Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shrikedar Kalp
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भूमिका। इस बातको सब भारतवासी जानते हैं कि, उत्तराखण्ड अतिपवित्र पुण्यभूमि जप तपस्याका परम स्थान है बडेबडे राजा महाराजा ज्ञानी घ्यानी इसी उत्तराखण्टमें अपनी चरमार व्यतीत करते थे यहीं नरनारायणका पुण्यमय पवित्र आश्रम है। बद्रीनारायणका निवासस्थान सहस्रों तीर्थोका एक निकेतन है जिसमें कैटासस्थान तो महादिव्य परमपुण्यदायक है यहीं भगवान भनानीपति अपने गणोसहित विराजमान होकर भक्तोंको अर्थ धर्म काम मोक्ष चारों पदार्थ प्रदान करतेहैं । यद्यपि बद्रीकेदारनाथजीका दर्शन उत्तराखण्टके यात्री करतेहैं परन्तु साधन और जप तप करनेसे साक्षात् शकरका भी दर्शन होसक्ता है और भी बडेवटे आश्चर्य यह प्राणी देखसकताहै यद्यपि योगधारणा ध्यान समाधिसे कैशसनाथ प्रसन्न होते है पर सदेह कैलासजानेका मार्ग और उसमें विनोकी निवृत्ति अन्य बातहै, यह बात इस केदारकल्प नामक महा गुप्त प्रयके द्वारा जानी जाती है। इसम कैलास जानेका मार्ग और उसके मार्गमें जो विघ्नहों उनके दूरफरनेके मत्र इम गुप्तमपस लिले हुएहैं यह प्रथ सम्म मुलभ नहीं हमको इसकी जितनी प्रति मिठी सवही महा अशुद्ध मिली जिससे अर्थकी सगति लगानी महाकदिन होगई और प्रथके शुद्धकरनेमें भी बहुत परिश्रम हुआ। इस प्रथके पाठ करनेसे और इसका अर्थ विचारनेसे बडा पुण्य होता है केलास- मार्ग स्फुटित होजाता है बवडे गुप्त और दिव्यमार्गजो कैलासमे हैं उनका भेद खुल जाताहै कैसे साधकको भगगान शकर दर्शन देतहैं किस मनसे सदेह यह पुरष कैलासपतिका दर्शन करसक्ता- है यह सब कथाएँ माहात्म्य सहित इसमें रिखीहैं। पुराण ही हमारा धर्म, पुराण ही दिव्यज्ञान, दिव्यपथ पुरावृतका प्रदर्शक है पुराणहीसे वेदार्थ प्रकाश होता है पुराणके अन्तर्गतही यह वेदारकप सर्वमाधारण अरभ्यलाभ पहुंचाने के निमित्त इमपरमोत्तम प्रथका हमने श्रीमान् महाराज बहादुरकी आज्ञासे भापाटीका किया हमको पूरी आशाहै कि यह प्रथ अवलोकन कर सनातन धर्मा पाटकोंक आनदकी सीमा न रहेगी कैलास मार्गका भेद जाननेके उत्सुक पाठकवृन्द इसको अवश्य अपलो- क्नर राम रटायेंगे और देवाधिदेव भगवान शकरकी कृपा लाभोंगे इसकी टीका करनमें यथासाध्य शुद्धताकी चेष्टा पीहे कुछ रहगई हों तो दूसरी आवृत्तिमें वहसन ठीक होजायेंगी। श्रीमान् गोराह्मण प्रतिपारक, प्रनाप्रिय, परमोदार श्री १०८ महाराजा रामनारायणसिंहजू देव बहादुर पदुमा हजारीबाग बगालको हम अनेक धन्याद देते हैं कि, जिनके नियावृद्धि और धर्म उत्साह से इस प्रथमा भापानुवाद हुआ है श्रीमान्के सद्गुणों के उलेख करनमें इतना ही बहुत है कि, इस समय श्रीमान् विद्या और धर्मवृद्धिमें पूर्ण यत्नमान हैं. इसके अनतर परमादार श्रीमान् धर्मगति गमरान श्रीकृष्णदासनीको धन्यवाद देतहैं जो कि अति प्राचीन प्रथोंका उद्धारकर जगत् उपकार पररहेहै ।। आजकल श्रीमान्की आज्ञानुमार श्रीबद्रीनारायण भक्तिरसामृत-कार्यालयके प०मदा नन्द दामी भनि तथा वैद्ययके २१४ प्रमोंकी भा० टी० करवाते हैं आशा है कि ये भी शीतही प्रकाशित होंगे। ज्वालाप्रसादमिश्र-दिनदारपुरा-मुरादाबाद । है ॥श्रीगणेशाय नमः ॥ ॐ श्रीकेदारेश्वराय नमः। अथ केदारकल्पः। भापाटीकासहितः। मङ्गलम् । ॐ द्वे भायें सिद्धिबुद्धी तदनु सहचरे ऋद्धिवृद्धी गुणान्ये द्वौ पुत्री लक्षलाभौ सकलगुणमयौ मंडपे कल्पवृक्षः ॥ गेहे यस्य प्रभुत्वं परममृतसमं मोदकाखंडमिश्रं भूयाद्भूतैर्गणेशः सकलगुणकुला- नन्दकारी कुटुंबः॥१॥ कण्ठे यस्य लसत्करालगरलं गंगा- जलं मस्तके वामांगे गिरिराजराजतनया जाया भवानी स्थिता।। नंदिस्कंदगणाधिराजसहितः श्रीविश्वनाथः प्रभुः काशीमन्दि- रसंस्थितो हि सकलं कुर्वीत नो मंगलम् ॥ २॥ ॐ भालेऽजो- दोहा-श्रीदेवी जगदम्बिका, श्रीशंकर भगवान । वंदनकर टीका लिखू, भक्तनको सुखदान ॥ सिद्धि और बुद्धि जिनकी दो भार्या हैं । ऋद्धि और वृद्धि जिनकी, दो, दासी हैं। लक्ष्य और लाभ जिनके सकलगुण मंडित दो पुत्र हैं, जो भक्तोंका मनोरथ पूर्णकरनेको कल्पवृक्ष हैं । जिनके घरमें महान अमृत है जिनको मोदक और खांड प्रियहै । वह गणेशजी अपने गणोंके साथ कटुम्बभरको मंगलकारी हों॥ १ ॥ जिनके कण्ठमें करालविप, मस्तक- पर गंगाजल, वामअंगमें हिमालयकी कन्या पार्वती भवानी भार्यारूपसे स्थित हैं। नंदि स्कंद आदि अपने गणोंसे अधिष्ठित, प्रभु श्रीविश्वनाथ काशीधाममें १ पुंस्त्वमार्यम् । - (२) फेदारकल्प। ऽथ गले करालगरलं गंगाजलं मस्तके वामांगे गिरिराजराज- तनया सर्वांगभूतिः स्थिता ॥ टुंढिस्कंदगणादिनंदिसहितः श्रीविश्वनाथः प्रभुः काशीमंदिरसंस्थितोऽखिलगुरुर्देयात्सदा मंगलम् ॥ ३॥ श्रीश्वर उवाच ॥ ॐ कैलासदर्शनं पुण्यं सर्व- देव न संशयः ॥ येन देहेन यत्कर्म क्रियते कर्मकर्तृभिः॥१॥ तदेहे तेन लभ्यं स्यात्कल्पकोटिशतैरपि।इदं देहायुतेनैव कर्मणो लभते फलम् ॥ २॥ अतोऽधर्मसमूहेन नैनं धमैतु लोपयेत् ॥ पद्मं त्वष्टदलं कुर्यात्तत्र पूजां समाचरेत् ॥३॥ ध्यायेच्छ्रीशं- करं तन्त्र पार्वतीवल्लभं हरम् ॥ उपचारैः पोडशभिः सर्वशक्तिसम- न्वितैः॥ ४॥ बलिप्रदानं कुर्वीत पुनः सर्वजनप्रियः ॥ वांछिताल्लभते कामान्मुक्तिमुक्तीच विन्दति ॥ ५॥ एवं सिद्धेन मंत्रेण साधयेत्स्वमनोरथम् ॥ यस्य कोपं समासाद्य कंपते देवता भयात् ॥ ६॥ इन्द्राद्या वशगा भूत्वा तं नमस्यंति साध- कम् ॥ चक्रवर्ती भवेद्भूपो यदीच्छेच्छिववल्लभः ॥ ७ ॥ एतत्ते स्थित हुए सदा हमारा मंगल करें ॥ २ ॥ जिनके मस्तकपर चन्द्रमा, कण्ठम करालविप, मस्तकमें गंगाजी, बामअंगमें गिरिराजकी पुत्री और सब अंगमें विभूति स्थितहै, हुंडिराज, फन्दादि, नंदिआदिके सहित समर्थ प्रभु विश्वनाथजी फाशीके मन्दिरमें स्थित हुए सब जगत्के गुरु सदा सबको मंगलदें ॥३॥ ईश्वर बोले । सदाही सबको कैलासके दर्शनसे पुण्य होता है, इसमें सन्देह नहीं । कर्म करनेवाले निस देहसे जो कर्म करते हैं।॥ १॥सौकरोड कल्पामभी उसदेहसे वह कर्म प्राप्त नहीं होताहै।इस देहसेही काँका फल नहीं अगले जन्ममिभी मिलताह॥२॥ इसमे धर्मसमूहमें पड़कर इस शिवात्मक धर्मका लोप न करे ! आठ दलका पद्म बनाफर उसमें शिवपूजन करै ॥ ३ ॥ पार्वतीके प्रिय भगवान शंकरका ध्यान पर, अपनी शक्तिभर सोलह प्रकारसे भगवानका पूजन फरै ॥ ४॥ फिर सब जगत्फो प्रिय होनेवाली बलिदे । इससे मनवांछित फलफी माप्ति और भुक्ति मुक्ति मिलता है ॥५॥ इसप्रकार सिद्ध मंत्रसे अपने मनोरथोंको सिद्ध करे जिसके पोपके भयसे देवताभी कंपित होतेहैं ॥ ६ ॥ इन्द्रादिक सब देवता और साधक निनको प्रणाम करते हैं, जो शिवकी भिपता चाह वह चक्रवर्ती होजाताहै ॥७॥ हे भाषाटीका समेत-१०२. (३) कथितं पुत्र महापथविचारणम् ॥ अनित्यममुखं लोकसिम प्राप्य भजस्व माम् ॥ ८॥ इदं पुत्र तव स्नेहान्मया गुह्यं प्रका- शितम् ॥न देयं धनलुब्धेभ्यो न देयं देवनिंदकें ॥९॥नास्तिके चैव दुर्बुद्धौ तथा चुम्बकवृत्तये ॥ १०॥ ॥ॐ इति श्रीरुद्रया- मले केदारकल्पे श्रीश्वरकार्तिकेयसंवादे अघोरमंत्रसाधनप्रकारे पंचयोगेन्द्रसाधनजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहकैलासगमनं नाम प्रथमः पटलः ॥१॥ पुत्र ! यह तुमसे महामार्गका विचार कहा अनित्य और सुखरहित इस लोकमें 'इस अभिप्रायको प्राप्त होकर मेरा भजन करो ॥ ८॥ हे पुत्र ! तुम्हारे स्नेहसे मैंने यह गुप्त वात प्रकाश की है । धनके लोभी देवनिंदकको यह कभी न देना ॥ ९ ॥ नास्तिक दुईद्धि तथा चुम्बकवृत्तिवालेकोभी न देना ॥ १० ॥ इति श्रीरद्रयामले केदारकल्प मापाटीकायां प्रथमः पटलः॥ १ ॥ द्वितीयः पटलः। ॥ श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ॐ अस्य श्रीअघोरमंत्रस्य अघोर ऋपिः बृहती छन्दः श्रीकालाग्निः रुद्रो देवता ह्रीं बीजं हुँ फट् स्वाहा शक्तिः अघोरप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥ इति संकल्पः॥ अथ पडङ्गन्यासः।। ॐ हाँ अंगुष्टाभ्यां नमः॥ ॐ ही तर्जनी- भ्यां नमः ॥ ॐ हूँ मध्यमाभ्यां नमः ॥ ॐ हूँ अनामिकाभ्यां नमः॥ ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः॥ ॐ ह्रः करतलकरपृ- प्ठाभ्यां नमः॥ इति पडंगन्यासः ॥ अथ हृदयादिन्यासः॥ * हाँ हृदयाय नमः॥ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा ।। ॐ हूँ शिखाये वपट् ॥ॐ ह्र कवचाय हुम् ॥ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ॥ ॐ ह्रः श्रीईश्वर वोले। इस अघोर मंत्रका अघोर ऋषि बृहती छन्द कालाग्नि रुद्दे- पता हीबीज हुंफट्स्वाहाशक्ति अपोरप्रसाद सिद्धिके निमित्त जपमें विनियोगहे ऐसा संकल्पकरके षडङ्गन्यास मूलके अनुसार करै । फिर हृदयादिन्यास करें। अथ ध्यान । कैलासके ऊपर स्थित चन्द्रकलासे स्फुरापमान जामंडलसे संयुक्त . फेदारफल्प। अस्त्राय फट् ॥इति हृदयादिन्यासः॥अथ ध्यानम् ॥ ॐ केला- सासनमीश्वरं शशिकलास्फूर्जजटामंडलं नासालोकनतत्परं त्रिनयनं वीरासनाध्याश्रितम् ॥ मुद्राटककरं च जानुविलसद्गौरी प्रसन्नाननं कक्षावद्धभुजंगम मुनिवृतं वन्दे महेशं परम् ॥ १॥ इति ध्यानम् ॥ अथ जपमंत्रः ॥ ॐ कॉ हुँ फटू स्वाहा ॥ अथ जपसमर्पणम् ॥ ॐ गुह्याद्ब्रह्मतरं गुह्यं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ॥ सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादान्महेश्वर । २ ॥ अनेन जपेन एतावत्संख्याकेन श्री अघोररूपो रुद्रः प्रीयताम् ॥ इति जपसमर्पणम् ॥ अथ स्तोत्रं पठेत् ॥श्रीश्वर उवाच ॥ ॐ नमः कामाय रुद्राय नमो मोक्षवपु ते ॥ नमो नादात्मने तुभ्यं नमो बिन्दुकलात्मने ।। ३ ।। नमोऽस्तु लिंगरूपाय लिंगातीताय ते नमः ॥ त्वं माता सर्वलोकान त्वमेव जगतः पिता॥४॥ त्वं भ्राता त्वं सुहन्मित्रं त्वं प्रियस्त्वं पितामहः॥ नमस्ते भगवन्रुद्र भास्करामिततेजसे ।। ६॥ नमो भवाय रुद्राय परमांबुमयाय च ॥ शर्वाय शितिरूपाय सदा सुरभिणे नमः ॥६॥ पशूनां पतये चैव पावकामिततेजसे।। अतिभीमाय सौम्याय अमृताय योगसमाधिमं नासिकाको अवलोकन करते हुए तीननेत्र वीरासनपर स्थित मुद्रा. टंक फरमें जानुसे शोभित पार्वतीसे प्रसन्नमुख,कक्षामें भुजंग बांधेहुए मुनिव्रतधारी महेश्वरको नमस्कार करताहूं॥१॥इति ध्यानम् । जपका मंत्र । ओं हुं फट् स्वाहा। जपका समर्पण कहते हैं।गुप्तसेभी गुप्त यह मेराजप आप स्वीकार करें। हेदेव महे श्वर ! आपके प्रसादसे मुझको सिद्धिहो॥२॥इस इतनी संख्याकेजपसे श्री अघोर स्द मुझसे प्रसनही इति जपसमर्पण । अथ स्तोत्रपाठ । ईश्वर वोले कामरूप रुद्र गोतस्पी शरीरधारी नाद आत्मा बिन्दुकलायुक्त शंकरको नमस्कार है ॥ ३ ॥ लिंगरूप लिंगसे रहित आपके निमित्त नमस्कारहै। तुमही सबलोककी माता और जगत्फे पिताहो ॥ ४ ॥ तुमही भाई तुमही सुहद तुमही मित्र तुमही प्रिय और तुमही पितामह हो ॥५॥ भव रुद्र परम अम्बुमय शर्व शितिकंठ सुरभीरूप आ- पफी नमस्कार ॥६॥ पशुपति पावक अमिततेजस्वी, अतिभीम, अतिसौम्प भापाटीकासमेत-५० ३. नमोनमः ॥७॥ उग्राय यजमानाय नमस्ते कर्मयोगिने ॥ पार्थिवानां तु लिंगानां यन्मया पूजनं कृतम् ॥ ८॥ तेन मे भगवान्द्रो वाञ्छिताथै प्रयच्छतु ।। इदं स्तोत्रं पठेद्यस्तु पूजाकाले विधानतः॥ ९ ॥ चक्रवर्ती भवेद्राजा सोऽन्ते शिवपुरंब्रजेत् ॥ ॥१०॥ इति श्रीरुद्रयामले केदारकंल्पे ईश्वरकार्तिकेयसंवादे पंचयोगेन्द्रसाधनजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापये शिवद- शने सदेहकैलासगमने सदाशिवाघोरस्तोत्रं नाम द्वितीयः पटलः ॥२॥ दर्शन, अमृतरूप आपको नमस्कार है।जाउन,यजमान कर्मयोगीआपको नमस्कार है । पार्थिवलिंगोंका जो मैंने पूजन कियाहै ।। ८॥ उससे भगवान् रुद्र मझे मन वां- छित फलप्रदान करें।पूजाके समय विधानसे जो कोई इस स्तोत्रको पडताहै ॥९॥ वह चक्रवर्ती राजा होकर अन्तमें शिवजीके लोकको जाताहै ॥ १० ॥ इति श्रीरद्रयामले केटारकल्प मापार्टाकाया शिवायोरस्तोत्रवर्णनं नाम द्वितीन.पटङ ॥२॥ तृतीयः पटलः। ॥ श्रीश्वर उवाच ॥ ॐ अस्य श्रीसदाशिवकवचस्य भृगु ऋपिः अनुष्टुपछंदः श्रीसदाशिवो देवता कैलासप्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः ॥ इति संकल्पः ॥ अथ कवचम् ॥ ॐ शिवो मेऽग्रतः पातु शंभुर्व पातु पष्टतः॥ त्रिपुरारिमिपाखें दक्षिणे मदनान्तकः॥ ॥१॥ॐ ऊर्द्ध पातु विशालाक्षो मधः कनकपिंगलः ॥ पार्व- तीवल्लभो जानू जंघे पश्वीश्वरः प्रभुः ॥ २ ॥ पादौ मे पातु श्रीईश्वर बोले । इस श्रीसदाशिवकवचका भृगु ऋपि अनुष्टप्छन्द । सदाशिव- देवता । कैलास प्राप्तिके अर्थ जपमें विनियोगह ऐसा संकल्पकरके कर्वच पड़े। ओं आगे शिव मेरी रक्षा करें। पीठकी ओरसे शंभु रक्षा करीबाई ओर त्रिपुरारी दक्षिण ओरसे मदनान्तक मेरी रक्षा करें ॥ १॥' विशालाक्ष ऊपरको ओरसे नीबसे कनकगिल,जानुकी पार्वतीवल्लभानांचोंकी पश्चीवर प्रभु रक्षा करें।२॥ सर्वेश मेरे दोनों चरणोंकी,कालाग्नि रक्षक दोनों हायोंकी।सवज्ञ मेरे शिरकी, देवे- फेदारकल्प । सर्वेशः करौ कालाग्निरक्षकः॥शीर्ष पातु सर्वज्ञः कर्णों देवे- खरः सदा ॥३॥ गुह्यं गुह्येश्वरः पातु हृदयं हृदयेश्वरः ॥ सर्वांगं सर्वदेवेशः कामिनीवल्लभः कटिम् ॥ ४ ॥ यदिदं कवचं वश्यं देवानामपि दुर्लभम्।।एतस्य पठनादेव भूतप्रेतपिशाचकाः॥न हि संति सदा सर्व योगिन्योविनकारकाः।।इदं कवचमज्ञाता यस्तु मंत्रं शिवात्मकम्॥अघोरं जपतेऽवश्यं तस्य विघ्नः पदेपदे ६तस्मा- सर्वप्रयत्नेन यदीच्छेदात्मनो हितम्।।विज्ञाय कवचं पूर्वपश्चान- पमुपाचरेत् ॥७॥ इतिश्रीकेदारकल्पे रुद्रयामलतंत्रे ईश्वरकार्तिके- यसंवादे पंचयोगेन्द्रसाधनजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शि- वदर्शने सदेहकैलासगमने अघोरकवचंनाम तृतीयः पटलः॥३॥ श्वर सदा कानोंकी रक्षा करें ॥ ३ ॥ गुह्येश्वर मेरे गुह्यस्थानकी सदा रक्षा करें। सब देवताओंके ईश्वर मेरे सागकी रक्षा करें। कामिनीवल्लभ मेरे कमरकी रक्षा करें ॥॥ जो जितेन्द्रिय होकर देवताओंकोभी दुर्लभ इस कवचका पाठ करतेहैं तो इसके पाठसे भूत प्रेत पिशाच ॥ ५ ॥ तथा योगिनी आदि कोई विन्न नहीं करसकतेहैं । इस कवचको विना जाने जो शिवात्मक मंत्रको ॥ ६ ॥ अघोर- संज्ञक शिवात्मक मंत्रको जपतेहैं तो उनको पदपदमें विन होतीहै, इससे सब प्रयलोंसे अपना हित साधनकरें ॥ ७ ॥ इति श्रीकेदारकसे रुद्रयामले शिवकवचवर्णनं नाम तृतीयः पटल. ॥ ३ ॥ चतुर्थः पटलः।. ॥ अथ पार्थिवपूजाविधिः॥श्रीश्वर उवाच ॥ प्रथममासनमंत्रः॥ ॐ पृथ्वीति मंत्रस्य मेरुपृष्ट ऋपिः कूमों देवता सुतलं छंदः अथ पापिषपूजापिपि । ईश्वर बोले पहले आदिमें आसनमंत्र है विनियोग पटके पृथिवीति यह मंत्र पढे, हे पृथिवी तुमने लोक धारण किये हैं तुमको विष्णुने १ भालपरमार्यम्।
(७) भाषाढीकासमेत-प०४. आसनोपवेशे विनियोगः इति संकल्पः । पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृतात्विं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥ इति आसनमंत्रः ॥ ॐ अपसर्पतु ते भूता ये भूता भुवि संस्थिताः॥ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यंतु शिवाज्ञया॥२॥ इति दिग्बंधः॥ ॐहाँह्रीं हराय नमः।। इति मृदाहरणम् ॥ॐहाँ ह्रीं महेश्वराय नमः ॥ इति संघटनम् ॥ ॐबांही शुलपाणये नमः।।इति स्थापनम् ॥ अथ ध्यानम्।।ध्याये नित्यं महेशं रजत- गिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्वलांगं परशुमृगवराभीति- हस्तं प्रसन्नम्॥पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैयाप्रकृत्तिं वसानं विश्वायं विश्ववन्धं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥ १ ॥ इति ध्यानम् ॥ कैलासं ध्यात्वा ।। वामनासापुटे अंजलि समा- नीय पुप्पं क्षिपेत् ॥ॐ पिनाकधृग्यावयां पूजयामि तावत्त्वं स्थिरो भव ॥ॐ महादेवस्य प्राणाः,वाक्,मनः,सर्बेन्द्रियाणि, जीव,इह स्थिताःॐआँह्रींकों हंसः त्वक्चक्षुःश्रोत्रघाणा इहागत्य · सुखं चिरं तिष्टंतु स्वाहा ॥ इति प्राणप्रतिष्टा ॥ ॐ पिनाकधृक् धारण कियाहै, हे देवि ! तुम मुझको धारणकरके आसनको पवित्र करो ॥१॥ इति आसनम् । अब दिग्बंध कहतेहैं।अपसर्पन्विति।जो प्राणी इस स्थानपर हैं वे यहांसे चले जाप और जो प्राणी विघ्नकरनेवाले हैं वे शिवकी आज्ञासे नष्ट हों।इति दिग्बंधः । ऑी हराय नमः। इससे मट्टीलावै । ह्रीं ह्रीं महेश्वराय नमः । इससे संघट्ट करै । ॐहीं ह्रीं शूलपाणये नमः । इससे प्रतिष्ठा स्थापन करै । अथ ध्यान-जो महेश रजतगिरिके सदृश, चारुचन्द्रभूषणवाले रत्नभूपणकी सदृश उज्वलांगयुक्त, हस्तमें परशु, मृग, अभय और वर धारण किये प्रसन्न रूप, पद्मासनपर बैठे हुये, सभी दिशावोंसे अमरगणोंसे स्तुत, व्यायाम्बर पहने- हुये, विश्वके आद्य, विश्वबीन, समस्त भयहरण करनेवाले हैं मैं उनको ध्यानगो- चर करता हूँ ॥ इति ध्यानम् ॥ कैलासका ध्यान करै । वामनासापुटसे ध्यानकरै। फिर पुष्प छोडै । और कहै हे पिनाकधारिन् जयतंक तुम्हारी पूजा करूं तस्तक तुम यही स्थिर हो। महादेवके प्राण वाणी मन इन्द्रिय आत्मा सब इस मूर्तिम स्थित हों। आंहीकोहंसः । यहमंत्र पढकर कहै । त्वचा चक्षु श्रोत्र प्राण सब यहां (८) केदारकल्प। इह सन्निहितो भव ॥१॥ॐ शिवाय नमः॥ आवाहनम् ॥२॥ ॐ शिवाय नमः॥आसनम् ॥ ३ ॥ॐ शिवाय नमः पायम् ॥४॥ॐ शिवाय नमः॥पादावनेजनम् ॥६॥ॐ शिवाय नमः अय॑म् ॥ ६॥ ॐ शिवाय नमः।। मधुपर्कः ॥ ७ ॥ ॐ ह्रांहीं पशुपतये नमः स्नानम् ॥ ८॥ॐ शिवाय नमः ॥ आचमनीयम् ॥९॥ ॐ शिवाय नमः वस्त्रम् ॥ १०॥ॐ शिवाय नमः अलं काराः॥ १३ ॥ ॐ शिवाय नमः सुगंधः ॥ १२॥ॐ ईशानाय नमः दीपः ॥ अथावरण पूजा ॥ ॐ शर्वाय क्षितिमूर्तये नमः ॥१॥ ॐ भवाय जलमूर्तये नमः॥२॥ ॐ रुद्राय अनिमू- तये नमः॥ ३ ॥ ॐ उग्राय वायुमूर्तये नमः ॥ ४ ॥ ॐ भीमाय आकाशमूर्तये नमः॥५॥ ॐ पशुपतये यजमानमू- र्तये नमः॥६॥ॐ महादेवाय सोममूर्तये नमः॥७॥ॐ ईशा- नाय सूर्यमूर्तये नमः ॥८॥ इति आवरणपूजा ॥ ॐ शिवाय नमः । श्रीखण्डचन्दनं समर्पयामि ॥ २१ ॥ ॐ शिवाय नमः रक्तचन्दनं समर्पयामि।।२२।।अक्षतं समर्पयामि॥२३॥ॐशिवाय नमः पुप्पं समर्पयामि ॥२४॥ ॐ शिवाय नमः अबीरगुलाले समर्पयामि ॥२५॥ ॐ शिवाय नमः धृपं समर्पयामि ॥२६॥ ॐ शिवाय नमः दीपं समर्पयामि ॥२७॥ॐ शिवाय नमः॥ नैवेद्यं समर्पयामि ॥२८॥ ॐ शिवाय नमः फलताम्बूले सम- आकर सुससे चिरफालतक निवास करें । इति प्राणप्रतिष्ठा । हे पिनाकधारिन तुम यहां स्थित हो ।ॐ शिवाय नमः। यह मंत्र पढकर आवाहन, आसन, पाय, अवनेनन, दीप, मधुपर्क दे, हीपशुपतये नमः। इससे स्नान करावै। शिवाय नमः इससेही आचमन वस्त्र, अलंकार, गन्धसुगन्ध दे । फिरआवरणपूजा करै । शाय क्षितिमृतये नमः । इत्यादि आठ आवरण पूजाफे मंत्र, इनको पढे । इति आवरण पूना। फिर शिवाय नमः।यह मंत्र प्रत्येकवार पढफे चन्दन, लालचन्दन,अक्षत, पुष्प, अंबीर, गुलाल, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, ताम्बूल, आति, नीराजन,प्रदक्षिणा मापाटीकासमेत-प० ५. (९) पंयामि॥२९॥ॐ शिवाय नमः||आरात्र्तिकं समर्पयामि॥३०॥ॐ शिवाय नमः नीरांजनं समर्पयामि ॥३१॥ ॐ शिवाय नमः। प्रदक्षिणं समर्पयामि॥३॥ॐ शिवाय नमः ॥ध्यानं स्तुस्तिपाठं समर्पयायि ॥३॥ ॐ शिवाय नमः ॥ अष्टोत्तरशतं मंत्र जपेत्।। जपसमर्पणम् ॥ विसर्जनम् ॥ ३४ ॥ इति श्रीरुद्रयामले केदार- कल्पे ईश्वरपार्वतीसंवादे पंचयोगेन्द्रसाधनजीवन्मुक्तये परब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहकैलासगमने शिवाघोर- पार्थिवपूजाघोरमंत्रसाधनप्रकारो नाम चतुर्थः पटलः ॥४॥ भ्यान, स्तुति, पाठ समर्पण कर यह ३३ मंत्रपूर्वक करै फिर जप समर्पणकर विसर्जन करै । इति श्रीकेदारफल्से ईश्वरपार्वतीसम्बादे पूनानिधिवर्णनो नाम चतुर्थः पटलः ॥ ४ ॥ पञ्चमः पटलः । श्रीश्वर उवाच॥ॐ शैलराजस्य पृष्टे तु शृणुस्थानानि यानि वै॥ अस्ति पुण्या महादेवी नदी वैतरणी. शुभा ॥१॥ पितॄणां तोय- दानेन तृप्तिर्भवति पुप्कला।तत्रापि परमं देवि पश्येद्रुद्रहिमाल- यम् ॥२॥ हिमालये तु चेदत्तं त्रुटिमात्रं हि कांचनम् ॥ तेन दत्ता भवेत्सर्वा सप्तद्वीपा वसुंधरा ॥ ३॥ आत्मानं घातयेद्यस्तु भूगुपृष्टेपु मानवः॥ इंद्रेण धारित छत्रे रुद्रलोकं स गच्छति ॥४॥ गत्त्वा हिमालयं पुण्यं दृष्ट्वा माहेश्वरं पदम्। वासात्संतारयेत्सयो शिवजी वोले हे देवि ! हिमाचल पर्वतके पृष्ठभागमें जितने स्थान हैं सो सुनो। तहां बड़ी शुभ पवित्र वैतरणी नदी है ॥ १ ॥ तहां जलदान करनेसे पितरों- की सबप्रकार तृप्ति होती है । हे देवि ! और वहां बड़े हिमालय पर्वतका दर्शन करै ।। २ । टस हिमालय पर्वतपर त्रुटिमात्रभी सोना दान करे तो मानो उसने सातदीपवाली भूमि दानकी ॥ ३ ॥ जो मनुष्य पर्वतशिखरपरसे अपने आपको नष्ट करै वह इन्दसे छत्रधारण कराता हुआरुद्रलोकमें प्राप्त होता है॥४॥ और पवित्र हिमालयको प्राप्त हो शिवनीके चरणारविन्दोंके दर्शनकर शीत्र दश- (१०) केदारफल्प। पूर्वान्दशापरान् ॥५॥ द्वितीयं मध्यमं स्थानं तन मध्ये कृतं मया ॥ तत्र या स्यानदी पूज्या महापुण्या सरस्वती ॥६॥ तत्तुंगे सा प्रणयापे प्रभाते तु प्रकाशिता ॥ सरस्वती महाध्वाना देवगंधर्वसेविता ॥७॥मध्यमं चोदकं पीत्वा गणो भवति मध्यमः॥ ब्रह्मपत्रं समासाद्य सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ८॥ श्रीदेव्यु- वाच ॥ मनुष्याणां हितार्थाय मया पृष्टो महेश्वर ॥ तन्मे कथय देवेश यत्रैव संशयो महान् ॥ ९॥ स्वभावात्परमं धाम यथा पुण्यमहं प्रभो ॥ धातुमिच्छामि तत्त्वेन युष्मद्रनाद्विनिर्गतम् ॥३०॥ श्रीश्वर उवाच ॥ शृणु देवि यथातथ्यं तीर्थसद्भाव- मुत्तमम् ॥ यदहं संप्रवक्ष्यामि निखिलं तन्निबोध मे ॥ ११ ॥ तृतीयं तत्परं स्थानं केदारं चेति विश्रुतम् ॥मच्छरीराद्विनिष्कांतं शुक्राख्यं पानमुत्तमम् ॥ १२॥ केदारमुदकं देवि ये पिबन्ति महाजनाः ॥ मम तुल्यबलाः सर्वेसर्वे स्वच्छन्दगामिनः॥१३॥ त्रिशूलांकितहस्ताश्च. सर्वे वै शूलपाणयः ॥ त्रिनेत्राश्च पीढ़ी पिछले और दश पीढ़ी अगले वंशको तारताहै ॥ ५ ॥ और दूसरा मध्यमस्थान मने उस पर्वतके मध्य में कियाहै, तहां बड़ी पवित्र सरस्वती नदी पूजनीयहै ॥ ६ ॥ उस कर्वभूमिमें वह सरस्वती नदी नष्ट हुईभी प्रातःकाल मका- शित होती है और देवता गन्धर्वोस सेवितहै, उसके ध्यान करनेसे ॥ ७ ॥ तथा बीचमेंसे जलपान करै तो मध्यमगण होताहै, और सम्पूर्ण पापनाशक यज्ञोपवी- तको धारण करै ॥ ८ ॥ देवी घोली हे महेश्वर ! मनुष्योंके हितकी कामनासे मैंने पूछा है । हे देवि ! जहाँ २ मुझे संशय है सो मुझसे कहो ॥ ९ ॥ हे प्रभो ! जिस प्रकार यह परमधाम पवित्रहै सो विधिपूर्वक आपके मुखसे सुनना चाहती हूँ ॥ १० ॥ शिवजी बोले हे पार्वति ! इस उत्तम तीर्थकी श्रेष्ठ महिमाको ठीफ २ श्रवण करो, जो मैं कहूंगा, सो सम्पूर्ण मुझसे सुनो ॥ ११ ॥ उससे आगे केदारनामक स्थानहै, वह मेरे शरीरसे निकला शुक्र है और पान करने योग्यह ॥ १२ ॥ हे देवि! जो महापुरुप फेदारफे उदक (जल) को पान फरते है ये मेरे समान पराक्रमी हो सर स्वेच्छाचारी होते हैं ॥ १३॥ जिनके हाथों में त्रिशूल विहित है, और त्रिशूल हायमें लिये तीन नेत्रपाले सब गण मेरी भक्ति- - भापाटीकासमेत-प०५. (११) गणा भक्त्या सर्वेऽपि मत्पराक्रमाः ॥ १४ ॥ मन्दाकि- न्यां नरः स्नात्वा चार्चयित्वा वृषध्वजम् ॥ गणाधिपत्वं लब्ध्वा च कुलानामुद्धरेच्छतम् ॥ १५॥ तत्र मंदाकिनी पुण्या नदीनामुत्तमा नदी ॥ द्रावयेत्सर्वपापानि.स्तुता भवतु वा.नता ॥१६॥ तस्यां स्वर्गाच्युतायां तु शुचिस्नातो हि मानवः ॥ यः पिवेत्तत्र देवेशि वामहस्तेन वै जलम् ॥१७॥ अंकितः स्यात्रिशू- लेन ललाटे नंयनेन च ।। गणो हि च समस्तस्तु पुनर्नावतको भवेत् ॥ १८॥ सर्वधर्मपरां प्राप्य सत्यं तुलभते गतिम् ॥ गण- पत्वमवाप्नोति यत्र तत्र मृतो नरः॥१९॥ तस्यास्तोयं शरीरस्थं मम लिंगादिनिःसृतम् ।। मृतो यत्र गतो वापि स्कंदस्य सदृशो भवेत् ॥ २०॥ जन्मांतरसहस्रैस्तु बहुभिः शोधितो नरः ॥ ततो याति परं स्थानं केदारं तीर्थमुत्तमम् ।। २१ ॥ केदारं प्रस्थि- तो देवि सर्वश्च म्रियते नरः।।सोऽपि सो गणो मह्यं भवत्यमरते- जसा॥२२॥भस्मनो धारणं नित्यं शिवमंत्रः प्रदक्षिणम्।। केदारो: करनेसे मेरे समान पराक्रमी होते हैं॥१४॥मनुप्य मन्दाकिनी नदीमें स्नानकरके शिवजीको पूजकर उत्तमं गणताको प्राप्त होके सौ कुलोंको उद्धार करता है।।१५॥ वहां बड़ी पवित्र नदियों में श्रेष्ट मन्दाकिनी गंगाकी अनेक प्रकारको स्तु- तियोंसे ध्यान करै तो संपूर्ण पाप नष्ट होते हैं ॥ १६ ॥ स्वर्गसे गिरती हुई उस नदी में स्नानकर पवित्र हो, जो पुरुष वॉरं हायसे, जल पीवै ॥ १७ ॥ वह त्रिशूलसे तथा मस्तकंपर नेत्रसे चिहित होवै उसको शिवका गण होना होता है। और वह फिर जन्म धारण नहीं करता ॥ १८ ॥ वह परमधर्मको प्राप्त हो सद्गति (मुक्ति) को प्राप्त होता है वह मनुष्य चाहे जहां मरै शिवजीका इत्तम गण होता है ।॥ १९ ॥ मेरे लिमसे निकला केदारका जल जिसके शरीरमें स्थितहो वह मनुष्य जहां कहींभी मरजाय तो स्वामिकार्तिकेयकी समान होता है ॥ २० ॥ अनेक सहस्रों जन्मोंसे शुद्ध हुआ मनुष्य उत्तम केदार 'तीर्थको प्राप्त होताहै ।। २१ ॥ हे देवि ! केदारतार्थपर जो कोईभी मरजाय वे सब देवताके समान तेजस्वी मेरे गण होते हैं ॥ २२ ॥ नित्यविभूतिका शिवमन्त्र दक्षिणा सहित धारण करना; केदारमें जलपान करनेकी सोलहवीं कलाको भी (१२) केदारकल्प। दकपानस्य कलां माईति पोडशीम् ॥२३॥ अनेकानि सहस्राणि ऋतूनां सुविशेषतः ॥ कलौ कृत्वा गति:पा केदारेण तु या भवेत् ॥२४॥ दिव्यवर्पसहस्राणि तपस्तत्वा तु पुष्करे ॥ न लभ्यते गतिर्मत्यैः केदारेण तु. या भवेत्॥२॥भूतं भव्यं भविष्यं च सर्व- लोकस्य यद्भवेत्॥सर्व विधिवदस्माकं तद्भवेत्तीर्थमीदृशम्॥२६॥ केदारमुदकं पीत्वा यत्र देशे प्रपद्यते ॥ सोऽपि देशो भवेत्पूज्यः किं पुनस्तस्य बांधवाः ॥२७॥ आत्मा वै पुत्रनामातु ब्राह्मणो वेदवान्भवेत् ॥ अंकितास्तु त्रिशूलेन ते पूज्याः सदैवतैः॥२८॥ पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च । केदारोदकपा- नस्य कलां नार्हति पोडशीम् ॥ २९॥ वसेदीशानमासाद्य हिम- पूर्णमहागिरौ । यावत्तत्क्रमते च्छाया दृष्टिमा तथा पुनः॥३०॥ अंते वा यदि वा मध्येये मृता हिमवद्गिरौ ॥ तावत्ते दिवि तिष्टंति यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥३१॥ आत्मानं घातयेद्यस्तु प्रत्यक्षं च हुताशने ॥ न तां गतिमवाप्नोति केदारेण तुया भवेत् ॥ ३२॥ नहीं पहुंचताहै ॥ २३ ॥ कलियुगमें अनेक सहस्रों यज्ञ विधिपूर्वक करके वह गति नहीं प्राप्त होतीहै जो केदारतीर्थसे मिलतीहै ॥ २४ ॥ मनुष्य पुष्करमें दिव्यसहस्रवर्प तप करके वैसी गति नहीं पाताहै जैसी केदारके दर्शनसे मिलती है ॥२५ ॥ संसारमें भूत, भविष्य जो कुछ है वह मुझे विदितहै ऐसा कोई उत्तम तीर्थ नहीं है ॥ २६ ॥ फेदारके जलको पीकर मनुष्य.जिस देशमें चला जाय, वह देशतक पूजनीय होताहै फिर उसके बांधचोंकी क्या हैं ।। २७ ।। आत्मा पुत्र नामसे प्रसिद्धहै ब्राह्मण वेदज्ञाता होव यदि त्रिमूलसे अंकित हो तो विना वेदके पढ़ेभी वह देवताके समानहें ॥ २८ ॥ पृथ्वीपर जितने पुण्य तीर्थ और देवमंदिर हैं वे सम्पूर्ण फेदारमें जलपानकरनेके सोलहवें भागकोभी नहीं पाते हैं ॥ २९ ॥ सुवर्णसे पूर्ण इस महापर्वतपर ईशानकी ओर जबतक छाया चली जाय उतनी दृष्टि मात्रही नियास करे।॥३०॥हिमालय पर्वतपर अन्तमें या मध्यमें जो पुरुष मरजांय तो घे तबतफ स्वर्गमें रहतेहैं जबतफ चौदह इंद्र रहतेहैं॥३१॥ जो मनुष्य प्रत्यक्ष अमिम अपने आपको गिराय नष्ट कर घहभी पैसी गतिको नहीं माप्त . होता जैसी पदारतीयसे मिलतहि ।। ३२ ॥ फेदारके जलको एकबार पीफर तथा भाषाटीकासमंत-प०५ (१३) सकृत्पीत्वा तु कैदारं वाराणस्यांसकृद्गतौ ॥ ब्रह्मविद्यां सकृजवा न भवेत्पुनरालये ॥ ३३॥ विपमं दुर्गमं घोरं प्रविश्य हिमव- द्विरौं। केदारस्योदकं पीत्वा मृतेनापि न शोच्यते ॥ ३४ ॥ सकृत्पीत्वा तु कैदारं मम तुल्यबलो भवेत् ॥ अदृश्यः सर्वभू- तानां विचरेच यदृच्छया ॥३५॥ दिव्यांतरिक्षपातालं यत्र यत्र यथेच्छति ॥ मम देवि प्रसादेन क्रीडते कामरूपधृक् ॥३६॥ केदारस्य कथां दिव्यां पवित्रां पापनाशिनीम् ॥ ये स्मरन्ति सदा भत्त्या ते चैव दिव्यदेवताः ॥ ३७॥ यावत्प्रधानात्पुरुपो यावच्चाहं महेश्वरः॥ मम देहस्वरूपेण यत्राहं तत्र ते मृताः ॥ ॥३८॥ एतच्च परमं गुह्यं तव देवि युदाहृतम् ॥ यस्तु धारयते नित्यं यश्चैव शृणुयानरः॥३९॥"मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्र- लोकं स गच्छति ॥ ४०॥ इति श्रीरुद्रयामलये केदारकल्पे श्रीश्वरदेवीसंवादे पंचयोगेन्द्रे च्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहकै- लासगमनं नाम पंचमः पटलः॥५॥ एकवार काशीमें जाके और एकबार ब्रह्मविद्या (अध्यात्मविद्या) को जपकर फिर जन्म नहीं होताहै ॥ ३३ ॥ कठिन तथा घार दुर्गम प्रकारसे हिमालय पर्व- तपर जाकर केदारके जलको पीकर मरकेभी नहींशोकको प्राप्त होताहै ।। ३४ ॥ एकबार केदारके उदक (जल)को पीकर मेरे समान वली होताहै सब प्राणियों में अदृष्ट होकर अपनी इच्छासे भ्रमण करताहै ॥ ३५॥ हे देवि ! स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा पाताल लोकको वा जहां कहीं भी वह जाना चाहताहै मेरे प्रसादसे इच्छा- चारी हो विचरता है ।। ३६ ॥ जो मनुप्य केदारमाहात्म्यकी दिव्य पवित्र पापना- शक कथाको भक्तिपूर्वक स्मरण करते हैं, वह दिव्यदेवता हैं ॥ ३७॥ जयंतक प्रधान पुरुपहैं । जबतक में महेश्वर हूँ, मेरे भक्त मरके मेरे स्वरूपमें हो जहां मैंहूँ तहाँही प्राप्त होतेहैं ॥ ३८ ॥ हे देवि ! यह परम गोपनीय वार्ता तुमसे कही, जो मनुष्य इसको नित्य सुनै अथवा धारण करै।। ३९ ॥ वह संपूर्ण पापोंसे छूटताहै और शिवलोकको प्राप्त होताहै ॥ १० ॥ इति श्रीकेदारकन्ये शिपातीसम्वादे भाषा काया पंचमः पटलः ॥५॥ १इडमावापः।
फेदारफल्प। पष्ठः पटलः। देव्युवाच ॥ॐ क्षेत्राणां परमं क्षेत्र तीर्थानां चैव यत्स्मृतम् ॥ प्रमाणं तस्य क्षेत्रस्य श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १॥ श्रीश्वर उवाच॥दक्षिणोत्तरतश्चैव पंचयोजनमायतः॥पूर्वपश्चिमतश्चैव यो- जनत्रयमायतः॥२॥ तस्मिस्तु पर्वते देवा ऋपयश्च तपोधनाः॥ क्षेत्रस्य वाह्यतः सर्वे तपः कुवैति पुंगवाः॥३॥सिद्धगंधर्वयक्षाश्च किन्नराद्यप्सरोगणाः केदारकांक्षिणः सर्वे समाराधनतत्पराः॥४॥ न लंभंते सुरा देवा ये चान्ये दिव्यजातयः॥यक्षस्तुरक्षितं स्थानं नंदिस्कंदपुरोगमैः॥५॥ विनायको महाकाल ईशानश्च महा- बलः॥जया च विजया चैव मोहिनी स्तंभिनी तथा॥६॥ मम रूपधराः सर्वे क्षेत्रं रक्षति सर्वदा॥पष्टिकोटिगणानां च क्षेत्र- पालाः प्रकीर्तिताः ॥७॥नंदी चैव महाकालः सततं क्षेत्ररक्षकौ।। अहं तत्र स्थितो देवि त्वया सह वरानने ॥८॥दृष्ट्वाय चैव केदार देवानामपि दुर्लभम् ।। क्षेत्राणां परमं क्षेत्र तीर्थानां तीर्थमुत्तमम् ॥९॥ तत्र स्नात्वा दिवं यांति मुक्ताः संसारबंधनात् ॥ अशयाः पार्वती बोली, क्षेत्रोंमें बड़ा क्षेत्र तीयों में उत्तमतीर्थ कहाँहै ? तथा उसक्षेत्रके प्रमाणको सुननेकी इच्छाहै ॥ १॥ शिवजी बोले केदारक्षेत्र दक्षिण और उत्तरसे पांचयोजन विस्तृतहै, और पूर्वपश्चिमसे तीनयोजन विस्तृत है ॥२॥ उस पर्व- तपर तपस्वी, देवता और ऋपि, रहतेहैं और क्षेत्रके बाहरभी तप करतेहैं ॥३॥ और सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, फिनरादिक तथा अप्सरायें संपूर्ण फेदारको इच्छा करते हुए आराधनामें तत्परहैं ॥४॥ देवता और जो दिव्यजातिहें घेभी केदा- को नहीं प्राप्त होते यह फेदारस्थान स्कन्दआदि यक्षासे रक्षा किया हुआ है।॥५॥ विनायक, महाकाल, ईशान, महाचल और जया, विनया, तथा मोहिनी, और स्तंभिनी,॥६॥मेरे स्वरूपको धारण किये सब निरंतर क्षेत्रको रक्षा करते हैं, और साठकरोड क्षेत्रपालगण फेहेहे ॥ ७ ॥ और नंदी व महाफाल यहभी क्षेत्रकी रक्षा करते हैं है दपि ! है परानने.! मैं तेरे साप तहाँ स्थितहूं ॥८॥ देवताकोभी दुष्याप्प और दुर्लभ केदारक्षेत्र क्षेत्रों में उत्तम तया तीर्थो में श्रेष्ठ कहाहै ॥९॥ यहाँ . भाषाटीकासमेत-प० ६. परमाश्चैव मत्प्रसादाद्भवति ते ॥ १० ॥ ब्रह्महत्याकृतश्चैव ये चान्ये पापकारिणः।।न पश्यंत्यशुभं देवि शुद्धाश्चापि भवन्ति ते ॥११॥ येषु येषु च काय्यपु याति मामपि सुत्रते ॥ तेषु तेषु च योगेषु जायते मत्प्रसादतः ॥ १२॥ तावत्ते बहनो वर्णाः सर्वे केदारकांक्षिणः ॥ केदारं चैव संप्राप्ताः सर्वे वर्णा द्विजातयः ॥ १३ ॥ रश्मिभिर्मम संस्पृष्टा अवज्ञातास्तु ये नराः॥ तत्र यांति परं देवि पूर्व शप्तास्तु ते मया ॥ ११ ॥ पूर्वशप्तास्तु ये देवि ते भवंति गणेश्वराः ॥ तेषां च निर्मितं देवि केदारोदकमुत्तमम् ॥ १९॥ तेन पीतेन मुच्यन्ते जन्मसं- साधनातात्रिनेत्राःशुलहस्ताश्चशशांकाकिंतमूईजाः।।१६।। व्याघ्रचर्मधराः सर्वे मम पुत्रा महाबलाः।। मम वीर्यसमुत्पन्ना सब ते मत्पराक्रमाः॥१७॥ये पित्रति नराः सर्वे ते भवंति गणेश्वराः।। गाणपत्ये तु केदारे तेन तीर्थ तदुत्तमम् ॥ १८॥ न तेन सशं पुण्यं त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यान्या- स्नान करके संसारबंधनसे छूटकर स्वर्गलोजको सिधारतेहैं, और वे मेरे प्रतापसे नक्षय और बडे होतह ॥ १० ॥ हेदेषि ! जो पुल्प ब्रह्महत्यारे तया किसी करनेवालेहों उनके पाप नष्ट होकरके वे शुद्ध होतेहैं ॥ ११ ॥ हे सुबते ! जिन २ कामाने अर्थ मुझको प्राप्त होतेहैं टन २ कामामें मेरे प्रतापसे सिद्धि होतीहै ।। १२॥ तभीतक ब्राह्मणादि अनेक वर्णहें जबतक केदारको अभिल्लापा नहीं करत, और केदारतीयपर प्रान हुए संपूर्णवर्ग द्विजाति होत ॥१शामिरी कान्तिसे स्पर्श किये जो मनुष्य स्पर्शवाले होतह हे देवि नमसे पहले सात मुझसे प्राप्त होतेहैं ॥ १४ ॥ हे देवि ! पहले सात गणेश्वर होते हैं उनके निमित्त उत्तम केदार का जल है ॥१५॥ टसके पान करनेसे जन्म संसार बंधनसे छूटते हैं जो तीन नेत्रबाले त्रिशूल हायमें लिये मस्तकपर चंद्रमासे चिह्नित हैं ॥१६ ॥ व्याप्रकी साल धारण किये के, सब मेरे पुत्रह और मेरे वीर्यसे उत्पन्न हैं ये मेरे समान पराक्रमी होतेहैं।। १७ । जो मनुष्य केदारके जलको पीतहे ये सब गोंके स्वामी होतेहैं गाणपत्य केदारमें यह टत्तम तीर्य है ॥ १८ ॥ उसकी समान पुण्यतीर्य तीनों लोकम नहीं है पृथ्वीपर जितने पुण्यतीर्य और देवस्थान १ सम्बन्धविवश्या पटी।
कदारकल्प। यतनानि च ॥ १९॥ केदारस्य तु तोयस्य कलां नाहति पोड- शीम्॥इएक्षेत्रं समासाद्य चैकरात्रि वसेत्तु यः॥२०॥वासस्तस्य भवेदेवि नित्यकालं शिवालये । मंदाकिन्यां नरः सात्वा पितृ- पुण्योदकं ददत् ॥२१ ।। तारितास्तेन ते चैव कुलान्येकोत्तर शतम् ॥ इदं क्षेत्रं परं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥ २२॥ दृष्ट्वा पतिं जलं चात्र संसारभयभेदकम्॥ येऽपि प्रदक्षिणं कुर्यात्तस्थानं पुरुषोत्तमः ॥२३॥ प्रदक्षिणा कृता तेन सप्तद्वीपा वसुंधरा ॥ यत्फलं सर्वतीर्थानां सर्वयज्ञेषु यत्फलम् ॥ २४ ॥ यत्फलं लभ्यते यज्ञैः साश्वमेधैः सदक्षिणैः ॥ तत्फलं कोटिगुणितंलभते नात्र संशयः ॥ २५॥ तप्तकांचनवर्णाभाः सर्वालंकारभूषिताः॥ विचरंति गणा देवि सर्वभूतविमर्दकाः ॥ २६॥ ऋपीणां चैव दैत्यानां यक्षगंधर्वरक्षसाम् ॥ ग्रहाणां भूतसिंहानां ये च केचि- द्विरोधकाः ॥ २७ ॥ इन्द्रो वा यदि वा ब्रह्मा विष्णुवापि प्रजा- पतिः ॥ एतेपां चैव सर्वेषां स बध्यो नात्र संशयः ॥ २८॥ हैं ॥१९॥ केदारफे उदक (जल)के सोलहवें भागकोभी नहीं प्राप्त होते जो मनुष्य इस प्रिय केदारक्षेत्रको प्राप्त होकर एकरात्रि टिकै ॥ २० ॥ हे देवि ! उसका निवास नित्य शिवालयमें होताहै, जो मनुष्य मंदाकिनी नदीमें स्नान करके पितरोंको पवित्र जलदान करतेहैं ।। २१ ॥ उन्होंने एकसौ एक कुलको तार दिया हे देवि ! यह पवित्र क्षेत्रहै देवताओंकोभी दुर्लभहै ॥ २२॥ इस क्षेत्रके दर्शन करके तथा यहां संसारके भयके नष्ट करनेवाले जलको पौवं तथा जो पुरुपोंमें श्रेष्ठ उस स्थानकी प्रदक्षिणा करतेहैं ॥ २३ ॥ मानो उन्होंने सातदीपवाली पृथियोंकी परिक्रमा की संपूर्ण तीथामें जो फलहै, और जो फल सब यज्ञोंमें है ॥२४ावह फल मनुष्योंकी यहां स्नानसे प्राप्त होताहै दक्षिणासहित अश्वमेध करनेसे जो फल मिलताद टससे करोडगुना फल प्राप्त होताहै, इसमें कुछ संशय नहीं है ॥२५॥ मनुष्य तंप सुवर्णकी समान कान्तियान संपूर्ण आभूपोंसे भूपित गण होकर मय जीवोंको पराभव करते हुए पिचरतेहैं ॥ २६ ॥ ऋपियोंके और देपोरे यक्ष और राक्षस गंधर्ष इनफ ग्रह भृत सिंहफे जो कोई पिरोधी है ॥२०॥ इन्द्र हो पा ब्रह्मा अपया विष्णु पा प्रजापति इन सबोंका कोई विरोधी हो उसका भापाटीकासमेत-प० ७. (१७) हे देवि मम भक्ताश्च मृताः केदारचिंतकाः॥ते पि सर्वे गणा मा भवत्येव न संशयः॥२९।। एककालं द्रिकालं वा त्रिकालं नित्य- मेव च ॥ये स्मरन्ति च केदारं शिवभक्त्या जितेन्द्रियाः ॥३०॥ न तेपा विद्यते पापं सहस्रगुणितं फलम् ॥ यत्फलं लभते यज्ञैः साश्वमेधैः सदक्षिणैः॥३१॥ इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे श्रीश्वरदेवीसंवादे पंचयोगेन्द्रे- च्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहकैलासगमनं नाम पष्टः पटलः॥६॥ वध होताहै इसमें कुछ संशय नहीं है ॥ २९ ॥ एककाल वा दोनोंकाल वा तीनों काल वा नित्य जो पुरुप केदारको शिवभक्तिसे जितेन्द्रिय होकर स्मरण करते हैं ॥ ३०॥ उनसे पाप कदापि नहीं होताहै दक्षिणासहित अश्वमेध यज्ञोंसे जो फल मिलताह सो केदारतीर्थसे प्राप्त होताहै ॥ ३१ ॥ इति केदारकल्पे शिवपार्वतीसंवाद भाषाटीकायां पष्टः पटलः ॥ ६ ॥ सप्तमः पटलः। श्रीश्वर उवाच ।। ॐ अतः परं प्रवक्ष्यामि केदारस्य तु यत्फलम्॥ मम वीर्यस्थितं देवि केदारं तीर्थमुत्तमम् ॥१॥ तत्र गत्वा न शोचंति जन्मसंसारवंधनात् ॥ तीर्थगो दुर्गतिं देवि न लभ्येत कदाचन ॥२॥ इदं तीर्थमिदं तीर्थ किं भ्रमंति च साधकाः ।। सकृत्पीत्वा तु कैदारं भवेयुर्मम सनिभाः ॥३॥आहृतास्ते च दै शुभ्राह्मविष्णुमहेश्वरैः । न तेषां पतनं चैव मम तुल्यान्विभा- शिवजी वाले हे देवि ! इसके आगे केदारके फलको कहताहूं यह उत्तम तीर्थ मेरे वीर्यसे स्थित हुआहै॥१॥तहां (उदक) जल पीकर शोक नहीं प्राप्त होताजन्म संसार बंधनसे रहित होकर कदापि तीर्थज्ञाता बुरी गतिको नहीं प्राप्त होताहै २॥ यह तीर्थहैरयह जानकर सिद्धलोग क्यों भ्रमण करतेहैं ? केदारके जलको एक- बार पीकर मेरे समान होतेहैं ॥ ३ ॥ ब्रह्म, विष्णु, महेश्वर, इन सबोंसे वह शुभ विमानोंमें बुलाया जाताहै उन विमानोंसे पतन नहीं होताहै, उस मनुष्यको मेरी १ पठयर्थे चतुर्थी । २ (१८) केदारकल्प। वयेत्॥४॥तथैव मम भक्ता ये मत्कथारंजिताश्च ये।। कदारमुदकं पीत्वा न तेपां विद्यते भयम् ॥५॥ यथाहं सर्वलोकेषु पूज्य- मानः सुरासुरैः।।तथा तेपि विशालाक्षि पूज्यते दिवि दैवतैः।।६।। न जन्मान्येव दुःखानि बंधः कश्चिन्न जायते ॥ सततं तर्पिता देवि मम तोयेन पुत्रकाः॥७॥ यथा स्कंदश्च नंदी च महा- कालो विनायकः ॥ तथा ते मम पुत्राश्च विचरंति न संशयः ॥८॥क्रीडते सर्वदा देवि गणैः सार्धे वरानने ॥ कामरूपधरा ये ते वर्धते मम तेजसा ॥ ९॥ यत्राहं ते गणास्तत्र विचरंति न संशयः॥ अहमेव वरारोहे गणैः परिवृतः सदा ॥ १० ॥ तीर्थानां परमं तीर्थ गतीनां परमा गतिः । ज्ञानिनां परमं ज्ञानं मोक्षाणां मोक्ष उत्तमः ॥ ११॥ अपूर्व सर्वतीर्थानां मनसोड- भीष्टदायकम् ॥ क्षेत्रं तु परमं देवि केदारं तीर्थमुत्तमम् ॥ १२ ॥ एकदापि जनो यस्मात्केदारेऽत्र विनिश्चितः ॥ तेन शोधित आत्मा वै कुलानां चोद्धृतं शतम् ॥ १३ ॥ कालंजरे महाकण समान जाने ॥ ४ ॥ और मेरे भक्त जो मेरी कथा ममहैं, केदारमें जलपान फरके वे निर्भय होतेहैं ॥५॥ जिसप्रकार मैं सब लोकोंमें सुर और असुरोंसे पृजितह हे विशालाक्षि! इसी प्रकार वे भक्तभी दिव्य देवतोंसे पूजे जाते॥६॥ उसको जन्ममें दुःख और बंधन नहीं होते हे देवि ! वह पुत्र मेरे जलसे निरन्तर तृप्त किया जाताहै ॥ ७॥ जैसे स्कंद और नंदी महाकाल और विनायक उसी प्रकार के मेरेपुत्र सर्वत्र पिचरतेहैं इसमें कुछ संशय नहीं॥ ८॥ हे वरानने । वे फामरूप (इच्छानुफूलस्वरूप) धारण किये गणोंके साथ खेलते हैं और मेरे समान तेजस्वी हो पढतेह।।।जहाँ मैं रहताहूं यहाही गण विचरतेहैं इसमें कुछ संशय नहीं में श्रेष्ठ नंदी पृपभपर चढा गीसे चारों ओर पिरा रहताई ॥१०॥ तीर्थी में परमतीह औरगतियोंमें परम गति और ज्ञानोंमें परमज्ञानह मोक्षामि परममोक्ष है। १९ ॥ हे देवि ! समत्त तीयोंमें यह तीर्घ अपर्व है मनकी कामनाफा दापफहै और क्षेत्राम परमक्षेत्ररूप यह फेदार टत्तम तीर्थहै ।। १२ ॥ एक धारभी मनुष्य फेदारम निषित गमन फर तो उसने एफसी आठ पुलसहित अपनी आत्मा गुदपी ॥ १३ ॥ फालिनरम महापर्णपर तथा पाराणसीपर शिपफे मंदिरमें प्रत भापाटीकासमेत-प०८. (१९) वाराणस्यां हरालये ॥ अनाशेन मृतानां च यत्फलं परिकीति- तम् ॥ १४ ॥ सर्वावस्थां गतस्यापि भुंजतो विपयानपि ॥ त्रिकालमनतो वापि केदारं तु फलप्रदम् ॥ १५॥ अन्यतीर्थ- समायोगे यस्तु प्राणान्परित्यजेत् ॥ न तां गतिमवाप्नोति केदारेण तु या भवेत् ॥ १६ ॥ पंचानीन्धारयेन्नित्यमन्यक्षेत्रेषु मानवः । स वामकरपानो वा गतिं प्राप्नोति चोत्तमाम् ॥१७॥ इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे ईश्वरदेवीसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छा- सिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहकैलास- गमनं नाम सतमः पटलः॥ ७॥ रखने अथवा मरनेसे जो फल कहाहै ॥ १४ ॥ संपूर्ण अवस्थामें प्राप्त हुए, वा विषयोंकोभी भोगते हुए तीनों कालमें, केदारतीयही महाफलदायी है ॥ १५ ॥ और तीर्यपर यदि प्राणोंको त्यागन करें तो उस गतिको नहीं प्राप्त होते जो केदारसेवनसे प्राप्त होतीहै ॥ १६ ॥ मनुष्य और क्षेत्रोंमें पंचामिको सेवन करें उससे भी उत्तमगति वामहायसे जल पानकरनेसे यहां भक्ति प्राप्त करतेहैं १७॥ इति श्रीफ़ेदारकल्पे शिवपार्वतीसंगादे मापाटीकायां सप्तमः पटलः ॥ ७ ॥ अष्टमः पटलः। श्रीईश्वर उवाच ॥ ॐ अतः परं प्रवक्ष्यामि केदारस्य महत्फलम् ॥ सारात्सारं समुद्धृत्य क्षेत्रं यत्तत्कृतं मया ॥१॥ देवतानां यथा मध्ये प्रधानत्वं वरानने ॥ त्रयोदशवयोमृर्तेर्महाँ- श्वानन्दवृत्तिषु ॥ २ ॥ सिद्धानां च क्षमा यदल्लवणं भोजने यथा ॥ तद्वत्सर्वेषु तीर्थेपु केदारोदकमुत्तमम् ॥३॥ धेनूनां शिवजी वोले ! अब यहांसे आगे केदारतार्यका वडा फल कहताहूं सारमेसे सार, निकालकर यह क्षेत्ररूप मैंने बनायाहै ॥ १ ॥ हे वरानने ! जैसे संपूर्ण देवताओंमेसे मेरा अधिक होना कहाहै, उसीमकार सब तीयामें उत्तम केदार है ॥ २॥ निस प्रकार स्वाभाविक, साधुओम क्षमाहै, और भोजनमें श्रेष्ठ लवणहै उसीप्रकार समस्त तीथाम केदारका जल दत्तमहै ।। ३ ।। जैसे (२०) केदारकल्प। कामगौर्यबत्सर्वासामुत्तमोत्तमा ॥ सर्वरत्नेषु वै सारं कौस्तु- भस्तु यथोत्तमम् ॥ ४ ॥ तद्वत्सर्वेषु तीर्थेषु केदारं परिकीर्ति- तम् ॥ यस्य स्मरणमात्रेण मुच्यते भवबंधनात् ।। ५ ॥ दक्ष- यज्ञे महाभागे त्वनिमित्तेनये पुरा। पूर्वशप्ता मया देवि ते भवन्ति गणेश्वराः ॥६॥ घृतं सारं यथा दन्नः पुष्पसारं यथा मधु ॥ वेदानां सामवेदश्च यथा वै मुख्य उच्यते ॥७॥ सोपेण मया प्रोक्तं केदारसलिलं तथा ॥ मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति ॥८॥ इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्प ईश्वरदेवीसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छा- सिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहकैलास- गमनं नामाष्टमः पटलः ॥ ८॥ उत्तम कामधेनु और जैसे संपूर्ण रत्नों में कौस्तुभमणि सारहै ॥ ४ ॥ उनकेही समान समस्त तीयों में केदार उत्तमैहै जिसके स्मरण मात्रसे संसारबंधनसे प्राणी छूटते हैं ॥५॥हे महाभागे ! पूर्वकालमें तुम्हारे निमित्त जो दक्षके यज्ञमें थे, वे पहले सात गणेश्वर हुए ॥ ६॥ जैसे दधिसे घी सारहै और पुप्पोंका सार मधु' (शहत) है और वेदोंमें सामवेद जैसे मुख्य कहाहै वैसे तीर्थोमें केदारहै ॥७॥ सो संक्षेपसे मैंने वर्णन किया ऐसेही केदारका जलभी सारहै पानकर्ता पुरुष समस्त- पापोंसे छूटकर रुद्रलोकको प्राप्त होताहै ॥ ८ ॥ इति श्रीकेदारकल्पे शिवपार्वतीसंवादे भापाटीकायामष्टमः पटलः ॥ ८॥ नवमः पटलः। श्रीदेव्युवाच ।। ॐ अप्राप्तास्तु गृहे वापि यत्र तत्र गताश्च ये ॥ ये मृता हिममुदिश्य श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १॥ पर्वतो नैव दृष्टो यर्नव पीतं तु तज्जलम्॥तेषां गातः का देवेश ब्रूहि तत्त्वेन पार्वती बोली तीर्थकी कामनाफरता हुआ जो मनुष्य तीर्थमें न जाफर घरमें वा और कहीं उक्त देवताके उद्देशसे मरजाय तो उसकी गतिको विधिपूर्वक सुन- ना चाहताई ॥ १ ॥ हे देवेश ! जिन्होंने यह पर्वत नहीं देखा और उसका जल भापाटीकासमेत-प०९. (२१) शंकर ॥ २ ॥ श्रीश्वर उवाच ॥ शृणु देवि यथातत्त्वं केदारं तीर्थमुत्तमम् । तत्र पीत्वा तु मुच्येत जन्मसंसारवंधनात् ॥३॥ अप्राप्ता मां मृता ये च पथि देशान्तरे तथा ॥ ते भवन्ति गणा मह्यं मम लोके सुरेश्वरि ॥४॥ पर्वते क्षणमात्रेण सर्वपापक्षयो भवेत् ॥ पीतमात्रे जले देवि गणो भवति शूलभृत् ॥ ५ ॥ अवध्यः कामरूपी च सर्वभूताभयप्रदः ॥ गच्छतीश्वरलोकेषु हेमकुंडलमंडितः ॥६॥ अन्यक्षेत्रेषु यत्पुण्यं केदारे तु न तादृशम् ।। अध्वराणां सहस्त्रेषु विधिवद्विहितेषु च ॥ ७॥न ल- भ्यते गतिमत्यः केदारेण तु या भवेत्॥ जन्मांतरसहस्रेषु यत्फलं यज्ञयाजिनाम् ॥ ८॥ केदारोदकपानेन तत्फलं परिकीर्ति- तम् ॥ त्रिकालं परिभुजानः क्रीडते त्रिदशैरपि ॥९॥केदारोद- कपानेन ये भ्रमंति सुपंडिताः॥ तेषां पुण्यफलं जन्म कृतार्थास्ते नरोत्तमाः ॥ १०॥ विकर्माणि चरन्त्येव मम भक्तास्तु नहीं पान किया हे शिवनी ! उनकी क्यागति होगी ? सो तत्त्वपूर्वक कहीं ॥२॥ शिवजी बोले हे देवि! केदारतीर्थ परमश्रेष्टहै सो यथार्थसे सुनो तहां मनुष्य जलपान करके जन्म संसार बंधनंसे छूटताहै ॥ ३॥ हे सुरेश्वरि ! जो पुरुष मुझे विना प्राप्तहुएही मार्गमें तथा किसी देशमें मरजॉय वे मेरे लोकमें गण होतेहैं॥४॥ पर्वतके दर्शन मात्रसे समस्त पाप नाशको प्राप्त होतेहैं हेदेवि ! जलके पीतेही त्रिशूलको धारण करनेवाला गण होताहै ॥ ५ ॥ और वह अवश्य (किसीसे न मारनेयोग्य) तथा इच्छानुकूलरूप धारण करनेवाला और समस्त जीवोंको भय- देनेवाला सुवर्णके कुंडलसे शोभित हो शिवलोकमें प्राप्त होताहै ॥ ६ ॥ और क्षेत्रों में जो पुण्य कहाहै वैसा न्यूनपुण्य केदारमें नहीं होता सहस्रों यज्ञ विधिपूर्वक करनेपर ।। ७॥ मनुष्य वैसी गति नहीं पाता जैसी केदारतीर्थसे मिलतीहै सहस्र जन्मोंमें यज्ञ करनेवालोंको जो फल होताहै ॥ ८ ॥ वह फल केदारमें केवल जल- पान करनेसे मिलताह, और तीनों काल देवताओंके सहित भोगोंको भोगताहै ॥ ९ ॥ जो चतुर मनुष्य केदारके जलपान करनेके निमित्त भ्रमण करतेहैं. उनका जन्म पुण्यके फलवालाहै और वे मनुष्य कृतकृत्य हैं ।॥ १० ॥ जो मेरे (२२) केदारफल्प। ये नराः॥यत्र तत्र गता वापि लभन्ते गणपालताम् ॥ ११ ॥ न केदारात्परं गुह्यं परं धामप्रदायकम् ॥ देवि दत्ताभयं यच्च मम लिंगादिनिःसृतम् ॥ १२॥ये पिबति नरा भत्त्या मनः कृत्वा सुयंत्रितम् ॥ तेऽपि गच्छंति वै मुक्ति संसारभयवंधनात् ॥१३॥ पीतमात्रेण देवेशि यथा मे वचनं भवेत् ॥ तथा तेषां विशालाक्षि न भयं विद्यते कचित् ॥ १४ ॥ स्वच्छन्दगामिनो नित्यं रमते देवतैः प्रिये ॥ देवदानवभूतेषु पूजनीयाः समंततः ॥१५॥ तीर्थमात्रमिदं गुह्यं तब देवि प्रकाशितम् ॥अतः परं महातीर्थ न भूतं न भविष्यति।।३६॥ यथैवेक्षुरसों मध्ये दनो घृतमिवोद्धृतम् ।। सर्वलोके हि श्रीर्यद्वत्तद्वत्केदारमुत्तमम् ॥ १७॥ तिलेपु च यथा तैलं पुप्पेषु च यथा मधु ॥ तद्वत्केदारतीर्थं च सर्वसारसमुच्च- यम् ॥ १८॥ मृतके सूतके चैव पाचितं पापकर्मणाम् ॥ रज- स्वलादिभिः स्पृष्टं भोजनं परिवर्जयेत् ॥ १९॥ ये न रक्षति भक्तजन कुत्सित कर्मकरनेकी रक्षा करते हैं जहां कहीं प्राप्त होकर वे गणोंके स्वामी होनेके फलवाले हैं ॥ ११ ॥ केदारसे अधिक गुप्तस्थान कोई नहीं है प्राणियोंको अभय देनेवाला मेरे लिंगसे उत्पन्न हुआ केदारका जल ॥ १२ ॥ जो मनुष्य भक्तिसे सावधान चित्तहो पानकरते हैं वे, मुक्तिको प्राप्त होते हैं और ससार बंधनसे छूटतेहैं ॥ १३ ॥ हे देवेशि ! उदक पीनेही मात्रसे मेरे वचनके अनुसार उनको कहींभी भय नहीं प्राप्त होता ॥ १४ ॥ हे प्रिये ! वे इच्छापूर्वक गमन करते हुए देवतोंके साथ रमण करते हैं, और देवता व राक्षसोंसे चारों ओर सन्मानित होतेहैं ॥ १५ ॥ हे देवि ! यह तीर्थ परम गोपनीय तुमसे प्रका- शित किया इससे अधिक कोई तीर्थ न हुआ और न होगा ॥ १६ ॥ जैसे इक्षु- (ईस) के मध्यमें रस, दहीफे मध्य घी, और जिसमकार सब संसारमें लक्ष्मी उत्तमहे तिसप्रकार फेदार उत्तम फहाँहै ॥ १७ ॥ जिसमकार तिलोंके मध्य तेल और पुष्पॉमें मधु तद्वत् यह फेदार तीयोंका सारहै ।। १८ ॥ मृतकमें और सुत- कहोनेपर और पाप कर्ममें बनाया भोजन तथा रजस्वलास्त्रीआदिसे स्पर्श किया भोजन त्यागे ॥ १९॥ हे परारोहे ! जो मनुष्य पापोंसे रक्षा नहीं करता पा सब . भापाटीकासमेत-प०९. (२३) पापेभ्यो सर्वावस्थां गता आपि।मृत्युकालं वरारोहे गता गृह्णन्ति तज्जलम् ॥ २० ॥ रक्षति च प्रयत्नेन पापकर्मणि भोजनम् ।। तेपां रक्षामि तं देहं शुचिं प्रयतमानसः ॥२१॥ यस्तु रत्नवती दद्यात्सागरांतां वसुंधराम् ॥ न लभेत गति तां तु केदारेण हि या भवेत् ।। २२॥ कैदारं तु पिवेत्तोयं पण्मासञ्च सुयंत्रितः ॥ तेन क्षीणं भवैदेवि संसारभयवंधनम् ॥ २३॥ भूमिशायी ब्रह्म- चारी चैकभुक्तिश्च तिष्ठति ॥ नित्यस्नायी विधानेन ध्यायते जंपते सदा ॥ २४॥ अथवापि च पात्रं शिवतीर्थ प्रकारयेत् ॥ तेन सबै कृतं देवि कृतकृत्येन निश्चितम् ॥ २५ ॥ दुष्प्राप्यं' देवि केदार मानुपस्य वरानने ॥ये जति नरास्तत्र कृतज्ञास्ते न संशयः ॥ २६ ॥ सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वयज्ञेष्ठ सुन्दरि॥ तदेकत्र कृतं चैव केदारं तु तथा कृतम् ॥ २७॥ दृष्टा चैव तु पीत्वा च गच्छंति परमां गतिम् ॥ एतत्ते कथितं सर्व महाख्यानं अवस्थाओंमें प्राप्त होके और मृत्युके समय जाकर, केदारके जलको ग्रहण कर- ताहै ।। २० ॥और पापकर्मोस यत्नपूर्वक भोजनकी रक्षा कीहो तो मैं दत्तचित्त होकर पवित्र देहसे उसकी रक्षा करताई ॥ २१ ॥ जो मनुष्य समुद्रपर्यन्त पृथि- वीको दान करै तौभी उस गतिको नहीं पाता, जैसी केदारसे प्राप्त होतीहै।।२२॥ हे देवि ! जो सावधान चित्तहो छैमास पर्यन्त केदारके जलको पीवै तो, संसार- बंधनसे मुक्त होजाताहै ॥ २३ ॥ भूमिमें शयन करनेवाला वा ब्रह्मचारी एक- भुक्तिसहित हो अथवा नित्य स्नान करनेवाला हो, तथा सदा विधानसे ध्यान करता हो, वा जप करता हो ॥ २४ ॥ तथा छै रात्रि पर्यन्त इस शिवतीर्थपर जागरण प्रकाशित करे । हे देवि ! उसने सब कुछ कृतकृत्य मनसे कर लिया ॥ २५ ॥ हे वरानने ! मनुष्यको केदार कठिनतासे प्राप्यहै,जो मनुष्य वहां गमन फरतेहैं वे कृतकृत्य, इसमें कुछ संशय नहीं ॥ २६॥ हे सुन्दार ! संपूर्ण तीथों में अथवा समस्त यज्ञोंमें जो पुण्यहै सो सव एकत्र किया हुआ यह केदारहै ॥२७॥ इसका दर्शन करके और जलपान करके मनुष्य परमगतिको पहुंचताहै, हे वरा. १ आत्मनेपदमार्पम् । २ इहापि तथा । " (२४) केदारकल्प। वरानने ॥ २८॥ तीर्थराजप्रभावस्तु मया ते समुदाहृतः ॥ केदारस्य तथा ख्यातं स्वर्गारोहणमुत्तमम् ॥ २९ ॥ य इदं शृणुयानित्यं यश्चेदं पठते नरः ॥ मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोके स गच्छति ॥ ३०॥ इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे श्रीश्वरदेवीसंवादे पंचयोगेन्द्रे- च्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहक- लासगमनं नाम नवमः पटलः ॥९॥ नने ! यह संपूर्ण कथा तुमसे कही ॥ २८ ॥ तीर्थराज केदारका प्रभाव मैंने कहा यह तीर्थ स्वर्गका चढ़ानेवाला है ॥२९॥ जो मनुस्य इस माहात्म्यको नित्य श्रवण करै, अथवा पढ़े वह सब पापोंसे छूट जाताहै और रुद्रलोकमें प्राप्त होताहै ॥ ३०॥ इति श्रीकेदारकल्पे शिवपार्वतीसवादे भापाटीकायां नमः पटलः ॥ ९॥ दशमः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॐ अतः परं प्रवक्ष्यामि केदारफलमुत्तमम् ।। तत्पीत्वा यद्भवेत्पुण्यं तन्मे निगदतःशृणु ॥३॥ एककालं द्विकालं वा नित्यं केदारचिंतकाः ॥ न ते पापेन लिप्यते पद्मपत्रमिवां- भसा ॥२॥ न केदारात्परं स्थानं न केदारात्परं तपः॥ न केदारात्परो मोक्षः स्वयं देवेन भापितम् ॥३॥ पृथिव्यां यानि लिंगानि ससमुद्रचराचरम् ॥ केदारस्य तु सर्वाणि कलां नाहति पोडशीम् ॥ ४ ॥कामयेस्त्री सहस्राणि पिवेत्केदार शिवजी बोले इसके आगे केदारका उत्तमफल कहताहूं। उसके जलको पीकर जो पुण्य होताहै वह मुझसे सुनो ॥ १॥ जो पुरुप एक समय वा दो अथवा तीनोंकाल नित्य फेदारका स्मरण करते हैं जैसे जलसे कमलपत्र लिप्त नहीं होता टसी प्रकार के पापसे लिप्त नहीं होते ॥२॥ केदारसे उत्तम स्थान नहींहै और न फेदारसे अधिक तपहै । न केदारसे अधिक मोक्षहै । यह स्वयम् शिवजीने पहाहै ॥ ३ ॥ समुद्रपर्यन्त चर और अचरवाली पृथिवीपर जितने लिंग, वै- टारके सोलहय भागकोभी नहीं पहुंचते ॥४॥ सहसों स्त्रियों की कामना कर- भापांटीकासमेत-प० १०. : (२५) शम्वरम् ॥ पीतमात्र जले देवि किमर्थं परितप्यते ॥५॥ ज्ञानशक्त्यापि संस्पृष्टो लीयते परमे पदे॥काले वा यदिवा काले किं करिष्यति तच्छृणु।।६॥जन्मांतरसहस्रेषु लक्षकोटिशतेपु च ।। प्राप्नोति धर्मयुक्तात्मा शिवभाक्तं तु मानवः॥णामासे तथा श्रावणे च शुक्ले शम्भुतिथिर्यदा ॥ मध्य दिनं गते सूर्ये तदा शुष्यति तज्जलम् ॥ ८ ॥ शुष्के वै जलरेखा तु दृश्यते चतुरंगुला ॥ इदं स्रोतःप्रवृत्तं तु चैत्रे सितदले शिवे ॥९॥ शिवरेतो जलं तत्र प्रत्यक्ष कुंडमध्यतः ॥ आपाढे :श्रावणे चैव कार्तिके च तथैव च ॥ १० ॥ त्रिभिर्मासैमहापुण्यं कथितं तव सुत्रते। स्नात्वा मंदाकिनी पुण्यां पितृभ्यः पिंडमावहेत् ॥११॥ ईशा- नायतनं गत्वा अर्चयित्वा वृपध्वजम् ॥ स्थित्वा कुंडसमीपं च भावयुक्तेन चेतसा ॥ १२॥ तच्चारु प्राप्नुयाद्यस्तु शास्त्रदृष्टेन कर्मणा।।पंचरत्नसमायुक्तं तरुंमानसमन्वितम्॥१३॥ उदकेन च मिश्रं यत्ततः पंचात्मकं परम्। आचार्यः सर्वशास्त्राणांन्यासंकुर्या- 'नेवाला केदारके उत्तम जलको पावे । हे देवि ! उदक पीनेहीमात्रसे क्यों दुःखी होताहै ? अर्थात् दुःखी नहीं रहता ॥५॥ ज्ञानके विना सामर्थ्य सेभी जलका स्पर्श करै तो वह परम पदमें लय होताहै । और बहु कालमें वा अकालमें क्या करैगा यहभी सुनो। ६४ सहस्रों जन्मोंसे लक्ष वा शतकोटि जन्मोंसे वह मुक्त आत्मा पुरुष शिवभक्तिको प्राप्त होताहै ॥ ७ ॥ श्रावणमासकी शुक्लपक्षको चतुर्दशीके दिन मध्याह समय तथा उस जलके सूख जानेपर ॥८॥ शुष्क जलमें चार अंगुल जलकी रेखा दोसै और वह नदी शुक्ल पक्षके वीत जानेपर आधे स्रोतवाली रहतीहै ॥ ९॥ वह शिवके वीर्यसे उत्पन्न हुआ जल कुंडके मध्यमें प्रत्यक्ष दिखाई देताहै आपाह तथा श्रावण और कार्तिक मासमें ॥ १० ॥ हे सुव्रते ! इन तीन मासमें वह जल वडा पवित्रहै और पवित्र मंदाकिनी नदीपर स्नान कर पितरोंको पिंडदान करै ॥ ११॥ ईशान दिशाकी ओर जाकर शिवजीका पूजनकर प्रेमयुक्त चित्तसे कंडके समीप स्थित हो ॥ १२ ॥ शास्त्रकी विधिके अनुसार बहुत मान- पूर्वक पंचरत्न सहित वृक्षका स्थापन करै ।। १३ । जलसे मिला हुआ वह पंच-
(२६)
फेदारकल्प।
द्विधानतः।।१४ादशाक्षरी पटेद्विद्यां परमाक्षरसंयुताम्॥तेनाभिमं-
त्रितंतोयं ददाति ज्ञानमुत्तमम्।।१६॥ज्ञात्वा देवं तथादेवि नंदि-
स्कंदविनायकान्।।जयं च विजयं चैव मोहिनीः स्तंभनीस्तथा ॥
॥१६॥ ईशानाभिमुखो भूत्वा पिवेद्वामेन पाणिना ॥ दक्षिणेन
च तत्पीत्वा पातासौ वृपभो भवेत् ॥ १७ ॥ भूमिभागं स्व-
जानुभ्यां हस्तयुग्मं प्रसार्य चापिक्षमा त्रिवार चांगलि स्फोटं तु
कारयेत् ॥ १८ ॥ अहं ब्रह्माप्यहं विष्णुरहं रुद्रस्तथैव च ॥
इत्थं पीत्वा नरा यांति विधिना परमं पदम् ॥ १९॥ ईशानं
तु नमस्कृत्य कृतांजलिपुटो नतः ॥ पीत्वा तु लभते ज्ञानं तीर्थ-
स्नानं परां गतिम् ।। २०॥
इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे श्रीश्वरदेवीसंवादे पंचयोगेन्द्रे-
च्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेह-
कलासगमनं नाम दशमः पटलः ॥१०॥
रत्न है उससे शास्त्र विधान के अनुसार न्यास आदि करना योग्यहै ॥ १४ ॥ और
दश अक्षरवाले मंत्रको पटै, उस मंत्रसे जल उत्तम ज्ञानको देताहै ॥१५॥ हे देवि!
शिव देवको तथा नन्दीस्कंद विनायक इनको जानकर जय विजय मोहिनी तथा
स्तंभिनीको स्मरणकर ॥ १६ ॥ ईशानकी ओर होकर वाम हाथसे जलको पीवै,
और दाहिने हायसे जो पीवे तो बैल होताहै ॥ १७ ॥ भूमिपर प्राप्त होकरजंघासे
दोनों हाय फैलाकर (अंगुलीसे) तीनचार तीनस्फोटकरै ॥ १८ ॥ मैही ब्रह्मा हूं
मैंही विष्णु, और मैं महेश्वरहूं यह जाने इस प्रकार मनुष्य जलको विधिसे पीकर
परम पदको प्राप्त होतेहैं ॥ १९ ॥ईशान दिशामें अंजलि बांधके नमस्कार करके
जलपीकर ज्ञानको प्राप्त होताहै तीर्थमें स्नान करनेसे परमगति मिलती है ॥ २०॥
इति श्रीकेदारकल्पे शिवगौरीसवादे भापार्टीकाया दशमः पटलः ॥ १० ॥
भापाटीकासमेत-प०११.
(२७)
एकादशः पटलः।
श्रीश्वर उवाच ॥ ॐ अतः परं प्रवक्ष्यामि केदारफलमुत्तमम् ॥
किमधीतैस्तपोवेदैर्यज्ञैर्वहुसदक्षिणैः ॥ १ ॥ किं तप्तेनापि
तपसा किं व्रतेन जपेन वा ।। किं च तीर्थाभिपेकेन किं वेन्द्रि-
यदमेन च ॥२॥ पीत्वा केदारमुदकं स्वच्छन्दं क्रीडते सदा ॥
यस्य देशस्य मध्ये तु पुण्यभागे स गच्छति ॥ ३ ॥ सोऽपि
देशो भवेत्पुण्यः किं पुनस्तस्य वांधवाः॥ एतत्ते कथितो देवि
केदारस्य च संभवः॥४॥ ज्ञातेन यत्फलं तेन तत्सर्वं कथितं
तव ॥ न मुच्यते नरा देवि न दैत्या न च राक्षसाः ॥५॥ न
नागा नापि गंधर्वा न यक्षा नैव किन्नराः॥ विद्याधरगणा देवि
योगिन्योऽप्सरसांगणाः॥६॥ सिंहेन पालिताः सर्वे सप्तकोटि-
गणेश्वराः ॥ न तेपां मोचनार्थाय दर्शितं तीर्थमुत्तमम् ॥ ७॥
इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे श्रीश्वरदेवीसंवादे पंचयोगेन्द्रे-
च्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेह-
कैलासगमनं नामैकादशः पटलः॥ ११ ॥
ईश्वर वोले-अब केदारका श्रेष्ठ फल कहताहूं वेद पढने तथा अधिक दक्षिणा
देनेवाले यज्ञोंसे क्या फलहै और तपोंके तपनेसे क्या फलहै ॥१॥ व्रत और
तपस्यासे क्याफलहै तीर्थस्नान दान शान्ति और इन्द्रिय दमनसे क्या फल है
॥ २ ॥ केदारका जलपान करनेसे प्राणी स्वच्छन्द विचरताहै वह पुण्यात्मा
जिस देशमें जाताहै ॥ ३ ॥ वह देश पवित्र होजाताहै फिर उसके बांधवोंकी तो
बातही क्याहै हे देवि यह तुमसे केदारका फल कहा ॥ ४ ॥ इसके जाननेसे
जो फल होताहै तुमसे वह सब कहा हे देवि ! उस पुण्यात्माको मनुष्य दैत्य
राक्षस ॥५॥ नाग गंधर्व यक्ष किन्नर कोईभी नहीं मार सकते, हे देवि उसको
विद्याधर योगी तथा अप्सरा कोई नहीं सतासक्ते ॥ ६ ॥ सातकरोड गणेश्वर
सिंहसे पालितहैं उनके बचानेके निमित्त यह उत्तम तीर्थहै ।। ७ ॥
इति श्रीकेदारकल्पे शिवपार्वतीसंवादे भाषाटीकायामेकादशः पटलः ॥ ११ ॥
(२८) केदारकल्प । द्वादशः पटलः। श्रीदेव्युवाच॥ॐ कीदृशी चापि सा विद्या चाक्षराणि कति प्रभो। आख्याहि देवदेवेश रहस्यं परमं महत् ॥१॥ श्रीश्वर उवाच ॥ ॐकारद्वयसंयुक्ता भ्रूकारत्रयभूपिता ॥ रुंकारपंचकोपेता दशबि- न्दुप्रपूरिता ॥२॥ॐ अथ शिवाघोरमंत्रः॥ ॐ रूं झू झू रूं हं ॐ अथ मंत्रन्यासः॥अंगन्यासं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि यथाविधि ॥ वामांगुष्ठात्समारभ्य न्यस्येद्रीजेदेशांगुलीः॥३॥ करन्यासो मया प्रोक्तोागन्यासं ततः शृणु ॥ ॐ शिखायाम्॥ झं शिरसि।छूि नेत्रयोः वोक्षं भ्रुवोगावं हृदये।झू नाभौ। वाह्वोः॥रूं गुह्ये॥ॐरूं पादयोः॥अंगन्यासोमया प्रोक्तो दिक्षु न्यासमिमं शृणु ॥ ४ ॥ ॐ कारं पूर्वदिग्भागे रूमाग्नेये तथैव च ॥ शुंकारं दक्षिणे चैवरूं नैर्ऋते ततो न्यसेत्॥६॥शंकारं वारुणे चैव रूंकारं वायुगोचरे ॥ शंकारमुत्तरे चैव रूमशिान्यां च वैन्यसेत् ॥ ६॥ रूंकारं चाधः क्षिप्य क्षिपेदोंकारमूर्द्धतः॥ दिक्षु न्यासो मया प्रोक्तो येन धर्मस्थितिर्भवेत् ॥ ७॥ कुंड- न्यासं प्रवक्ष्यामि ये वै कुवैति साधकाः॥ ॐकारं कुंडमध्ये च देवी बोली, कि प्रभो ! वह विद्या कैसी है ? और कौन कितने अक्षरहैं ? हे देवदेवेश ! सो परमगुप्त वार्ता कहो ॥ १॥ शिवजी बोले दो ओंकार सहित और तीन शंकार तथा पांच खूकार और दस विन्दुसे पूर्ण विद्या जाननी अर्थात् * सं हूं हं हं ॐ यह मंत्र है. ॥२॥ हे देवि अब अंगन्यास को कहताई विधिपूर्वक सुनो वाएं अंगूठेसे लेकर दस अंगुलियोंमें ॥ ३ ॥ कर- न्यास करै अब अंगन्यास सुनो शिसामें ॐ शिरमें रं, नेत्रमें झू मुखमें हं भौंमें खू हृदयमें सं,नाभिमें सूं दोनों भुजामें रं गुह्येन्द्रयमें संॐ चरणों में यह अंग- न्यास तुझसे कहा अब दिशान्यास सुनो ॥ ४॥ ॐकार पूर्वदिशाके भागमें से आपेय कोणमें क्षं दक्षिण दिशामें नैर्ऋत कोणमें न्यासकर ॥५॥ तूं को पश्चिममें और से फो घायु कोणमें इंशर को उत्तरमें सैंको ईशान दिशामें रक्स ॥ ६ ॥ संगो पाताल ॐ को ऊपर रक्खै दिशाओंका न्यास कहा,जिससे धर्मकी स्थितिहो ॥ ७ ॥ अब एंटन्यासको कहताहूं जो साधक करतेहैं ॐ कारको भापाटीकासमेत-१० १२. (२९) रूंकार पूर्वतो न्यसेत् ॥ ८॥ शंकारं चाग्निदिग्भागे रूंकारं या- म्यतो न्यसेत् ॥ शंकारं नैते न्यस्य रूंकारं वारुणे न्यसेत् ।। ॥९॥ रुंकारं वायुकोणे तु रूंकारमुत्तरे न्यसेत् ॥ईशानकोणे तु रुंकारमोकारं व्यापकं न्यसेत् ॥ १० ॥ एतत्कृत्वा विधानेन कैदारंसलिलं पिवेत् ॥ कृष्णाष्टम्यां चतुर्दश्यामेवं विद्याभिमंत्रि- तम् ॥ ११॥ यः पिबेदुदकं देवि केदारसदृशो भवेत् ॥ अज्ञा- त्वा च पिवेदेवि विद्याहीनस्तु मानवः ॥ १२ ॥ विद्यायुक्तो भवदेवि नात्र कार्या विचारणा । मंदाकिन्यां तु तत्तोयं पिबन्दै वेदविद्भवेत् ॥ १३ ॥ कैदारमुदकं पीत्वा गृहे चैव समागतान् ।। क्षमापयित्वा वाचार्याञ्छास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ १४ ॥ मुद्रिकां छत्रिकं चैव पादुकां तत्र दापयेत् ॥ यः स्नात्वान्यमना भूत्वा दद्यानां च पयस्विनीम् ॥ १५॥ तांबूलं च विशेपेण ततो दत्वा क्षमापयेत् ॥ त्वत्प्रसादात्कृतार्थोहं भवे जन्मनि जन्मनि॥१६॥ दद्याच्छत्त्यनुसारेण विना शास्त्रं न कारयेत् ॥ तस्मिंस्तुऽप्टेप्यह कुंडके मध्यमें और लंको पूर्वकी ओर धरे ॥ ८॥ आनेय दिशाकी ओर झूको, रूंको दक्षिण दिशाको ओर झूकारको नैर्ऋत भागमें रखकर रूको पश्चिमकी तरफ धरै ॥ ९ ॥ शृंको वायुकोणमें रूंको उत्तरमें धरै ईशान कोणमें संको ॐ कारको व्यापकमें रक्खै ॥ १०॥ इस न्यासको विधिपूर्वक समाप्त करके केदारके जलको पीवै कृष्णपक्षकी अष्टमीको वा चतुर्दशीको पूर्वोक्त विद्यासे अभिमंत्रित ॥ ११ ॥ जलको जो मनुष्य पीताहै हे देवि ! वह केदारकी समान होजाताहै जानकरके विद्याहीन पुरुष जलको न पीवै॥१२॥ हे देवि ! वह विद्या युक्त होताहै इसमें कुछ संशय नहीं मंदाकिनीमें जो मनुष्य जलपान करै वह वेदवेत्ता होताहै ॥ १३ ॥ केदारके जलको पीकर अपने घर लौट आवै तो आचार्योंसे प्रार्थना करके शास्त्रको विधिपूर्वक ॥ १४ ॥ मुद्रिका ( अंगूठी) छत्री खडाऊं यह देव और शक्तिका अनुसार वस्त्रालंकारादि दे दूध देने वाली गाय देव ॥१५॥ पानको देकर विशेष आचार्यसे प्रार्थना करै कि-आपकी प्रसन्नतासे मैं जन्म जन्ममें कृतार्थ हुआ ॥ १६ ॥ शक्तिके अनुसार दान देव १ आत्मनेपदमार्यम् ।
(३०) फेदारफल्प। तुष्टो मम तुल्यो ह्यसौ यतः ॥१७॥ तस्मिन्दत्तं हुतं जप्तः सर्व चाक्षयमाविशेत् ॥ पश्चात्संपूजयेदेवि शिवभक्तिपरायणम् ॥ ॥ १८॥ एप देवो यथाशक्त्या प्रीयतां मे त्रिलोचनः ॥ कुर्या- द्वित्तानुसारेण शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ १९ ॥ एतत्सर्वं यथान्यायं कथितं तव सुत्रते ॥ केदारस्य महाख्यानं मद्भावप्रदमुत्तमम् ॥२०॥ यस्त्विदं पठते नित्यं यश्चैव शृणुयादपि ।। मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति ॥२१॥ इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे ईश्वरदेवीसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छा- सिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहकैलास- गमनं नाम द्वादशः पटलः ।। १२॥ श्लोकाः २३५॥ शास्त्र के प्रतिकूल न कर उस आचार्यक संतुष्ट होनेपर मैं सन्तुष्ट होताई और वह दानकर्ता मेरे तुल्य होताहै ॥ १७ ॥ उसको दानदिया हवन तथा जप किया यह संपूर्ण अक्षय हो प्रवेश होताहै पीछे भक्तिपूर्वक शिवको पूजे ॥ १८॥ हे त्रिलोचन ! यथाशक्ति पूजा करनेसे मुझपर प्रसन्न हूजिये अपने धनके अनु- सार तथा शास्त्रके अनुकूल दान करना चाहिये ॥ १९ ॥ हे सुव्रते ! यह केदार माहाम्त्य जो मेरे प्रेम व पदका पात्रहै वह संपूर्ण न्यायपूर्वक तुमसे कह मुनाया।॥२०॥जो इस नित्य पढे पा भुनै वह समस्त पापोंसे छूटकर शिवलोकको माप्त होताहै ।। २१॥ इति श्रीकेदारकल्ये शिवगौरीसवादे भापाठीकाया द्वादशः पटल; १२ ॥ त्रयोदशः पटलः। श्रीदेव्युवाच ॥ अप्राप्यैव मृता देव गृहानिर्गम्य मानवाः ॥ नव दृष्ट्वा च केदारं नैव पीतं तु तज्जलम् ॥ १ ॥ देवी वोली हे देव!अपने घरसे केदार तीर्थके निमित्त निकलकर मार्गमहीजो मनुष्य मरनाय, और फेदारके दर्शन न करसके तथा उसका जल न पियाही॥१॥ १मावापः।
भापाटीकासमेत-प० १३. (३१) तेषां च का गतिदेव श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥श्रीश्वर उवाच॥ अप्राप्ता ये मृता देवि गृहानिर्गत्य मानवाः ॥ २ ॥ विचिन्त्य हृदि केदारं क्रोशमात्रं च भक्तितः ॥ तेऽपि देवि नराः सर्वे भुंजते परमं पदम् ॥ ३॥ संसारं नोपपद्यते जन्ममृत्युविवर्जि ताः ॥ त्रिनेत्रा वृपभारुढा यथाहं शंकरः स्वयम् ॥ ४॥ गच्छंति रुद्रभवने हेमकुंडलमंडिताः ॥ मद्विधास्ते गणाः सर्वे शशांकां- कितशेखराः।शायदा संदृश्यते देवि मत्समानो नरोत्तमः ॥तद सर्वाणि चिह्नानि लक्ष्यन्तेऽस्य सुरेश्वरि ॥६॥ पूर्ववृत्त कथां देवि तथा च कथयाम्यहम् ॥ कश्चिद्विप्रः पुरा देवि धनधान्यसमृद्धि- मान् ॥ ७ ॥ तस्य पुत्रो महाभक्तश्चितयंस्तु दिवानिशम् ।। केदारं हि गमिष्यामि तच्च संभाव्यते सदा ॥८॥ न मन्यते पिता नेव तदा माता विशेषतः ॥ हृदयेनैव केदारं ब्रजाम्येप न पश्यतु ॥ ९ ॥ एतद्विचिन्तयामास गतोऽसौ मनसा गिरिम् ॥ ततः संसारविरतः प्रस्थितो रात्रिमध्यतः ॥ उनकी क्या ? गति होतीहै ? सो तत्त्वसे सुनना चाहतीहू शिवनी वोले हे देवि ! केदारमें विना पहुँचे जो पुरुप घरसे निकल के मरजाय ॥२॥ हृदयमें केदारका स्मरण करके एक कोस तकभी आये हुए हों वे मनुप्यभी परम पदको भोगतेहैं ॥ ३ ॥ और जन्म तया मृत्युसे वर्जित हो संसारमें नहीं आते, और तीन नेत्र वाले हो वृपभपर चढकर जिस प्रकार स्वयम् शंकर तैसे ॥ ४॥ मुवर्ण के कुंडलोंस शोभायमान हो शिवलोकमें प्राप्त होतेहैं और वे संपूर्ण गण मेरी समान मस्तकपर चन्द्रमाको धारण करतेहैं ॥५॥ हे देवि ! जब वह पुरुषश्रेष्ठ दीखताहै तो है सुरेश्वरी !समस्त चिह्न मेरे समान ही उसमें होतेहैं।ाहे देवि ! पुरातन वृत्तान्तवाली कथाको कहताहूं कोई ब्राह्मण धन धान्य और समृद्धि वाला, ॥ ७ ॥ उसका वडा भक्तिमान् पुत्र था वह रातदिन विचारता, और सदा कहता था कि मैं केदारको जाऊंगा ॥ ८ ॥ परन्तु उसका पिता और माता नहीं मानती थी वह मनसे यह विचारता था कि-केदारको ना पिना देखेही ॥९॥ निश्चय कर वह कैलास जानेके निमित्त, 1 (३२) केदारकल्प। |१०||दृष्टोऽसौ कोटपालन हतो वै स शरेण च ॥ सोऽथ दृष्टोऽप्यभिज्ञातस्तत्क्षणाद्वाह्मणीसुतः ॥ ११ ॥ तेन भौतेन देवेशि तदोपायं विचिन्वता ॥ प्राकारस्य समीपे तु सवि- छायामपश्यताम् ॥ १२ ॥ स्थापितोऽसौ यदा विप्रः कोटपा- लेन धीमता ॥ ततः प्रभाते विमले पुत्रोऽसौ च न दृश्यते॥१३॥ तत्र दुःखेन संतप्तौ ब्राह्मणी ब्राह्मणश्च तौ ।। इतश्चेतश्च धाव- न्तौ तौ गृहाश्रमवीक्षकौ ॥ १४॥ पृच्छंती पथिकाल्लोकान्पुत्र- पुत्रेति वादिनौ ॥ स्मृत्वा पुत्रस्य वाक्यं तु केदारगमने सदा ॥ १५ ॥ विप्रास्ताभ्यां विस्सृष्टाश्च पुत्रान्वेपणकारणात् ।। पुत्रमाता पिता द्वौ च यथा दुःखं न लभ्यते ॥१६॥ पृच्छंतस्ते तथा विप्राः केदारे च महापथे॥ न दृष्टो न श्रुतश्चायं निराशै- स्तैविसर्जितः॥१७॥संप्राप्ते मोक्षमार्गे च केदारेथ नभोध्वनिः॥ सर्वे च स्वगृहं प्राप्ताः श्रुतस्तैस्तावदध्वनि ॥ १८॥ तावत्कस्या- पि भूतस्य ध्वनिर्दृष्ट्वैककं द्विजम् ॥ भूत उवाच॥ कथयस्व महा- रात्रिको चल पडा ॥ १० ॥ तब इसको कोतवालने रातके विपे देखा, और वाणसे मार दिया उस समय निकट आकर उसने जाना कि यह ता ब्राह्मणका पुत्रहै ॥ ११ ॥ उस भयभीत कोतवालने यह उपाय बिचारा कि- खाईके समीप जहां कुत्तेकी विष्ठा पड़ी थी ॥ १२ ॥ तहां बुद्धिमान कोतवालने इस मरे हुएको दबादिया, प्रातःकाल उस ब्राह्मणका पुत्र न दीखपडा ॥ १३ ॥ उसके दुःखसे ब्राह्मण और ब्राह्मणी अति दुःखी हुए इधर उधर घर और आश्र- मामें देखते, दौडते, फिरते थे॥१॥और मार्गमें! पुत्र, पुत्राऐसा कहते हुए लोगों से पूंछते थे, तब पुत्रके पिछले वाक्यको याद करके केदार जानेके निमित्त ॥ ॥ १५ ॥ उन दोनोंने ब्राह्मणोंको अपने पुत्रके ढूंढनके लिए वहां भेजा और पुत्र की माता तथा पिता अतिदुःखी थे।॥ १६ ॥ तब उन ब्राह्मणोंने केंदारके मार्ग में पुत्रमा वृत्त पूंछा तो कहा कि न देखा, न सुना, यह समाचार पाय, वे निरा. श होकर लौटते हुए ॥ १७ ॥ तभी मोक्ष प्राप्त हुए उस ब्राह्मणके विषयकी उन घरको आते ब्राह्मणाने मार्गमें ऐसी ध्वनी ( शब्द ) सुनी ॥ १८॥ उसी समय फिसी मृतकी घनिवाला पुरुप ब्राझणसे बोला, भृत बोला हे महाभाग ! किस भापाटीकासमेत-प० १३. (३३) भाग प्रेपितः केन कर्मणा ॥ १९॥ विप्र उवाच ॥ प्रेपितोऽस्मि द्विजेनात्र कार्यभूयस्ततः शृणुः ॥ ब्राह्मणस्य सुतो नष्टस्तस्या- न्वपेण आगताः ॥२०॥ भूत उवाच ॥ को दृष्टः केन चैवात्र कस्यासौ ब्राह्मणः सुतः ॥ विप्र उगच ॥ न दृष्टो न श्रुतश्चैव मृतो भस्मनि कुन सः॥२१॥ पुत्र उवाच ॥ स्वर्गे तिष्ठाम्यहं विप्र गंधर्वगणसेवितः ॥ रुद्रकन्यामहाभोगभोगी च सततं स्थितः ॥२२॥ अक्षयं च पदं प्राप्त हदि केदारचिंतनात्॥ विप्र उवाच ॥ केन कर्मविपाकेन संप्राप्तमक्षयं पदम् ॥ २३॥ पुत्र उवाच ॥ अहं केदारकं चात्र प्रस्थितो रात्रिमध्यतः ।। दृष्टोऽस्मि कोटपालेन हतो रात्रौ शरेण च ॥ २४ ॥ तत्क्षणान्मे गताः प्राणास्ततो रूपं प्रवर्तते ॥ सद्यो विमानमारुह्य द्वादशा- दित्यभास्वरम् ॥ २५ ॥अप्सरोगणसंकीर्ण सर्वाभरणभूपितम्।। तेन कर्मविपाकेन संप्राप्तोऽस्मि शिवालयम् ॥ २६॥ एकोत्तरं 'कुलशत समस्तं तारितं मया ॥ मातरः पितरश्चैव तथा स्वजन कर्मके निमित्त भेजे गएहो ॥ १९ ॥ ब्राह्मण वोला एक ब्राह्मणके कार्य के निमित्त आयेहैं वह कार्य यहहै सो सुनो कि-एक ब्राह्मणका पुत्र नष्ट होगयाहै उसक ढूंढनेको आरहैं ॥ २० ॥ भूत बोला किसने देखाहै, और किस ब्राह्मणका यह पुत्र है ब्राह्मण वोले न देखा न सुना कहां मर गया ॥२१॥ पुत्र बोला हे ब्राह्मणो ! मैं शिवके गण और गंधवों सहित स्वर्ग लोकमें रहताई और शिव लोककी कन्या- ओंके सहित बडे भोगोंको भोगता हुआ स्थितहुं ॥ २२ ॥ केदारको मनसे चिंतन (स्मरण) मात्रसे यह अक्षय पद पाया, है ब्राह्मण वोला किस कर्मफलसे अक्षय पद पाया ॥ २३ ॥ पुत्र बोला मैं रात्रि के विषय केदारको चल पड़ा, उस समय कोतवालने देखा, रात्रि होने के कारण उसने वागसे मुझे मारा ॥ २४ ॥ उसी समय मेरे प्राण निकल गए और अपना रूप बदलगया, शीग्रही वारह सूर्यके समान कान्तिवानहो, विमानपर चढ कर ॥ २५ ॥ अप्सराओंसे व्याप्त तथा संपूर्ण गहनोंसे मुषित, उस केदार चिंतन कर्मके फलसे शिवके पदको प्राप्त हुआ॥ २६ ॥ मैंने एकसो एक कुलतारदिये, माता, पिता, कुटुम्बी, और बंधुगण (३४) कदारकल्प। बांधवाः ॥२७॥ तथा ह्यशीतिमान्याश्च बंधून्वाक्यमुदीर- येत् ॥ ममोपरि द्विसहस्रमुद्धरेत्तु कुलं तथा ॥ २८ ॥ अत्रैव च मय दृष्टं यादशं सर्वमेव तु ॥ अन्यन्मातुश्च मे वाच्यं मा दुःखं करु चाम्बिके ॥२९॥ मया समुपभोगाथ संप्राप्तः काम उत्तमः ॥ मत्युशोको न मे कार्य एतत्सर्वं वदाम्यहम् ॥ ३०॥ विप्र उवाच ॥ यदि पुत्रस्य वाच्यं तु तन्मे सत्यं प्रकाशय ॥ ज्ञातिज्ञानं दर्शय त्वं येन निःसंशयो भवेत् ॥३१॥ तदहं प्रत्य- यिष्यामि पितरं ते समंततः॥ पुत्र उवाच ॥ न चेत्पिता विश्व- सिति तदाख्येयो द्विजोत्तम ॥ ३२ ॥ ज्ञानस्य च पराभूतोमम देहे समुद्भवः ॥ केदार प्रस्थितोऽह निशि मध्ये यदा ततः ॥३॥दृष्टोऽस्मि कोटपालेन निहतस्तच्छरेण च ॥ दृष्टस्तावदई तेन तदा विस्मयचेतसा ॥ ३४॥ निक्षिप्तः सहसा चैव प्राका- रस्य समीपतः ॥ अनौ निःक्षिप्य देहं मे दहन्तु मुदिता- जनाः॥३५ ।। यतंतं पितरं विप्रशीघ्रं दर्शय मामुत।कुरुते येन संसार अग्निदाहं हुताशने ॥३६॥ मध्ये यं कथयित्वेदं तस्य ॥ २७ ॥ मेरे माता, पिता और बांधवोंसे यह वचन कहना कि मेरे स्नेहसे तुम सब उद्वेग (चिंता ) मत करो ॥ २८ ॥ और जो कुछहै सो सब यहां मैंने देखा और मेरी मातासे कहना किन्हे मातः, दुःख मतकरो ॥ २९॥ मैंने संभोगके अर्थ स्वर्गकी कामनाकी,मृत्युलोकके भोगसे मेरा कुछ काम नहीं है यह सब मैं कहताह ॥ ३० ॥ ब्राह्मण वोला यदि पुत्रका वचनहै तो मुझसे सत्य २ प्रकट करो और जाति तथा ज्ञानका परिचय दो जिससे संदेह दूर होवै ॥ ३१ ॥ तब मैं तुम्हारे पितासे तया और चारोंतरफ फहूंगा, पुत्र बोला हे द्विजोत्तम ! यदि पिता न विश्वास करें तब उनसे फहना कि ॥ ३२ ॥ मेरे शरीरसे ज्ञान उत्पन्न हुआ इस कारण केदार जानेके निमित्त रात्रिके मध्यमें चला ॥ ३३ ॥ कोतवालने मुझे देखा और वाणसे मारा और मशे मरा देस ब्राह्मण जान और आश्चर्य युक्त चित्त से देसा ॥ ३४ ॥ एक साथ गढके समीप कुतिया विष्ठाके समीप चकित हो फेरदिया ॥ ३५ ॥ हे ब्राह्मण ! यह विश्वास कराके मेरे पिताको यह शव दिसाना जिममे पह अमिदाह संस्कार फरें ।। ३६ ॥ मेरा यह वचन पितासे कहना, इस भापाटीकासमेत-प० २१. विप्रस्य पश्यतः॥ विमानवरमारुह्य भानु कोटि समद्युतिम्॥ एवं पुत्रो गतः स्वगें कथयित्वा यथार्थतः॥३७॥ नानाविधान्म- हाभोगान्भुक्ते हरपुरे महान् ॥ एकोत्तरशतं देवि मयापि सहितो विवि ॥ ३८॥ इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे ईश्वरदेवीसंवाद पंचयोगेन्द्रेच्छा- सिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने ब्राह्मणपुत्र- मोक्षप्राप्तिःसदेहकलासगमनं नाम त्रयोदशः पटलः।।१३॥ प्रकार फहकर वह ब्राह्मणका पुत्र स्वर्गको गया । ३७ ॥ यहां शिवलोसमें अनेक प्रकारके भोगोंको भोगकर उसने एकसौपक कुलोंको तारा और मेरे साय निवास किया ॥ ३८॥ इति श्री केदारकल्ये शिवगौरीतादे भापाटीकाया प्रयोदश पटलः ॥ १३ ॥ चतुर्दशः पटलः। श्रीदेव्युवाच ॥ यदि कोऽवाप्यजानानः शास्त्रमुक्तंयथाविधि ॥ अगम्यागमनं कुर्यात्तत्फलं वद शंकर ॥ १॥ श्रीशंकर उवाच ॥ यावत्पृच्छसि देवेशि तत्सर्व कथयामि ते ॥ कोऽपि सर्वत्र भोक्ता तु ब्राह्मणो ज्ञानिसत्तमः ॥२॥ सदेव मम भक्तो हि ध्यात्वा . सर्वांगमीश्वरम् ॥ तेन विप्रेण सुश्रोणि संसारभयभीरुणा ॥३॥ केदारगमनं कृत्वा यह दृप्टो न संशयः॥ पुनश्चैव गृहं प्रात इप्टैः सह तु तिष्ठति ॥४॥अथासो राजसदनं कदाचिच्च गतोऽभ- पार्वती बोली हे शिवजी ! यदि कोई पुरुष शास्त्रविधिको न जानताहुआ विप. यके अयोग्य स्त्रीके साथ विषय करे तो उसका फल कहो ॥ १॥ शिवजी बोले है देवि ! जो तुमने पूंछा सो सब तुमसे कहताह कोई ब्राह्मग उत्तमज्ञानको छोडकर ॥२॥ सर्वांग ईश्वरका ध्यान करनेवाला निरंतर मेरा भक्त था, उस ब्राह्मणने सं. सारके भयसे ॥ ३ ॥केदारमें गमन करके मेरा दर्शन किया और फिर आया मित्रों महित रहनेलगा।।2। किसी दिन यह ब्राह्मण राजाफेघरको (३६) केदारकल्प। वत् ॥आशीर्वादपरो विप्रो दानं लब्धा पुनः पुनः ॥६॥ तेन दृष्टा श्वपाकी च मधुरध्वनिशोभिता ॥ तस्या गीतध्वानं श्रुत्वा सुस्वरं कर्णशीतलम् ॥६॥ मोहितो ब्राह्मणो देवि दृष्ट्वाम्लेच्छी स्वरूपवान् ॥ मूछिता चेतना तस्य सद्यो नारी निरीक्षणात् ॥७॥पुनरालोक्य तां सोऽपि कामान्धः पतितो भुवि ॥ विस- जितेन गीतेन नृपवृंदे गृहङ्गते ॥८॥ ब्राह्मणस्तेन माग्नेंण गतो म्लेच्छी स्वमंदिरे ॥ म्लेच्छी सा प्रार्थिता तेन भार्या मम भव स्वयम् ॥ ९॥ म्लेच्युवाच ॥ दृश्यते ब्राह्मणं रूपं कु- त्सितं तब भापितम् ॥ सर्ववर्णमहाश्रेष्टं सर्वशास्त्रविशारदम् ।। ॥ १० ॥ भापसे विगुणं विप्र महतां लोमहर्पणम् ॥ नीचाहं सर्ववर्णानां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ॥ ११॥ प्रसंगो नैव कर्तव्यो म्लेच्छयह ब्राह्मणो भवान ॥ ब्राह्मण उवाच ॥ विवादो नैव कर्त्त- व्यो ह्यस्मिन्काले मया प्रिये ॥ १२॥ यहोपो जायते देह सर्वस्वमपि तिष्ठति ।। तेन सा कामलुब्धेन मधुरालापवा- और आशीर्वाद देकर दानको लेकर ॥ ५॥ उसने अपने समीप मधुरध्वनि युक्त वेश्या देखी, उसके गीतकी ध्वनि जो कानोंको सुखदेनेवाली अच्छी सुरेली थी ॥६॥ हे देवि ! उस सुन्दर रूपवती म्लेच्छीको ब्राह्मण देखकर मूर्छित चेतना रहित हो दिशाओंकी ओर देखताहुआ ॥७॥ फिर उस म्लेच्छीने उस ब्राह्मण यो तरफ देखा तो काममें अंधा होकर भूमिपर गिरपडा गीत नृत्यके वि- सर्जन होनेपर सय समुदाय राजाके दरवारसे परको गया ॥ ८ ॥ ब्राह्मण उसी मार्गस उस म्लेच्छोफे घर गया ब्राह्मणने म्लेच्छोसे प्रार्थना की फि-तू मेरी स्त्री हो ॥ ९ ॥ म्लेच्छाघोली तेरा रूप ब्राह्मणकेसा दीखताहे तेरा कहना बहुत चुराह तू सर यमि उत्तम और संपूर्ण शायोंमें निपुणहै ॥ १० ॥ हे ब्राह्मण ! न यह बडे लामहर्षण यवन यहताह में संपूर्ण वर्णो में नीचहं और ब्राह्मण सब पाया गुरई ॥ १३ ॥ मुझसे प्रसंग (विषय) करना उचित नहीं है क्योंकि मैं ग्रन्छीदं और तुम ब्राह्मणही ब्राह्मण बोला है प्रिय ! इस समय मेरेसाय पिपाद परना उचित नहीं है ॥ १२ ॥ जो कुछ दोपहो यह सब मुझको होपे फाममें रब्ध ..
भापाटीकासमेत-प०१४. (३७) दिना ॥१३॥ म्लेच्छी वशीकृतास्ते च विप्रेणात्यादरेण तु ॥ गृहे बालगता तेन म्लेच्छी सा सह मोदते ॥ १४ ॥ तत्रासौ गृहिणी जाता सर्वलक्षणसंयुता ॥ यथा प्राप्ता उर्वशी च दृश्यते चारुलो- चना ॥ १५॥ मुप्रतिष्टितपादास्या करपल्लवसुप्रभा ॥ सुरूपा च सुजघाभ्यां कदलीस्तंभसन्निभा ॥ १६॥ क्षामोदरी सुकन्या च विस्तीर्णहृदया तथा ॥ चलत्प्रदक्षिणावर्त्तमध्यत्रिवलिसंयुता ॥ १७॥ स्तनद्वयभगकान्ता वाहुभ्यां विसरुग्धरा।।मुखं पूर्णेन्दु संकाशं कामराजांवजप्रभम् ॥ १८॥ तां दृष्ट्वा लोकललनां सर्व- लक्षणलक्षिताम् ।। विप्रस्य तस्य लुब्धस्य गतं जन्म तया सह ॥ १९॥ ततः प्रभूतकालेन जरा तस्याभवत्तदा ॥ अतिज्वरेण तप्तम्य मृत्युश्च तदनंतरम् ॥२०॥ ततो विप्रपितायत्र म्लेच्छी- तद्भवनंगता॥प्रणाममकरोत्तस्य म्लेच्छी विप्रस्य सन्निधौ ॥२१॥ तव पुत्रो हि मे भर्ता ज्वरेण गतजीवनः ॥ अग्निदाहं कुरुष्वास्य यद्ययं प्राणवल्लभः ॥२२॥ विप्र उवाच ॥ न मे कार्य सुतेनात्र हुए उस मधुर आलाप वाले ब्राह्मणने ॥ १३ ॥ उस ल्मेच्छीको वशमें किया, ब्राह्मणने आदरसे ल्मेच्छीसहित घरमें वास किया और आनंद पाया ॥ १४ ॥ तहां सब लक्षणोंसे संयुक्त वह सुन्दर नेत्रवाली उर्वशीके समान उसकी स्त्री हुई ॥ १५ ॥ सम भागवाले चरणोंसे युक्त सुन्दर हथेली गौर वर्ण शोभित रूपवाली जंघाओंसे केलेके खंभकी समान ॥ १६ ॥ सूक्ष्म उदर, विस्तीर्ण हृदयवाली प्रदक्षिणार्वत मध्यमें त्रिवली युक्त ॥ १७ ॥ दोनों मुन्दर स्तनवाली भुजाओं में और हाथोंसे शोभित मुखसे पूर्ण चन्द्रमाकी समान और कामदेवकी समान कान्तिवाली ॥ १८ ॥ उस लोक सुन्दरी तथा सर लक्षणोंसे सुशोभित स्त्रीको देख उस ब्राह्मणका जन्म उसके साथ रहते वीत गया ॥ १९ ॥ तब अधिक समयके पीछे उस ब्राह्मणको ज्वर आया और अति पीडित हो मृत्युको प्राप्त हुआ ॥२०॥ तिसके मरंन पीछे वह ल्मेच्छी ब्राह्मणके पिताके घर गई और ब्राह्मणके पास जाकर प्रणाम किया ॥ २१ ॥ कहा कि तुम्हारा पुत्र जो मेरा स्वामी था वह ज्वरसे मृत्युको प्राप्त हुआ है यदि तुम्हारा प्राणप्रिय है तो उसका अग्निदाह संस्कार करी ॥ २२ ॥ ब्राह्मण बोला मुझे पुत्रसे (३८) केदारकल्प। तथा चैवमतः शृणु ॥ चांडालकर्मतां यातः कर्मचंडाल उच्यते॥ ॥ २३ ॥ ईश्वर उवाच ॥ तच्छ्रुत्वा सा गता गेहं म्लेच्छी शोक- प्रपीडिता । गृहोपस्करणं त्यका तस्य दाहं चकार ह ॥ २४ ॥ स्वगृहस्तु तथा दग्धो धूमा जाताः सुदारुणाः ।। तत्स्थाने वट- वृक्षस्य शाखायामाललम्बिरे ॥२५॥ तत्र वृक्षे समारूढं भूतानां शतपंचकम् ।। धूमेन चावृतो वृक्षो भूतैश्च समधिष्टितः ॥२६॥ स्वर्गलोकं गता भूता वटवृक्षेण संयुताः ॥ क्रीडति चाक्षयं कार रुद्रलोकं समुद्गताः ॥ २७ ॥ एको भूतो गतोऽन्यत्र भोज्यं लब्धा स गोत्रतः॥ तत्र यावच्च संप्राप्तो वटस्थानं न दृश्यते ॥२८॥ तदा विस्मयमापन्नं रुदंतं द्विज उत्तमः ॥ कस्त्वं विध सि दुःखातों रात्र स्थाने वदस्व मे ॥ २९ ॥ भूत उवाच ॥ वि त्वं पृच्छसि मां विप्र परित्राणं कुरुष्व मे ॥ विन उवाच । हेतुना केन भूतस्त्वं केंदसे दारुणं वद ॥३०॥ भूत उवाच ॥गर केदारको विप्र सोऽस्मिन्स्थाने प्रतिष्टितः सोऽपि म्लेच्छीसमा कुछ काम नहीं है क्योंकि वह चांडालके कर्मको प्राप्त हुआ और कर्मसे चांट कहाता है ॥ २३ ॥ शिवजी बोले यह सुन कर वह म्लेच्छी शोकसे व्याकल अपने घरको गई और घरके काम धंधेको छोड़ उसके दाहकी चिन्ता का भई ॥ २४ ॥ तब सामग्री इकट्ठी कर उसने घरमें आग लगादी जब घर बडा धुआं फैला, उस स्थानपर एक बडका वृक्षथा जिसकी शाखाओंका ७ न था ॥ २५ ॥ उस वृक्षके ऊपर पांचसौ भूत रहते थे वह भूतोंसे सेवित धुएँसे व्याप्त होगया ॥ २६ ॥ वे भूत उस वृक्षके सहित स्वर्ग लोकको प्राप्त और शिवलोकको पाय अक्षय कालतक क्रीड़ा करते रहे ॥ २७ ॥ उनमेंसे भूत अपने गोत्रके भोजनसे लुब्ध हो अन्यत्र गया था तहां जबतक लौटकर अ तो यह बड़का पेड न देसा ॥ २८॥ तब विस्मय करते हुए तथा रोते हुए उस देस ब्राह्मण वोला कि तुम कौनहीं ? क्यों दुःखीहो ? क्योंफर व्याकुल होते सो मुझसे कहो ॥ २९ ॥ भूत बोला हे ब्राह्मण ! तुम क्या पूंछतेहो ? फरो !!! ब्राह्मण वोला है भूत !तुम किस हेतुसे कठिन रुदन करतेहो ? सो र ॥ ३० ॥ मृत बोला फेदारयो जानेवाला ब्राह्मण इस स्थानपर रहताथा भापाटीकासमेत-प० १४. सक्तो गृहदास्यां यदास्थितः॥३१॥ तस्य जाता तदा कन्या सुरूपा च सुलक्षणा ॥ तस्यां सोऽपि रतो विनोगतं जन्म तया सह ॥३२॥ न्यग्रोधो यो गृहद्वारे भूतानां शतपंचकम् ॥आरुह्य सेवते चैकं म्लेच्छीभूतं महाद्रुमम् ॥ ३३॥ तत्क्षणात्याप्तमृत्युध वह्निदाहत्तया कृतः॥ तेन भूता गताः स्वगै वटवृक्षेण संयुताः।। ॥३४॥ अक्षयं च पदं प्राप्तांस्तमेन द्विजोत्तम ॥ अहं पापी दुराचारो बन्यकार्यव्यवस्थितः ॥ ३९ ॥ तेन दुःखेन संतप्तः कंदयामि पुनः पुनः॥ विप्र उवाच ॥ ॥यदि किंचित्प्रकर्त्त- व्यं मया प्रीत्या प्रसादनम् ॥ २६॥ कथयस्व महाभूत येनाहं प्रकरोमि तत् ॥ भूत उवाच ॥ ॥ यदि मे वचनं श्रोतुं श्रद्धा कत्तं च ते द्विजे ॥ ३७ ॥ मन्यसे विप्र यद्येवं सुमहत्पापहार- कम् ॥ तत्क्षणात्कुरु विग्रेन्द्र मैत्रं कार्य सुवत्सलम् ॥ ३८ ॥ तस्य विप्रस्य या कन्या सुरूपा च सुलक्षणा ॥ तस्याः कृत्ये भवेन्मोक्षः करणीयं द्विजोत्तम ॥ ३९ ॥ विप्र उवाच ॥ ॥ म्लेच्छोसे आसक्त हो उसक साथ घरमें रहताया ॥३१॥ उसके मुन्दर रूप. वाली शुभलक्षण युक्त कन्या उत्पन्न भई उसके होंनपर वह ब्राह्मण मृत्युको प्राप्त हुआ ॥ ३२ ॥ उसके घरके द्वारपर वडका वृक्ष था जिसपर पांचसौ भूत रहते थे म्लेच्छी वृक्षपर चढ़कर उसे सेवन करती थी ॥ ३३॥ उसी समय वह मृत्युको प्राप्त हुआ उस म्लेच्छीने आमिदाह करदिया उसके धुएँसे सपण भूतगण उस वडके वृक्षसहित स्वर्गको प्राप्त हुए ॥ ३४ ॥ और अक्षय पद मात किया उसके धुएँसे हे ब्राह्मण ! मैं पापी दुराचारी बंचित रहा कारण कि औरही कार्य में संलग्न था॥ ३५ ॥ उस दुःखसे व्याकुल हो वारम्बार रोलाई । ब्राह्मण बोला यदि इच्छा पृत्तिके अर्थ मुझे जो कुछ करना योग्य हो ॥३६॥ सो हे भूत ! मुझसे कहो जिसे मैं पूर्ण करूं भूत बोला यदि मेरा वन नुनते हो ॥ ३७ ॥ और मेरा पाप हरण करना मानते हो तो इसी समय मित्रत कार्य करो ॥ ३८॥ उस ब्राह्मणकी अच्छी रूपवती शुभलक्षणवाली कन्या है उसके द्वारा मेरा मोल हो सकता है वह यहां काष्ट एकत्रकर अग्नि लगावै ॥ ३९ ॥ ब्राह्मण बोला यदि
(१०)
फेदारफल्प।
यदि मोक्षो भवेत्तुभ्यं शीघं तत्प्रकरोम्यहम् ॥ श्रीश्वर उवाच ॥
तेन विप्रेण दग्ध्वा च स्थाने चैव हुताशने ॥ ४० ॥ तथमो वि-
हितस्तेन पतितः सर्वभूतकः ॥ पावके तु प्रज्वलिते विप्राज्ञागृह-
मध्यतः ॥ ११ ॥ तत्क्षणादिव्यदेहस्तु त्रिनेत्रस्स चतुर्भुजः ।।
कुंडलाभरणो भूत्वा शशाङ्कधर एव च ।। ४२ ॥ प्रणम्य दृष्ट-
पुष्टात्मा प्रोवाच गगनस्थितः ॥ त्वत्प्रसादाद्विजश्रेष्ट स्वर्ग ग-
च्छामि चाक्षयम् ॥ १३ ॥ तस्य भूतस्य रूपं हि तत्क्षणात्तेन
वीक्षितम् ॥ विप्रोऽपि पतितः सोऽपि तत्र मध्ये हुताशने ॥
. ॥४४॥ सोऽप्यगच्छत्तदा देवि यत्राहं शंकरः स्वयम् ॥ अक्षयं
च पदं प्राप्तो रुद्रत्वमनिवर्त्तकम् ॥ १५॥
इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे श्रीश्वरदेवीसंवादे पंचयोगेन्द्रे-
च्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने
सदेहकैलासगमने पंचशतभूतवटवृक्षमोझो नाम
चतुर्दशः पटलः॥१४॥श्लोकाः ॥३८॥
तुह्मारी मोक्ष होगी तो मैं ऐसा शीन करताहूं। शिवजी बोले उसी स्थानपर उस
ब्राह्मणके अमि जलानेपर ॥ ४० ॥ उस धूमसे व्याप्त भूत उसमें गिरा और अमि
के प्रज्वलित होनपर ब्राह्मणके घरमेंसे ॥४१॥ उसी समय दिव्य शरीरधारी
त्रिनेत्र और चारभुजा धारण करक वह कंडल आभूषणोंसे भूषित चन्द्रमा मस्त-
कपर धारण करे ॥ १२ ॥ प्रणाम करके हृष्ट पुष्ट आत्मा हो, आकाशमें स्थित
होके बोला हे द्विज ! तुम्हारे प्रसादसे अक्षय स्वर्गको प्राप्त होता हूं ॥४३॥
उस समय ब्राह्मणने भूतक उस रूपको देखा तब यहभी उस अमिके मध्यमे
गिरगया ॥ ४४ ॥ हे देवि ! वह तहां प्राप्त हुआ जहां मैं स्वयं स्थित हूं और
अक्षय स्थान पाया जहां जाकर नहीं लौटते ॥ ४५ ॥
इति श्रीमदार कल्ये ईश्वपार्वतीमयदे भापाटीकाशं चतुर्दशा पटलः ॥१४॥
भाषाटीकासमेत-प० १५. (४१) पंचदशः पटलः। श्रीदेव्युवाच ॥ ॥ॐ तेनोदकेन पीतेन किं चिह्न देहजं भ- वेत् ।। कथं मोक्षपरिज्ञानं चित्तसंयतिकारणम् ॥ १ ॥ एत- देव ममाख्याहि मानवानां हिताय च ॥ श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ पीतमाचे जले देवि रौद्रो भवति वै गणः ॥ २॥ गर्जितो बहु शब्देन महोत्साहो गजन्द्रवत् ॥ तावदुद्रविमानेन प्रयाति त्रिदिवं जनः ॥ ३ ॥ अप्सरोगणसंवर्ण नानावीसमावृतः ॥ गायंति तत्र गंधर्वा नृत्यति गणनायकाः ॥ ४ ॥ महारागं प्रकति रुद्रकन्याः समंततः ॥ तावत्तत्र ध्वनि श्रुत्वा क्षणेनैव निरीक्षते ॥६॥ क्षणात्पश्यति स स्वर्ग विमानवरमास्थितः ॥ सूक्ष्म- गीतध्वनि श्रुत्वा क्षणेनैव स पश्यात ॥६॥ आत्मानं चित्तसुभगं पूज्यमानं महश्वरम् ॥ जटामुकुटसंवीतं चन्द्रार्दैन विभूपि- तम् ॥ ७ ॥ न्यक्षं चतुर्भुजं चैव कुंडलद्योतिताननम् ॥ श्री- देव्युवाच ।। तस्यसंभवता लिंगं कथं चैव स पश्यति ।। ८॥ एतं पार्वती बोली उम जलके पौनेस देहसे उत्पन्न हुआ क्या चिह्न होताहै और किसमकार मोक्षका ज्ञान चित्तको परिचय देनेवाला होता है?॥१॥ यह मनुष्योंके हितार्थ मुझसे कहो शिवजी बोले हे देवि ! मनुष्य जलके पीने ही मात्रसे रुद्रका गण होता है ॥ २॥ और बडे शब्दके माथ उत्साहपूर्वक सिंहक समान गर्जता' हुआ मनुप्य रुद्र के विमानपर चढ़ स्वर्गको जाताहै ॥ ३ ॥ अप्सराओंसे व्याप्त और अनेक देवताओं सहित क्रीडा करताहै, तहां गंधर्व गान करते हैं, गण, नायक नृत्य करतेहैं ॥ ४ ॥ और रुदकन्या चारों ओर बडे २ रागोंको गाती हैं तहां ध्वनिको सुनकर वह क्षणमात्र देखता है ॥५॥ क्षणमात्रमें वह स्वर्गको अवलोकन करता है और क्षणही नहीं देखता सुक्ष्मगीतकी ध्वनिका सुनकर ॥ ६ ॥ अपने आपको मुभगचित्त, पूज्यमान महेश्वर जटा मुकुटधारी मस्तकपर चन्द्रमा धारण किंप जानता है ॥ ७॥ त्र्यक्षवारी चतुर्भुज तथा कुंडलसे प्रका- शित मुखवाला होताहै । देवी बोली उसका लिंग शरीर होता है सो किस प्रकार वह देखता है ॥ ८ ॥ हे देव ! यह मुझे संशयहै सा कहा । शिवजी वोले है 1 (४३) फेदारकल्प। म संशयं देव कथयस्व महेश्वर ।। श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ शृणु देवि कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥ ९॥ कुल महात विप्रस्य दुहिताभूत्पतिव्रता ॥ कालेन विहिता सा च विधवा पूर्वकर्मणा ॥१०॥ तदा साचिंतयत्कर्म केदारगमनं प्रति ॥ यास्यास्यहं च केदारं शीघ्रमन्वेपणाय च ॥११॥ तयाभ- त्या तदा सा.च गता वै हिमपर्वते ।। दृष्ट्वा चैव तु केदारमी- शानममराधिपम् ॥ १२ ॥ रेतोवारि ततः पीत्वा पुनरेवागता गृहम् ।। आमंत्रयित्वा सा विप्रान्भोजयामास मन्दिरे ।। १३ ।। कामार यौवनं कृत्वा भ्रातृभिः स्वजनेवृता॥ प्राग्भावविनिवृत्त्यै च दान दत्वाक्षमापयत् ॥ १४॥ तावत्सा धर्मसंयुक्ता व्रतं नि- यममाचरत् ॥ यावत्तस्यास्तदा भ्राता चकार कलहं प्रिये ॥ ॥ १५॥ महद्भिर्दुष्पवचनैर्देवदूषणतत्परैः ।। यादृशी तादृशी त्वं हि केदारगमनेरता।।१६॥हृदये संभवेनैव लिंग नेदं कदाश्रुतम्।। श्रुत्वा च शोकसंतता दुःखं कृत्वा यहर्निशम् ॥ १७ ॥ केदारं - देषि ! ससारके मध्य दिव्य कथाको मुनो ॥ ९॥ एक ब्राह्मणको बड़ी मुलीन- पुत्री बडी पतिव्रता थी समयके फरस पूर्व कर्मयोगके कारण वह विधवा होगई ॥ १० ॥ तब उसने केदार जानकी इच्छाकी और कहा कि मैं शीब अन्वेपण करनेके अर्थ केदारको जाऊंगी ॥ ११ ॥ उस भक्तिसे वह हेमपर्वतपर गई, तहां केदारके देवस्वामी ईशान (शिव) का दर्शन करके ॥ १२ ॥ वीर्यसे उत्पन्न हुए (केदारके) जलको पीकर फिर परको आई और भक्तिसे तपोधन ब्राह्मणों को बुला ॥ १३ ॥ यौवन अवस्थाको मदकर भाई और कुटुम्बियों सहित ब्राह्म- णको दान देकर प्रार्थनाकी ॥ १४ ॥ जब वह धर्ममें तत्पर तथा व्रत और नियममें लगरही थी उस समय उसका भाई लडाई ( कलह करने लगा॥१५॥ और देवताका दोप लगानेवाले, बडे निंद्य वचनोंसे कहता था कि त ऐसीह, पैसाह, और फेदारके जानेमें तत्पर हुई॥१६॥तू कहती है हदयमें शिवलिंग प्रगट होताद हमने यह फिसीसे नहीं सुना यह वचन सुन वह शोकसे घ्यायल तया रातदिन दुःसी रही ॥ १७ ॥ और हृदयमें पेदारको चिन्तनफरती थी क्या यह भापाटीकासमेत-प० १५. (१३) हृदये चिंत्य किमेवमुदकात्फलम् ॥ शोचन्ती निशि सा दीर्व निद्रां याता च तत्क्षणात् ॥ १८ ॥ तावत्पश्यति देवं च जटामुकुटधारिणम् ।। देवतादर्शनं लब्ध्वा ब्राह्मणी प्रणतस्थिता ॥ १९॥ अब्रवीत्पादलमा सा देवदेवं महेश्वरम् ॥ किमथै तु जलं पीत भ्राता म वक्ति भापितम् ।।२०।। एतत्कथय दवेश- त्वयात्रा च न निप्फला ॥ श्रीकेदार उवाच ॥ ॥मा शोची- स्त्वं महादेवि सफलं जन्म तत्तव ॥ २३ ॥ त्वद्धृदि प्रभवेल्लिंगं कंठमा प्रसादतः ॥ प्रभाते विमले प्राप्ते चाहयस्व सहोदरम् ॥ ॥ २२॥ अपरेपा तथा च गोदोहं पिव सुंदरि ॥: अंगुली च मुखे दत्वा शुद्धिं कृत्वा च तत्क्षणात् ॥ २३॥ तन्मध्ये च महा- लिंगं पश्येत्कंठसमप्रभम्।। प्रपश्यंतः सर्वलोका निश्चयो जायते ध्रुवम् ।। २४॥ ॥ श्रीश्वर उवाच ॥ प्रभाते ताशं कर्म सर्व- लोकविलोकितम् ॥ लिंगभेदभयाद्रीता ब्राह्मणी च ततोऽभवत ॥ २५ ॥ हाहाकारः कृतः सर्वैदिजस्तद्रातृनिश्चिते । पापिष्टा जल पीनेका फलहै ? हे देवि ! जवहीं वह ऐसा शोककर रहीथी कि उसे निदा आगई ॥ १८ ॥ तब जटा मकट धारी देवको देखा, और ब्राह्मणीने पृथ्वीपर प्रणाम किया ॥ १९ ॥ रोतीहुई देवताओंके देव महेश्वरके चरणाम पडकर चोली कि मेरे भाईने कहा कि तूने क्यों केदारका उदक (जल) पिया ॥ २० ॥ है देव ! क्या आपकी यात्रा निष्फलहै ? सो यह कही। केदार बोले हे ब्राह्मणी ! तृ गोक मत कर तेरा जन्म सफल होगया है ॥ २१ ॥ कंठ मात्र प्रसादस तेरे हृदयमें लिंग उत्पन्न हुआ है प्रातःकाल अपने भाईको बुलाकर ॥ २२ ॥ तया अन्य त्व. जनों आगे गायको दुहकर अपनी अंगुलीको मुखमें देना उसी नमय प्रारम्प ॥२३ ।। उसके माध्यमें सुवर्णकी समान कान्तिपाल टस लिंगका देवना, तया संपूर्ण मनुष्य देखेंगे तो निश्चप विश्वास होगा ॥ २४ ॥ शिवजी बोले प्रातःकाल यह प्रोक्त दृश्य सब पुरूषोंने देखा तो उस लिंगभेदके भयस वह माननी पकिन हुई ।। २५ ।। और सबोंने हाहासार किया, भाई के निश्चय होनेपर लोगोंन रहा
(१४)
केदारकल्प।
भ्रातरो बस्या दुर्मदाः कुलपांसनाः ॥२६॥ भगिनी निंदका मृदा
देवताप्रभुद्वेपिणः ॥ एत एव महाघोरे पति नरकाणवे ।।
॥ २७ ॥लिंगभेदेन ते सर्वे भगिनीशब्दकारकाः ॥ ततोऽसौ
ब्राह्मणी विप्रेरक्तालिगं त्वमाहर॥२८॥ गांदोग्नं च प्रपिवेद्येनेदं
संनिवर्तयेत् ॥ पीतेदुग्धं तदा याता ब्राह्मणी क्षीणदुष्कृता ।।
॥२९॥ संतोप्यवाह्मणान्प्रीत्या प्राप्ता तत्परमं परम् ।। अहं पा-
पी दुराचारःपापात्मा च विशुद्धये ॥ ३० ॥ इति भ्राता भव-
त्तस्याः प्रायेणात्मविशुद्धय।तदा निष्पादितं विप्रैस्तस्य पापस्य
शोधनम् ॥३॥ महाकृच्छ्रे त्रिरात्राणि परमानशनादयम्॥ एतत्ते
कथितं देवि लिंगमाहात्म्यमुत्तमम् ॥ ३२॥ इदं गुहा महापुण्यं ये
शृण्वंति पठति चासर्वपापविनिर्मुक्ताः शिवलोकं बजन्ति च३३॥
इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे श्रीश्वरदेवीसंवादे पंचयोगे-
न्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने
सदेहकैलासगमने विधवात्राह्मणीमोक्षप्राप्तिर्नाम
पंचःशः पटलः॥ १९॥ श्लोकाः॥३५१॥
कि यह भाई दुर्मद और पापी कुलका मल है॥ २६ ॥ तथा वहिनकी निन्दा करने
वाला मूर्य, देवताका देषी है इसको महाघोर नरक प्राप्त होगा ॥ २७ ॥ लिंगके
भेद होनेसे वे सब बहिन बहिन ऐसा शब्द करनेलगे। तब ब्राह्मणेने उस ब्राह्मणी
से कहा कि लिंगको लोप करो॥२८॥ फिर गायको दुहक पी, जिससे यह
लिंग अस्प हो, तब उसने दुम्पको दुहकर पिया ॥ २९ ॥ और ब्राह्मणीने उने
ब्राह्मणोंको संतुष्ट करके परम पद मोक्ष ) को पाया, भाईने भी कहा मैं पापी
दुराचारी हूँ॥ ३० ॥ इस प्रकार अपने पापकी शुद्धिके निमित्त विचाग तो ब्राह्म-
गोंने उसके पाप दूर होनेका उपाय यों कहा ॥ ३१ ॥ कि तीनरात्री निराहार
हो महाकृच्छ व्रत करो। हे देवि ! यह लिंग माहात्म्य तुमसे कहा ॥ ३२॥ इस
गोपनीय वडे पावत्र इतिहासको जो मनुष्य पढते हैं तथा सुनते हैं वे सब पापोंस
हटकर शिवलोकमें प्राप्त होते हैं ॥ ३३ ॥
इति श्रीकेदारको शिरपार्वतीसवाद भाषाटीकाया पंचदशः पटलः ॥ १५ ॥
भापाटाकासमंत-प०१६.
(४५)
पोडशः पटलः।
श्रीकात्तिकेय उवाच ॥ ॥ॐ मेरुपृष्टे सुखासीनं देवदेवं जग-
द्वरुम् ॥ प्रासादयञ्जगन्नाथं सर्वपूर्ण महेश्वरम् ॥ १ ॥ अप्राक्ष-
महमीशानं साधकानां हिताय च ॥ महापथेन पश्यंति कया
शक्त्या च मानवाः ॥२॥ तदर्थं च फलं ब्रूहि सत्यं देव सदा-
शिव ॥ गच्छंति साधकाः सर्वे स्वयं देहेन शंकर ॥३॥ श्रीश्वर
उवाच ॥ ॥ मनसा कर्मणा वाचा सप्तजन्मनि किल्विपम् ॥
विनश्यति कृतं तेपां ये शृण्वंति महापथम् ॥ ४॥ महापथः
परो धर्मस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ रुच्यते यदि लोकानां गतीनां
परमा गतिः ॥५॥ मया मेहेन ते नूनं कथ्यते यदि कौतुकम्।।
पथां मध्ये महापथाः पदानां पदमुत्तमम् ॥६॥ पथां चैव हि सर्वे-
पा महाज्ञानं समुत्तमम् ॥ उद्धर्तु सर्वजंतूनां केदारं तीर्थदुल-
भम् ॥ ७॥ दुर्लभं देवतानां च दुर्लभ्यमितरैर्जनैः॥ दुर्लभं गण-
गंधर्वैर्यच शास्त्रं वदाम्यहम् ॥८॥ रम्यं च दिव्यशास्त्रेषु भुक्तिम्-
क्तिप्रदायकम्।।श्रुत्वा विना विनश्यति पापानिसकलानि च॥९॥
श्री कार्तिकेय समेरु पर्वतके ऊपर मुखसे बैठे हुए देवताओंके देव जगद्गुरु
महेश्वरको प्रसन्न करके बोले ॥ १॥ कि हे ईशं ! मैं साधकोंके हिताथ पूछता हूं
कि मनुष्य फिस शक्तिसे वडे मार्ग (महापंथ ) को देखते हैं ॥२॥हे सदाशिव!
उनके अर्थ सत्य ॥२॥ उस फलको कहो जिससे संपूर्ण साधक सदेह उस परम-
पंयको पावें ॥ ३ ॥ शिवजी वोले जी महापंथक महत्वको श्रवण करते हैं उनके
मानसिक कायिक वाचिक सात जन्मोंके पाप नष्ट होते हैं ॥ ४ ॥ महापंथ परम
धर्म और तीनों लोकोंमें विख्यात है, यदि सबलोकोंमें परम गतिकी रुचि हो ।।
॥५॥ तो मैं निश्चय तुमसे स्नेहकं कारण कहता हूं कि समस्त पंथोंके मध्यमें
उत्तम महापंथ हे ॥ ६॥ समस्त ज्ञानों में ब्रह्मज्ञान उत्तमहै और सब प्राणियोंके
उद्धारको केदार तीर्थ है ॥७॥ वह, देवता, मनुष्य, गण तथा गंधर्व इन सबको
दुप्पाप्य है । जो शास्त्रमैं कहताहूं ॥ ८॥ वह सब शास्त्रोंमें रम्य तथा भक्ति मुक्ति
का दायक है जिसको श्रवण करके समस्त विघ्न और पाप नष्ट होते हैं ॥ ९ ॥
फेदारकल्प। श्रुतश्च पठितश्चैव कल्पो यच्छेन्महापथम् ॥ पदे पदे महापुण्यं गंगास्नानं दिनदिने ॥ १० ॥ अधर्मेण समायुक्ता न पश्यति महापथम्।। पश्यंति योनिमार्ग तु जनाः पापेन मोहिताः ॥ ११॥ मानुपाश्च महासेन पापं कृत्वा विशेषतः केदारष्टि- मात्रेण पापराशिविनश्यति ॥ १२ ॥ यत्र तिष्ठति कल्पश्च तत्र तिष्टंति देवताः॥ अष्टपष्टयादितीर्थानि ख्यातानि भुवनत्रये ॥१३॥ ब्रह्मविष्णुमहेशानां सुरेन्द्रस्त्रिदशाधिपः ॥ देवतासहित- स्तत्र इन्द्रस्तिष्ठति नित्यशः ॥ १४ ॥ स्वग मत्यै च पाताले ग्रहनक्षत्रतारकाः॥ यत्र तिष्टति कल्पस्तु सर्वे तिष्टंति तत्र वै ॥ ॥१६॥ पवित्रं वै सदाकल्पं ये शृण्वंति पठति च॥राजदारे यम- द्वारे भय तत्र न विद्यते ॥ १६॥ पवित्रं वै महापुण्यं यत्र कल्पो महापथः॥ सदेशो रुदतुल्यो वै विशेपो यस्य मन्दिरे ॥१७॥ गृहे ये तु सदा कल्पं शृण्वंतिंच पठति च॥ घोर संकट आरण्ये न भयं विद्यते कचित् ॥ १८॥ वाराणस्यां कुरुक्षेने गयायां पंथ कल्पको मुनकर अथवा पढ़कर पद २ में गंगास्नान करने के समान अधिक य होता है ॥ १० ॥ अधर्मस युक्त जो मनुष्य महापंथ (कल्प) को नहीं दखते पापी योनि मार्ग (जन्ममृत्यु) को देखते हैं ॥११॥ ह स्वामिकार्तिकेय प्य विशप पापको भी करक कदारक दर्शन कर तो पापोंका समुदाय नष्ट होता । १२ ॥ जहां कल्प स्थित होता है तहां दवता नित्य रहते हैं अडसठ ६८ तीर्थ नों लोकमें विख्यात हैं ॥ १३॥ ब्रह्मा विष्णु महश बृहस्पति आदि दयताओंक हेत वहां इन्द्र नित्य स्थित रहताहै ॥ १४ ॥रवर्ग मृत्यु और पाताल में जितने नक्षत्र तारे हैं वे जहां पर कल्प पुराण स्थित जानते हैं तहां सब स्थित रहते ॥ १५॥ जो मनुप्प पवित्र कल्पको मदा सुनते हैं अथवा पढ़त हैं राजद्वारमें र यमफे दारमें उनको भय नहीं रहता ॥ १६ ॥ जिस मनुप्यके पर महा- पल्प स्थित होताहै वह बडा पवित्र है, वह पुरुप शिवके तुल्य विशेपंहै ॥ १७॥जो अपने घरपर नित्य कल्पको श्रवण करते हैं और पढतेहैं उनको घोर ट तथा पनमें कहीं भय नहीं होता ॥ २८ ॥ काशी कुरुक्षेत्र प्रयाग और य भापाटीका समेत-प० १६. (१७) च प्रयागके ॥ यत्फलं प्राप्यते येन तत्फलं प्रतिपूजनात्॥१९॥ वसंति तानि तीर्थानि गृहे यस्य महापथः ॥ महापथं महाकल्पं सर्वकालं पठति ये ॥२०॥ फलं केदारयात्रायां ते लभते गृहे स्थिताः ॥ पूर्वजैः सहिताः सर्वे ह्यन्ते यांति शिवालयम् ॥२१॥ नतेपां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ॥ शंकरस्य प्रसादेन विष्णोश्चैव विशेपतः ॥ २२ ॥ गच्छंति शिवसान्निध्यं सुंजते विपुलां श्रियम् ।।तेपां तुष्टो महादेवो गौर्या साई त्रिलोचनः ।। ॥२३॥ ते लभते महाकल्पं देवदानवदुर्लभम् ॥ विना रुद्रप्र- सादेन न लभंते महापथम् ॥ २४ ॥ एतानि च महासन सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ यस्मिन्नेव नराः पूर्वमर्चयित्वा महेश्वरम् ॥ ॥२५॥राज्यं स्वर्ग च मोक्ष च संलभंते युगेयुगे । मह्यं चैव प्रतिष्टते यानि वृक्षतृणानि च ॥ २६॥ समुद्राशीतिलक्षाणा- मभ्रच्छाया गृहे तथा।।तेषां संख्यां च जानामि हेमपुण्यं वदा- म्यहम् ॥२७॥ हेममंदरसंकासः प्रासादाः शिवशाशने ॥ तेपां जानेसे जो फल प्राप्त होताहै वह एक केदारके पूजनसे उपलब्ध होताहै ॥ १९ ॥ जिसके घर महापथकल्प होताहै तहां संपूर्ण तीर्थ स्थित रहते हैं, जो महापंथ कल्पको सब समय पढतेहैं ॥ २०॥ वेकेदारकी यात्राके फलको घरपर स्थित हुएही पातेहैं और अन्त समय अपने पूर्वजों ( पुरुषाओं) सहित शिव लोकको प्राप्त होतेहैं ।। २१॥ और उनकी पुनरावृत्ति ( पुनर्जन्म ) करोंडों कल्पोभी नहीं होतीहै. शिव प्रसादसे विष्णुको ॥ २२ ॥ तया शिवकी समीपतामो पात हैं, और अधिक लक्ष्मीको भोगते हैं उसीसे पार्वती सहित शिवनी संतुष्ट होतहैं । ॥ २३ ॥ वेही, देवता और राक्षसोंमें दुर्लभ महाकल्पको पातेहैं, विना शिवकी कृपासे यह कल्प नहीं मिलता ॥ २४ ॥ हे महासेन ! यह सत्य २ मैं कहताहूं कि, जो पहले केदारपर महेश्वरको पूजतेहैं ।। २५ ।। वे प्रति युगमें राज्य, वर्ग, मोक्ष, को प्राप्त करतेहैं, और पृथ्वीपर वेलके पेड होकर स्थित होतेहैं ॥ २६ ॥ और चौरासीलास मेघोंकी छाया जितने घर पर होतीहै उतनीसंस्पारो जानकर केदा- रके पुण्यको कहताहूं ॥ २७ ॥ सुमेरु पर्वतकी जैसे योजनकी संख्या नहीं है वे (१८) केदारकल्प। संख्यांच०॥२८॥ आकाशात्पतितं तोयं पृथिव्या परितिष्ठति ॥ तस्य संख्यां च०॥२९॥समुद्रांशीतिलक्षाणि तारकाणि स्थिता- नि च ॥ तेपां संख्यांच० ॥ ३०॥ सागरे च महासेन ह्यनला विपुला मताः ।। तेपां संख्यां च०॥३१॥ नरानार्यश्च यत्रो- व्या तिप्टंति च गृहेगृहे ॥ तेपां संख्यां च० ॥३२॥ देवदानव- दैत्याश्च यक्षराक्षसकिन्नराः ॥ तेषां संख्यां च जानामि हेमपुण्यं वदाम्यहम् ॥ ३३ ॥ सर्वभूताश्च तिप्टंति स्वस्थिता भुवनत्रये ॥ तेषां संख्यां च जानामि हेमपुण्यं वदाम्यहम् ॥३४॥ महा- पथे महापुण्यो महारुद्रभयंकरम्।।स्वामिन्पथेन कल्पेन दर्शनेच महाशुभम् ॥ ३५ ॥ तेन मार्गेण गंतव्यमभेद्यो देवदुर्लभः॥भय- शंका न कर्त्तव्या गंतव्यश्च हिमालयः।। ३६॥ महापथे महासेन विघ्नो नास्ति कदाचन ॥ तस्य कल्पप्रसादेन सत्यं सत्यं वदा- म्यहम् ॥ ३७॥ स्वर्गः सोपानमार्गेण मया तात विनिर्मितः॥ ही हिमालय पर्वत पुण्पको संरया नहीं है ॥ ८ ॥ आकाश परसे गिराहुआ जल पृथ्वीपर गिरताहै उसके कणोकी संरया नहीहै चाहै यह सरया होजाय पर केदारकी पुण्यकी संख्या नहींहै।।२९॥चौरासी लाख तारागणोकी संरपा होसकती है परंतु हिमालय पर्वतके पुण्यकी सीमा नहीहै ॥३०॥ हे महासैन समुदमे वडवा नल अमि अधिरहै उसकी संख्याहै परंतु इस पुण्यको संख्या नहीं है ॥३१ ॥संपूर्ण नर नारी तीनों लोकमें अपने २ घरपर स्थितहै टनकी संख्याहै और इस पुण्यकी नहीं।।३।।देवता दैत्य यक्ष राक्षस विनर इन सबकी संरयारो जानताहूं परंतु इस . पुष्पी संग्पागे नही जानता॥३३॥संपूर्ण जीव जो तीनो लोकमे स्थितह उनकी संरपारो जानताह पर इस पुण्यफी सस्या नहीं जान्ता॥३४॥महापंथमे वडा पुण्यह महारौद्र और भयंकरहै स्वामीके पंथ तथा फ्ल्पक दर्शनसे अधिक कल्याण होता है ॥३५॥ उस मार्गसे जाना चाहिये जो अभेद्य और देवतोको दुर्लभहै उस मदापन्यर्फ गमन परनयो भपको शंका नहीं परनी चाहिये ॥ ३६॥ हे हासेन टस महापंयम पदापि पिन नहीं होते उस फ्ल्पप्रतापस यह सत्य २ पहताहूं ।। ३७ ॥हे तात ! मैंने सोपान मार्गसे स्वर्ग निर्माण कियाहे जो मनुप्य उस भापाटीकासमेत-५० १६. (४९) मानुपा नैव पश्यंति संसारे किमुपार्जितः ॥३८॥ ब्रह्मघाती तथा गोनो मातृनः पितृवातकः॥ वालवृद्धा युवानो वा हीन- सत्त्वास्तथालसाः ॥ ३९ ॥ अगम्यागमने शता वेदशास्त्रार्थ- वर्जिताः॥ अधर्मेण समायुक्ता भुवि तिष्टंति मानवाः ॥ ४० ॥ जन्मांतरसहस्रेषु क्रियते पापकर्म यैः ॥ केदारोदकपानेन भस्मी- भवति तत्क्षणात् ॥४१॥ संसारे मानवा अंधाः पापराशिसम- न्विताः॥ कल्पश्रवणमात्रेण ते यांति शिवशासने ॥ ४२ ॥ करे कल्पो भवेद्यस्य सस्तिस्यार्थसिद्धयः॥ यत्कृतश्च मया- कल्पः साधकानां हिताय च ॥४३॥ प्रत्यक्षेच कृत दीपे अंधाः कूपे पतंति च ॥ संसारे ये नराः सर्वे मोहिताः कर्मबंधनैः॥४४॥ केदारं ये न जानति वृथा तेषां जनुर्बुवम् ॥ संसारे सागरे घोरे दुस्तरे न कार्णवे ॥४५॥ बिना कल्पं महासत्त्वैः स्पंदितुं न च शक्यते ॥ रचितः स्वर्गसोपानो नोर्या संसारसागरे ॥ ४६॥ उत्तारणाय लोकानां मृत्युलोकेऽवतारिता ॥ जलं च बुझुदा- केदारकल्प। कारं यथा संसारिणस्तथा ॥४७॥ अभ्रच्छाया यथा सेनं तथा संसारिणोजनाः॥जलमध्ये यथा मत्स्याः धिम्रजालेश्चरोधिताः।। ॥४८॥ संबद्धा मोहपाशेन नैव गच्छंति मत्पुरे ॥ संसारमोह- पाशेन बद्धा यांति च नारकम् ॥४९॥ महापथं महाशास्त्रं देव- दानवदुर्लभम् ।। स्वर्गशास्त्रं महारम्यं सर्वपापविनाशनम् ॥५०॥ प्रसादो मंदिरं छत्रं शिवस्य परिकीर्तनम् ॥ तस्य रुद्रपदे वासो यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥ ५॥ केदारं च महानाम ये वदंति गृहे स्थिताः ॥ संवत्सरकृतं पापं मुच्यते नात्र संशयः।। ५२॥ ध्या- यंतो मनसा लोका ये गच्छति हिमालये ॥ सप्तजन्मकृतं पापं तेपां नश्यति तत्क्षणात् ॥५३॥ केदारगमनं ये च वाचयंति वदंति च ॥ रविदिव्यप्रकाशेन गच्छंति शिवशासने ॥५४ ॥ कर्मणा च महासेन गताः केदारदर्शनम् ॥ केदारदर्शनं कृत्वा रेतोनीरं पिवंति ये ॥५५॥ कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटि- तक संसारके मनुष्यहै ॥ १७ ॥ हे महासेन ! मेघकी छायाकी समान संसारी मनुष्यहैं जैसे जलके मध्यमें मछली धीमरोंके जालस फंसीहैं ॥ १८ ॥ तैसे ही मोहक फांससे बंधे हुए मनुष्य मेरे पुरमें नहीं जाते संसारके मोहपाशमें फंसे मनुष्य सदा नरकमें पड़तहैं ॥ ४९॥ महापंथका यह कल्परूप महाशास्त्र देव तथा दानामि दुर्लभैहै तथा यह स्वर्गीय शास्त्र सब पापोंको नष्ट करनेवालाहै ॥५०॥ जी शियका प्रसाद तथा मंदिर और छत्र धारण कर उसका शिवपुरमें निवास तब- तक रहताहै जबतक चौदह इन्द्र रहतेहैं ।। ५१ ॥जो मनुष्य अपने घरपर स्थित हॉफर कंदारफे नामका स्मरण करतेहैं वे एकवर्षके पापोंसे छूटतहें इसमें कुछ से- देह नहीं है ॥ ५२ ॥ मनसे ध्यान करनेपर अथवा हिमालय पर्वतपर जानेसे, सात जन्मका संचितपाप तत्क्षणही नष्ट होताहै ॥५३॥ जो पुरुप केदारके गमनको कह- लांतह अथवा स्वपम् कहतेहैं दिव्य सूर्य के प्रकाशसे घेशिय लोकको माप्त होतेहैं।। ॥५८ ॥ हे महासंन ! सुफमसे मनुष्य फेदारफे दर्शनोंको जाते हैं और फेदारफे दर्शनको फरफे तीर्यमे उत्पन्न हुए जलको पीते हैं ॥ ५५ ॥ घे करोड़ों फल्प १ नगरपोपत्र गधन्दः दसो देव इतियत् । २ भीवरे स्टोऽयम् ।
भाषाटीकासमेत-प०१६. शतानि च ।। सहितः पितृभिस्तेऽपि गच्छंति शिवशासने॥१६॥ यत्र स्थाने सुराः सर्वे गंधर्वाश्च गणैः सह ॥ तत्र स्थाने तदा तेऽपि भुंजते विपुला श्रियम् ॥१७॥ वसति मानुपास्तत्र गर्भ- वासं पुनः पुनः ॥ केदारं नैव पश्यति संसारेनिष्फला गताः॥ ।। ५८॥ अज्ञानानव जानंति न गच्छंति शिवालयम् ॥ ततः कृत्यं महासेन कथयामि शृणुष्व तत् ॥५९ ॥ भावभक्तिसमा- युक्तं मंत्रशास्त्रे यथोदितम् ॥ स्थापितं यैर्महालिंगं शृणु तेषां च यत्फलम् ॥६०॥ यावद्भूरचलो मेरुर्दिव्यस्वगै सुरोत्तमाः॥ भाव- भक्तिसमायुक्तं मंत्रशास्त्रं यथात्मनः॥ ६१ ॥ पितृभिः सहिता स्तेऽपि शिवलोके वसंति च ॥ सर्वधर्मचये व्यग्रा. गुर्वतिथ्योः प्रपूजने ॥ ६२ ॥ यावत्स्वर्गे महादेवो यावन्नीरं च सागरे । सहिताः पितृभिस्तेऽपि शिवलोके वसति च ॥ ६३ ॥ सर्वदेव समाः सिद्धा झुंजते विपुलां श्रियम्।।भुक्त्वाच विपुलान्भोगाल्लभं- पर्यन्त तथा सैकडी कल्पतक अपने भाई वांधवोंके सहित शिवलोकको पाते हैं ॥५६ ॥ जिस स्थानमें संपूर्ण देवता तथा गंधर्व गणों सहित स्थित है उसी स्थानमें अधिक भोगोंको भोगते हैं ॥ ५७ ॥ जो मनुष्य केदारको नहीं देखते हैं वे मनुष्य वारंवार गर्भाशयमें निवास करते हैं, उनका जन्म संसारमें निप्पल गया ॥ ५८ ॥ वे अज्ञानसे नहीं जानते कि शिव महिमा फैसी है और जो शिवके आलय (केदार) को जाते हैं हे महासेन ! उनका कृत्य कहताह सो सुनो ॥ ५९ ॥ प्रेम और भक्तिके सहित जैसा मंत्रशास्त्र में कहाहै उस प्रकार जिन्होंने महालिंग स्थापित कियाहै, उनका फल सुनो।। ६० ॥ जबतक पृथ्वी अचल है तथा मुमेरु और स्वर्गम देवता हैं भावभक्तिपूर्वक तथा मंत्र शास्त्र विधिके अनु- सार ॥ ६१ ॥ पितरों सहित वहभी शिवलोकमें निवास करताहै, अतिथि सत्कार गुरुसेवा करना आदि धर्ममें जो मनुष्य तत्पर हैं ॥ ६२ ॥ जबतक स्वर्गम महा- देव और समुदमें जल है येभी पितरोंके सहित शिवलोकमें निवास करतेह ॥६॥ और संपूर्ण देवताओंके सहित विपुल भोगोंको भागते हैं, और उन भागांको १ आमनेपदमारंम् । निशामयेति वा पा०॥
फेदारकल्प। ते चाक्षयां गतिम् ॥ ६४ ॥ शंकरस्य प्रसादेन लभंते रुद्रता नराः ॥ इच्छाभोगो भवेत्तेपां भुंजते विपुलां श्रियम् ॥६५॥ अमृतं च परित्यज्य विपं लोकाः पिवंति च ॥ कौतूहलं मया दृष्टं क्षीरं त्यक्त्वा विपं पिवेत् ॥ ६६ ॥ सागरे च यथा नीका संसारे कल्प एप च ।। विनिर्मितो महासेन मनुष्योत्तरणाय च ॥ ६७॥ न पश्यंति मृति दिव्यां मायामोहसमाकुलाः ॥ बहु- कामप्रपूर्णाश्च क्रोधपापैश्च पूरिताः ॥ ६८ ॥ एतैस्तु दोपः सहिता जात्यंधा मानुपा भुवि ॥ स्थाने तत्र न पश्यति यत्र दिव्यो महापथः॥६९॥योनिमागें सहस्त्रं च मधमोत्तममध्यमाः ॥ गच्छति मानुपाः सर्वे नैव गच्छंति मत्पुरे ॥ ७० ॥ गृहद्वार परित्यज्य ये गच्छंति महापथम् ॥ अर्द्धस्थाने तु जायते यत्र. देवो महेश्वरः ॥ ७॥ एकचित्ताश्च ये केचिच्छिवलोकं ब्रज- ति च ॥ एवं रम्यं महाशास्त्रं त्रिपु लोकेषु दुर्लभम् ॥ ७२ ॥ स्वर्गशास्त्रं महारम्यं दृष्ट्वा स्कन्दुस्तमब्रवीत् ॥ स्कन्द उवाच ॥ भोगकर अक्षय गति (मोक्ष) को पाते हैं ।। ६४ ॥ और शिव प्रसादसे रुद्रके गणोंकी पदवीको पाते हैं और उसको इच्छानुकूल भोग मिलता है ॥ ६५ ॥ हा ! लोक अमृतको त्यागकर विष पान करते हैं यह मैंने कौतूहल (आश्चर्य) देसा कि दूधको छोड विषको पीते हैं। ६६ ॥ समुद्र में जैसे नौका है इसी प्रकार संसारमें कल्प मैंने मनुष्योंके पार जानेके अर्थ निर्माण किया ॥ ६७ ॥ माया और मोहसे युक्त मनुष्य दिव्य मार्गको नहीं देखते और जो पूर्ण कामसे भरे तथा कोष और पापोंसे परित हैं ॥ ६८ ॥ इन दोपोंके सहित मनुष्य जाति, अंध हुए हैं वहां उस स्थानको नहीं देख सकते जहां दिव्य महापंय है ॥ ६९ ॥ और हजारों वार योनि मार्गमें अधम मध्यम उत्तम मनुष्य मात्र होते हैं जो मेरे पुरको नहीं जाते ॥ ७० ॥ जो घरके द्वारको छोड महापंथको जाता है वह ऊपर स्थानमं प्राप्त होता है जहां महेश्वर देव हैं ॥ ७१॥ जो एकचित्त हुए मनुष्य है धे शिवलोकमें जाते हैं यह रम्प महाशास्त्र (कल्प) तीनों लोकोंमें दुर्लभ है ।। ॥७२॥ स्वर्ग शास्त्रको देखकर वन्दने मुझसे पूछा स्कन्द बोले कि हे देव !
भापाटीकासमेत-१० १७. पुनः पृच्छाम्यहं देव वचो मे शृणु शंकर ॥ ७३ ॥ पुरा मार्ग व पश्यति साधकानां हिताय च ॥ नराणामृर्द्धनाथाय केदार तीर्थमुत्तमम् ॥ ७ ॥ कैलासपीठमध्ये तु योगगम्य महेश्वर ॥ ब्रह्मविष्णुसुराः सर्वे सिद्धविद्याधराश्चये ॥ ७९ ॥ एवं मम हितं हवा विस्मयं परमं गतः ॥ महापथः कथं देव क स्थाने व महापथः॥ ७६॥येन गच्छंति मार्गेण संसारभयपीडिताः॥ ब्रूहि वाक्यं महादेव त्रिदशेश्वरपूजित ॥७७॥ इति श्री० श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे ईश्वरकार्तिकेय सं- वादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महा- पथे शिवदर्शने सदेहकैलासगमने कल्पप्रशंसा- नाम पोडशः पटलः ॥१६॥ श्लोकाः ४३०॥ में फिर इच्छा करता हूं ।। ७३ ।। और साथकोंके हितके कारण उस पुरातन पंचको देखा मनुष्योंके उद्धार करनेको केदार उत्तम तीर्थ है ॥ ७४ ॥ कैलास पर्वतके ऊपर योगसे मिलने योग्य शिवजी हैं ब्रह्मा विष्णु सिद्ध विद्याधर आदि वहां स्थित हैं ।। ७५ ।। इस प्रकार कठिनताको देखकर स्कंदने कहा हे देव ! महापंथमें किस प्रकार और किस स्थानमें श्रमपूर्वक ॥ ७६ ॥ जिस मार्ग के द्वारा संसारके भयसे पीडित मनुष्य जावें सो मार्ग कृपा करके आप मुझे सुनर्वि ।। ७७ ॥ इति श्रीकेदारकसे शिवपार्वतीसंवाद नापाटीकायां पोटशः पटलः ॥ १६ ॥ सप्तदशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ॐ शृणु स्कंद महाप्राज्ञ महायोगिन्महा तपः ॥ गच्छंति शिवसांनिध्य केदारं तीर्थमुत्तमम् ॥१॥ निर्भ- येन महामागों गंतव्यश्च हिमालयः॥ अघोरेण च मंत्रेण ह्यष्ट शिवजी बोले हे महाबुद्धिमान् महापोगी महातपस्वी स्कंद ! उत्तम फेदार तीर्थ शिवके समीप प्राप्त होतेहैं ॥ १॥ निर्भय हो हिमालय पर्वतपर महापंय.
केदारकल्प। पष्टविनिर्मितः ॥२॥ अघोरश्च महामंत्री महासिदिकरोनृणाम्।। महाविघ्नहरो नित्यं महामोक्षप्रदायकः ॥ ३॥ आश्विने चैव मासे वै गंतव्यश्च महापथः॥ अघोरेण च मंत्रेण ये स्मर- न्ति च नित्यशः ॥४॥ प्रथमं तत्र गंतव्यं ललिता यत्र ति- प्रति ॥ स्नात्वा मंदाकिनीतीर्थं छुपवासं च कारयेत् ॥ ५ ॥ मंदाकिनीसंगमे च ह्येकरात्रप्रजागरात् ॥ महारुद्रप्रसादेन प्राप्त व्यो मार्ग उत्तमः ॥ ६॥ रुद्रेश्वरो महातीर्थ दृष्टो हरति पात- कम् ॥ पूर्वजन्मकृतैनांसि नश्यति शिवदर्शनात् ॥७॥ केश- त्यागश्च कर्त्तव्यस्तत्र स्थाने महाबुधैः ॥ मालाया धारणं कृत्वा स्नात्वा मंदाकिनीजले ॥ ८॥ तुष्टा वरप्रसादेन तेऽपि यांति परां गतिम् ॥ लोकदृष्ट्वा च मार्गेण गंतव्या चोत्तरा ककुप् ॥ ९ ॥ विघ्नेश्वरप्रसादेन गुरुधर्मबलेन च ॥ पश्चात्तत्रैव गंतव्यं केदार प्रथमाश्रमः ॥ १० ॥ संप्राप्य तत्र स्थाने च केदारं परमेश्वरम्।। को जाना चाहिये अघोर मंत्रसे जो आठं तथा ? अक्षरोंसे निर्माण कियाह ।। ॥ २ ॥ अयोर महामंत्र मनुष्योंको सिद्धि कारकहै और बड़े विनाको हरण करने वालाहै तथा घडे मार्गको देनहाराहै ॥ ३ ॥ आश्विन मासमें महापंयमें जाना योग्यहै जो पुरुप अघोर मंत्रसे नित्य स्मरण करतेहैं ॥ ४ ॥ पहले वहां जावै नहीं ललिता स्थितहै, मंदाकिनी तीर्थपर स्नान करके टपवास करें ॥ ५ ॥ मंदा किनीके संगममें एक रात्रि जागरण करें । शिवके प्रसादसे फिर उत्तम मार्गको प्राप्त हों ॥ ६ ॥ रुदेश्वर महातीर्थम शिवके दर्शन करनेसे पूर्वजन्मके पाप नष्ट होतंहें ।। ७ ॥ और बुद्धिमान् पुरुप उस स्थानपर फेशत्याग ( मुंडन ) करावें और मंदाकिनीके जल में स्नान करके माला धारण फरें ॥८॥उन शिवकं प्रसाद से पद तृप्त होकर परम गतिको माप्त होतेहैं मनुष्य देखकर टस: मागसे उत्तर दिशाफी ओर जा ॥ ९ ॥ विनश्वर प्रसादसे और गुरुसेवा रूप धर्मके वलसे फिर तहाही फेदारफे पहले आश्रममें जाना चाहिये ॥ १० ॥ उस स्थानमें के १९ गमी राम्पमानित।
भाषाटीकासमेत-प०१७. तृप्ताश्च पितरस्तत्र हंसतीर्थेषु साधकाः ॥ ११ ॥ पूजयित्वा यथा शत्त्या केदारं पापनाशनम् ।। संप्रातं च महामार्ग केदारे पापनाशने ॥ १२॥ सप्तकोटिसहवाणि संति च गणोत्तमाः॥ मनुष्याणां हितार्थाय स्वयं देवेन निर्मिताः ॥ १३॥ देवदानव- दैत्याश्च यक्षराक्षसकिन्नराः॥ न लभंते जलं स्कंद ये चान्ये पापिनो जनाः ॥ १४॥ पितृदेवगणाः सर्वे स्नात्वा मंदाकिनी- जले ॥ भवेयुर्निर्मलाः स्कंद ये चान्ये पापकारिणः ॥१५॥ तुष्टा . वरं प्रयच्छति ततो यांति परां गतिम् देवस्य दक्षिणे पायें रेतः- कुंडं व्यवस्थितम् ॥३६॥ इह जन्मकृतं पापं दृष्टमात्रे निहति तत् ॥ स्पर्शनाच्छुक्रकुंडस्य सप्तजन्मकृतं ब्रजेत् ॥१७॥ यानि कानि व तीर्थानि विख्यातानि महीतले ॥ रेत कुंडस्य तान्येव कलां नाहति पोडशीम् ॥ १८ ॥ कुंडस्य दक्षिणे भागे उत्तरा- भिमुखः स्थितः॥ वामहस्तेन पूर्वस्यास्त्रीन्वारान्प्रपिवेजलम् ॥ ॥३९॥ दक्षिणस्यां च वारांस्त्रीन्पिवेदनलिनोदकम्।।गोमुखे तत्र दार परमेश्वर स्थितहैं वहां पितरोंको तर्पण करके ॥ ११ ॥ पापनाशक केदार को जगार महामंत्रम पूजन करके पाप नष्ट करनेवाले केदारमे महापंथका मार्ग प्रान हातहि ॥ १२ ॥ वहां सातसहस्रकोटिगण रक्षा करतहैं क्योंकि मनुष्योंके हित करने के निमित्त वह स्वयम् गिवने अपनीदेहम निर्माण कियाहै ।। १३ ॥ तहां देवता दैत्य यक्ष राक्षस विनर रहतेहैं और पापी मनुष्य उसके जल नहीं पी सरनहैं ॥ १४॥ पितर तया देवतागण संपूर्ण मंदाग्निी जलम म्नान परतह है स्कन्द ! पापी मनुष्य भय करतेहे ॥ १५ ॥ प्रसन्न हुए शिव वरी देतहै तो परम गति मिलना है और केटारक दाहिनी और रेतझुंड स्थितहै ।। ॥ १६ ॥ टमके दर्शन करनेमे इस जन्मकं पार नष्ट होतह तया इम कुंटके स्पर्श करनेसे सात जन्मक पाप नष्ट होतेहैं ।। १७ ॥ भूमिपर जितने तीर्य प्र- सिहं वे इस रेताडके सोलहवें भागोभी नहीं पाने ॥ १८ ॥ और कंडके दाहिनी और टचर मॅह करके स्थित हुआ पहले वाम हाथमे तीनवार जल परि ॥ १९ ॥ और तीन बार दनिमें अंजलीमे जलसो पीर तहां गोमुम्बास केदारकल्प। पीत्वा च त्रिनेत्रो जायते नरः ॥ २०॥ ब्रह्ममूत्राभिमंत्रितं शत- मष्टोत्तरं स्मृतम् ।। जलं च कंठगं तेपां लिंगं भवति देहिनाम् ॥ ॥२१॥ तृणाने बिन्दुमात्रेण ब्रह्ममूत्रेण वेटितम् ॥ मृत्युलोके न तत्प्राप्तित्रिनेत्रो जायते नरः ॥२२॥ श्रीकात्तिकेय उवाच ।। रेतीविद्या महादेव कथयस्व प्रसादतः ॥ अक्षराणि च कानीह कति मात्राः प्रकीर्तिताः ॥२३॥ श्रीश्वर उवाच ॥ अथ मंत्रोद्धारः॥ ॐकारद्वयसंयुकं झूकारत्रयभूषितम् ॥ पंचरेफसमा- युक्तं दशबिन्दुमहाद्भुतम् ॥ २४॥ ॐ कारश्च स्वयं ब्रह्म झूकारो विष्णुरुच्यत ।। रूंकारश्च स्वयं रुद्रो दशबिन्दुसमाश्रितः॥२६॥ एपा विद्या महासेन मम देहेन निर्मिता ॥ शृणु स्कंद महाप्राज्ञ सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ २६॥ यत्र यत्र पिबेत्तोयमनया शु- ऋविद्यया ॥ केदारदर्शयात्रायाः फलं प्राप्नोति मानवः ॥२७॥ अथ मंत्रः ॥ ॐ रूं झू रूं झू एं हूं ॐ ॥ ॥१०॥ नवभांडे महासेन रेतोविद्याभिमंत्रितम् ॥ शालिवान्य गृहीत्वा च गंतव्यं झुत्तरामुखैः ॥ २८॥ नवभांडं करे जल पीकर मनुष्य त्रिनेत्र होताहै ॥२०॥ यज्ञोपवीत पहन कण्ठतक जलमें ना कर एकसौ आठ बार मंत्रको जपै तो वह लिंगस्वरूप होताहै ॥ २१ ॥ तृणके अग्र भाग मात्र जल पान सहित यज्ञोपवीतके धारण करनेसे मनुष्य मृत्युकाल. के प्राप्त होनेपर त्रिनेत्र होताहै ।। २२ ॥ कार्तिकेय बोले हे महादेव ! अपनी प्रसनतासे रेतविद्याका वर्णन करो उसमें कितने अक्षरहैं और कितनी मात्रा कहहिं ॥ २३ ॥ शिवजी बोले दो ओंकार तथा तीन झूकारसे भूपित और पांच संकार तथा दशबिन्दुओंसे संयुक्तहै अर्थात ॐ रखू संखू खूरू रूॐ यह मंत्र है ॥ २४ ॥ ॐ कार स्वयम् ब्रह्मस्वरूपहै, झूकार विष्णु तथा रुंफार शिव दश बिन्दुओंके सहित पहाहै ॥ २५ ॥ हे कार्तिकेय यह विद्या मेरे शरीरसे उत्पन्न हुई है में सत्य र कहताहूं सा सुना ॥ २६ ॥ इस रेतविद्याको पठकर चाहें निधरमे जलकी पीयै वह मनुष्य केदारकी दर्शयात्राके फलफो पाताहै ॥ २७ ॥ है फार्तिकेय 1 नवे पात्र में रतविद्या पठनी कहीहै शाल्य ( तेंडुल)धान्यको लेकर उत्तरपी और नाच ॥ २८॥ नव पान हाथमें लेकर जलमें घाफ उतरकी और भाषाटीकासमेत-प० १७. (५७) धृत्वोदकमध्यप्रक्षालितम् ॥ उत्तराभिमुखैश्चैव रेतोविद्याभिम- वितम्।।२९॥तत्र तिष्ठति सा देवी गौरी नाम महातपाः॥ तस्या अग्रे जलं चैव रेतो विद्याभिमंत्रितम् ॥३०॥ गृहीत्वा गम्यते तत्र ह्यपामार्गस्य तंदुलान् ॥ अपामार्गस्य चाभावे शालिकस्य चतंडुलाः ॥३१॥ साधयित्वा चरुं तत्र घोरेणाभिमंत्रितम्॥ पंचब्रह्मसमायुक्तं चरुं यत्नेन साधयेत् ॥३२॥ यरवलंहं ॥५॥ एतैः कृत्वा चरुं तत्र चतुर्भागं तु कारयेत् ॥ प्रथमो देवतानां च द्वितीयो वह्नये तथा ॥ ३३॥ तृतीयश्चापि गौय्य व चतुर्थों ह्यात्मतप्पणः ।। प्राश्य सम्यक् चरुंतत्र पानीयं प्रपिवेत्ततः।। ।। ३४ ॥ पश्चाच्छिवाय गौर्ये च स्तुतिं कुर्यात्प्रयत्नतः ।। अचिंत्यरूपचरिते परमादित्यरुपिणि ।। ३५ ॥ शमस्व मेऽ- पराधं च जननि त्वं सदाम्बिके ॥ त्वं माता सर्वलोकस्य शंतव्यं परमेश्वरि ॥३६॥ संसारभयभीतोऽहं मार्ग देहि महेश्वरि ॥ तस्या देव्याः प्रभावेण लभ्यते मार्ग उत्तमः ।। ३७ ॥ नम- स्कार शिवे कुर्याद्गुरुदेवं प्रणम्य च ॥ गौरीशानपथा स्कन्द गंतव्या ह्युत्तरा ककम् ॥ ३८ ॥ गोदडंमयमात्रश्च दृश्यते मार्ग मुख करके रेतविद्याको पढ॥२९॥तहां ह महातप!गरिनाम देवी स्थित ह उस- के आगे रेतविद्यामंत्रका पढकं जल छोडे॥३०॥तहां अपामार्गके(चिरचिटा चांवल लेकर जावै अपामार्गके न होनेपर धानके चावल होवें ॥ ३१ ॥ तहां अघोरमंत्रसे चरुको बनावै पांच ब्रह्मसहित चरुको यत्नपूर्वक साधै ।। ३२॥ यरवलंहं ५ तहाँ चरु करके चार भाग करै पहला भाग देवताओंको दूसरा अग्निको ॥ ३३ ॥ तीसरा पार्वतीको, चौथा अपने लिये है, तहां उस चरुको भोजन करके जलपान कर ॥ ३४ ॥ पश्चात् शिव तथा गौरीकी स्तुति करै । हे अचिन्त्य स्पे! हे परमा- दित्यरूपिणि ॥ ३५ ॥ हे जननि ! हे अम्बिके ! मेरे अपराधको क्षमा करो। तुम सब संसारफी माताहो । हे परमेश्वरि ! क्षमा करो ॥ ३६ ॥ हे महेवार ! में संसारकै भयसे डग हुआ हूं मुझे मार्ग दो, उस देवीक प्रमादमे महापुन्य प्रात होताहै ।। ३७ ।। शिवकों नमस्कार करके गुरु देवताको नमस्कार कर, गौरी कईशान मासे उत्तर दिशा नावै ॥ ३८॥ गादंडमार ( भण) म वह केदारफल्प। उत्तमः ॥ प्रमाणं तस्य मार्गस्य द्वात्रिंशदंगुलान्तरः ॥ ३१ ॥ दर्शितः शंभुना मार्गः सिद्धानां स्वर्गकांक्षिणाम् ॥ एतस्यात्रि- विधा वर्णाः श्वेतः १ कृष्णस्तु २ पीतकः३॥ ४०॥मध्ये चत्र भवेत्पीत इति शास्त्रस्य निश्चयः ॥ धन्वन्तरिशतार्धन तत्र चिह्न तु दृश्यते ॥४१॥ मृगेन्द्रसदृशाकाराः शिलास्तिप्टंति सम्मु- खाः॥ तस्य संदर्शनं कृत्वा भयभीताश्च साधकाः ॥ ४२ ॥ अधोरोऽय महामंत्रो महासिद्धिकरो नृणाम् ।। अथ मंत्रः ॥ हुँ फटू स्वाहा ।।५॥अघोरंजपमानस्तु सर्वविघ्नभयंकरम् ॥४३॥ तस्य प्रदक्षिणं कृत्वा गंतव्या चोत्तरा ककुन् । बुधैर्धर्मार्थतत्त्व- विलम्बो नात्र युज्यताम् ॥४४॥ अड़चन्द्रनिभश्चैव शैल- स्तिष्टति चोर्द्धगः ।। त एव शैलं पश्यंति आचार्या विस्मयं गता॥४॥भयशंकान कर्त्तव्या अघोरमक्षरं जपेत्॥अथ मंत्रः॥ ॐ हुंफट्स्वाहा तस्य विघ्नं नकर्त्तव्यं शतं शैलसमीपगम् ॥ ॥४६॥ तस्य प्रदक्षिणं कृत्वा गंतव्यं चोत्तरादिशि ॥ धन्वंतरी- उत्तम मार्ग दीख पड़ता है उस मार्गका प्रमाण बत्तीस अंगुल विस्तृत है ।। ३९ ॥ स्वर्गकी इच्छा करनेवाले सिद्धोंको शिवजी मार्ग दिसाते हैं इसके श्वेत, कृष्ण, तथा पीत, तीन वर्ण हैं ॥४०॥ मध्यमें पीत वर्ण है, यह शास्त्रका निश्चय है। धन्वन्तरी शतकसे किया तहां चिह्न दीखता है ॥४१॥ और सिंहके आकार वाली शिला सन्मुख दीखती है साधक उसको देख भयभीत होते हैं ॥ ४२ ॥ अघोर महापंथ मनुष्योंको सिद्धि कारक है ॐ हूं फट् स्वाहा अधौर मंत्र जपनेस संपूर्ण विन दूर होते हैं ॥ १३ ॥ उसकी परिक्रमा करके उत्तर दिशाको जावै तहां धन्वन्तरी शतकसे कृत चिह्न दीखता है ॥ ४४ ॥ और पर्वतकी उंचाई चन्द्रमांक भाधे मार्गतक है, उस पर्वतको देख आचार्य भी विस्मयको प्राप्त हुए ॥ ४५ ॥ तहां भयको शंका न करें, और अघोर मंत्रको जपै उसमें विध नहीं करना पर्वतके समीप प्राप्त हो ॥ १६ ॥ उसकी प्रदक्षिणा करके उत्तर दिशाको जाव तहां तीनसौ १ भात्मनेपदमार्यम् ।
भापाटीकासमंत-प० १८. (५९). शतत्रीणि आत्मानं चैव गम्यते ॥४७॥ लिंग हेममयं तत्र स्थितं दृश्येत साधकः ॥ श्वेतरक्तं कृष्णपीतं तस्य वर्णं च दृश्यते ॥ ॥४८॥ नाना रत्नसमाकीर्ण ज्वलंतं पद्मरागवत् ॥ आत्म- हस्तेन लिंगे च स्पृष्ट्वात्मनि विलेपयेत् ॥ ४९ ।। अघोरणव मंत्रेण आत्मरक्षां च कारयेत् ।। प्रथमं जपित्वा मंत्रं च पश्चाचैव सुसंगतः ॥५०॥ तस्य लिंगप्रभावेण वांगं च भवि- प्यति ।। आचार्याःसाधकाः सर्वे प्रणम्य च पुनः पुनः॥५१॥अथ मंत्रः ।। ॐहुंफट्स्वाहा ॥५॥ इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेयसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवनमुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहकैलासगमने सिद्धिप्राप्तियोगो नाम सप्तदशः पटलः॥ १७॥श्लोकाः॥१८॥ धन्वन्तरीकी आत्मा जासकतीहे ॥ १७ ॥ तहां सुवर्णके लिंगकी स्थिति अव- लोकन होतीहे और उसका वर्ण श्वेत, रक्त, कृष्ण, पीत, दीखताहै ।। १८ ॥ अनेक रत्नोंसे जटित, पद्मराग मणिकी समान कान्तिमान, उस लिंगको अपने हाथस स्पर्श करके अपने शरीरमें लेपन करै । ४९ ॥ और अयोर मनसे अपनी रक्षा करे प्रथम मंत्र जपकर पश्चात् समीपमें जावै ॥ ५० ॥ उस लिंगके. प्रभावस वनके अंगवाला होताहै . संपूर्ण आचार्य और साधक वारंवार नम- स्कार करें॥५१॥ इति श्री केदारको शिरगौरीमंगादे भापाटीकायां स्तदशः पटलः ।। १७ ॥ अष्टादशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ॐ शृणु स्कंद महाप्राज्ञ वज्रं भवति देहि नाम् ॥ अघोरेण च मंत्रेण महाविनः प्रणश्यति ॥ १॥ खड्ग- ईभर बोले हे महामाजस्कंद ! इससे मनुष्योंका शरीर पव होताहै और अपार महामंत्रसे बडे विन नष्ट होतेहैं ॥ १ ॥ हे देवि ! पडंग महामंत्र देवता (६०) केदारकल्प । तुल्यो महामंत्री देवदानवदुर्लभः॥ तस्य लिंगप्रभावेण हिमैनव स बाध्यते ॥ २॥ धन्वंतारिशतत्रीणि ह्येकचित्तो व्रजेत्पुनः ॥ नत्र चैव पुरी रम्या दृश्यते च मनोरमा ॥ ३ ॥ तत्र हेमप्रभा दीता दृश्यते चोत्तरा हरित् ॥ दृष्ट्वा शक्रपुरी तब ब्रह्मविष्णुपुरी ततः ॥४॥ सूर्यकोटिसमं तेजो ख़ुदीच्यां दिशि दृश्यते ॥ इन्द्र- नीलमहानीलपमरागोपशोभितम् ॥५॥ तस्माच्छंकरपूजायां दृश्यते शिखरे ध्वजः।मनोहरश्च दिव्यश्च मंगलादपि मंगलम्।।६।। दृश्यते च महासेन प्रतोल्यां धवलं गृहम् ॥ नित्योत्सवसमाकीर्णा दृश्यते चोत्तरा हरित् ॥७॥ एकविंशतिसंख्याताः पुर्य्यः कांचन- सन्निभाः॥ पश्चाच साधकाः सर्वे गताश्च चोत्तरी दिशम् ॥ ८॥ नदी च दृश्यते तत्र साक्षादेवी सरस्वती ॥ हंसकारंडवाकीर्णा- चक्रवाकोपशोभिता ॥ ९॥ नानाट्ठमलताकीर्णानानापक्षिसमा- कुला ॥ हरति सर्वपापानि सप्तजन्मार्जितानि वै ॥ १० ॥कुमु- दोत्पलपद्मश्च शोभितं सर उत्तमम् ॥ तत्रैव प्रपिवेत्तोयं पूजयित्वा और दैत्योंको दुर्लभहै, इस सत्य लिंगके प्रभावसे हिमालय पर्वतपर बाधा नहीं होती ॥२॥ धन्वन्तरि शतत्रपको एकचित्त होकर जावै तहां मनोहर रम्या पुरी- के दर्शन होतेहैं ॥ ३ ॥ यहाँ सुवर्णकी कान्तिकी समान प्रकाशित इन्दपुरी दी. सतीहै फिर उत्तर दिशाफी ओर ब्रह्मपुरी और विष्णुपुरी है ॥ ४ ॥ उत्तर दिशा- फरोडॉ मूर्यको समान कान्तिवान है। यह इन्द्रनील और महानील, तथा पद्मराग मणियोंसे शोभित है॥५॥और फैलासके शिखरपर शंकर पुरी है सो अति मनोहर और मंगलसे भी मंगल है।॥६॥हे महासेनाप्रतालीसे स्वच्छ पर दीयता हे उत्तर दिशा नित्य उत्सवोंसे शोभायमान है ॥ ७॥ तहाँ सुपर्णकी समान देदीप्यमान हकीम पुरी है पीछेस साधक लोग उत्तर दिशाको गाय ॥८॥ तहां सरम्पती नदी है जो इस चोर तथा चफोंसे शोभित है ।।९|| अनक वृक्ष तया अंश पार पक्षिपॉस प्यास है यह मनु पंक सात जन्मरे पापको हरण करती यदी। १०यपुर. कमन्ट,तपा नील पमला शोभित सरोष है, तहां शंकरको .
भापाटीकासमेत-१० १८. (६१) च शंकरम् ॥११॥ पितृवंश्यागताः स्वर्ग मातृवंश्यसमन्विताः॥ शिवस्य च प्रसादेन पितॄणां चाक्षया गतिः ॥ १२ ॥ उत्तराभि- मुखो भूत्वा नद्यास्तीरं व्रजेत्ततः॥योजनाई ततो गत्वा ह्याश्रम वक्षिते महान् ॥ १३ ॥ शक्रेण स्थापित लिंगं हेमपीठक- भूपितम् ॥ योजनादै च विस्तीर्णा पुरी शक्रेण निर्मिता ॥ १४॥ पताकाध्वजसंयुक्ता हेमप्राकारवेष्टिता ॥ देवगंधर्वसंकीर्णा चा- क्षया श्रीमती शुभा ॥१६॥ देवकन्यासमाकीर्णा वंशवादेनवा- दिता ॥ गायत्यप्सरसस्तत्र देवगंधर्वयोपितः ॥ १६ ॥ वेदं सध्वनिनिर्घोपं पठति मुनयो मुहुः ॥ स्नात्वा सरस्वतीतीर्थे ह्यर्चयित्वा च शंकरम् ॥ १७ ॥ कुशास्तरणकं कृत्वा चैकरात्रं वसेत्ततः ॥ एकराने व्यतिक्रान्ते नमस्कृत्वा जगद्गुरुम् ॥१८॥ सरस्वती नदीतीरं गंतव्यं योजनत्रयम् ॥ अग्रतो दृश्यते तत्र सिनवारणसविता ॥ १९ ॥ नानारत्नविचित्रैश्च हेमकूटा वसुं- धरा ।। इन्द्रनीलमहानीलपद्मरागोपशोभिता ॥ २० ॥ दशयो- पूजन करके उसके जलको पावै ॥११॥ माताके वंशके पुरुष तथा पिताके वंशके पितरोंकी शिव प्रसादसे अक्षय गति होती है ॥१२॥ उत्तरकी ओर मुख करके नोके किनारे जावै, फिर आधे योजनपर आगे जाकर एक बड़ा आश्रम दीख पडता है ॥१३॥ तहां इन्द्रसे स्थापित लिंग और सुवर्ण जटित सिंहासन है,और आध योजन विस्तारवालीपुरी इन्द्रने निर्माण की है।॥१४॥सी प्रवाल्य तथा धवल मणियोंस जटित भवनोंसे शोभित सुवर्णकी दीवारोंसे घिरी हुई और देवता गंधवासे व्याप्त अक्षय गतिवाली है।।१५।।देवकन्याओंसे युक्त पांसुरी वाद्यसे गुं- जार हुई जहां अप्सराएँ देवता और गंधर्वांकी स्त्रियां गान करती हैं ॥१६॥ और मुनिगण वेदध्वनि सहित अतियोंको पड़ते हैं। तहां सरस्वतीक किनारे ज्ञान करके शिवकी पूजा करके॥१७॥ एक रात्रि कुशाओंको विछाफर निवास फेरै एक रात्रि बीतनेपर नगगुरु शंकरको नमस्कार करफ ॥१८॥ सरस्वती नदीक किनारे किनारे, तीन योजन जावे, तहां सिद्ध वारण ( हाथी) से सेवित भूमि है ॥१९॥ और अनेक प्रकारके विचित्र रत्नोंस जडित सुवर्णसे ढकी पृथ्वी है, इन्द्रनील, महानील, पद्मराग मणियोंसे, शोभायमान है ॥ २० ॥ वह सुवर्णसे शोभित -
(६२)
फदारकल्प।
जनविस्तीर्णा पुरी कांचनशोभिता ॥ विष्णुनास्थापितं लिंग
तन देवो महेश्वरः॥२१॥वापीकूपतडागाश्चप्रासादालय उत्तमः॥
चूतचंदनसंयुक्तः कदलीखंडमंडितः ॥ २२ ॥ पताका-
ध्वजसंयुक्तो द्वारशाखासुशोभितः॥ देवकन्यासमाकीणों वैशवा-
दिवनादितः ।। २३॥ भेरीमृदंगशब्देन शंखतृर्यरवेण च ॥ गी
तं गायति गंधर्वा अप्सरोगणसविताः ॥२४ ॥ तस्य मध्ये म-
हालिंगं विष्णुना स्थापितं पुरा ॥ सात्वा सरस्वतीतीर्थे पञ्चते
तत्र साधकाः ॥२६॥अर्चयित्वा महेशानमेकरात्रं च जागरम् ॥
नमस्कृत्य च देवेशं गंतव्या चोत्तरा हरित् ॥२६॥
इति श्री केदारकल्पे विख्यातपुण्ये श्रीश्वरकार्तिकेयसंवादे
पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरत्रहाप्राप्तये महापथे
शिवदर्शने सदेहकैलालगमनेहेमलंघनं नामा-
शादशः पटलः ॥ १८॥ श्लोकाः५०७॥
पुरी दसयोजन विस्तारवाली है तहाँपर विष्णुने महेश्वर दधक लिंगको स्थापन
किया है ॥ २१ ॥ और वाउडी, कूप, सरोवर, उत्तम भवन, आमके वृक्ष, तथा
चंदनके वृक्ष, तथा केलेके वृक्षोंसे शोभायमान है ॥ २२ ॥ प्रवाल्य ध्वजा मणि-
योसे युक्त द्वारशाखा (वंदरवाल ) से शोभित, और देव कन्याओंसे व्याप्त वंश
चाद्य, ध्वनिसे गुंजारित ॥ २३ ॥ भेरी, मृदंग, तथा शंख, वीन आदि वाजोंक
शब्द सहित गंधर्व गान करते हैं, और अप्सरागण नृत्य करती हैं ॥ २४ ॥ पूर्व-
कालमें विष्णुने तहां शिवलिंग स्थापन किया है सरस्वती तीर्थपर स्नान करके
साधक ॥ २५॥ महेश्वरका पूजन करके तथा एक रात्रिभर जागरण करे और
देवको प्रणाम करके फिर उत्तरदिशाको जावै ॥२६॥
इति श्रीकेटारकल्पे शिवपार्वतीसंगाद भापाटीमायामष्टादशः पटलः ॥ १८ ॥
भापाटीकासमेत-१० १९, (६३) एकोनविंशतिः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॐ सरस्वतीनदीतीरे आश्रमो दृश्यते महान् ॥ वासुकिप्रमुखाश्चैव दृश्यते पन्नगोत्तमाः ॥ १ ॥ महापालो गय- श्चैव शंखपालश्च कर्कटः ॥ अनंतजयनामा च आस्तीकः परमो मुनिः ॥ २॥ दृश्यते शेपनागश्च तक्षको धरणीधरः ।। तिप्रति पन्नगाः सर्वे राजा चैव विरोचनः ॥ ३ ॥ वितिष्ठते वासुकिश्च सभायां परिवेष्टितः ॥ सिंहासनानि दिव्यानि हेम- रत्नकृतानि च ॥ ४॥ तत्र तिष्ठति राजेन्द्र पन्नगप्रवरास्तथा ॥ वासुकिदृश्यते तत्र वाद्यते बहु नकधा ॥ ५॥ भेरीमृदंगशब्देन काहलैः शंखमईलैः ।। वाद्यते तादृशाश्चैव वीणापणवझर्झराः॥ ॥६॥वाद्यते च तथा सर्वे यथा मेघविगर्जितम् । स्थानंतत्र पुरे रम्ये नानारत्नविभूपितम् ॥ ७॥शतयोजनविस्तीर्ण हेमप्राकार- वेष्टितम् ॥ द्वादशादित्यतेजश्च नागकन्यासमाकुलम् ॥ ८॥ युवत्यस्ता मदोन्मत्ता विद्युत्तेजःसमग्रभाः॥ मृगाक्ष्यो हंसगामि- शिवजी वाले ! सरस्वती नदीके किनारेपर एक बडा आश्रम दीखता है, तहां वासुकी आदि सर्प श्रेष्ठके दर्शन होते हैं ॥ १॥ महापाल, गय, शंखपाल कर्कट, तथा अनंतजय, नामक परम आस्तिक हैं ॥ २॥ शेषनाग जो पृथ्वीको धारण कर रहे हैं वह तथा संपूर्ण तक्षक ( सर्प) व, विरोचन राजा स्थित है ॥ ३ ॥ उनसे वासुफी उस सभामें घिरे हुए शोभित होत हैं और मुवर्ण तथा रत्नजडित सिंहासन बिछा है ॥४॥ उन सिंहासनोंपर राजेन्द्र सर्पराजा वासुकी विराज- मान हैं उस स्थानपर अनेक प्रकारके वाजे, वजते हैं ॥ ५॥ भेरी, मृदंग, तथा शंखके शब्दसे वहाँके मृगभी वीणाकी समान शब्द करते हैं ॥ ६॥ और ऐसा शब्द करते हैं जैसे मेघकी गर्जना होती हो और उस नगरमें अनेक प्रकारके रनों- से भूपित स्थान हैं ॥७॥सौ योजन विस्तारवाला गुवर्णकी दीवारोंसे पिरा हुआ तथा बारह सूर्यकी समान प्रकाशित और नाग कन्याओंसे व्याप्त है ॥ ॥ जो कन्या यौवनसे उन्मत्त हैं वे विजलीकी समान तेजवाली और मृगक समान - (६४) कदारकल्प। न्यो नपुरारावसंकुंलाः ॥ ९॥ करकंकणसंयुक्ता हारकेयूरभू- पिताः ॥ संपूर्णचन्द्रवदना दिव्यवस्त्रपरिच्छदाः ॥ १०॥ मृदु- कोमलदेहाश्च वदति कोकिलस्वरैः ॥शीणि पुप्पसुगंधेन नाग-. वल्लीविभूषिताः ॥ ११ ॥ सर्वलक्षणसंपूर्णा रूपयीवनगविताः॥ सर्वा गुणसमायुक्ताः कुंडलाभरणोज्वलाः ॥ १२ ॥ दिव्य- प्रसूनशिरसो दिव्यगंधानुलेपनाः॥ साधकाश्च गतास्तत्र सर्वे ते विस्मयं गताः ॥ १३ ॥ तत्र दृष्ट्वा महाप्राज्ञ पुरं सर्वगुणा- न्वितम् ॥ रम्यं मनोहरं दिव्यं वह्निज्वालासमप्रभम् ॥ १४ ॥ उत्तुंगशिखराकारैः प्राकारस्तोरणैश्चितम् ॥ रत्नमौक्तिकवैदूर्यवि- स्फुरत्किरणान्वितम् ॥ १५ ॥ कपाटागारसंयुक्तं वेष्टितं च पुरोत्तमम् ॥ इन्द्रनीलमहानीलपद्मरागोपशोभितम् ॥ १६ ॥ तस्मिन्नेव पुरे रम्ये हेमबद्धा वसुंधरा ॥ सौवर्णकेतकीजाता ह्या- सते राजचंपकाः ॥ १७॥ सौवर्णकास्तत्र वृक्षा नानापशिस- नेत्रवाली विहुए पायजेबास भूपित हैं ॥ ९ ॥ हायमें कंकन, हार तथा याजूबंदसे शोभित पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखारविन्दवाली तथा दिव्य वस्त्र धारण किये हैं ॥ १० ॥ अतिमृदु और कोमल शरीरवाली कोपलके समान स्वरसे बोलती हैं सिरपर पुष्पांकी मुगन्धि, और मुख पानस भूपित ॥ ११ ॥ संपूर्ण शुभ लक्षणोंसे लक्षित और रूप यौवनमें संयुक्त समस्त गुणोंसे अलंकृत कुंडल आभूपणोंसे उज्ज्वल ॥ १२ ॥ दिव्यपुष्प ( सीसफूल) सिरपर बंधा और मुन्दर सुगंध लेपन किय स्थित हैं उस स्थानपर संपूर्ण साधक लोग गये तो वे विस्मयको प्राप्त हुए ॥ १३ ॥ हे महामास ! यहां सर्व गुण आगार पुरको देसकर जो सब प्रकार रमणीफ और मनोहर है अमिकी लपटकी समान फान्तिवान् ॥ १४ ॥ ऊंच २ शिखर सथा दीवार और घदरवारोंसे संयुत्ता, रत्न मोती पैदूर्य मणियोंकी यान्ति से मिश्रित ॥ १५॥ और फाटक तथा मृमले सहित इस प्रकार यह उत्तम नगर पिग दुभा है और इन्द्रनील और महानील तथा पद्मराग मणियोंसे शोभित है ॥ १६ ॥ उग रम्प पुरमें सुवर्णसे पृथ्यी आच्छादितहै और सुपर्णके फेतकी और रानपक पृक्षह ॥ १७ ॥ और पहा मुवर्णक पृक्ष और अनेक प्रकारपे.
. भापाटीकासमेत-प० १९. माकुलाः ॥ फलैर्विनिर्मिताः साक्षात्कूप्मांडसदृशोद्वतः॥ १८॥ वकलैः शतपत्रैश्च विल्ववृक्षैश्च पाटलैः॥ वापीकूपतडागादिप्रा- सादैश्च गृहस्तथा ॥.१९ ॥ ध्वजमालाकुलं दिव्यं शिखरैश्वापि शोभितम् ॥ चूतचंदनसंयुक्तं कदलीखंडमंडितम् ॥ २० ॥ राजवृक्षसमाकीण विवाहोत्सवेसंकुलम् ॥ रम्यं मनोहरं दिव्यं चोदितार्कसमप्रभम् ॥ २१ ॥ जलमध्ये यथा पद्मं नक्षत्राणां यथा शशी ॥ तथा नागपुरीणां च तत्पुरो शोभते भृशम् ॥२२॥ 'मणिमध्ये यथा पमं दिनमध्ये यथा रविः ॥ तथा नागपुरी चैव शोभते च मनोरमा॥ २३॥ साधकाश्च गतास्तत्र दृष्ट्वा च कुलवल्लभाम् ।। निशि-वह्नर्यथा तेजो दृश्यते च तथा पुरम् ।। ॥२४॥ गीतज्ञास्तत्र ग़ायंति नृत्यते नर्तकोत्तमैः ॥ ब्राह्मणा वेदनिर्घापैः सर्वशास्त्रं पठति च ॥ २५॥ शिवालयं समाकीण नानालिंगसमाकुलम् ॥ तस्य मध्ये महाराजा आसते पन्नगो- पक्षीगण निवास करते हैं फलोंसे सजित जो कुम्हडा (गोलकह) के समानहें सं- पूण शाखा भर रही हैं.॥ १८ ॥ केसर कमल, तथा वेलपत्र आदिके वृक्षोंसे तथा वारडी कृप तालाव आदि और भवन, प्रासादोंसे व्याप्त ॥ १९ ॥ और ध्धना (पताका) मालाओंसे शोभित, मुन्दर शिखरोंसे शोभित, आम, चंदनके वृक्षों- से संयुक्त तथा केलेके खंभोंसे शोभायमान ॥ २० ॥ सप्तवर्ण वृक्षोंसे संयुक्त तथा विवाहोत्सवोंसे शोभायमान और रमणीक मनोहर दिव्य उदय हुए सूर्यको समान कान्तिमान।।२शानलकेमध्यमें जैसे कमल,और तारागों में जैसे चन्द्रमा,है उसी प्रकार नागपुरीयोंके मध्य वह नगरी शोभित होरहीहै।।२२॥संपूर्णमणियोंके मध्य में जैसे पनरागमणि और दिनके मध्यमें जैसे सूर्यह टसी. प्रकार यह नागपुरी मनो. हर शोभायमान है ॥ २३ ॥ तहां साधक लोग पहुँचे और टस प्रियनगरीकी देखकर जैसे रातमें अमिका तेजहो तैसे वह पुर दीखताहै ॥ २४ ॥ वहां गीत- गानेवाले गायन करतेहैं और नृत्य करनेवाले नाचते हैं तया ब्राह्मण लोग वेद- ध्वनि फरतेहैं और संपूर्ण शास्त्र पढतेहैं ॥ २५ ॥ और शिवके मंदिर अनेक सिं- (६६) वेदारकल्प। त्तमाः ॥ २६ ॥ दिव्यवस्त्रपरीधाना दिव्यगंधानुलेपनाः॥ दिव्यपुष्पशिरोवृद्धा दिव्यतेजःसमप्रभाः ॥ २७ ॥ दिव्यदेहा महाकन्याः सर्वाभरणभूपिताः॥ सर्वा गुणसमायुक्ता दिव्यभोग- समावृताः ॥२८॥ दृष्ट्वा च साधकाः सर्वे वदति स्वागतं प्रिये ॥ राजोवाच ॥ वागता भुवनात्सिद्धाः क स्थानं चैव लभ्यते ॥ ॥ २९ ॥ एतदहि महाचार्य साधकोपरि चेष्टितम् ॥ साधक उवाच ॥ कथयामि महाराज शृणु मे वचनं शुभम् ॥ आगता मृत्युलोकाये तैः प्राप्यः शंकरालयः ॥ ३० ॥ राजोवाच ।। शृण्वन्तु साधकाः सर्वे मम वाक्यं सुनिश्चितम् ॥ पश्चाच्च सा- धकाः सर्वे गच्छाचार्य्य यथासुखम् ।।३१॥ साधक उवाच ॥ किमर्थ भोग्यमायुष्यं पश्चाच्च किं भविष्यति ॥ एतद्रूहि महा- राज कुत्र स्थानेषु गम्यते ॥३२॥ राजोवाच ॥ शतकपंचक कन्या दीयते च पृथक्पृथक् ॥वर्षपंचशतं ह्यायुः कामरूपा महा- बलाः ॥३३॥ आचार्यसाधकाः सर्वेऽभुजन्भोगान्यथेप्सितान॥ गोसे भरे हैं उसके मध्यमें सर्प विराजतेहैं ॥ २६ ॥ सुन्दर २ वख तोशक तकिये अवलंघन किये तथा सुन्दर सुगंध लगाए, सिरपर दिव्य पुष्प (सीसफूल) बांधे और दिव्य तेजकी समान कान्तिवाली ।। २७ ॥ दिव्यदेह धारण किये सुन्दर शरीर वाली समस्त आभूपोंसे भपित सब गुणोंसे अलंकृत दिव्य भोगों को भोगती हुई ॥ २८ ॥ सम्पूर्ण कन्याओंने देखकर साधकोंको बोले हे प्रिय ! स्वागतह रानाबोला हे सिद्धो ! कहांसें आर हो और किस स्थानको जातेहो। ॥ २९ ॥ सो हे महाचार्य साधक ! हमसे कहो । साधक बोला हे महाराज ! मैं कहताह मेरा वचन मुनो हम मृत्युलोकसे आएहैं और शंकरके स्थानको जाते, ॥ ३० ॥ राजा बोला । हे साधको ! मेरा वचन संपूर्णसिद्ध सुनो पीछे से सुसपूर्वक सब लोग जाना ॥ ३१ ॥ साधक वोला भोग और आयु किस लिये हैं और पीछे क्या होना है ? हे महाराज ! और किनस्थानों में जाते हैं यह सब वर्णन करो ॥ ३२ ॥ राजा बोला पाँचसौ कन्या पृथक् २ प्राप्तहोंगी और पांचसौ वर्पकी आयु और इच्छानुकूल स्वरूप धारण फरोगे ॥ ३३ ॥ तुम सं- पूर्ण आचार्य साधक यथेप्सित भोगोंको भोगकर दिव्यवस्त्र धारण करके तथ भाषाटीकासमेत-प० १९. (६७) दिव्यवस्त्रपरीधाना दिव्याभरणभूपिताः॥३४॥अस्मिन्नेव पुरे रम्ये बहुकन्यासमाकुले । अस्मिन्स्थाने महाभोगास्ते भोगा- देवदुर्लभाः ॥ ३५ ॥ दिव्यपुष्पशिरोबद्धा विमानारूढसाध- काः। यत्र स्थाने महावीरा यथेच्छा तद्धि गम्यते ॥ ३६॥ति- . ठंतु साधकाः सर्वे भुंजतां विपुलां श्रियम्।।एते मत्कथिता भोगा भोक्तव्याः साधकैः सह ॥३७॥ पश्चाच्च सांधकाः सर्वे मृत्यु- लोकं व्रजति च ॥ सर्वकामसमृद्धाश्च जायते विपुले कुले । ॥३८॥ सर्वे गुणसमायुक्ता राजानोऽपि भवंति हि ॥ साधक उवाच ॥ मृत्युलोके मया चांत गंतव्यं च महानृप ॥३९ ॥ मृत्युलोकभयागीता राजनवागता वयम् ॥ कोऽत्र स्थाने महा- राज पश्येन्नैव च शंकरम् ॥ ४०॥ अस्माभिस्तत्र गंतव्यं यत्र ब्रह्मा हरो हरिः ॥ त्वया यदुदितं राजन्हृदेय नैव रोचते ॥४॥ अवश्यं तत्र गंतव्यं यत्र देवो महेश्वरः ॥ ४२ ॥ राजोवाच ॥ सिद्धसिद्ध महाप्राज्ञ क्षणमेकं च तिष्टतु ॥ करसंपुटितं कृत्वा राजा तेपां वदेत्ततः ॥४३॥ भक्षित्वा फलमेकैकं देवदानव- दिव्य आभूपण पहने ।। ३४ ॥ अधिक कन्याओंसे व्याप्त इस रमणीक स्थानमें ऐसे भोगोंको भोगो जो देवताओंकोभी दुर्लभहैं ॥ ३५ ॥ शिरपर दिव्य पुष्पों- को धारण करके विमान पर चढके जिस२ स्थानमें जाना चाहोगे तहां तहां जा सकतेहो । ३६ ॥ हे साधको ! तुम सब यहां निवास करो और अधिकभोगों- को भोगो यह भोग हमने कहे ।। ३७ ॥ पश्चात् सब साधक मृत्युलोकमें प्राप्तहोंगे संपूर्ण कामनाओंसे पूर्ण और श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न होतेहैं ॥ ३८॥ वे सब गुणों से परिपूर्ण तथा राजा होतेहैं साधक बोला हे महानृप ! मृत्युलोकमें वडा दुःख है तहाँ नहीं जायगे ॥ ३९ ॥ हे राजन् ! हम लोग मृत्युलोकके भयसे डरे हुए यहां पर आए हैं। हे महाराज ! इस स्थानमें कौन शंकरहै ? हमने नहीं देखा। ॥ ४० ॥ हम लोग वहां जायगे जहां ब्रह्मा शिव विष्णुहैं । हे राजन् तुमने जो भोग कहे सो नहीं रुचते ॥४१॥ अवश्य वहां जायँगे जहां महेश्वर देवहैं ॥४२॥ राजा बोला हे सिद्ध ! हे सिद्ध ! एक क्षणमात्र यहां ठहरो इस प्रकार हाथ जो. डकर राजाने उनसे कहा ॥ १३ ॥ भक्तिका रोपण करके एक रे फल सबने .
(६८) फेदारकल्प। दुलभम् ॥ पश्चाच साधकाः सर्वं भवंतु राजरामराः ॥ १४ ॥ फलस्य भक्षणं कृत्वा ह्यमृतं प्रपिवति च ॥ पश्चाच साधकाः सर्वे गताश्चैवोत्तरामुखे ॥ ४५ ॥ इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्ति- केयसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहकैलासगमने नाग- पुरीवर्णनं नामैकोनविंशः पटलः॥१९॥ ॥श्लोकाः॥६५२॥ भक्षण किया जो देवता और दैत्योंको दुर्लभहै पश्चात् सब साधक अजर अमर होगए ॥ ४४ ॥ उन्होंने फलोंको भक्षण किया और अमृतकोभी पिया पश्चात् सब साधक उत्तरदिशाकी और चलदिये ॥ ४५ ॥ इति श्रीकेदारकल्पे शिवपार्वतीसवादे भाषाटोकायामेकोनरिंशः पटलः ॥ १९ ॥ विंशतिः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॐ अग्रतो दृश्यते तत्र हेमबद्धा वसुंधरा ।। अस्मिन्स्थाने पुरं रम्यं नानारत्नविभूपितम् ॥ १ ॥ अर्द्धयोजन- विस्तीर्ण प्रासादरूपशोभितम् ॥ वासितं च ततः सर्वैर्महागंधैः सुगंधिनाम् ॥२॥ इन्द्रनीलैमहानीलैर्विस्फुरत्तन्महापथम् ।। मौक्तिकैश्चन्द्रकांतैश्च वैदूर्य्यमणिभिश्चितम् ॥ ३ ॥ इन्द्रजाल शिवजी बोले आगे सुवर्णसे आच्छादित भूमि देखपडी, इस स्थानमें अति रमणीक नगरथा जो अनेक प्रकारके रत्नोंसे शोभित ॥१॥और आधे योजन भर चौडा और भवनोंसे शोभायमानहै वहां बडे २ सुगंधित वृक्षोंकी सुगधिसे सब लोक सुगंवित होगये ॥२॥ इन्द्रनील और महानील, मणियोंसे वह मार्ग प्रका- शित होताथा, और मोतियोंसे, तया चंद्रकांता, और वैदर्य मणियोंसे शोभित या ॥ ३॥ रत्नजटित जालोंसे शोभायमान, तथा चित्र कर्मसे शोभित . भापाटीकासमत-प० २०. (६९) परिक्षितंचित्रकर्मोपशोभितम् ॥ रम्यं मनोहरं दिव्यं चन्द्रादित्य- समप्रभम् ॥४॥ उत्तुंगशिखराकारं दीपमालाविभूपितम् ।। तत्र स्थाने महादिव्यो बहुगंधादिवासितः ॥ ५ ॥ नानारत्न- समाकीर्णः प्रासादस्तत्र शोभते ॥ तस्य मध्ये महारम्यं गतास्ते सर्वसाधकाः॥६॥ ब्रह्मणा स्थापितं लिंग तत्र देवो महेश्वरः।। साधकाच गतास्तत्र नमस्कृत्य जगद्रुम् ॥७॥ स्वर्गस्थानं गताः सर्वे लागता गणकोटयः ॥ गंधर्वाश्च गताः सर्वे अर्च- यित्वा पृथक्पृथक् ॥८॥ पूजां कृत्वा ततः सेन स्वर्गे ता गण- कन्यकाः॥ भेरीमृदंगशब्देन शंखकाहल्लमर्दलैः॥९॥वीणा- तालमहाशब्दैदिनैर्विविधैरपि॥घंटादुंदुभिर्नि?पैरप्सरोनृत्यगा- यनैः ॥ १० ॥ प्रेक्षणं च प्रकुर्वति लिंगस्य पुरतः स्थिताः ॥ मधुरस्वरगंधर्वा गीतं कुर्वन्ति योपितः ॥ ११ ॥ आगता दह्य- माने च तथा च हरिचन्दने ॥ पठति विविध स्तोत्रं मुनयो देव- संयुताः॥ १२॥ आरात्र्तिकं प्रकुर्वाणाः कपूरेण समन्विताः॥ अतिरम्य मनोहर दिव्य चन्द्रमा और सूर्यकी समान कान्तिवान् था ॥ ४ ॥ ऊंचे २ शिखरोंपर दीपक समुदाय रक्खेये । उस स्थानपर अधिक सुगंधित द्रव्योंसे सुगंध आतीथी ॥ ५॥ और अनेक रत्नोंसे जटित मकान शो भायमानथे, उस नगरके मध्यमें वे संपूर्ण सापक गये ॥ ६ ॥ जहां ब्रह्माजीने महेश्वरदेवका लिंग स्थापित कियाथा साधकोंने वहां जाकर जगत् गुरु शिवको नमस्कार किया ॥ ७ ॥ तहाँ कोटिगण स्वर्गस्थानमें प्राप्त हुए हैं और गंधर्वभी पृथक २ शिवका पूजन करके चले गए ॥ ८॥ हे स्वामिकार्तिकेय स्वर्गलोकमें वहगण और कन्या पंच कृत पूजाको करके भेरी, मृदंग, शंख आदिकको कोलाहलके शब्दों सहित स्थितथी ॥ ९ ॥ वीणा आदि अनेक वाजे बजते थे और घंटा डमरूके शब्दोंसे सहित अप्सराएं नृत्य करती थीं ॥ १० ॥ शिव- लिंगके आगे, स्थित होकर अवलोकन करतीहुई गंधर्वस्त्रियां मधुरवाणीसे गान करतीर्थी ॥ ११ ॥ और अगर कर्पूर जलाकर चंदन चढा, देवतों सहित मुनि- गण अनेक प्रकारके स्तोत्र पढतेहैं ॥ १२ ॥ और कर्पूरकी आर्ती करतेहैं, उस , (७०) केदारकल्प। तस्मिन्स्थाने महातीर्थे धर्मकर्मसमागमः ॥ १३॥ गुरूपदेश- मार्गेण पूजयित्वा महेश्वरम् ॥ स्तोत्रमंत्रैर्महादेवं वेदसिद्धान्त- मध्यगेः ।। १४॥ तस्मिन्स्थाने महातीर्थे निवसेचैकरात्रकम् ॥ आचार्यसाधकाः सर्वे निद्रावशमुपागताः ॥ १५ ॥ अईराने . भवेनिद्रा स्थाने तस्मिन्महायुधैः ॥ स्वप्ने च दृश्यते तत्र रुद्रदेवो महेश्वरः ॥ १६॥ जटामुकुटधारी च चंद्रार्धकृतशेखरः॥ नी- लकंठो वृपारूढशूलपाणिर्महाबलः ॥ १७॥ त्रिनेत्रो दशहस्तश्च भस्मगात्रविलेपनः॥ सिवाक्यं वदेत्तत्र सिद्धाश्चैवोपदेशिनः॥ ॥ ३८॥ देवस्य पश्चिमे भागे तिप्टंति फलिताद्रुमाः॥ तत्फलै- रानताः शाखाः कूष्मांडसदृशैर्भुवि ॥ १९ ॥ कूष्मांडफलरूपेण त्वमृतं तत्र तिष्ठति ॥ आचार्यसाधकाः सर्वेऽप्यागत्य द्रुमसनि- धिम् ॥ २० ॥ गृहीत्वा फलमेकैकं गताश्चैव शिवालयम् ।। पंचते साधकास्तत्र पूजयित्वा महेश्वरम् ॥ २१ ॥ फलं चाई च नैवेद्यमर्धभक्षणमेव च ॥ स्वप्ने चैवं समाख्याता पुनर्निदा महातीर्थ स्थान पर बड़े धर्म कर्म होतेहैं ॥ १३ ॥ और गुरुके उपदेश किये मार्गके द्वारा शिवको पूज, तथा वैदके सिद्धान्तोंके अनुकूल स्तोत्र मंत्रोंसे अर्च- ना करके ॥ १४ ॥ उस महातीर्थपर एक रात जागरण कर फिर संपूर्ण आचार्य साधक निद्राके वशीभूत हुए ॥ १५ ॥ आधीरातके विषय जब संपूर्ण साधकोंको निदा आगई, उस समय महेश्वरदेव स्वममें दीखे ॥ १६ ॥ जो जटा मुकुट धारण किये थे, और मस्तक पर आधा चन्दमा विराजताथा, नीलकंठ नाँदिये (बैल) परचढे त्रिशूल हायमें लिये थे ॥ १७ ॥ तीन नेत्र और दशहाथ भस्म शरीरमें लगीहुई थी, तब सिसि वाक्य वाले और उनको उपदेशदिया ॥ १८ ॥ इन शिवदेवके पश्चिम भागमें फलित हुए वृक्ष लग रहे थे, फम्हडा ( गोलकद ) के समान फलोंस वृक्ष झुकरहेथे ॥ १९ ॥ कूष्मांड फलफे रूपमें अमृत स्थित था, संपूर्ण आचार्य साधक उन वृक्षोंके समीप आए ॥ २० ॥ और एक २ फल ग्रहण, परएं: शिपालपको गये यह पांचो साधक महेश्वर देवको पूजकर ॥ २१ ॥ आधा- पर, और नघद्य देवताको चढाया तथा आधा भक्षण किया इस प्रकार स्वम देस ~~ भाषाटोकासमेत-प० २०. (७१) हि तद्गता ॥ २२॥ विषुधा विस्मयं गत्वा मुखं पश्यति सत्व- रम् ॥ साधका विस्मयं जग्मुः स्वप्ने दृष्ट्वा महेश्वरम् ॥२३॥ आचार्य उवाच ॥ ॥ मयोक्तं हि पूर्वमिदं शास्त्रं सर्वत्र दर्शनम् ॥ अद्य वै पंकटेयत्र दृश्यते च महेश्वरः ॥२४॥ तत्र दृष्ट्वा महा- देवं हर्प यांति मुहुर्मुहुः ॥ अद्य मे सफलं जन्म चाय मे सफलं तपः॥२५॥ अद्य मे सफलं जाप्यं यदि दृष्टो महेश्वरः॥ श्री- श्वर उवाच॥भो भोः सिद्धा महाभागा तुष्टो वो हि त्रिलोचनः।। ॥ २६ ॥ गुरुभक्तिप्रभावेण मार्ग पश्यति सत्वरम् ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वापृच्छंस्ते सर्वसाधकाः ॥२७॥ आचार्य साधका सर्वे क्षणमेकं च तिष्ठतं ॥ दृश्यते च पुरं श्रेष्टं नातिदीर्घ न ह्र- स्वकम् ॥२८॥सुपकामृतगंधं च फलं कांचनसन्निभम् ।। गृहीत्वा फलमकैकं गताश्चैव शिवालयम् ॥ २९ ॥ स्नात्वा भत्त्या च ते सिद्धाः पूजयित्वा महेश्वरम् ॥ अद्वै च शिवनैवेद्यमर्द्धभक्ष- णमाचरन् ॥ ३० ॥ फलभक्षणमात्रेण मूछी गच्छंति साधकाः फिर वे सब निद्रासे छूठे ॥ २२॥ वे पंडितलोग विस्मय को प्राप्तहोकर मुखौंको देखते हुए साधक गण स्वम देखकर विस्मयको प्राप्त हुए ॥ २३ ॥ आचार्य बोला मैंने पहलेही शास्त्रमें सुनायाया कि, दशन होगा। आज शिव देवने प्रकट होकर दर्शन दिया ॥ २४ ॥ उस समय महादेवको देखकर वे लोग वारंवार हर्पको प्राप्त हुए और कहा आज हमारा जन्म और तप सफल हुआ ॥ २५ ॥ आज हमारा जप महेश्वरके दर्शनसे सिद्ध हुआ । ईश्वर बोले, हे सिद्धो ! तुमसे त्रिलोचन शिव संतुष्ट हुए ॥ २६ ॥ गुरुभक्तिके प्रतापसे शीघ्र सुमार्गको देखते हैं उनका यह वचन सुनकर संपूर्ण साधक पूंछने लगे ॥ २७ ॥ क्षणमात्र उन अ चार्य साधकोंके स्थित होनेपर एक नगर जोन बहुत बडा न बहुत छोटा ॥ ॥ २८ ॥ जो सुन्दर २ पके हुए फल और सुगंधसे शोभायमान और सुवर्णके समान देदीप्यमान था तहां से प्रत्येक साधक एक २ फलको ग्रहण करके शिवके स्थानको गए॥२९॥और उन्होंने स्नान करके शिवका पूजन किया,आधारफल शि- वको चढ़ायाआधा स्वयम्भोजन किया।॥३०॥फलके भक्षण मात्रसे साधक विस्मय (७२) केदारकल्प। तावत्तिष्ठति ते सिद्धा यावद्दोदोहमात्रकम् ॥३३॥ चिंतकाः स्थि- तिमात्रेण स्मरंति परमेश्वरम् ।। सर्वव्याधिविनिर्मुक्ता जरामृत्यु- विवर्जिताः ॥ ३२ ॥ दिव्यदेहा महाकाया मलगंधविवजिताः।। अशेपवेदवतारः सर्वशास्त्रविशारदाः ॥ ३३ ॥ देवद्विजप्रसादेन गुरुधर्मबलेन च ॥ भवंति साधकास्तव रुद्रतुल्यपराक्रमाः ॥ ॥३४॥ बहुज्ञानात्ततः सिद्धा जाता जातिस्मरा ध्रुवम् ॥ प- श्यति साधकाः सर्वे स्वगै मृत्यु रसातलम् ॥ ३५ ॥ महावीरा महावेगां महाबलपराक्रमाः ॥ रूपवतो महातेजा जायते तत्र साधकाः ॥ ३६॥ पश्यंति गगने रम्ये कैलासशिखरालयम् ।।. सर्वे पुरी प्रपश्यंति आचार्यः साधकाच ये ॥३७॥ दिव्यचक्षु- भवेत्तेपां दीर्घदृष्टिस्ततो भवेत् ॥ इच्छया कुर्वते सृष्टिमिच्छया नंति ते जगत् ॥ ३८॥ त्रीनपीमान्पुनर्लोकान्कुर्वते ते च ली- लया। सहस्रं योजनं गत्वा पुनरायन्ति ते ध्रुवम् ॥ ३९ ॥ नव- कोटिगजानां च बलं प्राप्य दिवं गताः ॥ पां संख्या न कर्त्त- (मूछी)को प्राप्त हुए और गोदोहन(क्षण)मात्र वे इस दशामें रहे॥३१॥ फिर सचेत होकर परमेश्वरको स्मरण करने लगे और सब व्याधि और जरामरण से रहित हुए।॥ ३२ ॥ दिव्य देह को धारण कर जो मल दुर्गंधसे रहितहैं चारों वेदके कहने- वाले तथा संपूर्ण शास्त्रों में निपुण हुए ॥ ३३ ॥ देवता और ब्राह्मणोंके प्रसादसे तथा गुरुभक्तिके वलस तहांपर वे साधक शिवके समान पराक्रमी होगये ॥३४॥ तब उन सिद्धोंको अधिक ज्ञानसे जातिका स्मरण होगया और सब साधकोंने म्यगंमृत्यु रसातलको देस ॥ ३५॥ वे बडे शूर वीर तथा महातेजरवी; पराक्रमी, और सुन्दर रुपवाले साधक है ॥ ३६॥ रम्य आकाशसे शिखरों सहित कैलास पर्वतका और संपूर्ण पुरोको दसहि ॥ ३७॥ उनके दिव्यनत्र होतेहैं और दीर्घ- दृष्टि होतीहै,अपनी इच्छास सृष्टि कर सकते हैं तथा इच्छासेही हरणकरसकते हैं ॥ ३८॥ क्षणमात्रमें तीनों लोकों में भ्रमण करसफतेह और सहसों योजन जा कर फिर आसय तह ॥ ३९ ॥ नौ करोड हाथियोंका चल पाफर स्वर्गको प्राप्त १. भदन्त माम् ।
भाषाटीकासमेत-प०२१. (७३) व्या देवदानवराक्षसैः॥ ४०॥ स्वर्ग मृत्युं च पातालं लंघेरन्गो- प्पदं यथा ॥ एवं देहे वलं तेपां सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥४१॥ तत्र ते साधकाः सर्वे भवंतु हजरामराः ॥ सिद्धाचार्यसमायुक्ता आत्मानं शोधयंति हि ॥४२॥ मनुष्यजन्मसंभूता स्थितास्ते- "नरकार्णवे ॥ विहायतन्महाशास्त्रं महामार्ग भयानकेः ॥ ४३॥ न पश्यंति परं दिव्यमंधास्ते ज्ञानमोहिताः ॥ अनेनैव च देहेन स्वर्गों यैर्नाधिगम्यते ॥४४॥ये वदंतिं च आचार्यः सिद्धाश्च वि स्मयं गताः।तत्र ते साधकाः सर्वे गतास्ते चोत्तरां दिशम्।।४६॥ इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेय संवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शि- वदर्शने सदेहकैलासगमने स्वप्ने शंकरप्राप्तिः प्रत्यक्ष दर्शनञ्च नाम विंशः पटलः॥२०॥श्लोकाः॥१९॥ होतेहैं उनके पराक्रमकी देवता तथा दैत्य, गणना नहीं करसकते ॥ ४० ॥ स्वर्ग मृत्यु तथा पाताल लोकको गोपदकी समान उल्लंघन करसकते हैं इस प्रकार टन के देहमें वल होताहै ॥४१॥ और वहांपर वे सब साधक अजर अमर होतहें सिद्ध और आचार्यों सहित अपनी आत्माको पवित्र करतेहैं ॥ ४२ ॥ मनुष्य जन्मकी स्थिति नरकार्णवमें हैं जो महाशास्त्र तथा महापंथ कल्पको नहीं पढतेहैं ।। ४३ ॥ वे दिव्यमार्गको नहीं देखते वे अंधे हैं और अज्ञानसे मोहित हैं, इसही देहसे जो स्वर्गको नहीं जातेहैं ॥ १४ ॥ वे अज्ञानीहैं यह वचन सुनकर वे आचार्य सिद्ध विस्मयको प्राप्त हुए तब वे साधक उत्तर दिशाको गमन करने लगे ॥ १५ ॥ इति श्रीकेदारकल्पे शिवपार्वतीसंवादे भाषाटोकायां विंशः पटलः ॥ २० ॥ एकविंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच॥*कृत्वा शिवनमस्कार सर्वज्ञाने विचक्षणाःपुरा पश्यति ते सिद्धानदी पुलिनगामिनीम् ॥१॥ ब्रजंति स्वर्गभवनं शिवजी बोले उन सिद्धोंने शिवको नमस्कार करके आगे नदी देखी जो पुलिन- वाली ॥ १ ॥ और दशयोजन विस्तारवाली अतिरमणीक और मनोहर थी, - . . (७४) फेदारकल्प । प्राप्य वेगमनुत्तमम्।।शोभते विमलं नीरं दृश्यते च मनोरमम्॥२॥ सरस्वती महाभागा पवित्रं पुरमुत्तमम्।।तस्य मध्ये निरीक्ष्यास- न्परमानंदमास्थिताः॥३॥ बहूनि पद्मपत्राणि परीतानि समंततः।। तृप्ति ते साधका यांति महागंधसुगधिभिः ॥४॥ आनन्दतोपिताः सिद्धाः परं निर्वाणमास्थिताः।महानद्यास्सरस्वत्याः सिद्धास्तीर- मुपेत्य ते ॥ ५॥ दृष्ट्वा ते चोत्तमां शोभा हपै यांति पुनः पुनः।। दशयोजनविस्तीर्णा अतिरंम्या.मनोहरा ॥६॥ लहरीतुंगगंभीरा- नेकावर्तसमाकुला ॥ मणिरत्नसमाकीर्णा पुप्पाकारा सुवालुका ॥ ७॥शंखमुक्तासमायुक्ता हंससारसशोभिता ॥ चक्रवाकयुगो- पेता मत्स्यकूर्मसमाकुला ॥८॥ कर्पूरगंधवत्तीयमतिस्वादुसुशी- तलम् ॥ अनेकपुष्पसौगंधपद्मनीलोत्पलैरपि ॥ ९ ॥ अप्सरो- देवगंधर्वविद्याधरवरस्त्रियः॥ जलक्रीडार्थमागत्य पूजयंति सदा- शिवम् ॥ १०॥ एवं पश्यति ते सिद्धाश्चंद्रवेगां सरस्वतीम् ॥ तंत्र और उसमें निर्मल जल शोभायमान होरहा था.॥२॥ हे महाभाग ! उसका नाम सरस्वती नदी, और नगर वडा श्रेष्ठ था, उसके मध्यमें स्नान करके परम आनंदको प्राप्त हुए ॥ ३ ।। उसमें अधिक कमलपत्र खिल रहे थे, साधक बड़ी सुगंधियोंसे संतुष्ट ॥ ४ ॥ और आनंदसे पूर्ण वे सिद्ध बडी शान्तिको प्राप्त हुए और महानदी सरस्वतीक तीरपर जाकर ॥५॥ वडी शोभा देखी वारंवार हर्पको प्राप्त हुए। यह नदी दशयोजन विस्तृत थी, बडी मनोहर और रमणीय ॥६॥ लहर और तरंगों तथा तटोंसे संयुक्त मणि तयारत्रोंसे शोभायमान और निसको वाळू पुष्पोंकी समान थी ॥ ७॥ शंख और मोतियोंसे संयुक्त हंस और सारस पक्षियोंसे शोभित चकवासे यासित और मत्स्य कछुए इनस भरी हुई थी ॥८॥ और जल कपूरको समान मुगंधित और बड़ा स्वादिष्ठ शीतल और अनेक प्रकारके पुष्पोंसे सुगंधित और रक्त कमल और नील कमलोंसे व्याप्त थी ॥९॥ और उसका तट अप्सरा देवता गंधवासे संयुक्त था, वे जलक्रीडाको करते और सदाशिवका पूजन करते थे।॥ १० ॥ इस प्रकार टन सिद्धोंने चन्द्रमाकी समान .म्पन्ट और पगवती सरस्वती नदीको देखा । हे महासेन ! उस महास्थानमें . भाषाटीकासमेत-प०२१. (७५) स्थाने महासेन पंथाश्चैव न दृश्यते ॥ ११॥ गंधर्वाणां ध्वनि श्रुत्वा सम्मुखे यांति साधकाः॥ पश्यंति च महास्थानमतिरम्यं 'मनोहरम् ।। १२॥ अत्युच्छ्रितं महादिव्यं शंकुपालपुरं महत् ॥ संप्राप्ताः साधकास्तव ह्यानंदो यत्र तिष्ठति ।। १३ ॥ प्राकारैर्गों- 'पुराव्यैश्च निर्मितं दिव्यकांचनैः॥ प्रविस्फुरन्महारत्नैर्दिव्यजालै- श्व शोभितम् ॥ १४ ॥ ध्वजमालाकुलं दिव्यं चित्रकर्मोपशो- भितम् ॥ भेरीमृदंगशब्दैश्च शंखतूर्यसुवेणुकैः ॥ १५ ॥ शतैश्च शतपत्रैश्च लक्षकोटिभिरेव च ॥ एकविंशतिगुणोपेतो दृश्यते धवलो गृहः॥ १६॥ नानापुष्पगणोपेता नानागंधमनो- हरा।। देवतासंदृशी दिव्या नानारत्नविभूषिता।।१७॥ द्वादशादि- त्यतेजस्का मगलादपि मंगला ॥पुरी रम्या महादिव्या तप्तकांच- नसनिमा॥ १८॥ पीतरक्तसितश्यामनानावर्णक्रमेण च ॥ पंच- वर्णपताकाश्च दृश्यंते पवनेरिताः ॥ १९॥ स्तंभा हेममयाः सर्वे सोमकांतिसमप्रभासपक्कफलसंपूर्णा नानाद्रुमसमाकुलाः२०॥ मार्गभी नहीं देख पडता था ॥ ११ ॥गंधर्वोकी ध्वनिको सुनकर साधकगण उनके सन्मुख चले और उस स्थानको बडा रमणीक देखा ॥ १२ ॥ वह बड़ा संन्दर दिव्य शंकुपाल पुर था । साधक लोग तहां पर प्राप्त हुए जहां वह आश्रम था ॥ १३ ॥ वह दिव्य सुवर्णकी दीवारोंसे और गोमहाल बना हुआ और बडे २ रत्नोंसे प्रकाशित तथा मुन्दर २ जालोंसे सुशोभित ॥ १४ ॥ पताका और माला- से व्याप्त सुन्दर चित्र काँसे शोभित और भेरी मृदंग शंख वेण आदि बाजोंसे निनादित था ॥१५) सैकड़ों तथा लक्ष कोटि कमलोंको इक्कीसगुना करनेसे जो हो इतने कमलोंसे युक्त स्वच्छ गृह दीख पड़ते थे ॥ १६ ॥ अनेक प्रकारके फूलोंसे और नाना प्रकारकी गंधोंसे मनोहर और देवताओंके समान, अनेक रत्नोंसे भूषित ॥ १७ ॥ बारह सूर्यके समान तेजयुक्त मंगलसे भी सुमंगल तप्त सुवर्णकी समान चमकीली वह मनोहर पुरी थी॥ १८ ॥ और श्वेत लाल पीली श्याम तथा अनेक वर्णक क्रमसे छैप्रकारके वर्णवाली पताकाओंसे जो पवनसे प्रेरित होती हुई शोभायमान थी ॥ १९ ॥ मुवर्णके खंभे जो चन्द्रमाको समान कान्तिवाले.
(७६) केदारकल्प। चूतचंदनसंयुक्तं कदलीखंडमण्डितम् ॥ देवगंधर्वसंकीर्ण वंशवादिवनादितम् ॥ २१ ॥ हेमरत्नसमायुक्तं प्रासादैश्च गृहैस्तथा ॥ शतयोजनविस्तीर्ण शंकुपालपुरं महत् ॥ २२ ॥ हेम्नैव रचिता भूमिरुधदर्कसमप्रभा ॥ इन्द्रनीलमहानीलैः पद्म- रागैश्च शोभितः ॥ २३ ॥अईयोजनविस्तीर्णः शंकपालस्य' मंडपः ।। स्तंभा हेममयास्तत्र चन्द्रकांतिसमप्रभाः ॥२४॥वि- शेषेण च तिष्ठति दीपमालासमाकुलाः॥ रत्नमालासमायुक्तं पुष्पमालाभिरावृतम् ॥ २५॥ नानारत्नसमायुक्तं शोभितं धव- 'लैगृहैः ॥ स्वस्तिकै रत्नपुगैश्च कुंकुमैर्यक्षकर्दमैः॥ २६॥ नित्यो- त्सवसमाकीण द्वारे च गणशोभितम्।। तस्य मध्ये महाश्रेष्टं शंख- पालं नृपोत्तमम् ॥ २७॥ सिंहासनानि दिव्यानि हेमरत्नमया- नि च ॥ तत्र तिष्टंति राजेन्द्र शंखपालं नृपोत्तमम् ॥२८॥ अ- प्सरोगणगंधर्वास्तिष्टंति ात्र नेकधा ॥ संप्राप्तास्साधकास्तत्र और अनेक प्रकारके वृक्ष फलोंसे लद रहे थे ॥ २० ॥ आम तया चंदनके वृक्षोंसे च्याप्त, फेलोंके वृक्षांसे शोभापमान, देवता और गंधोंसे युक, योमरी आदि वाजोंसे शब्दायमान ॥ २१॥ मुवर्ण तथा रत्ननटित प्रासाद और गृहोंसे युक्त, वह शंकुपाल नगर सायोजन विस्तारवाला है ॥ २२ ॥ और भूमी सुवर्णसे रचना फोहुई उदय हुए सूर्यको समान कान्तिवाली है और इन्द्रनील तथा महानील पद्मराग मणियोंसे शोभायमान ॥ २३ ॥ शंकुपाल नगरका मंडप (घेरा) आधे योजन है, तहाँपर सुवर्णके खंभे चन्द्रमासी समान कान्तिमान हैं ॥ २४ ॥ और दीपकोंके समुदायसे व्याप्त, और रत्नमाला तथा फूलोंकी मालासे चारों ओर घिरे हुए ॥ २५ ॥ और अनेक प्रकारके रनसि नटित स्वच्छ पर शोभित होरहे हैं रनों और दंगम, केसर, तया कस्तूरीसे पूर्ण हैं ॥ २६ ॥ नित्यके उत्सवासे शोभा- यमान, और दारपर गण विरानमान है, उसके मध्य महाश्रेष्ट शंसपाल राना है ॥२७॥ और दिव्य सिंहासन मुरण व ग्वाम नटित है उनके ऊपर रानपि शंखपाल गिनमान है ।। २८ । और तहां अप्सरागण गंधर्व आदि रहते हैं। . तिमान भापाटीकासमेत-प० २१. (७७) ह्याश्रमो यत्र तिष्ठति ॥ २९ ॥ प्राकारगोपुराट्टालैनिर्मितं सर्व- कांचनैः ॥ प्रस्फुरत्तन्महारत्नैवेष्टितं च पुरोत्तमैः॥३०॥ ध्वज- मालाकुलोपेतं चित्रकोपशोभितम् ॥ भेरीमृदंगशब्दैश्च शंख- तूर्य्यरवान्वितम् ॥ ३१ ॥ दुंदुभ्युत्तालनिर्घोपवेशवादिननादि- तम् ॥ तत्र स्थानं महादिव्यं गताः सर्वे च साधकाः ॥ ३२॥ तत्र तिष्टंति वै कन्याः सर्वाभरणभूषिताः ॥ दिव्यवस्त्रपरीवाना दिव्यगंधानुलेपनाः ॥३३॥शोभिताः शिरपुप्पैश्च तांबूलमुनि- रति च ॥ मृगाक्ष्यो इंसगामिन्यः कुंडलाभरणोज्ज्वलाः॥३४॥ संपूर्णचन्द्रवदना वदंत्यः कोकिलस्वरम् ॥ करकंकणसंयुक्ता' हारकेयूरभूषिताः ॥३५॥ दिव्यदेहा महाकाया विद्युत्तेजःसम- प्रभाः ॥ अशोकपल्लवा हस्तारूपयौवनगर्विताः ॥ ३६॥जानु- वाह तथा सेन कदलीस्तंभसन्निभोकमलोदरसंपूर्ण रूपशोभा- युताः स्त्रियः ॥ ३७ ॥ काश्चिट्टजसमारूढाः सर्वाः स्वच्छंदगा साधक लोग वहां गए जहां आश्रम था ॥ २९ ॥ प्राकार, गोपुर और अट्टालोंस जो सुवर्ण से बने थे और बडे रत्नोंसे प्रकाशित और विरा हुआ था ॥ ३० ॥ पताका और मालाओंसे व्यात चित्र कर्म (चित्रकारी) से शोभायमान भेरी मृदंगके गन्द और शंखतोरईकी ध्वनिसे गुंजारता हुआ .॥ ३१ ॥ दुंदुभि तया तालके और बांसुरीके वाजेसे शब्दायमान उस दिव्य स्थानमें साधक गये ॥३२॥ . तहांपर संपूर्ण आभूपोंस भूपित कन्या स्थित हैं जो दिव्य वस्त्रोंको धारण किये हैं और दिव्य गंधको लेपन किये हैं ॥ ३३ ॥ सीस फूलोंसे शोभायमान हुई और तांबूलको चावती हैं और मृगको समान नेत्रवाली हंसको समान गमनशील, कुंडल आभूषणोंसे उज्ज्वल ॥ ३४ ॥ पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखारविन्दवाली कोयल के समान बोलता हायमें कंकन पहने हार बाजूबंद धारण किये ॥ ३५ ॥ दिव्य देहवाली, बिजलीकी समान तेज और कान्तिवाली अशोक वृतके कोमल पत्तोंके समान हायवाली, रूप और यौवनसे गर्वित हैं ॥ ३६ ॥ हे महासेन ! जंघापर्यन्त लम्बायमान भुजावाली केलेके खंभके सदृश सुन्दर कमलके समान उदरवाली, पूर्ण शोभायुक्त स्त्रियां ॥ ३७ ॥ कोई हाथीपर चढ़ी स्वतन्त्रता- १ अदतत्वमाम् ।
. (७८) . केदारफल्म । मताः ॥ काश्चिद्विमानसंहढाः काश्चिच शिविकाधिगाः ॥ ३८॥ मत्तमातंगगामिन्यः सर्वा यौवनगविताः ॥ ३९ ॥ इच्छावाहन- मारूढा गच्छंति ललना गतिम् ॥ शंकुपालसुताः सवा रमंते च पठति च ॥ ४० ॥ सुधांशुनिभवनास्तारमंते प्रचरंति च ॥ वर्धमानलताकाराः पद्मनालभुजोपमाः ॥४१॥ नानाच्छंदा मदोन्मत्ताः पठति पाठयंति च ॥ सर्वा लक्षणसंयुक्तास्तपति च परंतपः॥४२॥ आपगा चंचलाकारा पद्मनालैस्सकंटकैः ।। क्षणं शुक्ला क्षणं कृष्णा क्षणं दर्पणसंनिभा ॥४३॥ शंखपाल सुताः सर्वाः कैर्मुखं चुम्बयन्ति ताः ॥ चन्द्रवेगातटश्चैव बहु- पुष्पोपशोभितः॥४४ ॥ तस्य मध्ये महावृक्षःसुवटो नाम नामतः॥ तस्मिंस्तु दोलिता दोला घंटाचामरभूपिताः॥४५॥ रत्नमुक्ताप्रवालैश्च कांचनै रचितालयाः ॥ हिंदोलयंति ताःक- न्याः गायंति क्रीडयंति च ॥४६॥ फलपुष्पसमाकीस्तिस्य शाखा विलंबिताः॥नानापुप्पसमाकीर्णः सुपक्कफलसंयुतः॥४७॥ पूर्वक गमन करनेवाली, कोई विमानपर चढ़ी कोई पालकीपर चढ़ी हुई थी॥३८॥ सब गजगामिनी हावीपर चढ़ी हुई ॥ ३९ ॥ तथा अपने इच्छानुकूल वाहनपर चटकर मनोहर गतिवाली, शंकुपालकी कन्या पढ़ती और रमण करती थीं ॥१०॥ चंद्रमाफी समान मुसयाली विचरती और रमण करती बढ़ती हुई चलाफ समान लंबी फमलंदंडी (भसीडा) के समान भुनावाली ॥४१॥ नाना प्रफार बन्दोको उन्मत्त होकर पढ़ती और पढ़ाती थीं, सब लक्षणोंसे लक्षित तपम्पिनी तप करती थीं ॥ ४२ ॥ और चंचल आकारवाली नदी है जो कमल दंडी और कोटॉम क्षणमाघमें शुग, क्षणमें कृष्णवरणको तथा क्षणमें दर्पणकी समान म्यन्ट भान होती है ।। १३ ॥ शंरापालकी फन्यायें, फिस निमित दीगा ? चन्दयेगा नदी किनारे अधिक पुष शोभायमान हैं॥११॥ उसः माप एफ. गुपट नामक पृक्ष है, उम पृक्षम आनन्दमय पंडा पंनता है ॥१५ रख, माती, मूंगा, मान आदिसे मंदिर बना है, और पहा फन्या झुलती, गाती, और ग्रीडा पारनी है ॥ १६ ॥ उस पृसरी शाखाएँ पर पलाम सुफी और ७ भापाटीकासमेत-प० २१, अईयोजनविस्तीर्ण उच्छायो दशयोजनम् ॥ तस्य शाखाः प्रमाणैः स्वैर्गताश्चैव दिशो दश ॥ १८ ॥ दिव्यवौँ महा- कायश्छाया तस्य सुशीतलारम्यो मनोहरो दिव्यंश्चद्रादित्य- समप्रभाः॥४९॥ तत्र तिष्टंति ताः कन्याः सर्वाभरणभूपिताः॥ पंचलक्षाश्च तिष्टंति शंखपालसुतास्तथा ॥५०॥ साधकाश्च गतास्तत्र यत्रं तिष्टति सा पुरी ॥ दृष्ट्वा ताश्च ततः कन्याः सा- धका विस्मयं गताः ॥ ११ ॥ आगताः स्वागताः सिद्धाः कन्यास्तत्र वदंति च ॥ आचार्यसहितास्तत्र मृग गच्छेति सा- धकाः ॥ ५२ ॥ कन्यकानां कृते चान्ते आचार्यसहितास्तु ते॥ शंकुपालसुतानां च नित्यं यानैत्रजंति ते॥५३॥ कन्याः सर्वे निरीक्ष्यैवमूचुराचार्यसाधकाः ॥ अमृतं तासु सरति शंख- पालसुतासु च ॥ ५४॥ नखाग्रात्संरते नित्यं ह्यमृतं बहुशीत- लम् ।। कामयित्वा महासेन पतंति साधकोपरि ॥ ५५ ॥ क्षणं लम्वायमान हैं । अनेक प्रकारके फूल और पके हुए फलोंसे युक्त हैं ॥ १७ ॥ वह आये योजन विस्तृत है और दश योजन ऊंचा है उसकी शाखाके प्रमाणसे मानों दशा दिशा आगई ॥ १८ ॥ उसका दिव्य वरण और बडा शरीर है और छाया अतिशीतल है रम्प मनोहर दिव्य और चंद्रमा सूर्यके समान कान्तिवाला है ॥ १९ ॥ तंहांपर संपूर्ण आभूपपोंसे युक्त वहां कन्या विश्राम करती हैं, पांच लाख शंखपालकी सुता हैं ॥ ५० ॥ साधक वहां गए, जहां यह नगरी थी, तहां उसको और कन्याओंको देखकर विस्मयको प्राप्त हुए ॥ ५१ ॥ और वहां कन्या आगत स्वागतकर इस प्रकार उन साधकोंसे कहती हैं आइये वैठिये ! उस समय साधक आवायाँक सहित मूछाको प्राप्त हुए ॥ ५२ ॥ कन्याओंके समीप होनेपर वे साधक आचार्योंके सहित हायको स्पर्श करते हुए ॥५३॥ कन्याओंने आचार्य सहित साधकोंसे संभाषण किया और शंखपालकी कन्याओंने अमृत छिडका ॥ ५४ ॥ नखोंक अग्रभागसे अतिशीतल अमृत टपकाया, हे महासेन ! तर वे कामनाकरके साधकों के ऊपर गिरीं ॥ ५५॥ क्षणमात्र वहां टन कन्याओंने उनके १ जामनेपदमाम् ।
(८०) फेदारकल्प। तत्र च भापते संवादे सह साधकः ॥ सिंहासनं महादिव्यं हेम- रत्नविभूपितम् ॥ ५६॥ तत्र तिष्ठति चाचार्यः साधकः परिवे- थितः॥अध्ये पायं प्रकुति तेपां ताः कन्यकास्ततः॥ ५७॥ करसंपुटितं कृत्वा कन्यास्तत्र वदंति च ॥ दिव्यवस्त्रपरीधाना दिव्यगंधानुलेपना ॥ ५८ ॥ दिव्यपुप्पशिरोवद्धा दिव्या- भरणभूपिताः॥ स्वागता भो महासिद्धाः क्षणमेकं च तिष्टत ॥ ॥५९ ॥ साधुसाधु महाप्राज्ञा दर्शनं वोऽत्र दुर्लभम् ।। कन्यका ऊचुः॥ वागता भुवनात्सिद्धाः क्व स्थाने चैव गम्यते ॥ ६ ॥ एतदहि महाचार्य साधकैः परिवेष्टित ॥ सिद्धा उचुः ॥ कथ- यामि महायक्ष्यः शृणुतेदं वचो मम ॥ ६१॥ आगता मृत्यु- लोकाच्च गंतव्यं शंकरालये ॥ कन्यका उचुः ॥ पितास्माकं गतः सिद्धा वाटिकां पुष्पकारणात् ॥.६२ ॥ क्षणाई स्थीय- तां तावद्यावत्तातो न चावजेत् ॥ ६३॥ यावद्वदति ताः कन्याः शंखपालः समागतः॥ जटामुकुटधारी च दिव्यदेहश्च मूर्तिमान् ॥ ६४॥ दिव्यवस्त्रपरीधानो दिव्यगंधानुलेपनः॥ साथ संभाषण किया और जो महादिव्य सुवर्णरत्नोंसे भूषित सिंहासन था।॥५६॥ वहां साधक आचार्यों सहित बैठ गए तब उन कन्याओंने उनका अर्घ्यपाद्य किया ॥ ५७ ॥ और हाथ जोड कन्या उनसे बोली जो दिव्य वस्त्र और मुन्दर गंधसे लिप्त थीं ॥ ५८ ॥ सुन्दर सीस फूल धारण किये और सुन्दर गहने पहने थी उस समय बोली हे सिद्धो !! क्षणमात्र यहां ठहरो ॥ ५९ ॥ हे महाबुद्धिमान ! आपका दर्शन वडा दुर्लभ है । कन्या बोली । हे सिद्धो ! कहाँसे आए हो और कहांको जति हो ? ॥ ६॥ हे आचार्यों ! सिद्धोंके सहित यह कहो। सिद्ध बोले। हम कहते हैं मनो ॥ ६१ ॥ मृत्युलोकसे आये हैं और शंकरके स्थानको जाते हैं कन्या बोली हे सिद्धो !!! हमारा पिता फूल लेनेको वागमें गया है ॥ ६२ ॥ जबतक पिता नहीं आवै क्षणमात्र स्थित रहो ॥ ६३ ॥ जवही कन्या ऐसा कह रही थी तभी उनका पिता शंखपाल आगया जो जटा मुकुट धारण किये हुआ, दिव्य देह और मृतिमान था ॥ ६४ ॥ और दिव्य वस्त्र धारण किये, मुगंध लिप- .. दुष्णाभिरिशिषः।
भाषाटीकासमेत-प० २१. (८१) दिव्यपुष्पशिरोवद्धो रूपवांश्च महानृपः ॥ ६५॥ महाराजेन तेनाथ दृष्टा वै पंचसाधकाः॥ हृष्टपुष्टस्ततो भूत्वा राजा तान- वदत्ततः॥६६॥ साधकानां मुखं दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ अद्य मे सफलं जन्म चाय मे सफलं तपः ॥ ६७ ॥ अद्य मे सफलं राज्यमद्यमे सफलाः क्रियाः॥ पुष्पकाण्डं ततस्त्यक्त्वा राजा तानभ्यवोचत ॥६८॥ शंखपाल उवाच ।। पुष्पाणि शिवपूजायां समर्थ च शिवालये ॥ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा साधकांश्च नमस्यति ॥६९॥ कागता भुवनात्सिद्धाः कं स्थाने चैव गम्यते ॥ ७० ॥ साधक उवाच ॥ कथयामि महाराज शृणु मे वचनं शुभम् ॥ आगता मृत्युलोकाच गंतव्यं शंकरालये ।। ॥ ७१ ॥ राजोवाच ।। अस्मिन्नेव पुरे रम्ये बहुकन्यासमाकुले । पश्याचार्य इमाः कन्याः सर्वालंकारभूपिताः ॥ ७२॥ स्तनौ तालफलाकारौ सर्वास्ता मदविह्वलाः॥ तिष्ठति पंचलक्षावै क- न्यकाश्च ममालये ॥ ७३ ॥ क्रीडंतु कन्यकाः साईमाचार्य A टाये सुन्दर फूलसिरपर बांधे अतिरूपवान्था॥६५॥तहाँपर उसने पांचांसाधकोंको देखा । प्रसन्न होकर राजा उनसे वचन बोला ।। ६६॥ हे साधको !! आपके दर्श- नसे सब पाप मुक्त होते हैं आपके.दर्शनासे मेरा जन्म तथा तप सफल हुआ ॥ ६॥ आज मेरा राज्य सफल हुआ और सब क्रिया सफलं हुई, राजाने पुष्प- समूहको रखकर उनको प्रणाम किया ॥ ६८ ॥ शंखपाल बोला, ( पुष्पोंको शिवपूजामें समर्पणकर)अंजलि बांधकर माधकोंको नमस्कार किया ॥ ६९ ॥ हे सिद्धो! किस स्थानसे आये हो? और किस स्थानमें जाते हो? ॥७॥ साधक बोले । हे महाराज ! हमारा वचन मुनो हम कहते हैं । मृत्युलोकसे आये हैं शंक- रके मंदिर में जाते हैं ॥७१॥राजा बोला। इन रमणीक, कन्याओंसे पूर्ण नगरमें रहो । हे आचार्य ! इन संपूर्ण आभूषणोंसे शोभित कन्याओंलो देखो ॥ ७२ ॥ स्तन तालके फलके समान हैं, और सव मदोन्मत्त पांचलाख कन्या हिमालयपर रहती हैं ।।७३ ॥ हे साधक आचार्यो ! इन कन्याओंके साय क्रीडा करो हे महा.
(८२)
केदारफल्प।
साधकैरिह ॥ भुंजते विपुलान्भोगान्साधकाश्च महारथाः ॥
॥७४ ॥ साधक उवाच ॥ अस्मिन्नेव पुरे रम्ये कति वर्षाणि
जीवति ।। पश्चाच कां गतिं गच्छेदिति नो वद सत्वरम् ॥ ७९ ॥
शंखपाल उवाच ॥ सहस्रनयकन्यानां दीयते च पृथक्पृथक ॥
संवत्सरसहसं च ह्यायुरत्र विधीयते ॥ ७६ ॥ भुक्त्वा च विपु-
लान्भोगान्मृत्युलोके हि गम्यते ॥ सर्वकामैः समृद्धे च जायते
विपुले कुले ॥ ७७ ॥ सर्वगुणगणोपेता राजानोऽपि भविप्यथ।।
चंद्रास्याश्च स्त्रियः प्राप्याक्त भोगान्यथेप्सितान् ॥ ७८ ॥
धन्या माता पिता धन्यो धन्यो देशो नृपस्तथा ॥धन्यो ग्रामः
पुरीधन्या चोत्पन्ना यत्र साधकाः॥७९॥ उत्थिता गमने सिद्धा-
स्त्वरते च महापथम्।।तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पुनश्चितंति साधकाः॥
॥ ८० ॥ साधका ऊचुः । आचार्य वदनं पश्य प्रत्यक्षं चैव
दृश्यते ॥ किमत्र पांडुगात्राणि कन्यानां च महामुने ॥ ८१ ॥
राजोवाच ॥ केतकीनां सुगंधेन लितास्ताः पद्मरेणुभिः ॥
आनन्देनोच्चकैः कन्याः पद्मानां धूलिलेपनात् ॥ ८२॥
रथो ! अधिक भोगोंको भोगो॥ ७४ ॥ साधक बोले इस नगरमें रहकर कितने
वर्ष जीते हैं और पीछे किस गतिको पाते हैं ? यह शीघ्र कहो ॥७५॥ शंखपाल
पोला पृयक २ तीन सहस्र कन्याओं सहित यहां एक हजार वर्षको आयु दी
जापगी ॥७६ ॥ और अत्यन्त भोगोंको भोगकर मृत्यु लोकमें प्राप्त होते हैं सब
फामना पूर्ण होता है और उत्तमकुलमें जन्म होताहै ॥ ७७ ॥ और सब गुणोंस
अलंकृत राजा भी होता है । चन्द्रमाको समान मुखपाली कन्या और लक्ष्मीको
पाकर यथेप्सित भोगापो अनुभव कगे।।७८ ॥ वे माता पिता धन्य हैं । धन्य वह
दश और धन्य वह राजा तथा ग्राम देश धन्य है, जहाँपर साधक उत्पनहए।॥७९॥
साधने उठके महापयके जानकी शीघ्रता करी, उनका यह वचन सुनकर
सायफ फिर विचार करने लगे ॥ ८० ॥ साधक बोले हे आचार्य ! देखो इन
कन्याओं के शरीर पांडु (पीले। परणके क्यों हैं ? जो प्रत्यक्ष दीखतेहैं ।। ८१॥
• गना पोटा फेतकीफे सुगंध सहित फमलकी धलिके लिप्त होनसे ॥ ४२ ॥
भापाटीकासमेत-प० २१. (८३) कामरागप्रपन्नाश्च तेन पांडुरतां गता। अत्र स्थाने महावीरा भु- जंतु विपुलां श्रियम् ॥८३॥ साधका ऊचुः॥शंखपाल महाराज गंतव्यं शंकरालये ॥ तेपां तद्वचनं श्रुत्वा भूयो वचनमब्रवीत् ।। ।। ८४ ॥राजोवाच॥ कथंभूयो न रोचते कथं चैवात्र आगताः।। मृत्युलोके महाभोगान्कथमेतान्त्रवामि वः ॥ ८५॥ नानाभोगा- परित्यज्य मृत्युलोकादिहागताः ॥ नार्यश्च विविधाश्चापि त्यक्ता यौवनगर्विताः ॥ ८६॥ मृत्युलोके महाभोगान्कथयामि ततः शृणु ॥ शालिमुद्घृतं क्षौद्रं पयोऽनं गुडशर्कराः ।।८७॥ चंदनादिमहाभोगाः केतकीराजचंपकाः ॥जातयः शतपत्राणि बकुलाः पाटलैस्सह ॥८८॥ मृत्युलोके महापीडा वायुवेगास्तु- रंगमाः॥ गजो रथस्पुखं चेति पूर्णचंद्रमुखाः स्त्रियः ॥ ८९ ॥ मृगाक्ष्यो हंसगामिन्यः कुंडलाभरणोज्वलाः॥ करकंकणसंयुक्ता हारकेयूरमेखलाः ॥९० ॥ संपूर्णनागलतिकाः कर्पूरेण सम- न्विताः ॥ ईच्छाभोगाश्च सर्वेऽमी मृत्युलोके व साधकाः।। ९१ ॥ कामराग अपने शरीरमें लगायाहै, इसकारण पांडुवरण होगया है सो हे महावीर! इस स्थानमें अधिक भोगोंको भोगो । ८३ ॥ साधक बोले हे शंखपाल महा- राज ! हम शंकरके स्थानको जायँग, इसप्रकार साधकोंका वचन सुन फिर वह । ॥ ८४ ॥ राजा वोला, क्यों आप इच्छा नहीं करते ? और क्यों यहां प्राप्त हुप मृत्युलोको जो २ भोग, उनको तुमसे कहताहूं ।। ८५ ॥ कि जो अनेक प्रकार- के भोगोंको त्यागकर यहां आए और तुमने अनेक प्रकारको योवनवती स्त्रियां त्यागों ॥ ८६ ॥ मृत्युलोकमें जो महाभोगहें उनको तुमसे कहते हैं सुनो ! धान, मंग. घी, शहत, दुग्ध. शर्करा, ।। ८७ ॥ चंदन, केतकी, राजचंपक, आदिके अनेक संभार, और कमलोसर पाठल आदिके अनेक वृक्षोमे शोभायमान ।। ॥ ८॥ मृत्युलोकमें पवनकी समान पैगयाले घोडे हायी रय और पूर्णचन्द्र- मुखी नियोंजा सखहै ।। ८९ ॥ जो मृगनयनी हंसगामिनी कुंडलआदि आभूषणों से शोभित, और हायमें फंगधारे हार और वाजवंद मेसला (यींपनी) पहर ।। ९०१ कपूरसहित पानको चाये हैं इस प्रकार मृत्युलोक, मंपूर्ण इच्छानुकूल .
(८४) फेदारकल्प। नानाफलसमाकीर्णोनानापुष्पसमाश्रितः कदलीफलसंयुक्तो ना- रिकेलैश्च चूतकैः ॥ ९२ ॥ नानावृक्षसमाकीर्णों नानापक्षिसमा- कुलः ॥ मृत्युलोको महाचार्य साधनः परिवेष्टितः ॥ ९३ ॥ भुजतां साधकाः सर्वे स्वर्गतुल्यो न संशयः॥ भुक्त्वा च विपु- लान्मोगान्कोडंतश्च यथासुखम् ॥९४ ॥ साधका ऊचुः॥ मृत्युलोके महादुःखं कथयामि ततः शृणु ।। मातृपितृसुतानां व बांधवानां तथैव च ॥ ९५ ॥ वियोगेन महादुःखं तस्मात्स्थातुं न शक्यते ॥ गर्भवासभयाद्रीता राजनवागता वयम् ॥ ९६॥ संसारः स्वप्नमात्रश्च चलाः प्राणा धनं तथा॥ चिन्ता बहुतरा तत्र क्षुधा तत्र पुनःपुनः ॥ ९७॥ एवं दुःखभयागीता राज: बत्रा गता वयम् ॥ एवंदुःखे महादुःखं मृत्युलोके व्यवस्थितम् ॥ ॥९८॥ कथयामि पुनर्दुःखं शृणु तत्तन्महानृप ॥ अष्टोत्तरशतं देहं व्याधयः पीडयन्ति हि ॥ ९९ ॥ सागरश्च जलैस्तद्वत्संसारो दुःखपूरितः ॥ सुखं तत्र न पश्यामि दुःखं तत्र दिनदिन।।१००॥ भोगहैं ॥९१ ॥ अनेक प्रकारके फल लगैहें नानाप्रकारके पुष्प लहलहातेहे केलेके फल और नारियल तथा आम आदिसे संयुक्त हैं ॥ ९२ ॥ अनेक प्रकारके वृक्षोसे तया नाना प्रकारके पक्षियोंसे व्याप्तहैं। ऐसे मृत्युलोकमें साधकों सहित ।। ९३ ॥ सब भोगोंको भोगो, कारण कि वह स्वर्गके तुल्पहै, इसमें कुछ संशय नहीं है, अधिक भोगोंको भोगके मुखपूर्वक क्रीडा करो ॥ ९४ ॥ साधक बोले । मृत्युलो. कमें बडे दुखहै, सुनो ! माता, पिता, पुत्र तथा भाइयोंके ॥ ९५ ॥ वियोगसे महादुःख होताहै इस कारण वहाँ स्थित होनेको हम समर्थ नहींहैं हे राजन् !गर्भ में रहनके भयसे यहां आएहैं ।। ९६ ॥ यह संसार स्वममात्रहै । प्राण और धन नाशवान हैं, वहां अधिक चिन्ताद और वारम्वार क्षुधा लगती है ॥ ९७ ॥ इस प्रकार अनेक भयोंसे भीत हुए हम इस स्थानमें प्राप्त हुए हैं मृत्युलोकमें टपरोक्त दुखहैं ॥ ९८ ॥ हेरानन् । और मैं मृत्युलोकके दुःखवर्णन करता हूं फिशरीरमध्यमें एक्सी आठ व्याधि (रोग) पीडा देतीहैं ॥ ९९ ॥ निस प्रगर समुद जलसे पूर्ण है तैसेही संसार दुःखोंसे पूर्णदे, यह भापाटीकासमेत-प० २१. तत्रैव विपुलान्भोगानायुहीनांश्व मानवान् ॥ इन्द्रजालमयं दृष्ट्वा संसारं सरितो यथा ॥ १०१ ॥ महादुःखं नृपश्रेष्ठ मया दृष्टं पुनःपुनः ॥ मृत्युलोके महादुःखं सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।। ॥ १०२॥अल्पं सुखं च संसारे पुनर्दुःखं गता वयम् ॥ प्रथम गर्भमध्ये हि उर्द्धपादमधोमुखम् ।। ३०३ ॥ द्वितीयं जन्मकाले च महादुःखं प्रवर्त्तते ॥ तृतीयं यौवने दुःखं कामांधा मदविह्व- लाः ॥ १०४॥ पश्चाहुःखं महादुःखजर्जरीकृतदेहिनाम् ॥ तत्र संकुचितं गानं जरया पांडुरं वपुः ॥ १०५ ॥ पुत्रदारास्तथा वंधु व कुर्वति किंचन ॥ नासानेत्रजलश्रावा मुखे लाला च -जायते ॥ १०६॥ अभ्रमध्ये च पश्यति चंचलां विद्युतां गतिम्॥ सणं दृष्टा च नश्यति तथा संसारिणो जनाः ॥ १०७॥ तस्मि- न्काले महादुःखं पश्चाद्रूपं विनश्यति ॥ एवं दुःखभयाद्रीता राजन्नत्रागता वयम् ॥ १०८॥ अहं ते कथयिष्यामि पुनदुःखं महानृप ॥शंखपाल महाराज श्रूयतां वचनं मम ॥ १०९ ॥ सुख कुछ नहीं प्रतिदिन दुःखकोही देखताई ॥ ०० ॥ वहां भोमतो अधिक, परन्तु मनुप्य आयुहीन हैं इन्द्रजालकी बनी हुई नदीके समान संसार है॥ १०१॥ हे नृपश्रेष्ठ ! मैने दुःख वारम्बार देखा सत्य २ कहताहूं कि-मृत्यु. लोक दुःखका सागरहै ॥ १०२ ॥ क्षणिक सुखकाले संसारमें फिर हुसको मान हुप, पहले तो गर्भ बीच में ऊपरको पैर और नीचको मन किया ॥ १०३ H दूसरे जन्मके समय वडा दुःख होताहै तीसरे युवा अवस्थामें दुःखको कामांध और मदसे विह्वल हुए भोगतेहैं ॥ १०४ ॥ पीछेसे बुढापेमें जब शरीर जनरी भूत होनाताहै तब महादुःख होताहै और टस अवस्थामें सब शरीर मुकह और पांडुवरणका होताह ॥ १०५ ॥ पुत्र स्त्री वांधवगण कुछमी नहीं करसकते, ना- सिमा नेत्र मुखमसे जल टपकताहै ॥ १०६ ॥ जैसे मेघोंके वीच विजली चंचर दिखाई पड़ता है, क्षणमात्रमें नहीं दीखती इसी प्रकार संसारी मनुष्य हैं । १०७॥ टस जीवन के समय महादुःख होताहै, पवाद रूपभी नष्ट होता है, है राजन् ! इस प्रकारके दुःखोंसे डरे हुए हम यहां आए ॥ १८॥ हे शंसपाल ! मैं और (८६) केदारकल्प। यथा हि कूपमध्ये च घटमाला भ्रमति च।गमागमौहि पश्यामि तद्वत्संसारिणो जनाः।।१३०॥जले चबुबुदो यद्वत्तद्वत्संसारिणो जनाः।।मया दृष्टा महाराज सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥१११॥निमग्नो जलमध्ये तु प्राप्तस्तत्र रसातलम् ॥ संसारेषु तथा लोका भयं दृष्ट्वा पुनःपुनः ॥ ११२॥ स्वकर्मणा समायुक्ताः पुनर्गहें पतति च ॥ तेन दुःखभयाद्रीताः श्रूयतां वचनं मम ॥ ११३ ॥ गिरे- श्च शिखरे यन्निर्मलं वपते जलम् ॥ मोयं चैव हितं तोयं तथा संसारिणो जनाः ॥ ११४ ॥ लोचने च महाराज निमेपपरि- पूरिते ॥ मया दृष्टा महाराज तद्वत्संसारिणो जनाः ॥ ११५ ॥ चपलं सर्वसंसारमहं दृष्ट्वा पुनः पुनः॥ एवं दुःखभयाीता राज नवागता वयम् ॥ ११६ ॥ संसारस्य महाघोरमहादुःखैः प्रपी- डिताः ॥महाकष्टं श्रिता राजंस्तस्मात्संसारिणो जनाः।।११७॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राजा वचनमंत्रवीत् ॥ राजोवाच ॥ मंदिर भी बडे दुःखको वर्णन करताई मरा वचन सुनो ॥ १०९ ॥ जिस प्रकार कूपके मध्यमें घटोका समुदाय घूमताहे आना जाना सा दीख पडताहै तदत् संसारी मनुप्पहैं ॥ ११० ॥ और नलमें जैसे बुबुदे रहतेहैं तैसे संसारी मनुष्य क्षणभंगुर है ऐसा मैंने देखा सो सत्य २ पहताई ॥ १११ ॥ जैसे जलफे मध्यमें गिरकर पातालको प्राप्त होता है इसीप्रकार प्राणी संसारमें आकर चार २ दुःय (भप ) देसताहै ॥ ११२|| अपने कर्मके अनुसार फिर गर्भमें प्रविष्ट होतेहैं, ये दुग्म और भयसे ग्रस्त होते हैं यह मेरा पचन मुनो ॥ ११३ ॥ जैसे पर्वत शिवरपर भपॉम निर्मलगल वर्पताद परन्तु क्षणमें नहीं दीसता, उसी भरार मंमागगन । ११४॥ हे महारान! जैसे नन एफ. क्षणमात्र पलक मारते है टम पालपासमान संमारियोंपा जीयन है ।। ११५ ॥ यह सब जगत् चलाय. मानद पमा मन पारम्यार देसाद, रामन इस दुम्मा भयंस भीतहप हम इस स्थानपर आप ॥ ११६ ॥ गंसार. महापार दुःयस दुसीओपा महापष्ट मुनी ॥ १७ ॥ दमासा पचन सुनपर गना घाला, मेरा मंदिर दगी फिर समोसा भाषाटीकासमेत-प०२१. (८७) मम द्रष्टव्यं यथेच्छसि तथा कुरु ।। ११८ ॥ शंखपालेन सहि- ता गतास्ते नृपमान्दिरम् ॥ आचार्यसहिताः कन्या वदंति च परस्परम् ॥ ११९ ॥ सिद्धा ऊचुः ॥ कमाता के पिता वोऽद्य भ्रातरो वः कच प्रियाः॥ कामिन्यो ब्रूत तत्सर्वं यत्पृच्छा- मोवयंच वः॥१२०॥कन्यका ऊचुःवयं च कथयिष्यामोमवचः शृणुतादरात् ॥शंखपालमुताः सिद्धा दोलिते दोलितास्तथा ॥ ॥ १२१ । कथयिष्यामहे वो वै शृणुतेमानि वांसि नः॥ शंखपालसुता एता वलाढया मदविह्वलाः॥ १२२ ॥ सिद्धा ऊचुः ॥ कामिन्यस्तत्त्वतो वाक्यं शृणुत महे वयम् ॥ शंखपालस्य राजः कथ्यते कति पुत्रिकाः ॥ १२३ ॥ कन्य- का उचुः ॥ पंचलकपुत्रीणां सप्तलकपुत्रकाः ॥ अईलक नारीणामेवं सिद्वाः कुटुंवता ।। १२४ ।। सिद्धा उचुः॥ ॥ स्थाश्च कति तिष्टंति कति संति'तुरंगमाः॥ गजाश्च कति तिष्ठति कति योधाश्च भृत्यकाः ॥ १२५ ॥ कन्यका ऊचुः॥ ॥ दश कोटिगजाश्चैव पोडशकोटितुरंगमाः॥ त्रिंशत्कोटी स्थानां च पद्मकोटिश्च भृत्यकाः ॥ १२६ ॥ सिद्धा ऊचुः ॥ ॥रोचते जैसी इच्छा हो वैसा करना ।। ११८ ॥ फिर सब साधक शंखपालके साथ उसके मंदिरको गयो, तब आवर्यसाहित कन्या अपसमें संभाषण करती हुई। ॥ ११९ ॥ सिद्ध बोले हे प्रिये! तुम्हारे माता और पिता तथा भाई कहां गएँ, है कामिनी ! यह सत्य २ कहो ॥ १२० ॥ कन्या बोली हे महातप! हे सिद्धो ! सुनो हम कहती हैं । कि हम सब शंखपालकी पुत्री झूलोमें झूलनेवाली हैं ।। १२१॥ हे महामते ! हे महातप ! सुनो यह सब कन्या पूर्वकर्मसे मदमें मोहित हुई ॥ १२२ ॥ सिद्ध बोले हे कामिनियो ! मुनो हम कहतेहैं कि शंखपाल राजर्षिक कितनी पुत्री हैं ॥ १२३ ॥ कन्या वोली पांच लाखपुत्र, सातलाख पुत्री और आधे लाख स्त्रियांहैं इसमकार रानाका फटुम्बहै ॥ १२१ ॥ सिद बोले रय और कितने घोडही कितने हायी कितने योड़ा और कितने नौकर?||१२५॥कन्याबोलीवारह करोड़ हायी सोरह करोड़घोडे तीस करोड़ रय पयकोटि भृत्यहैं।।१२६॥सिदवोले
(८८)
केदारकल्प।
नाव वै स्थाने वासी नो मृगलोचनाः ॥ अनेकव्यसनोपेते
नानाभोगसमाकुले ॥ नानाविचित्रचित्राढये नानावस्त्र-
सुवासिते ।। १२७ ॥ मृत्युलोके यदि पुनर्गतव्यं च महानृप ।
अस्मभ्यं रोचतेनेदं यदि भोगाइनेकधा ।। १२८ ॥राजोवाच
न रोचते यदा भोगा रोचंते न च कन्यकाः ॥ गच्छगच्छ महा-
मार्ग साधकैः परिवेष्टित ॥ १२९ ॥ अद्य मे सफलं जन्म
चाय मे सफलं तपः॥ अथ मे सफलं राज्यं मया दृष्टाश्च सा
धकाः ॥ १३०॥ अद्य मे सफलं कर्म चाय मे सफलाः क्रियाः
अद्य में सफलं सेवा मया दृष्टाश्च साधकाः ॥ १३॥ अद्य
सफला भूमिरद्य मे संर्वसाधनम् ॥ तत्रैवं साधकाः सवै गतास्ते
चोत्तरां दिशम् ।। १३२॥
इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेय संवादे-
पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे
शिवदर्शने सदेहकैलासगमने शंखपालराजपुरी-
वर्णन नामकविंशः पटलः॥२१॥
इस अनेक भोगास व्याप्त स्थानमें रहनेकी रुचि नहींहै, जो स्यान अनेक चित्रास
विचित्र और बर्नक वस्रोंसे सुवासितहै ॥ १२७ ॥ हे महानुप ! यहाँसे फिरभी
मृत्युलोकमें प्राप्त होतेहैं इस कारण यह अनेक प्रकारके भोग नहीं रुवते ॥११८॥
राना बोला. यदि भोग तया फन्पा नहाँ रुचती तो महापय ( शिवालय) को
जाओ। १२९ ॥ आज दमारा जन्म, तप, राज्य सर सफल हुआ, फि-जो आप
साथको दर्शन गुर १३० ॥ आज मेरा फर्मकांड, तपा सब क्रिया, सेवा
नादिसब सफलई॥ १३१ । आग मेरी भूमि तया हे साधको भान भेरा
मर सफ्ट टुना, फिर साधा उत्तर दिशाफी ओरफो गए ।। १३२ ॥
इति श्री शिवाट मयादे मावाटपापा पिशः पटलः ॥ २१ ॥
श्रीश्वर उवाच ॥ भापाटीकासमेत-प० २२. (८९) द्वाविंशः पटलः। ॥ ॐ तस्मात्ते साधकाः सर्वे गताश्चैवो- त्तरामुखम् ॥ अग्रतो दृश्यते तत्र ह्यप्रमादो महागिरिः॥१॥ अप्रमादपुरो दृश्यो ज्ञानाह्वः पर्वतोत्तमः ॥ पर्वतद्वयमध्ये च क्षीराब्धिसदृशप्रभः ॥ २ ॥ अप्रमादस्य सोपानो हेमरत्नविभूषितः ॥ तदा तेनैव मार्गेण गंतव्यं साधकैः सह ।। ।।३॥ तस्य शृंगे परा रम्या अतिदिव्या मनोरमाः ॥शतयो- जनविस्तीर्णा वालार्कसहशप्रभाः ॥४॥ प्रतोलीद्वारसंयुक्ता हेमप्राकारवेष्टिताः। तत्र गच्छंति मार्गे च साधकाः सत्वरं ततः ॥५॥ प्रासादगृहसंकीर्णास्तरणैरुपशोभिताः॥ हेम्ना विरचि- ता भूम्यो वह्निज्वाला समप्रभाः॥६॥ पुष्पप्रकरसंपूर्ण चित्र कोपशोभितम् ॥ अईयोजनविस्तीर्ण मंदिरे तन मण्डपम् ॥७॥ सिंहासनानि दिव्यानि रत्नश्च जटितानि च ॥ तत्र तिष्ठति राजेन्द्रः श्रुतपालो महानृपः ॥ ८॥ सर्वलक्षणसंपूर्णो महावल- वे साधक टस स्थानसे उतर दिशाको गए । वहां सन्मुख अप्रमादनामक वडा पर्वत देस पड़ा॥१॥उसके आगे ऊंचे उत्तुंग शृंगवाला ज्ञान पर्वतदीसा,और दोनों पर्वतीक मध्यमें बहा क्षीर सागरया ॥२॥ अप्रमाद पर्वतके सोपान(सीढ़ीयों) पर सुवर्ण और रत्न जड़े हुए थे उस समय उस मार्गसे साधकोंके सहित आचार्य चले ॥ ३ ॥ उस शिखरके ऊपर परम मनोहर दिव्य और सौ योजन विस्तीर्ण- वाले सूर्यको समान कान्तिवाली ॥ ४ ॥ प्रतोली और बारसे संयुक्त सुवर्णके प्रकर (परकोटे ) से घिरी हुई नगरी देखी वहां साधक शीव गये ॥ ५ ॥ वह मासाद और घरोंसे व्याप्तथी और बन्दरवालासे शोभायमान और सुवर्णसे रचित भूमि और अमिको लपटकी समान कान्तियो ॥ ६ ॥ फलोंके परकोटे और चित्रकर्मसे शोभित और उसका मंडप आधे योजन विस्तार वालाया ॥७॥ और दिव्य सिंहासन रत्ननटितये, टनपर राजेन्द्र श्रुतपाल विराजमान था । ॥ ८॥ जो संपूर्ण लक्षणोंसे सुन्दर और महावली पराक्रमी था, और प्रकाशमान १९०) केदारकल्प। पराक्रमः ॥ दीप्तदेहा महाकन्या दिव्याभरणभूषिताः ॥९॥ दिव्यवस्त्रपरीधाना दिव्यगंधानुलेपनाः ॥ संपूर्णचन्द्रवदनाः सर्वालंकारभूपिताः ॥ १० ॥ साधकाश्च गतास्तत्र दृष्टा वै नृपमन्दिरे ॥ साधकः. सह चाचार्यमालिंगंति परस्प- रम् ॥ ११ ॥राजोवाच ॥ आगता भवनात्कस्मात्क स्थाने चैव गच्छत।। सत्यं धूत महासिद्धाममागे कार्यविस्तरम् ।। ॥ १२ ॥ सिद्धा ऊचुः । शृणु राजन्महद्वाक्यं वृत्तांतः कथयिष्य- ते॥ आगता मृत्युलोकाच गंतव्यः शंकरालयः॥ १३॥ राजो- वाच ॥ पृथिव्यां च रुचिन्नैव किमर्थं चागतः प्रभो ॥ सत्यं ब्रूहि महाचार्य साधकैः परिवेष्टित ॥ १४ ॥ सिद्ध उवाच ॥ संसारः स्वप्नसदृशो हपारो दुःखसागरः ॥ महादुःखतरो राजञ्च्छोक- चिन्तापपीडितः ॥१५॥ जननीगर्भमध्ये च महादुःखं प्रव- तते ॥ भोक्तव्यो नरको घोरो महादुःखेन पीडितैः ॥ १६ ॥ गर्भानिज्वालया दग्धैर्मलज्वालादिभिनवैः॥ भोक्तव्यं च महा- शरीर महाकन्यायें सन्दर आभूषणोंसे भूपित॥९॥ सुन्दर वस्त्र पहने दिव्य सुगंध लगाए पूर्ण चन्द्रमाकी समान मुखवाली सब गहनोंसे अकृतथीं ॥ १० ॥ उस राजाके मंदिरको देख कर साधक लोग वहां गए तब साधकों सहित आचार्यको परस्पर आलिंगन करती हुई ॥ ११ ॥ राजा बोला हे सिदो ! कहांसे आतेहो और प.हांको जाओगे ? यह विस्तारपूर्वक मेरे आगे कहो ॥ १२ ॥ सिद्ध वोले हे राजन् ! सुनो सब वृत्तान्त कहते हैं हम मृत्यु लोकसे आए और शंकरके मंदिर- को जाते हैं ॥ १३ ॥ राजा बोला हे प्रभो! पृथ्वीपर तुम्हारी रुचि नहीं है ? क्या किसलिये आरहो ? हे आचापों ! साधकों सहित सत्य २ कहो ॥ १४ ॥ सिद्ध वाले संसारतो स्वम मात्रहै और अपार दुःखोंका सागरहै हे राजन् मिसारी मनुप्य महादुःखी और शीक चिन्तासे पीटितह ।।१५॥ माताके गर्भ मध्यमें चहा दुःखदै मनुष्य बडे दुःखोंसे पीडित हुए घोर नरकको भोगतेहैं ॥ १६ ॥ गर्भ- रूप अमिसे तथा मलरूप अमिसे महा कष्ट भोगना होता है और अति दुःस भरमामिरिनि शेषः।
भापाटोकासमेत-प०२२. कप्टमतिदुःखं प्रवर्तते ॥ १७॥ पश्चादुत्पद्यते भूमौ महाप्रसव- वेदना ।। काले तस्मिन्न जानंति सुखं दुखं च ते जनाः॥१८॥ तुच्छमायुर्मनुष्याणामदै गृह्णाति शर्वरी ॥ तस्यादै च वियोगेन शेपं वालं च यौवनम् ॥ १९॥ एतद्दुःखभयाद्रीता राजन्नत्रा- गता वयम् । मृत्युलोकेमहादुःखं सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥२०॥ इन्द्रजालं यथा स्वप्नः संसारश्च तथा नृप। विह्वलः सर्वसंसारो यतिकप्टेन पीडितः॥२१॥ मायामोहमहालोभतृष्णाव्याकुल- चेतसः।। कुर्वते मनुजाःकर्म देवोपहतबुद्धयःमाचपलः सर्वसंसारो मया दृष्टः पुनःपुनः॥२२॥ चपलं च धनं तत्र चपलं तत्र यौवनम् ।। स्वजनै त्यवर्गश्च धनींनं च मंदिरम् ॥ २३ ॥ एतत्सर्वं मया दृष्टं चपलं च महानृप ॥ अतिकष्टं च संसारे महानरकरिते ॥ २४॥ एतदुःखभयागीता राजन्नवागता वयम् ॥ पितृवन्धून्परित्यज्य स्वजनानि च नकधा ॥२५॥ पुत्रदारास्तथा सर्वे त्यक्त्वा यत्रागता वयम् ॥ वैभवं धनराज्ये च भूमि वैदूर्यमौक्तिकान् ॥२६॥ सर्वस्वं च मया त्यक्तं नाना- होताहै ॥ १७ ॥ पश्चात मूमिपर उत्पत्तिको पीडा उत्पन्न होतीहै, टस समय वे मनुप्प सुख और दुःखको नहीं जानते हैं ॥ १८ ॥ प्रथमती मनुष्योंकी आयुद्दी कितनीहै ? आधी रात्रि ग्रहण करतीहैं उसकी आधी वियोगसे शेप वालक और जवान अवस्थामें व्यय होताहै ॥ १९ ॥ हे राजन् ! इस दुःख भरसे डरे हुए हम यहाँपर आएह मृत्युलोकमें महा कष्टहै यह सत्य २ कहतेहैं ॥ २० ॥ हे नृप ! जैसे इन्द्रनाल और स्वाहै उसी प्रकार यह संसारहै, संपूर्ण संसारी विद्वलह और अति कष्टसे पीडित होतेहैं ॥ २१ ॥ माया, मोह, लोभ, और तृष्णा, में मनुष्य फँस जाते हैं यह सब संसार चंचलह, ऐसा वार २ देवा ॥ २२ ।। टसमें धन और योयन चपलहै, कुटुम्बीलोग नौकर भाई मकान ।। २३ ॥ हे रानन् ! यह सब चंचल और वह नरकोंसे पूर्ण इस संसारमें अति कष्टहै ।। २८ । इस भपसे डरे हम यहां आए और पिता बंधु स्वजन आदि ।। २५ ॥ पुत्र नियोंकी त्याग फर यहाँ आप देवयं धन राज्य मणि वयं मातीसे ॥२६॥हेरानन्।
(९२) केदारकल्प। देशो महानृप ॥ गजाश्चाश्वरथास्तत्र तिष्ठति च गृह मम ।। ॥ २७ ॥ उष्ट्रश्च वाहनं चैव शुभं शिविकया सह ॥ तिष्टंति मंदिरे सवैगैतव्यो हि शिवालयः ॥२८ ॥ सर्वमेतत्परित्यज्य राज्यं चैव मनोरमम् ॥ चलं सर्व तथा दृष्ट्वा तस्मादना गता जयम् ॥ २९ ॥ एतदुःखं च संसारे श्रूयतां वचनं मम ॥ तत्र तिष्ठति रम्यं च यत्र देवो महेश्वरः ॥३०॥ तत्र स्थाने महासे- न विमानेन गता बहु । आगताश्च सुरास्तत्र विमानश्च मनो-. रमैः॥३१॥ आरुढाश्च सुराः सवै वामाश्चैव समागताः ॥ तथैवाप्सरसो दिव्या देवगंधर्वयोपितः ॥ ३२ ॥ सुरेन्द्रसहिता- स्सर्वे देवाश्चैव समागताः ॥आगताश्च ततः सर्वा रंभायाः सकलाः स्त्रियः ॥३३॥ देवता दिव्यकन्याश्च सर्वभूपणभूपि- ताः॥ आगताश्च तथा सिद्धाः वाद्यते च ह्यनेकधा ॥३४॥ इन्द्र उवाच॥ साधुसाधु महाप्राज्ञ आचार्य साधकैः सह। विमा- नैश्च शताराः शिवलोके च गच्छत ॥३५॥ अहं च प्रेपितः सिद्धा ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ॥ युप्मासु तुष्टो देवेश उमासहित- . नाना प्रकारके देश आदि सवदी हमने छोड, हाथी घोडा रथ आदि सब मेर घरपर स्थित हैं, ॥ २७ ॥ ऊंट, वाहन, सुसीन, पालकी, आदि सब मेरे घर स्थितहै, सबको त्याग शंफरके आलयको जातैहैं ॥ २८ और मनोहर राज्यभी त्यागाह हे राजन् ! यह सब हमने चपल देखा, इस कारण इस स्थानमें प्राप्त हुए हैं ॥ २९ ॥ यह अनेक प्रकारके दुखद संसारमें, हम तहांपर स्थित होंगे जहाँ महेश्वर देवह ॥ ३० ॥ हे महासेन ! उस समय वहां पर बहुत से देवता मनोहर विमानॉपर चठे हुए आए ॥ ३१ ॥ सब देवता और खियां तथा अप्सरा और देयता गंवोंकी खिा आई॥ ३२ ॥ इन्दसहित संपूर्ण देवता और रंभा मेनपा आदि समस्त लप्सरा प्राप्तहुई ।। ३३ ॥ देवता और सुन्दरी फन्या संपूर्ण आभू- पांसे शोभायमान धी और सिद्ध भी आएप तया अनेक प्रफारफे वाजवतेय ॥ ३४ ॥ इन्दमाले, हे महामान ! हेसाथ है साधु ! आप साधकों सहित पिमा. नाग द्वारा शिप लोफ चलिये ॥ ३५ ॥ हे सिद्धो ! हमया ब्रह्माविष्णु और भापाटीकासमेत-पं० २२, (९३) शंकरः॥३६॥ उत्थाय गम्यतां सिहा गंतव्यःशंकरालयः॥ विमानसहितास्तत्र आगताः स्युरनेकधा ॥ ३७॥शंखदुंदुभि- निघोंपैः काहलैभैरिमर्दलैः ॥ पटहैवेणुवंशैश्च वादयंति ह्यनेकधा ।।३८॥ आगताश्च ततः कन्या रूपयौवनगर्विताः ॥ संपूर्ण- चन्द्रवदना वदत्यः कोकिलस्वरम् ॥ ३९ ॥ मृगाक्ष्यो हंसगा- मिन्यः कुंडलाभरणोज्वलाः ॥ विद्युत्तेजोनिभाः सर्वा पूरा- रावसंकुलाः॥४०॥ दिव्यवस्त्रपरीधाना दिव्यगंधविलेपनाः॥ शिरस्सुशोभिताः पुष्पैर्नागवल्लीविभूपिताः ॥ ४१ ॥ स्वर्ण- कंकणसंयुक्ता हारकेयूरभूपिताः ॥ सर्वलक्षणसंपूर्णाभानुविंव- समप्रमाः ॥४२॥ कन्यकासहिता देवा विमानारूढसंपदः।। चामरैर्वीज्यमानाश्च च्छत्रैरुपरि शोभिताः ॥४३॥ इन्द्रस्य वचनं श्रुत्वा आचार्यों वेदते तदा ॥ आचार्य उवाच ॥ शृणु- राजन्वचः शक्र एकचित्तो व्यवस्थितः ॥ नरोचते विमानं मे महेश्वरने भजाहै क्योंकि पार्वती समेत शिवजी बडे सन्तुष्ट हैं।। ३६ ।। हे सिद्धा! उठो शंकरके स्थानको चलो अनेक प्रकारके विमानोंपर चढे हुए देवता आए । ।। ३७ ॥ शंख, दुन्दुभिका कोलाहल भेरी मृदंगके शब्द तथा पटह, वेणु, वाँसुरी आदि अनेक प्रकारके बाजे बज रहेये ॥ ३८ ॥ तत्पश्चात रूपवती यौवनवाली कन्या आई जो पूर्ण चन्द्रमाके समान मुख वाली थीं, और कोयलकी समान स्वरसे चोलतीयीं ॥ ३९ ॥ मृगकी समान नेत्र, और हंसके समान चालवाली, कुंडल,आभूपणोंसे प्रकाशित, विजलीकी समान कान्तिवाली, पायवॉको धारण कियेथीं ॥ ४० ॥ सुन्दर वस्त्र पहने और सुगंध लिपटाये सीसफूलोंसे शोभाय- मान पान चावे हुए ॥ ११॥ हायमें कंगन धारे, हार, वाजूबंद, पहरे सब लक्ष- गोसे श्रेष्ठ सूर्यको किरणोंके समान कान्तिवाली थीं ॥ ४२ ॥ कन्याओंके सहित देवता विमानोंपर चढके आए जिनके चीर दुर रहेथे ऊपर छत्र लगेये ॥ १३ ॥ तब इन्द्रका वचन सुन आचार्योंने कहा आचार्य बोले, हेमहाशक ! हेमहाराज! १हस आर्यः । २ आत्मनेपदमार्गम् । .
फदारकल्प। सत्यंसत्यं वदाम्यहम्॥४४॥विमानानैव रोचंते गुरुधर्मवलेन च। अहं चात्रागतो देवालं विमानन संशयः॥४५॥शंकरस्य प्रसा- देन विमानं नैव रोचते ॥ विमानेन च मे कार्य शृणु शक महा- प्रभो॥ ४६ ।। विमानं च नमस्कृत्य आचार्यः साधकैः सह ।। गतानि च विमानानि यत्र ब्रह्मा हरो हरिः ॥ ४७ ॥ श्रुतपाल उवाच ॥ ॥ शृणु साधक तत्त्वेन मम वाक्यं तु निश्चितम् ॥ अस्मिन्स्थाने महारम्ये भुंश्वभोगान्यथेप्सिताम् ॥४८॥ सा- धक उवाच ॥ मह्यं भोगा न रोचते राज्यं च विपुलं धनम् ।। यत्र स्थाने महादेव उमासहितशंकरः॥४९॥तत्र स्थाने महा- राज गंतव्यं साधकैः सह ॥ भोगल्लोभो न मे राजल्लोंभः शंकर- 'दर्शने ॥५०॥आगताश्च ततः कन्याः श्रुतपालस्य वै सुताः।। सर्वारूढविमानाश्च गजैश्चैव स्थैस्तथा ॥ २१ ॥ रूपयौवन- संपूर्णाः सर्वाभरणभूपिताः ॥ भूतिमत्यः प्रधानाश्च कन्या ल- क्ष्मीसमप्रभाः॥५२॥ सर्वा लक्षणसंयुक्ताः सकामा मदविह्वलाः॥ - - एकाग्र चित्तहो सुनो हमें विमान नहीं रुचता, आपसे सत्य २ कहतेहैं ॥ १४ ॥ हम सब शिवके प्रसादसे तथा गुरुभक्तिके बलसे यहांतक आए कुछ विमानको नहीं आएहैं ॥ ४५ ॥ शिवके प्रसादसे विमान नहीं रुचता, हे महाप्रभो ! हे शक ! मुझे विमानसे कुछ कार्य नहींहै ॥ ४६॥ आचार्य और साधकोंने विमान- को नमस्कार किया विमान वहाँ गए जहाँपर ब्रह्मा शिव विष्णु थे ॥ १७ ॥ श्रुतपाल बोला हे सापक ! मेरे वचनको यथार्थ से मनो कि इस स्थानपर रह- कर यथेच्छा भोगोंको भोगो ॥ १८ ॥ साधक बोले हमको भोग राज्य और अधिक धन नहीं रुचता, जिस स्थानमें पार्वती सहित शंकरहें। ४९॥ हे राजन् ! उस स्थानको साधकों सहित जानाहै हे राजन् ! भोगका लोभ मुझे कुछ नहींह, येवल शंकरका दर्शन करनाह ॥५०॥ तव श्रुतपालकी कन्या विमान रथ हाथि- यों पर चटी हुई आई ॥५१॥ जो रुप और यौवन तथा आभूपोंसे सजी हुईथी और समृद्धिवती साक्षात् लक्ष्मीके सदृशीं ॥ ५२ ॥ और सुन्दर लक्षगाँसे मुख्य मोपन्यागुतम् । पति या पाठः ।
भापाटीकासमेत-प० २२. ईदृश्यश्चागताः कन्या मायिनामपि मोहिकाः ॥५३॥ कन्यका ऊचुः ॥ ॥ अस्मिन्स्थाने वरं लध्व्वा भुलभोगान्यथेप्सि- तान् ॥ कि करिप्यति कैलासः किं करिप्यति शंकरः ॥१४॥ देवा अस्मान्वरिप्यंति युमासहितशंकरम् ।। किमर्थं वृण्वते सिं- दाः किमर्थं न सुखे रतिः ॥ ५५ ॥ रूपपात्रं ततः कन्याः पूर्ण- चन्द्रनिभाननाः ॥ दिव्यवस्त्रपरीधानाः सर्वाभरणभूषिताः ॥ ॥ ५६।। पंचलक्षा महासेन श्रुतपालस्य वै सुताः। दिव्यदेहा महाकाया महावलपराक्रमाः ॥१७॥राजोवाच ॥ ॥अस्मि- वेव पुरे रम्य स्वर्गतुल्ये न संशयः ॥ इच्छ यां यां च साचार्य संवरिस्यति सत्वरम् ॥ २८॥ इच्छावनपरीधाना दिव्यगंधान लेपनाः ॥ अस्मिन्स्थाने महाभोगा ये भोगा देवदुर्लभाः। ॥५९ ॥ आचार्य उवाच ॥ ॥ किमत्र भोग्यमायुप्यं कति कन्याः प्रदास्यसि ॥ पश्चाच का गती राजन्सत्यं कथय सुत्रत ॥६०॥राजोवाच ॥ ॥ कन्याः पंचसहस्राणि-दीयं- ते च पृथक्पृथक् ॥ संवत्सरायुतं सिद्धा आयुरन विधीयते॥६॥ परिपूर्ण कामना सहित और मदमें विवल थी चन्द्रमाके समान नौर मायोकोभी मोहित करनेवाली थीं ।। ५३ ॥ कन्या बोली है वीरो ! इस स्यानपर निवास करके ययेच्छित भोगोंको भोगो कैलास, और शंकर क्या ? करेंगे ॥ ५४ ॥ है देव ! हमको वरण करो पार्वती सहित शिवो किस वर्ष वरण करतेहो ? मनुप्य देहमें किस अर्थ प्रीतिहै ? ॥ ५५ ॥ रूपवती चन्द्रमसी कन्या जो दिव्य वन धारण किये संपूर्ण आभूपोंस भूपित, ।। ५६ ॥ हे महासेन ! पांच लाख श्रुतपालकी पुत्री मुन्दर शरीरवाली नति वलपराक्रमवाली ॥ ५७ ॥ राना बोला, इस स्वर्गतुल्य रमणीक पुरमें विमानपर चढकर जो इच्छाहो सो भोगो । ॥५८॥ इच्छा अनुसार वस्त्र बिछौने मुगंध आदि लगाओ । इस स्थानपर महा भोगोंको भोगा, जो देवताओंको भी दुर्लभ ॥५९ ।। आचार वोले यहां पर फितना भोग और कितनी मायु, और पीउसे क्या गति मिलती है ? सो सत्य २ कहो।। ६० ॥ गना बोला, एक सहस्व पन्या पृयक २ दी जापगी वीर (९६) केदारकल्प। भुक्त्वा च विपुलान्भोगान्मृत्युलोकं व्रजति च ॥ सर्वकामसमृ- दे च जायते विमले कुले ॥६२ ॥ चक्रवर्ती महाराजो भवे- द्भूयो न संशयः ॥ मृत्युलोकान्महाप्राज्ञ पुनरायाति चात्र वै ॥ ॥ ६३॥आचार्य उवाच ॥ मृत्युलोको यदि पुनर्गन्तव्यश्च मया नृप । मृत्युलोकभयागीता राजनवागता वयम् ॥ ६४ ॥रोचते गर्भवासो न तस्माद्भोगा निरर्थकाः ॥ अवश्यं तत्र गंतव्यं यत्र ब्रह्मा हरो हरिः॥६५॥ अस्मिन्नेव पुरे रम्ये रुचिन्नैव महानृपः प्रत्यक्षं यत्र दृश्यते ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥६६॥ अस्मिन्स्थाने न मे कार्य राज्यं च विपुलं नृप ।। मया च तत्र गंतव्यं यत्र देवो महेश्वरः ॥ ६७ ॥ पतिहीना च या नारी नासिकाहीनमा- स्यकम् ॥ शर्वरी चन्द्रहीना च रविहीनं दिनं यथा॥६८॥ नृप- हीनं यथा सैन्यं शिवहीनं पुरं तव॥तस्मान्न रोचतेऽस्माकं गर्मि- प्यामो न संशयः॥ ६९ ॥राजोवाच ॥ ॥ यदा न रोचते दश सहस्त्र वर्षकी अवस्था प्राप्त होगी ॥ ६१ ॥ और पूर्ण भोगोंको अनुभव करके फिर मृत्यु लोकमें जाना होगा सब कामनाओंसे पूर्ण और निर्मल फुलमें जन्म होगा। ६२ ।। और चक्रवर्ती महाराजा होतो इसमें कुछ संशय नहीं, और फिर मृत्युलोकसे यहां आना होगा ॥ ६३ ॥ आचार्य बोले हे महानृप ! यदि फिरभी मृत्युलोकमें जाना पडताह तो हम मृत्युलोकके भयसे व्याकुल हुए यहां पर आपहें ।। ६४ ॥ गर्भ में निवास होना नहीं चाहते, इस कारण यह सारे भोग निरर्थकहैं, अवश्य वहां जांयगे जहांपर साक्षात् ब्रह्मा, शिव, विष्णुहैं ॥ ६५ ॥ है महानृप ! इस नगर में रहनेकी रुचि नहीं, तहांकी इच्छाहै जहां ब्रह्मा, विष्णु महेन्चर प्रत्यक्ष दीसते हैं ॥ ६६ ॥ हे राजन् ! इस स्थानमें अधिक राज्यसे मुझे मुछ काम नहीं है, मुझे तो तहोपर जाना है जहाँपर महेश्वर देव विराजमान हैं ॥ ६७ ॥ जैसे पति हीन स्री, विना नासिकाफे मुख, चन्द्रमाके विना रात्रिसूर्यके विना दिन है ॥ ६८ ॥ और जैसे विना रानाके सेना है उसी प्रकार शिवफे विना तुम्हारा पुर है इस कारण हमें नहीं रुचता इससे अब हम जाते हैं ॥६९।। राना बोला हे सिद्धी ! यदि नहीं रुचता तो क्षण मानतो यहां ठहरो जवतक' - भापाटीकासमेत-प० २३. सिद्धाः क्षणमेकं च तिष्ठत ॥ अपूर्णता भवेत्तावद्यावद्भक्ष्यसमा- गमः ॥ ७० ॥ क्षीरं दधि मधु द्राक्षाममृतं ये, पिवंति च ॥ क्षण- मात्र च ते धीरा मूछौं गच्छंति साधकाः ॥ ७१ ॥ पश्चाच्च साधकाः सर्वे रुद्रतुल्यपराक्रमाः ॥ चतुर्वेदप्रवक्तारः सर्वशास्त्र- विशारदाः ॥७२॥ यदा न रोचते राज्यं देवकन्यास्तथैव च ॥ ग़च्छगच्छ महासत्त्व यत्र देवो महेश्वरः ॥७३॥ ब्रजति साध- काः सव चोत्तरस्यां दिशि स्वयम् ।। ७४ ।। इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेयसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहकैलासगमने श्रुतपालराजपुरीवर्णनं नाम द्वाविंशः पटलः ॥२२॥ भोज्य पदाय पूर्ण होत हैं तबतक ठहरा ।। ७० ॥ तब दूध, दही, शहत, अमृत उन साधकोंने पिया और क्षण मात्रमें वे मूर्खाको प्राप्त हुए ॥ ७१ ॥ पश्चात् वे साधक शिवके तुल्य पराक्रमी हुए और चारों वेदके वक्ता तथा संपूर्ण शास्त्रों में विचक्षण हुए ।। ७२ ॥ राजाने कहा कि यदि राज्य और कन्या नहीं रुचती तो हे महासत्व ! आप वहां जाय जहां देवताओंके स्वामी महेश्वर उपस्थितहैं ॥७३॥ फिर संपूर्ण साधक उत्तर दिशाको चल दिये ॥ ७४ ॥ इति श्रीकेदारकल्पे शिवपार्वतीसवादे भापाटीकायां द्वाविंशःपटलः ।। २२ ।। त्रयोविंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ।। ॐ अप्रमादस्य सोपान उत्तीर्य गम्यते ततः।। अग्रतो दृश्यते तत्र चंद्रादित्यसमप्रभः ॥ १॥साधकाश्च महा- श्री ईश्वर वाले तब वे अप्रमाद पर्वतको उतर कर गए तो आगे चन्द्रमा तथा मूर्यके समान प्रकाशमान दिशा दीखी॥१॥ये महा पराक्रमी साधक प्रमाद रहित हो उत्तरफी ओर चले वहां अप्रमाद पर्वतकी सीढ़ियां सुवर्ण और रवास (९८) फदारकल्प। सत्त्वा गतास्ते उत्तरामुखम् ॥ अप्रमादस्य सोपाने हेमरत्रविभू- पित॥२॥ ज्वलंत्यः पभरागैश्च वैदूर्यमणिरश्मिभिः।। चंद्रकांत- शिलास्तत्र भानुर्विवसमप्रभाः ॥ ३ ॥ महागिरिमहाशृंगो यतिरम्यो मनोहरः ॥ दिव्यवृक्षमहातेजा दृश्यते च दिशो दश ॥४॥ अप्रमादो गिरिश्रेष्ठ उत्तीर्य गम्यते ततः॥अग्रतोदृश्यते तत्र क्षीरोदसागरोपमः ॥५॥ शतयोजनविस्तीर्णस्तडागो वि- पुलोमहान् ॥ सुवर्णपंकजाकीर्णो बहुपुप्पोपशोभितः ॥ ६॥ कुमुदोत्पलपमेश्च कल्हारैरुपशोभितः ॥तडागो हेमसोपानर्वेष्टि- तश्च दिशो दश ॥ ७॥ सुवर्णकर्दमस्तत्र रेणुकांचनशोभितः॥ इन्द्रनीलमहानीलवैदूर्यमणिरश्मिभिः ॥ ८॥ तत्र वृक्षो महा- दिव्यो हंससारसशोभितः ॥ तस्मिन्स्थाने महातीर्थ धर्मकर्म- समागमे ॥ ९ ॥ पितॄणामुदकं दत्त्वा पिंडदानं तथैव च ॥ श्राद्धं कृत्वा विधानेनते च पंच पृथक्पृथक् ॥१०॥ अथ श्राद्धमंत्रः।। ॐ हुं हुं हुं हुं रु रुं हुं हुं ॐ एकोत्तरशतं चैव पितृवंशं समु- जटित थीं ॥२॥ पद्मराग मणि और वैदूर्य मणियोंकी किरणोंसे प्रकाशित थीं, और शिलाएँ चन्द्रमाकी तथा सूर्यको समान कान्तिवाली थीं ॥ ३ ॥ उस महा पर्वतका शिखर अति रमणीक और मनोहर था, मुन्दर वृक्षोंवाली अति तेज. युक्त उत्तर दिशा देखपड़ी ॥ ४ ॥ अप्रमाद पर्वतको लांघकर तहां गए, जहां क्षीरसागरको समान ॥ ५॥ सौ योजन विस्तारवाला बड़ा सरोवर था जो स्व. मय कमलोंसे च्याप्त बहुतसे पुष्पोंसे शोभायमान ॥ ६ ॥ बबूले रक्त कमल नील कमलोंसे मूंगोंके समान देदीप्यमान थ उस सरोवरमें सुवर्णके सोपानोंसे चारों ओर दशों दिशा पिर रही थीं ॥ ७॥ मुवर्णको कीचड और मुवर्णकी धूलि तोपर शोभित थी, इन्द्रनील वैदूर्य महानील मणियोंको कान्तिसे प्रका- शित ॥ ८ ॥और वहाँपर बड़े सुन्दर २ वृक्ष हंस सारस पक्षियोंसे शोभायमान थे, टस महातीर्थके स्थानपै धर्म कम करनेवालोंका समागम था ॥ ९ ॥ पितरोंका जलदान और पिंडदान करके और विधान सहित श्राद्ध करके शिव आदि पांचोंको पृथा २ स्थापन करै ॥ १० ॥ यह श्राद्धका मंत्र है " ओं हुँ हुँ
भापाटीकासमेत-प० २३.
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रेत् ।। मातृपक्षेण संयुक्तं श्वथूपक्षं समुद्वरेत् ॥ ११ ॥ कल्प-
कोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च ॥ अत्र श्राइप्रभावेण पितृ-
भ्यश्चाक्षया गतिः ॥ १२॥ साधकाः सह पित्रा च जल्पति च
परस्परम् । प्रत्यक्षं तत्र दृश्यते पितरोऽपि वदंति च ।। १३ ॥
प्रसादात्तव भोः पुत्र ह्यश्चया च गतिर्मम ॥ तेन पुण्यप्रभावेण
निर्विघ्नो भव पुत्रक ॥ १४ ॥ ब्रह्मणा स्थापितं लिगं मध्ये पूर्व
महात्मनाम् ।। शंखमुक्ताप्रबालेश्च हंससारसशोभितः ॥ १५ ॥
चक्रवाकयुगोपेतो मत्स्यकूम्मश्च संश्रितः ॥ कर्पूरगंधवत्तोया:-
मृतस्वादुः सुशीतलः ॥ १६ ॥ दुग्धं दधिं घृतं क्षीदममृतं
खंडशर्कराः॥ एतैस्तु पूरितो नित्यं क्षीरोदसागरोपमः ॥१७॥
सहत्रस्तंभविन्यस्तः प्रासादश्चित्रवेष्टितः ॥ ध्वजमालाकुलो
दिव्यश्चित्रकोपशोभितः॥१८॥ गयाकोटिगुणं पुण्यं तत्पुण्यं
क्षीरसागरे । प्रत्यक्षं तत्र दृश्यते पितरोऽपि वदंति च ॥ १९ ॥
हुं हुं रुरु हुँ हुँ" इसके करनेस एकसौएक पिताका वंश उद्धार होता है माताके
वंश सहित और सासके वंश सहित एफसीएक वंश उद्धारको मात होत ह॥१॥
सहस्र कोटि कल्प तया शतकोटिकल्प पर्यन्त इस भाइके प्रभावसे पितरॉकी
अक्षयगति होती है ॥ १२॥और सायकोंके साथ पितर आपसमें संभाषण
करते हैं तहांपर पितर प्रत्यक्ष बोलते दीखते हैं ॥ १३ ॥ हे पुत्रो ! नुम्हारे प्रसा-
दस हमारी अक्षय गति हुई है पुत्र ! इस पुग्यके प्रभावसे निर्विन होनो॥१२॥
प्रथम महात्मा ब्रह्माने इसके मध्यमें शिवलिंग स्थापन किया था, यह शंव माती
मूंग आदि हंस सारस आदिसे शोभित या ॥ १५॥ यस्याओंमें व्याप्त मम्प
फछुए आदि जल जंतुनासे सेवित और कपूरकी समान मगंधित और स्वादिष्ट
शीतल जलयाला है ॥ १६ ॥ दूध, दही, घी, मधु, अमृत, बंड, शर्करा, आदि-
से पृरित, और क्षीर सागरकी ममान है ॥ १७ ॥ और हजारों संमोस गुक्त चित्र-
कारियोंसे शोभित मदलास वाटत है और पताका मालामासे शोभायमान हैं
॥ १८॥ यहांपर कोटि गया समान पुण्य मिलता है औरक्षीर मागरमें जो पुग्य
है मो पुण्य मिटना है और यहां पितर प्रत्यक्ष संभापन करते हैं ॥ १९ ॥
(१००) केदारकल्प। साधकाश्च गतास्तत्र सर्वे ते विस्मयं गताः ॥ स्तुति. कुर्वति देवस्य साधकाश्च पृथक्पृथक् ॥ २० ॥ अप्सरोयक्षगंधर्वा अर्च- यति ह्यनेकधा ॥ भेरीमृदंगशब्देन शंखतूर्यरवेण च ॥ २१ ॥ पटहै?पशृंगैश्च मंजीरेस्तालनादितैः ॥ गीतं कुवैति गंधर्वा वीणां रणति सुन्दरी ॥ २२ ॥ विलिप्यंति च ते लिंगं कर्पूराग- रुचंदनैः॥ भवभक्त्या महासेन नमस्कृत्य पृथक्पृथक् ॥२३॥ अर्द्धरात्रे च ते देवं स्तुतिं कृत्वा पुनःपुनः ॥ अप्सरोगणगंधर्वा अर्चयंति ह्यनेकधा ॥ २४ ॥ नानाप्रकारभक्त्या च नानापूजा व्यवस्थया ॥ सुवर्णपंकजैस्तत्र पूजयंति सदाशिवम् ॥ २५ ॥ आरार्तिकं प्रकुर्वति लिंगस्याये निरंतरम् ॥ सरसः पश्चिमे भागे आस्ते वनमनुत्तमम् ॥२६॥रणितं शृंगराजैश्च रक्तकृष्णं च कव॒रम् ॥ वनेनतेन तच्चारुशोभते सर उत्तमम्।। पीतपंकजशोभा- ढयं रक्तकैरवमंडितम् ॥२७ ॥ तच्च भ्रमरगुंजारै नापद्मश्च शोभितम् ॥ चूतचंदनसयुक्तं कदलीखंडमंडितम् ॥ २८ ॥ सवसाधक वहां गए और विस्मयको प्राप्त हुए और वे साधक पृथक् २ देवताओंकी स्तुति करने लगे ॥ २० ॥ जहाँपर अप्सरा गंधर्व आदि अनेक प्रकारसे पूजन करते थे, और भेरी मृदंग शंख तुरईके शब्दोंसे गुंजारता ॥ २१ ॥ पटह, पोप, शृंग, तबला, ताल लय आदिके साथ गंधर्व गीत गाते सुन्दरी वीणा वजाती हैं।।२२॥ तथा कपूर अगर, चंदन आदिसे शिवलिंगको लेपन करती हे महासेन ! प्रेम भक्ति के सहित पृथक् २ नमस्कार करती हैं ॥ २३ ॥ अर्धरात्रितक वे देवको पूनती वारम्वार स्तुतिको फरक अनेक प्रकार अप्सरा गंधर्व अर्चना करते हैं।॥२४॥ अनेक प्रकारकी भक्ति और पूनासे एकान चित्तहो सुवर्णके कमलोंसे सदाशिवको पृनते हैं ॥२५॥ और शिवलिंगके आगे निरंतर आरती करते हैं उस सरोवरके पश्चिम भागमें उत्तम वन है ॥ २६ ॥ गुजारते हुए भौरा आकारसे लाल काले चित्र फबरे पॉल वरपके फमलांस विचित्र शोभा हो रही थी और रक्त गुमुदफे संहासे शोभायमान ॥ २७ ॥ और फिनारपर भ्रमरशन्द करते और अनेक प्रका रफेफमलोस शभित्त, आम और चंदन तथा फलफे. वृक्षास सुशाभित ।। २८ ।।
भाषाटीकासमेत-प० २३. (१०१) सुवर्णकेतकीजातीनानापुप्पोपशोभितम्।।वकुलेशतपत्रैश्च तिष्टं- ति राजचंपकाः ॥ २९ ॥ कूष्मांडफलरूपेण सर्वे वृक्षाः फलंति च ॥ वनमध्ये महाचार्यः साधकैः परिवेष्टितः॥ ३० ॥ सौवर्ण- कांस्तत्र वृक्षान्दृष्ट्वा चैव दिशो दश ॥अग्रतो दृश्यते तत्र प्रोत्तुं- गश्च महागिरिः ॥३१॥ तस्य सोपानमार्गेण गंतव्यं च ततः परम् ॥ तस्य शृंगे पुरी रम्या हेमरनविभूषिता ॥ ३२ ॥ साधकाच गतास्तत्र पश्यति च हिमालयम्।।नानाविनोदसंयुक्ताः पश्यति च दिशो दश ॥३३॥ विवाहोत्सवसंकीणी मंगलाद- पि मंगलम् ॥ दृष्ट्वा तत्र पुरी रम्यांचन्द्रादित्यसमप्रभाम्॥३०॥ ध्वजमालाकुलां दिव्यां विस्तरे शतयोजने ॥ प्रतोलीद्वारसंयुक्तां हेमप्राकारशोभिताम् ॥ ३५ ॥ वापीकूपतडागान्यां प्राकारण प्रवेष्टिताम् ॥रम्यां मनोहरां दिव्यांबहुगंधादिवासिताम् ॥ ३६॥ अमितेजःसमोपेतां चित्रकर्मोपशोभिताम् ॥ यस्या मध्ये मुनि- श्रेष्टः पूर्वधन्यो महामुनिः ॥३७॥ जटामुकुटधारी व दिव्य- सुवर्णमयी कतकी खिलीहुई तथा नाना प्रकारक पुप्पोंसे देदीप्यमान. केसर शत- पत्र और राजचंपिका आदि खिल रहीथीं ॥ २९ ॥ कुम्हड़ा (गोलकद्दू) के समान फलोंसे वृक्ष फलित होरहेहैं टस बनके मध्यमें आचार्य और सापकोंन । ॥ ३० ॥ सुवर्गके वृक्ष दशा दिशाओमें देखें, और आगे बडा ऊंचा एक महा पर्वत अवलोकन किया ॥ ३१ ॥ तब बड़ी मीदियों के मार्गमे गए तो उसके शिवरपर पक नगरी जो अनेक प्रकारके रत्न और सुवर्ण भूपित यी ॥ ३२॥ देखी साधर वहां गये और वहां परसे हिमालयको देखा और अनेक प्रकारसे आनंदपूर्वक दशा दिशाओंका अवलोकन किया ॥ ३३ ॥ विवाह टत्सवास सु- शोभित मंगलसभी मंगल अति मनोहर मूर्यके समान प्रकाशित पुरी देखी ।। ॥ ३४ ॥ यह पताकाओं तया मालाओंसे सुन्दर और सौ योजन विस्तारवाली थी, प्रतोली दार तया सुवर्णके प्राकारोंसे सुशोभित ॥ ३५ ॥ बावडीवर सरी- वर आदिस पिरी तथा रम्य मनोहर और बहुतसुगंधिसे वासित ॥ ६॥ और अनिये समान तेनवाली चित्र कर्मसे विचित्र थी, जिसके मध्य में वं धन्य महामनि ॥ १७ !! जटा और मस्ट धारण किये दिव्य देह और मृत्तिमान तो - (१०२) केदारकल्प । देहश्च मूर्तिमान् ॥ दिव्याभरणशोभाव्या दिव्यवस्त्रपरिच्छदाः ॥ ॥ ३८॥ दिव्यपुष्पशिरोवद्धा दिव्यकुंडलभूपिताः ॥ चतुर्वेद- प्रवक्तारः सर्वशास्त्रविशारदाः ॥ ३९ ॥ अईयोजनविस्तीर्ण मंडपं तत्र मंदिरे ॥ सिंहासनानि दिव्यानि हेमरत्नचितानि वै ॥ ॥४०॥ तत्र तिष्ठति राजेंद्रः सभायां परिवेष्टितः ॥ साधकाश्च गतास्तत्र दृष्ट्वा दिव्यं महामुनिम् ॥४३॥ ऋपिराज उवाच ॥ क्वागता भुवनासिद्धाः क स्थाने चैव गम्यते ॥ सत्यं वदत भोः सिद्धा यदि कल्याणमिच्छथ ॥ ४२॥ सिद्ध उवाच ॥ शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि मम वाक्यं सुनिश्चितम् ॥आगता मृत्युलोकाच्च गंतव्यः शंकरालयः॥४३॥ऋपिराज उवाच ॥ अस्मिन्नेव पुरे रम्ये नानाभोगसमाकुले ॥ तिष्ठन्तु साधकाः सर्वे मुंजतां विपुलां श्रियम्॥४४॥ किं करिष्यति कैलासः किं करिष्यति शंकरः।।मम स्थाने महाभोगा देवदानवदुर्लभाः॥४५॥ साधक उवाचा किमत्र भोग्यमायुप्यं पश्चात्किं च भविष्यति।।कस्यलोके भवेद्दासः सत्यं सुन्दर वस्त्र पहने दिव्य आभूपण धारे ॥ ३८॥ सुन्दर २ फूल सीसपर बांध सुन्दर कुंडलोंसे प्रकाशित, चारों वेदोंके वक्ता सर्व शास्त्रों में निपुण थे ।। ३९ ॥ और उसका मंडप (पेरा) आधे योजन विस्तृतथा और दिव्य सिंहासन जो रत्न जटित ये सुवर्णसे आच्छादित थे ॥४०॥उस सभा राजेन्द्र मुशोभितया साधक तहां गए उस दिव्य महर्पिको देखा ॥४१॥ ऋपिराज बोला हे सिद्धी ! कहांस आरहो और किस स्थानपर जातेहो ? सो सत्य २ कहीं यदि कल्याण चाहतेहो । ॥ १२ ॥ सिद्ध बोला हे राजन् ! मेरे वचनको सुनी फि हम मृत्युलोकसे आएहैं और शिव स्थानको जाते हैं । ४३ ।। ऋपिराज चोला, अनेक प्रकारक भोगोंसे य्याम इस मनोहर नगरमें तुम सब साधक रही और अधिक भोगोंको अनुभव परी ॥ १४ ॥ फैलास और शंकर क्या करेंगे, ? इस हमारे स्थानपर अधिक रामहै जो देवता दानयापीमी दुष्माप्य है ॥ १५ ॥ साधकः बोले, यहां पर क्य भांग और पितनी आयुट ? और फिर फिस लोरमनिरास होताद सीई मुमत !
भापाटीकासमेत-प०२३. (१०३) कथय सुत्रत ॥ ४६॥ऋपिराज उवाच ॥कन्याः सप्तसहस्राणि दीयते च पृथक्पृथक् ॥ तथा लक्षं भवेदायुर्महाभोगसमन्वितम्।। ॥४७॥ भुक्का च विपुलान्भोगान्मृत्युलोके च गम्यते ॥ चक्र- वर्ती भवेद्धपः पश्चाजातिस्मरो भवेत् ॥४८॥ पुत्रपौत्रसमा- युक्तो धनधान्यसमाकुलः ॥ दीर्वायुर्विपुलान्भोगान्पुनस्ते स्व- गंगामिनः ॥ १९॥ साधक उवाच ॥ मृत्युलोको यदि पुन- गैतव्यः शंकरालयः॥ मृत्युलोकभयाद्रीता राजन्नत्रागता वयम् ।। ॥ ५० ॥ मृत्युलोके महादुःखं त्यक्त्वेह समुपागताः ॥ तत्र चैवागताः सर्वा विमानारूढयोपितः ॥ ५१ ॥ साधकाँस्ता- स्ततो दृष्ट्वा हृष्टपुष्टा वदंति च ॥ दिव्यवस्त्रपरीधानां दिव्यगंधा- नुलेपनाः ॥५२॥ कर्णालम्बितताटङ्काः कटिघंटासुशोभिताः।। शिरःपुप्पैः सुगंधाश्च तांबूलेन मुहुर्मुहुः ॥५३॥ मृगाक्ष्यो हंस- गामिन्यो रुपयौवनगर्विताः॥ करकंकणसंयुक्ता हारकेयूरभूपि- ताः ॥ ५४॥ संपूर्णचंद्रवदना नपुरैः समलंकृताः ॥कट्या मृगे- सब सत्य २ कहो ॥ ४६ ॥ ऋपिराज वोला, सात सहस्र कन्या पृथक् २ दी जायगी और लाख वर्षको अवस्या भोगोंसहित मिलेगी ॥ ४७ ॥ और संपूर्ण भोगोंको भोगकर मृत्युलोकको प्राप्त होओगे, और चक्रवर्ती राजा होओगे, पश्चात् जातिका स्मरण होगा ॥ ४८ ॥ और पुत्र पौत्र सहित धन धान्य समेत अधिक आयुपूर्वक पूर्ण भोग अनुभव करके फिर स्वर्गके गामी होगे ॥ १९॥ . साधक बोले हे राजन् ! यदि फिरभी मृत्यु लोकको जाना पडताहै तो हम मृत्यु लोकके भयसे व्याकुल हुए यहांपर आपहैं ॥ ५० ॥ मृत्युलोक महा दुःखहै जिस को छोड यहां प्राप्त हुए तब सापकोंके समीप उस स्थानपर सम्पूर्ण विमानपर चढी फन्या प्राप्त हुई ।। ५१ ॥ और साधकोंके दर्शन करके प्रसन्न हुई मनोहर वचन बोलती हुई सुन्दर वस्त्र पहने सुगंध लगाए ॥५२॥ कुंडलोंसे फर्ण गोभित थे जिनके कमरपर घंटा स्थितया और मस्तकपर फूल विराजतेथे पानसे शोभित ॥ ५३ ॥ मृगके समान नेत्रवालौं, और हंसके सदृश चलनेवाली, और रूप तथा यौचनमें भरीहुई, जिनके हाथों में कंकण धारण होरहये, और जो हार बानू- बंदको धारेयीं ॥ ५४ ॥ पूर्ण चन्द्रमाके तुल्य मुखारविन्दवाली, पायनेवासे
(१०८)
केदारकल्प।
न्द्रमानिन्यः कुचतालफलैशुभाः ॥ ५५ ॥ कन्यका ऊचुः ॥
आगताः स्थ कुतः सिद्धाः क स्थाने चैव गच्छथ ॥ कन्याः
पृच्छति तान्सेन वराथै सुन्दरभ्रवः॥५६॥ आचार्य उवाच ॥
शृण्वन्तु कन्यकाः सर्वा मम वाक्यं सुनिश्चितम् ॥ आगता
मृत्यलोकाच गच्छामः शंकरालयम् ॥ ५७॥ कन्यका ऊचुः॥
अस्मिन्नेव पुरे रम्ये नानाभोगसमाकुले ॥ तिष्टंतु साधकाः सर्वे
भुंजतां विपुलां श्रियम् ॥५८॥ साधक उवाच ।। अस्मिन्स्था-
ने महारम्ये कामिन्यो न रुचिर्मनाक् ॥ अस्माभिस्तत्र गंतव्य
यत्र देवो महेश्वरः ॥ ५९॥ एवं वदंति ते सिद्धाः शृण्वतीनां
सुयोपिताम् ॥तस्माच साधकास्सवें गताश्चैवोत्तरामुखम् ॥६॥
इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेयसंवादे
पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शि-
वदर्शने सदेहकैलासगमने ऋपिराजतपःपुरीवर्णनं
नाम त्रयोविंशः पटलः ॥ २३ ॥
भूषित, जिनकी कमर सिंहफीसी और स्तन तालके फलोंके समान थे ॥ ५५ ॥
कन्या बोली हे सिद्धो ! किस स्थानसे आपहो और किस स्थानको नतिहो ?
इस प्रकार यह सब मन्दरी पूंछतीहैं ।। ५६ ॥ आचार्य बोले हे कन्याओ ! ! तुम
सब हमारे पापयको मुनो, हम मृत्युलोकसे आए और शिवके आलयको जातेहैं
॥ ५७ ॥ कन्या बोली इस रूप नगरमें जो अनेक प्रकारके भोगोंसे भराहै हम
म साधक रहो और अधिक भागोंको भागी ॥ ५८ ॥ साधक बोले. इस दिव्य-
स्थानमें हमको फामिनी नहीं रुची, हमको तो वहां जानाहै जोपर महबार
दय विराजतेहैं ।। ५९ ॥ हे मुन्दरिया!! मुनो ऐसा दन सिडोंने कहा और सब
माधफ.फिर टचर दिशाको चले ॥ ६ ॥
नीधीशार शिवानीमादे पाटीकायां प्रयोविंशः परः ॥२३॥
भाषाटीकासमत-प० २४. चतुर्विंशः पटलः। श्रीसर उवाच ॥ ॐ अग्रतो दृश्यते तत्र कृतरूपांतरो हरः ।। वृद्धवाह्मणरूपेण जर्जरीकृतदेहवाच ॥ १ ॥ रुपयौवनहीनश्च झीणकुजश्च देहिनाम् ॥ मंदान्मंदतरो दीनो वेपमानश्च रोगवान् ॥२॥ कायस्तस्य क्षीणतरः कम्पमानौ करो तथा ॥ वदन्मंद- स्वरश्चैव पीडितश्च क्षुधा तृपा ॥शा अस्थिवर्मावशेषश्च क्षुडू- भ्यां प्रपीडितः ॥ ईशो ब्राह्मणो वृद्धोदृष्ट्वाचार्यञ्च तत्क्षणात् ॥ ॥ ४ ॥ ब्राह्मण वाच ।। वागताभुवनात्सिद्धावस्थानेचै- वगम्यते ।। सर्वकथयवृत्तांतंत्राह्मणाग्रेमहातपः ॥५॥ साधक उवाच ॥ ॥ आगतामृत्युलोकाच गंतव्यं शंकसलये ॥ एतन्म- तं द्विजश्रेष्ट प्रसादेन हरस्य च ॥ ६॥ ब्राह्मण उवाच ।। ।। नैवदृष्टो महासिद्धारुद्रस्त्रिभुवनेश्वरः ॥ स्वर्ग मत्र्ये च पाताले नामितोहिदिशोदश ॥ ७॥ दिव्यवर्पसहस्राणि नेव दृष्टो महामुने ।। मयानिरीक्षतासिद्धा कनिष्टात्प्राप्यतेजरा ॥ ८ ॥ कुतस्वंगच्छसे सिद्धमागच्छकुरुभापितम् ॥ रुद्रस्य दर्शनं कुत्र आगे चलकर क्या देखतहैं कि दूसरा वैप धारण किये वृद्ध ब्राह्मण जिसका शरीर ननरी भूत या देखा ॥ १ ॥ जो कुरूष यौवन रहित था. नौर अतितीग तुन, हीन, कुबडा, दीन, मंदसे भी मंद, रोगीया ॥ २ ॥ दसकी काया क्षीण और हाय कांपते और मंदत्वर (धीमी वाणी ) से बोलता, क्षुधा तृप्यासे व्या- कुल ॥ ३ ॥ केवल हड्डी शेपयो, भूख प्याससे व्याकुल ऐसा इट्टा बाह्मण दम्बा उस समय ॥ २॥ प्राह्मग बाला हे मिद्दो ! कौन स्यानते बारहो और किस स्थानको जातेहो हे महातप ! सो मुझ ब्राह्मणके आगे सब वृत्तान्त कहीं ॥५॥ साधक बोले, हम मृत्युलोकसे आए और शंकरके स्थानको जाते हैं, हे विनश्रेष्ठः इतना संमत है ॥ ६ ॥ ब्राह्मण वाला हे महासिद्धो ! तीनों लोकोंके स्वामी रुद्धको हमने नहीं देखा, स्वर्गलोक, मृत्युलोक और पाताललारने दशौ दिशा- औपर भ्रमण किया ॥७॥ दिव्य सहसवर्ष मैंने देखा वाल्य अवस्था बूटा होगया परन्तु शिवको नहीं देखा ॥ ८ ॥ अब तुम कहां जातही ? मत जानो, (१०६) केदारकल्प। देवानामपिदुर्लभम् ॥ ९ ॥ आचार्य उवाच ॥ ॥ यच्च त्वयोदि- तं विन हृदये नैव रुच्यते ॥अवश्यं तत्र गंतव्यं यत्र देवो महेश्वरः ॥ १० ॥ब्राह्मण उवाच ॥ कत्र स्थाने वसेद्रः किं , रूपं कीदृशं फलम्।।कथंकायो महादेवः किंफलं किं प्रयोजनम्॥ ॥ ११॥ आचार्य उवाच ॥ ॥ दुर्लभःसर्वसंसारे दुर्लभ्यो हीतरे- जनः ॥ दुर्लभः सर्वभूतानां संसरतामति दुर्लभः।।१२॥कस्य चैव समो रुद्रः केन रूपेण दृश्यते ॥ कथं कायो महादेवः कथं वाच्यः स शकरः ॥१३॥ ब्रूहि तन्मे महावीर किं करिष्यति शंकरः ।। रुद्रस्य दर्शनं दृष्ट्वा कथयामि शृणुष्व तत् ।। १४॥ सिद्ध- उवाच ॥ ॥शृणु विप्रेन्द्र यद्रूपं कथयामि यथाश्रुतम् ॥ नील- कंठं बृपारूढं शूलपाणि महाबलम् ॥ १५॥ त्रिनेत्रं च दशभुजं चंद्राकृतशेखरम्।। भस्मना धूलितं गात्रं मूर्यकोटिसमप्रभम् ॥ ॥ १६॥ कर्पूरगौरं शिरसा जटामुकुटभूपणम् ॥ देवदेवं जग नाथं भक्तानामभयप्रदम् ॥ १७ ॥ एवमुक्ते साधकेन रुद्रो वै रुद (शिव) का दर्शन देवताओंको भी दुर्लभ है ॥ ९ ॥ आचार्य बोले हे ब्राह्मण ! जो तुमने कहा सो हृदयमें नही रुचता, हमको अवश्य वहां जाना है, जहाँपर साक्षात् महेश्वर विराजते हैं ॥ १० ॥ ब्राह्मण बोला कि शिवजी किस स्थानमें रहते हैं उनका कैसा रूप है क्या फल है क्या कार्य है क्या प्रयो- जन है ॥ ११ ॥ आचार्य बोले जो संपूर्ण संसारमें दुर्लभ है और तदितर जनामें तथा सब प्राणियों में दुर्लभ है ॥ १२ ॥ और रुद्र किसके समान है और किस रूपसे दोसता है ? क्यों महादेव है और क्यों शंकर है ? ॥ १३ ॥ हे महावीर ! शंकर क्या करेंगे सो हमसे कहो, हम रुद्रक दर्शनको तुमसे मुनाना चाहते हैं ॥ १४॥ सिद्ध बोल हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! मुनो जो रुद्धका रूप मैंने सुना हैसो पाहता हूं नीलकंद हैं साक्षात् नंदिपेपर चढ़े त्रिशूल हायमें लिये हैं ॥ १५ ॥ तीन नेत्र दश भना आधा चंद्रमा माथेपर विराजता है, भस्मसे सारा शरीर लिप्त है, पारि सूफि समान न्ति है ॥ १६॥ कर्पूरके समान गौरवर्ण सिरपर जटा रक्स सकट धारे पसे देवताओंफ तया जगतक स्वामी और भनोंको अभय देने- याले है ।। १७ ॥ ऐसा साधककै कहनेपर शिवने उस समय दर्शन दिया और भापाटीकासमंत-प०२४. (१०७) दर्शनं ददौ ॥ विप्ररूपविनाशेन साक्षादेवो महेश्वरः ॥१८॥ रुद्रस्य दर्शनं कृत्वा सर्वाभरणभूषितः॥ दिव्यदेहो महाकायो दिव्यगंधानुलेपनः ॥ १९ ॥ जटामुकुटधारी च चंद्रार्धकृत- शेखरः ॥ दिव्यज्योतिर्महामूतिर्महारूपो महाप्रभुः ॥२०॥ नीलकंठो वृपारूढः शूलपाणिः पिनाकधृक् ।। सर्वलक्षणसंपूर्णी वालार्कस्य समप्रभः ॥ २३ ॥ दशवास्त्रिनयन उमासहित- शंकरः।। प्रत्यक्ष दर्शनं लब्ध्वा साधका प्रवदंति च ॥ २२॥ नमस्कृत्य ततो देवं पिनाकिवृषभध्वजम् ॥ दंडवच्च प्रणम्याथ पततो धरणीतले ॥ २३ ॥ कृतांजलिपुटो भूत्वा प्रणम्याति, पुनः पुनः ।। अब मे सफलं जन्म ह्यद्य मे सफलं तपः ॥ ॥२४॥अद्य मे सफलं जाप्यमद्य मे सफलाः क्रियाः ॥ अब मे सफलः पंथा अद्य मे सफलार्चनम् ॥२५॥अद्य मे सफलं कर्म मया दृष्टः सदाशिवः ॥ नमस्यं चरणं पूज्यं दृष्टः संभा- पितः शिवः॥ २६ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ ॥ वरं ब्रूहि महा- .. उस वृद्ध ब्राहाणका रूप दूर कर साक्षात् महेश्वर देव होगए ॥ १८ ॥ रुद्रका दर्शन किया जो सब आभूषण धारे दिव्यं देह महाकाय सुन्दर गंध लेपन किये थे॥ १९ ॥ जटा और मुकुट धारे मस्तकपर आधा चन्द्रमा अवलम्बन किये जो दिव्य तेज और बड़ी मूर्तिवाले सुन्दर रूपवाले थे ॥२०॥ नीले कंठवाल वृपं (बैल) पर चढ़े त्रिशूल हायमें लिये पिनाक ' धनुष ) को धारण किये सब लक्षणोंसे शोभायमान उदय हुए सूर्यके समान कान्तिमान् ॥ २१ ॥ दश भुजा और तीन नेत्रवाले पार्वतीसहित शिवने साधकोंको दर्शन दिया तब साधक परस्पर बोले ॥ २२ ॥ और वे सब वृपभध्वज साक्षात् शिवको नमस्कार करके भूमिपर गिरे और साष्टांग दंडवत की ॥ २३॥ और हाय जोड वारंवार नम- स्कार किया और कहा आज हमारा जन्म सफल हुआ, और आजही तप सफल हुआ॥ २४ ॥ तथा आज हमारा जप, क्रिया, पंथ, अर्चन, सब सफल हुया ॥ २५ ॥ तया आज हमारा कर्म सफल हुआ सदाशिवके दर्शन करके, चरणोंको पूनते हुये और दंडवत करते हुये उनको देखकर शिवनी बोले ॥ २६ ॥ हे
११०८)
केदारकल्प।
सिद्ध साधकैः परिवेष्टित ॥ तव तुष्टो महादेवो महावीरो महा-
तपाः॥२७॥ साधक उवाच ॥ ॥ यदि तुष्टो महादेव उमा-
युक्तस्त्रिलोचनः । गर्भवासं न पश्यामि तादृशं कुरु मां प्रभो ॥
॥२८॥ कस्मिन्काले तु संप्राप्ते मृत्युलोके न याम्यहम् ॥ गृही
त्ता गम्यते तत्र शिवकल्पं महापथे।।२९ ॥ तव मार्गेण गं.
तव्य रुद्रदेव महेश्वर ॥ एवं देहि वरं देव यदि तुष्टोऽसि शंकर
॥३० ॥ एतादृशं वरं लब्ध्वा चित्ते ते ह्यतिहर्पिताः ॥ हष्ट-
पुष्टमनाः सिद्धाः प्रणमति महेश्वरम् ॥३३॥ स्तुति कय्युस्त-
तः सव प्रणमंति मुहुर्मुहुः ॥ साधकानां वरं दत्त्वा शिवलोकंगतो
हरः ॥ ३२ ॥ क्षणमेकं च तिष्टंति साचार्याः साधकाः पुनः।।
तत्र ते साधकास्तत्र गताश्चैवोत्तरामुखाः ॥ ३३॥
इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेय-
संवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे
शिवदर्शने सदेहकेलासगमने वृद्धवाह्मणरूपेण रुद्रदर्श-
नवरप्रदानं नाम चतुर्विशः पटलः ॥२४॥
सायको ! हे आचार्यों!!! वरदान मांगी हे महातप! तुमसे हम साक्षात् शिव
अमन हुए ॥ २७ ॥ साधक बोले हे महाहेव ! है त्रिलोचन ! यदि आप पार्व-
तौर सहित प्रसन्न है तो हे प्रभो ! हम गर्भके पासको फिर न देसे ऐसा करो
॥ २८॥ और किसी समय हम मृत्युलोफको नहीं प्राप्त हो और शिप फल्पको
ग्रहण पर महापंथयो जावें ॥ २९ ॥ हे महेश्वर ! तुम्हारे मार्गसे रुद्रदेवको जावें
ऐमा पर दयो यदि प्रसन्न हो तो ॥ ३० ॥ इस प्रकार घरको पाकर उनके चित्तमें
वटा हप हुआ और हष्टपुष्ट मन होफर महेनरको प्रणाम करने लगे ॥ ३१ ॥
और सब पापार स्तति परने लगे तब शिव टन साधकोंको घर देकर शिपलो.
की मिपार ।। ३२ ॥ क्षणमात्र आचार्य सापकों सहित स्थित हुए फिर आगे
रागी ओर चले ॥३३॥
दी भोरदार चिनी मापटीपार्या पाश: पर: ॥ २४ ॥
भापाटीकासमेत-प० २५, (१०९) पंचविंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ।। ॥ ॐ अग्रतो दृश्यते तत्र चेन्द्रराजो महा- नृपः॥ कृत्वा वै सिंहरूपं च महारौद्रो भयंकरः॥१॥ पर्वत- स्थदरीवको गिरिशृङ्गशिरास्तथा॥ तस्य शूरनिनादश्च यथा मे- घस्य गर्जितः ॥२॥ भूमिश्च स्फोटते क्रोधात्कंपते भुवनत्रयम् ॥ एवं दृष्ट्वा महासिंह तीक्ष्णदंष्ट्राभयानकम् ॥ ३ ॥ वईते च ततः सिंहो नखलांगूलवेगतः ॥ जिह्वा चातिचलादिव्या वईते च पुनःपुनः॥ ४ ॥ ततो दृष्ट्वा महासेन वने सिंहं भयंकरम् ॥ दृष्ट्वा सिहं महारूपं तीक्ष्णदंष्ट्र महाबलम् ॥५॥ साधकाश्च ध्वनि श्रुत्वा वर्द्धमानं पुनःपुनः ।। सिंहं दृष्ट्वा महाप्रौढं साधका विस्मयं गताः॥६॥ भयभीतास्ततः सिंहादात्मनः शोचयंति हि ॥ अघोरणव मंत्रेण सर्वविघ्नः क्षयं गतः ॥७॥ अथ मंत्रः॥ हुँ फट् स्वाहा ॥ सिंह उवाच ॥ भुवनात्कुत आयाताः क- स्थाने चैव गच्छथ ॥ सत्यं ब्रूत ममाग्रे हि यदि कल्याण- शिवजी बोले, जब वहांसे आगे चले तब इन्द्रमहाराज जो बड़े भयंकर । सिंहके रूपको धारण किये हुए दीख पडे ॥ १॥ जिनका मुख पर्वतकी गुफाकी सहश ऊंचा पर्वत शिखरके सदृश था,और शब्द मेघ गर्जनेको समान था ॥२॥ क्रोधसे भूमिको खोदता हुआ जिससे तीनों लोक कम्पायमान होते थे इस प्रकार तीक्ष्ण दांतोंवाले भयानक सिंहको देखा ॥ ३॥ तब वह सिंह नख और पूंछके वेगसे बढ़ने लगा और उसकी जिह्वा विजलीकी समान चपल थी॥ ४ ॥ हे महासेन ! वनमें ऐसे महासिंहको देखकर जो भयंकर रूप और बडा बली या तथा जिसकी डा. बडी तीक्ष्ण थीं ॥ ५ ॥ साधकगण उसकी ध्वनिको सुन और क्षण क्षणमें वृद्धि होती देख तथा विलक्षण रूपको देखकर विस्मयको प्राप्त हुए ॥ ६॥ सिंहके भयसे व्याकुल होकर मनमें चिन्ता करनेलग, तब अधोरमंत्र के जपनेसे सब विन नष्ट हुए ॥ ७ ॥ 30 हुं फट् स्वाहा यह मंत्रहै, तब सिंह बोला हे सिद्धो ! कहाँसे आयेहो और कहाँको जातहो सो मेरे आगे सत्य २ कहो यदि (१९०) केदारकल्प। मिच्छथा॥८॥सिद्ध उवाच||आगता मृत्युलोकाच गंतव्यं शंकरा- लये॥ एवं नो हि मतं सिंह तत्रेच्छा पारमेश्वरी॥९॥सिंह उवाच।। आयान्तु साधकाः सर्वे वांछामि वश्च दर्शनम् ॥ आगंतव्यं समीपे च पातव्यं रुधिरं हि वः ॥ १० ॥ कुतो गच्छेत यूयं हि मम दृष्यावलोकिताः ॥ तृप्तं करोमि आत्मानं मांसेन रुधि- रेण च ॥ ११॥ सिंहरूपं समाश्रित्य यत्र तिष्ठामि वै सदा ।। नैव गच्छंति ते स्वर्गे स्वयं देहेन मानवाः ॥ १२ ॥ आचार्य- साधकाः सर्वे मा गच्छत शिवालये ॥ यदि गच्छथ चेत्सिद्धाः स्वयं देहेन जीवता॥ १३ ॥ पण्मासाभ्यंतरे सिद्धा भोजनं न कृतं मया ॥ मया दैवाच्च भोक्तव्यं मांसं वो साधका ध्रुवम् ।। ॥ १४ ॥ जीवंतो नैव पश्यंति उमया सहितं हरम् ॥ महापथे महाघोरं जपंतश्च शनैः शनैः ॥१९॥ आगता दिव्यमार्गेण दृष्ट्या सिंहं भयंकरम् ॥ आकागार्जितंघोरंशब्दत्रैलोक्यव्यापिनम् ॥ ॥ १६ ॥ आचार्यमूचिरे सिद्धाः सिंहवासेन व्याकलाः ॥ अपने कल्याणकी इच्छा करतेहो ॥ ८ ॥ सिद्ध वाले हम मृत्युलोकसे आये और शिवकै स्थानको जाते है सिंह ! यह हमारी इच्छाहै इस विषयमें शिवनी भमान, ॥९॥ सिंह बोला हे साधकी, तुम सब मेरे निकट आओ मैं तुम्हारा रुधिर पान फलंगा ॥ १० ॥ तुम मेरी दृष्टिक सामनेसे कहां जासकते हो,तुम्हारे मांस और रधिग्स अपनी आत्माकी तृप्ति फरंगा ॥ ११ ॥ मैं यहां सिंहकारुप धारण किये मदैव निवास करताहूं जिससे मनुष्य संदेह स्वर्गको न जाय ॥१२॥ तुम सब साधक आचार्य शंकरपं. लोकको मतगाओ, यदि तुम जाओगे तो देह नहीं रदगा ॥ १३ ॥ हे माधी ! है: महीने में मैंने भोजन नहीं किया, इस कारण नुम्टोर मांसपा अयश्य भागन फरंगा ॥ १४॥ जीते मनुप्प पार्वतीसहित शिय- पोनही दयामयते, यह गुनफर ये साधर धीरे २ महापंयको नाने और अपार गंगा नपनेटगे ॥१५॥ दिप्यमार्गम माप्त हो उस भयंफर सिंहको दंग, निमः भयंकर गर्जनासन्द तीनॉस्लीकॉमप्यान हुआ या॥१६॥आचापंगण सिंहकभपसे THEREचना ।
भाषाटीकासमत-प० २५. आचार्यों वदते तांश्च सिंहानैव भयं मम ॥ १७ ॥ अघोरस्तु- महामंत्रो घोरो देवदुर्लभः॥ भीतैश्च जपितो मंत्रः सर्ववास- क्षयंकरः ॥ १८ ॥ अथ मंत्रः ॥ ॐ श्रीश्रीश्रीश्रीं ॐ हुँ फटू स्वाहा ॥ अघोरंश्च महामत्रः सर्वविघ्नविनाशनः ॥ अघोराय नमस्तस्मै दुर्लभो भुवनत्रये ॥ १९॥ अघोराय नमस्तुभ्यं अघोराय च ते नमः ॥ अघोरः सर्वसिद्ध्यर्थ शिवेन निर्मितः पुरा।। २० ।। अघोरं जपमानश्च पिनाक्येवाभिजायते ।। मृत्ति- रूपो भवेद्रुद्रः सर्वालंकारभूपितः ॥ २१ ॥ सिंहरूपं परित्यज्य प्रत्यक्षोऽसौ बभूव च ॥ गजारूढः सहस्राक्षो वज्रायुधसुशोभितः ॥२२॥ इन्द्र उवाच ॥ धन्याधन्या महासिद्धा एकचित्ते व्य- वस्थिताः ॥ आगता मृत्युलोकाच गंतव्यं शंकरालये ॥२३॥ अहं तुष्टो महासिद्धा वरं वृणुत सुव्रताः॥ तत्सर्वं च प्रदास्यामि येन श्रेयो ह्यवाप्स्यथ ॥ २४ ॥ आचार्य उवाच ॥ यदि तुष्टोऽसि मे देव शकराज सरोत्तम ॥ महापथे च यत्किचिद्विघ्नं माभूत्क- व्याकुलहुए साधकोंसे बोले,हमको सिंहसे कुछ भय नहींहै ॥१७॥डराहुआ मनुष्य देवताओंको दुर्लभ अघोरमंत्रका जप करै तो उसके सब भय दूर होजातै सोजप कर सब दुःख दूर करो॥१८॥श्री श्रीं श्रीं श्रीं ॐ हुं फट् स्वाहा यह मंत्रहै,यह अघोर महामंत्र सबविनोंका नाशकहै,इस अवोरमंत्रको नमस्कारहै॥१९॥यह मंत्र सब सि- छियोंके अर्थ पूर्वकालम स्वयं शिवजीने बनाया था॥२०॥इस अपारमंत्रको जपकर शिवके तुल्य होजाताहै, साधकोंने ज्याही मंत्र जपा कि वह सिंह सब अलंकारसे भूपित इन्द्रकी मूर्ति धारण करताहुआ ॥ २१॥ और टस सिंहके स्वरूपको त्या- गन करके साधकाके प्रत्यक्ष हुआ, और हाथीपर चढे वत्र शस्त्र धारण किए, इन्द्र शोभित हुआ ॥ २२ ॥ इन्द्र वाला हे सिद्धो ! धन्यहै. आप सब लोग एकान- चित्त हो मृत्युलोकसे आये तया शिवलोकको जाओगे ॥ २३ ॥ हे साधको! मैं प्रसन्न हुआ आप लोग जो वर मांगोगे उसको मैं प्रदान करूंगा कि जिससे कल्या- 'णकै प्राप्त होंगे ॥२४॥ आचार्यबोले हे राजा इन्द्र ! यदि आप मसनहैं तो हम - (११२) केदारकल्प । दाचन ॥ २५॥ यत्र स्थान सुराः सर्वे ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ तत्र स्थाने महाराज न भयं मार्गयायिनाम् ॥ २६॥ महापथेन गंतव्यं न विकल्पो भवेत्ततः ॥ तत्र विघ्नं न पश्यामः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ २७ ॥ साधकेभ्यो वरं प्रार्थ्यमिन्द्रो रात्वा गत- स्तदा ॥ तत्पश्चात्साधकैः सर्वैगंतव्यमुत्तरादिशम् ॥ २८ ॥ इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीखरकार्तिकेयसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवनमुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शनेसदहकैलासगमने सिंहरूपेन्द्रराजदर्शनसा- धकवरप्रदानं नाम पंचविंशः पटलः॥२५॥ यह वरदान मांगतेहैं कि महामार्गमें जाते हुए हमको कोई विन न हो ॥२५॥ निसस्थान में ब्रह्मा विष्णु शिव आदि सब देवता हैं वहां जानेसे किसीप्रकारका भय नहीं ॥ २६ ॥ महापंथमें विन और विकलता नहीं, यह हम सत्य २ कहतेहैं ॥ २७ ॥ तर साधकोंको वरप्रदान करके राजा इन्द्र अन्तर्धान हुए, और फिर साधक आगेकी ओर चले ॥२८॥ इति श्रीकेदारकल्ये भापाटीकाया साधकतरप्रदानं नाम पंचविंशः पटलः॥ २५ ॥ पड्दिशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॐ अग्रतश्चमहासेनदृश्यते च महापुरी ।। साधकाश्च गतास्तत्र दृष्ट्वा च विस्मयंगताः ॥ १॥ हेमशृंगे महारम्ये नानारत्नविभूपिते ॥ अग्नितेजःसमरूपचंद्रादित्यसम- प्रभम् ॥ २ ॥ चंवेगातटेचैवपुरीरुद्रेणनिर्मिता॥ स्थिता- कलासस्वच्छांशेमहागिरिवरोत्तमे ॥ ३ ॥ शतयोजनविस्ती- है महामन ! इसके आगे एफ बडी नगरी दीखपड़ी यहाँ साधकलोग जाफर पिस्मयी मात दुप ॥ १ ॥ सुवर्णके शिसर बडे शोभायमान और अनेक प्रकार- दरबनटित अंपिक समान देदीप्यमान तथा चन्द्रमा और सर्यये समान या. न्तियाल ॥२॥ यह पुरी चन्द्रपेगानदी पिनार साक्षात शिवने निर्माण पी है, पेटामयंत शिवरपर स्थितहै ॥ ३ ॥ जो सो पोनन विस्तारयाली और 0 भाषाटीकासमेत-प० २६. ( १९३) णारत्नकांचनशोभिता ॥ प्रत्यक्ष्यंतत्रदृश्यतेज्वलितौशशिभा- स्करौ ॥ ४ ॥ इन्द्रनीलमयं रम्यं चंद्रकांतोपशोभितम् ॥ हैमेनरचिताभूमौरुद्रप्राकारतोरणम् ॥५॥ जलमध्येचशोभ- तेनक्षत्राणिचतारकाः ॥ एतस्मिश्चगृहेरम्येवहुगंधादिवासिते ॥ ॥६॥ चंपिकास्तत्र तिष्टति कन्याकोटिसमावृताः ।। कोकिला स्वरनादेननागवल्लीविभूपिताः॥७॥ नानापुष्पसमाकीर्णा बहु गंधादिशोभिताः ॥ भेरीमृदंगशब्देन शंखवीणास्वनेनत्र ॥ ॥८॥ वेणुतालश्च वाद्यंते पट्टहं तत्र नादितम् ॥ ब्राह्मणा वेद निघपैःसर्वशास्त्रविशारदाः।।९॥विदग्धास्वरभेदैश्वगायति क्रीड- यति चाकुंकुमैदिव्यगन्धैश्चदिव्यवस्त्रपरिच्छदाः॥१०॥हारकंकण केयूरनपुरैश्च ह्यलंकृताः॥ पद्मपत्रविशालाक्ष्योरूपयौवनगर्विताः ॥ ११॥ उद्गिरांति च ताम्बूलंकरण समन्वितम् ॥केशैभ्रमर संकासविह्वलागजगामिनी ॥ १२ ॥ प्रोत्फुल्लापद्मवदनाविवोष्ठी रत्ननटित सुवर्णसे शोभित और साक्षात् सुर्य चन्द्रमाके समान प्रकाशित दोखती ॥ ४ ॥ इन्द्रनील तथा चन्द्रकान्तमणियोंसे शोभायमान तथा सुवर्णकी भूमि और शिवकेद्वारा प्रकार और तोरनोंसे निर्माण हुईहै ॥ ५॥ उस नदीके जलके मध्यमें नक्षत्र तारागण शोभायमान होरहेथे और वहाँफे घर सुगन्धित पदायोंसे मुगन्धित थे॥६॥ तहां कोटिकन्याओंके सहित चंपिका स्थित थीं, जिनका नाद कोयलके स्वरकेसमान था, और नागवेल, (पान ) से भूपित थी ॥ ७ ॥ नानाप्रकारके फूलोसे सुगन्धित अनेक प्रकारके गन्धोंसे लिप्त और भेरी मृदंग वीणा शब्द ॥ ८ ॥ तथा वेणुताल पटह आदि वाजोंसे गुंजारित, और वेद पारंगत ब्राह्मणाद्वारा वेदोंकी ध्वनिसे शब्दायमान होरहाया ॥९॥ कहीं चतुर देवांगना अनेक स्वरभेदोंसे गातीहुई क्रीडा करतोहैं, कंकम चन्दनादि सुन्दर गं- घोंसे तथा दिव्यवस्त्रोंसे वेष्टित ॥ १० ॥ हार, कंकण, वाजूबंद, पायजेव. बिछु एको धारण किये. कमलके समान विशालनेवाली रूप और यौवनस गर्वितहैं ।। ॥ ११ ॥ कपूरसहित ताम्बूलको भक्षणकिये भौंरोके समान केशवाली हाथोकी समान गतिवाली ।। १२ ॥ कमलके सदृश खिले हुए मुख फन्दूरीके समान है (१९४) केदारकल्प। कोकिलस्वराः ॥ मृदुकोमलदेहाश्चदिव्यगंधानुलेपनाः॥ १३॥ मुष्टिग्राह्यसुमध्या च करिकंभोवतस्तनी ॥ अशाकपल्लवी हस्ती नातिहस्तौ न लंवतौ ॥ १४॥ दृष्ट्वा च तद्विधाःकन्याःसाधका विस्मयं गताः ॥ स्वागतं स्वागतं सिद्धाः कन्यास्तत्रादति च॥ ॥१५॥ कन्यका ऊचुः॥॥ वदाचार्यश्च सर्व मे विस्तरेण महा तपः ॥ कभुवनागतासिद्धाः क्वस्थाने चैवगम्यते ॥१६॥ सिद्ध उवाच ॥ शृणु सुन्दरि यत्नेन एवं वदति साधकः॥ आ- गतामृत्युलोकाच गंतव्यं शंकरालये ॥ १७ ॥ कन्यकाउचुः॥, चंपिकातिष्ठते तत्र कन्याकोटिसमावृता॥ चंपिकातिष्ठतेतत्र पुष्प दर्शनकारणम् ॥३८॥ चंपिकातिष्ठते तत्र चंपिका अतिहर्पिता ॥ अस्मिन्नेवपुरेरम्ये नानाभोग समाकले ॥ १९ ॥ तिष्ठति साधकाः सर्वे भुजन्तु विपुलां श्रियम् ॥ साधकाश्चपिका दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २० ॥ चंपिकोवाच ॥ कागता भुवनासिद्धा क्वस्थाने चैवगम्यते ॥ एतद्रूहि महाचार्य दोनों होंठ, कोपलके समान स्वरवाली अतिकोमल देहकी सुन्दर सुगन्ध लगाये ॥ १३ ।। अतिसूक्ष्म मुट्ठीमें आनेयोग्य मध्यस्थान (कमर) पाली, और हाथीके कुंभस्थल के समान स्तनवाली, तथा अशोक वृक्षके पत्तोंफी समान लाल हाथोंकी बद्भुत पडी न छोटी ॥ १४ ॥ साधक लोग इस प्रकारकी कन्याओंफो देख बड़ विस्मपको प्राप्त हुए । हे सिद्धी ! शुभागमन हो इसप्रकार स्वागत फरफे कन्या वाली ॥ १५ ॥ हे महातप आचार्यों! आप अपना वृत्तान्त विस्तारसे कहो फि यांस आप और यहाँको जातेहो ॥ १६ ॥ सिद्ध पोले हे सुन्दरि ! मनो, हम मृयुलारसे आप है और शंकरके लोकफो जाते हैं ॥ १७ ॥ फन्या चोली यहाँ चा अनेक फन्याजों सहित निवास करती हैं ॥ १८ ॥ अनेक प्रकारफे मांगों महित इग मनोहर नगरमें चम्बा अति प्रसन्न हुई है ॥ १९ ॥ हे साधको! त्रार दाग पदापर नियाम परो और अधिक भागोंको भौगो, हे सापकगणी ! पम्पा दाफर मप पापोंसे एटते हैं ॥ २० ॥ चम्पिका बाली साधपों! पहम जापान पिस म्यानको गाओगे ? ६ आनापी ! यह सप में सन्मुख भापारीकासमेत-प० २६. (११५) ममाग्रेत्वमशेपतः ॥ २१ ॥ साधक उवाचे ॥ ॥ चंपिका वचनं सत्यं कथयामि च तच्छृणु । आगता मृत्युलोका च गं- तव्यं शंकरालये ॥२२॥ चंपिकोवाच ॥ तिष्ठतिष्ठ महा- चार्य भुक्त्वाभोगसमाकुलाम् ॥ एवमुक्त्वा ततः कन्या साधको वाक्यमत्रवीत् ।। २३॥ साधक उवाच ॥ ।। किमत्रभोगमा युप्यं पुनःस्थानं क लभ्यते ॥ एतत्सर्व समासेन ममाग्रे शीघ्रमु- च्यताम् ॥ २४ ॥ चंपिकोवाच ॥ ॥ कन्याशतसहस्राणि दीयते च पृथक्पृथक् ॥ कोटिव च ह्यायुष्यं महाभोगसम- न्वितम् ॥ २५ ।। आचार्य मन्दिरे भोगान्देवानामपि दुर्ल- भान ॥ आचार्य उवाच ॥ ॥ चंपिके वचनं सत्यं तव शब्देच्छ- याशृणु ॥ २६ ॥ सर्वैर्मया प्रतिज्ञा च गंतव्यं शंकरालये । कि कन्याया च कथ्यते ह्येकचित्ते व्यवस्थितम् ॥ २७ ॥ किंचि- त्मात्रा प्रतिष्ठंति कितुसंख्या च पातने ॥ चंपिकोवाच ॥ अस्मिन्नेवपुरे रम्ये बहुकन्यासमाकुले ॥२८॥ तिष्टतिष्ठमहा निवेदन करो ॥ २१ ॥ साधक बोले हे चपिके ! तुमसे हम संन्य वचन कहत हैं सुनो, मृत्युलोकसे आते हैं और शिवलोकको जाते हैं ॥ २२ ॥ चंपिका बोली हे महाचार्यों ! इस स्थानपर ठहरो और भौगोंको अनुभव करो,ऐसा कन्याओंक कहनेपर साधकोंने उत्तर दिया ॥ २३ ॥ साधक बोले । इस स्थानपर कितनी आयु और क्या २ भोग हैं फिर कौनसा स्थान प्राप्त होता है, हे देवि ! सब शीन हमारे आगे संक्षेपसे कहो ॥ २४ ॥ चम्पिका बोली शतसहस्र कन्या पृथक २ दी जायगी, और करोड वर्षकी अवस्था, सम्पूर्ण भोग आनन्दके सहित भोगोंगे ॥ २५ ॥ हे आचार्यों ! इस मंदिरमें जो भोग हैं सो देवताओंको भी दुर्लभ हैं, आचार्य बोले हे चंपिके ! तुम्हारा वचन सत्य है, अब हमारा वचन मुनो ॥ २६ ॥ हमारी यह प्रतिज्ञा है कि शिवलोकको जायगे, हम एकाग्रचित्त वालोंको यह कन्याओंके वचन नहीं रुचते ।। २७ । कारण कि कुछ कालतक यहां रहकर फिर भी तो पतनका भय है, चम्पिका वोलो हे महासिद्धो ! अनेक कन्याओंसे व्याप्त इस नगरमें ॥ २८ ॥ निवास करो विपुल भोगोंको भौगो इस केदारकल्प। सिद्धाभुजंतुविपुलांश्रियम्।।अस्मिन्नेवपुरेभोगाभोक्तव्याः साधकः सह ॥ २९ ॥ सर्वदेव समंसिद्धोभुंजतु विपुलांश्रियम् ॥ पश्चा- चमृत्युलोके वै जायते सर्वसंपदः ॥ ३०॥ साधक उवाच ।। किमर्थं चैवतिष्टामिया गतासत्वयातने ॥ स्थापिता च पुरादि- व्या कन्यासहविनिर्मिताः ॥३१॥ चंपिकोवाच ॥ ॥ तच्छु त्वा वचनं तेपां गच्छाचार्य यथासुखम् । अस्मिन्स्थानेन रुच्यं ते यत्रेच्छा तत्र गम्यताम् ॥ ३२॥ मयात्वं पृच्छताचार्यका- मिनो मदविह्वलाः॥आराधिता मया पूर्वैःकामांधामदविह्वलाः ॥ ३३ ॥ दिव्य वर्षसहस्राणि तत्र तुष्टो महेश्वरः ॥ महापथेनते सिद्धागच्छंते च सुमध्यतः ॥ ३४ ॥ त्वयापादप्रसादेन गृहमकं च चंपिकाः ॥ गृहीत्वा चंपिकामेकं प्रस्थितापंचमुत्तमम् ॥ ॥३५ ।। साधकस्तिष्टते तत्र तस्य चित्ते समुद्भवेत् ॥ साधक उवाच ॥ ॥ब्रूहि मे चंपिका सत्यं किंत्वयासुकृतं कृतम् ॥३६॥ एवंतु दिव्य लोकेस्मिनुत्पन्नाकामयौवना ॥ गृहत्विा साधका कन्यातावत् दृष्ट्वा च व्याकुलम् ॥३७॥ साधक उवाच रम्प नगरमें ठहरो ॥ २९ ॥ सब देवताओं के समान आनन्दको प्राप्त करो. तत्पश्चात् मृत्युलोकमें सब सम्पत्तियों सहित जन्म होगा ।। ३० ॥ साधक चोल- हम किस निमित्त दुःख यातनाओंमें ठहरें, पहलेही अनेकों कन्या उपस्थित थीं ॥ ३१ ॥ चंपिका बोली अच्छा तो आप मुखपूर्वक गमन करें इस स्थानमें न रहनेकी रुचि है तो जहाँ इच्छाहो वहां जाओ ॥ ३२ ॥ हे आचार्य ! प्रथम मदमें कामान्धहो हमने प्रार्थना की थी कारण कि पहले भी हमने ऐसोंका सेवन किया है ।। ३३ ॥ सहस्त्र वर्षों में शिवजी प्रसन्न होते हैं, हे सिद्धो ! मटायसे जो गमन करते हैं उनपर शंकर प्रसन्न होते हैं ऐसाही हमने किया था ॥ ३४ ॥ आपके चरणोंकी कृपासे हमारे गृहमें जो चंपा है उस एकको ग्रहण करके प्रस्थान कीजिये ॥ ३५ ॥ साधक वहां गये । और अपने चित्तमें प्रसन्न हो सा- धफ बोले हे चंपे ! सत्य २ कह तूने क्या पुण्य किया ॥ ३६ ॥ जो इस दिव्य लोकमें मुन्दर यौवनयती उत्पन्न हुई साधक उस कन्याको गृहण करके और देखके व्याकुल हुए ॥ ३७॥ साधक वोले यहां क्या पुण्य और क्या फल तथा ॥
भापाटीकासमेत-प० २६. (११७) कस्थानं कश्चलोकश्च किं पुण्यं फलमाप्यते ॥ वतीर्थ च प्रसा- देन किं गृह्णति च साधकाः॥३८॥ चंपिकोवाच ॥ ॥ केदा रनामक्षेत्रस्य तत्र मंदाकिनीनदी॥ केशेहपिकानामलोके यदि परमांगतिः॥३९ ॥ लोकेशजपनं कृत्वा भक्तिभावसमन्वि- तम् ।। नाचेप्टाका गताज्ञाताः साधकाः सहसास्थिताः॥४०॥ तस्यतीर्थप्रसादेनशिवसोपानमास्थितः ।। अप्सरसो मया प्राप्ताः पूर्वकामसमन्विताः ॥ ४१ ॥ सर्वदेवसमोपेता राज्यं प्राप्त मयात्विदम् ॥ महारुद्रप्रसादेन महापंथप्रदायकम् ॥ ४२ ॥ केदारस्यैव पथि च येमृताहैमपूर्णिताः॥ शूलहस्ताः शिवसमा- मुंजति विपुलांश्रियम् ॥ ४३ ॥ एवं तन्मेऽर्चनं सिद्धा गृहंति झेकसाधकाः॥ तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा ह्याचार्यः साधकैः सह ।। ॥४४॥ साधक उवाच ॥ ॥ शृणु कामिनि तत्त्वेन कस्ते धर्मः प्रकाशितः॥महापथं गता नैव तिष्ठस्यत्र तपस्विनी ॥४॥ चंपिकोवाच ॥ ॥ शृणुध्वं साधकाः सर्वे मम वाक्यं तु निश्चि- . आगेको कौनसा स्थान मिलता है और किस तीर्थके प्रसादसे साधकोंको यह सब मिलता है ? ॥ ३८ ॥ चम्पिका बोली केदारक्षेत्रके समीप मंदाकिनी नाम नदी है, केशरजूपिका नामवाली परमगति प्रदान करती है ॥ ३९ ॥ वहां लोकेश शिवका भक्तिभावसहित जप करके सारी कुचेष्टाएँ दूर हो जाती हैं। यह नहीं ज्ञात होता कहां गईं।॥ १० ॥ मुझको उस तीर्थके प्रसादसे शिवके स्थानपर स्थिति हुई तथा अनेक अप्सराँए कामनाके अनुकूल प्राप्त हुई ॥४१॥ और समस्त देवताओं सहित यह राज्य मैंने प्राप्त किया । शिवके प्रसादसे महा- पंयकी प्राप्ति हुई ॥ ४२ ॥ केदारके मार्गमें जो मनुष्य वर्फके पर्वतसे नष्ट होजॉय वे त्रिशूल हायमें ग्रहण करके शिवके समान बडे भोगोंको भोगते हैं ॥ ४३ ।। हे साधको ! इस प्रकारके अर्चनसे यह प्राप्त हुआ है, इस प्रकार वचन सुन आ- चायोंके सहित साधक बोले ।। ४४ ॥ हे कामिनी तवसे मनो तुमने यह क्या धर्म प्रकाशित किया ? नुम महापंथको क्यों न गई यहां कैसे रहगई ? ॥ ४५ ॥ तब चम्पिका बोली हे साधको मेरे वचनोंको सुनो, और निश्चय करो। पृथ्वी- (११८) केदारकल्प। तम् ॥ पृथिव्यां च बभूवैको राजा वै मंडलेश्वरः ॥ ४६॥ उl राज्यं कृतं तेन नानालंकारखटिताः ॥ पृथिव्यां च हि तिप्टंति राजपत्न्योऽधिकाः शुभाः ॥ १७ ॥ महालक्ष्मीमहारत्नधन- धान्यसमाकुले ॥ तस्य राज्ञो गृहे रम्ये जाताहं बुधपुत्रिका ॥४८॥ कामरूपा कलाभिज्ञा यौवने मदविह्वला ॥ पूर्वपुण्या कृतज्ञा च शुभवाक्यं समाचरम् ॥४९॥ धर्ममार्गहशः सर्वे- मंदभावेन वंचिताः ॥ वाक्यं न रोचते तस्या अभ्यासे ह्यागतो मुनिः ॥ ५० ॥ तस्याथै सिद्ध शृणु च मनसा धर्मप्रीतये ।। तत्फलं भुंजते सवै पूर्वकम्मोपभोगिनः ॥५१॥ देहश्च धार्यते पूवैरिद्धते नारिकुंडके ॥ पूर्वजेन च न मां प्राप्तो गृहीत्वा चेह साधकः ।। ५२ ॥ कामरूपकलाभिझं तेन संराधितेश्वरम् ।। वासितं च पुरं दिव्यं कोटिसुन्दरिसंगमम् ॥५३॥ ममपुरी नायकः सोपि तिष्ठते च विनायकः ॥ शिवमापृच्छत्कन्याय शंकरेण च भापितम् ॥५४॥ दातव्या वररुद्राय साधकाय सु- पर एक मंडलेश्वर (चक्रवर्ती) राजा हुआ ॥ १६ ॥ उस पृथ्वीपति के उग्र- राज्यमें अनेक प्रकारके गहनोंसे युक्त अधिक स्त्रियां थी॥ ४५ ॥ यह राज्पबड़ी लक्ष्मी धन तथा धान्य रनोंसे व्याप्त था, मुझे उस महाराजाकी पुत्री जानो ॥४८॥ में कामस्वरपिणी युवती मदमे व्याकुल समस्त पुण्य करनेवाली तथा श्रेष्ठ वचन कहनेपाली हुई ॥ १९ ॥ मंदभाषसे धर्म कहनेवाले मुझे न रुचे, जो मुनि आते उनसे धर्म पूछती ॥ ५० ॥ हे सिद्धो । मनसे धर्म और प्रीतिका आशय सुनो । जो कुछ मनुष्यने पर्म रिये हैं उन सबका फल मिलता है।॥५१॥ नैसा पूर्व जन्ममें किया है, उसफ अनुसार देह धरता है पूर्वजन्मक फलानुसार एफ. साधर मुझे प्रहण परफ यहां आया ॥५२ ॥ उसने कामरूपी सब फला- मोमे युन भर परापण करोडो सुन्दारयांसे व्याप्त दिव्यपुर निर्माण पिया ५५३॥ यही हमारी पुरीरा नायक है, टसका पोई नापक नहीं, डराने पन्या पं. निमित शिपगीस पडा तर शिपन वहा ।। ५४ ॥ इस रक्षित बन्यापी उस भापाटीकासमेत-प० २६. राक्षिता ॥ महापथे सदेहोयोह्यागंता पथिदिव्यकः ॥ ५५ ॥ वदते कन्यकासत्यं शृणु वाक्यं शुभावहम् ॥ वलं तव महाश्रेष्ट- मस्यास्त्वं रक्षणं कुरु ॥५६॥ शंकरं वरमिच्छामि साधकं वर- वल्लभम् ॥ मृपा न भापणं मा च समादायचगच्छ त्वम्॥५॥ प्रसादऐश्वरः सिद्धः शृणु साधो महातपः॥ किं करोमि मोहरूपं तस्मात्संवसनं मम ॥५८॥ प्रकटे ह्यांतरे देशे सहिता शब्द- भापिते ॥ सेवावासादिभक्तिश्च रक्ष्यते च गृहे मया ॥ ५९ ॥ तिष्टन्तःप्रथमं सिद्धास्ते रोचते च संगमे ॥ पश्चाच वागताः सिद्धास्ते भापन्ते स्म नायकम् ॥ ६० ॥ पृच्छंतः साधकाः सर्वे भापिते ह्यामरांगने । त्यत्वा तु चंपिकालोकं गतास्ते चो- त्तरामुखम् ॥ ६॥ इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेयसंवादे- पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदशने सदेहकैलासगमने चंपिकाराज्ञीपुरीवर्णनं नाम पड्दिशः पटलः ॥ २६ ॥ रुद्रस्वरूप साधकको देना, जो सदेह इस दिव्य महापंयमें आने की इच्छा कैरै ॥ ५५ ॥ यह कन्या सत्य कहती है तुम इसका भापण सुनो, तुम्हारा वल महा- श्रेष्ठ है । तुम इकलेही रक्षा कर सक्ते हो ॥५६ ॥ मैं एक साधक शंकररूप वरकी इच्छा करती हूं मैं असत्य नहीं कहती तुम मुझे लेकर चलो ॥ ५७ ॥ हे साधी ! महातपस्वी सिद्धो ! सुनो, मुझे शंकरका प्रसाद है पर क्या करूं किसी कारणसे मुझे मोह होगया ।। ५८ ॥ बाहर भीतर प्रगट, शब्द भापणसे रहित सेवा, वास, आदि भक्ति मेरे घरमें रक्षित हैं ॥ ५९ ॥ पहले सिद्ध रुचन्तिके, संगममें स्थित रहते थे चंपाके वचन गुन फिर पीछे सिद्धोंने उस पुरीके नायकसे भापण किया ।। ६० ।। देवांगनाओंके पूछनेपर उन्हें उत्तर दे चम्पिकाको छोड कर वे उत्तरकी ओर चले गये ॥ ६१॥ रति श्रीकेदारकल्प शिरगौरीसंपादे भापाटीकाया पड्विंश पर ॥ २६ ॥ .
(१२.) कंदारकल्प। सप्तविंशः पटलः। ईश्वर उवाच ॥ ॥ ॐ अग्रतो दृश्यते तत्र पुंगिरिनामपर्वतः॥ मूर्यकोटिप्रतिकाशोऽग्निज्वालासमप्रभः ॥ १॥ योजनांशतं चैव दृष्टा च पर्वतोत्तमम् ॥ उत्तम शिखराकारं रक्तकांतिविभू- पितम् ॥ २ ॥ सौवर्णकास्तथा वृक्षाः फल पुप्पसमन्विताः ॥ सर्वाभरणसंयुक्ता देवास्तत्र समागताः ॥३॥ सप्तद्वीपा वसुमती सप्तसागरसंयुता ।। तस्मिन् तु शिखरारूढः पश्यते सर्वगोचरम् ॥४॥ सप्तसागरपृथ्वी चगोप्पदं मात्रदृश्यते ॥ पथं भयानकं दृष्ट्वा मंत्र जप्त्वा च निर्मलम् ॥ ५ ॥ अथ मंत्रः ॥ ॐ हुँ क्षी क्षी हुँॐ हुं फट् स्वाहा।।अघोरोयंमहामंत्रो महासिद्धिकरो नृणाम्।। ॥दामहाविघ्नहरं नित्यं स्वर्गपंथप्रदायकम् ॥ मेरुशृंगं महारूढं दिव्यमालाकुलध्वजम् ॥ ७॥ पश्यतां तस्य शैलस्य कलापूर्ण समापुरी ॥ आपदा कर्महंता च वैतालायक्षराक्षसाः॥ ८॥ गण गंधर्वसंस्थानं पुरी पंचकलान्विताम् ॥ शतयोजनविस्तीणी रत्न- कांचनभूपिताम् ॥९॥ ब्राह्मणावेद नि|पर्वदूर्यमणिरश्मिभिः ।। ईश्वर वोले आगे पुगिरिनामक पर्वत मिला जो कोटि सूर्यके समान मका- शित अमिफ लपटफी समान कान्तिमान् था ॥ १ ॥ सैकड़ों योजनसे उस पर्व. तोत्तमको देख जिसके शिखर बडे उन्नत और लालकान्तिमगियोंस शोभाय- मान थे ।। २ ॥ वहाँ सुवर्णके वृक्ष फल फूलोंसे युक्त थे, देवता लोग सम्पूर्ण आभूषणोंसे व्याप्त थे ॥ ३ ॥ सात दीपवाली और सातसमुदयाली पृथ्वी उस पर्वतके शिसरपर चदफे ॥ ४॥ गोपद (गायफे खुर) के समान दाखती है। उस भपानफ मार्गमा देखफर सिद्ध अपार मंत्रको जपने लगे और उसके जपन मावसे निर्मल पंप दीसने लगा ॥ ५॥ ॐ हुंक्षी क्षाएं हुं फट् स्वाहा, यह अपोर मदामंत्र मनुष्यों को परमसिदि फरनेवाला है।॥ ६ ॥ बढे २ पिनाका हरनेवाला स्वर्गलोफफा देनपाटा है। सुमेरु पर्वतफे शिसरपर चढ दिव्यमाला पताकाओं सहित ॥ ७॥ उस पर्वतकी पलाशी समानताको नहीं पाया ॥ ८ ॥ आपत्तिम फर्मपा नष्ट करनेवाले पैताल, यक्ष, राक्षसगण, गन्धर्व हं पह पुरी पांच फलाओं महित मायोजन विस्तृत, रनोंफरपं. तया मुपर्णसे शोभापमान है ॥९॥ वाम भापाटीकासमेत-प० २७. ऋपयो यक्षगंधर्वाः एवंते पुरवासिनः ॥ १० ॥ इन्द्रस्य नगरी दिव्याः श्रूयते कन्यकोत्तमा नलिता पद्मरागस्य वैदूर्यमणि- शोभिताः॥१३॥ इन्द्रनील महानीलैः दृश्यते च मनोहरम् ॥ तिष्टंति च ततः सर्वे पुत्रदारासमन्विताः॥ १२ ॥ क्षीरोदधि यथाविष्णुं संप्राप्ते दीर्घनिद्रया ॥ तत्र स्थाने तथालोके भुजति विपुलांश्रियम् ॥ १३॥ स्वयंतुष्टोमहादेवउमासात्रिलोचनः ।। अधीयत्वाकपिःसर्वेगणगंधर्वसेविताः ॥ १४॥ भेरीमृदंगश- ब्देनशंखतूर्याचवेणुकाः ॥ गीतंगायंतिगंधर्वाः वीणावाद्यंतिसु- न्दरी ॥१५॥ तालवादननिष|पैः लिंगस्याग्रेनिरंतरम् ॥ केचित्पक्षोपवासैश्चकेचित्मासोपवासिना ।। १६ ।। केचित्पुष्प- फलाहार केचिन्मारुतभोजनम् ॥ अग्निहोत्ररताकेचित्केचित्पू- ज्यतिब्राह्मणम् ॥ १७ ॥ केचित्कामरताशक्तिः केचिदिपु- लभोजनाः॥केविद्यज्ञरताविप्राकेचिल्लोकातपंतिच ॥ १८ ॥ केचिच्चपवनाशक्तिः केचिद्ध्यानतपोरताः॥ ऊर्द्धपादस्थिता के गोंको वेदध्वनि तथा वैदूर्य मणियोंकी कान्तिसे व्याप्त ऋषि, यक्ष, गन्धवोंसे युक्त ॥ १० ॥ इन्दकी दिव्य नगरीमें उत्तम २ कन्या सुनी जाती हैं, पर यहांकी कुमा- रियां पद्मराग मणियोंकी कान्तिसे प्रज्वलित वैदूर्यमणियोंसे शोभित थीं ॥ ११ ॥ इन्द्रनील महानील मणियोंसे अति मनोहर दोसती थीं। तहां सब मनुष्य पुत्र स्त्री सहित निवास करते हैं।॥ १२ ॥ जिस प्रकार क्षीरसागरमें विष्णु दीर्घ निदासे सोते हैं तसे उस लोकमें विपुल सम्पत्ति मुखको भोगते हैं ॥ १३ ॥ यहां साक्षात शिव, पार्वती सहित सयं सन्तुष्ट हुए हैं, सब ऋपिगण गन्धवों सहित अपना करते हैं ॥ १४ ॥ भेरी, मृदंग, शंख, वेणु आदि बाजोंसहित गन्धर्ष गान गाने हैं स्त्रियां बजाती हैं ॥ १५ ॥ शिवलिंगके आगे निरंतर ताल बागे आदिमन्दाग नृत्य करते हैं, कोई पक्षके उपवास तथा कोई मासके व्रतको करते हैं | कोई फूल, फल, कोई पवन भोजन करते कोई अग्नि होममें तत्पर तथा मी ब्राह्मणोंको पूजते हैं ॥ १७॥ कोई काममें तत्पर कोई अधिक मागन काम कोई ब्राह्मण विद्या, यज्ञ करनेमें निमम, कोई तप करत, ॥ १८ ॥ गई पर. नकी समान शक्तिवाले कोई ध्यान तपमें तत्पर, मई म (१२२) केदारकल्प। चित्केचिच्चांद्रायणेरताः ॥ १९॥ एकपादेस्थिताकेचित्केचिये. काँगगुप्या ॥ महाध्यानरतायोगीवायुविन्दुममागमम् ॥२०॥ ऐवंबहुविधालोकाअर्चयंतिसदाशिवम् ।।भृगुमुनिनारदस्यवाल्मी- किकश्यपस्तथा ॥२१॥ मरीचीमार्कंडेयदुर्वासाव्यासपंडिताः॥ वशिष्ठगौतमश्चैवकृष्णद्वीपाचअंगिराः॥ २२ ॥ ऋपिकन्यारथा- रूढादृष्ट्वाकाममयोध्वनिः ॥ गौरीचसदृशासपद्मनीमृगलो- चनी ॥ २३ ॥ दिव्यवस्त्रपरीधानादिव्यगंधानुलेपना ॥ दिव्य- पुप्पशिरोवध्वादिव्याभरणभूपिताः॥२४॥ दिव्यदेवमहाकाया- दिव्यदेहसमावृता ॥ करकंकणसंयुक्ताहारकेयूरभूपिता ॥ २५ ॥ नातिदीर्धनातिस्थूलाकरिकुंभौकुचस्तथा ॥ एवंसर्वागुणैर्युक्ता- ऋपिकन्यामनोरमाः ॥ २६॥ सिद्धाश्चैवागतादृष्ट्वाआगतासा- धकाश्रये ॥ पश्चाचसाधकाः सर्वेवदेवंदेसहस्रशः ॥ २७ ॥ स्वा- गतामोमहासिद्धाकन्यास्तत्रवदंतिच ॥कन्यका ऊचुः॥ कागता- भुवनात्सिद्धाः कस्थानेचैवगम्यते ॥ २८ ॥ एतद्रूहिमहाचार्य- कोई चान्दायण प्रत करने में प्रवृत्त थे ॥ १९ ॥ और कोई एक पैरसे स्थित कोई एफ अंगूठेसे खडेहप बड़े ध्यानमें निममहैं, पवन तथा जलचिन्दुके खानेवाले योगीहं ॥ २० ॥ इस प्रकार अनेक प्रकारसे सदा शिवको पूजतेहैं भृगु, मुनिश्रेष्ठ नारद, तथा पाल्मीकि ॥ २१ ॥ मरीचि, माण्टेय, दुवासा, व्यासादि पंडित यसिष्ठ गौतम कृष्णद्वैपायन अंगिरा ॥ २२ ॥ तथा स्थपर चढीहुई मधुरध्वनि वाली ऋपिकन्या और सम्पूर्ण पार्वती सदृश पद्मिनी और मृगके समान नेत्र वाली ।। २३ । इन्दर २ पम्र धारण करनेवाली दिव्प सुगंध लिपटाये दिव्य पुष्प सिरपर धारण किये तथा मुन्दर २ यख सुन्दर आभूपण पहने थीं ॥ २४ ॥ दिव्यशरीरयात्री महामन्पायें हाथ में फंफण धारण फिय दार पाबंदास शोभाप- मान ॥ २५ ॥ अतिलम्मे, न अतिस्थर हाथीये घुमायलरे समान स्तनपाली रममगार मय गुणांसे अलंयत ऋषि पन्याएं या ।।२६॥ये टनसाधकोंआभ- ममें भाई, पथात् सम्पूर्ण फन्याय सहयोंदल समेत स्थित हुई ॥ २७ ॥ हे साध तो म्याग । कन्या पाली । आप किस म्यानमे जायाँ और कहाँ जाना चा- न. ॥ २८॥ ६ महाचार्ग! मी भाप कृपार पही, माधय घोल महापल्या भापाटीकासमेत-प० २७, ( १२३) साधकै परिवोष्टित ॥ साधक उवाच ॥ कथयामिमहाकन्या- शृणुमेवचनंपरम् ॥ आगतामृत्युलोकेचगंतव्यंशंकरालये॥२९॥ कन्यका ऊचुः । अस्मिन्स्थानमहावीरानानाभोगसमाकुलाः॥ भुंजंतिसास्त्रियासर्वेजरामृत्युविवर्जिताः ॥३०॥ साधक उवाच ॥ ममभोगानरुच्यतेसत्यंमत्यंवदाम्यहम् ॥अस्माभिस्तबगंतव्यंयत्र ब्रह्माहरोहरिः ॥ ३१॥ यत्रस्थानेमहादेवस्तवगच्छंतिकामिनी ॥ साधकाःसहसाकन्यागतायत्रमहामुनि ॥ ३२॥ ऋपिभिर्महतो- दृष्ट्वाहतुष्टोसमाहिताः॥स्वागताभोमहासिद्धाऋपिस्तत्रवदतिचा। ॥ ३३ ॥ ऋपिरुवाच ॥ कन्यकास्तत्रतिष्टंतिसंख्याश्चैवनविद्य- ते ॥ एतानिसर्वरूपाणिक्रीडयंतिदिशोदश ॥ ३४ ॥ साधक उवाच ॥ किमर्थभोगमायुष्यंपश्चाच्च किंभविष्यति ॥ एतद्रूहिमु- निश्रेष्ठकुतःस्थानेपुगम्यते ॥ ३६|| ऋपिरुवाच ॥ स्वरूपंचततो कन्याकीडयंतियथासुखम् ॥ क्रीडयित्वामहाभोगयावचंद्रार्कता- रकाः ॥ ३६ ।। भुक्त्वाचविपुलान् भोगान मृत्युलोकेनजतिच ।। ओ!! हम कहतेहैं । हमारा वचन सुनो । हम मृत्युलोकसे आहे शिवलोकको जातेहैं ॥ २९ ॥ कन्या बोली । हे महावीर ! इस स्थानपर अनेक प्रकारके भोगों सहित स्त्रियाँसमेत जरामृत्युसे वर्जित होकर आनन्द भोगो ॥ ३० ॥ साधक बोले हमको भोग नहीं रुचते सत्य २ कहते हैं हम को वहां जानाहैं जहाँ ब्रह्मा, शिव, विष्णु हैं ॥ ३१ ॥ हे कामिनी ! हम उस स्थानको जातहैं जहां महादेवहैं। तर साधकोंको वह कन्या वहां लगई जहां ऋपिथे ।। ३२ ।। ऋपिगण उन सा- धकों को देखकर बडे प्रसन्नहुए है सिद्धो ! शुभागमनही इसमकार ॥ ३३ ॥ ऋषि चोले यह कन्या स्थितहैं कि जिनको संख्या नहींहै अतिरूपवती दशों दिशाओं में क्रीडा करती हैं इनसे आनन्द करो ॥ ३४ ॥ साधक बोले, भोग और आयु किस अर्थ है, पश्चात् क्या होगा? हे मुनिश्रेष्ठ ! यह आप भले प्रकार कहिये कि, फिर किसस्थानपर जाना होगा ॥ ३५॥ ऋपि बोले यह शोभायमान रूपवाली कन्या क्रीडा करती हैं इनके साथ सुखपूर्वक जबतक मूर्य चन्द्रमा हैं आनन्द भोगो ॥३६ ॥ और अनेक भोगोंको भोगकर फिर मृत्युलोकमं मनुष्य सब इच्छाओंकी
(१२४)
केदारकल्प।
सर्वकामसमृद्धश्चजायतेविपुले कुले ॥३७ ॥ सर्वक्रियासमः
सिद्धासर्वाचारोभवेत्छुचिः ॥ सर्वशास्त्रेभवेद्वक्तासर्वश्रीकसमृ-
धिमान् ॥ ३८ ॥ चक्रवर्तीभवेद्राजाजातोजातिस्मरोभुवि ॥
भुक्ताभोगान्महाश्चर्यान्विविधान्मनसेप्सितान् ॥ ३९ ॥आचार्य
उवाच ॥ यदि भूयोमृत्युलोकेचगंतव्यमहामुने ॥ किंततोराज्य-
भोगेनशिवलोकोनप्राप्यते ॥ ४० ॥ साधकान्प्रस्थितान्दृष्ट्वा
निःस्वसांतेवराननाः।।यौवनस्थामदोन्मत्ताःसर्वशास्त्रविशारदाः॥
॥४१॥ सर्वलक्षणसंपूर्णाःसुभोगैर्वस्त्रकुंकुमैः ॥ सुकोमलाश्च-
द्रवदनाःसाधकास्तेत्यजन्तिच ॥४२॥ तत्रतेसाधकाः सर्वगता-
स्तेचोत्तरामुखे ॥ यःशृणोतिमहापंथं सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥४॥
शिवकल्पंपठति च ईश्वरं प्रतिगच्छति ॥४४॥
इति श्रीकेदारकल्पेविख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेय संवादे
पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवनमुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे
शिवदर्शनेसदेहकैलासगमनेऋपिपुरीवर्णनो नाम
सप्तविंशः पटलः ॥ २७ ॥
पूर्तिसहित घडे उच्च कुलमें उत्पन्न होताहै ॥ ३७॥ सम्पूर्ण कार्योंमें सिदिवाला
तया समस्त आचरणों में पवित्र और सब शास्त्रोंका वक्ता तथा समस्त लक्ष्मीसे
भरपूर ॥ ३८ ॥ चक्रवर्ती रामा होताहै हे महाचार्य ! अनेकप्रकारफे मनोरय
और भीगाँको भोगकर जातिका स्मरण होताहै ॥ ३९ ॥ आचार्य बोले हेमहा-
मन : यदि फिरभी मृत्युलोमै जन्म होताह तो राज्यमोगसे क्याजयेहै, हम
शिवलाफको जातेहैं ॥ ४० ॥ हे वरानने ! यह कह उन साधक लोगोंने प्रस्थान
फिया दन पौवन में उन्मत्त मदपिवल सब शास्त्रों में निपुण ॥ ११ ॥ सब लक्ष-
गोस भरी मुन्दर २ भाग पन और फेसर नादिसे पेष्टित मति कोमल शरीर-
वाली चन्दमाफै समान मुसपाली फन्याओंको छोटा ॥ ४२ ॥ तब पे साधक
स्तर (आमे)की और चलदिये जी गनुप्प महापंथको श्रयण करते हैं यह सब
पापोंसे छूट जाता ॥ १३ ॥ ४१ ।।
पति धारदारकरी शिल्पाशीमयादे भापाटीफायां सप्तर्षिशः पटलः ॥२०॥
भाषाटीकासमेत-प० २८. (१२५) अष्टाविंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॐ अग्रतोदृश्यतेनबहेमस्तंभपरिच्छदः ॥ ज्वलंतपद्मरागं च चंद्रकांतिसमप्रभम् ॥ १ ॥ दर्शनह्यद्भुतं रूपं दृष्ट्वा तत्र महामुनिः ॥ संप्राप्ताःसाधकाः स्तऋषि दृष्ट्वा बधोमुखम् ।। २।। हेमस्तंभंततो दृष्ट्वा नानारत्नविभूपितम् ।। अर्द्धयोजनविस्तीर्ण उछायोदशयोजनम् ॥३॥ चंद्रादित्य- समंतज छायातस्य सुशीतला ।। इन्द्रनीलमहानीलैः पद्मरागो- पशोभितम् ॥४॥ ध्वजमालाकुलंदिव्यं चित्रकर्मोपशोभितम्।। तस्य शृंगेपुरंदिव्यं शोभितंधवलंगृहम् ॥५॥ तस्यमध्येमहा- लिंगअप्सरःस्थापितंपुरा ॥ पूजयंतिततःकन्यास्त्रिकालंभक्ति- । वत्सलम् ॥ ६॥ नृत्यंत्यप्सरसस्तत्रगीतंगायतियोपितः ॥ प्रेक्षणीयंप्रकुर्वतिवंशवादिचनादितम् ॥७॥ भेरीमृदंगशब्देन- शंखतुर्यरवेण च ॥ गानंकुर्वतिगंधवाअर्चयित्वावृपध्वजम् ॥ ॥८॥ हेमपुष्पैर्महाभक्ताः पूजयंतिएनेकधा । पटहोवेणुवंश- श्रीशिवजी बोले तहां आगे मुवर्णके स्तम्भोंसे युक्त प्रचलित पद्मराग चन्द्र- कान्त मणियोंसे प्रकाशित भृमि देखी ॥ १ ॥ साधक वहां गये और नीचेको मुख किये एक ऋपिको देखा तया उसके अद्भुतरूपको देख चकित हुए ॥२॥ और नानाप्रकारके रत्नोंसे जटित सुवर्णके खम्भको देखा जो आधे योजन विस्तृत और दसयोजन ऊँचा था ॥ ३ ॥ उसका तेज सूर्य और चन्द्रमाके समान, तथा छाया वडी ठंडी थी, इन्द्रनील और महानीलमाण व पद्मरागमणियोंसे शोभाय- मान था ॥ ४ ॥ पताका माला तथा दिव्यचित्रोंसे सजाहुआ उसके शिखरपर स्वच्छ गृह शोभायमान थे ॥ ५ ॥ उनमें शिवलिंग स्थापित थे और अप्सरा व कन्या तीनों समय भक्तिपूर्वक पूजन करतीर्थी ॥ ६ ॥ अप्सरा नृत्य करती स्त्रियां गान करतीयी बाँसुरी आदि बाजोंके शब्द होतेथे ॥ ७ ॥ भेरी मृदंग शंख तोरईके शब्दोंसे गन्धर्व शिवका अर्चन करके गान करतेथे ॥ ८ ॥ अनेक देवता बड़ी भक्तिभदासे सुवर्णके पुप्पोंसे पूजन करतेथे, पटह वेद वाँसुरी आदि केदारकल्प। अवाद्यतेविविधानिच ॥९॥ चंदनागरुकर्पूरदिव्यधूपैश्चधूपिताः॥ तस्यशृंगेमहासेनगतास्तेसर्वसाधकाः ॥ १०॥ अर्चयित्वामहा- देवं हेमपुष्पैःसमन्विताः ॥ आरात्र्तिकंप्रकुर्वन्तिलिंगस्याग्रे- निरंतरम् ॥ ११ ॥ तत्र ते साधकाः सर्वे उतीर्णतत्रतिष्ठति ॥ पठतिसर्वशास्त्राणिचतुर्वेदभवोध्वनिः ॥ १२ ॥ दृष्ट्वा सर्वेप्रव- श्यन्तिब्रूहितस्यशुभाशुभम्॥ ततो दृष्ट्वा मुनिश्रेष्टसाधकोवाक्य- मब्रवीत् ॥ १३ ॥ साधक उवाच ॥ मया दृष्ट्वा महादुःखमूर्द्ध- पादयधोमुखम् ॥ सत्यंबहिमहासिद्धाः किंदुःखं हि तपः कृतम्।। ॥ १४ ॥ ऊर्द्धपाद उवाच ॥ पूर्वजन्मकृतंपापमूर्द्धपादमधोमु- खम् ॥ मृत्युलोकेषुमंजातोराजामंडलेश्वरः ।। १५ ॥ अहर्निशं शिवध्यानपूजयित्वा पुनःपुनः ॥ यजंतोहिमहादेवं नविष्णोर्चनं । कृतम् ॥ १६॥ विष्णुधाम महादिव्यंप्रसंगाद्गतवानहम् ॥ विष्णुनाशापितं तत्रयू पादमधोमुखम् ॥ १७ ॥ साधक उवाच ।। अस्मिन्स्थानेसुराः सर्वेगणगंधर्वसेविता ॥ अप्सरायो- अनेक प्रकारके वाने बनतेथे ॥ ९ ॥ चंदन अगर कपूर आदिकी मुन्दर धूपोंसे मुगन्धित उप्तके शिखरपर वे मब साधक गये ॥ १० ॥ और मुवर्णके पुष्पोंसे महादेवको पूजन कर निरंतर शिवलिंगके आगे आर्ती करनेलगे ॥ ११ ॥ तहां उन सापकोंने स्थितहोकर सम्पूर्ण शास्त्रों व वेदोंका पाठ फिया चारोंवेदोंकी ध्वनि होने लगी ॥ १२ ॥ तब साधक यह शुभाशुभ देखनेकी इच्छासे मुनिसे कहने लगे ॥ १३ ॥ हमने आपको बडा दुःसी देखा फि, ऊपरको पैरकिये और नीचेको मुख कि, सो सत्य २ फहो कि किसकारण यह दुफर तप करतेही ॥ १४ ॥ उर्द्धपाद बोला पूर्वजन्मके पापप्ते कारको पैर और नीचेको सिर करने वाला मैं मायुलोसमें चक्रवर्ती राना था॥ १५॥ रातदिन ध्यानसे शिवको पूजा करता और रिणका पूजन नहीं करताया ॥ १६ ॥ कभी प्रसंग वशमें विष्णुके मंदिर गया, तब विष्णुने उर्द्धपाद अधोमुख होने का शाप दिया ।। १७ । सा- धकघोले इम मुन्दर स्थानमें सम्पर्ण देवतागण गन्धर्षसहित अप्सरा स्त्रिय भापाटीकासमेत-प० २८. (१२७) पितःसर्वा जंतिपुलांश्रियम् ॥ १८॥ एकाकीत्वमुनिश्रेष्टदुःख- सागरपीडितः । कस्मिन्कालेभवेन्मोक्षोभाविष्यसि महासुखः ।। ॥ १९॥ ऊर्द्धपाद उवाच ॥ कोटिसिद्धागमिष्यंतिमममोक्षो- भविष्यति ।। चांद्रायणंभवेत्कृछतदामोक्षोभविष्याते ॥ २० ॥ आकाशपथमारुढाः पश्यति च हिमालयम्।।तबच्छायांमहाकाय मेरुशृंगंव्यवस्थितम् ॥ २१ ॥ गछंति च महासिद्धाःपथिचैव हिमालये ॥ तस्यसंदर्शनेनैवमममोक्षोभविष्यति ॥ २२ ॥ हेम- स्तभंचतेदृष्ट्वासर्वरत्नविभूपितम् ॥२३॥ अईयोजनविस्तीर्ण- उछायोदशयोजनम् ।। चंद्रादित्यसमंज्योतिश्छायातस्य सुशी- तला ॥ २४ ॥ इन्द्रनीलमहानीलैः पद्मरागोपमानिच ।। ध्वज- मालाकुलं दिव्यंनानारत्नोपशोभितम् ॥ २५ ॥ ज्वलंतपद्म- रागं च स्फुरंतंकिरणेर्यथा ॥ तस्यश्रृंगमहादिव्यंशोभितंधवलं गृहम् ।। २६।। तस्यमध्येमहालिंगाप्सरःस्थापितंपुरा ॥ पूज- यंतितथाकन्यास्त्रिकालभक्तिवत्सलम् ॥ २७ ॥ नृत्यंत्यप्सरस- अधिक सम्पत्तिको भोगतीहुई निवास करती हैं ॥ १८॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! तुम अकेले दुःखसागरमें पीडितहुए स्थितहो, हेमहामुने ! तुम्हारा फिसकालमें मोक्ष (इस दुःखसे छुटकारा ) होगा ॥ १९ ॥ ऊर्द्धपाद वोला जब करोड़सिद्ध इधरसे शिव- लोकको जांपगे तब मोक्ष होगा अयवा चान्द्रायण कृच्छत्रत करनेसे मोक्ष होस- कताहै ॥ २० ॥ सिद्धगण आकाशमार्गमें चढ़कर हिमालयपर्वत को देखतेहैं, वहां पर उसको छाया महाकाय सुमेरुपर्वत स्थितहै ॥ २१ ॥ जो नहासिद्ध हिमा- लयपंथको जातेहैं उनके अवलोकनसे मेरा अवश्य मोक्ष होगा ॥ २२ ॥ तब चलकर सिद्धाने तहां सबरनोंसे भूपित सुवर्ण का स्तंभ देखा ॥ २३ ॥ जो आ- धायोजन चौडा तथा दसयोजन ऊंचा था, उज्ज्वल चन्दमा व सूर्या रामान प्रकाशित उसकी छाया अतिशीतल थी ॥ २४ । इन्द्रनील महानीट पराग मणियोंसे जडी हुई ध्वना मालाओंसे व्याप्त नानांमकारके रसि शापायगान ॥ ।। २५ ।। पद्मराग मणियोंकी किरणोंसे प्रकाशित उसफे शियापर गुन्दर अंत गृह शोभित थे ।। २६ ।। उनमें शिवकी प्रतिमा स्थापित भी गपागपं. भक्तिपूर्वक तीनोंसमय शंकरका पूजन करतीधी ॥ १७ ॥ ~ .
4
(१२८)
फेदारकल्प।
स्तत्रगायतिताश्चयोपितः॥प्रदक्षिणांप्रकुर्वन्तिवेणुवाद्यंचनादितम्
॥ २८ ॥ शंखतूर्यचवीणाश्चभेरीमृदंगशब्दयोः ॥ गति
गायंतिगंधर्वा अर्चयंतिमहेश्वरम् ॥ २९ ॥ हेमपुप्पैर्महापौ-
रचयंतिह्यनेकधा ॥ गुग्गुलैपितास्तत्रकपूरमंत्रितस्तथा ॥
॥ ३० ॥ धूपितंदेवदेवस्यअतिगंधंमनोरमम् ॥ सर्वप्रकारः
कुर्वीतधूपदीपसमन्वितम् ॥ ३१ ॥ पटहासलवीणाश्चवाय-
तेबहुनैकधा ॥ कौतुहलंबहुगुणानानारंगमनेकधा ॥ ३२ ॥
चंदनांगरंतत्रकर्पूरंचसुवासितम् ॥ तस्यशृंगेमहासेनगतास्ते
सर्वसाधकाः ॥३३॥ अर्चयित्वामहादेवंहेमपुष्पैस्तुपूजितम् ।।
पूजयेथूपदीपायैःकर्पूरागुरुचन्दनैः ॥ ३४ ॥ आवासास्तत्र
सौवर्णाअग्निज्वालासमप्रभाः ॥ मौक्तिकैःचंद्रकान्तैश्चप्रासादा
विविधास्तथा ॥ ३५ ॥ प्रवालैश्चमहामूल्यै मणिकिरणोपशो-
भितम् ।। संप्राप्ताःसाधकाःस्तत्रगृहद्वारमुपस्थिताः॥३६॥
इतिश्रीकेदारकल्पेविख्यातपुराणेश्रीश्वरकार्तिकेयसंवादेपंच-
योगेन्द्रेच्छासिद्धिविनमुक्तब्रह्मप्राप्तयेमहापथे शिव-
दर्शनेसदहकैलासगमने उर्द्धपादतपस्विदर्शनो-
नामाटाविंशः पटलः॥२८॥
नित्य नृत्य करती, स्त्रियां गान करती और परिक्रमा करती वेणु वाजे बजा
ते॥२८॥ शंख तुरई वीणा भेरी मृदंगके शब्दोंके सहित गन्धर्व गीतोंको गाते
और शिवका पूजन करते थे ॥ २९॥ अनेक प्रकार सुवर्ण के पुष्पोंसे पूजते गुग्ग-
लसे धूप करते तथा कपूरसे आरती करतेथे ।। ३० ॥ देवदेवके सम्मुख आति-
सुगंधित मनोहर धूप दीप प्रदान करते ॥ ३१ ॥ अनेक प्रकारके पटह आदि
वाने बनते और अनेकगण वहाँपर कौतूहल करते थे ॥ ३२ ॥ अगर तथा
सुवासित कपूर चढाते नमस्कार करते थे है महासेन ! उसके शिखरपर सब
साधक गए ।। ३३ ॥ महादेवकी सुवर्णके पुष्पोंसे तथा धूप दीप कपूर अगर
चन्दनसे पूजा करतेथे ॥३४॥ तहाँ सुवर्णमय स्थान अमिको समान कान्तिमान
मोती चन्द्रकान्तमणि जटित शोभायमान भवन देखा ॥ ३५ ॥ मूंगे रोंकी
फिरणोंसे शोभायमान उस स्थानके द्वारपर साधकलोग उपस्थित हुए ॥ ३६ ।।
इति श्रीकेदारकपे मापाटीकायामष्टाविंशः पटलः ॥२८॥
भापाटीकासमेत-प० २९. एकोनत्रिंशः पटलः। श्रीश्वरउवाच ॥ ॥ॐ पश्यंतिदक्षिणेभागेपृथिव्यांतिलकंयथा॥ हंसस्वरेणदिव्येनवदंतिचसुरोत्तमाः ॥ १ ॥ देवदानवगंधर्वा पश्यतेचैवसाधकाः ॥ साधक उवाच ॥ ॥ मनुष्यसदृशंवाक्यं कस्यसंवदतगृहः ॥२॥ महारम्यंमहादिव्यंह्यधऊर्द्धदिशोदश ॥ गृहउवाच ।। ।। कागताभुवनात्सिद्धावस्थानेचैवगम्यते॥३॥ सिद्ध उवाच ॥ ॥आगतामृत्युलोकेचगंतव्यंशंकरालये॥ गृह- स्यवचनंश्रुत्वासाधका. स्मयंगताः ॥ ४ ॥ नैवष्टश्रुतं वा- पिकनकंवदतेगृहम् ।। पृच्छंतिसाधकाः सर्वगृहमेकायचेतसः ।। ॥६॥ बहिवेश्मममाओणकस्यसंबंधिनोगृहम् ॥ गृह उवाच ॥ ततःप्रीताःस्तुतिसिद्धाःदृश्यतेनमहागृहम् ॥ ६॥ गृहसंबंधि- नोकस्यसर्वलक्षणसंयुतम् ॥ हेममयंसुविस्तीर्णसर्वालंकारभूषि- तम् ॥ ७ ॥ मुक्तादितेमहाभागैवैदूर्यमणिशोभिता ॥ गाव- सशतसंकीर्णनानाविहंगसेविता ॥ ८ ॥ नानागंधर्वसिद्धा- शिवजी बोले उन्होंने पृथ्वीके दक्षिणकी ओर दिव्यस्थान देखा जहाँ देवता- गण हंसकी समान दिव्यस्वरसे बोलते हुए ॥१॥ देवता दैत्य गन्धर्वोको सा- धोंने देखा, साधक वोले यहां मनुष्यके समान वाक्य घरोंमें किसका सुनाई देताहै ॥ २॥ आतिमनोहर सुन्दर दशदिशा ( कोने) समेत गृह वनाहै, गृह बोला हे सिद्धो ! कहांसे आतेहो और कहांको जातेहो ?॥ ३ ॥ सिद्धबोले हम मृत्युलोकसे आतेहें शिवलोकको जाते हैं, घरका वचन सुन साधकलोग आश्चर्य- को प्राप्त हुए ॥२॥ ऐसा न देखा न मुना कि मुवर्णमय गृह वोलताहो, तब सब साधकोंने एकाग्रचित्तही घरसे पूछा ।। ५॥ हे गृह ! हमारे सामने कहो कि किस सम्बन्धीका गृहहै, गृह बोला हे सिद्धो ! गृहका स्वामी नहीं दीखपड़ताहै ॥६॥ किसका यह सवलक्षणोंसे शोभायमान गृहहै जो सुवर्णरचित अति विस्तृत सब अलंकारोंसे भूपित है ॥७॥ मोती आदि तथा वैदूर्यमणियोंसे शोभितहै, गाय बछडे अनेक प्रकारक पक्षियोंसे सेवित है ।। ८ ॥ नानागन्धर्व सिद्ध नाग आदि- ९ (१३०) केदारकल्प। श्चनागानांसेवितंशिवम् ॥ पुरंदरगृहंचवप्राकारशतमाकुलम् ॥ ॥ ९ ॥ पदंपश्यतिचाचार्यमेतत्कांचनवद्गृहम् ॥ उच्यतेसाध काःसर्वेकिमिदंचैवदृश्यते ॥ १०॥ नमनुष्यानदेवाश्चनयक्षान चराक्षसाः॥ किन्नरानचगंधर्वाःसंपूर्णैःसहशैभृतः॥११॥ आस्थि ताभुवनेनैवअधऊर्द्धदिशोदश ॥ ममनाथकुलेगत्वाउदधेदीक्ष- तटे ॥ १२ ॥ स्वपाणीभ्योस्तोपथिमहादेवस्यसाधुना ॥ पंथिरुवाच ॥ किमर्थसाद्यतेदेवमहादेवेनभोगृहम् ॥ १३ ॥ गृह उवाच ॥ ईश्वरस्यस्वयंलिंगंप्रकाशितंतयोमुनिः समुत्थंवै- श्रुतेनित्यंसमुद्रस्यतटेशुभे ॥ १४ ॥ तेनैवक्रीयतेस्वामीगृह स्यशततंवदेत् ॥ नयत्रस्थानेसंक्रोधाएतत्पश्यंतिकारणम् ॥ ॥ १५॥ यःस्थित्वायचस्थानेचतत्रासौपार्वतीपतिम् ॥ नन्द- नस्यगृहनामवेदशास्त्रार्थपारगः ॥ १६ ॥ तेनाहंनिर्मितः सिद्धागृहवैस्फाटिकंवदेव ॥ सोपिसंगतपुष्पार्थततःक्षीरोदसा- गरे ॥ १७ ॥ यावद्वदंतितेसिद्धानन्दनागृहमागतः ॥ कारण्ड से सेवित सौ प्रकार युक्त यह इन्द्रका गृहहै ॥ ९॥ आचार्य इस सुवर्णके घरके पदको देखते हैं और साधक परस्पर कहतेहैं कि यह क्या अद्भुत विषय दीखता है।॥ १० ॥ न मनुष्य, न देवता, न यक्ष, न राक्षस, न फिनर, न गन्धर्व हैं सब अलक्ष्यहैं ॥ ११ ॥ यह पर ऊपर नीचे दशोंदिशाओंमे स्थित है, सागरके दक्षिण- तटमें मानो प्राप्त होकर हमारे स्वामीने ॥ १२ ॥ इसको स्थापित कियाहै यह महादेवनीने पथिकोंके निमित्त रचाहै, यह देख वे पथिक बोले हे गृह ! किस लिये महादेवने यह गृह निर्माण किया ॥ १३ ॥ गृह बोला हे मुने ! ईश्वरका लिंग यहां प्रगटहुआ समुद्रके किनारे प्रकाशित ॥ १४ ॥ उसके स्वामीने यह गृह मोल लिया ॥ १५ ॥ इस स्थानमें पार्वतीपरि स्थित हुए, यह नन्दनका गृह है जो घेदशास्त्रमें पारंगतहै ॥ १६ ॥ हे सिद्धो ! उसनेही हमकों बनाया स्फटिक मणियों सहित रचा है, और यह पुष्प लेनेको क्षीरसागरको गया है ॥ १७ ॥ गृहफे इतना कहनेपर गृहका स्वामी नन्दन गृहको आया, कारंडव (हंस) भापाटीकासमेत-प० २९. (१३१) हेमपुष्पैश्चमुक्ताचंपकपूरिताः ॥ १८॥ कृताञ्जलिपुटोभूत्वा तेपांकृत्वाभिवादनम् ॥ नन्दनोवाच ।। ।। स्वागतंचमहासिद्धा दुर्लभंतवदर्शनम् ॥ १९ ॥ कृतंचदुप्कृतंकर्मएकाकीविचरा म्यहम् ।। साधक उवाच ॥ ॥ ततःपृछाम्यहंबहित्वियादुष्कृतं कृतम् ॥ २० ॥ एकाकीतिटतेचात्रसर्वलोकविवर्जितः ॥ नन्द- नोवाच ॥ ॥ अज्ञानादालभावेनपुरापूर्वेव्यवस्थिताः ॥२३॥ पूर्वकर्मविपाकेनएतत्पापंकृतंमया ॥ शुभवाप्यशुभंवापिभुंक्ते कर्माणिचानध ॥ २२॥ यैष्टिस्फुटितलिंगंदग्धखंडंचमेवच।। समुत्थितंदुच्छ्रितंचापिशिवलिंगंनचालयेत् ॥ २३ ॥ उद्यानज- लमाभावः पुरीपंथेनमास्थिताः ॥ पूर्वकर्मविपाकेनलिंगमुत्पाटि- तंमया ॥२४॥ निस्वासितंयथानागासर्वलोकविवर्जिता ॥ भुजतिसर्वकर्माणिमेकस्तिष्ठाम्यहवनम् ॥ २५ ॥ ब्रह्महत्यासह- स्राणिगोहत्याशतानिच ।। कोटिकन्याहतेपापंपितृमातृवधेनच ॥ ॥ २६ ॥ यत्पापंप्रभवेत्सिद्धोतत्पापंलिंगभग्नकम् ॥ तेनपापेन सुवर्ण पुप्पों तथा मोती चंपक पुप्पोंसे पूर्ण ॥ १८ ॥ अंजलि बांधकर उनसे बोला, नन्दन बोला हे सिद्धो ! स्वागत है आपका दर्शन दुर्लभ है ॥ १९ ॥ मैं दुखपूर्वक अकेला इस घरमें निवास करताहूं, साधक बोले आपने क्या पाप किया सोहम पूछते हैं ॥ २०॥ कि सब मनुष्योंसे पृथक अकेले यहां रहते हो, नन्दन बोला पहले वाल्यावस्थामें अज्ञानसे यहां रहता था ।। २१॥ पहले कर्मके फलसे मैंने एक पाप किया हे साधो!पूर्व किये हुए शुभ वा अशुभ कोंको अव- श्य भोगते हैं ॥ २२ ॥ जिन्होंने ट्टा शिवलिंग अथवा जला हुआ या संडित हुआ देखा उसको उखाडनेसे महापाप होता है । उखडे हुए हिलते हुए शिव- लिंगको न टखाडै ॥२३॥ वनमें जलका अभाव था मार्गमें नगरी थी, पूर्व कर्मके फलसे मैंने लिंगको उखाडा ॥ २४ ॥ जैसे सव नागोंका सब संसार वि. श्वास नहीं करता उसी प्रकार सब कर्माको भोगता हुआ अकेला यहां मैं रहता हूं ॥ २५ ॥ सहस्रों ब्रह्महत्या तथा सैकडों गोहत्या और करोडों कन्या मारनेका व माता-पिताके मारनेका ॥ २६ ॥ जो पाप होता है सो लिंगके रखाडनेसे होता .
(१३२)
केदारकल्प।
संयुक्तनगच्छेच्छंकरालये ॥२७॥ साधक उवाच ॥ ॥ एकाकी
चमुनिश्रेष्टदुःखसागरपीडितः ॥ कस्मिन्कालेभवेन्मोक्षस्तन्मे
बहिमहामुने ॥ २८ ॥ नन्दनोवाच ॥ ॥कोटिसिद्धागमि-
ध्यंन्तिमहापंथस्यदर्शनम् ॥ प्रवक्ष्यामि शैवसवैमममोक्षो भ-
विप्यति ॥२९॥ पूर्वकर्मविपाकेनएतत्पापंकृतमया ॥ भुनज्मि
तेनकर्माणि कस्तिष्टन्महामुने ॥ ३० ॥ यादृशंस्फुटितलिंग
दग्धखंडमहामने ॥ दृष्ट्वाचएवदग्धानिशिवलिंगंनचालयेत् ॥
॥३१॥एवं श्रुत्वाततोसिद्धागंतव्यपवनोयथा।तत्पश्चात्साधकाः
सर्वंगतावैचोत्तरामुखे ॥३२॥
इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेय-
संवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे
शिवदर्शने सदेहकैलासगमने शून्यभवनवर्णनोनाम
एकोनविंशः पटलः॥२९॥
है हे सिद्धो ! उस पापके कारण मैं शिवलोकको नहीं जाताई ॥ २७ ॥ साधक
वाले हे मुनिश्रेष्ठ इस वनमें अकेले निवास करते दुःखसागरसे पीडित होतही
सो किस समयतक तुम्हारा छुटकारा होगा यह मुझसे कहो ॥ २८ ॥ नन्दन
बोला, जब करोडों सिद्ध शिवलोकको जायगे इस मार्गमें दर्शन देंगे तो मेरा
मोक्ष होगा ॥ २९ ॥ पूर्व कर्मके फलसे यह पाप मैने किया, उसका फल भोग-
ताई ॥ ३० ॥ चाहै लिंग फूटा हो जलाहो खंड २ हो उसको देखकर भी न
उखाडै ॥ ३१ ॥ इस प्रकार वचन सुन सिद्ध पवनवेगसे शीघ्र चल दिये उसके
पीछे सब साधक फिर उत्तरकी ओर चले ॥३२॥
इति श्रीफेदारकप भापाटाकायामकोनत्रिंशः पटलः ॥ २९ ॥
भापाटीकासमेत-प०३०. त्रिंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ ॐ अग्रतोदृश्यतेतत्रअपूर्वचममप्रिये ॥ आकाशेउत्तरेभागेईशानेदिग्विभागके ॥ ३॥ ज्वलंतपद्मराग असूर्यकातिसमप्रभम् ॥ ध्वजमालाकुलंदिव्यनगेन्द्रोरत्नपि- तम् ॥ २॥ हेमशृंगेमहाकूटेवदंदृष्ट्वाचकांचनैः॥ द्वादशादि- त्योजान्यंनानारत्नप्रशोभितम् ॥३॥ सहस्रयोजनविस्तीर्णउत्तुंगं बचतुर्गणम ॥ तस्यशृंगेपुरीदिव्यंचित्रकम्मोपशोभितम् ॥४॥ अप्सरोभिःस्थापितलिंगपद्मरागोमयानिच ॥ पूजयंतिमहा दिव्यंत्रिकालंभक्तिवत्सलम् ॥ ५ ॥ त्रिंशत्कोटिसहस्राणि पूज्यतेकन्याकोत्तमा ॥ भेरीमृदंगशब्देनशंखकोलाहलंतथा ॥ ६ ॥ इंद्रभिवंदनिघोंपैस्तालशृंगचमद्दलैः ॥ वंशवा- दत्रयंत्रस्थदिव्यैःपुष्पैःसुशोभिता ॥ ७ ॥ चंदनागरकपूरैर्देव- दारैःफलेस्तथा ॥ कपालैःशंखपालैश्चनानापुष्पैःप्रशोभिता ।। ॥ ८ ॥ आगताचपुरस्थानेद्वारेतिष्ठतिसाधकाः ॥ पुरमध्ये रावजी बोल हे प्रिये ! आगे एक अपूर्व दृश्य दीखा कि उत्तरकी और ईशा. नदिशामें ॥ १ ॥ पनरागमणियोंसे प्रकाशित सूर्यकी समान कान्तिवान् पताफा नाला आदिसे भूपित रत्रोंसे शोभित एक पर्वत है ॥२॥ सुवर्णमय महाफूट शिवरमें सुवर्णसे बंधा हुआ और बारह मूर्यको समान तेजयुक्त रत्नोंसे शोभा- यमान ।। ३ ॥ सहस्त्र योजन विस्तृत तथा चार सहस्र योजन ऊंचा उसके शिम्बर, पर चित्रविचित्र कसे शोभित दिव्यपुरी विराजमान थी।॥ ४ ॥ वहां अपाग- आने पभरागमणि जटित लिंग स्थापित किया है. और तीनों समय भक्तिसहित पूजन करती हैं ॥ ५ ॥ तीस सहस कोटि कन्या प्रगना हैं, भेरी, मृदंग, शंखध्वनिसे कोलाहल करती हैं ॥ ६ ॥ माविमथा "वेदध्वनि वैताल, शृंग, मर्दल, वाँसुरी, आदि बाजार मागिर दिया दिव्यपुप्पोंसे शोभायमान ॥ ७॥ चन्दन जगर कपूर तथा दादा सांस शोभित कपाल शंखपाल आदि अनेक पुप्पोंसे शोमित 11८11मार पर साधकगण उपस्थित हुए टस पुरके मध्यमें बालगु मगृह (१३४) फेदारकल्प। गृहंतस्यबालानसमप्रभा ॥ ९ ॥ उत्तुंगशिखराकारंपाकार तोरणान्वितम् ॥ कपाटार्गलसंयुक्तंवटितंचपुरोत्तमम् ।। १०॥ द्वारोत्पाटितशब्देनद्वारपालेनधीमता ॥ महावीरामहातेजामहा- वलपराक्रमाः॥ ११ ॥ सकरोतिमहानासंसिद्धानांचमहद्रलम् ।। तत्रतेचभयंदृष्टाभयंतबनविद्यते ॥ १२॥ द्वारपालस्वरूपंचदृष्ट्या भीताश्वसाधकाः॥प्रतिहार उवाच ॥ ॥ किमर्थसाधकाःसर्वे ह्यस्थानेचैवगम्यते ॥ १३ ॥ अघोरायभयंदृष्ट्वासर्वतेपांपलाय नम् ॥ तस्यश्रुत्वामहाशब्दमघोरमक्षरंजपेत् ॥ १४ ॥ॐ श्रीं श्रीं श्रीं हुं हुं हुं फट् स्वाहा ॥ इतिमंत्रः॥ ॥ अघोरंचमहा मंत्रसर्वविघ्नक्षयंकरम् ॥ भीताजपित्वामहामंत्रमघोरंदेवदुर्लभम्॥ ॥ १५ ॥ अघोरंजपमानश्चप्रतीहारोवदेत्ततः ॥ वदतेचशुभं वाक्यंविचार्यचपुनःपुनः॥ १६ ॥ सौम्यरूपामहामूर्तिःसर्वा- लंकारभूपिता ॥ नानारत्नविचित्रैश्चबहुवस्त्रैश्चशोभिता ॥ ॥ १७ ॥ स्वागतंचमहासिद्धाकपाटोत्पाटनंकृतम् ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वाकन्यास्तुष्टाहसंतिच ॥ १८ ॥ कन्यकाऊचुः ॥ शित था॥ ॥ ऊंचे शिखर पर्यन्त प्राकार वंदनवारसे भूषित कपाट मूसला- आदिसे वेष्टित नगर था ॥ १० ॥ द्वारपर कहे शब्दसे घुद्धिमान द्वारपालने जो महातेजस्वी पराक्रमी साहसी था ॥ ११ ॥ बड़ा त्रास (भय ) दिखाया तब सिद्धगण महाभयको देख व्यथित न हुए ॥ १२ ॥ परन्तु साधक द्वारपालके स्वरूपको देख भयभीत हुए, द्वारपाल बोला हे साधक ! किस कारण तुम सब इस स्थानमें प्राप्तहुए, और कहां जाते हो ? ॥ १३ ॥ इसप्रकार उसका महाशब्द सुनकर उन्होंने अघोरमन्त्रको जपा ॥ १४ ॥ॐ श्री श्री श्री हूं हूं हूं फट् स्वाहा यह मंत्र है,यह अघोरमहामंत्र सबविनोंका विनाशक है॥१५॥अघोर दुर्लभमंत्रको जपकरतेहुए उन साधकोंसे द्वारपाल शुभवाक्योंको वार २ विचारकर बोला ॥ १६ ॥ सौम्यरूपवती सुन्दर मूर्ति सब आभूषणोंसे तथा अनेक विचित्र रनोंसे भृपित्त, बहुत वस्त्रोंसे शोभित ॥ १७ ॥ कन्या कपाटोंको खोलती हैं, उसका सुन फन्या सन्तुष्ट हो हँसती हुई ॥ १८ ॥ कन्या बोली हे सिद्धो ! कौन - भापाटीकासमेत-प०३०. (१३५) कभुवनागतासिद्धाकस्थानेचैवगम्यते ॥ एतहिमहाचार्यसाध- कोपरिवेष्टितम् ॥ १९ ॥ साधक उवाच ॥ ॥कथयामि- महाकन्याशृणुमेवचनमहान् ॥ ‘आगतामृत्युलोकाचगंतव्यं शकरालये ॥ २० ॥कन्यका ऊचुः ।। ॥ श्रुत्वाचार्यमहा- प्राज्ञरुभक्क्यामहातपाः।। देवीपद्मावतीनामइमा जतिसापुरीम् ॥ २० ॥ प्रवेशंचपुरीरम्यांनादैःस्वभिरलंकृतम् ॥ नृत्यंगीतं तथाकृत्वाआचार्यस्वागतावदेत् ॥ २२ ॥ देवीपद्मावत्युवाच ॥ कभुवनागतासिदाकस्थानेचैवगम्यते । सर्वमाख्याहितत्त्वेनयदि कल्याणमिच्छसि ॥ २३ ॥ साधक उवाच ॥ ॥ शृणुदेखि समासेन एवं कथतिसाधकाः ॥ आगतामृत्युलोकाच गंतव्यं- शंकरालये ॥२६॥ देवीपद्मावत्युवाच ॥ ॥ तिप्टंतिसाधकाः सर्वेनगंतव्यमहापथे ।। कामरूपीस्त्रियासर्वाजरामृत्युविवर्जिताः॥ ॥ २५ ॥ देवोहरिहरीब्रह्मादृश्यतेस्मिन्पुरेसदा । आगच्छंतिचतु- ईश्यांसर्वेभोक्तार्थकारणे ॥२६॥ कात्तिकेचास्विनेमासेझमा- भुवनसे आये और किसस्थानको जातेहो सो सब आप कहो ॥ १९ ॥ साधक बोले हे कन्याओं !! कहते हैं सुनो, हम मृत्यु लोकसे आये हैं शंकरके स्थानको जाते हैं ॥ २० ॥ कन्या वोली हे महाप्राज्ञ ! आचार्य ! शिक्की भक्ति करनेवाली पद्मावती देवी इस नगरीको भोगती है ॥ २१ ॥ इस रम्यपुरीमें अपन शन्दोंसे अलंकृत नृत्य गीत करती वह आचार्योंसे यह स्वागत वचन बोली ॥ २२ देवी पद्मावती बोली हे सिद्धो! किस भुवनसे आते हो किस स्थानको नातेही सो सब ठीक र कहो ? यदि कल्याणको बाहते हो ॥ २३ ॥ साधक बोले, हैदेवि ! संक्षेपसे कहतेहैं सुनो ! हम मर्त्यलोकसे आये और शिवलोकको जातेहैं।। ॥ २४ ॥ पद्मावती देवी बोली हेसायको : तुम सब यहां ठहरो महापंथको मत जाओ, कामकी समान स्वरूपवती स्त्रियां यहां जरामृत्युसे वर्जितहैं ॥ २५ ॥ और इसनगरमें ब्रह्मा, विष्णुमहेश्वर सब चतुर्दशीको भोग करनेको आतेहैं ।। ॥ २६ ॥ कार्तिक आश्विन मासकी अमावस्याके दिन शिवजी मेरे पुरमें क्रीडा केदारकल्प । वस्यायदाभवेत् ॥ तदिनेशिवमायांतिमत्पुरेकीडनायच ॥२७॥ येत्रतिचकेदारंदवानामपिदुर्लभम् ॥ मंदाकिनीमहागंगांस्नात्वा- रेतःपिवंतिच ॥ २८ ॥ पश्यंति च महादेवंकैलासेहरमंदिरे ॥ तस्मात्तिष्ठमहाचार्य जन्भोगान्यथेप्सितान् ॥ २९ ॥ यावदेवे- नपश्यंति उमासात्रिलोचनम् ॥ कुतोहंतत्रतिष्टंतिआचार्य- साधकैः सह ॥ ३० ॥ अवश्यंतत्रगंतव्यकैलासेहरमंदिरे ॥ तदादेवोविरूपाक्षः पश्यंतिसाधकोत्तमम् ॥३१॥ प्रतिमाल- क्षणोपेतंचन्द्रादित्यसमप्रभाम् ॥ कटिश्चनागबद्धाश्चक चहेम- कुंडली ॥ ३२ ॥ ततोदृष्ट्वामहाप्राज्ञाममकन्यानरुच्यते ॥ तस्यतद्वचनं श्रुत्वाप्रस्थितासर्वसाधकाः ॥ ३३ ॥ संप्राप्तासा- धकास्तत्रविमानानिदिशोदश॥ विमानानिसहस्राणिआकाशश्च- समाकुलम् ॥ ३४ ॥ गणगंधर्वसंयुक्तादेवगंधर्वयोपिता ॥ सर्वाभरणशोभाव्यांनानावस्त्रपरिछदाः ॥३५॥ इंद्रकन्याब्रह्म- कन्याहरिकन्यास्तथैवच ॥ कुबेरयक्षणीकन्याचंडकन्यानिलो- करनेके निमित्त आतेहैं ॥ २७ ॥ जो मनुष्य देवदुर्लभ केदारको जातैहै और मन्दाकिनी महागंगामें स्नानकरके जलपान करते हैं ।। २८ ॥ और कैलासमें हर मंदिरके विषयमहादेवका दर्शन करतेहैं, तो मनईप्सित भोगोंको भोगतेहैं इससे यहां रहकर भोगोंको भोगो॥ २९ ॥ साधक बोले जबतक पार्वतीसहित महा- देवको नहीं देखतेहैं, तबतक अन्यस्थानमें हम आचार्य साधक नहीं ठहरसकतेहैं ॥ ३० ॥ अवश्यही वहाँ हरमंदिरको जावेगे, उससमय विरूपाक्ष देवको उन साधकोंने देखा॥३१॥उनकी मूर्ति सुन्दरा लक्षणोंवाली और जिनकी कान्ति सूर्य चन्द्रमा समानहै कमर सपंकेसमान पतली कानों में सुवर्णके कुंडल धारण किये |३२||उसे देख वह बोले हमको कन्या नहीं रुचतांठसका वचन सुन सम्पूर्ण साधक चलदिये ॥ ३३ ॥ फिर साधक वहाँ प्राप्तहुए जहांपर विमान स्थितथे सहस्रों विमानोंसे आकाश व्याप्त था ॥ ३४ ॥ गण गन्धर्व सहित देवता गन्धर्वकी त्रिपां जो सम्पूर्ण आभूपणांसे शोभित अनेफपकारके वस्त्रोंसे आच्छादित थीं ॥ ॥३५॥ इन्द्रकन्या ब्रह्मकन्या तथा विष्णुकी कन्या कुबेर और यक्षोंकी कन्या चंड - भापाटीकासमत-१०३०. चनी ॥ ३६॥ विमानारूढसर्वाश्च अप्सरोगणनेकपा ॥ रन- बंधाविमानानिकामिनीसर्वकामिकाः ॥ ३७ ।। आगताश्चततः कन्याविमानः पुष्पपूरणैः॥शंखदुंदुभिनिषोपभैरीकाहलमईलैः। ॥ ३८॥ पटहावेणुवंशस्यवाद्यतेवहुनेकधा ॥ एतैश्चसहितादेवे- विमानारुढमागताः ॥ ३९ ॥ चामरै-ज्यमानस्तुच्छचोपरि विराजितम् ॥गीतंगायतिगंधर्वार्वाणावायतिसुन्दरी ॥४०॥ संपूर्णचन्द्रवदनारूपयौवनगर्विताः।दिव्यवस्त्रपरीधानंदिव्यगंधा- नुलेपनम् ॥४१॥ शोभिताःशिरसःपुष्पैर्नागवल्लीविभूपिताः॥ करकंकणसंयुक्ताहारकेयूरभूपणाः ॥ ४२ ॥ अशोकपल्लवैर्हस्तै- वदतिकोकिलास्वरम्।यौवनस्थामदोन्मत्ताःसर्वशास्त्रविशारदाः।। ।। ४३ ॥ यत्रस्थानमहावीराःसर्वास्तत्रसमागताः ।। आगता- चसुराःसर्वेगणगंधर्वयोपितः ॥४४॥ देवाऊचुः ॥ ॥ शृणु- साधोमहाप्राज्ञएकचित्तोहिमालयम् ॥ दर्शनेनत्वयासर्वे आग- ताःसुरेनकधा ॥ ४६॥ अहंचप्रेपितःसाधोत्रमाविष्णुमहेश्वरैः ।। कन्यात्रिलोचनी ॥ ३६ ।। सब विमानपर वीं और अनेक अप्सरागणोंसे शोभि- तयाँ विमान रनजतिथे कामसे अधिक सुन्दर कामिनी थी ॥ ३७ ॥ फलोंसे भरे विमानोंपर बदकर आई शंख, दुन्दुभि, भेरीका हल,मर्दल, इनके शब्दोंसे ।। ॥३८॥ तया पटह वेन वाँमुरी आदि अनेक वाजोंसे देवी विमानों में प्राप्त हुई। 1॥ ३९॥चवरासे चालित छत्रको धारे गंधर्व गीतगाते और मुन्दरी वीणा वजाती थीं ॥ १० ॥ पूर्णचन्द्रमाकेप्तमान मुखारविन्दरूप यौवनसे गर्वित, दिव्यवस्त्र धारे सन्दर संगंध लगाये ॥ ४१ ॥ शीस फूलोंसे शोभित नागवल्लीसे भूपित हाथमें कंकग पहने हारबाजूबंदसे शोभायमान ॥ ४२ ॥ अशोकके पत्तोंके सदृश हाय- वाली कोयलके समान मधुरशब्द बोलतों, यौवनसे तथा मदमें उन्मत्त सब शा. स्खोंमें निपुण ॥ ४३ ॥ वे सब उस स्थानमें प्राप्त हुई जहां साधक लोग उपस्थित थे, सब देवतागण गन्धर्व स्त्रियांसहित आये ॥ १४ ॥देवता बोले हे महाप्राज्ञ साधो !! मनो एकचित्तहोके आपके दर्शनोंको सब देखते आये हैं ॥ ४५ ॥ है साधो ! हमको ब्रह्मा विष्णु महेश्वरने भेजाहै देवदेव जगत्पति शिवके लोकको (१३८) केदारकल्प । देवदेवंजगन्नाथंशिवलोकंत्रजंतिच ॥ ४६॥ आरुढाचविमा- नानि शिवलोकेबजाम्यहम्।।तपांचवचनेनैवविमानारूढसाधकाः ॥ ४७ ॥ साधक उवाच॥ ॥ विमाननैवरुच्यतेसत्यंसत्यं- वदाम्यहम् ॥ देवदेवंजगन्नाथंदुर्लभंतवदर्शनम् ॥४८॥ शंक- रस्य प्रसादेनगुरुधर्मबलेनच ॥ वदतिसाधकाः सर्वे पूजयित्वा- प्रयत्नतः ॥ ४९ ॥ तस्यपादौनमस्कृत्यविमानानिचसर्वदाः ॥ यदाहं शंकरोयात्रासाधकोपरिवेष्टितम् ॥५०॥तदादेवस्यरुद्रेण- कैलासेगम्यते ध्रुवम् ॥ विमानानिप्रणम्यंचआचार्यसाधकैः सह ॥५१॥गतातत्रविमानानियत्रब्रह्माहरोहरिः॥ पंथानमुद्यताः सिद्धागच्छंतिचोत्तरामुखम् ॥५२॥ इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेयसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवनमुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शनेसदेहकैलासगमने देवीपद्मावती पुरीवर्णनो नाम विंशः पटलः ॥ ३० ॥ चलिये ॥ १६ ॥ हमारे संग विमानोंपर चढ़के चलिए उनके यह वचन सुन सा- धक विमानापर न चढ़े ॥ ४७ ।। साधक बोले हमको विमान नहीं रुचते सत्य र कहतेहैं देवदेव जगन्नाथका दर्शन परमदुर्लभहै ॥ ४८ ॥ शिवके प्रसादसे तथा गुरुभक्तिसे प्राप्त होतेहैं, यह कह, सब साधकोंने उनका पूजन किया ॥४९॥ और उनके चरणोंको प्रणामकर और इन विमानोंको पूजके कहा जब हम शिव- की यात्रासे लौटें ॥ ५० ॥ तब फैलासमें रुद्रदेवके पास अवश्य जायेंगे, इस प्रकार आचार्य साधकगणोंने उन विमानोंको प्रणाम किया ॥ ५१ ॥ और विमान यहाँ गये जहां ब्रह्माविष्णु महेश्वरथे, वे सिद्धभी और आगेको उत्तरकी और चलदिये ।। ५२ ॥ इति श्रीकेदारकल्प भापाटीकायां पद्मावतीपुरीवर्णनो नाम निशः पटलः ॥ ३० ॥ .
मापाटीकासमेत-१०३१, एकत्रिंशः पटलः। श्रीवर उवाच ॥ ॥ॐ अग्रतोदृश्यतेतत्रपुरीयोपावतीतथा॥ शोभिताचपुरंदिव्यमुदितार्कसमप्रभम् ॥ १ ॥ ईदृशीचपुरीयत्र साधकास्तत्र आगताः ॥ तस्मिनगृहाणिदिव्यानिपद्मरागमया- निच ॥२॥ चंद्रकांतिसमोपेतवैदृर्यमणिरश्मिभिः ।। देवतापूज- विप्यामिकामरूपामहाबलाः ॥ ३ ॥ तदाचरतिरूपाणि श्रीपतेःपुरमुत्तमम् ॥ तत्र स्थाने च ये वृक्षाःसर्वकालेफलांत च ॥ ॥ ४ ॥ नदीचवहतेतववृतंक्षीरमधुःसदा ।। भेरीमृदंगशब्देन- शंखकाहलमईलैः ॥५॥ महागंभीरतरलैर्वाद्यतेवहुयंत्रिणः ।। वायतेतानिनियापैवेशवादिननादितम् ॥ ६॥ उत्साहंदृश्यतेतत्र पदेपदेमहापय एवंरम्यस्थलंहष्ट्वाधवलगृहसंयुतम् ॥७॥ ध्वजमा- लोकुलंदिव्यपद्मनीखंडमंडितम् ॥ दिव्यशब्दमहानादंदीर्घवर्ण- निनादितम् ।। ८ ॥ अग्रतोदृश्यतेतत्रप्रतिहारावदंतिच ॥ महा- उग्रंततोदृष्ट्वारुद्रदेवोप्रतीतिच||९|| त्रिनेत्रंचदशभुजंचन्द्रार्धकृतशे- फिर आगे धोपावतीनामक नगरी देखी वह दिव्यपुरी शोभायमान उदय हुए सूर्यके समान कान्तिमान थी ॥ २ ॥ ऐसी नगरीमें साधक प्राप्त हुए जहां सुन्दर पअराग मणि जटित घर बने थे ॥२॥ चन्द्रमाकी समान कान्तिसे दीतिमान पैदूर्य मणियोंकी कान्तिसे प्रकाशित जहां कामरूप महाबली देवता शिवका पूजन करते थे ।। ३ ।। उस समय नगर अति सुन्दर रूपसे शोभित होता था, उस स्थानमें जो वृक्ष थे सो सब ऋतुओंमें फलते थे ॥ ४ ॥ और वहां घो दूध शह- दकी नदियां बहती थी, भेरी, मृदंग, शंखकाहल मईल आदि वाजोंके शब्दोंसे ॥५॥ तया बडे गंभौर शब्दोंसे अनेक बाजे बजते, बांसुरी आदिकी घनि होती ।। ६ ।। उन्हें उस महापयम पद २ में उत्साह (आनन्द) दीख पड़ता था, इस प्रकार स्वच्छ गृहोंसे व्याप्त स्थलको देख ॥ ७ ॥जो घना मालाओंसे व्याप्त, कमलनौके खंडोंस शोभित, दिव्य व गंभीर शब्दोंसे गुंजारित या ॥ ८॥ आगे वहां द्वारपाल टनको देख बोला जो महातेजस्वी रुदेवके सदृश था ॥९॥ तीन नेत्र, दश भुजा, तया मस्तकपर आधे चन्द्रमाको धारण किये था. त्रिशूल (१४०) केदारकल्प। खरम्॥शूलपाणिवृपारूढंमहाबलपराक्रमम् ॥१०॥भयंकरंभया- गीतातस्यदर्शविलोकितम् ॥ महाउग्रंततोदृष्ट्वामुद्गरंगृह्यताडयत्।। ॥ ११ ॥ तस्यस्वरनिनादेनयथामेघविगर्जितम् ॥ सुमेरो सम तुल्येनभुजादृष्टानसंशयः ॥ १२ ॥ यथाभाद्रपदेमासेवपावपति माधवौ ॥ तथाहितस्यद्वेपेनजलधाराःपतंतिच ॥ १३॥ प्रति- हार उवाच ॥ ॥कभुवनागतासिद्धावस्थानेचैत्रगम्यते ॥ एत- हिममाचार्यसाधकोपरिवेष्टितम् ॥ १४॥ ॥ साधक उवाच ॥ कथयामिमहाबाहोशृणुमेवचनहितम् ॥ आगतामृत्युलोकाञ्चगं- तव्यंशंकरालये ॥ १५ ॥ देवोहरिहरीब्रह्मासदेहोचनिरीक्ष्यते ॥ तत्रस्थानेमहासेनममइच्छागमिष्यति ॥ १६ ॥ प्रतीहार उवाच ॥ ॥ संग्रामदेहिमेवीरागमनंतत्रकारयेत् ॥ योमामजि- त्वासंग्रामेसदेहोनचरक्षति ॥ १७ ॥ मुद्गरंशैलखपंचपूरयित्वा मुहुर्मुहुः ॥ बद्धनेचत्वयासाधोत्युक्तादेहविवर्जितः ॥ १८ ॥ वजंचपटलंदेयमग्रतोवचनंततः॥ दैत्यमुष्टितलंचैवहुंकारंवानगा- डिभीः ॥ १९॥ गर्जयंतिपुरद्वारकंपमानवसुंधरा ॥ सुमेरु सहि- हाथमें धारे बैलपर चढ़े बड़े बल और पराक्रम युक्त ॥ १० ॥ भयंकर उसके दर्शन करके साधक भयभीत हुए, वह बडी उग्न आकृति सहित मुगरको लेकर ताडन करनेको उद्यत था ॥ ११॥ उस शूरका शब्द ऐसा था जैसे मेघ गर्जते हो, सुमेरु पर्वतके समान उसकी भुजा थी ॥ १२ ॥ जैसे भाद्रपद मासमें मेषों की चार वर्षा होती है उसी प्रकार उसके देहसे जलकी धारा गिरती थीं ॥१३॥ द्वारपाल बोला हे सिद्धो! कौन भुवनस आये हो और किस स्थानको जाते हो? सो सब फह मुनाओ ॥ १४ ॥ साधक बोले हे महाबाहो ! मैं कहता हूं मेरा पचन अवण करो हम मृत्युलोकसे आये हैं शिवलोकको जाते हैं ॥ १५ ॥ जहाँ विष्णु शिव ब्रह्मा विराजमान हैं हे महासेन ! हम इस स्थानको जाते हैं ॥१६॥ द्वारपाल वोला हे पौरो ! हमसे संग्राम (युद्ध ) करो तब जाना, जो मुझे युद्धमें जीतोगे तो तुम्हारी रक्षा होगी ॥ १७॥ मुद्दर पर्वत सङ्गको वारंवार पकडकर पाहताह हे साधो ! तुम्हारा वध करके देह वनित करूंगा ॥ १८ ॥ वन पटल, अहण कर मुष्टितल तथा इंफार फरके दैत्योंकी समान गर्नता था ॥ १९ ॥ दार- भापाटीकासमंत-प०३१. (१४१) तोदेवाब्रह्माण्डोकंपतेसदा ॥ २० ॥ स्वर्गमृत्युश्चपातालंडोलयं त्यनिलोयथा ।। नराणांपन्नगानांचवानराह्यामरेश्वरम् ॥ २१ ॥ एवंद्यामहाउग्ररुद्ररूपभयंकरम् ॥ आचार्यसाधकाःसर्वेमृच्छौ गच्छंतितत्क्षणात् ॥२२॥ त्रासितापतिताभूमौयावद्रोदोहमात्र- कम् ॥ उत्थिताचेतनालुब्धोदृष्यामृत्युश्चसंगिनाम् ॥ २३ ॥ आचार्याशंकितास्तत्रस्मरंतिपरमेश्वरम् ॥ तत्क्षणक्षणमात्रंचा- घोरंजपतेमहान् ॥ २४ ॥ अघोरंजपमानश्चसर्वविघ्नायंकरः अथमंत्रः ॥ ॐ हुं हुं नमोनमः फट्स्वाहा ।। क्रोशमाप्रमाणेन युत्तंगःपंचयोजनम् ।। २॥ हेमस्तंभसमालगंघंटाचामरभूपि- तम् ।। ध्वजाकरंशतंजायसवरत्नविभूषितम् ॥ २६॥ गृहमध्ये चहिंदोलंबठानुपुरनादितम् ॥ भूपितंदिव्यगंधैश्चदिव्यवनपरि- च्छदाः ॥२७॥ दिव्यपुष्पशिरोवध्वाहारनपुरभूपिताः ॥ भुपितं पद्मरागंचहेमस्यकंकणकरैः ॥ २८ ॥ हिंडोलयंतितेकन्या- जरामृत्युविवर्जिताः ॥ संप्राप्ताःसाधकास्तत्रभापयंतितप- पर गर्जनसे सम्पूर्ण पृथ्वी कांप उठी, उस समय सुमेरु पर्वत सहित देवता व सब ब्रह्मांड कांप गया ॥ २० ॥ स्वर्ग, मृत्यु, पाताल लोक सवही डोलेके समान कांप उठे, मनुष्य सर्प वानर दैत्येश्वर व्याकुल हुए ॥ २१॥ इस प्रकारकी उग्ररूप दुर्घटनाको देख वे सब आचार्य सायक क्षणमात्रमें मू को प्राप्त हुए।॥२२॥ भयभीतही क्षणमात्र भूमिपर गिरपट्टे फिर उठकर चेतमें आये और आगे इस प्रकार मृत्युको देख ॥ २३ ॥ आचार्यगण परमेश्वरको स्मरण करनेलंग और क्षण- मात्र अघोरमंत्रको जपा ॥ २४ ॥ अघोरमंत्र जपनेसे सारेविन नष्टहुए, द्वारपालने मार्ग देदिया हूँ हूँ नमो नमः फट स्वाहा तब एक कोशमात्र चौडा, पाँच योजन ऊंचा स्यान देसा उसमें ॥ २५ ॥ मुवणके खंभे लगे घंटाचांवरोंसे भूपित सैकड़ों ध्वजाए और रलोंसे जटित था ॥ २६ ॥ और टस गृहके: मध्यमें हिंडोला घंटा धुररसे शब्दापमान मुन्दर सुगंधसे तथा दिव्यवस्त्रोंसे वेष्टित था ॥ २७ ॥ दिव्यशीस फलोंको वाँध, हार पायजेबस भूपित पद्मरागमणि जटित मुवर्णक कंकनोंसे अलंकृत हायवाली ॥ २८॥ जरा मृत्यु रहित कन्या हिंडोलेपर झूलती (१४२) केदारकल्प । स्विनीः॥२९॥ तपश्चिन्य उचुः॥ नानाघोपवतीदेवीभुजंतिविपु- लांश्रियम् ।। शतयोजनविस्तीर्णपुरीकांचनभूपितम् ॥ ३० ॥ पुरीमध्येगृहादिव्या बालार्केणासमप्रभाः ॥ तत्रतिष्टंतिसादेवी शंकरणविनिर्मिता ॥ ३१ ॥ गौरीचसहशाकारंसलिंकारभू- पिता ॥ संप्राप्ताचगृहद्वारेप्रतीहारावदन्तिच ॥ ३२ ॥ प्रतीहार उवाच ॥ ॥ महावीरामहातेजादृश्यतेचमहातपाः ।। साधकाचप्रवक्ष्यामिसर्वपापैःप्रमुच्यते ॥ ३३ ॥ तस्यतद्वच- नश्रुत्वाप्रस्थितासर्वसाधकः ॥ अभिवायततोदेवीवदेयोप- वतीतथा ॥ ३४ ॥ देवीघोपवत्युवाच ॥ ॥गताभुवना सिद्धावस्थानेचैवगम्यते ॥ एतब्रूहिमहाचार्यसाधकापरिवेष्टि- तम् ॥ ३५॥ साधक उवाच ॥ ॥ कथयामिमहादेवीशृणु मेवचनंतथा ॥ आगतामृत्युलोकाचगंतव्यंशंकरालयम् ॥३६॥ देवीघोपवत्युवाच ॥ ॥ शृणुसाधोमहाप्राज्ञममवाक्यंसुनिश्चि- तम् ॥ राजाचित्ररथोनामचक्रवर्तिमहदलः ॥ ३७ ॥ पुन- थीं वहां जाकर साधक उन तपस्विनियोंसे बोले ॥ २९ ॥ तपस्विनी बोली महाराज ! यह घोपवती नाम नगरी अधिक लक्ष्मीसे पूर्ण तथा सौयोजन विस्तृत सुवर्णसे शोभायमान है ॥ ३० ॥ इस पुरीके मध्य दिव्यगृह बाल सूर्यके समान कान्तिमान हैं, यहाँपर वह देवी स्थित है यह पुरी साक्षात् शंकरने निर्माण की है ॥ ३१॥ पार्वतीके समान आकारवाली देवी सब भूषणोंसे शोभित हैं, तब उस गृहके द्वारपर प्राप्त हुए द्वारपालने कहा ॥ ३२॥ द्वारपाल बोला हे महावीर महातेन ! हे महातप ! साधक आप सब पापोंसे छूटे॥३३॥उसका यह वचन सुन साधक लोग यहां देवी के स्थानपरं पहुँचे और देवी घोपवतीको प्रणाम किया३४॥ देवी घोपयती बोली हे सिद्धो! कहाँसे आये हो और कहाँको जातेहो ? हे आ- चार्य ! सो सब कहो ॥ ३५॥ साधक बोले, हे देवि कहता हूं मेरा वचन सुनी, हम मृत्युलोकसे आय और शिवलोकको जाते हैं ॥ ३६॥ देवी घोपवती बोली हे महाप्राज्ञ ! हे साधो ! मेरा वचन सुनी और सत्य २ जानो यहाँका चित्ररथ- नामक चक्रवर्तीराना महाबली है ।। ३७ ॥ तुम उसके पास जाओ तब सिद्ध- भापाटीकासमेत-प०३१. (१४३) खेततःसिद्धाआगताश्चपुरावृता।।अहमीश्वरपार्श्वेनश्वागतापृच्छ- याकृतम् ॥३८॥ पुरीघोपवतीनामतत्रतिष्टंतिसाधकाः ॥ सिंहा- सनानिदिव्यानिहेमरत्नकृतानिच ॥ ३९ ॥ रम्यंतांकन्यकाः सर्वाःसर्वशास्त्रविशारदाः ॥ युवत्यस्तामदोन्मत्ताहारकेयूरभूपि- ताः॥४०॥ संपूर्णचन्द्रवदनाविवस्फुरतितेजसाः॥ मत्तमात्तंग- गामिन्योविस्फुरतिपदेपदे ॥ ४१ ॥ नमंतिमानुभावेनजरा- मृत्युविवर्जिताः॥ जतिसस्त्रियाःसरूपयौवनगर्विताः ॥४२॥ राजभोगसमोपेतानानाभोगसमाकुलाः ॥ तिष्यंतिसाधकाःसर्वे- भुजंतिविपुलांश्रियम् ॥ १३ ॥ साधक उवाच ॥ ॥ तस्मि- स्थानेनमेकार्यसत्यंमत्यंवदाम्यहम् ॥ मयाचतत्रगंतव्यंयत्रदेवो- महेश्वरः ॥४४॥ चित्ररथ उवाच ॥ ॥ स्वर्गलोकेचयेभो- गाकैलाससदृशंगृहम्।।ब्रह्मलोकेविष्णुलोकेचन्द्रलोकेचसाधकाम ॥४५॥ तेनभोगान्महाभोगातत्रभोगायत्रतिष्ठति ।। तत्रस्था- नेमहासिद्धाकिमर्थतत्रगम्यते ॥ ४६॥ देवोहरिहरीब्रह्मादृश्यतेऽ- वहां प्राप्त हुए और बोले हम शिवक समीप जायगे ऐसे पूछा ॥३८॥ उस घोप- वती साधक स्थित हुए वहां दिव्य सिंहासन सुवर्णरत्नोंसेटित थे रम्प कन्या जो संपूर्ण शास्त्रोंमें निपुण यौवनमें उन्मत्त मदवाली हार बाजूबंदोंस भूषिता॥सम्पूर्ण चन्द्रमाक समान मुखारविन्दवाली कन्दूरीके समान ओष्ठवाली मतवाले हा के समान चलनेवाली पद २में चलायमान होती थी ।।४१॥ मानव- भावसे प्रणाम करतींजरामृत्य वजित वह स्त्रियां रूपयौवनसेगवित भोग करती थी इनकोवताकर उसने कहा हे साधकोरानभोगसहित तथा अनेक सांसारिक भागोंसमेत इसस्थानपर ठहरो २ विपुलभोगोंको भोगो ॥ ४३ ॥ साधक वाले इस स्थानमें हमारा कार्य नहीं सो सत्य जानो, हमको वहां जाना है जहां महेश्वर देव हैं ॥ ४२ ॥ चित्ररय बोले यहाँपर स्वर्गलोकके समान भोग हैं और कैलासके सदृश गृह हैं और ब्रह्मलोक, हरिलोक, चन्द्रलोककी समान ॥ १५ ॥ भोगोंको भोगो और यहांपर निवास करो। हे सिहो ! उस स्थानपर क्यों जाते हो ? ॥ १६ ॥ निरंतर यहांपरभी ब्रह्मा विष्ण महेशके दर्शन होते हैं और चतु- (१४४) केदारफल्प। स्मिन्पुरेसदा ॥ आगच्छंतिचतुर्दश्यांसर्वे भिक्षार्थकारणे ॥ १७ ॥ सर्वमेवप्रत्यक्षतेमैत्रस्यसाधकोत्तमम् ॥आगताश्चततःकन्याकी- बेरस्तनयोमहान् ॥ १८ ॥ सर्वारूढविमानानिगजअश्वरथ- स्तथा ॥ निशिवह्निर्यथातेजाउदयेशशिभास्करी ॥ ४९ ॥ त्रिनेत्रंदशभुजायांचन्द्रार्धकृतशेखरम् ॥ दिव्यदेहमहाकायाकीवे- रेनचनासिकाम् ॥ ५० ॥दिव्यवस्त्रपरीधानंदिव्यगंधानुलेपनम्।। दिव्यपुष्पंशिरोवंध्वादिव्यदेहीस्वरूपकम् ॥५१॥ हृदयनाभि- देशेतुपद्मनीसर्वकन्यकाः॥संपूर्णचन्द्रवदनावदंतिकोकिलाश्वरम्।। ॥५२॥ मधुरस्वरगंभीरानागवल्लीरचंतिच ॥ पोडशेर्दिव्यशृंगा- रैस्सवागेसर्वसुन्दरी ॥ ५३ ॥ हेमसूत्रमहारम्यैचलनेत्रैश्चशो- भिताम् ॥ करकंकणसंयुक्तं हारकेयूरभूपिताम् ॥५४॥ज्योतिवं- तोशरीरस्यज्ञानध्यानार्थपारगाः॥ शीलवत्यःसतीसर्वाशिवभ- क्तिवराननाः ॥५५ ॥ एवंसर्वगुणेर्युक्ताराजाराजसुतानिच ॥ तस्यदर्शनमात्रेणसर्वपापैःप्रमुच्यते ॥ ५६ ॥ यत्रस्थानेमहा- दशीको सब भिक्षाके अर्थ आते हैं ॥ १७ ॥ हे साधकोत्तम ! सब प्रत्यक्षही देखलो इतनेमें कन्या और कुवेरके पुत्र प्राप्त हुए ॥ १८ ॥ सब विमानों और हाथी घोडे स्थोंपर चढ़े थे, जिस प्रकार रात्रिमें अनि चन्द्रमा और सूर्यका उदय हो तद्वत् प्रकाशित थे ॥ १९ ॥ तीन नेत्र दस भुना अर्ध चन्द्रमाको मस्तकपर धारण किये दिव्य देह मुन्दर नासिका ॥५०॥ दिव्य वस्त्र मुन्दर सुगन्ध लिप- टाये दिव्य शीशपर फूल बांधे दिव्य स्वरूपवाली ॥ ५१ ॥ हृदय और नाभि. स्थानमें पद्मिनी सम्पूर्ण कन्या पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाली कोयलकी समान बोलती ॥ ५२ ॥ मधुर गंभीरस्वर नागवेल चाव,सालह शृंगार किये सब अंगों में सुन्दर ॥ ५३॥ सुवर्णके डोरे (तार) परम रमणीक चंचलनेत्र हाथमें ककण- धारे हार फेयूरसे भूपित ॥ ५४॥ कान्तिसे प्रकाशित ज्ञान तथा ध्यानमें तत्पर मुशील तथा शिवभक्तिमें परायण ॥ ५५ ॥ इसप्रकार समस्त गुणों में पूर्ण राना और रानपुत्री थीं, उनके दर्शनमात्रसे सम्पूर्ण पापोंसे छट जाते हैं ॥ ५६ ॥ निस स्थानपर साधक उपस्थित थे उनके आगे कामिनी अनेक गीत रागोंसे .
भापाटोकासमेत-प०६१. सिद्धास्तवागंताचकामिनी ॥ अनेकैरागगीतैश्वरमंतिचपठतिच॥ ॥ १७ ॥ अंवकंवरदेकन्यामोहनार्थेसमागताः ।। दिव्यच्छत्र- शिरतस्यघंटाचामरभूषितम् ॥ ५८ ॥ चन्द्रज्योतिर्यथादीतमाग- तासाधकाश्चये ॥ स्वागताभोमहासिद्धाःकन्यास्तत्रवदांतच ॥ ॥ ५९॥ कन्यका उवाच ॥ ॥ भुवनागतासिद्धाकस्थाने- वगम्यते ॥ एतहिमहाचार्यसाधकोपरिवेष्टितम् ।। ६० ।। सा- धक उवाच ॥ ॥ कथयामिमहाकन्याशृणुमेवचनंहितम् ॥ आगतामृत्युलोकाचगंतव्यंशंकरालये ॥ ६१ ॥ कन्यका उवाच ॥ ॥ ममइच्छामहासिद्धावपैविपुलवर्तते ॥ अंवरसुं- दरीसर्वाअधमेवरआगता ।। ६२ ।। तपोवलयुताःसर्वामहातपा- बसाधकाः ॥ उपनिपत्सुवाक्येनप्रजापतिमुखेनच ॥ ६३ ॥ आहुतियज्ञकर्मेणप्रणवेवरसुंदरी ॥ स्वरूपंचततःकन्या भोक्तव्यं- साधकैः सह ॥ ६४ ॥ साधक उवाच ॥ ॥ मृत्युलोकेमहा- कन्याराज्यंचविपुलंमम ॥ अश्वैर्गजरथश्चैवनानारत्नै वसुंधरा ।। ॥६५॥ मातृपितृतथाधातृचंद्रवदनीचकामिनी ।। गर्भवासेन- रमण करती और पाठ करती थीं ।। ५७ ॥ शिवके भक्तोंको सम्मोहनार्थ वे कन्या प्रान हुई, सिरपर दिव्य छत्र घंटा चामरसे शोभित थे ॥ ५८ !! जैसे चन्द्रमाकी कान्ति दीप्त हो ऐसी कन्यायें साधकोंके पास आकर बोली हे महासिदो ! स्वा- गतहो ॥ ५९ ॥ कन्या बोली हे साधक ! कौन भुषनसे आये और कहांको जाते हो सो सब वृत्तान्त आद्योपान्त कहो ॥ ६० ॥ साधक वोले हे कन्याओ ! मेरा वचन सुनो कहताहूं हम मृत्यु लोकसे आये हैं और शिवलोकको जाते हैं ॥६॥ कन्या बोली हे सिद्धो ! हमारी इच्छासे यहां विपुल भोगोंको अनुभव करो, अब तुमको मुन्दर अप्सराएँ प्राप्त ई ॥ ६२ ॥ यह सब सुन्दरी तपस्विनी हैं और आप तपस्वी हैं यह ब्रह्माके मुखसे उत्पन्न हुई हैं ।। ६३॥ उपनिषदके वाक्य, यज्ञ कर्म आहुतिदान ओंकार जपती हुई स्वरूपवती कन्या भोगनी चाहिये ॥ ६४ ॥ साधक बोला मृत्युलोकमें बहुत कन्या तयाअधिक राज्य मेरे यहां है, घोडे हाथी स्थ, तथा अनेक प्रकारके रन, व पृथ्वी । ६५ । माता, पिता, भृत्य, चन्द्र- ॥ (१४६) केदारकल्प । दुःखेनत्यत्वासंसारसागरात् ॥६६॥ कन्यका उवाच ।। प्रसन्नोमेमहासिद्धाकिंकरिष्येत्रिलोचनः । किमर्थवदतेसाधोशं- करस्यपुनःपुनः॥३७॥ दिव्यवस्त्रपरीधानंदिव्यगंधानुलेपनम् ।। भुवाचविपुलान्भोगाजरामृत्यविवर्जिताः ॥ ६८ ॥ आचार्य उवाच ॥ ॥ कैलासंप्रथमदृष्ट्वा उमासात्रिलोचनम् ।। गर्भा- वासविनिर्मुक्तीतस्यदेवेतिगछति ॥६९ ॥ चित्ररथ उवाच ॥ ॥ पूर्वमेवंप्रतिज्ञायांपविचंसाधकैःसह ॥ भुंजंतिविपुलान्भोगान्कि- करिष्यतिशंकरः ॥७० ॥ अस्मिन्स्थानेमहाभोगानक्रीडयंति- मनेऽप्सितान ॥ कोदेशःकासुखंडश्चकोमंडलेकोग्रामयोः॥७१ ॥ कस्थानेवसतेबहिसाधकाश्चमहातपाः ॥ साधक उवाच ॥ ॥ पंचखंडदेशश्चैवमंडलंग्रामयोयथा ॥७२॥ तथाभोमेनाटिका- वसतव्यमममालये ॥ महाकल्पमहाशास्त्रमहापंथंझनुत्तमम् ॥ ॥७३॥ तादृशंपटनाध्यानंत्यत्वासंसारसागरात् ॥ किमभूमं- डलंराजाकिमित्वमत्र आगताः ॥ ७४ ॥ कन्यकासहितं राज्यं वदनी कामिनी हैं इन सबको गर्भवासके दुःखके कारण संसार सागरसे त्यागा है ॥६६॥ कन्या बोली हे महासिद्धो! प्रसन्न हुए शिव क्या करेंगे, हे सायो ! किस लिय वारम्वार शिवरे कहते हो ॥ ६७ ॥ दिव्य वस्त्र पहने दिव्यगंध लगाये जरा मृत्यु वर्जित कन्याओं सहित भोगोंको भोगो ॥ ६८ ॥ आचार्य वोले प्रथम तो कलासम पार्वती सहित शिवका दर्शन करेंगे जिससे गर्भवासके दुःखको न देखें ॥ ६९ ॥ चिनस्य बोला प्रथम सम्पूर्ण साधनो सहित विपुल भोगोंको भोगो शंकर क्या करेंगे ? ॥ ७० ॥ इस स्थानपर मनोभिलपित भोगों सहित क्रीडा करो, हे साधको ! आपका कौन देश कौन खंड कौन मंडल कौन नाम है ॥ ७१ ॥ और कोन स्थानमें निवास है सो सब कहो, साधक बोले पंचखण्ड देशमें रहते हैं ।। ७२ ॥ जैसे इस नगरमें दीखती हैं उसी प्रकार सारी कन्या हमारे गृहमें नि- वास करती हैं, महाकल्प महाशास्त्र है और महापंथ सर्वोत्तम है ।। ७३ ॥ आप संसारसागरको त्याग किस प्रकार चक्रवर्ती राजा हुए और कैसे यहांपर प्राप्त हुए ७४ ॥ और कन्याओं सहित प्रतिष्ठाको प्राप्त हुए राज्य करते हो, चित्ररथ (११७). भाषाकासमेत-प०३१. प्रतिष्टांकिविधिप । चित्ररथ उवाच ॥ ॥ पृथिव्यांदक्षिणे खंडेदेशकालिंजरेतथा ।। ७५ ॥ तत्राहंकृतवानराज्यंनरनारी- समदृशम् ॥ मयाकृतमहापुण्यंमुनयोर्मठदेवलम् ॥ ७६ ॥ कर्तव्यंतपसाभक्तितन्मेसर्वस्यचिन्तये ॥ ध्यायतिशंकरांनत्यं- श्रुत्वाशास्त्रंशिवात्मकम् ॥ ७७ ॥ भावभक्तिसमायुक्ताः पूजयंतिशिवपरम्।।शिवभक्तिचसंसारेपण्मुखंलिष्टतेसदा ।। ७८ ॥ अहमतानभवस्यतेमहतिनगम्यते ॥ यवनारिपेमयाचात्रपुरुपै- भंद उच्यते ॥ ७९ ॥ वांच्छितिशोभनरूपंवासमध्येसुरांगनाः॥ स्वमंचतादृशंदृष्ट्वासाधूनांनचसाधनम् ॥ ८० ॥ देवांगनामध्य- राज्यंप्रतिष्टांशिवशंकरम् ॥ सत्यंशान्तामायांचकन्यासर्वमनो- स्था ॥ ८१ ॥ भुंजतेसावकावीरा जरामृत्युविवर्जिताः ।. सत्यशिल्पलक्ष्मीश्वविज्ञानयानस्थगामिभिः ॥ ८२ ॥ स्तुवंतेः भवसिंधुंचभनवंतास्तनिस्तथा।निरोनवांछितामंक्तिस्तेजोनास्ति- सुन्दरी ॥ ८३॥ विमानानितयोर्मध्येएवं भक्तिसुरांगनाः ।। बोला पृथ्वी दक्षिण खंडमें माल राजदेशमें ॥ ७५ ॥ मैं श्री पुरुषों सहित राज्य करता था, अपने पूर्वसंचित पुण्यसे मुनियोंके मट देवालय बनाता ॥७॥ भनिपूर्वक शिवकै ध्यानमें तत्पर रहता सम्पूर्ण शिवात्मक शास्त्रोंको पढ़ता ।। ।। ७७ ॥ भाव भक्तिसमेत शंकरकी आराधनासे सदाही सन्मार्ग स्थित रहता या ॥ ७८ ॥ अभिमानसे रहित था महत्वपन नहीं करता था, मैं महात्माओंमें भेदभाव नहीं करता था ॥ ७९ ॥ एक समय मनमें देवांगनाओंकी वांडा की और स्वप्न भी साधुओं सहित वैसाही दीसा || ८० ॥ देवांगनाओं के मध्यमें शंक- रका पूजन होरहा है, सत्य शांत क्षमायुक्त सब मनोहर कन्या हैं जागकर शिव- जीको कृपासे यह सब पाया ॥८१ ॥ हे साधक! वीरो यह मय जरामृत्यु रहित कन्या भोगनी चाहिये सत्य शील ज्ञान विज्ञानवान हैं ।। ८२ ॥ धनवान इनके निमित्त अनेक प्रार्थना करते हैं, मनुष्य भक्ति नहीं चाहते सुन्दरी चाहते हैं ।।८३॥ और विमानों मध्यमें देवताओंकी स्त्रियांसप यौवनवती हायोको समान नीली - भाषाशासमेंत-२०३२. (११९) तावत्संख्यावसायुष्ययावचंद्रार्कतारकाः ॥ ९३ ॥ क्रीडतिविषि- वाचेष्टामृत्युलोकेत्रनंतित्र ॥ सर्वलक्षणसंयुक्तासर्वशास्त्रविशा- न्दाः ॥ ९४ ॥ तेजस्वीचमहाप्राज्ञापूर्वजातिस्मरोभवेत् ॥ माधक वाच ।। यदिपुनःमृत्युलोकेगंतव्यंचमहानृप ॥ ९५ ॥ तदाकिंराज्यभोगेनकैलासेचनजाम्यहम्।।सर्वमेवंप्रतिज्ञायामाचा- घंसाधकैः सह ॥ ९६॥ एवंचसुन्दरीसर्वाजरामृत्युविवाजिता ॥ यदि न रुच्यतेसिद्धाजंतुन्यनशक्यते ॥ ९७ ।। नानाचित्र- विचित्राणिपुप्पवयंचशोभितम् ।। कन्याश्चैवततस्त्यताउत्तराभि- मुखेगताः॥९८॥ इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकात्तिकेयसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापये शिवदर्शने सदेहकैलासगमने गजचित्ररथपुरीवर्णन नामकत्रिंशः पटलः ॥ ३१ ॥ हैं॥९३ ॥ जनक प्रकारकी कोटा भोगोंको भोगकर फिर मुत्युलोकमें प्राप्त होते हैं, मव लमणांसे युक्त सब शान्त्रमें निपुण ॥ ९? ॥ तेगसी महाप्राज्ञ होतेहै. फिर जातिका स्मरण होताहै. साधक वोले हेमहानुप! यदि फिरभी मृत्यलोकम जानाहै ॥ ९५ ॥ तो पेसे भागोंसे क्या प्रयोजन है, हम कैलास जाते हैं, इस प्रकार कहकर वचन मन राजा बोले ॥ ९ ॥ हे सिद्धो ! जरा मृत्य वर्जित सुन्दरी यदि नहीं रुची तो ययेच्छित देशांकी जाइये ॥ ९७ ॥ अनेक शोभासे भूपिन पुष्प बॉम अलंकृत कन्याओंको छोर मारक फिर उत्तरको औरको चले ।। ९८॥ अनि श्रीक्लारले नापावीराना त्रिस्यपुरावना नानैतनिशः परः ॥३१॥ द्वात्रिंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच॥ ॥ॐतदापथसमारूढा पश्यतितत्रसाधकाः।। उत्तश्चमहाभागेगंतव्यंयोजनत्रयम् ॥ १॥ तत्रस्थानमहातीर्थ श्रीशिवजी बोले हे महाभागे उस समय पंचपर चट्टेहुए सारक उत्तरकी ओर तीनयोजन नागे बटर ॥ १॥ देवतेहैं कि, टम न्यानमें महातीर्यहे देवभूमि (१४८) कदारकल्प। रूपयौवनसदृशागजलीलाभिगामिनी ।। ८४ ।। जानुबाहुकद- लीस्तंभऊरुस्थलंचमेखला ॥ डिंभंत्रिलालकिश्चैवगीततिनलि- नीरसैः ॥ ८५ ॥ दृश्यते उरस्यवंतीकनकस्थंभवासुकी ।। कर्दशंचकामिन्यांहास्यंपुष्पप्रकाशितम् ॥ ८६॥ पाटपटी- एकुंकुंमेनकीरचंचितनासिकाः ॥ अशोकपल्लवौहस्तौविद्युत्तेजः- समप्रभाम् ।। ८७॥ प्रकाशचन्द्रवदनाबिम्बोष्ठीकोकिलास्वरी।। पद्मपत्रविशालाक्षीरूपयौवनगर्विताः ॥ ८८ ॥ उद्धृतं चैवतां- बूलंगमनंहंसगामिनी ॥ मृगाक्षीचन्द्रवदनीअरावलीप्रवालकम्।। ॥ ८९ ॥ करकंकनसंयुक्ताःहारकेयूरभूपिताः ॥ तपस्विनी महाश्रेष्टामनोवेगामहासती ॥ ९० ॥ सर्वशास्त्रसमायुक्ताः ज़रामृत्युविवर्जिता॥ आगच्छतिचतुर्दश्यांसवेभिक्षार्थकांक्षिणः।। ॥९१ ।। साधक उवाच ॥ ॥ कियत्तभोगमायुष्यंपश्चात्तु- किंभविष्यति ॥ तत्सर्ववदमेराजन्महातेजामहातपाः ॥ ९२ ।। चित्ररथ उवाच ॥ ॥ स्वरूपचारुसंयुक्तं नानाभोगचभुञ्जते । गतिवाली ।। ८४ ॥ जंघापर्यन्त लम्बायमान भुजा, केलेके खंभके समान जघा- वाली मेखला धारण किये सुन्दर अलकों सहित मधुर गीतगान करतीं ॥ ८५ ॥ हृदयमें मुवर्णकी माला सर्पवत् विराजती कर्दल शंखकी समान कामिनी पुष्प- सिलनेकी समान हास्य ॥ ८६ ॥ कुकुंमसे लिप्त हुई तोतेकी समान रचित ना. सिका, अशोकके पत्तोंके समान रक्त हाथ, विनलीकी समान कान्तिवाली॥ ॥ ८७ ॥ चन्द्रमाके समान मुखवाली कन्दूरीके सदृश होंठ, कोयलकेसे वैन, कमलकेतुल्य फैले नेत्र रूपयौवनमें भरी ॥ ८८ ॥ पान चावे, हाथीके समान बलतों, मृगकेसे नेत्र, चन्द्रवदनी, मुंगेकी माला धारे ॥ ८९ ॥ हाथमें कंकण पहने हार बानूवंदोंसे भूपित, तपस्विनी अतिश्रेष्ठ महासती ॥ ९० ॥सवशास्त्रों- में निपुण जरामृत्यु पर्जित चतुर्दशीको सब भिक्षाफे कारण यहांपर आतीहैं । ॥९१॥ साधक वोले यहां कितना भोग और मिलती है पश्चात् क्या होता महातप! हेराजन् ! सी मब कहिये ।। ९२ ॥ चित्ररथ बोला सुन्दर स्वरूप. फन्या तथा अनेक भाग और आयु जबतक चंद्रमा तारहें तबतक प्राप्त होती भाषाटीकासमेत-५० ३२. तावत्संख्यावसायुष्ययावचंद्रार्कतारकाः ॥ १३॥ क्रीडतिविवि- धाचेष्टामृत्युलोकेनजतिच ॥ सर्वलक्षणसंयुक्तासर्वशास्त्रविशा- रदाः ॥ ९४ ॥ तेजस्वीचमहाप्राज्ञापूर्वजातिस्मरोभवेत् ॥ साधक उवाच ।। यदिपुनःमृत्युलोकेगंतव्यंचमहानृप ॥ ९५ ॥ तदाकिराज्यभोगेनकैलासेचबजाम्यहम्।।सर्वमेवंप्रतिज्ञायामाचा- यसाधकः सह ।। ९६॥ एवंचसुन्दरीसर्वाजरामृत्युविवर्जिता ॥ यदि न रुच्यतेसिद्धानजंतुव्यंनशक्यते ॥ ९७ ॥ नानाचित्र- विचित्राणिपुष्पवस्त्रंचशोभितम् ॥ कन्याश्चैवततस्त्यक्ताउत्तराभि- मुखेगताः ॥ ९८॥ इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेयसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहकैलासगमने राजचित्ररथपुरीवर्णनं नामैकत्रिंशः पटलः ॥ ३१ ॥ १९३ ॥ अनेक प्रकारकी क्रीडा भोगोंको भोगकर फिर मृत्युलोकमें प्राप्त होते हैं, सब लक्षणांसे युक्त सब शास्त्रमें निपुण ॥ ९४ ॥ तेजस्वी महाप्राज्ञ होतेहैं. फिर जातिका स्मरण होताहै. साधक बोले हेमहानुप! यदि फिरभी मृत्युलोकम जानाहै ॥ ९५ ॥ तो ऐसे भोगोंसे क्या प्रयोजनहै, हम कैलासको जातेहैं, इस प्रकार कहकर वचन मुन राजा बोले ॥ ९६ ॥ हे सिद्धो ! जरा मृत्यु वर्जित मुन्दरी यदि नहीं रुचती तो यथेच्छित देशोंको जाइये ।। ९७ ॥ अनेक शोभासे भूपित पुप्प वस्त्रोंसे अलंकृत कन्याओंको छोड़ साधक फिर उत्तरको औरको चले ॥ ९८॥ इति श्रीकेदारकल्पे भापाटीकाया चित्ररथपुत्रिर्णनो नामैकत्रिशः पटलः ॥ ३१ ॥ द्वात्रिंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच॥ ॥ॐ तदापर्थसमारूढाःपश्यतितत्रसाधकाः ।। उत्तरश्चमहाभागेगंतव्यंयोजनत्रयम् ॥१॥ तत्रस्थानमहातीर्थ श्रीशिपनी बोले हे महाभागे उस समय पेयपर चढ़े हुए सापक उत्तरकी ओर तीनयोजन आगे बढकर ॥ १॥ देखतेहैं कि, उस स्थानमें महातीर्थहै देवभूमि (१५०) कंदारकल्प । देवरमणीयभूमिकाः॥ मन्दाकिनीमहागंगाअतिरम्यामनोहरा ॥ ॥२॥लहरीतरंगगंभीरफेनावंर्तसमाकुलम् ॥ उभयोस्तटपाखें- तुसर्वलोकइदंउभा ॥३॥ तत्रहेममयाभूमौयत्रसावहतेनदी । सुवर्णचेलुकास्तत्रपंकजाविपुलानिच ॥ ४॥ तस्यगंगामहातोय- ममृतंचप्रवाहकम् ॥ घृतक्षीरमधुस्वादअतिस्वादुसुशीतलम् ॥५॥ जलक्रीडा प्रकुवैतिदेवकन्याह्यनेकधा ॥ यौवनस्थामदोन्मत्ता- मत्तमातंगगामिनी ॥ ६॥ सुरनदीतटेतोरेबहुपुष्पफलैस्तथा ।। देवतावृक्षरुपेणवदंतिसाधकोत्तमम् ॥७॥ सुवर्णपक्षिकास्तत्र- नदीपापप्रणाशिनी॥८॥ वृक्ष उवाच ॥ साधुसाधुमहाप्राज्ञा- पुनःसाधोमहातपाः ।। एवंचवदतेवृक्षावुद्धिंदद्यात्तुसाधकाः॥९|| इमांमंदाकिनीपुण्यपूजयित्वामहेश्वरम् ॥ अष्टोत्तरशतमंत्रमधोरं-. जपतेमहान् ॥ १०॥ ॐ हुँफटूस्वाहा ॥ जपितातस्यमंत्रेण- श्रूयतेशंखयोर्ध्वनिः॥ सन्मुखंपश्यतेस्तत्रदृश्यतेपंथनिर्मलम् ।। ॥ ११ ॥ अग्रेवंचपश्यतिईशानीदिशिसन्मुखैः ।। अघोरंच- महामंत्रंमहापातकनाशनम् ॥ १२॥ महाविघ्नहरेन्नित्यंमहासिद्धि- अतिरमणीकहै, मन्दाकिनी महागंगा अतिमनोहरहै ॥२॥ जिसकी लहरें तरंग अतिगंभीरहैं, फैनवालीहैं, उस नदीके दोनों किनारोंपर दाडिम वृक्ष लहलहातह।। ।॥ ३ ॥ वहां सुवर्णकी भूमि थी जहाँपर वह नदी बहतीथी सवर्णके वृक्ष व कमल लगेथे ॥४॥ उस गंगाका मुन्दर जल अमृतके समान प्रवाहित था, घी दूध शहद को समान स्वादिष्ट शीतल जल है ॥ ५ ॥ देवकन्यायें जलमें अनेकप्रकारको कीडा करताहैं जो यौवनमें भरी मदस पूर्ण मदवालं हाथोकी समान गमन शील हैं ।। ६ ॥ उस देवनदी किनारे अनेकप्रकारके फूल फल खिलथे और देवता पृत रूपाम टन साधकोंसे वोलतेथे ॥ ७ ॥ मुवर्णके पक्षीथे नदी पापोंकी नाशा थी ।। ८ ॥ वृक्षवोला हे साधी ! हेमहातप ! महाप्राज्ञ ! इसप्रकार ये वृक्ष बोलतेये ॥९॥ सिद्धान रस पवित्र मंदाकिनी नदीके तटपर महेश्वरका पूजन पर एफसी आठवार अघोरमंत्र जपा ॥ १० ॥ हुं फट् स्याहा इस मंत्रका जपकर सिध्यनि मुनी, और सन्मुस निर्मल पंथ देसा ॥ ११॥ आगे ईशानकी और चले टस अपार मंत्र जपनेसे महापातफ नष्ट हुए ॥ १२ ॥ नित्य घडे २ - भाषाटीकासमंत-प०३२. (१५१) प्रदायकम् ॥स्मृत्वातेनमंत्रणपंथतिप्टंतितत्क्षणात् ॥ १३ ॥ अतितेनमार्गेणवेगेनपवनोयथा ॥ आश्रमंदृश्यतेतत्रध्वजा- मालाकुलैर्महत् ॥ १४ ॥ पश्यंतिसाधकाःसर्वेत्रिपथोतवदृश्यते संप्राप्तसाधकास्तरक्षणमेकंएतंतिच ॥ १५ ॥ ततःपश्यति मार्गेणईशानंचदिशोदिशम् । सन्मुखंतत्रपश्यतिकैलासनामपर्व तम् ॥१६॥शंकरस्यप्रियोनित्यंसर्वदेवलयंकृतम् ॥ श्वेतवर्ण गिरिशृंगेसंविभेदविवर्जितः ॥ १७॥ अधऊईमंडलाकारंमध्य स्थलोमहागिरिः ॥ मृदंगाकृतिरूपेणदृश्यतेपर्वतोत्तमम् ॥ ॥ १८ ॥ अशीतिशतसहस्राणिउत्तुंगोयोजनमहान् ॥ त्रिंश- शतसहस्राणिअधउद्धेप्रकीर्तितम् ॥ १९ ॥ पर्वतेचमहारम्ये सूर्यकोटिसमप्रभा । गृहाणिचसतांतत्रसहस्रयोजनानिच ॥२०॥ नामधारणहश्यतेनानारत्नविभूषितम् ॥ श्वेतपीतंतथारक्तंश्याम- वर्णतथैवच ॥ २१ ॥ पंचवर्णपताकाचश्यतेपयनरिता ॥ क्षणैःमणैवतिष्टंतिदीपमालाविभूषितम् ॥ २२ ॥ स्तंभहेमम- वित्रों नाशक परम सिद्धिके दायक उस मंत्र जपनसे तक्षण सव मार्ग. स्मरण हुआ ॥ १३ ॥ रस मार्गद्वारा पवनके समान चले और आगे धनामाला- ऑसे मुशोभित स्थान देखा ॥ १४ ॥ सब साधकोंने वहाँ त्रिपय (तिराहा देखा और वहां क्षणमात्रको वैठे ॥ १५ ॥ तब ईशानकी ओर दृष्टि दी तो सामने कै. लासनामक पर्वत दीव पहा ॥ १६ ॥ जो शिवका मिय और निवासस्थान है स्वच्छ श्वेतवर्ण जिसके शिखर संधिभेद रहितहैं ॥ १७ ॥ नीचे कपर मंडलाकार तथा बीचमें स्सूलपर्वतहै ऐसा मृदंगकी समान आकारवाला दीखा ॥ १८ ॥ अस्सी सहस पोजन ऊंचा तथा तीससहन योजन नीचे ऊपरका घेरा था। ॥ १९ ॥ परमरमणीक पर्वतपा कोटिसूपंती समान फान्तियी और वहाँ सहय योजनमें महात्माओंके घर बनेये ॥ २० ॥ नामोंसे अंकित नानारत्नोंसे शोभित अत पातरक्त तया श्यामवर्ण ॥ २१ ॥ पाँचवर्णकी पताका पवनसे उडतीहुई दीय पडी क्षण २ में दीपमालाफे समान शोभा होतीयी ॥ २२ ॥ मग स्तंभ चन्द्र- (१५२) केदारकल्प। यासर्वचन्द्रकान्तिसमप्रभा ॥ कर्मधर्मसमायुक्तस्फुरतिकिरणा- न्वितम् ॥ २३ ॥ सुवर्णकेतकीजातितथाजायीचपाडली ॥ सुवर्णपिकास्तत्रपंकजांविपुलानिच ॥ २४ ॥ पंचपुप्पमहा- मालावेष्टितंधवलगृहम् ॥ इन्द्रनीलमहानीलध्वजमालाचवेष्टि- तम् ॥ २५ ॥ यथारुद्रसमर्थस्यतथासर्वचमन्दिरम् ॥ गृहे तस्मिंस्थिताकन्यादिव्याभरणभूपिता ॥ २६ ॥ त्रिनेत्रंदश- भुजंयांचन्द्रार्धकृतशेखरम् ॥ गणगंधर्वदेवस्यसर्वशास्त्रविशा- रदाः॥ २७ ॥ मुनयःसहितादेवागंधर्वासुरपन्नगाः ॥ दश- बाहुंत्रिनेत्रंचत्रिशूलंकरपल्लवैः ॥ २८ ॥ अजराअमरावृत्तां कैलासस्यमहदलम् ॥ अतिकौतूहलस्तवतस्यवासोनवि- द्यते ॥ २९॥ संप्राप्तासाधकास्तबकैलासस्यसमीपथे ॥ दृष्ट्वा सुतद्रूपंचैवसाधकाविस्मयंगताः ॥ ३० ॥ यावदोदोहमात्रेण मूलीगछंतिसाधकाः ॥ आचार्यचेतितास्तत्रस्मरंतचमहेश्वरम् ॥३१॥ शिवस्मरणमात्रेणदृश्यतेपंथनिर्मलम् ॥ पुनश्चैवततो चार्यअघोरमक्षरंजपेत् ॥ ३२॥ अघोरंचमहामंत्रसर्वविघ्नक्षयं माके समान कान्तियुक्त, धर्मकर्म सहित किरणोंसहित प्रकाशित होतेथे॥२३॥ सुवर्णकी केतकी जायी पाडली चंपिका अनेक कमल ॥ २४ ॥ पंचपुप्पोंकी मा- लासे स्वच्छगृह वेष्टित थे, इन्द्र नील महानील मणियोंसे ध्वजा माला आदिसे व्याप्तं थे ॥ २५ ॥ जैसे रुद्रके मंदिरथे उसीप्रकार सबके मंदिरथे, उनमें सब आभूषणोंसे भूपित कन्या विराजमान थीं २६ ॥ तीन नेत्र दस भुजा आधे चन्द्रमाको मस्तकपर धारणकिये गणगन्धर्व देवता सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पारंगत ॥ ॥ २७ ॥ मुनिसहित देवता, गन्धर्व, मुर, सर्प,दसभुजा तीनने हाथों में त्रिशूल धारे ॥२८॥ अजर अमरदुए फिरतेथे, इसमकार कैलास पर्वतका बल था अति कौतूहलसे सब वहां निवास करतेथे ॥ २९ ॥ साधक कैलासके समीपमें गये और उसका स्वरूप देखकर आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥ ३० ॥ गोदोहनकालतक साधक मूर्दाको प्राप्तहुए, और महेश्वरका स्मरण किया ॥ ३१ ॥ शिवके स्मरण करतेही पंप निर्मल दीखाडा, फिर आचार्योंने अपौरमंत्रको जपा ॥ ३२ ।। अपौर महामंत्र समस्त विनोंका नाशकहे विधिपूर्वक अष्टोत्तर शतनाप भाषाटीकासमेत-१० ३३. करम् ॥ अष्टोत्तरशतंतत्रजाप्यंकृत्वायथाविधि ॥ ३३ ॥ ॐ हुं फट् स्वाहा ।। अघोरंचमहामंत्रंदुलभदेवदानवम् ॥ दुर्लभ गणगंधैर्दुर्लभंमुनिपन्नगैः॥ ३४दुर्लभंतत्पदंसवॆदुर्लभ्यमितरै- जनैः॥ सिद्धमंत्रमहामंत्रमहापंथप्रदायकम् ॥ ३५ ॥ येनमंत्र- प्रभावेणसदेहंशंकरालये ॥ मोहितादेवदेवेनसंप्राप्ताच त्रिपंथकम् ॥ ३६॥ जपितासिद्धमंत्रणभुवंपश्यतितेगिरिम् ॥ जयशब्दंप्रकु- वन्तिसाधकावदतेध्रुवम् ॥ ३७॥ इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेयसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शि- वदर्शने सदेहकैलासगमने विपंथदर्शनोनाम द्वात्रिंशः पटलः ॥३२॥ किया॥३३॥ॐ हुं फट् स्वाहा अधोरमंत्र देवता तया दैत्योंको परमदुर्लभहै।॥३४॥ परम सिहि महापंथका देनेहाराहै ॥ ३५॥ जिस मंत्रके प्रभावसे साधकगण देह- सहित शिवलोकमें प्राप्त हुए ॥ ३६ ॥ उस सिन्दमंत्रको जपकर पर्वतकी भमिको देखा, और सबसाधकोंने जय २ वनि उच्चारण की ।। ३७ ॥ इनि श्रीकेदारकल्पे भाषाटीकाया निपथदर्शनो नाम द्वात्रिंशः पटलः ।। ३२ ।। त्रयस्त्रिंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ पृच्छंतिसाधकाःसर्वेशाचार्यकथयस्वमे ।। कुतश्चैवतुगंतव्यपथंचैवपृथक्पृथक् ॥ १ ॥ आचार्य उवाच॥ ब्रह्माणशंकरचैवविष्णुलोकेयथोत्तमम् ।। दृष्ट्वातथैवेशानस्यत्रयो मार्गाः प्रकीर्तिताः ॥२॥साधक उवाच ॥ ब्रह्मलोकेचये शिवनी बोले तब सम्पूर्णसाधक कहने लगे हे आचार्य ! सबमार्ग पृया २ जाते हैं किस ओर जाय सो कहिये ? ॥१॥ आचार्य बोले यह ईशानरी आरके तीनों मार्ग ब्रह्मलोक विष्णलोक तया शिवलोकह ॥ २ ॥ साधक बोले हे (१५४) केदारफल्प। भोगाआचार्यकथयस्वमे ॥ विष्णुलोकेचयेभोगाकथनीयंत्वया प्रभो॥३ ॥ रुद्रलोकेचयेभोगाममागेकथितंत्वया ॥ ब्रह्मलो- केचयेभोगारूपवन्तः प्रयत्नतः ॥ ४ ॥ कथयामिविशेपेण कथयामिकथा:शृणु ॥ विष्णुलोकेचयेभोगाकथयामिप्रयत्नतः।। ॥५॥ रुद्रलोकेचयेभोगाकथयायिकथामिमाम् ॥ विस्तार कुरुताचार्यसाधकंवचनंवदेत् ॥ ६ ॥ आचार्य उवाच ॥ ॥ ब्रह्मलोकेविष्णुलोकेशिवलोकेविशेषतः ॥ त्रिपुलोकेपुयेभोगाः कथयामिशृणुतत्त्वतः ॥ ७ ॥ ब्रह्मणासदृशंरूपमुकुटकुंडलभूप- णम् ॥ ८ ॥ चतुर्वकंचतुर्बाहुबलाणीसहशीस्त्रियः ॥ अप्स- राणांतुलकविमानारूढकामिनी ॥ ९ ॥ चतुर्वश्चतुर्वेदानु- चरंचमुहुर्मुहुः ॥ अष्टादशपुराणानिनवव्याकरणानि च ॥१०॥ रत्नमालापुष्पमालाशिखाकंठेप्रशोभिता ॥ खेतंपीतंतथाकृप्णं- नीलंरक्तंज्वलंतिच ॥ ११ ॥ शिरोमणिसुन्दरेणकनकसूत्रेण- कुण्डलाः॥ सर्वागुणसमोपेताः वर्जन्तेह्यजरामराः॥१२॥ भंगेन- चन्द्ररेखस्यतपंतिप्रचरंतिच॥उद्गालयंतितांबूलरुपयौवनगर्विताः॥ आचार्य ! ब्रह्मलोकमें जो भोगहें सो कहो और विष्णुलोकके भोगोंको वताओ। ॥३॥ और शिवलोकमें जो भोगहें उनको मेरे सामने वर्णन करो ॥ ४॥ आ- चार्यने कहा मैं कयाको कहताहूं मुनो विष्णुलोकम जो भागहैं उनको कहूंगा ॥ ॥५॥ और जो शिवलोकमें भोगहें सोभी कहताहूं विस्तारपूर्वक ऐसा साधकों- से आचार्य ने कहा ।। ६ ॥ आचार्यबोला शिवलोक ब्रह्मलोकमें जो २ कुछ भोग, सो सब कहताहूं ॥ ७ ॥ ब्रह्मलोकमें ब्रह्माके समान रूप मनोहर कंडल धारण किये ॥ ८ ॥ चार मुख, आठभुजाकै मनुष्य तथा ब्रह्माणीके सदृश स्त्रियाहैं, तथा एक लक्ष अप्सरा विमानोंपर चढ़ी हुई कामिनी हैं ॥ ९ ॥ चारों मुखोंस चारों वेद वारम्वार उच्चारण करती हैं और अठारहपुराण व्याकरण ॥ १० ॥ और रत्नोंकी माला फूलोंकी माला शिखा व कंठम शोभित होरहीहैं, श्वेत,पाली, कृष्ण नील लाल चरणकी कान्तिवाली ॥ ११॥ शिरोमणि तथा फंडल मुवर्ण- सूत्रोंस बंधे शोमा देरहह सब गुणास पूर्ण अजर अमर उपस्थितहैं ॥ १२ ॥ भोग सहित माथेपर चन्द्ररेखा धारे तप फरती ताम्बूल चावे रूपपौषनसे गर्वित
भाषाटीकासमेत-प०३३.
(१५५)
॥ १३॥ हिंडोलयंतिताःकन्यासुताश्चचतुराननाः ।। तासांदर्शन-
देहस्यदिव्यकांतिसमग्रभाः ॥ १४ ॥ शतयोजनविस्तीर्णमुत्तुं-
गोचचतुगुणम् ॥ इन्द्रनीलमहानालै पद्मरागोपशोभितम् ॥१६॥
ब्रह्मलोकेचयेभोगाब्रह्मणःसममायुपम् ॥ कस्मिन्कालेचसंप्राप्त-
मृत्युलोकेत्रजंतिच ॥१६॥ सर्वकामसमृद्धश्चजायतेविपुलेकुले।
सर्वर्गुणैःसमोपेतोराजाप्यथभविष्यति ।।१७।। चक्रवर्तीभवेद्राजा-
जातोजातिस्मरोभवेत् ।। स्मरंतिपूर्वकमाणिस्मरीतचमहापथम् ॥
॥ १८ ॥ पुत्रपौत्रसमायुक्तंवामावर्तिसुलक्षणी ॥ एवंभोगंमहा-
भोगान्ब्रह्मलोकेव्यवस्थिताः ॥ १९ ॥ तिष्टंतिसाधकाःसर्वेयाव-
देवोप्रजापतिः ॥ स्मरंतिपूर्वचरितंस्मरंतिचमहापथम् ॥ २० ॥
उत्तमेचकुलेजन्मब्रह्मलोकपुनर्बजेत् ॥ ब्रह्मलोकेपर्दछतेगंतव्यं-
पथदक्षिणे ॥ २१ ॥
इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेयसंवादे-
पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे
शिवदशने सदेहकैलासगमने ब्रह्मलोकवर्णनो
नाम त्रित्रिंशः पटलः ॥३३॥
॥ १३ ॥ कन्या हिण्डोलोंपर झूलती तया ब्रह्माकी पुत्री विहार करतीहैं देखने
दिव्यदेह सुन्दर शोभावाली हैं ।। १५ ।। वह लोक सौ योजन चौडा तथा चौ.
गुनालांचाहै, इन्द्रनील महानील पद्मराग मणियोंसे शोभितहै ।। १५ ॥ ब्रह्मलोक.
के यह भोगहैं कि ब्रह्माके समान आयु होतीहै, किसीसमपमें मृत्युलोकको प्रात
होतेहैं ।। १६ । सम्पूर्ण कामाम सम्पन्न धनवान् श्रेष्ठकलमें जन्म होता है. सब
गुणोंसे युक्त ॥ १७ ॥ चक्रवर्ती राज्य करताहै, पश्चात् जातिका स्मरण होतोह,
और पूर्वकमाको तया महापंयको भी स्मरण करतेहैं ॥ १८ ॥ पुत्र पौत्र सहित
लक्षों स्त्रियां होतीहैं इसप्रकारके भोग ब्रह्मलोकमें विद्यमानहै ॥ १९ ॥ और सब
साधक तबतक स्थित रहते हैं, जबतक ब्रह्मा रहते हैं, तयापूर्वचरित्र ओर महापं.
थका स्मरण होताहै ॥२०॥ उत्तम कुलमें जन्म तया वार २ ब्रह्मलोफमें जात
ह,ब्रह्मलोकके मार्गको इच्छावाले दक्षिणमार्गसे जातहैं ।। २१ ।।
इति श्रीकेदारकल्प नापाटीकाया अमटोफानो नाम प्रयस्त्रिंशः पटलः ॥१३॥
(१५६) केदारकल्प। चतुस्त्रिंशः पटलः। श्रीसाधक उवाच ॥ ॥ ॐ ब्रह्मलोकनमेकार्यसत्यंसत्यंवदा- म्यहम् ॥ विष्णुलोकेषुयेभोगाकथयस्वमहागुरो ॥ १ ॥ आ- चार्य उवाच ॥ ॥ विष्णुलोकेषुयेभोगाकथयामितवशृणु ॥ शंखचक्रगदापद्मशारङ्गायुधमुत्तमम् ॥२॥ चतुर्बाहुंमहात्मा- नश्यामवर्णमहाद्युतिम् ॥ विजयंतिसुराःसर्वेयत्रदेवोजनाईनः ॥ ३ ॥ दशलक्षंचविस्तीर्णमुछायोदशयोजनम् ॥ विमान- कामिनीदिव्यंपद्मरागोपशोभितम् ॥ ४॥ द्वयंलक्षसहस्रा- णिकन्यासर्वाचतुर्भुजी ॥ यौवनस्तामदोन्मत्तागतिहंसग- जोगतिः ॥ ५ ॥ लक्ष्मीचसशासासर्वाभरणभूपिताः ॥ विष्णुलोकेमहावीरा क्रीडयंतिमहातपाः ॥ ६॥ गतारूढासुखा- सीनारथारूढामहाबलाः ॥ शंखचक्रगदाहस्तंयथाआयुधकेश- वम् ॥ ७ ॥ विष्णुलोकेषुयेयांतिविष्णुतुल्यमहायुपम् ।। कस्मि- न्कालेचसंप्राप्तेमृत्युलोकेवजतिच ॥ ८॥ चक्रवर्तीभवेद्राजा- साधक बोले ब्रह्मलोकमें हमारा कार्य नहीं विष्णुलोकके भोगोंको वर्णन करो ॥ १॥ आचार्य बोले, हे साधक ! विष्णुलोकमें जो भोगहें उनको कहताई मुनो वहां शंख, चक्र, गदा, पद्म, शाहूआयुध धारण करतेहैं ॥ २॥ चार भुनापाले महात्मा श्यामवर्ण अतिकान्तिमान सम्पूण देवता आनन्द करतेहैं जहां जनार्दन दंघ (विष्णु) विद्यमानहैं।॥३॥ यह लोक दस लक्ष योजन चौडा तथा दस लाख योजन लंबाहै, दिव्पविमान तथा पद्मरागमणियोंसे शोभायमानहै ॥ ४ ॥ दो महस्र लक्ष कन्या चतुर्भुज यौवनसे भरी मदमें उन्मत्त हम व हायीकी समान गमन शील ॥५॥ लक्ष्मीको समान सब आभूपोंसे भूपितहैं इसप्रकार विष्णु- लोरमें कीडा करती हैं ॥६॥ गनपर तथा मुखपूर्वक रथपर चढ़ी शंख,चक्र, गदा, पम हायमें धार हैं ।। ७ ।। जो विष्णुलोकमें जाते हैं उनको विष्णलोक ममान आयु मिलती है, और किसी समपही मृत्यु लोकको प्राप्त होते हैं। ८॥ यमयी गना होकर पचात् नातिका स्मरण होता है, पुन पोन भापाटीकासमेत:५० जातोजातिस्मरोभवेत् ॥ पुत्रपौत्रसमायुक्तंधनधान्यसमाकुलम्।। ॥ ९॥ कामवंतोतेजवंतोजायतेविपुलेकुले ॥ दीर्घायविपुलान् भोगान्महावलपराक्रमम् ॥ ३० ॥ दारेचतिष्टतेसैन्यमश्वनाग- एनेकपा ।। सतजन्मभवेद्राजाह्यजितोनात्र संशयः ॥ ११ ॥ नारीचलभतेपुत्रंपूर्णचन्द्रप्रभाननम् ॥ एतानिमहासेनानीसत्यं- सत्यंवदाम्यहम् ।। १२॥ एतानिचभवेत्तस्यपुरीविष्णुगतेसती।। विष्णुलोकेनमेकार्यमेवंवदंतिसाधकाः॥१३॥ इति श्रीकेदारकल्पेविख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेय संवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवनमुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शनेसदेहकैलासगमने विष्णुलोकवर्णनो नाम चतुस्त्रिंशः पटलः ॥३४॥ धन धान्य समेत ॥ ९ ॥ कामयुक्त तया तजस्त्री हो विपुल कुलम उत्पन्न हो, बडी आयुरे अधिक भोग बल पराक्रमी होते है ॥ १० ॥ उनके द्वारपर बड़ी सेना, घोडा, हायी, अनेक निवास करते है वे सात जन्मतक राजा होते है, इसमे कुछ संशय नहीं ॥ ११ ॥ चन्द्रमाके समान स्त्रियां व पुत्र प्राप्त होते हैं यह विष्णुलोक्के भोग कहे है ॥ १२ ॥ विष्णु- पुरीमे जानेसे इतने भोग मिलते है, यह सन साधक बोले विष्णलोक्से हमारा कुछ कार्य नहीं है ।। १३ ॥ इति श्रीस्वारस्ये भाषाटीकाया विष्णुगेकार्णनो नान चतुस्विंग पटर ॥ ३४ ॥ पंचत्रिंशः पटलः। साधक उवाच ॥ ॥ॐ विष्णुलोकैमहाभोगाममभोगानरुच्य- ते॥शिवलोकेचयेभोगाआचार्यकथयस्वमे॥१॥ ॥आचार्य साधक बोले । विष्णुलोकके महाभोग हमसे नहीं रुचते अब हे आचार्य ! शिवलोक्के भौगोको हो ॥ १ ॥ आचार्य बोले, हे सिद्धो! यह तुमसे कहा (१५८) केदारकल्प । उपाच । एतत्तेकथितंसिद्धरुद्रलोकमतःपरम् ॥ शिवलोकेषुये- भोगान्कथयामिसततंशृणु ॥ २ ॥ त्रिनेत्रंदशभुजंचैवचंद्रार्ध- कृतशेखरम् ।। विमानंकामिकादिव्यंचन्द्रादित्यसमप्रभम् ॥३॥ त्रिशूलंवरदहस्तंगणगंधर्वसेवितम् ॥ कैलासपीठमध्यस्थंयत्र- देवोमहेश्वरः ॥ ४॥ यावद्रूपमहाकायायावत्सुरगणकोटयः॥ उमाशिवाग्रक्रीडतिहमराः सुखसमन्विताः॥५॥रमाकोटिस- हस्राणिहारकेयूरभूपिताः॥सर्वशृंगारशोभाढयानूपुरारावलंकृताः॥ ॥६॥ अभयंयौवनासर्वाउमयासहशोपमम् ।। दिव्यवस्त्रपरी- धानमहाभोगपरिच्छदाः ॥ ७॥ सर्वभोगसमायुक्ता क्रीडंति शिवसन्निधौ ।। यावत्तिष्टतिमेदिन्यांयावन्माक्षीरसागरे ॥ ८॥ ध्रुवोहिनिश्चलोयावद्यावत्स्वर्गेत्रिलोचनः ॥ चन्द्रार्कोगगने यावग्रहनक्षत्रसंयुतैः ॥ ९ ॥ यावद्धिनिश्चलोमेरुावल्लोकत्रय- स्थितिः ॥ तावत्तिष्टंतितेसर्वेयावहेवोमहेश्वरः ॥ १०॥ इच्छा- कालेतुसंप्राप्तेमृत्युलोकेबतिच ॥ सर्वकामसमृद्धाश्चजायतेविषु- दिया अब शिवलोक्में जो भोग है उनसे वर्णन करता हूं ध्यान देकर सुनो। ॥२॥ ताननेन, दसभुना, माथेपर आपा चन्द्रमा धारे, दिय विमानोपर सुन्दर कामिनी जो चन्द्रमा वा सूर्यके समान पान्तिवाली विराजती है ॥ ३ ॥ विगल दायमें लिय गण गन्धवासे सेवित पेलासपर सिहासनामें विराजमान जहाँपर महेश्वर देव है ॥ ४ ॥ जबतक अनेर योटि देवता है, तबतक रूपवाले महापाप पार्वती शिवके आगे अक्षय सुखपूर्वक अमर हो नीड़ा करते है ॥५॥ सहना कोटि अप्सरांए हार वानंद आदिसे भूपित नूपुर (पायर) पहने सम्पूर्ण शृंगारकी शोभासे युक्त ॥ ६ ॥ अक्षय यावनवती पार्वती सदृश दिव्य पन्न धारण रिपे महाभोग सहित ॥ ७ ॥ शिरसे समीप नीडा करती है, गर- नर पृथ्वी तथा समुद्रमें जल रहता है ॥ ८॥ जपतर भ्रय निश्चल है, जपतर मगन शिया, गवतप आरासमें चंद्रमा य स्र्य है ग्रह नक्षत्र सहित है ॥९॥ पिनर न निश्चल है अक्षय देयता सिद्ध मंटपर पगरता है ये तवता पिन रहते हैं।। १० ॥ इन्डा होनेपर मृत्युरोरमें जाते है, तथा सब पामना- - मापाटीकासमेत-प० ३५. (१५९) लेकुले ॥ ११ ॥ सर्वगुणैःसमोपेताराजानोपिभवन्तिवै ॥ पुत्रपौत्रसमायुक्तधनधान्यसमाकुलम् ॥ १२ ॥ द्वारेवतिष्टते सैन्या गजैरश्वैरनेकधा ॥ ज्ञानयुक्तः तेजयुक्तः चक्रवत्तिमहानृपः ।। १३ ।। सर्वसौभाग्यसंयुक्ताभुजंतिविपुलांश्रियम् ।। दीर्घायु- विपुलान्भोगान्पुनस्तेस्वर्गगामिनः ॥ १४ ॥ अजराश्चमहा प्राज्ञापूर्णचन्द्रमुखास्त्रियः ॥ कैलासपीठमध्यस्तुयत्रदेवोमहेश्वरः ॥ १६ ॥ सुवर्णगोपुराहालैर्मणिप्रकारवेष्टितम् ॥ इन्द्रनील- महानीलै पद्मरागोपशोभितम् ।। १६ ॥ तत्रस्थानेमहासेनदेवा- नांचमहावलम् ॥ ध्वजमालाकुलंदिव्यंश्यतेशिखरोपमम् ॥ ॥ १७॥ निवासदेवताःसर्वेसुरेन्द्रस्यचकोटिभिः॥ शिवस्थाने महासेनशोभितंपुरमुत्तमम् ॥ १८ ॥ निशिवह्निर्यथातेजो दृश्यतेचदिशोदश ॥ तथाचन्द्रस्यतेजेनह्यनितेजःसमप्रभाः ।। ॥ १९ ॥ नृत्यंतिअप्सरासर्वारभाद्याअष्टनायिकाः ॥ नित्यो- त्सवसमाकीर्णदृश्यतेचपुरेसदा ॥ २० ॥ वाटिकाःकांचना- ओं सहित श्रेष्ट कलमें उत्पन्न होते हैं ॥ ११ ॥ सब गुणागर राना होते हैं, पुत्र पौत्र धन धान्यसे पूर्ण ॥ १२ ॥ द्वारपर सेना उपस्थित होती है, तथा अनेक घोड़े हायी रथ आदि होते हैं, ज्ञानी, तेजस्वी, चक्रवर्ती, राज्य करता है ।।१मा मन सुखपूर्वक विपुल भोगोंको भोगता है, बडी अवस्यास आनन्दको अनुभव काके फिर स्वर्गको जाता है ॥ १४ ॥ वहां अजर अमर हो चन्दसखी मियाँ समेत कैलासपर्वतपर विराजमान होते हैं, जहां कि महेश्वर हैं ॥ १५॥ सुवर्ण गांपुर मणि आदि प्राकारसे व्याप्त इन्द्रनील महानील पद्मराग मणियोंस शो- मित ॥ १६ ॥ और उस स्थानमें देवताओंको समान बड़ी सेनाहोती हैं, बना मालाऑसे शोभित जो शिखर दीखता है ॥ १७ ॥ वहां मुरेन्द्र सहित अनेक देवता निवास करते हैं, शिवके स्थानमें सुन्दर नगर शोभा देते हैं ॥ ८ ॥ रात्रिमं जिस प्रकार अमिका तेज हो टसी प्रकार दशों दिशाएँ चन्द्रक तनसे प्रकाशमान हैं ॥ १९ ॥ रम्भा आदि आइ नायका नृत्य करती है तयारस पुरमें नित्य नवीन उत्सव होते हैं ॥ २० ॥ और मुवर्णकी याटिका फल फुलासे
(१६०)
कदारकल्प।
स्तत्रफलपुष्पोपशोभिताः ॥ कूष्मांडफलरूपेणामृतंतत्रतिष्ठति
॥२१॥ चूतचंदनसंयुक्तकदलीखंडमंडितम् ॥ एवंपुरेमहारम्ये
सर्वदेवादिवासितम् ॥ २२ ॥ एकविंशसहस्राणिदृश्यतेधवला .
गृहाः ॥ तत्रहेममयादिव्यावहुरत्नोपशोभिता ॥ २३ ॥ नदीच
वहतेतत्रघृतक्षीरमधुस्यदा ॥ देवगंधर्वसंकीर्णदेवकन्यासमाकु-
लम् ॥ २४ ॥ चन्द्रादित्यसमंतेजोदृश्यतेचपुरेसदा ।। इन्द्र-
नीलमहानीलैःपद्मरागोपशोभितम् ॥ २५ ॥ तस्यमध्येमहारम्ये
ह्यग्निज्वालासमप्रभा ॥ हेनोवसुंधरातत्रस्फुरतिकिरणानिच ॥
॥ २६ ॥ साधकाश्चगतास्तत्रयत्रदेवोमहेश्वरः ॥ लोकद्वारे
गताश्चैवचंडीश्वरउवाचह ॥ २७ ॥ चंडीश्वर उवाच ॥ ॥
कभुवनागतासिद्धाकस्थानेचैवगम्यते ॥ एतद्ब्रूहिमहाचार्यसाध-
कोपरिवेष्टितम् ॥ २८ ॥ साधक उवाच ॥ ॥कथयामि
महाचंडशृणुमेवचनमहान् ॥ आगतामृत्युलोकाचगंतव्यशंकरा-
लये ॥ २९ ॥ देवा उचुः ॥ ॥ दिव्यविमानकामिन्यांपश्यं-
तिसर्वसाधकाः॥आरूढांच भवेत्सिद्धावेष्टितासर्वसाधकाः॥३०॥
शोभित हैं, कूष्माण्डके फल रूपसे मानों वहां अमृत स्थित है ॥ २१॥ आम
चन्दनसे युक्त फलोंसे मंडित टस नगरमें सम्पूर्ण देवता निवास करत हैं ॥२२॥
इक्कीस सहस्र स्वच्छ मुन्दर गृह दीखते हैं, और वहां व सुवर्णमय दिव्यरत्र-
जटित होनस अति शोभा देते हैं ॥ २३ ॥ वहाँ पृत, दूध, मधुकी नदी
वहती है, देवता गन्धर्व सहित देवकन्याओंसे व्याप्त ॥ २४ ॥ चन्द्रमा सूर्यक
ममान उस पुरमें प्रकाशित इन्द्रनील, महानील, पमराग, मणियोंसे शोभा होरही
है ॥ २५॥ परमरमणीक उसके मध्यमें अमिकी लपटफी समान प्रकाशित भूमि
मृवर्णमें आच्छादित होरही है ।। २६ ।। यह सुन साधकगण यहां पहुँचे जहां
महेन्यर थे उस समय दारपर उपस्थित चण्डीपर बोला ॥ २७ ॥ चण्डीश्वर
पोला हे सिद्धा! पीन स्थानस आये और फोन स्थानको जांत हो ? आचार्य
मा मावधान होकर फही ॥ २८ ॥ साधक बोल हे चंडीश्यर ! हमारा
गगन मुनी जो कहते हैं कि हम मृत्युलाफसे आये और शिवलोफको नात है
•॥ २९ ॥ दंपता वाले दिव्य विमानपर चढी कामिनी उपस्थित है ॥ ३० ॥
भाषाटीकासमेत-प० ३५, दिव्यचीरपरीधानैर्दिव्यगंधानुलेपनैः॥दिव्यपुष्पशिरोवद्धादिव्य रत्नसमाकुलम् ॥ ३३ ॥ विमानारूढभोसिद्धायत्रेच्छातत्रगम्य- ताम् ॥ आरूढंतवाविप्रेन्द्रयथोयंतत्रगछति ॥ ३२ ॥ इच्छावरं चभुक्तव्ययावच्चन्द्रावतेजसा ॥ सुवर्णकेतकोजातितिष्टंतिराज- चंपिकाः ॥ ३३ ॥ बकुलै शतपत्रैश्चबिल्ववृक्षैश्चपाटलैः । एवं पुरेमहारम्येवहुगंधादिवासिते ॥३॥ यौवनादिमहाकायमहारूपं महलम् ।। साधक उवाच ॥ ॥ तस्मिन्स्थानेनमेकायनमे- भोगप्रयोजनम् ॥ ३५ ॥ मयाचतत्रगंतव्यंयत्रदेवोमहेश्वरः ।। तत्रस्थानेमहासेनचंडरूपंधृतंमहान् ।। ३६ ।। ओप्टमेकंभुजौद्धी- चद्वितीयेगगनस्थितः ॥ रक्तनेत्रमहाक्र्रतीक्ष्णदंष्ट्राभयानकम् ।। ।। ३७ ॥ तस्यासुरनिनादेनयथामधेनगार्जिता ॥ जिह्वास्फु- रतिविस्तीर्णसाधकाविस्मयंगताः ॥ ३८ ॥ आचार्यशंकितास्तत्र ह्यवोरंजप्यतेमहान् ॥ अष्टोत्तरशतंचैवह्मपोरंजप्यतेक्षणात् ॥ ॥ ३९ ॥ अघोरंजप्यमानस्तुह्यदृश्योजायतेभयात् ॥ ॐ हुं दिव्य वस्त्र धारे मुन्दरमुगन्ध लगाये दिव्यपुष्पोंको सिरपर बांधे जो सुन्दर रनोंसे जाटतहैं ॥३१॥ हेसिद्धो! विमानोंपर चढ़ो,जहां इच्छा हो वहां जाओ हेविप्रेन्द्र ! इसपर चढके चाहै जहां जाओ ॥ ३२ ॥ और मनइच्छित भोगोंको चन्द्रसूर्यको स्थितितक भोगो, यहां सुवर्णकी केतकी राजचंपिका ॥ ३३ ॥ बकुल शतपत्र बेलपत्र, पर्वल आदिसे शोभापमान मुन्दर नगरहै, इसनगरमें अधिकसुगन्धित ॥ ३४ ॥ यौवनोन्मत सुन्दर शरीरवाली कामिनी, साधक बोले हमारा ऐसे स्थानमें कुछ काम नहींहै, न भोगोंसे कुछ प्रयोजनहै ॥ ३५ ॥ हम वहां जायेंगे जहां महेश्वर देवताहै, हे महासेन ! तब उसस्थानमें चण्डीश्वरने वडा भयंकर रूप धारण किया ॥ ३६ ॥ एक ऑट आठ भुजा थी लम्बाईमें मानो दूसरा आकाशहै लालनेत्र महाकूर तीव्र दृष्टि भयानक ॥ ३७ ।। मेघकी समान गर्नन प्रकाशमान अतिविस्तृत जिहाको देख साधक विस्मयको प्राप्त हुए ॥ ३८॥ और शंकित हुए आयायाने अयोरमंत्रको जपा, तक्षण एकसौ आठ जावृत्ति मंत्रजप किया ॥ ३९ ॥ अघोरमंत्र जपनेसे भय टूटगये, 'हूं फट् स्वाहा' यह (१६२) केदारकल्प। फट्स्वाहा ॥ हर्पतुष्टामहासिदाप्रणम्यपरमेश्वरम् ॥ ४० ॥ तत्क्षणंदृश्यतेरूपंचंडीश्वरमहाबलम् ॥ सत्यंचवदतेयावत्तावच्चं- डीश्वरःपुनः॥ ११ ॥ रत्नमालाकरेतस्यकर्णेचहेमकुंडला ॥ चतुहिरिनेत्रंचशूलहस्तंधृतस्तदा ॥ ४२ ॥ दिव्यवस्त्रपरीधा- नंदिव्यदेहस्वरूपकम् ॥ दिव्याभरणशोभाढयंदिव्यगंधानुलेपनम् ॥ ४३ ।। चंडीश्वर उवाच ॥ ॥ सिद्धसिद्धमहाप्राज्ञकृत कर्मसुदुस्तर ॥ क्षणमेकंस्थितोवीरयावद्रुद्रःसमागतः॥४४॥ इतिश्रीकेदारकल्पेविख्यातपुराणेश्रीश्वरकार्तिकेयसंवादेपंच- योगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवनमुक्तब्रह्मप्राप्तयेमहापथे शिव- दर्शनेसदहकैलासगमने गिरिकैलासवर्णनचंडीश्व- रदर्शनोनाम पंचत्रिंशः पटलंः ॥३५॥ मंत्रहै, तब वे महासिद्ध हर्पसे संतुष्ट होकर परमेश्वरको प्रणाम करनेलगे ॥४॥ तब उसीसमय चंडीश्वरने अपना पूर्वरूप धारण किया और फिर कहने लगा। ॥ ११ ॥ उसके हाथमें रत्नकी माला कानोंमें कुंडल चारभुजा तीन नेत्र त्रिशूल हायमें धारे था ॥ ४२ ॥ सुन्दर वस्त्र पहने दिव्यदेह स्वरूप धारण किये तथा दिव्यआभरणोंकी शोभायुक्त, मुन्दर गन्ध लगायेहुए दर्शन दियाथा ॥ ४३ ॥ चंडीवर बोला हेमहाप्राज्ञ ! सिद्धो ! आपने बडा दुष्कर मुकर्म किया है वारा ! क्षणमात्र यहां स्थितहो जबतक रुद्र आँवै ॥ १४ ॥ इति श्रीकेदारकल्पे भापाटीकायां पचत्रिंशः पटलः ॥ ३० ।। पत्रिंशः पटलः । ॐ हर्पतुष्टस्ततश्चंडःसाधकानांप्रबोधितः । एवमुक्त्वाततश्चंडः यत्रदेवोमहेश्वरः ॥ १ ॥ चंडीश्वर उवाच ॥ कृतांजलि- पुटोभूत्वापृच्छतिपरमेश्वरम् ॥ साधकामृत्युलोकाचयागतादेव - -- तर चंडीश्वरने अतिप्रसत्रहो साधकोंको समझाया, और जहां महेश्वर देव थे यहां मच गये ॥ १॥ चंडीश्वरने अंजलि वाँध परमेश्वरसे कहा कि यह सा.
- भापाटीकासमेत-प०३६. (१६३) दर्शने ॥ २ ॥ श्रीपरमेश्वर उवाच ॥ ॥ शृणुचंडमहा प्राज्ञह्येकचित्तोव्यवस्थितः ॥ मृत्युलोकेमहातीर्थेकेदारोनामदैव तम् ॥ ३ ॥ तत्रैवललितागंगाह्यचयित्वातुशंकरम् ॥ तत्र कालेतिचंडस्यसाधकाहृदयंतथा ॥ १ ॥ आगच्छंतुमहा- चार्योंविलंबनैवकारयेत् ॥ हर्पतुष्टोमहाचंड यत्रतिष्टंतिसाध- काः ॥ ५ ॥ चंडीश्वर उवाच ॥ ॥ युप्मत्तुष्टोमहादेवो उमासात्रिलोचनः ।। उत्तिष्टगम्यतांसिद्धतुष्टस्तेपरमेश्वरः ।। ॥ ६ ॥ नंदीस्कंदमहाकाल आगता स्थगामिनः ॥ त्रिनेत्रा दशभुजाश्चैवत्रिशूलंकरपल्लवैः ॥ ७॥ तदासिदासमारूढास्कं- दस्तरसमागमत् ।।स्वागताश्चमहातेजोइच्छंतिचरथोत्तमम् ।।८।। साधक उवाच ॥ ॥ प्रणम्यदेवदेवस्यआरूढंचरथोत्तमान् ॥ तपुससमारूढाःसर्वकामैःप्रपूरिताः ॥ ९ ॥ दिव्यदेहामहा- कायासर्वभोगसमाश्रिताः ॥ तावत्पश्यंतितेचंडंवदंतिसाधको- त्तमाः ॥ १० ॥ पृच्छतेदेवदेवस्यआरूढंचरथोत्तमैः ॥ सर्व कन्यासमायुक्ताआगतारथगामिनी ॥ ११ ॥ तावत्पश्यति धक मृत्युलोकसे देवके दर्शन करनेको आयेहैं।॥ २ ॥ श्रीपरमेश्वर बोले हेचण्डे- उबर ! हे महाप्राज्ञ ! एकचित्त होकर सुनो, मृत्युलोक में केदारनामक परमतीर्थ है ॥३॥ तहांही ललिता गंगाहै यह वहांपर शिवका अर्चन करें टससमय चंडे श्वरने साधकोंसे कहा ॥ ४ ॥ है आचार्य ! आओविलंब मतकरी यह कह चंडे- वर वडा प्रसन्न हुआ ॥ ५॥ चंडेघर बोला आपके समीप पार्वतीसमेत महादेव हैं, उठके चलिये तुमसे परमेश्वर संतुष्ट हुम्हें ॥ ६ ॥ नंदी स्कंद महाकाल रयपर प्राप्तहुम्हें, तीन नेत्र दस मना हस्तपल्लवमें त्रिशूल धारेहैं, तब सिद्धोंके समीप रथपर चढे स्कंद प्राप्तहुए और बोले हेमहातेजस्विन् ! स्वागत है उत्तम रयको इच्छा करो ॥ ८॥ साधक बोले उत्तम रयोंपर चढ़ेदए देवदेवोंको प्रणामहै यह कह आपभी सब कामनासे पूर्णहुए उनपर चड़े ॥ ९ ॥ दिव्य महाशरीरधारे सबभोगोंसे आनन्दित साधकोत्तम चंडेश्वरसे संभाषण करते ॥ १० ॥ उत्तम रयपर चद्देहुए देवदेवको पूछतेये, स्थरर चट्टी सम्पूर्ण कन्या आई ॥ ११ ॥ चंडेश्वर साधकों की ओर देखकर कहने लगा, देपो मग शिवरसर कैसी शोमा (१६४) केदारकल्प। तेचंडवदंतिसाधकोत्तमाः ॥ किमेवदृश्यतेस्वग्गॅशिखरैश्चैवशो- भितम् ॥ १२॥ यस्यदेवस्ययःस्थानंयादृशंयस्यभूपणम् ।। प्रतिबंधचभोचंडीवदंतिसाधकोत्तमाः ॥ १३ ॥.एपांस्थानंच नामानिसुस्थानंशोभनानिच ॥ तत्रस्थानंचनामानितत्सर्वकथ- यामिते ॥ १४ ॥ चंडीश्वर उवाच ॥ ॥ दृश्यतेकांचना वृक्षाः पारिजातकपंकजाः ॥ तत्रहेमप्रभादिव्यंनानारत्नविभूपि- तम् ॥ १५ ॥ इन्द्रनीलमहानीले पद्मरागोपशोभितम् ॥ तेपांस्थानानिदिव्यानितत्संरकथयाम्यहम् ॥ १६ ॥ अम- रावतीपुरिम्यापूर्वभागेव्यवस्थिता ।। सर्वदेवस्यराजोयंदैत्यारिः शकनामतः ॥ १७ ॥ आग्नेय्यांयाचदिग्भागेपुरीतेजोवती चसा ॥ हुतभुग्वसतेतत्रयोमुखपितृदेवताः ॥ १८॥ याम्यां चैवदिशासिद्धापुरीज्योतिप्मतीशुभा ॥ धर्माधर्मनिरीक्षार्थधर्म- राजोरवेःसुतः ॥ १९ ॥ नैर्ऋत्यांचैवदिग्भागेपुरीयक्षवती शुभा ॥ निवासोयक्षरक्षानांमहादेवेननिर्मितः ॥ २० ॥ वारु- दीखताहै ॥ १२ ॥ जिस देवताका जो स्थान जो दिशा जो भूपणहै सो सब कह नेके लिये साधकोंने चंडेश्वरको प्रेरणाकी ॥ १३ ॥ इनके स्थान नाम आभूषण आदि सबमैं कहताहूं यह कहकर ॥ १४ ॥ चंडीवर बोला, देखो यह सुवर्ण के वृक्ष पारिजातक पुष्प कमल दीखतेहैं,वहांपरही मुवर्णको कान्तिसे दिव्य अनेक रत्नोंसे भूपित ॥ १५ ॥ इन्द्रनील पद्मरागसे शोभित उनके दिव्यस्यान आदिके नाम मब कहताई ॥ १६ ॥ अमरावती रमणीक नगरी पूर्वभागमें स्थितहै, वहां सबदेयताओंका राजा दैत्योंका शत्रु इन्द्र निवास करताहै ॥ १७ ॥ और आमेय दिशाकी और तेजोवती पुरौहै, वहां अपिदेवता रहतेहैं, जो पितृ देवताओंके दृत हैं ॥१८॥ हेसिद्धो ! दक्षिणदिशामें जोतिष्मती नगरीहै तहां धर्म और अधर्म फे फल देनेको साक्षात् सूर्यपुत्र धर्मराज रहतेहैं ॥ १९ ॥ और नैर्ऋत दिशाके भागमें पक्षयती पुरीहै वहां यक्ष और राक्षसोंका नियासहै यह साक्षात् शिवने निर्माण फीहे ॥२०॥ पश्चिमदिशामें वरुणकी महापुरीहै. वहां जल जन्तुओंका भापाटीकासमेत-प०३६. (१६५) वदिग्भागवरुणस्यमहापुरी ॥ पश्चिमेजलजंतूनांनाथावरुण एक्व ॥ २३ ॥ वायवीयेचदिग्भागेपुरीगंधर्वसेविता ॥ ये रुद्रसभामध्येनृत्यतिवहसंतिच ॥ २२॥ कौवेादिचादिग्भागे महादनीपुरीशुभा ॥ यत्ररुद्रस्यवसतिरमात्योधनदस्तथा ॥ ॥ २३ ॥ यशोवतीपुरीरम्याशान्यांचनमाश्रिता ॥ मध्येलिंग भवेदिव्यंशंखकुन्देन्दुसन्निभम् ॥ २४ ॥ कोटिद्वादशाविस्तीर्ण उछायश्चचतुर्गुणम् ॥ कैलासशिखरेग्म्येनानारत्नविभूषितम् ।। २९ ॥ संप्राप्ता साधकास्तत्रपश्यतिचहिमालयम् ॥ विमानं कामिकादिव्यमणिरत्नसमाकुलम् ॥ २६ ॥ सर्ववाद्यमथो- पेतंदुंदुभिःपटहानिच ॥ शंखकोलाहलंपूर्णमहामर्दलसंयुतम् ।। ॥ २७ ॥ वेणुवंशमृदंगानांमहानादैःसुनादितम् ।। नृत्यंत्यास- रसासरिभाषा:सुमनोहराः॥ २८ ॥ श्रुत्वाचसाधकाःसर्वेहर्ष- यंतिपुनःपुनः ।। नमस्तेशिवरूपायनमस्तेब्रह्मयोगिने ॥ २९ ॥ शतयोजनाविस्तीर्णशोभितहरमंदिग्म् ॥ देवगंधर्वसंकीर्णमुत्तुंगो स्वामी वरुण निवास करता है ॥ ॥ २१ ॥ और वायुकोणमें गन्यवासे सेवित नगरी है जो गन्धर्व स्टकी सभा नृत्य करते और हर्प करते हैं ॥ २२ ॥ कौवेयं ( उत्तर ) दिशामें नहादनीपुरी है जहांपर स्टंदवताका अमात्य कुबेर रहताहै ॥ २३ ॥ और ईशान दिशामें यशोवती नगरी है. जहाँके बीचमें शिवलिंग. शंख कुन्द चन्द्रमाके समान मुन्दर है ॥ ॥ २५ ॥ जो बारहकोटि योजन वितृतहै तथा इसके नौगुना चाहै. कैलास पर्वतके शिखरपर अनेकप्रकारके रन शोभायमानहैं ।।२५।। मापकगण वहां प्राप्त हुए और हिमालयशे देखतेहैं उनके विमान दिव्यमणि रवजटितये ॥ २६ ॥ सम्पूर्ण वाजे गाजे दुन्दुभि परह शंख जादिका शन्द गूंजता या ॥ २७ ॥ बंधु वांसरी मृदंग आदिक नादसे शन्दायमान रंभा आदि मुम्पूर्ण अप्सरा मार धानिसे गाती नृत्य करती थी॥ २८ ॥ यह सब सापक श्रवण करके वारम्बार हर्पको प्राप्त हुए और बोले शिवरूप आपको नमन्कार है।॥ २९ ॥ यहां सौ यो- जन विस्तृत शिवका मंदिर शोभित है और चौगुना रंचा जहाँ देवता गन्धर्व (१६६) केदारकल्प। हिचतुर्गुणम् ॥ ३०॥ हेमरत्नसमायुक्तंप्राकारमपिशोभितम् ॥ तत्रस्थानेमहारम्येयमिज्वालासमप्रभा ॥ ३१ ॥ मौक्तिकंचन्द्र- कान्तश्चप्रस्फुरतिहनेकधा ॥ मेरुशृंगेसमारूढानानारत्नविचि- त्रिताः ॥ ३२ ॥ प्रतोलीद्वारसंयुक्तंवेटितंशिवशासनम् ॥ हेमरत्नसमायुक्तंतोरणेनप्रशोभितम् ॥ ३३ ॥ पोडशकला- समायुक्तंदिव्यज्योतिमनोहरम् ॥ लक्षयोजनविस्तीर्णहरस्थानंच- मंडपम् ॥ ३४ ॥ स्तंभा हेममयाःसर्वेचन्द्रकांतिसमप्रभाः ।। हैमेनरचिताभूमिर्नानारत्नविभूपिता ॥३५॥ क्षणेक्षणेचतिष्ठति- सूर्यकोटिसमप्रभा ॥ तस्यमध्येमहादेवःसभायांपरिवेष्टितः ॥ ॥३६॥ सिंहासनानिदिव्यानिहेमरत्नकृतानिच ॥ भूपिता- कनकांताचपद्मरागंततःपरम् ॥३७॥ मुक्ताफलप्रवालैश्चचन्द्र- कांतिसमप्रभम् ॥ तत्र तिष्ठतिदेवेशोजगन्नाथोमहेश्वरः ॥ ३८॥ चामरैर्व्यज्यमानस्तुधनदोवासुकीतथा ॥ नंदीचण्ड प्रतीहारास्ति टतेदारसंस्थिताः॥३९॥ सोमेनधारितछत्ररुद्रस्योपरिचाश्रितम् ।। 4 विराजमान हैं ॥ ३० ॥ मुवर्णरत्न जटित प्राकार शोभा देरहा था, उस परम रमणीक स्थानमें अमिकी कान्तिकी समान चमकशी ॥ ३१ ॥ मोती चन्द्र- कान्तमणि अनेक प्रकारकी शोभा देरहीहैं, और सुमेरु पर्वतपर चढ़करतहां अनक रवोंकी सुन्दरता देखी ॥ ३२ ॥ मतोली और द्वारपर शिवके शासक लोग चारों ओर उपस्थित थे, मुवर्णरत्न जटित बंदरवालोंसे शोभायमान ॥ ३३ ॥ सोलह कला समेत दिन्य ज्योतिस मनोहर लक्ष योजन विस्तारवाला शिवस्थानका मंडप था॥ ३४ ॥ सम्पूर्ण संभे सुवर्णमय तथा चन्द्रमाको कान्तिके समान थे, यह भूमि स्वर्णस आच्छादित अनेक रनोंसे शोभित ॥ ३५ ॥ क्षण २ में काटि सुर्यको कान्तिक सदृश उपस्थित थी उसके मध्यमें सभाकं बोच साक्षात् महादेव विरानमान हैं ॥ ३६॥ दिव्यसिंहासन सुवर्णरचितहै चन्द्रकान्त पमराग मणियोंसे भूपित ॥ ३७॥ मोती मूंगोंके रहनेस जो चन्द्रमाको समान प्रकाशमान हैं । वहां जगत्पति महादेव विराजमान हैं ॥ ३८ ॥ कुवर और मासको (सपंरान ) चामर झालते, और नन्दी द्वारपाल द्वारपर स्थित हैं। ३९॥ और स्ट्रो छत्रको चन्द्रमा धारण किये तथा पवन सुन्दर ध्यानपूर्वक भापाटीकासमेत-प०३६. . (१६७) पवनवाद्यतेवीनामहानादादिपूरिता ॥४०॥ देवदेवंसुरश्रेष्टसर्वा- भरणभूषितम् ।। दिव्यवस्त्रपरीधानंचंदनागरुलेपनम् ॥ ११ ॥ नीलकंठंमहातेजोसूर्यकोटिसमप्रभम् ॥ त्रिनेत्रंदशभुजचैव- चन्द्रार्धकृतशेखरम् ॥ ४२ ॥ महादेवपारूढंशुलहस्तधरं- तथा ॥ सर्वाभोगसमायुक्तंभस्मगात्रविलेपनम् ॥४३॥ कपा- लखड्गधरंदेवपंचवक्रपिनाकिनम् ॥ चन्द्रंचव्यालशोभाब्यदेवदेवं- वरप्रदम् ॥ १४ ॥ देवगंधर्वसंकीर्णरुद्रकन्यासमाकुलम् ॥ देव- देवमहादेवंसर्वदेवशिरोमणिम् ॥ ४५ ॥ विश्वनाथंजगन्नाथमहा- वानांग्रहाणकम् ॥ तिष्टंतिमुनयःसबैतिष्टतेसर्वदेवताः॥४६ ॥ लोकनाथंजगन्नाथसर्वव्यापिनमीश्वरम् ॥ जिह्वाग्रेचचतुर्वेदा- हृदयेभुवनत्रयम् ॥४७॥ रोमारोमुनयःसबैतिष्टतेसर्वदेवताः ॥ सप्तपातालपादौचह्याकाशेमस्तकंतथा ॥४८॥ लोचनेचमहा- सेनवह्निचन्द्रावतेजसा ॥ तितंचसुराःसर्वेत्रलाद्यादेवतागणाः॥ ॥४९॥ सभायांपरितिष्टंतिब्रह्मविष्णुपुरंदराः ॥ प्रेक्षणीयंप्रक- - वीणा बजाता है ।। ४० ॥ इसप्रकार सब आभूपोंसे भूपित देवदेव शिवको देखा, जो दिव्य वस्त्र धारे, चन्दन अगर लिपटाये ॥ ११॥ नीलकंठ, महातेज- स्वी कोटि सूर्यको समान कान्तिमान त्रिनेत्र दशमजा, मायेपर अर्धचन्द्रमा धारण किये ॥ ४२ ॥ वलपर बड़े, त्रिशूल धारण किये, महादेव सब भागों सहित शरीरपर भस्म लेपन किये ॥ १३ ॥ कपाल तथा खड्ग धारण किये. पिनाक धार, चन्द्रमा तथा सपाको अवलम्बन दिये हैं, ऐसे देवदेव शिवको देवा ॥ २४ ॥ जो देवता गन्यवसि पिर रुदकन्याओं सहित सब देवॉक शिरो- मणि शिव हैं ॥ ४५ ॥ विश्वनाय जंगनाय, बडे पापाको दूर करनेवाले, तथा जिनके समीप सब ऋषि मुनि व देवता स्थित हैं ॥ १६ ॥ लोकनाय जगनाय, सर्व व्यापी ईश्चर जिनकी निहाके आगे चारों वेद रहते हैं हृदयमें तीनों लोक हैं ॥ १७॥ जिनके रोमान भागमें सब मुनि व देवता हैं मात पाताल निनके चरण हैं आकाश मस्तक है ॥४८॥ अमि चन्दमा सूर्य नेव हैं, बन्ना आदि देवतागण समीप स्थित हैं ॥ १९ ॥ सभार बीच में ब्रह्मा विष्णु इन्द उपस्थित + 1 (१६८) केदारकल्प। वैतिवाद्यतेवादनंबहु ॥ ५० ॥ शंखदुंदुभिनिघाँप काहल - रिमईलैः ॥ पटहावेणुवंशस्यगर्जितै निनादितम् ॥ ११ ॥ नृत्यंत्यप्सरसस्सर्वारभायाःसर्वनायिकाः ॥ पताकातोरणानीहरं- गमालातथाकृता ॥ १२॥ स्वस्तिकै पद्मशंखैश्चलिपितास्तत्र कन्यकाः॥ विद्युत्तेजसमोभूत्वाहेमरत्नविभूपिताः ॥ ५३ ॥ दिव्यवस्त्रपरिधानंचंदनागरुलेपनैः। सर्वलक्षणसंपूर्णनूपुराधैरलं- कृताः ॥५४॥करकंकणसंयुक्ताहारकेयूरभूपिताः ॥ संपूर्णचन्द्र- वदनाकुण्डलाभरणोज्ज्वलाः॥५५॥ रूपयौवनसंयुक्तानागवल्लि- विभूपिताः ॥ शिरपुष्पैःसुगंधाश्चवदतिकोकिलास्वरम् ॥ ५६ ॥ नृत्यतिशकंरस्याओवाद्यतेवह्वनेकधा ॥ पठतिविविधस्तोत्रंसे- वितंसुरनेकथा ॥ १७ ॥ नानारत्नसमायुक्तंपुप्पमालाभिशो- भितम् ।। चन्दनागरुकर्पूरंत्र्यम्बकेनप्रशोभिताः ।।५८ ॥ रत्न- पुष्पसमायुक्तंद्वारेचगणदेवताः ॥ दर्पणैःचामरैस्तत्रवासितैर्वि- पुलानिच ॥ १९॥ पारिजातपंकजास्तत्रनागपुप्पोपशोभिताः॥
भाषाटीकासमेत-प० ३७. मंदारकल्पवृक्षस्यपुप्पावल्यनेकधा ।। ६० ॥ केतकीशतपत्रैश्च- विल्ववृक्षैश्चपाटलैः । एवंवृक्षसमाकीर्णदेवदारैर्फलैस्तथा ॥६॥ पुप्पगंधाकुलं चैवकांचनराजचंपिका ॥ मोगरामालतिवृक्षैर्गुला- बेर्गुलचंदनः ॥ ६२ ॥ चूतचंदनसंयुक्तंकदलीखंडमंडितम् ।। वासितंराचेतंसर्वैर्नागपुप्पोपशोभितम् ॥ ६३ ॥ संप्राप्तासाधका- स्तत्रपृच्छतिचशिवालयम् ॥ सर्वदासर्वसिद्धिचहप्पुष्टाश्च- साधकाः ॥ ४ ॥ इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीखरकार्तिकेयसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवनमुक्तपरब्रह्मप्राप्तयेमहापथे शि- बदर्शमेसदेहकैलासगमनं नामपत्रिंशः पटलः॥३६॥ पुप्पोंसे शोभायमान मंदार, कल्प वृक्षके फूलोंकी भेंट चढ़ती है ।। ६०॥ केतकी, शतपत्र, विलक्ष, पाडुल, तथा देवदारु वृक्षोंस व्याप्त ॥ ६१ ॥ पुष्पगंध, कांच. नराज, चम्पिका, मोगरा, मालतीक्ष, गुलाब, चंदन आदि ॥ ६२ ॥ आमते संयुक्त केलेके खंभोंसे मंडित, सुवासित नाग पुप्पासे शोभित हैं ॥ ६३ ॥ उस स्थानपर साधक गपे, और शिवालयको देखने लगे और सब प्रकार हट पुष्ट प्रसन्न हुए ॥ ६॥ इनि श्रीकेदारकल्प मापाटीकायांपाशा पटट. ॥ २६ ॥ सप्तत्रिंशः पटलः। शौनक उवाच ॥ ॥ वदस्तमहाप्राज्ञशिवमाहात्म्यमुत्तमम् ॥ केलासेसाधकोगत्वाकिंचकारततःपरम् ॥ १ ॥ सूत उवाच । शृणुभार्गवयत्नेनयत्पृष्टोऽसित्वयामुने ॥ तत्सर्वकथयिष्यामि- शौनक बोले हे सतनी! आप उत्तम शिवमाहात्म्पको वर्णनकौनिये, कि फैला- सपर नाकर साथकोंने क्या किया ? ॥ १ ॥ स्तनो बोले ! हे भार्गव ! यत्र- पर्वर सुनो, नो तुमने मुझसे पूछा है सो सब कहता हूं जिसमकार सेनापतिसे केदारकल्प। यथारुद्रेणभापितम् ॥२॥श्रीशिव उवाच॥अतःपरंप्रवक्ष्यामि- शृणुकार्तिकयत्नतःचारहस्यंभुवनदृष्ट्वासिद्धाश्चविस्मयंगताः॥३॥ सर्वेदशभुजायस्तुवन्द्रार्धकृतशेखरः ॥ ब्रह्माविष्णुस्तथाशक- ग्रहनक्षत्रसंयुतैः ॥ ४ ॥ नंदीश्चंडमहाकालभंगीकूष्मांडएव च ॥ सिद्धविद्याधरानागाशूलपाणिमहेश्वरः ॥ ५ ॥ भुजंग- कंकणैश्चैवपुष्पहस्तंतथैवच ॥ वृपभोवासुकीचैवयेचान्योत्रिदशाः सुराः ।। ६॥ तेनदृष्ट्वामहाप्राज्ञा साधकाविस्मयंगताः ॥ तब- स्थानेमहासेनकथयामितवशृणु।।७॥ साधक उवाच ॥ पृच्छति साधकाःसर्वेकुवेदवोमहेश्वरः ॥दृश्यतेचसमरूपंसर्वदेवाव्यवस्थि- ताः॥८॥ चंडीश्वर उवाच ॥ ॥ ब्रह्माचदक्षिणेभागेवामेवि- प्णुःसमाश्रितः ॥ ९ ॥अर्धनारीश्वरोदेवासर्वाभरणभूपिता ।। भस्मनाधूलितगात्रमर्धकुंकुमचर्चितम् । एवंदेवो मासादविदशैः सुरपूजितम् ॥ १० ॥ एवंपश्यतितेसिद्धादेवदेवं महेश्व- रम् ।। दंडवत्प्रणमन्तिचपतंतिधरणीतले ॥ ११॥ कृताञ्जलि- - . रुद्रन कहा है ॥२॥ श्रीशिवजी बोले हे स्वामिकार्तिक ! मुनो इसके आगे कहता हूं, उस रहस्यमय भुवनको देखकर साधक विस्मयको प्राप्त हुए ॥ ३ ॥ नन्दी, चंड, महाकाल, भंगी, कूष्मांडसिद्ध, विद्याधर, नागों सहित त्रिशूल धारे ॥॥५॥सासाद शिवसर्पके कंकण पहने, पुष्प हायमें लिये,वृषभ वामुकी तथा और देवता आदि सहित दर्शन देते हुए ॥ ६ ॥ हे महाप्राज्ञ ! यह विचित्र वृत्त देख साधक आश्चर्यको माप्त हुए, अब उस स्थानका वर्णन करताहूं सुनी ॥७।। साधक बोले महेश्वरदेव कहां हैं, क्योंकि सब देवताओंका एकसारूप था ॥ ८ ॥ चंडीश्वर चौला दाहिनी और ब्रह्मा और चामभागमें विष्णु स्थित हैं ॥ ९ ॥ अर्धनारीश्वर महादेव सब आभूपोंके सहित हैं. जिनका शरीर भस्मसे धूलित इं, आधा तन फंतुमसे चर्चित है, यहां पार्वती समेत महादप देवतास पूजित हैं ॥१०॥ इस प्रकार सिद देवदेव महेश्वरका दर्शन करके दंडवत प्रणाम करके भूमिपर गिर ॥ ११ ॥ अंजलि बांधकर पारम्पार मणाम फरफे सापक. बोले !
भाषाटीकासमेत-प० ३७. (१७१) फुटयभृत्वाप्रणमन्तिपुनःपुनः ॥ साधक उवाच ॥ ॥अधर्म सफलंजन्मअद्यमेसफलंतपः ॥ १२ ॥ अयमेसफलंजाप्यमय मेसफलाक्रियाः ॥ १३ ॥ अद्यमेसफलंपंथमद्यमेसफलार्च- नम् ॥ अचमेसफलंकर्ममयाहट सदाशिवः ॥ १४ ॥नमन्य चरणपूज्यदृष्ट्वासंभापितशिवम् ॥ दृष्टासंभापितंशंभो प्रसिद्धः साधकोत्तमः ॥ १५ ॥ नमस्कृत्वाततोदेवपिनाकिवृपमध्य- जम् ।। अयमेसफलंकृत्यंदृष्ट्वादेवमहेश्वरम् ।। १६ ।। नमस्कृत्वा जगन्नाथंपन्नगंसपिनाकर ॥ वरदेहिमहादेवउमावचनमब्रवीत ॥ १७ ॥ श्रीपार्वत्युवाच ॥ ॥ वरंदेहिमहादेवसाधकानां यथोत्तमम् ॥ एवमुक्तासुरेशानांततोह्याज्ञाप्रदीयते ॥ ३८ ॥ श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ नंदीस्कंदमहाकाल सचगणनायकाः॥ जयंचविजयंवनर्मदाचसरस्वती ॥ १९ ॥ गंगाचयमुना चैवकावेरीसागरेणच ॥ नावाहेमकुंभेनपठंतेसिद्धचारणाः ॥ ॥ २० ॥ जयशब्देनदेवस्यशंखतूर्यरवेणच ॥ दिन्याभरण- आज हमारा जन्म सफल हुआ आज हमारा तप सफल भया,आज हमारा जप तथा समस्त क्रिया सफल हुई ।। १२ ।। १३ ॥ आग हमारा पंय और पूजन सफल हुआ। आज हमारा सब काम सफल हुआ, जो शिवा दर्शन किया ।। ॥ १४ ॥ तब साधकॉन शिवके चरणोंको नमस्कार करके संभाषण किया ॥१५॥ देवपिनाकी वृपभवन देवरो नमस्कार करके कहा, आन शिरके दर्शन करते हमारे जन्म सफल हुए ॥ १६ ॥ जगन्नाप, सर्प. तपा पिनाक धारण कानवाल महादेवको नमस्कार है । हे देव ! वरदान दो इस प्रकार शिरनामे पार्वती बचन वाली ॥ १७ ॥ हे देव ! इन टत्तम सापकोंको वरदान दो. ऐमा कहरर देवताओं को आता दो ॥१८॥ ईश्वर चोले नंदीस्सन्द महाराल तया सब गण नपग्निय नर्मदा सरस्वती नदी ॥ १९ ॥ गंगा, यमुना, कारी नद समेत समुद्र इनमें सव- पके कलसोंसे स्नान करके सिद्ध चारण पाठ करके ॥२०॥ जय २ शन्द करक शंख वेगु वामन बनाते, दिव्य आभूपण वत्र धारण फिर्य तया नानारत्रोंमे वि.
फेदाग्यल। । (१७२) वस्त्रस्यनानारत्नविभूषितम् ॥ २१ ॥ रत्नमालाशिरेतस्यल- लाटेचन्द्रशेखरम् ॥ प्रकाशसहशोरूपंसौख्यकामरूपानिच ॥ ॥ २२॥ देवीस्मरणमात्रेणयानंदमुत्तमोत्तमम् ॥ पद्मंचदृश्यते रूपंसाक्षात्रैलोक्यगामिनः॥२३॥ देविसुवर्णपात्रेणधारामृत- मुत्तमम् ॥ पीयंतेयेमृतंसिद्धायोनिग निवर्तते ॥ २४ ॥ उमया सहितोरुद्रवरंदत्वातुसाधका ॥ पश्चाचसाधकासर्वेयवेच्छातत्र गम्यताम् ॥२५॥ इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेय- संवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने श्रीश्वरपार्वतीदर्शनप्राप्तिवर्णनोनामसप्त- त्रिंशः पटलः ॥ ३७॥ पित ॥ २१॥ जिनके सिरपर रनों की माला और ललाटमें अर्धचन्द्र था प्रकाशके समान मुन्दर स्वरूपवाले जय वोले ॥ २२ ॥ जिस देवीके स्मरण मात्रसे मृत्यु- दुम्ब छूटता है, अत्यानंदप्राप्ति होती है जिनका रूप कमलके सदृश है ॥ २३ ॥ वह देवी सुवर्णके पात्रमें अमृतको धारण किये लाई, तब सिद्धोंने उस अमृतको पान किया और योनि गर्भवासके दुखसे छूटगये ॥ २४ ॥ पार्वती समेत शिव उन साधकोंको वरदान देकर अन्तान हुए, पश्चात साधक यथेच्छित देशको गए ॥ २५ ॥ इति धोकदारकल्प भाषाटीकाया सप्तत्रिंशः पटलः ॥ ३७॥ अष्टात्रिंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ चण्डेश्वरसहितासिद्धाप्रेप्सितंपुरमुत्त- मम् ॥ पूर्वादिशिमहादिव्यापुगेशकस्यशोभिता॥ १॥ साध- तब चंडेश्वरके साथ सिद्धोंका उत्तम पुरीमं भेजा, पूर्वदिशाके शिखरपर इन्द्र- परी शोभापमान थी ॥१॥ साधक इन्द्रपुरीको गए, जिसका विस्तार लक्ष- भाषाटीकासमेत-प. ६८. (१७३) काश्चगतास्तवयवइन्द्रपुरीमहान् ॥ द्वादशलक्षविस्तीर्णमुच्छाय- श्ववतुर्गुणम् ॥२॥ द्वादशादित्यतेजाढ्यहमप्राकारवटितम् ॥ मणिरत्नसमाकर्णिप्रासादगृहमाकुलम् ॥ ३॥शतयोजनविस्ती- णमंदिरस्यचमंडपम् ॥ प्रतोल्याद्वारसंयुक्तंदिव्यकांचनशोभि- तम् ॥ ४ ॥ ध्वजमालाकुलंदिव्यतारणैरुपशोभितम् ॥ नानारत्नसमायुक्तं दिव्यंकांचनवेष्टितम् ॥५॥ सिंहासनानिदिव्या- निहेमरत्नकृतानिच ॥ तत्रतिष्टंतिराजेन्द्रइन्द्रराजोमहानृपः॥६॥ दिव्यवस्त्रपरीधानोदिव्यगंधानुलेपनः ॥ दिव्यपुप्पशिरोवधादि- व्याभरणभूपितः ॥७॥ करवज्रगृहीत्वाचसहस्रनयनोज्ज्वलः॥ जयमुकुटधारीवकुंडलानिज्वलंतिच ॥ ८॥ निर्जरारिसमामध्ये शोभितःपाकशासनः ।। सूर्यचंद्रानिलेन्दूनांयमस्यवरुणस्यच ॥ ॥ ९ ॥गणगांधर्वदेवस्यनापयोसुरपन्नगाः ॥ सभायांपरिति- एंतिसिक्ष्यसंचयोपितः ॥ १०॥ साधकाश्चगतादृष्ट्वाइन्द्रराजस्य सम्मुखम् ।। इन्द्र उवाच ॥ ॥ विमानारूढभोसिद्धाइन्द्रोवचन मत्रवीत् ॥ ११॥ विमानारूढदेवस्यदेवकन्यासमाकलम् ॥ चा- योजन तथा ऊंचा उसकी अपेक्षा चौगुना था ॥ २ ॥ बारह सूर्यके समान तेज- युक्त सुवर्णके प्राकार वेष्टितमणि रनों से व्याप्त प्रासाद यह थे ॥३॥ शतपोजन विस्तृत उस मन्दिरका मण्डप था, मतोली दारसहित दिव्य कांचनसे शोभित या उत्तम पताका मालाओस व्याप्त, तोरण (वंदनवार ) से शोभाय- मान, अनेक रत्रोंसे समाकुल मुन्दर मुवर्णसे वेष्टित ।। ५ ॥ तथा दिव्य सिंहासन सुवर्णरत्न जटित थे, वहां राजा इन्द्र विराजमान थे।॥ ६ ॥ दिव्यवस्त्र धार मुन्दर सुगन्ध लगाये दिव्य पुष्प सिरपर बांधे,सुन्दर आभूपणांसे भूषिता॥हाथमें वत्र अहण पिपे, सहस्रनेत्र समेत जटा मुकट धारण किये कुंडलोंसे प्रकाशित ॥ ८॥ देवताओंकी सभाम राजा इन्द्र शोभित थे, मूर्य, चन्द्र, पवन, यम, वरुण ॥९॥ गण, गन्धर्व, ऋपि, सुर, सर्प, सिद्ध, यक्ष तथा स्त्रियां उस सभामें विद्यमान थी ॥ १० ॥ साधक राजा इन्द्रके सन्मुख गये, इन्द्र बोले हे सिडो ! विमानपर बढी । इस प्रकार इन्द्रने कहा ॥ ११ ॥ विमानपर चढ़े इन्द्रदेवके चारों ओर देव.
क्दारकल्प। (१७४) मगवीज्यमानास्तुस्तुतिकुवतियोपितः ॥ १२॥ प्रेक्षणीयंप्रक- तिच्छचचामरशोभितम् ।। भोजनःपूरितास्तत्रमणिवर्य्यमौक्ति- केः॥ १३॥ आगताश्चततःकन्यावदंतिसाधकान्प्रति ॥ कन्य- का उवाच ॥ ॥ दिव्यवस्टंपरीधानंदिव्यगंधानुलेपनम् । ॥ १४ ॥ दिव्यपुष्पशिरोवध्वाहारकेयूरभूपिता ॥ करकंकण संयुक्ताकिंकिणीभिरलंकृता।। १५॥इन्द्रनीलमहानाले पद्मगगो- पशोभिता ॥ संपूर्णचन्द्रवदनासर्वाभरणभूपिता ॥ १६॥ सर्व- लक्षणसंयुक्तानानाविद्यापरायणाः ॥ कन्यकाआगतास्तब्रह्मर्च- यतिचसाधकाः॥ १७॥ चंदनैकुंकुमैर्युक्तंपुष्पमालामनोहरम् ।। गीतंगायतिताःकन्यावाद्यतेवहुनेकधा ॥ १८॥ शंखदुन्दुभिनि- चौपहिलैरिमर्दलैः ॥ माधकास्तत्रसहिताजल्पन्तिचपरस्प- रम् ॥ १९॥ इन्द्र उवाच ॥ ॥ अस्मिन्स्थानेपुरेरम्येनाना- भोगसमाकुले ॥ यत्रस्थानेमहासिद्धायावञ्चन्द्रार्कतारकाः॥२०॥ यावद्गाचरेवाचगोदावरि सरस्वती ॥ यमुनासिंधुकावेरीयावनी- कन्या स्थित थी और झूलती हुई स्तुति कररही थी ॥ १२ ॥ इयर अवर निरी- क्षण करते छत्र शोभासे मुशोभित पात्रोमे मणि वैदूर्य माती सम्मिलित थे ॥१३॥ व पन्या साधकोंके पास आई और बोली, दिय वस्त्र पहने मुन्दर गन्ध लगाये ॥ ॥४॥दिव्यपुप्प सिरमे बांध, हार बाजूबंदासे भूपित हाथोंमे कंकण पहने फिकि- णी भूपीसे अलंकृत ॥ १५ ॥ इन्द्रनील, महानील, पद्मराग मणियोसे शोभित सम्पूर्ण चन्द्रमागरी समान मुखारविन्द, सब आभूपणोसे भूपित ॥ १६ ॥ सब लक्षणोंसे संयुक्त अनेक विद्याओमी पारंगत वे कन्या आई, और साधकोका अर्चन किया ॥ १७ ॥ चंदन कुंकुम पुष्पमालाओसे मनोहर ये कन्या गीत गाती, अनेक याने बजाती ॥ १८ ॥ शंख, दुन्दुभि, फाहल, भेरी, मर्दलके शब्दो सहित माधोंसे वहां इन्द्र संभाषण परन लगे ॥ १९ ॥ इन्द्र बोला । इस स्थानमे नानामसारको भोग मिलतेह, हे सिद्धो ! जस्तक चन्द्रमा सूर्य तारे है ।। २० ।। गवत गंगा रेवा, गोदावरी, सरसती, यमुना, सिन्धु, पारी, तथा समुद्रमे -- - 1
भापाटीकासमेत-प० ३८.
(१७५)
रंचसागरे ॥ २१ ॥ यावत्तिष्टंतिमेदिन्यांग्रहनक्षत्रतारकाः॥
यावदस्मिन्पुरेरम्येतावत्तिष्टंतिसाधकाः ॥ २२ ॥ साधक
उवाच ॥ ॥ यत्रस्थानेनरुच्यतेसत्यंसत्यंवदाम्यहम् ॥ विना-
रुदेणभोशक्रपुरीमानरुच्यते ॥ २३ ॥ इन्द्रनीलमहानील-
पद्मरागोपशोभितम् ।। मणिरत्नसमाकोणमिन्द्रनगरीसुशोभिता।।
॥ २४ ॥ देवदेवजगन्नाथंदुर्लभंतवदर्शनम् ॥ पुरीध्यानंततः
कृत्वाशृणुशक्रमहानृपः ॥ २५ ॥ नमेमोगस्यकार्यवैदर्शनार्थ
समागतः ॥ विष्णुसंदर्शनार्थवतत्रगच्छामिदेवराट् ॥२६॥ नम-
स्कारं ततः कृत्वागंतव्यपंथमुत्तमम्।। साधकाश्चगतास्तत्रविष्णो-
पुरिमनोहरम् ॥ २७॥
इति श्रीकेदारकल्पेविख्यातपुराणे श्रीश्वरकात्तिकेयसंवादे-
पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे
शिवदर्शने सदेहकैलासगमनेशक्रपुरींद्रसमा-
गमोनामायात्रिंशः पटलः॥३८॥
जल है ॥ २१ ॥ जबतक पृथ्वी गृह नक्षत्रनार उपस्थितहै है सायका ! इसनगर
मंतबतक स्थित रहतेहैं ॥ २२ ॥ साधक बोले । इस स्थानमें निवास करनेकी
इच्छा नहीं है, यह सत्य २ कहतेहैं, विनारुदके यह आपकी नगरी नहीं रुक्ती ॥
॥ २३ ॥ इन्दनील महानील पद्मराग मणियोंमे शोभित, मणिरल नटित इन्द्र
पुरी शोभायमान है ॥ २८॥ हे देवदेव ! हेजगन्नाय ! आपका दर्शन परमदुर्लभ
है इन्टपुरीका ध्यान करके साधक बोले हे महानृपशक ! ॥ २५॥ हमें भागसे
गुछ प्रपानन नहीं आपके दर्शनोंकी अभिलापासे यहां आपहें, फिर सायक
विष्णु के दर्शन करनेको आये ॥ २६ ॥ परस्पर नमस्कार करके माधक विष्ट
लोसमें प्राप्त हुप ॥ २७॥
इति प्रारदारको मापाटौनायामष्टानेशः पटरः ॥ ३८ ॥
(१७६) केदारफल्प। एकोनचत्वारिंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ तत्पश्चात्साधका सर्वेगताविष्णुपुरंमहत्॥ दशयोजनलक्षाणिउच्छ्रायोपिचतुर्गुणम् ॥ १॥ विष्णुपुरीमहा- दिव्यासूर्यकोटिसमप्रभा ॥ तेजोमयंद्योतितंसंतप्तकांचनसन्नि- भम् ॥२॥ हैमेनरचिताभूमिःप्रासादगृहमाकुलम्॥ध्वजमालाकुलं- दिव्यंचित्रकर्मोपशोभितम् ॥ ३॥ सिंहासनानिदिव्यानिहेमरत्न- विभूपितम् ॥ तत्रतिष्टतिदेवेशोजगन्नाथोजनार्दनः ॥ ४ ॥ अग्रतोदृश्यतेतत्रवायतेविमनेकधा । शंखदुंदुभिनिर्षांपर्काहलै- भैरिमर्दलैः ॥५॥ पटहावेणुवंशस्यवायतेविविधानिच ॥ नृत्य- त्यप्सरसस्तवदेवगंधर्वयोपितः ॥ ६ ॥ वशिष्टगौत्तमश्चैवदुर्वा- साव्यासपंडिताः॥ अनेकैपिभिः सवर्वेदयोध्वनिगीयते ॥७॥ साधकाश्वगतास्तत्रयत्रदेवोजनार्दनः ॥ दृष्ट्वाचसाधकाःसर्वेवदंति स्वागतंप्रिये ॥ ८॥ श्रीविष्णुरुवाच ॥ ॥ अस्मिन्नेवपुरेरम्येब- इसके पीछे साधक विष्णुलोकमें गये वह दस लाख योजन विस्तृत तथा उस से चौगुना ऊंचाया ॥ १ ॥ विष्णुपुर परमदिव्य, कोटिसर्यकी समान तेजयुक्त, फान्तिमान सुवर्णके समान प्रकाशित था ॥२॥ वहांकी भूमि सुवर्णसे आच्छा- दित और सुन्दर गृहरत्नादिस युक्त थे ध्वजा मालाओस शोभित, चित्रकर्मसे चि- त्रित ॥३॥ दिव्यसिंहासन सुवर्णरत्नोंसे भूपितथे, वहाँपर जगन्नाथ जनार्दन देव विराजमान थे ॥४॥ जिनके आगे अनेक बाजे बजते दीखे शंख दुन्दुभि काहल, भेरी, मर्दल, ॥५॥ पदह वेणु तथा वंशी आदि अनेक बाने बनतेथे, अप्सग दय गंधर्वको त्रियां नृत्य करती थीं ॥ ६ ॥ वशिष्ट, गौतम, दुर्वासा, व्यास पंडित आदि अनेक ऋषि वेदनानिपूर्वक गान करते थे ॥७॥ साधक वहां गये जहा विष्णु देय उपस्थित थे, जब साधकोंने स्तुतिकी तब यह देववाणी कि है प्रिपननी ! स्वागत है ॥ ८॥ विष्णु वौल बहुत फन्याओंसे व्याप्त भाषाटीफासमेत-प० ३९. (१७७) हुकन्यासमाकुलम् ॥ तिष्टंतिसाधकाःसर्वेयावदिन्द्राश्चतुर्दशा॥९॥ श्रीसाधक उवाच ॥ ॥ देवदेवमहाविष्णोश्रूयतांवचनमम ।। आगताचमयादृष्टः दुर्लभंतवदर्शनम् ॥ १० ॥ दुर्लभंसर्वभूतानां- देवानामपिदुर्लभम् ॥ अद्यमेसफलंजन्मअद्यमेसफलंतपः ।। ॥११॥ अद्यमेसफलंजाप्यमद्यमेसफलाःक्रियाः ॥ अद्यमेसफ- लंबासअचमेसफलार्चनम् ॥ १२ ॥ अधमेसफलंभाग्यमुक्ता- मेवंविधानतः ॥ आदिदृष्ट्वाचगोविंदसर्वपापै प्रमुच्यते ॥ १३ ॥ अद्यमेसफलंपंथानमस्तेस्तुजनार्दनः ॥ श्रीविष्णुरुवाच ॥ सिंहासनानिदिव्यानिदिव्यरत्नयुतानिच ॥ १४ ॥ अत्रतिष्ठंतु- भोसिद्धामहावीरामहातपाः ।। भुंजंतुसाधकाः सर्वेतिप्टंतुगरुडा- सने ॥ १५॥ दिव्यवस्त्रपरीधानंदिव्यगंधानुलेपनम् ॥ दिव्य- पुप्पशिरोवध्वाचंदनागरलेपनम् ॥ १६ ॥ अस्मितिष्टंतुभो- सिद्धाभुजंतुंविपुलांश्रियम् ॥ आचार्य्यसाधका-सर्वेभुकाभोगान् ॥ इसनगरमें सम्पूर्ण साधक तुम तबतक निवास करो जबतक चौदह इन्द्र हें ॥९॥ साधक वोले । हेदेवदेव ! हे विष्णो ! आपका वचन सत्य है हम आप के दर्शन करनेको आयेहैं क्योंकि आपका दर्शन वडा दुर्लभहै ॥ १० ॥ सव प्राणियों व देवताओंकोभी दुर्लभहै आज हमारा जन्म तया तप मुफल हुआ ॥ ॥ ११ ॥ आज हमारा जप तथा क्रिया सफल हुई, और आन हमारा निवास तथा पूजन सब सफल हुआ ॥ १२ ॥ आज हमारा भाग्य सफल हुआ, और बंधनसे छूटे यह प्राणी आदिदेव गोविन्दको देखकर सबपापोंसे छूटजाताहै ।। ॥ १३ ॥ आज हमारा पंथ सुफल हुआ आपके चरणस्मलोंको नमस्कारहै, विष्णु बोले ! यह दिव्यसिंहासन रलजटितहै ।। १४ ॥ हेमहावीर ! हेमहातप- खियो ! इनमें बैठो, और तुम सब साधक अनेक भोग भोगो तथा गरुडासनपर बैठो ॥ १५ ॥ दिव्यवस्त्र पहनो मुगंध लगाओ, दिव्यपुष्प सिरपर धारो, चंदन अगरका लेप करो ॥ १६॥ और यहां निवास करके सब आचार्य साधक भने- (१७८) केदारकल्प। मनेप्सितान् ॥ १७ ॥ आचार्य उवाच ॥ ॥अस्मिन्स्थाने नमेकार्यसत्यंसत्यंवदाम्यहम् ॥ नमस्कारंततःकृत्वागतास्ते- पंथमुत्तमम् ।। १८॥ इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेयसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहकैलासगमने विष्णुपुरीश्रीविष्णु- दर्शनो नामैकोनचत्वारिंशः पटलः ॥३९॥ प्सित भोगोंको भोगो ॥ १७॥ आचार्य बोले इस स्थानमें हमारा कुछ कामनहीं यह सत्य २ जानो, यह कह नमस्कार करके उत्तम पंथको गये ॥ १८ ॥ इति श्रीकेदारकल्पे भापाटीकायामकोनचत्वारिंशः पटलः ॥ ३९ ॥ चत्वारिंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ पश्चाचसाधकाःसर्वेत्रह्मलोकेगतास्तथा ॥ सप्तलक्षंचविस्तीर्णब्रह्मस्थानंचपुरीमहत् ॥ १॥ ब्रह्मस्थानं महा- दिव्यमुछायोचचतुर्गुणम् ॥ द्वादशादित्यतेजाढयंसूर्यकोटि- संमप्रभम् ॥ २॥ नानारत्नसमाकीणैवैदूर्य्यमणिरश्मिभिः ॥ रम्यंमनोहरंदिव्यमुदितार्कसमप्रभम् ॥ ३॥ अग्निज्वालासमो- पेतहेमप्राकारवेष्टितम् ॥ पठतिविविधस्तोत्रंवाद्यतेचपुनःपुनः ॥ विविधानिचरंगानिस्तोत्रमंबाह्यनेकधा ॥४॥ स्वराणिचमहा- पश्चात् वे साधक ब्रह्मलोकमें गये जो सातलाख योजन विस्तृत और उससे चौगुना लंबा था ॥१॥ ब्रह्मलोक बडा सुन्दर था, वारह सूर्यको समान तेज युक्त ॥ २ ॥ अनेक रत्नासे जटित, पैदूर्यमणियोंकी कान्तिसे शोभित मनोहर टदय होते सूर्यकीसमान कान्तिमान् ॥ ३ ॥ अमिकी लपटके तुल्य देदीप्तमान, सुवर्णमाकारसे आच्छादित अनेक स्तोत्रपाठतथा वाजोंकी ध्वनिसे गुंजारित, विवि- - धरंग तया स्तुतिमंत्रोंसे शब्दायमानten दशोंदिशाओं में स्वरोंका महानाद होत.
भाषाटीकासमेत-प०१०. (१७९) नाइंदृश्यतेचदसोदिशः॥ चूतंचंन्दनसंयुक्तंकदलीखंडमण्डितम् ॥ ॥५॥ देवगंधर्वसंकीर्णदेवकन्यासमाकुलम् ॥ ध्वजामालाकुलं- दिव्यंप्रासादगृहमाकुलम् ॥ ६॥ वापीकूपतडागानिदृश्यतेच- ननोहराः ॥ वेदध्वनिचनि?पै पठतिचद्विजोत्तमाः ॥ ७॥ नारदश्चभृगुश्चैववसिष्ट गौतमस्तथा ॥ कश्यपोवामदेवश्चशुकश्च- व्यासपंडिताः॥८॥ अन्याश्चरुपयःसबैवेदयोध्वनिगीयते ॥ ब्रह्मलोकेमहासेनवेष्टिताऋपिउत्तमाः ॥९॥ सिंहासनानिदि- व्यानिहेमरत्नयुतानिच ॥ तत्रतिष्टतिदेवेशःदेवदेवःप्रजापतिः ॥ ॥ १०॥ त्रयोदेवासमायुक्तंब्रह्माविष्णुमहेश्वरम् ॥ साधकाश्च- गतादृष्ट्वावदंतिस्वागतंप्रियम् ॥ ११ ॥ सन्मुखवागतास्तत्र- देवदेवःपितामहः ॥ ततःपश्यतितेसिद्धाब्रह्मावैवाक्यमब्रवीत् ॥ ॥ १२ ॥ ब्रह्मोवाच ।। ॥ भोभोसिद्धामहाप्राज्ञास्थिता- अस्मिनपुरेसदा ।। अवस्थानेपुरेरम्येमहाभोगसमन्विताः॥१३॥ इच्छावरंचभोक्तव्यंब्रह्मलोकेचसाधकाः।।एवंभोगामहावीराब्रह्मलो- केव्यवस्थिताः ॥ १४ ॥ इदंपंचमहासेनयावादिन्द्राश्चतुर्दश ॥ था, आम, चंदन, संभोसे मंडित ॥ ५ ॥ देवता गन्धर्व देवकन्याओंसे परिपूर्ण, वजामालाओंसे अलंकृत मुन्दर प्रासाद गृहोंसे संयुक्त ।। ६ ॥ वापी कूप सरोवर आदि दीख रहेथे, स्वरपूर्वक उत्तम ब्राह्मण वेदपाठ करतेथे ॥ ७ ॥ भृगुमुनि,नारद वशिष्ठ, गौतम, कम्यप, कृष्णद्वैपायन, शुक, व्यास, आदि पंडित ॥ ८ ॥ पर स्पर सब ऋषि वेदोंका गान करतेथे हे महासेन ! ब्रह्मलोको टत्तम ऋषि विराज- मान थे ॥ ९ ॥ दिव्यसिंहासन मुवर्णरत्न जटित थे, वहांपर देवेश प्रजापति (ब्रह्मा) विराजमान थे ॥ १० ॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, तीनों देवत्ता विराजमान थे, साधक वहां गये, टनका स्वागत हुआ ॥ ११ ॥ उनके सन्मुख साक्षात् पिता- मह ब्रह्मा उपस्थित हुए और उन साधकाने दर्शन किये, ब्रह्मा यह वचन बोले ॥ १२ ॥ हे सिद्धो ! हे महाप्राज्ञ ! इस नगरम नित्य निवास करो, और इसी जगह अनेक भोगोंको अनुभव करो ॥ १३ ॥ हे साधको ! ब्रह्मलोकमें इच्छा- पूर्वक वरनहण करो, और इस २ प्रकारके महाभोग हैं ॥ १४ ॥ है महासेन ! .
(१८०) केदारफल्प। साधकाश्चमहासत्यंवदंतिब्रह्मणोयदि ॥ १५॥ यदिपंचमहासेन- उपुर्धचविधीयते ॥ तिष्टन्त्ववपुरीरंम्यांभुक्तान्भोगान्यथे- प्सितान् ॥ १६ ॥ शृणुसिद्धामहाप्राज्ञाभुक्तभोगाननेकधा ॥ हेमवदामहास्थानमेकचित्तोव्यवस्थिता ॥ १७ ॥ त्रिसंध्यंच- भवेन्नित्यंकुर्वन्तिचमहाप्रभो ॥ एवंब्रह्मपुरंदिव्यंभुक्ताभोगान्म- नप्सितान् ।। १८ । साधक उवाच ॥ ॥ देवदेवप्रजानाथ- शृणुत्ववचनमम ॥ आगतावमयादृष्ट्वादुभंतवदर्शनम् ॥ १९॥ अयमेसफलंजन्मअयमेतफलंतपः ॥ अद्यमेसफलंजाप्यमद्यमे सफलंक्रिया ॥ २० ॥ त्वांदृष्ट्वाचप्रजानाथसर्वपापैःप्रमु- च्यते ।। अयमेसफलंभाग्यमुक्तोहंभवबंधनात् ॥२१ ।। गर्भ- वासेनदुःखेनत्यक्तासंसारसागरात् ॥ गर्भगसविनिर्मुक्तौतस्य- दोवेतिगच्छति ॥ २२ ॥ तेनदुःखभवादीताकैलासेगमनंकृतम्।। विनारुद्रमहाप्राज्ञनरुच्यतेपुरीतव ॥ २३ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ ब्रह्मलोकसमोलोकासुरश्रेष्टसमोसुरः ।। ब्रह्माणीसदृशानारीकथं- पांच आवृत्ति जबतक चौदह इन्द्र हों तबतक यहांकी आयु है इस प्रकार सत्य र ब्रह्माने कहा ॥ १५ ॥ हे भाग्यवानो ! पांव कल्पतक ऊपरके भोग भोगो, तबतक अत्यन्त भोगोंको सुखपूर्वक भोगो ॥ १६ ॥ हे महाप्राज्ञ ! सुवर्णसे आच्छादित इस स्थानमें एकाग्र चित्तसं निवास करके सुखोंको भौगो ।। १७ ॥ हे प्रभो ! नित्य त्रिसंध्या करो, इस प्रकार ब्रह्मपुरीमं दिव्य भोग हैं ॥ १८ ॥ साधक बोले हे देवदेव ! हे प्रजानाय ! आप हमारे वचनको सुनो, आपके दर्शनार्थ हम आये हैं आपका दर्शन परम दुर्लभ है ॥ १९ ॥ आज हमारा जन्म सफल हुआ, आन हमारा तप सफल हुआ, तथा आम हमारा जप और क्रिया सफल हुई ॥२०॥ आदिदेव प्रमानाथ आपका दर्शन कर सब पापोसे छूटे, आन हमारा भाग्य सफल हुआ और संसार बंधनसे छूटे ॥ २१ ॥ गर्भवासके दुपसे तथा संमार सागरसे छूटे ॥ २२ ॥ उस दुःखके भयसेही फैलासको आये ये, हे ब्रह्मन् ! बिना रुके आपकी पुरी नहीं रुचती ॥ २३ ॥ ब्रह्मा बोले ब्रह्म- Hit लोक व ग्राम दाना, बना गौसी ना,यहाँकैसे भोग, हे आर्य । आप भापाटीकासमेत-प०१०. (१८१) चायनरुच्यते ॥ २४ ॥ अष्टाशतसहस्राणिऋपयोवेदपारगाः॥ नौकुलोपन्नगाःसर्वेदेवत्रिदशकोटिभिः ॥ २५॥ रतिसर्वमहा- श्रेष्टंदेवदेवःप्रजापतिः ॥ कथंभोगानरुच्यतेइच्छायांचपनःपुनः॥ ॥ २६॥ आचार्य उवाच ॥ असरलमहाभोगास्तिष्टतेचगृहे मम ॥ रथनागसमायुक्तैर्विमानानिह्यनेकया ॥ २७ ॥ सेना- कोटिसहस्राणिपूर्णचन्द्रमुखास्त्रियः ॥ सत्यंसत्यंपुनःसत्यंविना- रुद्रेनरुच्यते ॥ २८ ॥ झुत्वाधर्मपुराणानित्यवत्वाचावसमा- गताः ॥ नमस्कारंतत कृत्वाप्रजानाथनमाम्यहम् ॥ २९॥ एव- मुक्ताततःश्रुत्वावगेनपवनोयथा ॥ धर्मराजपूरींगत्वाआचार्य- साधकै सह ।।३०॥ इति श्रीकेदारकल्पविख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेय संवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवनमुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शनेसदेहकैलासगमनो नामब्रह्मपुरीब्रह्म- दर्शनोनाम चत्वारिंशः पटलः ॥४०॥ को क्यों नहीं रुचते ॥ २४ ॥ यहां अठारह सहस्र ऋपि वेद पारंगत हैं तीस कोटि देवता और श्रेष्ठ कुलके सर्प रहते हैं ॥ २५ ॥ इसप्रकार जहां महाश्रेष्ठ मजापति देवदेव है, रमणीक नगरमें रहकर इच्छा करनेपर प्राप्त होनेवाले भोग क्यों नहीं रुचते ? ॥ २६ ॥ आचार्य बोले हमारे घरमें भी अनेकों भोग स्थित हैं, हाथी घोडा रस विमान आदि अनेक ॥ २७ ॥ कोटि सहस्र सेना पूर्णचन्द्रमुख. बाली स्त्रियां हैं, परन्तु विना रुड़के नहीं रुचते यह हम सत्य र ही कहते हैं ।।२८।। धर्मपुराण आदि श्रवण करके उनको छोड़ यहाँपर प्राप्त हुए हैं, तब प्रजानाथ ब्रह्माको नमस्कार करके ॥२९॥ वे साधक पवनके समान धर्मराजकी नगरीको गये और टनके साथ आचाप भी गये ॥३०॥ इति श्रीकेदारफरसे मापाटीकायां चत्वारिंशः पटटः॥ ४० ॥ .
(१८२) फदारकल्प। एकचत्वारिंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच॥ ।। तत्पश्चात्साधका सर्वधर्मराजपूरींगताः ।। कैलासदक्षिणेभागेतिष्ठतिअंतिकापुरी ॥ १ ॥ द्वादशलक्ष विस्तीर्णमुछायश्चचतुर्गुणम् ॥ शोभतेचमहादिव्यंयोजनश्चपुरी महान् ॥ २ ॥ हेमरत्नसमायुक्तलोहप्राकारवेष्टितम् ॥ रम्यं मनोहरंदिव्यंसर्वेपांचभयापहम् ॥ ३ ॥ सिंहासनानिदिव्यानि हेमरत्नजटानिच ॥ तत्रतिष्ठतिदेवेशधर्मराजोमहानृपः ॥४॥ तिष्ठंतिकिंकरा सर्वेचित्रगुप्तश्चतिष्ठति ॥ पापंपुण्यंचलोकानांलि- ख्यतेतत्रपत्रिका ॥ ५ ॥ सुकृतंदुष्कृतंकिचित् जतिचसुखं दुखम् ॥ महानकोचभोक्तव्यकृतंकर्मशुभाशुभम् ॥ ६ ॥ ऊर्द्धपादाःस्थिता केचित्तप्ततैलंपुनःपुनःकिचित्तुरौरवेघोरेकुंभी- पाकेतथैवच ॥ ७॥केचित्तक्रमिणःस्थानेकेचिन्मुद्रचूर्णिताः॥ हस्तिचरणस्थिता केचित्तप्तांगारेपुलोहिताः ॥ ८॥ गण्डपाके स्थिता केचित्तताङ्गारेसिर्जिता ।। आरण्येचस्थिता केचित्स्थि- श्री ईश्वर बोले तत्पश्चात सम्पूर्ण साधक धर्मराजकी पुरीको गये, वह अव- न्तिका पुरी-कैलासके दक्षिण भागमें स्थित है ॥ १॥ बारह लाख योजन विस्ता- रवाली, उसकी अपेक्षा चौगुना लम्बाव है, इस प्रकार वह दिव्य नगरी शोभा पाती थी॥२॥ मुवर्ण रत्नजटित लोह प्राकारसे वेष्टित, रमणीक दिव्य सबके. भय दूर करनेहारी है ॥३॥ वहां दिव्य सिंहासन मुवर्णरत्नसे जटित है, वहांपर श्रीमान् राजा धर्मराज विराजमान थे ।। ४ ।। तथा सब किकर (दास) चित्र गुप्त आदि उपस्थित थे, संसारके पाप और पुण्योंको पत्रपर लिख रहे थे ॥५॥ माणी जो कुछ सुकृत और दुष्कृत करते हैं, उनका सुख और दुःखरूप फल भोगते हैं, तथा पापोंसे महानर्फ भोगना होता है, शुभ तथा अशुभ कर्म करने- वाले ॥ ६॥ कोई ऊर्ध्वपाद (ऊपरको पैर किये हुए) कोई तपाये हुए तैलमें गिरे हैं, कोई चार रौरवमें प.हैं, तथा कोई भी पाकमें पडे हैं ॥ ७ ॥ कोई कृमि फीट आदिमें स्थित हैं, कोई पैरोसे चूर्ण २ किये हैं, कोई हाथीके पैरोंसे रहे हैं फोई तप्त अंगारोंसे लाल किये जाते हैं ॥ ८ ॥ कोई गंडपाकमें स्थित .
भाषाटीकासमेत-प०४१. (१८३) ताकेचिन्महार्णवे ॥९॥ केचिद्धाश्चपाशेनकेचिद्वातिअंकुशैः॥ पाशवदा स्थिता केचित्केचिदण्डेनपीडिताः ॥१०॥ आलि- गितास्ततस्तभै रुदन्तिदुःखपीडिताः ॥ खड्नछेदिता केचि- केचिन्मुशलपीडिताः ॥ ११ ॥ केचिल्लोहातप्तपाशैर्वत्रशक्ति- प्रच्छेदिता ॥ संस्थिताचकृतंकायंक्रियतपापकर्मणा ॥ १२ ॥ सप्तजन्मकृतंपापं जंतेचपृथक्पृथक् ॥ पापाणैपिता केचिना- नादुःखैश्चपीडिताः ॥ १३ ॥ पुण्यधर्मकृतंयैस्तुभुजंतेसुकृ- तं महान् ॥ वालुकायांचतप्तायांकुंभीपाकेपुनपुनः ॥ १४ ॥ केचिञ्चकंटकैस्तीक्ष्णैस्तप्तलोहकमेवच ॥ केचितिमिराशिस्थाने केचिच्चाररुदंतिच ॥ १५ ॥ बहुधावेदनांप्राप्ताभुशुंडीचपृथक् पृथक् ॥ अस्मिन्स्थानेमहाघोरेसर्वजन्तुप्रपीडिताः॥ १६॥ केचित्तुतैलयत्रैस्तुलौहपात्रतथैवच ॥ केचित्तुशाल्मलिवृक्षके- चिद्विकटसंकटे ॥ १७ ॥ तदुष्कृतंकर्मकृतंयच्चशुभाशुभम् ॥ यैःपूर्वनिन्दितशास्त्रंदुष्कृतंचकृतमहान् ॥ १८॥ तेनरानरकयां- हुए, तथा कोई बडे समुद्र में पडे डूबते थे ।। ९ ॥ कोई पाशोंसे बांधे गये, कोई अंकुशसे प्रहार किये गये, कोई रस्सी में बंधे, कोई दंडसे पीडित देखे ॥ १० ॥ कोई तपाये हुए खंभोंमें लिपटाये हुए दुःखी रोते थे, कोई खड्गसे काटे जाते कोई मूसलसे पीडित हो रहे थे ॥ ११ ॥ कोई तप्त लोहके पिंजरेमें बंद किये गये कोई बचशक्तिसे छेदित इस प्रकार पाप कर्म करने वालों को कायाको कष्टदिया जाताथा ॥ १२ ॥ सातजन्मका किया पाप पृथक् २ भो- गतेथे, नानादुःखोंसे पीडित नर शिलाओंसे पीसे जातेथे ॥ १३ ॥ और जिन्होंने पुण्यकर्म कियाथा वह सुखफल भोगतेथे, कोई पापी तारतमें स्थित, तथा कोई कुंमीपाकमें पडेथे ॥ १४ ॥ कोई तीखे कांटों में पड़े तथा कोई तपाए लोहेसे पीडित होते, कोई कृमिके स्थानमें स्थित, कोई दुःखीहुए रोतेथे ॥ १५ ॥ अनेक मकारकी वेदनाओंसे ग्रस्त पृथक् २ भुशुंडी (बन्दूक) आदिसे पीडित, उस महा पोरस्थानमें सब जन्तु पीडितये ।। १६ । कोई तैलपात्र तथा लोहपात्र में स्थित, कोई शाल्मलीके वृक्षमें बैंधे कोई विकट संकटमें पडेथे ॥ १७ ॥ अनेकप्रकारके शुभाशुभ कर्मोको भोगतेथे, जिसने पूर्वमें शास्त्रोंकी निन्दाकी ॥१८॥ वह मनु- - (१८१) केदारकल्प। तिमहदुःखंपुनःपुनः ॥ अनेकनरकांश्चैव जंतेचपृथक्पृथक ॥ ॥ १९॥ बजेतिरौरवेघोरेयत्रधर्मपुरेसदा ॥ साधकाश्चागता- स्तयत्रधर्मपुरीमहान् ॥ २० ॥ दृष्ट्वासमागतान्सिद्धान्धों- वचनमब्रवीत् ॥ धर्मराज उवाच ॥ ॥ सिद्धसिद्धमहाप्राज्ञ तुष्टोहंतवसाधकाः ॥ २१ ॥ इच्छानुरूपंसदृशंवरंयाचन्तु सत्तमाः ॥ साधक उवाच ॥ ॥यादतुष्टोसिमेधर्मश्रूयतांवचनं मम ॥ २२ ॥ गर्भवासभयागीतात्यत्वासंसारसागरम् ॥ तत्रस्थानेचययांतिमहानप्रपीडिताः ॥ २३ ॥ यदितुशासि मेदेवधर्मराजोमहाप्रभुः ॥ पंचवर्षशतंदिव्यंमोक्षंचकुरुदुःखतः॥ ॥ २४ ॥ धर्ममोक्षतदाकृत्वागताःस्वर्गौचयंतवः ॥ सर्वेषां तुभवेन्मोक्षःस्वर्गक्रीडापृथक्पृथक् ॥ २५ ॥ धर्मेणमोक्षणं कृत्वाधर्मोवचनमब्रवीत् ॥ धर्मराज उवाच ॥ ॥ शृणुसाध- कतत्त्वेनममवाक्यमुनिश्चितम् ॥ २६॥ अन्तरेस्थापितःशंभुः भजनीयासुरैर्यदा।। सत्यंसत्यंवदाम्येतत्कुंडमस्त्यतिभैरवम् २७॥ प्यभी नरकम प्राप्त हुएथे, इसप्रकार अनेक नरक पृथक् २ भोगतेथे ॥१९ ॥ घोर रौरवनरकभी महाभयानकथा, साधक वहां गये जहां महती धर्मपुरीथी ॥२०॥ धर्मपुरीमें देखकर धर्मराजने कहा, धर्मराजबोले हेसिद्धो ! हे महाप्राज्ञ, ! हम नुमसे संतुष्ट हुएहैं ।। २१॥ अपनी इच्छाके अनुकूल उत्तम वर मांगो. साधक वोले हे धर्मराज ! यदि आप प्रसन्न हुए तो हमारा वचन सुनो ॥ २२ ॥ गर्भ- यासके दुःखसे भयभीतहुए संसारसागरसे डरके यहां आयेहै कि इसस्थानमें आने वाले महानरकसे पीडितहैं ॥२३॥ प्रभो। हे धर्मराज हे महाप्रभो! यदि आप हमसे प्रसनहें तो दिव्य पांचसीवर्ष पर्यंत हम कोई क्रूरकर्म न करें और मोक्ष हो ऐसा घर दो ॥ २४ ॥ तव धमरान मोक्षपदान करके स्वर्गलोकको गये॥ २५ ॥ धर्मपूर्वक हमारी मोक्षहो यह सुनकर धर्मरानबोले धर्मबोले हे साधको!! तत्त्व से हमारे निश्रित वचनोंको सुनो ॥ २६ ॥ इसके अन्तरमें ,शिवजीकी स्थापना जो जगदफे फारणहें यह हमारे वचन सत्य, इसके आगे महान् भयंकर भापाटीकासमेत-प०४१. (१८५) एवंचभुंजतेसर्वेशपंपुण्यपृथक्पृथक् ॥ मोसंभवतितस्यैवनि- यतीयोगमध्यगः ॥ २८ ॥ आगमंविधिसहितविस्तरे- णहितण्डुलम् ॥ सुखंदुःखंहानिवृद्धिराधारंप्रतिपालयेत् ॥ ॥ २९ ॥ शतवचरायुयंमहाभोगेनसंयुतम् ॥ प्रथम अविरोवित्रपितापिण्डस्यमध्यतः ॥ ३० ॥ नाडिकायांत्रिक मध्यंसंचरेतेचप्राणिनः ॥ बिंदुमध्येकृतंवामलभतेचयथेप्सितम् ॥ ३१ ॥ दशपंचचदिवसंपितापीडप्रपीडिताः ॥ ऋतुकाले कृतंभोगंरजोयुक्ताचकामिनि ॥ ३२ ॥ समयोनिचपतितो बिन्दुवीर्यसमभवेत् ॥ रजमातुःपितुर्वीर्यउन्सीचदशमास- कौ ॥ ३३ ॥ तत्सर्वप्रवरेरूपनारीपुरुपउच्यते ॥ चतुरस्या- पितेपिंडावालुतरुणवालयोः ॥ ३४ ॥ वृद्धिंचभवतेपश्चाद वस्यास्थादृश्यमानवः ॥ सुकृतंदुष्कृतंकमलिख्यतेतत्रपत्रिकाः ॥३५ ॥ आयुष्यंसर्वभुक्तंचज्ञात्यौचिविचित्रको ॥ भापन्ते धर्मवृत्तस्यह्यायुष्यंसर्वभुक्तये ॥ ३६ ।। भापतेवर्मराजस्य कुंडहै।। २७ ॥ पापकरनेवाले नरक भोगते हैं और पुण्यवाले पृथक् २ पुण्य भो. गतेहैं, जैसे इन्द्रियोंसे पापपुण्य कियेहैं, भोगनेको वही मिलते हैं ।। २८ ॥ विधि के सहित आगम सुखदुःख हानि वृद्धि आधार इनका पालन करना चाहिये ॥ ॥ २९ ॥ यहां दिव्य शतवर्षकी आयु होतीहै, पुण्यात्माओंको यहां बड़े भोगहैं, पहले अम्बरका विम्वपरदादेका पिण्डहै पीछे पितासे पहलेमध्पपिंडदादेकाहै ॥ ॥ ३० ॥ यही प्राणीजन नाडीके त्रिकस्थानमध्यमें विचरतेहैं, जो योगी विन्दु- नादका दर्शन करतेहैं वह यथेच्छ वरका लाभ करतेहैं।। ३१ ॥ दस पन्दह दिन- तक पिंड न मिलनेसे पिंडअदाताके पिताको पीडा होती है। ऋतुकालमें जिन्होंने रजस्वलाहोनेके पीछे भोग कियाहै ।। ३२ ॥ जिस समय वह वीर्य उस स्थानमें पतितहोताहै, तो माताके रज और पिताका वीर्य मिलकर पिंड बनताहै ॥३३॥ पही रूपवाला होकर नारी वा पुरुष होताहै, वह पिंड क्रमसे बढताहै ॥ ३४ ॥ और वृद्धिहोकर मनुष्यादि अवस्थाको प्राप्त होताहै, मुकृत वा दुष्कृत कर्म सब चित्रगुप्तकी पुस्तकमें लिखाजाताहै ॥ ३५॥ तथा चित्रगुप्त उनकी समस्त आयु. पाभी लिखतेहैं, और आयुके भोग और धर्मभी सब कहे जातेहैं ।। ३६ ।। धर्म- (१८६) फदारकल्प। किंकराचतुप्रेपितम् ॥ किंकराःपटचतुश्चैवपृथिवीचतुमध्यतः ॥ ॥३७॥ रसनामंडितामायासाधकारस्यमेवच ॥ तेनजानन्ति- ममाकायापितुःपिंडनचर्चितम् ॥ ३८॥ धर्माधर्मेणलिंगंच- आगतापृच्छकामया ॥ चित्रविचित्रौव्यक्तंधर्मभापितमुत्थिती॥ ॥ ३९ ॥ दुःस्थंविचारितमंत्रिउपदशंचजंतवः ॥ प्रथमेकुरुते- धर्मपश्चाद्धर्मप्रपीडिताः ॥१०॥ पापपुण्यंसमंकृत्वापुण्यपापी- हन्यते ॥ पापपुण्यंफलंयुग्मनवांच्छतियेप्राणिनः ॥ ११ ॥ वांञ्छाफलसाधकस्ययत्रभवतिसिद्धये ॥ किञ्चित्प्रकाशितंपुण्यं- फलंद्वयंचवाञ्छति ॥ ४२ ॥ वांछितधर्मप्रकाशवांछिताय- स्वर्गपुरी ॥ सगुणंनिर्गुणंपुण्यंपदंतस्यप्रतिष्टितम् ॥ ४३ ॥ एकमानात्मनोयस्यस्वर्गवास प्रतिष्ठितः। ब्रह्माविष्णुश्चरुद्रस्य- घ्यायंदेवनिरञ्जनम् ॥४४॥ द्वादशइन्द्रियाःसर्वव्यापितेजन- राजके भेजेहुए किकर सब कथन करते हैं वे फिकर ६४ पृथिवी अन्तरिक्षक मध्यमें निवास करतेहैं बड़े चतुर ॥ ३७ ॥ मनुष्यमायाके बंधनमें पडेहुए साधन न करनेसे मेरी आज्ञा और पिंडार्चनको नहीं जान्तै हैं ।। ३८॥ धर्माधर्मके विचारसे पूछते यहां आतेहैं यहां धर्मकी गति चित्रविचित्र देखी जातीहै ॥३९॥ यहांके दुःख विचारकर मंत्रीवर्य उपदेश करतेहैं, लोग पहले धर्मकरके पोछे धर्ममें पीडा करतेहैं ॥४०॥ जब इसके पापपुण्य बराबर होजातेहैं, तब यह पापपुण्योंसे हनन होजाते हैं, अर्थात् प्राणियों में पापपुण्य नहीं रहते, जो प्राणी पाप और पुण्य दोनोंकी इच्छा नहीं करते ।। ४१॥ वह साधकके फलकी वांछा सिद्ध करनेको समर्थ होतेहैं जिनका पुण्य फल कुछ प्रकाशितहै, जो दोनों फलकी इच्छा करतेहैं ॥ ४२ ॥ जो धर्मका प्रकाश और धर्मपुरीको वांछा करते हैं, सगुण निर्गुण पुण्यका फल उनको प्राप्त होताहै ॥ १३ ॥ जो सर्वथा पुण्यात्मा हैं उनका निश्चय स्वर्गवास होताहै, जो विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र इन निरंजन देवका. ध्यान करतेहैं ॥ ४४ ॥ वह परमपदं पातेहैं, जो दुर्मतिइन्द्रियभोगोंमें लीनहैं। .
.. भापाटीकासमंत-प० ११, (१८७) दुर्मतिः ॥ शंभुनामनजानन्तिमाणिनह्युच्चरेत् ॥ ४५ ॥ मोहितामन्मथामायारौरघोरेपतंतिते । शृणुसिद्धामहावीरामहा- योगीमहातपाः ॥ ४६॥ आगतावरमिछायाददातुवरमुत्तमम् ।। साधकं उवाच॥ ॥ पृच्छतिसाधका सेनशृणुधर्मनृपस्तथा। चित्तंमनोवचोधर्मध्यायतेमननिर्मलम् ॥४७॥ हृदयंध्यानयो- धर्मआवर्तचममालये ॥ सदातुष्टोसिमेधर्मधर्मराजप्रकाशि- तम् ॥ १८॥ मुंचवर्षशतंपुण्यपंचमोक्षंचकुरुधर्मयोः ॥ मोक्ष- चक्रियतेसवेंगताःस्वर्गचजंतवः ॥४९॥ धर्म उवाच ॥ ॥ अस्मिन्स्थानेमहाभोगादेवदानवदुर्लभाः ॥ तिप्टंतिसाधकासर्वे- जरामृत्युविवर्जिताः ॥ ५० ॥ साधक उवाच ॥ ॥ नवयं- भोगकार्यार्थीह्यागतादेवदर्शनम् ॥ नवलव्यंमहाराजनधर्मराजो- महानृपः ।। ५१ ॥ वयंचतत्रगच्छामोयत्रदेवोमहेश्वरः॥ तवपुरी- ध्यानंकृत्वासत्यंसत्यंवदाम्यहम् ॥५२॥ अवश्यंतत्रगंतव्यं- जो शिवका नाम नहीं जानते जिन्होंने मधुर वाणीसे शिवका नाम न जपा॥४५॥ जो काम कीमायासे मोहितहैं वह घोर रौरवमें पड़तेहैं हे वीरो! महायोगी महा- तपस्वी सिद्धो सुनो।॥ १६ ॥ तुम वरकी इच्छासे आयेहो तो मैं तुमको उत्तम वर देताहूं, साधक बोले तब सब साधक पूछने लगे हे धर्मराज ! मुनिये, मन वचनकर्मसे जो निर्मल धर्मका ध्यान करतेहैं ।। १७ ।। हृदयसे ध्यान धर्म कर्म- वाला आपके स्थानमें आगमन करता है यदि आप हमारे ऊपर प्रसन्न हैं और आपने हमपर कृपाकर धर्म प्रकाशित कियाहै, ॥४८॥ तो पांचसौ वर्पतक जीवों यहांसे छुटकारा दो अर्यात् यहांके सब प्राणी स्वर्गको चलेजॉय ॥४९॥ धर्मराज बोले यहाँक भोग देवता और दानवोंको दुर्लभहें यहां साधक जरामृत्युसे रहित होकर स्थित रहसकतेहैं ।। ५० ॥ साधक बोले हमको भोगकी इच्छा नहीं हम तो केवल आपका दर्शनकरने आयेथे ॥ ५१ । हम तो जहां महेश्वरदेवहैं वहां जायगे हम सत्य कहतेहैं आपकी पुरीका ध्यान करके ॥ ५२ ॥ अवश्य वहां (१८८) पदारपल्प। यत्रदेवोमहेश्वरः ॥ आचार्य्यस्यप्रसंगनसिद्धासर्वागतापुरी || .. ॥५३॥ भूयश्वसाधकाःसर्वेशिवलोकयथानिच ॥ प्रतिदृष्ट्वापुरी- सर्वायत्रगास्तत्रआगताः॥५४॥ इति श्रीकेदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकार्तिकेयसंवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शि- वदर्शने सदेहकैलासगमनो नाम धर्मपुरीवर्ण- नो नाम एकचत्वारिंशः पटलः॥४॥ जायगे जहां महेश्वरदेवह आचार्यके प्रसंगसे सबकोई पुरीमें आये ।। ५३ ॥ तब फिर वे सब साधक शिवलोकके मार्गको उसीपुरीमें होकर चले कि जहाँसे सब आयेथे ।। ५४ ॥ इति श्रीकेदारकल्पे धर्मपुरीवर्णनोनामेकचत्वारिंशः पटलः ।। ४१ ॥ द्विचत्वारिंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ पश्चाचसाधकायतेआगताशिवशासने । उमयासहितोरुद्रोवरदत्वापुनःपुनः ॥ १ ॥ सप्तकोटिस्ततः कन्याएकैकस्यप्रदीयताम् ।। गौरीचसदृशामूर्तिःसर्वालंकारभूपि- 'ताः।।२॥ सर्वभोगसमोपेतास्तिष्टतेसाधकोत्तमाः॥इच्छारूप- धरासस्त्रियः स्वच्छंदगामिनि ॥३॥ क्रीडयंतिमहाभोगान् यावदेवोमहेश्वरः ॥ कैलासभुवनेचैवशिवशक्तिश्चतिष्ठति ॥४॥ इश्वर बोले पीछे वे सब साधक शिवके शासनसे वहां आये उमाकेसहित रुद्र- ने उनको वारंवार वरदिया ॥ १॥ कि एकएक को सात आठ कोटि कन्या दी जाय, जो गौरीकी मूर्तिकी समान सब अलंकारोंसे भूपितहों ॥२॥ यह उत्तम साधक यहां सब भोगोंके सहित स्थित हों और यह सब स्त्रिये अपनी इच्छाकी समान रूपधारण करती और स्वच्छन्द गामिनी हैं ॥ ३ ॥ जबतक देव महेश्वर १ स्थिति है तबतक यह महाभोगोंसे यक्त कीडा करती हैं फैलासस्थानमें शिव भापाटीकासमेत-प० १२. (१८९) उत्तमंपतितंविश्वेश्रेष्ठंचतारयेच्छिवम्।। ससिलांस्त्रियासर्वानवसप्त- चनियौवने ॥ ५॥ सामुद्रीकलक्षणाःसयत्रगोत्रसमन्विताः ।। दिव्यांगवस्त्रधारिण्यादिव्यकांचनरत्नयोः ॥६॥ पोडशशृंगार- संयुक्ताभूपितामणिरश्मिभिः ॥ अष्टगंधोदकैस्तत्रमिश्रितंयक्ष- कदमः ।। ७ ।। अष्टपुप्पासुगंधेनमुकुटैमस्तकैःशुभैः॥ मुक्तरक्ता- चतांबूलैनीसामुक्तिकरवपुः ॥ ८ ॥ नेत्रखाशुचज्वालाललाटे- तियक्षणा ॥ मृगाक्षीहंसगामिन्योदिव्यजातिसमप्रभाः॥९॥ कृष्णावेनीशिरश्चैवकुंडलाभरणोज्ज्वलाः॥ कृष्णवेनीशिरश्चैवअ- ग्रेचरत्नरक्षका ॥ १० ॥ वपुःसुवर्णस्थमंशोभतेबहुतेजसा ।। शोभतेकेशपृष्ठौचचटतेचभुजंगमा ॥ ११ ॥ मुखंचन्द्रकला- पोडशउदितोशशिभास्करौ नासामुक्तिकरंचैवयुतंतादाडमीकले। ॥ १२॥ रसानारामृतंवाचावाचंमधुरवेणुका ॥ कोकिलासुर- नादेनभासयंतिपरंपदम् ॥ १३ ॥ करकंकणसंयुक्ताहारकेयूर- शक्तिके सहित क्रीडा करतीहैं ॥ ४॥ यह समस्त ससारमें श्रेष्टहैं यह श्रेष्ठ होने से शिवसे तारितहैं सब स्त्रियं सरल और सोलह सिंगारकियेहुएहैं ॥ ५॥ मामु- दिक लक्षणोंसे सब लक्षितहैं, सब कुलीन हैं दिव्यवस्त्र और दिव्यरत्न धारण कियेहैं ।। ६ । सोलह सिंगार किये मणियोंकी प्रभासे सब अलंकृतहैं जहां अष्ट बंधसे युक्त जलकी कर्दमहै।॥ ७ ॥ और आठ मुगंधियोंसे युक्त निनके मुकुट हैं मुक्तामणिपहरे लाल तांबूलकी गरसे नासिका तृप्त होजातीहै ।। ८॥ जिनके नेत्र बडे बडे उज्बलललाट शोभायमान,मृगों की समान नेत्र हंसकी समान वालवाली, दिव्यजातिको समान कातिवाल|॥९॥शिरपर शोभायमान काली वेनी कुंडल और आभूपोंसे उज्ज्वल तथा कर्णभूपण मानो दोनों ओरके रक्षकहैं ॥१०॥ सुवर्णको समान शरीर मानो सुवर्णका स्तंभहीहै बहुत तेजसे शोभायमानहें और पीटके ऊपर वेणी सर्परानकी समान शोभा पातीहै ।। ११ ॥ मुखचंद सूर्यको समान है, नासा तिलमसनकी समान दाडिमीकी समान दांत ।। १२ । रसना अमृतको समान वचनोमें मानी बंसी बजरहीहै अथवा मानों कोकिला बोलकर परमपद देरहीहै ॥ १३ ॥ हाथों में कंकण हैं हार और केयूरोसे भूपित हैं, हदयस्यान फलके (१९०) केदारकल्प। भूषिताः ॥ उरःस्थलंफलाकारकिंकिणीउमेखला ॥ १४ ॥ गंभीरनाभिकेनमिहरंघटिकारूपा ॥ जानुबाहुंकदलीस्थंभपंथ- मानोजआसनम् ॥ १५ ॥ हिंडोलतिहंसगामिन्योपादौनपुरलं- कृतौ ॥ गुणलक्षणसंपन्नाज्ञानध्यानस्यचिन्तयेत् ॥ १६ ॥ चिन्तामणिजनिस्वर्णेमनपेगानहासति । गुह्यपृष्टतःहृदयश्रूयते- भवतिद्वयम् ॥ १७ ॥ भुजंतिचस्त्रियःसर्वाजरामृत्युविवर्जिताः ॥ स्थापितंपदकैलासंयोनिगविवर्जिताः ॥ १८॥ साधकासंगम- कन्यासंगतिः समउच्यते ॥ श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ देवतासम-- प्रीत्यंचप्रतिष्टायत्रशेखरे ॥ १९ ॥ कीडंतिसाधकास्तावन्याव- देवोमहेश्वरः ॥ साधक उवाच ॥ ॥ देवदेवजगन्नाथदुर्लभंतव- दर्शनम् ॥ २० ॥ मह्यंभोगानरुच्यतेसत्यसत्यंसदाशिव ॥ तवचरणेसदावासदीयतांगिरिजापति ॥ २१ ॥ देवेशपार्वती- नाथसर्वदेवीवशंभरम् ॥ महाकैलासगंतव्यंयत्रदेवोपरंशिवः॥२२॥ वंध्यानस्मरणंकृत्वापूजयित्वापुनःपुनः॥ उमयाशंकरदेवहदयं- आकार किंकणी मेसला शोभायमान है ॥ १४ ॥ गंभीर नाभि हदके आकार- वाली है जानु कदलीफे स्तंभ भुजा कनक लता, नाभितल मानो कामका आ- सन है ॥ १५॥ हिंडोलशी समान गति हंसकी समान चाल चरण नूपुरोंसे शोभापमान, गुणलक्षणोंस सम्पन्न ज्ञान ध्यानसे संयुक्त हैं ॥ १६ ॥ चिन्ता- मगिकी समान कामनादायक गान, हासविलासमें तत्पर हष्ट पुष्ट शरीरसे मिनी गति शोभायमान है ॥ १७ ॥ यह सब खियें जरा मृत्युसे रहित ही भांग करती है, यह मर ज्योति गर्भवाले फैलासमें स्थित हैं ॥ १८ ॥ यहां माधक स्न्याओंके संग नियास फर श्रीईश्वर बोले इस पर्वतके शिखरपर स्थित होनम देयतासी समान होता है ॥ १९ ॥ महेश्वरको स्थितितफ यहां साधकों की स्थिति है माधर घोल ह देवदेव जगताप आपका दर्शन दुर्लभ है ॥२०॥ नदाशिष ! यह हम सत्य पहते हैं, कि हमको भोग नहीं रचते है हम पही पाहते है फि. आपके चरणों में हमारा सदा नियास हो ॥ २१ ॥ हे नाय ! हम तो आपफे समीप ही सदा स्थित रहना चाहते हैं, हम महादेयनीफे समीप HIमनाना चाहते हैं ॥ २२ ॥ आपरा ध्यान स्मरणर और पारंपार PA , भापाटीकासमेत-प०४२. (१९१) चव्यवस्थितम् ॥२३॥ जग्माताजगत्श्रीश्चत्रैलोक्येशचराचरम्।। त्वमातासर्वभूतेषुप्रसादंकुरुईश्वरि ॥ २४ ॥श्रीदेव्युवाच ॥ ॥ सिद्धसिद्धमहाप्राज्ञमहावीरामहाबलाः ॥ तुष्टाहंचमहासिद्धात्रणी- ध्वरमुत्तमत् ॥२५॥ हृदयेच्छायथादद्याद्वरंब्रूहिचसाधकः ॥ साधक उवाच ॥ ॥ त्वंमातासर्वलोकानांअहंचशरणंतव ॥ ॥२६॥ महापंथेचगंतव्यपंथंदेहिसुरेश्वरि ॥ ईश्वरस्यमहादेवि- वरंदत्वाचसाधकाः ॥ २७॥ महापंथेचगंतव्यंनविघ्नस्यात्कदा- चन ।। हृष्टपुष्टंमहादेवंसाधकानांपुनःपुनः ॥ २८ ॥ गच्छा- चार्यमहापंथेमत्प्रसादैश्वपंथिकः ॥जयजयप्रकुर्वन्तिगच्छतिच- महापथम् ॥ २९ ॥ अग्नेचदृश्यतेतत्रमहावैकुंठमंदिरम् ॥ महाकामिहादिव्यंमहाधर्मप्रवर्तते ॥ ३० ॥ द्वादशकोटि- विस्तीर्णेउछायोचचतुर्गुणम् ।। मणिरत्नसमाकीणहेमप्रकारवष्टि- तम् ॥३१॥ पद्माकारंसमायुक्तंअप्टदलैश्चशोभितम् । कोटि- पूजन करके उमा और शंकरको सदाही हृदयमें धारण करना चाहते हैं ॥२३॥ आप जगत्के माता पिता त्रिलोकीक पिता चराचरके पिता हैं । हे भगवती ! तुम सब प्राणियांकी माता हमारे ऊपर कृपा करो ॥ २१ ॥ श्रीदेवी बोली, हे महापंडित सिद्धो तुम थोडी देर ठहरो मैं तुमसे प्रसन्न होकर तुमको वर देनेको इच्छा करती हूं ।। २५ ।। हे साधको ! जो तुम्हारे हृदयमें इच्छा हो सो वर मांगो ! साधक बोले, आप सब लोगोंकी माता हो हम सब तुम्हारी शर- णमें हैं ॥ २६ ॥ हे महेश्वरि हम महापंथमें जाना चाहते हैं, सो आप हमको मार्ग दीजिये, हम साधक ईश्वरका महापंथ चाहते हैं ॥ २७ ॥ हम चाहते हैं महापंथ जाते समयाहमको कोई विघ्न नहो यह साधक महादेवके दर्शन पर्यंत हृष्ट पुष्ट रहैं ॥२८॥ आचार्य भी तुम्हारे प्रसादसे आनन्दपूर्वक गमन करें, जयजय करते हुए महापंथको गमन करें ॥ २९ ॥आगे महावैकुण्ठ मंदिर दिखाई देता है, जो महाकाश महादिव्य महाधर्म वर्तता है ॥ ३० ॥ बारह- कोटि योजन विस्तीर्ण और चौगुना इससे ऊंचा है, मणि रत्नोंसे आकीर्ण और सुवर्णके प्राकारसे वेष्टित है ।। ३१ ॥ पद्मके आकारसे युक्त आट दलोंसे शोभित .
(१९२) केदारकल्प। मध्येचवैकंठंदलेयुपुरिशोभितम् ॥ ३२॥ अष्टद्वारंचवैकुंठप्रति- हारंचपोडशम् ॥ जयंचविजयचैवमहायोधस्यवेष्टितम् ॥ ३३ ॥ मध्येलिंगचवैकुंठंतत्रगत्वाचसाधकाः ॥ हेमरत्नमपाकीर्णतोरणे- दारशोभितम् ॥ ३४॥ इन्द्रनीलमहानीले पद्मरागोपशोभि- तम् ॥ कोटिसूर्यप्रतिकाशंकोटिचन्द्रस्यशीतल ॥ ३५ ॥ प्रस्फुरंतिमहाकाशमनिज्वालासमप्रभा ॥ लक्षयोजनविस्तीर्ण- मुछायोचचतुर्गुणम् ॥ ३६॥ स्तंभहेममया:सर्वैमणिरत्नयुता- निच ॥ सिंहासनानिदिव्यानिहेमरत्नंकृतानिच ॥ ३७ ।। तत्र- तिष्ठंतिदेवेशपरमशिवजगद्गुरुः॥तिष्ठंतिवसुराःसर्वेत्रह्माविष्णु-महे- श्वरम् ॥ ३८ ॥ इन्द्रवरुणवैकुंठंधर्मराजसुशोभितम् । सभायां- तत्रतिष्ठंतिवाद्यतेबहुनेकधा ॥ ३९ ॥ प्रदक्षिणप्रकंर्वन्तिनाना- विधिह्यनेकधा ॥ शंखदुन्दुभिनि|पैकाहलैर्भरिमईलैः ॥४०॥ पटहैर्वेणुवंशश्चगजितोधुनिनातितम् ॥ नृत्यतअप्सरारंभासर्वा- भरणभूपिता ॥ ४१ ॥ हेमरत्नभूपिताचविद्युत्तेजःसमप्रभाः।। जिसकी कोटिक मध्यमें वैकुण्ट शोभायमान है ॥ ३२ ॥ वैकुण्ठके आठ दार और सोलह प्रतिहार हैं जय विनय महायोधा द्वारपाल स्थित हैं ॥ ३३ ॥मध्य- में वैण्ट है महासाधक जाकर स्थित हुए जो सुवर्ण और रनोंसे जटित और जिसके द्वार तोर्ण शोभा पाती हैं ॥ ३४ ॥ इन्द्रनील, महानील. पद्मराग मणियोंस शोभायमान कोटि सूर्यकी समान निर्मल पोटिचन्द्रमाकी समान निर्मल ॥ ३५॥ अमिज्वालाकी समान आकाशमें प्रकाशमान, लाखयोजनके विस्तारमें और चौगुने उचाईमें स्थित १ ३६१ मणिरत्नके जड़े हुए सब सुवर्णके खम्भे दिव्य सिंहासन सुवर्ण रत्नोंके बने हुए ॥ ३७॥ उसके ऊपर जगद्गुरु परम शिव स्थित हैं, जहां ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवता महेश्वरके समीप स्थित हैं। ॥३८॥ इन्द्र वरुण बेर धर्मरान इस सभामें स्थित हैं अनेक प्रकारके मनोहर वान बनतह ।। ३९ ॥ अनेकप्रकारसे सब कोई शिवनीको प्रदक्षिणा करतेहैं । शंस दुइभी काइलमेरिका तथा मदलबाजोका नहीं शन्द होरहाहै।। 2 ० ॥ पटह येशु . बंशीया शब्द होरहाहै और अप्सरायें अनेक आभूषण धारे नृत्य कररहीहैं॥४१॥ प्रवर्णरन्नो गहने पहरे बिनलीकै तनको समान पांति दिप यन पहरे दिप्य भाषादीकासमेत-प० ४३. दिव्यवस्त्रपरिधानादिव्यगंधानुलेपनाः ॥ ४२ ॥ सर्वलक्षण संयुक्तानपुराभिरलंकृताः ॥ करकंकणसंयुक्ताहारकेयूरभूपिताः॥ ॥४३॥ संपूर्णचंद्रवदनाकुंडलाभरणोज्वलाः ॥ शिरपुष्पसुगं- धाश्चनागवल्लीविभूपिताः ॥४४॥ रूपयौवनसंपूर्णागायतिको- किलास्वरम् ॥ पठंतिविविधास्तोत्राःसर्वशास्त्रविशारदाः ।।१५।। पठतिविविधंस्तोत्रमंत्रशास्त्रमनेकधा ॥ मणिरत्नसमोपेताःपुष्प- माल्यैःप्रशोभिताः॥१६॥ चंदनागुरुकपूरैर्वासितंचपुरंमहत् ॥ चूतचन्दनसंयुक्तंकदलीखण्डमण्डितम् ॥४७॥ केतकीशतपत्र- श्चतिष्टतेयत्र गायका॥दृश्यतेपुरिसर्वनानाविधमनेकधा ॥४८॥ इति श्रीरुद्रयामले केदारकल्पे विख्यातपुराणे श्रीश्वरकात्तिकेय- संवादे पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथे शिवदर्शने सदेहकैलासगमने महाकैलासवैकुंठे परम- शिवदर्शनोनामद्विचत्वारिंशःपटलः ॥ ४२ ॥ गंध और अनुलेपन लगाये ॥ १२ ॥ सब लक्षणोंसे सम्पन्न नूपुरादिसे अलंकृत हाथों में कंकण और हार वाजूबंदोंसे भूपित ।। ४३ ।। सम्पूर्णही चंदमुखी कुंडल आभरणोंसे उज्ज्वल शिरसफूल और सुगंधिधारे पान चावे ॥४४॥ रूपयौवन- से सम्पूर्ण कोकिलास्वरसे गातीहुई सब शास्त्रविशारद अनेक स्तोत्रपाठ करती मणिरत्न और पुष्पोंकी मालासे शोभायमानहैं ॥ ४५ ॥ ४६॥चंदन अगर और कपूरसे वह पुर सुगंधितहै आम चंदनसे संयुक्त केलेके खण्डसे मंडितहैं ॥ ४७॥ केतकी शतपत्रोंसे शोभायमान वह पुरी अनेक प्रकारसे शोभायमानहै ।। १८ ॥ इति श्रीकेदारकल्प भापाटीकाया द्विचत्वारिंशः पटलः ।। ४२ ।। त्रिचत्वारिंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ ॐ साधकास्तेगतास्तवदर्शतेपरमे- खरम् ।। दंडवत्प्रणताःसर्वेपतंतिधरणीतले ॥१॥ कृतांजलि- श्रीईश्वर बोले, वहां साधकोंने जाकर परमेश्वरका दर्शन किया और पृथिवीपर लेटकर दंडवत् प्रणाम किया ॥ १ ॥ और हाथ जोडकर साधक प्रणाम करने . १३ (१९४ केदारकल्प। पुटाभूत्वासाधका प्रणमंतिच ॥ देवदेवंजगन्नाथदुर्लभंतवदर्शनम्॥ ॥२॥ प्राप्यतेपरमधर्मदृश्यतेपरमेश्वरम् ॥ साधक उवाच ॥ अद्यमेसकलंजन्मअद्यमेसफलंतपः ।। ३।। अयमेसफलंकार्य- दृश्यतेपरमेश्वरः ॥ अयमेसफलंजन्मअघमेसफलंतपः॥४॥ अद्यमेसफलंध्यानदृष्ट्वाचपरमेश्वरम् ।। अयमेसफलंविद्याअयमे- सफलंयशः ॥ ६॥ अद्यमेसफलंपंथायदिदृष्ट्वापर शिवः ॥ अद्यमेसफलंज्ञानंदृष्ट्वाचपरमेश्वरम् ॥ ६॥ त्रयोदेवाश्चभापते- वरदेहिमहेश्वरम् ॥ ईश्वरस्यत्रयोदेवावरंदद्याचसाधकाः॥ ७ ॥ अमृतंपिवतेसिद्धाजरामृत्युविवर्जिताः ॥ अजराअमरचैवयोनि- गर्भनवर्जिताः॥८॥ पुनःपुनःसाधकानांमृत्युलोकेनगच्छति ॥ पश्चातुसाधकानांचअजराअमरावति ॥ ९॥ कस्मिन्कालेसु- संप्राप्तेमहापंथेनगम्यते ॥ महापंथेमहास्थानेदेवदानवदुर्लभे ॥ ॥ १०॥ गुह्याद्ब्रह्मतरंगोप्यंयदिस्थानंनउच्यते ॥ तत्रगत्वामहा- सेनपुनर्जन्मनविद्यते ॥ ११॥ मयावगोप्यंकृत्वाचकृत्वाब्रह्मा- लगे, हेदेवदेव ! जगन्नाथ ! आपका दर्शन दुर्लभहै ॥२॥ हेपरमेश्वर ! आपके दर्शनसे परमधर्म माप्त होताहै। साधक बोले आज हमारा जन्म और तप सफल दुआ ॥३॥ आज परमेश्वरका दर्शनकर सब कार्य सफल हुए आज जन्म और तप सफलहै ॥ ४ ॥ आज परमेश्वरको देखकर हमारा ध्यान सफल हुआ। आज विद्या और यश सफल हुआ ॥५॥ आज भाग्यसे शंकरका दर्शन कर हमारा पंय सफल हुआ, आज परमेश्वरको देख हमारा ज्ञान सफल हुआ। ॥ ६॥ तीनों देवता महेश्यरसे पर देनको कहते हैं साधकोंको ईश्वरकी कृपासे तीनों देय पर देते हैं ॥ ७ ॥ हेसिद्धी जरा मृत्युसे रहित हो अमृतपान करो अजर अमर होकर योनिगर्भसे रहितहो ॥ ८ ॥ इससे फिर साधक मृत्यलोकमें नहीं जोपगे पीछे साधको अजर अमरता माप्त होगी ॥९॥ किसीसमय जो महा पंपमें जातेहैं, यह महापंथ महास्थान देवदानवोंको दुर्लभहै ॥ १० ॥ यह गुप्तसे गुप्त स्थान किसीको माप्त नहीं होता, हेमहासेन यहाँ प्राप्त होफर फिर जन्म नहीं ॥ ११ ॥ में ब्रह्मा हरिहर इसवातको गुप्त रखतेहैं, यह महापंथ गुप्त रखना . भाषाटीकासमेत-प०४३. हरोहरिः ॥ गोपनीयंप्रयत्नेननदेयंयस्यकस्यचित् ॥ १२ ॥ दुर्लभंत्रयलोकानांतस्मिन्स्थानेषुगच्छते ॥ सिद्धसादाकदेवानां- केचिन्जानंतिसाधकाः ॥१३॥ साधकानांवरंदत्वातिष्ठतेचयथा- सुखम् ॥ महाविशालेवैकुंठेयत्रेच्छातत्रतिष्टताम् ॥ १४ ॥ महाकल्पमहापर्थशृणुस्कंदमहातपाः ॥ कोटिमध्ये सिद्धास्ते- गंछंतिचमहापथम् ॥ १५ ॥ चतुर्युगेसाधकानांतस्यसंख्या- विधीयते ॥ सप्तलक्षम् ॥ ७००००० कृतयुगेसत्यंसत्यंवदाम्य- हम् ॥ १६॥ चेतायांपंच ॥ ५००००० लक्षचगच्छंतिचमहा- पथम् ॥ द्वापरेचत्रयोलक्ष्यम् ॥ ३००००० ॥ कलौलक्षक- साधकाः ॥ १००००० ॥ १७ ॥ कैलासभुवनेचैवशिवशक्ति- चतिष्ठति ॥ समुद्रलक्षणाःसर्वेयनगात्रादिसंक्षयः ॥ १८॥ दिव्यांगवस्त्रधारिण्योनानाभरणभूपिताः ॥ अष्टगंधोदकेनैवमि- श्रितंयक्षकदमम् ।। १९॥ कुंकुंमागुरुकस्तुरीकर्पूरंचन्दनंतथा ॥ महासुगंधिमित्युक्तनामतोयक्षकर्दमम् ॥२०॥ दिव्यपुष्पसुगंधेन- कुंकुमाकान्तमस्तकाःउद्गिरंतचताम्बूलंने।रेखाचकजलैः२१॥ ललाटेतिलकंयस्यदिव्यजातिसमप्रभाः।मृगाक्षीहंसगामिन्यःकुं- चाहिये जिस किसीको न देनाचाहिये ॥ १२ ॥ इस स्थानमें लोकोंका आना दुर्लभहै सिद्ध साधक देवताओंमें कोईही इसको जातेहैं ॥ १३ ॥ साधक पर प्राप्त होकर वहां यथासुख वैठे और उनसे कहागया महाविशाल वैकुंठमें जहां इच्छा हो वहां विचरो ॥ १४ ॥ हेस्कंद ! यह महाकल्प महापंथ है करोडोंमें कोई एक सिद्ध यहां पहुंचतेहैं ॥१५ ॥ चारयुगोंमें साधकोंकी संख्या कही जातीहै मैं सत्य कहताहूं सतयुगमें सातलाख, ॥ १६ ॥ त्रेतामें पांचलाख, दा. • परमें तीनलाख और कंलिमें एक लाख साधक पहुंचतेहैं ॥ १७ ॥ कैलासभवन में शिवशक्तिस्थित रहतीहैं सब सामुद्रिक लक्षणोंसे युक्त महाप्रसन्न हैंसम्पत्तिमान- हैं ॥ १८॥ दिव्यवस्त्र धारण किये, अनेक आभरणों से भूषितहैं जहां अष्टगंधसे युक्त जलकर्दमहै ॥ १९ ॥ कुमकुम, अगर, कस्तूरी कपूर, चंदन, यह महा सुगंधियुक्त यज्ञ कर्दम कहाताहै ॥ २० ॥ दिव्यपुष्पकी सुगंध और कुमकुम मस्तकपर लगाये नेत्रोंमें कजल लगाये ताम्बूल चावे ।। २१ । जिनके ललाटमें .
(१९६) केदारफल्प । डलाभरणोज्ज्वलाः।२२शमुखचंद्रकलाश्चैवकलाभिःशीशभास्करैः नासिकाचैवकीरस्यदंतदाडिमभूपणैः।२३।रसनायामृतंचैवकोकि- लास्वरनादिनी ॥ करकंकणसंयुक्ताहारकेयूरभूपिताः॥ २४ ॥ उरूस्तनफलाकारंताटककाटिमेखला।।गंभीरनाभिकूपाचकटिसिं- हस्यलंकृता ॥२५॥ गुणलक्षणसंपूर्णज्ञानध्यानसमाकुला ॥ जातिस्मरक्षमोपेतांगुह्यकादिसमाश्रिता ॥ २६ ॥ गुह्यपृष्ठति हृदयंश्रोपिताभवसिद्धये ॥ भुजतिचस्त्रियाःसर्वाजरामृत्युर्विव- जिताः॥ २७ ॥ स्थापितंपदकैलासंयोनिमार्गनिवृत्तये ।। साधकासंगमेकन्यामागतोपरिभापणम् ॥ २८ ॥ श्रीश्वर उवाच ॥ ॥देवताससमंप्राप्ताशिवस्यवचनंतथा.॥ मद्रूपाभव तेसिद्धासत्यंसत्यंवदाम्यहम् ॥ २९॥ इति श्रीकेदारकल्पेविख्यातपुराणे श्रीश्वरकात्तिकेयसंवादे- पंचयोगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तये महापथेशिव दर्शने सदेहकैलासगमने महाकैलासोअजरामरप- रमशिववरप्राप्तये चतुर्वर्गसाधकपंथनिर्गमनो नामनिचत्वारिंशः पटलः।।४३॥ दिव्यजातिका तिलक बिजलीको समान कांति, मृगनेत्री, हंसगामिनी, कुंडल आभरणोंसे उज्ज्वल ॥ २२ ॥ मुखपर चंद्रकला चंदभास्करकी समान मनोहर फीरकी समान नासिका दाडिमकी समान दांत भूषण धारे ॥ २३ ॥ रचनामें अमृत कोकिलाकी समान स्वर हाथों में कंकण हारकेयूरोस भूपित ॥२४ ॥ फल. के आकार स्तन करणफूलधारे कमरमें मेखला नाभिगंभीर सिंहकी समान कमर ॥ २५ ॥ सम्पूर्ण गुणलक्षणोंसे युक्त ज्ञानध्यानमें तत्पर, जातिस्मरणके ज्ञान- पाली गुह्यकादिसे सेवित ॥ २६ ॥ जिनका गुह्य हृदय अतिपवित्र संसारसे पृथक्पृथक् सिदिसेयुक्त ऐसी स्त्रियोंको जरामृत्युसे रहित होकर भोगतेहैं । ॥ २७ ॥ यह फैलासस्थल योनिमार्गकी निगृत्तिकेलिये स्थापितहै यहां साधक पन्यास सानन्द भाषण करतेहैं ॥२८॥ ईश्वर बोल शिवफे वचनसे यहां देव. ताओंफी समान होते हैं सिद्ध मरे रूपको प्राप्त होतेहैं यह मैं सत्य कहताहूं॥२९॥ श्री श्री केदारपल्प मापाटीकायां साधकपंथनिर्गमा नाम नियरिंशः पटलः ।। ४३॥
भापाटीकासमेत-प०४४. . (१९७) चतुश्चत्वारिंशः पटलः। श्रीश्वर उवाच ॥ ॥ श्रुत्वाकल्पंकृतंध्यानविनाकल्पेनसि ध्यति॥नानासिद्धिप्रदास्थानंसिद्धसिद्धिचहेतवे।। १॥पञ्चादौसा धका-सर्वेएकविंशतिमेवच।।एतन्मध्येमहासिद्धाभावंतत्रैवासिध्यति ॥२॥पठतेचसहस्रद्रयंमहापथेनगम्यते।।दिव्यमार्गदेवास्कंदसत्यं सत्यंवदाम्यहम् ॥ ३ ॥ महादेवमहासेनमहाकल्पमहापथ ॥ महासिद्धमहाभोगादुर्लभभुवनत्रये ॥४॥ महापंथेमहापुण्यं- सत्यंसत्यपडानन ॥ भावेनपठतेनित्यंगंगास्नानंफलंभवेत् ॥ ॥५॥ शिवनिन्दाचयेमूढाःयेचशास्त्रंशिवात्मकम् ॥ निंदतेच गुरुश्चैवतेपांसिद्धिश्चदुर्लभा ।। ६॥ गृहेयस्यसदातिष्ठेचशिवकल्पं- महापथे ॥ ब्रह्महत्यादिकंपापंतस्यसर्वव्यपोहति ॥७॥ यद्गोप्यं- चसुराःसर्वेयद्गोप्यंमुनिमानवैः॥ यद्गोप्यंगणगंधर्वायेचशास्त्रं- कथितंमया ॥ ८॥ तेषांरुद्रपदेवासोकल्पकोटिसहस्रकम् ॥ ९ ॥ अन्तकालेमनुष्याणांमहाकल्पंशृण्वंतिच ॥ तेषांतुष्टोमहादेवो ईश्वर बोले, इसबातको श्रवण और ध्यान करके जो विनाही कल्पके सिद्ध होजाताहै अनेक सिद्धिके देनेवाले स्थान सिद्धिके निमित्त सिद्धहैं ॥ १ ॥ जिसमें आदिमें एकही सिद्ध प्रवेश करतेहैं हे सिद्धो! इनके बीचमें भावही सिद्ध होतेहैं । ॥२॥ दो सहस इसके पाठ करनेसे महापंथसे जायाजाताहै हेस्कंद ! दिव्यदेवता वहां स्थितहैं, यह मैं सत्य २ कहताहूं ॥ ३ ॥ महादेव महासेन महाकल्प महा- पंयमें महासिन्धु महाभोगके देनेवाले हैं, यह मैं सत्य २ कहताई त्रिभुवनमें यह दुर्लभहै ॥ ४॥ महापंचसे महापुण्य होताहै यह मैं सत्य २ कहताहूं । जो भावसे नित्य पढते हैं उनको गंगास्नानका फल होताहै ॥ ५ ॥ जो मूढ शिवकी निन्दा करतेहैं, जो शिवात्मक शास्त्रकी निन्दा करतेहैं तथा जो गुरुको निन्दा करतेहैं उनको सिद्धि दुर्लभहै ॥ ६॥ जिसके घरमें महापंथ शिवकल्प ग्रंथ स्थित है टन के ब्रह्महत्यादि पाप सब छूटजाते हैं ॥७॥जो देवताओं में गोपनीयहै जिन मुनि मनुष्यों में गोपनीयहै जो गणेश्वरसेभी गोपनीयहै जो गणगधोंसे गुप्तहै वह शास्त्र मैंने तुमसे कहाहै ॥ ८ ॥ जो अन्तकालमें महाकल्प सुनतेहैं उनका सौ कोटिकल्पतक रुद्रस्थानमेवास होताहै॥९॥उनपर प्रसनहोकर महादेव शिवलोकमें . (१९८) केदारकल्प। शिवलोकेवसतिच ॥ १० ॥ गयायांपिंडदानेनकाशिदर्शनमुत्त- मम् ॥ दिव्ययोगेश्वरस्थानंकेदारंसचदर्शनम् ॥ ११ ॥ दृष्ट्वा चवद्रिकास्थानंसर्वदाचशिवालयम् ॥ गवांकोटिसहस्राणिस्नानं भागीरथीतटे ॥ १२ ॥ यज्ञंचसहसैकंगवांदत्वासमाहिता ॥ ऐतेप्राप्तेभवेभक्तिमोक्षकालेतुमोक्षदा ॥ १३ ॥ एतेप्राप्तेभवेत्यु- ण्यंकथाशृण्वंतियेनराः॥ इच्छासिद्धिर्भवेत्तस्यसर्वपापै प्रमुच्यते ॥ १४ ॥ ध्रुवश्चचलतेमेरुःसागरेचमहार्णवे ॥ यदेवंध्रुवंचल तेकल्पेनअन्यथाभवेत् ॥ १५ ॥ येनिन्दासर्वदासर्वक्रोधश्च मदमत्सरः ॥ तेनरानरकयांतियावचन्द्रदिवाकरौ ॥ १६ ॥ गृहेयस्यसदाकल्पंराजलीलासदाभवेत् ॥ आपदाहरतेनित्यं ईश्वरंप्रतिगच्छति ॥ १७ ॥ यज्ञपुण्यंधार्मिकाणांतीर्थस्नानंच यत्फलम् ।। तस्यसंख्याचजानातिकल्पसंख्याविधीयते ॥१८॥ पश्चिमेचदिशांगत्वाउदयंतांशशिभास्करौ ॥ विपरीतंभवेत्सर्वैः कल्पश्चनान्यथाभवेत् ॥ १९ ॥ अनेकधर्मततःकृत्वावतो निवास देतेहै ॥ १० ॥ गयाम पिडदानकरने और काशीम शंकरदर्शनका जो फ्लहै, वह दिव्य योगेश्वरस्थान केदारेश्वरके दर्शनका फलहै ॥ ११ ॥ बदिका- अम और शिवालयका दर्शन परके महाफ्ल होतेहै, कोटिसहस्रगायोका जो पल हे भागीरथीके तटमें स्नानका जो फलहै ॥ १२ ॥ यज्ञमे सरसगोदानका जो पल है, इन सबके फरनेसे मोक्षरी भक्ति माप्त होतीहै ॥ १३ ॥ इनका जो पुण्य है वह इस क्याफे मुननेसे प्राप्त होताहे उसको इच्छासिद्धि प्राप्त होतीहे और वह सब पापासे छूटजातहि ॥ १४ ॥ निश्चयही वह संसारसागरसे पार हो जातेहै चाहे सुमेरु चरनाय समुद्र मर्यादा छोडदे पर फ्ल्पका फल अन्यथा नहीं होता ॥ १५ ॥ जो सदा समको निन्दा करते बडा बोध और ममत्सरता परतहै, यह मनुष्य जस्तक सूर्य चन्द्रमाह तसतक नरममे गाते। ॥ १६ ॥ जि- मये यहां यह पदारपल्प हसनलीला उसके सदा होती.टसको आपति सदा घरी जाती और यह सिरके प्रति गमन करताहै ॥ १७॥ धर्मात्माओंगे याया पुष्प हातातीर्थरनानया नो पदै टसपी संरपा जो जानताह, परी परपर्य पापी संख्या जानताद ॥ १८ ॥ चाह चंद्रसूर्य पश्चिममे जागर उदय होगांय सपही पिपरीत होगाय परन्तु प पपा पर अन्पया नहीं होता ॥ १९॥ अनेक भापाटीकासमेत-प०४४. (१९९) वावशमेवच ॥ नभवंतिप्तमतुल्यंकल्पशृण्वंतियत्फलम् ॥२०॥ वनिश्चशीतलंयातिनैवकल्पोम्पाभवेत् ।। दानपुण्यंवहिकृत्वाहोम यज्ञस्तथैवच ॥ २१ ॥ नभवंतिसमंतुल्यंकल्पशृण्वंतियत्फ- लम् ॥ सर्वतीर्थतपःकृत्वानात्वाचभुवनंत्रयम् ॥ २२ ॥ नभवं तिसमंतुल्यंकल्पंशृण्वंतियत्फलम् ॥ दानयज्ञंतपस्तीथैकाय- केशशुचिक्रियाः ॥ २३ ॥ नभवंतिसमतुल्यंकल्पशृण्वंतिय- त्फलम् ॥ दानंयतपस्तीर्थकल्पंपठतिनित्यशः ॥ २४ ॥ हरते कर्मदुःखंचभक्तानाचनसंशयः ।। महाकल्पमहापंथमहातीर्थसम- न्वितम् ॥ २५ ॥ महेशानापरोदेवोमहिनोनापरास्ततिः ॥ अघोरान्नापरोमंत्रोनास्तितत्त्वंगुरोःपरम् ॥ २६ ॥ यदक्षरंपद भ्रष्टस्वरभेदविवर्जितम् ॥ तत्सर्वक्षम्यतांनाथत्वंगतिःपरमेश्वरः ॥ २७ ।। काव्यकर्त्तायदाव्यासोलेखकोगणनायकः ॥ तदापि चलतेबुद्धिःकाकथाइतरेजनाः ॥ २८ ॥ रैन्यादिचयथास्वनअ- भ्रच्छायायथारविः ॥ जलेचदाकारंतथासंसारिणोजनाः।। धर्मकरके वा व्रत करके जो फलहै वह फल कल्पसुननेकी बराबरी नहीं करसकते॥२०॥चाह अमि शीतल होजायपर कल्पका फल वृथा नहीं होता अनेक दान जप होम पुण्य करकेभी ॥ २१ ॥ कल्पकी वरावर पुण्य नहीं होता सब तार्यों में तप करके और सबभुवनों में स्नान करके ।। २२ ।। कल्पमाहात्म्य सुननेके समान फल नहीं होता दान यज्ञ तप तीर्य फाय क्लेश शुधिकिया ॥ २३॥ कल्प माहात्म्य सुननेकी वरावर फल नहीं होता, दान यज्ञ तप तोयंसे विशेष फल कल्पसुननेका होताहै ॥ २४ ॥ इन सबसे कर्मदुःख हरेजातेहैं इसमें सन्देह नहीं महाकल्प महापंय महातीयोंसे युक्त ॥ २५ ॥ महेशानही परमदेवहैं टनके समान दूसरेकी महिमा नहींहै महिम्नकी समान स्तुति नहीं अघोरकी समानमंत्र और गुरुको समान दुसरा तत्त्व नहींहै ॥ २६ ॥ जो अतर पदभ्रष्ट तथा स्वरभेदसे बुर्जित, हेनाय ! वह सब क्षमाकरो हेपरमेश्वर ! तुमही सबकी गतिहो॥ २७ ॥ जैसे काव्यकर्ता व्यास वैसेही उनके लेखक गणेशजाह तौभी उनको बुद्धि बलाय मान होनातीह दूसरोंकी तो वातही क्याहै ॥ २८ ॥ जैसे रात्रिका स्वा क्षण भंगुरहै जैसे मैपके छायामें रवि क्षणमात्रको उकताहै जैसे जल में बुदबुदे क्षणमात्र (२००) केदारकल्प। ॥ २९ ॥ जलात्तैलात्तयारक्षेत्रक्षेतशिथिलबंधनात् ॥ मूर्ख हस्तेनदातव्यंएवंवदंतिपुस्तकम् ॥ ३० ॥ भनपृष्टंकटिंग्री वाबद्धमुष्टिरघोमुखम् ।। कप्टेनलिखितंग्रंथंयत्नेनप्रतिपालयेत् ॥ ॥ ३१॥ इदंकल्पमहापुण्ययेशृण्वंतिपठतिच ॥ सर्वपापविनि मुक्ता शिवसायुज्यमाप्नुयुः ॥ ३२ ॥ यादृशंपुस्तकंदृष्ट्राता दृशंलिखितमया ॥ यदिशुद्धमशुद्ध्वाममदोपोनदीयते ॥ ३३ ॥ इतिश्रीकेदारकल्पेविख्यातपुराणेश्रीश्वरकार्तिकेयसंवादेपंच- योगेन्द्रेच्छासिद्धिजीवन्मुक्तपरब्रह्मप्राप्तयेमहापथे शिव- दर्शनेसदेहकैलासगम ने केदारतीर्थेफलश्रुतिवर्ण- नो नामचतुश्चत्वारिंशः पटलः॥४४॥ काँहैं वैसेही संसारीजन हैं ॥ २९॥ जलसे तेलसे शिथिलबंधनसे पुस्तककी सर रक्षा करै मूर्खके हाथमें पुस्तक न देनी चाहिये ऐसा पंडितजन कहतेहैं ॥ ३० पोट कमर, गरदन, टेढी करनी पड़तीहै मुट्टी बांधनी होतीहे नीचेको मुख कर होताहै बहुत कष्टसे ग्रंथ लिखना होताहै इसकी यनसे रक्षा करनी चाहिये २१ ॥ यह कल्प महापुण्य देनेवालाहै, जो इसको पढते और सुनतेहैं वह स से छूटकर शिवके सायुज्यको पातेहैं ॥ ३२ ॥ जैसी पुस्तक मैंने देखी वैर लिखी यदि शुद्ध अशुद्ध हो तो मुझे दोष न देना चाहिये ॥ ३३ ॥ इतिश्रीकेदारकल्पे विल्यावपुराणे भापाटीकायां केदारतीर्थफलश्रुतिवर्णनोनाम चतुश्चत्वारिंशःपटल दोहा-जगपिता शंकर विमल, जगन्माप सुखदान || वालक जान दया करो, सकल सुमंगल खान ॥ १ ॥ लाभ पदारथ चारको, जो सुमिरै दिन रैन । प्रजा समान मुपालही, देत सदा सुखचैन ॥२॥ साम्बशिवहि नित ध्यानधर, टीका फियो विचार ॥ दया भाव नित भक्तपर, करटु भक्त निस्तार ॥३॥ उनिससै प्रेसठ सुभग, पोप गुफ शशिवार ॥ द्वितीयाको टीका कियो, मिश्र सुमंगलबार ॥४॥ शिव शिव रटिये प्रेमसे, मिटें सकल जंजाल ॥ श्रीकामेश्वर नाथजी, सन्तत रहैं दयाल ॥५॥ पुस्तक मिलनेका पता-खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवटेश्वर " स्टीम्-यन्वाय-संबई.