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Panchanga Ratnavali
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श्रीगणेशायनम ॥
पंचाङ्गरत्नावली॥
चतुर्युगप्रमणाम् ॥
कृत्युगप्रमाणम् १७२८००० त्रेतायुगप्रमाणम् १२१६००० दापर
प्रमाणम् ८६४००० कलियुगप्रमाणम् ४३२००० संवतविक्रमीय में
३०४४ अथवा शाके शालिवाहनीयमें ३१७६ जोड़ देनेसे गति
कलि होता है कलिगति को कलियुग प्रमाण में हीन करने से
भोग्य कलि होताहै ।।
अथसम्वत्सरोत्पत्ति ज्ञानम् ॥
शाकाको २ जगह रखना प्रथमको २२ से गुणा करना उसमें
४२६१ जोड़ देना तिसमें १८७५ का भागलेना जो अंक लब्धि
ॐ पंचाङ्गरत्नावली मिलै उसे दूसरी जगह के शाकेमें जोड़देना फिर उस्में ६० काभाग देना जो शेष बचे सो बृहस्पति के मतसे प्रभवादिगत सम्वत्सर होताहै शेपमें १ जोड़ लेनेसे प्रवेश संवत्सर होता है ।। १८७५ के भागदेने से जो अंक शेष बचाहै उसको १२ से गुणाकरिके फिर (१८७५)का भागदेय जो लब्धि होय वह प्रवेश संवत्सर के भुक्त मास होंगे फिर शेषको ३० से गुणा करिके (१८७५)का भागदेय जो लब्धि होय वह मुक्त दिन होते हैं फिर शेषांक को ६० से गुणा करिके (१८७४) का भागदेय जो लब्धि होय वह भक्त घटी होती है फिर शेषांक को ६० से गुणा करिके (१८७५) का भागदेय जो लब्धि होय वह मुक्तफल होते हैं भुक्त मासादिक को १२ मासमें घटीने से भोग्प मासादिक होते हैं यह संक्रांति मासवशात जानना । श्रीशाके १७७६ घटानेसे भी, वर्तमान संवत्सर होताहै ।। नरमदायां उत्तरे भागे व्यवहरति इस संवत्सरमें १२ हीन करके जो संवत्सर प्राप्ति होय सो नरमादायां. दक्षिणे भागे व्यवहरति ।। -सम्बतसर स्वमीज्ञानम ॥ पांच वर्ष की १ युग संख्या होती है प्रभवादि६० वर्ष में १२ युग होते हैं तिन वर्षोंके अवि देवता क्रमसे मुनियोंने कहे हैं युगप्रति क्रमसे विष्णु १ बृहस्पति २ इन्द्र ३ अग्नि ४ वष्ट ५ अहिर्बुध्न ६ पितर ७ विश्वदेव ८ चन्द्रमा १ अग्नि १० अश्वनी कुमार ११ भगदेव १२ ।। पहिली बीसी ब्रह्माकी दुसरी बीसी विष्णु की' तिसरी घीसी शिवकी। .
® पंचागरत्नावली. संवत्सरों के नाम . " विभव प्रमोद प्रजापति मंगिरा भीमुब + धाता ५ भावः वा ईश्वर प्रमांधी विक्रम ... वृष चित्रमा समानु. सारण पार्थिव उपय २० सजित १२१ खर पधारी विरोधी २३ विनय विकत ! २४ नंदन २६ हेमलंय मन्मथ २९ विकारी ३३ संबरी ३० शुभकत शोभन क्रोधी विश्वास पराभव कीलक ૧૨ प्रमादी मानव सौभ्य' साधारण विरोधक परिधावी ४३ ५५ ४६ ४४ ५९ पिंगल धुंदुभी कालयुक| सिद्धार्थ ५२ ५३ . . दधिरोदू गारी ५७ कोधन रक्ताक्ष ५८ ॐ पचारित्नावला संक्रांति वाहनादि ज्ञानम् ॥ संक्रांति का ज्ञान चक्रों से जानलेना चाहिये ।। ऋतुचक्रम् ॥ सूर्यराशि, २०११११.१२.१ ४।५ १७.८1८; शिशिर बसत प्रीम बर्षा शरद हेमंत अवन उत्तरायणेरविः दक्षिणायनेरविः सूर्यराशि १०1११ । १२ ११।२।३। ५७ संक्रांति मूहूर्ती चक्रम् ।। महती , मही, म्ही ४५ धनिष्टा-कम- ले- सत- आद्रा स्वाति भ.ज्ये- - वि. पुनरो: उफा: उपा-उमा.. पूफा० पूषापूमा म्म::चि- 'अनुराधा अश्क. पुष्य- ! . . अघन्य संडा समसंहा ३० बृहत्संहा - करण वि 1 ब 15 ति १.अपमृ. वय. ठी स्थिति फल el मध्यम णि लोह पात्र 'सकाति बाहनादि चकम् ॥ संक्रान्ति जिस कारण में लगे उसी के हिसाब से चक्रमे देललेष बोलप कौलव तैतिळ 'पणिज्य "विष्टि शकुनी चतुष्पद नाग किंस्तुत बर: हाथी "माहिष घोड़ा स्वान मेषा व्यान गौर मुरगा मीठा खर, सिंह शार्दूल माहिष ध्यान बंदर सुभिक्ष लक्ष्मी क्लेश सौर्य पाड़ा सौर्य कुमारी गताल युवा प्रौदा प्रगल्मा बध्या मति बंश पुत्रेसावली सन्यासिनी सुप्त बैठी “बैठी ऊर्च सुप्त, ऊर्व मध्यम महर्य 'नेष्ठ मध्यम मध्यम ने मद्ध रोया ताम्र कांस्य खप्पर भूमि' +काठ कंकण, मोती 'प्रवाल 'मणि गुंजा नीली कांच सुवर्ण पर्ण भूजर्य, कृष्णाजिद चम यत्कल पांडर कंचुकी श्याम सित चित्र कम्मर दिगम्बर मेघसरश धनुष तोमर माला परमान पकान्न दुग्ध भोजन 'माटी गोरोचन महांवरि सुरमा कप प सर्प वैश्य राम शंकरवर्ण बलतकषा मदार बेटा पाहर दुपहरिया पुष्प t भूषण सित पांड "M . " गुरी k - पिलार हरिद्रा Jh ता 41 जाति ॐ पंचाङ्गरत्नावली, सम्वत्सर मध्ये लाम व्यय ज्ञानम् ॥ विंशोत्तरी व अष्टोत्तरी क्रमसे राशिके स्वामी की वर्ष संख्या से वर्षके राजाकी वर्ष संख्या को परस्पर जोड़ देवे ३ से गुणाकरे ५और युक्त करै १५ का भाग देय जो शेष रहैं वह लाभ होता है लन्धि को उसे गुणा करे ५ युक्तकरै १५ का भाग देय शेष जो बचै वह व्यय (खर्च) होताहै ।। चक्रसे समझ लेना सम्बत के राजा स्यादिसे जानना ।। १२० विंशोत्तरीमतानुसार लाभव्ययः॥ 1 राशि मेष वृष मिका सिं०/० तु१० धo म.कुं.मीन ११ *A y २ २ ५ ५ २पया ११ ८ ५ ८ ८ २ ५ १४ ८ ७.म. २ २५ २ १४ ५ १४ धू २ २ २ ८ ५ २ ११ ८ ५ २ ८ ५ २ ८ शुः " ८ प १ २ २ ८ ५ १५ ८ ८ २ ८८ शनि २ १७ -- २ ५ . ५ * पंचाङ्गरत्नावली १०८ अष्टोत्तरीमतानुसार लाभव्ययः॥ * १ 4 राधि मे. ० मि० क. सि.क.|तु वृ० घ० म. कुं.मी. १४ ८ ८ 37 ८ २ ५ लाभ ५ ५ २ ५ ला. - १४.३ १४ FS १४|११ ला १४ ५ ध्य ८ ... १४ २ ८ ला०१७ 23 ५ ८ २ २ १४ ला० ५ ५ ५ ५ २ २ CF १४ ११।११ ११।१४ १४ ग्य०११ शनि २ معر ८ १४ १४ १४ ५ ५ २ २ ८ |ला. व्य . १४ ८ संवत्सर मध्ये वर्षादि विश्वा ज्ञानम् ॥ शाके को तीनसे गुणा करिके सात का भाग लेना लब्धिको अलग रखना शेष को दूना करके पांच जोड़ देना जो अंक होय सो वर्षा के विश्वा जानिये और लब्धि को तीनसे गुणाकरके सात का भाग देना लब्धि को अलग रखना शेषको दूना करके ५जोड़ देना जो अंक होय सो धान्य के विश्वा जानिये फिर लंब्धांक को इसी प्रकार गणितक्रिया बारम्बार करनेसे तृण-शीता, तेज-वायु- बृद्धि-क्षय-विग्रह इन सबके विश्वा पूर्व प्रकार अलगर निकलेंगे ॥शाके को ४ से गुणा करना उस्में ७ का भाग लेना १० ॐ पंचागरत्नावली लब्धि को अलग रखना शेषांक को दूना करना और जोड़ देना जो अंक होय सो क्षुधा के विश्वा जानिये लब्धि को फिर ४ से गुणा करके ७ का भाग लेना लब्धि अलग रखना शेषांक को दूना करना ३ और जोड देना जो अंक होय सो तृषा के विश्वा जानिये फिर लब्धांक को पूर्वोक्त बारम्बार क्रिया करने से निद्राआलस्य, उद्यम, शांति, क्रोध, दंभ, पाखंड, लोभ, मैथुन, रस, फल, उत्साह के अलग २ विश्वा निकल आयेंगे ॥श्रीशाकाको ८ से गुणा करना १ का भाग देना लब्धिको अलग रखना शेषांक को दूना करके १ जोड़ देना जो अंक होय सो उगत्व के विश्वा जानिये फिर लब्धांक को ८ से गुणा करके ९ भाग देने से जो लब्धि होय उमको , अलग रखना शेषांक को दता करके १ जोड़ देना जो अंक होय सो पाप के विश्वा जानिये फिर 'लब्धि को वारंवार इसी प्रकार क्रिया करने से पुण्य-व्याधि-व्याधिनाश आचार-अनाचार-मृत्यु जन्म-देशोपदव-देशस्वास्थ्य चौर-नौरनास- अग्नि- अग्निशान्ति इन सबके विश्वा अलग २ बन जायेंगे || श्री ॥ शाके को चार जगह स्कदै प्रथम को ५ से गुणा दूसरे को ७ से गुणा कर तीसरे को 1 से गुणा कर चौथे को ११ से गुणा कर इन चारौं अंकों में अलग २ सात का भाग देय शेषाकों को दूना'दूना करके तीन तीन जोड़देय तो क्रम से उद्भिज-जरायुज-अंडज स्वेदज-जीवों के विश्वा बनजावेंगे ॥ श्री ।। शाका को सात से गुणा करना और ६ का भाग लेना लब्धि को अलग रखना शेषांक को दूना करना उसमें३और जोड़ देना जोअंकहोय r-
ॐ पंत्रीङ्गरत्नावली,
सो टीड़ी के विश्वा जानिये फिर लब्धांक को ७ से गुणा करना
और ९ का भाग लेना लब्धिको अलग रखना. शेषांक को दूना
करना ३ और जोड़ देना जो अंक होय सो तोताके विश्वा
जानिये फिर लब्धांक को बारम्बार इसी क्रिया से. मूषक-सोना
तांबा-स्वचक्रपरचक बृष्टि बृष्टिनास के विश्वा अलग अलग
निकल आवेंगे। श्री।।
संवत्सरविश्वाज्ञानम् ॥
कर्क की संक्रांति जिस दिन होय उसी दिन के अनुसार
सम्वत्सर के विश्वा जानिये यथा रविवार को कर्क की संक्रांति
होय तो संवत्सर के १० देश विश्वा जानिये सोमवार को
विश्वा मंगलको = विश्वा बुधको१२विश्वा बृहस्पति को विश्वा
शुक्रवारको भी १८ विश्वा शनिवार को कर्क की संक्रांति होने से
सम्वत्सर के ५ विश्वा होते हैं।
चतुर्मेधज्ञानम् ॥
शाके में, ३५ नोड़कर भाग ४ को देय शेष १ बचे
आवर्तक नाम मेघ २ वर्षे तो संवर्तक नाम ३ ववे तो युष्कर
नाम ४ बर्षे तो दोष संज्ञक मेष जानिये मेरफत्तम ।
आवर्त में महावर्त होय संवर्तक में बहुत जल व पुष्कर में चित्र
विचित्र बर्षा होय द्रोणमें चूड़ाआवै ।
अथनवमेघज्ञानम् ॥
शाके में १५१२ हीन करके ९ का भाग देय जो शेप. रहै
उसको में हीन करदेय जो अंक प्राप्ति होय सो क्रमसे जानना
।
पंचारत्नावली
यथा-आवर्त १ संवर्त २ द्रोण ३ पुष्कर कीलक ५ नील
वरुण ७बायुदतम ९फलम
अष्टनागज्ञानम् ॥
शाके में रसादि (७६) युक्त करके ८ का भागदेयं शेष बचे
सो क्रमसे अष्टनाग जानना यथा अनन्त १ वासुकी २ पन
३ महापद्म ४ सुतक्षक ५ कुलीर कर्कट ७ शंख ८॥फलम ॥
हादशनागज्ञान॥
शाके में १५१० हीन करके १२ का भाग देय शेष बचे सो
क्रमसे द्वादश नाग जानना यथा सयुद्धो नन्दसारी २ कर्कोटक
३ पृथुश्रवा ४ वासुकी ५ तक्षक ६ कंवल ७ अश्वतर ८ हेममाली
१ नरेद्रं १० बज्रदंष्ट्र ११ बृष १२ ॥ फलम् ।।
सप्तवायुज्ञानम्॥
शाके में शशांक (१)युक्त करके ७ का भागदेय शेष जो
बचै सो क्रम से सप्तवात जानना यथा आवहः १ प्रवहः २ संवहः
३ विवहः १ उदहः ५ अतिवहः ६ बायुः ७॥ फलम् ।।
सम्बत्सरों के फल ।।
१-प्रभव १ ब्रह्मा स्वामी चैत्र वैशाप श्रेष्ट समस्तु वर्ष समर्थता
ज्येष्ठ-अपाद श्रासर्वधान्य महर्षता गोधूममुगादीनां युगंधारीनां
च विशेष महर्ष भाद्रपदोपि शुभः आश्विनिश्वकविन्महर्यता
पश्चादोगपीड़ा महती सर्व क्रयाणक महर्षे ।।
२-विभवः २ विष्णुस्वामी-रोग व्याप्तिः पृथिव्यां नागपुरीषभंग:
तिलंग मगध चीन देशे महर्षता उच्च मुलनानस्थलमहाविग्रहः
"
ॐ पंचाङ्गरत्नावली* अन्यत्रसमताः चैत्रादिमासस्त्रयो महर्घना ततो मेघबाहुल्यं कार्तिकादयोमासेषु सर्ववस्तु समर्घता गोधमा समा । ३-शुक्लारुदस्वामी-उत्रभंगो म्लेच्छ देशेषु मंत्रिणोराज्यं चैत्रादि मास ३ समता आषाढ़ादि मास ३ महामेघः आश्विने जनरोगः घृतानांसमधू फाल्गुण मासो व ड्वरं सर्वत्रविग्रहः लोक ग्राम पीड़ा देशेषु आकुलता शून्यत्वंगामेषु ।। ४--प्रमोद ४ रवि स्वामी मध्यमवर्षा अलावृष्टि मंडले मेद पात पीडा देश उद्देशः म्लेच्छ वर्णक्षयः छत्रभंगा पर्वत तटे स्वल्पप्रजा तैलंगराजविड्वरंचैत्र बैशाषेचमहर्घता ज्येष्ठेरोग पीड़ा आषाढ़ादि मास ३ अल्पमेधः आश्विने किविदा धान्यस्यत्रयोदशंफदिया कलसिका कार्तिकादि मास ४ सर्वरस महकमा फाल्गुनमध्यमी ।। ५- प्रजापति ५ चन्द्र स्वामी-द्वादशैव मासा शुमा असमेघः आश्विनेरोग बाहुल्यं धान्यस्य कलशिका त्रिंशत्फादियानाणका कार्तिकादि मास मंदं पौषादि मास ३ मरिष्ठ कचिदुत्पात दर्शनेपि पीडा ६-अंगिरा ६ मंगल स्वामी चैत्र बैशाषश्च मंदः ज्येष्ठे वायु प्रवल आपाढ़े मेघबाहुल्यं श्रवणादि मास ३,रोग पीड़ा कार्तिके सर्व धान्य निष्पत्तिः पौषादि मास ३ समता ।। ७--सुमुखः ७ बुधस्वामी चैत्रेसर्व धान्य महर्घ आषाढ़े कृष्णपक्षे अत्यन्त मेंघवर्षाः श्रावणे गोधमा मही घृते धान्येच दिगुणो लाभः वणिक लोग पीड़ा पश्चिमायां रौखम् पूर्वस्याम परचक्रं उच्य मुलतानस्थले प्रजापीड़ा भादपदे वर्षा अश्विनादिघु प्रजा प्रसन्नः ॥ . ܀ * ॐ पंचाङ्गरत्नावली ८- भावः ८ गुरु स्वामी-बहु क्षीरा गावो वर्षा बहुला विंशोप काः सर्व वस्तु महर्घता: उच्च मुलतान अयोध्या सुराजविड्वर लोक पीड़ा धूत गुई अहिफेन पुंगी:मंजिष्ठ , मरीच . चंदन बस्तु महर्षता चैत्रे समताः बैशापे महर्घ धान्ये द्विगुणो लाभः आषाढ़े श्रावणे किंचिद्वभाटे मेघ वर्षी आश्विने रोग बाहुल्यं कार्तिक उत्तमा मार्ग शीर्षादि मास ४ राजविंचर मंदं ॥ .. E-~-युवा र शुक्र स्वामी भूकंप उल्काभयं बहुलं चैत्रादि मास २ उत्पात ज्येष्ठ रोगः आपाड़े. शुद्धपक्षे महामेघः वायु:: अन्न महर्ष भादपद दिने १४ महावृष्टिः व्याकुलता राजविग्रहः उत्तर देशेरोवं. दुर्भिक्ष-पूर्वस्याम. निष्फला कृषिर्दक्षिणस्याम् विराधो मार्गे विपासा पश्चिमायां लोक पीड़ा पश्चादुभिः सर्वरसेपुसमता कार्तिकादि मास २,उत्तमः पौध्ये माघमध्यमः फाल्गुण मासे किंचिकेशः माघादी मार्गे विग्रहः ।। : १०-धाता १० शनि स्वामी- चैत्र वैशापे सर्व धान्य महर्षता ज्येष्ठे मासे समता आपाहाल्प मेघः घृत तैल युगंधरी कार्पास मंजिष्ठ मरीत्र पुंगीफलं महर्षताः श्रावणे, सर्वधान्य : महर्घताः भाद्रपदे पुरुषा नपुंसकानि पश्चिमायां महतीमेघ वर्षा सर्वधान्यं महर्ष दक्षिणोत्तस्योर्मध्ये महामेघः परलोक पीड़ा आश्विने रस कस धातु महर्षता कार्तिक में सर्व अन्न समघ ।। ११-ईश्वर ११ राहु स्वामी उत्तरस्या दुर्भिक्ष पूर्वस्यां सुभिक्ष पश्चिमायां परस्पर विरोधः चैत्रं बैशापे अन्न महर्घता जेष्ठापाठ्यो रल्य मेघः परं सर्व धान्य : महर्षता आश्विने घृत महर्षता कार्तिके रौरव दुर्भिक्षं मंजिष्ठ मरीच लवण लवंग एला पुंगी * पंचाङ्गरत्नावली FORESEXE एतदस्तु महर्षता मार्ग शीर्षादि मास ४ अति दुर्भिक्षं धान्य महर्घ मनुष्याणां रंड मुंडादि भूम्या पतंति ॥ १२-बहु धान्य १२ केतु स्वामी-पुरुषानिर्याः पश्चिमायां शुभिक्षं परं सौख्यं सर्व देश मध्ये दक्षिणस्यां विगृहः परं यहा भयं उत्तर पथे सर्व देशेषु पीड़ा पूर्वस्यां दुर्भिक्षं अन्न संग्रहकार्याः चित्र बैशाषयो किंचिन्महर्षता ज्येष्ठ मासे चतुर्गणो लाभः श्रावणाषाढ़योधः अनसर्वमहर्षं : पड्गुरोलामः १ भाद्रपदे अत्यंतमेघः । सर्वधान्य समर्पता आश्निमेघः कणक धाराभिः कार्तिकादि ४ मास समता ॥ १३--प्रमाथी १३२विस्वामी-आषाढ़े श्रावणेच अल्पमेघःभादपदे पंचम्यां किंचन्मेषः चैत्रेगोधूम युगंधरी महर्घता वैशाषे ज्येष्ठेवा सर्वत्रधान्य महर्षता परं कृष्ण सप्तमी अमायां महामेषः परंभति- वारिष्टं कार्तिके दिने २१ मास ५ सर्वअन्न महर्षता सरस महर्घता मंजिष्ट पुंगी हिंगुल काश्मीर अगरु पट्ट सूत्र नारिकेलं एतदस्तु महर्षता॥ १४-विक्रम् १४ चन्द्रस्वामी राजा प्रजा सौख्यं अतिमेधः चैत्र वैशाषे महर्घ अन्ने द्विगुणलामः परं वैशापे म्लेच्छभयात् नगर उदसवंअरण्ये वासः वैशापे दिन १० महावायुः भूमिकं प्रजा पीड़ा ज्येष्ठमासेदुर्भिसं आपाड़े प्रलयः श्रावण भाद्रपदे महामेषः प्रजा सुखं सर्वधान्यसमधे सर्ववस्तु समता आश्विने रोगः सर्व रससमता कार्तिकादि मास ५ सर्व अन्न समता ।। १५-वृषः१५ भौमस्वामी-बी बहुला परंनृपाणां पीड़ास्त्रभंगा ज्पेष्टेवर्षे मन्न समर्पता धान्ये त्रिगुणालाभः आपाड़े अन्न महर्घना है १६ ॐ पंचाङ्गरत्नावली श्रावणे महान्मेघम्भादपदाश्विनी सर्व धान्ये समता घृत महर्षता पश्चिमेन्नमहर्फे देशा उद्रशाः पश्चिमायां किंचित्दुर्भिक्षं अश्विनेमेघः सर्ववस्तु : समर्पता कार्तिके किंचिदरिष्ठं मार्ग शीर्ष दौस्य पोषादिमास ३ महर्षता परं मध्यमं समयः ।। १६-चित्रभान १६ बुधस्वामी लोक सुखी पूर्वे अल्पं मेघः पश्चात्महती वर्षा धान्यघृतं समता वैशाषे अन्न समंभावना ज्येष्टादि मास तीन महान्मेघः सर्वधान्य महर्षता भाद्रपदादि मासः २ रोगतिः कार्तिके महामारी भयम् मार्गशीर्षदयेऽरिष्टं माघद्रये सरोग प्रजा परं सर्वान्न रस समता वैशाष ज्येष्टयो रोग पीड़ा अन्न व कर्षाणक सर्व वस्तु महर्षता॥ ~१७----सुभानु १७ गुरुस्वामी-पूर्वस्यां दुर्भिक्ष लोक सुखी चैत्रे महर्घता बैशाष ज्येष्ठयो रोग पीड़ा आषाढ़े अन्न महर्ष श्रावणे मेघः अन्न समता भाद्रे महामेघः आश्विने रोग पीड़ा गोधमा समता युगधरी मुद्रादि मणप्रतिफदिया नाणकानि १२ धातु सर्व बस्तु महर्घ घृत समता कार्तिकादि मास २ मध्यम राजपीड़िता लोकाः पौष्यादि मास ३ रोग पीड़ा भयंकरः परस्पर विरोधः॥ . १८-तारण १८ शुक्र म्वामी-अतिवायुः परस्परं युद्धं बहुलं चैत्रे सरोगा बैशाषे सर्ववस्तु समर्घ ज्येष्टै महान्वायुः आषाढ़े अल्प वृष्टिः श्रावणे सप्तमी तो नवमी तो वा वर्षा भादपदे एकादश्यां अत्यन्त मेघः आश्विने अन्न महर्घ सरस संग्रह कार्यः कार्तिके महर्घता मार्गे विग्रहः धान्य मइथं योगिनी पुरे महाभयं राज्ञा बिरोधम्लेच्छभयं पौष्ये युद्ध पश्चिमायांधान्यं महर्घ उत्तरपथे महा दुर्भिक्षं फालगुण मासे मध्यमः तस्कर भयम् अन्न महध विग्रहः ॐ पंचारत्नावली, राजा विरोधात महत्पतिक पूर्वायां दक्षिणस्यां वा वनेवासः पश्चि- मायां महायुद्धं परं अन्य वस्तु समर्थे । १९–पार्थिव १९ शनि स्वामी-उत्पाता बहुला चैत्रे वैशाषेच महर्घता सर्वतो विग्रहः ज्येष्ठे रोग पीडा नृप युद्धं आषाढ़े अल्पमेधः धान्यं मह महाबायुः श्रावणेखंड बृष्टि भाद्रपदे नैऋत्य वायुः अन्न महर्घता अश्विने वृष्टि गोधूमंयुगंधरी, मुगादि महर्षता कार्तिकादि दयरोग पीड़ा पाप माघयो महर्घता फाल्गुणे समता॥ २०-व्यय२०राहु स्वामी-अना बृष्टिः दुर्भिक्ष रौरवं चैत्रो मध्यमः वैशापदये महर्षता देश विग्रहः आषाढ़े अल्पमेधः-परं महर्षता श्रावण दुर्भिक्ष मध्य देशे विग्रहः दक्षिणस्यां प्रजापीड़ा भाद्र पैदे खंड वृष्टिः अन्न महर्घता आश्विने रोग पीड़ा पूर्वस्यां विग्रहः, गोधूमामहर्षता मध्यम-समये कार्तिकरोग पीडा यदाविग्रहोपशमः मार्गशीर्ष मासे अन्न महर्षता परं युद्ध किंचित् पोषादि २ मास अति महर्घता फाल्गुणे समता परं मार्ग वैषम्यं अन्नं मह ।। इति उत्तम विंशतिः ॥ २१.सर्वजित २१ ब्रह्मास्वामी चैत्रादि३ मास समर्घ आषाढ़े अल्पमेघः श्रावणे महामेघः सर्वधान्य स्स वस्तु समर्घता नवीन मुद्रोदयः राजाविग्रह परस्परं अन्नमहर्घता भादपदे दिन ५ पश्चान्महतीवृष्टिः आश्विने रोगार्तिः सर्वधान्य समर्पता कार्तिः के राजा राज्यं करोति प्रजासुखं अन्न समर्थता मार्ग पौषोत्तमो सर्वलोकमुर्ख माघमासे मेघा दिन ३ मंजिष्टा मुहरा मरीत्रिशुंठी 1१८. । -- , * पंचाङ्गरत्नावली पिप्पली सुपारी प्रमुख महर्घता फाल्गुणे सर्ववस्तुं समता उत्तमःसमयः॥ १९-सर्वधारी २२ विष्णुस्वामी राजीराज्य सुस्थः प्रजासुखं अनसमंध मार्ग शीर्ष पोध्यौ उत्तमः सर्वलोकसुखं पट दर्शन महत्पूजा सर्वनगर देशेषु स्थानवासः चैत्र संबंधान्य समता उत्तरापथे दुःकालः बैशाष महर्घ जेष्टे महर्घता महाभयं अरिष्टा- पादे महामेघः श्रावणे अल्प वर्षा अन्नं मह) भादपदे दुर्भिक्षं आश्विनेरोगः अन्न समता राज्ञांपरस्पर विरोधः अनमहर्घता ।।। । २३.विरोधी २३ रुद्रस्वामी चैत्रादि ३ मास धान्य महर्घता आषाढ श्रावणे अतिवर्षा भाद्रपदे खेड वृष्टिः मासत्रयतिभयं। किंचिदुत्तपात राजाप्रजा सुखी कचिद्राज्य युद्धं सर्वधान्य सम.. घेता आश्विने सर्वसमध कार्तिके मारीरोग बहुलता मार्गशीर्षादि। मास ४ गुजरे महदेशे अन्नमह । २५-विकृत् २४ रेबिस्वामी अकाले वर्षा राजविग्रहः देशा उदसा मरुधरायां दुर्भिक्षं चैत्रादिमास ४ महर्षता कण कलशिका प्रतिफदिया नाणके एक सतेन लाभः श्रावणमास द्वय मेघवृष्टि- नास्ति रौवं दुर्भिक्ष आश्विने उत्पात भूकंप कार्तिके क्षत्रभंगः सुवर्णादि सर्वधातु समर्घता कण कलशिका प्रति २० फदिया नाणकानां एक प्राधिन भवति ॥ २५-खर २५ चंद्रस्वामी-चैत्रादिमास ५ महतीवर्षा सुभिक्ष प्रजासुखं सर्वलोके गुरुणां महत्वं पश्चिमायां मुभिक्षं आश्विने अन्न समता रस महर्घना मंजिष्टा सुहागा वस्तुतो मरुधरायां त्रिगुणो लाभः म्लेच्छायं परं रोगपीड़ा सर्वधान्यनिष्पत्तिःप्रजा - प 1 . * पंचाङ्गरत्नावली सुखं कार्तिकादि मास ५ मध्यम सर्वधान्य समर्पता ॥ २६-नंदन २६ भौमस्वामी-प्रजामुखं सर्वधान्य समता चैत्र मध्ये करका पतनि वैशाषे धान्य महर्घ प्रचंडवायु ज्येष्टेपि तथैव महर्घ आषाढ़े महामेघःश्रावणे अल्पवर्षा भाद्रपदे महावृष्ठि अश्विने सुभिक्ष राजाराज्यं प्रजासुखं कार्तिके सुभिक्षं अन्न समता मार्ग शीर्षादि ४ मास महर्षता मंजिष्टा लवणो महर्घता।। २७-विजय २७ स्वामी-बुधः सर्वदेशे महापीडा राज्ञां परस्पर विरोधः अन्नमहर्घ तुच्छ जलं महिलोहित पापिनी विप्र गो महिष अश्व हस्ती, पीड़ा क्षेत्रमध्ये महती वर्षा शाषे ज्येष्ठे अन्न महर्घता आषादे भावणे अल्पमेघः कण कल. शिका प्रतिफदियाभावपदे वी वर्षति कलशिका प्रतिशत दिया १४ आश्विने मध्ये बणिक जन पीड़ा अन्नं महर्षता फाल्गुणे समतापरं विप्रहः धान्ये षट् गुणोलाभः ।। २८-जयरमगुरुस्वामी-महासुभिक्षं चैत्रे महर्घता वैशाष ज्ये- छयो समर्घता आषाढ़े मेघवर्षा अन्नमहर्घ श्रावणे दिन २५ अमहामेघः भाद्रपदे दिन ७ मेघवृष्टिः आश्विने अन्नंसमध कणा नांमणं प्रतिद्रामा ३५ लभ्या स्वर्णादि धातु समता कार्तिकादि मास ५ उत्तमं अन्न समता अन्य वस्तूनि महर्घता भवति मौक्ति प्रवालकादि महर्घता मार्गशीर्षे रोग बहुलता चणिक पीड़ा उच्च मुलतान देशे रोग पीड़ात्रभंगालोकदुःखिता।। २१-मन्मथ २६ शुक्रस्वामी राजविरोधःपूर्वदेशेलोकपीड़ा परं अतिवृष्टिः रोग बाहुल्यं धान्यं संग्रह चैत्रे वर्षाभूमि कंपः वैशापे समर्घताज्येष्टाषाढ़ महर्घता धान्ये पद्गुणोलाभःश्रावणे अल्पमेष - , २० ॐ पंचाङ्गरत्नावली भाद्रमहामेघः दिन २४ आश्विने रोग पीड़ा अनं महर्घ धान्य मणं प्रतिद्रामा ६० लभ्यते सर्वधान्य समर्पता कार्तिके मुभिक्षं अन्नसमता मार्गशीर्षादि मास ३ अन्नसमर्थ राजा लोकौ सुखं सर्वधातु समर्घता वनमहर्षता॥ ३०-दुर्मुख ३० शनिस्वामी-अत्र अशुभ अल्पमेघः महता लोकानां पीड़ा सरोगाकुलाः उत्तरापथे दुःकालः पश्चिमायाँ महापीड़ा पूर्वदेशे सुभिक्ष अन्न महर्घ क्षत्रियेषु नकुल सभ्यां विषगृह्यते चैत्रादि मास ३ महर्घता आषाढ़े अल्पमेघा श्रावणे प्रचंडवायुः सर्वधान्य महर्घता भाद्रपदकणानांमणं प्रतिद्रामा ८५ लभ्यते खंडवृष्टिः आश्विने रोगपीड़ा सर्वधातुवा समर्घाः कार्तिकादि मास ४ रोखं दुर्भिक्षं जीवादयो' अकराः प्रवर्तते मातापुत्रं विक्रयः पितापुत्र स्नेहमुक्तः फाल्गुणे रोगपीड़ा राज्ञा परस्पर विरोधः लोक पीड़ा ।। - - ३१-हेमलंब ३१ राहु स्वामी अति रौरवं सरोगा लोका भूकं- पादयः उत्पातः वणिक पीड़ा चैत्रे वैशाषे पीड़ा धान्यादि मंजिष्ठा मंदभावः परंचक्रागम ज्येष्ठादिमास ३ धान्यं महर्षता चतुर्गुणो लाभः भाद्रपदेमहामेघः अन्नसमता मंजिष्ठा मरीच लवंग महर्घता कार्तिके छत्र भंगः लोक पीड़ा अन्न कलशिका प्रतिफदिया १०२ सर्व धातु समर्पता चतुष्पदानां पीड़ा मार्ग शीर्षादि मास ४ राज्ञां सुस्थतालोक सुखिनः ।। ३२-विलंब ३२ विस्वामी चैत्र वैशाषयो धान्यं समता आषाढ़े श्रावणे धान्यं कलशिका प्रति टका ५ फदिया २५ लभ्यतेआषाढ़े मेघ अल्पाश्रावणेमहामेघःसुभिक्ष भाद्रपदेदिन२१ T पंचाङ्गरत्नावली वर्षा बहुला परंगोधूमाश्च महर्घता पश्चिमायां सुभिक्षं राजविग्रहः पूर्वेदेशे अन्न महर्घ अन्नं दुःप्राप्यं दक्षिणदेशे संज्ञामन्योन्य विरोधः आश्विने अन्न महर्षता रोगपीड़ा सर्व कृयाणक बस्तु महर्घ कार्तिकादिमास ५ धान्य कलशिका प्रति", फदिया १० लभ्यते । .३३-विकारी ३३ चन्द्रस्वामी-सर्व अन्न महर्घ सर्व,वस्तु मह घता दिजः सुखिनः चैत्रादिमास ३ धान्य .महर्घता आषाढ़े श्रावणे महान्मेघः सुभिक्षं भाद्रपदे स्वल्प मेघः आश्विने सर्प भयं केतूदयः अन्न कलशिका प्रति फदिया १० लभ्यते सर्व वस्तु महर्घता कार्तिकादिमास २ धान्यं समर्घ पौषे रोगपीड़ा लोकः सुखी फाल्गुणे धान्य महर्घता ॥ ३४-सर्वरी३४भौमस्वामी-प्रजाप्रलय अल्पवर्षा राज्ञां बिरोधः चैत्रादिमास ३ अन्न समता आषाढदये महामेघः परं खंडवृष्टिः अन्न समर्घता भाद्रपदे वर्षा नास्ति' राजपीड़ा लोकेषु आश्विने रोगपीड़ा अन्न, कलशिका प्रति फदिया १० बाण कैलभ्यते पश्चिमायां दुर्भिक्षं पूर्वस्यां सुभिक्षं कार्तिकादिमास २ अन्न महर्ष पौष्यादिमास ३ धान्यसमध ।। ३५-प्लव ३५ बुधस्वामी बर्षाकाले वर्षावहुला उत्तमः समयः चैत्रेधान्य मंदता वैशापे भूमि भयंकरी ज्येष्ठे अन्न समर्घता तेलंगे पूर्व देशे पीड़ा आपाड़े महावायुः उत्पात लोका सरोगाः श्रावणे महान्मेषो दिन २७ वर्षी भाद्रपदेश्वनो धनागम-धान्यं समर्धे कणकलशिका ११ फदिया नाणकैरष्टभिर्लभ्यते आश्वि. ने सर्व बस्तु सर्वधातु समर्घता गोधूमानां महर्षता कार्तिके 7 ॐ पंचाङ्गरत्नावली ® अन्न समर्घ लोक सुखी मंडपांचालो विग्रहः पोषादि मास । अति सुभिक्ष राजराज्यं आनन्दम् ।। ३६-शुभकृत् ३६ गुरुस्वामी-अति वर्षा राजापजा सुखेन वर्त ते उत्तरापथे वह्नि भयं चैत्र बैशाषे समर्घता धातु समर्थता श्रावणो ९ तिथितो वर्षा अन्न समर्पता भाद्रपदे महान्मेषः वह्निभयं अन्न. कलशिका एकाफदिया नाणकै रष्टभिः घृत तैलं समर्घ कार्तिकादि मास ३ युगंधरी गोधूम चणक तिल मुद्ग तंदुला इत्यादि अन्न समर्घ राज्ञां परस्पर विरोधः ज्येष्ठादि मासेषु सर्व वस्तु समर्घ फाल्गुणे किंचिदुपातः मरु देशे रोगः परं सुभिक्षं ॥३६॥ ३७-शोभन ३७ शुक्र स्वामी-राज्ञां प्रजानांच सुखम् अति वर्षा चैत्रादिमास ३ धान्यं समर्थ राजा विग्रहः किंत्रिदुत्पात आषाढ़े अल्पमेघः श्रावणे अति वर्षा परलोक पीड़ा भाद्रपदे महान्मेघः आश्विने सुभिक्षं ततो अवि किंचिद्विग्रहः ।। १३८-क्रोधी ३८ शनिस्वामी-दादशमासान अन्न महर्ष मध्य मः समयः राज्ञां परस्पर विरोध प्रजायां परलोको निर्धन व्यापा- रीनां चैत्र बैशाषे कर्कापातः रोगभारी भयं ज्येष्ठे धान्यं' महर्घ आषाढ़े समता अल्पो मेघा श्रावणे रोखं भाद्रपदे खंड बृष्टि अन्नं महर्घ अश्विने मेघ बर्षा सर्वत्र रसकस बस्तु समता अन्न बस्तु सर्व समध कार्तिके समता ।। ३८-विश्वावसु ३६ राहस्वामी वर्षा समता अन्न महर्घता चैत्रे राज्ञां विरोधः धान्यं मह वैशापे मंडपदुर्गे विग्रहः अन्न स्य ४५ फदिया नाणकै रेकाकलशिका अन्यत्रदेशे सुभिक्षं .
. अन्न समता भाद्रपदे खजरसरणलाभः श्रावणे महतीवर्षा पंचाङ्गरत्नावली मश्विने रोगपीड़ा रोग वाहुल्यं गो.महिषी बोटक अजा महर्घतो सुवर्णादि धातु महर्षता कार्तिकादि मास ३समर्पता कण कलर्शि का एक फदिया । ४० पराभव ४० केतु स्वामी-दादशमास: वर्षा मध्यम वृष्टि चैत्रे बैशाषे अन्न महर्ष मेघ गर्जते ज्येष्ठे धान्य संग्रह उदंड मुखं पर धान्य रसवस्तु महर्षता धातु समर्घताकार्तिकादि मामी समता पश्चिमायां अन्न समता सिंधुदेशाधान्यागमाइति मध्यम विंशति फलम् ॥ ४१-प्लवंग ४१ ब्रह्मा स्वामी-चैत्रे वैशाष महर्घता ज्येष्ठ मध्ये राजा.पीडा आषाढ़े अल्पमेघःभूमिकपः हस्तिपीड़ातुरंगम महर्धेता श्रावणे :महामेघः भाद्रपदे ८ सीतो महामेघः आश्चिने रोगः रस महता फाल्गुणे कण कलशिका एक फदिया १० प्रमाणों अश्व महिषी तथा लोक पीडा॥ '४२-कीलक ४२ विष्णुस्वामी-वर्षामध्यमः चैत्रेधान्य महर्ष शारोगः मरुदशे दुर्भिक्षं पश्चिमायां समर्थता ज्येष्ठे धान्य संग्रह आपाढ़े श्रावणे अल्पमेघः अन्यसमधै धान्येदिगुणोलाभः भाद्रपदे अष्टम्यांमेघः आश्विनेवर्षा अन्नमहर्घ राजधानी नगरे उदसता रोगा बहुला गोधूमा महधः सर्वधान्य व रसः समर्घात एक मणं प्रति फदिया ५०० कार्तिकादि मास ३ समर्पता माघे अन्न मह रोगपीड़ा महत्ती फाल्गुणे राजा राज्य सुस्थः प्रजा सौख्यं मन्नसमता 40 है ● पंचाङ्गरत्नावली, ४३-सौम्य ४३ रुद्रस्वामी अल्पमेघः गावःअल्पक्षीगः वृक्षे अल्पफलम् चैत्रे महर्घता वैशाषे उदंडवायुः ज्येष्ठेविग्रहः प्रजा पीड़ा आषाढ़ेअल्पमेघः अन्नं मह श्रावणे महामेघः धान्यं दिगुणो लाभः गोधूमानां कलशिका एकाप्रतिफदिया ५० प्रमाणं लभ्यते सर्वधान्यसमता रसमहर्घता भाडे खंडवृष्टिः अन्न दुर्भिक्ष आश्विने राजाविरोधः लोकपीड़ा मार्गे विषमता अन्ने संग्रहः धान्ये द्विगुणोलाभः सर्वरसधातुं समर्पता कार्तिकादि मास १ तेषुसमता परंराज्य विद्दरं बालक रोगः देशाउदस्ता देशांतरीय लोकपीड़ा फाल्गुणे उदंडबायें पश्चिमायां मुभिक्षसिंधु देशे राजविरोधः अन्नं समर्घता ।। ४४---साधारण ४४ रनिस्वामी-चैत्रेधान्य मंदता वैशाषे ज्येष्ठे उत्पातः भूमिकपः रोग बृद्धिः राजाविरोधः धान्यमहर्षता आषाढ़े वायुदंड सैखं कचिदलामेघः श्रावणेमहती वर्षा अन्न समताभाद्रपदे अल्पमेघः आश्विने अल्पधान्य निष्पत्तिः कार्ति कादि मास २ मध्यमारिहं भूमिकपः अकस्माद्राज विग्रहः अन्न महर्घता सर्वरस संग्रह परं राजासुखी । ४५-विरोधकृत४५चन्दूस्वामी-पंडपाल दुर्गविग्रहः कोकण देशे मेहपाट मंडले मध्यदेशेमहा रौरवं परस्परं राजविग्रहः मार्ग विषमः चैत्रादि मास ३ अन्नसमता आषाढ़ेअल्पमेधः पावणे महा वर्षा भन्न समर्पता भाद्रपदे मेघः अनसमता सर्व धातु महर्घता फाल्गुणे देशविरोधः मार्ग वैषम्यं मंजिष्ठा सोपारिका पट्टमूत्रं देतमहादस्तु तुरंगमादिमहर्घता ।। ४६-परिधावी १६ भौमस्वामी-दुर्मिकं नागपुरे मेह पाटे SEXERESEASEE * पंचागरत्नावली, जालंधरदेशराज्ञांविरोधाचैत्रादि ४ मास अन्नसमतातत्रसंग्रहः काश्लिोके रोगभयंचतुष्पद महिषी तुरंगहस्तीनां पीना श्रावणे भाद्रपदेअल्पमेघःखंडवृष्टिःअन्नमहर्घनासर्वरसमहर्घतासर्वेधातवः समर्घाः कार्तिकादि मास ५ धान्यसमता राजा विड्वर सिंधुदेशा- खान्यागमः ॥ ४७-प्रमाथने १७ बुधस्वामी-कोकणदेशे दुर्भिक्षं विग्रहः चैत्रे धान्य समता बैशाषज्येष्ठयोर्धान्यसंग्रहः आषाढ़े नवीनमुद्रा पर अल्पमेघः श्रावणस्याः मेघ वर्षा अन्नमहर्षे धान्ये त्रिगुणो लामः भादूपदे महामेघः अन्नप्समध आश्विनादि मास ६ सुभिक्षं सर्वस्स महर्घता लोकः सुखी गुरुणां पूजा महिष बृद्धिः राजाधाः॥ १८-आनंद गुरुस्वामी-वर्षा बहुला सुभिवं चैत्रदेशाप अन्नसमर्घ ज्येष्ठाषाढयोर्मध्यमबृष्टि पर नवीनमुद्राजायतेश्रावणे महामेघः भादूपदे खंडवृष्टिः गोधूमा महर्घता आश्विने समर्घा रस अन्नबस्तु समताधातु महर्घता कार्तिके अकस्माजयं लोक पीड़ा मार्गशीर्षे लोकानां दक्षिणदिशि गमनं पौष्य माघे मेष वर्षा अन्न समर्घ फाल्गुणे धान्य महर्घ ॥ VE-क्षस ४९ भृगुस्वामी-धान्यसंग्रहः कार्यः चैत्रे करका पतंति बैशाषे ज्येष्ठ तैल महर्घ ज्येष्ठे आषाढ़े गुड़ शर्करा द्रव्यं महर्घ श्रावणेदय अल्पमेघः अन्न महर्घता आश्विने समता कार्तिके रोगाति: मार्गशीर्षादि मास ४ धान्य समर्पता राजा सुखी प्रजाराजा मान्या फाल्गुणे समर्घता वृक्षा' नवपल्लवा मार्गे सुखे सुभिक्षं ॥ F * पंचाङ्गरत्नावली के ५.-तल ५० शनिस्वामी-अल्पमेघपरं समर्घ चैत्रेरोग पीड़ा बारिद बहुला वायुः प्रवला वैशाषे अरिष्टअन्नसंग्रहः कार्य ज्येष्ठे राज्ञांपरस्पर विरोधः लोकमागे वैषम्यं कचित् आषाढ़े संग्रह कार्यों कार्तिकेविक्रयः मार्गशीर्षादिमाम ३ अन्दसमताफाल्गुणे बालानां रोगः तस्करेभयं उत्तरादेश दुःकाल पूर्वस्याम दुर्भिक्षम् ।। ५१-पिंगल ५१ राहुस्वामी-उच्चमुलतान नागपुर मरु दिल्ली मंडलेषु मथुरायां पूर्व देशेषु दुर्भिक्ष सर्वधातु अन्नं वा समर्थ परं सर्वत्रविग्रह नगरे बास गामानां उदसतं ५०० रोग पीड़ा राजा सुस्थं प्रजासुखं अन्न संमतो गुर्जरदेशे समर्घता सिंधु देशे धन्यागमः चैत्रे धान्य महर्षता प्रजापड़िा वैशाषादि मास ३ अन्न समर्पता प्रजाक्षयः अश्वपीड़ा आपाढ़े श्रावणे अल्प मेघः धान्ये चतुर्गुणो लाभः भाद्रे खंडवृष्टिः आश्विने समता कार्तिक मास ५ विग्रहः पीड़ा अन्न महता चतुष्पद रोगः ॥ ५२.कालयुक्त ५२ कालवत्सरे ५२ केतुस्वामी अल्पमेधः देशे उदसनं अल्प व्यापारः राजविग्रहः चैत्रे शापेच अति अरिष्टं उत्तरापथदेशभंगः ज्येष्ठ धान्य संग्रहः धान्येषगुणो लाभः आषाढ़े अल्पमेघः लोके सुखं मागें विषमता श्रावणे महान्मेधः अन्न समता भाद्रपदे खंडवृष्टि धान्यं दुर्भिक्ष उत्पातः आश्विने रोग शीतलादि विकारः धान्य फदिया ७५ नाणः कलशिका एका लभ्यते सर्वरस महर्घता सर्वधात समर्घता कार्तिके माप्त पंचके यावत परंराज विड्डरं अश्व चतुष्पदपीड़ा। ५३-सिद्धार्थ ५३ रविस्वामी-सुभिक्ष सर्व देशे यसति बहुला अन्न विक्रयः चैत्रे वैशापे लोक पीड़ा ज्येष्ठापादयो उदंडवायुः ● पंचाङ्गरत्नावली. है श्रावणेदिन । महावर्षी सर्वान्न महर्षता भाद्रपदे खंडवृष्टिः आश्विने अन्न समता कार्तिके धान्य निष्पत्ति; बहुला अन्न समर्पता सर्वधातु समता मार्गादिमास ४ अनंतर सर्वत्र ग्राहकता उत्पातः कचिद्राज विरोधः लोक विग्रहः अश्व मूल्य महर्षता ।। ५४-रौद्र ५४ चन्द्रस्वामी-पृथिव्यां विरोध बाहुल्यं चतुष्पद नाशः क्षत्रभंगः स्वदेशे ग्रामभंगाः अल्पमेधः चैत्रादि मास ३ अन्न महर्घ आषाढ़ श्रावणे अल्पमेघः खंडवृष्टिः भादपदे महान्मेषः अन्न समर्घना अन्यदस्तु मंजिष्ठा सोपारिका लवंग महर्घता लोक सुखी चतुष्पद समर्पता हस्तीनां पीड़ा । ५५-दुर्मति ५५ भौमस्वामी मैत्रे वैशापेच धान्य सम, ज्येष्ठे अन्न समतां आषाढ़े उदंडवायुः श्रावणे ,अल्पमेघ कण कलशिका फदिया ३४ प्रमाणेनलभ्यते सर्वधातवः समर्पता लभ्य ते आश्विनै सर्वरस समर्घता धान्य समता कार्तिकादि मास २ यावत् सर्ववस्तु समता राजास्वस्थः ग्रामे ग्रामे नवीन बसति सर्वलोक सुखी अश्व महर्षता चतुष्पद ३२ महर्घता पौषादि मास ३ यावत् सर्वधातु समर्घता ।। ५६-दुंदुभी ५६ घुधस्वामी-वर्षा बहुला अन्न समता रस कस वस्तु समर्घता चैत्रादि मास ३ अन्न समर्था आपाढ़े दिगुणो लाभः अल्पमेघः श्रावणे दिन ११ महावृष्टिः भादपदे मेघ दिन १ वर्षति अन्नं समर्थ देशा नवीना वसति आश्विने अन्न समर्घ रोगाः बहुला-मंजिष्ठा मरीचानां समर्घता सरस सर्वधातु समर्थः कार्तिके धान्यं ममर्ध अन्न दुर्भिक्ष पश्चिमायां शुभम् मागशीर्षे समघना राज्ञांपरस्पर विरोधः लोका देशांतरयांति PAGER 1 ॐ पंचाङ्गरत्नावली पोषादि मास ३ समता अश्व वा मंजिष्ठा महर्धा ॥ ॐ । ५७. रुधिरोदारी ५७ गुरुस्वामी राज्ञां. परस्पर विरोधः लोके देशान्तरयांनि दुर्भिक्षं द्विज पीडाजीवादि दुःख म्लेच्छः राज्य परदेशात धान्या माया -आषाढ़े शुक्लपक्षे महामेघः श्रावणे दिन'१५ महावर्षा चैत्रादि मास ३ समर्घता धातवः समर्थः उत्तरापंथे उच्चमुलतानं तिल तैलंगे गौड़े मोठ एषुदेशेषु दुर्भिक्षं पश्चिमायां सुभिक्ष सिंधुदेशे धान्य निष्पत्तिः भाद्रपदे खंड- वृष्टिः धान्ये त्रिगुणों लाभः आखिने समताः रोगः बालक: कार्तिकादि मास अन्नं समर्थ मेदपाटे लोक पीड़ा.॥ ताक्षर शुक्र स्वामी अन्न समर्थ मेदपाटे बृक्षे महा. मेघः आपाढ़े महती जल वृष्टिः सुराष्टायां ग्रामे प्रवाहकः अन्नं समय श्रावणे अल्पमेघः किंचिदिग्रह भाद्रपदे. अल्पवर्षा, रोग पीड़ा आखिने अन्न समर्घ कार्तिकांदि मास धान्यं महध विवाहादिक नास्ति अश्व पीड़ा पश्चिमायां शुभम् ॥ ५९-क्रोधन ५६ शनिस्वामी सेना बहुला मंदबुष्टि, प्रजा. पीडा उत्तरापथे दुःकालः लोका निधनाः चैत्रे बैशाषे अल्पमेघः अन्न'समर्थता ज्येष्ठे मंद रोग पीड़ा अनसमता आपाढ़ श्रावणे अल्पवर्षा धान्य त्रिगुणो लाभः भाद्रपदे मेघः अन्नसमध आश्विने रोग पीड़ा कार्तिके विग्रहः धान्य समर्घ मार्गशीर्षे धान्य समता अकस्मादुत्पातः पोपेप्समर्थता बणिक पीडा धान्ये दिगुणो लाभः अन्यबस्तु सम॥ ६०-क्षयः ६० राहुस्वामी चैत्रे करकापातः बैशापे उत्पातः भूमिकपः ज्येष्ठापादयो रोगबालकः नवीन मुदा उदयः अल्पमेघः । EXSEXERCISEMES " * पंचाङ्गरत्नावली अन्नसमर्घता भाद्रपदे खंडवृष्टिः चतुष्पदहानिः फदिया ५० नाणके धान्य कलशिका एका आश्विने रोगः परं अन्न समर्थ सर्वधातु समता मध्यमः समयः राजविरोधः पश्चिमायां सुभिक्ष अनसमर्थ सिंधु देशातस्थलदेशादा अन्नागमः पूर्वस्यां विडुरं अन्न समता६० इतिकश्यप संहितायां संवत्सर फलम् समाप्तम् ।। अथ सम्बत्सर फलान्याह कश्यपः ॥i १ इनयश्चाग्निकोपश्च व्याधयःप्रचुरोभुवं ।। प्रभयाब्दे मन्दवृष्टिश्च तथापिसुखिनोजनाः ॥ १॥ दंडनातिपराभूया बहुसे स्यार्पवृष्टयः ॥ विभवाब्देखिलालोकः सुखिनयुर्विवैरिणाः ॥ २॥ शुक्लान्देनिखिलालोकाः ' सुखिनःसुजन सह ॥ राजानोबुद्धं निरताः परस्परंजवैषिणः ॥ ३॥ प्रमोदाब्देप्रमोदते राजानोनि खिलाजनाः । वीतरोगावीतभया इतिवैरिविवर्जिता || नचलत्यंखिलालोकाः स्वस्वमार्गावकवचन ।। अन्देप्रजायतानून बहुसस्यार्घवृष्टयः ॥ ५ ॥ अन्नाद्यभुजतेशश्वज्जनरतिथि मिन्सहः । अंगिराब्देखिला लोको भूयोश्चकलहोत्सुकाः ६॥ श्रीमुखाब्देखिलोधात्री ‘बहुसस्यार्घसंयुता ॥ अध्वरेनिरताविना वीतरोगविवरिणः ॥ ७॥ "भावान्देप्रचुरारोगा मध्यसस्या घवृष्टयः ॥ राजानोयुद्धं निरतास्तथापि सुखिनोजनाः ॥ ८ ॥ प्रभूतपयसोगावः सुखिनः सर्वजंतवः ॥ सर्वकामक्रियासक्ते युवाब्देयुवतीजनः ॥ ९॥ धात्रिवर्षेखिलाक्ष्मेशाः सदायुद्ध परायणः ॥ संपूर्णाधरणीभीत बहुसस्यार्घवृष्टया ॥ १०।। धात्रधिात्रीवसर्वदा ॥ पोपयमतुलं 'चान्नं फलंमासेत्रित्रीहिभिः ॥ ११ ॥ अनीतिबन्लाष्टिः - - 8 पंचाङ्गरत्नावली बहुधान्याख्यवत्सरे ॥ विविधैर्धान्यनिचयैः सं. ॥ १२ ॥ नमुंचंतिवयोवाहः कुत्रचित्कुत्रविज्जलं ॥ मध्यमा वृष्टिरर्घश्च नूनमब्दप्रमाथिनी ॥ १३ ॥ विक्रमान्देधराधाशा विक्रमाक्रांतभूतयः ॥ सर्वनासर्वदामेघ मुंचंतिप्रचुरंजलं ॥ १४ ॥ वृपादेनिखिलाभै शायुध्यंतिवृषभोजव ॥ विद्यः प्रशक्ताविप्रेद्राजयते . सततंसुरान् ॥ १५ ॥ चित्रावृष्टि सस्याथै विचित्रनिखिलाधरा ॥ निसकुलाखिलालोकाश्चित्रभानो श्चक्रसरो ! १६ । सुभानुक्सरेभूपो भूमियानांचविग्रहः ॥ भातिभूर्भूरिसस्यायं भयंकारभुजंगमाः ॥ १७ ॥ कथंचि- न्निखिलालोका स्तरंतिप्रतिपत्रता ॥ नृपाहवक्षतादोगानेपज्यै तारणब्दे ॥ १८ ॥ पार्थिवाब्देतुराजानः सुखिनःसुप्रजाभृशं ।। बहुभिफलपुष्पायैर्विविधैश्चपयोधरैः ।। ॥ व्ययान्दे निखिलालोका बहुव्यपराभृशं । बीरमत्तेभतुरंगैस्थैर्भूपतिसर्वदा ।। ॥ २०॥ सर्वजिदत्सरेसर्वे जनास्त्रिदशसन्निभः ॥ राजानोविलपं योति भीमसंग्रामभूमिषु !॥ २१॥ सर्वधाब्दिकेमपाः प्रजापालन तत्परा 'प्रशांतवैरासर्वत्र बहुसस्यार्घवृष्टयः ॥ २२ ॥ विरोधी वत्सरेभूपा-परस्परविरोधिनः । भरिभूवियुता भूमिभूरिवारिसमा कुला२३ प्रकृतिविकृतियातिविकृतिः प्रकृतितथा । तथापिसुखिनो लोकाः शविकृतिवत्सरं ॥ २४ ॥ खराब्दे निखिलालोकाः अन्यो न्यसमरोत्सुकाः ॥ मध्यमावृष्टिरत्युग्ररोगै पालयययुः॥ २५ ॥ नंदनाब्देसदापृथ्वीबहुसस्यार्घ वृष्टयः ॥ आनंदोप्यखिलानातं जंतूनांसमहीभुजाम् ॥ २६ ॥ विजयादेतुराजानःजयसंघोष तत्पराः ॥ सुनदंतिप्रजासर्वेवहुसस्यार्घ वृष्टयः ॥ २७ ॥ जय ॐ पंत्राङ्गरत्नावली मंगलघोषाद्यैर्वाणाभीतिसर्वदा ॥ । जयाद्धरणीनाथः संग्राम जयकांक्षिणः ॥ २८ ॥ गन्मथादे प्रजाःसर्वे तस्कारात्पति लोलुपाः॥शालीञ्जयवगोधूमैनयनाभिनवाधराः॥ २६ ॥ दुर्मुखान्दे मध्यबृष्टि रितिचौराकुलाधराः ॥ महावैरामहीनाथः वीरवारिण वाजिभिः॥३०॥ आकुलहेमलंबेतु मध्यसस्याघदृष्टयः । भाति भूर्भपतिक्षोभव हुविद्युल्लतादिभिः।। ३१ ॥ विलंबीवत्सरेभूपाः परस्पर विरोधिनः ॥ प्रजापीड़ाअनयत्वं तथापिसुखिनोजनाः ॥ ३२ ॥ विकार्यदेखिलालोकाः सरागाबृष्टिपीड़िता ॥ पूर्वमस्यफलस्वल्प बहुरंबापरंफलम् ॥ ३३ ॥ शर्वरीवत्सरेपूर्णा धरासस्यार्पवृष्टिभिः ।। जनाश्चसुखिनःसर्वे राजानंस्युषिवैरिणः ॥ ३४ ॥ नवाब्देनि खिलाधात्री वृष्टिभिप्लवसन्निभाः ॥ रोगकालान्वीतिभीतिः संपूर्णेवत्सरेफलम् ॥ ३५ ॥ शुभकृत्सरेपृथ्वी संपूर्णविविधो सवैः ।। आतंकचौराभयदा राजानःसमरोत्सुकाः ॥ ३६ ॥ शोभकृद्धत्सरेधात्री प्रजानांरोगमोकदा ॥ तथापिसुखिनाः लोकाः बहुसस्यार्घवृष्टयः ॥ ३७ ॥ क्रोधान्देनिखिलालोका क्रोधलोभपरायणाः।। इतिदोषेसासततं मध्यसस्याघवृष्टयः ॥ ३८ ॥ अब्दोविश्वावसासैश्वद् घोररोगाधरानराः ॥ सस्यार्घवृष्टयोमध्या भूपालानातिभूतयः॥३६॥पराभवाब्देराज्ञस्यात्समरं सहशत्रूभिः॥ आमयःक्षुद्रसस्यानि प्रभूतान्यल्पवृष्टयः॥ ४० ॥ प्लवंगाब्देमध्यवृष्टि रोगाचौराकुलाधराः ॥ अन्योनसमरेभूपो.शत्रुभिर्हतभूमयः ॥११॥ कीलकाब्देसीतिभीतिः प्रजाक्षोभनृपाहवौ ॥ तथापिवर्धतेलोकाः समधान्यार्घवृष्टिभिः ॥४२॥ सौम्याग्देनिखिलालोकाःबहुसस्याई दृष्टिभिः ॥ विवैरिणोधरावीशा विषाश्चाधरतत्पराः ।। ४३ ॥ manumA . ३२ * पंचारत्नावली साधारणाब्दे वृष्टयर्च भयंताधारणमतम् ॥ मध्यसद्धराधीशाः प्रजास्युःस्वस्थचेतसाः ॥ ४४ ॥ विरोधकदरसरेतु परस्पर विरोधिनासर्वे ननानृपाश्चैव मध्य सस्यार्घवृष्टयः ॥ ४५ ॥ भूपा होमहारोगो मध्यसस्यघि वृष्टयः ॥ दुःखिनोजंतवःसर्वे वत्सरे परिधावनी ।। १६॥प्रमाधीवत्सरे तत्र मध्य सस्पर्घ वृष्टयः॥प्रजा कथंचिज्जीवति समात्सवीक्षितश्विराः ॥ ४७॥आनंदान्दखिला लोका सर्वदानन्दचेतसः ॥ राजानःखिनासा वत्सोमेदनी शिवे ॥ १८ ॥ राक्षसान्दखिलालोका सक्षसाइवनिकृयाः ॥ इन्द्रोपिन जलंदद्यात् सुभिक्षं नैव जायते ॥४१॥ नलान्दे मध्य सस्यार्घ वृष्टिभिःपचराधराः ॥ नृपंसोभसजाता भूरितस्कर भीतयः ॥ ५० ॥ पिंगलादेवीतिभातिमध्य सस्यार्घवृष्टयः॥ राजानोविक्रमकांता भुज्यतेशत्रुमेदनी ।। ५१ ॥ वत्सरेकाल युक्ताख्ये सुखिनःसर्वजंतवः ॥ संतीततोपिसस्यानि प्रचुराणि तथागदाः ॥५२ ॥ सिद्धार्थीवत्सरेभूपा शांतरस तथाप्रजाः॥ सकलावसुधाभाति बहुसस्या दृष्टिभिः ॥ ५३ ॥ रोद्राब्देनृप संभूत संक्षोभ क्लेशभागिनः || सततत्वखिलालोका मध्यसस्या बृष्टयः ॥ ५४ ॥ दुर्मत्यान्देखिलाभूपा लोकदुर्मतयःसदा ॥ तथापिसुखिनःसर्वे संग्रामाः संतिवेदपि ॥ ५५ ॥ सर्वसस्य युताधात्री पालिताधरणीधरैः ॥ पूर्वदेशादिनासस्यात्तत्रदुर्दुभि वत्सरे ।। ५६॥ अदिवेवनिताःसर्वे भूपारोगैस्तथाजनाः ॥ यथा कथंचिज्जीवति रुधिरोद्वारिवत्सरे ॥ ५७ || रक्ताशीवत्सेर सस्य बृद्धिष्टिरनुतमा:प्रेक्षतेसर्वदान्योन्यं राजानोरक्तलोचनः ५८ ॥ क्रोधनान्दे मध्यवृष्टिः पूर्वदेशे विशेषतः ॥ संपूर्ण निरताःसर्वे
* पंचाङ्गरत्नावली*
भूपाः क्रोधपरायणाः ॥५९ ॥ कासिंगंधतलेच मधुसस्य विना
शनं ।। क्षीयमाणाश्चापिनग जीवतिक्षयवत्सर ।। ६० ।। इति ।।
संवत्सरमध्येराजादिज्ञानम् ॥
संवत्के आदिमें (चैत्रशुक्ल १ को ) जो बार हो वह संवत्
का.राजा होताहै मेषकी संक्रांतिको जो बार होय सो -मंत्री होता
है वृषकी संक्रांति को जो चार होय सो कोषाधिप होता है मिथुन
की संक्रांति अथवा आदेऽकः जिस बारको होय सो मेघाधिप
होताहै इत्यादि चक्रसे जानना चाहिये ॥
वर्षे राजादीनां संक्षेपात्फलम् ॥
गुरु वा शुक्र वा चंद्रमा राजादि हो- तो मनुष्यों को
सुखदेनेवालेहैं बर्षा अच्छी सुभिक्ष होवै तथा देश स्वास्थ्य
भी कर और जो शनिश्चर मंगल राजादि होय तो दुर्भिक्ष विप्रह
कर ।। बुध राजादि होय तो सुख थोड़ाकर और मूर्य राजादि
होय तो दुःख होय तथा विशेष फल आगे लिम्चगें अब पहिले
राजादि ज्ञान के लिये चक्र लिखने हैं।।
im
+
भंत्री
कोशाधिपः
मीन
A
अगर बत्राधिक मास हो तो प्रथम नैत्र शुक्र को जो पार होये राजा
होता और दूसरे चैत्र शुक्ल को नवरात्रारमादि होताहै इसका निर्णय शायरी
नवरात्र प्रमाण है।
ॐ पंत्राङ्गरत्नावली वर्षेराजादीनां विशेषफलंतत्रादौराजाफलम् ॥ सूर्यनृपेस्वल्पफैलाश्चमेघः स्वल्पंपयोगोषुजनेषुपीड़ा । स्वल्पंसुधान्यंफलस्वल्प वृक्षाश्चौराग्निवाधानिधनं नृपानाम् ॥ चन्द्रेनृपेमंगलशोभनानि प्रभूतिवृष्टिःप्रचुरचंधान्यम् । सौख्यंजनानांमुदयोनृपाणां प्रशाम्यतिव्याधिजरानराणाम्।।२।। 'भौमेनृपेवन्हिभयंजनक्षयं चौराकुलंपार्थिवविग्रहंच' ।। दुःखप्रजाव्याधिवियोगपीडा स्वल्पंपयोमुचतिवारिवाहा ।। ३ ।। बुधस्यराज्येसजलमहीतलं गृहेगृहेतुर्यविवाहमंडलम् ।। प्रकुर्वतेदानदयाजनीपिस्वस्थं सुभिक्षंधनधान्यसमाकुलम् ॥४॥ गुरौनृपेवर्षतिकामदंजलं महीतलेकोमदुधाश्चधेनवः ।। यजन्तिविप्रावहवोग्निहोत्रिणो महोत्सवंसर्वजनेषुवर्तते ॥ ५ ॥ शुक्रस्यराज्येवहुसस्यसंकुला स्वतीवेगासरितोबुराशिभिः ।। फलंतिवृक्षावहुगोप्रसूतिर्वसुंधरा पार्थिवसौख्यसंयुता॥६॥ शनैश्चरेभूमिपतौसज्जलं प्रभूतरोगैपरिपीडयतेजनाः॥ युद्धंनृपाणांगदतस्तुराधै भूमंतिलोकाक्षुधिताश्वदेशान् ।। ७ ॥ इतिराजाफलम् ॥ अथमंत्रीफलम् ॥ नृपभयंगदतोपिहतस्कराप्रचुरधान्यधनादिमहीतले ॥ रसचयहिसमर्घतमंदतारविरमात्यबदहिसमागतः॥१॥ शशिनिमंत्रिगतबहुसस्ययत्यपिधरारमतेसुखमण्डिता ।। विपतिवारिधरावहुवर्षिणोजनपदाःसुखराशिसुशोभिताः ॥ २!! अवनियोननुमंत्रिपदंगतोभवतिदयुगदादिजवेदना ।।
VERS ॥ ® पंचाङ्गरत्नावली जनपदेषुजयसुखसंचयनषहुगोषुपयोदिजकर्मच॥ ३ ॥ शशिसुतेशुभमंत्रिसमागतेस्वपतिनारिमतेमंदनक्रियां। बहुधनंबहुवारिसमन्वितंयवमसूरिचरणान्नमहर्षता ।। विविधधान्ययुताखलुमेदितीप्रचुरतोयघनामुदितोभवेत् ॥ नृपतयोजनपालनतत्परागुरौननुमंत्रिसमागते. ॥५॥ भृगुसुतेननुमंत्रियदंगतेशलभमूषकरांवषमाहिषैः ।। भवतिधान्यसघितयाममंजनपदेषुजलंसरितोधिकम् ।।६।। रविसुनेय दिमंत्रिणिपार्थिवाविनयसंरहितावहुंदुःखदाः ।। नजलताजलताजनतापदाजनपदेषुसुसंधनदंचित् ॥ ७॥ इतिमंत्रीफलम् अथसस्येशफलम् ॥ सस्याधिनाथेतरणौहिपूर्व धान्यंसमवहवोपिचौरा: ॥ युद्धनपाणजिलदाजलाढ्या स्वल्पंचसस्यंबहुमहाश्च ॥ १ ॥ संस्थाधिपेशीतकरेषजासुखं 'मेघा यथोमुचतिगोयगोधुक् । देवदिजाराधनतत्परानृपा धराभवेधान्यधनीषपूर्णा ॥ २ ॥ प्रथमेधान्यपतौधरणीपती गजतुरंगखरोष्ट्रगवामपि । प्रभव दावाहुरोगधनोजलनसमसौख्यकरंतुषधान्यहत् ॥ ३ ॥ जल घराजलराशिमुचोभृशं : सुखसमृद्धियुतनिरुपद्रवम् ॥ दिजगण स्तुति पाउकरासदा प्रथमसस्यपतीसतियोधने ॥४॥ सस्य पतोसुरराजपुरोहितेसकलसौख्यकरश्रुतिपूर्वकाः - जलधरा जलदाबहुसंस्यदारसपयांसिवहूनिवसूनिवै ॥ २५ ॥ शुक्रोपदा धान्यपति-धरायांमेघाजलंवर्षतिशोभनमियम् ॥ गोधूमशालेक्षु 2 ॐ पंचाङ्गरत्नावली, धनप्रियंगुवृक्षेपुपुष्पानिसुखपदानि ॥ ६ ॥ रविसुतेयदिधान्य पतौजनौनृपतिभिःपरिपीडितविग्रहः । गदभयंतुषधान्यहरंसदा, हदुरितवादविवादयुतानराः ।।७।। इतिसस्येश फलम् ॥ अथधान्येशफलम् ॥ पश्चाद्धान्याधिपेसूर्ये पश्चाद्धान्यंतदानहि ॥ विगूई भूभृतांधान्यं महर्षवरपीडनम् ॥ १ ॥ चन्द्रेधान्याधिपेजात प्रजाद्धिप्रजायते ॥ गोधूमासर्पपाश्चैव गोषुतारतथावहुः ॥ २॥ भूमिजे ग्रीष्मधान्येशे ग्रीष्णधान्यमहर्षकम् ॥ शालीवुघृततैलादि महर्घाणिभवतिच ॥ ३ ॥ बुधेधान्याधिपेमेघाः जलंबित (वैभृशं ॥ सैद्यवैलाटदेशेच माधवोल्पंचवर्षति ॥ ४॥ गुरौ धान्यपतीयाति यवगोधूमशालयः । पच्यतेसर्वदेशेषु यज्वान ब्रह्मवादिनः ॥ ५॥ भृगौपश्चिमधान्येशे पश्चाद्धान्यनपश्यते सस्यासमर्घतोयांति स्वल्लंक्षीरंगवामपि ॥६॥ दुर्भिक्षजायतेतत्र कलहंदेशविग्रहम् सौराष्ट्रदेशनष्टश्चयत्रधान्याधिपोशनिः । इति अथमेघेशफलम् ॥ जलदयेयदिवासरपेतदासरसिवैरमतेजनतारसय बचनेक्षुतिका रसुशालिभिः सुखवयंसुलभभुविवर्त्तते ॥ १॥ शशिनियोयदये यदिगोमहिष्यजवरादिषुदुग्धरसंतदा ॥ फलवतीधनधान्यव तीधरोविविधभोगवतीननुभाविनी ॥२॥ अवनिजेजलदस्य पतौभुविश्रुतिविचारविहीनधराभवाः ॥ कृचिदपिप्रचुरंजल मल्पकं कृत्रिदवारंबहुतापदम् ॥ ३॥ अमृतरश्मिसुतेयदि वास्विहुजलंनुषधान्यरसादिकम् ॥ द्विजवरायजनोत्सुकवेतसा है-
80 पंचाङ्गरत्नावली
विविधसौख्ययुनाधरणीतदा ॥ ४ ॥ गुरुरविप्रियदृष्टिकर सदा
खिलविलाशवतीधरणीतदा ॥ श्रुतिविचारपरानरपालका रस
समृद्धियुताखिलमानवाः ॥ ५॥ भृगुसुतेजलदस्यपतिर्थदा जल
युताजलदादिविशोभनाः ।। धननिधानयुतादिजपालकानृपतयो
जनदासुखदायकाः॥६॥रविसुतेजलदस्यपतो भवेदिरतवृष्टिवती
वसुधातदा ॥ मनसितापकरोनृपतिःसदा विविधरोगरताजन
तापदा॥७॥ इतिमेघेशफलम् ॥
अथरसेशफलम्॥
रसपतौतरणौधरणीतदाविरसभोगरताल्पपयोधराः ।। वसनतैल
घृतप्रियमानवासुखरसंचभुनक्तिमहीपतिः ॥ १ ॥ यदिविधोरसपे
भुविमानवोनवनवायुवतीवुभुप्रियामाजलधरावहुचारिविघायका
रसवतीधनधान्यवतीमही ॥ २॥ यदिधरातनयोरंसपोभवेत्
नरसगाशयुताजनताशुभा ॥ नस्पतिर्विषमोजनतादो नजलदो
वहुष्टिकरोभुवि ॥ ३ ॥ रसपतौद्विजराजसुतेमहीसुलभधान्य
घृतादियुताजनाः ॥ प्रमुदितावरनायकपालितावहुजलाखिलदेश
सुरक्षिताः॥१॥ यदिगुरौरसपेजनसौख्यदाकमलवंतिसरांसितृणा
निच ॥ जनपदादिजपूजनतत्परागजसबाजिस्थोष्ट्रयतानुपाः ।।
यजनयांजनकोत्सवकोत्सुकाजनपदाजलनोषितमानसाः ॥ सुख
सुभिक्षसमोदवतीधराधरणिपाहतपापगणानिया ॥ ६ ॥ रविसुते
रसपेरससंक्षयोनजलदागददाश्वपयोधराः ॥ अजगवांगजवाजि
खरोष्ट्रहाजनपदेषुनरानरसयुता ॥७॥ इतिरसेशफलम् ।।
अथनीरसेशफलम् ॥
निरसाधिपतौसूर्यत्रयुचंदनयोरवि ॥ रत्नमाणिक्यमुक्ता
ॐ पंचागरत्नावली दिर्घवृद्धिप्रजायते ॥ १ ॥ शुक्लवर्णादिवस्तूनिमुक्तारजनवास साम् ॥ अर्घवृद्धिप्रजायनशशांकनिरसाधिपे ॥२॥ नीरसे शोयदाभोमावालंरक्तवाससं ॥ रक्तचदंनताम्राणांमर्घवृद्धिर्दिने दिने ॥ ३ ॥ चित्रवस्त्रादिकत्रैवशंखचंदनपूर्वकं ॥ अद्धिः प्रजायेतनीरसेशोवुधोयदि ॥४॥ हरिदापीतवस्तूनांपीतवस्त्रादिक चयत् ॥ नीरसशायदाजीवेसर्वेषांप्रीतिरुत्तमा ॥ ५ ॥ कर्पूरागरुगंधानां हेमौक्तिकवाससाम् ॥ अर्घवृद्धिःप्रजायत नीरसेशोभूगर्यदि ॥ ६ ॥ त्रयुःपिंडादिलोहानांकृष्णवस्त्रादि- वस्तुनां।। अर्घ बृद्धिः प्रजायेत मंदेनीरसनायके । इतिः॥ . {! • अथधनेशफलम् ॥ । द्रविणपे यदिवः सरपेतदावणिजमो बहुद्रव्य समागमाः ॥ गजतुरंगमपखरोष्ट्रतोधनवयंलभतेकयविक्रयात् ॥ १॥ धन पंतिम॑गलांछनकोयदारसचयालयविक्रयतोधनं । वसनशालि युगंधनजंबहुदविणतैलघृतंनृपसौख्यकम् ॥ २ ॥ असतिमौल्य करोघरणीसुतःशरदितांवकरस्तुषधान्यहृत् ॥ महामभासिभवे द्विगुणंतदानरपतिर्जनशोकविधायकः ॥ ३॥ द्रविणयोहिमर श्मिसुतोयदाविविधसंग्रहवस्तुफलायदा || द्विजवराजपयोगसु सयुता:कृषिविशेषविशेपिनमानसाः ॥ ४ ॥ सुमनसांचगुरुर्द विगाधिपो वणिज बृत्ति परासुखभाजनाः ।। फलितपुष्पितभूमि रुहाः सदाविविधद्रव्ययताभुविमानवाः ॥ ॥ द्रविणपोभृगुजोद विणैर्युतासमधनाः सकलातनुमानवाः ॥ सममुखाक्रयविक्रय जीवनोनृपतियोजनपालनतत्पराः ॥६॥ द्रवणिपेयेविजेविरलंधनं गदरतधरणीवतयःसदा ॥ अधनवांवाणिजाकृषिजीविनांदिजवरा का पचाङ्गरत्नावला ॐ ३१ CAawaRRESIRAL परिपीडितमानवाः ॥७॥ इतिद्रव्येश (धनेश) फलम् ॥ अथ फलेश फलम् ॥ द्रुमवतीफलपुष्पवतीधरा प्रमुदिताफलभोगविरोधतः,बहुजलं: जलदोभुवि मुंचतिकचिदपिप्रमितं फलयोरविः॥१॥ यदिविधुप फलयोद्गुमराशयः फलयुतावातिभिः कुसुमैर्युता ॥ द्विजमुखावरभोग समविन्ता नृपतयोनयनाटनतत्पराः ॥२॥ फलपतीयादिभूतनयो भवेल्प वहुपुष्पफलान्वितमेदिने । गतभयानृतदेशजनास्तदा नृप तयोबहुविग्रहकारकः ॥ ३ ॥ यदिवुधेफलयेफलमुत्तमं जलधराजल राशिमुचस्तदा ॥ बहुतृणकुसुगंकमलैर्युतंजनदा जनसौख्यमुदा विता॥ ४ ॥सुरगुरु फलनायकांगतोगतमयावनीशमहाद्रुमः यजनयाजनकोत्सवमंदिराः श्रुतिविचारपराद्विजपूर्वकाः ॥ ५॥ यदिफलस्यपतौभृगुजेधराः मृदुकुमारमहीरुहराशयः ॥ बहुपथा नरनाथसुभोगदा द्विजवराश्रुतिपाठपरायणाः ॥ ६ ॥ यदिशनिः फलम कलहाभवेज्जनित पुष्पगणस्यद्रुमःसदा। हिमभयंनस्तस्कर जंतदाजनपदा जनराशिसमाकुला. ॥ ७ ॥ इतिफलेशफलम - 1 अथदुर्गेश (सैन्याधिप) फलम् ॥ नयविशेषकरस्तरणिस्तदागतभयानरराजपुरोगमाः । समधि केनतदानृपजोन्यजखपथिसंधजतानभयंकाचित् ।।९।। गढपतिः 'मृगलांछनकोयदानृपसुराज्यविलाशितपौरजा || बहुधनेक्षुज ॥ २ ॥ अवनिजोगढ़ ॥ जनपदेषुजना यविक्रयेभयविशेषतयानफलंक्वचित् ॥ विषयसाम्यसुखशणि ॐ पंचाङ्गरत्नावली जैप्रभाभवतिराशिततेषुविशेषतां ।। शशिसुतेयदिकोटकपालके पथिषुद्रव्ययुतानभयंकचित् ॥ ४ ॥ .सुरगुरीगढ़पेनयशोभितानर वरानरपाःकरपालिताः ॥ गिरिघुवैनगरेपुसमंसुखसुखमतीदिज शास्त्रवतांनिश ॥ ५॥ नरवरेषुविशेषपतिर्यदाभृगुमतावहुसौख्य करोमतः ॥ विनयवाणिजवोहसमासुखोगतवननिकटेपिवदूरतः ॥६॥ रविसुतेगढ़पालिनिविग्रहसकलदेशगताश्चलिताजनाः ।। विविध वैरिविशेषितनागरा कृषिधनंशलभभुषितंशुचिः ॥ ७ ॥ इतिकोटपालफलम् ।। इतिराजादीनांफलम् ।। : गुरुउदयवशेनवर्षफलम् ॥ नक्षत्रेणसहोदयमस्तवायेनियातिसुखमंत्रीतत्संझवर्षस्यात् ।। कार्तिक्यादिसंयोगे कृतिकादिद्वयंदयं ।। अंतोपांत्यौपंचमच विधामासत्रयस्मृतम् ॥ अथफलम् ।। सस्यानिधृतकार्पास तैला दिसुखसंचयः ।। चैत्रवर्षेभवेवृद्धि पसौख्यफलप्रदा ॥ १॥ अर्थ विविधभावेन जायतेदविणप्रदानिकजानिर्भयपालोकविशाषेजन पूजिताः ||२॥ तस्करपापरोगे; पीडयतेपीडयाजनाः ॥ भ्रमतेस्वेच्छयाभुम्या निर्द्रव्यज्येष्ठसंज्ञके ॥ ३ ॥ अर्घमहघतायांति धनधान्यसमंभवेत् ॥ आपास्वल्पवृष्टिश्च तुपधान्यमहर्षता ।। मनोल्हादार्थकुति जनाःसोख्यसमायुताः ॥ श्रावणेबृष्टिरत्यु गागोमहिष्यादिकंसुखं ।। ५ ।। अर्घमहर्घतायांति धनधान्यसम भवेत् ।। माधवावर्षतिस्वच्छं संपदोभाद्रवपके ॥ ६॥ सुभिक्षपूर्व सस्यस्याज्ज्वररोगाकुलंजगत् ॥ अश्विनेशोभनावृष्टि पसौख्यकरी सदा ।। ७ ।। पापवुद्धिरतोलोका' भवंतिकार्तिकसदा ॥ देवतानवमन्यन्तराज्यंचतस्करहतम् ॥८॥ कार्पासादिमहर्घस्याव ४१ - पंचाङ्गरत्नावली. गोधूमाषातिलादिकं ॥ मेघोवर्षतिदेवोवामार्गशीविशेषतः १९ ज्वसरोगक्षुधार्ताश्च नानाजनपदा-सदा ।। महतियोमासापी ध्ये स्वस्थ्यंततःपरं ॥ १० ॥ सुभिक्षपूर्वयाम्यायां मध्यमपश्चिमे तथा ॥ उत्तरेरौरखमाघे वर्षधान्यसमर्घता ॥ ११ ॥ सुभिक्षप्रचुरा दृष्टिः उत्तरेयाम्यपश्चिमे ॥ पूर्वस्यारोखंघोरं फाल्गुणवत्सरेशुभम् ।। इतिगुरुवर्षफलम् ।। अथगुरुचारशनिचारफलम् ॥ अथानःसंप्रवक्ष्यामिगुरुचारमनुत्तमम् अनेनगुरुचारेणप्रभवाद्यन्द संभवः ॥१॥ मेषराशीयदाजीवचैत्रसंवत्सरस्तदा ॥ प्रवुद्ध नामाजलदवर्षाचसर्वतोसुखी ॥ २ ॥ सुभिक्षविग्रहोराज्ञांसमवस्त्र कर्पटम् ॥ हेमरूप्पंतथाताकासंचप्रवालकम् ॥ ३ ॥ मंजिष्ठा नारिकेलंचपट्टसूत्रसमर्घता ।। कॉस्पलोहंतथैवेक्षुपूगादीनांचसंग्रहा ॥ ४ ॥ अश्वपीडामहारोगोदिजानांकष्टसंभवः ॥ मासत्रयेफल मिदपश्चादाद्रपदेपुनः ॥ ५ ।। गोधूमशालीमाषानां आज्य स्याग्रेमहर्षता ॥ दक्षिणामुचरस्यांखंडवृष्टिपूजायते ॥ ६ ॥ दक्षिणोत्तरयोदेशे छत्रभंगोपिकुत्रचित् ॥ दुर्भिवमपिषण्मासा आश्विनेफाल्गुणेतथा ॥ ७ ॥ पश्चात्सुभिवंदौमासौनाम्ना मेघोजलेंद्रकः॥ कार्तिकमार्गशीर्षच कापसान्नमहर्घता ॥८॥ मेदपाटेराजपीड़ा देशभंगोल्पवर्षणम् ।। लोका-सरोगादुर्भिक्षपोष्ये रसमहर्षता ।। वाणिज्येसंशयोलाभ वैशाषेदुर्जरारसाः ॥ छत्रभंग स्तथाषाढ़े श्रावणेचभयंयुधि ।। १० ॥ नवीनोजायतेराजा कृषि मेघोपिकार्तिके ॥धान्यानिसंग्रहेलाभात्रिगुणोमासपंत्रमे।। ११ ॥ अन्दमध्येयदाजीवः क्रमादाशीत्रयंस्पृशेत् ॥ तदासुभटकोटीभिः ३२ पंचागरत्नावली* RAAVANESSA प्रेतपूर्णावसुंधरा ।। १२ । उदवीथीचरन्जीवः सुभिक्षक्षेमकारकः मध्यमेमध्यमंचार्थमेवमन्येपिखेचराः।। १३ ।। एपराजकिलमेषविशेषः, शेषमत्रगुरुगम्यमशेष ।। द्वेषमत्रगुरुवारविचारः संग्रहेभजनुजानु हुनकश्चित् ।। १४ ।। इतिगेषेगुरुफलम् ।। वृषराशीयदाजीवो वैशा- पोवत्सरस्तदा ॥ नंदशालिभवेन्मेषः सर्ववान्यसमर्थता ॥ १५ ॥ बैशापेअश्विनेमासेम्रीणां रागोश्चदंतिनो । अस्वानांचमहापीड़ा गृहेवेरंपरस्परं ।।, १६ ॥ उत्तरस्यामनावृष्टिः दुर्भिक्षमंडलेक्वचित् ।। पूर्वस्यांचमहासौख्यं राजवृद्धिविपर्जयः ॥ १७ ॥ घृतं तेलंचमंजिष्ठा गौक्तिकंचप्रवालकम् ॥ लवणरक्तवत्रंचनारिके लसमर्घता ॥ १८ ॥ गोधूमाशालिवणका मुद्राभापास्तथातिलाः॥ महर्षी श्रावणेज्येष्ठे मेघानांचमहाजलम् ॥ १९ ॥ श्रृंगालकेमालवेच उत्पानोराजविग्रहः ।। देशभंगाद्भयमन्यं घृतधान्यममर्थता ॥ २. मेदपाटेग्रीष्मऋतौ समर्धधान्यमीरितं ।। मरौधान्यंघृतंतैल महर्घ धातवोन्यथा ॥ २१॥ अश्वरोगश्चतुष्पाद नाशतीडागाकचित् ।। आपाश्रावणेवनिवर्षाभाद्रपादके ।। २२ ॥ सिंधुदेशेनागपुरेश्री विक्रमपुरस्थले ॥ धान्याह(समर्घमेदपाटिनदाभवेत् ॥ २३ ॥ मासदयसंग्रहास्याद्धान्यानांचनतोशुभम् ।। दुर्भिक्षमासदशकेमार्ग रोध प्रजाक्षयः ॥ २६ ॥ मुनिवृपमैत्रपमतो गुरोफलंसकतमेवमादि ष्ठम् ॥ जिनवृषभष्टया नवलादवलासर्वत्रसरसास्यात्।। ५५ ॥इति।। मिथुनेसंगतेजीवेज्येष्ठाख्यौवत्सरेभवेत् ॥ वालानांदोषमश्वानांखंड वृष्टितदाभवेत् ॥२६|| कर्कोटकस्तदामेघोगिंडूयदोमतांतरे। तस्करैः पीड्यतेलोकापापोपहतमानमः२७पश्चिमायांसिंधुदेशे वायव्येचो त्तरादिशि ॥, चित्राविचित्राजायते रोगा-पीडोत्तरापथे ॥ २८॥ - पंचाङ्गरत्नावली, श्वेतवसंतथाकाश्य करिंचन्दनादिकं ।। मंजिष्ठोनारिकेलंच पुंगी स्वर्णचरूंप्यकम् ॥२९॥ मासानांपंचयावत् समचित्रतोभवेत्।। पश्वात्मह(पूर्वोक्तं धान्यानांचसमर्थता ॥ ३० ॥ पूर्वाग्निया म्यनेत्यिा. मीशानेवासुभिक्षता ॥ श्रावणेतुमहत्कष्टं महिपानाच हस्तिनां ।। ३१ ॥ सजायुद्धप्रजावद्धिः सुभिक्षमंगलंभुवि ।। समर्धेतलखंडानि शर्करांधातयोपिच ।। ३२ ॥ शृंगालदेशेचोत्पाता: क्रयाण केयुमंदताः ॥ महावर्षाधृतधान्यसमर्घचगुरुस्तथा ॥३३॥ शंगमरीचपिप्पल्योमंजिष्ठाजातिकोशकाः ॥ महमेतद्धस्तूस्यात् फाल्गुणेधान्यसंग्रहः ॥ ३४ ॥ कासिलवणंगुतिलगोधूमयुगं घरीचणकमुद्गान् ॥ ग्राह्यविक्रयक्रितस्त्रिगुगोलाभांत्रिमासांते ।। ३५॥ गुरुपिमिथुननिलीनसारस्यमनस्यतः करोतिजनेव्याभि चारचारच वलात्काचित् देशभंगभयम् ॥ ३६ ॥ इतिमिथुन ।। कर्कोगुरुस्तथापादेवत्सरेतत्रजायते.॥ पूर्वदक्षिणयोम॑घोमध्यमकव: लोभिवः ॥ ३७ ॥ महसर्वधान्यानांकार्तिकेफाल्गुणेतथा · । पश्मिायासिंधुदेशेवायव्येवोत्तरादिशि ॥ ३८॥ क्षयःवतुष्यदानां स्यात्दुर्भिक्षमृगसैव्यकम । हेमरूप्यतथातामंपट्टसूत्रप्रवालकम् ।। ३६ । मौक्तिकद्रव्यमन्त्रादिलोकोक्यालोकविक्रयः । मंजिष्ठा श्वेतवस्त्राणांमहर्घसुभदक्षयः॥ ४०॥ गोधूमशालितलाज्यलयः णादिगुंडयुतः ॥ मापामहर्घजायतेपापकर्मरतोजनः ॥ ११ ॥ कार्तिकेदितथेधान्यंघृततैलमहर्घता पट्टसूत्रंचवस्त्रानिजातीफल लवंगकम् ॥ ४२ ॥ मरीचशीतकालेपुसंग्राह्याणिवणिकजनैः।। वैशाषेज्येष्ठयोलीभोदिगुणस्तस्यविक्रयात् ।। ४३ ॥ वर्षाकाले महावर्षासर्वधान्यमहर्घता ॥ सुभिक्षेतिलकापासवर्णक्यानांगुह '४ - ॐ पंचाङ्गरत्नावली स्यच ।। ४४ ॥ गोधूममापतुवरीयुगंधरीमुद्गकोदवादिनां । आषाढ़े संग्रहतोलाभः पुनरुद्रवोदिगुणः ॥ ४५ ॥ इतिकर्कराशिफलम् ॥ सिंहजीवश्रावणाख्यो वत्सरेवासुकिर्घनः ॥ बहुधीरघृता गावो जलपूर्णाचमेदिनी ॥ ४६ ॥ देवत्राह्मणपूजास्यानराणां, मान्यतासतां ।। रोगाविवाहश्चान्योन्यं चतुष्पदमहर्घता ॥ १७ ॥ म्लेच्छदेशमहायुद्धं छत्रभंगश्चविड्डरं ॥ उद्रसक्रियतेलोका पश्चिमोत्तरवायुषु ।। ४८ ॥ गोधूमातिलमाषाज्य शालीनांच महर्घता ॥ सुवर्णरूप्यताम्रादिपवालानांसमर्थता ॥ ४९ ।। सुभिक्षसर्वदेशश्च मेघोप्यापाढ़भाद्रयोः ॥ श्रावणेबृष्टिरल्पैःवसुका' लाकार्तिकस्मृतः ॥ ५० ॥ सोपरीिखोपराडोंडा मंजिष्ठाःशुठि' खारिका ॥ पट्टकूलं जातिफलंकपरंसुमहर्षकम्॥५१॥उदकालेगुरुः खंडाहिगुप्नीश्चित्रशर्करा ॥ महर्घमेतदस्तूस्यात्धान्यस्याति समर्थता ॥ ५२ ॥ ज्येष्ठेपृष्कंदकैर्धान्यं लभ्यतेमणमानताः ॥ स्कंदकैपंचविंशताघृतंतैलंतुविशिषे ॥ ५३ ॥ स्कंदकैर्दशभिल भ्यां गोधूमामणसमता ॥ धान्यंकासितैलादि रससंग्रहणं शुभं ॥५४॥ फाल्गुणेरवतोज्येष्ठात् लाभौद्विगुणतःपरं ।। गुरौ सूर्यगृह प्राप्लेसर्वत्रभ्रामिकोदयः ।। ५५ ॥ इतिसिंहराशिफलम् ।। कन्याभोगेगुरोर्जातेमेघनामनमस्तमाभादसंवत्सरस्तत्रसप्तमासान रौरवंततोपरंसुभिक्षस्यात्कार्तिकान्यावावधिः आद्यासंग्रहणा लाभोद्रिगुणोभाद्रमासतः५७चतुष्पदानांपीडापिगोधमाशालिश रातिलमाषामहर्षाणिगुडादीक्षरस्तथा॥५८ भदाणांमत्यजानांत्र कष्टसौराष्ट्रमंडलं ॥ खंडवृष्टिदक्षिणास्यान्मुत्पाताम्लेच्छमंडले ॥ मेदपाटेश्रृगालेचपरचक्रभयरणं ।। सर्वदेशोवन्हिमयमेघोल्पश्च । .
ॐ पंचाङ्गरत्नावली साल्पता ॥६०॥ मरुदेशछत्रभंगाचेत्रेवामाधवेभवेत् ॥ गोधूमा घृततेलानिमहर्घाणिसमादिशेत् । ६१ ॥ वसकंवलबातूनारत्ना देश्चमहधर्ना | आषाढ़ेधान्यसंगृहयोभादलाभश्चतुर्गुणः॥ ६ ॥ इतिकन्या ॥ गुरौस्तुलायांमेघस्यात्तक्षकोवत्सरोश्चिनः॥ तदातिवृष्टिमंजिष्ठा नारिकेलमहर्घता ॥ ६३ ।। अन्योन्यराजयुद्धानिसमभौज्यतेल- योः॥ मार्गशीर्षतथापौषेद्रयोद्धीन्यस्यसंग्रहः ।। ६४ ॥ लाभस्या पंचमेमासेमार्गादारभ्यचैत्रतः ॥ छंत्रभंगस्ततोराजविग्रहवापि मंडले ॥६५॥ उत्पातोमरुदेशेस्यान्मार्गेभयंचचौरतः ।, कोटजे सलमेधैिःपरचक्रगमोमतः॥६६॥स्कंदकैर्दशभिश्चैकमणवान्य चउच्यते ॥ कार्तिकमार्गशीर्षेवामाघस्तेषाढकेमहान् ॥ ६७ ॥ त्रयोदस्कन्धकैश्च पंडामणमवाप्यते॥ पंचासत्स्कंदकैमिश्रीशर्करा मणिविक्रयः॥१८॥ रसक्रयाणकादीनां संग्रहेणवतुर्गुणः ॥ लाभश्चतुर्थमासेस्यात् धातूनांचमहर्घता ॥६॥ इतितुलाराशि ॥ वृश्चिकस्थेगुरोसोमे मेघःकार्तिकमासतः । संवत्सरापंडवृष्टि- धान्यमल्पभयमहत् ॥ ७० ॥ गृहेपरस्परं वैरमष्टोमासानमंशयः॥ भादाशिवनेकार्तिकाख्यास्त्रयोमासामहर्षता ॥ ७१ ॥ तता (सुभिक्षजायते मंदवृष्टि चमंडले || पश्चिमायां जीववृष्टिर्दुर्भिसंवायु मंडले ॥ ७२ ॥ हेमरूप्यकांस्यताम्रतिलाज्यश्रीफलादिष ॥ महधैगुडकार्पास लवणश्वेनवस्रकम् ।। ७३ ।। महिषावृपमाअक्षा समर्थाधान्यमंडले ॥ तीडानाम्लेच्छ लोकानामहोपाताश्वसं भवेत् ।। ७४ ॥ शृगालदेशेकटकं रोगोश्वमहिषीषुव ॥ राजा निवमहर्षाणि हिंगुपारिकपोपरा ॥ ७५ ॥ देशभंगोस्वल्पवृष्टि ।
पंचाङ्गरत्नावली मता ॥ अष्टादशामिराज्यंच तैलेतैर्मनुसंमिते ॥ १०८ ॥ श्रावणे वाभाद्रपदेधान्य संगृह्यतेतदा ।। पेिस्यादिगुणोलाभः युगंधर्पाश्च विक्रणात् || १०६ ॥ इतिकुंभराशिफलम् ॥ * मीनेगुरोफाल्गुणिस्यादरसर संभवोधनः ॥ खंडवृष्टिमहर्घाणि सर्वधान्यानिभूतले. ११०॥वायुरोगश्चपीडाचदेशांतरजेज्जनः।। मासानांपंचमं यावद्भयंराजविरोधनः ।। १११ ।। पश्चात्सुखसुभिक्षं चशालिगोधूमशर्करा ॥ तिलतैलगुडानांच महर्घत्वंसमीरित ॥ ११२ ॥ मंजिष्ठानारिकेलानिश्वेतवस्त्रंचदंतकाः॥ कर्पूरलवणा ज्यानां महर्घत्वंप्रजायते ॥ ११३ ॥ चतुष्पदानांमरणं वैशाषज्येष्ठ योभवेत्।। आषाढश्रावणेधान्यं घृतंतैलमहर्षता ।। ११४ ॥ श्रावण स्योत्तरेपक्षे महावर्षापजाते ॥ घृतंसमभाद्रपदे शुभावाश्विन कार्तिकौ ॥ ११ ॥ समस्तिलकार्पासाः छत्रभंगततोर्बुदे ।। मार्ग शीतथाषिउत्पातोमरुमंडले । ११६ ॥ ग्रीष्मेकटकसंग्रामे चतुष्पदःमहर्षता ।। स्यान्नागपुरदुर्भिक्ष वर्षाकालेसुभिक्षता११॥ इतिकतिपयशास्त्रात् वीक्षणाद्गौरवेण गुरुचरितविचारः स्फारवोधाय वृद्धः ॥ इहमतिरतिशाषी नैवयुक्ताप्रयुक्तादविकलफललाभो. वाक्यतोय यतः स्यात् ॥ इतिगुरुचारफलम् ॥ अथशनिचारफलम् ॥ मेषराशौयदाशौरी तदापश्चिमायां राजविग्रहः वस्तु महर्घता नृपतेर्भयं गुर्जरंगौड़सौराष्ट्रदेशेषुधान्यमईघताद्विगुणोव्यापारेलामः छत्रभंगः राशिभोगात्परतः उत्पात् वहुलामही तथा महीनदी पाश्वे पीड़ा राज्ञामुपद्रवः मेघावहवः सप्तधान्यानि युगंधर्या दीनिसंगृह्यते मास चतुष्टयानंतरे विक्रये द्विगुण लाभः गुजरे ॐ पंचाङ्गरत्नावली दिशे अहिफेन गुड़ शर्करा खंडा गोधूम बाजर चवला विक्रये लाभः सुर्वणरूप्य लाभः प्रथमं शनैश्चर सप्त मास राशिभोगतः पश्चादुत्पातश्चालका भूकंप गर्जितः कचित्काल्गुणेउपद्रवः तदा वस्त्र महर्घता व्यापारेजयः मालपदेशे घृत शर्करा तेल ‘खोपरां रायणः इत्येतानि महर्षाणि कटक चालकः अष्टौमासान इत्येत द्वोतम स्वामिभाषितम् राशिमंडलम् शनैश्चर प्रचारेण ज्ञातव्यं वर्षहेतवे ॥१॥ इतिमेषराशिफलम् ।। वृषेयदाशनि तदा विग्रहो दक्षिणादिशिपरचक्रभयं वैराडदेशे अश्वस्थता पश्चिमापतिर्दक्षिणस्यांयातिः देशउदश अनं महर्ष गोधूमचणक गापारे लाभः सुवर्णरूप्य पित्तलकांस्य व्यापार लाभो मासषट्कंयावत् आषाढदि मास त्रये महान व्यवसायें. लाभः अशोरदेशे युद्धंम्लेच्छ हिंदुराजस्यक्षयः भाद्रपदे अहि फेनाल्लाभः अशोरदेशे युद्धं देवगढ़ देशेविग्रहः दुर्गभंगः शनि. श्चरस्यः राशिभोगे एकवर्षानंतरंच महर्घता तन्मधेअजमका तस्य माघ मासेविक्रयेलाभः।। इतिवृषराशिः। मिथुने शनि तदा पश्चिमायां दुर्भिक्ष राजकुल विग्रहः मालव देशविग्रहः राजभौगात् मासपंचक तत पश्चात् उज्जयिन्या उत्पातः दुर्गभंगा मासद्धयात्परं दुर्भिक्ष मास १ यावत्ततोवत्सरें शुभम् धान्यनिष्पत्तिः पूर्वदेशे उत्पातः गुड़समता लवंग केसर एलची पारदहिंगु पानड़ी रेसमकथीर शुठिएतानिमहर्यानिक्षत्रिया णां मालवेदेशेषडेजयदुर्गेराधेः उच्चवस्तुविक्रयः।इतिमिथुन राशि । कर्कराशि शनिस्तदामेद पाटदेशे मालवा सीमांत उद्ध सता छत्रभंगो महीपतेः राजयुद्धं सवलं मालयदे मुगल ६ पचाङ्गरत्नावला कटकं तापी नदीतीरे यावत् विग्रहः परं कुशलं दक्षिण दिशि लोकनाशा ग्रामभंगः श्रावणे धान्य महर्घ भादपदे जलोपद्रवः मेघावहवः अश्विने वर्षा अहिफेन महर्घता मास द्धये पुनःसमर्थतः बासर वस्तु महर्षे घाटेक महिष महर्घता व्यापारेलाभः ।। इतिकर्कराशिफलम् ॥ सिंहराशौ शनिस्तदा अन्न सर्वत्रं निष्पद्यते जल वृष्टिर्बहुलता, मालवा देशे व्यापारेलाभः राशिभोगांतरंमासगमनं यातिवला चलत्वं परं अन्नं महशोक वंधु तुल्याः संग्रामाः पतिनामां-गुड गोधूम चणक तंदुल शालि मसान्न घृतादि वस्तु. व्यापारे लाभः, पूर्व सुभिक्षं परं मारीभयं सर्व देशेषु पीडाः व्याकुलता अशुभं संवत्सर. फलं मरीच शुठिप्रमुख क्रयाणेलाभः ताम्र- पित्तल मह धता घृततैलादि रस महर्घता कुंकुगदेशे तृणमहर्घता मालवा मध्ये उपद्रवः परं राज्यसुख कटक विग्रह पूर्वदेशे वस्त्रलाभः सर्व वस्तु महर्घः।। इतिसिंहराशिफलंम् ॥ . कन्यायांयदाशनिम्तदादुर्भिक्षं चतुर्दिशासुपितापुत्र विक्रीणाति अन्ननाशः: जलव(नास्तिमरुदेशे शिवपूयादवणिदेशे राजपीडा छत्रभंग शैषासर्वदेशा शुभाअर्बुददेशेसुभिक्षं शिरोहिमध्ये अन्न लाभः सर्वधान्यसंग्रहदिगुणलाभः मासनवकं यावत्धान्यरक्षणीयं पश्चादिक्रयः धातुवस्तुसमघु उत्तमवस्तुमहर्घ मालवदेशे परस्पर विरोधः राजभयांभूम्यांकीचिदुत्पादि अशुभंगुइसमताधान्यमहर्ष अन्नभयंमहावृष्टि-त्रयंक्रयाणकानिसमर्धानि ।। इतिकन्याराशिफ. तुलाराशौयदशौरीसुभिक्षस्याच्चराचरं ।। प्रजानांसुखसौभाग्य धनधान्यंचसम्पदः ॥ ॥ बंगालदेशे विग्रहः तत्रैवप्रजापीडरोगा एक पपानरमापका ETERES वहुलता कार्तिकेमहाजनत्रयेकष्टं बहुलवंगालेउत्पातः छत्रभंगः अर्द्धराशिभोगात्परंउत्पातः . दक्षिणदिशिंउपदवः गोधूमणक समघामारुंगीकांगुणीउडद ऐतमहर्षता ज्येष्ठमासादिक्रयेदिगुणो लाभः अन्येसैवैदेशाः सुभिक्षसुस्थाः । इतितुलाराशि : बृश्चिकेयदाशंनिः' तदाहस्तिनागपुरेतद्देशै वैराटदेशेविगृह, मालवमेदपाटवागड-गुजरातिसौर उत्तरार्धदेशे एतेषुकटकचालक: अन्नातलाभः गोधूमकार्पासमसूरानतिलकपडादिः व्यापारेलाभ: मासनवकपरंउपद्रवः राजराणांम्लेच्छानां परस्परंयुद्धं पातसाहिः गृहक्लेश मालबदेशेतिपाडाआयांतिसर्ववस्तुमूल्यवृद्धिअफीमलामा ज्येष्ठमासा वृद्धिःअजमोमेथी प्रमुखविक्रय रोगचालकावर्षावहुलाः in !' इतिवृश्चिकयाशिः :::: धनेशनिः तदासर्वत्रमहर्षता लोकदुर्वलतातैलतिलेदाणागोधूमः चणकसमर्घा लौंगडोडाअसालिनु अजमोमेथी घृतएतानिवस्तूनि महर्षानि श्रावणादि मासवतुष्टये : मारीपीडाराजसुखं उत्तरापथे कटकचालका इतिधनराशिफलम् ॥ मकरेशनिस्तदानन्दःसर्वसुभिक्ष राजनिर्भयः आरोग्यसमा धान तथाकर्पूरपारदजातीफललौंग खोपराहींगु जीरासोपारी आ- वीरहालीघृतलवणमहर्षता मूल्यवृद्धिःआपादादिमास सप्तकयावत अहिफेनलाभादशिणास्यांअहिफेनमहर्घताचौरभयदेशांतरेमहाज नपींग.धनहानिशाखाप्रमाणेन मालवदेशेरोगपीड़ा प्रथमवर्षमयं. करंपश्चात्शुभानदेवाभंगराशिभोगते ॥ इतिमकरराशिः॥ कुंभेशनिस्तदादक्षिणकुंरुण महाविगृह राजक्षयःपजामयं धन प्रलेपाराशिभोगात् माससप्तकंयावत् . सर्वधान्यमहर्षताआषाहादि -- क्ष पचाङ्गरत्नावला r - अथरष्टिअवरोधकयोग ।। वर्षा के दिनों में सूर्य के अंशों से मंगल आगे हो और सूर्य मंगल एक राशिकोहोचे तो दृष्टि को रोकता है. यदिबुध और शुक्र एक राशि का होवै और दोनो के बीच के अंशोंमें मूर्य होवे तो कृयोंग वर्षों को रोकता है ।।२।। जब बृहस्पति औरमंगल, एकैराशिका होवे तो चौमासेमें वर्षा रोकताहै।शसिंह कुम्भकाराहु केत होवे और कांग्रहों करिक युक्त हो या कूरग्रह देखते हो तो वर्षा में बाधा होती है | PM महर्घयोग । ज्येष्ठा नक्षत्र के सूर्य मंगल हो तो १ मांसतंक गेहूं महंगा रहै -11... -सूर्य और केतु. भरणी नक्षत्र के होंय . तब-लवण : महँगाहोवैगाऽनुराधा का शनि और ज्येष्ठा का गुरु होवे तो अन्न महँगाहोवै प्रजाजंगमचै धनका शनिश्चरमिथुनका मंगल इन दोनों ग्रहोंके साथ राहु वा केतु आदी या पूर्वाषाढ़ का होवे तौ अन्न और रस महँगा करै और ऐसा योग वर्षाकालमें हो तो वृष्टि का अवरोधकरे ॥ ४॥ धनिष्ठा का शनिश्चर-मंगल होनेसे भी वर्षाका अवरोध होताई ॥३॥ शतभिष का गुरु चित्राका मंगल माघ या फाल्गुणका महीना हो तो गेहूंकी फसलको बिगाड़ दे ॥ ६॥ आद्रा नक्षत्रका शनिराहु होवै तो वर्षाका नाश और दुर्भिक्ष का संभव करें।। ७॥ बृपका राहु मंगल युक्त होनेसे अन्न खरीदनेवालेको ६ मासके अर्तपत दूंना लाभ होताहै ८॥ बृषराशिका सूर्य मंगल शनि होवे तो १ मास, वर्षाका अवरोध होताहैं।... उत्तराभाद्रपद का शनि विशापा का मंगल कर्क- ।
un * पंचाङ्गरत्नावली का गुरु होवै तो दुर्भिक्ष करै ।।१०॥ उत्तराभाद्रपद और हस्तके राहु-तथा केतु होवे तो रस व कापस महँगाहा तथा-एक-एक नक्षत्र पर एक एक होनेसे बहुत अशुभ फल जानना ॥ ११-11; मेष तथा वृश्चिकके शुक्र अन्न महँगा करतेहैं ॥१२॥ मकर तथा कुंभके सूर्य वन महँगा करतेहैं.।। १३ ॥ मकर तथा कुंभका राहु: तथा शनि और बुध होनेसे द्विपद तथा चतुष्पद प्राणियों को महादुःख होताहै ॥ १४॥ मेष और वृश्चिक के मंगल तथा राहु केतु और सूर्य शुक्र होनेसे गुड़ व कपास महँगा होताहै१५॥ मेष और वृश्चिक का राहु तथा शनि होवै तौ ताम्र तेज होवें १६ समंर्घयोगबिचारः॥ महर्ष योग में यदि समर्घ योग आजावे तो महर्घ योग की नाश करता है। यदि चैकराशे शनिराहुं युक्त अन्नं समः ।। श्लेषा नक्षत्र के मंगल बुध शुक्र होने से अन्न समर्घः राज्य प्रजा में आनंद हो । मूलका शनि स्वाति का बुध अन्न सस्ता करताहै ।। आदा की बृहस्पति में रस कपास सता होता है ।। श्रवण-का बुध, शुक्र पूर्वाषाढ़ का गुरुहोवे तो अन्न वं.रस कपासको सस्ताको :: मघा या धनिया का गुरु मृगशिरा का राहु भी. अन्न मंदा करता है। सूर्य बुध शुक्र एक राशि में हो तो सर्व धान्य सस्ता हो इसयोग में सूर्य से अधिक अंश पर बुध शुक्र हों तो-वर्षा श्रेष्ठ होती है कृत्तिका.और उत्तराभादपद का गुरु चांदी.चावल रस कपास सस्ता करता है.॥ विशाषा का और भरणी का शुक्र तथा गुरु होवै तथा पुनर्वसु का शुक्र होने से कपास और अन्न को सस्ता करै ।। श्रवण और धनिष्टा के शुक और गुरू होने से गई । LutrTIETY.
- . * पंचाङ्गरत्नावली को सस्ता करै। अधिक मास में यदि मंगल काराशि चार होवे। तो उत्तमवर्षा हो ॥शनिसे वें वें वें चंद्रमाहो और बृहस्पनि शुक्र की पूर्ण दृष्टि हो तो उत्तम वर्षा होवै । शुक्र से ७ 'चंद्रमा हो बृहस्पति की पूर्ण दृष्टि हो तो वर्षा का अभाव न होनेसे उत्तम वर्षाहोतीहै ।। तुलाका शुक्र मंगल हो तो अन्न, मंदाहो । सूर्य आगे पीछे शुक्र बीचमें बुधहोवे तो अन्न सस्ता होवें ॥ इत्यादि। वर्षागर्भलक्षणम् ॥ मार्गशीर्ष शुक्ल १ से जिस नक्षत्र में बद्दल बायु इत्यादि गर्भ रहा सो १६५ दिनोंसे वर्षताहै परन्तु मेष संक्रांति में अश्वि- न्यादि नक्षत्र १० दश वर्षे तो उक्त दिन में थोड़ा वर्षताहै ।। पुरुषनपुंसकत्रीनक्षत्रसंज्ञा ॥ आदासे स्वाति तक १० नक्षत्रस्त्री संज्ञा विशाषासे ज्येष्ठातक नक्षत्र नपुंसक संज्ञा मूलसे मृगशिरा तक १४ नक्षत्र ।। पुरुष संज्ञा फलम।। वर्षा रोधक योगनहो और स्त्री नक्षत्रके दिन पुरुष नक्षत्रके मूर्य हों अर्थात् पुरुष स्त्री होनेसे पुरुषपुरुष होनेसे गर्मी पुरुष नपुंसक होनेसे गर्मीहो स्त्री नपुंसक योग' होनेसे. किंचित् वर्षा नी स्त्री योग होनेसे बद्दल आवे ठंडारहै ।। और इस्कावाहन भी विचार लेना चाहिये ॥ यथा ॥ सूर्यके नक्षत्रसे दिन नक्षत्र तक गिनके १ का भागदेय शेष बचैतौ अश्व २ जंबुक ३ मंडुक मेष ५ चातक ६ मूषक तथामृग ७ महिष ८ खरं नाग क्रमसे नक्षत्रके वाइन होते हैं ।।
8 पंचाङ्गरत्नावली 'रोहिणी पास और समय बास। मेषकी संक्रांति जिस नक्षत्र में लगे उस नक्षत्र से रोहिणी नत्र तक अभिजितुसहित गिने जहां रोहिणी.आवै वहां रोहिणी बास प्रथम र नक्षत्र समुद्र तट १ सधि १ पर्वत् १ संधि १ तट सी कमसे रोहिणीवास जान लेने तथा रोहिणी चक्र से समझ फिलम।। समुदेतुमहावृष्टितटेवृष्टिसुशोभना पर्वतेविदुमात्रश्च संवृष्टिश्चसंधिपु.॥ समयकाबासजानना ।। रोहिणी का बास समुद्र में हो तो संवत्सर का वास माली घर होताहे, तट में धोबीघर बास संधिमें वैश्यघर बास पर्वतमें रोहिणी का वास होनेसे समय का बास कुम्हारघर होता है । तट २८ संधि मालीरहे । रजकरहे रजगृहे वैगरे বই म्हारगृहे वैश्यप वैश्वगरे रजकगृहे ত समुद्र मालीगृहे.. रोहिणी तथा संवत्सर बास चक्रम् मालीरहे . समुद्र R वैश्यो Pane कमारगर रजकगृहे रजकगृहे वैश्यपहे. सा
।
५८.
ॐ पंचागरत्नावली
समयवाहनबिचार ॥
सूर्यादि संवत्सर का राजाहोवै उसीसे क्रमसे समय बाहन
जानना यथा- अश्व । मृग २ वृषभ, ३ सियार ४. चातक
दर्दुर ६ महिष उक्त वारोंके कपसे समय बाहन जानना आषाद
कृणपक्ष की कृष्णारोहिणी कहलाती है है"
अथसमयमुहूर्ताः समयदिनानि ni...
मेषादि द्वादश संक्रांतियों के मुहूर्तः एकत्र करने से समय.
मुहूर्त होता है ।। चैत्र शुक्ल १ से चैत्र कृष्ण ३० तक वारानुसार
जितने दिन हों वह समय के दिन होते हैं ।। कार्तिक शुक्ल
सौभाग्य पंचमी कहलाती है शुक्लपक्ष की १० रवि-युक्त होने
तो रविं.दर्शमी होती है शुक्लपक्ष की तिथि जिसवार युक्त हो
उसी वार के नाम से वह तिथि बोली जाती है दोनों पक्षों की
४मंगलको हो तो मंगलाचौथ ८ बुध होवै तो बुधाष्टमीहोती है ।
वर्षऔरवर्षेशकुंडलीबनानेकी रीति ।।
गत वर्ष की चैत्र कृष्ण ३० की घटी को इष्टकाल मानकर
लग्न गृहादि रख देवै वह वर्ष कुंडली होती है और मेपार्क प्रवेश
समय की लग्न वर्षेश लग्न होती है ।
पञ्चाङ्गमचंद्रलिखनेकीरीति
सर्वः बनाके जिस चरण में राशिं प्राप्ति हो उस घटी परिमित
इष्ट करिके चन्द्र लिखदेव,
ॐ पंचाङ्गरत्नावली, करणलिखनेकीरीति ॥i एक तिथि में दो करण भोग करते हैं। शुक्लपक्ष की परिवा के तरार्द्ध में ववकरण एक तिथि में दो, करण के क्रम से कृष्णपक्ष की चतुर्दश के.पूर्वार्द्ध में विष्टि (भद्रा) करण भोग करता है और कृष्ण १४ के उत्तरार्द्ध में शंकुनी करण व अमावस्या को चतुष्पद करण नागकरण और शुक्ल परिवाके पूर्वार्द्ध में किंस्तुघ्न फिर शुक्ल परिवाके उत्तरार्द्ध में ववकरण भोग करता है बारम्बार इसीक्रमसे जानना ॥ करणों के नाम ॥ वव १ बालव २ कौलव ३. तैतिल गर ५ वणिज्यविष्टि (भद्रा.)७॥ शकुनी चतुष्पद, २.नाग-३ किंस्तुम्न ॥ शुक्लपक्ष की परिखासे ववादि करणा कृष्णपक्ष की १४ के पूर्वार्द्ध को दृष्टि आठ- आवृत्ति में भोग करते हैं। और कृष्ण.१४ के उत्तरार्द्ध से शुक्ल के पूर्वार्द्ध तक शकुन्यादि ४ करण भोग करते हैं । इंग्रेजीसन तथा महानीआदि.॥ शाकमें ७ जोड़नेसे तथा संवत् में ५६ हीत करनेसे इंग्रेजी सन् पोष्य मास अर्थात् धन के सूर्य के १७ अंश के अर्ज पत में प्रारंभहोताहै। नाम महीना और तादाद दिन यथा ॥ १ जनवरी ३१ दिनका २ फरवरी २८ दिनका ३ मार्च ३१ दि. ४ अप्रैल ३० दि०५ मई ३१ दि०६ जून ३० दिनका ७ जुलाई ३१ दिनका अगस्त ३१ दिसितंबर ३० दि०१० अक्तूबर ३१ दिनका ११ नवम्बर ३० दि० १२ दिसम्बर ३१ दिनका और सन् में ४ का भागदेने से जिस सनमें शेष शून्य बचै उस सन् में फरवरी २६ -
.
7
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पंचाङ्गरलावली
दिन की होती है और जब पूरे सैकड़े का सच होवे तो सर
१४०० का भागदेय जो शून्य शेष बचे तो फरवरी २६ दिन
नहीं तो २८ दिन की होती है।।२५ दिसम्बरको बड़ा दिन होताहै।।
मुसलमानी हिजरी सन्और महीना ।
शाके में ५४३ तथा विक्रमीय संवत् में ६७८ हीन
'शेष को २ जगह रखकर ६१ के भाग से दूसरी जगह के अंक
हीन किये शेप के ३२ के भागसे लब्धको दूसरी जगहके अंक में
युक्त करके १२ भागसे जो लब्धि मावै सो हिजरी सन् शेष बचे
'सोगतमास जानना चाहिये ।। दूसरीरीति | सं०.१९५९ के
प्रारंभ में हिजरी सन १९२० मुहर्रम मास प्रारंभ हुये हैं यह
•मानी महीना चंदाधीन होताहै इसकारण ३३ महीने के बादलौंद'
परने से इस्में अंतर होजाताहै जैसे कि एक अधिक मास होने के.
नाद प्रारंभ संवत् मे सफर का महीना होवेगा जितने आधिक
होते जायगे उतने मुसलमानी मास प्रारंभ संवत् में बढ़ते जायगें,
अधिक मास जाननकी स्पष्ट रीति आगे लिखेंगे।
अगर सं-१६५९ से पहिले का जानना हो तो विपरीति ग्रहण
पीछेजबका जानना होय वहां तक जितने अधिक
मास हुए हैं वह सं०१९५६ के ? मुहर्रम मासमें घमनेसे अभीष्ट'
संवत्का मास होवेगा ।। और ३३ वर्ष में १२ अधिकमास होते हैं
इसकारण हिजरी सन् ३३वर्ष में, एक संख्याबढ़ जाता है। इत्यादि।
२. पंचाङ्गमैतारीख लिखनेकीरीति॥
इसका महीना चंद्रमेके अनुसार होनेसे कभी २९ दिनका कमी
1
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3
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पंचाङ्गरत्नावला.
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३० दिनका होताहै कृष्ण पक्ष ३० को २८ तारीख लिखकर
उलटे क्रमसे अर्थात् कृष्ण ११ को २७ कृष्ण १३ को २६ इसक्रम
से १ तक रख जावै ।। स्पष्टान्यक्रम् ॥ चन्द्र दर्शनहोने के बाद प्रात
को मुसलमानी महीने की पहिली तारीख होतीहै यह सिद्धांत है
शुक्लपक्ष परिवाको चन्द्र दर्शन होना व न होना जानने के लिये
आगे लिखेंगें।
मुसलमानी त्यौहार ॥
"रोजा रमजान की १ तारीख से शुरू होताहै और समालकी
'तारीख को ईद मनाकर पूराहोताहै जिन्हिज की तारीख
को बकरीद और 8 तारीखको हज्ज होती है मुहर्रमकी तारीख
को ताजिया भोर सावानकी १४ तारीखको शबेरात होती है।
महीनोंके नाम।
१ मुहर्रम सफर ३ खीउलान्बल ४ वीउलाखिर जमादी.
उलावल जमादीउलाखिर ७ रज्जब ८साबान ९ रमजान १०
सवाल ११ जिल्लाद १२ जिल्हज ॥
पोरसीसन जाननेकी विधि।
शाके में ५३ अथवा विक्रमीय सम्वत् मैं ६८८ हीन करने
से शेष बचै सो पारसी सन (इयजदेजर्दी ) होते हैं इसका प्रारंभ
भादों से होता है ।।
६२
8 पचाङ्गरत्नावली ॐ
SRBHEESE
महीनों के नाम॥
फरवर्दिन र आदिवेहस्त ३ खोरदाद तिर ५ अमरदाद
६-शरेखर, ७ मेहर-८ आबान ९ आदर-१० देह ।। वहमन?
आस्पंदादं यह सब महीने ३० तीस दिन के होते है पीछे दिन ५
की गाथा होती है।
Hits
याहूदीसनबनानेकाक्रम ॥
शाके में ३८३८,अथवा विक्रमीय संवत् में ३७०३ युक्त करने
से साहूदीसन होताहै | कुवार सुदी १ के समीप प्रारंभ होता है ।।
शाक में १३५ जोड़देने से विक्रमीय संवत् होताहै;
शुक्लेप्रतिपदांचन्द्रदर्शनजाननेकाक्रम् ॥
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अमावाश्या की घटीको ६० घटीमें घटानेसे जोशेष रहै उस्को
दिनमानमें, जोड़ देवै जो अंक प्राप्ति हो उसको अलग रक्खे
फिर देखें कि सूर्य किस राशिके हैं और राहु, किस राशिका है
फिर चन्द्र दर्शन सारिणी में उसी राशिके सूर्य के सामने और
उसी राशिके राहुके नीचे राहु-सूर्य, मिलकर जो कोठा प्राप्तिहो
उस्में जो अंकहो वह अक पूर्व अंक अलग संखे हुयेसे अधिक
हो तो प्रतिपदाको चन्द्रदर्शन नहीं होगा दितियाको होगा और
जो पूर्व अकसे सारिणी अंक कमहो तो शुक्ल प्रतिपदाको चंद्र
दर्शन अवश्य होगा।
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पंचागरत्नावली 'चंद्र दर्शन सारिणी॥ मेष धूष मि० कर्क सिंहकन्या तुलाधन मकर कुंभ मीन | राहु रा रा रा रा रा रा रा रा रा रा राइ मेष ४५/ ५४ ५५/५२ (५६ ५५ ५४५३५२ ५५ ५३ ५२ सूर्य - - ५६५७ ४९ , ५३) ६०/ १४७ ७७७२ ६६ ६२५२ man ६४111 ૮૦ ८२ ७२ ९७ . १०२/-10 NEWS ६४ ૭ सूर्य वृश्चि ८ ७८ ७८८२ धन ५३५९ १३ ४८1५१ १०५८५८/५६ [५३ ५६ ५५ ५४, ५३ ५२५१ ४९ दू ११ | ५३ सूर्य -- 19 ® पंचागरत्नावली. अथ पञ्चशलाकाचक्रम् ॥ - E - . "विवाह के नक्षत्र के सामने १ रेखा पर कोई ग्रह उस नक्षत्र का होवे तो वेध होता है विवाहे वर्जितः॥ विवाहलग्नमुहूर्तादि ॥ विवाह-मेष वृष-मिथुन-बृश्चिक-मकर कुंभ-इन के सूर्य में करना शुभ है और मिथुन के सूर्यमें आषाद सुदी १० तक करना श्रेष्ठहै शुक्र गुरु का उदयास्त होवे तो अस्त होने से ३दिन पहि- ले से लेकर उदय के ३ दिन पीछे तक विवाह तथा शुभकर्म में वर्जित है और सिंह की बृहस्पति में भी विवाह करना अशुभ नक्षत्र रोहिणी १ मृगशिरा २ मघा ३ उत्तराफागुल्णी ४ हस्त ५ स्वाति १ ऽनुराधा ७ मूल ८ उत्तराषाढ़ , उत्तराभाद्रपद १० रेवती ११ यह नक्षत्र विवाह में शुभ हैं कृष्णपक्ष की १३ से शुक्ल पक्ष की परिखा तक (क्षीणचंद) विवाह में नहीं लेना चाहिये और व्यतीपात व वैधृत योग और विठि (भद्रा) करण यह विवाह में नहीं होना चाहिये ।। गोधूली तथा रात्रि की लग्न लेना शुभ हे लग्न से छठे आठवें (त्रिक ) कोई प्रहन होप ®पंचाङ्गरत्नावली चंद्रमा वर कन्या की राशिसे शुभ होना चाहिये चंद्र जीवादि शुभस्थानों में होना चाहिये ।। अथलत्तादोषज्ञानम् ॥१॥ । सूर्य अपने नक्षत्र से १२ नक्षत्र को शनिश्वर आठवें को और गृहस्पति छठे नक्षत्र को मंगल तीसरे नक्षत्र को लत्ता मारता है यह गृह अपने नक्षत्र से आगेवाले को लता मारते है तथा चंद्रमा.अपने नक्षत्र से बाईसवें नक्षत्र को और राहु नवयं को बुध सतये नभत्र को लचा मारता है शुक पचियें को लता मारता हे यह ग्रह अपने नक्षत्रसे पीछेवाले नक्षत्रको लता मारते यह लग विवाह में वर्जित है ।। लात दोष मालव देश में वर्जित और सब देशो में होता है। अथपातदोषज्ञानम् ॥ २॥ व्यतीपात वैधृति गंड-साध्य हर्षण-भल इन योगों का जिस नक्षत्र में अंत होय उस नक्षत्र में पान दोष लगता है। बंग वा कलिंग देश में वर्जित है ।। वा कुरुक्षेत्र वा जांगल में वर्जित है और सर्वत्र विवाह होता है। युतिदोषज्ञानम् ॥३॥ . - 'जिस गृह में चन्द्रमा होय उसी घर में शुक्र बिना और प्रह होय तो युति दोष होताहै ॥ तस्यफलम् ।। सूर्य संयुक्त होय तो हानि होय मंगल युक्त होयतोमृत्यु होय गहु या केतु या शनियुक्त होवै तो मूल नाश करे अगर चन्द्रमा अपने वर्गोतम. में होय नांशाः मेषा उच्चको हो या मित्र घरहो तो युति दोष नहीं होता बुति दोषमें सर्वत्र विवाह होताहै ।। है * - -- - २६ पंचाङ्गरत्नावली SEBSCRRE पंचशलाकावेधज्ञानम् ॥४॥ रोहिणीऽभिजित् का परस्पर वेधहै मृगशिरा उत्तरोपोट को आर्दा पूर्वाषाद का पुनर्वसु मूलका पुष्प ज्येष्ठा का श्लेषा धनिष्ठा का मघाश्रवणका पूर्वाफाल्गुणी अश्वनीका और उत्तराफाल्गुणी खेतीका हस्त व उत्तराभाद्रपद का चित्रा व पूर्वाभाद्रपदका, स्वाति व शतभिष का विशाषा व कृतिका का ऽनुराधा व भरणी का परस्पर वेंध होताहे पंचशालाकाचक्रमेदेखो चलिखचुके हैं । विवाह नक्षत्रके वेध नक्षत्रपर कोई ग्रह होय अर्थात पंचशलाका को एक रेखामें परस्पर विवाह का नक्षत्र और कोई ग्रह होय तो सर्वत्र बर्जितह । फलमृत्युकारकं ॥ अथयामित्रदोषज्ञानम्॥५॥ विवाह के नक्षत्र से चौदहवें नक्षत्र पर कोई ग्रहहोय तौयामित्र दोप, जानिये सो वर्जित है, परंतु विवाह सर्वत्र होते हैं ।। अथबुधपंचकदोषज्ञानम् ॥६॥ सूर्य केगत अंशऔर १५ वा १२ वा १० वा वाइनकोअलगर धरके जोड़ना तिन अंकों में नव १ का भाग लेना शेषपांचव तो क्रमसे पांचौ स्थानमें पांच पंचक रोग १, अग्नि २, राज३,' चौर ४, मृत्यु ५, होती हैं सो विवाह में वर्जितहै केवल : मृत्यु पंचक विवाह में सर्वत्र बर्जितहै ।। अथेकार्गलदोषज्ञानम।। १. अतिगंड विकुंभ वज्र परिध व्यतीपात शूल व्याघात वैधृति गंड इन योगनमें एकागल दोष का विचार होताहै सूर्यके नक्षत्र " पंचारत्नावली -- - से चन्द्र के नक्षत्र नक अभिजित् समेत गिनै जो, नक्षत्र) सम संबक होंय और पूर्व कहै योगभी होय तो एकार्गल दोष जानिये सो काश्मीरमें वर्जित है और देश में विवाह होताहै ।। अथोपग्रहदोषज्ञानमा सूर्यके नक्षत्रसे चन्द्रमाके नक्षत्र तक गिने जो पांच वर या १०.या७या १४ या १९ या १५ या १८ या २१ या २२ या ५३' या १४ या २५. होय तो उपग्रह दोष जानिये सो कुरु वा बाहीक देशमें वर्जितहै और सब देशोंमें इस दोषमें विवाह होताहै । :: अथक्रांतिसाम्यज्ञानम् ॥९॥ सिंह मेषके परस्पर तथा वृष मकर तथा तुला कुंभ तथा कन्य मीन तथा कर्क बृश्चिक तथा धन मिथुनेके परस्पा सूर्य चन्द्रम होय तोक्रांतिसाम्य दोष जानिये सो सर्वत्र बर्जितहै ", अथदग्धातिथिदोषज्ञानम् ॥ मीन वा धन के सूर्य में बीज तिथि दग्धा होती है और वृष वा कुंभ के सूर्य में चौथ दग्धा होतीहे और मेष वा कर्क के सूर्य में छठ दग्धा होतीहै और कन्या वा मिथुन के सूर्य में अष्टमी दग्धाहै तथा वृश्चिक और सिंह के सूर्य में -दशमी दग्धा है तथा मंकर और तुला के सूर्य में द्वादशी दग्वाहोतीहै सो बर्जित है ।। बुध गुरु शुक्र लग्न केंद्र त्रिकोण में होतो शुभहै । अथपंचांग में इनदशौदोषों के लिखने का क्रम् ।। लत्ता पातादि १० दोष जो ऊपर कह चुके, जिसमें दोषहो उसकी लकीर टेढ़ी (5) और जिस्में दोष न हो उसकी लकीर - । Hamarilalih पंचारत्नावली सीधी (1) इस क्रमसे दशो दोष की दश लकीर लिलदे 'ग्रहणसंभवज्ञानम् ॥ सूर्य अथवा चंद्रग्रण होने से दिन में तथा २६ साढ़े पांचमहाँने में तथा महीने में तथा ईसा के महीने ग्रहण का संभव होता मोर पर्व (पूर्णावा अमावा) कालीन स्पष्ट रवि में राहु को घटाने से व्यग्वर्क होता है व्यग्वर्क मेषादि हो तो उत्तर तुलादि हो तो दाक्षिण होता हे व्यग्वर्क के भुज करके अंश करें जो १५ अंश से कम हों तो सूर्य अथवा चंद्रप्रहण का संभव होता है न्यग्वर्क दक्षिण हो और अश से कम होतो और व्यग्वर्क उत्तर.हो और ८ अंश से अधिक और १५ अंश से कम हो तो सूर्य ग्रहण होता है इस विपरीति सूर्य ग्रहण नहीं होता हे सूर्य वा चन्द्र ग्रहण संभव होने से भी यदि अमावाश्यां दिन में हो तो सूर्य ग्रहण , दिखाता है और पूर्णमाः रात्रि में हो तो चन्द्र ग्रहण दिखाई देता है। मेषादि हादशराशिंगतग्रहणफलम् ॥ उपरागोयदामेषे पीस्पतेसर्वदाजनाः।। कौवोजांनिकिरातेश्व पांचालश्चकलिंगको, int., वृषेवग्रहणगोपाः पशवधिका जनाः ॥ महांतोमनुजोयश्च पीड्यतेसाधवस्तथा ॥ २ ॥ रविश्चं दमसौगस्तो मिथुनेचवरांगनाः॥ पीड्यंतेवाहिकामत्स्या यमुना तट वासिनः ॥३॥-कर्कटेग्रहणेपीडा मल्लादीनांचजायते ॥ अंतरंसर्वरानांच तदामत्स्यविनाशिनः ४॥ सिंहेचग्रहणेपीड़ा सर्वेषांवनवासिनाम् ॥ नृपानांनृपतुल्यानां मनुजानांचजायतेशा कन्यायांगहणेपीडा त्रिपुराणांचशांलिनां ॥ कवीनालेखकानांच ॐ पंचाङ्गरत्नावली आयतेपी पतेसदा ॥ ६॥ तुलायांमुपरांगेच दशाणवाहुकाईको।। मस्वश्चपरात्पश्च पीडते साधवश्त्रये ॥ ७॥ वृश्चिकेाहणे पीडा सर्पजातेश्चैजायते ॥ औदुम्बरस्यभावस्य बोलायोध्येयक स्वच ।।८॥ यदोपरागेचापंचतंदामत्स्याश्ववासिनः ॥ वि हमल्लपांचालाः पीज्यंतेभिषकोविदः ॥३॥मकरेग्रहपीडा नीचानांमंत्रवादिनाम ॥ स्थविराणांभटानांच चित्रकूटस्थसंक्षयः ॥१०॥ कुंभेचेवोपरागेवः पश्चिमस्थैस्तथार्दुदेः ॥ तस्करैरोगि पांमृत्युः पीत्पतेवहुधाबुधा.,॥ ११॥ मीनोपरागेपीरयंते जल ल्याणिसागराः ।। जलोपजीवनोलोका येत्रयेद्यपतिष्ठिताः १२॥ अथभद्राज्ञानम्॥ कृष्णपक्ष में तीज और दशमी को भदा-पर- दल में वास करती और सप्तमी वा चतुर्दशी को भद्रा पर्वदल में बास करती है। शुक्लपक्ष में चौथ वो एकादशी को भद्रा परदल में, वास करती है और अष्टमी या पूर्णमासी को भद्रा पूर्वदल में वास करती है। पूर्वार्द्ध की रात्रि में और पार्द्ध की दिन में हो तो दोष नहीं होता है। अथभौमवतीवासोमवतीअमावश्यापर्वयोगः । 3. अमावश्या सोमवार हो तो सोमवती योगः मंगलवार को हो तो भौमवतीयोग भौमवंती में केवल गंगा स्नान:से एक हजार गोदान का फलहै और सोमवतीमइससे भी अधिकपल ।। अथकपिलाषष्ठीपर्वयोगः ॥: कुँवार बंदी ६ को मंगलवार वा रोहिणी नक्षत्र' तथा व्यतीपात AND
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® पंचाङ्गरत्नावली
योग युक्त होय तो असंख्य पुण्यको देनेवाला कपिला नामक
पर्व होता है तीर्थ स्नान में बड़ा पुण्य है,॥ -
र अथपुष्करपयोगः॥
विशाषा नक्षत्र के जब सूर्य होंय और दिन नक्षत्र कृतिका
होय तो पुष्कर संज्ञक योग होता है सोस्नान पुष्कर में दुर्लभ है
अर्थात् बड़ा फल है ।
अथवारुणीपर्बयोगा।
'चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को सतभिष नक्षत्र सूर्योदय में मिले
तोवारणी पर्व होताहै तिसमें गंगास्नान करनेसे कोटिसूर्य ग्रहण
समान फल होता है ।। भौर इस योग में शनिवार भी हो तो
महा बारुणी संज्ञक पर्व होता है। शुभ योग वाशतभिषा नक्षत्र
व शनिवार त्रयोदशी यह सब योग होने से महावारुणी
पर्व होता है तिसमें गंगा स्नान करने से तीन कोटि कुल को
उद्धार करने को समर्थ है।
'अथगोविन्दहादशीपर्वयोगः ॥
धनकी वृहस्पनिहोय कुंभ के सूर्य होय कर्क का चंद्रमा होय
फाल्गुण शुक्ल द्वादशी होय रविवार होय तथा पुष्य नक्षत्र और
शोभनयोग होय तौ गोविन्द द्वादशी नाम पर्व होता है तिथि
सर्योदय होना चाहिये, इस पर्व में अयोध्या के स्नान का
वही माहात्म्यहै।।
अथा दयमहोदयपर्वयोगः ॥
माघ या पौध्य की अमावश्याको श्रवण नक्षत्र और व्यती.
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पंचाङ्गरत्नावली
पात योग होय तो अद्धोदय,पर्व होता है इनयोगों में से कोई
हीन होय तो महोदय संज्ञक योग जानना । अद्धोदय योग में
सर्व जल गंगा के समान होताहै.और ब्राह्मण सर्व-शुद्धात्मानमा
के समान होते हैं जोकुछ भी किंचिन्मात्र दानदेय सो दान सुमेरु
के बराबर होता है महोदय का भी यही फलहै ।।
६. अथ ब्रतादिनिर्णयों तत्रादौचैत्राश्विनशुल
प्रतिपदा नवरात्रनिर्णयः ।।
अमावश्यावेधी परेवाको नवरात्र व्रत करना वर्जिन उदयमें
प्रतिपदा तीन मुहर्ततकं मिलै वही ब्रत के योग्य है ।।
'अथगणगौरीब्रतनिर्णयः॥
चैत्र शुक्ल चौथ को गणगौरीबन होताहै सो मध्याहन्यापनी
लेना योग्य है पार्वती व गणेशजी का पूजन करना चाहिये
पक्कान्न मिष्ठान्न पुष्पयुक्त ॥
अथएकादशी निर्णयः॥
एकादशी की हानिहोय बादशी संपूर्ण होयतो उसी दादशीको
बत करना चाहिये और त्रयोदशीको पारण करे उदयमकादशा
घोरीहोय अंत में त्रयोदशी होय मध्य में दादशी यहयोगबादशी
'की हानि होने से होता है इस एकादशी की अस्पृहा संबाहे
'एसी एकादशी बन के योग्यहे विष्णु के प्रिय है ऐसीएकादशी
'एक का व्रत करनेसे हजार जने के तुल्य फलहे और पुण्य हजार
• गुणाहै और इस्में त्रयोदशी को पारण करना योग्य है और बाकी
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पंचागरत्नावली.
में।१२ को पारण करना योग्यहै तथादशमी वेधी एकादशी के
व्रत करने से पहिला कियाहुमा भी फलनाश होताहै ।।
7 अथानंतचतुर्दश्यादिनिर्णयः॥
कृष्णपक्ष की चर्तुदशी सब महीनों की शिवरात्रि इत्यादि
अर्द्धराति न्याविनी योग्य है और भादशुक्ल में अनंत चतुर्दशी
होतीहासो एक मुहूर्त तक मिले तो व्रत के योग्य है तथा
बैशाष शुरल १४ को नृसिंह जत होता है. सो सायंकाल युक्त
लेना चाहिये।
नागपंचमीनिर्णयः॥
श्रावण शुक्ल की ५ नागपंचमी होतीहै सो छठि युक्त अर्थात्
सूर्योदय की पंचमी में करना योग्य है नागदेव प्रसन्न होते हैं
और.शेष पंचमी जोहैं सो चौथ विद्धा करै ।। अन्यप्रकारः अन्य.
प्रकार से मध्यान्ह व्यापिनी पूना योग्यहै और आचार्य कहते
है कि पूर्वाह गामिनी मोक्ष की देनेवाली हैं ।।
अथश्रावणीनिर्णयः॥
श्रावण शुक्ल १५ को अपराह्न काल में रक्षाबंधन करना
योग्य है जो भद्रा में रक्षाबंधन करै तौ पुरके राजाको हने ।
अथबहुला ४ व्रतनिर्णयः
भादपर कृष्ण चतुर्थी को बहुलाचन होता है सो पूर्व वा पर
की जो चन्द्रोदयं विष मिले उसी को बन के योग्य जानने
को कहा है।
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• पंचाङ्गरत्नावली
श्रीकृष्णजन्माष्टमीनिर्णयः ।।
भाद्रपद कृष्ण ८ को जन्माष्टमी कहते हैं सो अर्द्धरात्रि व्या
पिनी योग्य है जो दोनो दिन अर्द्ध व्यापिनी होय तो पर दिन
व्रत के योग्यहै ।।
अथहरतालिकानिर्णयः ॥
भाद्रपद शुक्ल ३ को गोरी बत होताहै सो एक मुहूर्त तक
उदय समय में मिले तो वही ब्रतके योग्य कही गई है। अन्य
मतेन । मुहूर्त्तमात्र उदय में तीज मिले उसी दिन गौरी व्रत करै
और जो शुद्धाधिक ( ६० घी से अधिकवाली तिथि वृद्धिा)
मिले उसकी गणयोग संज्ञाहै व्रतके योग्यहै ।।
अथऋषिपंचमीनिर्णयः॥
भाद्रपद शुक्ल ५ को ऋषिपंचमी ब्रत होताहै मध्याहून,गत
व्रतके योग्य कही है और हस्तोद्भव भोजन बर्जित है ।।
अथर्वाष्टमीनिर्णयः॥
भाद्रपद शुक्ल ८ को दूर्वाष्टमी होतीहै पूर्व व्यापिनी ग्राह्य है
तथा और आचार्यों का यह मत है कि शुक्लपक्ष की अष्टमी
नवमी समेत करना तथा कृष्णपक्ष की अष्टमी पूर्वविद्धायोग्य है।
अथमहालक्ष्मी ८ निर्णयः॥ .
कुँवार कृष्ण ८ को महालक्ष्मी व्रत होताहै तीन मह॒त्त तक
पर मिले वही ब्रत के योग्य है परन्तु धन लाभ की अभिलापासे
व्रत करनेवाला चन्द्रोदय व्यापिनी में ब्रत करे।
अथविजय १० (दशहरा) निर्णयः॥
कुँवार शुक्ल १० को विजय १० कहते हैं सो पूर्वयुक अपराह
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पंचाङ्गरत्नावली
कालमें लेना चाहिये पूजन प्रशस्त है और श्रवणके योगसे पर
मिले तो पर और पूर्वमिले तो पूर्व की गृहण करें ।।
अथकर्क ४ निर्णयः॥
कार्तिक कृष्ण ४ को करवा चौथ कहतेहँसो चन्द्रोदय व्यापि
नी में गौरीब्रत कहाहै सौभाग्यदेनेवाला है।
अथदीपमालिकानिर्णयः॥
कार्तिक कृष्ण अमावाश्या को सायंकाल व्यापिनी में दीप
दान करना चाहिये पूर्ण अर्द्धरात्रिको श्रीलक्ष्मीनाका पूजन
योग्य है ।। दीपदानमें स्वात्यक्ष वर्जित है ।।
अथसंकष्टहरणचतुर्थीनिर्णयः॥
माघ कृष्ण ४ को सकट चौथ व्रत होताहै सो चन्दोदरा व्या.
पिनी ग्राह्यह तिसके व्रत करनेसे समगू सुख होता है ।।
अथहोलिकानिर्णयः॥
फाल्गुण शुक्ल पूर्णमासी की रात्रिमें पूर्वयुत् होलिका दाह
करना योग्य है परन्तु भद्रा वर्जितहै इसकारण पर में होती है ।
शेषतिथिनिर्णयोसंक्षपः॥
तीज छठि हलछठि वसंतपंचमी यमद्वितीया अष्टमी श्रीराम
नवमी चतुर्दशी अमावस व्यासपूजा पूर्णमासी एकादशी इतनी
तिथि पर युत करनी चाहिये और वटसावित्री का पूजनमात्र
पर युत करना चाहिये ।। प्रदोष सायंकाल युत और गणेश चौथ
चन्द्रोदय में करना चाहिये ।। जन्माष्टमी बुध रोहिणी के युक्त
होय और शिवरात्रि व चौदसि इनको पूर्वयुत व्रत करना योग्य ।
तथा तिथि के अन्त में पारण योग्य है तीज पंचमी दुर्गावत
पचाङ्गरत्नावला FREEX पर युक्त योग्यहै और जो बाकी रही तिथि सो पूर्व युक्त करना चाहिये । इतिव्रतादिनिर्णयोः।। अथाधिकमासज्ञानम्॥ जिस विक्रमीयसंवत्में अधिकमास जाननाहो कि अधिकमास होगा या नहीं और कौनमहीना लौंदकाहोगा।कम।।संवत् १६५१ विक्रमीयमें अभीष्ट संवत्को घटावै अथवा१९५१को अभीष्ट संवत् में घटावे शेषको दो जगह रक्खै १ जगह १६ का भागदेनेसे जो लब्धि होय सो (दूसरी जगह में ११ से गुणाकरके) गुणनफल में जोड़देय फिर ३० का भाग देकर जोशेष फल ब, उस शेष फलको ३६ में ऋण धन करना तत्र स्पष्ट अंक होताई यथा १६५१ में जो अभीष्ट संवत् घटे तो शेषफलको ३६ में ऋण करना और जो अभीष्ट संवत् १४५१ तो शेपालको ३६ में धनकरके ३०से भागदेकर शेपको ग्रहण करना तब स्पष्टॉक होवैगा जिस संवत्में स्पष्टांक १९ तथा २० । २१ । २२ । २३ । २४ । तथा १२५ ॥ २६ ॥२७ । २८१२६१०० होवै उस संवत्में अवश्य अधिक मास होगा और स्पष्टांक जितनी गिनतीहो उसको चैत्रशुक्ला दि परिवामें जोड़नेसे जो तिथि प्राप्तिहो उस्के दूसरे दिन मेषकी सक्रांति हुआ करती है ।। मास जानने का क्रम । जिस महीने में संक्रांति न होय वह महीना लाँद का होताहै यहां महीना शुक्ल पक्षादिसे जानना ।। सरल रीति ।। पूर्वोक्त जो सष्टांकहै उस्को ३० मे घटाये जो शेष बचे उस्को आधा करके जो गिनती होय उसके अनुसार वैशापआदि करके जो मास आवै वही महीना लोंद का होगा अथवा १ न्यूनाधिक करनेसे लौंद मास होगा ।। इति ।।
- ७६ ॐ पंचाङ्गरत्नावली ® सप्तऋषियोंकीनक्षत्रस्थितिज्ञानम् ॥ संवत् १६५६में ५ राशि २१ अंश ३६ कलापर सप्त ऋषियों की स्थिति थी प्रति वर्ष ८ कला धन करनेसे आग्रिम वर्षकी स्थिति होतीहै अर्थात् सं० १९५६ से पीछे जितने वर्षका जानना हो उन वर्षों को ८ से गुणा करके गुणन फल कलाओं को ५॥२१॥ ३६ १००में ऋण करनेसे अभीष्ट वर्ष सम ऋषियों की स्थिति जानना इत्यादि। अगस्तकाउदयास्तज्ञानम् ॥ सूर्य राश्यादि ।।२८१५६ / ०० के जब होते हैं तब शाहजहां पुरमें अगस्त्य का उदय होताहै क्योंकि यहांके पलमा ६।२२ हैं। तथा सूर्य जब राश्यादि०० २७१४101 के होतेहैं तब अगस्त्य मुनिका अस्त होताहै।' दाहिम बीजज्ञानम्॥ दाडिम में जितने कंगूरे हो उनको ७२ से गुणा करि देव जो गुणन फल होवें उतनेही बीज दाडिम मे होवेंगे। नींबूतथानारंगीवीजज्ञानम् ॥ नीबू तथा नारंगी पर जो रेखा बनी होती हैं उनको गिनै जो विषम होंय तो ३ से गुणा कर जो सम रेखा होय तो २ से गुणा करै जितना गुणन फल हो उतने बीज होते हैं। तबूंजतथाखरबूजावीजज्ञानम्।। तरबूज तथा खरखूजे में जितनी फांक होंग उनको ८८ से गुणाकरै जो गुणन फल होवै उतनेही बीज होवेंगे। इति ॥
। भगवद्गीता भापाटीकासहित ।। इसका टीका बहुतही सरल कियागया है जिसमें हरकोई ऐसी पुस्तक का भाशय भलेप्रकार जानसकै ।। मू॥) पु० डा) मनुस्मृतिदोहावली॥ मनुजोके हरश्लोक का एक एक दोहा कहा है हरग्रहस्थ को इस पुस्तकको पढ़नाचाहिये। मू०१) पु. डा०) मनुस्मृति भाषाटीका सहित ॥ हर श्लोक के नीचे टोका विस्तार पूर्वक सरल रीति से बनाया गया है उत्तम कागज मोटे अक्षर है॥ मू० २) पु० डा०-) मुहूर्तमञ्जरी भापाटीकासहित ॥ यह मुहतों को प्रसिद्ध पुस्तक पुष्ट कागज पर छपी है ॥ मू०२) पु० डा०)। मयूरचारित्र भाषा ॥ जिसमें अनेकानेक नक्षत्रों के उदय समय व अस्त समय का ज्ञान और उनके फलाफल,का विचार वर्णित है। मू०) डा०॥ शैवभक्तमनोरंजनी॥ इसमें शिव जी के अनेक प्रकार के भजन बिनय के बर्णित है शिव भको के लिये तो यह पुस्तक बहुत ही उपयोगो है इसके भजन बहुत मधुर मू०)डा० ॥ सीताहरणनाटक ॥ श्री जान कोजीका हरण नाटक को रोति पर वर्णन हे जिसके पटन से अवश्य आंसुओ को धारा चलती है। को०) पु० डा० ॥ हिन्दीभाषाभूपण ।। इसपुस्तक को बाबू सूर्यमल अखावरी अमिस्टेक्टमास्टर लायल झालोजियट स्कूलबलरामपुर जिला गोंडा ने बनाया है इसमें हिन्दी लिखने पढने के शब्दों को शुद्धता और उर्दू शब्दोंके दूषण भलोभाति वर्णन किये हैं। मू.) डा०)। विश्रामसागरगुटका ।। श्री बाबा रघुनाथदास रामसनेही महाराजजोके बनाये हुये गन्य विधामसागर को ऐसा कोन भगवद् प्रेमो है जो न हो मानता जैसे कि बाबई में रामायणों के गुट के छपे हैं ऐसे हो विश्रामसागर का गुटका तैयार कियागया है कागज चिकना प मजबूत लगाया गया है जिन्द भो खूबसूरत व पुना बनाई गई है कीमत सर्व साधारण को सुगमता के लिय केवल It ) रखे गय है अलावा डाक व्यय के- 1
मयूरचरित्र माया ॥
जिसमे अनेकानेक नक्षत्रोंके उदय समय व अस्तसमय का ज्ञान और उन
फनाफल का विचार बर्णित है।
मू. 1) डा०)।
महेश्वररसमोरकाव्य।
पजाबके प्रसिद्ध कवि रायदौलतरामजो ने भलेप्रकार नायकानायक भेद पारि
नवरसकाव्य उत्तम रीति से वर्णन किया है।
मु०) पु० डा०-)
सुदामाकृष्ण नाटक।
इसमेसुदामाजी व काणचन्द्रजीकासम्बाद नाटकरीतिपर बर्णित है मू०१)डा० )।
मनुस्मृतिदोहाचली।
मनुजोक हरलोकका एकएकदोहाकहा है हर ग्रहस्थ को इसपुस्तकको पढना
चाहिये
मू०१) घु० डा०३)
मुहूर्तमञ्जरीभापाटीकासहित ।
यह मुहतों को प्रसिद्ध पुस्तक पुष्ट कागज पर छपी है। मू० पुo डा० ॥
ज्ञानगुणकवितावली ॥
यीयुत पण्डित युताय पतिराज महाराज विचित इसमें दोहा, सवैया,
वित्त, भजन, छन्द,खेमटा, कजरी, मलार, कुराइलिया, ज्ञान गुण व अनेक
प्रकार के रस वर्णित है ॥ मू.)-पु. डा० )।
विनायक वन्दना॥
गणेश श्रादि देवताओ को बन्दना व लोला अति मनोहर कबित्तों में वर्णित
मूक) डा)।
हमारे यहांकी छ हुई सब पुस्तकें नीचे लिखे
ठिकानोंपर मिलती है
पण्डित रामरत्नं बाजपेयी
मैनेजर लखनऊ प्रिंटिंगप्रेस लखनऊ
दूसरापता
पनीलकण्ठ-द्वारकाप्रसाद
बुरोलर अमीनाबाद- लखनऊ