Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Ilaj
Front matter
No text on this page.
मनोहर सीरोज ने०४
इलाज
(कहानी-संग्रह)
लेखक
भी शम्भूरन मिश्र, 'मुकुल
मूल्य बार
काराको दमोहन मित्र,
माया कार्यालय,
Copyright reserred with tho pabustier
मुमक-बोरे द्रनाथ,
माया प्रेस,
इलाज हरीश खाने बैठा हो था कि मुन्नी ने बाहर से दौड़ कर सुनाया-"भैपा, कोई भाया है, ताँगा खदा है।" हरीश खाते-खाते उठा, हाथ धो, बाहर पाया। देख का विनय को नमस्कार किपा । "और पीङ यह कौन " विनय योला--"अरे, इसे नहीं पहिचाना, चिन्ता है, मेरी बहिन ।" और चिन्ता क्या कहे । सादी सँभाल, मुस्करा भर दी। हरीश के नमस्कार का उत्तर दे वह चुप हो गई। फिर विनय हरीश के साथ धीरे धीरे श्रदर पहुँचा । बीनू ने तागे से सामान उतार लिया था। हरीश चिता और विनय के आने का नुशी में अपने को मी मूल गया । कमरे में चिन्ता को ठिठकते देख विनय बोला--"अरे, यहाँ किसका सर है? यह तो अपना घर है। घल, धन, श्रन्दर पल फिर भीता उसे ढकेलते वह दादी के निकट पहुँचा | मुफ का पैर छुये। दादी ने विनय की पीठ पर हाथ फेरा, बोली-“बेटा, ठीक से तो रहे १ बहुत दिन याद बनारस भाये धीर विनय ज़ोर से हम पदा । योला-"दादी, इसे नहीं पहियाना, चिन्ता है, मेरी बहिन, जो श्रापको माला उठा कर मास में भाग जाती थी।" "चिन्ता" दादी हँस पड़ीं। फिर योलों-"इधर आ बेतू तो बहुत सयानी हो गई है। हरीश के जनेऊ के समय तो तू केवल पाठ साल की थी।" चिना के मस्तक पर हाथ फेरते पिर बोली-"याद है, मुझे मेरी ?" चिन्ता धीरे से इस दी, जसे कहना चाहती हो-अरे नहीं । "घर पर सब लोग अच्छे है ?" "जी, श्रापका कृपा से बोला विनय । चिन्ता ने नीचे बैठे ही बैठे कहा "भैया की चुहियों थीं। पापके यहाँ पाने को तैयारी करने लगे तो मैंने -में भी चलूंगी ।" " ४ इलाज चला गया था। दादी स्नेह विगलित हो उठौं। और हरीश तो मानो पागल हो गया हो। विनय और चिता को एकाएक पाया देख कर, उसे समझ ही न पड़ता था कि क्या करे । पिछले दिनों उसने उसे वैस हो लिख दिया था कि यदि हो सके, तो चले पायो। लेकिन यह चिता ।चिता को देख कर क्यों उसका मन सुम्ब से भर जाता है? क्या हो गया है उसे ? भातिर, क्यों उलझाये है चिता! हरीश कॉप गया। भातर से श्राफर बोला--विनय, थामो, चाय पियें।" हरीश विनय को लिये दूसरे कमरे में पाया देखा-नौकर चाय का ट्रे रख कर तभी दादी के साथ चिता भा कमरे में आई। हरीश ने इशारा किया बोला- "बेठिये एक प्याला आप भी !' चिता कुछ न बोली बुझी-युझी कुरसा पर बैठ गई। हरीश पाय प्यालियों में दाली, फिर विनय को देकर बोला- कय खुलेगा कालेज जनाय का?" 'आप घबरायें नहीं, हम अभी कानी दिन आपके मेहमान रहगे।" विनय की यह बात सुन चिन्ता हंस पड़ी। एक और बैरी दादी बोली-हरीश पहिचाना इसे " हरीश ने चाय का घुट उतारते हुये कहा-'हा, यह तो पिता राना चिता ने कनखियों से देखा कि हराश बहुत देर से उसा को थोर देख रहा था। सीधा सादा, सरल हरीश बड़ा भजा लगा उसे। चिता की प्रोवें भी मुक गई। अधरों पर जैसे शरीर का रक्त विखर गया हो-इतने जाल हो उठे थे थे। और अमी मातर से मुभी आई चिल्लाती-'भैया, खाना ठण्डा हो गया।" ही जैसे धासमान से नीच गिरा हो। खाने का माद भा गई उसने कहा- "अय तो विनय यावू और पिता भी था गये हैं, साथ ही खाऊँगा।" मुन्ना चली गई। बात-बातों में विनय ने बताया था कि जय से इसने पदन में हरीश का साथ छोड़ा तय से कितनी बल्दी जल्दी ने पास करता चला गया। और तभी तो आज वह पR PO का विद्यार्थी है। कवन साल में एम० ए० फाइनल का विद्यार्थी । कोई साधारण मात थोड़े ही है। दिन भर पढ़ना, न स्वैजना न कूदना । भरत, इधर उधर धूमनेवाले हरीश का साय माह दने पर हो तो यह इमना सब कुछ हो पाया है। विनय ने अनुभव किया कि पिता और दिनों की अपेक्षा प्राज अधिक प्रसर है। सफेद गालों पर हलका मुस्कान की लालिमा दौड आई है, और पाखों में एक विशेष धमक पैदा हो गह - इलाय ५ . x और निकट बैठी हुई चिन्ता सवमुश हो आज बहुन प्रसन्न मालूम हो रही थी। उसकी बड़ी बड़ी आखें बार बार हरीश की प्रॉखों से टकरा जाती थी कहीं कुछ न पा केवज वह हम भर देता थी। हरीश निगाह फेर लेता था लना कर। कि नौकर फिर पाया और बोला-'खाना तैयार है।" हरीश विनय चौर चिन्ता को लेकर उठ पाया। दादी ने थालियों परोसी । चिता ने चुपचाप, साथ साथ खाना शुरू किया। खाते साते विनय बोला- "दादी को क्यों कर दे रहे हो ? श्रम को इलाहाबाद से भाभी को ले पाऊंगा, में।" भाभी का नाम सुन कर हरीश ज़ोर से हंस पड़ा, योला-"प्रभा क्या होगा भाभी का।" "भाभी तो श्रायेंगी ही" पिता ने धीरे से पात जोड़ी, टोक धपे ही, जैसे कोई विद्यार्थी मार के सामने गाजत उत्तर देने में जल्दी करता है। विनय और हरीश दोनों हँस पड़े। x x एक दिन शाम को चिता यों ही निकल पड़ी घूमने। पास ही थोड़ी दूर पर सामने पार्क था । हरी हरी घास बहुत सुन्दर लग रही थी। पानी अभी प्रभा बाम कर का था । फूल की डालों पर से वू दें चूचू कर नीचे गिर रही थी, जैसे जगत् नियन्ता ने स्वय अपने हाथों मोतियों के वृक्ष लगा दिये हों, और जो अम हवा के हलके में नीचे गिर रहे हो। श्रासमान साफ हो चला था। सारा वातावरण मन को मोह लेनेवाला था। प्रकाश पर इन्द्र धनुष सतरगे पन्नों को फैजा काया गया था। बादल का एकाध टुकड़ा सक्ने वा के समान इधर उधर हवा में धूम रहा था। चिता का भावों में प्रकृति की सुषमा ने क हलचल पैदा कर दी थी। रह-रह कर हरीश की शकल सामने खिंच जाती थी। यकी सी यह एक और नाकर बेच पर बैठ गई। और तमी हरीश पाया, न जाने कहाँ से घूमता फिरता । आते ही बोला-"घरे, श्राप !" चिता पीक पदी। हरीश को देख उरने की कोशिश की। पर हरीश के मना करने पर फिर बैठ हाई । निकट पाकर हरीश बोला-"कहिये, पापको मनारस कैसा लगा" "जी, बहुत अच्छा लगा है मुझे।" चि ता ने उसो भौति नीचे ताकते हुये उत्तर दिया। "देखिये न, यह पूल कितने सुदर अगते हैं, जैसे यस, पोलना घाइते हो। और यह हरा लाल मखमल का सा " अरछा लग रहा है।"-अनजाने कह दिया चिन्ता "समें यह ६ इलाज हिता को क्षगा, हरीश साल यहुत खुश है। एक सप्ताह में हमी भी हो नियम पाई थी उससहा- मान प्राप यात समातूम होता है? रोश इस दिया। पिता भी इस पर। हरीश पूल धोदन में शुर गया। पिता थेगे सोचती रही कि यह हरीश भी ऐसा है। भैया ने तो कभी भी इनका नाम नहीं बताया था, केम कहा करते थे कि बनारस में एक औरत है। तय याराव किया करते थे। किन मुझे क्या हो गया है। मरे हृदय में यह सूपान 21 उठ रहा हरीश की मोर घरका से सिंध है। पहले तो मा मह हासा था । इराश की भावनामों में इतना रमझ गई चि ता कि उसे पसा ही न चला कि कम पून जोरते सोते राश उसके पाकर रुदा हो गया। तो वह तम, जवरा शोर सस पा। पिता ने देखा, पीछे पासों में दो गुखाय के पद-पद कृष उलझे हुये थे। माल ठीक करती योदा हंस, वह बोली-"मापने यह क्या किया? हजारी पर यही भगवान् भी फूल चढ़ाया करत है?" भय हारा न सारे पूल चिता पापेंक दिये, तिर खूप गम्भार हो कहा-"भग घान् हा यदि अपने पुजारी की पूजा न करेंगे तो और कौन करेगा। पामा पिर परसन को भा गया। नारों भार वादल पने छोकर दागय थे। धेरा यद रहा था। चिता उठ परखी हो गई। इराश भी चुपचाप चल दिया। सरते भर कोई किसी से न याला । कौन आने दोनों मूक रहसे हुये भी दय की सब स स्पट भाषा में कितना ही महत्वपूर्ण धानों का सखा कर रहे थे। दोनों के ही दिल पक रहे थे जसे कोई तूपान यानेवाला हो। बीनू, चिन्ता वायी के खाने का प्रयध कर द।" "बहुत प्रया "और देव, विनय मायू भी आते ही होंगे, उनके लिये भी। और मेरे लिये मी ॥ बाहर से थाते होराश ने कहा। दादी इस पड़ी। फिर कहा- सरे ऐसा खापरयाइ तो देखने में नहीं पाया। घर में प्राय मेहमान, और तू है जो न जाने कहा मmमारा पिरता है। महिलाने को पिकर, और न पिलाने की चिता। दुख, येचारी चिता का पल-सा चहरा पन्द्रह दिनों में ही फैसा कुम्हला गया है " हरीश का। चिता के दुख की पात थो, साधे मन में लगी। सच हा सो दादा कह रही हैं। इन दिनों वैसा उसका चेहरा स्तर गया है। यह काप कर भातर माया । खा, चिता .
इलाज अस्त-व्यस्त सोफे पर पड़ी है। दूध के समान सफेद चेहरे पर एकाध जर विखर पाई है, जैसे कहीं से चाँद का एक छोटा सा टुकड़ा किसी ने लाकर रख दिया हो और नोटों पर कुछ ऐसी लालिमा यिखर गई है, जिससे वह और भी सुन्दर दीखने लगी है। हरीश यदा देर तक खदा विधि की इस थप्य सुदरता को निहारता रहा। सहसा दादी ने पुकारा-"चिता!" चिन्ता की निद्रा टूटी। हड़बड़ा कर उठ बैठी। सोमने हरीश को देख, खजा से घट गई । साड़ी ठीक कर बोली-"आपको अभी सरला पूछ रही थी।" "सरला. यात हलके दोहराई या हरीश ने। सोचा--सरला क्यों आई थी, जब उसने कहला दिया था कि यह दो-तीन दिनों में स्वय श्रावेगा । तब फिर क्या काम पढ़ गया उसे पिता के देहान्त हो जाने पर, अपनी माँ को ले सरला उसी के घर पर मा घसी थी। और हरीश सरला को कर अपने को रोक सका था। खूब सुस लगा था उसे पाकर । भोली भाली अलहद सरला ने मन उसका जीता था। दादी ने कहा था एक दिन-'हरीश ! सरला को अपना ले, ऐसी लड़की भाग्य से ही मिलती है। और देखा हरीश ने भीतर जाती हुई सरला के मुंह पर हलकी हपी बिखर गई थी। जैसे सरला के समझ म हो न पाया हो कुछ, ऐसी वह बन गइ थी। कितना ध्यान रखती थी वह उसका ! एक दिन वह ज़रा बीमार पड़ा, तो दूसरे ही दिन सरला को लोगों ने उदास पाया। हरीश ने सिर में दर्द होने की शिकायत की, तो सरला 'यूडीफ्लोन' की शीशी ले आई। पट्टा भिगो कर मस्तक पर रखी, बाहिरता से विस्तर के प्रति निकट माकर योला--'भोक, थाप दर्द की शिकायत करते हैं। भला, श्रापको दद न होगा, तो क्या मुझे होगा!" फिर बिस्तर पर से किताबें सर काती बोली- जय अच्छे हो जाइयेगा, तव पदियेगा!" सरला ने कितारें उठा कर घालमारी में रख दी। हरीश उसकी ओर देख, केवल हंस भर दिया था। चार दिन याद वह आफिस जाने की तैयारी करने लगा, तो देखा--सरला सीधे सन कर दरवाजा रोके खड़ी है। अधिकारपूर्ण स्वर में पाली थी वह-"आत नहीं पाप आफिस जायगे।" 'क्यों ?" "सरला का हुक्म है। देखिये न, प्रभा श्राप किसने कमजोर है। कल ही तो युतार टूटा है। जरा भी फिकर नहीं करते अाप अपने स्वास्थ्य की। यदि कही कुछ हो पाये, तो ८ भागे सरला की घास भर पाई थीं। उन यही बड़ी, कानी छाला धोखों की वह अवहलना करे भी ता कैपे । जैसे बरसात उमा थाई हो ऐसा हो गई थी ये अखेिं । हरीश यक कर बैठ गया कुरसा पर । वह क्या करे, कैसे कहे साजा से कि माज आफिस जाना जरूरी है। हाश को बैग दस कर निकट दौड़ पाई थी, फिर कोट उतार खूरी पर टाल दिया था उसने । चारपाई विछा कर यह पोली -'ममी माप पाराम काजिये, मैं जाती हूँ। इस सरला के सामन हराश हार गया है। सामान अपने अनुरागको एक गहरी, सट रेखा खींच दो था हरीश के मन पर । दो महाने वाद सरला के एक निकट सम्बधी श्राकर, हरीश और दादी के अत्यधिक मना करने पर भा उसे अपने यहाँ ले गये। यह महाशय किया स्कूल में अध्यापक थे। शहर में ही दूसरा मकान ले रखा था। एक धुनो सपा में सरला जय दादा के पैर छूकर अपनी माँ के साथ विदा होने लगी, तो दराश कमरे में बैठा न रह सका था । दूर बहुत दूर एक स्वप्न सी विज्ञान होती सरला को उसने राते विजयते सिक्का के सीखचों के उस पार, जहाँ दुनिया का प्रत्येक प्राया स्वत यता पूर्वक चल फिर सकता था जाते देखा था। पिता को वैसे हा खहे देष, व हरीश चौका, अपने में पाया। सरला का विचार भग हो गया, को हुये बादलों के सफेद गोलों की मात भारताओं के थपेड़ों से बहुत दूर उड़ गया से। धौर चिता भारा, उदास, गहरे अधकार से पूर्ण मन लिये चिता कमरे से निकल गई थी। साता-यह सरला कौन है ? हरीश के मान सतह पर क्या उसने भी कभी अपना नहा सा घोंसला मनाने का इरादा किया था क्यों हराश उसको विचार धाराओं में थाया? तभी मन में एक छोटा, बहुत छोग बुलबुला उठ और सरला के नाम के साय रोग के मन के निकट पहुँच फूट गया। चिता चकित विस्मित, गम्भीर थी। सो गाँधी अनायास सरक्षा उठा लाई थी, उसे कैसे हटाये चिन्ता''चिता ठिक गई, कुरसी का सहारा लिया। गिरते गिरते पची! "क्या हो गया विता' पूछा हराश ने । कुछ नहीं, यों हो चार सा आ गया, तबापत ठीक नहीं है।" हराश बौड़ कर निकट पहुँचा; बोला--"डार को बुलाऊँ? चिता ने कमरे का कड़ियों की ओर देखते हुये कहा- 'शार मेरा इलाज नहीं करेगा। हरीश भारचय चकित रह गया । पोखा-"तुम क्या कहती हो, चिन्ता !'
इलाज चिन्ता चुप रही। क्या कहे यह ? कैसे कहे, दिल में दर्द पैदा हो गया था। योली-दापर मेरा मन नहीं पहिचानेगा" हरीश चिल्लाया--"चिता " और यम चिता ने व्यथा से मुंह दूसरी ओर फेर लिया था। आँखें उसकी भर वाई थी, यरसात उमड़ पाई या, जैसे अमरोई -अब रोई। "हरीश भैया !" मुली या गइ थी, घात टूट गई। वह योला-"विनय भैया बुलात हैं।" घरीश चिता को छोड़ दूसरे कमरे में आया। देखा, विनय सामान बांध रहा है। देखते ही बोला-"यह तैयारा कहाँ की हो रही है, भाई ?" विनय इस दिया, बोला--"अब तो छुट्टी सरम हो गई !" "श्रोह, तो यह कहिये कि जनाय तैयारी कर रहे हैं जाने की ।" विनय जोर से हंस पदा-इतने जार से कि भीतर बैठो विल्लो चौंक कर बाहर भागी, और मपर कर दूर निकल गई। एक योर से दादी योलीं-"मैं सो रोकते रोकते थक गई । कहता हूँ तार ही दे पानो।" हरीश ने दादा का सहारा पाया, निकट पहुँच, विनय का विस्तर खोलते हुये बोला-"चलो भाई, तार दे पायें, अभी आये हो। कम से कम पन्द्रह दिन तो और सको।" श्रदर नजर इ । चिता ने हम कर मुंह फेर लिया था। पोस पाक्सि से जय वह लौटा, तो देखा, चिन्ता ने साड़ा बदल ली थी। हलके नाले रग का फामदार जनाउज़ और पैरों में चप्पल, पहुत उलझनी लगी चिता । हरीश ने देखते ही पूछा- "शहर चलियेगा?" चिन्ता हँस कर श्रदर माग गई, कहती-- भैया से पूछिये, मैं क्या पता" शातिर शहर का प्रोग्राम बन गया। चिन्ता ने कहा, उसे सादा खेनी है। विनय भी बोला-'उसे घड़ी का फ्रीता यदलवाना है।" तागाधा गया था। हरीश विनय और चिन्ता के साथ चल दिया शहर की भोर । रास्ते भर हरीश विनय से घुल घुल कर बातें करता रहा । जैसे वस, याज के याद विनय मिलेगा या नहीं। बातें करते करते हरीश काखियों लेता, चिन्ता हंस कर नीचे देखने लगती, एसा उसे कुछ भी मालूम नहीं है। शहर या रहा था, दूकाने शुरू हो गई। हरीश/तोंगा खड़ा कर, विनय और चिन्ता के साथ उतर पदा। एक कपड़े की चिन्ता सड़ी हो गई । साडी खेनी थी, दूकानदार ने साड़ियों का चिन्ता को देख दूकान पर 10 इलाम देर लगाना शुरू किया। पिता पारी बारी से सादियों देनी जाती थी बीच मीच में हरीश की भोर देख, सादी अपने पिनकुज सामने कर-जैस पहिने हो, बहुर धीमे स्वर में पप भी क्षेती- कैसी लगती हूँ।" और हराश क 'यहुत सुदर' कर देने पर एक विधिय गुदगुदी दौद नामी उसके दिल में, श्रमि धमक उरती, और सुर्स ऐसी हो जाती, जैसे पके सेव । तमा पिसा ने पुरा- 'हरीश ?' हरीश चौंक पड़ा । यहाँ कौन परिचित है, जो उसका नाम लेकर युला रहा है । किन्तु स्वर कुछ पहिचाना सा लगा । और तभा राही हो गई भाइ से भाकर एक भाली भाली अल्प सुयता ।राश ने सकुचित होकर कदा-"अरे सरला-सुम परला सिलसिला कर हँस पक्ष । बोली-"मा के साथ थाई थी वपन लेने । चापको देखा " फिर चिता का हाथ पकड़ कहा-'सरे, चिता पाप भी !" चिता ने केवल मुंह फेर कर कहा-'हा! मन उसका बैठा जा रहा था। एकापक जो भाग सरला लेकर था पहुँ दी थी, पह अब जल रही थी--ऐसी, जिसमें चिता की दुनिया ही प्राक हुइ । जा रही थी। जैसे यदि उसके पख होते, तो एक पछी की तरह यह पुर से २६ कर इस भागस बच जाती। घना अँधेरा छा गया था जैसे रात हो हो गई हो । गिरते गिरते कई जगह बची चिन्ता, मोसं उसकी भर भाई था। सरला ने हरीश के बिलकुल निफर पहुँच कर उसे छूकर कहा-"याप र, मैं अमा पाती हूँ ! माँ से कह दूँ, यह प्रतीक्षा कर रहा होंगी, तय चल !" और इसके पहिले कि हराश कुछ बोले-सरला भाग कर भीद में ग्वो गई। जब निकली, सब पाया इतज़ार करते इसी स्थान पर हराश को ताँगे में बैठे, विनय और चिता के साथ । प्रसवता से इसका मन नाच उरा। कितने दिनों के बाद उसने इतने समीप से देखा है हराश को! सरला चुपचाप चिन्ता के निकट पिछली सीट पर बैठ गह। हाँगा प दिया। और चिन्ता का विचित्र हाल था। मुँह उसका एकदम सफेद हो गया था जैसे बर्फ का एक टुकड़ा हो । यह देख हरीश ने पूछा- तवायत क्या ठीक नहीं है चिता ? 'जी, कुछ ऐसा ही सिर में दद है!' सरला नौका । हरीश को देखा और वह तो बराबर चिता कीवी और देग रहा था। सरला अपने में खो गई थी। मन उसका खूब धुएं से भर गया था, फिर भो बोली-'दीदा से जाइये, भापका सिर दया हूँ।'
इलाज और चिता क्या कहे १ जी करता था कि कहीं दूर-बहुत दूर भाग कर पहुँच जाय । कहा उसके हृदय को चैन मिलेगा ? शायद कहीं भी नहीं । मज तो बिलकुल उसके निकट सरला का रूप लेकर बैठा था। चिता को घुर देख, मस्तक पर हनके हाथ रख कर सरला बोली-"क्या हो गया है आपको ?" "मुझे ?" चिन्ता को घायल, मूक ऑखें एक पार ऊपर उठी, जैसे सरला की नस नस में घुस कर वह उसका भेद ले लेंगी। कॉप गई सरला । धारे सोठ काट लिये । उसके बाद रास्त भर कोई यात नहीं हुई । सांगा जय हरीश के दरवाजे पर पहुंचा तो बहुत देर हो गई थी। घर्ग में चिरामा जल चुके थे, और बाहर दरवाजे पर धैरे कुत्ते किसी बाहट को पाबार बार भोंक कर चुप हो जाते थे। ताँगे से उतर कर चिन्ता हरीश, सरला और विनय के साथ अन्दर गई । फिर जल्दी ही खाना खाकर सोने की तैयारियाँ होने लगी। और सरता को रात भर नींद नहीं आई । रह रह कर हरीश और चिन्ताकी सजाय छाया में धुएँ के समान कुछ याकर घाखों में फुहारें छोड़ जाता था। तो क्या सच हरीश अथ । सरला कैसे लटे ? अब वह उठ कर बैठ गई थी। जी न लगा- दरवाजा खोल याहर थाई। पास ही हरी हरी घास पर टहलती फूलों से भरे गमलों के निकट आई। प्रासमान साफ हो गया था। चाँद निकल आया था। दूर तक सफेद चाँदनी पिछी थी-शीतल, सुखद । हरीश के कमरे से हलका प्रकाश पा रहा था--लगा, जैस हरीश कुछ ज़ोर ज़ार से घोल रहा हो माहस कर निकट पहुंची। सिडका खुली थी, देखा हरीश चारपाई पर लटा था और सामने बैठी थी एक युवती। प्रकाश के उस हलके पुञ्ज में भी सरला ने चिता का वह गोरा, सुडौल चेहरा पहि- धान लिया । सरला पापाणवत हो गई, यहीं खदी रह गई। चक्कर पाते श्राते बचा उसे । दीवार का सहारा न लेती, तो शायद गिर पड़ती । दधे पाव धारे-बहुत धीरे अपने कमरे की ओर बढ़ी। सुबह जय लोगों ने उसे देखा, तो बहुत तेज बुखार चढ़ आया था। हरीश धमरा गया। पया हो गया है सरला को। दौड़ा-दौड़ा डाक्टर को बाया। फिर सिर- हाने बैठ, मस्तक पर हाथ पैर पूछा स्नेह से-कैसी तमीमत है सरजा?" सरला चुप रही। और बाहर से चिता ने देखा हरीश सरला के सिरहाने बैठा है। चारों उसकी सजल है और ओंठों पर एक विचित्र प्रकार का भाव पैला है। चिता पापाणवत्
इलाम
-
हो गई दो जैस, यही शमी रह गई। पार पाने पाते बची यादीवार कासार
नती, सो शायद गिर हो पाना । ६५ पाप पारे-पहुए धीर यदा यह प्रश्ने कमरे
को भोर।
दूसरे दिन जब हरीय दापयर को माया, तो लोगों को पता पधा किचिनाको
भी यदुत रोग वा हो गया है।
हरीश और पिाय दोना हा दवाई पर रह | रामा पद पा ।
उनका कहना है-सरमा और पिता का कोई गहरा मानसिक धागा है।
साकर साता है। पिता और सरका का टेम्परेचर लेकर दावार पर टंगे
पारो परमोट द देता है। कौन जाने, मन की गरमा मा पर घमामीटर मार
सकता है। गत दिशा हो गया है सरक्षा और पिता का इला उसी प्रकार हो
रहा है, अन्तर यन इतना हुधा है कि साहबदल दिये गये हैं। मानेच
सक सरक्षा और पिता मनी होगी। यही होगा भी या नहीं।
इलाज चल रहा है।
अब टमरेचर नहीं रहता, कि मन पर एक मारा सदासी समरी मामारी
दार बताते हैं।
इलाज पर भी पक्ष रहा है।
अधूरा चित्र १७ माकर । स्पर्श को कोमलता से सौदामिनी चौंक पड़ी थी। फिर हलके टटोल कर बोली पी-"बिनो, पुष्पा, सरला!" और तब एकाएक खिलखिला कर किसी ने उसकी गोद में बैठते हुये कहा- "अरे नहीं, मैं हूँ शकुन्तला ।" सौटामिनी खिलखिला कर हंस पड़ी। "तू भी खूब है, भैय्या की है तेरे !" "वह क्या पाहर से सामान जा रहे हैं।" शकुन्तला एक घायल पो की भाँति सौदामिनी के सीने से चिपक गई। फिर बोली-"एक भी पत्र नहीं भेजा मुझे, और भैया " सौदामिनी ने इस कर शकुन्तला के गालों पर एक हलकी चपत जड़ दो, वे और भी सुख हो गये। और तभी भीतर से या गया--कमल शकुन्तला को देख, वह ठिठक गया । गोरा शरीर, इकहरा बदन, पैरों में चप्पल बड़ी सुन्दर लगी यह। और तभी कमन को देख, उसकी ओर इशारा कर बोली सौदामिनी-"इन्हें जानती हो।" शकुन्तला चौकी। अपने प्रति कहे गये पाक्यों की मीमांसा यह क्यों करे ? समल कर गोद से नीचे उतरते बोली-"नहीं" और तय बताया सौदामिनी मे--यह है मिस्टर कमन ! आपके भैया के परे दोस्त" शकुन्तला ने उठ कर निकट पहुँच, धीरे से कहा -"मस्ते" कमल धीरे स मुस्करा दिया। तभी सौदामिना बोली-"और एक पात पाऊँ ? पापदे भारी चित्र ती हुई सौदामिनी की ओर देख कर बोबो यी शकुन्तला-"तय सो भापकी " "चुप !" सौदामिनी मारा-सी हो गई थी। बोली- यह शकुन्तला, मिस्टर कमल ! और पाप हैं दुष्यन्त । कही जगहों की मांति !" शान्तखा सूर्व विनिता कर हँस पड़ी थी। और कमन तपशकुन्तला का मुंह सजा से खान होता पापा थारात साना खाते यताया था सौदामिनी मे-'शकुन्तला की वह मामी खासी है।चार दिन हुपे, यह अपने घर पई है।" ..-२ प्रवरया १५ वजा" कीजिये । फज रात हो तो आपको छाती में भयङ्कर दर्द हुश्रा या। सुबह माँसो मा खूप भाई था। जाने कितना विरानापन छिपाये है चार अपने मन में। यदि मैं न माता, तो न जाने कितना देर तक श्राप याँहा बैठे रहते ।" कहते म्हतं पणाने कमल के दोनों हाथ प.६ जिये, फिर उन्हें धार धारे अपने गालों से लगाकर पोली- 'देखिये कितने गम है ! मैं जो कहनी था, पापको सुनार होगा। पलिये, लेटिये, कमल ने इनकार न किया। चुपचाप उठ कर याणा के साथ पल दिया। रात में वाणा ने सुनाया यह भनित के साथ घूमने गइया । जिसिलाता अजित उसे बहुन भना लगा था और वह गात, वाणा का भय सहारा देने लगा। स्वामी के सीने से तय वह बच्चों की भाँति चिपक गई, फिर भी कमल ने अनुभव किया कि रात भर याणा कॉपती रक्षा है। इस पहाड़ा प्रदेश में कमल को प्राये मास हो गये है। इस बीच पह कुछ स्वस्थ हो चला है । यद्यपि खामी अय भी कमा कमी जोर पकड़ चेता है। टेम्प रेचर मा हो पाता है, फिर भी वाणा को अनुभव हुमा, जैसे वह अब पहले की अपेक्षा अधिक स्वास्थ्य नाम कर रहा है। किन्तु पहारा जल वायु, डाक्टर को तत्परता और चाणा की देख भाल के बाध भी कभी-कमी कमल के मन में एक हलके से दर का अकुर पूर पड़ता था। तब कई-कई दिन यह बहुत बचैन रहता था। बाकी भी यह आती और सीने में दर्द अधिक होने लगता । शला को याद विवर जाती। यह सत्रह साल की अस्त व्यस्त नारा उसे पूर्व उलमती नगती शव । मन में लगा यह नारा अनजाने हा अपना सब कुछ दे गई या एक दिन । और यों ही न जाने किस प्रकार शपला ने एक दिन उसके मन में पख खोलकर छोग सी उड़ान भर दी थी। सौदामिनी का बात मा वह कहाँ तक टालता ? अपने रिश्ते को वह स्वय सम झती थी-खूब ? उस सौदामिनी ने उसके लिये कोई सुख उठा कर नहीं रखा। धूमते फिरते एक हफ्त के लिये वह उसके घर मा पहुँच गया था। एक दिन रात को था देर से घर अाया, तर सौदामिना ने सपालों की झड़ी लगा दी थी। फिर स्नेह विगलित हो कमल के बिलकुल निकट पहुँच कर थोड़ा सा हंस, उसके सिर के बालों को टक करते बोली था-पापको मेरा भा कुछ ग्याल है।' सौदामिनी का बहुत सा बातें उसके पास जमा हो गई थी। उस निकट पड़ी सौदामिना को तब उसने सच कर याहों में कस लिया था। और स्नेह तथा भातुरता का सहारा पा, उसकी बड़ी बड़ी घास सजल हो आई थीं। और एक सध्या का सौदामिनी की खेिं किसी ने याद कर ली थी, पाछे से अपूरा चिश्न थच्छा हो।" सारा शरार सूब कर लकड़ी सा हो गया था । कभी कभी रात में सूष प्यास लगती थी। और दिन चारपाई पर लेटे जेटे शिफल नाता था। पीछे कई महीने बाद साक्टरों ने पहाड़ पर ले जाने की सलाह दी। और वीणा को लेकर वह इसीलिये तो यहाँ प्राया था। रात घाणा ने अनुभव किया, कमल परावर पीड़ा से कराहता रहा है। रहरह एक हलकी, कि तु तेज़ चीख जैसे अनायास ही निकल पड़ती थी। और सबेरे सादर ने प्राकर कहा-“वीणा देवो किसी और डाक्टर को मा दिखा लीजिये, तो "डाक्टर | वीणा गिरते गिरते बची। समीप के कमरे से अजित ने श्राकर संभाला। और सभी कमन को फिर जोरों से प्रासी पाई। बाहर के एक “यस्त हया के मोक ने सहसा प्रवेश पर मज पर पैले उस अरे चित्र को उड़ा कर एक और गिरा दिया। अनित ने चित्र उठा कर मेज पर फिर से जमा दिया। पड़ी देर तक चित्र पर धनी पूर्ण नारी को वह निरखता रहा। तब अपने निकट भारा दुख घिरता पाया था उसने । अजित ने देखा, कमल इशारा कर रहा था। घीणा से योला- "धारको जुना रहे हैं।" और वीणा ने तय निकट पहुँच कर कमल के मस्तक पर हाथ फेरते हुये कहा- "श्राप ठीक हो जायगे स्वामी । और उत्तर में कमल फूट-फूट कर रो पड़ा । शकुन्तला का याद ताजी हो गई था शायद । वीणा ने लेटे हुये स्वामी के सीने में मुंह छिपाते हुये कहा -"श्राप यह सब क्या कहते हैं, स्वामी ?" लटे हुये कमल ने अब अनुभव किपा कि यह वाणा मा बहुत महँगी पदो । पिर उसे हृदय से मटाते योला-- चित्र अधूरा रह गया, धोया! उस शकुन्तला की सहसा बीच में वह मुझ गया, वहे जार से खाँसा श्राई थी। वीणा ने घरों पर सिर रख दिया था। प्रघ यह फर फूट कर रो रही थी। और तभी हलके-बहुत हबके सुना वीणा ने-कमल गा रहा था- घर घर में दिवाली है मरे घर में अंधेरा!' वीणा धरणों से और भी जोर से लिपट गई थी, जैसे कहीं वह उट कर भग जायगा। फिर उसके दोनों हाथ पकड़ "कर याजी-"मेरे देवता ! इतना तो न किन्तु कमल गाता ही रहा--गाता ही चला गया। दे देना।"
बाम रात भर कमल को नींद नहीं पाई। रहर शकुनना का महा चित्र बागों में मन उरता था | तब क्या यह सौदामिनाको देवल पक सहारा मात्र ही मान ले ! वैमा पेज प्रातिर गई सीमिनी उस निकट ! शकुन्तला की घड़ी हरिणी के समान चयन थपि यता को भंग कर देती थी। जैसे कहना चाहती हो- मैं क्या मान , और पार मेर पाछे इतनी पुरा तरह से क्यों पड़े हैं।' प्रय कमल ने उठ कर विदको बोन दो था। साफ चाँद का चादर-मी विधी थी दूर तक । उमा चाँदनी म शकुन्तला का स्वर धावा दे रहा था। उस पकात रात में तमा कई चिट्टियाँ उसने लिखी शकुन्तला को। पितये सब भूग लगा । फाड़ डाला एक-एक कर हैं। अत में एक चिहा लिसी भी- शकुन्तला मुझे समा करना ! जो में तुम एकदम समा गई दो-इतनी किवच, उसमें तनिक भी स्थान प्रय शेष नहीं है। चाहता था, चलते समय मिल लेना कि । मेरा याद रखना घरचार से मैंने अपना सब कुप देने में वहाना नहीं किया है। मेरा मताशश मत करना। सौदामिनी ने जो रोज रोना है, इन प्रमार्णी कनिका उसे कैसे भुलाऊँ! मैं इसी रात यहाँ से जा रहा हूँ। और उसी रात कपल चुपचाप अपना कोट पहिन कर वहाँ मे दिया था। चार महान याद एक दिन सौदामिनी मे बिचा- "शतना को छोड़ कर यों ही चले जानोगे यह सोच कर शकुन्तला फूट-पूर कर शेती है । आखिर क्या था जिसे आपने हम लोगों को बताया भा नहीं? शY न्तला की शादी की बात बात चल रही है कि यह परावर इनकार कर रहा है। मेरी हरा है कि जब आपने अपने मन को उसके लिये उठा कर नहीं रखा, तर शतजा यहाँ क्यों न स्थान पाये ! बहुत दुदली हो गई है वह। पापका नाम बराबर लिया करती है। क्या आप उसे यही रहने देंगे ? पोलिये, उत्तर दीजिये।" और पाच एक माह बाद शतजा को चिट्ठा यो- "सौदामिनी ने नो सेज बेजा मेरे साथ, उसे कैस भुलाऊँ? अापको ठीक से देख भी न पाई । चापका पत्र पास है। जय मिलियेगा, तब खूर झगदा करेंगी। अमी नहीं।" कमल ने लेटे ही लेटे सैम्प पुझा दिया। फिर तकिये से मुंह छिपा कर फूट फूट कर रो पड़ा। अथ कमल को सूर खासी पाने लगी थी। इनका टेम्परेचर मी हो पाता था।
वीमानर । प्रकाश की खोज - "जी, मैं रेखा " और हंस कर खिलखिलाती हुई यह भीतर भागी। वह सुन्दर नारी भन यटाती बगी निर्मल को। दो दिन बाद निमन के कहने सुनने से माया ने फोटो खिंचवाने की तैयारी की। दोपहर से सब ने खाना खाया । शाम को खान में फोटो खिंचवाने की बात तय हुई। तागा मगाया गया, अन्य लड़कियों के साथ रेखा मा बैठी। अगली सीट पर निर्मब था । बदकियों के बीच रेखा का वह अस्त-व्यस्त गौर शरीर मा बुझाता लगा। बदी सुन्दर दिखाई पड़ी रेखा उसे । जब की शीतल बहर के समान रेखा का सौंदर्य निर्मल के छू गया। जैसे किसी ने मन्त्र मुग्ध कर दिया हो, ऐसा हो गया वह रास्ते में अपनी विवशता समेटे, निर्मल ने कई बार चाहा कि उस निकट बैठी रेखा से बातों का सिलसिला जोड़ें, किन्तु चुप ही रही वह । खान पर पहुँच कर, एक झाड़ी के सामने फोटो का कार्यक्रम बना। तभी याद पाया, रेखा कहाँ है? और सच ही तो रेखा यहाँ नहीं थी। विवश हो, तलाश शुरू हुई । बान की सारी झाड़ियों देख हाबी गई। नदी का रेतीला किनारा भी दा गया, कि तु रेखा न मिली, साथ की बदकियों हैरान थी कि यातिर गई कहाँ रेखा। और तमी निर्मल घूमते-घूमते एक मादो के निकट पहुँचा। हरी-हरी पत्तियों के वीच फूल लिने थे बहुत से । और उनके पीच ठोक फूलों-सी हो रेखा को पाकर वह चौका, बोला-"पाप यहाँ " रेखा जैसे लाज से गढ़ गई हो। अधरों पर लाली दौर आई थी। समन कर योली-"कुछ नहीं, ऐसे हो चली थाई यो । सोचा था, आपको क्या दूँ!" रेखा मादी से बाहर प्रा चुकी थी। सादी ठीक कर, नाचे साकती पोली-"माँ मापका नाम अकसर लिया करती थी। आप बड़े भावुक और अच्छे हैं ?" भागे बात छोटी सी मुस्कान में खो गई ! रेखा को हँसी ने निमन के हदय पर अधिकार जमाया। जैसे उस शाश्वत रेखा की हसी में उसका कण-कण सो जायेगा । रेखा की सरत हसी को छाया में उसे ऐसी नींद प्रतीत हुई, जिसमें प्राणों का कम्पन अपनरव समेट कर दिप जाना चाहता है। उम जैसी साल और स्नेह स्निग्ध नारी, उसने कहाँ देखो यो। लापरवाही से सादी का एक छोर कधे पर डाले, वाखों का चोटी का फाता मुंह में दवा कर सड़ी हुई रेखा के परम सौन्दर्य को निर्मल ने इतने निकट से आज पहली ही बार देखा था। उस अयाचित गतिहीन विवशता का तह में यह कैसे उतरे। पाहा या निर्मन ने कि मन - प्रकाश की खोज निर्मख ने खिड़की खोल दी। पने फैले हुये दूर तक अन्धकार में ये धमकती विखी की पत्तियों और भी प्रखर हो उठी। उनके चारों योर सीमित प्रकाश से विखकुल बगा हुपा घंधेरा! नाम कर निमज ने विरकी बद कर दी। श्रम यह अपने जीवन को मीमांसा कर लेना चाहता था--पस ! जीवन, जिसमें नारी प्रकाश बैकर पाती । ठीक उन बाहर की यत्तियों की मासि जगमगाहट होती है उस जीवन में । कितना अन्धकार दूर करता है वह मकारा ! किन्तु प्रकार के समीप ही अधेरा निमल सोते से जागा हो जैसे । घरकार की बात देर तक मन को उलझाती रही । सप प्रकाश का महत्व क्या धोना मात्र है। बहुत बहुत सा बातें भाकर निमंश के सामने पैखने लगी । उसकी पलती फिरसा दुनिया में अनेक स्मृतियाँ पम्प लगा कर जाने कहाँ से भा गई थी। चौर सभी निमल के मन को जैसे किसी धने अन्धकार ने छू लिया हो । रेसा जैसे सामने बिखर गई खिखा निजी विचारों का बाप टूट गया था। तब क्या था कि किसी दिन यौवन में सिकुरता खाज से गड़ती इस रेखा के समीप ही भधकार है। काम की चहारदीवारी में बैठे-बैठे अनायास ही उसका नाम मन में जुड़ने लगा था। निर्मल ने कोई बहाना नहीं बनाया उसके सामने। यह नाम बार-बार पास विसरता दो काली काली घड़ी मोली माता की रचना करसा-सा लगा निर्मख को। माँ के मुंह से सुना हुअा नाम, अब पानी की तरह उसके रोम रोम में बहने लगा, वय कहीं निमस को इसका ज्ञान हुआ। और एक दिन इसी बात से प्रेरित होकर उसने अन्य सम्बन्धियों के मना करने पर मा जाने क्यों देखा को अपना जीवन सौंप देने का निश्चय कर लिया । छुट्टियाँ हुइ, तो वह माया के घर आया था। सोसा, चनो, दस पाप दिन बड़ी रहाय । एक सपेरे सोकर उठा कि बरामदा पार करते उस मिजमिल प्रकाश में एक हलका सा धका लगा। तमी जैसे किसी ने कहा-"श्रोक ! पाप है, मान कीजियेगा।" अनायास स्पर्श की उस सिहरन से निमन का मन दूध गया, बोबा झटपट--- "पाप कौन हैं? T प्रकाश की खोज । भारी खिलखिलाहट से चौंका था रिमल । सँभल कर योला-"चलिये, जरा यों ही आ गया था। सोचा था क्या हूँ श्रापको?" रेगा पर यात कही गई थी। सूख लगी उसे। अपने से यह बाहर गई क्यों ? नारी की मर्यादा उसने तोड़ी है, बहुत बहुत शरमा गई वह। और फोटो के लिये लान के बीच में खड़ी थन्य लड़कियों के साथ रेखा ने हाथ रठाया-जैसे कहना भर चाहता कि रको जी, मेरा फोटो मत लो; कि तु निर्मल ने शिव दया दिया । फोटो खिंच गया था। घर लौटते समय काफी देर हो गई थी। घना अंधेरा छा गया था। चारों योर गहरी कालिमा छाने लगी थी। देर हो जाने से तांगा भी नहीं मिला। विवश हो पैदल ही चलने का निश्चय हुा । नदा का रेताला किनारा, नीचे बड़ी बड़ी घास, सुनसान वातावरण, धंधेरे से ढंका रास्ता । रेखा पीछे छूट गई थी। एकात था, निमल ने कहा- मेरा हाथ पकड़ लीजिये, कहीं ठोकर न खा जाय।" चौर रेखा ने इनकार नहीं किया । चुपचाप भागे बदते निर्मल के वलिष्ट हाय को थाम लिया। फिर बहुत निकट बोली-"देखिये, आपने मेरा हाथ पकड़ा है, कहीं फिर धोखा और उसर में रेसा ने पाया कि निर्मल ने और भी जोर से उसका हाथ दयाया था। किन्तु फिर किसी अज्ञात श्राशका से तुरन्त ही चौंक कर बोला-"मैं तो तुम्हारा हूँ, रेम्बा " यह सुन, रेखा न उस भागे बढ़ते हुये निर्मल से सट जाना चाहा । हृदय उसका धेग से धपक रहा था, सारा शरीर पसीने से तर था, वह चुप रही । लड़कियों निकट या गई थी । भागे पढ़ गई रेखा और उन्हीं में सो गई। और एक दोपहर को रेखा के भाई ने एक चिट लाकर दी। निर्मल ने लिखायट पहिचानी, रेखा ने भेजा थी, लिखा था-- "मुझे माफ कीजियेगा । कल का बात मन में खूर्व लजा भर लाती है। रात भर नींद नहीं आई। आपकी याद क्यों इतनी घाई, समझ में नहीं पा रहा है। फिर भी मन हलका हलका है। हा! सच, उसमें कहीं भी भारीपन शेष नहीं है। जैसे जो वोमा था, उसे आपने उतार लिया हो। माँ की इच्छा है कि आप मुझे अपनी ! क्या आप मुझे स्थान न देंगे-लिसिये" निमल ने पन मोद कर जेब में रख लिया। फिर सिगरेट जला कर विचारों में दूब गया, सोचा, था खर क्या पहेली-सी बनी रहेंगी ये सब बातें और रेखा ही उसे क्यों उलमाय है। अपना जीवन किसी पुरुप की छाया के नीचे सुला देने की जो
KAR
का कोई काना गाया मरामा। मामय रासादर में
प्रवश कामास मा पाल हाथों में पर दल, निमंज में 1-"और
चोरी करा गई थी। रेया शरमा गई रियों भरीर का एक
सिरा दासी सदवासी, घोड़ा हमका नी-'मेरा भैसीकार करेंगे धार!"
"घर Anant,कही भार मानकर"
"रेखा!'
"मही, पर पधन दीजिये।
पास काटा रखन, कहा-'किसमे मुदा हैं पल ! ए सदेग कर पशि-
वेगा। की चापको खापरवाही से "
निमल हस पड़ा।
कहा रेखा न भागे-"पुरप लापरवाह होता है। किसी बात को व्यर्थ करते
दुस नहीं होना। अपना मन बनाना भर जानते हैं। से दुनिया का
सारा मय वर्ग मिट्टी की डायनाई।"
फिर सुपचाप र निमजा अासों में ताक नीचे मुक कर, फूलों को पैरों के
निका रस, बोली-'इन्हें चरणों में स्थान दीपियगा! भला"
' और फिर इसकी हँसी बिखराकर भागो था रसा।
पदी देर तक निम रेखा के बारे में सोचता रहा। मानिर रेखा पाहता या
है। कैसा खेद शर किया है उसने । बटुन गम्भार गौ रेशा निमत को। और
अब जैस रेखा का हसा उसे पु7 मुनाई पर रहा हो। रेशा कहन बगी-'मैं
मुझे !'
निर्मल न विवश हो माने याद कर ली। रेखा फिर निकट यो, से पूर्व सन
संवर कर आई हो। इस रेखा को यह कहाँ रमे उठा कर ! ऊब पर मास खाक्ष दी।
रेखा का विचार टूट गया ।
प्रम था-केवल भ्रम
दान स पूत्र तोद जेब में 14। यदे सुन्दर बगे घे फूल कि देसा, पीछे अन्य
मड़कियों के भाव रेया घो। उन्होंने कहा- सू। भाप यही है और हम सब प्राप
प्रताचा करें ।
.
प्रकाश की खोज २५ एक सप्ताह हो गया है। इस पीच में रेखा को उसने खूब निकट से देखने की चेष्टा की थी। खूप समझ लेने की बात भव मन में शेप न थी। रेखा ने निर्मन के हृदय को अपनी मुस्कानों से भर दिया था। प्रातिर प्रतिपन निकट आती उस सुदर नारी की अवहेलना मी वह कैसे करता ? तितली-सी उस रेखा नारी ने निर्मल के चारों ओर द उद कर एक दायरा वीस दिया था। निमन सोचता, रेखा क्या है-नारी, वरदान, याचना अथवा निरी अनबूझ पहेलो ! क्या जी की पुरुष के प्रति यही मागऔर कभी निर्मल पुष्पा के बारे में हम जाता । तब कई कई सिगरेट फूंक डालने पर भी वह रेखा के समझने के सवाल को हल नहीं कर पाता। विचार अधिकाधिक धेर लेते । उस ऊपर उठते हुये धुएँ के गोलों में सप सब कुछ खोता सा लगता उसे। तीन साल हो गये। इस बीच रेखा ने भाकर निमन को गृहस्थी सचमुच समाल स्वी थी। नारी रेखा पुरुप निर्मज के निकट मन सौंप चुकी थी और पाया था एक अपनत्व, थोड़ा सा स्नेह और जिज्ञासा-मात्र कर लेने योग्य सुख । निमल मय डाक्टर हो गया था। अस्पताल की भीड़ में दिन बीत जाता । रात में रेशा गम्भीर भाव से मिलती, उजहनों से मन भर देती, काती-"जल्दी मा माया कीजिये, मुझे डर लगता है कितनी अंधेरी रातें है!" और सब निर्मल उस निकट बेटी रेखा को थपथपा कर समझाता और अपनी सफाई पेश कर लेने के बाद कही कुछ इलका हो पाता। रेश्मा चुप हो जासी । पाहती ऐसे हा या चुप रहे। एक दिन शाम को एक केस पाया। ऑपरेशन थियेटर में मेज पर बेटी हुई थी एक नारी । मुंह बिमल पोला हो गया था। जैसे शोर का धुंद पद खून निकाल खिया हो किसी ने पीछे पता चला, दो दिन हुये हैं एडया हुये। निर्मन ने भागे पद कर्तव्य निभा, स्टेपसकोप उसकी छाती पर रख दिया । भारी धड़कन थी। मन भर माया था उसका। तब बेटी नारी बड़ी निस्सहाय बगी। निमन ने सोचा, कितनी विचराता लेकर भारी भाती है। और क्या कृते बिल्लियों की भांति हो इनका जीवन घुट घुट कर समाह होने के लिये है ? मानव की सम देन ने पेदना का प्रकार निर्मज के मन में फैला दिया था। वह भव पैलता साखा, मानो निम के सारे शरीर में यह पैन कर उसके प्राय ले लेगा। स्टेयसीप के स्पर्श से कर मार सोनी । इन सफेद मसिपल सुमाती हुई माखों के मध्य उसे जैसे रेवा दिखाई पड़ी। और, रेरा भी हो जाती है, ठीक इसी तरह । सब तब ! मैले विवश हरे ना मान । ही रहना चाहती हों। वाया सम्पन्धियों ने सयेरे से मोख बन्द है। सारा' बाम भगृत प्यास रेखा हिरो पिरती है, उसे निरस पापा निभाने में माया । रेखाधि पाएर गया ! म गुणा भीमा की बस बहिन । तरती में रख कर मिटाई भाई भी मारले निर्म मेममरने दिया। पुराने मिटाई को सरसी मेज पर समकाने हुा- वो भूब गई थी। परकीये, रेसा मे पार दिखा दामार कीजियेगा।" निमरसाधगया। इस बीस साल का युवती पुला कोवा के समान माती! पातलिमिया या माना मर जानती Rina ने का मन हा भाषा उसके। मिमि सागाचोर दिखता पुकाय मागत हर पोrmसे। तिनी बारापा। और या वाहिया विवाह प्रपम ही परवार मामका अपने पास रमतो । वामीको मरने को साक, महामो से निश्चित होइटी। पिरमा दुये निर्मको पूर कर उसने कहा-ये, सामाजि" निर्म सुरमाप टप । शिष्टाचार के मासे पोहा-"इसकीया मारपस्ता पी" पास पपी कोसी-"ममी नहीं, अपने हो जाइयेगा, तप!" "चोर पाप' निर्मशमे मिठाई बा कर मुंर में पी। हमी पुष्पा पोखीर मही पूजा अापने।" निर्मन को अपनी भूष की पार पाई, मोजा--"मालूम था, भाप न खायगी "तूबा ज्योतिएर पीसन इसते है। तो रेषा गारे जीवन से परिचित होंगे भाप !" विर मिठाई का क मा हटा कर मुंह में डालतो, यह बोली-"एक बात तो माननी पड़ेगी भार" 'कौन-सी ।" "मोह। भाप जैसे जानते इस मही" का सही हो गई थी। घोरे से सकर कहा--"हम लोग बरा घोडे भापको इश दे नहीं पायेंगे, फिर भी जी ratio " निमल सुप पहा । पुष्पा कासी ही रही-सा को तो जानते ही है भा!" सकर पुमा अन्दर भाग गई।
प्रकाश की खोज और बाहर का घना अन्धकार विजली को हलको यत्तियों के नीचे या प्रकारा जैसे कह रहा था-मैं-मुझे लो। मैं तो तुम्हारे ही अन्दर हूँ।' ऊर कर निमज ने खिड़की खोल दी। खूप-खूब बुजार चढ़ पाया था उसे। भारी प्यास लगी थी, नाचे उतर कर, मन मर कर ठएडा पानी पी लिया था उसने । तमी हवा के एक झोंके से कमरे में जलता दीपक युझ गया । गहरा अंधेरा पैल गया था वहाँ। और निर्मल की घाखों में यह अंधेरा था, जिसमें दो नारियों का स्ने अपना मृत शरीर गाद गया था। रेखा जैसे प्रोखों में प्राई हो, और वह केस । निमल ने पुकारा-"रेखा" ध्यान टकरा कर लौट आई। जैसे वह पागल हो, चारपाई से उठा, बाहर के अन्धकार का जैसे वह पता वगा लेगा भात । आखिर क्यों यह अंधेरा मन को घेरे है और मौत १ मौत क्या है? क्या अंधेरा ही सो मौत यन कर नहीं पाता? निर्मल दरवाजा खोल कर बाहर सड़क पर आ गया या। जो प्रकास उसके मन से रेखा छोन ले गई थी, उसे खोजने बह दीदा चला जा रहा था। पानी बरसने बरसने को था। यादल खूब घिर आये थे। घना अंधेरा छा गया था-ठीक वैसा ही, जैसा निमल के मन में था। उस सघन और गहन बदती हुई अंधियारी में निमल जिन्दगी का प्रकाश खोजने निकल पड़ा । कौन जाने, उस प्रकाश की खोज उसने कर ली है अब तक अथवा नहीं।
इलाम "alaन मिस्र निर्मड, शाम से हा योजना बन्द है। रिवरियम' हो गया है। इजेशन दे दिया है। गये । हामीभिगा। मैं सपेरे पाउँगा । प्राया, ममरते !" कह कर आप एक पोरा गया। निमम का USE हा या, जैसे घर मालिी मार पाकर मर को मायगा। कमरे के बीच एक साल पलग पर रेक्षा घेटी थी। जिसके उमगुम प्रकाश में उसका शरीर बड़ा सुम्मर घमा इसे पर अभी भी पुरचार सोई से। देख कर निमन का सारा शरीर कापगया। मा ने बताया था-"चार दिन पहले तक डोकयो। रात पेट में जोर का ६६ दुमा और सयरे घड़का पैदा हुई " निर्मन सहा AC HIT मा काक्षि एकर धम् से पैड गया। रेसा का स्नेह भावों से पार पाने गाया। अपने पर एक शोध भाया उमे। भातिर ४सी मे तारेखा को मारने के लिये फासी तयार की थी। निमन्त्र में मार पहली बार मनुभव किया था कि रेखा का धमाध पर RR सकेगा। पहुन रात सक निर्मन की हिचकिया पक्षती रही और रेखाकी दाखलराम होती गई। सयेरे दादर ने भाकर दवा सिकाइव' की। निमक 'साइनोसिस' में योग रिया। दोपहर हालत निगमोगा। पार-चार गरी आता था, मुंह एकदम पन्द हो गया और एक पफुट, किन्तु गोर का स्पर चालू हो गया था। लिख दोबर वाटर को लाने गया। बीटा तो घर में कदम सुनाई पड़ा। कहीं कुछ प न था, जैसे कोई पनी अपने पिंजदे को तोड़ कर डर गया हो। निर्मल पार का दरवाजा पार कर वहीं पैठ गया। बदर भादमियों की भोप बढ़ रही थी। सर्वनाश हो चुका था। भय पद अन्धकार निमन के मन में पैधता-सा लगा। उसके बीच रेखा का असहाय शरीर प्रम भी वैसा ही लेटा दिखाई पद रहा था~मारो भ्रम निमल को घेर था । प्रसिपल पर अघहार गादा हो होता जा रहा था। वान दिन हुये हैं, यह हार से बीटा है। कहा कुछ बकापन मही है, जो मन बेटा ले निकट रेसा को बाद मर शेष है-रोगहरी । एक धुंधला या को ता भरे नीले प्रकाश के नीचे सडेर 'प्रझनुपर' में टसन निकट की दीप मालिकाओं की अगमगाहट में क-कल करती मा गगा की तरल धार में रेखा के भारीर को भस्थियों प्रवाहित की और पहली ही ट्रेन स छाद दिया यह मगर। जीवम अंधेरा छा गया। रेखा ने अपना प्रकाश समट लिया था।
प्रकाश की खोज
२६
-
और बाहर का घना अधिकार विजली को इबको यत्तियों के नीचे वह प्रकाश
जैसे कह रहा था-'मैं-मुझे लो। मैं सो तुम्हारे ही अन्दर हूँ।' ऊर का निमन ने
खिड़की खोल दी। खूप-खूब बुखार चढ़ पाया था उसे । मारी प्यास लगी पो, नाचे
उतर कर, मम मर कर ठयहा पानी पा जिया था उसने ।
तमी हवा के एक मोंके से कमरे में जबता दीपक बुझ गया।
गहरा अंधेरा फैल गया था यहाँ ।
और निमन की बातों में वह अंधेरा था, जिसमें दो नारियों का स्नेह पना
मृत शरीर गाद गया था।
रेखा जैसे प्रोखों में पाई हो, और यह केस !
निर्मल ने पुकारा-"रेखा ।"
ध्वनि टकरा कर लौट थाई।
जैसे यह पागल हो, चारपाई से उठा, थाहर के अन्धकार का जैसे यह पता
लगा लेगा धाम । आखिर क्यों यह अंधेरा मन को घेर है। और मौत मौत क्या
है? क्या अंधेरा ही सो मौत बन कर नहीं पाता।
निर्मल दरवाजा खोल कर बाहर सड़क पर पा गया था। जो प्रकार उसके मन
से रेखा छीन जे गई थी, उसे खोजने यह दौडाचला जा रहा था । पानी यरसने-बरसने
को था । बादल खूब घिर आये थे। घना अंधेरा छा गया था-ठीक वैसा ही, जैसा
निर्मल के मन में था। उस सघन और गइन पढ़ती हुई अंधियारी में निमल जिन्दगी
का प्रकाश खोजने निकल पड़ा । कौन जाने, उस प्रकाश की खोज उसने कर ली है
अब तक अथवा नहीं।
विवाह का संदेशा विमता मरन में गायन में TMIT का भौति पाई। शहर में नरेन्द्र के चाचा रहते हैं। उन्ही के घर पर ह, उसने यूनीवगिग का गिरियो बा है । पदाम का स्त्रियों क दिन उसके यहाँ प्राई। उहा में विमशा मी थी। तमाम जाने क्यों अनभाने नरन्द्र का विमला यहुत पला। गोत्र नपने वाकियों को देना था, किन्तु विमला की मग मागे ने उसे विचित्र हो मुख चौर सताप दिया। और एक दिन न यिमना के पिता ने नरेद्र के चाचा सविमक्षा को पक पर पकाइने के लिये नरेन्द्र को कहा, सो नरेद्र का पारयय नहीं हुमा । पहले ही दिन विमला इसे विचित्र लगी। इतना पार पटु और पुराबरको तो उसने जान में नहीं देखा। यकेला मातान हाने के कारण विमा पद मालह साल में ही पूर्ण युक्ता लगने लगी था। विमला के रिता शहर के प्रमुख पाहीजी में था नरेन्द्र पर शुरू से ही उनकी श्रद्धा थी। उस दिन विमला ने कृप पका नहीं। अनेक प्रश्न पूछे गये-~-मार साक्ष्य का षया नाम है, घर कहा है कितनी पहिने और माह है, मासर साहब ने पी० ए० में श्या ले रक्सा था? नरे द इसका क्या उत्तर दे । मागिर इतने सारे प्रश्नों का उत्सादे मा तो कैसे ? जिज्ञासा का दम भाभी के सामने, जिसमें विमला दी जा रही थी, नरेन्द्र थका सा रह गया फिर बोला-"पाप पदें भी " वानाम तो पापको बताना हा पड़ेगा।" नरद कट गया। अधिकार की गतिमान सह में विमला एक पायक गृगी के समान घाना घर पनाता सी लगी। नरेद के मन में एक तूफान उठ रहा था। वह विमासे झगड़ा कैसे मानले ? समानौर ने पाकर कहा- मालो बुनाती है।" विमला अदर गइ और फिर 1 भाई । उस दिन को पदाइ वहीं रुक गई। घर भाकर नरेद्र ने अपने प्रदर एक अनोसा घेना और चातुरता का अनुभव किया । रह रह कर विमला को काता मक, भावनाएण प्रोवे नोद के सामने नाधने . 1 १० विवाह का संदेशा लगती । नरन्द्र सोचना, विमला कितनी सुशीख है। कोई भी तो उससे प्रथम पार ही मित कर सका हो सकता है। कितनी पार नीचे बैरी विमला ने उसे श्नखियों से देखा किन्तु जी भर हंस योगा कहाँ पाई यह ! पिर दूसरे ही पण नरेन्द्र को अपनी स्थिति का ज्ञान हुधा । मन में समाई विमला को वह कैसे निकाल वह विमला, जो केरल पहले ही दिन उसकी नस नस में समा कर रक का सचालन करने लगी मो, उसे एकाएक दूर भगाने का नरेन्द्र में साहम नहीं था। पी देर तक अपने पर विमला के अधिकार की यात को हटाता रहा यह । सोचता, व्यर्थ नया रिश्ता यह क्यों जोडे । जिन्दगी में किसी की याद रखना हा तो दुख को याचना है। अपने ही धनाये हुये माया जाल में नरेन्द्र मा रहा। यहाँ तक कि उसे पता ही नहीं चला कि रामदास कर चाय का कप मेज पर रख गया। पादा देर में ग्रामदाम पिर थाया। मालिक को उसी प्रकार बैठा देख कर उसका जी भर गया। निकट श्रा मोला-"धापने चाय भी नहीं पी" "नहीं, रामदास पुछ सोचता था । पाद ही नहीं रही। दूसरा कप ले थायो!" जब रामदास चला गया, तो नरेद्र ने दिन पहबाने के लिये एक मोटी-मी किताब निकाली। किन्तु मन न लगने के कारण बन्द कर उसे एक तरफ रख दिया। चाय पीकर बाहर निकला कि सुधा पाधी ने सुनाया, खाना तैयार है, खाकर कहीं नरेन्द्र खाने बैठ गया। सुधा ने थाली सामने रखते हुये कहा-"माज तो तू बाहर ही नहीं निकला। मैं कहता हूँ, इमका जब इम्तहान सिर पर श्रा जाता है, तो खाने पीने का भी निक जाता रहती है। नर द चाची की इस नस्युक्ति पर हँस पड़ा। निकट बैठी हुई शान्ति ने शोर मचाया-"दाल में Tमक अधिक है, तरकारी में भी मिच ज्यादा है" सुधा ने जिनासा-भरी दृष्टि नरेन्द्र पर डाली। किन्तु यह चुपचाप, सिर नीचा किये साता ही रहा। विमला की कल्पना ने उसे इतने ऊँचे उठा कर रख दिया था कि नमक और मिर्च ज़्यादा होने की उस याद ही नहीं थी। शान्ति की चीख पुकार सेक कर बोला-'हो! ज्यादा तो है।" सुध खिलखिला कर हंस पड़ी, फिर यौली--"अभी क्या । पाने दो जरा सुधा ने दाल में धम्मच डालते हुये फिर कहा-"सभा को साधा स्वामी योदे ही मिलता है। इसके लिये भी बड़ी तपस्या करनी पड़ती है।" जाय। पहूरानी को!"
- नरेन्द्र के मुंह पर स्वामाविक बमा का बाली दौड़ गई, हंस कर योना- "नहीं, चाची। पाम क्लास में मार्स की 'योरी' बताई गई था, उसी को बैश देय सुधा चाची चुप हो गई। अपनी हालता पकड़े जाने पर बैस विधायों को दुख और साताप होता है, वैसा हो मरेन्द्र ने मा अनुभव किया । बाना स्नाकर ठठा, कपड़े पहिन बाहर निकला, फिर सोचा, विमला के यहाँ ही धजा जाय । विमला दरवाजे पर ही मिला। दोनों हाय ठा कर नमस्ते का, पितहस कर बोली-"अाज आपने बहुत देर का?" नरेन्द्र क्या उत्तर दे चाहा, कह दे कि विमना, खाने में जरा दर हो गई । कल से और मा पहले या जाया करेगा। किन्तु नि शम्द चुप ही रहा। विमला नरेन्द्र को कोर अन्दर भाग गई। नरेन्द्र के मन माय पर इलको प्रगति- बाल यौवन का चचलता से मरा विमला की पुतकित मुस्कान और स्नेह स्निग्ध चविं मन की अत्यन्त मातुर बहर के समान फैल गई। माधुरा की इस सरल-स्नेहसिक धारा में नरेन्द्र का भानुक मन बह गया। नरेन ने सोधा-कितनो सुपर है विमजा! एक मुमन के समान उसका यह निसिख सोदय, ससे क्या पता, कितने प्रमरों को पागल बना सकता है! बिमला की विचार धारा बहुत देर तक नरेन्द्र को जमाये रहो। सामने बिखरी पुस्तकों पर टि गई। नरेन्द्र ने एक पुस्तक ठा कर देवा, पहले हो पृष्ठ पर महीन मुन्दर प्रवरी में लिखा था---'कुमारा विमला' मरेद्र सिहर उठा, पाखे र पुस्तक रख दी। फिर एक सिगरेट जला कर उसका पुस मा शुमा कपर साइते हुये यह सोचने लगा-काश, विममा को वह इससे भी निरसे दस पाता ऊरकर नरद ने सिगरेट पुमा दिया। सभी सामने से विमजा अपने छोटे भताजे वियन के साथ माती दोस पड़ी। विरान ने भावे ही नमस्त की। सिसदे-सदेही हसकर योना-"मास्टर साहय कामापके चझे जाने के पारस !" 'विरान!" विमला में बात काटा। विरान ने उस प्रकार हँस कर कहा- नही, में सो रहूँगा-हा, सो !" माविमना मे परन्तु विरान मे उसी प्रकार अपनी बाय नि हयद कर दिया। मेरा मोबा विराम, स्तिनामा बोली- , ३ विवाह का सीया । स्नेह के अतुल माद से भरे इस माहे को देख कर नरेन्द्र पारि योजा-"विमला, अपना पाठ याद करो" विमक्षा को पालती मालुम हुई । एक अपराधी को मोति मुंह पर लिया। चुपचाप भरना जगह या घर : गई। तब नरेन्द्र ने ग्वा बस से बिना का चेहरा लाल होता हुआ पाया था। मुंह सुनते ही विशन ने हंप कर उसी प्रकार कहा-"दिन भर आपका नाम लता रही। कहता था कि मुझे तो मार साहम यहुत अग्छे लगते हैं। कितने सुशील और हंसमुख हैं। शा करता है कि "विशम तू !" और फिर कुछ न का, विमला हप कर अन्दर माग गई थी। विशन को पकाएक अपनी भूल की याद थाई। हाय, उसने या कर दिया ! इतना यही यात विमला दादी के लिये वह कह गया था। सदर ही अन्दर विशन दुख से गल गया । वह भुरा हो गया। नरेन्द्र ने कमरे के चारों धार रष्टि दाना। अखि एक पड़े से फोटो पर जा कर टिक गई । यह फोटो विमबा का था। नरेन्द्र ने इस बिखरा हु ऐसी दय-राशि के अन्दर विमला का छोरा सा तड्पता हुमा मन पाया-यह मन जिसकी अभ्यर्थना करने के बाद भी उसे सन्तोष महा हुआ था। यही देर तक चिन का विमला के सौ दय को नरेन्द्र निरखता, एक असाम सुख का अनुभव करता रहा। फिर एकाएक विशन को याद कर बोला-'तो मेरा नाम लेती रही ?" विशन केवल हैस भर दिया। फिर किताब बन्द कर योजा-"प नहीं घना ऊँगा। चिला दीदी मारा होती है।" नरेन्द्र ठहाका मार का हंस पड़ा। विमला पिर नहीं पाई। और एक दिन खाना खाका उठा, तो रामदास ने एक चिट्ठी बारदा। नरेन्द्र ने लिखावर पहिचानी । एक विचित्र सुख से वह भर गया, लिखा या विमला ने- "इस दिन विशन की बातों से क्या बार सवमुख नाराज हो गये। मैं अनो असावधानी के लिये समा चाहता हूँ। तान घार दिनों से प्राप भाये नहा ! मुझे न जाने क्यों कुछ अच्छा नहीं लगता है। मारा दिन पापका याद धाया करता है। शका होता है, कही थाप बीमार न हो गये हो।माशा है, मार स्वाध होंगे। यदि हो सके तो श्राज र भाइये।" 'और विमला ने सब हो तो लिखा था-साचा नोदने-'कहाँ पाँव रोग से विमला के घर वकील साहब के पूछने पर भो तो उसने खाम ही कह दिया था कि पुही महीं मिशी, वर जाऊँगा। कमीज पहन कर ar पाहर निकया कि प्रधााक पिरान मे नमस्ते की। पिर बोया-विमना दादी ने भापको पुसाया है।" "मुझे?" 'तीन दिनों से विमया दीदी ने खाना नहीं खाया है। मालूम है प्रापको?" नरेद्र एक अपराधी को मांति चुपचाप सदारहा। विशन ने फिर कहा- "मास्टर सादव, भापको त भी महीं पता कि रिमा विना " "दिशन " मरेन ने पुष जोर से कहा। "यापने विमक्षा दीदी का मन वयाँ दुखाया-योखिये " नरेन्द्र भागेपुरा न सका। पदर भाग गया। भूते पहिन कर बाहर पाकर पोखा--"वख, विशम, चलें । सुम्हारे घर चलता हूँ।" विशा धुपचाप मन्त्रमुग्ध-सा सागको लिया। घर पहुँच कर नोह ने देखा विमा पहले से ही अपने कमरे में किताबें गोले हुये बैठी था। गरेट को घाते देख कर उसने ममले की। विरान ने दीडर कहा-"देखो, में लाया हूँ मास्टर साहब को मुला कर । मुमो मिठाई खिलायो।" विमनाने डॉट बताई, सो नरे ने हंसकर कहा-"मई, मिठाई सी में भी विमला खाज से गड़ गई। विमला की टोसे रिशत धुपचाप अन्दर भाग गया। नरेंद्र ने अपो अस्य व सहिद वैठी, किताबों से सलझी हुई विमना को देखा और देखा उस रूप पुक्ष शदर उठती हुई महान अभिवापा को जो पेन के समान पाई थी। रेब ने अनुभव किया, विमला इन तीन दिनों में ही बहुत उदाम हो गई है। भाख ससकी मौतर धंस गई है और मुख पर एक स्नान, भनिहिन हसी को रेखा खिच गई है। अपने इस अनुभव से नरेन्द्र को दुख हुधा । यह एक माइत पहा की माति बोला--'विमना !" साऊँगा" । "क्या मुझे उमा न करोगी?" विमला पुस्तक की काली-काची अकीरों से ही सखमी रही। केवल उसकी बड़ी बदी, नीचे झुकी हुई घाँखे भीग गई । नरेन्द्र ने निकट पाकर कहा-"मुझे माल विवाह का संदेशा । " "आपको" श्रम विमला ने अपनी प्रोपे उठाई । कनखियों से मरेन्द्र को देखा। नरेन्द्र ने उन फार मूल श्री में अभिलाषा का यह रूप देसा, जिसे देख कर यह कॉप सठा। पिर बोला--"मुझे नहीं मालूम था कि तुम मुझे इतना विमला ने अय बात काटना ज़ली सममा, उत्तर दिया--"यापको क्या, माप भी यदि पुरुष न हो कर मेरा हो भाँति श्री हुये होते, तो जानते !" नरेन्द्र पर एक अनोसा नशा का रहा था। विधिनसिहरन चपने अन्दर घह अनुभव कर रहा था। नीय पठी शिमला ने मन का एक छाग कोना अपने से क लिया था। रस एकात निर्जन, कमरे के पाच बैठे हुये नरे द ने विमला को देखा, विमला ने चासे गोची कर की नरहने नीचे थैठा विमला का हाथ अपने हाथ में ले लिया। धन का रक्त दोों के शरीर में पौड़ने लगा। विमला निश्चय निव, स्वप्न में बोइ-सा, प्रतिमा सी, थैठी रही। विमला की पतली गोरी-गोरी गुलियों को छूता हुमा नरैन बोला-'क्या सच, मुझे मा न मिलेगी?" रिमझा हस पड़ी। उसकी छा थी कि वह इसी प्रकार बाते करता रहे। इस यातों की कमी मत न हो । किसाहीन काहनत, विमला के अलसाय, यौवन मार से बोमित शर को खींच कर नरेन्द्र ने अपने याहुपाश में कस लिया। इसी समय माँ ने अन्दर से पुकारा--"विमबा" विमला दौड़ कर माँ के पास भाग गई। इस घटना के पश्चात् नरेन्द्र विमला के अभ्यधिक निकट या गया। विमला सोचती-'नरेन्द्र कितना सरल और मायुक है। यातयात के सिलसिले में कितनी बार उसने अपनरव की धाया विशेरी है। नरेन्द्र सोचता-काश, जिन्दगी का प्रभात उसी की सह धारा में मह पाता। अपनी इस सुपर कपना में उसे विचित्र सुख मिलता। मा के दिन थे। नरेन्द्र देर से विमला के घर पाया। बाहर का कमरा खाली या। विमना किसी कायवश भीतर गई थी। किताये इधर उधर बिखरा दी थी। मरे सीधे विमक्षा के परे से फोटो के निकट पहुँचा । पड़ी देर तक चित्र में बिखरी हुई रूप-सुधा को निरसवा रहा। जैसे तस्वीर समुध सजीव रही हो। नरेद्र मावनाओं - में दरगा। मन मा का विमा को प्रणाम दिया जायेगा सेवाण-"वम! तुम्हें वा पता ।' तभी एक विविधारिस भरमगाम गा रिमा पुरासो का सहारा बिये दीनvar उसे मारे। मन बनाया। विमला ने पार से मुस्करा कर मार भाषा में --*AN NS नीचा, माम सार" मान्द्र नियोक मूक माय विमूगा प्रदाता विमाने माग यार, शिखास मरद ममाप पर कहा--"माण साहस' रिवर का भार ERON-मारास होना मरम्म म गरदन रिमा र सादिया- 'हा। Atar ने एक मानका भात भान मीन पर गुमीरा--"!" समा विमला पिर मरन मोरा-जामत है, पर कहाँ रहती है।" भोग्न पुरा पद मे पास जी हपता हुई शिमला अप भाग वा का शुर शारे दुये नरेन्द्र काप कर कार-बाइय, मैं यना, यह देवाना कहा रहता है। और विमला म मरेन के दश्य को अंगुला से एकर कहा-"प समझे चार" मरे दाखिला कर हंस पड़ा। विममा एक सोफे पर चा का गई । मन उसका एक अनूठे ग्रामद से मर पापा । फिर वही मेष कर बोला-'एक थात पूएँ मार साहय!' मरेन्द्र में सिर हिला कर असे हामी भरी। 'तो मताइये, प्रेम क्या है ?" मरेन अपने में पाया । यह कैसे समझाये क्या कडे विमा सजिस आसाम यम मानाय प्रेम की कोई परिमापा , उसे यह कैसे प्रकट करे किस भी शिमला को तो उत्ता देना ही है। पह अरमी पराजय माने वैसे ! इसीलिये बोला एक जिया का माति--'स्तिा सो गई ह। एक-दो दिन में देख कर पताऊंगा।' विमला मिलविज्ञा पर हंस पड़ी। फिर अत्यत स्नेह मा विमला निकट था कर यह बाजा-"विमला रानी! जानता हो, प्रेम क्या है। विमला ने नाये वाकये हुये धीरे से कहा--"नहीं !' नरदन विमजा का हाथ अपने हाय में ले लिया। निश्चेष्ट, नि पर बनी ही x विवाह का संदेशा वह, जैसे किसी ने म प्रमुग्ध कर दिया हो। श्रावेश की तरल धार में नरेंद्र यह गया। उसके बालों को धार धारे सहलाते हुये बोला-"भय भी नहीं समझी विमला, कि प्रम क्या है" विमला ने अखि ऊपर की। नरेद्र की मदभरी अखिों से उसकी प्रति टकराई। स्वम विस्मृत ती वा मुस्करा दी। X और एक दिन नरेन्द्र ने सुना कि विमला की नानी बीमार है, सब लोग गाय जा रहा है। उस रात यह नींद करोन पाया। हह कर विमला की याद आती रही। सुबह से ही हाथ मुंह धो, कपडे बदल वह विमला के घर पहुँ।। देखा, मकान खाली पड़ा है। नौकर ने बताया, अमी सव साग स्टशन गये हैं। नरेद्र ने घड़ी दखी, ५ बज कर दस मिनट हो चुके थे, और साहेब पर ही तोटून जाती है।गा घर नाइ शीघ्रता से स्टेशन की थोर पदा। मार्ग भर वह अनमनासा पैठा विमला के विषय में न जाने क्या-क्या सोचता रहा। बीच में रेल के फाटक पर टाँगा रक गया । फाटकवाले ने बताया, गादी पा रही है। नरेन्द्र ने धनी देखी, छ बज कर पैतार हो चुके थे। एक भारी निदा से धौंका नरे द । और तमी समुच ट्रेन भा गई । नरेन्द्र का हृदय धड़कने लगा। यह तागे पर खदा हो कर दखने लगा। माद के याच उसने देखा-इन्टर-बनास के एक दिधे का खिदकी मे दो हाथ अचानक ऊपर उठ कर उसे नमस्ते कर रहये। नरे पर जैसे बिजली गिरी। वह चिल्ला उठा-"गा खौटायो" तोगावाला चकराया बोला-स्टेशन न चलेंगे सरकार ?" "नहीं।" विवश होनेवाले ने रांगा वापस किया, और उसी दिन नरेद्र ने चाना का पा घर छोड़ दिया। मरेन्द्र ने शहर के बाहर रहने के लिये जय मकान लिया, तो उसके मिनों को बदा भाश्चर्य हुआ। समा से साइटियों में पसी की मोति चाहनवाले नर को साधुनों जैसा जीवन यापन करते दस, पहले तो उनकी मम में ही न पाया विस्तु बाद में नर की पीड़ा प्या शिजली के १ वल प्रकाश की माति समीप बिखर गई। रिले सान दिनों से विमला की याद को वह किसी भी प्रकार भुल नही पाया । न जान क्यों वह सुर विमान के जीवन में फिर एक बार पता की माँति पहचहा उठी।
१८
इलाज
भरे सवेरे जा देर से उठा। हाथ मुंह धो कर अब बैग, तो रामदास ने कहा,
"पाय खाऊँ, वायू जी!"
नरेद्र थामने स्वर में कहा-“जे पायो।"
सभी रामदास 1 पाकर एक हिला दिया। नरेन ने जिवार पहिचानी,
विमला का लिपि थी। फादर पर रिकामा एक दार्थ निवास के साथ पाएर
कर पर गिर पड़ा। नरेन्द्र गिरते गिरते बचा।
नीचे यदा देर तक पर पड़ा रहा।
काम काज पर सुगहरे अक्षरों में लिखी हुई पतिया सूर्य के प्रकाश में और
भी चमक रही थी। नरेन्द्र वड़ा देर तक दावार से पीठ टिकाये सिगरर पीमा रहा।
फिर एकाएक पश पर पड़े हुये पर को उठा कर बड़े दुई कर डाले। यह था
विमला के विवाह का संदेशा।
पतन की ओर ज्पेषु साप्य को तरता हुई दुपहरिया में भी उपकी पाज्ञा यामों में शीतलता और सतुष्टता की छाया सी नाच उरती। किसी अज्ञात वेदना से उसके जाच अधर सुरमा जाते। सिर पर एक छोटी सी पीतल की कलसी और हाथ में लोटा ले का सपतिया अपने में एक नया नाकर्षण अनुभव करती। खेता का सभी भेडों पर अपनी मैना धावी आँचल से रोटियों को ढंके हुये जद बीनू के पास अपनी छलकत्ती हुई पाखें ले कर जाशी, उस समय सारे ससार का उन्मादसा उसे अपनी उस धनी मुद्रा में सामित सा मालूम होता । सम्पतिया सब कुछ समझ कर भी नासमझ बनी रहती। उसका घर या-दो कमरे पटे हुये, एक छोटी सीकड़िया, द्वार पर एक छपर। यह उहें देख कर सोचती-'सघ । हमारे पाम सब कुछ है, खेत है बैज्ञ हैं फिर ये भी तो मुझे प्यार करते हैं। मुझे और पाहिये दो क्या । शहरों में क्या रखा है। उसकी अभिशापा जाप्रत हो उठती । पीनू उससे हसता बोलता और पास में उसकी फरी हुई धोती की ओर सकेन कर कहता--"अरी देख न | शहरों को खियाँ कभी इन्हें दूनी तक नहीं। अय की जब कमो 'पैठ' जाऊँगा, तो तेर लिये एक थम्धी सो धोती लाऊँगा । समझी,हो !" और सम्मतिया शरमा-सी जाती, और फिर धीरे से कहनी--"हो। तुम्हें दिन भर यहा सम्झता है। मुझे इसी में सुख है। शहरों की औरतें सुनती हूँ, वही धरिग्रहीन होती हैं, फिर भला मुम्ही यडायो उन्हीं के से पस्न मुझे गा पा माप्रोगे?" यौर पौनू तिक ! तिक" फर हल घजाने लगता । चार के गांव से देहला शहर थोड़ो दूर था। महीने में एक दो चार वह याने खलिहान को साफ कर नाज बे याजार में बचने जाया करता था। वही पुरानो आमा मरिगद के मामने भरना देर लगाये हुये वीनू बैठा वैशा साचता-यह विशजी का मन प्रधाश, यदि सागविषा एक बार मो देव ले, गो मिो सेज को द्विरिश से काम लेना ३" सा हादूर तक फैली सरकों को देख कर उसका हर इलाज हुधा था। रो परता। जाप नी गृहों के समान घाटे टे बच्चे गादियों में बैठे हल रहे हैं। मोटरों की भी भी, साइकिलों को न ! सब का सघाबोन धहो रहने पर तुला उस दिन अाकाश म भाग सी लग गई थी। उसकी बालास प्राणि मात्र प्याख हो इधर उधर भाग रहे थे। लू सर्राटे ले रही थी। मालो तक किसी छायादार वृक्ष का पता न था । सम्पतिया अपने धगा में खुमारी लिय हुये वहा पीतल की छोटी सी कलसा के साथ मेड़ों पर बढ़ी चली ला रहा था। "माँगी, महँगी सखी । मरूंगी मरूँगा !" कोई गा रहा था। रात्रि के तिम पहर का भात शात वह स्वर उसके कानों को मुभा रहा था कि-'सम्मतिया ! मैं सुम्हारा हूँ, और तुम मेरी । देखो मुझे रष्ट न करना, मेरा प्रसता तुम्हारी प्रसता में ही तो है, समझी और सम्प तिया का टरसुक थासे, बैलों की जोड़ियों का चलते हुये देख रही थी। चीन कुछ गुनगुमाता हुया हल चला रहा था। उसके मस्तक पर पसान की दों को देखकर वह एक बार सोच में पड़ गई- यदि नौकरा कही मिल जाय, तो हमसे लाय भरहा है । मगर करेंगे कहाँ ? हल रुक गया, पोन उसकी धोती से रोटी खोल मड़ पर बैठ कर खाने लगा। वह सोच रहा था-'इसमें हानि का क्या है । सब खियाँ तो चरित्रहीन होती नहीं है, रि केवल सुदर-मु दर वस्त्रों को ही पहन कर कोई अपने चरित्र को नष्ट नहीं करता। जय इसकी छोटी-छोटी पतली कलाइयाँ, शहरों की रयड़ की चूदियों से ढंक जायेंगी, उस समय वह कितना मजी, अनू, सरस लगेगी।" विचार धारा बह रही पा-! तो हमे रामी कैसे करूँगा ? यही तो कहता हूँ, बिना पढ़ी लिसा औरत भगवान् फिसो को भा न पति को चुपचाप देख कर सम्पतिया योलो-"अाज क्या देख रहे हो, क्या मेहनत अधिक करनी पड़ी " चीन की वासों में इसका भविष्य हंस गया, योला-"मुम्हें क्या! सुम तो ar पर बैठी रहती हो, अगर कहीं इतना काम करना पड़, सो सर मालूम हो आय । भी मुखिया माया था बगान के लिये कहा था।" “पिर क्या सोचा है?" सम्पतिया ने एक करणा मरी पाहींची। 'सोसा क्या है यदि शहर में होता तो मजदूरी ही करके कुछ रपयों का प्रयध पर खेता।" धीनू गये सिर दिये हुये हा बोला। सो क्या हुमा, कोन नौ सौ मनाही कौन करता है। अगले हलते ही में सबसक कर लना।"
पवन को प्रोर समझे - सम्पतिया की ग्यग्यपूष मुस्कान चीन के हृदय में घस गइ। उसने लापरवाही से कहा-"तो शहर में जा कर करना पड़गा।" "शहर में ही सही, सम शाम को वापस धा जाया करना, मैं यही रहूँगी धीन को क्या जो चाहता था वही मिला, दोखा--"धरी पगली' मूने अभी शहर देखा ही कहा वहाँ चमाचम बिजली की रोशनी होती है। सुनता हूँ, चीलगादिया प्राकारा में टदती है। घरी, क्या बताऊँ यदि एक बार भी न बहा हो भावे, तो यही रहन का नाम ही न ले।" "रहने मी दो। नुम्हें अगर किसी की तारीफ करने को लगा दिया जाय, तो इस "सपतिया ने अपना मुख पति की घोर से हरा लिया। "तरी । इसमें तारीक ही काहे की। अगर मन न मानो, तो धनानाजी अपने पर पापस या जायेगे। अभी कल ही तो बलदेव वहाँ से लौट कर आया है। कहता था, तस्वीरें नाचती और गाती हैं, और हा! तुम्हें मा मांग का सिंदूर ला दूंगा, समी!" स पविया के खिले हुये गालों पर लचा की लालिमा दौड़ गई। उसने सिर नीचे. करके कहा-"मरे लिये सिंदूर लेकर क्या करोगे। अपने लिये यूर ले लेना।" और पान हल चला रहा था। सम्पतिया सेन पर से चली आई। शहरों की तड़क भड़क और नौकरी कोइया ने उसके हृदय में उत्सुकता भर दी। समस्त दिन वह अपने पड़ोसियों से शहरों की विचित्रता के सम्बन्ध में बात मान करती रही। शाम होते ही उसने खाना बना लिया। फिर वीन द्वारा मेले से खाई हुइहरी धोती पहन कर पति का प्रतीश करने लगी। धान उसने अपना पड़ोसिन से सावुन ले कर जीवन में प्रथम बार लगाया था और बार र शीत में मुंह देख का मोघा में-'मनी क्या शहर में चल कर मैं इसमे मी भधिक मुदा हो जाऊँगी। नाले प्रकाश में दीपज उठे। प्रकृति गम्भीर हो चला। सया का प्रथम चरण मारी हो गया ! सम्पतिया और भी रस्मुक हो गटक समय पर वान् माया। बाहर बैल बाध कर वह बैठक में कुछ गुनगुनाने लगा। फिर कपड़े उतार कर वह अन्दर गया। सम्मतिया घेटी सोच रही थी-'चलो, शहर में रहेंगे। धूम धाम देवेग, यहीं क्या रखा है। राधे की अम्मा मा तो शहरों में रहती है। वे चरित्रहीन दूर स स साड़ी की चमक दिखाई पडा! वोन की प्रतादिन बेला-"मो तो अब ठेके शहर की-सी औरत बन गई है' मातिया की माने गुरूगई। धीरे से घर मेणा-या रोको मौर ऐगी को मारता !' थीन हैं। कर Imatar ME पो ! पहा "कामा पाप हो है। उसमें मानी।" "तो 1 का दिन है। परिमाभी या नियमाने बुध तक पापम मा जायेंगे। कर दसरपये भारxि साकी है। रमल कर गाने पर पिप जायेंगे।" “ART TERममो वैसा कर दो!" HIR सम्पतिया मी दगा के साप मेगाना पिता थी। X x rad मात और सुमहरा रायगे मानिया राय को प्रासारित कर दिया था। परमानी र बरे हुए प्रालित मन सम्पतिवार सानु मा एक पारस घर में मैथे। पीनू मे का चेष्टा कर एक दूकार शिला RTI TA पर पामो वैधना चारता पर दूसरे ही दिन कुछ पान सिगरेट और सासमायों के पास लाकर इसम दुकान में रख दिया। पोटी होती हुई मा जादूहन परोस की दुकानों से पानी था। यह यार का रास्ता पासमत दिन मनु घशा ही करते थे। वान ने एक सहा पार एक ६निक पत्र में प्रेस में नौकरा कर बा । वोन कुछ पता था, अत घोहे ही दिनों में उसे कामामारी का काम मिल गया। काम पर पटना थी पजा सारलिया। इस दिनों तक तो यह सपाई परन्तु फिर परिस्थिति ने उसमें बज साहस और भारत का माक दिया। उसकी दान पर प्राय भवनों की भोग रहती। लोई कोई मनपनाम गुनगुनाता हुघाख कर देता- भाजपान महा खिायामा! और सतिया हम पर हाथ पदा देखा। उसकी उस अनूठी, सरम मुभाग मैं भा एक आकर्षण था। उसके महरू उमो के पास पाते थे। सम्मतिया है सता हुई सब से कहा-'हो, मार पास दिनों में प्राये" राधि हात पान काम पर स पारस पाता, दोनों में कुछ मीठा साठी बातें हाती । पिर इस नये नावन पर दीपिपा होती, और उनके नेत्रों में नदिने लगती। x पतन की प्रार १३ " घा मुदर सवेरा था। समतिया उस दिन प्रान काल से ही अपनी दूकान पर बैठा था ! निय की भाँति नवयुवकों का दल उमड़ रहा था। और वह सब को उनके इच्यानुसार पान बीड़ी दे रहा था। उसकी उनींदी पोखें उस दिन किसी को ढूँढ़ सो रही थी। वह नित्य पाता था। एक सफद सदर का तुरता मोर चप्पल पहो हुये। यह पान खाकर चुरचार चल देता था । पहले ही दिन उसने पान ले कर उसके हाथ में एक या रख दिया था, और सम्पनिया की भोली पाली प्रति आश्चर्य से चमक उठी थी। उसने उसे वारस काने की चेष्टा की थी। पर वह न माना था। बस, उसी दिन से यह उसे जाता और पहचागती थी। कभा कभी वह हंस कर का भी देता था - 'चलो, श्राज सिनेमा देख पायें " पर सम्पतिया केवळ गुस्कग कर रह जाती थी। उस दिन भी यह पाया। वही प्यार की पहली छाया, वहा ढीला पायामा | इनी गिना अस्थियों के अन्दर सीमित सौन्दय की सच्ची प्रतिमा ! सदा की भाँति उसने एक रुपया निकाला और उसे उसके हाथ पर रख कर योधा-"लो, इसकी मिठाई खा लेना, समझी।' सम्परिया चुप थी। शहर के मनुष्य बढ़े दयालु होते हैं, यह घाबूद जानती थी। भीड़ कम हो चली थी, वह पास ही खदा सिगरेट पी रहा था-"चरोन "ना, पाप होगा।" वर और पास आ गया । स्थान जन हीन था। उसने उसे पकद लिया। सम्प तिय हाफना सी उट सही हुई-फिर झट से बोली-"यह सुमने क्या किया ? हाय ! यदि कोई व बोता तो वह एक पोर हँसता हुआ चला गया। समतिया पान बेचने लगी। उसरानि को वह श्रीनू से जी भर कर बोली भी नहीं। "चलो न 'यह स्त्रम देख रहा थी । वही ढोला पायजामा और चपल पहने हुये वह समता हा धाया। और यह दूकान पर बैठी थी। उसने उसे मना लिया था और वह उस सायचज दी थी। कोई उसे हिला रहा था। उसने धोखा खोली। देखा-धोनू काम पर जा रहा था। यह हदयदा कर उस बैठी। फिर पीनू को काम पर भेज कर वह अपनी दूकान पर भाकर बैठ गई। "चलो !' सहावी भौति यह पाया । सम्पतिया का यम मूर्ति हो उसके सामने बड़ा था। वह उसकी भोर देख कर कभी मुस्करा ऐती और कमा बारा सी हो मुख फेर लेती। सम्पतिया सोच रही थी इसमें हानि ही क्या है ? पलू, देत् । सुनती हूँ, तस्वीरें चलता है, यह भी तो कह रहे थे। फिर एमा दयालु मनुष्य भी तो मिलना मुश्किल " (मान awar मगे। पाद: प्रायेंगे, सप T चामा जागा सादर मानगा कह गोदाम पर धी। मातिया के मुह पर दे दोबा--"यो क्यालोर सम्पसिया मामो पृष्या में द गई अवक-तत्वार पक्षता kal "हा मासात मनमा केप मामा-Tant" सयतया पाना चाहता था। यहीं पर मारी कोम शमिया पुस्तका सपना के बरे अपना पहना उपस्थित र देती है। वहीं पर मारी पुरुष समरामा विश्ससय का मुक प्रतिमा पर कर से मुमाता कि मैं Tant अपवासों में मिल का प्रमर होना चाहती है। ता, स पक्षाप सरमाये हुये लो। "कसीम यह एक और मुग्धता माना गया। राम भर सतिया कोमोर म पाई। प्रात काम होते ही वह दूकान पर चा महापाप बज शाम को मापा, वही दीक्षा पायजामा परम पहने थे । सम्पतिया में काम बन्द कर ।। घोर बन्धकार की माता में दो परिधित प्रानने का रहे। y धीन स्वय भी देखा जैसे प्यभिधारण नगर में भा पर पहना न रहा अपने साथियों के सहन से वह मदिरा का भी सघन करने लगा था। पाय दोदो, मीन-तीन दिन तक पर घर में जान पाता था। भोली सम्पतिया 'प्रोपर-टाइम समझ कर मनुष्ट हो जाती। उस बात को मा निस्य को मोतियान नामें ममता घर मायापा यह क्या | घोर मोरयता में घर कोट में किसी भयक वेदना काषी पाया कापरहीं थी-सब अन्धकार था शानू सहम गया। सोचा-'ममी दूकान सेमी माई होगी। परसों मी का हम्मी ममय भाई थी। उसने उठ कर मिहा के सेकी दिविया जबाई, फिर कुल लोन कर उस बुझा दिया। मन !! घाने दो ममाये । बीन की पथराई हुई मासों में तग गलियों घूम गई । फिर गाद कादरी भरी भूमि और कुष र याद सम्पतिया का सरल भोला मुस' उसका हृदय जोर जोर सधधक रहा था। इसकी प्रोखों में नींद सा थी। उसे स्वा रहा था, देखा-यह गांव के अपने खेत जोताहा। बैन धुपचाप धने नारा x पता की घोर १५ और मम्पतिया कुछ दूर से ही पीतल की छोटी सी कजसी लिपे हुये धजा मा है। वह उसे प्रामीण जीवन पर चिढ़ा रहा है और 'वह' प्रकृति की एक सरस ना गाँव छोड़ना नहीं चाहती। वीनू की प्रति खुज्ञ गई, कोई न था । केवल यही, केला, निर्वाध पबोध ! प्रात काज की भरण किरणें उसके लिये न जाने कितना पण सरेश खाई थी ! योन काम पर चला गया। एक सप्ताह हो गया । बानू अब प्राय घर में हीन याता था। सम्मतिया की भी से चिंता न थी। समस्त दिन यह शराब के नशे में पूर हो प्रेम का काम करता, तर रात होते ही किसी वेश्या के यहाँ चला जाता । उसका जीवन उहास और "माद का ज्याला में भुजस रहा था। X भास अपना क मिय उसे एक नवीन वेश्या के पास ले जायगा, इसीलिये उसने साफ कपड़े पहने 1 ठाक समय पर यह पल दिया। वह एक तीन मजिन पर का कमरा था। सड़क की दाहिनी ओर होने के कारण यक्ति का उस पर रष्टि जाती थी। पीनू धारे पीरे उसी की ओर बढ़ रहा था। कौन जानना था कि उसकी अपनो भोली सम्पतिया इसी विशाल प्रासाद में बैठी हुई भान पतन और अवनति के गत में गिर कर समार पर राज्य कर रही होगी? कौन कह सकता था, एक सरल ग्रामाणा माज अपने रूप और यौवन से नागरिकों का वासना की तृप्ति कर रही होगी ? वीन चुराप उसी की ओर पा रहा था। उसके हाथ पैर काँप रहे थे, हृदय धक् धक् कर रहा था। मन कुछ सोच रहा था-शायद सम्मतिया के दिने की ही यातही। ग्राज यह एक नवीन वेश्या के पास पाया है, तमी तो भारम्भ से ही उसे उदार और स्नेही बनना चाहिये । इसीलिये तो वह मैनेजर से चालीस रुपये उधार ले कर पाया था। सो क्या वह सचमुच उसे अपना पाहत हृदय सौंप देने के लिये हो पाया है। वान् साड़ियों पर चढ़ रहा था। विचारों में नवीनता आने लगी, कराने प्रत्यक्ष का स्थान ले लिया। एक अहह सुकुमारी बैटरी पान लगा रही थी। धीन की प्रा खुली रह गई । पाश्चात्य पाउदर और लवेण्डर से योन प्रोत होते हुये भी उसका मुख बानू से छिपा न रह सका। धीरे से उसने कहा--"स र ति अदर जा चुकी थी। पाछे से कुछ गिरने का शब्द हुमा.) थी। पुलिम 'बीनू' को पकड़ हुये थाने की दो काली-काली लकीरें सर्मिहा टी-से लेकर पाई। निशिफातगार पाना रहा। उर्मिला ने से मेज पर समा दिया, पर पदामा नहीं।रा गौर से सो पापको महसूम का शाम ने मालगा। मूक दायरे में सेवा प्रामी भारनामों को फैजा, पाहा को विकसिी रहगा। रिशिका न उम देखा और देण्या 87 से उगो परेरा भार को भर बोला-"ममा सा, गिरकर चाप सप-सर गौर भूप it उमिला जैसे पर गई हो । वह अपहलना का सइ में पहुँच श्या ? यद साय समाये, साये और निस निशिकान्त काश पाने से क्यों हटे। पाग धानत छानसे वाय जहा पाच गया था यहा जरा अधिक दुग्पा । दुखा भार प्रसा पेरना मे निलमिला कर पोला--"भूख हो तो खाने में महमान क्या ' पौर उस घर पर पक पोर मन्धर गति से चली गई। यह भी निशिका त के लिये योदा है। मिला की उसमम से उसका मग मी जाता है। सरन से दूरदरा पर भा जैसे शर्मिला सरार और बदा गई पर यह तकरार की योर में मा, जरा गुम्सा हो, भरना देता यहाँ दान यषों गई? भूख सका है। इस गाय उसने पार तर अपने में पाता है। फिर मिला को यह कैसे इसमें शामिल करे ओर उभिशा पाई नहीं, ता सोचा-'यदि यह जरा पी लेता, तो क्या मिशा ठरे पुरा करता।' निगिकात ने जरा समक्ष सिगरे। जलाई । नाँत दीवार पर सो एक पाषष्ठ- पए पर रुकी, शिर मेस पर विचे मापोश पर कुछ देर हरा याद भाई, इसी मेश पोश दिये उसने पारस्मल डेमसिल के गुलों का तकाजा किया था। दुही में पढ़ाई से जप वर पर पाया, तो धर्मिला ने एक धार दर का प्रोट खे सुनाया था- "लूर, कोई यहा गुल्ला का रास्ता देखे धौर कोई यहाँ जा मज मे सोता रहे।' निशिकाra माक का शिकार बना। - दो काली काली लकीरें थात उस पर कही गई थी। फिर भी वह चुप रहा। जरा जमा, सो एक 'मूक छाया का ध्यान धाने छगा। यह उस छाया का मिलान अमिला से करता, और ठीक उसे ऐसा लगता, जैसे उर्मिला उसकी कोई रही हो। पर निशिका त उसकी पकड़ में न पाता, न याता, न प्राता। उमिला सोचती-'यह निशिका त भा कैसा पुरुष है । यह मेरी भावनाएँ चूमता ही नहीं। सवाल का सुन, जरा ऊप, मुस्त-सा ऊपर-ऊपर का जवाब दे देता है, और यह इसे कहे भी क्या ? निशिकात उसे पहले से गनता है। तब भी वह उसकी ख़याली मनपा, अन्य लद कयों से मिला। वहश्तेि में उसकी घुत्रा की लड़की थी। कुछ छुट्टियों बीत चली, नो एकदिा उमने सिनेमा का प्रोग्राम क्यों पना बाला और उसे सुन, अपनी खिला सिली श्राखा को युमा उस वचनाइ स्कीम म उर्मिला समूी समा क्या गइ ! साड़ा में यह अस्त-व्यस्त नारी कुछ कुछ भरी ती केवल मूक कल्पना-सी मोची समझा न गई। धीरे से बोला--"जरा रुक, उहर ! खा कर दूसरे शो में चली। दमिला अपने में समा गई। छुप बोली नहीं । चुप चाप रहा। मन की बात था, वह पूरी उतरी। थोड़ा सा हस, मन पैंग धीरे धारे उसके सामने से ही कहनी कहती 'चलना जरूर एक घोर चली गई। बात कहने की थी, कही, उसे निभाना क्या ? राजने का बहाना ही ठीक था। और यह कहा जाना चाहता था? नुद समझ न पाता था। उमिला उसकी बात लिये बैठा रही। रात में जप सर सो गये, तो धद याई, जरा और भागे पढ़ी, तो देखा निशिकात सुपचाप सो रहा है। बुध पोलना अरला न लगा। मन मार कर बोट घाई। दूसरे दिन धीरे से कहा-"वाह । सोमा देख कर तो पेट भर गया !" निशिकान्त कुछ बोला नहीं। यात उसी पर थी। कुछ उलझी उलमी यह नहीं की। अमिला मखौल से बाहर रही। सोधा-'उमिक्षा ठीक कहती है। एक घोग्वे में था क्या इम उसे सप न करेंगे एक दिन निशिकान्त पकड़ में आ गया । उसकी माँ का अनुरोध काटा ! पोली थी-"मो निशि इस सिनेमा दिखामा, कान खाये है." - प और निशिस्त मनामनामनियों के माए पश्मे की सारे भाप निशिकान्ता भागे, उर्मिला और मनपा करने का मने, पुरको हो-पार्मिधा भी देगी खामी, रास भर देती है। और वह गुरू मा | दिम शर्मिला जागे हो, माती लामा विमरमती पसा। भिमा को करना और मन को माराडा, पारमिता मिधापा का स्याहारिक घोग में पाया या म मिा पान का बास बहाती हुई मन-मी बगा-!" दूर सेरमा पनि उमिमा पर पाहतो, ताप पर होशियो म । भाजपयों को प्रपन से ! - पमिशिक विचारों में पर, उसगरा विकासन माने निजी धानों में पुराना पुलिया का चित्रहापुमोकामा! भला में इसमाचा गया कि थैडना मान लगा| यस पुरा उठा, चौर वारा पार्क में प्रा सोशियारे पहर की सरावही ६ मिमे पार र सारे कसम्म को निमा, पुर होना पाता हो । पुरसा वापर में भूल जैसे उम अपना धरून बनाने में एगरा विकर पोहोर यमिता । सामने उमिना को देख्न पार्मिका मे देखा कि निशिकार "पाक में पायर का मूत्ति के पास पुरयाप समाधा। जरा पाम प्रा. मिमा कर उसने कहा-बजा, पेसे काई पाच भागभाना "और क्या तुम्हें यह न घगा कि तुम्हारे साथ चौर कोई है? समिक्षा करता गइ-"मैं कुछ नहीं मानती, भाको चना देगा।" 'किन उमिखा मैं कहता हूँ कि मात्र 'मूा में महा है। र पामो, मैं न जा सगा।" और रा यह पास भाई । याच में पयर की मूर्ति चौर साय हर्मिना ! सामने हरा घास, पाद सिनेमा का बड़ा-सा महान--2% मानी दस्मता 1ोमी- "मेरी चुराई होगी।" चौर निशिकात ने मूर्ति के सहारे खड़े हो, देश-एक भीमा मारी को माया को गहरे याजे रग की साड़ी में जरा निना विजी, विश्री विखरी ये वहाँ पर फजी। इसमेघा जमने लगा, ये पापा को मुक्ति उर्मिशा में बदल रहा हो।
दो काची काबी लकीरें "भो निशि मैं हूँ। मुझे देखो, लो, मैं तुम्हारे सामो हूँ ।" फिर पीछे उर्मिजा की हिलती माड़ी को देख कर यह चौंक कर पोला-"मैं अब न जाऊँगा। जिन्दगी में कुछ एपा हुआ है कि पकड़ 7हीं पाता । तुम जानोग जरा और सरक कर सिगरेट जलाहे, और धुएं को छोन कर कुछ सोचने लगा, मानाय एक दानिक की भाँति नीरन का मस्य मालूम कर लेगा। यही हुई उर्मिला ने सोच-' अधिक बोदना ठीक नहीं है। एक सम्मान स उभरा प्रश्न सामने प्रायः । सुरही पेपना किया, पधिक खुशामद क्या? कुछ योली नहीं, चुपचाप लाया मो बद कर प्रदर पाई। इस घटना के बाद दी यदि जिदगी का मूना स्त्रम टूट, सरम हो मिल जाता, aas होता जैम यह मय कुछ दाध कालो राती सा सफल और मौन मा शून्य हो । सिप मन का हंसा से खेज अपने को खोना ही जैसे होनहार है। यह ENTEार वेदना का ऐसा मै तीर निशिकान्त में साल गया है कि वह पद नहीं पाता । जैसे सारा दुख पाने में समाय जमा रहेगा। फिर काम करते. करत निशिकान्त को लगता जैसे उमिला भाई हो। गुजायी हलके के जर में वह और मा विना खिजी है। अग अजग 'स्केचेज' और 'पोज से उसे मिलाता । पुराना 'दब साइज और नई 'फुज साइज' सिम की हमती TV से मिलाता, उर्मिला को हँसो भा ठाक इसा प्रकार का 1वह मा सहारा पापेमी हो हमी निखरती था। उसका भी पकड़ से बाहर उलमान से दूर एक पनी नाई भावना था, और यह पोज़ कुछ बिस्तर विखरे बाल, खुले खुले भग। नारी का एक पूरा जमाव, निरी कोमलता । दूर पर अमिला कहता मी लगता हाँ, मेरी भायुक्ता पोत की कोमलता और तुम 1' एक दिन पढ़ मे बैठा, तो रैम्प जल उठा, जल उठा पास के एक 'पोज' को साथ में लिय। जल्दा में बुझाया तो बुझा नहीं। नीली साड़ी में की हुई एक नारी श्रोड पर मलिन हँसा---एक शू य सा, गहरी गहरी, पसरी पसरी उससे दसा गया नहीं। हाथ चले, और घर वह पोज़ प्राधा ही रह गया था। निशिका ने सोचा, यह अधमला चित्र सा श्रद्धा बंटा रहा है। नारी ये मोह का क्या यहा का है। माह। वह रुका । उसने उमिता को भ्रम में डाल क्या मोह नहीं पाया ! सिनेमा से उठ, उमे पाहा दे क्या वह फत्तव्य निभा जरा बेटा, ता पास का चित्र जैसे कहने लगा-"उमिला, उर्मिला" और फिर ५० इलाज मपती "में जला में जली" पिरपिर? घटना उभर रभर आने लगी। फिर कप उस दाट भाई ने अपने ग्राप उमर युन हुये 'पुलोवर' को पदिन लिया था। और उस देख जरा उय, गुरम से जन पक्ष कमर स बाहर काम पर घसीता सा लाइ थी, कता at-ले, और पहिनमा सतरे लिय तो धुना हो।' बया कुछ न योता । दालान पार कर चला तो निशिका त कोपा सा हंस, जरा सारा को संभाल दा का जाने का । जैस वह उस कुछ समझ । और निशिका त ने सोचा-'क्या यह उमिशा को कमी भा भूल सोगा? नारी की भावनाओं स उमिता को पकर से दूर हो पा घह बदलेगा ना? पुलोवर' का सहारा पा पह रमिला, नारी पुब हसा। अपने से ही सरा और हस कर, मट कर से यह एक पहला हा यनी रहेगा । यस। कुरसी सींच बैठा, सो उर्मिला सादा यदल नइ हो एक अोर से हँसती हुइ पाई और हाथ बड़ा जरा रस पान की सश्तरा मा पर रा कमरे से बाहर हो गई। माता उमिक्षा को पारदर्शाशा ने बहुत दूर पहुँचाया । एक उलमा की यात उठा। समिला गुस्था बना उसके मन में पला वहीं भरफ रहा। वहीं पर भगद भर मन में घात सुद में खो गई। पप समझ म न पाया। धौर शी के उस पार खड़ा हुई आमला ने दरवा-निशिकात या हुआ कुछ सोच रहा है। यह लोगन उमेर महत्व से हटाता ज्यादा भला नहीं बगा । मन भाव का यहाना था, यह पूरा सारा । देखा कि निशिका त हाथ या, पान उठा, मुँह में रत रा अपने में था भर गया है। और कमर में छे निशिकान्त ने सोचा, यह उमिला पान में अधिक चूना क्यों लगा लाई ? क्या यही उस देना या? यह उठा, और पान थूक, उस फेंक सिगरम मला, उसमें सो, सोचा- यह सुदर नारा क्य तक उसके मासे खेलती रहगी ! ना उसमें बैठी लुका दिपी करता, एक रहस्यपूर्ण गृहस्थी आता दूर दूर छाया की माति हसजी-भागता उमिला की धन पाई। देसा, पान फेंक दिया । इस, हाथ में 'पुलोवर' ले जरा गहरी सिं घुमाता सामने थाई। सपा निशिका व चौका, फिर जरा संभल कर पूला-"प्रेम से खिलयाद करना कब से सीखा ?"
दो काली-काली लकीरें ७१ और उत्तर मिला -“जन से प्रेमी जरा से कष्ट को न सह, याद हग, किसी को भूल, विश्वास सोने लगे।" बस, प्रागे कुछ पूछना आवश्यक लगा। चुर हो उर्मिला पड़ी रही। सोचा, जो कुछ उसने पूछा है वही क्या कम है, जो और पूछ मन को हलका करे । अपनी गलती उस रीता जगह में फैला पाई उसने । पान का सहारा पकड़, चूने का प्रोट में वह भाहर याहर आना जाना चाहती थी। धपो मखौल से थब, खूप सबर वन पE सोप गई उसे । अब उसने पाया, यदि वह पान मा हो लेता, सो क्या नीचे बैठी दो चार फ द दाल, वह योली--"मैं तो जाना था, भाप उसे खा "मैं " "पर उसे फेंक, जैसे श्रापने एक उलझन म पाहा छुढ़ाया हो क्यो?" और निशिकात उसे कैसे सममावे? आज उसका जी एक भीतरा वेदना से लबालब भर गया। उर्मिला के आगे वह जीत सकता नहीं । पलिक जरा दय, मुक, और भी पोदा में ऐसा हो जाता है जैसे पाहा फट बाहर थाना ही घाइती हो। 'जिन्दगी में पीछा छुहाना पाप है। मैं उसे पैसे पा सकता हूँ। और यह जो दूर-दूर एक रोमास है, यह क्या ऐसा ही काला काला रहेगा ?" और उमिला कट गइ हो जैसे। फिर हाय का पुलोवर ले, उसमें उलम सोचा-'जिन्दगा ठीक टाक क्या ऐसी ही बीत जायेगा? और यह निशि क्या कभा भी न सोचेगा कि मैं कोन हूँ ? निशि का तन मन यंग पूछा--"कितने में 'पुलोवर' या नाता है।" उत्तर मिला--"अाजकल ऊन का क्या भाव है" और निशिकान्त ने कहा-"उन कई तरह का होता है। गुल्लों से अपी मन, नहाना अंगुलियों से सेन, रग विरगों में श्रा वह उलझ भर जाता है। मा भी कहानी होता है । पिर लाज इमली के ट्रेट माफ से क्या होता है ? धारा और यात्र मन मिरस का का अधिक विक, 'पुलोवर' के यहाने कि पहुँध, किसी व्यावहारिक प्रश्न को सुलझा, किसी की गहरी याhinn - जाना है।" . 'व्यावहारिक प्रश्न एक यादसा यह सब यह क्या करे17rit gr था, न उसने सुना! यात खरी लगी। जरा उलमी बातों को nिal उतरी नहीं। यहाना पुरा नहीं। फिर पीक उठी, सादhire फारसा-"ut मागरे गा मा सामना दिनही मार काना। जरा घ८ मासी हूँ।" 'पुलाया प्रदा गई। जिसमे थेntarमाई। मे पर जमा पोली-खि महाने में साईया मुहै!' देष शिक्षा : मन में प्रमशाने पाठा, यम दिमाश को #r या सिखाप ! ईरहासा नामा मोनासिकार दे। यद मैं अकादा, उमेरा मचाना चाहती है। मानो पन का सहाना पा कर जग उर्मि1- यह मगला1ो पनि पाइर उम गए मा " पास गामा पायर का TIAमहा पे हिना, दिया पी. fit for दुकों में परिजन गया। चयनिशिबाना मोहाग समजा तो देखा मिस ने मेगा , मेक Frernर में लापरावर सन्पिा था। एक यार थापा पनि नेम पनारामा frers, सपो को खो, सामने सामानले धार पर तागमा कास यग सगा! उर्मिला की शिनासमहल पर PिETI FOR TET पर। पास उठा धीरे धारे, यह नाममदल का गुम्मद हादिया। यमी, वह जो सपूणे ताजमहल का निसा रहा था। और उस कागा १६ मोगमा 'मुमसा की सपाजी पर इसमें पाई दिल का कहा नामिशिकान्त पर गुस्सा पाया तामे की उलझन था. नौ निशिमा प्ररने का गुलझाते हुए कहा -“হা সা যা কি भाता है। एक घोंसले में टिके मन पर, सारा शिन्गा निभा-या भाता है, ताकि यह घोपा टूट ना माहीहाटे। श्रागर में बहुत प्राधे'ताममइ मिलते हैं।" उर्मिला योडी-पापही हा गुशरफ हो।' और शिशीकान्त जरा शामाता योजा--"सुमनाला मुर रही होगी! उसका सुक्षा की मुपलमानी सम्पना में गोइया बाँखों स शाह उलझ गया था । सिवा मुमताज के उस बी से और कोई पता भी था। जिगी का सफर पूरा करते करते यह सानिक भाका था। और तभी मुमतान में अपने को गमा, सौप बहादशाह मन का हो गया था। मन का? १ दो काली-काजी लकीरें भात पली-धह भी सो मा का है ! जरा उर्मिला से इलम गया है। और मुमताज ? वह कारना में कैपी दुबी सुदरी शलवार से की जरा सुखे-खुले योल नाले फाते से बंधे। तभी दूर जैस उमिला मुमतान से लग कहने-सी बगी, जिन्दगा एक स्वम है । यह थादशाह था, पात निमा ला । पर हम अपने बाहर क्या यादगार रस ?" । जरा धीर बोली-जैसे मेरा भी ताजमहल बनवानोगे। बोलो यह तुम कहते हो निशि और निशीकात ने धीरे से हामी भरी। जैसे हामी भर यह अपने उत्तरदायित्व स भगढ़ रास्ता बना लेगा। 'यादगार रसना एक जरूरत है' जैसे यह एक हलकी याद में या भूल कर कला की चीज ही अपना रूप ले लेती हो।' और उमिला उस परधर के टुकड़ों में खूब झगड़ी था। उन्हें उठा बाहर फेंको गई । गइ पौर फिर शाई। शिशिकात शाम को उठा, तो उमिला का छोटा भाई सामने पड़ गया। चटपट पूछा--"तेरी दादी कहाँ है ?" और उसन सुनाया कि दीदी उर्मिला शान्ति के साथ सिनेमा गई है। घस, फिर कुछ पूछा नहीं । साचा, यह उर्मिला अाज अजी क्यों गई ? जरा पास के चित्र पर थो रिकी, वह चिहाने सा लगा-उर्मिला, उमिला! निशिकान्त घबरा गया । उठा, और शालमारा साल मगीबेग निकाल, काट पहिन चल दिया। लान की पापर की भूचि के पास था देपा, सेल शुरू हो चुका था। दुर जाते न बना। एक गहरी याद कुहरा सी छायी रही। सुपचाप मुक, सिगरेट नला, मूत्ति से लग, अपने में सो गया। पास लम्बे लम्बे हाथ सुदौल चिटा शरीर निरा पापाण जैसे पर पत्थर की मूर्ति सुमा रही हो कि हूँ नाt। यही, वही जो मुम्हारे अन्दर जरा विसरी बिखरा है । नागे दिमागी उमिला का खाका प्राया। तमा जैम किमा ने उस मूत्ति में प्राण भर दिये हों, कहो लगी-'में मिला है, समिता पिर सारी कोमलता में सजीवा मा पास आ स बह पत्थर की उर्मिला अपने दोनों हाथ फेला योकी-'मैं हूँ श्रो रिशि तुम डरो मत, मुझ लो।' और उम स्तब्ध भ्रम के ग्राम प्रण को निशिकात अस्वीकार न कर मका । बड़ा जरा और यदा। फिर उस मूर्ति को हाथों में समेटे सड़ा रहा कि ध्याघग किसी ने टेले को न पा वह भूति से और नासा चिपटा । धीरे धीरे योला-"उमिला, उर्मिला! जैसवद असह्य भार और यह कर भी तो क्या ? मन उस है, दय भी है। उसमें जरा सी याद भी सिरजा है। यह याद, यह निकाले कैसे कि मन कहा था कि अचना, देखो, रापन को समझ लो, मैं और कुछ पाहता नही चल तुम्ह मुम्हारा शान भर कराना चाहता हूँ। तुम नारा हो। स्वामी को दिर हुइ धदरों का समगेगी। और फिर भी क्या उससे पृयक रह सकोगा? यहा होनहार है । यहा विधि का विधान है। और अचला ने अपने को समझा तनिक अपने मन में लग पाया-यह नारा है। वास, स्वामा उमे चाहिये । प्यार की मुख है उसमें । पर वह क्या उसस स तुष्ट हा सगा। और मुनीता। यह स्वस्थ सुदर है, अपनी मासुकता में दया है। पर दम म्यामा उससे पृथक होगा- सुभास का श्रम बहुत दूर । शायद उससे अधिक मजुएट सुदर मा। वह एक व्यतित गति में चूक जाता है। उसका चूक मन ही लफारी के पास से दस बार हाना चाहता ही है। ये लकार सुन पद धुरा है। यह उसे क्या कर कि सकारें कुछ मलिन हो उटती है। स सुनील उस रला धुला कर ही लकारों में अपना अस्तित्व धुला देगा और जैसे वह इस यहाँ महगा। ण्य मया को उसन स्वामी का हाथ पकड़ा था। उस समय उसे क्या पता था कि सच हा तो वह स्वामी माता शतों का हो उस अपना न सगा। उसो को भूलों में पंस, एक सीमित दायरे में था वह केवल रा भर रह जायेगी। सुनान दिन मराया नहीं, उसका चौर पथरा गह। मताहा क्यों कर और कहाँ तक! उसका जी उसे देसी को हो रहा था । वद धार स तनिक उस से खग हँस, मुस्करा कर रमभाना भर चाहता था-'था, सुरस नाराज न होना। मैं अपन में बंधी हूँ। मेरी यह विवशता परमात्मा को "न है। हर समेटना बाहो पर भी ममेरपाई नहा। मैं नारा जो हूँ। स्वाध का ग्यात कहो मुझे तुम तक प्राने देता है। पर मैं कहूँगा कुछ नहीं | मरा मन मुग्दी में रमा रहता है। चाहती हैं कि शुम में यधारहूँ। शाम को सुनाव श्राता हुआ दिखाई दिया-कुद भारी मारी सा। अपने में - - शस भार झुपा धरा पुस्प और यह उसस कहाँ कह पाती थी-'नामी' और उप दिए वह कुछ योली हीं। केवा चुपचाप पदी रही, कुछ यी दधी। सुनाल का पाते पहलमायेगी। लेकिन । सुख पास बैठा था। उसका धनमानी छाया को यह पाँधेगा। और कल ? उसका स्वामी उससे अधिक शमैनिक होता। लगा--वह स्वामा अधूग यादों का पुनला मान है, एक महान् सात का पारा खाका सा। वह स्वामी सस अच्छा लगता है नहाँ । अधिकारा और अनुराधों के बीच की गहरी साई को यह भाप भा गई थी, कि सुनील पोला-रात भर दाई नहा है। हर क्षगता रहा, मानो काई मुझसे मेरी कला मांग रहा है। एनकायहर-पुशिा के स्कूल को एक कहानी लिख रहा हूँ। अाज उसका दूसरा भाग समाप्त हुआ है । यह पहाना अपने जीवन का एक नावित चाल है। एक अरसे छा अशुभव उसमें रख चुरा है, उस समाश करना है।' और अचला न देखा, मीद भरी घाँखों से वह साफ गई। सामने एक काराजा का वाटत रखा था। - उसने उसकी बहुत सी कहानियाँ 'पर' का है ! दिन दिा भर, रात रान भी पद उसके पेन्सिल से विपे हुये काराजों को संतता रही है। समी, कभा कमा उसने उसे समाप भी पाया है । घर के एक कोने में तमा उसो कुछ पण टिक कर मुनाल के विषय में अपना धारणायें बसाई है। उस वद माता रहा है । घर स लगा हुआ है, उसका घर, उसा में उसने सुनाल को पहिया है। उसकी भोला भाला छाया का पड़ा है। और यह मा सो युवा है । उसका भी कहीं, किसी का सहारा परिक जाने का जरुरत मालूम पड़ता होगा। कहानियों को सा करते करत यह अकबर साचती ता पाता कि सुगीन भावुक है । उससे बोल पाता नहीं, इसा से कहानियों का सहारा पड़ा है । सुनास उसे सुझाता-'मैं अपने जायन में जा चुका है। शब कुछ करने का ना फरता नहीं है । श्रार यह कहाना भी तो तुम्हें समास करना है । तुम्हारी अनबूझ मन मैं मुझ पाता हूँ। यस पैसे कमा भा लगता है, जर में तुम्हार fire अपा। ममत्व छोड़ जाता हूं, से तुम में अटक ध्रुपमा दूदा हो भर माना है। पर यह कुन कहती न थी। सुपचाप हँसो हँसा में अपा में था मेज़ पर मुक उसकाराज संवारा करता। फिर उन्हें साफ करने में लग पाती। भावा के प्रवाह में पद भी यही थी। उसकी मनचला बदनाओं को उसो मा समझा था । और यह कुछ विसरा हुआ सुनात रोय पर केली बार से - ५८ इलाज - यहचाय प्याले में उपल श्रयता के मामन रस घारे म कहना "ग्रो, अपला मुझे मनाना अाता नहीं ह इमालिये देने में हिचकना हूँ 1 तुम मे कुछ कह सुन लेता है। फिर भा विना दिय जी भरता नहीं है । और तुम को यह क्यों असो लगेगी।' और अचला हँस कर कहता- 'चाय का सहारा पड़ा है। और क्या तुमको यह नहीं लगा कि अचला का मन एक बार में बैंश है। वह दो धपन से हट कुछ पण के लिय कहानी लेखकों का मन सा देता है। कभी कभी तुम्हें पका हुमा पाया है पर कह सका नहीं। और तुम्हारी चाय म' क्या सूप है। बिना मैंने पाली नहीं । कुत्ते स भा मुझे अधिक प्रेम नहीं है। मैं हूँ अकला । तुम्हें देख कर कुछ सोच भर खेता हूँ। उस दिन जाजा से कह दिया था- यदि तुम्हें सुनाल का धाप मिड . जाय वह प्याली उसके भागे से लगा देता। और वह यपोल कुछ भी धरी तारा कुर बोलता महीं। कवल जरा सा हँस, मुंह विचका कर उस पी जाती, फिर वहा कहानियां पर प्रौखें कि जाती। चौर गाड़ी धागे बढ़ रहा थी। किमा मन का गहराई से तो उसने उससे मम्म जोड़ा है नहीं। एक वैवाहिक कार्य में वह स्वय चूक चुका है। यह अपने में लगा उसस ग था कि भाग्य के पजड़े में था उस उसको स्वामी मान लेना पड़ा। अपने से एक पृथक रूप में वह उस कहाँ देख सका था। उसने मुना था कि उसका स्थामा कामा यूझों से लदा है। उसका दुनिया मरह, नेग, कह सुन का क्या यह उमे निमा न सकेगा एम० ए० में पटाये है, और यह क्या उसके लिये कम गौरव की बात है फिर शादा के बाद वह उस लिया गये थे। गाढ़ा एक स्टेशन पर रकी। सामने से उसका स्यामा हसता हुआ, मम कर चला गया। सुदर है। काफी 'मिविलाइ भा। फिर भी वह अपने को कैसे समझाये । वह उपस छू कर क्या कहे-सुने। अपनी सारी बातों को समझाने के लिये यह जाय कहा। और एक सुनाल ? एक रोमास यना उसके पाम गेंना भर रहा है। वह उस खूर पढ़ चुका है। उसमस्यामा-और उप-जैसा खिला खिला युवा। सारा कहानिया में उसका बारा हुई पहिचान भरी है। उसने कहा था-चनो, पाज उप यास समाप्त हो चुका । मुऐ उसका अतिम अध्याय लिखाने पाया हूँ।' और मारा मारा आँखों का सपर पुनबिषों में एक अपनस्व की छाया ला कर पा उस ताक । लेकिन यह जाय मा तो वैस उसके साथ। रात हा को तो उसे एक अनजाने युवक को स्वामा मान लेना है। अपनी उलझन साभार ५६ - - में वह खुद ही बंधी है। और क्या यह लाल साड़ी देस फर भी वह नहीं समझ सका है । पैरों में महावर भा तो उसने लगाया है, और हाथों में भी। फिर भी तो -वह अनजान है। और मेहदी के दाम हाय यह जाय कैसे ? मानो वह उसे सुझाना चाहती हो कि श्री सुनील । तुम हो बड़े भावुक बहानीकार भी। फिर भी मुझे समझ सके ! मुझे खोलने की जरूरत हो न ममी। और मैं कैसे कहूँ, मैं भी नारी हूँ जो क्या कहीं भी कुछ कहती है ? पर बहन माना था। उसने उसे समझाया था, उसके पास अपनो टिका धकी स्मृतियाँ धुझाना भर चाहता था। वह था उसे क्य कह दे। उसकी अपनी घेदना में वह उसे क्या समभा दे। यह कहानी लेखक है। उसने बहुत सी 'केरास्ट्रीफी' लिखी है। और और मन के पास ही उसने सभी किसी को तौला मर था। किन्तु अचला टीक तो है। उसने उसे जाना है । रूठी हुई मास्त्रों से उस हसाया है। पर जैसे अब यह सारा टूटना टूटना भर चाहता हो । यही होनहार है। कमरे की शाशे लगी हुई बड़ी बड़ी पालमारियों के पदर जैसे उसकी चीख पढ़ती हो 14 कमरे में खड़ी था। सामने मेज पर रात को देर तक लिखने के कागज़ पड़े थे जैप वह सोया नहीं कि वह योली-"मुझे कुछ लगता नहीं है। सुम भले हो। और इतना क्यों निररते हो स्वास्थ्य कहाँ खराम |फिर ससने उपन्यासों के कागज़ों को सीरियल से लगाया, सुनील के उपन्यास का वह मैनुम्कृष्ट था। वह कुछ बोला था नहीं । केयज सामने मेज पर वैग कुछ सोचता भर रहा था। कि गाड़ी एक जकशन पर खड़ी थी। सुनील में कितना अाकर्षण है। यह "थिलिंग' का दीवार बना उसके मन केाँगन में खड़ा हो गया। और स्वामी सामने के सीट पर बैगया। जीवन और समाज की परतों के बीच में उसने उसे सामने ही तो पाया था। पर उसे कहीं कह पाई थी कि सुनील मैं तुम से लग सगी नहीं। मातुक तुम हो। अपनी कल्पना से मेरा निर्माण कर लेते हो । मुझे मा में पास जान, अपने में पौच, तनिक हस, मुस्करा कर कह लेते होगे कि मैं पुरुष हूँ-तुम्ही पाया में खो जाना मर घाइता हूँ ! पर तुम क्या जामो कि समाज से सुम्हें धर सकेंगी नहीं । और तुम व्यय में मुझे कहानियों मेंवाला क्या उमका या गया। निकर की खिड़की पकद सा झिम लेना भर चाहता हो कि मैं तुम्हारा ग 1 ६० इलाज कहलाने का अधिकार भी रसता हूँ। पर तुम घोल । क्यों नहीं । तुम्हारी आँखों की नुमा पास मैं चुप रहना चाहता नहीं। और तुम क्या मी हा ही रहोगी एसा हा यह वाजा-"लेर ही डाइये । श्राप थक गई होगी। श्रमी स्टेशन कानी दूर उसका यनुराध । स्वामी वह है। प्यार मा करे शायद मे मनावे भा! यह तक नहीं भा कर सकता था। वह सात में उसे श्राधे माघरों में घुसा डूबी मारा था वहा थौर पद क्या कहे? अचला नुप, मुस्करा कर में कर, सवा कर जरा विपक भर गई, जैसे यहा उसका नियम था । वा इलस्ट्रेटेड योकजी का पहला हल कर रहा था। मरे गोर चेहरे पर मुनहरा कमाना का घरमा और वह क्या मुनील से माधिक श्रक पास हा गया या IR मा मुनाल को मह भूले कैस ? उसन उरा पूर्व हा ता पढ़ा है । यहुन सा समझाया ते कर यह उसे निका सका थी। कई बार की चुटकी में यह उस भाँप गई था। रामका सब स निराला रूप सामन था। "तुम ने मुझे इत्मा सहा, भावुक और कशाशर क्यों मना दिया-अचला।" पहन दिनो ता वह इसका उत्तर दगाल बोल रही थी। फिर यह क घार घर गई था । सुनाल को ओ मालूम हुधा तो उसने एक पत्र के साथ दुध पुस्तके भेन दा। पर इस प्रकार था- "अचला xxमनहा दख एका। धीर तुम तो श्रम निराना हो। मैं तुम्ह 'सुम कहो का अधिकार रमता का? पिरमा नुम्ह समझा है। विश्व में इतना ऊँचा उठ गया हूँ कि अपने को भी भूजा पा रहा हूँ 1 तुम्हारी भाती छाया को पकड़ मैं जो कुछ हो सका हूँ, उसा की पाँच प्रतिया भेज रहा है। उप याम को ठीक से पढ़ लेना घरछा ! और एक पर अपन स्यामा का भीफिर कभा मिलँगा मा करना तुम्हारा, -सुनील ।' कि विचार टूट गया मुनील जग हँस, माथा कर पाई हट गया। कु मिस्तर का बड उठा कर स्टा पर रप रहा था। यहां रमे उतरना था। मन के पी. सुनी था और स्वामी उसने कहा था-माम मु आश्रय देना, घाई याहर तुम मुझे मत रसा में रहना चाहता भा नहीं हूँ । पर सुनाज को यह भूने मे और उसका स्वामा मुनाल से कम पाना मर।
प्रपा मार गई थी। मोव ना धाय यनी। चौर नभी उसकी धुंधती रोशा में उसके समाने धुक-स्टेड में रमा हुमा उपन्यास देवा । यड़ा रात योते जय वह सो गई, तब उसका स्वामी चुपके से उप याप उठा, ऊपर के कमरे म पा लेट गया । और उपान्याप अदर समपण या। उसके बाद एक भानुक चित्र-निखरे शिखरे यालों में एक पहिचा हुई युक्ता चित्र कुछ बह-सुन चुका था। खगा, उसने उमे कहा देया भर है जैप यह पाना भर चाहता हो कि तुम मुझे व्यय ही में ध्याह कर घर लाये में नो सुनान की है। उसके नेत्रों के निकर और जी के पास हूँ जसे घद अपन में स्वामित्व को रेखायें भा छाइना जानती हो। यहुत धागे वह पहुँच दूसरे मवरे उसका स्वामी उससे कुछ बोजा नहीं। केवल उपन्यास पढ़ने में तल्लीन रहा । अचला ने कई बार गनुभव किया कि उपयास पढ़ते बढ़ते उसका स्वामा कमा घाँसू पछि दुर हम कर सामने लगता था। भार शाम को उसका स्वामी यदा देर तक घर आया नहीं। अचला मुंदी की धरी भरी बैठा भर रही रि उम यार पाया कि उसका स्वामी गद रात को बड़ी देर तक पा लिम्ब रहा था । सोबा, तो उसने पाया- 'सुनील की तुम 'सुम्ह ममम मका नहीं। मैं भी पुरुष था। किसा को निकट देख कर पढ़ना भर चाहता था। फिर भी अलग अलग हटा रहा। तुम एक कहानी लेसकी आँखों में बैठी हो, हमा हो । भावुप्ता के रंग में रंगा हो। तुम्हारा निर्माण कल्पना मे हुमा है। और म से सुम्हें समझा सकूँगा। तुम ठहरी नारी । तुम्हारा चित्र शमा उप न्यास में देगा, साप ही सूखा समपण मा। सोचा-'यदि मैं तुम्हें मासे लगा सका होना । पर मैं तुम्हें धोया दूंगा नहीं। तुम्हारे योग्य भी मैं हूँ नहीं । मुझे समा करना। 'सुम्हारा भार ले कर मैं बता सकूँगा वहाँ, इसलिये अलग अलग जा रहा हूँ। 'तुम्हारा जा चाहे तो सुनाल के पास चला गाना । मुझे भूल जाना, थच्छा! -तुम्हारा स्वामा फिर मा उमा स्वामी श्राया या नहीं, कौन जाने ? परसों सिनेमा गया था। तभी मुनीव मिला था। मिलत हा उसने अपने उपन्यास की एक प्रति दी और यह अपह्म भार उसा का हो तो एक अध्याय है न! 1 नीलम महाभर. - । THEम उihanो पारा उस मग में पHिD, मना निहानि घर न म विराम गाय को मामिल का नारा दETA manil', बा पास गुपसा नही पुनामा पुरसारमा में महसी बन पुनर को सोचने में बाध महाशाती है। RITY मरने को भूग पानाम अपूरेपन में प्रो एकरा! tant पुप दिनों को मान चारों में या १ क मा किमु से कम मम पाहमा से दूर-दूर परमामा मामी। रिमा भाग लिया नहीं। माम पाजता कामा किमि माnt, frमेरो दिमाममा है। उसमें किया को समझा TRIMemपारदगा गुमीको मोनम पाठा--"गा पर शियापासणकाजियगा।" चीर उमर मिया--"HTTET पार घागत विकारही!" माजमा गई। मुँहबार, साकोसक मासे गागर। गाप, पहजो सामने गुगुर नाम का पुरुष है, यह इसना था क्यों का देश है। धौर पर दामनमा कि मालग प्रतिया का घोर सो के निराहा रही है। पास करने को पानीलम कोप क्षगी। और यह सा क्या पहा सा कुमुद रहा है। बुर दिन पर गृहरया से घर, घर से निदो, AIR के निधायगा, सपा मुर काबरा ऐमोती रहेगो! पालिया मालम के यार में शो भ्रम का मुमुक मन में पन गया है, उसे यह मिटा नहीं पाता है। हा, कमी उसने सोचा था कि नीलम उसे मी मना लगती है। जोकमा को जररत राम प्रसाती पाहा है, यह माता में पूरी उतरा, है। जरा हंसी से, भरे गोल-गोल मुंह में हम सामित यार! माते ही ए ६१ नीलम उल्लास बिखेर नीलम को वह क्या माने ? जाट की रंगीन साड़ियों का सहारा ले, मामन से धूम, अखबारी का पुजिन्दा हिला कहती फल पाऊँगी। अच्छा करून ! वह सुदा भागती हुई नीलम क्या क्या में जावन नहीं दे जाती ? यह सय कुमुद को लगा है। नीलम अपने में जरा चूक जाता है। जो स्वामी का यगव उसने पाया है, उससे उसका जी सुसा नहीं है। उसकी इच्छा है कि स्वामी से भी भागे 'कुछ' हो। यह 'कुछ' की बात यह सोचती है । इसी भावना से बना हुई नीलम श्राम कुमुद को बहुत बहुत उलझा देती है। उस बार एसे ही कुमुद ने उसे देखा था। तब वह अपने किसी निकट सम्बन्यो के य । भाइ थी। तभा सय कुछ समझा जुमा, मन के पास आ जम चला थी। घातें उलझता ही चला गई थीं। और जब सुलझी, तय पाया कि वह नीलम नाम की सुदर, भरी भरी नारी में श्रा घटका है । वैसे ही कभी यह उसके माइ को देखन घर गया था। उसका भाई है। तनिक यामारी से लगा, और यह यामारा को वात नालम के मन में घेदा भर गई है । सूष इटपा घह उम निकाले कैसे ? कुछ , तो सामने नीलम भाइ । भेया का पाड़ा मे ऊर, यह तिलमिला कर बोला-"कुछ खाइयेगा ?" इसका भाई कुछ बोला नहीं, और वह समझदार नालम जैसे सर कुछ समझ गई हो । गई, फिर यक तश्तरी में कुछ जमा, पाहर का ऑगन पार कर ऊपर की सीढ़ी पर थाई। तभी कुमुद के मा में अनजाने बात उरी थी कि यह नीलम क्या है, जो वह उसे समझ नहीं पाता है? फिर उसके सशोधन की याद आई थी, और श्रम उसकी कहानियां को ठीक करते समय, जैसे नीलम अपने से बाहर थाहर हो लकीरों में था, स, भैर, कह जाती हो कि हाँ कुमुरत स्वागत गात ठीक कर देना। और देखो, कड़ों स्यय को ठीक न कर बैठना। उसके छोटे-छोटे यगार-मर श दा से लगी लगा लाइनें और उपका चित्रण ! नालम कुछ सुझा आती। बहुत पुरानी बात नहीं, बिलकुल इ, अपनी ही बांके से लदी लदा भर, जैसे उनके मध्य की रेसार्धा में उतर, जरा पास था, मिस जाना चाहती हो। और कुगुद को लगता, उसमें एक जागरण फिर से स्थान पना चला है। यह उसकी यात साधे से। नारीकीपात-नीबम की यात . सध्या को मातम घाई थी। कुमुद हो पा अपने को भून गह। फिर समल, गम्भारता में श्रा मजा से थोड़ा-"किमा श शादी हो, और किसी को मिाई भी न मिळे 'भा याह और कुमुद चिलाया-"म" "हो, कमा के साथ ! मुझपे भा अधिक सुदर रही होगी।" 'नालम" नम चुप था। पात्र शादा का पात पकड घले कर ) इतके चारों ओर उड़ रहा थी, वह कम का हा ग्यारहा होगी। और उससे एक दो नाचम अपने को स्यामा में या सू पाया। दयदया पर बैठा रहा पुरवार छ मोचना सोपना सो। और उमुर योनामा- 'ITम, भनिय का मसौज्ञ उदा रा रमी से लग दम क्या नहीं करत है ? प्यार शादा और सब पता नीलम ने यात फार महाया-ना समर साबने के बाद न होता है कुमुद | नारी पाता है कि उसका दुप सीमित न रहे। यह भागे यह जहर । पाहे यह दुध अधूरा ही हो पर नहीं । ए दगा में स्कना पार है और चलते रहना M ६. पुण्य 'क' ग्रह कमना नाम की नारा मालग के सहारे फुर सिली सिजा हो उठा थी। एसे हा यातों बातों में कमी उमा TIA मा पाहा था, और तमा मुदरता का परि भाषा में थाने को नीलम से हारो मान चुकी थी। कुछ दिशों के बाद नालम बहुत गम्भीर मजाक काने बगी धी। अपने उत्तर दायित्व सहा वह मजाक कुछ बुरा यादेही लगता था।हाँ नाम का एक भराभा। रूप उसमे बहर ही रह जाता था। इसी को रोक फिर नाजम बोली था-"नाम मा ता मिलने ही है, पढ़ी लिपी भी। पाप वुमुद, और यह कमना के वर्ग " धागे नाम हम पड़ा। हम ही रही, जैसे सिता रहेगी। कुमुद नातम के सामन गम्भीरता में यह पता है। और वह चाहता है कि उसको वह पकान उसे दु य न दे। चाहे मजाक वह भले हा न करे। और पढ़ा, लिया बालम का मजा घर कर गया। उसने सोचा-यह नो पास हो नीलम में समाई नारा है, वह इतनी गम्भार क्यों है जरा हँसा हँसा में आ दार्शनिकता से अग, नीलम भर २६जायगा। नीलम कमला नीलम नहीं, नहीं" और। नीलम ! नीलम ! नीलम जैसे नीलम में नीलम है। फिर कभीमा ने उसके स्वामी के पास जाने की यात सुनाई थी। स्वामी कुमुद खूब घेदना से भर गया था। नीलम का स्वामी भी है। जरा कुमुद से सुन्दर, स्वस्थ और अधिक पढ़ा लिखा भी। फिर भी कुमुद क्या कहे ! फैस सुनाये कि वह स्वामी उसे भला नहीं लगता है। नालम को अपने में छिपा, क्या यह भला रह मा सकेगा। चौर तभी नीलम झिलमिल झिलमिल साड़ी हिलाते हिलाते सामने था हँस कहती-"नहीं, नीलम की मन की यात उत्तकी हसी क्या वह एक मखौल समझे ? और स्वामी ? दिमागा नीलम को दौड़ । जैसे चुप हो धीरे धीरे कहना चाहती हो कि यदि कुछ पहले मिलते, तो तो । फिर नाम सध्या को श्राई । तो कुमुद कुछ बोला नहीं । चुपचाप किताय पद, उसी में खो, चुपचाप बेटा रहा। पाते हो नीलम वुमुद को देख सिलखिला पड़ी। और कुमुद लेग रहा, यह सोचते-सोचते कि इस टुकड़ा-सी जिन्दगी में यह नीलम को कहाँ रखे ? नीलम है नारी, सुन्दर और पढ़ी लिपी भी। और वह आई. क्यों जम उसे टूटना ही था ? विचार हटा । नीलम ने कहा था-"यही दूर से या रही हूँ। सच ! धूप में। खूब थक गई हूँ सूब" तो कुमुद इसकी पाहा, घेदना से तिलमिला कर प न रह सका । धीरे से योला--"दुख से जिन्दगी छोरी होती है। आपके कष्ट से ज़िन्दगी का एक साल और छोटा हो जायगा।" सुन कर नालम ने चाहा कि कुछ कहै। फिर बोली 'धाप भी पात कट गई। और मो फिर यातों में उलझा थी। कुमुद को लगा, जिन्दगी एक स्वस है। इसी स्वम में भा, कभी सच ही तो उसने विद्या को भी परसा था। यह भी ऐसी ही थी। भजी मतो पूरी, समूची विद्या! फिर शादी की नोट ले, यह भागी। इसका स्वामी और नीलम भा तो स्वामी रखती है। स्वामी स्वामी, स्वाती और तभी माने फिर कहा-"सुम तो स्वामी के पास जाने वाली हो?" " साज गुम पर नासम एप सा। और गुरदको यह सामो माया नहीं। यहवार यह फसेस विधा मी तो उमने ऐसे का सोई है और अब नालम-चम-या भीमम नालम धमा- कुमुद विधार इलफे-मालम भोगावगा। उमे बहकमे मळेगा। स्वामा का दरजा किम योता है। भोजम भो उमा में गह. भोर विवाह ! व मालम उठ कर पास पाई। उस देश इगुर सडियो ६ दिपा सुपधार लेटा हारमा । और अब नाम न माना कि मुद रो रहा है। मुरकी वेदना! चौक का नाम मे विजात पाम भा, सिर पर हाय पंरा और पुमुद को am, एक हाय की पतजा पतनी अंगुलियाँ उस मरमा पर गमगम थमा है। ये अप हटना नही चाहती है, थमा ही रहेंगी। मन का जरा समझा कर यह बोला-"कुगुन, किसकी याद पा रहा है?" याद १ मुरचूर पूर-पूर कर रोया था। जैसे अनजाने ही कह पाहा हो कि नाबम पह सम कहती हा मोखो ! और क्या कोई बताने की बात याकी ससका मोर , माँ ने सुनाया कि गुर को कोई पात खा गई है। क्षम चला। मागे मो मे धात जोदा थी, मुम्हारे स्वामो के घर जाने का पात से ही मुर को थोर कुमुर ने साचा था कि यह मा इतना सब क्यों कहे जा रही है। जब सच है भा और नहीं भी। नीलम क्या करे ! खसा में गर, येदना से भीग, घर रह गई। फिर सम समझ कर पोबा-"लिः, पागल हो ! मैं कहीं न पाऊँगी सब, कही न जाऊँगी नियों का भौति रोते हो " उस समझ जरा गम्भीर हो, कुमुद बोला था-"नालम, रोना ही मिदगी का सुख है। हम रोते हैं, यह जानने के लिये कि सुख क्या है। और उसे ज्ञान का भुलाते नहीं । तुम नाळम हो, स्वामी रखता हो और स्वामी का भारतीय अधिकार सुरहें रोक नहीं सकता।' नीलम कुछ बोली नहीं। हाँ, उसकी आँखें भर आई ।
नीलम - जय माँ चली गई, तो कुमुद फिर बोला-"नीलम, तुम लिखती रमा। स्वागत गति और कहाँनियाँ मा । और पाना कि सुम्हारे लिखने में मैं हो हूँ।" नीलम चुप रही। पिर मार को भली भली नमस्ते में उसे दूर कर कुमुद जरा हलका हुघा- तो माँ ने सुनाया था कि तुम्हारे चले जाने के बाद नीजम यहा बेचैन रहो-पूछती था कि कुमुद क्यों रोया ? और मन से उलझ स्वामी से छ' मेरी धोती में छिर नीलम भी बड़ी देर तक रोई थी। नीलम मी रोह कुमुद चौंका । नीलम में अपनाव प्राया। सोचा, सच ही क्या मोजम नारी है। नीलम नारी फिर एसया नीलम बाहर का दरवाजा पार कर अदर पहुँची और कुमुन उसे पा, अपने से थाहर श्रा, माप मर गया था कि नालम ही है। जो मन में छिपी छिपी नारी का एक भराव है, उसे नीलम से मिलता गुलता पा, वह खिलखिला पहा । नीलम पैठा, तो कुमुद बोजा-"अपनी चीज़ देती है ?" सुन कर नीलम मुंह छिपा कर हँसी थी। और कुमुद 'माधुरी' की प्रति सामने की । नीजम पढ़ने में खो गई । और जब जागी, तो पाया कि यह कहानी उसे अच्छी नहीं लगा। कहानी ? हाँ, यह भी तो एक कहानी ही है! नीलम कुछ सचेत गई । चुपचाप ही बुरचार प्रति बन्द कर बैठ गई । कुमुद ने पूछा-"कैसा रही?" नालम ने चाहा कि वह कहे, पाप ठोक नहा लिविते हैं, और मिजन वियोग की छाया के नीचे हम एक-दूसरे को क्या पहिचान न सकेंगे ! मन मार मोनो-"थाप ने यह सब क्यों लिखा?" आगे नीलम भावों में खो गई। कुमुद ने भात पकड़ी। बोला-"नीलम । यहो तो मैं भी नहीं जानता हूँ।" उस दूर का नीलम में वह यात घर कर गई। नीलम की बातें कुकुर को अब भलो लगता है । मन से उज्जम वह उन्हीं का निर्माण कर चुप रहता है। और एक सध्या को कुमुद ने जाना कि नीलम स्वामी के पास ना रही है। उस दिन वह उसके विषय में उसे समझाता रहा । और कि कमरे में घुसा, कागज पर पेसिल की रेखाओं से रात को मनवहला काता रहा। जैसे वे रेखायें उसके मन में एक प्रभाव का पूर्ति कर खिंधी विंची, गहरी गहरी हो उगा दो। उन्हें
रवर समिटामिया यह मुचित नहीं हो पाता। और घर ये रेसाय एक नारी
का रुप ले रही थी। देख, कुमुद ने माना कि नोक्षम है। शुषधार कम
शादी है और कुछ बाबती नहीं है। जैसे भव यह गूक ही रहेगी । म्यामी म काका
उप्त मूरता की राह में क्या पायाखो सगो।
सभी जैम पिन में नीलम पाई।
और कुगुरन धीरे मे पनि कागा पर इस बाधा।
यहा मुबह नीलम को जाना था। कुमुद रात मर, जागता चित्र बनाना था।
जैग दूर पर यह नाम को देख चौका।
नालम, नाखम
पर भीलम में उसका आम था।
नमा बम का bfmoया। पीछेरा पाले में मानम और धागे उसका
स्वामा । कुमुद धागे यदा और मजम उसे देख इसी मही। प्रयास भर, स्नेह से
लग, यद भेटी हा हा । सभी इमुदगिक पास पहुँच, सधा-सपा का काम
बगदल भीतर फेंक कहता-कहता एक चोर पा गया कि नीलम, मुम माना।
माना ज़र। यह सुम्हारा पाज है। मैं हारा, तुम जीती-जीता। आगे कुमुद
फूट-फूट कर रो दिया । रोता ही रहा।
मालम ने वहन उठा कर देखा-एक विविसी नारी जा सिली खिखा
बठा थी। और उप अपनी-पी पा, यह रोमाधि स्वामी पर रकी,
चाइना हो कि तुम हो म्यामा ? यलो, तुम हो? और पुमुद को वह क्या करे ?
नीलम री रहीधी।
होगा रहा था।
उसका स्वामी कुन समम सका।
-
नीला डोरा उससे जो मिना, तो यह सकुना, लजा, मुक कर खिों में टिक गई। अपने से बाहर वह नहा थी दूर दूर जीवन के किनारे से टूट, सिकुड़, सट कर पात या गई पर बोला नहीं कुछ । चुपचाप रही-केवल हँसता सी। उसने भी सब कुछ सोचा होगा शायद सुल भी जाना चाहा हो । सूनापन मेला था, मन में किसी को समझा बुझा कर मनाया था। इस रचना को वह पाता कहाँ थी? अपने में खोकर वह उसे दवाये थी। तीन साल से उसकी मां उसे मेरे जीवन में घुला देने की सोच रही थी । कुटुम्ब के सदस्यों ने भी बातों बातों में मुझे ही चुना था । और मैं भी तो एक सन्ध्या को उसके यहाँ पहुँच गया था। तब वह जरा पास श्रा, धागे खिसक कर मुझे पढ़ लेना भर चाहती था। अपने में चूकी थी वह । एक के भीतर सीमित्त उसके नारी सुलभ पाकर्षण को समझा था। यह कुछ निकट पाती गई और फिर कई बुरे-बुरे साल टल गये, ठहर सका नहीं। उसे उत्सुक बना, रला धुला कर चला थाया, पर यह जैसे पास ही रही। मन में बहुत निकट थी, जैसे यह बोलना भर चाहती हो कि मैं सो नारा हूँ। तुम से छिपा नहीं रहना चाहती, और तुम क्या सदा दूर हो रहोगे ? जी चाहता है तुम्हारी छाया को पकड़कर याद कर लूँ, पर कह पाती नहीं कि यो जीजा, तुम जीजी हा में यो हिपे रहो। अपने पास तुम्हारा मन घटका देख सब कुछ पा लेती हूँ। । तुम्हें देख कर जी भरता नहीं। और जीजा सच हा तो तुम जीजा से भी निट की चाज हो मैं तुम्हें जीजा ही में क्यों सामित रस्। अपने में क्यों न बोल देख भर लें। उस पार पो धारस आया, तो मामा ने बताया कि कमला बढी भावुक है। चार-पांच महीने के बाद भी उसमें एक अपना अपनरव है ! यह अपने में छिपी धरी नारी कमज्ञा को अपने से बाहर नहीं पाता रहा थी। बातों का जवाब नपा तुला देता । उसकी हार में भी एक जीत रहती। बचपन की सरलता के साथ साथ गहरी चुकियों या उसे पदर था। मामी की यहिन में अपने को निकर पाता रहा । तान साल की पावश्यकताओं को उसका भरा भरा मुग्य देव का सिाजा था । लाउन से साड़ियों सा उसे उलझा पाया था, धौर भइ यह कमला के रूप में मानो विरानी इलाज १पर उसे अपने लित न रही हो हस खेन, विटय रूठ कर पास था, मानो गम्भीर, मायुक, दोल हो, उप हो जाता हो। फिर भी जैसे यह दूर हटना नहीं जानती है। भाभा ने मुझे स्वय मापा है । दद्दा का याद में पुरषों की भावुकता को सममा है। वह अपना भूल में एक पाती है। पर वह कुछ नहीं पाती। कमला के बारे में कभी कभी वह कुछ कह लेती है। अपने से दूर होना भी उसने सीखा है, पर साल की मामी यातों में वह पूर्व दुयक गइ है। कमना की प्राया को हुगा धाइ कर भी वह अलग अलग हट जरा संभल जाना चाहती है, पर कमबा के स्नेह को वह भटका नहीं पाती है। उपरी मन से उसे दया धार से हंस, पासा, उसने भी कभा कहा था कि मला इस घर में नहीं मा सस्ता है। फिर कभी यताया था कि हम और दहा सगे भाई हैं और मामा और कमला दूर कर सका नहीं ! मशा को अपने पास से-पास देखने की चाहना कर के भी उसस कह न पाता था। उस दिन जरा यूँ ही जी चाहा कि कमला। को उष हूँ। यात पकड़ ली और दिखा- कमला पर कलम चला नहीं। विचार मन में ही रह गये। सोचा, यह भी नारी है किसी को जरा सा देख हँस भर देना चाहता होगी, और मै भी तो पुष हूँ। दोनों प्यासे है। खगा भाभी पा रहा है। पीछे देखा तो सघ, भामा कय की खड़ा पर देख रहा थी। मैं कुछ मेंप गया। पत्र फाड़ कर फेंक दिया। पर मामा से सब कुछ ना कर दिल में उतर चुकी थी, योली-"तुम्हारा यह खिंचाव टा नहीं है। कमला को बदनाम करने की कोशि क्यों कर रहे हो? अब की बार जय मैं कानपूर गई थी, वय पिता जी कह रहा कि राजन को कमला के पास पत्र लिखने को मना कर दी यह ठीक नहीं है।" मैं कुछ बोला नहीं । केवल सोचा, चाहे भले ही भाभी की घासों में वह छ हट कर पृथक हो जाये, पर फिर भी उससे दूर रह न सांगा। नारी को विला भाननाओं के सगे वह घुमतो जायगी, पर टूटा नहीं। और चार साल की स्मृतियों में यह क्या अपनी खोई हुई सूरत ओंकन नायगी। कमला को पड़ा है, उसे समझा है। वह समम अधूरी समझ से मिल कर से अलग सगी पौर अमी वह मा नारा है अपना कमला के लिये भी उसे चिन्ता नहीं है, मैटिक की पराया में जब वह पस्ट डिवाशन में पास हुई या, तब भाभी ने उस रला, मना कर सम भाया था कि राजन स कमी-कभी पूर्ण लिया कर, यह भी तो अपने मोर भत्र । उस दिन सिनेमा गया तो देखा कमला दर एक युवक के साथ पास ही बैठी पुल घुल कर बातें कर रही थी। दिव कुछ टूट गया, बोलना चाहने पर भा बोल म ।
नीला टोरा । सका लगा जैसे थम वह कमला है नहीं। उसकी पास-पास हँसी में अपने को सोने की इच्छा रखते हुये भी मैं उससे सट न सका। केवल चुप ही एक और पैठा रहा कि यह युवक बोला-"कमला, मैने बी. ए. में हिन्दी ले रखी है। इसलिये समय जरा कम मिल पाता है। जी भर घाना चाहता है, पर स्टडी में अटक कर रह जाता हूँ। और तुम तो खाली रहती हो । तुम्ही या जाया करो न " और कमला हंस कर बोली-"आप तो बहुत व्यस्त रहते हैं, और मैं ।" कि धागे कुछ सुन न सका। उस दिन न जाने क्यों, सिनेमा म मन न लगा, जी उचाट हा रहा था। स्त्रीन' की ओर देखते हर कर भी कुछ समझ पाया नहीं। फिर कमला कुछ योली नहीं । मुझस जीती हुई नारी कमला को प्रबोध पढा रहा था। घर या कर सुना कि उसो प्रयाध के साथ उसका जीवन बँधने जा रहा है। और शान्ति १६ साल की सरस बालिका बढ़ती हुई हँसी में अपने को पाया था। यह मुझमें धुला शान्ति, हृदय के पास था मानो कह चुकी थी, कि यो चाचा, मैं छोटी सी हूँ, ज्यादा समझ नहीं पाती फिर भी तुम्ह पाया है। तुम जो कहोगे उससे दूर न रहूँगा । रूट, हँस, खेल और खुन कर यह मुझे सो चुकी है, यह कमला को खूब जानती है। उसकी धरा भरी सकुचाई हुई आदतों से यह खून हिलक गई है। मामी के साथ जब उस यार वह पहले पहल कमला के घर गई थी, तभी उसने चुपके से कहा था-"वाचा । श्राज मैने मौसी को देख लिया है। फल उसे यहाँ धुला बाऊँगी, तब आप भो दस लेना।" उसके बाद वह प्राय तीसरे चौथे दिन कमला के घर जाती । खाने को बैठा, तो शाति ने सुनाया कि श्रासकल मौसी प्रबोध के साम अधिक बुखी रहती हैं। नाना उसे खुद घुला कर वातों बातों में मौसी को अटका फंसा कर अलग हो दूर दूर हट जाता है । पर यह मुझसे हटती नहीं। कभी-कभी भापकी बातें पूल हंस भर देती हैं । जैसे उसने कभी धारको जाना हो, पर प्रयोघ फिर उसे बातों में लगा पास कर लेता है । कल जो मौसी के घर गई, तो वह पहले से ही बैठाया। मुझ देख कर मौसी उसके पास गई नहीं। मेरे पास बैठी-बेटी पाएकी बातें करती रहीं और वह चलते समय धीरे से बोला था-"कमला, तुम न जाने क्यों, रट रहा करता हो ? मुझसे भी अधिक यह लड़की तो है नहीं और मौसी इसका उत्तर ६न के लिय बाहर गई । मैने सुना, प्रबोध को जाते हुये यह सुना रही थी कि मयोध तुम नहीं जानते । अगर जान लते, तो कितना अच्छा होता। खबरदार गमतीजी है, जो उसके सम्बन्ध में कुछ कहा । - " 1 इलाज . मेरे पास प्रा का पाना-'शान्ता कुछ नायगा, कमीकमा मो मा बापा कर।" प्रयध घाँखों के पास था गया, पर मन से खा का हर गया। भायुक युग था। उसने भी कमला का भोर कर पुष कहने को साधा होगा। योर एक दिन प्रबोध का निमग्रम प्राधा या दाता। नोचे कमला के भो हस्तासर थे। दिन भर सार में चला गया थोर शाम को प्रपोध और कममा स्थय पा कर घर पर मिल, सा मैंन देखा कि कमला में कोई विरानापन ही थाना सदा का नारा कमला पास था माना दालना गर चाहता हो, पर बोल पाठी मया। घरा साहा में दिस धरा पक रेखा सा उसासीको भी धरने से बाहर न पाया था, पर यह पे पास माने म कुट लगने लगता थी। भयो को दिपाये भर दूर रही कि प्रबोध बाला-पाठ पिकनिक का प्रोग्राम है। मापको भी सामने को भी कर रहा है । दायत भा है।" घऔर कमजा, प्रयोघ क पाम येडा दुई कमज्ञा ने जरारेमा, सो पौर मी जपे साक कर पास थाना भर पाहता हो । प्राय भाग में कुछ कहा। हाय के परतों के नीचे वह उतर गई, पर कुछ बोजा नहीं। और मैंने सोचा, सोचा और सोचा कि प्राध कमला के मम से बंधा है। इसका हँसी में कुछ रोल कर पाक मर जाना चाहता होगा। यह भी मनुष्य है, खोका पाया में अपने को सुला जगा कर मुखा होना ही चाहता होगा, कि कमला पोजी- "धलिये मिम्र प्रयोग । राजन या हो पायगे, देर हो रही है । कममा का चिरानापन अब भी पाखों से दूर रहा। चौदह साल की कमला जिसे घोट से बड़े होने तक सूर पहा था, उसमें परायापन भय माप, देख, समझ सका महीं। फिर भी कुछला हा गया, पर प्रयोध नहीं माना। साथ हाशति को भाले घलने को कहा। मैं माना न चाह कर भी धन दिया। रास्त भर कमजा चुप रही। शान्ति ने भी अधिक उसे सग न किया। दावन भर कमा सिधा खिया रहा। चौखों के भाग पर मन के पाये । चलते समय प्रयाध ने सुनाया कि मेरा विधार य का गरमी में मसूरी जाने का है । साथ ही कमजा भा जानेवाली है। मो प्रोग्राम की गुशी में यह बात का दावत है। चौथे दिन कमला को पन लिखा- . कमजा. - सम बोलोगी नहीं । मेरे जाने पर भी नहीं । फिर भा जैसे सुम्हें पोजना पड़ेगा, मदोध के साथ जाने के लिये मैं तुम्हें मना करता नहीं,पर फिर भी मुम्हें पास रम्य 1 गीला होरा .३ जी भर देख लेना चाहता हूँ। और तुम मा तो नारी हो आँसों की मानी और हृदय की पहिचानी हुई। शान्ति को भेज रहा हूँ। अपना चिन दे देना अच्छा । तुम्हारा, राजन" फिर शान्ति को चुला कर पन दे समझा बुझा बोला-"इम अकेले में मौसी को देना, समी " और शान्ति चन दी। बाहर देखा, तो प्रबोध और कमजा खडे कुछ बातें कर रहे थे। वह रुक सका नहीं। सीधा अदर चली गई। वहाँ नानी से जो कुछ उसने पाया उसमें वह मौसी का भूल गई । लौट कर श्राइ, तो कमला अकेली था। उसकी श्रात जैसे भरी भरी थी। और उनमें मानो सारे विश्व का उपहार भरा था। वह बोली नहीं केवल शाति के पास चुप था खड़ी भर हो गई। और शानिन जैसे उसे छोटी हो कर भी पढ़ चुका थी; कुछ भाव सधा कर योनी-"क्या राजन चाचा की थाद पा रही है" चुप। अब की बार शाति ने पग धागे यदा कर फहा--- -"मौसा, चाचा ने दिया है।' कमला सहम गई । सोचा, यह भी अपना है जरा सोच, पास श्रा, कुछ पढ़ लेना भर चाहता है । और क्या प्रबोध से भी अधिक यह कि प्रयोध का चित्र सामने था। वह भी । अपनी धरोहर में उसने भी किपी को पाया है। लेकिन वह रे क्या प्रयोध थौर राजन । श्रम से पहुत बहुत पहले उसने उसम एक बात पाई थी। उस दिन वह कालेज से था कुछ कह लेना चाहता था, और वह लजा से दपी, मुस्कानों स हैका कुछ योली नहीं थी। गोलरिग पर रमाल कसा था, अंगुलियों में नीले डोरे की सुई उखमी थी वह कुछ धुन रही थी कि उसने आते हा सुनाया था कि मेरा बटन टूट गया है कमला और वह जरा सा हँस, मुक, खुल कर उसे उस नीले ढोरे से टॉक भर गई थी। सिल्क की पतला कमीज़ पर नीला डोरा भर उसने धरा था। जैस यह दारा उसके मन में उतर कर घता देना चाहता था कि 'यो राजन! यह भी एक नई चीज़ है, तुम्हें सदा पास रखने के लिये ही कर रही हूँ। और तुम क्या इसे तमा न करोगे ?? कि शान्ति बोली-"मौसी, चाचा कल कह रहे थे कि अब इलाहाबाद जाऊँगा । यहाँ प्रेक्टिस कुछ चजती रही है । तुम्हें बुलाया है, शाम को धनी थाना।" दूसरे दिन पाक गगा, तो देखा कमला भी वहीं थी। मिलते ही उसने नमाने किया, फिर कुछ दूर हो जैसे अलग हट समझ गई थी।
तग न किया। दावत मर कमज्ञा सिचा विचारहा। थोपा के प्रागे परमर मरे पर पाकर बा-गागा माया, कमीकमा नो पात्रापास।" प्रद्रों के पास गया, पर मासे पकाया। च भास था। उसने भी कममा काम कर पुकान कामाचा चौर एक दिन का निमप्रय पाश शाशपणा नौमm हस्तार दिम मापान में मा गयी. काजोपी मा म्य माकर घर पर मिमे, हा मेन देना किमया में कोई सिमाया ही था, सदा का मारा कमा पाम मा मामो यामना मर पाइलाहो पर पानी की। रासार में दिसरा परमासी महासमीरने ममारम पापामा पर यह पाम पान म पु मगन ना थी। प्राने को दिप मारी प्रबोध यासा-'मा पिकनिकका पोग्राम। पापको मामाय घने को म कर रहा है। दायामा।" चौ. कमला, प्रपोध के पास हा दुई कारवा, सा पर मसाल कर पास पाना मा पासा हा भाजीसा में कदम परतों के पन्ने यह उतर गई पर रोमानहा। और मैंने सोपा सोश और सामाHिE TREE मन से है। उसका हंसा में कुल गार PH माना चाइना होगा। यामा गनुपपोका पाया में अपने को मुभा नगा फर गुखी होना चाहा होगा, रिकामा योगा- चिलिये मिस्र प्रयोग न माहाभागे, दर हाहामा का चिरावार पर भागाधाम दूर रहा। चौरस साल की मासे घोट से बड़े होने तक पदा था उसमें परायान पर भाप, दल, सम समातिमी म लग गया, पर प्रयोग नहीं माना । साप हासत को माले पक्षने को कहा बामा म पार कर मा पत्र दिया । राम्ने भर कमा शान्ति में भी अधिक उमे पीये। पजते समयमा ने मनाया मेरा विचार का गरमों में भारी जाने का है। साथ ही कमजा भी जानेवाला है। इस प्रोग्राम को गुणों में यह माम का दारा है। धौथे दिन कमला को पत्र लिखा- “कममा! सुम योजोगा नहीं। मरे पुझाने पर भी नहीं । फिर भा रे तुम्हें योजना परेगा, प्रयोध के साथ जाने के लिये मैं तुम्हें मना करता नहीं, पर फिर भी तुम्हें पाम रस नीला टोरा जी भर देख लेना चाहता हूँ। और तुम भी तो नारी हो घाँखों की मानी और हृदय को पहिचानी हुई। शान्ति को भेज रहा हूँ। अपना चित्र दे देना धाया । तुम्हारा, राजन" पिर शान्ति को बुला कर पन दे समझा घुमा बोला-"हम अकेले में मौसी को देना, समझी ?" और शान्ति चल दी। बाहर देखा, तो प्रबोध और कमजा खहे कुछ बातें कर रहे थे । वह रक सही नहीं। सीधा अन्दर चली गई। वहाँ नानी से जो कुछ उसने पाया उसमें यह मौसा को भूल गई । लौट कर पाई तो कमला अकेली थी। उसकी आस जैसे भरी भरी थीं। और उसमें मानो सारे विश्व का उपहार भरा था। वह योली नहीं, केवल शाति के पास चुप या पड़ी भर हो गई। और शानिन जैसे उसे छोटी हो कर मा पढ़ चुकी थी, कुछ भाप सकुचा कर योली-"क्या राजन चाचा की याद मा रहा है ? चुप! अय की बार शान्ति ने पग भागे वदा कर कहा-"मौमी, चाचा ने दिया है।" कमला सहेज गई । सोचा, यह भी अपना है जरा सोच, पास श्रा, कुछ पढ़ लेना भर चाहता है । और क्या भयोध से भी अधिक वह कि प्रबोध का चित्र सामने था । वह भा मनुष्य है। अपनी धरोहर में उसने भी किसी को पाया है। लेकिन वह करे क्या प्रयोध और राजन । श्रम स बहुत-बहुत पहले उसने उसमें एक यात पाई थी। उस दिन वह कालेज से था कुछ कह लेना चाहता था, और वह लजा से दयो, मुस्कानों में हकी कुछ घोली नहीं थी। गोलरिंग पर रमाल कसा या, अंगुलियों में नीजे डोरे की सुइ उखझी थी यह कुछ चुन रही थी कि उसने आते हा सुनाया था कि मेरा बग्न टूट गया कमला और यह जरा सा हंस, मुक्, खुल कर उसे उस नाले ढोरे से टाँक भर गई थी। सिरक की पतला कमाज पर नीला दोरा मर उसने धरा था। जैसे वह बोरा उसके मन में उतर कर बता देना चाहता था कि 'ओ राजन यह भी एक नई चीज़ है, उन्हें सदा पास रखने के लिये ही कर रही हूँ। और तुम क्या इस समान करोगे ?' कि शान्ति घोली-"मौसी, चाचा कल कह रह ये कि अब इलाहाबाद जाऊँगा । यहाँ प्रेक्टिस कुछ चलती नहीं है। तुम्हें बुलाया है, शाम को चला थाना ।" दूसरे दिन पा गया रेखा कमला भी वहीं था। मिलते ही उसने किया. फिर कुछ टर - ७४ इलाज - मने कहा-"कमला, मेरी भी कुछ सुन लो। मैं थोड़ा अधिकार रखता नहीं ! पिर भी जो करता है कि मुम्हें प्रोम्ब मर, मी मर निहार पास रखतं । म जीतीं और मैं हारा ! प्रबोध को थपना स्थान देकर मैंने जाना कि कमला अब विरानी है। मसूरी टूर की खुशी में भी विराना रहेगी। लगता है कि तुम मुझे पमा करोगी नहीं। हुलाहाबाद जा रहा हूँ, तुम्हें चिट्ठी लिएस धो कि कि भात अधूरी रह गई । प्रबोध बीच में था गया। उस पाम कर दूर हट जाना पड़ा । कमला एक ओर सरक अटक गह। शाम को शान्ति के हाय एक सिपक की कमीज़ और एक पाँच रुपये का नोट कमला के पास भेजा। खोला, तो उसने यही पाया जो आज से चार साल पूर्व मिला था। कई बार धुलने के कारण फ्ट चला थी। उसी के घर में उसा के हाथ का मरा हुन्ना नीला सारा जरा हलका हो टूटना चाहता था । पिर उमने पाया कि एक शाम का में गाड़ी में बैठ स्टेशन की ओर घज्ञ पदा था। इलाहाबाद का ट्रेन पाई । मैंद पाया, तो मिगनल के पास एक तागे में बैठा कमला कुछ सोच रहा था। उसके हाथ में एक कमीज़ थी जो कई बार धुलने के कारण फर घना थी। उसी के घर में भरा हुया 'नीला डो' जरा हलका हो टूटना चाहता था।
छाया-गीत प्रभा अपने भीतर अय कोई थात पाने लगा है। मन में जो एक पीढ़ा जमी है, उसे वह छिपा नहीं पाती है। कुछ म्यवहार से हट जरा सामने हो, यह पीड़ा प्राग्वों- आँखों में ही न रह, जैसे हँसती हँसती कह जाती हो कि प्रभा, देखो, तुम टूटना मत । समाज, ससार, लोकाधार तुम्हें क्यों उलझायें ! जो बाहर है यह तुम्हारा है और उसी पर टिकी टिकी तुम रहना । इस यात से प्रभा का मन कुछ कठिन हो पाता है उस कठिनता की तह में एक इनकी छाया देख, वह सिहर उठती है। जिन्दगा में उत्तम की कुछ ऐसी पकड़ पाई है कि उसे याद नहीं रहता कि वह उत्तम है, और जब कि स्वय प्रमा, वह प्रभा है जरूर, पर उत्तम से हटने की बात होता है, वहाँ दिल का एक कोना पाली हो जाता है और यह कोना भारीपन से भर घाता है। इतना भारी कि बैठना नहीं भाता है। और तभी उस सही या प्रमा से उत्तम जैसे कहने लगता--प्रमा, जरा अपने को समझा लो। मैं यही चाहता हूँ। तुम रहो, रहो ज़रूर; पर अपने से बाहर क्यों रहो ? और जो दूर, बहुत दूर, नहाँ पर श्रोखों का टिकाव एक लकीर सा बन उन्हें निहार चुका है, वह क्या श्रय पेसा हा रहेगा। फिर वह क्यों उसके लिये बहके ? पक अनजान पीढ़ा लिये खिली खिली रहे वह पर उत्तम से भली भर । यही उसने जाना है । उत्तम उसका दूर का सम्बन्धी है। यह सम्बध उसने सोचा है। कई बार घर, उसमें उलझी । तब वह यह जानना चाहती था कि उत्तम उसे क्यों अच्छा लगता है। यात जरा उमरी। उस पार वह क्यों उसके सामने सोई-सोई सी रही है और सिर की धोता का एक सिरा जरा हटा हग रहा होगा, उसमें सरी सटा, पतली पतली अंगुलियों भी और समीप उत्तम, पीले माँ । तब क्या उसने सममान हागा कि प्रमा जरा अलग नहीं है? हाँ, एक बहान में श्रा, मनमार कर लेटी-बेटी रहना चाहती है। और उत्तम ने माँ की थोट ले सुनाया था---अाजकल दिन में नींद अधिक पाती है।
इलाज । प्रभा मजाक के बाहर ही ठहरा । वैपी हो रहा और हिला नहीं जैसे पास प्रा । मन में कहा-"सुनो जा, मुझे लेटी ही रहने दो। समाज का पर्दा कहाँ तुम तक श्राने देता है । जरा ऐसे हा भर जाती है। प्रभा छ योली न था । मन की विव शता को आप उस तौल यह समझ चुकी था। चाहा कि कुछ बोले, पर मन मार रह गई। और तब उसने देखा कि सामने जो पुरुप बैठा है, यह एक पहली सा हो, मन के नाच उतर रहा है। उसमें एक गहराई है। फिर एक हलका स्वस्थ अंगड़ाई ले वह हिला। जरा मुँह खोना पाया उत्तम हो है । चा मीच विचारों में खो गई । साचा, गुलावा मादा के एक सिरे से विखरे निसरे बाल और उनमें अस्त -यस्त में क्या ऐमी हा पहा रहूँगी? और क्या उत्तम इसे समझता नहीं है। और मौ? श्रव यह कुछ झिमकी थी कि पीछे मे दो हाथ आ कर साड़ा पर रुक गये, कुछ श्रागे बा साही समाली और फिर रहा रहे। इन हाथों का स्पश वह सह पुका है कि माँ पीछ से घूम सामने आई, कहता कहता-"प्रभा, ऐसी हा रहेगा ? २ खाज, न शरम जा यदर ले. " पर वह उठी नहीं। जरा व दया चहर से ढंका लेटाहा रहा। जैसे कहना चाहती हो कि तुम्हारा क्या जाता है ? मैं लेगेहूँ, मुझे लेटा ही रहने दो न ! और यह उत्तम जाज १ वि पिर माकुर यौली नहीं। और तभावह हो, घार से सादा मंभाला रिम पर गति से मुक यादा साहस, उस भाप, एक घोर अखबार हिलाता हिलाती चली गई। घऔर उत्तम को लगा कि यह नारा असा भावना को विग्वेर, रा शुली मुली मन में प्रा लिक भर गई है। एक घटना से सट, जिगा को हटा, वह ममा श्या एसा हो रहगी-और बोलेगी नहीं ! जय उत्तम चला गया, तो वह कुछ दोली हो पास आई। मन भरा था, जहाँ पर घोसा था, वह स्थान खाली हो गया था खाजा हो रहा। शाम को माँ ने उत्तम के सामने रहने के लिये जली गे सुनाई। तब उत्तम सामन लगा, पर यह चुप हो रहाउसका मन कह रहा था-या मा मुझे समझती नहीं है। और फिर उस विचारों से यह बात अनायाम ही जुद गई कि उत्तम पही सा है जिसे देख, मुन समम मा सिली सिनी मुझाता कि प्रभा, तू इसी के साथ जायगा, जायगी और रहेगी। ? उमसे - छाया गीत और अय उत्तम जैसे कह उठता-"हाँ, हाँ, प्रभा, तुम मुममें अपनी पातें छिपा देना और पाना कि मैं तुम्हारा हूँ।' उस पार जरा उत्तम रूठा, चलने चलने को हुमा माँ पास था बोली- "उत्तम तुम्हारी जिम्मेवारी जिन्दगी में अधिक है। मैं कहती हूँ कि मेरी प्रभा रानी भी इसमें से कुछ हिस्सा बगले।" रिमा यह सय क्यों करती हैं। एक पुरानी बीती याद लिये वह जीवित रही है। और उसने सोचा, उस बार ऐसे ही उत्तम का नाम उसके सामने लिया गया था। तभी एक श्रद्धा बोट उसके समीप वह पहुँच चुकी थी। और याज? ठीक, ठीक, ठीक वह उत्तम से क्यों हटे? उस रात वह जी भर सो न सकी। एक मानसिक गृहस्थी में था जैसे वह अपना स्थान समझ चुकी थी। और फिर उत्तम कभा धाया था, कुच सँभला संभला । और वह अब क्या करे ? जो एक सुख पना है, वह सुख उत्तम का सहारा ले सामने खड़ा है। माँ थी नहीं, वह कुछ सकुचाई। फिर छोटे भाई के साथ गिलास में भर कर कुछ भेमा । उत्तम बैठा रहा सोपता सोचता कि यह जो नारी प्रभा है, यह कितनी व्यस्त रहती है । जैसे काम में जुर, अपने को भूल, वह अवकाश नहीं पाती थानेवालों की पूरी पिक रखती है, जरा कभी-कभी दोट उपट मी करती रहती है, और तभी मेन से गिलास पकड़ा, कहते-कहते-"अभी अभी मैं चाय पोकर पाया और मदर प्रभा ने तुनक कर सोचा, पी पाये हो तो एहसान क्या, मत पियो। कोई मुफ़्त की थोड़ी हो है। विनोद ने सुनाया--"दीदी, आजकल चाय का विरोध कर रहा है। यह नशा है । स्वास्थ्य के लिये नुकसान करती है" और उत्तम ने वह गिलास उठा, फिर सोचा, ऐमी सर्दी में यह शयत क्यों दिया गया है। सभी उस गहरे रंग के गिलास का धूमिल छाया में उसे प्रमा कासिता हंसता मुंह दिखाई पड़ा । जैसे कहना चाहता हो कि पीना हो तो पियो और भय तो तुम्हें पीना हा पगा। उत्तम ने एक घुट उतारा। किवाड़ की पोटले, प्रमा ने देखा-वह सो को पचा शर्यत के साथ बेल रोल रहा है। और उसने चाहा कि यह प्रमाण सारा शयन क्यों न पो जाय कि प्रमा ने पुकारा--"उत्तम!" 1 अधूरा मिलन - प्रय मैं कुछ मोम जग्गो ने लेट ही लेट कहा-"तो मैं क्या कान् ! मगर हा नारों में मैं ममी नहीं है, तो मुझे मेरे पाप के घर भेज दो। मैं समगी कि मेरे भाग में पहा बिना था" पीन इस दिया । उम अंधी में उमड़ीसा में मन और अविरत इलका रंग भरा था। यह विश्वास जो हादो मावों के पाप एक दावर काम करता है-पिसमें पूषा, महमा भौर पेणी के कर पाकार के जाते हैं। माना यह कह रहा हो यान् ! सुम जग्गा की जमा हुई बातों में न श्रा जाना यह तो नारी का स्वभाव है। इमी में तो वह अपने किये हुय अतीत के पापों को दुमका घेतो है, इसी में यो उसको my ने पनपता है और यहा तो उसने अपनापन है। फिर उसने मिर से चार II र कहा- मैं सुगह कुछ का घोरे हा रहा है, जो इतना पुरा मान गद पोगा।" उमने उठ कर सेल का दियो जलाद । देखा जागो रो रही था। इसके भोळे, गोल मुख पर भामुों की मूखा हुइ बाहरी लकारें थम रही थी, जो अब दार क उपले प्रकारा म साप साफ पदी ना सकती थी। इसने कहा-"गो!" वह गुमसुम । “जग्गो!" वह चुप रही। पागो!" प्रय का पार यह समम् गइ, बोली--"हूँ!' चीन का हृदय भर भाया । उसके नेनों में यह सदा की भाति हसता सेजती था कर उसे मुझा गई कि पोन् । मै तुम्हारी व्याही हुई तो रहीं। मैंने तुम्हें प्यार किया था, यह सोच कर मुम मा भूलों को मेरे दिल से मिल सकोग और मेरी वनमा हुई मुद्रा को मुखमा कर कह सकोगे-गो ! भूल गया है, तो क्या हुया, में तो नहीं भूला हूँ ! ८० अधूरा मिलन 41 जग्गो की बेबसी मे बीन् के हृदय एक हलचल मचा दी। वह सोचने लगा, क्यों वह उसके बारे में ऐसा सोचता है ? नहीं, यह सम मूठ है, उसकी जग्गो अप वित्र नहीं है। मगर बह ! श्रय वह काप रहा था। उसी ने सो उस दिन मेजे से आ कर कहा था- मैं उसे चाहती थी। किन्तु अाज कि ही धनवूमी शक्तियों का सोया हुआ रूप उसे दूर पर रंगरेलियों करते हुये दिखाई दिया । वह जग्गो को प्यार करता था। उसने अपनी यहुत-सी छोटी-छोटी याते उसके जीवन में छिपा दी थी, जो अब परवस अन्दर से निकल कर बाहर विसर पड़ना चाहती थीं । जग्गो के आंसुओं ने श्रीन के चारों ओर वह दीवार पड़ी कर दी थी, जिसे वह तोड़ना चाहे तो सोई नहीं सकता था। बान दियासलाई को दिबिया ले कर उसके पास पहुँचा। फिर उसके माथे पर हाथ रख कर बोला-"जग्गो। छि रोती हो! कैसी पागल की-सी सनक वह चुप न हुई । अब यीन को अपनी गलती पर पूरा विश्वास हो गया। उसके विचारों की ग्बोई हुई छाया में भगो के प्रति सहानुभूति की सिसकने चकर कार चुकी थी। उसे स्पय अपने से होने लगी। स्ना पुरप की दासी है, वह उसके इशारों पर चलना चाहती है। उसके चरित्र पर दोप लगा कर क्या उसने उसे पद नाम करने का कोशिश नहीं की ! यह दात पास कर सोच रहा था, काश, उसमे ऐसी यात न कदा होसी लकिन मे क्या पता था कि वह इतनी जल्दा उससे तुरा मान जायगी कितु पद ? इस विचार ने न जाने क्यों उसके मॉठ पदका दिये मही यह इतना भोला नहीं है। तुरत के जले हुये दापक का लाल लाल रोशना में वह उसकी व्यथा को समझ नुका या । श्रीन् उसके भार को हलका करना चाहता था। वह उसकी गम्भीर मुद्रा को मुखा कर उसे बता देना चाहता था कि तुम रोती क्यों हो जग्गो ? लो, मैं माफी मांगे लेता हूँ, सच। प्रभा उसके अलसाये हुये अधरों पर हन की लकीर सी मुस्तान में जग्गो के उस मूड का चित्र था, जिसे अपनी आँखों में भरने के लिये कमी बीन् छटपटा उहा था। उसकी आँखों की मस्ता बोन् को अब मी हिला रही थी। स्वामी को इस प्रकार से घुप देस कर जग्गो और मी पूर-फूट कर रोना चाहती थी। पर घले नहीं, यह धार रही थी कि कोई उसमे पूछे और वह उसके थागे अपने को सोल कर हलका कर ले । उसको इच्छा थी कि उसका स्वामी उसके रोने पर खुद दो घासू निकाल दे, और तब वह उसे समझा कि बीन् ! सुम्ही बताओ बिना उसके कैसे रह सकती हूँ ! उसके गोल गोक गालों पर दूर तक बहे । को याद कर बाजार हो जाना अपकमा भी जता पालन कईगा!" रात को सोनभर शामी समर मे IIT मकर राना पाहा। पान श्यों व उसके पाम तक न पहुंच मान MATET सारा मार उसे बाँध सा गया हो । टस अधिपारे में सम मामा ने कई पार अनुमय किरा लिया गया पर दरा-साकार राधा। उस दिन शाम फा भयो भी बना रहा था कि उसने पादर अपने सामोरे माय डिमा पनि हा घाया-मो मु। उम पति को सुन कर मार उठा । उसने दरवाने का भो म देसा, तो सरा भ्रम मि ! मिट्टी को दिवस के धुर प्रकाश में पद उस पापान गई कि वह पहा था। पी। उस ६दय कुछ कहना चाहता था-शायर उमडा येशन पर मारा। करवा इस दरिना मा चाहना मेति ने मां-बारपाद भाई, मानो धमा पहर घर छोर कर पाईहा हो भOTOHIT मा Tara में धूम गया, जिसमें पह हिमा के हाथों पर कराया था। इतना इस नहीं, रमे अपने मकान माथ-सायनो स म मा में समाती हुई मालूम पनी था। जग्गो ने दूर तक उमे अधिपारे में बात देश । भव यह अपने को विज्ञान भूल गई थी। रात को उसका स्वामी जय माना पाने माया, तो देखा ताकारी में नमक न था । राटियों पर पुणे के काले दाग लगे थे, चार जजी दुई थी। उसने धार से कहा-'जगोमाश ने खाना विवाद समा है।" जागो जल उठी-उसने तेज धाकर सत्ता दिया-"तो में क्या करूँ। मुझसे तो सीहा बनता है।जा चाहतो या बो!" वान् की समम में कुछ भी न पाया । वह सुपाचप रोटी खाने लगा। उस रात यह भमके पास अपना हृदय न विमा पाई। कोने में रमाई मोद यह म जाने क्या- क्या मोचती रहा । उसे याद पाया कि बाजार के उस मोर पर अपनी छोटी-सी पान का दुकान पर धन्ते समय यह कितनी पुश थी। वह दुकान ही इसका दुनिया को। भाते जाने युकों का परिहास ही उसकी चचक्षता से पता रहा। यह किसा तर अपो प्राहकों का मनोरञ्जन हो रही थी। कभा कोई पान मागता, तो यह रामती से उसे गोरडाले की दिबिया दे जाती, तो कभी किसी से पैसे लेना ही भूल जाता। उसको उस अदा मुस्कान में पाना की लहर TRE दूर हटी हुई घेदना को लीक थी। वह व्यस्त सी अपने मावों को दवाय रहा। मानो उसे किसी ची। का प्रभाव असता हो, माना ना सका न के अधिक समय तक और .
अधूरा मिलन ८३ न रह सकेगी। कोई उससे कुछ कहता नहीं था। कोई उसे पढ़ न पाता था। उसमें पक जादू था कि ग्राहक अपने को भूल जाता था। वह पहुधा गुलाबी धोती पहनती थी, और साथ ही हाथ पाँव में मेंहदा लगाना भो न भूलती थी। उसकी दुकान के ग्राहक अधिकतर पढ़े लिखे लोग ही थे। और भी थे, पर वह उनके हाथ पान न बेचती थी। वे सवेरे पाते थे और उस समय उसका पिता दूकान पर बैठा करता था । मारा का मारा चित्र उस अधिकार में उसे दिखाई पड़ रहा था। उसने रजाई से मुँह निकाला । देखा, बीन् मो रहा था। यह फिर सोचने लगी कि वह किस तरह पातपात में लोगों को छेड़ा करती थी। किमी से कहती-वा- पान ही खा लो। सोचते होंगे, कि पैसा यो हो न ले ले । न यायू, मैं ऐसी बेशर्म थोड़े ही हूँ। मत देना पैसा और क्या" तो दूसरे से चुटकी लेकर बोलती-"थाप तो अब पास हो गये हैं। मुझे सब मालूम है। मिठाई न खिलायोगे बाबू ?" वह अपने खास-सास प्राहकों की लिस्ट सा रखती थी और पूरा पूरा पता भी। दुकान की हलकी पाली रोशनी में उसका गारा चिट्टा-सा मुँह साफ-साफ झलक उठता था, जिस पर पान की गहरी सुखी वैग मुस्कराया करती था। महसा इसे याद पाया कि उन दिनों पक ठाकुर का छोकरा उसका दुकान पर पाश लेन थाने लगा था। वह स्वस्थ, सुडोल और सुन्दर भी था। पहले ही दिन उसने पान ले कर पक अठन्नी उसके हाथ पर रस दी था। वह कॉप गई थी। उसका वश चलता, तो वह उसे वापस कर देतो; पर वह न माना था। सिफ मुस्कराता हुधा एक भोर चला गया था। वह कुछ समझना चाहती थी। मानो भय यह अलापन न सह सकेगी। अपनी प्रॉखों का शोखी में उसने उस युवक को एक विचित्र मोहना खाते हुये अनुभव किया था। अन्य ग्राहकों के भीच बद भी खदा-खड़ा सिगरेट पिया करता। फिर सब के घने जाने के बाद वह सुरके से खिसक कर उसके पास आता। उस समय उसकी भी आँख उससे उलझ जातीं। न जाने क्यों यह उसे देख कर घबरा जाती थी। उसका हृदय धक धक करने लगता। एक दिन वह सदा की भाँति दुकान पर येगे थी। प्राइक पढ़ रहे थे ! सहसा वह आया, वही धुंघराले पान और पम के जूते । म के चझे जाने के वाद, उसने धीरे से कहा-"जमगो, मैं अकेला हूँ-विजकुल यकेला" "तो मैं क्या करूँ, पावू?" "जगो, यह सुका दिपी कय तक चलो मेरे पहा! मैं तुम्हें रानी बनाऊँगा ।
4" 1 1 यह एमबीबीया साधर में भास मुकाम दममा था ! मा सात पर मुहर लगाया। फिर उसने पार से कहा था-~ीन् । पामुमम गोगा !" पह यात भारत र हाना-"गो, घर में हारे बिना स!" इसन जप कर जग्गो का हार शिया वापरा कर उठ बैठी ! टमी गवयमा में उसके हाथ को दियो मी पट गई यौ। तापन हिरी कार में मर-मकाने मग ! उसने पी पर उस कई बार में धूम था--"जम्मा तुम मेरा जग्गा शरमा गई था। शिर उसने अपने को समान कराया--" महमा उसके हाथ पर उसमे कोट पाय दी थी। पाव या या। गो घबरा गई थी। पपने को समाज र रघना पाहता थी| Fa मिह करे से पान र अपने गाजे गालों को राप गरग कर या l वह उसके अन्दर मारण्यायें पानी मकर बहा दना पाहती थी। यह 8 किशनसे गन निकलने पर उसने समझाया कि या पवित्र हो गई थी। कि प दिन परों का भूकम्प माया दुकान में मकान गिर रहे थे। यह पथराई-सी घर पहुंची था। देग, मो सारा मकान गिर धु था। वह अकेला दरवाजे पर खड़ी था। किसी ने भी इस समझ म पाया था, फिमा उसे परम पाया था। कुछ उलमा सार धुस गई थी। बस, फिर उसे धागे कुछ याद नही माया बाप तुला, सो एक मुदा जवान म रोजा से किये पाया| उसो कर र कहा था-"पाना" वहा गाण स्वर था । उत्तर मिला--"जग्गो, अभी नही " जग्गा मेरा नाम 1 सके हवय में एक FE-सा उठ खड़ा हुधा अपना का अस्त व्यस्त सदा की हलकी सुमारा में भा उसने उस पहन लिया था। वहा पानवा ना युवक ! उसने अपना भास मीच कर उसके हृदय में घुस थाना * या फिर धार सयोली थी-कौन, तुम मुम' और यह उम धुप कर रहा था। उस याद थाया, फिर वह विज्ञान अच्छा हो गई थी। उन शाले दिनों फिर से वह एक बार अपने को बाई सा लगी था। बदोश उस दूध क साथ यानिक दता था। अस्पताल से पाकर सो रहने लगी थी। तर धधूरा मिलन ८५ मालूम हुआ कि वह किस प्रकार इंटों के नीचे दब गई थी। और किस प्रकार उसने पहुँचकर उसे निकाला था। यह बात सुनते समय वह एक पार सोच गई थी कि क्यों न यह उसके साथ व्याह कर ले। उसमें न जाने कौन सी शक्ति थी, जो उसमें मित जाने के लिये उसे विवश कर रही था। किसी अपात बंधन में बंधी हुई यह उसकी ओर बराबर खिंच रही थी। वह उसके आगे अपने को हारी-सी पाती थी। उस दिन वह कुछ शिथिल मा या! इसको भारी शोखे देस कर वह चौंक उठी थी। उसने डरते-डरते पूछा था-"याज क्यों सुस्त हो" पर यह कुछ भी न योला था। उस दिन उसने खाना न बनाया । लकड़ी जलता ही न थी। दियासलाई की कोदियों तीलियाँ फूंकने पर मा वह उसे जला न मकी थी। चूल्हें में पानी डाल कर वह उसके पास पहुंची थी। टीन का दिविया के धुंधले प्रकाश में यह चुपचाप लेटा था। अन्त में उसने वही सुनाया, जो उसने बहुत पहले से ही साच रहा था । यह पक सनक थी, पागलपन था। उसा मोंक में यह कह गया था-"जग्गो मैं मर जाऊँगा। मैं अब तुम्हारे बिना नहा रह सकता । जग्गो, जग्गो ! मेरी रानी।" इस उत्तर ने न जाने क्यों उसे हिला दिया । फिर दूसरे हो पण कमरे को प्रत्येक वस्तु ने उसे उसकी सुकुमार बाहो में देखा था। कुछ सजग होते हुये उसने कहा था--"तो मैं कब मना करती हूँ?" उनके ओंठ एक-दूसरे के नोटों में सट गये थे। अाज ससे अपने जीवन की सारी छायायें याद पा रही थी। वह अप रो रही थी। हो तो फिर वह एक दिन मेला गई थी। वहीं पर यह उससे पृषक हो कर खो गई थी। शाम भा गई, पर यह उसे न दूंढ़ सका था । अत में एक प्रादमी ने कहा-"सुम को कहाँ जाना है " - "क्या तुम्हारा साथी खो गया है" यह गुमसुम "शातिर यहाँ क्य तक खड़ी रहोगी। लोग क्या समझेगे। चलो, मेरे साथ।" यह कुछ सोच रही थी। शायद वही जो वह चाह रहा था। सोचा, जाना तो है ही सो क्यों न चला जाय? यहाँ का नक खड़ी रहूँगी । साथ होली कर उसने सारा हाल सुना दिया। उसकी बीवी 4
तो
इलाज
में उसने उसके मचलते हुय अनुरोधों को मान लिया, और अब वह उसी के साथ
आज शाम को वही तो उसके स्वामा के साथ आया था। उस रात मर अगो
सिसकियाँ भरती रही। सुबह उठ कर अपने स्वामी
मुँह मे उसने जा सुना
उसका सारा भ्रम जाता रहा । उसने कहा-"RE REETभाकिजगो पहने मेरा
बीबी थी।"
यहो तो उसने रात में मा कहा था। इसी बात ने तो उसके दिल में येदना का
एक इमारत ला सदा की थी। इसी बात ने तो उसकी बातों में मासुचों का प्रवाह
ला उपस्थित किया था। वह कुच न बोली।
आकाश साल या उद रह थे, मानो यह मोच रही थी कि अब इस अपूर्व
याद को लेकर क्या करेगी।
उसी समय यीन ने उसकी ठोदी हिला कर कहा-"क्या! या नाराज हो"
और वह हंसदा । मानो यह भी उसका 'अधूरा मखिन' था।
आनन्दी . आज मन के पास पहुत सी भाभियों जमा हैं। ये माभियों कहीं पर कुछ फीकी नहीं है । इनका अपना एक रोजनामचा है । भारा पीढ़ा यहाँ पर है, और मन में इनके प्रति सूब-खूब याद है। एक खास समीदगी के दायरे में भाभियों न जाने क्यों देवरा कोला सोचने की आदी । जाती हैं। तय नई नई बातों को दूसरों पर पैलाना ये सूब सीस जाता है। बंधी बधाई गृहस्थी का उत्तरदायित्व निभा, मन भी बैंगना उन्हें खूब श्रा जाता है । पास जाधो, तुनुक कर पाछे हटेंगी। एक हाथ से दरवाजा पकड़, हंस, पिलखिला कर कहगी-"खूप ! किसी की याद पा रही है ?" तय अपनी गहराइ नापना वे पसन्द नहीं करती। केवल छाया-सी बात विखेर, पाछे रिपे रहने में भी सूच मावधानी बरसना उहें श्रा जाता है। वैसे ये दिन भर मजाक उगाती रहता है। मन से सेन, आँखों आँखों में कह ये भाभियों जैसे यस, केवल मन बहलाव के लिये हा पाता है। और होली का दिन इनके मजाक का खास दिन होता है। पानन्दी मा इनमें से एक है। पूरे सग्रह साल पार कर अठारहवें में पाई है। अन्य भाभियों की भाँति भाम दा भी खूब जानकार है। बातों के सिलसिले में भारी पीडा बिसेरना उसे सूब भाता है। दिन भर चुहुन बनी पूछेगी- कहाँ रह इतनी रात? अपने प्रश्न का उतर स्त्रय पा फिर कुछ बोलेगी नहीं। श्रानन्दी पड़ोस के भाई साहवा नाते से भाभी लगता है। ये भाई साहब रेल में नौकर हैं। बेचारे ठीक पाठ बने ध्यता पर जाते हैं। और रात को जब पान दी की शाखें रास्ता देखते देखते पथरा जाता है, तब ये कहीं वापस आते हैं। शान दी ने अपना कुछ छिपा कर इनसे नहीं रम्बा है। जब से घरवालों ने हल्दी से हाय पाळे किये, धान दी ने की कहीं पर उनक साथ चलने में आनाकानी भान दी का यह रिश्ता अपना एक खास इतिहास रखता है। तय ग्रानन्दी पड़ोस में नई नई प्राई थी । पोछ यहिन ने सुनाया था कि आनन्दो बहुत सुन्दर है। अपना इस बात के लिय में कोई खास कमोटी नहीं रखता, न मैं कुछ इसके लिये “माण ही जुटाता हूँ । एक दिन शाम को खिड़की से दो काली काली पाखें भर देवी ।
८. इनान 1 R थी। और था। उन्हें प्रारदा मान लेने में कहीं कोई हिपक नहीं है। पान दा मन के निकर गहरी उतरा थी। और भाज धानन्द सुबह से ही घर पर है। फमा कमी यह मानवी पहा सरळ जाती है। तय जास उलम, थोड़ी देर के लिये मैंने अपने को समझाया भर है। वहीं भान दा का बैठा, इस खिला, देर तक मन बहलाया है। तय मानन्दा ने इच्छा न रहते उसे मा मन में केवल अपन को सौंपा भर है कि भान दी सामने भाई प्रश्न गते बोखी-"थान सोयापित याद है " 'क्यों " कहा था मैंने । "होला ।" बाबा थी प्रानदा। 'यात हलके गुनगुनाई गई था। कहीं पर कुछ गहराई न भाई थी तप । पिछली होला में इस शानदी की छोटी बहिन आई थी। यह अल्हा महका भी उन दिनों खूब मन बैंटाता लगा थी। सुबह से ही घर आ जाता। रवा-सा निखरा रहती । कानपुर की लड़कियों पर बात करते करते मागे पढ़ाई लिखाई का जाल बिछा पद हसता खिलखिलाता, फहता 'जानाजा मैं तो पापके साप शादा करेंगी। तब उसकी बात सोच लेने के बाद दी मामाती थी। माज साचता है, यदि सच ही शीक्षा निदगा में भाता तो क्या होता । भानदा ने मुनाया था कि शीला हैजे से मर गई। 'शीना बोलाथा मैं सामने भान दी तब खूप जा मर र पृ गई थी। शीला मन से उलझती मगहती खगा यो सूप, सोलाको हक समझ लेने को जी चाहता था। होबी के दिन यान दी ने उसे खूब सिखाया पढ़ाया था। शाम को पैट पहिना जरा टहलने निकला तो पाया उसकी जे कटी थीं । पोछ पता चला था कि यह शाला की कार स्वाना थी। पर भाननी खड़ी को खड़ी रहो। जैसे मौतर जाने की सामर्थ्य यह हारी है। एक बार मुझे देखा। बाहर भी पास गई हॉगी सव। साधयाना परतती थानन्दी चलने को हुई। मैंने रास्ता रोक लिया। एक बार फिर शानदी की बड़ी बड़ी मात दिनेश या रास्ता छोड़ दो और क्या तुम्हें नहीं लगता कि मैं परवश हूँ। तुमने ऊपर उठी। माल बाल पाया था तब उन्हें मैने । वे भाख सुझाती लगी हुट जानो, देवर का रिश्ता क्यों जोड़ा जोदा क्यों जान लो कि मैं ! तब उसका मुंह बाजा से गीला होता मा माँगा था मैंने । धान दी ऐसी खदा है। कि जब चाहे भाग कर प्रदर घुस आया। फिर भी पायर की मूति की भांति एक दिन सुर . y 3 धानन्दी अचल है बह । साड़ी उसकी सिर से उतर कर नीचे आ गई है। और उसे याद नहीं कि उसको एक पतला बट वालों को उड़ कर मुँह पर फैल गई है। मैं समझाते हुये बोला-"श्रानन्दा | हमारे धाफिस में छुट्टी नहीं हुमा करती। वहाँ के इन्सान के लिये होली कोई खास महत्व भी नहीं रखता। दिन भर खटर खटर,खट खट मशीनों के पास कपड़ों की लम्बी-लम्बी साड़ियों की हलकी-गहरी किनारियों पर मन घर। सकता है। यहाँ एक भारा अंधेरा वब फैलता लगता है। जैसे मनुष्य केवल अकेला हा प्राया है। तब अकेले ही उसे झेलना पड़ेगा सब छ। यानन्दी कुछ न बोली। न बोलना था उसे । जैसे मेरा यात समझने बायक समय यह सो बैठी थी। समझने की चेष्टा भी न की उसने । इधर उधर देख पोली--- "अाज तो रकमा ही पड़ेगा। मेरा भी तो कुछ अधिकार है "" कहते-कहते श्रानन्दा रा रकी। अपना गलती जैसे अब पकड़ी हो उसने । अधिकार की बात तय मन से समझ लेने में यही दिक्कत न पड़ी थी। पानदी ने का अधिकार जमाया है। किसी पर । पिछले दिनों उसकी बात से इटने में मामथ्य हारा हूँ। साथ ही पागे एक स्वर-सी जब से यानन्दी को जाना है, उसकी यात लिये भला हुँ । जव एक बार मन बिछा, आनदी को खिों में साथ साथ कर लेने का वचन दिया था तब से आज तक कहीं रुका नहीं। कहा मैने-'भानन्दी मामी" पर धानदी कुछ बोली न । धान उसकी भर थाई यों । यह मैंने मापा था। चौर भारचर्य में पाया मेंन कि एक दार भानन्दी जिद पर सुली, बोला यो-"धा ! कोई एसे ही रहता है होली के दिन " पिर दोपहर को हम पानी रग से सराबोर होने पर भी कहाँ चुप रह सका थी। मानन्दी जरर आँखों को तय यदा सुन्दर खायी। परदा पार कर बाहर भाई, मुझे देख कुप मिमकी, फिर योनी पद--"देवर जी " मागे मानन्दी कुछ न कह सकी श्री। यानन्दी के सामने अपने को मसहाय भर पाया था मैंने । मस्तक मुका अदा से पानन्दी बहुत निकट मा गई थी सप । उस कोमल मारी के गुदगुदे स्पर्श को याद कर लेने में घास अधिक बुष दिवकत नहीं मैं चमा भाया। पिछले दिनों बहिन ने लिया था- 'प्रिय दिनेश! दो दिन बाद
दम्दारे पन्ने मान के बाद at asme माई me Min में न
भाषा, रोमा म ने
EMETERMITTEE
मए पHिit Ramrit
झिम्बना।
परमा-प्रभा
शुष - T UAE को भी मारमा
राना प्रणा
और मानादो मे जिवापा-
'मुसमाना IRNERARE ARED IN THIRD मार
सरा मा पाम मायामामा यो
मन्दिगा मैं TA रासो मनोमन grat me rai
पा र रामबारे भाई ICE CAN MANTRA
MINI-मो भान पर बने हैं। जो है, सपा
गा।
भामाशा
तुम्बा-
१
मागी। मानापार गुपए से भाk और WHAT
सो एकदम निकर है | दोपरा पर HIR
साली पहिने सामने ही मनासा मार-मांगामा !ir
एकाकी याद उस रात को चमेली जब छत पर गई, तो उसने देखा ओसारा खाली पड़ा था। उसकी भली भली याद थाई। जैसे यह स खेल कर उसे बुझा रहा है कि श्रो चमेली, मैं पराया हूँ। तुम्हें देख कर आँखों में कर लेता हूँ। जी नहीं भरता है। सुमसे घुल मिल भी नहीं सकता हूँ । और सुम तो परिचित मूर्ति हो। तुम से कुछ छिपा नहीं पाता हूँ, फिर भी तो निकरत्व की छाया सी मुझे बाँध रही है। यदि दूर पर उलझ गई, बड़ा सा बड़ का ए उस सूनेपन में लहरा उठा । जैसे बह मी परदशी के हठात् चले जाने पर कुछ कहना चाहता हो । जल की दूर तक फैला हुई लहरों में उसने उसे खोजना चाहा। पास के खंडहर में उसने उसके पाने की धेष्टा का। ऊपर देखा, काला अमावस्या की रात । नीच देखा, घोसारा भायें माय अधकार फैल रहा था। उसके जी में पाया कि एक बार वह नीचे उतर कर परदेशी का पता लगाये और बह के नाचे की तिल तिल जमीन दान डाले। उसने कई रोज सक उमे गज के पास पानी परभर की सोदी पर एक दरी विधा कर सोते हुये पहा था। यह पहुस रात तक गर्मी के कारण पखा मजा करता, और फिर अपनी उलझी हुई भूलों को सुलझाते हुये कुछ धीरे से गुनगुना कर सो जाता। रात के उस समाटे में गीत को ध्वनि चारों ओर फैल जाती। परदेशी उसे श्वासों में छिपाने का प्रयास करता। पाकाश में बादल घिर पाते। हया के झोंके हे उदा उड़ा कर एक दूसरी ही दुनिया में ले जाते, तप परदेशी अपनी परी समेट, सादी पर से उठ कर पद के घर के नाच या जाता । मानों उसरे उदासी से भरे हुये गीतों का यही ध्येय हो। जैसे यह प्रय उसे किसी की धोनी से धोना भर . कर रहा था। चाहता दो। धमली एत पर खड़ी थी। उसकी प्रमिलापायें नीचे घोसारे में पर काट रही यो। पी-पदा मौतों में परदेशी को सममान के लिये उस अंधेरे में गर्द थी। यह उस समाप पहुँचा जाइती था, पर न जाने क्यों दिमों के तोलना चाहती थी कि याद * ।
समा जानेको सोच जाता हो। पर फिर भी वह उसे सबार नहीं पानो है। अपनी १२ खाज खाते पर थाता था तभी वार्ता हो पातों में धद कुछ जी की कर लेना चाहता था। जैसे मन का परतों में यह उतर कर मुमाना जाता हमेशा अ यो हा दर हो गई । म तो आ पाया करता हूँ भार मेरा कौन भरोसा ! धमे जो कुछ मि के सामने पार पासी की सरल हेमा में छिपी हुइ भावनायें घूम गई | HATHIमा मना हरा पतले पतले बो और चमेला सोचने लगा, यह तो पथिक है पता ही रहेगा। वैसे यहाँ तक भाया है वैसा ही मीलतामगा। कितना सरल है यह उस दिन जा उसने उसे पहले पहल देखा था, ता यह पद के मोघे रोटी टोक रहा था। हस्त हुये कोयले की साल-लाल रोशनी में उसने उस समझने का पेष्टा की थी। उसका भराभरा घोचों न उसे रुजाया था। परदेशाका रहस्यमयी बालों ने उसके दिन एक गुदगुदा की दुनिया साक्षी यो| aar यह श्रमो तक धाया क्यो नहीं। वह कुछ भर-सी गई। उसके विचारों में किपी ने अपनी मुस्कान भर की थी। उसके हृदय की उठता हुई मरती को कोई घर कर बैठ गया था। उमेली को सुकमार शाखा ने अपनी दोधार हसरतमरी पंसुरिया इधर उभर पैला पाथी, चौर व पृथ्वी पर सोने से पहले अपने काल्पनिक देवता से मित्र का कुछ कह सुन जाना चाहती थी। यह यरयस यहुत भागे पर गई थी। अपना सारी यादों को यहुत पाये छोर कर अपनी प्रधी स्मृतियों को सुला का । उस पर को उसे पकी दर तक नींद न थई । उसकी अलसाई हुई यादों में कोई मुस्कराकर कह रहा था कि धमेली देनो में परदेशी हूँ। मुझे भला बुरा नहीं छू गया। भी प्यार करना सीखा है। मेरे दिल में भी एक भीगा l का है, उसमें भी 'कुछ' है । और भी पीजी, मैं कहाँ तक अपने को सिर । प्रातिर में भी भादमी हूँ, यस ! वह उससे छू गई। लगा, परदेशा है। - + x x x । धमेली भय काफी बढ़ी है। उसको खिली खिज्ञा आखों से भी इसका यह थापन मापा जा सकता है। उसमें अय चचजता नहीं है, और भी है उसमें 'कु। पर वह उसे किसी को बताता नहीं दिखाती नहीं। जैसे वह उसे हिला कर दिक में रख लेना चाहती हो। जैसे वह उसे खोलकर कमवझे पाप में रोधो कर रीता इवायों में उपजी हुई की लहर की भाँति स्वच्छ अनयम को वह खास खाख समेने पर भी सिाज नहीं पाती। दिन काम-काम में चला जाता।
एकाकी याद - दंदा के धादेश और खाना पकाने में वह उलझा उलझी भी अपने को भूल नहीं पाता है। लगता है, जैसे यह सब कुछ बहुत पुराना हो चला है। और उसने १६ साल तक यही तो किया है । वह अपने में किमा की गीली-गीली सहानुभूति देखना चाहता है। उसकी 'वाह' है कि कोई उससे गीली लकड़ियों के न जलने पर भीगी बालों को पोंछ कर कहे कि चमेली री, मत धना खाना। क्या जान यो ही देना है, बाजार से पूही ला दूंगा । और वह मरी मरी सी उठ कर चूल्हे में पानी दान दे। दिन बीतता, रात याती। फिर वही काम और उससे लिपट कर भी तो उस सुख नहीं। अकेली है, सारा काम कर चुकने पर भा तो स्वतन्त्र नहीं है। उसके पड़ोस में चहल पहल है । पर यह वही नहीं जा सकता है। माँ ने कहा था-'चमेली, किशोर भला नहीं है। तू यहाँ मत जाया कर।" घर की महरी ने भी धीरे से बड़यदा कहा था-"चमेली को मत जाने दिया करो । अब काफी सयाना है हो गई।" इन्दी सारी बातों से उसका जीरन बना है। उसमें चैन नहीं, एक प्यास है, सुख नहीं, पर भूरा है। वह इसे सूब समझती है। शाम को यह रोज त पर जाती है । धूप ढल गई, सन्नाश चढ़ गया । यह ता अन्धकार भी चढ़ पाया। पर यही नहीं । खाना उसे बनाना नहीं था । दीदा ने खाने से इनकार कर दिया था। कमरे के अन्दर का खोली हुई धोती भी जरदी में वैसा ही पड़ा था। श्रोगन में मैना टंगी हो रह गई। और जय अध काला मिजाव मारा पीठा समझ कर तेल का कटोरा सुदका गया, तब कही छत की मुंडेर पर बैठी, उरमुक नाल, किनारे के बड़ के पेड़ पर लगाये टिकी धमेला उठी। उस रात को सीढ़ियों पर से पैर फिसलते फिसलते बचा। रास्ते में वह दावार से टकरा गई और वह अदर से बाहर तक कॉप गई। प्राज चमेली ने बड़ी मुश्किल से घिरामा जला पाया । माचिस की तीलियों बुझ जाती यी । और सभी उसने देखा कि उसका धोता का छोर गीला था। बहुत-बहुत-सी बातों ने रुलाया था। उस रात उसे नींद न आई। रात उलझी-उलझी सी चल गई। दूसरे सुबह असन दखा, तो वही परदेशा कुछ भरा-भरा-सा अपनी सारी इण्याओं को समेटे हुये घुपचाप गच के पासवाली सादा पर लेग है, इसके मी मन है। कुछ सोधी हुई बातें भी शापद हो, जिसमें वह कल्पना की दोरा से बंधा बंधा भी मुक्त है। उस पक' में क उसे यह समिर रहती दैन । यो विषय का गुण पर! और 1 उभने सुनारन मना है। सममा है पर उमड़ी पर बड़ी बार सा तो मी है, जो बहुत गन्दा ना मेहकर मि मिट गई। इस तो कहीं व भूना तामही हो रहा है। सभी दुई मुम्कान का शो हुम उपका पहला सा रहता है-"ETE विका पना है क्या कोई यक्षार या घराई है सापके पह" और यहा सो समान है, जिम मुन का यह पता नहीं, भरतो मी, यमामा नहीं। निमा जमायन के लिये उसका मुंहो जा! मिमा सुगर थद चाहना है कि कोई उसमे हम पौ। उमा दुई माग मे वर कार उता है। यह मा ए लेन के बाद भी जाती है। पर उसका मन अपे का उठना हो तुम तो परदेशी दो सहारे जिस में पाक मे यह सुपार देहरी पर सहा पर कुछ पदकामा चादना होकाई का जाता है कि भो पादशा येर गामा म इतना सदा काहा। में असा है। कभी-कमी घूम जाया कारे, अछा । पर सूनापन या ऐम हो रहेगा चीर में क्या केली ही रहेगी, बिनाक्ष ऐसहा? ससका थामा में गमापा का भरोसा । TR हराए काली रात बन कर उसके मन के माँगन में उतर चुका है कि सा वह करेगा वही होगा। और यह अपने को मिरश कर लौट नहीं जाता है। यह यहाँ सा है। धाम उसे उसका हयानों का निगलने में मुम मिल रहा है। उसे भी कम हो गया है। यह भी धमेशा का पदने का धि में । उसे सुख है कि उसका मन पाम किसी सोई बात को ले कर उसके सामो अपन चौधन का पोर हा मुरा रहा है, पर सिर का पाठा समाजे उसकी सारी बातों का उत्तर देने की बार में है। उसका एक दूसरा मा मन है, जो एन पर उसे इसतेमेशात देय कर मचल उठता है जो उसका सास बातों को लिस लेना मर चाहता है और जिसका भारीपन उसकी सरजम झना के सामने अपना सिर मुका घेता है। उस याद कि भ्रमी उसा दिन को उपका हाय अचार होते हुये हिल गया था। इस दिन यह मड़ी मुश्किल से अपने को संत सका था । और यह उपका मन ही तो है, जो भाज कुछ समझ गया है। यह मन किमी का रचना नहीं करता है। यह उसे टुकराव कैसे ! वह उस में कैम सुखी रह सकेगा। पोड़ी पर तर यह चुप रहा फिर पोला-'धमेली ! यह मागा-भूगा कर तक! मैं भी अकेला है। किसी को भोली भालो माया को पहचानना चाहता हूँ। उसी में एकाकी याद मिल कर में सुखा हो सकूँगा। मैं कुछ भूल जाऊँगा, मेरी सारी प्याप्त उसी में रम जायगी। तुम्हारा भी कोई नहीं है। इस अलसाये हुये भारीपन को ले कर क्या करोगा। तुम रह भी नहीं सकोगी। और अपनी ओर तो देखो, क्या सदा 'एक' म कसी रहोगा, बंधा रहोगा । यह दिन मा चले जायेंगे। "मकान छादन को मैं नहीं कहता। लेकिन तुम यहाँ रहोगी वैसे तुम मेरे पर चलना। रोग बनाना, वैन स रहना । उम्र के तास माल ऐसे बुरे-बुरे बात जाने पर श्राज यह जी चाहता है कि किसा के दद में अपना खून जम जाने दूं। पत्थर की भौति जम जाने दूं। उसमें फिर से मिल कर घुल जाऊँ।" वह फिर बोला--"अपना सारी उम्मीदें चमेली, तुम्हारा अखिों की तेजी के सामने विधा दूं और इस तरह गलता-गजता गल जाऊँ। और मुझे यह मिले कि मैं परदेशी था। पराये के पोई जलता चलता जल गया। श्राज न जाने क्या मुझे हो गया है। उसमें तुम्हारी ही ऊय तो नहीं भरा है । मैं दिन के अंधेरे में सुमसे कुछ कह-मुन कर इलका भर होना चाहता हूँ, कई दिनों की दवा हुई यातें तुम से चुपके से कह डालने का विस होता है। चमेली, चमेला, मो चमेली' तुम्ह मेरी कसम है, तुम मुझे नहीं समझ सकी हो । 'हा' मर, कह दो। सच, मेरे मन में तुम्हारे लिये कोई बिगाद नहीं है।" धीर बसेलीन सोचा। उस उसके उत्तर में न जाने क्या हो गया था उसने धीरे से अपना सिर घुमा निया था । जैसे किसी गहरा खुशा के ग्राम को उसका सिर अब अधिक देर तकन उठा सकेगा। पाखिर उसने सारा सामान बाधा दूंधा पर ठीक समय पर यह न दिन निकला। ऊपर चढ़ा और दीवालों के उस पार भी जा पहुँचा । चारपाई पर दरी में लिपटी हुई चीजें धरी थी। अदर का सामान उलया पुलथा पड़ा था। पर पहन थाया! चमेली ने उसका प्रती में अग्नेि बिछा दी। मन बोल दिया। रात आ गई, पर वह पाया नहीं। उस रात को घमेला नांद भर सोई नहीं। दीदी के पूछने पर भी यह रोती ही रही। द्वार पर या कर 'याया' शाम की भीख मांग रहा था। यह मागी-भागी बाहर आई, देसा, तो परदेशी झोली जिये खड़ा था। वह कांप गई। फिर बोला-"पाया ! मेरी " "लेकिन, मैं तो परदेशी हूँ परदेशी, चमेली।" "परदेशी ! तुम बड़े धनगान हो ! सारा सामान ठीक कर लिया है। प्रय थाया। A
इखान
-
.
"लेकिन मैं कह पा रहा हूँ कि मैं परदेशा हूँ।"
"हा ! तुम परदेशा हो यह ठाक ही है। लेकिन तुम आ रह हो । यात्र प्राप्ये
हा कुछ आराम कर लो। और में क्या ऐसी हो रहूँगा?
"पर, धमेली। मुझे बहुत दूर जाना है। मैं अब तुम्हारी छाया समान नई
मगा। संघ, मुझे धावा न दो। मैं तुम्हारा यो न उठा सगा। यह भार है और
मैं कमजोर हैं।
'सो क्या तुमने मुझय नहीं कहा था कि धर चलना।"
ही कहा था पर अमी उमा समय नहीं पाया है चमेलो । अवसर प्राने
पर मैं खुद या माऊँगा । अमेजी, चमेली मुझ पमा करना
कि चौथे साल।
परदेशी चला गया। धमेली मूति सी पड़ी दसती रही। जैसे वह कुछ समग गई
हो-नारीव का विभुसा का पक सिरा-सा ।
शाम को नसी पौवा का भी धमली जाकर मोचने लगती है
कि धन परदेशा है पर उसका भूरी-भूरी प्रति हसता हुमा चेहरा
मच ही वह फिर पायेगा। उसका हृदय धम पाता है। जप रात का अंधेरा थारों
पार फैला कॉप उठता है, तब वह सुपके से कर उसी पद के भी या जाता
है। यही सका नियम | Amalniमय के निगलने
की चेष्टा करती है। पहुधा वह अपने को भी भारी लता मानो उसके प्रायो
में प्रलय हो रहा हो । यहुन दिनों तक वह ऐमा हो रही। सुसी रही, या दुखी, कौन
यह फिर पाया या नहीं? यह नहीं कहा जा सकता। प्राज मी ससके दिन म
वह घुमी हुई है 'एकाका याद
और 7
जान!
-
त्याग-पत्र - प्रय प्रमिला सोचती है कि प्रशान्त में उसका मा जरूर है। एक सातारिक दायरे में घिरी हुई यह प्रशान्त युबक को कैसे सहे। अपनी गुयी घर बनाये और बिगाहे भा, पर प्रशात को उसमें वह क्यों घसीटे। कभी कभी मन में यह कर भी जाती है। प्रशान्त का एक घिरा हुशा शपना मन है। यह मन किसी को छूता नहीं है, और उलझनों ही उलझनों में पास से रूल भर जाता है। यह इसे अपनी गलता मान तनिक ठहर जाना चाहती है। पर रुक नहीं पाती। रक कर अपने उत्तरदायित्व को कैसे निभा सकेगी। प्रमिला उसकी भाभा है। यह नारीत्व में छिपी प्रमिला इस पुरप प्रशान्त के जी से मर चुकी है । बातों-बातों में उस लगा है कि वह पराई नहीं रह गई है। थापित स धुर, वाइसिकिल पर बैठ जब प्रशान्त शाम को घर चल दता है, तब दिन भर की मरी की प्रमिला शाम की शोट में श्रा, सम काम छोड़, जरा मुँह हाय धो, अपने को पा, दरवाजे पर टिक जाती है। और प्रशान्त की गहराई, उसका भार कि वह उसे कहाँ तक देखे प्रा भरती नहीं। एक रेखा सी, मूक हंसी में सीमिन प्रशान्त वह उससे अलग होन की बात पर रके केपे ? भामा को मूक नम्रता में खो उसने कहा था-"प्रमिला, मैं तुम में अपनस्व पाता हूँ । देखो, मुझ अपना भाराजगी में मत लेना, अच्छा और प्रमिला ने चाहा कि इस सद्दे हुये युवक से कहे कि प्रशान्त, मेरा जा मेरे पास नहीं है । जो है भी यह तुम्हारा है, और जो मुम्हारा नहीं है, वह है मी नहीं, सच । फिर ऊपरी मन से उन्हें प्रजा क्या करूँ। स्वामी का तो एक नाम भर है और अब जैसे उसने काई यात पकड़ ना हो । धीरे-से योली थी- प्रशान्त !" और प्रशात ने जाते हुये सुना प्रमिला घुला रही है। उस मुख को वह कहाँ चिपा कर रख ले। जो कुछ है, यह प्रमिला है, और प्रमिला से बाहर जो है, यह उसका है भी नहीं । विचारों में कुछ यदा तो प्रमिला थाती सी लगी । गुलाबी जरा की सारा में लिपटा हु । प्रमिला को वह क्या कह दे! और प्रमिला में जैसे कुछ कहा ही नहीं, और न सुप हो कि चाय की तस्तर पर य रुका । प्रमिला - इखात्र - - अपने माथ '7 माइ है। और उसो हाय हा अभ्यबार गणो दुई माप में दया कि प्रमिला भामा कमी में गया है। इस नई भाभा की पूजको पद माम म चाय पिया पर भाभी को क्यों गे उसका यह सा भा क्या दे । जो सपा उसनदा है, वह है महाँ, और मना नया बस क्या माने ? उसे भाप प्रमिला ने मादास मुंह निकाश EिRE, म्ह, Ret कहा--"तुम्हारी बात मुझे लगी।माय हो मैंन मामामा का राजा निमा और प्रशात से वह नाय नहीं पी गई। प्रमिला कर चोर भागे ली था और समा जैसे उस समाप पा, चाय का प्याला रस, ए भावुक हो उसने प्रमिमा के नोठों से लगा दिया। उसकी भाभी प्रमिला राना, मिकी भी नहीं । भारा अपनी मत्ता से ऊपधारा-सा हंस, धीरे से उसे गले के नीचे मुंह विषाकर सवार भर गई। भौर उसने पिर भुना-प्रगात !' या उसका क्या उसर दे। उस पाटे से भाग का पहा-सा युक जया मा कम माम सोटा जस पर उस से माम में मराव अधिक है। प्रशान्त सोचना है-'प्रमिला में केवल मामीपन हामही है, यदि उससे भागे भा कृष है। मे उसका मन कहना चाहता हो कि मिशा, मैं क्या उत्तर । नाम मेरा सर है, पर में माम काममा है । मुम्हारा दुनिया में क्या पुसा ही होता है। प्रशान्त बोल क्या यह पेवस है। और या प्रमिला नारा इस सोटेपन को पा नहीं पाती है। मामी सामने पायी । प्रनि अपनी हार माने क्यों । प्रमिला सोचता रहा । उसने उसे पुकारा, अशा घरका भी । पिर भी येयो कुछ झिसका क्यों । यह सकारको उसे मुहावी नहीं है। यह युलापे और प्रशासन रके नहीं । यह क्या प्रमिला इस अपन में ले सकेगा। उस छोर स काम में प्रशान्त को खगा था, माना यह भाभी इसे दूर म कर सारा सुख या जिन्दगी में निभ सकेगी। बात बदलने के विचार से यह पोलो था-"कल जरा माफिस से जल्द जल्द पाना, यह जैसे पशात से शहर की यार है। काम यह करे, इसमें हो भी। फिर प्रमिला को वह अपना दुसक्यों दे। मारिसर का मन कठिन है। और भूम प्रशान्त को बर हुये लगा, जैसे इसका भार पूरा नहीं उतरा है। मन की सिस को बह छिपाये क्यों, जैसे पह युवक सुन कर इस सुनारी में मिल जाना चाहता थाना स्याग पत्र ६ हो। और प्रमिला ने आगे कहा था -"तुम्हारी दावत है, घरछा चार पजे शाम को, देखो, चूकना मत ।" दावत की बात वह सुने, प्रमिला उसे पाम लाये और वह क्यों ससे पृथक पृथक रसे। वह भाभी की व्यस्तता में कुछ सुधार लाना चाहता है। कुछ सका तो मन कहने सा लगा कि मामी, इतनी जल्दी क्यों, और तुम्हें यह नहीं लगा कि मैं तुम्हारा हूँ। कभी पा कर चाय के सहार तुम्हें र लेता पर तुम ! फिर भी प्रशाल पहले ही भा पहुँचा था । देखा, तो प्रमिला कुछ सुधरी सा सामने मेज पर मुकी मिली। प्रमिला का अपना काम है। एक बँधा हुमा नियम उसे लग गया है। और यह प्रमिला नारी उसे साध, टोस्रों के यहल खोल बाज यथा से अधिक भा गई है। लना करना समे आता नहीं, और प्रशान्त के श्रागे घह छिपे क्यों ? सामने प्रशान्त को देस यह चौकी थी और एक हलका साफ नमस्ते में व्यावहारिक हार जीत का प्रश्न हुदा हुया इसे मिला था कि यह युवक उसके और भी पास प्राता जा रहा है। और पदि जिन्दगा यहीं पर रक एक चाय का चूंट यन समाप्त हो सकती । जैसे उसे गले से उतार भाप में भीग कर ही सारे कर्तव्य को निभाना होता है, जैसे उसका सम्बन्ध केवल पार हा का रहा हो। प्रशान्त थय केवल गैर जिम्मेदार आदमी ही रह गया है। वह है, और उससे भी दूर निमजा। निमबारी ज़िन्दगी कुवरकती सा लगती है। प्राज्ञ से चार साल पहले प्रमिला ने इसी का नाम लिया था। याद कुछ उमर उभर भाती है। श्राफिम से श्रा, अपना सूट उतार, जरा सुस्ता १५ यह अपने कमरे में बैठा था, तो भाभी दूर से हंस, अपने में मचल, पास आई । अखिों में भाख टिकी रह गई। एक कुरसी सींच प्रमिला बोला-"श्राज माफिस से कैसे जल्दी आ गये? निर्मला थाई थी, और सुमने तो हमे देवा ही होगा । बड़ी भली लहको है " और परसों निर्मला अपना माँ के साथ घर आई या। तब उसने यह जाना था कि यह उसे अच्छी जरूर लगी थी। कल धाफ्सि में उसकी याद आई, वो जो देखने देखने को करने लगा। जरनल और लेजर के बड़े बड़े रजिसरों पर घास को जरा और रकी, तो पदा 'निमजा निमला ! पद धयरा गया। घड़ा ने अपनी इन-टम में सुनाया निमजा ! निर्मजा" और अब प्रशान्त जैसे अधिक न सकगा। उठा और याइसिकिल पकड़ कर घर पहुँच। । जहाँ पर निर्मजा बैठो था, उसे ध्यान से देखा-से यह मोखो निमजा अपना रेखाचित्र छोड़ गई हो। आज प्रशान्त को यहुत ऊब है। नी में एक प्रभाव का स्थान बन गया है, जिसमें निर्मजा नाम की एक नारी अपना अस्तित्व छोड़ कुछ मुझा गई है। इसने N धरा पाहा कि मामी से कुछ रोन, पर पानी में अटक न RTI सुपचाप कुरसा पर पेड, प्रसार सोल उसमें सो गया। समामा हो पाया बढ़ी सदम नायी नानी और यह निमता का मलिन ईसा में स्प, स, शेल र कार उat तभी प्रशान्त को धगा, म भाभा उस मममम पायेगी, और यह एक मूड ध्यरतता में ऐसा हा सगा रहगा। इतने में निमना हाथ में गहरा का सरलस ने पास धाई । उस मा पर समाो याला- कुछ पाट्यगा ।' बास कुछ उमझो सी धगी। प्रशान्त से थाहर । कुछ पोजा नहीं। साधा-समिक्षा मापी मला है और यह निर्मा। यह सोच विचार कर चालका है। थाय यह, पर इस प्रमिला कानी यया । पर निगला नही, प्रमिा प्रमिला वह भी सब करे पर प्रमिता हायसे गहरियों के दृगों मैं उसने सय कृप पा लिया हो। सा कर जय में भर ली। पास थे। प्रमिला न सोग गॅशीया यह पनागे, उसे मजाये भी पर पर प्रशात हे न साव में क्यों मरमरिया मनाना ,गुनी नहा कर गई, वह अब दुखा दुखा और उस तिलमिला यह योखा-सामने थाने में कुछ प्रशात उस पैसे समझाये । मन के घुमागेम से रसले, यह यह भी थाहता है। जैस मन E- मामिला मनात मी नहीं है, जा रहा है, इसा से उन्हें पाहर पा र है। पिरानमसा को यात सामने आई। साफ-साफ सच सच । पर दया, एक गहरी किाल मुंह में रस यह सुप रखा। धान वह सोचता है, निमला उसके घर माई, येही भा और कुछ दे भी गई। उसको देन वह रमे कहा पर प्रशात ने उस देना नही यह साय वह कैसे सहे । प्रमिला को घाखों में पढ़ास उसो उसे समझ लिया हो। एक धुंधया पहला सामने यार। यदि निनला जीयन में निम सकती । कुछ सोच उसो धारे से कहा था-"हा, देखा तो है। और प्रमिला कट गई। यात बदाई नहीं। वह लाज में छिपा रही। जरा बीमार हुआ तो निमना फिर चाई । बारामती श्रीच कैरो, ता प्रमिता ने प्रशान्त की बामारी का दाल सुनाया। उसका एक यागे पाया। प्रशा-सा HIT मला! और निमजा ने दूर देखा प्रशान्त लेटा चुपचाप वसा में गड़ा। और अब निममी अपने को क्या करे? धीरे से प्रमिला को ले प्रशान्त के कमरे में आई। इस युवक प्रशान्त में प्रान तमता का जम गया है। जी उसका है, पर - श्याग पत्र चुका हो। - जमाव पर इसका लगाव नहीं है। पास लेटे हुये युवक प्रशान्त की भावनाओं का कुछ दूर साका सा बना, फिर मिग मी। जैम प्रमिला की प्रोट में यह से छ और प्रशात उसे पा कुछ चोंका, दीवार पर टंगे हुये चित्र पर माखि टिकी । निमला माता सी लगी। हमारी गृहस्था मा चिन का भौति है। उसने सोचा, हम बोजते हैं, हमते भा है, और फिर अपना अस्तित्व पाकर जल को लहर की मोति कुछ दूर-दूर आ मिल, रह जाते हैं। और सोचा निर्मला ने दूर का महारा पकड़ा है। और ममिला नहीं, निमत्रा दोनों में यह किमसे मनबुझाव करे ? निर्मला यदा भोली है, सिर्फ चुप खड़ी रहता है। आज भी बैठा है कि प्रमिला ने दवाई का समय जान हाथ बढ़ाया, उसे निर्मला को दे बोली-"तुम दवाई दो मैं भाती है " और निमक्षा का सारा उत्साह टूट गया। कभी उसे पामामी की श्रोट ले प्रशान्त ने कहा था-"जिन्दगी में बदलना पुण्य है और एक-सा रहना पाप" पुष नहीं सको। दवाई का फैसना खुद कर, ममाप पहुंची, जरा सकुचा, लना, झुक, हँस कर दवाई का गिलास मुँह से सटाया। क नारी की कोमलता, निमला की कोमलता क्या वह इसी भौति रहेगा। सामने निमला का साकार चित्र देख यह बहक गया। मुकात्र का सहारा ले एक सधी हुई उलझन में उसकी आँख उस पर रिकी रह गई। दवा वह पिये, पर निर्मला को कष्ट रोग क्यों जेंचे । दूर पर निमला कहती-सी लगी-प्रशात, तुम यहाँ रहना, रहना और ऊपमा मन | नारी के माय 6 शादी में ग्रा, अपन श्रापका गला देना प्रधा। यही मेरा बात है, अपने से बाहर की पायोगे। कि नारी कला को एक चीज है, मुझसे मिलान मत करना । दुख-पीहा, येदना में साथ साथ ही थेट सकेगी। और प्रमिला कि प्रशात ने जरा सत्ता से हर दवा गले के नाचे उतार दी। उसके धूर से शब्द उठा-'निर्मजा, निर्मला! दूसरे दिन वह कुछ स्वस्थ हो पाया। फिर निमजा दर की म रहो। उस पास माती नारी को यह पदसा गया। उसमें कोई दुरी भावना न देख उसने सोचा कि निर्मला भली ही नहीं है, बल्कि उसमे मा भागे वर बढ़ गई है। जरा कुछ और सजग हुमा सो पद प्रमिला भाभी के साय पित मिली। यह मिनी और मीना भी। और मीना मा उसको पड़ा मली लगती है। जैस यह माछी विझो सब कुछ समझ कर भी धुप रहना चाहती है । जानवा यह है, पर उस समझा Ter बायरा गया है। यह प्रशात युवक का प्य समस्ती है। अपनी पोज भाषा में अमे करना चाहता हो कि में योग है, माम म प मत नगर निar बादी की है। सुहारा मा हूँ और मत मानो यह सम समझ लेता है, मानो टम पुजा अपना दुबार पद बोर और ? I मसावि में मारी भर पनि पर प्रशान्त के परों पर दुम रस खीर जाता है। जरा निमला और पदी, सो मामा न रिचार में भा, और पैर चाटे और प्रशान्त और सब कुछ पा लिया हो । धार सहाय पर सुधार कर उस छाया । उस दिन रमे न जान का मन माना में मिला टापा, तो प्रमिलाने सुनाया कि मिमला था, माध में सपियर की दुहय माहट' भी समझने बाई है। प्रशा त में माना का भार दखत हुय कहा-"जा, अपनी निमकर वादी के पास और जैस माना ने ग्याऊँ पर छमा बहा कि जाऊँ, सच, यह आम काते हो। कि सामने समिक्षा को पानी दव यह एक रसी ale योज-पाश मैसे भूल पी इधर " चौर निर्मक्षा से भर गई हो, चुपचाप रही। रिपाइ की बातें जमा, और निर्मला से यह सब सुना नहीं चाहता थी। शान्त मीताको पथपते हुये कहता -"शेक्सपियर अग्रेज़ा-साहित्य में बड़ा मारा कलाकार हो चुका है। उसकी कला ने विश्व को परखा है और और । जम चला तो मीनाको आवाज दी पर हम उठा 1 घुपचाप मशान्त का गोद में बैठा रही। हो, देषा जरूर जाता हुई निर्मला का और प्रशान्त ने कहना चाल रमा-शासपियर ने नारा दय परसा था। उसे अपने में ना तोला था। इसी से इसके 'नाइरदुबैल' में मूक युग की नारी का, कोमल नारी की थाह भरा है। 'बह रुका दि निमला ने पिर पुकारा- माना !" और प्रगान ने सीमा को शोर सचिपकाते हुये कहा-'किसी को प्यार करना सरल है, पर भूलना मुश्किल । सक्सपियर ने एक बार कहा था-पुरुष चाहता कि वह एक बही हिस्सा अपनी शिकार न ही नहीं पाता है । भोग इमे जान इत्ता पालते हैं, जरा भूल बदना को हटा दिली को भी कि बात कट 'नारी हृदय स्याग पत्र १०३ । "मीना, माना !" आवाज फिर भाइ । और अव जैस माना रक न सकेगी। 'म्याऊँ' कर गर्दन उठाई, उसे रोक वह कहता रहा-'अपनी प्रिय वस्तु से अपने को हटाना एक प्रसरो की पाव है। हम कुछ रखते हैं, पर उसके चले जाने पर दुप ही करते हैं !" कि दूर पर निमंना हंसा ज़रा सजग । एक छाया-सा यह पास श्रा बोली-- "अच्छा, अष चलती हूँ, मात करना।" निर्मला पूछता है, वह रोके क्यों । जाना उसे है ही। यह जायगी भी। फिर वह क्यों उसमे कुछ कहे । जैसे यह कहना चाहती हो कि सघ, जाऊँ तुम कहते हो जाऊँ और मोना यह विवशता जान, बोल पड़ी 'म्याऊँ।' वह जैसे कहने लगी- श्रमी बैठो, तुम जामो क्यों, निमला दादा में भी तो चलूँगी प्रशात ने सोचा, क्या यह निमला नारी सघ जाना चाहता है। फिर मुझसे पूछने क्यों भाई है। अाज थाफिस में काम करते करते प्रशान्त को लगा, निर्मला की शादी ठीक हो गई है। वह शादी में बंध कर रहना नहीं चाहती है और अब तो वह बीमार है पीला-पीला मुँह । यह दूर पर कहती सी लगी प्रशान्त, प्रशान्त ! घह कॉप उठा। घर पहुँचा तो प्रमिला ने सुनाया-"दूर के रिश्ते से निमला मेरी बहिन लगती है इसीलिये मैं ने पूछा था । पड़ी इला था कि तुम्हें उसे सौंप स पर परसा उसको शादी ठाक हो चुकी है।" 'शादी ठीक हो चुका है। प्रशात रुका। दूर पर निर्मला की हँसी सुन वह चौंका । वह कहता-सी जगा 'प्रशान्त, मैं छोटी हूँ, और सुम यहे। इतने बड़े कि सोच कर भय लगता है। समाज में भी, उम्र में मा तुम यहीं रहना । विदा।। कोई एक महाना हुआ, तब निमला को चिट्ठी श्राइ, बिसा था- "प्रिय प्रशान्त, जिन्दगा पक रहस्य है। डरता हूँ कि क्या लिखू और क्या न जिएँ! तुम्हें न पा इस जिन्दगी का धमला रूप और भा चमक उठा है । मुझे थाइसिप हो गया है। डाक्टरों ने बताया है कि किसी सिनेगेरियम में ले जायो। इस महीने में यदि पा सको तो चले पाना । तुम्हें देखने को जी कर रहा है, अच्छा, शेष कृपा । तुम्हारी- 1 -
खान
-
.
साफ अाकाश में खिली हुई चाननी को देख प्रशra का मन एक अज्ञात पाहा
से भीग जाता है कि यह चोदना हंस शिखर कर मिला का रप ले लेती है। यह
कहती सा लगता, प्रशान्त मेरी भावनायें मत वूमो । में पराई है और यह परायापन
का धन मुझे तुम तक नहीं माने देता है।
कि यह छाया रूपी निमला दूर हरे,
उस छु, पुखक र ६ प्रमिला में सो सिम समा भर जाता है।
और अब प्रशात कैम तक।
प्रमिला, नहीं निर्मला मिला ! जैसे वह धौदनी कह उठती हो-निममा, ओ
निर्मला । और यह चारपाई से मामी प्रमिला में पहुँध, उसे पहचान देख सिसक
मिसक कर रो देता है।
vi जीवन का रहस्य - 'पसात छाया अपने में गुनगुनाई। कुछ भार कहीं इजका लगा । जैसे अवज्ञा भार वह कर रहो हो मृती प्रेमाहा में शो खेिं विखाती, सरसता उहेन्द्र अपने में दो यहीं रहती । उलझी उलमा, काला काला सोइ भर । अदर एर घुरना चित्र । जरा सा मायदे मे लगा, वइ चित्र हसता मुस्कराता लगता कहता-'छाया । मैं हूँ मैं हूँ।' और याहर कुछ अलग अलग एक धात्रा बहा-सा हल्ला । दुनिया की समझदारी में हलका पढ़ता। पीहा यॉट मो कहीं चुप ही होता । दूर-दूर एक भ्रम । जिदगा फाका कहा था हाँ, उचाट उचाट जी में था छ कमी प्रभाव में पेज । यहीं गुबार मनुष्य के बनाये कानून कोट के फैसले की तरह धीरे धीरे पलते, जहर उदेल घागे आते, समाज के दायरे में सिखाते- चुप, चुप चुप! बात अपने में न थाती। कुछ कहीं पर छ अलग ही हो रह जाती, दूर दूर, कहता कहती। झूठ, झूठ, मूठ भू। अब छाया चौंकी। अपने को पकड़ चाहा कि सूब समझ ले। उत्तर दायित्व की याद आई । उटा, किताब ले स्वामी के निकट पहुँचा । समय काटने लायक थी यह किताब । मन बहलाव यह किये जा रही थी कहाँ? और चारपाई पर लेटे स्वामी ने देखा--एक बुझी उलझा हलकी नारी । बाल साड़ी सफेद सफेद बिन्दियों से बगी। हाथों में हरी चूदियों-बीच में लाल और भागे पिर हरा, गोल गोल किताब के ऊपर सधी, रुकी । सप, सप । म बुझातो लगी। खिली खिली कि वाया ने गदी गड़ा कहा-"मन नहीं लगता।" मन! स्वामी का । दिमाग भर गया। वहाँ रल की निपट खर-म्बर पाई उसने । थाहर दूर-दूर हरे खेत । उनसे लगे गाँव । वह लाल धोती पहिने, जरा गादी लकी सिर पर पीतल की कलसी, चौर सामने टेढ़ी मेढ़ी, साफ-मान मार पर धागे बढ़ती फिर- 1 के दो दिन बादशाये। एक घाव बना दिल में पसारे। यह घाव प्रब वद देताकमक पहावा स्वदक के पास वह हिदुस्तानी टुकड़ी का मा डर था। पिछी घटना इलाम सगनपटर। । हर सेतों के उस पार यह घूमता चलती। गाया मागे पसी । अन्दर सि को दावार में बार-बार खुद । उही में आपस मगाई विष्टियों, रजिस्ट्री माय सय । सुमात, टाउमा में उघा और इबजे के पाच एक ईसा परशाना के पास पाम । पलको आवन में बंधी स्यूटी । यहाँ पाया दलका लगा। पार पदहा-"घर जापागा?' छाया शिथिल हा युज गई। याहा, हमे धो उमी में रह जाय या चुरा रहा, फिर योजा-और चार" थपनाव का बात उलपिहर में किसी को समाती यह भारो भाई है। और मन में TMT MATTERE एक पायर-सी जमा पहरी पर है । जिन्दगी का मखौल उहा भनको पास, पसार जाधारी और का, तो फिर हाता यह है । म सममा युमा एक प्रभाव चलाकरमत का सबा खेतासन दिन पहले । वह नोले सूर की मार धारियों मन से सेजता एक उलमा अबहानी खिर यहीं रहता - समन-शुमाव का मोह हो । पुष की से न था, जो समझ लता उनके बीच बसन्त । उसकी पोशा, पाप दुख और मस कुछ लोग उसे उठाकर पाना या ठीक जंची थी। जय सदाग पाया, सो पद बाबा था-"पाया, राप लामी कर दो, 4 छाया ने पट्टी बोली, दाली कर एक गाडदे योजा-"यस!" वसत कुष्याला न था। कमरे में ठीक एक पालक सी एस बोला-जरा बोतल दे दो, सामन तत्परता में पसरा घाया। नामा साही जप सजा। थानों में हरा फाता। मन में समाया, वा पदूकों का धाय धायें । दूर-दूर रस पर छिपे झुण्ड धाय। वे धागे बढ़ते बाल लाल साप्नों में थौर- धाय !धाय!! पास में धुआँ उड़ता-सपद मफेद । ऊँचे उठ कहता- धोखा धोखा धोरया! बड़ा गहरा धार" कसक हलके बात उठती-सोना ata!
जीवन का रहस्य धाय । एक पायर। बड़ी रात गये कहाँ सुइखुवाहर पेली थी। फिर- 'धाय, धाय ।' दो फायर। 'पाय, धाय, धाय तान फ्रायर । रख दक चारों भोर मे विरी पाई उसने । सव समझ गया पह। उनमा ठीक से पकड़ा । सम-सब सामने आया टोकलीक । चट्टानों में छिपी टुकड़ी ज़िन्दगी में हारी | दसदम, साथ। मागे, बीस-यास । पाछे, पाँच पाँच। सब शान्न में सोये। केवल मा युझाव करने कराहना-मान थी यहाँ । प्रागे दूर दूर सेतों में ये खो गये। "योग" किमी ने कहा था। यह भोला सरल मुख, घुटने तक झाक, पालों में एक नीला रुमाल, श्रीक-सीका लगी। अदर गुदगुदी। वह याहर रही। "जरा कस कर बाँध दो !" थपने कत्तय को निमा सोको यदा थी। पास उसके श्रा, हलके घाव छू बोली थी-"तुम पू० पी० का है" "और तुम ?' बात को न पकड़ सोफ्री हंस दी थी। फिर मोला--"मैं " सोशी की हसी जरा श्रदर पाई । वहीं पसरी रही। करवट ले सोचा, यह सेतो मनी भली । हसता हसती । और यह जिदा क्यों रहा। अपने को धासा दे, गोली लगी, एक घाय यना, खून बहा, पार चली-सन्-सन् सन् । और अय पह इस नई सोफ्री में क्यों उलझ रहा है। विधारों में सोना उलझी। रा ऊपर घर पास में हवाई जहाज । सोकी चिल्लाई -'भागो, भागो!" खसरे से परिचित थी वह ।
1०८ इखाद पाम में धुल । रत बैठा एक बम गिरा। मोरा पीसो, इसने प्रतिपादका दूरपा पोषी पाया रोग बरही था। मोशो का पता न था। पापा का भ्रम आया। घूमता हम 1 में यह मोती को क्यों टटोल रहा है। वई मासर घर भाने का इमानत देदीधी। वो मे फदिस पहने मुना था- 'एक हिन्दुस्ताना कमाएर को भान बचास समय सोश ने अपनी शादा।' वह नारी महा बगा। दर भादों क पाम से देख वह भ्रम में चौका-"मोफी, सोको छाया पास भाई । बोतल देवही रहा । पानी-" महरा घाव है " 'गहरा " यमत पात दुराई । साभा को कहा था-पाय गहरा है। रीक मे रमना मान न समझ हेस दिया। लाया मान के नि घat पाम पास कुछ सुझाती । पहारको पीडा पोटता। सोपी से मिमान कर सुखमा। यात उठी, यह पाया और यह सोनी नाम का कमरे का सरखारी भाषा में फैलता | उसा में रहा, परा अदर और बाहर एक काबा परदा श्रम का। फिर कई दिन यह उसके घर पर रहा था। इसके मित्र को यदिन होने के नाते यह निभ गई सूर । कुछ स्वस्थ हुघा, तो एक दिन गाने को ठहरा। हरी हरा धार, पास मिल फूल, यहता नाला, घाया पपनी सखियों के साय या खूब सजी, विलासिता घास सवार यात! । नपा तुला फ्रासना, - साँझ हो चुका थी । घाँदना में स्वम सा छाया, भागती सखियों। सब सय । बुमाती-सी ब-"खूब । खूब और मद पर वसन्त । दखा, छाया है। पचों के से लापरवाही से कपड़े । साड़ी जरा उलमा दागों से बचा। कहने लगी-घसत, सत" अब गाना खत्म हुग्रा तथ और भी रात हो गई थी। मेल-खेल में सखियाँ भागे रही। मेड़ के पास पाया को देख यह योला-"माया?' माया चौकी । वमत का देख हसी थी। खूप निहार योबा--"हसनी रात भाप यहाँ, चलो, घर चलें।"
जीवन का रहस्य छाया आगे रही पड़ी। वसन्त को प्राते न देस घद ठिठकी ? पिर यहीं से हा-"प्राइये पलिये,न" वसत बैठा रहा, सुप-चुप, गुमसुम । पास के नाले से खेलता, लहरें उठाता। सोचता, ति दी कितनी थोड़ी है। उसमें सोत्री, पदूक की गोली, पाय, छाया और खहरों से उसका गया। जरा उठा लगा, ऊपर भिगोता । स यह मय बातें अपना लिये हो उसमें बोला-'मन नहीं करता छाया" छाया सुमाती लगी-कुछ कहीं पर । यापम पा पास से योता था-सा भी क्या मैं कहती हूँ चलो।" पिर हस, आगे बढ़ उसका हाथ पकड घास से भरी पगढडी पर भाई। छाया साथ साथ । एक दाय का हबका सहारा । महारा अनान हटा सा लगा। चलते यह बोला था-"छाया, मुझे याद न करना, जिन्दगी बन्दूका के सहारे धागे बहता है। उसी में रह चलता नहीं। टिकी टिकी मनुष्यों की लड़ाई में खून यहा, पफ धार्थ, पड़ा सा दम्म यही मने जाना है। पत्र कभी न लिपना, प्रदा।" छाया चुप रही थी। यह सोच रही थी- मनुष्य कितना स्वार्थी है। अपनी बुद्धि के सहारे दूसरे का पवले मनुष्य का पून पदाना उसके लिये कितना सरल है। योली थी- वसन्त, यह अपने पस की बात नहीं है।" तान दिन पहले के ये काले काले सध सधे दो अक्षर मेज़ की बनावट से मिले मिल सफेद कागज़ पर, सामने थाये। कहती रहो-"आप यह न लिसा करें, मेरा नाम और श्राप फिर हंस बोली- 'जी में भाया था-उसे मिटा दूं और बसन्त का 'मूह' बिगड़ा। एक अवना यहाँ पाई उसने, निरा सूनापन । मन में उलझा। यात पर बोला-"इतना भी अधिकार प्रापको अखरता है।" धागे चुप ही रहा। घर ा गया था। छाया नमस्ते कर धागे रही। अगली सुबह उसे जाना था। घाया न कर सकी विदा । मन से दूर-दूर चला, यहा रुका नह!। तान महीने पहले छाया स्वामी के घर में प्राई थी। हंसी दौर, वसत में खो. हलकी हो यहीं रह गई थी।
इलाश
मन यहल ने मात्र का साधन था, यह भी गया।
कहता-कहता-“सच, सष, स!"
पाया म न योलो । परना मन समे, पुस्तक पसोकावी कालो-दिना
पापके में कैसे रहूँगी "
सभी पास में वसात को घान-पान " उनीसा सूर मास सोला-
युलाता-छाया, भोछाया"
दूर पर दादल सड़ रहे।
कमरे के पाच कुरसा पर बैठा पद्द साप रही थी धमत यदि हामी हसिया
-
और हवामा
पड़ी उलझन थी।
तुम हँसी क्यो ? - यत, पर-ऊरर का जवादे,कोट के फाउण्टेन पेन से खेजता रहता है। कहता है t ११" शिया में जो एक गुबार लिये धुआँ सा है उसमें कमला का मन जमा है। व आर ऊपर ही उपे हटा, पंजा, जैस कुछ हलका होना चाहती है। जैसे उस सिर्फ पास था, खुशी को ममेट, उसके दिल में समाया है, और उसमें अपनी बात पा, पइ कमला नारी चौक पड़ती है। भांगन की दालान की बात पर इतवाली खिड़को का ओर निहार कर पह सकुचाये क्यों ? एक गुयार पुरा लिये आया, जो चुपके से सुझा गया कि कमला, यहा जिन्दगी है, मन का योझ भी यही। और देखो, इसे संभाल कर खच करना। वह कुछ ही करे, फिर इस मन का मन न जाने क्यों भीग जाता है। और प्रभात की हसी उसे अच्छी लगती है, श्रम अच्छी लगती है, और उसका मन है कि प्रभात सदा उसी का रहे। वह सोचती है मन की पीड़ा, वेदना, दुख निराशा दे क्या उसे यह अपना न सकेगी? वो दुख है, यह प्रभात का है नहीं, और जो सुख है, वह उसका है। उसमें प्रभात के न थाने की भी यात है शरा समझना अधिक है, कुछ भावुक भी है। फिर वह क्या प्रभात से अपना रास्ता अबग मग ही यना जायेगी। मन को उलमन से हटाया, तो वह सूना हो जाता है, और क्रि सारी बातों को आगे कर यह सूनापन वैसे प्रमात के ढाले पायजामे और काले कोट में उसे ट्द कर पुकारता हो-प्रमात ! यो प्रमात !!" प्रभात अनायास ही उसके सामने या खड़ा होता है। चुप चुप, बेबोज, प्रज्ञा अलग, कुछ सकुचाया सा । और तब कमला चाहती है कि वह कुछ कहे- जरर । चाहे वह बोलना उसके लिये हो, या उसकी गृहस्थी के लिये। कमला को लगता है कि यह प्रभात भी कैमा सूसा जीव है। इधर उधर जरा बाहर याहर ही चुपचाप दरवाजा पकड़ कर खड़ा हो जाता है, जैसे यह सही रहेगा और मेरी भावनायें यूमता नहीं है। यूझे भा तो, सोटा सा धन कर पर प्रमात बोलता नहीं है। से । पद श्या सुने और या - जाता कि शादा निम्मेदारा, मनुष्य क राजन के सिय मा का निर्माण महाँ हुमा है। भागे बात गम्भारता स यात्रा जाना है। यह वैज्ञानिक उसर टसक प्रिय कारा नहीं रहता नहा, यह स्वयं उमका समझ म हटा हुआ है। फिर भी उसे दम इस पती हसता-मी पद दिपा छिस लड़ा सपन्न क्या नही पामा । जो मारता का पान उसने ताला, वह टा है। शाम जिम्मदारी या इमम महमत है पार भय धमका मन उसका जिnan का बाम-पज कर कि कार दासो को हो पाए है। टूर-र का वैवाहिक गति में श्रा, उसे सफ्ना में निभा सो पाया है किया प्रमाके बहुत समीप स ममाप धाता जा रहा और उसे समीप पा, यह मन हा मन में यह सेती प्रभात, देसी अधिक 471 मही है। जि महारा भी है, यह हमारा भा है । उस अकल गये उसाय जब तुम गा मामा राम मरे बम्धी पर रख दना ! म प्राग यपाहता है कि इस जिम्मेदारी पर अपना सारा भार 'टकी हूं, और तमाम प्रभात कुछ मस्त सा तुम मुम हंस सुप याद खत्म नहीं होता है। प्रभात को प्रतीत होता है कि कुछ-कुछ यह पदना हा रस परिवर्तन में क कोमल का उदास पाचना का करान हग रहो और बह रहा है कि सुम्ही पुरुष हो, ऐसे पुरुष पर कान शिव लामिल हय मुस को देख उसे भ्रम हो जाता है जैस EिEE मामा भाति मारी रही होगा, और तब जैन धह पूर्व नारा विल सिल, खिलम्पिज्ञाता-सा उसके सामने भा, इस एक बार चना जाता है, और कहता है कि मेर साथ रहना। अरहा, मुझ भूना मत । कभा इसने मरहा तो कहा था कि मैं सुम्हार साध जिदगा यादगा । और पाऊँगा कि यह बचने मराह नहीं तुम्हारा मा । उस समय पाम लगात खगाते उसका मन पाट रहा था। नहा नहीं, नहीं! वह क्या करे? कमला को क्यों धोखा है। और क्या उसे नहीं मालूम है कि प्रभात कितना दुखा है। एक बात याद मन म लगाय फिरा करता है। और लि कमला को घर के किसी काम में नपा से शान्ति की यादी जाता है। थकी थका वह सामने आ जाती।चुप चुप गया था। शाति दूर करिश्ते का सो यो, पर बुना के साथ उसे पा लगता जैसे घडू कभा वह उसके घर चला तुम हसी क्यों? उसकी हा हो। फिर यह क्यों उसके लिये का रहा था! पता, तो नित पनाव विम्वेरा, रोई सूप खिल कर, जैसे रोना हा उसे चाता हो। मेरे कागा पाहतो हो कि यह रोनो हार पिना और प्रभासी निका से चल दिया था। पाती। x x कमला को लगता है कि प्रभात को किसी की सुध रहती है, पर ar नही फिर एक दिसध्या को प्रभात पाया, पेठा, तो कममा की माने का भा--- "कमला बोला है, कहीं किसी को सौंपना है इसे।" यह सब प्रभात जानता है, कमला की माँ की इछा भी उसी पर है। सी राह चले चलते उसने कहा था-"तुम्हें तो में भगा वाली" भोर भने जरा गम्भीर हो, यात को गल उत्तर दिया था-"मैं तो भार का हो।" शान्ति को दया सोचा, यह रोख पुराना है। पाप साथ-सा दिया। अब यह उसका उत्तर क्या दे। विवाद छि, छि दि! x दूर पर शान्ति को हरी साही में उनका देख यह रहा। यामी निm गई प, हाथों में डायम कट को दो पतली-तपली पूरिया, कामानित खिली खिली लगी हो लगी- 'यही समानाधि, गुगाभा- हम से दूर-दूर देखो नारी की पहचाग करो।" और प्रभात रा पाप्त गया, Ke सत्ता । बडी रही, एक कोने में दुबको दुधकी। फिर इसे देश धार से पोज- "मन का न होना होता है। स्वामी प्रसस्प है। का पारा चीत में बदमे शोर से होश और और तुम !" "शाति" यह कहती हो गई। "जिसे पापा उसे खोया, और 'पाया' की जिदगी का एक भार, भार रहेगा।" "शासि!" उसकी उलाहना इस दूर तक बहती नदी में जैसे शोभा के नाम की चिट्ठा दिया, जिस, अब लगता है जरुरत निमा, पास पास ना, जिम्मेदारी से लग केवल उत्तरदायिव में रह जाना पड़ेगा। पिछले दिनों की यात पहल में प्रा, लहरों स खेल, व्यथा विखेर दिल में एक स्थान बना, जैसे सुझाना चाहती हो कि तू चिट्ठी लिखना, मेरे नाम की। पदना मा। अपना हाररत सहा । कुछ भी हो और शोभा को चिट्ठी- शोभा! पान कई दिनों से तुझे पत्र लिखने की सोच रहा हूँ। चारता हूँ कि अपनी यह जरा-सी विवशता fu,मित राग बिजी और सर हृदय-मात्र से मुहार सहारे जो दुनियादारी का उसूल जमा है, उसे खोटा न करूं। ठीक वैमा हो से मिला । घटनायें कहाँ तक सिर्जु जिम्मेवा में लगी तू घर श्राफर जैसे न्याना रहना नहीं चाहता। तू भी क्या है ? जैसे कभी समझ में भी नहीं पसरी है। अलग अलग थपना रास्ता प्राविर मनाये ही रही। वहीं सकता गती-मैं हूँ कोई दूसरा कहाँ (१) तब ही याद भाती है कि तुमसे कुछ दिपाया नहीं है।। पिहले दि वह सिकी खिली श्यामा यातों में था जम बनी थी। सुझ भी कहा शमाया था। अभी भा वह वैसी ही है। हसती, खिल खिलाती यहीं रहता। सससे मिल एक हपनी थी। वहीं पर इसे का ठिा मागे आया था। शम मन में उसके प्रति सौदा नहीं था। आज रयामा का अभाव प्रखरता है। मन से जह भगद जैसे पूछना चाहती हा कि अलग क्यों सफेद साड़ी पहने थी। सादे वालों में लिप लगे थे। घोच में एक छोटी-सी वि दी । सूर्य सुदर लगा यह । हंस योषी था-"हम और लिखते - उलाहना केमदारे कह-सुन,रा हलका हो, माफत यन पास या जाती है। आगे वह दिल में मूक हो रही । धवा का प्रभाव पाकहाँ ? मन में एक उलझन यो। उसे बिखेर चाहा था कि निभ जाऊँ () और मुझे भी तो लिखा था कि रयामा मुझे सूत भली लगती है। सय क्या मालूम या कि हम पृथक ही रहेंगे- रखामा से बहुत दूर। वहीं रह अपना जिन्दगा चला, जिम्मेदारी समेट चाहेंगे कि और श्यामा चिट्ठियाँ जिसना खूष जानती है। इसी अब उसके स्वामी है। उसी में अपने को समूपो पाती जैसे हटगा उससे एक पाप है। उस पार गया था-श्यामा दुवो मिली। मुझे देख हसी नहीं । पास श्रा, धार नमस्ने कर एक घोर गम्भीर हो चला गई । मन से पह उलझी, पूछा-'श्यामा, क्या है।" "श्यामा-2" यात हएके दुहराई । कार जाने पर जाती योला-"म कमा यात इम यही हैं। पास नहीं है-जैसे पुर जानते ही नहीं।" "श्यामा " श्यामा नाचे आई। पोली-"किसी दूसरे के पास रखना अश्या लगता नहीं। मेरी कमजोरी को मनायो हार हो । कला दिया जा देना । पराये हाय क्यों लू । और तुम ? स्वामी थागे श्यामा ने चूड़ियाँ उतार फश पर फेंका। उनकी खन खन सुनी। तभी साधा-यह श्यामा कर अपने को समझ सके। फिर माँग का सिर पोछ भागे माँग का सिन्दूर भी पाई । बोली- "देखो, अभी मुझ में कुछ भी धुराई नहीं है। तुम सब चीजें कज लाना जरूर तमी पहिगी था" शाम को ट्रेसे मैं चला पाया । अाज तक श्यामा की चाम नही भेजी है। पर भोली नारी या कोरे कागज़ पर बिखरी मालूम देती है, कहती सी-'मेरी चीजे और क्या तुम्हारा यही श्रादश है।' तभी पास में एक छोटे बच्चे की दर्द भरी हँसोजती । उमका 'प्रिमियश' सँभाख का रख लिया है। पड़ोस में माता पोड़ एक को चाया बनाया था। यह चाची भी भी से सलमी है। और बच्चा-१ इन्हीं का वह छोग-सा बना बीमार रहा था। देखने गया । यह भोला शिशु-छोटा सी चारपाई पर लेग असहाय खगा। कहता- "मैं अपनी पीड़ा पता नहीं पाता !' उसकी गोरी गोरा सूरत मुंह तक यिखरे १८ इजाम और उसका . चाँसों के पास एक छोग-सा दाग और गया बीमार रहापाड़ा से तिलमिला, मुँह सोन चुप होता दुध पोलसा नहीं । मन भर पापा । पारने कहा- साकत का दया देता है।" यह पैम पर मुमो याशा वाण! प्रिरिश पचा मर सुका था। घर पाया । प्रिपिशन बाद कर सोपा-पया सगुण यह मर गया। और डामर का तात की या एक दिन सुना पापी ग्याना मही गाया। उसी के पीछे हँसा । पात सोचता है, मुझे हंसना नहीं चाहिय मा। निमा कहाँ और फिर अब की रयामा से मिला था। बच्चे की यात कही, तो या पोजी-"धार क्यों दुख लेत फिरते हैं। भार पुरप है। ऐमा होता थाप के लिये ठीक नहीं।" मन के निकट सभी काम कहती सी-"कश पाऊँगी अश्या !" कामना का मकान पड़ा भारी है। मुझे पहुत अपहा लगता है। उसी में रह, अपने को सवार मुमर लगा है। कमा सुमे भी तो कामना के विषय में दिखाया। सूर्य खिक्षा है यह सब उसे देखते ही नहीं भरता। पहिले ही दिन घुल मिल गई या। सरदा मैं ने सोचा था-'यह गारी दिख यसा सकेगी। इसकी भनी पका चोख नीला नीला मुझे भाती है। दिन में विक्षरी एक घर बना वही रहती है। बाहर क्यों (१) चलते-चलते थोषी पीक्षा पीसा है। उसने गहरी गहरी-धनी धनी ! उसी में अपने को थाम जरा दुखी हो सशक्षा की है। काफी पड़ी है। रगी सारियों से उलझी उलझी पहलगता है, जैसे कोई अपनी रही हो । नीचे बैरती, धीर पोल भागों में समझ, पसरता जगती है। एक युवक उसके जीवन में पाया था। अपना याद सैंत बह चला कहता-कामना ! मेरी धद युवक अब इलाहाबाद में पढ़ता है। नाम तुझे नहीं बताऊँगा । यही कालेज की पुस्तकां से उजम, काली-काली छपी छापे की लकीरों में कामना को ढूंद, समर लेना चाहता है । जब कामना छोटा थी । बों के से वापरयाह काई पहिनती। घर में दीदी-दोगी तो क्या उसे पता था कि वह उसे ठुकरा मिदगी में इटा दया। घगपने को उसमें पाती पिएले दिनों इलाहाबाद गया था तो उससे मिला था। कामना की फोटो पर शाम को पाना चाहती हHE RE बोला- यह भी एक जिदगी की सनक कामो कोही मानतान ही - पंक
No text on this page.
हतान और कम्मो न कर सकी थी नहीं । धुप धाप ले, अदर जास में दकर चिसो दिनों उसी साड़ी के कुछ टुकड़े मकान के पीछे दूत में मिले थे। माँ ने सुना तो बुरा भला कहा था। दिल में एक थंधेरा, दूर पर उदासी से भरा। हरता कहा ? फिर कामना मिजा या कमा घर पर मिली खिली । मुझे दन उटी, धारे थोशी-"याइये" कुल योमार रही वह । कमजोरी में प्राइभर। मैं का नहीं, पुरधाप मराए म साँस लो। वहाँ सफेद सफेद कबूतर बकनी के घर से निकलते मौक, पर सोम उसी में रहते, जैसे यस, उसी तक उनका पहुँच रही हो। यह काले रंग का पास ना बाल फैलाता, फिर जाने पर पाबदा, कहतामा कम्मो का सिखाया हूँ। और यह काला-काजी मेरा माथिन जानते हो ।' साथिन ! सोचा, अथ इतने दिनों के माद या दुनिया में रह कर, कामना को इलाहाबाद थाने युवक को याद नहीं आती होगा। तभी जैसे कामना सामने ही गुस्सा स कहती-दि मेरा स्वामा है और यह ! निकट में पुस्तकों से मरी प्रामारा। भागे हरे चरित यीच नाबाल और आगे कासना को देख जरा उलझा । मोगा तो कामना को दीदी से उनमा पाया। पास पापा, कामना कुछ छिपाती सी लगी। सहा-“कामना दूर ही यह रही । यही से थोड़ा हँस बोली-"कुछ नहीं प्राप १" "कामना, मुझे नहीं दिखामोगी?' मुन, कामना कुछ शिथिल हो दूर ही रही। चोरी पकड़ी गई थी। लजाती माती कुछ माली ही फिर पास ओ धोती-मापसे क्या लिपाऊँ!" कामना तस्वीर में आई । सफेद साधा पहिने थी। सिकुड़न से हा। उसा में पिता खिला किती कलाकार की मारपन कोरे काग पर हसता रही-सजीव ही तो नीचे तान अधरों का नाम ' इलाहाबाद वाला युवा समीप पाया । ढीला ढाला पैट पहिने था, होस्टर में पैठा कहता लगाने कमी कम्मो का एक तस्वीर खींची थी। तभी अपना अधिकार देग मीच अपना नाम लिस, मिरता मिग्या मिट गया था। पिलो दिनों यह तस्वीर माग भी थी। मुना था, कम्मो उसे कहीं बाहर भेजने वाली है। युवक हंस कर कुछ दूर हट गया। अपने में पाया, कामना सामने रही। शरमाई-शरमाई-पाई हरी| उसका दापन धाज दिख में कुछ-कुा करने लगा है। सोचता है-इतना सब कुछ होने पर भी कामना ने अपने को पृयक क्यों जब मरण पास यायोली थी-क कापी और चाहिये?" दिया था। कामना याज भी एक पहेली बी श्राफिस की पाइला से खेलती लगती कुछ दिन बाद सुना था, कामनाने सुद ही विवाह के लिये उससे 'न कर है। वहीं 'शाट हंट' की मेड जकीरों में यह छुपसी नहीं। पतली, लाज, कीरों समी प्राफिम से दी हुई कापी के एक कोने पर बैठी हसती हसती कहती-सी- दावार का श्रोन ले। बाहर से थाया, सीधे बराएडा पार कर अन्दर पहुंचा। रालवी तुम एक पहचानती है कामना! घर मा दिपी दिपी यह रही थी एक ओर. पकड़ी गई। पीछे काम अपगी सुपुदगी में जान सूप हसी थी। अपनी सफलता पर तब सोचा था-श्या विवाह हो जाने के बाद भी कामना निरीषची ही रहेगी। पदों की साचाल चलता है। हँसती और पेलती भी। फिर चन्दर मेज से मेरा বয়ান। पाटा पोली था-"अच्छा, यह चोरी क्यों ?' "तो पिर किसके लिये खिंचवाई है?" 'इम काम करो, मैं तुम्हारे साथ हूँ।' "चोरी।" 4 कामना जैसे कट गई हो। व पी सी लगी। रूमाल मुंह पर रख इसा घी खूप ! फिर उसे प्लाउज़ की "क्यों" "बहिन " एक हमारी और एक हमारी पदिन की।" तय कहाँ सममा था कि यह म कामना मुझे ही दिया था। अपना मार्फत कापी को घोट ले जरा अपनप पिता तुमे हो जिन्दगी में सौंपाया। भान उसको या पात मन से मगहा करती है। तब मैंने उसका नाम पदस कर भाशा कर दिया था। यह दो पर अपने में सो घेदना भरसे कि समझ नहीं पाता कि मैं सब कुछ पयों न हुभा। वह धार पर इसा परती, मंगलता, भागेपदवी भाशा को माँ म पाता। सिजी-निजी पमरती। फनी वही रहती। कहता-दती या पागा कौगो भार फे दिल से चिकोटी कासी हंसती ही रहती है, एक अपनाय खादे की बात कहाँ और वास्तविक दास भान खमन पोड खाम से कर यह मुन्दर नारी सर मान खेतो। फिर भी nam मिता-"जी, हाँ! मैं सब जामता, पार ने माना किसी और " "सप,नही कामना" फिर कसम का दिमागी मुनियाद पर या माती। यही हा मानती। कहती-- "मुझे मार यो मानते हैं।' भाका उमके पास मा स्वामी है। मुना है कान का प्रोमा है। कभी 'इकनानिा' और 'बाजिद' की गारा दास का में हर बसे शोर मा चाहता है कि कम्मो में भी मुझे धोरा म देना, प्रामा! पाकामा कोषमा कमी ठा-गक माममा समाये काई कहना-नहीं, नहीं, मही!' ना! तेरी चिहियों का दान से चिहियो भी रूप होती है। पार है- शादा के युष दिन पहिस की लिहिया । जैसे उन बाली-काशी मोरों में होगा नाम का पिट्ठी मुझमें दरारना वाहता मी। उन्हों की मारपण मय कुन सागर मुझे कहा मालूम था कि रा हरामा कमजोर है। मा का भावना निरी समयापा। पसी भा नहीं ! सिद्वियों की सम भाई था गुमाती-म दूर कहाँ पाम har, मुम ना मद यह रहना पास हा । घर से मेरी दुराई दूर करसो। यही माता । धान ते वे चिया मेरे और सरे बाद मात्र एक अपना पारे। नाशकापात तू पुप रही थी। सहारा ११ सप सममाता । दूर पर सती पर पेश कहा पी थाया था। शाला का साग । मन खोज सब दुमदेभाने में सिगट चाहा था कि सुमे अमीत । शाळा पाप उससे सगात् । भाइना उस पाप खड़ी कर लेमा धान एक साधारण बात है। सब ही इस लम्बा चौदा शिगी में शोला को बीच खा पसरा पसराई रही। मन कहता हि दिसू पर तुमसे कुछ हिश नहीं कमा दिपाया है या मारा? शाला ने कहा था-शोमा परे लिये गृहस्थी रायगी। एक खिलौना यन तेरी उस गृहस्थो में भी शोमा दुख वोट सूब निभेगी ने भो तो अपनी राय दी था। सब मेरे सामने समझ जरा शरमाई भगी था। भावुकता में जब यहता हूँ अपने से कोई रास्ता बना प्रेक्षता, सामने रहता और तू - कामना मी खूब है। मा कहती, करता। बिलकुल सघ सच, मूठ हा श्यों ? पात बना, उसस सिर नवाना उसे आता हीं। अपनी पार-हाजिरी में जिम्मेदारी दिखाने की यादो रही है। सिफ एक दिन घर से भाकर सुना-शोमा की गादा हो गई। शाम को कामना ने सुनाया। मनुष्य जो घाइता-वहीं रह, उसे पाता नहीं। .
उखाहना १७३ "कामना !" कामना मोली--"पाहा था कि शोभा बहिन को आप में सौंप से कि दूर मही " हरी-लाल विदियों से लगी साड़ी में कामना रही। उसी में एक घर बनाती, वहीं दुबकी, खूप खिली खिली। शोभा का बहाना जुग मन के पास आई। दूर पर काले काले बादलों के पास तभी जैसे शोमा अपने स्वामी के पास रही हो । पैसे की गृहस्थी शुग, उसी में सुख समेट को लगी-तू बिना पैसे का वही रहना धागे खूप सफेद साड़ी हिलाते हिलाते मिलमिल भाग गई । कहती-कहती छि ! हि तू कहाँ और में ? सोचा ज़िन्दगी में एक परिवतन मर हम दुख को समीप रसते । महिचानते नहीं। और शोभा या सच ही पैसे पर पसरती । स्वम, निराशा, दुख, पीमा सय को सोहम पैसे पर रिका भागे चलते है । सोधो को सामध्यं हारा । ध्यान Jटा । कामना ने कहा-"क्या शोमा दीदी की याद भा रही है?" शोभा मन भर शाया। एक दिन यह दो असर का नाम अपनी इसी दिखेर दिल मे खेला था । सूब समझाता, जरा पसर जैसे मुफ ही हो वेदना भरने पापा। सप मन दलका थोड़ा ही था, जो समझ लेता और अब ? कभी घूम कर वापस आया था। हारा थका, तमा शोभा के बड़े भाई ने चिट्टी ला कर दी। यह रूलदार कागज का छोटा टुकड़ा एक व्यथा को लकीर खींच दिल में दिखरा । छोटी सी कविता की भाठ दस लाइनें-और भी भाधे टुकड़ों पर मा शोभा था, हँस विट्ठी घिस गई हो। । मेरी कविता भी क्या खूब है, भापकी पसद में रहेगी भी । जरा लिखते- लिखते थक जाती है। और तब चाहती हूँ कि अयन लिएँ । पर अपनी कमा, कुछ भी कही जरूरत हो सही। और मेरे याने से आपने आना क्यों बाद कर दिया । सुम्हारी- शोभा।" सत्र शोभा घर से वापस भाइ या अपने पीछे की बातों से जरा अलग रही। सुबह सपजता पा, मुझे देख मात्र, दरवाजे की ओट ले जैसे चोली हो-'मेरी चत और फिर प्लेट की यह नमकीन कहाँ साई गई थी। रास्ते में पाते सोचा या, शोभा से सभी सप दिपा है। जिन्दगी का सुस्वन्दु ख पटोर यह भागे आई। वहीं हसती रही सिलखिलाती पसरी । एक स्थान सुमाती। अपने सपने को पात सुन कर तय शोमा जरा मन के निष्ट हंसा समे पड़े बड़े प्रासुत्रों में रोई था। कहती सुम मुझे दूर करोगे, पालो ! और भय में रहा। पिछले दिनों कामना की बात याद थाई। यह चुप क्यों रहे । दुनियादारी में अपने को गला। केब खाने को ठहरा थी। केले छीज पास बा विखरी फिर दूर हा से योला-"श्राप भी ।" भागे मत शरम में खो गई। कामना केवल तत्र हसी मर थी और यहाना करते देख दुख में सिकुड़ जरा गुस्सा हो बोली थी--"श्राप को मेरा कप्तम है पो न खा" कामना भरी पूरी मन के नीचे ठाक ठीक उतरी। उस दिन कामना को थवा नहीं लगा कि यह टहरे । पात चीत का सिलसिला सम का पन्जता पनी । x X दो महान के बाद एक उजाली राa! सामने दूध मो घाँदनी बिही उसी में सोया, मायना समेट कुछ जिसने मार तुला कि कामना ने पादरवाजा घर सटाया। पीये एक पापा-सी दूसरा मारा को समे यह धागे रही। फिर बोला- इसे सौंपने खाई है।" "कामना" "हा, मुझे यकीन भा कि माप मेरी बात जाने न दो। तभी तो यह साहस किया।' आगे बोला-"कच पाई है, स्वामी का पता नहीं।" शायद बात सुनों में यह गई। सुन कहा-"कामना मैं समझ न सका " और कामना ने पार पाँच कर कहा-"यह शोभा है जिसे एक दिन !" "शीमा" दुपज्ञा पतलो, केवल हट्टियों में सामित धौर यह शोमा ? भावना बोट मोला- "तो फिर " भागे धदी देर तक कामना चुर रहा। अन्त में बोली-"तो मिल मैं प्रव जाती उखाहता यातों ने एक जगह बनाई । यहाँ शोमा की तरतरियों का रक्षामा नाम ही गमा। उसी के निकट मामा का गोरा-गोरा मुँह कहता लगा-पोवाल, कक्षाकार ! तू और मेरा स्वामी विना पैसे का हके योला-"कामना ! पहरी गोमा का उलाहा चुकाना है। फिर सोच कर इत्तर दूंगा, अभी नहीं । मैं ने मिठाई खाई है। पुष लामच हो तो ।" मेरी मिठाई। शोमा कुछ चकी। उसने मिठाइयों खिलाई है। पर मामी और प्रय बोली-"इतना खोटा उत्तर मैं बोला-"शोमा सम्भव है मनुष्य के कोई यात न लगती हो। फिर भी ससके दिल में एक गहरी दी रह जाती है, जिसे निकाल, पादर लाना हो गए शोमा गाली-"उस गहरी चीर से अथ दर लगता है। गुरसे से ऊप मात कहने में फमा यदा सुख मिला। फिर भी !" "शोमा" भागे पिर शोमा थैठी नहीं । कामना को लेकर ४४ पड़ी। फिर यदसी पापा समेट, दूर होती होती चली गई। रात भर शरीर श्राग सा जलता रहा। हाथ-पैरों में दद को मारी अधिरना थी। सुषह एक थाल में मिठाई की तश्तरियाँ लगवा शोमा के घर पहुँचा। नौकर से काला भेजा, और तय ऊपर कमरे में बैठा शोमा ने सीधा-या नरेव भी कैसा है। क्या कभी भी इसको समझ सकेंगी । हल्की बात को भी गहरी या जिन्दगी में समेट लेता है। गुलाबी साड़ी में सिजी रिक्षा न घे आई । बोली-"नोद, श्राप धाहता है।" मैने वैसे ही कहा-'आमा, करियेगा। पास हो पापका उलाहना सुका पाया चौर शोमा जैसे चकिती बोली--"उलाहना !" "हाँ, हाँ, आप की सारी तश्तरियाँ बाया हूँ, इ हे संभालिय। मैं हारा । हारा" "मगर भाप की तबियत वैसी है। ग्राख कैसी साख और .
"शोभा ! यह मधं की बातें हैं। मिाई संचार लो। मैं बन रहा हूँ।"
शोमा के दिल में भावना पसरी । मेरा जान पहिचान ले वहीं रहो । प्रागे नहीं
बही । ममता, स्नेह, सुख, मिलन सभा तो इस मावना में या । बोली-"कहाँ से
वा सभास?"
"धार के जाने के बाद सारा कितावें वेव दी।"
शौर मेरे लिये दा जाने बाजी भी।"
उनका क्या करता शोभा। वे भी सा उलाहना चुकाना मात्र धी। भी साथ
गई।"
धय शोमा भागे बढ़ी।
हाय एका बोली-"मोह। यो "
धागे कहती रही-“यह कहिये, यार को पुखार भी है 12 सोचती थी कि
क्या बात है। थार ने पताया क्यों नहीं " किनीधे तांगेवाले को विजाता सुन
बोला--"और यह तापावाला क्यों बुला रहा है।'
"जा सो रहा हूँ। कुछ सामान इसा में धरा है।"
चौकशोमा ने प्रश्न किये-"कौन जा रहा है। घर क्यों जा रहे हो। श्रमी या
है घर में, का घर है, तुम्हें धुखार क्यों पाया ? मेरे उलाहने के पौधे किताये क्यों
बेची ?"
पिर धारे से मस्तक छ हाय पा, मानते हुये बोली-"एलिये ऊपर लेटिये !
पिर जाइयेगा घर।।
शोभा, एक पाठ सुन लो । देखो, परन स्वामा को हूँदना । और मिल जाने
पर इसी के निकट विधाना। अदा।"
शोभा बोजी वैसे हा- 'यह सभ लिए कहियेगा, और चलिये । माप घर क्यों
जा रहे हैं। पिर देखा जायेगा।'
"देखो, शोमा एक बार और इतनी जल्दा नाज हो बात न लगाना यह
तुम्हारा स्मामी है । स्वामा हा रहेगा."
सवाहना
१२.
।
बाल शोमा के मुके घेहरे पर पड़ी। वह लाज लाल हो रही थी। श्री भरी
भरा थी-जैसे अब रोई अय रोई । बोली-"चलिये !" फिर ऊपर समालती
पहुँची। एक विस्तो पर शिया बोली--"घर सो गाय । फिर सुनूंगी सप पाते !"
बॉखों में शोभा का वह स्नेह घूम गया। फिर धीरे धारे दिल के नीचे उतरा,
सुझाता लगा-नारी की कोमलता-ौर शोभा भी तो नारीहा है।
तमी चादर उदा, यह सामने ही हम, खिली खिली खूप, बोली-"अपने टलाइने
तुम्हें भी समेटा है । मिठाई और तरतरी भी | अब मिठाई मेरो, और मिठाई
पाला भी मेरा
फिर तरतही पाप क्षा कहती गह-"मेरा उलाह। मिगइये।"
श्रागे खूब मुधरासी सामने से भित्रमित भाग गई। तभी मैंने सोचा-शोभा
का सलाहना
No text on this page.
No text on this page.