Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Mahrishikulvaibhavam

Shri Madhusudan Ojha · 2010/08

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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला राजस्थान राज्य द्वारा प्रकाशित सामान्यतः अखिल भारतीय तथा विशेषतः राजस्थानदेशीय पुरातनकालीन संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, राजस्थानी, हिन्दी आदि भापानिबद्ध विविध वाङ्मयप्रकाशिनी विशिष्ट ग्रन्थावलि प्रधान सम्पादक पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्त्वाचार्य [आनरेरि मेम्बर श्रॉफ जर्मन अोरिएन्टल सोसाइटी, जर्मनी ] सम्मान्य सदस्य भाण्डारकर प्राच्यविद्या संशोधन मन्दिर, पूना; गुजरात साहित्य-सभा, अहमदाबाद: विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, होशियारपुर; निवृत्त सम्मान्य नियामक ( आनरेरि डायरेक्टर ), भारतीय विद्याभवन, बम्बई। ग्रन्थाङ्क ५६ समीक्षाचक्रवर्ति-विद्यावाचस्पति-महामहोपदेशक- स्वर्गीय-पंडितप्रवर श्रीमधुसूदनअोझा-विरचितं महर्षिकुलवैभवम् (मूलमात्रम् ) प्रकाशक राजस्थान राज्याज्ञानुसार सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान जोधपुर (राजस्थान) || श्रीः ॥ समीक्षाचक्रवर्ति - विद्यावाचस्पति - महामहोपदेशक- स्वर्गीय पण्डितप्रवर - श्रीमधुसूदन अोझा-विरचितम् (ब्रह्मविज्ञान विभागे - दिव्यविभूती महर्षिकुलवैभवम् हिन्दी-भाषानुवादरूपसारांश-सहितम (मूलमात्रम् ) तदिदम् तदात्मजेन विद्याविनोद-विद्यारत्न- पं० श्रीप्रद्युम्नशमणा सम्पादितमनूदितञ्च ★ प्रकाशक राजस्थान-राज्याज्ञानुसार राजस्थान प्राच्यविद्यापतिष्ठान ( Rajasthao Oriental Research Institute ) जोधपुर (राजस्थान) विक्रमाब्द.२०१८] प्रथमावृत्तिः १००० * मृल्यम् *५०..[निस्तान्द १६६१ १ राजस्थान छाच्यविद्या प्रतिष्ठान जोधपुर ( Rajasthan Oriental Research Instilole ) JODHPUR. १. राजस्थान में और अन्यत्र भारतीय संस्कृति के आधारभूत संस्कृत, प्राकृत अपभ्रंश, राजस्थानी, हिन्दी व अन्य भाषाओं में लिखित प्राचीन ग्रन्थ की खोज करना तथा उन्हें प्रकाश में लाना । २. प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थों का संग्रह कर उनके संरक्षण की व्यवस्था करना और उपयोगी ग्रन्थों को सम्बन्धित विद्वानों से सम्पादित करा कर उनके प्रकाशन की व्यवस्था करना। ३. साधारणतः भारतीय एवं मुख्यतः संस्कृत व प्राचीन राजस्थानी के अध्ययन, अन्वेषण, संशोधन हेतु अत्यावश्यक उत्तम प्रकार का सन्दर्भ- पुस्तक भएदार (मुद्रित ग्रन्थालय) स्थापित करना और उसमें देश-विदेश में मुद्रित विविध विषयक अलभ्य दुर्लभ्य सभी ग्रन्थों का यथासम्भव संग्रह करना। २. संगृहीत सामग्री से शोधकर्ता अध्येता विद्वानों को उनके अध्ययन और अनुसंधान में सहायता पहुंचाना। राजस्थान के लोक-जीवन पर प्रकाश डालने वाले विविध विषयक लोक- गीत, सांप्रदायिक भजन, पदादिक भक्ति साहित्य एवं सामाजिक संस्कार धार्मिक व्यवहार तथा लौकिक आचार-विचार आदि से सम्बन्धित सभी प्रकार की सामग्री की शोध, संग्रह, संरक्षण, एवं प्रकाशन करने की व्यवस्था करना।

सञ्चालकीय वक्तव्य समीक्षाचक्रवर्ति, वैदिकविज्ञानमार्तण्ड, विद्यावाचस्पति, महामहोप- देशक इत्यादि उपाधियों से विभूषित स्वर्गीय पण्डितप्रवर श्रीमधुसूदनोझा विरचित महर्पिकुलवैभवम् के प्रथम भाग का प्रकाशन राजस्थान ग्रन्थमाला के अन्तर्गत ग्रन्थाङ्क ६ में किया जा चुका है जिसकी संस्कृत व्याख्या और हिन्दी भापाटीका महामहोपाध्याय पं० श्री गिरधर शर्मा चतुर्वेदी ने की है। उक्त प्रथम भाग के प्रकाशन के थोड़े समय पश्चात् स्वर्गीय अोभाजी के सुपुत्र पं० श्री प्रद्युम्नजी शर्मा हमारे पास महर्षि कुलवैभवम् की मूल प्रति लेकर आये और बताया कि इस ग्रन्थ की मूल पुस्तक जो उनके पिताजी ने लिखी थी उसमें और राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान से प्रकाशित पूर्व पुस्तक में कुछ क्रम-परिवर्तन हो गया है। उन्होंने यह इच्छा भी व्यक्त की कि स्व० अोझाजी की लिखी पुस्तक का यथावत् प्रकाशन उनके सम्पादन में हो । अतएव पं० श्री प्रद्युम्नजी के अनुरोध को दृष्टि में रखते हुए हमने मूल लेखक की पुस्तक को यथावत् प्रकाशित करना स्वीकार कर लिया । राजस्थान सरकार द्वारा संस्थापित संस्कृत सलाहकार मण्डल ने भी अपने एक प्रस्ताव में स्व० ओभाजी के ग्रन्थों का प्रकाशन राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान द्वारा किये जाने की सिफारिश की है। प्रस्तुत पुस्तक के इस प्रावृत्ति प्रकाशन से यह प्रयत्न आपाततः अनवी- कृत-सा प्रतीत होता है किन्तु वास्तविक स्थिति इस सम्भावना से विपरीत है क्योंकि इस सम्पादन में पंदितवर श्री प्रद्युम्नजी अोझा ने पुस्तक के मूल लेखक के अपत्याधिकार से जो विसर्गवैशिष्ट्य अर्जितकर उसका भावनात्मक सम्पुट देते हुए इस दुरूह वैदिक विपय को सारांशरूपेण हिन्दी में उपन्यस्त कर दिया है, इससे यह प्रयास पुनर्नवीकृत ही हो उठा है। विद्वान सम्पादक के अपने "वक्तव्य" ने भी इसे अधिक विशद, उदात्त और उपयोगी वना दिया है। आशा है कि विद्वानों को इस प्रकाशन से लाभ पहुंचेगा। मुनि जिन विजय सामान्य सञ्चालक राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान. जोधपुर (राज.)

राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला प्रधान सम्पादक-पद्मश्री मुनि जिनविजय, पुरातत्याचार्य neeorap. प्रकाशित ग्रन्थ मूल्य ६.०० - १. संस्कृत १. प्रमाणमंजरी, तार्किकचूड़ामणि सर्वदेवाचार्यकृत, सम्पादक-मीमांसान्यायकेसरी पं. पट्टाभिरामशास्त्री, विद्यासागर । २. यन्त्रराजरचना, महाराजा सवाई जयसिंह-कारित । सम्पादक-स्व. पं. केदारनाथ ज्योतिर्विद् ,जयपुर। मूल्य-१७ ३. महर्पिकुलवैभवम, (व्याख्या सहितम्) स्व. पं. मधुसूद नोझाप्रणीत, सम्पादक- म. म. पं. गिरिधर शमा चतुर्वेदी । मुल्य १० " ४. महर्पिकुलवैभवम्, (मूलमात्रम्-हिन्दी भाषामारांश-सहितम्) सम्पादक एवं हिन्दी भाषासारांश लेखक अन्यकर्तात्मज वि. वि. पं0 प्रद्युम्नशमीयोझा । मृः ३५० ५. तर्कसंग्रह, अन्न भट्टकृत, सम्पादक-डॉ. जितेन्द्र जेटली, एम. ए., पी-एच. डी., मूल्य ३.. ६. कारकसंबंधोबोत, पं. रभमनन्दीकृत, सम्पादक-डॉ. हरिप्रसाद शास्त्री एम.ए., पी-एच. डी. । मूल्य १७ ७. वृत्तिदीपिका, मोनिकृष्णभट्टकृत, सम्पादक-स्व. पं. पुरुषोत्तमशर्मा चतुर्वेदी, साहित्याचार्य। मूल्य २... ८. शब्दरत्नप्रदीप, अज्ञातकर्तृक, सम्पादक-डॉ.हरिप्रसाद शास्त्री, एम.ए , पी-एच डी. मूल्य २.०० है. कृष्णगीति, कवि सोमनाथविरचित, सम्पादिका-डॉ. प्रियबाला शाह, एम. ए. पी-एच. डी, डी. लिट् । मूल्य १७५ १०. नृत्तसंग्रह, अज्ञातकर्तृक, नम्पादिका-डॉ. प्रियवाला शाह, एम.ए., पी-एच.डी., डी. लिट् । मूल्य १७५ ११. शृङ्गारहारावली, श्रीहर्षकविरचित, सम्पाटिका-डा. प्रियवाला शाह, एम. ए., पी-एच. डी., डी लिट् । मूल्य २७ १२. राजविनोद महाकाव्य, महाकविउदयराजप्रणीत, सम्पादक-पं. श्रीगोपालनारायण बहुग, एम. ए., उपसञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर मूल्य २.२५ १३. चक्रपाणिविजय महाकाव्य, भट्टलक्ष्मीधरविरचित्त, सम्पादक-केशवराम, काशीराम शास्त्री। मूल्य.३५० १४. नृत्यरत्नकोश (प्रथम भाग), महाराणा कुम्भकर्णकृत, सम्पादक-रसिकलाल छोटालाल परिख तथा डॉ. प्रियवाला शाइ, एम.ए., पी-एच.डी., डी लिट मूल्य ३७५ १५. उक्तिरत्नाकर,साधु सुन्दरगणिविरचित, सम्पादक-पुरातत्त्वाचार्य श्रीजिनविजयमुनि, सम्मान्य सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य ४७५ १६. दुर्गापुष्पाञ्जलि, म. म. पं. दुर्गाप्रसाद द्विवेदीकृत, सम्पादक-पं.श्रीगंगाधर द्विवेदी, साहित्याचार्य । मुल्य ४.२५ १७. कर्णकुतूहल, महाकवि भोलानाथविरचित, सम्पादक-पं. श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम. ए., उप-सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । इन्हीं कविवर की अपरकृति श्रीकृष्णलीलामृतसहित । मूल्य १.५० १८. ईश्वरविलासमहाकाव्यम् , कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्टविरचित, सम्पादक-भट्ट श्रीमथुरानाथ शास्त्री, साहित्याचार्य, जयपुर। मूल्य ११"५. १६. रसदीर्घिका, कविविद्यारामप्रणीत, सम्पादक-पं. श्रीगोपालनारायण बहुरा, उप- सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य २.०० २०. पद्यमुक्तावली, कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्टविरचित, सम्पादक-भट्ट श्रीमथुरानाथ शास्त्री, साहित्याचार्य। मूल्य ४.०० २१. काव्यप्रकाशसंकेत, भाग१ भट्टसोमेश्वरकृत, सम्पादक-श्रीरसिकलाल छो. परीख, मूल्य १२.०० २२. मूल्य ८२५ २३. वस्तुरत्नकोष, अज्ञातकर्तृक, सम्पादक-डॉ. प्रियबाला शाह । मूल्य ४... २४. दशकण्ठवधम् पं. दुर्गाप्रसाद द्विवेदीकृत, सम्पादक-पं. श्रीगंगाधर द्विवेदी । मूल्य ४.०० २५. श्री भुवनेश्वरीमहास्त्रोत्रम् , सभाष्य, पृथ्वीधराचार्यविरचित, कवि पद्मनाभकृत, भाष्यसहित पूजापञ्चाङ्गादिसंवलित । सम्पादक-पं. श्रीगोपालनारायण बहुरा । मूल्य ३.७५ २६. रत्नपरिक्षादी सप्त-ग्रन्थ-संग्रह, ठक्कुर फेरू कृत, सम्पादक-पदाश्री मुनि जिन विजयजी अगरचन्द नाहटा और भंवरलालजी नाहटा । मूल्य ६.२५ । भाग २ राजस्थानी और हिन्दी २७. कान्हडदेप्रबन्ध, महाकवि पद्मनाभविरचित, सम्पादक-प्रो.के.बी.व्यास, एम.ए., मूल्य १२.२५ २८. क्यांमखां-रासा, कविवर जान-रचित, सम्पादक-डॉ. दशरथ शर्मा और श्री अगरचन्द नाहटा । मूल्य ४.७५ २६. लावा-रासा, चारण कविया गोपालदानविरचित, सम्पादक-महताबचन्द खारैड़े। मूल्य ३७५ ( 5 ) ३०. वांकीदासरी ख्यात, कविवर बांकीदासरचित, सम्पादक-श्री नरोत्तमदास स्वामी, एम. ए., मूल्य ५५० ३१. राजस्थानी साहित्य संग्रह, भाग१, सम्पादक-श्री नरोत्तमदास स्वामी, एम.ए. मूल्य २.२५ ३२. राजस्थानी साहित्यसंग्रह भाग २, सम्पादक-पुरुषोत्तमलाल मेनारिया एम.ए., साहित्यरत्न । मूल्य २.७५ ३३. कवीन्द्र कल्पलता, कवीन्द्राचार्य सरस्वती विरचित, सम्पादिका-श्रीमती रानी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत ! मूल्य २०० ३४. जुगल विलास, महाराज पृथ्वीसिंहकृत, सम्पादिका-श्रीमती रानी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत । मूल्य १७५ ३५. भगतमाल, ब्रह्मदासजी चारणकृत सम्पादक-श्री उदयराज उज्जवल । मूल्य १७५ ३६. राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिर के हस्तलिखित ग्रन्थों की सूची भाग १ । मूल्य ७५० ३७. राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान के हस्तलिखित ग्रन्थों की सूची, भाग २ सम्पादक-श्री गोरालनारायण बहुरा एम. ए., उप सञ्चालक, राजस्थान प्राच्य- विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य १२.०० ३८. मुहता नैणसीरी ख्यात, भाग १ मुहता नैणसीकृत, सम्पादक-श्री बद्रीप्रसाद साकरिया । मूल्य-८५० ३६. रघुवरजप्रकाल,किसनाजी बाढ़ाकृत, सम्पादक-श्री सीताराम लालम । मूल्य ८२५ ४०. राजस्थानी हस्तलिखित ग्रन्थसूची, भाग १ सम्पादक-मुनि श्रीजिनविजय । मूल्य ४.५० ४१. राजस्थानी हस्तलिखित ग्रन्थसूची, भाग २ सम्पादक-श्री पुरुषोत्तमलाल मेनारिया एन. ए., साहित्यरत्न मूल्य २७५ ४२. वीरवाण, ढाढ़ी बादर कृत, सम्पादिका-श्रीमती रानी लक्ष्मीकुमारी, चूंडावत । मूल्य ४.५० ४३. स्व. पुरोहित हरिनारायणजी विद्याभूपण ग्रन्थ संग्रह सूची, सम्पादक- श्री गोपालनागया बहुरा एम. ए. और श्री लक्ष्मीनारायण गोस्वामी दीक्षित । मूल्य ६.२५ ४४. सूरजप्रकास, भाग १, कविया करणीदानली कृत सम्पादक-श्री सीताराम लालम मूल्य८०० ४५. नेहतरंग, रायगजा बुधसिंह कृत, सम्पादक श्री रामप्रसाद दाधीच एम. ए., मूल्य ४.० माम मका "राजस्थान पुरातन ग्रंथमाला' के अन्तर्गत कुछ वर्ष पूर्व "महर्पिकुलवैभवम्" पुस्तक का प्रकाशन हो चुका है। इसके सम्पादक तथा व्याख्याता म०म० पं० श्री गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी हैं । श्रीयुत चतुर्वेदीजी ग्रन्थलेखक पूज्य पिताजी के पट्टशिष्य रहे हैं और जैसा कि उन्होंने अनेक स्थलों पर उल्लेख किया है, लगभग चालीस वर्षों तक उनका किसी न किसी रूप में पाठ्यक्रम चालू रहा । अतः पूज्य पिताजी के ग्रन्थों के मर्म को समझकर व्याख्या करने की इतनी क्षमता किसी अन्य व्यक्ति में सहज नहीं है । विल- क्षण-प्रतिभासम्पन्न श्री चतुर्वेदीजी ने जो व्याख्या लिखी है, उसकी विद्वज्जनों ने भूरि भूरि प्रशंसा की है। प्रस्तुत ग्रन्थ में वर्णित वैदिकविज्ञान सर्वथा नवीन है और इसे हृदयंगम कराने की दृष्टि से ग्रन्थकार ने अनेक ग्रन्थों में प्रकरणवश कुछ बातों को स्पष्ट किया है। उदाहरणार्थ महर्षिकुलवैभव में ऋपिप्राणों के सम्बन्ध में बताये गये कुछ अंश प्रकरण के अनुरोध से आधिदैविकाध्याय में भी आये हैं जिसका प्रकाशन कई वर्ष पूर्व किया जा चुका है। आपातंत: यह पुनरुक्ति जान पडती है परन्तु इसके बिना प्रकरण की सगति बैठना कठिन होता । अतएव यहां पुनरुक्तिदोष की स्थिति तो नहीं है, परन्तु पूर्व प्रकाशित ग्रन्थान्तर्गत व्याख्या में पाठ्यक्रम मूलग्रन्थ के अनुसार नहीं हैं। सम्भव है कि पाठकों के सोविध्य की दृष्टि से यह क्रम परिवर्तित किया गया हो । उदाहरण के लिये, व्याख्यावाले अश में प्रारम्भ में ही “अथ ऋपिनिर्वचनम" शीर्पक देकर "ऋपिशब्दस्य चतुष्टयी प्रवृत्तिः असल्लक्षणा, रोचनालक्षणा, द्रष्टलक्षणा, वक्तृलक्षणा चेति ।" इस प्रकार ऋपि शब्द की चार प्रकार की प्रवृत्तियां उल्लिखित हैं। मूलग्रन्थ में यह ऋषिनिर्वचन वशिष्ठप्राण के अन्तर्गत लिखा गया है । मुलग्रन्थ को कश्यपप्राण से प्रारम्भ करने का हेतु भी वहीं पर दिया गया है "कश्यपात् सकलं जगदित्याहुः । तमेतं कश्यप व्याख्यास्यामः" । इसी प्रकार आगे का भाग भृगुअंगिरा प्रकरण का अश है। इस क्रम के परिर्वतन से मूलग्रन्थ की व्याख्या न हो सकी । श्राधिदैविकाध्याय का जो अंश स्पष्टीकरण के लिये लिखा गया था, उसी में से एक आध की कुछ व्याख्या हो सकी और मूल ग्रन्थ संम्पूर्ण प्रकाशित न हो सका। यों तो ग्रन्थकार की रचना में एक मुख्य विशेषता यह है कि ग्रन्थ के किसी भी विपय के एक अश को पूर्ण समझा जा सकता है। परन्तु वह तो भिन्न भिन्न प्रकरण का ही एक विवेचन कहलायेगा । भिन्न भिन्न प्रकरणों को एक क्रम में देकर ही एक ग्रन्थ की रचना की गई है। क्रमपरिवर्तन से उसकी वह सार्थकता नहीं रहती है। मेरी दृष्टि में लेखक के भावों की रक्षा के लिये उसी क्रम का निर्वाह करना समुचित प्रतीत होता है। फलतः सम्पूर्ण मूल ग्रन्थ को अक्षुण्ण रखते हुये यथावत् सम्पादन और प्रकाशन की आवश्यकता प्रतीत हुई। एतदर्थ मैंने राजस्थान प्राच्यविद्याप्रतिष्ठान, जोधपुर में मूलप्रति प्रस्तुत कर सम्पूर्ण ग्रन्थ के प्रकाशन की अभिलापा व्यक्त की। सम्मान्य सञ्चालक पद्मश्री मुनि जिनविजयजी महाराज ने मेरे प्रस्ताव से सहमति प्रकट करते हुये इसे समिति में स्वीकार किया। प्रस्तुत ग्रन्थ में जिस विषय का विवेचन किया गया है वह ग्रन्थ के नाम से ही स्पष्ट है अर्थात् महर्पियों के कुल का वैभव । कश्यप, वसिष्ठ श्रादि जिन महर्षियों का इस में वर्णन है, क्या वे एक ही वशिष्ठ आदि ऋषि थे, अथवा शरीरधारी मनुष्य ही थे, किंवा अन्यत्र भी उक्त नामों का प्रयोग होता था इत्यादि बातों का ऐतिहासिक अर्थात् उन उन नामों के ऋपियों एवं उनके वंशजों का पूरा वर्णन साथ ही वैज्ञानिक, जैसे वसिष्ठ आदि तारामंडल में भी हैं, इस प्रकार ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक दोनों प्रकारों को बड़े परिश्नम और खोज से पूर्णरीत्या विस्पष्ट किया गया है, जिसका हिन्दी भाषा में अनुवादरूप क्रमबद्ध सारांश भी आगे प्रस्तुत किया है, जिससे हिन्दी भाषा में विशेष रूचि रखने वाले भी इससे लाभान्वित हों और वेद के विषय में अभिनव जानकारी प्राप्त कर सकें। इस "मूलमहर्पिकुलवैभव" के प्रकाशन में राजस्थान प्राच्यविद्याप्रतिष्ठान के सम्मान्य सञ्चालक पद्मश्री मुनि श्री जिनविजयजी महाराज तथा उप सञ्चालक पं० श्री गोपालनारायण जी बहुस, एम. ए. प्रधानतः सहायक रहे हैं जो ससम्मान अभिवाद्य हैं। म०म० पं० श्री गिरिधर शर्मा जी चतुर्वेदी वाचस्पति, पं० श्रीआद्या- दत्तनी ठाकुर, एम. ए. भूतपूर्व संस्कृत प्रोफेसर लखनऊ विश्वविद्यालय,स्वामी श्री सुरजनदास जी, एम. ए. साहित्य, व्याकरण, वेदान्त, सांख्य योगाचार्य प्रधान संस्कृत विभाग गवर्नमेंट कालेज कोटा, प० श्री नवलकिशोरजी कांकर व्याकरण शास्त्री साहित्याचार्य, साहित्यरत्न, काव्यतीर्थ, प्रोफेसर, पारीक कालेज जयपुर पूज्य पिताजी से अध्ययन कर उनके ग्रन्थों का सम्पादन लेखन आदि उनके समक्ष करते रहे हैं और अब मेरे ग्रन्थ प्रकाशन में भी यथाशक्य सहयोग देते रहते हैं । इसके लिये मैं इन सब महानुभाओं का वड़ा आभार मानता हूँ।

समीक्षाचक्रवर्ति स्वर्गीय पण्डित श्री मधुसूदनशर्ममैथिलाः लन्दन नगरे सन् १६०२ ई०

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॥ श्रीः ॥ महर्षि कुलवैभव का सारांश- १कश्यप इस प्रकरण में कश्यप प्राण जिससे पार्थिव समस्त वस्तु की उत्पत्ति होती है बताया गया है। कश्यप और कूर्म पर्यायवाची माने गए हैं इनका रहस्य तथा कच्छप जलचर प्राणी से किस अंश में साहश्य है बताया है। कश्यप प्राण सूर्य स्थित मरीचियों से उत्पन्न होने के कारण मारीच कहलाता है यह भी सप्रमाण सिद्ध किया गया है। इसी प्रकरण में कश्यप की प्रधान स्त्री अदिति के सम्बन्ध में विशद विवेचन है । मतभेद से अदितिप्राण को चार प्रकार का दिखाया गया है १-सूर्य के सम्बन्ध से, २-द्रष्टा के सम्बन्ध से, ३-नक्षत्र के सम्बन्ध से तथा ४-आकाश के सम्बन्ध से । मनुष्य रूप वेद कर्ता कश्यप ऋपि से सम्बद्ध मंत्र संहिता तथा उनके आश्रम के सम्बन्ध में प्रकाश डाला गया है। २-बसिष्ठ । वसिष्ठ ऊर्जा शक्ति युक्त प्राण है और इस प्राण के द्रष्टा भी मनुष्य रूप वेदकर्ता वसिष्ठ ऋषि थे। श्रुतियों के आधार पर इनका आश्रम सरस्वती नदी के दोनों पार्श्व में बसी हुई सरस्वती नाम की नगरी में था । वहीं इनकी प्रयोग शाला थी जिसे विज्ञान भवन या सूर्य भवन कहा जाता था। इस विषय का विवेचन ग्रन्थ कर्ता के 'इन्द्रविजय' ग्रन्थ में विशदतया वर्णित है । वसिष्ठ मित्र और वरुण के वीर्य से उर्वशी अप्सरा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। यह पुराणों में वर्णित है तथा पुराणों की मूल भूत श्रुतियों में भी इसका उल्लेख है । यह मनुष्य ऋषि के सम्बन्ध में चरितार्थ नहीं होता तथा वैज्ञानिक दृष्टि ( २ ) से यह वर्णन प्राण रूप वसिष्ठ के सम्बन्ध में हुआ है यह सप्रमाण सिद्ध किया गया है । मित्र अर्थात सूर्य अथवा इन्द्र प्राण तथा वरुण प्राण से किस प्रकार वसिष्ठ प्राण का प्रादुर्भाव हुआ यह विवेचन अत्यन्त हृदयंगम है। इसी कारण वसिष्ठ, इन्द्र और वरुण दोनों के कृपापात्र थे तथा ऐन्द्रभारत और वारुणभारत के मध्यवर्ती स्थान में इनका आश्रम था । इन्द्र की कृपा से इनका यातायात भूस्वर्ग में भी अव्याहत था । वरुण से इनका विशेष रूप से मैत्री भाव था यह स्पष्ट रूप से वसिष्ठ के वेद संत्र में मिलता है। वसिष्ठ के पुत्र शिष्य परम्परा वाले भी वसिष्ठ कहलाते थे अतः रामचन्द्र के काल में सिष्ठ महर्षिका उल्लेख है वे वसिष्ठ के गोत्रोत्पन्न थे ,मूल वसिप्ठ से भिन्न थे यह भी सिद्ध किया गया है। ३-गरस्य । इसी प्रकार अगस्त्य भी मुख्य रूप से प्राणथा तथा उसके प्राण के द्रष्टा ऋपि भी अगस्त्य नाम से अभिहित हुऐ। ये कुम्भजन्मा क्यों कहलाते हैं यह भी वैज्ञानिक रहस्य दिखाया गया है । वसिष्ठ के समान ही इनकी उत्पत्ति का मित्र और वरुण से सम्बन्ध वैज्ञानिक प्राण में ही सर्वथा घटित होता है। सष्ठ प्राण सौम्य होने के कारण उत्तर दिग्वर्ती है तथा आकाशस्थित सप्त पियों में से वसिष्ठ नामक तारा में इस प्राण की विशेषता है इसी से वसिष्ठ का आश्रम भी उत्तर में था । अगस्त्य श्राग्नेय है और इसी लिये याम्य(दक्षिण) दिशा में इनका आश्रम था । अगस्त्य तारा जिस में अगस्त्य आग्नेय प्राण की प्रचुरता है वह भी दक्षिण अाकाश स्थित है । अाग्नेय प्राण होने के कारण जल का शोपण करना उसका विशेष धर्म है। इसी अगस्त्य प्राण के जल शापण के प्रभाव में , जल किस प्रकार फेन, ऊपा, मृत्तिका आदि मे परिणत होकर अन्त मे पत्थर, लोहा तथा हिरण्य रूप मे आकर पार्थिव स्वरूप का निर्माण करता है। यह वैज्ञानिक प्रक्रिया समझाई गई है। अगस्त्य प्राणके प्रचुर रूप से वित- रण करने वाले अगस्त्य तारा के उदय से किस प्रकार आकाशस्थ मेंधों का तथा पृथ्वीस्थ समुद्र जल शोपण होता है यह दिखाया गया है। इसी विज्ञान के आधार पर अगस्त्य कृपि के समुद्र पान करने का रोचक आख्यान पुराणों मे वर्णित है । अगस्त्य की पुन शिष्य परम्परा इसी नाम से अभिहित थी।

( ३ ) ४-भृगु अंगिरा। भृगु-अंगिरा के प्रकरण में सृष्टि प्रक्रिया का विशेष सम्बन्ध है अतः प्रारम्भ में ही सृष्टि प्रक्रिया पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया । कारण ब्रह्म के विषय में लिखा गया है कि उक्थ, प्रतिष्ठा और साम इस प्रकार त्रिल तण अद्वितीय कोई एक तत्त्व ब्रह्म है । जिसमें से उत्थान होता है वह उत्थ होकर उवथ कहा जाता है । स्वतः उपक्षीण न होताहुआ वह अपूर्व वस्तु का उद्भा- वन करता है। अतः वृहण स्वभाव के कारण ब्रह्म कहलाता है । उत्पन्न हो होकर अर्थ समूह जिसके आधार पर प्रतिष्ठित होता है वह प्रतिष्ठा कह- लाती है । तथा इन उत्पन्न हुए भिन्न भिन्न पदार्थो में जो समान रूप से व्याप्त होता है वह साम कहा जाता है। यह ब्रह्म पहिले अव्याकृत था; वृहण स्वभाव होने के कारण इसका व्याकरण हुवा । जो विभक्त नहीं है एक है. उसमें विभक्ति ( विभाग ) का उपपादन करना व्याकरण कहलाता है। उन्मुग्ध अवस्था वाले की उद्बद्ध अवस्था है । जो निर्विशेप है उसमें विशेप की अभि- व्यक्ति व्याकरण है । मन, प्राण और वाक् इन तीन सृष्टि कर्ताओं से आरब्ध कर्म पुरुप अथवा मन, विज्ञान और आनन्द इन तीन मुक्ति साक्षि से प्रारब्ध विद्या पुरुप हों, ये ब्रह्म के व्याकृत रूप में है। विद्या पुरुप सृष्टि बंध का मोचन करने वाला है। मन एवं कर्म पुरुष सृष्टि वन्धन करने वाला है। इनमें मन ज्ञान का, प्राण क्रिया का और वाक अर्थों के उक्थ, साम और प्रतिष्टा हैं । ये तीनों एक दूसरे के बिना नहीं रहते। इन तीनों मिले हुए रूप को ही आत्मा कहा जाता है । यह प्रात्सा सत्य रूप से विश्वव्यापी है और यह धर्मो को धारण करके धर्मा वन जाता है। यह धर्मों से पृथक् कभी नहीं रहता। प्राण ही शक्ति है अतः यह आत्मा सदैव कुछ न कुछ करता ही रहता है । ज्ञान के कारण निरन्तर कुछ न कुछ जानता रहता है। यह कारण ब्रह्म हुआ। अब इससे जो कार्य ब्रह्म हुए उनमें कार्यों के वैचित्र्य के कारण यह वैविध्य ( उक्थ, साम और प्रतिष्ठा ) भिन्न भिन्न आश्रय से रहता है। जो कोई भी पिण्ड दृष्टिं पथ में आता है वह एक एक पृथक् उक्थ है । उसके भीतर नाभि ( केन्द्र ) में इन्द्र नाम का प्रतिष्ठा प्राण है। उसके चलने से पिण्ड चलता है तथा उसके स्थिर रहने से स्थिर रहता है अतः वह प्रतिष्ठा कहलाता है । यह पिण्ड जितनी दूरी तक दिखाई दे सकता है वहां तक फैला हुआ मंडल साम कहलाता है परन्तु ये तीनों ही सदा साथ रहते हैं ये एक दुसरे की आत्मा हैं। इनमें से एक के नष्ट होने से सभी न हो जाते हैं । m ( ४ ) इस कार्य ब्रह्म की तीन जातियाँ हैं-१-स्वयं ज्योति सूर्य अादि । २-पर ज्योति चन्द्र आदि तथा ३-रूप ज्योति पृथ्वी आदि । श्रुतियों में जहाँ कहीं भी सृष्टि होने का प्रकरण आता है वहाँ सर्वत्र यही मिलता है कि उसने इच्छा की, तप किया और श्रम किया । अतः इच्छा तप और श्रम ही सृष्टि के हेतु माने गए हैं। इन तीनों को यहाँ विस्तार से समझाया गया है । इसके आगे 'प्राजापत्यं कुरुक्षेत्रम्' शीर्पक में यह प्रतिपादन किया गया है कि जहाँ कहीं जो कुछ दृष्टि में आता है वह सब एक प्रजापति का कार्य क्षेत्र है। अव्यय पुरुप की पांच कलाओं में से (आनन्द विज्ञान, मन, प्राण और वाक् ) प्राण के आधार पर अक्षर पुरुष का विकास होता है। प्राण ही क्रिया का जनक है प्राण के द्वारा ही क्रिया संभव है अतः सृष्टि प्रक्रिया में प्राण की प्रधानता मानी जाती है । अक्षर पुरुप की प्रेरणा से वाक् भाग में विकृति होती है वह विकृत होने वाला तत्व पर पुरुष कहलाता है। अव्यय अक्षर और क्षर तीनों एक साथ रहते हैं। इनमें वाक् भाग के क्षर पुरुप में विकार होने से उनके पांच विभाग हो जाते हैं जिन्हें प्रकृति ब्रह्म कहते हैं । ये प्राण, आप, वाक, अन्न और अन्नाद कहे जाते हैं । फिर इनका पंची करण होता है। प्रत्येक के आधे भाग में अन्य चारों के भाग सम्मिलित हो जाते हैं। परन्तु आधा भाग मुख्य रहता है इससे प्रधानता के कारण इनका नाम वही प्राण आदि रहता है । श्रुतियों में अनेक स्थलों में ऋपियों को अनेक स्थानों में प्राण कहा गया हैं-"प्राणा वा ऋपयः" । अनेक स्थलों में उन्हें वाक कहा गया है। इसका समन्वय इसी प्रक्रिया से होता है कि अक्षर पुरुप (प्राण ) के प्रेरणा से वाक् के विकार से जिनकी उत्पत्ति है वे विवक्षा के अनुसार प्राण भी कहे जाते हैं तथा वाक् भी । उदाहरण के लिये क्षरपुरुप की कला में प्रथम जो प्राण शब्द है वह प्राण तो है ही वाक् का विकार होने से वाक् भी है । मनः प्राण वाङ्मय अक्षर पुरुप सृष्टि करने के लिये प्रवृत्त हाता है । इनमें प्राण प्रधान है यह कहा गया है क्योंकि मन और वाक् स्वतः अक्रिय हैं। प्राण के आधीन ही इन्हें वृत्ति का लाभ होता है । ये तीनों सदा साथ रहते हैं अतः अक्रिय होते हुए भी मन अपने सहचर प्राण के आधार पर इच्छा करता है। स्वतः अन वच्छिन्न होने पर भी प्राण की सात्रा के अनुसार ही मन की कामना होती है। क्षुद्र मन का काम शुद्र तथा महत मन का महान् होता है । काम वल की मात्रा के अनुसार उनके आश्रित वाक् का मी भण्डल छोटा या बड़ा होता है । इस प्रकार मनः प्राण वाङ्मय से ( ५ ) प्राजापत्य संज्ञक कुरुक्षेत्र संज्ञक ये अनन्त ब्रह्म रूप उत्पन्न होते हैं। इनमें भी एक एक प्राण सामान्य खण्ड में काम के अनुसार अवान्तर अनेक विशेष उत्पन्न होते हैं। परन्तु इन सब विशेषों का अविशेष पौर्विक रूप प्राण सामान्य है वही असत् प्राण या ऋपि कहा जाता है। विद्यमान कार्य के समान उसका रूप वही है इससे उसे असत् कहते हैं । इसी असत् प्राण अर्थात् ऋपि प्राण अन्तः सृष्टियां होती हैं। अव्यय पुरुप अव्यय पुरुप के आलम्बन से क्षर पुरुप का साधन बनाकर विश्व व्यापी कोई अक्षर पुरुष प्रकृति (प्राण, अप् आदि) से विशिष्ट होकर प्रकृति ब्रह्म के पांच प्रकार के होने के कारण पांच प्रकार का हो जाता है । वह प्राणमय स्वयं भू है; आपोमय परमेष्ठी, वाङ्मय सूर्य, अन्नमय चन्द्र और अन्नादमय पृथ्वी है। स्वयंभू सत्य लोक है इसके परमेष्ठी के मध्य का अन्तरिक्ष तपो लोक है; परमेष्ठी जनल्लोक कहलाता है । परमेष्ठी और सूर्य के मध्य का अन्तरिक्ष महर्लोक है। सूर्य स्वर्लोक है । सूर्य और पृथ्वी के मध्य का अन्तरिक्ष भुवर्लोक तथा यह पृथ्वी भूलोक है । ये सात लोक उत्तरोत्तर क्रम से संनिविष्ट हैं। इनमें सत्यलोक स्वयं भू ब्रह्माग्नि लोक हैं । ऋक् साम और यजुः में यजुः को ब्रह्माग्नि कहते हैं । यत् (गतिशील ) तथा जू-(स्थितिशील ) दोनों तत्व सम्मिलित रूप से यजुः कहलाते हैं । स्थितिशील आकाश है तथा गतिशील वायु (ये आकाश और वायु भौतिक आकाश और वायु से भिन्न तत्व हैं)। ये गतिशील अनन्त वायु ऋषि कहलाते हैं । ये दो प्रकार के हैं जिनमें अवयव उन्मुग्ध हैं विकसित नहीं है तथा जिनमें अवयव उब्दुद्ध हैं । प्रथम प्रकार के असत प्राण सत्य लोक में है। फिर ये तपो लोक में आकर तप्त होकर परिक्षुब्ध होकर क्रम से तृतीय पारमेष्ठय जनल्लोक में आकर उब्दुद्धावयव होकर पितृ बन जाते हैं । अर्थात् आगे की सृष्टि के निर्माण में प्रवृत्त होते हैं। ये अनन्त प्रकार के हैं। इनमें से बारह की अधिक स्तुति पाई जाती है-भृगु अगिरा अत्रि, मरीचि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, वसिष्ठ, अगस्त्य, विश्वा- मित्र और विश्व कर्मा । ये पितृ संज्ञक सृष्टि कर्ता प्राण वाक् योनि में अपने को सिक्त करते हुए अक्षर पुरुष के मनो विशेप से ग्रहण किये हुए वल के प्रयोग विभिन्न रूप इन सब सृष्टियों को उत्पन्न करते हैं। मन की उत्पत्ति सोम से होती है अतः सोम मय मन सर्व प्रथम कामना करता है.। मानस रूप की कल्पना करके तदर्थ प्राण को नियुक्त करता है और प्राण से आघात् पाकर वाक् विकृत होती है । यह सर्व सृष्टि का सर्व साधारण नियम है।

( ६ ) यह ऋपि प्राण स्वभावतः वर्तुल वृत्त प्रायः होता है। यह परिमण्डल शरीर तीन प्रकार से विभक्त होता है। मध्यम प्राण (केन्द्र या नाभि स्थित) अभय कहलाता है । यह दो प्रकार का होता है सवीर्य और कहीं कहीं नि:र्थ । ब्रह्म, क्षत्र और विश ये बीर्य हैं। ब्रह्म वीर्य होने पर यह अात्मा प्रशान्त वृत्ति- युक्त शान्ति प्रधान ज्ञान शील होता है। चत्र वीर्य होने पर वीर भाव के कारण स्वतन्त्र वृत्ति, महोत्साह सम्पन्न तथा पराक्रमशील होता है । बिवीर्य होने पर पशु भाव के कारण अन्य का अनुरोध रखने वाला परतन्त्र वृत्ति पर के आश्रय की अपेक्षा रखने वाला दूसरों के लिये व्यवसाय करने वाला होता है। निर्वीर्य मृत भावापन्न आत्मा दूसरों से पराभव पाता हुअा, लघुता के कारण अधीर और शीघ्र द्रवित होने वाला होता है। इन तीनों वीर्यों के प्रभव मन प्राण और वाक् क्रमशः होते हैं । ये तीनों सदा साथ रहते हैं अतः मनः प्राण वाङ्मय आत्मा में ये तीनों वीर्य सदैव रहते हैं। परन्तु प्रधानता जिसवीर्य की होती हैं उसके अनुसार विभाग बताया गया है। प्रत्येक पिण्ड में असंज्ञ अन्तः संज्ञ और ससंज्ञ में इन वीर्यों की अवस्थिति है इसीलिए रत्नादि वृक्ष आदि में भी यह वीर्य प्राधान्य जन्य विभाग शास्त्रों में वर्णित है चन्द्र की आत्मा ब्राह्मण है, सूर्य की क्षत्रिय और पृथ्वी की वैश्य । इन पिण्डों में रहने वाले पशुओं की आत्मा निर्वीर्य अर्थात् शूद है । यह आपेक्षिक है। वास्तवमें शूद्र और पशुओं में तीन बीर्यों की सत्ता है परन्तु अत्यन्त अल्पमात्रा में होने की दृष्टि से निर्वीर्य कहा जाता है । इस ब्रह्म वार्य की प्रधानता के अनुरोध से प्रजापति शब्द तथा क्षत्रवीर्य के अनुरोध से इन्द्र शब्द का व्यवहार होता है । वास्तव में दोनों एक ही हैं । इस केन्द्रस्थ इन्द्र से इद्ध होकर सात प्राण उद्भूत होते हैं । इनमें मध्य के चार आत्मा (मुख्य आत्मा नहीं) दोनों ओर के दो पक्ष और एक पुच्छ होते हैं। ये चित्य होते हैं अर्थात चयन होकर स्थिर रूप में भूतों के आधार बनते हैं। फिर और समिन्धन होने पर इनकी श्री से शिरः स्थानीय सात प्राण होते हैं ! जो चितेनिधेय कहलाते है और ये दोनों के आधार भूत हैं। ये दोनो प्रकार के प्राण एक शब्द अग्नि नामसे व्यवकृत हैं और उसी अग्नि के भेद चित्य और चितेनिधेय हैं। चिन्य विना चितेनिधेय के नहीं रहता। दोनों सदा साथ रहते हैं। प्राण का जितना अंश सीमाबद्ध होकर भूत रूप में चित्य है और जो प्राण उससे अति- रिक्त चित्य रूप में न होकर स्वरूप में रहते हैं वे चितेनिधेय है । ये दोनों ही इन्द्र से सन्नद्ध हैं । चित्य को मर्त्य और चितेनिघेय को अमृत कहते हैं और । में ( ७ ) मध्यस्थ इन्द्र इनकी प्रतिष्ठा है। इस प्रकार इन्द्र अमृत और मर्त्य के द्वारा सर्वत्र त्रिवृद्भाव समझना चाहिये । इसके श्रागे पशु शब्द का विस्तृत विवेचन है। यह पारिभाषिक शब्द है । केन्द्रस्थ इन्द्र प्राण के मूल में अक्षररूप इन्द्र और विष्णु रहते हैं । वह इन्द्र विक्षेपण प्राण है उसके विक्षेप के साथ विष्णु जो उसका सहचारी है वह भी बाहर निकलता है और अशिति ग्रहण करके आत्मा में समर्पण करता है। इसी विष्णु के साथ यह नभ्य प्राण इन्द्र भी बाहर निक- लता है और विष्णु के द्वारा समाकृष्ट आगन्तुक दिव्य रसों की आहुति से यज्ञ जन्य मर्त्य अमृतमय अन्य रूप धारण करता हुआ उन दोनों नए अमृत और मर्त्य के आश्रय से उनके केन्द्र में प्रतिष्ठित होता है। जैसे भूपृष्ठ पर शिला, गैरिक आदि धातु अथवा दूर्वा वनस्पति अथवा कीट पशु मनुष्य आदि, ये पशु हैं। मुख्य इन्द्र प्राण वर्तुल वृत्त होता है यह कहा जाचुका है परन्तु यह वाइर निकला हुआ इन्द्र प्राण समान रूप से सब ओर नहीं निकलता अतः मण्डल रूप नहीं होता अतः इन पशुओं में पूर्ण इन्द्र नहीं रहता है अर्धेन्द्र कहा जाता है। यहां पर जो यज्ञ होता है अग्नि में सोम की आहुतही यज्ञ है, इसे शिपिविष्ट कहा जाता है । यद्यपि शतपथ ब्राह्मण में तथा ऐतरेय ब्राह्मण में भी दूर्वा आदि अन्तः संज्ञ को ही पशु कहा गया है तथापि असंज्ञ और ससंज्ञ भी उससे उपलक्षित होता है। पृथ्वी के को पुष्ट करने के कारण ही अन्तः संज्ञ दूर्वा आदि को पशु वहां कहा गया है । यह पोषत्वरूप पशु का लक्षण असंज्ञ और ससंज्ञ भी समान रूप से घटित होता है । यह भी स्पष्ट किया गया है कि यद्यपि इन्द्र प्राण के ही आधार पर तीनों लोकों में अमृत के साथ मर्त्य और पशु कहे गये हैं। तथापि वे प्राण सर्वत्र मन और वाक् के साथ रहते हैं। वाक् ही उल्वण रहती है, इसलिए ये उसे वाक् भी कहा गया है। पशुओं को पूर्व में निर्वीर्य कहा गया है वह पृथ्वी आदि मूल आधार की अपेक्षा से अल्पत्रीर्य के अर्थ में समझना चाहिये यह भी कहा जा चुका है । पृथ्वी पिण्ड की अपेक्षा से मनुष्य भी पशु माना गया है। यह अर्धेन्द्र है, इसका दूसरा अर्ध भाग विवाह के द्वारा स्त्री के द्वारा पूर्ण होता है-यह सप्रमाण विशद रूप से सिद्ध किया गया है। इस अर्धेन्द्र को मनु भी कहा गया है । मनु वैराज कहलाते हैं इसके लिए भी मनुस्मृति का प्रमाण दिया गया है । इसके आगे विराट् पुरुष का सविस्तार वर्णन है। विराट के दश धर्म कहेगये हैं यथा-प्राण, देव, ऋपि, ग्रह, स्तोम.पृष्ठ, ऋतु, दिक्, छन्द और साम । इसका विस्तृत वर्णन पद्यों में यहां किया गया है। स्वरूप - ( ८ ) विराट् अग्नि रूप है इसकी व्याप्ति २१ अहगणों तक है इसके आगे इससे अव्यवहित २२ से ३३ अहर्गण तक पारावत सोम की अवस्थिति बताई गई है। अग्नि में सोम की आहुति ही यज्ञ है। बिना सोमकी आहुति के अग्नि का स्वरूप ही सिद्ध नहीं होता। यह विराट् सोम को प्राप्त करके उसे अग्नि रूप में परिणत करके अात्मारूपी इन्द्र को आप्यायित करता है। वास्तव में अग्नि और सोम एक ही तत्व के रूपान्तर हैं। दिशाओं से पाकर सोम अग्नि में आहुत होकर अग्नि रूप में परिणत हो जाता है। इस प्रकार यह परिवर्तन निरन्तर चलता रहता है। इसके आगे वेद सृष्टि पर भी विचार किया गया है। इन्द्र अमृत और मर्त्य जिसका विग्रह है ऐसे आद्य प्रजापति ईश्वर ने कामनाकी कि हम भूयान् (विपुल) हो जाँय । उन्होंने तप और श्रम किया और इच्छा तपः और श्रम के द्वारा सर्व प्रथम ब्रह्म अर्थात् त्रय्या विद्या ऋक्, साम और यजुः का सृजन किया । उसीके अनुसार सब अन्य प्रजापति भी इच्छा तपः श्रम के द्वारा अपने अपने विग्रह में पृथक् रूप में त्रयी विद्या का उद्भव करते हैं । कारण के धर्म ही कार्य के धर्मों को प्रारम्भ करते हैं यह नियम है । यह त्रयी विद्या उस आत्मा की प्रथमसृष्ठि है । यही त्रयी विद्या उस उस अात्मा की प्रतिष्ठा होती है । यह त्रयी विद्या चतुर्थ आथवर्ण विद्या का भी उपलक्षण है। अग्नि और सोम के द्वारा विभक्त सम्पूर्ण सृष्टि में अग्नि के विभाग रूप त्रयी विद्या से अव्यवहित संलग्न ऊर्ध्व भागमें सोम रूप अथर्व विद्या भी संनिविष्ट रहती है क्योंकि सोम की आहुति के विना अग्नि का रूप ही निष्पन्न नहीं होता। प्रजापति ब्रह्म हैं। उसके द्वारा सृष्ट ये वेद भी ब्रह्म कहे जाते हैं। प्रजापति के सन्तनन (फैलाव) रूप ही ये वेद हैं तथा सन और प्राण को भीतर रखती हुई वाक् ही ये तीनों वेद हैं । वाक् का यह सन्तान (फैलाव) वैदिकी परिभाषा में सहस्र नाम से कहा जाता है। इसके आगे प्रजापति के दशव्यूह बताये गये हैं इनमें प्रधान तीन भेद माने जाते हैं । नभ्य इन्द्र अनिरुक्त प्रजापति है वह प्रतिष्ठा है। शिपिविष्ट विराट् प्रजापति है वह उक्थ है तथा सब लोक सब वेद संवत्सर प्रजापति है ।* * नोटः--भृगु अगिरा प्रकरण का यहां तक का अंश म. म. गिरिधर शर्मा जी की व्याख्या सहित छप चुका है । हिन्दी भाषान्तर भी वहीं दिया हुआ है ।

( ६ ) अग्नित्रय के तीन लोक हैं उससे आगे अंगिरा और भृगु का संवलित आपो लोक है। याज्ञवल्क्य आदि कई महर्षियों ने आपोलोक को चतुर्थ लोक कह कर वर्णन किया है । इसका मुख्य कारण यह है कि जिस प्रकार तीन अग्निवेद-ऋक् यजुः और साम क्रमशः पृथ्वी अंतरिक्ष और आदित्य इन तीन अग्नियों से सम्बद्ध हैं उसी प्रकार भृगु अंगिरा दोनों से मिला हुआ चतुर्थ श्राथर्वण वेद आपोलोक से सम्बद्ध हैं । वेद चार हैं अतः इन महर्षियों ने लोकों कोभी चार ही बताया है। इसके लिए गोपथ ब्राह्मण का प्रमाण उद्धत है कि आपोलोक भृगु और अंगिरा का रूप है, वह भृगु अंगिरोमय है । परन्तु आन्द विद्या में वर्तुल वृत्त रूप गर्भ कोष को अान्द कहा गया है। अंगिरा वृहस्पति तथा विद्यु भृगु के द्वारा पृथक् पृथक् लोक माने गये हैं। यहां उनके सम्बन्ध में उपपत्ति देकर पूर्ण विवेचन किया गया है। वाग्लोक से सर्व प्रथम आपः की सृष्टि हुई । मनः प्राण मयी वाक् ही अप रूप में परिणत हुई। यहां इस आप को यौगिक जल न समझा जाय । वास्तव में यह जलकी ही पूर्वावस्था नहीं है प्रत्युत आगे की सम्पूर्ण सृष्टि ही सर्व प्रथम तत्त्व का परिणाम है। इस अप की सृष्टि होने पर ब्रह्म के तीन प्रकार हो गए। प्रथम जो सृष्ट हुआ वह भी ब्रह्म का रूप है। उसकी सृष्टि करके ब्रह्म उसमें प्रविष्ट हुआ वह प्रविष्ट ब्रह्म कहलाया तथा इन दोनो से अतिरिक्त अविकृत रूप में स्व स्वरूप में स्थित तीसरा मुख्य ब्रह्म हुश्रा । उस प्रजापति ने उन अप में अपनी छाया देखी । सृष्ट ब्रह्म मेंजो प्रविष्ट ब्रह्म था वही मुख्य ब्रह्म की छाया कही गई है । वही अथर्ववेद सहित त्रयीवेद है। पूर्व अविकृत ब्रह्म में मनः प्राणमयी वाक् असीमित थी उससे भिन्न यह आपो मण्डल की मनः प्राणमयी वाक् छोटी है तो भी पूर्व विग्रह की समानता होने के कारण उसे छाया कहा गया है । बृहन्मण्डल के भीतर क्षुद्र मंडल रूप स्वच्छाया को देखकर ब्रह्म का रेतः स्कन्न होकर उन अप् में प्रविष्ट होगया उसने अप् संवरगा किया इसलिए वह 'वरुण' नाम से अभिहित हुआ । यह वरुण दो प्रकार का हो गया । एक अपं में लीन और दूसरा अय् से मुक्त । इसी के प्रभाव से अप के भी दो भेद हो गये-एक क्षार युक्त अपेय, दूसरा सुस्वाद और पेय । प्रजापति ने उस रेत में जल को सन्तप्त किया और श्रम किया उससे रेत का भर्जन हुआ और वह भृगु कहलाया। इस वरुण रूपी रेत से उत्पन्न होने के कारण भृगु वारुणि कहे जाते हैं। भृगु की सृष्टि करके वे अन्तर्हित ( १० ) .. होगये । सृजन किए हुए इन भृगु ने पांच प्रकार का रूप सृजन किया वायु मातरिश्वा, पवमान, वात और अथर्वा । ये सब वायु रूप हैं,अनायतन प्रवहण शील अन्तरिक्षचारी भाव हैं। इसके आगे भृगु और अथर्वा का भेदाभेद दिखाया गया है। अनेक श्रुति वाक्य उद्धृत करके दिखाया गया है कि कहीं भृगु और अथर्वा को भिन्न भिन्न माना है और कहीं एक ही । तथा इन दोनों मतों का समन्वय भी किया गया है । श्रुतियों में भृगु और अगिरस सम्बन्धी चतुर्थ वेद पाथर्वण का लोक अप माना गया है और चन्द्रमा लोकपति है । ये वायु प्राप् और चन्द्रमा अन्योन्य समन्वित रहते हुए सहचारी हैं और सवका आप्यायन करते हैं। चन्द्रमा दो प्रकार का है-भास्कर चन्द्र और रिक् चन्द्र । पृथ्वी की परिक्रमा करने वाला चन्द्र भास्कर है यह बाद में अत्रिप्राण से उत्पन्न हुआ है । अतः भृगु प्रकरण में दिक् चन्द्र अभिप्रेत है जो आद्य है भास्कर चन्द्र की आरम्भक तत्व है अनायतन है और सर्व जगद् व्यापी है । इस प्रकार आप वायु और दिक् चन्द्र (सोम) से भृगु तीन स्वरूप वाला माना गया है। अब वरुण जो ब्रह्म रेतो रूप थे और अप से वरण होने के कारण वरुण कहे गए हैं वे समुद्र से मुक्त हो गए । उस अवच्छेद (सामा) से स्वतन्त्र होना ही मुक्ति है । इसीलिए ये मुच्यु होकर मृत्यु कहे गये हैं। प्रजापति ने उनको अभितप्त किया और उनके सब अंगों से रस क्षरण हुआ वह अगरस अंगिरस् कहलाया। उसने ऊर्ध्व में रहकर इन सब लोगों का अवष्टम्भन किया। सब घन पिण्डों में से प्रत्यंग से निकलकर ऊपर संचरण करता हुआ यह अगिरा प्राण प्रतीत होता है । पृथ्वी पिण्ड से भी निकलकर यह प्राण द्यौः की ओर जाता है श्रुतियों में मिलता है आदित्य प्राण और अगिरा प्राण में परस्पर स्पर्धा होती है कि कौन पहिले स्वर्गलोक को जाता है। इसका वैज्ञा- निक समाधान यह किया गया है कि पृथ्वी पिण्ट के केन्द्र से निकल कर यह अगिरा प्राण स्वर्ग की ओर जाता है । इसी प्रकार आदित्य प्राण भी पृथ्वी पिण्ड से आहत होकर ऊपर जाता है इन दोनों में पहिले कौन स्वर्ग . पहुंचता है। यह स्पर्धा है। सूर्य प्राण प्रथम पहुंचता है क्योकि उसकी व्याप्ति तृतीय लोक तक ही है । परन्तु अंगिरा प्राण का प्रभाव चतुर्थ लोक है अतः उसका गन्तव्य मार्ग बड़ा होने से वह अपेक्षाकृत विलम्व से पहुँचता है। जितने जप यज्ञ हैं वे सब ईसी में अर्पित होते हैं। कठिनः धातु रूप यह ( ११ ) अंगिरा प्राण तीनों लोकों के रस. से मिलकर तीन प्रकार का होजाता है.-. आग्नेय, याम्य और आदित्य । आग्नेय कृष्णवर्ण है; याम्य सीसा के वर्ण का है तथा आदित्य शुल्क वर्ण है। गोपथ में आता है कि अग्नि आदित्य और यम ये अंगिरस् हैं । इनमें भौम अंगिरा प्रज्वलित होते हुए अग्नि का स्वरूप सम्पन्न करता है । अग्नि को त्रिवृत् (तीन रूप वाला) कहा गया है- अंगार, अर्चि (लपट. लौं) और धूप । अंगारों में अंगिरा उत्पन्न हुआ तथा ज्वाला से भृगु हुश्रा इसका अभिप्राय यही है कि अगार के स्वरूप का आरम्भक यह अगिरा प्राण है तथा ज्वाला सोम के योग से होती है अतः उसका आरम्भक भृगु प्राण है ये भृगु और अगिरा प्राण आपोलोक के तत्व हैं। स्वरूप से ये आन्तरीक्ष्य और अनायतन हैं तब सर्वत्र व्याप्त हैं। इसी प्रकार नक्षत्र विद्या में रोहिणी लुब्धक आख्यान के द्वारा भृगु और अगिरा प्राणों का वर्णन किया गया है। अध्यात्म में भी भृगु और अगिरा प्राणों का कार्य उपलब्ध होता है। अगिरा प्राण के प्रभाव से पूर्वानुभव की स्मृति होती है। भृगु प्राण के द्वारा ख्याति यश श्रीः प्राप्त होती है । इसी प्रकार इन प्राणों के द्रष्टा महर्पि भी इन नामों से प्रसिद्ध हो गये हैं। अन्त्रि अत्रि भी मुख्यतः प्राण रूप हैं। सप्तर्पियों में जो अत्रि तारा रूप में हैं इनमें भी अत्रि प्राण की प्रधानता है। अत्रि प्राण का गुण यह है कि जिस वस्तु में इस प्राण की अधिकता रहती है वह पारदर्शक नहीं होती । सूर्य आदि की किरणें उसके पार न जाकर उससे टकराकर प्रत्यावर्तित हो जाती हैं । दक्ष और वरुण नामक प्राणों के योग से इस प्राण की उत्पत्ति बताई गई है। सूर्य चन्द्र पृथ्वी आदि जितने घन द्रव्य हैं उनमें इस अत्रि प्राण की अधिकता पाई जाती है। इसी प्राण से आकाश स्थित चन्द्र की उत्पत्ति हुई है यह इस प्रकरण में विस्तार से प्रतिपादित हुआ है। इस प्राण की शक्तिभूता अनसूया है । जिस पुरुप में इस प्राण की अधिकता होती है उसमें अनसूया नामक गुण विशेष रूप से पाया जाता है। अनसूया का लक्षण यह दिया गया ( १२ ) है कि जो गुणी के गुणों का नाश नहीं करता, सम्मान करता है तथा जिनमें कम गुण हैं उनकी भी प्रशसा करता है तथा दूसरे के दोषों को देखकर उपहास नहीं करता । ये गुण अनसूया कहलाते हैं। इस अनि प्राण से चन्द्र की उत्पत्ति किस प्रकार हुई इसका विपद् वर्णन किया गया है। श्रुति का घोष है कि यह विश्व अग्नि और सोम तत्त्वों से मुख्यतः बना है। अग्नि का गुगा में विशकलन करना अर्थान बिखेरना-अलग २ करना। साम का गुण संकुचित करना-इकट्ठा करना । इन्ही दोनो तत्त्वों के तारतम्य से प्रत्येक पदार्थ में घनता तरलता तथा विरलता प्रत्यक्ष परिलक्षित होती है । प्रत्येक पदार्थ में दोनों तत्व सम्मिलित रहते हैं । यदि सोम तत्त्व न रहे तो कोई भी वस्तु अपने स्वरूप में नहीं रह सकती-अग्नि के द्वारा विशकलन होते होते उसका लोप होही जायगा। इसी प्रकार अग्निफे न रहने पर भी वह वस्तु संकुचित होते होते लुप्त हो जायगी । फलतः जिस पदार्थ में जितनी अधिक घनता होगी, जितनी अधिक मात्रा में अत्रि प्राण होगा उसी के अनुसार उसमें सोम तत्त्व को मात्रा भी अधिक होगी । पृथिवास्थ इसी सोम तत्त्व से अाकाशस्थ सोम पिण्ड (चन्द्र) की उत्पत्ति की । वैज्ञानिक प्रक्रिया का प्रकार यह है कि जव यह पृथ्वी प्रतिसंवत्सर काल में सहस्रांशु सूर्य के पास पास भ्रमण करती है तब सूर्य की किरणों के संताप से यह अत्रि प्राण प्रतिक्षण निकलता रहता है और पृथ्वी के ऊपर सब ओर छा जाता है । यह प्राण इसी प्रकार उप्ण होता रहता है। परिक्रमण की तीन आवृत्ति होने पर तीन संवत्सर सूर्य के उत्ताप से यह अत्रि प्राण सोमत्व को प्राप्त होता है । यह सोभ भाग गरम होते हुए अत्रि के नेत्र से नु त होता है। नेत्र शब्द यहां रश्मि (किरण) का वाचक है । अत्रिप्राण का यह सूक्ष्म भाग इसने पृथक होकर सब दिशाओं में ऊपर व्याप्त होता हुआ सजातीय आकर्षण के कारण फिर पृथिवी पर गिरने का उपक्रम करता है । पृथ्वी पर गिरते हुए इस सोम हमूह को हिरण्य गर्भ ब्रह्मा वायु रूप से चन्द्र कक्षा के धरातल में रोककर इक्कीस बार परिक्रमण करते हुए क्रम से इस सोम राशि को एकत्र करते हुए सूर्य के समान सहस्र किरण युक्त सोम पिण्ड के रूप में सम्पादित करते हैं । यही चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता हुआ आकाश में दृष्टिगोचर होता है। वर्तमान विज्ञान भी मानने लगा है कि श्राकाश में फैली हई केतु की किरणों के क्रमशः एकत्रित होने पर सूर्य पिण्ड वना है। इसी प्रक्रिया से अत्रि प्राणों के सार भूत सोम ( १३ ) तत्व से यह चन्द्र पिण्ड बना है इसे मानने में कोई आपत्ति का अवसर नहीं होता। अत्रि प्राण के द्रष्टा मनुष्य रूप में भी अत्रि महर्पि थे जिनका उल्लेख श्रुतियों में तथा पुराणों में स्पष्ट रूप से मिलता है । इनका आश्रम कहां था यह ठीक ज्ञात नहीं होता। महाभारत के उल्लेख से इतना ज्ञात होता है कि इनका आश्रम उत्तर भू-भाग में था । ये प्रथम अत्रि महर्षि अत्रि परिपद् (विज्ञान-शाला) के अधिष्ठाता (ब्रह्मा) थे। इनके द्वारा प्रतिष्ठित अत्रिवंश में ग्रह नक्षत्र आदि ज्योतिर्विद्या की परीक्षा विशेष रूप से प्रचरित थी। प्रथम अत्रि के समय सूर्य के ग्रहण होने पर तत्कालीन बहुत से विद्वान् उसके कारण का निर्धारण करने के लिए प्रयत्न करते थे। किन्तु सर्व प्रथम अत्रि परिपद् के अधिष्ठाता अत्रियों ने ही ग्रहण के कारण का अवधारण किया था उसका स्पष्ट उल्लेख वेद मन्त्र में मिलता है। इसीका रोचक वर्णन पुराणों में भी किया गया है । ग्रहण काल में सूर्य की परीक्षा करने के यन्त्रों के नाम भी मंत्र में उल्लिखित हैं परन्तु उनका विशेष विवरण कालदोप से लुप्त हो गया । वेद मन्त्र द्रष्टाओं में अत्रि नाम के दो महर्पियों का उल्लेख है। प्रथम अत्रि भूमिष्ठ अत्रि प्राण के द्रष्टा थे इसलिए ये भौम अत्रि कहे जाते हैं। इन्हीं की परम्परा में दूसरे अत्रि ने सप्तर्पि तारा स्थित अत्रि नामक तारा के प्राणों का आविष्कार किया था ये भी अत्रि परिषद् के ब्रह्मा पद पर प्रतिष्ठित थे। ये सांख्यात्रि नाम से प्रसिद्ध हैं। प्रथम भौम अत्रि महर्षि के औरस पुत्र अनसूया गर्भज मनुष्य रूप चन्द्र थे । इनसे ही प्रकाशमय पवित्र चन्द्र वंश प्रवृत्त हुआ जो देव युग से अब तक अविच्छिन्न रूप से चलरहा है और जो ब्रह्मा के द्वारा प्रवर्तित वैदिक धर्म का पालन करता हुआ आज दिन भी दृष्टिगोचर होता है। अत्रि महर्षि की परम्परा भी अत्रि नाम से प्रसिद्ध हुई । इसी प्रकार इनकी पत्नी अनसूया भी जातिवाचक हो जाने के कारण वंशधर अत्रियों की पत्नियों के नाम से व्यवहृत होने लगी। इसी कारण भिन्न भिन्न काल में पति पत्नि के रूप में अत्रि और अनसूया के नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है। महाभारत-बन पर्व में एक कथा उल्लिखित है। अत्रि निःस्पृह वृत्ति होने के कारण दारिद्रय से कष्ट पा रहे थे। पुत्र कलत्रादि का कष्ट देखकर ( १४ ) धनयाचनार्थ वेन पुत्र पृथु के यज्ञ में जाने का विचार किया-परन्तु याचना कर्म में दुःख ही है यह सोचकर तपश्चरण के लिये वन में ही जाने का निश्चय किया । परन्तु अपनी पत्नी अनसूया के आग्रह के कारण इच्छा न रहते हुए भी पृथु की यज्ञ शाला में पहुँच गये तथा राजा को सम्बोधन करके चाटुवाक्य बोलने लगे कि आप धन्य है आप ईश्वर है इत्यादि । वहां उपस्थित सहपि गौतम ने क्रुद्ध होकर उन्हें फटकारा कि तुम्हें इस प्रकार नहीं कहना चाहिये । ये राजा मनुष्य हैं इनकी ईश्वर रूप में स्तुति प्रशंसा करना युक्त नहीं है । ब्राह्मण होकर तुम्हें चाटुवाद करके मिथ्या भापण नहीं करना चाहिये । तव सनत्कुमार ने मध्यस्थ होकर अत्रि के पक्ष में व्यवस्था देकर विवाद का शमन किया । इनका आशय यह था कि मनुष्य रूप होने पर राजा देवता है । पृथु ने प्रसन्न होकर अत्रि को प्रभूत धन राशि दी । वह सब अपने कुटुम्ब को सौंप कर तपस्या के लिए वन में चले गये । पृथु भी अत्रिवंशज थे। उनके यज्ञ में पहुंचने वाले ये अत्रि भी अवश्य ही अत्रिवंशज थे, प्रथमात्रि नहीं हो सकते। इसी प्रकार जिन अत्रि और अनसूया निर्देश रामायण में मिलता है। ये दोनों भी मुख्य अत्रि और अनसूया से भिन्न थे। पुराणों में कही चन्द्र को अत्रिनेत्र से उत्पन्न हुआ कहा गया है, कहीं अत्रि की भार्या अनसूया से उत्पन्न । इस परस्पर विरोध का समाधान यही है कि अाकाशस्थ चन्द्र की उत्पत्ति अत्रि के नेत्र से है। तथा भूमिष्ट मनुष्य रूप चन्द्र की उत्पत्ति अनसूया के गर्भ से है। विश्वामित्र । मन्त्र और ब्राह्मणों के अनुसार सूर्यगत प्राण को इन्द्र कहते हैं । इन्द्र शब्द विपय भेद से चौदह अर्थों में प्रयुक्त हुआ है यह ग्रन्थ कर्ता ने ब्रह्म समन्वय आदि में स्पष्ट किया है। यहां इस प्रकरण में सूर्य प्राण रूप इन्द्र का उल्लेख है। यहां भी तीन प्रकार के इन्द्रों में से महोक्थ, महाव्रत और पुरुप प्राणों में से महानत नामक अन्न रूप इन्द्र प्राण को विश्वामित्र कहा गया है। श्रुतियों के आधार पर यह दिखाया गया है वेद रूप प्राणों के फैलाव से जहां तक उनकी व्याप्ति होती है उनकी पारिभापिक संज्ञा 'सहस्र' है। यह साहस्त्र ( १५ ) तीन भागों में विभक्त है साहस्र के अवान्तर विभाग 'अहः' कहलाते हैं। उक्थ पिण्ड से विस्तृत होतीहुई उत्तरोत्तर छोटी होतीहुई जो मूर्तियां अंतिम साम तक फैलती हैं (जिन्हें ऋङ् मूर्ति भी कहते हैं) उनके समूह को महोक्थ समुद्र कहते हैं । तथा सब दिशाओं से केन्द्राभिमुख श्राते हुए अन्नरूप सोम का भक्षण करता हुआ उममे तृप्त होताहुआ तथा सोम को अग्नि रूप में परिणत करता हुआ अग्नि समुद्र महावत कहलाता है । इसी प्रकार अग्नि का जो भाग देव और भूत के लिए उपादान बनता है उसे पुरुष कहते हैं । ये तानों-महोक्थ, महाव्रत और पुरुष क्रमशः ऋक् साम और यजुः भी कहलाते हैं और इन्ही तीनों वेदों के सन्तनन को सहस्त्र नाम से कहा जाता है। इनमें से यह जो महाव्रत रूप से सर्वत्र व्याप्त है और सब ओर से आते हुए सोम अन्न का भक्षण करता रहता है वही यह त्रयी सूर्य प्राण- इन्द्र हैं और इसी इन्द्र प्राण का विश्वामित्र प्राण कहा गया है । ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है कि जब विश्वामित्र ऋपि पर प्रसन्न होकर इन्द्र ने उनसे वर मांगने के लिए कहा तब ऋपि ने. यही मांगा कि हम आपको जान सकें। इस पर इन्द्र ने यह समझाया-हे ऋषे ! हम प्राण हैं, तुम भी प्राण हो, सब भूत भी प्राण हैं । यह जो तप रहा है (अर्थात् सूर्य) वह प्राण है। वह हम इसी प्राण रूप सब दिशाओं में व्याप्त हैं । अन्न हमारा मित्र और दक्षिण (अनुकूल) है यह अन्न सोम रूप विश्व में व्याप्त प्रागा से सदा संलग्न रहता है अतः मित्र है और इसीसे वैश्वामित्र कहलाता है। भृगु अगिरा के प्रकरण में इसका विशेष विवरण हुआ है। यही सूर्य प्राण इन्द्र अध्यात्म में आकर क्षेत्रज्ञ आत्मा कहलाता है । इसी की उपासना गायत्री मंत्र में की जाती है यह विस्तार से समझाया गया है। यही मनुष्य की आयु का कारण है। इसी की उपासना से इस प्राण से मंलग्न भूतात्मा का प्रज्ञान भाग दोपों से मुक्त होकर स्वच्छ होकर अपने मुख्य प्रभव सूर्य में चला जाता है । यही मुक्ति है। मनुष्य रूप जिस ऋपि ने इस प्राण का शाविष्कार किया वे भी इसी नाम से अभिहित हुए । इस प्रकरण में बताया गया है कि ये ऋषि पहले विश्वरथ नाम के चन्द्र वंशीय राजा थे और महोदय में राज्य करते थे। तत्का. लीन वसिष्ठ का ब्रह्मवीर्य जन्य साहात्म्य देखकर क्षात्र वीर्य को उससे अल्प के ये ब्राह्मण हो गये और विश्वामित्र प्राण के द्रष्टा होने स मानकर तपस्या द्वारा

कारण
( १६ )
के विश्वामित्र नाम से प्रसिद्ध हुए । इनके पुत्र और शिप्य परम्परा भी
इसी नाम से प्रसिद्ध हुई । अतः भिन्न भिन्न काल में भिन्न भिन्न विश्वामित्र हुए।
हरिश्चन्द्रोपाख्यान में वर्णित विश्वामित्र भिन्न थे। तथा रामचन्द्र के काल में
भिन्न । विश्वामित्र मैथिल थे और वृहद् विष्णु पुराण तथा यामल सारोद्धार के
मिथला खण्ड के अनुसार मिथिला में कोशिकी नदी के तट पर इनका आश्रम
था। इन्ही की वंश परम्परा में उत्पन्न याज्ञवल्क्य महर्षि मिथिला में गौतम
आश्रम के समीपवर्ती, जयन्तपुर से अति सन्निहित धनुर्यज्ञ महारण्य में निवास
करते थे।
विश्वामित्र महा महर्षि थे । इनके ३७८ मन्त्र हैं तथा इनके पिता पिता-
मह तथा पुत्र पौत्र परम्परा के आय ४३८ इस तरह कुल मिलाकर ८१६
मंत्र इन विश्वामित्रों के परिगणित हुए हैं ॥ इति ।।
विद्याधर का रास्ता,
प्रद्य म्नशर्मा अोझा ।
जयपुर (राजस्थान)
१-६-६१
Emmy

|| श्रीः ॥ विषय सूची विषयाः पृष्ठाङ्काः १ ५ ६ १० .... .... १-कश्यपः १-अदितिः सूर्यमूला २-अदिति टिमूला ३-अदितिनक्षत्रमूला ४-अदितिराकाशमूला ५-कश्यपोनामान्यो वेदमन्त्रकृन्मनुष्यऋपिः ६-काश्यपी मन्त्रसंहिता २-वसिष्ठः १-श्राश्रमनिरूपणम् २-जन्मनिरूपणम् ३-आश्रम स्थानम् ४-मनुष्यवसिष्ठस्य भीमस्वर्गसंचारित्वम् ५-वसिष्ठोब्रह्मणपुत्रः ११ १३ .... .... १३ १५ १५(क) २१ .... ૨૨ २५ •.. ३१ ३-अगस्त्यः ४-भृगुः अङ्गिराः .. १-सर्वसृष्टिसाधारणोनियमः २-आत्मनोवीयंत्रयम् ३-उक्थं प्रतिष्ठासामेति कारणब्रह्मलक्षणम् ४-ब्रह्मणो व्याकरणम् ५-आत्मनः सत्यरूपेण विश्वव्यापित्वम् ६-उक्थं प्रतिष्ठा सामेति व्यस्तं कार्यब्रह्मलक्षणम्".. ३१ ३१ .... ३२ .... ३२ ३३ (२) विषयाः पृष्ठाङ्काः .... .... .... ४४ ६ ४७ .... ४७ ७-सूर्यचन्द्रपृथिव्यो ब्रह्मजातयः ६३ ८-इच्छातपः श्रमाः सृष्टिहेतवः ६-प्राजापत्यं कुरुक्षेत्रम् १.-प्राणस्य सप्तविभागाः ३६ ११-प्राजापत्यकुरुक्षेत्र अक्षरस्तरोपरि आकाशस्तरः प्राणस्वरश्च ४० १२-पशवः ४३ १३-असंज्ञान्तः संज्ञससंज्ञजीवानां पशुत्वम् १४-अमृतमय॑साम पशूनां प्राणमयवाकत्वम् १५-पशुपु वीर्यनिरुक्तिः ४६ १६-पशूनामास्ततोऽर्धन्द्रत्वम् १७-स्त्रीपुयोगात् पूर्णात्मत्वम् १८-अर्धेन्द्रात्मनि मनुशन्दः १६-मनोवैराजपुरुषत्वम् २०-विराद ४६ २१-पारावतसोमस्य विराडुपरि भक्तित्वम् ५६ २२-इन्द्राग्निसोमाः प्राजापत्यम् २३-इन्द्रस्य मनः प्राणवाङमयत्वम् ६० २४-इन्द्रस्यामृतमर्तस्य देवयोनित्वं भूतभावनत्वं च ६० २५--इन्द्रब्रह्मतो देवसृष्टिः ६१ २६-वेदत्रये सहस्रशब्दः २६---प्रजापतेर्दर्शव्यूहाः २८-प्रजापतेः स्थानानि ५-अत्रिः ८२ कोशिको-विश्वामित्रः १२२ .... .... .... .... ६२ ६२ .... .... ॥ इति ॥

॥ श्रीः ॥ ब्रह्मविज्ञाने दिव्यविभूतेः उपविभागे ★ महर्षि कुलवैभवम् ★ कश्यप (१) कश्यपात् सकलं जगदित्याहुः । तमेतं कश्यपं व्याख्यास्यामः- (6) सूर्यकिरणानां परस्परसंघर्षणादुत्पन्नाः सूर्यकिरणस्थाना आपो मरीचय उच्यन्ते । तत्प्रत्यक्षकर्ता विद्वानपि यशोनाम्ना मरीचिरुच्यते । तस्य मरीचेविदुषःपुत्रः कश्चिद् विद्वानासीत् स कूर्म नामादित्यमपश्यत् । येन रूपेणायमादित्यः सृष्टिं सृजति तद्र पावच्छिन्नोऽयमादित्यप्राणसंघातः कूर्मः प्राणमयः सप्तपुरुपः पुरुपः प्रजापतिः, भातश्च प कूर्मः प्रजापतिः । कश्यप- पश्चाकारो हि तद्र पम् । तद्र पावच्छिन्नस्तु प्राणो लोकत्रयानुविधैतद्दधिधृतमध्यात्म करसत्रयसध्रीचीनो द्यावापृथिव्यः । एषां च रसानां त्रिलोकव्यापिनीष्वप्सु प्रविष्टः सूर्यप्राणविशेषैः समन्वयात् परिपाकाच्च तत्र तत्र लोके प्रत्युत्पत्तिरिति मधुविद्यादिभिरवगम्यते । स एष कूम्र्मो नाम रसत्रयरूपाकारित एवादित्यप्राण: सर्वविधपिण्ड जातानामुत्पत्ति हेतुरुपपद्यते । (३) तथा च वाजिश्रुतौ श्र यते "सोऽयं पुरुएः प्रजापतित्र मव प्रथममसृजत त्रयीमेव विद्याम् । सैवास्मै प्रतिष्ठाऽभवत् तस्यां प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितोऽतप्यत । सोऽपोऽसृजत ।

४ ] * महर्षिकुलवैभवम् * RA कच्छपशब्देन कमठशब्देन वा प्रसिद्ध पशुविशे रुढ़ः । कशामर्हति कश्यः स्कन्धाधस्तलदेशः कच्छ इति प्रसिद्धः । तेन पिवतीति वा कश्यन पादी गोपयन्नात्मानं पातीति वा व्युत्पत्तेः । इत्थं चाकृतिसाधाद् द्यावापृथिव्ये कुम्मे कश्यपशब्दस्य, कश्यपे च तस्मिन् पशी कूर्मशब्दस्य व्यतिपङ्गेन प्रवृत्तिः । अथवा मुख्ययैव वृत्या कश्यपशब्दः कूर्मो वर्तते । अ यते हि- कश्यपः पश्यको भवतीति" वर्णव्यत्यासेन च शब्दसिद्धिं नरुक्ता सन्यन्ते, द्रष्ट-दृश्ययोरन्योन्यसाममण्डलभोगादेव दर्शनसंपत्तेई श्योऽपि द्रप्टार पश्यति साम्येनेति नियमाद् दृष्टिसिद्धस्यास्य द्रष्दृत्वोपपत्या पश्यकत्व- सिद्धिः । यत्तु वैयाकरणा आहुः- पशिरयमादेशो न धातुः । स चापि सार्वधातुकविपयो ना धातुके प्रयोगमह तीति । तत्तुच्छम | व्याकरणस्य सिद्धशब्दप्रतिपत्तावभ्युपायत्वेऽपि शब्दनिर्मापकत्वाभावात् । शब्दपरतन्त्र हि व्याकरणम, न विमे व्याकरणपरतन्त्राः शब्दाः इष्यन्ते । भापाव्यवहारो हि व्याकरणे प्रमाणं भवति । तस्मिंश्च प्रमाणे दृष्टे न दृप्यते, लक्षणं चेत तदकात्यं व्याकरणस्य मन्यामहे । दृश्यते तु पश्यतेर्धातोरार्द्धधातुकेऽपि क्वाचिकः प्रयोगः- असूयं पश्या राजदारा इति । पशुरिति । पश्यक इति । पश्यक सन्तं कश्यप इत्याचक्षते परोक्षेण । स हि दृश्यकपालस्थो नित्यं सर्वाः प्रजाः पश्यतीत्यत एव अ यते- “ अच्छिन्नपत्राः प्रजा अनुवीक्षस्वेति " अथवा दूरस्थत्यापि सतो यदनया प्रजया नित्यं संबन्धस्तनेष्यते दृष्टिव्यवहारः । यथाहि- "श्रादेवो याति भुवनानि पश्यन्"- इति मन्त्रे सूर्य्यस्य द्रष्टुत्वं व्यवह्रियते तद्वत् । तेन दृश्यकपालस्थो द्रष्टा प्राणधनो जायमान प्रजासंबन्धात कश्यप इति सिद्धम ।। %3D (८) नानाजातीयाश्चैते प्राणा भवन्ति । तेष्वयं कश्यपः किं जातीय इत्यत्राह- "यः स कूर्मः असौ स प्रादित्य" इति । यत्य विभक्तयो द्वादशादित्या उच्यन्ते स एप द्वादशानामेकः प्रजापतिः संवत्सरो नाम प्राण एवादित्यः । स सूर्यायतनो विभुः । तत एव संवत्सरादादित्यामादित्या उत्पद्यन्ते दित्यां दैत्याः । ते हैते कश्यपस्य पल्ल्यावुपचयेते सहधम्मित्वात् ।। -

सूर्य:
अदिति
(६) तत्र त
3
.
मूला, नक्षत्रमूला,
सूर्ययोरनवरोधेन संर
ऽवरोधेन संस्थानं दिति
सृर्यज्योतिपि गच्छ
मादित्यत्वं नियम्यते । ए
गच्छतामम्भसामसुरत्वं
सूर्ययोः सांमुख्ये दि
स्तेपामशेषाणां संमि'
मन्त्रश्रुतिः श्र यते-
"अदितिधौरदि
विश्वे देवा अदि
अत्र पिता सूरन
"द्यौः पितः पृ
विश्वेदेवा अदि
इति मन्त्रान्तरे।
इत्थं चैवं विधेपु

* महर्पिकुलवैभवम् । ... सोऽनया त्रय्या विद्यया सहापः प्राविशत् । नत प्राण्डं समवर्तत । ततो ब्रह्मवै प्रथममसृज्य त त्रव्येव विद्या । मुखं ह्य तदग्नेर्यद् ब्रह्म । अथ यो गर्भोऽन्तरासीत् सोऽग्निः । अथ यत्कपालमासीत् सा पृथिव्यभवत् । तां संक्किश्याप्सु प्राविध्यत् । तस्यै य: पराङ रसोऽत्यक्षरत् स कूम्मोऽभवत् " ( ६।१११) (४) अपि च अ यते तत्रैव-- "रसा वै कूर्मः ! यो वै स एपां लोकानाम् अप्सु प्रविद्धानां पराङ रसोऽत्यक्षरत् स एप कूर्मः । यावानु वै रसस्तावानात्मा । स एप इम एच लोकाः । तस्य यदधरं कपालम् अयं स लोकः । तत्प्रतिष्ठितमित्र भवति, प्रतिष्ठित इव ह्ययं लोकः । अथ यदुत्तरं सा द्यौः । तद् व्यवगृहीतान्तमित्र भवति । व्यवगृहीनान्तेव हि द्यौः अथ : यदन्तग तदन्तरिक्षम् । स एष इम एव लोकाः । तमभ्यनक्ति दध्नामधुनावृतेन । दधि हैवास्य लोकस्य रूपम्.घृतमन्तरिक्षस्य, मध्वमुप्य । दधि हैवास्य लोकस्य रसो,घृतमन्तरिक्षम्य,मध्वमुप्य । स यत्कृम्मों नाम । एतद्वैरूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत । यदसृजत अगेनन् । यदकरोन् नस्मात्कुम्मः । कश्यपो वै कृमः । तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः काश्यप्य इति । स यः स कम्मः । असौ स श्रादित्यः । प्राणो वे कृमः । प्राणो कूर्म मधु घृत्तम् दधि कश्ययः पृ. .

* कश्यपः * [ ३ हीमाः सर्वाः प्रजाः करोति । द्यावापृथिव्यो हि कूर्मः । अवका अधस्ताद्भवन्ति,अवका उपरिष्टात् । आपो वा अवकाः" इति ।। १ २ 3 (५) इह हि कश्यपस्य द्यावापृथिवीभ्यामभिसंबन्धो लभ्यते । द्यावा- पृथिवीशब्दस्य च प्रवृत्तिर्यद्यपि दृश्यकपालाण्डकपालायतनसामशुक्रभेदान पञ्चलक्षणरहस्ये व्याख्याता,तथाप्यत्र संभवतो दृश्यकपालानुगते एव ते गृह्य ते । तल्लक्षण च अ यते हविर्यज्ञब्राह्मणे- ( ६ ) तद्वा एप एव वषट्कारो य एष तपति ! स उद्यन्न वाभ- मधिद्रवति । अस्तं यनिमामधिद्रवति । तस्या अमुष्या अयस्ताल्लम- चन्द्रमा नक्षत्राणि सूर्यः । अथोपरिष्टाल्लक्षणा पृथ्वी । तस्या अस्या उपरिष्टाल्लक्ष्म अोपधयो वनस्पतय आपोऽग्निरिमाः प्रजाः" इति । (७) अयमत्राभिसन्धिः । क्वचित् प्रान्तरे निरावरणप्रदेशेऽवस्थाय द्रष्टुः सर्वतः समतलमण्डलात्मकाधःकपालरूपया पृथिव्या संलग्नावनत- प्रान्तोन्नतमध्यो–कपाला नीलवर्णा हीयं द्यौई श्यते । तथा च विसहशकपाल- द्वयात्मिका सेयमुभयी द्यावापृथिवी सर्वस्य॑तस्य दृश्यप्रपञ्चस्यावपनभूता भवति । तयोरुधिरकपालयोरन्तरतो यदावपनं तदन्तरिक्षम् । तथा चैतत् कपालद्वयाव- च्छिन्न यदन्तरिक्ष तवच्छिन्नो यः प्राणघनः स कूर्म इत्याह "द्यावापृथिव्यो हि कूर्म" इति । तद् द्रष्टुः स्थित्युपलक्षितभूमिबिन्दुस्तद् दृश्यान्तरिक्षा- वच्छिन्नस्य कूर्मप्राणस्य साक्षी भवति । तद्विन्दुसाक्षिकः कूर्मस्तद्विन्दूपलब्ध जन्मनः प्राणिनो जन्मदाताऽवसीयते । यावदेव हि द्रष्टा दृश्यतेऽन्तरिक्ष तदवच्छिन्नः प्राणघन एव तत्र जन्मोपधायकबिन्दौ संनिधत्ते । तदेशे जायमान- स्तावतैव प्राणघनेन कृतात्मा भवतीत्यतस्तस्य प्राणघनस्य कर्तृत्वात कूर्मशब्देन व्यपदेशः। कश्यपाकृतिश्च स नित्यं दृश्यते । तस्मादसौ लक्षणया कश्यप- शब्देनापि व्यपदिश्यते । यद्वा यथाकृतिः कश्यपस्तथाकृत्या संनिविष्ठः प्राणः कश्यपो वेदितव्य इत्युक्तं भवति । एष च कश्यपशब्दःवषट्कारः स्वरूप- समर्पकः ।

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* कश्यपः *
[६
अदितिदृष्टि मूला।
अदितिः
दितिः
(१०) अथ द्रष्टस्थित्युपलक्षितभूमण्डलोपलक्षितामेके तामदितिमाहुः ।
तेपां मते सर्वत्रैवाण्डकपालस्यार्द्धस्य दृश्यत्वमदितिरद्धस्य चान्यस्याश्यत्वं
दितिः । तेनैतस्याः क्रमेण प्राचीमनुसरन्त्या रात्रावपि सत्तोपपद्यते । उक्तरीत्या
सूर्यानित्यायाः स्थिरादित्या अभ्युपगमे तु --
"अष्टौ पुत्रासो अदितेर्ये जातास्तन्वस्परि ।
देवाँ उपप्रैत् सप्तभिः परा मार्तण्डमास्थत् " (
सप्तभिः पुत्रैरदितिरुपप्रैत् पूर्व्य युगम् ।
प्रजायै मृत्यवे त्वत् पुनर्माताण्डमाभरत्" (
इति मन्त्रद्वयोक्तयोः सूयंत्यागपुनराहरणयोरसंभवापत्तेः । तथा चैतस्या
अदित्याः सर्वा पृथिवीं, सर्वा दिवं, सर्व चान्तरिक्षं संसर्पन्त्याः सर्वात्मकत्वं
संपद्यते । तथा च श्र यते
)
अदितिधौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।
विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्" इति ।
"इयं वै पृथिव्यदितिः" (
इति च ॥ २॥

أليسا
* महर्पिकुलवैभवम् *
अदितिर्नक्षत्रमूला।
अदितिः
स्वाती
a
MPSC
दितिः
अ यते
-
(११) अथान्ये पुनरेकस्मिन् संवत्सरे.सूर्येण त्रयोदशकृत्वश्चन्द्रमण्डल-
संयोगात्तसंयोगबिन्दुविभक्तासु त्रयोदशसु चन्द्रकक्षाखण्डरूपासु दाक्षायणीपु
कश्यपस्त्रीत्वेनाध्यवसितासु नित्यामेव कांचिदचलामदितिमाचक्षते । तदायतनं
" देवस्य त्या सवितुः प्रसवेऽश्विनो हुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् ।
प्राददे नाय्यस"
इति स्वातीतारकोदये रेवत्यामस्तंगतायामनातंगतायां
चाश्विनीतारकायां यः खस्वस्तिकविन्दुश्चन्द्रमार्गस्थः सा हीयमदितिर्नाम ।
तेन पुनर्वसुनक्षत्रस्य तृतीयचरणमदित्याः स्थानं सुप्रतिपन्न भवति तस्यैव
तदानी खस्वस्तिक भूतत्वात् । तद्वै परीत्येन च निवृत्तारासन्नविन्दोदितित्व-
मास्थेयम् तस्यैव तदानीमधःस्वस्तिकत्वात् । अन्याश्चैवमेकादशमिता
दक्षसंज्ञकचन्द्रमार्गविभक्तयः कश्यपस्य सहयोगिन्यः कल्प्यन्ते,
तदन्यत्र
निरूपितम् ॥ ३॥

* कश्यपः* अदितिराकाशमूला। - (१२) अथवा अश्विनीमारभ्य चित्रान्तमाकाशमण्डलं दैवसंपत्या- ऽन्वितम् । अत्र हि मध्यस्थाया अदित्याः सप्त पुत्रा आदित्या नामोपपद्यन्ते । तेषामदितिपर्यन्त उद्ग्राभः । ततः पश्चान्निग्राभः । उद्ग्राभे यज्ञाः प्रवर्तन्ते । अदितिमध्य हीदमाकाशमण्डलमुपलक्षणया अदितिर्विवक्ष्यते । तद्वयतिरिक्त तु स्वात्यारब्धरेवत्यन्तमाकाशाद्ध दित्युपलक्षितमासुरसंपत्यान्वितं दितिर्विवक्ष्यते एताभ्यामेव द्वाभ्यां पत्नीभ्यां दित्यदितिभ्यां संयुज्यमानः स सूर्यसंवत्सरो नाम सर्वेषां जनयिता प्राणो यया संस्थया सर्वमिदं यथायथं जनयति ताशसंस्था- वच्छिन्नः कश्यप इत्युच्यते-इति सिद्धम् । (१३) स एष कश्यपः प्राणो नान्तरेण भूतसंबन्धमनाश्रितः क्वचिदवतिष्ठते इत्यत आह- "अवका अधस्ताद् भवन्त्यवका उपरिष्टादिति" । अप्सु ह्यष कश्यपः प्रचरति तस्यावस्तादुपरिष्टाचापोभवन्ति । एवमयं प्राणो नित्य- मद्भिः सम्पद्यमानः प्रचरति । ताश्चैता आपश्चतुर्विधा ऐतरेयके श्र यन्ते- "अम्भो मरीचयो मर आप"इति । "अदोऽम्भः परेणदिवं, द्यौः प्रतिष्ठा ॥२॥ अन्तरिक्षं मरीचयः ॥२॥ पृथिवी मरः ॥३॥ या अधस्तात् ता आप:" ॥४॥ इति । तत्रैप कश्यपो मरीचिभिः क्लृप्तशरीरो भवति । अत एवैनं मरीचिसुतं मारीचमाहुः पौराणिकाः। मरीचयश्चैताः सवित्राकृष्ठाः सूर्य- रश्मिस्था आपः। ''सूर्यो मरीचिमादत्ते सर्वस्माद् भुवनादधि" एता वा प्रापः स्वराजो यन्मरीचयः" । इत्यादि श्रुतेः । . ताश्चैता मरीचयो लोकेभ्यस्त्रिभ्यः समाकृष्टैर्दधि - घृत- मधुभिः संश्लिष्य रसमय्यः संपद्यन्ते । या अधस्तादपां ता घनीभूतत्वाद् द्धिमय्यः । मध्ये च द्रवाः स्निग्धा घृतमय्यः । अथ या उपरिष्ठात्ताविरला- ६ ] * कश्यपः * •. वयवाः स्वादिष्टाः मधुमय्यः । एतानेव रसाननवरतं सिञ्चन्नसो भगवान् कश्यपात्मा प्राणः । सर्वमिदं चराचरमेतैरेव दधि-घृत-मधुभी रसैः कृतशरीरं जनयति । सर्वेषामेव प्राणिनां शरीराणि दध्ना घृतेन मधुना चोत्पद्यन्ते, कठिन प्राय वप्रायः पवनप्रायैश्चाङ्गः संपन्नत्वान्, मांसेन श्लेपणीय वसारसेन शर्कराभिः स्पष्ठमुपपन्नत्वाच । पुनश्चैतानुपाहरन्नात्मसात् कुर्वन् स एतत्रिरसमय- मेव सर्वदा रूपं धत्ते । तदाह- "यावानु वै रसस्तावानात्मा” इति । स यात्रदस्मिन् दधिरसस्तावानयं लोकः, यावद् घृतरसस्तावदन्तरिक्षम् । यावद्वा तस्मिन् मधुरसस्तावानसौ लोकः । तदाह-"स एए इम एव लोकाः" इति । अत एव त्रयो रसा अभ्यः शरीर निर्माण साधन द्रव्यम । तैरेव रसैः कृतशरीरः सर्वः शरीरेण संयुज्योत्पद्यते इत्यत आह- सर्वाः प्रजाः काश्यप्य" इति । कश्यपेनोत्पादिते वसिष्ठादिभिर्विशेषा आधीयन्ते । स एष कश्यपो जनकः सर्वेपां देवमनुष्याणां तिरश्चां च भूतानाम् । तदित्थमयं सर्वजनको रमत्रयात्मा मारीचोऽर्द्ध मण्डलाकारः संवत्सर प्राणघनः कश्यप इति निष्कर्षः । तमेतं कर्म कश्पयं पश्यन ऋपिरभ्यनवाच- "अपां गम्भन्त्सीद, मा त्वा सूर्योऽभि ताप्सीन्माग्निर्वैश्वानरः । अच्छिन्नपत्राः प्रजा अनुवीक्षस्व,अनुत्वा दिव्या वृष्टिः सचताम्" ।। 'त्रीन् समुद्रान् समसृपत् स्वर्गानपां पति पभ इष्टकानाम् । पुरीपं वसानः सुकृतस्य लोके तत्र गच्छ यत्र पूर्वे परे ताः" ॥२॥ "एतद्धयपां गम्भिष्टं यत्रेप एतत्तपति । इमा वे सर्वाः प्रजास्ता- अरिष्टा अनार्ता अनुवीक्षस्व ! इमे वै त्रयः समुद्राः स्वर्गालोकाः । तानेप कृम्मों भृत्वाऽनुसंससर्प । पशवो वै पुरीपम् । पशून बसानः"- इति हि तद् ब्राह्मणं भवति एप खलु कश्यपप्राणः पश्यकोऽस्तीति रसत्रय- श्याऽनवरतं सर्वाः प्रजा अनुवीक्षते । इत्येकमस्य व्रतं भवति ॥१॥ अपिच “यथा सुदीप्तात् पावकाद् विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ति सरूपाः । तथाऽक्षराद् विविधाः सौम्यभावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति"।।

* महर्षिकुलवेभवम् [ १० इति श्रुतेरपरिमितादक्षरतो योगमायापरिमितोऽक्षरभावः प्रजायते । स वाङमयः । मनोमयप्राणगर्भितायां वाचोविश्वव्यापित्वाइतरूपत्वेपि योगमाया- वच्छेदात् सत्यरूपेणोत्पत्तौ तद्ध दये ब्रह्मप्रजापतेः प्राणेस्य संघर्षाद् वाचो- विकारेणापामुत्पत्तिः । तासां पुनरन्तरान्तरतो घनीभावक्रमेण त्रयः समुद्राः समपद्यन्त आपो वायुः सोम इति । एप च सोमो घनीभूतप्राणसंघर्षण प्रज्वलन्नपां हृदयेऽग्निः प्रादुर्भवति सोऽग्निसाहस्री सूर्यो भवति । तस्यैतस्य सूर्यस्य पटपर्वा संस्था समपद्यत । सर्वान्तरतो हिरण्मयप्राणघनो विम्बः । तद्वहिः परितो ज्योतिःसंस्था । तद्वहिः परितः सोमेन वायुना अद्भिश्चोपपन्ना समुद्रत्रयसंस्था । तवहिर्वाचःसंस्थेति । तत्रैतास्त्रीन् समुद्रानेष कश्यपप्राणो- ऽनुस ससर्प । इतिद्वितीयमस्य व्रतंभवति ।। २ ॥ अथ सूर्यादिप्राणमलभूतैः पशुभिरयं पर्यावृतो भवतीति तृतीयमस्यं व्रतं भवति ।। ३ ॥ स इत्थमय कूर्मप्राणोऽन्तरिक्षद्यवि सूर्यद्यवि सोमद्यवि च संनिविष्टो व्याख्यातः। अपिच-कश्यपस्य स्वर्विदो यावाहु : स युजाविति । ययोविश्वमपि व्रतं यज्ञं धीरा निचाय्य" इति मन्त्रवर्णः श्रूयते । तत्र द्यावा पृथिव्योर्वा मित्रावरुणयोर्वा सयुक्त्वं द्रष्टव्यम् । ज्योतिर्विदां समये तूत्तरा स्वर्गमण्डले भवत्येका काश्यपतारा द्वाभ्यां ताराभ्यां संयुक्ता । “अग्निः पुच्छस्य प्रथमं काण्ड तत इन्द्रस्ततः प्रजापतिरभयं चतुर्थम्" इति श्रुताबपि कश्यपस्यैव प्रजापति- शब्देनाभिधानमिति दिक् । कश्यपो नामान्यो वेदमन्त्रकृन्मनुष्य ऋषिः ! (१४) तदित्थमेतत्कश्यपप्राण द्रष्टरि कस्मिंश्चिद्विदुपि कश्यपशब्दो भत्या प्रयुज्यते । दिदमेतस्य विदुषः कश्यपप्राणद्रष्टत्व निबन्धनं यशोनामा वगन्तव्यम् । स चायं मनुष्यविधः कश्यपो महर्षिः स्वर्गलोकस्थ एवासीत । "कश्यपस्य स्वर्विदो या बाहुः सयुजावितीति" मन्त्रश्रुत्या तथावगते ।

११ ] * महर्पिकुलवैभवम् अ - स्वर्गप्रदेश च तस्याश्रमो ब्रह्मपरिपत्रस्थानं वा कुत्रासीदिति विशिष्य न श्र यते । पौराणिकास्तु- पामीरनाम्नः प्रागमेरोः पूर्वेण विकङ्कमणिशैलयोः पर्वतयो- रन्तरद्रोण्यां चम्पकवनं प्रागासीत् । तत्रैतस्य कश्यपस्य प्रजापतेराश्रमो ब्रह्मपरिपद्वा बभूवेत्याहुः । तथा च वायुपुराणम् - "विकङ्कस्याचलेन्द्रस्य मणिशैलस्य चान्तरे। विपुलं चम्पकवनं सिद्धचारण सेवितम् ।।१।। तत्राश्रमं भगवतः कश्यपस्य प्रजापतेः । सिद्ध साध्यगणाकीर्ण नानाति विभूषितम्"।।२।। इति (पु.अ.३७) काश्यपी मन्त्रसंहिता। रिन्द्रच तुपाव । (१५) तत्र निवसता भगवता कश्यपेन प्रणीतैका मन्त्रसंहिता दृश्यते । तस्यां च कश्यपसंहितायां कश्यप एकः, कश्यपपुत्रा अष्ट्रौ, योपितो द्रु इत्येवमेकादशर्पयो भवन्ति । तत्र तावदयं कश्यपो मारीचः एकोत्तरर्चेन सूक्तसहस्रण वा त्रिष्टुभैकया वा जातवेदसनामाग्निं ततोऽपरैर्बहुभिः सूक्त. दृ चाद्या सहस्रर्चान्तं सूक्त नानाविधं भवेत् । नव नवतिः पञ्चल क्षा ऋचः स्युः स चतुः शतम्” । जातवेदस्यं सूक्तसहस्रमके ऐन्द्रात्पूर्व कश्यपापं बदन्ति । जातवेदसे सूक्तमाद्यन्तु तेपामेभ्यस्त्वं मन्यते शाकपूणिः" । इति वृहद बतायां शौनकोक्तं :(५००४६८) दशभिविश्वान्देवान एकपञ्चाशता पवमानं तुष्टावति द्वापष्ट्रिमन्त्रंकश्यपार्प प्रथम पर्व ।। ६२ ॥ श्रथासितदेवली काश्यपावेकादशभिराप्रियमग्निं, द्वापञ्चाशेन शतेन पत्रमानं नुष्टुवुतुः । त्रिपश्यधिकशतमसितदेवलार्पम् ॥ १६३ ॥ अवन्सारः काश्ययः पञ्चदशभिर्विश्वान्देवान्, । द्वात्रिंशता पवमानमिति सप्रचत्वारिंशता वत्सारार्पम् ॥ ४७ || नित्रु विस्त्रिंशता पवमानं रेभः पञ्च- गुन्दशभिरिन्द्र, रेभ काश्यपी · सनदशभिः परमानं, विवृहापभिर्यक्ष्मघ्नं * कश्यपः * [ १२ भूतांश एकादशभिःरश्विनौ, हे शिखण्डिन्यौ, काश्यप्यावप्सरसौ षड्भिः पवमानं तुष्टावेति (८५) पञ्चनवत्यधिकशतद्वयेनोत्तर कश्यपा द्वितीयंपर्व ।। २६५ ।। तदित्थं सप्तपञ्चाशानित्रीणि शतानि काश्यपी संहिता पूर्णा । (३५७) • (१६ ) स एप वेदग्रन्थः स्वर्यः स्वर्गागतो द्रष्टव्यः । तन्निर्मातुः कश्यपस्य महः स्वर्गनिवासित्वाद्, अत्रवर्णनीयानां मनुष्यदेवानां भौमस्वर्ग-- वामित्वात्, प्राणदेवानां सूर्यस्वर्गवासित्याच्च । यद्यपि कश्यपस्यारिष्टनेमिरिति नामान्तरं पौराणिकै स्मय॑ते किन्तु कश्यपाऽरिष्टनेमिरित्येतौ पर्यायवाचिनौ ना अरिएनेमेयंहच्छाशब्दत्वात् । कश्यपशव्दस्तु गोत्रनिबन्धनो जातिशब्दः । बायोदशकश्यपावभूवुः तेपामेकः कश्चित् अरिष्टनेमिःस्यात् । प्रकृते तु नायमरिष्टनेमिकश्यपः पष्टिमितासु दक्षकन्यासु त्रयोदशानां कश्यपाय, चतसृणांत्वरिष्टनेमिने पार्थक्येनप्रदानाख्यानात् । तस्यादयमज्ञातनामाकश्चित् क्श्यपो ध्येयः ।।इति।। स्थेयो । सोऽयमैतिहासिको वैज्ञानिकश्च द्विविधोऽपिकश्यपो व्याख्यातः ।। ।। इति कश्यपः ।।

१५ ] * महर्षिकुलवैभवम् * अनेन सरस्वतीनद्याः उभयपार्श्वयोः संनिविष्ठा काचिदयःप्राकारोपता सरस्वतीनाम्नी नगरी लक्ष्यते । तन्नगर्या मध्यतो रथ्येवेय सरस्वती प्रवहतिस्म । तत्कूलोपाश्रये च वसिष्ठस्य गृहं तत्रासात् । स च वसिष्ठस्तत्रासन्न प्रतिष्ठान- पुरनिवसतो नाहुपस्य महाराजस्याय पुरोधा यज्ञकर्तासीत् । अत एव स नहुपं वाल्ये प्रतिपालयन् नाहुपराजत्वकालपर्य्यन्तं जीवित आसीन् । तेनैवेयं मन्त्र- संहिता प्रणीतेत्यतो नाहुपकाल एवास्य बसिष्ठस्य जीवनकाल इत्येतदर्थजातं विज्ञातं भवति । अधिकं चात्र भारतख्यातौ द्रव्यम् ॥ ४ ॥ जन्म-निरूपणम् । एष चादिवसिष्ठः कस्य पुत्र प्रासीदिति नावधार्यते । यत्वयमादिब्रह्मणः पुत्र श्रासीदिति पौराणिका आहुः । तन्न । ब्रह्मणो मानसपुत्रत्वेन वसिष्ठ- स्मरणात् । तावता औरस पुत्रत्वाप्रतिपत्त: । अन्यौरसानामेव हि ब्रह्मणा पुत्रत्वेन प्रतिगृहीतानां मनसा पुत्रत्वेन भावितानां मानस पुत्रत्वमिष्यते । तस्मादस्य ब्रह्मगृहीतमानसपुत्रत्वे स्थितेऽपि ब्रह्मौरसपुत्रत्वं नाध्यवसातु शक्यम् । ब्रह्मौरसपुत्रत्वेनाथौंकारादिवदस्य वसिष्ठस्य विशिष्याश्र यमाणत्वान् । परे तु वसिष्टमत्स्यागम्त्यानां मित्रावरुणाभ्यां देवाभ्यां गन्धविण्यामुवश्या- मुत्पादितत्वान् मैत्रावरुणित्वं वेश्यापुत्रत्वं चा चक्षते । तथाहि- “विद्य तो ज्योतिः परि संजिहानं मित्रावरुणा यदपश्यतां त्वा । तत्ते जन्मोतेकं वसिष्ठागस्त्यो यत् त्वा विश आजभार ॥" (ऋ. ७/३३/१० मोह जाता विपिता नमोभिः कुम्मेः रेतः सिपिचतुः समानम् । ततो ह मान उदियाय मध्यात् ततो जातमृपिमाहुर्वसिष्टम् ।। (ऋ. ७/३३/१३) इतिश्रवणान विद्यु ज्योतिः परित्यजन्तं वसिष्टं यदागस्त्यः स्वसंनिवेशायाजहार तदा- ऽगस्त्येन सहवायं प्रजापतिपुत्रो वसिष्ठः पूर्वशरीरं परित्यज्योर्वश्यां जज्ञ,

* वसिष्ठः *
[ १५क
-
आश्रमनिरूपणम् ।
अनेन सरस्वतीनद्याः उभयपार्श्वयोः
संनिविप्ना काचिदयः प्राकारोपेता सरस्वती
नाम्नी नगरीलक्ष्यते । तन्नगा मध्यतो रथ्ये
वेयं सरम्बती प्रबहतिस्म । तत्कूलोपाश्रये
वसिष्ठस्य गृहं तत्रासीत् ।
च
आश्रम :-
uuuuup
घरूपाम्
अत्र सूर्य सदन
विज्ञान भवन भिडल्य
838253
5c
८

अखिष्टः , नाम-निरूपणम् । (१) वसिष्ठ इति ऊर्जाशक्तिमति प्राणविशेपे रूढः शब्दस्तत्प्राण- द्रष्टरि पुरुषविशेषे तद्वशधरे च भक्त्या प्रयुज्यते । तस्येदं यशोनाम विद्यात् । वसिष्ठप्राणद्रष्टुत्वयशसैव तत्र वसिष्ठशब्दस्य लोके प्रसिद्ध: । तद्वशधरे तु व्यक्तिमात्रे योनिसंबन्धाद् वासिष्ठशब्दो गुणसम्बन्धाद् वसिष्ठशब्दश्च प्रवर्तते । वसिष्टेति यशोनाम्ना चिरप्रख्यातेरस्यादिवसिष्टस्य वैधं मातापितृकृतं यादृच्छिकं नाम न क्वापि स्मर्यते इति व्यवहाराभावाच्चिरेण विलुप्तमेवाभूत् । यत्तु प्रापत्र " इति वा " आप्सव " इति वास्य प्राचीनं नामान्तरं स्मयते,तदप्यान्तरिक्षस्य तारारूपस्यैव नाम स्यात् । तस्याप्सुत्पत्तेरद्भिर्गुण. विशेषसंबन्धाच, न त्वस्य मनुष्यविधस्य ताशं नाम सम्भाव्यते इति वोध्यम ।। आश्रम-निरूपणम् । (२) एष च वेदमन्त्रद्रष्टा महर्पिर्वसिष्ठः पुरा कुन देशे निवसितस्मेति चिन्त्यते । तत्रास्य वसिष्ठस्य व त्यानि नौ सख्या बभूवुः स चावहे यदवृकं पुरा चित् । बृहन्तं मानं वरुण स्वधावः सहस्रद्वारं जगमा गृहं ते ।। (ऋ. ७/८८/५) इत्यादि अ ते:-वरुणदेवेन सह सख्यसंस्त्रवाधिक्यश्रवणात वगस्थितोऽयं स्यादिति केचित् । तन्न, मनुष्यलोकस्थस्याप्यस्य स्वर्गे गमनागमनयोगाद् वरुणेन संस्रव- संभवात् । “प्र मे पन्था देवयाना अदृश्रन्” इति वसिष्ठोक्क्या वसिष्ठ- हमानां देवयानानां दूरदेशान्तरस्थत्वप्रतिपत्या वसिष्टस्य स्वर्गेतरदेशस्थ त्वावगमाच॥ १॥ भारतवर्षे पुष्करतीर्थसंनिधावर्बुदाचले तदाश्रम श्रासीद् इति परे ।

* वसिष्ठः * [ १४ तदपि नातीव युक्तम् । वसिष्ठवंश्येष्वपि वसिष्ठशब्दप्रयोगादुत्तरकालिकस्य कस्यचिद्वसिष्टस्य तत्राव॑दाचले तपःस्थानत्वसंभवेऽपि वेदमन्त्रद्रा रादिवसिष्ठस्य तत्राश्रमे प्रमाणाभावात् । यद्ययमबुंदगिरावभविष्यत् तर्हि ध्रुवमयसबुंदमपि मन्त्रे न्यरूपयिष्यत ॥२॥ परे तु पुरूरवःपौत्रस्यायुपुत्रस्य नहुपस्य सिन्धुनदात् पश्चिमप्रान्ते पञ्चगौर- प्रदेशीये प्रतिष्ठानपुरे जन्मवतोऽतिसंनिहिते वसिष्ठाश्रमे शैशवकालीन परिचर्य्यालालनपालनादिस्मरणात सिन्धुनदपश्चिमे आर्यायणदेशे क्वचिदस्य निवास आसीन । अत एव बाह्नीकनगराधिष्ठात्रा राज्ञा वरुणेनास्य संस्रवोऽप्यव- कल्पत इत्याहुः । यत्तु प्रयागसंनिधौ प्रतिष्ठानपुरमासीदिति बहवः प्रतिपद्यन्ते तद् भ्रान्तमिति भारतख्याती सुविशदं निरूपितम् ।। ३ ।। ॥ वस्तुतस्तु सिन्धुनदादतिसंनिहिते पूर्वभागे सरस्वतीनद्याः कूले सूर्यमन्दिरप्रतिष्ठापकस्यास्य मन्त्रद्रष्टुर्वसिष्ठस्य निवास आसीदिति सप्तममण्डलस्य पञ्चनवतितमसूक्तादवगम्यते । (७ म ६५ सू.) ७ ६ ५ 3 ४ ४ १ प्रेक्षोदसा धायसा सस एपा सरस्वती धरुण मायसी पूः । १६ ११ १२ १3 ह १० प्र वावधाना रथ्येव याति विश्वा अपो महिना सिन्धुरन्याः ।।१।। 3 ६ एकाऽचेतत् सरस्वती नदीनां शुचिर्यती गिरिभ्य अासमुद्रात् । रायश्चतन्ती भुवनस्य भूरेघृतं पयो दुदुहे. नाहुपाय ॥ २ ॥ १3 १४ १५ १६ २ 3 ८ ។ * इमा जुह्वाना युष्मदा नमोभिः प्रतिस्तोमं सरस्वति जुपस्व । ११ १२ 13 १८ १८ १५ १६ तव शर्मन् प्रियतमे दधाना उपस्थेयाम शरणं न वृक्षम् ॥५॥ * इमा हवीपीन्यर्थः । जुबानाः वयमितिशेपः । श्रा उपसर्गश्रु तेर्योग्य- क्रियाध्याहारः । आददीमहीत्यर्थः धनानीति शेपः ।

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* वसिष्ठः * لا १६ - द ४ ६ उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठोश्या ब्रह्मन् मनसोऽधिजातः । १५ १३ १७ द्रप्सं स्कन्न ब्रह्मणा देव्येन विश्व देवाः पुष्करे त्वाऽददन्त (ऋ७/३२/११) अप्पसरसः परिजज्ञे वसिष्ठः । " ( ऋ/७/३३/१२) इति मन्त्रश्रवणादादिब्रह्मणो जन्मन्थाने पुष्करे दैव्येन ब्रह्मणा संपन्नस्यो- वैश्यां स्कन्नस्य मित्र,वरुणोभयरेतोद्रप्सस्योत्पन्न पुरुपं वसिष्ठत्वेन सर्वे देवा अगृहन्निति स्वयं वसिष्ठेन रसिप्ठपुत्रेण वेन्द्रण वोक्तत्वात् तथावगच्छन्ति । स्मरन्ति व शौनकादयः - "तयोरादित्ययोः सत्रे दृष्ट्वाऽप्सरसमुर्वशीम् । रेतश्चस्कन्द तत्कुम्भे न्यपतद्वासतीवरे ॥१॥ तेनैव तु मुहर्तेन वीर्यवन्तो तपस्विनौ । अगस्त्यश्च वसिष्ठश्च तत्री संवभूवतुः ॥ २ ॥ बहुधा पतितं रेतः कलशे च जले स्थले ! स्थले वसिष्ठम्तु मुनिः संभृत ऋपिसत्तमः ॥ ३ ॥ कुम्भे त्वगस्त्यः संभृतो जले मत्स्यो महायु तिः । उदियाय ततोऽगस्त्यः शम्यामात्रो महातपाः ॥ ४ ॥ मानेन संमितो यस्मात्तस्मान्माल्य इहोच्यते । यद्वा कुम्भाषिर्जातः कुम्भेनापि हि मीयते ॥ ५ ॥ कुम्भ इत्यभिधानं च परिमाणं च लभ्यते । ततोऽप्सु गृह्यमाणासु वसिष्ठः पुष्करे स्थितः । सर्वतः पुष्करे तं हि विश्वेदेवा अधारयन् ।। ६ ।।" इति ।: .

१७ ]
* महर्पिकुलवैभवम्
तस्मादमोघवीर्ययो मित्रावरुणयो देवयोरादित्यसत्रे समागतयोर्वशी प्रति
दृष्टिपातात् सहैव रेतः स्कन्दनात् तस्य च रेतसो यज्ञियकुम्भे वासतीवरे
त्रेधा निपतनात् त्रयस्ते पुरुषाअजायन्तेति मैत्रावरुणित्वमेपामुपपद्यते ।
उर्वश्याश्च कामासक्तायास्तत्र रेतसि मनोयोगादेपामुवंशीपुत्रत्वमित्याहुः ।
तदेतदप्य वैज्ञानिकम् । चतुष्टयी तावदस्यर्पि शब्दस्य प्रवृत्तिः असल्लक्षण रोचना
१
२
3
८
लक्षणा द्रष्टुत्वलक्षणा वक्तृत्वलक्षणाचेति ।
१- असल्लक्षणं तावत प्राणानामृपित्वमाहुः-
असद्वा इदमग्र आसीत् किं तदसदासीदिति ।
ऋपयो वा व तेऽग्रेऽसदासीत् । के ते ऋषयः इति प्राणा वा
ऋपयः" इति श्रुतेः ।
“ साकं जानां सप्तथमाहुरेकजं पडिद् यमा ऋपयो देवजा इति ।
तेपा मिष्टानी विहितानि धामशः स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः।।"
(ऋ १/१६४/१५) इतिमन्त्रवणाच ।।
प्राणो वै वसिष्ठ ऋपिः, यद्वै नु श्रेष्ठस्तेन वसिष्ठः ।
अथो यद्वस्तृतमो वसति तेनो एव वसिष्ठः ।। १ ।।
मनो वे भरद्वाज ऋपिः अन्नं वाजः । यो वै मनो विभर्ति सोऽन्न
वाजं भरति । तस्मान्मनोभरद्वाज ऋषिः ।। २ ।।
चक्षुबैजमदग्नि ऋपिः । यदनेनजगत्पश्यति अथो मनुते तस्याञ्चक्षु
जमदग्नि ऋपिः ।। ३॥
श्रोत्रं वैविश्वामित्र ऋपिः । यदेनेन सर्वतः शृणोति, अथो यदस्मै
सर्वतो मित्रं भवति तस्माच्छोत्रं विश्वामित्रऋपिः ।। ४ ।।
वाग् वै विश्वकर्मऋषिः । बाचा हीदं सर्व कृतं तस्माद्वान् विश्वकर्म
ऋषिः । इत्यादिचयनश्रवणाच ।

* वसिष्ठः * [ १८ २- अपिच रोचना लक्षणं ताराणामृपित्वमाहुः । तथा च श्र यते- " सप्तपीनु ह स्म वै पुरा इत्याचक्षते । अमी ह्य त्तरा हि सप्तर्पय उद्यन्ति" इति । यत्रा सप्त ऋपीन् पर एकमाहुः, इत्यादि । अत्रोत्तरस्यां दिशि व्योम्नि ध्रुवतारासंनिधाने दृश्यमानानां स्थूलानां सप्तताराणामेव मरीच्यादिसप्तर्पित्वेन विवक्षा दृश्यते । तत्र चत्वारश्चतुरस्रक्षेत्र कोणस्थाः, ततोऽन्ये त्रयः पूर्वतो निविष्ठाः । तेपु त्रिषु यः सर्वतः प्राच्यां दृश्यते स मरीचिः यः पश्चिमश्चतुरस्रसंनिहितः सोऽङ्गिराः । तयोर्मध्यगतो वसिष्ठो- ऽरुन्धतीसहितः, चतुरस्र पुत्व ङ्गिरसः संनिधा वत्रिः । ततोऽन्ये पुलस्त्य-पुलह- क्रतवः इति पौराणिका आहुः । तदनुसारेण ज्योतिर्विदोऽप्याहुः । यथा बृहत्संहितायाम्- पूर्व भागे भगवान् मरीचिरपरे स्थितो वसिष्ठोऽस्मात् । तस्याङ्गिरास्ततोऽत्रिस्तस्यासन्नः पुलस्त्यश्च ।। १ ।। पुलहः क्रतुरिति भगवानासन्नानुक्रमेण पूर्वाद्याः । तत्र वसिष्ठ मुनिवरमुपाश्रिताऽरुन्धती साध्वी ।। २ ।। (अ. १३) एवमन्येऽप्युत्तरत्यां दिशि मार्कण्डेयकश्यपादयो मध्याक.शे वृहस्पति मत्स्यादयोऽवाच्यामगस्त्यादयस्ताराविशेपा ऋषित्वेनेष्यन्ते । ३- अपिच द्रष्तृत्वलक्षणं मन्त्रकृतां मन्त्रविदां मन्त्रपतीनामनूचानानां मनुष्याणामृपित्वमाहुः । यामृपयो मन्त्रकृतो मनीषिण अनौच्छन् देवास्तपसा श्रमेण । तां देवीं वाचं हविषा यजामहे सा नो दधातु सुकृतस्य लोके । इति । नमोऋषिभ्यो मन्त्रकृयो मन्त्रपतिभ्यः । इति । .

१६ ] * महर्षिलवैभवम् * मा मामृपयो मन्त्रकृतो मन्त्रविदः प्रादुर्दैवीं वाचम् " इत्यादि श्रवणात । अजान्ह “यो चै ज्ञातोऽनूचानः स ऋपिः" इति शतपथब्राह्मणश्रवणाच । "ऋपयो मन्त्रद्रष्टारः साक्षात्कृतधर्माण ऋषयो बभूवुः । तेऽसाक्षान्कृत- धर्मभ्य उपदेशेन मन्त्रान् संप्रादुः" इति निरुक्तस्मरणाच्च । " पृश्नींस्तपस्यमानान् ब्रह्म स्वयम्भु अभ्यानपत् । तदृषीणामृपित्वमिति" यज्ञेन वाचः यदवीयमायंस्तामन्यविन्दनृषिषु प्रविष्टाम् ।" इति । तद्वा ऋपयः प्रतिबुवुधिरे य उ तहि ऋपय प्रासुः” इति । अग्निः पूर्वमि ऋपिभिरीड्यो नूतनैरुत । स देवाँ एह वक्षति" इत्यादि श्रु तिनिदर्शनेपु प्रयुक्त ऋपिशब्दः साक्षात्कृतधर्मसु प्राणानां विद्वत्सु मनुष्यविशेपेवेव प्रवर्तते ॥३॥ ។ २ ८ ५ ४- अपि चान्यन्मान्त्रवर्णिकमृपित्वं वाक्यसापेक्षम। यस्य वाक्यम् स ऋषिः, या वाक्यनोच्यते सा देवतेति परिभापितत्वान् । मन्त्रो हि वाक्यं, वाक्यसमुदायो वा। स येनायं मन्त्रोऽयं दृष्ट्वोपदिष्टः सोऽस्य मन्त्रस्य ऋपिरुच्यते । ऋपिभिरेवैते मन्त्राः पुरोपदिष्टाः । तस्मान् पारोवठविदोऽमी ऋपय एवैतेषां मन्त्राणां वक्तार ऋपयः प्रायेण दृश्यन्ते । क्वचित्वनृपयोऽपि वक्त त्वेन विवक्षणादेपामृपयो निर्दिश्यन्ते । तत्रेदं वक्त त्वलक्षणं गौणमृपित्वं द्रष्टव्यम् । तथाहि पञ्चविधो मन्त्राणां वर्गोभवति-भाववृत्तं, देवस्तवः, वक्त्रात्मस्तवो,देवात्मस्तवः,कपोश्चित्सवादो वेति । सृष्टिक्रमनिरूपणं भाववृत्तम , प्राणदेवानां स्वरूपधर्मप्रदर्शनं देवस्तवः । तयोरयं मन्त्रप्रणेतैव ऋपिः, द्रष्तृत्वाच वक्त त्याच्च । देवता तु तत्र सृष्टिविषयो वा प्राणदेवा वा । अथ वक्त्रात्म- स्तवेऽपि अयं मन्त्रप्रणेता आत्मानं स्तोतीति स एव म्यापिश्च देवता च । अथ चतुर्थे देवात्मस्तवे तु मन्त्रप्रणेता प्रतिपाद्य देवं तद्देवमुखेनैव स्तावयति । तत्र तन्य प्राणदेवस्यैव वक्त त्वेन विवक्षणात् स एव ऋपिः स्यादेवता च । मन्त्रप्रणेतुन्तु वक्त त्वेऽपि तत्र ऋपित्वमपहनुयते । अथ पञ्चमे संवादेऽपि मन्त्रप्रणेतु पिस्त्रमपहनुयते । बयोस्तु संचादो वर्ण्यते तयोर्मध्येवक्तु ऋ पित्वं सेबोध्यन्य देवतात्वमिति पविणोभयो पित्वं देवतात्त्रं च विवक्ष्यत इति - *. वसिष्ठः * [ २० बृहद्दे वतायां भगवता शोनकेत सुविशद व्याख्यातम् । एषामुदाहरणानि तु विस्तरभयान्न होपन्यस्यन्ते । ऋग्वेदादिमन्त्रसहिताचतुष्टये तु य इमे मन्त्राणाम ऋपयः केचन स्मर्यन्ते तत्रैत-पञ्चमं वक्त त्वलक्षणमेव ऋषित्वं द्रष्टव्यम। तु तसमा मध्यमस्य तादित्थं लक्षणभेदापयश्चतुर्धा भिद्यन्ते, तेषां च जन्मकमस्वरूपा- ख्यानादयो विपया अपि प्रातिस्विकतया भिद्यन्ते नान्यधर्मा अन्यत्रोपपद्यन्ते, तथापि नाममामान्यादन्यत्राप्यन्यधर्माः सांकर्येण प्रतिधीयन्ते । यथाऽनेकवर्ष सहस्रजीवित्वं प्राणलक्षणेपूपपन्नमपि नियतपुरुषायुपेपु शतायुपु मनुष्येपु नोपपद्यते । एवमेवेदं मैत्रावरुणित्वमुर्वशीजन्यत्वं च रोचनालक्षणेषु मत्स्य वसिष्टागस्त्येष्वेवोपपन्नमपि मन्त्रद्रष्टुपु पारोवठवित्सु पुरुषेषु नोपपद्यते । अतएवायं वसिष्ठो मनुष्यविधो विद्वान् तारालक्षणं तदुपलब्धप्राणलक्षणं वा वसिष्ठ संबोध्य “ उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या" इति मन्त्र प्रयुङक्त । नतु मनुप्यविधमात्मानमेव तथासंबोधयितु युज्यते । “अहवं मित्रं रात्रिवरुण" इति च तेः। पूर्व कपालस्थादित्यम्य संस्रवशीलत्वामित्रत्वं पश्चिमकपालस्था दित्यस्य विशरणशीलतया ब्रियमाणत्वाद्वरुणत्त्वम । तयोश्चाबच्छेदकम्य याम्योत्तरवृत्तस्य दिकत्वा- दसरस्त्वमुसयत एवोवेन्तरिक्षे समानव्याप्तिमत्यादुर्वशीत्वम । मध्यमरेखायां नयोः समुद्ररूपेऽन्तरिक्षे कुम्भराशौपरिप्लवमानयो रेतः सेक मित्र वरुणोभयधर्माणस्त्रयस्तारापुमपा उत्पद्यन्ते उत्तरतो वसिष्ठो दक्षिणतोऽगस्त्यः कुम्भमध्ये तु मत्स्य इति । पुरायुगे कुम्भेन धान्यानि मीयन्ते स्मेति कुम्भस्य मानत्वं तत्रोत्पन्नत्वादेपां त्रयाणां मान्यत्वं चाहुः न त्वेवमेककुम्भजन्यत्वं मनुष्याणां वसिष्ठागस्त्य मत्स्यानां संभाव्यते । वसिष्ठेनैवसप्तमस्य त्रयस्त्रिंशसूक्त पञ्चभि- रिममित्रावरुणाभ्यामुत्रश्यां माने कुम्भे रेतःसेकाख्यानात् तदाख्यानम्य स्वविषकत्वासामञ्जस्यात् तदन्यविपयकत्वोपपत्तेः । तस्मात् तारारूपाणां वसिष्ठा- दीनामेवेदं तारा विज्ञानोपयोग्याख्यान विशेषसिद्ध मैत्रावणित्वमुर्वशीजन्यत्वं मान्यत्वं-वा न तु ब्रह्मणो मानसपुत्राणां मनुप्यविधानाम् । तारावियिणी सर्वापीयमाख्यायिका ताराविज्ञानोपयोगिनी बालक वनार्थाबवल्पसारा सिध्यैव कल्पिता पूर्वैरिति नैतावता मनुष्यविधर्पिपु तदा क्षेपःशक्यः कर्तुम् । यत्तु ब्रह्मणो मानस पुत्रस्य वसिष्ठस्य गोतमहोतके यज्ञे निमिशापाहग्धशरीरतया पुनर्वश्यां तस्या -- २१ ] महर्पिकुलवैभवम् * द्वितीयं जन्मेत्याचक्षते पौराणिकाः । तदपि नामसामान्याहुपतंक्रमितस्य मैत्रावरुणित्वादिधर्मस्योपपादनार्थ कल्पनामानं स्यात् । द्वितीयजन्मनि वेश्या- पुत्रत्वे कथंचिदभ्युपगम्यमानेऽपि वेदमन्त्रद्रष्टुः प्रथमजन्मनो ब्रह्ममानसपुत्रस्य जन्मदाता मुख्यःपिता कश्चिदन्य एव स्यात् स नाद्यापि निर्धारितो विज्ञायते इति विरम्यते । मनुप्यवसिष्ठस्य भौमस्वर्गसंचारित्वम् । ४- स्वर्गे सहस्रद्वारं वरुणगृहं गतोऽयं वसिष्ठो वरुणं स्तुवन्नात्मानं मनुप्यत्वेन प्रतिनानीते - यत्किञ्चेदं वरुणदैव्ये जनेऽभिद्रोहं मनुष्याश्चरामसि । अचित्तीयत्तव धर्मा युयोपि म मानस्तस्मादेनसो देव रीरिषः । इति ( ऋ७/६/५) एतेन भारतवर्षनिवासिनस्तस्य वरुणदेवकृपया स्वर्गे गमनागमनसंस्रवो विज्ञायते । मन्त्रद्रप्तृत्वस्य पर्पद्ब्रह्मत्वस्य तपस्विरयम्य राजपुरोधस्त्वस्य चान्यान्य वसिष्ठवृत्तित्वम् । ५- वसिष्ठवंशधरा अपि सर्वे वसिष्टा उच्यन्ते - आकृतिग्रहणा जातिर्लिङ्गानां च न सर्वभाक् । सकृदाख्यात निर्लाह्या गोत्रं च चरणैः सह । - इति वैयाकरणैः सिद्धान्तितत्वाद् वसिष्टादिगोत्रशब्दानां जातिवाचित्वात् । यथा गर्वा वंशधराः सर्वे गाव एव स्युरेवं वसिष्टवंशधराः सर्वे वसिष्ठा एव स्युः । तत्र नायं बसिष्ठशब्दस्तत्प्राणद्रष्टव्यक्तिमात्रे तत्पुत्रपरम्परायामेव वा रूढः, किन्तु वासियां ब्रह्मपर्पदि यः कश्चित् पुत्रो वा शिष्यो वा पर्पध्यक्षो ब्रन्यासीत स सर्वो वसिष्ठ इत्युच्यते । वसिष्ठस्य ब्रह्मत्वेन स्मरणात् पर्पदधिष्ठा- तुरेव च ब्रह्मत्वात् वसिष्ठानामानन्त्याचान्येऽन्ये वसिष्ठा अर्बुदाचलेऽयोध्यायां वा ऽन्यत्राख्याने वा संभाव्यन्ते न वेतेषामर्वाचां वेदमन्त्रद्रष्टत्वं कल्प्यम् ।

* वसिष्ठः * [ २२. अयोध्याराजपुरोहितनानावसिष्ठापेक्षया वहुपुरातनस्य कस्यचिन्मूलपुरुष वसिष्ठस्य वेदमन्त्रद्रपृत्वेनाभ्युपगम्यमानत्वात । ६- सोऽयमेको मूलपुरुपरूपो वसिष्ठो द्वादशैतस्य पुत्राश्चत्वारस्तत्पौत्रा इत्येवंसप्तदश पुरुपा बसिष्ठसंहितायां मन्त्रद्रष्टारः स्मर्य्यन्ते । एनद्वयतिरिक्ता स्तद्गोत्रे मन्त्रद्रष्टारो न सन्ति तेपांनामानि यथा (१) नमिष्टों ब्रह्मणः पुत्रः (८६५ मन्त्राः ) (२) बसिष्ठपुत्राः- १. मन्युः २. उपमन्युः ३. व्याघ्रपात् ७. इन्द्रप्रमतिः धम्नीकः ८. है. चित्रमहाः ४. मृडीकः ५. वृपगणः १०. कर्णश्रुत् ११. वसुक्रः १२. शक्तिः इत्येते द्वादश वसिष्ठपुत्राः । ६. प्रथः - (३) वसिष्ठपोत्राः १. बसुकृद वासुक्रः ३. पराशरः शाक्तयः २. वसुकणे वासुक्रः ४. गौरिवीतिः शाक्तयः इत्येते चत्वारः पौत्राः । ७- तत्र वसिष्ठोऽग्निं पञ्चविंशत्या. श्राप्रमग्निमेकादशभिः, पावकं शुचिं चाग्निं दशभिः, शुक्रं यविष्ठमग्नि दशभिः, वैश्वानरमग्नि पोडशभिः, नानागुणमग्नि त्रिसप्तत्या तुष्टावेति पञ्चचत्यरिंश शतम् १४५ आग्नेयं प्रथम पर्व । वसिष्ठ एव त्रिचत्वारिंशेन शतेनेन्द्र नवभिर्वसिष्ठवश्यान् संम्बोध्यैतमिन्द्र, पञ्चभिर्वसिष्ठागस्त्ययोरुर्वश्यां मित्रावरुणाभ्यां जन्माख्यानं, चतुर्भिः सुदास: पैजवनस्य दानं तुष्टावेत्येकषष्ठं शतम् (१६१) ऐन्द्र द्वितीयं पर्व । पार्थिवं वैश्वदेव्यं मेकेन सूक्तन मेकेन सूक्तन पञ्चविंशत्यामन्त्रैःदिव्यंवैश्वदेव्यं पड्भिः २३ ] * महषिकुलवैभवम् । 1 सूक्तश्चतुःपञ्चाशता मन्त्रैः आन्तरीक्ष्यं वैश्वदेव्यं पञ्चदशभिः- सूक्त रष्टपठ्या मन्त्रैः, चतुर्थलोकीयं वैश्वदेवमूनपश्चाशत्सूक्त र्नवाशीत्यधिक त्रिशंत्या मन्त्रैस्तुष्टावेति पट्त्रिंशानि पञ्चशतानि (५३६) वैश्वदेव्यं तृतीयं पर्वा । त्रिभिः सूक्त स्त्रयोविंशत्या (२३) मन्त्रैः पावमान्यं चतुर्थ पर्व । इति चतुर्भिः पभिर्वसिष्ठायं वृत्तम् । " यूयं पात स्वस्तिभिः सदानः" इति वसिष्ठ काव्याभिज्ञानं ध्रुवकपदम । (८) अथेन्द्रप्रमति पगणो,मन्युः,उपसन्युः,व्याघ्रपात्.कर्णश्रु द्वसुक्रो मृडीक: शक्तिरित्येते वासिष्ठास्त्रिभिस्त्रिभिः शक्तिश्चतुर्भिश्चान्येमन्त्रैः पवमान तुष्टाव । मृडीक पञ्चभिश्चित्रमहा, अष्टभिरग्नि, द्यु म्नीकः पड्भिरश्विनौ, अथ एकेन विश्वान देवांस्तुटाव (५१) अथ पराशरः, शास्यश्चतुर्दशभिः, गौरिवीतिः शाक्यो द्वाभ्यां पवमानं, गौरिवीतिरेकादशभिः षड्भिश्चेन्द्र तुष्टाव (३३) इति चतुरशीतिमन्त्रैरूत्तरवासिष्ठ पञ्चमं पर्व (५) तदित्थं पञ्चपप्टान्यष्टशतानि मन्त्राणा मयं वसिष्ठः स्वयं, एकपञ्चाशन्मन्त्रान् बसिष्ठपुत्राः, त्रयस्त्रिंशन्मन्त्रानवसिष्ठ पौत्राः ददृशुः- इत्यून पञ्चाशदधिकैनवभिः शतै वासिष्ठी संहिता पूर्णा । (६४६) (e) घचप्ययं मान्यो वसिष्ठो मनुष्यलोकन्थो न स्वयः भारतवर्षे मनुप्यलोके सिन्धुनदप्रान्ते सरस्वतीनदीसङ्गमस्थाने सरस्वतीयाने वसिष्ठाभि जनस्य व्याख्यातत्वात् । तथा प्युत्तरकालमिन्द्रानुग्रहवशात् तस्य स्वर्गे निवासः समपद्यतेति श्र यते वाजिश्र तौ तद्यथा । " वसिष्ठो ह विराजं विदांचकार । तां हेन्द्रोऽभिदध्यो । स होवाच ऋपे । विराजं ह वै वेत्थ । तां मे बहीति । स होवाच-कि मम ततः स्यादिति । सर्वस्य च ते यज्ञस्य प्रायश्चित्ति, व यां, रूपं च त्वा दर्शयेयेति । स होवाच-यन्नु मे सर्वस्य यज्ञस्य प्रायश्चित्तिं व था:- किमु स म्याद् यं त्वं रूपंदर्भयेथा इति । जीवस्वर्ग एवास्माल्लोकात् प्रेयादिति । ततो है ता मृपिरिन्द्राय विराजमुवाच-" इयं वे विराडिति"। तम्मा योऽस्य भूयिष्ठं लभते स एव श्रेष्ठो भवति । अथ हैतामिन्द्र ऋपये प्रायश्चित्तिमुवाच- अग्निहोत्रादने- आ महत उपथात् । ता * वसिष्ठः * [ २४ ह स्मैताः पुरा व्याहृतीर्वसिष्ठा एव विदुः । तस्माद्ध स्म पुरा वासिष्ठ एव ब्रह्मा भवति । यतस्त्वेना अप्येतर्हि य एवं कश्चाधीते-ततोऽप्येतर्हि य एव कश्च ब्रह्मा भवति । स ह वै ब्रह्मा भवितुमर्हति । स वा ब्रह्मन्नित्या मन्त्रितः प्रतिशृणुयाद्-य एवमेता व्याहतोफेद " इति । शत. १२/कां/३ प्र./ १ त्रा.) इति । तथा चैतस्य वसिष्ठस्योत्तरकालं जीवस्वर्ग वासितया ताशवसिष्ठ- प्रणीतोऽयं वेदसंहिताग्रन्थः स्वयं एवाभिज्ञायते । तद्वर्णितानां देवानां भौमस्वर्ग वासितया सूर्यप्राणतया च स्वार्थविषयकत्वात् ।। सोऽयमैतिहासिको वैज्ञानिकश्च द्विविधोऽपि वसिष्ठो व्याख्यातः ।। ॥ इति वसिष्ठः ॥

अगस्त्यः वासिष्ठ्यां वसिष्ठानास्त्यमस्या रोचनालक्षणा व्याख्याताः इह पुनः प्राणलक्षणानेतान् व्याख्यास्यामः । " मित्रः संसृज्य पृथिवीं भूमि च ज्योतिषा सह " इति श्रुतेः पृथिव्यां ज्योतिः संसर्जनाः सूर्यरश्मयो मित्रः । -- - "वि यो जघान शमितेव चौपतस्तिरे पृथिवीं सूर्याय " इति मन्त्रश्र ते: पृथिवीपृष्ठात ज्योतिरपसारयन्तः सूर्यरश्मयो वरुणः । "यह मित्र रात्रिर्वरुणः" इति ब्राह्मणश्रु तेरप्यत्रैव तात्पर्यम् । ताभ्यां च पूर्वपश्चिम- कपालौ लक्ष्यते । कपालद्वययोगिनी याम्योत्तररेखात्मिकादिगुर्वशी पञ्चचूड- ब्राह्मणे भगवता भाहित्थिना दिशामप्सरस्त्वेनाख्यानात् । भगवान याज्ञवल्क्यस्तु आहुतिरुवशीत्यभिमनुते । कपालद्वययोगादुत्पन्नोऽण्डरूपो मानः कुम्भः, आपोमयं चेदमन्तरिक्षं समुद्रः । समुद्र विहरयां मित्रावरुणाभ्यामुर्वेश्या दिश्याहुत्यां वा संयुज्यमानाभ्याभाग्नेयाप्यरेतोनिपेकादस्मिन् कुम्भे त्रिविधा मरुतः प्राणा उत्पद्यन्ते-शीतवीर्या उष्णवीर्या अनुप्णाशीतवीर्याश्च । श्राद्याः सोमधर्माण: सौम्या उत्तरायतना. उत्तरा हीयं सौम्या दिक् तस्यां प्रचरन्तो हीमे वरुणसखाः प्राणावसिष्ठा इत्याख्यायन्ते आपवा आप्सवा वसिष्ठा इत्येकार्थाः । एते हि मरुतः प्राणा वरुणसख्यत्वस्वाभाव्यान, अप्सु प्रविष्टा उभयोः समन्वया दद्यः पृथिवीं जनयन्ति तत्राप्त्वनिवृत्युत्तरमुत्पन्न पृथिवीत्वे तम्या अप्टी १ व्याहतयो भवन्ति आपः, फेनः, ऊपः, सिकताः, शर्कराः, अश्मा, अयो, क हिरण्यमिति । प्राथमिकी तावत् पृथिव्या व्यावृतिद्भवप्रायरूपत्वादापःशदेन- वाल्यागते । सा चातिरिच्यते पृथिवीत्वमनाप्ताभिमुख्याभिरद्भिः । आपस्ता- वन्मस्तं वृण्वत्ते, स बुबुदो नाम । तत्रापां निम्नगतिस्वाभाच्याद् बुबुशिरसो मन्दस्तरत्वोपपत्ताबुनमणस्वभावो मरुन्मन्दवलं बुदबुदशिरो निर्भिध *अगस्त्यः * [ २६ बहिर्भवति । यत्र तु मरुतोऽल्पत्वादपां च भूयस्त्वाद् बुबुदशिरसो मन्दस्तरत्वं नोपपद्यते, तत्रायमवरुद्धो मरुन्नियतकालोत्तरमवसन्नो म्रियते । वरुणवैमनस्यादैन्द्री शक्तिरुत्क्रमणलक्षणा मरुतो निर्वतते । सोऽसु दत्तात्मा स्वं खरत्वमासु प्रक्षिप्य तदुभयविलक्षणधर्माणां पृथुत्वं गतमर्थ जनयति सा पृथिवी मृत्तिका नाम । इदानीं यावदपा द्रवणधर्मस्यैकान्ततोऽनपलापादियं पृथिव्याः प्रथमा व्याहृतिराप एवोच्यते । ततः क्रमेण परिपाकात् फेनोपऽसिकता जायन्ते, तथाचैतास्वप्सु वेषां मस्तां प्राणानां संयोगादप्फेनोपःसिकताख्याश्च तस्रोऽप्सगमनस्वाभावा व्याहृतयः क्रमेण सृज्यन्ते, ते वासिष्ठा नाम प्राणाः स्युः । वेदात्सर्वा सृष्टिभूत्वा यज्ञाजीवतीति सिद्धान्तः । प्राणोर्गन्नानामन्योऽन्य परिग्रहो यज्ञ इति वाजिश्रुतौं व्याख्यानम् । ऊर्जा ह्यन्नं गृहीतं प्राणत्वमापद्यते । सोऽयमूर्जा शक्तिमानप्फेनोष सिकतागतो वसिष्ठप्राणोऽपएवान्न भूयो भूयो गृहन्नात्मनि भावति । तत एवैताश्चतस्रो व्याहृतयोऽद्भिः संमिश्रिता एकीभवन्ति । सोऽयमपी मूर्छनाद्भ्यः पृथिव्युत्पादकः प्राण उत्तरस्यां सप्तर्पिगतवसिष्ठाख्यतारातः परितो व्याप्नुवन् लभ्यते इत्यतः सा तारापि वसिष्ठ उच्यते । तत्सम्बन्धादेव च विपुरत उत्तरस्यामाधिक्येन वस्तु योग्या निवासभूमयो लभ्यन्ते । नैवं दक्षिणस्यां समुद्रप्रयायामगस्त्याचरिताया दिशि । तदित्थं वसिष्ठा नाम शीतवीर्याः प्राणा व्याख्याताः । अथ कुम्भजन्मान उष्णवीर्याः इतरे प्राणा यमधर्माणो याम्या दक्षि- णायतनाः । दक्षिणा हीयं याम्या दिक् । तानगस्त्या इत्याचक्षते । एते हि मरुतः प्रातः । तेपांच किं न इन्द्र जिवांससि भातरो मरुतस्तव । तेभिः कल्पस्त्र साधु या मानः समरणेऽव धीः ॥१॥ किं नो भातरगस्त्यसखा सन्नति मन्यसे । विद्मा हि ते यथा मनोऽस्मभ्यमिन्न दित्ससि ॥२॥ इति । ( १/१७०) इन्द्रागस्त्यसंवादश्रु तेरिन्द्रसख्यत्वं लभ्यते । इन्द्रसख्यत्वस्त्राभाव्याच वरुणविरोधादप्त्वप्रविश्य तासामपामवयवान् विश्लेप्य तद्रसान पीत्वा बिला- २७ ] * महर्षिकुलवैभवम् * १ ૨ पयति । अप्फेनोपसिकतासृष्ट्य त्तरमगस्त्याख्यमरुत्संयोगादपां नियमनादप्- संमिश्रणविरोधिन्यः शर्करा-अश्मा-अयो-हिरण्यमिति चतनो व्याहृतयः क्रमेण सृज्यन्ते । तेनाष्ठी व्याहतयः पृथिव्याः संपद्यन्ते । अपि चैतेऽगस्त्याः प्राणाः अन्तरिक्षरूपे समुद्रेऽपां रसं पीत्वाऽन्तरिक्षसमुद्र निर्जलं कुर्वन्तीत्यत एवागस्त्यताराभ्युदयादूर्ध्व वृष्टिचातुर्मास्यं निवर्तते । वर्पतु दोपाद् रजस्वलानां सरितामपामगस्त्योदयादूर्ध्व रजसामद्भ्यो विच्छेदादापः शुद्धा भवन्ति । श्रापश्च पृथिवीबन्धनाद् विमुक्ताः क्रमेणोर्ध्वमाकाशमनूत्क्रमन्ते इत्यतस्तदानीं भूमावन्तर्निपाताद् भूमिपृष्ठे तिर्यक् प्रबहणाद्वियत्यूर्ध्वमुत्क्रमणाच त्रिपथगाः सम्पद्यन्ते । अगस्त्योदयार्द्धमाकाशसमुद्रस्य निर्जलप्रायतया तत्रानिशं पार्थिव समुद्रादाप उत्क्रममाणा भवन्तीत्ययं समुद्रोऽपि सुतरां निपीतजलः क्रमेणो- पपद्यते । तदिदमगस्त्यस्याकाशसमुद्रपीतत्वं भौमसमुद्रपीतत्वं च लोका आहुः । अपि चेह द्विविधाः पर्वता भवन्ति-हिमादयश्च विन्ध्याद्रयश्चेति । जलग्राहीप्राणतया जलक्लिन्नान्तर्जालकाः फल्गुसारप्रस्तरा विशीर्णपर्णजालना- जलोच्छूनोदरत्वाञ्चात्यन्तमुन्नमन्तः पर्वता हिमाद्रयः, तद्विरुद्धा जलोत्क्षेपकप्राण तया शुष्यदन्तः स्तरा दृढसारा निर्जलोदरतयोत्तरोत्तरघनीभवदङ्गा विनमन्तः पर्वता विन्ध्यादयः । अप इन्चे उद्दीपयतीन्यविन्धः प्राणविशेषोऽगस्त्यो नाम । तमहतीत्यबिन्ध्यः सन् विन्ध्य इत्याख्यायते परोक्षम् । गथा चायं हिमाद्रि- वसिष्ठप्राणाकृष्टजलोदरत्वादुच्छवयमानः प्रोन्नमुच्छङ्गः समपद्यत, एवमयं विन्ध्याद्रि!न्नमच्छङ्गः समपद्यत, श्रागस्त्यप्राणनिक्षिप्तोदकसारत्वादुत्तरोत्तर घनीभावादधोऽधः संपातोपपत्तेः। तढिमगस्त्य विन्ध्याद्रिनिग्रहणमाचक्षते पौराणिकाः । अतएव चास्य मरुत्प्राणस्यागस्त्यत्वमाख्यायत । अगं पर्वत मश्मानं स्त्यायति संहन्तीति व्युत्पत्तेः । सर्वे चैतेऽगस्त्यप्राणधर्मा नामसामान्या दगस्त्यप्राणद्रष्टरि विदुप्यगस्त्ये भक्त्या निक्षिप्यन्ते लोकरित्यव सेयम् अगस्ति- रिति वगस्त्यस्य परोक्षव्यवहारः । मत्स्यपुराणकवष्ठि (६१) तमाध्यायेऽस्यागस्त्यरवाग्निमारतत्वमाख्यायते । तारकाद्यसुराः सामुद्रजलदुर्गप्रच्छन्नाः सुगुप्ता नाजीयन्तेत्यत इन्द्रेण समुद्र शोष- चितुमादिष्टावग्निमस्ती सहकेन शरीरेण रूपमाधातुमुर्वश्या मित्रावरुणरेतोभ्या मजायेताम् । ततोऽयमग्निमामतोऽगस्त्यो भूत्वा समुद्रमशोपयदित्याह ।

* अगस्त्यः * [ २८ काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसंभव । मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तुते " ॥१ ।। इति च प्रार्थनामन्त्रमाह । तदेतदग्निमारुतत्वं जलशोषकमारुतस्यास्यो- पणवीर्यात्वादवसेयम् तदित्थमगस्त्या नामोष्णवीर्या मरुतः प्राणा प्राख्याताः।।२।। तथा चायं निष्कर्षः उर्वशीनामके मध्यान्हवृत्ते सौम्ये उत्तरकपाले पूर्वापरकपालप्राणभ्यामाहुत्या यः प्राणो निष्पद्यते स वसिष्ठोममत्प्राणः । स वरुणसखः । अथ तत्रैवोर्वशीनामके मध्याह्नवृत्ते याम्ये दक्षिणकपाले पूर्वापर कपालप्राणाभ्यामाहुन्या यः प्राणो निष्पद्यते सोऽगस्त्यो मरुत्प्राणः । स इन्द्र- सखः । तदुभयसंक्रान्तधर्मा समवीर्यो ममत्प्राणो मत्स्यो नाम, तत्प्राणोपवर्षकश्च मध्याकाशे याम्यमल्यो नाम कश्चित ताराविशेषो दृश्यते । तदित्थं त्रिविधाः सर्वे मरुतः प्राणाः । ममतां सप्तसप्तकत्वेऽपि संहत्य सर्वे त्रिविधा एवेत्थं भवन्तीति निष्कर्षो द्रष्टव्यः ।। ३ ।। एषां च त्रिविधानां प्राणानां मध्येऽगस्त्यप्राणद्रष्टुरुपासकस्य विदुषोऽप्य- गस्त्य इत्येव यशोनाम प्रख्यायते स्म । स च वसिष्ठवद् भारतवर्षीय एवासीन्न तु स्वर्गीयो देवः । “ अगस्त्यो नरां नृषु प्रशस्तः काराधुनीव चित् यत् सहस्रः।" (ऋ. १/१८०/८) इत्येवमगस्त्येनैव स्वस्य नरत्वप्रतिज्ञानान । तस्य च देवेन्द्रकृपया स्वर्गे गमनागमनसंरत्रो विज्ञायते। वसिष्ठप्राणसंवाहिकाया वसिष्ठताराया उत्तरदिग्वर्तितया तदुपासना- नुरोधेन तत्प्राणद्रष्टुर्वसिष्टस्य विदुपोऽप्युत्तरस्यां दिशि यथाऽश्रमः प्रहश्यते तथैतस्या अगस्त्यप्राणसंवाहिकाया अगम्त्यताराया दक्षिणदिगवर्तितया तदुपासना- नुरोधेन तत्प्राणद्रष्टुरगस्त्यस्य विदुषोऽपि दक्षिणस्यां दिश्येव क्वचिदाश्रमः प्रसिध्यति । स च गोदावरीसंनिहितात पञ्चवटीनाम्नो रामाश्रमाद् योजन द्वयान्तरे पूर्वमासीदिति रामायणे स्मर्यते । तत्रागस्त्यस्य वातापील्वलभक्षकस्य रामसमसामयिकस्यैव वेदमन्त्रद्रष्ट्रत्य मासीदिति नास्थीयते । “ युवां गोतमः पुरुमीढो अत्रिः।" (ऋ.१/१८३/४) २६ ] 4 महपिकुलवैभवम् * इति मन्त्रवर्णात पुरुमीढसमकालिकस्य तस्य (रामसमकालिकत्वासंभवान् । अगस्त्यगोत्रप्रवर्तकस्य प्राथमिकायस्त्यस्य वसिष्टवन्मत्रावगित्वं स्मरन्तीत्यादि-- वसिष्टसमकालिकस्य तस्य सूर्यवंशप्रवृत्तेरप्यतिपुरातनया रामसमये तस्या संभाव्यमानत्वात् । अगस्त्यवंशधराः सर्वगल्या उच्यन्ते। अगस्त्यगोत्रस्य जातिवचनत्वात् सर्वेषां तद्गोत्र जातानामगन्त्यशब्देन व्यवहर्तुं शक्यत्वात् । गोत्रं द्वधा जन्मना, विद्यया च तत्र न जन्मना गात्रेऽयगगस्यशब्दो हहः । किन्तु विद्यया गोत्रे पुत्रो वा शिप्यो वा यः कश्चिदेवागल्या ब्रापर्पदि तदध्यक्षा ब्रह्मासीत सोऽयमन्योऽन्यः काले काले गस्त्यः प्रतिपयत स्म । तस्माद्रामसमये ऽप्यन्यः कश्चनागस्त्यः संभाव्यते। शतायु पुस्पो भवतीति । श्रुतेः । सर्वेऽप्येतेऽगस्त्यवसिष्टादयः शतायुपी द्रव्याः- इति दिक। 3M 4 १ अस्यागस्त्यस्य मन्त्रसंहितायां सोऽगस्त्य एकः । अगस्त्यपुत्र एकः अगस्त्य पौत्रश्चैक ! अगस्त्यशिष्यः । अगस्त्यपत्नी । अगस्त्यभगिनी । चत्वारो- ऽस्य भगिनेयाश्चेति दशर्पयो द्रप्पारः सन्ति । f तत्रागस्त्योऽपर्चसूक्त नाग्निमेकादशर्चसूक्त नाप्रिय तुपावेत्यूनविंशत्युच माग्नेय पर्व। चतुर्दशभिः सूक्त ऋचामष्टादशशतेनेन्द्र तुष्ट वेति द्वितीय पर्व । पचभिः सूक्तरूनचत्वारिंशता ऋरिभः अश्विनी एकादशर्चसूक्त न द्यावापृथिव्या, एकादशर्चसूक्तन विश्वदेवान, एकादशभिरोपधी, रणभिवृहस्पति, पोडशभिर- बोपधिसूर्यान तुष्पात्र । पडभिरगस्त्यलोपामुद्राब्रह्मचारिणां सवादः - इत्येकादश १०२ ज्ञानत्र ध्रुवपदम सूक्त द्वयधिकशतमन्त्रकृतं वैश्वदैव्यं तृतीय पर्व तदित्थमूनचत्वारिंशे वो शते : --अगस्त्यार्पवृत्तम् । विद्यामेपं वृजनं जीरदानुम् । इत्यगस्त्यम्य काव्याभि- अथागस्त्यपुत्रो दृढच्युत: पभिः पवमानम । इध्मबाहो दाढ्य च्युतश्च पड्भिः पवमान तुपात्र । बन्धु-सुबन्धु-श्रु नबन्धु-विप्रवन्धको लौपायना गौपायना वाऽगस्त्यभगिनेया अत्रिगोत्री द्वाभ्यामग्निं पद्मिविश्वान दशभिनिऋतिसोमासुनोतिद्यावापृथिवीन्द्रान, पडभिरसमाति राजानमिन्द्र पइभिः सुबन्धोर्जीविताहवानं, द्वादशभिर्मन आवर्तनं तुगावेति द्वाचत्वारिंशत । -- * गस्त्यः * [ ३० २63 तदित्यं चतुःपञ्चाशन मन्त्रमुत्तरागस्त्यं चतुर्थी पर्व । सेयं त्रिनवत्यधिकशत- द्वयेनागस्त्य सहिता पूर्णा । यद्यप्ययं मान्योऽगस्त्यो मनुष्यलोकस्थो न स्वयंस्तथाप्ययमगस्त्यप्रणीतो वेदसंहिताग्रन्थः स्यर्य एवाभिज्ञायते । तद्वर्णितानां मनुष्यदेवानां भौमस्वर्ग- वासितया प्राण देवानां स्वर्गवासिसूर्यप्राणतया च स्वार्थविपयकत्वात् ।।... 'सोऽयमैतिहासिको वैज्ञानिकश्च द्विविधोऽप्यगस्त्यो व्याख्यातः । m इति अगस्त्यः । PHOT भृगुः स्नेहः पाप्यः आधिभौतिकः तेजः आग्नेयः आधिभौतिकः २. अङ्गिराः अगस्त्यः ३. अत्रिः चान्द्राधिदैवतः . i 1४. मरीचिः कश्यपः सौराधिदेवतः -11 ५. वसिष्ठः दक्षिणाधिदेवतः अपां गुरुत्वापादकत्वादपक्रामुकः उत्तराधिदेवतः अपांलघुत्वापादकत्वादुत्क्रामकः ७.विश्वामित्र माध्यात्मिकः चार विश्वकर्मा प्राध्यात्मिक प्राध्यात्मिकः १०. क्रतुः प्राध्यात्मिकः दनः (११. पुलस्त्यः .१२. पुलहः यासुरः प्रासुरः Rechanis एम. an utu. noraminiuminstan भृगु:-अङ्गिराः अथ सर्वसृष्टिसाधारणो नियमः । (१) येनात्मनि दिव्यभावः संपद्यते, तदात्मनि मनोऽवच्छेदेन ज्ञानोदर्योदयाप्रतिबन्धो ब्रह्मवीर्यम । ततोऽस्मिन् ब्रह्मवर्चसं तेजः, आकारस्तपो- विद्यावुद्धिरित्येतानि वलानि संभवन्ति ॥१॥ अथ येन वीरभावस्तदात्मनि प्राणावच्छेदेन क्रियोदोदयाप्रतिवन्धः क्षत्रवीर्यम् । ततोऽस्मिन्नोजो, वाजस्तेज श्राकारः, ऐश्वर्य-पराक्रमोत्साह-प्रतापा इत्येतानि बलानि संभवन्त ॥२॥ अथ येन पशुभावस्तदात्मनि बागवच्छेदेन धर्मोदर्कोदयाप्रतिवन्धो विड्वीर्यम् । ततोऽस्मिन् घुम्नं तेज आकारः, वाणिज्यं, धनमित्येतानि बलानि संभवन्ति । अथ यत्र शारीरबलमात्रमुपपद्यते नात्मरलानामन्यतमसिद्धिः, तद् वीर्य शूद्ररूपम् । ततो हि स आत्माऽऽशु शीघ्रमुत्कर्षेण द्रवते, क्लिन्नो भवति, विपीति, अपि चातितरां द्राति, शेते, निष्कर्मालस्यं च धत्ते, तेनायं शूद्रो नाम । एतावदात्मनो वीर्यम् । यावद्वीर्य तावद्वित्तम्, यावद्वित्तं तावदात्मा, आत्मा हि ब्रह्मति सिद्धान्तः आत्मनो वीर्य्यत्रयम् । (२) तत्रैतदात्मनो मनोऽवच्छेदेन ज्ञानानामुत्थानप्रतिवन्धका धर्मा उपसन्ना जानव्याघातः पाप्मा । क्रियोत्थानप्रतिवन्धका धर्माः प्राणावच्छेदेनोप- सन्नाः क्रियाव्यावातः पाप्मा ! अर्थोपलब्धिप्रतिबन्धका धर्मा वागवच्छेदेनोपसन्ना अर्थव्याघातः पाप्मा । तेषां चायमप्रतिबन्धो वीर्यम् । तत् त्रिविधम्- ब्रह्म, तनं, त्रिडिति । उक्थं प्रतिष्ठा सामेति कारणब्रह्मलक्षणम् । (३) उकर्य, प्रतिष्ठा, सामेति त्रिलक्षणमद्वितीयं किञ्चिदेक तलं ब्रह्म ! यत उत्तिष्टते तदुत्यं सदुकथं नाम । स्वतोऽनुपक्षीणं सद्पूर्व भावयतीति अहणशीलत्वात् तदब्रह्म । उत्पद्योत्पद्यार्थजातं यत्र प्रतितिष्ठति सा प्रतिष्ठा नाम । * सोऽयंत्राविवर्ते प्रदर्शिता * भृगु-अङ्गिराः * [ ३२ विभर्ति सर्व मिति भमत्त्वात् तद् ब्रह्म ! अद्भयं उन्थितेपु अप्सु प्रतिष्टितेपु फेन- हिम- श्लेष्माद्यर्थजातेपु यथाऽऽपः साम्येन वर्तन्ते, सिकता-शर्कराऽश्मायो- हिरण्येषु यथा पृथ्वीभावो दृश्यते, तथैतेषु सर्वेपु भिन्न ष्वपि यावद् भिन्न सत्तासामान्यं तत् सर्वत्र समत्वात् साम नाम सर्वत्रोपबृहितत्वाच तद् ब्रह्म । तदित्थं लक्षणम्-" ब्रह्म वेदमग्रासीदेकमेवाद्वितीयम् ।" (गो.ना.पृ.१/१) ब्रह्मणो व्याकरणम् । (४) तदव्याकृतपूर्व बृहणस्वाभात्याद् व्याक्रियते । अविभक्तस्य विभक्तयुपपत्तिाकरणम् | उन्मुग्धावस्थस्योबुद्धावस्था व्याकरणम् । निर्विशेषा द्विशेपाभिव्यक्तिबोधः, मनःप्राणोयागिति सृष्टिसाक्षित्रैविध्येनारब्धः कर्मपुरुपोवा, मनो विज्ञानमानन्द इति मुक्तिसाक्षित्रैविध्येनारब्धो विद्या- रुपो बा-ब्रह्मणो व्याकृतं रूपम्। विधापुरुषः मृथिवन्धमोक्ता, कर्म पुरुपस्तु सृष्टिबन्धकर्ता । तानीमानि पृथग् ब्रह्माणि । तत्र मनस्तावद् ज्ञानानां, प्राणः क्रियाणां, वागर्थानामुकथं च भवति, प्रतिष्ठा च, साम चेति । अन्योन्याविना- भूतमेतत् त्रितयमेको भाव अात्मा नाम । “स वा एप अात्मा वाङमयः, प्राणमयः, मनोमयः" (शत. १४/४/३/१०) प्रतिपत्तव्यः । - आत्मनः सत्यरूपेण विश्वव्यापित्वम् । (५) पातश्चायमात्मा धर्माणि धारयमाणो धर्मी भवति । नानुपमृपः स कदाचिदुपपद्यते । प्राणः शक्तिः । तेनायं कुर्वद्र पोऽनवरतं किञ्चित्करोनि । " न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् " (भगवद्गीता) अनवरतं च किञ्चिजानाति । आत्मा, प्राणाः, पशव इत्येवं त्रिवृद्र पं सत्यम् । यावदुकथं स आत्मा । सोऽर्चश्चरतोत्या एतस्य प्राणाः । अनर्याम-बहियामा पयामादिभिस्तदनुगृहीताः पशुभावा अशितयः । आत्मन्यश्नुवते इत्यशितयः । उकथमर्कोऽशितिरित्येवं त्रिवृत्कृतंरूपं सत्यम् सत्येन रूपेण पशुपु प्राणावस्थिति- रात्मनो ज्ञानं नाम विकासो रूपम् । तथा चायमेक आत्मा सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान सर्वधर्मापपन्नश्च । सर्वा एताश्चेष्टाः सर्वा अभिव्यक्तयः सर्वा व्यायश्चायमेको भाव प्रात्मा । नातोऽन्यन किञ्चिदन्ति ।

३३ ] * महर्पिकुलवैभवम् * उक्थं प्रतिष्ठा सामेति व्यस्तं कार्यब्रह्मलक्षणम् । (६) ततः कार्यब्रह्माभवत् । कार्यब्रह्मणि च कार्याणां वैचित्र्यादिद त्रैविध्यं भिन्नाश्रयं व्यवतिष्ठते । तथाहि सूर्यो वा चन्द्रा वा पृथिवी वा, क्षुद्रः प्रस्तरखण्डो बा, सर्वमिदमेकैकं ब्रह्म त्रेधात्मानं प्रत्यसृज्य रूपं धत्ते-उक्थं प्रतिष्ठा साम चेति । यात्रानेप दृश्यते कश्चन पिण्डस्तदेकमेकं पृथगुक्थ भवति । सेयं निरुता वाक् । तस्मादुक्त सदेतत् पारोक्ष्यादुक्थं नाम । तदन्त भी प्रतिष्ठानामेन्द्रः प्राणः । तत्प्रचलने पिण्डप्रचलनं, तद्प्रच्युतौ पिण्डो न प्रच्यवते । तस्मात्सा प्रतिष्टा नाम । अथैप पिण्डोऽतिदूरात्परिपश्यतां श्यो भवतीति तल्लोकालोकमण्डलं तदन्तर्मण्डलं च सर्व साम । समं हि सर्वतो दिक्षु तद् दर्शयतीति साम नाम । तत्र दृष्ट चोक्थं महोक्थेन सम भवतीत्यतोऽपीदं साम नाम । प्रतिष्ठा ह्य क्थस्यात्मा साम्नश्च । उक्थं साम्न आत्मा प्रतिष्ठायाश्च । सामाण्यात्मा प्रतिष्ठाया उक्थस्य च । नत्त्वेपामेकमन्येन विना भवति । यत्सत्तया यस्य सत्ता स तस्यात्मा । तस्मादुक्थं प्रतिष्ठा साम चात्मा इत्याह भगवान वाजसनेयः । आत्मा हि ब्रह्म । तदित्थंलक्षणं ब्रह्म बेदं सर्वम् । तथाचोक्थं प्रतिष्ठा सामेति व्यत्तं कार्यब्रह्मलक्षणं वोध्यम् । सूर्यचन्द्रपृथिव्यो ब्रह्मजातयः । (७) अस्ति हि त्रिविधैतस्य ब्रह्मणो जातिः । स्वयंज्योतिः सूर्यो नाम । परज्योतिश्चन्द्रो नाम । रूपज्योतिः पृथ्वी नाम । तत्र यद्यपि सूर्यचन्द्रयोरेवाभि- समाम्नाये साम्नोऽभ्युपपत्तिः श्रूयते । “ सर्व तेजः सामरूपं ह शश्वत् इति मन्त्रशु ती ज्योतिष्येव साम्नः प्रतिपादनात् । तथापि तयारेद्वातमां साम- प्रतिपत्तेदाहरण विधया तदाख्यानं, न तु पृथिव्यां तदभावे तात्पर्यम् । समान- न्यायान सर्वत्र सामोपपत्तेः । अथवा रूपस्यापि तेजोविशेपतया पृथिव्यामप्यञ्ज- संवेवं श्रुतिः कृतार्था भवतीति वेद्यम् । इच्छा-तपः-श्रमाः सृष्टिहेतवः । (3) सृष्टः प्राक् सृष्टिस्थितिकाले चेत्यं ब्रह्मणस्त्रैविध्यलक्षणमात्मत्व- माख्यातम् । इदानी लुष्टिक्रम प्रदर्शयामः। अव्याकृतं तदाढ़ी तावत् त्रेधा * भगु-अङ्गिराः * [ ३४ व्याकृतमभवत्-मनोमयं, वाङ्मयं, प्राणमयं च । "यावद् ब्रह्म विष्ठितं तावती वाक् या वाक् स प्राणः, तन्मनः । तन्मनस्त्वाच्छन् । नाणत्वाइभ्यतपन् । वाकवादभ्यश्राम्यत् । अप्राप्तार्थप्राप्तिविपयिणी मनोवृत्तिरिच्छा । मनसि तद्वासना कामः । स्वतो सनसो निष्क्रियत्वेऽपि प्राणवैशिष्ट्याद् वृत्तिमतो यदशनाय प्राणप्रवर्तनावृतिः साऽशनाया सेच्छा। सा द्विविधा-वासनाक्रान्तमनः समुत्था, विशुद्धमनःसमुत्था च । निर्वासनेच्छया कृतकर्मणो बन्धकत्वं नास्ति । अंतएवेश्वरस्य सिसृक्षामुमुक्षयोर्वन्धकत्वाभावः । स वासनेच्छया तु कृतकर्मणो ऽवश्यंवन्धकत्वमुपपद्यते इति वोध्यम् । उक्थाळशितिलक्षणायां मनोवृत्ती मनो द्वधारूपं धत्ते पूर्ण चापूर्ण च । यावन्मनस्तावान् प्राण स्तावती वाक् तत्पूर्ण रूपम् । विस्रस्तसंभरितानां मनसिप्राणवाचांसाम्ये- नात्मनो विलिपाङ्गपरिपूर्तेः संभवात् । यत्पूर्ण तदुक्थं स आत्मा । अथात्मनो भूमस्वाभाव्याद् वृद्धिमभ्युत्क्रममाणस्य मनसो यदभ्युत्थानं तत्र प्राणमात्रामा असहयोगादशितिलक्षणवाचोऽसंपत्तिरिति वाचा प्राणेन च शून्यमात्मानं पश्यत् तदभ्युत्थितं मनोऽपूर्ण रूपम् । तद्यथा विशिष्टां संपदमाकाङक्षमाणा- नामसमर्थानां दरिद्राणां मनः । यद्यपि नैपां वाक्प्राणमनसामेकमन्येन विनाकृतं भवति । अस्ति हि निष्क्रियस्य मनसोऽभ्युत्क्रमणार्थो मनस्यन्तामः प्राणः । अस्ति चेच्छाविपयरूपा मनःस्था वाक् । अथायशनायायामशितिं ग्रहीतु बलं नास्ति अरानग्रहणास्यापेक्षितस्य वहिक्मप्राणस्य विज्ञानाल्पत्वेन कर्मदोपेण चानुपार्जितत्वात् । तत एव चाशितिर्नास्ति । तस्माद् यद्यथेच्छति तत्तथा न शन्कोत्यात्मसातकर्तु मित्यतस्तन्मनःशून्यमात्मान पश्यतीत्यपूर्णत्वं- यावानस्य सनसोऽन्तर्यामप्राणः । यावती चास्येच्छा विपयभूता बुद्धिमयीवाक् तदुभयसाम्येनाशितिलाभो नास्तीतिवैपम्यान् । तदिदमुदरमन्तरं कुरुते तस्माद् वैपम्यं सर्वत्रदुःखाय कल्पते । श्रातश्चेयं मवासनेच्छा दुःखमयी भवत्यल्पप्राणस्य । यदपूर्ण रिक्तोदरं लघुत्वाद्विचलितप्राय - ननसोज मः। - १- विष्टान संस्थानं व्याप्ति सीमा सहस्रधापञ्चदशान्युक्था, यावद् द्यावापृथिवी तावदित तन् । सहस्रधा महिमानः सहन यावद् ब्रह्म विष्टितं तावती वाक् ॥"

३५ ] * महपिंकुलवैभवम् * विरिष्यमाणं तदर्चदचरन् तस्मादर्कोनाम । अर्चनमाराधनं साधनं ‘संपादनमशितिग्रहणाय बलग्रहणमिति यावत् । एतेन प्राणसंपत्तिराख्याता । ततोऽशितिं प्राप्य पूर्ण भवदुक्थमात्मा संपद्यते । तत्रायमुक्थस्याक एव चरन्नात्मन इच्छानामोच्यते । तयेच्छया योऽर्थो विषयी क्रियते मनसि, तद्वासना कामः । वाचोऽथस्य मानसंरूपं कामः । यावान् वा प्राणेन मनसि वाचो भोग. स कामः । वाचोऽयमर्क उतिष्ठन् इच्छा भवति । तमर्थ जानानः कामयमान एवेच्छति ॥ १॥ प्रयत्नः इत्युक्त: कामः । अथैतत् तपो निरुच्यते । इच्छया सहैवोतिष्ठन प्राणस्तमर्थमभ्येति गमिच्छति । अर्थप्राप्ति साधनविपया प्राणवृत्तिः तत्तपः । मनोऽर्काहतकायाग्निसमुत्थापित प्राणप्रक्षोभस्तपः । प्रयतमानस्य प्राणक्षोभजन्योष्मणा योगो वाचस्तपः । उक्त च मैत्रायणश्रु तौ- " प्रजापतिः प्रजा असृजत । ता चै तपसैवासृजत । स वै स वाचमेवायच्छन् । तपो वा एप उपैति यो वाचं यच्छति । सृष्टिः प्रजानामग्निहोत्रम् । उभयन एव प्रजाः सृजते इतश्चामुतश्चेति"(१/८/४) अपिच तत्रैव श्र यते तपसोवें ताः प्रजाः प्रजायन्त । तपस्त्वं वा एतद्गच्छति यच्छ्तत्वं गच्छति । ततः प्रजायते । ” (१/१०/६) इति । शृतत्वमग्निसंयोगः । वाजिश्रु तावपि तपःस्वरूपं फेनदृष्टान्तेन श्रूयते । एतद्वै फेनस्तप्यते यदप्स्वावेष्टमानः प्लवते स यदेवोपहन्यते मृदेव भवति" (६.1.) अन्यत्रापि तैत्तिरीयके कद्र सुपर्णाख्याने श्र श्र यते- एतत् खलु बाब तप इत्याहुयःस् ददातीति" (तै. सं. ६ कां. १ प्र. ६ श्र.३ क ) । दानं समर्पणम् । तदात्मनोऽवदानादेव संभवतीत्यतोऽवदानमेव- तदानम् । तथाहि-" आत्मदक्षिणं वा एतद् यत् सत्रम् । यदा वै पुरुष यात्मनोऽवद्यति यं कामयते तमभ्यश्नुते" (ताण्डय० ४/६/२० ) इति ताण्डवश्रुतौ श्रु तस्यात्मावदानस्यैव तपस्त्वमभ्युपपद्यते ।। - यान्येतानि चज्ञतपोदानानि कर्माणि श्र यन्ते तपास्येवैतानि सर्वाणि । तंत्रतावान भेदः । आत्मा वितायसानो यत्राधिदैविकर्देवैः संयोज्यते । मानुपे * भृगु-अङ्गिराः * [ ३६ आत्मनि देवमात्मानमुत्पाद्य यत्रैनं देवमात्मानं दिव्य देवैः सश्लेषयति तदात्माव- दानं यज्ञः ॥१॥ अथ श्रात्मनो यो विराट् यच्छरीरं तस्य कति पयांशाः परत्र यद्यान्ते तत्तपः ॥२॥ यथा ध्यानं वाऽनाशकं वा सर्व मिदमन्त रङ्गाणा मात्मांशानामर्पणं वोध्यम् । यत्र तु बहिरङ्गाणा मात्मीयानामन्नाद्यर्थाना मवदानेन परत्रार्पणं क्रियते तदान मिति भाव्यम् ॥३॥ उत्तरोत्तरं ह्य तद्विप्रकृष्टमिति तारतम्यात् पृथक्छब्दा भवन्ति । सर्वथाऽप्यात्मावदानं तपः । प्रजोत्पत्तौ वा अग्निपरितापेव आत्मनः कश्चिदंशोऽवत्तः सन परनोपयुज्यते तस्मात तत्सर्व तप इत्याहुः । मनसोपहितस्य प्राणस्य वाचमभि यावृत्तिस्तत् तपः ॥ २ ॥ एवं प्राणोपहिताया वाचो या स्वस्मिन् वृत्तिः स श्रमः ॥३॥ एकस्मादेव तत्वान्नानारसरूपार्थोत्पत्तौ तपोविशेपप्रवर्तककामविशेष एव हेतुः । यदेव यतः कश्चिदुरपद्यते सेन्द्रियाद्वा निरिन्द्रियाद्वा सर्वत्रैवं कामतप:श्रमपूर्वैव सृष्टिर्भवतीति सृष्टिमात्रसाधारणो नियमः ।। प्राजापत्यं कुरुक्षेत्रम् । प्राजापत्यं पुरं यज्ञस्थानमस्तीति कारणात् । कुरुक्षेत्रमितिख्यातं क्रियते कर्म तत्र हि ॥१॥ यदिदं किञ्चित् क्वचिदृश्यते तदिदं सर्वमेकैकं प्राजापत्यं कुरुक्षेत्रम् । तमेदं तावन् शुक्रजनितंमृत्युमयं विद्यात् । वागगौद्यौरित्येतत त्रितयं मृत्युः शुक्रम् । अथैतत् सर्व मृत्युमयममृते शुक्रेनिहितं विद्यात वागापोऽग्नि- रित्येतत त्रितयममृतं शुक्रम् ॥२॥ अथ सर्व हीदं शुक्रियमन्नान्नादे ब्रह्मणि समर्पितानि सन्तीत्यग्नीषोमीयं विश्वविज्ञायते ॥३॥ अथेदं सर्वमग्नीयोमीयं वान् ब्रह्मणि सूर्यलक्षणे समर्पितानि भाव्यानि । “वाचीमा विश्वा भुवना- न्यपिता- इति मन्त्रश्रवणात ॥ भातश्चेदं वाङ्मयं विश्वमाहुः ॥४॥ अथेदं वाङ्मयं विश्वमप्सु समर्पितमस्तीति स्मृत्वा सर्वमापोमयं जगदाख्यायते । आपो हीमास्त्रिविधामिगवांसहस्राणि । आदित्यगवीनां सहस्राच्चैतन्यम् । अग्निगवीनां सहस्राच्छरीरे प्राणाः । वायुगवीनां सहस्राच्छरीराङ्गानि ३७ ] * महर्पिकुलवभवम् * जायन्ते । प्रतिसाहस्र त्रिंशता त्रिंशता-गवामहर्गणा भवन्ति । अहनां च पदकारो वपट्कारः स आतानयज्ञः प्रजापतिः ।।५।। अथ आपोमयं चेदं सर्व प्राणे प्रतिष्टितं प्राणमयं विद्यात । सप्तपुरुषश्चायमेकःपुरुपः प्राणमयम्य रूपं भवति ||६|| तदित्थं पञ्च पञ्चजना हीमे पञ्चप्रकृतिकमेकं ब्रह्म । अपिचाहुः- १ 3 ८ प्राण श्रापो बाग अन्नान्नादाविति चतुर्मुखो ब्रह्मप्रजापतिः। यन खलु दिवः परस्तात् पृथिव्याअवस्ताद्, यच्चैतदन्तरा द्यावापृथिव्यौ किञ्चित् सर्व खल्विदं ब्रह्मष्ठितं ब्रह्मविज्ञायते । प्राणः खल्वय वायुः । स नान्तरेणाकाशं संचरति । संचरन्ति चेमानि सर्वाणि दृश्यन्ते । तस्मादाकाशे तदोतं च प्रोतंच । वागाकाशः स्थितिलक्षणः । प्राणोवायुर्गतिलक्षणः । तावेतौ वाय्वाकाशी यजुः पुरुपः । यच्च जूश्चति व्युत्पत्तेः तदेतदाकाशं परमं व्योम नाम || ७ || अर्थ तदाकाशमक्षरपुरुष परमे ब्रह्मणि तदोतं च प्रोतंचास्तीति विद्यान । तदेतदन्तर- तमं परमान्थानम् ॥ ८॥ स एषोऽतरः सर्वेषामेपामेक आत्मा । अ यते च- यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाश्च प्रतिष्टितः । तमेवमन्ये प्रात्मानं विद्वानब्रह्मा मृतोऽमृतम् । तदित्थमेकमक्षरं पंचब्रह्माणि द्व शुक्र- इत्येव * मष्ठावास्थानानि प्रत्यर्थ विजानीयान । - १- अत्तरपुरुषः- अमृतम् [२ २- परमाकाशः यजुपोजूः - ब्रह्मयन् यजुः ३- सप्तर्पिप्राणघनः प्रजापतिः - ब्रह्मयजुषोयन् ४- गोसहस्रत्रयरूपापोमयः ब्रह्मयजुपोयत् ५- वाङ्मयः ब्रह्मयजुपोयत् - ६- अग्निपोमीयः - ब्रह्मयजुपोयत् . * अमृतशुक्रमयः - शुक्रम् - मृत्युशुक्रमयः -शुक्रम् * भृगु-अङ्गिराः * [ ३८ मनसः तत्र तावदिदमाद्यमक्षरं मनः प्राण - वाङ्मयं सत् सृष्टये प्रवर्तते । स वा एष आत्मा वाङमयः प्राणमयो मनोमयः" इति वृहदारयण्क श्रुतेः। मनःप्राणवाक्षु च प्राण एव प्रधानम् । वाङ्मनसयोरक्रिययोः प्राणाधीन- वृत्तिकत्वात् । प्राणो बलम् । बलाश्रिते हि ते वृत्तिं लभेते । न च ते प्राणेन कदाचिद्वियुक्त भवतः । तत्र मनो दिग्देशकालानवच्छिन्नमपि प्राणविशिष्टतया प्राणमात्रानुसारेण महच्च भवति नद्र च । क्षुद्रस्य खुद्रः कामो महतश्च महानित्यनन्तविधं तारतम्य निष्पद्यते । कामवलमात्रानुसारात् तदाश्रितवाचो मण्डलक्षुद्र महद्वा नानाजातीयमुत्पद्यते । ततोऽनन्तान्येतानि मनःप्राणवा- मयानि प्राजापत्यसंज्ञानि कुरुक्षेत्रसंज्ञानि च ब्रह्मरूपाणिसंभूतानि । प्राणजातय एव त्वनन्तविधास्तद्भेदे हेतुः । " विरूपास इदृषयस्तइद् गम्भीरवेपसः । ते अङ्गिरसः सूनवस्ते अग्नेः परिजज्ञिरे" ( १०/६२/५) इत्याद्याः श्रुतयः प्राणजातीनामनन्तविधत्वे प्रमाणम् । तत्राप्येकैकप्राणसामान्यखण्डे कामाधीना नानाविशेषा अवान्तरा उत्पद्ययन्ते । तेपां च विशेषाणां यदविशेष पौर्विक प्राणसामान्यखण्डमाख्यातं तमसत्प्राणमाचक्षते ऋषिप्राणं च । न तद्र पं विद्यमानकार्यरूपवदस्तीत्यसदुच्यते स यत्पुराऽस्मात्सर्वस्मादिदमिच्छन् श्रमेण तपसारिपत् तस्माद् ऋषि म । “ असद्वा इदमग्र आसीत् । ऋषयो वाव तेऽग्रेऽसदासीत् । प्राणा वा ऋपयः" इति हि वाजिश्रुतिः श्रूयते (६/१/१) प्राणा वा ऋषयो दैव्यासस्तनूपावानस्तन्वस्तपोजाः" (ऐ. वा. ६ अ. ३ ख.) इत्यैतरेयश्न तिश्च । तम्मादेवासदभिधानाद् ऋपिप्राणखण्डात् तदन्तः सृष्टयो जायन्ते । तत्र प्राणा वा ऋपयस्तन्वस्तपोजाः इति श्र त्या ऋषि- प्राणानां तपसा सृष्टिजनकत्वमवगम्यते । तथाहि-अव्ययपुरुपालम्बनः क्षरपुरुप साधनो विश्वव्यापी कश्चिदक्षरपुरुषः प्रकृत्या विशिष्टः सन् प्रकृतिब्रह्मणः पाञ्चविध्यान् पञ्चधात्मानमाधत्ते- स प्राणमयः स्वयंभूः । स आपोमयः परमेष्ठी । स वाङ्मयः सूर्यः । सोऽन्नमयश्चन्द्रः। सोऽन्नादमयः पृथ्वीलोकः । तत्र स्वयंभूः सत्यलोको द्यौः । परमेष्ठी जनल्लोकः पृथ्वी । तयोरन्तरतोन्तरिक्षं तपोलोकः । अथ परमेष्ठी द्यौः । सूर्यः पृथ्वी। तयोरन्तरतोन्तरिक्ष महर्लोकः ।

३६ ] * महर्पिकुलवैभवम * 3 अथः सूर्य:स्वर्लोको द्यौः । इयं पृथिवी पृथ्वी । तयोरन्तरतोऽन्तरिक्ष २ १ भुवर्लोकः । अथेयं पृथ्वी भूर्लोकः । तेऽमी सप्तलोका उत्तरोत्तरं क्रमेण संनिविशन्ते । तत्रायं सत्यलोकः स्वयंभू ब्रह्माग्निलोकः । अकसामयजुषां यजुर्ब्रह्माग्निरुच्यते । यच्चजूश्चति व्युत्पत्त्या वाय्वाकाशभेद भिन्नोऽयं ब्रह्माग्निः तत्रानन्ता वायवोऽमी ऋपयउच्यन्ते । ते द्विविधाः उन्मुग्धावयवा उद्बुद्धावयवाश्च । आद्या असत्प्राणाः सत्यलोकेऽवतिष्टन्ते । अथैते तपोलोकमागत्यतप्यमानाः परिक्षुब्धाः सन्तः क्रमेण तृतीये पारमेष्ट्य - जनल्लोके समागता उद्बुद्धावयवा भूत्वा द्वितीयाः पितरो जायन्ते । तपोजाहीमे तपसैव नानारूपा जायन्ते । तत्रोद्वोधावस्थायामवयवधर्मतो भेदादमी ऋपयो- ऽनन्तविधा भवन्ति । तेषु द्वादशाभिस्तुतयः स्मय॑न्ते-भृग्वङ्गिरसौ, अत्रिमरीची, पुलस्त्यपुलहौ, ऋतूदक्षी, वसिष्ठागम्त्यो, विश्वामित्रविश्वकर्माणौ इति । ते एते पितृसंज्ञाः सृष्टिकर्तारः प्राणा वाच्येव योनी अात्मानं सिञ्चन्तोऽक्षरपुरुष मनोविशेषगृहीतबलप्रयोगाद् विभिन्नरूपा एताः सर्वाः सृष्टीरुत्पादयन्ति । तथा चैतरेयश्रु तिराह - " प्राणो वा श्रायुः । प्राणोरेतः । वाम् योनिः । योनि तदुपसंधाय रेतः सिञ्चति । रेतस्तत् सिक्त विकरोति । सिक्तिर्वा अग्रेऽथ विकृतिः । रेतस्तद्विकृतं प्रजनयति । विकृतिर्वा अग्रेऽथजातिः" (१:/३८/३६ ) इति । एप च प्राणी मनसेषितो वाचि सिच्यते । " सोमो वे रेतोधाः ।" इति बहुधा श्रवणात, मोममयं मन एवादी कामयते, मानमरूपं प्रकल्प्य तदर्थ प्राणं नियुक्त । प्राणेन चाहता बाग विक्रियते- त्वष्टा रूपाणि विकरोति । स एप सर्वसृष्टिसर्वसाधारणो नियमः ।। - प्राणस्य सप्त विभागाः । अक्षरगताकाशेप्राणवायुश्चतुर्धा व्यासज्जते - इन्द्रः आत्मा पक्षौ पुच्छम् । अथैष तावषिप्राणः स्वभावात् परिमण्डलरूपः प्रायेण संपद्यते । तथैतत परिमण्डलं वर्म स्वभावतस्त्रेधा विभज्यते । अभयं सामन्त पारावतञ्च । मध्यवैनाभिः, मध्यमभयम् (शत. १/१/२/२३ ) एष खलु मध्यमः प्राणो दूधोपपद्यते स वीर्यो वा क्वचिन्निज़र्यो वा । ब्रह्म क्षत्रं विडिति वीर्यारिण - ( पृ. १/८२/६१ ) : तन्न ब्रह्मवीर्यत्वे. . दिव्य.. : भावोपपन्नो * भृगु--अङ्गिराः * [ १५ २ 3 प्राजापत्य कुरुक्षेत्रे अक्षरस्तरोपरि आकाशस्तरः प्राणस्तरश्च । HA व व E अ eta devr ६. क्षो द्वि . पु bo सा: अ चला. गा प्रा. प्रा षः ष्ठा प्र. ति १- अक्षरः मूलाधारः अमात्रामयः । अक्षरे ओतप्रोताकाशः । २- अथाद्ध मात्रायामाकाशः प्राणमयः । आकाशे ओतप्रोता:प्राणाः । ३- प्राणस्त्रेधा विभक्तः- आत्मा पनी पुच्छं च ।पुच्छंशरीरप्राणः । ४ २ ។ अ म अ- चक्षुश्चैतन्यमादित्यप्राणस्य गावःसहस्रम् । आत्मा उ- प्राणाःसर्वेअग्निप्राणस्य गावः सहस्रम् । पक्षी म्- गात्राणिशरीरं वायुप्राणस्य गावः सहस्रम् । पुच्छम

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[ ४१ * भृगु-अङ्गिराः * - स्वात्मा शूद्रः 1 ऽयमात्मा प्रशान्तवृत्ति तिमान् शान्तिप्रधानो ज्ञानशीलः संपद्यते । क्षत्रवीर्य्यत्वे बीरभावतया स्वतन्त्रवृत्तिमहोत्साहः क्षोभप्रधानः पराक्रमणशीलः संपद्यते । विडवी-त्वेपशुभावतयाऽन्यानुरोधी परतन्त्रवृत्तिराश्रयसापेक्षः परार्थव्यवसायशीलः संपद्यते । एतानि सवीर्याणां रूपाणि । निर्वीर्यास्तु मृतप्रायभावोपपन्न आत्मा पराभिभवनीयो लघुत्वादधीरत्वाचाशु द्रवणशीलो- भवति । यद्यपि सर्वएत्रात्मा मनःप्राण वाङ्मयत्वात् त्रिवीर्या एवास्ति तथापि वैशेष्यानुरोधिनि व्यपदेशे पृथिगिव वीर्य ससाख्या क्रियते । तथा चायमात्मा चतुर्विधो व्यवतिष्ठते ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्चति । चन्द्रस्यात्मा ब्राह्मण: । सूर्यास्य क्षत्रियः । पृथिव्या वैश्यः । एतेपु सतां पशूनां इति विवक्तव्यम्। विशेपानादरे तु सर्वत्र ब्रह्मक्षत्रवीर्यानु- रोधात् प्रजापतिशब्दश्चन्द्रशब्दश्च प्रयुज्यते । तत्र “प्रजापतिश्चरतिगर्भ " इति श्रतः स प्रजापतिरुच्यते । अपि च - तदध्याश्रितास्तन्नहनाः समन्तात प्राणाः प्रथन्ते इत्येतेषां सामन्तप्राणानामेप मध्यमः प्राण इन्द्रः । स मध्यतः सन्निन्धे सामन्तान प्राणानितीन्धः सन्निन्द्र उच्यते । इद्धाश्चैते सामन्तप्राणाः सप्तधा विभज्यन्ते नाभेरू मधस्ताच्च द्वी द्वो पुरुपाविति चत्वारः प्राणा आत्मा सोऽङ्गी । ततो बहिर्धा त्रयः पुरुपाः पक्षपुच्छानीत्यङ्गानि । तथा च " त्रिवृद्वै चक्षुः शुक्ल कृष्णं लोहितम् " ( ३/५) इति कौपीतकच तेः कनीनिकाकृष्णशुक्ल रक्षिवदिदं वर्तुलवृत्त त्रिवद्रूपं संपद्यते मध्यविन्दु- रनिरुक्तोऽक्षरपुरुपसंपरिप्वक्तः प्राण इन्द्रः, स एको भागः । तं परितश्चत्वारः प्राणाः आत्मा, स द्वितीयो भागः । तं परितो द्वौ पक्षावेकं पुच्छमिति त्रयः प्राणा श्रङ्गानीति तृतीयो भागः । अत्राङ्गिप्राणविगमे साङ्गोपाङ्ग विनश्यति । किन्तु यद्विगमे सत्यपि नाङ्गी स्वसत्तातश्च्यवते तदङ्गम् । यथा इत्तपादादि- विगमेऽपि प्राणी जीवत्येव, नाभिहृदयमस्तिष्काघात्मप्राणापाये तु सद्यः प्राणी नियते । तेनैतत्कायारम्भकाणां प्राणानां नभ्येन्द्रेणोपनहनतारतम्यान्मुख्या- मुख्यत्वाभ्यां भेदोऽवकल्पते । यत्र यत्र प्राणोनार्थस्तत्र सर्वत्रैवमिन्द्रामाङ्गभेदात - १ ४२ ] महर्पिकुलवैभवम् । त्रैविध्यमिति साधारणो नियमः (शत. ६/१/१) तच्चे दमात्मप्राणाङ्गप्राण- हूँ विध्यकृतं रूपमिन्द्रस्यात्मनोऽधिष्ठानं शरीरारम्भकभूतानामायतनं विज्ञायते । इन्द्रः आत्मा अङ्गानि प्रजापतिः १ ४ ३ अर्थतेषां सप्तानामङ्गाङ्गिपुरुषाणां श्रीभिरिन्द्रसमिन्धनविशेषादूर्ध्व मुदृढरसरूपाभिः पृथगिवामृतं सप्तप्राणरसमेकपुरुषमात्रं शिरो भवति । यस्वैतच्छिरस्तच्छरीरं तन्मय॑म् । वाक्प्रधान प्रसुप्तमिव निश्च शरीरम । प्राणप्रधानं जाग्रदिव कुर्वद्र पं शिरः । शिरसि च शरीरे च पृथगिव सप्त सप्त प्राणाः श्रयन्ते । देवप्रधानं शिरः प्राणमयं तत्रैतानि भूतानि देवानाश्रयन्ते । आहुतयश्च देवेभ्यः क्रियन्ते न भूतेभ्यः । तेनेदं भौतिकं शिरः कृश्यतो न कृश्यति मेद्यतो न मेद्यति । अथ भूतप्रधानमिदं शरीरं, तत्रैते देवा भूतान्याश्रु यन्ते । आहुतयश्च भूतेभ्यः क्रियन्ते न देवेभ्यः तेनैते देवाः कृश्यतो न कृश्यन्ति मेघतो न मेद्यन्ति । -- तत्र शारीरैः सप्तभिः पुरुपैरेक: पुरुपो भवति तमेतं पुरुषमग्निरित्या- चक्षते । सोऽयं वागापसहकृतः शुक्रोऽग्निर्द्विविधः - मय॑श्चामृतश्च । यो मर्त्यः सोऽग्निश्चित्यो नाम । यथा मनुष्यशरीरे लोमत्वगसुगवसामांसास्थिमज्ज शुक्राणि चीयमानानि चित्योऽग्निर्भवति एप मर्त्यः प्रजापतेर भागः। तत्र सर्वाणि भूतानि श्रितानि ॥१॥ अथैतत्सप्तपुरुपश्रासंभूतैः शिरस्यैः सप्तभिः प्राणैरेकः प्राणो भवति । सोऽग्निरमृतश्चितेनिधेयो नाम । येन येन रूपेणाय चित्योऽग्निश्चीयते । तत्र सर्वत्रायं तत्तदभ्यन्तरेऽनुस्यूतो भवतीति चितेनिधेय उच्यते । सोऽमृतः शुक्रोऽग्निर्वागापःसहकृतः प्रजापत रद्ध भागः । तत्र सर्वेदेवाःश्रिताः । अत्रहिसर्वेभ्यो देवेभ्योजुह वति (शत. ६/१) इति बाजिश्रुती अ यते । अपि च मन्त्रः पठ्यत " अग्नावग्निश्चरति प्रविष्ट ऋपीणां पुत्रो अधिराज एपः । स्वाहाकृत्य ब्रह्मणाते जुहोमि मा देवानां मिथुयाऽकर्भा- ।

* भृगुः-अङ्गिराः * [ ४३ गधेयम् " (तैत्ति//१/३/७/१४) इति नैत्तिरीयपाठः । अथर्ववेद यजुर्वेदे चायं किञ्चित्पाठभेदेन पठ्यते । म]ऽग्नावमृतोऽग्निः प्रविष्टो भवति । इत्थं चातिक्षुद्र कृमिकीटशरीरं वा महाविशालं जगद्ब्रह्माण्डरूपमीश्वरशरीरं वा सूर्यश्चन्द्रः पृथ्वी वा यावदिदं किञ्चिद् दृश्यते तत्सर्वमेकैकं कृत्वा बहि:शरीरा- भ्यन्तरप्राणाभ्यां द्विविभक्त मामृतमयं विद्यात् । इन्द्र एव च मामृताभ्यां द्वधा विभक्तात्मा तषां सप्तानां चित्यानां सप्तानां चितनिधेयानां चैकः संनह नः प्रतिष्ठत्येवमिन्द्रामृतमत्त्यैस्त्रिवृद्भावं सर्वत्र विद्याद् । ८ साम प्रतिष्ठा उक्थम् पशुः इन्द्रः अमृतम् मर्त्यम आत्मा प्रात्मा ४ अङ्गानि | अङ्गानि ३ ३ देवाः | भूतानि ३ पशवः विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे । “इन्द्रस्य युज्यः सखा" (ऋ.) इति श्रु तेर्विष्णुसहायोयमिन्द्रोऽमृतैः शिरोधातुभिर्मत्यैश्च शरीरधातुभिः सहोत्थायोत्थाय तदिन्द्रसहचारिणा विष्णुनासमाकृष्टानामागन्तुकानां दिव्य- रसानामाहुत्या यज्ञजन्यं मामृतधातुमयं रूपान्तरं धारयमाणास्तदुभयाश्रित एव प्रतितिष्ठति । यथा भूपृष्ठे शिलाजतुगैरिकादयो दुर्वावनस्पत्यादयः कृमि- कीटमनुष्यादयश्च । त इमे सर्वे पशुशब्देनाख्यायन्ते । तत्र यो यजस्तं

४४ ]
* महर्षिकुलवैभवम्
शिपिविप्रमाचक्षते । “पशवो वे शिपिविष्टम्। (१/६/८) एपा – प्रजापतेः
पशुष्ठातनूर्यम् शिपिविष्टम् । (१/११/६ ) ॥ इति मैत्रिश्रुतेः । परे त्याहुः-
शिपयो रश्मयः । रश्मिमण्डलस्यान्तर्विष्टं यत्पशुमयं प्रतिष्ठारूपं तच्छिपिविष्ट
यथैपा पृथित्री यथा चौः प्राणिशरीरं वेति ।
असंज्ञान्तःसंज्ञससंज्ञजीवानां पशुत्वम् ।
यद्यपि " एपा बाब पश्विष्टका यह बेष्टका" इतिवाजिश्रुतौ (६/२/१)
ओषध्यात्मा वे पशुः
" इत्यैतरेयश्रु तौ च (६/0/0)। अन्तःसंज्ञजीवा-
नामेवोपधिवनस्पतीनां पृथिवीपोषाणां पशुत्वमाख्यायते । तथापि पोपत्वाविशेषान
तदसंज्ञानांससंज्ञानां च जीवाना मुपलक्षणमास्थेत्रम। पोपत्वं पशुलक्षणमिति
यै रुपकरणैरस्याः पृथिव्याः पोपस्तेषु सर्वेष्वेव समानन्यायान् पशुत्वोपपत्या
त्रिविधानामपि जीवानां पशुत्वाभ्युपगमान् । एतेभ्योऽन्येषामप्युपकरणत्वा-
विशेपानपशुत्वमिप्यते।
द्वन्दांसि पोपा अन्नानि सलिलान्यग्नयोऽपि च ।
पञ्च ते पशवः प्राण धृता आत्मनि शेरते ॥
इति वचनात् ।।
अन्तरिक्ष दिवि चैवं पशवः केचनोपपद्यन्ते तानिह पशुसमाम्नाये
प्रदर्शयिष्यामः ।।
अमृतमय॑सामपशूनां प्राणमयवाकत्वम् ।
यद्यपि प्राणाधारेणेव त्रिप्वपि लोकप्वित्थममृतेन । सार्थ मर्त्य पशु
चाबोचाम । तथापि तं तं प्राणं वाङ्मयं मनोमयंचाव्यभिचारेण विद्यात् । वागेव
च तत्र यश इति वाचमेव नन सर्व वक्त प्रभवामः । अतएव मैत्रायणश्रु तो
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[ ४५ * भृगुः-अङ्गिराः * १ "अन्न वै वाजः । वागधि वाजस्य प्रसवः । सा वै वाक् सृष्टा चतुर्धा व्यभवत् - एषु लोकेषु त्रीणि तुरीयाणी । पशुपु तुरीयम् । या पृथिव्यां साग्नी सा रथन्तरे। याऽन्तरिक्ष सा वाते सा वामदेव्ये । या दिवि सा बृहति सा स्तनयित्नौं । अथ पशुपु” (१।११।५) इत्येवं लोकत्रये ऽप्यमृतमय॑योसक्थयोः साम्नश्च वाकत्वमाख्याय प्रतिलोकं पशुभावम्य वाक्त्वमाचष्टे । स्तनयित्नुरिन्द्रः । * यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौ रिन्द्रण गर्भिणीति । मन्त्रश्रुतेः दिव्योऽयमिन्द्रः पूर्वोक्तान् सर्वान्तर तमादात्मरूपान्नभ्येन्द्रादतिरिच्यते । अग्निवातेन्द्रा अमृताः आत्मरूपाः गतिमन्तो यपि प्रथसा विभूतिः। पृथिव्यन्तरिक्षदिवो माः लोकाः पिण्डरूपा मूर्तयऋचो द्वितीया विभूतिः । रथन्तर वामदेव्यबृहन्ति मामानि प्राणमयसहस्राणि वहिर्मडलरूपाणि तृतीया विभुतिः । अथ पशवः पराश्रितात्मानश्चतुर्थी विभूतिः । तदित्थं मनोमयप्राणगर्भिता वागियमेकधैव अन्तरतमाः अन्न प्रसवः- शुक्रवाक् यजुपि ऋचि सामनिअर्के आत्मनि लोके अमृते उक्थे | म]उक्थे पृथिव्याम् | रथन्तरे पशुषु मनोमयप्राणगर्भितावाक-१ अग्नौ स्वयंभुचि २ वाते अन्तरिक्ष वामदेव्ये पशुषु " बृहति पशुषु " ३ इन्द्र स्त- दिवि नयित्नौ पशुषु .... * ' यथाग्निगर्भा पृथिवी, यथा द्यौरिन्द्र णमर्भिणी। वायुर्दिशां यथा गर्भ एवं गर्भ दधामि ते । (शत. १४७/प्र. । ५ ब्रा.। २१ क.I) इति ।

४६ ] * महर्पिकुलवैभवम् सती लोकत्रयपशुभेदाचतुर्धाविभूयान्न वाजं प्रसूते । " चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदु ह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुप्या वदन्ति " (ऋ. सं. १११६४१४५ ) इति मन्त्रोप्यत्रानु- संधेयः । पशुषु वीर्यनिरुक्तिः। अत्रैषां पशूनामात्मनो यद्यपि निर्वीर्यात्वं प्रागाख्यातं तथापि तदाश्रय- पृथिव्याद्यपेक्षयाऽत्यल्पवीर्यातया तन्ने यम् । वस्तुतस्तु तेषामत्यात्मनोऽपेक्षाकृतं ब्राह्मणत्वं त्रियत्वं वैश्यत्वं शूद्रत्वं वा यथायथं तारतम्यादुपपन्न दृश्यते । नि:ौंक वीर्य-द्विवी--त्रिवीाणामुत्तरोत्तरं चाधिकं माहात्म्यं करप्यम् । पशूनामात्मनोऽभ॑न्द्रत्वम् । इदमन्त्रापरं द्रष्टव्यम् । सूर्यचन्द्रपृथ्वीनामात्मा पूर्ण इति कृत्वा सर्वतः समानभावेन विभवनाद् वर्तुलवृत्तत्वमस्य प्रानाख्यातम् । किन्त्वेतस्मात् प्रजापते विस्रस्तरसानामेकदिकप्रचारितया तदुपपन्नस्यात्मनोऽन्द्रत्वमेवोपपद्यते। तत्र सूर्यदिबिस्रस्तरसादाग्नेदिगवित्रस्तरसादा पुसामात्मा । सूर्यविपरीतदिग विसस्तरसात्सौम्यादविसस्तरसाद्वा स्त्रीणामात्मा उभयं चैतदर्धमर्ध तस्मादपूर्णम् । भर्धत्वादेवायं पशूनामात्मा प्राक् सवीर्यो भवति प्रत्यक तु निर्वीर्यः । वृक्षाद्यन्तःसंज्ञानां कृम्यादिससज्ञाना चात्मा न चतुर्दिक्षु समं वीर्य लभते । वृक्षादीनां मूलरूपाया नाभेरूद्धमत्यन्तमधस्तादत्यल्पं वीर्यम् । ऊर्ध्व शाखोप- शाखादिविकाशेऽपि मृलादधस्तिर्यदिक्ष तहिकाशादर्शनात । चेतनशरीरस्य च नाभेरूधिरविकाशेऽपि पार्श्वयोस्तथा विकाशाभावात् । पुसः स्त्रियो वा शरीरे मेरुदण्डो ऽर्धतमादेव विषुवन्मण्डलात् प्रजायते । यथा वै पुरुषः. एवं विषुवान् । तस्य यथा दक्षिणोऽर्द्ध:- एवं पूर्वोऽ| विषुवतः । यथोत्तरोऽधः- एवमुत्तरोऽधों विषुवतः । प्रवाहुक्- सतः शिर एच विषुवान् । विदलसंहित इव वै पुरुषः । (१८ अ./८ ख.) इत्येतु रेयब्राह्मणश्रतेः। .

* भृगुः-अङ्गिराः * अपूर्णात्वादर्धत्वादेवायमिन्द्र आत्मानमपर्याप्तं मन्यते तस्मादेकाकी न रमते तद्वितीयमिच्छति । यत्तु मूढतमस्य विज्ञतमस्य वा स्वात्मारामत्वं क्वचिदेकाकिनो दृश्यते तद् द्वितीयेच्छावैकल्यमात्रम् । तत्रापि मूढतमस्य द्वितीयसंसर्गजनितानन्दसंग्रहोपचाराज्ञानत्वनिबन्धनमकामत्वं, विज्ञतमस्य तु स्थितिप्रज्ञत्वनिवन्धनमकामत्वं हेतुः । अरतिस्तु विश्वोद्वगलक्षणा स्वात्मारामे- प्वपि नापवार्यते । तस्माज्जीवात्मनोऽपूर्णत्वं सिद्धम् । अपि च प्राणिशरीरोपादानभूतानां रेतसामर्द्ध मर्द्ध विभज्य स्त्रीपुरुषों प्रसुवाते न त्वेकक आत्मा कात्स्न्येन रेतः प्रत्याधातुभीष्ट । उभाभ्यां चात्मभ्यां प्रसूतयो रेतसोः संसृष्ट्या चैक आत्मा निष्पद्यते । तथा च कार्येन रेतोविनि- योगसामादर्शनादात्मनोऽर्धवीर्य्यत्वं प्रतिपद्यामहे । अद्धवीर्य्यत्वाचार्धन्द्रत्व ब्रमः । अतएव च । स्त्रीपुयोगात् पूर्णात्मत्वम् । यत्र पुमान् कृतदारो भवति अथैप पूर्णः संपद्यते । तथा च भूयते वाजिश्रु तौ- "अर्धमुहैतदात्मनो यन्मिथुनम् । यदा वै सह मिथुनेन- अथ सर्वोऽथकृत्स्नः" इति (EI७२।३) । अपि च तत्रैव- “ अझै ह वा एष आत्मनो यज्जाया । तस्माद् यावज्जायां न विन्दते नैव तावत् प्रजायते । असणे हि तावद् भवति । अथ यदैव जायां विन्दते अथ प्रजायते तहिहि सर्वो भवति" (शत. ५/२/१/१०) अपि च तत्रैव तस्मात् स पुरुषोऽर्द्धवृगलमिव " इति ह स्माह याज्ञवक्यः । "तस्याय माकाशः स्त्रिया पूर्य्यत एव" (श. १४/४/२/५) इति । तैत्तिरीयका अप्याहु :- अयज्ञो बा एष योऽपत्नीकः । न प्रजाः प्रजायेरन् अथो अर्थो वा एष आत्मनो यत्पत्नी । यज्ञस्य धृत्या अशिथिलम्भावाय" (ते. ब्रा. ३॥ ३३) इति । अर्धेन्द्रात्मनि मनुशब्दः। तत्र योऽर्धात्माऽयमिन्द्रः पशुशरीरेऽस्मिन्नु पसंनिधत्ते तं मनुमाचक्षते ।

४६ ] * महर्षिकुलवैभवम वा प्रशासितारं सर्वेषामणियांसमणोरपि । रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं तं विद्यात् पुरुषं परम् " || (मनुस्मृति १२अ.) एतमेके बदन्त्यग्नि मनुमन्ये प्रजापतिम् । चिद्ब्रह्मवायुमूर्यचन्द्रपृथिव्या द्यात्मयोनिभेदादेप मनुरप्यधिशरीरं * चतुर्धा सप्तधा चतुर्दशधा विवक्षावशाद भिद्यते । यद्यपि सूर्य्यरसादेबैतन्मनोः सृप्रिमैत्रिश्च ती श्रयते -“स वात्र विवस्वानादित्यो यस्य मनुश्च वैवस्वतो यमश्च । मनुरेवास्मिन् लोके यमोऽमुष्मिन्निति" ॥ (१।६।१२) सूर्यस्यापि ज्योनिनौरायुरिति निरम- स्यायं मनुरायुप: संपद्यते ।। मनुः सर्वः । आयुर्वे मनुः " इति कोपीतकि श्रुतेः (२६।१७ ) ॥ तथाप्येषा श्रुतिवैवस्वतं मनुम.चष्टे न स्वयम्भुवादीन प्रत्याचष्टे । तेपामपि स्वस्वप्रभवादुत्पत्तेः समानन्यायादनिवार्यत्वात् । सर्वो- ऽप्ययमर्धेन्द्रः । यस्तु मनुः सर्व इति कौपीतकिश्रु तो सर्वशब्दः श्रूयते स विश्वगतार्थानां साकल्यापेक्षो न तु प्रभवरसकात्स्न्यार्थः । मनोराजपुरुषत्वम् । अथवा यथा - पूर्णोऽयं सूर्यास्य चन्द्रस्य पृथिव्याश्चात्मा विराजमनु- संसृजति । विराजा नित्यमनुषज्जते । एवमयमर्धेन्द्र आत्मापि विराज जनयति । विराजश्चाभ्युस्थितादमृतरसादुत्पन्नो वैराजः प्राणो मनुरिच्यते । - " द्विधा कृत्वाऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् । अर्धेन नारी तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ।। तपस्तप्त्वाऽसृजंयं तु स स्वयं पुरुपो विराट् । तं मां वित्तास्य सर्वस्य स्रष्टारं द्विजसत्तमाः ।। (मनु.१ अ.३२,३३) इत्यादि स्मरणात्. * मनुस्मृतिः (६१/६३/३६) [ ४६ * भृगुः-अङ्गिराः * - तस्यामित्युपलक्षणं पुमर्धखण्डस्यापि पूर्णान् प्रजापतेरिवापूर्णादस्मात प्रजापतेरप्यविशेषाद्विराडुत्पद्यते - इति बोध्यम् । वैराजात्तु मनो: पुरुषात् - अपय उपतिष्ठन्ते भृग्वङ्गिरोऽत्रिवसिष्ठादयः । मनोरेव च वेदाउपतिष्ठन्ते । मनोचो भवन्ति " (मे. २।११५ ) इति मैत्रिश्रु तावृपदस्य सर्वेतर- वेदोपलक्षकत्वात् । त इमे भग्वाद्या ऋपय ऋगाद्या वेदाश्चेन्द्रादुत्पन्ना अमृताः प्राणा मारसोत्थितेषु शिरस्येप्वमृतप्राणेषु संसृज्यन्ते ॥ विराट अमृतमर्त्यपशूनां विराट्त्वम् । अमृताग्निः, माग्निः पाशुकाग्निश्च त्येतदग्निविशेपत्रितयं संहत्य विराडित्युच्यते । स त्रिपदाया विराजः प्रथमः पादः पृथ्वी नाम । एवं द्वितीयः पादोऽन्तरिक्षम् । तृतीयः पादो द्यौः । प्रतिपादममृतं च मयं च तदुभययोग- रूपः पशुश्चति त्रितयं प्रतिसंहितं द्रव्यम् । पशवो वै विराट" ( मै. १/६/६ ) इति अतिस्तु समुदाये दृष्टाः शब्दा अवयवेऽपि वर्तन्ते इति न्यायादुपपाद्या । चित्यचितेनिधेययोर्मामृतयोरन्नप्राणयोरपि विराट्वाभ्युप- गमात् । तथाहि अन्न विराट् श्रीविराट अन्नाद्य श्रियः । " (कौपी. १७/३) इत्यादिश्रुतेः इन्द्रस्य भोगोपकरणसाधकोऽन्नकोशस्तावद् विराडुच्यते एषैवान्न- माहत्याहृत्य स्वान्तश्चरायेन्द्रायोपनयतीत्यन्न विराडुच्यते । ननु ताण्ड्यश्रु तौ "एतद् वै विराजो रूपं यद्गौः" इति गोशब्देनोपात्तस्य रश्मेविराट् त्व- मुच्यते नान्नस्येति चेन्न । विरश्मिभिः ससृजे सूर्यों गाः " (२५/३) इति कोपीतकिश्रु तौ मन्त्रश्रु त्या रश्मिभिन्नस्यार्थस्य गोत्वप्रतिपत्तेः । तथा चेह- यज्ञो ह्य वेयं नो ह्य ते गोर्यज्ञस्तायते " अन्न ह्य वेयं, यद्धि किश्चान्न गौरेव तदिति ( २।२।४।१३) इति वाजिब तेरन्नमेव गोशब्देन प्रतिपद्यामहे ।

अथवा पश्चतयी गोशब्दप्रवृत्तिः ।। गाव वाक गौविराट् । गौः खल्वेव गौः । गौरिडा। गौरिदं सर्वम् । ( मै. सं. खिलकाण्डे गोनामिके २ प्र. ) इति मैत्रायणिश्रुतेः । तत्र चतुर्थी गौः पार्थिवं तेजः । ५० ] वेदः प्राणः प्रजापतिः २ १ ३ आत्मा पतौ पुच्छम् ४ उक्थप्राण: सामन्तप्राणः प्रतिष्ठाप्राणः इन्द्रः। आत्मा। प्राणः । पशुः २ ३ ४ २ आपः लोकः परमेष्ठी विराड् गौः वाक् । विराट् । गौः। इडा। भोगाः ॥ ४ २ ४ महर्पिकुलवैभवम् سه वाक प्राणः हिरण्यगर्भः मनुः ४ अन्नम् भूतानि चन्द्रमाः अन्नादः देवाः पृथ्वी [ ५१ * भृगुः-अङ्गिराः * + पाद, . वाग गौद्यौरित्वेवं त्रिधा विभक्तपु पृथ्वीरसेपु, द्वितीयो रसः पृथिव्या उत्थाय दिवं यावदभिव्याप्तः सर्वान्नानामुत्पत्तावुपादानभूतो गौरुच्यते । “यो वा इडां धेनु वेदेत्यारभ्य तस्या वा इयमेव पादः, अन्तरिक्षं द्योः पादः, कृषिः पादः।" इत्युक्त्वा असावादित्यः शिरोऽग्निरास्य वातः प्राणो गायव्यभिधानी त्येवं तत्रैवाख्यानान्। पञ्चमी त्विमे सर्वे भोगा स्तत्रैवोक्ताः । तथाच विराजो गोत्वात् ताण्ड्यश्रु तिरुपपद्यते, सर्वभोगानां गोत्वादन्तःश्न तिश्च । अथवोपादानकारणे गोशब्दः ततो या योनिरुदशिष्यत स गौरभवत् 'योनि नामैपः" । इतिमैत्रि श्रुतेः । गवामन्नरसोपनायकत्वा चान्नत्वम् । ज्योतिर्गौराथुरिति त्रिरसस्य सूर्यस्य गोभ्यः सर्वेरसाः सर्वाण्य- न्यानि पृथिव्यामुत्पद्यन्ते तानिन्द्रो भुक्त इति वाध्यम । अन्नोर्क प्राणमयत्वा चैपा विराडेव यज्ञः । सहीन्द्रप्रतिष्ठस्तदर्थश्चेत्यत " सर्वो वै यज्ञ इन्द्रस्यैव । सेन्द्रो यज्ञः । (श. १११।३।४)" ।। इन्द्रो वै यज्ञस्य देवता (श. २।३।२।३८)" इति । यज्ञो वै विष्णुरिति बहुधा श्र यते । - एव श्रयते तेनायं विराड् विष्णुरूपेन्द्रश्चोच्यते । तस्य नित्यमिन्द्रण संयोगात् । तथा च श्रूयते (१।२२।१६) “ विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो वतानि पस्पशे। इन्द्रस्य युज्यः सखा" इति । अन्न वै व्रतमिति ( वाजिश्रुतिः । अपिच प्राणमयकोशे प्रत्यासन्नानां बहूनां प्राणानामपि विराट् त्वमास्थीयते । दशदशिनी विराट् ( कोपी. १७।३ ) “दशाक्षरा विराट " ( ) इत्यादि श्रु तेरस्याः प्राणमयविराजो दशावयवत्वं निर्धारयन्ति । तद्यथा-दश वा एतानग्नीश्चिनुते-अष्टौ धिष्ण्यानाहव- नीयं च गार्हपत्यं च । तस्मादाहुर्विराडग्निरिति । दशाक्षरा हि विराट् । एतान्नु सर्वानेकमिवैवाचक्षतेऽग्निरिति । एतस्य ह्य बैतानि सर्वाणि रूपाणि (श.१०।३।२।२१) इति वाजिश्रु तौ श्रूयते । विभिन्ना वा दशधर्मा ट्विरात्र संहन्यते सा । तद्यथा ५२ ] * महर्पिकुलवैभवम् * १ 3 ४ * प्राणाश्च देवा ऋषयो ग्रहाश्च स्तोमाश्च पृष्टान्तवो दिशश्च । छन्दांसि सामानि दशाक्षरेपा विराट् प्रतिष्ठां लभतेऽभियज्ञम् ।। १ १ बाक् प्राण चक्षुः श्रुतयः पुरीप्यं शिश्नं च नाभि दशमीति प्राणाः । आदित्यवाय्वग्नि विधाभिरग्निस्त्रिधा द्विधा चन्द्रदिशस्तु सोमः ।। २ ।। देवा स्त्रयत्रिंशदहानि चाग्नीपोमीयरूपं द्विविधाहिदेवाः । देवा त्रयस्त्रिशदिहाग्निपूर्वा विप्णूत्तमा एप विराट् स यज्ञः ।। ३ ।। स्तोमेवंषटकार इहास्ति पभिः प्रजापतिः स्तोमचतुष्टयात्मा । इत्थं वषट्कारप्रजापति द्वौ ब्रवीति देवो मुनिरेतरेयः ॥ ४ ॥ प्रजापतिः सप्तदशोऽथ नभ्यःस्त्विन्द्रोऽस्ति कौपीतविगह तो हो। यद् ब्रह्म यत् क्षत्रमिति प्रभेदान्नभ्यं द्विधा ग्राह च याज्ञवल्क्यः ।। ५ ।। इन्द्रो वषटकार इमो तु देवो मतं परेपामपि तत्र नभ्यः । इन्द्रो वषट्कार इहास्ति पड्भिः स्तोमेरथो सप्तदशः प्रजेशः ।। ६ ।। ६ 3 *गौःवाक्-पृथिव्याम् अग्नौ रथन्तरे ॥१॥ अन्तरिक्षे बाते बामदेव्ये ||२|| दिविइन्द्रवहति ॥३॥ पशुपु ॥४॥.वाज (अन्न) प्रसवः । गौ:विराट-प्राणाः देवाः । ऋपयः । ग्रहाः । स्तोमाः । पृष्ठ नि ऋतत्रः । छन्दांसि । सामानि दिशः। द्विविधा विराट-अन्नं श्रीश्च आन्न पृथ्वी यज्ञः श्रीरन्नावयज्ञः गौ:इडा-पृथ्वी,अन्तरिक्षं,द्यौः कृषिः । आदित्यः अग्नि: वातः गायत्री पानः पादः पादः पाद शिरः मुखम् प्राण: अन्निधानी। चक्षुः प्राणाः तनुः 3 * भुगु:-अङ्गिराः * योऽग्निरादित्य इमेऽङ्गिरस्तो भृगोस्तु सोमोऽपि च वायुरापः । भृग्वङ्गिरोभ्यामभिपन्न मेतत् सर्व तदन्तर्निहिता हि वेदाः ॥ ७ ॥ ४ प्रातःसवे मध्यसवे च सायं सोमग्रहाः स्युर्दशतश्चतुस्त्रः । अष्टादशस्तोमविधाः पृथिव्याः पृष्ठानि तु त्रीणि दिवश्च तावत् ॥ ८ ॥ तु प्रवर्धतेऽग्निः क्रमतोऽथ सोमः प्रवर्धतेऽग्नेः क्रमतो निरोधात् । तथा च सोमस्थितितारतम्यादग्नेरवस्था ऋतवः प्रसिद्धाः ॥ ६ ॥ प्राची दिगूजर्जा प्रभवोऽस्ति साद्योंटिंग दक्षिणाऽन्तनिहता प्रतिष्ठा । पृथ्वी प्रतीची जननी श्रियां सा धर्मास्तथापो दिगुदीच्यनूक्ता ।। १० ।। (श. ११शश६।२१) 8 छन्दो विदुर्वाग्नियति द्विधा तद् वाचो हि मामृत जातिभेदात् । छन्दांसि मानि विशेषतोऽटो संकेतितार्थानि निदानशास्त्रे ॥ ११ ॥ आच्छन्दिता वाङ मनसाविनाकृता विज्ञानमाच्छन्दितमस्ति तन्मनः । यागेव वा प्राणमयी मनोमयी मामृताछन्दनमेति नो मनः ।। १२ ।' १ 3 विज्ञानमाच्छन्दितमुच्यते त्रिधा तद् ब्रह्मनाम्ना तदुपाधिरिन्द्रियम् । वेदः स शब्दो यदुपाधिरास्थितो विद्यातु संस्कारमुपाधिमाश्रिता ॥ १३ ॥ २ ५४ ] * महर्पिकुलवैभवम् * १ गायत्री तु च्छन्दस्तेजो बै ब्रह्मवर्चसं ब्रूते । उप्णित्वायु रनुष्ट प् स्वर्ग बृहती' श्रियं च यशः ॥ १४ ॥ 3 पंक्तियज्ञ त्रिष्टुप् विन्द्रियविम्यं पशु वियं जगती । श्रियमन्नं च विराडिति पूर्व छन्दोनिदानमधुः ॥ १५ ॥ वाक्परिच्छेदश्छन्दः । १-मर्त्यवाकछन्दः- ६ गायत्री ब्रह्मवर्चसंतेजः ७ उष्णिक श्रायुः। ८ अनुष्टुप्. स्वर्गः। ६ वृहती श्री:, यशः । १० पङ्गक्तिः यज्ञः । ११ त्रिघुम् इन्द्रियविय॑म् । । । । । पशुः। १२ जगती १० विराट श्री: अन्नम । • छन्दोऽमृतं वेद इति प्रसिद्धं वेदोऽयमृक्सामयजुस्त्रिधातुः ! विधात्वयं विक्रमणं प्रतिष्ठा याज्ञो रसस्तेऽनुविधाः पृथगवत् ।। १६ ।। २-अमृत वाक्छन्दः- ऋक्-प्रतिष्ठावेदः-ऋक-साम-यजुः । साम विक्रमवेदः-ऋक्-साम यजुः । यजुः-यज्ञरसवेदः-ऋक साम यजुः । शास्त्रम् ग्रहः स्तोत्रम् ऋक् यजुः साम उक्थं ग्रहः पृष्टमिति त्रिधारसः प्रजापतेर्यज्ञविधस्य ।

५५ ] * भृगुः-अङ्गिराः * A नाभेर्महोक्थं बहिरूमिवत् ततं महाव्रतं तु प्रधितोऽन्तरूमिवत् । वाग्योनिरग्निर्जलवत् स वाङमयो मनोमयः प्राणमयश्च विक्रमः ॥१७॥ (विक्रमः) वित्र सतेऽनुक्षणमप्यपानतः प्रपूर्यते प्राणनतोऽप्यनुक्षणम् । सोमोऽग्नितामेति च नाभिमागतोनाभेरुपैत्यन्तगतः स सोमताम् ।। १८ ।। लोकश्चितोऽग्निः प्रथमोऽन्तरिक्षं महाव्रतं द्योर्महदुक्थमस्ति । उक्थं दिवं याति महाव्रतं तु स्यादन्तरिक्ष स्थितिरत्रसोऽग्निः ।। १६ ।। (प्रतिष्ठा) वितायते मध्य विराट् परं परं महान्ति पृष्ठानि समांशमास्थिता । (ग्सः) उक्थं तु मूलं विततेर्वितायितं सामांशसाम्यात् स रसोऽग्निरुच्यते ॥२०॥ सहस्रपृष्ठानि भवन्ति साम्यात् तानि त्रिशत्या तिसृभिर्दशद्भिः । (३३३) त्रिभिश्च भक्तानि भवन्ति तत्र प्रापृष्ठमृक् साम परं तु पृष्ठम् ॥ २१ ॥ अग्नेःप्रतानं नतु सोम एप प्रतानमायाति समस्य दात्मा । त्रयीततोऽग्नित्रितयेऽथसौम्यश्चतुर्थवेदोऽग्नि हुतो बहिश्च ॥ २२ ॥ विनायमानः स रसोऽमृतं दृशं प्राप्तस्ततोऽस्तीति विदन्ति दूरतः । वितायमानः स रसोऽभितस्ततो वेदःप्रतिष्ठात्र विराटप्रतिष्ठिता ।। २३ ।। वाचोमितेस्त्रीणि तु सप्त वा चच्छन्दांसि सामानि च सन्ति नाना । वदन्ति सामेति वितानसीमां सप्तत्रयो वास्य भवन्ति भागाः ॥ २४ ॥ पूर्व प्रयाजाः परतोऽनुयाजाः यज्ञस्य तत्रोपयजश्च केचित् । सर्वे-ग्नि सोमान्वयनानुकूला धस्तितो● विविधाः क्रियन्ते ॥ २५ ॥ त्रिविक्रमो विष्णुरतस्त्रिपादः पादास्त्रयस्ते त्रय एव लोकाः । चित्योनिधेयः पशवस्तदित्थं प्रत्येक लोकेऽग्निरयं त्रिधास्ति ॥ २६ ॥ ॥

५६ ] * महर्पिकुलवैभवम् * . एकस्य यद्विक्रमणाद्दशेति तस्यापरं विक्रमणाच्छतं स्यात् । तस्यापरं विक्रमणात् सहस्र तथा त्रिधा विक्रमते स विष्णुः ।। २७ ।। पारावत सोमस्य विरा/परिभक्तित्वम् । - तदित्थमयं सामन्तप्राणानां प्रपञ्च आख्यातः । अथैतद् विराजो यदूर्ध्व किञ्चित् तत्पारावतं नाम । अन्तो वै पारावत इति कौपीतकिराह यदस्मिन् प्रजापत्येऽन्त्यं दृश्यते तत्पारावतम् । पारावतः सोमो विराडऽग्निः । वाभ्यामयमिन्द्रः समाधीयते । ननु-"वैराजः सोमः। अन्नविराट् ।अन्नं सोमः । यश उ वै सोमो राजान्नाद्यम्" (६६) इति कौपीतकिश्रु तो सोमस्यापि विराज्येवान्तर्भाव इतीन्द्रविराडभ्यां द्वैतमेव प्राप्नोति-इति चेत सत्यम् । तस्याः श्रुतेर्यावा पृथिव्यन्तर्गत सोमाभिप्रायकत्वाददोपात । अप् स्थानो ह्ययं सोमः । द्विविधं ह्यपां स्थानं-पृथिव्या उपरिष्ठादादित्या दुपरिष्टाच्च । “अग्ने दिवो अर्णमच्छा जिगास्यच्छा देवां ऊचिपे धिष्ण्याये। यारोचने परस्तात् सूर्यस्य याश्चावस्ता दुपतिष्ठन्तापः" (ऋ.सं. ३।२२।३) इति मन्त्रश्रवणात् । तत्रादित्या दूर्ध्वस्य सोमस्य पारावत त्वं ब्रमः । अधस्तात्सतस्तु सोमस्य विराट्त्वं न प्रतिरुध्मः । तस्यप च तदन्नत्व निबन्धनमग्न्याहुतसोमस्य विराट्वं गौणं द्रष्टव्यम् । अन्न विराट् अन्न सोम इति हेतूपन्यासेन विवक्षितत्वागतेः । अन्नग्राहि कोश लक्षण यज्ञ रूपत्वन्तु विराटल्व मग्ने रेवोपपद्यते । “अग्नि यज्ञः,, एप वै यज्ञो यदग्निः (श २।११४) इति श्रु त्या सोमाहुतिलक्षण प्रदेशस्यैव यज्ञत्वेन बिराट्न सिद्धान्तात् । उभा जिग्यथु नै पराजयेथे न पराजिग्ये कतरश्चनैनोः । इन्द्रश्च विष्णो यदुपस्पृधेयां त्रेधा सहस्र वितदै- रयेथाम् इति मैत्रि श्रुतौ (२।४।४ ) ऋ० सं० ६६६।८ पठिते मन्त्रे विष्णु- मन्त्रप्रसिद्धस्य विराजः साहस्रत्वेनैव सिद्धान्तितत्वात् । तथा हि । व्याख्या- तोऽयमैतरेयक तो मन्त्रः ।

* भृगुः-अङ्गिराः * ५७ ] " "इन्द्रश्च ह वै विष्णुश्चासुरेयुयुधाते । सोऽब्रवीदिन्द्रः । यावदेवायं विष्णुस्त्रिविक्रमते तावदस्माकमथ युष्माकमितरदिति । स इमान् लोकान् विचक्रमे । अथो वेदान् । अथो वाचम् । तदाहुः किं तत् सहस्रमिति इमे लोकाः । इमे वेदाः । अथो वागिति ब यात्" । (ऐ०ब्रा०२८०) इति कौपीतकिनश्च वाचो व्याप्तिमामनन्ति । "एतावान् नै वाचो विकारो भूभुवःस्वरिति" ( कौ० ३१५) इति । यज्ञस्याप्येतदविनाभाव मैत्रायणीया अप्याहुः- "भृभुवःस्वः, एतद्वै ब्रह्मः, एतत्सत्यम् । एतद् ऋतम् । न वा एतस्माद् ऋते यज्ञोऽस्ति" ( १८५ ) इति ॥ त्रय्या विद्ययाप्ययं यज्ञः प्रमीयते--"एतावान् वै सर्वो यज्ञो यावानेप त्रयो वेदाः, तस्यैतद् रूपं क्रियते" || "एतद् वै सहस्र वाचः प्रजातं यदेष त्रयो वेदः" (श.५।४।७। १०) इति ।। तथा च "अस्ति चतुर्थों देवलोक आपः" । (१८१२) इति कौपीतकि अ त्या अथर्वाणं चन्द्रमादेवतम् । आपःस्थानम्" (पू.१।२६) "आपो वै भृग्वगिरसामायतनं चन्द्रमादेवता वैद्यु तश्च" (पू० २।२४) "चन्द्रमा ह्यप्सु चरति (२।६) सोमात्मको ह्ययं वेदः" । (पू० २।७) इति गोपथश्रु तिवचनेभ्यश्चास्य सोमस्य चतुर्थलोकस्थत्वाच्चतुर्थ वेदत्वाच्च ततो- ऽर्वागेव विष्णुविक्रमणसमाप्त्या त्रैलोक्यस्य त्रैविद्यस्यैव विराट्त्वमध्यवसीयते। सर्वकनिष्ठादित्यस्य विष्णोरेव यज्ञात्मकमहाविष्णुशरीरान्त्यावयवत्वात् । तथा चैतरेयश्रुतिः--'अग्नि देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवताः । एते वै यज्ञस्यान्त्ये तन्वौ यदग्निश्च विष्णुश्चेति" (१११११) कौषीतकिरप्याइ-"अग्नि देवानामवराध्यों विष्णुः परायः । ताभ्यामवे- तत् सर्वा देवताः परिगृह्य सलोकतामाप्नोति" इति । (७१) "अग्ना- विष्णू वे देवानामन्नभाजी (१६।१८ ) इति च"। याज्ञवल्क्योप्याह- "अग्नि यज्ञस्यावरार्ध्या विष्णुः परार्ध्यः । तत् सर्वाश्चैवैतवताः सर्व च यज्ञं परिगृह्य दीः इति तस्मादाग्नावैष्णवं निर्वपति" (३।१३।१ ) ५८ ] * महर्पिकुलवैभवम् * इति ।। तथा चान्नादयोऽष्टी वसवः पृथिव्या ऋग्वेदम्य च रूपम् । एकादश नद्रा मध्येऽन्तरिक्षम्य यजुर्वेदस्य च रूपम् । वित्तमा द्वादशादित्याः दिवः नाम्नश्च तपम इत्येतावान यज्ञः । “इतिस्तुतासो असथा रिशादसो ये स्थ त्रयश्च त्रिंशच मनोवा यज्ञियासः" (ऋ. ८१३०१२) इति मन्त्र- श्रवणाञ्च । स विजाः न विराट् सोऽग्निः । तत ऊर्ध्वमापो दिशश्चायं चतुर्थी लोको बेचे तत्याथ सोमस्य ! अङ्गिरसो भृगवश्चेति चतुर्थो वेदः स सोमः नतो विराडन्नमिन्द्राय संगृल्हाति ॥ अन्नभूतः स सामो ऽन्नादाद्विराजाऽति- रिल्यते ॥ इन्द्राग्निसोमाः प्राजापत्यम् । तथा च सर्वान्तरतम इन्द्रः । तमनुपरितो विराड् विष्णुः। तमनुपरितोऽन्न सोम इतीत्यं त्रिवृत्कृतमिदं सर्वमेककं प्राजापत्यं विद्यान् । “यह किञ्च प्राणि स प्रजापतिः । (श.११।६।१७) इति वाजिश्रुतेः ॥ इन्द्रस्यात्मनोऽग्निरन्त- सोमः कु. ने. इन्द्र तावदग्नेन्तजः । इन्द्र इन्द्रियं सोमान् । प्रत्यर्थ चेन्द्रायात्मन अग्नी सोमो हूयते ॥ प्राजापत्यम् । सत्यप्रजापतिरवम् । इन्द्रः प्रजापतिरात्मा गिरिः पिण्डो मूर्तिः। आत्मा त्र. प्राणः म् . , अशितिः रङ्गम । मोमस्य दिग्भ्यः स्त्रयमग्निमच्छोपेतत्वान् । स्वभावाचायं सोमो वैद्यु तेन पुम्पेण संमृत्यते । उभयोराप्यत्वसामान्यान ॥ एतदेव त्रिवृत्करणं अतं * भृगुः-अङ्गिराः * [ ५६ मैत्रायण्यां श्रुतौ द्वितीयकाण्डे । (१ प्र.४अनु.)-"देवा वैसत्रमासत कुरुक्षेत्रे अग्निः सोम इन्द्रः । तेऽत्रु वन्–यतमं नः प्रथमं यश ऋच्छात् तं नः सहेति । तेषां वै सोमं यश आर्छन् । तमभिसमगच्छन्त । स हि यशस्वितमः । स गिरिमगच्छन् । तमग्निरन्वगच्छत् । तौ गिरा अग्नीपोमो समभवताम् । स वा इन्द्रः शिथिर इवामन्यत । सोनी- पोमा अन्नगच्छत् । ता अब्रवीत् याजयतं मेति । तं वा एतया अग्नीपोमा अयाजयताम् तस्मिस्तेजोऽग्निरदधाद् इन्द्रियं सोमः । तत इन्द्रोऽभवत् ।। इति ।। यज्ञस्थल्यां कुरुक्षेत्रशब्दो निरूढः । प्रत्यर्थं चन्द्रायात्मनेऽग्नौ सोमो नित्यमाहूयते ॥ "अयं सो अग्निर्यस्मिन् सोममिन्द्रः सुतं दधे जठरे वावशानः । सहस्त्रियं वाजमत्यं न सप्ति स सवान् सन् स्तूयसे जातवेदः ।। (श. ७।१।१।२२)" इति मन्त्र श्रवणात (सं. १२१४७) ।। आहूयमानः सोमोऽग्नित्वमापद्यते । अग्निश्चायमिन्द्रमात्मानमाप्याययति । आप्याय्यमानस्त्विन्द्रोऽइरहः स्वर्ग गच्छति-इत्येप क्रमो विमुक्तिं यावन्नोपरमते तस्मात् तत् सत्रम । अग्नौ सोमाहुतिर्यज्ञः नान्तरेण यज्ञं किञ्चिदपीदं वस्तुरूपं धत्त । तस्मादेककमिदं सर्व देवयजनभूमित्वात् कुरुक्षेत्रम् । बहुप्वेकत्र सन्नि- विष्टेपु परम्परेणाक्षितेपु यदुल्वणमिद्धा दृश्यते यत्र बुद्धिः प्रथमं संपतति यदन्येषां प्रतिपत्तौ द्वारं भवति तद् यशः । सूक्ष्मस्थूलसन्निवेशे स्थूलं यशः । बाह्याभ्यन्तरसन्निवेशे बाह्य यशः प्रकाशो यशः । वाजिश्रुतौ द्वादशस्य द्वितीय- प्रपाठके, गोपथश्र तौ पञ्चमस्य विशे-"मयि भगों मयि महो मयि यशो मयि सर्वम्" इति विराजोऽक्षितविद्यायां तृतीयस्तरस्य यशस्त्वमाख्यातम । इन्द्राग्निसोमेपु च क्रमसन्निविष्टेपु सोमस्तृतीयो भूत्वा द्वयोरन्ययोरक्षितो भवतीति यशस्त्वं सोमस्योपपद्यते । अत एवं "यशो 3 सोमः" (४।२।३।६) इति बाजिश्रु तिरपीद्धा श्र यते । पर्वत इवाग्नेरुद्गीर्णो भागो गिरिः । प्रत्यक्षो मूर्ति पिण्डो गिरिः । अतएवाध्यात्मं वाक् प्राणचक्षुरादीनां ब्रह्मगिरित्वमाख्या तमैतरेयारण्यके (ऐ. ३॥ १३॥ )। तत्र चान्यदन्यदास्मिन्निगीर्णं भवति-इत्य- ६० ] ** महर्षिकुलवैभवम् * तोऽपि स गिरिरुच्यते । - तृतीयाद्यौरग्नेनिरिः । तत्र ह्यग्नीपोमयोरेकीभावस्तद. ङ्गिरसो रुपम् । अग्निरनुगच्छति सोमं सोमश्चात्मानमग्नौ धत्ते । इन्द्रश्चानु- गच्छत्यग्नीपोमौ तावपि चात्मानमिन्द्र धत्त इतित्रयं त्रिष्वक्षितं भवति नैक मन्येन विनाकृतं भवतीति विद्यात् । यत्तु आन्दविद्यायां वाजिश्रु तौ ( ६।१२।३ ) सोमादक सतोऽस्यादित्यस्य यशस्त्वमाख्वातं तदग्निरूपापेक्षम्। अग्निवाय्वा दित्यानामग्निरुपाणामुत्तरोत्तरस्तर भावेन विन्यस्तत्वात् क्रमेण तत्र भर्गो महो- यशः शब्दा उपपद्यन्ते । ते चास्मिन्नात्मनीन्द्र सर्वेऽप्यात्मानं दधते सर्वेपु च तेष्वजसाऽयमिन्द्र आत्माधीयते तस्मादन्योन्यस्यान्योन्य मक्षितं भवति । अथे- न्द्राग्निसोमष्टी त्वयं सोम एव तृतीयस्तरो बहिःप्रकाश इति कृत्वा यश इत्य- विरोधः ॥ इन्द्रस्य मनःप्राणवाङमयत्वम् । पशुना सलोमकं चैतमिन्द्रामृतमयमयं पिण्डं बीजमित्याचक्ष्महे । तत्र मयो वीजकोशः । अमृतं मन्ना। इन्द्रस्ताभ्यां सुगुमो मुख्यो बीजभागो दलवृन्तात्मक: यथेदं मुख्यबीजं त्रैलोक्यरसाकर्षणैस्त्रिभिः प्राणे स्त्रिवृत्कृतं भवति । तथैतमिन्द्र मनःप्राणवाग्भिस्त्रिधातु विद्यात् । मनसा संकल्पयति । प्राणेन प्रयतते। वाचा विकुरुते प्राणो हि मानसं रूपमनु वाचो रूपं सृजति । तत्र मनःप्राणौ वाचम पीत इति वाच उल्बणत्वाद् वाङ्मय आत्मा। वाचश्वेन्द्र ज्वेकवादात्मायमिन्द्र इत्युच्यते । तथा च कौषीतक्रिश्र तिराह तत् सर्वं आत्मा वाचमप्येति । वाङमयो भवति । तदेतद् ऋचाभ्युदितम् ! नेन्द्राद् ऋते परते धाम किञ्चनेति वाग् वा इन्द्रः । न य ते वाचः पवते धाम किञ्चन " इति (२१७)। इन्द्रस्यामृतमय॑स्य देवयोनित्वं भूतभावनत्वं च । तमिन्द्रमाकाशं त्रु वते । श्रावपनमाकाशम् । अमृते च तत्राकाशे-इन्द्रवागाख्ये विभतामिन्द्रप्राणानां सर्वे विशेपा देवा उच्यन्ते । आग्नेयानामग्निया अग्नि- वावादित्याः । सौम्यानां तु सौम्या वृहस्पतिदिग्भेदाद् द्विविधाः । ब्रह्मणस्पति- भृगुः-अङ्गिराः - [ ६१ वृहस्पतिः । विद्यु द् दिक् । तदित्थं पञ्चैव सर्वे देवाः । अथ माकाशे शब्दवगाख्ये विचरतां मर्त्यप्राणानां रूपाणि भूतान्युच्यन्ते । ध्वनिवाय्वग्नयः संचारिणो विरलावयवाः असंघ स्वभावाः जलमृत्तिके प्रतिष्ठमाने निविडावयवे संघशक्तिविशिष्टे-इति पञ्चैव तानि भूतानि। एपां सर्वेषां समवायाद् भूत- ग्रामरूपोऽयं प्रतिष्ठा प्रजापतिः पशुप्रजापतिश्चेति बोध्यम् ।। इन्द्रब्रह्मतो वेदसृष्टिः। वेदसृष्टिस्तावत् । इन्द्रामृतमय॑विग्रहोऽयमीश्वरो नामाद्यः प्रजापतिरका- मयत । भूयान् स्यां प्रजायेयेति । साऽश्राम्यत् स तपोऽतप्यत । स ब्रह्मव प्रथममसृजत त्रयी विद्याम् । तमन्वेवान्येऽपि सर्वे प्रजापतयः कामयमानास्त- प्यन्तः श्राम्यन्तस्त्रयी विद्यां नाम ब्रह्म स्वस्वविग्रहे पृथगिवोद्भावयन्ति । कारण- धमा कार्यधर्मानारभन्त इति न्यायात । सेयं त्रयी विद्यौव तस्य तस्य सर्वस्यात्मनः प्रथमा सृष्टिः । सा सा त्रयी विद्या तस्य तस्यात्मनः प्रतिष्ठा भवति । ईश्वरो वाऽतिक्षुद्रः कृमिकीटो वा सर्वेऽप्येप प्रजापतिः सर्वाणि च भूतानि तस्यां त्रय्यां विद्यायां प्रतिष्ठितानि दृश्यन्ते । ऋग्यजुः सामानि त्रयी विद्या । एषा चोपलक्षणं चतुर्थ्या अप्यथर्व विद्यायाः। अग्नीसोमाभ्यां विभक्तायां सर्वस्यामपि सृष्ठावग्नि- भक्तिरूपायास्त्रय्या विद्यायां अव्यवहितसंलग्नोर्ध्व देशे सोमभक्तिरूपाया अथर्व विद्याया अव्यभिचारेण सन्निवेशात् । न च सोमाहुतिं विनाऽयमग्निः कुत्रापि रूपं धत्ते । सोमसंस्थैव चाथर्वणीविद्या । 'अन्तरा हि भृग्वाङ्गिरसो वेदा- नुह्यभृग्वगिरसो सोमपानं मन्यन्ते । सोमात्मको ह्ययं वेदः" इति गोपथ- श्रुतेः (५०१७) ऋचामग्निर्देवतं,यजुपां वायुर्दैवतं,साम्नामादित्यो देवतमथ- वणां चन्द्रमादैवतम् । ( १।२६ ) इति च तत्रैव अ यते । सोऽयं त्रय्यां विद्या- यामथर्व विद्योत्तरायां ब्रह्मणि प्रतिष्ठितः प्रजापति मावच्छिन्नत्वाद् ब्रह्मोच्यते । आत्मना ब्रह्मणा सृष्टोऽयं वेदोब्रह्म । वेदावच्छिन्नस्यैवात्मनः सर्वत्र स्वरूपाधाना- नायं वेदो ब्रह्मणो व्यतिरिच्यते । विशिष्टं यकं ब्रह्मोति विद्यात् ।

६२ ] * महर्पिकुलवैभवम् * वेदत्रये सहस्रशब्दः। प्रजापतेरेव सन्तायमानस्य सन्तानभूता इमे वेदा अभवन तथा च मन:- प्राणाभ्यां कृतोदरा बागेवते त्रयो वेदाः । सोऽयमस्य वाचः सन्तानः सहस्त्र- मित्युच्यते । “एतह सहत्र वाचः प्रजातं यदेते त्रयो वेदाः" इति श्रुतेः । त्रय इत्युपलक्षणं चतुर्थस्वापि नान्तरीयकत्वात् ॥ तैत्तरीयब्राह्मणे साहस्रस्यास्या- ग्निपोपत्वं श्रूयते-'अग्नियवर्तयत स साहस्रमपुष्यत् । पृथिवीन्यवर्तयत सोपधिर्वनस्पतिभिरपुष्यदित्यादि (२ कां० ।। 1 ) तिलो वाच ईश्यति प्रवन्हिरिति मन्त्रत्त्येहा प तात्पर्य सम्भवति ॥ तस्येतस्य वीजपिण्डस्य शिपि- विष्टाख्यस्य विष्कम्भः सहस्रप्रगुणितो यावदवकाशे प्रथमानो ध्रियते तावदव- काशा इमे वेदा इत्यतः सहस्र नाम । “सहस्रधा पञ्चदशान्युक्था यावद् द्यावापृथिवी तावदित् तत् । सहस्रधा महिमानः सहसू यावद् ब्रह्म विष्ठितं तावती वाक् । ( ऋ० सं० १०।११४८ ) इति मन्त्रश्रवणात । तथा चास्य प्रज्ञापतेर्द्व पृष्ठे सम्पद्यते-इन्द्रामृतमय॑पश्चन्तं शिपिविष्टाख्यमन्तः पृष्ठम् । सहस्रान्तं तु बहिः पृष्ठम् ।। प्रजापतेर्दशव्यूहाः। m 3 प्रजापतिश्चेत्थं दशविधः सम्पद्यते-इन्द्रस्तावदनिरुक्तोनभ्यो वा प्रजापतिः । आत्माङ्गलक्षणोऽमृतभागो देवः शिरोऽग्निनिधेयाग्निर्वा प्रजापतिः । श्रात्माङ्ग- लक्षणो मर्त्यभागो भूतं शरीरं चित्याग्नि प्रजापतिः । श्रोपधिवनस्पतिचेत- नादि प्राणिजातानि पशुः प्रजापतिः। त्रयी विद्या तु ब्रह्म वा यन्त्री वा सहलं या प्रजापतिः । अथर्ववेदस्तु ब्रह्म वाऽथर्वा वा प्रजापतिः । चातुर्विद्यमात्मनश्छा- दतम् छन्दो वा प्रजापतिः। मान्तः स प्रतिष्ठा वा यज्ञो वा विराड् वा प्रजा- पतिः ! पश्चन्तस्तु विराड् वा शिपिविष्टो वा यज्ञो वा प्रजापति.! सहस्रान्तो- जयन्तिोचा सर्वः प्रजापतिरिति ।। 2 । .

* भृगुः-अङ्गिराः -
ददित्थं दशविधत्वेऽपि प्रधान्यात् त्रैविध्यमेव नेयम् नम्यइन्द्रोऽनिरुक्तः
प्रजापतिः सा प्रतिष्ठा । शिपिविष्टो विराट् प्रजापतिः तदुक्थम् । सर्वे लोकाः सर्वे
वेदाः संवत्सरः प्रजापतिः तत्साम । इत्थमेतं त्रिवृत्कृतमात्मानं विद्यात् ।
प्रजापतेः स्थानानि
*
१. | हृदय ।
२
चितेनिधेयाग्निरमृतो देवग्रामः, प्राणाः ।
चित्याग्निर्मो भूतग्रामः शरीरम् ।
पाशुकाग्निः, प्राणिवर्गः, पशुमामः, पोषाः ।
५
वेदत्रयम् ।
६
अथर्ववेदः ।
चातुर्विद्यान्तः ।
मान्तः ।
8
पश्वन्तः।
१०
सहस्रान्तः।
7
.

६४ ] * महर्षिकुलवैभवम् - अत्रेयं वाजिश्र तिईटव्या-"आपो हवा इदमग्रे सलिलमेवासता अकामयन्त-कथं नु प्रजायेमहीति । ता अश्राम्यत् । तास्तपोऽतप्यन्त । तासु तपम्तप्यमानासु हिरण्मयमाण्डं संबभूव । अजातो ह तर्हि संवत्सर आस । तदिदं हिरण्मयमाण्डं यावत्संवत्सरस्य तावत्पर्यप्लवत । ततः संवत्सरे पुरुषः समभवत् । स प्रजापतिः । स इदं हिरण्मयमाण्डं व्यरुजत् । नाह तर्हि काचन प्रतिष्ठास । तदेतमिदमेव हिरण्मयमाण्डं यावत्संवत्सरस्य वेलासीत् ताबद् विभूत् पर्याप्लवत । स संवत्सरे व्याजिहीर्षत् । स भूरिति व्याहरत् । सेयं पृथिव्यभवत् । भुव इति तदन्तरिक्षमभवत् । स्वरिति साऽसौद्यौरभवत् । स एवेमान् लोकान् जातान् संवत्सरे प्रजापतिरभ्युदतिष्ठन् । स सहस्त्रायुर्जज्ञे । सोऽर्चच्छाम्यंश्चचार प्रजाकामः । स अात्मन्नेव प्रजापतिमधत्त । स आस्येनैव देवानसृजत । ते देवा दिवमभिपद्यासृज्यन्त । तस्मै स सृजानाय दिवेवास । तदहर कुरुत । अथयोऽयमवाङ प्राणस्तेनासुरानसृजत । त इमामेव पृथिवी मभिपद्या सृज्यन्त | तम्मै स सृजानाय तम इवास ! तां रात्रिमकुस्त ते अहो रात्रे । स ऐक्षत प्रजापतिः । सर्व वा अन्सारिपं य इमा देवता असूनीति । स सर्वत्सरोऽभवत् । सर्वत्सरो ह वै नामैतद् यत् संवत्सर इति । स ऐक्षत-इमे वा आत्मनः प्रतिभामसृषि यत्संवत्सर मिति तस्मादाहुः प्रजापतिः संवत्सर इति । ता वा एताः प्रजापते रधिदेवता असृज्यन्त-अग्निरिन्द्रः सोमः परमेष्ठी प्राजापत्यः । ताः सहश्रायुपो जज्ञिरे ता अर्चन्त्यः श्राम्यन्तश्चेतः । तत एतं परमेष्टी प्रजापत्यो यज्ञ मपश्यद्यदृर्शपोर्णमासो ताभ्यामयजत । स ापोऽभवत् । आपो ह वा इदं सर्वम् ! तां यत् परमे स्थाने तिष्ठन्ति तस्मात् परमेष्ठी नाम । स परमेष्ठी प्रजापतिं पितरमत्रवीत् । काम वा अहं यज्ञमदर्श तेन त्वा याजयानीति । तमयाजयत् । स इष्ट्वा अकामयत अहमेवेदं * भृगु:-अङ्गिराः * ६५ ] -- .. सर्वं स्यामिति स प्राणोऽभवत् प्राणो ना इदं सर्वम् , अयं वा प्राणो योऽयंपनते । स प्रजापतिरिन्द्रं पुत्रमयाजयत् । स इष्टना नागभनत् , बाग वा इदं सर्वम् । तस्मादाहुरिन्द्रो नागिति । स इन्द्रोऽग्नीषोमा वयाजयत् तयोरन्नाद एवान्यतरोऽभवादन्नमन्यतरः । अन्नाद एकाग्नि रभवत् । अन्न सोमः । अन्नादश्च वा इदं सर्वमन्नञ्च । ता वा एताः पञ्च देवताः एतेन कामप्रेण यज्ञेनायाजयन्तेति ॥ (शतः ११।१।६। १। १६ ),, , निर्वासनेऽभिचरणे च त्सरिधातुः “परमेष्ठिनो ना एप यज्ञोऽग्रासीत् । तेन स परमां काष्ठामगच्छत् । तेन प्रजापति निवासयत् । तेनप्रजापतिः परमां काष्टामगच्छत् । तेनेन्द्रं निरवासयत् । तेनेन्द्रः परमां काष्ठामगच्छत् । तेनाग्नीषोमौ निरवासयत् तेनाग्नीषोमों परमां काष्ठामगच्छताम्'। इति तैत्तरीयक (सं.)निर्वासन प्रयोगात् । प्रजापतेः सर्वात्मनः प्रतिमारुपेण निर्वासनं संवत्सरस्त इमे देवाः । त्सर छद्मगतौ गुप्ता प्रच्छन्ना गतिःत्सरः। यथा मृगयुर्गच्छति । यथा वा शशः शुने व्यापादकायात्मानं गोपायित्वा दूर मपसरति । तथा प्रजापते रसाः प्रच्छन्नं बहिर्धा गता; संवत्सरः इन्द्रवाचं परितोऽग्निरन्नादः । तं परितः सोमोऽन्नम्। सर्वमभिव्याप्यैतदापः प्रचरन्ति । परोवरीणः प्राणो वायु रिन्द्राख्यः पय॑न्तमभिव्याप्नोति । एतच्च पृथ्वी चन्द्रविग्रहात्मक प्रजापत्य सम्बन्धेना,ख्यातम् । तत्रैव दिवमभिपद्य दिवा देवानां, पृथ्वी मभिपद्यतु रात्रावसुराणां संभाव्यमानत्वात् ! पृथ्व्याः स्वे रश्मयः स्तामसत्वादसुराः । सूर्याहितरश्मयस्तु पृथिव्याघातेन प्रतिफलिता दीप्यमानत्वा- देवाः । सूर्ये विन्द्र प्रकर्षान्नामी असुराः स्थानं लभते । तत्र रारभावात् । तथाच अ यते वाजिश्रु तो"। "तां स्तत एव पाप्मना विध्यत् । ते तत एव पराभवत् । तस्मादाहुः-नैतदस्ति यद्दवासुरं यदिद मन्वाख्याने त्वदुद्यते इतिहासेत्वत् तस्मादेतद् ऋचाऽम्यवृत्तम्" । "न त्वं युयुत्से कतमचनाहन तेऽमित्रोमघवन् कश्चनासीत् । मायेत् सा ते यानि युद्धान्याहु द्य शत्रं नं नु पुरा युयुत्से,, । इति (श. ११।१।६।१०) प्राणः पूर्वपक्षः आप्यायनक्रमः । तस्य प्रतिपदशेष्टिः । अपानोऽपरपक्षोऽपक्षयक्रमः । तम्य ..

السا * महर्पिकुलवैभवम् * प्रतिपत् पूर्णमासेष्ट्रिः । प्राणापानाभ्यां हीसे देवासुरा असृज्यन्तेति दर्शपूर्णमासेष्ट्या तदुत्पत्ति माचक्षते । पृथिव्याः सम्बन्धश्च मैत्रीश्रु तौ श्रू यते । स वै त्रिवृत एव प्राणानायतनमचायत् । तैः प्रजा असृजत । उर्ध्व उदतृणत् पूर्वपक्षः पञ्चदशस्तेन देवानसृजत ते देवा ऊर्धा आप्यावन्त । अवाङबातृणदपरपक्षः पञ्चदशः तेनासुरानसृजत । तेऽसुरा अवाञ्चः प्राध्वंसन्त । दिवा देवानसृजत नक्तमसुरान् । ते देवाः शुक्ला अभवन् कृष्णा असुराः । सत्येन देवानसृजता नतेनासुरान् ते देवाः सत्यमभवन्ननृतमसुराः । दक्षिणेन हस्तेन देवानसृजत सव्येनासुरान् । ते देवा वीर्यवन्तोऽभवन् । मृद्वाअसुराः स तदेवनाविन्दत् प्रजापतिर्यवाहोण्यत् । नो अस्यान्यद्धोतृत्वमासीत् प्राणात् । स वा इन्दुमेवान्तरात्मन्नायतनमचायत् । वीर्यवेप्राणः । वीर्यमिन्द्रः । वीर्य एववीर्यमजुहोत्., इति । अत्र त्रिवृत प्राणः पार्थिवोऽग्निरेकविंशआदि इति तैत्तरीयके परिभाषणात् पृथ्वी विषयकत्वंलभ्यते । पृथ्वी प्राणायतने हीन्द्रप्राणे दिव्य प्राणस्या हूयमानस्याप्यायनापक्षयाभ्यां देवासुर स्वरूपसिद्धिः । अत्रदेवा असुरा इत्युपलक्षण मितरेषामपिनभस्थानामम्भस्थानाम" नभांसि-देवाः, पितरो, मनुष्याः, असुराः, ( सर्वेषु हवा एतेप्वम्भो नम इवेति मैत्रिश्रुतेः । ( खिलकां.गो. २ प्र.) “तानि वा एतानि चत्वार्य म्भांसि देवाः, मनुष्याः पितरोऽसुराः । तेषु सर्वेप्वम्भोनम इवेति तैत्तरीय श्रुतेश्च ।" (. बा. २।३।८) तेपां चतुर्णा सयोनित्वात तेषां चैषां गौर्योनिः । एषां चतुर्णा मुत्पत्यनन्तरम्' । ततो या योनि रुदशिप्यत सा गौ रभवत् । योनि बैनामेप" । इति मैत्रिश्रुतेः । तत्र पृथिव्या वा चन्द्राद्वां प्रतिफलिता गावो यावत्यो दिवमभिपद्य प्रवर्तमानाः सूर्यदिशि प्रत्यावर्तन्ते ते देवाः । सूर्येतर दिक्षु तिरश्च्यः प्रत्यावर्तमानाः सोम संसृष्टा: सूर्यगावः पितरः । “सर्वासु दिनु पितरः,, (मैत्रि १२७।१६) इतिश्रुतेः । "नियंञ्चापितरः” इति श्रुत्यन्तराच्च । सूर्यप्रतिदिगदृष्टाः पृथिव्याश्चन्द्रस्य वा ! चत्वारि [ ६७ * भृगुः-अङ्गिराः * स्वीयागावोऽसुराः । अज्योतिष्ट्वादिमे कृष्णाः । त्रयोऽप्यमी निर्मनस्काः । यास्तु पशूनां प्राणिनां मनोयुक्ता गावस्ते मनुष्याः गावस्ते मनुष्याः । चक्षुर्विभक्ति श्रुत्या ह्य तेनूच्यन्ते । तथा हि मैत्रि श्रुतिः “यद्दिवा पश्यामस्तहबानां चक्षुषा पश्यामः । असौ वा अादित्यो देवानां चक्षुः । यज्ज्योत्स्नायां पश्यामस्तत्पितॄणां चक्षुपा पश्यामः । चन्द्रमा वै पितृणां चक्षुः । यत्तमिस्रायां पश्यामस्तन्मनुष्याणां चक्षुपा पश्यामः । एतावद्वाव स्वं चनुः यदग्नेरन्त पश्यामस्तदसुराणां चनुषा पश्यामः । उच्च वा एप दीप्यते निचरिप्यति,,--इति । तथा चेह पृथिव्यां चन्द्र वा यावन्तोऽग्निवारादित्या अमृताः प्राणास्ते देवाः। सौम्या प्राणाः पितरः । भौतरसात्मका; माः प्राणा असुराः । हिरण्मया दिवाः । राजताः पितरः आयसा असुराः । एत एव च त्रयः प्रज्ञा युक्ताः प्राणा मनुष्या इति सिद्धम् । यद्यपीदं प्रजापत्य मिन्द्राग्निसोमैत्रिधातुपूर्व व्याख्यातमिह त्वद्भिस्तचतुर्धा व्याख्यायते इत्यापातविरोधः प्रतिभाति तथा प्यपां विद्युत इव सोमेन सालोक्यात् सलोकेषु च सर्वेषु सर्वेषामन्यतमस्य वा ग्रहणे कामचाराददोषात । अपि चैता श्रापो द्विविधाः अप्रिया परिणताश्च । ईश्वरविग्रहेऽभिजिब्रह्मविग्रहे सूर्यविग्रहे पृथ्वीविग्रहेऽपि वा पूर्व पूर्व विग्रहावच्छेदिका अप्रियाः । ताभ्य एवोत्तरोत्तर विग्रहावच्छेदाय परिणम्यमानाः परिणता तत्राग्रिया एवैता उत्तरोत्तर दहर स्वरुपाधानायान्यथा प्रवर्तन्त इति ना पूर्वत्वे । परिणतानाम् । इन्द्राग्नि सोमास्तु परिणताभ्यः प्रजायन्ते इत्यपामत्राधिक्येऽपि प्रस्थानभेदाद- विरोधः । प्रतिविग्रहमद्भ्यः प्रजातानां देवानां त्रित्वेनैवावच्छेदम्येष्ठत्वात् । तत्रापि द्वौ विभागौ द्रष्टव्यौ । इन्द्रोऽन्यः । अग्नीषोमो चान्यः । मनः प्राण वाङ्मय ब्रह्मात्मकत्वेऽपि वाचो यशस्त्वादयमिन्द्रो वागिति श्र यते । स हि यज्ञाधिष्ठातृत्वाद् यज्ञफलभोक्तृत्वाचै को विभागः । अग्नीपोमौ तु यज्ञस्वरूपा रम्भकत्वादन्यो विभागः । तत्राग्नेस्त्रैविध्या दग्निवाय्वादित्य सोमैश्चतुष्टयात्मक मपीमं विभाग मिच्छन्ति । तथाहि-भगवान् याज्ञवल्क्यः प्राह (६।-) त्रयी विद्या ब्रह्म । सा प्रतिष्ठा । तस्यां प्रतिष्ठितो ब्रह्मप्रजापतिस्तप्यन् ६८ ] * महर्षिकुलवैभवम् * बाचोलोकात् अपोऽसृजत । अाभ्योऽद्भयोऽधिप्रजायेयेति कामयमानः प्रजापतिरनया त्रय्या विद्यया सहापः प्राविशत् । यावती सा विद्या तदेकमान्द मस्ताख्यं भर्गस्याख्यं वा समवर्तत । तुलवृत्तरूपो गर्भकोश आन्दम् सामान्ता च सा पृथिवी । योऽपां गर्भ आसीत् सोऽग्निरभवत् । स यज्ञः प्रजापतिः । स यज्ञो वेदैरतायते । एतावान् नै सर्वो यज्ञो यावानेष त्रयो वेदस्तस्यैतद्र पं क्रियते । एप योनिराशयः एतस्मिन्नाशये त्रिधातु रिपा विधा शेते । एतद्वै सहसू वाचः प्रजातं यदेप त्रयो वेदः ।। (५४७) सैपा त्रयी विद्या ब्रह्म व प्रथममसृज्यत मुखं ह्य तदग्नेर्यद् ब्रह्म । यदेतद् ब्रह्मकपाल मासीत् सैषा पृथिव्यभवत् । सोऽकामयत-आभ्योऽद्भयो ऽधीमां प्रजनयेयमिति तां संक्लिप्याप्सु प्राविध्यत् । तस्यापः पराङ रसोऽत्यक्षरत् स कूमोऽभवत् । अथ यदूर्ध्वमुदौक्ष्यत तेनैता अद्भ्यो वक्ष्यमाणा नबसृष्टयो ऽभूवन् तत्र तावदियं पृथ्वी सर्वाप एवानुव्यैत् । तदिदमेकमेवरूपं समदृश्यत प्राप एव । तंद्र पः स श्रान्तस्तप्तः फेनमसृजत । फेनरूप: श्रान्तस्तप्तः क्रमेणमृदं शुष्का मूप सिकतं शर्करा मश्सान मयो हिरण्य मोपधि वनस्पत्यसृजत । तेनेमां पृथ्वी प्राच्छादयत् । यथा त्वगसृग्वसास्थिमज्जादयो लोमानि च शरीरधातवः शरीरमग्निं प्रच्छादयन्ति । तथैते अपफेनोषसिकता शर्करा श्मायोहिरण्यानि ओषधि वनस्पत्यादीनि पशुरूपाणि च पृथ्वी धातवः पार्थिवमग्निं प्रच्छादयन्ति । ता एता नव सृष्टयश्चीयमाना श्चित्याग्निरूपम् । सा पृथ्वी नाम । अथ योऽस्यां पृथिव्या मग्निः स चिते निधेयः । स पृथ्वी लोकपालः । तदेतदमृतं मर्त्यच्च- त्युभय मिन्द्र ण नद्धं समिद्ध, विद्यात् । यस्तु ददुपरिष्टात् संनिविष्ठः कूर्मः सोऽमृते साहस्र मो रसः पश्यकाकार परिच्छिन्नसंनिवेशतया कश्यपो नाम । ल च दधि घृत मधुमयोऽन्यत्रव्याख्यातः । तत्र दध्येव पृथिव्या रूपं विद्यात । तदित्यमिदं प्रथमान्दं व्याख्यातम् ।। १ ।। -- ततः सोऽग्निना पृथिवीं मिथुनं संभूय द्वितीयमान्दं पोपाख्यं महस्याख्यं वा समवर्तयत् । तदन्तरिक्षम् । यो गर्भोऽन्तरासीत् स वायुः । अथ वायुना * भृगुः-अङ्गिराः * [ ६६ सोऽन्तरिक्षं मिथुनं संभूय तृतीयमान्दं यशस्याख्यं समवर्तयत् । सा द्यौः यो गर्भः स आदित्यः । अथादित्येन स दिवं मिथुनं संभूय चतुर्थमान्दं रेतस्याख्यं समवर्तयत् । ता दिशः । तत्रेदं रेतश्चन्द्रमा असृज्यत । त एते चत्वारो लोका अभवन् । त्रयोऽग्निलोकाः । दिगन्त्यः सोमलोकः । अथैषु लोकेषु स मनसा वाचं मिथुनं संभूय क्रमेण प्रजा अमृजत । वसून रुद्रान्-आदित्यानग्निलोकेषु । विश्वान् देवांस्तु दिक्षपादधात् । तदित्थ मयमाप्यः सौम्यो दिश्यो वैश्वदेव्यो वा चतुर्थो विभागो भगवता याज्ञवल्क्येन ( श. ६।१।२ ) वेद चातुर्विध्यानुरोधात् स्थूलमानादेकधैव समस्याख्यात. तदनुरोधेनैव च कौपीतकादयः प्राहुः "चतुष्टये वा इदं सर्वम्" ( २।१।७) इति ।। वस्तुतस्तु पूर्वेभ्यस्त्रिभ्योऽनन्तरमिह द्वौ विभागौ द्रष्टव्यो। ब्राह्मणस्पत्यो बार्हस्पत्यो वा दिश्यो वैश्वदेव्य एकः । तचतुर्थं रेतन्यमान्दम । मनसा वाचं मिथुनं संभूय तु तत्र सोऽङ्गिरसोऽजनयत् । त इष्टाप्स्वभवन । अथ वैद्य त प्राप्यो वैश्वदेव्यो द्वितीयः । तदुत्तमं पञ्चमान्दम् । मनसा वाचं मिथुनं संभूय तु तत्र भृगूनजनयत । त इह दिक्ष्वभवन् । यथा चाग्नि ववादित्याना मान्दत्रयधिष्ठातृणामग्नित्वं तथैतयोब्रह्मणस्पति विद्यु तोश्चतुर्थ पञ्चमान्दाधिष्ठात्रोः सोमत्वम् । परे त्वनयोरग्नित्व मभिप्रत्यै तदान्दयोर्द्विदैवत्य मिच्छन्ति । "ब्रह्म वै बृहस्पतिः क्षत्रं सोमः । एतौ ह वा अस्य सर्वस्य 'प्रसवस्येशाते यदिदं किञ्च । (१० अ०)।" इत्यैतरेयश्र ती बृहस्पतिसोमयोर्भेदेन व्यपदेशात् । "आपो वै भृग्यङ्गिरसामायतनं चन्द्रमादेवता वैद्यु तश्चेति" (पू० २।२४) । "चन्द्रमा वैद्य तश्च भृग्वाङ्गिरसामिति च" (पू० ५।१५) । गोपथश्रुती बिधु त्सोमयो देन व्यपदेशात् । उभयधर्मानुयायित्वादग्निविशेषत्वं सोमबिशे- षत्वं च वृहस्पतिविद्यु तोद्रष्टव्यमित्यपरे। परे त्वाहुः तयोभिन्नत्वादेव तत्तदुपलक्षित लोकस्य भिन्नत्वसित्यान्द दैविध्य मुपपद्यते । अपां दिशां चोभयत्रा विशेषेण सत्वात्तुभयोरैक्यं पश्यन्ति । अत एव च लोकवेदयोश्चतुष्ट्वं श्रयते । तद्यथा कौषीतकि तौ- - -- * महर्पिकुलवैभवम् * "अस्ति च चतुर्थो देवलोक आपः,, ( १८१२ ) इति यथा चाथर्वणश्रु तौ- "चत्वारो वा इमे लोकाः पृथिव्यन्तरिक्षं द्यो रापः । (२।१६ ) इति ।। चत्वारो वा इमे वेदा:-ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदो ब्रह्मवेद इति ॥ चत्वारो वा इमे देवाः अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमाः (२।१६ ) इति ॥ "यद्यप्यपां विकारत्वाचत्वारोऽपि लोका आप एच सन्ति तथापि त्रिष्वाद्य विकाराधिक्यात यथा वैरूप्य भूयस्त्वं न तथा चतुर्थ इत्यतो दिशा मपत्वेनैव व्यवहारः । सोऽयमासु प्रत्यन्तत्व निबन्धनो दिक् छन्दः । तेन पञ्चलोकाभ्युपगमपक्षे आपो दिशश्च भिद्यन्ते । पञ्चमस्य दिक्त्वेऽपि चतुर्थस्य दिक्वाभावात । चतुर्लोकाभ्युपगमपक्षे त्वापो दिशश्चैकोऽर्थः। अत एवाथर्व संहितायां चतु- र्थस्योनचत्वारिंश सूक्त "पृथिव्यामग्नये अन्तरिक्षे वायवे दिव्यादित्याय दिनु चन्द्राय समनमत्,, (४।३६।१।८) इति पृथिव्यादिलोक प्रसङ्ग चन्द्रसन्बन्धेनाप स्विति वक्तव्ये दिक्ष्विति श्रूयते । प्रथयञ्चतुर्थे सौम्यान्दे वैश्वदेव्यं वाजिश्रुतौ अयते । तदपीह द्विविध विद्यात । अग्नियम आदित्य इत्येतेऽङ्गिरसः । एषां त्रयाणां संहतानां यदेकं रूपं तदाङ्गिरसं वैश्वदेव्यम । सोमो वायुराप इति भृगवः । तेषां यदेकं रूपं तद् भार्गवं वैश्वदेव्यम् । “एते वै सर्वे देवाः यद्विश्वे देवाः,, । (४।१४) इति कौपीतकिब तिरापेक्षिकानेकदेवत्यमभिप्रेति न त्वेकहेलया सर्वेपां देवानां समुच्चये तत्तात्पर्य नेयम् । तथा सति दिव्यन्यस्यान्तरिक्षेऽन्यस्य वैश्वदेवस्य संभवापत्तः । विभिन्ना नेक देवतान्वयभेदात्तु वैश्वदेव्यानि भिद्यन्ते । तत्रैत्योश्चतुर्थ पञ्चमान्दयोः सौम्यं वैश्वदेव्यद्वयं विद्यात् । इत्थं चाग्निना वसुभिर्वायुना रुदै रादित्येनादित्यै बृहस्पतिनाऽगिरोभि- विद्यु ता भृगुभिश्च कृतान्येतानि पञ्चान्दानि प्रत्यर्थमुपपद्यन्ते । त इमे पञ्च लोकाः। तेपा मुत्तरोत्तर परिवर्द्ध मानायतनत्वं श्रयते मैत्रायणीये । "उत्तर उत्तरो हि लोको ज्यायान्., इनि ।। तेप्वेतेषु पञ्चत्वान्देषु लोकेषु याप्रजान्ता देवा उच्यन्ते देवता द्वधा विभज्यन्ते । देवाश्च पितरश्चेति । अग्नियशस्विनः प्राणा देवाः । सोम- 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• भृगुः-मङ्गिराः [ ७१ - यशस्विनः प्राणः पितरः । अग्नि मनु सर्वे देवा ऋच्छन्ति सोममनुसर्वपितरः तत्र-अष्टौ वसवः प्रथमान्दे एकादश रुद्राद्वितीयान्दे, द्वादशादित्यास्तृतीयान्दे इन्द्रवषट्कारौ वा प्रजापतिवषटकारौ वा इन्द्रप्रजापतीत्येते त्रयस्त्रिंशदग्नि मनूचीना देवाः । त्रयोऽङ्गिरसश्चतुर्थान्दे त्रयो भृगवः पञ्चमान्दे अग्निसोमो त्सकद्वे ऋतुत्रिके चेत्यष्टी पितरः सोममनूचीनाः ।। तत्र- सर्वमापोमयं भृतं सर्वं भृग्वगिरोमयम् । अन्तरेते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिताः । इति गोपथ श्रुतेः । प्रति प्रजापत्यमापः प्रथमआत्मा । इतरान् प्रत्यमूपामुक्थत्वात प्रतिष्ठा- स्वात. सामत्वाचः। भृगवो द्वितीयमात्मा। अङ्गिरसस्तृतीय आत्मा तत्र द्यावा पृथीव्यो, तदन्तरितं. चोपपद्यन्ते । तस्मान् सर्वतः पूर्व मिहाप्सु भृग्वङ्गिरसो रुत्पत्ति माख्यास्यामः ।, गोपथ तौ श्र यते ( पू.२३ ) "तास्वप्सु स्वां छाया मपश्यत् प्रजापतिः । तावदपां सृष्ट्या ब्रह्मणस्त्रैविध्यं समपद्यत । सृष्ट प्रविष्ट निर्विकृतंच । स्विन्न यावदापोरूपं तत् सृष्टम् । तत् सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशदित्यप्सु प्रविष्टो ऽपामभिमानी तासामात्मा प्रविष्टब्रह्म । स सत्यं नामाग्निः । अथाभ्यामतिरिक्त विशुद्ध 'स्रष्ट्ररूपं निर्विकृतम् । त्रिष्वेतेपु यदायु प्रविष्ट सा निर्विकृतस्य ब्रह्मणश्छाया । त्रयी-मेव तां विद्या मर्वोत्तरी विद्यात् । मनः, प्राणमयी- हीयमन्या वाक् पूर्व विग्रहेऽपा ‘मण्डलस्य भिन्नत्वात्तदवच्छिन्न ब्रह्म बृहत्सा-.. मत्वाद्भिद्यते । तत्सृष्टस्य तु दहरस्यापा मण्डलस्यात्यल्प सामतया भिन्नत्वेऽपि सर्वाभिक्रमे पूर्वविग्रह साम्यं भवतीत्यस्तत्र च्छायाशब्दः ।। अन्तमण्डलं क्षुद्रमण्डलरूपां स्वां छायामीक्षमाणस्य ब्रह्मणो रेतः स्वय- मस्कन्दत् । तदप्सु प्रत्यतिष्ठत् । रेतसा सहैताप्रापः प्राच्यो दक्षिणाच्यः प्रतीच्यः, उदीच्यः समवाद्रवन्तेति समुद्रोऽभवत् । यावत् सहस्र तावानयं समुद्रः ता रेतः समुद्र वृत्वा ऽतिष्ठन् उद्भवणाद् भीतास्ता रेत एवैतच्छरणम वृणतेति स वरूणोऽभवत् । यदीदं ब्रह्मरेतः संवरणं ना करिष्यत् तीय मैन्द्रीवान् विभवनस्वाभाव्याद उद्रुता पनमानाऽभविष्यत् । अपांय जुर्नाम ब्रह्म- रेतसा तेनाऽविनाभावोपपादकएकीभावो वरणम । वरेणं सन्तं वरुण इत्यातक्षते । - ७२. ] * महर्षिकुलवैभवम् * यावत्य आपस्तावानयं वरुणः । असुरों यं वरुणः प्राणप्रदो वायुः। स द्वधा ऽभवत । अप्सु लीनोऽद्भयो मुक्तश्च । तत्राभ्यो मुक्तादङ्गिरसः सृष्टिं वक्ष्यामः । अप्सु लीनात्तु वरुणाद् भृगुरयं सृज्यते । वरुणेन ब्रह्मरेतसा सहैता आपो द्वैध मभवन् । अतिऽलवणा अपेयां अस्वाद्यस्ता अशान्ती अन्याः । पेयाः स्वाद्यः- शान्तास्त्वन्याः । तत्रैव रेतसि ता. आपोऽभ्यश्राम्यदभ्यतपत् प्रजापतिः ।। श्रान्ताभ्यस्तप्ताभ्यस्ताभ्यो यद्रत आसीत् तदभृज्यत । तस्मात् भृगुर्वारुणिः समभवत् । स भृगुसृष्ट्वाऽन्तरधीयत । भृगुस्त्वेप सृष्टः पञ्चधा रूपोऽसृज्यत । वायुः, मातरिश्वा, पवमानः, वातः, अथर्वेति । १ “सर्व एंवैतेऽनायतना वहन्तोऽन्तरिक्षचराः भावाः । तत्रायं सविता वायुः पर्जन्यादिविधः सूर्योपनंत कतिपय जातीय प्राणसंग्रहः । मातरिश्वा तु पृथ्वी परितो वेष्टयमानस्तां स्तम्भमानो भूपृष्टादृर्ध्व द्वादशयोजनावकाशपरिव्याप्तः स्थिर प्रायो वायुविशेपो यमेमूष इति वैदिकाः प्राहु: । पवमानः सोममयो यो दह्यमानो. ऽग्नि-त्व मापद्यते । वातस्त्वनियतदिगवाही कदाचित्सचारी ताराग्रह रसाना मुपसंग्रहः। अथाागप्सु निविष्टोऽतिसूक्ष्मः कश्चन वायुरथर्वा । यत् किद्धि- दात्मनो यज्ञे विश्लिले विरिष्ट वा तदनेनाथर्वणा भिषज्ममानं संधीयते । तथा च श्रूयते । एतद्वै भूयिष्ठ ब्रह्म यभृग्बङ्गिरसः ! येऽङ्गिरसः स रसः । ये- ऽथर्वणस्तद् भेपंजम् । यद् भेपजं तदमृतं । यदमृतं तद्ब्रह्म ति" (गो.पू.३।४) मन्त्रशास्त्रीयास्तान्त्रिक प्रयोगाःसर्व एवै तस्मिन्नाथर्वणे प्राणे सम्पाद्यन्ते । उक्त चं गोपथ-श्रुतौ "ब्रह्म वेदस्याथर्वणं शुक्रं, अतः एव मंत्राः प्रादुर्बभूवुः । स तुः खलु मन्त्राणामतपसाऽश्रुश्रूषानध्यायाध्ययनेन यदूनंच विरिष्ट चः यातयाम. च करोति तदथर्वणां तेजसा प्रत्याप्याययेत् मन्त्राश्च मामभिमुखी भवेयुगर्भा इवं मातरम,, इति ॥ एपोऽथर्वा भृगु प्राणान्नातिरिच्यते । सर्वेष्वेवासु भृगुत्वस्याभिव्याप्तत्वात् । भृगुंस्त्वथर्वणोऽरितिरिच्यते । सर्वेषु भृगुष्वथर्व त्वस्यानभिव्याप्तेः । अतो भृगुविशेषत्वादयमथर्वा प्राणो भृगुप्राणाद् भिन्नश्च। भिन्नश्च व्यपदिश्यते । भेदेन यथा । "अङ्गिरसो नः पितरो नवग्धाऽथर्वाणो " १--श्रुत्यन्तरे वायुस्थाने सविता पट्यते । सवितेव स वायु स्त्रष्यते ।

* भृगुः-अङ्गिराः भृगवः सोम्यासः" (:. ) इति भृगूनथर्वणश्च पृथक् पठति । अभेदेन यथा- "ऋग्वेदस्य पृथ्वीस्थानमन्तरिक्षस्थानो अध्वरः । यौः स्थानं सामवेदस्य आपो भृग्वङ्गिरसां स्मृतम् ॥ १ ॥ अग्निदैवतं ऋग्वेदस्य यजुर्वेदो वायुदेवतः । आदित्यः सामवेदस्य चन्द्रमा वैद्य तश्च भृग्वङ्गिरसाम् ॥ २ ।। • . ऋचो विद्वान् पृथ्वीं वेद सम्प्रति, यजूंषि विद्वान् बृहदन्तरिक्षम् । दिवं वेद सामगो यो विपश्चित् सर्वान् लोकान् यद् भृग्यङ्गिरो वित् ॥ ३ ॥ (गो.पू. २१३।१६) इत्येवमादिषु त्रय्या विद्याया उपरिष्ठात् भृगूनङ्गिरसश्चाख्याय- बचनान्तरे त्रय्या विद्याया ऊर्ध्वमथर्वणोऽङ्गिरश्चाचष्टेः। . "त्रिविष्टपं त्रिदिवं नाकमुत्तमं तमेतया त्रय्या विद्ययेति । अत उत्तरें ब्रह्मलोका महान्तोऽथवणमङ्गिरसां च सा गतिः ॥" (गो० पू०.१०) F+ प्रायश्चित्तभैषजैः संस्तवन्तोऽथवाणोऽङ्गिरसश्च शान्ताः । अथर्वभिरङ्गिरोभिश्च गुप्तोऽप्सु चन्द्र पादं ब्रह्मणा धारयन्ति(५।२४ ऋग्वेदमेव होतारं वृणीष्व । यजुर्विदमध्वयुम् । सामविदमुद्गा- तारम् । अथर्वाङ्गिरोविदं ब्रह्माणम् । ( २।४ ) इति । अत्र भृगुस्थानेऽथर्वाणमाचक्षाणस्तयोरभेदमभिप्रैति । स्मृतिरपि तयोरभेद माह-यथोक्तं वायुपुराणे पूर्वभागे ऊनत्रिंशाध्याये नवमश्लोके- अथर्वात भृगुज्ञेयोऽप्यंगिरायवणः सुतः । तस्मात् सलौकिकाग्निस्तु दध्यङ चाथ- ५४ ] * महर्षिकुलवैभवम् । -- वणः सुतः ॥” इति ॥ तदित्थं पञ्चविधो वायुाख्यातः । यदप्सु ब्रह्मणो रेत आसीत् तदयमद्भिः सम्पन्नः पञ्चविधो वायुरभवत् । श्रासां- वायुविधानां लोक इमा आपः । आपस्ततोऽतिरिच्यन्ते । अपश्चतुर्थ लोकं मन्यन्ते "अस्ति – चतुर्थो देवलोक आपः । (१८२)" इति कौपीतकि श्रुतेः । चन्द्रमसं च तल्लोकपालम् । “चन्द्रमाह्यप्सु चरति" (गो० पू० २०६) इति श्रुतेः । 'तस्याग्निर्होताऽऽसीत् । वायुरध्वयु: । सूर्यः उद्गाता । चन्द्रमा ब्रह्मा ।' (गो० १११३.) इति चन्द्रमसो ब्रह्मत्वश्रवणाच । ऋचामग्निचत्तं पृथ्वी- स्थानम् । यजुषां वायुर्दैवतमन्तरिक्षस्थानम् । साम्नामादित्यो दैवतं द्यौः स्थानम् । अथर्वणां चन्द्रमा दैवत मापः स्थानम् । (गो. श२६) इति ॥ पृथ्वी या ऋचा मायतन मग्निदेवता । अन्तरिक्ष वै यजुपामायतनं वायुर्देवता । द्यो साम्ना मायतन मादित्यो देवता । आपो ३ भृग्वाङ्गिर सामायतनं चन्द्रमा देवता वैद्य तश्च । (गो. २०२४) इत्यादिपुच श्रुतिपु भृग्वङ्गिरसां वेदानामापो लोकश्चन्द्रमा लोकपतिरिति श्रूयते। तथा च वायु रापश्चन्द्रमा इत्येते त्रयोऽप्यन्योन्या व्यभिचारेण सहचारिणः संभवन्ति । अत एवैपां. त्रयाणां योगादेकं वैश्वदेव्यं संपद्यते तत्राप्येष भृगुशब्दः प्रवर्तते । वायु रापश्चन्द्रमा इत्येते भृगवः । एत इदं सर्व समाप्याययन्ति । एक मेव संस्थं भवति (गो. २८) इति श्रुतेः । चन्द्रमा द्विविधः । भास्वर चन्द्रो दिक् चन्द्रश्चति । पृथ्वी परिक्रममाणो द्विपक्षः पिण्ड आद्यः तदारम्भणोऽनायतनः सर्वजगद्व्यापी सोमो द्वितीयः । तत्रेह प्रकरणे चन्द्रमप्शन्दैन सर्वदिग्व्यापी सोमो नेयो. न मास्वरः पिण्ड; [ "वृपा सोमो योपा आपो हविर्धानेऽध्येति । तस्मान्मिथुनाचन्द्रमाजातः । (४५प्रः । ६. ना..१२.क.) इति...श्रत्या तस्यादभिर्युक्तात्सोमा. दुत्पन्ने त्वेनोत्तर कालिकत्वात्. । अत्र हविर्धाने सूर्य पृथिव्यौ बमः । "यावा पृथिवी वै देवानां हविर्धाने आस्ताम् । ते उ एवाद्यापि हविर्धाने । ते हीदमन्तरेण सर्व हविर्यदिदं किञ्च"। इत्यैतरय श्रुतेः (५ । अ.) अत एवैतल्लोकतृतीयलोकयोमध्येऽयं चन्द्रमा जन्म घत्त । "यात्रा प्रधिव्यो एपर्धा - यन मोगगनाप्रार भृगुः-अङ्गिराः [ ७५ ॥ इत्यैतरेव श्रुतेः । श्रपिवा हविर्धानमिति वाङ्मनसयोः संहतयोः संज्ञा । "वाक् च वै मनथ हविर्धाने । वाचि च वै मनसि चेदं सर्व हितम्" । (६३) इति कौपीतकि श्रुतेः ॥ प्राणस्यापीद मुपलक्षणम् । तदव्यतिरेकेण सृष्टे रसंभवात् । तेन ब्रह्मव सोमेनापोमिथुनं संभूय चन्द्रमसमुदपादयत् । अत्रिश्च तत्रायं प्राणश्चन्द्रजनकः । तथाच-तस्यात्रेयत्वेन भृगुत्वाभावाच नेह ग्रहणं युक्तम् ॥ यस्तु दिक्सोमः स भृगुविशेपो द्रष्टव्यः । सोऽयमित्थं त्रिश्चरूपो भृगुाख्यानः । अथ यत् ना आपो ब्रह्मणो रेतः स्वं राजानमवृरणत । सोऽद्भिवरणाद् वरुणोऽभवत् । स समुद्रादमुच्यत् । तदनवच्छेदात् स्वातन्त्र्यापत्तिमुक्तिः । तेनैप मुच्युरेव सन् पारीक्ष्यात् मृत्युरुच्यते । तं वरुणं मृत्युमभ्यश्राम्यदभ्यतपत् । तस्य सर्वेभ्योऽङ्ग भ्यो रसोऽक्षरत् । सोऽङ्गरसोऽभवत् । अङ्गरसं सन्तमङ्गिरा इत्याचक्षते । ( गो. १७) स ऊर्यो अतिष्ठत स इमान् लोकान् व्यष्ठभ्नात् । "अङ्गानां ह्यप रसः" इति श्रुत्यन्तराञ्चायमङ्गिराः । सर्वेषा मेव घनपिण्डानां प्रत्यङ्गादुत्थायोर्चा दिवमनुसंचरन् रसः प्रतीयते । अत एवै तस्या पृथिव्या अपि नाभेरुत्थाय समन्ताद् बहिर्भवन्नादित्येन संपृक्तोऽनुक्षणं दिवमनु सपतीति अयते। "इत एत उदारुहन् दिवः पृष्ठान्यासहन् । प्रभूर्जयो यथा पथो या मङ्गिरसो ययुः ॥" इति ॥ भुवो दिव मभ्युत्क्रममाणानामगिरसामादित्यैरूर्वादभुवमागत्य पुनः प्रत्या वर्तमानैः सहाकाशे संघर्षो भवतीति बहुधा श्रूयते यथा कौषीतकीये । "आदित्याश्च ह वा अङ्गिरसञ्चास्पद्धन्त । वयं पूर्व स्वर्गलोकस्वर्ग- लोकमेष्याम इत्यादित्याः । वयमित्य गिरसः । तेऽङ गिरसः आदित्येभ्यः प्रजिध्युः (३०।६) ।। इत्यादि ऐतरेयकेऽपि-श्रादित्याश्च ह वा अङगिरसश्च स्वर्ग लोकेऽस्पर्धन्त । वयं पूर्व एण्यामो वयमिति । ते ह्यादित्याः पूर्व स्वर्ग लोकं जग्युः । पश्चेवाङगिरसः (१८। अ.) इति ।

७६ ] * महर्षिकुलवभवम् . A गोपथेऽपि-श्रादित्याश्च ह वा अङगिरसश्च स्वर्गलोकेऽस्पर्धन्त । वयं पूर्व स्वरे प्यामो वयं पूर्व इति । त आदित्या लघुभिः सामभिः श्चतुर्भिः स्तोमाभ्यां पृष्ट्याभ्यां स्वर्ग लोकमभ्यप्लवन्त । अन्यश्च एवाङ गिरसो गुरुभिः सामभिः सर्वैः स्तोमैः सर्वैः पृष्ठयः स्वर्ग लोकमभ्यस्पृशन्त ( पू. ४।२३) इति । इत स्तृतीयान्दे एकविंशस्तोमोऽयमादित्य इति तस्याङ्गिरो पेक्षया गन्तव्यमार्गः स्वल्पः । अङ्गिरसस्त्वितश्चतुर्थ पञ्चमान्दयोरित्रणव त्रयस्त्रिंशौं स्तोमो कृप्ता वित्यादित्या पेक्षया विप्रकृष्ठो गन्तव्यमार्ग इन्यभिप्रायः । सर्वे जपयज्ञास्तमेतमगिरसमेवापियन्ति तथा च श्रूयते- याश्च ग्रामे यांश्चारण्ये जपन्ति मन्त्रान् नानाथान् बहुधा जनासः । सर्वे ते यज्ञा अङगिरसोऽपि यन्ति नूतना सा हि गति मणो याध्वराया॑ ।। (गो. पू. ५१२४ ) इति । कठिन धातुरूपोऽयमगिरा लोकत्रय रस योगाद् त्रेधा दृश्यते लोके आग्नेयो याम्य आदित्यचोति । ऋष्णाति राग्नेयः । सीसाकृतिर्याम्यः शुक्लाकृतिरादित्य इति । - तथा च श्रूयते "अग्निरादित्यायमः "इत्येतेऽङ गिरसः एते इदं सर्व समाप्नुवन्ति" ( गो. पू. २८) इति ॥ तत्र भौमस्तावदगिरा एवाय प्रज्वलतोऽग्ने: स्वरूप निर्वाहयति । त्वमग्ने अङगिराः प्रथमो ऋपिः ( ) इति श्रुतेः। अग्ने स्त्रिवृत्त्वं श्रूयते कौपीतकीये । “त्रिंबृद्वा अग्नि:-अङ गारा अधूिम (इति कौपीतकि (२८1५) तत्र "पङ गारेप्वङ गिराः संबभूव अर्चिषि भृगुः संबभूव । ) इति श्रुतिरङ्गिरसोऽङ्गारस्वरूपा रम्भकत्वमाचले। कृष्ण- वर्णोऽयमगिरा दह्यमानःशुक्ले तेजसि रोहितो भवतीति रोहितवर्णो दृश्यते । सोऽयमित्थं त्रिस्वरूपोऽगिरा व्याख्यातः । "भृगूणा मङगिरसां तपसा तप्यध्वम्" इति मंत्र व्याख्यया । एतद्वै तेजिष्टं तेजो यद् भृग्वा गिरसाम् (१।१।५।१३)इति ब्राह्मण श्रुति दाहप्रवर्तक- * भुगु:-अङ्गिराः * [ ७ च माचष्टे । तञ्च दाहकत्वां योगनिशेपादुपपद्यते । योगविशेपात्वेषामुभयेपां तरलला चोपपद्यते। आपो भृग्वङ गिरोरूपमापो भृग्वङ गिरोमयम् ( १।३६ ) इति गोपथ श्रुते; || स्वरूपेण त्यान्तरीक्ष्या अनायतना एते सर्वत्र व्याप्ता पनान्ते इति बोध्यम् । नक्षत्रनिद्यायां रोहिणी लुब्धकाख्यानात् दिव्यप्यनयो भृग्वङगिरसो रारम्भणं श्रूयते । “प्रजापति स्वां दुहितरमभ्यध्यायत् । दिवमित्यन्ये आहुरुपसमित्यन्ये । तामृष्यो भृत्वा रोहितं भृतामभ्येत् । तं देवा अपश्यन्-अकृतं वै प्रजापतिः करोतीति । ते तमैच्छन् । य एन- मारिष्यति । एतमन्योन्यस्मिन्नाविन्दन् । तेपां या एव घोरतमास्तन्व अासन् ता एकधा समभरत् । ताः संभृता एप देवोऽभवत् । तदस्यैतद् भूतवन्नाम । तं देवा अव वन इमं विध्येति । स एतमेव वरमवृणीत-पशूना माधिपत्यम् । तदस्येतद् एशुमन्नाम । म तमायत्या विध्यत् । स विद्ध ऊर्ध्व उदपतत् । तमेतं मृग इत्याचक्षते । य उ एव मृगव्याधः स उ एव सः । या रोहित् सा रोहिणी । यो एवेगु स्त्रिकाण्डा मो एवेषु- स्त्रिकाण्डा । तद्वा इदं प्रजापतेः रेतः सिक्तप्रधावत् । तत्सरोऽभवत् । ते देवा अव बन्मेदं प्रजापतेरेतो दुषदिति । तन्मादुपमभवत् । तन्मादुषं सन्मानुसमित्याचक्षते । तदग्निना पादधुः । तन्मस्तोऽधुन्नन् । तदग्निर्न प्राच्यावयवत् । तदग्निना वैश्वानरेण पर्यादधुः । तन्मरुतो धुन्वन् । तदग्निर्वैश्वानरः प्राच्यावयत् । तस्य यद् रेतसः प्रथम मुददीप्यत । तदसावादित्योऽभवत् । यद् द्वितीयमासीत् तद् भृगुरभवत् । तं वरुणो न्यगृहणीत । तस्मात् स भृगुर्वारुणिः । अथ यत् तृतीय मदीदेदिवत् त आदित्या अभवत् । येऽङ गग आसंस्तेऽङ गिरसो ऽभवन् । यदङ गारा पुनरवशान्ता उददीप्यन्त तद् बृहस्पति रभवत् ] महर्षिकुलवभत्रम् * यानि परिक्षाणान्यासन् ते कृष्णाः पशवोऽभवन् या लोहिनी मृत्तिका तेरोहिताः अथ यद्भस्मासीत् तत्परुष्यं व्यसर्पद गोरो गश्य ऋष्य उष्टो गईभ इति । ये चैतेऽरुणाः पशवस्ते च तान् वा एप देवोऽभ्यवदत् मम वा इदं सर्वम् । मम वै वास्तुहम्" इति । एतचाख्यानमाकाशे कृत्तिका तारातोऽनुप्राची, लुब्धका दुनु प्रतीची, शश लक्ष्मणः, स्थिरचन्द्राच्छ्वभ्यां चानूदीची, प्रजापति तारायाः पुनर्वसुभ्यां चान्वबाची यावान द्य प्रदेशस्तत्रत्या भी रोचनाभिः क्लृप्रानां देवसत्वानां सम्बधेनाख्यायते । तद् यथा-अस्ति हिं कृत्तिकातः प्राच्या ज्योतिष्मती तारा लोहित वर्चन्त्वात सा रोहिणीत्युच्यते । तस्याः समसंमुखे दक्षिणाकाशे पडभान्तरे ताशो मेवान्यां ज्योतिष्मती ज्येष्ठां नाम तारां पश्यामः । ज्येष्ठाञद रोहिणी पर्यन्तं चन्द्रमा उदरोहति । पूर्वोक्त तारास्तु ज्येप्टार्द्ध पर्यन्तं स दक्षिणस्यामबरोहति । आरोहणा वरोहणा सीमत्वा- च ते उभे रोहिण्यौ श्रूयते । तत्र ज्येष्ठां दरिद्रामाचक्षते धूमावती च कृत्तिकातः पूर्वा तु लक्ष्मी भृगुजामाहुः । अपि चैतत्तारोपलचितायां दिवि रोहित सृगरूपं स्त्रीजातीयं कल्प्यते । ततोऽपीयं रोहिणी नाम । तत उदीच्या ब्रह्महृदयाख्यतारो पलक्षित शरीर: प्रजापतिर्भासते । प्रजापतिरित्यजमेपादि पशुचारणवृत्त: शूद्रजातेः संज्ञा लोके कृत्तिका हि तस्य शिरः । “प्रजापतेः ; एतच्छिगे यत् कृत्तिकाः । अमिरारास्यम् । सप्त ऋत्तिकाः सप्त शीर्पत् प्राणाः" ( १९६४ ) इति मैत्रायण श्रुतेः । मोऽन्या रोहिण्याः पिता कल्प्यते रोहिणी मनुमर्पन्तं तं दृष्ट्वा रोचनाक्ला मूर्द्ध यः सर्वे देवसत्वानः क्षुब्धा भूत्वा मर्वतारातेजोमयमूर्तिमत्युग्रवीर्य महाघोरं मद समाराध्य तद्वाराऽस्य मृगरूपं न तस्य प्रजापतेः शिरश्छेदयामासुः । तदिदं मृगशिरो नक्षत्रं दक्षिणभागे बाण मंलग्नं दृश्यते । प्रजापतिस्तु छिन्नशीर्पा तदुत्तरतः पतितो दृश्यते अथ रोहिणी चारणं प्रज्ञापतेः रेतोभर्बिच्युतः सरः मनभवन मानुपं नाम । तच्चाद्ध विपुत्रतो दक्षिणताऽर्द्ध तूत्तरतः संनयति । तायोत्तर नलग्ना तारास्त्यग्निर्नाम। पुनर्वस द्वं तार । तत्रैका पश्चिमादित्यो न.म । पूर्वा तु भृगु म । असुरस्य रसेनोपपत्नत्वान स वारुणिः । अर्थे ताभ्यामग्ने लुब्धकमन्यु यावद वक्रदण्डबदाभासमानास्तिन्नः तारा श्रादित्याः । तदन्यान्वति सूचना दृश्यादृश्यान्नन सर्वास्तारा अङ्गिरसः । ता * भृगुः-अङ्गिराः * [ ७६ स्वयमेकः प्रदीप्तो लुब्धक बन्धुहस्पतिर्नाम । अथ मृगव्याधं रोहिणीं चान्तरेण प्रजापतिं चान्तरेणानेकजातोया अनेक वर्णाः पशवो दृश्यन्ते । तेपां पतिः पूर्व प्रजापतिरासीत् । अकृतकरणादस्य प्रजापतेरपभ्रेपे भूतपति रयं मृगव्याधः पशुपति रभवत् । तदित्थमेतेनाख्याने नाख्यान नायकानां मृपिदैवतपशूनां रुपैरवत्याः सर्वास्तारा नामतः स्वभावतश्च संगृहीता विज्ञायन्ते । तारासु वाला सुशिक्षिता भवन्ति । तारा विज्ञान विद्यायां मिथ्याप्रकल्पितै राख्यानरर्थात्रयमुपपद्यते-पुराणा काशस्य रोचनाना संनिवेशे प्ररोचनया शिक्षासौकर्य्यम्। शिक्षोपयोगिलोकचरि- ताना मुत्तरोत्तर युगपय॑तं यशःसंरक्षणम् । संदर्भपरिक्लप्त्याऽनायासेन कतिपय वैज्ञानिकविपयाणामुद्घाटनं चेति । तथाच पुरा देवयुगे स्वर्गे कस्यचित् प्रजापतेरकृतं कुर्वतः प्रकुपितैः सर्वैदेवै रनुमोदितेन केनापि रुद्रण शिरश्छेदात्मकं दंडविधानं कृतमासीदित्य तदर्थस्य सार्वकालिक सर्वलोकविख्याति सिद्धये व्योम्नि तारकाग्रन्थे सोऽर्थः समुल्लिखितो दृढमुद्रितोऽभूत् । अकृत कुर्वतां महतामप्येष दण्डो विधेय इति देवाज्ञारूपोपदेशश्चानेन सुप्रसिद्धः कृतोऽभूत् इति भाव्यम् । एवमेवैतस्मिन्नाख्याने द्विविधं विज्ञानं सुरक्षितं भवति । दिव्यमुपस्यञ्च । "दिव मित्यन्ये आहुरुपसमित्यन्ये" इत्युपक्रमोक्तः। द्यौ रित्यपामुपलक्षणम् । लोकानमिवहन्तीति" ॥ गोपथ श्रुतौ (३१) अभि रेवोत्पत्तिश्रवणात्सर्वलोकानां तन्मयत्वात् कार्यशब्देन कारणस्य ग्रहीतु शक्यत्वात । ब्रह्म वै मनःप्राणवागात्मप्रजापतिः । वागवच्छेदेन च ब्रह्मणस्तावदापो जायन्ते । या हाइड्रोजनशब्देनाद्यतनैराख्यायन्ते । अप्सु ब्रह्मरेतः सिक्तमभूत् । ब्रह्मणो रस ऊर्ध्वमुदौहत् तदस्य शिरो नाम । रुद्रण ब्रह्मशिरश्छिन्नं पृथगभवत् । सोऽङ्गिरा नामाभूत् ब्रह्मरेतो हि कठिनद्रव्यम् । सामान्येनाग्निना तदप्रच्युता- बपि प्रवलेन वैश्वानराग्निनोत्तापे तत्प्रच्यवश्रवणात । प्रच्यवमानस्य तरलीकृतत्यै तस्य ब्रह्मरेतसस्त्रैविध्यमुपपद्यते । आदित्यो वरुण: प्रथमं रूपम् , भृगुर्द्वितीयम्, आदित्याः कतिपये तृतीयम् । ब्रह्मरेतांस्येवैतानि त्रितयानि । तत्र वरुणेन ब्रह्मरेतसा सहकीभूतानामा द्वैधं भवति । –अतिलवणा अपेया अस्वाद्यास्ता अशान्ता रेतः समुद्र वृत्वाऽतिष्टन । रेतः समुद्रवरणाद् स वरुणो नामोच्यते । "आप इमान् لا * महपिकुलवैभवम् * . तंवरुण मिदानी तनाः पाश्चात्यविद्वांसश्चतुर्धा रूपरनुसंधने-यलोरीन, बोमीन, आयोडीन् फ्लूरीन, इनि अथेतरास्त्वाप: पेयाः यायः शान्ताः । तासु हि तद् रेतो ब्रह्मरेतोऽभृज्यत । भर्जनात् स भृगुन म । भृगु तृष्ट्वा स यमणोऽन्तर- धीयते । तस्मात् ता आप: स्वाद्याऽभवन्नलवणाः तस्य च भृगोर्वायुरापः मोम इतित्रैविध्यमाहुः । तत्र वायुः पञ्चविधः । वायुर्मातरिश्वा, पवमानो, बातोऽयति। आपस्त्वन्यभृगुरूपम् । तत्रैतद् भृगुजातीयानामपां यौगिकद्रव्यत्वान ब्रहास्वेद रूपाभ्यो मौलिक कुलाभ्यः प्रथमाभ्योऽद्भयः सांप्रतिक पाश्चात्यविद्वत्समये हाइड्रोजन इति प्रसिद्धाभ्योऽतिरेको द्रष्टव्यः । अथ यदप्सु ब्रह्मरेतः संस्तुनं भृगुर्भवति यं. वरुणमाचक्षते तम्य समुद्रान्मुच्यमानस्य पृथगभवतः उत्तापयोगान सर्वेभ्योऽङ्गभ्यो रसः क्षरति सोऽगिरानाम | तमद्यतनाअर्वाञ्चः कार्वन् इत्याचक्षते । विंशतिविधा हीमै ऽङ्गिरसः श्रूयन्ते । अगिरसां विकारभूना उचश्यबृहस्पति संवर्तगोतमायास्य भरद्वाजघोराथर्व करवप्रस्कएवा. दयो बहुविधा अर्थाः श्रूयन्ते । असंज्ञान्तः संज्ञससंज्ञानां शरीरेभ्यः प्रत्यङ्गा दुत्थायोत्थायानवरतभयमङ्गिरा ऊर्ध्व दिवं गच्छन्नादित्येन सहमंसृज्यते । तत्र शरीरेभ्योऽङगिरसः प्रत्यङ गादुच्छेदे रुद्रः प्रयोजकः । एप हि रुद्रो द्रावणो अग्नि विशिमो भूतपतित्वात् भौतिके.प्वर्थेपु प्रतिभूत मनुपज्जते । पशुपनित्यच पशुवपि नित्यं निधत्ते । भूतेभ्य उत्पन्ना भूतविकारास्त्वसृगऽमांसमेदोऽस्थि- मज्जादयो दूर्वाकाप्टपर्णादयश्चभिन्नभिन्नाग्निमुपधारयन्तः सर्वे पशवः उच्यन्ते। भूतेभ्यश्च पशुभ्यश्च पोऽगिरा प्रजापतिनित्य मुच्छिन्नोबहिर्भवतीत्याहुः ।। उपसि चान्यद् विज्ञानं पश्यन्ति । ये यमापसीसोपाः । सेयं प्रजापतेहिता । एप प्रजापतिद्वादशधा परिच्छिद्यते । अग्निरादित्यः सोमः पशवो वायुमृत्युः पृथ्वी धोरग्निरादित्यो मनः संवत्सर" इति । एता वाव द्वादश प्रजापतेस्तन्यः । एप कृत्स्नः प्रजापतिः" । इति श्रुतेः । तत्र संवत्सरस्य प्रजापते रियमुपसा दुहिता भवति । स उपसि वैश्वानरं नामाग्नि रेतोभूतमसिञ्चत् । स संवत्सरे कुमारोऽजायत । तस्यैता श्रष्ठौ मूर्तयः । अग्निः आपः, श्रोषधयः, वायुः, विद्युत्, पर्जन्यः, चन्द्रमा, आदित्य इति । परे त्वोपध्या विद्यु तः पर्जन्यस्य च स्थाने पृथ्वीमाकाशमात्मानं चाहुः । तान्येतान्यष्टौ

[ ८१
* भृगुः-अङ्गिराः *
-
अग्निरुपाणि स चित्रो नामाग्निः । कुमारस्तेषां नवमः । न वाप्येते पशुषु
प्रविष्टा उपलभ्यन्ते । पशवो ह्यग्निः । पृथ्वींपृष्ठे द्यावापृथिवी रसेभ्यः समुन्ना
अचेतनो-द्भित्सचेतनशरीरा धातूपधात्वोपधि बनस्पति कृमिकीटादयः पशवः ।
तेष्वयमग्निदे॒धा संनिविशते-मर्त्यरूपेणा मृतरुपेण च सोऽयमग्निचितियज्ञो-
ऽध्वरयज्ञश्च । अन्नोक प्राणाना मन्योन्य परिग्रहस्य तेपु मर्त्यभागेऽमृतभागे
चानुक्षणमुपपन्नत्वात् । तस्य यज्ञरय शिरोऽङ्गरसः प्रतिपद रुद्रच्छिन्नः पराग
भवति । यथा-सूर्यस्य यज्ञस्य शिरोऽयं धर्मप्रवयंश्छिद्यते हयग्रीवश्वोत्पद्यते
एवं सर्वत्राप्ययमर्थः साधारणो ज्ञेय इति दिक् ।।
इत्यमयं भृग्वङ गिरोमयश्चतुर्थो वेदस्तावदाख्यातः,
तत्प्रसङगादत्रयमप्यत उर्ध्ववक्ष्यामः ।।
इतिमहर्षिकुल वैभवे भृग्वगिरोमयी वाक् साहस्री ॥
सोऽयमैतिहासिको वैज्ञानिकश्च द्विविधो भृगुःअङ्गिराश्च व्याख्यातौ ॥
॥ इति भृगुः :-अङ्गिराः ॥
(C)

अन्त्रि F (१) आदिब्रह्मणो बहुपु पुत्रेषु तृतीयोऽत्रिब्रह्मा चन्द्रवंशप्रवर्तको मूलपुरुप आसीत् । (२) सोऽयमनिर्बालस्य सप्तमे, पाझे सृष्टिद्व दशे, विष्णुचतुर्थांशस्य पष्ठ, भागवतस्य चतुर्थप्रथमे नवमचतुर्दशे च मार्कण्डेयस्य पोडशे अग्नेस्त्रयोदशे वाराहस्य पञ्चत्रिंशे, मात्स्यस्य त्रयोविंशे, ब्रह्माण्डोपोद्धातस्याप्टमे पञ्चपष्टच हरिवंशप्रथमपर्वण: पञ्चविंशे, महाभारतस्य शान्तिमोक्षधर्मेऽटोत्तरद्विशततमे आनुशासनिकदानधर्मस्य पटपञ्चाशशते च व्याख्यातः ।। ( ३ ) तृतीय प्रजापतित्वादयमविरत्रि शब्देनाख्यायते—इत्युक्त ब्राह्माण्डे "अहं तृतीय इत्यर्थस्तस्मादत्रिः स कीयते" ॥ इति । (उ० ४।४५) द्विविधो ऽयमत्रिराख्यायते प्राणविधो नरविधश्च । तत्र भृग्वझिरोऽत्रीणां प्राणविधानां क्रमिकोत्पत्या तृतीयत्वमत्रेः प्राणस्य बृहे वतादायुच्यते । एवं नरविधस्याप्यत्रे- स्तृतीयत्वं मानसेषु ब्रह्मपुत्रेपु तृतीयत्वादुपपद्यते। यथोक्त भारतादिपर्वणः पट्पष्टाध्याये- - "ब्रमणो मानसाः पुत्रा, विदिताः परमहर्षयः । मरीचिरङ्गिरा अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।। अत्रेस्तु बहवः पुत्राः श्र यन्ते मनुजाधिप । सर्वे वेदविदः सिद्धाः शान्तात्मानो महर्पयः ।।" इति ।। (४) स हि विपुलौजा अपि नितान्तशान्तप्रकृतिः शर्वलोकहितप्रवणश्वासीत् । तदुक्त ब्रह्माण्डे- "पिता सोमस्य वै वित्रा जज्ञेऽत्रिभगवानृषिः । * पुरुष; नामान्तराणि-अत्रिः, भौमात्रि;, सांख्यात्रिः । पत्नी-अनुसूया । -

* अत्रिः *
[ ३
तत्रात्रिः सर्वलोकानां तस्थौ स्वेनाजसाऽऽवृतः ।
कर्मणा मनसा वाचा शुभान्येव समाचरन् ।।" इति ।
(५) अस्यात्रेमू लनिवासस्थानं ब्रह्मपर्पदधिष्ठानं च विशिष्य न ज्ञायते ।
महाभारतभीप्सपर्वणि नवमाध्याये- "आत्रेयाः सभरद्वाजाः" । इति ।
मार्कण्डेये चतुःपञ्चाशत्तमाध्यायेऽपि-"अात्रेयाश्च भरद्वाजाः पुष्कलाश्च
कशेरुकाः" । एते देशा ह्यु दीच्यास्तु"-इत्येवं देशविशेषस्यत्रियत्वे
नाख्यानात् पुरा युगेऽत्रिनिवासोपलक्षितप्रदेशस्य लोके सुप्रसिद्धत्वेऽपीदानी
कालदोषेण तदपह्नवाद प्रतिपत्तेः। श्वेतगिरिस्थो जनपदविशेपः पुरायुगे तदत्रि
स्थानमासीदित्यस्ति बहूनां विश्वासः । यत्तुमात्स्ये पुरूरवसस्तपश्चर्याप्रसङ्ग-
"सगच्छन्नेव ददृशे हिमवन्तं महागिरिम् ।
खमुल्लिखद्भिर्बहुभिवृतं शृङ्गस्तु पाण्डुरैः ।। १ ।।
तस्यैव पर्वतेन्द्रस्य प्रदेशं सुमनोरमम् ।
अगम्यं मानुषैरन्यैर्देवयोगादुपागतः ॥ २ ॥
नेघश्यामस्त्यसो देशो द्रुमखण्डैरनेकशः ।
ऐरावती सरिच्छष्टा यस्मादशाद्विनिर्गता ॥ ३ ।।
तच्चाश्रमपदं पुण्यं बभूवात्रेः पुरा नृप ।
तत्प्रसादात् प्रभायुक्त स्थावरैर्जङ्गमैस्तथा ॥ ४ ॥
हिमपातो न तत्रास्ति समन्तात् पञ्चयोजनम् ।
उपत्यका सुशेलम्य शिखरस्य न विद्यते ।। ५ ।।
तत्रास्ति राजन् शिखरं पर्वतेन्द्रस्य पाण्डरम ।
हिमपातं घना यत्र कुर्वन्ति सहिताः सदा ॥ ६ ॥
तत्रास्ति चापरं शृङ्ग यत्र तोयधना धनाः ।
नित्यमेवाभिवर्षन्ति शिलाभिः शिखरं वरम् ॥ ७ ॥

८४ ] * महर्षिकुलवैभवम् * तदाश्रमं मनोहारि यत्र कामधरा धरा । सुरमुख्योपयोगित्वाच्छाखिनां सफलाः फलाः ॥ ८ ॥ तदाश्रम समन्ताच हिमसंरुद्धकन्दरैः । शैलवाटैः परिवृतमगम्यं मनुजेः सदा ।। || तत्र यौ तो महाशृङ्गो महावों महाहिमो । तृतीयं तु तयोमध्ये शृङ्गमत्यन्तमुच्छितम् ।। १० ।। तम्याधस्ताद् वृक्षगणो दिशां भागे च पश्चिमे । जातीलतापरिक्षिप्त विवरं चारुदर्शनम् ।। ११ ॥ तमसा चातिनिविडं नल्यमानं सुसङ्कटम् । नल्बमात्रमतिक्रम्य स्वप्रभाभरणोज्ज्वलम् ।। १२ ।। न तत्र सूर्यस्तपति न विराजति चन्द्रमाः । तथापि दिवसाकारं प्रकाशं तदहर्निशम् ।। १३ ।। इत्येवं षोडशाधिकशततमादिभिः कतिपयाध्यायः कश्चिदत्रेराश्रमो महता परिकरेण व्याख्यातः । सोऽप्यस्य तपश्चर्याप्रदेशोऽनुमीयते निर्जनारण्य- प्रदेशत्वात । वक्ष्यमाणेन तु परुष्णीकथानकेनाप्यस्य प्रदेशस्य सपरिवारात्रि- निवासस्थानत्वं चिरकालिकतपश्चरणार्थमेव स्थान्न त्वयं तस्य मुख्यो देशः । तस्य प्रदेशस्य मनुष्यलोकान्तरिक्षलोकयोः सीमारूपतया वायुपुराणादी व्याख्यातत्वादन्तरिक्षलोकादप्युत्तरवर्तिदेवलोकनिवासिनस्तस्यात्रेर्मनुष्यलोकोप- क्रमदेशनिवासिवायोगात् ॥ यदपि च मेरुसंनिधाने देवनिकायगिरौं वा तदत्रितीर्थमुक्त तदप्यस्य तपश्चर्यास्थानं नतु निवासस्थानम् । ब्राह्म गौतमीमाहात्म्यस्य सप्ततितमाध्याये (७०) यदा त्यतीर्थमुक्त, चित्रकूटे दण्डकारण्ये प्रयागे वा यदात्रेयतीर्थमुच्यते तदत्रिवंशधराणामुत्तरेपां केपाश्चिदत्रीणां स्थानं प्रतिपद्यते नत्त्वाद्यस्यात्रेः । उत्तरपां वनेकस्थानानि स्मर्यन्ते । भारतशान्तिमोक्षधर्म स्वस्तिकाध्याये प्राच्या स्वस्त्यात्रेयस्य, पश्चिमाया- मत्रेःपुत्रस्य, उदीच्यामात्रेयस्य च निवासस्थानादिति दिक् ।।

* अत्रिः * [ ८५ ( ६ ) पप हि त्रीणि वर्पसहस्राणि शक्तिविशेपलाभार्थमृक्ष पर्वतेऽनुत्तम- न्तपस्तेपे-इत्याहुः । तत्र सहस्रशब्दः पूर्णार्थः । “सर्वं वै सहस्रम्" इति श्रुतेः । पूर्णत्वं च वर्षाणां मासवासरादिभिरन्यूनानतिरिक्तत्वम् अनुत्तममिति मात्स्यादिपाठस्थानेऽनन्तरमिति पद्मादिपाठः । अन्तरमनवच्छिन्नम सुदुश्चमिति च ब्रह्मांडादिपु पठ्यते । ऋक्षपर्वतोऽयं भारतवर्षे प्रसिद्धः । तापी पयोष्णी निर्विन्ध्या कावेरी प्रमुखानदीः । प्रवर्तयनियः सोऽयमृनो नाम कुलाचलः ॥ १ ॥ (ब्राह्म १७) ॥ इत्यभियुक्तोक्तः । वस्तुतस्त्वत्रितपःस्थानमयमृक्षः स्वर्ग- भूमिथः कश्चिदन्योगिरिः तस्यानत्वयं भारतवीयः । श्राद्यस्यात्रे: स्वर्गवासितया स्वर्गभूमिं परित्यज्य मनुष्यलोकेऽस्मिन भरतखण्डे तपश्चर्यार्थ- मनुधावनस्य विचारायोगत्वान । (७) एप खल्वत्रिर्वसिष्टादिवदस्य ब्रह्मणो मानसः पुत्रः आसीत् द्विविधं हि पुरा युगे ब्रह्मणः पुत्रमाचक्षतेस्म औरसंमानसश्चेति । स्वधर्मपन्यां स्वरेनसोत्पादितः पुत्र औरसः । यस्त्वन्यौरमोऽपि ब्रह्मणा म्वपुत्रत्वेन भावितो- ऽभूत स मनसा पुत्रत्वेन क्लप्तत्वान्मानस इत्युच्यतस्म । मरीचिरव्यङ्गिरसो पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा वसिष्ठश्चेति सप्तते ।। इत्येते सप्ताऽप्यन्यौरसा एव पुत्रत्वेन ब्रह्मणा परिगृहीतास्तत्तल्लोकमण्डले धर्मोपदेशार्थ धर्मे शाशनार्थं च ब्रम्हपरिपदधिष्टानेऽधिष्ठातृतया प्रतिष्ठापिता अभवन् । वस्तुतस्तु प्रथमोऽयमनिरौरस एव ब्रम्हणः पुत्र आसीत । अत्रेनिस- पुत्रत्वं तु सांख्याध्यपेक्षया दृष्टव्यमित्याहुः । (८) पौराणिका पाहुः । अबिरयं प्रम्हणा वेदप्रचारार्थ नियुक्त श्रासीत् । तेन वैज्ञानिकयज्ञप्रचारकरणेन हेत्वन्तरेण वा परिक्रुद्धा अनुरास्तमत्रिमृषि सपुत्रकलत्रपरिवारगणमृबीसनाम्नि पीडायन्त्रगृहे प्रवेश्य तुपाग्निना अवाधिषत । ततस्तेनर्षिणा स्तुतावश्विनौ नासत्यदस्रौ देवौं तमग्निमुद केनोपशमय्य तस्मात ८६ ] * महर्पिकुलवैभवम पीडागृहाद विकलेन्द्रियवर्ग सन्तं निरगसयताम । असुरकृतपीडया काश्य प्राप्तायात्रये वलप्रदं क्षीरादिकमन्नञ्च पुष्टयर्थं प्रायच्छन मिति ऋकसंहितायां प्रथममण्डले पोडशशतसूक्त महर्पिः कक्षीवानाह-(श११६) ॥ "हिमेनाग्निं समवारयेथां पितुमतीमूर्जमस्मा अधत्त । ऋगीसे अत्रिमश्विनाऽवनीतमुन्निन्युथः सर्वगणं स्वस्ति ।।"(११११६) ऋषि नरावंहसः पाञ्चजन्यमृवीसाद त्रिं मुञ्चथो गणेन । मिनन्ता दस्योरशिवस्य माया अनुपूर्व वृषणा चोदयन्ता ।। (१।१५७) ।। इति ॥ है अश्विनी ! युवां हिमेन शीतोदकेनात्रिदाहार्थमसुरैः प्रक्षिप्तमति- प्रज्वलितं तुपाग्नि निवारितवन्तौ पितुमतीमृर्जमन्नवती बलप्रकृतिमत्रये प्रायच्छतम् । ऋबीसेऽपगतप्रकाशे पीडायन्त्रगृहे ऽवनीतमबाङमुखतयाऽसुरैः प्रापितं सर्वगणोपेतमत्रिं स्वस्ति यथा भवति तथा उन्निन्यथुः । "तस्माद् ऋवीसनामकात् कारागृहादुद्गमय्य स्वगृहं प्रापितवन्तौ"-इति प्रथमस्यार्थे सायणभाष्यम् ॥ १ ॥ द्वितियस्य हे नरौ ! प्रजापति वरुण-बाग-वाय्वाग्नि सहयोगेन जनितत्वात् पाञ्चजन्यम्, ऋपिपितृदेवतिर्यग्मनुष्यभेदेन पञ्चधा- विभक्तानां देवयुगसम्बन्धिनराणामभ्यर्हणीयत्वाद्वा पाञ्चजन्यम् । अथवा अणु-द्र ह्य -तुर्वसु-यदु-पुरूणां पञ्चशाखाविभक्तानां राजवंशानामेव पुरायुगे मनुष्यत्वेन पञ्चजनत्वेन च देवैर्व्यवस्थापित्वात् तेषां पञ्चजनानामयत्रिमूल- पुरुपत्वादाराध्यो वभूतेति कृत्वा सोऽत्रिः पाञ्चजन्यः प्रसिद्ध आसीत् । अतः पाञ्चजन्यं तमृपिमत्रिं पुत्रकलत्रादिपरिवारगणेन सह तस्माद् ऋवीसनामकात्का- रागृहाद् युवां मुञ्चथः । अशिवस्यानिष्टकरस्य दस्योरसुरस्य मायाः, निगड- बन्धनादिविषयकच्छलव्यापारसम्बन्धिनीर्मिनन्तौ नाशयन्तो अनुपूर्वं पूर्ववत् स्थिति प्रचोदयन्तौ प्रवर्तयन्तौ च युवां तमत्रिमृवीसादमोचयतमित्यर्थः'। (E) अथात्रेय्यां ब्रह्मपदि प्रतिष्ठितेऽस्मिन्नत्रिवंशे गृहनक्षत्रादिज्योति- विद्यापरीक्षणंविशिष्य प्रक्षरितमासींत । प्रथमात्रिकाले हि कदाचित् सर्वनासे सूर्यग्रहणे - जाते तत्कारणनिर्धारणाय तदानीन्तना वहव एव विद्वांसः प्रयतन्तेस्म। किन्तु सर्वप्रथमं तेष्वात्रेयपदधिष्ठातारोऽत्रय. एवं याथातथ्येन तत्कारणमवधारयामासुः । तत्र यदवधारितं तद् गणितोपपादनपरो विद्या अत्रिः * [ ८७ अन्धस्तु तस्यामात्रेयपर्पद्य वाधिष्ठितोऽअभूत । तदितिवृत्तं तु केवलं पञ्चभि- मन्त्रऋक्संहितायामुपनिबध्यते । तद्यथा- विध्यदासुरः। "यत्त्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसा अक्षेत्रविद् यथा मुग्धो भुवनान्यदीधयुः ॥ १ ॥ स्वर्भानोरथ यदिन्द्रमाया अबो दियो वर्तमाना अवाहन् । गृढं सूर्य तमसापव्रतेन तुरीयेण ब्रह्मणाविन्ददत्रिः ॥ २ ॥ मा मामिमं तव सन्तमत्र दरस्या द्रुग्धो भिवसा निगारीत् । त्वं मित्रो असि सत्यराधास्तो मेहावतं वरुणश्च राजा ॥ ३ ॥ ग्राव्णो ब्रह्मा युयुजानः सपर्यन् कीरिणा देवान्नगसोपशिक्षा । अत्रिः सूर्यस्य दिवि चक्षुराधात् स्वर्भानोरपमाया अयुक्षत् ।। ४ ।। सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः अत्रयस्तमन्वविन्दन्न ह्यन्ये अशक्नुवन्॥५॥"इति। (ऋ.५।४०१५-६) यं बै अयमत्राभिसन्धिः । अभिजितं नाम ब्रह्माणं परितः सूर्योऽयं परिक्रामति तस्य ब्रह्मणो रश्मिगताः सर्वे प्राणा ऋषय उच्यन्ते । चन्द्रमसि स्वतः कृष्णवर्णे प्रतिमूर्छित्तैः सूर्यकिरणरुत्पन्नायां ज्योत्स्नायां स्थिता नानाधर्म- विभक्ताः प्राणा मध्यमाः पितर उच्यन्ते । पृथिव्यामप्येवं प्रतिमूञ्छिते सूर्यकिरणेऽवराः पितरो भवन्ति । सूर्यरश्मिगतास्तु प्रकाशमयाः सर्वे प्राणा नानाधर्मविभक्ताः सर्वे देवा उच्यन्ते । चन्द्र पृथिव्यां वा सूर्यप्रतिदिग्भागे सूर्यकिरणप्रतिबन्धात तमोमये वियति सञ्चरन्तः प्राणा असुराः कथ्यन्त इति हि वैदिकी परिभाषा श्रुतिप्रसिद्धा ब्रह्मविज्ञाने सुविशदं निरूपिता । तत्र तस्य चन्द्रस्य पृथिव्याश्चेयं स्वभागव्याप्ता छायामयी भूमापि सर्वासुरप्राणसम्भृ- तत्वादसुर एवोच्यते । तस्य छायामयस्यासुरस्य तमो राहुः स्वर्भानुरित्येताः संज्ञाः स्युः । अन्धकारमयत्वात्तमः । सूर्यांशुराहित्येन क्लृप्तमूर्तित्वाद्राहुः । सूर्यमण्डलं स्वः, "एषा गतिरेषा प्रतिष्ठा य एष तपति । तस्य ये रश्म- यस्ते सुकृतोऽथ यत् परं भाः प्रजापतिर्वा स स्वर्गो वा लोकः" इतीष्टि- यजमानश्रुतेः । सूर्यमण्डलोपलक्षिते प्रतिदिग्भागे भानुभू मोपलक्षितप्रवेशव्याप्ति योग्यः प्रकाशो नियमेन यस्यास्ति स स्वर्भानुः । एप चोभयपार्श्वगतसूर्यकिरणयोः * महपिकुलवैभवम् * - - महान् भवति च पथा चन्द्र- कीरूपयोः सम्पातेन च्छिन्नशिरा दृश्यते । त्रिविधोऽयं राहु: एकः पार्थिवो द्विविधश्चान्द्रश्च । तत्र पार्थिवः सैंहिकेयोऽप्युच्यते । पृथिव्याः सिंहिकारूपेण श्रुतौ निरूपितत्वात् । तदुक्त लैङ्ग सप्तपञ्चाशाध्याये- "द्विविधः सूर्यविस्ताराद् विस्तारः शशिनः स्मृतः । तुल्यस्तयोस्तु स्वर्भानुभूत्वाऽधस्ताद्विसर्पते ॥ १ ॥ उद्धृत्य पृथिवीच्छायां निर्मितां मण्डलाकृतिम् । स्वर्भानोस्तु वृहत् स्थानं तृतीयं यत्तमोमयम् ॥ २॥” इति । (लिङ्गपुगण अ० ५७) सूर्यमण्डलविष्कम्भाचन्द्रविष्कम्मः कदाचिढल्पो भवति कदाचित्तु कदाचिदुच्चे न कदाचिन्नीचेन परिभ्रमणान् । कटकग्रासखग्रासाभ्यां सूर्यग्रहणस्य द्वविध्येन तथा प्रतिपत्त: । अनयो योः पार्थिवेन राहुणा चन्द्रग्रहणं भवति । चान्द्रेण तु राहुणा सूर्यग्रहणं सिध्यति । तदेतदनया श्रुत्या निरूप्यते- हेसूर्य ! आसुरोऽसुरनिकायस्वरूपोऽयं स्वर्भानुर्यदा त्वां तमसा चन्द्रा धस्तनकृष्णच्छायया अविध्यदावृणोत् , तदा भुवनानि सर्वे लोका अदीधयुर्देव- यामासुरज्ञानेन व्यामोहिता बभूवुः । यथा गन्तव्यं क्षेत्रमजानानः कुत्र गच्छा- मीत्येवं व्यामुग्धो भवति तथा कुत्र सूर्योऽगात् किमिदमभूत कथमकाण्डेऽन्ध- कारोऽभवदित्यादिरूपेण व्यामोहमापुः ॥ १ ॥ द्विविधः सूर्यः-चित्यश्चितेनिधेयश्च । दृश्योऽयं ज्योतिष्मान् पिण्डश्चित्य. । तदन्तर्गर्भः प्राणात्मा तु चितेनिधेयः स इन्द्रः । “यथाग्निगर्भा पृथिवी तथा द्योरिन्द्रेण गर्मिणी" इति श्रुतेः । तथा च प्रथमंशरीरपिण्डाभिप्रायेणोक्त्वा सम्प्रतिः तत्प्राणाभिप्रायेणापर मुच्यते-स्वर्भानोरिति । अधेत्ययथार्थो निपातः । अपर च हे इन्द्र ! दिवोऽवः सूर्य मण्डलादधोदेशे वर्तमानः स्वर्भानोर्मायाः । अन्यथा सत्यन्यथा प्रतीयमाना वा साधारणैरज्ञेयतत्वा वा निगृहितयाथार्थ्यभाग वा प्रयुज्यमाना प्रक्रिया माया । तथा चैता लोकविस्मयकारिण्यो राहोर्माया यदा सूर्यमवाइन् अवरुध्यालोपयन् तदा अवर्तनीयेन तमसा प्रच्छन्न सूर्यमयमत्रि महर्पिस्तुरीयेण ब्रह्मणा ग्राव्णो ब्रह्मति चतुर्थमन्त्रोपात्तेन विज्ञानप्रकारेणा- * अत्रिः * [ ६ विन्दन, सूर्य विलुप्तं पुनरलभत । तत्रैव विवि यथावन स्थितमजानादित्यर्थः ॥ १॥ उक्त पूर्वम, यत्र यत्र वस्तुन्यारम्भकविधयाऽयमविप्राण उपादीयते तद्वस्तु कठिनं भवन पारदर्शकत्वाविहीयेत । नेन प्रत्याहतः सूर्यरश्मिः परावर्तितो भवतीति । तदनुसारेणेह तृतीयो मन्त्रः सूर्यमुखेनार्थमाह-मामामिममिति । हे अत्रे ! चन्द्रमण्डलारम्भकात्रिप्राण ! इमं मां सूर्य तत्र सन्तं चन्द्रमण्डलं प्रत्यु- पस्थिवरश्मित्वाञ्चन्द्रगतात्रिमाणानुगत्वाच्चात्रिप्राणानुगृहीतं दुग्धो द्रोग्धाऽसुरः स्वर्भानुरिरस्याऽन्ने च्छया ग्रसनाभिप्रायेण भियसा भयङ्करतमसा मा निगारीत मा निगिलतु सर्वथा विलुप्तं मा करोतु । प्रतिवस्तु नियता शक्तिः सत्यमिति ब्रह्म विज्ञाने व्याख्यातम् । चन्द्रगतवस्तुशक्तिसाधितस्त्वमत्रिप्राणो मित्रोऽसि वरुणो राजा चासि । उभयसांमुख्येन परस्पराभिगमनं मित्रत्वम, विरुद्धदिग्वृत्त्या प्रत्यावरणं वरुणत्वम् । सूर्यमण्डलाधस्तनस्य चन्द्रमण्डलस्योपरिभागे मित्रो- ऽस्तीति सूर्यरश्मयः प्रतिरुद्धाश्चन्द्रण वियुज्यन्ते। "अहवै मित्रो रात्रिवरुणः” इति श्रुतेः । तत्रायं मित्रो वरुणो वा चन्द्रगतस्त्वमत्रिप्राण एवासि । यदि चन्द्र त्रिप्राणो नाभविष्यत् तदा तस्य पारदर्शकत्व प्राप्त्या सूर्यरश्मिप्रतिवन्धायोगामित्रो वरुणो वा नाभविप्यताम् । अत्रोऽत्रिभूतो तो मित्रावरुणौ युवां मां सूर्यमिह स्वर्भानुप्रासकाले अवतम=अवगमयतम् । अवति- रवगमार्थः । चन्द्रस्याधस्ताञ्चन्द्रेणावरोधादयं सूर्यो न दृश्यते । चन्द्रस्योप- रिपात्त्वयं सूर्योऽनवरूद्धः पूर्ववद् दृश्यत एवेत्यतो नाय सूर्यो विलुप्तोऽम्ती त्यर्थो मित्रवरुणाभिज्ञानाइवगम्यते ॥ ३ ।। अत्रिमहर्पिः पूर्वं ग्रहणकाले सूर्य द्रष्टु कञ्चिदपूर्व यन्त्रविशेपं निर्मापयामास । ग्रावकीरिनमांसि तस्यैव यन्त्रस्याङ्गानि सम्भाव्यन्ते । उपरागकाले सूर्यादशने सति सोऽत्रि मा ग्राव्णो युञ्जन्ऽकीरिणा देवानाराधयन् नमसा प्रसाधयन्, सूर्यस्य दिवि सूर्योपलक्षिताकाशभागे स्वं चक्षुराधान । तेनायं स्वर्भानोर्मायाः परान्मोहयन्तीः प्रक्रिया अपायुक्षत् न्यवारयत् । अत्रिकृतमन्त्रस्येदानीमनुप- लब्वेस्तत: सूदर्शनप्रकारस्तवयवभूतानि ग्रावकीरिनमांस्यपि यथावत्र . - ज्ञायन्ते इति भाव्यम ।। ४ ।।

६० ]
* महर्पिकुलवैभवम् ५५
अथोपसंहरति-
-
पुरा युगे सूर्योपरागत्वविविदिपया कृतप्रयत्नेषु तदानीन्तनकृतविद्य पु यं यं
सूर्यमासुरः स्वर्भानुस्तमसाऽविध्यत् , यदा यदा सूर्योपरागोऽभवत् तदा तदा
तमनय एवान्त्रविन्दन् नान्ये विद्वांसो यथावज्ज्ञातु तमशक्नुवन् इति ।। ५ ।।
-
एतच्छ तिमूलकमेवार्थ पौराणिकाः श्राख्यानकरूपेणोपन्यबध्नन् ।
तथाहि भारतेऽनुशासनपर्वणि दानधर्मे भीष्म मुखेनाहुः-
.
"घोरे तमस्ययुध्यन्त, सहिता देवदानवाः ।
अविध्यत शरैस्तत्र स्वर्भानुः सोमभास्करी ।। १ ।।
अथ ते तमसा ग्रस्ता निहन्यन्तेस्म दानवैः ।
अपश्यन्त तपस्यन्तमत्रिं विन तपोधनम् ।। २ ।।
अथैमत्र वन् देवाः, शान्तक्रोधं जितेन्द्रियम् ।
नाधिगच्छाम शान्तिञ्च, भयात् बायस्व नः प्रभो ! ॥ ३॥"
अत्रिरुवाच
"कथं वक्ष्यामि भवतस्तेऽव बँश्चन्द्रमा भव
तिमिरघ्नश्च सविता, दस्युहन्ता च नो भव ॥ ४ ॥
एवमुक्तस्तदात्रि तमोनुदभवच्छशी ।
अभवत् सौम्यभावाच सोमवत्प्रियदर्शनः ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा नातिप्रभ सोमं, तथा सूर्यञ्च पार्थिव ।
प्रकाशमकरोद त्रिस्तपसा स्वेन
संयुगे ॥६॥
जगद्वितिमिरं चापि प्रकाशमकरोत्तदा ।
व्यजयच्छत्रुसंघाँश्च देवानां स्वेन तेजसा ॥ ७ ॥
अत्रिणा दह्यमानास्तान्, दृष्ट्वा देव महासुरान् ।
पराक्रमैस्तेऽपि तदा व्यस्यघ्नन्नत्रिरक्षिताः ॥ ८ ॥

* अत्रिः * ६१ - उद्भासितश्च सविता देवास्त्राता हतामुराः । अत्रिणा स्त्र सामर्थ्य, कृतमुत्तमतेजसा" ।। 6 ।। इति ।। अत्र स्मार्ते कथानके सर्वोऽर्थः श्रुत्यर्थानुसारेणैव नेयः । तद्विरुद्धोऽर्थस्तु काल्पिनिकत्वादुपक्षेप्य इति तत्वम् । मर्येऽकस्मान खग्रासेन ग्रस्ते सर्वतोऽन्धकाराच्छन्ने भयभीतेपु. देवेषु मत्सु चन्द्रकृतमिदं सूर्य यावरणं न त्वन्यद्भयकारण मस्तीत्यत्रिणा स्वविद्यया देवानां भयनिरासः कृतः, ततः परितुष्टै यन्तस्मा अत्रये वरदानं दत्तमित्या- थर्वणश्रुतौ श्रृयते- "आदित्यं हि तमो जग्राह । तदात्रि रपनुनोद । तदत्रिरन्वपश्यत् । तदप्येतद् ऋचोक्तम् । स्तुताद्यमत्रिदिवमुन्निनाय । दिवित्वऽत्रिरधारयत् सूर्या मासाय कर्तवे ॥ इति ।। तं होवाच-बरं वृणीष्वेति । स होवाच-दक्षिणीया मे प्रजा स्यादिति । तस्मादात्रेयाय प्रथमदक्षिणा यज्ञे दीयन्ते"। इति ।(गो.पू.भा.२०१७) एतेन पुरा देवयुगेऽपि पारितोपिकप्रदानप्रचारो गम्यते । शाश्वतिकयश:- प्रतिष्टालाभार्थं स्मारकविधया धर्मविशेपव्यवस्थापनमेव च पारितोषिक विशिष्यासीदिति च गम्यते । अत्रिगोत्रेभ्यो यज्ञे प्रथमं दक्षिणा दीयते इति हि तत एवारभ्य यज्ञे देवैः कृता व्यवस्था प्रथमात्रिकीर्तिस्मारिकाद्यापि प्रवर्तत इति च गम्यते इति बोध्यम् । (१०.) अथैतदस्मिन् समये भद्राश्वो नाम कश्चिद्राजासीत् । तस्याप्सरसि घृताच्या प्रभाकरो नाम कः पुत्रो दश चान्याः कन्या जजिरे-भद्रा, शूद्रा, मद्रा, शलभा,मलदा,बला,इला,गोचपला,तामरसा, रत्नकूटा चेति ! ताः सर्वा अप्ययं भद्राश्वस्तस्मै अत्रये भार्यात्वेन प्रददौः। तासां भद्रायामः पुत्रः सोमो जज्ञे ।, स ब्रह्मयोनिरपि ब्रह्मणः प्रसादेन ब्राह्मणगन्धर्वादीनां राज्येऽभिपिक्ततया.पश्चात क्षत्रियः समपद्यत । अथान्यास्वप्यत्रिभार्यासु कतिपये पुत्रा, बभुवुः-दत्तः ६२ ] * महर्पिकुलवैभवम * - दुर्वासाः, अकल्मपः, सत्यनेत्रः, दीप्तिमान्, श्रापोमूर्तिः, तरुणः, निष्प्रकम्पः, युक्तः-इत्यादयः । सर्वे चैतेऽत्रिवंशधरा ब्राह्मणाः स्वस्त्यात्रेया उच्यन्ते । तेषु दत्तो दुर्वासाश्चेति द्वौ ब्राह्मणो विख्याती बभूवतुः । तत्र तत्तगोत्रान्वये श्यावाश्वा मुद्गला वाग्भूतका गविष्ठिरा इति चतुविधा अत्रयः पुरा युगे देवलोके मनुष्यलोके च सुप्रसिद्धा आसन् । तदिदमुक्त-ब्रह्म ण्डोपोद्घातऽष्टमाध्याये- "अत्रेशं प्रवक्ष्यामि तृतीयस्य प्रजापतेः । तस्य पल्ल्यस्तु सुन्दर्यो दशैवासन् पतिव्रताः ॥ १ ॥ भद्राश्वस्य घृताच्यां वै दशाप्सरसि सूनवः । भद्रा शूद्रा च मद्रा च शलभा मलदा तथा ।। २ ।। बला हला च सप्तता या च गोचपला स्मृता । तथा तामरसा चैव रत्नकूटा च तादृशी ॥ ३ ॥ तत्र यो वंशकृञ्चासौ तस्य नाम प्रभाकरः । मद्रायां जनयामास सोमं पुत्रं यशस्विनम् ।। ४ ।। स तासु जनयामास पुत्रानात्मसमानकान् । स्वस्त्यात्रेया इति ख्याता ऋषयो वेदपारगाः ।। ५ ।। तेषां द्वौ ख्यातयशसौ ब्रह्मिष्ठौ सुमहौजसौ। दत्तो ह्यनुमतो ज्येष्ठो दुर्वासास्तस्य चानुजः ।। ६ ।। यवीयसी सुता तेपामवला ब्रह्मवादिनी। दत्तात्रेयं तनु विष्णोः पुराणज्ञाः प्रचक्षते ।। ७ ।। तस्य गोत्रान्वया जाताश्चत्वारः प्रथिता भुवि । स्थावाचा मुद्गलाश्चैव वाग्भूतकगविष्ठिराः ॥ ८॥" इति ।। अत्राबलाशब्दो लेखप्रमादादपपाठः । ऋक्संहितायामऽष्टममण्डले एक नवतिसूक्तस्य द्रष्ट्या ऋषिकाया अपालानाम्ना प्रसिद्धः । अपालाभिप्रायेणै- वायमवलाशब्दः पठ्यते ब्रह्मवादिनीत्वाभिमानात् । अपालाविश्ववाराभ्या- मात्रेयीभ्यामन्यस्या आत्रेय्या ब्रह्मवादित्वास्मरणात् ।

* अत्रिः *
[१३
(११) ब्राह्म ( अ०७४) तु गौतमीमाहात्म्ये परुष्णीकथानकमुक्तम्-
,
"अत्रिराराधयामास, ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् ।
तेषु तुष्टेषु स प्राह, पुत्रा यूयं भविष्यथ ॥ १॥
तथा चैका रूपवती कन्या मम भवेत् सुराः ।
ततः पुत्रत्वमापुस्ते, ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।। २ ।।
कन्यां च जनयामास, शुभात्रेयीति नामतः ।
दत्तः सोमोऽथ दुर्वासाः, पुत्रास्तस्य महात्मनः ॥ ३ ॥
अग्नेरङ्गिरसो जातो, ह्यङ्गारेरगिरा ऋपिः ।
तम्मा अङ्गिरसे प्रादादात्रेयी मतिरोचिपम् ।। ४ ।।
अग्नेः प्रभावात् परुपमात्रेयी सर्वदाऽभवत् ।
आत्रेय्यपि च शुश्रपां कुर्वती सर्वदाऽभवत् ।। ५ ।।
सा कदाचिद् अत वाक्या(द्विग्ना परुपाक्षरात् ।
कृताञ्जलिपूटा दीना प्राब्रवीच्छवशुरं गुरुम् ।। ६ ॥
पतिां परूपं वक्ति वृथैवोद्वीक्षते रुपा ।
प्रशाधीमं सुरज्येष्ठ भर्तारं मम दैवतम् ।। ७ ॥"
अग्निरुवाच-
"अङ्गारेभ्यः समुद्भूतो भर्ता ते ह्यङ्गिरा ऋषिः ।
यथा शान्तो भवेद् भद्र तथा नीतिविधीयताम् ॥ ८ ॥
श्वशुरस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वाऽऽत्रेयी तदैव तत् ।
आग्नेयं रूपमापन्नमम्भसाऽऽप्लावयत् पतिम् ।। ६ ।।
उभौ तौ दम्पती ब्रह्मन् सङ्गतौ गाङ्गवारिणा ।
शान्तरूपधरी चोभी दम्पती सम्बभूवतुः ॥ १० ॥

६४ ] * महर्पिकुलवैभवम् * Cur भर्तारं प्लावयन्ती सा दधाराम्बुमयं वपुः । पहष्णी चेति विख्याता गङ्गया सङ्गता नदी ।। ११ ।। तत्र चाङ गिरसश्चर्यज्ञाँश्च बहुदक्षिणान् । विशेषतस्तु गङ गायाः परुण्या सह सङगमे" ।। १२ ।। इति परुष्णीतीर्यासरावत्याः पञ्चनदान्तर्गताया वैदिकी संज्ञा । "इरावर्ती परुष्णीत्याहुः” (६/२६ ) इति यात्कनिरुतात् । इरावतीनिर्गमप्रदेशोऽत्रि- स्थानमासीदिति वायुपुराणे उक्तम् । तत्रात्रिप्राणस्य भूयसोपसंनिधानात् स्वानुकूल्यं दृष्ट्वा नरविधोऽप्यत्रिस्तत्र चिरं तपस्तेपे । अत्रिप्राणसाधनमेवास्य तपश्चरणम् । अत्रिप्रधानस्थानात् प्रवर्तमानत्वादस्या. परुण्या अत्रिकन्यात्व- मारोप्यते । साऽत्रिस्थानादागत्याङ्गिरःस्थानमागतति विवाहकल्पना क्रियते । अङ्गिरःस्थानञ्च यज्ञप्रधानस्थानत्त्वादग्निप्रायस्थानमेव तच्च पद्वत्यापयासरस्वती- शतद्र विपाशैरावतीभिनंदीभिरुपलक्षितप्रदेशरूपम "नि त्वा दंधे वर या पृथिव्या इडायास्पदे सुदिनत्वे अह्वाम् , दृषद्वत्यां मानुप आपयायां सरस्वत्यां रेवदग्ने दिदीहि" (ऋ.३।२६।४ ) इति मन्त्रे इडायास्पदे इत्यनेन यज्ञाग्निदीपनप्रदेशस्यैरावतीपर्यन्तत्वावगमात । अथवा ब्रह्मावतीयब्रह्मपर्पदधिष्ठा- ताऽयमगिरा ब्रह्मा पश्चिमस्थाया इरावत्या अांगेव यज्ञोपयुक्तभूमि व्यवस्था- पयन् यतो नेरावतीप्रदेशं यज्ञार्थं रोचयते तत एवाहुरात्रेयी परुपं भासते-इति । अङ्गिराश्चात्र यज्ञान्निवर्तत इत्यत आहुरात्रेयी हीयमग्नि गतमङ्गिरसं शमया- मासेति । गङ्गति काचिदिरावत्यां सङ्गता शाखानदी स्यात् । तदिदमाधिदैविक वृत्तमाधिभौतिकोपाख्यानविधयोपनिबद्धम् । वस्तुतस्तु नेयमात्रेयी परुष्णी नामिका काचिन्मनुष्यविधात्रिकन्याऽऽसीत् । आध्यात्मिकाधिदैविकयोरप्यर्थयोराधिभौति- कत्वेनोपरज्योपाख्यानकरणस्य पौराणिकस्वभावसिद्धत्त्वात् । १२-"यत्तु अत्रेः पुत्रोऽभवद्वह्निः सोदय॑स्तस्य नैध्र वः । कृशाश्वस्य तु विप्रर्पताच्यामिति नः श्रुतम् ।। १ ।। स तस्यां जनयामास स्वस्त्यात्रेयान्महौजसः । वेदवेदाङ्गनिरतान्तपसा हतकिल्विषान् ।। २ ॥"

* अत्रिः * [ ६५ - इति कौमें उनविंशाध्याये उक्तम् । तत्रायं लेखकदोपादस्ति कश्चित त्रुटितः पाठ इति संशोधनीयत्वादुपेक्ष्यते १३-अथैपां सोम दत्त-दुर्वाससां सम्बन्धेनापि कतिपये पौराणिका भ्रान्त्या बहुभक्तिवादमाहुः । विष्णुपुराणे ( १।१०।८-६) तावदेकस्या एवान- सूयात्रा गर्ने त्रयाणामेपामुत्पत्तिरुच्यते । भागवते (८७ ) चात्रेऋक्षपर्वते तपश्चरतः पुत्रार्थमीश्वरमाराधयतस्तपसा परितुष्टा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराम्त्रयो देवाः सहैवागता आकाशमार्गे स्थित्या तमत्रिमूचुः । त्यो देवा वयमेक ईश्वर इति कृत्वेश्वरागधनया प्रसन्ना वयं स्वस्वांशस्त्रयस्ते पुत्रा भविष्याम इति । ततो ब्रह्मा स्वांशेन चन्द्रो विष्णुः स्त्रांशेन दत्तात्रयः शिवः स्वांशेन दुर्वासा इत्येवं त्रयः पुत्रा अत्रेरुद्वभूवुरित्युक्तम- य एते प्राणाः परिक्षुब्धा उपणा अभवन् तत्रायमुत्पन्नोऽग्निरेव स स्वयंभृरात्मा उप्णानां भूयः क्षोभऽग्नितापात् परिक्लिन्ना बहवोद्रवाभूत्वा प्रापोऽभूवन् परेवाहुः । अत्रेरस्य भार्याऽनसूया पतिव्रताऽसीत् । तस्याः पातिव्रत्यपरी- क्षार्थ ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः सहाव्याश्रममागत्य नग्नावस्थायामनसूयातो भिक्षामर्थयामासुः । तेपां तथा चरितं दृष्ट्वा सा पातिव्रत्यप्रभावेण सद्यस्तान् वालकान् भावयामासं ततः सावित्रीलक्ष्मीपार्वतीनां प्रार्थनया तान बालकत्वा- दुन्मोच्य पूर्वावस्थां प्रापय्य सावित्र्यादिभ्योऽर्पयामास । ततस्त्रयस्ते ब्रह्मविष्णु- महेश्वराः स्वस्वांशसंयोगादेकां मूर्ति कल्पयित्वाऽनसूयायाः पुत्रत्वमङ्गीचक्रुः । तैर्दत्तत्वान दत्तात्रेयं तमाचक्षते इति । अत्र मते दत्तात्रेयस्त्रयाणामंशेभ्य उत्पन्नो- ऽभून् । पूर्वमते तु त्रायाणां पृथगंशैः पृथगुत्पन्न पु त्रिषु पुत्रेपु दत्तोऽयं केवलाद्विष्णोरंशादुत्पन्न इति भेदः । वस्तुतस्तु देवयुगे चिरन्तनादत्रेरिमे सोमदत्तादयोऽभूवन् । न च तत्र युगे ब्रह्मविष्णुमहेश्वराख्यानां त्रयाणां देवानामेकेश्वरान्वाख्यानं सुप्रतिपन्नमासीत वेदमन्त्रे पु कुत्रापि तेपो त्रयाणां तथा साहचर्याख्यानानुपलव्धेः । तस्मादश्रीतोऽयमर्थो नातीव श्रद्ध य इत्यु- पेक्ष्यते । महाभारतशान्तिपर्वणः सप्तोत्तरद्विशततमाध्याये (शां० २०७।१० ) सोमश्चार्यमा चेति द्वावत्रिपुत्राव्याख्यातौ। तत्रान्येपामुत्तरोत्तरात्रिपुत्रत्वेऽपि बहुवचनस्वारस्यान सोमस्य प्रथमात्रिपुत्रत्वं निःसन्दिग्धं प्रत्येतव्यम् ।

६६ ] * महपिकुलवैभवम् * १४-अत्र केचित् प्रत्यवतिष्ठन्ते । सोमोऽयं नारोरसः स्वधर्मपत्न्यामन- सूयायामुत्पन्नः पुत्र आसीत् किन्तु अत्रिनेत्रपरिन तजलतोऽयमुत्पन्नत्वादयोनिजः पुत्रो द्रष्टव्यः । ऐतिहासिकसमये तथैव भूयसा स्मरणात् तथाहि ब्रह्माण्डो- पोद्घात हरिवंशे च --( ३.६५) - "पिता सोमस्य वै विप्रा जज्ञेऽत्रिभगवानृपिः । काष्टकुडयशिलाभृत ऊर्ध्ववाहुर्महाब तिः ।। १ ।। सुदुश्चरं नाम तपो येन तरतं महद पुरा । त्रीणि वर्षसहस्राणि दिव्यानीति हि नः श्रुतम् ॥ २ ॥ तस्योर्ध्वरेतसस्तत्र स्थितस्यानिमिपस्य ह । सोमत्वं तनुरापेदे महाबुद्धिः सबै द्विजः ॥ ३ ॥ अध्यमाचक्रमे तस्य सोमत्वं भावितात्मनः । नेत्राभ्यामस्रवत्सोमो दशधा द्योतयन् दिशः ॥ ४ ॥ तं गर्भ विधिना हृष्टा दश देव्यो दधुस्तदा । समेत्य धारयामासुर्न च ताः समशक्नुवन् ।। ५ ।। स ताभ्यः सहसैवाथ दिग्भ्यो गर्भः प्रसाधितः । पपात भासयल्लोकान् शीतांशुः सर्वभावनः ॥ ६ ॥ यदा न धारणे शक्ताम्तस्य गर्भस्य ता दिशः । ततः सहाभिः शीतांशुनिपपात वसुन्धराम् ।। ७ ।। पतन्तं सोममालोक्य त्रमा लोकपितामहः । रथमारोपयामाम लोकानां हितकाम्यया ॥ ८ ॥ म हि वेदमयो विप्रा धर्मात्मा सत्यसङ्गरः । युक्त बानिसहण स्थेऽध्यास्तेनि नः श्रुतम् ॥ ६ ॥ स नेन स्थमृग्वेन नागरान्तां वसुन्धराम् । त्रिसप्त कृत्वोऽतियशाश्चकाराभिप्रदक्षिणाम् ।। १० ।।

* अत्रिः ** [ ६७ तस्य यहवर्द्धितं तेजः पृथिवीमन्वपद्यत । अोषध्यस्ताः समुद्भूतास्तेजसा जलयंन्त्युत ।। ११ ।। ताभिः पुष्णात्ययं लोकान् प्रजाश्चापि चतुर्विधाः । पोप्टा हि भगवान् सोमो जगतो हि द्विजोत्तमाः ॥ १२ ॥ ततस्तस्मै ददो राज्यं ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः । बीजोषधीनां विप्राणामपांच द्विजसत्तमाः ॥ १३ ।। इति । . एवमेव मात्स्य पाद्म चोक्तम् । तथा चात्रेः स्वधर्मपल्यां समुद्रायां वा- ऽनमूयायां वा सोमोऽयमौरसः पुत्रोऽभूदिति विप्रतिपन्नमिति चेत्र ब्रमः- - १५-नरविशेपस्यात्रेनेत्रप्रस्रवणोदकान्नरविधस्य सोमम्योत्पत्तिरभूदित्येवं तावन्न प्रतिपत्तव्यम् श्रुतिस्मृतितात्पर्यविरूद्धतया तस्यार्थभ्य नितान्तभ्रान्तत्वात् । अपि तु नरविधयात्रेः स्वधर्मपत्न्यामेव नरविधः सोमो जज्ञे । अनरविधस्य त्वत्रेरश्रुजलादनरविधः सोमो जज्ञे इत्यर्थपृथक्त्वात् सोमोत्पत्ति विध्यं द्रष्टव्यम् । तथाहि- १६-वैदिकीनामितीहासश्रुतीनां त्रिपथगात्वं ब्रह्मप्रसङ्ग पूर्वमाख्यानम् । ततो भापान्तरीकृताः पुराणनामानः सृष्टीतिहासाः प्रायेणाधिदैविका एवं सन्तोऽध्यारोपेणाध्यात्ममधिभूत चोपनीयन्ते । तत्रैते चरित्रनायका ऋपिपितृदेवा- सुरगन्धर्वादयोऽर्था अध्यात्म शरीरारम्भका इप्यन्ते । अधिदैवतं ते ब्रह्माण्ड- व्यापिनो निरूढा यौगिका वा प्राणाः स्युः। अधिभूतं तु ते सर्वेऽपि प्राणिनो नरा अपेक्ष्यन्ते । तत्रैतेपामाध्यात्मिकाधिदैविकाधिभौतिकानां लक्ष्याणां यत्र यत्रैवार्थेषु प्रक्रियासाम्यं लक्ष्यते त एवार्थाः प्रायेणेतिहासमर्यादयोपनिवध्यन्त । यत्र तु पूर्वापरसाम्यभूयस्त्वेऽपि क्वचित् क्वचिदंशे वैषम्यमापतति तत्र सर्वार्थ- सामञ्जस्येनोपपादनाशक्यत्वादितिहासलेखकस्येच्छानुरोधेनैतदधिकरणत्रयतः कञ्चिदेकमेव पक्षं गृहीत्वा सन्दर्भयोजना क्रियते इति पौराणिकः समयोऽभ्यु- पगम्यते। तदनुसारेण प्रकृतेऽप्यत्रेः सोमोत्पत्तावेकत्र ब्रह्माण्डोपोद्घातेऽधि- भूतपक्षमेव प्रधानीकृत्य भद्रायां पल्यामत्रः पुत्रः । सोमो व्याख्यातः । सिन्धुनदात पश्चिमे देशे निवसतां गन्धर्वाणां राज्ञः सोमस्य तथैवात्र रूपन्नत्वात अन्यत्र ६८ ] * महर्पिकुलवैभवम् * H--- पुनराधिदैवतपक्षमेव प्रधानीकृत्य तप्यमानस्यात्रनेत्रप्रस्रवणरसान सोमोत्पत्ति- राख्यायने । अधिदैविकस्येमा पृथ्वी परितश्चरतश्चन्द्रस्य तथैवात्रे रुत्पन्नत्वात् । इत्थंचाधिभौतिकान्नरजातीयादत्र: स्वधर्मपन्यां भद्राख्यायामनसूयायामुत्पन्नो गन्धर्वजातीयो नरविधश्चन्द्रो भिन्नः । आधिदैविकात्तु प्राण ज्ञानीयादवेर्नेत्र- प्रस्नु तरसादुत्पन्नो दिवि प्रकाशमानः पृथिवीं परितः क्रममाणोऽयं चन्द्रो भिन्नः । तयोरुत्पत्तिप्रकारभेदेऽप्यनिजातत्वं साधर्म्यम् । या रुक् पारिजातस्य, शशिनः सज्जनस्यच । न सा वै रात्रिजातस्य तमसो दुर्जनस्यच ।।" इत्यादौ दिविष्ठचन्द्राभिप्रायेण यथात्रिजातत्वमुच्यते तथाऽनाधिदैविकयो- दत्तदुर्वाससोरात्र ययोः सजातभ्रातृभावेनोक्तस्य नरविशेपस्य चन्द्रस्याप्यत्रिज्ञा- तत्वोपपत्तेः । तत्र नरविशेपस्य चन्द्रस्यात्र रनसूयायामुद्भवाख्यानं निर्विवादम् । दिविष्ठस्य तु चन्द्रमण्डलस्योत्पत्तिः कथमभूदिति जिज्ञासायां प्रस्तुतेनानेन चन्द्रोत्पत्तिप्रकारणेनाकाशचारिसोमोत्पत्तिस्थितिरहस्यं सुविज्ञानं भवति । १७-तथाहि तत्रततसोमोत्पत्तिविवक्षया ब्रह्मणोऽत्ररुत्पत्तिस्ताबदा- ख्यायते-अस्ति खलु सर्वजगद्व्यापी सूक्ष्मोऽव्यक्तः कश्चिदव्याकृतोऽर्थः तत्रा- शनायावशात् क्षोभः समभवत् । अनात्मन्विनी तावदादावशनायाऽसीत् । तन्मनोऽकुरुत । आत्मा मे स्यादिति । ततः स्वयमत्रार्कः कश्चिदशनायावान- भवत । अप्सु सर्वजगद्वीजं हिरण्यगर्भोब्रह्मा वायुमयः प्रादुरभून् । यावदः शनायाऽसीत् तावदाग्नि स्तावदापः । तदिदमेकं हिरण्मयमण्डमुच्यते । हिरण्य- मित्यग्निरेतसां संज्ञा । तद्गर्भे यो नभ्यात्मा वायुः स हिरण्यगर्भो ब्रह्मा स एवैतस्मिन ब्रह्माण्डे सृष्टिकर्ता । सोऽग्निमयश्चापोमयश्च द्विधाभूतस्ताभ्यां स्त्रीभ्यामिव भागाभ्यां विराजमुदपादयत् । चिंत्यःकश्चित्परिच्छिन्नो यज्ञमयो- ऽन्नमयोऽग्निविराट् । सेयं पृथ्वी नाम । स तप्यमानोऽन्तरगर्भे चितेनिधेयं नामाग्निमजनयत् । तमग्नि मनुरित्याचक्षते पौराणिकाः मनोमरीच्यादयो दश प्राणा अभवन् ।

अत्रिः * [ ६६ - सोऽयमर्थस्तावद् वाजसनेयश्रुतौ श्रूयते- "नैवेह किञ्चनाग्र आसीत्-मृत्युनैवेदमावृतमासीत्-अशनायया । अशनाया हि मृत्युः । तन्मनोऽकुरुत आत्मन्बी स्यामिति । सोऽचन्न- चरत् । तस्यार्चत आपोऽजायन्त । आपो वा अकः । तदपां शर आसीत् तत्समहन्यत । सापृथिव्यभवत् । तस्यामश्राम्यत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निरिति" || एतदनुसारेण मनुरण्याह- आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतय॑मनिर्देश्य प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ १ ॥ ततः स्वयम्भूभगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् । महाभूतादिवृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः ॥ २ ॥ सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादो तासु बीजमवासृजत् ॥ ३ ॥ तदण्डमभवद्ध मं सहस्रांशुसमप्रभम् । तस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥ ४ ॥ यत्तत्कारणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । तद्विसृष्टः स पुरुषो लोके ब्रह्मति कीर्त्यते ।। ५ ।। द्विधा कृत्वात्मनो देहमन पुरुषोऽभवत् । अर्दैन नारी तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ॥ ६ ॥ तपस्तप्त्वाऽमृजा तु स स्वयं पुरुपो विराट् । तं मां वित्तास्य सर्वस्य स्रष्टारं द्विजसत्तमाः ।। ७ ।। प्रशासितारं सर्वेपामणीयांसमणोरपि । रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्त पुरुष परम् ।। ८ ।।

१०० ] * महर्पिकुलवैभवम् * एतमेके वदन्त्यग्नि मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ।। ६ ।। अहं प्रजाः सिसृजुस्तु तपस्तप्त्वा सुटुंश्चरम् । पतीन् प्रजानामसृजं महीनादितो दश ॥ १० ॥ मरीचिमत्र्यङ्गिरसो पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । प्राचेतसं वसिष्ठञ्च भृगु नारदमेव च ।। ११ ।। एते मनूंस्तु सप्तान्यानसृजद् भृरितेजसः । देवान देवनिकायाँश्च महपी'श्चामितोजसः ।। १२ ।। मनोहरण्यगर्भस्य ये मरीच्यादयः सुताः । तेपामृपीणामाद्यानां पुत्राः पितृगणाः स्मृताः ।। १३ ।। ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्यो देवदानवाः । देवेभ्यश्च जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः ॥ १४ ॥” इति ।। १८-नाय मनुविराजोऽतिरिच्यते । चियचितेनिधेययोः समानायत- नत्वेनैव पुरुपत्वा भमानान । विराट् चायं हिरण्यगर्भान्नातिरिच्यते। हिरण्यगर्भ- ग्राणस्यैव चित्या तदुत्पत्तेः, अन एवैषां मरीच्यादीनां मनुजन्यत्वमिव विराड्- जन्यत्वं ब्रह्मजन्यत्वञ्च पुराणोक्त न विरुध्यते । पु च मरिच्यादिपु भृग्वाङ्गि- रोऽत्रीणामुत्पत्तिं शौनकः प्राह बृहद वतायाम- , - "त्रिसांवत्सरिक सत्रं प्रजाकामः प्रजापतिः । अाहरत् सहितः साध्यविश्वेदे वेः सहेतिच ॥ १ ॥ तत्र वाग् दीक्षणीयायामाजगामाशरीरिणी । तां दृष्ट्वा युगपत्तत्र कस्याथ वरुणस्य च ।। २ ।। शुक्रं च स्कन्द तद्वायुग्नी प्रास्यद् यदृच्छया । ततोऽचियो भृगुजजे अङ्गारेभ्योऽगिरा ऋपिः ॥ ३ ॥ प्रजापतिमुती दृष्ट्वा हुष्टा बागभ्यभापत । है * अत्रिः * [ १०१ आभ्यामृपिस्तृतीयोऽपि भवत्वत्रैव मे सुतः ।। ४ ।। प्रजापतिस्तथेत्याह भापमाणां तु भारतीम् । ऋपिरत्रिस्ततो जज्ञे सूर्यानलसमा तिः ।। ५ ।। इति ।। प्रजापतिरत्र संवत्सरः सौरः । तस्य त्रैवार्षिके पृथिव्या योगे पार्थिवप्राजपत: प्राणस्य महिमा वागुपसृत्य । वाग्वादिवशरीरिणी सती पृथिव्या बहिर्धा- ऽभवत । तत्र दक्षवरुणयोरसी वायुभूती संश्लिष्टावभूताम् । दक्षस्तावदयं दशदिग्भ्यः स्वयं प्रस्रवतां प्रचेतोनाम्नां रसानां संयोगजन्मा दिमाममयः प्राणः । सोऽनवरतमिह पृथिव्यामुपसर्पति । एवं सूर्यमण्डलप्रकाशतो बहि- श्चतुर्दिक्षु परिव्याप्तादम्भःसमुद्रादापोमयः प्राणः पृथिव्यामुपसर्पति स वरुणः । तयोश्च पृथिव्या रसे बाङ्मये प्राणे संस्रवो भवति । पञ्चभूतानामादिभूत- माकाशनामक तत्वं सर्वजगद्व्यापीह पार्थिवप्राणस लग्नं तत एवोद्भूतं विव- क्यते । तेपां संघर्पादग्निर्वसुरुदभवन् । तस्मिन्नग्निस्वरूप भृग्वगिरोऽत्रयः प्राणाः सम्भवन्ति तत्र अर्चिपि भृगुः संबभूवेति । भृगुर्वारुणिरिति । अङ्गारे- प्वङ्गिराः सम्बभूवेति । "त्वमग्ने अङ्गिराः प्रथम ऋपिः" इति श्रुतिभ्यो वरुणांशतो भृगुरग्न्यंशतस्त्वङ्गिरा अभ्युपगम्यते । अग्निस्त्वत्र पृथिव्या आत्मा पृथ्वीतो वहिर्भवन् सांवत्सरः । अथ यावानिह वाचिको भाग ,उदपतत् सोऽत्रि म प्राणो भवति । यथाऽर्चिपि भर्जनप्रधानः पचमानः पच्यमानो वा वारुणो भागो भृगुर्नाम जायते । यथा वा पार्थिवे काष्ठादिघनद्रव्ये गर्भगतो रक्लोऽर्थो दहनकाले दृश्यते स वस्तुतो धनकृष्णवर्णः काष्ठाद्यङ्गिरसत्वा- दङ्गिरःशब्देनोच्यते । तथाऽयं दह्यमानः काष्ठादिवहिःस्थितं वायुरसाद्यर्थमात्मान येनाकृष्य स्वदिति स भोक्ता प्राणोऽदनप्रधान्यादविर्नामोच्यते । उत्पत्ति- रियमत्रेस्ता। १६-अत्रेदं कश्चित् प्रत्यवतिष्ठते । असमञ्जसमिदं शौनकोक्तमत्रिजन्मा- ख्यानम् । तथाहि कस्माथ वरुणस्य चेति व वन् शौनकः पूर्वसतः कस्य वरुणेन योगादत्र्युत्पत्तिमभिप्रैति । स च कस्तावदक्षो नाम प्रजापतिरुच्यते । तस्य चात्रिवंशप्रसूतादाक्कालिकात प्राचीनबर्हिपः सवर्णायां सामुद्रयामुत्पन्न भ्यो दशभ्यः प्रचेतोभ्यो मारिपायां वाल्या सामकन्यायामद्धेन , सोमांशेनार्द्धन १०२ ] महर्पिकुलवैभवम् * प्रचेतोंऽशेन च पञ्चादुत्पत्तिराख्यायते विष्णुपुराणे प्रथमांशे पञ्चदशाध्याये ब्राह्मप्रथमाध्याये च । महाभारतशान्तिपर्वणि मोक्षधर्मे स्वस्तिकाध्याये- "अत्रिवंशे समुत्पन्नो ब्रह्मयोनिः सनातनः । प्राचीनवहिभगवाँस्तस्मात् प्रचेतसो दश ॥ १ ॥ दशानां तनयस्त्वेको दक्षो नाम प्रजापतिः । तस्य द्वनामनी लोके दक्षः क इति चोच्यते ।। २ । इति । बहिर्धानाद्धिपणायां प्राचीनबहिरभून् । अन्तर्धानात शिखण्डिन्या बहिनो- ऽभूत् । पृथोरन्तर्धानः वेनान पृथुः। अङ्गाद्वनः । अङ्गस्वयमत्रिवंशेऽभवदित्ये- वमयं प्राचीनबहिरत्रिवंशजः । तथा चात्रिवशे बहूत्तरकालप्रजातेन केनातिप्राची- नस्यानरुत्पत्तिकथनं नावकल्पते इति । अत्रत्र मः । द्वौ दक्षौ । स्वायम्भुवमन्वन्त- रीयो ब्रह्मपुत्र श्राद्यः । स चात्रिसमजन्मनो मरीचेरपि पूर्वजः । अथान्यान् मानसान पुत्रान् सदृशानात्मनोऽसृजत् । भृगु पुलस्त्यं पुलहं क्रतुमङ्गिरसं तथा ॥ १ ॥ मरीचि दक्षमत्रिंच वसिष्टं चैव मानसान् । नत्र ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः ।। २ ।। इति विष्णुपुराणोक्त, *~-त्रिः १ अङ्गः २ वेनः सुनीथायाम् भयायां वा ३ पृथुः ४ अन्तर्धानः ५. वहिर्धानः शिखण्डिन्याम् ६ प्राचीन वर्हिः धिषणायाम् ७ दशप्रचेतसः सवर्णायाम् ८ दक्षः मारिषायाम्

A
* अत्रिः *
[ १०३
अंगुष्ठात् मसृजे ब्रह्मा मरीचेरपि पूर्वजम् ।
सोऽभवन भरतश्रेष्ठ दक्षो नाम प्रजापतिः ॥ ३ ॥
इति भारते शान्तिपर्वणि मोनधर्मे मर्वभनोत्पत्यध्यायोक्तश्च । अन्यन्तु
चालुपमन्वन्तरीयः सोमांशकताद्धेभ्यो दश प्रचेताभ्यो वाक्ष्यां मारिपायामुत्पन्नः ।
"तेजोमिरुदिताः सर्वे महर्पिसमतेजमः ।
दशः प्रचेतसः
पुत्राः
सन्तः पुण्य जनाः स्मृताः ।।
तेभ्यः प्राचेतसो जज्ञे दक्षो दक्षादिनाः प्रजाः ।।
इति भारतादिपर्वणि संभवपक्ति: । क इत्युभयाः समानं नामान्तरम् ।
तत्र पूर्वस्मादक्षाद्वरुण युक्तादत्रेर्जन्म स्यात् । अत्रेश्च बंशे पश्चात पुनरन्यो
दक्षः प्राचेतसः प्रजातः स्यादिति ना समञ्जमं भवति ।
इह हि मतत्रयं भवति । एक ताबदाचक्षते-
कः प्रजापतिरुद्दिष्ट इत्यभियुक्तोद : प्रजापतिवचनोऽयं कशब्दः प्रजापति-
मात्रसाधारणो नैकान्ततो दक्षमेवाचष्ट्र बहवस्तु प्रजापतयो भवन्ति दक्षादयश्च
तपां पतिमा चेति । तत्र ब्रह्म बेह प्रजापतिः स्यात भारतानुशासनपर्वणः
पञ्चाशीतेऽध्याये सुवर्णदानधर्मे साधारणेन ब्रह्मशब्देनैव तदुल्लेखान तथा हि
तदुक्तिः संक्षिप्य दश्यते-वशिष्ट उवाच-
"अपि चेदं पुगधीतं श्रुतं मे ब्रह्मदर्शनम् ।
पितामहस्य यह त्त ब्रह्मणः परमात्मनः ।। १ ।।
महादेवस्य रुद्रम्य वारुणी विभतस्तनुम् ।
यज्ञः ववृते तत्रा जग्मुरग्न्यादि देवताः ॥ २ ॥
तत्राग्नेविविशुस्तस्य शरीरं सर्व देवताः ।
एतम्मात कारणादाहुरग्नि सर्वास्तु देवताः ॥ ३ ॥
संजुहावात्मनात्मानं स्वयमेव तदा प्रभुः ।
यज्ञं च शोभयामास बहुरूपं शिवस्तदा ॥ ४ ॥

१८४]
* महर्पिकुलवैभवम *
देवीदीक्षापि तत्रासीद् यज्ञ रुद्रस्य वारुणे ।
स्वयंभुवस्तु तां दृष्ट्वा रेतः समपतद् भुवि ।। ५ ।।
तस्य शुक्रस्य विस्पन्दात् पाँशून संगृह्य भूमितः ।
प्रास्यत् पूपा कराभ्यां वै तस्मिन्नेव हुताशने ॥ ६ ॥
ततस्तस्मिन् संप्रवृत्त सत्रे अलित पावके ।
ब्रह्मणा जुइतस्तत्र प्रादुर्भावो बभव ह ।। ७ ।।
शुक्र हुतेऽग्नौ तस्मितु प्रादुगसंस्रयस्तदा ।
पुरुपा वपुषा युक्ताः स्वैः स्वैः प्रसवगुणैः ॥ ८ ॥
भृगित्येव भृगुः पूर्वमङ्गारेभ्योऽङ्गिराभवत् ।
अत्रवात्रति च तमो जातमत्रिं वदन्त्यपि ॥६॥
सहज्वालाभिरुत्पन्नो भृगुस्तस्माद् भृगुः स्मृतः ।
अङ गारसंश्रया चैव कविरित्यपरो भवत् ।। १० ॥
अङ गारेभ्योऽङ गिराजातो बालखिल्या कुशोचयात् ।
मरिचिभ्यो मरीचिस्तु मारीचः कश्यपोऽभवत् ।। ११ ।।
ततो ब्रवीन्महादेवो वरुणः पवनात्मकः ।
ममं सत्रमिदं तस्मात् त्रीण्यपत्यानि सन्तिभे ।। १२ ।।
अग्निरूचे ममांगेभ्यस्तान्यभूवन्ममाश्रयात् ।
तमैव तान्यपत्यानि वरुणो ह्यवशात्मकः ।। १३ ।।
अथाब्रवील्लोकगुनमा
लोकपितामहः ।
ममैव तान्यपत्यानि मम शुक्र हुतं हि तत् ।। १४ ।।
अहं कर्ताहि सत्रस्य होता शुक्रस्य चाप्यहम् ।
यस्य बीजं फलं तस्य मच्छुक्रजमिदं मम ॥ १५ ॥
ततो त्रुवन् देवगणाः पितामह मुपेत्यते ।
तवैव प्रसवाः सर्वे वरुणोऽग्निः परे च ये ॥ १६ ॥

* अत्रिः ** [ १०५ . भृगु पूर्वमपत्यंतु जग्राह वरुणः शिवः । ततः स वरुणाख्यातो भृगुः प्रसवकमकृत् ।। १७ ।। ईश्वरोऽङ्गिरसं स्वग्नेरपत्यार्थमकल्पयत् । आग्नेयाश्चाङ्गिरास्तस्मात् कवि यो महायशाः ॥ १८ ॥ एते हि प्रसवा सर्वे प्रजानां पतयस्त्रयः । सर्व सन्तानमेतेपामिदमित्युपधारय" ।। १६ ।। ( भा०. अनु० ८५ अ० एसञ्च वासिष्ठ विज्ञानं शौनकसमानार्थं नेयम् । तदस्मादत्रिजन्मनि नास्ति दक्षस्य सम्बन्धः । वायुमयस्य हिरण्यगर्भस्य वा, विराजोऽग्नेर्वा, वैराजस्य मनोर्वा सम्बन्धस्य तत्रेष्यमाणत्वात् । तस्माददोपः ।। १ ।। (२१) अथवा येपो मते दक्ष एवायं को नाम । तेपामपि नारत्ययं दोपः । ननु प्राचेतस्य दक्षस्याप्यत्रिवदेवात्रिसमकालं हिरण्यगर्भपौत्राद्वै राजात स्वयम्भूमनोरुत्पत्तिर्मनुस्मृतावुच्यते । "मरिचिमव्यङ्गिरसौ पुलस्स्यं पुलहं क्रतुम् । प्राचेतसं वसिष्ठं च भृगु नारद मे व च" ॥ इति ।। तस्मान्नात्रिवंशे पश्चादुत्पन्नः प्राचेतसो दक्ष इति चेन्न । प्रचेतोजनितस्यापि दक्षस्य मनुजन्यत्वाविशेषाभिप्रायेण तथोक्तः। ब्रह्मपुत्रदक्षस्य प्राचेतसदक्षस्य च स्वरूपादिसाधानुवोधनाय वा तथोक्तः । ( २२ ) अथवा पौराणिकैरेवात्र समाहितम् । यथा ब्राह्म प्रथमाध्याये- "मारिपानाम कन्यैपा वृक्षाणामिति निर्मिता । भार्या योऽस्तु महाभागाः सोमवंशविवर्धिनी ॥ १ ॥ युष्माकं तेजसोऽर्धेन मम चार्धेन तेजसा । अस्यामुत्पत्स्यते विद्वान् दक्षो नाम प्रजापतिः ।। २ ।।

१०६ ] * महपिकुलवभवम ARMA इत्थं सोमस्य वचनाजगृहुम्ने प्रचेतसः । संहृत्य कोप वृक्षेभ्यः पत्नी धर्मेण मारिपाम् ।। ३ ।। दशभ्यस्तुप्रचेतोस्यो मारिपायां प्रजापतिः । दक्षो जजे महातेजाः मोमम्यांशेन भोहिजाः ।।४।। इत्थं दक्षम्य प्राचतमत्वे निमपिते मुनयः पृच्छन्ति-- संभवस्तु श्रुतोऽस्माभिर्दन्नम्य च महात्मनः । अङ्गुष्ठाद् ब्रह्मणो जज़ दक्षः किल शुभवतः ।। ५ ।। कथं प्राचेतसत्वं स पुनलेंभे महातपाः । दौहित्रश्चैप सोमस्य कथं श्वशुरतां गतः ।। ६ ।। इत्थं प्रश्ने समावत्त उत्पत्तिश्च निरोधश्च नित्यं भृतेषु भा द्विजाः । ऋपयोत्र न मुह्यन्ति विद्यावन्तश्च ये जनाः ॥ ७ ॥ युगे युगे भवन्त्येते पुनर्दक्षादयो नृपाः । पुनश्चैव निरुध्यन्ते विद्वांस्तत्र न मुह्यति ॥ ८ ॥ ज्यैष्ठ्यं कानिप्ठ्यमप्येषां पूर्वं नासीद्विजोत्तमाः । तप एव गरीयोऽभूत् प्रभावश्च व कारणम् ।। ६ ।। इति ।। तथा चैतेषां दक्षादीनां युगभेदेन नानात्वविवक्षणादस्य दक्षस्य सोमः दौहित्रत्वं श्वशुरत्वं वा सर्वमेवोपपद्यते-इत्यविरोधः ॥ वयं तु व मः । पुराणाख्याने प्वार यातानां चरित्रनायकानां त्रिविधः सृष्टिकल्पो विवक्ष्यते तात्विकसृष्टिकल्पः, आध्यात्मिकसृष्टिकल्पः, मानुपसृष्टिकल्पश्च । तत्र तात्विकाध्यात्मिककल्पयो-पदार्थविद्यायां नैतदेवं व्यामोहनं कार्यम् पदार्थानां क्वचित्पुत्रपौत्रादिभ्योऽपि पितृपितामहादीनामुत्पत्तेश्यमानत्वात "तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः । आकाशाद्वायुः । वायो- रग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी" इत्येवं तैत्तिरीयश्रुतावग्नेरपां * अनिः * [ १०७ जन्मोच्यते । “कस्विद्गर्भ प्रथमं दध्रापः" इति प्रश्नश्रुतौ त्वग्निमपां गर्भजमाहुः । अग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवीत्यग्नेः पौत्री पृथिवीमाहुः । "यदपां शर आसीत् तत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत् । तस्यामश्राम्यत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निवर्तताग्निः" ।। इति वाजिश्रुतौ त्वद्भ्यः पृथिवी ततोऽग्निरित्यग्नेः पृथ्वीपुत्रत्वमाहुः । "अग्ने नक्षत्रमजरमासूर्य रोहयो दिवि । दधज्ज्योतिर्जनेभ्यः" इतिमन्त्रश्रुतौ सूर्यस्याग्नि जन्मत्वमुच्यते । "अयं ते योनिऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः । तं जाननग्न अारोहाथा नो वर्द्धया रविम्" ।। इति मन्त्रश्रतो त्वग्नेः सूर्यजन्यत्वमाख्यायते एवमन्यात्रान्यत्रेदमुभयं संभवति । यथा तन्तुभ्यः पट उद्भाव्यते तथा पटादपि तन्तव उद्भाव्यन्ते । यथाऽग्नेरयं दग्धोऽङ्गारो जायते तथा दग्धाङ्गारादयग्निर्जायते, एवं यथा संभवं लोके द्रष्टव्मम् । श्रूयते चायमर्थो वाजिश्रतो- “स एप पिता पुत्रः । यदेषोऽग्निमसृजत, तेनैपोऽग्नेः पिता । यदेतमग्निः समदधात् तेनैतस्याग्निः पिता । यदेष देवानसृजत, तेनैष देवानां पिता । यदेतं देवाः समदधुः, तेनैतस्य देवाः पितरः। उभयं हैतद्, भवति पिता च पुत्रश्च । प्रजापतिश्चाग्निश्च-अग्निश्च प्रजापतिश्च । प्रजापतिश्च देवाश्च, देवाश्च प्रजापतिश्च" इति । (शत० ६।११२) " एवमेव.त्र वागदक्षवरुणवाय्वग्नियोगान् पाञ्चजन्योऽयमविरुत्पद्यते । अत्रिवंशजप्राचीनवहिपः प्रसूतेभ्यो दशप्रचेतोभ्यो योगादपरो दक्षश्चात्पद्यते । अथ प्राणाधनो यो वायुशरीरो हिरण्यगर्भो ब्रह्मा । तदुत्पन्नावागादिभूत- मयशरीराद् विराजो यः स्वयंभूमनुरुत्पद्यते ततोऽप्येतादिक्षी संभवत इति ब्रह्मजन्यत्वमपि नैनयोरपलपितव्यम् । तत्र हिरण्यगर्भप्रजापतेर्वा दक्षप्रजापते- १०८ ] * महर्पिकुलवैभवम * र्वाऽयमत्रिरुत्पद्यताम् । उभवविधस्यापि तस्य पारदर्शकत्वप्रतिवन्ध कत्वं सूर्यादि- तैजसकिरणप्रत्यावर्तकत्वं च समानी धर्मः । एवं ब्रह्मानुष्ठजन्मा वा प्राचेतसो वाऽयं दक्षः म्यान । उभयविधस्यापि तस्यादित्या पष्टिविधमागविशेषजनकत्वं क्रतुसहचारित्वं च समानो धर्मः । तत्रादिति प्रभृतीनां स्वरूपनिरूपणं ब्रह्म- विज्ञानस्य रजोवादे वैशयन नपुव्यम् । क्रतुदजयोस्तु स्वरूपं वाजिब्रुनो श्रृयन- । - ह क्रतू दक्षौ ह वा अस्य मित्रावरुणौ । एतन्न्बध्यात्मम् । स यदेव मनसा कामयते-इदं मे• म्यादिदं कुर्वीयेति-स एव क्रतुः । अथ यदस्मै तत् समृध्यते स दन्नः । मित्र एव क्रतुः वरुणो दक्षः" इत्यादि (शत०४-कां० ४ बा.) अध्यात्ममेवेदंरूपम् । अधिदैवतरूपं रजोत्रादे व्याख्यातम् ! यत्तु दक्षम्य ब्रह्माङ्ग ष्टप्रदेशादुत्पन्नो नत्वयं प्राणविधो दक्ष इति कश्चित प्रतीयान स प्रति- वक्तव्यः । ऐतरेयोपनिषद्यद्भ्यः संभूतः कश्चिदाद्यो महायुमप आम्नायते । सोयं सर्वजगद्व्यापीश्वरः प्रतीपद्यते । यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्यैष महिमा भुवि । दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः ।। ३।२। बृहच तदिव्यमचिन्त्यरूपं मूक्ष्माचतत्सूक्ष्मतरं विभाति । दरात्सुदूरे तदिहान्निके च पश्यत्विहैवनिहितं गुहायाम् ।। (३९.१९७) यस्मिन् यौः पृथिवीचान्तरिक्षमोतंमनः सहप्राणेश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ अमृतस्यैपसेतुः ।। (मुण्डके ३२) अग्निमूर्द्धा चक्षुपी चन्द्रसूर्यादिशः श्रोत्रं वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुःप्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथ्वीह्यप सर्वभूतात्मरात्मा ॥ ( मुण्डके २१४) video * अत्रिः * [ १०६ - तस्मादग्निः समिधोयस्यसूर्यः सोमात् पर्जन्यः ओपधयः पृथिव्याम् । पुमान् रेतः सिञ्चति योपितायां बह्वीः प्रजाः पुरुपान् संप्रभूताः ।।२।। तस्मादृचः साम यजूपि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च संवत्सरं च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्रपवते यत्र सूय्यः ।। २।६। तस्माच देवा बहुधा संप्र सुताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि । प्रणापानौ व्रीहियो तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्य विधिश्च ।।२९७ सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिपः समिधः सप्तहोमाः । सप्त इभे लोका येपुचरन्ति प्राणा गहाशया निहिताः सप्त सप्त ।।२।। अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽस्मात स्पन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः । अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च येनैप भूतस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ।।२।। पुरुप एवेदं विश्व कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद् यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थि विकिरतीह सोम्य ॥२।१०। "तस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित् तस्मान्नाणीयो न ज्यायोस्ति किश्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्वम्" ।। श्वेता० नारायणो० इति श्रुतेः ।। एष हि सर्वेषां जन्मदाता प्राण घनः । स एवाग्निमयत्वाद् विराडुच्यते विष्णुश्च । स एव वायुमयत्वाहिरण्यगर्भ उच्यते ब्रह्मा च । स एवेन्द्रम मयत्वात् सर्वज्ञ उच्यते शिवश्च । त्रयो देवा एका मूतिः । स वायुना सर्वं जगत् सृजति, अग्निना सर्वं जगत् परिरक्षति । ज्ञानोत्पत्तो हृदयग्रन्थिमोक्षणान् सर्व जगदुपसंहरतीति पौराणिकी मर्यादा । उत्तरादिगेतस्य शिरः प्रान्तोद क्षिदिक पादप्रान्तः । पूर्वा दिग् दक्षिणः करप्रान्तः । पश्चिमादिगुत्तरः करप्रान्तः, पूर्वा शिरः पश्चिमा पादः । दक्षिणा दक्षिणकरः । उत्तरा वामकर इत्येके । प्रधानाङ्ग ली वाचिनाङ्गुष्ठशब्देन करप्रान्तरूपो दिग्विशेषोऽभिप्रेयते । तत्र दक्षिणाद् दक्षस्योत्तरात्तु दक्षपत्न्या जन्मेत्येवान्यत्रापि ब्रह्मशरीरभागादुत्पन्न - प्वर्थेपु पौराणिकी परीभापा द्रष्टव्या ।। - इत्येके।

११० ] महपिकुलवैभवम् - (२३) अव्युत्पत्तिप्रसङ्ग नेयं दक्षोत्पत्तिरिहाख्याता संप्रति प्रकृतिमनुस- रामः ॥ अयमेवादिपुरुषस्त्रिविधोऽवधीयते मनोमयः प्राणमयो वाङ्मयश्च । इत एव पुरुषात् सर्वमिदमुत्पद्यते । तत्रोत्पत्ती मनोसयो निमित्तकारणम् । प्राणमयोऽसमवायिकारणम् वाङ्मयस्तु समवायिकारणं भवति ।। बाक् चेयं द्विविधा भवति । अमृता मा च । अमृतातः सर्वे देवाः, मातस्तु सर्वाणि भूतान्युत्पद्यन्ते । तत्र पञ्चभूतानामादिभूताकाशपदप्रशिद्धायां वाच्येव दक्षवरु- णाचमृतयोगादयमत्रिरुत्पद्यते इति बोध्यम् ।। ( २४ ) अथोत्पन्नोऽयमत्रिर्यत्र यत्र वस्तुन्यारम्भकविधयोपादीयते तद्वस्तु पारदर्शकत्वाविहीयते तत्राचं सूर्यरश्मिः प्रत्याइतो भूत्वा तद्वस्तु नो रूपं जनयति तदेवरूपि द्रव्यम् चक्षुपा दृश्यते । यथा तेजसमाप्यं पार्थिवं च । काचादिपार्थि- वेऽयमत्रिप्राणोऽत्यल्पमात्र उपादीयते इत्यतस्तत्र सूर्यादितेजोरश्मिः किञ्चिदेव प्रत्याहन्यतेऽधिकमात्रया तु स पारं गच्छति । वाय्वाद्यरूपिद्रव्येष्वयमत्रि - रम्भकद्रव्यमत एव तेभ्यः सूर्यरश्मेरप्रत्याघाताद् रूपं नोत्पद्यते सूर्य चन्द्र पृथिव्यादीनि तु यावन्ति घनद्रव्याणि तेष्वयमत्रिः प्राणोऽधिकमात्रया संनिविशते।। । (२५) तत एवात्रेः सोमोत्पत्तिर्भवति तथा हि प्रतिसंवत्सरकालमियं पृथ्वी सहस्रांशु सूर्य परितः परिक्रामति । तत्र सूपशुपरितप्तात पृथ्विपिण्डान प्रतिपलमुद्भवन्नयमविप्राण: पृथ्वीमनुपरिप्लवते । तेनायमत्रिप्राणः संवत्सर सहस्रांशुभ्यः संयोगात प्रत्यावृत्ति परितप्यते । परिक्रमणावृत्तित्रयेण तु त्रिः संवत्सरसहस्रांशुपरिनापादन्यात्रिमाणस्य शरीरं सोमत्वमापद्यते । स सोनभागः परितप्यमानस्यात्रेनेंत्रतः परिम्नवते । नेत्रशब्दो रश्मिपरः । यावनयमत्रेस्तनुभाग: सोमरूपेण परिणमते तावानूर्ध्वरेता इतोऽत्रेः पृथग्भूय सर्वतो दिक्षु व्याप्नुवन् पृथ्वीमन्वेव पुनः संपतति । पृथ्वीमनुसंपतन्तमेवैतं सोमराशि हिरण्यगर्भो ब्रह्मा वायुरूपेण चन्द्रकना धरातले निगृह्ये कविशतिकृत्वः परिक्रमणोत्तरं क्रमेणैतं सोमराशिं सर्वतः संचिन्वन्ने के सूर्यवत् सहस्रांशुभयं सोमपिण्डं संपादयतिस्म । स एवायं चन्द्रः पृथ्वी परितः परिक्रममाणो दिवि श्यते। यथाऽहनि तोयराशिः सूय्यांशुपरितप्त ऊर्ध्वरेताः सन् पृथिव्या उत्क्रम्य दिक्षु व्याप्नुवन् रात्री पुनः पृथिव्यामेव संपतितुमारेभे । किन्तु स पृथ्वीमिमां परि- तश्चन्द्रकक्षोपलक्षितव्योम्नि हिरण्यगर्भेणोद्भाविते वायुचक्रमये धरातले

* अत्रिः -
। १११
प्रत्यवरुद्धो नाधस्तात पृथ्वीतलेऽवतरतिस्म । तत्रैव संचीयमानः स एकविंशति-
परिक्रमणावच्छिन्न न कालेन पिण्डात्मना परिणतो भूत्वा पृथ्वी परित एवा-
द्यापि तेन वायुना प्राणोदितः परिक्रमते। यथाऽऽकाशविकीर्णाशुः केतुरयं
क्रमेण पिण्डो भूत्वा सूर्यो भवति । एवमेव वीकीर्णाः सोमांशवः क्रमेण
संहत्य चन्द्रपिण्डतामगच्छन् । इति चन्द्रमण्डलोत्पत्तिरहस्यं ब्रह्माण्डादिपुरा-
णेपु पौराणिका आहुः ।। महाभारतानुशासनपर्वणि दानधर्मेऽत्रिमहात्म्यप्रसङ्ग
अत्रिणेव चन्द्रीभूयान्धकारनिवारणमुच्यते । (म० भा० अ० २६१)-(१५६ अ० ॥
( २६ ) यत्तु चन्द्रोऽयं कदाचित सूर्य्य आसीत् । स परिदग्धशान्तोऽन्त-
गर्भाग्निः पृथिव्यभवत् । सर्वथाग्निपरिक्षयणे सा पश्चाचन्द्रोऽभवदित्यर्वाचा
कपांचिन्मतं ब्रह्मविज्ञानस्याहोरात्रवादे व्याख्यातम् । तन्मतान्तरं भवेदित्यूह्यम् ॥
(२७) अस्य चन्द्रम्य यावान् सोमभागः पृथिव्यामोषधिवनस्पति प्राणि-
जातेयु संक्रममाणो हसति तागनेव पुनरितोऽत्ररुद्भ तः सोमश्चन्द्रमण्डले
प्रविशन् परिपूरयतीत्यद्यापि स क्रमोऽनुवर्तते । अस्य चन्द्रस्य रथश्चन्द्रकक्षाख्यो
वाथुमयो मार्गविशेषः सहस्रांशुप्रचयः ।
आख्यातच रथस्वरूपं पुराणेषु । यथा लैङ्ग पट्पञ्चाशदध्याये-
विथ्याश्रयाणि चरति नक्षत्राणि निशाकरः ।
त्रिचक्रोभयतोऽश्वश्च विज्ञेयस्तस्य वै रथः ॥ १ ॥
शतारैश्च त्रिभिश्चक्रेयुक्तः शुक्लैहयोत्तमैः ।
दशभिस्त्वकशैर्दिव्यैरसङ्गोऽस्तेमनोजवैः ॥२॥
रथेनानेन देवश्च पितृभिश्चैव
गच्छति ।
सोमो ह्यम्बुमयैगोंभिः शुक्ल शुक्लगभस्तिमान् ॥ ३ ॥
क्रमतेः शुक्लपक्षादौ भास्करात् परमास्थितः ।
देवैः पीतं क्षये सोममाप्याययति नित्यशः ।। ४ ।।
पीतं पञ्चदशाहं तु रश्मिनैकेन भास्करः ।
आपूरयन् सुषुम्णेन भाग भागमनुक्रमात् ॥ ५ ॥

११२] * महर्पिकुलवैभवम् । इत्येता मूर्यवीर्येण चन्द्रस्याप्यायिता तनुः । स पौर्णमास्यां दृश्येत शुक्रः संपूर्णमण्डलः ॥ ६ ॥ इति ।। आदिनाडी मध्यनाडी अन्त्यनाडीत्येवं नक्षत्राणां नाडीत्वेनभितानां चन्द्रकलावलम्बभूतानां त्रित्वाचान्द्ररथस्य त्रिचक्रतेहाभियते इत्येके । आकाशे- ऽत्युच्च मार्गण मध्यमार्गेणातिनीचैर्मार्गेण चायं परिभ्रमतीति विचक्रश्चन्द्र- कक्षाख्यो रथ इहाभिप्रेत इतिपरे ॥ सोमरसं पातु सूर्यस्थास्त्रयस्त्रिंशत् सोम- पायिनो देवाश्चन्द्रकक्षायां संक्रमन्ते इति चन्द्रचक्र वैविध्यान्नवनवतिरश्मयः संप- चन्ते इत्यतः शतारं चक्रमुच्यते ॥ अहोरात्र वृत्तान्यश्वा उच्यन्ते। पञ्चदक्षिणतः पञ्चोत्तरतश्च नाडीवृत्ताचन्द्राहोरात्रवृत्तानीत्यतो दशाश्वो रथः कल्प्यते । तत्रैकविंशतिकृत्त्वः पृथ्वीपरिक्रमरणोत्तरमन्माचन्द्रात कियांश्चित सोमभा- गश्चन्द्रान पृथग्भूय पृथिव्यामोपथ्यादिपु संभूय तत्तदर्थोपादानां भवती- त्यप्याहुः ।। (२८) तदित्थमाकाशचारिचन्द्रोत्पत्तिमूलभूतो योऽधिारणस्तस्य यः प्रथमो द्रष्टाऽसीत तमेव विद्वांसमत्रिनाम्ना व्यपदिशन्ति । अत्रिप्राणपरिद्रप्दृत्वादन- महर्पिनाम्ना प्रसिद्धस्यास्य विदुस्तथाविधयशोनामव्यवहारबाहुल्याढव्यवहृत- विस्मृतंयहच्छानाम न क्यापि स्मयंते ।। । (२६) एतस्यात्रेः पुत्र परम्पराप्ये तेनात्रिशब्देन व्यपदिश्यते । अत्रिप्राण- मय ब्रह्मवंशधरत्वादत्रिमाणमयत्वात् । एवमस्यात्रः शिष्यपरम्परा चात्रेयब्रह्म- परिपदधिष्ठात्री तेनैवात्रिशदेन व्यपदिश्यते । अत्रिप्राण,प.सकत्वादत्रिप्राणारा- धनपरीक्षादिप्रयोगप्रधानवृत्तित्वात तिनायमत्रिशब्द: कुलपरम्परारूढत्वाज्जाति शब्दः संपद्यते । अत एव जातेर स्त्रीविपचादिति सूत्रे गोत्रं च चरणैः सहेति वैचाकरणाः स्मरन्ति । ततोऽनन्ता अत्रयः काले काले भिन्ना भिन्नाः पुराणेतिहा- सादिषु प्रसिध्यन्ति । तत्र पुरा देवयुगे तावदात्रोयब्रह्मपरिपदि हावत्री पांयेरण लोकशास्तृब्रह्मासनमध्यतिष्टनाम् ।. भौमोत्रिः सांख्यात्रिश्च । आदौ ताबद् भूमिष्ट ने यात्रिप्राणं ददर्शति कृत्वा स भौमोऽत्रिः प्रथमः । स ऋग्वेदस्य पञ्च- ममण्डलद्रष्टा महर्पिस्तत्र सप्तत्रिंशादीन् कतिपयसृक्तमन्त्रानपश्यत् । एप एव हि भोमोऽत्रिश्चन्द्रस्य पिताऽऽसीत !

* अत्रिः * [ ११३ K (३०) अथ यः पश्चादाकारो उत्तरध्रु वसंनिहिते सप्तर्पिमण्डले तुरीयतार- कामयमत्रिमपश्यत् स द्वितीयः सांख्योऽत्रिः । सा तारका वृहत्सहिताया- मप्युच्यते- "पूर्व भागे भगवान्मरीचिरपरे स्थितो वसिष्ठोऽस्मात् । तस्याडिरास्ततोऽत्रिस्तस्यासन्नः पुलस्त्यश्च । पुलहः क्रतुरिति भगवानासन्नानुक्रमेण पूर्वाधाः ।। इति ।। त्रिप्राणमयहीदमृनमित्यतोऽत्रिरित्युच्यते । स एप आधिदैविकोऽत्रिः ।। (३१) एत्रमध्यात्ममप्यत्रिप्राणो विनियुज्यते । तथा हि-ऐतरेयब्राह्मणस्य द्वाविंशाध्यायत्रिंशाध्यायोक्तप्रकरगणानुसारेणाध्यात्मं चत्वारः सहचराः प्राणाः प्रधान्येनोत्पद्यन्ते नाभानेदिष्ठो वालखिल्या वृपाकपिरवयामरुञ्चेति । स्त्रीयोनी नावत् पौरुपरेतो येन सिच्यते स रतोमयो नाभानेदिष्टः । तद्र तो बालखि- ल्याभिः प्राणैर्विक्रियते। शिरोधीवाहस्तवक्षोजटरक टपादाद्यङ्गप्रत्यङ्गनिर्माणाय विभक्त क्रियते । अथ वृपाकपिरात्मानं कल्पयति । लोमानि त्वङ् मांसमस्थि- नज्जा चेति पञ्चधा विहितं करोति । ततोऽस्मिन्न वयामरुत् काठिन्यं संपाद्य प्रतिष्ठामादधाति । यावत प्रतिष्टां न लभते तावत् पराश्रयेणैव तिष्ठतोति गर्भाशय न त्यजति । अथ प्रतिष्ठा लभमानोऽयमात्मनाऽऽत्मानं धारयितु समर्थो भूत्वा गर्भाशयायद्दिर्भवितु प्रयतते । “एवयामरुतैतबै करोति, तेनेदं सर्वमतवैकृतमेति यदिदंकिञ्च" इत्यैतरेयश्रुतेः । तथा च रेतः प्राणा आत्मा प्रतिष्टेति चत्वारोऽर्थाः शरीरारम्भाय भवन्तीति सिद्धम । तत्र नाभानेदिष्ठं रेतः सोमः बालखिल्याः प्राणा वायुः । वृषाकपिरात्मा विष्णुः । एवमेव या मरुन्- प्रतिष्ठा साऽत्रिः । पञ्चममण्डलस्थ सप्ताशीतितमसूक्तस्यैवयामरुतप्राण निरूप- कस्य द्रपु रेवयामरुतो महप्रात्रेयत्वेन स्मर्यमाणतया तत्साम्येन प्राणस्याप्ये- वयासमन श्रात्रेयत्वेनैवाभ्युपगन्तव्यत्वात् । प्राणव्यवस्थानुसारेणैव देवे युगे प्राणिनां विदुपा व्यवस्थाया ब्रह्मणा कृतत्वात् ।। (३२) इत्थमध्यात्ममधिदैवतं च तत्र तत्र सर्वमत्रिं प्राणमयमन्यः सांख्यो- ऽनिरपश्यत् अत एव च तत्र तत्र भूयसोऽत्रेः सांख्यानादयमपरोऽत्रिः सोच्य - इत्युच्यते । सायणस्तु संग्ख्यपुत्रत्वादेनं सांख्यमाह ब्रह्मणो मानसः पुत्रोऽयमत्रिः ११४ ] * महर्पिकुलवैभवम संख्यनाम्नः कस्यचिदौरस: पुत्र आसीत । तं पश्चादयं ब्रह्मा पूर्वात्रिपरिपब्रामा सने प्रतिष्ठाप्य द्वितीयमत्रिमकरोदिति विज्ञायते । सोऽयं सांख्योऽविदेशममण्डले त्रिचत्वारिंशशततम ( १४३ ) सूक्तमपश्यत । तत्र चायं पूर्वस्य भीमन्यावनिंग डागार वन्धनाद्यसुरकृतपीडानिवारकत्वेनाश्विनी देवी स्तौति । तेनाप्ययमन्यो- ऽत्रिरिति प्रीयते । एतयोभौमसांख्ययो योरेवाध्यादेवयुगकालिकत्वं संभाव- यन्ति । इतरेपामत्रीणां वेद मन्त्र निर्मातृत्वेन कुत्राप्यस्मरणात । वस्तुतम्नु वेदमन्त्रनिर्मातृत्वं द्वयोरेवाव्योरस्तीत्येतन्मात्रं वक्तव्यं न तु देवयुगेऽन्येपा- मत्रीणां सत्तैव नास्तीत्यास्थेयम् । महाभारतयुद्धपर्यन्तं देवयुगप्रतिपत्तेस्ततः पूर्वमपि वेदप्रसिद्धपुरुप्रभृतिराजपितामहस्य नहुपस्य काले कस्यचित्रे. स्मर्य- माणत्वान् । तथा हि-अत्रिवंशेऽस्मिन्नत्र: पाठोदेवनहुपो मेंझगिरिसंनिधाने तपश्चरन्तमत्रिमाजगाम । किन्तु तमत्रि तत्रापश्यन्नयं देवनहुपस्तस्यात्र : स्थाने देवनहुषपुरी निर्मापयामास । एतं देवनहुपमेव यवनाः “दियोन्यसिउस" (Dionysius)इत्याचक्षते ॥ नां देवनहुपपुरींच-"दियोन्यसिबोपोलिस" (Dionysiopolis) इतिवदन्तीति केचित् संभावन्ति । नहुप एच पश्चाइ वानां राजा भुत्वा देवनहुप इत्युच्यते स्म । अत्रः पुत्रस्य शांखायनस्य म्लेच्छंप्रायतायाः पौराणिकै रुक्तत्वात् । तद्वंशधरा एवैते यवनाः स्युः अत एवैषां यवनानामप्ययमत्रिः पूज्यदेवेपु परिगणित आसीदिति केचिदाहु: ।। एवमयमत्रिः पाञ्चजन्यशब्दे- नापि विशेषितः श्रूयते- .. । "ऋषि नरावंहसः पाञ्चजन्यमृत्रीसादत्रिं मुश्चथो गणेन । मिन्नन्ता दस्योरशिवस्य माया अनुपूर्व वृपणा चोदयन्ता"- (१।११७१३) इति ।। -- अत्र मन्त्र पञ्चजनानामभ्यर्हणीयत्वादेवायमत्रिः पाञ्चजन्य इत्युच्यते । ते च पञ्चजना ऋपिपित्रादिपञ्चविधप्राण्यपेक्षया तदत्रिवंशधरा एव पञ्चविधमनुष्यविभागा अधिक संभाव्यन्ते । पञ्चानामपि तेषामाोयाणां श्रुत्यन्तरे स्पष्टं श्रयमाणत्वात् ।। -- - * अत्रिः * [ ११५ २६-पौरः "यदिन्द्राग्नी यदुपु तुर्वशेषु यद् द्रुह्य ष्यनुपु पूरुषुस्थः । अतः परिवृषणा वा हि यातमथा सोमस्यपिवतं सुतस्य ।। (ऋ० ११०८/८) इति । पञ्चाप्येते ययातिपुत्रा अोरेव बंशधराः पञ्चानां चन्द्रवंशशाखानां मूल- पुरुपाः सन्तीति पञ्चस्वपि तेष्वात्रोयशाखावंशेप्वयमत्रिरभ्यहणीयतमः संभवति । तेनायं पाञ्चजन्य इत्युच्यते । तथा चावश्यमेपां पञ्चनामपिसमये कस्यचिदत्रे: सत्ता गम्यते । न च मूलपुरुषस्यैवाने मस्य ययातिपुत्रकालपर्य्यन्तस्थितौ काचिद्विनिगमनास्ति । तस्मादत्रिब्रह्मपरिपदि काले कालेऽन्योऽन्योऽत्रिरधिष्ठाता ब्रह्मासीदिति संभावयामः ।। (३३) अपि च भौमसांख्याभ्यासत्रिभ्यासन्ये खल्वात्रेया बहवो मन्त्र- द्रष्टारः श्रूयन्ते ते यथा- १-सदापृणः १५-गविष्ठिरः २--प्रतिक्षत्रः १६-धरुणः ३०-अर्चनानाः ३-ससः १७-सुतम्भरः ३१-श्यावाश्वः श्रार्चनानसः ४-वत्रिः १८--अवस्युः ३२-अन्धीगुः श्यावाश्विः ५-प्रतिरथः १६-गातुः ३३-बुधः सौम्य आत्रेयः ६-प्रतिभानुः २८-रातहव्यः ३४-विश्ववारा आत्रेयी ७-बभ्रुः २१-यजनः ३५-अपाला प्रांत्रेयी -विश्वसामा २२ उरुचक्रिः ३६-मृक्तवाहा द्वितः ६-श्रुतिवित् २३-बाहुवृक्तिः ३७-द्युम्नः विश्वचर्षणि १०-प्रतिप्रभः २४-सत्यश्रवाः ३८-वसूयवः श्रायाः ११-गयः २५-एक्यामरुत् ३६-प्रयस्वन्तः आत्रोयाः १२-इप: २६-स्वस्ती ४०-गौपायना लौपायना वाऽऽत्रोया- १३-वसुश्रुतः २७-गोपनः श्चत्वारः बंधु,सुबन्धु, श्रुतबन्धु १४-कुमारः २८-सप्तवधिः विप्रबन्धवः--इति ॥ इत्यमेते चत्वारिंशत् । न चैते सर्वेऽप्यैकस्यैवाने: पुत्राः समकाला वा संभा- व्यन्ते । नच चैपामत्रिवंश्यत्वं विनाऽऽत्रेयत्वं संभवति । तस्माद्देवयुगेऽप्यन्ये बहवोऽत्रयः कालेकाले वभूवुरिति सिद्धम् ॥

११६ ]
* महर्पिकुलवैभवम *
(३४) अथ यथैवात्रिशिष्यवंशपरम्परायामुत्तरोत्तराः सर्वा एवात्रिपर्षदधि-
प्ठातृव्यक्तयोऽत्रिशब्देनैवाख्यायन्ते तथैव सर्वेषां तेपामत्रीणामेका वा दश वा
यावत्यो वा भार्याः स्युस्ताः सर्वा अप्ये केनैवानसूयाशब्देनाख्यायन्ते । तत्र
प्राणरूपस्यात्रेरनसूयाशक्तिमत्वहेतुः । यत्रात्मन्ययमविप्राण: प्रकृती विशिष्यते
स पुरुपोऽनसूयावान् भवति ।
"न गुणान् गुणिनो हन्ति स्तौति सन्दगुणानपि ।
न हसेचान्यदोपांश्च सानसूया प्रकीर्तिता"
इत्यनसूयालक्षणंस्मरन्ति । तथा चानसूयाशक्तिमेवात्रिमाणं सर्वेऽत्रयः
पुरुषाः समाराध्नुवन्निति कृत्वा तेपामपि पल्योऽनसूया एबोच्यन्ते । अनसूया-
शब्दोऽत्रिभाऱ्यांवचनोऽत्रिवदेव साधरणो न त्वयं व्यक्तिविशेपरूढो यहच्छा-
शब्दः । तेन पञ्चमण्डलद्रष्टु भॊमस्यात्रेदशसु भार्यासु भद्राख्यायामनसूयायां
सोमोत्पत्तिरासीत् । ते उभे अत्र्यनसूये अन्ये भवतः । ततोऽन्ये अत्र्यनसूये
काले काले स्मयेते । तथा हि कदाचिदयमत्रिनिस्पृहवृत्तिर्धनदारिद्रयात् परि-
क्लिष्टयोगक्षेमः पुत्रकलत्रादिपरिवाराणां भोजनादिल शंदृष्ट्वा धनयाचनार्थं
पृथोन्यस्याश्वमेधयज्ञे गन्तुमैच्छत । किन्तु याचनाकर्मणि दुःखं मन्यमानम्त-
पसे वनमेव गन्नु प्रववृत्ते । ततोऽनसूयया संप्रार्थ्यमानः सोऽनिच्छन्नपि तम्या
अनुरोधेन पृथोर्यज्ञबाटमाजगाम | धन्यस्त्वमसीश्वरस्त्वमसीत्यादिभिश्चाटु-
वाक्यैः पृथुराजभूयसा प्रशशंस च । तच्छ, त्वापरिक्रुद्धो महर्पिौतमस्तदानीमत्रये
तस्मै
पय्यु बाद । नैवं त्वं वक्त महसि । मनुष्यः खल्वयं राजा नेश्वरत्वेना-
भिष्टोतुं युज्यते । न ब्राह्मणेन सता चाटुवादः प्रोक्तव्यो न मिथ्या वक्तव्यम् ।
इत्येवं भूयोऽत्रि प्रत्युपालम्भं चक्रे । ततस्तत्र सनत्कुमारो मध्यस्थो भूत्वा
विवादं शमयामास ।
"बालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः ।
महती देवता ह्यपा नररूपेण तिष्ठति ॥ १ ॥
यमूद्धमिद्धा तिष्ठन्तं सर्वेऽधस्तादुपासते ।
तत्रेश्वरांशो विज्ञेयो नेश्वरादन्य ईडयते ॥ २ ॥

* अत्रिः *
[ ११७
हस्तपादादिसाम्येऽपि येनांशेन स शास्तिनृन् ।
तेनांशेनेश्वरो राजाऽभ्यर्हणीयतमो नणाम् ।। ३ ॥"
इत्थं सनत्कुमारेणात्रिमतस्य न्यायसंगतत्वेन स्थापनात संतुष्टो राजा पृथुस्त-
स्मात् अनये सालङ्कारं दासीसहस्र स्वर्णदशभारान् अर्बुदमिताः स्वर्णमुद्रा
प्रददौ । तच सर्वमयमत्रिः पुत्रकलत्रादिभ्यो विसृज्य निःस्पृहो भगवानत्रिर्गाह-
स्थाय विरक्तः स्वयं तपसे वनमेवाजगामेति महाभारते वनपर्वान्तरर्गतमार्कण्डे-
यसमस्यापर्वणि स्मय॑ते । ततस्याःराङ्गिरसेन गौतमेन समकालिकत्वा-
दङ्गिरसा समकालिकात् प्रथमादत्रे दः साधु विज्ञायते । तस्मादन्ये इमे पृथुकाले
अत्र्यनसूये भवतः । अपिचायं वेदमन्त्रद्रणा भोमो नाम प्रथमोऽत्रिः पञ्चम-
मण्डले सप्तविंशादिभिः कतिपयसूक्त रिन्द्र देवं परिष्टौति । किन्त्वयमन्यः
पृथुकालिकोऽत्रिरस्मिन् पृथुयज्ञे यज्ञविध्न मारित्वेन देवाधमत्वेन च भूयसा
देवेन्द्र परिनिन्दन्नसूयति । भागवते चतुर्थस्व.न्धोनविंशाध्याये तथोक्तः ।
तस्मादेवेन्द्र प्रत्येकस्य विरुद्धभावद्वयासंभावादन्ये इमे पृथुकाले अत्यनसूये
इत्यवगच्छामः । पृथुरप्ययमत्रिवंशधर एवासीदित्युक्त पाद्मभूमी अष्टा
विंशाध्याये-
"अत्रिवंशसमुत्पन्नः पूर्वमत्रिसमः प्रभुः ।
स्रष्टा सर्वस्य धर्मस्य अङ्गो नाम प्रजापतिः ॥ १ ॥
मृत्योः कन्यां स वा अङ्गः सुनीथामुपयेमिवान् ।
तस्यामुत्पादयामास वेनं धर्मप्रणाशनम् ।। २ ।।
मातामहस्य दोषेण वेनः कालात्मजात्मजः ।
निजधर्म परित्यज्य सोऽधर्मनिरतोऽभवत् ।। ३ ।।
ततो महर्पयः क्रुद्धा वेनंप्रति महाबलाः ।
तस्य निग्रहणं कृत्वा ममन्थुस्तस्य विग्रहम् ।। ४ ।।
सव्योरुमन्थनात्तस्य प्रागभूत् पापपूरुषः ।
तस्य वंशधरा एते दृश्यन्ते पापपूरुपाः ॥ ५ ॥

११८ ] * महर्पिकुलवैभवम् * निपादाश्च किराताश्च भिल्ला नाहलकास्तथा । भमराश्च पुलिन्दाश्च ये चान्ये म्लेच्छजातयाः ॥ ६ ॥ गतकल्मपमेवं तं जातं वेनं ततो नृपम् । ममन्थुर्द क्षिणे पाणो स्वेद एव ततोऽन्वगात् ।। ७ ।। पुनर्ममन्थुस्ते विश्रा दक्षिणं पाणिमेव च । ततोऽस्मात्पुरुषो जज्ञे शुभलक्षणलक्षितः ।। ८ ।। स पृथुर्नाम तं राज्ये तेऽभ्यषिञ्चन्महर्षयः । तस्याभिषेके विप्रेन्द्राः सर्व एव प्रतस्थिरे ॥ ६ ॥ इत्यादि । ननु वामनपुराणस्य सप्तचत्वारिंशेऽध्याये पृथुरयं मरिचिवंशज उच्यते नात्रिवंशजः । तथा हि- "एकार्णवे जगत्यस्मिन्नष्ट स्थावरजङ्गमे । विष्णो भिसमुद्र तः सर्वलोकपितामहः ॥ १ ॥ तस्मान्मरीचिरभवन्मरीचेः कश्यपः सुतः । कश्यपादभवद् भास्वांस्तस्मान्मनुरजायत ।।२।। मनोस्तु नुवतः पुत्र उत्पन्नो मुखसंभवः । पृथिव्याश्चतुरन्ताया राजा धर्मस्य रक्षिता ॥३॥ तस्य पत्नी बभूवाथ भयानाम भयावहा । मृत्योः सकाशादुत्पन्ना कालस्य दुहिता तदा ॥ ४ ॥ तस्यां समभवद् वेनो दुरात्मा वेदनिन्दकः । स मातामहृदोपेण वेनः कालात्मजात्मजः ॥ ५ ॥" इत्यादि पूर्ववत् । तथा चेक्ष्वाकुपुत्रोयं पृथोः पिता वेनो नत्वङ्गपुत्र इति चेन्न । बामनपुराण- लेखकस्य पौरणिकत्येतस्मिन् वेनजन्सनि भ्रान्ततयोपेक्षणीयत्वात् ।

* अत्रिः [ ११६ "पितृकन्या सुनीथा तु वेनमङ्गा दजीजनद्" (४ अ० ) - इति मात्स्यवदितरसर्वपुराण महाभारतादिष्वङ्गपुत्रतयैवास्यवेनस्य सुप्रसिद्ध- तया बहु संवादादागित्वेनैवपरिग्रहीतुमौचित्यात् । तत्राङ्गस्यात्रिबंशोत्पन्नत्वं त्रुवता साक्षादत्रिपुत्रत्वं निराक्रियते इति बहुत्तरकालिकत्वमस्य पृथोनिष्कृष्यते । अतस्तत्कालिकयोरत्र्यनसूययोः प्रथमाभ्यामत्र्यनसूयाभ्यां भिन्नत्वमध्यवसीयते ॥ एवमितोऽप्यर्वाक् काले कतिपयेऽत्रयेऽनसूयाश्च स्मर्य्यन्ते । यथा रामचन्द्र- वनवासकाले ऽत्र्याश्रमोपस्थितायाः सीतायाः केशसंवरणमनसूयया कृतमिति रामायणादौ (आरण्ये २ सर्गे) स्मय॑ते । रामश्चात्रिप्रभृतिभिः सहितो गोदावरीतटमाजगामेति अग्निपुराणे (७।२) उक्तम् । तेन तत्कालेऽप्यन्यनु- सूययोः सत्तागम्यते । न चैतयोरेकयोरेव दम्पत्योर्देवलोके दण्डकारण्ये च सत्ता संभाव्यते । देशकालयोरतिविप्रकृष्टत्वात । तस्मादन्ये अन्ये अत्र्यनुसूये काले काले यत्र तत्र बभूवतुरिति प्रतिपत्तव्यम् । अपि च तिस्रोऽनसूयाः स्मरन्ति पौराणिकाः-दक्षकन्यां कर्दमकन्यां कर्दमश्वश्रू चेति । तथाहि- "ख्यात्याया दक्षकन्यास्तु भृग्याद्या उपयेभिरे" इति प्रतिज्ञायाग्नेये | "सोम. दुर्वाससं दत्तमनसूयोऽप्यजीजनद्" इति दक्षकन्यामाह । "याः कर्दमसुताः प्रोक्ता" इति प्रतिज्ञाय भागवते- "अत्रेः पत्न्यनसूया त्रीन्जज्ञे सुयशसः सुतान्'' इति कर्दम कन्या- माह । अथ ब्रह्माण्डपूर्वभागैकादशाध्याये तु ततोऽन्यामेव पडपत्यवती कर्दमश्व- श्रमनसूयामन्याचष्टे- -- - "अनसूया विजज्ञे वै पञ्चात्रेयानकल्मषान् । कन्यां चैव श्रुतिं नाम माता शंखपदस्य सा । कर्दमस्य तु पत्नी सा पोलहस्य प्रजापतेः” इति ।। . पुलहपुत्रस्य कर्दमस्य पुत्रोयं शंखपदो वेनपुत्रस्यातिप्रसिद्धस्य पृथुमहाराजस्य दक्षिणादिक्पाल त्र्यासीदिति वक्ष्यते । अस्यामनसूयायामुत्पन्नाः पन्नात्रेयास्तु- सत्यनेत्रो हव्य आपोमूर्ति: शनैश्चरः सोमश्च त्याम्नायन्ते । तत्र सत्यनेत्रादि- १२० ] * महपिंकुलवैभवम् . साहचर्यादयं पञ्चमः सोमोऽपि दुर्वासोदत्तात्रेयभ्रातृकात सोमाद्विभिद्यते इति सुनिभृतं प्रत्येतव्यम ॥ 2 (३५) अन्यस्यामन्यम्यां चानसूयायामन्योऽन्यःपुत्रोऽवेरुदभवन । तत्राव्य- नुसूयाशब्दसामान्यादत्रिपुत्रविशेपाणामुत्पत्तिविपये वहवः खल्वैतिहासिका भ्रान्ता बभूवुः यथा विष्णु ( १।१८८) पुराणाद्यनुसारेण सोमदत्तदुर्वाससा- मनसूयागर्भजत्वे संभवत्यपि केचित्तावत कई ममुनिकन्यायामनसूयायामेपां त्रयाणामुत्पत्तिमाहुः । अन्ये पुनर्भद्राश्वराजकन्यायां भद्राख्यायामनसूयायां सोमोत्पत्तिमन्यस्यां च भद्राश्वकन्यायां दत्तायु त्पत्तिमाहुः । तदेतदसमञ्जसं भ्रान्तं च । भद्राश्वदुहितरस्तावदिमाः कस्यात्रेः पत्न्य श्रासन कस्य वाऽत्रेः कदममुनि- कन्या भार्यासीदिति विशिष्य न ज्ञायते । तथापि दत्तदुर्वाससः प्रभृतयोऽत्रि. पुत्रा उत्तरोत्तरकालानामत्रोणां पृथक् पृथक पुत्राः स्युरिति संभावयामः । महाभरतयुद्धसमकालानां दुर्वासः प्रभृतीनामतिपुरातनचन्द्रसहोदरत्वाभिमानम्या- नवक्लमत्त्वात् । अथवास्तु सोमभ्रातृभ्यां दत्तदुर्वासोभ्यां भारताशु त्तरकालिक- योर्दत्तदुर्वाससोरन्यत्वमिति सुधीभिरुह्यम् । सोमस्त्वयमाद्यस्यैवात्रेः पुत्र इति युक्तमुत्पश्यामः । सोमाय लोकपालत्वाधिकारप्रदानस्य प्रधानब्रह्माधीनतया प्रधानब्रह्मपुत्रादत्रेरेव तदुत्पत्तेरौचित्यात् ।। (३६) अथ यथा भौमस्या रयं सोमः पुत्र आसीत् तथैव सांख्ययात्र: शांखायनो नाम पुत्रो वभूव । शांखायन इति यहच्छाशब्दो नत्वपत्यप्रत्ययान्तः । अत्र: प्रथमपुत्रत्वेन पुराणे स्मरणात् । सोऽयमतिसुन्दरो बलिष्ठोऽप्युग्रस्वभावो- ऽत्यन्तमधार्मिकञ्चासीत् । स गिरिगहरेपु निवसन्नभक्ष्यमपि मांसं भक्षयति स्म । तद् भ्रतापि तथैवासभ्योभूत्वा वने वने विचरतिस्म । तयोस्तथाचरणात् परि- क्रु द्धोऽयमत्रिः परिभर्ल्सयस्ताभ्यामाचारविचाराद्यर्थं वहूपदिदेश । यत्र तत्र वने विचरतोस्तयोनिवासार्थमनेकस्थानान्यत्रिनाम्नैव कल्पयित्वा स्वयं सोऽत्रिः सिन्धुदेशे देवनिकायगिरौ गत्वा तत्रैव न्युवास । शांखायनतद्भात्रोवंशधरा यवना बभूवुरिति केचिदाहुः ।।

[ १२१
* अत्रिः.
-
(३७) अन्यस्या पुत्राणां म्लेच्छप्रायत्वेऽप्याद्यस्यात्र: पुत्रस्य सोमस्यायं
प्रकाशमयः पवित्रो वंश आदेवयुगादिदानी यावदविच्छिन्नः प्रवर्तमानो ब्राणा
प्रवर्तितं वैदिकमेव धर्म परिपालयन्नद्यापि दृश्यते । सोऽयं पवित्रो वंश
पाख्यायते ॥
सोऽयमै तिहासिको वैज्ञानिकञ्च द्विविधोऽपि अत्रिव्याख्यातः ।।
।। इति अत्रिः ॥
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कौशिको विश्वामित्रा (१) "यथाग्निगर्भा पृथिवी तथा धारिन्द्रण गर्भिणी" इति मन्त्र- श्रवणात् । “इन्द्र इति ह्यतमाचक्षते-य एप तपति" (शत.४५.प्र.वा.११) इति ब्राह्मणश्रवणाच सूर्यगतं प्राणमिन्द्र इत्याचक्षते । सूर्य्याद् विनिःसृता चैन्द्री वाक् परितः साहस्र नाम मण्डलं तनुते । "एतद्व सहन वाचः प्रजातं यदेप त्रयो वेदः” (शत० ५१४ प्र०। ७ ब्रा० । १२ क०) इति श्रुतेः । साहस्रस्य विभक्तयोऽहानीत्याख्यायन्ते । तत्रैतत्साहन तावत् धाविभ- ज्यते-महोवथं, महाव्रतं पुरुषश्चेति । नान्यम्मिन सूर्ये ऋक् साम यजूपि प्रति पद्यन्ते। उत्तरोत्तरं ह्रस्वीभवन्तीनां परितः प्रथितानामनन्तमृर्तीनां समद्रो महोक्थम तदप्येकैकमराशितीरादत्ते । अथ परितो दिग्भ्योऽभिनाभिं समा- यान्तं सोममयमन्नमश्नन्नाप्यायितः प्रतप्यमानोऽग्निसमुद्रो महाव्रतम् । यस्त्वग्नि- समुद्रो देवानां भूतानां च सृष्टय सर्वजगदर्थोपादानरूपेणोपयुज्यते स पुरुपो नाम । इत्थमिमानि त्रीण्यहानि त्रयः समुद्रा अन्योन्यसमदेशा अन्योन्यतोऽसं- सक्तास्त्रीणि साहस्राणि जनयन्ति । तेषु यदिदं महाव्रतमहस्तेन रूपेण विश्वतो- ऽभिव्यातो विश्वतश्चान्न सोममयमश्नन् प्रतपत्ययं त्रयीमयः सूर्यप्राणः । तमेतमिन्द्रप्राणं महाव्रतेनाहोपलक्षितं विश्वामित्र इत्याहुः । तथा चैतरेयारण्यके श्रूयते । “विश्वामित्रं छतदहः शंसिष्यन्तमिन्द्र उपनिषसाद । सहान्न- मित्यभिव्याहृत्य त्रिवृहतीसहस्र शशंस । तमिन्द्र उवाच-ऋपे ! प्रियं 4 मे धामोपागाः । वरं ते ददानीति । स होवाच-त्वामेव जानीयामिति । तमिन्द्र उवाच-ग्राणो वा अहमस्मि ऋपे, प्राणस्त्वं, प्राणः सर्वाणि भूतानि । प्राणा ह्यप य एप तपति स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टो- ऽस्मि तस्य मेऽन्न' मित्रं दक्षिणं तद्वैश्वामित्रम् । एप तपन्न वास्मीति होवाच" (श्रा० २ ० २ खं० ३) इति । छन्दानुवृत्तिसंवर्द्धनं च दक्षि- # कौशिको विश्वामित्रः * [ १२३ - णम् । तदन्न प्राणस्य विश्वाविष्टस्य मित्रं संलग्नं भवतीति वैश्वामित्रं नाम । तद्विशिष्टोऽयं महावताहरात्मकः सौरः प्राणो विश्वामित्रः । प्राणस्येत्थं विश्वामित्रत्वाख्याने। "वाग् वै विश्वामित्रः" इत्येवं वाचो विश्वामित्रत्वं प्रावयन्त्याः कौपीतकि श्रुतेस्तु ( १५।१ ) विरोधो नाशङ्क्यः । "तद्वा एतत् सहस्र वाचः प्रजापतं द्वे इन्द्रस्तृतीये, तृतीयं विष्णुः ऋचश्च सामानि चेन्द्रो यजुपि विष्णुः" (शत. ४।५ प्रा६ वा.।३ क ) इति श्रुत्या वागात्मक. साहस्रविभक्त रहो वागरूपस्वान । “उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे न पारजिग्ये कतरश्च नैनोः । इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रवि तदैरेयथाम्" ( ऋ. ६६६८ ) इति मन्त्रव्याख्यायामैतरेयब्राह्मणे अष्टाविंशेऽध्याये । "किं तत् सहस्रमिति । इमे लोकाः इमे वेदा, अथो बागिति व याद" इति श्रुत्या च वाच एव सहस्रतयातद्विभक्तिरूपस्याह्नोऽपि तदनतिरिक्तत्वात् । स इत्थमयमधिदैवतं व्याख्यातः । एवमेवायमध्यात्मं द्रष्टव्यः । “तद् योऽहं सोऽसौ योऽसौ सोऽहम्" तदुक्तमृपिणा "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्चेति इत्यंतरेयारण्यकश्रुने; सूर्यरसादुद्भूयमान एवायमध्यात्म विज्ञानमयः क्षेत्रज्ञ आत्मा । सोऽपि बहिर्वत त्रयाणां समुद्राणामन्तः शेते इत्यस्मादिन्द्राद् विश्वत्तः प्रथितोऽयमन्तःस्थो महावतारात्मकोऽन्नमश्नन प्राणो विश्वामित्रः । । ( २ ) स एप प्राणो वृइत्यात्मको द्रष्टव्यः । “वाम् वा अनुष्टुप् प्राणो बृहतीति श्रुतेः । “सर्व हीदं प्राणोनावृतम् । सोऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धः तद्यथायमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धः एवं सर्वाणि भूतान्यापिपीलिकाभ्यः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धानीत्येवं विद्यात्" (आ. २।१।६) इत्यैतरेयश्रुतेश्च,) पट् त्रिंशदक्षरत्वाच्चै तस्य वृहतीत्वमद्धोपपद्यते एकैकं चेदमक्षरं दशिनी विराट् । तेन पष्टिशतत्रयमक्षराणां लभ्यते । एतावन्ति च संवत्सरस्याहानि ततः संवत्सरादुपेतत्वात् तावद्विभागोऽऽयं प्राणो न आत्मा संवत्सरात्मकस्याप्यस्य बृहतीत्वमक्षराणां विराट्त्वापेक्षाय द्रष्टव्यम् । अपि चायं प्राणः शरीरे दशधा भवति । "अयं वै प्राणो योऽयं पवते । यो वे १२४ ] * महर्पिकुलवैभवम् * प्राणः स आयुः । सोऽयमेक इवेब पवते । सोऽयं पुरुषेऽन्तःप्रविष्टो दशधां विहितः" (श२।३।१० ) इति वाजिश्रुतेः । बृहतीत्वात पट्त्रिंशदक्षरो ऽयमिन्द्रः प्राणों विराजोपसंपद्यमानो दशधा विहितःसन् पटिशतत्रयात्मको लक्ष्यते । स पुनर्दशधाकृतो यदि भूयो दशधा क्रियते तर्हि म पट्त्रिंशत- सहस्रात्मकः संपद्यते । न हि तत्सहस्र दशत्यादतिरिच्यते । “तदेतत् सहस्रं तन् सर्वम् । तानि दश । दशेति वै सर्वम् । एतावती हि संख्या दशदशतस्तच्छतम् । दशशतानि तत् सहस्रम्, तत् सर्वम्" । (ऐ. बा. २।३।४) इति श्रुतेः । स एप बृहतीसहस्रात्मकः प्राणण अात्मा । तत्यारम्भकाणामेपां सर्वेपामक्षरापां शरीरादुत्थाय परज्योतिप्युपसंपत्तौ स्वेन रूपेणाभिनिष्पत्तावचमात्मा त्यक्तशरीरः सूयं गतो भवतीत्यत एवास्य प्राणस्य पुरुपायुपत्वमाहुः । तथा च श्रूयते । " इति ब्रह्म । तत्रागतमहमिति । तद्वा इदं वृहतीसहस्र संपन्नम् । तस्य वा एतम्य वृहतीसहस्रस्य संपन्नरय पत्रिंशतमनराणां सहस्राणि भवन्ति । तावन्ति पुरुषायुपोऽहां सहस्राणि भवन्ति । जीवाक्षरेणैव जीवाहराप्नोति । जीवाहा जीवाक्षरम्" इति (ऐ. पा. २६३८) "ग्राणो वा अायुः । प्राण उद्यमृतम् यावयस्मिन् शरीरे प्राणो वसति तावदायुः" (को० बा० उ० ) इति च । अयमर्थः पत्रिंशन्सइवानराजीवात्मनोऽस्माद् विनतमेकैकमतरमहरहः स्वर्ग गच्छदिव्याधीयते । विरक्त च तस्थाने मूर्योदयास्तपरिच्छिन्नमेकैकसहरात्म- न्याधीयते । अाहितानां तु नात्मत्वमुपपद्यते । प्रज्ञात्मनोभूतात्मनस्तत्रागन्तुकेपु संपरिश्वगायोगान प्रज्ञात्मना शिप्न शरीरेण पामसंधानात्तदनभिमानात् । तस्मानच्छशतसंवत्सरान्त सर्वेपामात्माजराणां विन सनाच्छरीरमात्मना हीनं विपद्यते । विनानि च सर्वा एवात्माराणि शरीरादुत्थाय सूयं गतानि भवन्ति । सूयरमरूपं विशुद्धं ब्रह्मविज्ञानमकारेण लक्ष्यते तत्र हम्मतीति व्युत्पत्त्याऽयमध्यात्म विज्ञानमयोऽक्षरव्यूह आत्मा "अह" मिति समाख्यायते । तदाइ-" इति ब्रह्म । तत्रागतमहमितीति । अथखलु प्राण एव प्रज्ञा- स्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति । यो वै प्राणः सा प्रज्ञा । या वा प्रज्ञा " -- - -- * कोशिको विश्वामित्रः * [ १२५ - स प्राणः । स ह ह्यतावस्मिन् शरीरे वसतः सहोतिष्ठतः" इति कौपीतकि श्रुते-रिन्द्रप्राणव्युत्थानेन सहैवायं प्रज्ञात्मपि शरीराद् व्युत्थाय कर्मगतिं गतो भवति । पृथिवीगृहीतान्छरीरात संबन्धमुच्छिद्य लोकान्तरं गते प्रज्ञात्मनि विधभावादिदं शरीरं पृथिव्याकृष्ट निपतति, पञ्चत्वं याति । (३) प्राज्ञस्त्वयमात्माप्यक्षराणां संघातोऽमुस्मिन्निन्द्रप्राणो बृहतीसहस्रा- क्षरसंघातरूपे संपरिष्वज्यते । तत्र मनःप्राणवाचामैकात्म्येऽक्षरशब्दः । तं चाक्षरमाणमाचक्षते । प्राज्ञेचायमक्षरप्राणः सप्तविधः संहत्यैकमात्मानमारभते मनो, वाक्, प्राणः, चक्षुः श्रोत्रं कर्माग्निरिति । प्रत्येकस्यैपामुक्थस्य पट् त्रिंशत- सहस्राण्याः श्रूयन्ते वाजिश्रुतौ तदिदं मनः सृष्टमाविरबुभूपत् निरुक्ततरं मूर्त्ततरम् तदात्मानमन्वैच्छत् । तत्तपोऽतप्यत तत् प्रादुर्छत् तत् पट्- त्रिंशतं सहस्राण्यपश्यदात्मनोऽग्नीनर्कान् मनोमयान्मनश्चितः । तद् यत् किञ्चमानि भृतानि मनसा संकल्पयन्ति तेपामेव सा कृतिः । एतावती चै मनसो विभूतिः। एतावती विसृष्टिः । एतावन्मनः पट्- त्रिंशत्सहसाण्यग्नयोर्काः' ( १०।४।१) इति । एषैवानुविधा वाक् प्राणादिष्वपि तत्र श्र यते । तथा च मनो वाक् प्राणश्चतुः श्रोत्रमिति पञ्चधा विभक्तः प्राण: प्रज्ञात्मा । तैजसः प्राणः कर्मात्मा वैश्वानरः प्राणोऽग्न्यात्मा इतीत्थं त्रेधा विभक्तः सप्तधा विभक्तो वा भूतात्मा। तत्राग्निरयं द्वधा-चित्यश्चितेनिधेयश्च लोमत्वगसृग्मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्रैश्च तने,बल्कल- निर्यास-दारु-सार-रसै क्षे, किंशारु-तुपफलीकरण किक्कस कंसारैर्यवधान्ये त्वग्रसगूई बालबीजमज्जाभिः फले, तथान्यत्रान्यैश्चयनीयैरवयवैश्वीयमानश्चित्यः तच्छरीरम् । तत्र दृष्टोऽयमू- प्मावैश्वानरोश्चितेनिधेयः तदन्तर्गतो वयोऽवस्थानिवर्तकः प्राणः कत्मिा । तदन्तरर्गतः प्रज्ञात्मा । तत्र चित्येन चितेनिधेयेन चात्मनाऽऽत्मन्विनोऽसंज्ञा जीवा रत्नधातूपधातुरसोपरसादयः । ताभ्यां च तैजसेन चात्मन्विनोऽन्तः संज्ञा जीवास्तुणगुल्मौपधिवनस्पत्यादयः । तैश्च प्रज्ञात्मना चात्मन्विनः ससंज्ञा जीवाः कृमि-कीट-पक्षि-पशु-मनुष्यादयः । (४) सोऽयं भूतात्मा यमन्यमात्मानमध्याश्रित्य पुरुपायुषमनुजीवन शरीरेणसंवर्तते स बृहतीसहसात्मायमिन्द्रः प्राणः । “तद्वा इदं बृहतीसहसू

१२६ ]
** महर्पिकुलवैभवम् *
संपन्न तद्यशः स इन्द्रः स भूतानामधिपतिः" (ऐ० श्रा० २।३।७)
इतिश्रुतेः । “स आयुः मामेव विजानीहि । एतदेवाहं मनुप्याय हित-
तमं मन्ये यन्मां विजानीयात् । प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा । तं ममायुरमृत-
मित्युपास्स्व" -इति कौपीतकि श्रु तो प्रतर्दनं प्रतीन्द्रोक्तेः । तमन्वेवाध्याश्रिता
इमे प्रज्ञादयो भूतात्मारम्भका भागाः सन्ति । "तस्य वा एतस्य वृहतीसह-
सूस्य संपन्नस्य परस्तात् प्रज्ञामयो देवतामयो ब्रह्ममयोऽमृतमयः संभूय
देवता अप्येति य एवं वेद" इति श्रुतेः (ऐ० प्रा० २।२।४ ) । तत्रैतस्मिन्
प्रज्ञात्मनि विज्ञानात्मनो यावदधिकं संत्रवान प्रतिष्ठा स्यात तावदयं प्रज्ञात्मा
तेनैव ब्रह्मणा विद्यया सर्वकपायदाहाद्विशुद्धिमागतः पाप्मभिर्विरहितो विज्ञाना-
त्मरूपेणाभिनिष्पद्यते । स कर्मभिः कामश्च विमुच्यते न स कर्मभोगाय लोकान्
परिभ्रमति । तदेतत्सर्वं पश्यतां प्राचां महीणां श्लोकानाह भगवानैतरेयः-
"यदक्षरं पञ्चविध समेति, युजो युक्ता अंभि यत् संवहन्ति ।
सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति ।।१।।
यदक्षरादतरमेति युक्त युजो युक्ता अभि यत् संवहन्ति ।
सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति ||२||
यस्मिन्नामा समतृप्यन् श्रुतेधि तत्र देवाः सर्वयुजो भवन्ति ।
तेन पाप्मानमपहत्य ब्रह्मणा स्वर्गलोकमप्येति विद्वान् ॥३॥” इति ।
अयमार्थः । शरीररूपेण परिणतं पञ्चविधं भूतजातं वा इन्द्रियरूपेण पारे-
णतं पञ्चविधं देवजातं वा यदक्षरं मुख्यप्राणमनुसमन्वेति । युञ्जानाः सन्तो
युज्यमाना इमे रश्मिरूपाः सर्वेप्राणा अपि अन्योन्यसंश्लिष्पा यदक्षरं मुख्यप्राण-
मभिसंबायन्ति । “अथ नामधेयं सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यं
तेपामेप सत्यम्" इति वाजिश्रु तेः शरीराधारभूतप्राणानामाधारभूतं मुख्य-
प्राणमनुलक्ष्य यत्र भागे सर्वैर्देवैर्युज्यते तत्रैतस्मिन् मुख्यप्राणभागे सर्वे देवा
अविस्पष्टभेदत्त्वांदेकत्वं यान्ति ॥ १ ॥

मेवाश्रित्य प्रज्ञेऽपि सर्वे देवाः मंहन्यन्ते इत्यर्थः । विज्ञानस्यैव सूर्य्यरसस्य विज्ञानात्मन्येव प्रतिष्टिताः सन्ति । प्रज्ञात्मारम्भकं तदन्तहितं विज्ञानात्मान- नामोपपद्यते । तस्मिंश्च पृथीरसात्मनि प्रज्ञाने सूर्यरसात्मनो विज्ञानस्यै तम्यातितरां समन्वयात तेन ब्रह्मणा विज्ञानेन सर्वेपां पाप्मनां कामशुक्रायविद्या * कौशिको विश्वामित्रः * [ १२७ अपि च एतत्पञ्चविधं भूतजातं देवजातं वा एतस्मान्मुख्यप्राणादक्षरात क्रमेणोपमृष्य यदन्यदक्षरं प्रज्ञात्मानं युक्तमभ्येति । रश्मयश्च प्राणा अन्योन्य- टुक्ता यन् प्रज्ञानमभि संवहन्ति । सत्यस्य सत्यं मुख्यप्राणोऽपि यस्मिन् प्रज्ञानेऽनुयुज्यते तस्मिन् प्रज्ञाने सर्वे देवाः संहत्यैकत्वमायान्ति ॥ २॥ यद्यप्येवं विज्ञानात्मनि प्रज्ञानात्मनि चोभयत्रैव सर्वे देवा एकंभवन्ति तथापि यस्मि- नात्मनि अ ते नामानि सर्वाणि स्त्रीत्वपुरत्वक्लीवत्वभेदितानि संतृप्यन्ते समर्थन्ते न ब्यावर्तन्ते, तत्र श्रीपुलीबेष्वविशेषरूपे विज्ञानात्मन्येव देवाः सर्वथा युक्ता द्रष्टव्याः । सर्वे देवा इन्द्रियरूपाः प्रज्ञात्मनि दृष्टा अपि मुख्यतया कश्चिदंशो भूगर्भमभिसृप्तः पृथिव्यात्मभूतः पार्थिवमिदं प्राणिशरीर मभिसं- पद्यमानः पाप्मभिः शरीरधर्मैः कामशुक्रादिभिः संसृज्यते । ततः स प्रज्ञानात्मा - कपायाणामुच्छेदा दृशुविज्ञानात्मनाभिनिष्पत्तौ प्रज्ञात्मा स्वर्ग याति सूर्य नाम । स प्रज्ञानत्वाद्विमुच्यते । मृर्य्यरसरूपं विशुद्ध चिन्मयं मनोमयं विज्ञान- मकारेण लक्ष्यते इत्युक्लप । तत्र हम्मतीति व्युत्पत्त्याऽयं प्रज्ञात्माऽप्यहमित्या ख्यायते इतिवोध्यम् । (५) एप च विज्ञानात्मा वृहतीसहस्राक्षरः सौरः प्राणोऽध्यात्ममप्यधि- देवतवद् विश्वतः 'प्राणान् धत्ते । "तस्य प्राची दिक प्राञ्चः प्राणाः दक्षिणा दिक दक्षिणे प्राणाः । प्रतीची दिक् प्रत्यश्चः प्राणाः । उदीची दिगुदञ्चः प्राणाः । ऊर्ध्वादिगूर्ध्वाः प्राणाः । अवाचीदिगवाश्चः प्राणाः । सर्वादिशः सर्वे प्राणाः” (१४।६।११ ) इति वाजिश्रु तेः । विश्वतो हीमे प्राणा अस्मिन्नामेदन्ते, मेद्यन्ति चामुष्मिन विश्वतोऽन्नानि तस्मादयं महावताहः प्राणो विश्गमित्रो नामाख्यायते । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोऽधिशरीर- मावि श्य विज्ञानमय आत्मासंपद्यते । धियो योनः प्रचोदयति । तमेतं प्राण- मनुवर्णयति कौपीतकिः । “एए ह्य वैतं साधुकर्म कारयति तं यमुन्निनीपति, एप एवैनमसाधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेन्यो नुनुत्सते यमधो १२८ ] * महर्पिकुलवैभवम् * तितीपति स म आत्मेति विद्यात्' (को० ३० ३) इति । हितं प्रियं च कर्म कतु प्रवर्तयतीत्येप प्राणो विश्व पांमित्रं तस्मात् विश्वामित्रः । "यावद्धय- स्मिन् शरीरे प्राणो वसति तावदायुः" इति कौषीतकिश्रुतेरायुःस्वरूपं तमेव प्राणमाराधयितु मुभयोः सन्ध्ययोः सूर्यमुपतिष्ठन्ते ब्राह्मणाः सावित्री च गायत्री वैश्वामित्रीं ध्यायमानाः प्रजपन्ति । सहि गायन्तं त्रायते गयांश्चप्राणां- स्त्रायते । श्राराधयन्तस्तत्संपत्त्या दीर्घायुषो भवन्ति । तथा च स्मर्यते- 'ऋपयोदीर्घसंध्यात्वादीर्घमायुरवाप्नुयुः" ॥ इति । येत्वेनामयथा कुर्वत न ते फलेन संपद्यन्ते । तस्मात सावहितोऽहरहः संध्यामुपासीतेति महतामादेशः । इत्थमयं विश्वामित्रः प्राणोऽधिदेवतमध्यात्मं च व्याख्यातः ! (६) अथ यः खलु विद्वानेतं विश्वामित्रप्राणमपश्यत, प्राणस्य च तस्य यो विश्वामित्र इति नामधेय मकरोत् स तत्प्राणद्रष्टा विद्वानपि यशोनाम्ना विश्वामित्र एव आख्यायते । स च मनुप्यविधो विश्वामित्रो महोदयनाम्नि नगरे राजासीन । यदिद कान्यकुब्जंनाम नगर मिदानीमुपलभ्यते, तत्र पुरा द्रुपदस्य राज्ञो द्रोणस्य वा ब्राह्मणस्य राजधान्यासीदहिच्छत्रा नाम । तत्रैवाति- पुरातनकाले वैजयाख्यक्षत्रियवंश्यानां राज्ञामधिष्ठानं नगरमासीत्महोदयं नाम । तत्र विश्वरथो नाम राजासीचन्द्रवंशीयः । केचित्तु कौशाम्बींनाम नगरीमस्य राजधानीमाहुः । सहि विश्वरथः पुरुरवसमारभ्य विजयापरसंज्ञामायुशाखागोत्रे त्रयोदशो वा दशमो वा भवति । तात्कालिकस्य च वसिष्ठस्य ब्रह्मवीर्यानुगं महात्म्य दृष्ट्वा ब्रह्मवीर्यात क्षत्रवीर्यमल्पं मन्यमानः स तपस्तपत्वा ब्राह्मणो- ऽभवन । स विश्वरथो राजा विश्वामित्राख्य प्राणदर्शनप्रभावान ब्रह्मत्वे विश्वामित्रोनाम्ना प्रथितोऽभूत् । "विश्वस्य ह वै मित्रं विश्वामित्र आस" (ब्रा० अ० २६ ) इत्येवमेतं प्रशंसत्यैतरेयः -- (७) स च पुरूरवसमारभ्यायुशाखागोत्रे चतुर्थस्य ययातेः समकाल आसीत् । गुरुदक्षिणां दित्सोः स्वशिष्यस्य गालवस्य विश्वामित्रेण ययाति नाहुपं प्रति प्रेष्यमाणत्वात् । तच्च कालसाम्यं ययातिपूर्वपुरुपाणां दीर्घायुष्ट्वाद विश्वामित्रपूर्वपुरुपाणामल्पाल्पायुष्ट्वाञ्चोपपद्यते । इक्ष्वाकुवंशे हर्यश्ववसु- मनस्त्रिधन्वस्वत्रय्यारुणसत्यवतहरिश्चन्द्ररोहिताश्वानां सप्नानां पुरुषाणामिक्ष्वाकृतः विश्वामित्राः कुशिका अप्युच्यन्ते । त्रिपञ्चाशसूक्तस्य नवमीदशम्योऋ चो * कौशिको विश्वामित्रः - [ १२६ पञ्चविंशादीनां समकालोऽयमेको विश्वामित्रः । कश्चिदन्यो भवेदन्यश्च कश्चिद् भवेद्रामसमसामयिकः । एकस्यातिदीर्घकालजीवित्वासंभवात् । मनुष्याणां शतायुष्ट्वसिद्धान्तात् । वसुमना हार्वश्विरयोध्यायां, प्रतई नो, दैवोदासिः काश्यां, शिविरौशीनरिर्भोजपुरे, अष्टको वैश्वामित्रिः कान्यकुब्जे, इत्येते चत्वारः सहोदराः ययातिकन्यायां माधव्यामुत्पन्ना विश्वामित्रेण समकाला आसन्निति पौराणिका आहुः । (5.) एष च विश्वामित्र शब्दो न तत्प्राणद्रष्टव्यक्तिमात्रे, नाऽपि तत्पुत्रपर- म्परायामेव रूढः किन्तु वैश्वामित्र्यां ब्रह्मपर्षदि तत्पुत्रो वा तच्छिष्यो वा य एव कश्चित् काले काले पर्षदधिष्ठाता ब्रह्मासीत् सोऽन्योऽन्यो विश्वामित्रः पर्षदधि- ष्ठातरि ब्रह्मणि विश्वामित्रशब्दप्रवृत्तेः । गोत्रे' रूढः सोऽयं विश्वामित्रशब्दो जातिशब्दत्वात् वसिष्ठादिशब्दवदेकवचनान्तो बहुवचनान्तो वा प्रयुज्यते । तृतीयमण्डले त्रिपञ्चाशसूक्तस्य सप्तमीनवम्योऋचोरेकवचनदर्शनात् प्रथमसूक्त- स्यैकविंश्यामृचि बहुवचनदर्शनाच्च । तत्र बहुवचने सर्वासां व्यक्तीनां स्वशब्दे- नैवविश्वामित्रत्वं द्रष्टव्यम् । अप्रत्यक्षप्राणविशेषद्रष्टुत्वरूपस्य ऋषित्वस्य तच्छब्दप्रवृत्तिनिमित्तस्य सर्वत्राविशेषात । विश्वामित्र इत्यादौ अपत्यप्रत्ययलोपं वदन्तो वैयाकरणास्तु नाक्षेप्याः। व्याकरणप्रक्रियायाः शब्दरूपाभिज्ञानाभ्यु- पायमानत्वात् । नासूया कर्तव्या यत्रानुगमः क्रियते इति नैरुक्तत्वात त इमे विश्वमित्रगोत्रजाभिप्रायेणैव कुशिकशब्द प्रयोगात् । ऐतिहासिकमनुष्यगोत्रा भिप्रायेण प्रयुक्तयोरेव कुशिक विश्वामित्रशब्दयोः पर्याय वाचित्वम् । न तु प्राणविशेषाभिप्रायेण प्रयुक्तयोः विश्वामित्र प्राणा पेक्ष्या कुशिकप्राणस्याति- रिक्तत्वात् । इन्द्रत्वसामान्याभिप्रायेण तूभयोरेकभाव्यं मन्यन्ते इति दिक् । (६) सर्व एवैते भिन्नभिन्नकाला विश्वामित्रा मन्त्रद्रष्टारः । तत्र हरिश्चन्द्र- सामयिकस्यैवैते मधुच्छन्दः प्रभृतयः पुत्रा श्रासन् । देवरातस्य शुनःशेपयूर्वा- ख्यस्य मधुच्छन्दः प्रभृतिनोऽपि ज्येष्ठत्वेन पौराणिकैराख्यानात् । सर्वविश्वामित्र- साधारणो चेयं वैश्वामित्री संहिता द्रष्टव्या। विश्वामित्रगोत्रस्य च वसिष्ट १२८ ] * महर्पिकुलवैभवम् * तितीपति स म आत्मेति विद्यात्" (कौ० उ० ३) इति । हितं प्रियं च कर्म कतुं प्रवर्तयतीत्येष प्राणो विश्व पांमित्रं तस्मात् विश्वामित्रः । "यावद्धय- स्मिन् शरीरे प्राणो वसति तावदायुः" इति कौषीतकिश्रुतेरायुःस्वरूपं तमेव प्राणमाराधयितु मुभयोः सन्ध्ययोः सूर्यमुपतिष्ठन्ते ब्राह्मणाः सावित्री च गायत्री वैश्वामित्री ध्यायमानाः प्रजपन्ति । सहि गायन्तं त्रायते गयांश्चप्राणां- स्त्रायते । श्राराधयन्तस्तत्संपत्त्या दीर्घायुपो भवन्ति । तथा च स्मर्य्यते-- "ऋषयोदीर्घसंध्यात्वाद्दीर्घमायुरवाप्नुयुः" " इति । येत्वेनामयथा कुर्वत न ते फलेन संपद्यन्ते । तस्मान सावहितोऽहरहः संध्यामुपासीतेति महतामादेशः । इत्थमयं विश्वामित्रः प्राणोऽधिदैवतमध्यात्मं च व्याख्यातः ! -- (६) अथ यः खलु विद्वानेतं विश्वामित्रप्राणमपश्यत, प्राणस्य च तस्य यो विश्वामित्र इति नामधेय मकरोन स तत्प्राणद्रष्टा विद्वानपि यशोनाम्ना विश्वामित्र एव आख्यायते । स च मनुप्यविधो विश्वामित्रो महोदयनाम्नि नगरे राजासीत् । यदिद कान्यकुब्ज़नाम नगर मिदानीमुपलभ्यते, तत्र पुरा द्रुपदस्य राज्ञो द्रोणस्य वा ब्राह्मणस्य राजधान्यासीदहिच्छत्रा नाम । तत्रैवाति- पुरातनकान्ने वैजयाख्यक्षत्रियवंश्यानां राज्ञामधिष्ठानं नगरमासीत्महोदयं नाम । तत्र विश्वरथी नाम राजासीचन्द्रवंशीयः । केचित्तु कौशाम्बींनाम नगरीमस्य राजधानीमाहुः । सहि विश्वरथः पुरुरवसमारभ्य विजयापरसंज्ञासायुशाखागोत्रे त्रयोदशो वा दशमो वा भवति । तात्कालिकस्य च वसिष्ठस्य ब्रह्मवीर्यानुगं महात्म्यं दृष्ट्वा ब्रह्मवीर्यात क्षत्रवीर्यमल्पं मन्यमानः स तपस्तप्त्वा ब्राह्मणो- ऽभवत् । स विश्वरथो राजा विश्वामित्राख्य प्राणदर्शनप्रभावान ब्रह्मत्वे विश्वामित्रोनाम्ना प्रथितोऽभूत् । “विश्वस्य ह वै मित्रं विश्वामित्र आस" (ब्रा० अ० २६ ) इत्येवमेतं प्रशंसत्यैतरेयः । .. (७) स च पुरूरवसमारभ्यायुशाखागोत्रे चतुर्थत्य ययातेः समकाल आसीत् । गुरुदक्षिणां दित्सोः स्वशिष्यस्य गालवस्य विश्वामित्रेण ययाति नाहुपं प्रति प्रेष्यमाणत्वान् । तच्च कालसाम्यं ययातिपूर्वपुरुषाणां दीर्घायुष्ट्वाद विश्वामित्रपूर्वपुरुषाणामल्पाल्पायुष्ट्वाञ्चोपपद्यते । इक्ष्वाकुवंशे हर्यश्ववसु- मनस्त्रिधन्वस्वत्रय्यारुणसत्यव्रतहरिश्चन्द्ररोहिताश्वानां समानां पुरुपाणामिक्ष्वाकृतः * कौशिको विश्वामित्रः . [ १२६ पञ्चविंशादीनां समकालोऽयमेको विश्वामित्रः । कश्चिदन्यो भवेदन्यश्च कश्चिद् भवेद्रामसमसामयिकः । एकस्यातिदीर्घकालजीवित्वासंभवात् । मनुष्याणां शतायुष्ट्वसिद्धान्तात् । वसुमना हाय॑श्विरयोध्यायां, प्रतई नो, दैवोदासिः काश्यां, शिविरौशीनरिर्भोजपुरे, अष्टको वैश्वामित्रिः कान्यकुब्जे, इत्येते चत्वारः सहोदराः ययातिकन्यायां माधव्यामुत्पन्ना विश्वामित्रेण समकाला प्रासन्निति पौराणिका आहुः । -- (= ) एष च विश्वामित्र शब्दो न तत्प्राणद्रष्टव्यक्तिमात्रे, नाऽपि तत्पुत्रपर- म्परायामेव रूढः किन्तु वैश्वामित्र्यां ब्रह्मपर्षदि तत्पुत्रो वा तच्छिष्यो वा य एव कश्चित् काले काले पर्पदधिष्ठाता ब्रह्मासीत् सोऽन्योऽन्यो विश्वामित्रः पर्षदधि- ष्ठातरि ब्रह्मणि विश्वामित्रशब्दप्रवृत्तेः । गोत्रे' रूढः सोऽयं विश्वामित्रशब्दो जातिशब्दत्वान् वसिष्टादिशब्दवदेकवचनान्तो वहुवचनान्तो वा प्रयुज्यते । तृतीयमण्डले त्रिपञ्चाशसूक्तस्य सप्तमीनवम्योऋचोरेकवचनदर्शनात् प्रथमसूक्त- स्यैकविंश्यामृचि बहुवचनदर्शनाच्च । तत्र बहुवचने सर्वासां व्यक्ती नां स्वशब्दे- नैवविश्वामित्रत्वं द्रष्टव्यम् । अप्रत्यक्षप्राणविशेषद्रष्टुत्वरूपस्य ऋषित्वस्य तच्छब्दप्रवृत्तिनिमित्तस्य सर्वत्राविशेषात् । विश्वामित्र इत्यादौ अपत्यप्रत्ययलोपं वदन्तो वैयाकरणास्तु नाक्षेप्याः । व्याकरण प्रक्रियायाः शब्दरूपाभिज्ञानाभ्यु- पायमात्रत्वात । नासूया कर्तव्या यत्रानुगमः क्रियते इति नैस्तत्वात त इमे विश्वामित्राः कुशिका अप्युच्यन्ते । त्रिपञ्चाशसूक्तस्य नवमीदशम्योचो विश्वमित्रगोत्रजाभिप्रायेणैव कुशिकशब्द प्रयोगात् । ऐतिहासिकमनुष्यगोत्रा भिप्रायेण प्रयुक्तयोरेव कुशिक विश्वामित्रशब्दयोः पर्याय चाचित्वम् । न तु प्राणविशेषाभिप्रायेण प्रयुक्तयोः विश्वामित्र प्राणा पेक्षया कुशिकप्राणस्याति- रिक्तत्वात् । इन्द्रत्वसामान्याभिप्रायेण तूभयोरेकभाव्यं मन्यन्ते इति दिक् । (६) सर्व एवैते भिन्नभिन्नकाला विश्वामित्रा मन्त्रद्रष्टारः । तत्र हरिश्चन्द्र- सामयिकस्यैवैते मधुच्छन्दः प्रभृतयः पुत्रा श्रासन् । देवरातस्य शुनःशेपयूर्वा- ख्यस्य मधुच्छन्दः प्रभृतिनोऽपि ज्येष्ठत्वेन पौराणिकैराख्यानात् । सर्वविश्वामित्र- साभारणो चेयं वैश्वामित्री संहिता द्रष्टव्या । विश्वामित्रगोत्रस्य च वसिष्ट १३० * महर्पिकुलवैभवम् * गोत्रेण प्रतिपन्थितया वृत्तिरपि सर्वव्यक्तिसाधारण्यात स्मयंत । तत्र विश्वामित्रस्य पितापितामहःप्रपितामहश्च त्ये कत्तस्त्रयः । विश्वामित्रः स्वयमेकः । विश्वामित्रस्याष्टी पुत्राश्चत्वारः पौत्राः इत्येवं पञ्चदश व्यक्तयः स्मर्यन्ते । तेषु प्रपितामह इपीरथस्तावपिर्नास्ति मन्त्रद्रण्डत्यास्मरणात् । पितामहः कुशिकः पिता गाथी मन्त्रद्रष्टुत्वाभावेऽपि नैपातिकावृपी संभाव्येते विश्वामित्रवंशस्य कौशिकगोत्रत्वेन लोके प्रतिपत्तेः । ऋष्यारब्धवंशस्यैव गोत्रत्वेनाख्यानात् । अथवा अनृपी एव स्याताम। विश्वामित्रस्य महर्पः कौशिकशब्देन ग्रहणात् तत एवास्य गोत्रस्य कौशिकत्वसंभवात । यत्तु दाशतभ्यां कुशिकगाधिनारायं स्मयंते तद्विश्वामित्रस्यैवाप्यं द्रष्टव्यमिति केचिदाहुः । वस्तु तन्तु कुशिकगाथि- नावप्येतावृपी एव स्याताम् । ऋप्यन्तरवदेतयोरप्यायस्मरणात । कौशिकगोत्रं तु कुशिकाद्वा विश्वामित्राद्वा प्रवर्ततामिनि नातिविशेषः । एप च विश्वामित्रो मैथिल आसीत् । मिथिलाप्रदेशे पूर्वस्यां कौशिकी नाम नदी वहति । तदुपलक्षिते एब प्रदेशे कुशिकाश्रमम्य निर्धारितत्वात् । तथाहि बृहृद्विष्णुपुराणे मिथिलामहात्म्ये । "विश्वामित्रस्तु पूर्वस्यां दिशि वासमकल्पयत्". इत्युक्तम् । यामलसारोद्धारे मिथिलाखण्डेचैवमाह । विश्वामित्राश्रमे प्राच्या- मृग्वेदध्वनिनादिते" इत्यादि । महाभारतस्यारण्यके च स्मयते । “कुशिक- स्याश्रमं गच्छेत् सर्वपापप्रमोचनम्” इति । अत एव च विश्वामित्रवंशजन्मा याज्ञवल्क्योऽप्यस्यां मिथिलायामेव गौतमाश्रम प्रत्यासन्नवर्तिनो जयन्तपुरम्या त्यन्तसंनिधाने धनुर्यज्ञमहारण्ये निवसनिस्म । अद्यापि तस्याश्रमस्य मिथिलायां सुप्रसिद्धत्वात इतिभाव्यम् । विश्वामित्रो ह्यप शती महामहर्पिः । पुत्रेषु तु धुच्छन्दो देवरातादयः केचन शतर्चिनः । परे महासूक्तक्षुद्रसूक्ताः । यद्यप्यस्य मतं पुत्राः स्मर्य्यन्ते पौराणिकः । तेषु च पञ्चाशज्जघन्यजाः वनेचराः दस्यु- प्राया म्लेच्छा एवाभवन् परे तु ज्येप्टा पञ्चाशदासन् ब्राह्मणाः विद्वांसः । किन्तु १-इग्रीरथ: (अनृषिः), २-कुशक ऐषीरथि:. ३-गाथी (गाधी) कौशिकः, ४-विश्वामित्रो गाथिनः इति ।

* कौशिको विश्वामित्र: * [ १३१ , तेष्वप्यष्टावेव पुत्राः ऋषयः ‘स्मर्य्यन्ते देवरातः, मधुच्छन्दाः, कतः, ऋपभः, रेणुः, अष्टकः, पूरणः, प्रजापतिः इति । अथ जेता अघमर्षणश्वत्येतो माधु- च्छन्दसी, उत्कीलः कात्य इति त्रयः पौत्राः । (१०) अत्रायं देवरातः पूर्वमजीगतस्यानृषिब्राह्मणस्य त्रिषु पुत्रेष्वन्यतमः पुरबासीच्छुनःशेपो नामाङ्गिरसः । केचित्तु पौराणिका अजीगतशुनःशेपयो- र्भार्गबन्बमाचक्षते तच्छ, तिविरोधादनुपादेयम् । “यथैवाङ्गिरसः सन्नु पेयां तव पुत्रताम्" "आङ्गिरसो जन्मनास्याजीगतः शुनः कविः" इतिच वहचश्रुतेः । स हरिश्चन्द्रस्य राज्ञो वारुणे यज्ञे क्रोतः पुत्रोऽभूत् । तत्रायं विश्वामित्रेण पशुत्वान् प्रमोचितः सन्नमुष्य विश्वामित्रस्य पश्चात कृत्रिमः पुत्रो भूत्वा विश्वामित्रकृपया पुत्रेपु ज्यैष्ठ्य वेदं चालभत । तेनायमृषिः समुदभूद्द वरातो नाम । मधुच्छन्दास्तु विश्वामित्रस्यौरसौ ज्येष्ठः पुत्रः । (११) कुशिको द्वधा-ऐपीरथिश्च सौभरिश्च । तेनायं विचिकित्सितः । एवं प्रजापतिस्त्रेधा-वैश्वामित्रो वाच्यः । परमेष्ठी च । प्रजापतेः पुत्रपौत्रप्रपौत्र- वृद्धप्रपौत्राः स्मय॑न्ते । यथा-हिरण्यगर्भः । विष्णुः, यज्ञः, दक्षिणा, प्रजावान्, विमदः, यक्ष्मनाशनः, पतंगः संवरणः, इति नवैते प्रजापत्याः । मनुः सांवरणः । अथ नाभानेदिष्ठः शाऱ्यांतो नापश्चति त्रयो मानवाः । ययाति हुपः इति । एप नावधार्यते कस्यैते हिरण्यगर्भादयः पुत्राः वैश्वामित्रस्य वा वाच्यस्य वा परमेष्ठिनो वेति । मनुरप्ययं नानाविधः स्मय॑ते । तत्र न ज्ञायते कस्यैते नाभानेदिष्ठादयः पुत्र पोत्रा इति, तन्मृग्यम् । (१२) यद्यप्ययं विश्वामित्रो मनुष्यलोकस्थो न स्वर्यः । तथाप्ययं विश्वामित्रकृतो वेदसंहिताग्रन्थः स्वयं एवाभिज्ञायते । तद्वर्णितानां मनुष्यदेवानां भौमस्वर्गवासितया प्राणादेवानां सूर्यस्वर्गवासितया च स्वार्थविपयकत्वात् । (१३) तत्रैतस्यां कौशिकसंहितायां कुशिक ऐपीरथिरिन्द्र द्वाविंशति (२२) मन्त्रैस्तुष्पाय । कुशिकपुत्रो गाथी दशभिरग्नि, पञ्चभिः पुरीष्यानग्नीन पञ्चभि- राग्नसंबन्धिनो विश्वान् देवांस्तुष्ठाव इति विंशति (२०) मन्त्रं गाथिन प्रायम् । तदिदं द्विचत्वारिंशता पौर्विकं पर्व प्रथमम् । (१४) अथ गाथिपुत्रो विश्वामित्रस्त्रिंरोन शतेनाग्निसामान्वमेकादश- १३२ ] * महपिकुलवैभवम् * भिराप्रियमूनत्रिंशता बैश्वानराग्नि, पड्भिर्मरुदादीन, नवभिरिन्द्राग्नी, एकादश- भिरग्निसंवन्धिनो विश्वान्देवांस्तुष्टावेति पणनवत्यधिकशतेन (१६६) आग्नेयं पर्व द्वितीयम् । ऊनविंशेन शतेन ( ११६ ) ऐन्द्र पर्व तृतीयम् । अथ पड्मिविश्वान्देवान्, नवभिरश्विनी, नवमिर्मित्रं, सप्तभिऋ भून्, सप्तभिरुप- समथ त्रिभिस्त्रिभिरिन्द्रावरुणौ बृहस्पतिं पूपणं सवितारं सोमं मित्रावरुणौ, ततश्चतुभिरिन्द्रसोमवरुणवृहस्पतिधातृविधातृसंघ, त्रिभिः पवमानं सोमं तुष्टावेति त्रिषष्ट्या ( ६३ ) वैश्वदेव्यं पर्व चतुर्थम् । इत्थं त्रिभिः पर्वभिरष्ठसप्त तानि त्रीणि शतानि (३७८) वैश्वामित्राःयं भवति । ( १५ ) अथ विश्वामित्रपुत्रो देवरातो विश्वामित्रपुत्रत्वात् प्रागजीगत- पुत्रत्वे शुनःशेपनामा द्वाभ्यामग्नि त्रिभिर्मगसवितारौ दशभिर्वरूणं तुष्टावेति पञ्चदशभिः शौनः शेपार्पेयं वृतम् । देवरातो भूत्वा एकविंशत्या वरूणं, त्रयो- विंशत्याग्नि, नवभिरिन्द्रयजसोमानां निवहं, त्रयोविंशत्येन्द्र, त्रिभिरश्विनौ, त्रिभिरुषसं तुष्टावेति द्वयशीत्या देवरातार्पयं वृत्तम् । तदित्थं सप्तनवत्या (६७) देवरातं पर्व पञ्चमम । (१६) अथ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रो नवभिरग्नि, द्वासप्तत्या मरुत्वन्त- मिन्द्र, ततस्त्रिभिस्त्रिभिर्वायुमिन्द्रवायू मित्रावरुणौ अश्विनी इन्द्र विश्वान् देवान् सरस्वतीं चेत्येकविंशत्या वैश्वदेव्यं, दशभिः पवमानं सोमं तुष्टावेति- द्वादशं शतं ( ११२ ) माधुच्छन्दसमायं पर्व पष्ठम् । ( १७ ) अथ ऋपभो वैश्वामित्रश्चतुर्दशभिरग्नि, नवभिः पवमानं सोमं तुष्ठाव रेणुवैश्वामित्रोऽष्टादशभिरिन्द्रमिन्द्रासोमौं च दशभिः पवमानं सोम तुप्राव । कतो वैश्वामित्रः पञ्चभिरग्निमष्टको वैश्वामित्र एकादशभिरिन्द्र, पूरणो वैश्वामित्रः पञ्चभिरिन्द्र, प्रजापतिर्वैश्वामित्रो दशभिरिन्द्र द्वापञ्चाशता विश्वान् देवास्तुप्रवेति त्रिचत्वारिंशेनशतत्रयेण (३४३) पुत्रार्ययम् । ( १८ ) अथ जेता माधुच्छन्दसोऽष्टादशभिरिन्द्रमघमर्पणो माधुच्छन्द- सस्त्रिभि विवृत्तमुत्कीलः कात्योऽष्टदशभिरग्नि संवरण: प्रजापत्य ऊनविंशत्या इन्द्र तुपावत्यष्टचत्वारिंशता (४८) पौत्रायम् । अथ देवश्रवा देवताश्च भारतौ राजानाविन्द्र पञ्चभिस्तुष्टु वतुरिति नैपाति- कायम् । इति सप्ताशीतिशतेनेन ( १८७ ) उत्तम पर्व सप्तमम् ।

* कोशिको विश्वामित्रः [ १३३ तदित्थं पाञ्चपौरुषी, पोडशायी सप्तपर्वा षोडशाधिकाष्टशतमन्त्रा (८१६) कौशिकी वेदसंहिता पूर्णा । (१६) कौशिकसंहिताया सोऽयंामन्त्रविभागः प्रकोष्ठ द्रष्टव्यः- -- पुरुषाःयायाणि ऋषयः श्राःयमन्त्राः पर्वाणि ७ २२ १ २ कुशिक ऐषीरथिः गाथी कौशिकः ४२ २ २० ४२ ३ ३ ३७८ १६६ ११६ ३७८ वैश्वामित्रो गाथिन: देवरातो वैश्वामित्रः ६७ . ६७ ५ मधुच्छन्दा" ११२ १२ ६ ऋषभः २३ रेणुः २८ ३४३ कतः ५ ह अष्टकः ११ १० ५ पूरणः प्रजापतिः १८७ ११ ६२ १२ जेता माधुच्छन्दसः अघमर्षणो माधुच्छन्दसः ३ ४८ १४ १ उत्कीलः कात्यः १८ १ १५ संवरण:प्राजापत्यः १६ (४) १६ देवाश्रवोदेववातौ भारतौ ५ ८१६ ८१६ ८१६ सोऽयमैतिहासिको वैज्ञानिकश्च द्विविधोऽपि विश्वामित्रो व्याख्यातः इति कौशिको विश्वामित्रः। समीक्षाचक्रवर्ति-श्रीमधुसूदनशर्म-विरचितं महर्षिकुलवैभवं समाप्तम् ।।

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महर्षिकुलवैभवस्य - शुधि पञ्चम् :- पृष्ठः पंक्तिः अशुद्धपाठाः शुद्धपाठाः कश्यपः- १ पुत्रः पुत्रः २ कूर्ममध्ये | बृत्तम् २ कूर्मकटौ | कश्ययः घृतम् कश्यपः ६ तल्लक्षण तल्लक्षणं ३ उद्यन्ने वाभू उद्यन्न वामू ३ १५ ३ १८ तयोरुर्वा विन्दूपलब्ध कूर्मो ४ ५ ८ द्रष्टार ४ शब्दपरतन्त्र १३ तयोरूर्वा बिन्दूपलब्ध कुम्में द्रष्टारं शब्दपरतन्त्र दृश्यते पृथ्वीस्थाना अवस्थिता यते मृडता नः नार्यसि अदितिमध्यं दृष्यते पृथ्वीस्थान अवस्थित श्रयते ५ ८ غر نعر १० १४ - मृडत नः ५ ७ ६ नार्य स ५ अदितिमध्य ख] * शुद्धि-पत्रम् * पंक्तिः अशुद्धपाटाः शुद्धपाठाः २४ दधिभव्यः दधिमय्यः इत्थमयं १० १३ इत्थमय १० २३ गत्या भक्त्या ११ १ २३ प्रदेश पञ्चसून्दशभिरिन्द्र रेभ काश्यपौ प्रदेशे पञ्चदशभिरिन्द्र रेभसून काश्यपी २३ वसिष्ठः- १ स्वर्गस्थितोऽयं १८ वगस्थितोऽयं १४ टिपण्ये | जुवानाः २ रश्येवेय जुह्वानाः रथ्येवेयं तत्रासात् तत्रासीत् भहाराजस्यायं ४ महाराजस्याय दम २ द्रप्सं ब्रह्यणा ब्रह्मणा ५ ५ ३ अमल्लक्षण असल्लना १६ १६ २६ २५ वभूवुः कपोश्चित् सेवोध्यस्य मन्त्रसहिता तादित्थं २ बभूवुः कयोश्चित संबोध्यस्य मन्त्रसंहिता तदित्थं जन्मकर्म तस्यां सेकान्मित्र २० जन्मकम तत्या २० १७ सेक मित्र २१ २३ ब्रह्मत्वात् एनयतिरिका ब्रह्मत्वात् एतद्व्यतिरिक्ता २२ * शुद्धि-पत्रम् * [ग पंक्तिः अशुद्धपाठा: शुद्धपाठाः २२ वसुकर्णे वसुकर्णो २३ लत्तर रुत्तर २३ त्रवत्रिशन्मन्त्रान् त्रयस्त्रिंशन्मन्त्रान् अगस्त्यः २५ २ नास्त्यमःस्या गस्त्यमत्स्या २५ १० २५ १३ भाहिस्थिना भाग्नेया त्रिविधा परिपाकान् फेनोऽसिकता माहित्थिना माग्नेया त्रिविधाः परिपाकात् फेनोषःसिकता २५ २६ ६ २६ ६ २६ स्वाभावा स्वभावा प्फेनोषः २६ प्केनोष ૨૭ जालत्वा जालकत्वा २७ नर्नोन्नमच्छृङ्गः २७ २० २७ २३ र्नोन्नमच्छङ्गः तदिदमगस्त्य निक्षिप्यन्ते परोक्ष ववहार पुरागैकत्रष्टि गस्त्यरवाग्नि २७ २४ तदिदमगस्त्यस्य निःक्षिप्यन्ते परोक्षव्यहारः पुरागौकषष्ठि गस्त्यस्याग्नि २७ २५ २७ २५ २६ ३ २६ २६ १४ पुरातनया भगिनेयाश्चेति नाप्रिय पचभिः षभिर्विश्वाद् र्जीविताहवानं पुरातनतया भागिनेयाश्चेति नाप्रियं पंचभिः षड्भिर्विश्वान्देवान् र्जीविताहानं २६ २६ २३ घ] * शुद्धि-पत्रम् * S पृष्ठः पंकिः अशुद्धपाठाः शुद्धपाठाः ३ २ संहिता सहिता दुत्क्रामक: ३० दुत्कामुकः भृगुः अङ्गिराः- ३२ ३ ३२ । १०-११ यावद्भिन्न विधारूषो मुकथं ३२ १३ यावदभिन्नं विश्वापुरुषो मुक्थं प्राणमयो तयोरद्धातपां ३२ प्राणमयः ३३ २० तयारेद्धातमां अशनंग्रहणा ३४ प्रशनग्रहण . ३४ २० मात्मान ३४ २५ १--विष्ठान मात्मानं १-विष्ठानं मुक्यस्यार्क उत्तिष्ठन् ३५ ३ मुक्थस्याक ३५ ६ उतिष्ठम् ३५ १६ कद्र कद्र १० एव m. २४ ४२ १७ सामन्त श्रासंभूतैः नैत्तिरीय मन्त्रश्रते. ४३ १ ४५ ७ ४५ २२ मर्मिणी एवं मामन्तं श्रीसंभूतैः तैत्तिरीय मन्त्रभुते गर्भिणी ससंज्ञाना इत्यैतरेय श्रुतेः वाजिश्रु गौविराट ४६ १८ ससज्ञाना ४६ २६ इत्यैतुरेय श्रतेः ४६ ४६ २२ वाजिश्र १ गौविराट * शुद्धि पत्रम * पृष्ठः पंक्तिः अशुद्धपाठाः शुद्धपाठाः २५ यत्र ५१ २५ ५२ १७ यट विरात्र संहन्यते सा ग्रान्नं अन्निधानी योऽग्निरादित्य संहन्यते सा विराट अन्नं अभिधानी यमोऽग्निरादित्य ५२ १६ ५३ १ ५३ ३ चतुत्रः यागेव चतुत्रः वागेव ५३ १३ ५५ १६ परतोऽनुयाजाः प्रतिरध्मः ५६ १५ ५६ तस्यप च परतोऽनुयाजा प्रतिरुन्ध्मः तस्यापि च विवक्षितत्वावगतेः श्रुतौ मन्त्रः दविनाभावं ५६ २४ ६ एतद्वै ब्रह्म विवक्षितत्वागतेः श्रतौमन्त्रः दविनामाव एतद्ब्रह्मः अथर्वाणं यज्ञस्यावराया संगृहाति श्रतं सोम १२ २३ अथर्वणां यज्ञस्यापरायों संगृह्णाति ५८ २२ श्रुतं ५६ २ सोमा ५६ ૨ यतमं नः यातमनः ५६ ५६ २४ . ५६ संन्निविष्टषु ब्रह्मगिरित्व दास्मि पिण्डं सर्व २५ सन्निविष्ठेषु ब्रह्मगिरित्व दस्मि पिण्ड सर्व १ १२ ३ असंघ असंघ धर्माः ६१ १ ११ धमा ..

प] * शुद्धि-पत्रम् . पृष्ठः पंक्तिः अशुद्धपाठाः शुद्धपाठाः ६१ विद्यायां विद्याया १६ नुह्य १ (५०१७) सौषधिर्वनस्पति नुदुह्य (५१२७) सोयाधिर्वनस्पति ६२ २१ या १ हतम् ददित्य दृष्टव्या तदित्थं १ द्रष्टव्या ६४ १ मेवासता मेवास ६४ ६ ६४ ६ ६४ १० अन्तरिक्ष द्यौ सहस्रायुर्जज्ञे इमामेव इमं सहस्त्रायुषो ६४ १४ १७ ६४ तदन्तरिक्ष साऽमौ? सहस्त्रायुर्जज्ञे इमामेव' इमे सहश्रायुषो मपश्यद्य आपोइवा तांयत् निरवासयत् मन्वाख्याने २० ६४ मपश्यद्य ६४ २२ श्रापोवा ૨૨ तायत् मिरवासाययत् है २२ मन्वाख्या २३ ऋचाभ्यनूक्तम् २४ नहन २४ ६६ १२ ६६ ऋचाम्यनूक्तम् नाहन र्नाद्य आदि इति तैत्तरीयके दिगष्टाः वायादित्या दिवाः नींद्य आदित्यः इति तैत्तिरीयके दिग्दृष्टाः वाय्वादित्या देवाः २५ ६७ ह .

शुद्धि-पत्रम् - [छ पृष्ठः पंक्तिः अशुद्ध पाठाः शुद्ध पाठाः ६७ १२ त्रिधातुपूर्व ६७ १८ स्वरुपा ६७ १८ ६७ २१ पूर्वत्वे आग्निोमो ब्रह्मात्मकत्वे (६) स्त्रिधातुपूर्व स्वरूपा पूर्ववं अग्निषोभौ ब्रह्मात्मकत्वे (६ कां) प्राभ्योऽद्भयो भस्त्याख्यं संक्लिश्याप्सु २२ ६७ २५ ६८ ६८ m आभ्योऽद्भयो भस्ताख्यं संक्लिप्याप्सु ६८ ६८ १५ मश्मान मश्सान ६८ २१ ददुपरिष्टात चतुष्टये ६६ ६ तदुपरिष्टात् चतुष्टयं ब्रह्मणस्पत्यो ६६ ११ ब्राह्मणस्पत्यो ६६ १२ इष्टास्वभवन् ववादित्याना इहाप्स्वभवन् वाय्वादित्याना ६६ १५ ६६ १५ ६६ २२ मान्दत्रया विद्यु त्सोमयोर्भेदेन सोमविशे मान्दत्रय बिधु त्सोमयोभेदेन सोमबिशे प्रयते ६६ ૨૨ ६६ २६ श्रयते ६६ २६ श्रुती ७० २१ दिक् छन्दः रूद्र देवा दिक् छन्दः रुद्र देवता ७० २५ १ प्राणः प्राणाः सर्वेपितरः ७ ८ सर्बपितरः प्रतिप्रजापत्य द्वितीय मात्मा प्रतिप्राजापत्य w द्वितीय आत्मा ज] * शुद्धि-पत्रम. पृष्ठः पंक्तिः अशुद्ध पाठाः शुद्ध पाठाः १० ७१ ७१ २० ७१ २७ ७१ २७ ૭૨ १३ ७२ २१ पृथीव्यौ सृष्टे प्रवृष्टे भवतीत्यस्तत्र वरेणं इत्यात्तक्षते संचारी भामभिमुखी ऽङ्गिरश्चाचष्टे भेषजैः ऋग्वेद विश्वरूगो पारीक्ष्यात् मङ्गिरस ७३ ७३ १५ ७३ ७५ ७ ७५ १० पृथिव्यो सृष्ट प्रवृष्ट मवतीत्यतस्तत्र वरगां इत्याचक्षते संचारी भामाभिमुखी ऽङ्गिरसश्चाचष्टे भेषजै ऋग्विद त्रिस्वरूप पारोक्ष्यात् मगिरस्त नानार्थान् सीमा रुषसि सर्वम् कृतिकातः प्रजापतेर्वा .. अग्निरास्यम् शीर्षन् छिन्नशीर्षा रोचनानां सहैकी ७६ ८ है नानाथान् सीसा ७७ ७८ ७८ १२ ७८ ७८ १७ ভs ७८ २२ सवम् कृत्तिकान्त: प्रजापते अग्निरारास्यम् शीर्षत् छिन्नशी रोचनाना सहेकी अत्रिः सृष्टिद्वदशे स्वेनाजसाऽऽवृतः ৩ ७६ २६ . ५२ सृष्टिद्वादशे स्वेनौजसाऽऽवृतः १ • शुद्धि-पत्रम् . ' [म पृष्टः पंक्तिः शुद्धपाटा: शुद्धपाठाः ५३ ६ देशाविशेषस्यत्रियत्वे देशविशेषस्यात्रेयत्वे स्यान्न स्थान्न योगत्वात् ८ योग्यत्वात् २२ प्रम्ह्ण ब्रह्मण भवाड मवाङ ८६ प्रक्षरित तेष्वायर्षद देवान्नगसोप लोकः m २५ सूर्यमवाहन २६ ३ १५ द्विहीयेत अत्रोऽत्रिमूती तत्तगोत्रान्वये सर्वदा ६२ ६३ ११ प्रचरित तेष्वात्र पर्षद देवान्नमसोप लोक सूर्यमवाहन द्विहीयते अतोऽत्रिमूती दत्तगोत्रान्वये सर्वदा ब्रह्मावर्ती श्रापोभवन् मेकेश्वरा पंपात ज्वलयंत्युत पुत्रोभूदिति गन्धर्व प्रकरणे ६४ ब्रह्मावती ६५ १२ आपोऽभूवन् मेकेश्वरी ६५ २३ ६६ पषात ६७ २ ६७ ज्वलयंन्त्युत पुत्रोऽभूदिति गत्व ह८ ६८ प्रकारणे ६८ সান্তা प्राणा ६६ वाजसनेय वाजसनेय सलग्नं ११ सलग्न १०१ १६ रल्कोऽर्थो रक्तोऽर्थों १०२ १ पन्चा पश्चा म] * शुद्धि-पत्रम् * पृष्ठः पंक्तिः श्रशुद्ध पाठाः शुद्ध पाटा: १०२ १०२ है १०३ २ १०७ १०७ १० २१ १०८ १८ बर्हिर्धानो चाविवशे इत्युभयाः कमकृत् एवमन्यात्रा प्राणावनो सर्वः तमेवैक मूतिः माच प्रशिद्धायां सृर्वशु साऽत्रिः वनपर्वान्तरर्गत कौशिको विश्वामित्रः नान्यस्मिन् बहिर्धानो चात्रिवंशे इत्युभयोः कर्मकृत् एवमन्यत्रा प्राणवनो सर्वः -तमेवैके मूर्तिः मांच प्रसिद्धायां सूर्त्यांशु सोऽत्रिः वनपवान्तर्गत १६ १०६ १८ १.१० ५ ur १६ ११० २१ ११७ ६ १२२ तान्यस्मिन् १२४ प्रागण प्राण १२४ २१ १२५ १२६ १२७ १३ १२७ २० १२७ १२८ च्छशत संबातोमुस्मिन्निन्द्रप्राणो एकंमदन्ति पृथीरसात्मनि व्युत्पत्त्याऽय प्रतीवी यदिद पुरव दीर्घायुष्टवाद मिक्ष्वाकत: वृत्तिरपि धुच्छन्दो सतं देवानवो ॥ इति ॥ च्छत संघातेमुष्मिनिद्रमाणे एकीभवान्ति पृथ्वीरमात्मनि व्युत्पत्याऽयं प्रतीची 'यदिदं पुरुरव दीर्घायुष्टवाद् मिक्ष्वाकुतः वृत्तिरपि मधुच्छन्दो शतं देवश्रवो १२८ २५ १२८ १२५ १३. २७ १ २१ २२ २० १३० ०

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प्रकाशक
सवालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर के आदेशानुसार
श्री गोपालनारायण बहुरा, एम. ए.,
खप सञ्चालक राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर
मुद्रक
ज्ञानप्रकाश काला, कुशल प्रिन्टर्स, मणिहारों का रास्ता, जयपुर
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Mahrishikulvaibhavam

Author
Shri Madhusudan Ojha
Title
Mahrishikulvaibhavam
File name
Mahrishikulvaibhavam
Text
OCR done
Citation
1961
Published
2010/08
Publisher
Jodhpur, Rajasthan Oriental Research Institute
Language
Sanskrit
Pages
182
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
326232
Barcode
99999990002382.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
kSpTACH1jh5
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