार, श्रा०
महिर निजर बगे श्री गुरु रान, उरल सूरिद गुरु गरीन निनाज ।।
सदगुर ग्तवन
मा०॥ ४ ॥ श्री जिा हर्ष करे उचरग, सत्य रल मन मान
उमग ॥ श्रा० ॥५॥ इति पदम् ।।
राग बगालो घाटो।
में निरख्या गुग्ष महारान पतिया हर्ष भरी में० ॥टेर ॥
अमल श्रात गुण आगरू रे, शमता रमनो धाम, परम परम
परमातना रे, वचित दायक वाम ॥ छ० ॥२॥ करणानिधि
गुर दौलती रे, सेवक जा प्रतिपाल, भवि जन भरते भाव सू
रे, ताये भर २ थाल ॥५०॥ २॥ फेसर चदन कुमकुमा
रे, भरियकचोली हाय, पदमण 'पावे मलपति रे, पूजे सहियर
साथ ।। ८० ॥ ३ ॥ उरल सूरीधर साहिना रे, श्री जिन चन्द
सूरि पाट, बलिहारी जिन कुरालनी रे, गाजे पणु गङ्गाट ।
छ० ॥ ४ ॥ अष्टसिद्ध सानिध करे रे, सुग्व सपूरण हार, श्री
निन हर्ष सूरीधरू रे, सत्यरत्नसुखकार ॥ छ० ॥५॥ इति
पदम् ॥
होरी सिन्ध काफी दीपचन्दी।
गुरू. पूज रचो रे मुज्ञानी, भले हिय भक्ति भराणी ॥ टेर
श्री जिन कुशल सूरीधर साहिब, रारतर गच्छराजानी, देश २
में थानक गुरू का, शोमा जग पहिचानी, सदा रवि तेज सगानी
गु० ॥ १ ॥ केसर चन्दन मृग मद मेली, चरणन पूज रचानी,
धूप दीप बलि आगे ढोयो, बहुविध पुष्प चढानी, भले फल भट
धरानी ।। गु० ॥ २ ॥ बाट घाट में परचा पाक, हाजर हान
-
गुरगुगरलारली। सहागी, जिा सौभाग्य सरि के साहिय, बधित काज परानी, सदा गुरु महर लखानी, गुरु ॥ ३ ॥ इति पदम् ।। शेरी। सद्गुरु के चरण चित लाय २, जिनदत्त मूरिद गुरु सरोरे सहाय 11 स० ॥टेर। रावन धीर अनेरलि चौसठ जोगण यश भीनी हर्ष लाय, विगा पुस्तक सोनन अतर, अ भो वा विडार पाय | स० ॥१॥ मुलतान में पच पीर महारल, पच पदी साधी चित्त लाय, इत्यादिक बहु परचा पूर, गुर समस्या सब दुख जाय || स० ॥ २॥ गुर के नाम से श्रटसिदि नीधि, गुरु गुण गावो मरही धाय, श्री जिन सौभाग्य गरि सुगुर पर, गहिर करो गुरु सुखदाय ॥ स० ॥ ३ ॥ इति पदम् ।। होरी राग लहरी। माया भक्ति से पूर रहो रे, दुरजन सब दर हरो रे॥०॥ टेर ॥ मेरे मा में भक्ति चरागी, चित परणिन लगा सु तागी, मेरी भाग्य दश अन जागी, जिया हो ॥ भा० ॥ १ ॥ सब सजन मिल कर पायो, गुरु चरणे चौक पूरामो, बलि प्रक्षत बाल यथावो, जिया हो । मा० ॥ २॥ गुरु महिमा वत सवाई, गुर ाम सदा सुरसाई, गुरु सेवा पाप पुलाई, निया हो। भा० ॥३॥ घस पेसर मरिय चोली, माहे मृगमद कुकुम पोली, गुरु पूज रचो भर झोली, जिया हो ॥ मा० ॥४॥ जिन हर्प सुरीश्वर राजा, वाने जग जशना बाजा, गुभ पाजा, जिया हो । भा० ॥ ॥ इनि पटम् सत्य रल सगरमा। . . . तिताला पर। जिन कुशल मूरिंद गुर गठा नमो ॥टे । मृम गम्पनि ऋद्धि सिद्ध सर हाजर, देश देशान्तर नाई भगो ॥०॥1॥ बाट घाट पर विगमी विरिया विस चुराई दूर गमो ॥ जि. ॥ श्रानिश नाम मन उग्धारो, मुगुर चरग चित ग्गो रमो ॥ जि० ॥ ३ ॥ इकमन ध्यावे वदित पाव, विपत यथा सर दमो दमो ॥ नि० ॥ ४॥ अभय महामुग सपति पाया, धिर थाकथिति नमो जमी ॥ जि० ॥ ॥ इति परम् ।। ताल इमरी। मना सताई कुल मुरित गुरु दो लानत गुर गयजी ।। स० ।।टेर । गाई सूटे रारची । हटे, ग्नि २ २ सवायजी। स० ॥ १ ॥ सम्जा सुन या मुदर गारी, शुग परिगर मुग्वगयजी स० ॥ मिा समागम मुजस वधारण, नित प्रति हरख उचाली ॥म० ॥ २ ॥ राजा प्रजा पाय नमे सद, गुरु समरण मुपसाय जी। स०॥दोषी दुश्मन नृप भय पड़िया,मगुरु परय सहायजी ॥ स० ॥ ३ ॥ विसमी विरिया सकट पडिया, समरचा भावे धायजी ।। स०॥ भूम्या भोजन तिसिया पाणी, निरधनिया धन दायजी ॥ स ॥ ४ ॥ सघ शकन ने तो मुखशता, जिम कीरति जग थायजी ॥ स० ॥ थानक थिरता पर घल भोजन, पगपर्ग कुशल सहायजी ।। स० ॥५॥ अभय महा सुसदाई सदगुरु, गव निधि वधित थायजी, सुमति सचाई नित पर सपत, दान विशन लहायजी ॥ स० ॥ ६ ॥ इति पदम् ।।
गुरगुणरत्नावली । सद्गुर जी सरगुल मुणो मोरी गरी १०॥॥परित पाम किये बहुतेरे शरना बिल रिचारी, पल २ च पड़ी सरगुजी मुतनब का गरनी ॥ स० ॥ १ ॥ ध्यान तुमागे बसुग्न ध्यायो, पूजा करी नहीं तेरी, तोही सेवक वधित पगा, यारी थारी मरजी || स० ॥२॥ निश्चे सेती तुम गुण गावे तुरत पटत दु र बेड़ी, भक्त उधार कहावत जग में, ताहे परत । श्ररजी ॥ म० ॥ ३ ॥ भोर देवा में नहीं घाउ, शरणमही मैं तेरी, दृर यदी में भटए भागो, विपत दशा सन ती }} स० ॥ ४ ॥ उशल गुरु का मे सेवा लोक जाणे सब काई, क्षमा रत्न को वीनती मुणा, दशा । स० ॥ ५ ॥ इति पग्म् ॥ छत्रपती थारे पाय नमेजी, सुग्नर हार सेव, जोति धारी जग जागती दादा, दुनिया में परतिरा देव ॥ १॥ तो मोहि रयाजी म्हारा राज, सदगुस्रे दरवार (टेर) रेशर श्रबर वडोजी, करती कपूर, चपो चदन राय चपेली, भक्ति कर भरपूर ॥ ह० ॥ २॥ मागुलिया ने पाव समापे, श्रावलियाने पाख, रपट्टीना ने रूप देवे दादा पास होना ने पास ॥१० ॥ ३ ॥ चद पाटोधर साहिया जी, श्रीजिन कुशल रिद, श्राठ पहर थाने पोलगेजी, रग घणे राजिंद । हू० ॥ ४ ॥ इति पदम् ॥ सहाना धमार। श्री जिनदत्त सूरिंदा परम गुरु श्री० (टेर ) परम दयाल दया कर दीजे, दरशण परम शानदा परम गुरु श्री० ॥१॥ जगम सद्गर जाना। सुरतरु पदित दायक सेफ जन सुसक्दा प० श्री०, सदगुरु ध्यान नाम नित समरण, दूर हाण उस पदा ॥ १० श्री. ॥ २॥ निज पद सेवक साधिकारी, रम्विये गुरूराजिंदा, ५० मी०, बेकर जोनिसियुनमिनी, श्रीशिन हर्ष मुनीन्दा ॥५० श्री० ॥ ३ ॥ इति पदम् ।। , प्रभातीतिनाला। मणि मस्तक पर शोपे निा के, बड़े हुए जयकारी जी (टेर) श्रीनिानपरि गणियाते, गुणगाने नग्नारी जी, पारा की तो गौर भरामा, मुझ को शरण तुम्हारी जी ।। ग० ॥१॥ जल बन्न अरु पुप्प मनोहर, अक्षत उचलकारी जी, दीप नेवेद्य शारती, पूजो फल विस्ताराजी ।। म० ॥२॥श्राप बुद्धि में गुण समुद्र तुम, केसे परो विचारी जी, शशि मण्डल जिम जलके भीतर, बालगटे करधारी जी ।। ग० ॥ ३ ॥ नाग प्रताप हमू पर कीनो, हा भापती भारी जी, श्रीजिा चद हर्ष हृदय में, चाया शरण तुमारी जी ।। म० ॥ ४ ॥ इति पदम्।। ईमनी तिताल। सद्गुरु मणिधारी महाराज, श्रीजिा चद्रसूरीधर साहिन, दरशण दीजे राज ॥टेर ।। महर करी ने प्रेम धरी ने, जि जन ने चितधार, श्री जिनदरा पटोधर मुशिवर, आनन्द सुसदातार ।। स० ॥ १॥ जन दु स भजन विरुद तुमागे, जाणे सह ...नार, श्रावक जा मा पचित पूरन, गुरतरु ज्यों जगसार गुरगुगार नारली। । स० ॥२॥ वाद विवादे जगजस पाचे तारे जलधि जिहार, बाट घाट भय सफ्ट टाले, समरण श्री गुरुराज ।। स० ॥३॥ पुत्र पुनीता परम चिनीता, रूपें लक्ष्मी नार, पान मिद्ध मुम्ब मपत पर में, बलि भरियो भएडार || ग०॥४॥ थारति चुरो यछित परो अवधागे अरदास, श्रीजिन चर प्रनय निधि दायक, सफल करो हम पास ॥ स० ॥ इति पदम् ।। लूम इकताला। सगुरु करुणा निपात, राग्या लान मेरी स० ॥ टेर।। जय २ जिन कुशल सूरि, समरत हार हज़र, महान निम या कपुर, महिमा जग तेरी ॥ स० ॥ १ ॥ जापर तुम हो दयान, धिा में करदो निहाल, सकट को चूर देव, दौलत की देरी ॥ स० ॥ २ ॥ तुम हो सुग्तर समा, पदित फल देवो दान, मेपन को दोन जान, मेटो भव फेरी ॥ स० ॥ ३ ॥ शरण श्राये की रसो लाज, धित सब पूरो काज, हर्ष चन्द्र शरए गायो, कीरति मुण तेरी ॥ स० ॥ ४ ॥ इति पदम् ।। भूपाली झपताला। कुराल गुरु याइये, वुशन मगन करण, सरतरे गच्च में अधिक राजे, मार मन में धरी, अगर फेशर करी, प्राता मन तना दुग माने । कु० ॥ १ ॥ विकट सकट टले, सजन श्राची मिले, श्रापना भक्तनी बारा पूरे, नमन धारजे सेव गुरुनी करे, तेहनी आपदा जाय दूरे ॥ कु० ॥ २ ॥ सक्त सार दरवार से सदा दिन दिने जामु महिमा सवाई , -- मद्गुरु म्तया। . माहरी लाज गुरु राज तुम ने अथे, इम करो जेम पाधे बड़ाई ॥ कु० ॥ ३ ॥ उदय फर २ अधिक खरतर धनी, सरि जिा रग सेवक तुमारो, सदा चढती कला करो गुरु माहरी, विपम बैरी बुरा दूर पारो ॥ ० ॥ ४ ॥ इति पदम् ।। विहाग जत। कुराल गुरु अव मोहि दरराण दीजै ॥टेर । ऐसी भाति गरो मेरे सद गुरु, ज्यू मन मूह पतीजै ॥ कु० ॥१॥ नल दातार विरुद अमृत रस, श्रवण अञ्जलि भर पीजै, सुरतरु शम दररान बिन देखे, कहो नयन फिम रीमै ॥ कु० ॥२॥ परम दयाल कृपाल कृपानिधि, इतनी अरज सुनीजै, परम भक्त निन राज तुम्हारो, अपनो कर जानीजै ।कु०॥३।। इति पदम्।। भैरवी तिताला। युशल गुरु कुशल करो भरपूर ॥कु०॥ टेर । सेवक जन मन रचित पूरन, समरया होय हजूर ।। कु० ॥१॥ परम दयाल प्रेम रस परन, अशुभ हरण भय दूर, सघ उदो कर सद् गुरु मेरा, विनवे थी जिनचद सूर ॥ कु० ॥२॥ इति पदम् ॥ भैरवी धमार। कुशल गुरु दररान दीजे हो । कु० ॥ टेर ॥ परतर गड पंति कुराल सूरींद गुरु, मुझ पर महर धरीजे हो ॥ १० ॥१॥ पतित उधागा विरुद तुमारो, इतनी अरज मुणीने हो । कु० - . crea गुरगुणस्तावली। . . ॥२॥ याधि व्याधि अरु दोपी दुश्मन, ये सब दर हराजे हो T० ॥३॥ क्षेम रता सेवा के निरा दिन, सदगुरु सानिश को हो । T०॥ ४ ॥ इति पदम् ॥ भैरवी खेमटा। गुरुदेवजी का वाासदा, चित्त में लाइये, गव भव के सकल पातक, छिन में मिटाइये गु० ॥१॥ निरुपम स्वरूप जिनका, अमी रस से है भरा, निर्मल गुणों को देस के, भानन्द सुख पाइये, 10॥२॥ साहिल सुजान जिनके, चरण की शरण गही, जागी मुमति सु घर से, परम पद को ध्याहये, गु० ॥३॥ दाता दयाल इन के, सिवा अग में कोन है, जिनकी कृपा से बोध, हिया मे जगाइये ॥ गु० ॥ ४ ॥ गुरु भक्ति आन प्रपन, हृदय बीच चुन्नीदास, सेवा में मन को दीजे, सु जस मुखसो गाइये। गु० ॥ ५ ॥ इति पदम् ॥ । गोट मझार पाडा चौताला। केसे कसे अक्सर मै गुरु रासी लाज हमारी, के० ॥ टेर।। गेको सरल भरोसा तेग, चढसूरि पटधारी || के० ॥१॥ तुम बिन और न कोई मेरे, या जग मै हितकारी, मेरा जीवन हाथ तुमारे, देखो आप विचारी | के० ॥२॥ प्रागे तो केह वेर हमारी, चिन्ता दूर निवारी, अपकी बेर भूल मत जावो, सरगुरु परउपगारी ।। क० ॥३॥ अबको श्राप लाज गूजर की, रखिये गुरु यश धागे मेरै उराल सरिद गुरु तेरा, वडा भरोसा भारी ।। के० ॥ ४ ॥ इति परम् ।। .
मगुर स्तवन। - आसावरी धमार। श्री गणधर गुरु कुशल सूरिन्द के, चरण कमल परवारी टे। समर चन्दन अनत कुमकुम, जल भर कचा झारी ॥ श्री० ॥१॥ देव ने आगे मगन दीपक, फूल धरो फुलवारी ॥श्री०॥२॥ ऐसी भाति रो विधि पूजा, पान के चित्त इकतारी, राज कहत मेरे परम गुग्य नी, नेर २ पलिहारी ॥ श्री० ॥ ३॥ इति पदम् ।। सारग करवा। पारी जाणे गुरु राय चरण की, वा० ॥टेर ।। श्री जिा दत्त पूरीश्वर सद्गुरु, सफल घड़ी सेवा चरन की ।। वा० ॥१॥ प्रथम ममल गुरु राय की सेवा, अशुभ फर्म सब हरन की। वा० ॥२॥ दाग्दि भजन गरि सब गजन, पग २ सानिध करन की ॥ ३ ॥ मोहे नहि परवाह अनेरी, शरण गही इन चरन की । वा० ॥४॥ श्री जिा हर्ष तुम चरण को दासा, आश पूरो सुख करन की ॥ वा० ॥ ५ ॥ इति पदम् ।। चाल लूभरकी। सद्गुर पूजन जावस्या, कुशल यूरिन्द गुण गाम्या हेमाय॥ टेर ॥ स० श्रीफल भेट चढावस्या, चरणारी पूज रचाम्या हे माय ।। स० ॥१॥ मारूदेश में शोभता, नगर बीकाणे राजे हे माय स०॥ गाम-गडाले दीपता, महियल महिमा छाजे हे माय ।। स०॥ २ ॥ समरया सकट चूरता, कुशल करन अव- तारी हे माग म० ॥ मुख दायक श्री सपने, खरतर गच्छ
गुरगुणरत्नावली
+
अधिकारी हे माय ।। स० ॥३॥ दृर देशतर थी पणा,
हिलमिल यात्री आवे हे माय स० लुल २ शीश नमावता, मत
मुजस मिल गावे हे माय ॥ स० ॥ ४॥ सम सिणगार मो-
हरू, ठम २ पाय ठमकावे हे माय, तन मन प्राण लोभावती,
गोरी मगल गाये हे माय । स० ॥ ५ ॥ विद्यध्या साजन मेलने,
अनमी पाय नमावे हे माय, मनरा मनोरथ पूरने, पर घल लख
मीलावे हे माय ॥ स०॥ ६ ॥ विखमी वेला वाट मै, समरयाँ
सानिध श्रावे हे माय स०॥ भूम्या भोजन मेलवे, तिसिया नीर
पिलावे हे माय ॥ स० ॥ ७ ॥ यात्री श्रावे नित नवा थान
आगल थिर थाट हे माय, सीरणिया नित सामठी, गावे गुण
गहगाट हे माय || स० ॥ - || कुशल सुरिन्द गुरु आगले,
भवि मिल भावना भावे हे माय, चदफते मुनि नित नमैं,
मानद सुख पाये हे माय । स० ॥ ॥ इति पदम् ।।
दादा चिरजीवो, सेवक जन सुखदाई दरराण सदा देवो ।।
टेर ॥ दादो दीनदयाल सदा दाता, दादो समरया आपे सुरत
शाता, दादो जग यधव जग गुरु आता !! दा० ॥१॥ दादो
परचा जग सगले पूरे, दादो सेवक ना सकट चरे, दादो दुरित
हरे सहुनी दूरे ॥ दा० ॥२॥ दादो अलगा थी यात्री श्रावै,
दादा देखी नै ते मुख पाव, म्हारा दादाजीनी बाड़ कोई नावै ।।
दा० ॥ ३ ॥ दादो राजनगर माहे छाजे, जिहा सुजम नगग
नित बाजे, दाढो योगाला सेहर घाजै ।।दा० ॥१॥ दादा पस
केमर सूकड़ पोली, हाथे लेइ सोवन कचोली, पूजो दादानी
मैं मिल २ टोनी ॥ दा० ॥ ५ ॥ दादो भारतिया धारति टाले,
पर
सद्गुर तिवा1 -- दादो सेवक जन नै प्रतिपाले, दादो जिन शासन नित उज- वाले । दा० ॥ ६॥ दादो महिमायत महाराजा, दादो राजे खरतरगद राजा, दादो समरथा सफल करै पाजा ॥दा ॥ ७ ॥ दादो कुराल रिन्द बहु गुण धागे, दादो परतिख मुर तरु अवतारी, जाऊ दादाजीनी है बलिहारी ॥ दा०॥ ८॥ दादो श्री जिन चद मुरिंद पाटे, दादो गानै गुणियन गह गाट, जसु थान साहै जग थिर थाटै । दा० ॥ ६ ॥ दादा महर निजर मुझ पर करिये, दादा प्रारति पीड़ा दुख हरिये, दादा जिम जग जय कमला परिये ॥दा० ॥१०॥दादा सेवक ने सानिध फरजो, दादा दुश्मन ने दूरे हरजो, जिनचद ना मन वक्ति फलजो ।। ११ ।। इति पदम् ।। गाजै जिन कुशल गडाले, सेवकना सकट टालै हो । गा० ॥ टेर ॥ परतिख गुरू परचा मरे, सेवकनी चिन्ता चूरै हो। गा० ॥ १॥ छतरी नितरी चचि छाजे, विचमैं थिर थूम विराजे हो । गा०॥ मुलरे यानी मिल श्रावै, दादोजी दीटा सुख पावै हो । गा० ॥ २ ॥ फेमर घस भरिय कचोली, माहे बाल मृग मद घोली हो ।। गा० ॥ पूजो पग नीर पखाली, गावो गुण गीत रसाली हो । गा० ॥ ३ ॥ दादोजी दु खिया सुख देवे निरधनिया धन नित देवै हो । गा० ॥ ह्य हाथी रथ पति बहुला, गुरुना मैं पामें कमला हो ॥ गा० ॥ ४ ॥ समजा मुत सुन्दरनारी, पामै परिकर मुख कारी हो ॥ गा० ॥ अलगा थी रोग गमाव, गुरु पूज्या वच्छित पावै हो । मा० ॥ ५ ॥ पावै गुरु तिसिया पाणी, तिण येला जलधर, आणी हो ।
मरवायी। সচ্ছলাম না गा० ॥ महगोचर जोर जनान गोटा हुं। गाने मान हो। गा० ॥ ६॥ बात ना जाना जा, गंज परसग्गर राग होगा० ॥ जसु जैत गिरी व मा, निरहागर मार विम्याता हो । गा० ॥ ७ ॥ मम्मन मनमय इक्यामी याती पुनम परवासी हो ! गा० । मह गय महित उक्लिास, अधिपे पर हेत लहान हा ॥ ८ ॥ उम या सरी प्रागद, निम गक्ति तीवर बद है। गा । इति पदम् ।। 'त मग हो मेवर ने माधि करा, पो माहजगीम हो नौलत से हो रामाजी सपन दी । टेर ॥ १ ॥ नातत दी गुर माहरा, भाग रिट ने हो था समरया गाट टने, याही दादाजी माँग टर हो । दो० ॥ २ ॥ जीनी चौसठ योगरी, घस रिया बापा वीर हो, सिंच माहै गर साधिया, पच ती पच पीर हो । दो० ॥ ३ ॥ पडियमरण गाटे भीगती, बत्तिय पति भाववाय हो, ये मंत्र राखी तिसरा, तठी परदे जाय हा ॥ दो० ॥ ४॥ उच्छव करता उच्च मै, मुगो मुगा रो पूत हो, जाप श्री जीवाडियो, संघ माहै राग्यो टाँद सूत हो ॥ दो० ॥५॥ बडनगर रे नाम में, देहरे धरी मृत गाय हो, पा प्रवेश विद्या चले, पिशु न लगायो दादै पाय हो । दो० ॥ ६ ॥ विक्रमपुर व्यापी मरी, टर रियो सहु दु ख हो परिवार पिण पोत रियो, सानै दियो दादै सुस हो ॥७॥ अपड हाथे अक्षरे, थे प्रगट्या तत संघ"हो, युग प्रधान पद त जयो, आखे अम्बरा देव हो । दो० ॥ ८॥ थाभो बज रिदारन, पोथी परगट कीध , सदार सरो। - . हो, विद्या सोवन अक्षरे, उज्जैणी माह तीध हो । दो० ॥२॥ इम विस्ट घणा के ताहरा, फरता नावै पार हो, भाग्य मयोगे दादो भेटियो, प्रडमडिया आधार हो । दो० ॥ १० ॥ ह धू सेवक ताहरो, थे पापो धन बद्ध हो, कनक कीरति सुपसाउले, लाग उदय सुरा सिद्ध हो । दो० ॥ ११ ॥ इति पदम् ।। तो अरग करू कर जोडनें जी म्हारी यरज सुणो गुरगय सद्गुरु सुनिना जोयजो सावा, शिल्द घणा छ राजराजी काई, सूरि सरल शिर तान || स० ॥१॥ यारे रावल गणा राजवी जी काई, थारा पूनम पूजे पाय ।स०॥ केसर अगर नै कुमकुमा जी काई, मृग मद म्ही महकाय । स०९० ॥२॥ यारे घुडलारा पागल पृमराजी काई, दुलत चमर राज दाल ।। स० ॥ कारण सेवै कामनीजी कार्ड, निरस कर जी निहाल ॥ स० सु० ॥ ३ ॥ यारी ठायी ठोडै यापनाजी काई उ'यापुर आर ॥ स० ॥ थारी महिमा भली गुरू मेडतेजी कार्ड, सालूडे वाली सागार ॥ स० सु० ॥ ४ ॥ थारी जोत धणी घणु झिगमिगेजी काई, बधती गढ़ बीकाण ॥सा श्राम्या पूरण आरजोनी थे तो, देरावर दिवान ।। स० मु० ॥ ५ ॥ म्हारी बीनतडी भल मानज्याजी काई, दादाजी दीनदयाल ॥ स० । कुशल सदा कविराजनै जी काई, पाटोधर प्रतिपाल || स० मु० ॥ ६ ॥ इति पदम् ।। सागानर विराजे, गुरु परतिरा निहा राजै रे, म्हारा सद्गुरुजी मी गलिहारी ॥टेर । मन बच्छित परो म्हाग, म्हेतो चरस ४४ गुरगुणरत्नापली । पखाला थारा रे || म्हा॥१॥ मोपन भरिय कचोली माहे पनि मृग मद घोली रे ॥ म्हा० ॥ पूजू सद्गुरू पाया पूज्या सय पाए पुलाया रे ।। म्हा० २ ॥ पूनम में सोमवारा, पारे यात्री बार अपारा रे ।। म्हा० ॥ शुद्ध मा पूजा कोज, दुस दोहग दर हीजै रे ॥ म्हा० ॥ ३ ॥ इण कलयुग माहे थारी, कीरति चिहु दिशि माहे मारी रे || म्हा० ॥ तुम्ह मम अपर न फोई, दीठो मैं परतिग्व जाई रे ।। म्हा० ॥ ४ ॥ साल्हेवाली सागानेर, जिहा राज करे नित मेरे ।। म्हा० ॥ श्री सघ मिल तिहा आवै, जिहा लूणिया गोठ रचावरे ॥ म्हा० ॥५॥ ज्ञान सार गुरु राजा, ज्यारा बाजे सदाई नावाजा रे || म्हा० ॥ क्षमानदन गुण गावे, कर जोड़ी शीरा नमाव रे म्हा० ॥ ६ ॥ इति पदम् ॥ श्रायो २ रे समरता दादोजी श्रायो । टेर || सफ्ट देय सेपका सद्गुरु, देरावरतें धायो जी ॥ स० ॥१॥ वरमे मेह नै रात अधेरी, वायु पिण सबलो वायो, पचनदी हम बैठे बेडी, दरिये चित्त दरायोजी ।। स० ॥ २ ॥ उच्च मणी पोहचावण, श्रागे, खरतर सघ सवायो, समय मुन्दर है कुशल कुशल गुरु, परमानन्द सुस पायो जी ॥ स० ॥ ३ ॥ इति पदम् ।। विनमै ऋद्धि समृद्धि मिनी शुभ योग पुण्य दशा सफ्ली, जिन कुशल सूरि गुरु अतुल वली, मन बच्चित श्राप दादो ग्ग रली ॥ १॥ मगल लील समै पिपुला, नवनवा महोच्छव राजेला, असायें गुरु चढनी कला, मुफ्तीणी पुनरनी महिला ॥२॥ सर ही दिन भाय सरता मयास म्परतणा कुरला, मशगस्तान। जल जय गय न पायक यदुता कालोल र मरि गमला ॥ ३ ॥ यो चमर निगान गुरे, नर वे दरबार सडा पहुंर, जय २ कर जादी उर, सानिद्ध गुर सर कान मेरे ॥ ४ ॥ मरा भोजन पान सपा, दुय रोग दुकाल 7 हाय का अविचल उलट म्यग गुगा गुरु परम रष्टि प्रमर सदा ॥५॥ धम २ मद्दल नाद उमे, यासे नाटक रंग ग्मे, प्रगटो पुरय प्रताप हमें, श्राला अग्यिणत आय नगे ॥ ॥ तन मुरुप मा सुग चीर तणे, पहिरे वेना उर होयग्ण, प्यायो कुशल गुरु एर मन, नृभक सुर मदिर माय धन ॥ ७ ॥ तन मिान गयो पाये र ज्याम घटा मेह वरमान निसिया तोय तुगत पावै, गता त्रिजग मुजन गाने ॥ ८॥ नहरवा जल गल्लोल करे मरण भामायर मझडर, पटना नाहन जे ममेर, ने श्रापर निश्चय थी उ॥ ॥ गट सड खग प्रदार वा सो मिली जिम मम सेर मेह, उराल २ गुरु नाम कह ने लेम कुरान रण गझ लरे ॥ १० ॥ उभ राकान परचा परे, श्री नागपुरे सरट वृर, मगतोर यदि नरे, राउर भर टाले दर ॥ १२ ॥ वीरमपुर गात गुभर, गभायनपुर विम नगरे, जिन नद सरि पाटे पर, जसुझारति गही मडल पमर ॥ १२ ॥ परन पश्चिम दानण सागे, उचर गुरु दीए सोभागे, दरदिशि जन सेगा माग, श्री परतरगच्छ नी महिमा जाग ॥ १३ ।। पुरपहन पान ठामे, गाज पृजे ने हित काम, ने चकमारा पदवी पाम ॥ १६ ॥ श्री जिन कुशल मार शाग्ने, नदो मार उन न मुखिया रावे, समस्या गुरू दरशन दावे, श्री माधु फोति पाठरु भाले ॥ ॥ इति पनम् ॥ गल नाराम - गुरुगुणरलागली दूर हो ॥ पुनः आयो सह श्री सघ पास धेरै, गुरु मौन गया कहो म मरे, दरशन पहिलो सद्गुर दाखो, निज सेवक जाण महर रासो ॥ १॥ य विखमी मिरिया धाय वणी केवी करिये तुझ घरज घणी, हिव अलगा हो तो येगा आयो, हिव ढील धड़ी भर मकगवी ॥ २ ॥ तु सदगुरु सरतम्गध माचो, कोई मन जाणे तुमने काचा, पण सकट में पालम मरगे, दादा दुश्मन ने कोह चक पड़ी सद्गुर हम मु, तो जिम सो तिण पर सम सु, पिण हिलगा हट ये मत ताणो, निश्चय पोता नो पर जाणो ॥ ४ ॥ माया सा की सत्र शठालगे, पाया किम जाना इणे पगे, zण पर करिये गुर प्रग्ज इमी, हिव सगला मेलो रो सुशी ॥ ५ ॥ जिा कुशल सुरीमर जग चारी अपणायन कर देगा श्रामो, अगला विस्त ये उजवालो, पर धन्न निज छोरा प्रतिपालो, ॥ ६ ॥ गुण गाग गढाले ये गायो, सुणता सद्गुर वेगो पायो राजी हुय सगला रगरली, लिन चदनी आन्या सफल फली ॥ ७॥ इति परम् ॥ कामितकामगवी, मुगुरु मेरो कामि० पटेगा मन शुद्ध राह अकबर दीनी, युग प्रधान पदवी । सु०मा० १॥ सफल निशकर मडल सम सूरि, दापत वदन छवी ॥ सु० मा० ॥२॥ महि मडल मा, महिमा नापी, दिन प्रति नयी नयी । मु० मा० ॥ ३ ॥ जिन माणस्य सरि पाट उदय गिरि, श्रीजिन चन्द्र रची ॥ ९० का० ॥ ४ ॥ पेरात ही हरखित मयो मन मेगे, रल निधान कनी । सु० का०॥ ॥ इति पदम् ।। +
मद्गुर स्तवन ।
चाल पलिलारी की।
पाटोधर गुरु गछपनि सद्गुरुजी हो उशल मूरिट गुरु
राज, वाला थो, नायक श्री जिन धर्म ना ॥स०॥ तायक सुर
शिर ताज, बाला हो॥१॥ भरत वल भगवन्त हो । स० ॥
सरणाई साधार, वाला हो, दरशण बहिलो नीजिये। स० ॥
करुणानिधि करतार, बाला डो॥२॥ चीनतडी अवधारिये ।।
रा०॥ पृरो बधित काज, बाला छो सेना पर मुनिजर करो ॥
स०॥ महर करो महाराज, पाला छो ॥ ३ ॥ जरतग्गवना
साहिबा ॥ स० ॥ सेवा जा प्रतिपाल बाला चो, परचा पूगे
परगटा ॥ स० ॥ वरजस जगत निस्यात, वाला छो, दुरगा जा
दृरे करो ॥ स० ॥ सन्तरगद हितकार बाला छो ।। ॥ उदय
परो जिा धर्म नो । म० ॥ दण पचम मलिकाल बा० ।।
एक भरोसो आपरो ॥ स० ॥ चरण शरण थाधार पा०
॥ ५ ॥ महिमा मोटी राजरी । स० ॥ महियल में मुसकार
मा० ॥ दीन दयाल दया करी ।। स० ॥ दीजिये बचित दान
मा० ॥ ६ ॥ जिन मौभाग्य मूरिंट ॥ स० ॥ पर पगार
प्रधान वा० ॥ ६ ॥ इति पदम् ।।
है
राग।
-
कुशल गुरु की निरसण दो असवारी ॥ टेर । फेसर
चदा अवर कुमकुमा, मृगमट महक अपारी, अवर गुलाब केतकी
चपो, पल रही गुलक्यारी ।। कु० ॥ १ ॥ देव भवा को इन्द्र
भवन है, झिगमिग जोति विचारी, बछित फल दायक वरदाई
गुग्गुणरताप मुर पारी मुम्बयारी ॥ १० ॥ २ ॥ गला गला नृपत 73 मचत हे, त्य गय गीड़ हजारी, रावत गर सेट सेापनि, श्रावन है सवारी ॥ ३० ॥ ३ ॥ भरी शग्य गृग धन वाजत, गुर नाई मुर मारी गावत रे कंद मधुर मधुर धुनि, मानव गया मझारी ।। T० ॥ ४॥ गनायकत्री चा पटोधर, खरतरगद यस्तारी पदम सूरि न्यु अरज करत है गुगल २ सुसारी ।। १०॥ ॥ इति पदम् ।। रागममानी। दरशरण गेदुर गान टेर।। सारे मन समेर सदगुरु क, तिणन तुरत निवाजे ॥ ना० ॥१॥ ताल नवलगढ था। मोहर गाव भक्ति शति छान ॥ तादा० ॥ २॥ यात्रा करण श्री सप उमायो, पच पर री गाजे॥ दादा द० ॥३॥ठोर ठोड था मदगुरु का महिमा गधिर विराने ॥ दादा द० ॥ ४ ॥ कल्याण विनय ह दशल मूरिद गुरु, रारतरगच पिसी गदा द० ॥ ॥ इति पदम् ।। राग चलत भैरती। यि गणनायर तय वग्गायक श्री गुरुदेव गणेशा ॥ जय० र ॥ तुम कृ निशदिन ध्यावत मुर नर, शोभा परत सुरेश, चद्र कान्ति गुण निरमा शोभित, यश गगाल जसा ॥ नय० ॥ नाम प्रतापत प्रसिद्ध नरनिद्ध, हाजर होत हमेशा, दाटा माहिब यदित दाता, फ्लु मै मुरतरु जसा ॥ ज० ॥२॥ पूजन चाण पप पर हान्वित, नायर मकल नरेगा, श्री निा गगुरु ना। दुशल सरि गुम मेपन, पावत फा गजेशा ॥ १० ॥ ३ ॥ इति पदम् ॥ राग बिहाग। गोकु शरण तिहाग बुगा गुरु गो श० ॥टेर ॥ सुपन ही सोबत निम दिन लागत चरण कयू अाधारा कुरान गुरु मोफु ॥०॥ वाट पाट गिध्यान सदाई, शाप विधनसभाग, दह दिसि टी महिगा जाकी, पतिग्द सकल ससारा यु मो० ॥धाहीना व धाके दाता प्रापे बहु परिवारा, सदगुरु गुण गाये मुख दायर, श्री जिन हर्ष श्रपाग यु० मो० ॥ ३ ।। इति पदम् ।। गग कैरयो। सेयो सुगुरु सुरपदायरे मे० ॥टे ॥ शी जिा युगल सूरीसम्माहिय, ननधि याचिन दायरे ॥मे० ॥१॥ प्राधि व्याप पार गयी दुश्मन नाम लिया गग जायरे । से० ॥२॥ चदा अतत सुगयुग, पूजो चित्त हित लायरे मे०॥३॥ घाट र विवमी गिरिया, समरया होत सहायरे ॥से० ॥६॥ अभय महा मुग्यदाई सतगुरु, पग २ पचित थायरे ॥ से० ५ ॥ नि पदम् ।। नगाये, राग कररया। गुर पढन भाये विवुध पती ॥ टेर। मुरगण गाये गए गर्व गती ।। गु० ॥१॥ युग प्रयाग "म जिनदत्त मरि यती ॥ गु० ॥२॥ पराई गुरु नग मरगुणानापा। , वाचा जग जाचा माचा माहिश्वत गनी । गु० ॥ ३ ॥ विपत दिडारण सपत कारण, विरुद धारण वडवसनी । गु० ॥४॥ सदगुरु दम्म सुधारस, परसत, पाप सताप रहै न रती ॥ गु० ॥५॥ चद चसार मोरधन गरजत, चित चाहत नित चरगनती ॥ गु० ॥ ६ ॥ श्रीजिन हर्ष सूरिंद गुरु सेवम, सेयक मुगुण करे विनती ।। गु०॥७॥ इति पदम् ॥ निरमत सुर भजले प्रभु प्यारा । राग! उगल सूरिंद गुरुभ्यान धरो हिये, ज्यू होवै पानद अधिक अपारा ।कु०॥ निरमल नीर पखाली नित तनु पहिरी क्षारोक वस्त्र सुप्याग । कु० ॥ २ ॥ कचन कलरा भरी पचामृत, चरण पग्वाले शुद्ध प्रभाग कु० ॥ केमर पानी भरीय चोली माहे मृगमद घसघन साग ॥ ० ॥२॥ धूप दीप बलि अक्षत नवद्य, पल पुप्पादिक यह विधसाग, अपरद्रय सर पृनन कर भाचे लीजै चिच उदाग ॥ कु० ॥३॥ गुरु चरणामृत गगेचर चित, दुष्टाट पण जाय विकारा सदगुर नाम जिये सर नासे शाधि न्याधि दुप दोष प्रचारा || ३० ॥ ४॥पर २ मॅगल नानिध मद्ध सिद्ध, हाजर होय रमेश अपारा, श्रीजिन सौभाग्य मूरि मुगुरुपद, सेनत होय सरे सुग्वकाग | कु० ॥ ५ ॥ इति पदम् ॥ जिादत सुगुर बलिहारी मुखकारी जिलाटेर सघ सक्ल नो मकर यागे, पच नती जिन नारी ॥ मु० ॥१॥विद्या पोथी ग 1 परगट यारी, थाना यग | मु॥॥ मृता गर जिन जिन गदित न परिय उठागे। मु०॥3॥ नाग सार गुरु नारा पामल पर पारी गा पार हजाग।। मु० (पाल) दिलमे द्विमाद्धि मिली। मन यदित पूरा जगनायो, जिमुर्गभर गुर यावा, वापर नमु नाम थपी विघंटे भरणातीलधि घरे प्रगट ॥ १ ॥ तुम्ह सुनम तणो पार न पाऊ, पिप भक्ति भी तुम ने प्याऊ, । परगोत्र पार माता, युधुनगरी यादग ताता ॥ २ ॥ सरन रजार यत्तीमे, जनम्या शुभ महुरत शुभ दिवसे, दीना हमारे इकनाले, गुरपद पाया अाधन टाले ॥ ३ ॥ गुणस्तर पर वैगाम वदी, मिट धाप्या गन्दाती, मरिर धमे पाश जागी, विधायन निग पामे याग्गी ॥४॥जोगणिया शावक रूप क्यिो, उज्जयणी में उपयोग यिो, बमरा बानोटा तामु पल, गुर पीनी नताभिए मा चले ॥ ५ ॥ वटागो नामग गतक गऊ, जिा मनिर हारे जाएमा विद्यापल भाषण पाय नम्या, गुम गरिर धरी गपगप गम्गा ॥ ६॥ रिहा गुगल तणे मुन जीव दिया, साभेला माहे मग कियो, बीजली पात्र नले रानी, ये विन्द राणा जग मायी ॥ ७ ॥ गिरगार मटण या देवी, हग भने अबड ममी, हुय परगट करतल वर्ण निस्याः यानता युग परधान लख्या ॥ ८॥ मरदग्यि मपण पार करचो, समरना गावी प गयो, 'पल प्रागन मोर नागर केग, , ,
गुरागरत्नापली।
भय भगा जाम मुगुरु तेरा ॥३॥ तुझ सुनिजर रानु पाय नमै,
मत हीमा बिवारे पुत्र रमे, परतरगर नायक गुरु राया, यह
पुरय थको रगण पाया ॥ १० ॥ सवत बोरसे इनारे, मुर
पुरन में निहु जग सारे, इज्ञारस सुदि आभाढ तणी, अजमेरे
पटना म्वर्ग भणी ॥ ११ ॥ थिर थापना चूमे निन गर्ने, गुरु
मजस तणा बाजिय वाजे, पडवडा नरपति तुम भ्यापै, दरशण
करना जानी प्रावै ॥ १२ ॥ समस्या सदगुरु मुराकारी, जिनदत्त
सूरीसर बलिहारी, चितामाणे रयण समो देस, दया गरु चाहे
सुगुर रोवा ॥ इति पदम् ॥
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ढाल विछियासी।
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अरे ला ता शाजिन उरान मूर्गमर, सीने मग शुद्ध
भानो लाता, परतिम परचा पूरने, इन कलियुग में गुरुरायो
लाला श्री जि० ॥ १॥ परे लाला फेसर चदा घसरी
पूतो मेतो पासाररे लाला, पवित्र बन पहरी करी, नव नेज
को उदाररे लाला, श्री जि. ॥ २॥ श्रग लाला अम भलो
देराउरे, शोभा रहु जेमलमेरे लाला, मुलनान मरोट मैं,
औसारे लाला ॥श्री जि०३॥ गरे लाला योधपुर नै मेडन
तारण नै नागोरे लाला, सोझन ने पालीयुरे, नालागे श्री साचारो
नाला ॥धी जि०॥ अरे लाला गननगर नै यूने, रामायन
पटण माहिर लाला, मेधुजे मोरे सग, नवे नगर उचाहरे लाला,
सोनि० ।। । ॥ अरे लाला पुर पुर में दम तोपतो, दादी जी
पनिम्ब दार लाला हक भागा पुरव निए उगमह सारे
गुरु सोह
सदगुर स्तथा। ३३ सेवरे लाला ॥ श्री जि० ॥६॥ अरे लाला नामे सकट सविटले, सिसिया ने पाये नीररे लाला, रण में जे समरण करे, सदगुरु होये तसु भीररे लाला ॥ श्री जि० ७॥ अरे लाला इम महिमा जग जेनी, जाणे सर को नर नाररे लाला, सुख सपत ये सेवका, बहु पुन क्लत्र परिवाररे लाला ॥ श्री जि० ८ ॥ अरे लाला समस्या दरशण देइज्यो, सेवक नी करज्यो साररे लाला, राज सागर कर जोड़ ने, वीनती करे वारवाररे लाला ॥श्री जि०६॥ इति पदम् ।। (मोरा भोला गुरु पाणी मंत्र दे तीन चलू) राग। दादा कुशल सूरिंद, तुम दरशणतै परमानद ॥ दादा० टेर।। नित तेरे प्रभुपर अरविद, वदे रावल राणा वृद ॥दादा०॥१॥ तुम दरशण से मुझ मनजोर, हरस लहे जिम च द चकोर, दादा० ॥ विरुदनिमुणी जिम जलधर शोर, मुझ मन नाचत जिम वन मोर ॥ दादा० ॥२॥ तगण इरती जलधि मझार, ते तारी निज गुण सभार ॥ दादा० ॥ बधित पूरण अतहि काल में गुरु सुरमाण अवतार ॥ दादा० ॥ ३ ॥ तो सम सुर नहीं दीनदयाल, तुम हो शरणागत प्रतिपाल ॥ दादा०॥ तुम समरण ते लहे विशाल, सेवक जन नित भगल माल ।। दादा० ॥ ४॥ अजीमगजपुर में सुखदाय, थूम निराजे सह मन भाय || दादा० श्री जिन हर्ष सुरिट मुपसाय, दरराण लयो शिवचद मुहाय ॥ दादा० ॥ ५ ॥ इति पदम् ।। राग सारग। नित नमिये कुगल सरि दजी नि० ॥ टेर ॥ परचा साचा उदार, ३४ गुरुगुणरत्नावली । नवला पूरे, ये देवा सिर इदजी ॥ नित०॥ १ ॥ अष्ट महा- भय विधन निवार, चिता चूरे मुणिदजी ॥ नि० ॥ मुदर सूरत वदन सुहाचे, दीठा पृनमचन्दजी ॥ नित० ॥२॥ इति पदम् ।। राग सारग। नित कुशल सूरीसर ध्याइये । टेर ॥ सदगुरु सेरा मन शुद्ध करके, मा यचित फल पाइये ॥ नित० ॥ १॥ चिता सकट कट पिटारण, श्री गुर नाम कहाइये । नित० ॥ दीन दयारा दया कर भोपर, दुस सब दूर गमाइये ॥ नि० ॥२॥ मकसूदाबाद मे थुभ थप्यो है, शुभ वेला सुखदाइये ॥ नि० ॥ रासी पूनम सद्गुरु भेट्या, हरग्ब २ गुण गाइये ॥ नित० ॥ ३ ॥ प्रहमम सद्गुरु ध्यान धरीजे, चरण कमल चित लाइये नि० ॥ आलमकू निज सेवक जागी, पानद अधिक वधाइये ।। ४ ॥ इति पदम् ॥ - नित० राग नन। दीपे बड़ली में गुरु थारो देहरो दी०॥ टेर । जिहा जिन दत्त कुशल गुरु मोहत, सरतरगछ को सेहरो ॥ दीपे० ॥१॥ रमणी रग वधायो सुगुरु को, मस्तक धरणी को वेवरो ॥ दी० पाटण सघ सहित जिन चद सूरि, जान करत बाभ्यो नेहरो दीपे० ॥ २ ॥ जाक् सानिधारी सद्गुरु, क्वण आहे याको छेहरो ॥ दीपे० ॥ महिमराज ऊपर सुनिजर कर, ऋठो सुधाग्स मेहगे । दीपे० ॥ ४ ॥ इति परम् ॥
सदगुरु स्तरन। ३५ देशी करहेरी। . , देरावर थारो देहरो हो साहित्य, गावीकाणे राज, नवला ये नागोर में हो साहिब, मोज समद जिहाज, थापर वारी हो सद्- गुरजी माहिब मुजरो मानोजी राज ॥१॥टेर॥ महिमा घणी थारी मेडते हो माहिब, माने जैसलमेर, तप थारा सूरज तपे हो साहिब, छन धरायो सागानेर ॥ थापर वारी० ॥२॥ चरणे चढाऊ केतकी हो साहिब, सूधो जी अगर गुलान, भमर लपेटी मालती हो साहिब, जाई जुई रे जबान ॥ थापर यारी० ॥३॥ दीवलो करू कपूर रोजी साहिब, महके मैण मेंताब, धूपउ खेचू करू पारती हो साहिब, गगाजल रो श्राव थापर वारी० ॥४॥ केसर भरू कटोरड़ी हो साहिब, पूनू जी थाहरा पाय, नव नेवजा परनेतरूहो साहिब, मिश्री दूध मिलाय ॥ थापर वारी ॥५॥ चिडलो पान पचासरो हो साहिब, नायक नागरबेल, माहे सुगधी, एलची हो साहिब, मुखड़े परिमल मेल ॥ थापर धारी० ॥६॥ अमर करो नैण अमी भरो हो साहिब, श्री जिन कुशल सूरिन्द, राज रमण राँझा करो हो साहिब, अरज करे राजिंद ॥ थापर बारी० ॥६॥ इति पदम् ।। राग केदारों कएरवो। गणधर सेवो गुरु कुशल सूरी ॥ ग० ॥टेर ॥ अमल विमल शशि मुख पनि सोहे, निरम्व २ नैना हरख भरी ॥ गण० ॥१॥ नयन कमल दल अधिक विराजे, भल हल भाण ज्यू भाल घरी ॥ ग० ॥२॥ नाश दीप शिखा ज्यू, सुरगी, लाल गुरुगुणरत्नावती। प्रवाली अथर परी ॥ ग० ॥ ३ ॥ गुरु के विरुद को पार न पावे, जो ध्यावे वापी धन्य घरी ॥ ग०॥ ४ श्री जिन र्ष लहे मुग सपत, सत्य रत्न दुम्ब दूर हरी ॥ गए० ॥ ५ ॥ . इति पदम् ॥ राग कहरवा तिहारे दरश की चाह रही, मोरी भरत मुणो गुस्रायजी ति ।।टेर । तिहार दरश तै पानद उपजे, रोम २ विकसाय जी ।। ति० ॥१॥ और देव सुपने नहीं धारू, तुम दिन चित अकुलायसी ॥ ति० ॥ २ ॥ कुशल क्ला जग में बरताद, लातें कुशल कहायजी ॥ ति० ॥३॥ परतिम्ब दररान दीजे मुझको, रिद्ध सिद्ध नवनिद्ध चायनी ॥ ति० ॥ ४ ॥ रग विनय गुरु के गुण गाये, चरण मल चित लायनी ॥ ति० ॥ ५ ॥ इति पदम् ॥ - पूजो भजो रे भाई, गुरु महिमा होत सवाई ॥ पूजो भ० ॥ टेर । मृग मद फेशर चन्दन अरचो, सुदर पुप्प चढाई ।। पृ० ॥१॥ सन मन परा पर ध्यान हिये घर, जिनदच जप वर- दाई॥ पू० ॥२॥ मविक जीव मिल गुरु गुण गारे, सद्गुरु होत सहाई ॥ ३० ॥ ३ ॥ या गुरु की मैं कालग वरण कीरत धीर पडाई ॥ ४॥ श्री जिन सौभाग्य सूरि मुगुरु मेरे, निशदिन हर्ष बधाई ।। पृमो भ० ॥ ५ ॥ इति पदम् ।।
सद्गुरु स्तवन। जग में राग कररयो। अरज सुलो गुरु एक हमारी ॥ १० ॥ टेर ॥ तुम दरशन विन बहु भटक्यो, आयो अब शरणागत थारी ॥शा० ॥१॥ पतित उधारण विस्द तुमारो, राखो सद्गुरु मोहि निरधारी ।। श्र० ॥२॥ अहनिश ध्यान तुमारो ध्याऊ, राखूचित हित में इकतारी ।। १० ॥ ३ ॥ परचा पण कलियुग में गुरु, शोभा बहु विस्तारी ॥ १० ॥ ४ ॥ हर्ष विशाल शिप्य इम माखे, चरण कमल की भै जाऊ बलिहारी ॥ १० ॥ ५ ॥ इति पदम् ।। राग कहरवा। आज हमारे आन द गयो, में भेट्या श्री गुरुरायजी॥. ॥टेर ॥ खरतर गच्छपति दीपतो रै, जिनदत्त सूरिद कहायजी ॥ प्रा० १ ॥ यानी आने बहु देसगारे, पूज रचे बटु भायजी ॥ भा०२॥ निरमल गगाजल भरीरे, चरण प्रक्षाल करायजी ॥आ० ३॥ सर चदन घस करीरे, मृगमद माहि मिलायजी ॥ श्रा० ४ ॥ धूप दीप नैवेद्यधीरे, पच रंग पुष्प चढायजी ॥ श्रा० ५ ॥ तीन प्रदक्षिणा देइनेरे, लुल २ शीश नमायजी ॥ श्रा० ६ ॥ इत्यादिक बहु भेदसूरै भक्ति, करो चितलायनी ॥ श्रा० ७॥ निश्चय सुगुरु ने भजेरे, कमणा नरहेकायनी ॥ आ० ८॥ श्राधि व्याधि दोपी पुन दुश्मन, गुरु नामैं मिट जायजी ॥ श्रा०६॥ सेवक क सकट पड्यारै, समस्या होत सहायनी ॥ श्रा० १० ॥ सवत् उगणतिड़ोत्तरेरे, भाद्रव मास मुहायजी ।। श्रा० ११ ॥ शुक्ल पक्ष पूनम दिनरे, दरशण .
गुरगुणरत्नायी। , - पायो मै प्रायजी ॥ था० १२ ॥ हर्ष विशाल शिष्य ऊमहीरे, प्रीति मुदर गुणगायजी ॥ श्रा० १३ ॥ इति पदम् ।। राग सोरठ। सदगुरनी शोमा सवाई णासायाज आनद वधाई पटेरा। श्रीजिन कुशल सूरीसर साहिब, वडवसती वरदाई एस० ॥ चद पटोधर चामो चिहु दिसि, दुनिया में फिरत दुहाई ॥स. २ ॥ कनक कमोनी केशर घोली, मृगमर माहि मिलाई ए ॥ स० ३ ॥ दीप धूप थक्षत फल नैवद्य, बहुविध पूज वनाई ॥ स० ४ ॥ बाट घाट बाल विखमी बेला, समरया होत सहाई ए ॥ स० ५ ॥ श्रीजिन हर्ष सूरिद गुरु गछपति, सुगुण सेवक सुखदाई ए ॥ १०६ ॥ इति पदम् ।। राग कालिंगहा। मैं बलिहारी गुरु चरना । मै० ॥ टेर ॥ श्रीजिन पुशल मरिंद साहिब के, चरण कमल का सग्ना । मे०॥१॥ केसर चदन चरचू चरने, फल चढ़ाऊ शुभ वरना । मैं० | भान विशुरे- गुरुगुरा गायो, ध्यान हिये में धरना ॥ मै० २ ॥ सुरतरु सम गुरु बचित दायफ, मन से नाहि विसरना । मैं ॥ चरण कमल को कर आराधन, कलियुग से निस्तरना। मै० ॥ ३॥ सेवन थरज सुणो सद्गुरु जी, बक्ति पूरन करना ॥ में। दरशण टीजै ढील न कीजै, होत नहीं अव जरना । मै० ॥ ४ ॥ गच्छ- उदो करदो गुण सपद, पापद दूरे हरनामैं। जिन सौभाग्य सूरी सर,साहिव, विजय सदा सुस करना #०५॥ इति पदम् ।। ,
-
मद्गुरु न्तयन ।
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राग काविगहा।
चीनउड़ी नुण लीनिये सद्गुरु जी गोरी ।। पी० ॥ टेर।।
श्रीजिनपद मरिंद पटवारी, गोपर मुनिनर कीनिये स०वी०१॥
गरतरगल के प्रभु प्रतिमानक, दरराण बहिलो दीजिये ।। स०
पी० ॥ गच्च उदो पर साहिब मेरा, आपद दूर हरीजिये
॥ स० वी० ॥२॥ मगट प्रतीत परम सदगुरु पी, और यास
परीजिये । स० ची० ॥ पाय रो पलियाल जगत में, किरण
विध धीर धरीजिये । स० वी०॥३॥ प्रपल ममाद नहीं गुण
सग्रह, जानन ल न पतीजिये । स० वी० ॥ नाय पुराणी
नहया गहरी, बेड़ा पार करीनिये ।। स०वी०॥ ४॥ धर्म नाव
नियमिक जग में, गुरु पिन कौन पहीजिये ॥स० वी० ॥ जिन
सौभाग्य सरिंद के साहिब, जग गुरु विजय करीजिये ॥ स०
वी० ५ ।। इति पदम् ॥
राग सोरठ।
सत्गुरु जी महारे मन भाया ।स०॥ टेर ॥ जप से दृष्टि
पड़ी गुरु चरने, देसत नया लुभाया ॥स०॥ १॥ थे म्हरा म्हे
भाखर थारा, एही सयोग बनाया, सेवक आनंद कुशल सरिंद
कू,रिपनने निद्ध पाया ॥ स० ॥ २ ॥ इति पदम् ।।
राग सोरट।
मगुरु मेरे तूही प्यारा हे ॥ स० ॥ टेर ।। मात पिता
सन ही म्वास्थ के, तेरा ये सहारा है। स० ॥ १॥ मेंगे मन
गुरगुणरावली तुम्ह ही भू श्रटमयो, सो क्यू होवत न्यारा है । स० ॥२॥ दुश्मन दाटे घाट घाटे, निधन हरन मुग्वारा है ।। स० ||३|| (पद अनेक या मै येता, महिमा अधिक अपारा है । म० ॥ ४ ॥ तातें जश शोमा मुग्य दाज, पालम दास तिहारा है ।। स०॥ ॥ इति पदम् ।। - राग सोरठ। नित चरणा मे चित लीनो है। निटे ठत ऊठत नाम तुम्हारो, लेता मुझ मन भी है ॥ नि० ॥१॥ मात पिता सद्गुरु तू माहरे, शरण सदा तु हीनो है ।। स. ॥२॥ चारित्र सुदरताम तुम्हारो, तुझ गुण गावा लीनो है ।। सरगुरु ने पाड़ी बाह, नहीं तर वजात ॥ स० ॥ टेर।। भवसागर के बीच परे रे, काम महागन दाह, गच्छ मला गल जहा लगी रे, दुख जल पर श्रगाह । न० स० ॥ १॥ देर असुर नर वर वढे रे जामें बहत निहार, तन मन मेरो थर हरे रे, पारन को श्राधार ॥ न० स० ॥ २ ॥ निर्यामक गिले रे,तारस भव्य जिहान, धम पोत के विच धेरे रे कहत क्षमा फ्ल्याण || T० स०॥ ३ ॥ इति पदम् ।। तुम सूरत मुम्बकारी में यागे जाऊ ॥ तु०॥ थी जिन वस्त सूरीमर साहिन ॥ तु० ॥ टेर ।। अनियुग में गुरु नाम सद्गुर स्तवन। . तुमारो है परचो अति भारी, मै, वारी जाऊ ॥ ५० ॥१॥ पूनम २ ने सोमवारे,आय मिले नर नारी, मैं बारी० प्रा० श्री. फेसर चन्दन पुष्पमाल सू , पूजा रचे अति भारी ।। मैं वारी० पू० श्री० ॥ २ ॥ जो सद्गुरुनो ध्यान धरे मन, नित २ बात करारी मै० नि० श्री० श्री निनचन्द अधिक उदय सू, यान करी जय कारी || मै या० या० ॥ ३ ॥ इति पदम् ॥ राग काफी। मुणियो अरज हमारी मुगुरुजी ॥सु०॥ टेर ॥ दीनदयाल कृपानिध साहिब, पासा एक तुमारी जी, बधिन दायक बधित दीजे, इक तुमरी इक तारी जी ॥ सुणि॥ १ ॥ चद पटोधर कुशल सूरिंदजी, जस जग में विस्तारी जी, भक्त वत्सल भगवत प्रभू को, चरन शरन सुसकारी जी ॥ मुणि० ॥२॥ सुनिजर पर प्रभु साहिब मेरे, दरगण बहिलो दीजे जी, सद्गुरु अपनो सेवक आणी, चित्त पूरण कोजे, जी ।। सुणि०॥ ३ ॥ परम प्रभु मेरो परउपगारी, शरणागत साधारी जी, वालक है मोहि वछित दीजे, वधती बान वधारी जी ॥ सुणि० ॥ ४॥ इति पदम् ॥ राग प्रभाती। कुशल करण मेरे परम गुरु की, बेर २ बलिहारी ।। To ।।टेर ॥ श्री जिन चन्द सूरिद पटधारी, जिन शासन उजवारी, गाम नगर थिर थूम विगजे, बारी जाऊ बार हजारी ।। कु० ॥१॥ महिमा मेरु समान है जाकी, कहि न सकू विस्तारी, श्रीजिशल सूरीसर साहिब, सुणिये अरज हमारी ॥ कु०॥ , ६ गुरगुणरावली। - ' ॥ २ ॥ मुर मुख मगन लगन लागी जब, ताते दिया विमारी, ऐसे सद्गुरु तुम ननि छाजे, लोजे काण तुम्हारी ॥० ॥३॥ निज गण निज पद लज्या अपनी, राखये विरूद मभाग, गिम्या कबह छेदन दाखे, रासे मान धारी || कु० ॥ ४ ॥ मेरी चूक पर निनर न दोने, 'कीने अनुमट भागे, श्री जिा हर्ष सूरीसर सद्गुरु, समरचा सानिरकारी ॥ ७० ॥ ॥ दी पाम् ।। पुनः प्रभाती। श्री जिन कुशल सूरीसर सद्गुरु, तुम दरशण बलिहारी ॥ श्री० ॥ टेर ॥ मन वचित पूरण इन कलि में, गुरु मुरतरु अवतारी, करुणानिधि जलनिधिते तरणी, करुणा कर निम्तारी ।। श्री० ॥ १ ॥ तुम हो त्रिदश शिरोमाणि साहिब, तुम सहु जग उपगारी, भगते सह नरपति नित पदे, तुम पद फन मनुहारी ॥ श्री० ॥ २ ॥ अति विस्वमी श्रटवी सीपम में, तप तरसितक निहारी, जलदायक निज पिस्द समारी, जल पाये सुखकारी ।। श्री० ॥३॥ तुम समरया खेचर अरु व्यतर, साफणि मय अति भारी, मिट जाने सहु तिमिर पुलाये, जिम दीठा तिमरारी ।। श्री० ॥ ४ ॥ पाली पुर गुरु थूम विराजे, सघ उदय जयारी, शिर नामी शिवचद इम जपे, वारी जाऊ बार हजारी ।। श्री० ॥५॥ इति पदम् ॥ राग अलहिया बैलाउल ।। श्री जिन कुशल सुरिंद गुरु साहिब, पूरण परम दयाना है कारणानिधि फिरपाना है ।। श्री० ॥ रे । अष्ट प्रमार्ग पूजा
मद्गुर स्तरन।
मोती माला
भविजा, विधि सु परत विशाला हे, वाकू अष्टभौति नहीं आये,
फाटे कष्ट कराला है। श्री० ॥ १॥ हीर चीर पाटयर अपर,
माराक है, पूजो परम गुरु के पगला, पग २ रिद्ध
रमाला है ।। श्री० ॥ २ ॥ पुन फलन मित्र मन भावे, दै हाथी
मतवाला है, मोटा मतिर महल मातिया, सुन्दर रूप रसाला है।
। रिपत विडाग्न सफट टालन, थापद उधारण
वाला है, ममग्य है साहिब गुरु मेग, घड़ी घड़ी रिछपाला है।
श्री० ॥ ४ ॥ सानिध करत सदाई सेवक, जपे गुरु पद माता
है, रतन कहत मन राजी हुय के, फयह नाहीं साला है ।
श्री० ॥ ५ ॥ इति पदम् ।।
श्री० ॥
राग प्रभाती।
-
श्री लिन कुशत सूरीश्वर साहिब, तुम हो पर उपगारी ।।
श्री० ॥ टेर ॥ खरतरगर नायक गुण लायक, जिन चन्द सरि
पटधारी ॥ श्री० ॥१॥ सत उधारण सुजस वधारण, भीड
भजन अति भारी, नाम तुमारो कुशल करण जग, बारीजाऊ
चार हजारी ॥ श्री० ॥२॥ जगबछल तुम ही हो जगत गुरु,
फ्रुणानिधि करतारी, कहे जिन चद मेरे हो मद्गुरु, हमें है पारा
तुमारी ॥ श्री० ॥ ३ ॥ इति पदम् ।।
राग प्रभाती।
तू है दाता मेरो कुशल गुरु ॥ तू० ॥ टेर ॥ तुम बिन
औरन किण याच , कोहे दाता अनेरो, ध्यान हृदय विच नित
प्रति धारू, एक भगेसो तेरो ॥ तू० ॥१॥ राज रमण रिद्ध
गम्गुणरत्नावली
-
सिद्ध सब हानर, नाम जपे सह तेरो, दीनदयाल सेवे सुखलाई,
कौरतवत बढेगे । नू० ॥ २ ॥ देर दयाकर दरशण दीजे,
सारो काज सवेरो, राज करत मोहि अपनो जानो चरण कमल
को चरो ॥ तू० ॥ ३॥ इति पदम् ।।
राग अलिहिया वेलाउल ।
कुशल सूरिंद सहाई हमारे ।। कु० ॥ टेर ।। मन बछित
मुख सर ही पूरै, यातें फिकर न काई ।। ३० ॥ १॥ परचा
पूरण चिन्ता चूरण, श्री गुरु नाम काई, प्रगट विरुद जगमे
सद्गुरु को, सेवक को सुखदाई । यु० ॥ २॥ श्री जिन कुशल
सूरीधर ध्याऊ, चरण कमत चितलाई, मेरे एक भरोसो तेरो
और न कोई मुहाई ॥ कु० ॥ ३ ॥ सेवर अपर सुनिजर कीजे,
यामें नव निधि पाई, आनद चद सदा मुस दीने, दिन २ होत
घधाई ।। कु० ॥ ४ ॥ इति पदम ।।
राग जय जयवती।
श्राज तो प्रानद मेरे, भाई भली भावना ।। श्रा० ॥टेर {{
भई जो कुशल गुर, भेटन की कामना, कलियुग मे सुरतरु दुरित
को दाना ॥ श्रा० ॥ १ ॥ दादा को दरश पायो, लोचन कू
अधिक भायो, सुधा त लग्यो सवायो, पूज्या सुख पापना ।। श्रा०
॥२॥ श्री जिन कुशल सूर, सेवक को हा हजूर, दुरित हरण ।
दृर, अधिक यधावना ॥ श्राज० ॥ ३ ॥ कुकुम चदा घसि,
सरस गुलाव रसि, उलमि उलमि पूज, गुरु गुण गावना ॥ श्रा०
॥ ४ ॥ यामे व ज्यू पाणी पावे, मले राह बताये, वन
सदगुरु स्तवन । छोटावे, दर विछरे मिलावना ॥ श्राज० ॥ ॥ लक्ष्मी वल्लम की आम, पूरे सदा सुग्व वाम, कविराज जसवास जगत मुहा- बना ॥ आ० ॥ ६ ॥ इति पदम् ।। राग परज। कुशल सूरिद सुखकारी हो सुगुरु मेरो ॥ टे॥ कुशल सुरिंद गुरु परतिस जगमें, परचा परत भारी हो ।। सु० कु० ॥ १ ।। कुशल मडन, पातक खटन, सुरतर सम जस- धारी हो ॥ सु० १०॥ २ ॥ सुजस मुण्यो तेरो मयिल में, आगो शरण तुमारी हो ॥ सु० कु० ॥ ३ ॥ दया मदिर की यही अरज है, दरशण धो हितकारी हो ॥ म० अ० ॥४॥ इति पदम् ॥ राग। मेरे होउ सहाई सद्गुरु ॥ मेरे हो० ॥ टेर ॥ तुझ सम- रण थी अट सिद्ध नव निद्ध, कमणा न रहे काई । मे० स० ॥१॥ आधि व्याधि अरियण अरु विसमी, वेला सहु टल नाद, पग २ कुशल सूरिद गुरु सानिध, करणा कर दिसलाई स० मे० ॥२॥ दुष्ट निकदन, सेवक रजन, खरतरगछ वरदाई, क्षमरतन कू दरशण दीजे, दिन २ चढत सवाई ।। स० मे० ॥ ३ ॥ इति पदम् ॥ राग प्रासाउरी। हमकू शरण तिहारी हो, दादा राखो शरण तिहारी ॥६० . - ॥ मनकी बात की ग्राम सोडा गरगुगारलारी। च्याधि मिटायो, काति बधायो, सपत यो सुसकागहा ॥१०॥२॥ भासू भर निद्रा में पोढे, अनहुन वात विचारी, आलम छोडो, करू निहोरो, मुणिये वीतर साग हो ॥ १० ॥ २ ॥ मारे बोला टोपी दुश्मा, लपट्या आण रारी, तेहने हणिये, ढील न करिये एही भरज हमारी हो दाता ॥१०॥३॥ घणु २ सू उलभो दीजे, सारीने मनुहारी, अपनादत कर जाण पतित नी, करिये गुरु रखनारी हो ।। रादा ह० ।। ४ ।। अब तो दिवस पणा ही बीता, मुमसन एगो गणधारी, श्री जिन उरान सूरीश्वर जी, क्षमरतन लिहारी हो । दादा १० ॥ ३ ॥ इनि पदम् ।। राग प्रभाती। श्री सद्गुर महाराज कुशल गुर, तुम हो पर उपगारी॥ श्री० To | टेर ॥ शिव सुग्वदायक लायर म्वामी, जिन चद मूरि पटधारी, नाम तुमारो कुशल कुशल गुर, करुणानिधि करतारी श्री० ॥ १ ॥ वाट घाट घणु विगमी वारे, समरण कीया मुस फारी ॥ श्री० ॥२॥ नित प्रति ध्यान तुमारो ध्यावे, पावे ऋद्धि समारी, तुम ही मात पिता हित वच्चल, निसदिन याद तुमारी ॥ श्री० ॥३॥ फेमर चदन तगर अरगजा, लावे भरर नारी, पून रचावे, भक्ति बनावे, गुण गावे अति प्यारी ।। श्री० ॥ ४॥ नाम लेत सकट टाले, पाने विरुद सुमारी, थी जिन हर्ष सरि सुपशाय, सत्यरतन बलिहारी ॥ श्री० ॥ ५ ॥ इति पदम् ॥ पुनः प्रभाती। श्री सद्गुरु पिन कुशल सूरीश्वर, साचो नाम धराये ॥ श्री.
सद्गुरु तपन 1
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।। टेर ।। परमानद पद परम सुधारस, गुरु पूज्या घर आये ॥
श्री० ॥१॥ सेवग जन मतिपाल जगत गुरु, जिन शासन
जनाले, करुणानिधि करतार परम गुरु, दरशण परतिख थाले।
श्री० ॥२॥ केसर चदन 'अनन कुरुम, श्रीफल मोडक सोहे,
सेट करी गुरु भागल हरग्बी, पाय परत मन मोहे ।। श्री०
।। ३ ॥ मयिल में विख्यात सकल गुरु, महिमा पत सहाई,
तिमिया रन मे तुमही पिलायो, पोपमा ऐमी पाई ॥ श्री०
॥ ४ ॥ निहा २ थान रिंगजे मद्गुरु, तिहा अतुली मल गाजे,
श्री बिन र्प सूरि सानिध कर, मत्यरत सुरा काजे ॥ श्री०
॥ ॥ इति पढम् ॥
पुनः राग प्रभाती।
गुगल करण गुरु कुशल सूरीश्वर, साचा सद्गुरु मेरा रे ।।
पु० ॥ टेर । सेवक जन सानिध गुरु समस्या, विपन हरण
तुम नेरा रे ॥ कु० ॥ १॥ श्री जिन चद सूरिद पटधारी, सूरि
सकल शिर सेहरा रे, निरमल कीरति जग गुरु तेरी, जैसा चद
उजेरा रे ॥ कु० ॥२॥ मात तात जग तू ही परम गुरु, तू
'साहिय सुम्ब केरा रे, तुम सम देर नहीं कोउ जगमें, फहन सर
गुण तेरा रे ।। कु० ॥ ३ ।। कुमति विडारन, मुमति यधारा,
वारण विखमी वेरा रे, श्री जिन हर्प गुरु चरण प्रसादे, प्रति दिन
शुभ वर तेरा रे ।। कु० ॥ ४ ॥ इति पदम् ।।
राग 1
कुराल करो रे महाराज कुशल गुरु ॥ कु० ॥टेर। सेवक ऊपर
फरुणा करके, दीजै मुख सगाज ॥ कु० ॥१॥ आधि व्याधि
गुरगुणरत्नारसी।
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श्रम विपत व्यथा गम दृर परो गुरु राज ॥ १० ॥२॥ प्रापद
इति सू पार उतागे, रायो मंग लान || कु०-॥ ३ ॥ संकट
विट निस्ट हीं पाये, ममरण श्री गुरु राज ।। कु० ॥ ४ ॥
तुम गुण नाम विहान जगत में, प्रशुभ हरण शिव काज ।
कु० ॥ ३॥ शमय महा मुग्वदाई सदगुरु, सर देवन सिरताज ।।
दु० ॥ ६ ॥ इति पदम् ।।
राग विहाग।
मोर शरण तिहाग कुशल गुरु ।। मो० ॥टे ।। सुपनदि
सोरत, निग दिन जागत, चरण क्नु अाधारा । उ०॥ मो०
॥१॥ बाट घाट रिछपाल सदाई, आपद विधन निगारा ॥५०॥
मो० ० ॥ दहदिस दीपे महिगा जाकी, परतिस सकल ससारा
॥कु० ॥ मो० ॥ २॥ धन हीना कृ धन को दाता, आपे बहु
परिमारा, सद्गुरु गुण गाये सुख दायक, श्रीजिन हर्ष अपारा
॥ कु० ॥ मो० ३ ॥ इति पदम् ।।
राग घगालो घाटो।
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प्रासा सफल फली, मैं पायो परमानद ॥ श्रा० ॥ टेर।।
श्रीनिन कुराल सूरीसरे, देवा सिर हरदेव, पुहवी माहे परगडोरे
सघ करे नित सेव || श्रा० ॥ १॥ हम धरी मन हरसियोरे,
दीठे दीन दयाल, दुख दोहग दूरे गयारे, टात्या दु स जजाल
॥ श्रा० ॥२॥ मान तरणो गुरु श्रागरे, परतिख गग प्रवाह,
मन गमता मित्र मैलवेरे, अति आनद उछाह ॥ श्रा० ॥३॥
सद्गुर स्तवन। तुम गुण गाता सद्गुरुरे, फहता नावे पार, गगनत में तुम मन चम्यारे, जपता जैजैकार || आ. ४ ॥ इति पदम् ॥ देशी फतमलरी। गरपति खरतरगद सिणगार, कीरत भूगडल कहे ।।ग०॥ देवण तुझ दीदार, राजा राणा श्रागल रहे ।। ग० ॥ रता फचोलो विसाल, केसर चदन घम भलो ॥ ग० ॥ गूथ २ पूल माल, पूजे निर्मल मन करी ॥ ग० ॥२॥ देश वगाला मझार, थूम झलाल दीपतो ।। ग० ॥ परचा पूरण हार, इन फलि काल में जीपतो ।। ग० ३ ॥ रहसु तुमारे पाय, दरशन दीजे मोमणी ॥ ग० ॥ पटधर कुशल सूरिंद, महिमा जस जग जागती। ग० ४ ॥ श्रापे सदा जिनचद, चरण कमलनी पीमती ।। ग० ५ ॥ इति पदम् ।। पुनः फतमलरी देशी। सद्गुरु श्रीजिन उशल सूरिंद, चारो चदपटों धरू ||स०॥ खरतरगद राजिंद, विरुद बड़ा अलवसरू ॥स० ॥१॥ परतिग्व पुहवी मझार, कीरत यारी कलियुगे ।। स० ॥ मला भला केहरे भूपाल, पागल ऊमा पोलगे ॥ स० ॥ महिमा नो मडाण, भाणतणी पर भलहले ॥ स० || जागनो धूम जेसाण, मेला नित गहमह मिले ॥ स० ॥ ३ ॥ दुखिया सुस दातार, निर- धनिया बहु धन दिये ॥ स० ॥ सरणाई साधार, हिंत वचल मोटे हिये || स० ४ ॥ मलेरे ऊगो सुविहाण, सफल दिवस भाई बीजनो । स० ॥ मिल महाजन महिराण, रगली घणी - ५० गुग्गुणग्नावली) रीझनो ॥ स०५ ॥ धाडवर उदरग, जुगत जुहारमा जग गुरु ।। स० ॥ सुनिजर धरन्यो सूरींद, श्रीजिनचद-सु-मुरतरु ।। स०६॥ इति परम् ॥ - " (मांगानेर पिराजे) चात। पृजो रे जो जो, दादे सम देव 7 दूनोरे, भविया भाग धो पूजो ॥ टेर ॥ परतिष पाशा पूरे, दादो सकट सगला चुरे ॥ भ० ॥ १॥ निचद सूरि पटधारी, दादो रारतग्गा अधिकारीरे ॥ भ० भा० ॥२॥ समरया सानिधकारी, ये अजन फला गुरु थारीरे ॥भ० भा० ॥शा दोनू गह मन में धारी, कोई श्रान न सडे थारीरे ॥ भ० भा० ॥४॥ चदन केसर भेली, चलि मृगमद माहे रेली रे ॥ भ० भा० ॥३॥ चरण कमल इम घरचो, इन गुरु नो मोटो परचोरे ॥ भ० भा० ॥६॥ पूज्या बचित पावे, सहु दुनिया ए जस गावरे । म० भा० ॥७॥ घाजडा कुल चदो, ए कुशल गुरु चिरनदोरे॥भ० भा० ॥ " हीज पचम पारे, सेवक जन ने साधाररे ।। भ० भा० ॥९॥ चाकोरे वेला वारे, जे गुरुनो नाम सभारेरे।। म० भा० ॥१०॥ सवत अठार तेतीसे, वदि मिगसर तीज जगीसरे ।। भ० भा० ॥११॥ धन २ हिमत कोठारी, जिा यात्रा कराई सारीरे भ० भा० ॥१२॥ चौरासी गड मुनि सगे, गुरु पाय नम्या मनरेगेरे भ० भा० ॥१३॥ दान घणो तिहा दीघो, सहु संघ में ए जम लोधारे ॥ भ० भा० ॥१या चदवाचक इम ध्यावे, गुरु दादो, चढते दायरे ॥ भ० भा० ॥१५॥ इति पदम् ॥ 4 सदगर म्ता। फलगा रिम जिनेनर सो जयो, मगल पेलि शिवान, वामय यदिय पाय फमल, नग मा पूरे पाम ॥१॥ नान ॥ चद कुलां पर पूनम चर पदो थी जिन कुरान मुनींद, नाग मा जमु महिमा रियास, जो समरे तमु परे पास ॥ २ ॥ मरुमटण सामियारणो गाग, धन करण पचन थति अधिगम. जिहा वसे जिल्हागर गति, जैतसिरी जमु परणों फलनि ।। ३ ॥ जसु तेरमे तीस जम्म, सताले मिरि सयम रम्म, पाटगा सतोनो तमु पाट, नयासि ये जमु म्यर्ग वाट ॥ ४ ॥ भमडल स्पर्गे पायारा, सचराचर जग इंग पतिसाल, गुर प्रताप नयि माने सोय, मनविय ने दीठो पोय ॥ ५ ॥ निरधन लदे धन धान्य सुपन, पुगय हीन पामें बहु पुन, यमुखी पाम मुम्प सतान, एमिना धरता गुरु ध्यान ॥ ६॥ गुर समरण आपद सप टले, श्रेय शाति सुस सपत्ति मिले, यावि व्याधि चिन्ता सनाप, सहु छटे नवि गडे व्याप ।। ७ ।। पाप दोप नगि लागे तिहा, गुर दरशण उतकटा जिहा, सेनता सुरतम नी पार, निश्चय दालिद्र मेले वाद ॥ ८॥ विस विस र विसमें नर नाह, भूत प्रेत ग्रह वितर राह, गुर नामें जे न करे पीड, भाजे भावठ भव भय भीड़ ॥ रोग सोग सब नासे दूर, अधकार जिम ऊगे सूर, मूररा फीटी पडित थाय, गुरु पसाय दुख दूर पलाय ॥ १०॥ दिन २ जिन शासन उद्योत, जिहा पो भव सायर पोत, सो सद्गुरुजी मै भेट्या आज, रलिय रग सहु सीधा काज ॥ ११ ॥ उलालो अज घर अगण सुर- तर फलियो, चितामाण कर कमले. मिलियो, उदयो परमानद् , ५२ गुरगुगरलावली। - करे, श्राज दीह में धने गिणियो, जुग पररागमजी भै थुणियो, चन्द्र गच्छ महिमा निलोए ॥ १२ ॥ फाई करो टवीपति सेवा, फाई मनायो देवी देवा, चिन्ता श्राणो काई मो, पार २ ये कविच भणीजे, श्री जिन कुशल सूरि सम रीजे, सरे काज पायास विना ॥१३ ।। सवत् चयद इत्यासी घरसे, मुलक वाहन परवर बिन हरसे, अजिय जिनेसर पर भयो, कियो कविध ये मगल पारी, विधन हरण बहु पाप तिवारन, कोई मत सशय धरो मने ॥१४॥ दिन २ सेवे सुर ार राया, श्री जिन कुशल मुनीश्वर पाया, जय सागर उयमाय धुणे, इम जे सदगुरु गुण श्रानदे, ऋद्धि समृद्ध सोचिर नदे, मन पछित फल मुझयोए ॥१५॥ इति पदम् ।। दादोजी परतिख देवता, ठादोजी देश दिवाा, म्हारा सद्गर परतिख जस जग परगडो, याचे सहुण्य साण ॥ मारा० ॥१॥ वाट पाट सकट हरे, तारे जलधि बिहाा ॥ म्हा०॥ द्धि ऋद्धि सुख सपद्रा, समरण श्री गुरु राज ॥ म्हा० ॥ २ ॥ तुमें श्रमीणा साहिवा, अमे तुमीणा दास ॥ म्हा० ॥ कमणाहिवन रहे कदा, ईहक मूरण भास म्हा०॥ ॥ ३ ॥ नगर २ गाम गाम में, थिर वर ते गुरु थान आम्हाला पूजे अरचे मादुका, नर नारी गय राण ॥ म्हा० ॥ ४ ॥ शोभे सूरत विंदरे, गुरधारी गवराज ॥ म्हा॥ श्री जिन लाभ सूरीराना, सारेग्यो सगला फाज ॥ मा० ॥ ५ ॥ इति पदम् ॥ जसु हृदय कमल गुर नाम बसे, तमु सरसति बदन सदा उत्तसे, वरसाते हाथ लिये धरती, जपिये श्री जिन दत्त सूरि यती सद्गुरु स्तरन । - ॥ टेर ॥१॥ समत् ग्यारे सौ बरसे, पत्तीले जनम्या शुग दिरसे, जमु वादग याह दे मुहती ॥ ज० ॥ २॥ इगताले शुभ प्रत ग्रहण कियो, गुण हतरे जिन त्रि मत लियो, थाप्पा जिन बल्लभ पाट पती ॥ ज० ॥३॥ लिव दीधो अवा अवड सरे, दासानुदास सोवा अक्षर, याच्यो पद जुग पर निज उगती ।। ज० ॥४॥ जोगा जिन धभी में राखी, वरसात लिया गुरु सहु सासी, यभी बलि भिजली भुय पडती ॥ ज०॥।॥ दिल्ली ने भर प्रय उज्जयणी, अजमेर वमे चौसठ जोगणी, मन में अभिमागे जें बहती ॥ ज० ॥६॥ प्रति बोध्या श्रावक लास निणे, यस कीधा सुर र नार निणे, तमु वरस गुण्यासी श्रायु वरती । ज० ॥७॥ सवत् पार इग्यारम में, प्रामादा जाणे शुभ दिवसे, शुभ ध्यान थई सुर लोक गती ॥ ज० ॥ ८ ॥ अजमेरे सद्गुर ना पगला, समरथ जे पाय नमे सगला, खेवे धूप करे भारती।। ज० ॥॥॥ न्हाही मिल धोती पहरी, घस केसर चदन अति सखरी, शुभ भवते पूज करो सुमती ॥ ज० ॥ १० ॥ सुर किन्नर नर नारी राया, श्रावी लागे जेहने पाया, जसु आणार माने महियपती ॥ ज० ॥ ११ ॥ परदेश ममता काई फिरो, घर बैठा सद्गुरु ने समरो, जेहने न हुवे दोपी कुमती ।। जे० ॥ १२ ॥ जिन दत्त सूरि जीना गुण गावे, तसु विघन व्यथा दूरे जावे, पावे जयचद दौलत चढती ॥ ज० ॥ १३ ॥ इति . पदम् ॥ दौलत थाय, बाकी रे बेला न,पडे काय, दादा कुशल सरिंद, पूजो मन रली ।। पूजो 18 गुग्गुणारत्नावली। रेर }गलोजो तुरत गमाचे पीड, बाजी मारे सगली भीड़ ।। पूजो म० ॥१॥ केपर 'चटा अगर कपुर, पृजता दादाजी होये हर ॥ पू० ॥ २ ॥ पूनम २ ने सोमगार, पाय जुड़े दादे दरवार ॥ पृ० ॥मुह माग्या वरसाये मेह, दादोजी साधे तूटा रोह पृ० ॥ ३॥ दादोजी गज नगर दीवान, पृज्या बोल चढे - परमाण पृ०॥ दाटेजी रा सेवक होय, तेहने गज न सके पोय ॥ पृ०॥ ४ ॥शन रंग हि कहे कर जोट, कवण परे म्हारा दावेजी री होट ।। पू० ॥ ५ ॥ इति पदम् ।। राग धगालो घाटो। चनो सखी पूजा जइये, जिन दत्त सरि गुर राज॥०॥ टेर ॥ हिये भाव अधिक धरी ने, पूजो पूजो शुम काज ॥ ५० ॥ १॥ सहु सघ यानी भावे, सम सामग्री साज ॥१०॥२॥ पूजा पर अष्ट प्रसारा, शुभ मारगती पाज || च०॥३॥ चोहिथरा समय फरते, तारी तुरत जिहाज 1 च० ॥ ४॥ दरगण सुगणनें दोने, सद्गुरु गरीव निवाज ॥ ध० ॥ ५ ॥ इति पदम् ॥ (सुणियो चाता राय सदागिय) शावणी चाल कुराल गुस्नी अरज मुणीजे, दरशण दीजे महाराजा, दास पै महिर करो सद्गुरुजी, मन बाधित होवे ताजा ॥ कु० ॥१॥ सोमवार ने पूनम दिवसे, दरराण क श्री सघ आवे, एक बार सद्गुरु ने "समरे, मन चिंत्या फल ये पावे ॥ कु० ॥२॥ पुण्यवान परतापचन्द के, पुन पाच पाडव कीना, श्री सद्गुरु की , - 4
सद्गुरु स्तवन ।
भक्ति करके, नर नारी लाहो लीना ॥ कु० ॥ ३॥ लगडा
पते पागला, कोढी शरणे आा पडे, एक वार सद्गुर ने ,
समरे, कचन सी काया मुधरे ।। कु० ॥ ४ || डाकण वगतर।
भूत-भयार, एवी, वाथन आन पटे उन येला सद्गुरु ने समरे,
कदेयन उनका रोम खिरे ॥ कु० ॥ ५ ॥ जेमलमेर के अमर
सागर मे, यूभज खून वण्या भारी, क्षेम मिल मुनि नगरचन्द
, करी लावणो शुभकारी ॥ १० ॥ ६ ॥ इति परम् ।।
(नीदड़ली स्टीली वैरण हो रही) देशी।
श्री जिन कुशल मूरीसरू, सहु देवा सिर ताज हो, सद्गुरु
मोरा, इण कलियुग सुरतरु सारिखा, सरतरगद महाराज हो,
स० श्री० ॥ १॥ जिहा तिहा तुम परचा घणा, पामन सके
कोई पार हो । स० ॥ तुरत सुजाणसिर भूप ने, कोधो बहु
उपगार हो ॥ स० श्री० ॥२॥ भस्त गरीन निवाज छो, जिा
शासन दीवान हो । स० । मकट निमिर गमाइला, तेजें झल
हल भाण हो ॥ स० श्री० ॥ ३ ॥ गुण गिरवा गुरु रायना,
रामरण थी जिन वृद हो । स० ॥ ह्य गय सुत धन कामनी,
पामें मन आनद हो । स० श्री० ॥ ४ ॥ थूम विराजे गुरु-
गय नो, सुथिर गडाले मुस दाय हो । म०॥ वाचक पुण्य शील
राजना, प्रहशम प्रणम पाय हो । स० श्री० ॥ ५॥ इति
पदम् ॥
(राणपुरो रलिया मणो रे लाल) चाल ।
श्री निनदत्त सूरीमरू रे लो, जिा शामा दीनान सुरवकारी
रे, भेटो भवि भाने मुदारे लो, खरतग्गव राजान म्हारा वाला
.
मे
--
"
गुन्गुणरत्नावली।
रे ।। श्री० ॥ १ ॥ गुरु वारे सुर पद लद्यो रे लो, अजयमेरु
दिर 47 ॥ म्हारा । यचित कारज साधवारे लो, सेवे सफल
निहार ।। म्हा० श्री० ॥ २ ॥ यात्री जन श्रावे घणारे लो,
परतिस परचो पेख ॥ म्हा० ॥ पास बिल्धा मानवी रे लो,
पूरे श्राश अरोप !! मा० श्री० ॥ ३॥ चौसठ यस करी
जोगणो रे लो, बलि वस चारन वीर | म्हा० ॥ सानिधकारी
सेवका रे लो, रासो सुगुन सधीर || म्हा० श्री० ॥ ४ ॥ दिवस
मह मन हुती रे लो, भेटवा श्री गुरुराय
थाम्या सफली थई रे लो, भेट्या श्री गुरु पाय ।। म्हा० श्री०
॥ ॥ श्राधि व्याधि आतापना रे लो, पिंड तणी हर पीड़।
म्हा० ॥ दु ख दोहग दूरे हरो रे लो, माजो मावठ भीड़ ।। म्हा.
॥६॥ लान थान इण गच्छनी रे लो, उदयरु नयण निहाल।।
म्हा० ॥ पोता वटपोते राखस्यो रे लो, तो करस्यो सभाल ॥
म्हा० जी० ॥ ७ ॥ जे बिलग्या तुम केडले रे लो, ते किम
मूके पेड ॥ म्हा०॥ रूठडो वालम मनापिये रे लो, यो दिलासा
तेड ।। म्हा० बी०॥८॥ तुम्ह जेया धणी मूकने रे लो,
कहने कहिये जाय ॥ म्हा०॥ कहिवानो वल था लगे रे लो,
करिवो श्री गुरु पाय ।। म्हा० श्री० ॥ ६॥ तिल एक सु-
निजर जो हुवे रे लो, तो सरे वचित कोड ।। म्हा० ॥ दुश्मन
जन दूर हरो रे लो, अम्हची तुम लग दोड ।। म्हा० श्री.
।। १० । मात तात अधव तू ही रे लो, तू साचो गुरु देव ।।
म्हा० ॥ भोला दाला बाला रे लो, चरण शरण नित मेव ।।
म्हा० श्री० ॥ ११ ॥ विनय सभी इम पिनवे रे लो, श्री जिन
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सद्गुरु म्तवन | ५७ - हर्ष सूरीश ॥ म्हा०॥ महिर निजर मुझ ऊपर रे लो, धरज्यो घिसया वीस ॥ म्हा० ॥ श्री० ॥१२॥ सवत् अठार सडसट में रे लो, यदि -फागण शुभ नूर ॥ म्हा० ॥ युक्ति सहित यात्रा करी रे लो, चढते पुण्य पडूर ॥ म्हा० ॥ श्री० ॥१३॥ इति पदम् ॥ (नमो रे नमो सेज गिरि रे) चाल देशी । श्री जिन कुशल सूरीसरू रे, राने श्री महाराज रे, तुझ गुण साभल मन ऊमह्यो रे, दरशण देखण काज रे ॥ श्री० ।। १ ॥ दरशण गे महाराज जी रे, थारा गुण अनेक रे, तुझ शम दुजो कोई नहीं रे, कुशल फरो मुविवेक रे ॥ श्री० ॥२॥ मिल २ बहुला माननी रे, जान करे सुसकार रे, नीर पखाली पगला विन्हे रे, पूजे विविध प्रकार रे ॥ श्री० ॥ ३ ॥ पागल ऊभा पोलगे रे, गावे गीत रसाल रे, मन बच काया ये करी रे, चरणनमें निहु काल रे,॥ श्री० ॥ ४ ॥ सवत् अठार गुण- चास मे रे, कार्तिक शुक्ल उदार रे, सघ सहित यात्रा करी रे, पाम दिन सोमवार रे ।। श्री० ॥ ५ ॥ पास धरी ह प्रावियो रे, दोलत यो राजान रे, धरमचद इम, वीनवे रे, यात्र चढी, पग्माण रे ॥ श्री० ॥ ६॥ इति पदम् ॥ राग जयतसिरी। सहाई मेरे श्री जिन कुशल गुन्द ॥ टेर । कुशल करण कलि माहे प्रगटयो, खरतरगच वरू। स० ॥१॥ यावनो. चदन मृगमद भेली, पूजो प्रेम भरू ।। स० ॥ चिता चरण गुरुगुणरत्नावती। - विधन विहारण, दालिद्र दूर हरु ।। स० ॥ २ ॥ दिन २ साहिब चढते यो, ध्यावो जान धम् ॥ स० ॥ वाजे जेहना जसना बाजा, टावी ठामे जन्द ।। स० ॥ ३ ॥ सवत् अठारसमें अड सटे, मिगसर मास थिम, मघ सहित श्री सद्गुरु भेटे, जी जिन हर्ष सरू ॥ स०॥ ४॥गाम गडाले चरण नगता, तूठो क्लप- तम् ।। स०॥ पाठक श्री विद्या हेम गाणि ने, ज्दय रतन करू॥ स०॥ ५॥ इति पदम् ॥ - - दादा पूर हो बवित मोरा, बलि २ करू रे निहोग ।। दादा पू०॥टेर ।। साचो सादिव जग में जाणी, चरण नमू तित तोरा ।। दादा० ॥ १ ॥ यमर सरे गुरु महिमा जागी, तो सम कोदयन तोले, वाल गोपाल सरे मन हरख्या, श्री गुरु ना गुण बोले ॥ दादा० ॥ २ ॥ बाट घाट तू ही साधारे, चोर चक्र भय बारे, माता जिम बालक प्रतिपाले, तिम इ तोरे सारे ॥ दादा० ॥ ३ ॥ लखमी लीला सपति सोहे, घर भवता के होये, गुण विनय कहे साहिव साचो, सोम निजर पर जोये ।। दादा० ॥ ४ ॥ इति पदम् ॥ देशीनी चाल। हेली हे सद्गुरु जात मनास्या हे, हेली सद्गुरु वेग यधास्या हे, हेली सद्गुरु पूजरचाम्या है । हे० ॥ सद्गुरु गुण जस, गाम्या हे ॥ हे० ॥ सद्गुरु म्हारो बड भागी हे ॥ हे० ॥ सद्गुरु मुगुण सोभागी हे ॥ हे • !! सद्गुर विस्द वडाला हे ॥ हे० ॥
सद्गुर स्तवन । सद्गुरु म्हारो रिछपाला हे ॥ हे० ॥ सद्गुरु निरमय याद है । । हे० ॥ सदगुर दुग्मा दाटे हे ॥ हे० ॥ सद्गुरु हा रस नामी रे । हे० ॥ गद्गुरु अतर जामी हे ॥ ३० ॥ कुशल रिंदा है ॥ २० ॥ सद्गुरु मेवे मुरयन्दा है । सदगुरु म्हारो वरलाई हे। हे० ॥ सद्गुरु हर्ष सदा इति पदम् ॥
गुग्गुणरत्नावली। भी हो लामपुरे तिम भागरे, दादा महिमा मडोर मझार, जो हो रागानेर श्रमरमरे, दादा सेवक जन सुपकार ॥ कु० ॥ ॥ जी हो इम पुर २ थूभ प्रणमिये, दादा नासे सह विखवाद, जी हो राज समुद्र इम वीनये, दादा समरया दीजो साद॥ यु. ॥१०॥ इति पदम् ।। , देशी। कोजे थे पर जोड ने दादाजी, वीनतड़ी निगताय हो, सद्- गुरजी, थरज मोरी सामलो दादाजी, राज गिर पिण पागले दादाजी, अतर यहीय न जाय हो । सद्गु० भ० ॥१॥ थारे तो सेवा घणा दादाजी, म्हारे थे गुर राय हो । सन् १०॥ तुम्हें अम्हादिशि की जो मया, दादाजी, ज्ञान निजर सुपसाय हो । स० १०॥२॥ आदि युगादि तणा श्रये, दादाजी, प्रगट थारा परभाष हो । स०11 गिणती सू नावे गिराया, दादाजी, जिम जल कण दरियार हो । स० अ० ॥३॥ म्हारे समरण राज नो, दादानी, थारो हीज श्राधार हो । स० ॥ म्हेतो थारा घोलगू, दादाजी, थे म्हारा परतार हो । स० अ० ॥ ४ ॥ इण गय में वरते उदो, दादाजी, थोक मला भला थाय हो । स० ॥ सोसगलाई राजरा, दादाजी, सुनिजर रा गहगार हो । स० , ।। ५ ।। जिण येला, दरशण हुवे, दादाजी, फीजे समरण ध्यान हो । स० ॥ नयण हसे तन उल्लसे, दादाजी, विक्स मन अस- मान हो । स०अ०॥ ६॥ धन २ दिन भाई बीजनो, दादाजी, आयो भाग्य प्रमाण हो । स० ॥ मल बाटवर मेटिया, दादाजी, - गुर स्तरन । गरतरगन्य दीपान हो । म० अ० ॥ ७ ॥ पग में नाविध करो, दादाजी रान दिवस प रग हो । म० ॥धू मेयर राउन्लो, दादानी, कदेयन घोड़ सग हो । स०अ० ॥ ८॥ श्री जिन कुशल गूरीसर दादाजी, जिन पर सरि पटधार हो। स०॥श्री जिन लाभ गरिद ने दादाजी, महिर नितर शवधार हो।।म० ॥ ॥ इति परम् ॥ राग मालहरा। . पनमा चाली र मुगुरु, पूजवा चा० ॥ टेर मोल शृगार सझी सहु पनिता, टोला मिरा • चाली, उज्नल थाल भरी मुक्ताफल, सुदर हाथे झाली । मु० ॥ १ ॥ गीत गारतो यह गुणवती, सद्गुर चरणे पाये, कनक चोली केसर पोली, चर- णारी पूज रचाये ।। सु० ॥ २ ॥ हियड़े उल्लसती नाटिक परती, ठम ठम पाय ठमकावे, पाच सात मिल सरिग्वी याला, लुललुल शीश नभावे ॥ सु० ॥ ३ ॥ मुखरो मटको हाथा फेरो लटको, प्रासडली अणियाली, हाव भाव पर सहु भघि जनना, चित चोरे मतवाली ॥ सु० ॥ ४ ॥ श्री जिन कुशल सूरिंद के आगे, भावना इण विध भावे ।। सन ससियन की भक्ति देखके, क्षेम रतन गुण गावे ॥ मु० ॥ ५ ॥ इति पदम् ॥ देशी हरियां मन लागो। अलवर देश सुहावणो, गाम सुहाचे नाल रे, सद्गुरु सुण मेरा, तिहा तू प्राप विराजियो, खरतरगछ रखवाल रे । स० ।। १ ।। अफल कला काई ताहरी, सो सम अवरन कोय रे॥ M मुगुणरत्नापली। , रे।। स० स० ॥ ताहरी परत शामली, मोमन अचरज होय रे ।। स० ॥२॥ परतिग्व परची पामियो, श्री नीराण नरेश रे॥स॥ पता पीरती बाहरी, जाग देश विदेश रे । स० ॥३॥ विवी बेला वार त . तू श्रामचो गाधार रे ॥ स०॥ सुजाणसिह नर । राज ने, परि भय लियो उनार रे ।। स० ॥ ४ ॥ श्रन्दे तुमीणा पोलगू, तू श्रमचो सिरदार रे, परदाई तू सेवरा, परचो दे गिरधार रे ।। स० ॥५॥ भाग्य भले तू भेटियो, मुधिर गडाले धान रे ॥ ॥ हिव अह पर कीजे गया, दीजे बधित वन ६॥ मादाजी दीनदयाल तू, देवा सिर हर देव रे, तिज संवर जागणी करी, दीजो पद पज सेवरे ।। स०॥७॥ यात्र सपल जिन भक्ति नी, माने ज्यो गुरु राय रे ।। स०॥ चलि रहना बीनती, करो मुझः सदा सहाय रे ।। स० ॥८॥ इति पढम्॥ नइया मेरी दादा तुम ही सेवइया, तुमारे नाम बेड़ा पार लपइया । न० ॥ गहरी नदिया नाव पुराणी, जोर हीवाय चलया ।। न० ॥२॥ उमार वार फछु सूझत नाही, तुमरो ही नाम जपइया । न० ॥ ३ ॥ सकट देख सेवक कू सदगुर, देरावर ते मया ॥ न० ॥ ४ ॥ सकट दूर हरो इक छिनमे तुरतही पार लपईया ।। न०५ ।। सेवक सरणे पायो तुमारे, तुम चरणन क गहिया न०॥६॥ आव जीव ए चरण न छोड़, तु में मुस दइया । न० ॥ ७॥ इति पदम् ।। शेरी। सदगुरु का ध्यान हृदय मेरे । स०॥ श्री जिन दन सूरी - सदगुध स्तवन। ६३ - भर सादिन, पद पफन मणगू तेरे ।। स० ॥ १॥ श्रीनिन बालग सूरि पटोधर, परणा कर रार जग रे ।। ग० ॥ २ ॥ सप सरल सानिधकारी, दु ख लोग दूरे गरे । म०॥ ॥ ३ ॥ सुण के शुद्ध उपदेश मुगुर को, दृझे भनि जन बहुतेरे ।। स०॥ ४ ॥ वैमानिक सुर पदयी पाई परतिय मुगु विग्यमी परे । स० ॥ ५ ॥ मदन क्षमा कल्याण अटोनिशि, मुनिजर परियो गुर मेरे म०॥६॥ इति पदम ॥ पुनः होरी। बतिगरी ह बुरात सूरीगर की बलि ॥ मेवक जा मन नदिन पूरण, सुग्गवि सुरमाणि सुर तर मी ॥ २०॥ १ ॥ सस्ट विकट तिमिर भय हग्ने, तरण तेन । सर कर की। ब० ॥२॥ जिन शामन नित २ उजालन, भी जिचन्द पटोधर की। ब० ॥ ३ ॥ सुन्दर खरतरगण गगणागण, घर शिवचन्द्र शोमा कर री ॥ २० ॥ ४ ॥ इति पदम् ।। ढाल यिलिये की। अरे लाला श्री जिन दत्त सूरीश्वरू, दादो प्रहरू गम ते. सूर रे लाला, भावधरी पूजे सदा, घस क्रम मेल कपूर रे, लाला श्री० ॥१॥जीती चोमठ जोगणी, यस कीना बावन बार रे लाला, मन बले करि साधिया, जिन पच नदी पन पीर, रे लाला श्री० ॥ २ ॥ प्रतिबोध्या श्रावक श्रापिका, मिल लास सना सह देश रे लाला. जैन धरम दीपावियो, सरतरगछ कमल दिनेश . - गुरगुरत्नावली। . - - , रे लाला श्री० ॥ ३ ॥ हिंमा टानी जीवनी, जयसिंध सवा लग देश रे लाला, दानव माना देवता, माने सह आण नरेश रे लाला श्री० ॥ ४ ॥ जुग प्रधान पद जेहने, देवता परगट दुय दीधारे ताला, पुगय पुस्प जग पर गो, जिन करणी उजल सीध रे ला! श्री० ॥ ॥ कामित दायक कलियुगे, साचो उर तर अवतार रे लाला, ममरत म्याम घटा करी, महियल चरमे जाधार रे लाला श्री० ॥६॥ याज विपम पचम अर, लेहना मोटा श्रमगत रे लाला, नागे न पड़े वाजली, न ये छल छिद्र तिल मात रे लाला श्री० ॥ ७॥ सवत बार वग्यारम, आमाढ शुक्त पक्ष जाण रे लाला, झारस सद्गुरु तणो, अनेमेरु नगर निरयाण रे लाला श्री० ॥ ८॥ मदिर वर्ग मुझ परे, गुरु ग्म निजर निहाल रे लाला, राज हरस पर जोड ने, वदे मन शुद्ध चरण निकाल रे ॥ श्री० ॥ ६ ॥ इति पदम् ॥ राग। जय जग जन दयाल सद्गुर मणि धारी ॥जय० ॥टेर।। ओस बिमल वश मान, समरा लज साहनान, रासल पितु देवी मान, देरहण उसकारी ॥ ज० ॥ ॥ कोटिर गण कुल चद सार, खरतर शुभ विन्द धार, नायक जिन चन्द सूरि महिमा मुनि भारी ॥ ज० ॥२॥ जगम युग वर प्रधान, श्री जिनाउप. पर बसान, दत्त सूरि पार उदय, गिरि रवि अवतारी ॥ ज० ॥३॥ रि सम अमर गास, संवत कृत निक्ट बाम, दिल्ली- पनि निपट दाम, यावत नर नारी ॥ ज० ॥ ४ ॥ दोलत घर , श्री नगृरोष्टकम् । 7 है - गरत भूर, सकट दा फरार मरामत निामी कापूर, दर- गलिगे || ॥ ५ ॥ प्रय संस्कृत गुन्न स्तुति। हासानुनासा हा सर्मला, यदीयपादानतते लुटति ॥ मरम्पले करता यात्, उगमगा जिनदर सरि ॥१॥ विनागरी फल्लता, युति भन्या निम कारगया । मगीत भी शिखर , गवेपटा इन्ति पदे रिया ॥२॥ नो योगी 7 च योगिता च धराधीशश्च नो शारिनी, नो बेताल रिशचगजस्गगा, नो रोग शो नयम् ।। गो मारी न च विनर प्रभूतय प्रीचा मग तुमके, जय जय श्री शिवमूरिमुगुरो नांमार सायति ॥ ३ ॥ सथ मी जिनवरागुरोरष्टकम् । यो रष्ट म्मरण गतोपि सततं दिन तक मम्गुनै , भक्तिपर उनोपि रुने सर्वार्थसपादनम् ।।दु सात तनुते दानि उमति कारगययारानिधि , स श्रीमान् जिनदत्तरियतादस्मार स्वप क्षामितान् ॥ १॥ तर उतिाति नामान्यप्यप पारयन्ति, दति परमशानि दिव्यागार जनेभ्य ॥ निनपदयुततम्मादादगत् टर सरे, रचिरनचापुरेरचन तें करोमि ॥ २॥ यशुमगतिरमत्मति- सक्त , मततमनार्यविधालमामच ॥ अनुदिनानपापमयुक्त पुरुपपशुर्यदिमादृशोऽयत्वाम् ।।३।। दिमलमतिरमत्तर प्रशात , शुविचरितोसिनसत्त्वमिरमूल ॥ प्रियहितरचनस्तव प्रसादाद्भवति, पतिननोजिनात्तगुम्विर्य ४ । सकलशीलगुणाधिरापद, 1 ।
गुरगुरतामनी । . + -- भरंकृतमु प्रचुर ।। करुगानिलय मुनि नहर, जिनदरगुरुप्रणमामि परम् ।।७। बरवाच्छगमात्रामुपद कृतवाहददेशमा प्रमुटम् ।। विगत व्यसन हितद समुदा, मुनिगममहमणमामि स| श्रीमच्छीमादचगरिमाने परवाणनातीतरोधोपि मुगु 'द्विजल पानिधिविध ॥ मत्स्पेविधिना मग मुगिना लब्धमुरो रक, ये ध्यायति नरामसितन सागावग प्रोपरा ॥६॥ इत्यष्टकम् ॥ - হাব শাহনা। মানবদেলিপসি, গয়হানওয়াল। মন্তু गुर पगडानयमहिन, उसलसरिगुरुप्रयत न्तु ।।१।। यतिन सति कियद्वरदायिनो, भुवि भवान मुगुर रिकाश्रित { मुरमाशयनिम्न गतो भवेत् , दिगपालिकाच ॥३॥ पटिनय टममा पुल वर्मनि, प्रवरसाग्यसमाबतसमी।।। मग हदि ग्मरण तव सर्पदा, भवतु नाम जमस्तुमुरीमुना ॥३॥ चिटिसाट टिपु परपत, 'तनु- भूताविपमानयनाममा।सुगुरुराज तवेष्पितदर्शनादभवनिमोरर गर्णताम् ॥ ५॥ पसभामुयशोवमानता, मिवियुमानजनेजयगा- दता। मुपरिवारसुशिप्यपरपग, तयगुगेपुद्रमाम्गुग्नतरा । १ नमल राजर्भय न रणाइय, नसलु रागमय न विमान सत्नु निमय नरिपोभयं भनि भक्तिभवानरगुपशाम्॥६॥ परगुडदिए मंटले मस्सुमलिसिद्धिपुतगले ।। गगधमायुमतेप्वपिगुजरे, प्रतिपुर महि तय गीयते ॥ ७ ॥ मम गनेर । पल्पलतामुना, कुशलगार गुगे फनितायुना। परमाग्यश्लेन मयानया, यद्रमृनन्दतेतवदर्शनम् ॥ शशिधरस्मरमाणरमक्षषि प्रमितविक्रमगपतिसंवति समय . - ।
भी शलगुगन्ष्टकम् । सुन्दरभक्ति नमस्कृत , कुरालमूरिगुस्माताश्रये ॥ २ ॥ इति समय मुद्ररोपा वायरचित बुरात गुगेरएकम् ।। फशल गुरोहितीयाष्टकम् । सुख समपदमति पदयोयन्यवदने, विनिद्रावागीशा हदय कमते सचिदधिकम् ॥ विराग मागेप्यपि च भगवद्भस्तिरनिश समूह वयं वदे कुशलगुरदेवम्य चरणी ।। १ ।। निशिन्यापाधीन निराग्निमधीनी समयिना, पर बागीलदायोनिलयमपित्तदाननि पुणो ।। सदा यो वतेते जयव सुपायोजयुगल, समृद्रियर्यव०॥२॥ निपतौ ती प्रेक्षा सरमिरुयोर्यो मृदुलगो, जपापुप्पामासो किप- 'लयजिताशेपमहसो । रासलेखालदम्य प्राटितपरा श्रीसदनयो , समृद्धयर्थ ब० ॥३॥ मुरेन्य विस्येन्च कतिपयदिने फत्तमयो, कदाचितेन्द्राक्रश्रियमपिरिद्रायपग्माम् ।। सुरइत्यसोपामतइसियुमा यो मुवि गती, संगृड्यर्थ च० ॥ सुगरवाद्य-ते परमगुरुधर्मोप- 'दिरात , सनाकाम पीतामृतरसनराशेरपिगिर , शुता यस्यश्रेय श्रियमपिदिशतिस्थिरधिया,समृद्ववर्य व० ॥५॥ निवि सर्वश्रीगा मनधिक्रयौ सर्वविपदा,मस्निधौ शोणायुपचितनग्यौ गूढपुटिनो।। समानौ प्रोत्तुग प्रपदपटशासा वितसितो, समृद्धयर्थ व० ॥६॥ ययौरास्ते धनमुरमधरा धामरमणि ,रागरारोग्यत्व निनवनयविद्या निपुणताम् ॥ गुणानौदार्यादीनपितनयतम्याश्रितनगी; समृद्धयर्थ ॥७॥ भयकारागारामयसमरपारीद फरणमृत, महापारावास द्विरदयन-वानरंभवम् ) 7 डाकिन्याग्रुपमहगरलजस्यानमाल , समृद्धयय व० [८] इत्थ श्रीजिनपद्मसूरिरचिना दिल्याप्दा मा- गुरो ,पुण्यगतमा मनोजफलद पापौघमिमनम्।। भरत्या प्रति
गुग्गलादली
-
.
भर नभुलचुर। कानिलय मुगिदु महर, जिन चगुरुवनानि
वरम् ॥७॥ रोजगभांत्रिमुर्नमुम्बद ननादरामन प्रभुदन ।।
। विगन न्यासन निट रानुना मुनिगम प्रणमामि सत्र ।। ८ ।।
श्रीमच्ट्रीनिन तमरिसुगुगे पल्लारावनीनग, लगो निध :
লিমায়ালিখিৰি তুলিনিনেনিনা শখুন
रेष्टक, येध्यायति नामवति सतत वागावग श्रीग 14,
ईत्याकम् ॥
अर्थ एनल गुरोरष्टकम् ।
मतनरेश्वरमौलिमरिप्रभा, प्रबकेशरचीचतपशुगम ॥ मा
मुत्यगडालयमदिन, ग्लसरिगुरु प्रात स्तुवे ॥शा अविन सा
किनगुग्दायिनो, भुविवान मारमविवाधित ॥ सुरमपियन्टि'
गतो भवन गिगलकाचा ॥२॥ पर्टिनरष्टसमा
वर्ननि, प्रवरसोम्यनमन्चितसमनि । मम हदि स्मरण सय सवदा
भांतुनाम पत्नुमुन्यमुना॥३॥ विट सकट कोटिए करपत गर्ने
'भृताविषमाननाना ।। सुगुरुराज नरग्नित नादनुभवतिमनोग्य
पूर्णताम् ॥2॥ पसभामुबजेबनान्ता, विमाननेजयया
टिना। मुपरिवार शिष्यपरपरा, स्तबगंगा-मास्युर तिरा निम्नु
राजभयं न रंगहा, नन्दनु रोगमनन विना न र भिय
म रिपोर्मनाभवति मत्तिमातिसम्॥३॥ अपर परंतुदोबर
हने मत्युमानिनिदिपुगने मगधमाधुम्प्वपिगुजर मतिपुर
महिना तव गीयते ॥ ७ ॥ मन मनोरथ कल्सयमुना, कुरामा
टोनिताना पदमाम्यवतन्यानया, यदन्नतेतादर्शनम्
IFICATसतविम्विविक्रमपतिरामति मान्य
.
श्री युशनगुगेरष्टकम् । " - मुन्दग्मानित नमा, कुशलग्गुिरुमवसाये ॥ ६ ॥ इनि समय सुटरोपाध्यायरचिन कुरात गुगेरष्टयम् ।। पुशल गुरोद्वितीयाटसम् । मुम्ब सर्यासपद्धमति पदगोर्यम्ययाने, विद्रिायातीजा हत्य पमले सपिदधिरम् ॥ विराग सांगेप्पपि च भगनानीश मगृहयर्थ ददे कुरालगुरदेवम्य चरणी ॥ १॥ निशिम्वापाधीन निशदिनमधी समयिना, पर बागीलपायोनिलयमपितदानगि पुणौ ॥ सदा यो वचते जयइव सुपायोगयुगल, समृद्धयर्थय० ॥२॥ 'निपतो तो प्रेक्षा सरसिरुयोर्यो मृदुलयो, जपापुप्पामासो किन- 'तयजिनाशेपमहसो ॥रासोपालदम्य प्राटिनपग श्रीसदनयो , समृद्धयर्थव० ॥३॥ मुरेभ्य स्वस्येन्य यतिपथरिनर्य फलमयो, पदाचित्तंद्राकामियमपिदरिद्रायपग्माम ।। मुरमुत्पत्तोपाननदतियुधा यौ भुवि गती, समृदयर्थ घ० ॥2॥ मुगावाय ते परमगुरुधर्मोप- दिशत , सदाकाम पीतामृतरसवर शेरपिगिर ॥ शुता यस्यय प्रियापिदिशतिस्थिरधिया, समृद्धयर्थ व०॥ निधि सर्वश्रीगण मनधित्रयो सर्वविपदा,गृस्निधो शोणानुपचितनग्गी गुढघुटिका!! "समानी प्रोतुग प्रपदपदशाखा विरासितौ समृद्धयर्थ व० ॥ ६ ॥ न्ययारश्चास्ते धनमुराधरा धामरमणि शरीरारोग्यत्व दिनयनानिया निपुणताम् ॥ गुणानौदार्यादीनपितनयरात्म्याधितणी, समृदयर्य "बगाभयकागंगारामयसमरपारीद्र फरणमृत्, महापारावाग 'द्विरदेवन धानरभवम् । डाकिन्यायमगहगरलजत्यत्समृगता, समृड्यय वor Jell इत्य श्रीजिनपेमसरिरचिन द्विव्याप्ट क-सद- गुरो ,पुण्यगनमय मनोजफलद पापौघविर्वमनम्।। मनत्या य मटति रामगुणरलारी! J - . T प्राज्यमानायट म ॥६॥रोपामशेषामायने,राभागामापः प्रम।। गह स्नान य पुर्यु शुद्धभ्यानगुगेम्गदा ॥ ७ ॥ जिलगुणों अति नन्ग गाजिततरवीगननितागणानाम्।। मान जा परित या विधविवर्या, ममवति मग्नाच, शिद्वितार मीसनाथ, पाकिटस्वामटक मया,ऽसरि परतरगच्चगद्गुरो ईम्मिनप्रद मनरपसारयः, रत्लमोमसमराध शमनम् ॥॥ इनिलम्पुिगे स्टाम् ॥ ना घग्घर निसाणी। नायक ग्धि मिद्धा मेवा रिसा परतिस सुरतम्फदा है, परिवारज वाधे गगों शगाने राजहटा दल चा दे, गि निरकसपच्चर सिम तहरा है, पुल भरण आगो धन्य विदाणो जनए जयती ॥१॥ तेरे रोताले भाग्य विशले भाव दिखादा, गुरयोग्य विधानी बहु सनमानी से स्थपाट दिया है बहु मुस समप्पे दालदकप्पे श्रीजिनउराल रामिा रे, सहुलोरज असे इन गुरु पसे कुण इच्छा पूरिया है २॥ निज परण ज्ञाने प्रायु पिचाने शुभ माना ध्यावना है, चौरासी लस योगा अस जीपासखामदा है,त्रणसग सागारी परि इकतारी सवारी जोपदा हे, बच्चर नन्यामी जे अविशी मचारी गावदा ॥३॥ थिए धुमजस्यप्पे दालिदरप्पे देरावर डापना है, चौरमपुर वाो माल वीकाणे अरियनक जीपदादा सुगरगुण गारे सहरसेगाचे योधपुरे जग्ग्दा हे, नागौर नगीनो गहु 17 लोगो ध्यतर भूतभगदा है ॥४॥ जे धन पर नारी घग्घर निसाणी। - ऊठ सवारी जाके पाय नमदा है, उन्हें जलनाहे अतिउमाहे इति प्रतीतद मदा है, जसुध्याने से नर होवे सुधरत तसु ग्रह दुष्ट न- सदा हे, अति उज्वल सखरी धोती पहरी कुरुम लेप घसदा है, घर वारना चइन पाप निकदन शुभ भावे पूजदा है ॥५॥ खसयोही चगीचिये अगीमधुकर तिहा गुजदा है, मलयागर सखर बलि कृष्णागर धूपदसूधूपदा है, कस्तूरी पूरी कपूरी चूरी गोइलाभे- लदा हे, पुलवृद्धा लायक सुखादायक साजन बहु मेलदा है॥६॥ जसु महिमा चारी श्रावक श्रावी जाको जस वाचदा है, मद्दल सुरणाई ससरीघाई मेघाज्यू गाजदा है, गुणगीत जगाचे सीस नमाचे नाटक मिलनाचदा है, झल्लरकसाला देदेताला बानिध बहु चाजता है ॥७॥ इम आलस छारी फर इकतारी जे मन शुद्ध ध्याचदा है, ते सघली भाते सयल सघाते मन इच्छा पावदा है, रायजादी राणी गुणे चखाणी बदनज ओपम चदा है, तसु देख्या मुखा जाये दु खा घुघरिया रणकदा है ॥८॥ कटिसोहे गुमा अनोपम वझा कटि मेखल झणस्दा है, जोवन वयमाती सहसुहाती तिणसू केल करदा है,, वलि घोड़ वयल्ला साथ छयल्ला सिर पर छत्र धरहा है, इङ्गचित्ते घ्यावे वेग वधावे पद चकाच लहदा है, ॥६॥ तसु ह्यगयथट्ठा वोलतभट्टा मुह श्रासीस फहदा है, खरतरगच्छ ईसर कुशलसूरीसर ताके गुण गावना है, सेवरु साभारे शसहारे तरस्या तोय पाचदा है, सुस सपति पारे अधिकेदारे चगासीमलहदा है, घग्घर निशाणी सह वाणी जय मुविचद कहता है॥१०॥ इति घग्घर नीसाणी प्रथम सपूर्णम् ॥ . ।
७६ गुरगुणरलावली। ॥ १३ ॥ तू श्री सघ रग्वे श्री सघ पसे श्री सघ शिल्लपसदा है, भी सघ थूम पाए कुशल वधाए श्री सघ कुशल होवदा है, सघ मिल इचित बोले कीरत पारन को पारदा है, श्री सप लही रिघ सिधि पाई नव निधि श्री सप नित बाधन्दा है ॥१४॥ सवत् अटारे वरस चिहुत्तर कार्तिक मास रहदा है, पूनम रवि वारे गुरु दरबार मेला खूब सोहदा है, तहा मैं भी पाया दरराण पाया मोफू तू तसदा है, घग्घर निसाणी कुशल कहाणी उदय रतन्न कहदा है ॥ १५ ॥ इति कुशल गुरु घग्घर निसाणी सपूर्णम् ॥ प्रय छन् लिख्यते। खरतरगय जाण सलक, राजे श्री गुरु राज, दादो दरशा रेखता, सरे सहु शुभ काज ॥१॥छद्र भुजगी--सरे सब काज सटप सटक, तूटे दुख जान तटक तटक, मिले मन मेलू मटक मटक्क, लगो गुर पाय लटक्क लटक ॥१॥म्बरे मन मेट सदर खटक, चोखे चित चाह चटक चटक, हरो हठ वाद हटक टक । लगो० ॥२॥ थुभे नर थान थटफ थटब, नारेल बटव बटक, गिलोजे सेस गटक गटक ।। लगो० ॥३॥ गुणो गुण माल गटक गटक, पणा मिसान घटक घटक, जुडे गज खान मटक झटक॥ 10 ॥ ४ ॥ भगे भय भूर भटक भटक, श्री रहे दूर अटक अटक, कदे न पुकारे कटक कटक 10॥५॥ चीजे सहु गेग घटक घटक, पुले सल सीस पटक पटक, मड़े सहु पाप झटक झटक ॥ लगो० ॥ ६ ॥ कलश लटक लटक पाय लगे नगे जस प्रगट पुण्याई, गुरु पधारे लगो -
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पद्गुर छ ।
सेवा मुरगदी आप लक्ष्मी पर भाई, बीकानेर विशेष जागतो
मार गडाले, जिनदत्तमरि जिन पुरालरा श्राप विस्ता उजगाले,
विजय हरप सौभाग्यवर, उवाय एमधग्मसी असे भी सपने
सानिद्ध फर ॥ ७ ॥ इनि छद सपूर्णम् ॥
अथ छद दूसरा।
समरु माता सरस्वती, कुमारी कर जोट, तू माता फवियण
तणा, पूरे बधित कोड़ ॥ १ ॥ कुशन करण जग बुशल गुरु,
दायक बधित देव, अह निसि तो पोलग करे, मुर नर मारे सेप,
॥ २॥ पुर पट्टणगामें प्रगट, जग सगले जस वास, पुरावनी तो
पालियो, वसे दादोजी वास ॥३॥ छद मोतीदाम-दादोजी वाम
लिये दोनच, वधे पत्रचाया सेवफवित्त, वधार मान दशोदिशिवान,
धरे इक चित्त जिके गुरु ध्यान ॥ ४ ॥ पूनम २ पूजे पाय,
नवा २ नेवज पारन पाय चपावलि तिकी फूल चरच,
अनोपम श्रीफल लेई अरच्च ॥५॥ लहे घर मुन्दर लाब पर,
सझती सोलवधती नेह, लहे घर नारी लोयणपान, लहे वलि
पुत्त सुपुत सुजाण ॥ ६॥ लहे भल गाम मुठाम भूपाल, लहे
ढिग मीत भला ढीचाल, लहे घर मदिर घोड़ा जोड़, लहे भट
सेव करे कर जोड ।। ७॥ लहे हित साजन हल कलोल, लहे
शित लीला छाका छोल, लहे घर कुरला दूर कपूर, लहे घर
जीमण मोती चूर ॥ ८॥ लहे पर विद्या पुण्य पड़ा, लहे घर
मुख उगते सूर, लहे घरमंगल मद्दमसत्त, लहे घर चीर अनो
पम सत्त ॥ ६ ॥ लहे घर चलित भोग रसाल, लहे पर साल
कपोता थाल, घरे गित गीत तणा गहगाट, मणे ति जय २
गुरगुग्गरलारली। - ध्यान प्रथा जो नेरा , चरण भाट ॥१०॥ भत पुन मधुचिय वाझ फलन, विछोहा वाला वेग मिलत, अनेकानेक निरद्द अपार, दीटो इक पलु में न श्राधार ॥११॥ जिहा सहस हुवे जो मुस, यह इक जीहा कर मुग्व, बड़ा विरटताहग अभियात, नर नारी फेह थावे जात, गुणे तू गिर श्रो समुद्र शर्गम, कयो में कोह न करज्यो रीम ।। १२ ।। दोहारीस न करज्यो कवियणा, मैं माहरी मति लार । कहियो जग में कुशल गुर, खरतरगद मिणगार ॥१३॥ छद लघुनागच-शृगार हार साहए, मुकाम धे दोहए, परति जो सता, टलति दुर पापा ॥ १४ रे, सुथान मियी उरे, जसाए थम जाग तो, सुदिव मध माव तो ॥ १५ ॥ मुन्नताण मीर सवता, अनेक पार देवता, पेरो हेरे फतेपुर, गुरु सदा उदो परे ॥ १६॥ मरोट थान मूलगो, एकात चिच भी लगो, वीकाणयान वोधतो, मुथान भान गो- मतो ॥ १७ ॥ प्रभारनारिणीपुरे, नीसाण वाजता धुरे, भेटो नर मनेर, जगन सहु हुवे जेर ।। १८ । नागोर नाम दीपतो, दाग देय जीपतो, तोरण तेम सोहए, जगत्र मन मोहए॥१॥ सम्प मेडते सही अपार लच्छि निहा लही, महिम माल पूर तो, लाहार दुग चूरतो 1॥ २० ॥ क्ला अनेक आगरे, छत्तीस परन मूलरे, दादेरी करत सेव, हिश्रा तुरका देव ॥ २१ ॥ मदामिद्ध सागानेर, जालमी करत जेर, अमरसरे फ्ला अनेक रासतोज तोड़े टेक ॥२२॥ मालपुरे मुझमान, सान सान सेवे थान, नाणपुर राज रीत, जैतारण जगजीत ॥ २३ ॥ सोझत मुम्ब सहय, रेना तटे विरुदय, पेजटले खरो सदा, वाहड़मेर मपदा ॥ २४ ॥ जोधाण मिले जातरा, जुहत देश देशरा, वीर- - सद्गुम्छ ' . - मपुर तिमरी, करत नृत्य अमरी ॥ २५ ॥ जालोर जैतमिहरी, खभायते स्वराखरी, प्रगट श्राप पाटणे, सन्त सुग्य यापणे ॥२६॥ अनन तेज अहम्मदा, सुमगलोर सर्यदा, साचोर भुज सासतो, तुरत शत्रु घासतो ॥ २७ ॥ जइपुरजईडरे, सेगावे कोटदगुडे, गुरु सदा उदो करे, एकात ध्यान जो धेरै ॥२८॥ भमत भाण जे तले, कीरति कोटि ते तले, कहू केता जीभ एफ, कोडयी कला अनेक ॥ २१ ॥दोहा-कला श्रीक कुशल गुरु, समरया होय हनूर । अलगी टाले आपदा, जिम अधारे सूर ॥ ३० ॥ फलश-पूर तेज तिम सूरि घरि आपद भर टाले, माचित्रा ज्यू मया करी सेवगा प्रतिपाले, मन बधित माइ बाप कुशल गुरु का मित दाना, पूनम पूजे पाय रहे ध्याने जे गता ॥ ३१ ॥ सुप्रसाद मोम सुन्दर मुगुरु अमय सोम प्रोलग सरी, प्रगटियो भ पालीपुरे विजयसिंह तीला वरी ।। ३२ ॥ इति रुशल गुर छद सपूर्णम् ॥ सदगुरु छन्द तीसरा। दोहा-परतिरा परचा पुरवे चूरे सार कोहि ॥ श्री जिन कुशल मुनिंदवर वर्ण दोय कर जोडि ॥१॥ छुटकर छोड सद- गुरु पाय लागु सजन पर उच्चव धणो, वरनयर देरावर वखाण सात थूम सोहामणो, परतित्व परचा सयलपूरे दुरिय पूरे सत विणो, जिनशल सूरीसर निरजा दियो हेरखे अन्हतो ॥२॥रिधनायधनराज सा पुत्र रेय यपुरिया, रो भागिया सोभाग अप्पे मुख मपे जात्रिया, इक चिरा भ्यारे सुगुरु श्रह- गुरुगुणरत्नापली। . निगि तिहा चिंतामणि जिस्मो, जिनकुरालमूर्गसर शिरोमपि बमुट्वटदाता इन्यो ॥३॥ सड महति सडसड सर विछूटे जति जोर विडिये, सड पनि बग्ग महार बम्जे कुति कुजर गड़िये, हुकार भरण हफे भडो भट इम्ये रण सदगुरुसरे, निन सुशल सूरीसर प्रसादे जयति निश्च ते वो ॥४॥ यतरहघाट, पुनति पथी पड़े जेहनिमालूया सूफत होठ मिलत लोयगा लगजीहाता लुया, गयजीव श्रामे नाक्सामे मुगुरु नाम जिसे कहे, जिन उशल सूरीसर प्रसादे नीर निर्मल ते लहे ll अल्लोल जल मल्लाल माला मगर मच्छ भयर, घणघोर नीर, सुतीर सायर सयल जन धुन्नेमर, बुद्दति वाहण मन्भिज जिन धुशल नामति उच्चरे, जिन कुशल मूगमर प्रसादे तारि सकट उद्धरे ॥६॥ बासिह विसहर सि पिम नर चदि खाना मधण, सायणि साइणि मोगल मोगा जाग्यररखसमय धणे, ममरत सत्गुर नाम परिजे मर जे प्रनिति भणे, जिन उशलसूरीसर प्रसादे मिले चिनिधि अगणे ||७|| गलवे मरहट मेदपाटे मूलनाने महले, घण घाट लाट कपाट सोरठ गुजराते सिंधले, खुरमाण गजनीपमुह देमा माहि महिमा जागिये, जिन कुशल सूरीसर शिरोमणि सुगुरु रम यवाणिये 11८11 नायना चदन मेल केशर मुगुरु पूना निन करो, मृगनाभि अगर कपूर भेली मोग उग्गा हो गरो, नारेल नेवज दाई अागालि गीत गाये भामिनी, जिन कुराल, सूर्गसर प्रमादे श्राम पी मन तणी ॥ ॥ कलश- श्राम्या पूगी माल मुरि किन कुशल पमाने, देसोरी वर तमणि रप्नि मधुर धान गारे, ममरथ मरगुरुगय पायमा म निन नम्बर --
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गुरगुरणलायली। . अग यता लीलपती ॥१०॥ युपति गुए लाया नैतमिरी, । भल चौसठ भेट क्ला सू भरी, लखीरे श्रातार लियो,' दुल जाए के भाण उद्योत त्यिो ॥११॥ जन मन पुत्र भयो जयकार, सघोपे वाजिर मगलाचार, अनग रूपा निमा उणियार, क्लिक कुदण देव मार ॥१२॥ यथते वेसथयो वटवीर, सराहे योगींद्र शील सधीर, इत जिन चद भट्टारक थाय, म मय जीत महा मुनिराय ॥१३॥ तपे सहु सूरतिया सिरताज, दिया घर छा गरीब निनाज, बलाबल हाजर बावन पोर, मली जेरे चोमट योगणि भीर ॥१॥ भयभीत पेस्वर दर भजे, फिर पच नदी पच पार मझे, डरे तार डारण दानव देव, सकेनाय पारए चारण सेव ॥१५|| अहो तपतेज अभीत गोनाड़, महा- वन सघर मेर पहाड, पगोतल लोटे छत्रपती जयभार इसो महा योग जती ॥१६॥ दोहा-गह सनियाणे जगत गुर, बाया गक पनि पाप, भेटण आवे भूपती, पुढया मुण परताप ||१७|| मनी जेव्हो दल मुगट, कुअर साथ फिवाह, विधि हित प्रायो वादया, लायक सपलियाह ॥१८॥ श्रीजीरी वाणी मुरी परे बचन कर जोट, श्र धरू सुत प्रापरे, महीपति गरपति मोड ॥१६॥ भागे ही सुर अग्गियो, स्वप्ने वायफ साम, कुल दीपक भल हल कमन्न, जम्यो तो घर जाम ॥२०॥ यही जे तो सुत परमसी, जोग समन मिहत्य, ममपे निननद सरिने, कुल म रहसी क्रम ॥२१॥ चित हित कर छाजह तणा, वचन सुरणी परदाय, श्रम्हा होमी श्रापाठ सिद्ध लीनो क्ठ लगाय ॥२२॥ भूमडल विच भमर पृथ्वी लोनमुपाय, इतरे श्रावण श्राधियों, - मद्गुरु बन्द बदल गहर बणाय ॥२३॥ धर गुज्जर मगल धवल, थिस्वा नै थार, पाटणचद पधारिया, पणाहुआगह गाट ॥२४॥ मवत तेरमतरत्तरे, पेठो चट रिमाण, तपे पाट कुरालेमातिए ज्योतिवत घण जाण ॥२५॥ छंद मोतीदाम-तिण पाट तपे कुरालेसकि मो, जिनदत्त चीयो जिनचद जिसो, बुल इस समो- पम देव पला, अवतार यो शमु पहला ॥२६॥ नग नेत्र झलोमल कम्मल नूर, परमल गान सकोमल पूर, दीपे धन सार महा सुर देह, अनत भुजारल रूप भव्ह ॥२७॥ धु जिन धर्म चले सुधराह, बडा इद्र देव वरवाणे वाह, जीता जिणे पाचे इद्री जोध, कदे तस कामन च्यापे क्रोध ॥२८॥ पगपग जीव दया मनिपाल, ठावी जेरे मोन तणी मन ठाल, महा सिद्ध योगींद्र भूप मरद, समेवपु भूमण शील जरद ॥२६॥ वणे सिर ऊपर रोप वेराग, धरे मन धीरज लागो भ्याग, क्षमा खग्ग साहि कमा खल खट्ट, जिसो मृगराज कुरग झपट्ट ॥३०॥ करा दृढ झाल विवेक कमाण, भरयो गुण वाण बडो भोथाण, चमाचम चीजल चारित्र रोल, फरे गज अग दुभादस फेल ॥३१॥ इसो तप तेज अभग तुरग, नवे पद जापनेजान वरग, महा भड जीत त्रिव मदन, वघे पण पोरस जोस बदन ।। ३२ ॥ जपे ऋषि जोगीद्र जयर कार, यदे पग चौविह सघ जिवार, गावे गुण गधर्व नागेंद्र गोम, भणे मुख कीरति सारी भोम ॥ ३३ ॥ दोहा-नय तत्त भेद गजोग युत, पथ सजम प्रतिपाल । नन्यासिये सुर वर निडर, हो अमर हटि पाल |॥ ३४ ॥ देराउर पुर सिंघ दिसि, प्रगरी ज्योति प्रमाण । पग पूजे हिन्दु श्राण पति, मीर पीर " , गुरणपरत्नावली 1 मुगलाण ॥ ३५ ॥ कमल २ चढती क्ला, इला मनाचे पाणं । गदसरतर कुरालेग गुर, दादो जैन से दीवाण ॥ ३६ ॥ छद मोवीटाम-दादो जिन धर्म तणो दीगण, ग्टे जस रानिद रावल राण, दाता मन बषित है वरदाय, पृथ्वी सहु हाजर सेवे पाय ॥ ३७॥ निरमल गग अनौपम नीर, अरचे चढन पूल शीर, घगो घनसार कस्तूरी घोल, चढे रंग केसर चोल ॥ ३८ ॥ भिगा मिग दीपक ज्योति झलक, मती विव मडल माण भलक, गिले श्रटगय उघूप महक, गारे -छग्गे गीत गहक ॥ ३९ ॥ वधारे श्री फल उनलगन, पूीचने चादि मिटाई पान, करे नवनेन ढोवे कोटि, जपे मुरा जाप पि कर ओदि ॥ ४० ॥ इसी विध तीनेही टक अभ्यास, स्वरे मन पूज करे पट् मास, जतावे रूप तुरतनयार, तसे गुरु देवतो लारिन यार || ४१ ॥ मिले पर सपत मगले माल, सदामद भोजा साफ रसाल, पाये नित दूध कटोरे पूर, सन्ची जन उच्छव ऊगे सूर ॥४२॥ तीया मृगमद लगा तवाल, करे अग न्हाण कपूर पठोल, वामा पनिवत्ता नपण पिशान, भलो मुखचर विराजे भाल ।। ४३ ॥ पृथ्वी जम कीरति पूत सप्त, अनमी प्राय करे प्रमतूत, मोती मणि माणक मदरडा, कर करण हेम जड़ार कड़ा ॥४४॥ बडा अग अोलग वाम सराम दो दिस हाजर मासी दास. पर जोद पणा नर सेब फेरे, धर भोग वे चामर छत्र धरे ॥ ४५ ॥ सुवासन आसन रथ सहल्ल, महा सुख माणे रंग महल्ल, पाराहित कच्छी खग उत्तग, मदोमत घूमत जूथ मतग ।। ८६ ॥ अटी मद महिपी गाया थाट, मथाणे गोरस , . में माट, भरया नानिव शरसुट भदार, कृपा कर पाए तृठा ना ॥१७॥ कलग-कृपा कर परतार, पाप तूटो पल. देसर गणधर गौतम जंग, पुढया दाना परमेमर, सोमवार मिर- नात, पगट पूनम HिIT प्रानी, सरे पपन पतीम, भाव भगा अर माझी, मांजा ममद दातार, मही महन्न मरिमा घणी, कपिराज शैम यहिन फरण, धन हो धन गरतर धरणी,॥४८il इति राजमिह मुनि हन राल गुर छत सम्पूर्णम् । "प्रय मद्गुरु जिनदत्तमरि छद । दोहा-वरटायक हम याहनी, सारद मात सहाय । त्रिभु- वन गुग्च दातार त, कीरती किनी पाय ॥ १॥ जग माटे, पडित जिरे, भाचे अपिल वाण । ते प्रमात सहु साहरी, श्रगम निगम अहिनाए ।। २॥ वाणी वाल "यारणी, वैदक तेम विनाण। की मुख वामा तु करे, तद गझे राजान ॥३॥ श्री सद्गुरु सीग्यापिया, भापा पद रस भेद । जण २ मुख वासी जुई, सुरणता वधे उमेट ॥ ४ ॥ गाऊ गुरण गरपति तणा, पदवी युग प्रधान । जगपुर महिमा जागती, श्री जिन दत्त सुजान ॥५॥ ज्या सेन्या त्या जाणियो, यो अन लियो मरद । जल यट थलवट जुगति सु, समरया लिये सबद ॥ ६॥ इण खोटे पचम अरे, पुची वडी प्रसिद्ध । गाम २ कोटे गढे, नगर २ नव निद्ध ॥ ७ ॥ छद जात मारसी-~-नवनिद्ध रिद्ध प्रसिद्ध वाधे गुरु जप्या गहगाटए, सुर असुर ऊभा परे गोलग थान आगल थाटण, परचा देखालण कर रालण गन्धखरतर .
गुरगुरणार नापी 1 - पतए, जिा दत्त सूरीस सद्गुरु मेवता मुख मन्त ए॥ ॥ !' मवत् इग्यारसे बत्तीसे सागवाड सुगजए, मत्रवी याचिग गोत्र ह बट, गृपता गजगजए, तमु धरणी पाहड़ देवी नामें, सत्ता शील समन ए || नि० || ६ || शुभ स्वम सूचित पुन जनम्या यदे कर वसावनी, याजिया ताल कसाल बहु विध, राग रगे। = मनरली, दश दिवस योरया हिवदगृटण पोखिया कर पतए । जि० ॥ १० ॥ तिण काल तिणहीन समे तिण पुर देग्य उच्छव हरग सू, गुर नाम जिन वल्लभ जती सर पजिया कर परखम् , तप जप्प सयम दया पालक किरण जिम जसु कातए । जि० ॥ ११ ॥ तसु पाय प्रणनी अंग ऊलट आण मन उच- रग प, हग्यारसै इकताल भवन् प्रधा रत गुरु सग ए। जिन बचन किरिया शुद्ध माधन श्राग मन एकात ए॥ जि० ॥ १२ ॥ इग्यार अंग उपाा बारे भेद भाव भला भण्या, गुरु यचन सहिता विनय यहिता सत्र मदि पर ये सुगया, सतशील सजम शुद्ध समकिा सह विध सोग्यत | जि. ॥ १३ ॥ गुरु देस प्रणिमा शिष्य महिमा वलिय गरिमा गज ग, सगलाई शिष्या माहि दीपक राम राणा रज ग, उद्योत- फारी ने प्राचारी शुद्ध धर्म सझन ए | जि०॥ १४ ॥ अनु' झमे दिन २ पुण्य वधते ऊपनी मन पामता, परसिद्ध घटवय गग प्रगटयो सरदहे गुण सासता, परिणाम गगा नीर निरमल खरीपर मन खत ए || नि०॥ १५ ॥ निज पाट थाप्या करि महोच्छव इम्यार सै गुणहोत्तरे, सूरि मत्र साधन गुरु श्राराधन चमिमा सेवाकरे, मन माह 'प्राणी गुरु परपर मन शक्ति महत " फीया, परचा देखाड्या रोग झाइया लोफ पायलसनए ॥ जाप साधाय पाय पटत ए॥ जि०२२ वरमान चामठ जोगणी बलि दीया लीया गुरु कन, इण ठाम वहिने गिज बानी मान पला फलमने परिवार पूरे पाटधारी वनन मिस वर्गत झरकार ए ते मत्र राखी सघ साखाजग सुनम जयराए, अंबड सुमारग हाथ अक्षर दासानुदासादिक मही-गुरु युपत #fro ९॥ गुरु रि पुगंगार या परिसर मुजविरारे बरना, गोगरंगे मातु सगे धर्ग नाचा चरचना, गमान गणा न्य भाव मेटया पट गन ५ ॥ जि० ॥ १७ ॥ जालोर नयरे नीय नागी सगर ना चहु प्राण तनु पुन मोहित्य नेण क पय प्रगगिया गुण जागा जापाडियो कर जाप जिनदरा अन धर्म सझन | जि० ॥ १८ ॥ अजमेर नयरे तीर्थ पुर- कर गयना हर रग प, तमु पोतरी वामदेव नाग कियो उज्जल मग ए, कृकहा वग्गणी गायनो घी चोपड़ाया सत ॥ निक ॥ १८ ॥ परचा दिग्पाले दुरियटाले मा शन्ते माहनी, उपगार कारी दया धारी शोभ जगमें सोरनी, सो वर्णवर्णी कीध काया राद सहुमित प जि० ॥ २० ॥ 43 बडे गामे ठाम ठामे... भूपति प्रति बोधिया, इक लवरय ऊपर सहम तीमा फ्लू में धावक - , नि० ॥ २१ ॥ गुना। मीरा पच पीग पच नरिया परिसरे, गोमट्टि जोगण वीर चायन दस दुनिया थर हरे, जपमान जाना जि० ॥ २३ ॥ पठिकमण माहे बाज लीना देव या तुम्ह पाय लागी मीख मागी बुघडिये दासत ए ॥ नि० ॥२४॥ रे प्रगट 'अनर जाणने जुग नर गही, परमिक जुग प्रभाग
गुग्गुणरत्नावली।
पदवी अविका वग सन ए ॥२॥ मेतरामरे सीह सामत तामुमुक्त
श्राम्था, गुर पाय लागी ऋद्धि मागी सरल विधि मुविधान
प, परिचम दिपि तुम्ह भाग्य फलसी राष्ट्र यश उधत ॥जिक
॥ २६ ॥ दिव उच्च नगर पड़े उच्छव प्राविया उण थान फै,
मुरपति पुत्र प्रमाण जाणी अजम मन मे माण के, करि जाप
विद्या बल बुलायो हर्ष लारु हसत ए॥ जि० ॥ २७ ॥ इण
विधे विक्रम पुर विहार मरि उपद्रव मेटियो, करि शात याणी
वाट पाणा सर रोग समेटियो, श्री सघ सगलो मुजस पाखे
कवि कीति कहत ॥ जि० २८ ॥ बटनगर माहे एक ब्राह्मण
जैन द्वेपी जाण ए, देहग द्वारे मृतक गमनी घीस नानी बाग
प, परकाय में परंश विद्या प्रगट कर पर सत ए॥ ज०
॥२२॥ उज्जैण नगर देव यात्रा बज थम विचाल ए, प्रच्छन्न
विद्या सोवनी विधि निण ममै ततकाल ए, लघु लाघवी कार
उरीलीधी दिवम तिण दीपत ए | जि० ॥ ३० ॥ सवत् बार
इग्यार बच्छर गुर थया निरनाण ए, आमाढ मासे तिथि दग्यारस
शुक्ल पक्ष सुजाण ए, अजमेर नगर वडे उच्चव पादुका पूजत
ए । नि० ॥ ३१ ॥ इम फिट' बटुला जगत माहे कवी कहो
कुग कह सके, मुर असुर सगला पाय नामी ताहरी सरणो
तके, दोलन दाता मुक्म माता पुहवी जम पभरत ॥ ॥ जि.
॥ ३२ ॥ वल बिद्र साहणि डायणी महि भूत प्रेत भयकरा,
जिन दरा जाप तुरत त्रापे प्रसन्न होय जावे पग पलि रोग मांग
पदेन न्यार गुणी जन गहरतग ॥ नि० ॥ ३३ ॥ वन्नि वाट
मारे गा पार कष्ट राट केनला गुभ रुप पुर कला मननि
।
जिनदत्तरि धन्द। 1 और चाहे जेतला, भूखिया तिमिया दिये मोजन पचत जस परत ए॥ जि० ॥३४॥ कलश करित्त-श्री जिनदत्त सूरिद अस मारे जग सारो, श्री जिदत्त सुदि भाज धारो वरतागे, भी जिनदत्त मूरिद सेवता रिद्धि समप्पे, श्री जिनदरा सरिद कष्ट इन सब कप्पे, विद्या निधान पाठक विनय श्री रुघपति पाठक सक, गुण ताल ममे गहगार मू रचियो घद मनोहरू ॥३५॥ इति विदत्त सूरि गुरु पद सपूर्णम् । राग करखेफी (छंग)। 'प्रेम मन धार नित पहर परभात रे, विविध जसपास गुण रासादो, अमल भाखियात विखियात गुण इण इला, दीपती देव जग माहि दादो ॥ १ ॥ घाट रिपु थाट जल बाट, भोपट घणे हणे मह आपदा भय हुय हरे, सूरि सिरदार दै सफल सुग्व सेवका पूर नित कुशल जिन कुशल पूरे ॥२॥ अधिक पण झाड उजाड अवगाहता लस्करा तस्करा पडया लारे, धींग गन्यगज रो ध्यान मन ध्यावता, विकट सक्ट सहु निकटवारे १३॥ पटकनी भाजती धूड़नी बेडिया, पार उतार जिन विरद पायो, तुम सेवक तणा दुख भाजे तुरत, धर्मसी कुशल गुरु नाम ध्यायो॥ ३ ॥ इति ॥ वावन वीर किये अपने वश चौसठ जोगणि पाय लगाई, डाइणि साइणि भूबर सेचर भूतम मेत पिशाच पुलाई, बीज “पटक भटद रहे मन मादि सदधनराई, कहे धममिहल कुण लोह लिये जिनढरा की एफ दहाई ॥ १॥ .
गुरगुणरलाचली। राजे धूम ठोर २ ऐसो देव नाहि और दादो २ नाम । जगत जस गायो है, अपने कू भाव आय पूजे लोक लक्षपा प्यासन इराण माहि पाणी प्राण पायो है, बाट घाट शत्रु था हाट पुर पट्टण में देह गेह नेह से बुराल परतायो है, धर्ममि ध्यान धरे सेमका कुशल करे माचो श्री गिन कुशल सरि ना यू कहायों है ॥ २ ॥ कुशल अग उदग्ग कुशल विणजे व्य पारे, कुशल देव देहरे उराल घणराज दुपारे, पुण्यपसायें कुश कुशल श्री सघ भणीज्ने, पाहण पाने कुराल कुशल घर २ गाईज निन चद तरि पुह पट्टधर नाम मत्र आरति टले, जिन कुश सरि पाय पूनता नव निधान लन्मी मिले ॥ ३ ॥ कुशल बड़ी ससार कुशल सज्जन जन चाये, कुशले मगल माल लच्छ पर कुराले श्रावे, कुराले घोड़ा थक्शन परिये मुवन्नो, कुशले धन पर- सत कुशल धन धन रवन्नो, ऐरसो नाम सद्गुरु तणो दशले जग रलिया मणो, निन कुशल सूरि जप्या जुगत पर २ होय वधा- मणो |॥ ४ ॥ मिश्री घृत क्षीर ग्लाय मिलाय प्रभात ममें गटके गटयो, मुग्बगस निनास सुधारण कृ मन मेल मिले मटके मटके, भली प्रद्धि बड़ी दिल रजन क्सन श्राय मिले सटके सटके, कहत्त नुगत मिल्या गुरुदेव नमू लटके लटके ॥ ५ ॥ मसूर पठाण गरर फियो भह या याद बदू कोई पडित जागे, साह सलेम बुलाय श्री पूज्य कू मोहि भरोमा चदन भाग, भट्ट हार गयो इक चाट रामद्द की जीत भई यू जैन के नागे, वाद पीनो तिन चद भट्टारत यू पतमाह दिल्लीपनि आगे ॥६॥ रुघपत जिनदत्तमरि छन्द " 1 and मात्र मृग नयण चले गुरु बदायूट गानू गजराज घटा, रण नेउर हार चण्यो गल माल यती विच छूट लटा; * गायन गीत सुहागण मगल परत मोतिय चोक छटा, काकतो जिन चंद भट्टारक सनमुग्व जाके वादी हटा ॥ ७ ॥ अपर पानशाह प्रतियोधक जिनचंद्र गुरु छन्द । गेनी सतन की मुख वाणि सुणी जिन चंद मुर्णिढ महत अली, तप जप्प करे गुरु गुज्जर में प्रति बोवत है भवि कू पुगती, तब ही चित चाहन चूप भई समय सुदर के प्रभु गच्छ पत, पठाय पतिसाह अजन्य की छाप बोला ए गुर गजराज गति ॥ १ ॥ जी गुज्जर ते गुमराज चले विच में चउमास बालोर रहे, मेदनी तट मत्र मटाण कियो गुरु नागोर आदर मान लहे, मारवाड रिणी गुरु वदन कू तरसे सरसे पिच येग वहे, हरप्यो सघ लाहोर आये गुरु पति साह अकन्वर पाव गहे ॥२॥ एजी साह अफव्वर बन्दर के गुरु सूरत देसत ही हरसे, हम योगी जती सिद्ध साध व्रती सब ही खट दर्शन के निरखे, तप्प जप्प दया धर्म धारण कू जग कोई नहीं इनके सरखे, मुन्दर के गुरु गच्छपती यूं साह भाबर ने परखे ॥३॥ गुरु अमृत पाण सुणी सुलतान ऐमा पतमाह हुकम्म किया, सब पालम माहि अमारपलाये बोलाय गुरु फरमाण दिया, जग जीव दया धर्म दाक्षण त निन शासन में जो सौभाग लिया, समय सुन्दर के गुणवत गुर ग रेन्वत हरस्थित होत हिया ॥४॥ हेजी श्री जी गुरुधर्म गोष्टि मिनी सुलनान सलेम अरज करी, गुरु जीव दया मन चाहत है चित अनर प्रीति प्रतीत खरी, . p- समय -- १२ गुग्गुणरत्नावली। कर्मचद बुलाय दियो फरमाण छोडाई सभायत की मधरी, ममय मुन्दर के सन लोकन में है खरतरगच्छ की रयात खरी ॥५॥ हे जी श्री जिन दत्त चरित सुणी पति माह भये गुरु राजीयरे, उमरान सने कर जोड़ खड़े पभणे अपणे मुख हाजीयेरे, चामर छत्र मुरातिब भेट गिगड़दू धूधु वाजिये रे, समय मुन्दर तू ही जगत्र गुरु पतिसाद अन्वर गाजिये रे ॥ ६ ॥ हे जी ज्ञाा पिनान कला गुण देख मेरा मन सद्गुरु सैझियेरे, हमायूको नदन एम अग्वेमानसिंघ पटोघर कीजीयरे, पतसाह हजूर थप्यो सिंह सरि महाण मत्रीश्वर वीझियेजी, जिन चर्द पटे जिन सिंह सूरि चद सूरज ज्यू प्रतपीजियेजी 1) ७ ॥ हे जी रीहड़ वश विभूषण हस खरतरगच्छ समुद्र शमी, प्रतप्यो दिन माणिक्य सूरि के पाट प्रभाकर ज्यू प्रणम् उल्लमी, मा शुद्ध अकव्वर मानत हे जग जाणत है परतीत इसी, जिा चद मुणींद चिर प्रतपो समय सुदर देत श्राशीस इमी ।। इति श्रकन्वर पाति साह प्रतियोधक दादा श्री जिन चद्र मूरि गुरु श्रष्टक पद । - अध अष्ट प्रकारी पूजा प्रारम्भ । दोहा-क्षारो दधि जल अमृत निधि, गगा गोमती वार, वचन कामित फलश भरि, चरणहवण करे सार ॥१॥ श्लोक-दिपेस्नपनतपनोत्करिमा, मरिभासितसत्क्रमणम्यगुरो घरवारिभिरादरितस्त्वरित, तरुपुप्पालापमवासरनै ॥१॥उँही श्रीं श्रीसद्गुरोर्जन निर्विपामितेस्वाहा ।
सद्गर "पष्टमकारी पृजा। १३ । . पदन केशर || टोहा।। फम चटा चरचिय, कस्तूरी पन सार, मरन सुरभिव्य मेलिये, कारये विधि विस्तार ॥१॥ म्लाक मुरभिमिश्रितक्रमची सुगुरुपादमहावुजसेवक । भविकरायफाललभनेमता, प्रपलमनिटमादिचिरमुदा ॥१॥ उदी श्रीस गुगेश्चद्रन निम्पिामिने स्वाहा ।।२।। दोहा-चपप, जाई मोगरा, केतकी, पल गुलान, सदगुरु भरणे रयाइये, भर २ सुन्दर वार । ग्लोक-सपूरितादशदिशा- धवलाभिरूप , समोहितालिगुणगीतयुतश्चपुष्पै 15 तेभ्य समर्चित पर परम लभते, श्रीजनचद्रगुरुपादविलामलीलम् ॥१॥उँदी पुप्प निर्विपामिते म्वाहा ॥३॥ दोहा-'अगर तगर भार मुरगि, चदा नदा मोद, भी जिनकुशलग्गुिरु, यामित परम प्रमोद ॥१॥ श्लोक-गुरराज पदेवरवासमय,भविक किल पूजयते प्रथितम् । जि देहजनजयत स्खलु, बहुद्धिसमृदिनिधिप्रथितम् ॥१॥ उँहीं श्रीं धूप निर्विपा. मिते स्वाहा ॥४॥ दोहा-रत्न जडित कचन मई, थाल नहीं कर माहि, गगल दीप भानो धरो, अशुभ टरे छिन मादि ॥१॥ श्लोक- विशालरूपादिसुपर्णपात्रे ,तिपायदीपचवराससडये यायकादीप- मयाचपूजा, भृश विधाय सुतरा मेण ॥१॥ उ ही श्री सद्गुरो दीपनिर्विपामिते स्वाहा ॥५॥ दोहा-अक्षत याल रसाल भर, स्वस्तिक पूजकरह, स्वस्तिक भती विध नीपजे, टोहग दूर टरेह ॥१॥ श्लोक-अमूत्य मुक्ता गुरगुरणग्नारली । तीन भुपन अथ सिद्धगिरि स्तवन लिख्यते । आज थापे चालो सहिया, सिद्धाचल गिरि जइये, सिद्धानल गिरि जइये बरनी, उज्जल गिरिवर जइये ए ॥ श्रा० ॥ सुण बहनी ये गिरिशी मरिमा, प्रादि निनद इम गाये, भरताविक नरपति ने श्रागल इदार्दिक सब सासी हे ॥ श्रा० ॥१॥ साश्वतो तीरथ ए सेनुनो, जोता लागे मीठो, में इण गिरि ताले, चीजो कोहया ढीठो है ॥ श्रा० ॥ २ ॥ इण गिरवरिण काल अनते, सायु अनता सीधा, जनम मरणना दु ग्य छोडीने, श्रमल अक्षय गुण लीधाहे ॥ श्रा० ॥ ३ ॥ इण गिरि सन्मुग्व पगला भरता प्रतिम शुद्ध म्बभागे, कोडि भाग पातिक कीधा, एक पलक में जावे हे ।। श्रा० ॥ ४ ॥ नीरजन सू नेह धरीने, पागल ओलग करस्या, अदभुत प्रादि निनेसर निरखी, प्रेम सुधारस पीसा हे ॥ श्रा० ॥ ५ ॥ पुष्प सुगधा लेई पचग्गा, हार सुरगा गूथी, पहिरानी प्रभु कटे लहस्या, शिव मारगनी सूची हे ॥ श्रा० ॥ ६ गहिरस्वरे जिनवर गुण गाता, जानगिनाए करिये, मनगमती भगती रिच भमता, भवसायर निम्तरिये हे ॥ मा० ॥७॥ पूर्व निनाणू वार प्रथम जिन, गयण रूसे श्राया, ए तीरथ शुभ भावेफरमी, परिये निर- मल काया हे || श्रा० ॥८॥ लाभ उदय ए गिरिवर लगिये, रहे इस केवल ज्ञानी, श्री जिन चल मदा हिताच्चल, प्रेम घणे मन पाणी हे ॥ पा० ॥ २ ॥ इति पदम् ।। नमो रे नमो सेनुर्जागरी रे, किरण शुद्ध निकाल रे, पाप पटल रे हारे, तूटे परम जलाल रे । मो० ॥ १ ॥ परव सेबुजय स्तवन । ३ नेनाणू समो मस्या रे, प्रथम जिनट नगदीश रे बावीसम नवर बिना रे, समक्सया तेवीस रे ॥ नमो० ॥ २ ॥ मधु अनत अण सण ग्रही रे, सीधा पहीज ठोड रे, काल (गामी बलि सीझ ये रे, साधु अनता कोड रे । नमो० ॥३॥ निंत कल्याण भमिका र, महिमा यत महत रे, साम्चतो तीरभ सही रे, अति सय जाम अनतरे }} नमो० ॥ ४ ॥ कोडि भनातर जे किया रे, पातिक विविध आय रे, सेज स मुग्व चालता रे, पग २ ते सहु जाय रे || नमो० ॥५॥ धन दिन तहीज जाणन्य रे, यहम्यू सजा केरी याद रे पहरी यया विध पालम रे, सघ सहित गह गाट रे ।। नमो० ॥ ६ ॥ पग उदय अनि घणारे, पग २ याचा दान, प्रेम भक्ति माहमी तणी रे पर पगार प्रधान रे ।। नमो० ॥ ७॥ धन से गिरिराय निरससू र, यती मगल माल र मणि मोतीय डेरामू रे, ग्जत सोवन भरी थाल रे ॥ नमो० ॥ ८ ॥ धन लिन गिरिराय फरससू रे, करम्यू पावन मोरी काय रे, भक्ति युक्ति जुहारस्यू रे, नाभिादन जिनराय रे ।। नमो० ।। र ॥ द्रव्य भार कास्यू मुना रे, पूजा विविध प्रकार रे, मारे भावा भाव रे, करम्य मफल अवतार रे ॥ नमो० ॥१०॥ रत्न नई ममती भली ने, देय ते घर बुद्ध ने, भर २ भमण निवाग्भ्य रे, करम् सातम शुद्ध रे ॥ नमो० ॥ ११ ॥ विधि फागन मन माहगे रे, मोहि नया दिन रात रे पुगय प्रपल था पामया रे, जनल गिरिग जान रे ॥ नमो० ॥२ नाव सुनाउपमार नीरे कारज नाता मिद्धरे रेनिन - - - । ३ मुस्गुणरत्नावली। - - - सग, दृरथ की परिहरिये ॥ वि० ॥ ६ ॥ एक्त श्राहारी में सचित्त परिहारी, गुरु साये पद चरिये ॥ वि०॥ ७॥ पडि- धमणा दोय विध सू कीर्ज, पाप पडल विष हरिये ॥ वि०॥ ॥ पलिकाले ए सीरथ मोटो, प्रवहणशम भर दरिये ॥ वि० ॥ २ ॥ उत्तम ए गिरवर सेवता, पा कहे भय तरिये ॥ वि. ॥ १० ॥ इति पदम् ॥ अथ उपाध्याय श्री रामलाल गणि कृत गुरुगुएरलावली। शाति चदन बज देख नयण, मधुकर मन लीनो रे (चाल)। श्री सद्गुर का दरस सरस म्हानू प्यारा लागे रे ॥ टेर ।। श्रीजिनचद सूरिंद पटधारी, जिन शासन के उद्योतकारी, भक्त- यत्सल गुण अगर नागर, ज्योती जागेरे ।। श्री स० ॥ १ ॥ रावत राणा आणा माने, परचा तेरा सब जग जा, ऋद्धि वृद्धि सुख सपत पाणद, गुरु से मागे रे ।। श्री म० ॥२॥ महर निजर मुझ ऊपर कीजे, शुद्ध दरशण अब मुझ को दीजे, उदय २ कर परगट सानिध, परिगण भागेरे ॥थी स०॥३॥ निन चारित्र सूरि पदयने, मय भय पातिक दुरित शिपदे, पाठक राम गुरु चिरनदे, गावत रांगेरे ॥ श्री स० ॥ ४ ॥ इति पदम् ।। . राग। चेत नर क्यूं भुला अज्ञान, धरो जिन कुरान सुरींद का ध्यान || टेर ॥ मिथ्या मति क दर हटा कर, समक्ति दिया निशन दया सत्य व्रत अनुभव दीना, धीना अमर विमान मगुम छन । १०१ - , -- । पो० ॥ १ ॥ काल अनते चिहु गति भमते, मिले कुशन्न गुज्यान, इम भव ऋद्धि परभव सिद्धि, मिले अचिंते पान ॥ धगे० ॥ २॥ सिद्ध योग है नाम अमोलक, रत्न चिंतामणि मान, कामधेनु सुरतरु है परतिख, महिमा जपे जिहान धगे० ॥ ३ ॥ सोमवार पूनम दिन ग्ण, जोति नागती थान, कर एकाम चित्त चरणन में, देते दरशण आन । घरो० ॥ ४ ॥ कुशल करण प्रगटे भघि जन के, धर्मशील पहिचान, जिन चारित्र सूरि के सदगुरु बुशन राम कल्यान ॥ घरो० ॥ ५ ॥ इनि पदम् ॥ राग गालो वादो। देख्या गै दरश तिहारा, श्री मद्गुर महागज ! 10 टेर ।। मफली फली मन पाशा, फली म० । पाया मुग्तर भाज ।। दे० ॥ १ ॥ तुम हो चिन्तामणि जैमा चिताम० ॥ दायक सब मुख माज ॥२०॥ गगा भगण में प्रगटी, अग०॥ मुम मा शिरमल कान | दे० ॥२॥ गुण इद्धि मपत काजे, सः ॥ काम धेनु गुर राज ॥ दे० ॥ मर सिद्धि लीला प्रगरी, लो ० ॥ दुख लोग गर भाज ॥ दे० ॥ ३ ॥ गुरु तुम्ह पर- उपगारी, १० ॥ मुरपद शिवपद पाज ॥ ३० ॥ शुभ थान पुर २ साहे, पु० ॥ मुलक बीकाणे रान ॥ २० ॥ घर गच्छन्यातर राजा. स. ॥ धर्मगीन रहे गाज ॥२॥ T नाम राम ऋद्धि मार्ग. नपे पाठर मिना ॥२०॥६॥ इति पदम् ॥
गुग्गुणारत्नावला। . जग मे अमर राजा भरतरी (चाल)। मगुरु दीनदयाल, गछपति दिनकर तुम धणी ॥ रेर।। सवर जन प्रतिपान, दुखतमहारण दिन मणी । स० ॥१॥ गढ मवियाणेगी देश, छाजेष्ट युल उदयाचले, जिल्ला साह पितेश, नयत मिरी अपर भले ॥ स० ॥ २ ॥ गइपति चद मुनीद, पाट तिलक किरणावली, स्वरतर कमल श्रानन्द, तेज प्रकाशन मन रली ॥ स० ॥ ३ ॥ पुर पतन सब देश, मिग मिग ज्योति झिग मिगे, पूनम में सोमवार, नर नारी गुर श्रोलगे ॥ स० ॥ ॥ श्ररचे अतर फुलेल, परिमल फूली मालती, महके घपक बेल, सुन्दर श्रावे मलपती ।। स० ॥५॥ शुभ थिर थूभ पीण, यालूचर महिमा घणी, कीरत वाग प्रधान, दुस भजन चिन्तामणी ।। स० ॥ ६॥ पूरो यदित आश, चाया तुम मुनिजर तणी, दाता मुत्र फेलास, चरण गरण किंकर भणी ॥ स० ॥ ७॥ पूजे पद गोविंद, चन्द्र शिखर जय राम में, कोटिक गण कुल चद, दुराल रिन्द प्रकाश में || ८ ॥ उगणीशय अउताल, मिगमर बदी दशमी करी, दरशण अतहि विशाल, कुशल निधान हरख धरी । स० ॥ ॥ गुर गुण सरिता नीर, मीर मगन उल्लास में, लक्ष्मी लील समीर, ऋद्धि सार जसवास में ।। स० ॥ १०॥ इति पदम् ॥ राग आसाउरी। सुगुरु मेरी मइया पार उतारो, तू पण अव माझी हमारो ।। मु०॥ टेर ॥ सरिता भाद्रव नीर जलधि ज्यू, ये ससार -- . - आगे का तट पापार र पद, ताशे वगा दातागे । ३० ॥ १॥ गग रग इक जीरण नौका, तिर रही भरममा पागे, में बेटा परमाथ साना, मोह मगर में उधारो ॥ २० ॥२॥ भस्त उपारण श्री सद्गुरजी, जलती कार नियागे, जाण बाल गगारनि फणानिधि, या विपतित र सागे । मु० ॥ ३ ॥ उकापात गगन विपयारा, दाम श्रतहि कगरो, विग्ह स्पमा कि निशि अधियारा, फोण करे निमतारो ।।मु०॥ ४ ॥ भमा विष्णु जर फोर्ड ईशा, 'भाना उगया प्यारो, मैं ध्याउ लिन देव कुशल गुर, अग्गिया गवन रारो ॥ ५॥ मुग्ण अरजी आपे गदत्तमहर, तुरत ही विधन विडारो, गामागपुर घाजीग गर्ने, कुशल निधाा जुहाग ।। २० ॥६॥ गोइयगा गुरु । लक्ष्मी पापत, हुकम धेरै ययुधारो, मैं । सेया परगा गमा की, माग गुरु दातारो ॥७॥ सरन उगा भाग, मेरु यो शी सारो, यणा गफत दिये गुगल सार तिहागे ॥ १० ॥ ८ ॥ ३शि पदम् ॥ सद्गुरुजी की पूना पर रे फर रे ॥ पा० ॥ माग दूरे र रे ॥ स० ॥टेर ) ये कलियुग भरागत भषा पषि, सद्गुरु बाह पकर प० ॥ १० ॥१॥ अगम अगार जिनकी महिमा, ना ध्यान चित पर रे, 'पग्र पुगय उन्य भये सरे, मिल गये समगुरु या रे य० ।। स० भय सकट चारण, पुश्मा तोपी हर रे, चन्द्र सरिक पाट प्रभा कर, उदय भयो दिन रे २० ॥ म० ॥ ३ ॥ उशन ३ ॥बाट घाट N 20 गुरुगुणरत्नावली । पूरीश्वर पुशल करण क, नित प्रति नाम समर रे, द्रव्य भाव दुय विथ ते पजन, कर भव सागर तर रे त० ॥ स० ॥४॥ म्वर संगीत ताल बुन गुरु गुण, गावत है नरवर रे, गाम २ धिर थम नगर में, परचा गुरु का जर रे ज० स० ॥५॥ लाल गुलाल अचार अतर में गुरु भक्ति अनुमर रे, जिन चारित सूरि पद बदन, राम भरण अनुचर रे च० स० ॥ ६॥ इति पदम् ॥ पुनः शेरी। होरी खेनो भविक सद्गुरु क सग, ति आन व उच्चन होतरग || हा० ॥ टेर ॥ मम्त महीना फागण आपा, श्री सघ से हिल मिल के मग ॥ हा० ॥ गिल शन्द करत म्वर झीणा, अली कन्नी के संग रग । हो० ॥ १॥ ऋतु वसत पानद पिया सग, गोरी गावत बनत चग ।। हो० ॥ ऐस साज ममाज भक्ति से. गुण गुलाल लिये गुरु के अभग ।। हो ॥ २ ॥ निरमल मन मकग्द सुधार, अतर पुष्प से चरचो अग ॥ हो० ॥ ध्यान पिचकारी अनन सुधारी, हिरको महफत सुरभिगग ॥ हो० ॥ ३ ॥ करत न गण में नण, ऋद्धि मार के मा उमग ॥ हो० ॥ ॥ इनि परम ।। हारी। ~ जयोलो पाम जिनेसर की (चाल)। मगुरुजी के द्वार मचा हाग ।। म०॥ आये भी मथ सर हिल मिन्न , मग लिय शाला जारी ॥ म० ॥ दीनन्यान मनमुर टारे पठन म पुर पुन गुण गौरी ॥मा ॥१॥ का पानी मग कनोनी, पजन है वाती गोरी । ग० ॥ ग गनान मन्यो सत्गुरका प्रवीर इशारत भर झोगे ॥ग० ॥२॥ धन.२ भाय हमारे प्रगटे, गगुर र पकड़ी डोगे । म || अति में रतन मा रिहरी चरण तोग ।।म० ॥ शामित मला ग नाता, गाजी या माले गांग ॥ ग० ॥ करत 'गम नरनि गार सुराठा, रत है तुम कर नाग | Ta |}} इति ॥ दत्त गुरु दग्ग निमारोजी, मैं प्याज सरे गा कर, । टेर । करिउ मुर्णी सत्ता मुग्य तेगे, दर ठेश मे पाया, नेक नजर फर सद्गुर मुझ पर नरणा शीश नमाया ॥४॥ 1211 अन धन लदगी मुग्व सपत पा, भरा खजाना पूर, नारे मुह को घदे स निल मर, दुख दालिदर ? ।। ६० ॥२॥ भागे विन्द क्यिा पहु तुमने, सन क्यू करते देरी, एक चिस से यान लगाता, शुद्ध मन उता फेरी ॥२०॥३॥ प्राशा घर कर रु प्रार्थना, बत्रित परण फीजै, लीला लहर पलक मे पाउ, यो जस सद्गुरु लीजै, ॥६० ॥ ४ ॥ माझा गत दिया गुरु ररशन, तेन झलामल पूर, भक्त वच्चल वरदाई प्रगटे, चद सूरमा ए | t० ॥ ५ ॥ श्री जिन यल्लम पार पीपक, खरतरगच्छ राजान, उदय २ कर सघ साल का, जिहान ॥ ३० ॥ ६ ॥ भक्तो के पाधीन परम गुम, किया ग दल ना, चरण शरण का लिया ग्रामग, गम चरणमा दाग ॥30॥७॥ इति परम् ॥ . जाणे सकल गुरगुणरत्नावली। मा श्राज ग वन्सेरे, चरमे सरसे सुगुरु दरराक, जियरा तरमे रे ॥ श्रा० ॥ टेर ॥ सायर ज्यू गभीर अनुल बल, धीरज मेस्जयोमर, मेघ घटा ज्यू भक्त जीव पर, 'ग्रमा सरसेरे । आ० ॥१॥ जिन वच सेती हिल मिल सदगुरु, भाखे वचन निडरमैरे, पचन ज्यू निरमैल ज्ञान गुण, भविजन फरमेरे ॥ श्रा० ॥ २ ॥ अपनीतल ज्यू तमा गीताना, पावना चदन करसेरे, तप बातप गुण तेज दिवाकर, शम शशिधरमेरे ' ॥ श्रा० ॥ ३ ।। मेवे सुरनर हाथ जोड कर, मुरपति ज्य गुरु दरमेरे, करपवृक्ष ज्यू बदिन पूरण, मानद हरसेरे, ॥ श्रा० ॥४॥ गच्छ चौगसी के गुर रक्षक, भूप रूप ग्वरतरंसेरे, श्री निन वालभ पाट दीपावन, दत्त श्रमग्सेरे ॥ श्रा०॥५॥ दरा विध यती धर्म के पालक, प्रगटे रतनाररसेरे, राम वारणा लेत चरगा का, ऋद्धि सिद्धि घरमरे, ॥ श्रा० ॥ ६ ॥ इति पदम् ॥१०॥ छोड गोरी छेलरो दुपट्टो (चाल)। दादा महिर निजर कर जोय, शोभा थारी जगत पणारे, । टेर ॥ दादा साहब मैं हु तेरा दास, मेरो दादा तू ही है धीरे ॥ दा० ॥१॥ थारा सुरनर सेवे पाय, धारा पूरण चिंतामणारे । दा० ॥ जग में नहीं है थारे कोई जोड, देख लोनी सारी ही दुनीरे ॥ दा० ॥२॥ दादो देवे अपुनियानं प्रत, धन हीनाने रतन मणारे ।। दा०॥ निश्चय मन जो ध्यावे थारो ध्यान, जावे आपदा दूर हणारे ॥ दा० ॥ ३ ॥ राजे दादो चट मरीश्वर पाट, नाम थारी कुल घणारे । दा० ॥ - सद्गुरु छन्द राम तुमारो पूगे मरजीलान, अग्जी म्हारीतुरत मुगीसे दा० ॥१॥ इति पदम् ।। चालो २ हे महेल्या सद्गुरु पूजवाहे ॥ चा० ॥ टेर ॥ सद्गुरु राजे यागा माह, मचरही फेल श्राव की छाह, सद्गुरु म्हारी पकड़ी माह ॥ चा॥१॥ खुल रहा चपा चमेली कन्द, खुल रहा मात्रा और मुरकुद, चल रही शीतल पवन सुगध ।। चा०॥२॥ जिस में जल के चले फुधार, चिहु दिशि भमरा कर गुजार, गह मह मच रही सद्गुरु द्वार, ॥ चा०॥३॥ गुरु पर चमर दुले लखच्चार, शिर पर तीन छत्र को पार, झिगमिग ज्योति जगे दरवार ॥चा० ॥ ४॥ बिच में गोभे दीनदयाल, पल में फर देते हैं निहाल, सद्गुरु भक्तों के प्रतिपाल || चा०॥ ५॥ सझलो मोले ही सिणगार, मुखडा चद यदन आकार, गावो गुर गुण की ललकार !! चा० ॥६॥ लीजो केशर पस धन सार, जिसमें कस्तूरी है सार, चोवा चदन अपरपार || चा० ॥ ७॥ पूजो दत्त कुराल गण इद, पूजा करता सुख शानद, वगसे लोला लहर समद । चा०॥ ॥८॥ गछपति जिन चारित्रसूरीद, पाटक राम करे गुण छद, मागे दुश्मन दोग्बी फद । चा०1111 इति पदम् ।। पास पियारो लागे प्यारो फलोधी घालोरे (चाल)। कुराल छोगालो लाडलो, तू गुर हमारो रे के सद्गुरु लागे प्यारो ॥टेर ।। जैत सिरीजी के लाडला, मन मोहन- गारोरे ।। स. १॥ जिला गत्रीभर परे, प्रगटयो अवतारोरे गुग्गुणरत्नावनी । श्रपर- , ।। स० ॥ छाजेट वश उनागर, उल कियो उजालारे ॥स०||२|| गढ साबियाणे प्रगटिया, दोपे दिन कागेरे ॥म०॥ सोग वरण सुहामणा, सारान वालोरे ॥ स० ॥ ३ ॥ नाम दियो तुम करममा, धन २ जयकारे ॥ स०॥ जिनचढ गुरु उपदेश से, लियो सजम भारोरे ॥म० ॥ ४॥ पाट दिपायो गणपती, दियो जग पगागरे । स०॥ जिहाज तिराई इवती कोई लोक हजारो ॥ स० ॥५॥ दुखिया कई सुमिया कग्या, दे धन भडारोरे ॥ स०॥ देव पीर ने यम करया, ঘ। पारे ।। स० ॥६॥ रोगादिक तप लब्धि मे, तू हरणे हारोरे ।। स० ॥ सेव करू नित ताहरी, तू वरदानारोगे । स०॥७॥ कुशल क्गे नित सघ के, है राम तिहागरे । स०॥ इति परम् पनजी मुढेबोल (चाल)। चाल २ म्हारा मित्र गालीजा, सद्गुर पूजा रे, याज मिल चालो रे ॥टेर ॥ होगाचारया ने गुर जीत्या, पाटण नगर उमगे रे, दुर्लभ राना श्रावक हो, गुर प्रसगे रे ॥ श्रा० ॥ १॥ नारि जिनेचर नाम रहारे, परतर पर जिग पायो रे, चा सूरि सयेग रग में, पाट पहायो रे ।। मा०॥२॥ वर्म उदय सू कोट रोग जिन, भक्ति सग मिटायो रे, देवी वचन सू नव अंग टीका, करी दरशायो रे ॥ ग्रा० ॥३॥ यमय देव सूरीश्वरससु पट्ट, जिा यल्लभ मूरि रायो रे, चामुदा देवी वश करके, पम जिन पायो रे ।। श्रा० ॥ 2 ॥वावन गोत्र राज बम्या मू, प्रति बोध्या मुग्यायो रे, प्रथ ओर रच्या सद्गुरजी, धर्म दिपायो रे ॥ आ० ॥ ५ ॥ श्री जिगनस मरितसु पाटे, उदय - ar w सww . *मागे रे, PAK मा । सो! पाय गुना पने या गा HR THE PAPA १९९६ }} योनगड rapy मारे समय में, मग ॥ 470 रश पिघाम भाग, गूगलत माया, विना मग 3, नाम गाया रे || " १२ नारा पाये संप मांद गिरि पराई हिन्द सुमनमा सम पूज्या, महिमा गारेगा० ॥१०॥ रोग दोष सिमी हटाया गुग ARAT सार, गाना छोटे भय विधा, सिद्धि पारे । भा. ॥ ११ ॥ मारणारी निज नीर, दस पाट पर गोरे, पनि प्रदा? शुभपा महिमा गाजे रे मा० १२ ॥ युगात सूर्गार सापरण T, प्रगटे गुरु श्रातारी, पनाम सहग श्राप प्रति योध्या, गुरु सुपारी रे ॥ श्रा० ॥ १३॥ मागा यामा परना, प्रनि बागे जिन चरे, उदय परा गुरु जैन धर्म का, दया पटट याजिन्ता र ॥ श्रा० ॥ १४ ॥ मंगे कृपा मदगुरुजी सब पर, में गुरु यानाकारी रे, हे गम पाठक गुरु मरिमा, अपरमपारी रे ॥ प्रा० ॥ ११ ॥ इति पदम् ॥ चाला श्री सद्गुरुजी से विनती रे, श्रायो शरण तुमारी, दादा साहियजी से बीनती रे, अरज सुणो गुरु म्हारी ॥ टेर।। छायालं विरुद मुण आयो, तन मन शुद्ध कर धान लगायो, गरि निजर शुनपीनिमी, चरण कमल बलिहारी UPT०१|| , . , - गुग्गुणरत्नावन्नी। १ प्राधि व्याधि मकट दु ख मेटो, सोमवार पूनम दिन भेटो, मन धन लवमी चौगुगा रे, बथती सपद सारी ॥ दा० ॥२॥ नर नारी अपचर मिल श्रावे, अतर गुलाव पंवड़ो लाये, पूजे मृगमद पुष्प से रे, खुल रही फेमर क्याग । दा० ॥ ३ ॥ कलियुग में परचा त पूरे, चिता दोषी दुश्मन पूरे, धन २ सद्- गुरु जग जयो रे, महस किरण अवतारी ॥२०॥४॥ उग- गीसे अठावन बरसे, कानी पूनम दिन भल सरसे, गच्छपति कीर्ति सूरीश्वर रे, बदे बार हजारी || दा० ॥ ५ ॥ अरस परस दरमण अब दीजै, अपणो दाम मुझे, मममीज, जगमें सुरतर मारिखो रे, कीरती या रही थारी ॥ दा० ॥६॥ प्रगट पणे वरनाता टेग्यो, पान सफल दिन में कर लेरयो, श्री जिन कुशल सरिट धणी रे, कहे राम प्रति सारी॥ दा० ।। ७ ।। ति परम ।। लावणी। सगुरजी म्हारा, दरराण देग्योजी गछपति साहिया ।। टेर।। कुशल सूरि यधित के दाता, देवो बुद्धि विग्याता, सदगुरु महर करीज्यो मुझ पर, ज्यू वालक पर माताजी ॥ स० ॥ १ ॥ खरतरराजचद पटधारी, सेवक जन आधार, विषम वाट में सकट काटे, सघ सफल मुम्वकारजी ॥ स० ॥२॥ जग माहे परचा अधिकाई, जाणे सर ससार, भर दरिया में जहाज उगारी, जिन गुरु की यलिहारजी ।। स० ॥ ३ ॥ गुरु चरणाबुज दरशन सेती, पाप तिमिर हट जाय, गुरु परमातम मुगुरा सौभागी, गुरगुण महायजी ।। स० ॥ १ ॥ मृगनयनी नेपुर उगा- मदगुरुहट - - - . गी, लिये सहेरवा लार नृत्य मस्ति गुरु या विचारा, गृह समर मरणारजी || म मनमम्नी हनीपर राजत, सद्गुरु दरवार, इद नरिंदनमें पदपफज, हरति नि उदारती । स० ॥ ६॥ एदि सिद्धि के सागर सदगुरु, गो ध्यारे मा पारे, यात्री थापे यार परण क. फेमर ग मलाये जी ॥ ग० ॥ ७ ॥ प्रेमपीन अर्चन गदगुरु यो, पान पुन सोमवार, वायनिनात तूर पुन मदार, परे मुविधि मुविचारजी । स० ॥ ८॥ फर अग्निपर सवत मुन्यकर, नद चद्र शशि भार, स्नैप मास प्रतिपर दिन भेया, शुक्ल पन अभिभारजी !! 6011 || सुरगिरि में नदन बन गाभे, तारक मे दिनमार, राग्द पर जिन हम सूरीश्वर, कुशल मुशल परतारजी। स.॥ १०॥ मद्गुरु धर्म शील परभावे, पुशल होत नित सहाय, ऋदिसार पर महिर फरीने, प्रविचत लील रतायती ॥ स० ॥ ११ ॥ इति पदम् ॥ मोरे छोड़ चला थिएजारा (बाल)। मेरे उशल गुरु सुखकारा, जिन पार किया ससारा । टेर ॥ तेरी कीरति मै मुणपाई, दीनवधु गुरुराई रे, है पुग्न का मेटन हारा || जि० ॥ १ ॥ मैने लिया बासरा तेरा, तू कर उद्धार गुरु मेग रे, तू समरथ तारणहारा || जि० ॥२॥ तेरा शुद्ध पचन मै जिस पर हद सरधा लाकरे, दो शान अध्यातम सारा ॥ जि० ॥ ३ ॥ धनसुत मपद तीता, गुरु नामें सुदर शीलारे, तुम समरण से जयकारा ॥ ॥५॥ इसमन जो ध्यान लगाये, वो अविचल सपद पावरे, , पाउ,
गुरुगुग्णतावनी ।
तेग बलिहारा । जि० ॥ ५ ॥ मैं दरशन का अमिलापी, गुरु
दीजै प्राट प्रकाशी रे, तेरी महिमा जग चिन्ताग || नि०॥
६ ॥गिचद मूरिट पटधारी, गछ वरतर के अधिकारी रे,
गद चौगमी का प्यारा ॥ नि० ॥७॥ प्रद्धिमार तुमाग
यदा, पाटक पाात गातारे, तेरे गुण है अपरपारा ॥ जि.
11 ८ ॥ इति पदम् ।।
बारी जारे सारिया तोपे वारणा (चाल)।
गाऊ गाऊ म सुयश गुरु सारणारे ॥ टेर ॥ धन्य मात,
तुम सो मुत जायो, भविजन के पान द परतायो, निरग्य
सुटर पनि लेवे वारणारे । गा० ॥ १ ॥ जीता मदन तरुण
वय निरमल, दश दिशि पसर रहा गुण पग्गिल. सूरि सरल
गिर तानक, विपत बिडारणारे ॥ गा० ॥ २ ॥ तुम दर्शन,
सुर सपत लीला, मुदर अष्टसिद्धि निधि शीला, ज्ञाा भान का
उदय, उदय ये कारणारे || गा०..॥ ३ ॥ परम पुनीत परम
गुरु पाया, कुशल करणं कुरले घर राया, चट्ट सरि के लाल,
भक्त जन पालणारे । मा० ॥ ४॥ पूरा मा द्धिसार मन श्राशा,
रामो युगल चरण के पासा, प्रेम मु पारस दान,' प्ररज शाय
भारणारे ॥ गा० ॥ ॥ इति पदम् ।।
हारी लाली छोगालो ऊभी यमुना के तीर
भ
म्हाग प्राण रियाग मोहना गुर थाहजी म्हारी भार टा
मोगुण रामहीरे, पग मे सगीर, या पढ़ाई,
-
संयुनयं स्तवन । +um4 - चन, गुरु भाजे पगई पोरो, गुग श्री रहार भार ११ ॥ धीलरस राई नारे, किया सायर से सीर, तर मामा साहिया गुम, हो रतनागर हीरे ॥ गुरु मा ॥२॥ भगो दिग्द विचार के, दागे सुमार, हा मोष्ट गरणी कम, गुरु आप दयाल अमारे || गुरु " || समान किलो नहोरे, दूगो साटस धीर, शनर रात तुझायषा गुरु, रिमन गगा नाररे ॥ गुरु प्रा० ॥ ४ ॥ चर या दिम सोहनी, सोवन वरण शंगर, नगगा न पारिता गुरु, गुण मीश्या गभीरे ।। गुरु या० ॥ ५॥ सगरम पाजो पाहु- गारे, घडियन मरलो ढोल, मासा पूरो गाहरी गुर, देग दास दिलगीरे ॥ गुरु श्रा० ॥ ६ ॥ बीमग्यिा मामी नहीरे, दीन- आधु बडवीर, म्हेवा हुकमी रायतारे, जडिया मेम जजीररे 1. गुरु श्रा०॥ ७ ॥ चत्सरीट फेकालजारे, तारण भय जन तार, दुशल करण साचो धणी गुरु, दुश्मन दालन मारर ॥ गुरु श्रा० ॥ ॥ नयणा नरमे दश करे, जीव घरे नहीं भीर, गमाहिये रग भापकोरे, माजी गडी नकारे ।। गुर पाक ॥ ८॥ उति परम् ॥ १६ ॥ पास पियारो लागे ध्यारो (चाल)। दप कुशल गुम मुग्तर, भवि तारण वालोरे, चार शिर पर निहालो । टेर ६ शुद्ध प्राचारी सरतग. मत्र वदन चालारे ॥ १० ॥ १॥ गुरु युदेव बुधर्म में, गयो अनत शालारे, नानीगोदमें फम रहो, दुम मरण उचालोरे ॥ ॥ २॥ गत निरा नाम म, रहि गम समानार - " गुग्गुणरतावनी ॥०॥ किलेद्रा का भव करया, कई माया कायालोरे ॥ च० ॥३॥ पुण्य सयोगे श्याविया, नर भवाम्मालोरे ॥०॥शिदा विस्था विषय में, पापक पिन्गलारे ॥ १० १॥ ४ ॥ मनाम न जाणिगा, पिन नान गाटालो| च०॥ मुन वस सदगुरु मित्या, अनुभप उनियाला ॥ १० ॥1॥ पाल अनादि मगको, मि या मति टालोरे ॥ १०॥ तव पिचाना सत्य का, ना ध जजालारे ॥ १० ॥ ६॥ शुद्ध ररशण शुद्ध ज्ञान), शुद्ध विरती पालारे ॥ च०॥ पुना पर गुर देव की, समफिन उजवालोर ।। च० ।। ७ ।। चरण शरए पाठक भणी, द्धि सार निहालारे ॥ च० ॥ इति पदम् ।। पुन: सही चाल में। नाल २ म्हारा सुगुणा श्रावक, सरगुंग पूनारे, मुगुरु के चालारे ॥ टेर ।। रेहत देव सुनायु गुरु पद, जिन भानित धर्म कहियोगे, समकित श्रद्धा नर तत्व भावे, गुरु गद्द गहि- योरे । सु०॥ १॥ रानन्य कुन में श्रावर मीना, भताभक्ष दिखायारे, प्रत्य अकयों पेया पेयी, जान सिखायारे ।मु०॥२॥ थूल हिंसा का त्याग कगया पाच 'अनुनत दीनारे, तीन गुण व्रत चार शिना प्रत, जैनी पीनारे ।। सु० ॥३॥ कष्ट श्रापदा सबही राली, ऊचे पद पहुचायारे, अनेक राना सेवा सारे, गुरु मन भायारे ।। सु० ॥ ४ ॥ रत्न चिंतामणि जिन धर्मदीना, गुरु परम उपगागरे, कई भव्यान चारित्र देकर, भव जलताशेरे ।। सु० ॥ ५ ॥ कर श्रणसन बाराधनकारी, प्रथम स्वर्ग में जायेरे, पर गड नायक देव प्रगट य, यु फरमापरे ।मु०॥ ६॥ .
. करेनर मघ सुणो इक विषा तुम गुरु दृक्त दिमागेर, हुआ व महीदक समाकतो, सुर मुरा मानेरे ॥ मु०॥७]] सध हे भय निश्चय कीजै, पूछो जिनवरगयारे, देव जाय मीनार पूर्वे, जिा फरमायार ॥ सु० ॥ ८॥ चार पल्यं के आयु शते, महा विदेह उपजगारे, ले दीक्षा केवल पद पासी, शिव पद बरसोरे ॥ ॥१०॥ ॥ दो गाथा सीमघर भाखी, देव सपने दीधारे, हर्प मग श्री सघं पुर मामें, थापना फीधीरे # में • ॥ १० ॥ ये गुरु मवहण सम भव दरिये, क्बलों वर्णन कीजरे, डा अवतारी मोज सिमामे, पद पूजीनेरे ।। सु० ॥११॥ इभव परभव बक्ति पूरण, कर सेवा युग्वदडिरे, 'सरतर गए नायक गुरु लायक, मुरनरु बाहोरे ।मु०॥ १२॥ किंग उपगार भूले गुरु गुण का, भूले लानी होर्डरे, धिग् २ जन्म वृथा तिण हाग्यो, देखो जोई रे ॥ मु० ॥ १३ ॥ श्राज नहीं ऐमा कोई समरथ, राजन को प्रतिबोधेरे, ओम वश फुल धादिकारक श्रावक सोधेरे ॥ १०॥ १४ ॥ राधे को राधे जो भोला, इसमें कहा बाइरे, गुरु गुण अतुल तणा में रमिया, मूलो म भाईरे मु० ॥ १५ ॥ गबनाया जिन चारित्रमूरि पाठक राम सवायारे, जन्म मरण मेटन गुरु समरथ, सत गुण गायारे । सु०॥ १५ ॥ इनि पदम् ।। पूज पूज्य जिन चन्द्र सूरीश्वर, क्यों जग भूला मटके है ।। रेर ॥ शासन धीर जिनन्द प्रभावक, खरतरगचं गुण गटके है। पू० ॥ १ ॥ पच महानत शुद्ध सजम धर, तरण तारण भाष ॥ १०॥ जिन माणिक्य मूरिपट्ट प्रभारर, मिथ्या 2 है
गुरुगुणारत्नापली।
तमा मटके है ।। पृ०॥ २ ॥ माह प्रकवर गुरु उपदेसे,
जीव हिंसा से अटके है, लिख फरमाण दिया सब जनपद,
अमारि झोपण चटके है । पू० ॥ ३ ॥ जिन शासन की श्रद्धा
कीनी, ऐसे गुरु के लटके है || पू० ॥ अम्मावत को पूनम
कर दी, चद्र उजाला चिटके है ॥ १० ॥ ४ ॥ वगे भद्र
बताया तीनों, काजी टोपी पटके है ।। ५० ॥ युग प्रान पर
दिया अकब्बर, पूर्ण ज्ञान जसु घटके हे ।। पृ० ॥ ५ ॥ भस्म
रामी ग्रह उतग जन ही, धर्म उदय थिर थटके है ॥ पृ० ॥
भूमकेतु ग्रह का मुत प्रगटा, जिन मत लोपक खटके है ।। पू०
॥ ६ ॥ चैत्य अर्थ प्रत्गनीक सूत्र के, न्याय बचन से हटके है।
पू जो पूर्व गुरु चरण हमेमा, अम्बालि तमु सटके है ।
पृ०॥ ॥ कहे पाठक ऋदि सार गम रवि, ध्यान "अमर पद
ग्टके हे ।। पु० ॥ इति परम् ॥
जाय यमे उन देश पीयारे पीत निभाना दोड दिया
(चाल)।
जाय फ्मा उगुर के पात्र में, गुरु गुण गाता छोडदिया ।।
रेर ॥ तापस वृत्ति प्रगान कष्ट से, डिन आजा म तोड़
दिया | जा० ॥ १ ॥ पथ प्रयोर मली चला कर, मा मान
ज्यों जोड़ दिया, नहीं पता पट् शास्त्र अज्ञानी, जिन मुद्रा मुग्य
मोह लिया। जा० ॥ २ ॥ विषम जाल में फमगया सद्गुरु,
जिन मारग को छोड दिया । जा० ॥ मिले सुजानी गुरु गुण
पुरे, भरम जाल को पोड रिया ॥ जा० ॥ ३ ॥ अव शरणा
तिरे सद्गुर, पार करो मेग म्पोलो हिया । जा० ॥ शुद्ध मय
तरी पूज रचाउ, कोई न तेरी होड किया ॥ जा० ॥ ४ ॥ भी जिन वल्लभ पाट उद्यानक, तत्य वचन को निचोड लिया। ना० ॥ श्री निन दत्त मीम हमारे, ऋद्धि सार गुण जोड दिया । जा० ॥ ५ ॥ इति परम ॥ दरगन देना जीनदलाल, वंशीवट के बताने वाले (चाल)। दररान देना जी गुमराज, भक्त पी जिहान तगो वाले ॥ टेर ॥ खरतर नायक बदित दायर, श्री जिन चद सूरिंद, तसु पट्ट दीपक सघ मुखाकर, दादा कुरान सूरिंद ॥ द० ॥१॥ गजरमल्ल बोथरा श्रावक, तेरा भक्त कटाये, गया देशातर पीछा घिरते, फटी जिहाज घबराये ॥ २० ॥ २ ॥ धरा ध्यान समरथ गुरु तेरा, श्राप व्याख्यान मुणाने, पसी रूप हुय उडार धाये, तत विण ज्याज तिराते ।। ८० ॥ ३ ॥ पीया तत्तण धाये सद्गुरु, श्री मघ अचरज पाते, आदन के दरिया में प्रवहण, दृबन कथा सुनाते ॥ द० ॥ ४ ॥ एक मास से पाटण गूजर, आकर शीस नमाते, सब निज बीतक महिमा गाई, तर श्री सघ हरवाते ॥ १० ॥ ५ ॥ जीवित परचा हुभा गुरु का, समी दर्शनी पूजे, पुत्र सपदादी बहुतों को, गुरु मम और न दूजे ॥ द० ॥ ६ ॥ समय सुदर की पच नदी पर, फटी जिहाच स्य- भावे, श्रीसघ युक्त ध्यान तेरा धरता, नई जिहाज यनावे |द. ॥ ७॥ सुखसरि भरु अछसे चढकर, गोगा बिदर जावे, वायु जोर फटा जन प्रवहण, गुरु तब पार लघाचे ॥ द० ॥८॥ गव जल मीच नाय गुर मेरी, अधविच गोता ग्यावे, पार . . , , , गुर शुगरलाचली। लघाना हाथ आप के, गम कयि गुण गावे ॥ द० ॥ ६ ॥ इति पदम् ॥ . में शीश नमाऊ थाने, परम गुरुटीनो दरशन म्हाने |र।। योगी जटिल केइ तपिना देस्या, गर्ज भरया अधिशाने, निंदा विश्था परे पराई, निज करिषत पखनाने ।। पर० ॥ १॥ शात शील जिन के शुद्ध सजम, श्रात्मध्यान कू ठाने, जिन मारग के सत्य प्ररूपक, तुम हो तारण याने ॥ पर० ॥२॥ पीर पेपर भूत बादया, त्या धर्म पहिचान, ये उपगार करा गुरु तेने, करलग कम वसाने ॥ पर० ॥ ३॥ बावन वीर योगणी चौसठ, योग क्रिया यम आने, परउपगार करे अधिकाई, सारी दुनिया जाणे ॥ पर० ॥ ४ ॥ भये प्रभावर जैन धर्म के, दरा. उरपुर थाने, धाम होय गुरु दरशन दीना, श्री सघ अति हर- गाT ॥ पर० ॥ ५ ॥ जो जो ध्यावे परचा पाये, गुरु कीरति मुविहाने, पुर २ बीच यूम गुरु तेरा, महिमा अधिक बंधाने, 1) पर० ॥ ६ ॥ खरतरगच्छ शुद्ध जिन प्राणा, छाजेड कुल प्रगटा, चद पटोधर गुरु गुणवते, भक्त बीव सुसदाने ।। पर० ॥ ॥ धर्म शील नानी गुरु मेरे, प्रगटे कुशल निधाने, पाठक प्राद्धिमार तुम सेवक, कुशल गुरु मामाने ॥ पर० ॥ ८॥ इति पदम् ॥ राग सोरठ, घर घावोजी रामरसिया (चात)। तारो २ फुशल गुरु रामिया, म्हारे मन मोहन चिच वसिया जी ॥ तारो ॥ टेर । तुम गुणमालती पुप्प भमर में,-रोम ? , . 7
माहिने जी, कोश्या पावे थारी जोड न०||१|| गिरु धागुण
मगुर छ ।
उल्लसियाजी ॥ ता० ॥ १ ॥ तुम गुण स्वाति बूद जलपर की,
मो मन चानक तिसियानी 11 तारो० ॥ शमदम युग तुम चरण
फसोटी, मो मन कचन घसिया जी ॥ ता० ।। २ ।। तुम
चवनामृत तत्व नीर से, मुझ तन पातिक नसिया जी ॥ता०॥
रामलाल पट खोल हृदय का, कुशल ध्यान से कसियाजी ना.
॥३॥ इति पदम् ।।
आवो नेम ररजावो मदन (चाल)।
श्रावो मनन करो गुरु का भजन, मत दिवम गमावा रे
॥ टेर ॥ क्यू चेतन कुगुर सग राचो, कुशल मुरीद गुरु है
साचो, मन मत मिल्या अर्थ जाल, उजड मत जावो रे
| आवो ॥ १ ॥ जिन आणा शुध सजम धारी, प्रगटे गुरु
जग के उपगारी, उभय लोक सुखदाता गुरु से, दकलय लायो
रे ॥ पापो० ॥ २ ॥ सुरतरु रनि शशि मेघ उनारी, इन से
अधिक गुरु उपगारी, कुशल २ ऋद्धि सिद्धि प्रदायक,
चरित पावोरे । आवा० ॥ ३ ॥ एक चित्त ध्याये सकट जारे,
जो शुद्ध मन से ध्याा लगाये, रामलाल गुर भक्त यच्छल से,
प्रेम जगायो रे ॥ प्रा० ॥ ४ ॥ इति पदम् ।।
म्हारा गणवर गुरु महाराज प्ररजी सुन लीजो
(चाल)।
म्हारे हृदय लिख्या गुरु नाम, चतुर नर मुन लीनो गरिमा
निन का कर वधामणार, आनद उच्छव मोड, इन कलियुग के
.
+
+
गुरगुणग्तावली।
-
.
-
थारा बणाजी, भक्त जना प्रतिपाल, संवक राक्लो जी,
मुनिजर नयण निहाल ॥ च०॥२॥ कल्पवृक्ष चितामणीजी,
बधित पूरण देव, आण परम शिर ताहरी जी, शुद्ध मन साझ सेव
॥३०॥२॥ रमना पर यह मै रिस विध, गुर गुण अपरपार,
भवसागर ममता काजी, बाह पकड़ निम्तार ।।च०॥४॥चौरासी
गव मेहगे जी, उगल मुरि गुरु राय, रावल गणा पोलगे जी,
से तुमारा पाय ॥ च० ॥ ५ ॥ पुरष उदय सद्गुरु मित्या
जी, तीन ग्ल दातार, यता घट में रमग्या जी, तार तार मोहे
तार ॥ १० ॥ ६ ॥ दरशण कर परसन हुआ जी, प्रगट्या
कुशल निभान, हाजर हुक्मी चीनवे जी, पाठक राम मुजान ।।
च० ॥ ७ ॥ इनि परम ।।
देशी जझेकी।
ह तो थारा दरशा करवा पायो जी, सुग्रफारी गुर राज,
दरशन कर कर चित्त में शानद पायो जी दयाल, भ
तुमारो यागां मादी सोहे हो ॥ सुन्ब० ॥ चिहुदिसि , परिमल
भमर तणा मन मोहे हो दयाल ॥ १ ॥ चपा चपेली मरुमओ
लो पूरपो हो ॥ सुख० ॥ केमर क्यारी देसत चितो
झल्या हो दयाल ॥ रव्य सुगधी भाव सुगधी भासे हो ॥
सुम्प० ॥ तुम गुण परिमल भवन हृदय परकाशे हो दयाल
॥ २ ॥ यध्यातम रम आतम रगग्गीजे हो । मुम्ब० ॥ तुम
उपदेगे जिन रच अमृत पो हो दयाल ॥ दुख दरिद्रता
मेटन मपत लीला हो ।। सुप० । सुर मुख मिद्धि नायक जान
रमीला हा व्याल || ३ || दान उया दम तीन नव नुम
मन, दरा एगल गु सघ म राज, ता प्रताप न॥
॥३॥ मृगपति दन्वत पशुगण नास, ना,
दत्त उसल की बारी सुधारम सुविहिन मागत्य ।
म० ॥४॥ जिा शासन के उदय पर नमक
दरशामा, राजन विष मादेश्वर गा ,
भाग्या हो । मु०॥ भर जलतग्मीजे भरिजन रस चाम्या
हो दयाल ॥ तृ उपगारी तारण नारा विगने हो ।मु० ॥
परता पवन सस्ट रागला भाने हो ठयाल | प्रष्ट ल्य
सू तुम युग चरण रचीजे हो ॥१०॥ भावन्नान बन ग पातिम
सो हो ढगल || जिन टन निा चः कुशल सूर्गट गुरु
राना हो ।। ९० ॥ मर्माका धरो म्हारे मनमे ताजा हो
दयाल ।। ५ ।। गुरु किया परतर जित आजा पाले हो । मु० ॥
भट्टारक चागि हा उजमान हो याल ॥ धर्मशील गुरु
सुराल निधार सामागी हो । मु० ॥ गन पाउनी उदय दशा
अन गगी हो दयाल ॥६॥ ति पदम् ।।
तुम
तो मले विराजो जी (चाल) ।
धर्म क यधिक पाया जी, मेरे पिन शासन मिणगा।
धर्म० ॥ तुम तो मले पिरातो जी, गच्छ चारामी सिरदार को
में भले गिनी जी।। दो टेर ॥ कइ सरि भये वीं
उन में तुम अधिकाई, सन जलमें शीतलता दरमे,
घडाई ।। म० ए० ॥ १ ॥ ताग गण मे पर विरामी
4० स० ॥ २ ॥ कमन्ना कर में लक्ष्मी राने, अमुझे कन,
सन्तरगर पं गुरु पिगने, गज गहिग्स मद ।
१२२ गुरगुएरनारली। ५० स० ॥ ५ ॥ देश २ से श्री सघ भावे, मेला खून मरावे, फेसर चरन पुप्प धूप से, पूजा मस्ति रचाने ॥ ३० स० ॥६॥ इस भवनानी कष्ट मिटार, पछित परण कीना, सुर नर मुख धारक न साधन, शिवपुरमा धन दीना ॥ ५० स० ॥ ७ ॥ गमे गुरु जो नित पूजे इक मन सेती थाने, सर्व मिद्धि उसके घर प्रगटे, राम प्रेम से गांव ॥ ५० स०॥1॥ इति पदम् ।। 'माज आपे चालो सम्यिा मिनाचन० (चाल)। साज थापे चालो बहिनी, कुशल सरिद गुरु पूजो ॥ टेर।। युशन सूरिद गुरु प० ॥ इण मम अवरन दूजोग ॥ पा० ॥ मा विष्णु महेश गा77, देवी देव ग्नापा, उभय लोक फारजनहीं सरिया, यों ही जनम मंगाया गया० ॥ १ ॥ मति साटिक सूरि मरल गुण, ज्ञान ध्यान का दरिया, चरगा करण मुमति गुप्ति सू, जिन मारग सपरिया ए ॥ श्रा० ॥२॥ रत्न जड़ित सिहासन अर, सद्गुरु मले मिराजे, गुर नर पिनर 'वामर ढोले, सिर पर छचर थाने ए॥ श्रा० ॥ ३ ॥ निन पाणी उपदेश सुणारत, सजल जलद ज्य गाजे मुणकर मिथ्या मत तज दीना, भविजन सशय भाजे ए॥ आ० ॥ ४॥ श्राषि व्याधि मेटन सद्गुरुजी, परतिस परचा देरे, पुन सपदा बधित सद्गुरु ने सेवे ॥ श्रा० ॥ ५॥ धर्म दान सद्गुम ने दीना, उभय लोक मुखकारी, क्रम से सिद्धि सपदा सगग, श्राराध्या बलिहारी ग. ॥ श्रा० ॥६॥ केसर चदन धूप अरगजा, पुष्प मुगधा लीजे, गगाजल से कर प्रदालन, गुरु चरण प्राचीने
एयाली लाल अण्वट रग लागो (चाल)।
सुज्ञानी लाल चरणा सू चित लागो, लागो रे खरतरगच
राज, थासू म्हारो मन लागो ॥टेर ॥ सुवरण रतन जडित कलशा
मगुर पन्द।
॥ पा० ॥७॥ भावग्नान मगुरु ने थुणता, भतर ज्योति
जगारे, चारित मूरि कृपाचद्र मूरि, राम प्रेम गुण गाये ए॥
मा० ॥ ॥ इति पदम् ।।
राग ग्वमा ताल।
मतो मेवग चढाय पाई थाज, गुरुनी के दिर में ।।
• ॥टेर ॥ देग २ महिमा मदिर की, निंदक सब रहे
राम ॥ गु० ॥ रशन कर परसन भया मन मेरा, हरस रहा
निल गान ॥ गु० ॥ १ ॥ सन धन रूप सझे श्राभूपण,
सम्मियन सग समान || गु० ॥ केसर चद्रन अवर श्रग्गजा,
पूजा का साज । गु० ॥ २ ॥ चपा चपेली टोना मरया,
भर फूलन का छाज || J० ॥ फरसत चरण धानदन माया,
मिले गर्गर निराज । गु० ॥ ३ ॥ पूजन से धूने सर रिंगण,
मिता मुगति का पाज ॥ गु० ॥ गाम गदाले सद्गुर भेटया,
नगर वीकाणे राज ॥ गु० ॥ ४ ॥ जान भ्यान सन्मान वधारन,
गणधर गुरु महागज । गु० ॥ अतरगत की तुम सब जानो,
रखो हमारी लान ॥ गु० ॥ ५ ॥ च दरि के सरतर नायक,
तारण तरण जिहान ॥ गु० ॥ कुशल २ गुरु पाटफ जपे, राम
मुधारो
कान ॥ गु० ॥ ६ ॥ इति पदम् ॥
में. लाऊ गगानीर, चरण कमल -
'गुऊ भव जल
गुरगुगरत्नारली। M ५० म०॥ ५ ॥ देश २ से श्री सघ आये, मेला सूव भरावे, फेसर चदन पुप्प धूप से, पूजा भक्ति रनावे ॥ ३० म० ॥६॥ इस भय साश्री पट मिटाकर, रित पृग फीना, सुर नर मुम्प पारक न साधन, शिरपुरसा धन दीना ।। ध० स० ॥ ७ ॥ ऐसे गुरु जो नित पूजे, इक मन सेनी यावे, सर्व मिद्धि उगके पर प्रगटे, राम प्रेम में गावे ।। ५० स० ॥ ८ ॥ इति परम् ॥ साज अापे घालो सरियां मिद्याचल (चाल)। गाज आप चालो बहिनी कुशल सरिद गुरु पूजो ॥टेर ॥ कुशल सरिद गुरु पृ० ॥ इण सम अपरन दूजोग ॥ था० ॥ उमा विष्णु महेरा गजान, रेवी देव मनाया, उभय लोर पारजनही सरिया, या ही जनम ममाया ए ॥ या० ॥१॥ प्रति हार्दिक सूरि सकल गुण, दान ध्यान का दाम्या, चारा करण मुमति गुप्ति सू, जिन मारग मचरिया " || प्रा० ॥२॥ रत्न जडित सिंहासन पर सद्गुरु मले मिराजे, मुर नर विनर चामर ढोले, सिर पर छत्तर छाने ए ॥ श्रा० ॥ ३ ॥ जिन घाणी उपदेश मुणावत, सजल जलद प्यु गाजे मुणकर मिथ्या मत तज दीना, भविजन सराय माजे ए ॥ आ० ॥ ४ ॥ श्राधि व्याधि मेटन सद्गुरुजी, परतिरख परचा देवे, पुन सपदा बधित ने से ए॥ या० ॥ ५॥ धर्म दान सद्गुरू ने दीना, उभय लोक सुखकारी, क्रम से सिद्धि सपढा सगम, आगध्या बलिहारी छ || श्रा० ॥६|| केसर चदन धूप अरगजा, पुष्प मुगधा ली गगाजल से पर प्रनालन गुरु चरण पर नाजे
मिले गरीव निवाज ।। गु० ॥ ३ ॥ पूजन से धूज सब
नगर घीकाणे राज ॥ गु० ॥४॥ज्ञान ध्यान सन्मान
१२३
सद्गुर एन्द ।
॥ श्रा०॥७॥ भावस्तवन सद्गुरुन थुगता, अतर ज्योति
भावे, चारित सूरि पाचद्र सूरि, राम प्रेम गुण गावे ए।
दाम ॥ गु०॥ दरशन कर परसन मया मन मेरा, हरख रहा
दिल गाज ॥ गु० ॥ १ ॥ सज धन रूप सझ श्राभूपण,
सम्वियन सग समाा || गु० ॥ फेमर चदन अवर अग्गजा,
पृजन का साज ॥ गु० ॥ २ ॥ चपा चपेली दोना मरवा,
भर फलन का छाज || गु० ॥ फरसत चरण थानदन माया,
मा० ॥ ८॥ इति परम् ॥
है।
राग ग्वेमटा ताल।
तो सेवग चढाय पाई शान, गुरुजी के दिर ने ॥
टेर ॥ देश २ महिमा मदिर की, निंदक सब रहे
ii
ले
अग्गिए,
.
मिला मुगति का पाज ॥ गु० ॥ गाम गटाले सद्गुरू भेटवर
गणधर गुरु महाराज | गु० ॥ अतरगत की
रखो हमारी लाज || गु० ॥ ५ ॥ चन्द्ररि-
तारण तरण जिहाज || गु० ॥ कुशल २
सुधारो काज ॥ गु० ॥ ६ ॥ इति
स्याली लाल श्रावट"
मुज्ञानी लाल चरणा सू
राज, थासू म्हारो मा लागो॥
में, लाऊ गगानीर, चरण
गुरुगरत्नापली । तीर ।। सु० ॥१॥हीर चीर उज्वल पर लाऊ, अति मुरा माल सुतान, पद पूछन सदगुरुजी थाग, पाउ म निशुपा सा सु० ॥ २॥ काश्मीर र फेसर लाऊ, चीनी शुद्ध कपर, गलय गिरी म चन्न ताऊ, पना करू मन धीर ॥ मु० ॥ ३ ॥ वागा माहि यू गरम फेनकी, लाउ पुष्प गुलान, राय चपो आन् रा लाउ, अरच तुमारा पार ॥ मु०॥ ॥ बन्लोन से चोगा चदा अतर, धरू मुगधी पूर, महरे परिमल नामा म्हाग, स टालिटर दूर ।। सु० ॥ ५ || मुटर वन सू चमर मगाऊ, सुपरण रता जहाऊ, पग्न सौभागी सदगुरु था पर' चौमठ चमर टुलाऊ ॥ सु० ॥ ६ ॥ लका गढ मू सोनो साऊ, वना. गर महींग घर जगऊ था पर चाट मेट्ट मन पी पीग ।। सु ॥ ७ ॥ मरत की वरफी ते थाऊ, पंना मधुगजी पा, मिश्री मावा औपुर मेती चार नग्ध नीका ॥ सु० ॥ ८ ॥ काबल का सब मना लाऊ, मिश्री बीकानेर, लगला बार बारस केरा, चाद पलांना देर || मु० ॥ ॥ पारनि मेटन आरती उतारू, पच रग बजा चढाऊ, श्रीफल उपर मोहर भेट धर, लुल २ भीम गाज ॥ मु० ॥ १० ॥ नाटक गाया बीण बजाज, गुण गाऊ मै तेरा, चट सरीन के लाल मोमार्गा, कुशल सूरीट गुर मेरा ॥ म० ॥ ११ ॥ चारित मूरि गचद्र सरि, बर खरतर मुगिहाण, पाठक राम लहे नित लीला, निशदिन तेरा व्यान ॥ सु० ॥ १२ ॥ इति पदम् ॥ गिरनारी जाताराग्य लीजो है (चार)। - गड उतगे सेहो । माय महिया । जिल्लागर मरीज 5 श्री जिा तुराल सूरिन्द ।। सयाई० ॥ राम रवि परजाइनम मपाद गुरु प्याग नगगि TITri महिया ए बायो पन रिनेम ॥ सपाट गुमाया ॥ || म ममी थापियो ए माय पाया गया मिरर || मरा: गु॥ मस्त नागु गागा मा साना भिनाइट गमाई ॥२॥ माग, T". नुम मृत दान ।। मनाची चटर्गन माग ' जगार भार ।। म० ॥३॥ गजमाना मना माय माग, या रहमी परियात || मघा न7 || पार, सगिया गामक्विायरिणत ! गमाद || 71 मी- वर पाने मार, चाट पुन उार 1700 ने निमा क्षा लिरेप माय । स० ॥ मुनि गाचार विचार ॥10॥1॥ पाट पिरान्ना चदरे माय सारया , नपता सूरि मर जाप ।। स० ॥ देव दानन व प्राणिया माय दिया , टाले सताप || म० ॥ ६ ॥ राजा प्रतिनीधन नाय, महिया ए, कीया पचाग हजार ||स०॥ धावक न धर दीपता ॥ माय, सरिया ए, धा २ तमु अवतार ॥ सवा० ॥ ७ ॥अधिन दोन मव तणा ग माय, सहि० सा या मनोरथ पाज ॥ स० ॥ उपगारी गुरु पूजता प माय, सहिया ए, तिरिया भन जल जिहाज स० ॥ ८ ॥ गछ यरतर महिमा घणी ए माय सहिया ए माय, सहिया ए, यडे पट 'अरविद ॥ सदा० ॥ २ ॥ इति दम् ॥ राग पीलू। पवतो क- गुरु दु ग्व की मै बेतिया, बनियानी पाल Ju -- गुग्गुग्गरलारनी। - फग्टन छतिया। क० ॥टेर ।। नरयतिर दुख रोय गमाये, गति मे पायो सुगया । २०॥१॥ पुग्य उदय अब नर भर पायो, उस राताप बहुत आपतिया || २०॥ इति उप- द्रव भर दातरे, राग सोग अरि गण मे यतिया 170 ॥२॥ विषय पाय जगात जान में, मोह बद्ध रह्यो पून कलनिया ॥ २०॥ तुम समरा क्वट्ट नहीं कीनो, अब मंग होगी कैसी गनिया ॥ के० ॥ ३ ॥ पाप सुधागे का भक्त के, अतर गत लिप भेजी पतिया ॥ १० ॥ तारक मान मिले अन मुम को, कुशल सूर्गद गुर जालम जतिया ।। फ० ॥ ४ ॥ पाठक राम सुवास चाग्यो, न तो मुगुम पर लागी मतिया ॥ १० | ५ || दत्ति परम् ॥ कोई देख्या रे सावरिया साहिब प्यारा लागे रे (चाल)। कोई टेरया रे नुपने में सद्गुरु, ज्योति सवाई रे ।। टे॥ अर्द्ध चद ज्यू भाल झलाहल राने रे, नयन कमल दल दोनू अधिक निराजे रे, श्याम मनोहर भृकुटि महा मुस्वदाई रे, हरे हारे महा० ॥ १॥ दीप शिया ज्यू सरल नामिका सोहे रे, लाल प्रवाला अधर सदा मन मोहे रे, दत पति मानू मोती युक्ति जमाई रे ॥ हर हारे यु० कोई० ॥२॥ कचन वरणी पाया सुन्दर दीपे रे, चद सूरजछवि निज तेजे कर जीपे रे, पुप्य 'माल शिर रत्न तिलक अधिकाई रे ॥ हर हारे तिल० कोई० ॥३॥ देव दुष्य पट उज्वल किरण मुहावे रे, अवर तल में दररान गुरु दरशाने रे, सिद्ध मनोरथ दीनो वर' गुरुराई रे ।।
तगुरुदे।
11
हरे हारे का ई० ॥ ४ ॥ चा पटोधर भक्त जीव प्रतिपान
नित छ जपिये कुशल गुन्द की माला रे, राम करे भग्ना
मा TT पाईरे | हरे हारे मा० कोई० ॥ ५ ॥ है।
,
॥१॥ दीन दयाल पाल छा, मन बछित दातार ललन
रोड २ थारी थापना, परग अति मनुहार लाल र
लुा२शीस नमाय लाल रे॥ कु० ॥ ४
तीस में, फाती पूनम जाा लाल रे, श्री मिन हमें
खरतरगछ राजान लाल रे ॥१० || धन कम
कुशल निधान उदार लाल रे, पद, पात्र में
प्रति गुरुभद्धि सार लाल रे ॥ कु० ॥
जैन प्रयापदयकार, जय
रीहडसर श्रोस वरा, खरतर गरा
राग।
श्रीसीमधर सारिया (चारा )।
कुशल मूरिन्ट गुरु माहिना, जिन चद मरि पट्यार जन
रे गुण अनेके शोभता सेवक जन भावार ताल र ॥
17
॥ २ ॥ देगर यूभ दीप्ता, उदयापुर पारेर लात का
पीकाणे शोमता, शोभे जमलमेर लाल रे ।। कु० ॥३] Pr
पनि केसरे, पूरे गुन गा पाय लाल रे, मुनिपति पनि
Y
y
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श्रश, प्रगटे सुर काना
पाट, सरट मन विन्न दाट, TRA
गरगलागली।
पन
शिर पाजा ॥ ज० ॥री पति यवन , अकवर
मुग व प्रम तुम च मे हा परिस, मति गनि मुग भाना॥
ज० ॥ ३ ॥ सुा प्रधान पन्थी दीन, जैन धर्म तव नीन,
"शन गुपिया तीन, काह ताना ॥ ज०॥४॥ हिमा
फरमागर, पिसीना निरोप उन्म गिन धर्म रेग्य,
चिदुनिशि म गा !! 10 || 4 || गुर श्री पिन रिपद,
भनिन अधिनार निा मानन, मन मुजन ना॥
॥ तिम
शन्नि।
श्रीनित म, मेरो टीका भमर केट म्थल थपे,
गरम पाले र मत्र तरो नल सेब को गुरु साटि जो, बाहग'
गोन मय प्रति बोध गया श का पापन कणे गटोटा रत
पहाय करे तमु शनु नणा दल दरी पप्पे ॥ १ ॥ पट्ट परसर
धर्म या गी नि मा मृगवा राजा, पनेमे पार विगत
लया गम सेवाजी राव सरम तागा, हार गये वेदातमती
गुम्देव के बाजे पिचन वाला, श्रीतिन लाभ सर्ग पटोधर
मघ मुमार मुकन काना || जानिमचा भये पर उग्नल
श्रीगिन प मृगा विगत प्राजिन सोभाग्यसार गुणार हनु-
मत वार र मत्र स माझ मिन्दारमिट पीत्रण नरे पर मेव
को सब मुस्य समान धन उस दान दिये जन जन दय
गंगानि भने के भात ॥ ३॥ हम सूरीश्वर चद्रसूरीधर जीचि
मर्गबर क्रम पयाग, वत्तमा चारित मृगर सग्तर गण के
शुम शातारी गगामिद काण र धर्मगन गुरु जग
प्रेम अमर खुमिगाल, पल निजय महाका मान हे नित
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पडेउपगारी भाख ॥१॥ कृपाचद्र सूर्गमा गुट मान गग,
निया उद्धारी प्रगटिया, सूरिंगुण सामाग २ मा मामी
मध युत, श्रातम ज्ञान उमग, चिरनीव बरनामा, मातर
सहाय दीना मिश्वर, विवुध पसरत गरी
बिहत्तर, लिखन गुरुगुण युद ॥ १॥ अपर मम नुनि,
सदगुरु बन्द।
हिनकारी, भुराल निधान प्रधान सुपाटक गुरु गुण नेम्स पर
मटिमा ॥ ४॥ इति श्रीक्षम पीर्ति शाखाधा उपाध्याय गम
सिसार गणि सग्रह रत गुरगुराग्नावनी मपूर्णर॥
मरतर गण के प्राचार्य उपाध्याय वाचा साधु मानी
रावक भाविकाया के नित्य स्मरणार्थ यह गुरुगुएरनापन्न
त्य फमल पर सर्वदा विराजमान रहे । गोरा कल्पारामना
केई तो ममस्त वस्त चातुरी विचारमार वयगभी स्तर
प्रय सरस्वती है, केई तो प्रगम्त काव्य भाषा मुग सुम्न का
पार कवि थम्त होत ऐमी दिल्य घुनि है, कई गग
रम्त गुम्न होत जात केई तर्फ विद्या में विस्त गुद
हम्त सिद्ध धमसिंह वादि हम्ती गस्त होत जन में
एमे मम्त जती है।
श्री कृपाचंद्र मरि प्रशति ।
कीर्ति रत्न सूरीश के, पट्टपरपरमान, देई गुल्मने हो गये.
-
गण उदरग।
लाल ।। २ ॥
श्रायवेद भूपण श्रीयुत पण्डित जीवनरामजी हप के
थी केवल जीवनानन्द प्रेस, बीकानेर में
पण्डित ओंकारदत्त शम्मा शान्त्री
मनेजर के प्रबन्ध से
मुद्रित।
छपे हुए ग्रन्थों का विज्ञापन । । 4 २). kya १ पुरदेव दादा साहब की पूजा १२ प्रश्नों का उत्तर. 5) (ल समुच्चय (रल सागर ) जैन धर्म का सर्प कृत्य. ६) पूजा महोदधि ३७ गायन पूजाविधि युक्त २॥ गृहस्थ व्यवहार धनादि उपार्जन का ११) महाजन मुक्तावली ओसवालादि ४ वर्ण इतिहास. वेद्य दीपक-देशी, यूनानी, डाक्टरी, होमयोपैथिक आदि रोग परीक्षा इलाज, पथ्यापथ्य आदि । ५) एकुन मनुष्य, पशु, पक्षी आदि का भावी फल और जिनदत्त सूरिजी रचित का साराशर, १६ चाणक्य अर्थ, पासा शकुनावली जैन स्वरोदयाभापा १) स्वप्नफल, सर्व देश की वस्तु,'तेजी मेंदी निकालना सिद्धमूति (प्रथम भाग) ॥ सिद्धमूचि (दुसरा भाग) ३२ सूत्र पाठ से मूर्षि पूजा । गुणविलास २२ समुदाय वालों के लिए उपयोगी पच प्रतिक्रमण १६ स्तोत्र अर्थ युक्त २० जैनदिग्विजय (सत्यामत्यनिर्णय ) ६) . 1 . naar ..