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Shreepashrvapuranbhashachhandbaddha

Munshi, Aman Singh · 2009/11

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. अनुक्रम भूमिका आदि ख़रीज ग्रंथ आदि लिखतकी अनुक्रमः॥ সখিনা आशय गणिता भाशय ८ २ 8 ३ बाटलपेज मार्थना टाटिलपेज भूमिकामादि खरीजकी अनुक्रम संख्यासहितछंदनामावलीयंत्र छंदोंक संछेप लक्षण १० | कैयक पुस्तकों में जो शब्दइस पुस्तकसे त्रिमुखदरेखगये उनका प्रगटकरने वालायंत्र ११ मुंशीश्रीराम (अज़ीज़) टीचर नौरमिनस्कूदेहलीकृत समा लोचना ९३. जोनिवरलिजियालालनीसमालो चना ग्रंथकी अनुक्रक ५ ६ भजन 'अमनसिंह रचित भूमिका श्रीपार्श्वपुराणभाषाछंदवद्धअनुक्रमः के छंद किस पृष्ठ किसपृष्ठ से भारं भ कै छंद से प्रारंभ से के तक से कैतक आशय आशय ३ १-६ श्री पार्श्वनाथ जी कथा प्रारंभ प्रथम स्तुति अधिकार ७-८ पंच परमेष्टी स्तुति ४१-५० | जंबूदीप भरतछेत्र ३ ६-११ | जिनवाणी स्तुति आदि प्रशंसा १२-१३ गणधर वा आचयों १० ५१-६० राजा अरविंद क. मठ मरु भूत कथन १४-२५ कविनमृता या ग्रंथ ११ ६१-६२ विश्वभूत मंत्री को करण कारण वैराग उत्पन्नहोना .६.२६-४० कथा विख्यात का १२ ६३-६६ विश्वभूतका दोनों रण पुत्र राजाको सौंप की स्तुति सूचीपत्र । 373sh ३ फिसमें gसेना कैछंद से कैतक प्राशय किसपृष्ठसे कैछंद प्रारंभ केतक आय चन में जाना १२ ६७-७४ | कमठ का मरभूत की स्त्री पर श्रा- शक्त होना २३ ७५-८३ कलहंस का शि- क्षित वचनों सेक मठका समझाना १४ ८४-८६ कमठकाभ्राताना रसे भोग करना ८७-६६ राजाका कमठको दंड देना १५३७.१०३ कमठका भूताचल पर्वतपर तपकरना १०४- मरुभूत का कमठ के पास पर्वत पर जाना १८ . ११०-- मरुभूत को कमठ ने मानना १६ | ११५ - राजाका मुनि.से २७ ११.२१ । राजा भरविंद का मुनि होकर मुपेर शिपरकी यात्राको जाना २२.४८ | सल्लकी बनमें वज्र घोप हस्तीका उप- द्रव मचाना घर- विंद मुनीश्वर से सिक्षा पाकर वृत लेना शिक्षित व- चन ४९-६३ वज्रघोष हस्तीका | वेगवती नदीके दह में फसकर कुरहर नाम सर्प कमटका जवसे डसाजाना फिर मरकर १२खें स्वर्ग में शशि प्रभु देव होना ६४-७८ शशि प्रभुदेव का १२वें स्वर्ग से नि- कल कर लोको- तमपुर में विद्युत गति भूपाल घर जन्म लेकर साधू उपदेश से मुनि होना चालपरमादी. जीवकी ७९.८९ / कुरकठनाम सर्प का ५ वेनमें १७ मरुभूत का ब्यौरा पूछना-शिक्षित व २० २० द्वितीय अधिकार प्रारम्भ १-१० मरुभूतकाजी बज्र घोपह स्त्री अरु वरणनाम कमठ की स्त्री का इतनी होकर संत की बनमे केलक रना ३० -- सूचीपत्र । किसपृष्ठ | कछंद मे किसमे के छंदसे आरंभ | केतक प्राशय प्राशय स प्रारंभ केतक - . १ ७३--१०२ नाभिराय का सं सारको असारजा न वैराग भावना भाना चाल जोगीरासा जिसमें कविने भले प्रकार संसार की अवस्था दिखाई वजूनाभि का परि १३० ग्रह त्याग चारित्र पंथसाधनमें ध्यान लगाना, कमठका जीव जो अजगर था छठवनर्कमें१७ सागर श्रायु भोग भील होकर पज़ नाभि मुनीश्वरको मारना, मुनीश्वर के जीवका मध्यम ग्रीवक में अहमिंड होना भीलका ७ वें नर्क में पड़ना १३१-नरक कथन जिस में विस्तार पूर्वक सागर श्रायुभुगत करअजगरतनधा रण कर मुनीश्वर को निगलना मुनी श्वर का१वेस्वर्ग में उत्पन्न होकर भोग भोगना तृतीय अधिकार पारम्भ ४४ पार्श्वनाथ स्तुति ३३. २-७ अश्वपुरनगर और बज वीरज राजा. की प्रशंसा ८.१% | विजयानामापटरा नीकापांच स्वप्न देख राजासे उत्तर लेना और १६वें स्वर्ग से उस मुरके जीव का चय हो कर बज्र वीरज रा जा के घर पुत्र हो राज पदवी पाना ३४ १९.३४ चक्रवर्ती की विभू ४८ ति का कथन १६.३५-४२ / निधियों का क थन ३७४३-५५ | १४ रत्न कथन ३९ ५६-६७ | चक्रवर्ति की अन्न संपदा का कथन ६८-७२ वजनाभि राय का धर्म सेवन ३ नरकों के दुःख व ड़े भयानक शब्दों में दिखाये गये सागरममाएं जिस मव्यवहारउद्धा र २ अर्द्धार पल्लो ... का व्यौरा है सूचीपत्र किस पृष्ट कैछदसे सेमारंभ केतक प्राशय कैपृष्ठसे के छदसे प्रारंभ कैतक प्राश्य चतुर्थअधिकार प्रा- संसारका रूप अ- पार्श्वनाथ स्तुति ६२ उस अहमिंद्र का ७१ मध्यमग्रीवकविया म से चय कर योध्या नगर में जूबाहु भूपतिके घर - ७३ प्रानन्दकुमार ना म पुत्रहो महा पंड ली पद पाना ६३ | १२.१७ आठजाति भूपकथन ६४ । १८-२४ स्वामीहित मंत्री के उपदेश से जिन । जाकी भावना कर, ७३ नगरउत्सव करना ६५ / २५.५२ धातु पाषान प्रति मा पूजने का . ष्टांत सहित समा घान-अपने प्रणा मों अनुसार जिन ८५ प्रतिमा पूजन फल दायक होना। ६६ ६८ ५३-६० भान उपासक मत फैलने का कारण ८१ सार विचारना राग उत्तम होना ७३.८५ भानंदकुमार का बारह भावना भा ना-चंडी ललित देखने योग्य है। ८६.१०८ आनंदकुमारराजा का राजछोड सा गरदत्त मुनीश्वर से सनम ने महा व्रत धारण कर १२ प्रकार के तप करना। १०९-- वाईस परीपक १३२ | यन-बडे ललित छंदों में देखने यो ग्य है। १३३- परीपह पदय वि. १३४ वर्ष । ११५-दस लाक्षणी धर्म १४५ कथन। १४६-सोलह कारण भा १६२ बना। १६३-सोलह कारन भा १६७ वना फल। १६८-सोलह कारण भा बना भाकर आ- तम लीन हो बन में ध्यान परनाक . भानु विमान में जिन मंदिर होने का समाधान। २०६१-७२ आनंदकुमार का धवल केश देख सूचीपत्र । w किस पृष्ठ कैछंद से मिश्रारंभ केतक किसपृष्ठसे कैछंद स भरंभ | केतक आशय प्राशय । मठ के जीवकानर बनारस नगरप्र. क में से निकल श्वसेनराय वामा पंचानन का शरी देवी रानी की प्रशंसनीक भत्र धारण कर आ नंदकुमार मुनीश्व स्था । रको भक्षण क. ११० ८०.१०१ गर्भ मंगल भान रना आनन्दकुमा न्द कुवेर काम र मुनीश्वर का आ श्वसन पर पंचा- नत नाम स्वर्ग में श्चर्य करना इन्द्र होना। वामा देवी का ६१ | १८२- स्वर्ग विवर्ण । सोलह स्वम दे- १६३ खना। १०२-प्रातकान कथन ६३ | १९४- स्वर्ग स्त्री कथन । ११३ १६७ १२७ बामा देवी का ९४ | १९८- अानत नाम स्वर्ग स्नान कर राजा २४३ में नाना प्रकार के सुख भोगना पूचना राजा का और उसको प. उत्तर देना हल भव के चारि ११६ १२८- सौधर्म सुरेश का का फल जान १५६ गर्भ औसर वि कर जिन दरशन चार कुल गिर करना उत्तम उप कमल बासनी श्री देश करते रहना भादि देवियों को पंचम अधिकार गर्भ सोपन भादि १०० प्रारम्भ पार्श्वनाथ सेवा निमत बना स्वामी का गर्भक रस नगर भेजना ल्याएका देवियों का नाना पार्श्वनाथ स्तुति भांति सेवा करना २-७९ लोका लोक क- इंद्रादिक देवका थन जम्बूदीप वनारस नगरी में भाना से रवमों का फल सूचीपत्र । किस पृष्ठ, कछंद से सेवारमा केतक प्राशय किस पृष्ठ कैछंद से से प्रारंभ कतक प्राशय थअश्वसेन राजा लोक में उलटा १ की स्तुति मी स्तुति १२०/ १५७- देव अंगना प्रश्न १३४ १९५-११० देवताओं काउल- १६९ माता उत्तर १२१ १७०- माता के गर्भ स- घा आना नगरम १७७ मय किसी प्रकार उत्सव होना का खंद न होना १११- इंद्र का अश्वसेन नव मास तक पं १२८ घर आनंद नाटक चाश्चर्य होना। करना फिर सर्व १२२ घण्टम अधिकार देवताओं का देव मारम्म श्री पार्श्व नाय स्वामी का जाना। जन्म कल्याणक सप्तमअधिकार प्रा १२२ पाश्वनाथ स्वामी रंभ दिक्षाअर्थात् तप कल्याणक १२३ २-१६ पार्श्वनाथ स्वामी १३६ श्रीपार्श्वनाथस्वा- का जन्म होना देवराजों का जन्म १३६ २-२१ जिनदेवकी पान कल्याणक कारण अवस्था कथन उद्यम करना १४१ /२२-२६ श्रीभगवानके श १२४ १७-२३ अरावतगज कथन रीर की अतिशय १२५ २४-४२ स्वर्ग देवोंकाजन्म ओसंक्षासे१००८ कल्याणक अर्थव- लक्षण कथन नारस नगरी में १४३ ३०-३६ जिनदेव शोभाक- पाना थन--अश्वसेनपि- १२८४३-४८ सुरगिर कथन ताकी जिनदेव से जिनदेव न्हवन विवाह अर्थ प्रार्थ १२८१४९-७१ ना करनी १११ ७२-७४ श्रीजिन गंधोदक स्नान ४०-४२ जिनदेका पिताको १३२/७५-८१ श्रीजीका श्रृंगार १४५ नावा स्तुतिकरना हीपाल राजाहोना) उत्तर देना ४३-५३ कमठके जीवकाम १३३ /८२-१४ देवताओंकी मार्थ ८ सूचीपत्र । किस पृष्ठ कैछंद से किसपृष्ठ से कैछंदसे आरंभ कैतक श्राशय प्राशय समारंभ, केतक के समीप दूतपठा अपनी स्त्री के देवका माता पिता मरनेपरतपसीभेप को. समझाना अ धारण करना वन श्वनाम बनमें जा मे जिनदवसे मेंट करनिनमुद्राधारण होना कर तप करना १४६ ५४-६६ जिन देवका काठ अष्टम अधिकार चीरने से तपसी प्रारंभ ज्ञान कल्या को वरजना-अज्ञा एक नतपक्षणदिखाना १५७ पार्श्वनाथ स्वामी १४७ । ६७-६८ नागयुगलका मर- स्तुति करनिंद्रपद्मावती | १५८ २-२९ जिनदेवकातपकर होना नेमे लोलीन होना १४८ [६६-९३| जैसेन अजुध्या के शम्वरनाम जोतषी राजा का जिनदेव देव कमठके जीव कानानाप्रकार- ना जिन देवका पद्रव उत्पन्न कर जुध्या नगरी का जिनदेवकोउपसर्ग वृतांत पूछनाउत्तर करना सबे उपद्रव देनेपर श्रीजी को का बृथा जाना वैराग उत्पन्नहोना १६२ ३०-४० | हुंडा अवसर्पणी यह स्थान देखने कथन योग्य है १६४ ४ ४१-५३ जिनदेवको केवल १५१ ६४१०६ वाराभावनाभाना ज्ञान उत्पन्न होना १५३ १०७... रिपीश्वर देवोंका १६६ ५४-६५ देवताओंका जिन १३८ आना अपने बच केवल पूजाकर ने नौसे वैरागढ़क- कारन पृथ्वी पर राना-चौविध इंद्रा आना दिक देवोंका तप १६८ ६६-१२४ समोसरण कथन कल्याणकअर्थ न बर्णन गरगे आना जिन| १७५ १२५- | अष्ट प्रातिहार्य १३३ वर्णन सूचीपत्र। 8 किम पृष्ट, कैछदसे सेमारंभ, केतक श्राशय किसपृष्ठमे, के छंदसे प्रारम केतक श्राशय १५६-११ प्रतिमा कथ न जिसमे छुल्लक १ १७७ १३४ देवताओंका जिन | २०६ १६४ देवकी स्तुति वा प्रार्थना करना १८१ नवमअधिकारप्रा. रंभ मोक्ष कल्या, २१७ पक १८१ पार्श्वनाथ रवामी २१७ स्तुति १८१ २-३ समोसरणमें वाग सभाका जुड़ना २१८ १८१४-१५ स्वयंभनाम गण घरका विनती क २२२ रना और बहुतसे मश्नकरना १८३ /१६-१८ वाणी अवस्था क थन २२४ १८३ १९-३३ साततत्त्वरत्तर सा मान सप्तनयविधा २२४ न १८५ ३४-३६ जीवविष सातों ग जीवनिरूपण २२८ १८६ ३७-३८ जीव निरूपण १८६ ३९-६६ जीवकथनजिसमें | २२६ जीवके लक्षण और समृदयात ऐलक का भीभे ददिखायागया २०३- नरकगति लहने वालोंका कथन सातों नरकमेजी व निकल कौनग तिधारण करई २०८- किसकिम करनी २४५ से क्याफल होता २४६- कितनेही पुरुषों २५८ कादिगंबर होना कमठके जीव का वैरभाव त्यागना २५९- द्वादशांगपदप्रमाण २६१ श्लोक सहित २६२- सुरेशका विनती २९९ करना भगवानकी अतिशयका कथन ३००- | सिद्धोंकेश्राकारका ३०६ कथन ३०७- इंद्रौका मोक्षकल्या ३१२ एककरना ३१२-- | पार्श्वनाथ कमठो ३२३ भवकथन ३२४- | जिनवाणी प्रशंसा कविलघुता ग्रंथ रचितकाल अंतिम सूचना-प्रय मद्रित काल का भी व्यौराहै ११६- । धर्म आदि १९८ (९७११५ अजीवतत्त्वकथन | २३३ २०१ द्रव्या का कथन २०४ १३१- आश्रवादि मांच, २३६ १५८ पर्यंततच्चोंकाकथन १० सूचीपत्र । * भजन राग सोरठ अनरवजन करनारे भइ'अंतर उज्जलकरनारे पाचली कपट कृपाणतनै नहीं तवलौ, करनी काज न सरनारे ॥शा अंतर-उज्जल करनारे । जपतप तीरय यज्ञ व्रतादिक, आगम अरथ उचरनारे । विषय कोय कीच नहिं धोई, याही पत्र मरनारे ।। २ ।। अंतर उज्जन करनारे। बाहर भेष क्रियाउर-शुचिसो, कीये पार उतरनारे । नाहीं है सबलोक रंजना, असे वेदन धरनारे ॥ ३ ॥ अंतर उज्जल करनारे । कामादिक मलोमन मैला, भजनकिये क्या तरनारे । भूधर नीन घसनपर कैसे केसररंग उपरनारे ॥४॥ अंतर उज्जन करनारे ।।

* भूमिका * । - - .. - ॥ २८ मात्रा हरिगीत छंद ॥ शुभ देशकाशी नगर वाना, रस विष जिनरवि उगे। पितु अश्वसेनरु मात वापा, देवि उर पंकज जगे ॥ धरयोग लघु वयमांहि सह, उपसर्ग शम्बर मदहरो । पुनिवरी शिवसो पार्थ प्रभु मम, बुद्धि को निर्मल करो ॥१॥ विद्वजन चरणाम्बुज रज अपनसिंह विष्णुसिंह आत्मन अग्रवाल गोयल गोत्र जिनमत दिगम्बर आम्नाय धारक सुनपत नगर निवाशी हाल अपील नवीस दिल्ली इंद्रप्रस्थ कश्मीरी दरवाजा धर्म अनुगगी पुरुषों की सेवा में सबिनय नि- वेदन करता है कि जब मेरी अवस्था अनुमान चालीस वर्ष की हुई तब मुझकों सकल गुण निवास पण्डित मेहरचन्ददासजी लघुभ्राता पंडित मथुरादासजी १-यह एक छोटासा नगर अनुमान तर हजार मनुष्यों की बसासत का दिल्ली नगर से अहाईस मील वायव्य कोन में वस्ता है जो अदाईसौ घर अ- प्रवाल नियों और तीन जैनमंदिर शिखर बंद एक चैत्यालयसे शोभायमान है।। २-पंडित मेहरचन्द दासजी लाला गंगादास जी अग्रवाल के लघुपुत्र संस्कृत हिंदी भाषा के सिवाय फारसी भाषा के भी भलीभांति ज्ञाताहै भी सज्जन चित्त- वल्लभ काव्य मुनि मल्लिसेन जैन आचार्य रचित की अन्वय पदच्छेद सहित संस्कृत और हिंदी भाषा टीका लिखकर प्रति संस्कृत श्लोक हिंदी मत्तगयन्द नाम प्रति ललित छंद बनाये-गुलिस्तां-पंदनामा फारसी पुस्तक विद्वान नीतिज्ञ शेख सादी शीराज़ी रचित जो नीतमार्ग में बड़ी प्रशंसनीय प्रसिद्ध पुस्तक हैं हिंदी भाषा में पुष्पोवन-शिक्षापत्री नामकर बड़ा उत्तम अनुवाद (तर्जमा) किया जो देखने योग्य है पंडित मथुरादासजी आपके बड़े भ्राता जैन पंडितों में खंडन मंडन विषय बड़े विख्यात वाद विजई पंडित थे कार्तिक मास सम्बत उन्नास सौ चवालीस विक्रमि में स्वर्ग वाशी हुये ।।

१२ भूमिका सुनपत नगर शोभित की प्रेरणा से भाषा जैन शास्त्रों के अवलोकन का मन में उत्साह बढ़ा सो मैंने भाषा छंद वध भूबर जैन शतक कविवर भूधरदासजीर- चितको जो अति निन्य ललित पदों के समुदाय औ बहु निर्मल उपदेशक अ. भिप्राय से नाना प्रकार के मन हरण छन्दों में रचा हुआ एक अनूठा विचित्र कुसुमाकर है विचार का शब्दार्थ सरलार्थ अर्थ प्रकाशनी नामा टीका से संशो भित कर प्रकाशित किया और तत्काल अति दृढ़ता के साथ यह विचार नि. श्चल करा कि श्री पार्श्वपुराण भाषा छंदवध कविवर भूधादाम जी रंचित को जो प्रायः मूख लेखकों की अज्ञानता कारण शब्दों और छंद मानाओं से बहुत कुछ अशुद्ध होरहा था शुद्ध करूं सो अपने विचार पूर्वक बड़े परिश्रम से कई एक प्रति प्राचीन पुस्तक भापा पार्श्वपुराण और अनेक संस्कृत हिंदी भाषा शब्दार्थ कोष पिंगल शास्त्र संचय कर वुद्धिवानों की सहायता ले धीर्यता सहित अपनी तुच्छ बुद्धि अनुसार सम्बत उन्नीस सौ चन्चन विक्रमी में ग्रन्थ संशोधन कर एक ऐसा विचित्र यंत्र बनाकर लगाया जिससे सर्व छंद ग्रन्थ प्रति अधिकार की नामौं सहित गणिता प्रघट हो पुनि अनुक्रम से छंद प्रति पिंगल शास्त्र अनुसार लक्षण लिख दिया जिससे पाठकगण छंद लक्षण जानकर छंद चाल भलीभांति उच्चारण करने लगें और एक शब्दार्थ कोप ( १४०८ ) शब्द संस्कृत हिंदी भाषा ग्रन्थ सम्बधिका ग्रन्थ के अन्त में लिखागया जिसका लाभ भी पाठक गणों को जैसा कुछ है मत्यक्ष है और एक असी अनुक्रमणिका ग्रन्थ के आदि में लिखकर लगाई गई है जिससे जो विषय ग्रन्थका देखना चाहो छंद संख्या सहित तुरंत मिलजावें पुनि एक यंत्र असा बनाया गया है कि जो शब्द वाक्य इस पुस्तक विषय 'मैंने लिखा है और किसी पुस्तक में उसी शब्द वाक्य के स्थानपर दूसरी प्रकार दृष्टिगोचर हुवाहै उसको भी पाठक पुरुष देखकर भी बुरेका विचारकरलें अब समयपाकर यह कहनाभी अवश्यहै कि कविवर भूधरदासनी १-- कविवर भूधर दासजी खंडेलवाल मुहम्मदशाह वादशाह के बारे संवत् सत्तरहसौ अस्सी विक्रमी में आगरे नगर संशोभित थे जैनकविमंडली में आप बड़े विख्यात थे निम्न लिखे हिंदी भाषा पुस्तक आपके रचे हुए प्रसिद्ध हैं।श्रीपार्श्व. नाथ पुराणछंदवध१चरवासमाधान वचनकारपुरुषार्थसिद्धपाय वचनका३ भूधर- भूमिका.. ने यह हिंदी भाषा पापराण किमी विशेष पार्थ पुराण मारत संस्कृन भाषा का अनुवाद नहीं करा है वरन किसी ग्रन्थ से कथाका मूल धाराय लेकर अपनी चुदि अनुसार ग्रन्थ के हरएक स्थलको ऐसा विस्तार पूर्वक वर्णन करा मिस की प्रशंसा में द्विजिन्ना लेखनी असमर्थ है इस विद्वान पुरुषके समय भोग्य सुन्दर ललित पदों में शिक्षित वचन ऐसे मनमोहन हैं जिनको श्रवण करने से ऐसा कौन कठोर चित्त मनुष्य होगा जिसके हृदय पर उयका विचित्र चित्रांम चित्रित न होगा नरक दुःख कथा जोगीरासा चारह भावना वाईस परीपह सप्त विलास छंदवध ४ इस विलास में भूधर जैनशतक १ प्रस्तावीक शतक २ भूपाल चतुर्विशतिकास्तोत्र : एकीमार स्तोत्र ४ भजन विनती स्तुति कई प्रकार की छोटी कथा आदि खरीज ५ ॥ २-हिंदी भाषा में पुस्तकों की रचना अनुमान वारहसै वर्ष से पाई जाती है अवंतीपुरके प्राचीन इतिहास राजिस्सान पुस्तक लिखत में ऐसा लिखा मिला है कि संवत् सौतमौ सत्तर में पुण्य नाम कवि ने संस्कृत अलंकार को हिंदी भाषा दोहों में वर्णन करा मानो उसी समयसे इस प्रफुल्लित वृक्ष की जड़ जमी शनैः शनैः संवत् सोलह में यह वृत्त भली प्रकार फूना फला हिंदी भापा ने यथा- वत बहुत कुछ उन्नति करी काव्य साहित नायका भेद पिंगल वेदक गणित गा- यन प्रादि विद्या की बड़ी बड़ी पुस्तकें रची गई जैनियों में भी इस भाषा के प्रचार का विशेष कर येही समय संवत् सोलहस पाया जाता है जैनियों में पंडित बनारसीदास जी शाहजहां बादशाह के बारे में आगरा नगर विष हिंदी भाषा के महान कवि हुये आपका रचाहुभा समयसार नाटक द्रव्यांग कथनी में बड़ा अनूपम ग्रंथ है इस समय यह हिंदी भाषा बड़ी प्रचलित है परन्तु व्याकरण का प्रबंध कोई नहीं हुआ लिखने पढ़ने में अपनी २ बोली अनुसार निम्न लिखे पणों या शब्दों में कुछ भी विवेक और अन्तर नहीं करते (ख, प,) (श, स, प,) (व, व,).(ज, य,) (र, ल,) (त, प, छ,) (ण, न,) (वनता, मनिता,) (भरम, मिरम, भ्रम, ) (पाय, पाय पाच, )(भान, भानु,) (मार्ग, मारग, ) ( कृपा, किरपा, ) कोई किसी शब्द पर अनुस्वार कोई अर्द्ध अनुस्वार कोई नहीं लिखता है।

१४ भूमिका। विपन निंदा आदि कैसी कुछ उत्तम योग्य कथनी हैं आपने हर एक अंग कवि धर्म का पूरा २ निर्वाह करा है साधूजन कभी पाप कर्म के उदय औ क्रोधादिक कषायन के प्रवल होने से क्लेशित हो अपने निज धर्म से डिगने लगते है तो ऐसी ही यज्ञ पुरुषों की पुनीत कथा उत्तम कवियों की रची हुईका श्रवण उनको उस निज धर्म पर स्थिर कर देता है । उक्तंच दोहा छंद ।। साधूनन के चित्तको, जय कर्मन अनुसार । धेरै पाप प्रकृतिन के, काम क्रोध वटमार .. विन इक तिर्थंकर कथा, दुनो को बर वीर । जो इन दुण्टन मंडली, कर नाश घर धीर । सो यह हिंदी भाषा पार्श्वपुराण कविवर भूधरदास जी ने पांच वर्ष कुछ सरस काल विप रच कर संवत् सत्तरईसौ नवासी श्रापाढ़ सुदी ५ को संपूरण करा जो मान्य हो- कर सूर्यवत प्रकाशित है, खोजने से विदित हुआ कि श्रीपार्श्वनाथ स्वामी सन- बंधि पुराण वा चरित्र इस समय तक देखेमा सुने जाते हैं सो यह हैं। ग्रन्थ नाम भाषा आचार्य आचार्य इतिहास " सकल की १ पाश्व-प्राकृत नागदेव इस श्राचार्य ने शीतलनाथ पुराण प्राकृत पुराण भाषा और मदनराज ग्रंथ संस्कृत में रचा। २ करनारकी पारश्यनाथ यह आचार्य गृहस्थाचारी प्राचार्य थे। संस्कृत यह भाचार्य संवत् १४९५ विक्रमी में हुए तिभट्टारक आप के रचे ग्रंय संस्कृत में महापुराण १ शां. तिनाथपुराण २ धर्मनाथपुराण ३ मल्लिनाथ पुराण ४ बर्द्धमानपुराण ५ श्रादिपुराण ६ शांतिचरित्र ७ सुभाषितसार ८ । पांदीचंद्र यह कवि संवत् १६८३ मेंहुए आप के रचे हुए संस्कृत में ज्ञान सूर्यउदय नाटक १ पांडव पुराण खंडेलवाल आगरे निवासी थे इनके रचेहुए भाषा ग्रंथोंकी सूचना पहले भूमिका में दिखा . ५ हिंदीभाषा भूधरदास हैं ६फा | संस्कृत जिनसेना आदि पुराण विवाह पद्धति आदि संस्कृत भ्युदयः चार्य में आपके रचे हुए हैं।

भूमिका।
१५
* ग्रंथ शुद्धकाल *
musical
॥ दोहा छन्द ॥
वेदवाणे गृह उदघि सुत, विक्रम वर्ष महान |
उत्तमता से शुद्ध भया श्रीजिन पास पुराण ॥
सज्जन जन प्रति प्रार्थना है यदि ग्रंथके शुद्ध करने में प्रमाद वश वा तुच्छ
बुद्धिं कारण कुछ भूल चूक होगई हो तो मुझको अज्ञात ज्ञात कर क्षमादान दे
कृतार्थ कर मेरा उत्साह बढ़ायेंगे और अपनी ओर निहार मेरे अपराधन पर
कभी ध्यान न देंगे॥
॥ सारेठा छन्द ॥
सज्जन जन की रीति करें प्रीत विपरीत तम |
यह विध परम पुनीत बड़े बड़ाई ना तजै ॥
।। शुभम् ॥
कृपाभिलाषी
14
अमनसिंह जैनी
अग्रवाल
.
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१६ भूमिका। १२५ 22 २३३ २४३ ९२८ ग्रंथकं प्रति अधिकार छंदों का जोड़ २ प्रकारकी दा ल के छंद १ प्रकारको ढाल ग्रन्थके १३ ३३७ . . के छंद ३ ३१मात्रा सवैया छंद १५ मात्रा अर्द्ध चौपाई छंद शार्दूल विक्रीड़ित छंद हरिगीत छंद आर्या छंद • ० ० ० ० . 11. . . कुसुमलता छंद .!.... श्रीपार्श्वपुराणकाप्रतिअधिकारसंख्यासहितछंदनामावलीयंत्र * छन्द नामावली संख्या * पौमावती छंद ! F चामर इंद . . . वारा३२/०४/२५/३०/२/१२/२०/२/१५ . सोरठा छंद arius नरिंद्र छंद 8/२३ मात्रा छंद पद्धड़ी छंद ." . चाल छंद अडिल छंद •ure द्रुति विलंब छंद वाला छंद घनाक्षरी छंद १५मत्राचौपाईछंदर छप्पै छंद दोहा छंद ARE RASA अधिकारगणती compreph . . .२a . Skeete प्रतिपः काजोड़ 303SA श्रीजिनायनमः॥ कबिवर भूधरदासजी रचित छंद बंद भाषा पार्श्वपुराण ॥ श्री पार्श्वनाथजी स्तुति । , दोहाछंद । मोह महातम दलन दिन, तप लक्षमी भर्तार ॥ सो पारस परमेश मुझ, होउ सुमति दातार ॥ १ ॥ बामा नंदन कल्प तरु, जयो-जगत हितकार ॥ मुनि जन जाकी प्रासकर, याचें शिव फल सार॥२॥ छप्पै छंद भुवन तिलक भगवंत, संत जन कमल दिवायर । जगत जंतु बंधव अनंत अनुपम गुण सायर ॥ राग नाग मय मंत, दंत उच्छेपण बलि अति। रैमाकंत अर्हत; अतुल यशवंत जगत पति ॥ १ मोक्षरूप लक्ष्मी के पति।

२) पाचपुराण भाषा । महिमामहंत मुनिजन जपत, आदि अंतसबकोसरण। सो परमदेव मुझमनबसो,पार्सनाहमंगल करण॥३॥ विमल वोध दातार, विश्व विद्या परमेश्वर । लछमी कमल कुमार, मार मातंग मृगेश्वर ।। मुख मयंक अवि लोक, रंक रजनी पतिलागे। नाम मंत्र परताप, पाप पन्नग डर भागे॥ जय अश्वसेन कुल चंद्र जिन, शक्र चक्र पूजत चरण। तारो अपार भव जलधि तें,तुमतरंडतारण तरण ॥४॥ बाघ सिंह वश होहिं, विषम विषधर नहिं डंकै। भूत प्रेत बेताल, व्याल बैरी मन शंकै॥ शाकिनि डाकिनि अग्नि, चोर नहिं भय उपजावें। रोग सोग सव जाहि, विपत नेरे नहिं आवें ।। श्री पार्श्वदेव के पद कमल, हिये धरत निज एकमन । छुटै अनादि बंधन बंधे, कौन कथा विनशै विधन॥५॥ चहुं गति भ्रमत अनादि, बाद बहु काल गमायो। रही सदा सुख प्रास, प्यास जल कहीं न पायो । सुख करता 'जिन राज, आजलों हिये न आयो । अब मुझ माथे भाग, चरण चिंतामणि पायो । राखू संभाल उर कोष मैं, नहिं बिसरू पल रंक धन। १ यहां यथा वाचक शब्द लुप्त है।

पापुराण भाषा। (३) । परमाद चोरटालननिमतकरूंपासजिनगुणकथन॥६॥ पंच परमेष्टी स्तुति॥ १५ मात्रा चौपाई छन्द॥ बंद तिर्थकरे चौबीस । बंदूं सिद्ध बसें जगसीस ॥ बंदू आचारय उभाय । बंदू परम साधु केपाय।७। येही पद पांचों परमेठ। येही सार और सब हेठ॥ येही मंगल पूजअतीव । येहीउत्तम सरण सदीव।८). जिनवाणी स्तुति॥ १५ मात्रा चौपाई छंद॥ बंदूजिनवाणी मन सोधा आदि अंत जो बिगल बिरोध ।। सकल बस्तु दर्शावनहार।भ्रम विषहरण औषधीसारा । ॥ दोहा छंद ॥ बरतो जग जयवंत नित, जिन प्रबचन अंमलान ॥ लोक महल में जग मग, माणक दीप समान। १०॥ हरो भिरम दालिद्र दुख, भरो हमारी प्रास ॥ करो सारदा लक्षमी, मुझ उर अंबुज वासः। ११॥ - -

(४)
पापुराण भाषा ।
गणधर वा प्राचार्यों की स्तुति ॥
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद॥
बंदूं वृषभ सेनगण राजागुरु गौतम भर जलधि जहाज॥
कुंद कुंद मुनि प्रमुख सुपंथाते सव आचारय निग्रंथ।१२।
जैन तत्व के जानन हार। भये यथारथ कथिक उदार ।।
तिनकेचरणकमलकरजोर। करूंप्रणाममानमदछोर।१३।
॥ कवि नम्रता वा ग्रंथ करणकारण ॥
॥ दोहा छंद॥
सकल पूज्य पद पूजकै, अल्प बुद्धि अनुसार ॥
भाषा पार्स पुराण की, करूं स्व पर हितकार । १४ ।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
जिनगुणकथन अगमविस्ताराबुधिबल कौनल है कविपार॥
जिनसेनादिकसरि महंत वर्णन कर पायो नहिं अंत।१५॥
तौ अबअल्पमती जनऔर।कौनगणति मैं तिनकी दौर॥
जो बहुभार गयंदन बहै । सो क्यों दीनससक निर्बहै।१६।
॥दोहा छंद॥
कह जा. ते यों कहैं, हम कुछ बरणों नाहि ॥

पापुराण भाषा।
(५)
.
जे कह जानेंही नहीं, ते अब कहा- कहाहि ।१७।
बिलस्त नम नापै. नहीं, चलू न. सागर तोय ॥
श्रीजिनगुणसंख्यासुयश,त्यों कवि करैन कोय। १८॥
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
पैयह उत्तमनरअवताराजिन चरचा बिन अफल असार॥
सुन पुराण जो घूमनसीस।सोथोथेनारियल सरीस। १६ ।
जिन चरित्र न सुनैते कान। देह गेह के छिद्र समान ॥
जामुखजैनकथा हिंहोयाजीभभुजंगनिकाबिलसोय। २०॥
या प्रकार यह उद्यमजोग। कहत पुराणन पण्डित लोग॥
जिनगुणगानसुधारसन्यायासेवतअल्पजन्मजुरजाय।२१
॥ घनाक्षरी छंद॥
जो लों कवि काव्य हेत आगम के अक्षर को,
अरथ विचार तोलों सिद्ध शुभ ध्यान की।
और बहु पाठ जब भूपर प्रघट होय,
पढ़ें सर्ने जीब तिनै प्रापति है ज्ञान की ॥
ऐसे निज परको विचार हित हेतु हम,
उद्यम कियो है नहीं बान अभिमान की।
१ श्री जिनके गुण वा सुयश की संख्या कोई नहीं करसका-यह देहली दीपक
न्याय अलंकार है।

(६)
पार्श्वगुरास भापा।
---
ब
ज्ञान अंश चाखा भई ऐसी अभिलाषा अब,
करूं जोड़ भाषा जिन पारस पुराण की।२२।
आगै जिन ग्रंथन के करता कवींद्र भये
करी देव भाषा महा बुद्धि फल लीनो है।
अक्षर मिताई तथा, अर्थ की गंभीर ताई,
पद ललताई जहां आई रीति तीनों हैं ।
काल के प्रभाव तिन, ग्रंथन को पाठी अव
दीषत अलप ऐसो, आयो दिन हीनो हैं।
तातें इस समै योग, पढ़ें बालरद्धि लोग,
पारस पुराण पाठ भाषा बंद कीनो है। २३॥
॥ दोहा छंद॥
शक्ति भक्ति बल कविनपै, जिन गुण धरणे जाहि ॥
मैं अब वरण भक्ति बल,शक्ति मूल मुझ नाहिं। २४।
वरणं परव कथित क्रम, ग्रंथ अर्थ अवधार ॥
'सुगमरूप संछेप पों, सुनौ सबै नरनार । २५ ।
॥ कथा विख्यात कारण।
॥ १५ मात्रा चौपाइ छंद॥
मग्धदेश देशन परधान । राजग्रही नगरी शुभथान ॥

पार्थपुराण भाषा। (७) राज करै श्रेणक भूपाल।नीतवंत नृप पुण्य विशाल।२६। छायक सम्यक दरशन धार । रूपशील सबगुण प्राधार ॥ तिनके घर अंतेवर घना । पटरानी रानी चेलना। २७ । जाके गुण वरणत बहुभाय । बरयाँलगै कथा बढ़जाय ॥ एकदिना निज सभा नरेश। निवसैं जैसे स्वर्ग सुरेश।२८॥ रोमांचित बनपालक ताम। प्राय रायप्रति कियो प्रणाम । छह ऋतुके फलफुल अनूप। आगेधरे अनूपम रूपा२६ । हाथजोर बिनवै बनपाल । विपुलाचल पर्वत की भाल ॥ वईमान तिर्थकर आप । आये राजन पुण्य प्रताप ॥३०॥ महिमा कछुवरणी नहिं जाय। इन्द्रादिक सबसब पाय॥ समोसरण संपति की कथा।मोपै कहीजायकिंमतथा॥३१॥ माली बचन सुनें सुखदाय । होराजा अंगन माय ॥ दीने भूषण बसन उतार । वनमाली लीने सिरधार।३२॥ सातपेंड़ गिर सन्मुख जाय। कियो परोक्ष बिनै नरराय आनँद भेरि नगर मैं दई। सबहीं को दर्शनरुचिभई।३३ चलोसंग परियन समुदाय । बंदे वर्धमान जिनराय ॥ लोकोन्तर लछमी अवलोक।गयेसकल भूपति केशोक३४ थुति आरंभ कियो बहुभाय । बार बार भुमिसीसनिवाय ॥ गौतम गुरुं पूजेकर जोर। निज कोठे बैव्यो मदछोर।३५/- १ अर्थात् ममाय ।

(८)
पार्श्वपुराण भापा।
1
करीप्रश्न श्रेणक बड़ भूप । प्रभु पारस जिन कथा अनूप ।
जाके सुनत पाप छै होय। कहियै देव कृपाकर सोय ।.३६ ।
तब गणधर बोले हितकाज । जोगप्रश्न कीनो नरराज ॥
सुन पुनीत पारस जिनकथा।सफल होयमानुष भवयथा३७
दोहाछंद
इहिं विधि जो मघदेश प्रति, कहयो चरित गणराज ।।
ताहीक्रम आये कहत, आचारज परकाज । ३८ ।
तिनही के अनुसार अब, कहूँ किमप विस्तार ।।
जैनकथा कल्पित नहीं, यह जानो निर्धार । ३६ ।
जैन बचन वारिधि अगम, पानी अर्थ अनूपं ॥
मति भाजन भर २ लिये यह जिन आगम रूप।४।
कथाप्रारंभ प्रथम अधिकार
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
जंबूदीप दिपै यह सार । सूर्य मण्डल की उनहार ॥
मध्यसुमेरु कर्णिका भास । बने क्षेत्र दल दीरघजास।४१)
तारागण मकरंद मनोगः। सूर्य चन्द्र भ्रमर कुल योग ।
लवणसंमुद्रसरोबरथान । दीप किधीयहकमलमहान।४।
आचार्यों ने अपनी अपनी मति के अनुसार यह जिन आगम रूप अर्थात् शास्त्र.
के भाजन भर लिये भावार्थ शास्त्र रचे ।

पापुराण भाषा। (6) लक्षमहा योजन विस्तार । बसै बिविध रचना आधार । दक्षणभरतधनुषसंठान । पर्वत पणच.नदीजुगबान।४३। मानो सागर प्रति अनुमान । तानत तीर धार जलजान ।। ऐसीभांतबिराजत खेत । छहों खण्डमंडितछबि देत ४४। पांच मलेत बसैं तामाहिं । धर्म कर्म कछु जानें नाहि ॥ उत्तम आर्यखण्डमझारादेशसुरम्य वसै मन हार।४५। जन कुल जहां रहैं बहु भात । पास पास सोहें पुरपांत ॥ सरवर नदीशैल उदयानाबन उपबन सों शोभामान। ४६ । तहां नगर पोदन पुरनाम।मानोभूमि तिलक अभिराम॥ देव लोक की उपमाधरै।सबही विध देखत मन हरै।४७॥ ॥ दोहा छंद। तुंग कोट खाई सजल, सघन वाग ग्रह पांत ॥ चोपथ चौंक बजार सों, सोहै पुर बहु भात ॥४८॥ ठाम ठाम गोपुर लसैं, वापी सरवर • कूप । किधों स्वर्ग नै भूमि को, भेजी भेट अनूप ॥ ४६ ॥ ॥ १५ मात्रा चौपाई छंद । जैनी प्रजा जहां परवीन बसै दान पूजा व्रतलीन ॥ जैन में मौतचेअति बने । शिखरधुजासोंशोभित घने।५०। .

(१०)
उपजे एकहि गर्भ सों, सजन दुर्जन पय:
पार्श्वपुरास भापा।
इहिं विध पुर शोभा अधिकार।बरणन करत ळगै बहुवार ।।
राज करै राजा अर विंद । सोहै मानों स्वर्ग सुरिंद्र । ५१॥
पालै प्रजाकुमति जिनदली।नीतबेल मण्डित भुजवली॥
दया धाम सज्जन गंभीर।गुणरागी त्यागी रणधीर । ५२।
तिस भूपति कै विप्र सुजान।विश्व भूत मंत्री बुधिमान
ताकै त्रिया अनुंधर सती।रूपशील गुण लक्ष्णवती।५३।
दोय पुत्र तिनकै अवतरे। पाप पुन्य की पट तर धरे ॥
जेठो नंदन कमठ कपूत । दूजो पुत्र सुधी मरुभूत । ५४ ॥
॥ दोहा छंद॥
जेठो मत हेठो कुटिल, लघु सुत सरल सुभाव ॥
विष अमृत उपजे युगल, विप्र जलधि कै जाव। ५५ ।
बड़े पुत्र नै भार्या, ब्याही वरुणा नाम ॥
लघुनै बरी विसुन्दरी, रूपवंत अभिराम। ५६ ॥
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥
यो सुख निबसें बंधव दोय । निज निज टेव न टारै कोय ॥
वक्रचालविषधर नहिं तजै। हंसर्वक्रता मूल न भजै।५७
॥ दोहा छंद ॥
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पापुराण भाषा। (११) लोह कवचं रक्षा करै, पाँडाघडै देह । ५८ । ॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥ अति सज्जन मरुभूतकुमार । नीत शास्त्र को जाननहार ॥ सबको इष्ट सकलगुणगेह । राजाप्रजाकरे सब नेह। ५६ । ॥ उक्तंच संस्कृत बाला छंद ॥ विद्यासदभ्यास बशादुपैति।सौजन्यमभ्यासवशाद गम्य। काँसपत्न्यापूविशालमीयुःविशालमीयुर्नतुनेत्रयुग्मा६० ॥ भाषा टीका॥ विद्या अर्थात् ज्ञान सच्चे विचार के आधीन प्राप्त होनाता है परन्तु सज्जनता अ- र्थात् भलापन जो स्वाभाविक धर्म है विचार आधीन प्राप्त नहीं होता द्रष्टांत-यथा शौकीन स्त्री अपने कानों को इस अभिप्राय से कि कर्ण भूपण पहरकर 'अपने पति को मोहित करूंगी मोर के पर वा तुली के गूदे आदि डालकर चौड़ा कर लेती है परन्तु अपने नेत्रों को बड़ा नहीं करसक्ती किसलिये कि नेत्र का विशाल होना उस्का स्वभाविक धर्म नहीं है। चौपाई छंद॥ एक दिना भूपति मंत्रीश । स्वत बाल देखो निज शीश ॥ उपजो विप्रहिये वैराग॥जानोसबजगअथिर सुहाग।६१ ॥दोहा छंद॥ जरा मौतकी लघु बहन । या मैं संशय नाहि ॥ ॥ १५ मात्रा

(१२)
पार्श्वपुराण भाषा।
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तो भी सुहित न चिंतवै। बड़ी भूल जगमाहिं । ६२ ।
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥
यह विचार मंत्री मनमाहि। निज सुत सोंप राय की वाहिं ।।
सुगुरुसापजिनचारितलियोोबनोबासआत्महितकियो। ६३॥
अबमरुभूत विप्र सुख करै। अहनिशनीत पंथ पगधरै ॥
राजाप्रीतकरैबहुभाय । सोम प्रकृति सवकाँसुखदाय।६४)
एक समय आपनअरिविंद । मंत्री सेना सहित नरिंद्र ॥
राय बन धीरज पर चढ़े। क्रोधभाव उरमैंअतिवढ़े।६५॥
पीछे कमठनिरंकुशा होय।लगो अनीत करण शठ सोय॥
जो मनासो हठ गहै। मैं राजासब सों इमकहै । ६६ ।
एक दिना निज भ्राता नार । भूषण भूषित रूप निहार ।।
रागंअंधअतिविहवलभयो । तिक्षणकामतापउरतयो।६७।
महा मलिनं उर बसैं कुभाव । दुर्गति गामी जीव सुभाव ॥
पुत्री सम लघुभ्रातानार।तहां कुदिष्टधरीअविचार।६८॥
॥ दोहाछंद ॥
पाप-कर्म को डर नहीं, नहीं लोक की लाज ॥
कामी जनकी रीतयह,धिकतिसजन्म अकाजो६६ ।
कामी काज अकाज में, हो हैं अंध अवेव ॥
मदनमत्तमद मत्तसम, जरो जरोयह टेव। ७०।

पार्षपुराण भाषा
(१३)
।
पिता नीर परसै नहीं, दूर रहै रवि यार.॥
ता अंबुज मै मूढ अलि, अरझमरैअविचार।७१।
त्योंही कुविसनरति पुरुष, होयअवश अविवेक ।
हितअनाहितसाचै नहीं, हिये विसनकी टेक।७२।
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद॥
बन में सघन लता ग्रह जहां गयो कमठ कामातुरतहां ॥
बढ़ीवेदनाकल नहिं परै।छिनछन काम विथादुखक।७३।
॥ उक्तंचसंस्कृत द्रुतिविलंबछंद ॥
परमधर्म नदाजनमीनकानशशि मुखी बडि शेनसमुद्धृतान
अतिसमुल्लसितेरतिर्मुमुरेपचति हाहतकस्मरधीवरः।७४।
॥ भाषा टीका॥
'हार्य कामदेव रूप हिंसक धीवर परम-धर्म रूप समुद्र जनं मच्छों ( अर्थात् धर्मा-
हमा पुरुपों ) को जो चंद्रमुखी स्त्री रूप वडिश कहिये लोहे के कांटे कर उस धर्म
रूप समुद्र से बाहर निकाले गये हैं 'अति तेज विषय रूपं भूभल अग्नि में प्रकाता है
आवार्थ कामदेव'धर्मात्मा पुरुषों को स्त्रियों के हाव भावपर मोहितकर व्याकुल कर
जरता है-सो बड़े शोक का स्थान है।
* ॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
कमठ सखा कलहंस विशेष पूछत भयो दुखी तिस देष ॥
कौनव्याधि उपजीतुमअंग। अतिव्याकुलदीषेसर्वग।७५॥

पार्थपुराण भाषा ।
(१४)
तबतिनलाज छोर सब सही। मन कीवात मित्रसों कही।
सुनकलहंस कथा विपरीत। शिक्षा वचनकहकर प्रीत।७६ ।
अतिप्रयोगकारजयह बीर। सो तुम चिंत्यो साहसिधीर ॥
परनारीसमपापनान। परभवदुख इहिंभवयशहाना ७७॥
इसही बंछा सों अघभरे। रावण आदि नरक मैं परे।।
जगजेठपितासम तूल। बात कहतलाजैनहिंमूल । ७८ ।
ताते यह हठ मूल न करौ । सुहित सीख मेरी मन धरौं ।
लोक निंद कारज यहजान । धर्मनिंदनिश्चैउरान ७६ ।
दोहा छंद ॥
यों कल हंस अनेक बिध, दई सीख सुख दैनं ॥
ते सबकमठकुशालप्रति, भराबिफलहित वैन । ८०
आयुहीन नर को यथा, औषधि लगै न लेश ॥
त्योंहीं रागी पुरुष प्रति, वृथा धर्म उपदेश।८१।
बोलो तब कामी कमठ, सुनो मित्र निर्धार ।
जो नहिं मिलै विसुंदरी, तो मुझमरण विचार।
देख कमठ की अधिक हठ, कुमति करीकल हंस
जाय कहे ता नार सों झूठ बचन अपशंस । ८३।
॥ अडिल छंद॥
सुन विसुंदरी आज कमठ बन मैं दुखी ।

१)
पावपुराण भाषा ।
तू ताकी सुध लेहु होय जिहिं विधसुखी ॥
सुनतेही सत्भाव गई बन में तहां
निवसे करपरपंचकमठ कपटी जहां।८४।
॥ दोहा छंद।
छलबल कर भीतर लई , बनता गई अजान ॥
राग बचन भाषे विविध , दुरा चार की खान । ८५।
॥१४ मात्रा चाल छंद॥
गज मातो कमठ कलंकी। अघसों मन्सा नहिं शकी।
भावज वन करनी रंजो। जिन शील तरोवर भंजो॥८६
रिपुजीत विजय यश पायो । अरविंद नृपति घर आयो॥
जे कर्म कमठ नै कोने । राजा सवते सुन लीने ॥८७॥
मंत्री मरुभूत बुलायो । ताको सब भेद सुनायो ।
कहु विप्र सुधी क्या कीजै।क्या दण्ड इसै अब दीजै॥८॥
दुज कहै सरल परिणामी । अपराध छमा कर स्वामी॥
जो एक दोष सुनलीजै। ताको प्रभु दण्ड न दीजै ॥८६॥
तब भूप कहै सुन भाई। जो निग्रह योग अन्याई ॥
तापैकरुणा किम होहै। यह न्याय नृपति नहिं सोहै ॥६॥
तातै ग्रह गच्छ सयाने । मत खेद हिये कुछ आने
ऐसे कह विप्र पठायो । तिस पीछे कमठवुलायो॥६॥

1 (१६) पाचपुराण भाषा। अति निंदो नीच कुकर्मी । जानो. निर्धार अधर्मी ॥ राजा अतिही रिस कीनी । सिर मुण्ड दंड बहु दीनी।६२॥ मुखकै कालोस लगाई । खर रोप्यो पीर न आई ॥ फिरसारे नगर फिरायो । प्रति बीथी ढोल बजायो॥६३॥ इस भांत कमठ की स्वारी । देईं सबही नर नारी ॥ पुरबासी लोक धिकारें। बालक मिल कांकर मारें ॥४॥ या दण्ड दियो अति भारी । फिर दीनी देश निकारी जो दीरघ पाप कमाये । ततकाल उदै वहुआये ॥६५॥ ॥ दोहा छन्द ॥ इहि बिधि फूल्यो पाप तरु, देण्यो सब संसार ॥ आगे फलहै नरकं फल, धिक दुर्विसन असारा६६। ॥१५ मात्राचौपाई छंद। महादण्ड भूपति जबदियो। कमठकुशील दुखीअतिभयो। बिलषत बदन गयोचल तहां भूताचलपर्वत हैजहां।६७। रहै तहां तपसी समुदाय । ज्ञान बिना सब सोखे काय॥ केईरहे अधोमुख भूल । बूंबां पान करें अघ मूल । ९८ केई ऊर्ध मुखी आघोर । देखें सबै गगन की ओर ॥ केई निवसैं ऊरध वाहिं । दुविध दयासों पर.नाहिं।। १ दुविधादया-त्रस जीविकी.१ थावर जीविकी २। हा भूमिका। पार्श्वपुराण छंदनामावली लिखित छंदों के संक्षेप लक्षण . १ (दोहा छंद) इस छंद में ४ चर्ण होते हैं १-३-चर्ण में १३ मात्रा अंत में १ वर्ष गुरू या २ वर्ण लघु से पहला वर्ण लघु देखो-२४ वर्ण में ११ यात्रा अन्तका वर्ण लघु देखो २ (छप्पै छंद) इस छंद में ६ चर्ण होते हैं यह छंद २ छंद रसावल १ उल्लाला २ से मिलकर बनता है रसावलि छंद लक्षण इस छंद मे ४ चर्ण होते हैं ११ मात्रा पर विश्राम देकर १३ मात्रा आगे देने से चर्ण पूरा होता है प्रति चर्ण २४ मात्रा जानौ और लघु दीर्धका कुछ नेम नहीं है उ. जाला छंद लक्षण इस छंद में ५ चर्ण होते हैं १-३-चर्ण में १५ मात्रा २-४. चर्ण में १३ मात्रा देखो और कुछ नेम नहीं ३ (१५ मात्रा चौपाई छह ) इस छह में चर्ण होते हैं प्रति वर्ण १५ मात्रा अंतका वर्ण लघु देखो ४ (घना. क्षरी छंद (इस छंदमें ४ चर्ण होने हैं १६ वर्ण पर विश्राम होकर १५ वर्ण आगे लिखने से चर्ण पूरा होता है चर्ण के अन्त में गुरू वर्ण का नेम हैं और कुछ नेम नहीं प्रति वर्ण ३१ वर्ण देखलो ५ (बालाछंद) इस छंद में ४ वर्ण होते १.२.३-चर्ण इंद्रवजा छंद ४ चर्ण उपेन्द्रवजा छह का होता है इन्द्रवजा छंद ल- तण इस छंद में ४ चर्ण होते हैं प्रति चर्ण ११ वर्ण १८ मात्रा इस भांति गिनो १-२-वर्णगुरू ३ लघु ४-५-गुरू६ ७-लघु ८ गुरू ६ लघु १०-११गुरू उपेन्द्रवजा छंद लक्षण इस छंद में ४ चर्ण होते हैं प्रति वर्ण ११ वर्ण १७ मात्रा जानो। वर्ण लघु शेष वर्ण इंद्रवजावत ६ ( इतिविलंब छंद ) इस छंद में ४ चर्ण होते हैं प्रति वर्ण १२ वर्ण १६ मात्रा इस भांति जानी १.२.३ वर्ण लघु ४ गुरू ५६ लघु ७ गुरू ८९ लघु १० गुरूं ११ लघु १२ गुरू ७ (अडिल छंद ) इस छंद ४ चर्ण होते हैं ११ मात्रा पर विश्राम देकर १५ मात्रा आगे देने से वर्ण पूरी होता है चर्ण के अन्त का वर्ण गुरू गुरू वर्ण से पहला वर्ण लघु जानो (८ चाल चंद निसका असली नाम सखी छंद है ) इस छंद में ४ चर्ण होते हैं प्रति चर्ण १४ मांत्रा गिनो प्रायः अन्त के २ वर्ण गुरू होते हैं । (पद्धड़ीछंद) १८ भूमिका । इस छंद में ४ वर्ण होते हैं प्रतिवर्ण १६ मात्रा चर्ण के अन्त का वर्ण लघु लघु से पहला वर्ण गुरू गुरू से पहला वर्ण लघु होताहै १० (२३मात्रा छंद) इस छंद के नाम का पता नहीं लगा परन्तु विचार से असा जाना गया कि इस छंद में ४ चर्ण होते हैं १३चण ११ मात्रा अन्त का वर्ण लघू लयमे पहला वर्ण गुरू होता है २-४ वर्ण में १२ मात्रा अन्त के २ वर्ण गुरू होंगे ११ ( नरिंद्र छंद) इस छंदमें ४ चर्ण होते हैं १-३ चर्ण में १६ मात्रा २-४ वर्ण में १२ मात्रा गिनी २ ४ वर्ण में अंत के दो वर्ण गुरू होंगे १२ (सोरठा छंद) इस छंदमें ४ चर्ण होते हैं १-३ चर्ण में ११ मात्रा अंतका वर्ण लघु २-४ चर्ण में १३ मात्रा अंतका वर्ण-गुरू वा दो वर्ण लयू से पहला वर्ण जय-नाडा उलटा जान और बात दुनी नहीं १३ (चामर छंद ) इस छंदमें ४ वर्ण होते हैं प्रति वर्ण १५ वर्ण २३ मात्रा इस भांति देखो १ वर्णगुरू २ वर्णलघू ३ गुरू ४ लघु इसक्रम से ७ वर्णगुरू वर्णलघु अंतका वर्णगुरू देखो १४ ( पौमावती छंद) इस छंद में ४ वर्ण होते हैं १६ मात्रापर विश्राम देकर १६ मात्रा आगे मिलाने से ३२ मात्रापर चर्ण पूग होता है चर्ण के अंतके २ वर्ण गुरू देखो १५ (कुसुमलता छंद ) इस छंद में ४ चर्ण होते हैं १-३ चर्ण में १६ मात्रा २.४ वर्ष में १४ मात्रा और अंतका वर्ण गुरू गुरू से पहला वर्ण लघू होगा १६ (भार्या छंद) इस छंद में ४ चर्ण होते १.३ चर्णमें १२ मात्रार चर्ण १८मात्रा ४ वर्णमें १५ मात्रागिनो अंतका वर्ण सर्व चौँ का गुरू होगा १७ ( हरिगीन छंद) इस छंद में ४ चर्ण होते हैं १६ मात्रापर विश्राम देकर १२ मात्रा आगे मिलाने से चर्ण पूरा होता है प्रति चर्ण २८ मात्रा गिनो चर्ण के अंतका वर्ण प्रायः गुरू देखो १८ (शार्दन विक्रीडित छंद) इस छंद में ४ चर्ण होते हैं प्रतिवर्ण १९वर्ण ३० मात्रा इस भांतिजानो?-२३ वर्ण गुरू ४-५ लघू ६ गुरू ७ लघू ८-९ गुरू १० ११ लघू १२ गुरू १३-१४गुरू १५ लघू १६-१७ गुरु १८ लघु १९ गुरू बारा वर्ण १८ मात्रापर विश्राम देकर ७ वर्ण १२ मात्रा आगे मिलाने से चर्ण पूरा होता हैं १६ ( १५ मात्रा अर्द्ध चौपाई छंद ) इस छंद में २ चर्ण होते हैं प्रति चर्ण १५ मात्रा अंतका वर्ण लघु देखलो यह छंद १५ मात्रा चौपाई छंद के २ चर्ण हैं ।। २० (३१ पत्रा सवैया छंद) इस छंद में ४ चर्ण होते हैं १६ मात्रापर विश्राम देकर १५ मात्रा आगे मि- लाने से चर्ण पूरा होता है चर्ण के अंतका वर्ण लघू लघू से पहला वर्ण गुरू होगा भूमिका। २६ (हालछंद) विचार से प्रगट होता है कि पिंगल शास्त्र अनुसार ढाल नाम कोइ विशेष छंद नहीं है सामान छंदो में १२ वर्ण और १.२ शब्द टकके बढ़ा नेते हैं उसी को ढाल कहते हैं दक्षिण देश में गुजराती भाषा विपे असी ढालोंका बहुत कुछ प्रचार है यहां-दोनों ढालों में असल में दोहे छंद हैं २-४ वर्ण में ঘু वर्ण के स्थान में गुरू वर्ण रखकर एक गुरू वर्ण और आगे बढ़ादिया दो चरणों के बीच में एक ढाल में (ज्ञानी) शब्द की दूसरी ढाल में ४ चर्ण के अन्त में (बारह विधतए वरनउँ) की टेक लगादी है-इति ।। कई यक पुस्तकों में जो शब्द इस पुस्तकसे विमुख देखे गये उन का प्रगट करनेवाला यन्त्र॥ पृष्ठ पंक्ति इसपुस्तकावर्षे कई यक स्तकों में भष्ट पंक्ति इसपुस्तकविष। कई यक पु ३६ और ७ बैल स्तकों में जगत २३ गैल सरण परम ३०१४ हिमगिर हरिगिर ६।१७। बल वश ३४|१३ | विभूति भूपति ८१६ सूर्य चंद्र सुरनर संग |३४|१७ कोटकोट कोटपोट ९] ३ धार पार ३६ २ देवल होउबल भूल ३६/६ लतकोट एककांट १५/८ गजमातो गजमातो मदमातो ३७५ | वनी भनी १५ १५/दोप गुनह ३८/१३ | महादेह महादेव सजा ४०१५वई छड़ १६१५ सब सठ ४३] १. सन्तति सम्पत्ति १६/१७ सबै सदा ४४.७ | संकट १७, ४, योअज्ञानंतपायोंतपसीतप ४५/४ श्रुति शुभ १८३ | अवश अधिक ४६ ६.दखत दीपत २१ २ |तरुपत्र तिनपत्र ५५१७ जिन अति २११४ छिरकै डाहै ५६६ वसा नसा २२८तन धन तवधन ५६८ कंटकतलवक कटितकलित बैल. करूर संकल भूमिका । पृष्ठ पंक्ति इसपुस्तकविष कई यक पंक्ति इसपुस्तकविषै कई यक पु. पृष्ठ स्तको स्तकों में ६५३ विहसाय शुमभाय १५७४ शाप भाष ६९ १८ मनंकप्पो तवठो १६३८ अहावन उनसट ७४५ सव घट मई ८२ ५ जैनयतीनिज तमुनितारण १६९९ चारोंदिश दसों दिशा नेमनिवाहै | तरणकहावै १६६ ११ चहूं दुहूं वृत्ति प्रति १८०, ३ विरद तुपी ८८६ मातम प्रापत १८२४ प्रपान परधान सप्तम १८२ १६ भेद वेद १०८१७ दीपक जोतिष १८९११ समान प्रमान १२९/१२/ रची मची १९२४ सा वश १३२/११/ नाय तिलक २२२/८ लवधि अवधि १३६८.पानन प्रानन भगवान १३४, १६ सावंत शोभंत १४१ १ निर्मलछाय गुणअनंतली कदर्शनवंत | येवहुभंत ६०१६ सोमर अति भूमिका । * १ समालोचना . मुन्शी श्रीराम (अज़ीज़ ) कानूगोय गुहाना नगर निवासी टीचर नौरमलस्कूल देहली ॥ * दोहा छन्द * गुरू ग्रंथ देव की, अनिश मन पच काय ॥ करो सर्व सच्ची विनय, भाव सहित शिरनाय .|| १ ॥ पढ़ो गुनो नित शास्त्रनी, सत्त धर्म अधिकार ।। केवल चुगला भक्त वन, करो न मायाचार ।। २३. हरिगीत छन्द कविराय भूधरदास जी जिन, आगरा शुभधान है । तिनका रचित भाषा ललित, तिर्थेश पास पुराण है। शिक्षित वचन भंडार है अति, भक्ति है थुति में भरी । पुन पाप की विस्तार से विधि, पूर्वक कथनी करी ॥ ३ ॥ नरकों के दुख स्त्रों के मुख दर, सादिये समझाय के । संत तत्व औ पैट द्रव्यका की, ना कयन इपायके ।। यह ग्रंथ मानो कोप है नव, निद्धि आगै रिद्धि का । नव रत्न नव अधिकार इक इक, शब्द जिनका नौलपा ॥ ४॥ तिस कोप को अहनिश सदा अहि, तुल्ल हम लख २ जिये । पर नेत्र या परना पड़े बहु, यत्न इस का. रन किये । निरधन नहीं हम सूप, निर्धन भने होकर धनी । खावें न खाने दें यही बस, स्वानमत मनमें ठनी ॥ ५ ॥ संचय करे ढूँढ़े सदा निधन धनी हो जायगा । पर रेत पत्थर तुल है कन, जूम का धन संपदा ॥ क्या सूम आदर धन का करता, है नहीं बेमादरी । निज को न पर को लाभ मानो, वंध में सम्पति करी ॥ ६ ॥ इस भांति करते हैं विनय हम, जैन ग्रंथों की सदा । करजोड़ माथा | टेकने थे, उन लपेटें जगमगा ॥ पर सूचना हम को नहीं जा, लौकि क्या खटराग २२ भूमिका। है । क्या अर्थ क्या आशय है इसका, पुष्प अथवा आग है ॥ ७॥ तर लौ कहो क्या वह विनय पू , री विनय कहलायेगी । क्या शास्त्र औ गुरुदेवकी स, ची विनय होजायगी ॥ योंही जो होजावे विनय पू, रीतु अच्छा काम है । करना पड़े कुछ भी नहीं बस, स्वर्ग अपना धाम है ॥ ४ ॥ भ्राता नहीं है यह विनय के, वल विनय अविनय हये । सच्ची विनय अब हम बताते हैं सुनो तुम ध्यानदे ।। पढ़ना पढ़ाना शुद्ध कर पर, चार करना भाव सूं । आशै को उसके जानकर घर, ताव करना चावसूं ६ ॥ केवल उन्हीं का है सुफल जीवन मरन संसारमें कटिबद्ध रहते हैं सदा जो, धर्म के परचार में । मुनशी अमनसिंह जिनमती सो, नी पती परमात्मा । करते हैं सेवन धर्म का इस, काल तन मन धन लगा। ॥ १० ॥ दिन रैन अभिलापा यही निज, धर्मका परचार हो । जिन देववाणी नाव तिष्य, सर्वबेड़ा पारहो ॥ बहुग्रंथ बहुपरयत्न से अति, शुद्धकर मुद्रित किये। रुचना सहित जिन वाक्य अमृत, चूंटतष्कोंने पिये ॥ ११ ॥ इसग्रन्ध की बहुमतें लेखा, की लिखी संचयकरी । जो शब्द थे उन में विमुख सब, लिख दिये से शयहरी ॥ बहु बुद्धजन सम्मतिलई फिर, शुद्ध करने के लिये । टीका लिखी विस्तार से जो, वाक्य टीका योग थे ॥ १२ ॥ पुनिछंद संख्या यंत्रसूची पत्र लिक्खे मनलगा । पाठकजनों हितकार फिरइक, कोप शब्दों का दिया । चन्चन अधिक उन्नीस सौ श्री, राम संवत् विक्रमी । मुद्रित कराया गन्ध परउप कार ताकी जड़जमी ॥१३॥ ॥२ समालोचना॥ 1 ज्योतिषरत्न पण्डित जियालालजी चौधरी रईस ॥ फरुख नगर ॥ मुंशी अमन सिंह साहिब की सची जाति हितैपिता का इस्से बढ़कर और क्या प्रमाण होसकता है कि आप तन मन धन तीनों द्वारा जैन जाति में फैले हुये अ- ज्ञान अंधकार का नाश कररहे हैं और शुद्ध जैन धर्म ग्रन्याभिलापियों के लिये .

भूमिका! जो उत्तम पदार्थ है उसको और भी परमातम बनाकर चाहने वालों की भेंट क- रते हैं, आजतक मापने भूधरजैन शतक, सज्जन चितवल्लभ-काव्य, भाषा स- न्दूर प्रकरण, भक्तामर, कल्याण मंदिर, छहढाला, आलोचना पाठ, इत्यादिक अनेक रत्न निज बुद्धिरूपी चर्खपर चढ़ा सरलार्थ ठीका और कोपादिक को ल. गाके ऐसे उत्तम कर दिखाये जो अकथनीय हैं, आजकल जब सम्पूर्ण भारत में छप जैन शास्त्रों के प्रचारकी अधिक धूम है तो आपने भी जगत विख्यात जैन धर्म के प्रसिद्ध तीर्थंकर श्रीस्वामी पार्श्वनाथ भगवान का भापा छंद वद्ध पुराण मुद्रित कराया है, यद्यपि यह पुराण जैन के एक प्रसिद्ध कवि भूधरदास जी का रचा होने से स्वताही अनुपम है, किंतु मुनशी अमन सिंह जीने इसके छपाने में अनेक प्रतियों से शुद्ध करने गृह शब्दों का कोप बनाने आदि का जो श्रम उठाया र है उस्से यह ग्रन्थ ऐसा बहु मूल्य रत्न धनगया है जो विद्या रसिक नैनियों के देखनेही योग्य है और यद्यपि जैन धर्म के लाखों ग्रन्थ विद्यमान हैं परन्तु इस एकही ग्रन्थ के मन लगाकर देखलेने से नैन धर्मका पूरा भेद जाना जाता है इस जा- तिहितैषिता का मैं मुनशी जी को सच्च मन से धन्यवाद देता - जियालाल.

いますでしょう DIA पार्थपुराण भाषा। (१७) ' केई पंच अग्नि झल सहैं। केई सदा मौन मुख रहें । केई वैठेभस्म चढ़ाय केई मृगछालातनलाय।१०। नख बढ़ाय केई दुख भरें । केई जटा भार सिर धरै। यो अज्ञान तपलीन मलीन।करें खेद परमारथहीन॥१०॥ तिनमैं एक तापसी नाथ । प्रणम्योताहिधरे सिरहाथ ॥ तिनअशीसदेआदरकियो।दिक्षादानकमठतहँ लियो।१०२॥ करन लगो तबकाय कलेश।उर वैराग बिवेक न लेश॥ ठाडोभयोशिलाकरलियोकिधोंफणीफणऊंचोकिये॥१०॥ मंत्री बंधव की शुध पाय। राजा सों विनयो इम आय ॥ भूताचल पर्वत की ओर।भ्राता कमठ करै तंप घोर।१०४॥ जो नरनायक आज्ञा होय । देखू जाय सहोदर सोय ॥ पूच नृपति कौन तप करे।भो प्रभु तापस के व्रतधरै।१०५॥ एक बार मिल आऊं ताहि ।राय कहै मंत्री मत जाय॥ खलसोंमिले कहासुखहोयाविषधर भेटेलाभनकोय ।१०६। बरज्यो रह्यो न बारम्बार । महा सरल चित्त विप्रकुमार ॥ भ्रातमोहबसउद्यमकियोकोमलहोतसुजनकोहियो।१०७॥ ॥ दोहा छंद ॥ दुर्जन दूखित संत को, सरल सुभाव न जाय ॥ १ इस प्रकार जैसे ऊपर कह पायेवे सर्व तपसी जो मलीनथे अज्ञान तपमें लीन हो रोयें ॥

(१६)
पार्थपुराण भाषा:
दर्पण की छविचारसों, अधिकहिं उज्जल थाय । १०८।
सज्जत टरै न टेव सों, जो दुर्जन दुख देय ॥
चंदन कटत कुठार मुख, अवश सुबास करेया १०६ ।
॥ १५ आत्रा चौपाई छंद ॥
गयो बिप्र एकाकी तहां । कमठ कठोर करै तप जहां ॥
विनयवंतहोविनयोतास। महासरलवायकमुखभास।११०॥
भो बंधव तौ उर गंभीर। यह अपराध छिमाकर वीर ॥
मैतोरायबहुत वीनयो।मानी नाहिं तुमैं दुख दियो । १११॥
होन हार सों कहा बसाय। तुम बिन मोहि कळू न सुहाय ॥
यों कहपांवनलागोजामाकोपोअधिक कमठदुठतामा११२॥
॥दोहा छंद ॥
दुर्जन और शलेषमा, ये समान जग माहिं ।
ज्यों ज्यों मधुरो दीजिये, त्योंत्यों कोपकराहि।११३॥
शिला सहोदर शीश पै, डारी बज समान ॥
पीरनआई पिशुनको, धिकदुर्जन की बान।११४।
दुर्जन को विश्वास जे, कर हैं नर अविचार ॥
ते मंत्री मरुभूत सम, दुख पावै निर्धार।११५।
दुर्जन जन की प्रीत सों, कह कैसे सुख होय ॥

पापुराण भाषा।
(१४)
विषधरपोष पियूष की, प्राप्तिसुनीनहिलोय।११६॥
मंत्री तन ते रुधिर की, उछली बाँट कराल ॥
दुर्जन हिततरुतैंकिधों, निकसी कोंपललाल।११७ ।
इहिं विध पापी कमठ नै , हत्या करी महान ॥
तब तपसीमिल नीचनर, काढ़ दियो दुठजाना॥
॥ १५ मात्रा चौपाई छद ॥
फेर दुष्ट भीलन तें मिलो। भयो चोर घर मूसन हिलो।
पाप करतकर आयो जब। बांध बुरी विध मारौ तवै। ११९॥
॥ दोहा छंद॥
जैसी करनी आचरै, तैसो ही फल होय ॥
इन्द्रायन की बेलकै, आंब न लागै कोय । १२० ॥
॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
एक दिना अरविंद नारद्र । पूँछे कर जुग जोर मुनिंद्र।
भोप्रभुमुझ मंत्रीमरु भूताक्यों नहिं आयोबाह्मनपूता
यहसुन अवधिवंतमुनिराय । सवबिरतंतकह्योसमझाय॥
राजा मन अतिभयोमलीनाहामंत्रीसज्जनता लीन। १२२ ॥
वरजत गयो दुष्ट के पास । कुमरण लह्यो सह्यो बहुत्रास।

(२०)
पापुराण भाषा।
होनहार सोई विध होयाँताहि मिटायसकैनहिं कोया १२३॥
यो बिचार मन शोक मिटाय। साधु पूज घर आये राय ॥
यहसुनदृष्टसंग परिहरी। सुखदायक सतसंगतिकरो। १२४॥
॥छप्पै छंद ॥
तपे तवापर आय स्वात जल बूंद विनट्ठी।
कमल पत्र पर संग वही मोती सम दिट्ठी॥
सागर सीप समीप भयो मुक्ताफल सोई।
संगत को परिभाव प्रघट देखो सव कोई ॥
योनीच संगते नीचफल, मध्यमते मध्यम सही ।
उत्तम संजोगतै जीवकों, उत्तमफल प्राप्तिकही। १२५॥
इतिश्री पार्श्वपुराण भापामरुभून भववर्णननाम प्रथमअधिकार संपूर्णम् ।।
॥ द्वतिय अधिकार॥
॥ दोहा छंद ॥
अश्वसेन कुल चंद्रमा, बामा उर अवतार ॥.
बंदूं पारस पद कमल, भविजन अलिआधार।१।
॥ पद्धड़ी छंद ॥
इसभाँततजे मरुभूत प्रान । अबसुनो कथाआगे सुजान ॥

पार्थपुराण भाषा। (२१) अतिसघनसल्लकीवनविशालाजहँतरुवरतुंगतमालताल। बहु बेलजाल छाये निकुंज । कहिं सूकपरे तरुपत्र पुंज ॥ कहिंसिकताथलकहिंशुद्धभूमाकहिंकपितरुडारनरहेभूमा कहिंसजलथानकहिंगिरउतंग । कहिरीछरोमबिचरैकुरंग ॥ तिसथानकआरतिध्यानदोष । उपजाबनहस्तीवजघोष।। अतिउन्नतमस्तकशिखरजास। मदजीवनझरनाझरेतास।। दीपैतमबरण विशाल देह । मानो गिरजंगम दुरस येहा५॥ जाको तन नख चोभवंत । मुसलोपम दीरघ धवलदंत ।। मदभीजेझलकेंयुगलगंड । छिनछिनसोंफेरसुंडदण्ड ।६। जो बरुना नामैं कमठ नार। पोदनपुर निवसै निराधार ॥ सोमरतिहिंहथनीहईआन। तिससंगरमै नितरंजमान 191 कवही घनज्योंगरजै विशेष। कबही दुकावैपथिक देष ॥ कंबही बहुखंडै बिरछबेल । कवही रजरंजित करहिकेल।। कबही सरवरमें तिरहि जाय। कबही जलछिरकैमत्तकाय ॥ कबही मुखपंकज तोर देय । कवही दहकादोअंगलेया। छंद॥ योसुछंद क्रीड़ा करै, बरुना हथनी सत्थ ॥ बन निवस बारण बली, मारण शील समत्थ ॥१०॥ १ मारणशील कहिये मारणे का स्वभाव जिसमें समय कहिये सामर्थ अर्थात चलवानथा॥ ॥ दोहा (२२) पार्थपुराण भापा। ॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥ एक दिवस अरबिंद नरेश । ज्यों विमानमैं स्वर्ग सुरेश ॥ योनिज महलन निवसैभूप। देखो बादल एक अनूप । तुंग शिखर अति उज्जलमहा । मानो मंदिरही बनरहा ॥ नरवै निरख चिंतवै ताम। ऐसोही करये जिन धाम।१२। लिखन हेतकागद कर लियो। इतने सौंसरूप मिटगयो। तबभूपतिउरकरैविचार । जगतरीतसवअथिरअसार ।१३। तन धन राज संपदा सबै। योंही विनश जायगी अवै ।। मोहमत्त प्राणी हठगहै। अथिर वस्तुको थिरसरदहै।४। जो पररूप पदारथ जात । ते अपने मानै दिनरात ॥ भोगभाव सब दुखके हेत। तिनहीको जानै सुखखेत।१५॥ जो माचन को दों परभाव । जाय यथारथ दिष्टि स्वभाव ॥ समझै पुरुष और की और।त्योंही जगजीवन की दौरा१६। पुत्र कलन मित्रजन जेह । स्वारथ लगे सगे सबयेह ॥ सुपन सरूप सकल संजोग।निज हितहेत विलंवनयोग १७ योभूपति वैराग विचार । डारी पोट परिग्रह भार ॥ राज समाज पुत्रको दियो।सुगुरु साखनप चारित लियो१६ धरी दिगंबर मुद्रासार । करै उचित आहार विहार ॥ बारह विध दुदर तपलीन । छहों कायपीहरपरबीन ॥२०॥ एक समैं अरविंद मुनीश । सारथ बाहीके संग ईश ।। १२ पार्चपुराण भाषा। (२३) शिखर सुमेर वंदना हेत । चलेईर्या पथपग देत ।२१। गये सल्लकी बनमें लंघ। तहां जाय उतरो सब संघ ॥ निजसिमझायसमेंमनलाय। प्रत्मायोगदियोमुनिराया२२॥ तावत ब.घोष गजराज । आयो कोपकाल समगाज ।। सेकल संगमैं खलबल परी।भाजे लोक कोकधुनि करी२३ गजके धकैपरो जोकोय । सो प्राणी पहुचों परलोय ॥ मारे तुरग तिसाये गैलं । मारे मारग हारे बैल । २४ मारे भूखे करहा खरे । मारे जन भाजेभय भरे ॥ इहिंविधहाथीकरतसँघारामुनिसन्मुखप्रायोकिलकारा२५॥ अति बिकराल रोषविषभरो।मुनि मारणको उद्यमकरो॥ साधसुदर्शन मेरु समान । श्रीवत्स लक्षन उर थान।२६। सोसुचिन्ह गज देषो जाम।जाती सुमरण उपज़ो ताम ॥ ततखिनशाँतभयोगजईश।मुनिकेचरणधरीनिजशीश२७ तंब मुनिचवै मधुर धुनिमहा। रेगयंद यह कीनो कहा। हिंसा कर्म परम अघहेत । हिंसा दुर्गत्ति के दुखदेतार। हिंसासों भ्रमये संसार । हिंसा निजपर को दुखकार ।। तैं येजीव विध्वंसे आय । पातक तैनडरो गजराय ॥२८॥ देख देख अघके फलकौन । लई विप्रते कुंजर जोन । १ सारे संगमै हलचल पड़गई और मनुष कोक कहिये मैंडक कैंसी धुनि अर्थात रूका पुकार करते हुये भागे ।

(२४) पार्चपुराण भाषा। तूमंत्री मरुभूत सुजान। में अरविंद क्यों न पहिचाना२६। धर्म विमुख आरत के दोष । पशु परयाय लईदुखपोष । अब गजपति यहभाव निवार।धर्म भावना हिरदैधारा३० सम्यक दरशन पूरब जान । पाल अणू व्रतजबलों प्रान ॥ सुन करिंद्रउरकोमल थयोकिये पापनिज निंदकभयो३१॥ ॥ दोहा छंद॥ फिर गुरु पायन सिर धरो, धर्म गहन उर हेत ॥. तवसत्यारथं धर्म बिध, कही साधु समचेत॥३२॥ ॥ चौपाई छंद॥ सुन हस्ती शासन अनुकूल । सकल धर्म को दर्शनमूल।। सब गुण रत्न कोषयहजान मुक्तिधवलहरिधुरसोपाना३२॥ सबैनेम व्रतविंदी कही। सम्यक अंकएक सो.सही।३४॥ ताते यह सबही को सार । याबिन सब आचर्ण प्रसारा। जहां यथारथ दिष्टिं प्रकास । दर्शननाम कहावैतास ॥ जोसरदहै और की और । सोमिथ्यातभाव कीदौर।३५॥ १-पाप जोकियं इस कारण अपने को निंदक भयो । २-सम्यक दर्शन मुक्ति रूप उनले पहाड़ की. हदतक चढ़ने के लिये सीढ़ी है।

पापुराण भाषा।
(२५)
दोषअठारह वरजित देव । दैविध संगत्यागी गुरुएवं ॥
हिंसाबरजितधर्मअनूप । यहसरधासमकितकोरूप।३६।
॥ दोहा छंद ॥
शंकादिक दूषन विना, पाठो अंग समेत ॥
मोखरच अंकूर यह उपजै भविउर खेत । ३७।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
अंगहीन दर्शन जगमाहिं । भवदुख मेटन समरथनाहि ॥
अक्षर ऊनमंत्र जोहोय । विष वाधामेटै नहिं सोय ।३८
तातें यह निरण उरआन । धरहिरदै सम्यक सरधान ॥
१-भूख १.प्यास २ भय द्वेष ४ राग ५मोह६ चिंता वुढापामृत्यु खेद१०
स्वेद अर्थात् पसीना ११ मद १२ रति १३ विस्मय १४ जन्म १५ निद्रा १६ रोग १७
शौंक १८॥
बाहर के परिग्रह जो-१० हैं, अंतर के परिग्रह २ जो १४ हैं।
३. सम्यक्त के आउदोष-शांकित अर्थात् जिन वचन मैं शंका करना ? कांक्षित
अर्थात संसार के सुखकी इच्छा करना २ बिचिकित्सा मुनीजन वा धर्मी पुरुष से
ग्लानी करना ३ मूढता अर्थात तत्व कुतत्व की पहिचान न करना४ अनुपगुहणना
अर्थात- पराये औगुण अपने मुणन ढकना ५ अप्रभावना अर्थात अपने धर्म की उन्नति
की उमंग न करना ६ असुस्यीकरण अर्थात आप वापरको धर्म से डिगती अवस्था
में अर्मपर स्थिर न करना ७ अवात्सल्य अर्थत धर्मी पुरुषों से गऊवच्छ सम भीत न
करना ८ इनके विनीत पाठ अंग सम्यक्त के जानना यथा निशांकित १ निकांक्षित
२ नित्रिचिकित्सा ३ अमूढ़ता ४ उपगुहणता प्रभावना ६ सुस्थीकरण ७ वात्सल्य

(२६) पाचपुराण भाषा। पंचे उदंबर तीन मकार । इनका तज बारह व्रतधार ॥३४॥ इहिबिध गुरु दीनो उपदेश।बारण हरषित भयो विशेष॥ सुगुरु बचन सब हिरदै धरै । सम्यक पूरब व्रत आद।४।। शार बार भुमिसों सिरलाय । मुनिवर चरण नमै गजराय॥ चलेसाध तिहिंहितउपजाय। तबहाथीप्रायोपहुँचाया४॥ ॥ दोहा छंद ॥ कर उपगार मुनीश तहां, कीनो सुबिध बिहार ॥ वन निवसै गजपति व्रती, सुगुरु सीख उरधारा४२॥ ॥१४ भात्रा चाल छंद ॥ अबहस्ती संजम साधै। त्रसजीव न मूल विराधै ॥ समभाव छिमा उरानै । अरि मित्र बराबर जानै।४३। काया कस इंद्री दंडै । साहस धर प्रोषद मंडै ॥ सूके तृणं पल्लवं भच्छै । पर मर्दित मारग गच्छै । ४४॥ हाथीगण डोहो पानी । सोपीवै गजपति ज्ञानी॥ देषेबिन पाँव नराषै । तन पानी पंकन नाषै.। ४५ । निजशील.कभी नहिं खोवै । हथनी दिश मूलन जोवै ॥ १-ॐवरफल १'कबर फल २ पीपल फल ३ बड़फल ४ गूलर फल ५ ॥ २-मांस, मधु, मदिरां॥ ३-देखो चतुर्थ अधिकार मध्ये १५ चौपाई आदि १०७ पर्यंत ।।

पार्श्वपुराण भाषाः। (२७) उपसर्ग सहे अतिभारी । दुर्ध्यान तजे दुखकारी । ४६ । अघके भय अंग न हालै । दिढ़धीर प्रतिज्ञा पालै ॥ चिरलों दुधर तप कीनो । वलहीन भयो तनछीनो।४७। परमेष्टि परम पद ध्यावै । ऐसे गज काल गमावै । एकै दिन अधिक तिसायो । तब बेगवती तट श्रायो।४८॥ जल पीवन उद्यम कधिो । कांदोद्रह कुंजर, बीधो॥ निश्चै जब मरण बिचारो । संन्यास सुधीतब धारो।४६। सो कमठ कलंकी मूयो। ताबन कुरकट अहि हूयो । तिनआय डसो गजज्ञाता । यह बैर महादुख दाता॥५०॥ ॥ दोहा छंद ॥ : मरण करो गजराज तब, राखे निर्मल भाव ।। : स्वर्ग बोरवें सुरभयो, देखोधर्म प्रभाव । ५१। ॥१५ मात्रा चौपाई छंद। तहाँ स्वयंप्रभनामविमान । शशिप्रभदेवभयोतिहिंथान ॥ अवधिजोड़सबजानोदेव । ब्रतकोफलपूरवभवमेव । ५२। जिनशासन शंसो बहुभाय। धर्म विषै दिढ़ता मनलाय ॥ सदा सास्ते श्रीजिन धाम । पूजाकरी तहाँ अभिराम।५३॥ महामेरु नंदीसुर आदि । पूजे तहँ जिन विंब अनादि ।।

(२८)
पापुराण भाषा
कल्याणकं पूजा विस्तरै । पुन्न भंडार.देव यों भरे। ५४ ।
सोलह सागर आयु प्रमान । साढ़े तीन हाथ तनजान.॥
सोलहसहसवर्षजबजाहिं। प्रशनचाहउपजैउरमाहि।५५॥
अनुपम अमृत मय आहार । मनसों भुंजै देव कुमार।
ओठदुंगन पषीतजास। तबसोलेयसुगंधउसाँस । ५६।
अवधि चतुर्थ अवनी परयंत । यही विक्रयाबलविरतंत।
अवधिछेत्रजावतपरमान। होयविक्रयातावतमान । ५७।
॥ दोहा छंद ॥
बदन चंद्र उपमाधरै, विकसत बारिज नैन ।
अंग अंग भूषण लसैं, सब बानक सुखदैन। ५८ ।
सुंदर तन सुंदर बचन, सुंदर स्वर्ग निवास ॥
सुंदर बनता मंडली, सुंदर सुरगणदास । ५६ ।
अणिमा महिमाआदि दे,आठ ऋद्ध फलपाय ॥
सुर सुछंद क्रीड़ा करै, जोमन बरतै आय।६०।
सुनत गीत संगीत धुनि,निर्षत निरत रसाल ॥
सुख सागरमैं मगन सुर, जात नजानेकाल।६१॥
लोकोत्तम सब संपदा, अनुपम इंद्री भोग ॥
सुफलफलोतपकल्पतरु,मिलोसकलसुखजोग।६२।
१-अर्थात सीलद पवबारे ||

पार्चपुराण, भाषा।
(२६)
.
जैवतो बरतो सदा, जैन धर्म. जग माहि ॥
जाके सेवत दुख समुद, पशुपंछी तिरजाहि। ६३.।
२३ मात्रा छंद चाल-यह परमादी
जीव, जग जंजाल परोजी,
इसही जंबूदीप, पुर्व विदेह मझारे।
पहुप कलावती देश, विकसत नैन निहारे ।६४।
तहां विजयारध नाम, सोहै शैल रवानो ।
उज्जल वरण विशाल, रूप मई गिररानो।६५।
योजन परमं पचास भूमि विषे चोड़ाई।
तुंग पैचीस प्रमाण, शोभा कहियनजाई।६६।
चौथाई भूमांझ, नौसिर कूट विराजें।
सिद्ध शिखरजिन धाम,मणिप्रत्मातहां छाजै।६७ ।
उत्तर दक्षण ओर, श्रेणी दोय जहां हैं।
. दोय गुफा गिरहेठ,अति अंधियारतहाँ हैं।६८।
तापर स्वर्गसमान, लोकोत्तम पुरसो है।
बापी कृप तलाव, मण्डित सुरमन मोहै।६६ ।
विद्युत गतिभूपाल,न्यायप्रजाप्रत पाले।
नीत निपुण धर्मज्ञ, संत सुमारग चाले।७० ।
विद्युत मालानांव, ताघर नार सयानी ।

(३०)
पार्षपुगण भापाः।
मानो मन मथ जोग, आय मिली रतिरानी 1७१
तिनकैसो सुरप्राय पुत्र भयोवड़भागी। ...
अग्नि बेग तसुनाम, अति सुंदर सौ भागी।७२
सोमप्रकृतिपरवीन,सकलसुलक्षण धारी।
जिन पद भक्ति पुनीत, सबहीं को सुखकारी।७३।
राज संपदा भोग, भुंजित पुन नियोगे।
एक दिना इनसाध, भेटे भागः संजोगे।७४
श्रवन सुनो उपदेश, भर योवन बैराग्यो।
आसन भव्य कुमार, संजम सो अनुराग्यो ।७५ ॥
तज परिग्रहगुरसाष, पंचमहा व्रतलीने ।
दुधर तप आराध, रागादिक कृषकीने । ७६ ।
छीन किये परमाद, विचरैं एक बिहारी।
बारह अंग समुद्र, पार भयो श्रुत धारी।७७।
एक दिवसधर योग,हिमगिर कंदरमाहीं।
निवसै आतम लीन, बाहर की शुधनाहीं।७।
॥ दोहा छंद॥
कुर्कट नामा कमठचर, दुष्टनाग दुखदाय।
सोमर पंचम नरकमें, परो पाप बशजाय। ७६ ।
१-शास्त्र अंग ११ पूर्व १४ अंग १ सर्व १२ हुये ।
.

पार्धपुराणं भापा।
( ३१ ).
.
छेदन भेदन आदि बहु, तहां वेदना घोर।
सहस जीमसों वरणये, तउवं न आवै ओर।८०
ऐसे दुख में कमठजी, कीनी पूरण आव।
सत्रह सागर भुगतकै, निकसो कूरसुभाव । ८१॥
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
बैर भाव उरतें नहिं टरो। फेर आय अजगर अवतरो॥
संसकारवशायोतहां। हिमगिरगुफांमुनीश्वरंजहां १८२॥
गिले साधसंजम धरधीर। सम भावन ते तजो शरीर॥
लीनोस्वर्गसौलवेवास । जोनितनिरुपमभोगनिवासा८३।
जन्म सेज तैं. योबन पाय । उठो अमर संपूरण काय॥
देखसंपदाविस्मय भयो। अवधि होत संशयसवगयोमा
पूजाकरी जिनालय जाय । भाव भक्ति रोमांचित काय ॥
पूरबसंचितपुन्नसंजोग । करै तहां सुर वंचित भोग।५।
गए वर्ष बाईसंहजार । भोजन मुंजै मनसाहार ॥
तावतमानपक्ष जब जाय। तब ऊसाँसो दिशमहकाया।
देषै पंचम भूपरयंत । अवधि ज्ञान वले मूरति वंत ।
तितनेमानविक्रिया करै । गमनागमन हिये जवधरैः।८७॥
१- ऐसे स्थान में सागर बड़ा समझना चाहिये ।
२. अर्थात् निगले ॥
:-भावार्थ मूर्तिवंत पदार्थ कोदेखें ॥
..

(३२)
पार्षपुराण भाषा..
तीनहाथअति सुंदर काय । लेश्या शुकलमहा सुखदाय॥
थितसागरवाईसविशाल । इहि विधवीतेसुखमेकाला८८
॥ दोहा छंद ॥
आदि अंत जिस धर्मको, सुखी होय सवजीव ।
ताको तनमन बचनकर, हेनर सेव सदीव। ८६।
श्री पाचपुगण भाषा वज्र घोप गजका बारवें स्वर्ग में देव होकर फिर
विद्युतगति नाम भूपालघर जन्मलेसोलवें स्वर्ग में देव होना
वर्णननाम द्वितिय अधिकार संपूर्णम्
॥तृतिय अधिकार॥
॥ दोहा छंद ॥
अश्वसेन कुल कमल रवि,बामा कुमर कृपाल ।
बंदू पारस चरण युग; सरनागति प्रतिपाल। ११
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥
जंबू दीपं. बसै. बहु फेर । जाके मध्य सुदर्शन मेर॥
कंचन मणिमयअतुल सुहाग।ता पर्वतकेपश्चिमभागा।
अपर विदेह बिराजै खेत । सो नित चौथे काल समेत ॥

पार्षपुराण भाषा!
३३)
पदपद जहादि जिन धाम नहींकुदेवन कोविश्राम ।।
जनयती जन दीखें सोय। नहीं कुलिंगी दीखे कोय ॥
उत्तम धर्म सदाथिर रहै। हिंसा धर्म प्रकाशनलहै।४।
तीनों बरणबसें जहां लोय।बामनवरण कभी नहिंहोय॥
तामें पद्म देश अभिराम । सोहै नगर अश्वपुरनाम।।
तहां बजवीरज भूपाल । न्याय प्रजा करै प्रतिपाल ॥
गुणनिवास सूरजसमदिपै । पानभूपउड़गणयविछिप।६।
विजया नामै नरपति नार। रूपवंत रतिकी उनहार ।।
पटरानी सब मैं परधान । पूरब पुन उदय गुणखान।७॥
एकसमें निश पश्चिम जाम । पंचे सुपन देषे अभिराम॥
मेरे दिवाकर चंद्र बिर्मोन । सजल सरोवर सिंधुसमाना।
प्रातभये आई पियपास । विकसत लोचन हिये हुलास ॥
रात. सुपन अवलोके जेह । नप आगे परकाशे तेह ।।
तब नरेन्द्र बोले विकसायं । सुंदर वचन श्रवन सुखदाय॥
सुनरानी इनको फल जोय। पुत्र प्रधान तुम्हारे होया१०॥
ऐस बचन पियके अवधार। अति आनंद भयो नृपनार।
अचुत स्वर्ग सोसुरचयो। बजूनाभि नामा सुतभयो।११॥
चौसठ लक्षण लक्षितकाय । पुन्नयोग जिम उतरोभाय ।।
जन्ममहोच्छवराजाकियो । जिनपूजेयाचकधनदियो ।१२।
जोजन दीखें सो जैन यती दी।
२-पुनके समय की तरह आ. उतरा ।।

पापुराणे भापनि
बढ़े बालजिमबालक चंद।सुजन लोक लौंचन सुखकद ।।
क्रमक्रमसोशिशुभयोकुमार । पढ़लीनीविद्यासवसारा१३॥
जोबनवंत कुमर जवभयो। निर्मलं नीतपंथ पंगठयो ।
रूपतेजवलबुद्धिविज्ञान । सकलं सारगुणरत्ननिधाना१४॥
कीनी पिता ब्याह बिंधयोग । राजसुता बहुवरी मनोग॥
क्रमकरकुमरपितापदपाय । राजकरैथुतिकरियनजाय।१५
पुन्नजोग आयुध ग्रह जहाँ । चक्ररल बरउपजो तहाँ ।
छहों खण्ड बरती भूपाल । बेशकीने नाये निजभाल।१६॥
देवदैत्य विद्याधर नये । नृपं मलेच्छ सब सेवकं भये॥
बढ़ी संपदा पुन्न संयोग । इन्द्रसमानकरैसुखभोग ।१७।
॥ दोहा छंद ॥
संपूरण सुखं भोगवै, बजूनाभि चक्रेश ।।
-तिस बिभूति बल बरनऊँ, यथाशक्ति लवलेशा१५
॥१५ मात्रा चौपाई छंदः॥
सहसवतीस सास्ते देश । धनकन कंचन भरे विशेष ॥
बिपुलबाड़ बेढ़े चहुंओर। तेसब गांव छानवै कोर। १६ ।
कोर्ट कोट दरबाजे चौर। ऐसे पुर छब्बीसहजार ॥
1
.
१- प्रति पुरके कोट में चार दरवाजे ।।
...

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पापुराण भाषा:
.
जिनकैलगें पांचसौ गांव । तेअटंबचउँसंहससुठांव।२०॥
पर्वत और नदी के पेट । सोलहसहसकहे वेखेट।
कर्वट नाम सहसचौवीस । केवल गिरवरबेढे, दीष । २१
पत्तन अंडतालीसहजार । रन जहां उपजै अतिसार ।।
एकलाख द्रोणामुख बीर । सेहसघाट सागर के तीरा२२॥
गिर ऊपर संबाहन जान । चौदहसहस मनोहर थान ॥
अट्ठाईस हजार अशेश। दुर्गजहां रिपुको न प्रवेश । २३ ।
उपसमुद्रके. मध्यमहान । अंतर दीप छपैन परिमान ॥
रत्नाकर छबीसहजार । बहु बिधसार बस्तु भंडार।२४।
रत्नकुच्छ सुंदर सातसै । रत्नधरा थानक जहँ लसै॥
इनपुर सूबस राजै खरे । जैनधाम धरमी जनभरे ।२५ ॥
बरगयंद चौरासीलाष । इतनेही रथ आगम साष ॥
तेजतुरंग अठारह कोर। जेबढ़चलैं पवन जोर । २६
पुनिचौरासीकोट प्रमाण । पायक संघ बड़े बलवान ॥
सहसँछानवै बनता गेह। तिनको अबबिवर्ण सुनलेहा२७॥
आरजखण्ड बसैं मरईश । तिनकीकन्या सहसवंतीस ॥
इतनीही अतिरूप रसाल । विद्याधर पुत्री गुणमाल।२८॥
पुनिमलेच्छ भूपन कीजान । राजकुमारी तावत मान ।
नाटकगण बचीसहज़ार । चक्री नृपको सुख दातारा२६ ।
आदि शरीर आदि संठान । पूर्व कथित तन लक्षणजान॥
१४००००००

(१६) पार्थपुराण भाषा। १ बहुबिधजिनसहितमनोग । हेमवर्णतनसहजनिरोगा३०॥ छेहोखण्ड भूपति बलरास । तिनसोंअधिकदेहबलजास। सहसवतीसचरण तलरमैं । मुकटबंधराजानितनमैं ॥३॥ भूपमलेच्छ छोड़ अभिमान । सहसंअठारह मानैान ॥ पुनिगण वद्धबखान देव । सोलहसहस करें नृपसेव ॥३२॥ कोटेथील कंचननिर्मान । लक्षकोट हलसहित किषानः॥ नाना वरण गऊकुल भरे। तीनकोटवजागमधरे ।३३ । ॥दोहा छंद ॥ अब नवनिधि के नामगुण, सुनोयथारथ रूप॥ जैनीबिन जानै नहीं, जिनको सहज स्वरूप ।३४। ॥ नवनिधनाम ॥ ॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥ प्रथम कोलनिधि शुभ आकार । सो अनेक पुस्तक दातार। महाकालनिधिदूजी कही। याकी महिमासुनयोसही।३५॥ असिमसि श्रादिक साधन जोग । सामग्रीसबदेय मनोग। तीजी निधि नैसर्पमहानानाना बिधिभाजनकी खान ३६॥ १-छहोखण्ड के राजाओं की देह के बल के समूहसे. चक्रवर्त की देहका बन अधिक है। .

पार्श्वपुराण भाषा. (२७) पांडुकनाम चतुरथी होय। सबरसधान समये सोय ॥ पदम पंचमी सुक्रतखेत । बंछितबसन निरंतर देत। ३७॥ मानव नाम छठी निधिजेह । आयुधजाति जन्मभुमि तेह ॥ सप्तम सुभग पिंगलानाम।बहुभूषण अर्पअभिराम । ३८॥ शंखनिधान आठमी गनीं । सब बाजित भूमिका बनी। सर्वरत्ननौमी निधिसार । सोनितसर्व रत्न भंडार । ३६ ॥ ॥ दोहा छंद ॥ ये नौनिधि चक्रेश के, सकटाकृत संठान ॥ आठचक्र संयुक्त शुभ , चौखूटी सभजान। ४० । जोजनआठ उतंग अति. नवजोजन विस्तार ॥ बारहमित दीरघसकल ,बसैंगगन निर्धार ॥४१॥ एकएक के सहसमित , रखवाले येषदेव ॥ येनिधि नरपति पुन्नसों, सुखदायक स्वयमेवा४२ ॥ चौदह रत्न नाम ॥ ॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥ प्रथमसुदेरशन चक्रपसत्थ। छहो खण्डसाधन समरत्थ॥ चंडवेगदिढ़ दंडेदुतीया जिसवल खुलैगुफागिरकीया४३ १-यक्षदेव ॥ -

(३८)
पाचपुराण भाषा:!
चर्मरल सोतृतिय निवेद । महा बजूमई नीर अभेद ॥
चतुरथर्चुडामणि मणिरेन।अंधकारनाशक सुखदैन।४४।
पंचमरत्न कॉकणी जान। चिंतामणि जाको अभिधान ॥
इनदोनों तें गुफामंझार ।शशिसूरज लखयैनिर्धार । ४५ ॥
सूरजप्रभ शुभछत्र महान । सोअति जगमगाय ज्योभान॥
सौनंदक असिअधिक प्रचंड । डरैदेख वैरी बलवंड़। ४६।
पुनिअजोध से पति सूर । जोदिग विजै करैवल पूर ।।
बुधसागर प्रोहित परबीनाबुधिनिधानविद्यागुणलीना४७
थपितभद्र मुखनाम महंत । शिल्प कलाकोविदगुणवंत ॥
कामसद्धिग्रहपति विख्यातासभग्रह काजकरैदिनराता४८
ब्याल बिगिरप्रति अभिराम । तुरगतेज पवनंजैनाम॥
बनतानाम सुभद्राकही । चूरै बजू पानसों सही । ४६ ।
महादेह बलधारै सोय । जापटतर तिय और न कोय ।
मुख्यरत्नयहचौदहजान औररत्नको कौनप्रमान । ५०
५०।
॥ दोहा छंद ॥
.
.
राजअँग चौदह रतन, बिविधिभांत सुखकार ॥
जिनकीसुर सेवाकरें, पुन्न तरोबर डार । ५१ ।
चक्रछत्र प्रसिदंडे मणि, चर्म कांकणी नाम ॥
सातरत्न निर्जीवयह , चक्रवर्त्त के धाम । ५२।-

पापुराण भाषा। (६) सेनापति ग्रहपतिथपित , प्रौहित नॉग तुरंग ॥ बनतामिल साँतों रतन, ये सजीवसरबंग।३। चक्रछत्र असिदंडये , उपजैं आयुध थान ॥ चर्म कांकणीमणिरतन,श्रीग्रहउतपति जाना५४| 'गजेतुरंग तिये तीनये , रूपाचलपर होतः ॥ चाररतनबाकी बिमल , निजपुरलहैंउद्योत॥५५॥ ॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥ मुख्य संपदा को बिरतंत। आगें और सुनो मतिवंत ॥ सिंहवाहनी सेज मनोग । सिंहारूढ़ चक्रवै जोग। ५६ । आसनतुंग अनुत्तर नाम । माणिकजालजटितअभिराम।। अनुपम नामा चमेर अनूप गंगातरल तरंग सरूपा५७ विद्युति दुतिमणिकुंडल जोटाछिपैऔर दुतिजाकीओट। कवचभेद अभेदमहान । जाविधै न बैरीवान । विषमोचनी पादुका, दोय । परपदसों विषमुंचे सोय । अजितं रथ महारवन्न । जलपैथलवत करेंगवन्न । ५६ । बजूकांड चक्रीघर चापं । जाहिचढ़ावै नरपति आप ॥ वाणअमोध जवैकरलेत । रण सदा बिजैबरदेत ।६०॥ विकट बजतुंडा अभिधान । शत्रुखंडनी शकती जान ।। सिंहाटकबरछी विकराल । रत्नदंडलागी रिपुकाल।६१।

(४०)
पापुराण भाषा।
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.
लोहबाहनी तिक्षणछुरी। जिसचमके चपला दुतिदुरी ।।
येसबबस्तु जाति भूमाहिं। चक्रीछूटऔर घरनाहिं । ६२।
॥ दोहा छंद॥
मनोवेग नामाकणय ग्रंथन कहो विख्यात ॥
खेटभूत मुखनाम है , दोनोंआयुध जात।६३॥
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
श्रानंदन भेरी देशदोय । बौरह जोजनलों धुनिहोय ॥
बजूघोष पुनि जिनकोनामाबौरहपटह नृपतिकेंधाम।६४।
बरगंभीरावर्त गरीश। शोभनरूप शंख चौवीस।
नानाबरणधुजारमणीय। अड़तालीसकोटमितकीय।६५।
ईत्यादिक बहुबस्तुअपार । वरणन करत न लहियै पार ।।
नमहलतणीरचनाअसमान । जिनमतकहीसोलीजोजान६६
॥ दोहा छंद ॥
चक्री नृपकी संपदा, कहै कहांलों कोय ॥
पुन्नबेल पूरबेबई, फली सांघणी सोयः। ६७ ।
-
१-बोई गई ।
-

पार्यपुराण मापा।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
इहि विधिबजू नाभि नरराय । करै भोग चक्रीपदपाय ॥
धर्मध्यान अहनिश आचरै। निर्मल नीत पथपगधरै ।६८)
पूजा कर चैत्यालय जाय । पूजै सदा सो गुरु के पाय ॥
सामायक साधै अघनास। करै परवप्रोषद उपवास । ६६ ।
चार प्रकार दान नित देय। औगुण त्यागै गुणगह लेय॥
सन्तशील पालै बड़भाग । मनबच काय धर्मसोंराग।७०॥
सिंहासन पर बैठ नरेश । करै पुनीत धर्म उपदेश ।
सुजनसभाजनकिंकरलोगादेयसुहितशिक्षासबजोगा७१॥
॥दोहा छंद॥
बीजराख फल भोगवे, ज्यों किसान जग माहिं ।।
त्योंचक्री नृपसुख करै, धर्मबिसारै नाहिं।७२।
नरेन्द्र छंद जिसकी चाल जोगीरासा
॥की ढाल है।
इहिं विधि राजकरै नरनायक । भोगै पुन्न विशालो।
सुखसागर में रमत निरंतर जात न जानै कालो।७३ ॥
,
१-औषधि १ शास्त्र २ अभय ३ अहार ४ ॥

४२
पापुराण भाषा।
एक दिनां शुभकर्म सँजोगे । छेमाकर मुनि बन्दे ।
देखे श्री गुरु के पद पँकज । लोचन अलि आनन्दे।७४
तीन प्रदक्षना दे सिर न्यायो । कर. पूजा थुति कीनी ॥
साधु समीप विनै कर बैठो। पायन में दिठे दीनी ।७५.
गुरु उपदेशो धर्म शिरोमणि । सुन राजा वैरागे॥
राज रमा बनतादिक जेरस । तेरस बरस लागे । ७६।
मुनिसूरज कथनी किरणावलि।लगत भिरम बुधभागी ॥
भक्तन भोग सरूप बिचारै। परम धरम अनुरागी।७७॥
इस संसार महाबन भीतर । भ्रमते ओर न आवै॥
जामण मरण जरादों दाझी । जीव महादुख पावै। ७८ ।
कबही जाय नरक थिति भुजै । छेदन भेदन भारी ॥
कबही पशु पर्याय धरै तहां। बध बन्धन भैकारी । ७९ ।
सुरगति मैं पर संपति देखै । राग उदय दुख होई॥
मानुष जौनि अनेक विपत मय। सर्वसुखी नहिं कोई।
कोई इष्ट वियोगी विलकै । कोई अशुभ संजोगी।
कोई दीन दालिद्र बिगूचे । कोई तन के रोगी। ८१।
किसही घर कलहारी नारी । कै बैरी सम भाई॥
किसही कै दुख बाहर दीखै । किसही उर दुठताई। ८२॥
कोई पुत्र बिना नित भूरै। होय मरै तंब रोवै ॥
1८०
१-दृष्टि अर्थात् नजर ।।

पार्षपुराण भाषा
खोटी सन्तति सों दुख उपजत।क्यों प्रानीसुखसोवै।८३॥
पुन्नउदै जिनके तिनको. भी। नाहिं सदा सुख साता ॥
यो जग वास यथारथ देषत। सब दीषै दुखदाता। ८४।
जो संसार विषे सुख होता। तिर्थंकर क्यों त्यागें ॥
काहे को शिव साधन करते। संजम सों अनुरागैं । ८५॥
देह अपावन अथिर घिनावन । यामैं सार न कोई ॥
सागर के जलसों शुचि कीजै।तौभी शुचि नहिं होई।८६।
सात कुधात. मई मल मूर्ति । चाम लपेटी सोहै ।
अन्तर देखत यासम जगमें। और अपावन-कोहै। ८७॥
नवमल द्वारश निशबासर । नाँव लिये घिनश्रावै ॥
ब्याधि उपाधिअनेक जहांतहां। कौन सुधीसुख पावै।८८
पोषत तौ दुख दोष करैसब । सोखत सुख उपजावै ।।
दुर्जन देह स्वभाव बराबर । मूरख प्रीति बढ़ावै । ८६ ।
राचन जोग स्वरूप न याको । विरचन जोग सही है ॥
यहतन पाय महा तपकीजै । यामें सारयही है। ६० ।
भोग बुरे भवरोग बढ़ावै । वैरी हैं जग जीके ॥
बेरस होहिं.विपाक समै अति । सेवत लागें नीके।६१।
वजू
अग्नि विषसों विषधर सों । ये अधिके दुखदाई।
धर्म रतन के चोर चपल हैं। दुर्गति पंथ सहाई । ६२।
ज्यों ज्यों भोग सँजोग मनोहर । मन वंछित जन पावै ।।
तृष्णा नागनः त्यो त्यों डंकै। लहर जहर की आवै।६३।

४४ पार्थपुराण,भाषा. मोह उदै यह. जीव, अज्ञानी । भोग भले कर जानै ॥ ज्यों ज्यों कोइजन खाय धतूरा ।सोसब कंचन मान। ६४१ मैं चक्री पद पाय निरन्तरः। भोगे भोग घनेरे ॥ तोभी तनक भएनहीं पूरन । भोग मनोरथ मेरे । ६५ । राज समाज महा अंघ कारन । बैर बढ़ावन हारा॥ वश्वासमलक्ष्मीप्रतिचंचल । इसका कौन पत्यारा।६६। मोह महा रिपु बैर बिचारा । जगजीय संकट डाले ॥ घर काराग्रह बनिता बेड़ी। परियन जन रखवाले।७। सम्यक दुर्शनं ज्ञान चरनतप। ये जियके हितकारी ॥ येही सार असार और सब। यह चक्री चितधारी। ९८ । छोड़े चौदह रत्न नेवों निधि । अरु छोड़े संग साथी । कोड अठारह घोड़े छोड़े। चौरासी लख हाथी। ६६ । इत्यादिक सम्पति बहुतेरी । जीरण तृण ज्यों त्यागी॥ नीत बिचार नियोगी सुतको ।राजदियो बड़भागी॥१०॥ होय निशल्य अनेक नृपति संग। भूषण बसन उतारे ॥ श्री गुरुचरन धरी जिन मुद्रा।पंचे महा रतधारे। १०१। धन यह समझ सुबुधि जग उत्तम । धन यह धीरजधारी॥ ऐसी संपति छोड़ बसे बन प्रतिनपद ढोक हमारी। १०२॥ ॥दोहा छंद॥ परिग्रह पोट उतार सब, लीनो चारित.पंथ.॥ ६४०००००

पापुराण भाषा ।
४४
'निज स्वभाव में थिर भये,बजूनाभि निग्रंथ । १०३।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
बारह विधि दुडर तप करै । देस लाक्षनी धर्म आचरै ।
पढ़ेअंगपूरब श्रुतिसार । एकाकी विचरैअनगार । १०४॥
ग्रीषम काल बसै गिर शीश । वर्षा में तरुतल मुनिईश ।।
शीतमास तटनीतटरहैं।ध्यान अगिनिमें कर्मनिदेही १०५॥
एक दिना बनमें थिरकाय । जोग-दिये ठाड़े मुनिराय॥
कमठजीवअजगरतनछोराउपजोईठेनरकप्रतिघो।१०६।
थित सागर वाईस प्रमाण । देखे दुख जानै भगवान ॥
पूरनआवभोगकरमरो।विहनकुरंग भीलअवतरो।१०७
काल सरूप बदन विकराल बनचर जीवनको छैकाल ।
धनुषबान लीयेनिजपान। भ्रमैंमांस लोभीवनथान।१०।
सो पापी चलायो तहां । जोगारूढ़-खड़े मुनि जहां ॥
शत्रुमित्रसों समकरभाव।लगेआपमैं शुद्धस्वभाव।१०६ ।
कुंकुम कादो महल मसान । कोमल सेज कठिन पाषान ।
कंचनकाच दुष्ट अरुदास। जीवनमरन बराबरजास।११०॥
निर्ममत्त तनकी सुधि नाहि सातौभय वरजित उरमाहि ।।
देषदिगम्बरकोपोनीच। कंपतअधर दशनतलभीचा१११॥
१-निदई अर्थात् जलावै ॥

पापुराण भाषा।
-
तान कमान कानलों लई । तिक्ष्ण शर मारो निर्दई ॥
मुनिवरधर्म ध्यानआराधादुखमें धीरजतजोनसाधा११२॥
दर्शन ज्ञान चरन तपसार । चारो आराधन चितधार ॥
देहत्यागतव भयेमुनिंद्र । मध्यम ग्रेवैयक अहमिंद्र।११३॥
तहां उत्पाद शिला निकलक । हंसतूल युत रत्न पलंक।
उठोसेजतज देखतकार्य । अल्पकाल में योवनपाय।११४॥
देखै दिशिअति विस्मयरूप। महा मनोग विमानअनूप।
अतुलतेजअहमिंद्रनिहार।अवधिज्ञानउपजोतिहिंवार ११५
जानोसम पूरज भव भव । चारित रक्षफलो सुख देव ॥
अनुपम आठोंदरब संजोयारत्नबिंब पूजेथिरहोय। ११६ ।
आयोसुर हर्षित निजथान । महारद्ध महिमा असमान ॥
तीनभवनबरतीजनधामाभावभक्तिनितकरैप्रणाम।११७१
तिर्थंकर केवलि. समुदायः । निज थानक थित पूजेपाय ॥
पंचकळ्यानक कालविचारप्रणमेंहस्तकमलसिरधार:१॥
॥दोहा छंद ॥
अनाहूत अहमिंद्र गण, आवै सहज स्वभाव ॥
धर्मकथा जिनगुण कथन, करै सनेह बढ़ाव 1:११६ ।
१-तिस स्थान में उत्पन्न होने की शिल्प निकलंक है. और रत्न युत पलंग इंस
कहिये सूर्य जिसकी तुल्य प्रकाशित है ।

पापपुराण भाषा:
४७
कवहीं रत्न विमान में, कवहीं महल मझार ॥
कबहीं बनक्रीड़ा करें, मिल.अहमिंद्र कुमार । १२० ।
और बास निज बासते; उत्तम देखै नाहिं ।।
ताहाते तें अमर गण, और काहिंनहिं जाहिं । १२१ ॥
प्रीत भरे गुण आगरे, शुभग सोम श्रीवन्त ॥
+ . सातधात मलसोरहित, लेश्या शुकलधरन्त। १२२
सब समान संपति धनी, सव मा. हम इन्द्र ॥
कलाज्ञान विज्ञानसम, ऐसेसुर अहमिंद्र । १२ ।
शुकल बरन-तन मन हरन, दोयहाथ परिमाम ॥
मानोप्रत्मा फटक की, महातेज दुतिवान । १२४ ।
काम दाह उरमें नहीं, नहिं बनिता को राग ।
कल्पलोक के सुरसुखी, असंख्यात 4 भाग। १२५ ॥
सत्ताईस हजार मित, वर्षबीत जब जाहिं ।।
मानसीकाहारकी, रुचि उपजै मनमाहिं । १२६ ।
साढ़े तेरह पक्षपर, लेत सुगंध उसास ॥
छठीअवनिलोंजिनकही, अवधिबिक्रियाजास। १२७ ।
सागर सत्ताईस मित, परम आवतिहिं थान॥
शुभग सुभद्र बिमान मैं, यो सुखकरैमहान । १२० ॥
प
५-नरक में सर्व जन्म प्रस्थान अन्य अधोमुख योनी और गल के आकार हैं
चिनावनी कठिन वास दुख स्थान हैं

४८
पार्धपुराण भाषा।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
अभसो भील महादुख दाय । रुद्रध्यान सों छोड़ीकाय ॥
मुनिहत्यां पातक तैं मरो। चरेम शुभ्र सागर में परो । १२९ ।
॥दोहा
कथा तहां के कष्टकी; कोकर सकै बखान ॥
भुगतै सो जानै सही, की जानै भगवान । १३०
॥ नरक कथन ॥
छंद॥
॥ दोहा छंद ॥
जन्म थान सब नरक में, अन्धअधो मुखजौन ॥
घंटाकार घिनावनी, दुसह बास दुख भौन । १३१ ।
तिनमें उपजै नारकी, तलसिर ऊपर पाय॥
विषम बजू कंटक मई, परै भूमिपर आय । १३२ ।
जोविषले बीछू सहँस, लगै देह दुखहोय ॥
नरक धराके परस तें; सरस वेदना सोय। १३३ ॥
तहां परत परवान अति, हाहा करते राम ॥
१-अंतिम नरक अर्थात् सातवां नरक

पार्चपुराण भाषा। ४९ ऊँचे उछलैं नारकी, तये तवा तिल.जेम १३४॥ ॥सोरठा छंद॥ नरक सातवें माहिं, उछलन जोजन पाँचसै॥ और जिनागम माहि, यथायोग सबजानियो।१३५॥ ॥ दोहा छंद ॥ फेर आन भू पर परें, और कहां उठजाहिं। छिन्नभिन्नतनअतिदुखित,लोटलोटविलकाहि।१३६। सबदिश देख अपूर्व थल, चक्रित चितभर्यवान ॥ मन सोचै मैं कौनहूं, परो कहां मैं आन।१३७। कौन भयानक भूमियह,सब दुख थानकनिंद ॥ रुद्र रूप ये कौन हैं। निठुर नारकी चन्द ।३८॥ काले बरन कराल मुख, गुञ्जा लोचन धार ॥ हुँडक डील डरावने, करै मारही मार ॥१३॥ सुजन न कोई दिठ परै, शरन न सेवक कोय ।। ह्यां सो कुछ सूझै नहीं, जासों छिन सुखहोय ।१४०) होत विभंगा अवधि तव; निजपर को दुखकार ॥ नरक कूप मैं आपको, परो जानः निरधार १४१॥ .. १-पहले जन्मों के खोटे काम किये हुये याद आना ।।

पार्थपुराण भाषा]
पूरब पाप कलाप सब, श्राप जाप.कर लेय ॥
तब विलापकी ताप तप, पश्चाताप करेय। १४२
मैं मानुष परयायै धर,धन योवन मद लीन।
अधम काज ऐसे किये, नरक बास जिन दीन। १४३॥
सरसों समसुख हेततब, भयोलंपटी जान ।।
ताही को अबफल लगो, यह दुखमेरुसमान। १४४।
कंदमूल मद मांस मधु, और अभक्षअनेक॥
अक्षण बस भक्षण किये, अटक न मानी एक।१४५॥
जलथल नभचारी बिविध,बिलबासी बहुजीव ।।
में पापी अपराध बिन, मारे दीन अतीव । १४६ ।
नगर दाह कीनो निठुर, गाम जलाये जान ॥
अटबी में दीनी अगिन, हिंसाकर सुखमान १४७।
अपने इन्द्री लोभको बोलो मृषा अलीन ॥
कलपित ग्रंथ बनायकै, बहकाये वहुदीन। १४८
दाव घात परपंच सों, पर लछमीहर लीय ॥
छलबल हठबलदिरबवल,परबनिताबशकीय।१४६।
बढ़ी परिग्रह पोटसिर, घटी न घटकी चाह ॥
जो ईधनके योग सों, अगिन करै अतिदाह । १५०।
बिन छानो पानी पियो,निश मुंजो अबिचार ।
देव दरब खायो सही रुद्रध्यान उर धार । १५१॥

पार्षपुराण भाषा।
५१
कीनी सेव कुदेव की, कुगुरुन को. गुरु मान ।।
तिनहीं के उपदेश सों, पशु होमे हितजान ।१५२।
दियो न.उत्तम दान में, लियो न संयम भार.॥
पियोमूढ़ मिथ्यात मद,कियो न तप जग सारा१५३।
जो धर्मीजन दयाकर, दीनी शीष निहोर ॥
मैं तिनसों रिस कर अधम, भाषे.वचन कठोरा१५४॥
करी.कमाई परजनम, सोआई मुझ तीर.॥
हाहा अब कैसेधरूं, नरक धरामें धीर। १५५॥
दुर्लभ नर भव पायकै, केई पुरुष प्रधान ॥
तपकर साधैं स्वर्ग शिव, मैं अभाग यह थान।१५६।
पूरब संतन यों कहीं, करनी चालैलार ॥
सोअब ऑषन सो दिषै, तव न करी निर्धार।१५७॥
जिस कुटंब के हेत मैं, कीने बहुविधि पाप।
ते सब साथी बीछड़े, परो नरक मैं आप। १५८ ।
मेरी लछमी खानकों, सीरी हुये अनेक ॥
अबइस विपत विलाप मैं, कोई नदी एक। १५६।
सारस सरवर तजगये, सुखो नीर निराट।
फलबिन बिरष विलोक के, पक्षी लागे बाट। १६०॥
पंचकरण पोषण अरथ, अनरथ किये अपार ।।
ते रिपु ज्यो. न्यारे भये, मोह. नरक मैं डार ।.१६१ ॥
तब तिलभर दुख सहन को, हुतो अधीरज भाव ॥

५२
पार्यपुराण भाषा.
अबये कैसे इंसह दुख भरहूँ दीरघ श्राव,। १६२॥
अघ वैरी के बश परो, कहाकरूं किंतजाउं॥
सुनैकौन पूछे किसैं शरन कोन इंसठाउं । १६३ ।
यहां कछू दुख हतन को, उक्त उपाव न मूर ॥
थिति बिन विपत समुद्र यह,कब तिरहूंतटदूर।१६४।
ऐसी चिंता करतहूं, बढ़े बेदना एम ॥
घीव तेल के योग ते, पावक प्रज्वलै जेम। १६५।
॥ सोरठा छंद॥
इहिं विधि पूरब पाप, तहां नारकी शुधकरें।
दुखउपजावन जाप, होय विभंगा अवधितै। १६६।
॥दोहा छंद॥
तबही नारकि निर्दई, नयो नारकी देष ॥
धायधाय मारन उठै, महादुष्ट दुर्भेष । १६७।
संबक्रोधी कलही सकल सबके नेत्र फुलिंग
दुःख देनको अति निपुन, निठुरनपुंसकलिंग।१६८।
कुंत क्रपान कमान शर शकती मुगदर दंड ॥
इत्यादिक आयुध बिबिधि, लियेहाथ परचंड । १६९।
कंहकठोर दुर्वचन बहु, तिलतिल खडे कायः॥
.

पार्षपुराण माषा। सो तबही वहिकालतन,पारेवत मिलजाय।१७० ॥ कांटोंकर छेर्दै चरन, भेर्दै मरम बिचार ।। अस्थिजाल चूरण करें, कुचलें खाल उपार ॥१७॥ चीकरवत. काठ ज्यों, फ़ारै पकर कुठार ॥ तो. अंतरमालका. अंतर उदर बिदार । १७२। पेलें कोल्ड मेलकै, पीसैं घरटी घाल ॥ तावै ताते तेल मैं, दह दहन परवाल । १७३ । पकरपाय पटकै पहुमि, झटक परसपर लेहिं॥ कंटक सेज सुवावहीं, शूली पर धरदोहं । १७४ घसैं सकंटक रूखसों, बैतरनी ले जाहि ।। घायल घेर घसीटय, किंचित करुणानाहिं । १७५॥ केईरक्त चुंवाव तन, बिहवल भा ताम ॥ पर्बत अंतर जायके करें वैठ विश्राम । १७६ तहां भयानक नारकी धार विक्रया भेष ॥ बाघ सिंह अहि रूप सों दारें देह विशेष । १७७॥ केई करसों पाय गहि, गिरसौंदेहिं गिराय ॥ परैआन दुर्भूमि पर, खंड खंड होजाय । १७८ । दुखसों कायर चित्तकर, ढूँदें शरन सहाय ॥ वे अति नर्दयघातकी, यहअतिदीन घिघाय।१७६॥ व्रण वेदन नीकी करें औसेकर विश्वास ॥ सींचें खारे नीर सों, जोअति उपजै त्रास ।.१८०।

पापुराण भाषा।
।
केई जकर जज़ीर सों, बैंचथंभ अतिबांध ॥
शुध कराय अघ मारवें, नाना आयुध साध। ११ ॥
जिनउद्धत अभिमान सों कीने परभव पाप ॥
तपत लोहं श्रासन विषै, त्रास दिषा थाप। १८२
ताती पुतली लोहकी, लाय लगावै अंग ॥
प्रीतकरी जिन पुर्वभव, परकामिनि के संग। १३ ।
लोचन दोषीजानिक, लोचन लहिं निकाल ॥
मदिरा पानी पुरुष को, प्यावैताँबो गाल । १४ ।
जिन अंगनसों अघकिये, तेई छेदे जाहिं।
पल भक्षण के पापते, तोड़ तोड़ तन खाहिं । १८५
केई पूरब बैरके, याद दिवावें नाम ॥
कह दुर्बचन अनेक बिधि, करें कोप संग्राम। १८६॥
भये विक्रिया देह सों बहुविधि आयुध जात ॥
तिनही सो अति रिसभरे, करें परस्पर घात ।१८७ ।
शिथिल होय चिर युद्धतै, दीन नारकी जाम ॥
हिंसानंदी असुर दुठ, आन भिरावै ताम। १८४)
॥ सोरठा छंद॥
तृतिय नरक परयंत, असुरादिक दुखदेत हैं।
भाषोजैन सिधन्त, असुर गमन आगे नहीं। १८९

पावपुराण भापा।
५५॥
॥ दोहा छंद ॥
इहिविधि नरक निवासमैं चैनएकपलनाहिं ।।
तपैं निरंतर नारकी, दुख दावानल माहिं । १९०॥
मार मार सुनिये सदा, छेत्र महा दुर्गंध ॥
वहेबाल असुहावनी, अशुध छेत्र सम्बंध।१९१॥
तीनलोक-को नाज सब; जो भक्षन कर लेय॥
तौभी भूख न उपशमैं, कौन एक कण देय । १९२॥
..सागरके जलसो जहां, पीवतप्यास न जाय ॥
लहै न पानी बंदभर, दहै निरंतर काय। १९३ ।
बाय पित्त कफ जनितजे, रोगजात जावंत।
तिनसंबही को नरंक मैं, उदै कह्यो भंगवंत।१९४॥
कटुतुबी सो. कटुक रस, करवत कीसी फाँस ॥
जिनकी मृतक मंझार सों, अधिक देह दुर्वास।१९५॥
योजन लाखं प्रमाण जहां, लोह पिंडगलजाय॥
ऐसीही अति उश्नता, ऐसीशीत सुभाया १९६।
॥ अडिल छंद ॥
पंकप्रभा परयंत उशनता जिन कही।
१-चौथा नरक ॥

५
पार्षपुराण भाषा।
.
धूमप्रभामैं शीतउश्न दोनो सही।
छटी साँतमी भूमि न केवल-शीत है।
ताही उपमा नाहिं महा बिपरीत है । १६७।
॥दोहा छंद॥
स्वान स्याल मंजारकी, पड़ी कलेवर रास ॥
मासबसा अरु रुधिर को, कादा जहां कुबास।१६८
ठाम ठाम असुहावने संभल तरु वर भूर ॥
पैने दुखदैने विकट, कंटक तलतक सूर । १६६ ।
और जहां असिपत्र बन,भीम तरोवर खेत।
जिनके दल तरवारसे, लगत घाव करदेत । २००।
वैतरनीसरिता समल, लोहित लहर भयान ॥
बहेषाद शोणित भरी, मासकीच धिन घान।२०१॥
पक्षी बायस गीधगण, लोहतुंड सों जेह ॥
मरम बिदारै दुख करें चूंटें चहुँदिश देह । २०२।
पंचेंद्री मनको महा. जे दुखदायक जोग।
तेसब नरक निकेत मैं, एक पिंड अमनोग।२०३॥
कथा अपार कलेश की, कहै कहांलो कोय ॥
कोड़ जीभसों वरनिये, तबव न पूरीहोय । २०४।
१-पांचवा नरक॥

. पार्थपुराण भाषा। ५७ सागरचंध प्रमाणथिति,छिनछिन तिक्षणत्रास ॥ येदुख देईं नारकी, परवंश परे निरास ॥ जैसी परबश बेदना, सहै जीव बहु भाय । स्ववश सहै जो अंशमी, तौ भवजल तिरजाया२०६॥ ऐसे नरकहि नारकी, भयो भील दुठ भाव ॥ सागर सत्ताईस की, धारी मध्यम आंव । २०७१ सागर काल प्रमाण अब, वरनूं औसरपाय॥ जिनसोनरकनिवास की, थितिसबजानीजाय।२०८ ॥ सागर प्रमाण कथन ॥ ॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥ पहले तीन पल्ल के भेव । एक चित्त कर सो सुनलेव । जिनसोसागरउपजैसही यथारीतजिनशासनकही॥२०६॥ ॥ सोरठा छंद ॥ प्रथम पल्ल व्योहार, दुतिय नाम उद्धार भण। अर्धात्रितियबिचार, अवइनको बिस्तारसुन ॥२१०॥ -- पार्थपुराण भाषा ॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥ पहले गोल कूप कल्पये । जोजन बड़े मान थरपये ॥ इतनोही करये गंभीर। धीबल ताहि भरो नरधीर ॥२११॥ सात दिवस के भीतर जेह । जने भेड़ के बालक लेह ॥ उत्तम भोगभूमिके जाना तिनके रोमअग्र मनान।।२१२॥ ऐसे सुक्षम करये सोय । फेर खंड जिन को नहिं होय ॥ तिनसौं महाकूपबह भरो । बारम बार कूटदिढ़करो॥२१३॥ तिन रोमन की संख्या जान । पैंतालीस अंक परवान ॥ तेश्री जिन शासनमें कहे। करप्रतीत जैनीसरदहे॥२१॥ ॥अंक संख्या कथन ॥ ॥चामर छंद॥ चार एक तीन चार पांच दो छ तीन ले। १-प्रथम एक गोल कुआं ऐसा कल्पित करो जो एक महा जोजन (जो दो हजार कोश का माना गया है ) गहरा हो और जिस्की व्यास रेखाभी इतनी ही हो फिर उत्तम भोग भूमि के सात दिन के अंदर जने हुये भेड़ के बच्चों के अग्र भाग रूम ऐसे सुक्ष्म कल्पित करो जिस्के खण्ड न होसके उन रूमन की संख्या जिन शास्त्र में ४५ अंकवताई है देखो टिप्पुण चामर छंद गणिता २१५ इन रूमन को उस कुय में ऐसा कूट कूट भरी जो और न ासकै फिर सौ सौ वर्ष में एक एक रूम निकालो जितने वर्ष विदीत होंगे सो प्रथम पन्य की संख्या है इस पल्य का काल केवल गिणती बताने के अर्थ है और कोई प्रयोजन नहीं रूमन की संख्या पर दो विंदु देने से वर्षों की संख्या जानो। २-सुगमता अर्थ अंक गिणती दिखावे हैं- १३४५२६३०३०८२०३१७७७४९५१२१९२०००००००००००००००००० पापुराण मापा। ५६ सुन्न तीनै सुन्न आँठ दोय अंक सुन्न दे॥ तीनै एक सात सात सात चारें नौकरो। पांचएक दोयएक नौसमारदोधरो॥२१५॥ ॥ दोहा छंद ॥ साँतबीस ये अंकलिख, और अठारह सुन्न। प्रथम पल्ल के रोम की, यह संख्या परिपुन्न॥२१६॥ ॥१५मात्रा चौपाई छंद॥ सौ सौ बरस बीत जब जाहिं । एक एक काढ़ोया माहिं।। ऐसीविधिसबकरतेसोय। कूप उदरजबखालीहोय॥२१७। जो कुछ लगै काल परवान । सो ब्योहार पल्ल उरान । प्रथमपल्लसब लघुरूप । बीजभूतभाष्योजगभूप।२१८। ॥ दोहा छंद ॥ संख्या कारण जिनकह्यो, और नयासों काज ॥ दुतिय पल्लविबरण सुनो, जोभाषो जिनराज।२१९॥ १५॥मात्रा चौपाई छंद ॥ पूरब कथित रोम सबधरो। तिनके अंश कल्पना करो ॥ (१-संपूर्ण॥२-पहले कहेहुये रुमनसे प्रविरूमइतने अंश कल्पनाकरोमितने असंख्य क्रोड़ वर्षके समय हो फिर इस कल्पित रूम रासिसे समय समय में एक एक नि- कालो जितना काललगै सो दुतिय पल्यकाल है, पच्चीस कोड़ गुणे हुई.एक कोड दुतिय पल्यके रूमन की जितनी संख्या है उतनेही दीप समुद्र मथ्वीपर जानो।

६०
पार्षपुराण भाषा।
बरसअसंखकोटकेजिते।समैहोहिं आतम परिमिते।२२०॥
एक एक के तावत मान । कराभाग बिकलप मन आन॥
याविधिष्ठान रोमकीरास।समैंसमें प्रतिएकनिकास।२२१॥
जितनो काल होय सबयेह।सोउद्धार पल्ल सुन लेह ॥
यारोमनसों परवान। दीपोदधिकी संख्या जान । २२२।
॥दोहा छंद ॥
कोड़ाकोड़ पचीस के, पल्ल रोम जावन्त ।।
तितनेदीप समुद्रसब, बरने जैन सिद्धन्त । २२३ ।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
अबसुनत्रितियपल्लककिथा।श्रीजिन शासन बरनी यथा॥
दुतियपल्लकेअमितअपार।रोमअंश लीजै निर्धार ।२२४॥
एक एक के भाग प्रमान । कर सौ वर्ष समय परवान ॥
इहिबिधिरासिहोयफिरएहासमैंसमैप्रतिलीजै तेह । २२५॥
असे करत लगैजे काल । सोई अर्धापल्ल विशाल ॥
करमनकीतिथियासोंजान । यहउत्कृष्टकहीभगवान।२२६।
१-दुतिय पल्यके रूम संख्या से मतिरूम उतने अंश कल्पना करो जितने सौवर्ष
के समय होय फिर समय २ में एक एक निकालो जोकाल लगै सो तीसरी अर्धापल्य
के काल की संख्या है जो असंख्यात तीनो पल्य यह अर्धापल्य बड़ी है-दश
कोड़ अर्धापल्य को एक कोड़ अर्धापल्य में गुणो जो गुणलब्धि प्राप्तहो उसके
कालकी वरावर एक अर्धा कहिये बड़ा सागर होता है इसही सागर से यहनीव
पुन्य पापकर स्वर्ग नर्क मैं स्थित रहता है।
मैं

पावपुराण भापा.
॥ दोहा छंद ॥
प्रथमपल्लसंख्यातमित,दुतिय असंख्यपरिमान॥
असंख्यातगुणतीसरी,लिखोजिनागमजान। २२७॥
इन सब तीनो पल्ल मैं, अर्धापल्ले महान ॥
देश कोड़ा कोड़ी गये, अर्धासागर ठान । २२८ ।
इसही अर्धा सिंधुसों, पुन्न पाप परिभाव ।।
संसारीजन भोगवै, स्वर्ग नर्क की आव । २२९ ।
असे दीरघ काललों, नर्क सातवें थान ॥
कमठ जीव दुखभोगवै, परो कर्म बश आन। २३० ।
धिकधिकविशयकषायमल,येवैरीजगमाहिं।
येहीमोहित जीवको, अवश नरक लेजाहि । २३१॥
धर्म पदारथ धन्यजग, जापटतर कछुनाहिं ।।
दुर्गति बास बचायकै, धरैस्वर्ग शिवमाहिं । २३२।
यही जान जिन धर्मको, सेवो बुद्धि विशाल ॥
मनतन बचन लगाय कै,तिहुँपन तीनोकाल । २३३ ।
इतिश्रीपार्श्वपुराण भापा वजनामिनाम चक्रवर्तहोकर फिर स्वर्गमैं अहमिंद्रहोसुख
वाभीलका नरकमैं दुख भोगननाम तृतीय अधिकार संपूर्णम् ।।
॥ चतुर्थ अधिकार ॥
॥दोहा छंद ॥
मारूथल संसार, बामा नंदन कल्प तरु ॥

पापुराण भाषा।
बंछितफल दातार, सुखकामी सेवो सदा । १।
॥१५मात्रा चौपाई छंद।
इसही जम्बूदीप मझार। भरथ खण्ड दचिन दिशसार ॥
कौशलदेशवसैअभिराम । नगर अयोध्या उत्तमठाम ।२।
आरज खण्ड माहिं परधान ।मध्य भाग राजै शुभथान ॥
गढ़गोपुर खाईग्रह पांत । बन घन सों सोहैं बहुभांत।३
ऊंचे जिन मंदिर मनहरैं । कंचन कलश धुजा फरहरैं।
बजबाहु भूपति तिहिंथान। बरइण्वाक बंश नभ भान।४।
जैनधर्म पालै बड़भाग । जिनपद कमलनि मधुप सराग।
प्रभाकरी तियताघरसती ।जीतीजिन रंभारति रती।५
॥दोहा छंद॥
यथाहंस के बंश को, चाल न सिखवै कोय॥
त्यों कुलीन नर नारिके, सहज नमन गुणहोय।६।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
वह अहमिंद्र तहां तै चयो। तिनके सुदिन पुत्र सो भयो ।
१-जिस प्रभाकरीनै रंभा कहियै पार्वती शिवकी स्त्री रतिकहियै कामदेवकी स्त्री
का भाग जीत लिया।-, :
.

पापुराण भाषा।
नामधरो आनन्द कुमार। अतुलतेज सब लक्षणसार ।।
सुभग सोम श्रीवंत महान। बलबीरज धीरज गुणथान ॥
नरनारी मन माणक चोर।देखत नयनरहैं जा ओर।।
जाके सुगुण शेष कह थके। और कौन वरनन करसके ।
जोबनवन्तजनक तिसदेष।ब्याहमहोत्सव कियो विशेषा।
परनी राज सुता बहु भाय। जिनकी छवि बरनी नहिंजाय ।।
क्रमसों कुमर पिता पद पाय।बलसे वश कीये बहुराया१०॥
॥दोहा छंद॥
योबनवयसंपतिबढ़ी,मिलोसकल सुखयोग ॥
महा मंडली पद लयो, पूरब पुन नियोग ।११।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
अबसुन आठजातिके भूपाजिनको जिनमत कह्योसरूप ॥
कोट ग्राम को अधिपति होय। राजा नाम कहावै सोय।१२।
नवें पांच सौ राजा जाहि । अधि राजा नृप कहिये ताहि ॥
सहसराय जिस मानै आन। महाराज राजा बहुजान ।१३।
दोय सहस नृप नवे अशेश । मंडलीक वह अर्ध नरेश ॥
चार सहस जिस पूर्जे पाय। सोई मंडलीक नरराय।१४।
आठ सहस भूपति को ईश । मंडलीक सो महा महीश ॥
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४ पापुराण भापा । सोलह सहस न भूपाल।सोअधचक्रीपुन्यविशाल।१५॥ सहस बतीस आन जिस वहैं। ताहि सकल चक्री बुधकहैं इनमें श्री आनंद नरेश । महामंडली.पद परमेश । १६॥ ॥सोरठा छंद आठ सहस सुख हेत, नृप नक्षत्र सेवै सदा। कीरति किरण समेत, सोहै नरपति चंद्रमा ॥ १७ ॥ ॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥ एक दिना आनंद महीश । बैठो सभा सिंहासन शीश ॥ मंत्री तहां स्वामिहितनामाकहै बिवेकी सुबचनताम।१८। स्वामी यह वसंत ऋतुराज।सब जनक” महोछवकाज ॥ नंदीस्वर व्रत औसर येहा करिये प्रभु पूजा जिन गेहा१९ पूजा सदा पाप निर्दलै । पर्वं संजोग महा फल फलै ॥ परम पुन्यको कारनान। नहीं जगतमैं याहि समाना२०॥ ॥दोहा छंद॥ जिनपूजा की भावना, सब दुख हरन उपाय ॥ करते जोफल संपजै, सो वरणो किमजाय । २१ । १-अधअर्थातअर्थ ॥ २-नंदीवर आठवें दीपकानाम जिस्में ५२चैत्यालयअकृत्रिमहै पापुराण भाषा: ॥१५मात्रा चौपाई छंद। सुनराजा मंत्री उपदेश । नगर महोछव कियो विशेश ॥ करसनान जिन मंदिरजायाजैन बिंब पूजे विहसाया २२॥ बहु बिधि पूजा दरब मनोग। धरे आन जिन पूजनयोग । भाव भक्ति सों मंगल ठयो। राजा के मन संशयभयो।२३॥ बिपुलमती मुनिवर तिहि थान। दरशन कारण आयेजान। तिनै पूज नृप पूछे येह । भो मुनिंद्र मुझ मनसंदेह।२४। ॥दोहा छंद प्रत्मा धात पषान की, प्रघट अचेतन अंग। पूजक जन को पुन्यफल, क्योंकर देय अभंग।२५। तुम जगमें संशय तिमर, दूरकरण रवि रूप ॥ यह मुझ भिरम मिटाइये, करै वीनती भूप । २६ । तब ज्ञानी गणधर कहैं, समाधान सुन राय ॥ भविजनको प्रत्मा भगत, महा पुन्य फलदाय॥ २७॥ भाव शुभाशुभ जीब के, उपजै कारण पाय ॥ पुन्य पाप तिनसों बँधै, यो भाषो जिनराय । २८ । कुसुम बरणको जोग लहि, जैसे फटक पषान ॥ अरुन श्याम दुतिकोधरै, यही जीवकीवान । २९ ।

६६
पापुराण भाषा।
सो कारन है दोय विधि, अंत रंग बहिरंग।
तिनके ही उर आय है, जे समझे सरवंग ।३०
बाहिज कारण जानयो, अंतरंग को हेत ॥
सोई अंतर भाव नित, कर्म बंधको देत। ३१॥
जिन परिणामन पुन्यबहु, बंधै अन्यथा नाहिं।
तिन भावनको निमतहै, जिनप्रत्मा जगमाहिं । ३२
चीत राग मुद्रा निरख, शुध आवै भगवान॥
वही भाव कारण महा, पुन्य बंधको जान । ३३ ।
रागद्वेषबरजित अमल,सुखदुख दातानाहिं।
दर्पन क्त भगवान हैं, यह आनो उरमाहिं। ३४
तिनकोचिंतनध्यानजप,थुतिपूजादिविधान ॥
सुफल फलै निज भावसों, है मुक्ती सुखदान । ३५।
जैसे गुण प्रभु के कहे, ते जिन मुद्रा माहि ॥
थिर सरूप रागादिबिन, भूषनआयुध नाहिं । ३६
यद्यपिशिल्पीकृतकृतम, जिनवरविवअचेत ॥
तदपि सही.अंतर विषे; शुभ भावनको हेत। ३७
और एक द्रष्टांत अब, सुनअवनीपतिसोय ॥
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१-जीव के परिणाम पलटने के दोकारण हैं एक अंतरंग कारण जैसे सत्ता में
स्थितकर्म परिमाण जो उदयावली मैं आकर आत्मा को रागीद्वेषीं करते हैं वहिरंग
कारण यथा कठोर बचनः श्रवन, स्त्रीदर्शनादि से।

पायुराण भाषा ।
६७/
जियके उर द्रष्टांत सों, संशय रहै न कोय । ३८॥
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद॥
गणिका धरी चितामै जाय । बिसनी पुरुष देखपछताय ।।
जोजीवतंमुझमिलतोजोग। तोमैकरतोबंछितभोग। ३९।
स्वान कहै उरक्यों यह दही। मैं निज भक्षण करतो सही।
पुंनितिसदेषकहैमुनिराय। क्योनकियोतपयहतनपाया४०॥
इहिबिधि देष अचेतन अंग । उपजे भावपाय परसंग ॥
तिनहीभावनके अनुसार।लाग्योफलतिनकोतिहिंवारा४१
॥ दोहा छंद ॥
विसनी नर नरकहुँ गयो, लहो छुदादुख स्वान ॥
साधु सुरंग पहुँचेसही, भावन को फलजान । ४२ ।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
योजिनबिंब अचेतन रूप। सुखदायक तुम जानो भूप ॥
कारनसम कारज संपजै। यामैं बुधसंशय नहिं भजै।४३,
॥दोहा छंद।
जैसै चिंतामणि रतन, मन बंछित दातार ।।
."
१-जीवके अर्थात् प्राणी के॥

६६ पापुराण भाषा । तथा अचेतन बिंब यह, बंछापूरण हार । ४४॥ जोयांचत सुखकल्प तरु, दानी जनको देय॥ त्यों अचेत यह देत है, पूजक को सुख श्रेय ॥४५॥ मणि मंत्रादिक औषधी, हैं प्रत्यक्ष जड़ रूप। विष रोगादिक को हरें, त्यों यह अघहरभूप ॥४६॥ जड़ सरूप को पूज पद, प्रघट देखये लोय॥ राजपत्र सिर धारयै, मुद्रा अंकित होय ॥४७॥ राजपत्र सिर धारय, राजा को भयमान ॥ जिनवर मुद्रा पूजय, पातक को डर जान ॥४८ प्रत्मा पूजन चितवन, दरशनादि विधान ॥ हैं प्रमान तिहुं कालमें, तीन लोक मैं जान ॥४६॥ जे प्रत्मा पूजे नहीं, निंद्या करें अजान ॥ तीनलोकतिहुं कालमें, तिनसम अधमनान। ५०॥ जे प्रत्मा पूजें सदा, भाव भक्ति विधि शुद्ध । तिनको जन्म सराहिये, धन तिनकी सदबुद्ध ॥५१॥ इत्यादिक उपदेश सुन, आई उर परतीत ।। जिन प्रत्मा पूजन विषै, धरी राय दिढ़ प्रीत॥५२॥ ॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥ तिसऔसर मुनि वरनै ताम। तीन भवनबरती जिन धाम। १-परतने वाले ॥

पार्षपुराण भापा।
भानु विमान विषै जिन गेह।सो पहले बरने धरनेह।५३॥
रत्नं मई प्रत्मा जग मगै। कोट भानु छबि छीणी लगै॥
निरुपमरचनाविविधविशालासूरयदेवल मैं तिहुंकाल।५४॥
सुन आनंदो आनंद राय। विकसत आनन अंगनमाय ॥
जब संदेह शल्य निर्वरै। तब अवश्य उर सुख विस्त ५५
प्रात सांझ मंदिर चढ़ साय। अर्घ देय रवि सन्मुख होय॥
करजिनबिंबनकोमनध्यानाअस्तुतिकरैरागमनाना५६।
रबि विमाण मणि कंचन मई।निर्मापो अद्भुत छवि छई ॥
जैनभवनकरमंडितसोया देखत जनमनअचरज होय।५७॥
पूजा तहां करै नित राय । महा महोछव हर्ष बढ़ाय ॥
प्रतिदिनदेयदयाउरान। दीन दुखितजनकोबहुदाना५८।
यह नित नेम करै भूपाल । चली नगर मैं सोई चाल ।
सब सूरज को करें प्रणाम। देखा देख चलो मतताम ।५९।
समझे नहीं मूढ़ परणये । भानु उपासक तब सो भये ॥
जो महंत नर कारज करै। ताकी रीत जगत आचरै।६०॥
यो बहु पुन्न करै भूपाल । सुख मैं जात न जानो काल ।
एक दिना निजसभानरेशानिवसै मानो स्वर्ग सुरेशा
धवल केश देषो. निज़ शीश। मन कंप्यो शोचै नरईश ।।
जाहि देष मनउत्सव घटै। कामी जीवनको उर फटै।६२।
१-समाय॥

पापुराण भाषा:
सो लख शेत बाल भूपाल । भोग.उदास भये ततकालः॥
जगतरीतसबअथिरअसारचिंतैचितमैं मोह निवार।६३
बाल अवस्था भई वितीत । तरुणाई आई निज रीत ।
सो अबबीती जरा पसाया मरण दिवस यों पहुंचैाय।६४
बालक काया फॅपल सोय। पत्र रूप जोवन मैं होय.॥
पाको पात जरा तन करै। काल बयाल.चलत भरपर।६५॥
कोई गर्भ माहिं खिर जाय । कोई जन्मत छोड़े काय ॥
कोई वाल दशा धर मरै। तरुण अवस्था तन परिहरै।६६।
मरन दिवस को नेम न कोय।यातें कछु सुध पर न लोय।
एक नेम यहतो परिवान ।जन्म धरै सो मरै निदान।६७।
महा पुरुष उपजे बड़ भाग।सब परलोक गएतन त्याग॥
संसारी जन अपनी बार । पूरब उदै करै अनुसार।६८।
परबतपतत नदी के न्यायाछिनहीछिन थितिबीती जाय॥
राग अंधप्रानीजगमाहिांभोग मगन कछुसोचैनाहिं।६९।
अंतकाल जब पहुंचे प्राय । कहाहोय जो तब पछिताय।
पानी पहले बंधैपाल । वही कामावै जलकालं।७०।
यही जान आतमहित हेत। करें विलंब न संत सुचेत ॥
आजकालजेकरत रहाहिं। ते अजान पीछे पछताहिं।७१॥
रात दिवसघटमाल सुभाव । भरहिंजल जीवन कीआव॥
१-संसारी-जन-अपनी बार अर्थात् समय को पूरब उदय कर्म के अनुसार
विदीत करै है॥
..
I

-
पश्चिपुराण भाषा
सूर्य चांद बैलये दोय। काल रहट नित फेरै सोय।७२।
॥ वारहभावना विवर्ण ॥
१ अथिरभावना॥
दोहा छंद
राजा राणा क्षत्रपति, हथियन के असवार।
मरना सबको एक दिन, अपनी अपनी बार।७३ ।
॥२अशरण भावना॥
दल बल देवी देवता, मात पिता परवार ॥
मरती बरयों जीव को, कुई. न राखण हार।७४
॥३ संसार भावना॥
दामबिना निर्धन दुखी, तिश्नावश धनवान ॥
कहीन सुख संसार में, सबजग. देखो छान ।७५॥
॥४एकत्व भावना॥
आप अकेला अवतरै मरे अकेला होय.॥
:योंकवही इस जीवका, साथी सगा न कोय । ७६ ।
.

७२
पार्थपुराण भाषा!
॥
.
॥५अन्यत्व भावना॥
जहां देह अपनी नहीं, तहां न अपनो कोय ॥
परसंपति पर प्रगट ये, पर हैं परयन लोय । ७७
॥ ६ अशुचि भावना ॥
दिपै चाम चादर मढ़ी, हाड़ पीजरा देह ॥
भीतर यासम जगत में, और नहीं घिनगेह। ७८ ॥
॥७आश्रवभावना॥
॥सोरठा छंद॥
मोह नींद के जोर, जग बासी घूमैं सदा ॥
कर्म चोर चहुँ ओर, सरबस लूटें सुधनहीं । ७६ ॥
॥८संबर भावना॥
सतगुरु देह जगाय, मोह नींद जब उपशमैं।
तब कल्लु बने उपाय, कर्म चोर आवत रुकै।८०॥
॥ निर्जराभावना॥
॥दोहा छंद ॥..
ज्ञानदीप तपतेल भर, घर सोधै भ्रम छोर ॥
१-यह बात प्रघट है कि परसंपति पर हैं।
-

पार्चपुराण भाषा
७३
MAP
*
-1
याबिधि विन निकसैं नहीं, बैठे पूरव चोर । ८१।
पंचमहाव्रत संचरन, समति पंच परकार ॥
प्रवलपंच इन्द्री विजय, धार निर्जरा सार । ८२।
॥१० लोक भावना।
चौदह राजु उतंग नभ, लोक पुरुष संठान ।
तामै जीव अनादि सों, भरमत है बिन ज्ञान । ८३॥
॥११धर्म भावना॥
यांचे सुरतरु देय सुर्ख, चिंतन चित्यारेन ॥
बिन यांचे बिन चिंतवै, धर्म सकल सुख दैन । ८४
॥१२बोधदुर्लभ भावना॥
धनकन कंचन राजसुख, सवै सुलभ करजान ॥
दुर्लभ है. संसारमें, एक यथारथ ज्ञान । ८५ ।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
इहिबिधि भूप भावना भाय। हितउद्यम चिंत्यो मनलाय ॥
सबसों मोहममत निर्वार। उठो धीर धीरज उरधार। ८६ ।
१-रैन प्राकृत शब्दरल अर्थ में है चिंत्यारैन चिंत्यामणि रत्न. .
।

पार्श्वपुराण भापा! ७४. जेठे सुत्तको दीनो राज।आप चले शिव साधन काज॥ सागरदत्त मुनीश्वरपास।संयमलियोतजीजगास.८७॥ घने भप भूपति के संग । धरे महाबत निर्भय अंग॥ अब आनंद महामुनिधीर।बननिवास बिचरै वरवीर।८८। दुद्धरतपं बारह बिधि करै। दुबिधि संग ममता परिहरै ॥ तिनके नाम कहूंकुछधार। जिनशासनजिनकोविस्तारा८९॥ प्रथम महातप.अनशन नाम। दूजो ऊनोदर गुणधाम ॥ तीजोहैव्रत परिसंख्यानारसपरित्याग चतुर्थम मान।९। पंचमाभिन संयनाशन सार।काय कलेश छठो अबिकार ।। यहषटबिधिबाहजतपजानाअबअन्तरतपसुनोसुजाना। पहले प्रांछित बिनय दुतीय । बैयाब्रत तीजो गनलीय ॥ चौथो अंतरंग सिझाया पंचमतपब्युत्सर्ग बताय।१२। षष्टम ध्यान हरै सब खेद । ये अन्तरतप के संब भेदः ॥ अबइनको संछेप सरूप।सुनोसंततज भाव बिरूप ॥३॥ जिनके सुनत बँधै शुभध्यान । सेवत पद लहिये निर्बान । तपबिन तीनकालतिहुँलोयाकर्मनाशकबही नहिंहोया६४) दिनसों लेय बरष लग करै। चार प्रकार अशन परिहरै॥ रागरोग निर्दलन उपायासोअनशनभाष्यो जिनराया९५॥ १-धारना कर के २-खाय यथा रोटीपूरी आदि १, स्वाध यथा चूसने की वस्तु आम्रआदि.२, लेहय यथा चाटने की वस्तु चटनी आदि ३, पेयायथा पीने की वस्तु दूध आदि ४; -

पार्श्वपुराण भापा
पौन अर्ध चौथाई टेक। एक ग्रास अथवा कन एक ॥
ऐसीविधि जो भोजनलेत। ऊनोदर बालस हरलेत ।९६॥
जैसी प्रथम प्रतिज्ञा करै। ताही विधि भोजन आदरै ।।
सोकहियेव्रतपरिसंख्यानाआशाब्याधि विनाशनजाना
लवनादिक रस छार उपाध। नीरसभोजन भुंजै साधं ॥
रसपरित्याग कहावैएम। इन्द्रीमद नाशन यह नेम । ६८
सूनगेह गिरगुफा मसान। नारि नपुंसक बरजित थान ।।
बसैभिन्न शयनासन सोय। यासों सिद्धिध्यान कीहोय।।
ग्रीषम काल बसै गिरि सीस। पावस में तरुवर तलदीस।।
शीतसमै तटनीतट रहै। काय कलेश कहावै यहै। १००।
॥ दोहा छंद ॥
यातप के आचरन सों, सहन शील मुनि होय ॥
अवअन्तर तपभेद छह, कहूं जिनागमजोय।१०१
॥१५ मात्राचौपाई छंद।
जो प्रमाद बश लागै दोष । सोधै ताहि छोड़ छल रोष ॥
आचारय बानीअनुसारायहीप्रथमप्राश्चिततपसार।१०२॥
जे गुण जेठे साधु महंत । दरशन ज्ञानी चारित वंत ।
तिनकी विनैकरैमनलाय। विनैनामतपसोसुखदाया१०३
१-जे साधु गुणों में जठे अर्थात् बड़े हैं ।।
.

७६
पार्थपुराण भाषा-1
रोगादिकपीड़ित अविलोय । बालविरध मुनिवर जोहोय।।
सेव करै निजसंयमराख ।सो वैयाव्रत आगमसाख १०४।
शक्ति समान सकल गुण ठाठ । करै साधु परमागमपाठ॥
परमोतमतपसोसिझायाजासोंसबसंशय मिटजाया१०५॥
निज शरीर ममता परिहरै। काउंसर्ग मुद्रा दिढ़ धरै ।।
अंतर बाहर परिग्रह छार । सोईतपव्युत्सर्गउदार। १०६।
भारत रुद्र निवारै सोय । धर्म शुकुल ध्यावै थिरहोय ॥
जहांसकलंचिंतामिटजाहिावहीध्यानतपजिनमतमाहि।१०७
॥ दोहा छंद।
यह बारहविधि तपविषम,तपैमहामुनिधीर।
सहै परीषह बीसदो, ते अब वरYवीर । १०८ ।
॥ समुच्चय २२ परीषहनाम ॥
॥ छप्पै छंद॥
छुधातृषाहिम उश्न डंस मंसक दुख भारी ।
निरावरनतन अति वेद उप जावन नारी॥
चेरया आर्सन शयन दुष्ट वायकवधर्वधन।
यांचैनहींअलाभरोगतिण फरस निबंधन॥

पार्षपुराण भाषा।
मलजैनितमानसेनमानवस.प्रज्ञाऔर अज्ञानकर।।
दरशनमलीनबाईससब,साधुपरीषहजानन।१०९
॥ दोहा छंद ॥
सूत्र पाठ अनुसार ये, कहे परीषह नाम ।।
इनके दुखजे मुनिसहैं, तिनप्रतिसदा प्रणाम।११०॥
॥भिन्न भिन्न २२ परीषह विवर्ण ॥
॥ पोमावती छंद ॥
॥१ तुधा परीषह॥
अनशन ऊनोदर तप पोषत, पापमासदिन बीतगये हैं।
जोग नबनै योग भिक्षा विधि, सूकअंगसब शिथलभये हैं।
तबबहु दुसह भूखकी बेदन, सहत साधुनहिं नेक नये हैं।
तिनकेचरणकमलप्रतिदिनदिन,हाथजोरहमसीसठयेहैं:११
॥२ तृषापरीषह॥
पराधीन मुनिवरकी भिक्षा , परघर लेहिं कहैं कछुनाहीं॥
प्रकृति विरोध पारना जत,बढ़तप्यासकी त्रास तहांही।

पापुराण भाषा:।
,
ग्रीषसकाल पित्तप्रति कोपै,लोचन.दोयफिरे जबजाहीं॥
नीर न चहें सहैं ऐसे मुनि, जैवते बरतो जगमाहीं।११२॥
॥३ शीतपरीषह॥
शीतकाल सबहीजन कपि, खड़ेजहां बनविरछ डहे हैं।
झंझावायु बहै वरषाऋतु , वरषत बादल झूमरहे हैं।
तहां धीर तटनी तट चौबट , ताल पालपै कर्मदहे हैं।
सह सँभाल शीत कीबाधा,तेमुनितारनतरन कहे हैं।११३॥
॥४ उष्णपरीषह॥
भूखप्यास पीडै. उर अंतर , प्रजलै प्रांत देह सब दागै॥
अग्निसरूप धूप ग्रीषम की , ताती बाल झालसी लागै॥
तपै पहार ताप तन उपजै , कोपै पित्त दाह ज्वरजागै॥
इत्यादिकग्रीषमकीबाधा,सहतसाधुधीरजनहित्याग।१.१४॥
॥ ५ डंसमंसकपरीषह ॥
डंस मंस माखी तन काटें पीड़ें, बनपंछी बहुतेरे ॥
डसैं ब्याल विषयाले बीछू , लगें खजूरे आन घनेरे॥
सिंह स्याल सुंडाल सतावै, रीछरोझ दुख देहिं बड़ेरे ॥
ऐसे कष्टसहैं.समभावन., ते मुनिरांज हरो अघ मेरे।११५

पापुराण भापा..
,
॥६नग्नपरीपह॥
अंतर विषय बासना बरतै , बाहर लोकलाजभयभारी॥
तातें परम दिगंबर मुद्रा, धरनहिं सकें दीन संसारी ॥
ऐसी दुहर नगन परीषह , जीतें साधु शाल व्रत धारी॥
निर्विकारबालकवतनिर्भय,तिनकेपायन ढोकहमारी॥११६
॥७ अरतिपरीषहः॥
देश कालको कारन लहिकै, होत अचैन अनेक प्रकारे।
तबंतहांतिन्नहोहिजगबासी , कलमलायथिरतापदछारै ।।
ऐसी अरति परीषह उपजत , तहां धीर धीरज उरधारे।
ऐसे साधनको उरअंतर, बसो निरंतर नाम हमारे।११७॥
॥८ स्त्री परीषह॥
जेप्रधान केहरि को पकरें , पन्नग पकर पावसों चापै ॥
जिनकी तनक देषभों बांकी , कोटक सूरदीनता जापै॥
ऐसेपुरुष पहार उड़ावन , प्रलय पवन तिय वेदपयापै॥
धन्यधन्यतेसाधुसाहसी ,मनसुमेरुजिनकोनहिंकांपै।११८
॥ चर्यापरीषह ॥
चारहाथ परवान निरखपथ, चलत दिष्टइतउत नहिंतान।।
B.

..
पार्चपुराण भाषा:
.
कोमलपाय कठिन धरती पर,धरतधीर बाधा नहिं माने।
नाग तुरंगपालकी चढ़ते , ते सवाद उर याद न आने ।
योमुनिराजभरैचर्यादुख,तबदिढकर्म कुलाचलभान।११९)
॥१० आसनपरीषह ॥
गुफा मसान शैल तरु कोटर , निवसै जहांशुद्धि हेरै ॥
परिमित कालरहैं निश्चलतन,वारबार आसन नहिं फेरै।
मानुषदेव अचेतन पशुकृत , बैठे विपत आनजब धेरै॥
ठौर न तजैभजैथिरता पद,तेगुरु सदाबसो उरमेरै।१२०॥
॥११ शयन परीषह ॥
जेमहान सोनेके महलंन , सुंदरसेज सोय सुखजोवै॥
तेअब अचलअंगएकासन , कोमल कठिन भूमिपरसौवें ॥
पाहन खंड कठोर कांकरी ,गड़त कोर कायर नहिं होवें॥
ऐसीशयनपरीषहजीतत,तेमुनिकर्म कालमाधो३।१२१॥
॥ १२ आक्रोश परीषह॥
जगत जीव यावंत चराचर,सबके हित सबके सुखदानी ॥
तिनै देख दुर्वचन कहैं दुठः, पाखंडी ठग यह अभिमानी।।
मारो याहि. पकर पापीको , तपसी भेष.चोर है छानी॥

पापुराण भाषा।
ऐसेवचन बाँणकीवर्षा । छिमाढाल श्रोटें मुनिज्ञानी ।१२२॥
॥१३ बधबंधनपरीषह।,
निपराध निर्वैर महामुनि । तिनको दुष्टलोग मिल मारें ।।
कई खेंच थंभ सो बाँधत । केई पावक में परजारें।
तहाँ कोप नहिं करहिं कदाचित। पूरब कर्म विपाकविचारें।
समरथहोय सहबधबंधनाते गुरुसदासहायहमारें। १२३।
॥१४ याँचनापरीषह ॥
घोरवीर तपकरत तपोधन, भयो क्षीण सूकी गल वाहीं ॥
अस्थिचामअवशेषरहोतन, नसाजालझलकोजिसमाहीं॥
औषधि प्रशन पान इत्याद्रिक,प्रानज़ाय परयांचतनाहीं॥
दुदर अयाचीकवतधारे, करहिनमलिनधरमपरबाही १२४
॥१५ अलाभपरीषह ॥
एकबार भोजन की बरयां, मौनसाध बसती मैं श्रावैं ॥
जो नवनै योग भिक्षाविधि, तौ महंत मन खेद न लावै ।।
ऐसेभ्रमत बहुत दिन बीते, तब तप विरद भावना भावें ।
योअलाभ की परम परीषह, सहसाधुसोई शिवपा३।१२५॥
१-तप है धन जिसके।

पापुराण भाषा।
- " ॥ १६ रोगपरीपह॥
बायपित्त कफशोणित चारों; येजब घटें बढ़े तन माहैं।
रोग सँयोग सोगं तन उपजत,जगत जीव कायरहोजाहैं।
ऐसीव्याधि वेदना दारुन, सहैं शूर उपचार न चाहैं ।
आत्मलीनदेहसोंबिरकत,जैनयतीनिजनेमनिवाहें।१२६॥
॥ १७ तृणस्पर्शपरीषह ॥
सूकेतृण अरु तिक्षणकांटे, कठिन कांकरी पायविदारें ॥
रज उड़ आय परै लोचनमैं, तीरफांस तनपीर विथारें ॥
तापर पर सहाय नहिं बांछित, अपने करसों काढ़न डा
योतण परस परीषह विजई, तेगुरु भवभव शरणहमारे॥
॥ १८ मलपरीषह ॥
यावजीव जलन्होन तजोजिन, नग्नरूप बनथान खरेहैं
चौं पसेवधूपकी बरयाँ, उड़त धूलसब अंगभरेहैं
मलिनदेहको देषमहामुनि, मलिन भावडर नॉहिकरेंहैं ।
योमलजनितपरीषहजीतें, तिनैहाथहम सीसधरेहैं।१२८॥
१-अर्थात् यावत् ।

पापुराण भाषा.
॥१६ सत्कारपरीषह ॥
जेमहान विद्यानिधिविजई, चिरतपसी गुण अतुलभरेहैं।
तिनकीविनयवचनसों अथवा, उठप्रणाम जननाहिकरहें।
तौमुनितहाँ खेद नहिं मानें, उर मलीनता भाव हरेहैं ।
ऐसेपरमसाधुके अहनिशि, हाथज़ोरहमपायपरेहैं ।१२६॥
॥२० प्रज्ञापरीषह॥
तर्क छंद व्याकर्ण कलानिधि, आगम अलंकार पढ़जानें।
जाकी सुमतिदेख परवादी, बिलखत होय लाजउरानें।
जैसेनाद सुनत केहरकी, बन गयंद भागत भयमाने ।
ऐसी महाबुद्धिकेभाजन, परमुनीश मदरचन ठानें ।१३०॥
॥ २१ अज्ञानपरीषह ॥
सावधान बरतें निशवासर, संयम शूर परम वैरागी ॥
पालत गुप्तिगए दीरघ दिन, सकलसंगममता परत्यागी।
अवधिज्ञानअथवामनपये, केवलकिरणअझोनहिंजागी॥
योंबिकल्पनाहिकरहितपोधन,सोअज्ञानविजईबड़भागी?
- ॥ २२ दर्शनपरीपह ॥
मैं चिरकाल घोरतप कीने, अजोरिद अतिशयनहिं जागै॥

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पापुराण भाषा।
॥
तपबलसिद्धहोहिं सबसुनिये, सोकुछबति झूठसी लागै ॥
योकदापि चितमें नहिचिंतत, समकितशुद्धशांतरसपागै॥
सोईसाधु अदर्शन बिजई, ताके दर्शनसोंअघभाग।१३२॥
परीषह उदैविवर्ण
॥ घनाक्षरी छंद॥
ज्ञानावरणीसोंदोय; प्रज्ञा ओ अज्ञानहोय ।
एक महा मोह तें, अदर्शन बखानये ।।
अंतराय कर्मसेती, उपजै अलाभ दुख ।
सप्त चारित्र मोहनी के बल जानये ॥
नगन निषिद्या नारी, मान सन्मान गारी।
याचना अंरति सब, ग्यारै ठीक ठानये॥
एकादश बाकीरही, वेदनी उदोत कही।
बाइस परीषो उदै, ऐसे उर आनये। १३३॥
॥ अडिल छंद ॥
एकबार इनमाहि, एक मुनि के कही।
सब उनीस उतकृष्ट, उदै आवें सही ॥
Ma.

पार्षपुराण भाषा।
1
आसन शैन बिहार, दोय इनमाहिं की।
शीत उश्नमें एक, तीनये नाहिं की । १३४॥
॥ दोहा छंद॥
अब दशलक्षण-धर्मके, कहूँ मूल दश अंग।
जे नित श्री आनंद मुनि, पालत हैं सरवंग।१३५
॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
बिनादोष दुर्जन दुखदेय । समरथ होय.सकल- सहलेय॥
क्रोधकषाय नउपजै जहां। उत्तम छिमाकहावैतहां ।१३६।
आठ महामद पाय अनूप । निर्भिमान बरतै मृदुरूप ॥
मानकषाय जहां नहिं होय। मार्दव नाम धर्म है सोय।१३७
जो मनचिंते सोमुख कहै। करै कायसों कारज वहै ।
माया चारन डर पाइये। आर्जव धर्म यही गाइये।१३८॥
बोल बचन स्वपर हितकार । सत्य सुरूप सुधा उनहार ॥
मिथ्या बचन कहै नहिंभूल ।सोई सत्यधर्म तरुमूल।१३९।
पर कामिन पर दरब मझार । जो विरक्त बरतै छल छार॥
अंतर शुद्धहोय सरबंग। सोई शौच धर्म को अंग।१४०॥
१-निभिमान

८६
पार्षपुराण भाषा!
मन समेत ये इन्द्री पंच । इनको शिथल करै नहिं रंच॥
त्रस थावर की रक्षा जोय।संयमधर्मबखानोसोय १४१॥
ख्याति लाभ पूजा सब छंड । पंचकरण को दीजै दंड ॥
सोतपधर्मकहोजगसार।अनशनादिबारहपरकार । १४२॥
संयमधारी वति परधान । दीजैचहुँ विधि उत्तम दान ॥
तथादुष्टविकलपपरिहार । त्यागधर्मवहुसुख दातार।१४३॥
बाहिजपरिग्रह को परित्याग। अंतर ममता रहै न लाग॥
आकिंचनयहधर्ममहानाशिवपद दायक निश्चैजान।१४४॥
बड़ी नारिं जननी समजान लघु पुत्री सम बहिनबखान॥
तज विकार मन बरते जेह।ब्रह्मचर्य परिपूरण येह ।१४५॥
॥ दोहा.
छंद ॥
सोलह कारण भावना, भावें मुनि आनंद ।
तिनकोनाम सरूपकुछ, लिखू सकलसुख कंदा१४६।
॥१५ मात्राचौपाई छंद॥
आठे दोष मद आठ मलीन छैअनाय तन सठता तीन ।
१-नहिं रंच-सर्व अर्थात् विलकुल या यों कहो इन्द्रियों को ऐसा शिथल करै
जो, फिर राचै नहीं ॥ , २-दुष्ट विकलंप-खोटा विचार, भावार्थ राग द्वेष ॥.
सम्यक्त के.सर्व.२५ दोष यह हैं, प्रथम आठ दोष-शांकित-जिन वचन
मैं शंका करना १ कांक्षित-संसार के सुख की इच्छा करनारविचिकित्सा-मुनि
जनों से ग्लानी करना ३ मूढ़ता-तत्व कुतत्व की पहिचान न कर्ना ४ अनुपगु-
इणता-पराये औगुण अपने गुण प्रघट करना ५ अप्रभावना-अपने धर्म की उमंग

पापुराण भाषा।
८७
येपचीस मल वरजित होय। दर्शन शुद्धिकहावै.सोया१४७१
रत्नात्रय धारी मुनिराय । दर्शन ज्ञान चरित समुदाय ॥
इनकी विनयविषैपरवीनादुतियभावनासोअमलीन।१४८॥
शीलभार धारै समचेत। सहस अठारह अंग समेत ॥
अतीचार नहिंलागैजहां तृतियभावना कहियेतहां। १४९।
आगमकथित अर्थअवधार। यथाशक्तिनिजबुधि अनुसार॥
करैंनिरंतरज्ञानअभ्यासातुरवैभावना कहिये तास।१५०॥
॥ दोहा छंद ॥
धर्म धर्म के फलबिबै बरतें प्रीत विशेष।
यही भावना पंचमी , लिखी जिनागम देष । १५१।
॥१५:त्राचौपाई छंद।
औषधि अभय ज्ञान आहार । महादान यह चार प्रकार ॥
शक्तिसमान सदानिर्वहै । छठीभावना धारक वहै । १५२।
अनशन आदि मुक्ति दातार। उत्तमतप बारह परकार ॥
न करना ६ अमुस्थि करण श्राप वापरको धर्म से डिगसी समय स्थिर न करना
७ अवात्सन्य-धर्मी पुरुषों से प्रीति न करनाट द्वितीय आमदकुलका मद १ वड़ी
जातिका मद २ रूपका मद ३ विद्या का मद ४धनका मद५वलका मद ६ वपका
मद ७ प्रभुताका मर्द छै अनायतन-कुगुरु १ कुदेव कुधर्ष ३ कुगुरु सेवककुदेव
सेवक कुधर्म सेवक ६ इनकी प्रशंसा करना, तीन शठता अर्थात् मूदत्ता-जिनदेव
१ जिन मुनि जिन शास्त्र ३ इनके विपरीतों की मानता करनी ।।

८८,
पार्चपुराण. भाषा।
बलअनुसार करैजोकोय।सोसातमी भावनाहोय। १५३ ॥
यतीबर्ग को कारण पाय । विघ्न होत जो करै सहाय॥
साधुसमाधि कहाँवैसोय। यहीभवना अष्टम होय । १५४ ।
देशविधि साधु जिनागम कहे । पथपीड़तरोगादिक गहे ॥
तिनकी जो सेवा सत्कार। यहीभावना नौमीसार। १५५ ।
परमपूज.बातम अर्हत । अतुल अनन्त चतुष्टय वन्त ॥
तिनकीथुतिनतिपूजाभावादशमभावनाभवजलनावा१५६
जिनवर कथित अर्थ अवधार । रचना करै अनेक-प्रकार ।।
आचारजकी भक्तिविधान। एकादशम भावनाजान।१५७॥
बिद्यादायक विद्यालीन । गुणगरिष्ट पाठक परवीन ॥
तिनकेचरण सदाचितरहै।बहुश्रुतिभक्तिबारमीयहै।१५८)
भगवत भाषत अर्थअनूप।गणधर ग्रंथित ग्रंथ सरूप ॥
तहांभक्तिबरत अमलान। प्रबचनभक्ति तेरमीजान। १५९॥
खटावश्यक क्रिया विधान । तिनकी कबही करै न हान॥
सावधानवरतथिरचित्त। सोचौदहमी परमपवित्त । १६०॥
कर जप तप पूजा व्रत भाव। प्रघट करै जिनधर्म प्रभाव ।
सोई मारग पर भावना । यहै पंच दशमी भावना । १६१ ॥
२-आचार्य १ उपाध्याय २ तपस्वी :३ सैत ४ गलाण.५ गण ६ कुल:७
संघः८ साधु ९ मनोग १०॥. २-परम पूज हैं आत्मा जिनकी ऐसे अति ॥
३-अनंत ज्ञान अनंत दर्शन २ अनंत सुख ३ अंनत बीर्य ४॥
४-समता धारण १स्तुतिउच्चारण २जिन. देववंदना शास्त्र.स्वाध्याय ४ प्रति-
क्रमण-पिछले कियेहुये दोषोंकादंडलेनारामहमिन्द्र-तनधारण की इच्छानकरना ६

पार्षपुराण भापान
चार प्रकार संघ सों प्रीत । राखै गाय वच्छ की रीत ॥
यहीसोलमीसबसुखदायाप्रबचनवात्सल्यअभिधाया१६२
॥दोहा छंद ॥
सोलह कारन भावना, परम पुन्य को खेत ।।
भिन्न भिन्न अरु सोलहों, तिर्थकर पद हेत।१६३।
बंध प्रकृति जिनमत विषे, कही ऐकसौ बीस ॥
सोसतरह मिथ्यात में, बांधत है निश दीस।१६४॥
तिथैकर आहार दुक, तीन प्रकृति ये जान ।।
इनको बंध मिथ्यात मैं, कहो नहीं भगवान ।१६५॥
: तातै तिर्थकर प्रकृति, तीनों समकित माहिं ।।
सोलह कारण सों बँधै, संभको निश्चै नाहिं ।१६६।
॥सोरठा छंद॥
पूजपाद मुनिराय, श्री सर्बारथ सिद्ध मैं॥
कह्योकथनइस न्याय, देखि लीजियोसुबुधजना१६७१
4
१- मुनि ? अर्जिका २ श्रावक श्राविका ॥
.२-अर्थात् एक सौसतरह.३-आहारदुक-श्राहारक आहारक मिश्र २ देपोसूत्र
'जी की टीका गोमठंसारजी काया मारगणा ४-तिर्यकर पदकी प्रकृति का बंध
यह निश्चय नहीं है कि सोलहू कारण भावना के समूह सेही हो भिन्न भिन्न
कारण भावना से भी होसकता है

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पार्यपुराण भाषा
A
॥ कुसुमलता छंद ॥
सोलह कारन ये भव तारन, सुमरत पावन होय हियो ।
भावैश्रीआनंद महामुनि, तिथैकर पदबंध कियो। १६८ ॥
काय कषाय-करी ऋष अतिही, सत संयम गुण पोढ़कियो।
तपबल नानारिख उपन्नी, राग विरोध निवारदिये।१६६ ।
जिसबन योगधरै योगेश्वर, तिस बन की सब विपत टलैं।
पानीभरहिं सरोवर सूके, सबऋतु के फलफूल फलों१७०
सिंहादिक जे जात विरोधी, ते सब बैरी बैर तसें ॥
मोर भुयंगम मूश मजारी, आपस मैमिल प्रीतम ।१७१॥
सोहैं साधु समता रथ बैठे, परमारथ पथ गमन करें
शिवपुर पहुँचन की उरबंछा, औरनकुछ चितचाहधरौं १७२।
देह विरक्त ममत्त बिना मुनि, सबसों मैत्री भाव धेरै ।
आत्मलीनअदीनअनाकुल,गुणवरणतनहिंपारलहैं।१७३॥
एक दिना ते वीर बनांतर, ठाड़े मुनि वैराग भरे ॥
पौनपरीषहसों नहिंकांपै,मेरुशिखर ज्यों अचलखरे॥१७४।
सो मर नरक कमठ चर पापी, नाना भांति विपत्त भरी ॥
तिसही कानन में विकटानन, पंचानन की देहधरी।१७५॥
देष दिगंबर केहरि कोपो, पुर्व भवांतर वैर दहो ।
१-पोढ़ अर्थात् ढ़े किये

पायुराण भाषा। १ धायोदुष्ट दहाड़ततिक्षण, आनअचानक कंठगहो।१७६। तीषे नखन विदारै काया, हाथ कठोरन खण्ड करै । बांकी दाढ़नसतनवेधै, बदन भयानक ग्रास भरै । १७७॥ यो पशुकृत परचंड परीषह, सम भावन सो साधु सही। क्रोधविरोधहियेनहिंआन्यो,परम छिमाउरमांझवही।१७८ धन धन श्री आनंद मुनीश्वर, धन यह धीरज भाव भजे ॥ ऐसे घोर उपद्रव में जिन, योग युगत सों प्राणतजे॥१७॥ अंत समय परयंत तपोधन,शुभ भावन सों नाहिंचये ॥ आनत नाम स्वर्गमस्वामी,सुरगणपूर्जत इन्द्र भये । १८०। ॥ दोहा छंद.॥ स्वर्गलोक वरणन लिखू, यथा शक्ति सुखरीत ॥ धर्म धर्म के फल विषै, ज्यों मन उपजे प्रीत।१८१॥ ॥ स्वर्ग वर्णन ॥ ॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥ चंद्र कांति मूंगा मणि मई । नाना वरण भूमि वरणई । रात दिवस को भेद न जहां रत्न उद्योत निरंतरतहां १८२२

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६२
पार्थपुराण भाषा!
मणि कंगरे कंचन प्राकार । औंडी परिखा ऊँचे हार ।।
तोरण तुगरल ग्रह लसैं । ऐसे स्वर्ग लोक पुरवसे ।१८३॥
चंपक पारियात मंदार । फूलन फैलरही महकार ॥
चैत बिरछ तें बढ़ो सुहाग। ऐसे स्वर्गरवाने बाग। १८४।
विपुल वापिका राजै खरी । निर्मल नीर सुधामय भरी॥
कंचनकमलछईछबिवानामाणकखण्डखचितसोपान १८५
काम धेनु सोहैं सब गाय । कल्पवृक्ष सबही तरुराय ॥
रत्नजातिचिंत्यामाणसबै उपमा कौन स्वर्ग कोफ।१८
गान करै कहिं सुर सुंदरी। बन वीथिन बैठी रस भरी॥
कहीं देवगण बनिता संगालीलाबनविचरें मनरंग।१८७१
मंद सुगंध बहै नित वाय । पहुप रेण रंजित सुख दाय॥
आंधी मेहनकबहींहोय । ताप तुसारनव्यापै कोय।१८८)
ऋतुकी राति फिरैनहिं कदा।सोम काल सुखदायक सदा॥
छत्र भंग चोरी उतपात।सुपने नहीं उपद्रवजात । १८९ ।
ईतिभीत भूचाल न होय । बैरी दुष्ट न दीधै कोय॥
१-ईति-उपद्रव जो सात हैं, यथा बहुत वर्षा होना नहीं वर्षा होना २ टिड्डी
दलाना ३ वहुत जंगली चूहों का पैदा होना ४ बहुत शुक आदि पक्षियों का
उत्पन्न होना ५ स्वदेशी राजा की चढ़ाई दूसरे राजापर ६पर राजा की चढ़ाई
अपने राजापर ७ ॥ भीत अर्थात् भय जो सात हैं यथा इस भवका भर १
परभव का भय २ मरने का भय ३ रोगकष्ट आदिका भय ४ नहीं रक्षा होने का
भय ५ अगुप्त अर्थात् मत्यक्ष होने का भय ६ अकस्मात् चानचककी आफतकामया

पार्षपुराण भाषा।
रोगी दोखी दुखिया दीनाविरधबैस गुण संपतिहीना१६॥
वढ़ती अंग विकलता कहीं। ये सब स्वर्ग लोकमेंनहीं॥
सहजसोमसुंदरसरबंग। सवाभरणअंलंकितअंग।१९१
लक्षण लक्षित सुरभि शरीर । रिड सिद्ध मंदिरमनधीर ।
कामसुरूपीआनंद कंदाकामिन नेत्र कमलनीचंद। १९२।
बदन प्रसन्न प्रीत रसभरे । विनय बुद्धि विद्या प्रागरे ॥
यो बहुगुण मंडित स्वैमेवा ऐसे स्वर्ग निवासी देव ।१९३॥
॥ स्वर्ग स्त्री कथन ॥
॥ दोहा छंद ॥
ललितबचन लीलावती,शुभलक्षणसुकमाल॥
सहजसुगंध सुहावनी, यथा मालती माल १६४
शील रूपलावण्य निधि, हाव भाव रस लीन ॥
सीमा शुभगसिंगारकी, सकल कलापरवीन ।१९५॥
निरत गीत संगीत सुर, सव रस रीत मझार॥
कोविदा होहिं स्वभावतें, स्वर्ग लोक की नार ।१९६॥
पंच इन्द्री मनको महा,जे जग में सुख हेत ॥
१-जितनी वस्तु इस जीवको संसार में मुख की हेतु हैं सो सर्व स्वर्ग लोक का
चिन मानो॥

18४.
पार्षपुराण भाषा.।
तिन सवहीं को जानयो, स्वर्ग लोक संकेत १९७)
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥
इत्यादिक वहु संपति थाना देवलोक महिमा असमान॥
आनतवर विमान है जहां धरोजन्म सुरपति नेतहां। १६८
॥ दोहा छंद ॥
उपजो संपुट गर्भ लें, तेज पुंज अति चंड ॥
मानो जलधर पटल तैं, प्रघटो दामिनि दंड । १९९।
एक महूरत में तहां, संपूरण तनधार ॥
किधों रत्न की सेज तंज, सोबत उठो कुमार। २००।
मणि किरीटमाथे दिपै,अानन अधिक सरूप।
कानन कुंडल जग मगै, पानन कटक अनूप ।२०१॥
भुज भूषन भूषत भुजा, हिये हार छवि देत
अंग अंग इत्यादि बहु,सव आभरण समेत ।२०२।
॥१५ मात्राचौपाई छंद।
शनै शनै देषै दिश सही। लोचन कोर कान लगरही ॥
विसमैवंत होय मन ताम। कहैं कौनआयो किसधामा२०३।
अहो कौन यह उत्तम देश । सकल संपदा.थान विशेश॥

पार्श्वपुराण भागा। ६५ कंचन के मंदिर मणिजरे। दिपै दिव्य अपराभरे।२०४॥ अति उतंग अतिही दुतिधरैः।मध्य सभा मंडफ मनहरै। सिंहासनअद्भुतइहिठाम।मानोमेरुशिखरअभिरामा२०५॥ अनुपम नाटक देषन योग । श्रवणसुखद ये गीतमनोग॥ ये लावण्यवती वरनार।रूप जलधि वेलाउनहार।२०६। येउतंग हाथी मद भरे। तेज तुरंगन के गण खरे कंचनरथपायक दलजेह । मोप्रतिसिरनावैसवयेह ।२०७१ सबआनंद भरे मुझ देष । सव विनीत सबसुंदर भेष ॥ जैजैकारकरें विहसाय। कारनकछु जानोनहिंजाय।२०८॥ ॥ दोहाछंद ॥ इन्द्रजाल अथवा सुपन , कै माया भ्रमकोय। यों सुरेश सोचै हिये , पै निरनै नहिंहोय ॥२०॥ ॥ १५मात्राचौपाईछंद ॥ तवतिस थानक देव प्रधान मनकीवात अवधिसोंजान॥ योगवचनवोलसिरनायासंशयहरनश्रवनसुखदाया२१०। हम विनती सुनियेसुरराज। जीवनजन्मसफल सवाज। अवसनाथ स्वामी हमभये । जन्मजोगतैपावन थयो२११॥ सूर्यउदय कमलनी वाग। विकसै यथा जग्यो सिरभागा,

पार्थपुराण भाषा.!
नंदवर्धहमदहिंअशीश। चिरयहराजकरोसुरईश ।२.१२
अहो नाथ यह उत्तम ठाम । स्वर्ग तेरमो आनत नाम ॥
जगतसारलछमीकोयेह । निरुपमभोगनिरंतरगेह ।२१३ ॥
तुम इहि थान इन्द्र अवतरे। पुर्व जन्म दुद्धर तप.धरे.॥
ये सब सुर सेवक तुमतने। ये परिवारलोक हैं घने।२१४॥
ये मनोग वनिता मंडली । तुम आदेश चहें मनेरली ॥
ये पटदेवी लावन खान । सब देवी इनमानें आना२१५॥
ये बिमान पुर महल उतंग । चमर छत्र सेना सप्तंग ।।
धुजासिंहासनादिमनोग।सकलसंपदायहतुमज़ोग२१६
ऐसे वचन अनंतर तबै। जाने इन्द्र. अवधि वल सवै ॥
मैं पूरब कीनो तप घोर । दंडे कर्म धर्म धन चोर ।२१७॥
जीव जात को निर्भयदान। दीनो आप बराबर जान॥
सबउपसर्ग सहे धरधीरजीतोमहाराग रिपुवीर ।२१८ ।
काम विषम वैरीबश कियो । अरु कषाय बन कूँचा दियो।
जिनवरआनअखंडितपोषाचारितचिरपालोनिर्दोषा२१९/
इहिविधि सेयो धर्म महान । तिस प्रभाव दीपै यह थान ।।
दुर्गतिपात निवारणकरो।तिनमुझ इन्द्रलोकलेधो२२०॥
सो.अब सुलभ नहीं इस देह। भोग जोग है थानक येह ॥
रागागदुखदायकसदाचारितजलविनबुझेनकदा।२२३
२-मनलगाकर ३-सेना सप्तंगकी व्याख्या देखो छंद अंक१३षम अधिकार।

पार्षपुराण भापा।
६७
सोकारण सुरगति में नाहिं।व्रतको उदै न या पद माहिं।।
यहिसम्यकदर्शनअधिकाराशंकादिकमलबरजितसार२२१
के जिनवर की भक्ति सहाय। और न दी धर्म उपाय ।।
यहविचारजिन पूजनहेत।उठोइन्द्र परिवार समेत।२२३ ।
अमृत बापिका मैं करन्हवनागयोजहांमणिमयजिनभवना।
रत्नविंबवंदे विहसाय।भावभंगत सों सीस नवाया २२४ ॥
पूजाकरी दरवधर पाठ। पुलकित अंगपढ़ो थुति पाठ ।।
चैतबिरक्षजिन प्रत्मा जहां महामहोछव कीनो तहां।२२५॥
यो बहु पुन्न उपायो सही । फेर आय निज सम्पति गही॥
दिव्यभोग जेबड़भागालोकोतमजहिं सहजसुहागा२२६॥
शोभनरूप प्रथम संठान । वसुवैक्रियक सुलच्छन वान ॥
कोमलसुरभिसचिकनदेहासातधात बरजितगुणगेह २२७
पलकपात लोचन में नहीं। मलपसेव नख केशन कहीं ॥
जराकलेशन चिंत्या सोगानाहींअल्प मृत्युभयरोग।२२८॥
इत्यादिक दुखयोग अनेक । तिनमें नहीं अमर के एक ॥
आठरिदिअणिमादिपसथातिसवलसकलकाजसमरथ२२६
स्वर्ग लोक के सुख की कथा । कहै कहांलो बुध वल यथा ॥
१-अयम संगन का नाम-सम चतुर संस्थान है-जो ऊपर नीचे ममान वि.
भाग रूप शरीर के अंग उपांग में आकप होय सो सुंदर मर्याद रूप अंग होग इसी
का नाम चतुर संस्थान है ॥ २-देपो वाण्या पाठ रिद्धि छंद अंश २२९ चतुर्थ
अधिकार ॥३-प्रतिमा महिमा २ लघिमा ३गरिमा ४ प्राप्ति प्राकाम्य
६ ईशस वशितः॥

85
पार्चपुराण भाषा..
बैठमनोगतिबिमलबिमानाबिचरैनभपथबंछितथाना२३०॥
कवही मेरु जिनालयगमै । कबही आन कुलाचलरमैं ।
दीप समुद्र असंखअपार। करै सुरेन्द्र सुछंद बिहार।२३१॥
वर्ष बर्ष मैं हर्ष बढ़ायं । तीनबार नंदीसुर जाय ।
पंचकल्याणकसमैं सुयोग। करैतीनपदनमननियोगा२३२२
और केवली प्रभुके पाय । दोय कल्याणक पूजै आय ॥
कोठे थिरहोयसुजान। करै दिव्य बानीरसपाना२३३॥
सभा सिंहासन बैठ सुरेश । देयसुरनप्रति हित उपदेश।
करैतत्त्ववर्णन विस्तार ।अनेकांत वाणी अनुसार। २३४॥
जैसुर सम्यक दर्शनहीन । तपबल देवभये सुख लीन. ॥
तिनप्रतिधर्मवचन उच्चरै। दर्शनगुणकी प्रापतिकरी२३५॥
इहिविधि विविधकरै सुभकाज । महापुन्न संचै सुर राज ॥
दर्शनज्ञानरत्नभंडार।चारित गुणकोनहिं अधिकारा२३६॥
धर्म बासना बासित योग। करै पुनीत पुन्न फल भोग.॥
कबहीसुनैअपछरा गानानिई नाटक निरुपमथाना२३७।
कबहीं शुभ सिंगार रस लीन। हाव भाव जोवै परबीन ।
कबही हास्यकथा बिस्तरै।बनक्रीड़ा देवनसंग करी२३८
योनानाविधि करतबिलास । प्रतिदिन सुखसागरमैंबास॥
साढ़ेतीनहाथ परवान। दिव्यशरीर अतुलदुतिवाना२३९।
.
१-धर्म की वासना से जिसका योग वासित है ।।

पार्षपुराण भांपा।
88
सागर बीस परम थिति जास।वीस पक्ष परलेयउसास ॥
बीसहजारवर्ष अवसान । मनसा भोजन करै महाना२४०।
पंचमपिरथीलों जिससही।अवधि शक्ति जिनशासनकही।
तावतमान विक्रिया खेतासकल काजसाधनसुखहेता२४१॥
असंख्यात सुर सेवन पाय। देवी नेत्र कमल दिनराय ।।
यों पूरख कत पुन्न संयोग। करै इन्द्र इन्द्रासन भोगा२४२
॥दोहा छंद ॥
कहाइन्द्रअहमिंद्र पद, जन्म धरै फिर आय॥
जैन धर्म नृप की धुजा, लोक शिखर फरराय।२४३॥
इति श्री पाच पुराण भाषा आनन्दकुमार महा मंडली. का पानत नाम तेरवें
स्वर्ग में इन्द्र होना वर्णनो नाम चतुर्थम् अधिकार सम्पूर्णम् ।।
। .
१-इन्द्र इन्द्रासन के भोग करें हैं।
२-क्या अर्थात् .तुच्छ है इन्द्र अहमिद्र पदकी प्राप्ति किसलिये कि इनका जन्म
मरण मिटा नहीं जैन धर्म की धुना उर्घ लोक के शिखरपर फहरारही है भावार्थ
जैन धर्म का प्रभाव यह है कि जीव मोत होकर जन्म मरणसे छूट जाता है ।।

'पापुराण भाषा ॥ पंचम अधिकार ॥ ॥ दोहा छंद॥ बंदूं पारस पदं कमल, अमल बुद्धि दातार ॥ अब वरणू जिन राजके, पंच कल्यानक सार।। ॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥ प्रथम. अनंत अलोकाकाश। दशौदिशा मरजादन जास॥ दूजो दरब जहां नहिं और। सुन्न सरूप गगन सबठौरा २ तहां अनादि लोक थिति जान । छीदे पाय पुरुष संठान।। कटिपै हाथ सदाथिर रहै। यह सरूप जिन शासनकहै।३। पौन पिंड वेढों सरवंग । चौदह राजू गगन उतंग ॥ घनाकार राजू गण ईश । केहे तीन सौ तैंतालीश।४ - - १-राजू की व्याख्या बहुत बड़ी है सो त्रिलोकसार ग्रंथ से देखलेना । २-पुरुषाकार लोक का सब से नीचे छीदे पैरों का भाग ७ उस्से ऊपर काट का भाग १ उस्से ऊपर कटि पर दोनों हाथ धरने से दोनों कुहनियों के बीच का भाग.५ उस्से ऊपर सिर का भाग १ राजू चौंड़ा हैं जिनके योग फल १४ का मध्य भाग ३॥ हुवा इस ॥ राजू चौड़ाव को १४ राजू पुरुषाकार लंबान मैं गुण- से ४९ गुणनफल हुवा इस ४९ को ७ राजू मुटाई मैं गुणने ३४३ राजू घनाकार लोक हुआ ॥

पार्षपुराण भाषा। जीवादिकछह दरब सदीव । तिनसों भरो यथा घट घीव॥ स्वयं सिद्ध रचनायह बनी। नाइस करता हरता धनी॥५॥ दरव दिष्टि सों ध्रौव्य सरूप । पर्यय सों उत्पतव्ययरूप॥ जैसे समुद सदाथिरलसै। लहर न्याय उपजैअनसै।६। लोक नाड़ि तिस मध्य महान। चौदह राजूव्योमउचान॥ राजूमित चौंड़ी चहुंपास। यह बस खेत जिनागम भासा याके बाहर जंगम जीव । समुदघात बिननाहिं सदीय ॥ तामें तीनों लोक विशाल। ऊरध मध्य औरपाताल 11 सोलह स्वर्ग पटल बावन्न । नव ग्रीवक नवपटलरवन्न । अनुदिश और अनुत्तर येह । एकएकही पटल गिनेह ।९। ये सब त्रेसठं पटल बखान । सिद्ध खेत सो है सिर थान। ऊरध लोक बसै इहिभायाउत्तम सुरथानक सुखदाय।१०। अधो लोक में बहुविधि भेव।सातनरक असुरादिकदेव।। मध्यलोकपुनितीजो तहां। असंख्यात दीपोदधिजहां।११। तिन मैं शोभावंत सुहात । जंबू दीप जगत विख्यात ।। लच महा जोजन विस्तार । सूर्य मंडल की उनहार।१२॥ वजू कोट जिस कोट अभंग। परमित योजन आठ उतंग ॥ चारों दिश दरवाजे चार। तिनकेनाम लिखू अवधार। १३ विजै नाम पूरब मैं जान ।बैजयंत दक्षिण दिश ठान ।। १-मात्मा के प्रदेश का शरीर से बाहर होकर फैलना जो सात प्रकार माना गया है देखो छंद अंक ५६ आदि ७५ पर्यंत नवम भधिकार ।।

पापुराण भाषा.!
पश्चिम भाग जयंत दुवार। उत्तर में अपराजितसार।१४।
लवण समुद्र खातिका रूप। चहुं दिश बेढो सजल संरूप॥
तहांसुदर्शन मेरु महान ।मध्य भाग शोभा असमान। १५॥
अति उतंगलख योज़न सोय। रिजुबिमान जा ऊपर होय।।
सबशैलन में ऊंचो यहै। ग्रीव उठाय किंधों इमकहै। १६।
करै कौन गिर मेरी रीस। जिन पति न्हौन होय मुझसीस॥
चारों दिश चारों गजदंत नील निषधसों लगे महंता१७
छेह कुल पर्वत बड़े विथार । पूरब पश्चिम दीरघ धार ।
आठमहा गिरदिग्गजनामामेरु निकटआठोंदिशठामा १८
कनक वरण सोलह बच्छार। महा विदेह विषै छबिसार ॥
कंचन गिर दी परवान । सीता सीतोदा तट थान । १६ ।
कुरु भुं माहिं यमक गिरचार।नील निषधके निकट निहार॥
चार नाभिगिरमिथ्यानाहि मध्यम जघन भोगभूमाहिां२०
विजयारध पर्वत चौंतीस । इतनेही बषभाचल दीस ॥
ते मलेच्छ मघ खडनविषे। चक्री जहांनांव निजलिषै।२१॥
यों गिर दीप विषै वरनये। ग्यारह अधिक एकसौ भये॥
भद्रसाल बन दोयसुबास । पूरव अपर मेरु के पास।२२।
दो तरु जंबू सेभल तने । उत्तम भोग भूमि मै.बने ॥
१-हिमवान.१ महा हिमवान २ निषध्य ३ नील.४ रुक्मी..५ शिपरी ६.
२–अपर अर्थात् पश्चिम ॥: ३ जामुन वृक्ष ।

पापुराण भाषा।
।
छहदहवड़े कुलाचल सीस। पद्म महापद्मादिक दीसा२३।
बीस सरोवर और सुनेह । सीता सीतोदा मध तेह ॥
उत्तममध्यम जघनविशेशाभोगभूमि छहकही जिनेशा२४॥
महादेश चौंतीस सुखेत। ऐरावत अरु भरथ समेत ॥
इतनीही नगरी परवान । आरजखंडमध्य थिरथान।२५।
उपसमुद्र की संख्या यही । कछू विनाशिक कछुथिरसही॥
पूरब दिशदो वाग महंत । देवारण्य दीपके अन्त ।२६।
ऐसेही पश्चिम दिशदोय। भतारण्य नाम तिनहोय ॥
गंगादिकसरिता दर्शचार । चौसठ महा विदेहमझारा२७
बौरह बिपुल बिभंगा जेह । महानदी नब्बे सव.येह ॥
इतनेहीसब कुंड महान । जहां तुरंगनि उतरै आन ।२८
सतरह लाख सबन परवार । सहसछातवे ऊपरधार ॥
यहसब जम्बूदीप समास । आगममें विस्तार प्रकासा२६॥
॥दोहा छंद।
यही कथन अंगन विषे, वरणो गणधर ईश।
१-पद १ महापब २ तिगच ३ केशरी ४ पुंडरीक ५ महा पुंडरीक ६
२-- मेरु पर्वत से दक्षिण दिशा में ३ उत्तम १ मध्यम २ जघन ३ हैं इसी
प्रकार उत्तर दिशा मै ३ जान लेनी जो सर्व ६ भाग भूमि हुई ।।
1-बड़ी लहर मारने वाली अथवा इनकी संभाभी विभंगा है।
Y~-संक्षेप रूप जंवू दीप इसप्रकार है।

१०४
पार्थपुराण भाषा ।
तीनलाख पद मैं संही, ऊपर सहस पचीस । ३०॥
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद॥
यों अनेक रचना आधार । दीप राज राजै अधिकार ।।
तहां मेरुकेदक्षिण भाग । किधोभूमितियशुभंगसुहाग।३१॥
भरथ खण्ड छह खण्ड समेत ।धनुषाकार विराजत खेत।।
तामेंसबसुखधर्मनिवास । काशीदेशकुशल जनवास।३२॥
गांव खेट. पुर पहन जहां । धनकन भरे बसैं बहुतहां ।
निवसै नागर जैनी लोय। दया धर्म पालें सर्वकोय।३३
जिन मैंदिर ऊँचेजिन माहि। नरनारी नित पूजन जाहि ॥
पदपद पुरपंक्ति पेषये। ऊदवथान न कहिं देषये। ३४
नीरअगाध नदी नित बहैं। जलचर तहांजीव नितर हैं।
मुनिजनभूषित जिनकेतीर।काड़सर्ग कर ठाड़े धीर।३५
ऊँचे परबत झरना झरें। मारग जात पथिक मनहरें ।
जिनमेंसदा कन्दराथान । निश्चल देह धरै मुनिध्याना३६।
जहांबड़े निर्जन वनजालाजिनमेंबहुविधिविरछ बिशाल॥
केला कर्पट कटहल कैर।कैथ करोंदा कोंच कनेर । ३७।
किर्मला कंकोल कन्हार । कमरष कंज कंदम कचनार ॥
खिरनी खारक पिंडखजूर । खैरखरहटी खेजड़ भूर। ३८॥
१-कुशल कहिये चतुर जनों का नाम है ।।
२-धन अर्थात् डांगर दोर कन नाज ||

पार्षपुराण मापाi
i
अर्जुन अंबलीव अना।अगर अंजीर अशोक अपार॥
अरणी औंगा अरलूभने। ऊंबर अरंड अरीठा घने।३६।
पाखल पीपल पुंग प्रयंग । पीलू पाटल पाट पतंग ॥
गोंदी गुड़हल गूलर जान। गांडरगुंजा गोरखपान ।१०।
चंपाचीढ़ :चरोंजी-फली। चंदन चोल चॅबेली भली ॥
जंटजभीरी जामन कोट। नीवुनारयल हींस हिंगोट।४१।
सोना सीसमसेंभल साल। नीमरु सिरस सदाफलजाल ।।
बांस बबूल बकायन बेर। बेत बेहड़ा बड़हल पेर।४२॥
महुआ मौलसिरी मचकुन्द । मरुवा मोगा करना कुन्द ॥
तत तबॉलति तीदूतालातगरतिलकतालीसतमाला४३॥
इहिविधि रहे सरोवर छाय । सबही कहत कथा बढ़जाय ।।
तहांसाधु एकांत बिचार करें पठन पाठन विधिसार।४४॥
विविध सरोवर शीतल ठाम। पंथी बैठ लेहिं विश्राम ।।
निर्मल नीर भरेमनहार।मानोमुनिचितविगतविकारा४५
सोहैं सफल साल के खेत । भये नत्र फल भार समेत ॥
सज्जनजनज्योसंपति पाया छोड़[मानचलें शिरनाया४६।
केवलज्ञानी करत विहार। जहां सदा सवसुख दातार ॥
आचारजशुभ संघसमेताविहरमान भविजन हितहता४७॥
केईजहां महाव्रत लेहिं । भवदुख वारि जलांजलि देहिं ।
केईधीर उग्र तप करें। ते अहिमिंद्र जाय अवतरै । ४८ ।
१-गुमान अर्थात् मान ।। २-विहार करते हुये ।।

पापुराण भाषा! केई शावक के व्रत पाल । अच्युत स्वर्ग बसैं चिरकालः॥ केई कर जिनयज्ञ विधान। पावैपुन्नी अमर विमान । ४९ केई मुलिवर दान प्रभाव । भोगैं भोग भूमि की आव ॥ अतिपुनीत सबही विधिदेश।जहाँजन्मचा, अमरेशा५०। तहां बनारस. नगरी बसै। देखत सुर नर मन हुल्लसै ॥ है प्रसिद्ध धरनी परसोय। तीरथ राज कहैं सब कोय। ५१। शोभा जाकी कहिय न जाय। नाम लेत रसना शुचि थाय॥ जहां सरोवर नाना भांत । जिनके तीर तरोवर पांत। ५२ निजजीवनजीवनसुख देहि। कमलसुबास शिलीमुखलेहिं ।। सोहें सघन रवाने बाग। फले फूल फलं बढ़ो सुहाग।५३। सजल खातिका राजै खरी । उठे लहर लोयन गति हरी॥ कोट उतंग-कांगुरेलसे।मानो स्वर्ग लोक दिशिहरूँ। ५४। ऊंचे महल मनोहर लगे। सोरन कलश शिषर जगमगें। अतिउन्नतजिनमंदिरजहां तिनमहिमावरणनबुधकहां॥५५॥ रेल विब राजै जिहि माहिं । शिषर सुरंग धुजा फहराहि ॥ कंचनके उपकरन समाज। आवैभविजन पूजाकाज!५६। जै जै शब्द सहितकबि छ । किधोंधर्म रयणायरगजै॥ नगर नारिनित बंदनजाहि जिन दर्शनउच्छवउरमाहि|५७॥ --सोलहवां स्वर्ग || - २--जिन पूजा ।। ३-जीवन अर्थात् जल ४-आखों की चाल को रोक दिया भावार्थ आंखें खुली देखती रहीं।' ६-कंचनके भांजनोंका समूह साथ लेकर भविजन पूजा काजश्रा |

पापुराण भाषा।
१०७
भूषण भूषित सुंदर देह। मानो स्वर्ग अपचरा येह ॥
सब ग्रहस्थ साधै खट कर्म । पालैप्रजा अहिंसाधर्म।५८
दोषं अँठारह बरजित देव । तिस प्रभुको पूज बहु भेव ।।
चाह विना बराजित जो धीर । सोई गुरु सेवें बरवीरा५९॥
आदि अंत जे विगत विरोध । तेई ग्रंथ सुनै मनसोध ।
सत्यं शील गुण पालैं सदा।तातेंलोग सुखी सर्वदा६०
॥ दोहा छंद ॥
प्रजा बनारस नगरकी, नागर नीत सुजान।
चार रत्न के पारखी, लहिये घर घर थान । ६१॥
देव धर्म गुरु ग्रंथ ये, बड़े रत्न संसार ।।
इनको परख प्रमानये, यहनर भव फलसार । ६२
जे इनकी जानैं परख, ते जग लोचन वान।
जिनको यह शुध नापरी, ते नर अंधअजान । ६३॥
लोचन हीने पुरुषको, अंध न कहिये भूल ।
उर लोचन जिनके मुँदे, ते अंधे निर्मूल । ६४॥
॥१५-मात्रा चौपाई छंद॥
इहि विधिनगरबसै बहुभाय । सर्वशोभा वरणीनहिंजाय।
१-सिंज्झाय अर्थात् सामायक १ तप २ जिन पूजा संयम अर्थान् इन्द्रियों
का रोकना ४ श्रीगुरु के पावाम चित्त लगाना ५ और अपने वित्त समान वान देना
•ये षटकर्म हैं ।। २-अठारह दोप की सूची पहिले लिख पायें देपोव्याच्या छंदा
| अधिकार २॥
--

~24 ------- १०४ पार्श्वपुराण भाषा। • . अश्वसेन भूपति बड़े भागा राजकरैतहां अंतुलसुहागा६५। काशिपंगोत्र जगतपरशन्स । चंशइष्वाक विमलसरहन्स। तेजवंत दिनपतिज्योंदिपै। प्रभुता देषशची पतिछिपै।६६। कल्प तरोवर सम दातार। रति पति लाजै रूप निहार।। रैणायर सम अति गंभीर । पर्बत राज बराबर धीर। ६७ ॥ सोम समानसबन सुखदाय। कीरति किरण रहीजगछाय॥ तीन ज्ञान संयुक्त सुजान । परम विवेकी दया निधाना६८ जिनपद भक्त धर्म धन वास। गुरु सेवारतिनीत निवास ॥ कला चातुरी बुध विज्ञान । विद्या विनै संपदा थान ।६। सकल सार गुण माणक कोष, उभय पक्ष निर्मल निर्दोष । जिनसूरजउदयाचलरायातिसंमहिमावरणीकिमजाया७०।। बामा देवी नाम पवित्त । तिनके घर रानी शुभ चित्त । निरुपमलावन सबगुणभरीरूपजलधि वेलाअवतरी७११ नखशिषसहज सुहागिननारातीनलोकतियतिलकसिंगारा॥ सकल सुलक्षण मंडित देह । भाषा मधुरभारती येह।७२। रंभा रति जिस आगे दीन । रोहिणि रूपं लगै छबिछीन । इन्द्र वधू इंम दीपैसोय। रवि दुति आगे दीपकलोय ॥७३॥ जन मन हर्ष बढ़ावन एम। कातिक चांद चंद्रिका जेम ।। १-मति-श्रुति, अवधि ॥ २-दोनों पक्ष अर्थात् पिता का कुल माता की जाति॥ ३-वारणी। ..

पार्षपुराण भाषा।
सकलसारगुणमणिकीखानाशीलसंपदाकीनिधिजान।७४॥
सज्जनता की अवधि अनूपा कला सुवुधि की सीमारूप ।।
नाम लेत अघतजैसमीपामहा पुरुष मुक्ताफलसीप।७५॥
त्रिवभुन नाथ रत्नकी मही। बुधिवल महिमाजाय न कही।
बहुविधि दंपति संपति जोग। करै पुनीत पुन्नफल भोगा७६।
॥ उक्तंच प्राक्त गाथा॥
॥ प्रार्या छंद ॥
तित्थयरा तप्पियराहलहर चक्काईवासदेवाई।
पडि बास भोय भूमिय आहारोणत्थिणी हारो।७७।
॥ भाषा टीका ॥
'तिर्यकर और उनके माता पिता बलभद्र चक्रवर्ति नारायण और भोगभूमि
वासी युगल इन सबके आहार हैं निहार अर्थात् मल मूत्र नहीं होता।
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥
जिनवर जिन मातां जिन तातावासदेव बलदेव विख्यात ॥
चक्री राय युगलया जोया इनसव के मल मूत्र नहोय।७८ ।
॥दोहा छंद॥
पूरब गाथा को अरथ, लिखो चौपाई लाय।

११०
..
पार्श्वपुराण भाषा-
.
खट पाहुड़ टीका विषै, देष लेउ इहि भाय।७९।
॥१५ मात्राचौपाई छंद॥
अब आगे भविजन मन थंभ। सुनोगर्भ मंगल आनंदः॥
एक दिनां सौधर्म सुरेश।धनपति प्रति दीनो उपदेशादा
आनेतेंद्र की थित में सही। आयु छ मास शेष अवरही ॥
तेबीसम अवतार महान । होसी नगर बनारस थान।८१॥
अश्वसेन भूपति के धाम । पंचाश्चर्ज करो अभिराम ॥
यह सुरेन्द्र ने आज्ञा करी।सो कुबेर निज माथे धरी।८२।
चलो तुरत लाई नहिं बार । सोहै संग अमर परवार ॥
हर्षत अंग पिता घर आय।करी रत्न वर्षा बहुभाय।८३॥
जिनके तेज तिमर नहिं रहै। नाना वरण प्रभा लह लहै ।।
ऐसे निर्मोलक नग भूर।वर नृप के आंगन पूर।८४।
॥ दोहा छंद॥
नभसों आवें झलकती, मणि धारा इहिभाय।
सुरग लोक लक्ष्मी किधौं सेवन उतरी माय।८५।
॥१५ मात्राचौपाई छंद॥
साढ़े तीन कोड़ परवान। यों नित वर रत्न महान ॥
-एक ग्रंथ का नाम । २.तेरवां स्वर्ग ।

पार्थपुराण भाषा।
२११
॥
सुरभि सुगंध कल्प तरुफूल। वरषांवें सुर आनंदमूल।८६।
गंधोदक की वरषा करें। मानो
मुक्ताफल अवतर
प्रति दिन देव दुभी बजै॥किधौं महा रैणायर गजै।८७।
नंद विरध जैजै उच्चरें। मात पिता प्रति सुरयों करें ।।
इहि विधि पंचाश्चर्य बिलोक जैनी भयेमिथ्यातीलोकाटा
॥ दोहा छंद॥
देवन किये छ मास लों, पंचाश्चर्य अनूप ॥
देष देष परजा भई, आनंद अचरज रूप। ८६.
॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
योअतिआनंदसों दिन जाहिीमाता मगन सुखोदधिमाहिं ।
माणकजटित मनोहरधामारलपलक सेजअभिराम।६०
मणिमय दीपजहांजगमगैं। अति सुगंधावत अंलिपगें।
करेचतुर्थानंद स्नान । करें सैन जननी सुखमान । ९१ ।
पश्चिम रैंन रही जब आय। सोलह सुपने देषे माय ॥
तिनके नामलिखू अवलोया पढ़तसुनतंपातकचैहोय।६२।
॥ पद्धडीछंद ॥
सुपनावलिसोलह सुनहुमीताजिन राजजन्मसूचकपुनीत।
१-ऋतु समय स्त्री चौथे दिन स्नानकर शुद्ध होती है भावार्थ वामा देवी
शुद्ध स्नानकर सोगई और ऐमा समय गर्दका कारण है ।।

पार्थपुराण भाषा-
ऐरोवत हाथी प्रथमदीसामद गीलेगंड विशालशीस।६३॥
देष्यो डकारत टेषभ राजा अति उज्जलमोती वरणभाज॥
देष्यो पंचनन धवलदेह। निज नादकरेन्यों सरदमेह।९।।
देष्योमणिआसनशोभमानातहां हेमकलश कमलासनान।।
देखीदोपावनपहुँप मालाभमरावलिवेढीअतिविशाला९५
रवि मंडल देष्यो तम गलंता उदयाचल ऊपर उदयवंत॥
संपूरण तारापति विमान।तारा वलिमध्य विराजमाना।
जलतिरत मनोहर मीनजोटा देषे जिन जननीपलकोट।
देषेचामीकरकलशदोयाअतिझलक वारिज़ढकेसोय।।७।
देण्यो कमलाकर कमल छन।वहु हंसी हंसन सों रवन्न ।
देष्योरैणायर गर्जमाना पुनि सिंह पीठमाणकनिधानाः।
फिर देष्यो देवै विमाग योगा धुज घंटा भालर सों मनोग।
प्रघटोमहीफोरफनेंद्रेधामामणिकंचनमयनयनाभिराम९६॥
पुनि रत्न रौंशि देषी अनूपा इन्द्रायुध वर्ण विचित्र रूप ॥
निधूम धनंजय दीपमाना येदेखेसोलह सुपन जाना १००
॥ दोहाछंद ॥
गजप्रवेशमुखकमलमैं,सुपनअंत अविलोय॥
१:-पौष माघ की वर्षा ।
२-मणि आसन शोभमानपर हेम कलश से लक्ष्मी को स्नान करते देखीं।
-कमलों कर छाया हुआ ॥४-नैनों को आनंद देनेवाला ॥५-दिपनी
हुईअर्थात् चमकती हुई ॥ ६-मुपनों के अंत में भावार्य अपनों के पीछे ।। -

पार्षपुराण भाषा
१११
सुख निद्रा पूरी भई, भयो प्रात तम, खोय । १०१
॥ प्रातकाल कथन ।
.
॥ दोहा छंद ॥
पुर्व दिवाकर ऊगयो,गयो तिमर दुखदाय ।।
जैसे जैन सिधांतसुन, भरम भाव मिटजाय । १०२॥
मंदतेज तारे भये, कछु दीपैं कछु नाहिं ।।.
ज्यों तिथैकर के उदय, पाषंडी छिपजाहि।१०३।
सूरजवंशी जे कमल, खिले सरोवर माहि ।
ज्योंजिनविंबविलोकके, भविलोचनविकसाहि१०४॥
चंद बिकाशीकमलजे,विकसत भये न सोय ॥
ज्योंअजान जिन वचनसुन, मुद्रित मूलनहोया १०५॥
चक्रवाक हरषत भये, ज्योंजिन मत्त संयोग ।
जीवसुमति पियनारिको, मिटोआनादिवियोगा१०६॥
घूघगण भूतल विषे, आंधे भये असूझ ।।
जैनग्रन्थ के रहस में, ज्यों परमती अबूझ । १०७॥
१-जीव रूप पुरुष और मुमति रूप नारी का जो अनादि काल से वियोग
था सो मिटगया ।।.
.

पापुराण भाषा। कमलकोष मधुकर बँधे, छुटेजग्यो सिर भाग ॥ यथा जीव जिनधर्मसों, मुक्तिहोय भवत्याग ।१०८। पथिक लोग मारग चले, सूझे घाट कुघाट । जिन धुनि सुन सूझै यथा, स्वर्गमुक्ति कीवाट।१०। इहिविधिभयोप्रभातशुभ, आनन्दभयोअतीव॥ धर्म ध्यान आराधना, करनलगे भवि जीव ॥११॥ जिनजननी रोमांचि तन,जगीमुदितसुखजान॥ किंधोंसकंटककमलनी, विकशीनिश अवसान।१११॥ मंगलीक वाजिब धुनि, सुन वन्दी जन गान ॥ उठीसेजतज सुखभरी, धरो हिये शुभ ध्यान । ११२२ सामायक विधि श्रादरी, पंच परम पदलीन ।। औरउचित आचारसब, न्हौन विलेपन कीन।११३॥ पहरे शुभ आभर्ण तन, सुन्दर वसन सुरंग ॥ कल्पबेल जंगम किंधौं, चलीसखी जन संग।११४॥ राजसिंहासन भूप तव, बैठे सभा सुथान ॥ देवी पावत देखिकै, कियो उचित सनमान 1११५॥ अर्धासन बैठन दियो, जोग बचन मुख भास ॥ योरानी विकशत बदन, बैठी भूपति पास ।११६। सभा लोक तारे विविधि, भूपति चांद सरूप॥ श्रीबामा देवी तहां, दिपै चन्द्रिका रूप 1११७॥ स्वामी सोलहु सुपनहम, देखे पश्चिम रैन ।

पार्थपुराण मापा।
श्रीमुखते इनको सुफल, कहो श्रवन सुखदैन । ११८॥
अश्व सेन भूपाल तव, वोले अवधि विचार ॥
एकचित्त कर देवितुम, सुनो सुपन फलसार । ११६ ।
॥१५ मात्राचौपाई छंद॥
धुरगजेन्द्र दर्शन तैं जान । होसी जगपति पुत्र प्रधान ॥
महाराषभपुनि देख्योसोय। जगजेठो नंदनतुमहोय । १२॥
स्वेतसिंह दर्शन फलभासाअतुल अनन्ती शक्तिनिवास।
कमलामज्जन तैंसुरईशाकरेंन्हौनकनकाचल शीश । १२१॥
पहुपदाम दो देषीसार । तिसफल दुविधि धर्मदातार ।।
शशितें सकल लोकसुखदायातेज पुंज सूर्य से थाय । १२३
मीन युगलः सवसुखभाज। कुंभविलोकन तैं निधिराज ।।
सरवरतें सब लक्षणवान । सागर से गंभीर महान । १२३ ।
सिंहपीठ तैं मृगलोचनी। होयवाल तुमत्रिभुवन धनी॥
सुर विमान देख्यों सुख पायास्वर्गलोकते उपाय । १२४॥
नागराज ग्रहको सुनहेत । जन्मैं मतिश्रुति अवधिसमेत ॥
रत्नराशि तें गुणमणि थान। कर्मदहन पावकतै जान। १२५॥
गज प्रवेश जो बदन मझार। सुपन अन्तदेप्यों बरनार ॥
श्रीपारसजिनजगत प्रधानागर्भ तुम्हारे उत्तरैयान । १२६ ॥
१-सुपनों के अन्त में

पापुराण भाषा।
॥ दोहा छंद ॥
सुन बामादे सुपनफल, रोमांचित तनभूर ॥
सुवचन जल सींचतकिधों, उगेहर्ष अंकूर । १२७ ।।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
अवसौधर्म सुरेश विचार । स्वामि गर्भ अवसर निर्धार ।।
कुलगिरकमल वासनोजेहाश्रीआदिकदेवीगुणगेह । १२८॥
तिन्हेंबुलाय कहोशुभ भाउ। अश्व सेन भूपति घरजाउ।
वामादेवी के उरथान । तेवीसम जिन उतरे प्रान। १६ ।
तिनक्रीगर्भ शोधनाकरो। निज नियोग सेवामन धरो॥
यहसुनसब आनंदितभई।इन्द्रधान माथे धरलई। १३० ॥
स्वर्गलोक तजि आई तहां । बसै बनारस नगरीजहां ॥
महाकांततनलावनभरी मानोनभदामिनिअवतरी। १६॥
अंगभंग सबसजे सिंगार । रूपसम्पदा अचरज कार ॥
चूड़ामणि.माथेजगमगा देखतचका चोंधसी लगै। १३२ !
सुरलरुसुमन दामउरधरी।अतिसुवास दशदिशि विस्तरी।
प्रवनसुखद नेवरभंकार शोभा कहत न आवै पार । १३३॥
प्राच नृपत के पायन नई । आयसु मांग महल में गई ॥
।
१-प्रथम स्वर्ग.

पापुराण भापा।
सिंहासनथितिमाय निहार। करप्रणामकीनो जैकारा१३४॥
॥ दोहाछंद ॥
जननी देहसुभावसों, अतिनिर्मल अविकार ।
ताहि कुलाचल वासनी, औरकरें शुचिसार १३५
कृष्णपाखवैशाखदिन,दुतिया निश अवसान ।।
विमलविशाखा नखतमें, बसेगर्भ जिन आन ।१३६।
यथासीप संपुट विषे, मोती उपजै जान ॥
त्योंहीं निर्मल गर्भ में, निरावाध भगवान । १३७॥
गर्भ बसें पर गर्भ ते. बरतें भिन्न सदीव
घटतेंघट वरतीगगन, क्योंनहिं भिन्नअतीव १३८॥
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
तबजिन पुन्नपवन बसहले। चहुँविधि सुरकेआसनचले ॥
चिह्नदेख इन्द्रादिकदेवाजानोंअवधिज्ञानवलभेव । १३६ ।
जिनवर आजगर्भ अवतरे। यहविचार उरआनन्द भरे ॥
चढविमान परिवारसमेत। चलेगर्भ कल्यानक हेत।१४०॥
जैजैकार करत बहुभाय । उच्छव सहित पिता घर आय ।।
मातपिता आसन परठय। कंचनकलश नहावतभये । १४॥
१-चार प्रकार देवता

पार्श्वपुराण भाषा।
गर्भमध्य वरतीभगवान । प्रण देव धरो मन ध्यान ॥
गीत निरत बांजिन बजाय। पूजा भेंट करी शिरनाया१४२॥
यों सुरगण सब साध नियोग।गये गेह कर कारज जोग।
इन्द्रराजको श्रायसुपाय । रुचक वासिनीदेवी आया१४३,
यथायोग सब सेवाकरें। छिनछिन जिनजननी मन हरें।
रुचक दीप तेरह मो जहाँ । रुचकनाम पर्वतहैतहाँ।१४४॥
सो चौरासी सहस प्रमाण । इतने योजन उन्नत जान ॥
इतनोही विस्तीरणधार।दीप मध्य सो वलयाकार । १४५॥
ताकेशिषर कूटबहु लसैं । दिशाकुमारी तिनमैं वसैं ॥
तेसबसेवन आबैंमाय। यह नियोगइनको सुखदाय।१४६।
॥ कुसुमलताछंद ॥
आई भक्ति नियोगिनि देवी । जिन जननीकी सेवभ।
कोई न्हान विलेपनठानैं। कोईसार सिंगारसज।१४७॥
कोई भूषन बसन समप्पै । कोई भोजन सिद्धकरैं ।
कोई देय तबोल रवाने । कोई सुंदर गान करें ।१४८ ॥
कोई रत्न सिंहासन था। कोई ढोलें चमर बरो
कोई सुंदर सेज बिछावै । कोई चापैं चरन करो। १४९॥
कोई चंदन सों घरसींचें । सारे महल सुबास करी ॥
१-गोल है चूड़ी आकारः
२-एक प्रकार की देवी हैं.
।

पार्चपुराण भाषा। कोई आँगन देय बुहारी। झारै रैफूल परागपरी १५० कोई जल क्रीड़ा कर रंजै। कोई वह विधि भेष किये ॥ कोई मणि दर्पण करधारें। कोई ठाढ़ी खड़ग लिये।१५१॥ कोई गूंथ मनोहर माला । आवै प्रान सुगंध परी ॥ कोई कल्प तरोवर सोले । फल फूलनकी भेटधरी। १५२ । कोई काव्य कथा रस पोषै । कोई हास्य विलास ठवें ॥ कोई गावै वीनबजावै । कोई नाचत सीसन। १५३ ॥ दोहा छंद ॥ इहिं विधिसेवा करत नित,न मासशुभश्रेय॥ प्रश्न करै सुरकामनी, माता उत्तर देय । १५४ ॥ अंतरलापि पहेलका, बहिर लापिका एव ॥ विन्दु हीन निहाँठपर्दै, क्रियागुप्ति वहुभेव ।१५५ । १-अन्तरलापि-पहेली उसको कहते हैं जिसका उत्तर उसी में ही बाहर से न लाया जावै यया उदाहरण पहेली वेर नाम फल हिय कठोर कोमल बदन दुर्जन संग विसगम । एक वेर मैं कहत हूँ फेर न लेऊ नाम यह अर्थचित्रअलंकारकीजातिहे. २-वहिर लापिका उस पहेली को कहते हैं जिसका उत्तर बाहर से लिया जावं यया उदाहरण पुढेली कसेरू नामफल-श्याम वरण परहर नहीं ना घरे नहिं ईश नाजान पिया कौन है केश लगायो शीश-यह अर्थचित्र अलंकार की जाति ई. ३-विन्दु हीन अलंकार उसे कहते हैं कि जिस छन्द को कवि ऐसा रच जिसमें अनुस्वार विदु वा विसर्ग दिन होय यथा वेग कहा करिये गड़भाग । दिक्षा गहन जगत को त्याग- यह वरण चित्र अलंकार की जाति है. ६-निहाँठ अलंकार उसे कहते हैं कि जिस बन्द में प्रोट स्थानी वर्ण उवर्ण और पवर्गी अतर और स्वर्ण की मात्रा नहीं यथा उदाहरण कली कवित्त-कनक लगाव न मानन ते चन्द्रकांति ललित चखन कंज खंजरीट हीन है-यह वर्णचित्र अलंकारकी जातिह.७-क्रियागुप्तअलंकार उसेकहतहजिसमेंक्रियादिपीईडीयया । पालक मेथी सोया खाकर-यहां प्रत्यन में पालक मेथी के सम्बन्ध से सोया साग को नाम प्रतीत होता है परन्तु वहां सोया क्रिया सोनेके अर्थमें है यहअर्थ चित्र- लकार की जाति है।

१२०
पार्श्वपुराण भापा।
.
इत्यादिक आगम उकत, अलंकार कीजात ॥
अर्थगूढ गंभीर सब, समझावै जिन मात । १५६ ।
॥ देवांगनाप्रश्न माताउत्तर॥
.
:.
॥१५ मात्राचौपाईछंद ॥
तुमसी त्रिया कौन जग आन । तिर्थकर सुतजनै महान ॥
जगमैंसुभटकोनसेमाय। जेनर जीतविषय कषाय।१५७।
कोन कहावै कायर दीन । इन्द्री मद मेटन बलहीन ।
पंडित कौन सुमारग चले। दुराचार दुर्मारग दलै १५८॥
माता मूरख कौनमहंत , विषई जीव जगत जावंत ॥
कौनपुरुष सानर भवधार, जोसाधै पुरुषारथ चार । १५६ ।
कोन पुरुष को कहियेमर्म । जो शठ साधन जानै धर्म ॥
धन्य कौन नर इस संसार । योवन समैं धरैव्रतभार १६०॥
धिक किनको कहिये सबैग। जे धर करें प्रतिज्ञा भंग
कौन जीवकै वैरी लोय । काम क्रोधहैं औरन कोय । १६१।
जननी जगमैं कौन मलीन । पातक पंकमलिन मतहीन ॥
१- प्रश्नोत्तर अलंकार ॥२- सापुरुष कहिये उत्तम पुरुष कौन ३--अर्थ ?
काम'२ धर्म ३ मोक्ष ४ ।। ४.-का पुरुष कहियै खोटा पुरुष कौन है इसका भेद कहो।।

पार्षपुराण भाषा।
१२१॥
कहोकौननर नित्तपवित्त । ब्रह्मचर्य धारी दृढ़ चित्त । १६२।
कौनपशू मानुष आकार । जिनके हिरदै नाहिं विचार ।
अंधकोन जोदेवप्रदेव । कुगुरुसुगुरु कोभेदनभेव ।१६३ ।
बधिर कौनसे उत्तरदेहं । जैन सिधाँत सुनैनहि जेह ॥
मूकनामनरकैसे लहै। जो हित सांच वचन नहि कह।१६४॥
लाँबी भुजा कौन करहीन । जिनपूजा मुनिदान न दीन ॥
कौनपाँगले पाँवसमेत । जेतीरथ परसें न अचेत ।१६५ ।
कौनकुरूप जननि कहु एह । शीलसिंगार विनानरजेह ॥
वेगकहाकरियैबड़भागादिक्षागहन जगतकोत्याग ।१६६।
मित्रकौन हितवंछकहोय । धर्म दिढ़ावै आलस खोय ॥
शत्रुकौनजो दिक्षालेत । विघनकरै परभवदुखहेत १६७ ।
जियको कोन शरण हैमाय । पंचपरम गुरु सदा सहाय॥
इहिविधि प्रश्नकरें सुरनार। माताउत्तर देह विचार।१६८।
वामादेवी सहज प्रवीन । सकल मरम जानै गुणलीन ॥
पुरुषरत्नउरअन्तरवहै।क्योंनहिंज्ञानअधिकतालहै।१६६।
॥ दोहा छंद॥
निवसै निर्मल गर्भ में, तीन ज्ञान गुणवान ।।
फटकमहल में जगमग, ज्योमणि दीप महान।१७०।
१-महत १ सिद्धराचार्य ३ उपाध्याय ४ सा५॥

१२२ पापुराण भाषा। उदैवान दिनकरसमैं, पूर्व दिशा छबितेम। त्रिभुवनपति सुतउरधरै, सोहत जननी एम।१७१। गर्भ. भार व्यापै नहीं, त्रिबली भंगन होय ।। देहन-दी पीतछबि, और विकार न कोय ॥१७॥ ज्योंदर्पन प्रति बिंबसों, भारी कह्योन जाय। त्यों जिनपति के गर्भसों, खेद न पावै माय । १७३॥ कल्पलतासीलसतअति; जननी छबि संयुक्त मंदहास कुसुमत भई, अरुफल है फलपुत्त ।१७४। देव राजके बचनसों, अहनिश हर्षत अंग ॥ : अलषरूप सेवै शची, लिये अपचरा संग।१७५॥ -पूरबवत नवमास लों, पंचाश्चर्य अनूप॥ अश्व सेन भूपालघर, किये धनद सुखरूप ।१७६। योंसुखसों निशदिनगये,खेद नाम कहिनाहिं।। यहसब पुन्य प्रभाव है, यही रहस इस माहिं ।१७७ श्री पारश्च पुराण भाषा गर्भ कल्याणक वर्णन नाम पंचम अधिकार सम्पूर्णम् ॥ ॥ षष्टम अधिकार॥ ॥दोहा छंद॥ रागादिक जलसों भरों, तन तलाव बहुभाय ॥ १-पेटके तीन पल भंगन हो॥ १-देखो छंद-आदिवापर्यंत पंचम अधिकार

पार्षपुराण भाषा।
पारस रविदर्शत.सुखै, अघ सारस उड़जाय। १ ।
गर्भ मास पूरण भये, नभ निर्मल श्राकार ॥
पोष मास एकादशी, श्याम पक्ष शुभवार। २॥
बामा देवी पुब्व दिश, जन्मो जिनवर भान ॥
मुदितभयोत्रिभुवनकमल, अशुभतिमरअवसान।३।
अश्वसेन नृप उदय गिर, उगयो बाल दिनेश॥
तीनज्ञान किरणावली, लिये जगत परमेश। ४ ।
॥ पद्धड़ी छंद ॥
जन्मों जब तीर्थंकर कुमार। तिहुँलोक बढ़ो आनंदअपार॥
दीखेंनभनिर्मल दिशअशेशाकहिंआंधी मेहनधूल लेशा५॥
अतिशीतल मंदसुगंधवायासोबहनलगीसुखशांतिदाय॥
सबसुजनलोकहर्षेविशेशाज्योंकमलखण्डप्रगटतदिनेशदा
घंटा घन गरजे देवलोक। जोतिव घर केहरनाद थोक ॥
भवनालय बाजे सहज संखाविंतरनिवास भेरीअसंख।७।
येअनहदवाजे बजेजाना जिनराज जन्म अतिशयमहान॥
बहुकल्पतरोवर पहुपदृष्टि।स्वयमेवकरन लागेविशिष्टिाटा
इन्द्रासन कांपे अकसमातायेकान किधों सारथ सुजात ॥
१-अर्थात् नवमांस ॥
२-ये कार्न अर्याद इन्द्रासन का चान चक कम्पाय मान होना पानी प्रयोजन
सहित पैदाहुआ सो प्रयोजन या निनदेव का जन्म भूलोक में हुभाई ऐमी समय में
इन्द्र का आसन पर बैठना योग्य नहीं है भविनयकी मात ।।

१२४
२४
पार्षपुराण भाषा।
जिनजन्मभयोभूलोकमाहि।उच्चासनअब तुमजोगनाहिं।
आनषभये मणिमुकटएमाश्रीजिनप्रतिकरतप्रणामजेम॥
येचिह्नदेष इन्द्रादिदेव। तबअवधि ज्ञानबलजानभेव। १०
निर्धारबनारस नगरथान। तीरथपति जन्मों आजभान॥
प्रभुजन्मकल्याणककरणकाजाउद्यमआरंभो देवराजा११॥
परवारसहित सबइन्द्रनाम । आयेमिलप्रथम सुरेन्द्रधाम॥
नानाविधिबाहनचढ़ेजेहाजिनभक्तिसलिलसिंचतसुदेह१२
सप्तांगसेन तबचलीएम।यहमहाजलधि की लहर जेम ॥
हाथीरेथपायकर्षभबाजागार्यनिनितकिसेनासमाजा१३॥
एकेक सेन में सातकच्छ । तिहिमाहिं प्रथमचउअसीलक्षा
फिरदुगुणदुगुणसातलोजानाइसभांतसात सेनामहान १४॥
सौकोरजोर छैकोर और । अठसटु लाष ऊपर वहौर ॥
यहएकहस्ति सेनाप्रमान ऐसीही सव सातों समान।१५॥
तहिनागदन्तसुराभियोग।सोकरतबिक्रियानिजनियोग।
ताप्रतिआज्ञा दीनीसुरेन्द।तिनकीनों ऐरावत गयन्द।१६।
लखयोजन मान मतंगईश। अतिउन्नतदेह उतंगशीश ॥
शुभशेतबरणमनहरतकायालीलागतिधारैललितपाय १७
सबलसतसुलक्षण अंगअंगानखविद्रुमवर्ण मनोभिरंग।
१-सौधर्म नाम इन्द्र के पास आये :।। - २--अर्थात् ८४ लाख ॥
३-दस प्रकार के कल्प वासी देवों में से:अभियोगनवी प्रकार के देव हैं जो
वाहनविक्रया करतहैं सों नागदत्त नाम देवने अपने नियोग इस्ती विक्रयाधारणकरी॥

पार्भपुराण भाषा-1
गंभीरघनाघनघोषजासाबहुसंदरसुंड सुगंध सांस। १८॥
बहुलसतजुशोभाजासअंगानहिंगिणीजाहिं जिसरवितरंग
सोकामसरूपीकामगौन। जादेखत मोहित तीनभौन ।१९।
घनघोरत घंटा लंव मान । मणि घुघर माला कंठथान ।।
सोरणपाखर सोदिपै देह । संपाजत मानो शरद मेह। २०॥
सौबदन विराजत शोभवन्त । एकेकवदन में पाठ दन्त ।
प्रतिदंतसरोवरएकदीस। सरसरहँकमलनीसौपचीसा२१॥
एकेक कमलनी प्रतिमहान । पच्चीसमनोहर कमल ठान ॥
प्रतिकमल एकसौआठपत्राशोभावरणीनहिंजायतत्रा२२॥
पत्रनपर नाचें देवनार । जगमोहित जिनकीछविनिहार ॥
नवनवरस पोईंकरतगानालावन्यजलधिवेलासमाना२३॥
तिसहाथी ऊपर शचीसंगासौधर्मसुरगपति मुदितअंग ॥
आरूढ़भयोअतिदिपतएमा उदयाचलमस्तकभानुजेम२४
चंद्रोपकचामर छत्रशीश । देसजाति कल्पसुर सहितईश।।
ईशानप्रमुखइमदेवराजानिजनिजबाहनकोचलेंसाज।२५॥
परियनसमेतउरहर्षभाव। जिनजन्मकल्याणककरणचाव॥
बाजेसुरदुन्दभिविविधिभेवाजैकारकरैंमिल सकलदेवा२६॥
.
१-अर्थात् १०० ॥२-अर्थात् १२५ ॥ ३-नए नए ।
४-कल्प वासी देव दश प्रकार इन्द्र १.समानिक २ वाशित ३ पारि
पद ४ आत्म रक्षक ५ लोकपाल ६ अनीक ७ प्रकीर्णक ८ भाभियोग ९ कि
ल्चिए १०॥५-सजाकर ॥

--------- १२६ पापुराण भाषा। उपजोकोलाहलगगनथान।सब दिशि दीवाहन विमान॥ आकाशसरोवरअतिगंभीर।इन्द्रादिअमरतनतेजनीर।२७ तहांविकशतमुखअपछराएमायहखिलोकमलनीबागजेम॥ इहिं विधिदेवागमभयोजानाअवतरेबनारसनगरथान।२८। चन्द्रादि जोतषी पंच जातादसे भेद भवनवाशीविख्यात|| पुनि आठ जातके वान देव।सब आये इन्द्रसमेत एव।२९। निजनिज बाहनचढ़सपरिवाराजिन जन्ममहोछवहियेधार।। तव पुरप्रदक्षना सुरन दीनापतिहर्षत उरजैकारकीन॥३०॥ बन बीथी मारगगगन रोक।सब ठाड़े देवी देव थोक॥ सब शक्रशची मिल भूप गेह।आयेघरांगनभरोतेहा३११ तब इन्द्र बधू अतिरंजमान। सोर्गेई गुप्तजिन जन्मथान। देषी जिनमात सपूतनाम। परदचना दे कीनो प्रणाम।३२॥ सुत रागरंगी सुखसेज मांझीजोबालक भानुसमेतसांझ॥ करजोरयुगुल सिरनाय नायाथुतिकीनीबहुजानैनमाया३३॥ सुख नींद रचीतव शची तास।माया मय राखोपुत्रपास। १-चन्द्र १ सूर्य २ ग्रह नक्षत्र ४ तारे ५ २-असुर कुमार १ नाग कुमार २ विद्युत कुमार ३ सुपर्ण कुमार ४ श्रमिकुमार ५ द्वीप कुमार ६ उदधि कुमार ७ दिक् कुमार ८ वायु कुमार सनत्कुमार १० ३-वान व्यन्तर देव आठ प्रकार हैं-किन्नर १ किम्पुरुष २ महोरग ३ गन्धर्व ४ यक्ष ५ राक्षस भूत पिशाच ४-सो इन्द्राणी गई ५-जैसे सांझरूप माता भानुरूप बालक साथ रंगी हुई हैं

पार्थपुराण भाषा।
करकमलनवालकरतनलीनाजिनकोटभानुछविछीनकीन?
सुख उपजे जो प्रभु परस देह। कवि वानी गोचरनाहितेह ॥
प्रभुको मुख बारिज देष देष।हर्षे सुर रानी उर विशेष।३५॥
वस मंगल दरव विभूत सारादिश दिव्य कुमारीअग्रचार॥
इहिविधिसौधर्मसुरेश नार। आनोशिव कन्याबरकुमारा३६।
देषो हरिवालकचंदजाम । आनंदजलाधि उरबढ़ोतामा३७
शिरनाय इन्द्रनिजबार बार ।थुतिकीनी कर जुगंशीसधार।।
छविदेषनपति नहिं होय लेशातवसहसआंखकीनीसुरेश ।।
करनमस्कार निजगोदलीन्हाईशानइन्द्रशिरछत्रदीन्ह ३०॥
तहां सनत्कुमार महेन्द्र सोय। एचामर डोलैंइन्द्र दोय ।।
ब्रह्मादि सुरगवाशी सुरेश । जैनंद विई वोलैं विशेश। ३६ ।
ना. सुररमणी रूपखान गंधर्व करै जिन सुयशगान ॥
सुरबाजे बाजें बहुप्रकार । कर धरहिं किन्नरीवीनसाराट
कई सुर श्रीजिन सुभग भेष। देषे भरलोयननिनिमेष ॥
केई योभासुर समाज । हमदेवजन्म फललहोबाजा४१॥
केई शरधायुत भये देव । मिथ्यात महाविष बम्योएव ॥
इसभांतचतुरविधिदेवसंघासवचलेजोतिषीपटललंघाट।
१-ईशान नाम दूसरे स्वर्ग के इन्द्र ने
२-सनत्कुमार नापतीसरे स्वर्ग का इन्द्र महेन्द्र नाम चोये स्वर्ग का इन्द्र
३-ब्रह्म नाम पांचवे स्वर्ग का इन्द्र
५-विन पलक झांपर्याद खुली अांख लगातार देखना
५- कल्प वाशी थुक्नवाशी र योतिषी ३ विन्तर ४

.१२८ पार्षपुराण भाषा । । ॥ दोहा छंद ॥ योजन सहसनिन्याणवै, सुरगिरशिखर उतंग। गयेसकल सुरगण तहां, भूषन भूषित अंग।४३। ॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥ महामरु के मस्तक भाग। पांडुक बनबहु धरै सुहाग । योजनसहस जास विस्तार।सुर चारण खगक विहारा४४॥ चहूदिशचार जिनालयतहां। सघनसासते तरुवर जहां ॥ मध्यचूलिका मुकंटसरीस।सोउतंग योजनचालीस ॥४५॥ बारह योजन जड़ विस्तार । आठमध्य अरऊरध चार ॥ जाकेऊपर रजिक विमान । रोमांतर नरेछेत्र प्रमान । ४६ । तिसईशान दिशाशुभ थान । मणिमय शिलासासतीजान। पांडुकनाम फटक उनहार । प्राकृतिअर्ध चन्द्रमाकार।४७ "सौ योजन आयाम अभंग। विस्तरआधी आठ उतंग। सुरविद्याधर पूजत नित्ताभरतखण्ड जिनन्हौनपवित्ताचा तहां हेमसिंहासन सार । रत्न जड़त सो बलयाकार ॥ धनुषपांचसौ उन्नत जोय । भूमिभाग विस्तीरणसोया४६ ऊपर जास अर्ध विस्तार। जाके तेज मिटै अंधियार ॥ १-मध्य लोक प्रमाण पापुराण मापा। १२ तिसहीपर पदमासन साजापूरवमुख थापे जिनराज ॥५०॥ इस औसर सोहैं इमईश। मानो मेघ रल गिर शीश ॥ धुजोकलशदर्पन गार। चमेरछत्र सुप्रतीक सुतार। ५१॥ मंगल दर्व मनोहर जहां। धरे अनादि निधन ये तहां ।। श्रासनदोय उभयदिशोरायुगलइन्द्र ठाड़ेतिहिंठौर।५२॥ चारोंदिश चारों दिगपाल । यथायोग जिन मज्जनकाल॥ शचीसुरेन्द्र अपछरा थोक। सवठाढ़े पांडुक चनरोक। ५३ ॥ चौविधि देवखड़े चहुंपास । जन्मन्हौन देखन हुल्लास ।। कियो महामंडप हरितहां। तीनलोकजन निवसेंजहां। ५४। कल्प कुसुम माला भनहार । लटकै मधुप करें भंकार ।। सुरवाजिब व®बहुभाय। सुराभि सुगंधरही महकाय ।५५ । मंगल मिलगावें सब शची। नासुरं वनिता रस रची। तवमज्जन प्रारंभ विशेशाउद्यमकियो प्रथम अमरेशा५६। ॥ दोहाछंद ॥ तहां कुवेर रतन खची, रची पैडका पन्त ।। मेरु शिखरसों सोहिये, छीरोदधि परयन्त । ५.७॥ सुर श्रेणी सोपान पथ, पंचम सागर जाय ॥ in-manare- १-पैडियोंकीपंक्ति २-देवतामोंकी श्रेणी कहिये जमाअत सीढ़ी केरस्ने पाँच सागर पर जाररनंदन चर्चितकंचन कलशमर लाई.

१३०
पार्श्वपुराण भाषा।
भरलाई कंचन कलश, चंदन चरचित काय ।५८
योजन एक प्रमाणमुख, वसु योजन गंभीर ॥
: यहमरयादा कलशकी, जिन शासन मैं वीर।५६
मुक्तमाल मंडित लसैं, कंचन कलश महन्त ।
नभवनिता के उरज ये, यों अति शोभावन्त।६०
॥१५ भात्राचौपाई छंद॥
सहस भुजासुरपति तबकरी। भूषण भूषित शोभाभरी ॥
इसौसर हरिसोहैं एम।भूषणांग सुर तरु वर जेम।६१ ॥
कलश हाथ हरि लीने जाम। भाजनांग सम शोभा ताम ॥
तीनबार कीनो जयकार । कलशोद्धरन मंत्रउच्चार । ६२॥
इहिंविधि श्रीसौधर्माधीश । ढाले कलश स्वामि के शीश ॥
तबसबइन्द्रकियोजिनन्हौनाअतुलउछावबढ़ोजगभौन ६॥
महा धार जिन मस्तक ढरी। मानो नभ गंगा अवतरी॥
मुदितअसंख अमरगणत।जैजैकारकियो मिलसबै । ६४॥
उपजोति कोलाहलसार।दशदिश वधिरभई तिहिंवार ॥
भयोअसम औसरहहिभायाबचनहारवरणोनहिंजाय।६५॥
॥ दोहा छंद॥
जाधारासों गिरिशिखर, खण्ड खण्ड होजाय॥
१-भूषणांग कल्पवृक्ष जाति नाम २-भाजनांग कल्पक्ष जाति नाम

पार्षपुगण भाषा!
सो धारा जिन देह पै, फूल कली सम थाय । ६६ ।
अप्रमाण वीरज धनी, तिर्थकर प्रभु होय ॥
ताते तिनकी शक्ति को, उपमा लगै न कोय । ३७
नीलवरण प्रभु देहपर, कलश नीर छविएम ॥
नीलाचल सिर हेमके, बादल वरपै जेम।।
चली न्हौन केनीर की, उछल छटा नभ माहिं ।।
स्वामिसंग अघविनभई, क्योंनहि ऊरधजाहिं । ६६ ।
न्हौनछटा तिरछी भई, तिन यह उपमा धार ।।
दिगवनता मुख सोहियै, करण फूल उनहार । ७ ॥
॥ सोरठा छंद।
जिनतनपरसपवित्त,भईसकलजगशुचिकरण॥
सोधारा ममनित्त, पापहरो पावन करो । ७१ ॥
॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
यो सुरेन्द्र मज्जन विधिठान । फिरकीनों गंधोद्दकन्हान ॥
सोजललेय विनै विस्तरी । शांतपाठपढ़ पूजाकरी।७२।
शक्र शची सुर आनंदभरे । यथा योग सब कारज करे ॥
परदछना दीनी बहुभाय । बारम्बार नये सिरनाय । ७३ ।
१-भगवान के पवित्र तनको पर्सकर जोसर्वजगत कोपवित्रकरने वाली रहेगी
धारा सदीव मेरे पाप हरी

१ पार्श्वपुराण भाषा। ॥ हरिगीत छंद। सौधर्म पति अभिषेक कारन, न्हौन पीठ सुदंसनो॥ गंधर्व गायन निरतकारक, अपचरा यश शंसनो॥ पंचम पयोनिध न्हौनकुंड, असंख सुर सेवक जहां ॥ तिसजन्ममंगलकीबड़ाई, कहनसमरथवुधकहां।७४। ॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥ जन्म न्हौन विधि पूरनभई । सकल सुरासुर देवन ठई । अबइन्द्रानी जिनवरअंगानिर्जलकियो बसनशुचिसंग।७५॥ कुंकुमादि लेपन बहु लिये। प्रभुके देह विलेपन किये ॥ इहिशोभा इसोसरमांझाकिधोनीलगिरफूलीसांझा७६। औरसिंगार सकलसहकियो। तिलकत्रिलोकनाथकेदियो। मणिमयमुकट शचीसिरधरो।चूड़ामणिमाथेविस्तरो७७॥ लोचनअंजन दियो अनूप। सहजस्वामि द्रगअंजितरूप।। मणि कुण्डल कानन विस्तरोकिधों चंद सूरज अवतरे७८ कंठ कंठिका मोतीहार । मुक्तिरमणि झूला उनहार ॥ भुजभूषण भूषितभुजकरी।कटक मुद्रिका शोभित खरी॥७९॥ कटिभूषण कीनो कटि थान। मणिमय छुद्रघंटिका वान ॥ १-इन्द्र न्हौनकारेण है सुदर्शन मेरुकी पीठका अर्थात चौकी -सर्व सुर असुर देवों की जन्म न्दौन विधि पूरण होगई जो विचारी थी पार्षपुराण भाषा। १३३ -new-L- पग नेवर पहराये सार । जिन में रल झलक भंकार।८०॥ ॥ दोहा छंद ।। अंगअंग आभरन युत, यह उपमा तिहिंकाल । सुरतरु समप्रभु सोहिये, भूषण भूपित डाल।८१॥ ॥१५ मात्रा चौपाई छंद। तब इन्द्रादि लगेजैकरन । जैजिनवर सब भारत हरन ॥ त्रिभुवनभुवन दीपउनहार । धन्यदेव तेरोअवतार । ८२ । जैश्री अश्वसेन कुल चंद । वामानंदन जोति अमंद । सुखसागर केवर्धनहार । सबजग श्रेयशातदातार । ८३॥ तुमजग भ्रमनाशन अवतरे । हमसे दासमहासुखभरे ॥ बिनरविउदयतिमिरक्योंजायाकैसेकमलबागविकसाया। मिथ्यामत रजनी अतिघोर । मूसैं धर्म कलिंगी चोर ।। जो प्रभुजन्मप्रभात नथाया तोकिमप्रजावसैसुखपाया८५॥ ये अनादि संसारी जीव । विलखें भोग उदैस अतीय ॥ सो दुखमेटन दया निधानाराज वैद जनमे भगवान।८। भ्रम कूप वरती बहु लोय । काढ़न हार तिन्है नहिं कोय॥ श्रीमुखवचन नेजु बलधार।अब उद्धार लहनिरधार।८७॥ १-पाप पुत्र के भागने से विलखें है।

• पार्षपुराण भाषा।
आप परम पावन परमेश। औरन को शुचि करहु विशेश॥
ज्यों शशिशेत प्रभातन धरै।शेत सरूपसबन कोकरै टा
बिन सनान तुम निर्मल नित्त।अंतर बाहज सहज पवित्त।
हममजनविधिकानीआजानिजपवित्रकारणजिनराज ८९।
तुम जगपति देवन के देव । तुम जिन सुयं बुद्धि स्वैमेव ।।
तुमजगरक्षकतुमजंगतातातुमविनकारणबंधुविख्याता
तुमगुण सागरअगम अपार।थुतिकर कौन जायजनपार॥
सुक्षम ज्ञानी मुनि नहिं तरें।हम सेमंदकहा बलधरें।६१।
नमो देव अशरण आधार। नमो सर्व अतिशय भंडार ॥
नमोसकलशिवसंपतिकरणानमोनमोजिनतारणतरण।१२।
॥दोह छंद॥
इंहिं विधि इन्द्रादिक अमर,सुरपदवी फललेय॥
जन्म न्हौनविधिकर चले,मानोनिजशुभश्रेय । ९३।
जन्म महोछव देख कर, सुरपति की परतीत ॥
वहु सुर शरधानी भये, तज शरधा विपरीत ।।४।
॥१५. मात्रा चौपाई छंद॥
तब सव देव जनम पुरथान। पूरबली विधि कियो पयांन।।
चढ़ोइन्द्र ऐरावतशीश गोंद लिये त्रिभुवनपंतिईशा ६५
१-इन्द्रादि देवताओं ने मानो अपना शुभ कल्याण किया न्हौन विधि करके।

पाणपुर भापा।
3
पूरबवतद्दभिधुनिगाजीउहिं विधिगीत निरतसबसाज॥
आये जैजैकरत अशेशापिता भवन कीनो परवेश । ९६
मणिमय प्रांगणमैं हरि थापाहेमसिंहासन परप्रभुथाप ।
अश्वसेन भूपति लिहिं वार ।देषो नंदन नयनपसार । ६७
तेजपुंज निरुपम छवि देह । रोमांचित तन बढ़ो सनेह ॥
मायानींदशची तव हरी। जिन जननीजागी सुखभरी 16८1
भूषण भूषित कांति विशाल।
लोयन देषो.जिनवाल॥
अति प्रमोद उर उमग्यो तवै। पूरन भये मनोरथ सबै।९९
तब सुरेश रोमांचित काय । मात पिता पूजे मन लाय ॥
भूषण वसनभेट बहुधरी।हाथजोरयुगथुति विस्तरी।१००।
तुम जग में उदयाचल भूप । पूरब दिशि देवी शुचिरूप॥
उदयभयोत्रिभुवनरविजहां तुममहिमावुधवरणनकहां?०१॥
धनधन अश्वसेन भूपाल । जिनके जग गुरु जन्मो वाल॥
कीरतबेलअधिकतुमबढ़ी। तीनलोकमंडपशिरचढ़ी।१०२॥
धन बामा देवी जगराय। जिन जायो नंदन जग राय ।।
तीनलोकतियसिष्टिसिंगाराधनजीवन तेरोअवतार।१०३॥
तुम सम जगमें और न आन।जिन देवल समपूजप्रधान।।
यो थुतिकर हरिहियेप्रमोदावाल दिवाकर दीनोगोदा१०४॥
कही सकल पूरवली कथा । मेरु महोछव कीनो यथा ॥
तबनिजनगरविषैभूपालाजन्मउछाहकियोतिहिकाल।१०५॥
हरषत संव पुरजन परिवार। घर घर भये मंगला चार ॥

पार्श्वपुराण भाषा
घरघरकामिनि गावे गीताघरघरहोंय निरतसंगीत। १०६।
मंगलीक बाजे बहु भेव । बाजन लगे सकल सुखदेव ॥
श्रीजिनभवनन्हौनविस्ताराकियेसकलमंगलाचार॥१०७
छिड़क्यौ चंदन नगर मझार । रत्न साथिया धरे.सँवार।
याचकदानसुजनसनमानायथायोगसबरीतविधान।१०८
इहि विध अश्वसेन नरनाह । कीनो पुत्र जन्म उच्छाह ॥
पूरन आसभयेसब लोय।दुखीदीन दीपै नहिंकोय।१०६।
॥ दोहा छंद॥
उदय भयो जिन चंद्रमा कुलनभतिलक महत॥
सुख समुद्र बेला तजा। बढ़ौ लोक परयंतः।११०॥
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥
तब बहु देवन संग विशेश। आनंद नाटक ठयो सुरेश ॥
करें गान गंधर्व समाज । समैयोग सब बाजेसाज।१११।
दे अश्वसेन नरनाथ । पुत्र सहित सब परियन साथ॥
प्रथमरूप नेव भव दर्शायापहुपांजुलि खपी सुरराया११२।
तांडव नामनिरत प्रारंभाकियो जगतजन करनअंचंभ।
नट संरूप धारो अमरेशारंग भूमि कीनो परवेश।११३॥
१-मंदिरों में न्हौन विस्तार आदि सकल मंगल.आचार किये ॥
२-पुष्प अंजुली इन्द्र ने वखरी॥
.

पापुराण मापा । मंगलीक सिंगार संवार । सब संगीत वेद अनुसार ।। तोल मान विधिसहित सुभाय । रंग धरापर फेरैपाय।११४॥ करें कुसुम वरषा नभ देव । देष इन्द्र की भक्ति सुभेव ॥ बीना मुरज वांसली ताल।वाजे गेय गीतकी चाल।११५॥ करें किन्नरी मंगल पाठ। वरयां जोग बनो सब ठाठ॥ नाचै इन्द्र भमैं बहु भाय। मोरै हाथ कंठ कटिपाया११६। अद्भुत तांडव रस तिहिं वार । दरसावै जन अचरजकार॥ सहस भुजा हरि कीनी तवै। भूषण भूषित सोहेंस॥१७॥ धारत चरण चपल अति चलै । पहुमी कापै गिरवर हलै॥ भमैं मुकुट चक फेरीलेताताकी रतन प्रभाछविदेत।११८॥ बलयाकत है मलकै सोया चक्राकार अगन जिमि होय॥ छिनमैं एक छिनक बहुरूपाछिन सुक्ष्म छिनथूल सरूप११९ छिनमें निकट दिखाई देय । छिन में दूर देह धरलेय ।। छिनआकाश माहिसंचरै । छिनमेंनिरत भूमिपरकरे।१२० छिन छूवै तारावलि जाय । छिनक चन्दसों परसै काय ।। इन्द्रजालवत योअमरेश दरसाईनिजरिन्दिविशेश।१२१॥ हाथ अंगुलिन पै अपछरा। नाचें रूप रतन की छरा ॥ अंगअंगभूषणझलकाहिं।विकसतलोचनमखमुसकाहिं?" १-तालके परिमाण की विधि संयुक मल प्रकार पांव पर अन नान ।। २-य गीत अर्थात् गाने के योग्य गीत ।। ३-इस प्रकार जोर से निकरा कि घरनी कांपी पार पाड़ हिन्न गये.

२३८
पार्श्वपुराण भाषा।
निरत भेद विधि धारै पांव । करै कटाक्ष दिखावैभाव ॥
बहुविधिकलाप्रकाशैसारासुरकामिनिदामिनिउनहार १२३
तिनसँयुक्त हरि सुरतरु एम । कल्प लता गण वेदो जेम॥
योनाटकविधिठानअनूपातिढुजगशक्र कियेसुखरूपा१२४॥
स्वामिजनमअतिशयपरतापाजिनवरपितासभापतिप्राप॥
इन्द्रमहानटनाचै जहां तिसअवसरवरणनबुधकहां।१२५॥
तबतहां मातपिताकी साष । पारस नाम सकल सुरभाष ॥
राख सुरासुर सेवा योग। चले देव सब साध नियोग।१२६॥
॥ दोहा छंद॥
इहिविधिइन्द्रादिकमर,जन्मकल्यानकठान ॥ ...
बहुविधि पुन्न उपायकै, पहुँचे निजनिज थान ।१२७॥
॥ हरगीत छंद॥
इन्द्रादि जन्म सनान जिनको, करन कनकाचलचढ़े।
गंधर्व देवन सुयश गायो, अपंछरा मंगल पढ़े।
इहिंविधि सुरासुर निजनियोग, सकल सेवाविधिठई।
तेपास प्रभुमुझआस पुरवो, शरण सेवक नेलई।१२८॥
॥ श्री पाश्वपुराण भाषा जन्मोत्सव वर्णन नाम षष्ठम अधिकार सम्पूर्णम् ।।'

पार्थपुराण भागां।
सप्तम अधिकार॥
॥दोहा छंद ॥
पारस प्रभु तज औरको, जेनर पूजन जाहिं ।।
कल्पवृक्ष को छाँड़कै, बैठे थोहर छाहिं ।१।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
अबजिन वाल चंद्रमा बढ़ें। कोमलहांस किरणमग्वकरें।
छिनछिन तात मात मनहरी।सुखसमुद्र दिनदिनविस्तरै ।।
अमरित इन्द्र अंगूठे देय । वही पोष पय पान न लेय ॥
देवीधाय हरष मनधरै । मज्जनमंडन विधिसबकरें । ३
केई मणि भूषण पहराय । करें अलंकृत प्रभुकी काय ॥
केईकामिनि करें सिंगार।श्रीमुख चन्द्र निहार निहार । ४॥
केई रहसवती तिय आय । हस्त कमल सो लेय उठाय॥
मणिमय आंगनमांझ अनूपाविरेंजिनपतिवालसरूपा॥
बहुविधि देव कुमार मनोग । वालक रूप भये बययोग ॥
घटियागमन करैतिनसाथ । जोनक्षत्र गणमें निशनाथ ।।
कवहीं सैनोसन सोवन्त । ऊपर दिढ़ जिनयों जोवन्त ।।
१-चिव लेटकर.॥

१४०
पार्षपुराण भाषा!.
-
अहौं मुक्ति सों केतक परै । मानो यहशंका मनधरै ।७।
कवहीं पुहुमी पै जिनराय । कंपत चरन ठवै इहिभायः ॥
सहै कि ना धरती मुझभार। शंकैउर भावन यह धार।।
कवहीस्वामिकुदक उठचलै।विकशतमुख सबकोदुखदलै॥
वांधे मूठी अटपट पाय । कैसे वह छवि वरनी जाय।।
कवहीं रतन भीत मैं रूप। झलकै ताहि गहै जग भूप ॥
जिनसोंजिननमिलैसर्वथा। करतकिधौंकहवतयहरथा।१०
कवहीं रत्न रेत करलेत । करै केल सुर कुमर समेत ॥
कबाहिं माय बिन रुदन करेय । देङफेर बिहस हँसदेवा११॥
कबही छोड़ शची की गोद । जननी अंक जाय मनमोद ॥
माता सों मानै अति प्रीत। बाल अवस्थाकी यहरीत।१२।
योजिन बालक लीलाकरै । त्रिभुवन जन मन माणकहरौ।
क्रमसोबालभारतीनाम।श्रीमुखकमललसीअभिरामा१३॥
अनुक्रम भई अंगवढ़वार। तब त्रिभुवन पतिभये कुमार ।।
निरुपमकांतिकला विज्ञानालावनरूपअतुलगुणथान।१४।
मतिश्रुति अवधि ज्ञानबलदेव । जानै सकल चराचरमेव ॥
१-जिनराय पृथ्वी पर कंपाय कर पैर धरै हैं इस संभावन से कि घरती हमारे
वोझ को उठा सकती है या नहीं यह उत्प्रेक्षा अलंकार है.॥
२-चाल भारती कहिये तुतली बोली भगवान के मुख में शोभा देने लगी भा-
वार्थ भगवान बोलने लगे यह स्वभाविक बात है कि बच्चे आदि में तुतली
बोली बोलते हैं. ।। ३-कला चौसठ प्रसिद्ध है कोषदेखो जोपुस्तकप्रितमेंहै.॥

पाणुगण मापा। - manuman- । सोमसुभाव सहजउपशंत। निर्मलदायक दर्शनवंत । १५॥ इहिविध आठवर्ष के भये । तबप्रभु आप अणूबत लिये। देवकुमार रहें संगनित्त। तेछिनछिन रजें जिन चित्त।१६। कवहींगज तुरंगतन धरै। तिनपै चढ़ प्रभु जनमन हरें ।। कवहींहंस मोरबनजाहिं। तिनसोजगपति केलकराहिीं१७॥ कवहीं जलक्रीड़ा थलगमैं । कवहीं वन विहार भूरम कवहींकरैं किन्नरीगान। सोप्रभुसुयश सुनॆनिजकान । १८ ॥ कवहीं निरत ठवै सुरनार । दे जिन लोचन सुखकार ॥ कवहींकाव्य कथारसठान । करेंगोठजिन बुध बलवाना१६। बिना सिखाये बिन अभ्यास।सबविद्यासव कलानिवास ॥ योसुखअनुभव करतमहान। भयेपासजिन योवनवाना२०॥ ॥ दोहा छंद ॥ सम्पूरण जोबन समैं, प्रभुतन सोहै एम ॥ सहज मनोहर चांदकी, शरद समें छविजेम ।२१। १५ मात्रा चौपाई छंद॥ प्रभुके अंग पसेव न होय । सहज सदामल वरजितसोय ।। १-सम्पर्क दर्शन तीन प्रकार है उपशम सम्यक दर्शन १३योपशम २ज्ञायिक १४२ पावपुराण भाषा। उज्जलवरणरुधिरजिम पीर।सुसमचतुरसठानशरीरा२२॥ प्रथम सारसंहनन सरूप । इन्द्र चन्द्र मनहरन अनूप ॥ बिनाहेततनसहजसुवासाप्रयहितबचनमधुरमुखजासा२३॥ अतुलदेह बलधरत महान । सहसअठोतर लक्षणवान ॥ तिनकेनामलिखूकुछजोय।पढ़तसुनतसुखसंपतिहोय॥२४॥ ॥हरिगीत छंद॥ श्रीरक्ष शंख सरोज सुस्तिक, शक्र चक्र सरोवरो॥ चामर सिंहासन छत्रतोरण, तुरगपति नारी नरो॥ सायर दिवायर कल्पबेली, कामधेनु, धुजा करी ॥ बरबजूबान कमानकमला, कलश कच्छपकेहरी ।२५ गंगा गऊपति गरुड़ गोपुर, बेणु बीणा बीजना ॥ जुग़मीन महल मृदंगमाला, रत्न दीप दिपै घना ॥ नागेन्द्र भुवन विमान अंकुश, विरछ सिद्धारथ सही। भूषण पटम्बर हह हाटक, चन्द्रचूड़ा मणिकही। २६॥ जम्बू तरोवर नगर सूबस, बाग जन मन भावना ॥ नौनिध नछत्र सुमेरु सारद, साल घेत सुहावना ॥ . १ १-इसका टिप्पण पहले लिख पाये हैं.॥ २-बजू वृषभ नाराच संहनन । ३-महान वृक्ष ॥ ४-रेश्मी चस्तर॥ .

पार्षपुराण भाषा!
ग्रह मंगलाप्टक प्रीतिहारज, प्रमुख औरविराजहीं।
परमितअटोतरसहसप्रभुके, अंगलक्षण छाजहीं। २७॥
अंतर अनंती अतुल महिमा, कथन दृररहो कहीं।
बहिरंग गुणथुति करण जगमें,शक्रसेसमरथ नहीं।
अवऔर जनकी कौन गिणती, दीनपार न पावना॥
परपासप्रभुकी सुयशमाला, पहरदास कहावना।२८।
॥ दोहा छंद।
सहस अठोतर लछनये, शोभित जिनवर देह
है॥
किधों कल्प तरु राजके, कुसुम विराजत येह।२९।
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद।
शुभ परमाणू मय जिन अंग। नीलवरण नौ हाथ उतंग ॥
छविवरणतनहिंपावैओर। त्रिभुवनजनमनमाणकचोरा३०॥
शत संवत्सर आवंप्रमाण । अतुल असा धारण गुणथान।
शत्रुमित्रऊपर समभाव । दयासरोवर सोम सुभाव । ३१ ।
सागरसों प्रभुप्रति गंभीर । मेरु सिखर सों अधिक धीर ॥
१-धुना १ कलश २ दर्पण ३ मुंगार कहिये झारी ४ चमर ५ ६६ मुनीक
कहिये ठाणा ७ वाल काहिये वीजण.८॥
२-प्राविहार्य ८ हैं चमर : छत्र २ अशोक वृक्ष ३ भामंडन ४ दुंदुभि मिटा
सन.६ पुष्प वृष्टि ७ वाणी..॥

पापुराण भापा.1 १४४ कातिदेष लाजैमिरगांका तेजबिलोकि छिपैरविरांक ।३२॥ कल्पबिरछ सों अधिक उदार।तिहुँजग आशा पूरणहार॥ योजिन गुणको उपमाकहीं। तीनकाल त्रिभुवनमॅनहीं।३३॥ ॥दोहा छंद॥ योंमुख निवसत पासजिन, सैवत कमला पाय ।। सोलह वरष प्रमाण प्रभु, भयेजगत सुखदाय।३४॥ सभासिंहासन एक दिन, बैठेसहज जिनेन्द्र ॥ सुरनरमैं प्रभुयों दिपैं, ज्योउड़गण में चन्द्र ॥ ३५॥ अश्वसेन भूपाल तब, बोले अवसर पाय ॥ नेहसालिल भीजे बचन, सुनो कुमर जगराय । ३६। एक राज कन्या बरो, करो उचित व्योहार ॥ वंशवेल आगे चलै, सुख पावै परवार । ३७॥ नाभि राजकी आसजों, भरीप्रथम अवतार ॥ तथा हमारी कामना, पूरण करो कुमार । ३८॥ पिताबचन सुन प्रभु दियो. प्रति उत्तर तिहिंवार । रिषभदेव सम में नहीं, देखो हिये बिचारि ॥३६॥ मेरी सब सौ वर्ष थिति, सोलह भये विदीत ॥ तीस वर्ष संजम समय, फिर मत कहो पुनीत ॥४०॥ १-जिनके पैरों को लक्ष्मी से है. ।।

पार्चपुगण भागा! । अल्पकालथितिअल्पसुख,अल्पप्रयोजनकाज॥ कौन उपद्रव संग्रहै. समझ देख नरराज ॥४१॥ सुन नरेन्द्र लोचनभरे, रहे वदन विलखाय ॥ पुत्र व्याह वर्जन वचन, किसे नहीं दुखदाय । ४२ ॥ १५ मात्रा चौपाई छंद। इहिंविधमंदरागाजिनराय। निवसैं सब जीवन सुखदाय॥ पूरबकथित कमठ चरसीहै । पापकरत मानीनहिंचीहा४३॥ मुनिहत्यावशदुर्गतिगयो। पंचमनरक वास सो लियो ॥ सहजलधितहाँदुखसहे। वचनद्वारजोजाहिंनकहे।४।। थिति पूरणकर छोड़ी ठौर । सागर तीन भमों फिर और ॥ पशुगतिमाहिविपतबहुभरी । त्रसथावरकीकायाधरी।४५ इहिंविध भयो पाप अवसान। काहूजन्म क्रिया शुभठान । महीपालपुर सोहै जहाँ । महीपाल नृप उपजो तहां।४६) पारस प्रभुकी बामा माय । इनको पिताभयो यह राय ॥ पटराणीकेप्राणवियोग । उपजोविरहबढ़ोचितसोग।४७। तपसी भेष धरो दुखमान । पंचागनि साधै बनथान ।। सीसजटा मृगछाला संग।भसम पीसलाई सब अंगाका भ्रमत बनारसके उद्यान । आयो कष्ट करत विनज्ञान ॥ १-सिंह ।। २-किसी जन्म में अच्छी क्रियाकरीना कारण ।।

१४६ पापुराण भाषा। इहिंअवसरश्रीपार्श्वकुमार।गएसहजवनकतरविहार।४६ राजपुत्रवहु सुरगन साथ । गजारूढ़ दिपै जिन नाथ ॥ कर सुरूंदवनकेलअनूप । चलेनगरकोआनंदरूप । ५०॥ देखो मग में जननी तात । तपै पंच पावक तपगात ॥ सोसमीपप्रभुकोअविलोय । चिंतौचितरोषातुर होय ॥५१॥ मैं तपसी कुलवंत महंत । जननी पिता पूज सभ भंत ।। अहोकुमरकैयहअभिमानाविनयप्रनामकरैनहिान ५२॥ इतनै ईधन कारण जान । लकड़ी चीरन लगोअयान ॥ हाथकुल्हाड़ी लीनी जबै। हितमित वचनचये प्रभुतवै॥५३॥ भो तपसी यह काठन चीर । यामैं युगल नाग हैं वीर ॥ सुन कठोर बोलो रिसान।भोबालकतुमऐसोज्ञाना५४॥ हरिहर ब्रह्मा तुमही भये। सकल चराचर ज्ञाता ठये ॥ मन करत उद्धत अविचार । चीरोकाठ न लाई वार ५५ ततषिण खंडभये जुगजीव जैनी बिन सब अदयअतीव॥ दया सरोवर जिनतबकहै । तपसी वृथा गरभ तूं वहै । ५६॥ ज्ञान बिना नित काया कसै । करुणा तेरे उर नहिं वसै ॥ तबसठरोषवचनफिरचयो। जननीजनकरतपसीभयो।५७ करैनमदं वश विनय विधान । और उलट खंडै मुझान।। पंच अगन साधूंतन दाह । रहूं एकपद ऊरध बांह।५८ । १-मैं तुम्हारी माता को जनकर तपसी हुआहूं भावार्थ में पुरानाहूं तुम नवीन तपसी हो।

पाचपुराण मापा।
mmmmuA
भूष प्यास बाधा सव सहूं । सूखेपत्र पारना गहुँ ।
ज्ञानहीनतपक्योंउचरै । क्यों कुमारमुझ निंदाकरे । ५९
तब प्रभु वचन कहै हितकार । तुझ तपमैं हिंसाअघभार।
छहोंकायकेजीवअनेक । नाशहोहिंनितनाहिविवेक ।६० ।
जहां जीववध होय लगार । तहां पाप उपजै निर्धार ॥
पापसही दुर्गति दुख देह । यातें दयाहीन तपयेह । ६१ ।
ज्ञान विनासवकायकलेश। उत्तम फलदायक नहिंलेश ॥
जैसेतुस खंडन कनछार।योंअजान तपअफलप्रसाराहा
अंधपुरुष बनदौ में दहै। दौर मरै मारग नहिं लहे
त्योअजान उद्यम करपचै। भवदावानल सोनहिं बचे।६।
ऐसेही किरया विन ज्ञान । सोभी फलदायक नहिं जान ॥
तथापंगलोचन बलधरै। उद्यम विन दावानलज। ६४।
तातैज्ञान सहित आचार। निश्चै बंछित फल दातार ।
इहिविधिजिनमतकेअनुसाराकरउत्तमतपयहहठकार।६५॥
मैं तुझ वचन कहे हितकार । तू अपने उर देख विचार ॥
भलीलगैसोई करमित्त । थामलीन करै मत चित्त ।६६।
दोहा छंद
नागयुगलसुनजिन वचन,क्रूरजीवअतिनिंद।
१-जलकाय १ अग्नि २ भूमि ३ पवन ४ वनपनि ५ ( पांच मारक
जीव यावर हैं ) म ६ दो इन्द्री आदि पंचइन्द्री पर्यन ।।

१४
पाचपुराण. भाषा।
देह.त्याग ततषिन भये, पदमावती धानंद । ६७।
नाग युगल के भागकी, महिमा कही न जाय॥
जिन दर्शन प्रापति भई, मरण समैं सुखदाय। ६८॥
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
घर आये श्री पार्स जिनंद । सुरनर नेत्र कमलनी चन्द ॥
समैपाय तपसी तजदेह । भयोजोतषी शम्वर तेह ।६९॥
देखो जगमें तप परभाव । ज्ञान बिना बांधी सुराव ।।
जेनर करें जैन तपसार । तिन्है कहा दुर्लभ संसार।७० ।
स्वामी मगन सुखोदधि माहि।हर्षविनोद करतदिनजाहिं।
प्रभुकेइष्ट वियोगनहोय ।सोग सँजोगन कबहीकोय।७१॥
वायपित्त कफजनित विकार। सुपनै होय न सोच विचार।
जरा नव्यापैतेजनजाय। नामुखकमल कभीकुमलाय।७२।
होहिनहीं दुख कारन आन । पुन्यउदधि बेला भगवान ॥
योंसुखभोग करतदिनगये। तबजिन तीसवर्षकेभये । ७३॥
पं जैसेन अयोध्या धनी। भक्ति प्रीतप्रभु सों अतिघनी।।
तुरगादिकबहु बस्तुअनूप । पठईविनयवचन कहभूप।७४।
राज दूत चलि आयो तहां। सभा थान जिन वैठे जहां।
हेमासनपर सोहैंएम । हिमगिरशिखर श्यामघनजेमा७५)
देखदूत रोमांचित भयो । बहुविधि चरन कमल को नयो।।
मानोसफलजन्मनिजसारात्रिभवनपतिपरत्यक्षनिहारा७६||
..

पार्षपुराण भाषा।
धरी भेंट जो राजा दई। विनय प्रणाम वीनती चई ॥
तवपूतहां त्रिभुवनधनी। संपतिनैर अजोध्या तनी ७७
कहै दूत करयुग सिरधार । वरणे तिर्थकर अवतार ।
मोषगयेवरणे तिहिंठाम । सुनस्वामी चिंतैउरताम। ७८ ।
॥१४ मात्रा चाल छंद॥
सुनदूत वचन वैरागे । निज मन प्रभु सोचन लागे ।
मैं इन्द्रासन सुख कीने। लोकोत्तम भोग नवीने । ७६
तब अपत भई तहांनाहीं । क्या होय मनुष पदमाहीं ।
जो सागर के जल सेती। नवुझी तिश्ना तिस एती 1८०!
सो डाभ अनीके पानी । पीवत अव कैसे जानी॥
ईधन सों श्रागन धापै। नदियों नहिं समुप समापै।।
यों भोग विषै अति भारी। तृपते न कभी तनधारी॥
जो अधिक उदै यह आवै। तो अधिकी चाह बढ़ावा८२॥
जो इनसों तृपति विचारै । सो वैसानर घृत डारे ।
इन सेवत जो सुख पावै । सो आको श्रांव उम्हावै ८३ ।
ये भीम भुजंग सरीखे। भ्रम भाव उदय शुभ दीखै ॥
चाखतही के मुखं मीठे। परिपाक समय कटु दीठे। ८४।
ज्यों खाय धतूरा कोई । देखै सव कंचन सोई ॥
धिक ये इन्द्री सुख-ऐसे । विषवेल लगे फल जैसे।८५।
-

पार्श्वपुराण भाषा।
१५०
इनही वश जीव अनादी। भव भाँवर भ्रमत सवादी ॥
इनहीं वश सीख न माने। नाना विध पातक ठाने। ८६।
थिर जंगम जीव संघारै । इनही वश झूठ उचारै
पर चोरी सों चितलावै । परतिय संग शील गमावै।।७।
परिग्रह तिस्ना विस्तारै । आरंभ उपाधि विचारै ॥
इत्यादि अनर्थ अलेखै। कर घोर नरक दुख देखै । ८८
येहीसुख पर्वत केरे । जग फोरन वन बड़ेरे ॥
येही सब दोष भंडारे । धन धर्म चुरावन हारे। ८९।
मोहीजन मोहैं योंहीं। ये आदर योग न क्योंहीं ।
इनसों ममता तज दीजै। परत्यागत ढील न कीजै।९।
सामानं पुरुष जग जैसे । हमखोये येदिन ऐसे ॥
संयम बिन काल गमायो । कछुलेखे में नहिं लायो।९११
ममतावश तप नहिं लीनो । यहकारज जोग न कीनो ॥
अबखाली ढीलनकीजै । चारित चिंत्यामणिलीजै । ९२।
॥ दोहा छंद ॥
भोगबिमुखजिनराजइम,शुधकीनी शिवथान॥
भावें बारह भावना , उदासीन. हित दान।९३॥
१-भवरूप भांवर कहिये-यतियोंका भोजन विस्का स्वादी भ्रमै है।
"

पापुराण भाषा।
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद
* १. अथिरभावना *
द्रव्य सुभाव विनाजगमाहि । परयैरूपकछू थिरनहिं ॥
तनधन आदिक दीपैजेह । कालअगनसबईधनतेह । ६४।
* २ असरणभावना *
भवबन भमत निरंतर जीव । याहिनकोई सरणसदीव ।।
व्योहारै परमेठी जाप । निश्चै सरण आपको आप।९५॥
* ३ संसार भावना *
सूर कहावै जो सिर देय । खेत तजै सो अपयश लेय ॥
इसअनुसारजगतकीरीत ।सबअसारसबही विपरीता६६।
* ४ एकत्व भावना *
तीनकाल इस त्रिभुवन माहिं। जीव संघाती कोई नाहि ।।
एकाकी सुखदुख सवसहैं । पाप पुन्न करनी फललहें । ९७॥

"
पार्थपुराण भाषा
..
* ५ अन्यत्वभावना *
जितने जग संजोगी भाव । तेसब जियसों भिन्न सुभाव ॥
नितसंगीतनहीपरसोय । पुत्रसुजनपरक्यानहिहोय।६८।
* ६ अशुचिभावना *
अशुचिअस्थि पिंजर तनयेह । चाम बसन बेढो घिनगेह॥
चेतनचिरातहांनितरहै । सोविन ज्ञानगिलानिनगहै ।
* ७ आश्रव भावना *
मिथ्या अविरत योग कषाय। ये आश्रव कारण समुदाय॥
आश्रवकर्मबंध कोहेत । वंधचतुरगतिके दुखदेत । १००।
* ८ संवर भावना *
समिति गुप्ति अनुपेहा धर्म । सहन परीसह संजमपर्म ॥
येसंवर कारण निर्दोष । संवर करै जीवको मोष । १०११
* निर्जराभावना *
तपबल पूर्वकर्म खिरजाहिं । नये ज्ञानवल पावे नाहि
यही निर्जरा सुख दातार । भव कारन तारननिर्धार।१०
तारननिर्धार।१०।
--

पार्षपुगण भाषा। - darana-MARA PI * १० लोकभावना सुयंसिद्ध त्रिभवन थितजान । कटिकर धरै पुरुष संठान।। भ्रमतअनादिआत्माजहां समकितबिनशिवहोयनतहां:०३॥ * ११ धर्म भावना * दुर्लभ धर्म दसांग पवित्त । सुखदायक सहगामी नित्त ॥ दुर्गति परत यही करगहै।देय सुरग शिव थानकयो।१०४॥ * १२ बोध दुर्लभ भावना * सुलभ जीव को सव सुख सदा । नौग्रीवक ताई संपदा ॥ बोध रतन दुर्लभ संसाराभव दरिद्र दुखमेटन हार।१०५॥ ये देसदोय भावना भाय । दिढ़ वैराग भये जिनराय ॥ देह भोग संसार सरूप। सब असार जानो जगभूषा १०६। इत. लोकांतिक सुर आय। पुहपांजलि दे पूजे पाय ॥ ब्रह्म लोक वाशीगुण धामादेवरिषीश्वरजिनकोनाम।१०७ सब पूरब पाठी वुधवंत । सहज सोम मूर्ति उपशंत ॥ वनिता राग हिये नहिं बहाएकजन्मधरशिवपदलही १०८ तिर्थकर जब विरकत होय। हर्षवंत तब श्रायें सोय ॥

पार्श्वपुराण भापा।
१५४
औरकल्यानककरें प्रणामासदासुखीनिवर्सेनिजधामा१०९।
हाथ जोर बोले गुण कूप । थुति वायक अरु शिक्षारूप
धनविवेक यहधन्नसयानाधनयह औसरदयानिधाना११०॥
जानो प्रभु संसार असार । अथिर अपावन देहानिहार॥
इन्द्री सुख सुपने सम दीस।सोयाही विधहै जगदीसा१११॥
उदासीन असि तुम कर धरी। आज मोह सेना थरहरी ॥
बढ़ोआजशिवरमणिसुहागााजजगेभविजनसिरभाग११३
जग प्रमाद निद्रा वश होय । सोवत है शुध नाही कोय ॥
प्रभु धुनि किरन पयासैजबै। होय सचेतजगैजनत।११३॥
यह भव दुस्तर पारावार । दुख जल पूरत वार न पार ॥
प्रभुउपदेशपोत चढ़धाराअंब सुखसों जइहैं जनती।११४॥
शिवपुर पौर भरम पट जहां। मोह मुहर दिढ़ कीनी तहां ॥
तुम बानीकूची करधार । अब भविजीवलहें पयसारा११५॥
सुयं बुद्ध बोधन समरत्थ। तुमप्रतिपर बुध बचन अकत्थ।।
ज्यों सूरज आगे जिनराज।दीप दिखावन है बे काज।११६॥
हम नियोग औसर यह भाय । तातें करें वीनती आय ॥
१-और कल्यानकों में देवे रिपीश्वर जो पांचव सुरग लोकके लोकांतिक
पाड़े में रहते हैं घर बैठे प्रणाम करते हैं केवल तंप कल्यानक में वैराग वढावन
हेत आते हैं।
२-आप जो सुयं बुद्ध औरों के समझाने को सामय हो इसकारण तुम प्रति
परलोगों के बुद्ध वचन अकत्थ अर्थात् निष्फल है ।

पार्षपुराण भाषा। -dan- F- धरिये देव महाव्रत भार। करिये कर्म शत्रु संघार।११७.१ हरयै भरम तिमर सर्वथा। सूझै सुरग मुक्ति पथ यथा ॥ यो थुतिकरबहुभाव दिढ़ायावारवारंचरननशिरनाया११८ साध-नियोग गये निज थान। लोकांतिक सुर बड़े सयान ॥ अवचौविधइन्द्रादिकदेवाचढ़निजनिजवाहनबहुभेव११६॥ हर्षित उर परवार समेत। आये तृतिय कल्याणक हेतं ।। सुर वनिता नाचें रस भरी।गावै मधुरगीत किन्नरी१२०॥ वाजै विविध बजै तिस वार। करैं अमर गण जैजै कार ।। सोरनकलशभरे सुररायाविमल छीरसागर जललाया१२१॥ हेमासन थापे जिनराय । उच्छव सहित न्हौन विधठाय ॥ भूषणवसन सकल पहिरायाचंदनअर्चितकीनीकाय।१२२॥ इस औसर प्रभु सोहै एम। मोष वधू वर दूलह जेम ॥ कहवैरागवचन जिनताप्रतिबोधेपरिजन जनसवै।१२३॥ अति हठसों समझाई मायालोचन भरे बदन विलषाय॥ विमला नाम पालकी साजापानी इन्द्रचढ़ेजिनराजा१२॥ पहले भूमि गोचरी राय ।सात पैंडलीनी सुखदाय ।। फिर विद्याधर राजा रले । पैंडसातही ते लेचले । १२५॥ पीछे इन्द्रादिक सुरसंघ । कांधै धरी चले पुरलंघ॥ नाअति निकट नदी दूर । नभ मारग देपें जनभृर। १२६॥ ॥ दोहा छंद ॥ जिन साहब की पालकी, इन्द्र उठावन हार ॥

१५६
पावपुराण भाषां।
तिसगुण महिमा कथन अब, पूरनहोउ अपार।१२७१)
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद।
योसुरनर सब हर्षित भये। अश्वनाम बनमें चलगये।
बड़तरुतलैशिलाशुभजहां।कीनोशचीसाथियातहाँ।१२८॥
उतरे प्रभुअति उत्तम ठाम । शान्तंभयो कोलाहल ताम॥
शत्रुमित्रऊपरसमभाव। तिणकंचनगिनएकसुभाव। १२६॥
सोमभाव स्वामी उरधार। पट भूषण सब दीने डार ॥
उदासीनउत्तरमुखभये। हाथजोर सिद्धन प्रतिनये। १३॥
दुविध परिग्रह तज परमेश । पंच मुष्टि लोचे सिरकेश ॥
शिवकामिनिकी दूती जोय। धरी दिगंवर मुद्रासोय।१३१॥
॥ दोहा छंद ॥
सोहै भूषन बसनः बिन, जातरूप जिन देह ॥
इन्द्र नीलमणि को किधों, तेजपुंज शुभयेह।१३२१
पोह प्रथम एकादशी, प्रथम पहर शुभबार ॥
पद्मासन श्रीपार्स जिन, लियो महाव्रत भार 1१३३॥
और तीनसै छत्रपति, प्रभुसाहस अविलोय ॥
राजछोड़ संयम धरों, दुख दावानल तोय । १३४॥
तब सुरेश जिनकेश शुच, छीर संमुद पहुँचाय ।।
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-

पार्षपुराण भापा। - करथुति साधनियोग सब, गयो सुरग सुरराय॥१३५॥ ॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥ अव स्वामी वनथान नियोगातेलाथाप दियोजिन योग ।। अट्ठाईस मूलगुण शाख। उत्तर गुण चौरासी लाखा१३६॥ सब प्रभुधरे परम समचेत । अचल अंगमुख मौन समेत।। यो वन बसत ऊपजो ज्ञान । संयम धर मनपर्यंज्ञाना१३७॥ ॥ सोरठा छंद ॥ लघु वै में जगपाल, कियो निवीरज कामदल ॥ धीरज धनुष सँभाल, तिनके पदनीर जनमूं । १३८ श्रीपाचपुराण भाषा श्रीजिन दिक्षाकन्याणक वर्णननाम सप्तमअधिकार संपूर्णम् ॥ ॥ अष्टम अधिकार ॥ ॥ सोरठा छंद ॥ जोप्रभुको यशहंस, तीनलोक पिंजरै वसे । सोमम पाप विधुंस, करो पास परमश नित।१। १-कामरूप सेना को निति करदिया भावार्थ जीनलिया ॥

१५८
'पापुराण भाषा।
१
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥
अबजिन उठे जोग अवसान । देहहेत उद्यम उरआन ॥
परम उदास अधोगतदीठ । सहजशाँतमुद्रामनईठ । २॥
दयानीर निर्मल परिबाह । गुल्मखेट पुरपहुंचे नाह ॥
लाभअलाभबराबरधार । निर्धनधनकोनाहिंविचार । ३।
ब्रह्मदत्त भूपति बड़भाग । प्रभुको देषबढ़ो उरराग ॥
उत्तम पात्रसकलगुणधाम । कर प्रणामपड़गाहेताम ।४।
हेमासन थापो नररोय । प्रासुक जल परछाले पाय ॥
आठभाँत पूजा विस्तरी । हाथजोर अंजुलि सिरधरी।।
मन तन बायक शुद्ध सरूपं । नौदाता गुण संजुत भूप ॥
शुद्ध अन्नदीनो परबीन । प्रासुक मधुर दोष दुखहीन।६।
उत्तम पात्र दान विधकरी। तीनभवन कीरति विस्तरी॥
पंचायभये नृप धाम । फिर स्वामीआये बनठाम ।७।
करें घोरतप साधे योग। दर्शन करत मिटें सबसोग ॥
अचल अंगमुख सोहै मौन। एकचित्त निजपद चितौना।
ज्योसमुद्रजलविगतकलोल। अथवासुरगिरशिषरअडोल।।
तथानीलमणि प्रतिमा येह। यों अकंप राजै जिनदेह।
१ पात्र को देखबुलाना १ उच्चासनपर विठलाना २ चरणधोना ३ चरणोंदक
मस्तक पर रखना ४ पूजाकरना ५ मनशुद्धरखना ६ वचन विनय रूपवोलना ७
शरीर शुद्धरखना:८ प्रहारशुद्ध देना ।

पापुराण भाषा!
----------
॥ उक्तंच संस्कृत शार्दूल विक्रीड़ित छंद ॥
नोकिंचित्करका-मस्तिगमन, प्राप्यनकिंचिदृशो।
ईश्ययसानकर्णयोःकिमपिहि, श्रोतव्यमायस्तिन ॥
तेनालम्बितपाणिरुज्झितगति, नासाग्रदृष्टी रहः ।
सम्प्राप्तोऽतिनिरकुलोविजयते,ध्यानैकतानोजिनः। १० ।
॥ भाषाटीका ॥
..
हायों से कुछ कामकरना नहीं रहा इस कारण हायलम्बे छोडदिये, चलन में हो.
ने वाला कोई काम नहीं रहा इस लिये गमन त्याग दिया दोनों भखों को देखने
योग कोई काम नहीं रहा इसलिये नाककी फुगल पर दृष्टी घरनहार भये, दोनों
कानों को कुछ सुनने योग कामनहीं रहा इसलिये श्रीजिनराज अति निराकुल
एकांत ध्यान में एकाग्रचित होवठे ।।
॥१५ मात्राचौपाई छंद
वैर भाव छाड़ो वन जीव । प्रीत परस्पर करें अतीव ॥
केहर आदि सतावे नाहिं । निर्विषभये भुजंगवनमाहि।११।
शील सनान सजो शुच रूप। उत्तर गुण पाभर्ण अनूपा।
तप मय धनुषधरी निजपान। तीन रलयेतिक्षण वान।१२।
समताभाव चढ़े गजशीशा ध्यान कृपान लियो कर ईश।।
चारित रंगमही में धीर। कर्म शत्रु विजई बरवीर । १३ ।
१-सम्यक दर्शन ! सम्यक ज्ञान २ सम्यक चारित्र'

१६० पार्षपुराण भाषा। .. 3B Ala m- 7. ॥ दोहा छंद ॥ स्वामी की सब.पर दया, सबही के रछपारः। जग विजई मोहादि रिपु, तिनके प्रभु छयकार ॥१४॥ ॥ सोरठा छंद ॥ देषो पवन प्रचंड, दूब न षडै दूबरी ॥ मोटे विरछ विहंड, बड़े बड़ोही बलकरें। १५॥ ॥ दोहा छंद॥ यो दुद्धर तप करत. अति, धर्मध्यान पद लीन। चार मास छदमस्त जिन, रहे रागमल हीन १६॥ ॥ १५ मात्रा चौपाई छंदः॥ एक दिवस दिवा बन जहां।जोग लीन प्रभु निवसैं तहां। काउसर्गतन विगत विरोधाठाड़े जिंनवर जोग निरोधा१७ शम्बर नाम जोतषी देव । पूरब कथित कमठ चरएव ॥ अटक्योअंबरजात विमान।प्रभुपररह्योछत्रवतान।१८ ततषिन अवधि ज्ञान बल तबै । पूरब वैर सँभालो सबै॥ 1 १-केवल ज्ञान होने से पहले केवलीकी छदमस्त संज्ञाहै अर्थात् थोड़े ज्ञान वाला।

पापुराण भाषा। १६१ कोपो अधिकथांभोजाय।राते लोयन प्रजुली काय॥१६॥ आरंभो उपसर्ग महान । कायर देष भर्जे भय मान ।। अंधकार छायो चहुंओर । गरज गरज वरपै घनघोर॥२०॥ झरै नीर मुसलोपम धार । झंझावायु बहै विकरार ।। चूड़े गिरतरुवर वनजात । लतामूल विध्वंशनिपात ।२१ जलथल भयोमहोदधिएम । प्रभु निवसैकनकाचलजेम। दुष्टविक्रियावल अविवेक । और उपद्रव करै अनेक।२२। ॥ छप्पै छंद॥ किले किलंत वेताल, काल कज्जल छवि सज्जहिं ।। भौं कराल विकराल, भाल मदगज जिम गज्जहिं ।। मुंडमाल गल धरहि, लाल लोयन डरहें जन ।। मुख फुलिंग फुकार, करें निर्दय धुनि हन हन । इहि विधि अनेक दुर्भेषधर, कमठजीव उपसर्ग किया। तिहूंलोकवंदजिनचंदप्रति, धूलडालनिजसीसलिय२३ ॥ दोहा छंद इत्यादिक उत्पात सब, तथा भये अति घोर ।। १-लाल होगई थांख॥ २-किलकी मारकर बोलते हैं वेताल कहिय प्रनादिक काले कम्जतनी धारि कर साने हैं।

१६२ पावपुराण भाषा। जैसे माणक दीप को, लगै न पौन भकोर ॥२४॥ प्रभुचितचलो न तन हलो,टलो न धीरज ध्यान॥ इन अपराधी क्रोधवश, करी वथा निजहान ॥२५॥ पावक पकरै हाथ सों, अवश हाथ जल जाय ॥ पर के तन लागै नहीं, वाके पुन्न सहाय ।२६। प्रानी विषय कषाय वश, कौन कौन विपरीत ॥ करतहरत कल्याण निज, जलो जलो यहरीत ।२७ प्रभु अचिंत्य महिमा घनी, त्रिभुवन पूजत पाय ॥ तिनके यह क्यों संभवै, सुर उपसर्ग कराय। २८॥ इहिं विधि जो कोई पुरुष, पूछ संशय राष ॥ ताके समझावन. निमत, लिखू जिनागम साप।२०। ॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥ अवसर्पनि उतसर्पनिकाल । होहिं अनंतानंत विशाल ॥ भरथ तथा ऐरावत माहि। रहटघटी वत आवे जाहि॥३०॥ जब ये असंख्यात परमान, बीते युगमे खेत में थान ॥ १-अवसनि निगलने वाला अर्थ कल्प काल जिसमें प्रति दिन आयु और काय घटती जाय उनसन उगलने वाला अर्थ कन्प काल जिसमें प्रति दिन आयु और काय बढ़तीनाय पूति सर्पणि काल के जिनमतियों ने ६ भाग करे हैं-मुखमा सुखमा १ सुखमार सुखमा दुखमा ३ दुखमा मुखमा ४दुखमा ५ दुखमा दुखमा ६ जिनकालों की वर्ष संख्या त्रैलोक सार आदि महान ग्रंथों में देषो । २-दोनों अर्थात् अव सर्पनि १ उत सर्पनि २ इस पृथ्वी क्षेत्र पर वीत तब हुंडा अब सर्पणि उत्पन्न हो॥

पापुराण भाषा तब हुंडा अबसर्पणि एक । परै करे विपरीत अनेक ॥३॥ ताकी रीत सुनो मतिवंत । सुखमा दुखमा काल कि अंत॥ वर्षादिक को कारण पाया विकलत्रय उपजै वहुभाया३॥ कल्प क्ष विनशैं तिहिवार । वरतै कर्म भूमि व्याहार ॥ प्रथम जिनेश प्रथम चक्रेशाताही समै होहिं इहिंदेशा३३॥ विजय भंग चक्री की होय। थोड़े जीव जाहिं शिवलाया। चक्रवर्त विकलप विस्त।ब्रह्मवंश की उतपतिकरै।३।। पुरुष शलाका चौथे काल । Jटावन उपजे गुणमाल ॥ नवमे आदि सोलह पर्यंत । सात तीर्थ में धर्म नशंत॥३५॥ ग्यारह रुद्र जन्म जहँध। नौकलिप्रिय नारद अवतरें । सप्तम तेईसम गुणवर्ग । चरमजिनेश्वर को उपसर्ग । ३६ । १-भोग भूमि की विरोधी जिसमें भरने परिश्रम से खान पान श्रादिक नामनी संचय की नाय ॥ २-चकी को लड़ाई में हार हो । -नय काम फैलावे ।। ४-६३ शनाका पुरुष में से चतुर्थम कानय नीन नियंकर शानिमाय ? कुंचनाय २ अरहनाथ ३ सोई चक्रवत हग र विरप्ट प्रयन नारायण का गांव महा- वार स्वामी का जीव हुआश्रीरादिनाथस्वामी प्रथम तधिकर नागर कालय जनाले- कर तीसरे ही काल में मोक्ष गये इसपकार५घटकर ५८ रहे ।। ५-श्री पुष्पदन्त जी इतीर्थकर आदि श्री शान नाथ जी ६ नायिकर पर्यावं नरालय काल में धर्म का नाश होजायगा। ६-भीमावलि ? जितशत्रु २३ विशाल ४ न्यूनिष्ट ५३न ६ पुंडरीक ७ र जिनधर ८ जितनाभि ९ पीठ १० सत्य वचन नय ११ ये ११ न्द्रमा भीम २ रुद्र महारुद्र ४ काल महाकाल ६ दृयुल ७ नमव ८ जागा ये नारद है। ७-गात मुसार्थनाय नेइसवें पायनाय अंतजिनेवर कहिय वाम पानी स्वापी हुँडासर्पनि में इन तीनों को उपसर्ग होता है --- १६४ पार्श्वपुराण भाषा। तीजे चौथे काल मझार । पंचम मैं दीर्ष बढ़वार ॥. विविधि कुदेव कुलिंगी लोग। उत्तमधर्म नाशकेजोग।३७॥ सवर विलालभील चंडाल । नाहरादि कुलमैं विकराल ॥ कल्कीउपकल्की कलिमाहि। बयालीसहोमिथ्यानाहि।३८॥ अनादृष्टि अतिवृष्टि विख्यात । भूमि वृद्धि वंजागनि पात॥ ईतभीत इत्यादिकदोष । कालंप्रभाव होयदुखपोष।३८ । ॥ दोहा छंद ॥ यो त्रिलोक प्रज्ञप्ति मैं, कथन कियो बुधराज ॥ सोभविजन अवधार यो, संशय मेटन काज।४।। ॥१५ मात्राचौपाई छंद॥ तबफनेशांसने कंपियो।जिनउपकार सकल क्षुधकियो। ततषिनपद्मावतिलेसाथा आयोजहँ निवसैजिननाथ ॥४१॥ करप्रणाम परदछना दई। हाथ जोर पद्मावति नई ॥ फर्णमंडप कीनोप्रभुशीश । जलबाधा व्यापैनहिंईश।४२॥ नागराज सुर देख्यो जाम। भाजो दुष्ट जोतषी ताम ॥ हीनजोग सधी यहबात । भागजाय तबही कुशलात।४३॥ १-हीन पुरुप के योगसूधी यह बात है कि भाग जाय इसी में कुशल हैं।

पापुराण भापा । अबसवतुरत कलह मिटगये।प्रभुसप्तम थानकथिरभये॥ विकलपरहित चिदातमध्यान। करैकर्म छयहेतमहानारा सात प्रकृति चौथे गुणठांन । पहले नाशकरी भगवान ।। अवह्यांधर्म ध्यानवलधीर । तीनप्रकृति जीतीवरबीररा४५॥ प्रथम शुकल पदसों परनये। खिपक श्रेणिमारग परठये ।। प्रकृतिकृतीस नेवेंठयकरी दसवैलोभ प्रकृतिप्रभुहरी॥४६॥ ॥ दोहा छंद॥ एकादेशम उलंघपद, चढ़े बारवें थान ॥ कर्म प्रकृति सोलैंह तहां, नाश करीअवसान ।४७। ॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥ इहिंविधि त्रेसठ प्रकृति निवार । घाते कर्म घातियाचार ॥ चैतअंधेरी चौदशजान। उपजोप्रभुके पंचम ज्ञान । ४८। लोकालोक चराचर भाव। वहुविधि पय्यैवंत सुभाव ॥ तेसवान एकही वार । झलके केवल मुकरमभार । ४६ भयेअनंत चतुष्टय वन्त । प्रगटी महिमा अतुल अनंत ।। १सानवें गुणत्खाननेंस्थिरहोगये-२-शुद्ध्यानके प्रपम पद रूप परगावकरक्षापककर्मी परथिर होने १-ज्ञानावणी १ दर्शनावी २ मोहनी ३ जिस्कंदोभद्र ( दर्शनमोहनी ? या रित्रमोहनी २)अंतराय ४ कर्मपति की व्याम्या गोमसार अंगम देखा। ४-केवलज्ञान॥

१६६ पापुराण भापा। दिव्यपरम औदारिकदेह । कोटिभानु दुतिजीतीजेह । ५० । अलोकीक अद्भुत संपदा । मण्डित भये जिनेश्वरतदा ॥ वचनअगोचर महिमासार।वरणन करत न पइयेपारा५१॥ ॥ दोहा छंद ॥ पांच हजार प्रमान धनु, उपजत केवल ज्ञान । अंतरिक्ष प्रभुतन भयो, ज्योंशशि अंबस्थान। ५२ ॥ ॥उक्तंच प्राकृत गाथा आर्याछंद॥ जादे केवल णाणे परमो राल जिणाण सब्वाणं। गच्छदि उबरे चावा पञ्च सहस्साणि.बसुहाउ ।५३ ॥ भाषा टीका केवलज्ञान होनेपर सब कंवल ज्ञानियों का परम औदारिक शरीर पृथ्वीस पांच- हजार धनुष. ऊपर चलता है ।। ॥पद्धड़ी छंद॥ प्रकटीरविकेवलकिरण जामापरिफूलो त्रिभुवनकमलताम।। आकाशअमलदीअनूपादिशंविदिशभईसबबिमलरूप५४ सुरलोकबजे घंटागरिष्ट । तस्करनलगे तहां पुहप विष्ट ॥ १-लोक से बाहर ।।

पापुराण भाषा:
इन्द्रासनकंपेअतिगरीश । आनघभयेसुर मुकुटशीशा५.५॥
इत्यादिक बहु विधिचिहनचार । प्रभुकेवलसूचकमयेसार ॥
तबअवधिजोड़ जानासुरेशाछपकरेकर्मपारसजिनेश ५६
सिंहासनतजनिजसीसनाय।प्रणभोपरोपसुप उरन माय॥
इन्द्राणीपूछे कहहुकंत। क्योंश्रासनतज उतरेतुरंत । ५७।
किसकारन स्वामी नयो शीश । याकोप्रतिउत्तर देहुईश ।।
तबबोलेविकसतदेवराज।प्रभुउपजो केवलज्ञानाजा५.८
ऐरावतगज सजसापरिवार ।प्रथमंद्रचलो आनंदअपार ॥
वाजेवहुपटह पयानभेर । सववर्णनकरत लगैअबेर । ५६ ।
ईशानप्रमुख सवस्वर्गनाथ । निजबाहन चढ़चढ़चलेसाथ।
हरिनादसुनो जोतषीदेव । चंद्रादिचलेतब पँचभेव । ६०॥
भावनघर वाजेसंख भूर। देसविधि सुर निकसे हर्ष पूर ।।
वसुविंतरघरगरजे निशानायोंपरियनसब कीनो पयाना६१।
योचली चतुर विधिसुरसमाजाजिनकेवल पूजाकरनकाज॥
अंबरतजआयअवनिमाहि।जहांसमोसरनधुजफरहराहिम
जो सुरपति को उपदेश पायाधनपतिने कीनो प्रथम आया।
वरपंचवर्णमणिमयअनूपाजगलक्ष्मीकोकुलग्रहसरूपा६३।
॥ दोहा छंद ॥
समोसरन की संपदा, लोकोत्तर तिहं भान ।।
1-माय समाय अर्थ में।। -सेतरतरपान हस्ति श्याम
--

१६८
पार्श्वपुराण भाषा।
न
वचनद्वार वर्णे तिसै, सो बुध समरथ कौन । ६४।
॥ सोरठा छंद ॥
पैथल अवसर पाय, धर्म ध्यान कारन निरख ॥
लिखू लेश मनलाय, पढ़त सुनत आनँद बढ़६५।
॥ समो सरण वर्णन ॥
॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
पहले गोल पीठका ठई । इन्द्र नील मणि मय निर्मई ॥
पांच कोश चौंडी परवान । उन्नत कोश अढ़ाई जान।६६।
जाके चहुंदिश गिरदाकार । बनी पेंडका बीसहजार ॥
हाथ हाथ पर ऊँची लसैं । नभ पर्यंत देषदुख नसैं । ६७।
तापर धूलीसाल उतंग । पंचरत्न रज मै सर्बग॥
विविध वर्ण सोबलयाकार।झलकै इन्द्रधनुष उनहारा६८।
कहीं श्याम कहिं कंचन रूप।कहिं विद्रुमकहिं हरितअनूप।।
समोसरन लक्ष्मी को एम । दिपै जड़ाऊ कुंडल जेम ।६९||
चारों दिश तोरन बन रहे । कनक थंभ ऊपर लहलहे ॥
१-हीरा १ मोती २ लाल ३ नीलम ४ सोना॥
.

पावपुराण मा
--
आगे मान भूमि है जहां मानर्थभ चारोदिशितहां।७० ।
तिनकीप्रथम पीठका बनी। सोलह पैड़ी संजुन ठनी ॥
चारचार दरवाजे ठान । तीनतीन तहांकोट महान। ७१ ।
तिनम और त्रिमेखलपीठ । तिनपे मानथंभ थिर दीठ॥
अतिउतंग कंचन के ठये। छत्रधुजादिक सौ छविछये।७२।
जिने देष मानी मदे बढ़े। उतरे मान महागिर चढ़े।
मूलभाग प्रतिमा मनहरें। इन्द्रादिक पूजा विस्तर । ७३ ।
एकएक दिशचहुँ दिशठई। सजल वापिका वारिज छई ।।
नन्दादिकशुभतिनकेनाम।चारोंदिश सोलहसुखधामा।
आगेखाई शोभित करी । ओड़ी अधिक विमलजलभरी ।।
रत्ननीरराजे चहुँओर । हंसकलाप करें चहिं शोर । ७५ ।
॥दोहा छंद ॥
बलया कृत खाई वनी, निर्मल जल लहरेय ॥
किधों विमल गंगानदी, प्रभु परदछना देय । ७६
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥
बेल बनसार । महा सुगंध मधुप सुरवकार ।।
सघनछांह सबरितुकेफुल । फूलेजहां सकल मुखमन।७७॥
आगे पुहुप
Pos
३-मद बढ़े मानी पुस्प जोमा मान गिरिपर पड़े हुए थे मी नीचे बनाये।

ខុ ១៦
पार्थपुराण भाषा
याके कछुअन्तर दुति धरै। कंचन कोट प्रथम मनहरै ॥
वलयाकृति अति उन्नत जेह ।मानो मानषोत्र गिरयेहा७८
चहुँदिश सोहैं चार दुवार । रूपमई तिषने मनहार ॥
रत्नकूट ऊपर जगमगै। लाल वरण अतिसुन्दरलगै!७६।
किधोंअरुन छबिहाथ उठाय। जगलछमी नाचै विहसाय॥
नौनिधिजहार, अभिराम पिंगलादिकहैं जिनकेनामा
प्रभुअजोग गिन दीनी छार । वे मचली से दरबार ॥
मंगल दरव एकसोआठ। धरे प्रतेक मनोहर ठाठ।१।
गाईंजिन गुण देवकुमार। और विविधि शोभातिहिं सार।
वितरदेव खड़ेदरवान । विनयहीन को देहिं न जान।८२।
यह पहले गढ़की विधिकही। आगे और सुनो अवसही।
गोपुरतज चारोंदिशगली।गमनहेतभीतरको चली।८३॥
तहां निरतंशाला दुहुँ पास । सबदिश मैं जानो सुखवास ॥
सोरनथंभ फटकमयभीतातिषणीमणिमयशिषरपुनीत
सुरंबनिता नाचँ तहिं एम। लावन तोय तरंगनि जेम॥
मैंदहास मुखसोहै खरी। जिनमंगल गावे सुखभरी।८५॥
बाजै बीन बांसली ताल। महामुरज धुनि होयरसाल॥
आगे.बीथी अन्तर धरे। दोनोंदिशा धूपघट भरे।८६
॥ सोरठा छंद।
श्याम वरण यह जान, धूपधुवां नभ को चला।

पापुराण भापा। mama --- MF- कियों पुन्न डरमान, धूवां मिस पातग भजे। ८७॥ ॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥ आगे चार बागचहुओर । प्रथम अशोकनाम चितचोर ॥ सप्तवर्ण चंपक संहकार । येइनकी संज्ञाअविधार । ८८ सवरितुके फल फूलन भरे । विरष वेल सों सोहत परे ॥ वापीमंडपमहलमनोग । राजै जहाँ यथा विधजोग।८६ चैत विरछ चारों वन माहिं। मध्य भाग सुंदर छवि काहिं।। जिनमुद्रामंडित मनहरें । सुरनरनितपूजा विस्तरें । १.० । वाग ओट वेदी चहुँ ओर । चारद्वार मंडित छवि जोर ।। अब इस वनं वेदी तेसही । गढपर्यंत गलीजेरही ।९१ । तिनमें धुजा पाँति फरराय । कंचन थम्भ लगी लहाय।। दशप्रकाराकार समेत । तिनकेभेदसुनो सुखहेत। ५२ ॥ मालो वसनं मोर अरविंद । हस गरुडहरिपर्भ गयी । चक्रसमेतदशचिहनमनोग। धुजादुकूलनिसोहेंजोग।९३॥ येदश एकभांत की जान । एक एकसोयाँठ प्रमान ॥ दशसैअंसी सबै मिलभई । एक दिशामें सबबरनई।९४ चारों दिशकी जोड़ सरीस । चारहजार तीनसे बीस ॥ यहपरमितजिनशासनमाहि। अतिविचित्रशोभाअधिकाहि 4- --एक प्रकार का वृक्ष जिसमें प्रतिमा का निद होना है।

‘पापपुराण भाषा।
१७२
।
8
हालै धुजा पवन बस येह । जिन पूजन भविं आये जेह ॥
पंथखेद तिनकोमनान। करत किधोंसतकार विधाना९६॥
मानथंभ धुजथंभ अनूप । चैत विरल वेदी गढ़रूप ॥
इत्यादिक ऊँचे इकसार । जिन तनौ बारह गुणधार ९७॥
आगे रजत कोट निर्मान । तुंगकोट अति धवल महान ।।
किधों सुयश प्रभुशेतप्रकास । फेरीदेयफिरो चहुँ पास।६८
पूरव. वत दरवाजे चार । रत्नमई. अनुपम छविधार.॥
नौनिधिमंगलदरबसमाज।तोरनप्रमुखौरसबसाजा९९॥
प्रथमकोट वर्णन समजान । ठाड़े भवन देव दरवान ।।
यासोलगी और अबगली। चारों तरफ एकसीचली।१०॥
कल्पक्ष बनराजै तहां । दश विधि कल्पतरोवर जहां ॥
भूषण बसन लगेजिनडा।शोभाकहतनलहियेपा।१०१।
मध्यभाग जिन विंव समेत । सिद्धारथ तरुवर बिदेत॥
चहुंदिशबेदीचहुंदिश द्वारा रचनाऔरअनेकप्रकार।१०२॥
इस बेदी के वारह भाग। आगे फटक कोटलों लाग।
अतिविचित्रमहलनकीपांतिाजिनसिररत्नकूटबहुभांति।१०३
चंद्रकांतिमणिभासुर भीत । सोरणमय तहां थंभ पुनीत ।।
सुरनरनागरमेंजिनमाहित फेनारगण बहु केलकराहि।१०४
वीथी मध्यदेश शुभरूप..। पद्मराग मणिमय नव रूप ॥
धुजाछत्रघंटाछबिदेहिं । जिनमुद्रासों मन हरलहिं ।१०५॥
आगे तृतिय कोट वनएम । फटक मई निर्मल नभ जेम
।
१

पापुराण भाषा। १७१ *- -AL अतिउतंगसोवलयाकारालालबरणमणिनिर्मितद्वारा १०६। और कथन पूरब क्त जान । ठाढ़े सुरग देव दरवान ।। महामनोहरलोचनहाराअनुपमशोभाअचरजकार। 161 अवसुनमध्यभूमिकीकथा। फटककोट भीतर विधियथा ॥ गढ़सोंप्रथमपीठलगलगी।फटकभीतसोलहजगमगी १०८ तिनपै रत्न थंभ छवि देहिं । प्रभाजाल सो तम हर लेहि।। तिनहीपै श्रीमंडप ठयो। फटक मई नभ में निर्मयो ।०९। ॥सोरठा छंद ॥ याश्री मंडपमाहि, निराबाध तिहुँजगवसे ।। भीरहोयतहांनाहिं,त्रिभवनपतिअतिशैअतुल।११० ॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥ भीतन बीच गली जेरही। वारहसभा तहां जिनकही ।। बैठेमुनिअपकरअर्जिया।जोतिपवानअसुरसुरतिया॥११॥ भावन तिर जोतिषि देव । कल्प निवासी नरपशुएब ।। तिन में प्रथम पीठकाठई। अनुपमवैडूरजमणिमई।११२। मोरकंठ वत आभाजास । सोलह पेंडसाल चहुँ पाम ।। वारहसभामहादिशचाररातिनकायहपथसोलहसार।।१३॥ मंगल दरव जहां सबधरे । यमदेव सेवक तहां न्वर ।।

१७४
#. ! पार्चपुराण भाषा।
धर्मचक्रतिनकेसिरदिपै । जिनकोदेषदिवाकरछिपै । ११४।
तापर दुतिय पीठका बनी। चामीकर मयराजत घनी ॥
मेरुसिंगवत उन्नति जेम।जगमगाय मंडल रवितेम।११५॥
आठधुजा पाठोंदिश जहाँ । तिन शोभा वर्णनवुधकहां ॥
तिनमैं आठचिहनचित्रामाचक्रगयंदवृषभअभिरामा११६॥
वारिज बसन केहरी भूप । गरुड़ माल आकार अनूप ॥
मंदपवनबसहालैंजेह । किधों पापरंजझारतयेह । ११७।
तापर तृतिय पीठका और । तीन मेषला मंडित ठौर ॥
सर्वरतनमयझलकतपरीकिरणजासदशदिशविस्तरी ११८
गंध कुटी जहां बनी अनूप । पंच रत्न मय जड़ितसरूप ।
जाकेचारहार चहुंओर । झलकमाणक होराहोर। ११६ ।
तीनपीठ सिर सोहतधरी। किधों त्रिजगछवि नीचीकरी॥
परमसुगंध नवरनीजाय।सुन्दरसिखरधुजाफहराया१२०॥
तहां हेम सिंहासन सार । तेजसरूप तिमर छयकार ॥
नानारतनप्रभामैलसैं । जगलछमीप्रतिकिरणनहीँ।१२१॥
बचन गम्य नहिं शोभा जहां। अन्तरीक्ष राजै प्रभुतहां ॥
त्रिभुवनपूजतपार्सजिनेशाज्योंजगशिषरसिद्धपरमेशा१२२
॥ दोहा छंद
समोसरन रचना अतुल, ताकोअति विस्तार ।
-

पार्षपुगण भापा।
74....
Homen-~-
संपति श्रीभगवान की, कहत लहत को पार । १२३॥
॥ सोरठा छंद ॥
जिन वरणन नभ माहिं, मुनि विहंग उद्यमकरें।
पै उड़पार न जाहिं, कौन कथा नरदीनकी । १२४॥
॥ अष्ट प्रातिहार्य वर्णन॥
॥हरिगीत छंद ॥
राजत उतंग, अशोके तरुवर, पवन प्रेरत थरहरें ।
प्रभु निकटपाय प्रमोद नाटक, करत मानो मनहरें ।
तिसफूल गुंछत भ्रमर गुंजत, वहीतान सुहावनी ।।
सोजयोपासजिनेन्द्र पातग, हरनजग चूड़ामनी।१२५॥
निज भरण देष अनंग डरपो, शरणढूंढ़त जगफिरो।
कोईनराषै चोरप्रभुको, पाय पुनि पायन गिरो॥
योहारनिज हथयार डारे, पुहुपं वर्षा मिस भनी ॥
सोजयोपास जिनेन्द्र पातग,हरणजग चूड़ामनी।१२०॥
प्रभुनील अंग उतंग गिरतें, वाणि शुचि सीताढली॥
सौभेद भ्रम गजदंत पर्वत, ज्ञान सागर में रली ॥
नयसप्त भंग तरंग मंडित. पाप ताप विध्वंशनी ॥

१७६ 'पावपुराण भाषा। सोजयोपास जिनेन्द्र पातग, हरनजग चूड़ामनी॥१२॥ चंद्रार्चि चयछवि चारु चंचल; चमर बन्द सुहावने ॥ ढोलें निरंतर यक्ष नायक, कहत क्यों महिमा वने ॥ यहनील गिर के शिषरमानो, मेघ झर लागी घनी॥ सोजयोपास जिनेंद्र पातग, हरनजग चूड़ामनी॥१२८॥ हीराजवाहर पचित बहु विधि, हेमें आसन राजही ॥ तहिंजगतजनमनहरनप्रभुतन,नील वर्ण विराजही॥ यहजटित वारिज मध्य मानो, नीलमणिकर्णिकाबनी। सोजयोपास जिनेंद्र पातग, हरनजग चूड़ामनी॥१२६॥ जग जीत मोहमहान जोधा, जगत में पटहा दियो । सोशुक्ल ध्यान कृपानबल, जिनविकट वैरीवश कियो येबजत विजय निशान दुंदुभि, जीत सूचै प्रभुतनी सोजयोपास जिनेंद्र पांतगं, हरनजग चूड़ामनी। १३० छदमस्त पदमैं प्रथम दर्शन, ज्ञान चारित आदरे॥ अबतीन तेईछत्र. छलसों, करत छाया छविभरे । अति धवल रूप अनूप उन्नत, सोम बिंब प्रभाहनी॥ .सोजयोपास जिनेंद्र पातग, हरनजग चूड़ामनी।१३१॥ दुतिदेष जाकी चांद शरमें, तेज सो रबि लाजए॥ १ चमर समूह ऐसे मुहावने हैं जैसे चन्द्र किरण समूह छवि और सुन्दर चंचल हैं ॥ २-कणिका फूल की डोडी का जीरा ॥ ३ चन्द्र विच प्रभाह को मारने वाली । muv पापुगण भाषा। - 4.mas- -un---- . अवप्रभा मंडल जोग जगमें, कौन उपमा छाजए। इत्यादि अतुल विभृत मंडित, सोहिये त्रिभुवनधनी॥ सोजयोपास जिनेंद्र पातग, हरनजग चूड़ामनी।१३२॥ योंअसम महिमा सिंधुसाहब, शक्रपार न पावही ॥ ; तजहास भयतुम दासभूधर, भगति वशयश गावही। अवहोउ भवभव स्वामि मेरे, मैं सदा सेवक रहूँ॥ करजोर यह बरदान मांगू मोषपद यावत लहूँ। १३३ ॥ १५ मात्रा चौपाई छंद॥ यहविध समो सरन मंडान । कियो कुबेर यथा विधथान ॥ आयेसुर वर्षावत फूल । जैजैकार करत सुख मूल ३४॥ अति प्रसन्नता सब विध भई । हरषत तीनप्रदछना दई । धूलसालि मैं कियो प्रवेश । चक्रभयो छविदेपसुरेशा१३५॥ मुदित महर्धिक देवनसाथ।जिनसनमुख आयोमुरनाथ ॥ हस्तकपल जोरेअमरेश । देषेद्रगभर पार्सजिनेश । १३६। मणिउतंग आसन परईश । मानो मेघरत्न गिरशीश ॥ फैलरहीतनकिरणकलापाकोटभानुसौअधिकप्रताप।१३७ विकसतचितरोमांचितकाय । प्रणमोचानसीसभुमिलाय।। मणिभारीभर तीरथतोय । पूजेमघवाजिनपदीया १३८ १----बड़े रिद्धि वाले ॥

पार्थपुराण भापा।
१७८
सुर्ग सुगंध सों भक्तिबढ़ाय । अर्चे इन्द्र जिनेश्वर पाय ॥
मुक्ताफल मय अक्षत लिये।पुंजपरमगुर आगेदिये।१३९।
पारजात मदार मनोग । पुहुप चढ़ाये जिनवर जोग ।
सुधापिंड चरुलेय पवित्त । पूजाकरी शक्र धर चित्त।१४॥
रत्न प्रदीप रवाने परे। श्रीपति पाय शचीपति धरे ॥
देवलोक की अगर अनूप । पास चरन घेई सुरभूप।१४१॥
कल्प तरोवरके फलरजे। जगपति पाय पुरंदर जजे ॥
सर्वदरवधरकरपरनाम। दीनोंइन्द्रअरघअभिराम । १४२
॥ दोहा छंद ॥
करजिन पूजा आठ विध, भावभक्त बहुभाय ॥
अवसुरेश परमेश थुति, करत सीस निजनाय।१४३।
॥ १५ मात्राचौपाई छंद॥
प्रभुइसजग समरथ नहिं कोय। जापैयश वर्णन तुम होय॥
चारज्ञान धारी मुनिथके। हमसे मंदकहा करसकें।१४४॥
यह उर जानत निश्चै कीन । जिन महिमा वर्णन हमहीन॥
पैतुमभक्तकरै बाचाल । तिसवस होय गहूँगुणमाल १४५
जै तिर्थंकर त्रिभुवन धनी। जगचंद्रोपम चूड़ामनी ॥
जै जै परम धर्म दातार। कर्म कुलाचल चूरन हार ।१४६॥

पार्भपुराण भापा। ORM-- PN-Rana Arpm--- जै शिव कामिन कंत महंत । अतुल अनंत चतुष्टय वंत ॥ जैजगासभरनबड़भागाशिवलछमीकेसुभगसुहाग१४७ जै जै धर्म धुजा धरधीर । सुरग मुक्ति दाता वरवीर ।। जै रतनत्रिय रत्न करंड । जैजिन तारन तरन तरंड ॥१४॥ जै जै समोसरन सिंगार । जै संशयवन दहन तुसार ॥ जै जै निर्विकार निर्दोष।जै अनंतगुण माणक कोपा१४९॥ जैजै ब्रह्म चरज दल साज । कामसुभट विजई भटराज ।। जैजैमोह महानगकरी। जैजैमद कुंजर केहरी । १५० । क्रोध महानल मेघ प्रचंड । मान महीधर दामनि डंड ।। मायाबेलधनंजयदाह। लोभसलिलसोषक दिननाह:५१ तुमगुणसागर अगमअपार । ज्ञानजहाज न पहुंचेपार ॥ तटहीतटपर डोलतसोय।स्वारथसिद्ध तहांहीहोया १५२। प्रभुतुम कीर्ति वेलबहु बढ़ी। जतन विनाजग मंडपचढ़ी। औरप्रदेव सुयशनितचहैं। येअपनेघरही यशलह।१५३। जगत जीव घूमैं विनज्ञान । कीनो मोह महा विषपान ॥ तुमसेवाविषनाशनजीयहमुनिजनमिलनिश्चैकरी ।।५४ जन्मलता मिथ्यामतमूल । जामनमरनलगे जिमफूल ।। सोकबहीबिनभक्तिकुठार। कटनहींदुखफलदातार। १५५॥ कल्पतरोबर चित्रावेल । काम पोरसा नौनिधि मेल ॥ चिंत्यामणिपारसपापान । पुन्नपदारथ औरमहान । १५६॥ ..

१८०
पापुराण भाषा।
येसवएक जन्म संजोग । किंचित सुख दातार नियोग।
त्रिभुवननाथतुमारीसेवा जन्मजन्म सुखदायकदेव ॥१५७।
तुमजगबांधव तुमजगतात । असरनसरनविरदविष्यात॥
तुमजगजीवनकेरछपाल।तुमदातातुमपरमदयाल।१५८/
तुमपुनीत तुमपुरुषपुरान । तुमसबदर्शी तुमसबजान ॥
तुमजिनयज्ञपुरुषपरमेशातुमब्रह्मातुमविष्णुमहेश। १५९।
तुमहीजगभरता जगयान.। स्वामिस्वयंभू सुखश्रमलान॥
तुमविनतीनकालतिहुंलोयानहिनहिंसरनजीवकोकोय१६०
तिस कारन करुणा निधनाथ। प्रभुसनमुख जोरे हमहाथ।
जबलोनिकट होयनिर्बान ।जगनिवास छूटैदुखदान।१६।।
तबलों तुम चरणांबुजदास । हमउर होउयही अरदास ॥
औरनकुछ बंछाभगवान। यहदयालु दीजैवरदान । १६२।
॥ दोहा छंद ॥
इहिविधिइन्द्रादिकअमर,करबहुभक्तिविधान ॥
निजकोठे बैठेसकल, प्रभुसनमुख सुखमान ।१६३॥
जीतकर्म रिपु जे भये, केवल लन्धि निवास ॥
तेश्रीपारसप्रभु सदा, करो विघन घननास ।१६४।
श्री पार्श्व पुराण भाषा-भगवत ज्ञान कल्याणक वर्णन नाम अष्टम अधिकार
। सम्पूर्णम् ॥ ..
.

पापुराण भाषा।
Taaramkommuante
॥ नवम अधिकार॥
॥ सोरठा छंद।
पारस प्रभुको नाउँ, सार सुधारस जगत में ।
मैं याकी धलि जाउँ, अजर अमर पदमूल यह । १॥
॥ दोहा छंद ॥
बारह सभा सुथान मध, यों प्रभु आनंद हेत ॥
यथाकमलनी पंडको, शशि मंडल सुख देत । २ ॥
विकसतमुख सुरनरसकल,जिनसन्मुखकरजोरा।
निवसैं प्यासे अमृत धुनि, ज्योंचात्रकघनोरा ३॥
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद॥
तब गणराज स्वयंभू नाम । चार ज्ञान धारी गुण धाम ॥
करप्रनाम पारसप्रभुओर। विनतीकरी करांजुलिजोर।४।
भो.स्वामी त्रिभुवन घरयेह। मिथ्या तिमरछयो अतिजेह ॥
भूलेजीव भमैतामाहि। हितअनहित कुछसझे नाहि । ५।
श्रीजिन वाणी दीपक लोय । ताविन तहां उदोत न होय ॥
१-मति १ श्रुति २ भवधि ३ मनपर्य ४ ॥
--
HAL

१८२
पार्षपुराण भाषा ।
तातेकरुणानिध स्वयमेव । करउपदेश अनुग्रह देव ।६।
॥ गणधर प्रश्न॥
जानन जोगकहा है ईश । गहन जोग सो कह जगदीश ॥
त्यागनजोग कहोभगवान । तुमप्सबदर्शीपुरुष प्रमान।७।
कैसे जीव नरक में परै। क्योंपशु योनिपाप दुख भरै ।।
काहेसों उपजै सुर लोय । कौनकर्म तैं मानुष होय । ८
कौनपाप फल जन्मै अन्ध । बहरे कौन क्रिया संबन्ध ।
किसअघ उदय होयनरपंग। गंगेकिस पातग परसंगा।
कौनपुन ते दिरब अतीव । क्योंयह होंय दरिद्री जीव ।।
पुरुषवेदकिस कर्मउदोत । नारिनपुंसक किसविधहोत।१०
किसआचरण बड़ीथितिधरैं।क्योंकर अल्प आयुधरमरैं ।
भोगहीन अरुंभोग समेत।सुखीदुखी दी किसहेत।११॥
किसकारन मूरखं मतहीन । क्योंउपजै पण्डित परवीन ॥
किसकारन तेहोय सरोग। किसअधर्म तैं पुत्रवियोगा १२॥
विकल शरीर पाप दुखसहै। नीचऊंच कुल कैसे लहै ।
किनभावनभवतिथिविस्तरे। भवथितभेद कहाकरकरी१३॥
क्योंकर होय सुरग मै इन्द्र। कैसे पद पावै अहमिंद्र ॥
चक्रीपदकिस पुन्नउदोत । किमबांधै तिर्थकर गोत। १४/
इत्यादिक यह प्रश्न समाज । इनको उत्तर कहजिन राज ॥
तुमसब संशयहरनजिनेश।जैसेभवतम दलनदिनेश।१५॥
..

पायपुगण भाषा:
A
-------hama
MATH.
॥ दोहा छंद ॥
तवश्री मुख बानी विमल, विन अन्चर गंभीर ॥
महामेघ की गरज सम, षिरीहरन जगपीर । १६
यथा मेघजल परन में, निवादिक रस रूप ॥
तथासर्व भाषा मई, श्री जिन वचन अनूप । १७॥
तालु होठ सपरस विना, मुख विकार विनसोय॥
सबभापा मय मधुरतर, श्री जिनकी धुनिहोय।१८।
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥
बहोदरख पंचासतिकाय । साततत्व नौपद समुदाय ॥
जाननजोग जगतमयेह। जिनसोंजाहिं सकलसन्देहा १९.।
सवविध उत्तम मोष निवास। आवागमनमिटै जिहिवास।।
तातेंजे शिव कारन भाव । तेई गहन जोग मनलावा२०॥
यह जगवास महा दुखरूप । तातै भ्रमत दुखी चिद्रूप ।।
जिनभावन उपजैसंसार । तेसव त्यागजोग निर्धार । २१॥
नरकादिक जग दुख जावंत। पापकर्म वशंत बहुभंत ॥
सुरगादिक सुखसंपतिजेह । पुन्नतरोवर कोफलतेह। २२
॥ दोहा छंद ॥
इहि विधि प्रश्न समाजको, यह उत्तर सामान ।।

पार्षपुराण भाश अबविशेष इनकोलिखें, यथाशक्ति कुछजान । २३ । जीव अजीव विशेष बिन, मूल दरव ये दोय ॥ इनही को फैलावसब, तीनकाल तिहुँ लोय। २४ । चेतन जीव अजीव जड़,यह सामान सरूप ॥ अनेकांत जिनमतविष, कहेयथारथ रूप । २५॥ दरव अनेकन यातमक, एक एक नय साध ॥ भयेविविध मत भेदसों, जगमैं बड़ी उपाध । २६ जन्म अन्ध गजरूप जो, नहिं जाने सर्वंग ॥ त्यों जगमें एकांत मत, गहे एकही अंग । २७॥ ता विरोध के हरन को, स्याद बाद जिनवैन । सब संशय मेटन विमल, सत्यारथ सुखदैन । २८ सात भंग सों साधियै । दरव जात जामाहिं ।। सधैवस्तु निर्विघन तब, सबदूषण मिटजाहिं । २९ । ॥ घनाक्षरी छंद ॥ अपने चतुष्ठै की अपेक्षा द्रव्य अस्ति रूप, परकी अपेक्षा बहुनासति बषानिये ।। एकही समै सो अस्ति नासति सुभाव धरै, १. अनेक श्म कर के॥ २-इन्य अनेक नय सरूप है भावार्य अनेक नाका सबै हैं ।। ३ याद बाद जिन बाणी ।। . ४-सात मंग सा-अस्ति ? नाति २ अस्तिनातिन्य अस्तित्र- वतन्य ५ नास्तिजन्य ६ अस्तिनास्तिवतन्य ७॥ ।

.
पापुराण भाषा।
ज्यों है त्यों न कहाजाय प्रवक्तव्यमानिये,
एकबार अस्ति नास्ति कह्योजाय कैसे ताते,
अस्ति नास्ति अवक्तव्य असे परवानिये,
आप पर द्रव्यादि चतुष्टे की अपेक्षा करि,
अस्तिनास्ति श्रवक्तव्य वक्तव्य सुमानिये । ३०
॥ दोहा छंद॥
इहि विध ये एकांतसो, सात भंग भ्रम खेत ।।
स्याहावे रुषधरें, सब भूम नाशन हेत । ३१ ।
स्यादशब्द को अर्थजिन, कहोकथ चितजान।।
नागरूप नयविष हरन, यहजगमंत्र महान । ३२
ज्योरेंस विहकुधातु जग, कंचन होय अनुप ॥
स्यादवाद संजोगते, सवनय सत्य सरूप । ३३
॥ जीव विपै सातों भंग निरूपण।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
दरव दिप्टि जियनित सरूप । पर्ये न्याय अधिरै चिप ॥
१-एक धर्म के पक्षमा सप्त भंग नयभ्रम र स्पहादि पद Eve
पिरोधि रहित से सपभ्रम नाशन ईनु ॥२-विशेष रहिन -मीय ॥
।

पापुराण भाषा। नित्यानित्यं कथंचितहोय । कहोनायकथं चितसोय।३४॥ नित्यबीचि कथंचितवही अथिराच कथंचितसही। नित्यानित्यबाचकजानाकहतकथंचितसबपरवान॥३५॥ इहिंविध स्यादवाद नमछाहिं। साधोजीव जैनमत माहिं। औरभांतिविकल्प जेकरैं । तिनकेमत दूषणविस्तरें। ३६ * जीव निरूपण * जीव नाम उपयोगी जान । करता भुगता देह प्रेमान ॥ जगतरूप शिवरूप अरूंप। ऊरधगमन सुभावसरूपा३७॥ ॥सोरठा छंद॥ ये सब नौ अधिकार, जीव सिद्ध कारन कहे ॥ इनकोकुछ विस्तार, लिखू जिनागम देषकै । ३८॥ ॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥ * १जीवः कथन * चार भेद न्याहारी प्रान । निश्चै एक चेतना जान ॥ जोइनसोनित जीवंतरहै। सोईजीवजैन मतकहै । ३३ । ॥ सोरठा छंद। प्रथम आव अवधार, इन्द्री सांस उसांसबैले ॥ -बल ३ है मन ? बचन २ काय ३॥ H पार्षपुगण भाषा। www मूल प्राण ये चार, इनके उत्तर मेद दस । १० । ॥ दोहा छंद॥ पांच प्राण इन्द्रीजनत, तीनभेद वल प्रान । एकसांस ऊसांसगिन, पावसहित देस जान।४१ ॥ १५ मात्रा चौपाई छंद॥ सैनी जीव जगत में जेह । दसों प्रान सों जर्जावें तेह ।। मनसोरहित असेनीजात। तेनौमान घरै दिनरात । ४२ कान विना चो इन्द्री जिते । आठप्रानके धारक तिते ।। तेइन्द्रीके आँख न भनी । तासात प्रानको धनी। १३ । नासा बिन वेइन्द्री जीव । तिनसव के पटप्रान सदीय ।। जीभवचन वर्जिततनजास।ऐकेन्द्रीचहुँ प्राननिवास ॥४॥ ॥ दोहा छंद। इहिंविध जीवमजीवसव, तीनकाल जगथान। सत्तासुख अववोध चित, मुक्त जीव के प्रान।४५। १- मुनि गये जीव के ये ४ मान में मत्ता भी होना १ पुस र मागंप मर्थान् ज्ञान ३ वित मया चतन सरूप ४ ।।

१८८
पापुराण भाषा ।
* २.उपयोगकथन *
॥१५ मात्रा चौपाई छंद।
दोप्रकार उपयोग बखान । दर्शन चार आठ विधज्ञान ।
चर्तुमचंतु अवधिअवधार। केबलयेसब दर्शनचौर।४६।
अबसुनबसुविधज्ञानविधानामतिश्रुतिअवधिज्ञानअज्ञान
मनपर्ये केवल. निर्दोष । इनकेभेद प्रतक्षपरोष । ४७
मतिश्रुति ज्ञान आदिके दोयै । येपरोष जानै सवकोय ।।
अवधिऔर मनपर्यंज्ञान । एक देशपरत्यक्ष प्रमाना ४८
केवलज्ञान सकल परत्यक्ष । लोकालोक विलोकनचन ॥
जहांअनंत दरबपरयाय । एकवारसब झलकैंपाय।४४
दर्शन चार आठ विधि ज्ञान । ये व्योहार चिन्हजी जान॥
निश्चरूप चिदातमयेह । शुद्धज्ञान दर्शन गुणगेह! ५० ॥
* ३ कर्ताकथन*
कल्पित असदभूत ब्यौहार। तिसनयघट पटादि कर्तार
--वन इंद्री समान है
२-झूठी असभूत विवहार नय कर के यह जीव घट पट आदि वस्तुओं का
कर्ता है. और अनुप चरित श्रययारथ रूप विवहार नयसै कर्म पिंड का करता
अशुद्ध-निश्चै नय कर कै राग दोप का हरता है शुद्ध निश्चै नय करके-शुद्ध
मांव कर्ताई॥
-
.....-...-

पार्षपुराण भाषा।
१८६
yamand
अनुपचरित अयथारथरूपाकमपिंडकरता चितरूपा५१।।
जव अशुद्ध निश्चै बलधरै । तवयह राग दोप को हरें ।
यहीशुद्ध निश्चकरजीव । शुद्धभाव करतार सदीव । ५२ ।
* ४ भोगताकथन *
॥सोरठा छंद ॥
प्रानी सुख दुख प्राप, भुगतै पुद्गल कर्म फल ।
यह व्योहारी छाप, निश्चै निजसुख भोगता ।५३ ।
* ५ देहमात्र कथन *
॥ दोहा छंद ॥
देहमात्र व्यवहार कर, कह्यो ब्रह्म भगवान ॥
दरवित नय की दिष्टिसों, लोक प्रदेश समान। ५४॥
॥ अडिल छंद॥
लघुगुर देह प्रमान जीव यह जानये।
१-विषहार करके।

१६० पार्चपुराण- भाषा। सोविथार संकोच शक्ति सों मानये ॥ जोंभाजन परवान दीपदुति विस्तरै समुदघात विनराम यही उपमा धरै । ५५ । * समुदघात कथन * ॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥ तेजस कारमान जुतभेस । बाहर निकसैं जीव प्रदेस ॥ चा.नहीं मूलतनठाम । समुदघात विधयाको नाम॥५६॥ सातमेद सब ताके कहे । गोमठसार देखसर दहे ॥ प्रथमवेदना नामवषान । दुतिय कषायनाम उरआना५७१ तन विकुंर्धनातीजा येह । चौथा मारणांत सुन लेह ॥ पंचमतेजस संज्ञाजान । षष्टम आहारक अभिधान ।५८॥ ॥ १५ मात्रा अर्ध चौपाई छंद ॥ केबल समुंदघात सातमा। ऐसीशक्तिधरै पातमा। ५९। * १ वेदना समुदघात * ॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥ दुसह वेदना के वश जहां । जीवप्रदेश कढ़त हैं जहां १-नाव के दो भेष हैं वेनस कहिये तेजमान १ कारमान कर्मपिंडसंयुक्तं ।

বাশয় শাখা। m . किसीजीवकै हो परवान । पहलासमुदघातयहजान ।६० *२ कपाय समुदघात* जवकाही रिपुकरण विध्वंश । वाहरजाहिं जीव के अंश ।। अतिकषाय सों हो है तेह । दूजा समुदघातहे येह । ६१ ॥ * ३ विकुर्वनासमुदधात * नाना जाति विक्रिया हेत । निकसें ब्रह्म प्रदेश सचेन ॥ देवनारकी के यह होय । तीजा समुदघात है सोय ।६२ * ४ मारणांतसमुदघात * किसी जीव के मरते संमें। हंसअंश तन बाहर गम बांधीगति के परसन काज। चौथाभेद कहाजिनराज ।६३॥ * ५ तेजस समुदघात* जो मुनि के कछु कारनपाय । उपजे क्रोधन थांबोजाय ॥ तेजसतनको औसर यही। बामकंध सो प्रघटे सही ॥३॥ ज्वालामई काहलाकार । अरुण सिंदुर पुंज उनहार ॥ बारह जोजनदीरघ सोय । नोजोजन विस्तीरण होगाइ दंडक पुरवतप्रलै करेय । साधसमेत भस्म करदेय ।। १-कुत्सित भाकार अपान वेरोन माकार २४दक पुर नगर का नाम निस्की । मुनि ने भस्म कर दियाणा रागा प्रकार वेनस ? कारमायौदारिक माहारिक ४ देशपार ॥ --- Rahu.- *

१६२
पार्श्वपुराण भांपा।
अशुभकषाययहीविख्यात। अवसुनशुभतेजसकीवाता६६।
दुर्भिक्षादिक दुख अविलोय । दयाभाव मुनिवर के होय॥
शुभआकृत सों निवसैंताम। दक्षणकांधे सोंअभिरामा६७
पूरब कथित देह विस्तार । रोगसोग सब दोषनिवार ॥
फिरनिज थान करैपैसार । पंचम समुदघात यहधार।६।
* ६ आहारकसमुदघात *
करत साधुपद अर्थ विचार मनसंशय उपजै विहिवार
तहांतपोधन चिंत्याकरै। कैसेयह विकल्प निर्वरै । ६६ ।
भरथखेत आदिक मँमाहि । अबयां निकट केवलीनाहि ॥
तातेकरयै कौनउपाय। विनभगवान भरमनहिंजाय।७।
तवमुनि मस्तकों गुणगेह । प्रघट होय आहारक देह ।।
एकहाथतिसपरमितकही। श्रीजिनशासनसौंसरदही।७१॥
फटक बरन मनहरन अनूप । तहांजाय जिहिकेवलरूप ॥
दर्शनकर संदेह मिटाय । फेरपान निजथान समाय।७२।
षष्टम समुदघात यहमान । मुनिके होहिंछटै गुणथान ।।
* ७ केवल समुदघात*
जवसयोग जिनकेपरदेस ।बाहरनिकसैं अलषअभेसा७३
१--सयोग केपलीके जीव मदेश जब बाहर निकलते हैं पहले दंड आकार फिर
कपाट अर्थात् किवाड़ पत चोड़े फिर प्रतर अर्थात् फैलेहुए होकर लोक पू.
रित होजाते हैं ।।
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.

पापुराण भाषा
Pramomumeme---
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दंड कपाटादिक विधठान । क्रमसों हायलोक परवान ॥
सप्तमसमुदघात यहभाय । शरधाकरो भविक्रमनलाया।
मरणांतक श्राहारक जेह । एक दिशा गतजानी येह ।।
वाकीपांच रहजेआन तिसबदसों दिशागतजान।७३।
* ६ संसारी जीवकथन *
दुविधरास संसारी जीव । थावर जंगम रूप सदीव ॥
तहांपांच विधिथावरकाया जलतेज वनस्पतिवाया७६।
चारजाति के जंगम जन्त । चलत फिरतदीप बहुभन्न ।
संपसीपकोड़ी क्रिमिजोक। इत्यादिक इन्द्रीथोक।७७॥
चैटीदीम कुंथ पुनियादि । येतेइन्द्री जीव अनादि ।
माषीमाछर भंगी देह । चमरप्रमुख चीइन्द्री येह । ७८ ।
देवनारकी नर विख्यात । केतक पश पन्द्री जान ॥
येसवत्रस थावरकेमेव । इनकाविषय छेत्रमुनलेव । ७६
* छप्पै छंद *
फेरस चौरमै चाप, जीभ चासेंट मानीमा ।
-फार्म इन्द्री का विपर १०० जीप का ६१ नाका - अनुराग
इन्द्रीका विपय १५४ प्रनुपरे ऐसा क्रम दिखाया है अपना दुगना नामामः
रिये और पन्तको ना धरण इन्द्री मनी के टमा विपक्ष
भोर सेनी के सौ इन्द्री जीभ इन्ट्री नाक इन्ट्री इनका सिर ६ टन नीर
नेत्र इन्द्री का विषय ४७६६३ यानन भार अरण उन्द्रका नारा बेदन .
antabananam
-.-

१६४
पार्श्वपुराण भापा।
द्रगजोजन उनतीस, शैतकचौवनक्रम भासा ॥
दुगुनअसैनी अन्त,श्रवनवसु सहस धनुषसुनि ।
सैनी सपरस विषै, कह्यो नौजोजन श्रीमुनि ॥
• नौरेसन घ्राणनो चक्षपति, सैंतोलीसहजारगिन।
दोसैत्रेसठि वारहश्रवण,
विक्षत्रपरवानभना८०
* जीव समास कथन *
* १५ मात्रा चौपाई छंद *
एकेन्द्री सुक्ष्म अरुथूल । तीनभेद विकल त्रियमूल ।।
दोयप्रकार पचेन्द्रीकहे । मनसोरहित सहितशरदेह । ८१
* दोहा छंद *
सातोही परयाप्त तें, अपरयाप्त तैं जान ॥
चौदह जीव समास यह, मूलभेद उरआन । ८२।
१-दो इन्द्री १ तेइन्द्री २ चौइन्धी ॥ २-असेनी १ सेनी २॥
३--परयात ६ हैं पाहार १ शरीर २ इन्द्रिय ३ स्वासो स्वास ४ मन ५ वचन जिस
नैयह ६ पर्याय पूरण धारण करी सो परयाप्त हैं और जिसने पूरण धारण नहीं
करी सो-अपरयाप्त है।

पाभपुगण भाषा! movealedonwun- Parmewasanik Ram- - - * १५ मात्रा चौपाई छंद ॐ ऐसेही चौदह गुणथान । चौदह मारगणा उरान ।। जवलगहै इनरूपीराम । तवलों संसारी यहनाम । ८३ । * अडिल छंद * यहअनादि संसार, जीवकी. भूलहै ।। इसकारजमैं और, हेतुनहिं मूल है । तौअशुद्ध नयन्याय, जीव जगरूप है । द्रव्यद्रष्टि सों देष, सबै शिवभूप है ।४। * दोहा छंद * भयेकर्म संयोगते, संसारी सब जीव । साधनबल जीतें करम, तवयहसिन्दसदीव । ८५! *७ सिद्ध जीव कथन * अडिल छंद * अष्टं गुणातम रूप, कर्म मलमुक्त है ।। -भाग्गुण प्रात्म रूप धारी है और कमों के मन महारथिन १ उपत्ति २ विनाश ३ इनतान धर्मकर संयुक्त है। miM .-- पार्षपुराण भाषा। थिति उतपत्ति विनाश, धर्म संयुक्त हैं। चरम देहत कछुक, हीनपर देश हैं। लोकअग्र पुरवसैं परम परमेंश हैं । ८६। सिद्धजीवविषय उत्पादव्यय * धौव्य स्थापन * * दोहा छंद * अथिर अर्थ परयाय जो, हानद्ध मयरूप ॥ तिसमैंसिद्ध वषानिये, उतपति नाशसरूप।८७। ज्ञेयत्रिविध परनतिधरै, ज्ञान तदाकृत भास ॥ योभी शिवपदमैसधै, थित उतपत्ति विनाश ॥८॥ अथवा सबपरनतिनसे, भईसिद्ध पर्याय ॥ शुद्धजीव निश्चल. सदा, योतीनों ठहराय॥८६॥ १- सिद्धों की अर्थकहिये द्रव्य पर्याय अथिर रूप में हानि वृद्धि मानी है जो ६ हैं संख्यात गुण वृद्धि १ असंख्यात गुण वृद्धि २ अनंतगुण वृद्धि ३ अनंतगुण हानि ४ असंख्यात गुण हानि ५ संख्यात गुणहानि ६ ॥ २-तिथि १ उतपत्ति २ विनाश ३ ॥

पागण भाषा १६ अरूप कथन अडिल छंद बरनपाच रसपांच, गंध दोलीजिये ॥ आठ फरसगुनजोर, बीस सबकीजिये ।। जीवविपै इनमाहि, एकनहिं पाइये ॥ यातें मूर्तिहीन, चिदातम गाइये ॥ ९ ॥ जगमें जीवअनादि, बंध संजोगत ॥ छूटो कवहीं नाहि, कर्म फलभोगते । असदभूत व्योहार, पक्ष जोठानये ॥ तोयह मातवंत, कथंचित मानये ॥९१ ॥ ह ऊर्द्ध गमन कथन * दोहा छंद प्रति बंधथितं वैधपुनि, अरु अनुभाग प्रदेश ॥ १-मानावणी दर्शनावणी भादियों की प्रहाने वंश १ कातकी मीमा पिनि संघ २ अनुभाग कहिये निममंद दुग्र मुग्न अवस्या पंध : प्रदेश कादिय मामा के मदेश परकर्म बंध ४ ॥

१६८ पार्थपुराण भाषा.। चारभेद यह बंध के, कहपास परमेश ॥६२॥ बंध विवर्जित आत्मा, ऊरध गमन करय ।। एकसमय कर सरलगति, लोकअंत निवसेयं ।।३। ज्यों जलं तूंबी लेपविन, ऊपर आवैसोय ॥ त्योंऊरध गति रामयह, कर्मबंध विनहोय ।।४। जबलों चहुंविध वंधसों बंधे जीव जगमाहिं। सरलबक तबलोंचले, विदशा मैं नहिजाहिं। ९५। अमृत चंद्रमुनि राजकृतकिमपि अर्थअवधार । जीवतत्ववर्णनलिषा, अबअजीव अधिकार । ९६। *२ अजीवतत्त्व कथन* पुदगल धर्म अधर्मन), कालनाम अवधार। येअजीव जडतत्त्व के, भेद पंच परकार । ९७। तिनमें पुद्गल दोय विध, बन्ध रूप अणुरूप॥ यहसब मैं रूपी दरव, चारों और अरूप । ६८॥ अणुरूपी पुद्गल दरव, छेदभेद नहिं जास ॥ अगन जलादिक जोगसों, होयन कबही नासाह जा अविभागी मैं नहीं, आदिमध्य अवसान ॥ १-विग्रह गति में ॥

aameem पागण माषा! शब्द रहित पर शब्दको, कारन भूत वपान111 * सोरठा छंद भूजल पावक वाय, हेतु रूप सबको यही ।। बहुविधि कारन पाय, वरणादिक पलट तुरत ॥१०॥ अवनाशी जिस माहिं, सदापंच गुण पाइये ॥ इन्द्री गोचर नाहि, अवधि ज्ञानसों जानिये ।। दोहा छंद वरण पांचरस पांचमें, एक एकही होय ॥ एक गन्ध दो गन्ध में, आठ फरस में दोय।।०३। ये परमाणू पंचगुण, सात बंध में जान । वर्णादिक जे वीसह, तेगुण जात वपान । १०१। श्रागे पुद्गल बंद के, सुनोभेद पट सोय ।। - १--चरण ५ (रा!लाल २ काला पाना ४ मपेद ५) रम (वहार मीठा २ चरचरा ३ कटुवा ४ कपायला ५) इनमें ? वर्ण भारत रसांगा दौर गंध में (मुगंधि : दुधि २) इन में में कोई ? गरोगी-स्पर्म - ( गर्भ या पलका ३ भारी ४.कोमल ५ कठार ६ रूपा ७ विकनान में माम ठरे से { रुख चिकने से ? इस कार गुम सदार पारी नादों मार सपिना। २-ध में दोगण चिकना अथवा मषा ! कोमल अपवा स्टार र पड़कर ७ होनायेंगे।

पार्थपुराण भापा।
सरधा करतें समझतें, संशय रहैन कोय। १०५।
* १५ मात्रा चौपाई छंद *
प्रथम भेद अतिथूल बषान । दुतिय थूल संज्ञाउर प्रान।।
तृतियथूल सुक्ष्मसर दहो। सुक्ष्मथूल.चतुर्थम गहो।१०६॥
पंचमसुक्ष्म नाम गिनेह । षष्टम अतिसुक्षम षटयेह ॥
अबइनकोवरणनविरतंत।सुनोएकमनसों मतिता१०७॥
पण्डषण्ड कीने जेबन्ध । फेरन मिले आपसों सन्ध॥
माटीईट काठपाषान। इत्यादिक अतिथूल वषान। १०८॥
छिन्नभिन्न होंफिर मिलजाहिं । ऐसेपुद्गल जे जगमाहिं ।।
घृतअरुतेलजलादिकजान।येसबथूल कहेभगवान १०६।
देखतलगै दिष्टिसों थूल । करमेंगहे जाहिं नहिं मूल ॥
धूपचांदनी आदिसमस्ताजानथूल तेसुक्षम बस्तु। ११०॥
आँपन सौं दीपै नहिं जेह। चारों इन्द्री गोचर तेह ॥
विविधसपर्स शब्दरसगंध । सुक्ष्मथूल जानतेबंध।१११॥
नाना भांत वर्गना भिंड। कारमाण परमाणू पिंड ॥
कालीइन्द्री गोचरनाहि । तेसुक्ष्मजिन शासनमाहि ११२
१- कारमाण परंमाण पिंडकी जोनानाभांत घरगना लियेहुये. एकभिंड ई.
और इन्द्री गोचरहै नही सो सूक्ष्म है कर्म वरगना अदि सूक्ष्म है दो आदि प्रमाण
का समूह सूक्ष्म अर्थात् सूक्ष्म सूक्ष्म जानो ।

पार्थपुराण मापा।
कर्म वर्गना सोही कहा। जो अतिही सुक्ष्म सरदहा ।।
दुणकादि परमाणूबंध ।सोसुक्ष्म सुक्ष्मसुनबंध । ११३॥
षटप्रकार पुद्गल इहिंभाय । मुख्य गौनसव में गुणथाय॥
इनहीसो निमपितलोक। और न दोषै दुजो थोक। ११४॥
शब्द बंधै छायो तम जान । सुक्षम थूल भेद संठान ॥
अरुउदोतातमबहुभाय ।यहदसविधिपुद्गलपर्याय।११५॥
*धर्म द्रव्य कथन*
जब जड़जीव चलै सतभाय । धर्मदरव तवकरै सहाय ॥
तथामीनकोजलाधारं । अपनीइच्छाकरतविहार।११६॥
* अधर्म द्रव्य कथन*
योही सहजकरैथितसोय । तव अधर्म सहकारी होय ॥
जोमगमैपथीकोछहिं । थितिकारनहेंबलसोनाहि । ११७॥
* आकाश द्रव्य कथन*
जोसव द्रव्यन को आकाश। देयसदासो द्रव्यप्रकाश ।।
ताकेभेददोय जिनकहे । लोकअलोक नामसरदहे। ११८
जहिं जीवाद पदारथनास। असरव्यातपरदेश निवास ॥

२०२ पार्श्वपुराण भाषा। लोकाकाशकहावेसोय । परैअलोकअनंताहोय ॥ ११६ ॥ * कालद्रव्य कथन * . लोकप्रदेश प्रसंषे जहाँ । एक एक कालाणू तहाँ । रत्नरासि बत निबसैं सदा । द्रव्यसरूपसुथिरसर्वदा१२०॥ बरतावन लक्षण गुणजास । तीनकाल जाको नहिंनास॥ समैघड़ी आदिक बहुभाय ।येव्योहार कालपर्याय।१२११ पहले कही जीव अधिकार । और अजीव पंचपरकार ॥ येहीलहोंद्रव्य समुदाय। कालविना पंचासतिकाय । १२२ ॥ दोहा छंद॥ वहु परदेशी जो दरब, कायवन्त सो जान ॥ तातै पचअथिकाय हैं, कायकाल विनमान । १२३ ॥ ॥३१ मात्रा सवैया छंद॥ जीवधर्म अधर्म ये तीनों, कहेलोक प्रदेश परवान ॥ असंख्यात परदेशी राजें, नभ अनन्त परदेशी जान ॥ संखअसंख अनंत प्रदेशी, त्रिविध रूप पुद्गल पहिचान।। एकप्रदेश धरै कालाणू, ताः काल कायविन मान।१२४ ।

पार्षपुराण भाषा।
---
* शिष्यप्रश्न *
॥ दोहा छंद ॥
कालकाय विनतुम कहो, एक प्रदेशी जोय ॥
पुद्गल परमाणू तथा. सो सकाय क्यों होय । १२५
* गुरू उत्तर *
॥३१ मात्रा सवैया छंद॥
अलख असंघ दरव कालाणू, भिन्नभिन्न जगमाहिं वसाहि।।
आपस माहिमिलै नहिंकवहीं, तात कायवन्त सो नाहिं।
रूष सचिक्कन ते
परमाणू,
ततखिन वन्धरूप होजाहिं।
योपुद्गलको कायकल्पना, कही जिनेश्वरके मतमाहिं ।१२६ ॥
*आकाश प्रदेशरूपतथा शक्तिकथना
.......
जितने मानएक अविभागी, परमाणू रोके आकास ॥
ताका नांव प्रदेश कहावै, देयसर्व दरवन को वास ॥
तहां एक कालाणू निवसैं, धर्मअधर्म प्रदेश निवास ॥
रहँअनन्त प्रदेश जीवके, पुद्गल बंधलहैं अवकास । १२७॥

|२०४
पार्थपुराण भाषा।
* शिष्य प्रश्न *
॥पोमावती छंद।
धर्मअधर्म कालअरु चेतन, चारोंदरब अरूपीगाये ॥
तातॆएक अकाश देशमें, प्रभुसबके परदेश समाये ॥
मूरतवन्तं अनंते पुद्गल, तेउस नभमें क्योंकरमाये ॥
यहसंशयसमभावकहोगुर,दासहोयहम पूछनाये१२८
* गुरु उत्तर *
॥ सोरठा छंद ॥
बहु प्रदीप परकाश, यथा एक मंदिर विषै ॥
लहसहज अवकाश, बाधा कछु उपजै नहीं। १२९॥
॥ दोहा छंद॥
त्योंही नभ परदेश में, पुद्गल बंध अनेक ॥
निराबाध निवसैं सही, ज्यों अनन्त त्यों एक । १३०॥
* आश्रव तत्त्व कथन *
जो कर्मन को आगमन, आश्रव कहिये सोय ॥
१-समाये ॥

पार्थपुराण भापा।
२०५
ताके भेद सिद्धांत में, भावित दरवित होय । १३१
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
मिथ्या अविरत योग कषाय । और प्रमाद दशा दुखदाय॥
एसब चेतन को परनाम । भावाश्रव इनहीं कोनामा१३२॥
तिनही भावन के अनुसार । ढिग वरती पुद्गल तिहिवार ।
आबैंकमै भावकेजोग। सोदरवित आश्रवअमनोग।१३३॥
*४ बंध तत्त्व कथन *
॥ सोरठा छंद ॥
रागादिक परनाम, जिनसों चेतन बंधतहै।
तिन भावनको नाम, भावबंध जिनवर कहो । १३४॥
॥ दोहा छंद ॥
जो चेतन परदेश पै, बैठो कर्म पुरान ॥
नए कर्म तिनसों बधें, दरव बंधसो जान । १३५॥
* ५ संवर तत्त्व कथन *
॥ पद्धड़ी छंद ॥
आश्रव अविरोधन हेतभाव।सोजानभाव संवरसुभाव ॥

२०६
पार्षपुराण भाषा।
जोदर्विताश्रवशुद्धरूप । सोहोयदरवसंवरसरूप ।१३६।
इतपंचसमितिपोचों सुकर्म । वरतीनगुप्ति दसैंभेदधर्म ॥
वारहविधअनुप्रेक्षाविचारवाईसेंपरीषहविजयसार।१३७।
पनि पांचजात चारित अशेष । येसर्वभाव संवर विशेष ।।
इनसैकर्माश्रवरुकै एम। परनालीकेमुहँडाटजेम। १३८॥
॥दोहा छंद।
शुभडपयागीजीवके, ब्रतादिकश्राचार ॥
पापाश्रव अविरोध को, कारणहै निर्धार । १३६ ।
शुद्ध उपयोगी साधजे, तिनकैये आचार ।
पुन्नपाप दोऊन को, संवर हेत विचार । १४०
*६ निर्जरातत्त्वकथन *
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
तपबल कर्म तथा थितपात । जिनभावों रस देखिरजात॥
तेई भावभाव निर्जरा। संवर पूरबहै शिवैकरा । १४१॥
१-सामायक १ छेदोंपस्थापना २ परिहारविशुद्धि ३ सुक्षमसापराय ४
यथायाव ५॥ २-मोक्ष करने वाला।

पार्षपुराण भापा।
वंधेकर्म छूटै जिसवार । दरख निर्जरा सो निर्धार ॥
इहिंविधजिनशासनमैकहेया।समकितवंतसांचसरदहेया ।।
* ७ मोक्षतत्त्व कथन
जो अभेद रत्नत्रिय भाव । सोईभाव मोष ठहराव ॥
जीवकर्मसोन्याराहोय । दरबमोक्षअविनाशीसोय। १४३।
येसब सात तत्व बरनए । पुन्नपाप मिल नौपद भए ।
आश्रव तत्त्व विषै वे दोय।गर्भित जानलीजियेसोया१४४
॥दोहा छंद॥
जीव यथारथ दिष्टिसों, सरधै तत्त्व सरूप ॥
सो सम्यक दर्शन सही, महिमा जास अनूप। १४५॥
नयप्रमाण निक्षेप कर, भेदाभेद विधान ॥
जो तत्त्वनको जाननो, सोई सम्यक ज्ञान । १४६।
सोसामान बिलोकये, दर्शन कहिये जोय ॥
जो विशेष कर जानये, ज्ञान कहावै सोय । १४७॥
चारित किरया रूपहै,सोपुनि दुविध पवित्त ॥
एक सकल चारित्र है, दुतिय देश चरित्त । १४८।

२०८
पार्श्वपुराण भाषा।
॥ दोहा
॥अडिल छंद ॥
जहां सकल सावध, सर्वथा परिहरै।
सो पूरन चारित्र, महामुनि वर धरै ॥
लेश्य त्याग जहिं होय, देश.चारित वही।
सो ग्रहस्थ को धर्मग्रहीं पालै सही । १४६ ।
छंद ॥
तिर्थकर निथपद, धर साधो शिवपंथ ॥
सोई प्रभु उपदेशयो, मोषपंथ निग्रंथ । १५०।
दसविध बाहिज ग्रंथमै, राषै तिलतुसमान ॥
तो मुनिपद कहिये नहीं, मुनि विननहिं निर्बान १५१॥
जेजन परिग्रह वंतको, मा. मुक्ति निवास ॥
तेकबही मुकतनलहैं, भ्रमैं चतुर गतिवास । १५२।
क्रोधादिक जवही करें, बंधै कर्म तब पान॥
परिग्रहके संजोगसों, बंध निरंतर जान । १५३ ॥
बंध अभावै मुक्ति है, यह जानै सबलोय ॥
वध हेत वरतें जहां, मुक्ति कहाँतै होय । १५४॥
पश्चिमभानन ऊगवै, अगननशीतलहोय ॥
यथाजात जिन लिंगविन, मोष न पावै कोय।१५५॥

पाचपुगण भाषा।
--------
॥ छप्पै छंद ।।
धन्य धन्य तेसाधु, देह भवभोग विरक्ये।
धन्य धन्य तेसाधु, आप अपने रसरच्ये ॥
धन्य धन्य तेसाधु, पीठजगकी दिशकीनी।
धन्य धन्य तेसाधु, दिष्टिशिवसन्मुख दीनी ॥
तज सकल आस वनवास बस नगन देहमदपरहरे ।।
ऐसेमहंतमुनिराज प्रति, हाथ जोर हम सिरधरे । १५६ ।
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
पंच महाव्रत दुबरधरै । सम्यक पांच समति आदरें।
तीनगुप्तिपालेंयहकर्म । तेरहविधचारित मुनिर्धम। १५७१
यातेंसधैं मुक्ति पदषेत । गिरही धर्म सुरग सुखदेत ॥
सोएकादश प्रतिमारूप । ते वर संक्षेप सरूप। १५८ ।
॥१ दर्शनपतिमा॥
पचे उदंवर तीनमकार । सात विपन इनको परिहार ॥
दर्शनहोयप्रतिज्ञायुक्त । सोदर्शनप्रतिमा जिन उक्त १५९॥
* सप्त विपन निषेध *
* ढाल *
श्रीगुरु शिक्षा सांभलौ, (ज्ञानी) सात विषन परित्यागौ।

२१०
पार्श्वपुराण भाषा।
.
एजगमैं पातगबड़े, (ज्ञानी)इनमारगमतलागोरे१६०
जूवा खेलन मांडये, (ज्ञानी) जोधन धर्म गमावरे ।
सबविषनन कोवीजहै, (ज्ञानी) देषतादुखपावैरे। १६१ ॥
रजबीरज सों नीपजै, (ज्ञानी) सोतन मास कहावरे ।।
जीवहतेबिन होयना,(ज्ञानी)नांवलियांघिन आवै।१६२॥
सड उपजैकी डांभरी, (ज्ञानी) मद दुर्गंध निवासोरे ॥
छीयासों शुचितामिटै, (ज्ञानी) पीयाबुद्धविनासोरे।१६३॥
धिक वेश्या बाजारनी, (ज्ञानी) रमती नीचन साथैरे ॥
धनकारन तनपापनी, (ज्ञानी) वेचैविषनी हाथैरे । १६४।
अति कायरसबसोंडरे, (ज्ञानी) दीन मिरग बनचारीरे ॥
तिनपै आयुधसाधते, (ज्ञानी)हाअतिकूरशिकारीरे१६५
प्रघट.जगतमें देखये, (ज्ञानी) प्रानन धनते प्यारोरे ॥
जपापीपरधनहरें, (ज्ञानी) तिनसमकौन हत्यारोरो१६६।
परतियबिषनमहाबुरो, (ज्ञानी) यामैं दोष बड़ेरोरे ॥
इहिमवतनधनयशहरे,(ज्ञानी) परभवनरकबसेरोरे१६७
पांडवादि दुखीभये, (ज्ञानी) एक विषन रतमानीरे ॥
सातनसों जेसठरचे, (ज्ञानी)तिनकीकौनकहानीरे१६८
॥ दोहा छंद॥
पेच उदंबर फल कहे, मधुमद मांस मकार ॥
१-छूने से ||

पापुराण भापा।
इनके दूषण परिहरो, पहली प्रतिमा धार । १६६ ।
* २ व्रत प्रतिमा *
॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
पांचे अणूव्रत गुण व्रत तीन । शिक्षाबत चारों मलहीन ।
वारहव्रत धारैनिर्दोष । यहदूंजी प्रतिमा व्रतपोष । १७०।
॥ दोहा छंद ॥
अवइन बारह व्रतनको, लियूं लेश विरतंत ॥
जिनकोफल जिनमतकहो, अच्युतस्वर्ग पर्यंत।१७।
* ढालचालजिनजपजिनजपजीवड़े
जोनितमन वचकायसों, कृतादिक सौंजैहाजी ॥
त्रसको त्रासन दीजिये, प्रथमअणू व्रतएहोंजी ।।
वारहव्रत विध वरणऊं । १७२।
१-कृतश्राप करना ? कारित मरे से कराना २ अनुमांदना नर को करने
देप आनंदमानना ३॥

पार्षपुराण भाषा।
भूठेवचन नहिंबोलये, सबही दोष निवासी जी ॥
दूजोबत सोजानये, हितमित बचनसंभाखो जी ॥
बारहव्रत विध वरणऊ। १७३ ।
भूलो बिसरो अॅपरो, जोपरधन बहु भायो जी॥
बिनदीये लीजै नहीं, जनम जनम दुख दायोजी।
वारहव्रत विध बरणऊं । १७४।
ब्याही बनिता होय जो, तासों कर संतोषो जी॥
परिहरिये परकॉमनी, यासम औरन दोषो जी॥
बारहब्रत विध वरणऊ। १७५ ।
धनकन कंचन आदिदे, परिग्रेह संख्या ठानो जी॥
तिशना नागन बसकरो, यहवतमंत्र महानो जी
बारहव्रत विध वरणऊं । १७६.।
अवधि दसोंदिश खेतकी, कीजैसंवर जानो जी॥
बाहर पांव न दीजये, जबलग घटमें प्रानो जी॥
बारहवूत विध वरणऊं । १७७।
कर मरयादा कालकी, करिये देश प्रमानो जी.॥
बनपुरसरिता आदिदे, नित्त गमनको थानो जी ॥
बारहव्रत विध वरणऊं। १७८ ।
जहां स्वारथ नहिं संपजै, उपजै पाप अपारोजी ॥
अनस्थ दंडवही कहो, त्यागै पंच प्रकारो जी॥:

पावपुराण मापा।
वारहवत विध वरणऊं । १७६ ।
सामायक विध भादरो, थलएकांत विचारो जी ।।
उर धर ये शुभ भावना, भारत रुद्र निवारो जी।
वारहवत विध वरणऊं। १८० ।
पोषह व्रत आराधये, चारौं परब मझारो जी ॥
चहुँविध भोजन परिहरो, घरआरंभसव छारोजी ॥
बारहवत विध वरणऊं । १८१ ।
भोजन पान तँबोल त्रिय, खटभूषण बहुएमो जी ॥
भोगयथा उपभोग है, कब इनको पम नेमो जी॥
बारहवत विध वरणऊं। १८२।
उत्तम अतिथिन कोसदा, दीजै चोविध दानो जी ।।
मान बड़ाई त्याग के, हिरदै सरधा श्रानो जी ॥
वारहव्रत विध वरणऊं । १८३ ।
अन्त समै संलेखणा, कीजै शक्ति संभालो जी ॥
जासोंवत संजम सबै, येफल दोहि विशालो जी ।।
बारहवूत विध वरणऊं ।, १८४॥
*३ सामायक प्रतिमा *
॥१५ मात्रा चौपाई छंद॥
तीनकाल सामायक करै। पांचो अतीचार परिहरें ।।

पार्षपुराण भाषा।
शत्रुमित्र जानै इकसार । सोनर तीजी.प्रतिमाधार।१८॥
* ४ पोषह प्रतिमा *
परब चतुष्टय तज आरंभ । पोषह व्रत मांडै मनथंभ॥
सोलहपहरधरैशुभ ध्यान।सोयहचौथी प्रतिमावाना१८६।
* ५. सचित्त त्याग प्रतिमा *
त्यागै हरी जाति जावंत । दल फल कंद बीजबहु भंत ।।
प्राशुकजल पीवैतजराग।सोसचित्त त्यागीबड़भागा१८७।
* ६ दिवा मैथुन त्याग प्रतिमा *
जोदिन में मैथुन परिहरै। मनबच कायशील दिदधरै ।।
षष्टमप्रतिमाधारधिीर । यहजघन्य श्रावक वरबीर।१८८
* ७ ब्रह्मचर्य व्रत प्रतिमा *
जोसब नार सर्वथा तजै। नौविधि शीलसदा बूत भजे ॥
कामकथारतकबहिनहोयासप्तमप्रतिमा धारीसोय।१८९।
१-त्रिय अस्थानमें वसना १ प्रेम रुचि से देखना २ प्रतिके मधुवचन बोल
ना श्रृंगारकरना ४ त्रियसेजपर सोना ५ पूर्वभवके रस चितवन ६ पुष्टप्रहार
भोजनकरना ७ मन्मय केथा कहना ८ पेटभर भोजनकरना है।

पापुराण भाषा।
* ८ प्रारंभ त्याग प्रतिमा *
जिनसब तजे वरन व्योहार । खेती लेन देन ए भार ।।
छेदनपालन करेनरच । तेपुनिमंदिर नाज न संचा१६०।
निरारंभ बरतै मदछार । जीव दया हितकरै विचार ।।
अहनिश हिंसासोभयभीत अष्टमप्रतिमावंतपुनीत।१६१
*.६ परिग्रह त्याग प्रतिमा *
जोसमस्त परिग्रह परित्यागाउचितबसन राखैबिनराग।
सोनोमीप्रतिमा निर्यन्थ। यहमध्यम श्रावक कोपंथा१९२॥
* १० अनुमति त्याग प्रतिमा *
जोग्रहस्थ कारज अघमूल । तिनको अनुमति देयनभूल ।।
भोजनसमें बुलायोजाय।सोदसमीप्रतिमा सुखदाया१९३३
* ११ उद्धिष्ट प्रतिमा *
॥ दोहा छंद ॥
अव एकादशमी सुनो, उत्तम प्रतिमा सोय ।।
-weRINE
१-जिसने सर्व वरण क्षत्री भादि के विवहार तजदिये ।।

पार्श्वपुराण भाषा।
२११
ताके भेद सिधान्त में, छुल्लक ऐलक दोय। १६४।
॥१५मात्राचौपाईछंद॥
जोगुरु निकट जाय व्रतगहै। घरतज मठ मंडप में रहै ॥
एकवसन तनपीछीसाथ।कटिकोपीन कमंडलहाथ। १९५॥
भिना भाजन राषैपास । चारों परन करै उपवास ॥
लेउदंड भोजन निर्दोष । लाभअलाभ रागनारोषः। १९६।
उचित काल उतरावै केश । डाढ़ीमोक्ष न राखै लेश ॥
तपविधानागमअभ्यासाशक्तिसमानकरैगुरुपासा१९७)
यह छुल्लक श्रावककी रीत । दूजो ऐलक अधिक पुनीत।
जाकेएक कमरकोपीना हाथकमंडल पीछीलीन । १६८
विधिसै खडा लेहि आहार। पान पात्र श्रागम अनुसार ॥
करैकेश लुंचन प्रतिधीर शीतघाम सबसहै शरीर ।१९९।
॥सोरठा छंद ॥
पान पात्र आहार, करै जलांजुलि जोड़मुनि ॥
खडोरहे तिहिबार, भक्तिरहित भोजन तजै।२००॥
॥ दोहा छंद ॥
एक हाथ पै ग्रासधर, एक हाथ से लेय ॥

पापुराण भाषा।
श्रावक के घर आयके, ऐलक अशन करेय ।२०१॥
यहग्यारह प्रतिमाकथन, लिख्योंसिधांत निहार॥
औरप्रश्न बाकीरहे, अवतिनको अधिकार । २०२।
॥ १५ मात्रा चौपाई छंद ॥
जे जगमें पापी परधान । सात विपन सेवक अज्ञान ॥
रुद्रध्यान धारै अघमई । अतिही कूर कर्म निर्दई ।२०३१
झूठवचन वोलें सतछोर । परधन पर वनिता के चोर ।।
बहुआरंभी बहुपरिग्रही। मिथ्यामतको पोसही । २०४॥
चंड कवाई अधिक सराग।जिन प्रतिमा निंदक निर्भाग।
मुनिवरनिंद पापसिरलेहि। जैनधर्मको दूषणदेहि । २०५॥
नीच देव सेवा रस रचे । धरै कृश्न लेश्या मद मचे ॥
इत्यादिक करनी रतरहैं। ऐसेनीचनरक गतिलहैं। २०६।
सातों नरक से जीवनिकल कौनगति
* धारण करे हैं *
॥ छप्पैछदं॥
सप्तम सों पशु होय, देश संयम न संभालें।

पार्श्वपुराण भाषा।
"छठेनरक सो मनुष, होय व्रत नाहीं पालैं ।
पंचम सों व्रत धरै, मोषगति को नहिंसाधैं ।
चौथे सों शिव जाय, नहीं तीरथ पद लाधैं ।
सबशुभ्रबाससों पायकै,वासुदेव नहिंभवधेरै ।
प्रतिबासदेवबलदेवपुनि, चक्रवर्तनहिं अवत २०७१
॥१५मात्राचौपाईछंद॥
मायाचारी जे दुठ जीव । पर पंचन में निपुन अतीव ॥
झूठलिखेंअरुचुगलीखाहिाँझूठीसाषभरत भयनाहि।२०८
शीलन पालें मोहउदोत । लेश्या जिनकै नील कपोत ॥
भारतध्यानी धर्मविहीनापशुपर्यायलहैं अकुलीन।२०६॥
आरतं रुद्र रहित निरांग। धर्म शुकल ध्यानी वड़भाग।
जिनसेवकपालैं व्रतशील। कसैंकरण मदमातेकीला२१०॥
जिनप्रतिमा जिन मंदिर ठवें । सातखेत उत्तम धनववै ॥
सदाचारसुन श्रावकहोय। यथाजोग पावैसुर लोय।२११॥
सहज सरल परनामी जीव । भद्रभाव उर धरै सदीव ॥
मंदमोह जिनके देखये। मंद कषाय प्रकृत पेषये। २१२।
१-मदमाती इन्द्रयों को कीलकर अर्थात् रोककर कसैं ।।
२-शुनिका १र्जिका २श्रावक इनतीनों कोदानदेना जिन मंदिर बनवाना ४
निम प्रातष्टा कराना ५ तीर्थयात्रा करना ६ शास्त्रदान देनी ७ ॥

पापुराण भाषा।
२१६
श्रलपारंभ अल्प धनचहैं । उरकपोत लेश्या निवहे ।।
पुण्यपापजहिं बरतेंदोया मिश्रभावसों मानुपहोया २१३ ॥
परकै दोष सुनैमनलाय । विकथा बानी बहुत सुहाय ।।
कुकविकाव्य सुनहरजोया तेबहरेउपजै परलोय।२१४॥
पढ़ें सुछंद विवेक न करें । मृषा पाठ विकथा विस्तर ॥
परनिंदाभावें बहुभाय । निजपरशंसा करें बढ़ाय । २१५।
मलमुत्रादिक भोजन काल । मौनबार वाले वाचाल ।
भूठकहतकछु शंकैनाहिं। तेगूंगेजनमें जगमाहिं ।२१६ ।
परतिय मुख देखें करनेह । निर्खे सब योनादिक देह ॥
वधबंधन याचैंधर राग। तेमराधे होहिंअभाग। २१७॥
जेनर करें कुतीरथ गौन। बहुत बोझलादें विन मौन ।।
रथाविहारी देखनचलें। होयपंगुते पातक फलें
।।
नीतबनज कर लक्ष्मी लेहि। ओछालहिन अधिकोदेटिं।
अल्पवित्त दानादिककरें। तेनरदिरव धनीभवत।२१९
जेधन पाय धरैअभिमान । समरथ होकर देहिं न दान ।
धनकारन छलछिद्रकराहिं। वढ़तपरिग्रह धापनाहि।२२॥
लक्ष्मीवन्त कृपन जनजेह । परभो होहिं दरिद्री नेह ॥
मंदकपाई सरलसुभाव। अहनिश वरतपूजाभाव। २२० ।
निज वनिता संतोपी सदा। मंदराग दीखे सरबदा ॥
१-मौनमान अर्थ अर्थात् प्रमान में ।

२२०
पार्यपुराण भापा।
दुराचारजिनके नहिंहोय। पुरुषवेद पावै सुरलोय। २२२॥
जे अतिकामी कुटिल अतीव । महा सरागी भोहतजीव ॥
परबनितारत शोकसंजुक्त । तेकामिनतनलहँनिरुक्ता२२३॥
रागअन्ध अतिजे जगमाहिं। कामभोग सोंतपतै नाहिं ।।
वेश्यादासी रत्तकुशील। तेनरलहैं नपुंसक डील । २२४ ।
मनबच. काय महानिर्दई । बध बंधन ठानै अघमई ।।
परकोपीड़ा बहुबिधकरें । तेजियअल्प आयुधरमरें ।२२५॥
कृपावन्त कोमल परणाम । देखविचार करें सब काम ।।
जीवदयामें तत्परसदा। परकोपीड़ा देहँनकदा । २२६ ।
सबही जीवन सों हितभाव । धरै पुरुषते दीरघ आव ॥
जेजिनयज्ञपरायणनित्त । पात्रदानरतशीलपवित्त।२२७॥
इन्द्री जीत हिये संतोष । तेनर भोगलहैं व्रत पोष ।।
पूजादानविमुखमदलीन। इन्द्रीलुब्ध दयागुणहीन।२२८।
दुराचार दुरध्यानी लोग । इनको प्रापत होहिन भोग ।
समैविचारि पढ़े जिनग्रंथ । पढेपढ़ावै जेसुभपंथ ।२२९ ।
हितसों धर्म देशना कहैं। ते परभो पण्डित पदलहैं ।।
ज्ञानगरव हिरदैधरलेहिं । जिनसिधांतकोदूषनदेहि।२३०॥
इच्छाचारी प. अशुद्ध । ज्ञानबिना बरजित जड़ बुद्ध ॥
पढ़नेजोग पढ़ावैनाहिं। ऐसे मर मूरख उपजाहिं । २३१ ।
अनाचार रत प्रारंभवान । परको पीड़न करें अयान ॥

पाणुगण भाषा।
२२१
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पापकर्मरत धर्म न गहें। तेपरभव में रोगी रहें । २०
परदुख देखहरष उरधएँ। परवनिता परधन जो हरे॥
नरपशुजीव विछोहैजोय ।सोपुत्रादि वियोगी होय । २३३ ।
नीचकर्म रतकरुणा नाहिं। हाथपांव छर्दै छिनमाहिं ॥
जपरको उपजावें पीर । तेनरपावें विकल शरीर । २३४ ।
जो मिथ्या मत मदरा पिये । पापसूत्र की शरधा हिये ।
धर्मनिमित्त जीववधकरैं । महाकषाय कलुषताधरैं ।२५५ ।
नास्तिक मतीपाप मगगहैं। ते अनन्त संसारी रहें ।
रतनत्रय धारीमुनिराज।आगमध्यानी धर्मजहाज । २१६ ।
इच्छा रहित घोरतप करें । कर्मनाश करभव जल तिरें।
उत्तमदेवन में शिरनाय । पूजेपरम साधके पांय । २३७ ।
साधरमी वतसल मुनिप्रीत । उत्तम गोतबंधै इहिरीत ॥
जिजिनयतीजिनागमजाना नमैंनहींशठकरअभिमाना२३८ ।
मानैनीच देव गुरुधर्म । ये सव नीच गोत के कर्म ॥
जिनकेहिये रमैं वैरागाधारैसंजम तृश्ना त्याग। २३६ ।
अतिनिर्मल चारित्त भंडार। ज्ञान ध्यान तत्पर अविकार
ख्यातिलाभ पूजानहिंचहैं। तेत्रहामंद संपदागहें । २४० ।
पंच करण बैरी वसपान । चारित पालें अतिअमलान ।।
दुद्धरतपकर सोबैंकाय । चक्रीहोय देवपदपाय । २४१।
जिसम्यक दिष्टी गुणग्रही । सोलह कारन भावें सही।

२२२
पार्षपुराण भाषा।
तेतिर्थकर त्रिभुवनधनी।होहितीन जग चूड़ामनी । २४२ ।
॥ दोहा छंद ॥
इहि विधि पूछन हारको, समाधान जिनराज॥
कीनो गणधरदेवप्रति, जगतजीव हितकाज । २४३ ॥
बानी सुन बारह सभा, भयो सबन आनन्द ।।
जैसे
सूरज के उदै, विकसै. बारिज बन्द । २४४
बचन किरण सो मोहतम, मिटोमहा दुखदाय॥
बैरागे जगजीव बहु, काल लवधि बलपाय । २४५ ॥
॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
केईमुक्ति जोग बड़भाग ।भरा दिगंबर परिग्रह त्याग।
किनहीश्रावक व्रतादरे । पशुपर्याय अणू व्रतधरे । २४६ ।
केई नार अर्जिका भई । भर्ता के संग बनको गई।
केईनरपशु देवीदेव । सम्यकरन लह्यो तहांएव । २४७ ।
केईशक्ति हीन संसार । व्रत्त भावना करी सुखकार ॥
पूजादान भावपरनरा । यथाजोग सबसेवक भरा। २४ ।
॥ दोहा छंद॥
कमठ जीव सुरजोतषी, कर बचनामृत पान॥

पार्श्वगुराण भापा।
बमों वैर मिथ्यात विप, नमो चरण जुग आन २४६॥
सम्यक दरशन आदरो, मुक्ति तरोवर मूल ।।
शंकादिक मलपरिहरे, गई जनमकी शूल । २५० ।
तहां सातसै तापसी, करत कष्ट अज्ञान ।।
देख जिनेश्वर संपदा, जग्यो यथारथ ज्ञान । २५१ ।
दई तीन परदक्षणा, प्रणमें पारस देव ॥
स्वामि चरण संयम धरो, निंदी पूरव टेव । २५२ ॥
धन्य जिनेश्वर के वचन, महा मंत्र दुख हंत ॥
मिथ्यामत विपधर उसे, निर्विष होहिं तुरंत । २५३ ॥
कहां कमठ से पातकी, पायो दर्शन सार ॥
कहांपाप तप तापसी, धरोमहा व्रत धार । २५४ ॥
जिनके वचन जहाज चढ़, उतरे भवजलपार ।।
जेप्रत्यक्ष आएशरन, क्यों न होय उद्धार । २९६ ।
अवश्री गणधर देवतह, चार ज्ञान प्रवीन ।।
जिस समुद्र तैं अर्थजल, मतभाजन भरलीन । २५६ ।
नाम स्वयंभू दयानिध, विविध रिद्धिगुणखेत ।
द्वादशांगरचना करी, जगत जीव हितहेत ।२५७।
परमागम अमृत जलधि, अवगाहे मुनिराय ॥
जन्म जरामृत दाहहर, होयसुखी शिवपाय । २५८ ॥
,

।
२२४
पापुराण भाषा।
* द्वादशांगपद प्रमाण कथन *
॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
प्रथम एकसोबारह कोड़ । लाख तिरण ऊपर जोड़ ॥
बावनेसहस पांचंपदसही बादशांग कीपरमितकही ।२५९ ॥
* एकपद श्लोक संख्या *
.
.
॥ पद्धड़ी छंद ॥
इक्यावन कोड़ी आठलाख। चौरसी सहसश्लोकभाख ॥
छस्सैसाढ़े इक्कीसजान । यहएक महापदको प्रमान। २६०।
॥ दोहा छंद ॥
इहिं विधसभा समूहसब, निवसै आनन्दरूप ॥
मानोअमृत नीरसों, सिंचत देह अनूप । २६१
॥१५ मात्रा चौपाई छंद ॥
तबसुरेश उठ विनती करी। हाथजोर सिर अंजुलिधरी॥
१-५१०८८४६२१३॥

पार्षपुराण भाषा।
भोजगनायक जगाधार । तीनभवन जनतारनहार २६२
यहविहार औसर भगवान । करये देव दया उरान ।।
भविकजीव खेतीकुमलाय । मिथ्यातपोसूकीजाया२६३॥
भोपरमेश अनुग्रह करो । बानी वरपा सों तप हो ॥
मोषमहापुरके परधान । तुमविनजारे दयानिधान ।२६४
प्रभुसहाय भविसुख पदलेहि। आवागमन जलांजलिदेहि
इहि विधिइन्द्रप्रार्थनाकरी।सहंसनामकरथुतिविस्तरी २६५
भयोअनिच्या गमन जिनेश। भविजीवन के भागविशेश।
सकलसुरासुरजयजयकियोोजिनविहारअमृतरसपियो।
गमनसमें और विधभई । समोसरन रचना पिरगई ।।
चलेसंगसुरचतुरनिकायाचहुँविधिसकलचलेसुरराय२६७
सुरदुंदुभि वाजें सुखकार । जिन मंगल गावे सुरनार ॥
हाथधुजाजत देवकुमार।चलेजाहिंनभमैं छविसारा २६८॥
चहुंदिश चार चारसौ कोष । होयसुभेक्ष सदानिदीप ॥
नभबिहारजिनवरकहोय। जीवघाततहांकरैनकोय।२६९।
सब उपसर्ग रहित भगवंत । निराहार पाव परयन्त ॥
चतुरानन देखैसंसार।सव विद्यार्पति परम उदार।२७० ॥
प्रभुके तनकीपरै नछाहिं । पलक पैलकसों लागे नाहि ॥
नषअरुकैशबनहिंजासायेदसकेवल अतिशयभास२७११
भाषासकल अर्ध मागधी। पिरै सकल संशय हरली ।।

२२६ पार्षपुराण भाषा। ॥ नरपशुजाति विरोधीजीव। सबउरमैत्री धरैसदीव।२७२ नानाजाति बिरछ दुखदलें। सवरितु के फलफूलैं फलैं॥ प्रभुसंचारि भूमिमणिमई। दर्पनवत आगमवरनई।२७३। सुरभिपवन पीछे अनुसरै। बायुकुमार जनित सुखकरै ।। सुरनरपशू शुभागतिजेहापरमानन्द सहित सबतेहा२७४। मारुत सुरयोजनमित मही। करैंधूल तण वर्जित सही ॥ मेघकुमारकरैं मनलाय । गंधोदकवरषा सुखदाय । २७५ ॥ चरन कमल जिनधारेंजहां। कंचन कमल रचैसुर तहां ॥ सातकमलते आगठान । पीछेसात एकमध जान। २७६ । योपंकज की पंद्रह पांति । सवादोइस सब इहिभांति ॥ शुकलध्यानउपजेंबहुभाय। निर्मलदिशनिर्मलनभथाय२७७ मुदितबुलावै देव समाज । भविजनकों जिनपूजनकाज ॥ धर्मचक्र आगेसंचरै। सूरज मण्डलकी छविहरै ।२७८ । मंगलदर्ब आठ भलकाहिं। यथाजोग सुरलीये जाहि ॥ येचौदह देवनकृतजान। बरअतिसै मंडितभगवाना२७९। करैंबिहार परमसुख होत । भविजीवन के भाग उदोत ॥ स्वर्गमोषमारगप्रभुसाराप्रगटकियोभ्रमतिमरनिवार२८० कहीं कुलिंगी दीखैनाहिं । भान उदैज्यों चोर पलाहि ॥ सबनिजनिज बांछाअनुसारापूरणासभयेतनधार॥२८॥ काशी कौशलपुर पंचाल । मरहट मारूदेश बिशाल ॥

पापपुराण भाषा!
मगधनवंती मालवठाम।अंगवंग इत्यादिकनाम।२८२॥
कीनौ आरजखंड बिहार । मेटोजग मिथ्या अँधियार ॥
अवसबकीगणनागणसुनो।यथापुराणकथितविधमुनो।१८॥
प्रथम स्वयम्भू प्रमुखप्रधान। देसगणधर सर्वागम जाना।
पूरवधारी परमउदास । सर्वतीन सै अरु पचास । २-४ ।
शिष्य मुनीश्वर कहैपुरान । दसंहजार नौसे परवान ॥
अवधिवन्त चौदेहसंसार। केवल ज्ञानी एकहजार २८५॥
विविध विक्रिया रिद्धवलिष्ट । एकसंहस जानो उतकृष्ट ॥
मनपरजैज्ञानी गुनवन्त । सातशेतकं पंचासमहन्ता२८३)
सैवाद विजई मुनिराज । सबमुनि सोलसहस समाज ॥
सहसंचवीस अर्जिकागनी एकलाखश्रावकवतधनी२८७
तीनलाख श्रावकनी जान । वरनी संख्यामूल पुरान ।।
देवीदेव असंघअपार। पशुगणसंख्याते निरधार।२८८ :
इहविध बारह सभासमेत । रतनत्रय मारग विध देत ॥
विहरमान दरसावतबाट । सत्तरवरप भयेकछुघाट ।२८६)
सम्मेदाचल शिषर जिनेश । आयेश्री पारस परमेश ॥
एकमासजिन योगनिरोधामनबचकाय कृपासबरोधा२६०
सचमकाय योगथितिठानात्रितियशुकलसंजुन तिहिताना
तजसयोग थानकस्वयमेव आएफिरअयोगपदेचार६१
पंचलघुक्षर है थितिजहां । चेतुरथ शुकल ध्यानवल तहां।

२२८
पार्श्वपुराण भाषा ।
प
दोयचरम समयेजिनभनी। प्रकृतिबहत्तर तेरहहनी२९२
इहविध कर्मजीत भगवान । एकसमै पहुँचे निर्वानः।।
औछत्तीसमुनीश्वरसाथालोकशिखर निवसजिननाथ२०३
सावन शुदिसातै शुभवार। विमल विसाखा नखत मंझार।
तजसंसार मोषगए। परमसिद्ध परमातमभए। २९४ ।
पूर्व चरम देह तैं लेश । भए हीन आतम परदेश ॥
अष्टगुनातममयब्यौहार । निहचैगुणअनंतभंडारा२९५॥
सादिअनंत दशापरनरा। सिद्धभाव बसु गुनजुतथरा ॥
परमसुषालयबासोलियो।आवागमनजलांजलिदियो२९६
॥ दोहा छंद॥
पंच कल्यानक पायसुख, जगत जीव उद्धार ।
भएपूज परमातमा, जयजय पास कुमार ।२९७१
जिनसुखको ज्ञानकी, नहीं उपमा जगमाहिं।
जोतिरूप सुषपिंडथिरि, इंद्रीगोचर नाहिं ।२६८०
अब तिनको आकार कछु, एकदेश अवधार॥
लिखोंएक दिष्टांतकरि, जिनशासन अनुसार।२९९॥
॥१५मात्रांचौपाईछंद॥
मोममई इकपुतला ठान। नखशिख सम्म चतुर संठान ॥
.
१-जिनके आत्म प्रदेश चरम शरीर से कुंछकम भये ।।
---.

पापुराण भाषा!
२२३
सवतन सुंदर पुरुषाकार नराकारइसहीविधसार।३००।
माटी सो इम लेपहु सोय । जैसेत्वचा देह पर होय ॥
कहींअंग खालीनहिरहै। सवउपचार कल्पनायहे।३०१॥
फुनिसो लीजै अगनि तपाय । सांचारहै मोमगल जाय ॥
अबताभीतर करोविचार।कहारह्योबुध ताहिनिहा।३०।
अन्तर मूसपोल है जहां । पुरषाकार रह्यो नभ तहां ॥
याहीअंवर के उनहार । ब्रह्मसरूप जाननिरधार । ३०३।
यहाकाश सुन्य जड़रूप । वह पूरन चेतन चिद्रूप ।।
यहीफेरहै यावा माहिं । आकृति मैं कछुअतर नाहिं। ३०४॥
याविध परम ब्रह्मको रूप। निराकार साकार सरूप ।।
यहंदृष्टांतहियेनिजधरोभविजियअनुभौगोचरकरो३०५
॥ दोहा छंद॥
वसैं सिद्धशिव खतमें,ज्यों दर्पन में छाहिं ।।
ज्ञान.न सों प्रगटहै, चर्म नैंनसों नाहिं । ३०६ ।
॥ १५ मात्रा चौपाईछंद ॥
तब इंद्रादिक सुर समुदाय । मोषगए जाने जिनराय ॥
श्रीनिर्वाणकल्याणककाजाआएनिजनिजवाहनसाज३०७
परमपवित्त जानजिन देह । मणिशिवका परथापी तेह ॥

२३०
पापुराण भाषा।
करीमहापूजा तिहिंबार। लियेअगर चंदनघनसार ३०८०
और सुगंधदरबं शुचिलाय । नमेंसुरासुर शीस नमाय ॥
अगनिकुमार इंद्रतैंताम।मुकटानल प्रगटीअभिराम३०९
ततषिनभस्मभई जिनकाय। परम सुगंध दंसौ दिसथाय।।
सोतनभस्म सुरासुरलई। कंठहियेकर मस्तगठई।३१०।
भक्तिभरे सुरचतुर निकाय। इहविध महा पुन्य उपजाय ॥
करआनंद निरतबहुभेव। निजनिजथान गयेसबदेव।३११॥
॥दोहा छंद ॥
पंच कल्यानक पूजप्रभु,शिवशिरिकंत जिनेश ।
सबजग सुख संपतिकरो, श्रीपारस परमेशा३१२॥
श्रीपार्श्वनाथ स्वामीके भवोंका
* सामान रूपकथन *
-
॥ पद्धड़ी छंद ॥
पहलेभव वामन कुल पवित्त। मरुभूत उपन्नो सरलचित्त।
दूजेबनहस्तीवत्रघोष ।जिनपालेबारहव्रतअदोष।३१३।
तीजेभवहादसस्वर्गबास । सहस्रारनामसबसुख निवास ॥

पार्भपाण भाषा।
..
चाँथेमवविद्याधरकुमार। लघुवैसलियो चारित्रभारा३१४॥
पंचमभवअच्युतमुरगथानाबाईसजलधिजहिंथितप्रमान।
छ?भवमैचक्रीनरेश । जिनसाधेसहसवत्तीस देश ।३१५
सातवेजनम अहमिंद्रहोय । सुषकीनेचिरउपमानकोय ॥
आठमभाश्रीआनंदरायातजराजरिद्धिबनवसेजाय ३१६॥
: सोलह कारन भाएमुनिंद्र । फुनिभए वारमै स्वर्गइंद्र ॥
इहविधउत्तमनौजनमपायावामाजननीउरवसेधाय।३१७।
जेगरभजनमतपज्ञानकाल । निर्वाणपूज कीरतविशाल ॥
सुरनरमुनिजाकीकरेंसेव । सोजयोपासदेवाधिदेव । ३१८।
॥ दोहाछंद ॥
नाम लेत पातिक भजै, सुमरतसंकट जाहिं ।
तेईसम अवतारमुझ, वसो सदा हिय माहिं । ३१९
* सामान्यरूप कथन*
॥ छप्पै छंद ॥
कमठ जीव तनछोर, दुतिय कुरकट अहिजायो।
नरक पंचमें जाय, आय अजगर तन पायो ।

२१२
पार्षपुराण भाषा!
धूम. प्रभा में उपज, भील अतिभयो भयानक ।
चरम नरक पुनिसिंघ, फेर पँचमभू थानक ।
पशुजौनि जमहिपालनृपं, देवजोतिषीभवतस्यो।
इहविधअनेकभवदुखभरे, वैरभावविषतरुफलो।३२०॥
॥ दोहा छंद॥
छिमाभावफलपासजिन, कमठबैरफलजान ।।
दोनोंदिशाबिलोककै, जोहित सो उर आन । ३२१ ।
॥सोरठा छंद॥
जीव जाति जावंत, सब सौ मैत्री भावकर ।।
याको यह सिद्धत, बैर विरोध न कीजिये । ३२२॥
* उक्तंच संस्कृत वाला छंद *
सत्वेषु मैत्री गुणिषु प्रमोदं । क्लिष्टेषु जीवेषु कृपा परत्वं ॥
माध्यस्थभावविपरीतटत्तौसदागमात्माविधधातुदेवः३२३
* भाषा टीका *
सच्चे शास्त्र ज्ञाता पुरुष अर्थात् महान पुरुष प्रति जीव मात्रों में मित्रता भाव और
गुणवान पुरुषों में हर्षभाव और दुखिया नीचों में दयाभाव विपरीत वृत्तिवानों में
माध्यस्य भाव अर्थात् भला बुरा रहित भाव रखते हैं ।

पापुराण भागा।
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॥पोमावती छंद ॥
जो भगवान बखान करीधुनि, सोगुरु गौतम ने उरानी
तापर आइ ठईरचना कछु, द्वादश.अंग सुधारस वानी ।
ताअनुसार आचारज संघ, सुधीवलसों बहुकाववखानी॥
योंजिनग्रंथ यथारथहै, अयथारथहें सबऔरकहानी।३२४॥
॥ दोहा छंद ॥
जितने जैन सिद्धांत जग, तेसव सत्य सरूप ॥
धर्म भावना हेतसव, हितमित शिक्षा रूप । ३२५ ।
कलपित कथा सुहावनी, सुनते कौनअरस्थ ।।
लापदाम किसकाम के, लेखनलिखे अकत्थ ।३२६॥
॥सोरठा छंद॥
सुन श्रीपास पुरान, जान शुभाशुभ कर्मफल ।
सुहितहेत उरआन, जगत जीव उद्यमकरों । ३२७॥
॥ दोहा छंद ॥
.. प्रभुचरितमिस किमपियह, कीनोप्रभुगुनगान।।
श्रीपारस परमेश को, पूरनभयो पुरान । ३२८ ।

२१
पार्श्वपुराण भाषा।
पुरब चरित बिलोकि कै, भूधर बुद्धि समान ॥
भाषाबंध प्रबंध यह, कियो आगरे थान । ३२६ ।
* कविलघुता *
॥ छप्पैछंद ॥
अमरकोष नहिं पढ्यो, मैंन कहि पिंगल पिण्यो ।
काव्य कंठनहिं करी, सारसुत सो नहिं सिष्यो।
अछर संघि समास, ग्यान वर्जित बुद्ध हीनी ॥
धर्म भावना हेत, किमपि भाषायह कीनी ।
जोअर्थचंद अनमिल कही, सोबुध फेर सवारियो ।
सामान्यबुद्धिकविकीनिरखि, छिमाभावउरधारियो ३३०
॥ दोहा छंद ॥
जिनशासनअनुसारसब, कथनकियोअबसान।।
निजकपोल कल्पितकही, मतसमझोमतिवाना३३१
छयउपशम कीओछौं, कैप्रमाद बस कोय॥
इहबिधि भूल्योपाठ मैं; फेर सवांरो सोय ।३३२॥
पंचवरष कछु सरससे, लागे करत न बेर ।

पापुराण भाषा।
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बुधथोरी थिरताअलप, तातें लगी अवेर । ३३३॥
सुलभकाज गरुवो गनै, अलपबुद्धि की रीत ॥
ज्योंकीड़ीकण लेचले, कि|चली गढ़जीत ।३३४॥
विधनहरननिरभयकरन, अरुनवरनअभिरामा।
पासचरन संकटहरन, नमोनमो गुनधाम । ३३५ ।
॥ छप्पैछंद ॥
नमोदेव अरहन्त, सकल तत्वारथ भाशी ।।
नमो सिद्ध भगवान, ज्ञान मृरति अविनाशी ।
नमोसाध निम्रन्थ, दुविध परिग्रह परित्यागी ।
जथा जात जिन लिंग, धार वन वसे विरागी।
बदोंजिनेश भाषित धरम, देवसर्व सुख सम्पदा ॥
येसारचार तिहुँलोक में, करोक्षेम मंगल सदा । ३३६
॥ दोहा छंद ॥
संवत् सतरह शतक मैं, औरनवासी लीय ॥
सुदि अषाढ़ तिथिपंचमी, ग्रंथसमापत कीय।३३७१
श्री पार्थ पुराण भाषा भगवस निर्माण गमन वर्णन नाम नवम अधिकार संपूर्णम्।।
इति श्री पार्श्वपुराण भापा कविवर
भूधरदास रचित समाप्तं ॥

२३६ पापुराण भाषा। * अन्तिम सूचना * कोड़ा क्रोड़ि धन्यवाद है उस परम पवित्र विज्ञान रूप निर्मलबाणी को जिसकी अनुकम्पा दृष्ट सहायता से श्री पार्श्वपुराण भाषा छंद बद्ध कविबर भूधरदास जी र- चित मेरे बिचार पूर्वक शुद्धता के सुन्दर बसन धारण कर छंद नामावली यंत्र आदि नाना प्रकार के अनुपम विचित्र भूषण से भूषित हो जैन प्रेस लखनऊ में लाला कन्हैया लाल भगवान दास.जी जैन यंत्र अधिकारी के प्रबन्ध से अति उत्तम गरिष्टं चिकने कागज़ पर बम्बई मोटे टाइप (अत्तर) में छपकर अपनी अन्तर वाह्य शोभा कारण धर्म अभिलाषी पुरुषों को प्रियहो जगत प्रसिद्ध हुआ । * ग्रन्थ मुद्रित काल * ॥ दोहा छंद ॥ १९५४ उन्नीससौ चव्वन अधिक, विक्रम सम्बतजान॥ जैनप्रेस लखनऊ में, मुद्रित भयो पुरान ॥ ॥ इति शुभम् ॥

कविवर भूधर दासजी रचित हिंदीभापा पार्श्वपुराण शब्दार्थ कोप भ अचल-पहाड़, पर्वत ॥ अचेतन-निनींव, नह ॥ भ-भव्य-जब किसी शब्द के भादि अच्छन में पानी के निपेध अर्थ में गत है पथा अक्षन नेत्र, भाँन, द्री॥ भतुल तुल्य रहित ॥ अंक-गोद, चिन्ह ॥ अच्युत-सालवें स्वर्ग का नाम ॥ अजर-जराफा विरोधी गन्द, युद्धारा अंकुश-हाथी हांकने का प्राभार ॥ अंकूर-अनुश्रा, बीन मोवोनेपर फूटता है अनितन--जो न जीनानाय ॥ रहित ॥ अंतरदीप-बड़े दीप में गरमित छोटादीप अमोध-निस से कोई न लम्फै ।। अंतरमालका-छाती के हाड़ों का पिनर ।। भटवी-वन, जंगल ॥ अंतरंग-आत्मीय, अपना, अंदर ।। अंतराय-८ कर्म में से १कर्म का नाम ।। अणिमा- ऋद्धि में से १ शुद्धि का नाम । अंतरीक्ष-अधर, निराधार, भामाश ॥ अणुत-बोटेवन,-मिनको श्रावक अंतेवर-रनपास, वेगमात ॥ पालते हैं। अंबुज-कमल ॥ अंश-भाग, हिस्सा, टुका ॥ अणुरूप-अणुगत मुन्नम ॥ अतिशय-तियकरी की अटन कृत ॥ भकसमात-चानचक ॥ अनीचार-भोगा, वन का मजीन फरने अकुलीन-कुलहीन । वाला काम ।। भगम-भगम्य-निसमै न नासके । भगर-वृक्ष विशेष-निसकी लकड़ी नलाने अनीर-अत्यंत, बहुत ।। से सुगंधि देती है। अधिति-अम्गामत, आया हुना,महमान अयप-नीन पुरुष, पापी पार॥ भगाध-गहरा, भया । प्रध-पाप। यघर-रोट, लब, निरापार ॥ अचर-१ इंद्रानीव, करनीव का विश्कार-पदवी. योग्यता, असाप ।। रोधी शब्द ॥ थपिपनि-स्वामी, मालिक, गना । अनमनीच॥ भगूचार-अगवानी॥

२३८ शब्दार्थकोष। . अनाहूत--विन अनुदिश । विमानों के नाम भयो-उर्द्धशब्द का विरोधी शब्द,नीचा अभिधाय-दौड़ना, चलना ।। अन-नषेध अर्थ मैं ॥ अभिरामं "सुन्दर, भला॥ अनगार-साधू, बेघर, उनाड ॥ अभिलाषा-च्छा, मनोर्थ ॥ अनहद-पाना विशेप, नो ब्रह्माएर मे अभेद-नही टूटनेवाला ।। स्वयंसिद्ध षमता है ॥ अभिषेक-स्नान क्रिया भनरथदंड-वृथावंड ।। अमरकोप-१ संस्कृत शब्दार्थ कोपका भन्यथा और प्रकार, झूठ ।। नाम ॥ अनादिनिधन-सास्ते, सदीपके,कदीम ॥ अमोघ फलदाता ॥. खुलाया ॥ अयान-मूर्ख वेवकूफ ॥ अनित्व-सवपर हैं, सब गैरहैं ॥ अरति-गिलानी ॥ अनुकूल-सहायक, प्राधीन, मुवाफिक ॥ अरणी-वृक्ष, विशेप ।। अनुत्तर अर्जुन-वृक्ष विशप ॥ अरलू-वृक्ष, विशेष ॥ अनुगृह-दयालता, मेहरवानी ॥ अरीता-वृक्ष विशेष जिस के रीठाफल अनुराग-प्यार, दिलका लगाव ॥ लगता है। अनुसरे--पीछेचलें, पैरवी करै ॥ प्ररथ अनुप्रेक्षाधर्म-वारा भावना ।। पूनाकी सामग्री पूनामें जलचढ़ाना ॥ अनुचरित्र-श्रावकों का आचार ॥ अनुपम उपमा रहित, वेमिसाल ॥ अनूप अरुण-लालरंग ॥ भनेकांत-अनेक भकार अर्चि- बस्तु स्वरूप -पूजन ॥ निश्चय होना ॥ अर्जिया-अर्जिका, साधुणी ।। श्रद्धासण-आधा आसण ।। अपरविदेह-पश्चिम विदेह ॥ अपराध-पाप, दोष ॥ अपशंस-खोटा, नाकिस ॥ अलप अपर्याप्त जीव-जो पूरीपर्याय ना पावै तुच्छ, थोड़ा किंचित ॥ शल्प भपावन-अपवित्र, नापाक || अवूझ-मूर्ख, बेवकूफ ॥ अनंकार-साहित शास्त्र, काव्य विचा ॥ अरि-बैरी, शत्रु॥ है से अ-भेटदेना ॥ अर्हत-पूजनीक ॥ अविवेक } बिबेक रहित, वेतमीज ॥ अनंकृत शोभामान ॥ - . अलंकित अभक्ष-नही खानेयोग्य वस्तु ।। अवधार-निश्चय, विचार ॥ अभंग-नही टूटनेवाला ॥ अवधि-हद, सीम एकदेशका नाम ॥ .. भभिधान-बोलता नाम, दूसरानाम ॥ अवधिज्ञान-ज्ञान विशेष देखो ज्ञानशब्द . शन्दाकोप। भविमोकन देखना ॥ आचार्य ग्रंथ रणसा मशन-मोनन ॥ मशरणनिधार ॥ । शुच-मलीन ॥ अवतार-उतरने पाला ।। भारो-संबोधन या भारवन वा हर्ष भवनी-पच्ची, परती।। समय बोला जाता है। भवसान- अंत, मंबाम ॥ भवक्ततव्य-नो कहन में न श्रावै॥ अवकाश-मौका, भवसर ॥ अवरोधन-नांकना ।। भाकिंचन-कुछपा न रसना ॥ भवंती-एका देशका नाम ॥ भाकृन-आकार रोत, मूर्ति ॥ भागति-धर्मशान बंद, आना ॥ भविनोय भागर-घर, समूह ॥ अविनाशी-नाश रहित, परम प्रात्मा ॥ माधोर-मलीन, नापाक ॥ अविशेष-विस्तार रहित अर्थात् सामान्य माचार्य निक्षित ॥ प्राचारज थाचर-करे ॥ पाठभांतपूजा-अप्टवरचते पूननफरना! भसरण पातममाला, जीव ।। आतु:-लीन, इवाहवा ।। अशोकवृक्ष विशेष॥ श्रादेश-आज्ञा, इनाजत, हुकुम ।। भशेष-सारा कुल, सर्व,॥ श्राधार-साहारा, टेक भसद्भूत विवडा- नयकानाम, नो भान-पाना, सौगंध और॥ निश्चय मे सेत न हो। श्रानत-१ विमान का नाम ।। असमान-निसकी मरावर दूसरा नहो । भानन-मुख || असंप-अनगिणत, पेशुमार ॥ आनम-झुकना ॥ असि- तलवार, शन्न ॥ भाभरन-गहना, नेवर, भूषण ।। असिमसि-चाक् प्रादि लिखनकी सामग्री आयस-हुकम, आना ॥ पायाप-लंबाव, तून ॥ अशीश) प्रायुधः -हथियार, शन॥ भागति-दुख ॥ श्रसेनी-मन रहित नीर।। श्रारतिध्यान-बोटाभ्यान ॥ अस्ति है अर्थमें ॥ अस्ति नास्ति-हेभी, नहीमी ॥ मारन] भस्ति-हाड़- भस्थिमाल-हाड़ोंका पिनर, टांध ।। भह-दिन॥ पाराप-मेगा. पूना॥ आरुत-सतार, नाग !! भसीस) आशीर्वाद ॥ - आर्य उत्तम, आर्यावर्त ॥ धारएय-बन जंगल॥ माहि- सर्प शब्दार्थकोप। लेना ॥ पासन-बैठक, her भाव-सिधापन, निर्कपट ॥ उज्झाय-उपाध्याय मुनियों का पढ़ानेवाला आवर्त-घेरा, चक्र, भँवर ।। उडगण-तारागण || श्राव उत्पाद-उपद्रव, अखेड़ा बखेड़ा। आयु, उमर श्रायु उतंग ऊंचा॥ श्रावलि-पंक्ति, लड़ी ॥ उत्कृष्ट-उत्सम, मला ।। आवागमन-आना जाना, मरकर भन्म उत्तरगुण-मूलगुण ॥ उत्तरभेद-मूलभेद ॥ आश्रव-कमौका आना॥ उदक-उछलन, कूदन, जल ॥ वैठनेकी वस्तु, समीप ॥ उदधि-समुद्र ॥ आहार-भोजन करना ।। उदर-पेट॥ आहारक-१ प्रकार का शरीर ।। उदंड पेठेका विरोधीशब्द, अर्थात् खड़ा। उदंबर-अभक्षफल,जो ५ हैं। उदार-दाता, महान पुरुप ॥ उदयाचल-१ पर्वत का नाम, निसपर इंद्रायन-विसलूभा फल ।। सूर्य उदय होता है। इंद्रयुध-धनुष, जो वर्षा में निकलती है । उद्धत-ऊपर होना, उछलना ॥ इंद्रीजनत-इंद्री से उत्पन्न हुवा ।। उद्धार-ऊपरलेना, इतिय पलका नाम । इंद्रीविनय-इंद्रीयो का जीतना ॥ उद्यम-विचार, तनवाज || इंदु-चंद्रमा ॥ उद्यान जंगल, उनाड़॥ इष्ट-प्यारा, प्रय॥ उद्योत-प्रकाश ॥ इचाक-छत्री वंशका नाम ।। उधरन-ऊंचा ।। उनहार-तुल्य, वरावर ।। उन्नती-अधिकता, पढ़वारी ॥ ईर्यापथ-४ हाथ पृथ्वीदेख कर चलना ॥ | उपकार-सहायता॥ उपकरन-पूजाके वरतन पूनाकी सामग्री । ईश-बड़ास्वामी, सरदार ॥ उपकिलकी-नीच, खोटा ॥ ईशान-दूसरे स्वर्ग का नाम ॥ उपदेशो-उपदेशदियो । उपचार-उपाय, सेवा, विवहार ॥ . उपद्रव-उपाधी, विन्न । उपवन–बागीचा, बाड़ी। उक्त-कहाहुवा ।। उपसमुद्र-खाड़ी, छोटा समुद्र ।। उग्र-कठोर, भयंकर ।। उपसर्ग- -दुख, तकलीफ ॥ उच्छेपण-उखेड़ना, तोड़ना ॥ उपभोग-नोवस्तु वार ५ भोगीनाया। . chr शब्दार्थकोप। w . ऐ विशप ॥ उपयोगी-विचार करनेवाला॥ एवम प्रकार, यह, निभय ।। उपशंन दवे, घंटे, कमहो॥ एत्रम- इस प्रकार, यह मीनरा॥ उपशम उपाधि-उपद्रव, विघ्न ॥ उपाय-तनवान, इलाज।। उपासक-पूजनेवाला ॥ ऐगवत-वाचित हाथी का नाम, दंग उभयदिश-दोनोोर, दोनोनरफ ॥ उभयपक्ष-दोनोपक्ष दोनोपखवार ।। एलक-१ मत्मारागारकों में में! उर-हृदा, मन ।। प्रकार काश्रावका उग्ज-छाती, चूची, ॥ उलोक स्वर्गलोक ॥ औ उशण गरमी, सपत ।। उशणता श्री-और ॥ नांगा-वृन विशेष ऊ दारक-शरीर, देह ॥ प्रापधी-दवा ॥ जदव-ऊनह, वरान ॥ सर-समय, काल, माका । जन-घटना ॥ ऊपमा-मुकाबला, तशवीह ।। क ऊंसर- फलका नाम जो अभक्ष है ।। कंकाल-कशनानी वृत ॥ उंचा,अधोका विराधीशन्दा ऊर्ष कंचन-सवर्ण, साना पानु ॥ कम-कमल ॥ ऋ कंटकई-कांटी बाना॥ कंठ-गला, हनक जवानी ।। ऋतु-मौसम, फसल, ऋतु ६ हैं बसंत । कठिका-कंटी, माला, गहना ॥ यापम २ वर्षा सर्व हिम ५ शिशिरकन स्वामी, पनि । ऋतुराज-मसंतऋतु ।। कंद-जड़गांठ ॥ कंदर कंग गुफा,पहाडीगह कच्छप-कतामानार, एकत्व-एकपना॥ कटक-कड़ा गहनागिंप, मन, दीना एमो-अमेही ॥ कटि-कमर ॥ ए शब्दार्थकोप। कल्पनरु । स्वर्ग का वृक्ष - कटिभूषण-तगड़ी,गइनाविशेष ॥ कलपवासी- देवताविंशप,जोर प्रकार हैं कटूकड़वा,तल्ख ॥ कलेवर-~लाश लोय ॥ कटुकरस-कड़वारस ।। कला-मामर्थता, अंश, भाग, ६४ कधिक-कहन वाला ॥ कलारागादि विद्या प्रसिद्ध हैं। कदा--कभी॥ कलाप-दुःख.ममूह, मार पनी॥ कदाभि-किसी कालभी। कलानिधि-चंद्रमा ॥ कन। कलश-घड़ा, कुंभ, सानका उपकान नान, गल्ला ॥ कण जो मंदिर के शिपर पर लगाया जाता है। कनकानल. -सुमेरु पर्वत ॥ स्वर्ग का वृक्ष जो मन वांछित कन्हार-वृक्ष विशेष ॥ कल्पत कपि-चंदर ॥ फल देता है ।। कपोत-कबूतर रंगलेश्या ॥ कलत्र-स्त्री, घम्की बी॥ कपोल-गाल, रुखसाग। कालन-भरी हुई। करच-जिरह, कतर, लोहे की कड़ियों के नुसना-कालस, स्याही ॥ का जामा । वल्लाल-लहर,माज ।। कमलनि-कुमादनी. कमलौंका समूह ॥ कलमलाय-कुल बनाना ।। कमलामज्जन-लक्ष्मीस्नान, देवीस्नान ॥ कपाय-क्रोध मान माया लोभ,कमलारस कमंडल-पानीका भाजननी मुनि रखते हैं। लाल रंग ।। करण-इंद्री ।। काँड---तीर विशेष अध्याय ॥ करनाल विशेष ॥ कौति-चमक दमक ।। कर्पट-वृन विशप ।। काउमर्गमुद्रा -बड़े होकर ध्यान लगाना काहा-उँट॥ काकरवीरन विशेष ॥ करवत-लकड़ी चीरने का औजार,आरा| कादो-कीचड़, गाग । करा करने वाला. यथा शिवकरा ! कापुरुष-खोटा पुरुष कग़ल-भयंकर, इरावनी सूरत ।। 'कायर-डरपोक ।। की कारागृह-कैदखाना, जेलखाना ॥ कान-मौत, समय, काला रंग ।।. करनी-हथनी, रानका आजार, करतूत ॥ कालमा-कालौंस, स्याही ॥ करुणा-दया ।। कारमारण- प्रकार का शरीर ॥ कार्णिका-फूलकी डोडी । कालाणू-काल परमाणु॥ कल-चैन, आराम, सुप ॥ काशिप-गोत्र का नाम ॥ कल्पित -झूठी, फरजी ।। काशी-काशीदेश १ नगर का नाम ॥ कलगलांक-स्वर्गलोक ॥ काहलाकार-बिलाव केसी हाथी, गजं ॥ सूरत।।

शब्दाप। virail N महशर ॥ किंकर-दाम, बांदा. सवक ।। किधी-मानी, गोया, कभी, कियो । नगी किलग-देव अंगना नानि जो गान गाती हैं करनाट-जीनिती माया माना किर्माला-फालमा वृक्ष, पन्नास वृन ॥ विशप !! किरीट-एकट, ताज॥ कोक-टक नाना॥ किलकी -अधम पुरुष.धर्मीयवंशी पुरुष | कोट-नोद नियनी, ओट, मान || किलकिलन-किलको मारना, किलपिन कोटा-कृतको गोपन्न । करना ॥ कादी-2 प्रकारका नाम, निम्मे नग कीनि-कीर्ति, यश ॥ कीधी-कियो । कोप-~ोध, गुम्मा ॥ कु-बाट अर्थ में यथा कुभाव खोटा भाव कोपीन-निगांट। कुंकुम-केसर, जाफरान ।। कोविद-पंटिन रहमान ।। कोलाहल-का. पुकार ॥ कुंबर हाथी॥ कोप-खजाना. भंडार, गदा शृंग || कुन-भाला, वरना अन्न ॥ कुन-~पना ॥ कुंद-फूल विशेष ॥ नम-बनायट॥ कुम-घड़ा, मटका ॥ जशन-तलवार, मांडा॥ कुटिल-नाच पुम्प, का पुरुष ॥ कृपाल-दयान ॥ मुगर-कुहाडा, दुल्हारा।। कृपपरपाटी मिमिन्दा कान ॥ कुमार-बाल अवस्था । कृप-कमर हलका.निल ॥ कुरंग-हिरन, मृग॥ काडा-दिल, कद, चन्दना करना, मर - कुल-वंश कुलगिर-पहाद विशेष ॥ कुलाचल-पर्वत शिय॥ कुलीन-कुलवाला,नांदानी ॥ कुवर-कोपाध्यन्न, बनानची ॥ कुना-भागका पलीता ॥ कुंची-ताली. ऊनी ॥ कूट-पहाड़ की चोटी कूप-कुता। केवलज्ञान-देखो ज्ञानशब्द ।। केल-कलोश, क्रीड़ा, खेलकूद ।। केश-बाल॥ खंड-टुरड़ा, हिम्मा खग-वियापर, आकाशगानी । सनी-जड़ी र॥ सो कनानजर जानवर ॥ खडगलवार, पांडा खर-गा। खरी खातिना-मा, नंदक॥ सारक-हरा, वृक्ष अनगिया शब्दार्थकोप। खेद-दुःख खिन्न-भिन्न भिन्न ॥ गरिष्ट भारी मोमल ॥ खिरी-चई, गिरी, उतरी ।। गरीष्ट खजइ-वृक्षविशेष ॥ गांडर-एक प्रकारकी घास। खेट---खडा, आवादी॥ गामी-चलनेवाला। खेत-क्षत्र ।। गिर-पहाड़। गिग्दाकार- गोल ।। खेपी-बखेरी, फेंका।। गिले-निगले ॥ खैर-वृक्ष विशेष ॥ गीध-गिद्ध पक्षी॥ ख्याति-फेलाव प्रकाश ॥ गुंझा-चिरमटी, बची ॥ गुप्त-छिपा, पोशीदा।। गुप्ति-३ हैं,मन १ वचन २ काय३ रोकना। गुफा-पहाड़ की-खोह ॥ गड-आखों के नाचेका माग, कपोल ॥ गुडहल-वृक्ष विशेष ॥ गंध-वास, बू, सुगंधि । गंधकरी-केवली के बैठनेका देवरचित स्थान गुलमखेटपुर-१ नगरी का नाम ।। गुणस्त-३ वृत जिनको श्रावक पालते हैं। गंधर्व-गानेवाले देवता ।। गह-घर ॥ गंभीर-गहरा, अथाह ॥ गैल-साथ, रस्ता ॥ गगन-आकाश, आसमान ।। गोट–सभा, टोली॥ गज-हाथी ।। गोंदी-वृक्ष विशेष,जिसका फलगोंदनी है।। गजदंत-पहाड़ विशेष ॥ गोपति-चल ।। गजे-गाजे, शोरकर, गूजै ।। गोपुर-गौशाला || गड-किला, दुर्ग । गोमठसार-ग्रंथका नाम । गणईश । भगवान की धुनिका अर्थ करने गोरखपान—पानविशेष । गणराज वाला ४ ज्ञानका धारक, मुनियौं | गौतम-महावीर स्वामी के प्रधान गणधर गणधर के गणमें प्रधान मुनि ।। का नाम गएबद्ध गौन-गबन, चलन, फिरन। गणिका वेश्या, रंडी, कसबी ।। ग्रंथ-पुस्तक पोथी॥ गति-चलना फिरना, नरक १ तिर्यच २ ग्रह–धर ।। देव ३ मनुष्य ४ ग्रीव-गला गर्दन ॥ गयंद -हाथी, गज ॥ ग्रेवेयक-विमानों की संज्ञा ॥ गरव. गर्व पेट, माधान, मान ॥ घ गर्भ) घट-घड़ा, कुंभ, हृदा, चित।। . .

शब्दार्यकांप। menu .FHere4amanna . घन-बादल, वटा, समूह ।। 'चिर-पनीर॥ घनसार-कपूर, नल, नंदन ॥ नीर-गुम्य ॥ घनघोर-बाइल का समूह, घटा । चुरापरिण-रम मिनी माटीमांनी घरटी-चकी ।। चतवृक्ष- प्रकार का वृक्ष, निममें प्रतिमा घामूमन-घर तूटना ।। पार होता है। घाट-दरिया पहाड़ का रस्ता ॥ चोल--मीठ मृत,निमका रंग ना घान-समूह ॥ चापर घाम-धूप, गरमी ।। -नाराहा ।। चौरट बिघाय-रोना । घुटियागमन-घुटनों के रस चलना ।। छ पघु-उल्लूपक्षी ।। घोर-समूह, गरन, मलीन ॥ छटा-छीट, बूंद, कतरा ॥ घारवार-सूरनीर ।। छंदशास्त्र-पिंगल गान ।। छमभंग-गननाय॥ च छन्न-छाया दुया ॥ छवि-शोभा, रौनक ॥ चंड-तेनमान | छय-क्षय,नान॥ चंदरोपक-चंदोया, सानियाना॥ बॉट-छोट, बूंद, ला॥ चंपक-चंपावृत ।। छानी-छिपा, पोशीदा।। चंपत-चापना, दाना, भागना ।। छाप-मोहर ॥ चक्र-हथियार विशेष, गाड़ी के पहिये, बायक-नायक सम्यक दर्शन । चक्रवर्तराना ॥ छिद्र-इक, सगाव ।। चाप-धनुप शस्त्र ॥ छिन्नभिन्न-टेक्टे टकरे टुकंद ।। चाांकर-सोना धातु ॥ हुदघटका---गरु, भूगण ॥ चारण-मुनिनाति विशेष हु-सुधा, भप ॥ चारित-चारित्र, मलन ॥ एल-११ प्रनिनावारीमा में, चारु-संदर, भला ।। प्रकारकाधारक। चिंतामणी) रत्न विशेप, १४ रत्नमें से? चितारन रत्न का नाम । चिन्ह-बनण, निशान ।। जंगप-पन्ने बांसनीय, प्रकार मिली चिता-हल्ला ॥ चिदातम) जंडांत मि . - विदरूप ! ग्राम ॥

२४६ शब्दार्थकोप -- जंतु-जानवर, नीव ॥ झालर-घड़ियाल वाना॥ पत-जापै, स्मरण करै । जंबू- दीपका नाम, नामनवृक्ष ॥ ट जंभौरी-नीबू, वृक्षविशेष ।। 'जघन्य-छोटा॥ टेक-सहारा, आधार,थंभ ॥ जड़-चेतन॥ टेव स्वभाव, आदत ।। जनक-पिता, वाप॥ जननी-माता ॥ ठ जयो-पैदाहुआ, अवंताहो ॥ जरा-बुढ़ापा ॥ ठयो ठैरायो, धरों, करा, हुवा॥ जलधि-समुद्र, सागर, प्रमाण ॥ जलधर-बादल, मेघ॥ जातिसुमरण -पिछलेभवकीवातयादवाना जाम-पहर, निससमय ।। डंड-डंडा, लठ॥ जावजीव-जीनेतक॥ डकारत-डकारताहुबा, दहाड़ताहुवा ।। जावंत-जितने, 'निसकदर । डाकिनी-पिशाचजात स्त्री॥ जिनमुद्रा -जिनधर्मका चिह्न ॥ डोहै-झकोले, खदूलै ।। -निनपूना॥ जिनसेन-१ आचार्यका नाम ॥ जीरण-पुराना, गलाहुआ ॥ जीवन-जिंदगी,जल ॥ ढोक-प्रणाम, झुकना, डंडोत ॥ -बड़ाबेटा ॥ मै -बीत, त फतह ॥ जय बोग-ठीक, मुबासि ।। तंबोल-पान, गर्भवती वा जच्चा स्त्री के पान जीजन-१ प्रयाण का नाम, जो ४ कोस मेवा आदि सामग्री भेजना ॥ का होता है। तगर- वृक्ष विशेष ॥ नोट-जोड़ा॥ तट-नदीका किनारा॥ जोतपी-१ प्रशारक देवतः॥ तनि-नदी। तलखिन-तिसहीकाल || भ ततकाल उसीसमय ॥ तत्व-मूल, सार, प्रकृति ॥ झंझावाय-क्रूरपवन, आंधी ॥ तथा-तैसा, तनक, थोड़ा। जिनयज्ञ- ढ जेठा . .

शब्दार्थकोप । तम-अंधेरा॥ नांय-जल, पानी॥ तमाल-वृक्षविशेष | तोरण-फूलमाना, संदरतात ॥ तया-पानीहयो, तगयो। तरंग-लहर, मौन ॥ थ तरंगनि-नदी। तरंड-नौका, किशती ॥ थपति-पान, मेमार ॥ तरले-चंचलता। थयो-हुयो । तांडव-तृत्तविशेप ।। यपिये-म्यापन कारये ।। ताम-तिससमय, तिसकाल ॥ थल-तला धरती ॥ तान-तीरखंचे, निगाह जोड़ें। थान-श्यान॥ ताल ताइन,खटतालबाना,पंखा,तालाब थावर--नगमका विरोधी गब्द, १ ट्रानीय धाप-चापकर, बहार तार तालीस-अमलतासवृक्ष थिति-आयू, गिति, गय ।। तात-पिता, वाप ॥ मिनिपात-कमाता पिति चंद तिरना ।। तिमर-अंधरा॥ श्रुति-स्तुनि ॥ तिय-खी। थूल-स्थल, भारी, १ प्रकार कानगर ।। तियवेद-त्रियाचरित्र, त्रियहच्छा ।। तिर्यकर-पवित्र,पाक ॥ तिलक-टीका, शोभा, विवर्ण ॥ तपा-प्यास।। दंडापुर- नगर का नाम ॥ तीद-वृक्षविशेप ॥ दंगनिमीयुगणना शामिन्द । तीनकाल-प्रातः१ मध्याह २ संध्या३॥ दावित-द्रव्य संबंधि ।। तुंग-उंचा।। दरमत-दंपत तुंडा-चोंच, मुख ॥ दर्पन-मुंह देपने का शीशा ॥ तुचा-खाल,चमड़ा। दशन-देपना, निश्चय करना । तुरंग-घोड़ा। दल-पत्ता, सेना, फोन ॥ तुरिय-चौथा ४ ॥ दनन-दलना, तोड़ना। तुम-दिलका ।। दसन-दांत ॥ दह-गहराय, पानी का भवर ।। तूंत्री-१ वेलका फल मसिद्ध है। दरे-नले ॥ दाम-माला ॥ तेला-३ दिनका व्रत ॥ दापनि विनती ॥ तैमस-1 प्रकारका शरीर ।। दार-विवार, चौ॥ द . तुसार-पाला, वर्फ ॥ तूत-वृक्ष विशेष २४८ शब्दार्थ कोप। दिननाही सूर्य, भानु । दारुण-क्रूर, कठोर ॥ देवभाषा-संस्कृतयोली ॥ दाह-तप, गरमी, आग, नलना ।। देशना-उपदेश ॥ | दिगविजय-चारौंदेिश नीतना ।। दैत्य-असुर, राक्षस ॥ दिग्गज-पहाड़ विशेष ॥ दो-आग ॥ दिगपाल-देवता विशेष ।। दौर-दौड़, इद ॥ दिगंबर मुद्रा-नग्न चिन्ह ॥ दृष्टांत-मिमाल॥ दिठ-नजर, निगाह ॥ द्रौणामुख-समुद्र के वीचकी खुशकी की दिही-देखी, निगाहकरी ॥ भावादी॥ दिढ-मजबूत ॥ ध. दिनपति दिवम-दिन ॥ धन-डंगर, ढोर, रुपया, पैसा ।। दिवाकर सूर्य, भानु ॥ धनंजय-अग्नि ।। दिवायर धनद । दिशा-तरफ, भोर, सिम्त ।। कोपाध्यक्ष, खजानची ।। धनपति दिशाकुमारी देवी विशेष ॥ धनुष-कमान, आयुध । दिशचार-चौपड़, ४ दिशा ॥ धग-धरती । रिष्ट-जनर, निगाह ॥ धरिंद्र-भवनवासी देवताओं का इंद्र ।। दिक्षा-गुरूमंत्र, उपदेश, क्रिया विशेष ॥ धात-सोना आदि ७ धातु हैं ।। दीन-क, महुताज ॥ धाम-स्थान, घर, किरण || दीप-दिवला, चिराग, बहुत बड़ा मुल्क॥ धाय-दूध पिलानेवाली स्त्री ।। दुकूल-रेशमी कपड़ा, महीन वस्त्र ।। घायधाय-दौड़दौड़। दुठ-दुष्ट, क्रूर ॥ धिक-फिटकार॥ दुज-ब्राह्मण, विम॥ धीर-धीमान॥ धुजा-मंडी, पताका ॥ दुद्धर-कठिन, कठोर ॥ धुनि-शब्द, घार, नदी ।।. दुवार-दरवामा, पौल ॥ धुर-हद, किनारा॥ दुर्जन-खोटा आदमी ।। धुलिसाल-~-मकान विशेष ॥ दुर्भिक्ष-अकाल, कहत ॥.. धौल-सफेद,श्वेत ॥ दुर्ग-गढ़, किला ॥ ध्रुव-तारा.विशेष ।। दुरस-दुरस्त ठीक, योग्य ॥ | दुरी-छिपी ॥ न दून-घास विशेष ॥ नंदन--पुत्र, वेटा ॥ . दुति-चमक दमक ॥ :

शब्दार्यकोप। , नपुंसको हिजड़ा, नामर्द । नरव राना नंदीमर-आठचंदीप का नाम ॥ निठा-पटोर ॥ नगपहाड.मणि ॥ नित्य-गवि ।। नतिनम्रता, झुकना। निदान-निश्चय, तस्योर।। निघान-पान, गर॥ नपुंस्क निधि-कोप, निधि ९ है। नियंप-पटक ॥ निपत कारण नरंश नियोगकाम, शगत ॥ नव-नया, ९ का अंक। निर्धार-निलय ॥ नरिंद्र-राना, १ छंदका नाम ।। निरत-नाच ॥ नसा-नस, रंग॥ नए--राना॥ नाग-हाथी, सर्प। निम्मान-रनादुवा ॥ नागर-उत्तम, भला, चतुर॥ निरंतर-लगातार ॥ नाटक--नाम तमाशा ।। निरवर-दरहो। नाथ स्वामी, मालिक ।। निरमाया-बनायो, स्नो॥ नाद---राब्द, वाना विशेष ।। निरा-कमाका गिरना ।। नाभगिर--पर्यत विशेष मो ४ हैं। निराम देखकर नाभि-पादनाय स्वामी के पिताका नाम ।। निरोध--रोकथाम नायक-सरदार ।। निर्वह-नाले, निवरे । नास्ति-नहीं है। निव-॥ नास्तिकमत-निसमत में पुण्य पाप न मा । निवास-यान॥ ना नाय॥ निवेद-प्रार्थना ॥ नाप-तोड़े, टुकड़े कर ॥ निहोर-कपा, उपकार ॥ नार-नाथ, स्वामी, प्राकृत शब्द।। निशा-~-रात्री॥ नाहर-सिंह, शेर॥ निंदा-मनम्मन, बुराई॥ निशनाय -गंद्रमा॥ निशान-बानाविषय॥ नीतच कानून ॥ नंदवरध ) निकुंज- रमणीक स्थान ॥ नीननिपुन-नानगाना पनि । नीरज-कमन॥ निकट-समीप, ननदीक ॥ निकाज-निरर्थक, निष्फल ॥ ननिनिपर-ना निकेत--पर ।। क-गोदामा॥ निग्रा-दंड, सना, जुरमाना ।। नर-गार ॥ निध-शुद्धमना, साझदिल ॥ नंबर-नागिर नंदरिरथ अानंद रही, बढ़ो॥

२५० शब्दार्थकोष। नैर-नगर ॥ पथ रस्ता, गैल || न्यात-पंक्ति,पांति ॥ पंथ न्याय-तुल्य, बराबर, भलीरीत ॥ पथिक-बटेऊ, मुसाफिर ॥ न्होंनपीठ-~-चौकी, पटड़ा ॥ पद-पैर, दरजा, अधिकार ॥: पदार्थ-वस्तु चीज ॥ प पदमराज-हीरा, चुन्नी, लालरंग कमल ॥ पन्नग-सर्प। पंक-कीचड़, मारा। पय-दूध, जल ।।. पंचकरण-पांचइंद्री ॥ पयान- चलना, यात्रा, कुंच ॥ पंचमज्ञान-केवल ज्ञान ॥ पयामै फैले । | पंचलघुअक्षर-अ-इ-उ-ऋ-ल॥ पयूप-अमृत ।।. पंचागनि-चार अग्निचारोंओरकी पत्रिभी परयन-परलोग, गैरआदमी।। सूरजकी गरमी सिरपर उठाते हैं, या अं-परणत-हालत, अवस्था । गीठी आगकी सिरपर धरते हैं । परनी-व्याही ।। पंचानन शिंह, शेर ॥ परपंच-छल,द्रोह, छलया ॥ पंचालदेश-पंजावदेश ॥ पर्वत-पहाड़। पंचास्तिकाय-काल रहित पटदृव्य की परब-पुन्नका दिन । पंचास्तिकाय संज्ञा है ।। परम-उतम, श्रेष्ठ, बड़ा ॥ पंति--पंक्ति, पांति ॥ परमदितिमार्ग-चलता रस्ता,साफरस्ता ।। पगै-मिलै ॥ परमाद-पालस, सुस्ती ॥ पट-वस्त्र, किवाड़ | परधान-बड़ा, महान ।। पटतर-उपमा, मिसाल ॥ परमारथ-बड़ा प्रयोजन ॥ पटराणी-प्रधानराणी। परमित-अन्दाजा, अटकल ।। पटल-परदा, श्रोट | परमेठ-परमइष्ट, अतिप्यारा॥ पटह-ढोलवाजा ॥. पर्याय-अवस्था, अलटपलट ॥ पठायो-भेनो॥ -पूरेभाणकी प्राप्ति।। पठनपाठन-पढ़ना पढ़ाना । परवीन-चतुर ॥ पडगाहे-पूज, आदरकरा ॥ परशंसा-बड़ाई॥ पणच--कमानका चिल्ला॥ परसै- -छूवै ॥ पतंग-वृक्षविशेष प्रसिद्ध है जिसका रंग पगग-रज, धूल ।। बनता है। परिहरै-छोड़े ॥ पनि-स्वामी, मालिक खाविंद ॥ परिखा-खाई, खंदक ॥ पन्यारा-प्रतीत, विश्वास ॥ परिगृह-सामान, असत्रात्र-॥ . . पर्याप्त -- .

शन्दायकोग। wor0amvaad प्रतिज्ञा परिपाक-फल,मतीना ॥ पारियान-हाभंगा ॥ परिवार-कुटर, कुनबा ॥ पारन-पार, गुल परिसह-दुःख, तकलीफ ॥ पाट-.प्रकारका मन ।। परोन-पाठपीछे, परदे ॥ प्रकार-किन्ना, गद ॥ पल-मास, पलक, कालकी ? गिनती ॥ प्रासुक-उत्तम,शुद्ध ।। पसत्य-प्रशस्त, पला, सुंदर ।। प्राण-जीव ॥ पल्लव--पत्ता, पत्र | पिंड-गोला ॥ पक्ष-पखवारा १५ दिन । पिंगल-इंदविद्या ॥ पसाय-फलना ॥ पिशुन-दुष्ट, कटोर॥ पहुमी-प्रथ्वी, धरती ॥ मित्रा-निरमलगुद्धि, सरस्वती ॥ पैर्य -अलटपलट ॥ पीठका-बासी ॥ प्रति-सनमुख, हरएक, नकल ।। पल्लू वृक्षविंग ॥ पहिर-पिनाका घा, पानका घर ।। प्रणाम-नमस्कार। प्रमुख-मुखिया, श्रादिलकर ॥ पीची-मोरपंच, मोहनी. प्रकृति-स्वभाव, आदत, वाण ।। पीर-दुख, दर्द ।। -नम, आपडी। पुंग- मुपाग वृक्ष ।। प्रभाव-यश, प्रताप ॥ पुगण-तिकीकी कथाका शारत्र ।। भभ-प्रकाश॥ पुनीत-निर्मल, उत्तम ॥ मदछना-प्रकम्मा ॥ पुर-नगर, यती॥ प्रयंग-प्यारा, मुंदर ॥ पुच-पूर्व दिशा, पहागभग ॥ प्रभा-चमक। पुन्नयोग-धर्मका समय ॥ प्रमोद-आनंद ॥ पुनि-फिर ॥ प्रथमअवतार -आदिनाथ स्वामी ॥ पुग्गल-पुल, परगानु.॥ पाखर-वृक्ष विशेप ॥ पुरंदर-इंद्र॥ पायकसंघ-प्यादोंकी सेना ॥ पुरानपुरुष-महापुरुष । पुजपद-पूननयोग पुरुष ॥ पपान--पत्थर ॥ पुर्व-प्रथम, पहन्ना ॥ पावक-श्राग ॥ पेर-पंदन ॥ पाल -टौल. हद ॥ भेत-मनमानि ॥ पावस--वर्षा,ऋतु ॥ पं-पर,लेकिन. परंतु ॥ पात्र-बरतन ॥ पोन-जहान, नद्राना पातक-पाप। पान-पानी. मुर, भागार पारना-तनोलका भोजन । पाप-पानन . पादुका-खड़ाऊँ॥

२५२ शब्दार्थकोप। पोमह व्रत ॥ पौर-दरवाजा ।। फ सर्प, नाग ॥ फणि फणी फरस-स्पर्श ॥ फुलिंग-चिंगारी, पतंगा ॥ फुनि-फिर, पुनि ।। ब बंदीजन कैदी ॥ | बंद-नमस्कार करूं ।।. बंधव-भाई ।। बर्दमान-महावीरस्वमी ।। चल-सामर्थ,ताकत ।। वनदेव-बलभद्र ॥ बलिन्याकार-गोल || वलि-बलबान || यसन-बस्त्र,कपड़ा। वमा-चरबी॥ वसु-पाठ॥ वहन-चलन ॥ बाघ-सिंह,शंगवरा ॥ वाचाल-बालनवाला ॥ बाज-घोड़ा। वाज़ारनी-वश्या,कसबी ॥ चाभित्र-बाजा॥ वाह-रोक,फसील॥ वाणीगोचर वाणी में आनयोग ।। पातसल्य-गौ,बच्चेजैसीप्रतिपालना ॥ वाद-निष्फल चरचा,वृथाशब्द ।। वान-स्वभाव,आदत ॥ वापी-वाबड़ी ॥ चामा-पार्श्वनाथ स्वामांकीमाताका नाम ।। वाय-पवन हवा ॥ चायक-वचन, वायुकुमार-देवताविशेष ॥ कारण-हाथी ॥ बारिध-समुद्र ॥ पारिज-कमल ॥ बाल-बालक,बच्चा ॥ वासर-दिन ॥ बासुदेव-नारायन ॥ वाहन-सवारी ।। वाह्य-बाहर ॥ बाल ॥ वक्रता-टेढ़ापन,वांकापन।। बज्र-बिजली, हीरामणि ।। - वज्रघोष-विजलीकी कड़क ।। वदन-मुख ॥ वध मारना ॥ बधिर-बहरा ॥ वधू-स्त्री,औरत ॥ बनपालक-माली,बागवाना || बनस्पति-वृक्षादिक,घासफूस ॥ बमो-उलटदियो॥ पय-समय,उमर ॥ बयाल-पवन॥ घरग-समूह ।। परती-परतनेवाले,रहनेवाले ॥ परयां-बार,समय वक्त॥ बर्गना-पिंड,समूह, मजमूआ॥

शब्दारकोप। २५४ - - वैन--चन, बोल ॥ चित्र-प्रतिमा, मूर्ति ॥ भानाय ॥ पिलान-नांचनाति विशेष ॥ भाय-मांति, समाल, पाई॥ विष्ट-वर्षा ॥ भाल-माया, पशानी॥ वीजना-पंखा ॥ भारना-नी॥ बीना-बाना विशेष ।। भारती सरस्वती, बोली। बुध-पंडित ।। भावना-नितयन करना। बे-दो,२॥ भास घेग-जलदी, जल्दी ॥ भामुर नमक दमक, प्रकार ॥ विगवती-नदी ॥ भ्राता-माई ॥ वेद-धेरैहुए । भिन्न-टुकड़े टुकड़े ॥ बदन- भित्ताभाजन-कमंदन ॥ वेदना दुःख, व्याकुलता ॥ भीत-भयान ॥ वंदनीकर्म कमों में से १ कर्म का नाम। भुना-बाजू.टंन ।। भुजंगम-भा॥ सानर-अग्नि ॥ भूताचल-पर्वत विरो॥ योधसान॥ भूपाल-राना ।। बोधो-समझायो, उपदेश दियो । भूमिगोचरी-पृथ्वीर पलनवाल ॥ भ भूर-वड़ा, बहुत ॥ भंग-टूटना ॥ भूपण-गहना, नेवर ॥ भंजो-काटो॥ भेट-उपहार, नना, मिन्टन भर में। भट-जोधा, सूरवीर ॥ भेद-यूट ने अमे, दिलकी बात ।। भण-कहने अर्थ में.॥ भेरिवाना विशेष ॥ भव-मेद ॥ भद्र-भगवान ॥ भो-संमार, नन्म,संधन अर्थ में । भांग-जो १ वार भंगानाय ॥ भार-पति, स्वामी.।। भव-संसार, जन्म ॥ भंगार-पूनासी कटोग। भ्रंगीजानवर विशेष सीट निर। भरम-भ्रम, संदेह ।। भवि-मन्य जीव, सीमने वाला नीव ।। म भक्षण-भानन करना॥ भ्रमर-भवरा जानवर ।। भाग-हिस्सा, नसीत्रा ।। मंगल-फल्यान, आनंद मंडए-माया बागान ॥ पात्र, वरतन ॥ भाजन) मंदल-पेमा, गिरा भद्रमाल--वन विशेष ॥

२५४ शब्दार्थकोष। . मंडली-सभा, गोष्ट ॥ माचन-घुमेर ॥ मंत्री-सलाहकार ॥ माणक-चुनी।। मैंभार-बिलाव।। मातंग-हाथी, गज॥ मकरंद-फूलका रस ॥ मानसीक मनसही आहार करना। मग्र देश विशप ॥ मानखोत्र-१पहाड़ का नाम । मझार-~-मध्य अर्थ में ॥ माया-फरेब, धोका, मकर ।। मणिरैन- R-रल विशेष ॥ मार-कामदेव, मत्त-मस्त ॥ मारणांत-मरनेका समय ॥ मति-बुद्धि, अकल ॥ मार्गप्रभावन-धर्म मार्गकी प्रभावना ।। मद-धमंड- हाथोकेकपोलकाचुवाव मार्गहार-मुसाफिर, रस्तके हारेहुयं ।।. मदिरा- शराब.. मारुत-देवजाति ।। मदन कामदेव ।। मारू । मनमथ) वागड़ का देश, निरजल देश॥ मारूथल मनसाहार-मन से आहार करना । मालती-पुष्प विशेष ।। मनोग-सुन्दर ॥ मालक-मालवा देश ॥ मयमंत-मस्त, शराबी ॥ मित–तोल, अंदाजा ॥ मय-मदिग मिल अस में ॥ मिथ्यात-झूठ॥ मयक-चन्द्रमा ।। मिश्र-मिलाहुवा ।। मस्तक-माथा, ऐशानी ॥ मीन-मछली, ॥ मसान-मरघट, छला । मुकर-दर्पन, आइना, शीशा॥ मसि-लिखने की स्याही ।। मुक्ताफल मोती, ॥ महंत-बड़ा,प्रधान पुरुष ।। मुंड-खोपरी, मूंडकर ॥ महिमा-बड़ाई, ॥ मुद्रा-~-अंगूठी, छाप, चिन्ह ॥ मंदार-वृक्ष विशेष स्वर्ग में है। मुद्रित-छपाहुवा ॥ मधुप-भवरा जानवर ॥ मुरज-बाजा विशेष मनपर्यज्ञान का नाम देपो ज्ञानशब्द ।। मुष्ट---मुट्ठी, मुक्का ॥ मरम-हदा ॥ मुसलोपम-मसलकीहै उपमा जिसकी ॥ मचकंद-पुष्प विशेष ॥ भरुवा-वृक्ष विशप ॥ मूल-जड़ ॥ महुवा-दृक्ष विशेष ॥ मूस-लूटै ॥ मदगज-मस्त हाथी ।। रू-पहाड़। मघवा-इंद्र ॥ मेषकुमार देवजाति ॥ महीधर-पहाड़, पर्वत ॥ मैथुन-स्त्री भोग, रति॥ माहर-मरहटा देश ॥

शब्दार्यकोष। मोचनी-दूर करनेवाली उखड़नेवाली ॥रंच-थोड़ा ॥ मोप-मोक्ष, मुक्ति । रक-लालरंग। मोपा-पोतिया पुष्य ॥ रज-धूल, मिट्टी ।। मोह-ममत, चाहत, आकुलता || . रजन-चांदी॥ मोहनी-८ कर्म में से १ कर्मका नाम ॥ रजनी-रात्री ।। मौलसरी-वृन विशेष ॥ रजनीपति-चंद्रमा ॥ मृगछाला-हिरनकी खाल ।। रण-युद्ध, लड़ाई। मृगांक-चंद्रमा ॥ रत्नपरा-रत्नमई घरती॥ मृगेश्वर-सिंह, शेर।। रत्नकुछ-रत्नकोप ॥ मृतक-मराहुवा ॥ रत्नाकर-रत्नग्रह ।। मृद-मुलायम, कोमल, नर्म ॥ रति-कामदेव की स्त्री, रचने अर्थ में । मृदंग-बाना विशेष ॥ रतिपति-कामदेव ।। रतिवंती-रतियोग श्री ॥ य रती-भाग, नसीव ॥ रमा-लक्ष्मी यथा-जैसे अर्थ में। रमणीय-मुंदर, रमणे योग । ययार्थ-ठीक, जैसका तैसा॥ स्यणायर-समुद्र॥ यमकगिर–पहाड़ विशेष जो ४ हैं ।। पश-कीर्ति ॥ रवाना) यपदेव-यक्षदेव ॥ रवि-सूर्य ।। यज्ञपुरुष-उत्तम पुरुष । रस-धातु, स्वाद ॥ यज्ञ-पूना ।। रसाल-रसीला, श्राम ॥ याचक-भिखारी, मंगता॥ राग-ममत, प्यार ॥ युगलया-मोग भूमिया ॥ राजग्रिही-१ नगरका नाम || योग-योग्य, लायक ।। राजपत्र-परवाना, फरमान ।। योतिषी-देवता जाति ।। राज-शोभादे ॥ योवन जवानी ॥ राते-लालहुये ॥ रानो-बड़ो॥ राप-आत्मा, जीय ॥ रंक-दीन, महताज ॥ राय-राजा॥ रंगधरा रावण-लंकाके रानाका नाम । रंगभूमि नाचघर तमाशकास्थान, अखाड़ा, रास-समूह, टेर। रंगमही) रिजु-विमान का नाम ॥ रवन्न सोहना, सुंदर ॥ 'र २५६ शब्दार्यकोप। रिपु-वैरी, शत्रु, दुश्मन ।। लीन वाहुवा, महव ।। रिस-कोप, गुस्सा लीला-पतिसंग स्त्रियोंका खेलकूद ।। रीति-चलन, व्यवहार ।। लीलावती-खिलारस्त्री,हंसमुख स्त्री। रुद्र-महादेव, नरकगामी पुरुष ॥ लुब्ध-लोभी, लालची॥ रुद्रध्यान-खाटाध्यान ॥ लेश-थोड़ा, जरा ॥ रुधिर-लहू, खून ॥ लेश्या-योग कपाय सहित प्रणामों की रूपाचल-पहाड़ का नाम ।। अवस्था । रेण-बूर, बुरादा, चूर्णं ॥ लोकोत्तर-लोकसे वाहर ।। रोम-रूंगटे, वाल ।। लोकनाड़ी-नाली ॥ रोमांचित-आनंद में रूगटे खड़ाहोना ॥ लोकान्तिक-स्वर्गस्थान विशेष ।। रोस-क्रोध, गुम्सा ॥. लोचन-आंख, लोचना, उखेड़ना ।। रोहिणि-नक्षत्र, तारा, स्त्री विशेष ।। लोय-कोक, लोग ।। लोयन- -आंख ॥ ल लोहित-लाल, कठोर ॥ लघुछोटा ॥ लता-बेल ॥ लंघ–लंघना, उलंघना ॥ व लंबमान-लटकते हुये ॥ लगार-पांति, कतार, थोडासामी ।। वंड) वाले अर्थ में, यथा वलवंड मलत लधू वंत, वलवाला ॥ वत्सल-प्यार, प्रीत ॥ लॅपटी-लबाड़, झूठा। वरी-व्याही ॥ लवधि-प्राप्ति ॥ वलि-सदका ॥ ललित-सुंदर, प्यारा ॥ वहिरंग-वाहरके ॥ लबलेश -णेड़ा, जरासा ॥ वहिरलापिका-१ प्रकारकी पहेली !! लसैं-शोभादें । वाट-रस्ता। लहै-देखे, पावै ॥ वाल-पवन, हवा ॥ लक्ष्मी-स्त्री, देवीकानाम जिसका कमल थापिका-बावड़ी। में वासा है, धन, दौलत, मोक्ष॥ व्याल- -सर्प, हाथी ॥ लक्षित-लक्षणवान ।। व्याधि-उपद्रव ।। लाम-फायदा ॥ व्याकर्ण-वाक्यवा' शब्दका स्पष्ट करने लार-साथ, हमराह, प्यार ॥ वालाशास्त्र॥ लावंती-सुंदरी, नमकीन स्त्री रूपवतीस्त्री. विकसना-खिलना ॥

शब्दार्थकोप । -- ॥ - , विकट-कठोर, खो॥ विश्वन-गुचंद होना, जुनाहगना विक्रया-अनेक शरीर धारण करना ॥ विरद-कीति, यश, प्रशE !! विगत-दूर करने वाली ॥ विललाय विख्यात प्रत्यक्ष, फैला॥ विलाप दुमल याद कर रोना विगू-लोकै, बाँधे ।। विवहन-अाकुलहाना, वकारहाना ॥ विघ्न-उपद्रव, विधन ॥ विशेष-बास, बहन ॥ विज-फतह ।। विश्व-पूर्ण, संगार ॥ विजन-छोटेचिन्हतिल आदि। विश्वाश-यान, निश्चय ।। विधा-दुःप, पीड़ा ॥ विग-जहर ॥ वितरदेव-१ नातिक देव ॥ विश्वर-सप ॥ विजयारध-पर्वत विशेष ॥ विषम--ऋर, कठोर ॥ विदश-दिशा ॥ विपनी-विपन मेनेवाला। विदेह-छेत्र विशेष ॥ विमल -भूळ, कोई विधुत-विनळी ॥ विसमय-प्राचनमान होना ।। विद्रुप- लालमूंगा ॥ विस्तर-फैलाव ॥ विध्य-विधाहुवा ।। विहसाय-हंसना ॥ वित्य-धन ॥ विहन-मारने वाला ॥ विध्वंश-नासकरै ।। विद्यार-चलना ॥ विधान-चलन, व्यवहार ।। विहरमान-चलते हुए ॥ विनय-अदव, बड़ाई ॥ चीथी-गली, कूवा ॥ विपीत-उलटी ।। वीरज-पराक्रम || विपाक-फल, नतीजा।। वृज-गांगला॥ वृन्द-समूह, झंड। विष-बासन॥ उपय-नार॥ विध-प्रतिमा, मूर्ति ॥ वृषभसेन-आदनाथ स्वामी के प्रधान गाय विविध-नाना भकार ॥ घर का नाम ।। विभंगा-मिथ्याज्ञान ॥ विभूति-संपदा ॥ वृपभाचल-पाद विशेष ॥ विमला-पार्श्वनाथस्वामी की पालकी का विताल-यन, प्रेतगाती ।। नाम। वेगवनी-नदी ।। विमुख-विरुघ, फिराहुवा ।। वैदुश्य-१प्रकार की मसी नारंग। निराध-मार, हतै, विरोध वैरभाव ॥ वैतरनी-नर्क की नही। विरतंत--किस्सा, कहानी, कहना ।। वरुप-शरण, साप, विपीन विपुल-ऊँचा ॥ वृपय-बैल !

२५८ शब्दार्थकोष । व्योम-आकाश ॥ श्रेणी-सीढ़ी, जीना ।। शैल–पहाड़ । श्रोणित-लहू॥ . . शत्रु-बैरी॥ ८ ष शक्ति-सामर्थता, बल ॥ शम्बर-दैत्य ॥ पंढ-तोड़े। शशि-चन्द्रमा ॥ पंदरूप-परमाणु रूप ॥ शक-इन्द्र॥ शची-इंद्राणी ॥ पंद-परमानुका समूह ॥ पग-आकाशगामी, पक्षी, विद्याधर ।। शल्प-फांस, कांटा। शलाका-महान पुरुष जो ६३ हैं॥ पांडा--तलवार, शास्त्र ।। पीर दूध ॥ पीणो 'शंसनो-प्रशसित, भला, सुन्दर ।। -क्षीणो॥ पैकाल-कान्न ॥ श्रवण-कान ।। अ-बहै ॥ शाकिनि-पिशाच विशपे, यक्षणी ॥ स शिथल-सुस्त, कमज़ोर ॥ शिवर-चोटी ॥ संकेत-इशारा, संक्षेपं ॥ शिव-मोक्ष, कल्याण ॥ संपबामा विशेष ॥ शिशु-बालक, बच्चा संख्या-गिणती।। -शिल्पी-राज, मेमार, संगतराश ।। संग्राम-लड़ाई ।। शिल्पाला-मेमारी विद्या ॥ संगी-साथी॥ शिला-पत्थर की चंटान ।। संगीत-राग, गीत ॥ शील-उत्तमस्वभाव, परस्त्रीभोग त्याग । संघ-ग्रोह, फिरका ।। श्रीवच्छ-१ जिन्ह का नाम जो महान पु संघाती-साथी ।। रुषों की छातीपर होता है। संघार-मारना ।। श्रीग्रा-कोष, खज़ाना । संचित-इकट्ठे हुवे ॥ श्रीवंत-लक्ष्मीमान, धनवान ॥ संजम-व्रत, इंद्रीदमन ॥ श्रीक्ष-कल्पवृक्ष ॥ मंठान-सूरत, मूर्ति ।। शुचि-निर्मल, पाक, साफ़ ॥ संपा-विजली ॥ शुक्ल-सफेद. शुक्लध्यान ।। संवतसर-वर्ष, साल | अति-शास्त्र, धर्मशास्त्र ॥ संपजे- प्राप्तिहो, मिलै ॥ श्रेय-आनंद, कल्यान । संगलेशण-मिलने अर्थ में ॥ . . . - शब्दार्थकोप। संबर-पातेहुए कमाँ की रोक ॥ सरल-सीधा ॥ संपति-~-दौलत, हसमत । सरम-प्रति, ज्यादा ॥ संक्षेप-कम करके। सरिता-नदी। सकंटक-कांटो वाला ॥ सन्लकी-वृन विशेष ॥ सकटाकृत-गाड़ी के आकार ।। सरोग-कमल। सखा-मित्र, दोस्त ॥ सलिल जल, पानी ॥ सघन -घिनके, मिले मिले। मसक-सापश, मूस ॥ सची-इंद्राणी ॥ सहज-स्वभाव सठ-मूर्ख ॥ सहस-हजार॥ सदाफल-वृत विशेष सहोदर-छोराभाई ॥ सनतकुमार-देवनाती ॥ सह-ठीक,पुनासिब ॥ सन्यास-दिगंबर धर्म ॥ स्वमेव-आपही आप ॥ समषेत-शुद्ध चित॥ स्वजन-भपने लांग॥ समप्प-इकट्ठा कर, जमाकरे॥ स्वयंगसिद्ध-आपही श्राप बना ॥ संतून-बराबर ।। साख-गवाही॥ समाज-गोट, समा॥ सागर-समुद्र, कालपी गिनती का नाम समान वरावर, तुल्य ॥ सांधणी-घिणकी, मिलीजुली ॥ समाधान--सबूत ॥ साज-सामान, बाजा॥ समाप-धर।। सातामुप, भानंद ॥ समास-मिलाप, नोड़॥ सायर-सागर, समुद्र" समिति-जैन शास्त्र में ५ ॥ सार---उत्तम, मूल॥ समीप-पास, नजदीक ॥ सारदा-सरस्वती ।। समुदाय-समूह, मनमुआ॥ सारस्वत-व्याकरण के १ अन्धका नाम। समेदाचल- -समेद सिखर का पहाड़॥ सार्थवाही-व्यापारियों के समूह का प्रधान समोसरण -चैरभाव को छोड़कर निस पुरुप ।। स्थान में नीव बैठते हैं अर्थात् तिर्थ करों सावधान-चीकना, होशियार ।। सावध-पापसंयुक्त काम ॥ सयन- सासन--- शाम, माना ॥ सयाल-गीदः पशु॥ सासते-सदीव॥ सयोग-योगसंयुक्त केवली ॥ साससास-स्वांन, दम ॥ सरवर -तालाव, ताल॥ स्वातनल-कन्याफे मरन में जो भी स्वान-ककर, पु.चा ॥ स्पाद कचिन, कहना ॥ की सभा ॥ -सोना॥ MA सर तीर, घाण ॥ शर 'शब्दार्थकोष । . ho स्थाल-गीदड़-पशु॥ सूल-कांटा, दर्द ॥ सिकताथल-रेतली धरती ।। सुप्रतीक-ठौणा, सथिया, मला ।। सिथल-आलसी॥ सूचक-विवर्ण,तफसील ॥ सिंघाटक-शरकी अटकाने वाली ।। सूर-सूरवीर, योधा ॥ सिली-भवरा नंतु ॥ सरि-आचारियोंकी १ पदवी ।। सीरी-साझी, शरीक ।। सेना-फौज ॥ सीता २नदियों के नाम । सेनी-मनवाला जीव ॥ सीतो सैनासन परपसार चितसोना ।। मीस सोम-शीतल, चंद्रमा ॥ शीस सिर, मूड़, कपाल । सोपान-सीदी, नीना ॥ सु-उत्तम अर्थ में। सोहना-सौहननावृक्ष ॥ मुकमाल-कोमल, मुलायम ॥ सुजान-भला, अच्छा आदमी ॥ मुछंद-मनमौजी, आज़ाद ।। सुत-बेटा, पुत्र । सुदर्शन-पहाड़ विशेष, चक्र विशेष ॥ हंस-जीव, पक्षी विशेष ।। सुधारस-अमृत ॥ इट-जिद ।। सुपथ--उत्तम पंथ ॥ ह-हाट, दुकान ॥ सुंडाल-हाथी ॥ हस्ती-हाथी ।। सुन्य-बिंदु, खाली, योथ ॥ हनहन-मारमार ॥ हरि-इंद्र ॥ हा-यशब्द शोककैस्थान में बोलानाता है। सुरतरु-कल्पवृक्ष ॥ हाटक-सोना धातु ॥ सुरभि-सुगंधित ।। हिंगोट-वृक्षविशेष ॥ सुरम्य-उत्तम, भला, १ देशका नाम ॥ हिम-सरदी । सुभ्र-नरक ॥ हिमगिर-हिमालापहाड़ ॥ सुलभ-आसान, महा।। हिंसानन्दी-हिंसामैं आनंदमाननेवाला ।। सुमन-फूल, पुष्पा हीस-वृक्षविशेष ॥ सुहाग---सुभाग्य ॥ हुँडक-वेडौल शरीर ।। मुहान-मला, उत्तम ।। हुलास-आनंद ॥ सुदंसनो-सुदर्शनमरू ॥ इंद-तुच्छ, नीच ॥ स्वयंभू-पार्श्वनाथ स्वामीके गणधरकानाम हेत—कारण, सवव ।। सुमित-आकालका विरोधीशब्द्र,समा ॥ | हेम–सोनाधातु ॥ सुमेर शिषरजीका पहाड़ ॥ सुमेद। .

शब्दार्थकोप। मिलाकममाप्ति-१ ग्रंथानम ॥ होम-अग्निमें धुतदाल मंत्र पद स्यान शुद्ध विस-२ इंट्रीनीव ।। होराहोर-उत्तममणि ॥ ज्ञ ज्ञान-जनशानमें ५ है, मनि ? श्रुति र अववि मनाव्य १ केवल ॥ त्रास-दुप, तकलीफ ।। इनि भाषापार्श्वपुराणशब्दार्थकोप संपूर्णम् ॥ शुद्धाशुद्धपत्र श्रीपार्थपुराणमापाछंदवन SORO गुद RA पृष्ठ पंक्तिः अशुद्ध पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध सौतन 1 १६ पंचानन . . ५ /१३/सिद्ध सिद्धि ८२१४'टर ७/१७ लोकान्तर लोकोत्तर ८७, २लामय ननर ११/११/शौकीन तुम्न नुग्य १३/१०/ रतिर्ममुरे रतिगुरे ९३१५ काविड़ा कांवित १९/१/नहिलोय नलीय अप २१/८/ोभवन्त शोभवन्न १०३, ?? नुरंगने नगनि ३७/१/सपणे सम १०४१ नाय विधान सन्न १०६ ४ विवभुन त्रिभुवन ४४२ कोई ११२३ पंचनन ४७/४/ताही तेत नाही ते ११४, ५ मानन्द ४८/१३/विपन विपैल १२७१४ थानन्द यानंद ४९/१/तय तपे ११:२० गमभाग याभाग ५६/१२/पाद पार १.७१०. हाने ६८/२ जोयांचत ज्यायाचन १३७ १७. मग ८१/१ वाण वाण १४०२१ मा ।

२६२ शुद्धाशुद्धपत्र। पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध पृष्ठ / पंक्ति श्रशुद्ध शुद्ध असेनी करि . १४३/१४ सामे सोम २०७२ दहेया दहो १४६ १ | कतर करत २०६/२ विरच्ये विरचे १४९/११ | समुप समुद २०९/३ रसरच्ये रमरचे १५३३ (यसा. यस्य २१०/१२ धनले तधन १६४|११ तुवा तुर २१३ ९ पम यम १६७८ सा २१६४ पाठी पांची (१८२१६ तिथि थिति २१६/७ | मोक्ष २८७६ सैनी सेनी २१६ १०पीछी पींची १८८१६ असभूत असद्धृत २१९) ३ परक परके (१६४२ असैनी २२२/१४ करी सेनी २२३, १४ प्रचीन परवीन दहे २२७१० साल सोलह २००१६ काली काई १२३४७ अछर अत्तर २०११४ श्राकाश अवकाश २३५) ११ देव २०७२ कहेया कहो इति ॥ विज्ञापन॥ जैन पुस्तकालय कृपापात्र अमनसिंह जैन सनपत नगर निवासी अपील नवीस ज़िला दिल्ली की विक्रयार्थ पुस्तक, दिल्ली कशमीरी दर्वाजे से मिलसक्ती हैं । (१) जिनमतकी पुस्तक जो आपही | टीका कर छपनाया है वडीप्रिय पुस्तक है संशोधन टीका-टिप्पण-कोषसे सुभूषित निल्द सहित !!-) विनाजिल्द ) कर अति उत्तम चिकने कागज़ पर मु (२) सज्जनाचतवल्लभ काव्य संस्कृत द्रित कराई है इन पुस्तकों में १० प्रति मुनिर्माल्लसेन प्राचार्यकृत जिसको पंडित के मूल्य आने पर १ पुस्तक उपहार में | मिहरचंद जीने पदच्छेद अन्वय संस्कृत वा दीजायगी डाकव्यय ग्राहक के ओर है- | मापा विवर्णकर प्रतिश्लोक अतिललिनभाषा (१) भूधर जैनशतक भाषा छंदबंद्धय छंदवनाय जिल्दसहित) विनाजिल्द 1) कविवर भूधरदास रचितजो शब्दार्थ सरलार्थ (३) सुक्तमुक्तवाली भाषा छंदबंद क- विज्ञापन। सहित ) विनाजिल्द ! विवर बनारसीदासनी का संस्कृत मुश्मृता ! (२) धर्मगाभ्युदय काय महाश्री वली सोमप्रभाचार्यकृन से उल्याकराहुवाशु हरिचंद्रविरचित भतिकटिनकाह मान?1) दुकरकोपसहित निल्दा विनाजिल्ला) (३) नंमडून काव्य संहन विक्रमका (४) पालोचनापाठ भाषा छंद्रवंद निस विरचिन मेघदून काव्य के जोड़े में प्रति का प्रतिदिन पाठ मनुष्य को अपनी पिछ सुंदर काव्य है कविने प्रतिशोक बदन ली खोटीकृत यादकराकर भागे को साटे । कविकालीदाम रांगत का प्रति का एक कामों से बचाता है मोल ) चरण के साथ नीन चरण अपने बनाकर (५) छहदाला माषा पंडित दौलतराम रचित रलोकपुराक्रियाह देखनयोग्यहमाना) मी लशकर गवालियर निवासी कृत निस (४) शृंगारयराज्य तरंगिणी मन को सरलार्थ टीका वा शब्दार्थ कोप से भू सोमप्रभावार्य कृत संस्कृत टीका सहित पित कर छपवाया है अवश्य देखा निल्द मोल ) (५) तत्वार्थपूत्र संस्कृत ? प्रध्याई (६)निनगुणमुक्तावली भाषा भूधरदास अर्थ प्रकाशनी पाया टीका महासुखनी कृत जीकृत कोप सहित) सहित मोल। (७) पार्श्वनाथ स्तुति अर्थात् भाषा (६) तत्वार्थमूत्र मूल मंनji) कल्याण मंदिर बनारसीदासजी कृत कोष (७) रत्नकरंटधारकाचार मंकास- मंत भवम्यामी रचित भाषा टीका महामुत्र (८) जिनदेव स्तुति अर्यात भाषा एजीकृत बड़ाउत्तम महान ग्रंथ है बड़े मां कीमाव भूधरदासनी कृत कोप सहित) टाइप में छपा है मोल ५) (९)जिनचतुराविशतका स्तोत्र अर्थान् भाषा! (८) रत्नकरंडश्रावकाचार गंम्न मर्मत भूपाल चौवीसी भूधरदासकृतकोप सहित। भद्रस्वामी राचिन वाटी भाषा टीका महिन (१०) श्रीआदिनाथ स्तति अर्थात मोल 0 भाषा भक्तामर हमराज कृत कोप सहित (९) पंचम्तोत्र मंस्कृत-मातार ! छापाटाइप मोल ) कल्याण मंदिर एकापाव शिरार '(११) प्रतिमात्रालीसी भाषा द्यानतराय भूपालचनुर्विशतका ५ माल ! कृत जिसमेंमतिमापूनन सिद्धक्रियाहमाल (१०) मत्तामर मस्तन मानगावाच्य (१२) पार्धपुराण भाषा छदबद्ध भूध रचिन मंस्कन टीका महिन वा भाषा भरला रदासजी कृत टिप्पण या कोप सहित मोल मर हेमराज कृत बारागनियों में भार -दिल्द स०) निन्द महित मान्न INS (२) जिनमतकी पुस्तक जो बंबई । (११) कन्याणमंदिर प्रस्तुन सुद आदि नगरों से विक्रयार्थ पगाई गई है। चंद्राचार्य रमित मस्तन मा महिला या (१) चंद्रप्रयुकाव्य संस्कृन नीरनंदी पापा कल्याणमंदिर कति पानी विरचित उत्कृष्ट काव्य हे १) कृत मोल 10 सहित ) विज्ञापन । [१२] कृयाकोष भाषा छंदवद्ध किशन [२९]नवकार मंत्र रंगीन 11) सादा ) सिंह कृत जिसमे ५३ क्रियाश्रावग का कथन [३०] गिरनार,शिपर,आबू-ढाईदीप- है मोल १) जिल्द सहित ।। नंबूदीप ज्ञानचौसर-नक्से रंगीन फी 12 [१३] वारहमासा संग्रह भाषा जिसमें ४ [३१] विपापहाड़ भापा मोल ) वारहमासे हैं यती नैनसुखदासनी कृत बड़े [३२] दश भारती मो०)। लालित बारहमास हैं मोल ॥ जैनियोंकी बनाई भाषा पुस्तक [१४] मुनिरान वारहमासा भाषा नो- | वा संस्कृत जो जैन पाठशालाओं में तिपरत्न जैनी जियालालनी कृत मोल ) पढाई जाती हैं और देखने योग्य हैं। [१५] प्रातसमय मंगलपाठ भाषा [१] कातंत्ररूपमाला व्याकरणनिस के जोतिषरत्न जैनी जियालालनी कृत ) सूत्र नेन आचार्य मच्छदेव रचित हैं और [१६] सुगुरुशतक भाषा जिनदास नी श्रीमति भावसेन त्रिविद्यदेव नेप्रकृया रचाहै कृत मोल ।) [१७] सम्यकज्ञानदीपका भाषा धर्मदास [२] लिंगबोध संस्कृत पन्नालालजी नी छुल्लक कृत मोल ॥ रचित जिसमें लिंगका बोधहोताहै मो02) [१८] भक्तामर संस्कृत मोल || [३ ] बालमित्रपह हलाभाग दूसरा।) [१९] जैनवृतकया छंदवद्ध मोल 10) [ ४ ] नैनप्रथमपुस्तक । दूसराभाग।) [२०] पंच मंगल भापा रूपचंदनी कृत [५] वालबोधसंधिज्ञान माल ) [६] शिक्षापत्री उल्था पंदनामा [२१]भजन संग्रह भाषा मोल-)| सादी मोल) [२२] ज्ञानानंद लावनी पहलाभाग।) [७] पुष्योपवन उल्या गुलिस्तांसादी मोल १० गोलका दूसरा ) मोल १) २३]धर्मअमृत सारभाषा मोल ॥४) [८] अंधके हाय वटेर भाषा मो००) [२४]सप्तम गुच्छक जिसमै २१ स्तोत्र [९]चमत्कारका भाषा मोल ) संस्कृत हैं १०) [१०] बनितावोधनी भाषा मो००) [२५]भाषा पूनासंग्रह मो०।।) [११] वाईसपरीसह भाषा जोगीरासा २६ शीलव्रत कथा वचनका मोल I) | सहित-jil २७] मोक्षमार्ग प्रकाश भाषा टोडरमल | | १२ ] दयानंद छलकपट दर्पन जिया इत ३) लालनी रचित मोल २) [२८] द्रव्य संग्रह संस्कृत माल ।) [ १३ ] कुसंग वृक्ष भाषा मो०) इतिशुभम् ॥

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को
* प्रार्थना
महान पुरुषों की सेवा में सविनय निवे-
दन है कि इस श्रीपार्श्वपुराण भाषा छंदवद्ध
के शुद्ध करने औ छपवाने में मैने बहुत कुछ
परिश्रम और अपना धन खर्च किया है
कोई साहब मेरी आज्ञाबिना इस पुस्तक की
प्रतिकराकर छपवाने का प्रबंध न करें और
यह भी सूचित करताहूं कि जिन पुस्तकपर
मेटी, दस्ती मुहर या हस्ताक्षर और मेरेजैन
पिस्तकालय की छाप नै होगी वह पुस्तक
चोरी की समझी जायगी.॥
कृपाभिलाषी":
अमनसिंहजैनी

Shreepashrvapuranbhashachhandbaddha

Author
Munshi, Aman Singh
Title
Shreepashrvapuranbhashachhandbaddha
File name
Shreepashrvapuranbhashachhandbaddha
Text
OCR done
Citation
1898
Published
2009/11
Publisher
Lakhanow, Jain Press
Language
Sanskrit
Pages
289
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain sahitya
DLI number
344273
Barcode
99999990234147.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
kNOLV80CsM1
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