Sanmati Library, Jaipur

Jainnityapath Sangrah (vol - I)

2009/11

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पृष्ठ or १० २० विषयानुक्रमणिका। विषयनाम नमस्कारमंत्रादि २ दर्शनदशक द्यानतरायजीकृत ३ दर्शनस्तुति ४ वयंभूस्तोत्र ५दौलतरामकृत स्तुति (दर्शन) ६वुधजनकृतस्तुति (छोटा दर्शन) वृदावनकृत स्तुति ८ भूधरकृत स्तुति भूधरकृतं दूसरी स्तुति १० भूधरकृत गुरुस्तुति (साधुवंदना) . ११भूधरकृत दूसरो गुरुस्तुति १२सरखती स्तवन नाथूरामप्रेमीकृत १३जिनवाणी माताकी स्तुति भूधरकृत १४निर्वाणकांड भैया भगोतोदासकृत १५आलोचनापाठ जोहरीलालकृत १६सामायिक पाठ पं० महाचंदजीकृत १७पंचमंगल पं० रूपचंदजीकृत १८अभिषेकपाठ हरजसरायकृत १६पंचामृत अभिषेकपाठ २० देवगुरुशास्त्रको नित्यपूजा द्यानतरोयकृत २१शेषके मध २३ २५ હ ३२ ३२ ३६ ६२ १ ७ .७४ ७७. ८० १७: १०३ . ११६. १२७ " १३८ १५८' २२शांतिपाठ विसर्जन भाषा: २३भाषा स्तुति पाठ. २भकामर स्तोत्र : हेमराजकृत २५कल्याणमंदिरस्तोत्र बनारसीदासवंत २६एकोमावस्तोत्र भूधरदासजीकृत .. २७ एकीभावस्तोत्र पांडे हीरानंदकृत २८.विपापहारस्तोत्र शांतिदासकृत २६ भूपाल चौवासोल्लोत्र भूधरकृत ३०.बारह भावना ३१ आदिनाथस्तोत्र श्रीमानतुंगाचार्यविरचित ३Rमोक्षशास्त्र अपर नाम तत्त्वार्थसूत्र दौलतरामजीकृत ३४ बीसतीर्थंकरपूजा भाषा धानतरायकृत: ३५ सिद्ध पूजा (संस्कृत द्रव्य पूजा) ३६समुच्चयंचतुर्विशति जिन पूजा वृन्दावन छत ३७ श्रीचंदप्रम पूजा ३८श्रीवासुपूज्य जिनपूजा ३६ श्रीशांतिनाथ जिनपूजा ४०श्रीपार्श्वनाथ पूजा बख्तावरकृत अश्वद्धमान जिनपूजा वृदावनकृत ४२वारहखंडो सूरतकविकृत ४३ आरती संग्रह ४४महावाराष्टक पं. गजाधरलालजीकृत '४५. अकृत्रिम चैत्यालयोंका अर्थ ३३ छहढाला १७७. 1 १८२ १८८.. .१६३ २०१ २०८. २१६. . २२३ २३१. . २४. "१ भाषाजैननित्यपाठसंग्रह। प्रथमभाग। अथ नमस्कार मंत्रादि। गाथा। णमोअरहताणं, णमो सिद्धाणंणमोआइ. रीयाणं । णमो उवझायाणं, णमो लोए सव्व- साहूणं ॥१॥ चचारि मंगलं-अरहंत मंगलं । सिद्धमंगलं। साहु मंगलं केवलिपण्णचो धम्मो मंगलं ॥१॥ चचारि लोगुत्तमा-अरहंत लोगुत्तमा । सिद्ध लोगुचमा । साहु लोगुचमा । केवलिपण्णचो धम्मोलोगुचमा॥२॥ चचारिसरणं पव्वजामि अरहंत सरणं पव्वजामि । सिद्ध सरणं पव्वजा- मि । साहु सरणं पव्वजामि । केवलिपण्णचो धम्मो सरणं पवजामि ॥ओं सौं झौं स्वाहा।।

धर्तमान चौवीस तीर्थंकरोंके नाम। कवित्त ३१ मात्रा। ऋषभ अजित संभव अभिनंदन, सुमति पद्म सुपास प्रभुचंद । पुहपदंत शीतल श्रेयांस प्रभु, वासुपूज्य प्रभु विमल सुछंद ॥ स्वामि अनंत धर्म प्रभु शांति सु, कुंथु अरह जिन मल्लि अ- नंद।मुनिसुव्रत नमि नेमि पासवीरेश सकल बंदी सुखकंद॥ (श्रीऋषभः १ अजितः २ संभवः ३ अभिनं- दनः ४ सुमतिः ५पद्मप्रभः६ सुपार्थः ७चंद्र- प्रभः ८ पुष्पदंतः ९शीतलः १० श्रेयांसः .११ वासुपूज्यः१२विमलः १३अनंतः १४ धर्मः१५ शांतिः १६ कुंथुः १७ अरः १८ माल: १९ मुं. निसुव्रतः २० नमिः२१नेमिः२२पार्श्वनाथ:२३ महावीरः २४. इति वर्तमानकालसंबंधिचतु- विशतितीर्थकरेभ्यो नमो नमः॥ इसप्रकार बोलकर साष्टांग नमस्कार करना चाहिये । नम- स्कारके पश्चात् पूजनके लिये चावल चढाना हो, तो नीचे लिखे यद्य तथा मंत्र पढकर चढावे ।

गीता छंद दोहा। यह भवसमुद्रअपार तारण, के निमिच सुविधि उई। अति दृढ, परमपावन जथारथ भक्ति वर नोका सही। उजल अखंडित सालि तंदुल, पुंज परि त्रयगुण जचूं। अरहंतश्रुतसिद्धांत गुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं ॥१॥ तदुल सालि सुगंध अति, परम अखंडित वीन । जासौं पूजौं परमपद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥१॥ यदि पुष्पोंसे पूजन करना हो तो नीचे लिखे पद्य और मंत्र पढकर चढावे। जे विनयवंतसुभव्य-उरअंबुज प्रकाशन भान हैं। जे एकमुखचारित्र भाषत, त्रिजगमाहि प्रधानह। लहिकुंदकमलादिक पहुप, भव भव कुवेदनसाँ बचूं। अरहंत श्रुतसिद्धान्त गुरुनिरग्रंथ नितपू- जा रचूं ॥२॥ छोहा। विविधभांति परिमल सुमन, भ्रमर जास आधीन । तासौं पूजी परमपद, देव शास्त्र गुरु (४ तीन ॥ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः कामवाणवि- ध्वंसनाय पुष्पं निर्मपामीति स्वाहा ॥२॥ यदि किसीको लोंग, वादाम, इलायची या कोई प्रामुक फल चहाना हो तो नीचे लिखे पंध और मंत्र पढकर चढावे । लोचन सुरसना घाण उर, उत्साहके करतार हैं। मोपै न उपमा जाय वरणी, सकल फल गुरु ण सार हैं । सो फल चढावत अर्थ पूरन,सकल अम्रतरस सचूं । अरहंत श्रुतसिद्धांत गुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं ॥३॥ दोहा। जे प्रधान फल फलवि, पंचकरण-रसलीन । जासौं पूजी परमपद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥३॥ ओं हीं देवशास्त्रगुरुभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलंनि- पामीति स्वाहा ॥३॥ यदि किसीको अर्घ चढाना हो, तो नीचे लिखे पद्य व मंत्र बोलकर चढाना चाहिये। जल परम उज्ज्वल गंध अक्षत, पुष्प चरू दीपक धरूंवर धूप निर्मलं फल विविध, बहु. जनम के पातक हरूं ॥ इह भांति अर्घ चढ़ाय .

नित भवि, करत शिवपंकति मछु । अरहंत श्रुतसिद्धांत गुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं ॥४॥ दोहा। वसुविधि अर्घ सँजोयके, अति उछाह मन कीन । जासौं पूजौं परम पद, देव शास्त्र गुरु तीन॥४॥ ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्योऽनयंपदप्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥४॥ इति नमस्कारमंत्रादि ॥१॥ (२) अथ दर्शनदशक । छप्पय । देखे श्रीजिनराज, आज सब विधन विलाये। देखे श्रीजिनराज, आज सब मंगल आये ।। देखे श्रीजिनराज, काज करना कंछु नाही। देखे श्रीजिनराज, हौस पूरी मनमाहीं । तुमदेखे श्रीजिनराजपद, भोजलअंजुलिजलभया चिंतामनिपारसकल्पतरु, मोहसबनिसोंउठिगया २ देखे श्रीजिनराज, भाज अधु जाहिं दिसंतर

देखे श्रीजिनराज, काज सब होह निरंतर ।।
देखे श्रीजिनराज, राज मनवांछित करिये।
देखे श्रीजिनराज, नाथ दुख कबहु न भरिये।
तुम देखे श्रीजिनराजपद, रोम रोम सुख पाइए
धनिआजदिवसधनिअबघरी,माथनाथकौंनाइए
३
धन्य धन्य जिनधर्म, कर्मकौं छिनमैं तोरे।
धन्य धन्य जिनधर्म, परमपदसौं हित जोरै ॥
धन्य धन्य जिनधर्म, भर्मको मूल मिटावै ।
धन्य धन्य जिनधर्म, शर्मकी राह बतावै॥
जगधन्यधन्यजिनधर्मयह, सोपरगटतुम किया
भवखेत पाप-तप तपतकों, मेघरूप कै सुख दिया
१.
तेज सूरसमै कहूं, तपत दुःखदायक पानी ।
कांति चंदसम कहूं, कलंकित मूरति मानी।
वारिधिसम गुणकहूं, खारमैं कौन भलप्पन ॥
पारससम जस कहूं, आपसम करै न पर-त ।।
१ कल्याणकी, आत्महितकी ।२ पापरूपअग्निसे तप्त । ३. सूर्यासEN
४ पराये सरीरको अर्थात् दुसरी धातुओंको 1.

इन आदिपदारथलोकमैं,तुमसमानक्योंदीजिये
तुममहाराजअनुपमदसा, मोहिअनूपमकीजिये।
तब विलंब नहिंकियो, चीर द्रौपदिको बाढयो।
तब विलंब नहिं कियो, सेठ सिंहासन चाढयो।
तब विलंब नहिं कियो, सियात पावक टारयो।
तब विलंब नहिं कियो, नीरे मातंग उबारयो।
इहविधि अनेक दुख भगतके, चूर दूर किये
सुख अनि । प्रभु मोहि दुःख नासनिविर्षे अब
विलंब कारन कवन ।।
६.
कियो भौनत गौन, मिटी आरति संसारी।
राह आन तुम ध्यान, फिकर भाजी. दुखकारी।।
देले श्रीजिनराज, पापमिथ्यात बिलायो।
पूजा श्रुति बहु भगति, करत सम्यकगुन आयो
इस मारवाड़े संसारमैं, कल्पवृक्ष तुम दरस है।
प्रभुमोहि देहु भौभौविषै, यह वांछा मनसरस है।।
१ पटतर, उपमा । २ जलमेंसे।३हाथी । ४ पृथ्वीमें । ५ घरसे ।
* शमन ! ७ मारवाडरूपी [धृक्षरहितसूले देश रूपी ] संसारमे ।
.

; ܀
७
जै जै श्रीजिनदेव, सेव तुम ही अधनासक ।
जै जै श्रीजिनदेव, भेव षटद्रव्य प्रकासक ॥
जै जै श्रीजिनराज, एक जो पानी ध्यावै।
जै जै श्रीजिनदेव, टेव अहमेव मिटावे ।।
जै जै श्रीजिनदेव प्रभु, हेय करमरिपु दलनकों
हूजे सहाय संघरायजी, हम तयारं सिवचलनकी
जै जिनंद आनंदकंद, सुरवृंदवंद पद।
ग्यानवान सब जान, सुगुन मनिखान आनपद।।
दीनदयाल कृपाल, भविक भौजाल निकालक।
आप बूझ सब सूझ, गूझ नहिं वहुजन पालक ।
प्रभुदीनबंधु करुनामई,जगउधरन तारनतरन।
दुखरासनिकासस्वदासकों, हमें एकतुमहीसरन।
९
देखेंनीक लखि रूप, बंदिकरि बंदनीक हुव ।
पूजनीक पद पूज, ध्यानकरिध्यावनीक धुव ।।
हरष बढ़ाय बजाय, गाय जस अंतरजामी।.
१ भेद । २ गद ऐसा.मी पाठ है।३ शत-छिपी । देखनेलायक।

दरब चढ़ाय अघाय, पाय संपति निधि स्वामी तुमगुणअनेकमुखएकसाँ,कौंन भांति बरननगरौं मनवचनकायबहुप्रीतिसौं एक नामहीसौं तरौं । चैत्यालय जो करे, धन्य सो श्रावक कहिए। तामै प्रतिमा धरै, धन्य सो भी सरदहिए ।। जो दोनौ विसतर, संघनायक ही जानो। बहुत जीवकों धर्म,-मूलकारन सरधानौ । इस दुखमकाल विकराल में, तेरो धर्म जहां चलै हेनाथ काल चौथौ तहां, इति भीति सवही टल।। ११ दर्शनदशक कवित, चित्तसों पढ़े त्रिकालं । प्रीतम सनमुख होय, खोय चिंता गृहजालं। सुखमै निसिदिन जाय, अंत सुरराय कहावै। सुर कहाय सिवपाय, जनम मृति जरा मिटावै॥ धनिजैनधर्मदीपकप्रगट, पापतिमिरछयकार है। लखिसाहिबरायसुआँखिसों, सरधातारनहारहै।। इति दर्शनदशक ॥ २॥ १ अतिवृष्टिं अनावृष्टि आदि.सात! इहलोक परलोक भय आदि सात ।। - (१०) अथ दर्शन स्तुति ॥३॥ छप्पया तुव जिनिंद दिहियो, आज पातक सब भज्जें तुव जिनिंद दिट्ठियो, आज बैरी सब लज्जे । तुव जिनिंद दिट्ठियो, आज मैं सरवस पायो । तुव जिनिंद दिट्ठियो, आज चिंतामणि आयो। जै जै जिनिंद त्रिभुवन तिलक, आज काज मेरो सस्यो। कर जोरि भविक विनती करत, आज सकल भवदुख टस्यौ ॥१॥ तुव जिनिंद मम देव, सेव मैं तुमरी करिहौं। तुव जिनिंद मम देव, नाम तुम हिरदै धरिहौं । तुव जिनिंद मम देव, तुही साहिब मैं बंदा। तुव जिनिंद मम देव, मही कुमुदनि तुव चंदा ।। जै जै जिनिंद भवि कमल रवि, मेरो दुःख नि-, वारिक। लीजै निकाल भव जालतें, अपनो भक्त विचारिक॥२॥ ४ अयस्वयंभूस्तोत्र। चौपाई। राजविषे जुगलन सुख किया। राज.त्याग ( १ ) 'भवि सिवपद दिया।। स्वयंवोध स्वंभू भगवान। बंदी आदिनाथ गुनखान॥१॥ इंद्र छीरसागर जल लाय । मेरुन्हुलाए गाय वजाय ॥ मदन विनासक सुखकरतार । वंदी अजित अजित पदधार ।। २ ।। सुक्ल ध्यानकर करम विनास। घाति अघाति सकल दुखरासलियो मुकतिपद मुख अविकार । वंदा संभव भवदुखटार ॥ ६॥ माता पच्छिम रयनमझारसुपने सोलै देखे सारा। भूप पूछि फल सुन हरखाय । वंदी अभिनंदन मन लाय ॥४॥ सब कुवादवादी सिरदार। जीते स्यादवाद धुनि धारि॥जैनधरमपरकासक स्वाम। सुमतिदेव पद करौं प्रनाम ॥५॥गरम अगाऊ घनपति आय । करी नगर सोभा अ. घिकाय ॥ वरखे रतन पंचदशमासानमा पदम प्रभु सुखकी रास॥६॥ इंद्र फनिंद्र नरिंद्र त्रि- काल । वानी सुनिर होहिं खुस्याल॥वारहस- भा ज्ञानदातार । नमों सुपारसनाथ निहार॥७॥ सुगुन छियालिस हैं तुम माहि। दोष अठारह को कनाहिं।। मोह महातमनाशक दीपानमाँ चंद- (१२) प्रभुराख समीप॥८॥बारह विध तप करम वि- नास । तेरह भेद चरित परकास।निज अनिच्छ भविइच्छकदान। बंदौं पहुपदंत मन आन॥॥ भवि सुखदाय सुरगतै आय । दसविध धर्म का यो जिनराय ।। आप समान सवनि सुखदेह । बंदी सीतल धरि मन नेह ॥ १०॥ समता सुधा कोपविषनाश । द्वादशांगबानी परकास चारि संघ आनंददातार।नमी तिअंस जिनेसुर सार।। रतनत्रय सिरमुकुट विशाल । सोभै कंठ सुगुन मनिमाल || मुकत-नारि-भरता भगवान । वासु, पूज्य बंदों धरि ध्यान ॥ १३॥ परम समाधि स- रूप जिनेस । ज्ञानी ध्यानी हितउपदेश ।। करम नास सिवसुख विलसंत । बंदी विमलनाथ भग- वंत॥१३॥ अंतर वाहर परिगह डार । परम दिगंबर व्रतकौं धार ॥ सरबजीव हित राह दि- खाय । नमों अनंत वचन मन काय ॥ १४ ॥ सात तत्त्व पंचासति काय । अरथ नवों छ दरव बहु भाय ॥ लोक अलोक सकल परकास ।बंदा बर्मनाथ अघनास ॥ १५॥ पंचमचक्रवर्ति .

(१६) निधि भोग। कामदेव द्वादसम मनोग ॥सांति- करनसोलमजिनराय। शांतिनाथ वंदी हरपाय बहु थुति करें हरप नहि होय। निर्दै दोष गहें नहि सोय।। सीलवान परब्रह्मस्वरूप।वंदों कुंथु- नाथ शिवभूप॥१७॥ वारहगन पूजै सुखदाय । थुति वंदना करें अधिकाय॥जाकी निज थुति कबहुं न होय वंदों अरजिनवरपद दोय ॥१८॥ परभौ रतनत्रय अनुराग इस भौव्याह समै वै- राग ॥ बालब्रह्म पूरनव्रतधार । वंदौं मल्लिनाथ जितमार ॥ १९ ॥ विन उपदेश स्वयं वैराग। थुति लौकांत करें पग लाग ॥ नमःसिद्ध क- हि सव व्रत लेहि,बंदी मुनिसुव्रतत्रत देहि॥२०॥ आवक विद्यावंत निहार । भगतिभावसाँ दियो अहार।। वरखे रतनराशि ततकालावंदी नाम प्रभु दीनदयाल ॥ २१ ॥ सब जीवनकी बंदी छोर।राग दोष दोउ बंधन तोर ।। रजमति तजि शिवतियों मिले। नेमिनाथ वंदा सुखनिले ।। दैत्य कियो उपसर्ग अपार । ध्यान देखि आयों फनिवार ॥ गयो कमठ शठ मुम्बकरि स्याम !

दोहा।
(१४)
नमौं मेरुसम पारस स्वाम॥ २३॥ भवसागरतें
जीव अपार । धरमपोतमैं धरे निहार ।। डूबत
काढ़े दया विचार । वर्धमान बंदी बहु वार ॥२४॥
चौवीसौ पदकमलजुग, बंदी मन वच काय ।
द्यानत पदै सुनै सदा,सो प्रभु क्यों न सहाय ।।
इति स्वयंमस्तोत्र ॥ ४ ॥
(५).
अथ दौलतरामकृत स्तुति ।
सकल ज्ञेयज्ञायक तदपि, निजानंद रसलीन ।
सोजिनेंद्र जयवंत नित, अरिरजरहसि विहीन ।
पद्धरिछंद।
जय वीतराग विज्ञानपूर। जय मोहतिमिरको
हरन सूर॥जय ज्ञान अनंतानंतधार। हगसुख
वीरजमंडित अपार॥ २॥ जय परमशांत मु-
द्रासमेत भविजनको निजअनुभूतिहेत।भवि
भागनवशजोगेवशाय । तुमधुनि है सुनि वि-
भ्रमनशाय॥शातुमगुणचिंतत निजपरविवेका
प्रगटै, विघटें आपद अनेक।। तुम जगभूषण
दूषणवियुक्त। सब महिमायुक्त विकल्पमुक्त॥४॥

(१५) अविरुद्धशुद्ध चेतनस्वरूप परमात्म परम पा- वन अनूप ।। शुभअशुभविभावअभावकांन । स्वाभाविकपरिणतिमयअछीन ॥५॥ अष्टाद- शदोषविमुक्त धीर। सुचतुष्टयमय राजतगंभीर।। मुनिगणघरादि सेवत महंत। नवकेवललब्धि- रमा घरंत॥६॥तुम शासन सेय अमेय जीव। शिव गयेजाहिं जैहैं सदीव । भवसागरमें दुख- छार वारि । तारनको और नआप टारि॥wit यह लखिनिज दुखगदहरणकाज।तुमही नि- मिचकारण इलाज ॥ जाने, तातें मैं शरण आय। उचरों निजदुख जो चिर लहाय ॥८॥ मैंभ्रम्योअपनपो बिसरि आप। अपनाये वि- धिफल पुण्यपाप निजको परको करता पि- छान। परमैं अनिष्टता इष्ट ठान ॥९॥ आकु- लित भयो अज्ञानधारि ।ज्यों मृग मृगतृष्णा जानि वारि॥ तनपरणति आपो चितार । कबहूं न अनुभयो स्वपदसार ॥ १० ॥तुमको बिन जाने जो कलेश पायेसो तुम जानताज- नेश ॥ पशु नारक नर सुर गतिमंझार । भव

.
(१६).
घर घर मस्यो अनंतवार ॥ ११॥ अब काल--
लब्धिवलत दयाल। तुम दर्शन पाय भयो खु-
शाल। मन शांत भयो मिटि सकलद्वंद । चा-
ख्योस्वातमरस दुखनिकंद ।।१२ ॥ तातें अब
असी करहु नाथ। विरै न कभी तुअ चरण
साथ ॥ तुम गुणगणको नहिं छेव देव । जग
तारनको तुअ विरद एव ॥ १३ ॥ आतमके
आहित विषय कपाय। इनमें मेरी परिणतिन
जाय। मैं रहूं आपमें आप लोन । सो करो
होहुँ ज्यों निजअधीन॥१५॥मेरे नचाह कछु
और ईशारत्नत्रयनिधि दीजे. मुनीश॥ मुझ
कारजके कारन सु आप। शिव करहुं, हरहु
मम मोहताप ॥१५॥शशि शांतकरन तपह-
रन हेत। स्वयमेव तथा तुम कुशल देत ॥
पीबत पियूष ज्यों रोग जाय । त्यों तुम अनुभ-
वतै भव नसाय ॥ १६ ॥ त्रिभुवनति हुंकाल-
मंझार कोग्रानहिं तुमविन निज सुखदायहोय ॥
मोउर यह निश्चय भयो आज. दुखजलधिउता--
रन तुम जिहाज ॥१७॥

दोहा तुम गुणगणमणि गणपती,गणतनपावहिं पार। दोल स्वल्पमति किमि कहै नत्रियोगसंभार।। इति दौलतरामकृत स्तुतिः॥ ५ ॥ अय बुधजनकृतस्तुति । प्रभु पतितपावन मैं अपावन, चरन आयो सर- नज़ी। यो विरद आप निहार स्वामी, मेट जा- मन मरनजी।। तुम ना पिछान्या. आन मान्या देव विविधप्रकारजी । या बुद्धिसती निज न जाण्या भ्रम गिण्या हितकारजी ॥ ॥ भववि कटवनमें करम वैरी, ज्ञानधन मेरों हरयो तब इष्ट भूल्यो भ्रष्ट होय, अनिष्टगति धरतो फिरयों॥धन घड़ी यो धन दिवस यों ही, धन जनम मेरो भयो । अब भाग मेरो उदय आयो, दरश प्रभुको लखलयों ॥२ ॥ छवि वीतरागी नगन मुद्रा, दृष्टि नासापै धरै । वसु प्रातिहार्य अनंत गुणजुत, कोटि रवि छविको हरै। मिट गयो तिमिर मिथ्यात मेरो, उदयरवि. आतम [] भयो मो उर हरख ऐसों भयो मनुरंक चिंता- मणि लयो॥३॥ मैं हाथ जोड ,नवाय मस्तक चीनऊंतुअ चरनजी । सर्वोत्कृष्ट त्रिलोकपति जिन, सुनहु तारनं तरनजी॥जाचूं नहीं सुर- वास पुनि नरराज परिजन साथजी। बुध जाचहूंतुअ भक्ति भवभव, दीजिये शिवनाथजी। (७). अथ वृंदावन कृत स्तुति (शैरकी रीतिम तथा और रोगिनियों में भी बनती हैं) श्रीपति जिनवरं करुणायतनं दुखहरन तुमारा बाना है। मत मेरी बार अवार करो मोहि देहु विमलं केल्याना है। टेक॥ त्रैकालिक वस्तु प्रत्यक्ष लखो, तुमसौं कछु बात न छाना है। मेरे उर आरत जो वरते, निह. संव सो तुम जाना है। अवलोक विथा मत मौन गहो, नहि मेरा कही ठिकाना है। हो राजिवलोचन सोचविमोचन, मै तुमसौं हित ठाना है। श्री०॥१॥ सब 'ग्रंथनिमें तिर- यनिने, निरंधार यही गणधार कहीं। जिन- - (१६) नायक ही सेव लायक हैं, सुखदायक छायकज्ञान मही। यह वात हमारे कानं परी, तव आन तु- मारी सरनं गही। क्यों मेरी बार विलंब करो, जिननाथ कहो वह वात सही। श्री० ॥३॥ काहूको भोग मनोग करी, काहूको स्वर्गविमा. ना है। काहूको नागनरेशपती, काहूको ऋद्धि निघाना है ।। अब मोपर क्यों न कृपा करते, यह क्या अंधेर जमाना है। इनसाफ करो मत देर करो, सुखवृंद भरो.भगवाना है ॥श्रीना खल कर्म मुझे हैरान किया, तब तुमसो आन पुकारा है। तुम ही समरस्थ न न्याव करो तब बँदेका क्या. चारा है। खल-पालक पालक वा- लकका, नृपनीति यही जगंसारा है। तुम नीति निपुनत्रैलोकपती,तुमहीलगिदारहमाराहै ।। जबसे तुमसे पहिचान भई, तबसे तुमहीको माना है। तुमरे ही शासनका स्वामी, हमको शेरना सरघाना है। जिनकोतुमरी शरनागत तिनसाँ जमराज डराना है। यह सुजस तु. मारे सांचेका, जस गावत वेदपुरानी है। श्री०॥ .

(२०) जिसने तुमसे दिलदर्द कहा, तिसकातुमने दुख हाना है । अघ छोटा मोटा नाशि तुरित, सुख दिया तिन्हें मनमाना है। पावकसों शीतल नीर किया, औ चीर बढा असमाना है। भोज- न था जिसके पास नहीं, सो किया कुबेर स- माना है। श्री०॥७॥चिंतामन पारम कल्प- तरू सुखदायक ये परधाना है। तब दासनके सब दास यही, हमरे मनमें ठहराना है । तुव भक्तनको सुरहंदपदी, फिर चक्रपतीपद पाना है। क्या बात कही विस्तार बडी, वेपावें मुक्ति ठिकाना है। श्री०सागतिचार चौरासी लाख- वि, चिन्मूरत मेरा भटका है । हो दीनबंधु करुणानिधान, अबलौँ न मिटावहखटका है। जब जोग मिला शिवसाधनका, तब विषन कर्मने इटका है। तुम विधन हमारा दूर करो, सुख देहु निराकुल घटका है।श्री०॥९॥गजग्राह असित उद्धार लिया, ज्यों अंजनतस्कर. तारा.. है। ज्यों सागर-गोपद्रूप.कियो, मैनाका सं- कट टारा है । ज्यों सूलीत सिंहासन औ..

६ २१ ) बेडीको काट विडारा है। त्यों मेरा संकट दूर करो, प्रभु मोको आश तुमारा है ॥श्री॥१०॥ ज्यों फाटक टेकत पाय खुला औ सांप सुमन करि डारा है। ज्यों खड्ग कुसुमकामाल किया बालकका जहर उतारा है। ज्यों सेठ विपत चकचूर पूर, घर लक्ष्मीसुख विस्तारा है। त्यों मेरा संकट दूर करो प्रभु मोको आस तुमारा है॥श्री ॥ ११॥ यद्यपितुमको रागादि नहीं यह सत्य सर्वथा जाना है। चिन्मूरति आप अनंतगुनी, नित शुद्धदशा शिवथाना है ।। तदपि भक्तनकी भीड हरो सुख देत तिन्हें जु सुहाना है । यह शक्ति अचिंत तुम्हारीका, क्या पावै पार सयाना है। श्रीपति ॥१२॥ दुखखंडन श्रीसुखमंडनका, तुमरा प्रन परम प्रमाना है। वरदान दया जस कीरतका, तिहुं- लोकधुजा फहराना है। कमलाधरजी ! कम- लाकरजी, करिये कमला अमलाना है। अब मेरी विथा अवलोकि रमापति, रंच-नवार ल- गाना है। श्री ॥१॥ हो दीनानाथ अनाथ -- ... ( २२ ) हितू, जनदीन अनाथ पुकारी है । उदयागत कर्मविपाक हलाहल, मोह विथा विस्तारी है। ज्यों आप और भवि जीवनकी ततकाल विथा निरवारी है । त्यो 'वृंदावन' यह अर्ज करें प्रभु आज हमारी वारी है ॥१४॥ इति वृंदावनकृत स्तुति ॥ ७.॥ (८) अप भूधरकृत स्तुति हरिगीतिका। पुलकंत नयन चकोर पक्षी, हँसत उर इं- दीदरो। दुर्बुद्धि चकवी विलख विछुरयो, नि- विड़ मिथ्यातम.हरो ॥ आनंद अंबुज उमग उछन्यो, अखिल आतम निरदले। जिनवदन पूरनचंद्र निरखत, सकलमनवांछित फले ॥१॥ मम आज आतम भयो पावन, आज विषन विनाशिया। संसारसागरनीर निवट्यो, अखि ल तत्त्व.प्रकाशिया।।अव भई कमला किंकरी मम; उभय भव निर्मल दये। दुख जरयो दुर्गति 2. (:२३ ) वास निवरयो, आज नव मंगल भये ॥२॥ मनहरन मूरति हेरि प्रभुकी, कान उपमालाइये। मम सकल तनके रोम हुलसे, हर्ष और न पा- इये ॥ कल्याणकाल प्रतच्छ प्रभुको लखे, जो सुर नर घने । तिह समयकी आनंद महिमा, . कहत क्यों मुखसों वने ॥२॥ भर नयन निरखे नाथ तुमको, और वांछा ना रही । मन ठठं मनोरथ भये पूरन, रंक मानो निधि लही। अव होउ भव भव भक्ति. तुम्हरी, कृपा. ऐसी कीजिये । कर जोर भूधरदास' विनवे, यही वर मोहि दीजिये ॥४॥ (१) अयं भूवरकृतं दूसरी स्तुति ! अहो! जगतगुरु एक, सुनियों अरजह मारी। तुम हो दीनदयाल, मैं दुखिया संसारी ॥४॥.इस भव वनमें वादि, काल अनादि ग- मायो । भ्रमत चढूंगति माहि, सुख नहिं दुख बहु पायोः ॥ २॥ कर्म महारिपु जोर, एक न . इ.मन भरके।

.. कान करे जी । मनमान्यां दुख देहि, काही न डरै जी ॥३॥ कबहू इतर निगोद, कबहू नर्क दिखावै । सुरनर पशुगतिमाहिं, वहुविधि नाच नचावै ॥४॥ प्रभु ! इनके परसंग, भव भवमाह बुरे जी । जे दुख देखे देव ! तुमसों नाहिं दुरेजी॥ ५॥ एक जनमकीवात, कहि. न सकों सुनि स्वामी! तुम अनंत परजाय, जानत अंतरजामी ॥ ६ ॥ मैं तो एक अनाथ, ये मिलि दुष्ट घनेरे । कियो बहुत बेहाल, सुः नियो साहिव मेरे ॥७॥ ज्ञान महानिधि लूटि रंक निवल करि डारयो । इनहीं तुम मुझमाहि, हे जिन ! अंतर पारयो ।॥८॥ पाप पुन्यकी दोड़, पायनि बेरी डारी । तनकाराग्रहमाहि, मोहि दियो दुखे भारी ।। ९ । इनको नेक वि- गार, मैं कंछु नाहिं कियो जी । विनकारनं जग बंध ! बहुविधि वैर लियो जी ॥ १०॥ अब आयो तुम पास, सुनि जिन ! सुजस तिहारो। नीति निपुन महराज कोंजेन्याव हमारो॥१॥ . १-कुछ मी परवाह (-१५ दुष्टन देहु निकार, साधुनको रख लीजै। विनवे भूधरदास, हे प्रभु! ढोल न कीजै ॥ १२॥ (१०) अथ भंवरकृत गुरुस्तुचि। बंदी दिगंवर गुरुचरनजग, तरनतारन जान। जे-भरम भारी रोगको, हैं राजवैद्य महान ।। जिनके अनुग्रह विन कभी, नहिं कटैकर्मजंजीर। ते साधु मेरे उर बसहु, मेरी हरहु पातक पीर ॥१॥ यह तन अपावन अथिर है,संसार सकल असार ये भोग विष पकवानसे,इहभांति शोच विचार। तपविरचि श्रीमुनिवनवसे,सब छोड़ि परिगह भीर ते साधु मेरे मन बसो,मेरी हरहु पातकपीर ॥२॥ जेका कंचन सम गिनाहि,अरिमित्र एक सरूप निंदा वढाई सौरिखी, वनखंड शहर अनूर ।। सुखदुःख जीवनमरनमें,नहि खुशी नहि दिलगीर ते सांधु मेरे उरवसो, मेरी हरहु पातक पीर।३। जे वाह्य परवत वनवसैं, गिरिगुफा मइल मनोग सिलसेंज,समतासहचरी,शशिकिरनदीपकनोग १ अमार-बराबर

र २६
मुगमित्र, भोजन तप मई, विज्ञान निरमलनीर
ते साधु मेरे मन वसो, मेरी हरहु पातक पीर।।
मुखहि सरोवर जलभरे, सूखहि तरंगिनि-तोय।
बोटहि बटोहीना चलैं, जहंघाम गरमी होय।।
तिहँकालमुनिवरतपतपहि,गिरिशिखरठाढेधीर
तेसाधुमेरे उरबसो, मेरी हरहुपातकपीर।५।
घनघोरगरजहि घनघटा, जलपरहिंपावसकाल
चहुंओर चमकह बीजुरी, अतिचले सीरीव्याल
तरुठरिष्ठहिं तब-जती, एकांत अचल शरीर
ते साधुमेरे मन् वसो, मेरी हरहु पातक पीर।।
• जब शीतमास तुषारसों, दाहे सकलं बनराय
जब जमै पानी पोखरी, थरहरै सबैकी काय ॥
तब नगन निवसे, चौहट, अथवा नदीकेतीर।
ते साधु मेरे उर बसो, मेरी हरहु पातक पीर ।।
करजोर 'भूधर' बीनवै, कबमिलहिं वे मुनिराज
यह आश मनकी कब फले, मेरे सरहिं सगरे काज
संसार विषम विदेशमें, जे विना कारण वीर।
१ नदीका जल । २ रास्तेसे । ३ रास्तागीर मुसाफिर. । ४ वरसात
में । ५ टंडी पवन । ६ वृक्षों नीचें। तलावोंमें।

. ( २७ ) . ते साधु मेरे उर बसो, मैरी हरहु पातक पीर इति. भूघरकृत गुरुस्तुति ॥ १०॥ (११) अय भूधरकन दूपरी गुरुस्तुति । शंग भरती दोहा। ते गुरु मेरे मन वसो, जे भवजलधि जि- हाज । आप तिर पर तार हीं, ऐसे श्रीऋषि- राज॥ ते गुरु० ॥१॥ मोह महारिपु जानिके छोड्यो सब घरवार होय दिगंबर वन बसे, आतम शुद्ध विचार ॥ ते गुरु० ॥२॥ रोग उरग-बिल व गिण्यो, भोग भुजंग समान । कदली तरु संसार है; त्याग्यो सव यह जान ।। ते गुरु०॥३॥ रतनत्रय निधि उर धरै, अरु निरग्रंथ त्रिकाल । मारयो कामर्सवीसको, स्वामी परम दयाल ।। ते गुरु०॥॥पंच महा, व्रत आदरें, पांचों सुमति समेत तीन गुपति पाल सदा, अजर अमर पद हेत ॥ ते गुरु०५॥ धर्म धरै दशलक्षणी, भावें भावना सार। मह : १ रोगरूपी सांपका विस २ शरीर! ३ राक्षस !

( २८१ 'परीषह बीस द्वै, चारित-रतन-भंडार ॥ ते गुरु ॥६॥ जेठ तपै रवि ओकरो, सूखें सरवरनीर शैल-शिखर मुनि तप तपैं, दोझै नगन शरीर॥ ते गुरु०॥७॥ पावस रैन डरावनी, वरसेजल, धर-धार । तरुतल निवर्स साहसी, वौजे झंझा- बार ॥ ते गुरु०॥॥शीत पड़े कपि-मद गलै, दाहै सब वनराय । ताल तरंगनिके तटै, ठाड़े ध्यान लगाय ॥ ते गुरु०॥ ॥ इहि विधि दुद्धर तप तपै, तीनों कालमंझार । लागे सहज सरूपमें, तनसों ममत.निवार ॥ ते गुरु०॥१॥ यूरव भोग-न त्रित, आगम वांछ नाहि । चहुंगतिके दुखसों डरें, सुरति लगी शिव- माहि ॥ ते गुरुः ॥ ११॥ रंगमहलमें पौढ़ते, कोमल सेज बिछांय । ते पच्छिम निशिभूमिमें सो संवरि काय ॥ ते गुरु०॥१२॥ गज चढ़ि चलते गरवसों, सेना साज चतुरंग । निराख निरखि पगते घर, पालें करुणा अंग ॥ ते १ तेजो। २ बला ३ चढ़ती है।४.मलती दुवाले झंडा नहते है।

(२६) गुरु०॥१३॥वे गुरु चरण जहां धरै, जगमें: तीरथ जेह। सो रज मम मस्तकं चढो, भूधर मांगे एह।। ते गुरु०॥१४॥ इति मुघरकृत दुसरी गुरुस्तुति ॥११॥ १२ अय नाथूरामप्रेमीकृत सरस्वतीस्तवन । शिखरिणी. जगन्माता ख्याता जिनवरमुखांभोजउदिता । भवानी कल्याणी मुनिमनुजमानी प्रमुदिता ।। महादेवी दुर्गा दरनि दुखदाई दुरगती । अनेका एकाकी द्वययुतदशांगी जिनमती || कह मातः! तोको यदपि संबही नादिनिधना। कथंचित् तो भी तू उपजि विनशै यो विवरना। घरे नाना जन्म. प्रथमजिनके बाद अबलों। भयों त्यों विच्छेदै प्रचुर तुव लाखों वरषलो २१. महावीरस्वामी जब सकलज्ञानी मुनि भये । विडोजाँके लाये समक्सृतमें गौतम गये ।। १दुःखदाई दुर्गतिको नष्ट करनेवाली १२ द्वादशांगण । ३ अनादिनिधन ५- इन अक्षरोंको संस्कृतके नियमानुसार दीर्घ पढ़ना चाहिये । ६.केव- मानी। इन्द्र के बुलाये हुए।

10) तबै नौकारूपा भवजलघि माही. अवतरी। अरूपा निर्वर्णा विगतभ्रम सांची सुखकरी ॥३॥ कर जैसें मेघ ध्वनि मधुर त्यों ही निरखरी खिरी प्यारी प्रानी ग्रहण निजभाषामहं करी॥ गणेशोंने झेली बहुत दिन पाली मुनिवर। रही थी पै तौलों तिन हृदयमें ही घरकुरे ॥४॥ अवस्था कायाकी दिन दिन घटी दीखन लगी तथा धीरे धीरे सुबुधि विनशी अंगश्रुतकी । तबै दो शिष्योंको सुगुरु, धरसेनार्य मुनिने । पढ़ाया कर्म-भाभृत सुखद जाना जगतने ॥५॥ -उन्हीने हे मातः लिखि लिपि करी अक्षरवती । संवारी ग्रंथोंमें श्रुततिथि मनाई सुखवती ॥ सहारा देते जो नहिं तुमहिने यो तिहि समै । सदाको सोजाती जगजलधि-गंभीर-तलमैं ॥६॥ भये पीछे नामी मुनि तिन बचाई विधनतें । हजारों ग्रंथों में रेचि रचि रची चारु रुचितें। १ निरक्षरी अक्षररहित २ गण:धरोंने । ३-४ संस्कृतमें पादात्य दीर्घ : होता है.|५श्रुतपंचमीका पर्व १६ धरी।..

" - १.३ अंसारी देशोंमें, वर विविध भाषामय करी। लुभाये मिथ्यातीलखिं विशद युक्तीयुत खैरी ७ नहीं ऐसा कोई विषय जगमें बुद्धिगत है। तिहारो जो प्यारो नहिं विमल आभूषण अहै ।। लजे अन्यावाणी रुचिर तुंव ये रूप लसिके । धुनें माथा हा! हा। करहि चुप होवें विलखि घरे हैं जो पानी नित जननि तिोको हृदयमें । करें हैं .पूजा वा मन वचन कायां करि नमैं ॥ पढावे देवं जो लिखि लिखित ग्रंथ लिखवा। लह ते निश्चैसों अमरपदवी मोक्ष अथवा.॥९॥ थके देवेंद्रादी स्तवन नहि तेरों कर सके । करें तो मा। कैसे हम नित अविद्याकर छके। तथापि त्वद्धती करत.अति उत्साहित हमें। किये तातें 'प्रेमी' पदवरन एकत्र तुकौ ॥१०॥ इति सरस्वतीस्तवन.॥ १२ ॥ + प्रय जिनवाणी माताकी स्तुति । सवैया मतपयंद। वीरहिमाचलतें निकरी, गुरुगौतमके मुख । निर्मल अकाट्य युक्किावाली 1२ यथार्थ - ३२ कुंड ढरी है। मोहमहाचल भेद चली, जगकी: जडतातप दूर करी है ॥ ज्ञानपयोनिधि माहिः रली, बहु भंग तरंगनिसों उछरी है । तो शुचि शारदंगगनदीप्रति, मैं अंजुरी कार सीस घरी है। या जगमंदिरमें अनिवार, अज्ञानअंधेर छयोअतिभारी। श्रीजिनकीधुनिदीप शिखा- सम,जो नहिं होत प्रकाशनहारी।तो किस भांतिः पदारथपांति, कहांलहते रहते अविचारी । या विधिसंत कहें धनि हैं २ जिन बैन बडे उपकारी जावानीके ज्ञानतें, सूझहि लोक अलोक । . सोवानी मस्तक चढौ, सदा देतहूं घोक।१। इति जिनवाणी माताकी स्तुति ॥ १३ ॥ ११.) अय निर्वाणकांड। . . दोहा। वीतराग बंदों सदा, भावसहित सिरनाय.। कई कांड निर्वाणकी, भाषा. सुगम बनाय ॥ अष्टापदआदीसुरस्वामि । बासुपूज्य चंपापुरि चोपाई १५ मात्रा :

(.३३) नामि । नेमिनाथस्वामी गिरनार । वंदी भाव -भगति उरधार ।२। चरम तीर्थकर चरम श- रीर पावापुरि स्वामी महावीर । शिखरसमेद जिनेसुर वीस । भाव सहित वंदौं निशदीस.॥३॥ वरदतरायरे इंदमुनिंद। सायरदचं आदि गुण- बूंदा नगरतारवर मुनि उठकोडि। बंदी भावस- हित कर जोडि । ४। श्रीगिरिनारशिखर वि. ख्यात । कोडि.बहत्तर अरु सौ सात ॥ संबु प्रदुम्न कुमर द्वै भाय।अनिरुध आदि नम तसु पाय । ५। रामचंद्रके सुत दै. वीर । लाडनरिंद आदि गुणधीर॥पांच कोडि मुनि मुक्तिमझार पावागिरि बंदी निरंधार. ॥६॥. पांडव तीन द्रविडराजान । आठकोडि मुनि मुकति पयान ॥ श्रीशत्रुजयगिरिके सीस । भावसहित बंदी निशदीस ॥७॥ जे बलभद्र मुकतिमें गये । आठकोडि मुनि औरहि भये ॥श्रीगज- पंथशिखरं सुविशाल । तिनके चरण नमू तिहुं: काल॥८॥राम हनू सुग्रीव सुडील । गयग- -साडे तीन किरोड' (३४) वाख्य नील महानील ॥ कोडि निन्याणवें मु. क्तिपयान । तुंगीगिरि बंदों धरि ध्यान ॥ ९॥ नंग अनंग कुमारसुजान पांचकोडि अरु अर्ष प्रमान । मुक्ति गये सिहुनागिरिशीश । तेबंदों त्रिभुवनपति ईश॥ १० ॥रावणके सुत आदि कुमार। मुक्ति गये रेवातट सार ॥ कोडि पंच अरु लास पचास । ते बंदी परि परम हुलास ॥ ११॥ रेवानदी सिद्धवरकूट । पश्चिमदिशा देह अँह छूट ॥ द्वै चक्री दश कामकुमार। ऊठकोडि बंदी भवपार ॥१२॥ बड़वानी बड़- नयर सुचंग। दक्षिण दिश गिरिचूल उतंग ।। इंद्रजीत अरु कुंभ जु कर्ण । ते बंदी भवसायर- तर्ण ॥१॥सुवरणभद्रआदि मुनिचार। पावा- गिरिवर शिखरमझार। चलना नदी तीरके पास । मुक्ति गये बंदों नित तास ॥१॥ फल होडीबड़गाम अनूप । पश्चिमदिशा द्रोणगिरि- रूप ॥ गुरुदचादि मुनीसुर जहां । सुक्ति गये बंदी नित तहां ॥१५॥ बाल महाबाल सुनिः दोय नागकुमार मिलें त्रय होय ॥ श्रीअष्टा-

(३५),
पद मुक्तिमझार । ते बंदी नित सुरत संभार १६
अचलापुरकी दिश ईशान तहां मेगिरि नाम
प्रधान ॥ साढे तीन कोडि मुनिराय । तिनके
चरण नमूं चित लाय ॥ १७ ॥ वंसस्थल वन
के लिंग होय । पश्चिमदिशा कुंथुगिरि सोय ॥
कुलभूषण दिशभूषण नाम । तिनके चरणनि
करूं प्रणाम ॥१८॥जसरथराजाके सुत कहे।
देशकलिंग पांचसौ लहे ।। कोटि शिला मुनि
कोटिप्रमान । बंदन करूं जोर जुगपान । १९ ॥
समवसरण श्रीपाश्वजिनंद । रेसंदीगिरिनयना-
नंद । वरदचादि पंच ऋपिराज । ते बंदी नित.
घरमजिहाज । २०॥ तीन लोकके तीरथ जहां।
नितप्रति बंदन कांजे तहां ।। मन वन कायस.
हित सिरनाय । बंदन करहिं भविक गुणगाय.
३२१ । संवत संतरहसौ इकताल । अश्विनसुदि
दशमी सुविशाल ॥'भैया' बंदन करहिं त्रिका-
ल। जय निर्वाणकांड गुणमाल । २२ । इति ॥

(३६) (१५) . अथ पालोचनापाठ। दोहा। बंदी पाचों परम गुरु, चौवीसौ जिनराज। कहूं शुद्ध आलोचना, शुद्धकरनके काज ।। सखी छन्द (१४) मात्रा। सुनिये जिन अरज हमारी। हम दोष किये अति भारी।तिनकी अब निवृति काजा। तुम सरन लही जिनराजां ॥२॥ इक वे ते. चउं इंद्री वामन रहित संहितजीवा।।ति- नकी नहिं करुणा धारी । निरदई है घातवि- चारी॥३॥ समरंभ समारंभ आरंभ। मनव- चंतन कीने प्रारंभ । कृत कारित मोंदन करि- कक्रोधादि चतुष्टय परिक।। शत आठ जुइम भेदनः । अघ कीने परछेदनः ॥ तिन की कहुं कोलौं कहानी । तुम जानत केवलज्ञा- नी॥५॥ विपरीत एकांत विनयके । संशय अज्ञान कुनयके वश होय घोर अघ कीने । वचत नहि जात कहीने ॥ ६ ॥ कुगुरुनकी (३७) सेवा कीनी। केवल अदयाकरि भीनी।। या विध मिथ्यात भ्रमायो।चहुंगति मधिदोष उपा- यो॥७॥ हिंसा पुनि झूठ जु चोरी । परवनि- तासोंहगजोरी॥आरंभपरिग्रहभीनो।पुनपाप जु या विधि कीनो॥८॥सपरस रसना प्रा- ननको । चख कान विषय सेवनको। बहुकरम किये मन मानी। कछु न्याय अन्याय नजानी ॥९॥ फल पंच उदंवर खाये। मधु मांस मद्य चित चाहे नहि अष्ट मूलगुणधारी । विसनजु सेये दुखकारी। १० । दुइ वीस अभख जिन गाये । सो भी निशिदिन भुंजाये॥ कछु भेदा- भेद न पायो।ज्यों त्यों करि उदर भरायो ११ अनंतान जु बंधी जानो। प्रत्याख्यान अप्रत्या- स्यानो ॥ संज्वलन चौकरी गुनिये। सब भेद जु षोडश मुनिये ॥ १२ ॥ परिहास अरति रति शोग। भय ग्लानि तिवेदसंजोग ॥ पनवीस जु भेद भये इम । इनके वश पाप किये हम १३ निद्रावश शयन कराई। सुपनेमधि दोष लगाई। फिर जागि विषयवन धायो। नानाविधि विष-

,
(३८)
फल खायो॥१४॥कियेऽहार निहार विहारा।
इनमें नहिं जतन विचाराविन देखी धरी
उठाई। विनशोधी भोजन खाई।१५। तब ही
परमाद सतायो। बहुविध विकलप उपजायो।
कछु सुधि बुधि नाहि रही है । मिथ्यामतिछाय
गई है ॥ १६ ॥ मरजादा तुम ढिंग लोनी।
ताहू, दोष जु कीनी ॥ भिन भिन अब कैसे
कहिये । तुमं ज्ञानविष सब.पइये ॥ १७॥ हा!
हा ! मैं दुठे अपराधी । त्रसजीवनराशि वि-
राधी ॥ थावरकी जतन न कीनी उरमें करुणा
नहि लीनी॥१०॥पृथिवी बहु खोद कराई।
महलादिक जागां चिनाई । पुन विन गाल्यो
'जल ढोल्यो। पंखात पवन विलोल्यो ।।१९।।
हा हा ! मैं अदयाचारी बहु हरितकायं जुवि-
दारी॥या मंधिजीवनिके खंदा। हम खाये धरि
आनंदा॥२०॥हा! मैं परमादबसाई। विन देखे
अगनि जलाई । तामधि जे जीव जु आये।
तेहू परलोक सिधाये ॥२६॥ बोध्योअन राति
पिसायो । इंधन विन सोधि जलायो । झाडू

. लै जागां बुहारी । चीटि आदिक जीव विदारी ॥१२॥जल छानि जीवानी कीनी।सोहू पुनि डारि जु दीनी ॥ नहिं जलथानक पहुंचाई। किरिया विन-पापं उपाई॥२३॥जल मल मो. रिन गिरवायो। ऋमिकुल बहु घात करायो । नदियन बिच चीर धुवाये। कोसनके जीव मराये ॥२४॥ अन्नादिक शोध कराई। ता मैं जुजीय निसराई।तिनका नहि जतन कराया। गरि- च्यालें धूप डराया ॥२५॥ पुनि द्रव्य कमावन काज। बहु आरंभ हिंसा साज॥ कीये तिस- नावश भारी। करुना नहि रंच विचारी ॥२६॥ इत्यादिक पाप अनंता।हम कीने श्रीभगवंता॥ संतति चिरकाल उपाई । वानी कहिय न जाई॥२७॥ताको जु उदय जब आयो।नाना विध मोहि संतायो ॥ फल भुंजत जिय दुख पावै । वचत कैसें करिगावै।।२८||तुम जानत केवलज्ञानी । दुख दूर करो शिवथानी ॥ हम तो तुम शरन लही है। जिन तारन विरद सही है।॥ २९ ॥ जो गांवपती इक हो। सो भी दु- (४०) खिया दुख खोवै ॥ तुम तीन भुवनके स्वामी। दुख मेटो अंतरजामी ॥ ३०॥ द्रोपदिको चीर बढायो। सीताप्रति कमल रचायो ॥ अंजनसे किये अकामी । दुख मेटो अंतरजामी ॥३॥ मेरे अवगुन न चितारो । प्रभु अपनो विरद निहारो॥सब दोषरहित करि स्वामी । दुख मेटहु अंतरजामी ॥ ३२ ॥ इंद्रादिक पदवी न.. चाहूं। विषयनिमें नाहि लुभाऊं ॥ रागादिक दोष हरीजे । परमातम निजपदं दीजे ॥३३॥ दोहा । - दोषरहित जिनदेवजी, निजपद दीज्यो मोहि। सब जीवनके सुख बढे,आनंद मंगल होय॥३॥ अनुभवमाणिकपारखी, जौहरी आप जिनंद। येही वर मोहि दीजिये, चरन सरन आनंद ॥ इति आलोचनापाठ समाप्त ॥ १५॥ . (१६) अय सामायिक पाठ : ११ प्रतिक्रमण कर्म। काल अनंत भ्रम्यो जगमें सहिये दुख भारी। . .

-
(४१) ।
जन्ममरण नित किये पांपको है अधिकारी।
कोड़ि भवांतरमाहि मिलन दुर्लभ सामायक ।
धन्य आज मैं भयो योग मिलियो सुखदायक
॥१॥ हे सर्वज्ञजिनेश किये जे पापजु मैं अब।
ते सब मनवचकाय योगकी गुप्तिविना लभ ।।
आप समीप हजूरमाहि मैं खड़ो खड़ो सब ।
दोष कहूं सो सुनो करो नठ दुःख देहिं जब
॥२॥ क्रोध मान मर्द लोभ मोह मायावशि
पानी । दुःखसहित जे किये दया तिनकी नहि
आनी॥ विना प्रयोजन एकद्रिय वि ति चउ
पंचेंद्रिय । आप प्रसादहि मिटै दोष जो लग्यो
मोहि जिय॥३॥आपसमें इकठौर थापि करि
जे दुख दीने पेलि दिये पगतले दाबकरि प्राण
हरीने । आप जगतके जीव जिते तिन सबके
नायक । अरज करों में सुनो दोष मेटो दुखदा-
यक॥४॥अंजन आदिक चोरमहा घनघोर
पापमय । तिनकेजे अपराधभये तेछिमाछिमा
किय। मेरेजे अबंदोष भये ते छिमोदयानिधि।
१ यदि स्त्री सामायिकपाठ पढ़ें तो " खडी खडी " कहना चाहिये।

(४२)- यह पड़िकोणो कियो आदि षटकर्ममाहि विधि। २ प्रत्याख्यानकर्म। जो प्रमादवशि होप विराजीव घनेरे। तिनको जो अपराध भयो मेरे अघ ढेरे।।सो सब झूठो होउ जगतपतिके परसादै ॥ जा प्रसादत मिले सर्वसुख, दुःख न लाधै ॥६॥ मैं पापी निर्लज्ज दयाकरि हीन महाशठ । किये पाप अतिघोर पापमति होय चिच दुठ॥ निंदू हूं मैं बारबार निज जियको गरहूं । सबविध धर्म उपाय पाय फिर पापहि करहूं ॥७॥ दुर्लभ है नरजन्म-तथा श्रावर कुल भारी सतसंगति सं- योग धर्म जिन श्रद्धाधारी । जिनवचनामृत- धार समावर्ते जिनवानी तोह जीव संहारे धिक धिक धिक हम जानी॥८॥ इंद्रियलंपट होय खोय निज ज्ञानजमा सब। अज्ञानी जिम करे तिसी विधि हिंसक है अवगमनागमन करं- तो जीव विराधे भोले। ते सव दोष किये निंदू अब-मनवच तोले॥९॥ आलोचनविधथकी "दोष-लागे जु घनेरें । ते सब दोप विनाश होउ (४३) तुमतें जिनमेरे ॥ वारवार इस भांति मोह मद दोष कुटिलता। ईर्षादिकतै भये निंदिये जे भयभीता ॥१०॥ ३ सामायिककर्म। सब जीवन में मेरे समताभाव जग्यो है। सब जिय मोसम समता राखो भाव लग्यो है। आर्च रौद्र द्वय ध्यान छोडि करिहूं सामायक। संयम मो कब शुद्ध होय यह भाव वधा- यक॥ ११ ॥ पृथिवी जेल अरु अग्नि वायु 'चउ काय वनस्पति। पांचहि थावरमाहिं तथा त्रस जीव वसहि जित ॥ वे इंद्रिय तिय चउ पंचेंद्रियमाहि जीव सव । तिनत क्षमा कराऊं मुझपर क्षमा करो अव ॥ १२॥ इस अवस- रमैं मेरे सब सम कंचण अरु ऋण । महल मसान समान शत्रु अरु मित्र हि सम गण । जामन मरण समोन जानि हम समता कानी । सामायिकका काल जिते यह भाव नवीनी ॥१३॥ मेरो है इक आतम तामैं ममतजुकीनौ। और सबहिं मम भिन्न जानि समतारसभीनौ ।। .

. (४४) मातु पिता.सुत बंधु मित्र तिय आदि सबै यह। मोते न्यारे जानि जथारथरूप करयो गह ॥ १४ ॥ मैं अनादि जगजालमाहि फसि रूप न जाण्यो । एकेंद्रिय दे आदि जंतुको प्राण हराण्यो ।.ते अब जीवसमूह सुनो मेरी यह अरजी । भवभवको अपराध छिमा कीज्यो करि मरजी॥१५॥ ४। स्तवनकर्म । नमूं ऋषभ - जिनदेव अजित जिन जीत कर्मको । शंभव भवदुखहरण करण अभिनंद शर्मकों । सुमति सुमतिदातार तार भवसिंधु पार कर । पद्मप्रभ पद्माभ भानि भवभीति प्रीतिधर ॥ १६ ॥ श्रीसुपार्श्व कृतपासनाश भव जास शुद्ध कर।श्रीचंद्रप्रभ चद्रकांतिसम देहकांतिघर ॥ पुष्पदंत दमि दोषकोष भवि- पोष रोषहर । शीतल शीतलंकरन हरन भव- ताप दोषहर. ॥१७॥श्रेयरूप जिनं श्रेय-धेय नित सेय भव्यजन । वासुपूज्य शतपूज्य वास: वादिक भवभय हन । विमल विमलंमतिदेन .

(४५) अंतगत है अनंत जिन । धर्म शर्म शिवकरन शांति-जिनःशांतिविधायिन ॥ १८ ॥ कुंथु कुंथुमुखजीवपाल अरनाथ जाल हर । मल्लि मल्लसम मोहमल्लमारण प्रचारधर । मुनिसुव्रत व्रतकरण नमत सुरसंघहि नमि-जिन । नेमि- नाथ जिन नेमि धर्मरथ माहि ज्ञानधन ॥ १९॥ पार्श्वनाथ जिन पावं उपलसम मोक्ष रमापति । वर्द्धमान जिन नमूं व भवदुःख कर्मकृत ॥ या विध मैं जिनसंघरूप चउवीस संख्यधर । स्तऊं नमूं हूंबार बारवंदी शिवसुखकर॥२०॥ ५। चंदनाकर्म। बंदं मैं जिनवीर धीर महावीर सुसन्मति । व- ईमान अतिवीर बंदिहों मनवचतनकृत त्रिश- लातनुज महेश धीश विद्यापति बंदू । बंद नि- तप्रति कनकरूपतनु पाप निकंदू ॥२१॥ सि- द्धारथनृपनंद द्वंद दुखदोष मिटावन । दुरित दवानल ज्वलित ज्वाल जगजीवउधारन । कुंडलपुरकरि जन्म जगतजियआनंदकारन । वर्ष बहत्तरि आयु.पाय सब ही दुख टारन । २२ N (४६) सप्तहस्त तनु तुंग भंगकृत जन्म मरण भय । बालब्रह्ममय ज्ञेय हेय आदेय ज्ञानमय.॥ देउप- देश उघारि तारि भवसिंधु जीवधनाभाप वसे शिवमाहिं ताहि बंदों मनवचतन ॥२३॥ जाके वंदनथकी दोप दुख दूरहि जावे । जाके. बंदनथकी मुक्तितिय सन्मुख भावे ॥ जाके बंदनथकी वंद्य होवें सुरंगनके। ऐसे वीर जि- नेश बंदि हूं क्रमयुग तिनके ॥२४॥ सामा- यिक पदकर्ममाहि वंदन यह पंचम । बंदों वीर जिनेंद्र इंद्रशतवंद्य वंद्य मम ॥ जन्म मरण भये: इरो, करो अघ शांति शांतिमय । मैं अघकोष सुपोष दोषको दोष विनाशय ॥२५॥ ६ कायोत्सर्गकर्मा कायोत्सर्ग विधान करूं अंतिम सुखदाई। काय त्यजनमर्य होये काय सबको दुखदाई॥ पूरव दक्षिण नमूं दिशा पश्चिम उत्तरमैं। जिन गृह बंदन करूं हरं भव पापतिमिर मैं ॥२६॥ शिरोनती मैं करूं नमूं मस्तक कर परिक। आवर्चादिक क्रिया करूं मनवचमदहरिके। तीन .

(४७) लोक जिनभवन माहि जिन हैं जु अकृत्रिम । कृत्रिम हैं द्वयअर्द्धदीपमाही बंदों जिम ॥२७॥ आठकोड़ि परिछप्पन लाख जु सहस सत्याणू । चार शतकपर असी एक जिनमंदिर जाणूं। व्यंतर ज्योतिषमाहि संख्यरहिते जिनमंदिर । जिनगृह बंदन करूं हरहु मम पाप संघकर ॥ २८॥ सामायिक समनाहिं और कोउवैर मिटा- येक । सामायिक सम नाहिं और कोउ मैत्री. दायकः। श्रारक अणुव्रत आदि अंत सप्तम गुणथानका यह आवश्यक किये होय निश्चय दुखहानक.॥२४॥जे भवि आतम काज क- रण उद्यमकेवारी ते सब काज विहाय करो सामायिक सारी ॥राग द्वेष मद मोह क्रोध लोभादिक जे सब । बुध महाचंद्र विलाय जाय तिात कीबो भव ॥३०॥ इति सानायिकपाठ समास ।। १६ ।। अय रूपपदहत पंचमंगल । पणविवि पंच परमगुरु,गुरु जिनसासनो।

..
(४८)
- सकलसिद्धिदातार सु, विधनविनासनो ॥
सारद अरु गुरु गौतम, सुमति प्रकासनो।
मंगलकर चउ-संघहि,पापपणासनो।
पापहिपणासन गुणहि. गरुवा, दोष अष्टादश-रहिउ ।
वरिध्यान करमविनासि केवल-ज्ञान-अविचल जिन लहिंगो
भनु पंचकल्याणक विराजित, सकल सुर नर ध्यावहीं।
त्रैलोकनाथ सु देव जिनवर, जगत मंगल गावहीं ।। ||
गर्भकल्याण।
जाके गरभकल्याणक, धनपति आइयो।
अवधिज्ञान-परवान,सुइंद्र पठाइयो।
रचि नव बारह जोजन, नयरि सुहावनी..!
कनकरयणमणिमंडित, मंदिर अति बनी।।
अंति बनी. पौरि पकार परिखा, सुवन उपवन सोहए।
नर नारि सुंदर चतुरभेख सु, देख जनमन मोहए।
तहं जनकगृह छहमास प्रथमहि, रतनधारा वरसियो।
पुनि रुचिकवासिनि जननि सेवा करहिं सब विधिहरसियो ।।
सुरकुंजरसम कुंजर, घवल धुरंधरो।
केहरि केसरशोभित, नख सिखसुंदरो॥
कमलाकलंस-न्हवन, दुइदामः सुहावनी।
रविससिमंडल.मधुर, मीन जुग पावनी ॥

पावनी कनक घट जुगम पूरन, कमलकलित सरोवरो ।
कल्लोलमालाकुलित सागर, सिंहपीठ मनोहरो ।
रपणीक अमरविमान फणिपति-भुवन रवि छवि छाई ।
रुचि रतन रासि दिपंत दहन सु, तेजपुंज विराजई ॥३॥
ये सखि सोरह सुपने सूती सयनहीं। .
देखे माय मनोहर, पच्छिम-रयनहीं।
उठि प्रभात पिय पूछियो, अवधि प्रकासियो ।
त्रिभुवनपति सुत छोसी, फलतिहँ भासियो॥
मासियो फल तिहि चिंति दंपति, परम आनंदित भये ।
छहमासपरि नवपास पुनि तह, रैन दिन सुखसों गये ।
गर्भावतार महंत महिमा, सुनत सब सुख पावहीं ।
मणिरूपचंद' सुदेव जिनवर जगत मंगल गावहीं ॥४॥
जन्मकन्याणका
मतिश्रुतअवधिविराजित, जिन जबजनमियो।
- तिहूँलोक.भयो छोभित सुरगन भरमियो ।।
कल्पवासिघर घंट, अनाहद बज्जिया।
जोतिपघर हरिनाद, सहज गल गज्जिया ।
गजिया सहजहि संख भावनः भुवन सबद सुहावने ।
वितरनिळय पं? पंटह बजहि कहत महिमा क्यों बने ।।
कंपित सुरासन अवधिवल जिन-जनम निचे जानियो ।
धनराज तब गजराज माया-मयी निरमय आनियों ॥५॥

(५०) जोजन लाख गयंद, वदन-सौ निरमए । वदन वदन वसु दंत, दंत सर संठए ।। सर सर सौ-पनवीस, कमलिनी छाजहीं। कमलिनिकमलिनि कमल, पचीस विराजहीं। राजही कमलिनी कमल ठोतर, सौ मनोहर दल बने । दलदलहिं अपछर नहिं नवरस, हावभाव सुहावने ।। मणि कनककिणि वर विचित्र, सु अमाप सोहए। धन घंट चवर धुजा पताका, देखि त्रिभुवन मोहए ॥ ६ ॥ तिहि करि हरि चढ़ि आयउ, सुरपरिवारियो । पुरिहि प्रदच्छन दे त्रय, जिन जयकारियो । गुप्त जाय जिन-जननिहि, सुखनिद्रा रची। मायामइ सिसु राखि तौ, जिन आन्यो सची। आन्यो सची जिनरूप निरखत, नयन तृपत न हूजिये ॥ तब परम हरषित, हृदय हरिने सहस लोचन पजिये ।। पुनि करि प्रणाम जु प्रथम इंद्र, उछंग धरि पा लीनऊ । ईसानइंद्र सु चंद्रछवि सिर, छत्र प्रभुके दीनऊ ॥७॥ सनतकुमार महेंद्र, चमर दुइ दारहीं। सेस सक जयकार, सबद उच्चारहीं। उच्छवसहित चतुरविधि, सुर हरषित भये। १पुरन किये, बनाये। - , (५१). जोजन सहस निन्यानवे गंगन उलंधिगये। सँघि गये सुरगिरि जहां पांडक, वन विचित्र विराजहीं। 'पांडकसिळा तह अर्धचंद्रसपान, मणि छवि छाजहीं ।। जोजन पचास विशाल दुगुणायाम, वंसु ऊंची गनी। चर अष्ट-मंगल-कनक कलसनि सिंहपीठ सुहावनी ॥८॥ रचि मणिमंडप सोभित, मध्य सिंहासनो। थाप्यो पूरव मुख तह, प्रभु कमलासनो। बाजहिं ताल मृदंग, वेणु वीणा घने। दुंदुभि प्रमुख मधुरधुनि, अवर जु बाजने ॥ वाजने वाजहि सची सव मिलि, धवल मंगल गावहीं । पुनि करहिं नृत्य सुरांगना सत्र, देव कौतुक धावहीं ।। भरि छीरसागर जल जु हार्दि, हाथ सुर गिरि ल्यावहीं सौधर्म अरु ईसानइंद्र सु, खस ले प्रभु न्हावहीं ॥९॥ वंदन-उदर-अवगाह, कलसगत जानिये । एक चार वसु जोजन, मान प्रमानिये ॥ सहस-अठोतर कलसा, प्रभुके सिर ढरे । पुनि सिंगारं प्रमुख आ, चार सबै करें। करि प्रगट मधु महिमामहोच्छव, पानि पुनि मातहिं दए । धनपतिहि सेवा राखि सुरपति, आप सुरलोकहिं गए ।। जनमाभिषेक महंत महिमा, सुनत सब सुख पापहीं। भणि 'रूपचंद' मुदेव जिनवर जगत मंगलं गावहीं ॥१०॥ ,

(५२)
३ तप कल्याणका
श्रमजलरहित सरीर, सदा सब मलरहिउ ।
छीर-वरन वर रुधिर, प्रथमआकृति लहिउ ।
प्रथम सार संहनन , सुरूप विराजहीं।
सहज सुगंध सुलच्छन, मंडित छाजहीं।
-छाजहिं अतुलबल परम प्रिय हित, मधुर वचन सुहावने ।
दश सहज अतिशय सुभग मृरति, बाललील कहावने ।।
आवाल काल त्रिलोडपति मन, रुचिर उचित जुनित नए।
अमगेनीत पुनीत अनुपम, सकल भोग विभोगए ।। ११ ।
भवतन-भोग-विरच, कदाचित चिचए।
धन जीवन पिय पुत्त, कलत्त अनित्तए ।
कोऊ न सरन मरनदिन दुख पहुंगति भयो।
सुखदुखएकहिभोगते,जिय विधिवसपरन्योन।
परयो विधिवत भान चेतन, भान जड जु कलेवरो।
तन असुचि परतें होय प्रास्त्रक, परिहरेत संवरो ।।
निरला तपबल होय, समकित,-विन सदा त्रिभुवन भम्यो ..
दुर्लभ विवेक विना न कवहूं, परम धरमविष रम्या ।।
प्रभु बारह पावन, भावन भाइया।
लोकांतिक वर देव, नियोगी आइया॥
कुसुमांजलि दे चरन, कमल सिर नाइया ।।
ये

(५३) स्वयंबुद्ध प्रभु थुतिकरि, तिन समुझाइया ।। समुझाय प्रभुको गये निजपुर, पुनि महोच्छव हरि कियो । रुचिरुचिर चित्र विचित्रं सिविका, कर सुनंदन-वन लियो । तहं पंचमुही लोच कीनो, प्रयम सिद्धनि नुति करी। मंडिय महाव्रत पंच दुद्धर, सकल परिगह परिहरी ॥ १३ ॥ मणिमयभाजन केस, परिहिय सुरपती। छोर-समुद-जल खिपकरि, गयो अमरावती ॥ तप संयमबल प्रभुको, मनपरजय भयो। मौनसहित तप करत, काल कछु तह गयो । गयो कछु तई काल तपवल, रिद्धि वसु विधि सिद्धिया। जसु धर्मध्यानवलेन खयगय, सप्त प्रकृति प्रसिद्धिया ।। खिपि सातयेंगुण जतनविन तई, तीन प्रकृति जु बुधि वढिउ । करि करण तीन प्रथम सुकलबल, लिपकसेनीप्रभु चढि उ॥१४॥ प्रकृति छतीस नवें गुण, थान विनासिया। दसवें सूच्छमलोभ, प्रकृति तहं नासिया ।। सुकल ध्यान पद दूजो पुनि प्रभु पूरियो। बारहवें गुण सोरह, प्रकृति जु चूरियो । चूरियौ त्रैसठ प्रकृति इइविध, घातिया करमनि तणी । तप कियो ध्यानमयंत बारह-विध त्रिलोकसिरोमणी ।। निक्रमण कल्याणक सु महिमा, सुनत सब सुख पावहीं। भणि 'रूपचंद्र' सुदेव जिनवर, जगत मंगल गावहीं ॥ १४॥ . .

(५४) , ४। ज्ञानकल्याणक । तेरहवें गुण-थान, सयोगि जिनेसुरो। अनंतचतुष्टयमंडित, भयो परमेसुरो॥ समवसरन तब धनपति, बहुविधि निरमयो॥ आगमजुगतिप्रमान, गगनतल परिठयो । परिठयो चित्र विचित्र मणिमय, सभामंडप सोहए । तिहिं मध्य बारह बने कोठे, वनक सुरनर मोहए ।। मुनि कल्पवासिनि अरजिका पुनि,ज्योति-भौमि-भवनतिया ।। -पुनि भवन व्यंतर नभग सुर नर, पसुनि कोठे वैठिया ॥१६॥ मध्यप्रदेस तीन, मणिपीठं तहां बने। गंधकुटी सिंहासन, कमल सुहावने ॥ तीन छत्र सिर सहित त्रिभुवन मोहए। अंतरीच्छ कमलासन, प्रभुतन सोहए। सोहए चौसठि चमर डरत, असोकतरु तल छाजए। पुनि दिव्यधुनि प्रतिसबदजुत तह, देवदुंदुभि वाजए । सुरपुहुपवृष्टिं सुप्रभामंडल, कोटि रवि छवि छाजए । इमि अष्ट अनुपम प्रातिहारज़, वर विभूति विराजए ॥ १७॥ . दुइस जोजनमान सुभिच्छ चहुं दिसी। गगन गमन अरुपाणी, वधनहिं अहनिसी। निरुपसर्ग निरहार, सदा जगदीसए। १ पश।

(५५)
आनन चार चहूदिसि, सोभित दीसए ।
[दीसय प्रसेस विसेस विधा, विभव वर ईसुरपना ।
छायाविवर्जित सुद्ध फटिक समान तन प्रभुका पना।।
नहि नयन पलक पतन कदाचित, केस नख सम छानहीं।
ये घातियाछयजनित अतिसय, दस विचित्र विराजहीं॥१८॥
सकल अरथमय मागधि-भाषा जानिये।
सकल जीवगत मैत्री-भाव वखानिये ॥
सकल रितुज फलफूल, वनस्पति मन हरै।
दरपनसम मनि अवनि, पवन गति अनुसरै ।।
अनुसरै परमानंद सवको, नारि नर जे सेवता ।
जोजन प्रमाण धरा सुमार्जहि, जहां पारुतदेवता ।।
पुनि करहिं मेधकुमार गंधो,-दक सुदृष्टि सुहावनी ।
पदकमलतर सुर खिपहिं कमलसु, घरणि ससिसोभा बनी।१६।
अमल गगन तरु अरु दिसि, तहं अनुहारहीं।
चतुरनिकाय देवगण, जय जयकारहीं।
धर्मचक्र चले आगे, रवि जहं लाजहीं।
पुनि भंगार प्रमुख वसु, मंगल राजहीं।
राजहीं चौदह चारु अतिश्य, देव रचित सुहावने ।
जिनराज केवलज्ञानमहिमा, अवर कहत कहा वने ।।
'तब इंद्र पाय कियो महोछव, सभा सोभा अति बनी।
धर्मोपदेश दियो तहां, उच्चरिस पानी जिनसनी ॥ २०॥

(.५६) १ , छुधा तृषा अरु राग, द्वेष असुहावने। जनम जरा अरु मरण, त्रिदोष भयावने ॥ रोग सोग भय विस्मय, अरु निद्रा घनी। खेद स्वेद मद मोह, अरति चिंता गनी ॥ गनिये अठारह दोष तिनकरि, रहित देव निरन्जनो। नव परमकेवललब्धिमण्डित, सिवरमैनि-मनरंजनों। श्रीज्ञानकल्याणक सुमहिमा, सुनत सब सुख 'पावहीं । भणि ' रूपचंद ' सुदेव जिनवर, जगत मंगलं गावहीं। ५। निर्वाण कल्याणक केवलदृष्टि चराचर, देख्यो जारिसो। भव्यनिप्रति उपदेस्यो, जिनवर तारिसो।।. भवभयभीत भविकजन सरणे आइया। रत्नत्रयलच्छन सिवपंथ लगाइया । लगाइया पंथ जु भव्य पुनि प्रभु, तृतिय सुकल जु पूरियो । तजि तेरहें गुणयान जोग, अजोगपथपग धारियो । पुनि.चौदहे चौथे सुकलवल वहत्तर तेरह हनी । इमि घाति वसुविधि कर्म पहुंच्यो समयमें पंचपगती ॥ २२ ॥ लोकसिखर तनुवात, चलयमहँ संठियो। धर्मद्रव्यविन गमन न जिहि आगें कियो। मयनरहित मूषोदर, अंबर जारिसो।

(५७)
किमपि हीन निजतनुतें, भयो प्रभु तारिसो।।
तारिसो पर्जय नित्य अविचल, अर्थपर्जय छनछयी।
निश्चयनये अनंतगुगा विवहार नय बसुगुणमयी ।।
वस्तु स्वभाव विभावविरहित सुद्ध परणति परिणयो ।
चिद्रूप परमानंदमंदिर, सिद्धपरमातम भयो ।। २३ ।।
तनुपरमाणू दामिनिपर, सब खिर गये।
रहे सेस नखकेस-रूप, जे.परिणये ।।
तव हरिप्रमुख चतुरविधि, सुरगण शुभसच्यो।
मायामइ. नखकेसरहित, जिनतनु रच्यो।
रचि अगर चंदन प्रमुख परिमल, द्रव्यजिन जयकारियो ।
पदपतित अगनिकुमार मुकुटानल, सुविधि संस्कारियो ।
निर्वाणकल्याणक सुमहिमा, सुनत सब सुख पावहीं।
भणि 'रूपचन्द' सुदेव जिनवर, जगन मंगल गावहीं ।। -
मैं मतिहीन भगतिवस, भावन भाइया।
'मंगलगीतप्रबंध' सु, जिनगुण गाइया ।
जो नर सुनहिं बखानहिं, सुर धरि गावहीं।
मनवांछित फल सो नर, निहचै पावहीं ॥
पावही आठो सिद्धि नवनिधि, पन प्रतीत जो लावहीं।
भ्रमभाव छूटै सकल मनके, निजस्वरूप लखावहीं ॥
शनि हरहिं पातक टरहिं विधन, सु होहिं मंगल नित नये ।
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.

(५८) भणि ' रूपचंद ' त्रिलोकपति जिनदेव चउसंघहि गये ।। इति रूपचंदकृत पंचमंगल समाप्त ॥ १७॥ (१८) अथ हरजसराय कृत अभिषेक पाठ। . दोहा। जय जय जयवंते सदा, मंगलमूल महान । वीतराग सर्वज्ञ प्रभु, नौं जोरि जुगपान । ढाल मंगलकी छंद गीता और अडिल्ल । . श्रीजिन जगमें ऐसो, को बुधवंत जू। जो तुम गुणवरननि करि पावै अंत जू॥ इंद्रादिक सुर चार,-ज्ञानधारी मुनी। कहि न सके तुम गुणगण, है त्रिभुवनधनी ॥ अनुपम अमित तुम गुणनि वारिधि, ज्यों अलोकाकाश है। किमि धरै हम उरकोशमें सोअकथ गुणमणिराश है ॥ पै निज प्रयोजन- सिद्धिकी तुम नामहीमें शक्ति है । यह चित्त में सरधान यांतें, नामहीमें भक्ति है ॥ १॥... ज्ञानावरणी दर्शनआवरणी भने। कर्ममोहनी अंतराय चारौ हने।

(५६) लोकालोक विलोको केवलज्ञानमें इंद्रादिकके मुकुट नये सुरथानमें ।। तब इंद्र जान्यो अवधितै, उठि सुरनयुतबंदत- भयो । तुम पुन्यको प्रेरयो हरी है, मुदित- धनपतिसौं चयो । अब-वेगि जाय रचौ सम- वसृति, सफल सुरपदकों. करौ । साक्षात श्रीअरहंतके, दर्शन करौ कल्मषहरौ ॥ २॥ ऐसे वचन सुने सुरपतिके धनपती। चल आयो ततकाल, मोद धारे अती॥ वीतराग छवि देखि, शब्द जय जय चयौ दै प्रदक्षिणा बार बार, बंदत भयो । अति भक्तिभीनो नम्रचित वैः समवसरण रच्यो सही। ताकी अनुपम शुभगतीको, कहन समरथ कोउ नहीं ॥ प्राकार तोरण सभामंडप कनक मणिमय छाजही । नग-जड़ित गंधकुटी मनोहर, मध्यभोग विराजही ॥३॥ सिंहासन तामध्य, बन्यो अदभुत दिपै । तापर वारिज रच्यो प्रभादिनकर छिपै।। तीन छत्र सिरशोभित, चौसठ चमरजी। - , (६०) महाभक्तियुत ढोरत है, तहां अमरंजी॥ प्रभु तरन तारन कमल ऊपर, अंतरीच्छ विराजिया । यह वीतरागदशाप्रतच्छ, विलोकि भविजन सुख लिया ॥ मुनि आदि द्वादश . सभाके, भवि जीव मस्तक नायकैं । वहु भांति - वारंवार पूजै, नमैं गुणगण गायकैं॥४॥ परमौदारिक दिव्य देह पावन सही। छुधा तृषा चिंता भय गद दूषण नही॥ जन्म जरा मृति अरति, शोक विस्मय नसै। राग द्वेष निद्रा मद, मोह सवै खसै श्रम विना श्रमजलरहित पावन, अमल जोतिस्वरूपजी ॥ शरणागतनिकी अशुचिता हरि, करत विमल अनूपजी ॥ ऐसे प्रभूकी शांतिमुद्रा,को न्हवन जलतें करें। 'जस' भक्ति- वश मन उक्तितें हम, भानु टिंग दीपक धरै।५। तुम तो सहज पवित्र, यही निश्चय भयो। तुम पवित्रता हेत, नहीं मज्जन ठयौ ।। मैं मलीन रागादिक, मलतें वै रहयो । महा मलिन तनमैं वसु,विधिवश दुख सह्यो।

(६१) बीत्यो अनंतो काल यह, मेरी अशुचिताना गई । तिस अशुचिताहर एक तुम ही भरहुवांछा चित ठई । अब अष्ट कर्म विनास सब मल,- रास रागादिक हरौ । तनरूप कारागेहत उद्धार, शिववासा करौ॥६॥ मैं जानत तुम अष्ट कर्म हरि शिव गये। आवागमनविमुक्त रागवर्जित भये ।। पर तथापि मेरो मनरथ पूरत सही। नय प्रमानतें जानि, महा साता लही ॥ पापाचरण तजि न्हवन करतो, चिच में ऐसे धरूं । साक्षात श्रीअरहंतको, मानों न्हवन परसन करूं ॥ ऐसे विमल परिणाम होते, अशुभ परणति नासतें । विधि अशुभ नसि शुभबंधतें, वै शर्म सब विधि तासतें ॥७॥ पावन मेरे नयन, भये तुमदरसतें। पावन पानि भये तुम, चरननि परसत।। पावन मन वै गयो, तिहारे ध्यानत। पावन रसनां मानी, गुणगण गान । पावन भई परजाय मेरी, भयो मैं पूरणघनी। - (६२) : मैं शक्तिपूर्वक भक्ति कीनी, पूर्ण भक्ति नहीं बनी॥ धन धन्य तेबडभागि भवि, तिन नीव शिवधरकी धरी। वर क्षीरसागर आदि जल- मणि, कुंभ भरि भक्ती करी ॥ ८ ॥ विधनसघनवनदाहन, दहन प्रचंड हों। मोह महातम दलन, प्रबल मारतंड हो। ब्रह्मा विष्णु महेश, आदि संज्ञा धरो। जगविजयी जमराज, नाशताको करो॥ आनंदकारण खनिवारण, परम मंगलमय सही मोसौं पतित नहिं और तुमसौ, पंतिततार सुन्यो नहीं। चिंतामणी पारस कलपतरु, एक भव सुखकार ही । तुम भक्तिनवका जे चढें, ते भये भवदधि पार ही ॥९॥ 'दोहा। तुम भवदधि तरि गये, भये निकल अविकार । तारतम्य इस भक्तिको, हमै उतारो पार॥१०॥ इति. हरजसराय कृत अभिषेकपाठ ।।.१८॥ (१६) अथ पंचामृत-अभिषेकपाठ। श्रीजिनवर चौवीस वर, कुनयांतहर भान ।

नाराच छंद। (६३) अमितवीर्यगबोधसुख, युत तिष्ठौ इह थान ११ गिरीश सीस पांडुपै, सचीस ईस थापियो। महोत्सवो अनंदकंदको, सबै तहां कियो । हमैं सो शक्ति नाहिं, व्यक्त देखि हेतु आपना। यहां करें जिनेंद्रचंद्रकी सुविथापना ।।२।। (पुष्पांजलि क्षेपण करके श्रीवर्णपर जिनविकी स्थापना करना) सुंदरीछंद । कनकमणिमयकुंभ सुहावने । हरि सुछीर भरे अति पावने । हम सुवासित नीर यहां भरें । जगत पावन-पांय तरै धरै ॥३॥ (पुष्पांजलि क्षेपण करके वेदीके कोनों में चार कलशोंकी स्थापना) हरिगीताछंद। शुद्धोपयोग समान भ्रमहर, परम सौरभ पावनो। आकृष्टभंगसमूह गंग-समुद्भवो अति भावनो। मणिकनककुंभ निसुंभकिल्विप, विमल शीतल भरि घरौं । श्रम स्वेद मल निरवारजिन, त्रय- धार दे पाँयनि परीं ॥४॥ (शुद्ध जलकी तीन धारा निनर्विवपर छोडना) अति मधुर जिनधुनिसम सुमाणित, प्राणि- " (६४) वर्ग स्वभावसौं। बुधचित्तसम हरिचित्त निच, सुमिष्ट इष्ट उछावसी । तत्काल इक्षुसमुत्थमासुक' रत्नकुंभविौं भरौं । यमनासतापनिवार जिन, त्रयधार दे पायनि परीं ॥५॥ ( इक्षुरसकी धारा) निष्टप्लक्षिससुवर्णमददमनीय:ज्यों विध जैनकी आयुप्रदा बलबुद्धिदा रक्षा, सुयौं जिय-सैनकी। तत्कालमंथित, क्षीर-उस्थित,प्राज्य मणिझारी भरौं। दीजै अतुलबल मोहि जिन, त्रयधार दे पाँयनि परौं॥६॥ (घृतरसकी धारा ) शरदन शुभ्र. सुहाटकयुति, सुरभि पावन सोहनो। क्लीबत्वहर बलधरन पूरन, पयसकल मनमोहनो॥ कृतउष्ण गोथनतें समाहत, घट जटित मणिमैं भरौं । दुर्बल दशामो मेट जिन- त्रयधार दे पायनि परी॥७॥ (दुग्धकी धारा) वर विशद जैनाचार्य ज्यों मधुराम्लकर्कशता- धरें।शुचिकर रसिक मंथन विमंथन नेह दोनों ,

(६५)
अनुसरें।गोदधि सुमणि भंगार पूरन लायकर
आगें घरौं।दुखदोष कोष निवार जिन त्रयधार
दे पायनि परौं ॥८॥
(दहीकी धारा)
दोहा।
सौषधी मिलायके, भरि कंचन भृगार ।
यजौं चरण त्रयधारदे, तार तार भवतार ॥९॥
(सर्वोषधिकी धारा)
इति पंचामृताभिषेकपाठ ॥ १६ ॥
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(२०)
अथ देवशास्त्रगुरुकी भाषा पूजा ।
अडिल्ल छंद।
प्रथमदेव अरहंत सुश्रुतसिद्धांत जू ।।
गुरु निरग्रंथ महंत मुकतिपुरपंथ जू॥
तीन रतन जगाहिं सो ये भवि ध्याइये।
तिनकी भक्तिप्रसाद परमपद पाइये ॥१॥
यूजौं पद अरहंतके, पूजी गुरुपद सार।
पूजी देवी सरसुती, नितप्रति अष्टप्रकार ॥१॥

(६६)
ओं ही देवशास्त्रगुरुसमूह ! अत्र अवनर अवतरः । संवौषट् ।
ओं ही देवशास्त्रगुरुसमूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठ ।।
ओं ही देवशास्त्रगुरुसमूह ! अत्र मम संनिहितो भव भव । वष्टः
गीता छंद।
सुरपति उरगनरनाल तिनकर, वंदनीक सुपद-
प्रभा। अति शोभनीक सुवरण उज्ज्वल, देख
छवि मोहित सभा॥वर नीर छीरसमुद्रघटभरि,
अन तसु बहुविधि नचूं । अरहंतश्रुतसिद्धांत
गुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं।
मलिनवस्तु हरलेत सब जलस्वभाव मलछीन ।
जासौं पूजी परमपद
देव शास्त्र गुरु तीन ॥१॥
मों ही देवशास्त्रगुरुभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं. निपा-
मीति स्वाहा ॥१॥
जे त्रिजग उदरमंझार प्राणी तपत अति
दुद्धर खरे। तिन अहितहरन सुवचनं जिनके
परम शीतलता भरे ॥ तसु भ्रमरलोभित प्राण
पावन, सरस चंदन घसि सबूं। अरहंत श्रुत-
सिद्धांतगुरुनिरग्रंथ नितपूजारचूं ॥२॥
चंदन शीतलता करै, तपतवस्तु परवीन ।
जासौं पूजौं परमपद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥२॥

(६७)
ॐहीं देवशास्त्रगुरुम्मः संसारतापविनाशनाय चंदन निर्बपा-
मीति स्वाहा ॥२॥
यह भवसमुद्रअपार तारण, के निमित्त सु-
विधि ठई। अति दृढ़ परमपावन जथारथ,
भाक्त वर नौका सही। उज्ज्वल अखंडित सा.
लि तंदुल, पुंज धरि त्रयगुण जचूं । अरहंत
श्रुतसिद्धांतगुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं ।। ३॥
तंदुल सालि सुगंध अति परम अखंडितवीन ।
जासौं पूजौं परमपद, देवशास्त्र गुरु तीन ॥३॥
अहीं देवशास्त्रगुरुभ्योऽक्षयपदपाप्तये मक्षनान् निर्वामीति
स्वाहा ॥३॥
(नहांपर अक्षतोंके चढाने में तीन पुंन करने चाहिवे अधिक नहीं).
जे विनयवंत सुभव्य-उरअंबुज-प्रकाशन
भान हैं। जेएकमुखचारित्र भाषहिं, त्रिजगमा-
हि, प्रधान हैं ।लहि कुंद कमलादिक पहुप भव-
भव कुवेदनसौं बचूं। अरहंतश्रुतासांतगुरुनिर-
ग्रंथ नित पूजा रचूं ॥४॥
विविध भांति परिमल सुमन, भ्रमरजासआधीन।
तासौं पूजौं परमपद, देवशास्त्रगुरु तीन ॥४॥

(८). ओं ही देदशास्त्रगुरुभ्य: कामवाणनिध्वंसनाय पुष्पं निर्वपा- मीति स्वाहा ॥४॥ . अति. सबल मदकंदर्प जाको, क्षुधा उरग समान है। दुस्सह भयानक तास नाशनकौं सु गरुड समान है। उत्तम छहों रसयुक्त नित नैवेद्यकरि घृतमें पचू । अरहंत श्रुतसिद्धांतगुरु निरग्रंथ नित पूजा रचूं ॥५॥ नानाविध संयुक्तरस, व्यंजन सरस नवीन । जासौं पूजौं परमपद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥५॥ मोहीदेवशास्त्रगुरुभ्यः शुभारोगविनाशनाय चकै निर्वपामीति स्वाहा • जे त्रिजग उद्यम नाश कीने मोहतिमिर महाबली। तिहिं कर्मघाती ज्ञानदीपप्रकाशजोति अमावली ॥ इहभांति दीप प्रजाल कंचनके सु- भाजनमें खेचूं। अरहंतश्रुतसिद्धांतगुरुनिरग्रंथ. नितपूजा रचूं ॥६॥ स्वपरप्रकाशक जोति अति, दीपक तमकरिहीन जासौं पूजी परमपद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥३॥ नों ही देवशास्त्रगुरुभ्यो मोइधिकारविनाशनाय दीपं निर्व- 'वामीति स्वाहा (६६) जो कर्म-इंधन दहन अग्निसमूह सम उद्ध- त लसैं । वर धूपं तासु सुगंधताकरि सकल परिमलता हंसें ॥ इहभांति धूप चढ़ाय नित, भवज्वलन माहि नहीं पy । अरहंत श्रुतसिद्धां- तगुरुनिरग्रंथ नितपूजा रचूं ॥७॥ अग्निमाहिं परिमल दहन. चंदनादि गुणलीन । जासौं पूजौं परम पद,देवशास्त्र गुरु तीन ॥ ॥ ओही देवशास्त्रगुरुभ्योऽष्टकर्मविध्वंसनायधूपं निर्वपामानि स्वाहा ॥ लोचन सुरसना.घान उर, उत्साहके कर- तार हैं। मोपैन उपमा जाय वरणी, सकल फल गुण सार हैं। सो फल चढ़ावत अर्थ पूरन, सं- कल अम्रतरस सचूं । अरहंत श्रुतसिद्धांत गुरु निरग्रंथ नित पूजा रचूं ॥८॥ जे प्रधान फल फलवि, पंचकरण-रसलीन । -जासौं पूजौ परमपद, देव शास्त्र गुरुतीन ॥८॥ ओहीं देवशास्त्रगुरुभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाग। जल परम उज्ज्वल गंध अक्षत, पुष्प वरु दीपक धरूं । वर धूप निरमल फल विविध, बहु . - (७०) जनमके पातक हरू ॥ इहभाँति अर्घ चढ़ाय नित भवि, करत शिव पंकति मचूं । अरहंत श्रुतसिद्धांतगुरुनिरग्रंथ नित पूजा रचूं ॥९॥ वसुविधि अर्घ सँजोयक,अति उछाह मन कीन। जासौं पूजौं परम पद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥१॥ ओं ही देवशास्त्रगुरुभ्योऽनय॑यदप्राशय अर्थ निर्वपामीति स्वाहा।। अथ-जयमाला। पद्धड़ि छंद । देवशास्त्रगुरुरतनशुभ, तीनरतन करतार । भिन्न २ कहुं आरती, अल्प सुगुणविस्तार ॥१॥ चउकर्मकि सठ प्रकृति नाशि। जीते अ- टादशदोषराशि॥जेपरम सुगुण हैं अनँतधीर। कहवतके छयालीस गुण गंभीर ॥२॥शुभ स-- मवशरणशोभाअपार । शत इंद्रनमत कर शी- सधार ॥ देवाधिदेव अरहतदेव । बंदी मनवच. तनकरि सु सेव ॥३॥ जिनकी धुनि लै ऑ- काररूप । निरअक्षरमय महिमा अनूप ।। दश अष्ट महाभाषा समेत । लघुभाषा सात शतक सुचेत ॥४॥ सो स्यादवादमय सप्तभंगो गणः

(७१)
घर गूंथें बारह सु अंग ॥ रवि शशि न हरे लो
तम हराय।सोशास्त्र नमाँ बहुप्रीति ल्याय 1५॥
गुरुआचारज उवझाय साधोतन नगन रतनत्र-
यनिधि अगाध ।। संसारदेह वैराग्यधार निर-
वांछि तपै शिवपद निहार ।।६॥ गुण छत्ति-
स पच्चिस आठवीस । अवतारनतरनजिहाज
ईस । गुरुकी महिमा वरनी न जाय । गुरुनाम-
जपी मनवचनकाय ॥७॥
सोरठा ।
कीजै शक्ति प्रमाण, शक्ति विना सरधा धेरै।
'द्यानत' सरधावान, अजर अमरपद भोगदै ।।
ओ ही देवशास्त्रगुरुभ्यो महाय निर्वपामीति स्वाहा।
इति देवशास्त्रगुरुकी-पूना ॥ २० ॥
(२१)
अब शेप अर्घ।
विद्यमान तीकरोंका अर्थ ।
उदकचंदनतंदुलपुष्पकैश्चरुसुदीपसुधूपफलाघः
अवलमंगलगानरवाकुले जिनगृहे जिनराजमहं
यजे॥१॥

(७२) ओं ही सामंधरयुगमंघरबाहुसबाहुसंजातस्वयंप्रभवृषभानन- अनंतवीर्यसूरप्रभविशालकीर्तिवज्रघरचंद्राननचंद्रबाहुभुजंगमईश्वरनेमि प्रभवीरसेनमहाभद्रदेवयशअजितवीतिविंशतिविद्यमानतीर्थकरेभ्यो- ऽयं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ अकृत्रिमचैत्यालयोंका अर्ध । कृत्याकृत्रिमचारुचैत्यनिलयान्नित्यं त्रिलोकी- गतान् बंदे भावनव्यंतरान्युतिवरान्कल्पामरा- सर्वगान् । सद्धाक्षतपुष्पदामचरुकैर्दीपैश्च धूपैः फलैर्, नीराधेश्च यजे प्रणम्य शिरसा दुष्कर्मणां शांतये ॥२॥ भों ही कृत्रिमाकृत्रिमचैत्यालयसंबंधिजिनीवेभ्योऽयं निर्वपा- मीति स्वाहा ॥२॥ सिद्धोंका अर्थ। गंधान्यं सुपयो मधुव्रतगणेः संगं वरं चंदनं पुष्पौषं विमलं सदक्षतचयं रम्यं चरुं दीपकं । धूपं गंधयुतं ददामि विविधं श्रेष्ठं फलं लब्धये सि- द्धानां युगपत्क्रमाय विमलं सेनोत्तरं वांछितं।३। ओं ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्थ निर्वयामीति स्वाहा ॥३॥ सोलहकारणका अर्थ । उदकचंदनतंदुलपुष्पकैश्चरुसुदीपसुधूपफलाघकैः (७३) धवलमंगलगांनरवाकुले जिनगृहे जिनहेतुमई यजे॥४॥ नों ही दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणेभ्यो अय निर्वपामीति स्वाहा ॥ ४ ॥ . 3 दशलक्षण धर्मका अर्ध! उदकचंदनतंदुलपुष्पकैश्चरसुदीपसुधूपफ- लार्घकैः । धवलमंगलगानरवाकुले जिनगृहे जिनधर्ममहं यजे ॥५॥ ओं ही अर्हन्मुखकमलसमुभवोत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्य- संयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्यदशलाक्षणिकधर्मेभ्योऽध्य निर्वप- मीति स्वाहा ॥ ५॥ रत्नत्रयकी अर्घ । उदकचंदनतंदुलपुष्पकैश्चरुसुदीपसुधूपफ- लार्घकै । ध्वलमंगलगानरवाकुले 'जिनगृहे जिनरत्नमहं यजे॥६॥ ओं ही अष्टांगसम्यग्दर्शनाय अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय त्रयो दशप्रकारसम्यक्चारित्राय अयं निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ इति शेष अर्घ .॥ २१ ॥ - (७४) । (२२.) अथ शांतिपाठ, विसर्जन भाषा | चौपाई १६ मात्रा। शांतिनाथ मुख शशि उनहारी। शीलगुण- व्रतसंयमधारी लखन एक सौ आठ विराज। निरखत नयन कमलदल लाजै ॥१॥ पंचम: चक्रवर्तिपदधारी । सोलम तीर्थकर सुखकारी । इंद्रनरेद्रपूज्य जिननायक । नमौं शांतिहितशांति विधायक ॥२॥दिव्य विटप पहुपनकी वरषा। दुंदुभिआसन वाणी सरसा॥छत्रचमरभामंडल भारी। ये तुव प्रातिहार्य मनहारी।३।शांति जि- नेश शांति सुखदाई जगतपूज्य पूजाँ शिरनाई। परमशांति दीजै हम सबको । पर्दै तिन्है, पुनि चार संघको.॥४॥ पूजै जिन्हें मुकुट हार किरीट लाके. इंद्रादिदेव अरु पूज्य पदाज जाके । सो शांतिनाथ वरवंशजगत्प्रदीप । मेरे लिये करहिं शांति सदा अप॥५॥ 'वसंततिलका।

संग्घरा। (७५). इंद्रवत्रा संपूजकोंको प्रतिपालकों को। यतीनको औ यतिनायकोंको।। राजा प्रजा राष्ट्र सुवेशको ले। कीजे सुखी हे जिन शांतिको दे.॥६॥ होवै सारी प्रजाको सुख वलयुत हो धर्मधारी नरेशा। होवे वर्षा समै तिल भर न रहै. व्याधियोंका अंदेशा होवै चोरी न जारी सुस- मय वरतै हो न दुष्काल भारी । सारे ही देश धारें जिनवर वृषको जो सदा सौख्यकारी ॥७॥ घातिकम जिन नाशकार पायो केवलराज शांति करौ सब जगतमें वृषभादिक जिनराज ॥ मंदाक्रांता! शास्रोका हो पठन सुखदा लाभ सत्संग- तीका । सङ्घचोंका सुजस कहके, दोष ढाकू सभीका।बोलू प्यारे वचने हितके, आपका रूप ध्याऊं। तोलों सऊं चरन जिनकेमोक्ष जाँ- लौन.पाऊ॥९॥ : दोहा।। १ (७६) आर्या । , , तवपद मेरे हियमें ममहिय तेरे पुनीत चरणोंमें। तबलों लीन रहो प्रभु, जबलों पाया न मुक्ति- पद मैंने ॥१०॥ अक्षरपद मात्रासे, दुषित जो कछु कहा गया मुझसे। क्षमा करोप्रभु सो सब, करुणा करि पुनिछुड़ाउ भवदुखसे॥ ११ ॥हे जगबंधु जिनेश्वर, पाऊं तव चरण शरण बलि- हारी । मरण समाधि, सुदुर्लभ, कर्मोंका,क्षय सुबोध सुखकारी॥१२॥ परिपुष्पांजलि क्षिपेत् । अथ विसर्जनपाठ। दोहा। विनजाने वा जानके, रही टूट जो कोय । तुव प्रसादत परमगुरु, सो सब पूरन होय ॥१॥ पूजन विधि जान्यों नहीं, नहिं जान्यों आह्वान। और विसर्जन हू नहीं, क्षमा करो भगवान ॥ ॥२॥ मंत्रहीन धनहीन हूं, क्रियाहीन, जिन- देव । क्षमा कर हु राखहु मुझे, देहु चरणकी सेव ॥३॥ आये जो जो देवगन, पूजे भक्तिम- Ko .. (७७) मान । सो अब जावहु कृपाकर, अपने अपने थान॥४॥ इति शांतिपाठ विसर्जन समाप्त ।। २२ ।। (२३) अप भांपा स्तुतिपाठ । तुम तरन तारन भवनिवारन, भविकमन- आनंदनो। श्रीनाभिनंदन, जगत वंदन, आ. दिनाथ निरंजनो ॥१॥ तुम आदिनाथ अ- नादि सेऊ, सेय पदपूजा करूं । कैलाशगिरि- पर रिषभाजनवर, पदकमल हिरदै धरूं ॥२॥ तुम अजितनाथ अजीता जीते, अष्टकर्म महा- बली । यह विरद सुनकर सरन आयो, कृपा कीजे नाथजी ।। ३॥ तुम चंद्रवदन सुचंद्रल- च्छन, चंद्रपुरी परमेश्वरो । महासेननंदन जगत बंदन चद्रनाथ जिनेश्वरो॥।॥ तुम शांति पांच कल्याण पूजी, शुद्ध मनवचकाय जू। दुरभिक्ष चोरी पाप नाशन, विधन जाय पलाय जू॥५॥ तुम बालब्रह्म विवेकसागर भव्यकमल विका-

(७८)
सनो। श्रीनेमिनाथ पवित्र दिनकर, पापति-
मिरविनाशनो॥६॥जिन तजी राजुल राज
कन्या, कामसैन्या वश करी। चारित्ररथ चढ़ि
भये दूलह, जाय शिवरमणीवरी॥७॥ कंदर्प दर्प
सुसर्प लच्छन, कमठ शठ निर्मद कियो। अश्वसे-
ननंदनजगतबंदन, सकल संघ मंगल कियो।
जिन धरीबालकपणे दीक्षा, कमठमानविदारक
श्रीपार्श्वनाथ जिनेंद्रके पद, मैं नमों शिर धार
के॥१॥ तुम कर्मघाता मोक्षदाता, दीन जा-
नि दया करो। सिद्धार्थनंदन जगत बंदन,
महावीर जिनेश्वरो॥१०॥त्रय छत्र सोहें सुर
नर मोहैं, वीनतीअवधारिये । कर जोड़ि सेवक
बीनवै, आवागमन निरवारिये ॥११॥ अब
होउ भव भव स्वामि मेरे, मैं सदा सेवक रहों।
कर जोरि यो वरदान मांगों, मोक्षफल जावत
लहों॥१२॥जो एकमाही एकराजै, एकमाहि
अनेकनो। इक अनेककी नहीं संख्या, नमो सि-
द्धनिरंजनो॥१३॥

(७९) चौपाई। मैं तुम चरणकमलगुण गाय । बहुविधि भक्ति करीमन लामजनम जनम प्रभुपाऊं तोहि । यह सेवाफल दीजे मोहि॥१४॥ कृपा तिहारी ऐसी होय । जामन मरन मिटावो मोय ॥ बार बार मैं विनती करूं तुम सेवत भवसागर तरूं। नाम लेत सब दुख मिट जाय। तुम दर्शन देख्यो प्रभु आय।तुम हो प्रभुदेवनके देव । मैं तो करूं चरण तव सेव ॥१६॥मैं आयो पूजनके काज। मेरो जनमसफल भयोआज । पूजा करकै माऊं शीश । मुझ अपराध छमहु जगदीश ॥१७॥ सुख देना दुख मेटना, यही तुम्हारी वान ।मो गरीबकी वीनती सुन लीज्यो भगवान ॥१८॥ विन मतलब बहुते अधम, तार दये स्वयमेव ॥ त्यों मेरा कारज संफल, कर देवनके देव ॥१९॥ जैसी महिमा तुमविष, और घरे नहि कोय। जो सूरजमें ज्योति है तारनमें नहि सोय ॥२०॥ नाथ तिहारे नामतें, अघ छिनमाहिं पलाय। दोहा। .

(८०) ज्यों दिनकर परकाशर्ते, अंधकार विनशाय २१ बहुत प्रशंसा क्या करूं,मैं प्रभु बहुत अजान । पूजा विधिजान्यो नहीं, सरनराखि भगवान २२ इति भाषास्तुतिपाठ समाप्त ।। २३ ।। (२४) अथ हेमरान कृत भक्तामा स्तोत्र । . दोहा। आदिपुरुष आदीशजिन,आदिसुविधिकरता। घरमधुरंधरपरमगुरु, नमहुं आदिअवतार ॥१॥ चौपाई। सुरनत मुकुट रतनछविकरें। अंतर पापतिमिर सब हरैं। जिनपद बंदों मन वच काय । भव जलपतित-उधरनसहाय ॥१॥श्रुतपारगइंद्रा- दिक देव । जाकी थुति कीनी कर सेव ॥ शन्द मनोहर अरथ विशाल । तिस प्रभुकी वरनो गुनमाल ॥२॥ विबुधवंद्यपद में मतिहीन होय निलज थुति-मनसा कीन ॥जलप्रतिबिंब बुद्ध को गहै । शशिमंडल बालकही चहै॥३॥ गुनसमुद्र तुम गुन अविकार । कहत.न सुरगुरु (८१ पावै पारः॥ प्रलयपवनउद्धत-जलजंतु । जलधि तिर को भुजबलवंत ॥ ४ ॥ सो मैं शक्तिहीन थुति करूं। भक्तिभाववश कछु नहिं डरूं॥ ज्यौँ मृग निजसुत पालन हेत । मृगपतिसन्मुख जाय अचेत ॥५॥ मैंशठ सुधी हँसनकोधाम । मुझे तुव भक्ति बुलावें राम ॥ ज्यों पिक अंब कली परभाव। मधुऋतु मधुर करै आराव॥६॥ तुमजस जंपत जिन छिनमाहिं । जनमजनमके पाप नशाहि || ज्यों रवि उगै फट ततकाल। अलिवत नील निशातमजाल ॥७॥ तुमप्रभा- वतें करहुं विचार।होसी यह थुति जनमनहार।। ज्यों जल कमल पत्रपै परै । मुक्ताफलकी युति विस्तरै ॥८॥ तुमगुन महिमा हत दुख दोप। सोनो दूर रहो सुखपोष। पापविनाशक है तुम नाम ।.कमल-विकाशी ज्यों रविधाम ॥९॥ नहि अचंभ जो होहिं तुरंत । तुमसे तुम गुण चरणत संत ॥जो अधीनको आपसमाना करें न सोनिंदित धनवान ॥१०॥ इकटक जन तुमको अविलोय । औरविर्षे रति करै न-सोय । .६.

(८२ को करिछीरजलधि जलपान । छारनीर पीवे मतिमान ॥ ११॥ प्रभुतुम वीतराग गुनलीन। जिन परमाणु देह तुम कीन ।। हैं तितने ही ते परमानु । यात तुमसम रूप न आर्नु ॥१२॥ कहँ तुममुख अनुपम अविकार । सुरनरनाग नयन मनहार ॥ कहां चंद्रमंडल सकलंकीदिन में ढाकपत्र सम रंक ॥१३॥ पूरनचंद्र जोति विवंत तुमगुन तीनजगतलंघत ॥ एकनाथ त्रिभुवन आधार । तिन विचरत को करे निवार ॥१४॥जो सुरतिय विभ्रम आरंभ । मन न डिग्यो तुम तोन अचंभः॥ अंचल चलावै प्रल- य समीर । मेरुशिखर डगमगय न धीर॥१५॥ धूमरहित बातीगत नेहा परकाशै त्रिभुवन घर येह ॥ वातगम्य नाही परचंड । अपर दीप तुम बलो अखंड॥१६॥छिपहुनलुपहु राहुकिंछा- हिं । जगपरकाशक हो छिनमाहि॥धनअनव- चे दाह विनिवार रवित अधिक घरो गुणसार. ॥१७॥सदोउचित विदलिततममोह । विघटित मेघ राहु अविरोह॥तुम मुखकमल अपूरव चंद

(८३)
जगत-विकाशी जोति अमंद ॥१८॥निशदिन
शशिरविको नहिं काम । तुम मुखचंद हरे तम
'धाम । जो स्वभावतै उपजै नाजासजलमेघते
कौनहुँ काज॥१९॥ जो सुवोध सोहै तुममांहिं ।
-हरिहर आदिकमें सो नाहि ॥ जोदुति महार-
तनमें होय । काचखंड पावै नहिं सोय ॥२०॥
छंद नाराच ।
सराग देव देख मैं भला विशेष मानिया,
स्वरूप जाहि देख वीतराग तू पिछानिया।
कछू न तोहि देखके जहां तुही विशेखिया,
मनोग चित्रचोर और भूलहू न देखिया॥२१॥
अनेक पुत्रवंतिनी नितविनी सपूत हैं,
न तो समान पुत्र और माततै प्रसूत हैं।
दिशा धरंत तारिका अनेक कोटि को गिने,
दिनेश तेजवंत एक पूर्व ही दिशाजनै॥२२॥
पुरान हो पुमान हो पुनीत पुन्यवान हो,
कहें मुनीश अंधकार नाशको सुभान हो।
महंत तोहि जानके न होंय वश्य कालके,
न और मोख मोखपंथ देव तोहि टालके ॥२३॥

.. (८४) अनंत नित्य चिचके अगम्य रम्य आदि हो, असंख्य सर्वव्यापि विष्णु ब्रह्म हो अनादिहों, महेश काम केतु जोग ईस जोग ज्ञान हो, अनेक एक ज्ञानरूप शुद्ध संतमान हो ॥२४॥ तुही जिनेश वुद्ध है सुवुद्धके प्रमाणते, तुही जिनेश शंकरोजगस्त्रियै विधानत तुही विधात है सही सुमोख पंथ धारतें, नरोचमोतुही प्रसिद्ध अर्थक विचारतें॥२५॥ नमो करूं जिनेश तोहि आपदा निवार हो, नमों करूं सुभूरि भूमिलोकके सिंगार हो । नमो करूं भवाब्धिनीरराशिशोखहेतु हो, नमौ करूं महेश तोहि मोखपंथ देतु हो ॥२६॥ तुम जिन पूरनगुनगन भरे । दोषगरवकरितुम परिहरे॥और देवगन आश्रय पाय । सुपन न देखे तुम फिर आय २७ तरुअशोकतरकिरन उदार । तुमतन शोभित है अविकार।। मेघनि- कट ज्यों तेज फुरंत । दिनकर दिपै तिमिरनि- हनंत ॥२८॥ सिंहासन मनिकिरनविचित्र । चौपाई।

(८५)
तापर कंचनवरन पवित्र तुमतनशोभित किर-
नविथार । ज्यों उदयाचल रक्तिमहार ॥२९॥
कुंदपुहुपसितचमर ढरंत । कनक वरन तुमतन
शोभंत । ज्यों सुमेरुतट निर्मल कांति । झरना
झरै नीर उमगांति ॥ ३०॥ ऊँचे रहे सूर दुति
लोप । तीन छत्र तुम दिएँ अगोप ॥ तीन लोक
की प्रभुता कहैं । मोती झालरसों छवि लहैं ।।
॥३१॥ दुंदुभि शब्द गहर गंभीर। चहुंदिश होय
तुम्हारे धीर । त्रिभुवन जन शिवसंगम करें।
मानों जय जय रव उच्च ॥ ३२ ॥ मंद पवन
गंधोदक इष्ट । विविध कल्पतरु पुहुप सुवृष्ट।
देव कर विकसित दलसार । मानों द्विजपंकति
अवतार ।। ३३ ।। तुमतन-भामंडल जिनचंद ।
सब दुतिवंत करत हैं मंद ।। कोटि शंख रवितेज,
छिपाय । शशिनिरमलनिशि करै अछाय ॥३४॥
स्वर्गमोखमारगसंकेत । परमधरमउपदेशनहेत ॥
दिव्य वचन तुम सिरै अगाघ । सबभाषागर्भित
हितसाध ॥ ३५॥

दोहा । पदपद। विकसितसुवरनकमलदुति, नखदुतिमिल चम- काहि तुमपद पदवी जहं घरै, तहंसुर कमलर.. चाहिं ।। ३६ ॥ ऐसी महिमा तुमविष; और धरे नहिं कोय । सूरजमें जो जोत है, नहिं तारागन होय ॥३७॥ मदोंवलिप्तकपोल-मूल अलिकुल झंकारें। तिन सुन शब्द प्रचंड, क्रोध उद्धत अति धारें। कालवरन विकराल, कालवत सनमुख आवै । ऐरावत सो प्रबल, सकल जन भय उपजावे ।। देखि गयंद न भयकर, तुमपद महिमा लीन । विपातरहितसंपतिसहित, वरतै भक्तअदीन ३० अति मदमत्त गयंद, कुंभथल नखन विदार। मोती रक्त समेत, डारि भूतल सिंगारै ।। वांकी दाढ विशाल, वदनमें रसना लोले। : भीम भयानकरूप देखि जन थरहर डोले। ऐसे मृगपति पग तलें, जो नर आयो होय । शरन गये तुम चरनकी, वाघो कर न सोय ३९

(८७)
प्रलयपवनकर उठी आग जो तास पटंतर ।
बमै फुलिंग सिखा, उतंग पर जलें निरंतर ॥
जगत समस्त निगल, भस्मकरहेगी मानो।
तड़तडार दव अनल, जोर चहुँदिशा उठानो।
सो इक छिनमें उपशमै, नामनीर तुम लेत ॥
होय सरोवर परिनमैं, विकसित कमल समेत ४
कोकिलकंठ समान, श्यामतन क्रोध जलंता।
रक्तनयन फुकार, मारविषकन उगलंता।
फनको ऊँचा करे, वेग ही सनमुख धाया ।
तुव जन होय निशंक, देख फनपतिकोआया ।।
जो. चांप निज पांवत, व्याप विषान लगार।
नागदमनि तुम नामकी, है जिनके आधार४१
जिस रनमाहि भयान, शब्द कर रहे तुरंगम !
धनसे गज गरजाहिं, मत्त मानों गिरि जंगम।।
अति कोलाहलमाहि, वात जंह नाहिं सुनीजै।
राजनको परचंड, देख वल धीरज छीजै ।।
नाथ तिहारे नामतें, सो छिनमाहिं पलाय।
ज्यों दिनकरपरकाशतें, अंधकारविनशाय ४२
मारे जहां गयंद, कुंभ हथियार विदार

.
(८).
उमगे रुधिर प्रवाह, बेग जलतें विस्तारै ।।
होय तिरन असमर्थ, महाजोधा वल. पूरे।
तिस रनमें जिन तोय, भक्त जे हैं नर सूरे॥
दुर्जन अरिकुल जीतके, जय पावै निकलंक।
तुम पदपंकज मन वसै ते नर सदा निशंक
नक चक्र मगरादि, मच्छकरि भय उपजावे।
जामें वडवा अग्नि, दाहत नीर जलावै॥
पार न पावै जास, थाह नहिं लहिये जाकी
गरजै अतिगंभीर, लहरकी गिनति न ताकी
सुखसों तिरै समुद्रको, जे तुमगुन सुमिराहि ।
लोल कलोलनके शिखर, पार यान ले जाहि
महा जलोदर रोग, भार पीड़ित नर जे हैं।
बात पिच कफ कुष्ट, आदि जो रोग गहे हैं।
सोचत रहैं उदास, नाहिं जीवनकी आशा
अति घिनावनी देह, धरै दुगंधनिवासा॥
तुम पदपंकजधूलको, जो लावै निजअंग ।
ते नीरोग शरीर लहि, छिनमें होंय अनंग ४
पांव कंठतें जकर, बांध सांकल अति भारी।
गाढ़ी बेड़ी पैरमांहिं, जिन जांघ विदारी॥

(८६.)
भूख प्यास चिंता शरीर, दुःख जे विललाने ।
सरन नाहिं जिन कोय, भूपके बंदीखाने ।
तुम सुमरत स्वयमेवही, वंधन सब खुल जाहि ।
छिनमें ते संपति लह, चिंता भय विनसाहि४६
महामच गजराज, और मृगराल, दवानल।-
फनपति रन परचंड,नीरनिधि रोग महावल ।।
बंधन ये भय आठ, डरपकर मानों नाशै।
तुम सुमरत छिनमाहि, अभय थानक परकाश।।
इस अपार संसारमें, शरन नाहिं प्रभु कोय ।
यात तुम पद भक्तको, भक्ति सहाई होय ॥४७॥
यह गुनमाल विशाल, नाथ तुम गुनन सवारी
विविध वर्णमय पुहुप, गूथ मैं भक्ति विधारी।
जे नर पहरे कंठ, भावना मनमें भावें।
मानतुंग ते निजाधीन, शिवलछमी पावें ॥
भाषा भक्तामर कियों, हेमराज हितहेत।
जे नर पढ़ें सुभावसौं, ते पावे शिवखेत ॥१६॥
इति हेमराजकृत भक्तामर स्तोत्र समाप्त ॥ २४ ॥

(६०) (२५) अथ कल्पाबमंदिर स्तोत्र दोहा । चौपाई। परमज्योति परमात्मा, परमज्ञान परवीन । बंदू परमानंद-मय, घट घट अंतर लीन ॥१॥ निर्भय करन परमं परधान । भवसमुद्रजल ता- रन जान ॥ शिवमंदिरअपहरण अनिंद । बंद पास चरण-अरबिंद ॥२॥ कमठमानभंजन वरवीर गरिमा सागर गुणगंभीर ॥ सुरगुरु पार लहै नहिं जास । मैं अजान लंपूं जस तास ॥३॥ प्रभुस्वरूप अति अगम अथाह । क्यों हमसे यह होय निवाह ॥ ज्यों दिनअंध- उलूको पोत । कहि न सके रविकिरण उद्योतः मोहहीन जानै मनमाहिं । तोहु न तुम गुण व- रने जाहिं।। प्रलयपयोधि कर जलबोन । प्रग- टहिं रतन गिनै तिहिं कौन ॥५॥ तुम असंख निर्मलं गुणखानि । मैं मति हीन कहूं निजबानि। ज्यों बालक निज बाहि पसार । सागर परमित (१) कहै विचारवाजेयोगोंद्र करहिं तप खेद। तऊ न जानहिं तुम गुण भेद। भक्ति भाव मुझ मन अभिलाष । ज्यों पंछी बोले निजे भाष ॥७॥ तुम जस महिमा अगम अपार । नाम एक त्रि- भुवन आधार आवै पवन पद्मसर होय । ग्रीषम तपत निवार सोय ॥८॥ तुम आवत भविजन मनमाहि । कमनिबंध शिथल है जाहियों चंदनतरु बोलहिं मोर । डरहिं भुजंग लगे चहुँ- ओर ॥ ९॥ तुम निरखत जन दीन दयाल ! संकटतै छटै ततकालज्यों पशु घेर लेहि निशि चोर । ते तज भागहिं देखत भोर ॥ १०॥तू, भविजनतारक किम होहिते चितघार तिरहिं ले तोहि ।। यह ऐसे कर जान स्वभाव । तिरहिं मसक ज्यों गर्भित वाव ।। १२ ।। जिहं सब देव किये वश वाम । ते छिनमें जीत्यो सो काम ।। ज्यों जल करै अगानि कुल हान । वडवानल पीवैसोपान । १२॥ तुम अनंत गरवा गुण लिये। क्योंकर भाक्ति घरों निज हिये। लघुरूप तिरहिं संसार । यह प्रभु महिमा अकथ अपार (९२) ॥१३॥ क्रोध निवार कियो मन शांत । कर्म सुभट जीते किहि भांति ॥ यह पटतर देखउ सं- सार । नील विरछज्यों दहै तुसारो१४मुनिजन हिये कमल निज टोहि।सिद्धरूपसमध्यावंतोहि।। कमल कराणका विन नहिं और । कमल वीज उपजनको ठौर१५जव तुवध्यान धरै मुनि कोय। तव विदेह परमातम होय ॥ जैसे धातारीला तनु त्यागकनक स्वरूप ध जवआगा. जाके मन तुम करहु निवास।विनशि जायक्यों विग्रह तास.||ज्यों महंत विच आचे कोय । विग्रह मूलनिवारै सोय।१७। करहिं विबुधजे आतम ध्यान ।तुमप्रभावतें होय निदान जैसे नौर सुधा अनुमान । पीवत विष विकारकी हानि ॥ १८ ॥ तुम भगवंत विमल गुण लीन । समलरूप मानहिं मतिहीन ॥ज्यों पीलिया रोग. हग गहै । वर्ण विवर्ण शंखसों कहै ॥ १९ ॥ निकटरहत उपदेश सुन, तरुवर भयो अशोक। ज्योरवि ऊगत जीव सव, प्रगट होतं भुविलोक। दोहा।

(१३)
सुमन वृष्टि जो सुर करहिं, हेठ बीठ मुख सोह
त्यों तुम सेवत सुमनजन, बंध अधोमुख होई ।।
उपजी तुम हिय उदधित, वानी सुधा समान ।
जिहंपीवत भवि जनलहै, अजर अमर पदथान
कहहिं सार तिहुं लोकको, यह सुरचामर दोय !
भावसहित जोजिननमें, तसगति ऊरध होय।।
सिंघासन गिरमेरुसम, प्रभुधुनि गरजत घोर।
श्यामसुतनुधनरूपलखि, नाचतभविजन मोरा।
छवि हत होत अशोकदल, तुम भामडंल देख
वीतरागके निकट रह, रहत न राग विशेख ।।
सीख कहैं तिहुं लोकको, यह सुरदुंदुभिनाद ।
शिवपथसारथिवाह जिन, भजहुतजहु परमाद।।
तीन छत्र त्रिभुवन उदित, मुक्तागण छविदेत॥
त्रिविधरूपधर मनहुशारी, सेवत नखतसमेत ।
प्रभुतुम शरीर दुतिरतनजेम । परताप पुंज जि-
मि शुद्ध हेम ॥ अति धवलसुजश रूपासमान ।
तिनकेगढतीनविरजमान ॥२७॥ सेवहिं सुरेंद्र
करनमत भाल,तिन सीसमुकुट तज देहिमाल।
पद्धरि छंद।

(९४) तुम चरण लगत लहलहै प्रीति,नहिरमहि और जनसुमन रीति ॥ २८ ॥ प्रभुभोगविमुख तनकर्मदाह,जनपारकरत भवजलनिवाहाज्यों माटी कलश सुपक्व होय, ले भार अधोमुख तिरहि तोय॥२९॥तुम महाराज निधन निरास । तज विभव विभव सब जग प्रकाश ॥ अक्षर- स्वभाव सुलिखे न कोय, महिमा अनंत भगवंत सोय ॥३॥ कोप्यो सुकमठ निज वैर देख, ति- नकरी धूल वरषा विशेख॥ प्रभुतुम छाया नहि मई हीन, सो भयो पापि लंपट मलीन ॥ ३२॥ गरजंत घोर घन अंधकार, चमकंत बिज्जु जल मुशलधार ॥ वरपंत कमठ घर ध्यान रुद्र, दु: स्तर करता निजभवसमुद्र ॥१३॥ (वस्तुछंद) मेघमाली मेघमाली आप बलफोरि, भेजे तुरत पिशाच गण, नाथपास उपसग्ग कारण। अग्नि जाल झलकंत मुख; धुनि करत जिमि मचवा- रण कालरूप विकराल तन, मुंडमाल तिह चौपाई। कंठाढ निशंक वह रंक निज, करै कर्म दिद गंठ॥ ३४॥ जे तुमचरण कमल तिहुंकाल। सेवहिं तजमाया जंजाल || भावभगति मन हरष अपार । धन्य धन्य जग तिन अवतार ॥ ३५॥ भवसागरमहं फिरत अजान । मैं तुम सुयश सुन्यो नहिं कान। जो प्रभुनाममंत्रमनधरै । तासों विपतिभुजंगम डरै ॥३६॥ मनवांछित फल जिनपदमाहि। मैं पूरेव भव पूजे नाहि ॥ मायामगन फिरयो अज्ञान । करहिं रंकजन मुझ अपमान ॥ ३७॥ मोहतिमिर छायो दृग मोहि । जन्मांतर देख्यो नहिं तोहि । ती दुर्जन मुझ संगति गहँ । मरम छेदके कुवचन कहैं । ३८ सुन्यो कान यश पूजे पाय। नैनन देख्यो रूप अघाय ॥ भक्ति हेतु न भयो चित चाव । दुखदायक किरिया विनभाव ॥३९॥ महाराज सरनागत पाल। पतित दधा- रण दीनदयाल ॥ सुमिरण करहुं नाय निज शीश । मुझ दुख दूर करहु जगदीश ।।१०।।

(९६) कर्मनिकंदन-महिमासारं। अशरणशरण सुय- शविस्तार ॥ नहिं सेये प्रभु तुमरे पाय तो मुझ जन्म अकारथ जाय॥४॥सुरगणवदित दया निधान । जगतारण जगपति जगजान.॥ दुख सागरतें मोहि निकासि । निर्भयथान देहु सुख- रासि॥४२॥मैं तुम चरण कमल गुणगाय! बहु विधि भक्तिकरी मनलाय ॥ जनम जनम प्रभु पाऊं तोहि । यह सेवा फलदीजै मोहि ॥४३॥ दोषकांत वेसरीलंद छप्पय । इहिविधि श्रीभगवंत, सुयश जे भवि जन भा- पहि। ते.निज पुण्य भंडार, सांचे चिर पाप प्र- णासहि ॥ रोम रोम हुलसति, अंग प्रभु गुण मन ध्यावहिं । स्वर्गसंपदा ज, बेगपंचम गति पावहिं॥ यह कल्याणमंदिर कियो, कुमुदचंद्रकी बुद्धि । भाषा कहत बनारसी, कारण समकित शुद्धि॥४४॥ इति कल्याणमंदिर समाप्त ॥ २५ (६७) (२६) अथ भूधरकृत एकीभाव स्तोत्र । दोहा। वादिराज मुनिराजके, चरण कमल चितलाय । भाषा एकीभावकी, करूं स्वपरसुखदाय ॥१॥ (छंद) जो अति एकीभाव भयो मानो अनिवारी। सोमुझ कर्मप्रबंध करत. भव भव दुख भारी ।। ताहि तिहारी भक्ति जगत रवि ज्यों निरवारे । तो अव और कलेश कौन सो नाहिं विदारेश तुम जिन ज्योतिस्वरूप दुरितअंधियार निवारी सो गणेश गुरु कहे तत्त्वविद्याधनधारी।। मेरे चितघरमाहि वसो तेजोमय यावत । पापतिमिर आकाश तहां सोक्योंकर.पावत ॥२॥ आनंद आंसू बदन धोय तुमसौं चित साने। गदगदसुरसों सुयशमंत्र पढ पूजा ठाने । ताके बहुविधि व्याधिव्याल चिरकाल निवासी ! भाजथानक छोड देहवांवइके वासी ॥३॥ दिवित आवनहार भये भवि-भाग-उदयवल। ७

(१४)
पहलेही सुर आय कनकमय कीय. महीतल ।।
मनगृहध्यानदुवार आय निवसौ जगनामी।
जोसुवरण तनकरोकौन यह अचरजेस्त्रामीण
प्रभु सब जगके विना हेतु बांधव उपकारी।
निरावरन सर्वज्ञ शक्ति जिनराज तिहारी।
भक्तिरचित ममचिचसेज नित वास करोगे।
मेरे दुखसंताप देख किमि धीर धरोगे॥५॥
भववनमैं चिरकाल भ्रंम्यो कछु काहय नजाई।
तुम थुतिकथापियूष-वापिका भागन पाई ॥
शशि तुषार धनसार हार शीतल नहिंजा.सम।
करत न्हौन तामांहि क्यों न भवताप बुझेमम ।।
श्रीविहार परिवाह होत शुचिरूप सकल जग।
कमल कनक आभाव सुरभि श्रीवास धरत पग।
मेरोमन सर्वग परसप्रभुको सुख पावे। अब सो
कौनकल्यान जो न दिनदिन ढिंग आवै ।।७॥
भव तजसुखपद बसे काममद सुभट संहारे।
जो तुम को निरखंत सदाप्रिय सदा तिहारे ।
तुम वचनामृतपान भक्ति अंजुलिसों. पीवें ।
तिनै भयानक कूर रोग रिपु कैसे छीवें ॥८॥

(१९) मानथंभ पाषाण आन पाषाण प्रीतर।। ऐसे और अनेक रत्ल दीखें जग अंतर । देखत दृष्टि प्रमाण मानमद तुरत मिटावे जो तुम निकट न होय शक्ति यह क्योंकर पावै ॥ ९॥ प्रभुतन पर्वत परत पवन उरमैं निवहै है। तासौं ततछिन सकल रोग रजवाहिर है है। जाके ध्यानाहूत बसो उरअंबुज माहीं।। कौन जगतउपकारकरण समरथ सोनाहीं॥१०॥ जनमजनमके दुःखसहे सब ते तुम जानो। याद किये मुझ हिये लग आयुधसे मानो। तुम दयाल जगपाल स्वामि में सरण गही है । जो कछु करनो होय करों परमाण वही है ।११॥ मरण समय तुम नाम, मंत्र जीवकतै पायो। 'पापाचारी स्वान प्रान तज अमर कहायो । जो मणिमाला लेय, जपै तुम नाम निरंतर ! इंद्र संपदा लहै कौन संशय इस अंतर ॥ १२ ॥ जो नर निर्मल ज्ञान, मान शुचि चारित साधे। अनवधि सुखकी सार भाक्त कंची नहिं लाधै ॥ सो शिव वांछक पुरुष मोक्षपट केम उपारे ।

(१००) मोह मुहर दिढ करी, मोक्षमंदिरके द्वारे ॥१३॥ शिवपुरकेरो पंथ, पाप तमसौं अति छायो। दुखसरूप वहुकूप खाडसौ विकट बतायो । स्वामी सुखसों तहां कौन जन मारग लागें । प्रभुप्रवचनमाणदीप जोनके आगें आगें ॥१४॥ कर्मपटलभूमाहिंदवी आतमनिधि भारी। देखतअतिसुखहोय विमुखजन नाहिं उघारी ।। तुम सेवक ततकाल ताहि निश्चय करघारै। थुतिकुदालसों खोद वंददं कठिन विदारे । १५॥ स्यादबाद गिरिउपज मोक्ष सागरलों धाई। तुमचरणांबुज परस भक्तिगंगा सुखदाई ॥ मोचित निर्मल थयो न्होन रुचिपूरव तामैं । -अब वहहोन मलीन कौन जिन संशय यामै १६ तुम शिव सुखमय अंगटकरत प्रभुचिंतन तेरो। मैं भगवान समान भाव यों वरतै मेरो॥ यदपि झूठ है तदपि तृप्ति निश्चल उपजावै। तुम प्रसाद सकलंक जीव वांछितफल पावै ॥१७ ।। वचन जलधि तुम देव सकल त्रिभुवनमें व्यापै। भंगतरंगिनि विक्थवादमलमलिन उथापै ॥

(१०१) मन सुमेरसौं मथें ताहि जे सम्यकज्ञानी । परमामृतसों तृपत होहिं ते चिरलों प्रानी ॥१८॥ जो कुदेव छविहीन वसनभूषण अभिलाखें। वैरीसों भयभीत होय सो आयुध राखें ।। तुम सुंदर सर्वंग शत्रु समरथ नहि कोई । भूषणवसनगदादि ग्रहण काहेको होई ॥ १९ सुरपति सेवा करै कहा प्रभु प्रभुता तेरी । सो शलाधना लहै मिटै जगसौं जग फेरी। तुम भव जलधिजिहाज तोहि शिवकंत उचारिये । तुही जगत जनपाल नाथथुतिकी थुति करिये॥२०॥ वचनजाल जडरूप आप चिन्मूरति झांई। तातै थुति आलाप नाहिं पहुंचे तुम ताई ॥ तोभी निष्फल नाहिं भक्तिरसभाने वायका संत- नको सुरतरुसमान वांछितवरदायक ॥ २१॥ कोपकभी नहिं करो प्रीति कव हूं नहिं धारो। अति उदास वेचाह चिच जिनराज तिहारो॥ तदपि आन जगबहै वैर तुम निकट न लहिये। यह प्रभुता जगतिलक कहांतुम विन सरदहिये ॥२२॥ सुरतियगावें सुजशसर्वगति ज्ञानव- (१०२) रूपी।जो तुमकोथिर होहि नमै भवि आनंदरूपी ताहि छेमपुर चलन वाट बांकी नहि होहै। श्रुतके सुमरनमाहिसोन कवहूं नर मोहै ॥२३॥ अतुल चतुष्टय रूप तुमैं जो चितमें धार । आ. दरसों तिहुंकालमाहि जग थुति विस्तारै ।। सो सुक्रत शिवपंथ भक्तिरचना कर पूरै। पंच कल्यानक ऋद्धि पाय निश्चै दुख चूरै ।। २४ ॥ अहो जगतपति पूज्य अवधिज्ञानी मुनि हारे। तुम गुणकीर्तनमाहि कौन हम मंद विचारे । थुतिछलसों तुमविष देव आदर विस्तारे। शिवसुख. पूरणहार कल्पतरु यही हमारे ॥२५॥ वादिराज मुनिराज शब्दविद्याके स्वामी। वादिराज मुनिराज तर्कविद्यापति नामी॥ वादिराज मुनिराज काव्यकरता अधिकारी । वादिराज मुनिराज वडे.भविजनउपकारी॥१६॥ मूल अर्थ बहुविधि कुसुम, भाषासूत्रमझार । भाक्तिमाल भूधर करी, घरोकंठ सुखकार ॥१॥ इति भूपरकृत एकीमावस्त्रोत्र ॥ २६ ॥ दोहा। .

(१०३) भय पांडे हीरानंदकृत एकीभाव स्तोत्र । दोहा। वादिराज मुनिराजके, वड्यौ सुहित उदगार। स्वपररूप अनुभव कथा,कहत स्वपरहितकार। चौपाई। एकीभाव भयो मुझ माहि करमप्रवंध आदि कहुं नाहि । सो भवभवगत अति दुख करै । दुर्निवार वारयौ नहिं परै॥॥ ताकी अरदुखकों जिनसूर । दूर करै तुझ भगति वचूर ॥ तो अब कौन तापकरि भूरि। जो न भगति दुख कर है दूर॥२॥ जोतीरूप पापतम नास । तू जिनरवि चिर मुनिवरं भास ॥ मेरे चितमंदिरमें आय प्रगट विभासमान सुखदाय॥ ३॥ तो कहु ता हृदि कसै वने । पाप अंधार वसतु जो भने ।नाशै इह निह परमान । आप आप पर पर पेद आन ॥४॥आनंद आंसु घोय मुख नैनोजो गदगद भाप जिनवैन। स्तोत्र मंत्र करिदृढता धरै। श्रीजिनराजरूप अनुसरै॥५॥ ताकै भ्यास करत चिरकाल । देहरूप वांवई के (१०४) व्याल॥व्याधिरूपजे वसहि अनादि । ते भजि. जांहि न उपजै सादि॥६॥ सुरग लोकत षण- मांसाव । पहलहिं भूमि होत बरसाव ॥ अथवा सकल कनकमय होय। जिन आगमन कहे सब कोय ॥७॥ मेरे हृदय कमल प्रासादा सूचि- कर ध्यानद्वार आल्हाद ॥ वसत. देव तुह कौन कहाव। जोसोवन वपुंहोय लखायासकल लोकका तू भगवान विनाप्रयोजन बंधु सुजा- न । सकल पदारथ भासकभास । तुझमें वसे अबाध विलांस ॥९॥ भगतिरचित सज्या मो हृदय । तामैं तू अधिवासी सदय तौतह कहां कलेस करूर । वसतु सहारि सके जिनसूर।१० जनम मरन अटवी संसार । भ्रमत भ्रमत गत काल अपार ॥ तामैं तुव नयकथा सरूप । अः मृतवापिका-लसै अनूप ।११। भगतिभावसीत- लजलभरी । स्यादवाद निरमलता करी| ताम मगनभयोहूं आय।क्योंमुझदुखदावान मिटाय । प्रभु तुव पावन उदयविहार। पदकमलनितरि कमल समार ॥ तातें हेमकमल आवास लिसे ३ सुराभि तरकमलावासं ॥१३॥मैं प्रभु सरव अं. गकरिधरयो। प्रभुफुनि सकल अब अवतरयो। तो कहूं कौन श्रेय मुझ रह्यो । जो दिन दिन होइ न लहलह्यो ॥१४॥ दुरनिवारमदमदनानि- कंद । त्रिभुवनपतिबंदित सुखकंद ॥ जो तुर दर्शनधारी जीव। तुववचनामृत धेरै सदीवा१५॥ अरु फुनि करम कुवनमै रहै । परम अनंद धाम संग्रहै । ताकै क्रूराकार उपाधि। कंटकरूप कहाँ है व्याधि ।। १६॥ पाषाणातम इतर समान । मानस्तंभ रतनपरधान॥ पुगलपुंजदृष्टि जो परै मानरोग मानी परिहरे॥१७॥ तो यह मानर्थ- भको हेतु । प्रभुसमीपता परगट देतु॥यात हम अवधारी जानि।परमातम पद सब सुखखानि ॥१॥जिनतनुशैल परासि जो वाउ।वहै सकल जन सुख उपजाउ। यदपि हियेमहि पैठिन है। तदपि रुजारज रंच न रहै ।। १९ ।। जाके हिये. कमल जिनदेव । ध्यानाहूतं विराजित एव ।। ताकै कौन रहा उपगार । जिन आतमनिधि पाई सार॥२०॥ तुम जानत हो दीनदयाल | है -- (१०६). जो मुझ भवभव दुख विकराल ॥ जब जब वह दुख हूंचितिकरौं । तब तब शस्त्रपात अनुसरों. ॥२१॥ तू सरवस सकृप जिनराजा तेरोसरन गयो हम आज। अब जोजो कछु करणाहोह। सो प्रमाण करिये अब.लोइ ॥२२॥ जीवकसेठि पढे नवकार । मरन समय कूकर अवधार। पा. पाचारी तिरजग जौनि । देवलोक सुख पायो तौंनि ॥२३॥ जो मानुषमनि निरमल जाप। नुतिपदं जपै विगत भवताप ॥ देवराज श्रीप्र- भुता लहै । तो संदेह कवन निरवहै ॥२४॥सु- धाज्ञान सुविचारित दोय! अरु जो श्रीजिन भगति न होय ॥ जो अनवधि सुख प्रगटन हार । मुकतिद्वारकी कुंजीसार ॥२५॥ तो कहु कैसे मुकति कपाट । मोह मुहरि खुलि पावे वाट यातँ सब जन मुक्त्यभिलाषि । श्रीजिनभक्ति करौ जिन साखि ॥२६॥ अघमय अंधकार करि भरी। मुकतिपंथभू विषमा खरी॥गरते लसै कलेस अगाध । चलि करि सके महामुनि ५-गरते-पर्वत निझरने के पानी से एकत्र. हुये सामान कुंड भादिक ।

(१.७). साध ॥ २७॥ तो मारग सुख चलि हैं कौन। जिनवानी करदीपक जौन । तिनके सकल म- नोरथ फलें। स्यादवाद मारग जो चलें॥२०॥ अथ अनवधि निधि आतम जोति । द्रष्टा कह अनमिति सुख होति ॥ करम पहल भूमहिंदवि रही। मिथ्यादृष्टि न कबहुं लही ॥२९॥जे तुव भगतिवंत परवीन। तिन वह निधि खिनकर करिलीन ॥ स्तोत्र कुदाल भूमिका खोदि। बंध पुरुष कठिनाई नोदि॥३०॥ नयाहिमगिर- ते उपजि. सुभाय। मोख सुधानिधि पहुंची जाय ॥ भगति नाम गंगा सुरसरी। श्रीजिन चरण कमल अनुचरी॥३१॥ तामें में चेतन रुचिवंत । न्हायधोय कीनो अघअंत ॥ तो कई कलमष मुझ कह रहा।जो संस भासै दुखदहा ।। ३२॥ प्रगट भये थिरपंदसुभ सार । श्रीजिनवर पद अगम अपार॥जब तुव ध्यानधरै मनलाय। तबहूं तुम इति दुविधा जाय॥३॥ मिथ्यारूप यदपि इहुभावातौहू त्रिपति आविचल उपजावो. दोषातम वांछित फल लहै । तुम प्रसाद मुनि (१०८) जन कहै ॥३४॥ श्रीजिनवानी उदधि अगाघ । सप्तभंगलहरी विनवाघ । मिथ्यावाद मैल अप- हरै। तीनिभवनमें जो विस्तरै ।। ३५॥ वानी 'उदधि सुविधि अवगाह। करै विबुध मन अच- ल निवाह ॥ बहुत सेवकरि पावै सोइ । अमृत. सुधा पुनि जनम न होई ॥३६॥ जो सुभाव तहि है अमनोगि। सोमनोगिता चाहै जोगि। जो वैरी करि संकित रहै । सो नित शस्त्रपाणि संग्रहै ॥३७॥ तू निज सहजसुभग सरवंग। सकल वैरि विसरै तुव संग ॥ तातै भूषण वसन बणाव । शस्त्र ग्रहण क्यों उपजे चाव ।। ३८॥ इंद्र सेव तुव करै सुभाय । न कछु बडाई तुत्र अधिकाय ॥ ताहीको प्रभुता अति बढी। एकी भवतारी गुनमढी ॥ ३९ ॥ तू तारक भवजल निधि नीर । सिद्धिविलासिनिपति वरवीर ॥ सकललोकप्रभुतू भगवान। इह विधि तुव थुति अनुभव मान ॥४०॥ वचनवरगना पुदगल- रूप । तू चेतन आतमा अनूप ॥ यातै हमकृत श्रुति उदगार । क्यों करि तुम महि-व्यापन- (१०६) हार ॥११॥ पै तथापि तुम वचनविलास । भगतिसुधापूरन प्रतिभास ॥ भव्य जीवकों बांछित फलै । क्रम क्रम पापपुंजमल गले ४२१ नहिं जिन तुव कहुं कोप कलेस । नहि प्रसन्न- ताको परवेस ।। अरु तुव चित अतिपरम उ- दास । निरपेछक सब जगतविकास ॥४३॥ तदपि भवन सव आज्ञाधीन । तुम समीपता वैरविहीन ॥ भुवनतिलक यह प्रभुतामाल । तुव विन और न कहूं त्रिकाल ॥४४॥ देव त्रिदशगणिका मंडली । गावत तुव कीरति मनरली ॥ सकल चराचर ज्ञायक ज्ञान । इहु प्रभुथुति जो करै प्रमान ॥१५॥ ताकौं खेम- पंथके जात । को मारग नवि करि है घात ।। अरु वह तत्त्वगरंथिनिविखे । मोह गहलतारंच न दिखें ॥४॥ निरवधि सुखहगवीरजवोध । इहु परमातमपद अववोध ॥ समय समय जो । जिन अनुभवे । परमादर मनवचकरि नवें ॥४७॥ सो सुकृत सिव मारग और । तितनेकरि पुरवै सुखठोर पंचकल्यानक रचना मांडि। शुद्ध होय . (११२) हे अच्युत जो भक्त नमैं तुम चरनकमलकौं। छिनक एकमें आप देत मनवांछित फलकी॥६॥ तुमसों सन्मुख रहै. भक्तिसौं सो सुख पावै । जो सुभावत विमुख आपत दुखहि बढावे ।। सदा नाथ अवदात एकातिरूप गुसांई। इन दोन्यौके हेत स्वच्छ दरपणवत सांई॥७॥ है अगाध जलनिधी समदजल है जितनी ही है। भेरू तुंगसुभाव सिखरलौं उच्च भन्यो ही। वसुधा अर सुरलोक एहु इसभांति सई है। तेरी प्रभुता देव भुवनिकू लंघि गई है ॥८॥ है अनवस्था धर्म परम सो तत्त्व तुमार। कह्यो ने आवागमन प्रभू मतमांहि तिहारें। दृष्ट पदारथ छांडि आप इच्छति अदृष्टकों। विरुधवृचि तव नाथ समंजस होय सृष्टकौं ॥१॥ कामदेवकू किया भस्म जगत्राता थे ही। लीनी भस्म लपेटि नाम संभू निजदेही। सूतो होय अचेत विष्णु वनिताकरि हारो। तुमको काम न ग्रहै आप घट सदाउजारो॥१०॥ पापवान वा पुन्यवान सो देव बताये।

(११३) तिनके औगुन कहें नाहि तू गुणी कहावै ।। निज सुभावत अंबुराशि निज महिमा पावै । स्तोक सरोवर कहें कहा-उपमा बढिजावै ॥११॥ कर्मनकी थिति जंतु अनेक करे दुखकारी। सो थिति बहु परकार करै जीवनकी स्वारी ॥ भवसमुद्रके मांहि देव दोन्योंके साखी। नाविक नाव समान आप वाणीमें भाखी॥१२॥ सुखकों तो दुख कहै गुणनळू दोप विचार। धर्म करनके हेत पाप हिरदै विच धार । तेल निकासन काज धूलिका पेले घानी। तेरे मतसौं बाह्य इसे जे जीव अज्ञानी ॥ १३ ॥ विष मोचै ततकाल रोगकों हरे ततच्छन । मणि औषधी रसाण मंत्र जो होय सुलच्छन ।। ए.सब तेरे नाम सुबुद्धी यौँ मन धरि हैं। भ्रंमत अपरजन था नहीं तुम सुमिरन करि हैं। किंचित भी चिंतमाहिं आप कछु करोन स्वामी। जे राखें चितमाहिं आपको शुभपरिणामी ।। हस्तामलवत लखें जगतकी परिणति जेती। .१ऐसे। २ रसायन (११४) तेरे चितके बाह्य तोउ जीवें सुखसेती॥१५॥ तीनलोक तिरकालमाहिं तुम जानत सारी। . स्वामी इनकी संख्या थी तितनीहि निहारी जो लोकादिक हुते अनंते साहिब मेरा। तेऽपि झलकते आनि ज्ञानका ओर न तेरा॥१६ है अगम्य तव रूप करै सुरपति प्रभु सेवा। ना कछु तुम उपकार हेत देवनके देवा ।। भक्ति तिहारी नाथं इंद्रके तोषित मनको। ज्यौं रवि सन्मुख छत्रं करै छाया निजतनकोस वीतरागता. कहां कहां उपदेश सुखाकर। सो इच्छाप्रतिकूल वचन किम होय जिनेसर ।। प्रतिकूली भी वचन जगतकू प्यारे अतिही। इम कछु जानी नाहि तिहारी सत्यासंतिही १८ उच्चप्रकृति तुम नाथ संग किंचित न धरनत। जो प्रापति नुम थकी, नाहि सो धनसुरनत ॥ उच्चप्रकृति जल विना भूमिधर धुनी प्रकासै । जलधि नीरसे भरयो नदीचा एक निकास तीन लोकके.जीव करो जिनवरकी सेवा। १ पहाट । २ नदी.

(११५ )
नियमथकी करदंड घरत्यो देवनके देवा ।।
प्रातिहार्य तो बने इंद्रके वनें न तेरे
अथवा तेरे-वन तिहारै निमित परेरे ॥२०॥
तेरे सेवक नाहि इसे जे पुरुष हीनधन।
बनवानोंकी ओर लखत वे नाहि लखत पन ।
जैसे तमथिति किये लखत परकास थितीकू ।
याकू सूझत नाहिं तमथिती मंदमतीकू ॥२॥
निजवृध सासोसास प्रगट लोचन टमकारा ।
तिनकौं वेदतं नाहिं लोकजन मूढ विचारा ।।
सकल ज्ञेय ज्ञायक अमृतीज्ञान सुलच्छन ।
सो किमि जान्यो जाय देव तव रूप विचच्छन ।
नाभिरायके पुत्र पिता प्रभु भरततने हैं।
कुल प्रकाशिक नाथ तिहारो तवन भने हैं।
ते लघुधी असमान गुननका नाहि भजे हैं।
सुवरनआयोहाथि जानि पापान तजे हैं।॥२३॥
सुरासुरनको जीति मोहने ढोल बजाया।
तीन लोकमें किये.सकल वाश यो गरमाया
तुम अनंतबलवंत नाहि ढिग आव न पाया।
करि विरोध तुमथकी मूलतें नाश कराया॥२४॥

(११६) एक मुक्तिका मार्ग देव तुमने परकास्या । गहन चतुरगतिमार्ग अन्य देवनकू भास्या । । 'हम सब देखनहार' इसीविधि भाव सुमिरिके। भुंज न विलोको नाथ कदाचित गर्भजुधरिके। केतुविपक्षी अर्कतनो फुनि अग्नितनो जल। अंभुनिधीअरि प्रलयकालको पवन महाबल ।। जगतमाहि जे भोग वियोग विपक्षी हैं निति । तेरो उदये है विपक्षतै रहित जगतपति ॥२६॥ जाने विन हू नमत आपको जो फल पावै। : नमत अन्यको देव जानि.सो हाथ न. आवै । हरी मणीकू काच काचकू मणी रटत है। ताकी बुधिमें भूल, मूल्य मणिकोन घटत है । जे विवहारी जीव वचनमैं कुशल सयानें। ले कषायकरि दग्ध नरनकौं देव बखानैं ।। ज्यों दीपक बुझि जाय ताय कहि नदि' भयो है। भरन घडेको कहैं कलस ए मँगलि गयो है। स्यादवाद संजुक्त अर्थको प्रगट बखानत । हितकारीतुम वचन श्रवनकरि कोनहि जानत। १ कंधोंको।

(११७) दोपरहित ए देव शिरोमणि वक्ता जगगुर । जो ज्वरसेती मुक्त भयो सो कहत सरलसुर२९ विनवांछा ए वचन आपके खिर कदाचित। . है नियोग ए कोय जगतको करत सहजहित । करै न वांछा इसी चंद्रमा पूरों जलनिधि । सीतरश्मिकू पाय उदधि जल वढे स्वयंसिधि३० तेरे गुणगंभीर परम पावन जगमाई। बहुप्रकार प्रभु हैं अनंत कछु पार न पाई। तिन गुणानको अंत एक याही विधि दीसै। ते गुण तुझ ही माहिं औरमै नाहिं जगी॥३॥ केवल थुति ही नाहि भक्तिपूर्वक हम ध्यावत। सुमरन प्रणमन तथा भजनकरितुम गुण गावत चितवन पूजन ध्यान नमनकरि नित आराधे ।। को उपावकरि देव-सिद्ध फलको हम साथें ॥३२॥ त्रैलोकी नगराधिदेव नित ज्ञानप्रकाशी। परमज्योति परमातमशक्ति अनंती भासी। पुन्यपापते रहित पुन्यके कारण स्वामी। नमो नमो जगवंद्य अपंचकनाथ अकामी ॥३३॥ रस सपरस अर गंध रूप नहिं शब्द तिहारे।

.
इनिके विषय विचित्र भेद सब जाननहारे॥
सव जीवनप्रतिपाल अन्यकरि हैं अगम्य गन ।
सुमर्रनगोचर नाहिं करौं जिन तेरो सुमिरन३४
तुम अगाध जिनदेव चिचके गोचर नाही।
निकिंचन भी प्रभू धनेसुर जाचत साई ।।
भये विधके पार दृष्टिसों पार न पावे।
जिनपति एम निहारि संतजन सरने आवै॥३५॥
नमो नमों जिनदेव जगतगुरु शिक्षादायक।
निजगुणसती भई उन्नती महिमालायक ॥
पाहनखंड पहार पछै ज्यों होत और गिर ।
त्यो कुलपर्वत नाहिं सनातन दीर्घ भूमिघर॥३॥
स्वयं प्रकाशी देव रैन दिनकू नहिं वाधित ।
दिवस रात्रि भी छतें आपकी प्रभा प्रकासित ।।
लाघव गौरव नाहि एकसोरूप तिहारो।
कालकलाते रहित प्रभू नमन हमारो ॥३७॥
इहावधि बहु-परकार देव तव भक्ति करी हम।
जाचूंवरन कदावि दीन कैरागरहित तुम ।।
छाया वैठत सहज वृक्षके नीचे है है।
फिर छायाकाँ जाचत यामैं प्रापति के है॥३०॥

(११९) . जो कुछ इच्छा होय देनकी तो उपगारी। द्योबुधि ऐसी करूं प्रीतिसौं भाक्त तिहारी ॥ करो कृपा जिनदेव हमारे परि है तोपित । सनमुख अपनोजानि कौन-पंडित नहिं पोषित। यथाकथंचित भक्ति रचे विनईजनके ही। तिनकूश्रीजिनदेव मनोवांछित फल दे ही। फुनि विशेष जोनमत संतजन तुमको ध्यावें । सोसुख जस धनं-जय, प्राप्त है शिवपद पार्दै ४० श्रावक माणिकचंद सुबुद्धी अर्थ बताया। सोकवि शांतीदास'सुगमकरि छंद बनाया। फिरिफिरिकै ऋषि रूपचंद' ने करी प्रेरणा। भाषा स्तोतर विषापहारकी पढो भविजना॥४॥ इति श्रीविषापहार स्तोत्र समाप्त ॥ २८॥ (२९) अय भूधरकृत भूपाळचौवीसी स्तोत्र । दोहा । सकल सुरासुर पूज नित, सकलसिद्धि-दातार। जिनपद बंदू जोरकर, अशरन जनाआधार १११ (१२) चौपाई। श्रीसुखवास महीकुल धाम । कीरतिहर्षणथल अभिराम ॥ सुरसुतिके रतिमहल महान । जय युवतीको खेलन थान | अरुण वरण वांछित वरदाय । जगत पूज्य ऐसे जिनपाय ॥ दर्शन - प्रात करै जोकोय। सब शिवथानक सो जन होय ॥१॥ निर्विकार तुम सोम शरीर । श्रवण सुखद वाणी गंभीर ॥ तुम आचरण जगतमें सार। सवजीवनको है हितकार|महानिंदभव- मारू देश । तहां तुंगतरु तुम परमेश-॥ सघन छांह मंडित छविदेत। तुव पंडित सेवै सुखहेत ॥२॥गर्भकूपत निकस्यौ आज । अब लोचन उघरे जिनराज||मेरो-जन्म सफल भयो अबै। शिवकारण तुम देखे जनै । जगजननैन कमल- वनखंड । विकसावन शशिशोक विहंड ॥आनं- दकरण प्रभा तुमतणी । सोई अमीझरण चांद- ..णी॥३॥ सब सुरेंद्रशेखर शुभरैन । तुम आ. सनतट माणक ऐन॥ दोऊं दुति मिल झलक जोर।मानो दीपमाल दुहुँ ओर ॥ यह संपति . .

(१२१ ॥
अरु यह अनचाह। कहां सर्वज्ञानी शिवनाह ।।
तातै प्रभुता है जगमाहि। सही असम है संशय
नाहि॥॥ सुरपति आन अखंडित बहै। तृण
ज्यौ राजतज्यो तुम वहै। जिन छिनमें जग
महिमा दली।जीत्यो मोहशत्रु बहुवली ।। लो-
कालोक अनंत अशेख कीनोअंत ज्ञानसों देख
प्रभु प्रभाव यह अद्भुत सवै । अवर देवमें मूल
न फवे ।। ५॥ पात्रदानतिन दिन दिन दियो ।
तिनचिरकाल महातप कियो। बहुविधि पूजा
कारक वही । सर्वशील उन पाले सही। और
अनेक अमल गुणरास प्रापति आयभये सक
तास।जिन तुम शरघासों कर टेक हग वल्ल-
भ देखे छिन एक ॥ ६॥ त्रिजगतिलक तुम
गुणगण जेह । भव भुजंग विपहरमणि तेह।। जो
उर कानन माहिं सदीव । भूपण कर पहरै भार
जीव।सोई महामती संसार । सो श्रुतसागर
पहुंचे पार ।। सकल लोकमें शोभा लहै। महिमा
योग जगतमें वहै ॥७॥

(१२२ दोहा । सुर समूह ढोलैं चमर, चंदकिरण दुति जेम। नवतनबधू कटाक्षसे, चपल चले अति एम ॥ छिन छिन ढलके स्वामि पर, सोहत ऐसो भाव । किधों कहत सिधिलच्छिसों जिनपतिकेटिंगआव चौपाई। शीश छत्र सिंहासन तलें। दिपै देह दुति चामर ढलैं। बाजे दुंदुभि वर फूल। ढिंग अशोक बाणीसुखमूल ।। इहिविधि अनुपम शोभामा- न । सुरनरसभापदमनीभान ॥ लोकनाथ बंदे शिरनाय । सो हम शरण होउ जिनराय ॥९॥ सुरगजदंतकमलवनमाहि। सुरनारीगण नाचत जाहि।। बहुविधि बाजे बाजै थोक । सुन उछा- ह उपजै तिहुलोक ॥ हर्षित हरि जय जय उ- चरै। सुमनमाल अपछर करधरै ।। योंजन्मादि समय तुम होय। जयो देव देवागम सोय ॥१०॥ तोष बढावन तुम मुखचंद । जननैनामृत भरन. अमंद॥सुंदर दुतिकर अधिक उजास । तीन अवन नहिं उपमातास ॥ ताहि निरख सनयन

( १२३ )
हम भये। लोचनआज सुफल करलये ॥ देखन
योग्य जगतमें देखा उमग्यो उरआनंद विशेस।
॥११॥ कोहक यों माने मतिमंद । विजित-
काम विधि ईश मुकंद ॥ ये तो हैं वनितावश-
दीन । कामकटकजीतनवलहीन ॥ प्रभु आगें
सुरकामिनि करें। ते कटाछ सब खाली परं ।।
यातें मदनविध्वंसन वीर । तुमभगवंत और
नहिं धीर ॥१२॥ दर्शनप्रीति हिये जव जगी।
तवै आम्र कोंपल बहु लगी । तुम समीप उठ
आवन ठयो। तवसों सघन प्रफुल्लित भयो।अ-
वहूं निज नैनन टिंग आय। मुखमयंक देख्यो
जगराय॥ मेरो पुन्यविरख इस बार । सुफल-
फूल्यो सवसुखदातार ॥१३॥
दोहा।
त्रिभुवन वनमें विस्तरी, काम दवानल जोर ।
वाणीवरपाभरणसों, शांति करहु चहुं ओर ।।
इंद्र मोर नाचै निकट, भक्तिभाव घर मोह। मेघ
सघन चौवीस जिन, जैवते जग होय ॥ १४ ॥

(१२४ ) चौपाई। भविजनकुमुदचंदसुखदैन । सुर नर नाथप्रमुख जगजेन ॥ ते तुम देख रमैं इस भांति । पहुप- गैह लह ज्यों अलिपाँति ॥ शिरधर अंजुलि भक्तिसमेत । श्रीगृहप्रति परिदक्षण देत ॥ शि- वसुखकीसी प्रापति भई । चरण छांहसों भेव तप गई ॥१५॥ वह तुम पदनखदर्पण देवे। परम पूज्य सुंदर स्वयमेव ॥तामें जो भविभाग- विशाल । आननअविलोकै चिरकाल॥ कमला कीरति कांति अनूप । धीरजप्रमुख सकल सुख रूपना वे जग मंगल कौन महान । जो न लहै वह पुरुष प्रधान ॥१६॥ इंद्रादिक श्रीगंगा जेह । उत्पतिथान हिमाचल येह ॥ जिनमुद्रा- मंडित अतिलौं । हर्ष होय देखे दुख नशै॥ शिखर ध्वजागण सोहैं एमाधम सुतरुवर पल्लव जेमः।। यों अनेक उपमा आधार । जय जिनेश जिनआलयसार ॥१७॥ शीश नवाय नमत सुरनार । केशंकांतिमिश्रित मनहार ॥ नखउ- दोत बरतै जिनराज । दशदिश पूरित किरण (१२५) समाज ॥ स्वर्गनागनरनायक संग । पूजत पायपदम अतुलंग ॥ दुष्टकर्मदलदलन सुजान। जैवंते वरतो भगवान ॥१८॥सो कर जागै जो धीमान । पंडित सुधी सुमुख गुणवान ।। आपन मंगलहेतु प्रशस्त । अवलोकन चाहै कछु वस्त ।। और वस्तु देखें किस काज । जो तुम मुखराजै जिनराज । तीनलोकको मंगल- थान | प्रेक्षणीय तिहंजग कल्यान ।। १९ ॥ धर्मोदय तापसगृहकीर । काव्यवंधवनपिक तुम वीर.। मोक्षमल्लिका मधुपरसाल । पुन्यका कजसरसि मराल । तुम जिनदेव सुगुणमणि- माले। सर्व हितकर दीनदयाल ।। ताको कौन न उन्नतकाय। धरैकिरीटमाहिहायरिणाकई वांछ शिवपुरवास । केई करै स्वर्गसुख आस । पचे पँचानल आदिक ठान । दुःख बंधेजस बंधे अयान ।। हम श्रीमुख वानी अनुभः । सरधा पूरव हिरदै ठवें । तिस प्रभाव आनंदित.रहै। स्वर्गादिक सुख संहजे लहें।। २१ ॥न्होनमहो- छव इंद्रन कियो। सुरतियमिलमंगलपढलियो (१६) सुयश शरद चंद्रोपम सेत । सो गंधर्व गान कर लेत ॥ और भक्ति जो जो जिस जोग । शेष सुरन कीनी सुनियोग । अब प्रभु करें कौन- सी सेव । हमचित भयो हिंडोलो एव ॥ २२॥ जिनवर जन्मकल्यानक घोस । इंद्र आप नाचे कर होस । पुलकितअंग पिताघर आय । ना. चत विधिमै महिमा पाय ॥ अमरी वीन वजा- वै सार ।धरी कुचाग्र करत झंकार । इहि वि- घि कौतुक देख्यो जबै । औसर कौन कह सकै अबै ॥ २३॥ श्रीप्रतिबिंब मनोहर एम । विक- सित वदन कमल दल जेम। ताहि हेर हरषे इंग दोय । कह न सकूँ इतनो सुख होय ॥ तव सु. रसंग कल्यानक काल। प्रघटरूप जोवै जगपा- लाइकटक दिष्ट एक चित्त लाय वह आनंद कहा क्यों जाय ॥२४॥ देख्यो देव रसायन धाम । देख्यो नवनिधिको विसराम॥चिंता र- यन सिद्धिरस अबै। जिनगृह देखत देखेसवै।। अथवा इन देखे कछु नाहिं । यह अनुगामी फल जगमाहि ॥ स्वामी सस्यो अपुरव काज।

सप्पय। (१२७ ॥ मुक्ति समीप भई मुझ आज ॥२५॥ अव दि- नवै भूपाल नरेश । देखे जिनवर हरनकलेश।। नेत्र कमल विकसे जगचंद चतुर चकोर करण आनंद ॥ युति जलसों यों पावन भयो । पाप ताप मेरो मिट गयो। मो चित है तुम चरणन माहिं । फिर दर्शन दीजे अव जाहि ॥२६॥ इहिविधि बुद्धिविशालराय भूपाल महाकवि । कियो ललित थुतिपाठ हिये सब समझ सके नवि।। टीकाके अनुसार अर्थ कछु मनमें आयो। कहीं शब्द कहिं भाव जोड भाषा यश गायो।। आतम पवित्रकारण किमपि, वाल ख्याल सो जानियो । लीज्यो सुधार भूधरतणी, यह वि. नती बुध मानियो ॥१॥ इति भूघरकृत भूपालचौवीसी स्तोत्र ॥ २६ ॥ भय भूपरदासजीकृत पारह भावना । १भनिलभावना। दोहा। राजा राणा छत्रपति, हाथिनके असवारः।

21 असरनभावना। (१२८) मरना सबको एकदिन, अपनी अपनी वार॥१॥ दलबल देई देवता, मातपिता परिवार । मरतीविरियां जीवको, कोऊ न राखन हार॥२॥ दामविना निरधन दुखी, तृष्णावश धनवान । कहूं न सुख संसारमें, सब जग देख्यो छान।।३।। आप अकेलो अवतरै, मरै अकेलो होय। यों कबहूं या जीवको, साथी सगो न कोय॥४॥ ३। संसारभावना। ४। एकत्व भावना। , ५। अन्यत्वभावना। जहाँ देह अपनी नहीं, तहां न अपनो कोय। घर संपति पर प्रगट ये, पर हैं परिजनलोय।।५।। ६। अशुचित्वभावना। दिपै चामचादरमढ़ी, हाड-पीजरा देह । भीतर यासम जगतमें,और नहीं घिनगेह ॥६॥ ७.आसवभावना । सोरठा। मोहनींदके जोर, जगवासी घूमै सदा। कर्मचोर चहुँ ओर, सरवस लूटै सुधि नहीं ॥७॥ संतगुरु देय जगाय, मोहनींद जब उपसमै । ८॥ संचरभावना।

(१२६) तव कुछ बने उपाय, कर्मचोर आवत रुकें ॥८॥ ९। निर्जरामायना ! दोहा । ज्ञानदीप तप तेलभर, घर शोधै भ्रम छोर । याविध विन निकस नहीं, पैठे पूरव चोर ॥९॥ पंचमहानत संचरन, समिति पंचपरकार। प्रबल पंच इंद्रियविजय, धार निर्जरा सार॥१०॥ १० । लोकभावना। चादह राजु उतंग नभ, लोक पुरुषसंठान । तामैं जीव अनादित, भरमत है विनज्ञान ॥१॥ ११ । चोधिदुर्लभभावना। धन कनकंचन राजसुख, सबहिं सुलभकर जान दुर्लभ है संसारमें, एक जारथ ज्ञान ॥ १२ ॥ १२॥ धर्मभावना। जांचे सुरतरु देय सुख, चिंतत चितौरन । विन जांचे विन चिंतये, धर्म सकल सुखदैन १३ इति भूधरदासकृत वारह भावना ।। ३० ॥ लश्यफी प्राप्तिर्षितामणि रत्ना ६ (१३०) अथ श्रीमानतुंगाचार्यविरचित आदिनाथस्तोत्र । (भक्तामर स्तोत्र) वसंततिलका भक्तामरप्रणतमौलिमणिप्रभाणा,-मुद्योतकंद लितपापतमोवितानं । सम्यक् प्रणम्य जिनपा- दयुगं युगादा, वालंबनं भवजले पततांजनानां। शायः संस्तुतः सकलवाङ्मयतत्त्ववोधा, दुद्भू- तबुद्धिपटुभिः सुरलोकनाथैः । स्तोत्रैर्जगत्रित यचित्तहरैरुदारैः, स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथम जिनेंद्र॥ ३॥ बुद्धचा दिनापि विवुधार्चितपाद- पीठ ! स्तोतुं समुद्यतमतिर्विगतत्रपोऽहं । वालं विहाय जलसंस्थितमिदुर्विब, मन्यः क इच्छीत जनः सहसा गृहीतुं॥३॥ वक्तुं गुणान्गुणस- मुद्र शशांककांतान, कस्तेक्षमः सुरगुरुपतिमोऽपि बुद्धया। कल्पांतकालपवनोद्धतनकचक्रं, को वा तरीतुमलमंबुनिधि भुजाभ्यां॥४॥ सोऽहं त- थापि तव भक्तिवशान्मुनीश, कर्तुं स्तवं विगत- शक्तिरपि प्रवृत्तः प्रीत्यात्मवीर्यमविचार्य मृगी मृगेंद्र, नाभ्येति कि निजशिशोः परिपालनार्थ ॥५॥ अल्पश्रुतं श्रुतवा परिहासधाम, बद्ध क्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्मां । यत्कोकिला कि- ल मघौ मधुरं विरोति,तचाम्रचारकलिकानिक- रैकहेतु ॥ ६॥ खसंस्तवेन भवसंततिसन्निवद्ध, पापं क्षणाक्षयमुपैति शरीरभाजां। आक्रांत- लोकमलिनीलमशेपमाशु, सूर्यांशुभिन्नमिव शा. वरमंधकारं॥७॥ मत्वति नाथ तव संस्तव- नं मयेद,-मारभ्यते तनुधियापि तव प्रभावात् । चेतो हरिष्यति सतां नलिनीदलेषु, मुक्ताफला- तिमुपैति ननूदविंदुः ॥॥ आस्तां तव स्तवन- मस्तसमस्तदोपं, वत्संकथापि जगतां दुरिता- नि हंतिदूरे सहस्रकिरणः कुरुते प्रभैव,पद्माकरे- पुजलजानि विकासभांजि ॥ ९॥ नात्यद्भुत भुवनभूपण भूतनाथ !, भूतगुणभुवि भवंतमभि- घटुवंतः । तुल्या भवंति भवतो ननु तेन किंवा, भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥ १० ॥ दृष्ट्वा भवंतमनिमेपविलोकनीयं, नान्यत्र तोपः, -- , (१३२) मुपयाति जनस्य चक्षुः पीत्वा पयः शशिक- रद्युतिदुग्धसिंधोः, क्षारंजलं जलनिधे रसितुं क इच्छेत् ॥१शायैःशांतरागसचिभिः परमाणुभि- स्त्वं, निर्मापितत्रिभुवनैकललामभूत । तावंत एव खलु लेप्यणवः पृथिव्यां, यत्ते समानमपरं न हि रूपमस्ति ॥ १२॥ वक्त्रं क ते सुरनरो- रंगनेत्रहारि, निश्शेपनिर्जितजगत्रितयोपमा- नं । विवं कलंकमलिनं कनिशाकरस्य, यद्वास. रे भवति पांडुपलाशकल्पं ॥ १३॥ संपूर्णमंड- लशशांककलाकलाप, शुभ्रा गुणास्त्रिभुवनं तव लघयति । ये संश्रितास्त्रिजगदीश्वरनाथमेकं,क- स्तान्निवारयति संचरतो यथेष्टं।॥ १४॥ चित्रं किमत्र यदिते त्रिदशांगनाभिर, नीतं मनागपिः अनो नविकारमार्ग। कल्पांतकालमरुता चलि- ताचलेन, किं मंदरादिशिखरं चलितं कदाचित् ॥१५॥ निघूमवरिपवर्जिततैलपूरः, कृत्स्नं जगत्त्रयमिदं प्रकटीकरोषि । गम्यो न जातुम- रुतां चलिताचलानां,दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ज- सकाशः॥१६॥ नास्तं कदाचिदुपयासि न 4 - (१३३) राहुगम्यः स्पष्टीकरोषि सहसा युगपजगति । नांभोधरोदरनिरुद्धमहाप्रभावः सूर्यातिशायि- महिमासि मुनींद्र लोके ॥ १७॥ नित्योदयं द- लितमोहमहांधकारं गम्यं न राहुवदनस्य न वा- रिदानां । विभ्राजते तव सुखाजमनल्पकांति, विद्योतयजगदपूर्वशशांकर्विवं ॥ १८ ॥ किं शर्वरीपुशशिनाह्नि विवस्वता वा, युष्मन्मुखेंदु- दलितेपु तमस्सु नाथ । निष्पन्नशालिवनशा- लिनि जीवलोके, कार्य कियजलधरैर्जलमार- नौः॥ १९॥ ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृता- चकाश, नैवं तथा हरिहरादिपु नायकेषु । तेजः स्फुरन्मणिपु याति यथा महत्त्वं, नैवं तु काचश- कले किरणाकुलेऽपि ॥२०॥ मन्ये वरं हरिहरा- दय एव दृष्टा, दृष्टेपु येपु हृदयं त्वयि तोपमेति। किंवीक्षितेन भवताभुवि येन नान्यः, कश्चिन्म- नोहरति नाथ भवांतरेऽपि २१॥ स्त्रीणां शता- नि शतशोजनयंति पुत्रान्, नान्यासुतं त्वदुपर्म जननी प्रसूता। सर्वादिशोदधति भानि सहख- रश्मि,प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशुजालं।२२१ (१३४) स्वामामनांत मुनयः परमं पुमांस, मादित्यवर्णम- मलं तमसः पुरस्तात् । त्वामेव सम्यगुपलभ्यज- यति मृत्यु,नान्यः शिवश्शिवपदस्य मुनींद्र पंथाः ॥२३॥ त्वामव्ययं विभुमचिंत्यमसंख्यमाद्यं,ब्रह्मा- मीश्वरमनंतमनंगकेतुं । योगीश्वरं विदितयो. गमनेकमेकं,ज्ञानस्वरूपममलं प्रवदंति संतः॥२॥ बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चितबुद्धिबोधात, त्वं शंकरोऽसि भुवनत्रयशंकरत्वात् । धातासि धीर शिवमार्ग- विधेविधानाद्,व्यक्तं त्वमेव भगवन्पुरुषाचमोऽसि ॥२१॥ तुभ्यं नमत्रिभुवनार्तिहराय नाथ, तुभ्यं नमः क्षितितलामलभूषणाय तुभ्यं नमस्त्रिजगतः. परमेश्वराय, तुभ्यं नमोजिनभवोदधिशोषणाय । १२६१ को विस्मयोऽत्र यदिनाम गुणैरशेष, स्वंसं- श्रितो निरवकाशतया मुनीश । दोषैरुपाचवि- विधाश्रयजातगः, स्वप्नांतरेऽपिन कदाचिदपी क्षितोऽसि ।२७ ।। उच्चैरशोकतरुसंश्रितमुन्मयू ख,माभातिरूपममलं भवतोनितांत स्पष्टोल्लस- किरणमस्ततमोवितानं, बिंब रवरिव पयोधर- पार्श्ववर्ति ॥ सिंहासने मणिमयूखशिखा , . (१३५) विचित्रे विभ्राजते तव वपुः कनकावदातं । विव वियद्विलसदंशुलतावितानं, तुंगोदयाद्विशिरसी- व सहस्ररश्मे ॥२९॥ कुंदावदातचलचामरचारु- शोभ, विभ्राजते तव वपुः कलधौतकांतं । उद्य- च्छशांकशुचिनिझरवारिधार, मुच्चैस्तटं सुरगिरें- रिव शातकॉम ॥ ३०॥ क्षत्रयं तव विभाति शशांककांत, मुच्चैस्थितं स्थगितंभानुकरप्रतापं । मुक्ताफलप्रकरजालविवृद्धशाभे, प्रख्यापयात्निज- गतः परमेश्वरवं ॥३॥गंभीरताररवपूरितदिग्वि- भाग,स्त्रैलोक्यलोकशुभसंगमभूतिदक्षः । सद्धर्म- राजजयघोपणघोपकासन्, खे दुंदुमिर्धनति ते यशसःप्रवादी ॥ ३२ ॥ मंदारसुंदरनगेरुसुवा- रिजात, संतानकादिकुसुमोत्करवृष्टिरुद्धा। गंधो: दविंदुशुभमंदमरुत्प्रयाता, दिव्या दिवः पततिते 'वयसांततिर्वा ॥३३॥ शुभप्रभावलयभूरिविभा विभोस्ते, लोकत्रये द्युतिमतां युत्तिमाक्षिपती । प्रोद्यदिवाकरनिरंतरभूरिसंख्या, दीप्याजयत्य- पिनिशामपि सोमसोम्यां॥३४॥ स्वर्गापवर्गग- ममार्गविमार्गणेष्टः,सद्धर्मतत्त्वकयनैकपटुस्त्रिलों;

(१३६) क्या:दिव्यध्वनिर्भवति ते विशदार्थसर्व,-भाषा स्वभावपरिणामगुणैः प्रयोज्यः ॥३५॥ उन्निद्र- हमनवपंकजपुंजकांती, पर्युल्लसन्नखमयूखशिखा- भिरामौ पादौ पदानि तव यत्र जिनेंद्र धत्तः, पद्मा. नि तत्रविबुधाः परिकल्पयति ॥३६॥ इत्थं यथा तव विभूतिरभूजिनेंद्र, धर्मोपदेशनविधौन तथा परस्य। याहकप्रभा दिनकृतः प्रहतांधकारा, ताह- कुकुतो ग्रहगणस्य विकाशिनोऽपि.।३७। श्च्यो- तन्मदाविलविलोलकपोलमूल मत्तभ्रमद्ममरना दविवृद्धको । ऐरावताभामिभमुद्धतमापतंतं, दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानां ॥३८॥ सिन्नेभकुंअगलदुज्ज्वलशोणिताक्त, मुक्ताफलप्रकर भूषितभूमिभागः। बद्धक्रमाक्रमगतं हरिणाधि- पोऽपि, नाकामति क्रमयुगाचलसंश्रितं ते॥३९॥ कल्पांतकालपवनोद्धतवह्निकल्पं,दावानलं ज्वलि; तमुज्ज्वलमुत्स्फुलिंग। विश्वं जिपित्सुमिव सं- मुखमापततं, त्वन्नामकर्चिनजलं शमयत्यशेष ४० रक्तक्षणं समदकोकिलकंठनीलं, क्रोधोद्धतं फणि- नमुक्तणमापतंतं । आक्रामति क्रमयुगेण निर:

(१३७) - स्तशंक, स्वन्नामनागदमनी ददि यस्य पुंसः। वलगत्तुरंगगजगर्जितभीमनाद, माजी वलं बलर" तामपि भूपतीनां । उद्यदिवाकरमयूखशिखाप- विद्धं, त्वत्कीर्चनाचम इवाशुमिदामुपैति । ४२॥ कुंताग्रभिन्नगजशोणितवारिवाह,वेगावतारतरणा- तुरयोधभीमे । युद्धे जयं विजितदुर्जयजेयपक्षा, स्त्वत्पादपंकजवनायिणो लभते।४३ अंभो निधी क्षुभितभीषणनचक्र, पाठीनपीठभयदोल णवाडवाग्नौ रंगचरंगशिखरस्थितयानपात्रा, स्त्रासं विहाय भवतः स्मरणाद् ब्रजति ॥४४॥ उद्भूतभीषणजलोदरभारमुग्नाः शोच्यां दशामु पगताश्च्युतजाविताशागवत्पादपंकजरजास- तदिग्धदेहा, मां भवंति मकरध्वजतुल्यरूपा: ॥१५॥ आपादकंठमुरुश्रृंखलवेष्टितांगा, गार्ड बृहन्निगडकोटिनिघृष्टजंघागवन्नाममंत्रमनिशं मनुजाःस्मरंतः, सद्यःस्वयंविगतबंधमया भवंति ॥४६॥ मचदिपेंद्रमृगराजदवानलाहिंसंग्रामवा रिधिमहोदरबंधनोत् । तस्याशु नाशमुफ्याति भयं भियेव, यस्तावकं स्तवमिमं मतिमानधीते ।

~ (१३८) वास्तोत्रस्रजं तव जिनेंद्रगुणैर्निबद्धां, भक्त्या *अया विविधवर्णविचित्रपुष्पां । धचे जनो य इह कंठगतामजलं, तं मानतुंगमवशा समुपैति लक्ष्मीः॥४८॥ इति श्रीमानतुंगाचार्यविरचितमादिनाथस्तोत्रं समाप्तं ॥३१॥ [३२] आचार्यश्रीमदुमास्वामिविरचित मोक्षशास्त्र। अपरनाम (तस्वार्थसूत्रं ] सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥१॥ तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनं ॥२॥तन्निसर्गाद- धिगमाद्वा॥३॥ जीवाजीवासूवबंधसंवरनिर्ज- रामोक्षास्तत्त्वं॥४॥ नामस्थापनाद्रव्यभावत- स्तन्यासः॥५॥ प्रमाणनयैरधिगमः ॥६॥ निर्देशस्वामित्वसाधनाऽधिकरणास्थितिविधान- तःसत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनकालांतरभावाल्पब- हुदैश्च ॥८॥मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानि (१३९) ज्ञानं ।। ९॥ तत्प्रमाणे ! १०॥ आये परोक्षं ॥११॥ प्रत्यक्षमन्यत् ॥ १२ ॥ मतिः स्मृतिः संज्ञा चिंताऽभिनिवोध इत्यनातरं ॥ १३॥ त- दिद्रियानिद्रियनिमित्वं ॥ १४ ॥ अवग्रहहाऽवा- यधारणाः॥१५॥वहुवहुविक्षिप्रानिःसृता- ऽनुक्तभुवाणां सेतराणां ॥ १६॥ अर्थस्य ॥१७॥ व्यंजनस्यावग्रहः ॥१८॥ न चक्षुरानिद्रियाभ्यां ॥१९॥ श्रुतं मतिपूर्व द्वयनेकदादशभेदं ।। २०॥ भवप्रत्ययोवधिदेवनारकाणां। २१ । क्षयोपश- मनिमिचः षड्विकल्पः शेषाणां । २२ । ऋजु. विपुलमती मनःपर्ययः । २३॥ विशुद्ध्यप्रति- पाताभ्यां तद्विशेषः । २४ । विशुद्धिक्षेत्र- स्वामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्यययोः ॥२५ ।। मतिश्रुतयोनिबंधो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु । २६ । रूपिष्ववधेः । २७। तदनंतभागे मनःपर्ययस्य २८. ॥ सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य । २९ एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्ना चतुर्यः 1.३० । मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च । ३१ । सदसतोरविशंपाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥३२ (१४०) जैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दसमाभिरूढवेभूता नयाः॥३३॥ इति तत्त्वाधिगमे मोक्षशासे प्रथमोध्यायः ॥१॥ औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदैयिकपारिणामिकौ च ॥ १॥ द्विन- वाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमं ॥२॥स- म्यक्त्वचारित्रे॥३॥ज्ञानदर्शनदानलाभभोगो- पभोगवीर्याणि च ॥४॥ ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्ध- यश्चतुस्त्रित्रिपंचभेदाः सम्यक्त्वचारित्रसंयमासं- यमाश्च ५गतिकषायलिंगमिथ्यादर्शनाज्ञानासं- यतासिद्धलेश्याश्चतुश्चतुस्त्यकैकैकैकपड्भेदाः जीवनव्याभव्यत्वानि च ॥७॥ उपयोगो लक्षणं । ॥स द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥९॥ संसारिणो मुक्ताश्च.॥ १०॥ समनंस्कामनस्काः ॥११॥ संसारिणस्त्रसस्थावराः॥ १२॥ पृथिव्यप्तेजोवा- युवनस्पतयःस्थावराः॥१३॥दींद्रियादयस्त्रसाः ॥१४॥पंचेंद्रियाणि ॥१५॥ द्विविधानि ॥१६॥ निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येद्रियं ॥१७॥लब्ध्युपयोगी (१४१) भावेंद्रियं ॥१८॥ स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्रा- णि ॥१९॥ स्पर्शरसगंधवर्णशब्दास्तदा गा२०॥ श्रुतमनिंद्रियस्य ॥२१॥ वनस्पत्यंतानामेकं ॥२२ कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि ॥२३॥ संझिनः समनस्काः॥२४॥विग्रहगती कर्मयोगः ॥२५॥ अनुश्रेणि गतिः ।। २६ ॥ अविग्रहा जीवस्य ।। २७ । विग्रहवती च संसा. रिणः प्राक् चतुर्थ्यः॥२०॥ एकसमयाऽविग्रहा ॥२९॥ एकं द्वौत्रीन्वानाहारकः ॥ ३०॥ सं. मूर्छनग पपादा जन्म ॥३॥सचिचशीतसं. वृताः सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः॥ ३२ ॥ जरायुजांडजपोतानां गर्भः ॥ ३३॥ देवनार- काणामुपपादः॥३४॥ शेषाणां संमूर्छनं। ३५ औदारिकवैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणानि श- दौराणि ।। ३६॥ परं परं सूक्ष्मं ।। ३७ ॥ प्रदेश- तोऽसंख्येयगुणं प्राक्तैजसात् ॥३८॥ अनंतगुणे परे॥३९॥ अप्रतीपाते॥४॥ अनादिसंबंधे च॥४१॥ सर्वस्य ॥ ४२ ॥ तदादीनि भाज्या- नि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्थ्यः॥४३॥निरुपभो:

(१४२) गमत्यं ॥४४॥ गर्भसमूर्छनजमाचं ॥१५॥ औपपादिकं वैक्रियिकं ॥४६॥लब्धिप्रत्ययंच ॥४७॥ तैजसमपि ॥४८॥ शुभं विशुद्धम- व्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव ।। ४९ ॥ नारकसमूछिनो नपुंसकानि ॥५०॥न देवाः ॥५१॥शेषास्त्रिवेदाः॥५२॥ औपपादिकचर- मोत्तमदेहासंख्येयवर्षायुषोऽनपवायुषः॥५३॥ इति तत्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ रत्नशर्कराबालुकापंकधूमतमोमहातम प्रभा अमयो घनांबुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताऽधोऽधः१ तासु त्रिंशत्पंचविंशतिपंचदशदशत्रिपंचोनैकन- स्कशतहस्राणिपंच चैव यथाक्रमं ॥२॥ नारका नित्याऽशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रिया: ॥३॥ परस्परोदीरितदुःखाः॥४॥ संक्लिष्टा- सुरोदीरितदुःखाश्च प्राक् चतुर्थ्याः॥५॥ तेष्वे- कत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरो- पमा सत्वानां परा स्थितिः॥ ६ ॥ जंबूद्वीपल- वणोदादयःशुभनामानो द्वीपसमुद्राः॥७॥ द्विद्विविष्कंभाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः (१५३) दातन्मध्ये मेरुनामिव॒चो योजनशतसहस्र- विष्कभो जंबूद्वीपः ॥ ९॥ मरतहेमवतहरिवि- देहरम्यक हैरण्यवतैरावतवाःक्षेत्राणि ॥ १०॥ तद्विभाजिनः पूर्वापरायताः हिमवन्महाहिमव- त्रिपधनीलरुक्मिशिखरिणो वर्षघरपर्वताः।११॥ हेमार्जुननपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः ॥१२॥ म- -णिविचित्रपार्था उपरि मूलेच तुल्यविस्ताराः१३ पद्ममहापद्मतिगिंछ केसरिमहापुंडरीकपुंडरीका ह्रदास्तेपामुपरि ॥ १४ ॥ प्रथमो योजनसहस्रा- यामस्तदविष्कंगो हदः॥ १५॥ दशयोजना- वगाहः ।। १६ ॥ तन्मध्ये योननं पुष्करं ।।१७ ॥ तद्विगुणद्विगुणा ह्रदाः पुष्कराणि च ॥ १८ ॥ तन्निवासिन्यो देव्यः श्रीद्रीधृतिकीर्तिबुद्धिल- क्षम्यः पल्योपमस्थितयः ससामानिकपरिपत्काः ॥ १९॥ गंगासिंधुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकां- तासीतासीतोदानारीनरकांतासुवर्णरूप्यकूलार- तारक्तोदाः सरितस्तन्मध्यगाः॥२०॥ द्वयो- योः पूर्वाः पूर्वगाः ॥२१॥ शेपास्त्वपरगाः२२ चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता गंगासिंधादयो नद्यः ra (१४४) ॥२३॥ भरतःषड्विंशतिपंचयोजनशतविस्तार अट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य । २४ । त- द्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहांता ॥ २५ । उत्तरा दक्षिणतुल्याः । २६ । भरते- शवतयोद्धिद्रासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवस- पिणीभ्यां ॥२७॥ ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थि. ताः।२०। एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमव- तकहारिवर्षकदेवकुरक्काः । २९ । तथोचराः ॥३०॥ विदेहेषु संख्येयकालाः।३। भरतस्य विष्कसो जंबूद्वीपस्य नवतिशतभागः। ३२॥ द्विर्द्धातकीखंडे । ३३ । पुष्करा॰ च । ३४ । प्रामानुपाचरान्मनुष्याः॥३५आUम्लेच्छाश्च ३३६। भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र दे- बकुरूचरकुरुभ्यः । ३ नृस्थितीपरावरे त्रिप- ल्योपमांतर्मुहुर्ते।३६॥ तिर्यग्योनिजानां च ॥३१॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशाले तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ देवाश्चतुर्णिकायाः ॥१॥ आदितस्त्रेिषु पीता-- तलेश्याः॥२॥ दशाटपंचद्वादशविकल्पा:कल्पो-- धूपन्नपर्यंताः ॥३॥ इंद्रसामानिकत्रायस्त्रिंश--.

(१४५) सारिपदात्मरक्षलोकपालानीकप्रकीर्णकामियो- ग्यकिल्विपिकाश्चेकशः शत्रायस्त्रिशल्लोक- पालवा व्यंतरज्योतिष्काः ५ पूर्वयोद्रिाः ६ कायप्रवीचारा आ ऐशानात् । ७१ शेषाः स्प- शरूपशब्दमनःप्रवीचारी। ८ । परेऽप्रवीचा- राः।९। भवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णा- ग्निवातस्तनितोदघिद्वीपदिक्कुमाराः ॥१०॥ व्यंतराः किन्नर किंपुरुपमहोरगगंधर्वयक्षराक्ष- सभूतपिशाचाः॥ ११ ॥ ज्योतिष्काः सूर्याचं- द्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाय । १२ । मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके । १३॥ तत्कृतः कालविभागः।१४। वहिरवास्थिताः ।१५। वैमानिकाः॥ १६ ॥ कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च ॥१७। उपर्युपरि । १८ । सौ- धर्मशानसानत्कुमारमाहेंद्रब्रह्मब्रह्मोत्तरलांतवका- पिष्ठशुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेवानतप्राणत- योरारणाच्युतयोर्नवसु वेयके पुविजयवैजयंत- जयंतापराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च । १९ । स्थि- तिप्रभावसुखातिलेझ्याविशुद्धींद्रियावधिविषय- ६ (१४६) तोऽधिकाः॥२०॥ गतिशरीरपरिग्रहाऽभिमा- नतो हीनाः॥२१॥पीतएझशुक्ललेश्या द्वित्रि- शेषेषु ॥ २२॥ प्राग्वेयकेभ्यः कल्पाः ॥२३॥ ब्रह्मलोकालया लोकांतिकाः॥२४॥ सारस्व- तादित्यवत्यरुणगर्दतोयतुषिताव्याबाधारिष्टाश्च ॥२५॥ विजयादिषु द्विचरमाः ॥२३॥ औ- पपादिकमनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः ॥२७॥ स्थितिरसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां सागरोपमत्रि- पत्योपमा हीनमिताः ॥२८॥ सौधर्मशान- योः सागरोपमे अधिक ॥३९॥ सानत्कुमारमा- हैद्रयोः सप्त ॥ ३० ॥ त्रिसप्तनवैकादशत्रयोद- शपंचदशभिरधिकानि तु ॥३१॥ आरणाच्यु- तादुर्वमेकैकेन नवसु अवेयकेषु विजयादिषु स- वार्थसिद्धौ च ॥ ३२॥ अपरा पल्योपममधिकं ॥ ३३॥ परतः परतः पूर्वापूर्वानंतराः॥३॥ नारकाणां च द्वितीयादिषु ॥३५॥ दशवर्षसह- साणि प्रथमायां ॥ ३६॥ भवनेषु च ॥३७॥ व्यंतराणां च ॥३॥ परा एल्योपममधिकं ३९ ज्योतिष्काणां च ॥४॥ तदष्टभागोऽपरा ४१ (१४७) लोकांतिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषां ॥४॥ इति तस्यार्थाधिगमे मोक्षशा चतुर्थोऽध्यायः ।।४।। अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः ॥१॥ द्र- व्याणि ॥२॥ जीवाश्च ।। ३ ॥ नित्यावास्थि- तान्यरूपाणि ॥४॥रूपिणः पुद्गलाः ॥५॥ आ आकाशादेकद्रव्याणि ॥ ६ ॥ निष्क्रियाणि च॥ ५॥ असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधर्मकजीवा- नां॥॥ आकाशस्यानंताः॥९॥ संख्येया- संख्येयाश्च पुद्गलानां । १०॥ नाणोः । ११ लो- काकाशेऽवगाहः।राधर्माधर्मयोः कृत्स्ने १३॥ एकप्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानां । १४ असं- ख्येयभागादिपु जीवानां ॥ १५॥ प्रदेशसंहार- विसर्पाभ्यां प्रदीपवत् । १६ । गतिस्थित्युपग्रहों धर्माधर्मयोरुपकारः। १७ । आकाशस्यावगाहः ११८॥ शरीरवामनःप्राणांपानाः पुद्गलानां १९ सुखदुःखजीवितमरणोपमहाश्च । २० । परस्प- रोपग्रहो जीवानां । २१ वर्तनापरिणामाक्रिया: परवापरत्वे च कालस्य । २२। स्पर्शरसगंवर- वंतः पुद्गलाः । २३ । शब्दबंधसाक्ष्यस्थौल्य- - (१४८) संस्थानभेदतमश्छायातपोद्योतवंतश्च ॥२४ाअ- णवः स्कंधाश्च ।२५भेदमंघातभ्यं उत्पद्यते२६ भेदादणुः । २८ । भेदसंघाताभ्यांचाक्षुपः॥२८॥ सद्रव्यलक्षणं । २९। उत्पादव्ययधौव्ययुक्तं सत् ।३०। तलावाव्ययं नित्यं । ३१ । अर्पितानर्पि- तसिद्धेः॥३२॥ स्निग्धरूक्षत्वाद् बंधः ३३ न-ज- धन्यगुणानां ॥३४॥ गुणसाम्ये सदृशानां ।३५। द्वयधिकादिगुणानां तु ३६ बंधेऽधिको पारिणा- मिकौ च ॥३७॥ गुणपर्ययवद्रव्यं ॥३८॥ काल- च ।३९। सोऽनंतसमयः॥४०॥ द्रव्याश्रयानि- गुणा गुणाः शतद्भावः परिणामः॥४२॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे पंचमोऽध्यायः ॥५॥ कायवाझमनःकर्म योगः॥१॥सआस्रवः २॥ शुभः पुण्यस्याशुभ:: पापस्य ॥३॥ सक- पायाकषाययोः सांपरायिकर्यापथयोः ॥४॥ इंद्रियकपायावतक्रिया:पंचचतुः पंचपंचविंशति- संख्याः पूर्वस्य भेदाः॥५॥तीव्रमंदज्ञाताज्ञात- भावाधिकरणवीर्यविशेषभ्यस्तद्विशेषः॥६॥ अ- धिकरणं जीवाजीवाः ॥७॥आय संरंभसमारं- (१४९) भारंभयोगकृतकारितानुमतकपायविशेोसिस्त्रि- निश्चतुश्चैकशः॥८॥निर्वर्तनानिक्षेपसंयोग- निसर्गा द्विचतुद्वित्रिभेदाः परं । । तत्पदोप- नितवमात्मांतरायासादनोपघाता ज्ञानदर्शना- वरणयोः ॥१०॥ दुःखशोकतापांदनवधपरि- देवनान्यात्मपराभयस्थानान्यसवेद्यस्य ॥१॥ भूतवूत्यनुकंपादानसरागसंयमादियोगःक्षांतिः शोचमिति सदेद्यस्य ॥ १२ ॥ केवल चुनसंघ- धर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य ॥ १३॥ कपायो- दयात्तीत्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य ॥१४॥वहा. रंभपरिग्रहत्वं नारकास्यायुषः ॥१५॥ माया तैर्यग्योनस्य ॥ १६ ॥ अल्पारंभपरिग्रहत्वं मानु- पस्य । १७। स्वभावमार्दवं च । १८ । निःशी- लवतित्वं च सर्वेषां । १९ । सरागसंयमासंयमा- कामनिर्जरावालतपांसि देवस्य ।२०। सम्यक्त्वं च । २१ । योगवक्रताविसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः ॥२२॥ तद्विपरीतं शुभस्य ।२३। दर्शन- विशुद्धिविनयसंपन्नता शीलवतेष्वनतीचारोऽभी- क्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगो शक्तितस्त्यागतपसी सा- (१५०) धुसमाधियावृत्यकरणमईदाचार्यबहुश्रुतप्रवचन- भक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचन- वत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ।परात्मनिंदा- प्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने च नीचैर्गोत्र- स्य ॥२५॥ तद्विपर्ययो नीचैर्वृत्त्यनुत्सको चोचर- स्य । २६. विघ्नकरणमंतरायस्य । २७ । इति तत्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६॥ हिंसानृतस्तयाब्रह्मपरिगृहेभ्यो विरतिव्रतं ॥१॥ देशसर्वतोणुमहती॥ २ ॥ तत्स्थैर्यार्थ भावनाः पंच पंच वाङ्मनोगुतीर्यादाननिक्षेपणसमि- त्यालोकितपानभोजनानि पंच॥४॥क्रोधलो. अभीरुत्वहास्यपत्याख्यानान्यनुवीचिभाषण चपंच 1। शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरण- भैक्ष्यशुद्धिसधर्माविसंवादापंच ६। स्त्रीरागक- थाश्रवणतन्मनोहरांगनिरीक्षणपूर्वरतानुस्मर- णवृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कारत्यागा पंच ॥७॥ मनोज्ञामनोजेंद्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि पंचा हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनं ॥९॥ दुःख- मेव वा । १० । मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थ्यानि + (१५१) च सत्त्वगुणाधिक क्लिश्यमानाविनयेषु । ११ । जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैराग्याथ । १२ । प्र- मचयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा । १३ । असद- भिधानमनृतं । १४ ।अदचादानं स्तेयं । १५/ मैथुनमब्रह्म ।१६ मा परिग्रहः । १७ । निः- शल्यो व्रती । १८ अगायनगारथ । १९ । अ. णुव्रतोऽगारी॥२०॥ दिग्देशानदंडविरतिसा- मायिकपोषधोपवासोपभोगपरिभोगपरिमाणा- तिथिसंविभागवतसंपन्नश्च ॥२॥ मारणांतिकी सल्लेखना जोषिता २२शंकाकांक्षाविचिकित्सा- न्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः सम्यग्दृष्टेरतीचाराः २३ व्रतशीलेषु पंच पंच यथाक्रमं ॥ २४॥ बंधवध- च्छेदातिभारारोपणान्नपाननिरोधाः॥२५॥मिन थ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखकियान्यासाप- हारसाकारमंत्रभेदाः ॥२६॥स्तेनप्रयोगतदाद- तादानविरुद्धराज्यातिकमहीनाधिकमानोन्मान प्रतिरूपकव्यवहारा॥२॥ परविवाहकरणेव- रिकापरिगृहीताऽपरिगृहीतागमनानंगकीडाका; मतीनाभिनिवेशाः॥२८॥क्षेत्रवास्तुहिरण्यसु- (१५२) वर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणातिकमाः २९ ऊर्धाधस्तिर्यग्व्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्यंतराधा- नानि॥३०॥आनयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानु- पातपुरलक्षेपाः ॥३१॥ कंदर्पकौत्कुच्यमौखर्या- समीक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगांनर्थक्यानि ।। ३२॥ योगदुःषणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥३३॥ अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादानसंस्त- रोपक्रमणानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥ ३४ ॥ संचिचसंबंधसंमिश्राभिषवदुपकाहाराः॥३५॥ सचित्तनिक्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकाला- तिक्रमाः ॥३६॥ जीवितमरणाशंसामित्रानुरा- गसुखानुबंधनिदानानि ॥३७॥ अनुग्रहार्थं स्व- स्यातिसर्गो दानं ॥३८॥ विधिद्रव्यदातृपात्रवि- शेषाद्विशेषः ॥ ३९॥ इति तत्वाधिगमे मोक्षशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बंधहे- तवः॥१॥सकाषायत्वाज्जीवः कर्मणो योरयान्पु दलानादचे स बंधः ॥२॥ प्रकृतिस्थित्यनुभाग- प्रदेशास्तद्विषयः||शाआद्योज्ञानदर्शनावरणवे- * (१५३) दनीयमोहनीयायुनामगोत्रांतरायाः ॥४॥ पंच- नवद्वयष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंगद्विपंचभेदाय- थाक्रमं ॥५॥ मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवला- नां ॥३॥ चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रा- निद्रामचलामचलाभचलास्त्यानगृद्धयश्च ॥७॥ सदसद्वद्ये ॥८॥ दर्शनचारित्रमोहनीया- कषायस्पायवेदनीयाख्यास्सिद्विनवपोडशमेदाः सम्यक्त्वामिथ्यात्वतदुभयान्यकायकथा यौँ हा- स्थरत्यरतिशोकमयजुगुप्साम्री'नपुंसक वेदाअ- नंतानुबंध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंचलनविक- ल्पाकशाकोधमानमायालोभाः। ९ । नार- कतैर्यग्योनमानुपदैवानि । १० । गतिजातिश- रीरांगोपांगनिर्माणबंधनसंघातसंस्थानसंहनन- स्पर्शरसगंधवर्णानुपूर्व्यगुरुलधूपघातपघाता- तपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयः प्रत्येकशरीर- ससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्म पर्याप्तिस्थिरादेययश: कीर्तिसेतराणि तीर्थकरत्वं च ॥ ११॥ उच्चनीचे- धं ॥१२॥ दानलाभभोगोपभोगवीर्याणां ॥१॥ आदितस्तिसृणामंतरायम्य च त्रिंशत्सागरोप- ।

(१५४) मकोटीकोव्यः परा स्थितिः।१४। सप्ततिमाह- नीयस्य । १५ विंशतिनामगोत्रयोः। १६ । त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुषः। १७ । अपरा द्वादशमुहूर्ता वेदनीयस्य । १८ । नामगोत्रयो- रष्टौ । १९ । शेषाणामंतर्मुहूर्चा । २०॥ विपा- कोऽनुभवः । २१॥ स यथानाम । २२। ततश्च निर्जरा।२३। नामप्रत्ययाः सर्वतो योगवि- शेषात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहंस्थिताः सर्वात्मप्रदेशेष्वः नंतानंतप्रदेशाः ।२४। सद्धेद्यशुभायुर्नामगो- त्राणि पुण्यं । २५.। अतोऽन्यत्पापं । २६॥ इति तत्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रेऽष्टमोध्यायः ॥ ८ ॥ आस्रवनिरोधः संवरः।१।स गुप्तिसमिति- धर्मानुप्रेक्षापरीषहजय चारित्रः॥२॥.तपसा नि- जरा च ॥३।। सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिः॥४॥ई- योभाषेषणादाननिक्षेपोत्सर्गाः समितयः॥५॥ उत्तमक्षमामार्दवाजवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागा- किंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः॥६॥ अनित्यांशरण- संसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्रवसंवरनिर्जरालोक- बोधिदुर्लभधर्मस्वाख्यातत्त्वानुचिंतनमनुप्रेक्षा . मार्गाच्यवननिर्जरायपरिपोढव्याः परीपहा ८ क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाम्यारतिस्रीचर्या निपद्याशय्याकोशवधयानालाभरोगतृणस्पर्श- मलसत्कारपुरस्कारप्रज्ञाज्ञानादर्शनानि ॥ ९ ॥ सूक्ष्मसांपगयछमस्थवीतरागयोचतुर्दश ॥१०॥ एकादश जिने ॥११॥वादरसांपराये सर्वे। १० ज्ञानावरणे प्रज्ञाज्ञाने । १३। दर्शनमोहांतराययो- रदर्शनालाभौ । १४ाचारित्रमोहे नाम्यारातिस्त्री निपद्याक्रोशयाच्चासत्कारपुरस्काराः।१५।वेद- नीये शेषाः॥१६॥ एकादयो भाज्या युगपदेक- स्मिन्नेकोनविंशतिः॥१७॥सामायिकच्छेदोप- स्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसापराययथास्या- तमिति चारित्रं॥१८॥अनशनावमौदर्यवृत्तिप- रिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तशय्यासनकायले शा वाह्यं तपः॥१९॥ प्रायश्चित्तविनयवेयावृत्त्य- स्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरं॥२०॥ नवचतुर्द- शपंचद्विभेदा यथाक्रम प्रारध्यानात ॥रशा आ. लोचनप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्गतपश्छेद- परिहारोपस्थापनाः॥ २२॥ज्ञानदर्शनचारित्रो- ..

(१५६.) पचाराः॥२॥ आचार्योपाध्यायतपस्विशैक्ष्य- ग्लानगणकुलसंवसाधुमनोज्ञानां ॥२॥वाचना: पृच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदेशाः।२५। बाह्याभ्यं तरोपध्योः ॥२६॥ उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिंतानि रोधो ध्यानमांतर्मुहूर्तात् ॥२७॥ आतरौद्रधर्म्य- शुक्लानि॥२०॥ परे मोक्षहेतू ॥२९॥ आर्तमम- नोज्ञस्य संप्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वा- हारः ॥३०॥ विपरीतं मनोज्ञस्य ॥३॥ वेदना- याश्च ॥३२॥ निदानं च ॥३॥ तदविरतदेशवि- रतप्रमत्तसंयताना ॥३४॥ हिंसानृतस्तेयविष- यसंरक्षणेभ्योरौद्रमविरतदेशविरतयोः॥३५॥ आज्ञापायावपाकसंस्थानविचयाय धयं ॥३३॥ शुक्ले चाये पूर्वविदः॥३॥परे केवलिनः॥३०॥ पृथक्त्वैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिव्युपरत- क्रियानिवर्तीनि४ि९त्र्येकयोगकाययोगायोगान ॥४०॥ एकाश्रये सवितवीचारे पूर्वे ॥४॥ अवीचारं द्वितीयं ॥४२॥ वितर्कः श्रुतं. ॥४३॥ वीचारोऽर्थव्यंजनयोगसंक्रांतिः॥४॥सम्यग्ह- ष्टिश्रावकविरतानंतवियोजकदर्शनमोहक्षपको (१५७), - . पशमकोपशांतमोक्षपकक्षीणमोहजिनाःक्रम- शोऽसंख्येयगुणनिर्जराः॥४५॥ पुलाकवकुश- कुशीलनिग्रंथस्नातका निग्रंथाः॥४६॥ संयम- श्रुतप्रतिसेवनातीर्थलिंगलेश्योपपादस्थानविक- ल्पतः साध्याः॥१७॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षग्रास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥ मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणांतरायक्षयाच के वलं ॥१॥ वंधत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्म- विप्रमोक्षो मोक्षः ॥२॥ औपशमिकादिभव्यता- नां च ॥३॥ अन्यत्र केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शन- सिद्धत्वेभ्यः ॥४॥ तदनंतरमूवं गच्छत्यालोकां- तात् ॥५॥ पूर्वप्रयोगादसंगत्वाइंघच्छेदाचया गतिपरिणामाच्च ॥६॥ आविद्धकुलालचक्रवद्वन्य- पगतलेपालांवदेरंडवीजवदाग्नशिखावच ॥७॥ धर्मास्तिकायाभावात् ॥ ८ ॥ क्षेत्रकालगतिलि- गतीर्थचारित्रप्रत्येकबुद्धोधितज्ञानावगाहनांत- रसंख्याल्पवहुत्वतः साध्याः ॥९॥. इति तत्त्वार्थ धगमे मोक्षशास्त्रे दशमोऽध्यायः ॥ १२ ॥ , (१५८) अक्षरमात्रपदस्वरहीनं व्यंजनसंधिविवर्जितरेफं। साधुभिरत्र मम क्षमितव्यं को न विमुह्यति शास्त्रसमुद्रे ॥१॥ दशाध्याये परिच्छिन्ने तत्त्वार्थे पठिते सति । फलं स्यादु ग्यासस्य भापित मुनिपुंगवैः ॥२॥ तत्वार्थसूत्रकारं गृद्ध पिच्छोपलक्षितं । वंदे गणींद्रसंजातमुमास्वामिमुनीश्वरं ॥ ३ ॥ इति तत्त्वार्थसूत्रापरनाम तत्वार्थाधिगममोक्षशास्त्र समाप्तं ॥३२॥ । (३३) स्वर्गीय कविवर पं० दौलतरामजीकृत छहढाला। सोरठा । तीनभुवनमें सार, वीतराग विज्ञानता। शिवस्वरूप शिवकार,नौं त्रियोगसम्हारिकें। पहिली ढाल । चौपाई (१५ माना) जे त्रिभुवनमें जीव अनंत। सुख चाहैं दुखतें भयवंत ॥ तातै दुखहारी सुखकारि। कह सीख शुरू करुना धारि ॥२॥ ताहि सुनो भवि मन

थिर आन। जो चाहो अपनो कल्यान ।। मोह
महामद पियो अनादि । भूलि आपको भरमत
वादि ॥ ३॥ तास भ्रमनकी है बहु कया।
कछु कहूं कही मुनि जथा। कालँ अनंत नि.
गोदमझारं । वीत्यो एकेद्रिय-तन धार ।। ४ ।।
एक स्वासमें अठदश वार जन्म्योमरयो भयो
दुखभार ।। निकास भूमि जल पावक भयो।
पवन प्रतेकवनस्पति थयो॥ ५॥ दुर्लभ लहि
ज्यों चिंतामणी । त्यों परजाय लही त्रमतणी।।
लट पिपीलि अलि आदिशरीर । घर घरमरचो
सही वह पीर ॥६॥ कवहूं पंचेंद्रिय पशु भयो।
मनविन निपट अज्ञानीथयो । मिहादिक सैनी
ढे कूर । निवल पश हति खाये भूर ॥७॥क-
वहूं आप भयो बलहीन । सवलनि करि खा-
यो अतिदीन । छेदन भेदन भूख पियास ।
भारवहन हिमआतपत्रास ॥८॥ वध बंधन
आदिकदुखघने । कौटि जीमतें जात न भने ।
अति संक्लेशभावतें मरयो । घोर शुभ्रसागरगे
परयो॥९॥

. (१६०) तहां भूमि परसत दुख इसो। बीछू सहसडसें नहि तिसो।तहांराधशोणितवाहिनी कृमिकुल- कलित देहदाहिनी ।१०। सेंमर तरुजुतदलअ- सिपत्र । असिज्यों देह विदारै तत्र । मेरुसमान लोह गलि जाय।ऐसी शीतउष्णता थाय ॥११॥ तिलतिल करहिं देहके खंड । असुर भिडा दुष्ट प्रचंड। सिंधुनीरतें प्यास न जाय । तौ पण एक न बूंद लहाय । १२ । तीनलोकको नाज जु खाय.। मिटै न भूख, कणा न लहायं । ये • दुख बहु सागरलौं सहै। कर्मजोगत नर तन लहै ११३ जननी उदर बस्यो नवमास । अंगसकु- चत पाई त्रास । निकसत जे दुख पाये घोर। तिनका कहत न आवै ओर। १४ । बालपने- में ज्ञान न लह्यो । तरुणसमय तरुणीरत रह्यो । अर्धमृतकसम बूढापनो। कैसे रूप लखै आपनो. ॥ १५॥ कभी अकामनिर्जरा करें । भवनत्रि- कमें सुरतन धरै। विषय-चाह-दावानल ह्यो । मरत विलाप करत दुख सह्यो । १६। जो वि- मानवासी हथाय ।सम्यकदर्शनविन दुख पाय।

पारद। तहत चय थावरतन धरै । यो परिवर्तन पूरे करे। १७ दूसरी दाल। ऐसें मिथ्या-दृगज्ञानवर्ण,-वश भ्रमत भरत दुख जन्ममर्ण। तातें इनको तजिये सुजान । सुन तिन संछेप कहूँ वखान ॥१॥ जीवादिन- योजनभूत तत्त्व । सरधै तिनमाहि विपर्ययत्व। चेतनको है उपयोग रूप । विनमूरति चिनमू- रति अनूप ॥२॥ पुदगल नभ धर्म अधर्म काल इनते न्यारी है जीवचाल ॥ ताको न जानि विपरीतिमान करि, करें देहमें निजपिछानाही मैं सुखी दुखी मैं रंक राव ! मेरो धन गृह गो. धन प्रभाव ।। मेरे सुत तिय मैं सवल दीन । वे रूप.सुभग मूरख प्रवीन ॥ ४॥ तनउपजत अ- पनी उपज जानि। तननशत आपको नाश मानि ॥ रागादिप्रगट जे दुःखदेन । तिनहीको सेवत गिनत चैन ॥ ५॥ शुभअशुभबंधके फ- लमझार । रति अरति करी निजपदविसार ।। ११ (१२) आतमहितहेतु विराग ज्ञान । ते लखे आपको कष्टदान ॥६॥ रोकी न चाह निजशक्ति खोय। शिवरूप निराकुलता न जोय ॥ याही प्रतीति- जुतं कछुक ज्ञान । सो दुखदायक अज्ञान जान ॥७॥ इनजुत विषयनिमें जो प्रवृत्त । ताको जानो मिथ्याचरित॥यौं मिथ्यात्वादि निसर्ग: जेह । अब जे गृहीत सुनिये सु तेह ॥८॥ जो कुगुरु कुदेव कुधर्म सेव । पो चिर दर्शन- मोह एव ॥ अंतररागादिक धरै जेह । बाहर धन अंबरतें सनेह ॥९॥धार कुलिंग लहि महतभाव । ते कुगुरु जनम-जल उपल-नाव ।। जे रागद्वेषमलकरि मलीन । वनिता गदादिजुत चिह्नचीन ॥ १०॥ते हैं कुदेव तिनकी जु सेव । शठ करत, न तिन भवभ्रमनछेच ॥ रागादि. भाव हिंसासमेत । दर्वित त्रसथावर मरनखेत॥ ११॥ जे क्रिया तिन्हें जानहु कुधर्म । तिन सरः जीव लहै अशर्मयाकौं गृहीतमिथ्यात जान। अब सुन गृहीतज हैं कुज्ञान ॥१२॥ एकांतवाद दूषित समस्त । विषयादिकपोषक अप्रशस्त ॥ ::

(१६३) कपिलादिरचित श्रुतको अभ्यास। सो हेकुवोध बहु देन त्रास ॥१३॥ जो ख्यातिलाभपूजादि चाइ । धरि करत विविधविध देहदाह आतम अनात्मके ज्ञानहीना जेजे करनी तनकरनछीन भातेसव मिथ्याचारित्र त्यागि।अब आत- मके हित पंय लागि॥ जगजालभ्रमनको देय ज्यागि । अब 'दौलत निजआतमसुपारी १५ तीसरी बार नरेंद्रद [ जोगीराया] आतमको हित है सुख, सो सुख आकुलता विन कहिये । आकुलता शिवमाहि न ताते, शिवमग लाग्यो चहिये। सम्यकदर्शन ज्ञान चरन शिव, मग सो दुविध विचारो।जो सत्या- रथरूप सुनिश्चय, कारन सो व्यवहारो ॥शा परद्रव्यनित भिन्न आपमें, रुचि सम्यक्त भला है। आप रूपको जानपनो सो सम्यकज्ञानकला है।आपरूपमें लीन रहे थिर, सम्यकचारित सोई। अब व्यवहार मोक्षमग सुनिये, हेतु (१६४) नियंतको होई ॥२॥जीव अजीव तत्त्व अरु आस्रव, बंध रु संवर जानो । निर्जर मोक्ष कहे जिन तिनके, ज्यौंको सौं सरधानो।। है सोई समकित व्यवहारी, अब इन रूप. वखानी। तिनको सुनि सामान्यविशेषे, दृढ़ प्रतीति उर आनौ ॥३॥ वहिरातम अंतरआतम पर- मातम जीव त्रिधा है। देह जीवको एक गिने बहि-रातमतत्त्व मुधा है ॥ उत्तम मध्यम जघन त्रिविधिके, अंतरआतम ज्ञानी.। द्विविधि संग- विन शुधउपयोगी, मुनि उत्तम निजध्यानी॥ ४ ॥ मध्यम अंतरआतम हैं जे, देशवती आगारी जघन कहे अविरत समदृष्टी, तीनों शिवमगचारी ॥ सकल निकले परमातम द्वैविध, तिनमें घातिनिवारी। श्रीअरहंत सकल परमातम, लोकालोकनिहारी॥५॥ज्ञानश- रीरी त्रिविधि कर्म, मलवर्जित सिद्ध महंता। ते हैं निकल अमल परमातम, भोगें शर्म अनंता॥ बहिरातमता हेय जानि ताज, अंतर " १ निश्चय । मोक्षमार्गका कारण !

, (१६५) आतम हो । परमातमको ध्याय निरंतर, जो नित आनंद पूजे ॥ ३ ॥ चेतनता विन सो अजीव है, पंच भेद ताके हैं। पुद्गल पंच वरन रस पन गध, दु फरसवसु जाके हैं। जिय पुद- गलको चलन सहाई, धर्मद्रव्य अनरूपी । तिष्ठत होय अधर्म सहाई, जिन विनमृति नि- रूपी ।। ७॥ सकल द्रव्यको वास जासमें, सो आकाश पिछानो। नियत वरतना निशिदिन सो, व्यवहार काल परिमानो। यों अजीव अब आस्रव मुनिये, मनवचकाय त्रियोगा। मिथ्या अविरत अरु कपाय पर, मादसहित उपयोगा। ८॥ये ही आतमके दुखकारन, तात इनकों तजिये। जीवप्रदेश बंधे विधिसों सो, बंधन कबहुं न सजिये। शमदमसौंजो कर्म न आवें, सो संवर आदरिये । तपवलत विधिझरन निर- जरा, ताहि सदा आचरिये ॥ ९॥ सकल करम- से रहित अवस्था, सो शिव थिरसुखकारी । इहिविधि जो सरधा तत्त्वनकी, सो समकित ona पूरै वा प्राप्त करें।

व्योहारी। देव जिनेंद्र गुरु परिग्रह विन, धर्म
दयाजुत सारो। येहुं मान समकितको कारन,
अष्टअंगजुत धारो।१०। वसुमद टारि निवा-
रित्रिसठता, षट अनायतन त्यागो । शंका-
दिक वसु दोष विना, संवेगादिक चित पागो।
अष्ट अंगअरु दोष पचीसों, अब संक्षेपहु कहि-
ये। विन जाने” दोष गुननकों, कैसे तजिये
गहिये । ११। जिनवचमें शंका न धारि वृष,
अवसुखवांछा भान । मुनितन मलिन न देख
पिनावै, तत्त्व कुतत्त्व पिछाने । निजगुन अर
पर अवगुन ढांक, वा निजधर्म वढावै। कामा-
दिककर वृषत चिगते, निजपरकों सु दृढावै।
१२ । धर्मीसौं गउवच्छप्रीतिसम, कर जिनधर्म
दिपावै ।इन गुनत विपरीति दोष वसु, तिनको
सतत खिपावै । पिता भूप वा मातुल नृप जो,
होय न तोमद ठाने । मद न रूपको मदन
ज्ञानको, धनबलको मद भानः। १३ । तपको
मदन मद जुप्रभुताको, करैन सो निज जाने।
मद धारै तो येही दोष वसु, समकितकों मल

(१६७) ठाने । कुगुरुकुदेवकुवृपसेवककी, नहिं प्रशंस उचरै है। जिनमुनि जिनश्रुत विन कुगुगदिक, तिन्हें न नमन करे है। १४ । दोपरहित गुन- सहित सुधीजे सम्यकदरश सजे हैं। त्ररितमो- हवश लेशन संजम,पै सुरनाथ जजे हैं। गेही पे गृहमें न रचे ज्यों, जलमें भिन्न कमल है।न. गरनारिको प्यार यथा, कादेमें हेम अमल है। १५. प्रथम नरक विन पट भू ज्योतिष, वान भवन पँढ नारी थावर विकलत्रय पशु नहि, उपजत समकित-धारी। तीनलोक तिहुँहाल- माहिं नहि, दर्शनसो सुखकारी सकलधरमको मूल यही इस, विन करनी दुखकारी । १६ । मोक्षमहलकी परथम सीढी, या विन ज्ञान व- रित्रा। सम्यकता न लह सौ दर्शन, धारोभव्य पवित्रा ।। 'दौल' समझ सुन चेत सयाने, काल वृथा मत सोवे।यह नरभव फिर मिलन कठिन है, जो सम्यक नहि होवे ॥१७॥ चौथी दान। दोहा। सम्यकश्रद्धा धारि पुनि, सेवहु सम्यकज्ञान ।

रोला छंद । २४ मात्रा। , ((१६८) स्वपरअर्थबहु धर्मजुत, जो प्रकटावन भान ।। सम्यकसाथै ज्ञान, होय पै भिन्न अराधौ।. लक्ष- ण श्रद्धा जानि, दुहूमें भेद अबाघो। सम्यकका- रण जान, ज्ञान कारज है सोई। युगपत होते हू, प्रकाश दीपकतें होई । १ तास भेद दो हैं परोक्ष, परतछि तिनमाहीं। मति श्रुत दोय प- रोक्ष, अक्ष मनः उपजाहीं। अवधि ज्ञान मन- पर्जय, दो हैं देशमतच्छाद्रिव्यक्षेत्रपरिमान लिये, जान जिय स्वच्छा।३। सकल द्रव्यके गुन अनंत, परजाय अनंता।जानें एक काल, प्रगट केवाल भगवंता। ज्ञान समान ने आन, जगतमें मुखको कारन । इह परमामृत जन्म, जरामृत- रोगनिवारन ।४।कोटि जनम तप तपैं; ज्ञान विन कर्म झरैजे ज्ञानीकेछिनमाहिगुप्तित, सहज टते॥मुनिव्रत धार अनंतबार, ग्रीवक उप- जायो। निजआतमज्ञान विना सुख लेश न- पायो।५। तातें जिनवरकथित तत्त्व, अभ्यास करीजे । संशय विक्रम मोह त्याग, आपो लखि 1 (१६९) लोजे।यह मानुषपरजाय सुकुल, नुनिको जि- नवानी इविधिगये न मिले, नुमान को 3. दघि ममानी॥६॥ धन समाज गज बाजाराज तोकाज न आवे ज्ञान आपको रूप भये, फिर अचल रहा ॥ नास ज्ञानको कारन, स्वपरवि- वैकवखान्यो। कोटि उपाय वनाय, भव्य ताको उर आन्यो ॥७॥जे पूरब शिव गये,जात अन आगे जै हैं। सोमब महिमा ज्ञानतनी, मुनि- नाथ कहे हैं। विषयवाह-दव-दाह, जगतजन अगनिदझावे। तासु उपाय न आन, ज्ञानवन- धान वुझावै ॥ ८ ॥ पुण्यपाप-फलमाहि, हरप विलस्रो मत भाई । यह पुदगल परजाय, उपार्ज विनसें थिर थाई लाख वातकी बात, यहे नि- अय उरलावो। तोरिसकल जगदंदफंद, निज आतम ध्यावो ।। ९॥ सम्यकज्ञानी होइ, बहुरि दृढ चारित लोजे । एकदेश अरु सकल, देश, तस भेद कहीजे ।। त्रस हिंसाको त्याग, वृया यावर न सँघारे । परवधकार कठोर निद्य, नहिं वयनबारे ।। १० । जल मृतिका विन .

(१७) और नाहिं कछु गहै अदचा निजवनिताविन सकल, नारिसौँ रहै विरता। अपनी शक्तिवि- चार, परिग्रह थोरो राखे । दशदिशि गमनप्र- मान, ठान तसु सीम न नाखै ॥ ११॥ ताहूमें फिर ग्राम गली, गृह वागवजारा गमनागमन प्रमान, ठान अन सकल निवारा । काहूके धन हानि, किसी जय हार न चीत । देय न सो उपदेश, होय अध वनिज कृषीत। १२ । कर प्रमाद जल भूमि, वृक्ष पावक न विराधै। असि धनु हल हिंसोपकरन, नहिं दे जसलाधै ॥रा- गद्वेषकरतारकथा, कबहुं न सुनाजे । और हु अनरथ दंड, हेतुअघ तिन्हें न कीजे ॥ १३ ॥ घर उर समताभाव, सदा सामायिक करिये । वचतुष्टयमाहि, पाप ताज प्रोषध परिये ॥ भोग और उपभोग, नियम करि ममतु निवार । मुनिको भोजनदेय, फेर निज करहि अहारै १४ बारहनतके अती-चार,पन पनन लगावै। मरन- समय सन्यास, धारितसु दोष नशावै ।। याँ ੧ ਚਲੋਝ ਨੂੰ ( १७१) श्रावकंवत पाल, स्वर्ग सोलम उपजावे। तहत चय नरजन्म, पाय मुनि द्वे शिव जावे ॥१५॥ पांचवीं दाल। सगारद (मात्रा १४) मुनि सकलवृती बढभागी। भवभोगनते वे- रागी। वैराग्यउपावन माई। चिंतो अनुप्रेक्षा भाई। १। इन त्रितत समरस जागें। जिमि ज्वलन पवनके लागे। जब ही जिय आतम जानै । तब ही जिय शिवसुखथाने । ४ । जो- वन गृहगोधननारी हयगय जन आज्ञाकारी।। इंद्रिय भोगा छिन थाई।सुरधनु चपला चपलाई ।। ॥३॥ सुर असुर खगाधिप जेते । मृग ज्यो हरि काल दले ते। मणिमंत्र तंत्र बहु होई । मरते न वचावै कोई।४। चहुँगतिदुख जीव भरे हैं। परिवर्तन पंच करें हैं। सबविधि संसार असारा। यामें सुख नाहि लगारा। ५। शुभ अशुभ क- रमफलजेते।भोग जिय एकहि तेते । सुतदारा होय न सीरी । सब स्वारथके हैं भारी ।। जलपय ज्यों जियतन मेलापि भिन्न भिन्न नहि ( १७२) भेला। तो प्रकट जुदे धन धामा। क्यों है इक. मिलि सुत रामा । ७। प्रल-रुधिर-राध-मल- थैली। कीकस वसादित मैली । नवद्वार वहैं घिनकारी । अस देह करै किम यारी।। जो जोगनकी चपलाई । तात आसूव भाई। आसूव दुखकार घनेरे । बुधिवंत तिन्हं निरवेरे ।९। जिन पुण्यपाप नहिं कीना । आतम अनुभव चित दीना । तिन ही विधि आवत रोके । संवर लहि सुख अवलोके । १०। निज काल पाय विधि झरना । तासौं निजकाज न सरना। तप करि जो कर्म खपावै । सोई शिव सुख दरसावै । ११ । किन हू न करयो न घरे को। षटद्रव्यमयी न हरै को। सो लोकमाहि विन समता। दुख सहै जीव नित भ्रमता । १२॥ अंतिम ग्रीवकलौंकी हद। पायो अनंतविरियां यद । पर सम्यकज्ञान न लाधो। दुर्लभ निजमें . मुनि साधो। १३ । जे भाव मोहत न्यारे । हग ज्ञान व्रतादिक सारे। सो धर्म जबै जिय धारै। . ११ कर्म।

(१७३" तव ही सुख अचल निहारे। १४ । सो धर्म मुनिनकरि धरिये,तिनकी करतृति उचरिये। ताको मुनिके भवि प्रानी, अपनी अनुभूति पिछानी। १५॥ ट्टी वाला हरिगीता संद। पटकाय जीव न हननतें, सब विधि दरव- हिंसा टरी रागादिभाव निवारते, हिंसान भा- वित अवतरी । जिनके न लेश मृपा न जल, तृन हू विना दीयो गहें । अठदशसहस विधि शीलघर, चिदब्रह्ममें नित रमि रहें। १ । अंत- रचतुर्दश भेद बाहिर, संग दशघातें टलें। पर- माद तजि चटकर मही लखि, समिति ईति चलें॥ जग सुहितकर सव अहितकर, श्रुतिसु- खद सब संशय हरै। भ्रमरोग-हर जिनके बच- न, मुखचंद्रतें अम्रत झरै ।। २॥छयालीस दोप विना सुकुलश्रावकतणे धर अशनको । ल, तए बढ़ावन हेत नहिं तन, पोखते तजि रसनको॥ शुचि ज्ञान संजम उपकरन, लसिक गहें लसिक .

(१७४) अरें। निजतु थान विलोक तन-मल, मूत्र-श्लेष- म परिहरै॥३॥ सम्यक प्रकार निरोधि मन- वच, काय आतम ध्यावते । तिन सुथिरमुद्रा. देखि मृगगन, उपल खाज खुजावते ॥ रसरूप गंध तथा फरस अरु, शब्द शुभ असुहावने । तिनमें न राग विरोध, पंचेंद्रियजयन पद पाव- ने ॥ ४॥ समता सम्हारै थुति उचारे, वंदना जिनदेवको। नित करें श्रुत रति धरै प्रतिक्रम, तजै तन अहमेवको। जिनके नन्हौन न दंत- धोवन, लेश अंबर आवरन । भूमाहि पिछली रयानमें कछु, शयन एकासन करन ॥५॥ इक बार दिनमें लें अहार, खड़े अलप निज पानमें। कचलोंच करत न डरत परिपह, सों लगे निज ध्यानमें । अरि मित्र महल मसान कंचन, का. च निंदन थुतिकरन । अर्घावतारन असिपहा- रन, में सदा समताधरन ॥६॥ तप तपैं द्वादश धरै वृष दश, रतनत्रय से सदा। मुनिसाथमें वा एक विचरें, चहैं नहिं भवसुख कदा॥यों है सकल संजमचरित, सुनिये स्वरूपाचरन अ- .

( १७५) वा जिस होत प्रगटै आपनी निधि, मिटे पर- की प्रवृति सव ॥ ७॥ निज परम पेनी सुधि छेनी डारि अंतर भेदिया। वरनादि अरु ग- गादित, निज भावको न्यारा किया।। निज- माहिं निजके हेतु निजकर, आपको आपे ग- हो।गुन गुनी ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय, मझार कल्लु भेद न रहो।।८॥जहँ ध्यान ध्यातायको न, विकल्प वचभेद न जहां । चिद्भाव कर्म विदेश करता, चेतना किरिया तहां। तीनों अभिन्न अखिन्न शुध, उपयोगकी निपल दशा। प्रगटी जहां ग ज्ञान व्रत ये, तीनघा एक लशा ॥१॥ परमान नय निक्षेपको न, उदोत अनुभव में दि- खै। दृग-ज्ञान-सुख-बलमय सदा नहिं, आन- भाव जुमोवि ॥में साध्य साधक में अवाधक, कर्म अरु तसु फलनितें । वितपिंड चंड अखंड मुगुन, काडच्युन पुनि कलनित ॥१०॥यों चिंत्य निजमें घिर भये तिन, अमय जो आनंद लहो । सो इंद्रनाग नरेंद्र वा, अहमिद्रक नाही कयो । तव ही शुलध्यानानिका, उपाति (१७६) विधिकानन दह्यो। सव लख्यो केवलज्ञानकार, भविलोककौं शिवमग कहो॥११॥ पुनि धाति शेष अघातिविधि, छिनमाहि अष्टमभू बसें । वसुकर्म बिनशै सुगुन वसु, सम्यक्त्व आ- दिक सब लदे ॥ संसार खार अपार पारावार: तिर तीरहिं गये। अविकार अकल अरूप शुध, चिए अविनाशी भये॥१२॥निजमाहि लोक अलोक गुन, परजाय प्रतिबिंबित थये। रहि हैं अनंतानंत काल, यथा तथा शिव परनये ॥ध- नि धन्य हैं जे जीव नरभव, पाय यह कारज किया। तिनही अनादी भ्रमनपंचप्रकार, तजि वर सुख लिया ॥१३॥ मुख्योपचार दुभेद याँ, बड़भागिरत्नत्रय धरै । अरु धरेंगेते शिव लहैं, दिन सुजसजल जगमल ह॥इमि जानि आ- लस हानि साहस, ठानि यह सिख आदरो। जबलौन रोग जरा गहै, तवली जगत निज- हित करो।यहरागागदहै सदा, तात. समामृत सेइये। चिर भजे विषय कषाय अब तो, त्याग निजपद बेइये ॥ कहा रच्यो परप- दोहा। " (१७७) दमें न तेरो, पद यह क्यों दुख सहै। अब दोल होउ सुखी स्वपदरावि, दाव मत चूको यह १५ ईक नेव वसु ईक वर्षकी, तीज सुकल बैसाख । करचो तत्वउपदेश यह, लखिवुधजनकी भाखर लघुधी तथा प्रमादत, शब्द अर्थकी भूल । सुधी सुधार पढो सदा, जो पावो भवकूल ॥२॥ इति दौलतरामकृत छहवाला समाप्त ॥ ३३॥ (३४) वीसतीर्थकर पूजा भाषा। दीप अढाई मेरु पन, अवतीर्थकर वीस । तिन सवकी पूजा करूं, मनवचतन धरि सीस।१। ही विद्यमानविंशतितीर्थकरा ! मन अवतरत अवतरत ! सवीष्ट । ॐ ही विद्यमानविंशतितीर्थकरा ! अत्र तिष्ठत निष्ठत । छ । ओ ही विद्यमानविंशतितीर्थकरा ! न मम सरिहिता भवत गवत । वषट् । इंद्रफणींद्रनरेंद्रवंद्य, पद निर्मलधारी। शोभनी.. क संसार, सार गुण हैं अविकारी । क्षीरोदधि- सम नीरसौं (हो), पूजो तृपा निवार । सीम-. .. १२ (१७) घर जिन आदि दे, वीस विदेहमंझार । श्री- जिनराज हो भव,-तारणतरणजिहाज ॥१॥ नों ही विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निवपामीति स्वाहा॥ (इस पूनामें यदि वीस पुंज करना हो, तो इस प्रकार मंत्र बोलना चाहिये) ओं ही सीमंधर-युग्मन्धर-बाहु-सुबाहु-संजात-स्वयंप्रभ-ऋष- भानन-अनन्तवीर्य-सुरप्रम-विशालकीर्ति-वज्रघर-चन्द्रानन- चन्द्रवाहु-भुजंगम ईश्वर नेमिप्रभ-वीरपेण-महाभट-देवयशोऽ- जितवीयति विंशतिविद्यमानतीर्थकरेभ्यो जन्मजरामृत्युविना- शनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ तीनलोकके जीव, पाप आताप सताये। तिनकों साता दाता, शीतल वचन सुहाये ॥ वावन चन्दनसों जजू (हो), भ्रमनतपन निरवार । सीमंधर०॥२॥ ओं ही विद्यमानविंशवितीर्थकरेभ्यो भवतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ॥२॥ (इसके स्थानमें यदि इ- च्छा हो, तो बड़ा मंत्र पढ़ें) यह संसार अपार,महासागरजिनस्वामी। तात तारे बडी भक्ति-नौका जग नामी ॥ तंदुल

8
(१७)
अंमल सुगंधमों (हो), पूजों तुम गुणसार ।
सीमंघर०॥३॥
नों ही विद्यमानविंशतितीयकरभ्योऽक्षयपदमाप्तये अक्षनान
निर्वपापीति स्वाहा ॥३॥
भविक सरोज-विकाश, निंद्यतमहर रविसे हो।
जतिश्रावकाचार कथनको, तुम्ही बड़े हो ।
फूलसुवास अनेकसों (हो), पूजों मदनमहार।
सीम०॥४॥
मों ही विद्यमानविंशतितीर्थकरैभ्यः कामदाणविष्यमनाय
पुष्पं निवपामीति स्वाहा ।।५।।
कामनाग विषधाम,-नाशको गरुड कहे हो।
क्षुधा महादवज्वाल, तासुको मेघ लहे हो।
नेवज बहुधृतमिष्टसौ(हो),पूजों भूखविडार ।
सीमं०॥५॥
ओं ही विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यः नुधारोगविनागनाय
नैवेधं निपामीनि स्वादा ॥५॥
उद्यम होन न देत, मर्व जगमाहिं भरची है।
मोहमहातम घोर, नाश परकाश करवो है ।।
पूजों दीपप्रकाशनों (हो) ज्ञानज्योतिकरता-
सीम०॥६॥

प (१८०.) मों ही विद्यमानविंशतितीर्यकरेभ्यो - मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्ब० ॥६॥ कर्म आठ सब काठ,-भार विस्तार निहारा । ध्यान अगनिकर प्रगट, सरव कीनों निरवारा धूप अनूपम खेवतें (हो), दुःख जलें निरधार। समि०॥७॥ ओं ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्योऽष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं. निर्वामीति स्वाहा ॥७॥ मिथ्यावादी दुष्ट, लोभऽहंकार भरे हैं सबको छिनमें जीत, जैनके मेर खरे हैं। फल अति. उचमों जजों (हो), वांछितफलदातार । समि।। ओं ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं नि- पामीति स्वाहा ॥८॥ जल फल आठो दर्व, अरघ कर प्रीत घरी है। गणधर इंद्रनिहू, थुति पूरी न करी है। 'द्या- नत' सेवक जानके [हो], जगतै लेहु निका; सीम०1९. ओं ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्योऽनर्षपदमाप्तये अयं नि- पामीति स्वाहा ॥९॥ . --- (१८१) भय जयमाला आरती। सोला। ज्ञानसुधाकर चंद, भविकखेतहित मेघ हो। भ्रमतमभान अमंद, तीर्थकर वीमों नमो |२|| चौपाई। सीपंधर सीमेवर स्वामी । जुगमंधर शुगर्मघर नामी । दाहुबाहु जिन जगजन तारे । करप मुबाहु पाहुपर दारे ।। जात मुनान केवलज्ञानं स्वयंभू मनु स्वयं प्रधान ! ऋपमानन ऋपि मानन दोष । मनवीरनवीरनको ॥२॥ सौरीमम सौरीगुणमालं । मुगुण विशाल विशाळ दगारं। वज्रपार भवगिरिवनर है। चन्द्रानन चन्द्रानन वर है ॥३॥ भद्रवाह भद्रनिके करता ! श्रीभुजंग सुनंगम भरता। ईश्वर सबके ईश्वर छाने । नेमिप्रमू जमनेमि दिराने ॥४॥ वीरसेन वीरं नग जान । महामन्द्र, महामद बखाने । नमो जसोघर जसघरकारी नमो भनिनीरज बलधारी ॥ धनुप पांचसे काय विराज । भायु कोटिपूरब सब छाने । समवसरण शोमित विनरामा भवनकनारनवरन मिटाना।। सम्यक रनत्रयनिधि दानी । लोकालोकप्रकाशक मानी । सन इंद्रनिकरि मंदित सौह । मुग्नर पशु पके मन मोई॥ दोहा। तुमको पूजे बंदना, करें धन्य नर सोय।

(१५१). 'द्यानत' सरधामन धरै,सो.भी धरमी होय ॥८॥ ओं ही विद्यामानविंशतितीर्थकरेभ्योऽध्य निर्वपामीति स्वाहा। (३५). अथ सिद्धपूजा। अधिो रयुतं सबिन्दुसपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितं वर्गापूरितदिग्गताम्बुजदलं तत्सन्धितत्त्वान्वितं अन्तःपत्रतटेष्वनाइतयुतंहींकारसंवेष्टितं । देवं ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो वैरीभकण्ठीरव ओं ड्री श्रीसिद्धचक्राधिपते ! सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र अवतर अव- तर। संवौषट् । ओं ही सिद्धचक्राधिपते ! सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र विष्ट लिष्ठ । 8. ओं ही सिद्धचक्राधिपते । सिद्धपरमेष्टिन अत्र मम सनिहितो भव भव । वषट् । निरस्तकर्मसम्बन्धं सूक्ष्मं नित्यं निरामयं । बन्देऽहं परमात्मानममूर्चमनुपद्रवं ॥१॥ (सिद्धयन्त्रको स्थापना) . .सिद्धौ निवासमनुगं परमात्मगम्यं हीनादिभावरहितं भववीतकायम्। रेवापगावरसरो-यमुनोद्भवानां नीरैर्यजे कलशगैर्वरसिद्धचक्रम् ॥ १॥ - है (१८३) ओं ही सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेटिने जन्ममृत्यूधि- नाशनाय जलं नियामीति स्वाहा ॥१॥ आनन्दकन्दजनकं धनकर्ममुक्तं सम्यक्त्वशर्मगरिमं जननातिवीतं । सौरभ्यवासितभुवं हरिचन्दनानां गन्धर्यजे परिमलेवरमिद्धचक्र ।।।। ओं दी सिद्धनाधिपतये सिद्धपरमेष्टिने संसारतापविनाशना. प चन्दनं निर्व० ॥ सर्वावगाहनगुणं सुसमाधिनिष्ट सिद्ध स्वरूपनिपुणं कमलं विशालम् । सौगन्धशालिवनशालिवराक्षतानां पुञ्जर्यजे शशिनिभरसिद्धचक्रम् ॥३॥ भों ही मिद्धचकाधिपतये सिद्धपामेष्टिने अक्षयपदमाप्तये अक्षनान निर्व०॥ नित्यं स्वदेहपरिमाणमनादिसंज्ञ द्रव्यानपेक्षममृतं मरणाद्यतीतं। मंदारकुंदकमलादिवनस्पतीनां पुष्पैर्यजे शुभतमैर्वरसिद्धचक्रम् ॥ ४॥ भों ही सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिन कामवायविस नाय पुष्पं निर्वः॥

(१८४.) ऊर्ध्वस्वभावगमनं सुमनोव्यपेतं ब्रह्मांदिवीजसहितं गगनावभासं। क्षीरान्नसाज्यवटकै रसपूर्णग:- नित्यं यजे चरुवरैर्वरसिद्धचक्रं ॥५॥ ओं ही सिद्धचक्राधिपवये सिद्धपरमेष्ठिने क्षुद्रोगविध्वंसनाय नैवेद्य निर्व०॥ आतंकशोकभयरोगमदप्रशांत निर्द्वन्द्वभावधरणं महिमानिवेशम् । कर्पूरवर्तिबहुभिः कनकावदातै- दीपर्यजे रुचिवरैर्वरसिद्धचक्र ।।६। ओं द्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्टिने मोहान्धकारविनाश नाय दीपं निर्व०॥६॥ पश्यन्समस्तभुवनं युगपनितान्तं त्रैकाल्यवस्तुविषये निविडप्रदीपं । सद्व्यगंधधनसारविमिश्रितान धूपैर्यजे परिमलेर्वरसिद्धचक्रं ॥ गों ही सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अष्टकमर्दहनाय पूर्व निवपामीति स्वाहा ॥७॥ सिद्धासुरादिपतियक्षनरेंद्रचक्र- (१२) ध्येयं शिवं सकलमव्यजनेःसुबन्धम् ३ नारिङ्गपूगकदलफिलनारिकेले: सोऽहं यो वरफलैर्वरामिद्धचक्रम् ॥ ८॥ ओं ही सिद्धचक्राधिपतये सिद्धारमेष्टिने मोडफल प्रात्ये फट निवपामीति स्वाहा ।।८॥ गन्धाढ सुपयो मधुव्रतगणःसझं वरं वन्दनं पुष्पापं विमल सदक्षतचयं रम्यं चरुं दीपक। धूपं गन्धयुतं ददामि विविघं श्रेष्ठं फलं लब्धये सिद्धानां युगपक्रमाय विमलं सेनोचरं बांछित भों ही सिद्धचकाधिपतये सिद्धपरमेष्टिने जनपद प्राप्तय अव निवपामीति स्वाहा ॥९॥ ज्ञानोपयोगविमलं विशदात्मरूपं सूक्ष्मस्वभावपरमं यदनन्तवीर्यम् । कर्मोंधकक्षदहनं सुखशस्वी वन्देसदानिरुपमं वरसिद्धचक्रम् ॥१०॥ भों ही सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेठिन महार्य निर्नयामाशि 'स्वाहा ॥ १०॥ त्रैलोक्येश्वरवन्दनीयचरणा प्रापुः श्रिय शाश्वः ती यानाराध्य निरुद्धचण्डमनसःसन्तोपि ती- (१८) थंकराः। सत्सम्यक्त्वविवोधवीयविंशदाऽव्या- बाधताधैर्गुणे-युक्तांस्तानिह तोष्टवीमि सततं सिद्धान्-विशुद्धोदयात् ॥११॥ ( पुष्पांजलि क्षिपेत् ) अर्थ जयमाला। विराग सनातन शान्त निरंश।निरामय निर्भय निर्मल हंस ॥ सुधाम विवोधनिधान विमोहे. । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धपमूह ॥ १॥ विदूरितसं- सृतभावनिरंग । समामृरपूरित देव विसंग.॥ अबन्ध कषायविहीन विमोह। प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥२॥निवारितदुष्कृतकर्मविपाश सदामलकेवलकेलिनिवास । भवोदधिपारग शांत विमोह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥३॥ अनन्तसुखामृतसागर धीर । कलंकरजोमलभू- रिसमीर ॥ विखण्डितकाम विराम विमोह। प्र- सीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥ ४॥ विकारविव- जित तर्जितशोकः । विबोधसुनेत्रविलोकितलो- क॥ विहार विराव विरंग विमोह। प्रसीद वि-:

(१८७) शुद्ध मुसिद्धसमूह ।। ५॥ रजोमलवेदविमुक्त विगात्र निरंतर नित्य सुखामृतपात्र।मुदर्श- नराजित नाय विमोह । प्रसाद विशुद्ध सुसिद्ध- समूह ॥ ६॥ नरामरवन्दित निर्मल भाव । अ- नन्तमुनीश्वरपृष्य विहार ।। सदोदय विश्वमहे- श विमोह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥ ७ ॥ विदंभ वितृष्ण विदोष विनिद्र । परापर शंकर सार वितन्द्र ॥ विकोप विरूप विशंक विमोह। प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥ ८॥जरामरणो- झित वीतविहार विचिन्तित निर्मल निरहंकार अचिन्त्यचरित्र विदर्प विमोह । प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ।। ९ ॥ विवर्ण विगंध विमान वि- लोभ । विमाय विकाय विशन्द-विशोभ ।। अ- नाकुल केवल सर्व विमोह । प्रसीद विशुद्ध सु- सिद्धसमूह १० घत्ता-असमसमयमारंवारुचेतन्य चिह्न परपरणतिमुक्तं पद्मनन्दीन्द्रवन्धम् ॥ नि- खिलगुणनिकेतं सिद्धचक्र विशुधं स्मरति न. मति यो वा स्तौति सोऽभ्येति मुक्तिम् ॥ ११ ॥ ओं ही सिद्धपरगेष्टिभ्यो महार्य निपामीति स्याहा ।।

(१८) मदिल छंद। अविनाशी अविकारपरमरसघाम हो । समाधान सर्वज्ञ सहज अभिराम हो। शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध अनादि अनंत हो। जगतशिरोमणि सिद्ध सदा जयवंत हो ध्यानअगनिकर कर्म कलंक सबै दहे। नित्य निरंजनदेव सरूपी हो रहे ॥ बायकके आकार ममत्वनिवारिकें। सो परमातम सिद्ध नमूं सिर नायकें ।। दोहा। , अविचलज्ञानप्रकाशत, गुण अनंतकी खान। ध्यान धरैसो पाइये, परमसिद्ध भगवान ॥३॥ इत्याशीर्वादः (पुष्पांजलिं क्षिपेत् ) (३६) समुच्चयचतुर्विंशतिज़िनपूजा । छंद'कवित। वृषभ अजित संभव अभिनंदन, सुमति पदम सुपास जिनराय । चंद पुहुप शीतल श्रेयांस नमि, वासपूज्य पूजितसुरराय ॥ विमल अनंत घरम जस उज्ज्वल, शांति कुंथु अर माल्लिम- नाय । मुनिसुव्रत नमि नेमि पासमभु, वर्दमा- नपद पुष्प चढ़ाय॥१॥ ओं ही श्रीपमादिवीरान्नचविधविजिनसमृद अत्र भववर, अवतर । संवाषट्। प्रोही श्रीटपभादिवीरान्तचतुर्विशतिनिन- समृह अत्र तिष्ठ तिष्ठ । टाउः। मोदी श्रीपमादिवशन्त- चतुर्विशविजिनसमूह अन मम सन्निहिनो भव भव । वषट् ॥ अष्टक . चाल धानतरायकृत नंदीश्वरट्रीपाष्टककी उया गरवा राग- आदि भनेक चालामें बनता है। मुनिमनसम उज्ज्वल नीर, प्रासुक गंध भरा। भरि कनककटोरी धीर, दीनों धार घरा ॥ चौवीसौं श्रीजिनचंद, आनंदकंद सही। पदजजत हरत भवफंद, पावत मोक्षमही ॥१॥ ओं ही श्रीपमादिवीरान्तेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल निर्मपामीति स्वाहा ।। गोशीर कपूर मिलाय, केशररंग भरी। जिनचरनन देत चढ़ाय, भवआताप हरी ॥ चौवीसो० ॥२॥ - .

(१९),
.
औं ह्रीं श्रीकृषभाविदिवीरान्तेभ्यो भवतापविनाशनाय चंदनं
• निर्वपामि० ॥
तदुल.सित सोमसमान, सुंदर अनियारे ।
मुकताफलकी उनमान, पुंज धरों प्यारे ।।
चौवीसो० ॥३॥
ओं ह्रीं श्रीपभादिवीरांतेभ्योऽक्षयपदमाप्तये अक्षतान् निर्व-
पामि०॥
वर कंज कदंब करंड, सुमन सुगंध भरे
जिन अग्र धरौं गुनमंड, कामकलंक हरे॥
चौवीसौ०॥४॥
ओं ह्रीं श्रीपभादिचीरान्तेभ्यः कामवाणविध्वंसनाय पुष्प
निर्वामि॥
मनमोदनमोदक आदि, सुंदर सद्य बने।
रसपूरित प्रासुक स्वाद, जज़त छुधादि हने ।
चौवीसौ०॥५॥
ओं ह्रीं श्रीकृषभादिवीरान्तेभ्यः सुधारोगविनाशनाय नैवेद्य
निर्वामीति स्वाहा ॥
तमखंडन दीप जगाय, धारों तुम आगें।
सब तिमिरमोह छै जाय, ज्ञानकला जागे॥
चौवीसौ०॥६॥

(१६१)
ओं ही थोपमादिनीगन्तग्यो पोसान्यकारपिनाशनाय
दीप नि०॥
दशगंध हुताशनमाहि. हे प्रभु खेवत हों।
मिस धूम करम जरिजांहि. तुम पद सेवन हो ।
चौवीसौ०॥ ७॥
मानी श्रीपमादिवीरानेभ्योऽष्टकर्मदहनाय धूप नि० ॥
शुचि पक्क सरसफल सार, सब रितुके ल्यायो।
देखत हुगमनको प्यार, पूजन सुख पायौँ ।
चौवीमो०-८॥
ओं दो श्रीपभादिवारान्तेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फल नि० ॥
जलफल आठों शुचि सार, ताको अर्थ करों।
तुमको अरप भवतार, भवतरि मोक्ष वरों।
चौवीसौ.॥९॥
ओं ह्रीं पीपमादिचतुर्विधतिनीयकरे पो अनर्गपदमाप्तये
अध नि०॥
जयमाला।
दोश।
श्रीमत तीरथनाथपद, माय नाय हितहेन ।
गावॉ गुणमालामवे, अजरअमरपद देत ॥१॥

(१९२), छंद घतानंद। जयभवतमभंजनजनमनकंजन, रंजन दिनमनि स्वच्छ करा। शिवमगपरकाशक अरिगनना:- शक, चौवीसों जिनराज वरा ॥२॥ छंद पड़ी। जय रिषभ देव रिषिगन नमंत। जय आजित जीतवसुअरि तुरंत । जय संभव भवभय करतः चूर । जय अभिनंदन आनंदपूर ॥३॥ जय सुमतिसुमतिदायक दयाल। जय पद्म पद्मद्युति तन रसाल ॥ जय जय सुपास भवपाशनाश । जय चंद चंदतनदुतिप्रकाश ॥१॥जय पुष्प- दंत दुतिदंत सेत । जय शीतल शीतलगुननि- केत ॥ जय श्रेयनाथ नुतसहसभुज । जय वास.. वपूजित वासुपुज ॥५॥जय विमल.विमल. पददेनहार । जय जय अनंत गुनगन अंपार ।। जय धर्म धर्म शिवशर्म देत । जय शांति शांति पुष्टी करेत ।। ६.॥जय कुंथु कुंथवादिक रखेयं । जय अर जिन वसुअरि छय करेय ।। जय मल्लि . मल्ल हतमोहमल.। जय मुनिसुव्रते व्रतसल्ल .

दल्ल॥७॥जय नमि नित वासवनुन सपेम । जय नेमनाथ पचक्रनेम ।। जय पारमनाय अनायनायाजयवर्द्धमान शिवनगरसाया पत्तानंद मंद। चौबीस जिनंदा आनंदकंदा पापनिकंदा मुख- कारी। तिनपद जुगत्रंदा उदय अमंदा, वासत्र- वंदा हितधारी॥९॥ औ ही श्रीपमादिचतुर्विगनिनिनेभ्यो महा निवामीति सोरठा। भुक्तिमुक्तिदातार, चौबीमा जिनराज वर । तिनपद मनवचधार, जोपून सो शिव लहें ॥१०॥ इत्यारीबीदः ( पुस्पांजलि रिपेन्) श्रीचंद्रप्रभजिनपूजा। इप्पर-अनोहर मनादेशार मान्दाहारशन्नामा वारुचरन आवरन, वरन वितहरनविहनवर। चंदचंदतनचरित, चंदयल चहृन चतुर नर । चतुक चंड चकचूरि, वारि चिदत्र गुनाकर। - ( १९४) चंचल चलितसुरेश, चूलनुत चक्र धनुरहर । चरअचरहितू तारनतरन, सुनत चहकि चिर- नंद शुचि । जिनचंदचरन चरच्यो चहत, चित- चकोर नचि रचि रुचि ॥१॥ दोहा । धनुष डेढसौ तुंग तन, महासेन नृपनंदः। मातुलछमनाउर जये, थापों चंदजिनंद ॥२॥ ओं ही श्रीचन्द्रपमजिनेन्द्र ! यत्र अवतर अनतर । संवोपट । ओं ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्र ! अन तिष्ठ तिष्ठ । । ओं ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्र ! अन मम सनिहिता भव भव । वपद् ।। अष्टका चाल. चानतरायकृन नंदोश्वराष्टकको अष्टपदो तथा होलीको तालमें, तथा गरामा आदि अनेक चालोंमें । गंगाहदानरमलनीर, हाटक गभरा। तुम चरन जजों वरवीर, मेटो जनमजरा ।। श्रीचंदनाथदुति चंद, चरनन चंद लगे। मनवचतन जजत अमंद, आतमजोति जगै॥।॥ ओं ही श्रीचन्द्रप्रपननेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामि०॥१॥ ..

1 १० श्रीखंडकपूर सुचंग, केशररंग भरी। घसि प्रासुकजलके मंग, गवानापहरी ॥ श्रीर ओम श्रीनन्द्रामानिनेन्द्र य भवनाविनाशनानंदन नियमित तद्वंल सित मोमसमान. साले अनियारे । दिय पुंज मनोहर आन, तुमपदतर प्यारे। श्री. योही श्रीचन्द्रमनिन्द्राग अक्षयपानाम नान निवास मुरद्रुमके सुमन सुरंग, गंधित अलि आवे । तासों पद पृजन चंग, कामविया जावे ॥ श्री. ही श्रीगंद्रनगजिनद्राग कामवागविश्वसनाम पनि पामि। नेवज नानापरकार, इंद्रियवलकारी। सो ले पद पूजों मार, आकुरताहारी ॥ श्री. गों की श्रीचन्द्र भनिनेन्द्राय दुधागगविनाशनाय भाई निर्वामि ॥५॥ तमभंजन दीप सँवार तुमगि धारनु हो । मम तिमिरमोह निवार, यह गुनधास्तुहोश्री ओं ही श्रीचन्द्रमभनिनेन्द्राय महाकाविनाशनाय श्री निशापि ॥ दशगंधहुतापनमाहि, हे प्रभु ववतु हीं। मम करम दुष्ट जरि जाँहि, यान मेश्नु हो। श्री है,

(१९६)
नों ही श्रीचन्द्रमजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निपामीति
स्वाहा ।। ७॥
अति उत्तम्फल सु मंगाय, तुम गुनगावतु हो।
पूजों तनमन हरपाय, विधन नशावतु हों। श्री.
ओं ह्रीं श्रीचंद्रप्रभजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति
4
'स्वाहा॥८॥
सजि आठो दरव पुनीत, आठों अंग नमों
पूजों अष्टमजिन मीत, अष्टम अवनिगमों।श्री०
ओं ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अनर्थ्यपदप्राप्तये अयं निर्वपा-
प्रीति स्वाहा।
पंचकल्याणक ।
छंद तोटक (वर्ण १२)।
कलि पंचमचैत सुहात अली। गरभागममंगल
मोद भली ॥ हरि हर्षित पूजतमातु पिता।हम.
ध्यावत पावत शर्मसिता॥१॥
ओं ही चैत्रकृष्णपंचम्पां गर्भमंगलप्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्रा-
य अर्धे निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥
कलि पौष इकादशि जन्म लयो। सब लोकविर्षे
सुखथोक भयो । सुरईशजजें गिरशीश तवै ।
हम पूजत हैं नुतशीस अबै ॥२॥

( १९७ ) पोको पापकादमां जन्ममंगलमातार श्रीनन्द्रः- निनेन्द्राय च नियामीति बाटा ॥२॥ तप दुद्धर श्रीधर आप धरा । कलिपॉप इण्या- रसि पर्व वरा निजध्यानविय लवलीन भये। धनि सो दिन पूजत विन्न गये ॥३॥ नोंदी पीपकृष्णकादश्यां निाक्रमणमनगवामिनाय. चन्द्रमजिनेन्द्राय प्र निपानीनि सारा ॥३॥ वर केवलभानु उद्योत कियो । तिहुँ लोकतणों भ्रम मेट दियो। कलिफाल्गुणसप्तमि इन्द्रजजे।। हम पूजहिं सर्व कलंक भजे ॥४॥ मों ही फागुनकृष्णगाम्यां नयनवानमंदिनाय धीमद. प्रभनिनन्द्राय अर्थ निपामानि स्वाहा ॥ ४ ॥ सित फाल्गुण सप्तमि मुक्ति गये। गुणवंत अनंत अबाध भये । हरि आय जजे तित मो- दधरे । इम पूजत ही सत्र पाप हरे ॥५॥ ओं ही फागुनगुनमालम्पा मोक्षगलमगिरनाय मंद्र- प्रभनिनेन्द्राय मध निर्मपामानि स्वार ५ ॥ प जयमाला। दोहा। हे मृगांकअंकितवरण, तुम गुण अगम अपार । .

- ( १९८) गणधरसे नहिं पार लहिं तौ को वरनत सार। पै तुम भगति हिये मम प्रेरै अति उमगाय । तातै गाऊं सुगुण तुम तुम ही होउ सहाय॥२॥ छंद पद्धरि (१६ मात्रा) जय चन्द्र जिनेन्द्र दयानिधान । भवकानन हानन दवप्रमान ॥ जय गरमजनममंगल दि- नंद । भविजीवविकाशन शर्मकंद ॥३॥ दश- लक्षपूर्वकी आयु पायं । मनवांछित सुख भोगे जिनाय ॥ लखि कारण है जगत उदास । चिं. त्यों अनुप्रेक्षा सुखनिवास ॥४॥तित लोकां- तिक बोध्यो नियोग। हरि शिविका सजि ध- रियो अभोग ॥ ताप तुम चढ़ि जिनचंदराय । ताछिनकी शोभा को कहाय ॥५॥'जिन अंग सेत सित चमर ढार। सित छत्र शीस गलगुलकहार ॥सित रतनजड़ित भूषण विचित्र सित चन्द्रचरण चरचें पवित्र ॥ ६ ॥ सित तनातिनाकाधीश आप।सित शिविका कांधे धरि सुचाप ॥ सित सुजस सुरेश नरेश सर्व । 1. चितमें चिन्तत-जात पर्व ॥७॥सित ( १९९) चंदनगरतें निकाल नाथ। सित बनने पहुंचे सकलसाथ ।। सितशिलाशिरोमाण स्वच्छछांह। सित तप तित धार्यो तुम जिनाह । मिन प- यको पारण परमसार । सित चंद्रदत्त दीनों उदार ।। सित करमें सो पयधार देत । मानों बांधत भवासिन्धुसत ॥ ९॥ मानों सुपुण्यधारा प्रतच्छ । तित अचरज पन सुर किय ततन्छ । फिर जाय गहन सित तपकरंत । लित केवल- ज्योति जग्यो अनंत ॥लहि समवसरणरचना महान जाके देखत सब पापदान । जस् तर अशोक शोभे उतंग। सब शोकतनो चूरे माम. ग!! ११ । सुर सुमनवृष्टि नभने सुहात । मनु मन्मथ तज हथियार जात ।। वानी जिन मुस- सौखिरत सार । मनु तत्वकागन मुकुर धार ॥१२॥जह चौसठ चमर अमर दुरंतो मनु सुजन मेघ झरि लगिय तत । मिहासन है जहं कमल मुक्त। मनु शिवसरवरको कमलशुक्त॥१॥ढुं दुभि जितवाजत मधुर सार । मनु करमजीतको है नगार ॥ शिर छत्रफिरें त्रय न्येत वर्ण । मनु (२००) रतन तीन त्रयताप हर्ण ॥१४॥ तनप्रभातनों मंडल सुहाताभवि देखत निजभव सात सात॥ मनु दर्पणद्युति यह जगमगाय । भविजन भव मुख देखत सुआय ॥१५॥ इत्यादि विभूति अनेक जान । वाहिज दीसत महिमा महान ॥ ताको वरणत नहिं लहत पार। तो अन्तरंग को कहै सार ॥१६॥ अनअंत गुणनिजुत करि विहार । धरमोपदेश दे भव्य तार ॥ फिर जो. गनिराधि अघाति हान । सम्मेदथकी लिय : मुकतिथान ॥ १७ ॥ वृन्दावन बन्दत शीश नाय । तुम जानत हो मम उर जु भाय ॥ तातें का कहाँसु बार बार । मनवांछित कारज सार सार॥१८॥ : छंद धत्तानंद । जय चंदजिनंदा आनंदकंदा, भवभयभंजन राजै हैं ॥ रागादिकद्वंदा हरि सब फंदा, मुक- तिमांहि थिति साजै हैं ॥१९॥ ओं ही श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय पूर्णाव निर्वपामीति स्वाहा ।।

(२०१) ईद मीनाला। आठौं दरव मिलाय गाय गुण, जो भविजन जिननंद जज ।। ताके भवभवके अघ भाजे, मुक्तसारसुख ताहि सजें ॥२०॥ जमके त्रास मिटें सब ताके, मकल अमंगल दूर भनें । वृ- न्दावन ऐसो लम्ति पूजत, जातं शिवपुरि गज रजें।॥ २१॥ इत्याशीवादः । परिपुष्पांजपिन् । इति श्रीचन्द्रप्रभजिनपूनी समान ॥ ८ ॥ (३८) श्रीवासुपूज्य जिनपूजा। छदस्प कपिध। श्रीमतवासुपूज्य जिनवरपद, पूजनहेत हिये उमगाय । पापों मनवचतन शुचिकारिक, जि- नकी पाटलदेव्या माय । महिए चिह्न पद लमे मनोहर, लाल बरन तन समतादाय । सो कल- नानिधि कृपादिष्टकरि, तिष्ठहु सुपरितिष्ट यह आय॥१॥ में ही श्रीमानुपूज्यजिनेन्द्र पत्र अवनर भवनर गौरद

(.२०२)
!
!
ओं ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्र ! अचं तिष्ठ, निष्ठ, ठः ठः
ओं ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्र ! अन मम सन्निहितो भत्र भत्र ।
वपट् ॥३॥
अष्टक।
छंद जोगीरासा | मांचलीबंध "जिनपदपून लवलाई ॥"
गंगाजल भरि कनककुंभमें, प्रासुक गंध मि-
लाई। करम कलंक विनाशन कारन, धार देत
हरपाई ॥ जिनपद पूजौं लवलाई ॥ वासुपूज
वसुपूजतनुज पद, वासव सेवत आई। बाल-
ब्रह्मचारी लखि जिनको, शिवतिय सनमुख
धाई। जिन ॥१॥
ओं ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं .
निवपामीति स्वाहा ।। १ ।।
कृष्णागरु मलयागिरिचंदन, केशरसंग घसाई।
अवआताप विनाशनकारन,
पूजों पद चित.
लाई ॥वा०॥२॥
ओं ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चंदन निर्व-
पामीति स्वाहा ॥२॥
देवजीर सुखदास शुद्ध वर, सुवरनथार भराई।
पुजधरत तुम चरनन आगैं,तुरित अखय पद-
पाई।वा०॥३॥

4 (२०३) भों ही श्रीवामुष्यजिनेन्द्राय अक्षयपदमाप्तये मानन नि. पामीनि स्वाहा ॥३॥ पारिजात संतानकल्पतरू,-जनित सुमन बहु लाई। मीनकेतुमदर्भजनकारन, तुम पदपा चढाई ॥ वा०॥४॥ नों ही श्रीवासुपूश्यगिनेन्द्राग कामवाणविनमनाय इप्पं निर्व नव्यगव्यआदिकरसपूरित नेवन तुरित उपाई छुधारोग निरवारनकारन, तुम्हें जजों शिरनाई ओही श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय सुधारोगविनाशनाय नमेधं नि. दीपकजोत उदोत होत वर, दशदिसमें छवि छाई । तिमिरमोहनाशक तुमको लखि, जजों चरन हरपाई ॥वा०॥६॥ ओही श्रीवासुपूज्य जिनेन्द्राय माहान्धकारविनाशनाग दीप निपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ दशविध गंधमनोहर लेकर, वातहात्रमें डाई । अष्ट करम ये दुष्ट जरतु है,धूम सु घूम उड़ाई। ओंनी श्रीवासुपूज्य जिनेन्द्राय अटकपदहनाग पं निश- मीति साहा ॥७॥ सुरस सुपकसुपावन फल लें, कंचनयार भराई ।

(२०४) मोच्छ महाफलदायक लखि प्रभु, भेंट धरों गुनगाई। वा०॥८॥ ओं ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फर नि: ॥८॥ जलफल दरम मिलाय गाय गुन, आठौं अंग नमाई। शिवपदराज हेत हे श्रीपति ! निकट धरो यह लाई।वा०॥९॥ ओं ही श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्रायअनयपदमाप्तये अर्व नि० १९॥ पंचकल्वाणक। छंद पाईता ( मात्रा १४)। कलि छ? असाइ सुहायो। गरभागम मंगल पायौ ॥ दशमें दिवित इत आये । शतइंद्र जजे सिर नाये ॥१॥ ओं ह्रीं आषाढकृष्णपष्ठयां गर्भमङगलमण्डिताय श्रीवासुपूज्य- जिनेन्द्राय अर्घ निर्व०। कलि चौदश फागुन जानों। जनमे जगदीश महानों। हरि मेर जजे तब जाई। हम पूजत हैं चितलाई ॥२॥ ओं ह्रीं श्रीफाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यां जन्ममङ्गलप्राप्ताय श्रीवा- सुपूज्यजिनेन्द्राय अयं नि।

स (२०५ ) तिथि चौदस फागुन श्यामा। धरियो तप श्री- आभिरामा।। नृप सुंदरके पय पायो। हम पूजत अतिमुख यायो॥३॥ ओं ही फागुनकपणचतुर्दश्णं तपामंगलपासाय श्रीवासुपूर इपभिनन्द्राय अब नि। वदि भादव दोइज सोहे। लहि केवल आतम जोहे । अनअंत गुनाकर स्वामी। नित बंदी त्रिभुवन नामी ॥४॥ ओं ही भाद्रपदकृपा द्वितीयायां केवलनानमण्डिताय श्रीवामु- पूज्यजिनेन्द्राय अब नि। सितभादवचौदशि लीनों ।। निरवान सुथान प्रवीनों ॥ पुर चंपाथानकसेती। हम पूजत नि- जहित हेती॥५॥ ओं ही भाद्रपदशकचतुर्दश्यां मोतमङ्गलप्राशाय श्रीवासु- अपमिनेन्द्राय अर्थ नि। जयमाला। - दोहा। चंपापुरमें पंचवर, कल्याणक तुम पाय । . सचर धनुतन शोभनो, जेजेजे जिनराय || छंद मोतियदाम ( वर्ण १२)। महासुखसागर आगर ज्ञान । अनंत.सुखामृत- भुक्त महान ॥ महाबलमंडित खंडितकाम । र. माशिवसंग सदाविसराम ॥२॥सुरिंद फनिंद खगिद नरिंद। मुनिंद जजै नित. पादरविंद ।। प्रभूतुव अंतरभाव विराग। सुवालहितें व्रतशी- लसों राग ॥३॥कियों नहिं राज उदाससरूप। सुभावन भावत आतमरूप॥ अनित्य शरीर अपंच समस्त । चिदातम नित्य सुखाश्रित वस्त ॥ ४॥अशन नहीं कोउ शन सहाय । जहां जिय भोगत कर्मविपायः ॥ निजातमकै परमे- सुर शन। नहीं इनके विन आपदहन ॥५॥ जगच जथा जलबुद्बुद येव । सदा जिय एक लहै फलभेव ॥ अनेकप्रकार धरी यह देह । भमें भवकानन ,आन न नेह ॥६॥ अपावन सांत कुधात भरीय । चिदातम शुद्धसुभाव धरीय ॥ घरै इनसों जब नेह तबेव। सुआवत कर्म तबै वसुभेव ॥ ७॥ जबै तनभोगजगत्तउदास । धेरै तब संवर निर्जरआस करें जब कर्मकलंक विनाश । लहें नव मोक्ष महानुखराश ॥८॥ तथा यह लोक नराकृत नित्त । विलोकिर ने पटद्रव्यवित्रिच॥सुआतमजानन बाधविहीन ! घर किन तत्वमतीत प्रवीन ॥९॥ जिनागम. ज्ञान रु संजमभाव । सबै निजज्ञान विना विर- साव । सुदुर्लभ दृव्य सुक्षेत्र सुकाल । मुभाव सवे जिहतें शिव हाल॥१०॥लयो सब जोग सुपुन्य वशाय ! कहो किमि दीजिये ताहि ग- वाय ॥ विचारत या लवकान्तिक माय ! नमें पदपंकज पुष्प चढ़ाय ॥ ११॥ कयो प्रभु धन्य कियो सुविचार । प्रबोधि मु येम कियो जु वि. हार ।। तय सर्वधर्मतनों हरि आय । क्यों शि- विका चदि आप जिनाय॥ धरे तप पाय सुके- बलबोध दियोउपदेश लुभव्य संवोध ।। लियो फिर मोन्छ महानुखराश । न निल भक्तः सोई मुख आश भानना नित वासचन्दन. पापनिकंदन, वामपन -- ... --- ४

(२०८)
ब्रह्मपती। भवसंकलखंडित, आनंदमांडत, जै
जै जै जैवंत जती॥१४॥
ओं ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय पूर्णा निर्वपापीति स्वाहा १४.
सोरठा छंद ।
वासपूजपद सार, जजै दरबविधि भावसों।
सो पावै सुखसार, भुक्ति मुक्तिको जोपरम:१५.
इत्याशीर्वादः । परिपुष्पांजलिं क्षिपेत् ।
इति श्रीवासुपूज्यजिनपूजा समाप्त ।।
श्रीशान्तिनाथ जिनपूजा।
मत्तगयंद छंद । ( तथा यमकालंकार),-
या भवकाननमें चतुरानन, पापपनानन घेरि
हमेरी । आतमजानन मानन ठानन , बान न
होन दई सठ मेरी। तानंद भानन आपहि हो,
यह छानन आन न आननटेरी आन गही
शरनागतको, अब श्रीपतजी पत राखहु मेरी
ओं ह्रीं श्रीशांतिनायजिनेंद्र ! अत्र अवतर अवतर। संवौ-
षट् ॥ १॥
मों ही श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्र ! पत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठामगाशा
ओंछी श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द! अत्र मम सन्निहितो भव भक
अषट् ॥३॥

*
(२०६)
द मिमगी। अनुमगाम । ( मा ३२ जागा)
हिमगिरिगतगंगा, धार अभंगा, प्रामुक संगा
भरि भुंगाजरमरनमृतंगा, नाशि अघंगा,
पूजि पदंगा मृदुहूंगा ॥ श्रीशान्तिजिनेशं. नु-
तशक्रेशं वृश्चक्रेशं, चक्रेशं । इनि आरित्र,
हे गुनधेशं दयामृतेशं मवेशे ॥१॥
ओं ह्रीं श्रीशान्तिनापमिनेन्द्राय जन्मजरा मदिनाउनाद
जल निपामीति ॥१॥
वर वावनचंदन, कदलीनंदन, धनआनंदन स-
हित घसों। भवतापनिकंदन, एरानंदन, इंदि
अमंदन, चरनवसों॥ श्री ॥२॥
नों ही धीशान्तिनापजिनेन्द्राय भवनापविनागनाथ चंदन
नियमीत ॥२॥
हिमकरकरि लजत, मलयसुमनन. अच्छाज-
बत, भरियारी । दुखदारिद गजन, मद पदार-
बत, भवभय भजत, अतिभारी श्री ॥३॥
सोही मानिनायनिनन्द्राए अश्पन्दननन.
पानीतिः ॥३॥

, ०॥४॥ (२१०) मंदार सरोजं, कदली जोज, पुंज भरोजं, मल- यभरं, भरि कंचनथारी, तुम ढिंग धारी, मदन- विदारी, धीरधरं ॥ श्री०॥४॥ ओं ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय कामवायविध्वंसनाय पुष्प निवपामीति पकवान नवीने, पावन कीने, षटरसभीने, सु- खदाई। मनमोदनहारे, छुधा विदारे, आगे घारे, गुनगाई॥श्री०॥५॥ ओं ही श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीतिः॥५॥ तुम ज्ञानप्रकाशे, भ्रमतम नाशे, ज्ञेयविकाशे सु. खरासे । दीपक उजियारा, यात धारा, मोहनि- बारा, निज भासे ॥ श्री०॥६॥ ओं ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीप निर्वपामीति०॥६॥ चन्दन करपूरं, करि वरचूरं, पावक भूरं, माहि जुरं । तसुधूम उडावे, नाचत जावे, अलि गुं- जावे, मधुरसुरं ॥ श्री०॥७॥ . ओंड्रीं श्रीशान्तिनायजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निवपामीतिः बादाम खजूर, दाडिम पूरं, निंबुक भूरे, से आयो । तासों पर जजों, शिवफल सम्जों, निजरसरज्जों, उमगायो । श्री० ॥८॥ मों ही श्रीशान्तिनाय जिनेन्द्राय मोक्षक नाम फन विशा- मीति स्वाहा॥5॥ वस द्रव्य सवारी तुमटिंग धारी, आनंदकारी, गप्यारी । तुम हो भवतारी, करनाधारी बातें यारी, शरनारी ॥ श्री०॥९॥ नों ही श्रीशान्तिनायजिनेन्द्राय अनर्यपदमामये अर्थ निदेश- मीति स्तारा॥ पंचकल्याणक ! मुंदर नया द्रुतविदित छंद। असित सातय भादव जानिये गरममंगल ता- दिन मानिये ।। सत्रि कियो जननी पद चर्चनं । इम करें इत ये पद अर्चनं ॥१॥ गों की भाद्रपद कृष्णसप्तम्यां गर्भपंगसमटनाय श्रीशानना अनिनेन्द्राग अप निर॥ जनम जेट चतुर्दश क्याम है। सकलइंद्र न.

(२१२)
आगत धाम है ।गजपुरै गजसाजि सबै तबै ।
गिरि जजे.इत मैं जजि हों अबै ॥२॥
मों ही ज्येष्ठकष्णचतुर्दश्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीशान्तिनाय-
जिनेन्द्राय अर्घ नि० ॥२॥
भव. शरीर सुभोग असार हैं । इमि विचार तबै
तप धार हैं ॥ भ्रमर चौदश जेठ सुहावनी ।
धरमहेत जजों गुन पावनी ॥३॥
ओं ही ज्येष्ठकृष्णाचतुर्दश्यां नि:क्रममहोत्सवपण्डिताय श्री.
शान्तिनायजिनेन्द्राय अर्घ नि०
शुकलपौष दशैं सुखराश है। परम-केवल ज्ञान
प्रकाश है ॥ भवसमुद्रउधारन देवकी । हम करें
नित मंगल सेवकी॥४॥
ओं ही पौषशुक्लदशम्यां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीशान्तिनाथजि-
नेन्द्राय अर्घ नि०॥
आसित चौदस जेठ हने अरी । गिरि समेदथकी
शिव-तिय वरी॥सकल इंद्र जजै तित आइक।
हम जजै इत मस्तक नाइकैं॥५॥
ओं ही ज्येष्ठकृष्णचतुर्दश्यां माक्षमंगलप्राप्ताय श्रीशांतिनाथ-
जिटाय अर्घ नि ॥५॥

(२१३) जयनाला। मंद म्योरता, चंद्रयास तया चंद्रयम (वन १२ गटानुमान) । शान्ति शान्तिगुनमंडिते सदा । जाहि ध्यावत मुपंडिते सदा ॥ में तिन्हें भगतमंडिने सदा । पूजि हों कटपहंडिने सदा ॥ १॥ मोन्टेन तुम ही दयाल हो । हे जिनेश गुनग्लमाल हो। में अवै मुगुनदाम ही घरों । ध्यावते तुरिन मुक्ति तोवरों ॥२॥ छंद पद्धार (१६ मात्रा)। जय शान्तिनाथ चिपराज । भवसागरमें अद- भुत जहाज ॥ तुम तजि मरवारथसिद्ध धान। सरवारयजुत गजपुर महान ॥१॥तित जनम लियो आनंद धार । हरि तताइन आयो राज- द्वार ॥ इंद्रानी जाय प्रसूतथान । तुमने करमें ले हरप मान ॥२॥ हरि गोद देय सो मोदधा- र । सिर चमर अमरढारत अपार गिरिराज जाय तित शिलापांड है ताप थाप्पो अभिषेक मांड ॥३॥ तित पंचम उदधितनों सु वार ! .

(२१४) सुर कर कर करि ल्याये उदार ॥-तब इंद्र सह- सकर करि अनंद । तुम सिर धारा ढारयौ सु- नंद ॥४॥अघ घ घ घघ धुनिहोत घोर । भभ भभ भभ घघ घघ कलशशोर ।। हमहम हमहम बाजत मृदंग। झन नन नन नन नन नूपुरंग ॥५॥ तन नन नन नन नन तनन तान धन नन नन घंटा करत धान ॥ताई थेई थेई थेई थेई सुचाल । जुत नाचत नावत तुमहि भाल॥६॥ चट चट चट अटपट नटत नाट । झट झट झट हट नट शट विराट ॥ इमि नाचत राचत भगतरंग । सुर लेत जहां आनंद संग॥७॥ इत्यादि अतुल मंगल सुठाट । तित वन्यो जहां सुरगिरि विराट । पुनि करि नि- योग पितुसदन आय । हरि सौंप्यो तुम तित वृद्ध थाय ॥ पुनि राजमाहि लहि चक्ररत्न । भोग्यौ छखंड करि धरम जत्न ॥ पुनितपरि केवलरिद्धि पाय । भवि जीवनकों शिवमग ब- ताय ॥ शिवपुर पहुंचे तुम हे जिनेश । गुनमं- डित अतुल अनन्त भेष | मैं ध्यावतु हौ.नित (२१५) शीश नाय हमरी भवचाबाहरि जिनाय ॥१०॥ सेवक अपनी निज जान जान । करना करि भाभय भान भान ॥ यह विधन मूल तरु खंड खंड।त्रितचिन्तित आनंद भंड मंड ॥१६॥ पचानंद वेद ( मात्रा ११)। श्रीशान्ति महता, शिवतियकवा, मुगुन अनं- ता, भगवन्ता। भवभ्रमन हुनता, सोस्य अनं- ता, दातारं तारनवन्ता ॥१॥ ओं ही शान्तिनायजिनेन्द्राय पुरि निर्वगामी त बाहा । छंद रूपफ संबया (मात्रा ३१) । शांतिनाथाजिनके पदपंकज, जो भवि पूजे मन- वचकाया जनम जनमके पातक ताके, ततछिन ताजेके जाय पलाच ॥ मनवांछित सुख पावे सो नर, वांचे भगतिभाव अतिलाय (तात 'वृन्दा. वन नित वंदे, जातं शिवपुरराजकराय॥१॥ इलागादिः । पुमांगति क्षिपेत् । इनि श्रीशान्तिनायजिनपुमा समाम ।। १६ ! wainment nemand (२१६) जीता। (४०). अथ पार्श्वनाथ पूजा। वर सुरग आनतको विहाय सुमातवामा सुत भये । विस्वसेन के पारस जिनेसुर, चरन तिनके सुर नये ॥ नव हाथ उन्नत तन बिराजे उरग, लच्छन अतिलशै। थापू तुम्हें जिन आय तिष्ठ- हु करम मेरे सब नशै॥१॥ ओं ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेंद्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ओं ही श्रीपार्श्वनाथ जिनेंद्र अत्र निष्ठ तिष्ठ । ठा॥ ओं ही श्रीपार्श्वनाथ जिनेंद्र ! अंनं मम सनिहितो भव भव बषट् । क्षीर सोमके समान अंबुसार लाइये । हेमपात्र धारकेसु आपको चढाइयें ॥ पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करूं सदा । दीजिये निवास मोक्ष, भू. लिये नहीं कदा॥६॥ ओं ही श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय 'जन्मजरामृत्युविनाशनाय नलं निर्षपामीति स्वाहा ।' चन्दनादि केशरादि स्वच्छ गंध लीजिये। आप चर्न चर्च मोहतापको हनीजिये। छन्द नाराचा (२१७) पार्श्वनाथदेव मेव आपकी करं सदा । दीजिये निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा ॥ २ ॥ यों दी श्रीनागजिनेंद्राय भवनापविनाशनाय चंदनं नि- पापोनि मासा ॥ फेन चंदके समान अक्षत मगाइकें । पादके स- मीप सार पूजको रचाइकें । पार्श्वनाथ ० ॥३॥ ओं ह्रीं श्रीपश्चनाय जिनेंद्राय अक्षयामासये सपनान, नियामानि स्वाहा ॥ केवड़ा गुलाब और केतुको चुनाइये। धारचर्न के समीप कामको नसाइये । पार्श्वनाथ ॥ मों ही श्रीपार्थनायजिनेंद्राय कामवाणविध्वानाय पुष्पं निपामीति स्वाहा ॥ घेवरादि वावरादिमिष्ट सपिमें सने आप चर्नर- चैते छुधादि रोगको हने । पार्थताय ॥५॥ ओं ही श्रीपाल नागजिनेंद्राय तुयारागविनामनाय नये निर्व- पामीति स्वादा। लाय रन दीपको सनेह पुरके भरू। वातिका कपूरचारि मोहवांतको हलं पाधनाथ ॥६॥ ओंनी श्रीपधिनापविनद्राय नोटांधकारविनाशनाए ही fiपापीति साहा ॥

. (२१८) धूप गंध लेयके सुअग्निसंग जारिये । तास धू- पके सुसंग अष्टकर्म बारिये ॥ पार्श्वनाथ ॥७॥ ओं ही श्रीपार्श्वनाथजिनेंद्राय अष्टकर्मदहनाय. धूपं निर्व- प्रामीति स्वाहा ॥ खारिकादि चिर्भटादिरत्नथालमें धरूं। हर्षधा- रके जजूंसुमोक्ष सुक्खकुंवरूं। पार्श्वनाथः ॥८॥ ओं ह्रीं श्रीपार्श्वनायजिनेंद्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपा- मीति स्वाहा ॥ नीर गंध अक्षतं सुपुष्प चार लीजिये । दीपधू- प श्रीफलादि अर्घौ जजीजिये ॥ पार्श्वनाथ मों ही श्री.पार्श्वनाथजिनेंद्राय अनयंपदप्राप्तये अध्ये निर्व- पामीति स्वाहा। पंचकल्याणक। . मदचाल। शुभआनत स्वर्ग विहाये । वामा माता उर आ- ये। वैशाखतनी दुति कारी, हमपूर्ण विघ्न निवारी ॥१॥ ओं ह्रीं वैशाखकृष्णद्वितीयायां गर्भमंगलप्राप्ताय श्रीपार्श्वना- अजिनेन्द्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ - PM

जनमें त्रिभुवन मुखदाता, एकादशि पोप वि.
ख्याता । झ्यामातन अदभुत राजनिविरित
नेजसु लाजे॥
को ही पोप फादरपो जन्ममगनपरिमाय माग
मायजिनेन्द्राय श्रीनिमीन माहा।
कलि पोप इकादशि आई, तब बारह भायन
भाई। अपने कर लौच नुकीना। हम पूजें वर्न
जजीना॥३॥
साही पोपका कमालटिनाय शीया माग
जिनेन्द्राय नपामीति माह |३||
कलित चतुर्थी आई, प्रभु केवलज्ञान उपाई ।।
तब वृप उपदेश जु कीना, भवि जीवनको सुन्न
दीना॥४॥
ओं ही कम्पनी दिने पेनशानमाभाय थीरामना.
यनिहाय अर्थ नियामाजिम्पार ॥ ४ ॥
सित श्रावन सात आई. शिवनारिरी जिन-
राई । सम्मंदावल हरिमाना, दम पर्ने माच्छक
ल्याना ॥ ५॥
मोदी भावणमनमानीदिन लगातग्निान श्रीपा-
मनायनिनेन्द्राय निवामीनपारा॥५॥

(२२०) जयमाला। कविता दोहा । पारसनाथ जिनेंद्रतने बच पौनभखी जरते सु- नपाये। कियोसरधान लियो पद आन भये प- झावती शेष कहाये। नामप्रतापटरे संताप सुभ- व्यनको शिव शर्म दिखाये । हो विश्वसेनके नंद भले गुन गावतु हैं तुमरे हरखाये ॥१॥ केकीकंठ समान छवि, वपु उतंग नव हाथ । लच्छन उरग निहार पग, बंदू पारसनाथ ॥२॥ चंद मोतिक्षाम। रची नगरी षट मास अगार। बने चहुं गोपुर शोभ अपार ॥ सुकोट तनी रचना छवि देत । कंगूरनपै लहके बहुकेत॥३॥बनारसकी रचना छवि सार ।करी बहुभांति धनेश तयार ।। तहां विश्वसेन नरेंद्र उदार।करें सुख वाम सुदे पंटनार ॥४॥तज्योतुम आनत नाम विमान। भये तिनके वर नंदन आन। तबैपुर इंद्र नियोगजुआय। गिरिंद करी विधि न्होनसु जाय ॥५॥पिता १२२१) घर मौपि गये निज घाम । बुवर करे बानु जाम सुकाम बिजिनदीज मयंकनमान । म बहु बालक निर्जर आन || ॥ भये जब अ. टमवर्ष कुमार । घरे अणुवृत महानुम्वकार ।। पिता जब आन करी अरदान करा तुमच्याह वरो मम आश ॥ ७ ॥ करत नाहि कहे जगचंद । किये तुम काम कपाय जु मंद ॥ चढे गजराज कुमारन मंग । सुदेखत गंगतनी सु तरंग ॥ ८॥ लक्ष्योहक रंक करे तप घोर। चहूं दिशि अग्नि बले अनिजोर ।। कही जिन- नाथ अरे सुन धान । करे बहु जीवननी मत घात ॥९॥ भयो तब कोपि को कित जीन । जले तत्र नाग दिखाय सजीव ॥ लम्यो इद कारन भावन भाय । नये दिव वा ऋशीधर माय ॥१०॥ नये सुर चार प्रकार नियोगि । घरी शिविका निज कंघ मनागि ॥ किया बन मादिनिवार जिनं। घर का वाग्नि आनं. दकंद ।।। १ । गत अमकेगवान गरे घनदत्त तने जु अवास ॥ दियो परदान महा-

(२२२)
सुख सार । भई पण वृष्टि तहां तिहं बार॥१२॥
गये तब कानन माहि दयाल। घरयो तुम योग
सबै अघ टाल ॥ तबै वह धूम सुकेत अजान ।
भयो कमठाचरको सुर आन ॥ १३ ॥ करे.
नभगौन लखे.तुम धीर । सुपूरव वैर विचार
गहीर ॥ कियो उपसर्ग भयानक घोर । चली
बहु तीक्षण पौनझकोररह्यो दशहूं दिशिमै तप
छाय । लगी बहु अग्निं लखी नहिं जाय ॥सु-
लंडनके विन मुंड दिखाय । परैजल मूसलधार
अथाय ॥१५॥ तबै पदमावतिकंथ घनिंद ।
गहे जुग आय तहां जिनचंद ॥भग्यो तंब रंक
सुदेखत हाल । लह्यो तब केवल ज्ञानविशाल
॥१६॥ दियो उपदेश महा हितकार। सुभव्यनि
बोधि समेद पधार ॥ सुवर्णहभद्र सुकूट
प्रसिद्ध । वरी शिवनारि लही वसुरिद्ध ॥ १७ ॥
जजू तुम चर्न दुहूं कर जोर । प्रभू लखिये अब
ही म्म ओर ॥ कहै 'वख्तावर' रत्न' बनाय।
जिनेश हमें भवपार लगाय ॥१४॥

(२२३) जे पारसदेवं सुरकृतसवं बंदत वन नुनागपती करनाके धारी पर उपगारी शिवमुखकारी कर्म हती॥ १९॥ मानी श्रीपाश्र्वनाथ जिनेन्द्राय महाध निरपानीस्निादा।। irमारला जो पूजे मन लाय भव्य पारस प्रभु नित ही। ताके दुख सब जांय भीति व्यापे नहि कित्तही ।। सुख संपति अधिकाय पुत्रमित्रादिक सारे। अनुक्रमतें शिव लहे रत्न इमि कहें पुकारे॥२०॥ रमा कि मामला RAIL (११) श्रीवर्द्धमानानमना। महारा श्रीमतवीर हरे भवपीर, भरे सुनसार अनाक- सनाई। कहरिअंक अरोकरदक. नये हरिपंक तिमोलि सुआई ॥ में तुमको इन धापन हो प्रभु: भक्ति समेत हिये दरखाई । हे करणा- (२२४) नधारक देव, इहां अब तिष्ठ हु शीघ्रहि आई। ओं ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्र ! यत्रभवतर अवतर । संवौषट् ॥ ओं ही श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ॥२॥ ओं ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितोभव भव । वषट् ३. अष्टका छंद अष्टपदी। (द्यानतरायकृत नंदीश्वराप्टकादिक अनेक रागोमें भी बनती है ) क्षीरोदधिसम शुचि नीर, कंचनभंग भरों। प्रभु वेग हरो भवपीर, यातें धार करों। श्रीवीरमहा अतिवीर सन्मतिनायक हो। जय वर्द्धमान गुणधीर सन्मतिदायक हो॥१॥ ओं ही श्रीमहावीरजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति म्वाहा ॥१॥ मलयागिरचंदनसार, केसरसंग घसा।। प्रभु भव आतापनिवार,पूजत हिय हुलसा श्री० ओं ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय भातापविनाशनाय चंदनं नि- पामीति० ॥२॥ तंदुलसित शशिसम शुद्ध, लीनों थार भरी। तसु पुंज घरों अविरुद्ध, पावों शिवनगरी श्री ।

(२२५) ओं ही श्रीमहावीरजिनेन्द्राय मापदभार असमान नि पामीति ॥३ सुरतरुके सुमन समेत. सुमन मुमनप्यारे । सो मनमथभंजनहेत. पूजी पदयारे ॥ श्री०४ ओं श्रीमहावीरमिनेन्द्राय कामशक्मिनाय पुर्ण निर्मपामीनिः ॥४॥ रसरजत सजत सद्य, मजत थार भरी। पद जज्जतरजत अद्य, भन्नत भूख अरी॥ श्री. ओही श्रीमहावीरजिनेन्द्रीय कुमारोगविनाशनाय नै निर्वष पीतिः ॥ ५॥ तमखांडित मंडितनेह, दीपक जोवन हों।। तुम पदतर हे सुखगेह, भ्रमतम खोवन हो। श्री. तोही सीपहायोसामनन्द्राय महान्यारमिनारनामा निशाणाति ॥६॥ हरिचंदन अगर कपूर, चूर सुगन्ध करा। तुम पदतर वन भूरि आट कर्म जरा। श्री॥ गोधीपदमीनेन्द्र मानिय निक रितुल कलपार्जित लाय, कंचनवार मा। शिव फलहित हेजिनराय, तुमडिंग भेट घरा श्रा. , -- .

. (२२६) नों ही श्रीमहावीरजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वामीति स्वाहा ||८॥ जलफल वसु साजि हिमथार, तनमनमोद धरों। गुण गाऊं भवदधितार, पूजत पाप हरों ॥ श्री ओं ही श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदमाप्तये अयं निवपा- मीति स्वाहा ॥९॥ पंचकल्याणक। राग टप्पाचालमें। मोहि राखो हो, सरना, श्रीवर्द्धमान जिनराय- जी, मोहि राखो गरभ साढ़सित छह लियो तिथि, त्रिशला उर-अघहरना। सुर सुरपति तित सेव करयोनित, मैं पूजों भवतरना।मोहिरा ओं ह्रीं आषाढशुक्लषष्ठयां गर्भमंगलपण्डिताय श्रीमहावीरजिने- न्द्राय अर्य नि०॥ जनम चैतसित तेरसके दिन, कुंडलपुर कनव- रना। सुरगिर सुरगुरु पूज रचायो, मैं पूजों भवहरना ॥ मोहिरा०॥२॥ ओं ह्रीं चैत्रशुक्लत्रयोदश्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीमहावीरजि- नेन्द्राय अर्थ नि०॥

मगमिर अमिर मनोहर दशर्मा. ना दिन ना आवरना । नाकमान्यर पारन कानों में जो तुम चरना। मोहिगा ही मानपादाम्प नागलटारगमनाली मंजिनेन्द्राय अनि॥ शुकलदो वैशाम्वदिवम अरि, घान तुक छ- यकरना। केवललहि भवि भरसर नारे. जलों वरन सुख भरना ।। मोहि ॥४॥ ओही नगासादनम् नाममा जिनेन्द्राय म नि ॥ कातिक झ्याम अमावस शिवनिध, पाचापुरने वरना। गनेफनिवृंद जजे मिन बहुविषि. में पूजा भयहरना । मो० ॥५॥ भोपाल ុះ , EET- जिनेन्द्राय नि ! । :::::: गनधर अमनिधर. रघर, हमर गदापरव. रखदा। अम नागर विशामुघर निरसनयर RAM (२२८) सेवहिं सदा ॥ दुखहरन आनंदभरन तारन, तरन चरन रसाल हैं। सुकुमाल गुनमनिमाल. उन्नत, भालकी जयमाल हैं॥३॥ घत्तानन्द। . जय त्रिशलानंदन, हरिकृनबंदन, जगदानंदन, चंदवरं । भवतापानकंदन, तनकनमंदन, रहित सपंदन नयन धरं ॥२॥ छंद तोटक। जय केवलभानुकलासदनं। भविकोकविकाश- नकंदवनं ॥ जगजीत महारिपु मोहहरं । रज- ज्ञानहगावर चूरकरं ॥१॥ गर्भादिकमंगलम- डित हो। दुख दारिदको नित खंडित हो। जगमाहिं तुमी सत पंडित हो। तुम ही भवभा- वविहडित हो ॥२॥ हरिवंशसरोजनकों रवि हो।बलवंत महंत तुमी कवि होलिहि केवल ध- मप्रकाश कियौ । अबलों सोईमारगराजति यौ। पुनिआप तने गुनमाहिं सही।सुर मगर, जितने सबही । तिनकी वनिता गुन गावत हैं । लय माननिसामनभावत है।। १।। पुनि नाचत रंग उमंगभरी तुझ भनिवि परायेमधरी | अननं झननं झननं झननं । सुरलेत नहाँ नननं तननं ॥५॥घननं घननं घनघंट बजे दम दम मिरदंग सजे ।। गगनांगनगभंगता सुगता। ततता ततता अतता वितता ॥ ६॥ गतां गतां गति वाजताई। सुरताल रसाल जुहा. जत । सननं सननं सननंनभाइकरूप अनेक जुधारि भमे॥७॥ कई नारिमुवीन बजावति हैं। तुमरो जस उजल गावति हैं। करतालवि- करताल धरें। सुरताल विशाल जुनाद करें ॥८॥इन आदि अनेक उछाइमरी । मुरम- क्ति करें प्रभुजी नुमरी ।। तुमही जगजीवनिके पितु हो। तुमही विनकारनत हितुहीं । तुमही सब विघ्नविनाशन हो। तुमही निज आनंद भासन हो ।तुमही वित्तर्विततदायक हो । जग- माहि तुमी सच लायक हो ॥तुनरे पनमंगलमा- हिं सही। जिय उत्तम पुन्नलियो मात्र ही है. मको नुमरी सरनागत है । नुमरे गुनमें मन

.
(२३०)
पागत है ॥ ११॥ प्रभु मोहिय और सदा बसि-
ये । तबलों वसुकर्म नहीं नसिये ॥ तब-
लों तुम ध्यान हिये वरतो। तबलों श्रुतचिंतन
चित्त रतों ॥१२॥ तबलों व्रत चारित चाहतु
हों। तबलों शुभ भाव सुगाहतु हों। तबलौं
सत संगति नित रहौ । तबलों मम संज्रम चिच
गहौ ॥१३॥ जैवलों नहिं नाश करों अरिको
शिवनारि वरो समता धरिको। यह यों तंबलों
हमको जिनजी। हम जाचतु हैं इतनी सुनजी
घत्तानंद)
श्रीवीरजिनेशा नमितसुरेशा, नागनरेशा भग-
ति भरा। 'वृंदावन ध्यावै विघननशावेबांछित
पाव शर्म वरा ॥१५॥
को ही श्रीवईमानजिनेन्द्राय महाधैं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दोहा ।
श्रीसनमतिके जुगलपद, जो पूजे धरि प्रीत ।
वृंदावन सो चतुरनर, लहै मुक्तिनवनीत ॥१६॥
इत्याशीर्वादः। परिपुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।
इति श्रीवर्द्धमानजिनपूनां समाप्त ॥ ४१ ॥

[ २३१) अपनानाविक चारहखडी। प्रथम नम अरतको नमूं निद आचार। उपाध्याय सव साधुको, नमें पंच परकार ।। १ ।। भजन कर श्रीआदिको अंत नाम महावीर । तीर्थकर उचीसको, नमुं ध्यान घर धीर ॥२॥ जिनधुनितें वानी सिरी, प्रगट भई संभार । नमस्कार तार कर हकत्रिन इनमन धार॥३॥ जा वानीके सुनतही, बढयों परम आनंद। भई सुरति कलुकहन की बारखडीक छंद ॥शा चारखडीके छंद बनाऊं यह मेरे मन आई। जैन पुराण वखानी बानी, मो मने सुन पाई ।। गुरुप्रसाद भविजनकी संगति का उपनी चतु. राई । सूरत कदे बुद्धि है शोरी, श्रीनिन नाम सहाई । कमा करन मदा फिलो जनमन मग्न अनंकालय वागाजानिम, काजन मगरनी एक ॥ काज न मुघरचा एक दिवाने. में शुभ (२३२) अशुभ कमाया । तेरी भूलि तुहीं दुखदाई, बहु तेरा समुझाया। भटकत फिरयो चहूं गति भी- तर काल अनंत गमाया। सूरत सत गुरु सीख न मानी तातै जग भरमाया ॥ ५॥ खक्खा खूबी मत लखो संसारीसुखजाना यह सुख, दुख का मूर है, सतगुरु कही बखान ॥ सतगुरु कही बखान जान यह, तू मति होय अयाना। विनाशीक सुख इन इंद्रिनका, ते मीठा करि जाना ॥ यह सुख जानि खानि है दुखकी, तू क्या भरम भुलाना । सूरत पछतावेगा तबही, होय नरक जब थाना॥६॥ गग्गा गुरु निर- ग्रंथको, सतवानी मुख भाख अवर विकार सबै तजो यह थिरता मन राख । यह थिरता मन राखि चाखि रस, जो अपना सुख चाहे । अवर सवहि जंजाल दूर करि ये बातें अवगाहे ॥पां- चौ इंद्रीवस करि अपनी कर्ममूलको दाहै। सू. रत चेत अचेत होय मति, अवसरवीताजाहै। घग्घा घाट सुघाटमें नाव लगी है आय । जो अबके चेतै नही, तो गहरे गोते खाय ।।.गहिरें :

(२३३) गोते खाय जाय जब कॉन निकासन द्वारा। समय पाय मानुपगति पाई. अजहूं नांहि स- भारावार बार समझाऊं चेतन मानो कहा हमारा । सूरत कही पुकार गुरुने, यों हो? निस्तारा।। नन्ना नाताजगनम, अपस्वा- रव सबकोय। आन गांठि जिसदिन घटेकोर- न मँगाती होय ।। कोउन सँगाती मगा न सा. थी जिमदिन काल मतावे । सब परिवार अप- न स्वारथका, तेरे काम न आवे । आठौं मदमें छाकि रहा है. में में में बिललावे । मृरत सम- शि होय मत बोरा, अवसर बीता जावे ।।९।। बचा चंचल विकलमन, निम मनको वासान। जवलग मन वसमें नहीं, काजन होय निदान! काजन होय निदान जान यह. वम नाही मन तेरा। पांचं इंद्री छठा चोरमन, तु इनका भया चरा॥राग दोष अन मोह ममापीहनह आन मल घेरा। मृरत जिमदिन मनधिर हो है.ति- मदिन होय न वेग ॥ १० ॥ बन्जाका. रन स्वादमें, रखो लदो रसमान । साकिरपो बारे (२३४) 'नहीं, समुझत नाहिं अजान ॥ समुझत नाहि अजान जात यह इन स्वाद में राचा । आरत चिंता लाग रही है ज्ञानध्यानको काचां ।। जैसे कार्य नचावे तोकू, तैसाही विधि नाचा॥. सूरत फिरये चहूं गति भीतर मिल्यो नसतगुरु साचा ॥ ११॥ जज्जा जाग सुजाग नर, यह जागनकी वार । जो अब तू जागे नहीं, फेर न होय सँभार ॥ फेर न होय सँभार सार यह, जो अवकै नहि जागे। जो जागे निरभय पद पावे जरा मरन भय भागे। नातरिफेर फंसे भवसा: गर, हाथ कछू नहि लागे । सूरत भला होय जब तेरा, संसारी सुख त्यागे ॥ १६ ॥ झज्झा झारिपछोरिके , कहूं तोहि समुझाय । जामें तें वासा किया , सो तेरी नहिं काय ॥ सोतेरीनहि काय जायसंग, तुझेअकेलाजाना तैने घर बहुतेर किये हैंआवत जात भुलाना॥ थावर पच त्रस पक्षी मानुष,भयो देव कहुंदाना। 'सूरत छहो काय ते भुगते.आपा नहीं पिछाना।। नन्ना भव. पद है भलो ऐसा.अवर नकोयाजेड (२३५ । संभार तेह निरे भवजल पार ज होय ॥ भवज- ल, पारजु होय विचारेज इस बेर संभारानीन काल जिन सही परीपह, कर्म चूरकर दुरा ॥ आवन जात काल बहु बीता, लोकालोक नि- हारा । सूरन जो सुख गेमा चाहे, चेनो वेग में- वारा ॥ ११ ॥ स्ट्राटाला निन किया. ते व संसार । फिरहिं भटकत जगतमें तिनको बार न पार ॥ तिनको वार न पार कह है, फिरने फि- रहिं विचारेनरतिरजच नरक देवगनि. चाय धाम निहारे ।। जम्मन मरन किये बहुतेरे. महे महादुख मारे।सूरत कोतुक आप काय, काय जाय पुकारे ।। ।। १५॥ठट्टा ठटाक कहां रह्यो वेगई क्यों न संभाल छोडि ठटमारके जो दृटे जगजाल ॥जो दृटे जगजाल बाउरे : वहरि नही दुखपाचे । मतगुरु कही मान नो शिक्षा फेरनजगमें आने ।।छोडोसंगबुमा खाटीको जो तुमको बहकावे । मृति संग सुमनिकी काजे शिवपुर जान दिसावे ।। १६ । नाटिंग मति जाय न अदिग होय पद साधि। दृढ़ता (२३६) करि परिणामकी, जो सुख लहे समाधि ॥ जो सुख लहे समाधिव्याधि तज, अप्पाखोजे भाई। सिद्धरूपतेरे घट अंतर, कहां ढूंढने जाई ॥जड़ पुद्गलको भिन्न जान तू मिटे करम दुखदाई। सूरत आप आपमें साथै, यह सतगुरु फरमाई ढड्ढा ढोरी छोडदे, ढिंगइनके मत जाय।कुगुरु कुदेव कुज्ञानको, तू मति चित्त लगाय॥तूमति चित्त लगाय भावतजि कुगुरु कुदेव कुज्ञानी। ये तोकू दुरगति दिखलावें, सो दुख मूल नि- शानी ॥ इनत काज एक नहिं सुधरे, करम भ- रमके दानी । सूरत तजि विपरीत इन्होंकी, सतगुरु आप बखानी॥१८॥णण्णारण ऐसा करो, संवर शस्त्र संभार । कर्म रूपयेअरिबडे तिनहि ताकि करि मार ।। तिनहि ताकि करि मार, निवारो कर्मरूप और सोई। है अनादिके दुखदाई, तेरी जाति विगोई॥नारायणप्रति- हरि हर चक्री, यात वचे न कोई। सूरत ज्ञान सुभट.जब जागे, तिन इनकीजडखोई॥१९॥ ये

(२३७ )
तत्ता तन तेरा नहीं, तामें रयो लुभाय ।
नाता तोरे तनकमें, ताहि कहा पतियाय ॥
ताहि कहापतियाय पाय सुख, हो रह्यो याको
वामी। छिनमें मरे छिनक में उपजे.होय जगतमें
हासी गाके संग बढे बहु ममता पर महादृख फांसी
मृरत भिन्न जानिइम तनको,यासोरहो उदासी
यत्या थिरपदको वहे. या विरपद नहि होय ।
घिरना करि परिणामकी, थिर पद परसे सोय ।।
विर पद परसे सोय होय मुख, गति चारनमों
छ । ज्ञान ध्यानको करे योरा, कर्म अरीको
कुटे। यह जगजाल अनादि कालका सो ऐमी
विधि दृटे। सूरत घिरपदको तो परसे, शिवपुर
के सुख लूटे ।। २१॥
दहा दर्व छही कहे, प्रगट जगत माहिं ।
अवर दरन म - बेल, जानी माने नाहिं।
ज्ञानी माने नाहिदम रे जो रनननको जाने।
माटी भूमिशेलकी साजि जगमें प्रगट बखान
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(२३८) पुदगल जीव धरम अरु अधरम काल अकाश प्रमाने। सुरत इन दरवनकी चरचा,ज्ञानी गिने बखाने ॥ २२ ॥ घध्धा ध्यान जु जगतमैं, प्रगट कहे हैं क्यार । आर्त रुद्र धर्म सु शुक्ल, जिनमत कहै विचार॥ जिनमत कहे विचार चार ये, ध्यान जगतके माहीं। आरत रौद्र अशुभके दाता, इनत शु- भगति नाहीं॥ धर्म ध्यानके जे नर धारक, शुभसुख होत सदाही। सूरत शुकलध्यानके करता, ते शिवपुरको जाई ॥२३॥ नन्ना नाश-करम जग, नेह धरै निज माहि । नटकी कला जु जगतमें, नेह करै छिन नाहिं।। नेह करै छिन नाहि जगतमें, अप्पा नाहि फ- सावै । ज्यों पानीमें रहै कमल तरु, जल भेदन नहि पावै ॥ शुभ अरु अंशुभ एकसे दोनों, रोझै ना पुछतावै । सूरत भिन्न लखै ऐसी विध, करम कहाँ ढिग आवै ॥२४॥ पप्पा प्रभु अपना लखो, परसंगति दे छोर। परसंगति आस्रव बढ़, देहि करम झकझोर ।।

(२३९) दय करम झकझोर जोरिकनि. पिर निकलन नहि होई । आसब बंध परी बरी, लग गा. यन कोई। ति प्रीति करो संबरलो. हिन करके दिल जोई। मुरत संघरको आदारिये, कर्म निर्जरा होई ॥२५॥ फफफा फल्यो ही फिर, फोकट देखन मृल। फांसी पड़ी अनादिकी, करि ताइनको सल ।। कर तोडनको मूल भूलमति, दाव भलो ते पा- यो । भ्रमते नमते भवसागरसों. मानुग गनिमें आयो। याही गतिमा भये . तीर्थकर, केवल ज्ञान उपायो । सुरत जानि भूलिमति है. यह सतगुरु फरमायो ।॥ २६ ॥ बधा विसन कुविमन है, जिवन बेग न त्याग। यस कार पांचों इंद्रियनि, शुभकारजको लागी शुभकारजको लाग लाग नर, विमन मान भारी ।जा आमिषमुरापान अर, आयटक दुखकारी। पर धन नारी अन बत्रपा, राग करो परनारी । सुन्त इन भवमें दुग्गु पारे. पर भव सुख अधिकानी ।। २७॥

(२४०) मम्मा मूल्यो ही फिरे, भरम्यो महा मिथ्यात । भेद न पायो ज्ञानको, तातै आवत जात ॥ तातै आवत जात बात सुनि, भेद ज्ञान नहि पाया। क्रोध मान लोभ अरु माया, इन सौं नेह लगाया। परमारथकीरीति नजानी, स्वा- स्थ देख भुलाया। सूरत भेद ज्ञान जब जाना, तब मिथ्यात मिटाया।॥२८॥ मम्मा मति तिनकी सही, निज मल कोनो दूर। मतवारे समुझे नहीं, तिनको नाहिं सहूर ॥ तिनको नाहिं सहूर दूर है, कुमति कुमत विचा- । तिन कुगुरुनि तिनकी समुझाये पकरि भ- बोदधि डारै । पुण्य पापको भेद न जाने, जी- व अनाहक मारे। सूरत ते नर परे कुसंगति, किस बिध जाहिं उवारे ॥२९॥ . यया अयान पणो बुरो, यात होय अकाज। यह ममतासों फमिरह्यो, याहि न आवैलाज।। याहि न आवै लाज बाज नहि, कह तेरो यहां को है । तात मात बांधव सुत कामिन, तू इन- के सुख मोहै। आठों जाम रहे इन ही में, यह (२४१) तुमको नहि सोहे। मृरत तजि अज्ञान ज्ञान गुरु तब शिव सुर सुख हो हे ।। ३०॥ रस रच्यो अनादिका, रविविषयनिसों प्रीति । रस चाख्यो नाहि आतमी, लसीनरसकीरीति ।। लम्बी न रमकी गनि मीन, न विषयनि संग सुख माना। आनमीक रस है सुखदायक, सो ते नहीं पिछाना ।। जिन रस रीति लस्सी आत- मकी, सो शिवपुरका राना। सूरत वे भवि मुक्ति गये हैं, जिन आतम हित ठाना ॥ ३१॥ लल्ला लिपट्यो डी रहे, लग्यो जगतके भेक। लख्यो न आप सरूपको,लयो नशुद्ध विवेक।। लह्यो न शुद्ध विवेक एक तें, पर अप्पा नहि बूझा। वस्तु पराई लखीन भाई, तात रयो अरुझा ।।उस्तु विनासी नहीं प्रकाशीत कर्मन संग अझा। दरन वे भव पार भये हैं. जिनको आत हशा॥३३॥ वव्या व संगत बुरी, जामों होय कुमार। सोमंगत शली भली, जामें सहज मुजाय ।। जाम सुभाव भाव है, सोशली मादि (२४२) प्यारी। तत्त्व दरवकी चर्चा तिनके, तजें कुच- ची भारी भरम भावतें दूर रहत हैं, धर्म ध्या- नकी त्यारी। सूरत यह बांछा मन मेरे, उन मित्रनसों यारी ॥३३॥ शश्शा सोई सुघर है, सुने सुगुरुकी सीख । सदा रहे शुभध्यानमें, सही जैनकी ठीक ॥ सही जैनकी ठीक तिन्होंके, अवर कछू नहि भावै।आगमअवर अध्यातम पानी,सुने सुना- वे गावै ॥ कुकथाचार विचार जगतमे, तिनको नाहिं सुहावै। सूरत सो सजन मो भावे, जो शिवपंथ बतावै ॥३॥ खक्खाखुटक निवारिक, खिमाभाव चितलाय। खुले कपाट अभ्यासके, खिरै करम दुखदाय ।। खिरै करम दुखदाय जाय वह, खिमाभाव चि- * तल्यावै । होय अभ्यासतास भविजनको, ज्ञानी ज्ञान जगावै ॥ सदा मगनता अपने मनमें, री- झ आप सुख पावै । सूरत सोई भिन्न सबनतें, सो आतम हित लावै ।। ३५॥ सस्सा सो स्थाना सदा, सुगुरु सीख सुन लेह । सदा रहै संतोषमें, सो साधू लखिलेह ।।

(२१३)
सो साधू लखिलेहगह में, जो संताप विवाद।
सौख बात है जो संसारी, तिनको नहीं निडा-
२॥ सँकलप विकलप जग के जितने, तिन दु-
समनको टारे । मूरत सोसाधू जन ऐसा, शिव-
पुर वेग मिधार ॥ ३६॥
हाहा हह कर रह्यो, हे परवसि दुख पाय ।
क्यों न आप वश हाजिये, होय परम मुख दाय।।
होय परम सुखदाय पाय पद, (है)अनरूपी
अविनाशी। केवलज्ञान दर्श जहँ केवल, सि.
द्वपुरी सुखराशी ॥ आठों करम खिपावे जि-
नक, आठों गुन परकासी । सुरन सिद्ध महा-
सुख पावे, काल अनंता पासी ॥३७॥
लल्या लेक परमपद, लखि लखगये निर्वान ।
लोक शिखर पर चंद, लयोसिद्धशिवधान ।।
लयो सिद्ध शिवयान आन लखि, सोई सिद्ध
कहाये । दर्शनज्ञान चरन गुन तीनों; तिन
शिवपुर पहुंचाये । जो जो दरसे मो मो भामें
आप अचल ठहराये। मृरत सिद, कहे ऐसे
गुरु, जिन पुरानमें गायें ॥ ३८ ॥

(२४४)
क्षक्षा लक्ष्मी जो वरे, गुन लक्षनको वेव।
लखे सुलक्षन परखिकैं, तजै कुलक्षण टेव ॥
तजै कुलच्छन टेव भेव लखि, सिद्धरूपकोध्या-
वे। अरहत सिध आचार्य उपाध्याय, साधन
सीस नवावै ॥ जिनमत धर्म देव गुरु च्यारों,
यह दिढता मनलावै। सूरत यह परतीत घरै
मन, सो सम्यक पद पावै॥३९॥ सम्यक पद
को जो लहै, करै वैनगुरु प्रीत । देव धरम गुरु
ज्ञानको पराखि गहै निजरीति ॥४०॥बारख-
ड़ी हितसों कही, नहि गुनियनकी रीस । दोहे.
तो चालीस है, छंद कहे छत्चीस ॥४१॥.
इति श्रीसूरतकविकृत बारहखड़ी समासा ।। ४३॥
(४३)
आरती संग्रह।
इह विधि मंगल आरति कीजे, पंच परमपद
भज सुख लीजे ॥टेक ॥ प्रथम आरती श्रीजि-
नराजा । भवजल पार उतार जिहाजाः॥ इह:
विधिः ॥१॥ दुसरि आरतिः सिद्धनकेरी।
सुमिरन करत मिटे भवफेरी ॥ इहविधिः ॥२॥

(२४५) तीजी आरति सूर मुनिंदा। जनममरन दुख दूरकरिंदा ॥ इनिधि० ॥ ३॥ चोयी आरति श्रीउवझाया। दर्शन देखत पाप पलाया । इह- विधिः॥४॥ पानाम आराति साइतिहारी। कुमति विनाशन शिव अधिकारी ।। इविधिः ॥५॥ रहीग्यारहमतिमा धारी। श्रावक चंदों आनंदकारीहविधि॥६॥सातमि आरति श्रीजिनवानी। 'द्यानत सुरग मुकानि सुखदा- नी।। इविधि०॥७॥ आरति श्रीजिनराज तिहारी । करमदलन संतनहितकारी ।। टेक।। सुरनर अनुरकरत तुम सेवा । तुम ही सब देवनके देवा ॥आरति श्री० ॥१॥ पंचमहावन दुद्धर धारे । रागदोष परिनाम विदारे ।। आरति श्री ॥२॥ भव- भय भीत सरन जे आये। ते परमारय पयल- गाय ।। आरति श्री० ॥ ३॥ जो तुम नाम जप मन माही जननमरन भय नाको नाहीं।। भारति श्री०॥॥ समक्सरन मंपूरन शो- भा। जीने मोष मान चल लोभा। आरनि (३४६). श्री०॥५॥ तुम गुणं हम कैसें करि गावें। गणधर कहत पार नहिं पावै॥आरति श्री० ॥ ६॥ करुणासागर करुणा कीजे। 'द्यानतं' से- वकको सुख दीजे ॥आरति श्री०॥७॥ अथ पंचपरमेष्ठीकी आरती। चाल सड़ी। मनवचतनकर शुद्ध पंचपद, पूजहु भविजन सुखदाई । सबज़न मिलकर दीप धूप. ले, करहु आरती गुणगाई । टेक ॥ प्रथमहिं श्री अरहंत परमगुरु, चौतिस अतिशय सहित व. सैं। प्रातिहार्य वसु अतुल चतुष्टय, सहित सम- वसृत माहिं लसें ॥ क्षुधा तृषा भय जन्म जरी मृति, रोग शोक रति अरति महा । विस्मय खेदै स्वेद मैंद निद्रों, राग द्वेष मिल माह दहा। इन अष्टादश दोषरहित नित, इन्द्रादिक पूजत आई। सब जन मिल० ॥१॥ दूजे सिद्ध सदा सुखदाता, सिद्धार्शलापर राजत हैं। सम्यकदर्शन ज्ञान वीर्य अरु, सूक्ष्म पंणाकर काजत ॥ अगुरुलघू अवगहनश- (२५) तिघर, बाधाविन अशरीरा हैं। जिनको मरण नित्य कियेतें, शीघ नशत भवपीरा है। या कारण नित विच शुद्ध कर. मजहु सिद्ध शिवके राई सवजन मिल०॥२॥ तीजे श्रीआचार्य परमगुरु, छत्तिस गुणके धारी हैं। दर्शन ज्ञानवरण तप वीरज पत्राचार प्रवारी हैं। द्वादशतप दाधर्म गुमित्रप, पद आवश्यक नित पालें। मब मुनिजनको प्राय- श्चित दे, मुनिव्रत के दृषण दालें। ऐसे श्री.आ. चार्य गुरुनकी, पूजा करिये चितलाई । मर जन मिल०11३॥ चोथे श्रीउवझायवरणपं. नजरज, सुखदा भविजनको । ग्यारह अंग र पूर्ववतुर्दश, पटें पढावें मुनिगनको ।। मुनिके सब आचरण आचरहि, द्वादश तपके पारी ३॥ म्यादवाद सुखकारी विद्या, सब जगमें विस्तारी है। प्रेम श्रीउवाय गुरुनके चरणकमल पूनहु भाई। सब जन मिल॥॥ पंचमि आरनि मर्वसाधुका. आटचीन गुण 1 -- (२४८) मूल धरें। पंचमहानत पंचसमिति धर, इन्द्रिय पांचों दमन करें॥ षट आवश्यक केशलोंचहक, बार खडे भोजन करते। दांतण स्नान त्याग भू सोवत, यथाजातमुद्रा धरते ॥ या विधि “पन्नालाल" पंचपद, पूजत भवदुख नश जाई। सब जन मिलकर ॥५॥ इसप्रकार आरती बोलकर नीचे लिखा श्लोक दोहा और मंत्र पटकर आरतीको मस्तकपर चढावै ।। ध्वस्तोद्यमांधीकृतविश्वविश्व- मोहांधकारप्रतिघातदीपान्। दीपैः कनकांचनमाज नस्थैर जिनेंद्रीसद्धांतयतीन् यजेऽहम् ॥१॥ दोहा। रूपरप्रकाशनज्योति अति, दीपक तमकरहीन । जासों पूजों परम पद, देव शस्त्रगुरु तीन ॥१॥ ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो मोहातामरविनाशनाय दीपं निर्वपामि० ॥१॥ धूपं चढ़ाते समय अथवा धूपकी आशिका लेते समय नीचे लिखा लोक दोहा और मंत्र बोलना चाहिये।

. है दुपाष्टकमधनपुष्टजालसंपने भासुग्मकन्न। पविधतान्यनुगंधिगजिनेंद्रसिद्धांनयनीन् य- जेऽहम् ॥२॥ अग्निमाहिं पारमल दहन, चंदनादि गुणीन। जासी पूजों परमपद, देवशाम्र गुरु नीन ||१|| पानी अष्टविनानाय देशागत Tifire (४४) जिन्होंकी मज्ञामें, मुकुरसम चेतन्य जड़ भी. स्थिती धान्योत्पत्ती. युत झलकने माय मबही। जगद्वाना मार्ग, प्रकटकरत सर्गसम जी. महावीरस्वामी, दरश हमको दें प्रकट ॥१॥ जिन्होंने दो वन प्रलम अरु लाली रहिन हो. जनाको दर्शात, उदयगत क्रोधानिलयको। जिन्टको शांतात्मा. अतिविमलमृती फुटपहा. महावीरम्वामी, दरश हमको दें प्रकट वे ॥२॥ नमते द्रकि. मुगाटमगिकी कांनि गरना. जिन्होंक पादाका, युग, ललितः संनम जनक ! भवानीका इना. म्मरण करते ही नुजल है, (२५०) महावीरस्वामी, दरश हमको दें प्रकट वे.॥३॥ जिन्होंकी पूजासे, मुदितमन हो मेंढक जवे, हुआ स्वर्गी ताही, समय गुणधारी अतिसुखी। लहे जो सुक्तीके, सुख भगत तो विस्मय कहा, महावीरस्वामी, दरश हमको दें प्रगट वे ॥४॥ तपे सोने ज्योभी, रहित वपुसे, ज्ञानगृह है, अकेले नाना भी, नृपतिवर सिद्धार्थ सुत हैं। न जन्मे भी श्रीमान्, भवरत नहीं अद्भुतगती, महावीरस्वामी, दरश हमको दें प्रकट वे ॥४॥ जिन्होंकी वाग्गंगा, अमल नयकल्लोल धरती, न्हवाती लोगोंको, सुविमल महा ज्ञानजलसे। अभी भी सेते हैं, बुधजन महाहंस जिसको, महावीरस्वामी, दरश हमको दें प्रगट वे ॥६॥ त्रिलोकीका जेता, मदनभट जो दुर्जय महा, युवावस्था में भी, वह दलित कीना स्वबलसे। प्रकाशी मुक्तीके, अतिसुसुखदाता जिनविभू, महावीरस्वामी, दरश हमको दें प्रकट वे ॥७॥ महामोहव्याधी, हरणकरता वैद्य. सहज,. विना इच्छा बंधू, प्रथितजग कल्याण करता।

सहारा भव्योंको सकल जगमें उत्तम गुणी, महावीरस्वामी दरश हमको दें प्रकट वै॥ मनन गराष्टक ररयो, मागचंद निधान । मस भाषा अनुवाद र, पटि पार निर्मान ! जब अकृत्रिम चैत्यालयोंका अर्थ বাহিমোফিলিপলিশ লাশ। माननथ्यन्तरादिनरालामगादेगान । मदन्यानगपूप- दामनदादा धूपः फल निगमप यो प्रारमिरमा द. कर्मणां बनने ॥१॥ में मचायालयानरमा निमी पशु वान्तरपति नन्दीप यानि च पन्दग। यान्ति मैत्यागननानिमीमाधि मन्द जिनपरगनाम পিন নানা নালিতাবা! গলগননামা ইন वैमानिकानाम अनुमानानां दनाजामिदान दिन- निन्यानां मानी | 11 जान समारीनप्रये ये मदारपदाम्मीजनियमिन्दानामा গনাখনা মানায়। भनानागमनमानमा मिलाप !! 4. लालदिर माल्या. पनि समानुष जनादों प्रविमा सानो पायक पिरन्दे भर- नामानि जपान्यानि FREET.

'(२५२) धवलौ द्वाचिन्द्रनीलप्रभौ । द्वौ बन्धूकसपप्रभौ जिनवौ द्वौ च प्रियंगुभौ । शेषाः पोटशजन्ममृत्युरहिताः सन्तहेमप्रभास्तै संज्ञानदिवाकरा: सुरनुताः सिद्धि प्रयच्छन्तु नः ।।५।। ओं त्रिलोकसम्वन्धिअकृत्रिमचैत्यालयेभ्यो अर्घ निर्वपामी०॥ इच्छामि भंते-चेइयमची कामोसग्गो को तस्सालोचेरो अहलोय तिरियलोय उढलोयममि किट्टिमाकिट्टिमाणि जाणि जिणचेझ्याणि ताणि सव्वाणि । तीसुवि लोएसु भवणवासि- यवाणवितरजोयसियकप्पवासियति चविहा देवा सपरि- वारा दिब्वेण गन्धे दिग्वेण पुप्फेण दिग्वेण धुन्वेण दि- व्वेण वासेण दिव्वेण हाणेण णिचकालं अचंति पुज्जति वंद- तिं णमस्संति । अहमवि इह संतो तत्य संताह णिचकालं अच्चे- मि पुज्जेमि बंदामि णमस्सामि । दुक्खक्खओ कम्मक्खनो बो- हिलाओ सुगइगमणं समाहिरणं जिणगुणसम्पत्ति होउ मज्झ। (इत्याशीर्वादः । परिपुष्पांजलि क्षिपेत् ) अय पौर्वाह्निकमाध्याहिकआपराह्निकदेववंदनायां पूर्वाचा- यानुक्रमेण सकलकर्ममयार्थ भावपूजावन्दनास्तवसमेतं श्रीप. चमहागुरुभक्तिकायोत्सर्ग रोम्यहम् । [ कायोत्सर्गकरना और नीचे लिखे मंत्र का नौवार जाप करना) णमो अरहताणं, णमो सिद्धाणं मामो प्रायरीयाणं । णमो उवझायाणं, णमो लोए सव्वसाहुणं ॥ ताव कार्य पावक- मं दुचरियं वोस्सरामि । इति भाषाजैननित्यपाठसंग्रह समाप्त । .

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Jainnityapath Sangrah (vol - I)

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Jainnityapath Sangrah (vol - I)
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Jainnityapath Sangrah (vol - I)
Text
OCR done
Citation
1921
Published
2009/11
Publisher
Calcutta, Jain Siddhantprakashak Press
Language
Sanskrit
Pages
254
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain sahitya
DLI number
344276
Barcode
99999990234150.00
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Banasthali University
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