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Swapanvasvaduttam

Kavi,bhas · 2012/08

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विषय-सूची भूमिका पृष्ठ १ ६ ७ १५ १८ २१ विषय १--नाटक' की रचना २-नाट्य कला की उत्पत्ति ३-नाटक (रूपक की परिमापा) ४-नाटक और अभिनय ५-मुखान्त और दुःखान्त नाटक ६-मास का स्थितिकाल ७-माम का जीवनवृत्त ५---मास के नाटक ६-क्या इन समी नाटकों के रचयिता मास हैं ? १०-स्वप्नवासवदत्तम् की कथावस्तु ११-प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण (१) उदयन ३२ (२) वासवदत्ता (३) पद्मावती (४) यौगन्धरायण (५) वसन्तक १२-स्वप्नवासवदत्तम् का नामकरण १३-स्वप्नवासवदत्तम् का मूल्यांकन एवं मास की नाट्यकला १४-मास की शैली (१) व्यञ्जकता तथा प्रमावोत्पादकता (२) गुण व रीति (३) सरलता (४) वर्णन कुशलता (५) मावों का व्यक्तीकरण (६) मरलता और रम्यता ४६ (७) मापा (८) स्वामाविकता मोर मनोवैज्ञानिकता (६) व्याकरण विषयक ज्ञान एवं पाण्डित्य (१०) प्रकृति-चित्रण ५२ (१२) मलकार १५-मास कीपालोचना (क) मास विषयक प्रशस्तियां (मास की महनीयता) (R) मास का परपर्ती पक्षियों पर प्रभाव ३६ ३६ ४२ ४४ ( २ ) पृष्ठ ७० ८४ ६४ १४५ १८४ विषय मूलनन्य और अनुवाद 'प्रथमोऽङ्कः द्वितीयोऽङ्कः तृतीयोऽङ्कः चतुर्थोऽङ्कः पञ्चमोऽङ्कः 'पष्ठोऽङ्कः परिशिष्ट परिशिष्ट १-(१) नाटक (रूपक के भेद) (२) नाटक के प्रमुख तत्व (३) मर्य-प्रकृति, अवस्था और संधियां (४) रङ्गमञ्च (५) नाटक मादि पन्दों के शास्त्रीय लक्षण १. नाटक; २. मङ्क, ३. गर्माङ्कः ४. पूर्वरङ्गः ५. नान्दी; ६. सूत्रधार; ७. नेपथ्य ८. (क) प्रस्तावना या स्थापना; (ख) प्रयोगातिशय; ६. कंचुको या काञ्चुकीय; १०. विदूषकः ११. नायक । (६) नाटकीय पात्रों के लिए विशिष्ट शन्द । परिशिष्ट २-कागदिक्रम से श्लोकानुक्रमणिका परिशिष्ट ३-स्वप्ननाटक में सुमापित परिशिष्ट ४--नाटक में भाये इंदों के लक्षण परिशिष्ट ५-मास की प्राकृत भाषा परिशिष्ट --मास के व्याकरण सम्बन्धी मपाणिनीय प्रयोग ४ ५ ७ भामुख या १२ भूमिका १--नाटक (रूपक) की रचना नाट्यशास्त्र की प्राचीनता यद्यपि नाटक को पञ्चम वेद कहकर वेदों के बाद नाट्यशास्त्र के अस्तित्व और उसकी महती लोकप्रियता का निर्देश किया गया है, किन्तु यदि हम दूर तक सोचें तो पञ्चम वेद की प्रतिष्ठा के पहले मी नाटक लोक-जीवन का प्रमुख अंग था। लोक-जीवन में इसकी सर्वप्रियता देख कर ही नाट्यशास्त्र की छानबीन और आविर्भाव की वात सोची गई। पाणिनि की अष्टाध्यायी के अनुसार उनके पहले नाट्यशास्त्र के दो आचार्य शिलालिन् और कृशाश्व का उल्लेख मिलता है :--'पाराशर्यशिलालिम्यां भिक्षुनटसूत्रयोः । पा० ४, ३, ११० । कर्मन्दकशाश्वादिनिः । पा० ४, ३, १११ । पश्चात् भरतमुनि ने 'नाट्यशास्त्र' नाम से नाटक-रचनासम्बन्धी विशाल ग्रन्य का निर्माण किया । इस ग्रन्थ में नाटकसम्बन्धी सभी विवरणों और तथ्यो का उल्लेख एवं विवेचन उपात्त है । ऐसा मालूम पड़ता है कि भरतमुनि के पहले भी नाट्यशास्त्र के सम्बन्ध में बहुत कुछ विवेचन हो चुका था। उन सब सामग्री को लेकर भरत ने एक सर्वाङ्गपूर्ण ग्रन्थ का निवन्धन किया । नाट्यशास्त्र के श्लोकों से इसका संकेत स्पष्ट होता है । एक श्लोक मे ऋषियो ने मरतमुनि से पूछा है-- योऽय भगवता सम्यक् प्रथितो वेदसम्मितः । नाट्यवेदः कथं ब्रह्मन्नुत्पन्नः कस्य च कृते । [हे ब्रह्मन् ! जो यह अापने वेद-सम्मत (नवीन) नाट्यवेद (सूत्री मे) प्रथित किया है, उसकी उत्पत्ति कैसे हुई और वह किसके लिए है। इसमे स्पष्ट कहा गया है कि मरत ने नाट्य के सिद्धान्तों को भूत्रो मे गूया अथवा निवद्ध किया। यद्यपि हमें सबसे प्राचीन नाटक भास के ही उपलब्ध हुए है, किन्तु नाटकों के अभिनय की चर्षा वाल्मीकीय रामायण पोर महाभारत में भी मिलती है । .

वाल्मीकीय रामायण में अयोध्या को 'वधूनाटकसंघश्च संयुक्ताम्' कहा गया है । महाभारत के हरिवंशपर्व में रामायण नाटक और कौवेररम्मामिसार नाटक के अभिनय का उल्लेख मिलता है । इन ग्रन्थों के अतिरिक्त पुराणों एव कौटिल्य- अर्थशास्त्र में मी नाटक और उसके अभिनय का प्रसंग पाया है । इन तथ्यों से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि नाट्यशास्त्र बहुत ही प्राचीन है और इसका प्रणयन सर्वप्रथम भारतवर्ष में हुमा । भारत के बाद यूनान के नाट्यशास्त्र की चर्चा की जा सकती है, जिसका प्रथम उल्लेख अरस्तू ने किया है। उसका समय ३८४-३२२ ई० पू० है । २-नाट्यकला को उत्पत्ति यह तो नाट्यशास्त्र के इतिहास की बात हुई । नाटक या अभिनय की कला का जन्म कैसे हुआ, इस पर भी विचार करना आवश्यक है । इस विषय पर भिन्न-भिन्न देशों में अपने अलग-अलग सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं। यूनानी प्राचार्यों के मत में नाटक की उत्पत्ति धर्मोत्सवो से हुई है। रोम में एक प्रकार के ग्राम्य खेल को नाटक का आविर्भाव स्वीकृत किया गया है । चीनी लोग नृत्य और गीत के संयोग से इसकी उत्पत्ति मानते हैं । लोक के मनोरजन मोर मलाई के लिये नाटक का प्रादुर्भाव हुआ, यह जापानियों का मत है । इनके अतिरिक्त मलाया, जावा और सुमात्रा आदि सभी देश, जहां प्राचीन सस्कृति और सम्यता के प्रतीक पाये जाते हैं, इस विषय में भारतीय मत से प्रभावित हैं। हमारे यहां कुछ लोग पुत्तलिका नृत्य से नाटक की उत्पत्ति मानते हैं । कुछ ऋग्वेद के संवाद, कुछ इन्द्रध्वजोत्सव और कुछ कर्मकाडसूक्त के द्वारा नाट्यकला का सूत्रपात स्वीकार करते हैं । परन्तु महामुनि मरत ने अपने नाट्यशास्त्र में उल्लेख किया है कि त्रेतायुग के प्रारम्भ मे देवों ने मनोरंजन की सामग्री के लिए ब्रह्मा से निवेदन किया । ब्रह्मा ने उनकी प्रार्थना पर नाट्य नामक पञ्चम वेद की सृष्टि की । इस नाट्य वेद की रचना चारो वेदों से भिन्न-भिन्न तत्त्वों को लेकर हुई । उनमे ऋग्वेद से मवाद, सामवेद से गायन, यजुर्वेद से मभिनय और प्रयवंवेद से रम लिया गया । सबसे अधिक सहायता ऋग्वेद से ली गई। क्योंकि उसमे निबद्ध वशिष्ठ, विश्वामित्र प्रादि ऋपियो के | नाट्प- - भास्थान, पुरुरवा, उसो मादि के मरने कहे गये कयोकयन तथा इन्द्र, महत, गूपं, उपम् मादि देवों को प्रार्थना में गाये गये गीत नाट्याला ये मूल तत्त्व स्वोरत हुए । कयोरकपन प्रपया मंवाद नाटक का मबसे प्रावश्यक प्रग है । वह येवल ऋग्वेद में ही नहीं, उनिपदों एवं ब्राह्मण प्रपों में भी बहे गुन्दर रूप में पाया जाता है । भरतमुनि के उल्नेय या यह नी तासयं है कि संवाद, संगीत. मभिनय और रम-निर्वाह--ये चारों नाटक के मूल तत्त्व शास्त्र के वे लोक इस प्रकार है- एवं संकल्प्य भगवान् सर्वयेदाननुस्मरन् । नाट्यवेदं सतश्चक्रे चतुर्वेदाङ्गसम्भवम् ॥ जग्राह पाल्पमावेशत् सामन्यो गीतमेव च । यजदादभिनयान् रसानायर्दणादपि ॥ वेदोपवेदः सम्बदो नाट्यवेदो महात्मना । एवं भगवता सृप्टो ब्रह्मणा ललितात्कम् । इस प्रकार सकल्प करके भगवान् ब्रह्मा ने सभी वेदों का स्मरण करते हुए चारों वेदों के अगों से प्राविभूति होने वाले नाट्यवेद की रचना की । उन्होंने ऋग्वेद से संवाद, सामवेद से संगीत, यजुर्वेद से अभिनय तथा अर्थववेद से शृंगार प्रादि रसों को लिया । फिर सुन्दरतामों मे भरा हुआ, वेदों और उपवेदों से सम्बद्ध यह नाट्यवेद उनके द्वारा रचा गया । इस प्रकार समी सिद्धान्ती का अनुशीलन कर लेने के बाद हम इस सिद्धान्त पर पहुंचते हैं कि शैशवावस्था में सामाजिक मनोरजन नाटक की उत्पत्ति का मूल हेतु या और उस समय उसका रूप ग्राम्य नाटक का रहा होगा । उस लोकनाट्य को परिष्कृत करने के बाद मनोरजन के माध्यम से लोक की मलाई और दुश्चिन्तामों के निवारण के उद्देश्य से उसे समन्वित करके नाटक का शास्त्रीय रूप खडा किया गया । प्रारम में केवल अभिनय अथवा सगीत लोक-नाट्य के मुख्य तत्व रहे होगे । सगीत, कया, अमिनय-इन तीनों के मयोग से नाटक का परिष्कृत रूप सामने प्राया, जिसने लोक के प्रेय और श्रेय दोनों को सम्पन्न किया।

३. --नाटक (रूपक) को परिभाषा नाट्यकला के आविर्भाव की यह कहानी अपने मूल में अनेक प्रकार से सम्पादित की जा सकती है । लेकिन बहुत वाद में प्राचार्यों ने इसे काव्य का एक भेद स्वीकृत किया और नाटक लिखने वाले को नाटककार ने कहकर संस्कृत साहित्य में कवि ही कहा गया । इस नाटक का नाम दृश्यकाव्य है और काव्य की मांति रम यहाँ भी प्रात्मा के रूप में प्रतिष्ठित है। इतिहास काव्य को तरह नाटक का भी उपजीव्य होता है । भरतमुनि ने कहा है- नाट्यसंज्ञमिमं वेदं सेतिहासं करोम्यहम् । [इतिहास के साथ मिला यह नाट्यसंज्ञक वेद में बताता हूँ। फिर नाटक की परिभाषा देते हुए वे कहते हैं- अवस्थानुकृतिर्नाट्यम् । [मर्थात् किसी भी अवस्था का अनुकरण नाटक कहलाता है । आचार्य विश्वनाथ ने 'साहित्यदर्पण' में काव्य के दो मेदों को बताते हुए दृश्यकाव्य (नाटक) को यही परिमापा दी है- दृश्यं तमाभिनेयं, तद्रूपारोपातु रूपकम् । [दृश्यकाव्य (नाटक) अभिनय के लिए होता है। उसमें नट लोग राम प्रादि का रूप धारण करके उनके चरित का अभिनय प्रदर्शित करते हैं। उस समय हम उनको राम मादि के रूप में ही मानते हैं । इस रूप मारोप के कारण इस काय्य-रचना को रूपक कहा जाता है । लो-जीवन से पूर्ण इन विस्तृत विश्व के किसी भाग या भंग में जो कुछ हुमा है या संभव हो सकता है, उन घटनामों का अभिनय वा मनुकरण नाट्य कहलाता है। इस प्रकार मत्य और कलना दोनों नाट्य के प्राधार हैं- प्रसिद्धकल्पितरतानकर नाट्यम् । (मभिनव नाट्यशास्त्र) [गल्प पोर काल्पनिर जगत् की भाति नाट्य है ।] दूसरे प्रकार में हमें यह पहना पाहिए कि यह दृश्यमाप धपाय से भी अधिक राफस हपा। इसे पार पोर दम्वा मिनप देराकर मी मानन्दसिमाना सकता है । यह अभिनेय काव्य जगत् को विभिन्न मानव-प्रहतियों एवं ज्ञान- विज्ञान, कला प्रादि को मनोरंजक रूप में उपस्थित करके सभी को प्रमादित करता है। इसलिए मरतमुनि ने कहा है-- न लगानं न तन्छिन, न सा विद्या न सा कता । न स योगो न तस्कम नाट्येऽस्मिन् पन्न दृश्यते ।। (नाट्यशास्त्र १-११३) साहित्यदर्पणकार ने अभिनय के चार प्रकार बताये है-- भवेदभिनयोऽवस्थानकारः चतुर्विधः । प्रांगिको वाचिकश्चवमाहार्यः सात्विकस्तया ।। [अवस्था का अनुकरण ही अभिनय है और वह चार प्रकार से होता है-- आंगिक (अंगो से), वाचिक (वाणी द्वारा), माहार्य ( देश-भूषा को बनावट से) और सात्विक (रस, माव के प्रदर्शन से) 1] ४--नाटक और अभिनय इस अभिनय का नाटक में बहुत बड़ा महत्त्व है। या यों कहना चाहिए कि नाटक अभिनय को ही वस्तु है । काव्य, उपन्यास आदि में केवल पढ़े-लिखे लोग ही प्रानन्द ले सकते हैं, परन्तु नाटक का अभिनय होने से पढ़े-अनपढ़े सभी समान मानन्द और लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इसीलिए नाटक से जन-रुचि का जितना परिकार समव है, उतना काव्य आदि के द्वारा नही । अतः अभिनय से ही नाटक को सजीव कहा जाता है। रग-शाला में कुशल प्रमिनेता अपने नृत्य, गीत अथवा कथोपकथन के माध्यम से शारीरिक चेष्टाओं और स्वरो का नितान्त स्वामाविक प्रयोग करके दर्शकों को आत्म-विभोर कर देता है। उसके अभिनय को ध्यान में रखकर रस, सवाद अथवा गीति के माध्यम से कथावस्तु का सफल विन्यास करना नाटककार का कोशल है। नाटक के अभिनय मे सार्वजनिक मनोरंजन की यह उपस्थिति देखकर ही महाकवि कालिदास ने 'मालविकाग्निमित्र' में कहा है। देवानामिदमामनन्ति मुनयः शान्तं ऋतुंचा पं रुदेणेदमुमारस्पतिकरे स्वाड़े विभक्तं द्विधा ।

( अंगण्योद्भवमत्र लोफचरितं नानारसं दृश्यते नाट्यं भिन्नरचर्जनस्य बढयाप्यकं समाराधनम् । [मुनियों ने कहा है कि नाटक तो देवताओं की मांखों को शान्ति प्रदान करने वाला सुहावना यज्ञ है। भगवान् शंकर ने भी पार्वती के साथ विवाह करके नाटक को अपने शरीर में ताण्डव और लास्य दो भागों में बांट लिया है। नाटक में सत्त्व, रज और तम तीनो गुणों से युक्त एवम् अनेक रसों से परिपूर्ण लोक-जीवन के चरित्र दिखाई पड़ते हैं । इसलिए अलग-अलग रचि रखने वाले लोगों के लिए नाटक ही एक ऐसा उत्सव है, जिसमे सभी एक समान मानन्द पा सकते हैं ।। ५--सुखान्त और दुःखान्त नाटक मांखों का मुहावना यज्ञ होने के कारण ही भारतीय नाटको की परम्परा सुखान्त होने को है तथा हत्या, मारकाट प्रादि का प्रदर्शन रंगमंच पर नहीं किया जाता । इसके विपरीत पाश्चात्य नाटककार दुःखान्त नाटक लिखने में ही अपनी नाट्यकला का उत्कर्ष मानते हैं। प्रायः वे यथार्थवादी विचार को लेकर चलने वाले कवि हैं, जिनकी दृष्टि में मनुष्य का जीवन दुःखमय हो दिखाई देता है । अत: वे सत्य की रक्षा करने के लिए दुःखमय जीवन का पास्तविक रूप उपस्थित करते हैं। किन्तु ऐसा उद्देश्य रखने पर नाटक में जन-मन-रंजन की कल्पना हमे नहीं करनी चाहिए। हो सकता है कि समाज में कुछ लोगों का मनोविनोद हत्या, मारपीट, युद्ध भौर कलह से ही होता हो, लेकिन यह सिद्धान्त सार्वजनिक या सार्वत्रिक नहीं हो सकता । दुःसान्त नाटकों में जब प्रधान नायक की हत्या एवं न्याय पर चलने वाले लोगो को मारने-पीटने का दृश्य दिसाया जाता है तब दर्शकों की मास्या सत्य मोर न्याय से डिगने मगती है। कहते हैं कि एक बार ऐसे ही एक दुःसान्त नाटक के अभिनय में एफ. करुणाजनक दृश्य देखकर एक महिला जोर-जोर से रोने लगी मोर माटकरा ममिनय विरस हो गया। एक यार एक नाटक में प्रतिनायक एक बासा को घेत से पीटने का भमिनय कर रहा था और बालक भी बड़ी पुरासता के साप पोट से पीड़ित होकर चिल्ला रहा था । यह परुणाजनक दृश्य देश कर एक दर्शक मरने को न संभाल सरा मोर उसने जूता सौंप कर प्रनितारामको मार दिया नाटकों के अभिनय द्वारा हमारे यहाँ जन-मचि के परिष्कार और उच्च पादों को प्रतिष्ठा के साथ मनोरंजन का विधान किया जाता है और हमारी साहित्य-परम्परा में सुसान्त नाटक लिखने की ही प्रणाली है। भरत मुनि ने कहा है- सुश्लिप्ट सन्धियोगं च सुप्रयोग सुखाययम् । मृदुशम्दाभिधानं च कविः कुर्यात्त नाटकम् ॥ [कवि को ऐसा नाटक लिखना चाहिए जिसकी सव संघियो का जोड़ ठीक हो, जिसके अभिनय करने में सुगमता हो, जिसका विषय सुखात्मक हो और जिसमें कोमल शब्दों का प्रयोग किया गया हो। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अतिरिक्त प्राचार्य नन्दिकेश्वर का अभिनय- दर्पण, पनजय का दशरूपक, शारदातनय का भावप्रकाश और विश्वनाथ का साहित्यदर्पण नाट्यशास्त्र के अन्य ग्रन्य हैं, जिनमे नाटक के सम्बन्ध में विस्तृत सामग्री और सिद्धान्तों की परिभाषा के साथ अपने समय के हुए नाटककारों की रचनामों के उदाहरण स्पप्टीकरण के लिए दिये गये हैं। ६--भास का स्थितिकाल मास के स्थितिकाल के सम्बन्ध मे बहुत विषमता है । कुछ उन्हें ईस्वी पूर्व चौथी शताब्दी में मानते हैं तो कुछ उनका अस्तित्व ईसा की दसवी सदी मे स्वीकार करते हैं । दशमी शताब्दी में मास का होना नितान्त असगत प्रतीत होता है क्योकि डा० वाजेंट, कालिदास, तथा वागमट्ट द्वारा उल्लिखित मामनाटकचक्र को किसी केरलीय कवि को कृति मानते है जो साउदी शती में हुआ। मरत- वाक्य में 'राजसिंहः प्रशास्तु नः' के आधार पर उन्होंने राजसिंह को सातवी शती में हुए फेरल देश का राजा माना है । उसी समय (सातको माती में) लिखे गये महेन्द्रवीर विक्रम के 'मत्तवितारा' प्रहसन से इन नाटकों की भाषा तथा पारिभाषिक शब्दों का साम्य दिखलाया गया है किन्तु इसके प्राधार पर इनका समय भास का समय नहीं कहा जा सकता 1 मामह द्वारा प्रशासित होने से मास की प्राचीनता सिद्ध होती है। साथ ही राजासह को ध्यक्तिविशेष मानने +- कोई दहतर प्रमाण भी नहीं हैं ।

भास के समय-निर्धारण के लिए निम्नलिखित विवेचना प्रावश्यक है :--- १-नाट्यशास्त्र प्रणेता भरत । २---कामसूत्रकार वात्स्यायन । ३-पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि । ४--अर्थशास्त्र रचयिता कौटिल्य । ५--मनु । ६-रामायण, महामारत तथा लोक-कथायें। ७--अशोक के शिला लेख । ८--अश्वघोष एवं कालिदास । ६--ऐतिहासिकों तथा पालोचकों के मत का विवेचन । १–मास की कृतियों में भरत विरोधी नियमों के अनेक उदाहरण पाये जाते हैं । जैसे भास ने भरत मुनि द्वारा प्रतिपादित नान्दी पाठ के अनन्तर काव्य के नाम निर्देश का वर्णन अपनी रचनाओं में नहीं किया है। भास ने युद्ध, वध, प्राक्रमण तथा मंच पर रुदन प्रादि का प्रयोग स्वच्छंदतापूर्वक किया है जिसका मरत ने नाट्यशास्त्र में निषेध किया है । बालचरित नाटक में परिष्टपंम मुष्टिक का वर्ष, ऊरुमग मे दुर्योधन-मीम-युद्ध, प्रमिपेक में राम- रावण-युद्ध तथा वालि की मृत्यु का वर्णन किया गया है । ये उदाहरण मास के मरत-नाट्यशास्त्र से अपरिचित होने के प्रमाण में प्रस्तुत किये गये हैं । भतः मास मरत के पश्चाद्वर्ती नहीं हो सकते जिनका समय विद्वानों ने ईसा की तृतीय शताब्दी तथा ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी निर्धारित किया है। २- वारस्यायन का भान मास को नहीं है क्योकि प्रतिमा नाटक में जब रावण राम के समक्ष मपने मध्यपन की चर्चा करते हुए मन्य शास्त्रों की गणना करता है तब वात्स्यायन के कामसूत्र का उल्लेख नहीं करता। कामसूत्र पर पन्य भाचार्यों का प्रभाव लक्षित होता है जिनसे मास परिचित रहे होगे क्योकि वात्स्यायन द्वारा मास को रचनामों की प्रसिद्धि स्वीकार की गई है। प्रपम ममय कन्या को माकृष्ट करने में वात्स्पान ने भविमारक कपा का पापप लिया है जिसमे अनुमान किया जा सकता है कि मास वात्स्यायन के पूर्व हए है। वात्स्यापन का समय दूमरी पठी का पन्त माना जाता है, प्रतः मास इससे पहने हुए होंगे।

३--कुछ विद्वान् पाणिनि, कात्यायन तथा पतञ्जलि को मास से पूर्व का मानते हैं । मास की रचनामों में व्याकरण सम्बन्धी प्रयोगों में पाणिनि से यत्र तत्र वैषम्य है । सम्भव है मास ने नाटकों में लौकिक व्यावहारिकता की दृष्टि से इन नियमो का अक्षरसा: पालन न किया हो अथवा ऐन्द्रादि अन्य व्याकरण का उन पर प्रभाव पड़ा हो । प्रपाणिनीय प्रयोगों के आधार पर मास को उनसे पूर्ववर्ती नहीं कहा जा सकता । मास के प्रयोग पाणिनि के विरुद्ध होते हुए भीपतञ्जलि के अनुकूल हैं । कहीं-कही पाणि नि, कात्यायन तथा पतञ्जलि द्वारा प्रयुक्त तीनों रूपों के दर्शन मास के नाटको में होते हैं। पाणिनि का समय ई० पू० चौथी शताब्दी, कात्यायन का ई० पू० तीसरी शताब्दी तथा पलजलि का दूसरी शताब्दी ई० पू० माना जाता है । अत: भास को इनके पश्चात् होना चाहिए । ४.--कौटिल्य के अर्थशास्त्र में अधिकरण १० अध्याय तीन का नवं शरावं सलिले: सुपूर्णम्' श्लोक मासकृत प्रतिज्ञायौगन्धरायण के चतुर्थ अंक में मिलता है। भास की दृष्टि में ब्राह्मण अपव्य तया दोषयुक्त होते हुए भी प्रतिष्ठित तथा आदरणीय है किन्तु कोटिल्य ने ब्राह्मण का स्थान उतना ऊंचा नहीं माना है। कौटिल्य ने (नन्द्रगुप्त मौर्य के समय में) जाति प्रथा का प्राबल्य दर्शाया है पर मास ने चरित्र पर विशेष बल दिया है । कौटिल्य का समय ३०० ई० पू० माना जाता है । मास कोटिल्य के समकालीन थे। ५--मास के नाटकों में मनुस्मृति के नियमों के समर्थन में पक्तियां पाई जाती हैं । जैसे मृगया, चूत, दक्षिणाहीन यज्ञ प्रादि की निन्दा दोनों में दृष्टि- गोचर होती है । अतः मास का रामप मनु से पूर्व निश्चित होता है क्योकि अनुमानत: मनुस्मृति के पूर्व मानव धर्मशास्त्र सम्बन्धो किसी रचना से ही मास प्रभावित हुपे होगे । ६--मास को रचनामो से ज्ञात होता है कि वे रामायण, महाभारत तथा जातक कथानी से मलोमांति परिचित थे । पचरात्र में पाण्डवों को प्राधा राज्य दिलवाकर भास ने महाभारत की कया से भिन्नता प्रदर्शित की है। रामायण भरत लक्ष्मण के अग्रज हैं पर भाम ने लक्ष्मण को बड़ा माई दर्शया है जातक कथाओ में यक्षिणी' का वर्णन मिलता है जिसका वर्णन मास में भी अपने 'स्वप्नवासवदत्तम्' मे किया है । जातक कथाओं के अनुसार ब्रह्मदत्त काम्पिल्य' नगर का राजा था। भास ने भी ऐसा ही वर्णन किया है। ७--अशोक के शिलालेखो से ज्ञात होता है कि प्रद्योत का राजदूत अपने स्वामी के जामाता उदयन को आर्यपुत्र से सबोधित करता है । स्वप्नवासवदत्तम् के छठे मक मे महासेन का कञ्चुकी उदयन को आर्यपुत्र कहता है। भास के प्रायः सभी नाटकों में 'महीमेकातपत्राम्' की कामना की गई है । यह विचार- धारा चन्द्रगुप्त मौर्य अर्थात् ३२७ ई० पू० से लेकर कुशानवंश दूसरी शती ई० पू० तक प्रचलित थी । संमवत: मास तत्कालीन भावनामों से प्रभावित हों। ८-महाकवि कालिदास ने अपने नाटक मालविकाग्निमित्र की प्रस्तावना में मास की प्रसिद्धि स्वीकार की है। उसी प्रकार बौद्ध कवि अश्वघोष के ग्रन्थों पर मास की स्पष्ट छाया लक्षित होतो है । प्रतिज्ञायोगन्धरायण के प्रथम मंक के श्लोक का माय अश्वघोष के बुद्धचरित में मिलता है पर अश्वघोष की अपेक्षा भास के भावों में अधिक प्रभावोत्पादकता है। अतः मास कालिदास मौर अश्वघोष दोनों से पूर्ववर्ती हैं । E--डा० विटरनिज का कथन है कि मास की भाषा तथा पौली अस्वघोप की मपेक्षा कालिदास के अधिक समीप है। उन्होने मश्वघोप की तिथि ईसा की दूसरी पाती मानी है। वे मास की रचना को तीसरी शताब्दी का मानते हैं । डा. कीप भी मास की यही स्थितिकाल स्वीकार करते हैं । स्टेन कोनो के अनुसार मास ईसा की दूसरी पाती में हुए । प्रो. बलदेव उपाध्याय ने भाम के समय-निर्धारण के विषय मे विद्वानों के विचारो को विवादास्पद कहा है। डा० एस० एन० दास गुप्त ने कालिदास के पूर्व की रचना का ही अपने 'संस्कृत साहित्य के इतिहास मे समर्थन किया है । उन्होंने भास के समय पर अपना कोई स्वतंत्र मत नहीं दिया है। उन्होंने अन्य विद्वानों के मत का उल्लेष किया है । पृष्ठ ७१२ पर वे लिखते हैं- १-प्रन्तिमुन्दरी माम पक्षिणो प्रतिवसति, सा स्वया दृष्टा भवेत् (स्वप्न मंक ५) २-रामा ब्रह्मातः काम्पित्य माम मगरम् । (स्वप्न. मंक ५) ...: Ganapatil The earliest mention of Bhasa is made by Kalidasa in LS-..min. - Karimmitra We know " be dramas dorsed by most European scholars excepting Dr. Barnett. Dr. Cottapteing seems to be upable to propounce any judgment while Dr. Barnett, Pisharoti and Rawavatara Pandeye and some other scholars hold that these dramas cannot be of Kalidasa pre Bhasa, hut that they were probably written sometime in the Tth. Century A.D." सुकथानकर, डा. लेस्नी तथा प्रिन्टन जैसे मनीषियो द्वारा प्राकृत भाषा की विवेचनोपरान्त भास की प्राकृत को कालिदास से प्राचीन तथा प्रश्वधोप से अर्वाचीन सिद्ध किया गया है। भास के नाटकों को मापा कालिदास से पूर्व की ठहरती है पर अश्वघोष की माषा इससे भी पहले की है । ये विद्वान् ईसा की पांचवी शती मे कालिदास का कालनिर्णय करते हैं । इसके सहारे उनके द्वारा भास का काल ईसा की तीसरी शताब्दी निर्धारित किया जाता है । पर मापा के आधार पर लिथि सबंधी कोई निर्णय लेना पवितसंगत प्रतीत नहीं होता। डा० ए०पी० बनर्जी ने "मास का समय तथा मागधी' शीर्षक अपने लेख में पर्याप्त विवेचनानन्तर मास का समय ईसा को दुसरी शती निश्चित किया है। महा- महोपाध्याय टी० गणपति शास्त्री के अनुसार गास ईसा पूर्व छठी शताब्दी में हुए । प्रो० ए० एस० पी प्रप्यर भास को निश्चित रूप से मौर्यकालीन मानते है" जो उचित प्रतीत होता है । अंतरंग परीक्षण के आधार पर काल निर्णय १-मास के नाटको का माधार रामायण, महाभारत तथा लोक-कथाएं हैं । उदयन, प्रयोत तथा दर्शक ई० पू० छठी शताब्दी के ऐतिहासिक व्यक्ति हैं । रामायण तथा महामारत का भी यही समय है। अत: मास के समय की उपरितन सीमा ई० पू० छठी शताब्दी है। २--प्रतिज्ञायोगापरायण प्रविमारक तया स्वप्नवासवदतम, नाटको में हम ऐतिहासिक तथ्य पाते हैं । प्रथम दो नाटकों में दो राजाओं की स्मृति । १२ ) का नवीन होना लेखक के अस्तित्व को उस काल के समीप ही सूचित करता है। राजगृह का राजधानी के रूप मे तया पाटलिपुत्र का एक साधारण नगर के रूप मे वर्णन करना इस बात का द्योतक है कि मास ईसा की पांचवी शती में थे । ३--प्रतिमानाटक में वणित विद्यामों का समय ई० पू० छठी शताब्दी से मी पूर्व का है । मानवीय धर्मशास्त्र (वर्तमान मनुस्मृति का मूलरूप) गौतम धर्मसूम में निर्दिष्ट होने के कारण ईसा पूर्व छठी शताब्दी से भी प्राचीनतर है । गौतम धर्मसूत्र सबमे प्राचीन धर्मसूत्र है जिसका समय ई० पू० छठी शती है । बार्हस्पत्य धर्मशास्त्र का महाभारत में उल्लेख है और कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र मे उसका उद्धरण अनेक स्थलों पर किया है। मेधातिथि का न्यायशास्त्र मेघा- 'तिथि द्वारा की गई मनुस्मृति पर टीका नहीं है अपितु गौतमरचित प्राचीन न्याय-ग्रन्थ है । माहेश्वर योगशास्त्र भी पातञ्जल योग से पहले का है। इन समी उल्लेखो से भास की प्राचीनता सिद्ध होती है । ४---मास के नाटकों में वर्णित सामाजिक दशायें अर्थशास्त्र तथा जातक कथामों से सम्बद्ध प्रतीत होती हैं । प्रतिमा नाटक मे निर्दिष्ट मन्दिरों के परि- वेश में बालू डालने को प्रया प्रापस्तम्ब सूत्रो में ही मिलती है । प्रतिमा नाटक में उल्लिखित मृत व्यक्तियों की प्रस्तर मूर्तियों की स्थापना शिशुनाग वंशी राजामों के युग का स्मरण दिलाती हैं। ५-भरतवाक्यो में निर्दिष्ट 'राजसिंह किसी निश्चित राजा का बोधक नहीं है । हिमालय से विन्ध्य तक शासन करने वाले राजा का संकेत संभवतः नन्द वंश से है ? इनके अतिरिक्त मास की मापा भी प्राचीन ही प्रतीत होती है। इन उपयुक्त तकों के माधार पर प्रो. बलदेव उपाध्याय ने भास सा समय नौयी तथा पांचवी शताब्दी ई० पू० स्थित किया है । वहिरंग परीक्षण के मापार पर काल-निर्णय वहिरंग परीक्षण मी चोयी पांचवी शती ई०पू० के मीतर ही मास का बाल निर्धारण करता है । १-मालविकाग्निमित्र नाटक में कालिदास द्वारा सूत्रधार के मुख से मास पादिको रचनामों का इस प्रकार कपन किया गया है :- 'प्रथितयशसा मासमामिहलकधिषुत्रादीनां प्राधानतिप्रम्य कथं वर्तमानस्य फवेः कालिदासस्य कृतो वहमानः । ई० पू० प्रथम शताब्दी में होने वाले कालिदास के इस उल्लेख से मास का समय उनसे पूर्व ही निश्चित होता है। २-बाण' ने (सातवीं शताब्दी में) भासकृत नाटकों का, वामन' ने (आठवी शती मे) अपने ग्रन्थ काव्यालंकार सूत्र वृत्ति में एक श्लोक का जो मास के नाटक में पाया है उल्लेख किया है । वामन ने चारुदत्त (१/२) तथा प्रतिज्ञा (४/२) श्लोकों को अपने ग्रन्थ मे उद्धृत किया है। स्वप्नवासवदत्तम् नाटक में केवल 'चन्द्राश' के स्थान पर शशांक' पोर कृत के स्थान पर 'मम' पाठ है । शूद्रक का मृच्छकटिक मास के चारुदत्त के आधार पर है। अन्तर होते हुए भी दोनों में बहुत समानता है। ३-कौटिल्य के अर्थशास्त्र (१०/३) मे दो श्लोक उद्धृत हैं। इनमें तीसरा श्लोक प्रतिनायौगन्धरायण के चौथे प्रक का दूसरा श्लोक इस प्रकार है :- नवं शरावं सलिल सुपूर्ण सुसंस्कृतं दर्भकृतोत्तरीयम् तत्तस्य मा भून्नरकं स गच्छेद यो भर्तृपिण्डस्य कृते न युध्येत् । कौटिल्य द्वारा यह अवश्य ही भास से लिया गया होगा। ४-केवल प्रतिमानाटक में (जो मासरचित है) दशरथ की प्रतिमा के उल्लेख से ज्ञात होता है कि वौद्ध आचार्य दिइनाग इस नाटक से परिचित ये क्योकि उन्होंने अपनी कृति कुन्दमाला में दशरथ को पडिमागदो महारापो (प्रतिमागतो महाराजः) लिखा है । १--सूत्रमारकृतारम्भर्नाटकंबहुभूमिकः । सपताकपंशो लेभे भासो देवकुलरिव ॥ पंचरित १.१५ २--शरच्चन्द्रांशगोरेण बाताविहेन भानिनी । काशपुष्पलक्षेनेदं साथपात मुखं कृतम् ॥ स्वप्न. वा. ४३ ५-अश्वघोपविरचित बुद्धचरित महाकाव्य के प्रयोदशसर्ग का निम्न- लिखित साठवा श्लोक मास के प्रतिज्ञा नाटक के प्रथम मंक के मठारहवें श्लोक से कितना मिलता-जुलता है ? इनमें शब्द तया प्रर्य दोनों में पर्याप्त साम्य है:- काठं हि मयनन् लमते हुताशं भूमि खनन् विन्दति चापि सोयम् निबंधिनः किञ्चन नाप्यसाध्य न्यायेन युक्तं च कृतं च सर्वम् ॥ बुद्धचरित १३/६० काष्ठादग्निर्मापते मध्यमानाद भूमिस्तो पन्यमाना ददाति । सोत्साहाना नास्त्यसाध्यं नरार्णा मार्गारब्धाः सर्वपत्नाः फलन्ति । प्रतिज्ञा १.१८ इससे भास का प्रभाव अवधोप पर सष्ट लक्षित होता है। इन बाह्य साक्ष्यों के प्राधार पर मास का स्थितिकाल ई० पू० चौथो शती तथा पांचवीं शती के मध्य ठहरता है। ऐतिहासिक विवेचन के आधार पर यह सर्वमान्य है कि मास गौतम बुद्ध के पश्चात् हुए । बुद्ध का निर्वाण ४८३ ई० पू० में हुआ था। उस समय भारत में प्रवन्ति, मगध, वत्स तया कौशल ये चार बडे राज्य रह गये थे । उनके जन्म मे पूर्व सोलह जनपद थे। शेष समो पारस मे लड़-झगडकर अन्त में इन्ही चार राज्यों में विलीन हो गये थे । डा. जगदीश दत' दीक्षित पुरु के पश्चात् चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रारमिक काल ही माम का कार्यकाल मानते हैं । वे कहते हैं- "मास के अन्यों में वर्णित सीमा के माधार पर हम पुरु के युद्ध के समय के भारत के मानचित्र को प्रस्तुत करते हैं नया पूर्णतया दृष्टिपात करने से हिमालय तया विन्ध्याचल सीमावर्ती क्षेत्र को ही मारत का राज्य अनुमानित करते हैं । इससे यह प्रमाणित होता है कि उन समय भारत की सीमा मास को वणित सीमानो के समान है । सिकन्दर के आक्रमण के समय के भारत १--मास को मापा संवबो तया नाटकीय विशेषताएं पृष्ठ २७ का मानचित्र जो ऐतिहासिकों द्वारा सम्मानित रूप में प्रयुक्त किया गया है, उसी को यहाँ उद्धृत किया जाता है ।"चन्द्रगुप्त, विन्दुसार तया अशोक के वंशज अपने लिए राजसिंह का प्रयोग करते थे। अशोक ने भी सिहत्रयमुखी राजकीय मुद्रांकित स्तम्भों का निर्माण किया है ।"मास ने अपनी रचनानी मे नाटक के नायक की उपमा 'चन्द' से दी है ।...रणशिरसि' समरशिरसि' के इतने अधिक स्थलों पर प्रयोग से सिकन्दर का आक्रमण तया पुरु के उत्तर से प्रतिज्ञा में योगन्धरायण का उत्तर 'वधः' इस ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर इसी काल का प्रमाणित होता है। भास को हम इसी समय का मानने के लिये बाध्य हैं अतः भास का समय मेरी दृष्टि में ३२७ ई०पू० के समीप ही निश्चित किया जा सकता है।" निष्कर्ष---इस प्रकार विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रस्तुत तकों की समीक्षा करते हुए 'भास का स्थितिकाल' ई० पू० तीसरी तया चौथी शताब्दी के मध्य ही निर्धारित करना सर्वाधिक युक्तिसंगत प्रतीत होता है। ७-भास का जीवनवृत्त कालिदास तथा भारवि की मांति मास ने भी अपने संबंध में कुछ प्रकाश नही डाला । उनके सभी नाटक उनके जीवन की घटनामों के विषय में मौन हैं । अतः उनको जीवनी के विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। फिर भी किंवदन्तियों और उनकी रचनाओं के प्रापार पर ही हम कुछ थोड़ा. बहुत कह सकते हैं। एक किंदन्ती के अनुसार वे जाति के घावक (धोबी) थे। काव्यप्रकाशकार मम्मटाचार्य ने उन्हें महाराज श्रीहर्ष का समकालीन माना है। किन्तु यह किवदन्ती सत्य से परे प्रतीत होती है क्योंकि थीहर्ष कालिदास के बहुत बाद में हुए और मास बहुत पहले । एक दूसरो दनकया यह है कि वे घोबी ये उनका नाम घटखबर कवि या किन्तु घटसपर महाराज विक्रमादित्य के नवरत्लो में से एक थे जिससे वे कालिदास के समकालीन प्रतीत होते हैं जैसा कि निम्नलिखिन श्लोक में व्यस्त किया गया है:- धावन्तरिः क्षपणकोऽमरसिहाकु- घेतालभट्टघटखपरकालिदासाः।

- , स्यातो वराहमिहिरो नृपतेः समायां रत्नासि वं वररुचिनयविक्रमस्य ।। अर्थात् महाराज विक्रमादित्य की सभा में ये नवरत्न थे-धन्वन्तरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेतालमट्ट, घटसर्पर, कालिदास, वराहमिहिर और वररुचि । इनका भिन्न-भिन्न समय निश्चित हो चुका है। पर महाराज विक्रम की समा का गौरव बढाने के लिए संभवतः सबको एकत्र कर दिया गया है। यह दन्तकथा भी असत्य प्रतीत होती है। तीसरी किंवदन्ती इस प्रकार है कि एक बार व्यास और भास दोनों मे महत्त्व के लिए विवाद हुमा । निर्णयार्थ उन दोनो के ग्रन्थ अग्नि में डाल दिये गये । मास के ग्रन्थ प्राग में नहीं जले प्रतःमास ही विजयी घोषित हुए। यह दन्तकथा इतना अवश्य सकेत करती है कि मास कालिदास की अपेक्षा अधिक प्राचीन थे क्योकि उनका सघर्ष कालिदास से हुआ न बताकर व्यास से बतलाया गया है। चौथी दन्तकथा के अनुसार मास का नाटकचक्र जव भाग में डाला गया तो पाग ने 'स्वप्नवासवदत्तम्' नाटक को नहीं जलाया। इस दन्तकथा से यह सिद्ध होता है कि भास ने अनेक नाटको की रचना की थी जिनमें 'स्वप्नवा- सवदत्तम्' ही सर्वश्रेष्ठ था । भास के नाटकों के अध्ययन से पता चलता है कि वे ब्राह्मण थे। इसी मत की पुष्टि डा० पुसल्कर, श्री ए० एस० पी० अय्यर लथा श्री एस. एन. दासगुप्त करते हैं । श्री दासगुप्त अपने संस्कृत साहित्य के इतिहास के पृ०७०८ पर लिखते हैं Bbasa was probably a Brahmin and a devotee of vishnu" प्राचार्य बलदेव' उपाध्याय मी उनके ब्राह्मण होने का समर्थन करते हैं :-- "ब्राहाणीय धर्म तथा समाज-व्यवस्था के प्रति उनका महान् आग्रह, अकुलीनो का सुरूप न होना (अविमारक) आदि तथ्य उन्हें बाह्मण सिद्ध करते हैं । परम्परा से भी विद्या-क्षेत्र ब्राह्मणो के आधिपत्य में ही मुख्यतः था, अतः १. महाकवि मासः एक अध्ययन-प्राचार्य बलदेव उपाध्याय ।

यही सही प्रतीत होता है कि मास ब्राह्मण थे। वे दक्षिण भारत के नहीं अपितु उत्तर भारत के निवासी प्रतीत होते हैं। मास के नाटकों में अनेक देशों का उल्लेख है, जिसमें अवन्ती, वत्स, काशी, शूरसेन, कुरु, मत्स्य, कोशल, विराट, गान्धर्व, काम्बोज, मद्र, मिथिला, जनस्यान, दक्षिणापथ तथा लंका प्रमुख हैं। उनकी कृतियों में उत्तरी भारत के नगर, नदी, पर्वत तथा रीतिरिवाजो का अत्यन्त व्यापक वर्णन पाया जाता है। पर्वतों मे हिमालय, महेन्द्र, मलय, विन्ध्य, त्रिकूट, मेरु, मन्दर, क्रौञ्च, कैलास आदि का उल्लेख है। उनको चित्तवृत्ति अयोध्या, मथुरा तथा उज्जन में विशेष रूप से रमी है । 'स्वप्न- वासवदत्तम्' एवं 'बालचरितम्' में उनका भरतवाक्य---- इमा सागरपर्यन्तां हिमवद्विन्ध्यकुण्डलाम् महीमेकातपत्रांकां राजसिंहः प्रशास्तु नः ।। - धोतित करता है कि हिमालय और विन्ध्य पर्वत के मध्य में ही उनका निवास स्थान होना चाहिए। भास का दक्षिण भारत का ज्ञान उत्तर भारत की अपेक्षा बहुत ही सीमित था। ऐसा प्रतीत होता है कि दक्षिणी भारत विषयक उनका ज्ञान केवल रामायण तथा महाभारत तक ही सीमित था। क्योकि रामकथा-वर्णन करने के प्रमग मे रामेश्वरम् जैसे प्रमुख तीर्थ का उन्होंने उल्लेख नहीं किया जिमसे इस अनुमान की और भी पुष्टि होती है । जैसा पहले कहा जा चुका है कि मास वर्णाश्रम व्यवस्था के पक्षपाती थे। वे किसी राजा के राजपण्डित थे जिसके लिए उन्होने राजसिंह' शब्द का प्रयोग किया है, पर यह किसी व्यक्तिविशेप के लिए प्रयुक्त प्रतीत नहीं होता, न इस संबंध में उनका कोई स्पष्ट लेख ही है। उनके ग्रन्थो से भाम का राजकुलों से गहरा संबंध दृष्टिगोचर होता है। राजप्रामाशे, अन्त.पुरों आदि का दिगद वर्णन किसी राजसमा से इनका सवध सूचित करता है । अमात्यो, सेना, द्वन्द्व प्रादि का वर्णन इनके नाटको मे सर्वत्र पाया जाता है। चारुदत्त नाटक में एक समृद्ध नागरिक के विसालितापूर्ण जीवन का चित्र सोचा गया है । यह नागरिक जीवन का सच्चा प्रतिनिधित्व करता है जिससे प्रतीत होता है कि धनी-मानी नागर जनों से भी इनका सम्पर्क रहा होगा। स्व. द०-२ ( १८ ) जैसा पहले कहा चुका है कि भास वर्ण-व्यवस्था एवं प्राश्रम-व्यवस्था के पूर्ण समर्थक थे। बौद्धो के प्रबल प्रहार के बाद भी ब्राह्मणों का अत्यधिक सम्मान था। वे विद्वान्, धार्मिक तथा सत्यवादी माने जाते थे। ब्राह्मणों के पश्चात् क्षत्रियों का स्थान था। वे युद्धविद्या में निष्णात होते थे । युद्ध से पराङ्मुख होना वे पाप समझते थे । वैश्य व्यापार में सलग्न होते थे। शूद्रों का कर्म सेवा था तथा छोटे पैमाने पर कृषि भो करते थे। उनके समय में चारों आश्रमों की व्यवस्था स्थिर प्रतीत होती है । ब्रह्मचर्य जीवन संयमित तथा कठोर होता था। सन्यासियो में तपस्वी तथा परिव्राजक दो वर्ग थे। स्वप्नवासवदत्तम् के प्रथम अक से ज्ञात होता है कि स्त्रियां मी तपस्विनी होकर वनों में रहती थीं। इसका उदाहरण मगधराजमाता हैं। मास स्वमाव से नम्र, विनोदप्रिय, तथा प्रत्युपत्रमति थे। वे संलापकला में कुशल थे। मनुष्यस्वभाव तया प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रेमी और पारखी थे। उनका कौटुम्बिक जीवन भी संमवतः सुखमय था। अपने मातापिता के प्रति वे अपना कर्तव्य पालन करते थे। उनकी पत्नी परम साध्वी एवं पतिपरायण थी। अपनी सन्तान के प्रति उनका अगाध स्नेह था । अपने से बड़ों का वे सम्मान करते ये तथा संयुक्त परिवार-प्रथा प्रवल समर्थक थे। उनके नाटको से उनकी प्राशावादिता तथा राष्ट्रीय मावना व्यक्त होती है। ये न्याय तपा स्वतत्रता के पुजारी थे। उनके नाटकों के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि वै भनेक शास्त्रों में निष्णात थे । साहित्यशास्त्र मे उनका पाण्डित्य अगाध था। उन्होंने वेद, इतिहास-पुराण, लोककथाएँ, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, धर्म- शास्त्रादि भनेक शास्त्रो का गम्मीर मध्ययन किया था। भास वैष्णवधर्मावलवी थे। राम तथा वृष्ण के चरितो में उनकी भक्ति इस यात की परिचायक है । देवतामों में उनकी प्रास्था थी। वैदिक कर्मकाण्ड में उन्हें पूर्ण विश्वास या । वे गो-माहागों के बडे भान थे और उन्हें सदैव मादर की दृष्टि मे देखते पे। --भास के नाटक महावि भास के पात्र तर प्राप्त नाटकों को संस्था कुल तेरह है । नाटक त्रावणकोर राज्य में संस्कृत के हस्तलिखित ग्रन्यो पा.मन्वेषण करते । - (१६) . 'हुए स्वर्गीय महामहोपाध्याय श्री गणपति शास्त्री को १६०६ ई० में प्राप्त हुए थे। इन नाटको के विपय विविध स्थानों से लिए गये हैं। ऐसा मालूम पडता है कि उस समय महाभारत के पठन-पाठन का अत्यधिक प्रचार था । महाभारत की घटनाओं से लोग बहुत परिचित थे । मास ने जन-जीवन में प्रसृत घटनाओं को ही अपने नाटक का विषय बनाया है और इनमे से सात माटक महामारत की घटनाओं से ही सम्बन्धित हैं। अतिरिक्त दो नाटक सम्राट् उदयन से सम्बन्ध रखते हैं, दो रामायण की कथा से और दो कल्पनामूलक हैं। नाटक का कयानक चाहे महाभारत या रामायण पर आश्रित हो, चाहे कोरी दन्तकया या ऐतिहासिक किंवदन्ती पर आश्रित हो, सर्वत्र मास की मौलिकता तथा अनूठी कल्पनाशक्ति का पूर्ण सञ्चार है । उनको नाट्यकला की कुशलता से उनकी मौलिक प्रतिमा का प्रमाण मिलता है । मास के नाटक प्राधार-क्रम के अनुसार इस प्रकार हैं १. दूतवाक्य--यह एक एकाको 'व्यायोग' है। इसका कथानक महा- मारत पर आधारित है । इसमें पाण्डवों को पोर मे सन्धि का प्रस्ताव लेकर भगवान् श्रीकृष्ण कौरवपक्ष के शिविर में जाते हैं और वहाँ से विफल होकर लौट आते हैं। २. कर्णभार—यह एक अंक का 'उत्सृष्टिकाङ्क' है। इसका भी कथानक महाभारत का है। इसमें कर्ण द्वारा ब्राह्मण वेपधारी देवराज को अपना कवच- कुण्डल दान-स्वरूप प्रदान कर देने की कथा है। इस नाटक मे स्यान-अन्विति का पूर्ण निर्वाह किया गया है । ३. दूतघटोत्कच-यह भी महामारत के क्यानक पर आश्रित एकांकी 'उत्सृष्टिकाई है। इसकी कथा अभिमन्यु के पश्चात् कम से चलती रहती है। अभिमन्यु मरणोपरान्त अर्जुन जयद्रय-व की मीपण प्रतिज्ञा करते हैं। श्रीकृष्ण घटोत्कच को दूत बनाकर कोरवपक्ष में मज कर धृतराष्ट्र के पास भीषण विनाश की सूचना देते है । दुर्योधनादि द्वारा घटोत्कच का घोर अपमान होता है । दोनों पक्षों में भीषण संग्राम प्रारम्भ हो जाता है। इसमें दुर्योधन तथा घटोत्कच के संवाद वीर रस से परिपूर्ण हैं।

४. करमंग-'दूतवाक्य', 'कर्णमार' आदि की तरह यह भी एकांकी है। कथानक, जैसा कि नाम से ही परिलक्षित है, महाभारत का है। इसमें भीमसेन तथा दुर्योधन के अन्तिम गदायुद्ध का मार्मिक चित्रण है । करुण रस का पूर्ण परिपाक हुआ है । दुर्योधन का कारुणिक मरणदृश्य उसे पूर्ण दुःखान्त बना देता है। संस्कृत का यही एकमात्र दुःखान्त नाटक (Tragedy) है। इसमें भी कर्ण भार के सदृश समय और स्थान की प्रन्विति (Unity of time and place) की ओर समुचित ध्यान दिया गया है । ५. मध्यमव्यायोग-यह भी महाभारत पर आधारित भास का सबसे छोटा नाटक है। इसमें मोम ने एक ब्राह्मण-पुत्र की रक्षा घटोत्कच के हाथ से की है। भीम पाण्डवों में मध्यम थे, अतः नाटक का नाम मध्यमव्यायोग पहा। ६. पञ्चरात्र--यह तीन प्रकों का समदकार है। इसमें महाभारत की एक घटना को अन्यया रूप दिया गया है। द्रोण ने दुर्योधन से पाण्डवों को माया राज्य दे देने के लिए अनुरोध किया। दुर्योधन ने कहा कि यदि केवल पांच रात्रि की अवधि में ही पाण्डव मुझसे मिल जाएं तो मैं उन्हें प्राधा राज्य दे राक्ता हूँ । उस समय पाण्डव अज्ञातवास में ये । किन्तु द्रोण के प्रयत्न से पाण्डप पाच रात के भीतर दुर्योधन मे मिले मौर उसने उन्हें भाषा राज्य दे दिया । इसमें कई नाटकीय दृश्यों का समावेश किया गया है किन्तु इतिवृत्त की दृष्टि से महाभारत के इतिवृत्त के समान प्रभावशाली नहीं हो सका है। ७. बालचरित-यह भी महाभारत की कथा पर पाश्रित पांच पंक का नाटक है। इसमे भगवान् श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर कंस-वयपर्यन्त का परित वर्णन किया गया है। ८. अभिषेक-यह पद अंको का नाटक रामायण की कथा पर माश्रित है। इसमे यालि-वय में लेकर गवग-वप तक की कया बड़े ही संयत ढंग से थगित है। अन्त में राम का राम्पाभिषेक है। राम के राज्याभिषेक के वर्णन कारण नाटकमा माम 'मभिपेकपहा। १. प्रतिमानाटक-रामायण पर माश्रित भाम का यह दूसरा नाटक है। इममे मात पंग है पीर राम-यमवास से लेकर रावण-यप के उपरान्त राम के । २१ ) । अयोध्या लोटने तक का कथानक है । भरत अपने ननिहाल से लौटने पर जब अयोध्या के एक प्रतिमा-गृह में अपने मृत पूर्वजों की प्रतिमा के साथ दशरथ को भी प्रतिमा देखते हैं तो उन्हें ज्ञात हो जाता है कि उनके पिता अब जीवित नही हैं । प्रतएव इम नाटक का नाम प्रतिमानाटक पड़ा है । १०. प्रतिज्ञायौगन्धरायण--यह चार अंकों का नाटक है। इसमें मंत्री यौगन्धरायण ने प्रतिज्ञा की कि वह अपने राजा उदयन को उज्जैन के राजा प्रद्योत के यहां से छुडा कर लाएगा । वह अपने प्रयत्न में सफल हुमा और उसको प्रतिज्ञा पूरी हुई। इसी से नाटक का नाम प्रतिज्ञायौगन्धरायण पड़ा । ११. स्वप्नवासवदत्त-छह अंकों में परिपूर्ण यह नाटक भास के नाटकों में सबसे अधिक प्रसिद्ध है और कथा-बन्ध एवं रंगमंच की दृष्टि से सस्कृत साहित्य मे एक अद्वितीय कृति है । इसको हम प्रतिनायोगन्धरायण का उत्तर भाग कह सकते हैं । इसमे मंत्री योगन्धरायण को दूरदर्शिता का प्रखर परिचय मिलता है । यौगन्धरायण ही पानी दूरदर्शिता से वासवदत्ता के अग्नि में जल जाने का प्रवाद फैलाकर उदयन का दूसरा विवाह मगध की राजकुमारी पद्मा- वती से करा देता है और फिर मगधराज की सहायता से कौशाम्बी का नष्ट राज्य उदयन को पुनःप्राप्त कराने में सफल हो जाता है । १२. अविमारक-यह नाटक कल्पनामूलक है। इसमे छह अंक हैं। राजा कुन्तिभोज की रूपवती कन्या कुरंगी के साथ भविमारक नामक राजकुमार के प्रम-विवाह की कथा का चित्रण इसमे किया गया है। १३. चावदत--यह भी कल्पनामूलक एक प्रकरण है । इसका पूर्ण आकार अभी तक प्राप्त नहीं हो सका है । इसके केवल चार अंक ही उपलब्ध हुए हैं। इस प्रकरण में वेश्या ३ चमेना के साथ एक सदाशय निर्धन ब्राह्मण का मात्विक प्रेम चित्रित किया गया है । इसी को लेकर बाद मे शूद्रक ने अपना 'मृच्छ- कटिक' लिखा। E-~-क्या इन सभी नाटकों के रचयिता भास हैं ? इस विषय में मिन्न-भिन्न मत हैं कि इन तेरह नाटकों के रचयिता भास हैं । कतिपय विद्वानों का कथन है कि कुछ नाटकों की रचना मास ने की है - ( २२ ) शेष की रचना किसी अन्य के द्वारा की गई। इनके अन्वीक्षण से यह स्पष्ट व्यक्त होता है कि इन सव नाटकों की रचना एक ही व्यक्ति ने की है। प्रायः सभी विद्वान् इन्हें एक ही व्यक्ति की रचना मानते हैं। इसके लिए निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत किये जाते हैं : १-समी नाटक सूत्रधार से प्रारम्भ होते हैं जिनमे प्रथम संकेत मिलता है 'नाचन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः' जब कि अन्य संस्कृत नाटक नान्दीपाठ से प्रारम्भ होते हैं । २--प्रकों के मध्य में लघुविस्तार वाले प्रवेशकों' तथा 'विष्फभकों का प्रयोग किया गया है । दर्शको को अंकों के बीच में होने वाली घटनामो को सूचित करने के लिए इनको काम में लाया गया है। ३–प्रायः सभी नाटकों में प्रस्तावना के स्थान पर 'स्थापना' शब्द प्रयुक्त हुआ है । 'प्रस्तावना" का प्रयोग केवल 'कर्णभार में किया गया है । ४--समी नाटकों मे "इमां सागरपर्यन्तां हिमवविन्ध्यफुण्डलाम् । महोमेका. तपत्रांका राजसिंहः प्रशास्तु नः॥" से अथवा इसी भाव वाले किसी पद से भरत वाक्य समाप्त होता है । पर चारुदत्त तथा दूतघटोत्कच मे भरतवाक्य नही है । ५-सामान्यतः भरत के नाट्यशास्त्रीय नियमों का पालन नहीं किया गया है। मृत्यु तथा सडाई-झगड़े रगमंच पर ही दिखाये गये है (मरत नाट्यशास्त्र में में वजित हैं) और अभिषेक, पूजा, रापय या अशु-प्रशालनापं रगमंच पर जल साया गया है। जैसे 'प्रतिमा' मे दहारण की, 'मभिषेक' में पालि की तथा 'ऊरमग' में दुर्योपन की मृत्य रंगमंच पर ही प्रदर्शित की गई है। ६-इन सभी नाटको में प्राय: 'माकासमापित' मिलता है जिसमें रंगमंच पर पान मप्रवृत प्पनियों को मुनता है पथया अनुपस्थित व्यक्तियों से दातांसाप करता है। ७-इन नाटकों में बुध गद प्रपने प्रचलित मयों से मिन्नार्य में प्रयुक्त हुए हैं। जैसे 'भापुत्र' शब्द का प्रयोग पने यार ऐसे पों में हमा है जिनका विपान मात फे नाट्य शास्त्र में नहीं है।

(५ २३.) +--इन सभी नाटकों में अन्त में नाटक के नाम का उल्लेख किया गया है । किसी में भी ग्रन्थ-प्रणेता का नाम नहीं है। ६-इन नाटकों में यद्यपि विभिन्न छन्द प्रयुक्त हुए हैं, पर इन छन्दों के प्रयोग में समानता है । कतिपय अप्रचलित छन्दों का प्रयोग उपयुक्त है जैसे सुवदना, दण्डक आदि । अनुष्टुप् छन्द बहुत अधिक मात्रा मे पाया है। १०-विभिन्न नाटकों में कई पात्रो की पुनरावृत्ति है जैसे 'प्रतिज्ञा' और 'दूतवाक्प' में 'कंचुकी' का नाम 'बादरायण' है । इसी प्रकार स्वप्नवासव- दत, प्रतिज्ञायौगन्धरायण, प्रतिमा तथा अभिषेक इन चार नाटकों मे 'प्रतिहारी' का नाम 'विजया' है। ११-इन नाटकों में समान शब्दों तथा दृश्यों की अवतारणा की गई है। किसी विशिष्ट व्यक्ति के आगमन को उपमा तारागणमध्य चन्द्रोदय से दी गई है। १२-कई नाटको मे समान वाक्यों का प्रयोग मिलता है। जसे जन-समूह को मार्ग से हटाने के लिए 'उस्मरह उस्सरह अय्या, उस्सरह (हटिये, हटिये श्रीमानो) कई स्थानो पर प्रयुक्त हुआ है । कई विषयों का उल्लेख भी समानरूप से अनेक नाटको में पाया जाता है जैसे सूर्यास्त, राज्यागमन, युद्ध प्रादि । इनकी वर्णन-प्रणाली में भी समानता दृष्टिगोचर होती है। १३-इन नाटकों में से पांच ( स्वप्नवास पदत्त, प्रतिनायोगन्धरायण, प्रतिमा, पचरात्र और कस्मंग) के प्रथम श्लोक मे मुद्रालंकार का प्रयोग है। इसमे देवस्तुति के माय ही साय मुख्य पात्रो के नाम मोपा गये हैं। १४.-'एयमार्पमित्रान् विमापयामि किन खल मपि विगापनव्यः शाद इय भूपते, अंग परमामि' यह पक्ति प्रतिज्ञापोगन्धरायण, भविमारक, प्रतिमा व्या चारदात को छोड पर ममी नाटको ये पाई जाती है। १५--पपाणिनीय प्रयोगों को बहुलता है। क्योकि इनमें पाणिनीय याकरण के नियमो का कठोरता में पासन नहीं किया गया है। १६-प्रधिक्तर नाटकों में पताका-स्थान' या प्रयोग मिलता है।

( २४ ) - १७--सभी नाटकों को मापा तथा शैली में बहुत साम्य है । अनेक शब्दों, वाक्यों, श्लोकों और पदों की विभिन्न नाटकों में पुनरावृत्ति की गई है। वे ही उपमायें तथा उत्प्रेक्षाएं पाई जाती हैं। १८-कई नाटकों में ऐसी प्रणाली प्रयुक्त हुई है कि किसी नवागन्तुक से ही अप्रत्याशित उत्तर मिल जाता है। उदाहरणार्थ, प्रतिज्ञायोगन्धरायण में महासेन कई राजामों की सूची बतलाकर अपनी महारानी भंगारवती से पूछते हैं कि कौन राजा वासवदत्ता के योग्य है, उसी समय कञ्चुको महसा पाकर कहता है-~-'वत्सराज' । प्राशय यह कि उनके प्रश्न का अकस्मात् उत्तर मिल गया यद्यपि कञ्चुकी यह कहने पाया था कि 'वत्सराज बन्दी बना लिया गया' । अमिपेक में रावण सीता से पूछता है कि जब इन्द्रजित् द्वारा राम- लक्ष्मण मारे गये तो रक्षा कौन करेगा? नेपथ्य में-राम। अविमारक में विलासिनी नलिनी से कहती है कि विवाह कब होगा? पर्दे के पीछे से 'माज' ध्वनि पाती है। १६--इन ममी नाटकों में समान नाटकीय परिस्थितियों की भवतारणा हुई है । प्रमिक मोर प्रतिमा दोनों में रावण के निवेदन को सीता शाप के माय ठुकरा देती है । इसी प्रकार चारुदत्त में वसन्तसेना भी शकार के अनुनय को शाप के साथ भस्वीकृत कर देती है। प्रतिज्ञापौगन्धरायण मौर प्रविमारक में राजा तया तथा रानी मे पुत्री के उपयुक्त वर के लिए विचार-विमर्श है । बालचरित में कंस देवकी के पुत्री उत्पन्न होने की बात तब तक नहीं मानता जब तक कचुकी इसी प्रकार का प्रश्न नहीं करता। २०-नाट्यनिर्देश की कमी सभी नाटकों में एक-सी पाई जाती है । जो नाट्यनिर्देश है मो उनमें एक से अधिक निर्देश एक साथ मिलते हैं जैसे 'निष्क्रम्य पुनः प्रविश्य'। २१-इनमें माता नाम से युक्त पुत्र का नाम पाया जाता है, जैसे कौशल्यामातः (राम), सुमित्रामातः (सक्ष्मण), चंदेहीपुत्रः (उदयन) । २२-इन नाटकों में युद्ध की सूचना प्रायः माटों, ब्राह्मणो मादि के द्वारा दिसाई गई है।

। २५) २३-पंत्ररात्र; कर्णमार, दूतघटोत्कच आदि रूपकों में किसी घटना को मूचित करने के लिए 'निवेचता निषेधतां महाराजाय' वाक्य का समान रूप से प्रयोग किया गया है। २४.-इन सभी में सामाजिक परिस्थितियों एक-सी पाई जाती हैं। २५-मावसाम्य इनकी एक बड़ी विशेपता है। प्रविमारक तथा बाल- चरित में नारद कलहप्रिय एवं स्वरतंत्री के साधक बताये गये हैं । दूतघटोत्कच तथा ऊरमंग में अर्जुन की वीरता का वर्णन है। मृत्यु के बाद भी राजाओं का यसमारोर से जीवित रहने तथा साहसियों के पास लक्ष्मी रहने का विधान सर्वत्र पाया जाता है। २६-इन सभी नाटकों में समान मादशं दृष्टिगोचर होता है। उदाहरणार्य समी में देश की स्वतंत्रता मोर विदेशियों के निष्कासन की कामना की गई है । दूसरों से स्वतंत्रता की मिक्षा मांगने की अवहेलना की गई है। वर्णाश्रम धर्म तथा गायों की रक्षा करना, तपस्वियों तया साघुषों को प्रसन्न रखना, न्याय करना राजधर्म माना गया है । २७---कष्ट के समय 'माप अधिक संतप्त न होइमें ऐसा किसी पान द्वारा कहलाना मास की अपनी विशषता है।' २८-इन नाटकों की रचना कोई साधारण कवि नहीं कर सकता। इनके उच्चस्तर मे प्रतीत होता है कि ये मास जैसे प्रतिमाशाली कवि को ही कृतियाँ हो सकती हैं। इन समानतामों से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि किसी एक ही व्यक्ति ने इन नाटकों की रचना की होगी। पर इनके रचयिता मास ही पे मथवा कोई पन्य यह विषय प्रारम्म से ही विवादासर रहा है । डा० ए० डी० पुसालकर तया १० ए० मो कीप इन्हें मासात मानते हैं। दूसरी भोर देवपर, कुन्हन राजा, सिरोती तपा विन्टरनोन इन्हें भामरचित नहीं स्वीकार करते। डा. मुरुमांतर प्रालिय विद्वान् ममम मागं का माथप सेकर प्रतिमायोप- १मा भवानतिमात्र संतप्प:- यह वाय स्वप्नवासवदत्तम्, पविमारक सपा पारस्त में पारा है।

- उत्तर मिल १७-समी नाटकों की भाषा तथा शैली में बहुत साम्य है । अनेक शब्दों, वाक्यों, श्लोकों और पदों की विभिन्न नाटकों में पुनरावृत्ति की गई है। वे ही उपमायें तथा उत्प्रेक्षाएं पाई जाती हैं। १८-कई नाटकों में ऐसी प्रणाली प्रयुक्त हुई है कि किसी नवागन्तुक से ही अप्रत्याशित उत्तर मिल जाता है। उदाहरणार्थ, प्रतिज्ञायोगन्धरायण मे महासेन कई राजामों की सूची बतलाकर अपनी महारानी भंगारवती से पूछते हैं कि कौन राजा वासवदत्ता के योग्य है, उसी समय कञ्चुकी सहसा पाकर कहता है-'वत्सराज' । प्राशय यह कि उनके प्रश्न का अकस्मात् गया यद्यपि कञ्चुको यह कहने पाया था कि 'वत्सराज बन्दी बना लिया गया' । अभिषेक में रावण सीता से पूछता है कि जब इन्द्रजित् द्वारा राम- लक्ष्मण मारे गये तो रक्षा कौन करेगा? नेपथ्य में--राम। भविमारक मे विलासिनी नलिनी से कहती है कि विवाह कब होगा? पर्दे के पीछे से 'आज' ध्वनि पाती है। १६-इन समी नाटकों में समान नाटकीय परिस्थितियों की अवतारणा हुई है । अभिषेक और प्रतिमा दोनों में रावण के निवेदन को सीता शाप के माथ ठुकरा देती है । इसी प्रकार चारुदत्त में वसन्तसेना भी शकार के अनुनय को शाप के साथ अस्वीकृत कर देती है । प्रतिज्ञायौगन्धरायण और भविमारक मैं राजा तथा तथा रानी में पुत्री के उपयुक्त वर के लिए विचार-विमर्श है । वालचरित में कंस देवकी के पुत्री उत्पन्न होने की बात तब तक नहीं मानता जब तक कचुकी इसी प्रकार का प्रश्न नहीं करता। २०--नाट्यनिर्देश की कमी समी नाटकों में एक-सी पाई जाती है। जो नाट्यनिर्देश है भी उनमें एक से अधिक निर्देश एक साथ मिलते हैं जैसे 'निष्क्रम्य पुनः प्रविश्य। २१-इनमें माता के नाम से युक्त पुत्र का नाम पाया जाता है, जैसे कौशल्यामातः (राम), सुमित्रामातः (लक्ष्मण), वैदेहीपुत्रः (उदयन) । २२-इन नाटकों में युद्ध की सूचना प्रायः माटों, ब्राह्मणो भादि के द्वारा दिसाई गई है।

( २५ । २३--पंत्रराव, कर्णभार, दूतघटोत्कच प्रादि रूपकों में किसी घटना को सूचित करने के लिए 'निवेद्यतां निवेद्यतां महाराजाय' वाक्य का समान रूप से प्रयोग किया गया है। २४-इन सभी में सामाजिक परिस्थितियां एक-सी पाई जाती हैं । २५----भावसाम्य इनकी एक बड़ी विशेषता है। अविमारक तथा बाल- चरित में नारद कलहप्रिय एवं स्वरतंत्री के साधक बताये गये हैं । दूतघटोत्कच तथा अरुमंग में अर्जुन की वीरता का वर्णन है। मृत्यु के बाद भी राजाओं का यशःशरीर से जीवित रहने तथा साहसियों के पास लक्ष्मी रहने का विधान सर्वत्र पाया जाता है। २६-इन सभी नाटकों में समान प्रादर्श दृष्टिगोचर होता है। उदाहरणार्थ समी में देश की स्वतंत्रता और विदेशियों के निष्कासन की कामना की गई है । दूसरों से स्वतत्रता की मिक्षा मांगने की अवहेलना की गई है। वर्णाश्रम धर्म तथा गायों की रक्षा करना, तपस्वियों तथा साधुओं को प्रसन्न रखना, न्याय करना राजधर्म माना गया है । २७-कष्ट के समय 'पाप अधिक संतप्त न होइये ऐसा किसी पात्र द्वारा कहलाना भास की अपनी विशषता है।' २८---इन नाटको की रचना कोई साधारण कवि नहीं कर सकता। इनके उच्चस्तर से प्रतीत होता है कि ये भास जैसे प्रतिभाशाली कवि को ही कृतियां हो सकती हैं। इन समानताओं से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि किसी एक ही व्यक्ति ने इन नाटकों की रचना को होगी। पर इनके रचयिता मास ही थे अथवा कोई अन्य यह विषय प्रारम्म से ही विवादास्पद रहा है । डा० ए० डी० पुसालकर तथा डा० ए० बी० कोय इन्हें मासकृत मानते हैं। दूसरी मोर देवघर, कुन्हन राजा, पिशरोतो तया विन्टरनोज इन्हें मासरचित नहीं स्वीकार करते। डा. सुक्यांकर मादि कुछ विद्वान् मध्यम मार्ग का माश्रय लेकर प्रतिज्ञायोग- १-मा भवानतिमात्र संतप्य:-यह वाक्य स्वप्नवासवदत्तम्, प्रविमारक तथा चारुदत्त में माया है।

। न्धरायण और स्वप्नवासवदत्तम् आदि कुछ नाटकों को मासकृत मानते हैं पर कुछ को भास के नाम के साथ पीछे से जोडा गया मानते हैं। कुछ पालोचक इन नाटकों को केरल के चाक्यारों की रचना मानते हैं 1 प्रस्तावना या स्थापना में मास के नाम का प्रभाव, हस्तलिपियो का अन्य प्रान्तों में न मिलकर केवल केरल मे ही प्राप्त होना, स्वप्नवासवदत्तम् तथा प्रतिज्ञा नाटकों में विवाह के लिए संबंध शब्द का प्रयोग इन्ही तर्कों के आधार पर चाक्यारो मी सृष्टि मानी गई है। पर ये बातें युक्तिसंगत नही प्रतीत होती । संभव है उस समय नाटक- कार के नाम देने की प्रथा न रही हो । यदि यह चाक्यारों की रचना होती तो प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए रचयिता का नाम अवश्य दिया गया होता । उत्तरी भारत में मुसलमानों के प्रभुत्व के कारण संस्कृत साहित्य के अन्य ग्रन्थयों के जलाने के साथ ही साथ भास का साहित्य भी भस्म हो गया हो अतः उनका अन्य प्रान्तों में प्रभाव है । रही बात विवाह के अर्थ मे 'सम्वन्ध' शब्द के प्रचार की तो मिताक्षरा पद्धति में यह शब्द इस अर्थ में अब भी प्रयुक्त होता है। यदि चाक्यारों में इतनी काव्य-प्रतिमा तथा नाट्यकौशल होता और उनकी माषा इतनी समृद्ध होती तो वे दूसरे नाटकचक्रों की रचना करते। इन तेरह नाटकों के बाद उनकी अन्य रचनायें भी उपलब्ध होती । अतः चाक्यारो द्वारा इनकी रचना नहीं हुई। इस प्रकार अभी तक प्राप्त युक्तियां यद्यपि पूर्णतया निर्णयात्मक नहीं हैं तथापि माससमर्थक युक्तियां अधिक समीचीन प्रतीत होती हैं। प्राचीन कवियों ने मास की जिन विशेषताओं का उल्लेख किया है वे सब इन नाटकों मे दृष्टिगोचर होती हैं । इन प्राचीन कवियों के नाम इस प्रकार हैं बाणमट्ट, दण्डी, वाक्पति मामह, वामन, राजशेखर, अभिनवगुप्त, मोजदेव, जयदेव । इन प्राचीन कवियों की प्रशस्तियो के आधार पर यह स्पष्ट रूप में कहा जा सकता है कि इन तेरह नाटकों के रचयिता भास ही हैं । ये प्रशस्तियाँ मागे दी गई हैं। १ -स्वप्नवासवदत्तम् की कथावस्तु वत्सदेश के अधिकांश भाग पर मारुणि ने अधिकार जमा लिया था। इस राज्य को पुनः स्वामी के अधिकार में लाने के लिए वत्सराज उदयन के मनियो ( २७ ) की दृष्टि में मगधरान दर्शक की सहायता नितान्त आवश्यक थी। परन्तु यह सहायता उदयन और पद्मावती के विवाह से ही संभव थी। इधर ज्योतिषियों ने बताया था कि पद्गावती उदयन की रानी बनेगी। किन्तु जब तक वासवदत्ता जीवित थी, यह विवाह नहीं हो सकता था। क्योंकि प्राणप्रिया वासवदत्ता के रहले न तो उदएन ही विवाह के लिए सहमत था और न दर्शक ही अपनी रहन का विवाह उदयन से सहर्ष कराने को तैयार या। अतः मंत्रियों ने वासवदत्ता की स्वीकृति से एक पड्यन्त्र रचा। राज्य को पश्चिमीय सीमा के निकट लावाणक नामक ग्राम में राजकीय पडाव डाल दिया। क दिन जब राजा प्राखेट के लिए बाहर गया तब उस ग्राम में प्राग लगवा दी और घोषणा कर दी कि वासवदत्ता और योगन्धरायण उसमें जल गये। तत्पश्चात् वासवदत्ता मौर यौगन्धरायण वेश बदल कर मगध के एक तपोवन में पहुंचे। यहीं से स्वप्नवासवदत्त का प्रथम प्रक प्रारंम होता है। पहला अंक-मंगल-गान के पश्चात् सूत्रधार रंग-मंच पर पाकर प्रार्थना करता है कि बलगम जी की मजायें दर्शकों का पालन करें। अनन्तर वह कुछ कहना ही चाहता है कि नेपथ्य मे 'हटो, हटो की आवाज होती है। उसे ध्यान से सुनकर वह कहता है-'अरे ! यह तो मगधराजकुमारी के नोकर तपस्वियों को हटा रहे हैं। इतना कहकर वह चला जाता है। तब अवन्तिका के वेश मे वासवदत्ता और सन्यासी का देश धारण किये हुए योगन्धरायण पाते हैं। सिपाहियों द्वारा तपस्वियों को हटाये जाने की बात सुनकर वासवदत्ता योगन्ध- रायण से कहती हैं-'आर्य ! ये उजड्ड सिपाही कही हम लोगो को मी न हटा दें। इतने में मगधराजकुमारी पद्मावती का जो उस समय तपोवन में निवास करने वाली अपनी माता का दर्शन करके राजधानी को लौट रही थी और तापसी के अनुरोध पर उस दिन वहाँ के आश्रम मे ठहर गई थी, कंचुकी उन सिपाहियों को रोक देता है और पद्मावती की आज्ञा से याचको को मनोवांछित दान देने की घोषणा करता 1 पोगन्धरायण जो पुष्पकमद्र प्रादि ज्योतिषियो के कथनानुसार पद्मावती को अपने महाराज उदयन की होने वाली रानी समझता है, इस अवसर से लाभ उठाता है । वह पद्मावती से अपनी कल्पित भगिनी वासवदत्ता को घरोहर रखने की प्रार्थना करता है । पद्मावती उमे स्वीकार कर लेती है। बातचीत के सिलसिले में तापसो पद्मावती के विवाह कर 'चर्चा छेड़ देती है । पद्मावती को दासी तापसी को बताती है कि उज्जयिनी के "राजा महासेन के पुत्र के साथ राजकुमारी के विवाह-सम्बन्ध को चर्चा चल रही है । इतने में एक ब्रह्मचारी, जो लावाणक गांव से लौट रहा था, वहाँ विधाम के लिए रुक जाता है । कुशल प्रश्न होने पर वह मपने वेदाध्ययन में हुए विघ्न का कारण बताते हुए कहता है----'लावाणक गांव में रहने वाले राजा उदयन एक दिन जब शिकार पर थे तब उस गांव में भाग लग जाने से उनकी प्रियतमा वासवदत्ता और मंत्री योगन्धरायण जल कर मर गये। शिकार से लौटने पर जब राजा को दु:खद समाचार मिला तो उन्होंने उसी भाग में कूद कर "अपना प्राण दे देना चाहा । पर मयियों ने बडे प्रयत्न से उन्हें रोका। तब से वे बहुत रोते हैं, वासवदत्ता के प्रधजले आभूषणों को छाती से लगाकर बार- •बार मूच्छित हो जाते हैं। परन्तु मण्वान् नामक मंत्री बड़े कष्ट एवं धैर्य से उनकी रक्षा कर रहा है। इस समय लावाणक में राजा का रहना उचित न -समझकर मत्री लोग उन्हें मन्यत्र ले गये हैं । राजा के चले जाने पर वह ग्राम हतथी हो गया। इसलिए हम भी वहां से चले माये ।' इतना कहकर ब्रह्मचारी चला जाता है । परन्तु वासवदता पाने प्रति अपने पति के मादर्श प्रेम को सुनकर बहुत सन्तुष्ट होती है और पद्मावती भी उदयन के गुणों से प्रमावित होकर मन में उससे प्रेम करने लगती है। अनन्तर पद्मावती से माशा पाकर यौगन्धरायण के चले जाने के बाद तापसी से, मनुरूप पति की प्राप्ति का माशी- वदि सेकर पदमावती पासवदत्ता एवं निज परिवार के साथ प्रस्थान कर देती है। दूसरा अंक-माधवीलतामण्डल के पास पद्मावती वासवदत्ता के साथ गेंद खेलती है । काफी देर तक खेल चुकने के बाद जब दोनों विधाम, कर रही हैं उस समय वासवदत्ता परिहास में पद्मावती से कहती है-'बहन ! गेंद सेसने के कारण ललाई बढ़ने से तुम्हारे हाथ मानो दूसरे के हो गये हैं । भव तो तुम शीघ्र हो महासेन की बहू होगी इम पर पद्मावती को दासी इस रहस्य को 'प्रकट करती है कि पद्मावती पसराज उदयन के गुणों पर पनुरषत है। ठीक उमो समय पद्मावती को उपमाता पाकर सूचना देती है कि उदयन के साथ पदमावती का विवाह तय हो गया । फिर दूमरी दासो कहने के लिए पाती है 'किमान ही विवाह को गुम पड़ी है, पर शोधता कीजिए। इसके बाद सय पन्त:पुर में पली जाती हैं।

। २६ ) तीसरा अंक-पमावती के विवाह की खुशियां मनायी जा रही हैं, किन्तु वासवदत्ता के लिए यह विवाह दुःसह हो रहा है । मला वह अपनी ही शांखों से अपने पति को पराये होते कैसे देख सकती है ? इसलिए वह राजमहल से निकल कर मन बहलाने के लिए नजर-बाग मे चली जाती है। उसे खोजती हुई एक दासी भी वही जा पहुँचती है और उससे पद्मावती के लिए विवाह-- माला गूध देने के लिए अपनी महारानी का सन्देश सुनाती है। विवशत:- वासवदत्ता माला गूथने लगती है। परन्तु उस पाला में वह अविधवाकरण प्रोषध को ही गूयती है, सपली-मर्दन को नही । इतने में दूसरी दासी आती है और माला लेकर पहली दासी के साथ शोघ्रता से चली जाती है। घर वासवदत्ता अपते पति के साथ पयावती के विवाह से प्रत्यंत व्यथित होकर शान्ति पाने के लिए सोने का उपक्रम करती है। चौथा अंक-विवाहोत्सव में नित्य नये-नये पदार्थों को दस-ठूस कर खाने से विद्रूपक को मन्दाग्नि हो जाती है, जिसे वह दासी के साथ वार्तालाप में प्रकट करता है। अनन्तर पद्मावती वासवदत्ता और एक दासी के माथ प्रमदवन में जाती है। वहाँ पद्मावती दासी से कुछ शेफालिका के फूलों को चुनवाती है भोर कुछ प्रियतम के मनोविनोद के लिए बिखरे हुए पड़े रहने देती है। फिर बातचीत के सिलसिले में पद्मावती उदयन के प्रति अपना प्रत्यंत अनुराग व्यक्त करती है । उसी समम उदयन और विद्रूपक वसन्तक नीप्रमदवन मे प्रा जाते हैं। पद्यावती वासवदत्ता का ख्याल करके अपने पति से मिलना नहीं चाहती। इसलिए समी सताकुंज में छिप जाती हैं । उदयन मोर वसन्तक भी तीखी धूप से बचने के लिए उमी सताज मे जाना चाहते हैं। किन्तु टासी सता-बुज यो प्रधान लता वो इतने जोर में हिला देती है कि उस पर बैठे हुए समी मोरे उड्ने समले हैं, जिनके काट साने के नप से वे दोनों घसकर उसके पास हो रमै हुए शिला-गंड पर बैठ जाते हैं । यहाँ विद्रूपक पमा से पूछना है--'पाप को तब वामवदत्ता पपिक प्रिय पी या पय पपानी?' राजा उत्तर देता है-'पपावती सब गपों मे प्रिय होने पर भी कामयदत्ता में मनुरक्त मेरे मन को सींच नहीं पाती है। इस प्रकार पारस्परिक यानिार में बारादता का पोक उमाने के कारण राजा की पायों से मान बहने सगने चार को मेन । ३० ) है। विदूषक मुख धोने के लिए पानी लाने जाता है। इधर अवसर देखकर वासवदत्ता पद्मावती को राजा के पास भेज कर स्वयं वहां से खिसक जाती है । विदूपक के लौटने पर पद्मावतो उससे राजा के प्रांसू का कारण पूछती है। वह चतुरता से रहस्य छिराते हुए उत्तर देता है कि प्रांखों में काशपुष्प के पराग पड़ जाने से आंसू आ गये। तब पद्मावती राजा की पाखें घोने लगती है । फिर राजा को प्रणय-संकट से बचाने के लिए विदूपक स्मरण दिलाता है कि उनको तो मगधराज के सम्मानार्थ एक प्रीति-उत्सव में जाना है, इसलिए शीघ्रता की 'जाय । राजा मी उसके प्रस्ताव का समर्थन करके वहां से चल देता है। पांचया अंक--पद्मावती सिर-दर्द से पीडित है । इसकी सूचना वासवदत्ता को देने के लिए पद्मिनिका नामक दासी मयुकरिका नाम को अपनी सखी को भेजती है और स्वयं वसन्तक को ढूढकर राजा के पास मी यह समाचार भिजवा देती है । राजा अपनी पत्नी का दुःखद समाचार सुनकर समुद्गृह में जाता है, जहाँ पद्मावती की शय्या लगाई गई थी। परन्तु वहां पद्मावती को न देख कर उसकी प्रतीक्षा में राजा उसी शय्या पर लेट जाता है और विदूपक सोत से बचने के लिए कम्बल लाने चला जाता है। इसी बीच वासवदत्ता वहाँ पाती है । वह वस्त्रावृत राजा को पद्मावती समझकर उसी की बगल में लेट जाती है। पर उसके हृदय में एक अपूर्व प्रानन्दोल्लास उठता है । वह इसका कारण ढूढना ही चाहती है कि राजा स्वप्न मे (वासवदत्ता का स्मरण करके कुछ बोलने लगता है। वासवदत्ता पलग पर से उठ जाती है और अपने प्रियतम का मह निहारते हुए उसकी लटकटी हुई मुजा को धीरे से शम्या पर रखकर बाहर चली जाती है। प्रियतमा के हाथ का स्पर्श पाकर राजा उठ जाता है भोर उसे पकड़ने के लिए लपकता है, पर दरवाजे से टक्कर साकर गिर पड़ता है । विदूषक के लौटने पर राजा उससे कहता है कि वासवदत्ता प्रमी जीवित है । विदूषक इसे स्वप्न मयया भवन्तिसुन्दरी नामक यक्षिणी का दर्शन बताता है । इतने में मगधराज दशंक का भेजा हुमा कंचुकी भाकर उदयन में कहना है-'पापका सेनापति रुमग्नान् मगधेश्वर की सैन्य-महायता से मागि नामक शत्र पर चढ़ाई करने जा रहा है। माप शीप तैयार हों।' इस प्रकार मदेश पाकर राजा युद्धोचित उमाह दिखलाते हुए लड़ाई के लिए प्रस्पान कर देता है।

छठा अंक--संग्राम में विजयी होने के बाद एक दिन उदयन को घोषवती नामक वीणा, जो वासवदत्ता को अत्यन्त प्रिय थी, सूर्यामुख नामक प्रासाद में किसी व्यक्ति में प्राप्त हो जाती है। राजा उसे गोद में लेकर विलाप करने लगता है । इसी बीच वासवदत्ता के पिता मोर माता द्वारा भेजे हुए कंचुकी और वासवदता की धाई विजय के उपलक्ष्य में बधाई देने के लिए उदयन के पास पाते हैं । कुराल-प्रश्न के अनन्तर वे रागा-रानी का सन्देश सुनाते हुए कहते है-'यद्यपि वासवदत्ता अब नहीं है, फिर भी हम तुम्हें अपने पुत्रों के समान ही समझते हैं। जब तुम अपनी चपलता के कारण बिना विधिपूर्वक विवाह किये ही यहां से वासवदत्ता को लेकर माग गये थे, तमो हमने तुम दोनों के चित्र तिववा कर नकली विवाह करा दिया था। भव तुम यह चित्र देखकर चित को शान्त करों'। यह कहकर पाई राज के हाथ में चित्र समर्पित करती है। पद्मावती चित्र में लिखित महिला को देखकर राजा से कहती है कि मेरे विवाह में पूर्व ठोक इसी स्वरूप को युवती को किसी संन्यासी ने अपनी बहन बता कर मेरे पाग परोहर रख दिया था। वह पमी भी हमारे संरक्षण में रह रही है। उमका नाम प्रवन्तिका है। यह सुनकर राजा उसे बुला लाने के लिए माशा देता है । इमो वीच यौगन्धरापण भी अपनी परोहर वापिस लेने के लिए उपस्थित हो जाता है। भवन्तिका ये वेश में वासवदत्ता जब वहाँ माई जाती है तो उसकी धाई यमुन्धरा उमे पहचान कर कहती है-'मरे! यह तो वासवदता है। इम पर राजा पानी प्रामा से उसका पूंपट ह्वाता है। भरसर देख कर योगन्धरापण मी प्रपना फस्सित देश हटाकर राजा का जय-पोष करता है। यासवदता भी उसके स्वर मे स्वर मिलाती है । पश्चात् राजा से अपने पराप लिए क्षमा याचना करते हुए योगन्धरापन रहस्योद्घाटन करता है कि किम मार ने स्वामी के कल्याण की दृष्टि में उगने पममा मादि मत्रियों की मलाह में ऐगी योजना बनाई, गिगरे अनुमार उगे पासवदता को राजा पाम गेहार पद्मावती के पाग परोहर रगना पड़ा। इमोबाइगर ६. उरमपिनी जाने के प्रस्ताव के गाय मलयापर दिगताकर नाटक समाप्त हो जाता है।

। ३२ ) ११-प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण (१) उदयन उदयन स्वप्नवासवदत्त नाटक का सर्वगुणसम्पन्न नायक है । यद्यपि नाटकीय परिभाषा मे वह घोरललित है, किन्तु धीरोदात्त नायक का लक्षण भी उसमे घटता है। उसके गुण-वह एक पराक्रमशील युवक है। क्षात्र धर्म के सभी तत्त्व उसमें भलीमोति विद्यमान हैं । उसमें रसिकता एवं गुणग्राहकता की अनोखी परख है। उसकी प्रान्तरिक तथा बाह्य प्रकृति का सामञ्जस्य बड़ा ही प्रमा- वोत्पादक है । वह समुद्र के समान गम्भीर-धीर एवं सुशीलता की प्रतिमूर्ति है। उसका हृदय अत्यन्त कोमल, दयालु तथा दृढनिश्चयी है । उसका पत्नीव्रत-वह एक विश्वसनीय पति है। उसका अपनी पत्नी के प्रति प्रेम बड़ा ही अचल एवं निष्कपट है। उसकी प्रियतमा वासवदत्ता के अग्नि में जल जाने का प्रवाद प्रसारित हो जाता है। वह इस समाचार से इतना व्यथित होता है कि स्वयं को भी उसी अग्नि मे भस्मसात् कर देना चाहता है । किन्तु मन्त्रियों द्वारा भग्नि में कूदने से रोक लिए जाने पर वह वासवदत्ता के जले हुए मामूषणों को छाती से लगाकर मूच्छित हो जाता है। उसके इस अनन्य प्रणय का वर्णन करते हुए ब्रह्मचारी को भी कहना पड़ता है-- नैवेदानी तादृशाश्चक्रवाका नेयाप्यन्ये स्त्रीविशेषर्वियुक्ताः। (अंक १ श्लोक १३) यह उसका वासवदत्ता-वियोग-जन्य सन्ताप बड़ा ही दीर्घ एवम् प्रशमनीय है। वासवदत्ता की आकृति उसकी प्रास्त्रों में सर्वदा प्रत्यक्ष-सी दिखाई पड़ती है। वासवदत्ता को विस्मृत कर देना उसके लिए समस्या है, नितान्त असम्भव है । उमको नवपरिणीता व पद्मावती का विशिष्ट सौन्दर्य भी उसके हृदय को भाकृष्ट करने में असमर्थ है। विदूषक से वह कहता है-- 'पद्मावती बहुमता मम पद्यपि रूपशीलमापर्यः । पासवदत्तापदं न सु सायन्मे मनोहरति ॥' (मंक ४ श्लोक ५)

इसका मतलब यह नहीं है कि वह पद्मावती से कम प्रेम करता है। वह
उसके सिर-दर्द की बात सुनकर व्याकुल होता है और मन में अनेक प्रकार
की माशकार्य करते हुए कहता है-~
'स्पधिया समुदितां गणतश्च युक्ता
सध्या प्रियां मम तु मन्द इवाध शोकः ।
पूर्वाभिघातसह जोऽप्यनुभूतदुःखः
पदमावतीमपि तव समर्थयामि ॥ (मंफ ५श्लोक २)
उसको विलासप्रियता-यद्यपि वह एक वीर एवं श्रेष्ठ पुरुष है तथापि
उसमें प्रारम्मिक अवस्था की चञ्चलता कम नहीं है । वह इतना अधिक विलासी
तथा कामप्रिय है कि वासवदत्ता के लावण्य में आसक्त हो जाने के कारण
राज्य तक खो बैठता है। यहाँ तक कि पद्मावती के विवाहोपरान्त पुनः प्राप्त
राज्य से उसे सन्तोष नहीं होता । उस समय भी वह वासवदत्ता के लिए आतुर
दीख पड़ता है । स्वप्न में वासवदत्ता से प्रश्न का उत्तर मांगना उसकी आसक्ति
की चरम सीमा है।
'हा प्रिये ! हा प्रियशिष्ये ! देहि मे प्रतिवचनम् ।'
उसे कोई उत्तर नही मिलता है । फलस्वरूप पासवदत्ता के रुष्ट होने की ।
सम्भावना करके तर्क-वितर्क करने लगता है-
'किं कुपितासि ?
x
x
'यद्यपिता किमयं नालडकृतासि ?'
विदूषक के कहने पर कि-वासवदत्ता को मृत्यु हो चुकी है, आपने स्वप्न
देखा होगा-वह विभोर होकर कह उठता है-
'यदि तावदय स्वानो धन्यमप्रतिबोधनम् ।
प्रयायं विभ्रमो या स्थाव विभ्रमो ह्यस्तु मे सदा ॥ (अंक ५ दलोक ६)
उसकी धोरता और व्यवहार-कशतता-उदयन को पाण्डवों से
उत्तराधिकार मे स्वाभिमान और शौर्य मिला था । वह पाण्डववंशीय राजा

शशांक का पुत्र और सहस्राक का पौत्र था। भागवत के अनुसार अर्जुन की छब्बीसवी पीढी में 'दुर्दमन' का नाम प्राता है । इसी दुर्दमन का नामान्तर उदयन है। वह राजोचित गुणों से सम्पन्न है । जब मगध राज का कञ्चुकी उसे युद्ध में चलने के लिए बुलाने आता है तो वह वीरोचित शब्दों में कहता है- 'उपेत्य नागेन्द्रतरगतोणे तमाणि दारुणकर्मदक्षम् । विकोणबाणोप्रतरङ्गभङ्गे महार्णवाभे युधि नाशयामि ॥' (अंक ३ श्लोक १३) यह वाक्य वीर और साहसी ही कह सकता है, भीरु या विलासी नहीं । महासेन का कंचुकी उदयन को बधाई देते हुए ठीक ही कहता है कि 'प्रायेण हि नरेन्द्रधीः सोत्साहैरेव भुज्यते।' अवन्तिका को लौटाने के समय साक्षियो की नियुक्ति उदयन के व्यावहारिक शान को प्रकट करती है । अज्ञातवास के बाद वासवदत्ता के पुनः प्रकट होने पर यह सन्देह का एक शन्द भी मुंह से नहीं निकालता है । रुमण्वान् के रहस्य को नितान्त गोपनीय रखने पर वह पाश्चयं तो करता है, किन्तु उस पर क्रुद्ध नहीं होता। प्रमोदवन मे अपने मासुमों का सत्य कारण इसलिए नहीं बताता कि उससे पद्मावती को दुःख होगा । मगध जाकर युद्ध के लिए दर्शक से महायता प्राप्त करने में सफल हो जाना मी उसकी व्यावहारिक कुशलता का परिचायक है। (२) वासवदत्ता वासवदाता नाटक की प्रधान स्वीया नायिका है। उसमें राजमहिपी के अनुरूप लावण्य, बुद्धिमत्ता एवं संवेदनायुक्त कोमलता है। उसका स्वाभिमान-पद्यपि यह एक नि:स्वायं पली है, पति के लिए सर्वस्व का त्याग कर सकती है तथापि उसमें एक प्रकार की मात्मसम्मान की भावना प्रचुर मात्रा में विद्यमान है। प्रथमाक में उसका भात्मसम्मान एप स्वभिमान अनेक स्पलों पर उद्दाम मावना के साथ जागरित हो उठा है। प्रारम्भ में तो यह पूर्ण भारमसम्मानी महिला प्रतीत होती है ! संन्यामोवेशपारी योपपराण के साप प्रविष्ट होती हुई वह दो कर्मचारियों द्वारा 'उत्सरत' उत्सरत पार्याः !' का प्रादेश सुनती है । उस समय वह अपने भी हटाये जाने की प्राशंका ये स्वाभिमान को ठेस लगते देखकर तुरन्त योगन्धरायण से प्रश्न कर बैठती है-- अहमपि नामोत्सारयितव्या भवामि ?' वह इस उत्सारणाजन्य अपमान को इतनी संवेदनशीलता से अनुभव करती है कि हठात् उसके मुख से निकल जाता है-'पार्य ! तथा परिश्रमः परिवंदं नोत्पादपति यया परिभवः। उसकी पतिपरायणता-~वासवदत्ता पति के प्रेम में आत्मत्याग की मूर्ति है । साथ ही वह अत्यन्त बुद्धिमती एवं कर्तव्यपरायण है। यह योगन्धरायण की योजना बिना किसी तर्क-वितक के स्वीकार कर लेती है । योजता की सफली- भूत अवधि पर्यन्त उसे अनेकशः कष्ट उठाने पड़ते हैं; किन्तु उसमे भी वह अनुपम प्रानन्द का ही अनुभव करती है, क्योकि उसमें उसके पति का हित निहित है । उसके लिए पति का सुख ही सर्वस्व है। नवविवाहिता पद्मावती रुग्ण हो जाती है । इस समाचार से उसे प्रसव पीड़ा होती है। क्योकि उसका पति बहुत दुःखी है । एक तो उसका वियोग, दूसरा मनोविनोद के एकमात्र साधन (पद्मावती) का प्रभाव । वह कह उठती है-'पार्यपुत्रस्य विश्रामस्थान- भूता इयमपि नाम पदमावती अस्वस्या जाता।' उसकी पतिपरायणता के कारण ही तो राजा उसकी कल्पित मृत्यु पर अपने प्राण देने को उतारू हो जाता है। ब्रह्मचारी ने ठीक हो कहा है कि धन्य है वह स्त्री जिसका पति उसे मरने के पश्चात् भी इस प्रकार स्मरण करे-- 'धन्या शास्त्री यां तथा वेत्ति भर्ता । भत स्नेहात् सा हि दवाप्यदग्धा ॥' उसको नारी सुलभ ईर्ष्या--उदपन के हृदय की एकमात्र अधिकारिणी वासवदत्ता प्रानी मानी (सोन) की सरक्षकता मे जीवन-यापन कर रही है । ऐसी परिस्थिति में उसके अन्तस् मे दिने ईष्या के माव कमी-कमी उसे कोसने से लगते हैं । 'पार्यपुत्रोऽपि परकीयः सवृत्तः व्यया के कितने गहरे-माव हैं ! उसके हृदय-मन्दिर का देव अन्य मे प्रतिष्ठित होने जा रहा है, यह उसके लिये नितान्त प्रसह्य है । इसलिए वह पद्मावती के विवाह-संस्कार के समय स्वय को प्रमोदवन में प्रच्छन्न रखती है । इतने पर भी वह प्रतिक्षण सचेष्ट . रहती है कि कहीं योगन्धरायण की योजना निष्फल न हो जाय । जीवित रहते पति के मुख से 'वासवदत्ता बद्धं न तावन्मे मनो हरति' सुनकर अपार आनन्द मिलता है । वह कह उठती है-'दत्तं वेतनमस्य परिखेदस्य, ग्रहो ! प्रज्ञातवासोऽप्यत्र बहुगुणः सम्पद्यते।' वास्तव में वासवदत्ता नारी-सुलम समस्त गुण-दोषो से युक्त है, तथापि वह एक मादर्श महिला है, विधाता की कमनीय कला का विशुद्ध उदाहरण है । (३) पद्मावती पद्मावती नाटक की दूसरी स्वीया नायिका है। नाटक में इसका दर्शन सर्वप्रथम कन्यामाव में होता है। यह मगध-नरेश दर्शक की भगिनी है। यह बड़ी ही उदार-हृदय राजकुमारी है । घमंप्रियता का पूर्ण सञ्चार इसकी हत्तन्त्री को झंकृत करता रहता है। यह प्रतिज्ञापालन, सहानुभूतिशील एवम् प्रतिमासम्पन्न महिला है। सहृदयता-पद्मावती का स्वमाव अत्यन्त ही स्नेह तथा सौहार्द से परिपूर्ण है । न्यास रूप में वासवदत्ता की प्राप्ति पर वह तुरन्त कह उठती है--"भवतु, भवतु । भार्या प्रात्मीपेदानी संवत्ता ।' दोनों का पारस्परिक स्नेह बड़ा ही प्रगाढ़ हो जाता है । ब्रह्मचारी द्वारा जब वह उदयन का शोक सुनती है, उस समय उसे महती क्लान्ति का अनुभव होता है । जब उसकी मोहमुक्ति का समाचार सुनती है तो कहती है-'दिष्ट्या प्रियते । मोहं गत इति श्रुत्वा शून्यमिव में हृदयम् ।' पति-स्नेह--अपने पति के लिये उसके हृदय में अपार एवं पाश्वत प्रेम है। अपने पति में किसी प्रकार का दोष देखना या सुनना नहीं चाहती। म्वयं कष्ट उठा कर उसे मुखी देखने के लिए परनशील रहती है । घेटी एक थार अब उदयन को पद्मावती को अपेक्षा वासवदत्ता पर अधिक प्रेम प्रस्ट फरने के कारण पदासिभ्य कह देती है तो वह तुरन्त पेटी को रोकते हुए रहती है-'हसा ! मा मेवम् । सवाभिव्य एवापुत्रः य इरानोमर्याया गावरताया गणान् स्मरति !'

नारी-सुलभईर्ष्या का प्रभाव-अपनी सौत वासवदत्ता के प्रति उदयन का प्रेम देखकर वह न दुःखी होती है न ईष्या करती है। प्रत्युत वासवदता के प्रति आदर का भाव रखते हुए जब भी उसका नाम लेती है तो उसके नाम से पूर्व 'आर्या' शब्द का व्यवहार अवश्य करती है । इतना ही नही, चित्रफलक में प्रवन्तिका के समान वासवदता का रूप देखकर वह वासवदता के जीवित होने के विचार से गद्गद हो जाती है। फिर वासवदत्ता के प्रकट होने पर वह अपनी ईया-शून्यता एवं सहज स्नेह का परिचय देते हुए उसके पैरों पर गिर कर क्षमा मांगते हुए कहती है--'मायें ! सखोजनसमुदाचारेणातिकान्तः समुदाचारः। तच्छीर्षण प्रसादयामि ।' उसको विषय में विदूपक कहता है-'तत्रभवती पदमारतो तरुणी, दर्शनीया, प्रकोपना, अनहंकारा, मपुरवाक, सदाक्षिण्या ।' ये हैं उससे गुण । (४) यौगन्धरायण यह वत्सराज उदयन का मत्री और राजनीति में चाणक्य के तुल्य दूरदर्शी हैं। यह नाटक का एक प्रकार से केन्द्र-बिन्दु है । स्वामि-भक्ति--यह एक पूर्ण स्वामिभक्त मंत्री है। अपने स्वामी तथा राज्य के हित के लिए सर्वस्व त्याग सकता है । स्वामी के लिए यह प्रारम्भ से लेकर अन्नत तक अनेक प्रकार को भापत्तियों को राहन करता है। स्वयं उदयन ने उसकी प्रशंसा की है-- 'मिय्योन्मादश्च युद्धश्च शास्त्रदृष्टश्च मन्त्रितः । भवद्यत्नः खलु वयं मज्जमानाः समुद्धताः ।। चातुर्य-यौगन्धरायण एक प्रखर प्रज्ञावान् तथा कार्य-कुशल व्यक्ति है । जब पद्मावती दान की घोषणा करती है, वह तुरन्त प्री बनकर उपस्थित हो जाता है और इसी के बल पर वासवदत्ता पद्मावती के पास गुप्त रूप में रहती है । उसी को प्रज्ञा का परिणाम है, जो उदयन का राज्य उन्हें पुनः प्राप्त हो जाता है। गुणमाहिता-उसमें दूसरे के गुणों की पहचान करने की अद्भुत क्षमता है । रुमण्दान के किये गये परिश्रम को सुनकर वह उसको मुक्तकंठ से प्रशंसा करता है-- 'महो महद्भारमदहति रुमवान् । कुतः' 'सविधमो ह्ययं भारः प्रसक्तस्तस्य तु श्रमः। तस्मिन् सर्वमधोनं हि यत्राधीनो नराधिपः ॥' (मंक १ श्लोक १५) यह है उसकी गुणग्राहकता। समस्त नाटक में यद्यपि यौगन्धरायण के दर्शन केवल दो ही स्थलों पर होते हैं तथापि हम उसे एक प्रकार से नाटक का वह सूत्र कह सकते हैं जिसमें से पूरे नाटक की एक-एक घटना की व्याख्या निकलती है । (५) वसन्तक वसन्तक नाटक का विदूषक है । इस नाटक में विदूषक मास के अन्य नाटकों के विदूषकों की अपेक्षा अधिक गम्भीर है। केवल दो ही मंकों में वह दिखाई पड़ता है। उसकी सजगता-वसन्तक केवल हास्य-रस-साधन अथवा मोजन-भट्ट ही नहीं है, वरन् वह सर्वदा राजा के साथ रहकर उसके प्रत्येक कार्य में सतर्कता. पूर्ण प्रहरी का-सा साहाय्य देने वाला पात्र है। वह अपनी सजगता के कारण राजा को सभी विषम परिस्थितियो से बचा लेता है और सन्मित्र की माति उसे अपने कर्तव्य कर्मों में प्रेरित करता रहता है। जब राजा वासवदत्ता की याद हो पाने से रोने लगता है और वहां पद्मावती एकाएक आ जाती है, उस समय वह बड़ी सावधानी से पद्मावती को राजा की प्रांखो मे आंसू पाने का कारण बताते हुए कहता है-'भवति ! यातनीतेन काशकुसुमरेणुना पक्षिनिपतितेन साध्रुपातं खलु प्रत्रभवतो मुखम् । तद् गलातु भवतो इदं मुखोदकम् ।' फिर वह राजा को स्मरण दिलाकर कि 'मापको मगधेश्वर के साथ स्वागत-समारोह में चलना है, शीघ्र प्रस्थान कीजिये' वहां से हटा देता है। इतना ही नही, वह अधिक भोजन के प्रति भी सावधान रहता है कि कही अजीणं न हो जाय । चेटी के पूछने पर भोजन न करने का कारण बताते हुए कहता है--'प्रपन्यस्य यम कोकिलानाम् भक्षपरिवर्त इव कुक्षिपरिवतः संवृतः ।' पूर्ण स्वामि-भक्ति--यह बडा ही स्वामिभक्त सेवक है । मानव के समी सौजन्य, सहानुभूति भादि गुण उसमे पूर्णरूपेण विद्यमान है । वह राजा के में दु.खो तया सुख के अवसर पर स्वयं को भी सुखी समझता है । इसलिए राजा भी उस पर इतना अधिक विश्वास करता है कि उससे मपनी सब बातें । बता देता है । यहाँ तक कि अपनी दोनों पत्तियों के सम्बन्ध में मी..अपने विचारो को व्यक्त कर देता है। १२--स्वप्नवासवदत्तम् का नामकरण इस नाटक के नामकरण में कवि की सूक्ष्मान्वेपिणी प्रज्ञा का प्रदर्शन है। इसमें स्वप्न का दृश्य अत्यन्त ही मादपूर्ण पोर नाटकीय महत्त्व से भरा हुमा है । यह स्वप्न पांचवें प्रक में घटित होता है । राजा वासवदत्ता के प्रथम प्रेम में विह्वल होकर उसके रूप-सौन्दर्य के चिन्तन में मग्न है। उसे नीद पा जाती है । वह स्वप्न देखने लगता है। स्वप्न में उसे अपनी प्रियतमा का साक्षात्कार होता है । वासवदत्ता उसके प्रश्नो का उत्तर देती है । इस घटना के पश्चात् राजा को अपनी प्रेयसी के जीवित रहने और कालान्तर मे प्राप्त हो जाने की दृढ़ पाशा बंध जाती है। स्वप्नोद्भूत यह माशा ही पति-पत्नी के निश्चित साहचर्य का मार्ग प्रशस्त करती है, जो नाटक का अन्त है । कवि इस स्वप्नदृश्य से इतना प्रभावित या प्रसन्न है कि इसी के नाम पर नाटक का नाम रख देता है, जो अत्यन्त उपयुक्त है। १३----स्वप्नवासवदत्तम् का मूल्याङ्कन 'भाम-माटकन्धपिच्छेकः दिप्ते परीक्षितुम् । स्वप्नवासवदत्तस्य दाहकोभून्न पावकः ।। राजशेखर (हवीं शताब्दो) समालोचकों ने मास के नाटकों की परीक्षा के लिए उन्हें ममालोचना के अग्नि में तपाया, परतु 'स्वप्नवासवदत्त नामक नाटक उस मग्नि में न जला अर्थात् परीक्षणोपरान्त श्रेष्ठ सिद्ध हुमा । 'स्वप्नयामवदत महाकवि मास की नाट्यकला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। यह प्रकों का सर्पगुणसम्पन्न यह भोला माटक ही मास की प्रौद प्रतिमा को पूर्ण परिचय दे देता है । सच बात तो यह है कि रगमंच की दृष्टि से स्वप्नवासवरा, सस्मृत का सर्वश्रेष्ठ सफल नाटक है। इस नाटक को कथावस्तु में उत्पन के नायक होते हुए भी कपावस्तु के दिशाम में मनी पोगन्धरायण विशेष रूप से प्रोत-प्रोत है। 'मन्तिमारी बरामी वासवदता अग्निदाह में मस्म हो गई साथ ही मंत्री योगपरायण मी जल गया' इस प्रवाद के प्रचारित हो जाने के उपरान्त मंत्री की योजना के अनुसार वत्सराज उदयन का मगधराजकुमारी पद्मावती के साथ विवाह हो जाता है और उसके भाई दर्शक की सहायता से उदयन अपने खोए हुए राज्य को पुनः प्राप्त कर लेता है । बस, इतने से कथानक को कवि ने छह प्रकों मे विमाजित तथा नाटक के प्रधान गुणों-घटना की एकता, घटना की सार्थ- कता, घटनामों का पात-प्रतिधात तथा गति, कवित्व, चरित्र-चित्रण और स्वाभाविकता--से मण्डित करके अपनी अलौकिक प्रतिमा का दिग्दर्शन कराया है । डा० सुक्यांकर का परीक्षण बडा ही यथार्थ है-'नाटककार का मुख्य उद्देश्य है, एक ओर तो उस मादर्श रानी के पूर्ण पात्मत्याग को रूपाङ्कित करना जो अपने पति के कल्याणार्थ प्रानन्दमय सन्तोष के साथ मात्म-बलिदान करती है, दूसरी और उसके पति का चित्र खींचना जो हृदय से तो अपने प्रेम (पत्नी-प्रेम) के प्रति निष्ठावान, है परन्तु अनचाहे राज्य-जीवन की प्रावश्यक मांगों के प्रति प्रात्मार्पण कर देता है । कहानी का प्रमुख विषय है-अटल, दृढ और अमर प्रेम की विजय, जिसके लिए किसी भी प्रकार का महान् बलिदान साधारण ही है। नाटक चरित्रों का उत्तरोत्तर विकास-क्रम बड़ा ही रुचिकर एवं समीचीन है । पात्रों के चरित्र का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण बड़ी सफाई से किया गया है । नायक 'उदयन' का चरित्र पत्नी-व्रत का पवित्र मादर्श है। वासवदत्ता निःस्वार्थ पतिपरायणा तथा पति-हित के लिए सर्वस्व त्याग देने वाली प्रादर्श पत्नी है । उसी प्रकार उच्च विचारों वाली राजकुमारी पद्मावती भी नारी- जगत् का श्रृंगार है। मास के नाटको में रसाभिव्यक्ति बड़े ही शिष्ट एवं परिष्कृत ढंग से हुई है। स्वप्नवासवदत्त, प्रतिज्ञायौगन्धरायण, प्रविमारक एवं चारुदत्त अदि नाटकों मे मुख्यतया शृगार तथा करुण रस का परिपाक, विशेष रूप से हुमा हैं । करुण रस का प्रवाह देखने के लिए प्रतिमा-नाटक पर्याप्त है । दूतघटोत्कच, दूतवाक्य तपा कश्मंग मे वीर रस का पूर्ण परिपाक देखने को मिलता है । विभिन्न नाटकों में विदूषक की उक्तियो सहज ही हास्य रस का स्रोत बहा देती हैं। उनके नाटकों का हास्य पूर्ण रूप से परिष्कृत एवं संयमित है। मास ।

ने अपने तेरह नाटकों में २४ प्रकार के खन्दों का प्रयोग किया है और श्लोंकों की कुल संख्या १०६० है, जो मारवि के किरातार्जुनीय महाकाव्य के बराबर है । समस्त नाटकों में ४३७ अनुष्टप, १७६ वसन्ततिलका, ९२ ,शार्दूलविक्रीडित, ६१ उपजाति तथा ७२ मालिनी छन्दों का प्रयोग हुआ है। उन्होंने वैश्वदेवी सुवदना, दण्डक, वैतालीय प्रादि अप्रचलित छन्दों का प्रयोग भी अपनी कृतियों में किया है । मास की लोकोक्तियां बड़ी मार्मिक हैं-- 'कालत्रमेण जगतः परिवर्तमाना चकारपंक्तिरिय गच्यति भाग्यपंक्तिः, 'म हि सिखवाक्यान्युत्क्रम्य गच्छति विधिः सुपरीक्षितानि', 'स्त्रीस्वभावस्तु कातरः', 'प्रदेषो बहुमानो या संकल्पादुपजायते । "मास के नाटकों की संख्या तथा उनके वयं विषय की विविधता से स्पष्ट मालूम होता है कि उनकी प्रतिमा मौलिक थी तथा उनका मस्तिष्क प्रत्यन्त उर था !'जैकोबी का यह कथन बहुत ही न्याय-संगत एवं समीचीन है। यद्यपि व्याकरण तथा साहित्य-शास्त्र के अनुसार मास के नाटकों में कतिपय अटियां पायी जाती हैं तथापि वे संस्कृत नाटककारों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। उनकी शैली बड़ी ही सहन है। मधुर शब्दावली, मावों का सीधा प्रवाह तथा रसों का पूर्ण परिपाक उनको अपनी विशेषता है। कही मी कृषिमता का मामास नहीं । कालिदास, भवभूति मादि नाटककारों की मांति उनमे कल्पना की उड़ान नहीं है, प्रत्युत उनके नाटकों में मानव-जीवन की उदात्त विवेचना सहन ही प्राप्त होती है । उच्च से उच्च भावों को सरल से सरल भाषा में व्यक्त कर देना उनकी प्रमुख विशेषता है-- गुणानो पा विधालानां सरकाराणां च नित्यशः । परिः मुसमा लोके विशातारस्तु दुसमाः ॥ (स्वप्न० ४,६) निम्न विशेषतायें मास को कोति-कोमो को सर्वदा प्रमुग्ग रखने में पूर्ण पाक्त है- १. अनेक तपा विविप-प्रकार के नाटकों को रपना। २. प्राचीन तथा पौराणिक पाना को पमिनर कल्पना से अनुचित करके मौलिक रूप देना।

( ४२ ) ३. मानव-जीवन की उदात्त विवेचना। ४. प्रकृति का नसर्गिक चित्रण। ५. नाटकों में पुरुष पात्रों की बहुलता है । ६. पाठक के अन्तःपटल पर भावों का स्पष्ट प्रभाव डालने की पूर्ण क्षमता । ... वैयक्तिक स्वभाव तथा गुणो का विशिष्ट निरूपण। ८. पवित्र तथा उच्चादों की स्थापना । ६. अमिनेय नाटकों की रचना । १०. संस्कृत साहित्य में सर्वप्रथम एकांकी तथा दुःखान्त नाटक लिखना। भास की नाट्यकला संस्कृत नाट्य साहित्य में किसी भी अन्य नाटककार का इतने विस्तृत क्षेत्र में प्रवेश नहीं है जितना मास का। उनके द्वारा पुराण-इतिहास, महाभारत, आख्यायिका अन्य मोर लोक में प्रचलित कथानको का अपने नाटकों में उपयोग किया गया है। अब तक के प्राप्त साहित्य में वे संस्कृत के सर्वप्रथम नाटक- कार कहलाने के अधिकारी हैं। उनके नाटकों मे मौलिकता तया कल्पना- वैचित्र्य विशेष रूप से पाया जाता है। भरतमुनि प्रतिपादित नाट्यशास्त्र के नियमों का पूर्णरूप से पालन न होते हुए भी उनके नाटक मत्यन्त रोचक हैं तपा रंगमच की दृष्टि के विशेप सफल हुए हैं । मास के नाटको में ये विशेषतायें दृष्टिगोचर होती है- १-मापा की सरलता। २-प्रकृत्रिम शैली। ३ वर्णनों में यथार्थता। ४-नाटक के पात्रों के चरित्र-चित्रण में व्यक्ति-वंचिभ्य मोर नाटकीय गुणप्रवाह। ५-सजीवता एवं शक्तिमत्ता। रामायण के मापार पर रचित प्रतिमा नाटक में भास की मौसिकता और कलना-शक्ति का परिचय मिलता है। महाभारत के माघार पर लिखित माटम चनको कल्पना-पाक्ति तथा रमणीयता के घोतक है । इन नाटको में वीर रस की अभिव्यक्ति में मास को अन्य कवियों की अपेक्षा अधिक सफलता मिली है । इनके नाटकों में नव रसों का अस्तित्व लक्षित होता है । वीर, शृगार तथा करण ये नाटकों में अंगी हैं । विदूषक द्वारा हास्यरस की स्थिति बनी रहती है । अन्य रसों का भी यथावसर समावेश रहता है । जयदेव के अनुसार वे कविता-कामिनी के हास हैं। भले ही हास्यरस भंगी न हो पर उसका वर्णन अत्यन्त उदात है। उदाहरणार्थ-प्रतिज्ञायौगन्धरायण का विदूषक उद्धत हास्य मा प्रदर्शन करता है तो स्वप्नवासवदत्तम् : विदूषक में सुबुमार हास्य के दर्शन होते हैं। इस प्रकार इनके नाटकों में हास्य एवं व्यंग्य प्रचुर मात्रा में मिलता है। भास के सभी नाटक अभिनय की दृष्टि से मत्यन्त सफल हैं । संस्कृत के अन्य नाटक भले ही अभिनय के लिए पूर्णत: उपयुक्त न हों पर मास की ऐसी स्थिति नहीं है। उनके नाटक सभी दृष्टियो से प्रभिनेय है। क्यानक, पाय, भाषा, दोली, देशकाल, संवाद मादि समी तत्त्व इसकी पमिनेयता के अनुकूल है। बाद के नाटकों में पाई जाने वाली कृत्रिमता उनके नाटकों में नहीं है। लम्बे. लन् समास तथा अलंकारो की भरमार नहीं है। भास ने ही संस्कृत में सर्वप्रपम एकांकी नाटक लिषा है। उनके एकाकी ये हैं :- दूतवाय, दूतपटोवघ, करमग, कर्णभार तया मध्यमव्यायोग । भास पात्रो के परित्र-चित्रण में मत्पन्त कुशल है। उन्होंने सर्वत्र उदात्त मार्ग प्रस्तुत दिया है। पात्रो का परित्र उज्वल प्रदर्शित करने के लिए कपानक में परिवर्तन करने में भी ये संकोच नहीं करते। नायक-नायिका, भमाय, विदूषक, सञ्चुकी, गणिया मादि ममी का उमत परिण दिसाया गया है। उनके प्रत्येक पात्र का अपना पश्तिाव है। इन नाटकों में पुरप-पात्रों को प्रपिरता है। पात्रों के सवारों में भी भाग पीएसमता दिखाई पड़ती है। संवाद प्रापः सप है। गरस सपा मममस्त मापा र प्रयोग किया गया है। नाटक देगने या परिणत भरि भारिपारोनो प्रकार के होते है। तः माटारको एमो भाषा सिमो पाहिय को गरम वा भावान में पमपं हो। म भरत:- दृष्टि से मास सफल हैं।' भास कही-कही नाटकीय पात्रों का संवाद श्लोक में ही कराते हैं । एक ही श्लोक में एक पाद या उपपाद को एक पात्र बोलता है और दूसरे को दूसरा । इस प्रकार संवाद एक ही श्लोक मे पूर्ण हो जाता है। इस सम्बन्ध में प्रतिमा नाटक, प्रक तृतीय का निम्न प्रथम श्लोक द्रष्टव्य है-- भरतः-- :--पितुम को व्याधिः । सूतः हृदयपरितापः खल महान् । -किमाहुस्तं वंद्याः। सूतः--न खलु भिषजस्तत्र निपुणाः । भरतः-किमाहार भुक्ते शयनमपि, सूतः-भूमो निरशनः। भरत:-फिमाशा स्याद् सतः -देवं भरतः स्फुरति हृदयं वाय रयम् ॥१॥ उनके नाटकों में संवाद तथा उतर प्रत्युत्तर अत्यन्त संक्षिप्त एवं प्रमावो. त्पादक हैं। उनके वर्णन बड़े सजीव एवं यथाय हैं । जैसे सन्ध्या, रात्रि, तपोवन मध्याह्न प्रादि के वर्णन सूक्ष्म अन्वीक्षण के परिणाम प्रतीत होते हैं । इन वर्णनों में ययायंता, सजीवता एवं शक्तिमत्ता के दर्शन होते हैं। उनका प्रयोग कथानक में प्रसंगोपात्त होने पर ही किया है। पाण्डित्य-प्रदर्शन तथा प्राकार-वृद्धि के लिए नहीं। मास के नाटकों में अलकार-विधान भी दर्शनीय है। उपमा, उप्रेक्षा मर्यान्तरम्पास, स्वमावोक्ति, परिसंख्या प्रादि अलंकारों का प्रत्यन्त सफल प्रयोग हमा है । उन्होने माने कई नाटको में प्रथम मंक के प्रथम श्लोक में ही मुद्रास- चार का प्रयोग किया है मर्यात् नाटक के प्रमुख पात्रों के नाम का भी मंगला. चरण में उल्लेख कर दिया है । जैसे 'स्वप्नवासवदत्तम् का प्रारमिक श्लोक है:- १-महामहोराध्याय गणपतिशास्त्री ने मास की रचना की इस प्रकार प्रशसा की है "The seatences are evrywhere replete with a wealth of ideas beautifully cxpressed, which cultured miads appreciate. Critical study, P. 27 ४५ उवयनवेन्दुसवर्णावासवदत्तावलौ बलस्य त्वाम् । पदमावतीर्णपूर्णा वसन्तकम्रो भुजौ पाताम् ॥ इस श्लोक में वासवदत्ता, उदयन, वसन्तक तथा पद्मावती आदि प्रमुख पात्रों को सूचना प्रत्यन्त निपुणता से दे दी गई है। इन नाटकों में पताकास्थान की योजना द्रष्टव्य है । इसके द्वारा माश्चर्य- भावना उत्तेजित होती है । जैसे 'प्रतिनायौगन्धरायण' में महासेन अपनी रानी के साथ परामर्श कर रहे हैं कि वासवदत्ता के उपयुक्त कोन वर है ? उसी समय सहसा कंचुकी प्रविष्ट होकर कहता है 'वत्सराग' पर्यात् उदमन । यह कहना चाहता था कि वत्सराज बन्दी बनाकर लाया गया है । "नाटक की सफलता के लिए उन ६ गुणों को सत्ता पावश्यक होती है-11) घटना की एकता, (२) घटना की सार्थकता (३) पटनामों का पात-प्रतिघात तपा गति, (४) परित्र चित्रण में व्यक्तिचित्र्य, (५) स्वामायिकता, (६) कवित्व । ये समी गुण मास ये नाटकों में उपलब्ध होते हैं । प्रत्येक नाटक की कथावस्तु को इस प्रकार प्रमावोत्पादक घटनामों में विकसित किया गया है कि उनमे स्वाभाविकता पौर गतिमीसता के माप ही माय रमपरिपाक मी समुचित रूप से होता गया है । कपर दिये गये सके नाम को एक पुरान पोर मफस नाटककार मिर करते है। पात्रों का चरित्र-चिमण-वैशिष्ट्य भाग पारा गभी प्रकार के पानों परित्र-परिवन प्रत्यन युगमता में पिया गया है। पौरोत, भोरोदाता पोरगसित, देवी, पागुरी, राम मनी प्रशर पारलमारखों में मिला है। मान दे पनगार माग के नाटकों में पर गे पोरा गमावेश हुमा है । पर शिलाह है कि पान में एक मी पारपनायर (पास) महीं मानुम पटना । उन पात्रों वर्गीरण नरिमी के पार गमे ममारिटी तर पात्र मोति में पाहमानों में भी गोगा पार है। उनरी पर एर infrre पारी रि की है. मे हनुमो का सफल तापूर्वक सन्निवेश किया है। उदाहणार्य देव के पात्र में देवत्व का पूर्णतया समावेश किया है। वैसे ही दानव वर्ग के पात्र में दानव के अनुरूप समी गुणदोषों को दिखाया है । पात्रों के प्रशिष्ट व्यवहार को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि पाठकों की सहानुभूति उस पर हो । भास पात्रों को उज्ज्वल दिखाने के उद्देश्य से लोक-प्रसिद्ध कथानकों मे भी परिवर्तन करने से नहीं हिचके हैं । उदाहरणार्थ ब्राह्मण का शाप सत्य करने के लिए कैकेयी ने राम के लिए वनवास का वर महाराज दशरथ से मांगा था। नाटक के अनुकूल ही उन्होंने नायक का चयन किया है । प्रत्येक पात्र का सजीव मंकन हुमा है । कृत्रिमता लेशमात्र मी नहीं है। कथोपकथन में उनकी कुशलता दृष्टिगोचर होती है । कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक मनोगत माव को सरल भाषा में व्यक्त किया गया है। परिस्थिति के अनुकूल पान की मावदशा का ज्ञान भास को भली-मांति है। दर्शक को सर्वत्र परिचित व्यक्ति तथा वातावरण दिखाई पड़ेगा । उनके पात्र सामान्य घरातल पर अवस्थित हैं। बुरे पात्रो में मी यथासमव आदर्श गुणो का ही सनिवेश किया गया है। भरत प्रादर्श माई हैं, वासवदता तथा पद्मावती आदर्श सपत्नियां हैं। सुमंत्र यौगन्ध- रायण भादर्श अमात्य हैं । उदयन तथा चारुदत्त आदर्श प्रेमी हैं। सर्वत्र प्रादर्श ही पादर्श है । भरती उत्कृष्टता एवं विशदता के कारण ये सदैव चिरस्मरणीय रहेंगे। १४-भास की शैली भास के नाटकों की शैली का मरना एक विशेष महत्त्व है। इनकी शैली में (१) प्यञ्जकता तया प्रभावोत्पादकता--का मणिकाचन सपोग है । गंभीर तया रसपेशल भावों को छोटे-छोटे वाक्यों में अभिव्यक्त करने की उनकी अद्भुत क्षमता है । महाकाव्य में लम्बे समासयुक्त दुरूह पदों की योजना भले ही महत्त्वपूर्ण हो पर नाटक में मरल और छोटे वाक्य ही समावृत होते हैं। (२) गुण व रीति-मास को शनी मे प्रमाद, भावुयं मोर मोज तीनो गुण पाये जाते हैं। उनके नाटक ममास-बाहुल्य-क्लिष्टता, मस्वामाविकता प्रादि दोषों मे सपा मुक्त हैं । माषा मे सरलता, सरसता, सुबोधता तया स्वामाविकता मोर प्रवाहमयता के दर्शन होते हैं । मास अपने मावों की ममिव्यक्ति में इतने कुशल हैं कि कही भी विवक्षित माव दद नहीं सकता। अवसर के अनुकूल वे पपनी शैली में ऐसा मोड़ ला देते हैं जो प्रभावात्मकता तथा व्यञ्जकता की वृद्धि में सहायक हो । मभीष्ट यं का योड़े शब्दों एवं सरल भाषा मे चोघ कराने की उनमें अद्भुत क्षमता है । (३) सरलता--मास को यह एक बडी विशेषता है कि वे अंलकार रहित सरल भाषा में अपने मावों को अभिव्यक्त करने में समर्थ हैं । इसी गुण के कारण दरांक का हृदय उनके नाटकों को मोर बरबस सिंचता है। उनके कोपकथन में उनकी शैली की विशेषता दृष्टिगोचर होती है । इस प्रसंग में प्रतिज्ञायौगन्धरापण मे यौगन्धरायण तथा मरतरोहक के सवादों का उदाहरण द्रष्टव्य है। पार्तालाप के मध्य कमी-कमी ऐसी अप्रत्याशित घटनाएँ मा जाती है जिससे नाटक में रसाभिवृद्धि हो जाती है । उदाहरणार्थ अभिषेक नाटक में रावण द्वारा सीता से पूछे जाने पर कि 'इन्द्रजित ने राम और लक्ष्मण को मार डाला । पब तुम्हें कोन मुक्त करेगा ।' उसी समय एक राक्षस भाकर पाहता है 'राम' । यद्यपि यह यह कहना चाहता था कि 'राम ने इन्द्रजित् को मार डाला।' इस प्रकार के मनेवः उदाहरण हैं । ऐमी माकस्मिक उक्तियां माप्त की अपनी विधेपता है। (४) वर्णन-बदालता--मास द्वारा अपने ययविषय यही सूक्ष्मता से प्रस्तुत किये जाते हैं। विस्तृत विवरण उन्हें चिकर नहीं है । पापदस नाटक मे दखता का वर्णन पत्यन्त लामाविक एव यारीक है । यदि ये पिसी दृश्यमा गपत करने लगते है तो उमरा पित्र मांगों के मामने मिच जाता है जिससे पाठक दर्शक मुग्ध पोर तल्लीन हो जाते हैं। उदाहरणापं प्रतिमा नाटक मेराग्यामिका वर्णन, र मश्मन कपन, मरत ना करेयी को पिकाला पादिका गुभम एव समाविक पिन पौंपा गया है। स्पनयामव- दाम् की यह पति पारित्ति पनि मापतिः' पात्र भोगों का मासषक पहिरे परो समान प्रमानुसार प्रमता पाना है। विना मारिए

( ४८ )
एवं हृदयग्राही है । इसी प्रकार सन्ध्या 'वर्णन, मध्य रात्रिवर्णन, कृष्ण रात्रि-
वर्णन, मध्याह्नवर्णन, वनवर्णन, तारुण्य-वर्णन आदि में मास की सफलता
दर्शनीय है 1
(५) भावों का व्यक्तीकरण-मास के नाटक भारतीय भावों से प्रोत-
प्रोत हैं । इनमे पितृ मक्ति, भ्रातृप्रेम, पातिव्रत्य, क्षमाशीलता, त्याग मादि का
आदर्श प्रचुर मात्रा में पाया जाता । उदाहरण-
अनुचरति शशांक राहदोषेपि तारा
पतति च वनवृक्षे याति भूमि लता च ।
त्यजति न च करेणः पंफलग्नं गजेन्द्रं
व्रजत चरतु धर्म मनाया हि नार्यः ॥प्रतिमा० ॥१.२५॥
कुतः क्रोषो विनीतानां लज्जा वा कृतचेतसाम् । प्रतिमा० ६.६ ॥
प्रयुक्तं परपुरुषसंकीर्तनं श्रोतम् । स्वप्न० अंक ३ ॥
(१) पूर्वा तु काष्ठा तिमिरानुलिप्ता
सन्ध्यारणा भाति च पश्चिमाशा।
द्विधा विभक्तान्तरमन्तरिक्ष
यात्पर्धनारीश्वररूपशोमाम् ॥ वि० २ । १२
तथा
खगा वासोपेतर सलिलमवगादो मुनिजनः
प्रदीप्तोऽग्निर्माति प्रविचरति धूमो मुनिवनम् ।
परिभ्रष्टो दूरादविरपि च संक्षिप्तकिरणो
रपं ध्यावासौ प्रविशति शनरस्तशिखरम् ॥स्वप्न० १।१६ ॥
(२) तिमिरमिव वहन्ति मार्गनद्यः
पुतिननिभाः प्रतिभान्ति हर्म्यमालाः ।
तमसि दशदिशो निमग्नरूपाः
प्लवतरणीय इवायमन्धकारः ॥ भवि०३।४।।
(३) लिम्पतीव समोङ्गानि पंतोषांजनं नमः ।
प्रसत्पुरुषसेवेव दृष्टिनिष्फलतां गताः॥ चारुदत्त ॥१६॥
(४) स्वः पुत्रःपुरते पितुदि वचः कस्तत्र भो विस्मयः ॥ प्रतिमा ॥१॥

- (६) सरलता और रम्पता-मास के नाटक सरलता और रम्यता के कारण अत्यन्त लोकप्रिय बन गये हैं। स्वप्नवासवदत्तम् का यह श्लोक देखिये:- गुणानां वा विशालानां सत्काराणां च नित्यशः । कर्तारः सुलभा लोके विज्ञातारस्तु दुसंभाः ॥४६॥ (७) भाषा--इनकी भाषा प्रसादगुणसंयुक्त ।' रसपेशलता, भावों को सम्यक् अभिव्यक्ति, मनोरंजकता, गंमोरता, औदात्य, तथा माधुर्य इनकी शैली के गुण हैं । अवस्था तथा पात्र के अनुसार उग्रता एवं संयम का प्रयोग इनके नाटको की विशेषता है । हास्य की मम्यक् योजना मी इनकी शैली को सफलता का कारण है । एक पोर तो इस प्रकार को सरल भाषा का प्रयोग है- अहो बलमहो वीर्यमहो सत्त्वमहो जवः । राम इत्यक्षररस्पः स्याने व्याप्तमिद जगत् ॥प्रतिमा० ५-१४ ॥ दूसरी पोर समयानुकूल मापा क्लिष्ट एवं कठोर वर्गों मे युक्त है । जटाय के पातविघात से क्रुद्ध होकर रावण कहता है-- मद्भुनाशप्टनिस्त्रियाफ़तपक्षक्षतभ्यतः । दधिररागानं त्यां नपामि यमसादनम् ।। प्रतिमा० ॥५-२२ मास का ध्यंग्यप्रयोग प्रसाधारण एवं मार्मिक होता है। कैकेयी के कार किया गया व्यंग्य कितना कठोर है-- पापल्या वयं रामः पुत्रोन्यस्य महीपतेः । बने प्यानीच कैकेयी स्यया कि न एतं त्रयम् ॥ प्रतिमा० ॥२-८|| महामहोपाध्याय गणपतिशास्त्री ने उनको पारपमघटना की मुमयष्ठ मे प्रांगा यी है । उनी पनगार माम भी तुलना अन्य विमी पविगे नहीं की जागरती । पात्रो मे परित्रचित्रण में ये इतने युगल हैं कि पाल्पनियता का मान तक नहीं होता। ये भारतीयनि में प्राचाई है। उनरी भाषा मे स्पाना- पिरप्रयाह है, परत, उपम्पद गति है तथा यह माय, रग, देश-काल एम पात्रो पी पनगामिनी है। --महासवि माग-- पम्पदन-पष्ट १३० पापा समय उराप्याय । ६.

(८) स्वाभाविकता और मनोवैज्ञानिकता--मास की शैली मे कृत्रिमता का अभाव है। उसमें स्वाभाविकता है। उनकी दृष्टि मे समासरहित भाषा गद्य-साहित्य मे उच्च मासन पा सकती है। उन पर रामायण का प्रभाव लक्षित होता है । उन्होंने अलकारों पर विशेष बल नही दिया है । वे रसा- भिव्यक्ति तथा मावव्यंजना को ही विशेष महत्त्व प्रदान करते हैं । उनको शैली की प्रशंसा महामहोपाध्याय गणपति शास्त्री ने की है । वे इन नाटको को शैली को अद्वितीय समझते हैं ।' उन्होंने उद्दाम भावनामो का अत्यन्त सशक्त वर्णन किया है । आपत्तियो का सजीव चित्र खीचने मे वे बड़े कुशल है । नाटको मे अलकारो का प्रयोग अभिनेयता मे बाधक होता है प्रतः उनकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया । मास को मानवीय मनोवृत्तियो का पूर्ण ज्ञान था। उनका मनोवैज्ञानिक विवेचन उच्चकोटि का है । स्वप्नवासवदतम् के चतुर्थ भक के पष्ठ श्लोक से स्पष्ट प्रतीत होता है कि वे मनोमावों के सच्चे पारखी थे। दुःखं त्यक्तु बद्धमूलोऽनुरागः स्मृत्वा स्मृत्वा याति दुःख नवत्वम् । यात्रा त्वेषा यद्विमुच्यह बाष्प प्राप्तानुण्या याति बुद्धिः प्रसादम् ॥ पौर भी प्रथम प्रकका सप्तम श्लोक:- प्रद्वेषो बहुमानो वा संकल्पानुपजायते । (६) प्याकरणविषयक ज्ञान एवं पाण्डित्य-मास के व्याकरण विषय के गान एवं शास्त्रीय विद्वत्ता का परिचय यपास्थान प्राप्त होता है। निम्नलिखित श्लोक उनके व्याकरण सबंधी ज्ञान का द्योतक है :- घनः स्पृष्टो पोरः ममदपस्निग्धमपुरः फतः कंठे वक्षस्यनुपहतसंचाररमसः। 1. The superior excellence of sentences, which are not subject to the restriction of verification, is everywhere to be obscrved in these Rupakas, It really surpasses in grandeur, the style of other works is incomparabic.

-- :- पथास्थान प्राप्य स्फुटकरणनानाक्षरतया चतुर्णा वर्णानामभयमिव दातुं व्यवसितः ।। प्रतिमा० ४-७।। उनकी शास्त्रीय विद्वत्ता इस श्लोक में द्रष्टव्य है। जहां उन्होंने रावण के मुख से कहलवाया है नियतमनिपतारमा रूपमेतद् गृहीत्वा खरवधकृतवरं रायचं वञ्चयित्वा । स्वरपदपरिहीणां हव्यधारामिबाहं जनकनृपसुतां तां तुकामः प्रयामि ॥ प्रतिमा० ॥५-७।। माययापहृते रामे सीतामेको तपोवनान् । हरामि रुदती वालाममंत्रोकतामिवाहुतिम् ॥ प्रतिमा० ॥५-१६॥ ये दो श्लोक महर्षि पतञ्जलि द्वारा महामाष्य मे उद्धृत 'मंत्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या-प्रयुक्तो न तमर्यमाह । स वाग्वयो यजमानं हिनस्ति, यपेन्द्ररायुः स्वरतोऽपराधात् ॥' के प्राशप को लेकर रावण के मुख से कहलवाया गया है। अपने भावों की प्रति संक्षेप में किन्तु प्रभावोत्पादक रूप में रखने की मास की अदभुत क्षमता निम्नलिखित श्लोक मे द्रष्टव्य है:- जहाँ राम के प्रति मरत का सारा भाव व्यक्त कर दिया गया है । निगश्च कृतघ्नश्च प्राकृतः प्रियसाहसः । भरितमानागनः कश्चित् कपं तिष्ठनु यात्विति ॥ प्रतिमा० ॥४-५॥ नाटकीय घटनाचक्र का स्थानानुरूप परिवर्तन करना मास को कुशलता का परिचायक है जो मुमत्र की इस उक्ति मे देखी जा सकती है : सुपीयो भ्रशितो राज्याद् भ्रामा ज्येष्ठेन यातिना । हतदारो बसन् दोले तुल्यदुःखेन मोक्षितः ॥ प्रतिमा० ॥६-१०॥ भाम की ममाधारण प्रतिमा का परिचय उनके नाटकों से प्राप्त होता है। उन्होंने तेरह नाटकों का प्रपयक किया जिनमें कुल मिलाकर १००२ श्लोक हैं। इनमें विभिन्न २४ छन्दों के प्रयोग पाये जाते हैं। कुछ कम प्रचतित पन्दों का मी प्रयोग दिया गया है, जमे वैश्वदेवी, मुवना, दंडक, वतालीय मादि। - ( ५२ ) वृत्तरचना मे उन्होने पूर्ण स्वतन्त्रता दिखाई है तथा सर्वथा नये छन्दों का भी प्रयोग किया है। उनकी लोकोक्तियां अत्यन्त मनोहर एव मामिक हैं। स्वघ्नवासवदत्तम् में प्रयुक्त ये लोकोक्तियां उदाहरणार्थ प्रस्तुत हैं । 'अनतिक्रमणीयो हि विधिः।' 'पापमप्रधानानि सुलभपर्यवस्थानानि महापुरुप- हृदयानि भवन्ति । न हि सिद्धवाक्यान्युत्क्रम्म गच्छति विधिः सुपरीक्षितानि ।' 'स्त्रीस्वभावस्तु कातरः' आदि । (१०) प्रकृतिचित्रण-मास का बाह्य प्रकृति और अन्तःप्रकृति दोनों का चित्रण अत्यन्त हृदयग्राही है। प्राकृतिक दृश्यों का उनका सूक्ष्म पर्यवेक्षण है। ये उनका ऐसा सांगोपाग चित्र खीचते है कि पाठक उनमे तल्लीन हो जाता है । उनके वर्णन बहे यथार्थ, रोचक एवं व्यापक हैं । प्रकृति-वर्णन मे वे काव्य कारों की भांति स्वतंत्र नहीं हैं । नाटककार व नाते उनकी परिधि सीमित है । नाटकोपयोगी प्रश को ही वे स्थान देते हैं। प्रसगनम से प्राप्त दृश्यों का सूक्ष्म तथा मनोहर वर्णन दर्शक तथा पाठक की चित्तवृत्ति को रसमग्न कर देता है । इस वर्णन में कहीं-कही अलंकार-योजना सौन्दर्य तथा रमणीयता में चार चाँद लगा देती है। उदाहरणार्थ स्वप्नवासवदत्तम् के प्रथम प्रक के निम्नलिखित अन्तिम श्लोक में वनप्रान्त को सन्ध्या का वर्णन अवलोकनीय है खगा पासोपेताः सलिलमयगाढो मुनिजनः प्रदीप्तोऽग्निांति प्रविचरति घूमो मुनिवनम् । परिभ्रष्टो दूरादपिरपि ध संक्षिप्तफिरणो रपं व्यायपासौ प्रविशति निरस्तशिखरम् ॥१.१६॥ मनिपेक नाटक का मूर्यास्त वर्णन देखते ही बनता है :- प्रस्ताविमस्तगतः प्रतिसंहृतांशः सम्यान रनितयपुः प्रतिमानि पूर्यः।

रक्तोज्ज्वलांशुककृते द्विरदस्य कुम्भ
जाम्बूनदेन रचितः पुलको पर्यव ॥४-२३ ।
चारुदत्त नाटक में रात्रि के मघन अन्धकार का वर्णन कितना हृदयग्राही है:-
लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतोवाचनं नमः ।
असत्पुरुषसेवेव दृष्टिनिप्फलता गता ।। १.१६ ॥
सुलभशरणमाथयो भयानां
धनगहनं तिमिरं च तुल्यमेव ।
उभयमपि हि रक्षतेऽज्यकारो
जनयति यश्च भयानि पश्च भीतः ॥ १-२०॥
इसी प्रकार प्रविमारक के द्वितीय श्रक के बारहवें श्लोक में सन्ध्या तथा
रात्रि के आगमन का बडा ही मनोहर वर्णन मिलता है ।
चारुदत्त मे चन्द्रोदय का वर्णन दर्शनीय है-
उदपति हि शशांक: क्लिन्नतजूरपाण्ड-
मुंपतिजनप्तहायो राजमार्गप्रदीपः।
तिमिरनिचपमध्ये रामयो यस्य गौरः
इतनल इय पौरपाराः पतन्ति ॥ १.२६ ।।
स्वप्नरामवदतम् नाटक मे तपोवन का वर्णन रितना मनोहर है :-
विखन्य हरिणाश्चरन्त्यचकिता देशागतप्रत्यया
वृक्षाः पुष्पफमः समुद्रपिटपाः सय दयारक्षिताः ।
भूयिष्ठ कपिसानि गोकुलधनान्यक्षेत्रवत्यो दिनो
निन्दिापमिदं तपोवनमयं पूमो हि बवाषयः ॥ स्वप्न१.१२
पभिषे नाटक में गमुद्रा वर्णन माग द्वारा पत्यन्न गूपम दृष्टि के साथ
दिया गया है।
पषित फेनोद्गारी विपि प मोनासरतः
सापिसवाकोः विपि प नोलाम्पनिमः ।
सचिदोषीमाल: सपिपि प नरप्रनिमय
धिनीमावत: शिरि प मिसम्पासिमः ॥ ४.१॥

स्वप्नवासवदत्तम् नाटक मे उड़ती हुई बगुलो की पक्ति का वर्णन करते हुए उदयन कह रहा है:- ऋज्वायतां च विरलां च नतोन्नतां च सप्तर्षिवंशकुटिलां निवर्तनेषु । निर्मुच्यमानभुजगोदरनिर्मलस्य सोमामिवाम्बरतलस्य विभज्यमानाम् ॥ ४-२ ॥ भास की रचनाओं में अनेक पद्य प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन से भरे पड़े हैं। कुछ उद्धरण दिग्दर्शनमात्र के लिए पर्याप्त हैं । जो भास के प्राकृतिक दृश्यो से घनिष्ठ संबंध की सूचना देते हैं । इन वर्णनो में प्रकृति के सभी प्रगो का समा• धेश पाया जाता है । प्रकृति के किसी भी रूप के प्रति चाहे वह सुन्दर हो अपवा प्रसुन्दर उनका कोई विशेष पक्षपात नही है । वे प्रसंगवश प्राप्त समी का यथोचित चित्रण करने मे नहीं हिचकते । रस-मास की कृतियों में रसों का परिपाक बहुत स्वामाविक हुमा है । 'नाट्येऽप्टौ रसाः स्मृताः' भरतमुनि के इस सिद्धान्त को मास ने अपनी कृतियों मे पूर्णतया चरिताएं किया है। जहां तक 'वासवदत्तम्' का प्रश्न है, इस नाटक में संयोग और चिप्रलमशृंगार ही पाये हैं, जो कि भारतीय नाटक परम्परा की प्रमुख विशेषता रही है । इसमे श्रृंगार की अनेकानेक परिस्थितियां मर्म- स्पी बनकर माती है; क्या संचारी माव, क्या, विभाव, क्या अनुभाव ममी विना प्रयत्न के पात्रों की नाट्यकला मे अवतरित हुए हैं । रस की पूर्ण प्रमिव्यक्ति, रसामास, मावामास प्रौर मावशबलता इस नाट्पकृति के लघुकलेवर में बड़ी सफाई गे प्रतिष्ठित कर दिये गये हैं। पहले प्रक मे अंक के प्रारम्भ तक देवल विप्रलम श्रृंगार के भाव, "विभाव, अनुभाव और मंचारी मावो की विविध प्रमिव्यक्ति यासवदत्ता पौर उदपन को परस्पर मालम्बन मोर माश्रय मान कर की गयी है । पर अंक के ममाप्त होते मंयोग शृंगार का प्रसंग पाता है, जो बहुत कम है। प्रस्तावना के बाद नाटक का प्रारंम ही विप्रलम की परिस्थिति सेपर होता है। यही वागयता पायय रहती है। फिर प्राचारी गवादी में पवि-निवर या के रूप में उदयन पाश्रय रहता है । एक तरह से 'वासवदत्ता' का कथानक और इसका विप्रलम्म दोनों सहजात हैं और जहाँ उदयन तथा वासवदत्ता के वियोग का अन्त होता है वही कयानक पूरा हो जाता है। शत्रुओं का नाश और वत्सराज्य की प्राप्ति को वासवदत्ता की वियोग-कथा से सम्बन्धित करके मास ने कथावस्तु के संघटन का अद्भुत कौशल दिखाया है। अपने प्राप आदि में अन्त तक वियोग श्रृंगार की अभिव्यंजना होती रहती है। इतनी निसर्ग- जात अभिव्यक्ति अन्यत्र देखने को नहीं मिलती। पद्मावती का विवाह भी वासवदत्ता के विप्रलंम की अभिव्यक्ति का माध्यम स्वत: बन जाता है; क्योकि वासवदत्ता उसी के पास है। विप्रलम्म शृगार के अतिरिक्त शेष रसो में कही-कही केवल हास्य की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है, विदूषक के प्रसंगो में । कहीं-कहीं विप्रलम्म भी अधिक व्यापक होकर करुण और शान्त रस के रूप मे अभिव्यक्त होने लगता है। भास की रसामिव्यक्ति में सबसे बड़ी विशेषता यह है कि शब्दावली स्वाभाविक और सरल है। उसमें प्राडम्बर और कृत्रिमता नही है । विप्रलम्म शृगार का यह उदाहरण देखिये-- कामनोज्जयिनी गते मयि पदा कामायवस्थां गते,. वृष्ट्वा स्वरमयन्तिराजतनयां पञ्चपयः पातिताः । तरद्यापि सशल्पमेय हृदयं भूपश्च विद्धा वयं, पञ्चेपुमंदनो यदा कपमयं षष्ठः सरः पातितः ॥ (अक ४ श्लोक १) वासवदत्ता के प्रभाव में उसकी वीणा को जो दुर्दशा हुई उसे देखकर राजा का हृदय वासवदत्ता के प्रमाव-जनित विप्रलम्म से अभिभूत हो रहा है-- श्रुतिसुखनिनदे कप न दैय्याः स्तनपगले जघनस्यते च मुप्ता । विहगगणरजोविकोणंदण्डा प्रतिभयमध्युषितात्परण्यवासम् ॥ (मक ६ श्लोक १) वासवदत्ता के वियोग मे उदयन की भावरादसता का यह चित्र देखि- प्रहमवमितः पूर्व तावत् मुतः सह लालितो दामपहता कन्या भूयो मरा न १ रमिता ।

निधनमपि च श्रुत्वा तस्यास्तथैव मयि स्वता मनु यदुचितान् वत्सान् प्राप्त नपोऽत्र हि कारणम् ॥ (अंक ६ श्लोक ८) वासवदत्ता को प्राश्रय रखकर विप्रलंभ की उतनी अच्छी अभिव्यक्ति नहीं हो पायी है, जितनी उदयन के प्राश्रय में हो सकी है। वासवदत्ता-प्राश्रित विप्रलंम का एक उदाहरण देखिये- विवाहामोदसङ्कले चतुश्शाले परित्यज्य पद्मावतीम् इह पागतास्मि प्रमद- धनम् । यावत् इदानी भागधेयनिवृत्तं दुःखं विनोदयामि । (परिक्रम्य) प्रहो अत्याहितम् । प्रायपुत्रोऽपि परकीयः संवृत्तः । यावत् उपविशामि। (उपविश्य) धन्या खलु चक्रवाकवघः या प्रत्योऽन्यविरहिता न जीवति । पार्यपुत्रं पश्यामि इति एतेन मनोरन जीवामि मन्दभागा। (३ य अंक) करुणरसामास के प्रग सयोगशृंगार की यह मभिव्यक्ति भी देखिये; हृदय माव से आच्छन्न हो उठता है- स्मराम्यवन्त्याधिपतेः सुतायाः प्रस्थानकाले स्वजनं स्मरन्त्याः । वाये प्रवृत्ते नयनान्तलग्नं स्नेहान्ममवोरसि (मंक ५ श्लोक २) शान्तरसामास का यह उदाहरण मी दर्शनीय है- हपधिया समुदितां गुणतश्च युक्ता लम्ध्या प्रियां मम तु मन्द इबाद्य शोकः । पूर्याभिधातसरजोऽप्यनुभूताःखः पद्मावतीमपि तथंव समर्पयामि ॥ (मक ५श्लोक २) मलद्वार--'स्वप्नवासवदत्तम्' को नापा प्रसादगुणयुवत है । मास ने ऐसी भाषा का प्रयोग किया है, जो उस समय की प्रायः बोलचाल की ही भाषा प्रतीत होती है। माम अलंकारों के प्रयोग में नहीं उलझे हैं। फिर भी मापा के स्वाभाविक प्रवाह में, जैसे नीचे के श्लोक में, वृत्त्यनुप्रास का मन्या प्रयोग अपने पार हो गया है- मयुमरकला मथुरा मननााभिः प्रियामिरुपमाः । पारन्याराविषण्णा अमिय कान्तापिपरताः स्युः ।। (मर ४ प्लोर ३) पातयन्न्याः ॥

वैसे ही मास के स्वाभाविक प्रयं-निबन्धन में उपमा, व्यतिकर, स्वमा. वोक्ति, परिसंख्या और अर्थान्तरन्यास अलंकार अपने प्राप जहां-तहां मा गये हैं। वे भी कवि-निबद्ध नहीं प्रतीत होते, पल्लिा पात्रों के संवाद प्रवाह में पुले- मिले हैं । उपमा का प्रयोग नाटक में कई स्थानों पर पाया है। एक उदाहरण देखिये- कालक्रमेण जगतः परिवर्तमाना चकारपंक्तिरिय गच्छति भाग्यपंक्तिः॥ (ग्रंक १ श्लोक ४३) परिसंख्या के साथ अन्तरल्यास का यह उदाहरण कवि की समर्थ वाणी का साक्ष्य देता है- कः कं शरतो रक्षितुं मत्युकाले रज्जुच्छेदे के घट यारयन्ति । एवं लोकस्ल्पपर्मो धनाना काले काले विद्यते रहाते घामका ६ श्लोक १०) यहाँ पूर्वार्ष मे परिसख्या प्रलकार है और उत्तराधे में एक सामान्य बात कहकर पूर्वाध के सामान्य कयन का समर्थन किया गया है। उपमा की भांति ही स्वभावोक्ति भी कई बार नाटक में पाया है। एक उदाहरण से भास को स्वभावोक्ति-मञ्जुलता का परिणम मिल जाएगा- या पासोपताः सतितमवगावो मुनिजनः प्रदीप्तोऽग्निर्गति प्रविचरति पूमो मनिवनम् । परिभ्रष्टो पूराद् रविरपि च संक्षिप्तकिरणो रयं प्यायपासो प्रविशति दानरस्तशिरारम् ॥ (अंक ४ श्लोक १६) तपोवन का यह सायन्तन वर्णन भाडम्बरविहीन होकर भी बहुत मलित है। विशेषतः छन्द का दूसरा तथा तीसरा परण काञ्चुकीय जैसे साधारण पार का प्रत सवाद प्रतीत होता है। व्यतिरेक का भी उदाहरण देखिये- पद्मावती बहुमता मम मपि स्पनीलमाः । पासपरतावं न तु ताइन्मे मनो हाति॥ (भर ४ बलोक ५) यहाँ बासा को पद्मावती से पधिक सिद्ध करने के लिए उसके मनोहरण प विप गुणोपयां गिनने सरल महरे में कर दी गई है।

नाटक में मनुज्ञा अलंकार का एक उदाहरण भी दर्शनीय है- यदि तावदयं स्वप्नो धन्यमप्रतिबोधनम् । प्रयायं विभ्रमो वा स्याद् विभ्रमो हास्तु मे सदा ॥ यहां वासवदता के मनोरम सहवास की कामना से उदयन ने स्वप्न और विभ्रम को भी अत्यधिक पादर दिया है । भास की आलोचना मास संस्कृत साहित्य के एक जाज्वल्यमान मणि हैं। नाटककार के रूप में उनकी ख्याति अत्यन्त प्राचीन काल से चली आ रही है । सम्पूर्ण भारत में सुदूर दक्षिण से ध्रुव उत्तर तक तथा पूर्व से पश्चिम तक उनकी कीर्तिपताका फहराती थी। भास के नाटक 'नाट्यं भिन्नरचेर्जनस्म बहुधाप्येकं समाराधनम्' (नाटक भिन्न-भिन्न रुचि वाले व्यक्तियों का एकत्र समाराधन है) कालिदास की इस उक्ति को सम्यक् परिपुष्ट करते हैं । 'नाटकान्तं कवित्वम्' नाटक कवित्व का चरम परिपाक कहा गया है। इसमें लोकत्रय के भावों का समावेश होता है । इस दृष्टि से विचार करने पर मास का महत्त्व और भी बढ़ जाता है । नाट्य साहित्य के इतिहास में यह एक चिरस्मरणीय बात है कि प्रत्यन्त प्राचीन समय मे ही मास द्वारा तेरह नाटकों को सफलतापूर्वक रचना की गई जिसकी प्रशसा महाकवि कालिदास तक ने की है। पहले मास के बारे में कतिपय प्रास्तियां सुनाई पडती थी। लोग उनके नाटकों के स्वरूप से अपरिचित थे। सर्वप्रथम महामहोपाध्याय टी० गणपति शास्त्री द्वारा मास के नाटक प्रकार में लाये गये। पर उनके विषय मे लिखी हुई प्रशस्तियों से स्पष्ट है कि नाटककारों में उनका विशिष्ट स्थान बहुत पुराने समय से रहा है तथा लग्ध- प्रतिष्ठ कवि भी उनको सम्मान की दृष्टि से देखते थे । बाणमट्ट, दण्डी, जयदेव, वाक्पतिराज, राजशेखर मादि ने, भिन्न-भिन्न समय में होते हुये मी उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है । वास्तव मे वे संस्कृत के प्रथम नाटककार माने जाते हैं । परवी समी नाटककार उनके ऋणी हैं। उनको भास से ही नई दिसा मिली है। भारतीय मनीषियों के अतिरिक्त पाश्चात्य भासोचको ने भी मास की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है। पाश्चात्य मासोचक याकोबी का वचन है 'भास के नाटकों की संख्या तथा उनके वर्ण्यविषय को अनेकरूपता से स्पष्ट घोतित 'होता है कि उनकी प्रतिमा कितनी मौलिक तथा उनका मस्तिष्क कितना कम- शील था।" गणपतिशास्त्री के अनुसार- The unrivalled merit of Bhasa lies in the deliberation of the real nature of thiogs in their varied conditions by sweet, apt and lucid words suggestive of lofty ideals. In the Pratima the central sentiment is Dharmavira manifesting itself in the enthusiasm displayed by the hero cherishing the single thought of carrying out the Dharma fulfiling the mandates of his father." इतना होते हुए भी उनके सभी नाटकों में एक-मी नाट्य-कुशलता नहीं दिखाई देती । रामायण से सम्बद्ध नाटकों का कथासविधान अत्यन्त शिथिल है पर महामारत से संबद्ध नाटक मास को प्रौढ प्रतिमा के परिचायक हैं। प्रतीत होता है कि महामारत सबंधी इतिवृत्तों में उनका मन विशेष रमा है। उदयन से संबंध रखने वाले नाटकों मे उनको सबसे अधिक सफलता मिली है। इसीलिए स्वप्नवासवदत्तम् एवं प्रतिज्ञायौगन्धरायण उनके उच्चकोटि के नाटक हैं जो बाद में हर्ष द्वारा अपनी रत्नावली तथा प्रियदर्शिका नाटिकामो के आधार बनाये गये हैं । संस्कृत नाटको का मुख्य उद्देश्य रसानुभूति उत्पन्न करता होता है। इसी से यहां कास्यत्व अधिक पाया जाता है। मास के कवित्वपूर्ण श्लोक नाटकीय घटनाचक्र को गति देने में सहायक होते हैं । उनके संवादों को समासरहित सरल मापा और पद्यो की प्रसंगानुकूल भावात्मकता से नाटको की प्रमावोत्पादकता में वृद्धि होती है। मास की शैली प्रसादगणयक्त है पर वीररस के वर्णनों में मोज का भी दर्शन होता है। शृंगार और वीररम की अभिव्यक्ति में उन्हें फसलता मिली है । उनके पात्रों के चरित्र सर्वत्र उदात्त है । नायक-नायिका, अमात्य-विदूपक, कंचुकी, सेवक प्रादि समो पात्र उन्नत चरित्र के हो प्रदर्शित किये गये हैं । उनके नाटक रसपरिपाक की दृष्टि से उच्चकोटि के हैं । वीर, शृंगार तथा करुण ये तीन रम प्राय: अंगी बन कर पाये हैं। अन्य रसों का भी प्रयोग भवसरानुरूप किया गया है । उनके नाटको में विभिन्न प्रकार की छन्द योजना दिखाई पड़ती है । मलंकारों का विपान मो यथावसर सफलतापूर्वक दिया गया है । सुन्दर से मुन्दर उपमायें उनके नाटकों में मिल सकती है।

:- अभिनेयता की दृष्टि से उनके नाटक अत्यन्त सफल रहे हैं । कथानक, पात्र, भाषा, ली, देश-काल, सवाद भादि सभी तत्त्व इनमें पाये जाते हैं तथा अभिनेयता के अनुरूप हैं । उनकी शैली में व्यंजकता तथा प्रभावोत्पादकता का मणिकोचन योग है । वे सरल एव सूक्तियों से युक्त भाषा के प्रयोग में कुशल हैं। उनकी माषा पर्वतनिझरिणी के समान स्वामाविक गति से प्रवाहित होतो है। उनमे किसी प्रकार की तडक भड़क नही है । कृत्रिमता का सर्वथा अभाव है तथा वह माववहन में समर्थ है। महामहोपाध्याय गणपतिशास्त्री ने भास की वाक्यरचना की प्रशसा इस प्रकार की है :- "The sentences are everywhere replete with a wealth of ideas beautifully expressed, which cultured minds sappreciate." भास प्रकृतिचित्रण मे मत्यन्त दक्ष हैं । प्राकृतिक दृश्यों का उनका निरीक्षण बहत सूक्ष्म है । उन दृश्यों का ऐसा सागोपांग चित्र खीचते हैं कि पाठक को चित्तवृत्ति उनमे पूर्णतया रम जाती है। वे उनका पूर्ण विम्ब ग्रहण कराने को चेष्टा करते हैं। नाटककार के रूप में सीमित परिधि के भीतर ही उन्होने प्रसग प्राप्त दृश्यों का अत्यन्त सूक्ष्म तथा मनोहर वर्णन किया है। (पालोचना सबधी विस्तृत जानकारी के लिए 'भास को नाट्य-कला' तथा 'मास को रोती' शीर्षक लेख द्रष्टव्य है।) भास को घटियो-मास भत्यन्त प्राचीन नाटककार हैं अतः उनकी कुछ अटियां भी रह गई हैं जो दर्शको का ध्यान माकृष्ट करती हैं । कालिदास के नाटको मे जो प्रौउता दष्टिगोचर होती है वह भास के नाटको में उतनी उत्कृष्टता के साथ नहीं । उनकी कतिपय नाटकीय त्रुटियां ऐसी हैं जिनका उत्तरदायित्व मास पर ही है। उनकी दली सक्षिप्त है जिसके फलस्वरूप कतिपय स्थलों पर उसका भाव प्रपष्ट हो गया है। जैसे प्रतिमा नाटक के सनीय भक में-कियो-मात, कलुम्पा ननु प्रष्टया' का वास्तविक प्रमि- प्राय सष्ट नहीं है। प्रमिसरो, प्रागिधर्मम् अनुपात्रम् क्रियामाध्यम, महा- कन्छः पादि पप्रचलित पदों का प्रयोग किया गया है । मास के रितने ही ऐसे १-पापण्यामि भवन्तो। २-साधुजनहरतगतंया नोष्ठिष्यति ।

प्रयोग हैं जो पाणिनीय व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध है "स्मराम्यव- न्यायिपते: सुतापाः' में अनियमित सन्धि है। कुछ स्थलो पर परस्मैपद के स्थान पर प्रारमनेपद और ग्रात्मनेपद के स्थान पर परस्मैपद प्रयुक्त दुपा है। यया. परस्मैपद के स्थान पर प्रात्मनेपद का प्रयोग 'अपरिचयातु न लिप्यते में मनाम'। मात्मनेपद के स्थान में परस्मैपद का प्रयोग 'मापृच्छामि भवन्तो' । मही-कही पर अनियमित तमाम दिखाई पड़ता है-एवं लोकस्तुल्यधर्मों वनानाम् । इनके अतिरिक्त प्रकर्मक धातुपों का मकर्मक की भांति प्रयोग, प्रेरणार्थक के लिए मापारण का प्रयोग तथा अनियमित प्रत्यय का प्रयोग मो मास की रचनामो में मिलता है । इन प्रयोगों के लिए यह कहा जा सकता है कि मारा के ममय तक पाणिनि-व्याकरण पूर्ण रूप मे प्रतिष्ठित पोर मान्य नहीं था। गंमय है उस समय पाणिनीय प्रयोग मान रहे हों। छन्दोगंग के निवारणार्थ कतिपय व्याकरण संबधी अशुद्धियाँ रह जाना संभव है । भाग ने काल की प्रन्थिति पर ध्यान नहीं दिया। पटनानो में दीर्घकालीन समय गिरा रहता है । स्वप्नवासवदतम्, बानपरित, पारुदत्त प्रादि नाटको में वासाविति का प्रभाय महित होता है। नाटकों में कम्पकी, पानी और घेटी प्रादि का प्रवेश शीघ्रता से गराया गया है। यपि पानफ में सीता पाने के लिए ऐसा किया गया है सपापि इनका भाभिषय पाहनीय है। मारामापित मा प्रयोग भी प्रापतिजनक है। इसमे निरपंक विनार होने मे यच जाता है, पर वास्तविरना मे दूर होने के कारण प्रमायणासिता नही रह पानी। रगमप पर मनुपम्पिग पात्रों द्वारा मापण राना प्रभ्यामाथि है। उभारणा लिागधरापम में उदयन रा पागवत्ता को मेकर भाग जाने की गूना मे मागितारा मिलती है गो गमप पर मही है। माग नाटरी में ऐंगे पापभी नहीं है। मामलाप पिमोरिटी मानो तपा को बार infra प्रिमो परमरा में प्राग मग ।। दक्षिण भारत प्रदेशोंगायच में उता जान मीमा । गममा मन रामे मे सोपं पा राग नहीं लियागि इस बात की पुष्टि होती है। प्रतीत होता है कि दक्षिण भारत का जो कुछ भी उन्हें ज्ञान है वह प्रसिद्ध ग्रंथों पर ही आधारित है। दूतवाक्य में कृष्ण के मुख से तथा पंचरात्र मे द्रोण के मुख से अपशब्द कहलवाना शोभा नहीं देता। अविमारक में पराक्रमी नायक-नायिका का प्रात्म- हत्या के लिए प्रस्तुत होना तथा प्रतिमानाटक में राम का वन जाते समय अपने पिता दशरथ से न मिलना एक ऐसी त्रुटि है जो पाठक एव दर्शक को खटकती है । पर उनकी ये न्यूनताएं उनके विशाल साहित्य को देखते हुए नगण्य हैं । इन दोषों के कारण मास के महत्त्व मे किसी प्रकार की कमी नहीं हो सकती । वे एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं जिनका प्रकाश देश तथा काल से परे है। ये दोप इतने साधारण हैं कि उनके गुणो के प्रकाश में विलीन हो जाते हैं । भासविषयक प्रशस्तियां भास की महनीयता मास उन प्रसिद्ध नाटककारों में से हैं जिनकी प्रशंसा संस्कृत के प्राचीन कवियों तक ने की है। महाकवि कालिदास ने अपने मालविकाग्निमित्र नाटक मे मास का उल्लेख इस प्रकार किया है- (१) "प्रथितयशसा भाससौमिल्लकविपुत्रादीनां प्रबन्धानतिक्रम्य कथं वर्तमानस्य कवेः कालिदासस्य कृतो बहुमानः । अर्थात् लब्धप्रतिष्ठ मास, सौमिल्ल, कविपुत्र मादि कवियों के प्रबन्धों को त्याग कर वर्तमान कवि कालिदास की रचना का इतना सम्मान कैसे (हो रहा है)? महाकवि बाणमट्ट ने हर्षचरित मे मास की इस प्रकार प्रशंसा की है :- (२) सूत्रपारकृतारम्भर्नाटकवहुभूमिकः । सपताशो लेभे भासो देवकुलरिव ॥ पर्यात् मूत्रधार से प्रारम्म किये गये बहुत भूमिका वाले तया पताका से सुशोभित देवालयो की मौति मात ने माने नाटको द्वारा बहुत कीति पाई। मास के सम्बन्ध में राजरोसर का निम्नलिखित कथन है :- (३) भासनाटकचक्रेऽपिच्छेकः क्षिप्ते परीक्षितुम् । स्वप्नवासवदत्तस्प दाहकोऽभून्न पावकः ॥ अर्थात् मास के नाटकों की परीक्षा करने के लिए उन्हें विद्वानों द्वारा (समालोचनारूपी) अग्नि में डालने पर अग्नि स्वप्नवासवदत्तम् को न जला सका। इससे यह बात सिद्ध होती है कि मास की समी रचनामों में स्वप्नवासव- दत्तम् ही श्रेष्ठ है । इसी से उनकी कोति अद्यावधि अक्षुण्ण है । (४) दण्डी ने सातवी सती के उत्तरार्ध में अपनी कृति अन्तिसुन्दरी कथा की भूमिका के ग्यारहवें श्लोक मे भास को नाटकों रूपी शरीर द्वारा अवस्थित माना है सुविभक्तम खाद्यगळवतलक्षणवृत्तिभिः परेतोऽपि स्थितो भासः शरीररिव नाटकः ।। अर्थात् मास दिवगत होते हुए भी मुख प्रादि अवयवों के समुचित विभा- जन वाले तथा लक्षण पोर वृत्ति की उचित व्यवस्था वाले नाटक रूपी शरीर से अब भी जीवित हैं । तात्पर्य यह है कि जैसे मुख प्रादि इन्द्रियो तथा वृत्तियों द्वारा शरीर का स्पष्ट दर्शन तथा उसकी सत्ता स्वीकार की जाती है, उसी प्रकार भूस प्रादि संधियों व प्रकों के समुचित विमान के माय नाटकीय लक्षणों एवं वृत्तियों की उचित व्यवस्था मे विभूषित नाटकों की रचना फरकै मास अमर हो गये हैं । (५) वाक्पतिराज ने अपने प्रसिद्ध काव्य 'गउदवहो' में भास को जलण- मित (ज्वलनमित्र) पद से अमिहित किया है :- भासम्मि जलगतै कुन्तीदेवे प्रजस्स रहपारे । सो बन्यवेप बन्धम्मि हारिपन्दै म पाणंदो ॥ (भासे ज्वलनमित्र कुन्तीदेवे च यस्य रपुकारे । सौपन्यये च बर्ष हारिपन्ने घ मानन्दे ।) याक्पतिराज का भाग को 'ज्वलनमित्र' की उपाधि से विभूषित करना गर्वथा उपयुक्त है। भामरचित नाटकों को कया में यणित अग्निदाह के दृश्य पर है। स्वप्नवासवदतम् में सादाणकग्राम में अग्निदाइ, पंचरात्र ६४ ) में दावानल, अभिषेक नाटक में सीता का अग्नि-प्रवेश, प्रविमारक में नायक का स्वयं को अग्नि में फेंकने इत्यादि सर्वत्र अग्निदाह का वर्णन है पर सभी नाटकों में यह सहायक ही सिद्ध हुआ है । कही भी हानिकारक नहीं। कथा का विकास होकर उदयन की राज्यप्राप्ति, सीता के सतीत्वरक्षा की घोपणा, अग्नि-स्फुलिंगों का चन्दनशीतल होना ये सब अग्निदाह के ही परिणाम हैं । इस प्रकार माग सर्वत्र मित्र बनकर व्यवहार करती रही है । अतः मास को ज्वलनमित्र (माग का मित्र) कहना सर्वथा युक्ति-संगत है। प्रसन्नराघव- कार जयदेव ने भास को कविताकामिनी का हास माना है। (६) भासो हासः कविकुलगुरुः कालिदासो विलासः । भास का हास तथा कविकुलगुरु कालिदास का विलास प्रशंसनीय है । हास्यरस का चरम परिपाक मास के नाटको में उपलब्ध होता है। वासवदत्तम् प्रविमारक मादि मे वसन्तक का हास केवल आमोद-दायक ही नही है अपितु चिन्तित क्षणों में जीवनी शक्ति का भी संचार कर देता है। हास्यरस के प्रयोग मे मास सर्वोत्कृष्ट हैं । लिष्ट, साधारण एवं अनिन्द्य हास्य प्रस्तुत करने में कोई भी कवि उनकी समानता नहीं कर मकता । भास के वालचरित नाटक' की भूमिका मे अज्ञात श्लोक उद्धृत किया गया है:- (७) मा समानमहाकाव्यः कृतविंशतिनाटकः । अनेकान्तविधाता च मुनि सोऽभवत्कविः ।। इस एलोर मे मास को बीस नाटकों का रचयिता वहा गया है तथा भनेकान्तविपाता और उज्ज्वल महाकाव्यों के रचयिता भारामुनि नाम से पमिहित किया गया है। (८) प्राचार्य प्रभिनवगुप्त ने अपने अन्य नाट्ययेदविशति में (जो नाट्य पात्र पी टीरा है) वासवदमा उन्लेग पिया है :-- 'पयाचित्कीरा। यथा पासवदतायाम् । १. यासपरित-एम. भार• महगल, १६५६ संस्करण २०३१ (९) काव्यालंकारसूत्रवृत्ति में (ध्याजोक्ति के उदाहरण में प्राचार्य वामन द्वारा) ईसा को नवी शताब्दी में स्वप्नवासवदत्तम् नाटक का निम्नलिखित लोक उद्धृत किया गया है:- शरच्चन्द्रांशुगोरेण बाताविढेन भामिनि । फशपुष्पलयेनेदं साभुपातं मुखं कृतम् ।। (१०) निम्नलिखित विद्वानों ने मास की रचनामों से श्लोक उद्धृत किये हैं मथवा उनके विचारी के माधार पर अपनी भाषा में प्रस्तुत किये हैं:- (क) मोजदेव । (ख) शारदातनम्। (ग) रामचन्द्र तथा गुणचन्द । (घ) सर्वानन्द । (5) सागरनन्दिन् । (च) साहित्यदर्पणकार विश्वनाप । ईसा की ११वी पाती में मोजदेव ने अपने अन्य शृगारप्रकाश मे स्वप्न- पासवदत्तम् के भाव के प्रसग का उद्धरण किया है, जैसे :- पदमावतीमस्यस्था प्रष्टुं राजा समुद्रग्रहकं गतः। पदमावतीरहितं व तरवतोय तस्या एव शयने सुप्वाप । १२वीं शती मे शारदातनय ने 'भावप्रकार' में प्रशान्त नाटक के प्रसंग में 'स्वप्नवासवदत्तम्' के कथानक का निर्देश किया है। १२वी सती में रामचन्द्र तथा गुणचन्द्र प्रत नाट्यदर्पण में स्वप्नवासवदत्तम् नाटक तथा उसके रचयिता का नाम उल्लिखित किया गया है। पा- भासकृते स्वप्नवासवदते दोफालिका-शिमातसमयलोषम पसरा...- "अमरकोशटीकामवंस्व' मे मर्यानन्द ने उदयन के विवाह-प्रसंग में अंगाररस के तीन भेदों का उल्लेख किया है। यथा:- 'त्रिवियः गंगारः पपिकामभिन्नः ।' सागरनन्दिन् द्वारा अपने ग्रन्प नाटक माग रनकोश में स्वप्नवासवदत्तम् के मावोहम करणे अपनी मापा स्वत पिया गया है, पपा:- स्वप्ने वासवदत्ते नेपय्ये सूत्रधारः उत्सारणां श्रुत्वा पठति अये कथं तपोवनेऽप्यरसारणा...। विश्वनाथकृत साहित्यदर्पण मे नान्दी की परिभाषा के अनन्तर 'नान्यन्ते सूत्रधारः' का प्रसंग मी प्राप्त होता है जो मास की स्पष्टछाप प्रतीत होती है । (ख) भास का परवर्ती कवियों पर प्रभाव श्रव्यकाव्य के प्रादिकवि वाल्मीकि के समान भास ने नाटक के क्षेत्र नई दिशा प्रदान की तथा नाट्यकला को उत्कृष्ट रूप दिया । कालिदास तक ने इनकी रचनामों की उत्कृष्टता स्वीकार की है। संस्कृत के परवर्ती नाटक- कारों पर मास का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है जो उनको रचनामो के तुलनात्मक अध्ययन से प्रमाणित है। कालिदास यों तो भरत नाट्यशास्त्र की परम्परा के अनुयायी हैं पर मास के भावों, विचारों, घटनामों, शब्दों, परिस्थितियों मादि के मूलतत्त्व उनमें पाये जाते हैं । कालिदास अपनी समुन्नत प्रतिमा के बल पर दूसरे के भावों को परिवर्तित या परिष्कृत रूप में ग्रहण करते हैं जिससे स्पष्ट साम्य दिखाना संभव नही। अभिज्ञानशाकुन्तल में दुष्यन्त द्वारा माश्रमवासी तपस्वियों को फप्ट न देने का मादेश दिया जाता है । वही यात स्वप्नवासवदत्तं नाटक मे कांचुकीय के मुख से कहलाई गई है। दोनों नाटकों में तपोवन-वर्णन में पर्याप्त समानता सक्षित होती है । तपोवन के भूगों के प्रति स्नेहभाव दोनों में एक-सा मिलता है। स्वप्न वासवदत्तम् मे पोपपतीवीगोपलब्धि उदयन को वासवदत्ता के प्रति शोका. १. विलम्पं हरिणावरन्यमशिसा देशागतप्रत्ययाः । निःसन्दिापमिदं सपोवनमयं घूमो हि बह्वामयः ॥ स्वप्नवास०१-१२ पस्य स्वया प्रतिरोपणमिंगुबीना संसं म्यपिष्यत मुरकुमासूचिविखें । भयामारमुष्टिपरिवपितको जहाति सो म पुरातकः पदवों मगरते ।। २. पतिमुनिनवे रुपं न देण्यात प्रतिमपमप्पपितास्परण्यवासम् ।। स्वप्न... तप गुपरितमंगुलीय मूनम् "पइंगलीप । म.पा.१२ कप मम मन्पालोमातानि म.सा. ६१५ म .४ तुर बना देती है उसी प्रकार शाकुन्तल मे अंगूठी मिलने पर दुष्यन्त प्रत्य- धिक शोकसंतप्त होता है । तपोवन-वर्णन के साथ अतिथिसत्कार की भावना दोनों नाटको मे समान रूप से व्यक्त की गई है। प्रतिमानाटक में वल्कल धारण' को हुई सीता के सौन्दर्य को तुलना वल्कलधारिणी शकुन्तला से द्रष्टव्य है । प्रविमारक नाटक में शाप के कारण कुरंगी भोर अविमारक के विवाह बाधा पहुंचती है। उसी प्रकार दुर्वासा के शाप कारण दुष्यन्त को शकुन्तला की विस्मृति हो जाती है। अभिषेक नाटक मे वन, लतानी' के प्रति मन्दोदरी की स्नेहभावना अभिज्ञान शाकुन्तल में शकुन्तला का लतादि के प्रति प्रेम-भावना से साम्य रखती है। इसके अतिरिक्त कालिदास की अन्य कृतियो में भावसाम्य के उदाहरण मिलते है । रघुवंश के श्लोका' भाग पर मास का प्रभाय स्पष्ट लक्षित होता है। 'स्वप्नवासवदत्तम' तथा 'मिज्ञानशाकुन्तलम्' दोनों में पद्मावती तया शकुन्तला दोनों को अपने-अपने सौभाग्य की चिन्ता है। कत्यामाव की रमणीयता दोनों मे सपानरूप से दिखाई देती है । इस प्रकार मास के साथ १. काञ्चुकीयः--प्रतिगृह्यतामतिथिसत्कारः । मा० मा० च० पृ रामा-भवतीनां सूनुतपंव गिरा कृतमातिय्यम् अ० शा० १.२३ २. सर्वशोभनीय सुरूपं नाम । प्रलकरोतु भट्टिनो । तव खल शोभते नाम । सोवणिकमिव बल्कन संवृत्तम् । मा० भा० च०पू०२५३ इपमधिकमनोजा वल्कलेनापि तन्वी, किमिव हि मधुराणों मण्डनं नाकृतीनाम् । माशा १११६ ६. यस्यां न प्रियमण्डनापि महिपी देवस्य मन्दोदरी । स्नेहाल्लुम्पति पल्लयान च पुनवीजन्ति यस्यां भयात् । पातुन प्रथम व्यवस्पति जतं युष्माम्थपोतेषु या, नादत्ते प्रिममण्डनापि भवता स्नेहन या पल्लवम् । मकदा०४६ ४. सुरद्विपास्फालनकर्कशाङ्ग लिम कृतार्यः खत पाकशासनः । कर्णभार ११२३ हरेः कुमारोऽपि कुमारविक्रम-सुरद्विपास्फालनकर्कशाङ्गलो रघु० ३१५५ R अभिषेक ३१ भाव-साम्य के अनेक उदाहरण कालिदास के रघुवंश, कुमारसंभव तया मेघदूत में प्राप्त होते हैं । यथा--- कौतुकमालां गुम्फत्वार्या । स्वप्न मंक ३. एव तयोक्ते तमवेक्ष्य किंचिद् वित्रंसिर्यामधूकमालाः । रघुवश ६,२५ मधुमदकला मधुकरा मदनााभि रुपगूढाः स्वप्न०४।३ मधुद्विरेफः कुसुमंकपाने पपौ प्रियो स्वामनुवर्तमानः । कुमार सं०३.३६ दुःखं त्यक्तुं बदमूलोऽनुरागः। स्वप्न०४६ विषवृक्षोऽपि संवयं स्वयं छत्तमसांप्रतम् । कुमार० २०५५ कालक्रमण जगतः परिवर्तमाना चकारपंक्तिरिव गच्छति भाग्यपंक्तिः। स्वप्न०१४ फस्यकान्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा नीचंगच्छत्युपरि च वशा पकने मिक्रमेण उत्तरमेघ ५२ मुच्छकटिककार शूद्रक मास से प्रभावित हैं। इसकी योजना भासरचित चारदत्त के माधार पर की गई है। उन्होंने कथावस्तु तथा मावों का अंकन भी चारदात के ही समान किया है तथा दोषों का परिहार करके उचित परिकार के साप वाक्यों को भी अपने नाटक में स्थान दिया है। उदाहरणार्य-मच्छकटिक में मुजामों के लिए 'करिकरसमबाहुं प्रयुक्त हुमा है जो मास द्वारा दी गई मुजामों की उपमा 'हाथी की मजामों (मई) के सदृश' से साम्य रखती है। स्वप्न- पासवदतम् के छठे अंक में कंचुकी कहता है :- कातरा पेप्पनपता था नोत्साहस्तेष जायते । प्रायेण हि नरेनषो सोत्साहैरेव भुज्यते ।। इस लोक के उत्तरा का भाव मुग्छकटिक में पाया जाता है जहाँ कहा गया है कि साहस में लक्ष्मी का वास है। भवभूति भी मास के प्रभाव से प्रहते नही बचे हैं । उनके उत्तररामपरित में कतिपय स्थानों पर मास के भावों का साम्म पड़ता है। पचरात्र में 'प्रीतिपूर्वक मेवन' पर्य मे द्रोपद्वारा प्रयुक्त 'समाजपति का प्रयोग उतररामचरित के प्रपम पंक में इसी प्रर्प में हुमा है.यपा:- -- 'स्नेहालसमानयिमत्य दिनान्यमूनि । स्वप्नवासवदत्तम् के प्रथम अंक की इस पक्ति को छाया उत्तररामचरित के द्वितीय अंक के निम्नलिखित सातवें श्लोक पर स्पष्ट लक्षित होती है :--- 'पागमप्रधानानि सुलमपर्यवस्यानानि महापुरुषहरयानि भवन्ति ।' स्वप्न.मंक १. 'बजावपि कठोराणि मुनि कुसुमावपि । लोकोत्तराणां घेतांसि को न विज्ञातुमर्हति ॥' मालतीमाधव में प्रविमारक से प्रेरणा ली गई है। दोनों नाटक लोक- कथा पर माधारित है । दोनों की प्रकृतिवर्णनशैली में समानता पाई जाती है। प्रविमारक नाटक में हापी के उत्पात का वर्णन किया गया है। तो मालतीमाधव में व्याध का उपद्रव वर्णित है। प्रधिमारक मे विद्याधर ने उसके जीवन की रक्षा की तो मालतीमाधव में योगिनी के द्वारा जीवन रक्षा होती है। इन दोनों नाटकों में दण्डक छन्द का प्रयोग हुपा है। स्वप्नवासवदतम् मे अग्निदहनोपरान्त मी वासवदत्ता पतिस्नेह के कारण जीवित कही गई है 'दाधाप्यदग्धा' जली हुई भी नही जली है। ऐसा ही वर्णन मालतीमाधव में दो स्थानों पर पाया जाता है । जरो- त खलु स उपरतो यस्य बल्लभो जनः स्मरति । मा० मा. पु०३ उपरताप्यनुपरता । मा० मा० पृ०५६ "प्रियङ्ग शिलापट्ट' का वर्णन स्वप्नवासवदतम् तपा मालतीमाधव मे समानरूप से उपलब्ध होता है । विशाखदत्तरचित मुद्राराक्षस नाटक मास की नाट्यकला के अनुसरण पर 'माग्द्यन्ते से प्रारंभ होता है। भावों, विचारों तया शब्दों के प्रयोग में भी पर्याप्त साम्य है। इस नाटक में अप्रमत, काशपुष्प, सवाप्पम्, निवापारजलि भादि शब्द मास के समान ही प्रयुक्त हुए हैं। मास के 'सकाम' शब्द का प्रयोग मुद्राराक्षस में भी विशेष महत्त्व दिखाने के लिए किया गया है:- ( ७० ) सकाम इदानीमार्ययोगन्धरायणो भवतु । स्वप्न स्वगतम्। एवमस्मासु यामागेषु स्वकार्यसिद्धिकामः कामो - भवत्वार्य: मुद्रा० ३।३३ से पूर्व मुद्राराक्षस एक ऐतिहासिक तथा राजनीतिक नाटक है। यह प्रतिज्ञायो. गन्धरायण से प्रभावित है । इन दोनों नाटको के प्रमुख पात्र चाणक्य और यौगन्धरायण में समान गुण लक्षित होते हैं। भट्टनारायण ने वेणीसंहार नाटक, जो वीररस प्रधान है, की रचना महाभारत से उद्धृत पाख्यान के आधार पर की है। यह नाटक मास के वीर रस प्रधान एकाकी ऊरुमंग तथा दूतवाक्य से अत्यन्त प्रभावित प्रतीत होता है, क्योकि सम्पूर्ण पाख्यान उसी प्रकार के प्रमावशाली वाक्यविन्यास मे प्रस्तुत किया गया है। वेणीसंहार तथा पंचरात्र के पात्रों में समानता है । मास का प्रभाव हपं के नागानन्द, रलावली तथा प्रियदर्शिका पर भी दृष्टि- गोचर होता है । स्वप्नवासवदतम् में उदयन के लिए 'शरचापहीनः कामदेवः' प्रयुक्त हुमा है वैसे ही रत्नावली मे मी 'प्रत्यक्ष एवापूर्वः कुसुमायुधः' कहकर सादृश्य व्यक्त किया गया है । रत्नावली नाटिका में मास द्वारा चित्रित सान्ध्य- कालीन चित्र की समानता इष्टव्य है :- परिभ्रष्टो दूरावविरपि च संक्षिप्तकिरणो रयं व्यावार्यासौ प्रविशति शनरस्तशिखरम् । स्वप्न १.१६ सन्ध्यामृष्टविशिष्टस्वकरपरिकरस्पष्टहेमारपंक्ति- प्याकृष्यावस्थितोऽस्यक्षितिभूति नयतीवैदिक्चश्मकः ॥ रत्नावती १५ प्रियदशिका के द्वितीय मंक मे वणित अगस्त्यपूजा भविमारक के चतुषं मंक के माघार पर है । प्रबोधचन्द्र माटक में सूक्ष्म मनोमावों का पात्ररूप मे वर्णन किया गया है वो पालपरित के पापादि के पात्रत्व-कल्पना से मिलता-जुसता है। केरस के नाटको पर मी मास का प्रभाव लक्षित होता है। उनके उदयन के प्रास्पान के प्राधार पर वीणावासवदत्ता, पासवदत्ता तपा तापसपसराजपरित मादि नाटकों का प्रणयन हुमा है। उन्माद- नाटककारों के अतिरिक्त मास का प्रमाव वाण, मारवि, माघ मादि कवियों पर भी पड़ा है।मरणोपरान्त वासवदत्ता के गुणों के स्मरण के समान ही बाणकृत कादम्बरी मे मो गणो का स्मरण वर्णित है, जैसे- उपरतस्य तु न कमपि गुणमावहति । कादम्बरी पू०२६५ भास द्वारा कतिपय स्थलों पर प्रयुक्त घ्रियते' का प्रयोग शिशुपालवघ (माघकृत) के द्वितीय सर्ग में पाया जाता है । प्रियते यावदेकोऽपि रिपुस्तावत्कृतः सुखम् । माध०२३५ भारविकृत किरातार्जुनीयम् के तृतीय सर्ग में मास के नरेन्द्रधीः सोत्साहरव भुज्यते' का स्पष्ट प्रमाव दिखाई पड़ता है:-- 'रम्या धरित्री तव विक्रमेण उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि प्रायः सभी परवर्ती कवि भास से प्रभावित हुए हैं। रंगमंच के पात्रों का परिचय स्त्री पात्र पुरुप पात्र सूत्रधारः--नाटक का प्रारंभकर्ता रंग- घासवदत्ता-राजा की पटरानी, मंच का अध्यक्ष । प्रद्योत की कन्या, अवन्तिका। पद्मावती मगधेश्वर दर्शक की बहन, उदयन को दूसरी पत्नी। भटो-पद्मावती के दो सेवक । तापसी-सपोवन मे रहने वाली यौगन्धरायणः-राजा का प्रधान मंत्री। एक वृद्धा स्त्री। कांचकीयः-महाराज दर्शक के अन्तः- चेटी-पद्मावतो की विश्वासपात्र पुर मे रहने वाला सेवक । महाराज परिचारिका। प्रद्योत कारभ्य नामक मृत्य। पदिमनिका-1 पद्मावती की दो मयुरिका- सेविकायें। धात्री-पद्मावती की उपमाता । ब्रह्मचारी-लावाणक ग्राम में वेदा- पात्रो-पासवदत्ता ध्ययन करने वाला एक विद्यार्थी। नाम की उपमाता। राजा-वत्स देश का राजा उदयन । विजया-उदयन की द्वारपालिका, विदूषकः-उदयन का मित्र वसन्तक ।। प्रतीहारी । की वसुन्धरा

( २ )
केवल कथा-प्रसंग में आने वाले पात्रों का परिचय
दर्शक:--मगधदेश का शासक, पद्मा- । महादेवी-पद्मावती की माता ।
वती का माई।
अवन्तिसुन्दरी-एक यक्षी।
प्रद्योतः--उज्जयिनी का राजा महासेन, मङ्गारपती-प्रद्योत की राजमहिषी,
वासवदत्ता का पिता।
वासवदता की माता।
कमण्वान्--वत्सराज का मन्त्री भौर कुञ्जरिका-पद्मावती की सेविका।
सेनापति ।
विरधिका--उदयन
की
ब्रह्मवत-काम्पित्य देश का शासक ।
प्रेमिका।
प्रायणि:--उदयन का राज्य मप
हरण करने वाला शत्रु।
गोपालक:--प्रद्योत का पुत्र ।
पालक:-प्रद्योत का दूसरा पुत्र ।
पुष्पक:- भविष्यवाणी करने
वाले दो सिद्ध।

महाकविभासप्रणीतम् स्वप्नवासवदतम् प्रथमोऽङ्क (नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः) (नान्दी-पाठ के अन्त में सूत्रधार का प्रवेश) (Benediction; then enter the stage-manager) प्रथम अंक में महाराज उदयन के अपहृत राज्य को पुन: प्राप्त करने के निमित्त मंत्री योगन्धरायण लावाणक ग्राम में प्राग लगवा कर रानी तथा अपने को जल मरने की वार्ता प्रसारित करा देता है । वह रानी बारावदत्ता के साथ मगध राज्य से एक तपोवन मे पहुँच कर राजकुमारी पदमावती के पास उसे अपनी भगिनी कह कर घरोहर रूप में रख देता है । लावाणक ग्राम से आये हुए एक ब्रह्मचारी के मुख से राजा के अपनी रानी के प्रति अनन्य प्रेम को सुनकर वासवदत्ता अत्यन्त सन्तुष्ट हुई साथ ही पद्मावती के मन में राजा के प्रति प्रेमाकुर उदय होता है। टिप्पणी-(१) स्वप्नवासवदत्तम्- स्वप्ने दृष्टा वासवदत्ता स्वप्नवासवदत्ता मध्यमपदलोपी समास, स्वप्नवासवदत्ताम् अधिकृत्य कृतं नाटकम् इत्यर्थं स्वप्न- वासवदत्ता+पण । इस नाटक का यह नामकरण पांचवें अंक के स्वप्न-दृश्य के प्राधार पर हुमा है । यह स्वप्न दृश्य अत्यन्त नाटकीय और माव-विशिष्ट है । यहां उदयन वासवदत्ता के प्रथम प्रेम के चिन्तन मे मग्न है, इतने में नींद या जाती है । वासवदत्ता, जिसके विषय मे वह स्वप्न देख रहा है प्रत्यक्ष रूप में प्रापर उसके प्रश्नों का उत्तर देती है । मास अपने इस दृश्य से इतने प्रसन्न हैं कि इसी के आधार पर नाटक का नाम रख देते हैं। (२) मान्यन्ते-नान्द्याः अन्ते इति पष्ठी तत्तुरुप ममास । नन्दयतीति नन्दः नन्द्+अच् पचादित्वात्, नन्द एव नान्दः नन्द+मण प्रमादित्वात्, नान्द-+डीप-नान्दी । नाटक आरम्म करने से पहले उसकी निर्विघ्न समाप्ति के लिए देवता आदि की जो स्तुति की जाती है, उमे नान्दी कहते हैं । इसका लक्षण यह है-'भाशीर्वचनसयुक्ता स्तुतिर्यस्मात् प्रयुज्यते । देवद्विजनुपादीनां तस्मासान्दीति सजिता ॥ (साहित्यदर्पण) अर्थात्, देवता, ब्राह्मण स्व०८०-६

२
स्वप्नवासवदत्तम्
.
और राजा मादि की माशीर्वाद युक्त स्तुति इसके द्वारा की जाती है, मतः इसका
नाम नान्दी पड़ा, नाटय-प्रदीप में नान्दी का लक्षण लिखा है-'नन्दन्ति काव्यानि
कवीन्द्रवर्गाः कुशीलवाः पारिपदाश्च सन्तः । यस्मादलं सज्जनसिन्धुहंसी तम्मादियं
मा कथितेह नान्दी' ।। मयवा मंगल गान-वाद्य को नान्दी कहते हैं जो इस नाटक
में रंग-मंच पर न होकर नेपथ्य में (पद के पीछे) होता है। अन्य नाटयकारो से
भास के नाटकों को यही विलक्षणता है। 'नान्द्यन्ते' मे भाव में सप्तमी है । ततः---
उसके बाद । यह शब्द प्रकृत स्थल में अनावश्यक प्रतीत होता है; क्योंकि
'नान्द्यन्ते से ही ततः' का अर्थ प्रकट हो जाता है। ३) सूत्रधार:--सूत्र प्रयोगा-
नुष्ठान धारयतीति विग्रहे सूत्रध+णि+प्रण 'कर्मण्यम्' इति सूत्रेण । सूत्रधार
उस प्रधान अभिनेता को कहते हैं, जो रंग-मंच पर घटित होने वाली घटना को
नियमित रूप से चलाता है । वह रग-मंच का अधिष्ठाता होता है । वह प्रस्तावना
या स्थापना मे मुख्य रूप से उपस्थित होकर नाटक का प्रारम्भ करता है और
नाटकीय पात्रों को मावश्यक निर्देश देता है । इसकी परिमापा यह है--'नाटयस्य
यदनुष्ठान तत्सूत्र स्यात् सवीजकम् । रंगदेवतपूजाकृत् सूत्रधार इति स्मृतः ।।
अर्थात् नाटय को उत्पत्ति के साथ उसके अनुष्ठान को सूत्र कहते हैं पौर (उसका
धारण करने वाला तथा) रंग-मच के देवता का पूजन करने वाला सूत्रधार
कहलाता है।
सूत्रधारः-उदयनवेन्दुसवर्णावासवदत्ताबलो बलस्य त्वाम् ।
पद्मावतीर्णपूर्णी वसन्तकम्रो भुजौ पाताम् ॥१॥
अन्वय-उदयनवेन्दुसवर्णों पासवदत्ताबली पद्मावतीर्णपूर्णी वसन्तकम्रो
बलस्य मुजो त्वा पाताम् ।।१।।
संस्कृत टीका--उदये--उदयसमये, नवः--नवीनः, यः इन्दुः-चन्द्रः, तेन
सवों-तुल्यवों तत्सदृशौ घवलो इति यावत्, भासवदत्ताबलो-दत्तः अर्पितः
पासवः मद्य यस्य सा पासवदत्ता तथाविधा अबला रेवती नाम्नी बलरामप्रिया
याभ्या तो अथवा पासवेन मद्येन दत्तम् उत्पादितम् प्रा समन्तात् बल शक्तिः
ययोः तो पराक्रमशीली पद्मावतीर्णपूर्णी-पद्मा लक्ष्मी शोभामिति यावत् अवतीणों
प्राप्तो तथाविधौ च पूणों सामुद्रिकोक्तशुमलक्षणसम्पन्नौ प्रथया पद्माया: लक्ष्म्याः
प्रवतीर्णेन माविर्भावेन वासैन इति यावत् पूर्णो सनाथी सर्वदा श्रीसम्पन्नी इत्यर्थः,
वसन्तक सौ--वसन्तऋतुरिव को मनोहरी, बलस्य--बलरामस्य, मुजी--बाहू,
स्वा-नाटकद्रष्टवर्ग, पाताम्-रसताम् ॥१॥

प्रथम प्रक सूत्रधार-~-उदयकालीन नवीन चन्द्र के समान (ललाई लिये हुई उजले) रङ्ग वाली, अपनी प्रिया रेवती को मद्य देनेवाली (प्रथवा मद्य पान से विशेष बलशाली),श्री तथा गम लक्षणों से सम्पन्न और वसन्त ऋतु के समान मनोहर बलदेव जी की दोनों मुनायें आप लोगो (दर्शक वृन्द) की रक्षा करें ॥१॥ Stage Manager--May the arms of Bala-which resemble the new rising moon, invigorated by the wine, satisfied by the incarnation of Padma (goddess of wealth) and beautiful like the spring season, protect you, टिप्पणी--(१) उदयनवेन्दुसवों ---उदीयमान नवीन चन्द्रमा के समान कान्ति वाली । नवश्चासौ इन्दुः नवेन्दुः कर्मधारय समास, उदयकालिकः नवेन्दुः उदयनवेन्दुः मध्यमपदलोपी समास, समानः वर्णः कान्ति: ययो: तो सवणौ 'समानस्य च्छन्दस्यमूघंप्रमृत्युदपु' इति सूत्रेण ममानस्य म प्रादेशः, उदयनवेन्दुना सवर्णों इति उदयनवेन्दुसवर्णी तृतीया सत्पुरुष समास (२) पासवदत्तावलो-दिया गया है मद्य जिसको ऐसी अबला बलरामपत्नी (रेवती)(१) अर्थात् अपनी प्रियतमा रेवती को मद्य देने वाली (२) (मद्यपान से विशेष वलशाली) दोनों भुजाएं अथवा (३) जो (बलराम को) भुजाएँ मद्यपान के कारण बलहीन हो गई हैं । प्रथम व्याख्या से बलराम की भावुकता तया प्रेमी-प्रकृति की सूचना मिलती है। दूसरी मे मद्यपान से विशेप बलशाली भुजाएं रक्षणक्षमता की द्योतक हैं । ये दो व्याख्यायें युक्ति-सगत हैं पर तीसरी व्यास्था उपयुक्त प्रतीत नहीं होती, क्योकि बलहीन मनाएँ रक्षा करने में ममर्य नही हो सकती । दत्तः पासवः यस्य सा प्रामवदत्ता, बहुद्रोहिसमासे कृते 'वाहिताग्न्यादिपु' इति सूत्रेण दत्तशब्दस्य पनिपातः, पासवदत्ता चासोमबला कर्मधारय समास । किन्तु इस प्रकार समास करने से 'पासवदत्ताबलो' यह शब्द “मुजो' का विशेषण नहीं बनेगा । इसलिए प्रासमन्तात् बलम् प्राबलम् प्रादितत्पुरुप समास, पासवैन दतम् पासवदत्तम् तृतीया तत्पुरुप, तादृशम् प्राबलम् ययो बहुब्रीहि समास, तो पासव- दत्तावली- इस प्रकार समास करना ही उचित होगा । कोई यहाँ मासवेन प्रबलं-बलाभावो याभ्या तो इस प्रकार समास करते हैं । यद्यपि ऐसे समास से शब्दसिद्धि में कोई बाधा नहीं पहुंचेगी, पर इसका अर्थ मगल के प्रधान उद्देश्य के विरुद्ध जाता है। क्योकि बलहीन मुजायें किसी को रक्षा नही कर सकती। (३) मासप-मद्य । पाच उपसर्गपूर्वक पुन (मभिपवे) घातु से भर् प्रत्यय । (४)प्रदतीणं-पवतार-पद्मायाः अवतीर्ण तैन पूर्णी लक्ष्मी के अवतार से युक्त ५-ना अर्थात् श्री (सोमा) से सम्पन्न । अथवा पद्मस्य अवतीर्णम् अवतारः कमल के अवतरण से पूर्ण प्रथवा कमल के समान कोमल । तृतीया तत्पुरुष । अव त+क्त (त) । (५) वसन्तकम्रो-वसन्त ऋतु के समान मनोहर । वसन्त इव कम्रो' उपमित समास ।(६)कत्र--मनोहर, कमनीय/कम्मर नमिकम्पिस्यजसकहिं- सदीपो रः' इति सूत्रेण । (७) बलस्य--वलराम की। (क) त्वाम्-तुमको आप लोगों को प्रर्थात् दर्शको को । (२)भुजो-दोनों भुजाएँ। (१०)पाताम्- रक्षा करें अर्थात् बलराम की भुजाएं तुम लोगो (दर्शकों) की रक्षा करें। यहाँ 'उदयनवेन्दुसवर्णों' इस विशेषण से रवभावतः गौर तथा मद्य-पान के कारण कुछ ललाई लिए हुए बलरामजी की भुजाओं का सौन्दर्य प्रकट किया गया है। 'पासवदत्ताबलौ' इस विशेषण से उनकी मुनानों की रक्षण योग्यता सिद्ध होती है। 'पद्मावतीर्णपूणों' इस विशेषण से यह दिखाया गया है कि बलरामजी की बांहें आजानुलम्बी तथा शुभलक्षणशाली हैं। 'वसन्तकम्रौ' इस विशेषण से वसन्त के समान सर्वजनकमनीयता सूचित होती है। इस श्लोक में कवि ने मुद्रालंकार द्वारा बड़ी निपुणता से उदयन, वासवदत्ता, पद्मावती, वसन्तक प्रादि मुख्य पात्रो के नाम की सूचना दी है। उनमें भी उदयन प्रधान पात्र है। इसलिए पहले ही उसका नाम निर्दिष्ट हुभा है । मुद्रालकार उसे कहते हैं, जहां प्रकृतार्थवोधक शब्दों से सूच्यार्य को सूचना मिल जाती है या उन शब्दों से किसी नाम का बोध हो जाता है । यहाँ मार्या छंद है । इसका लक्षण यह है--'यस्याः पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीमेऽपि । अष्टादश द्वितीये चतुर्थक पञ्चदश सा पायर्या ॥१॥ एवमायंमिश्रान् विज्ञापयामि । अये ! किं नु खलु मयि विज्ञापनव्यग्ने शब्द इव श्रूयते । अंग ! पश्यामि । संस्कृत टोका-एवम्-~-वक्ष्यमाणप्रकारेण, प्रार्थमिश्रान्--प्रार्याः कुलशील. दयाधर्मसत्यादिसद्गुणसम्पन्नाः सम्याः ते च ते मिश्राः पूज्या: तान्, विज्ञापयामि आवेदयामि । मये! पाश्चर्यम्, मयि---सूत्रधारे, विज्ञापनव्यग्रे-प्रावेदनतत्परे, सति, किं न सलु-कुतो न खल, शब्द इव--प्रव्यक्तः कलकल इव, श्रूयते-- माकपते । अंग-सम्भ्रमे, पश्यामि--केन कुतः कीदृशः शब्दः कृतः इति सम्मक प्रकारेणशास्यामि इति भावः।

प्रथम ग्रंक ५ प्राप श्रीमानों से मेरा यह निवेदन है कि"अरे ! निवेदन करने में मेरे व्यस्त होते ही यह शब्द कहाँ से सुनाई पडा ! प्रच्या देखू । Thus I beg to inform the worthy gentlemen. Oh, why to be sure, some noise is heard wben I am busy in making the request. Ob, I see. टिप्पणी-(१) प्रापंमिश्रान्-सम्मानित मदस्यों को। 'गौरवितास्त्वार्य- मियाः' इति त्रिकाण्डदोषः। याश्चि ते मिश्राः इति प्राथमिश्राः तान् कर्मधारय समास । प्रर्यते सेव्यत्वेन गम्यते इति प्रायः ऋ ण्यत् । वशिष्ठ के अनुसार प्राय उसी को कहते हैं जो दृढता से कत्र्तव्य कर्म का पालन पोर पकतंय की उपेक्षा करते हुए अपने धर्म पर डटा रहता है---'कर्तव्यमाचरन् कर्म ह्यकर्तव्यमनाचरन् । तिष्ठति प्रकृताचारे स वा प्राय इति स्मृतः ।। परन्तु मरत ने पार्य का लक्षण यह किया है-'कुलं गोल दया दान धर्मः सत्यं कृतज्ञता । प्रद्रोह इति येवेतता. नार्यान् संप्रचक्षने ।' मिथ- यह एक उपाधि है जो सम्भ्रान्त व्यक्ति के नाम के साय लगायी जाती थी। यह सदा बहुवचन में प्रयुक्त हुआ है। इसका प्रयोग विष्णपुराण में भी मिलता है--'मरीचिमिधः दक्षेण मिश्र+अच । (२) विज्ञा- क्यानि--निवेदन करता हूँ। वि/ना+णिच्, पुक् प्रागम+ लट्--गिप् । (३) अये-यह क्रोध, पाश्चर्य विपाद द्योतक सम्बोधनवाची प्रव्यय है। Vइण्-+एच् । (४) अंग-सम्बोधनवाची अव्यय शब्द, जिसके प्रर्य होते हैं- 'बहुत अच्छा', 'श्रीमन् ! बहुत ठीक, "अवश्य', 'सत्य है,''अंगीकार है' इत्यादि। प्रग+प्रच (अ)। (५) पश्यामि-देखता हूँ, पता लगाता हूँ। उ० पु० ए० व० । यहाँ यतमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा' इस मूत्र से भविष्य के अर्थ मे लट् लकार हुआ। (६) विज्ञापनपत्रे--निवेदन करने में व्यस्त होने पर। (७) शन्द दव भूपते--कुछ इस प्रकार का अव्यक्त शब्द सुनाई पड़ता है। इव का यहाँ पर अर्थ है 'कुछ इस प्रकार का।' (नेपथ्ये) उस्सरह उस्सरह अय्या ! उस्सरह [उत्सरत उत्सरत प्रार्याः! उत्सरत।] (नेपथ्य में) हटो, हटो, महाशयो ! हटो। (Behind the Cartain) Get away, get away. gentlemen, get away. Erryो--(१) नेपथ्ये--नेपथ्य शब्द पर्दा पोर पर्दे के पीछे रूप-धारण- ६ स्वप्नवासवदत्तम् स्थल दोनों को कहते हैं-'नेपथ्यं स्याज्जवनिका रङ्गभूमिःप्रसाधनम् इत्यजयः। 'पाकल्पवेषो नेपथ्यं प्रतिकर्म प्रसाधनम्' इत्यमरः । इसका लक्षण यह है। 'कुशीलवकुटुम्बस्य गृहं नेपथ्यमुच्यते' अर्थात् जहां अभिनेता अपने को सजाते और अभिनयोचित वेप धारण करते हैं, उसे नेपथ्य कहते हैं। /नी+विच, नेः नेता तस्य पथ्यम् । (२) उत्सरत--हटो (मार्ग छोड़कर दूर हो) उत्+स+ लोट् म० पु. बहु० ३० । मार्ग परित्यज्य दूरे भवत । यहाँ सम्भ्रम (हडबडो) सूचित करने के लिए इस क्रिया का दो बार प्रयोग हुआ है। कहा भी है--'सम्भ्रमेण प्रवृत्ती यथेष्टम् अनेकया प्रयोगो न्यायसिद्धः' अर्थात् उद्विग्नता, त्वरा या भय की अभिव्यक्ति में किसी शब्द को दो बार या उतने वार तक दुहराया जा सकता है जब तक कि वक्ता का तात्पर्य अमित व्यक्ति को स्पष्ट न हो जाय। सूत्रधारः--भवतु विज्ञातम् । भृत्यर्मगधराजस्य स्निग्धः कन्यानुगामिभिः । धृष्टमुत्सायते सर्वस्तपोवनगतो जनः ॥२॥ (निष्क्रान्तः) अन्वय-तपोवनगतः सर्वो जनः मगधराजस्य कन्यानुगामिभिः स्निग्धः मृत्यः धृष्टम् उत्सार्यते ॥२॥ सस्कृत टोका--तपोवनगत:-मुन्याथमस्थितः, सर्वः-स्त्रीवृद्धबालपुरुषादिः, जन:-लोकः, मगवराजस्य-मगधाधिपतेः, कन्यानुगामिभिः-पुत्रीपरिचारकः, स्निग्ध:--म्नेहपात्रः, मृत्यः-सेवकः, पृष्टम्--धृष्टतापूर्वकम् उद्धत यथा स्यात् तथा, उत्सार्यते-दूरीक्रियते ॥२॥ सूत्रधार-अच्छा, समझ गया। मगघराज की पुत्री के पीछे-पीछे चलने वाले प्रिय सेवकगण तपोवन में रहने वाले लोगों को घृष्टतापूर्वक हटा रहे हैं ।।२।। (चला गया) प्रस्तावना समाप्त । Stage Manager-well ! I know. All the people in the penance grove are being rudely driven away by the loyal servants of the Magadh king who are following the princess. (Exit) (End of Prologue) टिप्पणी---(१) भवतु विज्ञातम्--(विशेषेण ज्ञातम् ) अच्छी तरह जान गया । भवतु--मू लोट-प्र० मु० ए० व० । (२) तपोवनगतः-- तप या तपस्या का वन अथवा तपस्या करने के लिए वन । तपोवन में रहने वाले । तपसः तपस्यार्थ वा वनम् तपोवनम् पष्ठीतत्पुरुष समास, जैसे 'मश्वस्य घासः प्रश्वार्थ वा धास: प्रश्वधासः' प्रयोग होता है प्रयम प्रक। ७ उसी तरह यह भी है । फिर तपोवनं गतः तपोवनगतः इसमें द्वितीया तत्पुरुष समास हुमा । (३) मगधराजस्य--मगध देश या मगध-निवासियो के राजा का । मगधन्य राजा मगध राज: षष्ठी तत्पुरप, राजाहः सखिभ्यष्टच्' इस सूत्र रो ममा- सान्त टच प्रत्यय । (१) कन्यानुगामिभि:- R:-कन्या के पीछे चलने वाले (सेवको) द्वारा । कन्याम् अनुगन्तुं शीलं येषामस्ति इति विग्रहे कन्या अनु/गम् +णिनि- कन्यानुगामिनः, तैः। (५) स्निग्धः--स्नेहो । /स्निह+क्त (त)।(६) मृत्यः-- नौकरों से IV मृ+क्यप्, 'हस्वस्य पिनि कृति तुक्' इत्यनेन तुगागमः । (७) धृष्टम्--उच्छृखता से, योग्यायोग्य का बिना विचार किए गरदनियाँ प्रादि देकर । राजसेवक लोग राजकुमारी के कृपापात्र होने के कारण धमंडी थे । इसलिए वे तपोवनवासियों को प्रशिष्टता या मुरोवती से हटा रहे थे । उत्साते- हटाया जा रहा है। उत/स+णिच् + लट् (मणि), यक् । (८) निष्कान्तः--निकल गया या चला गया। सभी लोग हटाये जा रहे हैं यह कहता हुआ सूत्रधार रंग-मंच से चला जाता है। निस्/कम्+क्त (त) । (8) स्थापना-स्याप्यते प्रस्तूयते कथावस्तु यस्या सा स्थापना, 'जिसमे नाटक की कथावस्तु स्थापित या प्रस्तावित की जाती है, उसे स्थापना या प्रस्तावना कहते हैं । इनी को प्रामुख भी कहा गया है । क्योकि तीनो के लक्षणों में समानता है । 'प्रविश्य स्थापकस्तद्वत् काव्यमास्यापर्यत्ततः।' (साहित्यदर्पण ६, २६) अर्थात् स्थापक प्रविष्ट होकर काव्य की (नाटकीय वस्तु की) स्थापना करे उसे स्थापना कहते हैं । 'नटी विद्रुपको वापि पारिपाश्चिक एव वा । सूत्रधारेण सहिताः सलाप यत्र कुर्वते ।। चित्रपिः स्वकार्योत्यः प्रस्तुताक्षेपिमिमिथः । प्रामुख तत्तु विज्ञेय नाम्ना प्रस्तावनाऽपि सा।। (साहित्यदर्पण ६, ३२। 'सूत्रधारो नटी ते मारिष वा दिदूपकम् । स्वकार्य प्रस्तुताक्षेपि चित्रोक्त्या पत्तदामुखम् ।। (दशरूपक) प्रर्यात् जहाँ सूत्रधार विचित्र प्रकार से नटी, मारिप, विदूषक या पारिपाश्विक से ऐसी बात कहे, जिससे प्रस्तुत नाटक को कथा की सूचना हो जाय, उसे 'प्रामुख' कहते हैं, 'प्रस्तावना' भी उसी का नाम । इस प्रस्तावना का नाम प्रयोगातिशय है । जैसा कि दर्पणकार ने लिखा है-~'यदि प्रयोग एकस्मिन् प्रयोगोऽन्यः प्रयुज्यते । तेन पात्रप्रदेशश्चेत् प्रयोगातिशपस्तदा ।' मास के तेरह नाटकों मे से ग्यारह नाटको मे इस स्थापना' शब्द का प्रयोग मिलता है। केवल 'बालचरित' मोर 'वर्णमार' में इसका प्रयोग नहीं हुमा है।

स्वप्नवासवदत्तम्
(प्रविश्य)
भटौ---उस्सरह उस्सरह अय्या! उस्सरह । [उत्सरत उत्सरत प्रायः
! उत्सरत । ]
(प्रवेश कर) दो सिपाही--हटो, हटो, लोगो ! हटो!
(Entering) Two soldiers-Get away, get away gentlmen, get
away.
ततःप्रविशति परिवाजकवेषो यौगन्धरायणः प्रावन्तिकावेषधारिणी
वासवदत्ता च]
(तदनन्तर संन्यासी का वेष धारण किये हुए यौगन्धरायण और मालवा की
स्त्रियों का-सा पहिनावा पहने हुई वासवदत्ता का प्रवेश)
(Then enter Yougandharayana in the garb of an ascetic and
Vasavadatta, in the disguise of Avantika.)
टिप्पणी--(१) परिवाजकवयः- (कार्यवश) संन्यासी का वेप बनाने-
वाला। परित्यज्य सर्व व्रजतीति परिव्राजकः संन्यासी' परिविज्+ण्वल---
अक तस्येव वेषो यस्य सः कार्यावशात् परितसन्यासिरूप इत्यर्थः बहुव्रीहि समास ।
(२) यौगन्धरायण-वत्मराज उदयन का मत्री। (३) प्रावन्तिकावेषधारिणी---
प्रवन्ति देश की स्त्रियों का-सा वेष धारण किये हुए । अवन्तिजनपदसम्भवाः
अङ्गनाः मावन्तिकाः तासामिव वेषं धारयतीति भावन्तिकावेष/+णिनि+
डीप, प्रवन्त्या भवा: मावन्तिकाः, अवन्ति+ठञ्-इक । (४) पासववत्ता--
उज्जयिनी के राजा प्रद्योत को पुत्री और उदयन को ज्येष्ठा पत्नी।
यौगन्धरायणः-(कर्ण दत्वा) कयमिहाप्युत्सीर्यते ! कुतः,
धोरस्याश्रमसंश्रितस्य वसतस्तुष्टस्य वन्यः फले-
र्मानार्हस्य जनस्य वल्कलवतस्त्रासः समुत्पाद्यते ।
उरिसक्तो विनयादपेतपुरुषो भाग्यश्चलविस्मितः
कोऽयं भो निभूतं तपोवनमिदं ग्रामीकरोत्याज्ञया ॥३॥
अन्वय-धीरस्य, वन्यः फलः तुष्टस्य वसतः, वल्कलवतः, मानार्हस्य, माश्रम-
सश्रितस्य जनस्य मासः समुत्पाद्यते । मो उत्सितः, विनयादपेतपुरुषः, चल:
भाग्यः विस्मितः, मयं कः इदं निमतम् तपोवनम् पाजया प्रामीकरोति ॥३॥

प्रथम प्रक संस्कृत टीका--(प्रत्र) धीरस्य-वयंवतः, पन्य:-वनोत्पनैः फलः, तुष्टस्य- तप्तस्य, वसतः कृतनिवासस्य, वल्कलवतः--वृक्षत्वग्धारिणः, मानार्हस्य सत्कारयोग्यस्य, पाश्रमसंश्रितस्य-प्राधमे-तरुमले पदिनिमितं कुटीरम्, संधितस्य-प्राश्रितवतः, जनस्य-लोकस्य, (अपि) त्रासः-मयम्, समुत्पाद्यते- जन्यते । मौ: सर्वसाधारणसम्बोवनमिदम्, उसिक्तः--उद्दण्डः, विनयादपेत- पुरुषः-विनयात् नम्रतायाः, अपेतः रहितः, पुरुषः जनः, चल:--चञ्चलः, विनाशशीरित्यर्थः, माग्य:-माग्यलम्यः सम्पदादिमिः, विस्मित:-गवितः अयं कः--एयः कः, (मस्ति, यः) इदं-दृश्यमानं निमृतं-शान्त, तपोवनम्- श्राश्रमस्थानम्, प्राज्ञया--प्रादेरॉन, ग्रामीकरोति-प्रामतुल्यता जनमति ?॥३॥ योगन्धरायण-(कान लगाकर) क्या यहाँ भी लोगों को हटाया जाता है। क्योकि, (यहाँ) स्थिर चित्तवाले, वन के फूलों से सन्तुष्ट रहने वाले, वृक्षो की छाल के वस्त्र पहनने वाले प्रोर मादर करने योग्य माधमनिवासी जनों को भी मपगीत किया जा रहा है। अरे । उदण्ड, नम्रता से रहित मौर नश्वर धन आदि से पर्वाला यह कोन आदमी है जो इस शान्त उपवन को (भपनी) माज्ञा से दूषित कर रहा है ? ||३|| Yaug. (listening) what I are the people being turned away even from here.? Why Alarm the sober, respectable inmates of this sanctuary, subsistiog on and pleased by the wild fruits and clothed in the bark of trees ? Oh, who is this unmannerly man lacking in modesty and puffed up with pride of fickle fortune that is turning this quiet place of hermitage into a (busy) village, टिप्पणी--(१) कमिहाप्यत्सार्यते-यौगन्धरायण के कहने का भाशम है कि यह तो तपोवन है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को विचरण करने को स्वतन्त्रता है, पाश्चर्ष वै पहा मी लोग हटाये जा रहे हैं । कैसे (क्या) यहाँ भी हटाया जा रहा है । (२) कुत:-कहाँ से क्योकि । (३) धीरस्य--सांसारिक मोग-पदार्थों के परि. त्याग रूपये से युक्त । कालिदास ने कुमारसम्भव मे 'घोर' उसी को कहा है, जिप्तका चित्त विकारोत्पादक साधनों के रहते हुए भी विकृत नहीं होता है- 'विकारहतो सति विश्यिन्ते पेषा न दासि त एच घोराः' । वस्तुतः धीर पुश्प का लक्षण तो इस लोक मे मिलता है-'कान्ताकटाक्षविशिक्षा न लुनन्ति यस्य चितं न निदेहति कोपकृशानुतापः । कपंन्ति भूरिविषयाश्च न सोमपाशा:लोकनय जयति कृत्स्नमिदं स धीरः ॥ पियदि रातिददाति इति घी/ रास्क १० स्वप्नवासवदत्तम् (४) वन्यः फलः तुष्टस्य वसतः-वन मे उत्पन्न होने वाले फलों से ही संतुष्ट होकर रहने वाले । वने जातानि इति वन्यानि वन+यत्, तः वन्यः । (५) आश्रम- संधितस्य-(ससार से छुटकारा पाने के लिए) पाश्रम का सहारा लेने वाले । आश्रमं सश्रितः इति प्राथमस श्रितः तस्य । 'द्वितीया प्रितातीत'-इत्यादि सूत्र से द्वितीया तत्पुरुष समास हुआ। (६) मानार्हस्य-प्रादर पाने योग्य व्यक्ति का। मानं अहंतीति मानाहः तस्य । (७) वल्कलवतः-वृक्ष की छाल धारण करने वाले के । वल्कलम् अस्ति अस्य इति वल्कलवान् तस्य प०ए०व० वल्कल+मतुप वित्)। (८) त्रासः-भय । (६) समुत्पाद्यते--उत्पन्न किया जा रहा है। सम्+उत्+पद्+णिच् (कर्मणि) । (१०) उसिक्तः--मर्यादा का उल्लघन करने वाला । उत्/सिच्+क्त (त)। (११) विनयादपंतपुरुषः--विनयहीन मनुष्य । विनयात् पपेतः इति विनयादपेतः अलुक् समास विनयादपेतश्चासौ पुरुप इति विनयादपेतपुरुपः कर्मधारय समास । यहाँ 'सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वात् समासः' इस नियम के अनुसार समास हुमा । यदि 'विनयाद्यपेतः' पाठ रखे तो इसकी आवश्यकता न पड़े। (१२) भाग्यः--माग्य से प्राप्त होने वाली सम्पदामो से । सम्पत्तिको क्षणभंगुर माना गया है-'प्रर्थाः पादरजोपमाः। इसलिए इसका विशेषण 'चल.' दिया। (१३) विस्मितः-धमंडी। विस्मि+क्त (त) । घन आदि का घमंड करना अनुचित है-'मा कुरु धनजनयौवनगवं हरति निमेपात् कालः सर्वम्' । (१४) निभृतम्-शान्त, एकान्त । नि+म+क्त (त)। (१५) प्रामीकरोति-गांव के समान प्रशान्त बना रहा है अर्थात् जैसे गांव का वातावरण प्रशान्त रहता है उसी तरह इस पवित्र एवं शान्तिमय पाश्रम के वातावरण को भी क्षुब्ध कर रहा है । अग्राम ग्रामं करोति इति ग्राम+च्चि/+ लट्-ति, 'कृम्वस्तियोगे सम्पद्यकर्तरि च्विः (प्रमूततद्भाव इति वक्तव्यम्) इत्यनेन चि प्रत्ययः, 'अस्य च्यौ' इति सूत्रेण ग्रामाकारस्य ईत्वम्? यहाँ तात्पर्यार्थ यह है कि जहां उजड्ड लोग वास करते हैं ऐसे गांवों में ही इस प्रकार का व्यवहार करना चाहिये न कि मुनियो के शान्त पाश्रमों में । प्रतएव यह धृष्टता अत्यन्त अनुचित है । इस श्लोक में परिकर और शार्दूलविक्रीडित छद है । "विशेषणयंत्सा कूतरुक्तिः परिकरस्तु सः' अर्थात् अभिप्राययुक्त विशेषणों के द्वारा जो कथन किया जाय वह परिकर अलंकार होता है । तल्लक्षण वृत्तरत्नाकरे--सूर्याश्वमसजा- स्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम् ॥३॥ वासवदत्ता-अय्य! को एसो उस्सारेदि ? [प्रार्य! क एष उत्सार- यति ?]

प्रथमः अंक वासवदत्ता--भार्य ? यह कौन (लोगों को) हटा रहा है ? Vasara-Venerable Sir, who is he that is away (people)? यौगन्धरायणः-भवति ! यो धर्मादात्मानमुत्सारयति । यौगन्धरामण-महारानी! जो अपने को धर्म से हटा रहा है (अर्थात् जो लोगों को यहां से हटा रहा है, वह पाप-मागी होपा) । Youg ladyship whoever keeps himself away from duty. वासवदत्ता-अय्य! ण हि एव्वं वत्तुकामा, अहं वि णाम उस्सार- इदवा होमि ति। [प्रायं ! नावं ववतुकामा, अहमपि नमोत्सारयितव्या भवामीति ।] वासवदत्ता--आर्य ! मैं यह नहीं कहना चाहनी, मेरा मतलब यह है कि क्या में भी हटाई जाऊँगी। Vasava.--Venerable Sir I did not intend that (I meant) whether 1 100 would have really to keep aside. यौगन्धरायणः-भवति ! एवमनि तानि देवतान्यवधूयन्ते । पौगन्धरायण-महारानी ! इस प्रकार विदित न होने पर तो देवताओं का भी अपमान होता है। Youg --Your ladyship unknown deities ate thus disregarded. वासवदता---प्रय ! तह परिस्समो परिखे ण उप्पादेदि, जह असं परिभवो। [प्रार्य! तथा परिश्रमः परिखेदं नोत्पादयति यथायं परिभवः ॥ वासवदत्ता--प्रार्य ! पकान (मुझे) उतना दुःख नहीं दे रही है जितना यह अपमान! vasaya:--Revered Şir, fatigue does not cause as much worry us this insult, टिप्पणो--(२) नझे दातुकामा-इस प्रकार (कहने की मेरी इच्छा नहीं हैं। प्रर्यात् मेरे पूछने का यह तात्पर्य नहीं है कि कौन वह व्यक्ति है जो इस प्रकार एकान शान्त तपोवन में भी लोगों को मार्ग से हटा रहा है और क्या वह इस १. पाठान्तर-विशातानि... ध्यद ।

२२ स्वप्नवासवदत्तम् - अत्याचार का परिणाम जानता है कि नही । मैं तो यह सोच रही हूं कि जब में यात्रा करती थी तब मेरे रक्षक गण मेरी सुविधा के लिये दूसरे लोगों को मार्ग से हटा देते थे आज में भी साधारण लोगो की तरह किसी के मृत्यो द्वारा हटायो जाऊंगी । म यही अपना दुर्दैव आपसे पूछना चाहती हूँ। वक्तुं कामः-प्रमिलापः यस्याः सा वक्तुकामा बहुव्रीहि समास । यहाँ 'लुम्पेदवश्यमः कृत्ये तुंकाममन- सोरपि । समो वा हितततयोमासस्य पचि युपत्रोः' इस कारिका के बल से 'वक्तुम्' का म् लुप्त हो जाता है। (२) नामोत्सारयितव्या भवामीति-क्या मैं भी हटाई जाऊँगी । वासवदत्ता के कहने का तात्पर्य यह है कि महारानी होकर भी मै क्या साधारण व्यक्तियों की भांति अपमानपूर्वक यहाँ से हटाई जाऊँगी। (३) एवम- निर्मातानि देवतान्यवधूयन्ते- -इस प्रकार दिना पहचाने देवता मी फटकारे जाते है । मर्यात देवता की सब उपासना करते हैं और कोई स्वप्न में भी उसका मपमान नही चाहता , परन्तु यदि वह मी अज्ञात वेप में सामने पाये तो उसका अपमान हो जाना माश्चर्य की बात नही है। (४) देवतानि---देवता । देव एव इति देव+ तल (स्वा)+टाप् स्त्रियाम्=देवता; देवता एव देवतम्, देवता+मण (स्वार्थ) तानि देवतानि । (५) प्रवधूयन्ते-तिरस्कृत होते हैं, अपमानित किये जाते हैं। तिरस्क्रियन्ते । प्रव/+लट् (कर्मणि), यक् प्रत्यय । (६) तया परिथमः परिखे नोत्पादयति ययायं परिभवः-यहाँ वासवदता योगन्धरायण से कहती है कि मैं इतनी दूर चलकर माई हूँ। पहले कमी चलने का अभ्यास नहीं था, मतः मुन्ने मारी थकावट है । परन्तु मेरे विचार में यह पकावट इतनी दुःपदायिनी नहीं है जितना यह हटाये जाने का अपमान । हमारे जैसे व्यक्ति के लिए अपमान मस के तुल्य है । प्रतः इस भावी मपमान से मुझे बहा क्लेश हो रहा है । यौगन्धरायणः-भक्तोज्झित एष विषयोऽभवत्या । नात्र चिन्ता पूर्व त्ययाप्यभिमतं गतमेयमासो. साध्यं गमिप्यसि पुनयिंजयेन भतुंः । फालकमेण जगतः परिवर्तमाना चकारपहिस्तरिय गच्छति भाग्यपंक्तिः ॥४॥ -पूर्व स्वया अपि एवं साप्यम् पभिमतं गतम् मामीत् पुनः भ पिन मितिःमाम्यपरितः पापविमासम्मंग परिवर्त. नापमाति ४ . कार्या । कुतः प्राय- प्रथम मंक संस्कृत टीका-पूर्व-पूर्वस्मिन् काले नगर-निवास-समये इत्यर्थः, त्वया अपि--श्रीमत्या अपि, एवम्---ईदृशं, श्लाघ्यं-प्रशंसनीयम्, अभिमतम्- पभीष्टम्, मलं--प्राप्तम्, प्रासीत् । पुनः~-भूयः, भर्तुः-स्वामिनः, विजयेन- राज्यप्राप्तिलक्षणेन जयेन (पूर्वोक्तां दशां) गमिष्यसि-यास्यसि। (यतो हि) जगत:--लोकस्य, भाग्यपंक्ति:--अदृष्टपरम्परा, चकारपक्ति:-चक्रस्य रथा- गस्प पराणाम् नामिगेम्यन्तरालतिकाध्ठखण्डानां पंक्तिः श्रेणिः, इव--- तद्वत्, कालक्रमेण--समयानुसारेण, परिवर्तमाना-भ्रमन्ती, गच्छति--चलति । कविकुलगुरुणा तत्र भवता कालिदासेनायमेव भावः स्वरचितमेषदूते व्यक्त:- कस्यकान्तं सुखमपनत दुःख मेकान्ततो वा, नीचर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण । अपरस्चामिज्ञानशाकुन्तलेतेशोद्वयस्य युगपद्व्यसनोदयाभ्यां लोको नियम्यत इवात्मदशान्तरेषु ।।४।। अय भावः--पूर्व कौशाम्बी-निवासकाले पद्मावती श्य भवती मपि परिजनाचरितसमुचितसमुदाचारपूर्वकं स्वेच्छया गता प्रासीत् । अग्रेऽपि स्वामिनि विजयश्रिया समलकृते सति इत्यमेव गमनसुखमनुभविष्यति । नात्र संदेहः कार्य: यतो हि मनुष्याणां शुमानि अशुमानि च भागपेयानि समय- गत्यनुमार तथव परिवर्तन्ते यया चक्रगतानि प्रराणि क्रमेण उपरि प्रपश्च गच्छन्ति दृश्यन्ते । एतएवास्मिन् विधुरे काले त्वया धैर्य धार्यम् । अपमानाम विभेतब्यम् तथा चोक्तम्-'आत्मानं शोकाम्या शत्रुम्यामिव नार्पयेत् ।' हर्षे शोके च समभावेन वत्तितव्यमिति विशदार्थ: ॥४॥ यौगन्धरायण-महारानी ने इस विषय का उपमोग करके (कार्यवा) छोड़ दिया है । इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए। क्योंकि, पहले पाप भी इसी प्रकार दलाधनीय मनोरथ को प्राप्त करती थी। (अर्थात् इसी तरह राजसी ठाट-बाट से चलती थी।) और पुनः पतिदेव की दिजय होने पर (इसी प्रकार) चलेंगी। (क्योंकि) लोगो का माग्य-चत्रा पहिये के परों की मांति समयानुसार घूमता हुमा चलता है (अर्थात जिस प्रकार रथ के पहिये के परे कमी नोने जाते हैं कभी ऊपर उसी प्रकार मनुष्य का माग्य भी कमी सुख देता है कभी दुःख) ॥४॥ Youg.---This thing has been enjoyed and left by your lady, ship. You should not worry dow, why. Formerly you had enjoyed your (mind's) desires and your husband's triumph will again restore these praise-worthy things स्वप्नवासवदत्तम् to you. For humao fortunes have their rise and fall like the spokes in a revolving wheel. टिप्पणी--(१) भुक्तोज्झितः-भोग लेने के बाद त्यागा हुआ। यहाँ योगन्धरायण के कहने का तात्पर्य यह है कि पहले वासवदत्ता भी इसी प्रकार राजकीय समारोह से चलती थी, जब कि उसके भी मृत्यगण लोगों को रास्ते में हटा दिया करते थे । किन्तु इस समय कार्य-विशेष की सिद्धि के लिए उसने अपने स्वरूप को छिपा कर राजसी ठाट-बाट का परित्याग कर दिया है। प्रतएव उसने जो कार्य स्वेच्छा से किया है, उसमें खेद का अनुभव करना अनुचित है। पूर्व मुक्तः पश्चात् उज्झितः इति विग्रहे 'पूर्वकालकसर्वजरत्पुराणनवकेवला:” इति सूत्रेण समासः । (२) विषयोऽभवत्या--पूज्य आपके द्वारा यह विषय अर्थात् राजसी ठाट-बाट से चलना। भवान् प्रथया भवती के पूर्व भत्रया तत्र का प्रयोग सम्मानसूचक होता है यया तत्र मवान् कालिदासः। राजमहिषी वासवदत्ता के लिए 'भत्रमवती' का प्रयोग किया गया है । त० ए० व० । (३) मात्र चिन्ता कार्या--इस विषय मे चिन्ता नहीं करनी चाहिए। यौगन्धरायण वत्सेश्वरी वामवदता से कहता है कि माप भी पहले इसी राजकीय मर्यादा का पालन करती थी। सेवक लोग पागे-मागे यह घोषणा करते थे कि मार्ग से दूर हटो, महारानी जी भा रही हैं पर इस समय किसी विशेप कार्यसिद्धि के निमित्त आपने वास्तविक स्वरूप को छिपाकर स्वेच्छा से राजसी ठाट-बाट का परित्याग कर किया है इसलिए पापको दुखी नहीं होना चाहिए । (४) श्लाघ्यम्-प्रदांसनीय । (५) भर्तुः विजयन-अपने पति महाराज उदयन के विजय (पुनः वत्सदेश का राज्य प्राप्त फरने। से। (६) अमिमतम्--प्रमोष्ट, मनोरय। अमि/मन्+क्त (त) । (७) परिवर्तमाना-बदलती हुई। परि वत+लट्-शानच् मुक् पागम । (0) धकारपंक्ति:--पहिये की तीलियो की श्रेणी । चक्रस्य परा: तेपा पतिः । ५० तत्प० । (६) भाग्यपक्तिः–माग्यदया। माग्यस्य पंक्तिः प० तत्पुः । (१०) कासमेण-जैसे समय बीतता है उसके भनुमार । बालस्य प्रमेण त. तत्प० । यही तात्पर्य यह है कि मनुष्य को भाग्यदशा परिवर्तनशील है। वह घूमते हुए पहिये के परों के समान रूपर-नीचे मासी-जाती रहती है। उनमें नित्यता नहीं है । वह कमी दुःख देती है तो कभी सुख । इसलिए मनुष्य को जग दुरा पाये तो उसको घयंपूर्वक भोग सेना चाहिये और जय मुग पाये तो उमा 'मी उपमोग कर लेना चाहिए । यही बात पञ्चतन्त्र में रही है-'मुसमाचरितं ।

प्रथम मंक सेव्यं दुःखमापतितं तथा । चक्रवत् परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥ इसी का छायामाव कालिदास के मेघदूत में मिलता है--'कस्यात्यन्तं सुखमपनतं दुःखमेकान्ततो वा । नीचेगच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण'। इस श्लोक में उत्तरा के सामान्य प्रर्य से पूर्वाध के विशेष प्रर्य का समर्थन होने के कारण अर्थान्तरन्यास अलंकार है और वसन्ततिलका छन्द है। तल्लक्षणं काध्यप्रकाशे 'सामान्य वा विशेपो वा तदन्येन समर्म्यते । यत्त सोऽर्थान्तरन्यासः साघम्णेतरेण दा ||-1॥४॥ भटौ--उस्सरह अय्या! उस्सरह । (उत्सरत प्रार्याः । उत्सरत ।] (ततः प्रविशति काञ्चुकीयः) काञ्चुकीयः-सम्भषक ! न खलु न खलुत्सारणा कार्या । पश्य- परिहरतु भवान् नृपापवादं न परुषमामधवासिषु प्रयोज्यम् । नगरपरिभवान्। विमोक्तुमेते वनमभिगम्य मनस्विनो वसन्ति ॥५॥ अन्दय-मवान् नृपापवाद परिहरतु । प्राश्रमवामिषु परुप न प्रयोज्यम् । एते मनस्विनः नगरपरिमवान् विमोक्तुवनम् अभिगम्य वसन्ति ॥५॥ संस्कृत टीका--भवान-सम्मषकः, नृपापवादं नृपस्य (राज्ञः दर्शकस्य) अपवादं-कलङ्क, परिहरतुदूरीकरोतु । पाश्रमवासिष-तपोवनवास्तव्येषु परुपं--कठोरं, न-नहि, प्रयोज्यम्--व्याहर्तव्यम्। (यतो हि। एते-इमे मनस्विनः-महानुभावाः, नगरपरिमवान्--नगरसुलमान अपमानान्, विमोक्तु --निराकर्तु, वनम्--परण्यम्, अभिगम्य-प्रागत्य, वसन्ति-निवास कुर्वन्ति (अयं भावः--उत्सरत, उत्सरत-इत्थेवविध परपवचनं तपस्विजनेषु त्वया न प्रयोक्तव्यम् । यतो ह्येते शान्तचित्ताः तापसाः नगरे सम्भाव्यमानेभ्योऽपमानेभ्य आत्मान मोचयितु तपोवनमधिवमन्ति । अत्रापि चेत् एमिः एतादृशी तिरस्क्रिया लन्या तहि लोका: त्वत्कृतापराधान् राज्ञि समारोप्य त कलययः) ॥५॥ (तदनन्तर कञ्चुको का प्रवेश) कचको-सभपक ! मत हटायो, मत हटायो । देखो, राजा पर कलक न लगने दो। तुम्हें पाश्रम में रहने वालों को कठोर वचन नहीं कहना चाहिए । (क्योंकि) ये महानुभाव नगरो मे होने वाले अपमानो से बचने के लिए वन मे पाकर रह रहे हैं ।।५।। Soldiers-Keep aside, keep aside, gentlemen, keep aside. (Then enter the Chamberlain) Chamberlain-Sambhashaka forbid not their approach forbid it not. See-You should १. पाठान्तर परिमवासि।

स्वप्नवासवदत्तम् remove the king's approach. Nothing harsh 'should be allowed to happen in the case of the dwellers in the hermitage. Those high souled people come to live in the forest to avoid the slights and iDjuries of city life. टिप्पणी--(१) काञ्चुकीयः--निवास का रक्षक, अन्तःपुराध्यक्ष । इसका लक्षण यह है--'मन्तःपुरचरो वृदो विप्रो गुणगणान्वितः सर्वकार्यार्थकुशलः कञ्चुकीत्यभिधीयते ।। अर्थात् अन्तःपुर में विचरण करने वाला, वृद्ध, गुण-समूह से युक्त और सब कार्यों के करने में निपुण ब्राह्मण कंचुकी कहलाता है। मात- गुप्ताचार्य ने काञ्चुकीय का लक्षण किया है-'ये नित्यं सत्त्वसम्पन्नाः कामदोष- विवजिताः । मानविज्ञानकुशलाः कांचुकीयास्तु ते स्मृताः ॥' अर्थात् जो सर्वदा मात्विक गुणों से सम्पन्न, काम भादि दोषों से रहित और ज्ञानविज्ञान में पारगत होते हैं । उन्हें कोचुकीप कहते हैं। 'कञ्चकी भक्तिः भज्यः सेव्योऽस्य' इस अर्थ में कंचक शब्द से 'वेणुकादिम्परछण वाच्यः' इस वात्तिक से छण् प्रत्यय, 'भायनेयी- नीयियः' इत्यादि सूत्र से छ, को ईय् मादेश और मित्त्वात् थादि वृद्धि हुई। यद्यपि प्रसिद्ध पशब्द कचुकी है, किन्तु भास ने कांचुकीय शब्द का प्रयोग किया है। कंचुक शब्द का पर्व है 'चोगा, लम्बा कुर्ता' । उसका धारण करने वाला कंचुकी हुमा । कंचुक+इनि । (२) संभषक- दो सिपाहियों में से एक का नाम । न सल न रास'सल सन्द निश्चयापक पव्यय है । बो 'न' का प्रयोग निषेध की दृढता को मूचित करता हैं । (३) उत्सारणा-हटाना । उत/स+णि+य-मन, टाप् । (४) मपापयारम-राजा की निन्दा । क्योकि तुम्हारे इस अशिष्ट ध्यवहार से लोग सोचेंगे कि यहां का राजा बहुत ही अविवेको है, मन्यपा उसका नौकर शान्त सपस्वियों के प्रति ऐसा कटु वचन नहीं बोलता। (५) परिहरतु- दूर करो। यहाँ प्राप्त काल मे लोट् मकार हुमा है। पर्यात् ममी तुम्हारे इम कार्य में राजा को निन्दा का अवसर उपस्थित ही है, ऐसा समयो । (६) पापम्- पठोर, पट या रूसा वपन । यहाँ विशेषणमात्रप्रयोगः विप्पप्रतिपत्तों इस नियम गे विशेष्य के योष के सिएषेवल विशेषण वा प्रयोग हुपा है । (७) मनस्विनः- उम्प ह्दय या विचार के सोग । प्रशस्तं मनः येषाम् इति विग्रह मनग+विनि 'मायामेपानजोविनिः' इसपनेन । (८) मगरपरिभयान-नगरों में होने यामे परमान । नगरमायमानाः परिमवा: मध्यमपसापरी गमाग, हान् । इस इमोर में पासिंग पवार है पोर पुषितामा पद है । सारा रामे-शामिन तोलापता।' पर्यात हेतु का पाया मका प्रथम अंक पदार्थ रूप में कहना कायलिंग अलंकार होता है । यहाँ पर हेतु का वाक्यार्थ रूप में कथन किया गया है। इस श्लोक में काव्यलिंग अलंकार है और पुष्पिताना छंद है (९) प्राथमवासिय-प्राश्रम में रहने वाले (तपस्वियों) मे। माश्रमे वसन्ति इति पाश्रमवासिनः तेषु । स० तत्पु० । (१०) प्रयोज्यम्-प्रयोग करना चाहिए । (११) विमोक्तुम्-दूर करने के लिए। वि+मुच्+तुमुन् (तुम्) । (१२) अभिगम्य-प्राकर; अमि+गम्+क्त्वा (ल्यप्) । पुष्पिताना का लक्षण वृतरत्नाकर में लिखा है-'अयुजि नयगरेफतो यकारो युजि नजी जरगाश्च पुष्पितामा ॥१॥ उभौ---अय्य ! तह । [आर्य ! तया] (निष्क्रान्ती।) दोनों-प्रार्य ! वैसा ही होगा । (दोनों का प्रस्थान ।) Both-Yes, revered sir, (Both retire) यौगन्धरायणः--हन्त ! सविज्ञानमस्य दर्शनम् । वरसे ! उपसा- वस्तावदेनम् । संस्कृत टीका-हन्त ! हर्षस्य विषयः दिष्ट्या उत्सारणामयं निवृत्तमित्यर्थः । अस्य-काञ्चुकीयस्य, दर्शन--बुद्धिः ज्ञान वा, सविज्ञानं--विज्ञानेन सहित कर्त- व्यविवेकेन युक्तिमिति यावत् (अस्ति । अतएव) वत्से! वासवदत्ते! तावत्-इदा- नीम्, (प्रावाम्) एनम्--काञ्चुकीयम्, उपसविः-समीपे गच्छावः । यौगन्धरायण-~-अहा ! इसकी बुद्धि परिष्कृत है (अर्थात् विवेक से पूर्ण है) । बेटी! हम लोग इसके पास चलें। Youg.--Ha! his inspection (darshan) shows understanding let us then approach him. child. टिप्पणी--(१) हन्त ! हर्ष की बात है ! 'हन्त हऽनुकम्पाया वाक्यारम्भवि- पादयोः इत्यमरः, 1/हन्+त (ोगादिक)। 'हन्त' अव्यय है। यह हर्ष, अनुकम्पा, वाक्य के प्रारम्म मे तथा विषाद में प्रयुक्त होता है। इस सन्दर्भ में हन्त' का प्रयोग 'हप' के अर्थ में हुआ है । हर्ष होने का कारण स्पष्ट है। क्योंकि उत्सारण का भय दूर होने से पद्मावती के सान्निध्य मे रहने का अवसर प्राप्त हो गया है। (२) दर्शनम्--बुद्धि । दृश्यते ज्ञायते तत्त्वम् अनया इति दृश् + ल्युट (करणे)- प्रन । 'दर्शनं नयनस्वप्नवृद्धिधर्मोपलब्धिषु' इति मेदिनी । वत्से !-बेटी। योग- ग्घरायण राजा उदयन का वृद्ध एवम् प्रादरणीय प्रधान मंत्री था। इसलिए उसकी रानी वासवदता को 'बेटी' कहकर सम्बोधित किया तो कोई अनुचित नहीं कहा? ।

स्वप्नवासवदत्तम् जा सकता। (३) सविज्ञानम्-विज्ञानेन कर्तव्याकर्तव्यविवेकेन सहितम् (४) तावदेनमुपसाव:--तावत् +एनम् उपसर्पावः । पहले इसके (काञ्चुकीय के) पास चलें । तावत् अव्यय है। इसका प्रयोग वाक्य की शोमा बढाने के लिए किया गया है । उपसावः-निकट चलें । उप+सप्+लट्-उ०पु० द्वि०१० (५) उपसर्पावः-~-नजदीक चलें। यहां लिडर्थ मे लट्लकार हुआ है । (६) तावन--- यह एक अव्यय है । वाक्य की गोमा बढ़ाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है । तत्-+-डावतु । वासवदत्ता-अय्य ! तह [आर्य ! तथा 1] धाराबरता-आर्य ! ऐसा ही करें। Vasava.-Sir, as you will, यौगन्धरायणः---[उपसृत्य] भोः ! किं कृतेयमुत्सारणा ! यौगन्धरायण-~(निकट जाकर) अजी ! यह हटाना किस लिए है ? Youg.--What is the reason, sir, for this expulsion ? काञ्चुकीयः--भोस्तपस्विन् ! कंचुकी-हे तपस्वी ! Chamberlain-Revered hermit. टिप्पणी (१)-किं कृतेयमुत्सारणा-यह हटाना किसलिए है । किंकृत्या । किसलिए । उत्सारणा हटाना उत्+स+णिच्+युक् (अन)+टाप् (मा):(२) मोस्तपस्विन्--अधिक तपस्या वाले। सम्बोधन है। प्रशस्तं तपः यस्य सः तत्संबुदो। तपस+यिन् । यौगन्धरायण-~[प्रात्मगतम्] तपम्विन्निति गुणवान् खस्वयमालापः । अपरिचयात्तु न लिप्यते मे मनसि । यौगन्धरायण-(मन में) 'तपस्विन्' यह सम्बोधन तो बहुत ही आदरसूचक है । परन्तु इसका परिचय न होने के कारण मुझे जंचता नहीं है । Yoog.-{aside) It is a title ibat signifies much merit yet it falls strangely uran my unaccustomed car. टिप्पणी-(१) प्रात्मगतम्-~-जब वक्ता यह चाहता है कि उसका कयन दूसरों द्वारा न सुना जाय तब यही नाटकार 'मात्मगतम्' या 'स्वगतम्' का प्रयोग प्रयम ग्रंक १६ करता है । इसका लक्षण साहित्यदर्पणकार ने किया है-'अश्राव्यं खलु यद् वस्तु. तदिह स्वगतं मतम्' अर्थात् जो बात सुनने योग्य नहीं होती है, उसे 'स्वगत' (मन में) कहते हैं । इसको 'मात्मगत' मो कहते हैं । इसका उद्देश्य यह होता है कि साथ के अभिनेता उस दात को न सुन सकें, केवल श्रोता ही उसे सुन पावें (२) गुणवान-प्रशस्त गुणो से युक्त, सम्मानसूचक 1 गुण+मतुप् (प्रशसायाम्)। (३) पालाप:-प्राभाषण, सम्बोधन । प्रार+लप्पन (म)। (४) अप- रिचयात्--अभ्यास न होने से । न परिचयः अपरिचयः तस्मात् । हतो पंचमी । (५) न शिलप्यते--न संलगति; जमता नहीं है। श्लिप् धातु दिवादिगणीय परस्मैपदी है । तदनुसार 'श्लिप्यति' प्रयोग होना चाहिए। किन्तु मास ने यहाँ मात्मनेपद का प्रयोग किया है, जिससे पतिसस्कार नामक काव्य-दोष उत्पन्न होता है। कांचुकीयः--भोः! श्रूयताम् । एपा खल गुरुभिरमिहितनामधेय- स्यास्माकं महाराजदर्शकस्य भगिनी पद्मावती नाम । सपा नो महाराजमातरं महादेवीमायमस्यामभिगम्यानुज्ञाता तमभवत्या राजगहमेव यास्यति । तदद्यास्मिन्नाश्रमपदे यासोऽभिप्रेतोऽस्याः । तद्भवन्तः- संस्कृत टीका-मो: । इति यौगन्धरायणस्य सम्बोधनम्, ग्रूपताम्- पाकम्यं ताम्, एषा-इयम्, खलु इति वाक्यालंकारे, गुरुमिः-पूज्यजनैः, पमिहित- नाम्पेयप-पमिहितम् उच्चारितं वृतमिति यावत् नामधेयं नाम यस्य तस्य, अस्माकं---मापनिवासिना, महाराजगंजम्प-दर्शकसनकस्य मगधाधिपतेः,मगिनी --स्वसा, पचायती नाम--पपमावतीति नाम्ना प्रसिद्धा । सा एपा--पप्रावती, न:--अम्मा, महाराजमातर-दर्शकजननी, महादेवीम्,प्रायमस्याम्-~पायम- थासिनीम्, भभिगम्प--मिसिन्या, समवत्या-पूज्यपा (मागा), मनुमाता- (पुना हं गन्तुम्) मादिष्टा, राजगृह व मगधराजधानीमेद, यास्यति- गमिष्यति। तत्-मुस्मात्, पव-पस्मिन् दिवगे, पन्या:-रागामार्याः, वास:--निवसनम्, पस्मिन्, दृश्यमाने, मायमर--माश्रमायाने, पमितः- पनिमतः इपितः इति पावत् । तत्-उस्मात् शरणात्, नयन्त:--पूयं गयें। ( माय:-दरनाम्नीस्मार महाराज मणिनी इचं पद्मावती सोन- मपियसन्याः समाः महादेमाः दानं ला सा भादिष्टा पुनः रामानं - २० स्वप्नवासवदत्तम् गमिष्यति । अस्मात् कारणात् प्रद्य पस्मिन्नेवाश्रमे राजकुमार्या निवासोऽमि. लपितः । प्रतएव भवन्त:-) कंचकी--मगवन् ! सुनिये । ये हमारे महाराज की, जिनका नाम गुरुजनो ने दर्शक रखा है, बहन पद्मावती हैं। ये हमारे प्रभु की माता महादेवी से, जो माधम में रह रही हैं, मिलकर उनकी प्राज्ञा से राजधानी को ही लौट जाएँगी। इसलिए प्राज इनका पड़ाव इसी प्राथम में डाला गया है। अतएव पाप लोग,- Chamberlain-Sir, hear, Padmavati, the sister of our great King, Darshaka, is here, She came to visit the queen-mother. who is a votaress of the hermitage and none, being permitted by her ladyship, she is going to Rajgriha. Therefore to-day she is pleased to stay in this hermitage. Therefore, you. टिप्पणी--(१) गुरुभिः-पिता आदि पूज्य व्यक्तियों द्वारा । 'गुरुमंह- त्याङ्गिरसे पित्रादी' इति हैमः । यहाँ 'पूज्यानां नाम न ग्राह्यम् तथा गुरवो नाम- करणं कुर्वन्ति' इन दोनों प्राचार-सरणियों का निर्देश किया गया है। (२) अभि- हितनामधेयस्य-कहा जाता है नाम जिसका उसको अर्थात् महाराज दर्शक नाम वाले की (भगिनी)1 मिहितं नामधेयं यस्य तस्य । अमि+या+क्त (त)। कर्मणि । (३) महाराजदर्शकस्य--महाराज दर्शक अजातशत्र का पुत्र और बिम्बसार का पौत्र था। महान् + राजा इति महाराजः कर्मधारय समास । 'राजाहः सखिम्पष्टच' से टच प्रत्यय, महाराजश्चासौ दर्शकः इति महाराज- दर्शक: तस्य । (४) माधमस्याम्-पाथमे तिष्ठति या सा प्राथमस्या ताम् माश्रम स्था+क-~टाप् । वृद्धावस्था मोर वैधव्य के कारण दर्शक की माता तपोवन में नियास करती थी। (५) अभिगम्य--वभि+ गम् + ल्यप् मिलकर । (६) अनुजाता-पाना दी हुई। अनु+ज्ञा+मत (त) +टाप् (मा)। (७) राजगृहम् -यह उस समय मगपदेश की राजधानी या। माजकल पटना जिले में प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय के स्थान से थोड़ी दूर पर राजगृह बसा हमा है। (८) प्राधमपदे--प्राथम के स्थान में। 'पदं व्यवसितत्राणस्यान. लक्ष्माधिवस्तुप' इम अमरकोश के प्रमाण से पद शब्द का भयं स्थान होता है। ()अभिप्रेत-पपन्द है। ममि+प्र+इ+क्त () । तोर्योदकानि समिधः कुसुमानि दर्भान् स्वरं बनादुपनयन्तु तपोधनानि । - । - प्रथम प्रक " धर्मप्रिया नृपसुता न हि धर्मपीडा. मिच्छत् तपस्विष कुलव्रतमेतदस्याः ॥६॥ अन्वय--तपोधनानि तीर्थोदकानि समिधः कुसुमानि दनि वनात् स्वरम् उपनयन्तु। हि नृपसुता धर्मप्रिया, तपस्विप धर्मपीडाम् न इच्छेत् एतत् अस्याः कुलवतम् ॥६॥ संस्कृत टोका-तपोधनानि-तपश्चर्यासाधनानि तपःसाधनीमूतान पदार्था- नित्यर्थः, तीर्थोदकानि-जीर्थस्य नद्यादेः उदकानि जलानि, समिध:--हवनीय- काष्ठानि, कुसुमानि--पुष्पाणि, दर्मान--कुशान्, वनात्-अरण्यात्, स्वरम्--- इच्छानुसारम् । उपनयन्तु-मानयन्तु । हि-यस्मात्, नृपसुता-राजकन्या, धर्मप्रिमा-धर्मानुरागिणी, (मस्ति, प्रतएव एपा), तपस्विष-तापसजनेषु, धर्मपीडाम् ~धर्मक्रियाव्याघातम्, न-महि, इच्छेत्-काछन् । एतत्--- तपोविध्नेच्छाराहित्यम्, अस्याः- राजपुत्र्याः कुलवतम्-वंशपरम्परागतो नियमः (विद्यते) । (पय माव-भवन्त: सर्वे तपःसाधकान-तीर्थजलानि, पालाशतरोः काष्ठपण्डानि, पुष्पाणि, कुशान्-इत्यादिपदार्थान् वनात् यथेच्छ समाहरन्तु । यत:इस राजकुमारी धर्मशीला यतते । तपस्विनां नियावाखापे मनागपि विघ्नंग सहते । मुनिजनतपश्चरणामिरमाण तु पस्पाः कुलपरम्परागतयमों वर्तते)॥६॥ मनुपार-तपस्या के साधन-तीर्घ-जल, समिया पुष्प मोर कुश पन से वेरोक-टोक से जायें। राजकुमारी धर्मात्मा है। ये तपस्वियों के पर्म में पापा डालना नहीं चाहती । यह इनके वंश का नियम है ॥६॥ May at your will bring holy waters, faggots, flowers and Darba grass the valuable articles of penance. The princess loves piety and indeed she does not want disturbance in the duty of sages, this is her family vow, टिप्पणी--(१) तपोपमानि-तरसे पनानि तपोषनानि । तपस्या निमित्त दम्प पति पदापं जिनका उपयोग तपस्या के लिए किया जाता है । (तीपोर गानि-तीर्थस्य उपानि--पष्ठी तत्पुरण-तीयं का जम (३) स्वरम्- मनी या मनुशार । स्वस्य पारमनःई: गमनम् इति स्वरः (स्व+ई.) 'स्वादोरेरिणोः' इति पानि पनि । यहाँ पर बियापिरोपन है। एक हितीचा हुई। ( उपनयन्तु-साइमं । यहाँ प्रापना में तो मार हमा है। (१) धर्मप्रिया-जिसे धर्म दिन हो। पर्यः प्रियो यस्याः सा. गोहि समाग में

२२
स्वप्नवासवदत्तम्
'वा प्रियस्य' इस वातिक से प्रिय शब्द का पूर्व प्रयोग विकल्प से होता है । इसीलिए
'धर्मप्रिया' प्रयोग हुमा, अन्यथा 'प्रियधर्मा होता है । (६) धर्मपीडाम्-धर्मस्य
तपोरूपस्य पीडा बाधा। 'पीडा बाधा'. इत्यमरः । (७) इच्छेत्--यहाँ अघीष्ट-
सत्कारपूर्वक व्यापार में विधिलिड लकार हुआ है। (८) एतत्—यहाँ विधेय
की प्रधानता से नपुंसक लिंग हुआ है। इस लोक में कालिंग प्रलंकार है और
बसन्ततिलका छंद है ।।६।।
यौगन्धरायणः--[स्वगतम्] एवम् ! एषा सा मगधराजपुत्री पद्मावती
नाम, या पुष्पकभद्रादिभिरादेशिकरादिप्टा स्वामिनो देवी
भविष्यतीति । ततः,-
संस्कृत टीका-एवम्-इत्थम् काञ्चुकीयेन यथार्थमेवोक्तमिति यावत् ।
एषा सा--इयं सैव, मगवराजपुत्री-मगधेश्वरस्य दुहिता, पद्मावती नाम--
पद्मावतीत्याख्यया प्रसिद्धा या पुष्पकमद्रादिमिः, प्रादेशिकः-देवज्ञः, मादिष्टा--
कथिता, स्वामिन:-अस्माकं प्रमोः उदयनस्य, देवी--भार्या, मविष्यति--
सम्पत्स्यते ।
यौगन्धरायण--(मन मे) ऐसा! यह वही मगधनरेश की कन्या पद्मावती
है, जो पुष्पकमद्र आदि ज्योतिषियो के कथनानुसार महाराज (उदयन) की रानी
होने वाली है। इसी कारण ----
Youg.- (to himself) So this is that Padmawati, the Magadha
princess who was predicted to become the queen of our monarch
by astrologers like Pushpakbhadra and others then :-
टिप्पणी-(१) एवम्-ऐसा । (२) एपा सा--यह वही । (३) मगध.
राजपुत्री-मगधानां राजा मगघराजः तस्य पुत्री। (४) पुष्पकभद्रादिभिः-
पुष्पकमद्र मादि के द्वारा। पुष्पकमद्रः मादियां ते
(५) प्रादेशिक:-मविष्यद्वक्ता सिद्धपुरुष या ज्योतिषी। (६) प्रादेश-ज्योतिः-
पास्त्र का फल । 'ज्योतिःशास्त्रफलं पुराणगणकरादेश इत्युच्यते' (सिद्धान्त-
शिरोमणि) । 'मादेशेन दीव्यन्ति या प्रादेश: शिल्पमेपाम्' इन विग्रहों में मादेश
पसन्द से क्रमशः तिन दीव्यति' वा 'शिल्पम्' मूत्र से टक प्रत्यय मोर उसको इक
पुष्पकमद्रादयः तः।
प्रादेश हमा।
प्रद्वेषो बहुमानो या सङ्कल्पादुपजायते ।
भर्तृ दारामितापित्वावस्यां में महतो स्वता ॥७॥

प्रथम मंक २३ अन्वय--प्रटेषः वा बहुमानः सङ्कल्पात् उपजायते । मतदारामितापित्वात् अस्या में महतो स्वता (अस्ति) ॥७॥ संस्कृत टोका---प्रदेपः-द्वयादिश्यः, वा-अथवा, बहुमानः-प्रत्यादरः, सङ्कल्पात्-मानसात् कर्मणः, उपजायते-उत्पद्यते। मतदारामिलापित्वात-- भर्तुःस्वामिनः उदयनस्य दारा: पली तान अमिलपति इति मतदारामिलापो तस्य भावः तस्मात, मस्यां--पद्मावत्या,मे-मम, महती-गुर्वो, स्वता-मात्मीयता (मस्ति)। (मयं भावः-जनस्य कस्मिश्पित विपये देवाधिक्यं का सम्मानाधिक्य स्वकीयमनोव्यापारादेव उत्पद्यते प्रति यस्य पित्त यादयो मापः सम्पद्यते यदिपये, म तद्भायानुसारेण त प्रवटि वा बहु मन्यते । मतएव पूर्वम् मस्यां पद्मावत्पाम् 'अनुचितोरमारणाप्रतिकेयम्' इति राबल्लात् मम विद्वेषः मासीत् । मयुना तु 'इय में महाराजस्य राजमहिपी मयतु इति सङ्कल्पात् मस्याम मे मद्दती प्रात्मीयता- धुदिः जापते) ॥७॥ अनुवाद-पुणा या सगाव मन के भाव से ही वपन्न होते हैं । (मतएप मपने) स्वामी की पत्नी (बनाने की इच्छा के कारण इस (पद्मावती) में मेरा मारी अपनारन हो रहा है ॥७॥ Liking and dislike are based on motive. On account of my arden desire that she sbould become the wiſe of my lord, 1 fcci next kinship towards her, स्वप्नवासदत्तम् शब्द मात्मीय मर्य का बोधक है--'स्वो ज्ञातावात्मनि स्वं विष्वात्मीये' इत्यमरः । इस शब्द का प्रयोग कालिदास ने भी किया है---'कामी स्वतां पश्यति' । इस पद्य में अर्थान्तरन्यास और काव्यलिंग अलंकार हैं तथा अनुष्टुप् छंद है। इसमें कवि ने एक मनोवैज्ञानिक तथ्य का निरूपण किया है। भिन्न-भिन्न समयो पर एक ही व्यक्ति एक ही वस्तु को अपनी धारणा या मावश्यकता के अनुसार अच्छा या बुरा समझता है। क्योकि योगन्धरायण पहले पद्मावती को मनियो के हटाये जाने की प्रवर्तिका मान कर बुरा समझता था पर बाद में जब उसकी यह धारणा बनी कि इसी पद्मावती का विवाह महाराज उदयन से होगा और इस सम्बन्ध से महाराज को पुनः राज्य-प्राप्ति में सुविधा हो जायगी तो उसके मन में पद्मावती का महत्त्व बढ़ गया ।।७।। वासवदत्ता- स्वगतम् ] राप्रदारिप्रति सुणिग्न भइणिप्रासिणेहो वि मे एत्य संपज्जइ। [ राजदारिकेति श्रुत्वा भगिनिकास्नेहोऽपि मेत्र सम्पद्यते । वासवदत्ता--(मन मे) 'राजकुमारी' यह सुनकर मुझे इसके प्रति बहन का- सा स्नेह भी हो रहा है। Vasava.--(to herself) None that I hear thar this is she, a wave of sisterly affection floods my heart. टिप्पणी-(१) राजदारिका-राजा की पुत्री। दारिका/+णि+ ज्वल-प्रक, टाप, इत्व । (२) भगिनिकास्नेहोऽपि-भगिनी एव भगिनिका, भगिनी+क-टाप, ह्रस्व । तस्याः स्नेहः-मगिनिकास्नेहः । वासवदत्ता और पद्मावती दोनों राजकुमारी थी। इसलिए वासवदत्ता का पद्मावती के प्रति भगिनी तुल्य स्नेह होना स्वामाविक था। यहां मपि शब्द से मत्यन्त सम्मान मूचित होता है। क्योकि दोनों के कुलीन होने के कारण एक दूसरी का सम्मान करना उचित हो पा । (३) सम्पद्यते-होता है। सम्+पद् ( दिवादि )+लट् प्र० पु० ए.२०॥ (ततः प्रविशति पद्मावती सपरियारा चेटी च) घेटो-एदु एदु भट्टिवारिमा, इदं प्रस्समपदं पविसदु । [एतु एतु भत दारिका, इदमाघमपदं प्रविशतु ।]

प्रथम अंक
२५
(अनन्तर परिवार सहित पद्मावती और चेटी का प्रदेश)
दासी--माइये, राजकुमारी जी ! माइये ! इस प्राश्रम में चलें।
(Then enter Padmawati and the maid with retioue.)
Maid--Come on, come on, princess, bere is the hermitage,
please enter,
.
टिप्पणी-(१) सपरिवारा--सखीवर्ग के साथ । परिवारेण सहिता इति
सपरिवारा। परि परितः वारयति इति परिवारः, परिव+पत्र (प्र)।
(२) चेटी--प्रधान परिचारिका, दासी । चिट प्र-चेट+डीप् । यद्यपि
"सपरिवारा' कहने से परिवार के अन्तर्गत दासी भी पा जाती है इसलिए इसका
पृथक उपादान करने की प्रावश्यकता नहीं थी, किन्तु विशिष्ट दासी का बोध
फराने के लिए नाटककार ने इसका प्रयोग किया है, ऐसा फञ्चित् कह सकते
हैं। (३) एतु एतु-माइए पाइए। यहाँ वीप्सा में 'नित्यवोप्सयोः' सूच से
द्वित्व 'हुमा है। इससे मादर सूचित होता है । प्रतएव प्रपोष्ट में लोट् लकार
भी हुआ। (४) भतर्वारिका--राजा की पुत्री । 'राजा मट्टारको देवस्तत्सुता
भर्तृ दारिका' इत्यमरः।
(ततः प्रविशत्युपविष्टा तापसी)
तापसो-सानदं रामदारिपाए स्वागतं राजदारिकायाः ।
(तदनन्तर बैठी हुई तपस्विनी का प्रवेश)
तापसी-राजकुमारी का स्वागत हो।
(Then coter a scated lady-ascetic)
Lady ascetic-Welcome to princess,
थासवदत्ता--स्वगतम्! इथं सा राप्रदारिमाए। अभिनणाणुष्यं
खु से रूयं । [इयं सा रानदारिका । अभिजनानुरूपं सल्यस्या
वासवदता--(मन मे) यह वही राजकुमारी है। इसका सौन्दर्य पुसीनता
पनप ही है।
रूपम् ।

. 1 રદ્દ स्वप्नवासवदत्तम् Vasava.--(To herself).So she is the princess. Her form indeed conforms to her high birtb. टिप्पणी-(१) उपविष्टा-बैठी हुई । उप+विश्+क्त (त)+टाप (प्रा)। यद्यपि आश्रम में राजकुमारी के पधारने पर उचित यह था कि तापसी उठकर उसकी अगवानी करती, किन्तु वह वृद्धा एवं तपः सिद्धा होने के कारण अपना गौरव बनाये रही और बैठे-बैठे ही उसने राजकुमारी का अभिनन्दन किया। (२) अभिजनानुरूपम्-अमिजनस्य-कुलस्य अनुरूपम् योग्यम् । 'सन्ततिर्गोत्र. जननकुलान्यभिजनान्वयो' इत्यमरः । अनुरूपम्-अनुगतं रूपमिति विग्रहे 'अध्ययं विभक्ति'-इत्यादिसूत्रेण अव्ययीमावसमासः । यहां पूरी पंक्ति का तात्पर्य यह है कि जहां पद्मावती का कुल ऊँचा है वहां उसका सौन्दर्य भी बहुत बढ़ा-चढ़ा है। पद्मावती-अय्ये ! बन्दामि ।[प्रायें ! वन्दे ।] पद्मावती-पाय ! प्रणाम करती हूँ। Padmavati-Revered lady, I salute. तापसी-चिरं जीव । पविस जादे ! पविस । तवोयणाणि णाम अदिहिजणस्स समगेहं । [चिरं जीव । प्रविश जाते ! प्रपिश। तपोवनानि नामातिथिजनस्य स्थगेहम् ।] तापसी-चिरजीवी होभो । मामो बेटी ! भाभो ! तपोवन तो प्रतिषियों का अपना पर है। Lady ascetic-Long life be yours. Come in my child, comc in. A visitor is cver welcome to this hermitage. टिप्पणी--(१) प्रयिश प्रविश-मामो मामो। विशेष हर्ष सूचित करने के लिए 'प्रविा' का दो बार प्रयोग हुमा है। कि रागकन्या रूपी विशिष्ट पतिपि का साम होने से तापमी का प्रमुदित होना उचित ही था। (२) नाम-- यह प्रसिद्धार्थक पव्यय है । 'नाम प्राकास्यसम्माष्यकोषोपगमकुत्तने' इत्यमरः। (३) पतिपिजनस्य-अभ्यागत लोगों का । मति गभ्यति बहुकाल न तिष्ठति इति प्रतिपिः, पत+इपिन् । मनु ने कहा है-'एकराव तु निवसन् प्रतिपिः प्राह्मगः स्मृतः । यहाँ मावायं यह है कि सपोदन प्रतिषियों का अपना पर ही होता है । मतः को यहाँ पर माता है, उसका भी यहां की वस्तुओं पर रामान हो भपिरार होता है। पतएव राजकुमारी निःसंकोप प्रवेश ।

प्रपमभंक २७ पद्मावती-भोदु भोटुप्रिये ! विस्सत्यहिह्म । इमिणा ब्रहमाणवणेण अणुग्गहिदह्मि। [भवतु । भवतु । प्रायें ! विश्वस्तास्मि । अनेन बहुमानवचननानुगृहीतास्मि । पदमावती----वस, बम ! प्रायें ! मुझे विश्वास हो गया। (मापक) इस सम्मानसूचयः वचन से मै अनुगृहीत हूं। Padmavati-Revered lady this welcome puts me at my ease. By this address of neat respect I fecl favoured, टिप्पणी-(१) भवतु भवतु यस वग । यहाँ सम्भ्रम मै द्वित्व हुमा है। तापसी के प्रौपचारिक वसनों से पद्मावती को संकोच हो रहा है । इसलिए वह भागे उपचार प्रदर्शन को रोकने के लिए शोधता मे कह बैठती है कि हो गया, हो गया' अर्थात् अव इसकी प्रावश्यकता नहीं है। (२) विश्वस्ता-वि+ श्वम् +7 (1) +टाप् (पा। । निश्चिन्द 'शंकारहित' (३) बदमानवचनेन- अत्यधिक प्रादरसूचक वचन से । बहु+मन्+घन् (प्र) बहुमानः तस्य वचनं तेन करणे तृतीया। वासवदत्ता--(स्वगतम्] ण हि रूवं एक्व, वामा वि ख से महुरा। (नहि रूपमेय, वागपि खल्यस्या मधुरा । यासवदत्ता--(मन मे) फेयल रूप ही नही इसकी वाणी भी मयुर है। Vasas.--( Ta herself ) Not only the form but her address तापसी-भद्दे । इमंदाव भद्दमहस्स भइणिनं कोच्चिरामा ण वरेदि ? भिने! इमां तावत् भद्रमुखस्य भगिनिकां कश्चिद्राला न वरयति? संस्कृत टीका-मद्रे!--कल्पाणि! भद्रमुखस्य-सौम्यदर्शनस्य महाराज- दर्शकस्येत्यर्थः, इमाम्-एताम्, भगिनिका-स्वसारम् तावत् इति वाक्यालंकारे, कश्चित्--कोऽपि, राजा-नरेशः, ननहि, वरपति-विवाहार्य प्रार्थयते (प्रय भाव-~-केनचित् भूपतिना सह महाराजदर्शकमागिन्या: पद्मावत्याः वंदाहिको वार्तालापो न भवति किम्) ? तापसी-शुभे ! क्या कोई राजा महाराज दर्शक की इस बहन (पद्मावती का वरण नहीं करता (मर्थात् किसी के साथ इसके विवाह की चर्चा नहीं चल also is sweet. । . .

स्वप्नवासवदत्तम् Lady-ascetic-Good girl, is there no King that seeks your prince's sister for a bride, टिप्पणी-(१) भद्रे !--यह सम्बोधन चेटी के लिए है। (२) भद्र- मुखस्य-सौम्य प्राकृति वाले । भद्र मुखं यस्य स भद्रमुखः तस्य जिसका मुख कल्याणसूचक हो अर्थात् प्रियदर्शन । साहित्यदर्पणकार ने कहा है-~'सोम्यमद्र- मुखेत्येवमधमैस्तु कुमारकाः अर्थात् निम्नश्रेणी का पात्र किमी राजकुमार को "सौम्प' या 'मद्रमुख' इस प्रकार के शब्दों से सम्बोधित करे । इस नियम के अनुसार तापसी को किस श्रेणी का पात्र माना जाय, यह शोचनीय है। ध्यान रहे कि इससे पूर्व यही तापसी अपनी मान्यता के कारण राजकुमारी के स्वागत के लिए भी उठ कर खडी नहीं होती है । (३) भगिनिकाम्-अनुकम्पिता भगिनी इति भगिनिका ताम्, भगिनी+कन् (अनुकम्पायाम्) टाप् (प्रा) । (४) नवरयति । म० पु० 'ए० ३० । नही चाहता है ? ईप्सार्थक वर् धातु से चौरादिक णिच्+लट्-तिप् । चेटो-प्रत्यि राम्रा पज्जोदो णाम उज्जइणीए । सो दारप्रस्स कारणादो दूदसंपादं करेदि । [अस्ति राजा प्रद्योतो नामोज्ज- यिन्याः । स दारकस्य कारणात् दूतसम्पातं करोति ।] दासी--उज्जैन के राजा प्रद्योत हैं । उन्होंने (अपने पुत्र के वास्ते दूत भेजा है। Maid-There is a King of Ujjain by name Pradyota on behalf of his son he sends ambassadors. टिप्पणी-(१) प्रद्योत-चण्ड महासेन प्रद्योत । यह पांचवी शताब्दी ई० पू० मे मालवा का शक्तिशाली शासक था और यही वासवदत्ता का पिता था। (२) वारकस्य पुत्रस्य (शेष पष्ठी)। (३) कारणात्-हेती पंचमी। (४) दूतसम्पातं-करोति-बार-बार दूत भेजते हैं । दूतस्य सम्पात:-सम्प्रे पणम् । दूत=सन्देश पहुंचाने वाला । 'स्यात् सन्देशहरो दूतः' इत्यमरः । यहाँ मावार्थ यह है कि उज्जैन के राजा प्रद्योत अपने पुत्र के साथ पद्मावती का विवाह- सम्पन्न करना चाहते हैं । प्रद्योत के दो पुत्र ये--गोपालक और पालक । वासवदत्ता-~[प्रात्मगतम्] भोदु भोदु । एसा अप्रत्तणीमा दाणि संवत्ता। भवतु भवतु । ऐषा चात्मीयदानों संवृत्ता।] वासवदत्ता--(मन में) मच्या पन्छा! यह तो भद (मेरो) अपनी हो गई। Vasara(To bersel!) she is now ours indeed.

प्रथम प्रका- २६, टिप्पणी--(१) भवतु भवतु यहाँ हर्षातिरेक मे द्विरुक्ति हुई है। (२) प्रात्मीया-अपनो, स्वकीया । प्रात्मनः इयम् इति भात्मन+छ--ईप, टाप (स्त्रियाम्) । (३) संवत्ता-सम्+ वृत्+क्त (त) टाप् (प्रा)। संजावा-हुई। तापसी-अरे खु इयं प्राइदो इमस्स बहुमाणस्स । उभप्राणि राप्रउलाणि महतराणि त्ति सुणोअदि । [मरे खल्वियमाकृति- रस्य बहुमानस्य । उभे राजकुले महत्तरे इति श्रूयते 13 तापसी--निःसन्देह (पद्मावती का) यह रूप लावण्य इस सम्मान के योग्य है । सुनते हैं कि दोनों राजवंश बड़े ऊचे हैं । Lady ascetic-Her beauty proves her worthy of such honour Both the royal houses are of high fame. टिप्पणी-(१) महा-योग्य । महं+अचू–टाप् (प्रा) (स्त्रियाम्।। (२) खलु-यह निश्चमार्थक अव्यय है । (३) राजकुले--दर्शक का राजवंदा और प्रद्योत का राजवंश । (४) महसरे-अत्यन्त महान् । प्रतिशयेन महती इति महत्तरे महत्+तरम् । यहाँ पहली पक्ति का प्राशय यह है कि पद्गावती का अनिन्द्य सौन्दर्य इतना बढ़ा-चढ़ा है कि इरो प्रतिदाय प्रतापशाली राजा प्रयोग की पुत्रवधू होने का गौरव मिलना ही चाहिए। पद्मावती--अय्य ! कि दिट्टो मुणिजणी अत्ताणं अणुग्गहो ? अभिप्पेदप्पदाणेण तवस्सिजणो उपणिमन्तीअदु दाव को कि एत्य इच्छदिति । [पाय! कि दृष्टो मुनिजन प्रात्मानमनुग्रहीतुम् ? अभिप्रेतप्रदानेन तपस्विजन उपनिमन्त्र्यतां तावत् कः किम.. अच्छतीति । मंस्कृत-टोका-प्राय ! काञ्चुकीय, प्रात्मानम्-माम्, अनुग्रहीतुम्--- कृतायितुम्, मुनिजनः, दृष्ट:--अवलोकितः, किम् ?, अभिप्रेतप्रदानेन- वांछितवस्तुदानेन हेतुना, तपस्विजनः- मुनिजनः, उपनिमन्व्यताम्-अम्पय्यं- ताम् तावत् इति वाक्यालंकारे, (यत्) प्रत्र-अस्मिन् स्याने, कः किम्, इच्छति-~वाछति (प्रय भावः भवता केऽपि मुनयो दृष्टाः, ये मत्तः किञ्चित् गृहीत्वा माम धनगृहीयः ? दृष्टाश्चेत्, तान् स्वस्वाभीप्सितार्यकयने प्रवर्तपतु भवान)। अनुवाद-पद्मावती--प्रापं ! धया भापको ऐसे कोई ऋषि-मुनि दिखाई स्वप्नवासवदत्तम् दिये हैं, जो (कुछ लेकर) मुझे अनुगृहीत करें ? ममोष्ट वस्तु दी जाने की घोषणा करते हुए भाप तपस्वियों से प्रार्थनापूर्वक पूछे कि कौन क्या चाहते हैं । Padmavati (To Chamberlain)-bas any holy anchorite been found, whom I may gratify myself by serving. Let all the ascetics be called near for gifts they desire and enquire "Does any body want any thing po टिप्पणी-(१) प्रात्मानमनुग्रहीतुम्-मुझ पर कृपा करने के लिए । चाकि राजकुमारी सात्त्विक दान देना चाहती है, इसलिए वह इस दान से प्रतिग्रहीता को कृतार्थ न समझ कर स्वयं को कृतकृत्य समझती । सात्त्विक दान का लक्षण गीता में लिखा है-'दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्विकं स्मृतम् ॥ ' (२) 'मभिप्रेतप्रदानेन-प्रमोष्ट वस्तु देने के कारण मभिप्रेत-प्रमि-प्र+इ+क्त (त) कर्मणि तस्य प्रदानेन । यहाँ हेतु में तृतीया हुई । (३) उपनिमंत्र्यताम्-उप+नि+मन्त्र+लोट कर्मणि (प्र. पु० ए० द०)। (४) तावत्---अव्यय । इसका प्रयोग वाक्य-शोमावर्धक है । काञ्चुकीयः-यदभिप्रेतं भवत्या । भो भो प्राश्रमवासिनस्तपस्विनः ! शृण्वन्तु शृण्वन्तु भवन्तः इहात्रभवती मगधराजपुत्री अनेन विश्रम्भणोत्पादितवित्रम्भा धर्मार्थमनोपनिमन्त्रयते । संस्कृत टीका-भवत्या-राजकुमार्या, यत्, अमिप्रेतम्-इष्टम् । शृण्वन्तु -~-आकर्णयन्तु, भवन्तः–श्रीमन्तः । इह--पत्र, अत्रभवती-~माननीया, मगध- राजपुत्री--मगधेश्वरकुमारी, प्रमेन-एतेन तापस्या प्रदर्शितेनेति यावत्, 'विसम्मेण--स्वागतोपचाररूपविश्वासेन, उत्पादितविसम्मा--जनितविश्वासा, (मूत्वा), धर्मार्थम्-पुण्याय, अर्थेन-द्रव्येण (हेतुना), उपनिमन्त्रयते-पायते (भवतः) (अयं मावः-तापसीकृतेन सत्कारेण समुत्पन्नविश्वासा भान्या मगध- राजकुमारी पुण्यकामाय भवद्भ्यः तपोवनेम्यः भवदमिलपितवस्तूनि दित्सति । 'मतो भवन्तः कृपया स्वस्वाभिलाष प्रकटयन्तु) । कचुकी-आपकी जो इच्छा । हे आश्रमनिवासी मुनिवृन्द ! आप लोग (कृपा करके) सुनें । यहां माननीय मगधराजकुमारी अपने स्वागत से सन्तुष्ट होकर पुण्य की कामना से आप लोगो को दान देने के लिए बुला रही हैं। Chamberlain-It shall be as your ladyship desires. Oh! • residing in this hermitage, listen, Padmavati, the royal प्रथम अंक - maid of Magadh, gratified by the reception here is inviting you, to receive gifts (from her) in a religious fargers, टिप्पणी--(१) यदभिप्रेतम्-जसी इच्छा । पत् मोर तत् शब्द बुद्धिस्थ- परामर्शक होते हैं। अर्थात् तत् शब्दघटित वाश्य यत् शब्दघटित वाक्यान्तर की प्राकांक्षा रखता है और तत् शब्दघटित वाक्य यत् शब्दघटित वाक्यान्तर की। इस नियम के अनुसार यहाँ तद्विधीपते गया इस धावय का अध्याहार किया जायगा। फलतः अर्थ होगा-'आपकी इच्छा के अनुसार में करूगा । (२) विनम्भेण-- विश्वास में । समौ विसम्मविश्वासी इत्यमरः। (३) पर्पि-पुण्य के लिए। धर्माय इदम् इति धर्मार्थम् मयरव्यंसकादित्वात् नित्यसमास । 'प्रविग्रहो नित्य- समासः अस्वपदविग्रहो या' । (४)मन--पन से । 'अर्कोऽभिपेपरवस्तुप्रयोजन- निवृतिपु' इत्यमरः। कस्याः फलशेन को मुगपते वासो ययानिश्चतं दीक्षां पारितवान् किमिच्छति पुनदेयं गुरोपंद्रयेत् ॥ प्रात्मानप्रहमिच्छतोह नृपजा धर्माभिरामप्रिया यद्यस्यास्ति समीप्सितं यदतु तत् कस्याद्य किं दीयताम् ॥८॥ अन्वय-कस्य कलशेन अर्पः? कः वासः मृगयते ? पुनः ययानिधित दीको पारितवान् (क:) किम् इच्छति, यत् गुरोः देयं मवेत् । धर्माभिरामप्रिया नुपजा इह प्रात्मानुग्रहम् इच्छति । यस्य पत् समीप्मितम् पस्ति तत् वदतु, भय कस्य किम् दीयताम् ॥८॥ संस्कृत टीका-स्य-तपस्विनः, कलशन--ताम्रादिघटेन कमण्डल्यादिना पात्रणेति यावत्, पर्षः प्रपोजनम्, (विद्यते) ? यः, यामः--यात्र' मृगयते मन्यिप्यति पान्तीत्पर्यः पुनः--भूयः, यपानिश्चितं-यथासंकल्पितं, मीसा- महाधर्षपूर्वक वेदामपनव्रतं, पारितवान् समापितवान्, (क:) विद-वस्तुपिषम् इन्छतियादति, यत्-वस्तु, गुरोः प्रापार्यपस्य, देयं--दातम्यं, भवेत्- स्मात् ? धर्माभिरामप्रिया--पर्म मनिरामः अभिविः येषां ते पर्मामि- रामा:-तपस्विनः ते प्रिपाः मस्या: मा, नाना--राजामा, रह-पस्मिन् पापमपर, पारमागपहन-पामतः सायंताम्, इनि-अभिमान। पन्य-- तपस्विनः पत्-वस्तु. गमीणिाम्-समीटम्, पस्ति-दिपते, तत्-म्न, पशु-पपा, पा~-अस्मिन् दियो, पप-तपम्बिनः, रिया दोरा-समताम् ? (पर्ष मायः-१० माय रामकुमारी पानो मापी ३२ स्वप्नवासवदत्तम् तपस्विनाम मावश्यकानि वस्तूंनि दातुमिच्छति । प्रतएव यः तपस्वी कमण्डल्वादि पात्रं वांयति स निःशंकमागत्य गृह्णातु । यः वस्त्रमिच्छति स तत् लमैत। य: गुरुगृहवासपूर्वक वेदाध्ययनव्रतं समापितवान् स गुरवे देयां दक्षिणामपि प्राप्नुयात् । भवत्सु प्रीति कुर्वाणा राजकुमारी भवद्भ्यः दानानि दत्त्वा प्रात्मनः कृतार्यतां कामयते । प्रतएव भवन्तः सर्वे स्वस्वामिलपित प्रकाशयन्तु माज्ञापयन्तु च अनया कस्मै कि देयमिति) ॥८॥ किसे जलपात्र की मावश्यकता है । कौन वस्त्र खोज रहा है ? और नियम के अनुसार पढाई को पूरा कर लेने वाला क्या चाहता है, जो (उसे) गुरु को देना हो । धर्म में मानन्द लेने वालों से प्रेम करने वाली राजकुमारी इस तपोवन मे अपने ऊपर (पापकी) कृपा चाहती हैं । (प्रतएव) जिसको जो प्रमीप्ट हो, वह बताएं कि प्राज किसको क्या दिया जाय ॥८॥ Who lacks the hermit's bowl or who requires the russet that this rule prescribes ? Does any one want to make a present to his preceptor after having fulfiled the investiture the princess devoted to the lovers of duty desires favours to herself. Therefore say whatever is desired, what should be given today and to whom? टिप्पणी--(१) कलशेन-घड़े अथवा जलपात्र से । फल भी हेतु माना जाता है इसलिए यहाँ 'अध्ययनेन वसति' की तरह हेतु मे तृतीया हुई । (२) अर्थः-- प्रयोजन । अर्थात् किसको जलपात्र को आवश्यकता है। (३) यथानिश्चितम् - निश्चय एव निश्चितम्, भाव में क्त प्रत्यय । निश्चय निर्धारण या संकल्प । निश्चितम् अनतिक्रम्य इति ययानिश्चितम्, पथार्थ में अव्यमीभाव समास । (४) दीक्षाम्-वेदाध्ययन कर्म । दीक्ष+ {गुरोश्च हलः इति सूत्रेण)+ टाप् । (५) पारितवान--समाप्त किया हुआ। पार तीरकर्मसमाप्ती धातु से क्तवतु प्रत्यय । (६) गरोः देयम्--गुरु को देने योग्य । यहाँ 'राज्ञः करं ददाति' की मांति सम्बन्ध सामान्यमात्र की विवक्षा मे षष्ठी हुई। पहले स्नातक अध्ययन- समाप्ति के पश्चात् गुरु को अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा देता था-स्नास्यस्तु गुरुणाज्ञप्तः शक्त्या गुर्वर्थमाहरेत्' इति मनुः । दक्षिणा का विधान तो यहाँ तक है कि यदि न कुछ हो सके तो एक नारियल पा एक जोड़ा यज्ञोपवीत ही गुरु को समर्पित कर दे। (७) इह-इस वन मे मथवा इस दान के वितरण के विषय में । (८) मात्मानुपह-अपने प्रति की गई कृपा न कि दानग्रहीता के प्रति ।

प्रथम मंक राजकुमारी पद्मावती की यह मावना कि दान ग्रहण करने से ग्रहीता द्वारा दाता उपकृत होता है उसकी निष्कपट एवं शुद्ध दानशीलता को द्योतक है । () पर्माभि- रामप्रिया-धर्म में रुचि रखने वालों से प्रीति करने वाली अथवा स्वयं धर्म में रुचि रखने के इच्छुक भयवा धर्म मे रुचि रसने के कारण सबको प्रिय । धर्म अभिरमन्ते इति धर्माभिरामा: ते प्रियाः यस्याः सा यद्वा एमें भमि- राम: धर्माभिरामः सः प्रियः यस्याः सा घाभिरामप्रिया । (१०) यद् यस्यास्ति समोप्सितम्-जिसकी जो इच्छा हो । यहाँ 'मतिबुदिपूजाम्पश्च' सूत्र मे 'यस्य' में पष्ठी हुई (११) समौप्सितम्-सम्/भाप+सन्+मा । (त) माये । इच्छिन । यहाँ विरोप 'वस्तु' छिपा हुमा है । "विरोप्योपपती विशेषणमात्रप्रयोग:' से यहां केवल 'समीप्सितम्' विशेषण ही प्रयुक्त हुमा है । (१२) दीयताम्--दिया जाप । दा+लोट् कर्मणि प्र. पु० ए० य० । यह पार्दूलविक्रीडित छंद है 10 योगापरायणः- हन्त ! दृष्ट उपायः। (प्रकाशम्) भोः प्रमों । पौगन्धरायणः--पहा 1 उपाय मूल गया । (प्रकट ) भजी ! मैं प्रार्थी हूँ। Youg-Oh ! a way is found out loudly ) Sir, I am a supplicant. टिप्पणी हन्त । यह प्रत्यय है। इसमा मयं हवं होता है 'हन्त ह- नुवमाया यापारमविपारयोः इस्मरः । उरः पुस्ति, मागं । गम्मने अनेन स्पाय: उप पर+पर (२) प्रशसम-गुना कर। मरा माण पहले 'मारमगतम्' के शाप पतापा ना पुरा है। वहाँ 'प्रायम्' पहला दार स्वगर' ही है यह पति से गिर होता है । (३) पों-पापा । प: प्रमोशनम् प्रस्ति मस्त पनि पर्षा, पर्य+शनि । पायो-विट्ठमा राहतं में तयोरणाभिगमणं । [दिष्ट्या सफर्म में तपोयनाभिगमनम् । परमानी-मार मे तोरा मेरा पाना सरमामा । Padmatati-O Joy I my journey to this hermitage has bet been in vain. पिमो-रिमा-गोरायगे। रहवापी पर है। स्मिा ३४ स्वप्नवासवदत्तम् समुपजोपं चेत्यानन्दे' इत्यमरः । पद्मावती को हर्ष इसलिए हुमा कि तपोवन में याचक का मिलना कठिन था। तापसी-संतुठ्ठतवस्सिजणं इदं अस्समपदं । अामन्तुएण इमिणा होदव्वं । [सन्तुष्टतपस्विजनमिदमाश्रमपदम् । आगन्तुकेनानेन भवितव्यम् । तापसी-इस माधम के समी तपस्वी सन्तुष्ट हैं, यह कोई प्रागंतुक होगा । Lady ascetic-In this hermitage all the sages are satisfied. This must be some outsider. टिप्पणी--(१) संतुष्टतपस्विजनम् जहाँ सबके सब तपस्वी सन्तुष्ट हों ऐसा । सन्तुष्टः तपस्विजनः यस्मिन् तत् तथाविधम् । (२) प्रागंतुकेन-नवागत, अजनबी । आगच्छति इति मागन्तुः, मा/गम्/तुन सितनिगमि' इत्युणादिसूत्रेण, मागन्तुरेव आगन्तुः, प्रागन्तु+क। (३) भवितव्यम् भू+तव्यत् (भावे)। फाञ्चकीयः--भोः ! कि क्रियताम् ? कचुकी-अजी, क्या चाहते हैं ? Chamberlain-Sir, what should be done for you. यौगन्धरायणः-इयं मे स्वसा । प्रोषितभर्तृ कामिमामिच्छाम्यत्र- भवत्या कञ्चित् कालं परिपाल्यमानाम् । कुतः- संस्कृत टोका--इयं-मत्समीपवतिनी, मे-मम, स्वसा-भगिनी (अस्ति)। प्रोपितभत काम्-प्रोषित: विदेश गतः मर्ता पतिः यस्याः ता तथाभूताम्, अत्रभवत्या-मान्यया मगघेशकुमार्या, कञ्चित्कालं-किञ्चित्कालपर्यन्तं, परिपाल्यमाना--परिरक्ष्यमाणाम्, इच्छामि--वाद्यामि । कुतः- यस्मात् कारणात्। (अयं भाव.--अस्याः मे स्वसुः पतिः विदेश गतोऽस्ति । तम् मन्विष्य यावदहं प्रत्यानयामि तावत्कालपर्यन्तं मान्या पद्मावती इमा परिपालयतु-इत्येव मम याचना ।) अनुवाद-यौगन्धरायण--यह मेरी बहन है । इसके पति परदेश गये हुए हैं । इसलिए मैं चाहता हूँ कि कुछ समय तक माननीय राजकुमारी जी इसको अपनी देख-रेख में रखें। Youg.--Here is my sister. I desire that your ladyship should look after her, as her husband has gone abroad, why.

प्रथम अंक टिप्पणी-1१) स्वसा-बहन । 'स्वसारमादाय विदर्भनाथः' रघुवंश । सु/प्रस्+ऋन् । (२) प्रोषितभत काम्--वह स्त्री जिसका पति परदेश गया हो । साहित्यदर्पणकार ने इसका लक्षण किया है-'नाताकार्यवशावस्या दूरदेश गतः पतिः । सा मनोमवदुःखार्ता भवेत् प्रोपितमतका ॥' प्रोपितो मर्ता यस्याः ताम् बहुव्रीहिसमासे कृते 'नतश्च' इत्यनेन का ततष्टाप् । प्रोषितः-प्र/वस्+क्त (त); 'वसतिअघोरिट्' इति सूत्रेण इडागमः, यजादित्वात् सम्प्रसारणं च । (३) कञ्चित्कालम्-कुछ समय तक । यहां 'कालाघ्वनोरत्यन्तसंयोगे' से द्वितीया हुई । (४) परिपाल्यमानाम् सुरक्षित । परि पाल-णिच्+लट् (कमणि)- शानन्, यक, मुमागम । कार्य नेवार्थेनापि भौगर्न वस्ननहिं कापायं वृत्तिहेतोः प्रपन्नः । घोरा कन्येयं दृष्टधर्मप्रचारा शक्ता चारित्रं रक्षितुं में भगिन्याः ॥६॥ मन्वयन एव प्रथैः, न अपि मोगः, न वस्त्रः (मम) कार्यम् (मस्ति)। म अहं वृत्तिहेतोः कापायं प्रपन्नः । इयं कन्या दृष्टधर्मप्रचारा धीरा (मस्ति मतः) भगिन्या: चारित्रं रक्षितुं शक्ना (अस्ति) ॥६ संस्कृत टीका-न एव-नहि एव, अर्थ:-धनः, न अपि भोग:--भोग्य- वस्तुमिरपि न, न वस्त्र:-न वासोमिः, (मम) कार्यम्--प्रयोजनम् (अस्ति), न महं-न योगन्धरायणः, वृत्तिहेतो:--जीविकार्यम्, कापायं-गरिकर वस्त्र सन्यासमिति यावत् प्रपन्ना--स्वीकृतवान् । इयं--पुरो दृश्यमाना, कन्या- कुमारी, दृष्टधर्मप्रचारा-दृष्टः अवलोकितः धर्मप्रचार:-धर्माचरणं यस्याः सा, पोरा-पण्डिता मनस्विनीत्ययः (प्रस्ति पतः) मे-मम, मगिन्याः- चारित्रं-चरित्रं सतीत्वमिति यावत्, रक्षितु-पालयितु, राता- समर्था (धर्तते) । (पयं भाव.--योगन्धरायणः काञ्चुकीयं कथयति-मम धनः वस्त्रः भोग्यपदार्पश्च प्रयोजन नास्ति । महं जीविका प्रवज्यां न गृहीत. पानस्मि । इय राजकुमारी धर्माचरणशीला विदुषी च यतते । प्रतः मम भगिन्याः चरित्र रक्षितु समर्या भवेदिति में परो विश्वासः) | अनुवाद-न तो पन-सम्मति मे, न सामारिक सुमों से और न वस्त्रों मे ही (मुझे कोई) प्रयोजन है । न मने पानीपिका के लिए गेरुमा वस्त्र धारण किया है। यह राजकुमारी धर्मात्मा तथा विदुपी हैं। मेरी बहन के परित की रसा कर सकती हैं (मतएव मेरी प्रार्थना स्वीकार करें) TELL स्वमुः स्वप्नवासवदत्तम् I have no need of money, clothes, or chattells. It's not to gain a carniog, that I wear these ocbre garments. This wise lady knowing the path of duty will be able to guard the chastity of my sister. - टिप्पणी--(१) अर्थः, भोगः, वस्त्र:-यहाँ फल को मी हेतु मानकर हेतु मे तृतीया हुई है । (२) कापायम्--कपायेण रक्तम् इति कापायम्, कपाय + प्रण 'तेन रक्तं रागात्' इत्यनेन । इसका अभिधेय अर्थ है--गेरुमा रंग में रंगा हुमा । पर लाक्षणिक अर्थ होगा--गेरुआ वस्त्र, संन्यास जीवन । यहाँ यौगन्धरायण के कहने का भाव यह है कि उसने जीविका के लिए गेरुमा वस्त्र धारण नहीं किया है । वह तो त्यागी है और वैराग्य के कारण इस रूप को धारण किया है। प्रतः उसे वस्त्र और भोग यादि की चाह नहीं है। वह तो केवल अपनी बहन को ही राजकुमारी के पास सुरक्षित रखना चाहता है । (३) वृत्तिहेतोः--जीविका के लिए। वृत्तिः जीविका तस्याः हेतुः तस्य । (४) प्रपन्नः---ग्रहण किया। प्र+पद्+क्त (त) । (५) धीरा-विदुषी । 'घोरो मनीषी श: प्राज्ञः संख्यावान् पण्डितः कविः' इत्यमरः । (६) दृष्टधर्मप्रचारा-जिसका धर्माचरण देखा गया हैं अर्थात् धर्म-कर्म मे निरत रहने वाली । (७) चरित्रम्--चर्यते अनेन इति चरित्रम्, च+इत्र 'अतिलघूसूखनसहचर इत्रः' इत्यनेन । चरित्रमेव चारित्रम्, चरित्र+अण् स्वार्थे । यहाँ तात्पर्य यह है कि जो स्वय चरित्रवान् और धर्मपरायण है वही दूसरे के चरित्र और धर्म की रक्षा कर सकता है । पद्मावती ने अभी-अभी अपनी धार्मिक वृत्ति का परिचय दिया है । अतः यौगन्धरायण को उससे पूरी माशा है कि वह उसकी बहन के चरित्र की रक्षा कर सकेगी। इसी कारण वह पद्मावती के हाथ अपनी बहन को थाती रखना चाहता है । इस श्लोक मे पद्मावती की न्यासरक्षणयोग्यता का समर्थन होने के कारण अर्थान्तरन्यास प्रलं. कार है भोर वैश्वदेवी नामक छन्द है। इसका लक्षण है--'पञ्चाश्वैश्छिन्ना वैश्वदेवी ममी यो ॥६॥ वासवदत्ता--[आत्मगतम्] हं,' इह में णिक्विविदुकामो अय्य. योगन्धरायणो । होदु, अविनारिन कम ण करिस्सदि। [हम्, इह मां निक्षेप्तुकाम प्रार्ययोगन्धरायणः। भवतु, अविचार्य क्रम न करिष्यति । १. हा। २. अच्यो इति केवलम। २.स मवि ।

प्रथम मंक ३७ वासवदत्ता--(मन में) उंह, प्रायं योगन्धरायण मुझे यही सौंपना चाहते हैं । प्रस्तु, विना विचारे वे कोई काम नही करेंगे। . Vasav.—(To Herself) Humph; The revered Yougandharayan wishes to entrust me to her care. Well ! he will do nothing without due thought. टिप्पणी--(१) हम्---यह वेदनासूचक अव्यय है। (२) इह-पद्मावती के पास । (३) निक्षेप्तुकामः-धरोहर रखने को इच्छुक । निक्षेप्तुं कामो यस्य स निक्षेप्तुकामः । यहां 'तुकाममनसोरपि' इस कारिका के बल से 'निक्षेप्तुम्' में 'म्' का लोप हो जाता है । (४) अविचार्य क्रमं न करिष्यति-बिना सोचे- समझे कदम नहीं उठायेंगे। क्रमम् पादविन्यासम् । काञ्चुकीयः-भवति ! महती खल्वस्य व्यपाश्रयणा । कयं प्रति- जानीमः । ? कुतः- मंस्कृत टीका-मवति ! --माननीये !, मस्य-योगन्धरायणस्य, घ्यपा- श्रयणा--माश्रययाचना, खल---निश्चयेन, महती-गर्वी (मस्ति)। कथ--केन प्रकारेण, प्रतिजानीमः ? पुनः-यत:--- अनुवाद--कंचुकी-राजकुमारी जी ! इमकी मायय-प्रार्थना बहुत बडो अर्थात् कठिन है । हम कमे स्वीकार करें ? पोकि-- Chamberlain-Your ladyship, his expectation seems very high. How can we promise ? because ! टिप्पणी-(१) प्यपाश्रयणा--प्राधय-प्राप्ति की इच्छा । वि-प्रप-प्रा। विनयच् (बाहुलकात्)-मन, टाप् । यहाँ कंचुकी कहना चाहता है कि इसकी प्रार्थना को स्वीकार करना टेढ़ी सीर है । क्योंकि पहले तो न्याम की रक्षा ही दुष्कर होती है, फिर यह तो विचित्र न्यास है। यह सड़को है भोर रूपवती मो। इसके परित्र का भी पता नहीं है । वही ऐसा न हो कि विपत्ति में फेम जाये। मतएव इमकी अभिलाषा पूर्ण करना दुःमान्य है । सुलमर्यो भवेद् दातु सुखं प्राणा. सुखं तपः । मुसमन्यद् भवेत् सर्व दुःख ग्यासस्य रक्षणम् ॥१०॥ मन्वप-पर्यादातु पुस मवेत् प्राणा: मुगम् तपः गुम्बम् मन्यत्मवंम् मुखं भवेत् न्यासस्य रसाप दुपम् ।।१०।।

. . स्वप्नवासवदत्तम् संस्कृत टीका--अर्थः-धनम्, दातुं समर्पयितुम्, सुखम् अनायासं, भवेत्-स्यात्, प्राणा:--असवः, (दातुं सुखम्) तपः--तपस्या तपःफलमिति यावत् (दातुं सुखम्) मन्यत्--इतरत्, सर्व-सकलं, सुखं--मुकर, भवेत् (किन्तु) न्यासस्य-निक्षेपस्य, रक्षणं-धारणं, दुःख-दुष्करम् (अयं भाव:-धनप्राण- तपःफलादीनां दानं सुकरं मवति किन्तु न्यासस्य रक्षणं सर्वथा दुष्करमेव । अतएव यौगन्धरायणस्य अमिलापपूरणम् अस्माभिः अशक्यमस्ति) ॥१०॥ अनुवाद-धन देना आसान है । प्राण, तपस्या का फल और सब कुछ दे देना सरल है; किन्तु अमानत की रक्षा करना कठिन है ॥१०॥ It is easy to give away wealth, life or even (power of) penatce. All other things are easy (but) to keep a trust safe is difficult. टिप्पणी--(१) दातु भवेत्--दातुम्-दान । 'तुम्' प्रत्यय यहां भाव मे हुआ है अतः इसका अर्थ होगा 'दानम्' अर्थात् धन देना। यहाँ 'शकषज्ञाग्लाघट- रमलभक्रमसहास्त्यिर्थेषु तुमुन्' सूत्र से अस्त्यर्थ मे तुमुन् प्रत्यय हुआ।(२) प्राणाः- 'सि मूम्न्यसवः प्राणाः' इस कोश-वाक्य के प्रामाण्य से 'प्राण' शब्द का प्रयोग पुंल्लिंग और बहुवचन में ही होता है । (३) ग्यासस्य-धरोहर का। (४) दुःखम्--दुष्करम्, कठिन । इस श्लोक मे अर्थान्तरन्यास अलंकार है, क्योकि 'सब कुछ देना सरल है' इस सामान्य का समर्थन 'न्यासरक्षण कठिन है विशेष से होता है।) और अनुष्टुप् छन्द है ॥१०॥ पद्मावतो-अय्य, पढमं उग्घोसिन को कि 'इच्छदित्ति अजुतं दाणि विआरिदुंज एसोभणादि, तं अणुचिट्ठदु अथ्यो । प्राय ! प्रथममुद्घोष्य कः किमिच्छतीत्ययुक्तमिदानी विचारयितुम् । यदेष भणति, तदनुतिष्ठत्वार्यः । अनुवाद-पद्मावती-आर्य ! पहले यह घोषणा करके कि कौन क्या चाहता है, अब उसमे आगा-पीछा करना अनुचित है । ये जो कहते हैं, उसे आप करें। Padmavti-Having proclaimed that all might ask a bood, It is not proper to hesitate pray, therefore, see that this man desires is done. टिप्पणी--१) उद्घोष्य--'कस्यार्यः कलशेन' इत्यादि द्वारा 'किसकी क्या १. एत्य इच्छ० (प्रत्र इच्छ०)। २. प्राणवेदि (प्राज्ञापयति)।

प्रथम मंक अभिलाषा है, वह निःसंकोच प्रकट करें इस प्रकार घोषणा करके । उत्Vघ+ णिच्+क्त्वा-त्यप् । (२) अनुतिष्ठतु -सम्पन्न करें। काञ्चुकीयः-अनुरूपमेतद् भवत्याहितम् । कंचुकी -यह मापने समीचीन कहा। Chamberlaia-Your ladyship has said the proper thing. टिप्पणी--(१) अनुरूपम्-उचित अर्थात् कुल, शील मादि के योग्य । अनुगतं रूपमिति अनुरूपम्, 'अव्ययं विमक्ति--इत्यादिसूत्रेण भव्ययीमावसमासः । चेटी-चिरं जीवदु भट्टिदारिया एवं सच्चवादिणी चिरं जीवतु भदारिफवं सत्यवादिनी ।] दासी~-इस प्रकार सत्य लोलने वाली राजकुमारी चिरकाल तक जीएँ। Mlaid-Long live the princess who thus truly sticks to her word टिप्पणी-(१) सत्यवादिनी-सत्य मापण करने वाली। सत्यं वदितु शील यस्या. सा सत्यवादिनी, सत्य वद्+णिनि-डी (ई)। कचुकी को प्रतिज्ञापालन करने का मादेश देने के कारण पद्मावती के लिए चेटी ने यह विशेषण प्रयुक्त किया है। (२) चिरं जीवतु-दीर्घाय हों। यद्यपि दासी को भाशीर्वाद देने का प्रधिकार नहीं है, किन्तु यह दासी पयावती की सखी के समान थी । अपवा इसने पाशीर्वाद नहीं दिया बल्कि मानन्दातिरेक में माना मानसिक उद्गार प्रकट किया। तापसी-चिरं जीवटु भद्दे ! [चिरं जीयतु महे ।। सापसी-मंगलमयो! (पाप,दीर्घायु हों। Lady ascetic-Long live good girl. काञ्चुकीयः- भवति । तया । (उपगम्य) भोः! अम्युप- गतमत्र भयतो भगिन्याः परिपालनमवमयत्या । हंपुरी-पमा, देवी ! (ममीप जाकर) मगवन् ! माननीया रामारी ने पानी बहन को देशमान करना स्वीयर कर लिया है। Chamberlalo-Your Isdysbip (alright) (Approaching) Sir, ber ladyship bas agreed to be the guardia of yoor siner, स्वप्नवासवदत्तम् यौगन्धरायणः-अनुगृहीतोऽस्मि तत्रभवत्या । वत्से ! उपसर्पात्र- भवतीम्। यौगन्धरायण--राजकुमारी जी ने मुझ पर बड़ी कृपा की। बच्ची ! देवी जी के पास जा। Youg.-I am favoured by the princess. Go, girl, to the lady. वासवदत्ता--[प्रात्मगतम् ] का गई। एसा गच्छामि मंदभामा। [का गतिः एपा गच्छामि मन्दभागा । वासवदत्ता--दूसरा उपाय ही क्या है । मै अमागी अब जाती हूं। Vasar-(Aside) what help ? unhappy that I am, I go. टिप्पणी--(१)भवति-हे माननीय पद्मावती । भवत्+डीप (ई)-मवती। सम्बोधन एकवचन में 'हे भवति' रूप होता है। (२) तथा--ऐसा ही हो। यहाँ 'अस्तु' क्रिया छिपी हुई है । वास्तव मे 'तथास्तु' होना चाहिए । (३) अभ्युप- गतम्-स्वीकार कर लिया गया है अमि+उप+गम्+क्त (त) कर्मणि । (४) अत्रभवतः-पूज्य आपकी (मगिनी) । (५) का गतिःदूसरा उपाय क्या है । अर्थात् पद्मावती को संरक्षकता मे जाने के अतिरिक्त और कोई उपाय नही है । (६) मन्दभागा--मन्दः-अल्पः भागः माग्य यस्याः सा! 'मागो रूप्याके भाग्यकदेशयोः' इति हैमः । यहाँ वासवदत्ता अपने को प्रमागिन इस- लिए कह रही है कि एक तो पति और बन्धु-बान्धवों का वियोग वह सहन कर ही रही थी, अब दूसरा एकमात्र अवलम्बन योगन्धरायण का भी वियोग सहन करना पडेगा, इससे बढकर दुर्भाग्य क्या होगा। पद्मावती-भोदु भोदु । अत्तणीमा दाणि संवुता। [भवतु भवतु । प्रात्मीयेदानी संवृत्ता 1] पद्मावती--अच्छा, अच्छा । अब यह अपनी हो गई। Padmavati-It's well, it's well, Now you are one of us. टिप्पणी--(१) भवतु भवतु-अच्छा अच्छा। यह अव्यय द्विरुक्ति से हर्ष प्रकट हो रहा है। दुःखित वासवदत्ता को पाश्वासन देती हुई पद्मावती कहती है भवतु मवतु मर्यात् मलमलम् खेदेन (दुःख मत करो)। (२) प्रात्मीया-अपनी । पात्मनः इयम् प्रात्मीया। प्रात्मन्+/-ईप । (३) संवृत्ता--हो गई । सम्+वृत्+क्त (त)+टाप् (मा).

प्रथम अंक तापसो---जा ईदिसी से पाइदो, इयं वि रामदारित्ति तक्कमि । या ईदृश्यस्या प्राकृतिः, इयमपि राजदारिकेति तर्कयामि I] तापसी-जब इसकी ऐसो प्राकृति है तो मेरा अनुमान है कि यह मी राज- कुमारी है। Lady ascetic-For this form of hers, I think, she too is a princess. चेटी-सुटु अय्या भणादि । अहं वि अणुहूदसुहत्ति पेक्खामि । [सुष्ठ प्रार्या भणति । अहमपि अनुभूतसुखेति पश्यामि । दासी-प्रार्या ठीक कह रही हैं। मैं भी समझती हूँ कि यह सुख मे पली है। Maid-Rightly says the Madam. I too can see that she has enjoyed prosperity. टिप्पणी-(१) अनुभूतसुखा-जिसने सुख भोगा हो । अनमूतम्-उपमुक्तं सुसंसराजकन्यकोचितमश्वयं यया सा । वासवदत्ता के शरीर की सुकुमारता, रमणीयता मादि देख कर दासी अनुमान करती है कि अवश्य ही यह राजकुल की कन्या है । अनुमत-अनु+म+पत (त) कर्मणि। यौगन्धरायणः--[प्रात्मगतम्] हन्त भोः ! अर्धमसितं भारस्य । यया मन्त्रिभिः सह सथितं, तथा परिणमति । ततः प्रतिष्ठिते स्वामिनि तत्रभवतीमपनयतो मे इहानभवतो मगधराजपुत्री विश्वासस्थान भविष्यति । कुतः-- संस्कृत टोका हन्त मो:-हर्षमूचकमव्ययद्वयम्, भारस्प-उत्तरदायित्व- पूर्णकार्यस्य, मम्मघमागः, प्रसितम्-सम्पन्नम् । मन्त्रिभिः मह-समन्व- दादिमिः सार्क, यपा-यादा, सयित-निर्धारितं, तया-ताश, परिणमति-- फार्य फलति । तत:--तदनन्तरं, प्रतिप्टिते-राज्यसिहासनमघिल्ले, स्वामिनि-- उदयने, तत्रमवतीम्-वागवात्ताम, उपनयतः-स्वामिनो निक्ट प्रापयतः, मे-मम, इहामवदतायाश्चारिभ्यविपये, प्रत्रभवती-माननीया, मगध. राजपुत्री-मगपेश्वरतुहिना पद्मावती, विस्वासस्पानं-विश्वसनीया साक्षिणी, भविष्यति सम्पत्स्यते । (प्रयंमाय:~-महाराजोदयनस्य राज्य विपक्षिण: प्रत्या- हरणीयम् इति संकलपमार भयों मागः वागवतापा: पद्मावतोहस्ते म्यासेन मम पिरसोती। हमवदादिमिः मन्त्रिभिः सह मन्त्रपित्या येन प्रसारण - ४२ स्वप्नवासवदत्तम् कार्य कर्तुम् मवधारितं तेनैव प्रकारेण कार्य फलति । क्रमेण पुनः स्वामिनि स्वराज्य- सिंहासनारूढे तेन सह वासवदत्ता संयोजयिष्यन्नहं तस्याः चारित्र्यशुद्धिविषये पद्मावतीमेव विश्वसनीयां साक्षिणी कर्तुप्रभविष्यामि ।) अनुवाद-न्यौगन्धरायण-(मन में)महा! माघा मार तो उतर गया। मंत्रियों के साथ जैसा निश्चय किया गया था वैसा ही हो रहा है। क्रमश: स्वामी (महाराज उदयन) के राजसिंहासन पर बैठ जाने के पश्चात् जब मै वासवदत्ता को उनके पास ले जाऊँगा तो माननीया मगघराजकुमारी ही इस सम्बन्ध में अर्थात् (वासवदत्ता की चरित्र-शुद्धि के बारे में) साक्षिणी होगी। क्योंकि-- Yodg.–(To himself) so half of my burden is thus discharged. The scheme, - 1... eqer paired is in the high road to success at princess of': take her ladyship (Vasav) in possession. iiow. टिप्पणी--(१) अर्धम्--खंडवाची अर्घ शब्द पुल्लिग है, जैसे--प्रामार्घः, नगराधः । किन्तु समान अंश (भाग) वाची मर्ध शब्द नित्य नपुंसक लिंग है। 'मधं समेऽशके' इत्यमरः। (२) अवसितम्-समाप्त हो गया। 'प्रवसीयते स्म' इस विग्रह मे अब उपसर्गपूर्वक पो अन्तकर्मणि घातु से क्त प्रत्यय होने पर 'यति- स्यतिमास्थामित्ति किति' सूत्र से इत्व हुमा । (३) उपनयतः-निकट ले जाते हुए । उप/नी+लट्--शतृ । यहाँ 'वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा' सूत्र से लट् हुआ है। पद्मावती नरपतमहिषो भवित्री दृष्टा विपत्तिरथ यैः प्रथमं प्रदिष्टा । तत्प्रययात् कृतमिदं न हि सिद्धवाक्या- न्युत्क्रम्य गच्छति विधिः सुपरीक्षितानि ॥११॥ अन्वय-यः प्रथमं विपत्तिः दृष्टा (त:) मथ पद्मावती नरपतेः महिषी पत्नी मवित्री प्रदिप्टा। तत्प्रत्ययात् इदं कृतम् । हि विधिः सुपरीक्षितानि सिद्धवाक्यानि उत्क्रम्य न गच्छति ॥१॥ संस्कृत टोका-य:-पुष्पकमद्रादिमिः सिद्धपुरुषः, प्रथम-पूर्वम्, विपत्तिः- विपत् उदयनस्य राज्यनारा इति यावत्, दृष्टा-भवलोकिता संसूचितेति यावत्, (:)मप-अनन्तरम्, पद्मावती-मगधराजपुत्री, नरपतेः-उदयनस्य, महिषी- प्रथम मंक ४३ पत्नी भवित्री-माविनी, प्रदिष्टा-निगदिता सूचितेति यायत् । तत्प्रत्ययात्-- तेषु सिदेपु प्रययात् विश्वासात्, इदं--पद्मावत्या हस्ते यासवदताया निक्षेपणं, कृत-विहितम् । हि-यस्मात्, विधिः-माग्यम् सुपरीक्षितानि-अनेकया सत्यत्वपरीक्षया वीक्षितानि, सिद्धवाक्यानि--सिद्धपुरुषाणां वचनानि, उत्क्रम्य- उल्लंघ्य, न गच्छति जति । अयं भावः---यैः सिद्धपुरुषः पूर्वम् भस्मन्महा- राजस्योदयनस्य राज्यनाशः उक्तः तरेव पश्चात् पद्मावत्या सह महाराजस्प परिणयोऽपि निगदितः । तेपाम् एका भविष्यवाणी सत्या प्रभूत, अपरापि तय स्यात् इति विश्वासादेव मया पद्मावत्याः सग्निधो न्यारारूपेण वासवदत्ता स्थापिता। विधिरपि सिसोक्तिम् उल्लंघ्य गन्तुं न प्रमवति, अपि तु तदनुसारमेव फल ददाति । तथा राति स्वराजया पद्मावत्या सूच्यमान विरविमुक्ताया अपि धासवदताया: नारियशुद्धिविषयक साक्ष्यं राज्ञो विश्वासमुत्पादयिष्यत्येव ।) ॥११॥ अनुवाद-जिन्होंने पहले (भाने वाली) विपत्ति को बताया था, उन्होंने (ही) पश्चात पदमायती राजा उदयन की पटरानी होंगी यह भविष्यवाणी की थी। उन्हीं में विश्वास के कारण यह धारावदत्ता का सौंपना) किया है। पयोंकि माग्य अच्छी तर परसे हुए सिद्धों के वचनो का उल्लंघन करके नहीं चलता है ॥११॥ That this same Padmavati would be the queen of the lord was declard by those seers, who prophesied our present adverse fortune. I acted from faith in them. Fate does not so beyond the divine oracles which have been tried altcady and found to be true. टिप्पणी-(१) महिपी-पटरानी, पट्टानिपिका महाराणी । 'कृठाभिषेका महिने' इत्यमरः । (२) भवित्री-होने वाली । भूपातु से भविष्यत् के मयं में तच प्रत्यय भौर ऋदन्तत्वात टीप हुपा । (३)प्रविष्टा-कही गई। प्र+दिन+ कर (स) टापू (मा) । (१) प्तरप्रत्यपात-उनमें विश्वास रगने के कारण। संपु प्रत्ययः तत्प्रायः तस्मात् हेतु मे पंचमी विभक्ति का प्रयोग हुमा है। (५) सुपरीक्षितानि~मली नाति पर हुए। (६) सिद्धयारयानि-ऋषिकल प्राप्त पुरुषों के वचन । निदानां वाक्यानि । ५० तत्पु० । (७) उत्कम्प- उलंपन करके, उत्+कम+ल्यप् । परि++(B) कर्मणि)मुष्टपरीशि- सानि । सुरक्षितानि सियापानि का विशेषण है। (८) रकम्प-पति- रमा करके । उत्+म्+स्पर । यहाँ तात्पर्य यह है कि भाग्य मी सिदों की वाणी पगार ही धमता है. क्योंकि ये सोच-विचार कर ही कहते हैं तो वर सिदों ४४ स्वप्नवासवदत्तम् की उदयन की राज्यच्युति रूप एक दात ठीक हो चुकी है तो कोई कारण नहीं है कि उनकी दूसरी बात--पद्मावती उदयन की पटरानी होगी-ठीक न हो। इसलिए पद्मावती के पास वासवदत्ता को थाती रखने में कोई भय नही है, ऐसा योगन्धरायण सोच रहा है। इस श्लोक कायलिंग अलकार और वसन्त- तिलका छन्द है ॥१॥ (ततः प्रविशति ब्रह्मचारी) ब्रह्मचारी--[ऊर्ध्वमवलोक्य] स्थितो मध्याह्नः । दृढमस्मि परि- श्रान्तः। अथ कस्मिन् प्रदेशे विधमयिष्ये ? [परिक्रम्य] भवतु, दृष्टम् । अभितस्तपोवनेन भवितव्यम् । तथाहि- संस्कृत टीका--ऊर्ध्वम्-उपरि, अवलोक्य-दृष्ट्वा, मध्याह्नः--दिनस्य मध्यभागः, स्थित:-वर्तते । दृढम्-~-अत्यन्तम्, परिश्रान्त:--क्लान्तः, अस्मि- विद्ये, प्रथ-~-प्रश्नवाचकमव्ययमिदम्, कस्मिन् प्रदेशे--कस्मिन् स्थाने, विश्रम- यिष्ये ?--विधान्ति प्रापयिष्ये प्रात्मानमिति शेपः ? परिक्रम्य --इतस्ततः परिभ्रम्य, भवतु-प्रस्तु तावत्, दृष्टम्--अवलोकितम् विश्रामयोग्यस्थलमिति शेषः । अमित:--निकटें, तपोवनेन-तापसाश्रमेण, भवितव्यम्-भाव्यम् (इत्यनुमीयते) तथा हि-तदेव दर्शयामि-- अनुयाद--(तदनन्तर ब्रह्मचारी का प्रवेश) ब्रहाचारी--(ऊपर देखकर) मध्याह्नकाल हो गया । मैं बहुत थक चला हूँ। किस स्थान में विश्राम करू ? (घूमकर) प्रच्छा,(स्थान)देख लिया। तपोवन समीप ही जान पड़ता है । क्योकि-- (Then enters a religous student.) (Looking upwards) It's dow high noon and I am very weary. Where shall I go to find a resting place ? (goes abouty welli see. A penance grove seems to be near-by Because :- टिप्पणी-(१) मध्याह्नः- :-दोपहर । 'मह्न. मध्यम्' इस विग्रह में सर्वोऽप्ये. फदेशोऽला समस्यते 'सत्याविसाय' इति ज्ञापकात्' इस नियम के बल से 'पूर्वा- परार्दोत्तरमेकदेशिनकाधिकरणे' मूत्र से समास हुआ और 'अहोऽह्न एतेभ्यः' मूत्र से 'महन्' को 'मह' मादेश हो गया । (२) दृढम्—यह क्रियाविशेषण है। (३) अय-यह प्रश्नवाची भव्यय है । 'मंगलानन्तरारम्भप्रश्नकात्स्यध्वयो प्रम' इत्यमरः । (४) विधमयिध्ये विश्राम करूंगा--वि+श्रम्+णिच् (स्वार्थे) + स्ट । उ० पु० ए० २०। (५) परिकम्म-घूमकर परि+क्रम् + ल्यप् ।

प्रथम ग्रंक ४५ (६) अभितः-समीप में । 'समोपोमयतः शीघ्रसाफल्याभिमुखेऽमितः' इत्यमरः (७) ब्रह्मचारी-वेदाध्ययन का व्रती~-ब्रह्म चरितु शीलं यस्य सः। ब्रह्म + च+णिनिः ताच्छील्ये । (८) दृष्टम्--देख लिया । विसब्ध' हरिणाश्चरन्त्यचकिता देशागतप्रत्यया' वृक्षाः पुप्पफलः समृद्धविटपाः' सर्वे दयारक्षिताः । भूयिष्ठं कपिलानि गोकुलधनान्यक्षेत्रवत्यो दिशो निःसन्दिग्वमिदं ततोवनमयं धूमो हि बह्वाश्रयः ॥१२॥ अन्वय---देशागतप्रत्ययाः अचकिताः हरिणा: विस्रब्घ चरन्ति दयारक्षिताः मवें वृक्षाः पुष्पफलैः समृदविटपाः । कपिलानि गोकुलधनानि भूयिष्ठम् । दिशः प्रक्षेत्रवत्यः । हि अयं घूमः वह्वाश्रयः । इदं निःसन्दिग्धं तपोवनम् ।।१२।। संस्कृत-टोका--देशागतप्रत्यया:--देशे अस्मिन् प्रदेशे पागतः प्राप्तः प्रत्ययः विश्वासः येषां ते तादृशाः, (अतः) अचकिता:--निर्मयाः (सन्तः), हरिणा:- मृगाः, विनव्ध-विश्वस्तं पया स्यात् तथा, चरन्ति--विचरणं कुर्वन्ति । दयारक्षिताः--दयया करुणया रक्षिताः, सर्वे--निखिलाः, वृक्षा:--तरवः, पुप्पफलेः-पुष्पः फलश्च, समृद्धविटपा:--समृद्धाः परिपूर्णाः विटपा: शापा: येषां ते तथाभूताः (सन्ति) । कपिलानि-कपिलवर्णानि, गोकुलधनानि-गवा धेनूनां कुलानि समूहाः धनानि अर्था इव, भूयिष्ठम्-बहुतगम् बाहुल्यै नेति यावत् (सन्ति) । दिश:--दिममयः, प्रक्षेत्रवत्यः-क्षेत्राणि केदाराः परितः कृष्टा भूमय इत्यर्थः तः शून्याः (सन्ति । हि--निश्चयेन, अयं-समक्षवर्ती, धूमः- भग्नर्वाप्यः, बह्वाश्रयः--बहवः प्रनेके प्राथया. उद्गमस्थानानि यस्य स तथागतः (प्रस्ति प्रतएव) इदं पुरोदृश्यमानं, निःसन्दिाघ-निश्चितं, तपोवन- तपस्विनामाधमः (अस्ति) [अय माव:-अस्मिन् प्रदेशे मगाः अकुतोमयाः सन्त: विचरन्ति, वृक्षाः फलपुष्पाढ्या: वर्तन्ते, कपिला गावः मयस्त्वेन दृश्यन्ते, प्रांत- भूमिषु कृषिप्रयोजनाना क्षेत्राणा नामापि नास्ति, हवनीयद्रव्याश्रयो धूमः सर्वतः प्रसरति । एमिः, कारणः नूनमिदं तपोवनमेवेति ॥१२॥ अनुवाद-इस प्रदेश मे विश्वस्त एव भयरहित मृगाण निःशक होकर चर रहे हैं । दया से पाले हुए वृक्षों की डालियां फूलो और फलो से लदी हुई हैं। कली गायों के समूह रूपी धन की प्रचुरला दिखाई दे रही है । चारों दिशाओं में खेतों का प्रभाव है । निश्चय ही यह धुओं पनेक स्थानों से ऊपर उठ रहा है । पतएव यह नि:संदेह तपोवन है ॥१२॥ ? वियन्याः । २. प्रत्ययात् । ३. विमवा।

४६ स्वप्नवासवदत्तम् With confidence engendered by this region, the deer are calmly moving about undisturbed, The trees nurtured tenderly, have branches full of flowers and fruits: great is the wealth of the herds of tawny cows; no signs of tilth are seen in any quarter Beyond all doubt is a hermitage This is proved by the smoke rising from many directions टिप्पणी--(१) देशागतप्रत्ययाः-देशात्=तपोवनस्थानानात् वा तत्रत्यजनात् पागतः प्रत्ययो येषां ते । जिनमे तपोवन के स्थान से या वहाँ के प्राणी से विश्वास उत्पन्न हो गया है । देशागतप्रत्ययात् पाठ में 'हेतो पंचमी' से पंचमी विभक्ति का प्रयोग हुआ है । (२) विश्रधम्-विश्वस्त । वि+सम्म्+क्त (त)। क्रिया- विशेषण है तथा 'चरन्ति' क्रिया की विशेषता बतलाता है। विस्रब्धाः पाठ मे हरिणाः का विशेषण है । (३) पुष्पफलैः-पुष्पाणि च फलानि च तः, इतरेतर- योगद्वन्द्व-समास अथवा पुष्पसहितानि फलानि तैः, मध्यमपदलोपी समास । (४) समृद्धविटपा:-मरी हुई हैं शाखायें जिनकी । समुद्धाः विटपाः येषां ते । (५) कपिलानि-पिंगल वर्ण या पीले रंग की । 'कडारः कपिलः पिङ्गपिशङ्गो' इत्यमरः । कपिला गाय का दर्शन बहुत पवित्र माना गया है-'भग्निचित कपिलासत्री राजा भिक्षुमहोदधिः । दृष्टमात्राः पुनन्त्येते तस्मात् पश्येत्तु नित्यशः"। (६) गोकुलधनानि--गवां कुलानि गोकुलानि तानि धनानि इव उपमित समास । गायें ऋषियो का एकमात्र धन है । (७) भूयिष्ठम्-अधिकता से। यह क्रिया- 'विशेषण है । यहाँ 'सन्ति' यह क्रिया प्राक्षेपलभ्य है । बहु शब्द से अत्यंत बहुत के अयं मे 'अतिशायने तमविष्ठनो' सूत्र से इष्ठन् प्रयत्य और 'इष्ठस्य यिट् च सूत्र से बहु शब्द को भू प्रादेश और यिट् का पागम करने पर मूयिष्ठ शब्द की सिद्धि होती है। (८) बह्वाश्रयः--बहुत से प्राश्रय उद्गम--स्थान हैं जिसके (धुमा) अर्थात् घुप्रो अनेक स्थानों मे उठ रहा है । इस श्लोक मे स्वभावोक्ति तथा वाक्यार्य- हतुक काव्यलिंग अलकार है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है । 'स्वमावोक्तिस्तु डिम्मादेः स्वक्रियारूपवर्णनम्' । 'हतोक्यपदार्थत्वे काव्यलिंगं निगद्यते । ॥१२॥ यावत्प्रविशामि। [प्रविश्य] अये ! आश्रमविरुद्धः वल्वेष जनः । [अन्यतो विलोक्य] अथवा तपस्विजनोऽप्यत्र । निर्दोषमुपसर्पणम् । अये ! स्त्रीजनः । तो भीतर चलू । [प्रविष्ट होकर मरे! यह मादमी तो पाश्रम के विरुद्ध (प्रति रहने वाला नही) मालूम होता है। [दूसरी तरफ देखकर] या यहाँ ..

प्रथम मंक तपस्वी लोग भी हैं । जाने में कोई दोष नहीं । अरे ! स्त्रियाँ (भी हैं)। I shall just enter. (Eatering) Oh! the person does not accord with a hermitage (looking in another direction). But here are ascetics also. Approaching them would be no fault Oh. there are women, टिप्पणी (१) यावत्--यह एक अव्यय है, जिसका प्रयोग वाक्य को अलंकृत करने के लिए किया जाता है। (२) प्रपिशामि-भीतर चलता हूँ। उ० पु० ए० २० । लट् लकार । यहाँ 'वर्तमानसमीप्ये वर्तमानवद्वा' सूत्र से लट् लकार हुमा । (३) अपे--यह पाश्चर्य तथा शासूचक अव्यय है । नागरिक वेष में कंचुकी को देखकर ब्रह्मचारी शशा प्रकट करता है कि यह तपोवन है या नहीं। (४) स्त्रीजन:--पद्मावती, वासवदता प्रादि । काञ्चुकीयः-स्वरं स्वरं प्रविशतु भवान् । सर्वजनसाधारणमा- श्रमपदं नाम । कंचुको-बिना सोचे-अटके चले माइये । पाश्रम तो सभी के लिए खुला है। Chamberiain-You may enter freely in perfect ease. The region of a hermitage is really free to all people. टिप्पणी--(१) स्वरं स्वर-स्वच्छन्द, निःशङ्क। यहाँ प्रवेश-शङ्का-निवारण की उतावली दिखाने के लिए दो बार उच्चारण किया गया है। (२) सर्वजन- साधारणमाक्षपदं नाम--यहाँ कंचुकी के कहने का तात्पर्य यह है कि तपोवन सब व्यक्तियों के लिए एक समान होता है । जैसे उसमे तपस्वी प्रवेश कर सकते हैं वैसे ही अन्य भी। अतएव यहाँ स्त्रियों के उपस्थित होने से ब्रह्मचारी किसी प्रकार का सङ्कोच न करें । निःशङ्कमाएं। वासवदत्ता-हम् ! वासवदत्ता---उह । Vasay.-Hum. टिप्पणी -हम्--यह मसम्मतिसूचक प्रकरण शब्द है। कचुकी के कहने से बेधडक घुसते हुए ब्रह्मचारी को देखकर परपुरुप के दर्शन में लज्जित होने वालो वासवदता ने अपनी प्रसम्मति मा प्ररुचि जताने के लिए इस शब्द का उच्चारण किया। पद्मावती--अम्मो ! परपुषसदसगं परिहरदिप्रया । भोदु, सुपरिवाल- ४८ स्वप्नवासवदत्तम् णीओक्खु मण्णासो। [अम्मो ! परपुरुषदर्शनं परिहरत्यार्या । भवतु, सुपरिपालनीयः खलु मन्न्यासः । पद्मावती--अहा ! प्रार्या (वासवदत्ता) दूसरे पुरुष को देखना नही चाहती। अच्छा, अब मेरे घरोहर को रक्षा बहुत सरल हो गई। Padmavati-Look how the lady shuns the sight of strangers. It is well. My charge can be easily protected. टिप्पणी-(१) परपुरुषदर्शनम्--(अपने पति को छोड कर) अन्य पुरुष का दर्शन । (२) परिहरति--त्यागती है। परि++लट् । प्र० पु० ए० २० । (३) सुपरिपालनीयः--प्रासानी से पालन करने योग्य । क्योकि जब वह एक तपस्वी पुरुष तक का मुंह देखना नही चाहती तो भला लम्पट पुरुषो के बहकावे में कैसे पड़ सकती है। इसलिए ऐसी पतिब्रता स्त्री के चरित्र की रक्षा करने में कठिनाइयां न होंगी । अथवा यहां इस प्रकार अर्थ करना चाहिए-'मेरी धरोहर की देख-रेख बड़े यत्न से होनी चाहिए अर्थात् हम लोग ऐसा कार्य कदापि न करें जो इसकी इच्छा के प्रतिकूल हों। (४) मन्यासः-मेरी धरोहर । काञ्चुकीयः--भोः पूर्व प्रविष्टाः स्मः । प्रतिगृह्यतामतिथि- सत्कारः । कंचुकी--महोदय ! हम लोग पहले से माये हुए हैं। (इसलिए पाप हमारा) आतिथ्य सत्कार स्वीकार करें। Chamberlain-Sir, we are the first comers. Pray accept such hospitality as I can offer. ब्रह्मचारी-[आचम्य] भवतु-भवतु । निवृत्तपरिश्रमोऽस्मि ब्रह्मचारी-[प्राचमन करने] बस-बस! मेरी थकावट दूर हो गई। Brahmchari-(Sipping water). My weariness is gone. यौगन्धरायणः-भोः! फुत आगम्यते, पव गन्तव्यं, क्वाधिष्ठान- मार्यस्य । यौगन्धरायण-महोदय, कहाँ से मा रहे हैं ? वहां जाना है ? भोर यहाँ मापका शुम स्पान है ? Yaug.-Sir, whence do you come ? where ure you going ? where is your residence.

प्रथम अंक । vatsa. ब्रह्मचारी-भोः ! श्रूयताम् । राजगृहतोऽस्मि । श्रुतिविशेषणार्थ वत्सभूमो लायाणके नाम ग्रामस्तत्रोषितवानस्मि । ब्रह्मचारी–श्रीमन् ! सुनें। मैं राजगृह से पा रहा हूँ। (महाराज वत्स) के राज्य में लावाणक नाम का एक गांव है, वहाँ मैं वेद का विशेष अध्ययन करने के लिए रह चुका हूं। Brahmcbari-Sir, bear, I am from Rajgriha. For specialising in shruti I lived in a village named Layanak in the country of वासवदत्ता--[मात्मगतम्] हा लावाणग्रंणाम । लावाणअसंकित्त- पेण पुणो णवोदिको विप्र में सन्दावो । [हा लावाणकं नाम । लावाणकसंकीर्तनेन पुनर्नवीकृत इव ने सन्तापः ।। वासवदता--(मन में) हाय ! लादाणक ! लावाणक के नामोच्चारण ने मेरे सन्ताप को फिर ताजा-सा कर दिया। .Vasavar-(To herseli) Ob, by name Iavarak my distress is as it were intensified by the respected utterance of Lavanak. यौगन्धरायणः--अथ परिसमाप्ता विद्या ? यौगन्धरायण--क्या अध्ययन समाप्त हो गया? Yougo--Are your studies finished. ब्रह्मचारी--न खलु तावत् । ब्रह्मचारी-अभी नही। Brahmchari-Not yet, यौगन्धरायण-~~यद्य नवसिता विद्या, किमागमनप्रयोजनम् ? यौगन्धरायण-पदि अध्ययन समाप्त नहीं हुआ तो चले क्यों आये ? Yang. If your studies are not completed why have you come ? ब्रह्मचारी --तत्र खल्वतिदारणं व्यसनं संवृत्तम् । ब्रह्मचारो--वहाँ बड़ी मारी विपत्ति पड गई । Brabmcbari--There cropped up indeed a great calamity स्व०८०- स्वप्नवासवदत्तम् यौगन्धरायणः--कथमिव ? यौगन्धरायण-कैसी (विपत्ति) ? Yang.-What calamity. ब्रह्मचारी--तत्रोदयनो नाम राजा प्रतिवसति । ब्रह्मचारी--वहाँ उदयन नामक राजा रहते थे। Brahmchari-A king Udayapa dwelt there. यौगन्धरायणः-धूयते तत्रभवानुदयनः । किं सः ? योगायरायण--महाराज उदयन का नाम सुना है । उन्हें क्या हुमा Yang.-Yes I have beard the name. What of him ? ब्रह्मचारी-तस्यावन्तिराजपुत्रो वासवदत्ता नाम पत्नी दृढमभिप्रेता ? किल । ब्रह्मचारी-उनकी मालवराजकुमारी वासवदत्ता नाम की पत्नी बड़ी प्यारी थी। Brahmchari-He had a bride, the princess of Ujjain,Vasvar adatta, whom he dearly loved. यौगन्धरायण:~भयितव्यम् । ततस्ततः ? योगधरायण-होगी। तब क्या हुमा ? Yang.-Well, further? ग्रह्मचारो-ततस्तस्मिन् मृगपानिएकान्ते राजनि प्रामदाहेन सा दग्धा । प्राचारो-नय (एक दिन) राजा के शिकार रोसने के लिए चले जाने पर गांव मे माग सगने से यह जल मरी। Brahmchari-When once the king had been out fora aur ting, she was burnt in a village-fire. पासवता--प्रात्मगतम्। मलिनं प्रलिभं सु एदं । जोयामि मन्द. भामा। [प्रलोकम् प्रलोकं पल एतत् । जोवामि मन्दभाग। बासवरता-- --(मन में) मिया है ! यह विसास मिया है । मैं पनागिन जी रही।

प्रयम मंक Vasava.-(To herself) False indeed. It is false. I am alive, illfated (though I am). यौगन्धरायणः- ततस्ततः ? यौगन्धरापण-फिर क्या हुआ? Yaug,- Well then ? ब्रह्मचारी ततस्तामभ्यवपत्तुकामो यौगन्धरायणो नाम सचिव- स्तस्मिन्नेवाग्नी पतितः । ब्रह्मचारी-तब उसको बचाने के लिए योगन्धरायण नाम का मंत्री उसी पाग में गिर पड़ा। Brahmchari--Then the minister named Yaugandharayan fell in the same fire desirious of rescueing her. यौगन्धरायणः-सत्यं पतित इति । ततस्ततः ? यौगन्धरायण-सचमुच गिर पडा फिर क्या हुआ? Yang.--Did he really fall ? What then ? ब्रह्मचारी --ततः प्रतिनिवृत्तो राजा तवृत्तान्तं श्रुत्वा तयोवियोग- जनितसन्तापस्तस्मिन्नवान्नौ प्राणान् परित्यक्तुकामोऽमात्यमहता यत्नेन वारितः। सस्कृत टीका-ततः-मृगयातः, प्रतिनिवृत्त:-प्रत्यागतः, राजा-उदयनः, तद्वतान्त---तत् तादृशं वासवदत्तायौगन्धरायणयोर्दाहविषयकं वृत्तान्तं समाचार, श्रुत्वा--प्राकण्यं, तयोः-पत्न्यमात्ययोः, वियोगजनितसन्ताप:--वियोगेन विरहेण जनितः उत्पन्नः सन्तापः प्रतिक्लेशः यस्य न तथामूतः, (सन्) तस्मिन् एव-तत्रैव, अग्नी- वह्नो, प्राणान्--प्रसून्, परित्यक्तुकामः-हातुमिच्छन्, अमात्यः--मन्त्रिभिः, महता--अत्यन्तेन, परनेन, वारितः--निधितः । अनुवाद–ब्रह्मचारी--शिकार से लौटने पर जब राजा ने उन दोनो का समाचार सुना तब वह उनके वियोग से सन्तप्त होकर उसी प्राग मे (कूद कर) प्राण छोड़ने को उतारू हो गया। किन्तु मन्त्रियों ने बड़े यत्न से उसे रोक रसा। Brahmchari-Then when the King returpad and heard the news, he was heart-broken by the loss of these and sought to end his life in the same flame but ty pagione his ministers restrained him.

૫૨ स्वप्नवासवदत्तम् टिप्पणी--['सुपरिपालनीयः' के आगे के शब्दों की टिप्पणियां यही दी जा रही हैं--] (१) प्रतिगृह्यताम्--स्वीकार कोजिए प्रति+यह+लोट कर्मणि। म० पु० ए० व०। (२) अतिथिसत्कारः--पाहुन की आवभगत । प्रतियः सत्कार वा अतिथियोग्यः सत्कारः मध्यमपदलोपी समास । अतिथि-सत्कार भारतीय संस्कृति की वही विशेषता रही है। लिखा है-'अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते । स तस्म दुष्कृत दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति । परावप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते । छेत्तः पार्श्वगतां छाया नोपसंहरने द्रुमः' (३)माचम्य-- माचमन करके । पाड+चम् + ल्यप् । (४) निवृत्तपरिश्रमः-जिसकी थकावट दूर हो गई है। नि+वृत्+क्त (त)कत्तरि । परिथम:--परि+श्रम्+घञ् । निवृत्तः =अपगतः परिश्रमः क्लान्तिः यस्य सः, बहुव्रीहि समास । (५) अधिष्ठानम्--- स्थान । अधि+स्या+ल्युट अधिकरणे । (६) क्व-वहाँ ? किम्+डि+अत्, कु मादेश । (७) राजगृहतः यहाँ 'प्रपादाने चाहीयरुहोः' सूत्र से 'तत भागतः' इस अर्थ में तसि प्रत्यप हुपा। (८) श्रुतिविशेषणायम्--वेद का विशिष्ट ज्ञान करने के लिए। श्रुतेः विशेषणम् विशिष्टज्ञानोत्पतिः तदर्थम् । (६) वत्स -उदयन के राज्य में । यह राज्य प्रयाग ये चारों प्रोर पमुना के दक्षिणी 'किनारे पर फैला हुमा था। इसको राजधानी कौशाम्बी थी, जो प्रयाग के लगभग २५ मील दक्षिण-पश्चिम कोने में है। (१०) उषितवान् --निवास किया। Vवस्+वतवतु कर्तरि, 'वसतिक्षुषोरिट्' इति सूत्रेण इडागम; यजादित्वात सम्प्रसारणम् । (११) नवोकृतः नया कर दिया। प्रनयोऽपि नव इव कृतः इति नवीकृतः, नव+च्यि; ईत्व/+क्त (त)। (१२) मनसिता--समाप्त नहीं। भव/सो+त-टाप, (मा) न अवसिता मनवसिता। (१३) व्यसनम्-- विपत्ति । 'व्यसनं विदि भ्रंश' इत्यमरः । (१४) संवृत्तम्-पड़ गई है। समझ युत+क्त (त) । (१५) वमभिप्रेता-मत्यन्त प्रिया । (१६) फिल-सोगों यह प्रसिर है, लोकप्रसिद्धि, सोकदार्ता । (१७) ग्रामवाहन-गाँव मै भाग सग जाने से, गाय के पग्निकांड से । 'हतो तृतीया' से तृतीया हुई है । (१८) मगमा निकान्ते-मृगया के लिए निकलने पर। निस्+क्रम्मत (त) कतरि (गत्यर्थः स्वात्) भावे सप्तमी। (१) मनोरम् मालीकम् -सरासर । 'प्रसी स्वप्रिपेनते' रपमरः । यहाँ मुशायं में दित्य हुमा है ।(२०) पम्मपतराम:- विपत्ति मे चने की दमदारणी वाला ! मम्यवात पसने साहाय दात कामः पमिलापः यस्य स ठाइस। तुमनाम नाममनगोरपि' में मुप्त हो गया है। भूमौ- - - मे ।

? प्रथम अंक ५३ 'व्यसनसाहाय्यमध्यवपत्तिः' इति कौटिलीयमयंशास्त्रम् । (२१) प्रतिनिवृत्तः-- लोटा हुआ (२२) तद्वत्तान्तम्- जयोत्तान्तः तम् अयवा स चासो वृत्तान्तः तम् । (२३) वियोगनितसन्ताप:~वियोगेन जनितः सन्तापः यस्य सः त्रिपद- बहुब्रोहि समास ।(२४) अमात्यः--मत्रियों ने, अमा सह वर्तते इति विग्रहे अमा+ त्यप् 'अव्ययात्त्यप्' इति सूत्रेण । (२५) वारितः-रोका गया । वासवदत्ता--आत्मगतम्] जाणामि जाणामि अय्यउत्तस्स मइ साणुक्कोसत्तणं । [जानामि जानाम्यार्यपुत्रस्य मयि सानु- कोशत्वम् । वासवदत्ता--[ मत में ] जानती हूँ, जानती हूँ, (अर्थात् में अच्छी तरह जानती हूँ कि) आर्यपुत्र मुझ पर कृपा रखते हैं। Vasara.—(aside) such is my prince's tender love for me, यौगन्धरायणः-ततस्ततः यौगन्धरायण-तब क्या हुआ Yaug.-Yes, yes proceed. ब्रह्मचारी--ततस्तस्याः शरीरोपभुक्तानि दग्धशेपाण्याभरणानि परिष्वज्य राजा मोहमुपगतः संस्कृत टीका-तत:-तदनन्तरम्, तस्याः-वासवदत्तस्याः, शरीरोप- मुक्तानि--शरोरे देहे उपमुक्तानि परिहितानि, दग्धशेपाणि-दग्धेभ्यः शेपाणि दग्धावशिष्टानि इति यावत्, सामरणानि-आभूपणानि, परिष्वज्य-प्रालिङग्य राजा---उदयनः, मोहम्-मूळम्, उपगतः-प्राप्तः । ब्रह्मचारी-पश्चात् वासवदत्ता के पहने हुए गहनो को, जो जलने से बच गये थे, छाती से लगाकर राजा मूञ्छित हो गये। Brabacbari--Then the King fell in a Swoon embracing the burnt remains of her ornaments that she used to put on. टिप्पणी--(१) जानामि जानामि-सम्यक् प्रकार से जानती हूं। महाँ मुसार्य में द्वित्व हुमा है । ज्ञा घातु-लट्-~-30 पु० ए००। (२) मार्य- पुत्रस्य-स्वामी का। मार्यस्य श्वशुरस्य पुनः प्रार्यपुनः, तस्य । (६) सात- कोशत्यम्--दमायुक्त होना । मनुकोशः-दया, अनु+कुरा+घञ् (म) मावे । तेन सहितः सानुमोदरः, तम्य भावः इत्यर्थं मानुकोमनत्व । 'कृपा दयानुकम्मा । स्वप्नवासवदत्तम् स्यादनुक्रोशोऽपि' इत्यमरः । (४) शरीरोपभुक्तानि शरीर पर धारण किये गये । उप+मुज्+क्त (त)। (५) वग्यशेपाणि-जलने से बचे हुए। दह+ क्त (त) कर्मणि-दग्ध (६) मोहम्--मूर्छा को। (७) उपगत--प्राप्त हुए उप+गम्+क्त (त) । (८) भाभरणानि-जेवरों का। 'अलङ्कारस्त्वाभरणम् इत्यमरः । (६) परिष्वज्य--प्रालिंगन करके । परि:/स्व+क्त्वा ल्यम् । सर्वहा! सभी-हाय ! हाय ! All-Alas lalas ! वासवदत्ता--[स्वगतम् ] सकामो दाणि अय्य जोपंधराग्रंणो होदु । [सकाम इदानीमार्ययौगन्धरायणो भवतु ।] यासवदता--(मन मे) अव प्राय यौगन्धरायण की अभिलाषा पूर्ण हो । Vasava.—(To herself) Let revered Yaugandharayan be satisfied now. चेटो-भट्टिदारिए ! रोदिदि खु इनं प्रय्या । रोदिति खलु इयम् आर्या दासी- राजकुमारी जी ! ये श्रीमती जी तो रो रही हैं । Maid-Look, princess. The lady is in tears. पद्मावती--साणुक्कोसाए ही दवं । [सानुक्रोशया भवितव्यम् ।। पदमावती-ये दपाल (पर्यात् मादक प्रकृति की) होंगी। Padma,-She must be tender. यौगन्धरायणः-प्रय किमय किम् । प्रकृत्या सानुक्रोशा मे भगिनी। ततस्ततः ? योगपरायणः-~मोर क्या, मौर क्या । मेरी बहन स्वभाव से ही दयाल है। तव पाहुमा ? Yaug.-Why, of course, my sister had always a tender heart. ब्रह्मचारी ततः शनैः शनैः प्रतिलम्बसंजः संवृत्तः । ब्रह्मचारी--मनन्तर धीरे-धीरे राजा को मुन्धा दूर हुई। Brahmcbari-The King came to himself at last. [भर्तृ दारिफे!

प्रथम अंक ? पद्मावती-दिठ्ठिया घरइ । मोहं गदो ति सुणिन सुष्णं विस में हिन? [दिष्ट्या प्रियते । मोहं गत इति श्रुत्वा शून्यमिव हृदयम् पद्मावती माग्य से वे जी रहे हैं । 'मन्छित हो गये' यह सुनकर मेरा हृदय शून्य-सा हो गया था। Padmavati--It is vell he lives. My heart became dejected when I heard that he fell in a swoon. यौगन्धरायणः-ततस्ततः? यौगन्धरायण-तब क्या हुआ ? Yaug.--And then ? What tlien, Sir ? ब्रह्मचारी-ततः स राजा महीतलपरिसर्पणपांसुपाटलशरीरः सहसोत्याय 'हा वासवदत्ते ! हा प्रवन्तिराजपुत्रि ! हा प्रिये ! हा प्रियशिष्य !' इति किमपि किमपि बहु प्रलपितवान् । कि बहुना- संस्कृत टीका-ततः तत्पश्चात्, सः---पूर्वोक्तः, राजा-भूपतिः उदयन इति यावत्, महीतलपरिसर्पणपांसुपाटलशरीर --महीतले भूतले यत् परिसर्पण परिलुण्ठनं तेन लग्नाः ये पासवः रजासि तः पाटल श्वेलरक्तं शरीरं देहो यस्य स तथाविधः सन्, सहसा-हठात्, उत्याय--उत्थितो मूत्वा, 'हा वासवदत्ते ! इत्यादि, बहु-प्रत्यन्तं, प्रलपितवान् विलापम् अकरोत् । कि बहुना-- किमधिककथनेन- अनुवाद- तदनन्तर जमीन पर लोटने से राजा का शरीर धूलिघूसरित हो गया। फिर वे एकाएक उठ कर 'हाय वासवदत्ता! हाय मालवराजकुमारी! हाय प्यारी ! हाय प्रिय शिष्ये' इत्यादि बहुत विलाप करने लगे। अधिक क्या कहूँ---- D-Lunhni. Than theKine hic had.. . टिप्पणी--(१) सकामः-कामेन ममिलापेण सह-समृद्ध इति सकामः 'तेन सहेति तुल्ययोगे' इति सूत्रेण तुल्ययोगस्य प्रायिकत्वात् समासः । कामोऽमिला. पस्तपश्च' इत्यमरः । यहाँ वासवदत्ता के कहने का तात्पर्य यह है कि महाराज - ने मुझे अवश्य ही मरी हुई समझ लिया, अन्यया उन्हें मूर्छा न होती। अब वे पद्मावती से विवाह कर लेंगे और उसके भाई की सहायता से राज्य भी उन्हें मिल जायगा। बस, यही तो योगन्धरायण चाहने थे। सो उनकी मन.कामना पूर्ण होगी। कोई टीकाकार यहाँ वासवदत्ता की व्यग्योक्ति बताते हैं। उनके अनुसार वासवदत्ता के कहने का अभिप्राय है-'महाराज मूच्छित हो गये। आगे न जाने क्या हो । अव यौगन्धरायण राज्य प्राप्ति की कामना पूरी कर लें। इस गब्द का प्रयोग अभिज्ञानशाकुन्तल में मिलता है-'अनसूया-कामः इदानी सकामो भवतु' । मुद्राराक्षस मे भी देखा जाता है-राजा-एवमस्मासु गृह्यमाणेषु स्वकार्य- सिद्धिकामः सकामो भवत्वार्यः । (२) किम् अथ किम्--यह द्विरुक्ति पद्मावती के तर्क को दृढ करने के लिए हुई है । (३। प्रकृत्या स्वभाव से । 'प्रकृत्यादिभ्य उपसख्यानम्' इस वात्तिक से यहां तृतीया हुई। (४) शनैः शन:-यहाँ वीप्सा मे द्वित्व हुमा। (५) प्रतिलब्धसंज्ञः-प्रतिसन्धा=प्राप्ता संज्ञा चेतना येन स तथाविधः । (६) ध्रियते-अवस्थित हैं अर्थात् जी रहे हैं। दिवादिगणीय घट अवस्याने धातु के लट् लकार प्रथमपुरुष एकवचन का यह रूप है । इसका प्रयोग अन्यत्र भी द्रष्टव्य है, यथा-ध्रियते यावदेकोऽपि रिपुस्तावत्कुतः सुखम्' शिशुपालवध । 'ध्रिये प्रार्यपुत्र प्रिये' उत्तररामचरित । (७) शून्यम्-चेतना- रहित । यह प्रवस्या पदमावती के मन मे उदयन के प्रति प्रेमाकुर को उत्पत्ति मूचित करती है। (८) महीतलपरिसर्पणपांसुपाटलशरीर-धरती पर लोटने के कारण धूल लग जाने से जिसका शरीर लाल तथा श्वेत रङ्ग का हो गया है। परि+सप्+ल्युट् मावे परिसर्पणम् । पांसु-चूल । "स्त्रिया धूलिः पासुनर्ना इत्यमरः । पाटल-लाल तथा सफेद । 'श्वेतरवतस्तु पाटलः' इत्यमरः। (६) उत्याप-उठ कर । उत्/स्था+क्त्वा-ल्यप् । 'उदास्थास्तम्भोः पूर्वस्य' इस सूत्र मे 'स्' को 'त्' और 'शरो शरि सवणे' इस सूत्र से 'त्' मा लोप । (१०) प्रियशिष्ये-विवाह से पूर्व उदयन ने वासवदत्ता को वीणा-वादन की शिक्षा दो पो । इसका कारण यह था कि वासवदत्ता के पिता प्रद्योत वत्मराम उदयन से अपनी पुत्री का विवाह कराना चाहते थे। किन्तु बहुत प्रपल करने पर भी जब उन्हें सफलता न मिसी तो उन्होंने छल से उदपन को अपने राजमहल मे से जाकर वासवदत्ता को वीणा सिखाने के लिए अनुरोध किया । कमशः परिचय होने पर दोनों में परस्पर प्रेम हो गया। तब एक दिन यौगन्धरायण की नीति से उदयन वासवदता को उड़ा कर अपनी राजधानी से पाये । यही कारण है कि प्रथम अंक उसने वासवदत्ता को प्रिय शिष्या कहकर सम्बोधित किया है । कालिदास ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है--'प्रियशिष्या ललित कलावियो।(११)किमपि किमपि-'वीप्सायां द्वित्वम् । वीप्मा में द्वित्व का प्रयोग हुमा है । (१२) प्रलपितवान्-विलाप किया। प्र+लप्+क्तवत् । (१३) दिष्टया-भाग्य से। दिष्टिः माग्यम् तपा हेतो तृतीया । अपवा यह अन्यय है । (१४) किं यहुना-- बहुत कहने से क्या । गम्यमानसाधनादिक्रियापेक्षया करणे तृतीया। नैवेदानी तादृशाश्चक्रवाका नवाप्यन्ये स्त्रीविशेवियुक्ता । धन्या सास्त्री यांतया वेत्तिभर्ता भर्तृस्नेहात साहि दग्धाप्यदाधा ||१३॥ अन्वय-~इदानी तादृशाः न एव चक्रवाकाः, न एव स्त्रीविशेषः वियुक्ताः अन्ये अपि । सा स्त्री धन्या यां मर्ता तया वेत्ति । हि मत स्नेहात् दग्या अपि सा पदग्धा ॥१३॥ संस्कृत टोकाइदानीम्-~अधुना, तादृशाः-तथाविधा: उदयनसदृश. शोकातुरा इति यावत्, न एद---न तु, चक्रवाका:--कोकाः, (सन्ति), नएव-- नहि, स्त्रीविशेष:----विशिष्टरमणीमिः, वियुक्ता:--विरहिताः, अन्य प्रपि- इतरे मपि, (सन्ति)। सा, स्त्री--गारी धन्या--अमिनन्दनीया, या-स्त्री, भर्ता--पतिः, तथा-तेन प्रकारेण, वेत्ति मन्यते । हि-निश्चयेन, मत- एनेहात्--पत्युः प्रेम्णा, दग्धा अपि~~दाहं प्राप्ता अपि, सा-~-नारी, अदम्या- प्रभस्मीमृता जीविता इति यावत् अस्ति [अयं भाव:-प्रधुना अस्मिन् लोके उदयनसदृशाः विरहिणः न तु चक्रवाका: सन्ति न अन्ये सीतादमयन्तीशकुन्तला- प्रभृतिभिः वियुनतः रामनलदुष्यन्तप्रमतयः एव । किञ्च या (वासवदत्ता) पति: लोकोत्तरस्नेहदृशा पश्यति सा नारीरत्ननेपु विशिष्टा विद्यते । अतः भस्मी- कृता अपि वासवदत्ता मर्तुः प्रणयात् जीवन्ती एव तिष्ठति । ||१३|| इस समय उस (राजा) के समान न तो चकते हैं मोर न विशिष्ट रमणियों से अलग हुए दूसरे ही (कोई) हैं । वह नारी पन्य है, जिसे (उसका) पति उस तरह समझता है । निःसन्देह पति के प्रेम के कारण जली हुई भी वह (दासवदता) ने जली हुई (ही) है ।।१३।। Now pot even the chakravakas arc so in sorrow. Not even others separated from their beloveds. Blessed is the lady whom "न्तर-साग्निदग्या ।

५८ स्वप्नवासवदत्तम् her husband so (dearly) loves, On account of the love of her husband she is indeed not burnt though burn, टिप्पणी (१) तादृशाः--उसके (राजा के) समान। (प्रियादियोग- जनित दुःख मे) । (२) चक्रवाका:-चकवा पक्षी। 'कोकश्चक्रश्चक्रवाको रथाङ्गाह्वयनामकः' इत्यमरः । प्रकृति का यह विधान है कि रात्रि मे चकवा अपनी चकवी से अलग हो जाता है और फिर प्रातःकाल होते ही दोनों प्रापस में मिल जाते हैं। तो इस प्रकार विरही चकवा के हृदय में अपनी प्रिया से मिलने की पाशा बनी रहती है, पर गतमार्य उदयन के हृदय में तो यह प्राशा भी नहीं रही। इसलिए चकवा इसको बराबरी नहीं कर सकता। (३) स्त्रीविशेष:-- विलक्षण स्त्रियों से वियुक्त । स्त्रीणां विशेषाः तैः । इन्दुमती, दमयन्ती, सीतादि प्रियतमामों से वियुक्त होने पर प्रज, नल, रामादि भी इतने शोक संतप्त नहीं हुए थे। (४) धन्या--धनं लब्धा इत्यर्थे धन+यत् 'धनगणं लब्यति' सूत्रेण, ततप्टाप् । (५) वयाप्यदग्धा-जल जाने पर भी जली नहीं है, अर्थात् पाञ्च- भौतिक शरीर को छोड़ देने पर भी प्रियतम का दिया हुमा प्रेम रूप दूसरा शरीर धारण करके जी रही है । इस श्लोक में चक्रवाक आदि उपमानों को उपमेय बनाया गया है, इसलिए प्रतीप नामक अलंकार है। तल्लक्षणं--प्रतीप- मुपमानस्य हीनत्वमुपमेयतः अर्थात् उपमेय ।(उदयन) से उपमान चक्रवाक की हीनता दिखाने से प्रतीपालंकार है । भोर शालिनी नामक छन्द है। तल्लक्षणं- मात्तीगौ चेपछालिनी वेदलोकः॥१३॥ यौगन्धरायणः--प्रय भोः? तं तु पर्यवस्थापयितुं न कश्चिद् यत्नवानमात्यः ? पौगन्धरायणक्यों महाराय ! उन्हें प्रकृतिस्य करने के लिए कोई मंत्री प्रयत्नशील नहीं है? Yaug.--Well, Sir, did no minister try to console him ? टिप्पणी-(१)मय-यह प्रश्नार्थक मन्यय है। तु-यह याक्यालकारायं है। (२) पर्यवस्थापयितुम् --माश्वासन मादि से प्रकृति में लाने के लिए। परि-प्रय/स्था+णिचु, पु+तुमनु । (३) पलवान् प्रयत्न करने वाला। पत्नः मस्तिपस्य इति विग्रहे यत्न-मतुप् । ब्रह्मचारो-मस्ति रुमण्यान्ना'मामात्यो दृढं प्रपत्नवांस्तत्रभवन्तं १. पाठान्तर-समवानामामात्यो।

प्रथम प्रक पर्यवस्थापयितुम् । सहि- ब्रह्मचारी---रुमण्वान् नाम का एक मंत्री है, महाराज को होश में लाने के लिए खूब प्रयत्न कर रहा है। वह तो- Brahmchari-Yes the minister named Rumanwana did try* his utmost to console his honour, since te. अनाहारे तुल्यः सतत रुदितक्षामबदनः शरीरे संस्कारं नृपतिसमदुःखं परिवहन् । दिवा वा रात्री वा परिचरति यत्ननरपति नृपः प्राणान् सद्यस्त्यजत्ति यदि तस्याप्युपरमः ॥१४॥ अन्वय-अनाहारे तुल्या, सततरुदितक्षामवदनः, नृपतिसमदुःखं शरीरे सस्कारं परिवहन, दिवा वा रात्री वा नरपनि यत्नः परिचरति । यदि नपः प्राणान् त्यजति प्रस्य अपि उपरमः सद्यः ॥१४॥ संस्कृत टीका--अनाहारे---अमोजने, तुल्यः-सदृशः सततरुदितक्षाम- वदन.---सततं निरन्तर यत् रुदित रोदन तेन क्षामं क्षीणं वदनं मुख यस्य स तथाभूतः, नृपतिसमदुःसं--नृपतिना राज्ञा समं तुल्यं दुःख कष्टं यस्मिन् कर्मणि तद् यथा स्यात् तथा, शरीरे-देहे, सस्कारं मार्जन, परिवहन्-धारयन्, दिवा वा रात्री वा--दिने रात्री च, नरपति--राजान, यत्नः--प्रयत्नः, परिचरति- सेवते । यदि-चेत्, नृपः--राजा, प्राणान्--असून, त्यजति---मुञ्चति, तस्य-- रुमण्वतो अपि, उपरमः---मृत्यु, सद्य.तत्क्षणं (भवेत्।। [अयं भावः-- वासवदत्ताशोकविकलो राजा इव भोजन परित्यजन् रुमण्वान् निरन्तररोदनेन म्लानमुखः संवृतः । यथा राजा कष्टाधिक्येन कथञ्चिदत्यावश्यक स्नानादि- सस्कारम् आचरति तथा रुमण्वानपि कञ्चित् शरीरमस्कारं स्वीकरोति । स च राविन्दिवम् राजानं महता क्लेशेन शुश्रूपते । यदि दुःसहेन वासवदत्ताशोकेन राशः प्राणवियोगः स्यात् हि तत्कालमेव रुमण्वतोऽपि मृत्युभवेत् इत्यत्र नास्ति सन्देहलवः। ॥१४॥ अनुवाद-~मोगन न करने मे (राजा के समान और निरन्तर रोते रहने से मूखे चेहरे वाला मंत्री राजा के समान ही दुःख से शरीर का संस्कार (स्नान आदि क्रियाएँ) करता हुमा दिन-रात यत्नपूर्वक राजा की सेवा में लगा रहता है । अगर राजा जीवन को छोड़ दे तो उसकी भी मृत्यु तुरन्त हो जाय ॥१४॥ १.प्रतत।

स्वप्नवासवदत्तम् He shared his master's fastings, and his face, like, his, was wasted with incessant weeping; the garb of woe which the king wore, he also wore, with all devotion he waited on his lord by night and day. If the king had died he too would have died on the instant. टिप्पणी--(१) सततदितक्षामवदन:--लगातार रोते रहने से जिसका चेहरा फीका पड़ गया हो । सतत-निरन्तर । 'सततानारताथान्तसन्तताविरता- 'निशम्' इत्यमरः । रुदितम्-- रुद्+क्त मावे । क्षामम्/क्ष+क्त कर्तरि 'क्षायो मः' इति सूत्रेण तस्य मः। (२) शरीरे संस्कारम्-स्नान आदि से शरीर को स्वच्छ करना । 'संस्कारो मार्जन गुजा' इत्यमरः । संस्कारम्--सम्/क+ घन 'सम्परिम्यां करोतो मूषणे' इति सूत्रेण सुडागमः । यहाँ 'शरीरेऽसंस्कारम्' भी पाठ हो सकता है । तब अर्थ होगा--शरीर की सजावट अर्थात् वस्त्रालंकार से शरीर को भूपित न करता हुआ (३) नृपतिसमदुःखम् --राजा के समान दुःखानुभूति । नृपतिना समम् । (तत्तत्पु०) तादृश दुःखं यस्मिन्, कर्मणि तद्यथा स्यात्तथा । अथवा सम दुःख यस्मिन् सः समदु.सः नृपतेः समदुःखः तम् । यह मस्कार का विशेषण है। क्रियाविशेषण 'परिवहन' को विशेषता बतलाता है । प्राशय यह हैं कि जब राजा शोक संतप्त होता था तो ममी रुमण्वान मी तदनुकूल चेष्टा करता था । (४) परिवहन-- --धारण करता हुआ। परि+यह+शत । (५) दिवा-यह दिनवाची प्रव्यय है । 'दिवाह्रोति' इत्यमरः । (६)वा--यह चकारार्थक या समुच्चयार्थक है। (७) उपरमः-मृत्यु । उप/रम्+घञ् (प्र)। निपातनात् वृद्धयमावः । इस श्लोक मे रुमण्वान् की अपूर्व राजभक्ति का वर्णन किया गया है । इसमें शिखरिणी छन्द है। रस रुद्रश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी ॥१४॥ वासवदत्ता--[स्वगतम्] दिठिआ सुणिविखत्तो दाणी अय्यउत्तो। [दिष्ट्या सुनिक्षिप्तः इदानीम् प्रार्यपुत्रः ।] वासवदत्ता--[मन में] सौमाग्य से इस समय पतिदेव अच्छे पुरुष के हाथ में सौंपे गये हैं। Vasara. -(To herself)-Happily the king is well cared for. यौगन्धरायणः-[प्रात्मगतम्] अहो महद्भारमुद्व हति रमण्वान् ।

• प्रथम अंक यौगन्धरापणं--(मन में) अहा ! रुमण्वान्' मारी बोझा ढो रहा है । क्योकि- 'Yaug.-(To himself) Oh ! Rumanwana is bearing a great burden; because ;-- टिप्पणी--(१) सुनिक्षिप्त:-मली माँति रक्षित, अर्थात् परम राजमक्ता मत्री के हाथ में पतिदेव की रक्षा का मार है, इसलिए मुझे चिन्ता करने की प्राव- श्यकता नहीं है । (२) महदभारम्--यहाँ 'महाश्चासो मारः' इस विग्रह में कर्म. धारय समास करने पर 'प्राममहतः-इत्यादि सूत्र से प्रात्व अनिवार्य है । तब रूप होना चाहिए 'महामारम्' । किन्तु 'निरंकुशाः कवयः' इस दृष्टि से महद्- मारम् का प्रयोग हुआ है, ऐसा कह सकते हैं । अथवा 'महत्' को 'उद्धति' पिया का विशेपण मान लीजिए । अथवा 'महतः विशिष्टस्य कार्यस्य भारः' इस प्रकार षष्ठी तत्पुरुष समास से काम चलाइए। सविश्रमो ह्ययं भारः प्रसक्तस्तस्य तु श्रमः । तस्मिन् सर्वमधीनं हि यत्राधीनो नराधिपः ॥१५॥ अन्वयहि अयं भार: सविथमः, तस्य तु श्रमःप्रसक्तः । हि यत्र नराधिपः अधीनः, तस्मिन् सर्वम् अधीनम् ।।१५।। संस्कृत टीका-हि-निश्चयेन, प्रय वासवदत्तारक्षणरूपो मदीयः भारः धः, सविश्रम:-विश्रमेण विरामेण महितः युक्तः अपगतप्राय इत्यर्थः, (प्रभूत् । तस्प तु-कावतस्तु, श्रम.--राजरक्षारूपो मारः, प्रसस्तः प्रकर्षण लग्नः विप. रूपेण स्थित इति यावत्, (अस्ति) हि-यतः, यत्र--यस्मिन्, नराधिपः-राजा, अधीन:प्रायत्तः, तस्मिन्तत्र, सर्वम्-समस्तं राज्यकार्यजातम्, अधीनम्- प्रायत्तम् (भवति) ।।१५।। अनुवाद-निश्चित रूप से मेरा यह भार कुछ उतर गया है, किन्तु रुमण्वान् का मार दृढ रूप से स्थित है । क्योकि जिसके हाय में राजा को देखभाल है, उसी के हाथ मे सब कुछ है ॥१५॥ This (mine) burden gives me rest ! but his effort must be continuous. On him certainy depends everything, on whom the king depends, टिप्पणी--(१) हि-निश्चयार्यक अध्यय है । 'हि हेतावधारणे' इत्यमरः । (२) भारः-वामवदता को पद्मावती के यहां रखने का दायित्व ६२ स्वप्नवासवदत्तम् 'महाराज उदयन के राज्य की पुनः प्राप्ति से संबद योजना के अन्तर्गत दो दायित्व थे-(१) वासवदत्ता को सुरक्षित रखना (२) राजा के जीवत तथा राजधानी की रक्षा । प्रथम का मार यौगन्धरायण तथा दूसरे का रुमण्वान् मंत्री को सौंपा गया था। (३) सविश्रमः-निवृत्तप्राय, विरत । वि/श्रम्-घ, (म) "नोदात्तोपदेशस्य' इति सूत्रेण वृद्धिनिषेधः । "विश्रामः' की सिद्धि इस प्रकार हो सकती है-श्रम एव धामः प्रशादित्वात् प्रण, विशेषेण श्रामः विधामः प्रादिसमास (४) प्रसक्त:--प्र+सञ्+वत (त) कतरि । लगातार चल रहा है । (५) तस्मिन् सर्वमधीनं हि ययाधीनो नराधिपः–यहाँ यौगन्धरायण के कहने का तात्पर्य यह है कि जिस पर राजा का जीवन निर्भर है उसी के अधीन सब कुछ है । हमारे जितने प्रयत्न हैं, वे सब उदयन को राज्य वापिस दिलाने के लिए ही हैं । यदि उनकी मृत्यु हो जाय तो हमारे सारे प्रयास विफल हो जायेंगे। राजा का शोक इतना बढ़ा-चढ़ा है कि कही वासवदत्ता के वियोग मे उनके प्राण चले जाने की नौबत न पा जाय इसलिए जो बड़े यत्ल से उनके प्राणों की रक्षा कर रहा है, वही वस्तुतः श्रेय का अधिकारी है । हमारी सफलता उसी पर निर्भर है । इस दृष्टि से मण्वान् का दायित्व मेरी अपेक्षा कहीं अधिक है। 'तस्मिन्' और 'यत्र' में 'अघिरीश्वरे' सूत्र से कर्मप्रवचनीय संज्ञा और 'यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचन तत्र सप्तमी' मूत्र से सप्तमी हुई। अधीन--वशीभूत । 'अधीनो निघ्न प्रायतः इत्यमरः । अधि+ख 'अषडक्षाशितङ्ग.' इत्यनेन ख इत्यस्य ईनादेशः । इस श्लोक में सामान्य से विशेष का समर्थन होने के कारण अर्थान्तरन्यास प्रलकार है और मनुष्टुप् छद है ।।१५॥ [प्रकाशम्] प्रथ भोः ! पर्यवस्थापित इदानीं स राजा । (प्रकट) क्यों महाशय ! अब तो वे राजा प्रकृतिस्थ हुए न ? (Loudly)-Well then the king is now consoled. टिप्पणी--पर्यवस्थापितः--प्रकृतिस्थ किये गए। अर्थात् रुमण्वान् की 'परिचर्या ने राजा को स्वस्थ किया या नहीं ? परि अव स्था+णिच् पुन क्त (त)। ब्रह्मचारी-तदिदानी न जाने । इह तया सह हसितम्, इह तया सह कथितम्, इह तया सह पर्युषितम् इह तमा सह कुपितम, इह तया सह शयितम, इत्येवं तं विलपन्तं राजानममात्यमहता यत्नेन प्रयम भंक तस्माद् ग्रामाद् गृहीत्वापकान्तम्' । ततो निष्क्रान्त' राजनि प्रोषितनक्षत्रचन्द्रमिव नभोऽरमणीयः संवृतः स ग्रामः । ततोऽहं निर्गतोऽस्मि । संस्कृत टीका-तत्-राज्ञ: स्वस्थताविषये किमपि, इदानीम् -पघुना, न-नहि, जाने-अवगच्छामि । इह--प्रत्र, तया--वासवदत्तया, सह-साऊं, हसितम्- हासः, कृतः, इह तया सह, कथितम्-वार्तालापः कृतः, इह तया सह, पर्युषितम्-~अवस्थितम्, इह तया सह, कुपितम्-~ोधः कृतः, इह तया सह, शयितम्-शयनं कृतम् । इत्येवम्-अमुना प्रकारेण, विलपन्तं-विलाप कुर्वन्तं, तं, राजानम्-उदयनम्, अमात्यः--मन्विमिः, महता--भूयसा, यत्नेन- प्रयासेन, तस्मात् ग्रामात्-लावाणकात्, गृहीत्वा-धृत्वा, अपक्रान्तम्- अपसृतम् । ततः-तस्मात् प्रामात्, निष्क्रान्ते--निर्गते, राजनि-नरेशे, प्रोषित. नक्षत्रचन्द्रम्-प्रोपितानि अस्तं गतानि नक्षत्राणि तारकाः चन्द्रश्च चन्द्रमा च यस्मात् तत् तादृशं, नमः-आकाशम्, इव-तद्वत्, अरमणीयः--अशोमनीयः, सवृत्तः-संजातः, स ग्रामः । ततः-तेन कारणेन तस्मात् ग्रामात्, पहमपि निर्गतोऽस्मि--प्रस्थितोऽस्मि । अनुवादब्रह्मचारी-वह तो अब मुझे मालूम नही। इस जगह उसके साथ हंसा था, इस जगह उससे बातचीत की थी, इस जगह उसके साथ बैठा था, इस जगह उससे रूठा था, इस जगह उसके साथ सोया था' इस प्रकार विलाप करते हुए राजा को बड़े प्रसारा रो साथ लेकर मंत्री लोग उस गांव से चले गये। पश्चात् राजा के चले जाने पर वह गांव उसी तरह हतश्री हो गया जैसे चन्द्रमा और तारों के प्रस्त हो जाने पर आकाश । इस कारण मै भी वहां से चला आया हूँ। Brabmcbari-I have no knowledge of this. All I know how have the king made lamentation. "Here we talked and laughed together here we told each other stories, here we passed the day. Here I was angry with her. Ilcre I did sleep with her" and thus lamenting, the king was with great effort taken away from the village by ministers; (and then ley) went. When the king had departed, that town lacked all attraction like the heavens bereft of the moon and the stars. Therefore I too departed. १. पाठान्तर-पक्रान्तमपश्यम् । २. अपकान्ते ।

स्वप्नवासवदत्तम् टिप्पणी--(१) जाने ने-जानता हूँ । यद्यपि जा घातु परस्मैपदी है और तदनुमार 'जाने की जगह 'जानामि प्रयोग होना चाहिए किन्तु 'अनुपसर्गोज्नः' इस सूत्र से मात्मनेपद कर देने पर जाने रूप हो सकता है। यही कारण है कि 'तन्न जाने सखे है, 'जानीते नितरामसी गुरुकुलक्लिष्टो मुरारिः कविः' इत्यादि प्राचीन इलोकों में ज्ञा घातु के पात्मनेपदी रूप मिलते हैं । (२) पर्युषितम्-रहा, स्थित हुआ। परि/वस्+क्त (मावे) 'ग्रहिज्यायिव्यघि' इत्यादि सूत्रेण सम्प्रसारणम् तथा 'वसतिक्षुधोरिट' इति स्त्रेण इडागमः । इसी प्रकार हसितम्, कुपितम्, शयितम् में क्त प्रत्यय हुमा है। (३) प्रोषितनक्षत्रचन्द्रम्---चन्द्रमा और नक्षत्रों से विहीन । प्रोपित अन्तहित । (४) नम-आकाश । 'नमोऽन्तरिक्ष गगनम्' इत्यमरः। यहां लावाणक ग्राम की तुलना माकाश से, राजा उदयन की समता चन्द्रमा से तथा मंत्रियों की उपमा नक्षत्रों से दी गई है। तापसी-सो खु गुणवन्तो पाम रामा, जो प्राअन्तुएण वि इमिणा एवं पसंतीप्रदि । [स खलु गुणवान् नाम राजा य प्रागन्तु- केनाप्यनेनैवं प्रशस्यते । तापसी-वह राजा अवश्य ही गुणवान् है, जिसकी प्रशंसा बटोही भी इस प्रकार कर रहा है। Lady ascetic—That king is certainly virtuous, as he is praisd even by such a new.comer. चेटो-भट्टिदारिए ! कि णु खु अवरा इत्यिा तस्स हत्यं गमिस्सदि? [भर्तृ दारिके ! किन्नु खल्वपरा स्त्री तस्य हस्तं गमिष्यति ?] दासी-राजकुमारी जी ! क्या दूसरी स्त्री उनके हाथ जायगी? (अर्थात वे दूसरा ब्याह करेंगे?) Maid--Is it possible that another woman may falt in his hands (i. e. marry him) पदमावती--[आत्मगतम्] मम हिअएण एव सह मंतिदं । [मम हृदयेनैव सह मन्त्रितम् ] । पद्मावती-(मन में) मेरे मन के समान ही सोचा (अर्थात् मेरे मन की बात कही)। Padmavati-(To herself) My heart too thinks likewise.

प्रथम अंक १५ , ब्रह्मचारी--प्रापच्छामि भवन्तौ । गच्छामस्तावत् । ब्रह्मचारी--प्राप दोनों की अनुमति चाहता हूं। मैं अब जा रहा हूँ। Brabmcbari I take leave of you both we go now. उभौ-गम्यतामर्थसिद्धये। दोनों-प्रयोजन-सिद्धि के लिए जाइये। Both-Go for success in your under-taking. ब्रह्मचारी- तथास्तु । (निष्क्रान्तः) ब्रह्मचारी-अच्छा । (चल देता है) Brahmchari-Let it be so (Exit). यौगन्धरायणः-साघु, अहमपि तत्रभवत्याभ्यनुज्ञातो गन्तु- मिच्छामि । योगापरायण-मच्या, में भी राजकुमारी जी से प्राज्ञा लेकर जाना चाहता हूँ। Yang.-I too wish to go after permission from her ladyship. काञ्चुकीयः--तत्रभवत्याभ्यनुज्ञातो गन्तुमिच्छति किल । कंचुकी-मापसे अनुमति लेकर ये भी जाना चाहते हैं । Chamberlain--He wisbes so after permission from your ladyship. पद्मावती-अयस्स भइणि अय्येण विना सक्कण्ठिस्सदि । प्रार्यस्य भगिनिकायण विनोत्कण्ठिप्यते ।] पद्मावती-इनरी वहन इनके बिना एवडाएगी। Padmavati-Your sister may feel alone in your abscocc. योगन्धरायणः-साधननहस्तगतैपा नोत्कण्ठिप्यते । [फाञ्चुकोयम- यलोक्य] गच्छामस्तावत् । पौगापरायण-मले लोगों के हाथ में पड़ने के कारण यह नहीं परराएगी। (संधुषी को देखकर) में प्रय जागा हूँ। Yaog.-She will not feel alone when she is in the bands of good persons, (looking to the Chamberlain) me go now. काञ्चुकीयः-वाच्यतु भवान् पुनर्देशनाय । पंचती-जाइये पार, फिर दान शैजिएगा। Chamberlain-May your bodour go for a later visit. to यौगन्धरायणः--तथास्तु । (निष्क्रान्तः) पौगन्धरायण--अच्छा । (चल देता है) Yaug.---Let it be so (exit). काञ्चुकीयः :--समय इदानीमभ्यन्तरं प्रवेष्टुम् । कंचुकी- --अब मीतर चलने का समय हो गया। Chamberlain-It is time now to go in. पद्मावती--अय्ये ! वंदामि । [मायें ! वन्दे ।] पद्मावती-प्रार्य ! प्रणाम करती हूं। Padmavati-Madam I salute.: तापसीजादे ! तव सदिसं भत्तारं लभेहि ! [जाते ! तव सदृशं भर्तारं लभस्व ।] तापमी--पुत्री ! तुम्हें अपने योग्य पति मिले। Lady ascetic-Child may you find a husband worthy of you. वासवदत्ता--अय्ये' ! वदामि दाव प्रहं । [पायें ! वन्दे तावदहम् ।] वासवदत्ता-पायें ! मै भी प्रणाम करती हूँ। Vasava—I too salute, you lady. तापसी--तुवं पि अइरेण भत्तारं समासादेहि । [त्वमपि अविरेण भर्तारं समासादय । तापसी-तुम्हें भी शीघ्र तुम्हारा पति मिले । Lady ascetic--You, too may be soon united with your lord. वासवदत्ता-अणुग्गहीदम्हि । [अनुगृहीतास्मि ।] वासवदत्ता--अनुगृहीत हूं। Vasava.-I feel obliged. काञ्चुकीयः--तदागम्यताम् । इत इतो भवति ! सम्प्रति हि- फंचको-तो ग्राइये । इघर से चलिये, इधर से। इस समय- Chamerlain-Then come. This way. this way Madam; टिप्पणी (१) गुणवान्-प्रशस्ता: गुणाः सन्ति यस्मिन् इति विग्रहे गुण+ मनुप् । (२) नाम-एक अव्यय है, जिसका प्रयोग वाक्य को अलंकृत करने के लिए पाठान्तर---१. मज्ने । गच्छामि । २. लमहि । - for now:- .

प्रथम प्रक
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किया जाता है । यहाँ व्यग्यार्य यह है कि ऐसा गुणी राजा निश्चित ही पद्मावती
का पर होने योग्य है। (३) हस्तं गमिष्यति-हस्तगत होगी, विवाह करेगी।
यहाँ मी व्यंग्यार्थ है कि पापको ऐमे अप्रतिम प्रेमी का वरण अवश्य करना चाहिए ।
(४) मम हृदयेन सह--मेरे मन के अनुसार । इसकी तुलना कीजिए शकुन्तला
को उक्ति से--'हृदय मा उत्ताम्य ! एपा त्वया चिन्तितानि अनसूया मन्मयते' ।
(५) प्रापच्छामि---विदा चाहता हूँ। यहाँ 'प्राडि नुप्रच्छ्योः' इस वात्तिक
से प्रात्मनेपद होना अनिवार्य है । तब शुद्ध रूप प्रापृच्छे' लिखना चाहिए था।
किन्तु 'निरंकुशाः कवयः' कहकर अयवा प्रा और पृच्छामि अलग-अलग पद
मान कर समाधान कर सकते हैं । अयवा उदयन की दशा का वर्णन करते-करते
उम ब्रह्मचारी का चित विह्वल हो जाता है जिमसे वह अशुद्ध प्रयोग कर देता
है, कदाचित यह माव दिवाना कवि को अभिप्रेत हो तो प्राश्चर्य नहीं। (६) सत्र-
भवत्या--माननीया, पद्मावती। (७) अम्पनुजात:-~-प्राज्ञा प्राप्तः सन् ।
अभि+मन+मा+क्त (स) कर्मणि । (क) किल-वाक्य की शोमा बढ़ाने के
लिए इस अव्यय का प्रयोग किया जाता है । (६) उत्कण्ठिध्यते--उन्मन या उदाम
होगी । उत्+कण्ठ+लुट् प्र०पु०ए०२० । (१०) सापुजनहस्तगता-~साधुश्चासी
जनश्च कर्मधारय समास, तस्य हस्त: पष्ठीतत्पुरुष, तं गता द्वितीयातत्पुरुष । नले
प्रादमी के प्राश्रय में स्थित । (११) गच्छामस्तायत--प्रव में पलता है।
यहाँ प्रादर में बहुवचन हुमा । (१२) तावत्--यह वाक्यालंकाराय है।
(१३) दर्शनाप-दर्शन के लिए । दा+ ल्युट-अन मावे-दर्शनम् तस्म. 'तुमर्याच्च
भावाचनात्' प्रर्यान् मन् प्रत्यय के अयं को ध्यान करने के लिए उमी घातु से
बनी हुई भाववाचक मशा का प्रयोग करने पर उममे चतुर्यों होती है।
(१४१ मन्यन्तरम् --गुटी के मौतर । (५) सब ससम्--यहां 'तुल्यायरतु.
लोरमाम्या तृतीयान्तरपाम् इम मूत्र में तृतीया विकल मे होने कारण
पाठी हुई। (१६) समासादर--प्राप्त करो। गम् +बाद+गद+णि लोट् म०
पु०ए०२० । तारमी वासवदत्ता को पर पागोवाद दे रही है क्योकि यह
पनिवियुका है।
सगा यासोपेताः सलिलमयगाटो मुनिजनः
प्रदीप्तोऽग्नि ति प्रपिचरति घमो मुनियनम् ।
परिभ्रप्टो दूरादविरपि च मंक्षिप्तकिरणों
रयं ध्यायांसो प्रविमति शनरस्तशिपरम् ॥१६॥

स्वप्नवासवदत्तम् (निष्क्रान्ताःसर्वे ।) इति प्रथमोऽडकः पन्यय--वगा: वासोपेताः। मुनिजनः सलिलम् प्रवगाढः। प्रदीप्तः अग्निः भाति । घूमः मनिवनम् प्रविचरति । दूरात् परिभ्रष्टः च संक्षिप्तकिरणः भमा रविः अपि रथं ब्यावयं शन: मस्तशिखरं प्रविशति ।।१६।। संस्कृत टीका-~-सगा:--पक्षिणः, वासोपेता:--वासं निवासस्थानं नोई यावत् उपेताः प्राप्ताः। मुनिजन:-तपस्विनः, सलिलम्--जलम्, अवगाह:--- पवतीर्णः प्रविष्टः इत्यर्थः । प्रदीप्तः-प्रज्वलितः, अग्नि:-वह्निः, माति- भागते । धूमः-वह्निजन्यः, मुनियगम्-तासाश्रम, प्रविचरति--व्याप्नोति । रात्दूरस्यानात्, परिभ्रष्ट:-~-ध्युतः, --पुनः, सक्षिप्तकिरण:--सभिप्ताः उपसहता: किरणाः रस्मयः मेन स तथाविधः, प्रमो-दृश्यमानः, रवि:--सूर्यः, अपि, रयं-स्वस्य यानं, व्यावत्यं-सनिरोध्य, शन:---मन्दम्, मस्तशिखरम्-- मस्ताचलस्य शृङ्गम्, प्रविशति-गच्छति । (प्रयं भावः-मादिनमाहारययनेन परिधान्ता: पक्षिणः स्वस्वनीड प्रविशन्ति । तपस्विनः स्नातु जसारायम् भवतन्ति । जाग्वल्पमानः प्रातः स्मातों वा अग्निः शोभते । गगनतलात् पतितः सूर्यः मन्दी- पकिरणः मन् स्वकीयं रयं परावत्यं नः धन: प्रस्ताचलशिखरमारोहति । मनीभिः लागः सायवेला समागतेत्यनमीयते । पोपमामिः मुटीराम्पनरं गनव्यम् ।) ॥१६॥ मनुवाद-सो पोमलों में चले गये हैं। मुनि लोग (स्नान परने पे लिए। जल में पार गर्द है । उसती हुई पाग चमक रही है। पुमा सपोर में पंस रहा है । दूर गे गिरा हुमा भौर मरनी किरणों को ममेट सेने वाला यह न मी ग को मोटा पर पोरे पोरे मलागल को पोटी की पोर जा रहा है ॥१६॥ (गमा प्रस्पान) पहला प्रा ममान। The birds bave resorted to their abodes, the sages have plunged into water, the flaming firss shine brilliantly, the smol: is moving onward in th: ascetic grove. The sun too with bears sfonly down towards the selling moustain. (Excunt Ogur.es) End of Act I. टिप्पणी-(1) सणा:-मिडियामा पनि तिमा पर गुपित nिt New हिमा । (२) शमोरेता:-- मान को भोगनों में पाए हैं।

प्रथम अंक
वासम् उपेताः, द्वितीयातत्पुरुष समास । उपेताः--उVण+क्त कर्तरि
'गत्यकर्मक' इत्यादिना । (३) सलिलम -जल । 'सलिलं कमलं जलम्'
इत्यमरः। (४) प्रयगान:--
--(जल मे) प्रविष्ट । प्रविष्ट । प्रव/गाह+का (त)
फरि। (५) प्रदीप्त:--प्रज्वलित । प्र/दीप्+क्त (त) कर्तरि दीप घातोः
अकर्मकत्वात् 'गत्याकर्मक' इत्यादिना । (६) प्रविचरति-व्याप्त कर रहा है।
यहाँ व्याप्ति अयं मानने पर ही मुनिवनम्' में कर्म में द्वितीया हुई है । (७) संक्षिप्त.
शिरण:--जिसकी किरणें संकुचित हो गई हो। (८) प्याययं-लोटा कर।
वि+माह+वृत्+णिच् + ल्यप् । प्रस्ताचल को जाते हुए सूर्य का स्वाभाविक
चित्र पनित किया गया है। इसी तरह का माव 'अभिज्ञानशाकुन्तलम् मे मिलता
है-'सोऽयं चन्द्रः पतति गगनादलोषमयूखः' । माम ने यहाँ सन्ध्या का कमा
मूक्ष्म एवं हृदयग्राही वर्णन सरल, सरस तया प्रयंवोधगम्य मापा में प्रस्तुत किया
है। इस श्लोक में 'खगा यासोपता:' इत्यादि हेतुप्रो से मध्याकाल का अनुमान
किया गया है, इसलिए अनुमान प्रलंकार है और शिखरिणी छन्द है । तल्लक्षणं
काव्यप्रकाशे-'मनुमानं तदुक्त यत् साध्यसाधनयोवंचः ।' अर्थात् साध्य-मापन
का पयन फरना अनुमान पलकार होता है ॥१६॥

पसर्पामि अम्मो ! इयं भर्तृ दारिका उत्कृतकर्णचलिकेन व्यायामस- अथ द्वितीयोऽङ्कः [ यह द्वितीय अंक पद्मावती का वासवदत्ता के साथ गेंद खेलने से प्रारम्भ होता है । बहत देर खेलने के पश्चात् वह विश्राम करने लगती है। उसी समय पद्मावती की दासी द्वारा ज्ञात होता है कि राजकुमारी उदयन के गुणो पर मुग्य है । तदनन्तर सूचना मिलती है कि पद्मावती का विवाह उदयन के साथ तय हो गया तथा नाज ही पाणिग्रहण की शुभ घडी है ।] (ततः प्रविशति चेटी) चेटी--कुञ्जरिए ! कुञ्जरिए ! कहिं कहि भट्टिदारिया पदुमावदी किं भणासि, एसा भटिदारिमा माहवीलदामण्डवस्स पस्सदो फन्दु एण 'कोलदिति । जाव' भट्टिदारिअं उबसप्पामि । (परिक्रम्यावलो. क्य) अम्मो इअं भट्टिदारिमा उक्करिदकण्णचूलिएण वाआमसञ्जा दसेदविन्दुविइत्तिदेण परिस्सन्तरमणोप्रदंसणेण महेण कन्दुएण कोलन्दी इदो एव्व आप्रच्छदि । जाव उपसप्पिस्स[कुञ्जरिके! कुञ्जरिके ! कुत्र कुत्र भर्तृ दारिफा पद्मावती ? कि भणसि, एपा भर्तृ दारिका माघ- बोलतामण्डपस्य पाश्वतः कन्दुकेन क्रीडतीति । यावद् भर्तृ दारिकाम- जातस्वेदविन्दुविचिनितेन परिश्रान्तरमणीयदर्शनेन मुखेन कन्दुकंन कोडन्तीत एवागच्छति । यावदुपसर्वामि ।] (निष्क्रान्ता) संस्कृत टोका-रगमंच समागता चैटी कुञ्जरिकास्यायाः घेटयाः नामोल्लेख- पुर: सर प्रसङ्गानुकूलं वचनमुपक्षिपति--कुञ्जरिके इति, कुत्र-4व, मनु दारिका राजकुमारी, पद्मावती । किं भगमिद कयास, एषा मतदारिखा, माधवी- सतामण्डपस्यमाघवीलतायाः वासन्तीलतायाः मण्डप निकजः तस्य, पायंड:- निवटे, कन्दुरेन-गेन्दुकेन, प्रोडति--संतति । यावत्-प्रतः, मतदारिकाम, उपमामि-उपगन्धामि । प्रमो-विस्मयानन्दसूचकमव्ययमिदम्, पाप- १. पाठान्तर-दारिम्य पदुमावदी। २. पस्मगदा (पावंगता) । ३. कोपन्दी। ४. ति। गद तुवं । ५. पहं वि ! ६. पसपामि। .

द्वितीय प्रक माना, मतदारिका, उत्कृतकर्णचूलिकन--उत्कृते उपरिकते कर्णयोः इति शेपः कणंचूलिके कर्णावतंसो यस्मिन् तेन तथाभूतेन, व्यायामसम्ञातस्वेदविन्दुविचित्रि. तेन-व्यायामात् कन्दुाक्रोडाजन्यायासात् सज्ञाताः समुत्पन्नाः स्वेदविन्दवः धमोदककणाः तः विचित्रितेन प्रपूत्रसौन्दर्य दयता, परिश्रान्तरमणीयदर्शनेन-- परिश्रान्तेन-क्लान्त्या रमणीपं कमनीय दर्शनम् अवलोकन यम्य तादृशेन, मरेन-पाननेन उपलक्षिता इति शेप, कन्दुकेन, श्रोडन्ती-गलन्ती। इत एव-इममेव प्रदेशम्, मागच्छति-~ममायाति । यावत्-वारयालंकररायमेतत्, उपमामि-समीपं गमिष्यामि । (तदनन्तर दासी मा प्रवेश) वासी-मरो जरिका ! राजकुमारी पद्मावती यहाँ है पया बहती हो, यह राजकुमारी माधवी युज को बगल मे गेंद गेल रही है। अच्छा, तो राजमारी के पाग चल । धूम पर मोर देगकर) पोहो! यह राजकुमारी, जिमने कर्णफूलो को कार उठा लिया है मौर जिसमा मुग व्यायाम गे उत्पन्न पीने को दो से विलक्षण एवं पवावट मे रमणीप दीप रहा है, गेंद गलती हुई पर ही मा रही हैं। पच्छा, ममोप तो गले । (पली गई) (Then enter a maid) Maid-Kunjarika, where is the princess padasvati ? What do you say Here the princess is playing with a ball in th: vicinity of the bower of Madhavi (jasminc) creepers. I shall now go to the princess. (Turns about and lookins) Oh I here only comes the princess, the locks of hair on her car put up. her face looking beautiful on account of fatigue and bespangled risb drops of perspiration through exercise and playing with a ball, I shall just approach her (rxit) ७२ स्वप्नवासवदत्तम् इत्यमरः। (५) अम्मो--हर्ष तथा पाश्चर्यसूचक अव्यय । (६) उत्कृतकर्ण- चूलिकेन--कीड़ा से समय कर्णफूलों या कुंडलों को कानों पर चढ़ाए हुए । (७) व्यायामसञ्जातस्वेदबिन्दुविचित्रितेन--कन्दुक-क्रीडा की श्रान्ति से निकले हुए पसीनों की बूदों से अपूर्व छवि वाले ।।६) मुखेन-इसमें 'इत्यभूततक्षणे' सूत्र से तृतीया हुई। प्रवेशकः [ततः प्रविशति कन्दुकेन क्रीडन्ती पद्मावती सपरिवारा वासव- दत्तया' सह ।] (तब गेंद खेलती हुई पद्मावती परिजनों तथा वासवदत्ता के साथ माती हैं ।) (Then enter Padmavati playing with a ball accompanied by her attendants and Vasavadatta). टिप्पणी-(१) प्रवेशकः-दो अंकों के बीच का एक प्रकार का अंक जिसमें नीच पात्र न दिखायी हुई तथा भावी घटनाग्रो की सूचना देते हैं। जैसा कि साहित्यदर्पणकार ने कहा है-'प्रवेशकोऽनुदात्तोक्त्या नीचपात्रयोजितः । पकद्वयान्तविज्ञेयः शेषं विष्कम्मके यथा ॥ विष्कम्भक का लक्षण यह है-- 'वृत्तवतिष्यमाणाना कथांशाना निदर्शकः । संक्षिप्तार्थस्तु विष्कम्भ मादावस्य दशितः ।। मध्येन मध्यमाभ्यां वा पात्राम्या सम्प्रयोजितः । शुद्धः स्यात् म तु मंकीर्णो नीचमध्यमकल्पितः। वासवदत्ता-हला! एसो दे कन्दुओ। [हला! एष ते फन्दुकः] । पासवदत्ता-सखी! यह तुम्हारा गेंद है। Vasara-Oh, here, this is your ball. पद्मावती-अय्ये ! भोदु दाणि एत्तमं [पायें ! भवतु इदानीम् एतावत् । पद्मावतो-पायें ! इस समय इतना ही पर्याप्त है। Padmarati-Madam, it is enough now. यासयक्ता--हला ! प्रतिचिरं कन्दुएण कोलिन अहिप्रसञ्जादराआ परफेरपा विन दे हत्या संवत्ता। हला ! अतिचिरं फन्दुकेन कोडित्वाधिकसजातरागो परकीयायिव ते हस्तौ संवृत्तौ ।] १. पाठान्तर-प्रावन्तिका वेषधारिणी वासवदत्ता छ । २. पाठान्तरमना किणिमित्त वारेसि किनिमित्तं वारयसि ।

द्वितीय अंक सस्कृत टीका--हे सखि !, प्रतिचिरं-दीर्घकालं, कन्दुकेन, कीडित्वा- खेलित्वा कन्दुकेन क्रीडनादेतोरित्यर्थः, ते~-तव, हस्ती--करो, अधिकसजात- रागो-अधिकम् बहु (सजननक्रियायाः विशेषणमिदम् । सजातः उत्पन्नः रामः लालिमा ययोः तो, परकीयो, अन्यदीयो, इव-तद्वत्, संवृत्ती- सजाती । वासवदत्ता-सखी ! अधिक देर तक गेंद खेलने के कारण लालिमा बह जाने से तुम्हारे हाय मानो पराये हो गए हैं । Vasara.-Friend, having played with the ball for a very long time your hands, with their reddishness enhanced greatly as it were, now belong to another, टिप्पणी-(१)हला यह सम्बोधनसूचक अव्यय है। इसका प्रयोग सखी के लिए किया जाता है-'हण्दे हजे हलाह्याने नीचा चेटो सयौं प्रति' इत्यमरः । यहाँ स्पप्टार्थ यह है-'मह तुम्हारा गेंद है । सो, खेलो। (२) एतायत्-यहाँ तात्पर्यायं यद है-बहुत देर तक खेलने से में पक गई हूँ और अधिक खेलना नही चाहती हूँ। इसलिए इस समय इतना ही रहने दो। (३) कन्दुकेन-गेंद से । इसमे 'साधकतम करणम्' सूत्र से करण सजा होने पर तुतीया हुई। (४) क्रीडित्या -लकर । यहाँ हेत्वयं मे क्त्वा प्रत्यय हुमा है । "क्रीटित्वा' के बाद'मलान्तायाः' पद का मध्याहार करने पर 'समानक्त कयोः पूर्वकाले मूत्र से मत्वा प्रत्यय के होने में कोई बापा नहीं है । यही मावार्य यह है कि जैसे दूसरे ने हाथ अपनाया करने में असमर्थ होते हैं उसी तरह बड़ी देर तक क्रीडा करने से पके हुए तुम्हारे दोनो हाप इस समय मानो दूसरे के हो जाने से गेंद खेलने में असमर्थ है । गूढार्य तो यह है कि प्रत्यन्त लालिमा से युक्त तुम्हारे दोनों हाप भव पीघ्र ही पाणि- ग्रहण होने पर परापे हो जाये। (५) परकीयो-दूसरे के । पर+ (ईय) मोर तर मुक्का मागम । (६) संवृत्तो-हो गये हैं। गम् +त+रत (त) कतरि। घेटी-कोल कोल दाव भट्टिदारिमाणिवत्तीप्रद वाय प्र कण्णाभायरमणोमो कालो । [क्रोग्तु कोतु तावद् भनदारिका । नियंत्यंता सायद् अयं कन्याभावरमणीयः कालः 1] राती-राजमारी व गैगरेपन के इस रमगोप समय को पार करें। Maid-Nay despa, plsyiog. princess and enjoy these goldca hours of girlhood while you may.

स्वप्नवासवदत्तम् पद्मावती---अय्ये ! कि दाणि म ओहसिद्ध विश्न णिज्झामसि । प्रायें ! किमिदानी मामपहसितुमिव निध्यायसि ।। पद्मावती-प्रार्ये ! क्या इस समय मेरी हंसी उड़ाने के लिए ताक रही हो? Padmavati-Madam. why do you seem to be. thinking of making fun of me. वासवदता-- --णहि पाहि । हला! अधिरं अज्ज सोहदि । अभिदो विन दे अज्जवरमुहं पेक्खामि । (नहि नहि। हला! अधिकमद्य शोभते । अभित इव तेऽद्य वरमुखं पश्यामि ।] संस्कृत टीका--नहि नहि--नो नो । हला !-सखि । प्रद्य--प्रधुना, (ते मुखम्) अधिकम् ~~-अत्यन्तं, शोमते-राजते । प्रद्य ते, वरमुखं--वरस्य वरणकर्तुः मुखं वदनम्, अमित इव-प्रासग्नमिव, पश्यामि, साक्षात्करोमि । यासयदत्ता-नही नहीं । सखी ! तुम्हारा मुख प्राज बहुत शोभित हो रहा है । पव में तुम्हारे वर का मुख निकट ही देख रही हूँ। Vasara. -Oh no, I do not. You are lovelier to-day than ever and I wish to see your pretty face from every point of view. टिप्पणी--(१)क्रोउतु क्रीडतु–यहाँ पौनःपुन्य के अर्थ में द्वित्व हुमा है। (२)निर्वत्यंताम्--उपयुक्त कर्म में (खेल मे) लगावें। निर+वृत्+णिच्+ लोट् । प्र० पु० ए० २०। (३) कन्याभावरमणीयः-यालोचित लीला से मनोहर । कन्यामादेन कौमार्येण रमणीयः । माव यह है कि माप मपनी इग किशोरावस्या को वालोचित सेल में बितायें । कन्या शब्द की परिमापा साहित्य- दर्पणकार ने इस प्रकार दी है-कन्या त्वजातोपयमा सलज्जा नवयौवना ! यस्मिन् काले बालानां वन्यात्वमुपजायते ।। कन्याभाव में स्वभावतः सौन्दर्य रहता है। नि+ध्य+लट् म० पु० ए०१०। (४) निम्यापसि-पस्यसि । एकटक देख रही हो। 'निध्यानं दर्शनालोकनेक्षणम्' इत्यमरः । (५) नहि महि-निषेध की दृढ़ता दिखाने के लिए दो वार उच्चारण किया गया है। भाव यह है कि सुम्हारा करने के लिए तुम्हारे मुस को नहीं देख रही है, बल्कि पात्र तुम्हारे मुम की गोमा ही मुझे यह सोचने के लिए वियर कर रही है कि मानो तुम्हारा प्रियतम तुम्हारे ममीप ही विद्यमान है, जिसके समागम के सोमाय मुन्दर मग रही हो। १. पाठालर-मोहसि । तुम इतनी द्वितीय अंक ७५. पद्मावती--प्रवेहि । मा दाणि मं मोहस । [अपेहि । मैदानी मामपस 11 पद्मावती-~-हटो अब मेरी खिल्ली मत उडायो । Padmarati-Go away. do not laugh at me. वासवदत्ता एसहिल तुहशीआ भविस्सम्महासेणबहू ! एपास्मि तष्णोका भविप्यन्महासनयधु !! वासयदता--प्रच्छा लो महासेन जी की मावी पतोह ! में चुप हो गई। Vasara.--Oh would be daughter-in-law of Mahasena here I kecp quict. पद्मावती-फो एसो महासेणो णाम? [क एप महासनो नाम ?] पद्मावती-ज्य महासेन कौन है ? Padmavati-Who is this Mahasenar यासयदत्ता-अस्थि उज्जइणीयो राम्रा पज्जोदो णाम। तस्स बल- परिमाणिध्यतं णामहेनं महारोणोति । अस्ति उज्जयिन्या राजा प्रद्योतो नाम तस्य वलपरिमाणनितं नामधेयं महासेन इति ।) यासयदत्ता--उज्जैन के राजा प्रद्योत हैं । विमान वाहिनी के स्वामी होने वे पारण उनका नाम महामेन पड गया है। Vasara-There isa king of Ujjain by name Pradyota Mahasena is his name from the size of this army. घंटो-भट्टिदारिआ तेण रजा तह सम्बन्यं पेच्छदि ! [भन. दारिफा तेन राजा सह सम्यन्य नेच्छति ।) दासी- राजकुमारी उस राजा के साप सम्बन्ध करना नहीं पाती। Mad-The princess desires to have no connection with him- वासवदत्ता-प्रह फेण ए दाणि अभिलसदि? (अय फेन सस्थिदा. नीमभिलपति ?) यावदसानो शिर रिण माप पारती है ? Vasara.-There with whom does she desire it ? घंटी-अयि यधरापो उपप्रणो गाम । तस्स गाणि भट्टदारिमा अभिसदि । (अस्ति वत्सराज उदयनो नाम भदारिकाभिलपति ।। सस्प गणान् "७६ स्वप्नवासवदत्तम् दासी -उदयन नाम का वत्स देश का राजा है। राजकुमारी उसी के गुणों पर लट्ट हैं। Maid-It is Udayan; the Vatsa king. It is for his virtues that my lady loves. वासवदत्ता-(आत्मगतम्) अय्यउत्तं भत्तारं अभिलसदि । (प्रकाशम्) केण कारणेण ? [ आर्यपुत्रं भर्तारमभिलपति । केन कारणेन ? 1 वासवदत्ता-(मन मे) प्रार्यपुत्र को स्वामी बनाना चाहती है । (प्रकट) किस कारण ? Vasava.--(To herself) It is my lord,my husband that she loves (aloud) say for what virtues ? चेटी-साणुक्कोसोत्ति । (सानुक्रोश इति ।) दासी-चूकि वह दयालु हैं। Maid--For his loving kindness- वासवदत्ता--(आत्मगतम्) जाणामि जाणामि । अप्रं वि जणो एव्व उम्मादिदो। ।जानामि जानामि। अयमपि जन एवमुन्मादितः । -(मन मे) जानती हूँ, जानती हूँ, यह व्यक्ति भी इसी प्रकार 'उन्मत्त बनाया गया था। Vasara.((To herself) I know, I koow it was this that won my heart, च टो-भट्टिदारिए ! जदि सो राआ विख्यो भवे? [भत- दारिके ! यदि स राजा विरूपो भवेत् ?] दासी-राजकुमारी ! यदि वह राजा कुरूप हो, तो? Mald-(To Padmavati) whatif the prince should prove to beill-favoured. चासवदत्ता -हिणहि । दसणीओ एव्व । (नहि नहि । दर्शनीय पासवदत्ता नही, नहीं । वे तो देखने योग्य ही हैं अर्थात् बड़े ही मुन्दर है। Vasara.-Oh no, Oh no, he is a handsome prince. पद्मावती--अय्ये ! कहं तुवंजाणासि? [आयें! कथं त्वं जानासि?] परावती--मायें । तुम के जानती हो ? वासवदत्ता-- द्वितीय मंक ७७ Padmaryti-Lady, how do you know ? वासवदत्ता--[आत्मगतम्) अय्यउत्तपक्खवादेण अदिक्कन्दो समुदा- आरो। कि दाणि करिस्सं? होदु, दिळं। (प्रकाशम्) हला ! एवं उज्जईणोओ जणो मन्तेदि ? (आर्यपुत्रपक्षपातेनातिकान्तः समुदाचारः । किमिदानी करिष्यामि ? भवतु, दृष्टम् । हला! एवमुज्जयिन्याः जनो मन्त्रयते ।) संस्कृत टीका--आर्यपुत्रपक्षपातेन-प्रार्यपुत्रस्य स्वामितः उदयनस्य पक्षपातेन तत्पक्षसमर्थनेन तस्य रूपशालित्वस्य प्रशंसयेति यावत्, (मया) समुदाचार:--- शिष्टाचारः कर्तव्यमिति यावत्, अतिक्रान्तः-उल्लंधितः । इदानीम्-प्रधुना, कि करिष्यामि ?--कि विधास्यामि ?, भवतु,-प्रस्तु, दृष्टम्-ज्ञातम् उत्तरमिति शेपः । हला!--सखि !, उज्जयिन्याः जनः--उज्जयिनीवासिनो लोकाः, एव मन्त्रयते-इत्थ कथयन्ति । वासवदत्ता-(मन मे) आर्यपुत्र का पक्ष लेकर मैने कर्तव्य की अवहेलना की । अब क्या करूं? अच्छा, उत्तर सूझ गया । (प्रकट) ऐसा उज्जैन के लोग कहते है। Vasara.-to herself) My eagerness to praise my lord made me forget myself, what shall I do now ?Ah ?I have it (aloud) why, so all the people of Ujjain declare. टिप्पणी-(१) अहि-दूर जा । अप उपसर्गपूर्वक इण् गतो धातु के लोट् लकार--- मध्यम पुरुप-एकवचन का यह रूप है । (२) मा-यह निषेधार्थक अव्यय है । प्रतएव 'अपहस' में विध्ययं मे लोट् लाकर हुमा है, अन्यया 'माडि लुद्ध' सूत्र से लुद्ध लकार हो जाता। (३) भविष्यन्महासेनवधु- होने वाली महासेन की वधू । महती सेना यस्य स महासेनः, तस्य वधः महासेनवधूः मविष्यन्ती चासो महासेनवधूश्च मविष्यन्महासेनवः तत्सम्बुद्धो भविष्यन्महासेनवयु ! "स्त्रियाः पद्मापित'-इत्यादि मूत्र से 'मविप्यन्ती' मे वझाव हुा । 'वपूः' मे दिति हस्वश्च' सूत्र से नदीसज्ञा, 'अम्बार्यनद्योहंस्वः' सूत्र से हस्वता और 'एडह्रस्वात् सम्बुद्धः सूत्र से 'सु' का लोप होने पर 'वधु' यह सम्बोधन' का रूप सिद्ध होता है। 'वधू' कहते हैं पतोहू को-'वपूर्जाया स्नुषा स्त्रीच' इत्यमरः । (४) तूष्णीका--चुप । तूष्णीशीलस्तु तूष्णीकः' इत्यमरः । 'तूष्णीम्' यह भव्यय है ।इसमे 'शोले को मलोपश्च' इस वार्तिक से क प्रत्येय मोर म् का लोप होने पर ७६ स्वप्नवासवदत्तम् "तूष्णीक शब्द बना, फिर तूष्णीक से स्त्रीलिंग में टाप होने पर तूष्णीका शब्द मिद्ध होता है। किसी पुस्तक में 'उज्जयिन्या राजा' की जगह 'उज्जयिनीयो' राजा 'पाठ है। इसकी व्युत्पति होगी-~-उज्जयिन्या अयम् इति उज्जयिनीयः उर्जायती सम्बन्धी । उज्जयिनी+छ: 'तस्पेदम्' इत्यधिकारे 'वा नामधेयस्य' इति वद. संज्ञाया 'वृक्षाच्छः' इत्यनेन, तस्य च 'आयनेयोनीयिय.' इत्यादि सूत्रेण ईयादेगः । (५) वनपरिमाणनिर्वृत्तम्-बलस्य सेनाया.परिमाणेन महत्त्वरूपेण निवृत्तम्- मम्पन्नम् अर्थात् असत्य मेना होने के कारण सम्पन्न । (६). वत्सराज-वत्मानां राजा वत्सराजः, 'राजाहः सखिम्यष्टच्' इति सूत्रेण समासान्तटचप्रत्ययः । (७) सानुक्रोशः--दयालु । अनुक्रोशः दया, तेन सहितः सानुक्रोश. । 'कृपा दयाऽनुकम्पा स्यादनुक्रोद्योऽपि' इत्यमरः । (८) समुदाचार:--सदाचार । सम्- उद्--प्राचर+घन (अ)। (६) मन्त्रयते--कानाफूसी करते हैं, कहते हैं । धुरादि गणीय गत्रि गुप्तपरिमापणे घातु के लट् लकार---प्रथम पुरुष-एकवचन का यह रूप है। पद्मावती-जुज्जइ। ण सु एसा उज्जइणोदुल्लहो । सधजण- मणोभिरामं पु सोभग णाम (युज्यते । न खल्वेष उज्जयिनी- दुर्लभः । सर्वजनमनोऽभिरामं खलु सौभाग्यं नाम 1) संस्कृत टोका--युज्यते---संगच्छते त्वदुक्तमिति शेपः। एप. श्रीमान उदयनः, उज्जमिनीदुर्लमः--उज्जयिन्याः ।उज्जयिनीवासिनामुपलभणात दुमः दुष्प्रापः, न चलनदेव (अस्ति) : सौमाग्य--पोन्दर्य', नाम--प्रतिद्वायंक. मेतत्, खल-निश्चयेन, सर्वजनमनोऽमिरामम्-सर्वेषां समस्ताना जनाना लोकाना मनमः पित्तस्य अमिरामम् आकर्षकम् (भवति)। प्रनुवार-ठोक है । उज्जैन के निवासियों के लिए उनका (उदयन का) दान दुर्लभ नहीं है । और मौन्दर्य सबके मन को प्राकृष्ट कर लेता है । Padmarati-Right. He is not difficult of access (to people) in Vjjain Indeed beauty gratifies the mind of all men. टिप्पणी-(१) न खस उज्जयिनीदुर्लभः-भाव यह है कि उज्जैन के सोगों के लिए उदयन का दर्शन दुर्मम नहीं है, क्योंकि वहाँ ममुराब होने के मारण ये कई बार गये पाये होंगे तो जब वहाँ के लोग उन्हें सुन्दर पहते हैं तब बोद पारण नहीं है कि वे मुन्दर न हो।

द्वितीय अंक ७६ घाई- (ततः प्रविशति धात्री) धात्री--जेदु' भट्टिदारिया। भटिदारिए ! दिण्णाति । [जयतु भर्तृदारिका। भर्तृदारिके ! दत्तासि ।] (तदनन्तर घाई का प्रवेश) धाई-राजकुमारी की जय हो । राजकुमारी! तुम दे दी गई अर्थात् तुम्हारी सगाई हो गई। (Then enter the nurse) Nurse-May fair fortune be fall your Royal Highness. Your hand has been bestowed. वासवदत्ता- --अय्ये ! कस्स [ आये ! कस्मै ?] वासवदता-देवी! किसे ? Vasava.-Revered lady on whom ? धानी-बच्छरामस्स उदअणस्स । [वत्सराजायोदयनाय 1] ई-वत्स देश के राजा उदयन को। Nurse--The Vatsa king, Udayan. वासवदत्ता --अह कुसली सो राया ! [अय कुशली स राजा ? ] वासवदता-वे राजा कुशल से तो हैं न ? Vasara.-Is the king doing well. धात्री-काशलो सोइह आअदो। तस्स भट्टिदारिमा पडिच्छिदा अ। [कुशली स इहागतः । तस्य भर्तृदारिका प्रतीप्टा च ।] घायो-वे कुशलपूर्वक माये हैं और उन्होंने राजकुमारी को (म्याहना) स्वीकार भी कर लिया है। Narse --The king is well and has come here and has accepted to marry my princess. यासपदता~'प्रच्चाहिदं ।' [अत्याहितम् । वासषरता-अनर्थ हो गया। Vasara-How terrible.? १. पाठान्तर । जे जेदु । २. गस्स दिग्गा (दता) । ३. पाठान्तर-- सो प्रापसे । ४, पाठान्तर--हिमसु एहं (सत्वेना ।।

स्वप्नवासवदत्तम् धात्री--कि एत्य अच्चाहिदं ? (किमत्रात्याहितम् ?) पाई-इसमें क्या मनयं हुमा Nurse--What is that ? why terrible? वासवदत्ता-ण हु किञ्चि । तह णाम सन्तप्पिा उदासीणो होदि ति । न खलु किञ्चित् । तथा नाम सन्तप्योदादीनो भवतीति] पासवदत्ता--कुछ नही । (वे राजा) उस प्रकार (वासवदत्ता के वियोग से) सन्तप्त होकर (वामवदत्ता से) उदासीन हो गये यही सोच कर मैने ऐसा पहा)। Vasava.--Nothing really. Having been pained in that way, now he has become indifferent. धात्री---अव्ये ! आअप्पमहाणाणि सुलहपय्यवत्याणाणि महापुरुस- हिअआणि होन्ति' । [आर्ये ! आगमप्रधानानि सुलभपर्यवस्था- नानि महापुरुषहृदयानि भवन्ति ।। पाई-..श्रीमती जी ! महापुरुषों के हृदय शास्त्रों पर विश्वाम करने के कारण आसानी से प्रकृतिस्थ हो जाते हैं। Nurse-Revered lady, the minds of great men are advanced. in knowledge and can casily become composed, वासवदत्ता--अय्ये ! स एव लेण वारिदा ?. [प्रायें ! स्वपमेय तेन वृता । घासयबत्ता-देवी ! क्या उन्होंने स्वयं वरण किया ? Vasara.--Revered lady, has she been chosen by himself (of his own free will)? धात्री--णहि पाहि । अण्णप्पग्रोअणेण इह विचाणयोरूयं पेविखन स एव महाराएण दिण्णा । [नहि नहि. अन्यप्रयोजनेनेहागतस्याभिजनविज्ञानययोरूपं दृष्ट्या स्वयमेव महाराजेन दत्ता । गंस्कृत टीका-नहि नहि नवम्। मन्यप्रयोजनेन-धारणान्तरेण, दह- मात्र, पागतस्य--समायातस्य, ममिजनविमानक्योरूपम्-भभिजनः बलम् विज्ञानम् शिक्षाशास्त्रपटुत्वम् वयः भवस्था सारुण्यमिति यावत् रूपम् सौन्दर्यम् इति दृष्ट्वा-प्रसोय, महाराजेन-दर्शकेन, स्वयम्-मात्मनेय, पत्ता- वामानेन समपिता। १. होन्ति सोममुग्णानि (पशुपानि)। आअदस्स अभिजण- द्वितीय अंक नही नहीं। किसी दूसरे उद्देश्य से पाये हुए उनके कुल, शिल्प और शास्त्रों • का ज्ञान यौवन तथा सौन्दयं देख कर महाराज ने स्वयं ही पद्मावती को दे दिया। Nurse-No, not certalnly. She was given by the king himself after noticing his exalted birth, achievements, age and personal charms when he came here on a different mission, टिप्पणी-(१) पात्रो-उपमाता, घाई । 'धात्री स्यादुपमातापि'इत्यमरः । (२) कुशली--कुशलयुक्त । कुशलम् अस्ति अस्य इति विग्रहे कुशल+इनि 'प्रत इनिठनो' इत्यनेन । (३) तस्य प्रतीष्टा--उन्होंने स्वीकृत वचन दे दिया है। यहाँ 'तेन प्रतीप्टा' होना चाहिए था, किन्तु कर्ता के अर्थ की अविवक्षा करके सम्बन्ध सामान्य मे पष्ठी हुई है। प्रति/इष्+क्त (त), टाप् (आ)-प्रतीप्टा। (४) प्रत्याहितम्--मारी अनर्थ, महाभय । 'प्रत्याहितं महाभीतिः' इत्यमरः । अतिशयेन प्राधीयते मनसि इति प्रत्याहितम्, प्रति--प्राVघा+क्त (त), दधातेहिः' इति सूत्रेण घा इत्यस्य हि प्रादेशः । (५) प्रागमप्रधानानि-शास्त्रो को महत्त्व देने बाले । प्रागमः शास्त्रम् प्रधानम् मुख्यो येषु तानि आगमप्रधानानि । (६) सुलभपर्ययस्थानानि--सु+लम्+खल् (प्र) कर्मणि । परि+व+स्था+ ल्युट् (अन) भावे--पर्यवस्थानम् । सुलमम्-अनायाससाघ्यम् पर्यवस्थानम्= प्रकृतिस्थितिः येषा तानि तथाविधानि । यहाँ वाक्य का तात्पर्य यह है कि शास्त्रों के ज्ञान से उद्भासित अन्तःकरण वाले पुरुष शीघ्र प्रकृतिस्थ हो जाते हैं । उदयन शास्त्रवेत्ता हैं अतः वे अब प्रकृतिस्थ हैं । उनमे उदासीनता नही है। इसलिए अनर्थ होने का कोई कारण नहीं है। (७) वृता--वरण किया । पत्नीत्वेन अमि- लपिता। व+क्त (त), टाप् (मा)। क्सिी-किसी पुस्तक में 'वरिता' पाठ मिलता है । ईप्सार्थक चुरादिगणीय वर घातु से क्त प्रत्यय करने पर इसकी सिद्धि होगी । (८) अन्यप्रयोजनेन-दूसरे प्रयोजन से। अन्यत् च तत् प्रयोजनम् अन्य- प्रयोजनम् कर्मधारय समास तेन । अत्र हेतो तृतीया अर्थात् करण मे तृतीया हुई है । (६) अभिजनविज्ञानवयोत्पम्-'अभिजनश्च विज्ञान च वयश्च रूपं च' इस विग्रह मे समाहार द्वन्द्व करने पर नपुंसकत्व और एकवचन हुमा । (१०) अभिजन-कुल । 'सन्ततिर्गोत्रजननकुलाग्यभिजनान्वयो' इत्यमरः । (११) विज्ञान-शिल्प पोर शास्त्रविषयिणी बुद्धि । 'विज्ञान शिल्पशास्त्रयोः' इत्यमरः । वर के लिए प्रावश्यक गुण ये बताये गये हैं--कुलं च शीलं च सनाथता च विद्या च वित च धपुर्वयश्च । स्व० ८०-११ . ८२ स्वप्नवासवदत्तम् वासवदत्ता--(प्रात्मगतम्) एवं ! अगवरद्धो दाणि एत्य अय्यउत्तो। (एवम् ! अनपराद्ध इदानीमत्रार्यपुत्रः ।। वासवदत्ता--(मन में) ऐसा । अब इसमे प्रार्यपुत्र का कोई दोष नहीं हैं। Vasava.--(To herself) Ab, then in this my lord is iot to blame टिप्पणी--(१) अनपराद्धः-अपराध या दोष से रहित । अपराष्+क्त (कतरि)॥ (प्रविश्यापरा) चेटो--तुवरदु तुवरदु दाव अय्या' । अज्ज एव्व किल सोभणं णक्खतं । अज्ज एव्व कोदुअमङ्गलं कादव्वं तिब्रह्माणं भट्टिणी भणादि । (त्वरतां त्वरतां तावदार्या । अव किल शोभनं नक्षत्रम् । अद्यव, कौतुकमङ्गलं कर्तव्यमित्यस्माकं भट्टिनो भणति ।) संस्कृत टोका-त्वरताम्-शीघ्रता करोतु, प्रार्याधात्री। प्रद्यव-- अस्मिन्नेव दिवसे, किल-निश्चयेन, शोमन-सुन्दरं, नक्षत्रम् (वर्तते) । मयैव, कौतुकमङ्गलम्--वैवाहिकसूरबन्धनरूपं मङ्गलकार्य, कर्तव्यम्--विधातव्यम्, इति-~-एवम्, अस्माकं, मट्टिनी--स्वामिनी महाराजदर्शकस्य पलीत्यर्थः, भगति-कथयति, माज्ञापयति इति यावत् ॥ अनुवाद--(दूसरी दासो का प्रवेश) दासो देवी ! शीघ्रता कीजिये । हमारी महारानी कहती हैं कि प्राज ही उत्तम नक्षत्र है। (इसलिए) माज ही कगन योधने का मंगलाचार सम्पन्न हो जाना चाहिए। (Enter another maid servant) Maid--Lady, make haste. make baste. This very day is the auspicious time, This very day the holy marriage tites must be performed, this is the behest of her majesty, the queen. टिप्पणी--(१) स्वरताम् त्वरताम्--अतिशय शीघ्रता सूचित करने के लिए दो यार उच्चारण किया गया है । (२) मोभनं नक्षत्रनाम नक्षत्र । यहाँ नक्षत्र सम्म शुम तिपि. लग्न मादिका मो उपलक्षक है 1 ज्योतिष में विवाह के लिए गुभ नाव, लग्न पादि ये कहे गये हैं-'रेवत्युत्तररोहिणीमृगमपामूलानु रामा करस्वाती प्रमानुलामियुनो लाने विवाहः शुमः । मासाः फाल्गुनमापमार्ग, गुनी ज्येष्ठतथा मापस्ता सौम्पदिन तय तिषयो रिकता बुहूदिताः ।' १. पाठासर-टिटवारिमा । मतदारिका । - द्वितीय मंक २३ (३) कौतुकमङ्गलम्-~-विवाह के अवसर पर वर और कन्या के हाथों में जो कगन बांधा जाता है, उसी को कौतुममंगल कहते है । 'कौतुकं स्वमिलापे स्यादुत्सवे नमहर्षयोः। विवाहसूत्रगीतादिमोगयोरपि न द्वयोः ॥ इति मेदिनीकोशः। मत्स्यपुराण के अनुसार कंगन में दूब, हल्दी आदि का व्यवहार किया जाता है- 'दूर्वायवा राश्चैव वालकं चूतपल्लवाः । हरिद्राद्वयसिद्धार्थ शिखिपत्रोरगत्वचः । कङ्कणोषधयश्चताः कौतुकास्था नव स्मृताः ।' कौतुकरूपं मङ्गलम् इति कोतुक- मगलम्, मध्यमपदलोपी समाप्त । (४) भट्टिनी--प्रकृताभिषेका रानी। 'देवी कृताभिषेकायामितरासु तु मट्टिनी।' इत्यमरः । वासवदत्ता--(आत्मगतम्) जह जह तुवरदि, तह तह अन्धीकरेदि मे हिअ । यथा यथा त्वरते तथा तथान्धीकरोति मे हृदयम् । वासवदत्ता- --(मन में) जैसे-जैसे यह शीघ्रता कर रही वैसे-वैसे मेरा हृदय सूना होता जा रहा है। Vasava—(To berself) The more they haste, still the deeper the shadows on my heart, टिप्पणी-(१) अन्धीकरोति---अंधा (किंकर्तव्यविमूढ़) बना रही है। न अन्धम् अन्धं करोति इति विग्रहे 'कृम्वस्तियोगे सम्पधकर्तरि विः' इति मूत्रेण चिप्रत्ययः, 'अस्य वौ' इति सूत्रेण ईत्वम्, ततः कृ+लट्-तिप् । कृ+लट् प्र० पु० ए०२० । धात्री-एई' एदु भटिदारिआ । एत्वेतु भर्तृ दारिका !] (निष्क्रान्ताः सर्वे ।) इति द्वितीयोऽङ्कः । धाई--माइये, राजकुमारो जो ! प्राइये । (सवका प्रस्थान 1) दूसरा भक समाप्त। Nurse--Come, come my princess (Exuent omnes). Here ends Act II. १. पाठान्तर-पविसा दाव अम्मन्तर० । (प्रविशतु तावदभ्यन्तरं०) । पाठान्तर मे अयं हा 'तो मन्दर प्रवेश करें। प्र+वि+लोट् प्र. पु० ए०व० ।

परित्तजन अथ तृतीयोऽङ्कः (इस अंक में अपने पति के साथ पद्मावती का विवाह होने से वासवदत्ता की व्यथा का वर्णन किया गया है। वह मनोविनोदार्थ राजमवन से निकल कर प्रमदवन में चली जाती है। वहीं मगधराज्ञी के कहलाने पर वह विवाह माना गूथती है गिममें प्रविधयाकरण ओषधि को हो. गूथती हैं सपनोमन को नहीं । इस विवाह मे व्यथित होकर शान्तिलामा वह सोने का उपक्रम करती है।) (ततः प्रविशति विचिन्तयन्ती वासवदत्ता ।) वासवदत्ता-विवाहमोदसङ्कले अन्तेउरचउस्साले पदुमादि इह पाप्रदह्मि पमदवणं । जाव दाणि भाअधेअणिबुतं दुःख विणोदेमि । (परिक्रम्य) अहो ! अच्चाहिदं । अस्यउत्तो वि णाम परकेरनो संवुत्तो। जाव उवविसामि । (उपविश्य) धमाल चकवान बहू, जा अण्णोपणविरहिदा ण जीवइ । ण ण् अहं पाणाणि परितनामि । अध्यउत्तं पैक्खामि ति एदिणा मणोरहेण जोवामि मन्दभाआ । [विवाहामोदसङ्कले अन्तःपुरचतुश्शाले परित्यज्य पद्यावतीमिहागतास्मि प्रमदवनम् । भागधेयनितं दुःखं विनोदयामि । ग्रहो ! अत्याहितम् ।आर्यपुत्रोऽपि नाम परकीयः संवत्तः । यावद् उपविशामि । धन्या खल चक्रवाकवः पान्योऽन्यविरहिता न जीवति । न खल्वहं प्राणान् परित्यजामि । आर्यपुत्रं पश्यामोति एतेन मनोरथेन जीवामि मन्दभागा। संस्कृत टीका-विवाहामोदमले विवाहस्य परिणयस्य प्रकृष्टानन्दः तेन सङ्कले व्याप्ते, पन्तःपुरचतुरशाले मन्तःपुरे गुमान्ने राजीना निवासस्थाने इति यावत् यत् चतुःशाल मजयनं परम्परामिभुषी मिश्चतसमिः शालाभिः युक्तं म्यानमिति यावत् तस्मिन्, पद्मावती--मगर राजकुमारों, परित्यज्य साया, इह-एकान्ते, प्रमदवनम्--ौरोधानम्, मागतास्मि--उपस्थितास्मि । यादत्तावत्, इदानीम् --सम्प्रति, मागधेय. नित-दुर्भाग्यसन्धम् दुगनटम्, विनोदयामि-पलयामि । ग्रहो ! यावदिदानी मामोद ८५ तृतीयोऽङ्कः --प्रहह !, प्रत्याहितम्--महामीतिः सम्प्राप्ता । आर्यपुत्रोऽपि- स्वामी अपि, परकीय:-प्रन्यदीयः, संवृत्तः–सञ्जातः । यावद् उपविशामि । चक्रवाकवघ:-- चक्रवाकी, खलु--निश्चयेन, घन्या-अमिनन्दनीया, या, अन्योन्यविरहिता- परस्परं वियुक्ता न जीवति--न प्राणान् धारयति । न खल्वहं--प्रहन्तु नंव, प्राणान्-प्रसून, परित्यजामि-मुञ्चामि । मार्यपुत्र-स्वामिन, पश्यामि- अवलाकयिष्यामि, इत्येतेन-प्रार्यपुत्रदर्शनप्रत्याशारूपेण, मनोरयन--प्रमिलापेण, (अहं) मन्दमागा-मल्पमाग्या, जीवामि--श्वमिमि । अनुवाद--(तदनन्तर सोचती हुई वासवदत्ता का प्रवेश।) वासवदत्ता-विवाह के भामोद-प्रमोद से परिपूर्ण रनिवास के चोसाले में पद्मावती को छोड़कर मै यहाँ क्रीडोद्यान मे चली आई हूँ। अभी दुर्भाग्य से उप- स्थित दु.ख को तब तक कुछ शान्त करूं ।(घम कर हाय ! विपत्ति पड़ी । मार्यपुत्र मो पराये हो गये। तब तक बैठ जाती हूँ। (बैठकर) निःसन्देह चकवे की बहू (चकवी)घन्य है, जो एकदूसरे से अलग होकर नहीं जीती। मैं तो प्राण मी नही घोड़ती हूँ। मार्यपुत्र को देसूगी, इसी अभिलाषा से मै प्रमागिन जी रही हूँ। (Taco cater Vasavadatta in meditation). Vasara.-Leaving padmavati in the quadrangle of internal apartments, astir with the marriage festivities, here have I come to the ladies' garden. Now theo I shall supress the sorrow laid upon me by fatc. (Walking about) Oh, alas, (how bad it is ?) Even the king should really belong to another. I shall sit down (sitting). Happy indeed is the female chakrawaka who does not live, if separated from her mate, but I do not leave my life, unfortunate as I am, I live in this hope that I can see my lord. टिप्पणी--(१) पिवाहामोदसंकुले-विवाह के मामोद-प्रमोद से व्याप्त । विवाहस्य पामोद: तेन सकुले पष्ठीगमित त० तत्तु० । (२) अन्तःपुरतुमाले- जनानसाने की चौसद्दी मे । 'चतसपा शासाना ममाहारः इति धतुरमालम्' इस विग्रह में समाहार दन्द करने पर एकवद्भाव तथा नपुसकलिग हो जाता है । मन्तःपुस्य पशुशालम्, पष्ठीतत्पुरुष । तस्मिन् मन्तःपुरचतुरशाले। (३) प्रमद- वनम्-वह उद्यान जिसमे राधा अपनी रानियों के साथ वियाह करता है, कीडोगान, प्रमोदवन । 'स्यादेतदेव प्रमदवनमन्त.पुरोचितम्' इत्यमरः । प्रमदाना वनम् इति प्रमदयनम् । यहाँ 'ध्यापोः सनापन्दसोबहसम्' इस मूत्र से प्रमदा में हस्वना हुई। (४) परिस्पग्य-दोडकर ! परि+र+स्पर । (५) भागपंप- स्वप्न निवृत्तम्-दुर्भाग्य से प्राप्त । मागघेयम् में स्वार्थ मे घेय प्रत्यय; तस्मात् निवृत्तम्। यह विशेषण है 'दुःखम्' की विशेषता बतलाता है। (६) दुःखं विनोदयामि-- दुःख हल्का करती हूँ। (७) अन्योन्यविरहिता--एक दूसरे से वियुक्त । (८) न जीवति-नही जीती है। अर्थात् चकची चकवे से बिछुड़ने पर मृतप्राय हो जाती है । (६) यावत् उपविशामि--अच्छा बैठती हूँ। उप+विश्+लट् उ० पु० ए० व० । (१०) विनोदयामि पावत्, उपविशामि यावत्-~-यहां 'यावत्' के योग में 'यावत्पुरानिपातयोलंट्' सूत्र से भविष्यत् के अर्थ में लट् लकार हुए हैं। (११) पश्यामि--यहाँ 'वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा' सूत्र से भविष्यत् के अर्थ मे लट् लकार हुा । (१२) मनोरथेन-प्राशा से 1 हेतु में तृतीया हुई। वियोग में प्रिय-मिलन की प्राशा से ही प्राणियों का जीवन-धारण होता है । जैसा कि मेघदूत में पाया है । 'प्राशावन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां, सद्यः पाति प्रणयि हृदय विप्रयोगे रणद्धि'। (ततः प्रविशति पुष्पाणि गृहीत्वा चेटो) चेटी-कहिं णु ख प्रय्या प्राविन्तमा ? (परिक्रम्यावलोक्य) अम्मो! इअं चिन्तासुग्णहिप्रमाणीहारपडिहदचन्दलेहा विन प्रमण्डिद- भद्दनं वेसं धारअन्दी पिअडगुसिलापट्टए उविट्ठा । जाव उवसप्पामि । (उपसत्य)प्रये ! अवन्तिए ! को फालो, तुम अण्णेसामि । श्वन खलु गता आर्यावन्तिका ? अम्मो ! इयं चिन्ताशून्यहृदया नीहार- प्रतिहतचन्द्रलेखेवामण्डितभद्रकं वेपं धारयन्ती प्रियङ्ग शिलापट्टके उपविष्टा । यावदुपसामि । आयें ! आवन्तिके ! कः कालः, त्वाममिन्यष्यामि ] संस्कृत टीका-ब न सलु गता-कुत्र हि याता, मार्या--पूज्या, भाव- न्तिा?-प्रन्तिसमुत्पता ? मम्मो !-हविस्मयद्योतकमध्यमिदम्, इयम्- मायन्तिका, नोहारप्रतिहतचन्दलेखा-नीहारेण तुपारेण प्रतिहता ताडिता या चन्द्रलेगा पाशिकला सा, इव-तद्वत्, चिन्तागून्यहृदया--चिन्तया प्रियतमविरह- चिन्ननेन हेतुना शून्य वर्तव्यज्ञानरहित हृदयं चितं यस्याः सा तयाभूता, ममति महकम्--प्रमरिडतः ममूपितरयासो मदर: मनोहरः तम्, वेपम्-स्वरूप पारपन्नी-महन्ती, प्रियाशिलापट्टकप्रियंगोः गन्पफल्यारूलतायाः अघो- वतिनि मिलापट्टकै पाषाणपण्डे, उपविष्टा--समासीना (मस्ति) । याहा मामि-त-समी गन्दापि । उपमन्य-निकटं गत्वा कपयतीति दोषः, पाय !

८७ . तृतीयोऽङ्कः कः कला:--कियान् समय व्यतीत इति शेपः, त्वाम्--मवन्तीम्, अन्विष्यामि-- भवत्याः अन्वेषणं करोमि । अनुवाद--(तदनन्तर फूल लेकर दासी भाती है।) दासो-उज्जन वाली प्रार्या कहां चली गई ? (घूम कर और देखकर) अहो ! ये तो हिमाच्छादित चन्द्रकला की भांति चिन्ता के मारे अपने आप में खोकर बिना शृङ्गार के मो सुन्दर वेश धारण किए हुए प्रियगु लता के नीचे पत्थर को चौकी पर बैठी हैं । अच्छा, समीप चलू। (समीप जाकर) श्रीमती आवन्तिका जी! मैं आपको कब से ढूंढ रही हूं। (Then, enter a majd with flowers), Maid-Where has the honourable Avantika gone ? (turning about and seeing) oh this, (she is) sitting here on the stoneseat under the priyangu (creeper) with a heart vacant in meditation, clad in an unadorned but chaste dress, like the moon's crescent, dimmed by mist. Now I approch (approaching) Honourable Avantika, for how long a time should I search you ? टिप्पणी--(१) प्रार्या--पूज्या । (२) प्रावन्तिका--अवन्तिप्रदेश में उत्पन्न । अवन्त्यां भवा इत्यर्थे अवन्ति+ठञ् 'काश्यादिम्यष्ठनिटो' इति सूत्रेण, तस्य इकादेशे स्त्रीत्वाट्टाप् । (३) क्व न खलु गता-कहां चली गई । (४)चिन्ता- शून्यहृदया--चिन्ना मे शून्य हृदय वाली । चिन्तया शून्यं हृदयं यस्याः सा बहुव्रीहि । (५) नोहारप्रतिहतचन्द्रलेखा--हिमाच्छादित चन्द्रमा की कला के समान । मीहारेण प्रतिहता या चन्द्रलेखा सा इव, तद्वत् । (६) प्रमण्डितभद्रकम्--विना सजाये ही सुन्दर लगने वाला, निसर्गसुन्दर । मद्र एव मद्रकः, तम् । मद्र+क: स्वार्थे । न मण्डितः प्रमण्डितः, अमण्डितश्चासो भद्रका प्रमण्डितमद्रक विशेषणो- भयपदकर्मधारय, तम् । यह 'वैषम्' का विशेपण है । {७) प्रियङ्ग.शिलापट्टके- प्रियङगुनीचः शिलापट्टकम् मध्यमपदलोपीसमासः तस्मिन् । प्रियंगुलता के पर्यायवाची शब्द ये हैं-'लतागोवन्दिनी गुन्द्रा प्रियगु. फलिनी मली। विष्वक्सेना गाधफली' इत्यमरः । इसको मैथिली में 'दहिगन' कहते हैं । इस लता के सम्बन्ध में कहा जाता है कि जहाँ उमे किमी सुन्दरी स्त्री ने पर्स किया कि वह फूलने लगती है। (८) उपविष्टा--बैठी हुई । उप+विस्+क्त (त) +टाप् (मा) निसान () यावदुपसमि-अच्छा, समीप चलती हूँ। (१०) उपसत्य- समीप जॉकर । उप+स+ ल्यप् । (११) प्रविष्यायि-सोज रही हूँ। मनु + इ+लट् । उ०पू० ए०६०।

८८ स्वप्नवास करत वासवदत्ता--किणिमित्तं ? (किनिमित्तम् ?) वासवदता-किसलिए? Vasava.-What for ? चेटो-अह्मा भट्टिणी भणादि-महाकुलप्पसूदा सिणिद्धा णिउणा त्ति इमं दाव कोदुअमालिअंगुह्मदु अय्या। [अस्माकं भट्टिनी भणति--महाकुलप्रसूता स्निग्धा निपुणेति इमां तावत् कौतुक- मालिकां गुम्फत्वार्या । संस्कृत टीका-प्रस्माकं मट्टिनी--स्वामिनी दर्शकस्य मनभिषिक्ता राशी मावत्, मणति-वदति (यत्), महाकुलप्रसूता--महति उच्चे कुले वर्श प्रसूता उत्पन्ना, स्निग्धा--स्नेहपूर्णा, निपुणा-दक्षा, इति-मस्मादेतोः, मार्या-- भवती, इमा--गुम्फनीयां, कौतुकमालिका-सौभाग्यकारकं मङ्गलमाल्यं, गुम्फतु-अप्नातु । वासी-हमारी स्वामिनी कह रही हैं कि मार्या (पाप) उच्च कुल में उत्पन्न हुई हैं, स्नेह रखती हैं और निपुण हैं; इसलिए (पाप ही) यह सोहाग की माला पू। Maid-Our queen says : you are born in a noble family and arc affectionate and skilled. Then honourable madam should, please, string this wedding garland. टिप्पणी--(१) भट्टिनी--मट्टः राजा, सोऽस्ति मस्याः पतित्वेन इति मट्टिनी भट्ट इनि-डी । जिसके पति का राज्याभिषेक हो जाता है, उसे 'राशी' 'देवी' नाम से सम्बोधित किया जाता है और रानियों को 'मट्टिनौ'। 'देवी पता- भिषेकापामितरासु तु भट्टिनी' । इत्यमरः । (२) महाकुलप्रसूता--कुलीना, खानदानी। महच्च तत् कुलं महाकुलम्, तस्मिन् प्रमूता महाकुलप्रमूता । (३) स्निग्धा-स्नेहशीला । स्निह +क्त (1) कतरि+टाप् (मा) । (४) निपुणा-दक्ष, कार्यान, ये विशेपण वासवदत्ता के बड़ी कुशलता, प्रेम पोरगीम्रता से माला गंपने के घोतक हैं। (५) कौतुकमालिका--मंगस माला। विवाह के समय हाप में धारण किया हुमा मूत्र । कौतुझमयी मामिका पारिवादिस्वात् समासः। (६) तावत्-यह अध्यय वाक्य को पसंकृत करने के लिए प्रयुक्त होता है। यहां प्रार्थना में सोट् सकार हुपा । (७) गम्मतुः- गू। लोट प्र. पु.ए.१०॥

तृतीयोऽङ्कः वासवदत्ता- अह कस्स किल गुह्मिदव्वं ? (प्रय कस्म किल गुम्फि- तव्यम् ?) टिप्पणी--(१) कस्मै--किसके लिए 1 'कर्मणा यममिति स सम्प्रदानम् अर्थात् कर्म के द्वारा जिसे कर्ता सन्तुष्ट करना चाहता है वह सम्प्रदान कहा जाता है। वासवदत्ता--किसके लिए (मुझे माला) गूयनी है ? Vasaya.--For whom am I to string it. चेटी-ब्रह्मानं भट्टिदारिआए । [अस्माकं भर्तृ दारिकार्य ।। दासी हमारी राजकुमारी के लिए। Maid-For our princess. वासवदत्ता-(प्रात्मगतम्) एवं पि मए फत्तव्यं मासी । अहो ! प्रकरुणा खु इस्सरा । (एतदपि मया कर्तव्यमासीत् । अहो ! प्रकरणाः खल्वीश्वराः। पासवदत्ता-(मन मे) यह भी मुझे करना था। हाय ! ईश्वर बड़े निर्दयी है। Vasara. -(To berself) Oh, was it also to be done by me ? Cruel indeed are the Gods. चेटो-अय्ये ! मा दाणि अण्ण चिन्तिम । एसो जामादुप्रो मणिभूमीए हणादि । सिग्धं दाव गुह्यदु अय्या । [ आयें ! मैदानीमन्यच्चिन्तयित्वा । एप जामाता मणिभूम्या स्नायति । शीघ्र तायद् गुम्फत्यार्या । दासी- देवी जी ! इस समय दूसरी बात न सोचें । ये दुलहा जी मणि- वैदिवा पर स्नान कर रहे हैं । इसलिए भाप तीन गुप दें। Niald-Pray think not now of anything but this, wby in the Jewelled chamber, even now matrons spojot the bridegroom pray make taste. यासवदत्ता--(आत्मगतम्) सक्कुणोमि अणि चिन्तेढुं (प्रकाशम्) हला! किट्टिो जामादुओ ? [न शक्नोम्यन्यचिन्त- यितुम् । हला !कि इप्टो जामाता ?

६० स्वप्नवासवदत्तम् वासवदत्ता--मन में दूसरी बात सोच नही सकती (प्रकट) सखी! क्या तुमने दुलहे को देखा है ? Vasava.--(To herself) How could I think of anything but this ? (aloud) Tell me have you seen the bridegroom. चेटो--आम, दिछो भट्टिदारिपाए सिणेहेण अह्मा कोदूहलेण अ। पाम्, दृष्टो भर्तृ दारिकायाः स्नेहेनास्माकं कौतूहलेन च । दासी--हो, राजकुमारी के स्नेह और अपने कौतूहल से देखा है । Maid-Oh yes I saw him through affection for the princess and through our curiosity. वासवदत्ता-कीदिसो जामादुओ? [कोदशो जामाता ?] वासवदत्ता--दुलहा कैसा है ? Vasava.-How is he? चेटी--अय्ये ! भणामि दाव, ण ईरिसो दिठ्ठपुरवो । [आयें ! भणामि तावद्, नेदशो दृष्टपूर्वः ।] दासी-देवी जी ! मै तो कहती हूँ कि ऐसा दुलहा कमी देखा ही नहीं था। Maid-Madam, I do say, never such a one was seen before. वासवदत्ता--हला ! भणाहि भगाहि, कि दसणोनो? [हला ! भण भण, फि दर्शनीयः?] यासयदत्ता-सखी! कहो कही, क्या देसने योग्य है ? Vasara.-Friend I tell me is he charming ? चटी-सक्कं भगिर्नु सरचावहीणो कामदेवो ति। [शक्यं भणि शरचापहीनः कामदेव इति ।। दासी-(दुलहा) पनुप मौर बाण से रहित कामदेव कहा जा सकता है। Maid - Why you might call him the god of love, without his bow and arrows. यासयवत्ता-होदु एत्तमं । [भयत्वतावत् । मागपत्ता-अन्दा रहने दो। Vasara...Enough of this. No morc. चटो-किणिमित्तं पारसि? किनिमित्तं वारयसि ?] '' .

तृतीयोऽङ्कः दासी-क्यों मना कर रही हैं । Maid-Why do you forbid ? वासवदत्ता-अजुत्तं परपुरुससङ्कित्तणं सोदु। [अयुक्तं परपुरुष- संकीर्तनं श्रोतुम् । वासवदत्ता--पराये पुरुष का गुणानुवाद सुनना उचित नहीं है । Vasaya.—It is not proper to listen to the praises of one who is the husband of another. चेटी--तेण हि गुह्मदु अय्या सिग्छ । तेन हि गुम्फत्वार्या शोघ्रम् ।। दासी--अच्छा, तो आप शीघ्र माला गय दीजिये । Maid-Then, please, your ladyship should soon put together (the flowers in a wreath.) वासवदत्ता -इग्रं गृह्मामि । प्राणेहि दाय । [इयं गुम्फामि । पानयः तावत् 1] वासवदत्ता-यह ग यती हूँ । लामो तो। Vasava.--I will, Bring me the flowers. चेटी-गणदु अय्या। [गृह्णात्यार्या । दासी-लीजिये। Maid-There take them lady. वासवदत्ता--(वजयित्वा दिलोश्य) इमं दाव मोसहं कि णाम ? इदं तायदोप, कि नाम ?] वासवदत्ता--(हटा कर मोर देवकर) इम मोपधि का क्या नाम है ? Vasara.--(Putting away same flowers and closely observing) what here is this ? चेटी--प्रविहयाकरणं णाम । [अविधयाकरणं नाम ।] दासी-गुहागिन बनाने यामी । stald-They call it "husband's life." वासवदत्ता--(प्रात्मगतम्) इदं यहुसो ग्रहह्मा मम प्र पटुमावदोए प्र। (प्रकाशम्) इमं दाय ओसहं कि शाम ? [इदं बहुशो गुम्फितव्यं महां च पद्मावत्य घाइदं सावदोपणं कि नाम ?

स्वप्नवासवदत्तम् वासवदत्ता-(मन में) अपने लिए प्रोर पद्मावती के लिए इस पोषधि को अनेक बार गुयना चाहिए। (प्रकट) इस ओषधि का क्या नाम है ? Vasava.-(To berself) of these I must weave many in the garland, both for myself and Padmavati, (aloud) what again is the name of this plant ? चेटी--सवित्तमद्दणंणाम । {सपत्नीमर्दनं नाम ।। दासो-सौत का मर्दन करने वाली। Maid-The destroyer of a co-wife. वासवदत्ता ---इदं ण गुह्मिदत्वं । [इदं न गुम्फितव्यम् । पासववत्ता-इसको नहीं गपना चाहिए। Vasara.-This should not be wreathed. चेटी-कोस ? [कस्मात् ?] दातो-क्यो? Maid--And why not? वासवदता-उवरदा तस्स भय्या, तं णिप्पओनणं ति। [उपरता तस्य भार्या, तनिष्प्रयोजनमिति ।] पासवदता-उनकी स्त्री तो मर चुकी है। इसलिए (इसका गुपना बेकार है।) Vasava.-His wife is dead there is no need for it. (प्रविश्यापरा) घेटो-तुवरदु तुवरदु अय्या। एसो जामादुओ अघिह- याहि अम्भन्तरचउस्सालं पवेसोदि । (त्वरतां त्वरसामार्या । एष जामाता प्रविधवाभिरम्यन्तरचतुश्शालं प्रवेश्यते ।। (दूमरी दासी का प्रवेश) दासी-देवी जी| शीघ्रता कीजिए, सीघ्रता । ये दुलहा सुहागिनों द्वारा कोहबर में लाये जा रहे हैं। (Enter another Maid-servant). 2ad Mfald-Your Ladyship should hurry up; burry up please. Here the bridegroom is being usbered into the innermost quadrangle by married ladies whose husbands are alive. यासवदत्ता-प्रद ! वदामि, गहण एदं । [प्रयि !वदामि, गृहाणतन्! पासपरता-रो! पहनी हूँ, मे सो। Vasari.Ob, I say, take this.

तृतीयोऽङ्कः चेटी-सोहणं । अय्ये! गच्छामि दाव अहं । [शोभनम् प्रायें ! गच्छामि तावदहम् !] (उभे निष्क्रान्ते) दासी-बहुत सुन्दर । देवो! अव में जाती हूँ। (दोनों का प्रस्थान) Mald-Well done, Your ladyship. I shall now go. (both retire.) वासवदत्ता–दा एसा । अहो ! अच्चाहिदं । अय्यउत्तो विणाम परफेरओ संवत्तो। अविदा ! सय्याए मम दुवं विणोमि, जदिः गिद्वं लभामि । [गतेषा । अहो प्रत्याहितम् । आर्यपुत्रोऽपि नाम परकोयः संवृत्तः। अविदा ? शय्यायां मम दुःख विनोदयामि, यदि निद्रा लभे।] (निष्क्रान्ता) इति तृतीयोऽङ्कः। संस्कृत टीका-एपा-चेटो, गता-याता । प्रहो!~प्रहह ! प्रत्याहितम्- महानीतिः, (उपस्थिता)। प्रायपुरोऽपि~म्वामी अपि, परकीय:--अन्यदीयः, मदत--राजातः । अविदा !-विपादार्थकमव्ययमिदम् । गय्यायां-यनीये, मम--स्वकीयं, दुःख-कष्टम्, विनोदयामि-अपनेष्यामि, यदि-चेत्, निद्रा- म्वर, समे-प्राप्म्यामि। वासवदत्ता--दह चली गई। हाय ! अनयं हमा! पापुन मी पराये हो गए । मोह ! यदि नींद पा जाय तो मेज पर पाना पष्ट निवारण कर लू। (वामपदत्ता या प्रस्थान) प्तीगरा कि समाप्त । Vasara.--She is gone, Oh alas, Even the king has become a strangar (to me) now Oh (help) I shall remove my pain in my bed, rigt sleep (Exit. Vasavadatta) Here ends the third Act.

स्वप्नवासवदत्तम् द्वन्द्व समास शोचे घातु के लट् लकार प्रथम पुरुष एकवचन का यह रूप है । (५)प्राम- हाँ । यह स्वीकृतिसूचक अव्यय है। (६) कौतूहलेन-कुतूहलता के कारण -हेतो तृतीया' से तृतीया हुई है। "रम्यवस्तुसमालोके लोलता स्यात् कुतूहलम् ।' (७) कीदृशः-कसा । (८) दृष्टपूर्व:--पूर्व दृष्टः इति दृष्टपूर्वः मयूरध्यमका- दित्वात् ममासः। (९) सक्कं भणिदु ... इसके स्थान मे 'सप्र खु ममव सरचावहीणो कामदेवोत्ति' ऐसा पाठभेद मिलता है। इसकी संस्कृतच्छाया होगी-'स्वय खलु भगवाञ्छरचापहीनः कामदेव इति' शरश्च चाप च शरचापे ताम्या हीनः तृतीया तत्पुरुष । (१०) सपत्नीमर्दनम्- मौत को नष्ट करने वाला । समानः पतिर्यस्याः सा सपत्नी, 'नित्यं सपल्यादि इत्यनेन समानस्य स प्रादेशः, 'विमापा सपूर्वस्य' इत्यनेन डीप नकारादेशश्च । मद्यते अनेन इति मर्दनम् / मद्+णि+ल्युट करणे, तस्य अनादेशः, सपन्याः मर्दनम् मपत्नीमर्दनम् । (११) उपरता--मता। उप/रम्+क्त+टाप् । तत्-यह हेत्वर्थक अव्यय है। (१३) निष्प्रयोजनम्-निर्गत प्रयोजन यस्मात् तत् निष्प्रयोजनम् प्रादि बहुव्रीहि समास। (१४) स्वरताम् त्वरताम्-इस प्रकार की द्विरुक्ति 'मम्ध्रमेण प्रवृत्ती यषेप्टम् अनेकधा प्रयोगो न्यायसिद्धः' के अनुमार होती है । (१५) पविषयामिः-सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा विगतो घयो यस्याः सा विधना, न विधवा इति प्रविधवा । विधवा स्त्रियों का मागलिक कार्यों में मम्मिलित होना जित है। । १६) प्रवेश्यते-प्र/विश्+णिच् + लट् वार्मणि । लाये जा रहे है। (१७) प्रथिदा-यह विपादायक प्रय्यय है। इसका प्रयोग प्राकृत में पाया जाता है । वहाँ यह विस्मय तथा गोक के मयं में प्रयुक्त होता है। (१८) विनोदयामि, सभे--पहा 'वमानसामीप्ये वर्तमानवता' मूत्र मे भविष्यत् यात रे में मट मसार हुए हैं।

अथ चतुर्थोऽङ्कः (विवाहोपरान्त पद्मावती एक दिन वासवदत्ता के साथ प्रमदवन मे जाती है। उसी समय महाराज उदयन भी वसन्तक के साथ वहां पाते हैं। पद्मावती और वासवदत्ता का प्रसग छिड़ने पर राजा वासवदत्ता के गुणों का स्मरण कर के मूच्छित हो जाता है तथा उसकी मांखों में आंसू आ जाते हैं । अवसर पाकर पद्मावती वहाँ सहसा प्रविष्ट होकर राजा को प्राखें घोती है । प्रणय सकट से बचाने के लिए विदूषक मगघराज के सम्मानार्थ प्रायोजित उत्सव में सम्मिलित होने का स्मरण राजा को दिलाता है। उसे मुनकर वह तत्काल वहाँ से प्रस्थान कर देता है।) (ततः प्रविशति विदूषकः ।) विदूषकः--(सहर्षम्) भो! दिठ्ठिया तत्तहोदो बच्छराग्रस्स अभिप्पेदविवाहमङ्गलरमणिज्जो कालो दिट्ठो । भो ! को णाम एवं जाणादि--तादिसे वयं प्रणत्यसलिलावते पक्खिता उम्मज्गिस्सामो ति । इदाणि पासादेसु बसोप्रदि, अन्देउरदिग्घिमासु, गाईप्रदि, पकिदिमउरसुउमाराणि मोदप्रसज्जप्राणि सज्जीवन्ति तिप्रणच्छरसंवासो उत्तरकुरुवासो मए अणुभयोअदि एक्को सु महन्तो दोसो, मम प्राहारो सुदृ ण परिणमदि, सुप्पच्छदणाए सय्याए णि ण लभामि, जह याद- सोणिदं प्रभिदो विप्र यत्तदि ति पैक्सामि ।भो ! सुहं गामप्रपरि- भूदं प्रकल्लयत्तं च । { भोः ! दिष्ट्या तत्रभवतो यत्सराजस्याभिप्रेतविवाह- मङ्गलरमणीयः कालो दृष्टः । भोः ! को नामंतजानाति- तादृशे वयमनयंसलिलायत प्रक्षिप्ताः पुनरुन्मदक्ष्याम इति । इदानी प्रासादेष उप्यते, अन्तःपुरदीपिकासु रमायते, प्रकृति- मधुरसुकुमाराणि मोदकसायानि सादात इति मनप्सरस्सयास उत्तरपुपयासो मयानुभूयते । एकः राल महान् दोषः, ममाहारः मुष्ट न परिणपति, सुमच्यदनायो शव्यायां निद्रा न लभे, यया यातसोगितममित इय यतंत इति पश्यामि। भोः गुरां नामप- परिभूतमकल्पयतं च ।].

स्वप्नवासवदत्तम् संस्कृत टीका--मो:-सम्बोधनात्मकमव्ययमिदम्, दिष्टया--माग्यने तंत्र- भवतः--माननीयस्य, वत्सराजस्य--वत्सदेशाधिपतेः उदयनस्येति यावत्, अमित- विवाहमङ्गलरमणीय:-अभिप्रेतम् अभीप्सितम् यद् विवाहमङ्गलम् परिणयोत्सर तेन रमणीयः माह्लादकरः, काल:--समय:, दृष्टः-प्रवलोकितः अस्माभिरिति शेषः । को नाम एतत् जानाति-~कः इदम् चिन्तितवान् न कोऽपोस्ययः, इति-- तत्, तादृशे--तथाविधे भयानके, अनर्थसनिलवर्ते-अनर्थः राज्यापहरणादि- लक्षण महत्कष्ट तद्रूपो यः सलिलावतः जलभ्रमिः तस्मिन्, प्रक्षिप्ताः--निपातिताः, वयम्-उदयनसहिताः मवें राजाश्रिता जनाः, पुनः--भूयः, उन्मक्ष्यामः-- उन्मग्नाः मविष्यामः ततो बहिर्मविष्यामः इति यावत् । इदानीम् - सम्प्रति, प्रासादेषु-राजभवनेषु, उप्यते--निवासः क्रियते, अन्तःपुरदीपिकासुप्रन्तः पुरस्य शुद्धान्तस्य दीपिकामु वापीप, स्नायते-स्नानं क्रियते, प्रकृतिमधुर- सुकुमाराणि-प्रकृत्या स्वभावेन मधुराणि मिष्टानि च तानि सुकुमाराणि कोमलानि, मोदकखाद्यानि-~मोदकाः लड्डुकाः तद्रूपाणि खाद्यानि भोज्यपदार्याः, खाद्यन्ते-~मध्यन्ते, इति, प्रस्मात् कारणात्, अनप्सरस्संवासः--नास्ति अप्सरसा स्वर्गवेश्यानां संवासः सहवास: यस्मिन् तथाविधः, उत्तरकुरुवास:--उत्तराः कुरवो नाम देवभूमय: तत्र वासः निवासः, मया- -विदूषकेण, भनुभूयते-~-उपमुज्यते । एक:--एकलः, पलु-निश्चयेन, महान्-विशालः, दोप:-विकारः (यत्। मम माहार:-भोजनम्, मुष्ठ-सम्यक्, न-नहि, परिणमति--परिपचति, सुप्रच्छदनाया--गोमनास्तरणयुक्तायां, शय्यायाम्--शयनीये, निदां - स्वाप, न लमे-न प्राप्नोमि, यथा-यन हेतुना, वातशोणितम्--वातरक्तनामा रोगः भमित इव--मम्पूर्णशरीरस्थितिमिव, वर्तते-विद्यते, इति–एवम्, पश्यामि- जानामि । प्राभयपरिभूतम्-प्रामयेन व्याधिना परिभूतम् पाक्रान्तम्, (तया) मकल्यवर्तम्-नास्ति कल्यवर्तः प्रातमोजनम् यस्मिन् तत् तयाभूत सुखं, न-- नहि सुतं यतुं शक्यते इति यावत् । (प्रयं भावः---पद्मावत्या सह उदपनाम विवाहे जाते समुहद विदूषकःमानन्दोत्सारा प्रकटयन् कषयति-सौभाग्येन राशः उदयनम्य विवाहोत्सवस्य शुमसमय: मस्माभिः साक्षात्कृतः। भाग्यवशादेव पप राग्यापहरणवासवदत्तादाहादिरूपात् जसावर्ताद बहिरमवाम । इदानीमहम् प्रासादेप नियमामि, मन्तःपुरस्य पापीए स्नानं करोमि, मुस्वादन मोलान् सामामि। एतावता अन्तरा अप्सरसंवा हयात साक्षात् स्वगंगुलमहमनभवामि । रिन्तु एक पत्र दोषोविधते पत् मम मोजनं सुट पतिनगरमैन चतुर्थोऽङ्कः सुकोमलायामपि शय्यायां मम निद्रा न समायाति, प्रत्युत वातरक्तरोगः पाका- मति । हन्त ! रोगाक्रान्तस्य प्रातराशवञ्चितस्य च कुतः सुखम् ?) । (तदनन्तर विदूषक का प्रवेश ।) विदूषक-(हर्षपूर्वक), मजी! माग्य से हमने वत्सराज उदयन के मनचाहे विवाहोत्सव का प्रानन्दमय समय देख लिया। आह ! किसको मालूम था कि वैसे अनर्थ (राज्यापहरण और वासवदत्तामरण) रूपी जल के भंवर में डाले हुए हम लोग उससे निकल पाएंगे। इस समय तो मैं राजमहल में रहता हूँ, रनवास की वावलियों में नहाता हूं और स्वभावतः मधुर तथा मुलायम लड्डू मादि पदार्थों को खाता हूं। इस तरह मैं (केवल) अप्सरामों के सहवास से रहित स्वर्ग का सुख लूट रहा हूं। हां, एक बड़ा भारी दोप है कि मुझे खाना ठीक से हजम नहीं होता, (जिस कारण) अच्छे बिछौने वाली शय्या पर भी नीद नही पाती। मालूम पड़ता है कि वातरक्त के रोग से मैं बिलकुल माकान्त हो गया हूँ। मजी! वह सुख सुख नही माना जाता, जो रोग से भाक्रान्त हो भौर जिसमे कलेवा न मिले । (Enter Vidushaka). Vidushala:--(joyfully) oh, fortunately the happy days of the desired auspicious marriage of his honour, the king of Vatsas are seen. (i.e. have arrived) Oh who knew that after being thrown into that whirlpool of the water of calamity, we could have risen up again ? Now we can live in palaces, cao bathe in the oblong tells of the harcm fand cat catables like sweetmeat naturally tasteful and delicious; thus I am enjoying our stay in Uttara Kuru country except for the company of Apsarases. There is (however) one great defect. My food docs not get properly digested. I do not get sleep on a bed with a finc coverlet. I SCC Acute cout on all sides, as it were, oh, there can be ao pleasure in bad health without a morning meal (or breakfast). टिप्पणी-(१) विदूषकः—यह हास्यप्रिय पात्र होता है। अपने हाव- माव कार्य मोर व्यवहार माह में दर्शको को हंसाना है। इसका लक्षण है- 'कुसुमवसन्तामिपः (कर्मवपुर्वपमापाय:। हास्पकरः कसहरतिविदूषकः स्यात् स्वरमंतः।। (सा. दपंग ३-४२) ! 'पिताङ्गवयोवेहास्पकारी विदूषकः । (मुपाकर) (२) अभिप्रेतपियाहमंगतरमणीय:--मनपाहे विवाह के कारण रमणीय । पमित पियामङ्गसं (बर्मधारय) सेन रमणीयः तु. सत्पु० । अपहत राग्य की पुनः प्राप्ति के लिए यह वियाह भनित पा 1(३) जानाति-मह!

स्वप्नवासवदत्तम् भूतकाल के मयं में लट् लकार हुमा है। (४) माय-पानी का भँवर । "स्वादावर्तोऽम्मतां नमः' इत्यमरः । (५) प्रनयंसलिलायत-भनयंरूपी जल के भंवर में । सलिलस्प पावत्त: (प० तत्तु प्रार्य एव सलिलावतः तस्मिन् । (मरव्यंसकादित्यात् रूपक समासः) । (६)प्रक्षिप्ता:-फेंके हुए। प्र+क्षिप् + वत (स) । (७) उग्मास्यामःइसमें 'प्रनवक्लप्त्यमर्पयोरकिंवृतेऽपि इस सूत्र से प्रममावना के अर्थ मे लट् लाकर हुआ है। उद्+मज+ लृट् । यहाँ लुट लकार का प्रयोग भसम्भावना के भयं मे हुआ है । उ० पु. बहु०३०। (८)प्रासादेषु- राजमहलो मे । 'हादि घनिना वास: प्रासादो देवभूभुजाम्' इत्यमरः । (६) उप्यते--निवास करता हूँ । वस् निवासे धातु से फर्म में लट् लकार, यक् और कित्त्वात् सम्प्रसारण करने पर इसकी सिद्धि होती है। (१०) दौधिकासु बावलियो मे । 'वापी तु दीधिका' इत्पदरः। (११) प्रकृतिमपुरसुफुमाराणि-- मधुराणि च तानि सुकुमाराणि विशेषणोमयपदकर्मधारय, प्रकृत्या मधुरसुकुमाराणि तृतीया तत्पुरुष । (१२) मोदकखाद्यानि-लड्डू प्रादि मिठाइयां । मोदकरूपाणि खाद्यानि । कर्मधारय)। (१३) अनासरस्संवास:--अप्सरानो से रहित निवास। अप्सरसां सवामः (प० तत्पु०) प्रविद्यमानः अप्सरसंवास: यस्मिन् सः बहुव्रीहि । (१४) उत्तरकुरुवास:---उत्तरकुरु मे रहना। उत्तरकुरु सुमेरु पर्वत के उत्तर में है, जो शाश्वत सौन्दर्य और यानन्द का स्थान माना जाता है। इसको देवभूमि कहते हैं, जहां समस्त मुखों की अधिकता है और अपारामें निवास करती हैं। कतिपय विद्वानों के मतानुसार उत्तरकुरु हिमालय प्रदेश के उत्तर मे (काश्मीर) मै अवस्थित है । (१५) परिणति-परि+नम्+सट् ति प्र० पु० ए० ३० । पचता है। (१६) सुप्रच्छदनायाम्-सुन्दर बिछौने वाली। प्रकर्षण छयते प्रास्तीयंत अनेन इति प्रच्छदनम, प्र/छद+ल्युट् (करणे)- प्रच्छदनम् यस्याम्, सा सुप्रच्छदना, तस्याम् । (१७) वातशोणितम्--वात व्याधि, गठिया। वातेन संसक्तम् शोणितम् इति वातशोणितम्, मध्यमपदलोपी समास । (१८) सुखं नामयपरिभूतमकल्यवतं च-इसका भाव यह है कि रोग के वशीभूत होना और कलेवा न कर सकना सुख नहीं है। क्योकि रोगी पीस से कराहता रहता है । उसके विहार और भोजन वद हो जाते हैं। नीद नष्ट हो आती है । अतएव इस प्रवस्या में सुख असमय है। (१९) कल्यवतं-कलेवा, सवेरे का हलका भोजन । (ततः प्रविशति चेटी)-चेटी--कहिं णु खु गदो प्रय्यवसन्तनो ? -अन । सुशोमनम्

चतुर्थोऽङ्कः
(परिक्रम्यावलोक्य) ब्रह्मो ! एसो अव्यवसन्तो। (उपगम्य)
अय्य ! वसन्त न ! को कालो, तुमं प्रणेसामि! [कुत्र न खलु गत
प्रार्यवसन्तकः ? अहो! एप प्रार्यवसन्तकः । आर्य! वसन्तक !
काः कालः, त्यामन्यिप्यामि ।]
(तदनन्तर दासी का प्रवेश) दासी--प्रायं वसन्तक कहाँ गए ? (धूमकर
पौर देसकर) परे ! यही तो पाय वमनक हैं। (समीर जाकर) वसन्तक
महोदय ! कल से मैं प्रापको ढूढ़ रही हूँ।
(Then enter a maid) Mald-(Tarns about and looking)
where has the revered Vasantaka gone 7 05 I here is revered
Vasantaka (Approaching) Oh ! revered Vasantaka how long
am I searching you ?
विदूषकः--(वृष्ट्या) किणिमितं भद्दे । मंगेससि ? [किग्नि-
मितं भरे। मामन्यिप्यसि ?]
विपक-(देशकर) देयो ! क्यों मुझे दूद रही हो?
Vidashaka-(Looking) sood girl why are you searching me ?
चेदी---अह्माणं भट्टिणी भणादि--प्रयि हणादो जामादुरो ति।
[अस्माकं भट्टिनी भगति--प्रपि स्नातो जामातेति ।
पापी हमारी मासविन पूछती हैं िदुलहा वो नहा धुके ।
Mald-Our qu.cn asks if the bride.groom has bathed.
विदूषकः--frणिमितं मोदि ! पुच्छदि ! [किनिमित्तं भवति !
पृच्छति ?
शिवपादेवी ! गिनिर पप रही ?
Vidashsha-Why does her fidyship ecquire ?
घंटो-पिम । गुमगोयलभं मार्गमि ति। [किमामत् । गुमनो-
परमागलामोनि ।

१०० स्वप्नवासवदत्तम् विदूषक--महाराज स्नान कर चुके हैं। पाप सब (चीजे) ले पाइए सिवा मोजन के। Vidasbaka-The bath is finished. Let her Mojesty bring anything she pleases, barring food. चेठी-किणिमितं चारसि भोप्रणं ? [किनिमितं वारयसि भोजनम्?] दासी-भोजन के लिए क्यो मना कर रहे हैं ? Maid-Why do you bar food ? विदूषकः :--अधणस्य मम कोइलाणं अविखपरिवट्टो विन 'कुक्ति परिवट्टो संवृत्तो। [अधन्यस्य मक कोकिलानामक्षिपरिवर्त इव कुक्षिपरिवर्तः संवृत्तः।] विदूषक-मुझ प्रमागे के पेट में ऐसा उलट-फेर हो गया है जैसा कि कोयल की प्रांख मे हुमा करता है। Vidashaka-Wretehed that I am, there is a twisting in my inwards like the surviving of a thousand cuckoo's eye. चेटी-ईदिसो एव्व होहि । [ईदृश एव भव ।]. दासी-आप ऐसे ही हों। Maid-Ever be it thus with you.' विदूषकः--गच्छदु भोदी ! जाव अहं वितत्तहोदी सप्रासं गच्छामि । [गच्छतु भवती । यावदहमपि तत्रभवतः सकाशं गच्छामि ।] (निष्क्रान्ती) (प्रवेशकः) विदूषक-तुम जानो। अब में भी महाराज के पास जाता हूँ। (दोतो का प्रस्थान)। Vidasbaka--You may go madam, In the meantime I shall also go to his honour. (Borh retire) (End of interlude) टिप्पणी--(१) बसन्तक-यह उदयन के मित्र विदूषक का नाम है । (२) किनिमित्तम्-यह क्रियाविशषण है । किनिमितमस्यां क्रियायाम् इति किग्निमित्तम्। (३) भद्रे !--कल्याणी ! मद्र-कल्याण । श्वःश्रेयस शिवं भद्र कल्याण मंगलं शुमम्' इत्यमरः । मद्रम् अस्ति अस्याः इति विग्रहे भद्र+मच प्रर्शादित्वात्, ततः स्त्रियां टाप् तत्सम्बुद्धो मद्रे इति । (४) अपि--यहाँ यह पशब्द प्रश्नवाची अव्यय है। 'गहासमुच्चयप्रश्नशकासम्भावनास्वपि' इत्यमरः ।

चतुर्थोऽङ्कः १०१ (५) स्नात:-- स्ना+क्त (त) 'गत्यर्याकर्मक'-इत्यादिना सूत्रेण कर्तरि । (६) सुमनोवर्णकम्-पुष्प या उपलक्षक मानने से पुष्पमाल्य तथा चन्दन या अगराग । सुमनसश्च वर्णकं च इत्यनयोः समाहारः सुमनोवर्गकम्, समाहारद्वन्द्वेन नपुंसकत्वम् एकत्वं च । 'स्त्रियः मुमनसः पुष्पम्' इत्यमरः। (७) प्रानयामि--- पाड+नी+लट् उ० पु० ए० ३० । यहाँ विध्यर्थ में लट् लकार हुपा है अर्थात् "प्रानयेयम्' की जगह इसका प्रयोग हुआ । (0) प्रघन्यस्य मम कोकिला- नामक्षिपरिवर्त इव कुक्षिपरिवर्तः संवृत्त:--माव यह है कि जिस प्रकार कोयल की अाँखें ऊपर-नीचे घूमती रहती हैं, उसी प्रकार मुझ प्रमागे का पेट घूम रहा है अर्थात् गड़गड़ा रहा है, जिससे में भोजन करने मे असमयं हूँ। अतएव तुम भोजन न लाना ।' यद्यपि प्रांखें घूमती हैं कौए की, इसलिए शास्त्रों में 'काका- क्षिगोलकन्याय' प्रसिद्ध है किन्तु यहाँ विदूषक ने भ्रम से कोए की जगह कोयल का नाम ले लिया है, ऐसा कह सकते हैं । प्रक्ष्णोः परिवर्तः प्रक्षिपरिवर्तः। परि Vवत्+घञ् (म) । भवती-/मा+इवतु--हो । (ततः प्रविशति सपरिवारा पद्मावती प्रावन्तिकावेषधारिणी वासव- दत्ता च) चेटो-किणिमित्तं भट्टिदारिमा पमदवणं प्राप्रदा? [किनिमित्तं भर्तृदारिका प्रमदवनमागता ?] (तदनन्तर परिजन समेत पद्मावती भोर मालव-निवासिनी के वेप में वासवदत्ता का प्रवेश दासो--राजकुमारी जी मानन्दवाग मे किसलिए पाई हैं ? (Then coter with retinue Padmavati and vasavadatta in the garb of Avantika.) Maid-Why has the princes come to the lady's garden. पद्मायती हला! ताणि दाव सेहालिसागुह्मपाणि पेक्सामि कुमुमि- दाणि या ण त्ति । [हला ! ते तायत् शेफालिकागल्मकाः पश्यामि कुसुमिता या न येति ।] पद्मावती-मली ! मैं प्रमो देख रही है कि हरसिंगार के वे गुच्छे फूले हैं या नहीं। Padmavati-O 11 have just come to se je zghe shepbalıka Dlaots have blossomed, १०२ स्वप्नवासवदत्तम् चेटी-भट्टिदारिए! ताणि कुसुमिदाणि णाम, पवालन्तरिहि विन मोतिमालम्बएहि आइदाणि कुसुमेहि [भर्तु दारिके ! ते कुसुमिता नाम, प्रवालान्तरितरिव मौक्तिकलम्बकराषिताः कुसुमैः ।] बासी-राजकुमारी जी ! वे तो फूल कर गूगों से छिपी हुई मोती की लड़ियों के समान पुष्पों से लद गये हैं । Maid-They have indeed blossomed. They are covered with flowers like pearl-pendants interpersed with coral. पद्मावती-हला! जदि इत्वं, कि दाणि विलम्बेसि? [हला! यावं, 'किमिदानी विलम्बसै ?] • पद्मावती---सखी ! यदि ऐसा है तो फिर क्यो अव विलम्ब कर रही हो ? Padmavati-Ob ! ifit is so why are you delaying (to show then to me.) चेटी---तेण हि इमस्सिं सिलावट्टए मुहुत्त उपविसद् भट्टिदारिमा । जाव अहं वि कुसुमावचनं करेमि । तेन हि अस्मिन् शिलापट्टके मुहूर्तकमुपविशतु भवती । यावदहमपि कुसुमावचयं करोमि ।। दामी--तो कुछ देर इस शिला-खड पर आप बैठ जायं । तब तक मैं भी फूलो को बटोर लेती हूँ। Maid-Then may the princess take a seat on the stone chair until I myself gather flowers. पद्मावती अय्ये ! कि एत्य उपविसामो? [नायें ! किमत्रोपविशावः ?) पद्मावती-पायेंक्या हम दोनों यहाँ बसें । Padmavati-Revered lady I should we both sit here? । वासवदत्ता--एव्वं होदु । [एवं भवतु ।। उभौ उपविशतः) वासवदत्ता-ऐसा ही हो (दोनों बंठ जाती हैं)। Vasava.--Be it so (Both sit) टिप्पणी--(१) शेफालिकागुल्मका-हरसिंगार के पोधे । शेफालिकास्याः गुल्मकाः अथवा शेफालिकाया गुल्मकाः इति शेफालिकागुल्मकाः। गुल्मा एव गुल्मकाः, स्वार्थ कः। पेड की जद से लेकर शाखा तक का माग प्रकाण्ड (तना) कहलाता है और बिना सने का पौधा जिसमें जह से ही कई शाखायें निकलती है चतुर्थोऽङ्कः हैं गुल्म कहलाता है। अस्त्री प्रकाण्डः स्कन्धः स्यान्मूलाच्छाखावधिस्तरोः।' 'अप्रकाण्डे स्तम्बगुल्मों इत्यमरः । (२) कुसुमिता-पुष्पित, खिले हुए। कुसुमानि सजातानि येषां तादृशाः, कुसुम इतन् 'तदस्य सञ्जातम्' इति सूत्रेणा (३) इति -इसको 'पश्यामि' क्रियापद से पूर्व जोड़ना चाहिए, ताकि पूर्व वाक्य 'पश्यामि' का कर्म बन जाय । (४) नाम--यह अव्यय यहाँ निश्चार्थक है। (५) प्रवा- लान्तरित:-~-मगों से ढके हुए या खचित । प्रवाल: अन्तरितानि इति प्रवाला. न्तरितानि, तैः । (६)मौक्तिकलम्बकः--मुक्ता एव मौक्तिकानि, तेषां लम्बकानि ललन्तिकाः, तैः । लम्बक-नामिपर्यन्त लटकने वाला सामान्य हार ।(७)माचिताः -व्याप्त, परिपूर्ण । पाइ+चि+क्त (त) । कर्मणि (5) शिलापट्टके-बैठने के लिये शिला-खड, पत्यर की चौकी । (६) मुहूर्तकम्-क्षणमात्र । चेटो--(तथा कृत्वा)पेवखदु पेक्खदु भट्टिदारिया अद्धमसिलायट्टपहि विन सेहालिाकुसुमेहि पूरिअं मे अंजलि । [पश्यतु पश्यतु भर्तृवारिका अर्द्धमनशिलापट्टकरिव शेफालिफाकुसुमैः पूरितं मेऽञ्जलिम् । दासी-(वैसा करके) राजकुमारी जी ! देखिये, देखिये । मनशिल के समान (अरुण) मूल माग वाले हरसिंगार के पुष्पों से मेरी अजलि मर गई। Maid-(Doing so) Look, look my lady, both my hands are filled with scarlet blossoms of Shephalika lika fakes of natural vermilion. पद्मावती--(दृष्ट्वा)अहो ! विइत्तदा कुसुमाणं । पेक्खदु पैक्खदु अय्या । ग्रहो ! विचित्रता कुसुमानाम् । पश्यतु पश्यत्यार्या । पद्मावती पहा ! कैसे रङ्गबिरगे फूल हैं । देवी जी देखिये। Padmavati-Oh what delicious flowers look, lady, look. वासवदत्ता--अहो दस्सणीअदा कुसुमाणं [अहो ! दर्शनीयता कुसुमानाम् । वासवदता-महा ! फूलो की मुन्दरता कैसी है । Vasara.--How lovely. चेटो--भट्टिदारिए ! कि भूयो अवइणुस्सं ? [भर्तृ दारिके ! कि भयोऽवचेष्यामि ?] ।

स्वप्नवासवदत्तम् मा मा दासी-राजकुमारी जी ! क्या पौर चुना जाय ? Maid--Princess, shall I gather more ? पद्मावती-हला! मा मा भूयो अवइणि हिला भूयोऽवचित्य । पद्मावती-सखी! न, न, प्रब मत चुनो । Padmavati-No, no, gather no more. वासवदत्ता-हला! किणिमित्तं वारेसि ? [ हला! किन्निमितं वारयसि ?] वासवदत्ता-सखी! किसलिए मना कर रही हो ? Vasava.-Friend, why do you stop her ? । पद्मावतो-अय्यउतो इह आअच्छिम इमं कुसुमसमिद्धि पेक्खिम सम्माणिदा भवे । [आर्यपुत्र इहागत्येमा कुसुमसमृद्धि दृष्ट्वा सम्मानिता भवेयम् । पद्मावती-यदि आर्यपुत्र यहाँ प्राकर फूलों की यह बहार देखेंगे तो मेरा सम्मान होगा। Padmavati-Because I hope my lord will honour me by visiting this grove, and secing all its wealth of blossom. वासवदत्ता-हला! पिओ दे भत्ता। [हला ! प्रियस्ते भर्ता ।। वासवदत्ता-सखी! तुम्हें स्वामी प्रिय हैं । Vasava.-Do you love your lord ? पद्मावती-अय्ये ! ण जाणामि, [अय्यउत्तेण विरहिदा उक्कण्ठिदा होमि । [आयें ! न जानामि, । आर्यपुत्रेण विरहितोत्कण्ठिता भवामि । पद्मावती-मायें ! यह तो मै नही जानती, पर उनसे अलग होने पर व्याकुल हो जाती हूँ। Padmavati-I do not know, and get my heart full with longing for bim when he is got near, वासवदत्ता-(आत्मगतम्)दुक्खरं खु अहं करेमि। इविणाम एवं मन्तैदि । [दुष्करं खल्वहं करोमि । इयमपि नामवं मन्त्रयते ।

चतुर्थोऽङ्कः १०५ वासवदत्ता--(मन में) मै बड़ा कठिन काम कर रही हूं। यह भी ऐसा कह रही है। Vasava.---(aside) How great the burden that is laid en me, when even she already speaks like this. चेटी--अभिजादं खु भट्टिदारिपाए मन्तिदं--पिओ में भत्तेति । [अभिजातं खलु भर्तृदारिकया मन्त्रितं-प्रियो मे भतेति ।। दासी-कुलीनता के अनुरूप ही राजकुमारी ने कहा कि पतिदेव मुझे प्रिय हैं । Maid--Courteously indeed did the princess say "I love the lord." पद्मावती-एक्को खु मे सन्देहो । [एकः खलु मे सन्देहः। पद्मावती- मुझे एक सन्देह है। Padmarati-Only one thing I suspect. वासवदत्ता-कि कि ? [कि किम् ? ] वासवदत्ता--क्या क्या? Vasaya.--What, what is it ? पद्मावती--जह मम अय्यउत्तो, तह एव्व अय्याए वासवदत्ताए त्ति? [ यथा ममार्यपुनस्तथैवाया बासवदताया इति । पद्मावती--प्रायपुत्र जैसे मेरे प्रिय हैं उसी तरह पार्या वासवदत्ता के भी (ये क्या? Padmavati-That the lord belongs to me (i.e. loves me) only equally with Vasavadatta. वासवदत्ता--प्रदो वि अहिलं । [प्रतोऽप्यधिकम् ।। वासवदत्ता-इससे भी अधिक। Vasara.-Even more than that. पद्मावती--कहं तुवं जाणासि ? [कथं त्वं जानासि ?] पद्मावती-कैसे तुम जानती हो ? Padmavati-How do you know ? वासवदता-(प्रात्मगतम्) है, अप्यउत्तपक्सवादेण अदिक्कन्दो समुदारो। एच्वं वाव भगिस्सं । (प्रकाशम) जइ अप्पो सिणेहो, सा सजणं ण परितजदि । [हम्, प्रार्यपुत्रपक्षपातेनातिकान्तः स्वप्नवासवदत्तम् . समुदाचारः एवं तावद् भणियामि । यद्यल्पः स्नेहः, सा स्वजनं] न परित्यजति । वासवदत्ता--(मन में) उह ! आर्यपुत्र के पक्षपात से मैंने शिष्टाचार का उल्लघन कर दिया । अच्छा तो इस प्रकार कहूँ। (प्रकट) यदि (वासवदत्ता का) प्रेम थोड़ा होता तो वह अपने परिवार को नहीं छोडती । Vasaya.-- (To berself) Through my love towards the lord due limits have been overstepped. I shall thus say now (loudly). If her love was less, she would not leave her own people. पद्यादती---होदवं [भवितव्यम् । पद्मावती-हो सकता है। Padmavati-May be. चेटी- भट्टिदारिए ! साहु भट्टारं भणाहि--अहं पि वोणं सिविख- स्मामि त्ति [भर्तृ दारिक ! साधु भर्तारं भण-अहमपि वीणां शिक्षिष्य इति । दासो-राजकुमारी जी ! पाप पतिदेव से अच्छी तरह कहें कि मैं भी वीणा सीलूगी। Maid-Princess, well tell the lord. “I too shall learn (to play on the flute). पद्मावती---उत्तो नये अय्यउत्तो [उपतो मयार्यपुत्रः 1] पद्मावती-मैने तो प्रायपुत्र से कहा था। Padmavati-I have told my lord. वासवदत्तातदो कि भणिदं ? [ततः किं भणितम् ?] वासवदत्ता--तब (उन्होंने) क्या कहा Vasava.--Then what did he say ? पद्मावती-अभणिन्न किञ्चि दिग्धं हिस्ससिन तुजीओ संवृत्तो । [अभणित्वा किञ्चिद् दीर्घ निःश्वस्य तूष्णीकः संवृत्तः ।। पद्मावती-विना कुछ कहे ही लम्बी सांस लेकर चुप हो गये । Padmavati-He said no word, but, sighing deeply. stood sileot. वासयदत्ता--तदो तुवं विस तपसि? ततस्त्वं किमिव तर्कयसि ?] ?

चतुर्थोऽङ्कः १०७ वासवदत्ता--तो इससे तुम्हारा क्या मनुमान है ? Vasaya.--And what do you derive from this ? पमावती-तमि अय्याए वासवदत्ताए गुणाणि सुमरिम दवित- णदाए मम अग्गदो ण रोदिदि ति। तर्कयाम्याया वासव. वत्ताया गुणान् स्मृत्वा दक्षिणतया ममाग्रतो न रोदितीति । पद्मावती--मेरा अनुमान है कि प्रार्या वासवदत्ता के, गुणो का स्मरण करके उदारता के कारण मेरे सामने नहीं रोए । Padmavati-I inferred that remembering the virtues of the revered Vasavadatta, he did not weep before me through courtesy. वासवदत्ता- --(प्रात्मगतम्) धण्णा खु ह्मि, जदि एवं सच्चं भये । {घन्या पल्वस्मि, यवं सत्यं भवेत् ।] वासवदता(मन में) यदि यह गत्य है, मैं कृतार्थ हो गई। Vasaya.--To herself) bappy indeed am I, if this be truc. टिप्पणी--(१) तपा कृरया-फलों को चुनकर प्रयया फूलो से मलि' मा फर। (२) अधमशिलापट्टकंः--जिनके माधे माग मैनमिल के टुकड़ों के ममान लान रङ्ग के हैं। (३) मनगिला--पर्वन में उत्पन्न होने वाली एक लाल रङ्ग को धातु, मनसिल । 'धातुमनः शिलाद्यद्रेः' इत्यमरः। मघम् एपदेगः मनशिलापट्टो येपा, ते. । मनःशब्दयाम्पा गिला मनस्सिला मध्यमपदलोपी समाम । गनशिलायाः पट्टः पप्ठी तत्पुरुष । (४) विचित्रता-प्रनेकरूपता । प्रायः सभी फूल एक रंग के होते हैं, किन्तु गेफालिका सालिमा तथा वेतना पार होने के कारण विचित्र या विस्मयकारक है । (५) दांनीयता-गुन्दरता । दर+पनीयर् कर्मणि दर्शनीयः सम्य माव; दांनीयता दर्शनीय+तत् । (६) प्रवचेप्यामि-पुन्। यहाँ विध्यपं मे पट सकार हुपा है। पव+चि+मुद्र (स्वामि। 3. पु० ए००। (७) मा मा-यह दिपारण निषय कीदाता के लिए किया गया है । (८) भविश्य-यहाँ 'मा' के योग में क्या प्रत्यय मानि- नीर है.किन्तु 'निरसा क्या मान कर स्पषित् ममापान रिया मा साना है ।.व+चि+स्यायोनिमसरामयोः प्रतिपययोः प्रायोकमा भर्षात निषेपार पसन् मोर मल के योग में पाया' रा पिपान होता है 'मा के माप नहीं। (E) पतो-(पापुत्रः)-यह पाठ पगल है। सही जगह 'मम्मरतन (पान)--ऐमा पाउ होला हिर। इस बार का मारा यह है कि मेरे - २०६ स्वप्नवासवदत्तम् । प्रिय पति यहाँ माकर और इन फूलो की बहार देखकर बहुत प्रसन्न होंगे और पुष्पों की सुपमा बढ़ाने में मरी सुरुचि जानकर मेरा सम्मान करेंगे। (१०) उत्कण्ठिता--अघोर । उत्कण्ठा जाता प्रस्था: इति विग्रहे उत्कण्ठा+इतन्+टाप (म) । (११) पुष्करम् -कठिन । दुःखेन कर्तुं शक्यम् दुस् क खल 'ईषदुःसुपः कृच्छाकृच्छार्थेषु खल् (प्र) । इत्यनेन । (१२) यया मन-वासवदत्तायाः इति ~~~-नवोढा पत्नी पद्मावती का अपने प्रगाढ़ पतिप्रेम समानता अपनी पूर्व सपली वासवदत्ता से करना स्वाभाविक ही है। (१३) हम्-यह अव्यय शंका, वितकं मोर मनुताप का सूचक है। (१४) प्रार्यपुत्रपक्षपातन--पक्षे पातः 'पक्षपातः सप्तमी तत्पुरुष, मार्यपुत्रस्य पक्षपातः षष्ठी तत्पुरुष, तेन इति हेतो तृतीया । (१५) परित्यजति–यहाँ सम्भावना के अर्थ में लट् लकार हुमा है । (१६) भवितव्यम्भू+तव्यत् । यहाँ हेतु मे तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुमा है । 'दाक्षिण्यतया' पाठ मी मिलता है। दक्षिण एव दाक्षिण्यः स्वार्थ उदारता के कारण अथवा 'दक्षिण' नायक होने के कारण सभी पत्तियों से समान प्रेम करता है। (१७) प्रणित्वा-यहाँ नन् समास है। इसलिए 'समारोऽनन्पूर्व पत्वो ल्यप् सूत्र से क्त्वा को ल्यप् मादेश नही हुमा। (१८) सूणोक:-गोन । (१९) दक्षिणतया-उदारता या विदग्धता के कारण। (२०) रोदिति-यहाँ भूत के धर्य मे लट् लकार हुआ है । (ततः प्रविशति राजा विदूषकश्च ।) विदूषकः--हो ! हो! 'पचिपपडिप्रबघुगोवकुसुमयिरलवादरमणिज्ज पमदवणं । इदो दाव भवं । हो ! ही ! प्रचितपतितबन्धुजीव- कुसुमधिरलपातरमणीयं प्रमदवनम् । इतस्तावद् भवान् । ] संस्कृत टीका-ही हो-पानन्दसूचकमव्ययमिदम्, प्रचितपतितवाघुजीव- कुमुमविरलपातरमणीयम्-प्रचितानि प्रचितानि पतितानि च यन्ततः स्वयं भ्रष्टानि प यानि बन्धुजीवकुमुमानि बन्धूकपुष्पाणि तेषां विरसेन स्वत्पन इतस्तत इति यावत् पातेन पतनेन रमणीयम् भाकर्षकम्, प्रमदवनम्-कीरोधा- नम् (मस्ति) । इतः-प्रस्मात् प्रदेशात, तावत्-ति याक्यासारे, मवान- महाराजः, भागच्छतु इति गैपः। १. पाठअन्तरगविवदिम् (नययिवपित) विरलसंताप पाठ अधिक आपस प्रतीत होता है, नवानि विवपितानि पुजीयकुसुमानि ।

चतुर्योऽङ्कः
(तदनन्तर राजा और विदूषक का प्रवेश 1) विदूषक--प्रहाहा
चुन लिये गये, कुछ बिखरे पड़े हुए और कुछ गिरते हुए दुपहरिया के फूलों से
मानन्द वाग सुशोभित हो रहा है। आप इधर से चलें ।
(Enter king and Vidushaka) Vidashaka-Aba, How lovely
is this pleasure grove in which the intermittent breeze has
stiuml. A crimson carpet of Bandhuka Blossosms. This way,sir.
टिप्पणी---(१) प्रचितपतित "-प्रचितानि च तानि पतितानि प्रचितपति-
तानि विशेषणोमयपद कर्मधारय समास खजकुन्जवत् । प्रचितपतितानि च
बन्धुजीवकुसुमानि कर्मवारय समास। (२) बन्धुनीवकुसुमानि-दुपहरिया के
फूल । 'रक्तकस्तु बन्धको बन्युजीवकः' इत्यमरः ।
राजा-वयस्य ! वसन्तक ! अयमहमागच्छामि ।
राजा--मित्र वसन्तक ! यह मै पा रहा हूं।
King-Friend. Vasantaka. I too am coming.
कामेनोज्जयिनी गते मयि तदा कामप्यवस्थां गते
दृष्ट्वा स्वरमवन्तिराजतनयां पञ्चेपवः पातिताः ।
तरद्यापि सशल्यमेव हदयं भयश्च विद्धा वयं
पञ्चेषुर्मदनो यदा कयमयं षष्ठः शरः पातितः ॥१॥
प्रन्यय--तदा उज्जयिनी गते, मवन्तिराजतनया स्वरं दृष्ट्या काम् भापि
पवस्यां गते मयि कामेन पञ्च इपव: पातिताः । तेः पद्य मपि (मम) हृदयम्
सशल्यम् एव । वयं भूयः च विद्वाः । यदा मदनः पञ्चेपः (तदा तेन) प्रय
पष्ठः पारः कप पातितः ॥
संस्कृत टोका--तदा-तस्मिन् समये, उज्जयिनों-प्रद्योतराजधानो, गते--
प्रयाते, अवन्तिराजतनया-वासवदता, स्वरं--ययाकामं, दृष्ट्वा-पवलोय,
काम् अपि-अनिर्वचनीयाम, भस्वथा-दशा, गते~-प्राप्त, मयि-उदयने
कामेन--मदनेन, पञ्च-एतत्सम्याकाः, इषवः--वाणा:, पातिता:--प्रक्षिप्ताः ।
त:--पाणः, भय मपि-प्रपना भरि, (मम) हृदयं-चेतः, साल्यम् एव--
कीलितम् एव (विद्यते) । वयम्-महम्, भूयः-पुनः, प-प्रपि, विदा:-
पाहताः । यदा-यहि । मदनः कामदेव , पञ्चेपुः-पञ्चपाणः (प्रस्ति
सदा तेन), प्ररम्-एपः, पक-एनसंख्याकः, घर:-बापः, कप मुता.
पातित:--प्रतिप्तः? ॥१॥

1 स्वप्नवासवदत्तम् प्रयं भाव:--राजा विदूषकं कथयति-मित्र ! यदाऽहम् उज्जयिनीं गत्वा साक्षाद् रतिमिव वासवदत्तां दृष्ट्वा मोहमुपगतः तदा कन्दर्पण स्वीयाः पञ्चापि बाणा: मयि निपातिताः । परमाश्चयं यत् इदानी पद्मावतीमुद्दिश्य कामेन पुनरप्यहं विटोऽस्मि ! यदि कामः पञ्षुः उच्यते तदा पञ्चानामपि वाणाना निपातनानन्तरं पष्ठः बाणः तेन कुत मानीत: ? अनुवाद--उस समय उज्जैन जाने पर मालवराजकुमारी को इच्छानुसार देखकर किसी विचित्र अवस्था को प्राप्त हुए मुझपर कामदेव ने पांचों वाण गिरा दिये थे । उनसे अब भी मेरा हृदय पीड़ित ही है । फिर भी हम वेध दिये गये हैं। जब कामदेव के पांच ही बाण हैं तो यह छठा बाण उसने कहां से फेंका ॥१॥ The God of love shot all his arrows at me, when in Ujjain 1 feit his uimost power. Gazing upon the eyes of that fair maid, my heart is still entertaining those shafts. We are again smitten, when Madan has five arrows only, how, could this sixth (arrow) be discharged. टिप्पणी-(१) कामेन--पातिताः क्रिया के साथ संबंध, 'मनको फरि तृतीया' से तृतीया हुई है । (२) त्वरम्--इच्छानुसार, अव्यय 'स्वादोरेरिणोः' सूत्र में वृद्धि हुई है। (३) सशल्यम्-शल्पः सह वर्तमानम् इति मल्यम् । (तुल्ययोग बहुव्रीहिः 1) (१) वयम्-यहाँ भस्मदो द्वयोश्च' सूत्र से बहुवचन हुआ। (५) विद्धा:--वैध दिये गये। व्य+क्त 'महिन्यावयियधि' इत्यादि- मूण सम्प्रसारणम् । (६) पञ्चेष:--कामदेव। पञ्च इषवः बाणा: यस्य स पञ्चेपः बहुव्रीहि समास । कामदेव के पांच वाग माने गये हैं। जैसे--प्ररविन्दम गोक च चूतं च नवमस्लिका । नीलोत्पलन्च पञ्चते पञ्चवाणस्य सायकाः ।।' "उन्मादस्तापनश्च शोपण: स्तम्मनस्ततया। सम्मोहनश्च कामस्य पञ्च बागा: प्रकोनिताः।। (७)पद:। पण्णा पूरणः इति विग्रहे पवादात इट् प्रत्यय हो 'पट्कतिकतिपयवतुरां युका' इति सूत्रेण पुगागमः । यह शामविपीडित पर है । तल्लक्षण वृत्तरत्नाकरे-गूर्यास्वमसनस्तताः सगुरयः शार्दूलविक्रीडितम् ।।१।। बिपक--हिं प रा गदा तत्तहोयो पदुमावदी, लदामण्यं गदा भवे, उदाहो असणकुसुमसञ्चिदं बग्यचम्मायगुण्ठिदं विग्न पध्यदतिल पाप सिलापट्टनं गदा भवे, प्राउ प्रधिनकड़अगन्धसत्तच्छदवर्ण पयिट्टा भये, महब मातिहिदमियपविससंकुलंदारपटपदमं गदा भये । [अध्यमवलोक्य] हो हो सरप्रकालणिमले अन्तरिक्स पसारि- 'चतुर्थोऽङ्कः अबलदेवबाहुदंसगी सासरसपन्तिं जाव सामाहिदं गच्छन्तिं पेक्खदु दाव भवं । [कुन नु खलु गता तत्रभवती पद्मावती, लतामण्डपं गता भवेत्, उताहो असनकुसुमसञ्चितं व्याघ्रचर्मावगुण्ठितमिव पर्वततिलकं नाम शिलापट्टकं गता भवेत् अथवा अधिककटुकगन्ध- सप्तच्छदवनं प्रविष्टा भवेत्, अधवा आलिखितमृगपक्षिसङ कुलं दारुपर्वतकं गता भवेत् । ही ! हो ! शरत्कालनिर्मलेन्तरिक्ष प्रसारितबलदेवबाहुदर्शनीयां सारसपङिक्तं यावत् गच्छन्तीं पश्यतु तावद् भवान् । संस्कृत टीका-तत्रमवती-माननीया, पद्मावती--मगवेशनन्दिनी, कुत्र नु खलु गता--क्व प्रस्थिता मवेत्, उताहो--प्रथवा, प्रसनकुसुममञ्चितम्-प्रसनानां सर्जकवृक्षाणां कुसुमः पुष्पैः सञ्चितम् प्राच्छन्नम्, (प्रतएव । व्याघ्रचर्मावगुण्ठितमिव व्याघ्रचर्माच्छादितमिव, पर्वततिलक नाम--एतनामक, शिलापट्टक-शिलाखण्डं, गता-प्रयाता, भवेत् प्रथवा-पाहोस्वित्, प्रधिककट कगन्धसप्तछदवन-अधिक- कटुकः प्रतितीक्ष्णः गन्धः मामोदः येषां तादृशाना सप्तच्छदाना सप्तवर्णवृक्षाना यनम् मरण्यम् तद्बहुलप्रदेशमिति यावत्, प्रविष्टा-~गता, मवेत्, अथवा, मालिखित. मगरक्षिसहकुलम्-प्रालिखितः चित्रितः मृगपक्षिमिः पशुपक्षिमिः सङ्कुलं व्याप्तम्, दाहावंतक काष्ठनिमित कोडापवंत, गता-प्रयाता, मवेत् । ही ही-विस्मयप्रसन्नता- सूचकमव्ययमिदम्, शरत्कालनिर्मने-शररकालेन शरदृतुना निर्मले स्वच्थे, अन्तरिक्षे--माकारो, प्रमारित बलदेवबाहुदनीया--प्रसारिती विस्तारितो बलदेवस्य वलरामस्य याहू भुजो तो इव दर्शनीयां मनोहरा, सारसपक्तिं सारसा- नाम् एतनामकपक्षिणां पदिस्त श्रेणि, समाहिन--पावयान सम्यरूपेण शृंवलित यथा स्यात् तथा, गच्छन्ती-वजनी, पश्यतु--प्रवलोकयतु, मवान्महाराजः । विदूषक--माननीय पद्मावती जी कहाँ चली गई? (शायद) कुन में गई हो । प्रथदा ममन वृक्ष के फूलो से ढक जाने के कारण बाघ की माल में मो हए की मांति (दीसने वाले) पर्वततिलक नामक शिनासर पर गई हो। मयदा यहुत बड़वी गध वाले पतिकन के वन में गई हो। अथवा नाती के बने कृत्रिम पहार पर, जहाँ बहन ने पशु-पक्षियों के चित्र गुदे हुए हैं, गई होगी। (ऊपर ताकार) महाहा ! सरद ऋतु के कारण निर्मम पारा में फैमाई हुई स्वप्नवासवदत्तम् बलदेव जी की मुजामों के समान कमनीय सारस पक्षियों की कतार को, जो निश्चिन्त रूप से उड़ रही है, आप देखें। Vidushaka-Where indeed has her ladyship Padmavati gone ? She might have gone to the bower of creepers, or it might be that she has gone to the stone chair called “Parvat tilaka" covered with tiger's skin, as it were, on account of its being heaped with the flowers of the Asapu tree (or the Pıtasala tree); or sbe might have entered the saptachbada woods with greater pungent odour, or she might have gone to thc Daruparvataka crowded with birds and beasts drawn in a picture. (L00- king up) Hi, Hi, in the meantime Your honour may sce the group of cranes going calmly in the clear autumnal sky as beautiful to look at as the arm of propitiated Baldeva. टिप्पणी--(१) उताहो--या, मयवा । 'माहो उताहो किमत' इत्यमरः । मसन० पीतशाल नामक वृक्ष। 'पीतसारके सर्जकासनबन्धूकपुष्पप्रियकजीवकाः' इत्यमरः । (२) प्रसनकसुमसंचितम्-प्रसन वृक्ष के फूलों से ढंके हुए । असनाना कुसुमः सचितम् (षष्ठीमित त० ता०) । (३) ध्यातवर्मायगुण्ठितम्--- व्याघ्रचर्म से प्रात्त । व्याघ्रचर्मणा अवष्ठितम् । त. तत्पु० । (४) अधिका- कटकः-अधिकं कटकः इति मधिककटुक: सुप्सुपा समास । (२) अधिककटक- गन्यसप्तच्छवयनम्-बहुत कड़वी गन्धवाली सप्तच्छद का वन । अधिककटुकः गन्यः येषा (बहुव्रीहि) ते अधिक कटुकगन्याः तादृशाः सप्तच्छदा: (कर्मघा०) तेषां बनम् ( ५० त० ।। (६) मालिखितमुगपतिसंकुलम् ---मृगारच पक्षिणश्न मृगपक्षिणः (८० स०) प्रालिखिताश्च ते मृगपक्षिणः (कर्मघा०) तः सकुलम् (स० तत्पु०) । चित्र मे लिखे हुए पशुपक्षियो से युक्त । (७) वारपर्वतकम- दानिमितः पर्वत: दारुपवंतः मध्यमपदलोपी समारा, दारुपवंत इव इति दारुपर्वतकः 'इवे प्रतितो इत्यनेन कन् प्रत्ययः, तम् । (८) प्रप्तारितयलदेवमाहानीयाम-- बलदेव जी को फैली हुई नजानों के समान सुन्दर । प्रसारिती पलदेवस्य वाह इव दर्शनीयाम् ( कर्मपा०) । प्रसारित-प्र+म+गि+3 (स) गर्माग। (९) पावत् "सावत् ये दोनों शब्द वाक्य की घोमा बढ़ाने के लिए प्रयत हुए हैं। (१०) समाहितम्-निश्चिन्त रूप से। पत्र रियाविशेषणात् दिनीया । राजा--ययस्य ! पक्ष्याम्येनाम्, मुग्यायतां च विरलाच नतोन्नतां च सप्तपियंशकुटिला प नियतनेषु ।

११४ स्वप्नवासवदत्तम् मप्तते शेयाश्चित्रशिखण्डिनः ॥' इत्यमरः । (५)निर्मुच्यमानभुजगोदरनिर्मसस्य- उतरती हुई केंचुली वाले सांप के पेट के समान । निर्मुच्यमानश्चासी भुजगः (वर्मघा०) तस्य उदरस् (प. तत्पु०) तदिव निर्मलम् तस्य । निर्मुच्यमान-~- निर+मुच्+शानच (कर्मणि) । (६) विभज्यमानाम्--अलग की जाती हुई। वि+म+शानम् (कर्मणि)। इम इलोक के पूर्वाद्ध मे नार 'च' से चार विशेषणों का समुच्चय समझना चाहिए । 'सप्तपिवंशकुटिलाम' पोर निर्मुच्यमानभुजगोदर- निर्मलस्य' इन दोनों जगह उरमा अलकार है 'सोमामिव' में उत्प्रेक्षा अलकार है । इस प्रकार उपमा और उत्प्रेक्षा से संसृष्ट स्वभावोक्ति अलंकार यहाँ उत्पन्न होता है । यह वसन्ततिलका छन्द है। तल्लक्षण-ज्ञेया वसन्ततिलका तमजा जो मः ।।२।। चेटी--पेक्खदु पेक्खनु भट्टदारिया एवं फोकणदमालापण्डररमणीअं सारसन्ति जाव समाहिदं गच्छन्ति । अम्मो ! भट्टा । पश्यतु पश्यतु भर्तृ दारिका एता कोकनदमालापाण्डररमणीयां सारसपडिक्तं यावत् समाहितं गच्छन्तीम् । अम्मो ! भर्ता । संस्कृत टीका---प्रेक्षताम्---पश्यतु, मतदारिका~-राजकुमारी, एता- पुरो दृश्यमानाम, कोकनदमालापाण्डररमणीया--कोनदाना श्वेतकमलाना माला परितः तद्वत् पाण्डरा श्वेता रमणीया मनोहरा र ताम्, सारसपक्ति-सारमणि, समाहित-मङ्घटितरूपेण, गच्छन्तीम्जन्तीम् । मम्मो !--हो ! मा-- पनिदेव. समुपागत इति दोषः । सी--रानकुमारी जी ! देखिये, देखिये--यह त कमल की माला के गमान उज्ज्वल एय मनोहर सारसो को पकिन (कंसो) निश्चिन्तता से उड़ी जा रही है । परे ! स्वामी (यही हैं) । Vaid-Look, just behold the line of cranes beautiful and white like a garland of Kokagada lotuses calmly proceeding oh ! the lord. टिप्पगो--(१) पश्यतु पश्यतु--यह दिदि भादर भूपनार्थ है । (२) कोरनदमालापाण्डरपणीयाम्--वेत कमल की माला के समान उपयर एथ मनाहर। पाग व रमणीया प इनि पाररमणीया विशेपणीमपदामंधारय मोक्नदमालाइव पाण्डररमणीया उरमित ममारा। परि तोलस पोरनदास प्रमरोग माग मे कोमा लान समान को पहले ६, रिनु मनाम, चतुर्थ अंक - यहां प्रसंगानुसार श्वेत कमल का अर्थ घट रहा है । पाण्डर--श्वेत 'विशदश्वेत- पाण्डराः' इत्यमरः । (३) समाहितम्--संघटित रूप से या सावधानी से या निश्चिन्तता से । यह क्रियाविशेषण है। - पद्मावती-हं ! अय्यउत्तो अय्ये ! तब कारणादो अय्यउत्तदंसणं परिहरामि । ता इमं दाव माहवीलदामण्डवं पविसामो । [हम् ! आर्यपुत्रः। आयें ! तव कारणादायपुत्र दर्शनं परिहरामि । तदिमं तावन्माधवीलतामण्डपं प्रविशामः ।] संस्कृत टोका--हम्--मद्दोचसूचकमव्ययमिदमत्र, प्रायें ! -देवि ! तव- भवत्याः, कारणात्---हेतोः, प्रार्यपुत्रदर्शन--पतिदेवस्य दर्शन,परिहरामि त्यजामि । तत्--तम्मात् कारणात्, इम--समीपस्थित, माधवीलतामण्डपम्- वामन्तीकुञ्जम्, प्रविशामः-प्रविश्य तिष्ठाम इत्यर्थः । अनुवाद-हैं ! प्रार्यपुत्र ! देवी ! तुम्हारे कारण में प्रार्यपुत्र का दर्शन छोड़ती हूँ। इसलिए अभी हम लोग इस माधवी-कुज मे चलें। Padmavati-it is my husband, venerable lady, on your account I shall avoid the sight of the prince. Then this bower of Madhavi cieepers. वासयदत्ता-एवं होदु । एवं भवतु । (तया कुर्वन्ति ।) वासवदत्ता-ऐमा ही हो। (माधवो-युज मे प्रवेश करती हैं) Vasava.--Let it te so.(They go inside the arbour) विदूषकः--तत्तहोदो पदुमावदी इह प्रामच्छिन जिग्गदा भये । तत्रभवती पद्मावतोहागत्य निर्गता भवेत् ।] विदपक~महारानी पद्मावती यह प्रारर चली गई हैं। Vidushaka-It seems that her ladyship Padmavati has been here and has gonc. राजा--कथं भवान् जानाति ? राजा--माने जाना है' King-How do you know ? विपक:-इमाणि प्रयइदकुसुमापिकालिआगच्छामि यस दाय । [इमानपचितकुसुमान शेफालिकाका प्रेक्षता सायद अमान् । we enter स्वप्नवासवदत्तम् . संस्कृत टीका-इमान्---पुरो विद्यमानान्, अपचितकुसुमान्-~अपचितानि वोटितानि कुसुमानि पुष्पाणि येभ्यः तान्, शेफालिकागुच्छ कान्-शेफालिका- कुसुनस्तबकान, मवान् -महाराजः, प्रेक्षतां पश्यतु । अनुवाद--विदूषक-- :--इन हरसिंगार के गृच्छो को तो देखिये, जिनके फूल तोड़ लिये गये हैं। Vidashaka-Just see these shephalika plants from which the blossoms have been gathered, राजा-महो! विचित्रता कुसुमस्य, वसन्तक ! राजा-अहा ! कैसे रग-विरगे फूल है, वसन्तकः ! King-Oh, the variety of flowers, Vasantaka. वासवदत्ता--[प्रात्मगतम् ] वसन्तप्रसङ्कित्तेण अहं पुण जाणामि उज्जइणीए वत्तामि ति । वसन्तकसंकीर्तनेनाहं पुनर्जानामि उज्जयिन्यां वर्त इति । वासवदता--(मन मे वसन्तक का नाम लेने से तो मैं समझती हूँ कि में पुनः उग्जैन मे हूँ। Vasaya.~(Aside) By the repetition of the name Vasantaka, I think, I am again in Ujjain (as it were). राजा--वसन्तक! अस्मिन्नेवासीनौ शिलातले पद्मावतों प्रतीक्षिष्यावहे । राणा-वसन्तक ! इसी शिला-सुण्ड पर बैठकर हम दोनों पद्मावती को प्रतीक्षा करें। King--Vasantaka. sitting on this very stone we (two) shall await Padmavati. विदूषकः--भो! तह । (उपविश्योत्याय) हो! हो ! सरअकाल- तिपखो दुस्सहो आदयो। ता इमं दाव माहवीमण्डवं पविसामो । [भोस्तथा । हो ! हो ! शरत्कालतीक्ष्णो दुस्सह प्रातपः ! तदिमं तावन्माधवीमण्डपं प्रविशावः ।] विषक- जी! अच्छा । (बैठते ही उठकर) हा हा ! शरद ऋतु की तीखी धूप सही नहीं जाती 1 इसलिए इस वासन्ती सुज में चलें। Vidushakar-Yes, alright {sitting down and getting up) Hi, Hi the sunshine, hot in the autumnal scason, is unbearabic. There we to shall enter the Madhavi bower.

ननुष अंक राजा--बाढम्, गच्छाग्रतः । राजा--प्रच्छा, आगे चलो। King-Alright, Move on, विदूषकः-- एव्वं होदु । [एवं भवतु ।] (उभौ परिक्रामतः।) विदूषकः--ऐसा ही हो । (दोनो का प्रस्थान) Vidashaka-Let it be so. (Both turn round.) पद्मावती--सत्वं पाउलं कत्तुकामो अय्यवसन्तयो । कि दाणि करह्म? [सर्वमाकुलं कर्तु काम प्रार्यवसन्तकः । किमिदानी कुर्मः ? पद्मावती-प्राय वगन्तक मब चौरट करना चाहते हैं । अब क्या करें ? Padmavati-Revered Vasantaka wishes to upset everything. wb3t may we do now ? चेटी--भट्टिदारिए ! एवं महुअरपरिणलोणं ओलंबलदं प्रोधूय भट्टारं वारइस्स । [भत दारिके ! एतां मधुकरपरिनिलीनामवलम्ब नतामयधय भर्तारं वारयिष्यामि ।] दासी-गजकुमारी ! भौंरो मे लदी इम महारे की लता को हिला कर म्बानी को (माने गे) रोक दूगी। Maid-My lady, shall I shake this hanging branch, with a buzz with bees to keep the king back ? पद्मावती--एव्वं करहि । [एवं कुरु।] (चेटी तथा करोति ।) पद्मावती-ऐमा ही करो। (दासी यंगा हो करती है।) Padmavati-Do this (The maid docs so.) विदूषकः---प्रविहा, अविहा, चिठ्ठदु चिट्ठदु दाय भयं । [अविह अयिह, तिष्ठतु तिष्ठतु तावद् भवान् ।। विदूषकः--मोह ! मोह ! टहरिये, जरा पाप ठहरिये । Vidashaka-Oh.ob, wait just want, your honour. राजा-किमर्थम् ? रागा--क्यों? King-Why, विदूषकः--वासोएपुत्तहि महमरेहि पौरिदो हि । दास्याः पुरमधुकरः पीडितोऽस्मि ।

स्वप्नवासवदत्तम् विदूषफ:--हरामी भोरों ने मुझ पर प्राक्रमण कर दिया है । Vidashaka-I am troubled by these whorl-son bees. राजा-मा मा भवानेवम् । मधुकरसन्त्रासः परिहार्यः पश्य, राजा--न न, ऐसा न कहो । भौरों का भय मिटा देना चाहिए। देखो- King--Let it not be with you, let it not be so Harming the bees should be avoided. टिप्पणी ---(१) सव कारणात्-तुम्हारे कारण । वासवदत्ता पर-पुरुष का मुख नही देखती है । इसलिए पद्मावती पति से मिलने की उत्कण्ठा रखते हुए भी उसके पास नही जाती है । (२) परिहरामि-~छोड़ती हूँ। परि+ह+लट उ० पु० ए०व० । (३) प्रविशामः-प्रवेश करते है। प्र+विश् + लट् उ० पु० बहु० व० । (४) अवचितकुसुमान-जिनके पुष्प तोड़ लिये गये है। अब+ धि+क्त (त) कर्मणि अवचित । अवचितानि कुसुमानियेभ्यः तान् बहुव्रीहिः । (५) शेफालिकागुच्छकान्--हरसिंगार के गुच्छे । गुच्छा एव गुच्छकाः, स्वार्थे कः, तान् । 'स्याद् गच्छकस्तु स्तबकः' इत्यमरः । (६) विचित्रता--अनेकवर्णता, सुन्दरता । (७) वसन्तकसंकीर्तनेन--'यसन्तक' इस सम्दोघन पद के उच्चारण से । उज्जैन में वासवदत्ता इस नाम को अनेक बार सुन चुकी थी। इसलिए चिरकाल के बाद पाज प्रियतम के मुख से इसका उच्चारण सुनकर उसे अपने जीवन के मधुर दिनों का स्मरण हो पाता है । इसलिए वह कहती है कि मानो आज मै उज्जैन में ही हूँ। (८) प्रासोनौ--उपविशन्तो । प्रास् (उपवेशने+ शानच्, 'ईदासः' इत्यनेन ईत्वम् । (E) प्रतीक्षिष्यावहे इंतजार करें । यहाँ विध्यर्थ मे लट् लकार हुपा है । प्रति + ईक्ष+ (स्यावहे) उ० पु० द्वि० व० । (१०) ही हो--यहाँ दुःखसूचक अव्यय है। (११) दुःसह-दुःखेन मोढ शक्यः । दु/सह+खल् (प्र) 'ईषदुःसुपु' इत्यादिना । (१२) तत्--यह हेत्वर्थक प्रत्यय है । (१३)प्रविशाव:--प्रवेश करें । विध्यर्थ मे लट् लकार हुमा। प्र+विश+ लट् । उ० पु० द्वि० व० । (१४)सर्वमाकुलं कर्तुं कामः-सारे प्रयत्न को विफल करने को इच्छुक । कतुं कामः यस्य स कतु कामः, 'तुवाममनसोरपि' के द्वारा 'कर्तुम्' मे 'म्' का लोप हो गया। (१५) मधुकरपरिनिलोनाम्--मौरी से व्याप्त । मधुकरैः परिनिलीना, ताम् । अथवा परिनिलोनाः मधुकराः यस्या सा, ताम् । वाहिताम्यादिषु' से 'परिनिलीन' का परनिपात हो गया । (१६) प्रवलम्बताम्-अन्य लतानो को अवलम्ब देने वाली प्रधान लता या वह लता + चतुर्थ प्रक ११६ जिसके सहारे पद्मावती बैठी हुई है । अवलम्बभूता लता इति अवलम्बलता ताम्, मध्यमपदलोपी समाम । (१७) अवधूप-हिलाकर या कंपाकर । अव धू (कम्पन)+क्त्वा ल्यप् । (१८) अविह--यह विपादसूचक अव्यय है। (१९) दास्याः पुत्रः---कमोनो ने । यहाँ अलुक् समास है । 'पष्ठ्या आक्रोशे' सूत्र से पष्ठी विभक्ति का प्रलुक हो जाता है । निन्दा या घृणा सूचित करने के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग होता है ।(२०) मधुफरसन्त्रासः परिहार्यः-परि+ हृ+प्यत् कर्मणि । -मधुकराणा भ्रमराणा सन्त्रास:--मयम् । अर्थात् मोरो को मन्त्रास देने वाला कार्य न करो। मधुमदकला मधुकरा मदनााभिः प्रियाभिरुपगूढाः । पादन्यासविषण्णा वयमिव कान्तावियुक्ताः स्युः ॥३॥ तस्मादिहैवासिघ्यावहे । प्रन्यय-मधुमदकला: मदनार्ताभिः प्रियामिः उपगूढाः मधुकराः पादम्या. मविषयाः (मन्तः) वयम् इव कान्तावियुक्ताः स्युः ॥३।। सस्कृत टीका--मधुमदकला.--मधुमदेन पुष्परसपानजन्यमानसविकार- विशेषेण कलाः भव्यवतमधुराः मयुर गुञ्जन्त इति यावत्, मदनार्ताभिः---काम- पीडितामिः, प्रियामिः-प्रियतमामिः भ्रमरीमिरिति यावत्, उपगढा:--- मादिलप्टाः, मधुकराः--भ्रमराः, पारन्यासविषण्णा: पादन्यासेन चरणक्षेपण विपण्या:सिनाः (सन्तः), वयम् इव-महम् इव, कान्ताविपुक्ता:--कान्तामिः प्रियाभिः विमुक्ता. विरहिताः स्य-मवेयः (अतएव अस्माभिः एते भ्रमरा: प्रियाविरहशोके न निपातनीयाः) ||३|| फूलो का रस पोकर मरतो मे गुजार करने वाले तथा कामातुर प्रियामो से प्रालिगित किये जाने वाले ये मोरे (हमारे) परो के रखने से दुखी होकर हमारी तरह प्रियामो मे वियुक्त हो जायंगे ॥३॥ इसलिए हम दोनो यही बैठे। The bees, sweet in their intoxication, clasped by their belo. veds. tormented by love. getting distracted by our footsteps, would like us, become separated from their beloveds. (Therefore let us both sit here) टिप्पणी--(मधुमदाता-गप पान मद से गूजने वाले । (२)मधु- पुष्परस । 'मधु मये पुष्परसे' इत्यमरः । (३) महारा:-मौरे । 'मनतो मधुकरी मलिण्मापासिनः । हिरेफ्युपतिमानपटपरभ्रमरासपः' इत्यमरः ।

१२० स्वप्नवासवदत्तम् (४) मदनाताभि:--मदनेन प्राामिः तु. तत्पु०। (५) उपगूढः-प्रालिगित । उपगह+4त (त) 1(६) पादन्यासविषण्णा:--रोके रखने या चलने या पाहट से दुःखित । (७) पादन्यासेन विषण्णाः । त. तत्युः । विषण्णा-विv सद्+क्त (त) । (८) कान्तावियुक्ताः-~प्रियतमामो से वियुस्त । कान्तामिः वियुक्ताः सृ० तत्यु० ॥३॥ विदूषकः-एव्वं होटु । [एय भवतु ।] (उभावुपविशतः) विदूषक-ऐसा ही हो। (दोतो बैठते हैं 1) Vidushaka-Let it be so. (Both sit down.) --- (अवलोक्य) । पादाक्रान्तानि पुष्पाणि सोम चेदं शिलातलम् । नूनं काचिदिहासोना मां दृष्ट्या सहसा गता ॥४॥ अन्वय-~-पुष्पाणि पादाक्रान्नानि इदं शिलाता च सोम ! नूनम् इह प्रासीना काचित मा दृष्ट्वा सहसा गता ।४॥ संस्कृत टीका-पुष्पाणि--कुसुमानि, पादाक्रान्तानि-पादः चरणः प्राका- न्तानि दलितानि (वर्तन्ते), इदं--दृश्यमान, शिलातलं--प्रस्तरतलं, सोम-- ऊष्मणा सहित (विद्यते ) । (अतः) नून--निश्वितम्, इह-पत्र, आसीना- उपविष्टा, काचित्-महिला, माम्--उदयनं, दृष्ट्वा--विलोस्य, सहसा--- झटिलि, गता-याता॥४॥ राजा--(देखकर) फूल पैरो मे कुचले हुए है, यह शिलातल भी गरम है । (प्रतए व) निःसदेह यहां बैठी हुई कोई महिला मुझे देखकर झटपट चली गई॥४॥ King-Looking. Here flowers are trampled upon by feet. | This stab is also hot. Therefore (it is clear) that some lady who sat here has gone away seeing me. टिप्पणो-कई संस्करणो मे राजा--(प्रवलोक्य) समेत इस श्लोफ का पाठ नही मिलता है । यद्यपि प्रकृत स्थल में पूर्वापरसन्दर्य के अनुसार इतने पाठ के न होने से भी कोई क्षति नहीं है, तो भी 'अधिकं तु प्रविष्ट न च तद्घान्म' इस न्याय मे हमने इस यधिक पाठ का समावेश कर देना ही उचित समझा। मह लोक रामचन्द्र के नाट्यदर्पण में पाया है-'यथा मातकृत स्वप्नवासवदते शेफालिकामण्डपशिलातलमवलोक्य पादाक्रान्तानि इत्यादि। () मासिष्यावहे--उपपेक्ष्यायः । । यहाँ विध्यर्थ में लट् लकार हुआ है। वत्सराजः चतुर्य प्रक १२१ (२) पादाक्रान्तानि-रो से कुचले हुए। पादः आक्रान्तानि (त. तत्पु०) । (३) इदम्-यह समीपता का द्योतक है। (४) सोष्म-गर्मी से युक्त । ऊष्मणा मह वर्तमानम् । त० तत्पु० । (५)प्रासोना--बैठी हुई। मास्+शानच् । चेटी-भट्टिदारिए ! रुद्धा खु ह्म वयं । [ भर्तृ दारिके । रुद्वाः खलु स्मो त्रयम् ।] दासी--राजकुमारी जी। हम लोग तो घिर गयी हैं । Maid--Princess we are indeed imprisoned. पद्मावता-दिठ्ठिा उपविट्ठो अय्यउत्तोदिष्ट्योपविष्ट आर्यपुत्रः।] पद्मावती--माग्य मे आर्यपुत्र बैठ गये हैं । Padmavati-Fortunately the prince has sat down, वासवदत्ता--[आत्मगतम्] दिठ्ठिा पकिदित्यसरारो अय्यउत्तो। । दिष्ट्या प्रकृतिस्थशरीर प्रार्यपुत्रः ।] वामयदत्ता--(मन में) माग्य से प्रार्यपुत्र शरीर से स्वस्थ हैं । Vasava. (To herself) fortunately the prince is good health. चेटो-भट्टिदारिए ! सस्मुपादा पु अय्याए दिट्ठी। [भर्तदारिक ! माश्रुपाता खल्यार्याया दृष्टिः ।। दासी- राजकुमारी जी! मार्या की प्रांखें डबडबा आई। Maid-Princess, the eyes of her ladyship are full of tears, वासवदता--एसा खु महुअराणं अपिणादो कासकुसुमरेणुणा पडिदेण सोआ मे दिट्ठी । एषा सलु मधुकराणामविनयात् काशक- मुमरेणुना पतितेन सोदका में दृष्टिः । वासयदत्ता-यह तो मोरो की चचलना में मेरी प्रोखों में काशपुप्पो की धूल पड जाने के कारण मामू पा गये हैं। Vasara.-My eyes are full of tears on account of the falling of the pollen of Kusha flowers through the rudeness of the becs. पद्मावती--जुज्जइ । युज्यते । पदमावती-ठीक रहती है। Padmarati-Right. यिदपक:-भो ! सुम्णं इदं पमदवणं । पच्छिदव्यं किञ्चि मयि ।

१२२ स्वप्नवासवदत्तम् पुच्छामि भवन्तं। [भोः। शून्यं खल्विदं प्रमदवनम् । प्रष्टव्यं किञ्चिदस्ति । पृच्छामि भवन्तम् ।। विदूषक-श्रीमान् ! यह प्रानन्दवन बिलकुल सूना है। आपमें कुछ पूछना है। पूछ? Vidashaka-Sir the lady's garden is lonely, I have to ask you something. May 1 ask your honour ? राजा--छन्दतः। राजा---खुशी से पूछो। King--You may happily do so. विदूषकः- --का भवदो पिआ ? तदाणि तत्तहोदी वारावदत्ता, इदाणि पदुमग्वदी वा। [का भवतः प्रिया, तदानी तत्रभवती वासवदत्ता, इदानी पद्मावती वा।] विदूषक-प्रापको कौन प्रिय है ? तब को माननीया वासवदत्ता या प्रब की पद्मावती? Vidashaka-Who is dear to you ? Her former ladyship Vasavadutta or her present ladyship padmavati ? राजा--किमिदानी भवान् महति बहुमानसंकटे मां न्यस्यति ? राजा--क्यों आप इस समय मुझे बहुत बड़े प्रेम-संकट मे डाल रहे हैं ? King-Why do you put me in this embarassment of very great magnitude, पद्मावती-हला ! जादिसे संकटे निक्खित्तो अय्यउत्तो ।[हला! यादृशे संकटे निक्षिप्तः पार्यपुत्रः ।] पद्मावती--सखी ! जैसे सकट में प्रार्यपुत्र डाले गये हैं (वैसे सकट में में भी)। Padmavati-Oh in what kind of an embarassment has my lord been put. वासवदत्ता -[आत्मगतम् [अहं अं मन्दभाआ। [अहं च मन्दभागा।] वासवदत्ता--(मन मे) में प्रमागिन भी। Vasta,-And I so unluckly.

चतुर्य प्रक १२३ विदूषकः--सेरं सरं भणादु भवं । एक्का उवरदा, अवरा असणिहिदा । {स्वैरं स्वरं भणतु भवान् । एकोपरता, अपरा असन्निहिता । विदूषक --आप निःसंकोच कहें। एक तो मर गई और दूसरी पास में नहीं है। Vidashaka-Tell me at your will, at your pleasure, one of them is dead another pot near. राजा---वयस्य ! न खलु ब्रूयाम् । भवांस्तु मुखरः । राजा--मित्र ! मै नही कहूंगा। तुम महफट हो। King-Friend I will not say. You are talkative. पद्मावती--एत्तएण भणिदं अय्यउत्तेण । एतावता भणितमार्यपुत्रेण ।। पद्मावती--इतने से आर्यपुत्र ने (अपना मन्तव्य) कह दिया । Padmavati-The King has answered in those words. विदूषकः--भो ! सच्चेण सवामि, कस्स वि ण प्राचविखस्स । एसा सन्दट्टा मे जोहा । [भोः ! सत्येन शामि, फस्यापि नाख्यास्ये। एषा सन्दष्टा में जिह्वा ।] विदूषक--महाराज ! मै सत्य की शपथ खाता हूँ, किसी से भी नही कहूंगा । यह मैने अपनी जीम काट ली। Vidushaks-I pledge my word, I will not tell anyone. See have I put a padlock on my tongue (puts his tongue out and bites it.) राजा--सखे ! नोत्सहे वक्तुम् । राजा--मित्र ! कहने का साहम नहीं होता। King-Friend, I do not venture to speak it. पद्मावती-अहो! इमस्स पुरोभाइदा । एत्तिएण हिमण जाणादि । अहो! अस्य पुरोभागिता । एतायता हृदयं न जानाति ।] पद्मावतो- हाय ! इनकी हटवादिता । इतने से भी हृदय ( का भाव) नहीं समझते। Padmarati-Ha, bis impudence, can he not know his heart by this much? टिप्पणी--(१) प्रकृतिस्थशरीर:--प्रकृतिस्पं नोरोगमिति यावत् शरीरं - २२४ स्वप्नवामवदत्तम् यम्म म तथाभूतः । वामवदसा ने चुपके मे उदयन को देख लिया इसलिए कहती है कि सोमाग्य से मेरे पतिदेव का शरीर स्वस्थ है । (२) खल.--यह निश्चयार्यक अव्यम है ।(३) प्रविनयात-उद्दण्ड होकर स्वच्छन्दतापूर्वक इधर-उधर घूमने से। यहाँ हेतु में पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग हुप्रा है । (४) सोदका-उदकन जलेन सहिता इति सोदका पशुजलपूर्णत्पर्यः। १५) सापाता--प्रभुपान से युक्त । प्रणा पात: पशुपातःषष्ठी तत्पुरुष । (६) काशसुमरेगुना--काशाना मुमानि तेषां रेणः (लिः)पष्ठी तत्पुरुष तेन । यहाँ करणे तृतीया हुई है। १७)शून्यं खल--तात्पर्य यह है कि महाराज! प्रमोदयन मे दम , समय हम धोनी को छोड़ कर कोई नहीं है। इसलिए मैं आप में एक बात पूछना चाहता हूँ। और विश्वास दिलाता है कि प्राप जो उत्तर देंगे, उसे मै गुप्त रसंगा। इसलिए प्राप मेरे प्रश्नों का यथोचित उत्तर दें । यहाँ नाटककार ने बड़े कौशल से नायक एव दोनो नायिकानों को एक स्थान में लाकर विदूषक के माध्यम से मपराय का उपक्रम कर दिया है । यह दृश्य उदयन का वारावदता के प्रति अगाध प्रेम मोर पद्मावती की उन्नह्दयता एवं मौम्य स्वभाव का चित्र वीणता है। (%)न्दत:-अभिप्राय गा इच्छा के अनुसार। 'प्रमिशाद HIT: इत्यमरः । (६) प्रष्टप्यम् --प्रवद्र+तमत् कतरि। (१०) बहुमानमछुटे- मरिक मान कयन रूप विपत्ति में, पर्यात में मिमयो अधिक मानता है यह मनाने में गो संपट उम्थित होता है, गमे । क्योकि यदि राजा महता है कि रह पामबदत्ता को पपिक मानता है तो विपकपी मुगरला से हमापसी को पर यात मारम हो जाने पर बदपिन होगी पोर पनि पद्मावती को पिर मारने की वात रहता है तो उसके बागवत्ता के प्रति वर्गनीर प्रेग से घटा लेगा। (यारसे सटे--पह वाय सग मागम होता है | ftyो मागे 'नाgो हमति तनु गाव जानाति ना गोड मेना पाहिः । (१२) उपरताया। मगा:--पथिकः बोमने गामा, मात्राम) unt मगम परित पनि मग+प्राण गमगार TESTRA गि मातम (3) साग--7) परम में गोश (टा- में मिली जी बार मी पपा ममे प्रग्नीशामा fer गि • पापा नहीं बनेगी। (१४परि माया-मोमी Armanimuft मम्मान में कामयोग ? चतुर्थ प्रक १२५ हुमा है। (१६) अहो अस्य पुरोभागिता...--पद्यावती कहती है कि इसके हत पर आश्चर्य है, जो इतने में मी मन को नहीं समझ सका है। क्योकि महाराज ने यह कह कर कि मैं नही बताऊँगा, तुम वाचाल हो, प्रकट कर दिया कि मैं वासवदत्ता से अधिक प्रेम करता है। फिर भी वह जिद कर रहा है, यह मूर्खता की पराकाष्ठा है । (१७) पुरोभागी-ढीठ, हदी, दोषकदशी । दोपैक्दा पुरोनागी' इत्यमरः । पुरोमागिनो मावः पुरोमागिता, पुरोमागिन् +तल- टाप् (प्रा)। (विदूषक:~कि ण भणादि मम ?प्रणाचविखन इमादो सिलावट्टादो ण सक्कं एक्कपदं वि गमिदु । एसो रुद्वो अतभवं । [कि न भणति मम ? अनाख्यायाऽस्माच्छिलापट्टकान्न शक्यमेकपदमपि गन्तुम् । एप रुद्धोऽत्रभवान् । क-यो नही मुझसे कहते ? बिना कहे इस शिला-खंड से अन्यत्र एक पग भी नहीं जा सकते। यह आप यहाँ रोक दिये गये। Vidashaka--Why do you not reply ? Unless you speak. you. shall not stir step from this stone bench. राजा-कि बलात्कारण? राजा-नया जबर्दस्ती? King-What ? By force. विदूषकः--आम, बलवकारेण । [आम्, बलात्कारेण पिपकः--हाँ, जबर्दस्ती। Vidashaka-Yes, by force. राजा-तेन हि पश्यामस्तावत् । राजा--तो देवताहूं (कैसे महो रोते हो) । King-Then I see (how do you ckeck me ?) विदूषकः--पसीददु पनीददु भवं । यमस्वभावण साधिदो, सच्च ग भगासि । [प्रसीदतु प्रसीदतु भवान् । यवस्यभावन शापितोऽसि, यदि मत्यं न भनि ।। विपक :--प्रसन्न हो महागज, प्रसन्न होइये । मारो मित्रतापीसोपंध है. यदि सच्ची बात नही पहले।

२२६ स्वप्नवासदत्तम् Vidushake---Be pleased your highness, be pleased. I conjure you to tell the truth in the name of frioedship. राजा-~का गतिः ? श्रूयम- पद्मावती बहुमता मम यद्यपि रूपशीलमाधुर्य । वासवदत्ताबद्धं न तु तावन्म मनो हरति ॥४॥ प्रत्यय-पद्यपि पद्मावती रूपशीलमाधुर्य: मम बहुमता । वासवदत्तायद्धम् 'मे मनः तु न तावत् हरति ।।४।। संस्कृत टीका-यद्यपि, पद्मावती-~-दर्शकमगिनी, रूपशीलमाधुर्य :- सौन्दयं शीलं सच्चरित माधुर्य मधुरमापिट्दम्---एत: गुणे, मम--उदयनस्य, बहुमता--प्रत्मादृता प्रेगारपदमिति यावत् (वर्तते तथापि सा), वासवदत्तावन- चामवदत्ताया पूर्वपल्याम् भावदम् प्रासवतं, मे~~पम, मनः~-चेतः, तु, न तावत् हरति-नंद प्राकति (प्रय भावः-पमावती सौन्दर्यसुशीलतादिगुणः 'मम बहुमानपानं भूत्वाऽपि वासवदत्तया स्वगुणः प्राकृष्टं मम हृदयं वशीकतुन प्रभवति । अतएव सा वासवदत्तापदवीमारोई माहति ।) ॥४॥ राजा---पया करें? सुनो-यद्यपि पावती (अपने) रूप, घोल पौर {अयन) माधुर्य से मेरी बड़ी प्यारी है तो भी वासवदत्ता में आसक्त मेरे मन को वह बीच नहीं सकती ॥४॥ King-Is there no way out ? Then listen. Though padmavatı is greatly thought of by me on account of hes forme, virtue, and amtadiuly, yet she does not attract my mind attached to Vasaradatta, टिप्पणी-(१)शिलापट्टकात-पत्पर की चौकी । यहाँ विसापटक यिहाप 'पत्र' इस प्रकार प्रयाहार करके स्यानो कमण्यधिकरणं चपातिक गे 'पम्मी हुई। १२) प्राग--यह स्वीकारायंका भव्यय है। (३) प्रसदितु. प्रमोस्तु--पही अतिशय प्रमग्नता घोषित करने लिए हिरुविन हुई है। (.) पायभायेन शापितोऽति--मित्रताया: पारवत्व बढोगि। यह पिर पर्य यह है कि में मिला की कराम देता हूँ, पाा गयो पात यह दोषिय। पनिहीं रहेंगे तो पाउरी हम दोनो को मित्रता समाप्त हो जाएगी। (५). मारमा:-पंच गोतं प माधुर्म ५ येतेषां समाहारा Ele.

चतुर्थ प्रक १२७ माधुर्याणि, तः । शील-सदाचरण । 'शीलं स्वभावे सद्वृत्ते' इत्यमरः । (६) मम बहुता-मेरी बहुत ही माननीया या प्रेसास्पद है । मता-मन्+क्त (त)+टाप (मा)। 'मम' में 'मतिवृद्धिपूजार्थेभ्यश्च सूत्र से पष्ठी हुई ।(७)वासववत्ताबद्धम्- वासवदत्ता में प्रासक्त-वासवदत्तायाम् प्रावधम् स० तत्सु० अथवा वासवदत्तया आवद्धम् । राजा का आशय है कि वासवदत्ता के उत्कृष्ट गुणो द्वारा उस पर प्रासक्त मेरे मन को पद्मावती अपने रूप, शील, प्रिय भाषण प्रादि गुणों से आकृष्ट नहीं कर पाती है । इस श्लोक मे प्रार्या छद है । तल्लक्षण-यस्याः पादे प्रयमे द्वादश मात्रास्तथा तृतीयेऽपि । अष्टादश द्वितीय, चतुर्थ के पञ्चदश सार्या । वासवदत्ता-[प्रात्मगतम्] भोदु भोदु । दिणं वेदणं इमस्स परि- खेदस्स । अहो । अझदवासं पि एत्य बहुगुणं सम्पज्जइ । [भवतु भवतु । दत्तं वेतनमस्य परिषदस्य । अहो ! अज्ञातवा- सोऽप्यन बहुगुणः सम्पद्यते ।] संस्कृत टीका-भवतु भवतु-कामं भवतु परिखेद इति शेपः, प्रस्य-वियोग. रूपस्य, परिसदस्य-क्लेशस्य, वेतन---पुरस्कारः, दत्त--वितीर्णम् । महो!- प्रानन्दविम्मयद्योतकमव्ययमिदम् अज्ञातवासोऽपि-प्रज्ञातः प्रविदित.स चासो वासः निवास: अपि, पत्र-पद्मावत्याः निक्टे, बहुगुण:-गुणविशेपाली, सम्पद्यते--मजापते । अनुवाद---वस बस । इस (विरह रूप) क्लेश का पुरस्कार दे दिया। अहा ! यहाँ छिप कर रहना भी बहुत गुणकारी हो रहा है। Vasara-Well, let it be so. It has given me compensation for my pains. Oh, even remaining incogollo has many advantages. टिप्पणी-(१) भवतु-भयतु- यहाँ मुशायं में द्वित्व हुमा । (२) वेतनम्- पारिश्रमिक । 'भूतिममं तु वेतनम्' इत्यमरः । यहाँ वासवदत्ता के कहने का तात्पर्य यह है कि मैंने मजालवाप्त स्वीकार करय पारे पति के वियोग का दुन, दागोवत् जीवन का दु.प मोर सौत के स्वीकार करने को वेदना को महा है। यह मय प्राज मफल हो गया। क्योकि मेरे पति मुझमे प्रगाढ प्रेम करते हैं। मी इमर्ग मषिक मुछ नही चाहिए । (३) प्रजातरास:--प्रजातनामो याम: महानयामः कर्मधारय ममाग। ( यर:-यहा पो पम्मिन् म यमः। यहाँ वासवरता रहती है कि महा ! मेरा मान वान माका मित्र +- १२८ स्वप्नवामवदत्तम् पद्मावती-हला ! यदि में अज्ञातवास में न होती तो मुझे पति के ये अमृत-वचन कभी सुनाई न देते । अतएव म कृतार्य हूँ। चेटो--भट्टिदारिए ! अदक्षिो खु भट्टा । [भर्तृ दारिके । अदा- क्षिण्यः खलु भर्ता । दासी--राजकुमारी जी! स्वामी उदार नहीं है। Madi-princess, the lord is really wanting in chivalry. मा मा एवं । सदविखो एव अय्यउत्तो, जो इदाणि वि अय्याए वासवदत्ताए गुणाणि सुमरदि । [हला! मा मैवम् । सदाक्षिण्य एवार्यपुत्रः, य इदानीमप्याया वास- वदत्ताया गुणान् स्मरति ।] पद्मावती--सखी! ऐसा मत कहो। मार्यपुत्र उदार ही हैं, जो अभी तक मार्या वासवदसा के गुणों का स्मरण करते हैं। Padmavati-Oh, no, do say so. The lord really courtesy. as he even now temembers the virtues of Vasavadatta. वासवदत्ता- --भद्दे अभिजणस सदिसं मन्दिदं। [भद्रे ! अभिजनस्य सदर्श मन्त्रितम् ।] वासवदत्ता-सौभाग्यवती ! (तुमने अपने) उच्च कुल के अनुरूप ही कहा। Vasara.--Good madam, you have spoken in accordance with your noble birth, राजा-उपतं मया । भवानिदानी कथयतु । का तदा वासवदत्ता, इदानी पद्मावती वा । राजा--मैने तो कह दिया। मब माप पहिये कि कौन मापको अधिक प्रिय है- उस समय की यासवदत्ता या इस समय की पद्मावती ? King-I have declared. You should tell me now, whom do you like, then ber ladyship Vasavadatta or her present ladyship padmavati, पद्मावती--अय्मउत्तो वि वसन्तप्रो संवृत्तो । [प्रापंपुरोऽपि वसन्तकः संवृतः। पदमावती--मापुत्र मी वसन्तर हो गये। . भवतः प्रिया ?

चतुर्थ अंक Padmavati-The prince has become Vasantak now. विदूषकः--कि मे विप्पलविदेण । उभओ वि तत्तहोदीओ में बहुमदानो। [कि में विप्रलक्तिन । उभे अपि तत्र भवत्यौ मे बहुमते ।। विदूषक--मेरे वकने से क्या ? मुझे तो दोनों श्रीमतियां मत्यन्त प्रिय हैं। Vidosbaka–Tusk, what have 1 to do with idle talk. Both ladies must command my high esteem. राजा- --वधेय | मामेवं बलाच्छ त्या किमिदानों नाभिभाषसे ? राजा--मूर्ख ! मुझसे इस प्रकार जबर्दस्ती सुनकर मव तुम क्यों नहीं कहते? King-Idiot having heard me speaking that through force you do not speak now ? विदूषकः- िमं पि बलकारेण ? [ कि मामपि बलात्कारेण?] विदूषक-क्या मुझसे भी जबर्दस्ती (बहलाना चाहते हैं) ? Vidushaka-Will you make me speak forcibly ? राजा--प्रय किम्, बलात्कारेण । राजा-मोर पपा, जबर्दस्ती। King-Yes, certainly. by force. विदूषकः-तण हि प सबकं सोढुं। [तेन हि न शपयं षोतुम् ।] विदूषक-तर तो भाप नहीं मुन सकते। Vidashaka-Then you shall not hear. राजा--प्रसीदतु प्रसीदतु महामाह्मणः । स्यरं परमभिधीयताम् । रामा-मान जाइये, महाबाह्मण को ! मान जाइये। अपनी इन्धा से काहिये। King--May be ofpra:cd, O great acd Loly man. Ard spook ia perfect freedom. टिप्पणी--(१) भाभिया-नास्ति राशियं यस्मिन् स पदाशियः । वाशिम्द-नापया सभी नाशिरामो के प्रति समान अनुराग । 'मनेरमहिमा- ममरागो दक्षिणः पितः साहिन । (२) राशिय:-माशियन सहितः इनि मासिकः। वही पदमावती पाली विद्यामहापसा एवं कालीनोपित kai रोहित मानाचा परिपर दोहएहरती है कि परिष पनी मन पाली १३० स्वप्नवासवदत्तम् की स्मृति बनाये रखने के कारण प्रत्यन्त उदार हैं । तुम उनको प्रदाक्षिण्य मत कहो । (३) अभिजनस्य-कुल का। 'कुलान्यमिबनान्वयौ' इत्यमरः । इसमें 'तुल्यार्थरतुलोपमाम्या तृतीयाऽन्यतरस्याम्' सूप से पाक्षिक पठी हुई। (४) सदशम्-अनुरूप । (५) मन्त्रितम्--कहा गया । (६) विप्रलपितेन- निरर्थक कथन। 'विप्रलापो विरुद्धोक्तावनर्यकवचस्वपि इति हैमः। 'प्रलापोड- नर्यकं वचः' इत्यमरश्च । (७)वधेय!--मूर्ख ! 'मूर्खवधेयबालिशाः' इत्यमरः । (८) महायाहाण:--निन्दित बाहाण या महापात्र जो प्रेतकर्म कराता है और उसका दान लेता है वैसे तो किसी शब्द के साथ महत् शब्द जुड़ने से उसकी उत्कृष्टता का योष कराता है, किन्तु जिन शब्दों के साथ लगने से मह निन्दा फा अर्थ देता है, वे ये है-'पांस तैले तथा मांसे वंद्ये ज्योतिषिके द्विजे । यात्रायां पपि निद्राया महन्छन्दो न युज्यते ।।' यहाँ राजा ने विदूषक को परिहास में महाबाह्मण कहा किन्तु इस शब्द के अषम प्राह्मण रूप मपं विशेष से अनभिज्ञ विदूपक इसका अर्थ उदार ब्राह्मण समझ कर प्रसन्न हो गया और इसीलिए मागे उसके प्रश्न का उतर देने लगा ! (E) स्वरम्-इच्यानुसार । (१०) अभिधीयताम्-कहना चाहिए । भमि+घा का प्रयं कहना होता है। 'उपमर्गण घात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते । प्रहाराहारमहारविहारपरिहारवत् ।' प्रति उपसर्प लगाने मे पातु के अर्थ में बड़ा परिवर्तन हो जाता है । विदूषकः--इदाणि सुणादु भवं । तत्तहोवो पासवदत्ता मे बहुमदा । ततहोदो पदुमावदो तरुणो दस्सणीमा प्रकोवमा अणहंकारा महुरवामा सदिरखञा। अप्रं च अवरो महन्तो गुणो, सिणिण भोप्रणेण मं पच्चग्गच्छद वासवदता-कहि ण खु गदो प्रय- यसन्तप्रो ति । (इदानी शृणोतु भवान् । तत्रभवतो वासवदत्ता मे बहुमता । तत्रभवती पद्मावती तरुणी दर्शनीया प्रकोपना मनहंकारा मधुरवाफ सदाक्षिण्या । अयं चापरो महान् गुणः, स्निग्धेन भोजनेन मा प्रत्युद्गच्छति वासवदता-कुन तु खल गत मार्यवसन्तक इति । संस्कृत टीका-इदानीम्-~मपुना, मवान्, गणोतु-प्रारर्णयतु स्वोर- प्रश्नोतरमिति पः । तत्रमयती-माननीया, पासवदत्ता, मे-यम, बहुमता- अतीवमानास्पदम् । सत्रमवती-माज्या, पद्मावती-मगपराजकुमारी, तनी- सपती, दांनीपा~मुन्दरी, मकोपना, कोप-हीना, पनहलारा-पमिमानरहिता, था कि चतुर्थ मक मघरवाक्-मघरमापिणी, सदाक्षिण्या--उदारा (तत्रभवत्यां वासवदत्तायाम्) मयम्, अपर:--द्वितीयः, महान्, गुणः (मासीत् यत् सा) स्निग्धेन--सरसेन, भोजनेन---भोज्यपदार्थेन, मा–वसन्तक, प्रत्युद्गच्छति--अन्वेषयति, कुत्र न --क्व नु, खल, गतः-यातः, मार्यवसन्तकः इति । मनुवार--अब भाप सुनिये। मैं माननीया वासवदत्ता का अधिक पादर करता हूँ ? यद्यपि माननीया पद्मावती यवती, सुन्दर, कोषहीन, अमिमानरहित, मधुरभाषिणी तथा उदार हैं किन्तु वासवदता जी में एक दूसरा बड़ा मारी गुण सुस्वादु मोजन लेकर मुझे ढढा करती थी कि मायं वसन्तक कहां गये । Vidashaka-Listen then. Har ladyship, Vasavadatta, is highly esteemed by me. Her bighness Padmavati is young, beautiful, free from anger, not egoistic, affable aad full of courtesy. An other great quality of hers is that she (Vasavadatta) welcomes mo with delicious food asking" "where has indeed the revered Vasantaka gone T" टिप्पणी 1-1१) प्रकोपना--क्रोधहीन । न कोरना पकोरना न तसुरुष । कप् + यच्+पन+टाप् (मा) स्त्रियाम्। (२) प्रनहंकारा-अमिमानरहित । भविद्यमानः महंकारः यस्याः सा (व० बी०) । (३) मधुरवार--प्रिय बोलने वाली। मधुरा वाक् यस्याः सा । स्निग्पन--सरस । स्निह+क्त (त) । (४) प्रयं चापरो महान गुण "--यहाँ पग्यायं यह है कि जैसे प्रतिदिन वासवदत्ता जो मुझे खोज-सोज फार स्वादिष्ठ भोजन कराती यों उसी तरह निम पद्मावती जी भी मुझे सुन्दर-पुन्दर पदार्थ खिला तो उन्हें भी में बहुत मानेगा। (५) प्रत्युद्गच्छति--पन्वेषणपुर: सर सम्मुखमागत्य सम्भावयति । यहाँ भूत काल के भर्प मे लट् लकार हुमा है। घासवदत्ता--भोदु भोदु, घसन्तन! सुपरहि दाणि एदं ।। भवतु भवतु, यसन्तक ! स्मरेदानीमताम् ।। वासवदता--प्रच्दा भन्दा वमन्तक । मद इमे याद करो। Vasara.--Well, let it be Vasantaka, remember ber ladyship here, -भवतु, भयतु, बसन्त ! समेतत् कपिणे देय यासय- - उत्ता।

१३४ त्वप्नवासवदत्तम् वासवदत्ता--(मन में) बस बस, मुझे विश्वास हो गया। महा! प्रानन्द है, जो ऐसा वचन परोक्ष में सुना जाता है (अर्थात् पीठ पीछे ऐसा वचन सुनना प्रिय लगता है)। Vasava.-(To herself) Letit be so. Well I am chcered. Oh, how sweet really. (Óh that) such a speech has to be heard incognito. टिप्पणी-(१) अप्रत्यक्षम्--परोक्ष में, मनुपस्थिति में । यहाँ तात्पर्य यह है कि सामने तो ऐसे चाटु वचन सभी कहते हैं, परन्तु पीठ पीछे प्रशंसा विरले ही करते हैं । मार्यपुत्र ने मुझे मरी हुई समझ कर ही ऐसी बातें कही हैं। इसलिए उनकी बातो से मुझे बड़ा मानन्द मिल रहा है। विदूषकः--धारेदु, धारदु भवं । अणदिक्कमणीनो हि विही । ईदिसं दाणिं एवं । [धारयतु धारयतु भवान् । अनतिक्रमणीयो हि विधिः । ईदमिदानीमेतत् ।। विदूषकः-पापयं धारण करें, धैर्य धारण करें। भवितव्यता टाली नहीं जा सकती। यह वो भव ऐसा ही है। Vidashaka-Take courage, you honour, tako courage. Fate is inevitable. It is thus now. टिप्पणी-(१) पारपतु पारपतु यह विरक्ति दृढता सूचित करने के लिए है । 'पारयतु मे स्वाथिक णिच् हुमा है। (२) मनतिक्रमणीयो हि विधिः- तापर्य यह है कि होनहार होकर रहता है । भव मापके भाग्य में ही पत्नी-वियोग सिखाया तो उसे कोन टाल सकता था । इसलिए पापको शोक महीं करता चाहिए प्रत्युत घर्य धारण करना चाहिए । न प्रतिक्रमणीयः इति मनतिकमा जीयः न समास। राजा-ययस्य ! न जानाति भयानवस्याम् । कुतः-- रामा--मित्र ! माप मेरो दशा को नहीं जानते हैं। क्योकि-- King-Frend, you do pot realise my present condition. दुःसं त्यक्तुं बदमलोऽनुरागःस्मत्या स्मृत्वा याति दुःख नपत्यम् । यात्रा स्वषा यद् विमुत्यह' याप्पं प्राप्तानण्या याति यद्धिःप्रसादम् ॥७॥ १. विमुष्येव-पाठान्नर। यह पथिक परियोकि संसार में प्रियो वियोग में पाम बहाये जाने का नियम है।

चतुर्थ अंक मन्तय बरमूलः मनुरागः त्यक्तुं दुःखम्, स्मृत्वा स्मृत्वा दुःखं नवत्वं याति । तु याचा एपा यत् इह वाष्पं विमुच्य प्राप्तानृण्या वृद्धिः प्रसादं याति ॥७॥ संस्कृत टीका-बदमूल:--बद्धं मूलं यस्य स दृढ इस्पर्षः, अनुराग:--प्रेम, त्यस्तु-विस्मतुं, दुःखम्-प्रतिकठिनम्, स्मृत्वा स्मृत्वा--पुनः पुनः वत्प्रेम संस्मृत्य, दुःस-कष्ट, नवत्वं-नवीनता, पाति-गन्छति । तु-संपापि, यात्रा- सोकव्यवहारः, एषा-इमम्, मत्, इह-पत्र, वाप्पम् मधुनलम्, विमुच्य--- विसन्य, प्राप्तानण्या-प्राप्तम् सम्पम् मानण्यम ऋणस्य प्रमावः तत्प्रेम्णो निवृतियया सा तथाभूता, वृद्धि:--मनः, प्रसाद-प्रसन्नताम् यातिप्राप्नोति । (प्रयं भावः-वासवदत्ताविरहाकुल: उदयन: वसन्तक कपवि-मित्र ! अहं कथमपि वासवदत्ता स्मृतिपपादपनेतु' न नोमि । पती हि प्रगाढं प्रेम दुस्त्यजं भवति । तच्च प्रेमपानस्य स्मरणेन नवं दुःखं ददाति । तथापीय लोकरीतियंत् मृतं प्रेमपात्रमुद्दिश्य जना रोदन्ति । रोदनेन समारो सपनवति तथा प्रियजनप्रेमरूपस्य ऋणस्य नितिनेन मनः प्रसन्नताम- शान्तिमिति यावत, पिगच्छति। ॥७॥ मनुवाद-जमी हुई जड वाले प्रेम को भूल जाना बड़ा कठिन है। बार- पर उसका स्मरण करने मे दुःस नया हो जाता है । तो भी व्यवहार मही है कि यहां (इस लोक में) मामू बहाकर ऋण से छुटकारा पाया मा मन शान्ति प्राप्त कर लेता है ॥७॥ It is difficult to abondon deep rooted love. lis repeated cmemberance causes new paio. Liſe is such that after shedding tears and paying the debt, does the mind set calmness. दिप्पमो--(1) दुःखम्-यहाँ 'अनुराग' कर्ता के अनुसार 'दुःखम्' को जगह उपकर: प्रयोग होना चाहिए था, ऐमा कोई-कोई पाप करते हैं, किन्तु यह और नहीं है । बयोकि दुःस पद नित्य नपुसतिग है। भतएर यह 'वैदाः प्रमाणम्' को तराने लिंग पोर वचन को नहीं छोर मरता । पयवा रही. म्हो सिम पार वचन का प्रयोग सम्बइ सा मे स्वतन्त्र होर भी दिया जाता है-सिगबदनस्यापि सामान्योकमात्' भएय 'पापम् पासिङ्गिा पवनः' यह सासितासा प्रयोग पौर सायं समाप्तादिमिरपि धत प्रगिलम' यह महामाहाराप्रयोग संमत होता है । (२) स्माया स्मृत्वा-या प्रत्यय किलनीय है । यो समानयोः पूर्वमने गूज । समान पारपे २३२ स्वप्नवासवदत्तम् - . , राजा---प्रच्छा, अच्छा वसन्तक ! मै यह सब बातें देवी वासवदत्ता से कह दूंगा। King-Well,' Vasantaka, I shall tell all this to queen Vasavadatta, विदूषकः----अविहा, वासवदत्ता । कहिं वासवदत्ता ? चिरा खु उवरदा वासवदत्ता। [अविहा, वासवदत्ता। कुन वासवदत्ता चिरात् खलूपरता वासवदत्ता।] विदूषक-हाय ! वासवदत्ता ! कहाँ वासवदत्ता ? वासवदत्ता को मरे बहुत दिन हो गये। .Vidushaka-Alas, Vasavadatta, where is Vasavadatta, Vasar vadatta has long since died. राजा-(सविषादम्) एवम् उपरता वासवदत्ता । राजा--(शोक के साथ) ऐसा, वासवदत्ता मर गई। King-(With sorrow) Yes, Vasavadatta is dead. टिप्पणी--(१) भवतु भवतु:..."--यहाँ पुनः पुनः होने के अर्थ में द्वित्व हुमा । इस वाक्य का भावार्थ यह है कि मेरी अनुपस्थिति मे तुम पद्मावती का ही गुण-वर्णन किया करो, क्योकि वही इस समय तुम्हें स्वादिष्ठ भोजन खिलाने में समर्थ है । (२) वेव्य वासवदत्ताय-यहाँ 'अकथितं च' सूत्र से कर्मप्रवचनीय संज्ञा होने पर द्वितीया विमक्ति होनी चाहिए थी, किन्तु 'तदा- चक्ष्यासुरेन्द्राय' की तरह सम्प्रदानत्व की विवक्षा में चतुर्षी हुई। (३) सविधायम् -दुःख के साथ । विषादेन सह वर्तमानम् । (४) उपरता--मर गई । उप+ रम्+वत (त)+टाप् (प्रा) । स्त्रियाम् । अनेन परिहासन व्याक्षिप्तं मे मनस्त्वया । ततो वाणी तयवेयं पूर्वाभ्यासेन निःसृता ॥६॥ मन्वय--अनेन परिहासेन त्वया मे मनः प्याक्षिप्तम् । ततः पूर्वाम्पादेन इयं वाणी तपंव नि.मृता ॥६॥ संस्कृत टोका--मनेन--पूर्वोक्तेन, परिहासेन-नर्ममापितेन, त्वया- वसन्तन, मे~-मम, मनः--चित्त, व्याक्षिप्तं-चञ्चलीकृतम्। सतः--तस्मात् हेतोः, पूर्वाभ्यासेन-प्राक्कालियसंस्कारदलात्, इयम् एषा, वाणी--पाक .

चतुर्थ प्रक 1 'सर्वमेतत् कथयिष्ये देव्य वासवदत्ताये' इत्येवंरूपा, तथैव-वासवदत्ताजीवित- कालसदशी एव, निःसृता--निर्गता ॥६॥ अनुवाद-इस परिहास से तुमने मेरे मन को विक्षिप्त - बना दिया। इसलिए पहले के प्रयास से वैसी ही यह बात निकल पड़ी ॥६॥ With that joke of yours my mind was distracted by you. And then those words came out of former habit, टिप्पणी-(१) परिहामेन-'पापको वासवदत्ता और पद्मावती मे से कौन अधिक प्रिय है' इस प्रकार के नर्म वचन से । (२. व्याक्षिप्तम्-मुग्ध कर दिया। क्योकि तुम्हारे इसप्रश्नोत्तर से मेरा मन वासवदत्तामय हो गया था और अनुभव करने लगा था कि मैं प्राणप्रिया वासवदत्ता के साथ रह रहा हूँ। वि+आ+ क्षिप+वत (त)-'त्वया' इसका अनुक्तकर्ता है तथा 'मनः' उक्तकर्म है । (३) पूर्वाभ्यासेन-पहले के अभ्यास के कारण । चूकि वासवदत्ता के जीवनकाल में बहुधा तुम्हारा अविनय देखकर में झट कह दिया करता था कि मैं वासवदत्ता जी मे कह दूगा । (४) निःसृता-निस्+स+क्त (त) कर्तरि+टाप् (मा)। स्त्रियाम् इस श्लोक में अनुष्टुप छंद है । तल्लक्षणं-इलोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पंचमम् । द्विचतुःपादयोर्हस्व सप्तम दीर्घमन्ययोः ।। यह समवृत्त छन्द है। ||६|| पद्मावती-रमणीओ खु कहाजोओ णिसंसैण विसंवादियो। रमणीयः खलु फयायोगो नृशंसन विसंवादितः ।। पद्मावती--सुन्दर क्या-प्रसंग को (इस) दुष्ट ने बिगाड़ दिया। Padmavati-Truly a charming episode is spoilt by that wicked man. टिप्पणी--(१) नशमन--कर पा निर्दयो ने । "नासो धातुक: क्रूरः' इत्यमरः । (२) विसंवादितः-विच्छिन्न या विनित कर दिया। वि+सम्+ य+गिन्+क्त(त) कर्मणि । यदि यह वासवदता की मृत्य की याद न दिलाता तो यह कथा प्रमी इसी मनोहर लमे चलती रहती मपया सुरपूर्वक समाप्त हो जाती। परन्तु इस निगोड़े ने मारा मजा किरकिरा कर दिया । वासवदत्ता-[आत्मगतम्] भोटु भोद, विस्सत्यहि । ग्रहो ! पियं पाम, ईदिम यमणं अपच्चरत मुनीनदि । भयनु-भयनु, विश्व- स्तास्मि । महो! निपं नाम,! ईदृशं धचनमप्रत्यक्ष श्रूयते ।)

त्वप्नवासवदतम् पासवदत्ता--(मन में) बस बस, मुझे विश्वास हो गया। पहा ! मानन्द है, जो ऐसा वचन परोक्ष में सुना जाता है (मर्यात पीठ पीछे ऐसा वचन सुनना प्रिय लगता है)। Vasara.-(To herself) Letit be so. Well I am cheered. Oh, how sweet really. (Oh that) such a speech has to be heard incognito. टिप्पणी-(१) अप्रत्यक्षम्-परोक्ष मे, अनुपस्थिति मे । यहाँ तात्पर्य यह है कि सामने तो ऐसे चाटु वचन सभी कहते हैं, परन्तु पीठ पीछे प्रशंसा विरले ही करते हैं । मार्यपुत्र ने मुझे मरी हुई समझ कर ही ऐसी बातें कही हैं। इसलिए उनकी बातो से मुझे बड़ा भानन्द मिल रहा है । विदूषकः--धारेदु, धारेदु भवं । प्रणदिक्कमणीनो हि विही । ईदिसं दाणिं एवं । [धारयतु धारयतु भवान् । अनतिक्रमणीयो हि विधिः । ईदृशमिदानीमेतत् ।] विदूषकः-पापधैर्य धारण करें, धैर्य धारण करें। भवितव्यता टाली नही जा सकती । यह तो मब ऐसा ही है। Vidushaka--Take courage, your honour, take courage. Fate is inevitable. It is thus now. टिप्पणी-(१) पारयतु धारयतु--यह द्विरुक्ति दृढता सूचित करने के लिए है । 'धारपतु' में स्वाधिक णिच् हुमा है । (२) मनतिक्रमणीयो हि विधि:-- तापर्य यह है कि होनहार होकर रहता है । भव भापके भाग्य में ही पत्नी-वियोग लिखा था तो उसे कौन टाल सकता था । इसलिए भापको शोक नही करता चाहिए प्रत्युत धैर्य धारण करना चाहिए। न प्रतिकमणीयः इति मनतिक्रम- णीयः नञ् समास राजा--वयस्य ! न जानाति भवानवस्थाम् । कुतः-- राजा-मित्र! आप मेरी दशा को नहीं जानते हैं। क्योकि- King-Friend, you do not realise my present condition, दुःखं त्यक्तुं बद्धमूलोऽनुरागःस्मृत्वा स्मृत्वा याति दुःखं नवत्वम् । यात्रा त्वेषा यद् विमुच्येह' बाप्पं प्राप्तानण्या याति बुद्धिःप्रसादम् ॥७॥ १. विमुच्येत--पाठान्तर । यह अधिक शुद्ध है क्योकि संसार में प्रिय के दियोग मे यांसू बहाये जाने का नियम है।

चतुर्थ अंक १३५ मन्तप-रमूलः अनुरागः त्यक्तु दुःखम्, स्मृत्वा स्मृत्वा दुःख नवत्वं याति । तु यात्रा एषा यत् इह वाष्पं विमुच्य प्राप्तानृप्या बुद्धिःप्रसादं याति ।।७।। संस्कृत टीका--बदमूल:--बद्धं मूलं यस्य स दृढ इत्यर्थः, अनुराग:--प्रेम, स्पक्तु-विस्मत, दुःखम् --प्रतिकठिनम्, स्मृत्वा स्मृत्वा--पुनः पुनः तत्प्रेम संस्मृत्य, दुःख-कष्ट, नववं-नवीनता, याति-गन्धति । तु-तथापि, यात्रा- खोकव्यवहारः, एषा--इयम्, यत्, इह-पत्र, दाष्पम् मश्रुजलम्, विमुच्य-- विसृज्य, प्राप्तानण्या-प्राप्तम् लब्धम् मानण्यम् ऋणस्य ममावः तत्प्रेम्णो निष्कृतियंया सातपाभूता, बुदि:--मनः, प्रसाद-प्रसन्नताम् शान्तिमिति यावत्, यातिप्राप्नोति । (मयं भावः~-वासवदत्ताविरहाफुल. उदयनः बसन्तक कथयति--मित्र ! महं कपमपि पासवदत्तां स्मृतिपथादपनेतुं न शक्नोमि । यतो हि प्रगाढ प्रेम दुस्त्यजं भवति । तच्च प्रेमपात्रस्य स्मरणेन नवं दुःखं ददाति । तथापीयं लोकरीतियंत् मृतं प्रेमपात्रमुद्दिश्य जना रोदन्ति । रोदनेन दुःखमारो लघूमवति तथा प्रियजनप्रेमरूपस्य ऋणस्य निर्यातनेन मनः प्रसन्नताम- घिगच्छति ॥७॥ अनुवाद-जमी हुई जड वाले प्रेम को भूल जाना बड़ा कठिन है। बार- बार उसका स्मरण करने से दुःख नया हो जाता है । तो भी व्यवहार यही है कि यहां (इस लोक में) मांसू बहाकर ऋण से छुटकारा पाया हुमा मन शान्ति प्राप्त कर लेता है॥७॥ is repeated shedding टिप्पणी--(१) दुःसम्यहाँ 'अनुराग' वर्ता के अनुसार 'दुःसम्' की जगह 'दुःसार' प्रयोग होना चाहिए पा.ऐमा कोई-कोई पाप करते हैं, किन्तु यह ठीक नही है । बयोकि दुःस पद मिश्य नपुंसकलिंग है। अतएव 'यह 'वेदा' प्ररने सिंग पोर वचन को नहीं छोड़ सकता। भया कही. कही लिग भोर वरन वा प्रयोग सम्पद सजा से स्वतन्त्र होकर भी रिपा गाता है--लिगवयनस्यापि मापान्योपस्मात् पाएर 'गापम् प्रासिङ्गितु' पदनः' यह कालिदास का प्रपोग पोर 'साप प्वमामानिमिरपि सत प्रनिहन्तुम' पह महामाध्याप्रयोग सपत होता है । (२) स्मृत्वा स्मृत्वा-पही बचा प्रत्यय चिनीर है । क्योरि समानयोः पूर्वरासे' मूत्र से समानस्तक पारपर्य .. . . . ess. प्रमाणम्' को स्वप्नवासवदत्तम् - रहने पर क्या होता है । यहाँ स्म और या घातु मिन्न-कर्तृक है । 'स्मृत्वा' के मागे 'व्याकुलीमवत:' या 'स्थितस्य' इस प्रकार के पद का माक्षेप कर लेने से काम चल सकता है । अतएव 'रये घ वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते' इत्यादि श्लोकों मे प्रयोग-संगति बैठती है । इसी प्रकार मागे 'विमुच्य' मे भी मध्याहार से काम चलाना चाहिए। (३) यात्रा त्वेषा-यहां तात्पर्य यह है कि इस लोक में प्रासू बहाने से मन उऋण होकर शान्ति का अनुभव करता है । क्योंकि मनुष्य अपने विछुड़े प्रिय जन के ऋण से ऋणो हो जाता है । जब वह उसकी स्मृति मे प्रासू बहा लेता है तब उसका ऋण चुक जाता है और मन में शान्ति मिलती है । इसलिए शोक सन्तप्त को अवश्य रो लेना चाहिए। भवभूति ने लिखा है 'पूरोत्पीडे तडागस्य परीवाहः प्रतिक्रिया । शोकक्षोमे च हृदयं प्रलापरव धार्यते।। (४) प्राप्तानण्याऋण से मक्ति । न ऋणम् अनृणम् (नन् तत्पु०) तस्य मावः मानण्यम् । प्राप्तम् पानृण्यं यया सा (ब० बी०। । इस श्लोक में शालिनी बंद है ॥७॥ विदूषकः-अस्सुपादकिलिणं खु ततहोदो मुहं । जाव मुहोदअं आणेमि । (निष्कान्तः) अश्रुपातविलग्नं खलु सत्र भवतो मुखम् । यावन्मुखोदकमानयामि ।] विदूषकः-महाराज का मुंह आँसू से भीग गया है। मैं तब तक मुंह धोने के लिए जल ले आता हूँ। (चला गया ।) Vidushaka-(Aside) His countenance is tyet with falling tears I will fetch water to efrace the stain. (Exit). पद्यावती-आय्ये ! गप्फाउलपडन्तरिदं अव्यउत्तस्स मुहं जाणि- क्कमह्म । [पायें ! याष्पाकुलपटान्तरितमार्यपुत्रस्य मुखम् । यावनिष्कामामः 1] पद्मावती-मायें ! आर्यपुत्र का मुंह बांसुओं से व्याप्त होने के कारण मानो वस्त्र से ढ़क गया है । इस बीच हम लोग निकल चलें। Padmavati-Lady, the King is weeping and his face is bidden in his robe, Let us go hence. वासवदत्ता--एव्वं होदु ग्रहवा चिट्ठ तुवं । उक्कण्ठिदं भत्तारं उजिय, अजुत्तं णिग्गमण । अहंएव्व गनिस्स एवं भवतु । अथवा तिष्ठ

।
चतुर्थ प्रक
त्वम् । उत्कण्ठिनं भर्तारमुज्झित्वायुक्तं निर्गमनम्। अहमेव
गमिष्यामि ।
वासवदत्ता-ऐसा हो हो । अथवा तुम रहो । उत्कंठा से युक्त पति को
छोड़कर चला जाना उचित नहीं है । मैं ही जाऊँगी ।
Vasava.--Let it be so or rather wait; it is improper to go
leaving the lord in sorrow. I alone shall go.
चेदी-मुठ्ठ अय्या भणादि । उयसप्पदु दाव भट्टिदारिआ। [मुप्-
वार्या मणति । उपसर्पतु तावद् भर्तृदारिका ।
दासी-देवी जी ठीक कह रही हैं । राजकुमारी स्वामी के पास जाय ।
Maid-The lady says the right thing. Go near him princess.
पद्मावती-किं णु खु पविसामि ? [किन्नु खलु प्रविशामि ? ]
पद्मावती क्या मैं (उनके निकट) जाऊँ ?
Padmavati-Should I go near him ?
वासवदत्ता-हला ! पविस । (इत्युक्त्वा निष्क्रान्ता ।) [हला!
प्रविश ।।
वासवदत्ता--सखी ! जामो। (यह कहकर चली गई ।)
Vasava.--Friend go (saying this she goes away.)
विदूषकः--(प्रविश्य ) (नलिनीपत्रेण जलं गृहीत्वा) एसा तत्त होदी
पदुमावदी ? [एपा तत्रभवती पद्मावती ?]
विदूषकः-(प्रवेश कारके) (कमलिनी के पत्ते में जल लेकर) ये माननीया
पद्मावती जी हैं ?
(entering), Vidushaka-(With water in a lotus led) Here is
her ladyship Padmavati,
पद्मावती -अय्य ! यसन्तम ! किं एदं ? [प्रार्य ! वसन्तक !
किमतत् ]
पद्मावती-आर्य वसन्तक ! यह क्या ?
Padmavati-Revered Vasantak, what is this?
विदूषकः--एवं इदं। इदं एदं । [एतदिदम् । इमेतत् । ।

१३८ स्वप्नवासवदत्तम् . . विदूषक--यह-यह-यह"। Vidrshaka-This, this, this. पद्मावती-भणादु भणादु अय्योभणादु ।[मणतु भणत्वार्यो भणतु ।] पद्मावती--कहिये कहिये, माप कहिये । Padmavati-Tell me, tell me, you say. विदूषकः-भोदि ! वादणीदेण कासकुसुमरेणुणा अविखणिपडिदेणु सस्सुपादं खु तत्तहोदो मुहं । ता गणदु होदी इदं मुहोदरं ! [भवति ! वातनीतेन काशकुसुमरेणुनाऽक्षिनिपतितेन साश्रुपातं तत्रभवतो मुखम् । तद् गृह्णातु भवतीदं मुखोदकम् ।। संस्कृत टीका--भवति-देवि !, वातनीतेन-वायुचालितेन, काशकुसुम रेणुना--काशपुष्पपरागेण, मक्षिनिपतितेन-नयनाम्यन्तरं गतेन, साथपातम्--- अश्रुपातसमन्वितं, खल--निश्चयेन, तत्रभवतः-महाराजस्य, मुखम्-पाननं (विद्यते) । तत्-तस्मात्, भवती–श्रीमती, इदम् एतत्, मुखोदकं-मुख- शुद्धिजलं, पृल्लातु-धारयतु । अनुवाद-विदूषक-देवि ! कास के फूल की धूल हवा में उडकर महाराज की प्रांतो में पड जाने से प्रांसू बह पाये हैं। इसलिए उनके मह घोने का यह जल माप लीजिये। Vidushaka-Your ladyship, His honour's face became full of tears by the vind-blown, pollen of the Kasha flowers falling in his eyes. therefore madam, take this water for washing his face. टिप्पणी-(१)मभुपातक्लिन्नम्-प्रामुमो के गिरने से भीगा हुआ। मश्रूणां पातः, तेन क्लिन्नम् । क्लिद्+क्त (त), 'रदाम्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः' इति सूत्रेण तकारदकारयो त्वम् । (२)मुखोदकम्--मुह धोने का पानी। मुखप्रक्षालनोदकम् मुखोदकम् मध्यमपदलोपी समाम । बाष्पाकुलपटान्तरितम्- बाष्पेण--प्रचणा माकुलं--व्याप्तम्, प्रतः पटेन-वस्त्रेण इव अन्तरितम्--- माच्छादितम्, बापाकुल च तत् पटान्तरितं बाष्पाकुलपटान्तरितम् विशेषणोमयपद कर्मधारय समास कुन्जखञ्जवत् । (३) उत्कण्ठितम्--उत्कण्ठा+इतच् 'तदस्य सजातं तारकादिम्य इतच्' इत्यनेन । (४) उज्झित्वात्यक्त्वा । (५) एतत् इदम् इदम् एतत्-त्यहाँ पद्मावती के मप्रत्याशित दर्शन से विदुषक घबड़ा गया है । इसलिए पद्मावती के प्रश्न का उत्तर वह पस्फुट रूप में 'यह-यह कहकर देता - चतुर्थ अंक १३६. है । अथवा यह इतना प्रत्युत्पत्रमति है कि पद्मावती को मुलावा देने के लिए हास्य का पुट देकर उत्तर देता है--(६) एतत्--यह । इदम्-~यह अर्थात् जल है । इदम् --यह । एतत्--यह अर्थात् जल ही है। अथवा एतत्- नलिनी के पत्ते का दोना मौर इदम्--जल । पदमावती--(आत्मगतम्)ग्रहो ! सदविखण्णस्स जणस्स परिजणो वि सदविखण्णो एव्व होदि (उपत्य) जेदु अय्यउत्तो । इरं मुहोदरं । [ग्रहो ! सदाक्षिण्यस्य जनस्य परिजतोऽपि सदाक्षिण्य एव भवति । जयत्यार्यपुत्रः । इदं मुखोदकम् ।] पद्मावती-(मन में) अहा ! चतुर व्यक्ति का सेवक भी चतुर ही होता है ।(समीप जाकर)आर्यपुत्र की जय हो । यह मह धोने का जल है । Padmavati--(aside)A clever man has clever followers, (going near) Ab hail my busband. Here is water to wash your face. टिप्पणी-(१) ग्रहो ! सदाक्षिण्यस्य "--यहाँ पद्मावती अपने मन में कहती है कि जैसा चतुर स्वामी है वैसा ही नौकर मी क्योंकि स्वामी अपने मन का मार किसी पर प्रकट नहीं होने देते। उसी तरह उनका सेवक कितना चतुर है कि उसने सत्य बात को छिपा कर अपने स्वामी की बात रखी है । यदि सेवक मूर्ख होता तो झट से कह देता कि वासवदत्ता की याद में रो रहे हैं । तब कितनी विषम स्थिति हो जातो? उसने अपने स्वामी को ऐसी स्थिति से बना लिया है, इसलिए नि:सन्देह वह भी स्वामी की तरह चतुर है । राजा-प्रये ! पद्मावतो। (अपवार्य)वसन्तक ! किमिदम् ? राजा-मरे! पद्मावती ! (मुंह फेरकर) वसन्तक ! यह क्या ? King-Padmavati ?(aside to Vidushata) How is this ? विदूषकः-(कणे) एवं विन। एवमिव विदूषक-(कान में) इस प्रकार। Vidashaka.-(whispers in the King'sear then aside) that's. how I managed it, राजा--साधु बसन्तक ! सापु । (प्राचम्य)पद्मावती! प्रास्यतान् ।' राजा-वाह वसन्तक ! वाह । (मह घोकर) पद्मावती ! बैठ जामो । King-Well done Vasantak, well done (washing the face). Padmavati, sit down, . स्वप्नवासवदत्तम् 'पद्मावती-जं अय्यउत्तो प्राणदि । (उपविशति ।) [यदायपुन प्राज्ञापयति । पद्मावती--जैसी प्रायपुत्र की प्राज्ञा । (बैठती है। Padmavati-As my lord wills. राजा--पद्मावती ! राजा-पद्मावती! King.-Padmavati. टिप्पणी--(१) अपवार्य-पद्मावती की तरफ मे मुह पुमाकर विदूषक की ओर करके । नाट्यशास्त्र में प्रावार्य या अपवारित शब्द पारिमापिक है । इसका अर्थ होता है-~-दूसरे को सुनने न देने के लिए दूसरी तरफ घूम जाना-- "रहस्यं कथ्यतेऽन्यस्य परावृत्याऽपवारितम्'। (२) एयमिव--ऐसा । इव शब्द अलंकारार्थ है । यहाँ विदूषक ने राजा के कान में यही कहा कि मैने पद्मावती जी से भापकी आँखों मे काश-पुष्प की धूल पड़ जाने से प्रासू पा जाने की बात जतायी है, इसलिए आप भी अपने रोने का कारण यही बताइयेगा। शरच्छशांकगौरेण वाताविद्धन भामिनि । काशपुष्पलवेनेदं साश्रुपातं मुखं मम ॥८॥ अन्वय---भामिनि । शरच्छशाङ्कगौरेण वाताविद्धन काशपुष्पलवेन इदं मम मुखम् साश्रुपातम् (अस्ति) ॥८॥ संस्कृत टीका--मामिनि !--सुन्दरि ! शरच्छशाङ्कगोरेण--शरत्कातीन- चन्द्रवत् घवलेन, वाताविद्धन--वान दायुना प्राविद्धन चालितेन, काशपुष्प- लवेन--काशकुसुमकणेन, इदम्--एतत्, मम--उदयनस्य, मुखम्--प्राननम्, 'माश्रुपातम्--प्रथुपातेन अश्रुजलपत नेन सहितम् (मस्ति) । अनुवाद-सुन्दरी | शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान उज्ज्वल काश-पुष्प का उड़कर प्रांखों में पड जाने से मेरे मुह पर प्रासू ढुलक गये थे ॥३॥ My face is bedewed with tears, oh lovely woman, by the wind flown pollea of the kasha flowers, white like the autumnal moon. टिप्पणी--(१) भामिनि !-सुन्दरी स्त्री तथा क्रोध करने वाली स्त्री को भी मामिनी कहते हैं । 'कोपना सैव मामिनी' इत्यमरः । (२) शरच्छशाङ्क: -कण हवा चतुर्थ मंक गौरण 1-शरदःभशाङ्क:पष्ठी तत्पुरुप, शरच्छा इव गौरः उपमित समास तेन । (३) वाताविद्धन-वायु द्वारा चालित होकर। (४) प्राविद्ध-कम्पित, चालित । 'प्राविद्धं कुटिलं मुग्न वेल्लितम्' इत्यमरः । (५) काशपुष्पलयेन-- कारा-पुष्प के कण से । काशस्य पुष्पम् तस्य लवः तेन (प० त०) करणे या हेतु. में तृतीया विमक्ति प्रयुक्त हुई है। यह मनुष्टुप् छंद है ॥८॥ (प्रात्मगतम्) इयं वाला नवोद्वाहा सत्यं श्रुत्वा व्ययां व्रजेत् । कामं धीरस्वभावेयं स्त्रोस्वभावस्तु कातरः ॥ अन्वय--नवोद्वाहा इय बाला सत्यं श्रुत्वा व्यथा व्रजेत् । इयं कामं घोरस्व- मावा तु स्त्रीस्वभावः कातरः ।।६।। संस्कृत टीका--नवोदाहा--नया नूतनः उदाहः विपाहः यस्याः सा तथाभूता, इयंदापमाना, वाला--पोडशी (पद्मावती), सत्यं–तथ्य, श्रुत्वा-प्राकण्यं. व्यथा-वेदना, ब्रजेत्-गच्छेत् । इयं पद्मावती, कामं पर्याप्त, धीर- स्वभावा-धीरः गम्भीरः स्वमाव: प्रकृति. यस्याः सा तादशी (अस्ति), तु-किन्तु, स्वीस्वमायः-स्त्रीणाम् नारीणां स्वभावः प्रकृतिः, कातर:-अधीरः (भवति) अनुवाद--(मन मे) नई व्याही हुई यह वाला सच्ची बात (रोने का वास्तविक कारण) मुनकर पोडा मनुमय करेगी। यद्यपि यह बड़ी गम्भीर प्रकति की है, किन्तु नारियों का स्वभाव तो प्रधीर होता है ।।६।। (Aside) she is but achild, and rewly married, and the truth would grieve her. It's brave heart and yet it is a woman's, there forc by nature it is timid. टिप्पणी--(१) नकोदाहा----नवविवाहिता, नवोदा । (२) माला--- मोलह वां तक की प्रग्या वाली स्त्रो। 'मानोसामवेद्याला तरुणी तर उन्मने । (३) फामम् -~-पर्याप्त । 'काम प्रवाम पयांप्तं निकामेष्ट पमितम्' विमरः । (४) कार--प्रपीर, पचन । 'प्रधीरः वामरः' इत्यमरः । यहाँ मनुप पर है ॥६॥ बिदूपः--उइदं तत्तहोयो मप्रधरामस्त प्रवाहकाले भवन्तं प्रागदो करिम मुहिग्जगदंसर्ग । सपगारो हि गाम सरकारेण पडिमियो स्वप्नवासवदतम् 'पोदि उप्पादि । ता उठेदु दाव भवं। [उचितं तत्रभवतो मगध- ‘राजस्यापरहणकाले भवन्तमग्रतः कृत्वा सुहुन्जनदर्शनम् । सत्कारो 'हि नाम सत्कारेण प्रतीष्टः प्रोतिमुत्पादयति । तदुत्तिष्ठतु तावद् 'भवान् । संस्कृत टीका-तत्रमवतः-माननीयस्य, भगधराजस्म--भगधेश्वरस्य, 'अपराल्लुकाले-दिनस्य चतुर्षमागे, भवन्तम्, उदयनम्, प्रातः कृत्वा-पुरो विधाय, सुहन्जनदर्शनम्वन्धुजनसाक्षात्कारः, उचितम्--योग्यम् (पस्ति) । हि-निश्चर्यन, सत्कार:--सम्मानः, सत्कारेण-सम्मानेन, प्रतीष्टः-स्वीकृतः, प्रीतिम्-तोपम्, उत्पादयति-उद्भावयति । तत्--तस्मात् कारणात्, भवान् -~-महाराजः, उत्तिष्ठतु--उत्थानं करोतु । वितूपक-~गाननीय मगधराज (दर्शक) ने आपको प्रागे करके अपराल मे 'मित्र-मण्डली से मिलने का समय तय किया है। मयोंकि यह निश्चित एवं 'प्रसिद्ध है कि सत्कार का बदला सस्कार से दिये जाने पर प्रीति उत्पन्न करता है । इसलिए प्राप उठे। Vidushaka-It would be proper, if his honour, the King of Magadha sees his friends this afternoon beginning from your honour, attention (RTT) begets love if received with courtesy. Therefore rise, your honour. टिप्पणी--(१) अपराहकाले--प्रल.मपरम् इति मपराः 'पूर्वापरा- 'चरोत्तरमेकदेशिनकापिकरणे, इति सूत्रेण एकदेशिसमासः, 'अहोऽह एतेभ्यः' इति सूत्रेण प्रह्लादेशः 'ग्रहोऽदन्तात्' इति सूत्रेण नस्य णत्वम् । अपराह्नस्य कालः अपराहकालः, तस्मिन् । (२) सत्कारो हि नाम" यहाँ विदुषक राजा को 'पद्मावती के पास से ले जाना चाहता है, इसलिए वह कहता है कि आज दोपहर के बाद मगधराज आपको आगे करके अपने मित्रों से भेंट करेंगे । आप मगधेश्वर के इस पादर को सादर ग्रहण करें। क्योकि पादर के साथ स्वीकार किया हुआ आदर प्रेम उत्पन्न करता है । इसलिए आप उठिये, चलिये । राजा-बाढम् । प्रथमः कल्पः। (उत्थाय) राजा--हाँ, यह तो पहला काम है । (उठकर) King-This is an excellent idea. (Rising). गुणानां या विशालानां सरकाराणां च नित्यशः । कारः सुलभा लोके विज्ञातारस्तु दुर्लभाः १०॥ -

चतुर्य अंक
१४३
:
(निष्क्रान्तः सर्वे ।) इति चतुर्योऽङ्कः
(सब का प्रस्थान 1) चौथा अंक समाप्त ।
अन्वय--विशालानां गुणानां वा सत्काराणां च कर्तारःमोके नित्यशः
सुलमाः, तु विज्ञातारः दुर्गमाः॥१०॥
संस्कृत टीका-विशालानाम्--अतिमहताम्, गुणानां--परोपकारादिस-
स्कार्याणां, वा-तथा, (विशालानां) सत्काराणां--परपूजामिनन्दनादीनां च,
कार:--सम्पादयितारः, लोके--जगति, नित्याः सततं प्रतिदिनमिति यावत्,
सुलमाः-सुप्राप्या:(सन्ति)तु-परन्तु, विज्ञातार:-विशेषेण ज्ञातार:गुणग्राहिण
इति यावत, दुर्लमाः-दुष्प्राप्याः भवन्ति)। (अयं माव:-इह संसारे उप-
फर्तारः तया सत्कर्तारः बहवः उपलभ्यन्ते । परं परकृतोपकाराणाम् परकृत-
सकाराणां च मादर्तारः विरलाः दृश्यन्ते । प्रतः सम्प्रति मगधराजसत्कार-
मादतुं मया तत्सग्नियो अवश्यं गन्तव्यम् ॥१०॥
It is casy to find people possessed of noble virlucs and
showing courtesy but it is difficult to find thoso who admire
(virtues and courtesy). (Excuent omnes) Here ends Act IV.
मनुवाद--(परोपकार भादि) प्रत्यन्त महान् गणों एवं सत्कारों के करने
वाले लोग तो ससार मे नित्य मिल जाते हैं, परन्तु (उन गुणों तया सत्कारों के
जानने वाले (मर्षात् भादर पूर्वक स्वीकार करने वाले मोग) कम मिलते हैं॥१०॥
(सबका प्रस्थान 1) चौपा में समाप्त ।
टिप्पणी-(१) प्रथमः कल्प:--मुख्य या प्रधान कार्य। 'मुस्यः स्यात्
प्रथमः पल्सः' इत्यमरः । (२) गगानाम् सरकाराणाम्--यह! 'यार' के योग
में 'वन कर्मणोः' इति मून मे पर्वा में पष्ठी हुई । इस लोक में वा शन्द और
प राम रामुचयापक है । 'विशासानाम्' का मन्वय गणानाम् पोर 'सलारा-
पाम्' दोनों से है । इस मोक में प्रस्तुत माघार गान के साथ प्रस्तुत गुणगा-
नादि के प्रकाशन में दोपकातार है। उल्लर पम्प साहित्यदर्पणे-परस्तुत.
प्रस्तुतपोपकं तु निगयो । प्रप पारफमेकं स्यादनेशागु त्रिसामु थे।
मनुष्टुप एंद है ॥१०॥

अथ पञ्चमोऽङ्कः Act V. (राजा पद्मावती को सिरोव्यथा को सूचना पाकर समुद्रग्रह में जाते हैं और वहाँ रोगशय्या को रिक्त पाकर उस पर लेट जाते हैं । विदूपक के कम्बल लाने के लिए बाहर जाने पर वासवदत्ता भी सूचना मिलने से वहाँ पा जाती है और पद्मावती के घोखे राजा के बगल में लेट जाती है। उसके हस्तस्पर्श से राजा की निद्रा भंग होती है । तब तक वह निकल जाती है । वह उसे पकड़ने के लिए दौड़ता है पर टक्कर खाकर गिर जाता है । इतने में उसे समाचार मिलता है कि सेनापति रुमण्वान् मगपराग की सहायता से शयु पारुणि पर चढाई करने जा रहा है । इस पर महाराज उदयन मी युद्ध में भाग लेने के लिए बाहर चल पडते हैं।) (ततः प्रविशति पदिमनिका ।) पदिमनिका-महुअरिए ! महरिए । अामच्छ दाव सिग्धं । [मघुकरिके ! मधुकरिके ! प्रागच्छ तावच्छीघ्रम् ।। (तदनन्तर पदिमनिका का प्रवेश।) पद्मिनिफा--मधुरिका ! मधुक- रिका! जल्दी तोप्रामो। (Then enter Padminik. Paduinika-Come, Madhukarika, come here at oncc. (प्रविश्य) मधुकरिका-हला ! इअलि । किं करोअदु? [हला ! इयमस्मि, कि क्रियताम् ?] (प्रवेश करके) मरिका--सखी ! यह मै हूँ, क्या करूं ? (Entering) Madhukarika-Well, here I am, Padmjaika, whar shall I do? पमिनिका-हला ! कि ण जाणासि तुवं भट्टिदारिमा पदुमावदो सीसवेदणाए दुक्खीवित्ति [हला । किन जानासि त्वं भदा- रिका पद्मावती शीर्ष वेदनया दुःखितेति ।] मधुकरिका-~-सखी ! क्या तुम नही जानती कि राजकुमारी पद्मावती सिरदर्द से पीड़ित हैं। Padminika-Friend do you not know that princess Padmavati is suffering from headache ? मधुकरिका-हद्धि । [हा धिक् ।]

पंचम मंक मधुफरिका-हाय ! हाय ! Madhokarika-Oh what a pity. पदिनिका-हला ! गच्च सिग्य, अय्यं आवन्ति सदाहि । केवलं भट्टिदारिआए सीसवेदणं एव्व णिवेदेहि । तदो स एव प्रागमिस्सदि । [हला ! गच्छ शीघ्रम्, प्रार्यामावन्तिका शब्दा- यस्व केवलं भर्तृ दारिकायाः शोपवेदनामेव निवेदय । स्वयमेवा. गमिष्यति । पद्मिनिफा-ससी ! जल्दी जानो, प्रार्या पावन्तिका को बुला लामो । केवल राजकुमारी को मिर-पीड़ा ही (उनसे ) बताना। वे स्वयं पलो पाएंगी। Padminika-Run then and call the lady of Avanti, Just inform her that the princess has a headache, Apd she will come here of her own accord. मधुकरिका--हला ! फि सा करिस्सदि ? [हला ! फि सा करिष्यति ?] मएफरिका-सी। वे क्या करेंगी? Madhokarika-Well, wbat will she do ? पद्मिनिका--सा सु दाणि महुराहि कहाहि भट्टिवारिपाए सोसयेदणं यिणोदेदि । [सा पल्विदानी मधुराभिः कयाभिः भर्तृ दारिफाया सीपंवेदनां यिनोदयति।] पदिमनिका-वे इस समय सुन्दर कथामों से राजकुमारी का सिरदर्द दूर करेंगी। Padminika-She will ally the headache of the princess by interesting stories. मधुफरिफा-जुग्न। फहि समणीयं रइदं भट्टिदारिमाए ? पिज्यते । फुत्र शयनीयं रचितं भत दारिकायाः ? j मधुपरिका-- ठीक है । राजकुमारी को गम्या यहाँ लगी है ? Madhnkarika-That will be splendid. But where has the Princess been laid 7 पदिमनिका मुद्दगिहरू फिल सेग्जा रियाणा । गच्छ दाणि तुर्य मह वि भट्टिको लियेदप्रत्यं प्रत्ययसन्तयं प्रणेसामि । समुद्रग्रहण किल दाम्या स्तीर्ण । गच्छेदानीं त्वम् । प्रहमपि भर्तृ निवेदनायं. मार्ययसन्तकमन्यिप्यामि ।

- ? ૨૪૬ स्वप्नवासवदत्तम् पमिनिफा-समुद्रगृह मे शय्या बिछी है । अब तुम जामो। मै भी स्वामी से निवेदन करने के लिए प्रार्य वसन्तक को ढूढ़ती हूं। Padıninjka-espect the bed is spread in the summer house. You go now. I shall also scck the noble Vasantaka for informing the lord. मधुकरिका-एव्वं होदु । (निष्क्रान्ता) [एवं भवतु।] मधुकरिका-ऐसा ही हो (चल देती है ।) Madhukarika-Let it be so (exit.) पदिमनिका-कहिं दाणि अय्यवसन्त पंवखामि ? (कुत्रेदानोमार्य- वसन्तकं प्रेक्षे ?] पदिमनिका-इस समय में प्रायं वसन्तक को कहाँ देखू Padminika-And where shall I find noble Vasanta ka now ? टिप्पणी--(१) प्रावन्तिकाम्-मालव की रहने वाली को। (२) शब्दा- यस्व--आवाज दो। शब्दं करोति इति शब्दायते, शब्द+क्यड 'शब्दवरकलहाभ्र- कण्वमेधेम्यः करणे' इति सूत्रेण, ततः लट्--त । इसी नामघातु के लोट् लकार मध्यम पुरुष एकवचन मे 'शब्दायस्व' रूप बनता है। (३) विनोदपति-दूरी करिष्यति वा लघूकरिष्यति । अत्र वर्तमानसामीप्ये भविष्यति लट् (४) समुद्र- गृहके-जल-यन्त्रों द्वारा तापनियन्त्रित गृह । 'समुद्रगृहमित्युक्तं जलयन्त्रनिकेतनम्' इति हारावली। आजकल इसी समुद्रग्रह को अंग्रेजी भाषा में 'एमरकन्डिशन' कहते हैं। (५) शयनीयम्-शय्या । शेते अस्मिन्, शी+अनीयर् । (६) रचितम्-बिछी हुई है । (७)स्तीर्णाविछायी हुई ।/स्तु+क्त (त), 'ऋत इद्धातोः' इति सूत्रेण इत्वम्, रपरः, दीर्घः, 'रदाम्याम्'- इत्यादि सूत्रेण तस्य नत्वम् । (८) शप्पा-शेते अस्याम् इति शय्या, Vशी+क्यप् 'संज्ञाया समज- निपद' इत्यादिना। (ततः प्रविशति विदूषकः।) विदूषकः-अज्ज खु देवोविनोवि रहिमअस्स ततहोदो बच्छराअस्स पदुमावदीपाणिग्गहणसमीरिनस्स प्रच्चन्तसुहावहे मङ्गलोसवे मदगग्गिदाहो अहिप्रदरं बड्ढइ । (पमिनिका विलोक्य) अपि पटुमिणिना! पदुभिणिए ! कि इह वत्तदि ? [अद्य खलु देवी- पंचम अंक यियोगविपरस्य तत्रभवतो वत्सराजस्य पद्मावतीपाणिग्रहण: समीरितस्यात्यन्तसुखावहे मङ्गलोत्सवे मदनाग्निदाहोऽधिकतरं यर्धते । अयि ! पदिमनिका! पदिनिके ! किमिह वर्तते ? सस्कृत टीका-प्रद्य--अस्मिन् दिवमे, खलु इति वाक्यालद्वारे, देवीवियोगा विपरस्य--देव्या यासयदत्ताया वियोगेन विरहेण विधुर व्याकुलं चेतः चित्तं यस्य तस्प, तत्रमवतः--माननीयस्य, वत्सराजस्य-उदयनस्य, पद्मावतीपाणिग्रहण- समोरितस्य-पद्मावत्याः मगधराजकुमार्याः पाणिग्रहणेन विवाहेन हेतुना समीरितस्य सन्धक्षितस्य यिपयामिमुसंप्रपतितस्य इति यावत्, अत्यन्तसुखावहे- अतिप्रमोदजनके, मङ्गलोरसवे-मङ्गलमये समये मदनाग्निदाहः--कामानल- सन्तापः, मधिकतरं-पूर्वापेक्षया राविशेपं, वर्षते वृद्धि प्राप्नोति । अयि इति पाश्चर्ये, पद्मिनिके !, किमिह वर्तते ? किमयंमत्रागतास्ति । अनुयाद-(तदनन्तर विदूषक का प्रवेश।) (महारानी वासवदत्ता के वियोग से व्याकुल माननीय वत्सराज को कामाग्नि की ज्वाला पद्मावती के विवाहरूपी वायु से प्रदीप्त होकर प्राज इस महान् सुख देने वाले शुभ उत्सव में पौर अधिक बढ़ रही है (पमिनिका को देखकर ) अरे! पमिनिका ! पदिनिका ! यहाँ कैसे हो ? (Then enter the Vidushaka), Vidushaka-Today, Indeed fanned by the marriage with Padmavati the torment of the firo of love of his honour Vatsaraj his heart suffering from the separation of the queen, has greatly increased on this very pleasant and auspicious festive occasion (seeing Padminika) oh Padminika what is the thing here ? पद्मिनिका--अय्य ! वसन्तन! किंग जाणासि भट्टिदारिआ पद्मावची सीसवेदणाए दुःखाविति । प्रार्य ! बसन्तक ! कि न जानासि त्वं भर्तृ दारिका पद्मावती शीर्षवेदनया दुःखितेति । पदिमनिका--प्रार्य वसन्तक ! क्या आप नहीं जानते कि राजकुमारी पद्मावती सिर दर्द से दुःखित हैं। Padminika--Revered Vasantak, do you not know that the priocess is suffering from headache, विदूषकः--भोदि ! सच्चं ? ण जाणामि ! [भवति ! सत्यं ? न जानामि ।

१४० स्वप्नवासवदत्तम् विदूषक--जी ! सच ? मैं नहीं जानता।' Vidashaka-Is it so ? I do not know. पदिमनिका-तेण हि भट्टिणो णिवेदेहि णं । जाव अहं वि सोसा- णुलेवणं तुवारेमि। तेन हि भत्रे निवेदयनाम् । यावदहमपि 'शीर्षानुलेपन त्वरयामि ।] पद्मिनिका--तो पाप स्वामी से यह निवेदन कर दीजिये । तव तक में भी सिर का लेप जल्दी तैयार करती हूँ। Padminika-You report this to the lord, meanwhile I shall prepare the ointment for the head. विदूषकः--कहिं सअणीनं रइदं पदुमावदोए ? [ कुत्र शयनीयं रचितं पद्मावत्याः ?] वियूपया-पद्मावती जी को शय्या पहां सगाई गई है ? Vidashak 2-Wbere has the bed of Padmavati been arranged ? पविमनिका-समुद्दगिहके फिल सज्जायिणा । [समुद्रग्रहके किल शय्यास्तीर्णा । पमिनिका-समुद्रगृह मे राम्या विछी है। Padminiha- The bed is in the Samudragrih. विदूषकः-गच्छदु भोदो। जाव अहं वि तत्तहोदो णिवेदइस । [गच्छतु भयती। यावदहमपि तत्रभवते निवेदयिष्यामि ।] (निष्क्रान्ती ।) (प्रयेशक:)) पिदूषक-माप जाइये। में भी महाराज से निवेदन पिये देता हूँ।. (दोनों रा प्रस्थान ।) (प्रवेशक समाप्त)। Vidashaha-You go, I too shall tell it to Kins. (Both retire) (Here ends the Praveshaka). टिप्पणी-(पदमायतीपाणिमहणसमीरितस्यपद्मायती के माप विवाद होने से विषयोपभोग में प्रयुन । वस्तुतः यहाँगीरित' पाठ होना चाहिए, जो 'गरनाग्निाहःपा विशेषण होगा । इमी पाउनुमार हिन्दी अनुवार पिया गया है । (२) पपि!--यह पारगूपर पायप है। (३) शीनरीपनं. वरपामि-मिर पर लेप लगाने की प्रोपितयार करने लिए शीघता पर पंचम ग्रंक १४६ रही हूँ।(४)प्रवेशक:--दो प्रकों के बीच का एक प्रकार का अंक जिसमें निम्न पात्र न दिखापी हुई तया मावी पटनाओं की सूचना देते हैं । यहाँ पद्मावती की अस्वपता तया उसके समीप राजा का गमन रूप भूत एवं भविष्यत् कालिक घटनामों की सूचना मिलती है। (ततः प्रविशति राजा 1) राजा-- श्लाघ्यामवन्तिनुपतेः सदी तनुजां कालक्रमेण पुनरागतदारभारः । लायाणके हुतवहेन हृताङ्गोष्ट तां पद्मिनी हिमहतामिव चिन्तयामि ॥१॥ अन्वय--कालक्रमेण पुनरागतदारमारः (मह) श्लाघ्याम् अवन्तिनृपतेः सदृशी तां तनूजा लादाणके हुतवहेन हताङ्गयष्टि हिमहता पद्मिनीम् इव चिन्तयामि ॥१॥ संस्कृत टीका--कालक्रमेण~-समय गत्या वासवदत्तानिधनात् कतिपयमा. सानन्तरम् इत्यर्थः, पुनरागतदारमार:--पुनः भूयः प्रागतः प्रायातः पन्याः भारः यस्मिन् स तयाभूतः, (प्रह)श्लाघ्या-प्रशंसनीयाम्, अवन्तिनृपतेः- उज्जयिनीपतेः, सदृशोम्-~मनुरूपाम्, ता--प्रसिद्धां, तनूजां-पुत्री, लावाणको- एतन्नाम्नि ग्रामे, हुतवहेन-~अग्निना, ह ताङ्गयष्टि हृता दग्घा अङ्गयष्टिः तनुलता यस्याः तादृशोम्, हिमहता--हिमेन तुपारेण हतां विनष्टां, (सुकुमारांगी नारी दुःखेनोपहता हिमतपभिन्योपमीयते तत्र तत्र काव्ये--"हिमसेकविपत्तिरत्र मे नलिनी पूर्वनिदर्शनं मता' रघुवरा । “जातां मन्ये शिशिरमथित्तां पद्मिनी वान्य- रूपाम्" मेघदूत ।) पद्मिनी कमलिनीम्, इप-तद्वत् चिन्तयामि-ध्यायामि । (प्रयं भाव:--वासवदत्ताविनाशानन्तर कियत्यपि काले व्यतीते प्रहमनिच्छन्नपि पद्मावतीपरिग्रहणमारेणाक्रान्तो जातः । किन्तु प्रशस्तगुणशालिनो महाराजप्रद्योत- स्थानुरूपा पुत्री मदीया प्रियतमा वामवदत्ता, या किल तुपारपातेन पद्मिनीव लावाणकामे अग्निना दाघदेहा अमूल्, सतत मत्स्मरणपदवी गाहते।)॥१॥ अनुवाद--(तदनन्तर राजा का प्रवेश (समय बीतने पर फिर पत्नी के भार को स्वीकार कर लेने वाला में उज्जैन के राजा के अनुरूप एवं प्रशंसनीय उस पुत्री को, जिसका इडे के समान छरहरा शरीर लावाणक ग्राम में प्राग से जल पाले से मारी हुई कमलिनी के समान याद कर रहा हूँ॥१॥ (Then enter the King) King--Having again been burdened with a wife ia course of time, I remember the esteem.d. worthy गया, स्वप्नवासवदत्तम् - daughter of the King of Avantis, that had her slender body burnt (of carried away) by fire in Lavanak like a lotus smitten by frost. टिप्पणी--(१) कालक्रमेण-समय के माहात्म्य से। कालस्य क्रमः, तेन । फरण मे तृतीया हुई ।(२)पुनरागतदारमारः-दाराणा भारः दारमारः षष्ठी तत्पुरुष, पुनः आगतः पुनरागतः सुप्सुपा समास, पुनरागतः दारभारः यस्य स पुनरागतदारमारः बहुव्रीहि समास । दार शब्द पुल्लिग, बहुवचन में सदैव प्रयुक्त होता है यथा दाराः, दारान्, दारः, दारेभ्यः प्रादि । (३) अवन्तिनृपतेः- यहाँ 'सदृशीम्' के योग में 'तुल्यायरतुलोपमाभ्या तृतीयाऽन्यतरस्याम्' सूत्र से षष्ठी हुई । अवतीना नृपतिः तस्य अवन्तिनृपतेः । (४) इलाव्याम्- प्रशंसनीय । श्लाघ्+ण्यत्+स्त्रियाम् टाप् (मा)। (५) हुतवहेन--अग्नि द्वारा । 'अनुक्ते कर्तरि तृतीया' से तृतीया हुई है। वह+अच् (पचाद्यम्) हुतस्य वहः पष्टी तत्पुरुष ।(६) हृताङ्गप्टि:-प्रङ्गं यष्टिरिव इति मगयष्टिः उपमित कर्मधारय समास, हृता अङ्गयप्टिः यस्याः सा हृताङ्गयष्टिः बहुव्रीहि । यद्यपि यहाँ पूर्वपद 'हृत' के 'हुतवह' शब्द से सापेक्ष होने के कारण समास नही होना चाहिए किन्तु 'सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वात् समासः' के अनुसार समास हुमा । (७)ताम्-~यहाँ प्रसिद्धार्थक तत् शब्द है । इसलिए यत् शब्द को अपेक्षा किये बिना इसका प्रयोग हुपा है-'प्रकान्तप्रसिद्धानुभूतार्थविषयस्तच्छब्दो यच्छन्दो- पादानं नापेक्षते' काव्यप्रकाश । (८) तनूजाम्-पुत्री को। तन्वाः जायते इति तनूजा तनू/जन्+ड 'पञ्चम्या जनेर्डः' इति सूत्रेण, ततः स्त्रियां टाप् (मा), ताम् । इस श्लोक में कितना सजीव वर्णन प्रस्तुत किया गया है। जैसे चारों मोर सुगन्धि फैलाता हुमा एक विकसित कमल हिमपात से नष्ट हो जाता है वैसे ही यौवनोल्लास से शोमित, स्वस्थ एवं प्रसन्न वासवदत्ता क्रूर काल द्वारा हमारे मध्म रो हटा ली गई है। इस फरुणाजनक घटना से मैं शोक सन्तप्त हूँ ॥१॥ इस पद्य में उदयन का वासवदता के प्रति प्रगाढ़ रतिमाव व्यक्त हुमा है । इसमे उपमा और विशेषोक्ति मलंकार है। तल्लक्षणं काव्यप्रकारे-"विशेषोक्ति- रखण्डेय कारणेप फलावचः ।" पर्यात् सम्पूर्ण कारणों के होने पर फल मान होना विशेषोक्ति मलंकार है । इसमें वसन्ततिलक मंद है ।। (प्रविश्य) विदूषकः--तुवरद तुयरदु दाव भव । स्वरतां त्यरता तायद् भयान् ।] (प्रवेशपरके) विदूषक-शीघ्रता कीजिये, महाराज ! तीघ्रता ।

पंचम प्रक (Entering) Vidashala-Make haste, make haste, O King ! राजा--किमर्थम् ? राजा-क्यों ? King-Why? विदूषकः--तत्तहोदी पदुमावदी सोसवेदगाए दुक्खाविदा। [तत्रभवती पद्मावती शीर्षवेदनया दुःखिता । विदूषक-माननीया पद्मावती जो सिर दर्द से पीड़ित हैं । Vidushaka-Her Gladyship Padmavati is suffering from headache. राजा--केवमाह ? राजा--किसने ऐसा कहा ? King-Wbo has said so, विदूषकः--पदुमिणिआए कहिदं । (पद्मिनिकया कथितम् ।) विदूषक-पदिमानिका ने कहा। Vidushaka-It was told by Padminika. राजा--भोः ! कष्टम्, रामा-प्राह ! कष्ट (देने वाली बात है)। King--Oh I very sad, रूपश्रिया समृदितां गुणतश्च युक्ता लब्ध्या प्रिया मम तु मन्द इवाध शोकः। पूर्वाभिघातसरुजोऽप्यनुभूतदुःखः पद्मावतीमपि तथैव समर्पयामि ॥२॥ अथ कस्मिन् प्रदेश वर्तते पद्मावती ? अन्यय-रूपणिया समुदिताम् च गणतः यस्ता प्रिया लम्या पूर्वामिषात- सरजः अपि मग मोकः प्रद्य मन्द इव । तु मनुभूतदु.स. पदमायतीम् मपि तथा एव समर्थयामि॥ संस्कृत टीका-रूपनिया-रूपस्य सोन्दर्यस्य थिया गोमया, समुदिता- युक्ता, गुणत:---गुणः, मुक्ता-समन्दिता, प्रिया-प्रेमास्पदं, सम्वा-प्राप्य, पानिपातमरजः मपि-पूर्वः प्राथमिकः यः मभिपात: वासवदत्ताविनाशरूप- मापात: तेन सरजः 'अपि पीडितम्प थपि, मम-उदयनस्य, शोकः-दुःसम्, १५२ स्वप्नवासवदत्तम् अद्य-प्रघुना, मन्द इव--किञ्चित् न्यून इव (प्रासीत्)। तु-परन्तु, अनु- भूतदुःख:--अनुभूतम् उपमुक्तं दुःख कष्टं येन स तथाविधः (मह), पद्मावतीम् अपि--दर्शकमगिनीम् अपि, तथा एव-वातवदत्तावदेव, समर्थयामि-मन्ये । (अयं मावः- रूपगुणसम्पन्नां पद्मावती नवपलीत्वेन लब्ध्वा मम वासवदत्ता- निषनात्मकः शोकः किञ्चितन्यून इव प्रमूत् । परमिदानी दुर्भागधेयोऽहं चिन्तयामि यत् कदाचित् पद्मावती अपि मां दुःख सागरे निमज्जयित्वा दिवं यास्यति।।२।। अनुवाद--रूप-सम्पत्ति तथा गुणों से युक्त प्यारी स्त्री को प्राप्त करके पहली चोट से दुःखी हुये भी मेरा शोक अब कुछ कम-सा हो गया था। किन्तु मुक्तभोगी होने के कारण मै पद्मावती की भी उसी तरह (वासवदत्ता के समान मर जाने वाली) समझ रहा हूँ ॥२॥ अच्छा, पद्मावती किस स्थान में है ? Having obtained my beloved possessed of the beauty of form and endowed with virtues, my grief had been somewhat mitigated today; still suffering from the previous shock and having experienced the pain, I believe Padmavati to be also in the same plight. And where is Padmavati now. टिप्पणी (१) रूपधिया-सौन्दर्य की शोमा से। रूपस्य श्रीः, तया । करण में तृतीया हुई । (२) समुदिताम्--समन्वित, युक्त । सम्-उद्-इ+ क्त (त)--टाप् (प्रा) । (३) गुणतः--गुणों से । गुण शब्द से तृतीयार्थ मे सार्वविमक्तिक तस् प्रत्यय । (४) पूर्वाभिपातसरजः-प्राथमिक प्राघात से पीडित । रु+क्विप्रुज्=रोग, पीड़ा, रुजा सह वर्तमानः सरुक् 'तेन सहेति तुल्ययोगे' इत्यनेन बहुव्रीहिसमासः. 'वोपसर्जनस्य' इत्यनेन सहस्य मादेशः, पूर्वश्चासौ अभिघातः पूर्वाभिघातः कर्मधारय समासः, तेन सरुक् इति पूर्वाभिघात. सरुक् तृतीयातत्पुरुषसमासः । मम का विशेषण है । (५) मम--यहाँ' कर्तृकर्मणोः कृति' सूत्र मे कर्ता में षष्ठी हुई । १६) शोकः-मन्द इव (भमूत्) मेरा शोक कुछ कम-सा हुमा । (७) तपंव--ठीक उसी तरह। अर्थात् 'स्नेह पापांकी' इस न्याय से राजा का सोचना कि पद्मावती मी वासवदत्ता की तरह न विनष्ट हो जाय । (८)समर्थयामि--सोचता हूँ, कल्पना करता हूँ। सम्/अपं +णिच् + लट्--मिप् उ० पु० ए०३० । इस लोक में पदार्थहेतुक फायलिंग अलकार है भोर वसन्ततिलका छद है ।।२।। विदूषकः-समग्रिहके फिल सज्जा त्यिण्णा । [समुद्रगृहफे किल शय्या स्तीर्णा ] पंचम प्रक १५३ विदूषक-समुद्रग्रह में सेज बिछायी गई है। Vidashaka-The bed is spread on the summer house. राजा--तेन हि तस्य मार्गमादेशय । राजा-तो उसका रास्ता बतामो। King-Then show me its way. विदूषकः-एदु एडु भवं । एत्वेतु भवान् ।। (उभौ परिकामतः।) विदूषक-पाइये, भाइये महाराज ! (दोनों चलते हैं।) Vidashaka-Comson, come on, your honour. (Both go about). विदूषकः-इदं समुद्दगिहकं । पविस भवं । इदं समुद्रगृहकम् । प्रविशतु भवान् ।] विदूषक-यह समुद्रग्रह है। माप प्रवेश करें। Vidasbaka- This is the palace. Be pleased to enter Sir. राजा---पूर्व प्रविश । राजा--पहले तुस प्रवेश करो। King-Nay do you enter first. विदूषकः-भो !तह (प्रविश्य) प्रविहा ! चिट्ठदु चिट्ठदु दाब भवं । भोः ! तया। अयिहर ! तिष्ठतु तिष्ठतु तायद् भवान् । विदूषक---जो । पन्छा । (प्रवेश करके ) मोहो! भाप जरा ठहर जाइये, ठहर जाइये। Vidasbaka-Well as you wish it (Epters) oh, borrible stay there, stay there sir. राजा--किमयम् ? राजा-नयों? Klog-by. यिदूपकः-- एसोपदीयप्पमायमूहदस्यो यमुथातले परिवतमाणो प्रय कामोगरो॥ [एप सल दीपप्रनायमूचितस्पो यमुघातले परिवर्त- मानोऽयं काकोदरः ॥

स्वप्नवासवदत्तम्
विदूषक--यह दीये के उजाले में स्पष्ट दिखाई पड़ने वाला जमीन पर
लोटता हुआ सांप है।
Vidushaka-This form which is clearly seen in the light of
the lamp is a cobra lying on the ground.
राजा--[प्रविश्यावलोक्य सस्मितम् ] अहो ! सर्पव्यक्तिधेयस्य।
राजा-पैठकर और देखकर मुस्कराते हुए) अहो ! मूर्ख इसे सांप समझ
रहा है।
King–(Enters and looks laughing) (Aher.) The foolish fellow
and his fancied serpent.
टिप्पणी-(१) तेन हि-~यदि ऐसा है तो । यहाँ हि शब्द वाक्यालंकारार्य
है।(२) प्रादेशय-सूचक । प्राडपूर्वक दिश् धातु सिद्ध होता है ।(३) एत्वेतु--यह
द्विरुक्ति शीघ्रता-प्रकाशनार्थ है। (४) दीपप्रभावसूचितरूपः--दीपस्य प्रभावेण-
सामोने सूचितं--प्रकटीकृत रूप-स्वरूपं यस्य सः अथवा दीपस्य प्रमया-
प्रकाशेन अवसूचितं रूपम्--प्राकारो यस्य सः । (५) फाकोदरः-साँप ।
'कुण्डली गूढपाच्चक्षुःश्रवाः काकोदरः फणी' इत्यमरः। ईपत् अकति इत्यर्थे मक
कुटिलायां गतौ इति धातोः पचादित्वात् अच्प्रत्यये 'ईपदर्थे च' इत्यनेन कोः कादेशे
काकम् इति रूपम्, तादृशम् अर्थात् ईपत् कुटिलगतिमत् उदरं यस्य स काकोदरः ।
(६) अहो ! सपंव्यक्तिवधेयस्य--हाय ! मूर्ख को सांप जान पड़ता है ! यहाँ
तात्पर्य यह है कि जिस वस्तु को विदूषक ने सांप समझा था, वह तोरणमाला थी।
अतएव राजा कहता है कि इस मूर्ख को तोरणमाला का भी ज्ञान नहीं है, जो
उसे सर्प मान रहा है । (७) वैधेप-मूर्ख, जो दूसरो के बताने पर ही कोई कार्य
करता है । विधेयं विधान तस्य प्रयम् अधिकारी इति विधेय+प्रण।
ऋज्वायतां हि मुखतोरणलोलमाला
भ्रष्टां क्षितो त्वमवगच्छसि मूर्ख ! सर्पम् ।
मन्दानिलेन निशि या परिवर्तमाना
किञ्चित् करोति भुजगस्य विचेष्टितानि ॥३॥
मन्वय-मूर्ख ! त्वम् तु ऋग्वायताम् क्षिती भ्रष्टाम् मुखतोरणसोलमा-
लाम् हि सर्पम् प्रवगच्छसि या निशि मन्दानिलेन परिवर्तमाना भुजगस्य विचेष्टि-
तानि किञ्चित् करोति ॥३॥

पचम अंक
संस्कृत टीका--भूखं! --मूढ !, त्वं तु-मवान् कित, ऋज्वायताम्---
ऋजुः सरला चासो प्रायता च दीर्घा च ताम्, क्षिती--पथिव्यां, भ्रष्टा--
पतिता, मुखतोरणलोलमाला--मुखं मुख्य यत् वोरणं गृहस्य बहिरिं तत्र या लोला
पञ्चला माला पुष्पसक ता, हि--निश्चयेन, सर्पम्--महिम्, प्रवगच्छति--
जानासि, या--तोरणमाला, निशि~-रात्री, मन्दानिलेन--मन्दवायुना, परिवर्त-
माना--परितः सन्दमाना, मुजगस्य--सर्पस्य, विचेष्टितानि--चलनानि,
किञ्चित्---ईपत्, करोति----विदधाति । (अयं भाव:--वसन्तक ! नायं सर्पः,
इयं किल समुद्रग्रहस्य बहिारे लम्बमाना सरला दीर्घा च पुष्पमाला वर्तते, या हिं
भूमी पतिता तया मन्दपवनेन कम्पिता सती सर्पस्य इव चेष्टितानि करोति ।
प्रतो माला सर्पत्वेन मवगच्छतस्तव मौम्यं प्रशंसनीयमस्ति।) ॥३॥
अनुवाद-~-मूखं! तुम तो सीधी, लम्बी और घरती पर गिरी हुई बाहर
के द्वार के महराव की चंचल माला को, जो रात्रि में मन्द-मन्द वाय से हिलती
हुई कुछ-कुछ सौप की चेष्टायें कर रही है, सोप समझ रहे हो ॥३॥
Oh fool, you believe the long and straight hanging garland
of the front entrance (now) fallen on the ground to be a serp-
ent; which, waved little by the gentle wind at night, makes the
movements of serpent.
टिप्पणी--(१) मूर्ख! --मुह्यति इति मूर्खः, मह+स, मूर मादेशः
'महः सो मूचं' इत्योणादिकमूत्रेण, तत्सम्बद्धो। (२) शून्यायताम्-ऋजुश्चासो
भापता ध विशेषणोमयपदकर्मधारय समास, ताम्। प्राद+यम्+क्त (त) कर्तरि+
स्त्रिया टाप् (मा)--प्रायता । (३) मुलतोरणलोसमासाम--मुग यत् तोरण
षमंधारय समाम प्रपया मुखे द्वारे तोरणम् सप्तमी तारूप, लोला घातो मासा
सोलमाला कर्मधारय, मुसतोरणे लोलमाला राप्तमी तत्तुरुप, वाम् (तोरण-
किमी घर या नगर का बाहरी दरवाजा तोरणोस्त्री यहितारम्' इत्यमरः ।
(५॥ सर्पम्-~यह विधय होने पर भी उद्देश्य 'माला' के लिंग से मिन्नता
पता है । सो इसका समाधान 'उदेश्य व विये च विमतिः मदनी भवेत् ।
फदाधिग्जायते तन पम्यं लिंगगंप्यमो:' इग कारिका के बल से करना
चाहिए। इस श्लोक मे भान्वापत्र.निप्रसार है सल्माणम्-'प्रान्नापरल.
नियस्य पराया भ्रान्तिकारणे' । यहाँ पर माला में विद्रूपक को मनी भान्ति
हुई। उमरा निराकरण राग द्वारा रिपे जाने मै भानापनि मनंगार हमा।
इसमें वमन्ततिला छन्द है ॥३॥

स्वप्नवासवदत्तम् विदूषकः--[निरूप्य] सुठ्ठ भवं भणादि । ण हु अझं काओनरो । (प्रविश्यावलोक्य) तत्तहोदी पदुमावदी इह प्राअच्छिा णिग्गदा भवे । सुष्ठु भवान् भणति । न खल्वयं काकोदरः । तत्रभवती पद्मावतोहागत्य निर्गता भवेत् । ] विदूषक-(गौर से देखकर) माप टोक कह रहे हैं। यह साँप नहीं है। (मीतर जाकर और देखकर) माननीया पद्मावती यहां प्राकार चली गई होगी। Vidushaka-(Looking closely) Rightly says your honour. Really it is not a snake (Entering and looking) the ladyship padmavati must have come here and gone out. ‘राजा-वयस्य ! अनागतया भवितव्यम् । राजा--मित्र पाई न होंगी। King-Friend, she must not have come. "विदूषकः--कहं भवं जाणादि ? [कथं भवान् जानाति ? ] विदूषक--कैसे आप जानते हैं ? Vidusbaka-How do you know ? "राजा-किमत्र ज्ञेयम् ? पश्य, राजा-इसमे जानना क्या है ? देखो--- King- What is there to know ? see. शय्या नावनता तयास्तृतसमा न व्याकुलप्रच्छदा न क्लिष्टं हि शिरोपधानममलं शीर्षाभिघातोषयः । रोगे दृष्टिविलोभनं जनयितुं शोभा न काचित् कृता प्राणो प्राप्य रुजा पुनर्न शयनं शीघ्र स्वयं मुञ्चति ॥४॥ -हि शय्या तथा प्रास्तृतसमा भवनता न, व्याकुलप्रच्छदा न, ममलं "शिरोपधानं शीर्षामिघातोषधः न क्लिष्टम्, रोगे दृष्टिविलोमनं जनयितु कापित चोमा न कृता, पुनः प्राणी रुजा शयनं प्राप्य शीघ्र स्वयं न मुञ्चति ।।४।। संस्कृत टीका--हि-पतः, शय्या-दायनीयम्, तपा--पूर्ववत्, पास्तम ममा-प्रास्तृता याद्यास्तरणेन युक्ता सा चासो समा भविषमा, अवनता न 'शरीरमारेग किश्चिदपि भवनति न प्राप्ता, प्याकुलप्रमादा नयासः इतस्ततः प्रावय- पचमक संकुचितः प्रच्छदः निचोलपट: मावरणपट इति यावत् यस्याः सा तयाभूतान, अमल-निर्मले, शिरोपधानम्-~-उपवहंगम्, शोभिघातोष:-सिरोवेदना- निग्रहसमर्थः ओषषिविशेषः, न क्लिष्टम्-दूषितम्, रोग-व्याधी सति, दृष्टिविलोमनम्-नयनाकर्षणं, जनयितुम्---उत्पादयितुम, काचित्कापि,- शोभा-मितो चित्रलेखनादिसम्भवं सौन्दर्य, न कृताने विहिता। पुन:--- अन्यच्च, प्राणी-शरीरधारी, रुजा--रोगेण, सपन-शयां, प्राप्य-लम्ध्वा, शीघ्रम्-पाशु, स्वयं-स्वतः, न मुञ्चतिन त्यजति। (अयं माय:--राजा समुद्रगुहे पद्गावत्पनागमनसाधकानि प्रमाणानि दर्शयन् कथयति-यदि सा मागता' भवेत् तहि शय्या किञ्चिदपि अवनता मवितु युक्ता तथा प्रच्छदपटे वलीमग्रेन भाव्यम्, किन्तु तदेतन दृश्यते किमपि । किञ्च निर्मले शिरस्थानीयोपपानेऽपि शिरसि वेदनापनोदनस्योषधस्य लेपेन मनागपि मालिन्य न लक्ष्यते । अपरञ्च भ्याधिकाले दृष्टिविनोदापं मित्ती चित्रादिभिः कापि शोमा न रचिताऽस्ति । अन्यच्च रोगातुरो जवः शयनं प्राप्य शीघ्र स्वयमेव तत् त्यक्त्वा अन्यत्र न गच्छति ॥१॥ अनुवाद-जिस लिए कि विसौना उसी प्रकार विधा हुमा है, दवा हमा मही है । चादर सिकुडी हुई नहीं है । मच्छा तकिया शिर-पीडा की मोपधियों से मैला नहीं हुमा है । रोग में माखों को बहलाने के लिए कोई सजायट नही की गई है । भौर प्राणी रोग के कारण बिस्तर पर पहुँच कर अपने माप गोय उमे नही छोडता है ॥१॥ The couch bas pot been pressed, its sheets are smooth, coverlet has not been disarranged; lhe pillow shows to mark of pressure and no orgaments attractive to the sight have been devised to please the patient's mind. Be sure of this, a person who has found a bed in sickness will not leave it ligbily. टिप्पगो-(१) पास्तृतममा-फैली हुई पोर बराबर । मास्तृता पानी ममा कर्मधारय ममास माध+म+वन (त) मंगि+स्त्रियाम्+टाप् (मा)- पात्रता । (२) भयनतारी हुई या दबी हुई। प्रा नमु+7 (8)- टाप (मा} 1(२) प्यासमरपदा-निगडी चादर मिकुट गई हो । प्याकुमः प्रयायाः सा महकोहिगमाग । प्रच्छद-विधान को पादा । निधान प्रखपद इत्यमरः । प्र+नि+पगि मनायां पः प्राग' इति मग, 'दादेवमामगंस्प' इत्यनेन हस्यः। (४) शिरोपधानम्-तकिया १ ५८ स्वप्नवासवदत्तम् 'उपधीयते स्थाप्यते यत्र तत् शिरोपघानम् । यहाँ शिर शब्द प्रकारान्त है । क्योंकि कोश में कहा है-'शिरोवाची शिरोऽदन्तो रजोवाची रजस्तथा'। और इसके 'प्रयोग भी मिलते हैं--'पिण्डं दद्यात् गयाशिरे', "विचकत शिरान् द्रौणिः' । (५) शीर्षाभिघातौषध:--- शीर्षस्य अभिघातः पप्ठी तत्पुरुष, तस्य औषधानि (तादर्थे पष्ठीतत्पुरुषसमास:) तैः क्लिष्टम् के योग मे अनुक्ते कर्तरि तृतीया । 'शिरोवेदना की ओषधियों से । क्लिश्+क्त (त)-क्लिष्टम् । अभि+हन्+घम् (अ)--अभिघातः । (६) रोगे--इसमें 'यस्य च मावेन मावलक्षणम्' सूत्र से भाव मे पष्ठी हुई। (७) दृष्टि विलोभनम् --प्रांखों को बहलाने वाली। दृष्टयोः विलोमनम् (षष्ठी तत्पुरुष) । (८) जनयितुम्-जन्+णिच्+तुमुन् । उत्पन्न करने के लिए । (६) रुजा-~भत्र हेतो तृतीया। इस पद्य में पूर्वोक्त हेतुओं से पद्मावती के अनागमन रूप साध्य की सिद्धि होने के कारण अनुमान अलंकार है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥४॥ विदूषकः--तण हि इमस्सिं सय्याए महत्तसं उवविसिन ततहोदि पडिवालेदु भव । तेन ह्यस्यां शय्यायां मुहूर्तकमुपविश्य तत्रभवती प्रतिपालयतु भवान् ।] विपक-तो भाप कुछ देर इस शय्या पर बैठकर श्रीमती की प्रतीक्षा करें। Vidashaka—Then why not sit down here upon the bed and wait the lady's coming. राजा-वाढम् । (उपविश्य) वयस्य ! निद्रा मां बाधते। कथ्यतां फाचित् कथा। राजा-मच्छा (वैठकर) मित्र ! मुझे नीद सता रही है । कोई कथा यहो । Klog-Very well (sits down) I feel an overwhelming drowsiness. Tell me some story. 'विदूषकः-प्रहं कहहस्सं । हो ति फरेदु प्रत्तभयं । अहं कथयिष्यामि । हो इति फरोवनभवान् । विदूषक-में पहूंगा। माप हुंकारी देते जाइये । Vidushaka-lfitell you one will you say "Hem" to stow that you hear me ? राजा-याडम् ।

पंचम अंक
१५६
राजा-अच्छा ।
King--Yes.
विदूषकः-अत्यि णपरी उज्जइणो णाम । तहिं पहिअरमणीप्राणि
उदग्रहाणाणि वसन्ति किल । [प्रस्ति नगर्यज्जयिनी नाम ।
तमाधिकरमणीयान्पुदकास्नानानि वर्तन्ते किल ।
विदूषक--उज्जयिनी नाम की एक नगरी है। यहाँ प्रत्यन्त रमणीय
जलाशय हैं।-
Vidushaka-There is a city named Ujjain. where there are
various glorious batbing places.
राजा --कथमुज्जयिनी नाम ?
राजा-या उज्जयिनी?
King-Oh what Ujjaini ?
विदूषकः-जइ प्रणभिप्पेदा एसा कहा, अगं पाहइस् । [यद्यनभि.
प्रेतया कथा, प्रन्या बययिष्यामि ।
विदूषणाः परि यह पा नहीं रपटी हो तो दूसरी बहूँ।
Vidasbals-Ir this story is not agrecable I shall sell another,
राजा-यपस्य ! न सतु नाभिप्रेतपा कया । किन्तु,
रामा--मित्र ! यह रात नहीं है कि.मुरे यह पपा प्रन्यो नही सगटी।

१६० स्वप्नवासवदत्तम् - स्मराम्यवन्त्याधिपतेः सुतायाः प्रस्थानकाले स्वजनं स्मरन्त्याः । बाष्पं प्रवृत्तं नयनान्तलग्नं स्नेहान्ममवोरसि पातयन्त्याः ॥५॥ अन्वय--प्रस्थानकाले स्वजनं स्नेहात् स्मरन्त्याः प्रवृत्तं नयनान्तलग्नं बाष्पं ममैव उरसि पातपन्त्याः अवन्त्याधिपतेः सुतायाः स्मरामि ॥५॥ संस्कृत टीका-प्रस्थानकाले-~-प्रयाणसमये, स्वजनं-बन्धुवर्ग, स्मरन्त्याः -ध्यायन्त्याः, स्नेहात्-~-प्रेम्णः, गः, प्रवृत्तम्-उद्भूतं, नयनान्तलग्नम्--अपाङ्गपोः संसक्तम्, बाष्पम्-अश्रु, ममैव-मदीय एव, उरसि-वक्षःस्थले, पातयन्त्याः --मुञ्चन्त्याः, अवन्त्याधिपते--अवन्तिराजस्य, सुतायाः-पुत्र्याः, स्मरामि --चिन्तयामि । (अयं मावः--राजा कथयति-मित्र ! मम निषेधस्य कारण- मिदं वर्तते यत् उज्जयिनीशब्दश्रवणमात्रेण अहं वासवदनायाः प्रस्थानकालिक दृश्यम् अस्मार्षम् । तदानीं सा मदर्थे परित्यज्यमानं पित्रादिकं विचिन्तयन्ती जनजागरणभयात तूष्णीमेव अश्दत् । तस्याः नयनयोः प्रवहमानया अश्रुधारया मम वक्षःस्थलं क्लिप्नं सञ्जातम् महो! कीदृशं तत् मामिकं दृश्यम् ! ) ॥५) अनुवाद-चलने के समय अपने परिवार वालों का स्मरण करती हुई भौर स्नेह के कारण निकले हुए एवम् भांखों की कोर में लगे प्रासुमों को मेरी ही छाती पर गिराती हुई प्रवन्तिराजकुमारी को याद कर रहा हूं ॥५॥ But I remember the daughter of the King of Avantis, think. ing of her relations at the time of starting and shedding, on my chest through affection, the gushing tears clinging to the corners of her eyes, टिप्पणी--(१) स्मरम्त्या:-यह 'सुतायाः' का विशेषण है। स्म+पात। स्त्रियां डीप (ई) स्मरन्ती । तस्याः (२) स्नेहात्--यहाँ हेतु मे पंचमी हुई। (३) प्रवृत्तम्-सहते हुए 18+वृत्+क्त (त)। (४) नपनान्तलग्नम्-मासों के कोनों में रुके हुए । नेत्रों के कोनों को अपाङ्ग कहते हैं पोर मपाङ्ग से देखने को कटाक्ष ।'मपाङ्गो नेत्रयोरन्ते कटाक्षोऽपाङ्गदर्शने' इत्यमरः । (५)याप्पम्- मांसू । यह 'पातपन्त्याः' का फर्म है। (६) प्रवन्त्याधिपते:-मालय देश के स्वामी की । यह प्रयोग मपाणिनीय है। क्योकि समास करने पर 'मवन्त्यधिपतेः' होगा पौर ममाम न करने पर भवन्त्या अधिपतेः'। ऐसी स्थिति में 'मा समन्ताद भावेन अधिपतिः, माधिपतिः, भवन्त्याः माधिपतिः भवन्त्याधिपतिः, तस्म' इस तरह मान कर काम चला सकते है। मपया 'गदा स्वामी', "मया स्वामी' मादि पंचम मंक की तरह तृतीयान्त 'प्रवत्या' पद मान 'अधिपति' के साथ 'दीर्घसन्धि करने से शुद्ध रूप कहा जा सकता है। (७) सुताया:-यहाँ 'स्मरामि' के योग में 'प्रपोगर्थदयेशां कर्मणि' सूत्र से पष्ठी हुई । इस श्लोक के प्रथम चरण में उपेन्द्र- वया (ोर शेष तीन चरणों मे इन्द्रवज्रा के होने के कारण उपजाति छंद है 'स्यादिन्द्रदमा यदि सो जगो गः।' 'उपेन्द्रवा जतजास्ततो गो । अनन्तरो- दीरितलदममाजी पादौ यदीयावुपजातयस्ताः' ।।। अपि च, बहुशोऽयुपदेशेषु यया मामीक्षमाणया । हस्तेन खस्तकोणेन कृतमाकाशवादितम् ॥६॥ मन्वय-~-उपदेशेषु माम् ईक्षमाणया यया सस्तकोणेन हस्तेन बहुशः अपि माकाशवादितं कृतम् ॥६॥ संस्कृत टीका-उपदेदोष--शिक्षासु, माम्--उदयनम्, ईशामाणया--- पश्यन्या, यया-चामवदत्तया, यस्तयोगेन-सस्तः च्यतः कोणः वीणावादन- सापनी मूतो वस्तुविशेषो यस्मात् स तथाविधः सेन, हस्तेन—करेण, बहुसः अपि --प्रनेकदारमपि, माकाशवादितम्---पाकाशे शून्ये यादितं यादनं, कृतम्--- अनुष्ठितम् (मयं मावः-यदा किल वासवदत्ता मत्तो वीणावादनकला शिक्षते स्म तदा सा प्रेमातिरेकेण सतत मन्मानकापितदृष्टिः मासीत् । तेन च तदानी स्वकीयहस्तानच्यत फोणं न ज्ञातवती सा। ततश्च सा मधेव वीणां वादयितुम मङ्ग लिय्यापारणं कृतवती । तत् तस्या मुग्पाचरणमिदानी स्पराम्पहम् ।) ॥६॥ अनुयाद-(वीणा) सिखाते समय मेरी पोर एकटक देखती हुई जिसने घटे हुए वीणा यजाने के यन्त्र वाले हाय रो भनेक बार शून्य स्थान में बजाने की त्रिया की पी (उसी प्रिया वा स्मरण कर रहा हूँ) ॥६॥ And again. Many a time on occasion of instruction, while (she was) looking at me, her hand, from which the plectrum has dropped, would aimlessly moic in the sky. टिप्पणी-(१) उपदेशप-शिक्षा देने समय । यहाँ भपिकरण में सप्तमी हुई। (२) ईसमागया-देगती हुई । V+सट-गान, मुगागम । (३)यस्तरोन--विससे मिराब गिर पुरी हो। सस्तः लोगो यस्मात् मः, तेन । (४)ोण-मिरार, तार का बना एला जिगरी नौर में मापात करके सितार, तानपूरा पादिपनाते हैं । 'रोगो वीगारिवादन' यमाहारी .

स्वप्नवासवदत्तम् 'सारिका' भी कहते हैं। 'द्वयोस्तु कोणो वीणादिदिनं सारिका च सा' इति शब्दार्णवः । यहाँ अन्त में प्रवन्त्याधिपतेः सुतायाः स्मरामि' इस पूर्व श्लोक के बाक्य से सम्बन्ध ममझना चाहिए । (५) अाकाशवादितम्--आकाशे वादितम् (स० तत्पु० ) वादनम् तालदत्तम्, उक्त कर्मणि प्रयमा । वासवदत्ता महाराज उदयन पर इतनी मुग्ध थी कि मिजराव के सरक कर गिर पड़ने पर हाथ शून्य घूम रहे थे पर वीणा से किसी प्रकार का तान न निकलने पर भी उसे कुछ भान न होता था। यह अनुष्टुप् छद है ॥६॥ विदूषकः--भोदु, अण्णं कहइस्सं । अत्थि गपरं ब्रह्मदत्तं णाम । तहि किल रामा कंपिल्लो णाम । [भवतु, अन्यां कपिष्यामि । अस्ति नगरं ब्रह्मदत्तं नाम । तत्र किल राजा काम्पिल्यो नाम ।] विदूषक: अच्छा, दूसरी (कथा) कहता हूँ । ब्रह्मदत्त नामक एक नगर है । वहां का राजा काम्पिल्य है। Vidushakar-Oh, very well, I will tell another tale. There is a city pamed Brahmadatta, where there reigned a King named Kampilya. राजा-किमिति किमिति ? राजा--क्या क्या? King-What, what do you say ? विदूषकः--[पुनस्तदेव पठति । विदूषक--(फिर वही कहता है। Vidashaka-Again repeats the same. राजा-मूर्ख ! राजा ब्रह्मदत्तः, नगरं काम्पिल्यमित्यभिधीयताम् । --पूर्व ? 'राजा ब्रह्मदत्त और नगर काम्पिल्य'--ऐसा कहो । King--Ob fool, you should say King Brahmadatta, and the city of Karopilya, विदूषकः---कि रामा ब्रह्मदत्तो, गनर कंपिल्लं? [कि राजा ब्रह्मदतः, नारं काम्पिल्पम् ?] पितृपक--वया राजा ब्रह्मदत्त और नगर कामिल्य ? राजा-- .

पंचम अंक १६३ Vidashaka-What, King Brahmadatta and the city of Kampilya ? राजा---एवमेतत् । राजा हां, ऐसा ही। विदूषकः-तण हि मुहुत्तमं पाडिवालेदु भवं, जाव ओट्ठा करिस्सं । रामा ब्रह्मदत्तो, णप्ररं कपिल्लं । (इति बहुशस्तदेव पठित्वा)इदाणि सुगादु भवं । अयि! सुत्तो अत्तभवं ? अदिसोदला इअं वेला। प्रतणो पावारनं गणिला आअमिस्सं । (निष्कान्तः) तेन हि महूर्तकं प्रतिपालयतु भवान्, यायदोष्ठगतं करिप्यामि । राजा ब्रह्मदत्तः, नगरं काम्पिल्यम् । इदानों शृणोतु भवान् । अपि ! सुप्तोऽत्रभवान् ? अतिशीतलेयं वेला। प्रात्मनः प्रायारक गृहीत्वामिप्यामि। विद्रुपक- तो माप जरा ठहर जाइये, जब तक मैं इसे कंठस्य करल। राजा ब्रह्मदत्त, नगर काम्पिल्प । इस प्रकार उसी को कई बार कहार) मब प्राप मुनिये । परे ! माप सो गए? इस समय बहुत ठंड पड़ रही है। में अपनी पादर लेकर पाता हूँ। (पल देता है ।) Vidashaka-Then your honour should wait for some time: in the meantime I shall get it on my lips--King Brahmadatta city of Kampilya (thus hc repeats the same many a time.) Now let your honour hear Oh, his honour is asleep. The hour is very cold. I shall bring my mantle and come, (Exit) (ततः प्रविशति वामयदत्ता आयन्तिकावेपेण, चेटी च ।) चेटो-एदु एदु अय्या! दिदं प भट्टि दारिआ सोसवेदणाए दुश्सायिदा । एवेत्वार्या । दृढं खलु भर्तदारिका शोषवेदनया दुःखिता।] (सदनन्तर पन्निवासिनी के वेश मे वागवदता घोर दासी या प्रवेशा) दामो--पाइये, मार्या ! पाइये । राजगुमारी जी मिर दरं मे बहा प्याकुल Then enter Vasgyadatta in Avanlıka's garb and a maid) Maid-Com: on, mosdam, com: on. The princess is pained, indeed severely. by headache. यासयदत्ता-हटि! कहि सप्रपोभं इदं पदुभाषवीए? हा पिफ ! कुन शयनीय रचितं पावन्या: ?| स्वप्नवासवदत्तम् . पासवदत्ता--माह | कष्ट ! ! पद्मावती की शय्या कहाँ लगी है ? Vasara --Oh how painful, where is the bed of Padmavati spread ? चेटी-समुद्दगिहके किल सेज्जा त्थिण्णा । [समुद्रगृहके किल शय्या स्तीर्णा ॥ वासी-समुद्रगृह में सेज बिछी है। Maid-It is told the bed spread in the summer house. वासवदत्ता- ---तण हि अगदो याहि । तेन ह्यग्रतो याहि] उभे परिकामत:। वासवदत्ता--तो तुम आगे-आगे चलो। (दोनो चलती हैं ।) Vasava.--Then walk in front. (Both walk) चेटी-इदं समुद्दगिहकं । पविसदु अय्या । जाव अहं वि सोसा- णुलेवणं तुवारेमि । (निष्क्रान्ता ।)[इदं समुद्रगृहकम् । प्रवि- शत्वार्या यावदहमपि शीर्षानुलेपनं स्वरयामि ।। वासी-यह समुद्रगृह है। प्रार्या अन्दर चलें। तब तक में भी सिर के सेप के लिए जल्दी करती हूँ। Maid-This is the summer house your ladyship may enter just I shall expedite the unction for the headache. टिप्पणी-(१) नगरं ब्रह्मदत्तं नाम यहाँ विदूषक ने राजा को हंसाने के लिए नगर के नाम को जगह राजा का नाम मोर राजा के नाम के बदले नगर का नाम ले लिया। (२) किल- यह प्रसिदार्थक अव्यय है । (३) काम्पिल्य- यह दक्षिण पाञ्चाल की राजधानी का नार पाम भी कम्पिला के नाम से प्रसिद्ध है पोर फरूंसाबाद जिले का एक कसबा है । दीपदी पा जन्म यही हुमा पा। (४) मुहूर्तकम्-सण मर । यहाँ 'कालापनोरत्यन्तसंयोगे' से द्वितीया हुई। (५) मोष्ठगतम्-मुतस्य कंठस्य । (६) प्रावारफम्--मोड़ने का वस्त्र, चादर, मोड़ना । प्राव (माच्छादन)+घन 'उपसर्गस्य पश्यमनुष्य बहुलम्' इति मूत्रेण उपसर्गत्य दीर्घः-प्रावार+4 (स्वार्थ)-प्रावरणः, तम् । (७)एतु एसु-यहाँ शोमता सूचित करने के लिए दो बार उच्चारण दिया गया है। (८) यम्-मत्यधिक क्रियाविशेषणत्वात् हितीया । (६) शीपंवेदना- ।

पंचम अंक १६५ सिरदर्द से, हेतु मे तृतीया हुई है। (१०) दुःखिता-दुःखम् सज्ञातम् अस्ति अस्याः इति विग्रहे दुःख+इतच् तारकादित्वात् ततष्टाप् (प्रा) 1 अपदा कण्ड्वा. दिगणीय दुःख तस्त्रियायाम् धातु मे क्त प्रत्यय करने पर इसकी सिद्धि होगी। (११) शीर्वानुलेपनम्-मिर दर्द को शान्त करने वाला लेप । (१)स्वरयामि- त्वरया मम्पादयितुगच्छामि इत्यर्थः । वासवदत्ता-अहो ! प्रकरुणा र इस्सरा मे । विरहपप्यस्सुनस्स अय्यउत्तस्स विस्समत्याणभदा इनं वि णाम पदुमावदी अस्सत्या जादा । जाव पविसामि। (प्रविश्यावलोक्य) अहो! परिजणस्स पमादो । अस्सत्य पदुमायदि फेवलं दोवसहाग्रं करिम परित्तजदि । इमं पदुमावदी प्रोसुत्ता। जाय उवयिसामि । अब प्रज्ञासण. परिगहण प्रप्पो विन सिणेहो परिभादि । ता इमस्सि सय्याए उविसामि । (उपविश्य) शिणहु एदाए सह उवविसन्तीए प्रज्न पह्लादिदं विम हितमं । दिट्टा अविच्छिण्ण. सुहणिसासा । णिव्युत्तरोआए होदव्यं । प्रहय एप्रदेससवि- भाप्रदाए सअणीग्रस्स सूएदि में प्रालिनेहि ति । जाव सइस्सं । (शयनं नाटयति ।) [प्रहो ? अकरुणाः सत्योदयरा में। विरहपर्यत्सुकत्यार्यपुत्रस्य विश्रमस्यानभूतपमपि नाम पद्मावत्यस्यस्था जाता। यायत् प्रपिशामि । अहो । परिजनस्य प्रमादः । अस्वस्या पचायती फेवलं दीपसहायां कृत्वा परित्यजति । इयं पायत्ययसुप्ता । यायवु- पविशामि । अयवान्यासनपरिग्रहेणाल्प इय स्नेहः प्रतिभाति । तदस्यां शव्यायामुपविद्यामि । फिनु सल्येतया सहोपविशत्या अप प्रहादितमिय में हृदयम् । दिष्ट्याविच्छिन्नसुतनिध्यासा । नियतरोगया भवितव्यम् । प्रययशासयिभागतया शपनीयस्य गूचयति मामासिङ्गति । पायच्छयिध्ये 1] मात टोग-प्रहो!-गंदगूयामिदमव्ययम्, मैं-मम, विरा:- भाग्य-देवताः, मात-निधयेन, पारना:-निदंयाः (गन्ति) । विरह- परस्य--विरहेग दिलोगेन परमुपरय प्यामितपेणगः, प्रार्यपुत्रस्य-- मिनः, विषमम्पानभूताः--मनोविनोदाराम, दापमाना, पद्मावती मार, नाम-पावालदाराममियम, मम्रपा राना, वा-पर।

स्वप्नवासवदत्तम् यावत्-प्रस्तु, प्रविशामिभन्तर्गच्छामि । महो !, परिजनस्य-परिचारक- वर्गस्य, प्रमाद:--अनवधानता । अस्वस्थां--रुग्णा, पद्मावतीं, केवलं, दीप- सहायों--दीप एव सहायः सहचरो यस्याः ताम् एकाकिनोमित्यर्थः, कृत्वा- विधाय, परित्यजति--प्रत्याक्षीत् । इयं, पद्मावती, अवसुप्ता--सुप्तवती । यावत्-अधुना, उपविशामि-उपवेशनं करोमि । अथवा-आहोस्वित् अन्यामन- परिग्रहेण-स्थानान्तरोपवेशनेन, स्नेहः--प्रेम, अल्प इव-न्यून इव प्रतिभाति- प्रतीमते, तत्-तस्मात्, अस्या-पुरोऽवस्थितापां, शय्यापा,--दायनीये, उप. विशामि । किन्नु खलु-किमिति, एतया-~-पद्मावत्या, सह-साकम्, उप- विशन्त्या:--उपवेशनं कुर्वन्त्याः, मे-मम, हृदयम्-चित्तम्, मद्य--इदानी अल्लादितमिव--होत्फुल्लमिव (जायते) । दिष्ट्या--माग्येन, (इयम् । अविच्छिन्नसुपनिःश्वासा-अविच्छिन्नः विच्छेदरहितः सुख: मुखपूर्वक: निःश्वासः उच्छ्वासः यस्याः सा तादृशी (वर्तते)। (अतएव मनया) निवृत्तरोगपा- निवृत्तः पपगतः रोग: व्याधिः यस्याः सा तादृशी तया, भवितव्यम्--माम्यम् । अपवा, शयनीयस्य-शय्यायाः एकदेशविमागतया---एकदेशे एकत्र प्रदेशे संविभागः पार्थक्येन अवस्थितिः यस्य तत् तद्भावः तत्ता तया, सूचयति-ङ्गित करोति, इति—यत, माम्--पदमावतीम्, प्रालिङ्ग-परिव्यजस्व । यावत्- प्रतः शयिष्ये-स्वप्स्यामि-- भनयाव-वासवदत्ता--हाय ! मचमुच विधाता मेरे प्रति निदय है । वियोग से प्याफुल पार्यपुत्र के मनोविनोद का साधन यह पदमावती भी पस्वस्थ हो गई। मन्दा, मोतर चलू। (नीतर जाकर और देखकर) हाय ! दामियों को प्रमाव- धानता ! मस्वस्थ पद्मावती को केवल दीपक के सहारे पर छोड गई हैं। यह पद्मावती मोयी है । भर बैठती हूँ। मथवा मना मासन पर बैठने से स्नेह में यमो मालूम पड़ती है। इसलिए इसी मेज पर बैठ जाती हूँ। विठकर) पहा ! पान इसके साथ बैठमी हुई मेरा हृदय पुलकित-सा क्यों हो रहा है ? मोमास में इसकी सास विना कायट के मुख से चल रही है। (प्रतएव) से नौरोग होना चाहिए । पपया शरया के एक भाग में सोने से (मानो) मह बह रही है कि मेरा पासिंगन करो । तो मोती है । (सोने । मभिनय करती है।) Vasara.--Oh Indeed, God is cruel to me. This Padmavati too, who had become the place of rest of his lordship. yearning for me in my separation, has also become indisposed I shall dow enter (Enters and sen), Oh the blunder of servants! They have ।

पंचम प्रक left the indisposed Padmavati with only the lamp to help (her). Here Padmavati is asleep. I shall just sit. Perhaps taking another (different) seat might show less affection indeed. Therefore I shall sit on this bed (sitting) why indeed does my heart, while I am sitting (here) today with her, seem delighted, as it were ? Happily her breath is uninterrupted and easy (continuous and good), She must be out of her illness.Can it be that,by sharing a portion of the bed she suggests that I should embrace her? Then I shall lie down (or sleep) (she gesticulates sleep). टिप्पणी-(१) प्रकरणा: -निष्ठुर, क्रूर । यहाँ वासवदत्ता के कहने का तात्पर्य यह है कि मेरे विधाता बडे कर हैं, नहीं तो मला विपत्ति पर विपत्ति क्यों पड़ती । अब मेरे पति को सान्त्वना देने वाली यह पद्मावती भी बीमार पड़ गई। निःसन्देह देव मैने प्रति निर्दय हैं । अविद्यमाना करुणा येषा ते प्रकरणा: 'ननोऽस्त्य- र्थाना वाच्यो वा चोत्तरपदलोपः' इति वात्तिकेन नम्बहुव्रीहिसमासः । विद्यमान इत्यस्य लोपश्च । (२) विश्रमस्थानभूता-मन बहलाने का साधन । विश्रमस्य स्थानम् पष्ठी तत्पुरुष, विश्रमस्थाने तुल्या इति विश्रमस्थानभूता अस्वपदविग्रहः नित्यममासः । भूत--सम, तुल्या । (मूत इमादौ . . प्राप्ते वित्त समे सत्य' इति मेदिनी । (३) दीपसहायाम्--दीप ही जिसका एकमात्र साथी था। दीप एव सहायः यस्याः सा (व० वी० ) ताम् । (४) प्रन्यासनपरिग्रहण-~-अन्यत् प्रासनम् कर्मधारय, तस्य परिग्रहः ५० त०, तेन हेतो तृतीया । यहाँ वासवदत्ता सोचती है कि मलग बैठने मे स्नेह थोड़ा प्रतीत होता है, गहरा नहीं । यहाँ प्रमी गहरा प्रेम नहीं है वही सकोच और दिखावट होती है । परन्तु मुझमे और पद्मावती मे अत्यधिक हार्द है,इसलिए मुझे अलग नहीं बैठना चाहिए। (५) प्रह्लादितमिब मे हृदयम् -प्रह्लाद आनन्द. सञ्जातोऽस्य तत् प्रह्लादितम्, प्रह्लाद+इतच् 'तदस्य मञ्जातम्' इत्यनेन । यहाँ कवि ने बड़ा ही मनोरम भाव प्रदर्शित किया है। क्योकि वासवदत्ता जिसे पद्मावती समझ कर स्पर्श-सुख का अनुभव कर रही यो वह वास्तव में उसका प्रियतम ही था। इस रहस्य को न जानने के कारण वह पाश्चर्य करती है कि न जाने क्यो प्राज मेरा मन प्रफुल्लित हो रहा है । मैं प्रतिदिन इसके साथ बैठती हूं, पर पाज का-सा सुख कभी अनुभव नहीं किया । क्या बात है ? कालिदास को कृतियों में यह माव द्रष्टव्य है यया:-'मनो हि जन्मान्तरसगतिजम् ।' रघुवरा० ७, १२ । 'तच्चनसा स्मरति नूनमोधपूर्व भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि ।'

१६८ स्वप्नवासवदत्तम् शाकु० ५.२ (६) दिप्ट्या-सौभाग्य से, अय्यय । हेतु में हतीया हुई है। (७) प्रविधिनसुखनिःश्वासा--ने विच्छिन्नम् मविच्छिन्नम् (मन्त०) अविच्छिन्नं मुलं यस्मिन् सः (प० पी०), अविच्छिन्नसुखः निश्वासः यस्याः सा (व० पी०) । बिना रुकावट मुखपूर्वक सांस लेने वाली । (८) निवृत्तरोगया-- रोगरहित । निवृत्तः रोगः यस्याःसा (३० ग्री०) तया, मनुक्ते कतरि तृतीया। (९) एकादेशसंविभागतया-एक भाग मे होने से। एकश्चासो देशः एकदेशः एकदेशस्य संविमागः (५० तत्पु०) तस्य मावः तया हेतो तृतीया। विशेष--वासवदत्ता का यह स्वगत माषण उसके उज्वल धरित्र का द्योतक है। पद्गावती के प्रति उसका सापल्यमाव नहीं है। उसे वह अपने शोक-संतप्त पति को सान्त्वना का साधन समझती है तथा उसको भस्वस्थता से प्रत्यन्त व्यग्र हो जाती है। अपने पति के सुख के लिए यह प्रेम और त्याग प्रादर्श की पराकाष्ठा है। राजा---[स्वप्नायते । हा वासवदत्ते ! राजा- -(सपने मे) हाय वासवदत्ता! King--Talking in his sleep) Ab me Vasavadatta. वासवदत्ता-सहसोत्याय] है ! अय्यउत्तो, ण पदुमावदी। फिणु खु दिह्यि ? महन्तो खु अय्यजोअन्धराअणस्स पडिण्णाहारो मम दसणेण पिफ्फलो संवृत्तो। (हम् ! आर्यपुत्रः, न खलु पद्मावती। किन्नु खलु दृष्टास्मि ? महान् खल्वार्ययोगन्धरायणस्य प्रति- जाभारो मम दर्शनेन निष्फलः संवृत्तः । वासवदत्ता--(झट उठकर) ऐं ! आर्यपुत्र, पद्मावती नहीं। वमा मै देख ली गई हूँ ? निःसन्देह आर्य यौगन्धरायण की प्रतिज्ञा का महान् उत्तरदायित्व मेरे देखे जाने से व्यर्थ हो गया। Vasaya.-(Starting up) what t the King ? It is the King and not Padmavati Have I been seen ? Then all my tail and care to keep the great resolve have been useless. राजा हा अन्तिराजपत्रि ! राजा-हाप मालवराजकुमारी! King-Ah, princess of Ujjain. वासवदत्ता--दिठ्ठिआ सिविणाअदि खु अय्यउत्तौ। ण एत्य कोच्चि जणो । जाव मुहुत चिट्ठिा दिछि हिमरं च तोसेमि ।।

पचम अंक १६६ (दिष्टया स्वप्नायते खल्वार्यपुत्रः । नात्र कश्चिज्जनः । याव- ' न्मुहुर्तकं स्थित्वा दृष्टि हृदयं च तोषयामि ।] वासवदत्ता-माग्य से प्रार्यपुत्र सपना देख रहे हैं। यहां कोई नही है। अतएव क्षण मर ठहर कर प्रांख और छाती को जुड़ा लू । Vasara.-Forutnately the King must be dreaming, There is no body here; just for a while, I shall wait and gratify my eyes and heart. राजा-हा प्रिये ! हा प्रियशिष्ये ! देहि मे प्रतिवचनम् । राजा--हाय प्यारी ! हाय प्रिय छात्र । मुझे उतर दो। King-Oh dear 1 Oh dear disciple give me an answer. वासवदत्ता T-पालवामि भट्टा ! पालवामि । [पालपामि भतः ! आलपामि ।] वासवदत्ता-उत्तर देती हूँ, स्वामी ! उत्तर देती हूँ। Vasava.-I am speaking, I am speaking. राजा--कि कुपितासि ? राजा-या रुष्ट हो गई हो? King-What, are you angry ? बासवदत्ता--- -हि पहि दुरिखदह्मि । [नहि नहि, दुःखितास्मि ।। वासवदत्ता-नही, नहीं, मै दुःखिता हूँ। Vasara.-N), no I am miserable. राजा-पद्यकुपिता किमर्थ नालडकृतासि ? राजा-यदि रुष्ट नही हो तो शृङ्गार क्यों नहीं किया? King-If you are not angry, why have you not put ornaments. वासयदत्ता-इदो वरं किं । [इतः परं किम् ?] वासवदत्ता-इससे बढकर क्या (मर्थात् मै दुःखी हूँ, इससे वहा और क्या कारण हो सकता है। Vasara.-What would be better than this. on १७० स्वप्नवासवदत्तम् राजा--कि विरचिका स्मरसि? राजा--क्या विरचिका का स्मरण करती हो ? King--Do you remember Virachika. वासवदत्ता-[ सरोपम् ] पा प्रवेहि, इहावि विरचित्रा ? [प्रा अहि, इहापि विरचिका ?] वासवदत्ता--क्रोधपूर्वक) माह ! हटो, यहाँ मी विरचिका ? Vasara.-(Angrily) oh begone Virachita even here ? राजा-तेन हि विरचिकायं भवती प्रसादयामि । [हस्तौ प्रसारयति । राजा-तो विरचिका के लिए तुम्हें मनाता हूँ। (दोनों हाथ फैलाता है ।) King-Then I beg pardon of your ladyship for Virachika. वासवदत्ता--चिरं ठिदसि । को विमं पक्खे । ता गमिस्सं । अहव सय्यावलम्बिनं अय्यउत्तस्स हत्यं सअणोए प्रारोविअ गमिस्सं । [चिरं स्थितास्मि । कोऽपि मां पश्येत् । तद् गमिष्यामि । अथवा शय्याप्रलम्बितमार्यपुत्रस्य हस्तं शयनीय आरोग्य गमिष्यामि ।] (तथा कृत्वा निष्क्रान्ता ।) वासवदत्ता-~-बहुत देर ठहर गई । कोई मुझे देख लेगा। इसलिए चल हूँ। या शय्या पर से लटके हुए आर्यपुत्र के हाथ को शय्या पर रखकर चलू । (वैसा करके चली गई।) Vasara.-I have been here too long. Some one might see me I will depart. But first let me replace His arm, which now is hanging from the bed. (Does so and exit.) टिप्पणी--(१) स्वप्नायते स्वप्न देखते हुए बोल रहा है। स्वप्न इव माचरति इति स्वप्नायते, स्वप्न क्यङ, दीर्घ+लट्-ते। यहां स्वप्न शब्द स्वप्नवत्परक है । मर्धसुप्तावस्था में जागरित अवस्था की वासना के अनुसार मन का विषयों का उपमोग करना स्वप्न कहलाता है। इसका लक्षण यह है-- "इन्द्रियाणामुपरमे मनोऽनुपरतं यदि । सेवते विषयानेव तद्विद्यात् स्वप्न. दर्शनम् ।” फिर इसके सात भेद हैं-"दृष्टः श्रुतोऽनुभूतश्च प्राषितः कल्पित- स्तथा । मावितो दोषजश्चेति स्वप्नः सप्तविधः स्मृतः।" (२) प्रतिभाभार:- यौगन्धरायण की प्रतिज्ञा यो कि वासवदत्ता को छिपाकर मगधराजकुमारी - पंचम मंक पद्मावती के साथ उदयन का विवाह कराने के बाद मगध राज की सहायता से उदयन के खोये हुए राज्य को पुनः प्राप्त कर लेंगे। इसलिए वासवदत्ता घबड़ा रही है कि मेरे देखे जाने पर मेरे जल जाने का सारा रहस्य खुल जाएगा। तब राजा दशक मेरे स्वामी को सहायता नहीं देगा । फिर तो यौगन्धरायण का महान्. प्रतिज्ञा-मार निष्फल ही है । (३) वृष्टिं हापं च तोपयामि-इस पंक्ति में वामवदता की महाराज उदयन को देखने को उत्कट ममिलापा प्रकट होती है। बहुत दिनो से वियुक्त होने के कारण वह अपने पति ः दर्शनार्थ अत्यन्त उत्सुक है तथा उमे जी भरकर देखना चाहती है । (४) विरधिकाम्-कथासरि. रसागर के अनुसार विरचिका उदयन की प्रेमिका थी। एक बार मूल मे उदयन ने दानवदत्ता को विरचिका के नाम में सम्बोधित कर दिया था, जिग पर वह नाराज हो गई थी। फिर उदयन ने उसके पर पकड कर मनाया पा । (५)मा अहि-यहाँ 'मा' पध्यय कोर और स्मरण का बोधक है। इसलिए 'पावपस्म- रणयोरहिन्' के अनुसार इसे निरात एकाजनाः' गूत्र गे प्रगृह्यमना और 'प्नुनप्रगृह्या मधि निरपम्' मूत्र से प्रति-माव होने कारण सवर्णदीपं नहीं हपा। (६) हस्तो प्रसारयति--स्वप्न मे कुपित होकर भागती हुई वामदएप्ता को पर पपड फार मनाने पे लिए रामपने दोनों हाय फैलाता है । यहाँ मन में गमा यो यामवदत्ता का दर्शन होता है। इसीलिए पपि ने इस नाटक का नाम 'स्पन-पागवदतम्' रखा है। याम्यिता-पलग गे नीचे सदयते हए। दास्यायाः प्रलम्बितम् पायाप्रलम्यितम् । राजा-महसोत्याय ) यासयदते ! तिष्ठ, तिष्ठ। हाधिक ! राजा-एएम उठकर) वागता! रहो, टहरो हाहा!! King-(Starting up) Vasavadatta stay. oh, stay. Alas. निकामन् सम्प्रमेणाहं द्वारपक्षेण तारितः । ततो ध्यपतं न जानामि मनायो: मनोरयः ॥७॥ সায়মন দিলাম এ রাবো শান্তিঃ। বস ম্ मा: मनोगप. (7) सात न गानामि १७२ स्वप्नवासवदत्तम् अनुवाद-जल्दी मे निकलता हुमा म दरवाजे के किनारे से टकरा गया । "इस लिए स्पष्ट रूप से नहीं जानता कि यह वास्तविक घटना थी या (मेरे) 'मन का भाव (हो। ॥७॥ King-Rising in head long haste I ran against the door that bars my passage forth. and now I have no certainty whether or not this desire is a reality. टिप्पणी--(१) सम्भ्रमण-हड़बड़ी मे वेग से। इसमे 'प्रकृत्यादिम्य उपसंख्यानम्' इस वातिक से तृतीया हुई । (२) भूतार्थः--भूतः-सत्यः अर्थः यस्य स भूतार्थः । 'भूत क्ष्मादौ... प्राप्ते वित्त समे सत्ये' इति मेदिनी । यहाँ राजा के कहने का भाव यह है कि मैं नहीं जानता कि यह सत्य घटना है या मेरे मन का माव, टक्कर लगने से में वासवदत्ता को न पकड़ सका । पकड़ लेता तो तथ्य का पता चल जाता । मब तो यह.मेरे मन की भावना भी हो सकती है जो मूर्त रूप मे स्वप्न के उपरान्त सामने दिखाई पड़ी। दोनो में से कौन-सी बात है, मैं नही जानता। (३) निष्कामन-निकलता हुमा निस्+म+ रात । (४) व्यक्तम्-इसमें क्रियाविशेषणत्वात् द्वितीया हुई। इस लोक में अनुष्टुप् छन्द है ॥७॥ (प्रविश्य) विदूषकः--प्रइ ! पडिबुद्धो अत्तभवं । अयि ! प्रति- बुद्धोऽनभवान् । (भीतर जाकर) विदूषक--अरे ! महाराज तो जग गये । (entering) Vidushaka-Oh, his honour is awake. राजा--ययस्य ! प्रियमावेदये, घरते खलु वासवदत्ता । राजा-मित्र ! में सुशखबरी सुनाता हूँ । वासवदत्ता निसंदेह जीवित है । King.–Friend, I tell you some happy news. Vasavadatta is Teally alive. 'विदूषकः-भविहा! वासवदत्ता ! कहिं वासवदत्ता ? चिरा उवरदा वासवदत्ता । [अविहा ! वासवदत्ता! कुत्र वासवदत्ता चिरात् खलूपरता वासवदत्ता ।] विदूषक-हाय ! वासवदत्ता! कहाँ है वासवदत्ता। वह तो बहुत पहले म्ही मर गई।

पंचम अंक Vidashaka--Alas Vasavadatta where is Vasavadatta 7 Vasavadatta is really dead long since. राजा--वयस्य ! मा मैवम्, राजा--मित्र ! ऐसा न कहो, King-Friend do not say so. शय्यायामवसुप्तं मां बोधयित्वा सखे । गता । दाति युवता पूर्व वञ्चितोऽस्मि रुमण्यता ॥८॥ अन्वय--सखे ! शय्यायाम् अवसुप्तं मा बोधयित्दा (सा) गता। पूर्वम् दग्घा इनि युवता रुमण्वता (महम्) वञ्चित: अस्मि || सस्कृत टोका-मखे!-मित्र !, पाय्यायाम्--शयनीये, प्रवगुप्त-शयित, माम्----उदयनं, बोधयित्वा-जागरयित्वा, (वासवदता) गता-ततो याता। पूर्वम्--पुरा, दाया-वासवदत्ता मम्मीभूता, पति-~इत्य, अवता--कथयता, रामवता---एतनामयेन मन्त्रिणा, (प्रहम्)वञ्चित:--प्रतारितः, पस्मि-जातः। (भय माव:-राजा कथयति-हे मित्र ! वासवदत्ता नूनमेव जीवति । इदानीमव सा पर्प, गाढ प्रसुप्न मां प्रयोध्य ममुद्रगुहाग्निगंता । अनुमिनोम्यह यत् रुमवान् वामवदता दात्यलीरवार्तानग्यापनेन मा प्रतारितवान् ।) अनुयार-मित्र ! पलग पर सोये हुए मुझे जगाकर (वारापरता) चली गई है। पहले (वासवदत्ता) जल गई-ऐगा कहने वाले रुमण्वान् ने मुझे धोखा दिया है। On friend waking me up when I was asleep on the coucb, she went away. Rumanwan did deceive me before, when he said that she was burnt. टिप्पणी-(१) योधयित्वा--जगाकर। य+णिच् +पया । (२) पूर्वम्-गमें 'वना' इस क्रिया का विरोषण होने मे द्वितीया दः । (३) पस्मि- पहा मृतान के प्रयं मे सट् सकार हा यह मनुष्टुप् छन्द है। महामहोपाध्याय मापति शास्त्री दग लोक पे बाद और विपक की उक्ति मे पहले एक पौर एलोपाठ मानते हैं-'पदमावत्या मग वोदय विशेषमविभूषितम् । जीवापा. पन्नियरव पूर्व विशातमेव में ।' पात् पद्मायती थे मग पर तिकी बिपिमा देनार मैंने पहले ही गमा सिरा पा कि वागवदसा जीवित है,नाशि १७४ स्वप्नवासवदत्तम् 'तिलक-रचना दूसरे हाय संभव नहीं।) परन्तु यह पाठ प्रादर्श पुस्तकों में नहीं मिलता है और प्रकरण के अनुरोध से इसको वंसी भावश्यकता भी नहीं प्रतीत होती है । इसलिए हमने भी छोड़ दिया ll 'विदूषकः-अविहा! असम्भावणीअं एवं ण। प्रा उदग्रलाण- सङ्कित्तणेण तत्तोहोदि चिन्तअन्तेण सा सिविणे दिट्टा भवे [अविहा ! असम्भावनीयमेतन । आ उदफस्नानसङ्कीर्तनेन तत्रभवतीं चिन्तयता सा स्वप्ने दृष्टा भवेत् ।। विदूषफ- हाय ! यह असंमव नहीं है। हो, उदकस्नान की चर्चा होने के कारण मापने महारानी का स्मरण करते हुए स्वप्न मे उन्हें देखा होगा । Vidushaka-Alas, this is not impossible, you fell asleep as I was mentioning Ujjain and its delightful bathing places, and no doubt the King of your late queen you dreamed of her. टिप्पणी--(१) प्रविहा--यह शोकमूचक अव्यय है। (२) असम्भावनीय- मेतद् न--यह असम्भव नही है अर्थात् आपने जो कहा---'मित्र! मैने वासवदत्ता को देखा, वह मुझे जगाकर चली गई'--वह असम्भव नहीं है । (३) प्रा.--यह स्मरणार्थक अव्यय है। (४) उदकस्तानसद्धीर्तनेन-जल-स्नान के वर्णन से अर्थात् पहले जो मैने कहा था कि उज्जयिनी मे बहुत-से रमणीय स्नानागार है, उसके श्रवण से। 'राजा--एवम् मया स्वप्नो दृष्टः? राजा-ऐसा, तो मैने स्वप्न देखा है ? King-Well then it was a dream. यदि तावदयं स्वप्नो घन्यमप्रतिबोधनम् । अथायं विभ्रमो वा स्याद् विभ्रमो हस्तु मे चिरम् ॥६॥ अन्वय--यदि तावत् अयम् स्वप्नः, अप्रतिबोधनं घन्यम् प्रय अय विभ्रमो वा स्यात्, मे विभ्रमो हि चिरम् अस्तु ॥९ संस्कृत टीका-~यदि-चेत्, तावत्--वाक्यालंकारार्थमिदम्, अयम्--एषः वासवदतादर्शनरूपो विषय इत्यर्थः, स्वप्न:-मनःसङ्कल्पजन्यं स्वप्नं विमान, (तहि) मप्रतिबोधनम्-मजागरणं, धन्यं प्रशस्तम् इष्टतमम् इति यावत् । 'प्रय--पक्षान्तरे, मयं-~-वासवदत्तादर्शनरूपो विषयः, विभ्रमः-मनोभ्रान्तिः, पंचम मंक १७५ वा--पादपूरणार्यकमिदम्, स्यात्--मवेत्, (तहिं) मे-मम, विभ्रमः-वृद्धि- भ्रमः, हि-एव, चिरं--दीर्घकालम्, मस्तु-तिष्ठतु। (प्रय माव:--वासवदत्ता मया विलोकिता इत्ययं यदि स्वप्नो वर्तते तहि स एव स्वप्न: सर्वदा मे अनुवर्तताम् । प्रयवा यद्ययं मतिभ्रमो वर्तते तहि सा भ्रान्तिरेव मे भूयासें कालं यावदनुवर्तताम् 1) en अनुवाद-अगर यह स्वप्न है तो न जागना अच्छा होता पौर यदि यह मतिभ्रम हो तो मेरा (यह) मतिभ्रम चिरकाल तक बना रहे ॥६॥ टिप्पणी-(१) स्वप्नः- --स्वपू+नन् (स्वपो नन्) भदादिः परस्मैपदी। (२) अप्रतिबोधनम्---न जागना । न प्रतिवोधनम् इत्यप्रतिबोधनम् (नन् तत्पु०) । प्रति+बुध+णि+ल्युट् (मावे)। (३) धन्यम्--यहाँ धन्य का अर्थ है 'माग्यवान्' । निद्रा मे ही रहना उसके लिए (राजा के लिए) सोभाग्य की बात है क्योकि स्वप्न मे उसे अपनी प्रियतमा का दर्शन होता है ।(४, विन्नम:--चित्त का विक्षेप । दि/भ्रम्+घञ् (प्र)। 'नोदात्तोपदेशस्य मान्तस्यानाचमः' इति सूत्रेण वृद्धिनिपघः । यहाँ राजा स्वप्न या विभ्रम की अवस्था को मी चिरकाल तक बनाये रखना चाहता है। क्योकि सुखार्थी मनुष्य जिस अवस्था मे सुख पाता है, उसी अवस्था मे रहना चाहता है। वत्सराज को स्वप्न में ही वासवदत्ता के दर्शनों का सुख मिला । यदि इसे उसके मन का भ्रम माना जाय तो भी उसे अपनी प्रियतमा के देखने का सुख मिलता है। सुख को हाथ से क्यों जाने दे ? मभिज्ञानशाकुन्तल के छठवें मंक का दसवां श्लोक द्रष्टव्य है । वहाँ दुष्यन्त के विश्रम का ऐसा ही वर्णन है 'स्वप्नो नु माया न मतिभ्रमो नु तावतफलमेव पुण्यम् ।' यह मनुष्टुप् छन्द है ॥१॥ विदूषकः--भो वनस्स ! एदस्सि णारे अवन्तिसुन्दरी णाम जविखणी 'पडिवसदि । सा तुए दिवा भवे। भो! वयस्य ! एतस्मिन् नगरेऽवन्तिसुन्दरी नाम यक्षिणी प्रतियसति । सा त्वया दृष्टी भवेत् ।। विदूपर है मित्र! इस नगर मे भवन्तिमुन्दरी नामक एक यक्षिणी रहती है। उसे मापने देखा होगा। Vidushaka-On friend, a Yakshini oamed Avanti Sundari lives berc, You might have seen her. 1 न क्लिष्टं - १७६ स्वप्नवासवदत्तम् टिप्पणी-(१) नाम--यह भव्यय है। (२) यक्षिणी-अप्सराविशप जिसका सम्बन्ध मत्यलोकदासियो से कहा जाता है । यक्षः पूजा प्रस्ति प्रस्याः इति विग्रह यक्ष+इनि-डोप् ()। राजा-नन, स्वप्नस्यान्ते विबुद्धेन नेत्रविप्रोपिताजनम् । चारित्रमपि रक्षन्त्या दृष्टं दीर्घालफ मुखम् ।।१०।। अन्वय-स्वप्नस्य अन्ते विबुद्धेन (मया) चारित्रम् मपि रक्षन्त्याः (वागव- दतायाः) नेत्रविप्रोपिताजनम् दीलकम् मखम् दृष्टम् ॥१०॥ संस्कृत टोका--स्वप्नस्य---स्वप्नावस्थायाः, मन्ते-समाप्तो, विबुद्धेन-- जागरितेन (मया) चारित्रम्-सच्चरित्रताम् सतीत्वमिति यावत्, भपिजीवितेन सह इति भावः, रक्षन्त्याः--पालन्त्याः, (वासवदत्तायाः) नेत्रविप्रोपिताज- नम्-नेत्राभ्यां विप्रोपित प्रवासं गतं दूरीमूतमिति यावत् अञ्जनं कज्जलं यस्मिन् तत् तथामतं, दीर्घालक-दीर्घाः लम्बमानाः मलका: चूर्णकुन्तलाः यस्मिन् तत् तादर्श, मुखम्--माननं, दृष्टम्-मवलोकितम् (भयं माव:-यदा अहं स्वप्नात् प्रबुद्धः तदा ताम् अपश्यम् । तस्या नेत्रे मजनशून्ये मास्ताम् । मुखे च दीर्घाः केशाः लम्बमाना मासन् । मतोऽहं मन्ये यत् सा न केवलं जीवति परञ्च स्वचरित्रमपि रक्षति । तथा च नेय त्वत्कथिता यक्षिणी इति मे स्थिरो निश्चयः1) ॥१०॥ अनुयाद--राजा-नही, नही, स्वप्न के पन्त में जागने पर मैने चरित्र की रक्षा करती हुई वासवदत्ता का विना काजल की प्रोखों वाला और लटके हुए बालो घाला मुख देखा ॥१०॥ King-No, no. When I woke up after the dream, I saw her face with eyes devoid of collyrium end the long bair of hers still guarding her character. टिप्पणी-(१) विबुद्धेनजागे हुए । विबुध्+वत(त) (कर्तरि) । यहाँ विशेष्य 'मया' अप्रकट है, फिर भी विशेषणसे काम चल जाता है-'विशेषणमात्र- प्रयोगो विशेष्यप्रतिपतो'। (२) चारित्रम्--चरित्रमेव चारित्रम्, चरित्र+मण (स्वायें) । (३) दीर्घालकम्--जिस पर धुंघराले बाल लटके हुए हों अर्थात् बिना संवारे हुए हों । क्योकि पति-वियोग-काल में शृङ्गार प्रादि करना वर्जित है- 'क्रीडां शरीरसंस्कारं समाजोत्सवदर्शनम् । हास्यं परगृहे यानं त्यजेत्प्रोषित- मर्तृका ॥' अलक-जुल्फ, धुंघराले बाल। 'अलकाश्चूर्णकुन्तलाः' इत्यमरः ।

पंचम अंक १७७ (४) नेत्रविप्रोपिताजनम्-बिना काजल की प्रांखों वाला। नेत्राम्या विप्रोपितम् (तृ. तत्पु०) नेत्रविप्रोपितम् अञ्जनम् यस्मिन् तत् । (बहुव्रीहि) । यह अनुष्टुप् छन्द है ॥१०॥ प्रपि च वयस्य ! पश्य पश्य, योऽयं सन्त्रस्तपा देव्या तया बाहुनिपीडितः । स्वप्नेऽप्युत्पन्नसंस्पर्शी रोमहर्षे न मुञ्चति ॥११॥ अन्वय-सन्त्रस्तया तया देव्या यः प्रयम् बाहुः निपीडितः स्वप्ने अपि उत्पन्नसस्पर्शः रोमहर्षम् न मुञ्चति ॥११॥ सस्कृत टीका--सन्त्रस्तया--मीतया, तया देव्या-वासवदत्तया, योऽयं-- पुरो दृश्यमानः, बाहः-मुजः, निपीडितः-शनैः गृहीतः, (स मुजः) स्वप्नेऽपि --स्वप्नावस्थायामपि, उत्पन्नसंस्पर्श:--उत्पन्नः सञ्जातः संस्पर्शः सम्पर्को पत्र तादृशः, रोमहर्ष-रोमाञ्च, न मुञ्चति--न त्यजति । (प्रय माव:---यदा शयानस्य मम बाहुं वासवदत्ता अस्पृशत् तदा तस्मिन् रोमाञ्चः सञ्जातः । इदानीमपि स मुजः रोमाञ्चित एव । प्रत्यक्षं पश्य इमम् । अतो मन्ये यत् सा वासवदत्तव न तु यक्षिणी ।।११।। अनुवाद--ौर मी मित्र ! देखो देखो, डरती हुई उस देवी ने जो इस बाह को पकड़ा सो निद्रावस्था में भी स्पर्श-सुख के कारण इसमे रोमाच हो माया, जो प्रमी तक बना हुआ है ॥११॥ And again see friend. This hand that was held fast by the queen in fear, does not give up the joy of horripilation leven though produced in a dream. टिप्पणी-(१) सन्त्रस्तपा-मयमीत, सशंकित । सम्+त्रस्+क्त (त) (कतरि) टाप, (मा) तया । वासवदत्ता भयमीत इसलिए थी कि कही राजा जाग न जायें । (२)निपीडितः-धीरे या हलके हाथो पकड़ा हुप्रा । निर/ पीड्+णिच् (स्वा)+क्त (त) । (३) संस्पर्शः-सम+स्पृश्+घन् (प्र)। (४) रोमहर्षम-रोम्णा हर्षः, तम् । रोमो का पुलकित हो जाना। जमे यहाँ वासवदत्ता के कर-स्पर्श से उदयन को रोमाच हुआ है उसी तरह उत्तररामचरित मे सीता के हस्तस्पर्श से राम के पुलकित होने का वर्णन मिलता है। रोमाच को शृंगार रस के पाठ सात्त्विक मावो मे से अन्यतम माना गया है (५)मञ्चति- छोड़ता है । मुच्+लट् । प्र० पु० ए०२०। यह अनुष्टुप छन्द है ॥११॥ स्वाद०-१७ १७८ स्वप्नवासवदत्तम् विदूषकः--मा दाणि भवं प्रणत्यं चिन्तिम । एदु एदु भवं । चउस्सालं पविसामो । मेदानी भवाननयं चिन्तयित्वा । एत्वेतु भवान् । चतुःशालं प्रविशामः।] विदूषक--मब भाप व्यर्थ की बात मत सोचिये । माइये, आप भाइये । चौमाल मे चलें। Vidashaka-Now enough of thinking of useless things. Come, come on we enter the quadrangle. (प्रविश्य) काञ्चुकीयः--जयत्वार्यपुत्रः । अस्माकं महाराजो दर्शको भवन्तमाह-एष खलु भवतोऽमात्यो रुमण्वान् महता बलसमुदा- येनोपयातः खल्वारुणिमभिधातयितुम् । तथा हस्त्यश्वरथपदातीनि मामकानि विजयाङ्गानि सन्नद्वानि । तदुत्तिष्ठतु भवान् । अपि च-- संस्कृत टीका--भार्यपुत्रः--श्रीमान्, जयतु--विजयताम् । अस्माक महा- राज:-मगधेश्वरः, दर्शकः, मवन्त--श्रीमन्तम्, माह-कथयति, (यत्। एप खलु--अयं हि, मवतः--तव, अमात्य:---मन्त्री, रुमण्वान्, महता--विशालेन, बलसमुदायेन--सैन्यसम्हेन, (सह) उपयातः, समुपस्थितः, भारुणिम्- वत्सराजस्य शत्रुम्, अभिघातयितुम्-नाशयितुम् । तथा तमेवार्थ साधयितुं, मामकानि-मदीयानि, हस्त्यश्वरथपदातीनि-हस्तिनः गजाः अश्वाः घोटकाः रथाः पदातयश्च पादचारिणश्च येषु सन्ति तादृशानि, विजयाङ्गानि--विजय: साधनोभूतानि संन्यानि, सन्नद्धानि-सज्जितानि (सन्ति) । तत्--तस्मात्, भवान्-श्रीमान्, उत्तिष्ठतु--विजययात्रार्थम् उद्यतो भवतु । अपि च-अन्यच्च, अनुवाद--(प्रवेश करके) कंचुकी-महाराज विजयी हों। हमारे महाराज दर्शक ने आपसे कहा है कि यह पापका मन्त्री रुमण्वान् भारी सेना के समूह के साथ (पाप से) पारुणि का वध कराने के लिए आ पहुंचा है। और मेरी विजय की सेनायें--हाथी, घोड़े, रय और पंदल--तैयार हैं। इसलिए प्राप उठिये । और मी-- Chamberlain ---Victory to his Majesty. Our gicat King Darshak says to your Majesty. Here is your Minister Rumanvan with a great gathering of forces to attack Arudi. My own divisions for victory-elephants, horses, chariots, and footsoldiers are ready. Therefore arise your honour. and again.

पंचम अंक १७६ टिप्पणी-(१) मा चिन्तयित्वा-यहां माड के योग मे क्त्वा प्रत्यय चिन्त्य है। इस नाटक मे ऐसे प्रयोग कई जगह पाये हैं। यदि इन प्रयोगों को पाणिनि- सम्मत बनाना ही हो तो 'अलखल्योःप्रतिषयोः प्राचा क्त्वा' मूत्र में 'अलम्' और 'सलु' को उपलक्षणार्यक मानकर क्त्वा प्रत्यय कीजिये ।(२) प्रार्यपुत्रः- प्रार्यस्य पुरः पष्ठी तत्पुरुष वा प्रार्यश्चासौ पुत्रश्च कर्मधारय । (३) एष खल भवतः- इम वाक्य मे दोनों खलु शब्द वाक्यालकारार्थ हैं। (४) अभियातयितुम् -- मरवाने के लिए। अभि/ हनु+णिच्+तुमुन् 'हनस्तोचिण्णलोः' इति सूत्रेण तकारान्तादेशः, 'हो हन्तेः- इति सूत्रेण हस्य षः । (५) हस्त्यश्यरथपदातीनि- हस्तिनश्च प्रवाश्च रथारच तेषा समाहारः हस्यश्वरयम् समाहार द्वन्द्व समास, हस्त्यश्वरथयुक्ताः पदातयः येषु तानि बहुव्रीहि समास । 'विजयाङ्गानि' का विशेषण है । पदाति--पैदल । पादाभ्याम् अतति गच्छति इति पदातिः, पाद/ अत्+इण 'अज्यतिम्या पादे च' इत्यनेन; ततः पादस्य पदाज्यातिगोपहनेषु' इति सूत्रेण पादस्य पदादेशः । (६) मामकानि-मम इमानि इति विग्रहे अस्मद् +अण् 'तबकममकावेकवचने' इति सूत्रेय अस्मदो ममकादेशः ।(७) विजयाङ्गानि- विजयकारकाणि अङ्गानि--सैन्यानि इति विजयाङ्गानि मध्यमपदलीपी समास । (८) सन्नद्धानि--सज्जित, तैयार । सम्/नह+क्त (त)। भिन्नास्ते रिपवो भवद्गुणरताः पौरा. समाश्वासिताः पाणी यापि भवत्प्रयाणसमये तस्या विधानं कृतम् । यद्यत् साध्यमरिप्रमाथजनन तत्तन्मयानुष्ठित तीर्णा चापि दलनदी त्रिपथगा वत्साश्च हस्ते तव ॥१२॥ अन्वय-ते रिपवः मिन्नाः, मवद्गुणरताः पौरा. समाश्वासिताः अपि मवत्प्रयाणसमये या पार्णी तस्याः विधान कृतम् । अरिप्रमाथजनन यत् यत् साध्यम् तत् तत् मया अनुष्ठितम् । अपि च वलः त्रिपथगा नदी तीर्णा, चक्त्साः तव हस्ते ।।१२।। संस्कृत-टोका--ते--तद, रिपक:--राव, मिन्ना:- भेद प्रापिता, मवद्- गुणरता:-मवतः श्रीमत. गुणेषु दयादाक्षिण्यादिषु रताः अनुरवता:, पौरा:-- नागरिका: प्रजा इत्यर्य, समाश्वामिता---पाश्वासनं प्रापिताः, अपि-तया, भवत्प्रयाणसमये--मददीयविजययात्रावसरे, या पार्णी-यत् संन्यपृष्ठ, तस्या- पारा, विधानं-रचना, तम्-सम्पादितम् । अरिप्रमायजनन- अरीणा एकूणा प्रमाया विध्वंस तस्य जननम् उत्पादक , यत्, यत् कार्य, सायं करणी, १८० स्वप्नवासवदत्तम् तत् तत् कार्य, मया-दर्शकेन, अनुष्ठित-साधितम् । पपि च--मन्यच्च, बल:--सैन्यैः, विषयगा नदी-गङ्गा नाम सरित्, ती लविता। च-प्रतः, वत्सा:-वत्सराज्यं, तव भवतः, हस्ते-~-करे (स्थिताः सन्ति ।) (अयं भाव.-- मया भवतः शत्रवः कूटनीत्या परस्परं विभक्ताः कृताः। मवद्गुणानुरक्ताः प्रजाः 'शीघ्रं वः नृपः शत्रून् पराजित्य प्रागमिष्यति' इति कथनेन समाश्वासिताः । अपि च भवतो यात्रावसरे पृष्ठानुतिन्याः सेनाया अपि सम्यक् प्रवन्यः कृतः । कि बहुना शत्रुविध्वंसनोचितं मकलमपि संविधानकमारचितम् । सेनापि गङ्गानदी तीर्वा अग्रे गता। इत्यञ्च वत्सराज्यं भवतो हस्तगतं वर्तते इत्यवगम्यताम् )॥१२॥ अनुवाद-प्रापके शत्रुनो मे फूट डाल दी गयी है। प्रापके गुणों पर रीझे हुए नगरवासियों को पाश्वासन दिला दिया गया है और आपकी विजय-यात्रा के समय पीछे चलने वाली सेना का भी प्रबन्ध कर दिया है। (इस प्रकार)शत्रु का नाश करने वाला जो-जो काम होना चाहिए, वह सब मैने कर लिया है। यहाँ तक कि सेनायें गङ्गा नदी पार कर चुकी है। अब वत्सदेश आपके हाथ में ही है (ऐसा समझिये) ॥१२॥ Your enemies are split, the citizen attached to your virtues are cheered up. The protection of the rear that would march at the time of your departure, is arranged, what ever has to be accomplished for bringing about the destruction of the cocmy has been all done by me. The river Ganga (Tripathaga) is also crossed by the forces, and the land of the vatsas is in your hands. टिप्पणी--(१) भिन्ना:--एक दूसरे से अलग कर दिये गए । यहाँ अन्त- वित प्यर्थ है । शत्रुप्रो मे फूट डालना यह एक नीति है। (२)भवद्गुणरताः-- मापके गुणों पर अनुरक्त । भवतः गुणा.(प० तत्पु०)तेषु रताः (स० तत्पु०)। 'पोरा:' का विशेषण है । (३) समाश्वासिता:-जिन्हें आश्वासन या सान्त्वना दी गई हो। सम्मा/श्वस्+णिच्+क्त (त)। (४) पौरा:--पुरवासी लोग । पुरे मवा: इति पौराः, पुर+पण 'तत्र भवः' इति सूत्रेण । जव शत्रुनो में फूट हो तथा अपनी प्रजा के लोग राजमक्त हो तब शत्रुनो पर आक्रमण करना चाहिए। कामन्दक-नीतिशास्त्र इस मत का समर्थन करता है, यथा-- "स्फीतं पदानुरक्तं च भवेत्प्रवृतमण्डलम् । परस्य विपरीतं च तदा विग्रहमाचरेत्।।" (५)पा!---सेना का पृष्ठभाग । 'पारिणः स्यादुन्मदस्त्रियाम्' इस कोश के पंचम अंक प्रमाण से यह शब्द इकारान्त स्त्रीलिंग है । किन्तु 'कृतिकारादक्तिन:' से झोप करने पर रात्रिः, रात्री:' की तरह 'पाणिः,पाणी' दोनों रूप चलते हैं। कामन्दक- नीति के मनुमार--'पुरश्च पश्चाच्च यदा समयः तदामियायान्महते फनाय । पुरः प्रसपंनविशुद्धपृष्ठः प्राप्नोति तो पलु पाणिमेदम् ॥' (६) भवत्प्रयाण- समपे-मापक प्रयाण के समय । भवतः प्रयाणम् तस्य समयः तस्मिन् । (५० तत्पु०) अधिकरण मे सप्तमी हुई है । प्रयाग--मन्य-प्रमियान । (७) यत् यत्- तप्त---जो जो “मो सो वीप्मापां द्विरुक्ति: । 'नित्यवीप्सयोः' द्वित्वम् (0) परिप्रमायमननम्-शत्रुओं को विघ्वस करने वाले । प्ररेः प्रमायः तस्य जननम् (१० तत्पु०)। प्र+मय +धन् । जननम्---जन्+णिच् + ल्युट् । (६) ग्रिपणा- गगा । 'मागीरपी विपषगा प्रिस्रोता भीष्ममूरपि' इत्यमरः । त्रयाणा स्वर्ग- मत्यंगतालात्मना पयां मार्गाणां समाहार: प्रिपयम् द्विगुसमास, तेन गच्छति मा मा त्रिपथगा, त्रिपथ गम् +8-टाप । (१०)यरमा:- चत्म देश । 'जनपदवाचिनः सदाः भूम्नि प्रमुरन्ते' इस नियम के अनुसार यही बहुवचनान्न प्रयोग गुर है। वामाना निवामो जनपक्ष: वत्माः, वत्स+मण 'तम निवामः इत्यनेन ततः 'जनपदे लए' इति भूत्रेण मणो लप. 'लुपि युक्तपद्व्यक्तिवचने' इति मूत्रेण प्रहनियत् लिगवचनमाव । यह गाम-विक्रीडित घर है ।।१२।। राजा-(उत्याय) वाढम् । प्रयमिदानीम्, राजा--(उठकर) बहुत ठीक । अभी में- The King-(Rising) very well, row this. उपत्य नागेन्द्रतुरङ्गती तमाणि दारुणकर्मदक्षम् । विकोणवाणोप्रतरङ्गभङ्ग महायाभे युपि नाशयामि ॥१३॥ (निकान्ताः सर्वे ।) इति पञ्चमोऽरकः । पवर-उमेरय नागेन्दतुरङ्गीन विकीगानोप्रवरान महापंपाने अघि सागरमंदाम् सम् पाणिम् नागरामि ॥१३॥ संग टोn-उप--पमिगर प्राकार इति यावर, नागेन्द्रनुरणी नागेन्द्राः हस्तिष्टा: तुरताः प्रयाप त: ठी, नरगोषिपोर, शिरीनंगपोतरमन--सोर्गा प्रतिमा: ये बागा: शराः त एव उपाः भानरा: तरजानाम् अनि मनाए म पम्मित् तपामा महान दाने-महादाय महागागरम्रपामा पामा पार पामुने, पि-मामे, दानासामागरमंगु मरंक मा निगुनम् -गिलम - -:

१८२ स्वप्नवासवदतम् मारुणिम्--एतनामकशत्रुम्, नाशयामि हन्मि । (प्रय मावः-प्रमिदानीमेव गजवाजिसञ्चारसले विकीर्णबाणरूपमयानकरतरङ्गलहरीव्याप्ते महासागरोपमे संग्रामे दुष्टमारुणिम् माक्रम्य समूलं विध्वंसयामि ।) ॥१३॥ मनुवाद-माक्रमण करके विशाल हाथियों एवं घोड़ों से पार किए हुए पोर लाए हुए बाणो रूपी भयंकर लहरों वाले महासागर के समान युद्ध मे घोर कर्म करने मे पट उस मारुणि को मार डालता हूँ ॥१३॥ (सब का प्रस्थान) पाचवा पक समाप्त । Mecting that Aruni, clever in horrible deeps. I shall destroy him in the great ocean of the battle-field, where elephants and horses stem the great tide where singog waves of cruel arrows break. (Exeunt omnes End of Act V) टिप्पणी--(२) उपेत्य-~समीर जाकर या चढाई करके । उप/+ क्त्वा-त्यप् । (२) नागेन्द्रतुरङ्गतोणें-जहां बड़े-बड़े हाथी और घोड़े तेर रहे हों अर्थात् घूम रहे हों। नागा इन्द्राः इव इति नागेन्द्राः उपमित समास, नागेन्द्राश्च तुरङ्गाश्च इति नागेन्द्रतुरङ्गाः इतरेतरद्वन्द्व, नागेन्द्रतुरङ्गः तीर्णः तृतीया तत्पुरुष, तस्मिन् । (३) दारुणकमदक्षम्-घोर कर्म करने में पटु । 'मारुणिम्' का विशेषण है । दारुणानि च तानि कर्माणि (कर्मघा०) तेषु दक्षः तम् । (स० तत्पु) । (४)विकीर्णबाणोप्रतरङ्गभङ्ग-जहाँ वाणप्रक्षेपरूपी भयकर लहरें उठ रही हो । विकीर्णाः प्रक्षिप्ताः बाणाः विकीर्णवाणाः कर्मधारय समास, उना. तरङ्गाः उग्रतरङ्गाः कर्मधारय, उग्रतरङ्गाणा मङ्गाः उपतरङ्गभङ्गाः ५००, विकीर्णबाणा: उपतरङ्गमगाः इव यत्र सः बहुवीहि समास, तस्मिन् । अथवा बाणाः उग्रतरङ्गभङ्गा इव इति बाणोग्रतरङ्गमगाः उपमित समास, विकोणा- व्याप्ताः बाणोग्रतरङ्गमगाः यत्र सः बहुव्रीहिसमास । (५)महार्णया महासमुद्र के समान भासमान । महाश्चासौ मर्णवः महार्णवः कर्मधारय, मान्महतः समानाधि- करणजातीययोः' सूत्रेण महतः तकारस्य भात्वम्, महार्णवस्य मामा इव' मामा यस्य स महार्णवामः, बहुव्रीहि, तस्मिन् । (६) युषि-युद्ध में /युध्+श्विप् 'सम्पदादिभ्यः क्विप्' इति वातिकेन । यहाँ स्त्रियाम्' इस अधिकार में विप प्रत्यय होने से तथा 'समित्याजिसमिद् युधः' इस को प्रमाण से युध् शब्द के स्त्रीलिंग होने पर भी भास ने इसका प्रयोग पुलिंग मे किया है। इससे सिद्ध होता है कि या तो भास के समय इसका प्रयोग पुलिंग में भी होता रहा होगा या पंचम प्रक १८३ 'नरंकुशाः कवयः' का अनुसरण उन्होने किया है (७)नाशयामि/नर+णिच् +लट--मिप उ० पु० ए० व०। यहाँ 'वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा' सूत्र से भविष्यत् के पर्थ में लट्लकार हुमा है । इस श्लोक में युद्ध की उपमा महासमुद्र से दी गई है। जैसे महासमुद्र में जल-हस्ती और जल-घोटक इधर-उघर धूमते रहते हैं उसी तरह इस ममरांगण में भी हाथी-घोडे घूम रहे हैं । उधर महासागर उत्ताल तरंगों से उद्वेलित होता रहता है तो समर-क्षेत्र मी बाणवर्षण को लहरों से तरगित हो रहा है । इसमें उपमा अलंकार है मोर उपेन्द्रवज्रा छंद है ।।१३।।

श्रथ पष्ठोऽङ्कः (Act VI) (उज्जयिनी के राजा और रानी द्वारा प्रेपित दूत निजी घात्री के साथ महाराज उदयन की विजय पर बधाई देने पाया भौर विवाह के समय वासवदत्ता के साथ लिये गये चित्र को उन्हें मेंट किया। पावती ने देखा कि चित्रस्थ वासवदत्ता ग्राह्मणी पावन्तिका से मिलती-जुलती है। उसी समय यौगन्धरायण धरोहर रूप अपनी। बहिन को वापिस लेने भाता है। धात्री वासवदत्ता को पहचान जाती है और रहस्योद्घाटन हो जाता है। इस प्रकार पति-पत्नी का सानन्द मिलन होता है। योगन्धरायण ने यह योजना राजहित मे बनाई थी। महासेन को यह शुम सवाद सुनाने के लिए राजा सभी के साथ उज्जयिनी के लिए.प्रस्थान करते हैं । ) (ततः प्रविशति काञ्चुकीयः ।) काञ्चुकीयः-क इह भोः ? काञ्चनतोरणद्वारमशून्यं कुरुते ? (तदनन्तर कचुकी का प्रवेश ।) कचुकी--अजी! यहाँ सोने के बाहर वाले फाटक पर कौन है ? (Enter a Chamberlain) Chanderlain-Who is here please ? Who is occupying the jewelled archgate ? (प्रविश्य) प्रतीहारी--अय्य ! अहं विजया । किं करीप्रदु ? [प्रार्य ! अहं विजया । किं क्रियताम् ? (प्रवेश करके) प्रतीहारी----पाय ! मै विजया हूँ। क्या प्राज्ञा है ? Door-keeper--(Eatering) Sir, I Vijaya. What is to be done ? काञ्चुकीयः-भवति ! निवेद्यतां निवेद्यतां वत्सराज्यलाभप्रवृद्धो- दयायोदयनाय-एप खलु महासेनस्य सकाशार रेभ्यसगोत्रः काञ्चुकीयःप्राप्तः, तत्रभवत्या चाङ्गारवत्या प्रेषितार्या वसुन्धरा नाम वासवदत्ताधात्री च प्रतीहारमुपस्थिताविति । संस्कृत टीका-मवति !--कल्याणि !, निवेद्या-सच्यताम्, वत्मराम्य- लामप्रवृद्धोदयाय--वत्सानाम् एतनामकाना देशानां राज्यस्य लामैन--पुनः .

पष्ठ भक १८५ प्राप्त्या प्रवृतः वृद्धि गतः उदयः सन्नतिः पस्य तस्म, उदयनाय, एष:--महम्, खल-निश्चयेन, महासेनस्य-उज्जयिनीपतेः, सकाशात्--समीपात, रम्य. मगोत्र:-रम्पगोत्रोत्पत्तः, काञ्चुकीयः- कञ्चकी, प्राप्त:-उपस्थितः, तत्र मवत्या-मान्यया, मङ्गारवत्या-महासेनपन्या,प्रेषिता-प्रेरिता, पार्या, वसुन्धरा नाम-वसुन्धरेति नाम्नी, वासवदत्ताधात्री च-वासवदत्ताया उपमाता च, (ो प्रावाम्) प्रतीहारम्-~-द्वारदेशम्, उपस्थिती-समुपागतो (स्व:) इति । अनुवाद--कंचुकी-मद्रे ! वत्सदेश के राज्य पा जाने से विशेष उन्नति को प्राप्त हुए उदयन से निवेदन कीजिये कि महासेन के पास से माया हुमा रम्यगोत्रोत्पन्न (अथवा रम्य नाम का) कंचुकी पोर माननीया भंगारवती को भेजी हुई श्रीमती पन्धरा नाम की वासवदत्ता को घाय दोनो ही दरवाजे पर माये हुए हैं। " yan, whose rise is advanced rying, "This Chamberlain, a here from Mahasena, of Vasavadatta, sent by ber ladyship, Augarvati. Both are waiting at the gate. टिप्पणी-(१) काञ्चनतोरणद्वारम्-सोने के बने हुए बाहरी फाटक पर। तोरणमेव द्वारम् तोरणद्वारम् मयूरम्पमकादित्वात् समास, माननिर्मित तोरणद्वारम् कामचनतोरणद्वारम् सम्पमरदलोपो ममास । (२) प्रतयं एदले- मनाय पा सोमित कर रहा है। (३) प्रतीहारीद्वारपास का काम करने वाली, स्त्री, दारपालिका | प्रतिVE+शन् (2), 'उपसर्गस्य पश्यमनुष्ये बहुमम्' इति मून गस्य दोधः-प्रतीहार:भारम् 'स्त्री वारंवार प्रतीहारः' इत्यमरः । प्रतीहारः पति पर पति प्रतीहारतद्वारपाल, प्रतीहार+म पनं पादिन्यात, स्त्रियाम् प्रतीहार+सोप-प्रतीहारी । (४) नियेताम् विवेचताम-सीप्रसा मूलित करने के लिए दो मार उभारण हुमा है। निविद+पिए+सोद (मंपि। यस्। (५) परसराम्पमामासोराय-यामाना रामम् २० स०, तम्ब मामः ५०० सेन प्रबरकत, मगराग्यसामप्रथम उदयः यस्य सः म.०, सम्म । यहाँ नागर कपूकी कमंहगे मात्र उत्पन यमराम की प्राणिको सूचना देकर परमा वर्णन वा गरे है । रणहि नाटक में मर का वर्णन करना निपिर है। रासानं प पटे. प्रामाणि न मिक्षिणेत्। का (६) रसगोत्र:- पोर में उत्पन्न मा नाम पनि। (७)-राम समान नाहगो नाम पार गतायः। यहाँ विमा स्वप्नवासदत्तम् रात्रिनामि नामगोरूपस्थानवर्णवयोवचनबन्धुप' सूत्र से समान को स आदेश हुआ। धर्मशास्त्र की प्राज्ञा है कि गोत्रनाम के मागे 'स' का प्रयोग अवश्य करना चाहिए -'सकारेण तु वक्तव्यं गोत्रं सर्वत्र धीमता। सकार: कुतुपो ज्ञेयस्तस्माद्यत्नेन तं वदेत् ।" (८) प्रेषिता-मेजी हुई। प्र/इ+णि+क्त (त)-टाप् (मा)। प्रतीहारी--प्रय्य ! अदेसकालो पडिहारस्स । [आर्य ! अदेशकालः प्रतीहारस्य । प्रतीहारी--पाय ! द्वारपाल का स्थान और समय नहीं है। अर्थात् इस समय द्वारपाल के लिए राजा से कुछ कहने-सुनने का अवसार नही है)। Door-keeper-Sir, the occaison is not suitable for me to go before the King. काञ्चुकीयः--कथमदेशकालो नाम ? कंचुकी---क्यों स्थान और समय (अर्थात् अवसर) नहीं है । Chamberlain-No suitable. And why ? प्रतीहारी–सुगादु अय्यो। अज्ज भट्टिणो सुय्यामुहप्पासादगदेण फेण वि वीणा वादिदा । तं च सुणि भट्टिणा भणिअं--घोसवदीए सदो विअ सुणीदि ति। [शृणोत्वार्यः । अद्य भर्तुः सूर्यामुख. प्रासादगतेन केनापि वीणा वादिता। तां च श्रुत्वा भी भणितम्-- घोषवत्याः शब्द इव श्रूयत इति ।] प्रतीहारी--प्रार्य सुने--माज स्वामी के मूर्यामुख नामक महल में जाकर किसी ने बीणा बजाई । उसे सुनकर स्वामी ने कहा कि घोषवती का-सा स्वर सुनाई दे रहा है। टिप्पणी--(१) प्रदेशकालः प्रतीहारस्य-प्रतीहार-द्वारपाल । 'प्रतीहारो द्वारपालः' इत्यमरः । मदेशकाल -देशसहितः कालो देशकालः मध्यमपदलोपी समास, भप्रशस्तः मयुक्तः वा देशकालः इति प्रदेशकाल: नज् समास । राजा से निवेदन करने के लिए द्वासाल के उपस्थित होने योग्य यह समय और स्थान नहीं है । (२) सुर्या मुखप्रासादगतेन--सूर्यामुख नामक प्रासाद मे गये हुए अथवा सूर्या नवोढा पद्मावती के मुख-प्रमुख प्रासाद-महल में गये हुए। श्रीमदभागवत के दशमस्कन्ध के प्रथमाध्याय के 'देवक्या सूर्यया सार्धम्' इस लोक का ।

पष्ठ अंक १८७. प्रर्य करते हुए श्रीधर स्वामी ने सूर्या शब्द को व्याख्या नवोढा की है । (३) घोप-- घरया:--घोपवती नामक वीणा का | घोषःप्रशस्त: घोषः शब्दः अस्ति प्रम्या: इत्यर्थे घोष+मतुप्, मस्य यः, डीप्-धोपवती, तस्याः । कहते हैं कि उदयन को यह घोपवती वीणा वामुकि के माई वमुनेमि ने दी थी । यह ऐन्द्रजालिक वीणा थी। इसके शब्द से हाथी वशीभूत हो जाता था। उदयन ने अपनी प्रियतमा वामयदत्ता को यह वीणा दे दी थी । वासवदत्ता की नाटकीय मृत्यु के पश्चात् यह वीणा भी रहस्यमय ढग से गायब हो गई थी । अब पुनः प्रकट हुई । राजा उमके स्वर को पहचान जाता है और बड़े प्रेम से प्राणप्रिया वासवदत्ता का स्मरण करने लगता है। काञ्चुकीयः --ततस्ततः ? चुकी:-फिर क्या हुमा? Chamberlain-Well, then ? प्रतिहारी-तदो तहि गच्छिम पुन्छिदो-कुदो इमाए वीणाए पागमो।' तेण मणि-प्रोहि णम्मदातोरे फुच्चगुम्मलागा दिछ । जइ प्पोप्रणं इमाए, उवणीप्रदु मट्टिणो ति । तं च उयणीदं अ करिम मोहं गदो भट्टा। तदो मोहप्पच्चागदेण यप्फपय्याउलेण मुहेण भट्टिणा भणि विठ्ठासि घोसवदि !साहन हिस्सदिति । अग्य ! ईदिसो प्रणयसरी। कहं गिवदेमि ? [ततस्तर गत्या पट:-बुतोऽस्या वीणाया मागम इति । तेन भणितम्-अस्माभिनंमंदातोरे चंगुल्मलग्ना दृष्टा । यदि प्रपोजन- मनया, उपनीयतां भत्र इति । तां चोपनीतामढ़ें फुत्या मोहं गतो भर्ता । ततो मोहप्रत्यागतेन वाप्पपर्याकुलेन मुझेन भर्ना भगितम्- वृष्टासि पोपयति । सा तलु न दृश्यत इति । प्राय ! ईदृशोऽ- नवसरः । कयं निवेदयामि ?] 1 १८८ स्वप्नवासवदत्तम् सक्ता, दृष्टा--प्रवलोकिता। यदि--चेत्, (श्रीमतः) अनया--घोपवत्या प्रयोजनम्-कार्यम्, (तहि मस्मामिः इयम्) मत्र--स्वामिने श्रीमते इति यावत्, उपनीयताम्--समर्प्यताम् । उपनीता-समपितां, तां--वीणाम्, प्रङ्के कृत्वा-- उत्संगे संस्थाप्य, भर्ता-स्वामी, मोहं गतः--मूच्छों प्राप्तः । ततः---पश्चात्, मोहप्रत्यागतेन--मोहात्प्रतिनिवृत्तेन, वाष्पपर्याकुलेन-मधुमलिनेन, मुखेन-- चदनेन, म;--स्वामिना, मणितम्-उवम् घोषवति !, (त्व) दृष्टामि-- अवलोकितासि, (परं) सा--वासवदत्ता, न दृश्यते--न विलोक्यते । मार्य ! श्रीमन् !, ईदृशः-पूर्वोक्तप्रकारः, अनवसर:--प्रयोग्यः समयः निवेदनस्येति शेषः । कथं-केन प्रकारेण, निवेदयामि-~-सूचयामि भवतः सन्देशमापित- मिति शेषः । अनुवाद--प्रतीहारी 1--तब वहां जाकर (उससे) पूछा कि यह वीणा कहाँ से मिली है । उसने कहा--हमने नर्मदा के किनारे कुशाओं की झाड़ी मे उलझी हुई इसे पाया । यदि इसकी आवश्यकता हो तो महाराज को यह मेंट दे दूं समर्पित की हुई उस वीणा को गोद में लेकर स्वामी मूच्छित हो गये। फिर सचेत होने पर प्रासुत्रों से व्याप्त मुख से स्वामी ने कहा--'घोपवती' ! तुम तो मिल गई हो परन्तु वह दिखाई नहीं देती।' महोदय ! इस प्रकार उचित अवसर नहीं है। कैसे निवेदन करूं? Then having gone there he asked, “How did you get this lute 7" He said. "I found it in a clump of jungle grass on the banks of Narbada. If there is any use for it, be pleased, sire, to accept it." The king took it and elasped it to his breast and swooped away. Then recovering from the swoon and with the face flooded with tears, the lord said, "you are seen Ghoshavati; sbe however is not seen" Sit, thus the time is improper. How can I usher you ? टिप्पणी-(१) कूर्चगुल्मलग्ना--कूर्चाना गुल्माः कूर्चगुल्माः ष० त०, तेषु लग्ना कूर्चगुल्मलग्ना म० त० । कूच कुश । 'कू!ऽस्त्री श्मश्रुपीठयोः, भ्रूमध्ये कत्थने दर्मे' इति कोशः । (२) अनया--यहाँ फल को मी हेतु मानकर हेतु में तृतीया हुई। (३) मोहप्रत्यागतेन-होश में माने पर । (४) बाष्पपर्याकुलेन- आसुप्रो से मरे हुए बाष्पैः पर्याकुलम् तृतीया तत्पुरुष तेन । काञ्चुकीयः-भवति ! निवेद्यताम् । इदमपि तदाश्रयमेव ।

एष्ठ प्रक
कंचुकी-महोदये ! निवेदन कर दीजिये। यह भी उसी से संबंध रखता है ।
Chamberlain-Lady, please inform this also has reference to it,
प्रतीहारी--अय्य ! इअंणिवेदेमि ! एसो भट्टा सुय्यामुहप्पासादादो'
ओदरइ । ता इह एल्ब णिवेदइरस । [प्रार्य ! इयं निवेदयामि ।
एप भर्ता सूर्यामुखप्रासादादवतरति । तदिहैव निवेदयिष्यामि।]
प्रतीहारी-आर्य ! अमी विवेदन करती हूँ। यह महाराज सूर्यामुख महल
से उतर रहे हैं । अतः यही पर निवेदन कर दूगी।
Door-keeper-I shall just announce you. Here is the lord
coming form the palace facing the last. Then I shall just in.
form him here.
काञ्चुकीयः-भवति ! तया। (उभौ निष्फ्रान्तौ ।) इति मिथ-
विष्कम्भकः।
कंचुकी--ठीक है, श्रीमती ! (दोनों का प्रस्थान 1) मिथविष्कम्ना
समाप्त।
Chamberlain-Airight, madam, (Both retire)
टिप्पणी-(१) तदाश्रयम्-तद्विषयकम् । उसी के सम्बन्ध का। सा
वासवदत्ता प्राश्रयो यस्य तत् तदाश्रयम् ब० स० । (२) अवतरति-उतर रहा
है । भव+त+लट् । प्र० पु० ए० व०। (३) मिषिष्कम्भक:--मूत और
मावी घटनात्रों के सम्बन्ध का संक्षेप में निर्देश करने वाली प्रस्तावना मिथ-
विष्कम्भक कहलाती है । यहाँ उदयन को पुनः राज्य प्राप्ति तथा महासेन के
संवाद का निवेदन ये दोनों भूत और भविष्यत् काल के वृत्तान्त मध्यम पात्र
कचुकी और नीच प्रतीहारी द्वारा बताये गये हैं। इसलिए मित्र या संकीर्ण
विष्कम्भक हुमा । कहा भी है-'स तु सकोणे नोचमध्यमकल्पितः'
(ततः प्रविशति राजा विदूषकश्च ।)
राजा---
श्रुतिसुप्सनिनदे ! कथं न देव्याः स्तनयुगले जघनस्यते च सुप्ता ।
विहागणरजोदिकोणंदण्डा प्रतिभयमध्युषिताऽस्परण्ययासम् ॥१॥
प्रत्यय--अधिसुगनिनदे ! देव्याः मानयुगले जघनस्यले च मुप्ता विहगगन.
रजोविकीगण्डा प्रतिमपम् भरण्यवामम् पयं न मध्यषिता ममि ॥१॥

१६०
स्वप्नवासवदत्तम्
संस्कृत टीका--अतिमुलनिनदे! त्योः कर्णपोः मुखः मानन्दप्रदः निनदः
'शब्द: यस्याः सा तपामते ! (पीगे!), देव्या: :--वासवदत्तायाः,
स्तनपगले-
कुचद्वन्दे, जघनस्थले-कटिपुरोमागे च, सुप्ता-शयनं प्राप्ता मुखस्थितेत्यर्थः,
(त्वम् अधुना) विहगगणरजोविकीर्णदण्डा-विहगानां पक्षिणा गणः समूहः तस्य
रजसा मलेन विकीर्णः व्याप्तः दूपित इति यावत् दण्डः प्रदालः यस्याः मा तथा-
“मता. प्रतिभयं-भयङ्करम्, अरण्यदासम्-वनवासम्, कयं नुकमिव, अध्युपि-
जाऽमि---प्राश्रितवत्यसि । (प्रयं भावः-अयि ! कर्णमधुरस्वरे ! वीणे या त्वं
'पुग पासवदत्ताया उत्सङ्गे कुचयुगले च सुखमस्वाप्सीः, मा त्व कयं पक्षिमलदूषित
प्रवालं दधाना भयङ्करं वनवासम् अध्यवात्सीः ?) ॥१॥
अनुपाद-(तदनन्तर राजा और विदूषक का प्रवेश ।) हे कानों को मुख
देने वाले स्वर वाली वीणा ! तुम तो महारानी के दोनो स्तनो और जांघों पर
मोती थी, फिर पक्षियों के समूह को वोटों से भरे हुए डडे वाली होकर भयंकर
जङ्गल में किस प्रकार रही हो? ॥१॥
Then enter king and the jester) On (fute) of melodious
tunes when indeed (once) you rested on the (pair) of breasts and
broad thighs of the queen, how could you suffer the brightful
residence in the forests, with your neck scattered with the dirt
of multitudes of birds ?
टिप्पणी--(१) निनद--शब्द। 'शब्दे निनादनिनदध्वनिध्वानरवस्वनाः'
इत्यमरः । नि/नद्+अपनी गदनदपटस्वनः' इत्यनेन । (२) स्तनयुगल-
स्तनयोः युगलम् प० त०, तस्मिन् अधिकरणे सप्तमी। (३) जघनस्पले-जपनस्य
स्थलम् प० त०, तस्मिन् । (४) विहग-विहायसा गच्छति-विहायस्+गम् ।
(५) दण्ड--वीणा के दण्ड को प्रवाल कहते हैं। 'वीणादण्ड' प्रवालः स्यात्
इत्यमरः । (६) प्रत्तिभयम्--भयकर । 'मयङ्करं प्रतिमयम्' इत्यमरः । (७)
भरण्यवासम्--उप्पते पत्र इति वासः-निवासस्थानम् /वस्+घञ् 'हलरच'
इत्यनेन, अरण्यमेव वासः तम् वनस्थलमित्यर्थः। यहाँ 'उपान्वघ्याङवसः' सूत्र
से कर्मसंज्ञा होने पर द्वितीया हुई। (८) विहगगणरजोविकीर्णदण्डा-पक्षियो के
ममूह की बीटो से भरे हुए दडवाली । विहगाना गणस्य रजः (१० तत्प०) तेन
विकीर्ण:-(तृ० तत्पु०) विहगगणरजोविकीर्ण: दण्डः यस्याः सा (ब० वी०) ।
विकीर्ण-दि+क+क्त (त)व्याप्त । इस श्लोक मे पुष्पिताना छन्द है । तल्लक्षण-
"प्रयज नयगरेपतो यकारो यजि च नजो जरगाश्च पुष्पितामा" ॥१॥

पष्ठ ग्रंक १६१ अपि च, अस्निग्धासि घोषयति ! या तपस्विन्या स्मरसि- और मी, हे घोषवती ! तुम स्नेह-शून्य हो, जो कि तुम बेचारी को याद नहीं करती हो- And again, Ghosha wati, you are unkind, you do not (unfortuately) remember the poor (queen). श्रोणीसमुदहनपाश्र्वनिपीडितानि खेदस्तनान्तरसुखान्युपाहितानि । उदिश्य मां च विरहे परिदेषितानि वाद्यान्तरेषु कपितानि च सस्मितानि ॥२॥ अन्वय--श्रोणीसमुद्वहनपावनिपीडितानि खेदस्तनान्तरसुखानि उपमूहितानि च विरहे माम् उद्दिश्य परिदेवितानि च वाद्यान्तरेप सस्मितानि कथितानि ॥२॥ संकृस्त टोका-श्रोणीसमुहहनपाश्वं निपीडितानि-श्रोण्या कटिमार्गेन समुद्र- हनानि धारणानि पाइँन कक्षाप.प्रदेशन निपीडितानि सघर्षणानि, खेदस्तनान्तर- सुखानिखेदे वादनप्रमे (सति) स्तनयोः कुघयो. मन्तरे मध्यभागे सुखानि सुखोत्पादकानि, उपगुहितानि-प्रालिङ्गनानि, च-पुनः, विरहे--वियोगे, माम्-उदयनम्, उद्दिश्य-अमिलक्ष्य, परिदेवितानि-विलापान, चतथा, वाद्यान्तरेषु-वाद्यानाम् सगीतानाम् अन्तरेप विरामेष, सस्मितानि-मन्दहासेन सहिनानि, कथितानि--माषितानि (न स्मरसि) । (मयं माव:-घोषवति ! नून त्व स्नेहरहिता शुष्कहृदयासि । यतस्त्व देव्याः किमपि मयुरचेष्टित न स्मरमि। वादनावसरे सा त्वाम् स्वकीयोल्मङ्गे पृतयती, पास्वंमागेन निपीडितक्ती, संगीत- अमेषु सुचयोर्मध्ये प्रालिंगितवती, मम वियोगकाले मादिश्य त्वत्स्वरानुगतानि दिलपितानि कृतवती, तथा सगीताना विराम सस्मितम् उक्तवती । एतानि तस्याः चेष्टितानि स्मरसि किम् ? यद ।) २॥ अनुवाद--जांघो पर धारण करने और बगलो मे दबाने को, पक जाने पर स्तनो के बीच मुराद पालिंगनो को, वियोग में मुझे उद्देश्य करके रोने- कलपने को मोर संगीत के बीव-चीच में मुसकान मरी बातो को याद नहीं करती हो ॥२॥ Her close grasps on the rides while bearing (you) on the hips, her pleasant embrace betaca her breasts full of saccts, her smiling conversations in the intervals of music (how do you forget all this 7) १९२ स्वप्नवासवदत्तम् स० त०, टिप्पणी-(१)तपस्विन्या:-दीन, दुखिया।'मुनिदीनौ तपस्विनौ' इत्यमरः । यहाँ शेषे षष्ठी या 'मधीगदपेशां कर्मणि' सूत्र से 'स्मरसि' के योग में षष्ठी हुई। (२) योमोसमुहहनपानिपीडितानि--श्रोण्या समुद्रहनानि त० त० वा श्रोण्या समुद्रहनानि स० त०, पावन निपीडितानि त० त०, श्रोणीसमुद्वहनानि च पाव- निपीडितानि च इति श्रोणीसमुद्वहनपावनिपीडितानि इतरेतरयोगद्वन्द्वसमास । श्रोणी--कमर । 'कटिः श्रोणिः' इत्यमरः । श्रोणि-डीए सर्वतोऽक्तिन्ना- दित्येक' इति गणमूत्रेण । निपीडितानि--नि/पीड्=णिच्+क्त (त) भावे) । (३) खेदस्तनान्तरसुखानि-स्तनयोः अन्तरम् प० त०, स्तनान्तरे सुखानि खेदे स्तनान्तरसुखानि स० त० । यहाँ 'खेदे स्तनान्तरे' इस प्रकार व्यस्त पदों का पाठ होना चाहिए, क्योंकि सामर्थ्याभाव के कारण समास मसभव है । (४) अन्तर--मध्य । 'अन्तरमवकाशावविपरिघानान्तधिभेदतादये । छिद्रात्मीय- विनाबहिरवसरमध्येऽन्तरात्मनि च' इत्परः। (५) उपगहितानि-प्रालिंगन । उपगुह +क्त (त), (मावे) । विरहे--इसमें 'यस्म च भावेन भाव- लक्षणम्' मूत्र से भाव में सप्तमी हुई। (७) परिदेवितानि-विलाप । 'विलाप: परिदेवनम्' इत्यमरः । परि देव+क्त (त) (भावे) । (८) वाद्यान्तरेषु-वाद्यों के बीच-बीच में अर्थात् संगीतात्मक स्वरों के विराम-काल में । (६) कथितानि-- वचनानि । कर्मणि द्वितीया । स्मरसि' क्रिया का कर्म है। /-णि+ क्त (त) (मावे) । (१०) सस्मितानि--मुस्कराहट के साथ। स्मितेन सह वर्तमानानि यानि तानि । यह 'कथितानि' का विशेषण है। यह वसन्ततिलका छंद है ॥२॥ विदूषकः--प्रलं दाणि भव प्रदिमत्तं सन्तप्पिन । [अलमिदानी भवान- तिमा सन्तप्य ।] विदूषक---इस समय पाप बेकार इतना संताप कर रहे हैं । Vidashaka-Away with this great anguish now, your Majesty. राजा-वयस्य! मा मैवम्, राजा--मित्र ! न ऐसा न कहो- King-Friend-no, do not say so. चिरप्रसुप्तः कामो मे वीणया प्रतिबोधितः । तां तु देवीं न पश्यामि यस्या घोपवती प्रिया ॥३॥ - पष्ठप्रक अन्वय-चिरप्रसुप्तः मे काम: वीणया प्रतियोषितः । यस्या थोपवती प्रिया तो देवी तु न पश्यामि ॥३॥ संस्कृत टीका-चिरप्रसुप्तः -चिरं दीर्घकालं प्रसुप्तः शयितः, मे--मम, काम:---प्रियासङ्गमेच्छा, वीणया--अनया पोपवत्या, प्रतियोधितः-जागरितः। यस्याः-वासवदत्तायाः, घोपवती--इयं वीणा, प्रिया-प्रीतिपात्रम् (प्रासीत्), तां--मत्प्राणवल्लमा, देवी-वासवदत्ता तु, न पश्यामि--नावलोकयामि । (अयं नाव:-वासवदत्तानिधनान्तरम् मम कामः सुप्तप्रायः इव मासीत् । परन्तु अद्य घोपवल्या स प्रतियोषितः । हा पिक ! एषा वीणा यस्य मृशमरो- चत, सा मे प्रिया वासवदत्ता अद्यापि न दृश्यते ।) ||३||, अनुवाद--बहुत दिनों के सोये हुएमेरे काम को वीणा ने जगा दिया । किन्तु जिसको यह वीणा प्रिय थी, उस देवी को नहीं देख रहा हूँ ॥३॥ That long dormant desire of mine is roused by the lute. I do pot see the queen to whom Ghoshavati was dear. टिप्पणी-(१) प्रतिमात्रम्--अत्यन्त, अधिक । 'प्रतिवेलमशात्यर्याति- मात्रोद्गानिमरम्' इत्यमरः। मात्राम् प्रतिक्रान्तः इति विग्रहे 'प्रत्यादयः शान्ताद्ययें द्वितीयया' इत्यनेन प्रादितत्पुरुषसमासः, ततः क्रियाविशेषणत्वात् द्वितीया । (२) प्रलम् “सन्तप्य--सन्ताप करना व्ययं है। सम्/तप्+क्त्वा 'अलखल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचा क्त्वा' इत्यनेन, ततः क्त्वास्थाने 'समासेऽनपूर्वे क्वो ल्यप्' इति सूत्रेण ल्यप् प्रादेशः । (३)चिरप्रसुप्तः-चिरं याचिरात् प्रसुप्तः। इति चिरप्रमुप्तः सुप्सुपा समास । प्रसुप्त---/स्वप्+क्त (त)। (४) प्रति- बोधितः-प्रति+गि+क्त (त)।(५) कामः--/कम्+णि+घन (प्र)। (६) प्रिया--/प्री+क'इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः' इत्यनेन, ततः इयछ, टाप् । यह अनुष्टुप् छद है ॥३॥ वसन्तक! शिल्पिजनसकाशाग्नवयोगां घोपवर्ती कृत्वा शोघ्रमानय । वसन्तक ! घोपवती को कारीगर से नयी बनवा कर (अर्थात् मरम्मत करा कर) शीघ ले प्रामो । Vidushaka 1 Quickly bring back Ghoshavati after putting stripgs from the artisans. विदूषकः--ज भवं आणदि । [योगां गृहीत्वा निष्क्रान्तः । यद् भवानाज्ञापयति । स्व०८०-१८ स्वप्नवासवदत्तम् विदूषक---जो मापको माज्ञा । (वीणा लेकर चला जाता है।) Vidashaka--As your Majesty commands (Retires with the lute.) (प्रविश्य) प्रतीहारी-जेदु भट्टा । एसो खु महासेणस्स समासादो रंभसगोत्तो कंबुईप्रो देवीएअङ्गारवदीए पैसिदा प्रय्या वसुन्धरा णाम वासवदत्तापत्तो अपडिहारं उद्विदा । [जयतु भर्ता । एष खलु महासेनस्य सकाशाद् रेभ्यसगोत्रः काञ्चुकीयो देव्याऽङ्गारवत्या प्रेषितार्या वसुन्धरा नाम वासवत्तापात्री च प्रतीहारमुपस्थितौ । (प्रवेश करके) प्रतीहारी-~महाराज की जय हो। महासेन जी के पास मे ये रम्य नामक कंचुकी और महारानी अंगारवती को भेजी हुई श्रीमती वसुन्धरा नाम को वासवदता को पाई द्वार पर उपस्थित हैं। (Eatering) Door-keeper--Hail, Sire, A herald of the Raibhya clan, from Mahasen's court stands at the gate and the lady Vasundhara, the nurse of Vasavadatta sent by Angarwati has also come. राजा-तेन हि पद्मावती तावदाहूयताम् । राजा-तो पद्मावती को पहले बुला लामो । King--Then first let queen Padmavati be called. प्रतीहारो--जं भट्टा प्राणवेदि ।(निष्क्रान्ता )[यद् भर्ताज्ञापयति ।। प्रतीहारी-जो महाराज की आज्ञा । (चली जाती है ।) Door-keeper--As you command. (Exit). राजा-~-किन्नु खलु शीघ्रमिदानीमयं वृत्तान्तो महासेनेन विदितः ? राजा-क्या प्रमी इतनी जल्दी यह समाचार महासेन जी को मालूम हो गया? King-Can it be that so soon has this news been 'known by Mahasena? टिप्पणी--(१) शिल्पिजनसकाशात्कारीगर के पास से । शिल्पी चासो जनश्च इति शिल्पिजनः कर्मधारयः समास, तस्य सकाशम् प० त०, तस्मात् । (२) नवपोगाम्--जिसका नया निर्माण या मरमम्त की गई हो। नवः योग: पस्याः सा ब० स०, ताम् । (३) उपस्थिती--यहां एक स्त्री और एक पुरुष पष्ट भक १६५ कर्ता है । इसलिए 'उपस्थितः च उपस्थिता च' इस विग्रह मे लिंग का एकशेष हो जाने से 'उपस्थितो' यह प्रथमा-द्विवचन का रूप बनता है । (४)प्रतीहारम्--- ड्योढी पर । (५)तेन यहां हेतु में तृतीया हुई। (६) तेन हि तावत्--यदि ऐमा है तो पहले । (७)विदितः जातः । विद् धातु अनेक गणों मे अनेक प्रयों मे पठित है । दिवादिगण में इसका अर्थ होता है 'सत्ता' और रूप 'विद्यते', मदादिगण में अर्थ 'जानना' मोर रूप 'वेत्ति', रुधादिगण मे पर्थ सोचना'पोर रूप 'विन्ते' तथा तुदादिगण में अयं 'पाना' और रूप "विन्दते--विन्दति'। कहा मी है-'सत्तायां विद्यते ज्ञाने वेत्ति विन्ते विचारणे । विन्दते विन्दति प्राप्ती श्यन्- लुक्-श्नम्-शेष्विद क्रमात्'। (ततः प्रविशति पद्मावती प्रतीहारी च ।) प्रतीहारी--एदु एदु भट्टि- दारिमा । [एत्वेतु भर्तु दारिका । (तदनन्तर पद्मावती पोर प्रतीहारी का प्रवेश ।) प्रतीहारी–आइये, राजकुमारी जी ! पाइये। (Then enter Padmavati and door-keeper.) Door-keeper- Come,Come, Princess, पद्मावती-जेदु अय्यउत्तो । [जयत्वार्यपुत्रः ।। पद्मावती-मार्यपुत्र की जय हो। Padmavati-Victory to the king. राजा-पद्मावति ! किं श्रुतं महासेनस्य सकाशाद् रेभ्यसगोत्रः काञ्चुकीयः प्राप्तस्तत्रभवत्या चाङ्गारवत्या प्रेषितार्या वसुन्धरा नाम वासवदत्ताधानी च प्रतीहारमुपस्थिताविति । राजा-पद्मावती! क्या तुमने सुना कि महासेन जी के पास से रम्य नामक कंचकी और पूजनीया प्रगारवती को मैजी हुई श्रीमती वसुन्धरा नाम की वासवदत्ता की घाई दोनो ड्योढ़ी पर माये हुए हैं । King--Padmavati, bave you heard that the Chamberlain, a kinsmen of the Raibhyas has come from Mahasena, land also a lady Vasundhara, the nurse of Vasavadatta sent by the ladyship, Angarvati; and that both are wating at the door. पद्मावती-अय्यउत्त ! पिप्रं मे आदिकुलस्य कुसलवुत्तन्तं सोहूँ। [प्रार्यपुत्र ! प्रियं मे ज्ञातिकुलस्य कुशलवृत्तान्तं श्रोतुम् ।]

-तम् पदमावती-प्रार्यपुत्र ! कुटुम्ब-परिवार का कुशल-समाचार सुनना मुझे प्रिय है। न . Padmavati-Your Majesty is will be a (matter of) pleasure to me to hear happy news about my kidsmen. रॉजा-अनुरूपमेतद्भवत्यानिहितं~-वासवदत्तास्वजनो मे स्वजन इति । पद्मावति । प्रास्यताम् ।किमिदानी नास्यते ? राजा-तुमने यह उचित कहा कि वासवदत्ता के भाई-विरादर मेरे भाई विरादर हैं । पद्मावती ! बैंठो। अब क्यों नहीं बैठती ? King--Fitly has it been said by your ladyship, that the house. hold of Vasavadatta are your relations. Padmavati take seat, why do you not take a seat now? पद्मावती-अय्यउत्त ! कि मए सह उवविठ्ठो एवं जणं पेक्खिस्सदि? {मार्यपुत्र ! किं मया सहोपविष्ट एतं जनं प्रैक्षिप्यते ?]! 'पदमावती-प्रार्यपुत्र ! क्या आप मेरे साथ बैठकर उन लोगों से मिलेंगे ? Padmavati - Your Majesty, spould you like to see them sitting with me 2 राजा-कोऽत्र दोपः १. राजा-इसमें क्या दोष है ? King-What harm is there, पद्मावती--अय्यउत्तस्स अवरो परिग्गहो ति उदासोणं विन होदि । [प्रार्यपुत्रस्यापरः परिग्रह इति उदासीनमिव भवति । पद्मावती--आर्यपुत्र ने दूसरा विवाह कर लिया है, यह उन्हें अच्छा न लगे। Padmavati---Perhaps your second marriage · might displease theml राजा-कलत्रदर्शनाहं जनं कलादर्शनात् परिहरतीति बहुदोषमुत्पाद.) पति । तस्मादास्यताम् राजा-पत्नी को देखने योग्य व्यक्ति को देखने से रोकने में बहुत ही बुराई होती है। इसलिए बैठ जामो। King--The man who from his wife's sight banishes those who are worthy of it, does great wrong. Therefore be sested. J .

पष्ठ मंक १६७ । पद्मावती--जं अय्यउत्तो आणवेदि] । [उपविश्य] अस्पउत्त! तादो वा अम्बा वा किंणु खु भणिस्सदि ति आविग्गा वि संवत्ता । [यदार्यपुत्र प्राज्ञापयति । प्रायपुत्र ! तातो वाम्बा वा किन्नु खलु भणिज्यतीत्याविग्नेव संवृत्ता।] पद्मावतो-जो आर्यपुत्र को पाना । (बैठकर) आर्यपुत्र ! पिता जी या नाता जी क्या कहेंगी, यह सोच कर उद्विग्न-सी हो रही हूँ। Padmavati-As my Lord commands (sits). My lord, my heart is anxious to learn what message, our father or mother have sept. टिप्पणी--(१) ज्ञातिकुलस्प--मम्वन्धियों या बन्धुओं के वर्ग का। 'मगोत्रवान्धवज्ञातिवन्धुस्वस्वजनाः समाः' इत्यमरः । अथवा ज्ञातिकुलतातकुल । 'ज्ञातिस्तातसगोत्रयोः' इति मेदिनी। ज्ञाति-~Vा+क्तिन् । (२) प्रियं मे-- यहाँ मे पद का अन्वय 'मध्यमणिन्याय' से 'प्रियम्' और 'ज्ञातिकुलस्य' दोनो के साय है । (३) श्रोतुम्---यहाँ प्रियम्' और 'श्रोतुम्' दोनों के एक ही कर्ता होने के कारण समानकत केप तुमन्' सूत्र से तुमुन् प्रत्यय हुआ । (४) अनुरूपम्-- उचित । अर्थात् कुल-शील के योग्य । रूपस्य योग्यम् इति अनुरूपम्, योग्यता के प्रयं मे अव्ययीमाव समास । (१) परिग्रहः--परनी । परिगृह्यते इति । परि ग्रह, +अप् । 'पलीपरिजनादानमूलशापा: परिग्रहाः' इत्यमरः । (६) उदा. सोनमिय--प्रवाछनीय जैसा । अर्थात् प्रापने दूसरी पत्नी कर ली, यह उन्हें अरुचिकर प्रतीत होगा। (७) कलनदर्शनाहं जनं “यहाँ राजा के कहने का भाव यह है कि जो व्यक्ति पत्नी को देखने का अधिकारी है, उसे यदि पत्नी न दिखायी जाय तो बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं । प्रागन्तुक कंचुको और धात्री के लिए जिस प्रकार वासवदत्ता थी उसी प्रकार पद्मावती भी । इनसे पत्नी को छिपाना मन मे पाप रखना है । ऐसे दुराव से हम केवल अपपश के मागी बनेंगे । इसलिए तुम्हारे साथ ही में उनसे मिलूंगा । कलत्र--पत्नी । 'कला श्रोणि मार्ययोः' इत्यमरः । कलत्रस्य दर्शनम्, तस्य अर्हः प० त०, तम् । (क) प्रह--Vई, (पूजायाम्)+ मम् । (६) बहुदोषम् --अनेक प्रकार के दोपो को । यहाँ 'बहून् दोपान्' होना चाहिये था, किन्तु जातिगत एकत्य की विवक्षा से एकवचन हुमा । (१०) कलर. दर्शनात् परिहरति--'प्रपादाने पञ्चमी' तथा 'ध्रुवमपायेऽपादानम् सूत्र . मे पचमी हुई है। यहाँ 'वारणार्यानामीप्सितः सूत्र लागू नहीं होता, क्योकि । कर्ता को कलत्रदर्शन मभीष्ट नहीं है। 1 -

१६८
स्वप्नवासवदत्तम्
1
इन पंक्तियों में पद्मावती के प्रादर्श चरित्र का चित्रण किया गया है।
उसमें सापल्य मावना का सर्वथा अभाव है। अपनी सपत्नी वासवदत्ता के
संबंधी जनों में उसका प्रात्मीय भाव है । प्रतीहारी तथा धात्री की भावना पर
आघात पहुंचने की माशंका से वह राजा के साथ नहीं बैठना चाहती।
राजा--पद्मावती ! एवमेतत् ।
King-Even so Padmavati.
राजा-पद्मावती ! वात तोऐसी ही है।
कि वक्ष्यतीति हृदयं परिशङ्कितं मे
कन्या मयाप्यपहृता न च रक्षिता सा ।
भाग्यश्चलमहदवाप्तगुणोपघातः
पुत्रः पितुर्जनितरोष इवास्मि भीतः ॥४॥
अन्वय-किं वक्ष्यति इति मे अपि हृदयं परिशङ्कितम्, कन्या मया अपहृता
न च सा रक्षिता । चलः भाग्यः महदवाप्तगुणोपघातः पितुः जनितरोपः पुत्र
इव मीतः मस्मि ॥४॥
संस्कृत टीका-किं वक्ष्यति--कि कथयिष्यति दूतमुखेनेति शेषः, इति----
अस्मिन् विषये, मे अपि- ममापि, हृदयं-मनः, परिशसितम्--शङ्काकुलं
(वर्तते) कन्या--कुमारी वासवदत्तेति यावत्, मया-उदयनेन, अपहृता--
अपनीता, न च--नव, सा--कन्या, रक्षिता-परिपालिता। चल:-चञ्चलः,
माग्य--देवः, महदवाप्तगुणोपघातः-महत्सु गुरुजनेषु प्रयाप्तः प्राप्तः गुणाना
सदाचारादीनाम् उपघात: मङ्गः येन स तथाभूतः, (महम्) पितुः-जनकस्य,
जनितरोष:--जनितः उत्पादितः रोपः क्रोध: येन स तादृशः, पुत्र इव--तनय इव,
भीत:--मययुक्तः, अस्मि--विद्ये । (प्रयं भाव:-तातः अम्बा वा किं सन्देष्यति-
इति विमृश्य अहमपि उद्विग्नो बोमवीमि । यतो हि तयोः अनूढा पुत्री अनुमति-
मन्तरेणव मया कौशाम्बीम् प्रानीता। परं तस्याः परिपालने प्रहं सर्वथा अयोग्यः
संवृत्तः । इत्यं सदाचारविनयादीना गुणानाम् उल्लङ्घनेन अहं पितुः कृतापराधः
पुत्र इव मीतोऽस्मि ।)॥४॥
अनुवाद-क्या कहेंगे-इस बात से मेरा भी हृदय सशंकित है । मैंने उनकी
पुत्री को भगाया, पर उसकी रक्षा नहीं की। (इस प्रकार) चंचल भाग्य के कारण
गुरुजनो के प्रति शिष्टाचार का उल्लघन करने वाला में पिता के क्रोध को उत्पन्न
करने वाले पुत्र के समान डरा हुआ हूं ॥४॥

पष्ठ अंक . I stole away their maiden daughter and did not preserve her. Through the fickleness of fortune I have transgressed and greatly transgressed and I feel afraid like a son who has given cause for anger to his father. टिप्पणी--(१) वक्ष्यति-कहेंगे, ब्रू या व+लट् प्र० पु० ए. ३० (२) परिशक्षितम्-~मय से पूर्ण । परिशका+इतच 'तदस्य सजात'-मित्यादिना अथवा परि+शङ्क+क्त (त)। (३) कन्याकुमारी, बिना ब्याही लड़की । 'कन्या त्वजातोपयमा' इति दर्पणः। (४) भाग्य:-यहाँ हेतु मे तृतीया हुई। (५) महदवाप्तगुणोपघाता-जिसने बड़ों के प्रति सदाचारमर्यादा को तोड़ दिया । गुणानाम् उपघातः गुणोपघातः प० त०, महत्सु अवाप्तः महदवाप्तः स० त०, महदवाप्तः गुणोपपात: येन ब० स०। (६) उपधात-भङ्ग, नाश उप/हन+घन् । (७) पितुः--यहाँ 'मीवार्थानां मयहेतुः सूत्र से प्रपादान में पंचमी हुई। (८) पिता-/पा (रक्षणे) +तन् । (६) पुत्रः-'पुत्' नाम- नरकात् त्रायते यः सः पुत्रः, पुत् +क पुनाम्नो नरकाद्यस्मात् पितरं त्रायते सुतः । तस्मात्पुन इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयंभुवा ।। (१०)जनितरोष:-क्रोध को उत्पन करने वाले, जनितः रोषः येन सः जन्+णिच्+क्त (त) कर्मणि। रुप् + घन्-रोपः। (११) पितुः--'भीत्रार्थाना भपहेतुः' से पचमी। भीतः मी (मये)+क्त (त) (कर्तरि) । इस लोक मे उपमा मलंकार है और वसन्त- तिलका छन्द है। 'उपता सन्ततिलका तमजा जगी ग: ॥४॥ पद्मावती- कि सक्कं रविखर्दु पत्तकाले ? [न कि शक्यं रक्षितुं प्राप्तकाले ? ] पद्मावती--क्या उचित समय पर रक्षा नहीं की जा सकती ? (भात अनुकूल समप में माप उनकी रक्षा प्रवश्य करते । प्रतिकूल समय में कोई किसी की रक्षा नहीं कर सकता। मतएव इसमे मापका कोई दोष नही है ।) Padmatati-What thing can be preserved whose time bas come ? प्रतीहारी-एसोकञ्चईओ धत्ती प्र पडिहारं उठिटवा। (एप काञ्चुकीयो धात्री च प्रतीहारमुपस्थिती ॥ प्रतीहारी-ये कचकी मोर पाईदोनो दरवाजे पर सा है। Door keeper-The Chamberlain and the ourse both are standing at the door.

२०० स्वप्नवासवदत्तम् राजा--शीघ्रं प्रवेश्यताम् । राजा-शीघ्र अन्दर ले प्रायो। King-Admit them speedily. प्रतीहारी-जं भट्टा आणवेदि [यद् भर्ताज्ञापयति । ] (निष्क्रान्ता ।) प्रतीहारी-जो स्वामी की प्राज्ञा । (चली जाती है।) Door-keeper-As my lord wills. (exit) टिप्पणी--(१) न किं शक्यम्"-~यहाँ पद्मावती के कहने का माव यह है कि मनुष्य का जीवन नियत है । जब उस जीवन की अवधि समाप्त हो जाती है तो उसका विनाश-काल पा जाता है। उस समय उसे कोई नहीं बचा सकता । उत्पत्ति के बाद नाश तो निश्चित ही है। प्रतएव देवी वासवदत्ता की मृत्यु होनी ही थी। इसमें प्रापका क्या दोष है ? 'जातस्य हि 5षो मृत्यधुंव जन्म मृतस्य च इति गीता । (२) शक्यम्-Vशक्+यत् 'शकिसहोश्च' इति सूत्रेण । (३) प्राप्तकाले--योग्य अवसर पर प्राप्तश्चासौ कालः प्राप्तकालः कर्म० स० तस्मिन् । (४) प्रयेश्यताम्-प्र/विश्+णिच्+लोट् (फर्मणि) । (ततः प्रविशति काञ्चुकीयो धात्री प्रतीहारी च ।) काञ्चुकीयः- भोः । (तदनन्तर कंचुकी, धाई और प्रतिहारी का प्रवेश।) कञ्चको-प्रहा (Enter cham berlain, and the nurse and the door-keeper.) Chamberlain-Aba. सम्बन्धिराज्यमिदमत्य महान् प्रहर्पः स्मृत्वा पुन पसुतानिपन विषादः । कि नाम देव ! भयता न कृतं यदि स्याद् राज्यं परपह्तं कुशलं च देव्याः ॥५॥ मन्वय- इदम् सम्बन्धिराज्यम् एरय महान् प्रहपंः, पुनः नृपसुनानियनम् स्मृत्वा विपाः । देव ! यदि पर माहतम् रापम् च देव्याः कुगसं, भवता कि नाम न कृतं स्यात् ।। संस्कृत टोका--इदम्--एतत्, सम्वन्धिराग्यम्सम्बन्धिनः स्वामिनामातु: राग्यम्-यत्सदेशम, एरप-प्राप्य, महान्-मयान्, प्रहपं:-पानन्दः (मनि) - पष्ठ मंक पुन:--किम्च, नृपसुनानिवनम् --नृपसुतायाः राजकुमार्या: वासवदत्ताया इति यावत्, निधनं--मरणं, स्मृत्वा--चिन्तयित्वा, विषादा-दुःखम् (मवति)। देव!-हे भाग्य !, यदि--चेत्, पर:-मामिः, अपहृतम्-बलात् गृहीतम्, राज्यं-वत्सदेशाधिपत्यं, च--तथा, देव्या:--वासवदत्तायाः, कुशलक्षेमम् (भवेत् ताह), भवता--स्वया कि नाम-किमिव, न कृतं स्यात्--नानुष्ठितं भवेत् । (अयं माव:----अस्मत्स्वामिनो जामातुः राज्यमागत्य प्रतीवाहम्माद्यामि । परन्तु राजकुमार्याः वासवदतामाः मरणं सञ्चिन्त्य विषीदामि च । हे भागधेय ! यदि भवत्कृपया दात्रुभिः अपहृतं वत्स राज्यं यथा मिलितं तथा वासवदत्ता अपि मिलिता मतदा भवता प्रस्माक महाराजस्य कि नाम हितं न कृत मवेत् अपि तु सर्वमपि कल्याणं सम्पादितं मवेत् ।) अनुवार- इस सम्बन्धी के राज्य मे पाकर बडा हपं हो रहा है। फिर राजपुत्री की मृत्यु का स्मरण करके शोक हो रहा है । प्रो माग्य ! यदि शत्रुप्रो से छोना हुआ राज्य और महारानी को कुशल मिल जाती तो तूने क्या नहीं किया होता ॥५॥ 'rjoyed, full of kingdom (only) was captured by the enemies leaving the queen happy (i. e. untouched) टिप्पणी-(१)सम्बन्धिराज्यम्--कुटुम्ब का राज्य । सम्बन्धिनः राज्यम् ५० त०, सम्बन्ध+इनि-सम्बन्धी, राज्ञः कर्म भावो वा इति विग्रहे राजन्+ यत्-राज्यम् । एत्य--पाकर । आV+क्त्वा--त्यप् । यहाँ एककर्तृक क्रिया मे क्त्वा प्रत्यय की सिद्धि के लिए 'एत्य के प्रागे 'स्थितस्य' जैसे किसी पद का अध्याहार कर लेना चाहिए । (२) निधनम् --मृत्यु । 'मरण निधनोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । (३) किं नाम देव "यहाँ तात्पर्य यह है कि है देव ! जैसे तुम्हारी कृपा से खोया हुआ राज मिल गया उसी तरह यदि वासवदत्ता सकुशल मिल जाती तो निःसन्देह यह बात सोने मे सुगन्य की तरह होती। इससे अधिक सुख की कामना क्या की जा सकती है ? नाम-~-सम्भावना में प्रव्यय का प्रयोग हुआ है 'नाम प्राकाश्यसंमायक्रोधापगमकुत्सने' इत्यमरः। (४) स्यात् यह अस् धातु के विधिलिङ्ग लकार के प्रथमा-एकवचन का रूप है। यहाँ 'इच्छाप लिडलोटी' सूत्र से लिड हुमा । इस श्लोक में वसन्ततिलका छंद है ।। . ! .

. २०२ स्वप्नवासवदत्तम् प्रतीहारी--एसो भट्टा, उबसप्पदु अय्यो।[एप भर्ता, उपसर्पत्वार्यः ।। प्रतीहारी-ये स्वामी हैं। प्राप जायं । Door-keeper-Here is the king. Draw near sir. काञ्चुकीयः--[उपेत्य ] जयत्वार्यपुत्रः । कञ्चुकी-(समीप जाकर) महाराज की जय हो । Chamberlain-(Going near) Hail. Prince. धात्री---जेदु भट्टा । [जयतु भर्ता ।] घाई--स्वामी की जय हो। Narse-Hail. राजा--[सबहुमानम् ] प्रार्य ! राजा-(सम्मान के साथ) मार्य । King-(Respectfully), sir. पृथिव्यां राजवंश्यानामुदयास्तमयप्रभुः । अपि राजा स कुशली मया काडक्षितबान्धवः ॥६॥ पृथिव्याम् राजवंश्यानाम् उदयास्तमयप्रभुः मया कारक्षितबान्धवः स राजा मपि कुशली? ॥६॥ संस्कृत टीका-पपिव्यां-भूमी, राजवंश्यानां राजवशोद्मवाना नृपाणा- मिति यावत् उदयास्तमयप्रमः--उदयः उन्नतिः प्रस्तमयः भवनतिः तयोः प्रमः समर्पः, मया--वत्सराजेन, कारक्षितबान्धव.-कारक्षितम् प्रमिलषितम् बान्धवं बन्धुत्वं येन तयाभूतः, स राजा--पूजनीयो महासेनः, मपि कुशली-कुशलयुक्तो वतते किम् ? (मपं माव:-यः पृधिम्या |सर्वेषामपि राज्ञामुत्कर्षापकपहेतुरस्ति तया येन मया सह बन्धमाय: अमिलपितः तस्य सम्राजो महासेनस्य कुराल- माचक्ष्व।) ॥६॥ मनुवाद-पृथ्वी पर से समस्त राजामों के उत्थान-पतन करने में समर्ष सपा मेरे साप बन्यत्व स्थापित करने के इच्छुक ये राजा कुशल से हैं न ? Is that king who makes the rise and fall of the royal scions in (this) world (and) with whom I desired friendship doing well? अन्वय-- पष्ठ प्रक २०३ टिप्पणी--(१) राजवंश्पानाम्-राजवंश मे उत्पन्न अथवा राजामों के वशघरों के । वशे मवाः वश्याः वंश+यत्, राज्ञां वंदयाः राजवंश्याः प० त० तेषाम् । (२) उदयास्तमयप्रभुः-उद्/+प्रच्-उदयः, प्रस्तम्/+अच्= प्रस्तमयः, उदयश्च मस्तमयश्च उदयास्तमयो द्वन्द्वसमास, तयोः प्रभुः प० त० । प्र+म+दुइति प्रमः । तत्कालीन इतिहासज्ञो के अनुसार मगध के सम्राट अवन्तिनाथ प्रद्योत का लोहा मानते थे। (३) कादिक्षतवान्यवः-सम्बन्ध या मित्रता चाहने वाला । बन्योर्मावः बान्धवम्, बन्धु+मम् । (४) अपि कुशली-- क्या कुशल से है ? यहाँ अपि शब्द प्रश्नार्थक है । 'गर्दासमुच्चयप्रश्नशङ्कासम्मा- वनास्वपि' इत्यमरः। (५) कुशली--कुशलम् अस्ति प्रस्य इति विग्रहे कुशल+ इनि । यह अनुष्टुप छन्द है ।।६।। काञ्चुकीयः--प्रथ किम् ? कुशली महासेनः । इहापि सर्वगतं कुशलं पृच्छति । कंचुको--और क्या ? (जी हाँ,) महामेन जी कुशल से हैं। यहां भी सबका कुशल-मगल पूछा है । Chamberlain-Yes, Mahasena is well. He also enquires of the welfare of all here. राजा---[पासनादुरयाय] किमाज्ञापयति महासेनः ? राजा-(मासन से उठकर) महासेन जो की क्या प्राज्ञा है ? Klog-(Rising from his seat) what are the orders of Mahasena. काञ्चुकीयः-सदृशमेतद् वैदेहीपुत्रस्य । नन्वासनस्थेनेव भवता श्रोतव्यो महासेनस्य सन्देशः । कंचुकी-यह (शिष्टता) वैदेही पुत्र प्राप) के अनुरूप ही है। किन्तु प्राप मासन पर बैठे ही बैठे महासेन जी का सदेश सुनें। Chamberlain--This reverence is worthy of the son of Vaidehi Even while on your seat you deserve to listen to Mabasena's message, राजा--यदाज्ञापयति महासनः । (उपविशति ।] रामा-महासेन जी को जो माज्ञा। (बंठ जाता है। King-As Mabasena orders. (Sits dowp), २०४ स्५-- -... काञ्चुको-दिष्ट्या पररपहृतं राज्यं पुनः प्रत्यानीतमिति । कुतः-- कंचुको-भाग्य से शत्रुनों द्वारा छीना हुमा राज्य फिर लौटा लिया गया। क्योकि- Chamberlain-Fortunately the kingdom seized by the enemies has been regained by you because. कातरा येऽप्यशक्ता वा नोत्साहस्तेषु जायते । प्रायेण हि नरेन्द्रनीः सोत्साहैरैव भुज्यते ॥७॥ अन्वय-ये कातराः मपि वा अशक्ताः तेषु उत्माहः न जायते । हि प्रायण नरेन्द्रश्रीः सोत्साहैः एव भुज्यते ॥७॥ संस्कृत टीका--ये--पुरुषाः, कातरा:-अधीराः, अपि वा-प्रथवा, अशक्ताः -~दुर्बलाः (मवि-त), ते --पुरुषेषु, उत्साहः--कर्म करणे साहस, न जायते-न उत्पद्यते । हि-यतः, प्रायेण-बहुधा, नरेन्द्रश्री:--राजलक्ष्मीः, सोत्साहैः-- उत्साहसम्पन्नः, एव, (पुरुषः), मुज्यते-~-उपमुज्यते प्रास्वाद्यते इत्यर्थः । (प्रय "माव:--पर्येण शक्त्या वा विहीना: पुरुषाः किमपि कार्य सोत्साहं वन प्रमवन्ति । एतादृशानां पुरुषाणां राजलक्ष्मीः योग्पा न भवति । यतो हि मा प्रायेण उत्साहिमिर्जनः उपमुज्यमाना दृश्यते ।।७॥ अनुवाद-जो प्रपोर या मममर्थ होते है, उनमें उत्साह नहीं होता। और जो उत्साही हैं, वे ही प्रायः राजलक्ष्मी का उपभोग करते हैं ॥७॥ In those who are cowardly or incapable, no streauous effort is possibe. Generally the dignity of a king is enjoyed by those who possess perseverancc only. टिप्पणी-११) सर्वगतम--ममी का । सर्वान गतम् इति सर्वगतम् द्वितीया त्रितातीत' इत्यादिना द्वितीयातत्पुश्पसमासः (२) वैदेहोपुत्रस्य--विदेहस्य -~-मिथिलापतेः अपत्य स्त्री वैदेही उदयनस्य माता, विदेह+मण 'तस्यापत्यम त्पनेन, ततः 'टिहवाणम्' इत्यादिना डीप्. तस्याःपुत्रस्य । कवि के 'वंदेहोपुत्रस्य' के प्रयोग से सिद्ध होता है कि उस समय मिथिला को संस्कृति बहुत ऊंची पी। वहाँ की स्त्रियाँ विनय, शोल, वैदुष्य मादिगुणों से सम्पन्न होती पी। प्राज मी मंपिलियों में विनग्रता विशेष रूप से पायी जाती है। (३) पासनस्येन- मासन पर बैठ ही बैठे। मासने तिष्टतीति भासनस्यः तेन । पास्यते अस्मि. मिस्यासनम् पास+ल्यूट् । (४) दिष्ट्या--यह हर्पमूषक तृतीयान्त प्रतिपक पटक अव्यय है । "दिष्टया समुपजोपं चेत्यानन्दे' इत्यमरः । (५) उत्साहः--कार्य करने का उल्लास या प्रेरणा, अध्यवसाय । 'उत्साहोऽध्यवसाय: स्यात्' इत्यमरः ॥ उत्सह+घन् । १६)सोत्साहै:--उत्माहेन सह वर्तमानाः इति सौत्साहा: 'तेना महेति तुल्ययोगे' इति सूत्रण बहुव्रीहिसमासः, तः । इस श्लोक मे अप्रस्तुतप्रशंसा और अर्थान्तरन्यास अलकार हैं। तल्लक्षण काव्यप्रकाशे-'अप्रस्तुतप्रशंमा या सा सैव प्रस्तुताश्रया । अर्थात् प्रस्तुत अर्थ के कथन से प्रस्तुत अर्थ की प्रतीति में अप्रस्तुतप्रशसा अलकार होता है। सामान्य वा विशेपो वा तदन्येन समप्यते । यतु मोन्तिरम्पासः साधम्र्येणेतरेण वा निर्यात सामान्य कथन का विशेष से अथवा विलोप का सामान्य से जहां समर्थन हो वहाँ अर्थान्तरन्यास होता है। महाँ अनुष्टुप् छद है ॥७॥ राजा-प्रार्य ! सर्वमेतन्महासेनस्य प्रभावः । कुतः- राजा-~-प्रार्य। यह सब तो महासेन जी का ही प्रभाव है । क्योकि-- King-Sir all this is due to Malasena's prowess. Because-. टिप्पणी-अभिज्ञानशाकुन्तलस्य सप्तमेऽके द्रष्टव्यं-राजा-पत्र खलु शतमतोरेव महिमा स्तुत्पः । मिध्यन्ति कर्मसु महत्स्वपि यन्नियोग्याः संभावना- गुणमवेहि नमीश्वराणाम् ।कि वाऽमविप्यदरुणस्तमसा विभेत्ता तं चेत्सहस्रकिरणो धुरि नाकरिष्यत् । अहमवजितः पूर्व तावत् सुतः सह सालितो दृढमपहृता कन्या भूयो मया न च रक्षिता । निधनमपि च श्रुत्वा तस्यास्तयं मयि स्वता ननु यचितावत्सान प्राप्त नूपोऽत्र हि कारणम् ॥८॥ अन्वय--पूर्वम् तावत् अहम् अवजितः, सुतः मह लालितः, मया कन्या दृढम् अपहृता भूय. न च रक्षिता । तस्या निधन श्रुत्वा अपि मयि तथैव स्वता, ननु उचितान् वत्सान प्राप्तुम् यत्, अत्र नृपः हि कारणम् ॥८॥ मंस्कृत टीका-पूर्व तावत्-जग्रहणावसरे, महमउदयनः, अजितः-- पराजित्य निगृहीतः, मुन'--पुत्रः, सह-साक, लालितः~सालनपूर्वक पालितः, मया--वत्मराजेन, कन्याकुमारी महाराजमहामेनस्य पुत्री वासवदत्तेति यावत्, दरम्--दलपूर्वकम्, अपहृता-अपनीता स्वगृहम पानीति यावत्, भूपः-- । . .

स्वप्नवासवदत्तम् 'पुनश्च, न च--नेव, रक्षिता--अग्निदाहात् त्राता। तस्याः-स्वीयपुश्याः, 'निधनं--मरणं, श्रुत्वा अपि-आकर्ण्य अपि, मयि-उदयने, तयंव-पूर्ववदेव, स्वता--प्रात्मीयता (अस्ति), ननु निःसन्देहम्, उचितान-मच्छाशनयोग्यान् मदीपान् इति यावत्, वत्सान्-~-वत्सदेशान्, प्राप्तुम्-पुनर्लधुम्, यत्- धैर्यबलोत्साहादिजयोपकरणम् (मासीत् ), पत्र-अस्मिन् जयोपकरणे, नृपः- राजा महासेनः, हि एव, कारणम्--हेतुः । (अयं माव:-अहं पुरा गज- मृगपावसरे महाराजमहासेनेन बन्दीकृत्यापि पुत्रवत् पालितः । परन्तु कृतघ्नोऽहं तदीया कुमारी वासवदत्ताम् अपाहरम्, देवात् अग्निना दह्यमानां च तां रक्षित नापारयम् । तस्याः मृत्योः समाचारं श्रुत्वापि महाराजः पूर्ववदेव मयि स्निह्यति । मतः निश्चयमहं वक्तुं शक्ये यत् शत्रुभिः अपहृतस्य राज्यस्य मया पुनः स्वायत्तीकरणे महाराजमहासेनस्यव प्रमावातिशयो विद्यते।।। अनुयाव-पहले मैं जीता जाने पर भी (महाराज महासेन द्वारा भरने) पुत्रो के साथ (समान भाव से) पाला गया। फिर भी में उनकी पुत्री को बलपूर्वक भगा ले माया, पर उसकी रक्षा न कर सका। उसकी मृत्यु की बात सुनकर भी वे मुझपर पृवर्वत् ममता या स्नेह रखते हैं। निश्चित है कि मैंने जो न्यापयुक्त वत्सराज्य को पुनः प्राप्त किया, उसमें राजा (महासेन) ही पारण है॥८॥ Formerly defeated, I was even then fondled together with his sons. His daughter was stolen by me and not cared for. Even after the tiding of her death, he shows the same affection as before, Truly it is to his favour that I owe it that Votsa land obeys me once again. टिप्पणी--(१) पूर्वम्-इसमे क्रियाविशेषणत्वात् द्वितीया हो। (२) अमितः हराया गया। प्रब/जि+क्त (त) । (३) बम्-यहाँ नो क्रियाविशेषणत्वात् द्वितीया हुई (४) मपि-यहां विपयाधिकरण मे मतमी हुई। (५) स्वता-- 1--प्रारमीयता, ममता। स्वस्य भावः स्व+तन् (मा)+ टापसमास्त्रियाम् । 'स्वोमातापारमनिस्व त्रिप्यारमीय इस्पमरः (प्राम- पहा दिया मासोत्' रिया के योग में सस्पषशालापटरमममममहाहमियत तुमन' सूत्र से तुमन् प्ररपय हुमा। (७) मुपाहि सरगम-- साप निरयन सफसिग होने मे नृपः का विषय होने पर भी पुनिंग नहीं है। मी:-हे परिपेये प वितिमाती भवेत् । पापा मारता षष्ट अंक २०७ वपम्यं लिंगसंख्ययोः।। (८) हि-एव । 'हि हेताववधारणे' इत्यमरः। (६) ननु-अव्यय-निश्चय ही । इस श्लोक में हरिणी छंद है । तल्लक्षणं-- रसयुगहयन्सौं नौ स्लो गो यदा हरिणी तदा ॥८॥ काञ्चुकीयः--एष महासेनस्य सन्देशः । देव्या सन्देशमिहात्रभवती कथयिष्यति । कंचुकी--यह महासेन जी का सन्देश है । महारानी का सन्देश पूज्यवसुन्धरा कहेंगी। Chamberlain-Thisis Mahasena's message. This lady Vasundhara will tell the queen's message. राज-हा ! अम्ब ! राजा-हाय माता। King-Oh mother. पोडशान्तःपुरज्येष्ठा पुण्या नगरदेवता । मम प्रवासदुःखार्ता माता कुशलिनी ननु 10 अन्वय-ननु पोडशान्तःपुरज्येष्ठा पुण्या नगरदेवता मम प्रवासदुःखार्ता माता कुशलिनी ? | सस्कृत टीका--ननु-प्रश्नार्थकमव्ययमिदम्, पोडशान्तःपुरज्येष्ठा- षोडशानाम् एतत्संख्याकानाम् अन्तःपुराणाम्-अन्तःपुरस्यस्त्रीणाम् ज्येष्ठा प्रधानमूता, पुण्या--पवित्रचरित्रा, नगरदेवता--नगरस्य देवता इव स्थिता, मम-उदयनस्य, प्रवासदुःखार्ता--प्रवासस्य देशान्तरवासस्य दुःखेन कप्टेन प्रार्ता पीडिता, माता-अम्बा, कुशलिनी-क्षेमयुक्ता' (प्रय माव:-महाराज- महासेनस्य षोडशप्रधानपत्नीषु सर्वश्रेष्ठा, नगरवासिना जनानां देवता इव मान्या शुद्धाचरणा, मम उज्जयिन्याः कौशाम्बी प्रति पलायनेन वियोगदुःखेन दुखिनी माता कुशलयुक्ता वर्तते न ?) Illl अनुवाद--सोलह रानियों मे प्रधान, नगर की देवता और मेरे परदेश के दुःख से दुःखिनी माता जी कुशल से तो हैं न ? | The most senior of the Sixteco queens, holy, the deity of the city my mother,afflicted by the sorrow of our absence, is she well? टिप्पणी-(१) अम्बा मातः!, यहाँ अम्बा शब्द के सम्बोधन में 'अम्दार्य- मद्योहस्वः' मूत्र से ह्रस्वता हुई। धर्मशास्त्र के अनुसार मनध्य की पांच मातायें २०८ स्वप्नवासवदत्तम् मानी जाती हैं-अपनी माता, पत्नी की माता, गुरुपली, राजपली, मित्र- पत्नी। इस दुष्टि से उदयन का अपनी सास को माता कहकर सम्बोधित करना उचित ही है । (२) षोडशान्तःपुरज्येष्ठा-पोडशसंख्यकानि अन्तः पुराणि षोडशान्तःपुराणि मध्यमपदलोपी समास, तेषु ज्येष्ठा त० स०। यहाँ अन्तःपुर शब्द का लाक्षणिक अर्थ---अन्तःपुर की रानियों-विवक्षित है। वैसे अन्तःपुर का अर्थ रनिवास होता है । 'स्थ्यगारं ममुजामन्तःपुरम्' इति कोप: । (३) पुण्या-पवित्र या धर्मात्मा । पुण्यम् अस्ति प्रस्या: इति विग्रहे पुण्य+म मर्शमादित्वात् ततष्टाम् । (४) नगरदेवता--यहाँ नगर का लाक्षणिक अर्थ नगरनिवासी और देवता का देववत् पूज्य समझना चाहिए। फलतः समुदाय का अर्थ हुमा नगरनिवासियों का पूज्य । (५) प्रवासदुःखार्ता-परदेश के दुःस से दुःखी, अ/वस्+घञ्-प्रवासः तस्य दुःखम् (५० त०) तेन ऋता प्रयासदुः- खार्ता-'ऋते च तृतीयासमासे' सूत्र से ऋकार की वृद्धि हुई । अथवा प्रवासनु:- खेन प्रार्ता ।(६) कुशलिनो कुशलम् अस्ति अस्याः इति विग्रहे कुशल+इनि- हो । यह अनुष्टुप् छद है. तल्लक्षण-पंचमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्पयोः । षष्ठं गुरु विजानीयादेतत् पद्यस्य लणक्षम् ॥६॥ धात्री-अरोआ भट्टिणी भट्टारं सव्वगदं कुशलं पुच्छदि । 'अरोगा भट्टिनी भर्तारं सर्वगतं कुशलं पृच्छति । पाई-नीरोग महारानी ने माप सेयका कुराल-मंगल पूछा है । Nurse---The queen is well. She enquires of your lordship regarding the welfare of all. राजा-सर्वगतं कुशलमिति ? अम्ब! इशं फुशलम् । राजा--सब की कुशल? माता कुशल तो ऐसी ही है। King-OL the welfare of all, oh mother. This sort of welfarst. धानी-मा दाणि भट्टा अदिमत्तं सन्तप्पिटु । मेदानी भांतिमान सन्तप्तुम् । पाई-मय पाप भघिर चोक न करें। Narse-Nay grieve not over much. कास्फोयः--धारयत्यार्यपुत्रः उपरताऽप्यनुपरता महासेनपुत्री एयमनुकम्प्यमानार्यपुत्रेण । अथवा- पष्ठ मंक २०६ कंचुकी-मार्यपुत्र घयं धारण करें । मार्यपुत्र द्वारा इस प्रकार स्मरण की जाने वाली महासेन जी की पुत्री मर कर भी नही मरी । प्रयवा-- Chamberlain-Have patience, sire, thus held in fond remembrance she being dead yet lives or. कः कं शक्तो रक्षितु मृत्युकाले रज्जुच्छेदे के घटं धारयन्ति । एवं लोकस्तुल्यधर्मो वनानां काले-काले छिद्यते रुह्यते च ॥१०॥ अन्वय-मृत्युकाले कः कं रक्षितुं शक्तः ? रज्जच्छेदे के घट पारयन्ति ? एवं वनानां तुल्यधर्मः लोकः काले-काले छिद्यते रुह्यते च ।। संस्कृट टीका--मत्युकाले-मरणसमये, क:--मर्यात् मृत्यनिवारणतत्परोऽपि कः नरः, कम्-अतिशयप्रियमपि जनम्, रक्षितुं-मृत्यमुखात् पातु, शक्त:- समर्थः ? रज्जुच्छेदे-रज्जोः गुणस्य कृपाज्जलाहरणार्थ घटग्नीवायां बद्धस्य वस्तुन इति यावत् छेदे मंगे (सति), के--पुरुषाः, घट--रज्जुच्छेन कूपमध्ये पतन्तं कलशम्, धारयन्ति-गृहन्ति ? एवम्-इत्यम्, वनानाम्---अरण्यानाम् तत्स्यवृक्षाणामिति यावत्, तुल्यधर्म:-तुल्य: समानः धर्म: विनाशोत्पत्तिरूप. स्वभावः यस्य स तादृश., लोकः-जनः, काले-काले-समय-समये यथाकाल. मिति यावत्, छिद्यते-छेदं प्राप्नोति नश्यतीत्यर्थः, रुह्यते-च उत्पद्यते च । (मयं भावः-मृत्युकाले समायाते सति कोऽपि कमपि वातुं न शक्नोति । यथा अवलम्बमूताया रज्जो छिन्नायां सत्या घटः मध्येकपं पतति न केऽपि तं पतनाद् चारयितुं प्रभवन्ति तथैव आयपः क्षये सति म्रियमाणं जनं रणितु कोऽपि न क्षमो भवति । तथा च वनस्थाः पादपा यथा यथाकालमुत्पद्यन्ते विनश्यन्ति च, एवमेव प्राणिनां जन्ममृत्यू नियतकालमाविनावनिवायों स्तः । इत्थं च सर्वथा देवपरतन्त्र संसारे भवता धैर्यमवलम्ब्य वासवदत्ताविषये शोको न कर्तव्यः।) ॥१०॥ अनुवाद-मृत्यु के समय कौन किसको बचा सकता है ? रस्सी के टूट जाने पर कौन घड़े को (गिरने से रोक सकते है ? इसी प्रकार वृक्षों के समान स्वभाव वाले मनुष्य समय-समय पर मरते और उत्पन्न होते हैं। (पर्थात् जैसे वक्ष समय पाने पर काटे जाते हैं और फिर समय आने पर पनप उठते हैं उसी तरह मनुष्य भी समय-समय पर मरते और उत्पन्न होते रहते हैं। ॥१०॥ Who can save one at the time of death, What can hold the water jar, when the rope is cut, Thus the world has a common स्व००-१६

स्वप्नवासवदत्तम्
peculiarity with the woods; at regular periods it is pruned and
itis grown.
-
टिप्पणी-(१) प्ररोगा-रोगरहित, स्वस्थ । नास्ति रोगो यस्याः सा भरोगा
'नमोऽस्त्यर्थानां वाच्यो वा चोत्तरपदलोपः' इति वात्तिकेन नम्बहुव्रीहिसमामः ।
(२) भर्तारम्-यहाँ द्विकर्मक प्रच्छ् धातु के योग मे 'प्रकथितञ्च' सूत्र से कर्मसंज्ञा
होने पर द्वितीया हुई ।(३) धारयतु-आश्वस्त होइये या घयं धारण कीजिये ।
(४) अनुकम्प्यमाना-अनुगृहीत की जाने वाली। मनु कम्प+णिच्+लट्
(कर्मणि), शानच् । (५) रज्जुच्छेदे-रस्सी के टूट जाने पर । यहाँ तात्पर्य
यह है कि जैसे कुएं से पानी भरने वाले घड़े की रस्सी यदि टूटी नहीं है तो सब
कोई उस घड़े को पामे रह सकते हैं, पर यदि रस्सी टूट जाती है तो कोई भी
उस घड़े को नहीं थाम सकता है । उसी तरह मनुष्य की माय जब तक प्रक्षीण
रहती है तब तक उसकी रक्षा के लिए किये जाने वाले समी उपाय सफल होते
हैं । परतु जय माय समाप्त हो जाती है तब उसे किसी भी उपाय से नही बचाया
जा सकता है । रज्ज्वाः छेदः ५० त० । यहाँ सन्धि होने पर 'छे च सूत्र से तुक
का पागम होता है। (३) एवं लोकस्तुल्यधर्मों ..-ज्यहाँ कंचुकी के कहने का
तात्पर्य यह है कि मनुष्य का स्वमाव वृक्षो की तरह होता है । जैसे वृक्ष पटते
रहते हैं मोर नये उगते रहते हैं, उसी प्रकार प्राणी मरते-जीते रहते हैं। मतः
यासवदत्ता का मरना स्वामाविक ही था। पाप उसे यवा नहीं सकते थे । उसके
लिए प्रव शोक करना व्यर्थ है । (७) तुल्यधर्म:-तुल्यः धर्मः यस्य सः ब० म० ।
यद्यपि इसका तुल्प शब्द 'बनानाम्' से सापेक्ष है, फिर भी 'सापेटत्येऽपि गमावात्
समासः इस कारिका के बल से समास हुमा । यहाँ 'पर्मादनि केवला' मूत्र
मे पनि होने पर 'तुल्यपर्मा' पाठ उचित या किन्तु 'समासान्तपिपिरनित्यः'
से पनि का प्रभाव करके 'तुल्ययमः' पाठ भी मसंगत नहीं कहा जा साता।
(८) बनानाम्--यहाँ तुल्य के योग में 'तुल्यापरतुप्लोरमाम्यो ततीपान्दार-
म्याम्' गूत्र से पटी हुई।(E) काले काले वीप्सा में विपरित हुई है 'पासापि
परणे मप्तमी से सप्तमी हुई है। वियते रहतेये दोनों मितवाच किया
हैं। इस मोक के पूर्वार में दृष्टान्त पसंकार और उत्तराषं मे उपमा असर
है। तल्लक्ष-इप्टान्तः पुनरेतेषां सर्वेषां प्रतिबिम्यनम् पनि उम्मान, उमेर,
उनी विगणयपा मापारण पमं गबरे मित्र होते हुए भी उरमान, मेस में
"पिरतिषिय माप' होने पर दृष्टान्त होता है। इसमें शामिनी है।
सम्मान--मागो ग्यामिनी देदमोरः ॥१०॥

पष्ठ पंक राजा--आर्य मा मैवम्, राजा--भायं ऐसा मत कहिये. King-Friend, say not so. महासेनस्य दुहिता शिष्या देवो च मे प्रिया । फर्य सा न मया शक्या स्मर्तु देहान्तरेष्यपि ॥११॥ भन्यप-महामेनस्य दुहिता मे शिप्या प्रिया देवी प, सा देहान्तरेप मपि मया स्म' कयं न वाक्या ? ॥११॥ संस्कृत टीका-महासेनस्प-प्रद्योतस्य, दुहिता-पुत्री, मै-मम, शिष्या- छात्रा, प्रिया-अभिमता, देवी प--प्रमिपिता महिषी च (प्रामीत), सा-- वामवरता, देहान्त रेप पि--मन्येप जन्ममु पपि, मया-उदयनेन, स्म- चिन्तयितुं', कर्य-चन प्रकारेण, न क्या-म योग्या? (मर्य माव:- उग्जयिनीपत: प्रद्योतस्य तनया वासवदत्ता मम अन्तररिया प्राणवल्ममा पट्टरानी च मासीत् । मतम्तामहं जन्मालरेप्यपि विस्मतुं न शक्नुपाम्, रिभुत एसम्मिन जन्मनि) मनुवार--महामेन जी की पुत्री मेरी गिप्या पार पारी पटरानी थी। मसा में जन्मजन्मान्तर में भी मे उसरा म्मरण नहीं कर सकता ? ॥११॥ Mabasena's daughter was my pupil and a dear queen. Hov would she not be remembered by the even in different bodies (i. c, future births.) टिप्पणी-110 हितायोपि इति दुहिता + (२) fa- पिने पनुवापन नीयने या मा निमा शाम+पर 'एनितुपामारपः कमर' अनि पूग । (३)यो-दोमनिया गा देवी+प-दीर। (v) सामरा ता पद पामरा महामहिम प्रयोत जी की पूरी १-यो एरपारण वगरे मामरण मिए पनि महीनोमारण विदमान है ।मिट में मरम्मान में भी परो भूप माग जाम की तोशाम ही न? (५) रेशमां--पाई देहानि मा- पारागिर निगममाम: यात्री--माह महिमो 1--उपरदा सासरासा। मम या महामेनाग या आरिमा गोगात प्राममा, सारिगो एप गुमं पाम एण २१२ स्वप्नवासवदत्तम् । अभिप्पेदो जामादुअत्ति । एदणिमित्तं उज्जइणि प्राणीदो । अणग्गिसक्खि वीणाववदेसेण दिण्णा अत्तणो चवलदाए अणिवृत्तविवाहसङ्गलो एव्व गदो । अहअ प्रीहि तव अ वासवदत्ताए प्र पडिकिदि चित्तफलाए आलिहिअ विवाहो णिन्वुत्तो। एसा चित्तफलआ तव समासं पेसिदा । एवं पेक्खिन णिन्दो होहि । [आह भट्टिनी--उपरता वासवदत्ता । मम वा महासेनस्य वा यादृशौ गोपालकपालको, तादृश एव त्वं प्रथम- मेवाभिप्रेतो जामातेति । एतन्निमित्तमुज्जयिनीमानीतः। अनग्नि- साक्षिकं वीणाव्यपदेशेन दत्ता । आत्मनश्चपलतयाऽनिर्वृत्तविवाह- मङ्गल एवं गतः। अथ चावाभ्यां तव च वासवदत्तायाश्च प्रतिकृति चित्रफलकायामालिख्य विवाहो निर्वृत्तः । एषा चित्रफलका तव सकाशं प्रेषिता । एतां प्रेक्ष्य निर्वृत्तो भव ।] संस्कृत टीका---मट्टिनी--स्वामिनी, पाह-कथयति,--वासवदता-मम पुत्री, उपरता-मता । मम--अङ्गारवत्याः, महासेनस्य वा-महाराजप्रद्योतस्य वा, यादृशी-यथा प्रीतिमाजी, गोपालकपालको-एतनामको पुत्रो, तादृश एव तत्सदृश एव,-त्वं--भवान्, प्रथममेव--पूर्वमेव, मभिप्रेतः-ममिमतः, जामाता--मम दुहितुः पतिः इति । एतनिमित्तम्-जामातृकरणार्थम्, (त्यम्। उज्जयिनीम्-अवन्तिपुरीम्, मानीत:--प्रापितः । मनग्निसाक्षिकम्-न विद्यते मग्निः वैवाहिकोऽग्निः साक्षी साक्षात् द्रष्टा यस्मिन् कर्मणि तत् यथा स्यात् तथा, वीणाव्यपदेशेन-वीणावादनशिक्षाव्याजेन, दत्ता-समपिता वासवदत्ता तुम्ममिति शेषः । किन्तु त्वम्) भात्मनः-स्वस्य, चपलतया-घञ्चलतया, भनियंत- विवाहमङ्गल एव--प्रनित न निष्पादित विवाहमंगलं परिणयोत्सवः यस्य स तपामूत एव, गतः-उज्जयिनीतः पलायितः । भय च-मनन्तरम्, मावाम्माम् --मया महाराजेन छ, तव-मवतः, वासवदत्तायाश्च--स्वपुश्याः, प्रतिकृति -चित्रम्, विषफलकायाम्-चित्राधारमते काष्ठफलके, पालिस्य--निर्माय, विवाहः-परिणयः, निवृत्त:--सम्पादितः । एपा-इयं, चित्रफसरा-चित्रपाठ फलक, तप, सकाश-समीपे, प्रैपिता--प्रहिता। एताम्-चित्रफलकाम, प्रेश्य- दृष्ट्वा, नितो भव-पाश्वस्तो मय । मपं भावः-दुर्दयोदयात् पासवदत्ता मता । मम महाराजस्य च स्वपुत्रगोपासकपासक्यत् स्वयि पारसल्यं वर्तते । प्रतएव–पूर्वमेव स्वम् मादाम्याम मनसा जामाता कस्पितः । तामेव मनामना पष्ठ मंक २१३ पूरयितु त्वम् उज्जयिन्यामपस्पापितः। विधिवग्निसाक्ष्येण विवाहमकृत्वव योणावादनकलाशिक्षायाः माजेन तुभ्यम् अपिता स्वपुत्री वासवदत्ता। परन्तु चेतमश्चाञ्चल्येन त्वं विवाहमंगलविधानमनपेक्ष्येव वासवदत्तामपहृत्य कौशाम्बी प्रति पलायितः । तदनन्तरम् स्वामिलापं पूरपितुकामो मावाम् युवयोः प्रालेख्य- कल्तियोः कृत्रिमं विवाहमंगल सम्पादितवन्तौ । तदिद चित्रफलक युप्मदाकार- मंवादिचित्रे धारयत् तव ममीपे प्रेष्यते । अस्मिन् वासवदत्तामूर्ति दर्श दर्श कश्चित् प्रात्मानं पारय ।)। अनुवाद-महारानी ने कहा है कि वासवदत्ता मर गई है। मेरे और महाराज के लिए जैसे गोपालक और पालक हैं वैसे ही तुम हो, जो पहले ही दामाद मान लिय गये थे। इसी कारण तुम उज्जयिनी मे लाये गये। अग्नि को साक्षी बनाये बिना ही वीणा (मिखाने) के बहाने वह तुम्हें दे दी गई थी। अपनी चचलता के कारण तुम विवाह के उत्सव को सम्पन्न किये बिना ही चले गये थे। पश्चात् हमने तुम्हारा और वासवदत्ता का चित्र एक चित्रपट पर बनवाकर विवाह कर दिया था। यह चित्रपट तुम्हारे पास भेजा है। इसे देखकर चयं धारण करो। Nurse-The queen says Vasavadatta is dead. You were.to me or to Mahasena as deara son in law from the first as are Gopalak and Palak. You were, for this very purpose brought to Ujjayini. Without a fire as witnese, she was given over under the device of lute. Owing to: the nuptial celebrat portraits patated o This picture-tablet टिप्पणी (१) अभिप्रेतः-इष्ट या स्वीकार कर लिया था। अमि-प्र/इ +क्त । महासेन तथा उसकी रानी अंगारवती के उदयन को अपने जामाता बनाने के निश्चय को वशामिमान के कारण उदयन द्वारा ठुकरा दिया गया था। अत: उसे बन्दी बना लिया गया। प्रद्योत ने वासववत्ता को वीणावादन की शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य मे उदयन सम्पर्क मे रख दिया। इस प्रकार दोनों मे प्रेम उत्पन्न हो गया तथा अन्त मे दोनों का विवाह हो गया। (२) अनग्निसाक्षिकम्- अग्निः साक्षी यस्मिन् कर्मणि तत् अग्निसाक्षिकम् ब० स० कप् प्रत्यय, तत् यथा स्यात् तथा क्रियाविशेषणत्वात् द्वितीया, न अग्निसाक्षिकम् अनग्निसाक्षिकम् न तत्पुरुष । (३) साक्षी--साक्षात+इनि 'साक्षाद्रुष्टरि संज्ञायाम्' इति " २१४ स्वप्नवासवदत्तम् सूत्रेण ।(४) वीणाव्यपदेशन--यहां वीणा का लाक्षणिक अयं वीणावादन की शिक्षा समझना चाहिए । उसके व्यपदेश-छल से। (५चित्रफलकायाम्-- काठ, हाथीदांत प्रादि की पटिया , जिस पर चित्र बनाया जाय बनाया गया हो। यह शब्द नपुंसकलिंग है । परन्तु यहाँ स्त्रीलिंग में इसका प्रयोग 'निरकुशाः कवयः' मानकर समाधेय है । (६) निबत्तो भव--धीरज घरो। निर+वृत् + क्त (त) कर्तरि । वियोग-काल में वियोगी अपनी प्रियतमा का चित्र खीच कर सान्त्वना प्राप्त करते हैं । उदाहरणार्थ- मेघदूत में यक्ष 'दामालिख्य प्रणय- कुपितां घातुरागः शिलायाम्' । इसी प्रकार दुष्यात शकुन्तला का चित्र खोच कर प्रात्मसन्तोष पाता है। राजा-अहो ! अतिस्निग्धमनुरूपं चाभिहितं तत्रभवत्या । राजा---ग्रहा ! महारानी ने अत्यन्त प्रेमपूर्ण और अनुरूप ही कहा । King-Oh very loving and fitting words from ber ladyship. वाक्यमेतत् प्रियतरं राज्यलाभशतावपि । अपराद्धेष्वपि स्नेहो तदस्मासु न विस्मृतः ॥१२॥ मन्वय-एतत् वावयम् राज्यलामशतात् अपि प्रियतरम् यत् अपराद्धेषु अपि अस्मासु स्नेहः न विस्मृतः ।।१२।। संस्कृत टीका-एतत्-मदवथ्वा प्रहितं, वाक्यं-सन्देशवचनं, राज्यतामा दातात् अपि-शतसंख्यकराज्यप्राप्तरपि, प्रियतरम्-अधिकप्रियम्, यत्-यस्मात् कारणात्, भपरादेषु अपि-कृतापराधेषु पपि, मस्मासु-~मयि, स्नेहः- पात्सल्यं न विस्मृतः न विस्मृति प्रापितः। (मपं भाव:--सहस्राधिकराज्य प्राप्तिरपि न तया मां प्रीणयितु प्रभवेत् यथेदमिदानीमम्बापाः सन्देशवचनं प्रीणति । यतो हि मया दुरात्मना तस्याः कन्या बलात् अपहृता, परन्तु मा कृतघोरापराधेऽपि मयि मानकोशा एव विद्यते ।) ॥१२॥ अनवार--यह (सन्देश) वपन सैकड़ो राज्यों के साम से भी बढ़कर प्रिय है। क्योकि उन्होंने मुझ मपराधी के प्रति भी अपना स्नेह नहीं मुलाया है।।१२॥ These words are more agreeable than the 'acquisition of a hundred kingdom, since even towards offenders like w affection was not forgottea. टिप्पणी-(१) प्रतिस्निग्यम्- -पत्यन्त प्रेमपूर्ण । मनिहितम्' की विशेषता बतलाता है। पति+लिह, क्त (त) कतरि। (२) अनुरूपम्-मनुस ।

पष्ठ प्रक २१५ रूपस्य योग्यम् इति अव्ययोमाव समास । (३) राज्यलामशतात्यहाँ शत शब्द बहुत्वबोधक है । इसलिएसंकड़ों-हजारों राज्यों के लाम से-ऐसा मर्थ कर सकते हैं । वस्तुतः राज्यानां लामाः ५० व०, तेषां शतम् प०तः । तस्मात्-- इस प्रकार समास होने से शत शब्द का अन्वय राज्यलाम से है न कि राज्य में। ऐसी स्थिति में संकड़ों राज्य प्राप्तियों से-ऐसा अर्थ करना उचित 'प्रतीत होता है। (४)प्रियतरम्---इदम् प्रनयोः प्रतिशयेन प्रियम् इति विग्रहे प्रिय+तरप् । (५) अपराद्धेष-अप्/राध्+क्त (त) (तरि)। यह अनुष्टुप् छंद है ॥१३॥ पद्मावती--अस्यउत्त! चित्तगदं गुरुप्रणं पेविखन अभिवाददुइच्छामि। [प्रार्यपुत्र ! चित्रगतं गुरुजनं प्रेक्ष्याभिवादयितुमिच्छामि 1] पद्मावती-मार्यपुत्र ! चित्र-स्थित गुरुजन को देखकर में प्रणाम करना चाहती हूँ। टिप्पणी--अभिवादयितुमिच्छामि--प्रणाम करना चाहती हूँ। इस पक्ति में पद्मावती का पादर्श चरित्र द्रष्टव्य है । भपनी बड़ी मगिनी के समान वासवदत्ता के चित्र को प्रणाम करना चाहती है। उसके प्रति तनिक भी ईर्ष्या नहीं है। Padmavati --Seeing the elder pepole in pictures I wish to salute. घात्री-पैक्खदु पेक्खदु भट्टिदारिआ । (चित्रफलकं दर्शयति ।) [प्रेक्षतां प्रेक्षतां भर्तृदारिका ।] घाई--देखिये, राजकुमारी जो देखिए । (चित्रपट दिखलाती है ।) Nurse-Shows the picture board) princess, have a look,see. पद्मावती- [दृष्ट्वा प्रात्मगतम्)हं ! अदिसदिसा सू इअं अय्याए आवन्तिनाए । [प्रकाशम् ] अय्यउत्त! सदिसी खु इअं अय्याए ? हम् ! अतिसदृशो खल्वियमाया प्रावन्तिकायाः । आर्यपुत्र ! सदृशो खल्वियमार्यायाः ?] पद्मावती--(देखकर मन) ऐं ! यह तो मार्या भावन्तिका से बहुत मिलनो-जुलती है। (प्रकट) आर्यपुत्र ! क्या यह मार्या के समान ही है ? Padmavati-Seeing, asid:) why this is, like the lady of Avantika. (aloud) My lord, this portrait, is it like the queen, राजा--न सदृशी । सवैति मन्ये । भोः ! कष्टम् ।

स्वप्नवासवदत्तम् राजा-समान ही नही, वही है-ऐसा मैं समझता हूँ। हाय ! कष्ट ! King-Not only similar I think it is herself. Oh alas. अस्य स्निग्धस्य वर्णस्य विपत्तिारुणा कथम् । इदं च मुखमाधुर्य कथं दूषितमग्निना ॥१३॥ प्रन्यय--अस्य स्निग्धस्य वर्णस्य दारुणा विपत्तिः कथम् ? इदम् मुखमाधुर्य च भग्निना कथं दूपितम् ? ॥१३॥ संस्कृत टीका--अस्य--दृश्यमानस्य, स्निग्घस्य-स्नेहरसपूर्णस्य मनोहर- स्येति यावत्, वर्णस्य-रूपस्य, दारुणा-मीपणा, विपत्तिः-प्रापत्, कथं- किमिति अमवत् इति शेषः । इदम्--एतादृशम्, मुखमाधुर्य च-मुखस्य वदनस्य माधुर्यं रमणीयत्वं च, अग्निना-वह्निना, कथं-केन प्रकारेण, दूपितं-विनाशितम् ? (अयं भाव: प्रहह! ईदशो नयनाकर्षको वर्णः कयं दारुणया विपत्त्या कवलितः ? किञ्च इदं वदनसौन्दर्यम् अग्निना कथं विलोपितम्) ।।१३।। अनुवाद--इस मनोहर रूप पर दारुण विपत्ति कैसी पड़ी ? भोर इस मुखमाधुरी को अग्नि ने कैसे बिगाड़ दिया? ॥१३।। How could this delicate complexion suffer such cruel injury? How could the flames destroy the sweetness of this countenance ? टिप्पणो-(१) प्रावन्तिकायाः- इसमे 'तुल्यार्थरतुलोपमाभ्यां तृतीया- न्यतरस्याम्' सूत्र से पष्ठी हुई । (२) स्निग्धस्य--सरस, चिकना, आकर्षक । Vस्निह,+क्त (त । (३) वर्णस्य-रूप, प्राकृति। (४) विपत्तिः--वि./ पद्+क्तिन् । (५) दारणा--मयकर । 'दारुणं मीपणं मीष्मम्' इत्यमरः । यह शब्द विशेषण बनाने पर अपने विशेष्य के समान लिग में प्रयुक्त होता है । दारुण+ अच्-टाप् (प्रा) । यह अनुष्टुप् छन्द है ॥१३॥ पद्मावती-अय्यउत्तस्स पडिकिदि पेविखन जाणामि इअं' अय्याए सदिसी ण वेत्ति ।[आर्यपुत्रस्य प्रतिकृति प्रेक्ष्य जानामीयमार्यया' सदृशी नवेति ।] पद्मावती-आर्यपुत्र का चित्र देखकर मै समझूगी कि यह प्रार्या के समान है या नहीं। Padmavati–By looking on your counterfeit my lord, I shall judge better whether the queen's is like or not. धात्री--पेवखदु पैक्खदु भट्टिदारिया।[प्रेक्षता प्रेसतां भदारिका।]

पाठक २१७ घात्री--देखिये, राजकुमारी जी ! देखिये । Nurse-princess, have look, seer पद्मावती---[दृष्ट्वा] अय्यउत्तस्स पडिकिदीए सदिसदाए जाणामि इसं अय्याए सदिसो ति। [प्रार्यपुत्रस्य प्रतिकृत्याः सदृशतया जानामीयमार्यायाः सदृशोति ।। पद्मावती--(देखकर) आर्यपुत्र के चित्र को समानता देखकर में समझती हूँ कि यह मार्या के सदृश ही है । Padmavati-(After seeing) By the resemblance of the portra: it of (your) lordship, I find that this is a likeness of her ladyship. राजो-देवि ! चित्रदर्शनात् प्रभृति प्रहृष्टोद्विग्नामिव त्वां पश्यामि । किमिदम् ? राजा--देवी ! चित्र देखने के समय से मैं तुम्हें प्रसन्न और उद्विग्न-सी देख रहा हूँ । यह क्या? King-Queen, from the time you saw the portrait I find you to be dejected after being overjoyed. पद्मावती-अय्यउत्त! इमाए पडिकिदिए सदिसी इस एक्व पडि वसदि । [आर्यपुत्र ! अस्याः प्रतिकृत्याः सदृशोहैव प्रतिवसति ।] पद्मावती-प्रार्यपुत्र ! इस चित्र की जैसी (एक स्त्री) तो यही रहती है। Padmavati-There is one living in this very place who is the living image of this porait, राजा--क वासवदत्तायाः ? राजा--क्या वासवदता की जैसी ? King-Vasavadatta's portrait ? पद्मावती-आम । [आम् ।] पद्मावती-हो। Padmavati-Yes my lord. राजा-तेन हि शीघ्रमानोयताम् । राजा-तो सीन लिवा सायो। King-Then let herbe brought here with all speed, स्वप्नवासवदत्तम् पद्मावती--अय्यउत्त! मम कण्णाभावे केवि बह्मणेण मम भइणि- अत्तिण्णासो णिक्खित्तो। पोसिदभत्तुआ परपुरुषसणं परि- हरदि । ता अय्यं मए सह आप्रदं पेक्खिा जाणादु अय्यउत्तो । [आर्यपुत्र ! मम कन्याभावे केनापि ब्राह्मणेन मम भगिनिकेति न्यासो निक्षिप्तः । प्रोषितभर्तृका परपुरुषदर्शनं परिहरति । तदार्या मया सहागतां प्रेक्ष्य जानात्वार्यपुत्रः ।। संस्कृत टीका--मम--पद्मावत्याः, कन्याभावे अविवाहितावस्थायाम्, केनापि-केनचित्, ब्राह्मणेन-विप्रेण, मम-मदीया, भगिनिका--स्वसा, इति (उक्त्वा), न्यासः-निक्षेपः, निक्षिप्तः-स्थापितः, प्रोपितमर्तृका-प्रोपितः प्रवासं गतः मर्ता पतिः यस्याः सा, परपुरुषदर्शनं-स्वस्वामिभिन्नपुरुषावलोकन, परिहति-वर्जयति । तत्-तस्मात् कारणात्, मार्याम्--मत्समीपे रक्षिताम् ब्राह्मणभगिनीम्, मया सह-मया साकम्, मागताम्-समायाताम्, प्रेक्ष्य-- दृष्ट्वा, जानातु--निश्चयं करोतु, मार्यपुत्र:--मवान् । अनुवाद--पद्मावती--मार्यपुत्र ! जब मै कुमारी थी तब किसी ब्राह्मण ने 'मेरी बहन है ऐसा कहकर उसे (मेरे पास थाती रख दिया। पति के परदेश मे होने के कारण वह दूसरे पुरुष को देखने से परहेज करती है। इसलिए मेरे साथ भाती हुई उस देवी को देखकर प्रार्यपुत्र समक्ष ले (अर्थात् मैं किसी बहाने उसको अपने साथ लाती हूँ। आर्यपुत्र उसे देखकर निश्चय करें कि वह वासवदत्ता ही है या मोर कोई ।) Padmavati-Your Majesty, in my maidenhood a certain Brahmin, describing her to be bis younger sister, made her over so me as a treasure (Nyasa). Her husband being abroad, she avoids the sight of other men, but I will bring her that you may see and know her for yourself. टिप्पणी-(१) मार्यपुत्रस्य प्रतिकृतिम्-यहां भाव यह है कि यदि माप वाले चित्र मे चित्रकार ने आपकी छाया ठीक-ठीक उतारी होगी तो उसी चित्रकार द्वारा चित्रित की हुई मार्या वासवदत्ता की छाया भी ठीक ही होगी । इसलिए मै भायपुत्र का चित्र देखना चाहती हूँ। (२) प्रतिकृति-चित्र, प्रतिमा । 'प्रतिमा प्रतियातना प्रतिच्छाया प्रतिकृतिरा पुसि प्रतिनिधिः' इत्यमरः! (३) जानामि--यहाँ 'वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा' सूत्र से भविष्यत्काल के अर्थ लट् लकार हुमा । (४)चित्रदर्शनात्प्रभृति--यहाँ 'कार्तिक्याः प्रमृति' इस १ष्ठ अंक २१६ माप्पप्रयोग के वल से प्रभूत्ययं योग मे पचमी हुई। (५) प्रहष्टोद्विग्नाम्- प्रसन्न और घबड़ापी हुई। प्रहृष्टा++हृष्+क्त(त) (कतरि)+टाप् (प्रा) उद्विग्ना--उत्+विन्+क्त (1) करि+टाप् (प्रा)। यहां पद्मावती को प्रमलता इस बात से है कि वासवदता जीवित है और घबड़ाहट इस कारण हो रही है कि एक ब्राह्मण द्वारा अपनी बहन बताकर थाती के रूप मे रखी हुई भावन्तिका को वह कैसे प्राप्त कर सकती है। (६) प्रोषितभर्तृका-प्रोषितः मर्ता यस्याः मा-वह स्त्री जिसका पति परदेश चला गया हो। 'नतः कप' सूत्र सेक प्रत्यय ।(७)तां भय्यं मए "----यहाँ कोई 'ता प्रय्या पेखदु सदिसी गति (तदार्या पश्यतु सदृशी नवेति) ऐसा पाठ मानते हैं । इसका अर्थ होगा-इसलिए. आर्या वसुन्धरा देखें कि वह वासवदत्ता की जैसी है या नहीं। राजा--पदि विप्रस्य भगिनी व्यक्तमन्या भविष्यति । परस्परगता लोके दृश्यते रूपतुल्यता ॥४॥ अन्धय-यदि विप्रस्य भगिनी व्यक्तम् अन्या भविष्यति । लोके परस्परगता रूपतुल्यता दृश्यते ।।१४॥ संस्कृत टीका---पदि चेत्, (सा) विप्रस्य--ब्राह्मणस्य, मगिनी--स्वसा (भवेत् तर्हि) व्यक्तम्, स्पष्टम्, अन्या- इतरा, भविष्यति--स्यात् । लोके-- ससारे, परस्परगता-पारस्परिकी, रूपतुल्यता-स्वरूपसादृश्य, दृश्यते--- अवलोक्यते । (मयं भावः त्वत्समीपे विद्यमाना सा महिला यदि ब्राह्मणस्य स्वमा वर्तते तहि सा वासवदत्ता नंद मवेत्। यतो हि वासवदता राजकुलप्रसूता, इस च ब्राह्मणी । का तयोस्तुल्यता ? रूपसादृश्य तु जगति बहु दृिश्यते । एताद- मात्रसादृश्यात् सा वासवदत्तवेति निश्चयकरण न समीचीनम् ।)॥१४॥ अनुवाद-राजा-यदि (वह) ब्राह्मण की बहन है तो स्पष्ट (है कि कोई) दूसरी होगी। क्योकि ससार मे (बहुतों के स्वरूप एक दूसरे से मिलते-जुलते दिखाई पड़ते हैं ॥१४॥ King-A Brahmin's sister ? Then she needs must be some other person. It is a chance resemblance, such as are often mst with in this world. टिप्पणी--(१)मरतम्-वि/पञ्+क्तु (त)। अत्र कियाविशेषण- त्वात् द्वितीया । (२) परस्परगता-सविमक्तिकस्य परशब्दस्य 'कमव्यतिहारे सर्वनाम्नो देवाच्ये समासवच्च बहुलम्' इत्यनेन द्वित्वे 'मसमासवद्भावे पूर्वपदस्य . २२० स्वप्नवासवदत्तम् मुपःसुवक्तव्यः' इत्यनेन पूर्वपदस्य विभक्तेः सु प्रादेशे सस्य रुत्वे विसर्गे च 'कस्कादिप च' इत्यनेन विसर्गस्य सत्वे परस्परम् सिध्यति, परस्परम् गता इति 'परस्परगता द्वि० त०। (३) रूपतुल्यता--रूपयोः रूपाणाम् वा 'तुल्यता रूप- तुल्यता ष० त० यह मनुष्टुप छद है ।।१४।। (प्रवैश्य) प्रतीहारी-जेदु भट्टा । एसो उज्जइणीओ बह्मणो, भट्टिणीए हत्य मम भइणिप्रति ण्णासो णिविखत्तो, त पडिग्गहिदु पडिहारं उठ्ठिदो। [जयतु भर्ता । एप उज्जयिनीयो ब्राह्मणः, भट्टिन्या हस्ते मम भगिनिति न्यासो निक्षिप्तः, तंप्रतिग्रहीतुं प्रतीहारमुपस्थितः ।। (प्रवेश करके) प्रतिहारी--महाराज की जय हो । उज्जैन के रहने वाले एक ब्राह्मण दरवाजे पर खड़े हैं; जो कह रहे हैं कि स्वामिनी के हाथ में मैने 'अपनी बहन को थाती रखा था। उसे लेने पाया हूँ । (Entering) Door-keeper-Hail, Sire, A Brahmin of Ujjain, who left his sister in the keeping of the queen-so he declares-- thas come to take her hence, and waits before the gate. राजा-पद्मावति ! किन्नु स ब्राह्मणः ? राजा--पद्मावती ! क्या (यह) वही ब्राह्मण हैं ? ' King-Padmavati, is he the same Brahmin ? 'पद्मावती--होदव्वं । [भवितव्यम्] पद्मावती-हो सकता है ! Padmavati-He may be. ' राजा--शीघ्र प्रवेश्यतामभ्यन्तरसमुदाचारेण स ब्राह्मणः । राजा--गृहोचित शिष्टाचार के साथ उस ब्राह्मण को शीघ्र अन्दर ले प्राप्रो । King-Bring in that Brahmin with the 'formalities of the internal apartments. प्रतिहारी-जं भट्टा आणवैदि । (निष्क्रान्ता ।) [ यद्भाज्ञापयति ।] प्रतिहारी-जो स्वामी की आज्ञा । (चली जाती है।) Door-keeper-As your majesty commands. राजा--पद्मावति ? त्वमपि तामानय ।

पष्ठ अंक २२६: राजा-पद्मावती ! तुम भी उसे ले पायो। King-Padmavati you too bring her. पद्मावती--जं अय्यउतो प्राणवैदि। (निष्क्रान्ता) [ यद् प्रार्यपुत्रः आज्ञापयति । पद्मावती-जंसी प्रार्यपुत्र को प्राज्ञा । (चली जाती है।) Padmavati--As your lordship commands (exit), टिप्पणो--(१) उज्जयिनीय:--उज्जयिनी निवासोऽस्य इति विग्रहे 'सोऽस्य निवासः' इत्यधिकारे 'वा नामधेयस्य' इति वृद्धसंज्ञायां 'युद्धाच्छः' इति सूत्रेण छप्रत्यये तस्य ईयादेश: । (२) प्रतिग्रहीतुम्---प्रति+ ग्रह +तुमुन् (तुम्) । (३) उपस्थित:---उप+स्था+क्त (त) । (४) अभ्यन्तरसमुदाचारेण-अभ्यन्तरे --गृहाभ्यन्तरे यः समुदाचार:--पाद्यादिप्रदानरूपोऽतिपिजनोचित: सत्कारः, तेन तत्पूर्वकेणेत्यर्थः। (ततःप्रविशति यौगन्धरायणः प्रतीहारी च।) यौगन्धरायणः-भोः ! प्रात्मगतम्] (तदनन्तर यौगन्धरायण और प्रतीहारी का प्रवेश 1) यौगन्धरायण-- (मन में) पाह। (Then enter Yaugandharayan and the door-keeper) Yaug- (Aside.) प्रच्छाद्य राजमहिषों नृपहितार्थ कामं मया कृतमिदं हितमित्यवेक्ष्य । सिद्धेऽपि नाम मम कर्मणि पाथिवोऽसौ कि वक्ष्यतीति हृदयं परिशङ्कितं मे ॥१५॥ अन्वय--मया नृपतेः हितार्थम् राजमहिषीम् प्रच्छाद्य इदम् हितम् इति अवेक्ष्य काम कृतम् । मय कर्मणि सिद्ध अपि नाम असो पार्थिवः कि वक्ष्यति इति मे हृदयं परिशङ्कितम् ॥१५॥ संस्कृत टीका--मया--योगपरायगेन, नृपतेः--राज्ञः, हितार्थम्-उप- काराय, राजमहिपीम्---पट्टराज्ञी वासवदत्तामिति यावत्, प्रच्छाद्य-सङ्गोप्य, इदम्--पद्मावत्या सह महाराजस्य परिणयनम्, हितम् --लाभकरम्, इति- इत्यम्, प्रवेक्ष्य--पालोच्य, काम--स्वर यथा स्यात् तथा, कृतं-विहितम् ।

२२२ स्वप्नवासवदत्तम् मम--मसम्पादिते, कर्मणि-कार्य, सिद्ध प्रपि--साफल्यं प्राप्ते भपि, नाम- 'वाक्यालङ्कारार्थमिदमव्ययम्, प्रसौ-प्रपं, पार्थिवः-राजा, कि वक्ष्यति---कि कथमिष्यति, इति--एवं विचार्य, मे--मन, हृदयं--चेतः, परिट्टितम-- 'शङ्काकुलम् (विद्यते) । (प्रय भावः--पद्मावत्या सह महाराजस्य विवाहे संवृत्ते मगधेश्वरसाहाय्यलामेन स्वामी शत्रु पराजित्य अपहृतं राज्यं पुनः स्वायतोकतुं प्रभवेत् इत्यस्माक योजना राज्ञः प्रणयविशेषशालिन्या वासवदत्ताया विद्यमानाया दुघंटा इति विमृश्य 'बह्रो वासवदत्ता दग्या' इति मिथ्याप्रवादं प्रचार्य मया राज्ञः प्राणेश्वरी वासवदत्ता भावन्तिकावेषेण पद्मावत्या हस्ते न्यस्तीकृता । अथ साफल्य प्राप्तायामस्माकं योजनायाम् मया सर्वमप्यनुष्ठितं स्वामिहितसम्पादनायैवेति जाननप्यहं विमेमि यत् स्वामी मदीयं कार्पमिदम् उचितम् अनुचितं वा वेत्स्यति •तदयं च साध्यसाघु किं वा कथयिष्यति इति ।) ॥१५॥ अनुवाद--मैने राजा के हित के लिए महारानी को छिपाकर इसी में कल्याण है- ऐसा सोच कर मनमाना काम किया। परन्तु मेरे प्रयत्नों के सफल हो जाने पर भी 'ये राजा क्या कहेंगे' यह सोचकर मेरा हृदय शंकित हो रहा -- Having conceald the queen for the welfare of the king, I have willingly done this, thinking it to be his good, Even though my action has really been accomplished, I feel doubtful as to what the king would say, टिप्पणी-११) हितार्यम्/घा+क्त (भावे) 'दधातेहिः' इति सूत्रण घा इत्यस्य हि प्रादेशः हिताय इदम् इति हितार्थम् अन नित्यसमासो विशेष्य- लिङ्गता चेति वक्तव्यम्' इति वातिकेन नित्यसमासः। (२) राजमहिषीं-- महारानी को, राज्ञः महिषी ताम् (५० त०) । (३) प्रच्छाद्य--/छन्+ 'णिच्+क्त्या-त्यप् । (४) प्रवेष्य--विचार कर। अब ईश्+क्त्वा-त्यप् । (५) कामम--स्वेच्छा से । पत्र क्रियाविशेषणत्वात् द्वितीया । (६) कर्मणि--- अन यस्य च मावेन मावलक्षणम्' इति सूत्रेण सप्तमी । (७) पार्थिवः-पृथिव्याः ईश्वरः इत्यर्थे पृथिवी+मन् । यह वसन्ततिलका छंद है । यौगन्धरायण का प्रकार घबड़ाना स्वाभाविक ही था। राजाया तो उसकी स्वामिभक्ति से प्रमान होता या पनि प्रकट करता ॥१५॥ प्रतीहारी-एसो भट्टा। उवसम्पदु अग्यो। [एप भर्ता । उपसर्पत्वार्यः।

पष्ठ ग्रंक २२३ प्रतीहारी-ये स्वामी हैं। भाप समीप जाय । Door-keeper-Here is the king. Approach him. यौगन्धरायणः--[उपसृत्य] जयतु भवान् जयतु । पौगन्धरायण-(समीप जाकर) मापकी जय हो । Yaug.-(Going near) Hail my lord. राजा--श्रुतपूर्व इव स्वरः । भो ब्राह्मण ! किं भवतः स्वसा पद्मावत्या हस्ते ग्यास इति निक्षिप्ता ? राजा--यह स्वर तो पहले का सुना हुमा-सा मालूम होता है। हे ब्राह्मण ! क्या आपकी बहन पद्मावती के हाथ थाती रखी हुई है ? King—This seems a voice that have I heard before. Say Brahmin was your sister left in charge with the princess Padmavati. योगन्धरायणः--प्रथ किम् ? यौगन्धरायग---और क्या? Yaug.-She was. राजा -तेन हि त्वर्यतां त्वयंतामस्य भगिनिका । --(प्रतीहारी से) तब शीघ्र से शीघ्र इनकी वहन ला दो। King-(To the door-keeper) then bring his sister soon, प्रतीहारी-जं भट्टा प्राणवेदि ।(निष्क्रान्ता ।) [यद् भर्ताऽज्ञापयति । ] प्रतीहारी-जो स्वामी की माजा । (चली जाती है।) Door-keeper-As your lordship commands (goes.) (ततः प्रविशति पद्मावती प्रावन्तिका प्रतीहारी च ।) पद्मावती- एदु एदु अय्या। पिसं दे णिवेदेमि । [एत्वेत्वार्या । प्रियं ते निवेदयामि। (तदनन्तर पद्मावती, भावन्तिका और प्रतीहारी का प्रवेश ।) पद्मावती- पाइय, माइये प्रार्या I में मापको प्रिय बात मुनाती हूँ। (Then enter Padmavati, Vasavadatta and door-keeper.) Padmavati-Come, lady, come I have good news for you. राजा- २२४ स्वप्नवासवदत्तम् प्रावन्तिका-किं कि ? [कि किम् ?] मावन्तिका--क्या ? क्या? Vasara.-What ? Tell. me what ? पद्मावती-भादा दे प्राग्रदो। [ भ्राता ते आगतः ।। पद्मावती--प्रापके माई पाये है । Padmavati-Your brother has arrived. प्रान्तिका--दिठिमा इदाणि पि सुमरदि। [ दिष्ट्येदानीमपि स्मरति । भावन्तिका-पन्य माग्य ! अभी भी याद करते है । Vasava.-How happy that he still remembers mc. पचायती--(उपसत्य)जेदु अय्यउत्तो । एसो ण्णासो। [जयत्यार्यपुत्रः । एप न्यासः । पद्मावती-(समीप जाकर) मार्यपुत्र की जय हो । यह परोहर है। Padmavati-(Going Rear) Hail, Sire here is the pledge cntrusted to me. राजा--निर्यातय पद्यायति ! सातिमन्यासो निर्यातयितयः । इहान- भयान रेभ्यः अभयती घाधिकरणं भविष्यतः। रामा- पद्मावती ! परोहर लोटा दो। साली के सामने परोहर मोटानी पाहिए । इगमे पूग्य रम्य और पूमा वमुम्परा साशी होगे। King-Padmavati, give it back. A deposit, should be returned in the presence of witnesses. Here the honoured Raibhya ard the served Basundhata will become the tribural. पपायती-प्रम्य ! पीपदादाण प्रग्या । [माय! नीयतामिदानो- भार्या । पदमापती- पार पार पाको मेगा । radmarati-Sir, talesour sister. यात्री-पाति नियं] मम्मो ! महिरिपा पागवता! [मम्मो ! मतवारिका पाराबदसा!)

पष्ठमक २२५ धाई--(भावन्तिका को ध्यान से देखकर) अरे ! यह तो राजकुमारी वासवदत्ता है। Nurse-(Closely looking at Avantika) Ob princess Vasavadatta. राजा--कथं महासेनपुत्री ? देवि ! प्रविशत्वमभ्यन्तरं पद्मावत्या सह । । राजा-क्या महासेन जी की पुत्री? देवी ! तुम पदमावती के साथ अन्दर जामो। King-Why, she is king Mabasen's daughter, Queen go inside with Padamavati. यौगन्धरायणः-न खलु न खलु प्रयेप्टध्यम् । मम भगिनी खत्वेषा। यौगन्धरायण-नन, भीतर नहीं जाना चाहिए। यह सचमुच मेरो वहन है। Yaug.--No, no, do not go in. Really she is my sister. राजा--कि भवानाह ? महासेनपुत्री खल्वेषा । राजा-पाप क्या कहते हैं ? यह निश्चित ही महासेन जी की पुत्री है । King-What do you say sir ? She is truly Mahasen's daughter. टिप्पणी (१) श्रुतपूर्वः-पूर्व श्रुतः इति श्रुतपूर्वः 'पूर्वकालकसवंगात्पुराण- नवकेवला: समानाधिकरणेन' इति सूत्रेण समासे विशेषस्य पूर्वनिपातः । (२) न्यास इति निक्षिप्ता ?--न्यासरूपेण स्थापिता किम् ? (३) स्वयंतामस्य भगिनिका--अतिशीघ्रमानीयतामस्य स्वसा । त्वयंताम्-त्व+णिच् (कमणि यक्त लोट् ताम्) । (४) प्रियं ते निवेदयामि-सम्प्रदाने चतुर्थी । निपूर्वक प्रेरणार्थकविद् घातु के प्रकृत दशा के कर्ता को कमरूप मे प्रयुक्त न करके सम्प्रदान रूप में प्रयुक्त करते हैं । (५) निर्यानप-न्यासं प्रत्यय । “निर्यातन वैरशुद्धी दाने न्यासापणेऽपि च' इत्यमरः । (६) साक्षिमत-सातिपूर्वक । यह क्रिया- विशेषण है। माक्षी विद्यते पत्र तत् यया स्यात् तथा, साक्षिन्+मतुः । (७)निर्यात. पितयः-प्रत्यपंणीयः। यहाँ भाव यह है कि परोहर साक्षी की उपस्थिति में ही लौटानी चाहिए। क्योकि विधान ऐसा ही है। लोक मे किसी बात को लेकर विवाद खडा होने पर साक्षी ही निर्णय में सहायता प्रदान करके सगहे को निपटाता 1 यहाँ तो पाती भी विचित्र प्रकार की है । इसमें साक्षी की मोर प्रावश्यकता स्व०२०-२० २२६ स्वप्नवासवदत्तम् हैं । (८) प्रधिकरणम्--निर्णयस्यान, न्यायालय । यहाँ इसका लाक्षणिक अर्थ न्यायाधीश विवक्षित है । (६) पलु-निश्चय । यौगन्धरायणः--भो राजन् ! यौगन्धरायण--हे राजन् ! Youg-Oh king. भारतानां फुले जातो विनीतो ज्ञानवाञ्छुचिः । तन्नार्हसि बलातु राजधर्मस्य देशिकः ॥१६॥ अन्वय-भारताना कुले जातः विनीतः, ज्ञानवान्, शुचिः, राजधर्मस्य देशिकः । तत् बलात् हतुन महंसि ॥१६॥ सस्कृत टीका--(त्वम्) मारतानां भरतवंशीयाना राज्ञां, कुले-वशे, जात:--उत्पन्नः, विनीत:-नम्रः, ज्ञानवान्-प्रज्ञावान् सदसद्विवेकशील इति यावत्, शुचिः--शुद्धः पवित्राचरण इति यावत्, राजधर्मस्य-राजोचित. कर्तव्यस्य, देशिक:--उपदेष्टा (मसि) । तत्-तस्मात् कारणात्, बलात्- हठात्, हतुं--प्रहीतुम्, न पहंसि-न योग्योऽसि । (अयं भावः- है राजन् ! भवान् जगद्विदितपाण्डववंशे समुत्पन्नोऽस्ति । भवतः नम्रता, विवेकशीलता, पवित्रता एवं राजधर्मस्य उपदेष्दता सर्व:प्रशस्यते । अतः नेदमुषितं यत् भवान् मम दरिद्रस्य ब्राह्मणस्य भगिनी हठात् स्वान्तःपुरे प्रवेशयेत् ।) ॥१६॥ अनुवाद-माप मरतवशी राजामो के कुल में उत्पन्न हुए हैं, विनम्र, ज्ञानी, पवित्राचरण वाले मोर राजधर्म के प्रवर्तक हैं । इसलिए बलपूर्वक (मेरी बहन) छीनने योग्य नहीं है ।।१६।। Prince, you are sprung from the race of Bharat, well nurtuced. Well instructed, well disposed and all kingly virtues are instructive to you. You cannot, will not take her hence by force. टिप्पणी--(१) भारतानाम्--मरत के कुल में उत्पन्न अभिमन्यु से पचीसवीं पीढी मे उदयन का जन्म हुआ था। भरतस्य गोत्रापत्यानि पुमासः इति विग्रह भरत+अम् 'उत्सादिम्पोऽन्' इति सूत्रेण । (२) देशिकः--उपदेशक या प्रवर्तक प्राचार्य । देशः= उपदेशः अस्ति अस्य इति विग्रहे देश+छन्--इक । यहाँ यौगन्धरायण के कहने का तात्पर्य यह है कि हे राजन् ! माप उन राजामों के कुल मे उत्पन्न हुए हैं जो न्याय के लिए प्रसिद्ध हैं। यही नहीं, आप ज्ञानी और पवित्र - पष्ठ भंक २२७ हैं । उस पर भी प्राप राजधर्म के चलाने वाले हैं। ऐसी स्थिति में यदि माप दूमरे की स्त्री को बलपूर्वक अपने घर में डाल लेंगे तो अनपं हो जाएगा। प्रतः माप मेरी बहन को लौटा दें, अपने घर में न डालें। इस श्लोक में सभी विशेषणों के साभिप्राय होने के कारण परिकर अलंकार है। तल्लक्षणं काव्यप्रकाशे- विशेषणयंत्साकूर्तरुक्तिः परिकरस्तु सः । और इसमें अनुष्टुप् छन्द है ।।१६।। राजा--भवतु, पश्यामस्तावद्पसादृश्यम् । संक्षिप्यतां जवनिका । राजा--प्रच्छा, प्राकृतियों को समानता देखें। जरा घूघट हटाइये । Kiag--Then here let us examine thes resemblancc and let the lady's veil be removed first. योगन्धरायणः--जयतु स्वामी । यौगन्धरायण-महाराज की जय हो । Yaug-All tail myking. वासवदत्ता- -जेदु अय्यउत्तो। [जयत्वार्यपुत्रः ।। वासवावता--मार्यपुत्र की जय हो। Vasava.-AL hail my lord and husband. टिप्पणी (१) संक्षिप्यता जवनिका-जवनिका कहते हैं पर्दे को। 'प्रतिसोरा जवनिका स्यात्तिरस्करिणी च सा' इत्यमरः । किन्तु यहाँ इसका अर्थ पूंघट मालूम होता है । क्योंकि पद्मावती राजा को दिखाने के लिए वासवदता को ले पाई थी। यदि वासवदत्ता पर्दे के पीछे खडी रहती तो पद्मावती का अभिप्राय मिद्ध नहीं होता और न वसुन्धरा ही को देख पाती। फिर पद्मावती ने यौगन्धरापण के सामने जो कहा कि यह है अापकी बहन, इस वाक्य की संगति मी पर्दे वाले अर्थ में नहीं बैठती है । धात्री के पहचानने पर वासवदत्ता के प्रति राजा का प्रादेश कि देवी ! तुम पद्मावती के माय भीतर चली जामो, पर्दे वाले प्रर्य में युक्तिसगत नहीं कहा जा सकता । इन अनुपपत्तियों के कारण हम यहाँ जवनिका का अयं पर्दा नहीं कर सकते । पूघट से मी तो पर्दा होता ही । इसलिए इसका मुख्यायें से कोई विरोय मी नहीं होगा । (२) जयतु स्वामी; जयतु प्रायपुर:-यहाँ यौगन्धरायण मोर वासवदत्ता अपने छद्म वेश को हटा कर रामाका अभिवादन करने लगते हैं । वस्तुतः नाटक यहीं समाप्त हो जाता है।

२२८ स्वप्नवासवदत्तम् . राजा--प्रये ! असौ यौगन्धरायणः इयं महासेनपुत्री । राजा--परे ! यह यौगन्धरायण और यह महासेन जी की पुत्री ! King-Oh it is Yaugandharayan and this Vasavadafta. किन्नु सत्यमिदं स्वप्नः सा भूयो दृश्यते मया । अनयाप्येवमेवाह दृष्टया वञ्चितस्तदा ॥१७॥ अन्वय--इदम् किन्नु सत्यम् स्वप्नः (वा) मया सा भूयः दृश्यते । तदा दृष्टया अपि अनया एवम् एव अहम् वञ्चितः ।।१७।। संस्कृत टोका--इदम्-वासवदत्तायाः दर्शन, किन्नु सत्यम्-ययायं किम् (अथवा) स्वप्न:--स्वप्नरूपमयचाय,(यत्)मया-उदयनेन, सा--वासवदत्ता, भूयः-पुनः, दृश्यते-~-अवलोक्यते, तदा तदानी समुद्रगृहशयनसमये इति यावत्, दृष्टया अपि---प्रवलोकितया अपि, अनया--वासवदत्तया, एवमेव---- इत्यमेष, प्रहम्--उदयनः, वञ्चितः--प्रतारितः (प्रय भावः- अधुना वासव- दताया दर्शन सत्य वा स्वप्नमह पश्यामि ? पुरा समुद्रगृहे शयानेन मया वास- वदत्ता दृष्टा मासीत्, परन्तु दृष्टिगोचरतां प्रयाताऽपि सा तत्क्षणमेव अन्तहिता- ऽभूत् । इत्यं तया वञ्चितोऽहं न निर्णतु पारयामि यदियं वासवदत्ता पुरो मे वर्तते वा दृाश्रमो मे सातः 1) ॥१७॥ अनुवाद-क्या यह सत्य है या स्वप्न है, जो मैं वासवदत्ता को फिर देस रहा हूँ ? उस समय (समुद्र-गृह में सोते समय ) इसी प्रकार देखी गई उसके द्वारा मै ठगा गया था॥१७॥ It is a dream or a reality that she is seen by me again at that time I was thus certainly deceived by her when I saw her, टिप्पणी--(१) किन्न"-पहले समुद्रगृह में उदयन ने स्वप्न के मन्त में वासवदत्ता को सादात् देखा पा । परन्तु वह भाग गई । अतः उसके मस्तिस्य का निर्णय नहीं हो सका। उदयन ने इसे अपने मन का विभ्रम ही समझा। भब जब वासवदत्ता सामने आती है तब वह सोचता है कि यह कही पहले के समान ही स्वप्न तो नहीं है जोक्षण मर बाद वास्तविकता में बदल जाय और वासवदत्ता मदृश्य हो जाय । यह मनुष्य धद है ॥१७॥ यौगन्धरायणः-स्वामिन् ! देव्यपनयेन कृतापरापः खल्वहम् । तत् क्षन्तमर्हति स्वामी । [इति पादयोः पतति ।।

पष्ठमक
२२९
संस्कृत टोका-स्वामिन् ! --प्रभो !, देव्यपनयेन-देव्या: वासवदत्तायाः
अपनयन स्वरूपप्रच्छादपुरस्मरमन्यत्र नयनेन, अहम-योगन्धरायणः, खल---
निश्चयेन, कृतापराषः कृतः विहितः अपराधः दोषःयेन स तथाविधः (अस्मि)।
तत्-मम दृर्विनमचेष्टितम्, स्वामी महाराजः, क्षन्तुमर्हति-मर्पयितु
योग्योऽस्ति।
अनुवाद-~-पोगन्यरायण-महाराज! महारानी को हटाकर मैने अपराध
किया है इसे श्रीमान् क्षमा करें। (यह कहकर परों पर गिर जाता है।)
Yang.--My Lord I am to be blamed for concealing the
queen. I request you to forgive me (Falls at the king's feet).
राजा--(उत्याप्य) यौगन्धरायणो भवान् ननु ।
---(उठाकर) क्या सचमुच पाप यौगन्धरायण हैं ?
King-(Raising) Are you really Yaugandharayan?
मिथ्योन्मादैश्च युद्धश्च शास्त्रदृष्टश्च मन्वितैः ।
भवद्यत्नः खलु वय मज्जमानाः समुद्धताः ।।१८।।
अन्वय-~-मिथ्योन्मादः च युद्धः च शास्त्रदृष्टेः मन्त्रितः च मवद्यत्नः मज्ज-
माना वयम् खलु समुदताः 11१८॥
संस्कृत टीका--मिथ्योन्माद:---मिथ्या, असत्याः उन्मादाः चित्तविभ्रमाः
तैः, युद्धः-मडग्राम , शास्त्रदृष्टः-शास्त्रानुमोदितः, मन्त्रित ---गुडविचारैश्च,
भवद्यत्नः--भवतः योगन्धरायणस्य यत्नः प्रयत्नः, मज्जमाना:--मज्जनशीलाः
विपत्सागरे इति शेषः, क्यम्, पल--निःसंशयम्, समुद्धताः समुत्तारिताः प्रय
भावः---यदाऽह महासेनेन निगृह्य स्वान्त.पुरे स्थापितः तदा भवानेव उज्जयिन्याम्
मात्मानमुन्मत्तमिव प्रदर्शयन् पश्चात् प्रद्योतसैनिकः सह युद्धमपि कुर्वन् मा
बन्धनान्मोचितवान् । समय-समये स्वमन्त्रणामिः प्रयत्नश्च विपल्सिन्घो मज्ज-
मानान् अस्मान् समुत्तारितवान् । इदानीमपि सजाता स्वराज्यप्राप्तिरपि
मद्राजनीतेरेव फलम् इत्थं परमोपकारिणो भवतः उपकारान् कथमहं
विस्मर्तुं शक्नुयाम् ? अतएव न मनागपि मदतोऽपराधः । भवान् सबंधा प्रशंस-
नीय एव1) ॥१८॥
मनुवाद-~मापने बनावटी पागल की-सी चेष्टायों, युद्धों, शास्नसम्मत
परामों और प्रपत्नों द्वारा निःसन्देह (विपत्ति-सागर में) इछते हुए हमें
उबारा है ॥१८॥

२३० स्वप्नवासवदत्तम् By feigned insanity, battles, counsels and your efforts we have indeed been sell saved from sinking into the ocean of misfortunes. टिप्पणी--(१)मिथ्योन्मादः--झूठा पागलपन। 'उन्मादश्चित्तविभ्रमः' इत्यमरः । उद्/मद्+घउन्माद । मिथ्या उन्मादाः मिय्योन्मादाः सुप्सुपा समास । करणे तृतीया । जब प्रद्योत ने उदयन को बन्दी बना लिया था तब यौगन्धरायण पागल का रूप धारण करके उज्जयिनी में रहने लगा था। वहाँ रहते-रहते वह राजा को निकालने का प्रबन्ध कर चुकने के बाद उसे लेकर वहाँ से भाग गया था । जव प्रद्योत की सेना ने उसका पीछा किया तो उसने डट कर मुकाबला किया था। (२) युद्धः-युध्+क्त (त) । करण में तृतीया हुई है। (३) शास्त्रदृष्ट:--राजनीति के सिद्धान्तों के अनुकूल । शास्त्रे दृष्टानि शास्त्र. दृष्टानि सप्तमी तत्पुरुष, तैः । (४) मन्त्रित:--मन्त्रणाओं से । मन्त्र+णि+ क्त । त) (मावे) । (५) मज्जमाना:-- :--डूबते हुए। मस्+लट्+चान 'ताच्छील्यवयोवचनशक्तिपु चानश्' इति सूत्रेण । यहाँ शानच् प्रत्यय नहीं हो सकता है, क्योकि यह परस्मैपदी घातु है । (६) समुद्धताः--उबारे गये । सम्+उद्+ घ+क्त (त) । यहाँ राजा के कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे ऊपर कई बार विपत्तियां पडी, हम बन्धन में पडे, राज्य खोया, स्त्री से वियुक्त हुए, पर मापने अपने प्रपत्नों द्वारा हमे नष्ट होने से बचाया पौर पुनः समस्त सुखो का भागी बना दिया। यह मनुष्टुप् छंद है ॥१८॥ यौगन्धरायणः-स्वामिभाग्यानामनुगन्तारो वयम् । यौगन्धरायण-हम तो स्वामी के भाग्य के पीछे चलने वाले हैं। Yaug.-We are the followers of our lord's fortunes. पद्मावती--अम्महे ! प्रय्या ख इअं। अय्ये ! सहीजणसमुदाधारण प्रजाणन्तीए प्रदिपकन्दो समुदापारो । ता सीसेण पसामि । [अहो ! प्रार्या खल्वियम् । आयें ! सखोजनसमुदाचारेणा- जानन्त्याऽतिक्रान्तः समुदाचारः । तच्छीण प्रसादयामि ।] संस्कृत टीका--पहो!-पाश्चयंप्रद्योतकमध्ययमिदम्, इयम्-पुरोवतिनी भार्या-मम पूज्या वासवदत्ता, खलु-निश्चयेन (वर्तते)। माय ! --पूज्ये ! सखोजनसमुदाचारेण-वयस्यासमुचितेन व्यवहारेण, प्रजानन्या-प्रनवगच्छन्त्या, (मया) समुदाचार:--शिष्टाचारः, प्रतिकान्त:-~-उत्सवितः। तत्-तस्मात् कारणात्, गोग-विरसा (प्रणामेन), प्रसादयामि-अनुनयामि।

पाठ अंक अनुवाद-पदमावती-पहा ! ये तो प्रार्या (पूज्य दीदी) हैं। दीदी ! अनजान में मैंने सखी का-सा व्यवहार करके शिष्टाचार का उल्लंघन किया है । प्रतः शिर झुकाकर क्षमा मांगती हूँ। Padamarati-Oh indeed she is a noble, lady madam. intreating you as a companion unknowingly I have transgressed proper conduct, I therefore propitiate you by head. वासवदता-[पद्मावतोमुत्याप्य]उठेहि उठेहि प्रविहवे। उलैहि । अस्थिसणाम सरीरं प्रवरद्ध । [उत्तिष्ठोतिष्ठाऽविधये । उत्तिष्ठ । अविस्वं नाम शरीरमपराध्यति ।। वासवदत्ता--(पद्मावती को उठाकर उठो उठो सुहागिन ! उठो। याचक का धन बना हुआ (मेरा) शरीर ही अपराधी है । Vasava.-- (Raising Padamavati) Stand up blessed one. A suppliant really does wrong to his own body. पद्मावती-अगुग्गहिदह्मि । [अनुगृहीतास्मि ।] पद्मावती में भनुगहीत हूं। Padamarati-I am favoured. राजा-वयस्य यौगन्धरायण ! देव्यपनये का कृता ते बुद्धिः ? राजा---मित्र ! महारानी को हटाने से तुम्हारा क्या तात्पर्य था ? King-What did you mean by removing the queen. पौगन्धरायण-कौशाम्बीमात्रं परिपालयामीति । यौगन्धरायण-केवल कौशाम्बी पर ही हमारा अधिकार रह गया था। Yang.--Only Kaushambi was left in or possession. राजा-~-अथ पद्मावत्या हस्ते किंन्यासकारणम् ? राजा-मच्छा, पद्मावती के हाथ घरोहर रखने का क्या कारण था ? King--What did yon mean by entrusting her to Padamavati. यौगन्धरायणः-पुष्पकमदादिभिरादेशिकरादिष्टा स्वामिनो देवी भविष्यतीति । यौगन्धरापण---पुष्पकमद मादि ज्योतिपियो ने भविष्यवाणी की थी कि पद्मावती महाराज की रानी होगी।

२३२ स्वप्नवासवदत्तम् ? Yang.--Astrologers, like Puspakbhadra had prophesied that Padamavati will be your queen, राजा--इदमपि रुमण्यता ज्ञातम् राजा-क्या यह रुमण्वान को भी ज्ञात था ? King-Did Rumanyan also know this यौगन्धरायणः-स्वामिन् सर्वैरव ज्ञातम । यौगन्धरायण-महाराज ! समी को ज्ञात या । Yaug.-Oh sire, it was known to all. राजा--ग्रहो ! शठः खलु रमण्वान् । राजा--प्ररे । रुमण्वान् बड़ा दुष्ट है। King-What arogue Rumanvan was. योगन्धरायणः--स्वामिन् ! देव्याः कुशलनिवेदनार्थमधेव प्रतिनिवर्त- तामवभवान् रेभ्योऽत्रभवतो च । यौगन्धरायण-महाराज ! महारानी की कुशल निवेदन करने के लिए भाग ही पूज्य रम्य और पूजनीया वसुन्धरा लोट जायें। Yaug.-Oa king let the revered Raibaya and the lady Vasun. dhara return just today to tell the welfare of the queen. राजा--न,न । सर्व एव वयं यास्यामो देव्या पद्यायत्या सह । राना-नहीं-नहीं। हम सभी लोग देवी पद्मावती सहित जायेंगे । KIng-No, no we all shall go with her ladyship Padamavati. यौगन्धरायणः--यदाज्ञापयति स्वामी। पौगन्धरायण-जो महाराज की माशा । Yaug.-As your honour says, टिप्पणी-(१) स्वामिमायानाम-स्वामिनः श्रीमतः भाग्यानाम् परमाभ्युदयमानादकानां शुमाइप्टानाम् । अर्थात् प्रापका मन्युदय पार पुष्य कर्मों का ही फस है । हम तो केवल निमित्तमात्र हैं। यही कातकर्मगोः कृति मूत्र रो कर्म मे पष्ठी हुई। (२) पगातार:--मनु गम्+तु । (३) सलो. जनसमावारण-मापी की तरह प्यवहार करने के कारण । गनी एक जनः षष्ठ मंक - सखीजन: मयूरप्यसकादित्वात् समास, सखीजनोचितः समुदाचारः सखीजन- ममुदाचारः मध्यमपदलोपी समास तेन । यहाँ हेतु में तृतीया हुई। (४) शीर्षण- अर्थात् मापो चरणों पर शिर रखकर । 'उत्तमाङ्गं शिरः शीर्षम्' इत्यमरः । यहाँ भावार्थ यह है कि परिचय न होने के कारण मैंने भाज तक मापसे सखी की तरह व्यवहार किया है । पूज्य व्यक्ति के साथ जैसा बर्ताव करना चाहिए वैसा नहीं किया । इसलिए चरणों पर गिर कर क्षमा चाहती हूँ। (५) प्रविधवे ! सौभाग्यवतो ! विगतः धवः पतिः यस्याःसा विधवा, न विधवा प्रविधवा, तस्याः सम्बोधने अविधवे इति । यहाँ प्रविधवा शब्द का प्रयोग सोमाग्यामाव का निषेध करके अखण्डित सौभाग्य रूप अयं को देता है । इसलिए यह सुन्दर है । महाकवि कालिदास ने भी इसका प्रयोग किया है-'भर्तुमित्रं प्रियमविधवे विद्धि मामम्बु- वाहम'--मेघदूत । (६) प्रर्पिस्वं नाम शरीरमपराध्यति-~यहां भाव यह है कि याचक का रूप धारण करके यौगन्धरायण ने मुझको तुम्हारे पास धरोहर रस दिया और उसके अनुसार मैने भी अपना नाम-धाम छिपा लिया । इस प्रकार वस्तुतः शिष्टाचार का अतिक्रमण तो मैने किया, तुमने नही । मतएव में ही अपराधिनी हूँ, तुम्हारा कोई अपराय नही। (७) अपराध्यति-यहाँ भूतार्य में लट् लकार हुआ और दिवादिगणीय घातु होने के कारण मध्य में श्यन् प्रत्यय मो। (८) देव्यपनये का कृताते वृद्धिः-~देवी को अलग करने में तुम्हारा क्या उद्देश्य था? देव्याः वासवदत्तायाः अपनयः=देशान्तरनयनम्, तस्मिन्, ते त्वया का बुद्धिः कीदृशी मतिः, कृता=विहिता । अपनयः-प्रप/नी+अन् । (8) कौशाम्बीमात्रम् --भाव यह है कि उस समय हम केवल कोशाम्बी नगर पर हो शासन कर रहे थे और सम्पूर्ण वत्सराज्य शत्रु के हाथ में चला गया था। उसे पुन: प्राप्त करने के लिए किसी शक्तिशाली राजा को सहायता प्रावश्यक थी। इसलिए हमने सोचा कि वासवदत्ता का अपहरण करने के कारण महासेनजी तो सहायता दे नहीं सकते । इमलिए मगधेश्वर से सम्बन्ध स्थापित करके हमे सहायता लेनी चाहिए। पुष्पकमद्र प्रादि ज्योतिषियो ने कहा भी था कि महाराज का दूसरा विवाह मगधराजकुमारी से होगा । परन्तु वासवदत्ता जी के रहते पाप दूसरा विवाह नही कर सकते थे। इसलिए हमने आपस में तप किया कि मग्निकाण्ड के माध्यम से देवी के जल जाने का मिथ्या प्रचार करके उन्हें मगधराजकुमारी के पास ही गुप्तरूप से पातो रख दें, ताकि महारानी सुरक्षित रहेंगी और इधर महाराज भी उनकी मृत्यु को निश्चित समझकर पद्मावती से विवाह कर लेंगे।

२३४ स्वप्नवासवदत्तम् फिर तो मगध राज की सहायता से हमें वत्सराज्य पर मधिकार करने में कोई कठिनाई नही होगी। (१०) परिपालयामि यहाँ भूतार्थ में लट् लकार हुमा उ० पु० ए० ०। (११) पुष्पकमद्रादिभिःतात्पर्य यह है कि पुष्पकमद्र आदि ज्योतिषियो ने बताया था कि पद्मावती जी मापकी अर्धाङ्गिनी होंगी। इन ज्योतिषियो ने पहले मापके राज्य नष्ट होने की भी बात कही थी। वह सत्य निकली । तो विवाह-सम्बन्धी बात भी सच्ची होगी--यह निश्चय करके हमने महारानी को पद्मावती के पास ही रखना उचित समझा । क्योंकि समय माने पर पद्मावती जी महारानी के चरित्र की शुद्धि के बारे में जो साक्ष्य देगी, उस पर मापको विश्वास होगा। और दूसरा कारण यह भी सोचा कि राजकुमारी पद्मावती के साथ रहने से महारानी को जीवन के प्रभावजन्य दुःखों का अनुमव न करना पड़ेगा और पद्मावती के चरित्रको साधुता का भी परिचय मिल जाएगा। पुष्पकमद्रामादिः येषा ते पुष्पकमद्रादयः बहुव्रीहि समास, तेः ।(१२)मादेशिक:- भविष्यदर्थयादिमिः सिद्धः। मादेशः शीलमेषाम् इति मादेशिकाः तः,भादेश+ठक 'शोलम्' इत्यनेन, तस्य इकादेशः । शठः । (१३) खलु मण्यान--यहाँ राजा रुमण्यान को स्नेहपूर्वक उपालम्म देते हुए राठः कहा । वह माश्चर्य करता है कि जो लोग इस विषय को नही जानते थे, उनकी तो कोई बात नहीं है किन्तु रमण्वान् ने इस बात को जानते हुए भी तथा मेरे दत्ता का कुशल-समाचार मुझे नहीं बताया यह उसकी मद्भुत वञ्चकता है । (१४) कुश्तनिवेदनार्यम्--कुशलस्य निवेदनम् प० त०, तस्म इदम् इति नित्य समासः । (१५) प्रतिनिवतंताम्-प्रस्थान कर दें। यहां प्रत्येक के अभिप्राय से एकवचन हुमा, मन्यया रम्य भौर पत्रमवती दो कर्ता होने के कारण द्विवचन होना चाहिए था। न न-ये दोन मफेले जाने का सर्वथा निषेध करते हैं। (१६) सर्व एव:-भाव यह है कि नववधू पद्मावती सहित हम सभी लोग पलने । क्योकि इन दोनो को देखकर पौर यह समाप्त कर कि पम तक पासवदत्ता पद्मावती के पास हो रही है तथा इन दोनों में परस्पर प्रगाढ़ स्नेह है, माता-पिता महत प्रसन्न होंगे। [भरतवाक्यम्] इमा सागरपर्यन्ता हिमवद्विन्ध्यकुण्डलाम् । महोमेकातपत्राद्धा राजसिंहः प्रशास्तु नः ॥१६॥ ने दुःख से दुःखी होते हुए भी वासव- पष्ठ अंक २३: । . ( निष्क्रान्ताः सर्वे ।। इति षष्ठोऽङ्कः । इति स्वप्नवासवदत्तं समाप्तम् । अन्वयनः राजसिंहः सागरपर्यन्ताम् हिमवद्विन्ध्यकुण्डलाम् एकातपत्रासाम्' इमाम् महीम् प्रशास्तु ।।१६।। मंस्कृत टोका-:-अस्माकं, रामसिंहः--सिंहसदृशपराक्रमी राजा उदयन' इति यावत्, सागरपर्यन्ताम्--मागराः समुद्राः पर्यन्ताः अन्तिमाः सीमाः यस्याः सा ताम्, हिमपद्विन्ध्यकुण्डलाम्--हिमवान् हिमालय: विन्ध्यः विन्ध्याचलरच इति हिमवद्विन्ध्यो ती एव कुण्डले कर्णभूषणे यस्याः सा ताम्, एकातपत्राद्वाम्- एकम् अद्वितीयम् प्रातपत्रम् छवम् अंकः (राज्यलक्ष्मीत्वसूचक) चिह्न यस्याः सा ताम्, इमाम्--दृश्यमानाम्, महीम्-पृथ्वीम्, प्रशास्तु--परिपालयतु । (अयं मावः अस्माकं राजाधिराजः श्रीमानुदयनः इमां कृत्स्ना मही परिपालयतात् या किल समुद्रपर्यन्तविस्तृता विद्यते, विन्ध्यहिमालयो यस्याः कुण्डलाविव शोमेते, यस्यां चंकाधिपत्यसूचकम् एकमेव तत्श्वेतच्छत्रं विराजते ।) ॥१६॥ अनुयाद--(नट या नाट्याचार्य भरत का वचन) हमारे राजसिंह समुद्र तक विस्तृत, हिमालय और विन्ध्याचल रूपी कुंडली से युक्त तथा एक छत्र से चिह्नित इस पृथिवी पर शासन करें ॥१९(सबका प्रस्थान) छठा भक समाप्त। स्वप्न-वासवदत्त नाटक समाप्त। (Benediction) May our Rajsiogha rule over this earth, girt by the oceans, possessing, earring of Himavat and Vindhya and marked by one (royal) umbrella (Exeunt all) Here ends the sixth Act. टिप्पणी-(१) भारतवाक्यम्-नाटक के पन्त में प्राशीर्वाद रूप में गाया जाने वाला पद्य । इसको प्रशस्ति कहते हैं। प्रशस्ति का लक्षण है-'नृपदेशा- दिशान्तिस्तु प्रशस्तिरमिधीयते' यह निर्वहणसन्धि का अग कहलाता है। यहां जब पद्मावती से उदयन का विवाह हो गया, उसके भाई की सहायता से उदयन ने वत्मराज को पुनः प्राप्त कर लिया, प्रधान नायिका वासवदत्ता उसे मिल गई और इस प्रकार सम्पूर्ण नाटकीय सविधान निष्पन्न हो गया तब अन्त में कवि ने यौगन्धरायण के मुख से इमा यागरपर्यन्ताम्' इत्यादि भरतवाक्य कहलाया है। (२)न:--यह मस्मद् दाब्द के षष्ठी-बहुवचन में 'बहुवचनस्य वस्नसौ' सूत्र से किये गये नस् पादेश का रूप है । (३) राबसिंहः-सिंह के समान पराक्रमी या राजानों में सबसे श्रेष्ठ । 'सिंहशार्दूलनापाद्या:पुसि श्रेष्ठायवाचकाः' इत्यमरः ।

२३६ स्वप्नवासवदत्तम् राजा सिंह इव इति राजसिंहः उपमित समास (४) हिमपद्विन्ध्यकुण्डलाम्- 'हिमांश्च विन्ध्यश्च इति हिमवद्विन्ध्यो द्व० स०, तो कुण्डले यस्याः सा ब० स० -ताम् । हिमाचल और विन्ध्याचल से घिरी हुई। (५) एकातपत्रांकाम् एकम् प्रातपत्रम् इति एकातपत्रम् 'पूर्वकालकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधिकरणेन' इति सूत्रेण कर्मधारयसमासः, एकातपत्रम् अंकः यस्याः सा ब० स०, ताम् । जिम पर एक ही व्यक्ति का अधिकार हो ऐसी (६) प्रशास्तु-प्रशास्+लोट् प्रथमपुरुषस्यैकवचने रूपम् (७) राजसिहः प्रशास्तु न:--यह वाक्य मास के नाटकों में से अन्य छह नाटकों में भी पाया है । यह अनुष्टुप् छद है ॥१६॥ इति श्रीतारिणीशशर्मकृतायां स्वप्नवासवदत्तस्य विभाख्यटीकाया विवरण समाप्तम् ।।६॥

ܢ ܀ परिशिष्ट १ (१) नाटक (रूपक) के भेद नाटक के मुख्य दस भेद है- नाटकमय प्रकरणं भाणव्यायोगसवकारडिमाः । ईहामृगाडवीय्यः प्रहसनमिति रूपकाणि दश ॥ (साहित्यदर्पण ६-३) [नाटक, प्रकरण, माण, व्यायोग समवकार, दिम, ईहामृग, अङ्क, वीथी और प्रहसन ये दस रूपक है।) इन दशो के लक्षण, कथावस्तु प्रादि मे प्रायः भिन्नता रहती है। नाटक की कथावस्तु कोई प्रसिद्ध पौराणिक या ऐतिहासिक होती है और उसका नायक लोक- विश्रुत होता है । रूपक की अधिकाश रचनाएँ इसी भेद का लक्षण लेकर लिखी गई हैं। प्रकरण की कथावस्तु काल्पनिक होती है । प्रायः नाटक और प्रकरण इन दो भेदों की रचनाएँ ही अधिक प्रचलित हैं। अन्य मेदों के लक्षण इन्ही से मिलते-जुलते हुए होते हैं । माण और प्रहसन व्याय और हास्य-प्रधान होते हैं । इनमें समाज के पाखडियो और वैदिक धर्म के न मानने वाले नास्तिक धर्मा- बलवियो की सस्कृत कवियो ने खिल्ली उडापी है । व्यायोग एक प्रत का होता है। ईहामृग चार प्रक, और तीन सघियों का होता है। वीथी का कथानक मी माण के ममान होता है। इसमें शृङ्गार रम और कैशिको वृत्ति प्रधान होती है । पात्र एक- दो ही रहते हैं। अङ्क में युद्ध का वर्णन रहता है । करुण रस की प्रधानता होती है। कथा इतिहास या पुराण से ली जाती है । डिम और समवकार के उदाहरण रूप में क्रमश: त्रिपुरदाह और समुद्र मन्थन सस्कृत में प्रादर्श माने जाते हैं। इन रूपको के अतिरिक्त १८ उपरूपक होते हैं। इनमे से अधिकांश एक प्रद्ध के होते हैं। सभी लक्षणों को लेकर सस्कृत मे रचनाएं की गई हैं । हमे इस विषय को विशेष जानकारी के लिए संस्कृत के लक्षण-प्रन्यों को देखना चाहिए। (२) नाटक के प्रमुख तत्त्व नाटक की सफलता के लिए उसके तीन प्रमुख तत्त्व-कथावस्तु, नायक और रस का भली भांति निर्वाह कवि को करना चाहिए । यद्यपि ये तीनो बहुत 1 महत्त्वपूर्ण हैं, परन्तु उत्तरोत्तर इनका महत्त्व अधिक होता है । लेकिन कथावस्तु का समुचित निर्वाह नायक मोर रस के निर्वाह को स्वतः सिद्ध कर देता है। 'इसलिए प्रायः कथावस्तु की ओर हो मधिक ध्यान दिया जाता है । काव्य के नव रसों में से शान्त रस को छोड कर पाठ रस नाटक में व्यवहृत होते हैं। वीर या शृङ्गार रस प्रायः नाटक के प्रधान रस होते हैं। धीरोदात्त, धीरोद्धत, घोरललित और धीरप्रशान्त ये चार नायक के भेद बताये गये हैं । कथावस्तु कथावस्तु का विन्यास नाटक का मूल तत्त्व है। यह जितना स्वच्छ और नाटकोपयोगी होगा उतना ही अधिक नाटक प्रमावशाली होगा । उपादेयता की दृष्टि से कथावस्तु दो तरह से विमक्म होती है-मुख्य कथावस्तु और उसकी अंगभूत कथावस्तु, जिससे मुख्य कथा के विकास में सहायता मिलती है। दोनों को क्रमशः आधिकारिक मोर प्रासङ्गिक कथावस्तु कहते हैं- इवं पुनर्वस्तु बुदिविषं परिकल्प्यते । माधिकारिकमेकं स्यात् प्रासनिकमयापरम् ॥ अधिकारः फले स्वाम्यमधिकारीच तत्प्रभुः । तस्येतिवृत्त कविभिराधिकारिफमुच्यते ॥ प्रस्योपकरणायं तु प्रासङ्गिकमितीप्यते । (सा० दर्पण ६, ४२-४६) प्रासङ्गिक कथावस्तु दो तरह की होती है-एक वह जो मुख्य कथावस्तु के साथ दूरतक चलती रहती है और दूसरी वह जो स्थान-विशेष पर ही मुख्य कया. वस्तु की सहायक होती है। दोनों को पारिभाषिक शब्दों में कमशः पताका भोर प्रकरी कहते हैं। प्रकार या प्रकृति की दृष्टि से भी कथावस्तु रूपक में तीन तरह की होती है--(१) इतिहास मादिपर मवलम्बित प्रख्यातकथावस्तु प्रायः 'नाटक' की कथावस्तु ऐसी ही होती है । (२) कवि द्वारा कल्पित उत्पाचफयावस्तु; जैसी कि 'प्रकरण' में होती है । (३) इतिहास के मंश मौर कवि-कल्पना दोनों में मिश्रित मिश्रकथावस्तु; रूपक के अनेक भेदों में ऐसी ही कथावस्तु होती है । रगमंच पर प्रदर्शन की दृष्टि से कथावस्तु मे दो भेद हैं--(१)अभिनेप--ये वस्तुएं, जिनका मिनप रंगमच पर पटना पोर सवाद के रूप में किया जाता है। (२)मध्य-वे वस्तुएँ, जिनका रंगमंच पर प्रदर्शन न होकर केवल पात्रों में संवाद के माध्यम से सूचना दे दी जाती है। ऐसी मूख्य वस्तुओं की सूचना के लिए शास्त्रीय दृष्टि से पांच प्रकार की व्यवस्था है जिससे रूपक की स्वाभाविकता बनी रहती है मौर वह नीरस नहीं होने पाता है । इस घ्यवस्था या उपाय को अर्योपक्षेपक कहते हैं-(१) बोती हुई और पाने वाली घटनाओं की सूचना मध्यम श्रेणी के पात्रों द्वारा दिये जाने को विष्कम्भक कहते हैं। किन्तु जहाँ विष्कम्मक में एक या दो मध्यम कोटि के पात्र माते हैं उसे शुद्ध विष्कम्भक कहते हैं और जहां उसमें नीच एवं मध्यम दोनों कोटि के पात्र माते हैं, उसे मिभविष्कम्भक कहते हैं । विष्कम्मक में संस्कृत भाषा का ही प्रयोग होता है। (२) ऊपर कही हुई घटनामों की सूचना जव निम्न श्रेणो के पात्रों द्वारा दी जाती है तब उसे प्रवेशांक कहते हैं । यहाँ प्राकृत भाषा का प्रयोग होता है । (६) पर्दे के पीछे बैठे हुए पात्रो द्वारा कथा की सूचना देने को चूलिका कहते हैं। (४) अंक की समाप्ति पर निष्कान्त होने वाले पात्रों द्वारा अगले अंक की कथा की सूचना अंकास्य--है। (५) अंक समाप्त होने के पहले ही आगामी प्रक की कथा प्रारम्भ कर देने से अंकावतार अर्थोपक्षेपक होता है । रगमंच पर कथोपकथन में पात्र भी कथावस्तु को तीन तरह से व्यवहार में लाते हैं-(१) जो बात सब के सामने कही जाय, उसे सर्वश्राव्य या प्रकाश कहते हैं। प्राय: अनेक रूपकों के सर्वाश में ऐसी ही कथावस्तु होती है । (२) जो दूसरे पात्रों के सुनने योग्य न होकर केवल अपने ही सुनने योग्य हो और उसे वह पात्र अपने मन के लिए ही कहे, वह स्वगत या प्रश्राव्य है । माण और प्रहसन मे प्रायः ऐसी कथावस्तु होती है । (३) जो केवल कुछ पात्रों के सामने कही जा सके, वह नियतयाव्य है । निपतत्राव्य मे ही जब दो पात्र हाथ की मोट करके बात करते हैं तो उसे जनान्तिक, जब कोई पान मुंह फेरकर दूसरे पात्र से कुछ बात कहता है तो उसे अपवारित और माकाश को देखकर किसी से बात चीत करने का अभिनय करते हुए कोई अपने पाप प्रश्न और उत्तर दोनो कहता चला जाता है तो उसे प्राकाशभाषित कहते हैं। घटनायें या कथायें प्रापः मनों के अन्तराल में पाती हैं। कथावस्तु के अनुसार रूपक अङ्को में विभक्त होता है । अङ्क का अर्थ होता है एक काल की निरन्तर चलने वालो कपा का विमाग । प्रायःपात्रों के प्रवेश और प्रस्थान द्वारा इस कया-विमाग के प्रसंग में नवीनता होती रहती है। सूच्य (३) अर्थ-प्रकृति, अवस्था और संधियां रूपक को कथावस्तु प्रायः मानव-जीवन के किसी तथ्य की अभिव्यक्ति लेकर पल्लवित होती है। रूपक में इस तथ्य का विकास कथावस्तु की प्रर्य-प्रकृति बन जाता है अर्थात् इस तथ्य को अर्थ (मुख्य प्रयोजन)कहते हैं । इस अर्थ के विकास मे कार्यक्रम या व्यापार की जो शृङ्खला होती है, उसे अवस्था और इस अवस्था के सयोग से अर्थ-प्रकृति के रूप में विस्तृत कथानक को, जो पांच अंशो मे विमक्त रहता है, पापम में परस्पर सम्बद्ध करने को संघि कहते हैं । इस प्रकार अर्य- प्रकृति, अवस्था प्रौर सघि के पांच-पांच भेद होते हैं, जो नीचे दिये जा रहे हैं। इनमे रूपक को कथावस्तु पूर्ण विस्तृत, नियमित और रमणीय बन जाती है। प्रर्य-प्रकृतियां १. बोज--मुख्य फल का कारणभूत कथाभाग, जिसका पहले बहुत संक्षेप में कथन किया जाता है और मागे वह क्रमशः विस्तृत होता जाता है । २. बिन्दु -कारण वनकर पाने वाली वह बात बिन्दु कहलाती है, जिससे समाप्त होने वाली अवान्तर कया मागे बढती है और प्रधान कथा अविच्छिन्न बनी रहती है। ३ पताका-इसका परिचय पहले दिया जा चुका है। यह प्रासगिक कथावस्तु, जो दूर तक नाटक मे चलती रहे। इसका फल भी प्रायः वही होता है जो प्रधान कथा का होता है । जैसे-बालरामायण मे सुग्रीव की कथा और उसकी राज्य-प्राप्ति । ४. प्रकरी-इसका भी परिचय पहले दिया जा चुका है। प्रासङ्गिक कथावस्तु के छोटे छोटे वृत्तों को प्रकगे कहते हैं । ५. कार्य-कार्य का अर्थ फल है । जिस फल की प्राप्ति के लिए यत्न किया जाता है और जो साध्य होता है, वह कार्य है । इसी को मन्तिम लक्ष्य या मुख्य प्रयोजन कहते हैं। अवस्या १. प्रारम्भ कार्य की सिद्धि के लिए नायक में जो उत्सुकता होती है, उसे मारम्भ कहते हैं। २. प्रयत्न-कार्य को सिट होता न देखकर उसके लिए शीघ्रता के साथ उपाय करना।

जब दोनों ३. प्राप्त्याशा-उपाय मोर विध्न दोनों के बीच की भवस्था, की खीचातानी में फल-प्राप्ति का निश्चय न किया जा सके। ४. नियताप्ति-विघ्न के नष्ट हो जाने से जहाँ फल-प्राप्ति का पूर्ण निश्चय हो जाय। ५. फतागम-पूर्ण रूप से उद्देश्य को प्राप्ति । सन्धियों १. मुख-सन्धि--'पारम्म' नामक प्रवाया मोर 'बीज' अर्थप्रकृति का जहाँ संयोग होता है, उसे मुख-संधि कहते हैं । २. प्रतिमुख सन्धि -रूपक के प्रधान फल का साधक क्यानक जिसमें कभी गुप्त और कभी प्रक्ट होता दिखाई पड़े, वह प्रतिमुख-सन्धि है। यह संघि 'प्रयत्न' अवस्था और बिन्दु' अर्थप्रकृति की कार्य शृंखला को आगे बढाती है ।। ३. गर्म-सन्धि--इस संधि में प्रतिमुख सघि का किंचित् प्रावित बीज बार-बार प्रकट, गुप्त और प्रवेपित होता रहता है । यह सघि 'प्राप्त्याशा' अवस्था और पताका' प्रर्थप्रकृति के बीच की स्थिति होती है। ४. विमर्श (अवमर्श) सन्धि--वहाँ होती है. जहां बीज के अधिक विस्तृत हो जाने पर उसके फलोन्मुख होने मे विघ्न होते हैं । इसमे 'नियताप्ति अवस्था और 'प्रकरी' अर्थप्रकृति होती है। ५.निर्वहण-सन्धि-इसमे 'फलागम' अवस्था और 'कार्य' अर्थप्रकृति होती है । यह रूपक की समाप्ति के सन्निकट, जहाँ पूर्व की संषियों पोर अवस्थाम्रो के अर्थों का समाहार होता है, स्थित होती है । (४) रङ्गमञ्च रंगमंच भी नाट्यशास्त्र का एक प्रमुख अंग है । वस्तु, नायक और रस के बाद संगीत, वाद्य, नृत्य तथा फिर रंगमच का ही क्रम पाता है। मरतमुनि ने रंगमंच के सबध में बहुत विस्तृत विवेचन किया है। इसके तीन प्रकार बताये गये हैं- १. विकृष्ट रगमंच जो १०८ हाथ लम्बा होता है। २. चतुरस्र अर्थात् चौकोर रंगमच जो ६१ हाथ लम्बा और उसका माधा ३२ हाथ चौड़ा होता है । ३. त्र्यन्त्र मथवा त्रिकोण रंगमच जिसमे प्रायः मापस के लोग ही बैठकर अभिनय स्व० द०-२१ देखते थे। रंगमंच की बनावट आदि के संबंध में भी बहुत से निर्देश दिये गये है, जिनसे मभिनय में होने वाले संवाद, संगीत प्रादि की ध्वनि मंपिक गूंजकर मुनाई पडे । प्रायः प्राधे माग में रंगमंच होता था और आधे भाग में दर्शकों के बैठने का स्थान । रंगमंच का पिछला माग रगशीर्ष कहलाता था। उसके पृष्ठ में नेपथ्य होता था, जहाँ पात्र अपनी वेश-भूषा प्रादि ठीक करते थे । कुछ लोग कहते हैं कि भारतीय नाट्यकला पर यूनानी नाट्यकला का प्रमाव पडा है । लेकिन हमें स्मरण रखना चाहिए कि जिस समय यूनान मे खुले मैदान में रंगमंच स्थापित किये जाते थे, हमारे यहाँ रंगमंच की व्यवस्था सुनिश्चित थी मौर नाट्यकला का विकास बहुत ऊँचाई पर पहुंच चुका था। प्रथम शताब्दी ईसवीय से पूर्व हुए कालिदास के पहले भी मास, सौमिल्लक जैसे अनेक नाटककार संस्कृत साहित्य में हो चुके थे । इघर परदे के लिए 'यवनिका' शब्द का प्रयोग यूनान पोर यवन शब्द को भोर संकेत कर लोगो को भारतीय नाट्यकला पर यूनानी नाट्यकला का प्रभाव प्रमिलक्षित कर रहा था। किन्तु 'यवनिका' राब्द ही भ्रान्ति से लिखा जाने लगा। मारतीय नाट्यशास्त्र का शब्द तो 'जवनिका' है, जिसकी व्युतत्ति इस प्रकार की जाती है-'जयते माच्छाद्यते यया यस्या या सा जयनिका, जु+ल्युट्--मन--डोप् +कन्टाप, हस्य' ज धातु का मर्प वेग से चलना भी होता है। तदनुसार 'जवनिका का अर्थ है जिसके भीतर लोग दौड़कर जल्दी से लिपला; मपदा अभिनय में परदे वेग से गिराये पौर उठाये जाते थे, जिनके लिए 'जवनिका' साम्द का प्रयोग होता था। यात फेवल 'यनिका' 'जवनिका' की ही नहीं है, अपितु ऐतिहासिक प्रमाण और यहाँ-वहाँ को नाटकीय प्रवृत्तियां समी यह सिद्ध करते हैं कि भारतीय नाट्यासा के विकास में कोई भी यूनानी प्रमाव नहीं पड़ा है। हमारे यहाँ के नाटको को प्रवृत्ति मानन्द, विनोद, शान्ति तथा उपदेश-मूलक है मौर वहाँ के नाटक इमः विपरीत मार-काट, हत्या, पीड़ा तथा दुःसान्त गापामों से भरे होते हैं। सिकन्दर ने भारत पर ३२७ ई०पू० में प्राकमण किया पापौर लड़ते हुए वापस बसा गमा पा। बाद में सिल्यकम मी पन्द्रगुप्त से पराजित हुमा पामतः मारा मे यूनानी नाटपरसा के प्रश्रय मिलने का कोई कारण नहीं दिखाई पाता, जब कि इसके बहुत पहले भरतमुनि का 'नाट्यशास्त्र' निता आ पुरापा पाणिनि दी प्राध्यापी के शाप मोर शिलासिन नाम से मारवाचार्य भी हो एक थे।

(५) नाटक आदि शब्दों के शास्त्रीय लक्षण
१. नाटक-नाटकं ख्यातवृत्तं स्यात् पञ्चसन्धिसमन्वितम् ।
विलासद्धर्यादिगुणवद्युक्तं नानाविभूतिभिः ।
सुखदुःखमुद्भतिनानारसनिरन्तरम्
पञ्चाधिका दशपरास्तत्राङ्काः परिकीर्तिताः ।
प्रख्यातवंशो राजर्षीिरोदातः प्रतापवान् ।
दिव्योऽय दिव्यादिव्यो वा गुणवान्नापको मतः ।।
एक एव भवेदङ्गो शृङ्गारो वीर एव वा ।
अंगमन्य रसाः सर्वे कार्यों निर्वहणोऽद्भुतः ॥
चत्वारः पञ्च वा मुल्याः कार्यव्यापृतपूरुषाः ।
गोपुच्छाप्रसमपं तु बन्यनं तम्य कोर्तितम् ॥
नाटक उसे कहते हैं जिसका कथानक प्रमिद्ध हो और जिसमें मुख, प्रतिमुख
प्रादि पांचों संघियां हों। इसमें विलास, समृद्धि प्रादि गुण तया अनेक प्रकार के
ऐश्वर्यों का वर्णन होना चाहिए । सुख और दुःख की उत्पत्ति दिखाई जाय मौर
अनेक रसों से उसे पूर्ण होना चाहिए । नाटक में पांच से लेकर दस तक अंक
होते हैं । इसका नायक प्रसिद्ध वरा में उत्पन्न, धीरोदात, प्रतापी और गुणवान्
राजपि होता है । वह दिव्य हो या दिव्य और प्रदिप दोनो प्रकार के गुणों से
मिश्रित हो । शृंगार या वीर मे से एक रस यहाँ मुख्य होता है और अन्य
सब रस उसके भंगमूत रहते हैं। इसे निर्वहण संघि में अमृत बनाना चाहिए ।
इसमें चार या पांच कार्य-रत पुरुप प्रधान हों और की पूंछ के प्रप्रभाग के
समान इसकी रचना हो ।
२.पा-म इति हरिशादो भाव रसश्च रोहयस्पान् ।
नानाविधानयुक्तो यस्मात् तस्माद् भवेदकः ।
पत्रार्यस्य समाप्तियंत्र चमोजस्य भवति संहारः ।
किञ्चिदपलानपिन्दुः सोऽहति सदायगन्तव्यः ।।
जो भावो मौर रमों के द्वारा प्रयाँ प्रस्मुटित करता है, जो पनेक प्रकार
फे विधानों से युक्त होता है मोर जहा एक प्रर्य को समाप्ति होती है तथा गैर

८ का उपसंहार होता है पर अंशतः बिन्दु का सम्बन्ध बना रहता है, उसे 'अंक' कहते हैं। ३. गर्भारप्रद्धोदरप्रविष्टो यो रङ्गद्वारामखादिमान् । प्रङ्कोऽपरः सगर्भाङ्कः सबोजः फलवानपि ॥ जो अंक के बीच में ही प्रविष्ट हो, जिसमें रंगद्वार तया आमुख आदि मङ्ग हों और बीज एवं फल का स्पष्ट पामास होता हो, उसे गर्भाङ्क कहते है । ४. पूर्वरङ्ग-यनाट्यवस्तुनः पूर्व रङ्गविघ्नोपशान्तये । कुशीलवाः प्रकुर्वन्ति पूर्वरङ्गः स उच्यते ॥ नाटकीय कथा के प्रारम्म से पूर्व रगमंच के विघ्नों की शान्ति के लिए नर्तक या अभिनेतागण जो मंगलाचरण प्रादि करते हैं, उसे पूर्वरङ्ग कहते हैं । ५. नाम्दी-माशीर्वचनसंयुक्ता स्तुतिर्यस्मात् प्रश्पते । देवद्विजनपादीनां तस्मानान्नीति संजिता ॥ मङ्गत्यशवचन्द्राजकोककरवशंसिनी । पर्दयुक्ता द्वादशभिरष्टाभिर्वा पदरत ॥ देवता, ब्राह्मण राजा प्रादि की भाशीर्वाद-युक्त स्तुति इससे की जाती है, मतः इसे नान्दी कहते हैं । इसमे मागलिक वस्तु, शंख, चन्द, कमल, चक्रवात मोर कुमुद मादि का वर्णन होता चाहिए और यह बारह मा माठ पदो से युक्त होनी चाहिए। ६. सूत्रधार--नाट्यस्य मदनुष्ठानं तत्सूत्रं स्यात् सयोजकम् । रङ्गदेवतपूजाकृत सूत्रधार उदीरितः ॥ बौज सहित नाटक के अनुष्ठान को सूत्र कहते हैं। उसका पारण मात् संचालन करने वाला तया रगमंच के अधिष्ठाता देव की पूजा करने वाला ध्यक्ति सूत्रधार बहलाता है। ७. नेपथ्य-शोलयाटम्बस्य गृहं मेपथ्यमध्यते । जहाँ नतंक या अभिनेता गण नाटकोपयोगी वेश-भूषा धारण करते है, उसे नेप्य पाहते हैं। ८. (क) भामुख याप्रस्तावना या स्थापना मटी विदूषको वापि पारिपाश्विक एप वा ।। सत्रधारेण सहिताः संसा पत्र कुति ॥

चित्रक्यिः स्वकार्योत्यः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मियः । भामुखं तत्तु विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनापि सा ॥ यहाँ नटी, विदूषक प्रपवा पारिपाश्विक (सूत्रधार का सहायक नट) सूत्रधार के साथ अपने कार्य के विषय में विचित्र वाक्यों द्वारा इस प्रकार बातचीत करें, जिमसे प्रस्तुत कथा की सूचना हो जाय, उसे प्रामुख कहते हैं और उसी का नाम प्रस्तावना भी है । (स्थापना मी इमको कहते हैं । मास ने इसी स्थापना' शब्द का प्रयोग किया है।) ८. (ख) प्रयोगातिशय--पदि प्रयोग एकस्मिन् प्रयोगोऽन्यः प्रयुज्यते । तेन पात्रप्रवेशश्चेत् प्रयोगातिशयस्तवा ॥ पदि एक ही प्रयोग मे दूसरा प्रयोग मो मारम्भ हो जाय पोर उसी के द्वारा पात्र का प्रवेग हो तो उसे 'प्रयोगातिशय' नामक प्रस्तावना कहते हैं। ६. कंचुको या कांद्यकीय-अन्तःपुरचरो वृद्धो विप्रो गुणगणान्वितः । सर्वकार्यायंकुशलः कञ्चकोश्यभिधीयते ।। प्रथया ये नित्यं सत्त्वसम्पन्नाः कामदोषविवर्जिताः । भानविज्ञानकुशलाः काञ्चुकीयास्तु से स्मृताः॥ कंचुकी उसको कहते हैं, जो पलापुर में जाने वाला, वृद्ध, गुणी, ब्राह्मण तपा सब कार्यों के करने में कुशल होता है । अयवा सदा सात्विक प्रकृति वाला, परित्र माधरण वाला मोर मान-विज्ञान में प्रवीण होता है, उसे काचुकीर कहते हैं। १०. विदूषक-वितावोवेवहाँस्यकारी विदूषकः । जो मरने विकृत अंगो, ऊटपटांग वचनों तथा तरह-तरह के वेषों से दर्शकों को हंसाया करता है, उसे विदूषक पहते हैं। ११. नायक-रागीलो कुपीत: मुमोको रूपयौवनोत्साही । रसोरानसोक्षम्तगोपंदाप्यतोसरान् नेता ॥ जो स्वागी, शिान्. पोन, मनन, गुरूर, या, उन्माही, पार, सोरत्रिय, सावी, निपुग एवं मुनीर हो, रहो नारा है (पांर नायक में ये मग होने पाहिए)।

. (क) बोरोदात्त नायक--प्रदिकत्यनः क्षमावानतिगम्भीरो महासत्वः । स्येयाग्निगूढमानो धीरोदातोढवतः कथितः ।। अपनी प्रशंसा स्वयं न करने वाले, क्षमावान्, अत्यन्त गंभीर, महापराक्रमी, स्थिर, गर्व को छिपा कर रखने वाले और दृढ़ निश्चय करने वाले व्यक्ति को धीरोदात्त नायक कहते हैं । जैसे--राम मौर युधिष्ठिर। (ख) धोरोद्धत नायक-मायापरः प्रचण्डश्चपलोऽहकारदर्पभूयिष्ठः । प्रात्मश्लाघानिरतो घोरधीरोद्धतः कषितः ॥ मायावी, प्रचंड, चंचल, अतिगर्वी तथा स्वयं अपनी प्रशंसा करने वाले को धीर पुरुप धीरोदत नायक कहते हैं । जैसे--भीमसेन, दुर्योधन प्रादि । (ग) धोरललित नायक--निश्चिन्तो मृदुरनिशं कलापरो घोरततितः स्यात् । निश्चिन्त, कोमल और दिन-रात नाच-गान में रत रहने वाला नायक षीरललित कहलाता है । जैसे-इस नाटक में वत्सराज । (घ) धीरप्रशान्त नायक-सामान्यगुणभूपान् द्विजादिको घोरप्रशान्तः स्यात् । सामान्य गुणो से अत्यन्त युक्त ब्राह्मण या क्षत्रिय को धीर प्रशान्त नायक कहते हैं । जैसे---मालती-माधव मे माधव । १२. नायिका-नायकसामान्यगुणयुक्ता नायिका । नायक में अपेक्षित गुणों से युक्त नायिका होती है। (६) नाटकीय पात्रों के लिए विशिष्ट शब्द "नाटक में प्रधान श्रेणी के मृत्यवर्ग राजा को 'स्वामी' अथवा 'देव' शब्द से सम्बोधित करें पौर निचलो श्रेणी के भृत्य 'भट्ट कह कर उसका सम्बोधन करें। इसी प्रकार राजपि तथा विद्रुपक उसे वयस्य' कहकर मौर ऋषिगण 'राजन' कहकर या अपत्यापंक प्रण प्रादि प्रत्यय लगाकर पुकारें । ब्राह्मणवर्ग मापस में चाहे अपत्यप्रत्यान्त सन्द से, चाहे नाम लेकर व्यवहार करें। राजा विदूषक को 'वपस्य' कहकर या नाम लेकर पुकार सकता है । नटी भोर सूत्रपार परस्पर मार्या पोर मार्य शम्द से व्यवहार करें। पारिपाश्विक मूत्रधार को 'भाव' कहकर पौर मूत्रधार उसे 'मारिप' कहकर बुलाये ।निम्न श्रेणी के लोग पापस में 'हहै' महकर, मध्यम श्रेणी के लोग इहो बहकर मोर उत्सम घेणी के लोग पाने ममान कोटि के पुरुषों को 'वपस्स' कहकर परस्पर सम्बोपन करें। बड़े भाई को मब - ( ११ ) लोग 'पाय' कहें । देवता, ऋषि और संन्यासी को समी श्रेणियों के लोग 'मगयन्' कहकर सम्बोधित करें। विदूषक रानी पोर चेटी को 'मवती' कहे। रयी को सारथि 'प्रायुप्मन्' कहे । वृद्ध पुरुषों को जवान और बालक 'तात' कहें । शिष्य, छोटे भाई और पुत्र को वत्स, तात, पुत्रक इन शब्दों से प्रयवा उनके नामों में गोत्र प्रत्यय लगा कर सम्बोधित करना चाहिए। मघम श्रेणी के लोग अमात्य को 'पाय' कहें पोर ग्राह्मण उसे 'अमात्य' या 'मचिव' पद से विभूषित करे । उत्तम श्रेणी के लोग तपोनिष्ठ मोर शान्तिनिष्ठ पुरुषों को 'सापो' कहकर पुकारें। शिष्य अपने गुरु या माचार्य को 'भगवन्' अथवा 'सुगृहीतनामधेय' मादि पदों मे सम्बोधित करे। राजा को महाराज' या 'स्वामी' शब्द से भोर युवराज को 'कुमार' शब्द से अभिहित करना चाहिए । छोटी श्रेणी के लोग राजकुमार को 'मतदारक', 'मद्र', 'सौम्यमुख' मादि शब्दों से पुकारें । राजकुमारी को राजा के नौकर-चाकर 'मतदारिका' कहें । उत्तम, मध्यम तथा प्रथम पुरष स्त्रियों को उमी प्रकार सम्बोधित करें जैसे उनके पतियों को करते हैं । राखी को 'हला' पाद से, दासी को 'हजे' कहकर, वेश्या को 'पञ्जुका' पोर फटनी को 'सम्या' कहकर पुकारना चाहिए । पाखंडी सोग अपने अपने भाचार के अनुसार सम्बो- पित किय जाने चाहिए । शक मादि जाति के लोगों के नाम के अन्त में भद्रदत्त पादि शब्दों को जोडना चाहिए। जिसका जो कम हो, शिल्प हो, जो विद्या हो या जो जाति हो, उसी में उसका व्यवहार करना चाहिए।"

पृष्ठ मनाहारे तुल्यः १२ २०२ २२१ २२ २२६ १७६ २२६ परिशिष्ट २ अकारादिक्रम से श्लोकानुक्रमणिका श्लोक पृष्ठ श्लोक ५६ पूर्व त्वयाऽप्यमिमतं अनेन परिहासेन १३२ पृथिव्या राजवंश्यानां प्रस्य स्निग्धस्य २१६ प्रच्छाद्य राजमहिपों अहमवजितः पूर्वम् २०५ प्रद्वेषो बहुमानो वा इमा सागरपर्यन्ताम् २३४ बहुशोऽप्युपदेशेष इयं बाला नवोद्वाहा १४१ मारतानां कुले उदपनवेन्दुसवर्णा २ मिन्नास्ते रिपवः उपेत्य नागेन्द्रतुरङ्ग १८१ मृत्यमंगधराजस्य ऋज्वायतां च विरला ११२ मघुमदकला ज्वायतो हि मुख १५४ महासेनस्य दुहिता कस्यार्थः कलशेन ३१ मिथ्योन्मादश्च कः कं शक्तो रसितु २०६ यदि तावदयं कातरा पेऽप्यशक्ता वा २०४ यदि विप्रस्य कामेनोज्जयिनी गते १०६ योऽयं सत्यस्तया कार्य नैवान पि ३५ रूपधिया कि यक्ष्यतीति हृदयं १९८ वाक्यमेतत् किन्तु सत्यमिदं सगा वासोपेताः दाय्या नावनता गुणानां च विशालाना १४२ गय्यायामवसुप्त पिरप्रसुप्तः कामो मे १६२ शरमशांक तीपोदकानि समिधः २० श्रुतिसुख दुःसं त्यक्तु बदमूलो १३४ श्रागीममुहहन धीरस्पायमसश्रितस्य ८ इसाध्यामवन्ति निकामन् सम्भ्रमेपार्ह १७१ पोडसान्तःपुर सम्बन्धिराज्य पद्मावती नरपतेः ४२ सवियमो हायं पद्मावती बढ़मता १२६ मुखमयों परिहरतु मवान् १५ स्मराम्यवन्त्याधिपतेः पादाक्रान्तानि पुष्पाणि १२० स्वप्नस्यान्ते २१६ २१४ २२८ विस्रब्धं १४० १८६ १६१ १४६ २०७ नवेदानी तादृशाः - ... परिशिष्ट ३ स्वप्ननाटक में सुभाषित १-मकरुणाः खल्वीश्वराः । (अपने पति के पद्मावती के साथ विवाह के समय वासवदत्ता की उक्ति) ईश्वर बडे निर्दयी हैं। २-अनतिक्रमणीयो हि विधिः । (विदूषक की उक्ति) मवितव्यता टाली नहीं जा सकती। १३४ ३-प्रनिर्मातानि देवतान्यवधूयन्ते। (यौगन्धरायण की उक्ति) इस प्रकार विदित न होने पर तो देवतामो का भी अपमान होता है । .... ४--अविचार्य क्रमं न करिष्यति । (वासवददत्ता की उक्ति) बिना विचारे वे (योगन्धरायण) कोई काम नहीं करेंगे। ५-प्रज्ञातवासोऽप्यत्र बहुगुणः सम्पद्यते । (वासवदत्ता की उक्ति) यहां छिपकर रहना भी बहुत गुणकारी हो रहा है । १२७ ६-प्रयुक्त परपुरुषसकीर्तन श्रोतुम् । (पराये पुरुष का गुणगान सुनना उचित नहीं है।) २१६ ७--अस्य स्निग्धस्य वर्गस्य विपत्ति रुिणा कथम् । (धात्री की उक्ति) इस मनोहर रूप पर भीषण प्रापत्ति कैसे पड़ी। ६१ -प्रागमप्रधाननि सुलभपर्यवस्थानानि महापुरुषहृदयानि भवन्ति । (धात्री की उक्ति) महापुरुषों के हृदय शास्त्रों पर विश्वास करने के कारण मासानी मे प्रकृतिस्य हो जाते हैं। -एव लोकस्तुल्यवर्मों वनानां काले काले छिद्यते रुह्यते च। (अर्थात् जैसे वृक्ष समय आने पर काटे जाते हैं और फिर समय माने पर पनप उठते हैं उसी तरह मनुष्य भी समय-समय पर मरते मोर उत्पन्न होते रहते हैं ।) २०६ १०-कः क शक्तो रमितुं मृत्युकाले । (कंचुकी) इसी प्रकार वृक्षों के समान स्वभाव वाले मनुष्य समय-समय पर मरते और उत्पन्न होते हैं। २०६ ... ८. ... ...

aa ... ११--कालकमेण जगतः परिवर्तमाना चक्रारपंक्तिरिव गच्छति भाग्य- पंक्तिः । (यौगन्धरायण) लोगो का भाग्यचक्र पहिये के भरों को भौति समयानुसार घूमता हुमा चलता है। .१२--कातरा येऽप्यशक्ता वा नोत्साहस्तेषु जायते । (कंचुको) जो अधीर या मसमर्थ होते है उनमे उत्साह नहीं होता। २०४ १३-गणानां वा विशालानां सत्काराणां च नित्यशः। कर्तारः सुसमा लोके विज्ञातारस्तु दुलंमाः ॥ प्रत्यन्त महान् गुणों एवं सत्कारों के करने पाले लोग तो संसार में नित्य मिल जाते हैं परन्तु (उन गुणों तथा सत्कारों को जाननेवाले (मर्थात् प्रादर पूर्वक स्वीकार करने वाले लोग) कम मिलते हैं। १४२ १४---तपोवनानि नाम पतिथिजनस्य स्वर्गहम् । (तापसी) तपोवन तो अतिथियों का अपना घर है । १५--तस्मिन सर्वमयीनं हि यत्राधीनो नराधिपः । (यौगन्धरायण) क्योकि जिसके हाथ राजा की देखभाल है उसी के हाथ में सब कुछ है ।.. ६१ १६-दुःसं त्यक्तुं बद्ध मूवोऽनुरागः । (राजा) जमी हुई जड़वाले प्रेम को मूल जाना बड़ा कठिन है । १७-चन्या सल पवाकरः, यान्योन्यविरहिता न जीवति । (पासवदत्ता) निःसंदेह चकवे को बहू (धावी) घन्य है जो एक दूसरे से वियुक्त होकर नहीं जीती। १८-न परुषमाश्रमवासिप प्रयोज्यम् । (कचुकी) पाश्रम में रहने वालों को कठोर वचन नहीं कहना चाहिए । १९--न हि सिदवाक्यान्यत्वम्म गवति विधिः सुपरीक्षितानि । (योग०) क्योकि माग्य मती मोति परसे हुए सिदों से धनों का उल्लंघन करके नहीं घसता है। २०-परसरगता लोके दृश्यते तुल्यरूपता । (राजा) संसार में (बहतों के) स्वरूप एक दूसरे से मिलते-जुलते दिखाई पड़ते हैं। २१६ ... ... ... ...

( १५ ), ... ... जाने पर ... २१--प्रद्वेषो बहुमानो वा संकल्पादुपजायते । (योग०) घृणा या लगाव मन के भाव से ही उत्पन्न होते हैं। २२--प्रायेण हि नरेन्द्रश्रीः सोत्साहैरेव भज्यते । (कंचुकी) जो उत्साही होते वे ही प्रायः राजलक्ष्मी का उपमोग करते हैं। २०४ २३--प्राणी प्राप्य रुजा पुनर्न शयनं शीघ्र स्वयं मुञ्चति । (राजा) प्राणी रोग के कारण बिस्तर पर पहुँच कर अपने प्राप , शीघ्र उसे नहीं छोड़ता है। २४–यात्रा त्वेपा यद्विमुच्येह वाष्पं प्राप्तानृण्यं याति बुद्धिः प्रसादम् । (राजा) वो भी व्यवहार यही है कि यहाँ !(इस लोक मे) मासू बहाकर ऋण से छुटकारा पाया हुमा मन शान्ति प्राप्त कर लेता है। १३४ २५-रज्जुच्छेदे के घटं धारयन्ति । (कंचकी) रस्सी के कौन पड़े को (गिरने से रोक सकता है। २०६ २६--सत्कारो हि नाम सत्कारेण प्रतीष्टः प्रीतिमुत्पादयति । (विदूषक) क्योंकि सत्कार का बदला सत्कार से दिये जाने पर प्रीति उत्पन्न करता है। १४२ २७--सदाक्षिण्यस्य जनस्य परिजनोऽपि मदाक्षिण्य एव भवति । (पद्मावती) चतुर व्यक्ति का सेवक मी चतुर ही होता है । १३६ २८-सर्वजनमनोऽभिरामं खलु सौभाग्यं नाम । (पद्मावती) निश्चय ही सौन्दर्य सबके मन को माकृष्ट कर लेता है। २६--सर्वजनसाधारणमात्रमपदं नाम । (कंचुकी) प्राथम तो समी के लिए खुला है। ३०-माक्षिमन्यासो निर्यातयितव्यः । (राजा) साक्षी के सामने धरोहर लौटानी चाहिए। २२४ ३१--सुखं नामयपरिमृतमकल्यवतं च । (विदूषक) यह सुख- सुख नहीं जो रोग से प्राकान्त हो और जिसमें कलेवा न मिले ।... ३२-स्त्रीस्वमावस्तु कातरः। ( राजा मन मे) नारियों का स्वभाव तो अधीर होता है। - ७६ ... ४७ ...

परिशिष्ट ४ नाटक में आये छन्दों के लक्षण (१) अनुष्टुपु--पञ्चमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः । षष्ठं गुरु विजानीयादेतत् पद्यस्य लक्षणम् ॥ अनुष्टुप् ८ अक्षर होते है। उनमें से सभी चरणो में पचम भक्षर लघु होता है। द्वितीय और चतुर्थ चरण मे सातवा अक्षर लघु होता है मौर छठा 'प्रक्षर सर्वत्र गुरु होता है । (२) प्रार्या-यस्याः पादे प्रथमे द्रावशमात्रास्तया तुतीयेऽपि । मष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चदश सार्या ॥ जिसके पहले मोर तीसरे पाद मे वारह, दूसरे पाद मे अठारह मीर चौथे पाद में पन्द्रह मात्रायें हों, उसे प्रार्या कहते हैं । (३) इम्प्रयज़ा--स्यादिन्द्रवज्रा यदि तो जगी गः । इन्द्रवजा मे २६तगण, १ जगण मौर २ गुरु अक्षर होते हैं । कुल ११ वर्ण होते हैं। (४) उपजाति--प्रनन्तरोबोरिततक्षमभाजी पादौ यवीयापजातयस्ताः । उपजाति छंद इन्द्रवजा और उपेन्द्र वजा दोनों छंदों के मिश्रण से बनता है। क्सिी चरण मे इन्द्रवजा छंद होता है और किसी में उपेन्द्रवचा। (५) उपेन्द्रपटा-उपेन्द्रवज्ञा जतजास्ततो गौ।' इसमें भी ११ वर्ण होते हैं-१ जंगण, १ तगण, १ जगण और २ गुरु मार। (६) पुष्पिताणा--प्रयुजि जयगरेफतो यकारो युजि नजो जरगाश्च पुष्पिताग्रा । पुप्पितामा ईद के प्रथम पोर तृतीय चरण में १२ वर्ण होते हैं--१ नगण, १ रगण पोर १ यगण। द्वितीय और चतुर्थ चरण में १३ वर्ण होते हैं--१ १ नगण, २ जगण, १ रगण मौर १ गुरु वर्ण। १७) वसन्ततिलका-उरता वसन्ततिलका तमजा जगौ गः । वसन्ततिला एंद मे १४ वर्ण होते है-१तगण, १ मगम, २ जगण मौर २ गुरु वर्ष (4) वैश्वदेवी--पञ्चाश्वश्छिन्ना वैश्वदेवी ममौ यो। वैश्वदेवी छंद में १२ वर्ण होते हैं--२ मगण और २ यगण । इसमें ५ मोर ७ पर विराम होता है। (९) शार्दूलविक्रीडित--सूर्याश्वयंदिमः सजो सततगाः शार्दूलविकोडितम् । इस छद मे १६ वर्ण होते हैं--१ मगण, १ सगण १ जगण, १ सगण, २ तगण और १ गुरु वर्ण । इसमे १२ मोर ७ पर विराम होता है। (१०) शालिनी--मात्तौ गो चेच्चालिनी वेदलोकः । शालिनी छद में ११ वर्ण होते हैं--१ मगण, २ तगण और २ गुरु वर्ण ४ और ७ पर विराम होता है। (११) शिखरिणी-रस रुद्रश्छिन्ना यमनसभला गःशिखरिणी । शिखरिणी छद मे १७ वर्ण होते हैं--१ यगण, मगण, १ नगण, १ सगण, १ मगण, १ लप और १ गुरु वर्ण । इसमे ६ मोर ११ पर विराम होता है। (१२) हरिणो--नसमरसला गः षड्वेदह पहरिणी मता। हरिणी छंद मे १८ वर्ण होते हैं-१ नगण, १ सगण, १ मगण, १ रगण, १ सगण, १ लघु और १ गुरु वर्ण । इसमे ६, ४ और ७ पर विराम होता है। परिशिष्ट ५ भास को प्राकृत--डा० भोलाशकर व्यास ने अपने 'संस्कृत कविदर्शन' में (पृष्ठ २४६) भास की प्राकृत के सम्बन्ध मे इस प्रकार लिखा है। "मास के नाटकों की प्राकृत प्रायः गोरसेनी है । दूतवाक्म के अतिरिक्त अन्य समी नाटकों में प्राकृत का प्रयोग पाया जाता है। मागधी का प्रयोग प्रतिज्ञा, चारुदत्त, बालचरित, पंचरात्र तथा कर्णमार मे हुआ है। मास की शौरसेनी से ऐसा पता चलता है कि वह अश्वघोष तथा कालिदास के बीच की स्थिति का सकेत करती है । प्रश्वघोष की प्राकृत मे मघोष अल्पप्राण ध्वनियों सघोष अल्प- प्राण नहीं होती, मास को प्राकृत में ट और त क्रमशःड और द हो जाते हैं। अश्वघोष की प्राकृत में स्वरमध्यग व्यंजन लप्त नहीं होते, जब कि मास में स्वर- मध्य क, ग, च, त, द, प, ब, द, च का लोप हो जाता है, यद्यपि यह लोग कालिदास की अपेक्षा कम पाया जाता है । महाप्राण स, घ, प, ध, फ, म मात की प्राकृत में ह हो जाते हैं, अश्वघोप में ये अपरिवर्तित बने रहते हैं। संस्कृत ज्ञ कालिदास की प्राकृत में पण मिलता है, अश्वघोष में , किन्तु मास की प्राकृत में इसका कमीज रूप मिलता है कमी पण । संस्कृत 'वयं' का रूप अश्वघोष में अपरिवर्तित रहता है, कालिदास में इसका 'अम्हे' रूप मिलता है । मास की 'प्राकृत मे ये दोनों रूप पाये जाते हैं, साथ ही 'वर्ग' रूप भी मिलता है । अस्मत् शब्द के षष्ठी बहुवचन में मास में अम्हाअं, मम्हाणं दोनों रूप मिलते हैं। अश्वघोप में प्रम्हाकं रूप मिलता है। भास की मागधी तथा अर्धमागधी में हमें दो रूप मिलते हैं। बालचरित तथा पंचराय में प और प्रो ध्वनि पाई जाती है। प्रतिज्ञा और चारुदत्त मेश और ए। मागधी में 'मह' के लिए 'प्रह' का प्रयोग पाया जाता है।" परिशिष्ट ६ भास के व्याकरण संबंधी अपाणिनीय प्रयोग १. आपच्छामि भवन्ती। २. विनयादपेतपुरुषः। ३, सुख मर्यो मवेहातु सुखं प्राणाः सुखं तपः। ४. न शिलप्यते मे मनसि । ५. देशागतप्रत्ययाः। ६. कः कालः त्वामन्विष्यामि । . तृतीय प्रक ७. घरते खलु वासवदत्ता। ८. प्रचितपतितबन्धुजीवकुसुमम् इत्यादि। ६. बाष्पाकुलपटान्तरितम् । २०. मघकरपरिनिलीनाम् । ११. मा भूयोऽवचित्य । १२. मेदानीमन्यथा चिन्तयित्वा । १३. स्मुरवा स्मृत्वा याति दुःखं नवत्वम् । १४. मार्यपुत्रेणेहा गत्येमा कुसुमसमृदि दृष्ट्वा इत्यादि । १५. पर्घमन.शिलापट्ट करिव दोफालिकाकुसुमः पूरितं मेऽतिम् । १६. स्मराम्यवन्त्याधिपतेः सुतायाः । पंचम प्रक प्रथम ग्रंक " " " " चतुर्थ भक " " " " , " १७. मेदानी भवाननयं चिन्तयित्वा । पंचम मंक १८. संबंधिराज्यमिदमेत्य महान् प्रहपः । पष्ठ अंक १६. स्मृत्वा पुनः नृपसुतानिधनं विषादः । परीक्षोपयोगी प्रश्न १. स्वप्नवासवदत्तम् को कथावस्तु को संक्षेप में लिखिए। २. स्वप्नवासवदत्तम् के कपातक की विशेषतामों पर प्रकाश डालिए। ३. भास ने इस नाटक का नाम स्वप्नवासवदत्तम् पयों रखा ? ४. वासवदत्ता पौर पद्मावती के चरित्रों की तुलनात्मक समीक्षा कीजिए। ५. प्रथम मंक में ब्रह्मवारी के समावेश से किस अयं की सिद्धि होती है। ६. योगन्धरायण, उदयन, यसन्तक, पासवदत्ता तया पद्मावती का सोद्धरण परित्र-चित्रण कीजिए। ७. सावाणक गांव को जलाने से कौन-सा नाटकीय तथ्य सिद्ध होता है ? स्पष्ट कीजिए। ८. योगापरापण ने पद्मावती का विवाह क्यों भोर किस प्रकार किया ? ६. उदयन कौन था? १०. योगपरायण ही नाटक में प्रमुख पात्र है । स्पष्ट कीजिए। ११. स्वप्नदृश्य का विश्लेषण कोजिए भौर नाटक मे उसका महत्व बतलाइये। १२. स्वप्नवासवदत्तम् के मूलस्रोत का उल्लेस कीजिए पोर बतलाये कि मास ने या परिवर्तन किये है पोर क्यों ? १३. मास के स्पिति-काल का निर्णय कीजिए। १४. माम को नाटयकला पर एक सक्षिप्त निबन्ध सिसिये। १५. मास की पेली पर प्रकाश डालिए । १६. मास की रपना में प्रराणिनीय प्रयोगों के सम्बन्ध में परना मत स्पष्ट कीजिए। १७. निम्नसिसित पर टिप्पणी निगिर:- नाटर, पूर्वरंग, नानी, मूत्रधार, विचम्मक, प्रस्तावना, कापुसी नैरप्य । १८. (म, निम्नसिगित सोझै का पर्य मिलिए:- घर प्रपम-१,२,४,७,८,११,१२,१४,१६

(: २० ).
मंक चतुर्य-२, ३,७,१०
अंक पञ्चम–३, ४, १२, १३
अंक पष्ठ--१,२, ४, ५, ८, १०, १५
(मा) निम्नलिखित गद्यांशों का सदमपूर्वक मर्प लिखिए---
पृष्ठ-१८ काञ्चुकीय का कथन ।
६८ चेटी का कथन।
५३ वासवदता का कथन।
६४,१२० विदूपक का कथन।
१६७ वासवदत्ता का कयन ।
१८६ प्रतीहारी का कथन ।
२१४ घात्री का कपन ।
.
.

Swapanvasvaduttam

Author
Kavi,bhas
Title
Swapanvasvaduttam
File name
Swapanvasvaduttam
Text
OCR done
Citation
1980
Published
2012/08
Publisher
Allahabad.,ramnarayan Benimadhav Prakashak
Language
Sanskrit
Pages
333
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312864
Barcode
99999990321609.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
kW5qU3NQDrt
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