Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Shri Aavshyak Shutra Part-i

Upadhay Shri Jain Muni Aatmaram · 2011/01

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थी वर्द्धमानाय नम ।
॥श्री आवश्यक सूत्र॥
॥ प्रथम भाग ॥
(श्रावक प्रतिक्रमण)
हिंदी पदार्थ और भावार्थ कर्ता,
जैन मुनिश्रीउपाध्याय आत्मारामजी(पजावी)
प्रकाशक,
श्रीमान लाला मुन्शीराम जिलेदार (कयनाल)
मिष्टर कशोरीलाल गार वी.एस.सी (गलासगो)
स्टेट इंजनीयर, रयास्त फरीदकोट (पजाय)
श्रा महावीरनिर्वाणाब्द ५४४१ ॥ ई स १९१५ ॥
प्रथमावृत्ति
प्रत १०००

अहमदाबाद
यह पुस्तक टकशालमें धी युनियन प्रिन्टींग प्रेस कपनी लीमीटेड में
मोतीलाल सामदासने छापा

TORE WORD. This tientiso has been vory bindly written by Upadhyaya Shoo Atma Ramji, to moot the longfolt rant of tho Jam community for having a wellcompilod Hudi Arashyalu Sutra (Jain prayer book'), at tho request of S S Jain Sabha, Punzab The contints will assure tho Jain public of its supozority in tiuo nnd idiomatic Hind, trans- Intion to such otlier publications Tho roador vill adınno tho truo senso of tho woll considorod commontory whoro ovor requnod Tho S S Jain Snbha Punjab, somo time ago, resolyod to get it publishod for the use of tho Jain public and sent tho inpuscript to Ajmoi for consultation It was by that timp that Lala Munshi Ram Zilludar and Mr Kishori Lal Gnir B Sc State Enginoor, Faridkot, undertook to got at published at their own ponses out of door love for Jain religion The S S Jain Sabha Punjab is very much indebted to the author, Upadhyaya Shree Atma Ramji as well as to the publishers This publi cation will do immense good to the community as lugards its daily. prayors (faqah) and I am sure that the roador will be benefitted by its perusa! The book is to some extent nos in its style eto, and is worth reading as well as committing to memory for those who hold a religious bent of mind SS Jain Sabha is also thankful to Lala Munshi Lal M.A., Government Pensioner, Lahore, for the labour of love ho took in rendering the book into expuro Hindi KASUR Dist Lahore pol PERMANAND B A. Pleader, Chief Court, Punjab

Opinion of Slirimian Lola Munshi Lal Jl, 1
Govornment Pensioner, Laliore
1
ITZ
I loro gono through the Ilinds of the bouk
namud Avashiyaha Sutrn, wutton by Jam Muni
Slırı Upadhyaya Atma Rain J. Tho book 16,
dood, a vory useful ono for the Sad 1114 and tho
Shrawakos. It Inys down rules for thio performance
of daily worship and puts stross on the fact that
our contoniplation of tho Supromo soul shonld be
puro sud uncontaminated and that wo should Icad
a life of virtuo and truth and bo compassionate to
all croaturos Such books ara zoally worthy of being
road and patronisod by tho gonoral public
Masa Lal 1A,
Government Pensionor,
LAIIORL

भईम् लेखककी प्रस्तावना ॥ प्रिय महोदयवर ! आत्मोन्नतिके लिये नित्य क्रिया करनी आव श्यकीय हैं क्योंकि इसके द्वारा जीव अपनी उच्च पदवीके योग्य हो जाता है,-सौ प्राणी मात्रके हित के लिये श्री अहंन देवने धर्मक्रिया वर्णन की है, निनके धारण करनेसे इस लोक और परलोकमे जीव सुटर फलको अनुभव करता है। अपितु अगसूत्र व उपाग सूत्र, च्छेद सूत्र, मूल सूत्र, कालिक सूत्र, उत्कालिक सूत्र इत्यादि सूत्रोंसे व्यतिरिक्त श्री भगवान् वर्द्धमान स्वामीने आवश्यक क्रियाओंको प्रतिपादन करनेवाला आवश्यक सूत्र रचा है जिसमें साधु साली श्रावक श्राविकाओंके नित्य कर्मका सुदर प्रकारसे वर्णन किया गया है, जिसके पट्र अध्याय हैं-जैसेकि-सामायिक १, चतुर्विशति स्तव २, वदना ३, प्रनिझमण ४, कायोत्सर्ग ५, प्रत्याग्न्यान ६, यही षट् आवश्यक अवश्य करणीय हैं जिनका फल श्री उत्तराध्ययन सूत्रके २९ वे अन्यायमे निम्न प्रकारसे लिखा है- तया च पाठः ॥ सामाइएणं भंने जीवे किं जणयइ सामाइएण सावज जोगं विरइंजणयइ। उ० सू० अ० २९ सू०८॥ अर्थ- हे भगवन् ! सामायिक करनेसे जीव क्या फल उत्पन्न करता है ? हे गौतम ! सामायिकके करनेसे नीव सावध (पापके ) योगोंकी -निवृत्ति करता है, क्योंकि समतारूप (सामायिक )के करनेसे पापके योगोंकी निवृत्ति होती है। फिर आत्मा सम्बरमे प्रवेश करके पापकर्मोके वधनसे छूट जाता है । यह प्रथम आवश्यकका फल वर्णन किया। अथ द्वितीय आवश्यक विषय ।। चवीसत्यएण भत्ते जीव कि जणयइ । चउवीसत्पएणं दसण विसोहिं जणयइ ॥ उ० सू० अ० २९ सू०९॥

४ अर्थ- हे भगवन् ! चतुर्विंशति स्तव (लोगस्स उज्जोयमरे )के पठन करमसे जीव क्या फल उत्पन्न करता है ? हे गौतम । चतुर्विशति स्तवका पाठ करनेसे जीव सम्यक्त्वकी विशुद्धि करता है क्योकि-चतुर्विंशति तीर्थकरोकी स्तुनि करनेसे जीव शुद्ध श्रद्धायुक्त हो जाता है । अथ वंदना आवश्यक विषय ॥ वंदणएणं भंते जीवे किंजणयइ वंदणएणं नीया गोयं कम्मं खवेइ उच्चा गोयं कम्मं णिवधइ सोहग्ग चणं अप्पडिहय आणाफलं निव्वत्तेइ दाहिण भावं चण जणयइ ।। उ० सू० अ०२९ सू० १०॥ अर्थ-वढना करनेसे हे भगवन् ! जीवको क्या लाभ होता है ? वदना करनेसे हे गोतम! आत्मा ऐसे कोंका नाश कर देता है जिनसे नीच घरा- नेमे जन्म हो, ओर ऐसे कर्मोको उपार्जन करता है जिनसे उच्च घरानेमे जन्म हो, फिर लोग उससे प्रीति करने लगते है और इसका परिणाम यह होता है कि वह अधिकारी वा माननीय पुरुष समझा जाता है, और सब लोग उसकी भलाई चाहते हैं तथा उसके अनुकूल हो जाते हैं । अथ *प्रतिक्रमण आवश्यक विषय ।। पडिक्कमणेणं भत्ते जीवे किं जणयइ पडिकम * स्थानाग सूत्रके पचम स्थानके द्वितीय उद्देश में आस्रयके पच द्वार लिखे हें जैसेकि-मिथ्यात्व १, अविरति २, प्रमाद ३, कषाय ४, योग ५। और पच सम्बर के द्वार है जैसेकि-सम्यक्त्व १, विति २, अप्रमाद ३, अपाय ४, और अयोग ५॥ इनको धारण करना और पहिले पाचौको दूर करना इसका नाम भी प्रतिक्रमण है। तथा ठाणागजीके पचम स्थानमें पाच प्रकारसे प्रति कमण और भी वर्णन किया है ॥ यथा-पचविहे पहिकमणे ५० त० आस पदा पडिकमण १, मिच्छत पहिकपणे २, कसाय परिकमणे ३, जोग परिक- मणे ४, माय पदिकमणे , तथा पष्टम स्थाने, छबिहे पडिघमणे ५० त. उचार पदिकमणे १, पासवण पदिकमणे २, इत्तरिते ३, आववाहिते ४, जकि ५ णणं वयच्छिदाई पिहेइ पिहिय वयच्छिद्दे पुण जीवे निरुद्धासवे असवल चरिने अठसु पवयण मायासु उवउने अपुहने सुप्पणिहिए विहरइ ॥ उ० सू० अ० २९ सू० ११ ॥ अर्थ-प्रतिक्रमगके करनेसे हे भगवन् ! जीव क्या फल उपार्जन करता है? प्रतिक्रमगके करनेमे हे गौतम ! नीर बोंके हिद्रोंको ढाप देता है। फिर वह नीव निराली हो जाता है और उसका चारित्र भी नि- ोप हो जाता है । वह अष्ट प्रवचन दया मानासे भी युक्त हो जाता है अर्थात् ५ समिनि ३ गुप्ति करके युक्त हो जाता है, और सयमके योगोमे तत्पर हो जाता है, फिर सयमको बडी मावधानोसे पालन करता है। अय कायोत्सर्ग आवश्यक विषय ॥ काउसग्गेण भत्ते जोवे कि जणयइ काउसग्गेणं तीयपडुप्पन्नं पायच्छित्तं विमोहेइ विसुद्ध पायच्छित्तेय जीवे निव्वुयहियए ओहरिय भरुच भारवहे पत- त्थज्झाणो वगए सुहं सुदेणं विदरइ ।। उ० सू० अ० २९ सू० १२॥ विमिच्छा ५, सोमणतिते ६, अर्थात् आघवद्वासे निवृत्ति १, मिथ्यात्य और काय योग अशुम मावासे भी निवृत्ति करना उसका नाम मी प्रतिक्रमण है । तथा पट् प्रकारसे मी प्रतिक्रमण वर्णन किया गया है जैसेकि-शिष्टा मून पश्चात् ईपिया वहिपादिको पढकर लोगस्सका ध्यान किया जाता है यह भी प्रतिममण है और जो देवती राइसीको प्रतिक्रमण किया जाता है वह भी प्रतिमामण है यावत् जीय पश्यात महायता प्रतिक्रमण वा अनसन व्रतको धारण करना यह भी पापसे निवृत्ति म्प प्रतिरमण है। मिथ्याचरणसे पीछे हटना यह भी प्रतिभामण है और जो शया कानके पीछे ध्यानादिक रिया की जाती है उसका नाम भी प्रतिक्रमण है ।।

. । अर्थ-कायोत्सर्ग (ध्यान) के करनेसे हे भगवन् ! जीवको क्या फल होता है ! हे गौतम ! कायोत्सर्गके करनेसे भूतकाल और वर्तमान कालके अतिचारोंकी शुद्धि होती है, फिर अतिचारोकी शुद्धि होनेपर जीव स्वस्थ चित्तवाला हो जाता है, जैसेकि-भारवाहक भारको उतारकर स्वस्थ चित्त हो जाता है, अन फिर वह सुदर न्यानयुक्त होकर सुखपूर्वक विचरता है । अथ प्रत्याख्यान आवश्यक विषय ॥ पञ्चक्खाणेणं भंते जीवे किं जणयइ पञ्चक्खा- णणं आसव दाराइं निरंभइ पञ्चक्खाणणं इच्छानिरोह जणयइ इच्छानिरोहंगएयणं जीवे सब दव्वेसु विणीय तण्हे सीयलभूए विहरइ ।। उ० सू०अ०२९ सू०१३॥ अर्थ-प्रत्याख्यान करनेसे है भगवन् ! जीवको क्या लाभ होता है ? हे गौतम ! प्रत्याख्यानके करनेसे जीव आत्रवके मार्गीको दाप देता है और इच्छाका निरोध कर देता है। फिर जब इच्छाका निरोध हो गया तब सर्व द्रव्योसे उस जीवकी निवृत्ति हो जाती है अपितु निवृत्ति होनेपर फिर वह जीव शान्तिरूप होकर विचरता है । सो यह षट् आवश्यक अवश्य करणीय है क्योकि इनके करनेसे आत्मा अपने निज स्वभावमें प्रवेश करने लग जाता है। पुन श्री अनुयोग द्वारनी सूत्रमे आवश्यक सत्रके चार निक्षेप किए है जैसेकि नामावश्यक १ योगाभ्यास भी इसका एक अदा है ॥ । सूत्रकर्ताने सर्व जीवोंको सुगम रूप उदाहरणोंसे प्रतियोधित किया है जैसेकि-इस स्थानपर भारवाहकका उदाहरण || + जो प्रतिक्रमणमें लधुव्रत गुर्जर भाषामे लिखे गये है वे इस देशक प्रथ नुगा है किन्तु जा य: प्रतों आतचार हैं उनसे भी ध्यान किया जा स्थापनावश्यक २ द्रव्यावश्यक ३ भावावश्यक ४ । सो मावावश्यक उमय (दोनो) काल अवश्य ही करणीय है किन्तु शोकसे लिखना पडता है कि अनेक विपत्तियोके कारण सूत्रज्ञान अल्प हो गया, फिर मतभिन्नताके कारण बहुधा आवश्यक सूत्रमें अनेक गच्छधारियोने अपनी २ आम्नाया- नुकूल अनेक प्रकारके पाठ संग्रह कर दिए, किसीने सस्कृतमे, किसीने प्रारुतमें और किसीने गुर्जर भाषामे । फल इसका यह हुआ कि-गच्छ२ का आवश्यक सूत्र बन गया, और कतिपय जनोंने तो इसकी वृद्धि कर- नेका ही ध्यान रखा कि-आवश्यक सूत्रकी श्लोक संख्या अतीव हो। सो इसका परिणाम भी यही निकला कि लोगोंने दोनो समय आवश्यक सूत्र (पडिक्कमणा) करना ही छोड दिया, क्योंकि यह स्वाभाविक ही बात है कि नित्यकर्मका पाठ अल्प हुआ करता है जिसको बालसे वृद्ध पर्यन्त सुख- पूर्वक पठन कर सके । इस लिए यह आवश्यक सूत्र दोनो समय सुखपूर्वक पठन हो सक्ता है और इसके पठन करनेसे अपने करणीय कार्योंका पूर्ण बोध हो जाता है। और इसको करते समय चार वस्तुओका ध्यान अवश्य ही कर लेना चाहिए, जैसेकि-द्रव्य शुद्ध १,जो आवश्यक करनेके सापन योग्य है जैसे कि-आसन, रजोहरण, रजोहरणी, मुखपत्ति, अन्य वस्त्रादि शुद्ध होने चाहिए ॥ क्षेत्र शुद्ध २, स्थान भी शुद्ध होना चाहिये जैसेकि- जिस स्थानमें असमाधि होवे वहापर आवश्यक भी शुद्ध नहीं हो सकेगा, इस लिए शुद्ध स्थानकी भी आवश्यकता है। काल शुद्ध ३, जो आवश्यक करनेका समय है वह उल्लयन न करना चाहिये ।। भावशुद्ध ४, अन्त कर- पसे पडिकमणा करना चाहिए जैसे कि श्री अनुयोग द्वारजी सूत्रमे भावा वश्यक विषय निम्न प्रकारसे लिसा है- तथा च पाठः॥ सतिं लोगोरिअं भावावस्मयं जणं समणे वा समणी वा सावयो वा साविआ वा तच्चिने तम्मण्णे तल्लेस्ते तदज्झवस्तित्ते तदज्झवसाणे तदोवउत्ते तद- ८ पिअकरणे तभ्भावणा भाविते अणत्य कथ्यइ मण अकुब्वमाणे उवउत्ते जिण वयण धम्माणु रागरत्ते तम्मपणे उभयोकाले आवस्सयं करेति से लोगोत्त- रियं भावावस्सयं से मोआगमतो भावावस्सयं से भावावस्मयं । इमे एगहिआ णाणा घोसा णाणा वंज णाणा मधेजा भवंति तंजदा आवस्तय अवस्त क- रणियं धुव निग्गहो विसोहीय अज्झयणं छकवग्गो नाओ आराहणमग्गो ॥१॥ समणेणं सावएणय अ. वस्स कायव्वं दवति जम्हा अंतो अहो निसस्सय तम्हा आवस्सय नाम ॥ सेतं आवस्सयं ॥ अथ-शिप्यने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! लोकोत्तर भावावश्यक कौनसा है? तब गुरुने उत्तर दिया कि भो शिष्या जो साधु, साध्वी, श्रा- वक, श्राविका, एकाग्र चित्तसे एकाग्र मनसे एकाग्र अध्यवसायोसे अर्थका उपयोग करते हुए, ओर आवश्यकमें पूर्ण प्रीति रखते हुए उसीकी पूर्ण भावना करते हुए अन्य कही भी मनको न करते हुए उपयोगपूर्वक जिन वचन और धर्ममे रगे हुए जो दोनो समय आवश्यक करते है उसे लोगो- त्तर नोआगम भावावश्यक कहते है। और आवश्यक सूत्रका एक ही अर्थ है किन्तु नाना प्रकारके उदात्तादि पोप हैं और नाना प्रकारके ही इसके व्यजन है और यह अवश्य करणीय है, ध्रुव है, निग्रह करने वाला है, न्याय पूर्वक है, आराधक होनेका मार्ग है, और रात्रिदिवसके अतरमें दोनों काल साधु,सावी, श्रावक, श्राविकाओको अवश्य करणीय है, इस लिये ही इसका नाम आवश्यक है । सो इस आवश्यक सूत्रके दो भाग है। द्वितीय भागमें साधु साध्वीके पट आवश्यक और इस प्रथम मागमे श्रावक श्राविकाओके अवश्य करणीय पट् अध्याय लिखे गए हैं। और श्री श्री श्री पूज्य १००८ श्री अमरसिंहजी महाराजकी आम्नायानुसार है, क्योंकि-श्री श्री श्री आ- - चार्य अमरसिंहजी महाराजकी आम्नाय सूत्रानुसार है जैसेकि-श्री ज्ञाता- सूत्रके पचम (पाचवे) अध्यायमें पथकजीने कार्तिक चौमासीको दो प्रति- क्रमण किए थे- तथा चपाठ॥ तत्तणं से पंथए कत्तिय चाउम्मासियंसि कय काउसग्गे देवसियं पडिक्कमणं पडिकचे चाउम्मासियं पडिक्कमिओ कामे सेलयं रायरिसिं खामणठयाए सी- स्सेणं पाएसु सघट्टए तत्तेणं से सेलए पंथएणं सोस्सेणं पाएसुसंघट्टिए समाणे आसुरते जावमिति मिसेमाणा उठेतिर एवं वयासीसे केसण भोएस अपत्थिय प- स्थएजा ववज्जिए जेणं ममं सुहपसुत्तं पाएसु सघट्टेति तत्तेणं से पत्थए सेलएणं एव वुत्ने समाणे भीए तत्थे तसिए करयलकटु-एवं वयासी अहणं भने पंथए कय काउसग्गे देवसिय पडिकमणं पडिकते चाउम्मालियं खामेमाणे देवाणुप्पियं वंदमाणे सीस्तेणं पाएसु मम संघटेमि त तुम्हें देवाणुप्पिया मम अवराहं तुमणं देवाणुप्पिया खमंतु मारुहंतुणं देवाणुप्पियाणाति भु- ज्जो २ एव करणयाए तिकडे सेलय अणगारं एयमई सम्मविणयणं भुज्जो २ खामेइ । इति वचनात् ॥ अर्थ-तत्पश्चात् पथकनीने कार्तिक चातुर्मासीके दिन जबकि कायो- सर्गका समय था उस समय देवती प्रतिक्रमण किए पीछे और चातुर्मासी प्रतिक्रमण करनेकी आकाक्षा करते हुए शेलक राजरूपिको क्षमावनाक वास्ते अपने शिरसे उनके चरणकमलोंका स्पर्श किया, तब शेलक ऋपि अपने चरणोंको स्पर्शित हुआ जानकर तथा ऋद्ध होकर बैठ गए। पुन इस १ प्रकार कहने लगे-कौन है मृत्युकी इच्छा करनेवाला और हीन लक्षणोंका धनी, निसने मुझ शयन किये हुरके चरणकमलोका स्पर्श किया है? इस प्रकार शैलक रुपिके भयानक वचन सुनकर पथकनी भयको प्राप्त हुए और विनयपूर्वक दोनो हाथ जोडकर निम्न प्रकारसे विज्ञप्ति करने लगे कि- हे मावन् ! मै पथक नामक साधु प्रतिक्रमण कर रहा हू, मैंने देवसि सम्ब- धि पडिकमणा कर लिया है और चातुर्मासी सम्बन्धि प्रतिक्रमणकी क्षमा वना करके आपको वदना कर रहा हू, इसी लिए ही मैंने आपके चरण- कमलोका स्पर्श किया है, अत हे भगवन् ! मेरे अपराधको क्षमा कीजिये, आप क्षमा करने योग्य हैं, मैं फिर ऐसा अपराध नहीं करूगा | इस प्रकारके शीतल वचनो करके शेलक पिनीको शान्त किया ।। ता- त्पर्य यह है कि नित्यम् प्रति प्रतिक्रमण करनेकी प्रथा न होने पर भी दो प्रतिक्रमण किए जाते थे। जब प्रतिक्रमण अवश्य करनेकी प्रथा है तब तो चातुर्मासी और सम्वत्सरीको दो प्रतिक्रमण अवश्य ही करने सूत्रोंसे सिद्ध हैं तथा यही आम्नाय श्री पूज्य* अमरसिंहजी महारानको है, और पचम आवश्यक अर्थात् पक्षीको १२ लोगस्स उज्जोयगरेका ध्यान, चातुर्मासीको २०, और सम्वत्सरीको ४० रोगस्सका ध्यान करना, क्योकि यह कथन पच व्यवहारानुकूल है और चातुर्मासी वा सम्वत्सरीको प्रथम देवसी प्रति- क्रमण फिर चातुर्मासी वा सम्वत्सरी प्रतिक्रमण करने चाहिये ॥ इस लिए ही मैने श्रीश्रीश्री १००८ परमपूज्य आचार्यवर्य श्री सोह- नलालजी महारानकी आज्ञासे तथा श्रीधीश्री १००८ गणावच्छेदक या स्थविर पदविभूपित श्री स्वामी गणपतिरायजी महारानकी आज्ञासे पडावश्य- कका हिंदी भाषायुक्त अर्थ लिखा है। आशा है भव्य जन विधिपूर्वक आव- श्यक सूत्रके पठनपाठनसे अपने अमूल्य मानुष जन्मको सफल करेंगे । उपाध्याय जैन मुनि आत्माराम ।। * श्री पूज्य अमरसिंहजी महाराजका नाम वर्तमानकालमें विख्यात हो. नेसे ही पुन १ लिखा गया है ॥

आवश्यक करनेकी विधि ॥ सुदर स्थानमे पवित्रतापूर्वक एक आसनपर स्थिति करके श्री सीमदर स्वामीनीको वंदना करके या वर्तमानमें अपने गुरुओंको वदना नमस्कार, तिक्खुतोके पाठसे तीन वार करके फिर, चौवीसत्था करनेकी आज्ञा लेकर निम्न लिखित पाठ पढे । अरिस्तो महदेवो, फिर, इच्छाकारण, फिर, तस्तोतरीका पाठ पढके एक लोगस्सका ध्यान करे, फिर नमो अरिहताण कहके ध्यान पारे, फिर एक चउविसत्था उदात्त स्वरसे पढे, फिर वामा जानु उञ्चा करके दाहिण जानु भूमिपर रखकर दो नमोत्युण के पाठ पढे-प्रथम सिद्धोका द्वितीय अरिहतोका, फिर निरखुत्तोके पाठसे वदना करके प्रतिक्रमण करनेकी आज्ञा लेकर प्रथम-आवाही इच्छा- कारण, यह पाठ पढे, फिर नवकार मन, फिर, करेमि भत्ते सामाइय, फिर, इच्छामि ठामि का पाठ, फिर, तस्सोतरी करनेका पाठ, फिर, “यान करे। ध्यानमें ९९ वे अनिचार और इच्छामि आलोइय पर्यन्त ध्यान करे। ध्यान- मे-जो मे देवसि (राईसि) अझ्यारकउ चिंतनु-पेमे कहे, फिर नमो अरिह ताण कहके ध्यान पूर्ण करे। फिर तिखुतोके पाठमे वदना करके रोगस्स उज्नोयगरेका पाट पढे । फिर वदना करके इच्छामि समासमणोका पाठ दो वार पदे। फिर तिक्खुतोके पाठसे चतुर्थ आवश्यककी आज्ञा लेकर वही सर्व अनिचार पढे । फिर तिखुतोके पाठसे वदना करके श्रावक सूत्र पठन करे। फिर दो वार इच्छामि खमासमणोका पाठ पढके यथाशक्ति पचपदोको वटना नमस्कार करके फिर अनत चौवीसीका पाठ पढे। फिर सर्व जीवोंको खमावना करके आनस्सही इच्छाकारेण, नमोकार मत्र, करोमि भत्तेका पाठ, इच्छामि ठामि काउस्सग्ग, फिर तस्सोत्तरीका पाठ पठन करके कायोत्सर्ग किन्तु सर्व पाठोंके भतमें जो मे देवसि भयारकउ तस्स मिच्छामि दुषद, ऐसे कहे।

૨૨ करे । नित्यम् प्रिति ४ लोगस्सका ध्यान करे, फिर नमो अरिहंताणं पढ़कर एक लोगस्स उन्नोयगरेका पाठ और दो वार इच्छामि खमासमणोका पाठ पढकर, फिर तिकवुत्तोके पाठसे वदना नमस्कार करके यथाशक्ति प्रत्या- ख्यान करे। यदि गुरु प्रत्याख्यान करवाए तो वोसिरामि आप कह लेवे। फिर पूर्व विधिपूर्वक दो नमोत्युणके पाठको पढे और समय धर्म ध्यानमें व्यतीत करे।जब सामायिक पूर्ण हो गइ ज्ञात करे तब "इच्छाकारण" इत्यादि सूत्र पढके "तस्तोत्तरी करणेण" के पाठको पठन करे। तत्पश्चात् एक "लोगस्स उज्जोयगरे"का व्यान करे, फिर "नमो अरिहताग" ऐसे कहके ध्यान पार करे। एक लोगस्स उज्जोयगरेके पाठको उच्च स्वरसे पढ । फिर प्राग्वत् दो नमोत्युण पढके नवमा सामायिक व्रत इस स्त्रको पढे । एतावत् मात्र सूत्रों के पठन करनेसे सामायिककी आचना हो जाती है। फिर चतु- देश नियम धारण करे जिनके करनेसे महान् काँका आलव निरोप होता है, सो सर्वथा आस्तवका निरोध हो जानेपर जीव मोक्षाधिकारी बन जाते हैं। - ॥ इति विधि समाप्त ॥ । पक्षिको १२, चातुर्मासिको २०, सम्पत्सरीको ४० का ध्यान करना चाहिये ॥

॥ णमोत्थुण समणस्स भगवतो महावीरस्सणे ॥ ५६ श्रावक प्रतिक्रमण ॥ (37 तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेमि वंदामि नमसामि सकारेमि सम्मामि कल्लाणं मंगल देवयं चेइयं पज्जुवासामि मत्थएण वदामि ॥१॥ हिंदी पदार्थ-(तिपयुत्तो) तीन वार (आयाहिण) गुरु महारा- जजीकी दक्षिण औरसे लेकर (पयाहिण) प्रदक्षिणा ( करेमि) करता हू (वदामि) स्तुति करता हूँ (नमसामि ) नमम्कार करता हू (सकारेमि ) सत्कार देता हू (सम्माणमि) सन्मान देता हू । गुरुदेव कैसे हैं (कहाण) कल्याणकारी (मगल) मगलकारी (देवय ) धर्मदेव (चेइय ) ज्ञानवत, यह चारो ही नाम गुरु महारानके है, सो मैं (पज्जुवासामि) ऐसे गुरु महा रानकी मन वचन काया करक सेवा करता हू और (मत्थएण) मस्तक करके (वटामि) वदना करता हूँ। भावार्थ-उक्त सूत्रमें यह वर्णन है कि गुरु महाराजके दक्षिण पासेसे लेकर तीन प्रदक्षिणा करके नमस्कार करे और गुरु महारानको स. न्मानादि भली प्रकारसे देवे, मस्तक नमाकर वदना करे, किन्तु (तिपखुत्तो आयाहिण पयाहिण) यह दो सूत्र वदनाके विधि विधान कर्ता हैं, अपितु (कमि)जो कि सस्कृत भाषामे 'कमि' शब्द उत्तम पुरुषका एक वचन है, वहाते ही वढना करनेका मूल सत्र जानना । और इस सूत्रके द्वारा गुरु चिति सज्ञाने धातुसे ताडतका भ्य प्रत्यय लगकर चैत्य शन्द यनता है और प्राकृतमें चेय ऐसे रूप होता है किन्तु चेय रामद द्वितीयाका एक वचन ही है।

महारानकी तीन वार वदना करके चतुर्विंशति स्तवकी आज्ञा लेकर क्त्वके विशुद्धयर्थे निम्न लिखित सूत्र पढे । अथ मूल सूत्रम् ।। अरिहंतो महदेवो जावज्जीवाय सुलाहु सुगुरु जिणपण्णत्तं तत्तं एसम्मत्तं मे गहिये पंचेंदिय सं रणो तह नवविह बंभचेर गुत्तिधरो चउविह कर यमुक्को इय अठारस्त गुणेहिं संयुत्तो पंचमहन्द जुत्तो पंचविह आयार पालण समत्यो पंच समिः त्तिगुत्तो छत्तीस्स गुणो गुरु होइ सो गुरु मज्झं ॥१॥ हिंदी पदार्थ (अरिहतो ) अहं पूनाया धातुसे जो शतृ प्रत्यया होकर अर्हत् शब्द बनता है, तिसका नाम प्राकृत भापामे अरिहत है। य अई ऐसा धातु है फिर ( सल्लड्वयल्लुटोवाऽनिनी ) शाकटायन व्या रणके इस सबसे अई पूजाया धातुको शतृ प्रत्यय हो गया। फिर शक ऋकारकी इत्सना करके पुन (यस्येत्सज्ञा तस्य लोप) अर्थात् लोप कर अर्हत् ऐसे रूप बन गया। फिर (शत्रानश)प्राकृत व्याकरणके इस सूत्र शत् प्रत्ययके तकारको न्न आदेश हो गया तब अर्हत ऐसे हुआ । पि (उच्चाहति ) प्राकृत व्याकरणके इस सूत्रसे अरिहत अरुहत अरहत हे तीन रूप सिद्ध हुए। अपितु यह शब्द प्रारुत मापामे अजत हो गया। (अत से?) इस सूत्रसे (अरिहतो) यह रूप हुआ सो अरिहत (मिह मेरे (देवो) देव हैं (जावनीवाय ) यावत्काल मेरी आयु है, फिर ताव त्काल ही (सुसाहु) सुसाघु जो है सो (सुगुरुण) मेरे गुरु हैं (निण प्रणत्त) जिनेन्द्र देवका प्रतिपादन किया हुआ जो (तत्त) तच है सो +मे मद मम मह मह मन अम्ह अम्ह इता ॥ प्रा० म०८ पा० सू०११३॥ अस्मदोडसा यष्टपेक वचनेन सहितस्य एतेन वादेशा भवति ।।

मरा धर्म है (ए सम्मत्त) यही सम्यक्त्व (मे) मेरे (गहिय ) गृहीत है अर्थात् देव गुरु धर्मकी जो पूर्ण निष्टा हे सो मेरा सम्यात्त्व है । और गुरु मेरे वह है जो (पत्रिंटिय सवरणो) पाच इद्रिय यथा श्रोत्र, प्राण, चक्ष, रस, स्पर्श, इनको जो वश करनेवाले है (तह) तथा (नाविह) नवविधिक (वभचेर गुत्तिधरो) ब्रह्मचर्यकी गुप्तिके धरनेवाले जैस कि जिस स्थानमें स्वी पशु नपुसकका निवास होवे ऐसे स्थानको छोड देवे भूपक विनाम (मानार) का दृष्टान्त १, स्त्रीका व्याख्यान न करे नींबूका दृष्टान्त २, स्त्रीसे सबटा भी (स्पर्श भी) न करे उष्ण भूमिकामें घृतका दृष्टान्त ३, स्त्रीके सागोपागको भी न देखे नेत्रोंके रोगीको सूर्यको हेतु ४, पूर्व क्रीडाको स्मृति न करे तक वा सुदर अनिष्ट वार्ताओका दृष्टा त ५,स्त्रीके समीपकी वस्ती- को भी छोड देवे जैसे वादल गरजते हुए समय मयूरके नृत्य करनेका दृष्टान्त ६ प्रणीत आहारको भी न आसेवन करे जीर्ण वस्त्रका दृष्टान्त ७, फिर अतीव आहार भी न करे स्वल्प भाजनमे बहुत वस्तुका दृष्टान्न ८, शरीरका भी मृगार न करे मलीन वस्त्रमें रत्नका दृष्टात ९, सो जो गुरु उक्त विधिसे ब्रह्मचर्य पालनेवाले हैं और (चउविह कसायमुको) चतुर्वि विक्री कपायोसे भी मुक्त है जैसे क्रोध १ मान २ माया ३ लोम ४ (इय अहारस्स धुणेहि सयुत्तो) इन १८ गुणो करके जो सयुक्त है, फिर (पच महव्वय जुत्ती) पान महाव्रतो करके सयुक्त है जैसेकि अहिंसा १ सत्य २ दत्त ३ ब्रह्मचर्य ४ अपरिग्रह ५ इनको पालनेवाले, फिर (पचविह) पाच विधिके (अयारपाला समत्यो) आनार पालणमें समर्थ है जोकि ज्ञानाचार १ दर्शनाचार २ चारित्राचार ३ तपाचार ४ बलवीर्यावार ५ फिर (पच समिओ) पाच समित करके भी युक्त है जैसेकि (इर्या समित) विना देखे न चलना (मापा समित) विना विचारे न बोलना (एपणा समित) निर्दोषाहार लेना ( आयार भडमत्त निरखेवणा समित) विना यल वस्तुका न रखना न उठाना (उच्चार पासवण खेल सिंगण मल्ल मल परिठावणिया . । . --- समित ) पूरीप, मूत्र, थूक, श्लेप्म, स्वेट, मलादि जो गेरने योग्य वस्तु है उनको विना यत्न न गेरना, फिर (त्तिगुत्तो) त्रिगुप्त जैसोक मन, व चन, काया सो जो ३६ (छत्तीस गुणो होई सो गुरु मज्झ) गुणों करके युक्त है वे ही मरे गुरु हैं। भावार्थ-इस सूत्रमें यह वर्णन हे कि देव गुरु धर्मका पूर्ण स्वरूप ज्ञात करके फिर समग्र प्रकारसे देव गुरु धर्मोपरि निश्चय करना यही सम्यक्त्व है और वही धर्म सत्य है जो सत्य पदार्योंका सम्यक् प्रकारसे उपदेश है। पुन अहिंसा सत्य परोपकार ब्रह्मचर्य क्षमा दया दान तप भाव मृदुता मजुभाव इत्यादि पदार्थों का पूर्ण नीतिसे वर्णन करनेवाला है ॥ देव वही है जो राग द्वेपादि अतरग शत्रुओंसे मुक्त होकर सर्वज्ञ वा सर्वदशी है। गुरुका स्वरूप मूल सूत्रके पदार्थमे किंचित् मात्र लिख चुका हूँ जैसे- कि-अहिंसा, सत्य, दत्त, ब्रह्मचर्य, अपरिप्रह, इनको धारण करनेवाले, मन, वचन, कायाको वश करनेकाले, क्रोध मान माया लोभको त्यागनेवाले, ज्ञान दर्शन चरित्रके पालनेवाले, पाच इन्द्रियोको दमन करनेवाले, वैराग्य मुद्रा सौम्य प्रवृत्ति इत्यादि गुण करके जो युक्त हैं वही गुरु है। सो देव गुरु धर्मका पूर्ण विधिप्से आराधन होना चाहिये । इस सूत्रको पढके फिर श्रावक निम्न लिखित सूत्रको पठन करे। अथ मूल सूत्रम् ॥ इच्छाकारेण संदितह भगवन् इरियावहियं प- डिकमामि इच्छं इञ्छामि पडिकमिउं इरियावहि- याए विराहणाए गमणागमणे पाणकमणे वीयक- मण हरियकमणे उसा उत्तिंग पणग दग मट्टीमकड़ा संताणा संकमणे जे मे जीवा विराहिया एगिंदिया बेइदिया तेइंदिया चउरिदिया पंचिंदिया अइयार कओ तियालेसियासंघाइया संघट्टिया परियाविया किला- मिया उद्दविया ठाणा उठाणं संकामिया जीवियाउ पवरोविया जो में देवति तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥ २॥ हिंदी पदार्थ-(इच्छाकारेण ) आपकी इच्छापूर्वक (सदिसह) वा आपकी आज्ञानुसार ( भगवन् ) हे महा भाग्यवान् (इरियावहिय) नो चलनेके समय हिंसादि क्रिया हुई है सो उस कियासे मै ( पडिक्कमामि) पीछे हटता ह अर्थात् हिंसादि कियाओंसे निवृत्ति करता हू। तब गुरु कहने लगे (पडिक्कमह) हे शिष्य ! सावध क्रियाओसे शीघ ही पीछे हटो । तब शिष्यने कहा (इच्छ) आपकी आज्ञा मुझे स्वीकार है और मै भी यही ( इच्छामि ) इच्छा करता है । यह सर्व सूत्र सामायिक क के विनयके ही सूचक हैं किन्तु आलोचनाके निम्न लिखित सूत्र हैं-(इरिया वहियाए) मार्गमे चलते समय जो गेरेसे विना उपयोग ( विराहणाए ) विराधना हो अर्थात् विना उपयोग चलते समय किसी भी जीवकी विराधना यदि हुई हो तो मै उस विराधनासे (पडिक्कमिड) निवृत्ति करता हूँ क्योंकि विराधना (गमणागमणे) आने जानेसे ही होती है सो यदि गमनागमनसे (पाणक मणे) प्राणी उपरि आक्रमण हो गया हो, इसी प्रकार (बीयकमणे) बीजो- परि (हरियक्मणे)हरिउपरि (उसा) ओसोपरि (उसिंग) कीडियोके भवनोपरि (पणग) पाच प्रकारको वनस्पति ( दग) पाणी (मट्टी) वा स- चित मृत्तिका उपरि (मकडा ) कोई नीव विशेष (सताणा) वा जालोपरि (सकमणे) आक्रमण हुआ हो (जे) नो (में) मेरेसे (जीवा ) जी. वोका उक्त विधिसे नाश हुआ हो जैसे कि-(एगिदिया) एकेन्द्रिय जीव पृथिवी पाणी अग्नि वायु वनस्पति (बेइदिया) हिइद्रिय जीव जैसे गडौं- पांच वर्णकी सूक्ष्म वनस्पति होती है जैसे कि निगोदारि, सो पांच वर्ण निम्न प्रकार है। कृष्ण १ पीत २ रक्त ३ हरित ४ श्रेत ५॥ ३ १८ ~ लादि (तेझंदिया) त्रिइद्रिय जीव जैसे कुयुवा, न, लीखादि (चरिंदिर चतुगिद्रिय जीव जैसे मत्सरादि (पचिंटिया) पचेद्रिय जीव जैसेकि- चर, स्थलचर, खेचर, सर्व जातिके पनेद्रिय इत्यादि जीवोकी विराधन कारण शास्त्र वर्णन करते हैं जैसे कि-(अभिहया) सन्मुख आते हुए विना उपयोग पीडित हुए हो ( वत्तिया) रज उनोपरि आच्छादन गई हो (लेसिया) भूमिकामे मसले गए हो (सपट्टिया) पर सघटित हुए हो ( परियाषिया ) परितापना उन जीवोंको हुई ( किलामिया ) वा किलामना ( उद्दविया ) अयवा उपद्रव ३ जीवोको किया हो वा (ठाणा उठाण) एक स्थानसे ( सकामिआ) दून स्थानोपरि सक्रमण किया हो वा (जीविआउ) जावकी जो आयु (ववरोविया) उससे व्यवरोपित हुए हों अर्थात् वह जीव मृत्यु हो गये (नो) जो (मे) मैने (देवसि ) दिन सम्बन्धि (अइयार) अनिचार (कों किया है (तस्स) उस अतिचाररूप (मिच्छा मि दुक्कड) पापसे मैं पं हटना हु॥ भावार्थ--उक्त सूत्रमे प्रथम तो सामायिक कर्ताका विनय वर्मसि किया है, फिर सामायिक करनेवाला जीव यह विचार करता है कि मैने : सामायिक करने के लिए गमनागमन किया है, यदि उक्त क्रिया करते हु कोई भी जीव मेरे विना उपयोग दुखित हुआ हो या रक्षा करते २ मेरे मृत्युको प्राप्त हो गया हो और मैने उसको किसी प्रकारकी पीड़ा दी है तो मैं उस पापका पश्चाताप करता हू, क्योंकि मैं पाप कर्मको मिथ्यारू मानता हू ॥ सो श्रावक उक्त सूत्रको पढके फिर कायोत्सर्गकी शुद्धि वास्ते निम्न लिखित सूत्र पढे ।। अर्थ मूल सूत्रम् ॥ तस्स उत्तरी करणेणं पायच्छित्त करणेणं विसोहि करणेण विसल्ली करणेणं पावाणं कम्माण निग्याय णहाय ठामि काउसरगं अन्नत्य उसस्सिएणं निस -- स्सिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइएणं उड्डएणं वाय- निप्लग्गेण भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहि अग संचा- लेहि सुहुमहि खेल संचालेदिं सुहुमेदि दिष्टि सचालेहि एवमाइएहि आगारेहिं अभग्गो अविराहिओ हुज मे काउसग्गं जाव अरिहंताणं भगवताण नमोकारणं न पारेमि ताव कायं ठाणेण मोणेणं ज्झाणेणं अप्पाण वोसिरामि ॥३॥ हिंदी पदार्थ-(तस्स) पुन आत्माकी शुद्धि अर्थे (उत्तरी कर- ण) प्रान जो कृत है उसको उत्तरीकरण कहते हैं, फिर (पायच्छित्त करणेणा) पापोके दूर करनेके वास्ते तया (विसोहि करणेण ) आत्माको विशुद्ध करनेके लिए पुन (विमल्ली करणेण ) शल्योंके दूर करने वान्त और (पाण) पापकोंके (निग्मायणटाय) नाश करनेके वास्ते (ठामि) एक स्थानोपरि (काउसण) पारकर्मोंके दूर करनेके वास्ते कायोत्सर्ग करता हू, किन्तु (अन्नत्य) इतना विशेष जो आगे कह जाते है इनके विना कायाको हिलाअगा नहीं अपितु यह भो आगार स्ववशके नहीं है जैसेकि-(उस- सिपण) ऊो श्वासके आने पर अथवा (निसस्सिएण) नीने श्वासके होने पर वा (खासिएण) खामीके होने पर, इसी प्रकार (छीएण) ठीक (जमा इएण) नभाई [अवासी ] (उडुरण) डकार (पायनिसग्गेण ) अधो वायु- के निकलने पर (भमलिए ) चक्रके आने पर (पित्तमुच्छाए ) पित्तके उच्छ- लेने पर (सुटुमहिं) मूक्ष्म (अग सचालेहिं) अंगके सचालन होनेपर (सुहु- मेहि ) सूक्ष्म (खेल सबालोह ) श्लेष्मणके सनालन होनेपर (सुहुमेहिं) सूक्ष्म (दिहि सचालेहि) दृष्टिक चलने पर (एपमाइएहिँ) इत्यादि अन्य कई आ गारो प्रतिज्ञाओ] करके यदि मेरा शरीर न्यानावस्थामें कपायमान हो जावे तो मेरा ध्यान (अपगो) भग न होगा (अविराहिओ) विराधित न होगा २० । किन्तु इन प्रतिज्ञाओ करके (हुज्न) होवे (मे ) मेरा (काउसग्ग) का- योत्सर्ग । सो कायोत्सर्गक कालका परिमाण निम्न प्रकारसे है जैसेकि- (नाव) यावत् काल में (अरिहताणं) श्री अरिहतों ( भगवंताण) भगवतो को (नमोकारेण) नमस्कार न करू तावत्काल पर्यन्त (कार्य) कायाको (ठाणेण) एक स्थानमें रक्खूगा, पुन (मोणेण) मौन वृत्तिों तथा (मा- णेणं) एकाग्र ध्यानगृत्तिमे (अप्पाणं) अपनी कायाको वा अपनी आत्मासे पापकर्मको (वोसिरामि) [व्युत्सृजामि ] ओडता है ॥ भार्थ-उक्त सूत्रमें यह विधान है कि-पापकर्मके नाश करने के वास्ते ध्यान करे और जो प्रतिक्षाए सूत्रमें वर्णन को गई है उनके विना ध्यानमे कायाको सचालन न करे। पुन ध्यानका नियम यावत् काल नमो अरि हताण ऐसा पाठ न पढे तावत् काल ध्यान ही रक्खे ! यह सर्व उक्त सूत्रमे आत्माको विशुद्धिके लिए ध्यानविधि प्रतिपादिन की गई है अपितु व्यानमे निम्न लिखित सूत्र पढे ॥ अथ मूल सूत्रम् ॥ लोगस्स उजोयगरे'धम्मतित्थयरे जिणे अरि- इंते कित्तइस्सं चउवीसंपि केवली ॥१॥ उसभ म.। जियं च वंदे संभवमभिणदणं च सुमइं च पउमप्पदं सुपासं जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुप्फ- दत्सीयल सिजंस वासुपुजं च विमल मणंतं च जिणं १ टाणे-शस्येत् ॥ टादेशेणेशसिचपरे अस्य एकारी भवति ।। टाण- पच्छेण-शस-पच्छे-वृक्षान् । इसी प्रकार लोकस्य उद्योतकरान् । सो आगे भी इस प्रकार जानना चाहिये ॥ २ मे स || प्रा. व्या. अ० ८। पा० ३ । सू। धातो परो भविष्यति काले तहस्स इत्यादि ॥ न २१ धम्म संतिं च वदामि ॥३॥ कुंथु अरं च मलिं वदे मुणि. सुवयं नमिजिणंच वंदामि अरिहनेमि पासं तह वद्ध- माण च ॥ ४॥ एवं मए अभित्थुआ विहुय रयमला पहीण जरमरणा चउवीसंपि जिणवरा तित्थयरा मे पसीयंतु ॥५॥ कित्तिय पदिय महिया जे ए लोगस्त उत्तमा सिद्धा आरोग्ग वाहिलाभं समाहिवर मुत्तमर्दितु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा आइञ्चेसु अहियं पयास. यरा सागरवर गंभीरा सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥७॥ हिंदी पदार्थ-(लोगस्स) लोकके विषय (उज्जोयगरे) उद्योत करनेवाले और (धम्मतित्थयरे) धर्म रूपी तीर्थके स्थापन करनेवाले पुन (जिणे) रागद्वपके जयकत्ती (अरिहते ) ऐसे जो श्री अरिहत है (कित्त इस्स) तिनकी कीर्ति करता हू ( चउवीसपि) और ऋपमादि चतुर्विशति तीर्थकरोंके नाम लेकर स्तुति करता हू । अपि शळसे अन्य जिनन्द्राका भी ग्रहण करना । पुन २४ तीर्थकर कैसे है ( केवली ) केवल ज्ञानके धारक हैं ॥१॥ अथ चतुर्विशति तीर्थकरनामानि । (उसभ) ऋषभदेवजीको (अनिय) (च) पुन अजितनायजीको (वदे) वदना करता हू (सभव ) समवनाथजी- को (अभिणदण) अभिनदननाथनोको (च) और (सुमइ) सुमतिनापनीको (च) पुन (पउमप्पह) श्री पद्मप्रभुस्वामीनीको (सुपास) श्री सुपाउन नायनीको (मिण ) रागद्वेपके जीतनेवाले (च) और (चदप्पह) चद्रम मुनीको (नदे) वदना करता इ ॥ २॥ (सुविहिं ) सुविधिनाथनीको (च) पुन इनका द्वितीय नाम (पुप्फदत) पुष्पदतनीको (सीयल) शीतलनाथनीको (सिग्नस) श्रेयाप्सनाथनीको (वासुपुज्ज) वासुपूज्य स्वामी नीको (च) और (विमल) विमलनायनीको (अणत ) अनतनाथनीको (च) और (मिण) रागद्वेपके जीतनेवाले (धम्म) धर्मनाथनीको (च) २२ उन (सति) शान्तिनाथजीको ( वदामि ) वदन करता हूं ॥ ३ ॥ (कुथु), कुथुनाथनीको (अर) अरनाथजीको (च) और (मडिं) मल्लिनायनीको (वदे) वदना करता हूं (मुणिसुन्वय) मुनि सुबन स्वामीजीको (नमिनिण) नमिनाथनीको रागद्वेपके जीतनेवाले (च) और (वदामि) वदना करता ह (अरिष्टनेमि) अरिष्टनेमिजीको (पास) पावनायनीको (तह) तया (वरमाण) वर्द्धमानस्वाभीनीको अर्थात् श्री महावीरनीको पदना करता है। (च) पाद पूर्णार्थे है ॥ ४ ॥ (एव) इस प्रकारसे मैंने ( अभित्युआ) अरिहतोंकी स्तुति की है क्योकि अरिहत कैसे है (विहुय) जिन्होंने दूर, करी हे (रयमला) कोंकी रज तथा मल फिर (पहीण) क्षय किया है (जरमरणा) जरा और मृत्यु ऐसे जो (चउवीसपि) चतुर्विशति तीर्थंकर है वा अन्य केवली भगवान हैं वे सर्व (जिणवरा) जिनवर (तित्ययरा) वा सर्व तीर्थंकर देव (मे) मेरे ऊपर (पसीयतु) प्रसन्न हो। यह सन व्यव हार नयके मनसे प्रार्थनारूप वचन हैं ॥५॥ श्री तीर्थकर देव (कित्तिय) कीर्तित (वदिय) वदित और (महिय) पूज्य है, अपितु महिड् धातु पूजा वा वृद्धि अर्थमे व्यवहत है सो इस स्थानोपरि भावपूनाका ही विधान है, (ज) जो (ए) यह प्रत्यक्ष (लोगस्स) लोगों ( उत्तमा) उत्तम (सिद्धा)' सिद्ध है सो मुझको (आरोग्य) रोगरहित निर्मल ऐसा जो सिद्ध भाव है वा (बोहिलाम) बोधचीज सम्यक्त्वका लाम ओर (उत्तम) उत्तम (समाहि) समाधि (वर) जो प्रधान है सो मुझको (दितु) दो ॥ ६ ॥ क्योंकि आप कैसे है ? (चदेसु) चन्द्रमासे (निम्मलयरा) अधिक निर्मल और (आइ- च्चेसु) सूर्यसे भी अत्यत ( पयासयरा) प्रकाश करनेवाले हो ( सागरवर ) प्रधान सागर जो कि स्वयभू रमण समुद्र है तिसकी तरह (गभीर) गुणोंमें गम्भीर है सो हे सिद्धो (सिद्धा ) कार्य सिद्ध हुए है जिनके ऐसे जो श्री सिद्ध प्रभु हैं सो हे सिद्धो (सिहि ) मुक्ति जो है सो ( मम ) मुझको (दिसतु ) दो ॥ ७ ॥ भावार्थ-इस सूत्रमे मो सम्यक्त्वकी विशुद्धिके लिए पाठ है उनका गृहस्थी ध्यान करे जैसे कि २४ तीर्थंकरों के नाम हैं, फिर उनके गुणोका - यथाशक्ति अनुकरण भी करे क्योंकि सामायिकमे मुख्यतया समाधिकी ही आवश्यकता है। जो प्रार्थनाके पाठ हैं वह भी इस प्रकारसे है जो शीघ्र ही आत्मबोधको दिसलाते है-जैसे कि (जिन) ग्यान करते २ वर्ण विपर्यय करनेसे (निज) व्यान हो जाता है, इसी प्रकार सामायिकमे भी प्रार्थना आत्मसमाधिको ही पुष्ट करती है अर्थात् प्रार्थना इस प्रकारसे समाधि देती है जैसे चिंतामणि रत्न इच्छककी इच्छा पूरी कर देता है । सो इस सूत्रका ध्यान करके फिर नमो अरिहताण ऐस पाठ पदके फिर वही पाठ एक वार उचे स्वरसे पढे ॥ फिर बैठकर दक्षिण जानु भूमिका पर रखकर वामा जानु ऊचा करके पुन हाथ जोडकर निम्नलिखित सूत्र पढ़े ॥ अथ मूल सूत्रम् ॥ नमोत्गुणं अरिहंताणं भगवंताणं आइगराणं तित्ययराणं सयसंबुदाणं पुरिसुत्नमाणं पुरिससोहाण पुरिसवरपुंडरीयाण पुरिसवरगधहत्थोण लोगुत्तमाण लोगनाहाणं लोगहियाणं लोगपईवाणं लोगपज्जोयग- राणं अभयदयाणं चक्खुदयाणं मग्गदयाण सरणद. याणं जीवदयाणं वोहिदयाणं धम्मदयाण धम्मदेसि. याण धम्मनायगाणं धम्मसारहीणं धम्मवरचाउरंत चक्कवहीणं दीवोत्ताणं सरणगइपइठाण अप्पडिहय- वरनाणं दसणधराणं विअछउमाणं जिणाणं जाव- याणं तित्राण तारयाणं बहाण वोहियाणं मुनाणं मोयगाण सव्वण्णुण सव्वदरिलिण सिव मयल मरुय मणंत मक्खय मयावाहमपुणरावित्ति सिद्धिगइनाम- धेयं ठाणं सपत्ताण नमो जिणाणं जियभयाणं ॥१॥ # हिंदी पदार्थ- नमोत्यु) नमोऽस्तु अर्थात् नमस्कार हो (ण) णं इति वाक्योपन्यासे ( अरिहताग) श्री अरिहतोंको-इसी प्रकार सर्वत्र जानना, ( भगवताण) भगवतोंको (आईगराण) धर्मको आदि करनेवालोको (तित्थयराण ) चतुर श्री सवरूप तीर्थस्थापकोको, फिर जिनको (सयस- बुद्धाण ) स्वयमेव बोध हुआ है फिर (पुरिसुत्तमाग ) पुरुषोमे उत्तम (पु. रिससीहाण) पुरुपोंमे सिंह समान बलापेक्षा (पुरिसपर पुडरीयाण) पुरुषों मे पुडरीक कमल समान निर्लेप ( पुरिस ) पुरुपोमे (वर) प्रधान (गधहत्यीण) गधहस्ती समान (लोगुत्तमाण) लोगमे उत्तम (लोगनाहाण ) लोगके नाथ (लोगहियाण ) लोगके हितैपी (लोगपर्दवाण ) लोगमे प्रदीप समान (लोग, पज्जोयगराण) लोगमे परम उद्योत करनेवाले (अभयठयाणं), अभय दान करनेवाले (नक्खुदयाणं) ज्ञानरूपी नेत्रोके टेनेवाले ( मग्गदयाण) मोक्षके बतलानेवाले (सरणदयाण ) सर्व जीवोको शरणभूत (जीवदयाण) सयमरूपी जीवनके दाना (बोहिदयाण ) बोध वीनको देनेवाले (धम्म- दयाग) धर्मके देनेवाले (धम्मदेमियाग) धर्मका उपदेश करनेवाले (धम्म नायगाग) वर्मके नायक अर्थात् धर्म नेता (बम्मसारहीण) धर्मरूपी रथक सारथी (धम्मवर) धर्ममे प्रधान ( चाउरत) चार गनिके अत करनेवाले अर्थात् अपनी आत्माको चार गतिसे पृथक् करनेवाले (चकवीण) चक्रवती समान (दीवोत्ताण) ससार रूपी समुद्रमें द्वीप समान (सरणगइपइठाण) शरणागतोकी वत्सलता करनेवाले (अप्पडिय) अप्रतिहत ऐसे (वर) प्रधान (नाणे) ज्ञान (दसण) दर्शनके (घराग) धरनेवाले ( वियह ) दूर हो गया है जिनका (छउमाण) छद्मस्थभाव अर्थात् कर्म नष्ट हो गये है (निणाण ) और फिर जिन्होंने रागद्वेषको जीता है (जावयाण ) आरोंको रागढेपके जीतनेका उपदेश करते हैं फिर (तिन्नाण) ससाररूपी सागरसे आप मिरे है (तारयाग) औरोंको तारते है (बुद्धाण) आप बुद्ध है (बोहियाण) औरों को वोध देते हैं फिर (मृताण) आप कर्मोंसे मुक्त हुए औरोको यह सर्व पद पष्ठपन्त हैं।

२५ (मोयगाण) कौसे मुक्त करते हैं फिर (सव्यण्गुण) सर्वज्ञ है (सव्व- दरिसिण) सर्वदशी हैं फिर (सिर्व ) कल्याणरूप (अयल) अचल (अन्य) रोगरहित (अणत ) अनन ज्ञानादि करी (अक्खय) अक्षय (अब्बाराह ) बाधा पीडादि रहिन अर्थात् दु सादि रहित ( अपुणराविति) निसको अपुनर्वृत्ति है अर्थात पुर्नजन्म नहीं है ऐसी जो सिद्ध गनि है(सिद्ध- गई) अर्थात् मोक्ष है (नामधेय) नाम भी यही है जिसका सो ऐसे (ठाण) स्थानकको (सपत्ताग) जो सप्राप्त हुए हैं अर्थात् जो मोक्षको प्राप्त हुए हैं ऐसे जो श्री अरिहत प्रभु हैं तिनको (नमो) नमस्कार हो (निणाण) जिन्होंने कर्मरूपी शत्रुओंको जीता है फिर (नियमयाण) जीत लिये हैं जिहोंने सर्व भय ॥ भावार्थ- यह स्तुति मगल दो वार पढणा। द्वितीय वारमे यह पाठ कहना (ठाण सपाविउ कामरस नमो निणाण नियभयाण) और इस स्तवमें जो आत्मा मोस हो गये है वा होनेवाले हैं उनकी स्तुति है। फिर उनके गुणोका गृहस्थी यथाशक्ति अनुकरण करे क्योंकि स्तुति करनेका साराश यही होता है कि वे गुण स्वय भी ग्रहग किये जाये। निस प्रकार रागद्वे- पादि अतरग शत्रुओंको जीतके अहन हुए है इसी प्रकार सर्व भव्य प्राणि- योको भी होना योग्य हैं। फिर निश्वुत्तोके पाठसे गुरुदेवको वदना नमस्कार करके सामायिक करनेको आज्ञा लेकर निम्न लिखित सूत्र पठन करे । आवस्तहो इच्छाकारेण संदिप्तह नगवन देवसी पडिकमणो ठामि देवसी ज्ञान दर्शन चरित्ताचरित तप अतिचार चितवणा अर्थ करेमि काउसग ।। हिंदी पदार्थ-(आवस्सही) आवश्यमेनही (इच्छा) इच्छा है मेरी (कारण ) करनेको (सदिसह ) आज्ञा दीजिये (भगवन् ) हे भगवन् मैं (देवसी) दिन सम्बन्धि (पडिकमणो ठामि) प्रतिक्रमण प्रारम करता हू ४ २६ अर्थात् आवश्यक करनेकी आज्ञा लेकर आवश्यक करता है जैसेकि (देवसी) दिन सम्बन्धि (ज्ञान) ज्ञान (दर्शन) दर्शन (चरित्ताचरित्त) चरित्रा चरित्र (देशव्रत) (तप) द्वादशभेदि तप (अतिचार) अतिचारोके (चिंतवणा अर्थ) स्मरणके लिए ( करेमि) करता है (काउसग्ग) कायोत्सर्ग। भावार्थ-श्री अर्हन देवकी आज्ञासे प्रथम आवश्यक करनेकी आज्ञा लेकर उक्त सूत्रको पठन करके फिर (नमस्कार मत्र पढे) ॥ णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आय- रियाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं ॥ $ महाशय ! इस महामन्त्रको नमोकार मन्त्र भी कहते हैं अर्थात् महामन्त्रका द्वितीय नाम नमोकार मन्न भी है, परन्तु कोई २ नमोकारके स्थानोपरि नवकार मन्त्र ऐसे भी उच्चारण करते हैं, सो यह भी सत्य ह क्योंकि प्राकृत व्याकरणमें इसका विवेचन इस प्रकार है, यथा- रुद्नमोर्च । प्रा० । व्या० । अ० । ८ । पा० । ४ । सू० । २२६ ॥ अनघोरन्यस्य वो भवति ॥ अर्थात रुट ओर नम् धातु के अन्न वर्गको धकार हो जाता है जैसे रुबइ नया इत्यादि । इस सूत्रसे नवकार ऐसे सिद्ध हुआ ॥ पुन नमस्कार शब्दसे नमोकार पद इस प्रकारसे सिद्ध होता है जैसे फिनमस्कार परस्परे द्वितीयस्य ॥ प्रा० व्या० अ० ८ पा० १ सू० ६२॥ अनयोदितीयस्य अत और भवति ॥ इस सूत्रसे नमस् शब्द के द्वितीय शब्दके भकारको अर्थात् नमस् शब्दके मकारके अकारको ओकार हो गया जैसे कि, नमोस्कार, फिर क-ग-ट-ह-त-द-व-श-प-स-क-पामू लुक् ॥ प्रा० भ० ८ प.० २ सू० ७७ ॥ एपा सयुक्तवर्णसम्पन्धिनामूस्थिताना लुग् मयति ॥ इस सूत्रसे सकारका लोप हो गया तर नमोकार ऐसे रहा ।। पुन अनादी शेषादशयोदित्वम् ॥ पास्यानादो वर्तमानस्य शेषत्वादेशस्य च द्वित्व भवति । फकार द्विरद हो गया, तब परिपक प्रयोग नमोकार ऐसे सिद्ध हुआ॥ अपितु "इस्व सयोगे" प्रा० अ० ८ पा० १ सू० ८४ से "नमुकार" मी सिद्ध हो 1 प्रा० अ०८ पा. इस सूत्रसे जाता है ॥

हिंदी पदार्थ-(नमो)* (नम ) नमस्कार (अरिहंताण) अर्ह- भ्य अर्ह पूजाया धातुसे जो शतृ प्रत्ययान्त होकर अर्हत् शब्द बनता है तिसका नाम प्राकृत भाषामे अरिहत है, अर्थात् जो सबके पूज्य सर्वज्ञ सर्व- दी हैं तिन अरिहत भगवन्तोंके ताई नमस्कार हो, अर्थात् उनको नमस्कार हो, (नमो) (नम) नमस्कार (सिद्धाग) (सिद्धेभ्यः) पिघूमराधौ धातुसे जो 'क्त' प्रत्ययान होकर सिद्ध शब्द बना है अर्थात् जो सिद्ध बुद्ध अनर अमर अशरीरी सर्वज्ञ सर्वदर्शी हैं तिनके ताई नमस्कार हो, (नमो) (नम) नमस्कार (आयरियाण) (आचार्येभ्य ) जो आइ उपसर्ग पूर्वक चर् गति भक्षण वातुसे कृदन्तका घ्यण् प्रत्ययान्त होकर सिद्ध होता है अर्थात् आचार्योके ताई नमस्कार हो, (नमो ) ( नम ) नमस्कार हो (उवझा- याण) (उपाध्यायेम्य ) उपाध्यायोंके ताई जो कि उप अधि उपसर्ग पूर्वक इड् अन्ययने धातुसे कृदन्तका घन् प्रत्ययान्त होकर बनता है, (नमो) (नम ) नमस्कार हो, (लोए सव्वसाहूण ) लोकदर्शने, सृगतो, * तथा कोई • पुरुष ऐसे भी भाषण करते हैं कि (णमोकार ) शद ही शुद्ध है अर्थात् जिमके पूर्व णकार होवे बही शुद्ध है, अन्य सर्व अगुख है, फिन्तु प्राकृत व्याकरणमें इस प्रकारसे लिखा है यथा-वादी ।। प्रा० अ० ८ पा० १ मू० २२९ ।। अमयुक्तस्यादी वतमानस्य नस्य णो धा भवति । णगे- नरो। नई-नई-दति ॥ पंच पदकी चूलिका इस प्रकार है जैसेकि-एसो पर णमोकारो सव पार पणासणो मगलाण च सम्छसि पटम वह मगल ॥ अथार्यान्वय, एसो) (एप ) यह (पच) (पश्च) पत्र (नमोकार) ( नमस्कार ) नमस्कारलए पद (सभ्य ) (सर्व) मारे ( पाव) (पाप) पापोंके (प्पणासणो ) (प्रणाशन) प्रणाशनहार है अर्थात् पापों के नष्ट करनेवाले है, (मगलाण) (मगलाना) मगलीक हे (च) (च) और अपितु च अयय है (स- छोसि) (सर्वश) सई स्थानोपरि पढे हुए (परम) (प्रथम) प्रथम अर्थात् दध्यादि पदाधासे पूर्व (हपह) (मगल) (मङ्गलम् ) मालीक है। भावार्थ-इस महामन्त्रक पात्र ही नमस्काररूप पद सब पापोंके नाश करनेवाले ई तया मगलोक और सब स्थानोपरि पठन किये हुए दयादि पदार्थोसे भी पहिले मगलीक है क्योंकि अनत गुणयुक्तोक्त महामन्त्र है।

राध साध ससिद्धी, इन धातुओंसे मो नमो लोए सव्यसाहू शब्द बनता है- ( लोके सर्व साधुभ्य ) लोकमे जितने साधु हैं अर्थात् लोकमे सर्व साधु ओंके ताई नमस्कार हो-जो कि मुगुणो करके युक्त है। भावार्थ-इस महामन्त्रमे यह वर्णन है कि अनन्त गुणयुक्त चतु _ति कर्म नष्ट कर्ता और जिनके द्वादश गुण प्रगट हुए हैं ऐसे गुणग- णालकृत श्री अरिहतजी महारानोंको नमस्कार हो, पुन जिनके अशरीरी सिद्ध बुद्ध अनर अमर इत्यादि अनेक नाम मुप्रख्याति सयुक्त मुप्रसिद्ध है जिहोंके सर्व कर्म क्षय हो गये है अर्थात् जो कर्मरूपी रनमे विमुक्त हो गये है और निन्होंके अष्ट गुण प्रादुर्भूत हुए हैं इत्यादि अनेक सुगुणो सहित श्री सिद्ध महाराजोको नमस्कार हो, अपितु जो पत्रिंशत् गुणोसे युक्त मर्यादासे क्रिया करनेवाले जिनकी ज्ञानमे गति अधिक है तथा जो सम्यक् प्रकारसे गच्छ ( साधु समुदाय) की सारणा (रक्षा करना ) वारणा (स्थिलाचार होतेको सावधान करना) साधमण्डलको हितशिक्षा दना तथा वस्त्रपात्रादि द्वारा भी मुनियोको सहायता देनी वा परम्परायशुद्ध शास्त्रार्थ पठन कराना अपितु यदि कोई दुर्बल अर्थात् जबाबल क्षीण रोगादि युक्त साधु हो उनको यथायोग्य सहायता करना इत्यादि अनेक गुणोंसे युक्त है और उक्त वार्ताओके पूर्ण करनेमें सदैव कटिबद्ध हैं ऐसे श्री आचार्यजी महाराजको नमस्कार हो, अपिच जो पचविंशति गुणोंसे अल- कत हो रहे हैं अर्थात् जो एकादश अग तथा द्वादश उपागको स्वयम् पढते हैं औरोंको पढाते है-जिन शास्त्रोके नाम ये हैं - सख्या अयागसूत्राणि सख्या अथोपागमूत्राणि (१) आचाराग (१) उव्वाइ (२) सूयगडाग (२) रायपश्रेणी (३) ठाणाग (३) जीवाभिगम (४) समवायाग (४) पण्णवन्ना.

संख्या अगसूत्राणि सल्या उपागसूत्राणि () विवाहमज्ञप्ति (६) जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति (६) ज्ञाताधर्मकथाग. (६) चन्द्र प्रज्ञप्ति (७) उपासकदशाङ्ग (७) सूर्य प्रज्ञप्ति. (८) अंतगड (८) निरावलिका (९) अनुत्तरोक्वाइ (९) पुफिया (१०) प्रश्न व्याकरण (१०) कल्पिया (११) विपाक (११) पुष्फचल्लिका (१२) वहिदशा अर्थात्- जो पूर्वक्ति शास्त्रोंका अभ्यास स्वय करते हैं और औरों को यथा अवकाश वा यथा अप्सर पठनाभ्यास करवाते है, पुन विद्याकी उ न्नति करनेमे तत्पर रहते हैं और जिसके द्वारा धर्म तथा विद्याकी वृद्धि हो वही कार्य करके परिफडिन होते हैं, ऐसे परम पण्डिन महान् विद्वान दी- दर्शी परमोपकारी श्री उपायायनी महारानोंको नमस्कार हो, जो कि श्रुत विद्याकी नाबसे अनेक भव्य जीवोंको ससाररत्नाकरसे उत्तीर्ण करते हैं ।। अयच्च-नमस्कार हो सर्व साधुओको जो लोकमें सुगुणों करके परिपूर्ण हैं सदा ही परोपकारी हैं और ज्ञानके द्वारा स्व आत्मा वा अन्यात्माओंके कार्य सदैव काल सिद्ध करते है, अपितु सप्तविंशति गुणयुक्त है तिन मु नियोंको पुन पुन नमस्कार हो || फिर सामायिक करनेका निम्न लिसित सूत्र पढे । ॥ अथ मूल सूत्रम् ॥ करेमि भने सामाइथं सावज्जं जोगं पञ्चस्वामि जावनियम* पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न करेमि * सामायिक कर्ताको चाहिये इस पाठरे अतर्गत ही याव मात्र मुहूर्त करने हो तावन्मात्र ही बह लो, जैसेकि-जावनियम मुहूत १-या २-पज्ज वासामि इत्यादि।

न कारवेमि मणसा वयसा कायसा तस्स भने पडिट मामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥१ दिदी पदार्थ-( करेमि ) मैं करता हू ( भत्ते ) हे भगवन (साम इय) समतारूप भान जो सामायिक हे (सावन) और सावद्यरूप: जोग) मन वचन कायका योग है (पञ्चक्खामि) तिसका प्रत्याख्या करता हू (जार) यावत् (नियम) नियम सामायिकका काल है ताव काल पर्यन्त सामायिकका सेवन करता हूं, (दुविह) दो करण जैसे कर ओर कराना सो सावध योगको ( मणसा ) मन करके ( वयसा) वच करके ( कायसा ) काय करके (तिविहेण) इन तीनो योगों करके (न 4 रेमि) न करु (न कारवेमि) नहीं ओरोसे कराऊ (तस्स ) वह सावद्यरूप पाप है ( भत्ते ) हे भगवन् ( पडिकमामि ) पापसे पीछे हटर हू (निंदामि ) और पापसे अपनी आत्माको भिन्न करनेके लिये आत्म निन्दा करता हू ( गरिसमि) विशेष करके आत्माको पापसे पृथक् करने लिये आत्मनिंदा करता हूँ (अप्पाण) और अपनी आत्माको (बोसिरामि पापसे अलग करता हू) भावार्थ-~-उक्त सूत्रमे यह वर्णन है कि सामायिक करनेवाला भग वानकी आज्ञानुसार सामायिकमे द्विविध त्रिविध करके सावद्य (हिंसक योगोंका प्रत्याख्यान करता है-जैसे सावध कर्म करू नहीं मन करके वचन करके काय करके, कराऊं नहीं मन करके वचन करके काय करके, और पापसे अपनी आत्माको पृथक् करके समतारूप मावों मे आत्माको स्थिर करता हू | फिर अपनी आलोचनाके वास्ते निम्नलिखित सूत्र पठन करे- क्योंकि ज्ञान, दर्शन चारित्राचारित्रकी चिंत्वनार्थ ही कायोत्सर्ग किया जाता है। इच्छामि ठामि काउसगं जो मे देवसि अइयारो कओ काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकरणिज्जो दुग्झाउ दुचिंतिउ अणायारो अणिच्छियन्वो असावगो पावगोताणे तहदसणे च. रित्ताचरिते सुय सामाइय तिण्हं गुत्तीणं चउण्हं कसा. याणं पंचण्ह अणुव्बयाण तिण्हं गुणव्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं बारस्स विहस्त साबग धम्मस्त जं खडियं जं विरादियं तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥२॥ हिंदी पदार्थ-(इच्छामि) मै इच्छा करता हू ( ठामि ) एक स्थानमे स्थिर रहकर ( काउसग्ग ) कायोत्सर्ग करनेकी (जो ) जो (मे) मैंने (देवसि) दिन सम्बन्धि ( अइयारो) अतिचार (कओ) किया है (काइओ) कायमे ( याइओ) वचनसे (माणसिओ) मनसे तथा (उस्युत्तो) सूत्रसे प्रतिकूल कथन किया हो ( उम्मग्गो) उन्मार्ग ग्रहण किया हो जो कि सर्वथा ही जिनमार्गसे प्रतिकूल है (अकप्पो) अकल्पनीय पदार्थ सेवन किया हो जैसेकि मास मदिरादि (अकरणिज्जो ) अकरणीय कार्य किए हो ( दुयाउ ) दुष्ट ध्यान किया हो जैसे कि आत यान रौद्रध्यान (दुचिंतिउ) दुष्ट पियन किया हो (अणायारो) अनाचार सर्वथा ही निय. मोका भग कर देना इस प्रकारसे काम किया हो (अणिच्छियव्वो) को इष्ट नहीं है उसकी इच्छा की हो (असावगो पावगो) आवक वृत्तिसे विरुद्ध काम किया हो (नाणे) ज्ञानमे (तह ) तथा ( दसणे) दर्शनमें नया ( चरित्ताचरित्र ) चरित्राचरित्रमे (देशव्रतमे) (सुए) श्रुत सिद्धा न्तमें (सामाइए) समतारूप भाव सामायिकमें फिर ( तिण्ड गुत्तीण ) तीन प्रकारकी गुप्ति जसेकि-मन वचन कायको वशमे न किया हो ( चउण्ह कसायाण) चार प्रकारकी कपाय की हो जैसेकि कोच मान माया लोभ और (पचण्ह अणुब्बयाण) पाच प्रकारके अनुव्रत जैसेकि स्थूल हिंसा त्याग १ स्थूल मृपायाद त्याग २ स्थल अदत्तादानका त्याग ३ स्थूल मैथुनका परित्याग जैसेकि स्वदार सतोष ४ स्थूल परिग्रहका परित्याग ५ इन व्रतों में अतिचार लगा हो अथवा (तिण्ह-गुणव्वयाण) तीन ही गुणननोमें दोष , लगा हो जैसेकि-दिग् व्रत, उपभोग परिभोग विरमण व्रत, अनर्था दंड परित्याग व्रत, (चउण्ह सिरखावयाण) चार शिक्षाबतों मे अतिचार लगा हो जैसेकि-सामायिक व्रत, देशावकाशिक व्रत, पौषधोपवास व्रत, अतिथि सविभाग व्रत (वारस विहस्स) द्वादश प्रकारके (साव्वग धम्मस्स) श्रावक धर्मको (जसडिय) जो मैंने खंडित किया है (ज विराहिय) जो मैने नि- यमादि सर्व प्रकारसे विराधित किए है ( तस्स ) वह अतिचारादि पाप (मिच्छा मि) निष्फल हो जो (दुक्कड) दुकृत पाप हैं तथा इनसे मैं पीछे हटता हूँ॥ भावार्थ-उक्त सूत्रमे द्वादश व्रतोके अतिचारोंकी आलोचना है, फिर मन वचन कायको वशमें करना चार कपायोका परित्याग करना श्रापक वृत्तिसे विरुद्ध न होना अपितु अकरणीय कार्य न करने सम्यग् दर्शनको कलक्ति न करना इस प्रकारसे वर्णन किया गया है । ( फिर तस्सोत्तरीका पाठ पठन करके कायोत्सर्ग करे निप्समे १४ ज्ञानके अतिचार ५ सम्यक्त्वके ६० द्वादश व्रतोके १५ कर्मादानके ६ सलेखनाके इस प्रकारसे ९९ प्रकारके अतिचारोंका यान करे, खडा होकर कायोत्सर्ग करनेकी ही रीति है, यदि कारण हो तो बैठके ही कर लेवे) चतुर्दश प्रकारके ज्ञानानिचार निम्न प्रकारसे है- आगमे तिविहे पणते तंजहा सुत्तागमे अत्या. गमे तदुभयागमे एहवा श्रुत ज्ञानके विषय ले कोई अतिचार लागा होय ते आलोउं जंवाइडर वच्चामे. लिय २ हीणक्खरं ३ अञ्चक्खरं ४ पयहीणं ५ विण- यहीणं ६ जोगहीणं ७ घोसहीणं ८ सुदिन्नं ९ दुहु- पडिच्छियं १० अकाले कउ सज्झाओ ११ कालेन कर सज्झाओ १२ असज्झाइयं १३ सज्झाइय न सज्झायं - १४ जो मे देवसि' अइयार कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥१॥ अर्थशास्त्र तीन प्रकारसे वर्णन किया गया है जैसेकि-सूत्रागम १ अर्थागम २ और तृतीय मूत्र और अर्थागम दोनो ही। सो ऐसे श्रुत ज्ञानके विषय यदि कोई अतिनार लगा हो तो उसकी आलोचना करता हू । अपितु ज्ञानके अनिचार निम्न प्रकारसे कथन किए गये हैं जैसेकि-अनुक्रमता- पूर्वक न पढा हो १ अन्य सूत्रोंके पाठ अन्य सूत्रके साथ सग्रह कर दिए हो २ हीनाक्षर युक्त पठन किया हो ३ अधिक अक्षर श्रुतके कर दिए हो ४ पद ही न पढा हो ५ विनयसे रहित पठन किया हो ६ शुद्ध योग धारण न किए हो ७ घोपरहित शास्त्राययन किया हो ८ सुदर ज्ञान सुयोग्य शिप्यको पठन न कराया हो ९ अविनीत भावोंसे ज्ञान ग्रहण किया हो १० अकालमें स्वाध्याय की हो ११ कालमें स्वाध्याय न की हो १२ तथा अन यायके समय स्वायाय की हो १३ और स्वा यायके समय स्वा ध्याय न की हो १४ सो यदि उक्त अतिचारोंसे मुझे दिनमे कोई भी अति- चार लग गया हो तो मैं उस अतिचारसे पीछे हटता हू ॥ दरसण श्री सम्यक्त्व रत्न पदार्थने विषय जे कोई अतिचार लागो होय ते आलोउं जिन वचनमे सका करी होय १ पर दरशणकी वांछा करी होय २ फल प्रति संदेह आण्या होय ३ पर पाखडीनी पर- संसा कोघी होय ४ अन्य तिरथीका संस्तव परिचय १ नोट-यानमें जो में देवसि अइयार को अयशा जो में गइसि भइयार फओ तथा जो मे देवति परिख अड्यार कभी-जो मे चाउमासी यार की जा मे सपच्छरी अड्यार कभी-चिंतयु से कहना चाहिए, अर्थात् प्रोपई हो उसीके ही नामसे विस्थना करनी चाहिये ५ ३४ तस्त मि कीधा होय ५ जो मे देवसि अइयार कओ च्छा मि दुक्कडं ॥२॥ अर्थ-यदि दर्शन (सम्यक्त्व) के विषय कोई अतिचार लगा तो मै उसकी भी आलोचना करता हू जैसेकि-जिनवचनों मे शका के हो १ अथवा परमतकी आकाक्षा करी हो कि-अमुक मत बहुत ही सुद है-निसके उपासक सदैव काल ही सुग्वी रहते है इस प्रकारके भाव करने से सम्यस्त्वमे द्वितीय अतिचार लगता है २ और कर्मों के फल विषय सशर किया हो ३ तथा पर पापडियोकी स्तुति करी होजिसके द्वारा बहुतसे प्राणि योको मिथ्यात्वकी रुचि हो जाये इस प्रकारसे कर्म किया हो ४ और अन्य मतावलम्बि नास्तिकादि लोगोसे सस्तव-परिचय किया हो ५ क्योंकि-दुष्ट जनोकी सगति अवश्य ही विकृति भावको उत्पन्न कर देती है इस लिए दुष्ट जनोकी संगति कदाचित् भी न करनी चाहिये । सो यदि इस प्रकारसे स- म्यक्त्वमें कोई भी अतिचार लग गया हो तो मैं उस दोषसे पीछे हटता और फिर ऐसा न करूगा इस प्रकार भाव रखता है। पहिला थूल प्राणातिपात वेरमण व्रतने विषय जे कोई अतिचार लागा होय ते आलोउरी माढा बंधण वांध्या होय १ गाढ़ा घाव (' अवयवना विच्छेद कीधा होय ३ अति म होय ४ भात पाणीका विच्छेद कीधा हो देवसि अइयार कओ तस्त मिच्छा मि अर्थ-जो प्रयम अनुव्रत है उसमे यदि कोई लग गया हो तो मैं उसकी आलोचना करता हूँ जसा जीवोको कठिन वधनोसे वाधा हो १ निर्दयके साथ किया हो २ उनके अवयवोको काट दिया हो ३ भार लादा हो अर्थात् अतीव भारका लादना भी एक अतिचार है ४ और अन्नपानीका व्यवच्छेद कर दिया हो तथा वेतन आदि न दिया हो सो यदि इस प्रकारसे मेरे प्रथम अनुवतमे दोष लगा हो तो मैं उस दोपसे पीछे हटता हूँ अर्थात् उन दोनोको जेडता हूँ ॥ वोजा थूल मृपावाद वेरमण व्रतके विपय जे कोई अतिचार लागो होय ते आलोउं सहसातकारि कही प्रते कूडा आल दीघा होय १ रहस्त छानी वार्ता प्रगट करी होय २ स्त्री पुरुषका मर्म प्रकाश्या होय ३ कहीं प्रते पाय पाडवा भणी मृपा उपदेश दीधा होय ? कूडा लेख लिख्या होय ५ जो मे देवसि अइ- यार कओ तस्त मिच्छा मि दुकडं ॥ अर्थ-द्वितीय अनुनतकी भी आरोचना इस प्रकारसे करे कि-यदि मैंने विचारशून्य होकर किसीके ऊपर दोपारोपण किया हो १ अथवा किसीकी गुप्त वार्ता प्रगट कर दी हो २ स्त्री वा पुरुपको मर्मयुक्त वार्ता- ओंका प्रकाश किया हो ३ अपने वश करनेके लिए किसीको असत्य [ दुष्ट ] सम्मति दी हो ४ अथवा कूट लेख लिखें हो ६ क्योंकि यह कर्म द्वितीय अनुननको कलकिन करनेवाले हैं। यदि इस प्रकारसे मैंने कोई भी दिनमे दोप किए हों तो मै उन दोषोसे पीछे हटना हू अर्थात् उनको छोडता हूँ॥ त्रीजा थूल अदत्तादान वेरमण व्रतके विपय जे कोई अतिचार लागो दोय ते आलोउं चोरको चुराइ वस्तु लोधी होय १ चोरने साहज दोधा होय २ राज्य विरुद्ध कोघा होय ३ कूडा तोल कूडा मापा 1 कीधा होय ४ वस्तुमें भेय संमेल कीधा होय ५ जो मे देवसि अइयार को तस्त मिच्छा मि दुक्कडं ।। अर्थ-तृतीय स्थूल अदत्तादान व्रतके विषय यदि कोई अतिचार लग गया हो तो मै उसका विचार करता है जैसे कि-चोरीकी वस्तु ली हो १ चोरोकी सहायता करी हो २ राज्य विरुद्ध कर्म किया हो ३ और द स्तुओका तोल वा माप आदि विपरीत किया हो ४ सुदर वातुमे निकृष्ट वस्तु विक्रय करनेके वास्ते मिला दी हो ५ सो यदि उक्त प्रकारसे कोई भी दोप लग गया हो तो मै उस दोषरूप अतिचारसे पीछे हटना हूँ ॥ चोथा धूल सदार संतोस मैथुन वेरमण व्रतने विषय जे कोई अतिचार लागों होय ते आलोउं इ- तर थोडा कालकी राखीसुं गमण कीधा होय १ अप. रिगहियासुं गमण कीधा दोय २ अणंग कीडा कीधी होय ३ पराया विवाह नाता जोड्या होय 'कामभोग तीन अभिलाषासे सेव्या होय ५ जो मे देवसि अइ. यार कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कड ॥ अर्थ-चतुर्थ स्थूल सदार सतोष व्रतके अतिचारोंकी भी आलोचना करता हू जैसेकि-लघु अवस्थायुक्त अपनी स्त्रीसे यदि सग किया हो तथा अल्प परिमाण होने पर अधिक सग किया हो १ पानीग्रहणके पूर्व स्व स्त्रीका सग किया हो २ कुचेष्टा की हो ३ परके नाते आदिको अपने साथ सयोजन कर लिया हो ४ और कामभोगकी तीव्र अभिलाषा करी हो ५ यदि इस प्रकारसे कोई भी अतिचार लग गया हो तो में उन दोपो- को छोडता हू॥ १ काममागनी तीन भभिरापा कीधी होय-इति च पाठ ॥

पांचमा थूल परिग्रह परिमाण व्रतने विषय जे
कोई अतिचार लागो होय ते आलोउं खेत्त वत्युनो
परिमाण अतिक्रम्या होय १ दिरण्य सुवर्णनो परि-
माण अतिकन्या होय २ धन धान्यनो परिमाण अति-
क्रम्या होय ३ दोपद चौपदनु परिमाण अतिकम्या
होयट कुविय धातुनो परिमाण अतिक्रम्या होय ५
जो में देवसि अइयार कओ तस्त मिच्छा मि दुकडं ।
अर्थ-पाचवें स्थूल परिग्रह परिमाण ब्रतकी आलोचना करता हू
कि-क्षेत्र वस्तुके भी परिमाणको अतिकम किया हो अर्थात्-खेत और हर
आदिके परिमाणको अतिकम किया हो १ चादी और सुवर्णके परिमाणको
अतिक्रम किया हो २ अथवा धन और धान्यके परिमाणको अतिकम कर
दिया हो ३ द्विपद और चतुप्पदके भी परिमाणको छोड दिया हो ४ और
घरकी सामग्रीके परिमाणको भी यदि अतिक्रम किया हो ५ तो मैं दिनके
किए हुए दोपोसे पीछे हटना हू ॥
छठा दिश व्रतने विषय जे कोई अतिचार लागो
होय ते आलोउं उदृ दिशनो प्रमाण अतिक्रम्या होय
१ अघो दिशनो प्रमाण अतिक्रम्या होय २ तिरञ्छि
दिशनो प्रमाण अतिक्रम्याहोय ३ क्षेत्र वधारचा होय
४ पथनो संदेह पड्या आगे चाल्या होय ५ जो मे दे.
वसि अईयार कओ तस्त मिच्छा मि दुक्कडं ।।
अर्थ --पष्टम दिग्नतके अतिचारोकी आलोचना करता हु कि-उर्व
दिशाके परिमाणको अतिक्रम किया हो १ अधो दिशाके परिमाणको अनि-
क्रम किया हो २ अथवा निर्यग् दिशाके परिमाणको उहयन कर दिया हो

३ एक ओरसे द्वितीय ओर क्षेत्रकी वृद्धि की हो जैसेकि दक्षिणकी ओर क्षेत्र अल्प करके पूर्वकी ओर क्षेत्रकी वृद्धि करना ४ तथा मार्गमें चलते हुए यदि सशय पड गया हो कि स्यात् मै परिमाणयुक्त मार्ग आ गया हूगा यदि सशय होनेपर फिर भी आगे ही गमन किया हो । सो इम प्रकारसे यदि कोई भी अतिचार मुझे लगा हो तो मै उन दोषासे पीछे हटता हूं। सातमाउवभोग परिभोग परिमाण व्रतने विषय जे कोई अतिचार लागो होय ते आलोउं पञ्चक्खाण उपरांत सचित्तका आहार करया होय १ सचिन प. डिबद्धका आहार कस्या होय२ अपकना आहार कस्या होय ३ दुपक्कना आहार कस्या होय ? तुच्छौषधीका आहार करया होय ५ जो मे देवसि अइयार कओ तस्त छा मि दुकडं ।। पनरा कर्मादानके विषय जे कोई अतिचार लागो होय तो आलोऊ इंगालकम्मे १ वणकम्मे . साडीकम्मे ३ भाडोकम्मे ४ फोडीकम्मे ५ दंतवणिजे ६ लक्खवणिज्ने ७ रसवाणिज्जे ८ केसवणिज्जे ९ विसवणिज्जे १० जंतपीलणियाकम्मे ११ निल्लंच्छ- णियाकम्मे १२ दवग्गि दावणियाकम्मे १३ सरदह तलाव सोसणिया कम्मे १४ असइ जणयोसणिया क- म्मे १५ जो मे देवसि अइयार कओतस्त मिच्छामि दुझाडं..

थ-सप्तम उपभोग परिभोग परिमाण इतके विषय यदि कोई अतिचार लगा हो तो मै उसकी आलोचना करता हू ।यद्यपि सचित्त वस्तु- ओका सर्वया त्याग गृहस्थको नहीं होता तथापि यदि सर्वथा त्याग हो तो-निम्न लिसिन दोपोको दूर करे जैसेकि-सचित्त वस्तुका आहार करना सचित्त प्रतिवद्धका आहार करना २ अपक्क वस्तुका आहार करना ३ दु कप वस्तुका आहार करना ४ तुच्छऔषधिका आहार करना ५ यह पाच ही दोप हैं । सो इनको दूर करके फिर पचदश कर्मादानको भी छोडे अर्थात् पचदश मार्ग विशेष कर्म आनेके है इस लिए उनको छोडे जिनके नाम निम्न लिखितानुसार है -कोयलोंका बनज १ वन कटवाना २ शकटादिका व्यापार ३ भाटक कर्म ४ स्फोटक कर्म ५ दातोंका बनन ६ लाखका वनज ७ रसोका बनन ८ केशोका बनन ९ विषका वनज १० यत्रपीडन कर्म १२ नपुसक कर्म १२ [निलाउन कर्म] वनको अग्निका लगाना १३ जलाशयको शुष्क करना १४ हिंसक जीवोका पोपण करना १५ । सो यदि कोई भी दोष लगा हो तो मै उन दोषो से पीछे हटता ह॥ आठमा अनर्थ दंड वेरमण व्रतके विषय जे कोई अतिचार लागो होय ते आलोऊ कंदर्पनी कथा कीधी होय १ भंडचेष्टा कीधी होय २ मुखारि वचन बोल्या दोय ३ अधिकरण जोडी मूक्या होय ४ उव. भोग, परिभोग अधिका वधास्या होय ५जो मे देवसि अइयार कओ तस्स मिच्छा मि दुकडं । अर्थ-अष्टमा अनर्थ दड विरमण नतके अतिचारोकी आलोचना करता ह-कामनन्य कया की हो १ भडचेष्टा की हो २ असम्बद्ध वचन भा. पण किए हों ३ अपरिमाणयुक्त शस्त्रादिका संग्रह किया हो ४ जो वस्तु १ ४० एक वेर आसेवन करनेमें आवे अथवा पुन पुन ग्रहण करनेमें आनेउनके परिमाणको अधिक कर लिया हो ५ सो यदि इनमे कोई भी दोप लगा हो तो मै उक्त दोपोको छोडना हू ।। नवमा सामायिक व्रतने विषय जे कोई अति- चार लागो होय ते आलोऊमन वचन कायाका जोग माठा वरताया होय सामायिकमें समता न आणी होय अणपूगी पारी होय जो मे देवसि अइयार कओ तस्स मिच्छा मि दुकडं ॥ अर्थ-नवमे सामायिक व्रतमें यदि कोई दोष लगा हो तो मैं उन दोषोंकी आलोचना करता हू जैसेकि-सामायिकमें मन वचन और कायके योगको दुष्ट धारण किया हो सामायिकमे यदि शान्ति न की हो और विना समय पूर्ण हुए सामायिककी आलोचना करी हो तो मैं इन दोपों से रहित होता है । दसवॉ देसावगासी व्रतने विपय जे कोई अति- चार लागो होय ते आलोऊ नीमी भूमिकी वाहि- रकी वस्तु अणाइ हो १ मुकलाइ हो २ शब्द करी जणायो होय ३ रूप करी दिखलाई हो ४ पुद्गल नाखिया आपण पर जणावो होय ५ जो मे देवति अइयार कओ तस्त मिच्छा मि दुकडं ॥ अर्थ-दशवे देशावकाशिक ब्रतके दोषोकी आलोचना करता हू जैसेकि परिमाण की हुई भूमिकाके बाहिरसे वस्तु मगवाई हो १ अथवा भेनी हो २ शब्द करके अपने आपको जताया वा दर्शाया हो ३ अथवा रूप करके अपने भाव प्रगट किये हो ४ किसी वस्तुके गिरानेमे किसी व- ४१ स्तुको बतला दिया हो ५ यदि इस प्रकारसे कोई भी दोष लगा हो तो मै उन दोपों से अपने आपको पृथर करता हूँ। इग्यारमा पडिपुण्ण पोसह व्रतने विषय जे कोई अतिचार लागो होय ते आलोउं अप्पडिलेहिय दुप्प- डिलेहिय सिजा संथारा १ अप्पमज्जिय दुप्पमजिय सिजा सधारा २ अप्पडिलेहिय दुप्पडिलेहिय उच्चार- पासवण भूमिका ३ अप्पमन्जिय दुप्पमजिय उच्चार- पासवण भूमिका ४ पोसह मादि विकथा प्रमाद कोधा होय ५ जो मे देवसि अइयार कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।। अर्थ-कादशने प्रनिपूर्ण पोपध बनके अतिचारोंकी आलोचना क- रता हूँ कि-शम्या सस्तारकको अप्रतिलेखित वा दु प्रतिलेसिन किया हो १ अथवा शय्या सस्तारकको अप्रमानित वा दु प्रमार्जित किया हो २ इसी प्रकार विष्टा और मूत्रके स्थान भी सम्यक् प्रकारसे प्रतिलेखितादि न किए हो ३ ओर प्रमानित भी न किए हों ४ और पौरधमें विकथा वा प्रमाद किया हो ५ । सो इस प्रकारके दोपोसे मै पृथक् होता है अर्थात् मैं उक्त दोपोंको छोडता हूँ॥ बारमा अतिथिसंविभाग व्रतने विषय जे कोई अतिचार लागो होय ते आलोऊं सूझती वस्तु स- चित्त उपर मूकी होय १ सचित्त करी ढाकी होय २ काल अतिक्रम्या होय ३ आपणी वस्तु पारकी कीधी होय ४ मच्छर भाव दान दीवा होय ५ जो मे देवसि अइयार कओ तस्स मिच्छा मि दुकड ।

-
કરે
अर्थ-द्वादश अतिथिसविमाग व्रतके दोषोकी आलोचना करता
हू कि-यदि निषि वस्तु सचित्त वस्तुपर रख दी हो १ अथवा निर्दोष
वस्तुको सचित्त पदार्थोसे ढाप दिया हो २ निन पदार्थोंका काल अतिक्रम
हो गया हो उनके देनेकी विज्ञप्ति की हो ३ अपनी वस्तु न देनेकी बुद्धिसे
अन्यकी कह दी हो तथा अपने हाथोसे दान न दिया हो ४ इर्ष्यासे दान
दिया हो ५ इस प्रकारके जो दिनमे दोष लगा हो तो मै उन दोषोसे पीछे
हटता है॥
संलेखणाके विषय जे कोई अतिवार लागा होय ते
आलोऊं इहलोगा संसप्पउग्गा र परलोगा संसप्पउ.
ग्गा २ जोविया संसप्पउग्गा३ मरणा संसप्पउग्गा ४
कामभोगा संसप्पउग्गा ५ मा मुन्ज हुज मरणते जो
मे देवसि अइयार कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
अर्थ-सलेखनाके विषय यदि कोई अतिचार लगा हो तो मैं उसकी
आलोचना करता हूं जेसेकि-सलेखनामे इस लोककी आशा करना १ पर
लोककी आशा करना २ जीवनकी आकाक्षा करना ३ अथवा मृत्युकी इच्छा
करना ४ तथा कामभोगकी आशा करना ५ । ये दोष सलेखनामें मुझे
कदापि प्राप्त न हो और यदि इन दोपोंमेंसे कोई भी दोष मुझे लग गया
हो तो मैं उस दोपसे पीछे हटता हू॥
मूल-चौदा ज्ञानके,'पांच सम्यक्त्वके, वारा व
तोके पांच पांच एसाठ, बारा व्रतोंके पनरा कर्माटा-
नके, पांच सलेखणको, ९९ निनाणवे अतिचारोके
विषय जे कोई अतिक्रम व्यतिक्रम अतिचार अणा-
चार सेव्या होय सेवाया होय सेवता प्रति अणुमोद्या

होय जो मे देवसि अइयार कओ तस्स मिच्छा मि दुकडं ।। अर्थ-चतुर्दश ज्ञानके अतिचार ( १४), पाच सम्यक्त्वके, ६० द्वादश नतोके, १५ कर्मादानोके, ५ पारसलेखनाके एव ९९ अतिचारोके विषय यदि कोई अतिक्रम १ व्यतिक्रम २ अतिचार ३ अनाचार ४ आप दोप सेवन किए हों औरोसे दोप आसेवन करवाये हो जो उक्त दोप जासे वन करते हैं उनकी अनुमोदना की हो अन जो मैंने दिनके विषय इस प्रकारसे अतिचार आसेवन किए हो तो मैं उन दोपोसे पीछे हटता हू अ- र्थात् वे मेरे दोप निष्फल हो। अठारा पापस्थानक ते आलोऊं प्राणातिपात १ मृपावाद २ अदत्तादान ३ मैथुन ४ परिग्रह ५ क्रोध मान ७ माया ८ लोभ ९ राग १० देप ११ कलह १२ अभ्याख्यान १३ पिसुन १४ परपरिवाद १५ रति अरति १६ माया मोसो १७ मिच्छा देसण सल्ल १८ । अठारा पापस्थानक सेव्या होय ? संवाया होय २ सेवता प्रति अणुमोद्या होय ३ जो मे देवसि अइयार कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।। अर्थ अब मैं अष्टादश पापोंकी आलोचना करता हू जैसेकि हिंसा १ झूठ २ चोरी ३ मैथुन ४ परिग्रह ५ क्रोध ६ मान ७ माया ८ लोप ९ राग १० द्वेप ११ लेप १२ असत्य दोपारोपण १३ चुगली करना १४ दूसरोके अवगुण वर्णन करने १५ विषयादिमे रति और उनके न मिलने पर अरति करना वा दु ख मानना १६ छलसे असत्य बोलना १७ मिथ्या दर्शन शल्य १८ ये अष्टादश पाप सेवन किए हो अथवा औरोंसे आसेवन काइओ दुज्झाओ करवाए हों तथा जो आसेवन करते है उनकी अनुमोदना की हो सो इस प्रकारके दोपोसे मै पीछे हटता हू ॥ इच्छामि ठामि काउसगं जो मे देवसि अइ. यार कओ वाइओ माणसिओ उसुत्नो उम्म- ग्गो अकप्पो अकरणिजो दुचिंतिओ अ. णायारो अणाछियवो असावग्गो पावग्गो नाणे तह दसणे चरिना चरिचे सुय लामाइय तिण्ह गुणबयाणं चउण्हं सिक्खाव्बयाणं पंचण्हं अणुव्वयाणं वारस्स विहस्स सावग धम्मस्त जखंडियं जं विराहियं जो मे देवलि अइयार कओस्त मिच्छामि दुक्कड । अर्थ-मै इच्छा करता हु एक स्थानमें बैठकर कायोत्सर्ग करने की क्योंकि-जो में ने दिनम अतिचार किए है कायासे, वचनसे, मनसे, अथवा सत्रविरुद्ध प्रतिपादन किया हो कुमार्गमे गमन किया हो अकल्पनीय पदार्थ सेवन किए हो अकरणीय कार्य किए हों सो इनकी निवृत्ति के लिये शुभ ध्यान करता हू तथा दुनिसे निवृत्ति करता है, दुश्चित्वनसे भी पीछे हटना हू । इसी प्रकार अनाचार अनिच्छनीय (जिसकी इच्छा करनी योग्य नहीं है) पदार्थ अश्रावक भावकी प्रवृत्ति से भी निवृत्ति करता हू । यदि ज्ञान ढ- र्शन चरित्राचरित्र श्रुत सामायिकमें दोप लगा हो तो उससे भी निवृत्ति करता है । यदि तीनो गुणवतों चार शिक्षात्रों पच अनुवो एव द्वादश प्रकारके श्रावक धर्मको खडिन किया हो अथवा सिराधित किया हो जो मैने दिनमें अतिचार किया है उससे मैं पीछे हटता हू तथा वह मेरा अति- चाररूप पाप निष्फल हो। १ ध्यानमें यहा तक ही पठन करना चाहिये ।

४५ 1 सव्वस्तवि देवसियं दुभ्भासियं दुचिंत्तियं दुचि हियं दुनिस्तियं अधिका ओच्छा पाठ पढ़या होय आगलनूं पाछल पाछल आगल कोई खोटा अक्षर खोटी मात्रा बोला होय वोलाव्या होय जो मे देवति अइयार फओ तस्म मिच्छा मि दुक्कडं ॥ अर्ध-दिनमें यदि मैंने दुचितन किया हो दुष्ट मापण किया हो दुष्ट प्रकारमे यठनादि क्रिया को हो पाठ अनुक्रमतापूर्वक पठन न किया हो तथा अशुद्ध पाठ पठन किया हो तो मैं उन दोपोंसे पीछे हटना हू अयत्रा ने मेरे अनिमाररूप दोप निष्फल हो । फिर नमस्कार मन पढ़के कायोत्सर्गको सपूर्ण करे ।। ॥ इति प्रश्रम सामायिक आवश्यक सम्पूर्णम् ।। फिर "शिरखुतो"के पाउसे गुरु देवको बदना नमस्कार करके द्वितीय आवश्यक करे, लेकि-'लोगस्म उज्जोयगरे" इत्यादि पाठ पढके द्वितीय आवश्यक पूरा करके फिर तृतीय वदना रूप आवश्यककी आज्ञा लेकर निम्न प्रकारसे तृतीय आवश्यक करे ॥ (इन्छामि खमासमणो) का पाठ दो बार पढे किन्तु प्रथम वार नन निस्सहियाय ऐसा सूत्र आवे तब हाय जोडकर बैठ जाने, फिर पट्प्रकारसे आवर्तन निम्न लिखिनानुसार करे जेसेकि -प्रथम (अहोकाय) यह सूत्र पढता हुआ तीन आवर्तन होते हैं, दोनो हाथ दीर्य करके दशों अगुली गुरुके चरणों पर लगाता हुआ मुखसे "अ' असर उच्चारण करे, फिर दोनों हाथ मस्तकको स्पर्शन करता हुआ "हो" अक्षर क्हे यह प्रथम आवर्तन है। इसी प्रकार 'का" और 'य" असरोके उच्चार गसे द्वितीय आवर्तन होता है । फिर पूर्वोक्त विविसे "का" और "य' अक्षरके कहनेसे तृतीय आवर्तन होता है।

इसी प्रकार जत्ता, मे,जवणिज च मे, इन सूत्रोंके भी तीनर ही आवर्तन होते है-जैसेकि-प्रयम मद स्वरके साथ "ज" अक्षर उच्चारण करे, फिर मध्यम स्वरसे "ता" ऐसे कहे, फिर उचे स्वरके साथ हाथ मस्तकको लगाता हुआ "मे" ऐसे वर्ण उच्चारण करे। इन तीनों अक्षरोंसे प्रथम आवर्तन होता है। फिर "ज" व "न" यह तीनही अक्षर पूर्वोक्त स्वरोंके अनुकूल उच्चारण करनेसे द्वितीय आवर्तन होता है। फिर "ज" "" इन तीन वर्षों को पूर्वोक्त प्रकारसे उच्चारण करनेसे तृतीयावर्तन होता है । इस प्रकारसे पट आवर्तन एक पाठसे होते है और दो वार उच्चारण करनेसे द्वादश आ- वर्तन हो जाते है, किन्तु द्वितीय वारके पाठमें "आवस्सियाए" ऐसे पाठ न पढे, अपितु सर्व सूत्र निम्न लिखितानुसार हे ॥ इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए नि तोहियाए अणुजाणद मे मिउग्गहं निसीही अहो कायं कायसंफासं खमणिज्जो भे किलामो अप्पकिलं. ताणं बहु सुभेण भे दिवसो वइक्कतो जत्ता भे जवणि ज्ज च भे खामेमि खमासमणो देवसियं वइकम आ. वसियाए पडिकमामि खमासमणाणं देवलियाए आ. सायणाए तितीसनयराए ज किंचि मिन्छाए मण दुक्कडाए वय दुक्कडाए काय दुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोहाए सव्व कालियाए सव्व मिच्छो वया- राए सव्व धम्माइक्कमणाए आसायणाए जो मे दे- वसिओ अइयारो को तस्स खमासमणो पडिकमामि निंदामि गरिदामि अप्पाणं वोसिरामि ।। हिंदी पदार्थ-(खमासमणो) हे क्षमाके श्रमण शान्तिके समुद्र १७ (जावणिजाए) मिस करके कालक्षेप होता है ऐसी शक्ति करके तथा जन्म समयके बालकवत् जिसके दोनों हाथोकी दोनो मुष्टिया आखो पर होती हैं उसकी नाई ( निमीहियाए ) जिस शरीरका मुख्य कर्तव्य प्राणा- तिपातके निपेधका है ऐसे शरीर करके आपको ( वटिउ) वदना करनेकी (इच्छामि ) इछा करता हू (मिउग्गह) स्व देह प्रमाण प्रमाण की हुई भूमिकामे प्रवेश करनेकी ( मे) मुझेको (अणुनाणह) आक्षा दीनिए । इस प्रकारसे आज्ञा लेकर अवग्रहमें प्रवेश करे (निसीह ) गुरुदेवको बदना विना जिसने अन्य क्रिया रूप व्यापारका निषेध किया है, फिर मुखसे ऐसे कहे कि (अहोकाय) हे क्षमा श्रमण आपके चरण कमलोंको (काय) हाथ करके (सफास) स्पर्श करता है । इस प्रकार आज्ञा लेकर चरण कम- लोको स्पर्श करके ऐसे कहे कि (किलामो) यदि आपके शरीरको मैंने कोई पीडा दी हो (भे) हे भगवन् आप (खमणिजो) क्षमा करने योग्य हैं इस लिए क्षमा कीजिए क्योंकि-(बहु सुभेण)बहुत ही शुभकियाओ करके (भे) आपका (दिवमो) दिपम [दिन] (वइकतो) अतिकान्त हुआ है और आप (अप्पकिलत्ताण) अल्प वेदनावाले हैं-शारीरिक मानसिक वेद- नासे रहित है यदि शारीरिक वेदना आपको उत्पन्न होती है तो आप उसमे आर्त और रौद्र ‘यान नहीं करते है । हे करुणासमुद्र ( जत्ता) तप नि- "यम मयम स्वाध्याय रूप याता (भे) आपमे सतत विद्यमान है, (च) और (जवणिज भे) इन्द्रिय नोइद्रियके उपशम करनेसे आपका शरीर परम सुन्दर और शान्तिरूप हो गया है, (खमासमया) हे क्षमा श्रमण (देवसिय) दिन सम्बन्धि (वइकम्म) व्यतिक्रम हुआ मेरा किया हुआ जो अपराध उसकी मैं (खामेमि) आपसे समा मागता हू-आप दोपको क्षमा करनेके योग्य हैं इसलिये क्षमा कोनिए, और (आवसिआए ) अप- श्य करणीय प्रनिलेपनादि क्रियाओंके करनेसे यदि मुझको अतिचार लग गया हो तो मै उस अतिचार रूप दोपसे (पडिकमामि ) पीछे हटता ४८ (खमासमणाणं) क्षमा श्रमणोंके सम्बन्धि [मुनियोके सम्बन्धि] (देव- सिआए) दिनमे की हुई ( आसायगाए) आशातनाये जैसेकि-(तेतीस- नयराय ) त्रयस्त्रिंशत् [तेती] आशातनायों से अन्य वा अमुक आशा- तनायें की हो तथा (ज किंचि मिच्छाए)जो किंचिन् मात्र भी मिथ्या भावका वर्ताव किया हो तथा (मग दुकडाए) मन सम्बधि जो पाप हैं उन आशा तनाये करके इसी प्रकार (वय दुक्कडाए) वचनके पाप करके (काय दुक्क- डाए) कायके पाप करके ( कोहाए) क्रोध करके (माणाए.) मान करके (मायाए) छल करके (लोहाए लोम करके (सव्व कालिआए) सर्वका- लमें यदि गुरु आदिकी अविनय की हो (सव्व मिच्छोश्याराए) सर्व मिथ्यो- पचार करके आशातनायें की हो (सव्व धम्म अइक्कमणाए) सर्व धर्म अष्ट प्रवचन दया माताके उल्लयन करनेसे यह सर्व पूर्वोक्त(आसायाणाए) आशातनाये करके (जो) जो (मे) मैं ने (अइयारो) अतिचार रूप दोष (को) किया है (तस्प्त ) उस अतिचारसे (खमासमणो) हे क्षमा श्र- मण आपके समीप (पडिय मामि) प्रतिझमग करता हूँ (निंदामि) स्व- आत्माकी निंदा करता हूँ (अप्पाण) आत्मामेसे दुष्ट कर्मोका (चोसिरामि) परित्याग करता हूँ॥ भावार्थ-स्वइच्छानुसार पापकर्मका दूर करता हुआ शान्तिरूप मुनिको वढना करे क्योंकि वदना करनेसे नीच गोत्र कर्मको क्षय कर देता है ऊच गोत्रको बापता है। पुन बैठकर गुम्के चरणकमलोंको हस्तादि करके म्पर्श करे, फिर कह हे भगवन् ! आप क्षमा करो यदि मेरेमे आपको पीडा हुई हो क्योंकि आप अल्प वेदनावाले है, आपको दिन बहुनही शुभ क्रियाओ करके व्यतीत हुआ है, और आप समा करनेके योग्य हैं, भाव- यात्रा मुनियोंके सदेव कालही विद्यमान रहती है, इस लिए शिष्य यात्राके सबोधनसे गुरुसे फिर कहता है कि हे भगवन् ! आपका शरीर इन्द्रियोके उपशम करनेसे शान्ति रूपतासे विराजमान है। फिर गुरुसे दिनमें किए हुए ४९ दोपोकी क्षमा करनेकी प्रार्थना अवश्य ही करे क्योकि क्षमा मागनेसे अविनय भाव दूर हो जाता है। त्रयस्त्रिंशत् प्रकारकी आशातनायें करके वा मन वचन काय करके तथा चारों कपायों करके कभी भी गुरुकी आ- शातना न करे । यदि किसी प्रकारसे भी गुरुको आशातना हो गई तो उसका पश्चात्ताप करे, फिर स्वआत्माद्वारा उस कर्मकी निंदा करता हुआ पुन कभी भी आशातना न करे क्योंके अविनय भावसे ज्ञानादि गुणोकी सफलना नहीं होती है। इति श्री पदनारूप तृतीयावश्यक समासम् ॥ फिर तिपयुत्तोके पाठसे वदना करके चतुर्थ आवश्यक करनेको गुरु महाराजप्से आज्ञा लेकर पूर्वोक्त ९९ अतिचार जो कायोत्सर्गमे पठन किए थे उनको पठन करे किन्तु सर्व पाठोंके अनमें "तस्स मिच्छामि दुकई" ऐसे कहना चाहिये क्योंकि ध्यानमें यह कहा जाता है कि "जो मे देवप्सि अइयार को तस्त चिंतवणा" इत्यादि । फिर तिखुत्तोंके पाठसे वदना करके बैठकर दक्षिण जानु ऊर्य करके थामा जानु भूमिका पर रखकर नमस्कार मत्र पढे । फिर "करेमि भत्ते का सूत्र पठन करे । फिर निम्न प्रका- रसे पाठ पढे-इस क्रियाको वा पाठको श्रावकसूत्र भी कहते हैं । चत्तारि मगलं अरिहंता मंगलं सिद्धा मंगलं साहु मंगलं केवलिपण्णतो धम्मो मंगल चत्तारि लोगुत्तमा अरिहंता लोगुत्तमा सिद्धा लोगुत्तमा साह लोगुत्तमा केवलि पण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा चत्तारि सरणं पच- ज्जामि अरिहंता सरणं पव्वज्जामि सिद्धा सरण प- व्वज्जामि साहू सरण पञ्चज्जामि केवलि पण्णत्तोध. म्मो सरण पव्वज्जामि ॥ १ भरिहताजीको सरणो सिद्धाजीको सरणो साघुजीको सरणो केवलि परूप्या ७ ५० हिंदी पदार्थ-(चत्तारि मगल ) चार मगल है-जैसेकि-(अरिह- ता मगल) त्रैलोक्य पूज्य श्री अहन्त मगलीक हैं, द्वितीय-(सिद्धा मगल) सिद्ध प्रभु मगलीक है, तृतीय-( साहू मगल ) साधु मगलीक है, चतुर्य- (केवलि पण्णत्तो धम्मो मगल) श्री केवली भगवान्का प्रतिपादन किया हुआ श्रुत चारित्र रूप धर्म मगलीक है, (चत्तारि लोगुत्तमा) नार ही पदार्थ लोकमे उत्तम हैं (अरिहता लोगुत्तमा) अरिहत प्रभु लोकमे उत्तम है, (सिद्धा लोगुत्तमा) सिद्ध भगवान् लोकमे उत्तम हैं, ( साहु लोगुत्तमा) अ- हनाज्ञानुकूल क्रिया करनेवाले साधु लोकमे उत्तम है, (केवलि पण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा) श्री केवाले भगवानका प्रतिपादन किया हुआ धर्म लोक- में उत्तम है। पुन (चत्तारि सरण पध्वजामि ) मै चार शरण अगीकार क- रता हू (अरिहता सरण पवजामि) श्री अर्हन् भगवान्का शरण ग्रहण करता हू (सिद्धा सरण पनजामि) श्री मिद्ध महाराजाओका शरण ग्रहण करता हू (साहू सरण पवजामि) श्री साधु मुनिराजोंका शरण ग्रहण हू (केलि पण्णत्तो धम्मो सरण पव्वजामि) श्री केवलि भगवान्के प्रति- पादित धर्मका शरण ग्रहण करता हूँ। भावार्थ-लोकमें चार ही मगल है, चार ही उत्तम हैं, चार ही श- रण है जैसेकि अर्हन् १ सिद्ध २ साधु ३ केवलि भापित धर्म ४ ॥ फिर "इच्छामि ठामि" इस सूत्रको पढके इच्छाकारेण यह सत्र पाठ पढे, फिर तिरखुत्तोके पाठके साथ वदना नमस्कार करके व्रत अतिचारके पठन करनेकी आज्ञा लेकर प्रथम ज्ञानातिचारोंकी आलोचना करे, जैसेकि- "आगमे तिविहे पण्णत"का पाठ ॥ आगमे तिविहे पण्णते तंज्जहा सुत्तागमे अ. दया धर्मको मरणो ॥ चार सरणा ख हरणा और न पोजो कोय, जो मधि प्राणी आदरो तो अक्षय अचल गति होय।। ।

स्थागमे तदुभयागमे एहवा श्री ज्ञानने विषय जे कोई अतिचार लागो होय ते आलोउं जंवाइद्ध व- चामेलियं हीणक्खरं अञ्चक्खरं पयहीण विनयहीणं जोगहीणं घोसहीणं सुलु दिन दछु पडिञ्छियं अकाले कओ सज्झाओ कालेन कओ सज्झाओ असज्झाइय सज्झायं सज्झाइय न सज्झायं भणता गुणता चित. वता अने विचारता ज्ञान अने ज्ञानवंतनी आशातना कीनी होय तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥ हिंदी पदार्थ-(आगमे निविहे पण्णते) सूत्र तीन प्रकारसे प्रति- पादन किया हुआ है (तजहा) जैसे कि-(सुत्तागमे) सूत्रागम, (अत्थागमे) द्वितीय अर्थागम, तृतीय (तदुभयागमे) सत्र और अर्थ रूप आगम, (एहवा श्री ज्ञानने विषय में कोई अतिचार लागो होय ते आलाउ ) इस प्रका- रके श्री ज्ञान के विषय यदि कोई अतिचार लगा हो तो मैं उसकी आलो- चना करता हू, तथा उन अतिचार रूप दोषोको प्रमाश करता हू । (जवाइद्ध) सूत्रको अनुक्रमतापूर्वक न पठन किया हो तथा अन्य प्रकरणको अन्य प्रकरणके साथ एकत्व कर दिया हो (वच्चामलिय) अन्य शास्त्रके पाठसे कोई अन्य सूत्र पाठ अधिक कर दिया हो (हीणक्खर) आगमको हीना- क्षरसे पठन किया हो वा (अञ्चरखर ) सूत्रके अधिक अक्षर कर दिए हों (पयहीण) पदहीन पठन किया हो (विनयहीग) विनयसे हीन सूत्र पदा हो (जोगहीण) शुभ योगोंमे रहित सत्र पढा हो (घोसहीण) उदात्त अनुदात्त स्वरित घोपसे रहित सूत्र पढ़ा हो (सुहु दिन्न) अयोग्यको सूत्र- दान किया हो (दुहु पडिच्छिय) अविनय भावसे पठन किया हो (अका- ले को सलामो) अकालमे स्वाभ्याय किया हो (काले न कओ सज्झाओ) कालमे स्वाध्याय न कियाहो (असज्झाइय सज्झाय )अस्वाध्यायके समयमे स्वाध्याय किया हो (सज्झाइय न सज्झाय) स्वाध्यायके समयमें स्वाध्याय न किया हो (जो) जो (मे) मेरा (देवसि) दिन सम्बन्धि (अइयारो) अतिचार (कओ) किया हुआ है (तस्स) उसका (मिच्छा मि) फल मिथ्या हो वा निष्फल हो (दुकड) पापका ॥ भावार्थ-आगम तीन प्रकारसे प्रतिपादन किया गयाहे जैसेकि सूत्रा- गम १ अर्थागम २ तदुभयागम ३, सो जवाइह इत्यादि १४ अतिचार ज्ञान के है सो उनको श्रावक दूर करे। उक्त पाठसे श्रावकको सूत्र पठन करने स्वत ही सिद्ध होते हैं। दर्शनका पाठ ।। दर्शन सम्यक्त्व परमत्थ संयवो वा सुदिष्ट प- रमत्य सेवणावावि वावग्ण कुदंसण वज्जणाय एवी - 1 सम्यस्त्वक प्रहण घरनेके निम्न लिखित मृत्र पहना चाहिए - अहन भते तुम्हाण समोवे मिच्उत्ताउ पडिकमामि, सम्मत्त उबस पत्र न मि तजहा दस सित्तउ कालउ भाउ दव्य उण मिच्छत कारणाइ पच- क्खामि, सम्मत्त कारणाइ उषप्त पवनाम नो में कप्पद अज्झप्पभिई आउ थिए या अनउत्थिय देवयाणि वा अनउस्थिर परिग्राहियाणि, चेइयाणि परित्तए वा नमसित्तए धा पुर्वि अणालित्तण आलवित्ता वा सलवित्तए पा तेसि अस ण पा, पाण वा, खाइम घा, साइम पा, दाउ बा, अणुप्पयाउ था वित्तउण इत्य वा अनथ घा, काल उण जाधजीवाए भाषण जावगहेण न गहिनामिजा पच्चलेण न छलिजामि, जाव सनिवारण नामिविजामि जाय अनेण वा वेणयरोयाय कारणाए सपरिणामो न परिवहइ तामेव असम्पदसण ननधगया भिउगेण, गणाभिउगेण, पलामिडगेण, देवयाभिउगेण, गुरू निग्गहेण वित्तीक तोरेग पोसिरामि ॥ अाहतो महदेवी जावनीशय सुमाहु सो गुरुणो जिण प- मत्त तत्त ईयसम्मत मए गहिए ।

सम्मत्त सहहणा एहवा सम्यक्त्वना समणोवासया- णं सम्मत्तस्त पंच अइयारा पयाला जाणियव्वा न समायरियव्वा तंज्जदाते आलोउं संका कक्खा वि- तिगिच्छा परपासंडी परसंसा परपासंडी संश्रवो एवं पांच अतिचार मध्ये जे कोई अतिचार लागो होय तस्स मिञ्छा मि दुकडं ॥ हिंदी पदार्थ-(दर्शन सम्यक्त्व) दर्शन सम्यक्त्वका स्वरूप व र्णन करते हैं कि (परमत्थ) परमार्थ जो नव तव जीवादि हैं उनका (सपो) सस्तव करना परिचय करना तथा (सुदिष्ट परमत्यसेवणावि) परमार्थको जिन्होने भली प्रकारसे देखा है उनकी सेवा करनी (वावणं मिहोने सम्यक्त्वको धारण करके त्याग दिया है वा वमण कर दिया तथा जो (कुदसण) कुत्सित दर्शन हैं जिन्होंमें सम्यक्त्वका ही अभाव ऐसे पुरुषोंकी संगतिको (वनणाय) वर्जना (एवी) इस प्रकार (सम्म सम्यक्त्वनी (सद्दणा) श्रद्धा होती है (एहवा सम्यक्त्वना सम सयाग) इस प्रकारसे जो सम्यक्त्वके धारक अमणोपामक हैं (सम्मत्तस्स) सम्यात्व सम्बन्धि (पंच) पाच (अइयारा) अतिचार ला) स्थूल हैं जोकि (नाणियव्या) जानने योग्य तो अवश्य हैं. (न समायरियव्वा) समाचरण योग्य नहीं हे (तज्जहा) नद्यथा लोड) उनकी आलोचना करता हू-जैसेकि (मका) निनवचनों करना (कक्सा) परमतकी आकाक्षा करना (वितिगिच्छा) फ सशय करना जैसेकि सुव्रतोंका फल है किम्वा नहीं है (पर मा) परपाखडियोंकी प्रशसा करना क्योंकि मिथ्यात्वियोंकी मे ही प्रवेश कर जाते है (परपा in ५६ का परित्याग करे क्योंकि सर्वथा हिंसाका त्याग तो गृहस्थोंसे हो नहीं स- कता, इसलिये स्थूल शब्द ग्रहण किया गया है। फिर त्यागमे भी जो नि- रपराधि जीव है उनको न मारे, अपितु स्वअपरावियोका त्याग नहीं है। उक्त व्रतमे न्यायधर्म वा न्यायमार्ग भली प्रकारस दिसलाया गया है । जो निरपराधियोकी रक्षा स्वअपराधियोको दड इस कथनसे राजे महाराने भी जैन धर्मको सुसपूर्वक पालन कर सकते है। फिर पाच ही अतिचार रूप दोपोंको भी दूर करे कि क्रोधके वशीभूत होकर जीवोंको बाधना १ । वध करना अपितु जो बालकोंको ताड़नादि किया जाता है वह केवल शिक्षाके वास्ते होता है किन्तु उस आत्माको पीडित करनेके लिए नहीं जैसे अ. ध्यापक छात्रोको शिक्षाके लिये ही ताडता है किन्तु उनके प्राणनाश कर नेके लिए नहीं इस लिये क्रोधसे वर करना भी प्रथम अनुव्रतमें अतिचार रूप दोष है २ । तृतीय अतिचार छविका छेदन करना ही है जेसेकि नेत्रोंके विषयके वास्ते पशुओके अगोपाग काट देने ३। और चतुर्थ अतिचार अतिभारारोपण हे, पशुओंकी शक्तिको न देखते हुए अति भारका ला दना यह भी प्रथम अनुव्रतमें दोप है ४ । पचम दोष अन्नपानीका निरोध रूप है, क्योंकि वे अनाथ आत्मा जो पूर्व पापोंके फलसे पशु योनिको प्राप्त हुए है उनकी भली प्रकारसे रक्षा न करना यह भी प्रथम अनुव्रतमें अति- चार रूप टोप है ५ ।। इस लिये अनुवत द्विकरण तीन योगसे आयु पर्यन्त ग्रहण करे, करू नहीं मनकरके वचन करके काय करके कराऊ नहीं मन करके वचन करके काय करके इस प्रकार गृहस्थी प्रथम अनुनत धारण करके फिर द्वितीय अनुगत धारण कर जोकि निम्न लिखित है-- बीजू अणुव्रत श्रूलाउ मोसावायाउ वेरमण कन्नालिए गोवालिए भोमालिए पापणमोसा मोट- को कूड़ी साख इत्यादि मोटकं झूठ बोलवाना पञ्च- क्खाण जावजीवाय दुविहं तिविहेणं न करेमि न का- रवेमिमणसा वयसा कायसा एहवा बोजा थूल मूपा- . वाद विरमण व्रतना पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्या तज्जदा ते आलोउं सदस्ता भक्खाणे रहस्सा भरवाणे सदारमंत भेए मोसोवएसे कूड लेह करणे तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥२॥ हिंदी पदार्थ-(बीजु अणुव्रत) द्वितीय अनुबन (थुलाउ) स्थूल [मोटा] (मोसावायाउ) मृषावादसे (वेरमण) निवृत्ति करता हूँ जेमेकि- (कन्नालिए) कन्या तथा वर सम्बन्धि असत्य जैसे किसीने विवाह सम्म न्धि वार्ता की तब वर कन्या सम्बन्धि असत्य भाषण करना तथा इसी प्रकार (गोवालिए) गो आदि पशुओ सम्बन्धि असत्य (भोमालिए) भू- मिका सम्बन्धि असत्य (थापण मोसो) तथा स्थापन मृपा अर्थात किसीने अमुकके पास विनाशासिओंके कोई वस्तु स्थापन करा दी तो उसके लिए असत्य भाषण करना उसीका नाम स्थापन मृपा हे (मोटकी कुडी सारस) स्थूल कूट शाक्षि देना जैसेकि राज्यद्वारमे किमी कारणके पृच्छा करनेपर असत्य भाषण करना (इत्यादिक मोटक झूठ बोलवाना पञ्चासाग) इ. त्यादि स्थूल मृपावाद बोलनेका प्रत्याख्यान [नियम ] ( भावनीपाय) या- वत् जीव पर्यन्त (दुविह) हिकरण (तिविहण) त्रियोगसे जैसेकि (न करेमि) उक्त कारणोसे असत्य भाषण नहीं करू (न कारमि) नहीं आरोसे कराऊ (मासा) मनसे (वयसा) वचनस (कायसा) कायसे, ए- हवा बीना थूल मृपावाट विरमण के पन अतिचार (जागियबा) जानने योग्य है किन्तु (न ममायरियवा) आचरणके योग्य नहीं हैं (तज्नहा) तद्यथा जलेकि-(सहस्मा माखाणं) विचारशून्य होकर अन्य आत्माओं के दोषारोपण किया हो वा अकस्मात विनाविचारे अन्य जीवोको दोपोंके ~

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भागी सिद्ध किया हो (रहस्सा मामाणे) किसीकी रहस्य वार्ता प्रगट करी
हो (सदारमत भेए) सदाराका मत्र भेद किआ हो जैमेकि-स्त्रीकी मम
युक्त वार्ताका कयन करना (मोसोवएसे ) अन्य आत्माओंको मृपा भाषण
करनेका उपदेश दिया हो (कूड लेहकरणे) कूट [ असन्य ) लेख लिखा
हों (तरस) उम (मिच्छामि दुबड) अतिचार रूप पापसे मैं पीछे,
हटना है॥
भावार्थ-द्वितीय अनुव्रतमें स्थूल मृपावाद बोलनेका परित्याग किया
जाता है जिसमें कन्यालीक गवालीक भूमाठीक स्थापन मृपा कूट शासि
इत्यादि प्रकारके असत्य भापणका द्विकरण त्रियोगसे प्रत्यारयान करे।
फिर उक्त अनुनतकी रक्षाके वास्ते पाच अतिचारोका भी परित्याग करे
जसेकि-विचारशून्य होकर किसी पर दोपारोपण करना १, किसीके
मर्मयुक्त भेदको प्रगट करना २, स्वदारा मत्रभेद करना ३, अन्य आत्मा-
ओको मृषा भाषण करनेका उपदेश देना ४, कुट लेख लिखने ५, यह पाच
ही अतिचाररूप दोप द्वितीय अनुनसकी रक्षाके वारने दूर करे, इनके
प्रत्यक्ष फसे लोग अनभित नहीं हैं इसी लिये ही इनका विशेष अर्थ
नहीं लिखा है |
अथ तृतीय अनुव्रत विपय ॥
तीजा अणुवत यूलाउ अदिनादाणाउ'वेर,
मणं खातर खणी १ गाठड़ी छोड़ो २ तालापड़ि कुंची
३ वाट पाड़ो ४ पड़ी वस्तु धणीयाती जाणी ५ इ.
त्यादिक मोटका' अदत्तादाण सगा सम्बन्धि व्यापार
सम्बन्धि तथा पड़ी निर्धनी वस्तु ते उपरान्त मो-
टका अदत्तादाण लेवाना पञ्चक्खाण जावजोवाय
दुविहं तिविहेणं न करेमिन
1
मणता वयसा
J

रज्जाईनम्मे ३ कूड़ कायसा एहवा तीजा थूल अदत्तादाण विरमण व्रत- ना पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तं- ज्जहा ते आलोउं तेणाहडे १ करपउग्गे २ विरुद्ध तोले कूड़ माणे ४ तप्पडिरूवग ववहारे ५ जो मे देवसि अइयारो कउ तस्स मिच्छा मि दुकडं ॥३॥ हिंदी पदार्य-(तीना) तृतीय (अणुन) अनुबन (थुलाउ) स्थूठ (अदत्तादाणाउ वेरमण) अदत्तादानसे निवृत्ति करता है (सातर स्वणी) किसीफे परमे संधि करी हो [भित्ति आदिका तोडना] (गाठडी छोडी होय) गाठ कतरी हो (तालापडि कुची) अन्यके तालाओंको अन्य कुनिया लगाई हो (वाट पाडी)मार्ग[पथ मे लूटना (पडी वस्तु धणीयाती जाणी) किसीकी महा वस्तु जानकर कि इसका अमुक धनी है या देखकर उठा ली हो ( इत्यादि मोटका अदत्तादाण) इत्यादि स्थूल अदत्तादानका प्रत्याख्यान करना है किन्तु ( सगा सम्बन्धि ) रवमन सम्बन्धि वस्तु उठा- कर लेनेका त्याग नहीं है, यदि उनको किसी प्रकारका भ्रम न हो, तथा (व्यापार सम्बन्धि ) व्यापार सम्बन्धि जैसेकि-आदर्शके नमूनेके वास्ते कोई वस्तु उठाई जानी है (तथा निर्धनी वस्तु) तथा जिस वस्तुका खोन करने पर भी स्वामी सिद्ध न हो (ते उपरान्त मोटका अदत्तादाण ) इनके विना स्थल अदत्तदानके (लेवाना पञ्चरसाण ) लेनेका प्रत्याख्यान (जावनीमाय) आयु पर्यन्त ( दुविह) हिकरण और ( तिविहेण) त्रि योगसे जैसेकि (न करेमि) न करू (न कारवेमि) और नाही चोरी कर- नेका अन्यको उपदेश देकर उनसे चोरी क्राऊ (मणसा) मन करके (वयसा ) वचन करके (कायसा) काय करके (एहवा तीजा थूल अ- टत्तादाण विरमण व्रतना) ऐसे तृताय स्थल अदत्तादान निवृत्तिरूप नन " 1 4 2 के (पच अड्यारा) पाच अतिचार (नाणियव्वा) जानने योग्य है किन्तु (न समायरियव्वा) आचरणे योग्य नहीं हैं (तज्जहा) तद्यथा (ते आलोउ) उनकी आलोचना करता हू-जैसेकि (तेनाहडे) चोरीकी वस्तु ली हो (तक्करप्पउग्गे) चोरोकी सहायता की हो (विरुद्ध रज्जाइस्कम्मे ) राज्य विरुद्ध काम किया हो क्योकि-जो राज्य नियम [कानुन] हे उसके विरुड, धर्नाव करना तृतीय ब्रतमे अतिचार रूप दोष है, इसलिए राज्य नियमसे यदि विरुद्ध काम किया हो (कुड तोले) न्यूनाधिक तोला हो (कृड मागे) वस्त्रादिका माप न्यूनाधिक किया हो (तप्पडिरूवगववहारे) अधिक मू- ल्यकी वस्तुमे अल्प मूल्यकी वस्तु एकत्व करके विक्रय करना जैसेकि- घृतमें चरबी, दुग्धमे जल, इत्यादि (जो) जो (मे) मैने (देवसि) दिन- मे ( अइयारो) अतिनार (कर) किया है (तस्स) उस ( मिच्छा मि दुक्कड) अतिचारोंसे मैं पीछे हटता हू ॥ भावार्थ-तृतीय अनुवनमे स्थूल चार्य कर्मका परित्याग होता है जेमेकि-सधिका छेदन करना १ गाठ कतरना २ परके ताले अन्य कुजि- योसे सोलने ३ किसीकी वस्तु उठा लेनी ४ इत्यादि इस प्रकारके चौर्य क- मौका परित्याग करे। फिर उक्त व्रतकी रक्षाके लिए पाच अतिचार रूप दोपोको भी छोड देवे, जैसेकि-चोरोंका माल लेना १ चोरोकी सहायता करनी २ राज्य विरुद्ध कार्य करने ३ न्यूनाधिक तोलना और मापना ४ बहुमूल्य वस्तुमे अल्प मूल्यवाली वस्तुको एकत्व करके बहु मूल्यके भावसे विक्रय करना ५ इन पाच अतिचारोको परित्याग करके तृतीय अनुव्रतको द्विकरण और तीन योगोसे शुद्ध पालन करे क्योकि ये नियम उभय लोकमे सुखदायक है जैसेकि-इस लोकमे शान्ति, राज्य सेवा, वर्म- रक्षा, परलोकमें आराधक भाव प्राप्त होना अनुक्रमनासे मुक्तिको प्राप्ति होना एव अनेक सुखोकी प्राप्ति होती है । T - 1 । 1 1 ।

अथ चतुर्थ अनुव्रत विषय ।।
*चौधुं अणुव्रत थूलाउ मेहुणाउ वेरमणं सदा-
रा संतोसिए अवप्लेस मेहुण सेववाना पञ्चक्खाण
ए पुरुषने अने स्त्रीने सभर्तार संतोलिए अवलेस मे.
हुणर्नु पञ्चक्खाण अने जे स्त्री पुरुपने मूलथकीज
.कायाए करी मेहुण सेववानु पञ्चक्खाण होय तेहने
देवता मनुष्य तिर्यंच सम्बन्धि मेहुणर्नु पञ्चक्खाण
जावजीवाय देवता देवी सम्बन्धि दुविहेणं तिविहेणं
न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा मनु-
पर तिर्यच सम्बन्धि एगविहं एगविदेणं न करेमि
कायसा एहवा चौथा स्थूल मेहुण विरमण व्रतना
पच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तंज्जहा
* चतुर्थ प्रतधारा श्रावकों को इस प्रकारसे पाठ पठन करना चाहिये-
जैसेफि-(चौथा अणुप्रत थूलाउ मेहुणाउ घेग्मण सदाग सतोसिए अवसस
मेहुण पञ्चक्खाण) इस प्रकारसे तो श्रायक पढे, और प्राविकायें निम्न प्रकारसे
पढे (चौधु अणुप्रत घटाउ मेहुणाउ वेग्मण सभा सतासिए अवसेस मेहुणनु
पथक्वाण ) यदि ची पुरुषको सर्वथा ही कायकरके मैथुन आसेधनका प्रत्या
रपान हो तिनो निम्न प्रकास पाठ परना चाहिये ।। चौधु अणुव्रत पृ
लाउ मेहुणा येरमण देवता देवी सम्पन्धि दुर्षिह तिविहेण इत्यादि मनुष्य
तियच सम्यधि एगविह एगविहेण न कामि कायसा इत्यादि तथा श्री उपा
सक दशा सूत्रमें महाशत्तकजाने नग्नत्य रेवतीपमुवा तेरस्स दागण अवसेस
मेहुणाउ बेरमण इत्यादि उक्त सूनसे सिद्ध होता है जितनी स्त्रियों का आगार
ग्वा हो उतने प्रमाणसे उपरान्त मैथुन सेवन प्रत्याख्यान करे, प्रतिरमण
करनेवालों को योग्य है कि वे अपने २ यथेट इस पाठको परे ॥

ते आलोई इनरिय परिग्गदियागमणे अपरिग्गहि. यागमणे अणंगकीडा परविवाह करणे काम भोगे. मु तिवाभिलाता जो मे देवति अडयार कउ तत्स मिच्छामि दुफडं ॥४॥ हिंदा पदार्थ--(नाअगुमत भूगर मेनु गाउ गरमा ) मध अनुजन म्धृन्द मगनमें निति करना । नमेकि-(सदारा सेनामिए) म. स्त्रीपर ही मनोप धारण करना ( अगम) अप (मेहुणनु पाताण) मेधुन भामेनका परगाग्यान (ए पुरुषने) गह नियम तो पुसरोकार (अंने सीने) परंतु विगोको निम्न प्रकारसे पहना नारिगे (ममार सनोमिए ( सभार उपर ही सलोय परना) अचमेस मेदुमा पाग ण ( भित्ताक दिना अन्य सर्वथा मथुन से प्रत्यायन ) अने में स्त्री पुकाने गृपन कायाए करी मेथुन सेनगनु पचागण होय (यदि स्त्री और पुरुषको प्रथमसे ही काय करके मेथुन सेवनका प्रत्याग्न्यान होवे नी (तहने देवता मनुष्य नियंन सम्वनि) उनको देव, मनुष्य, ति- * गतुर्य मत धारणा पाठ- अन्न मो तुम्हाण समीने उगलिय बेउध्विय यूलग मेहुण , पञ्चामामि इम बमनेरवय उपम पम्नामि दिन दुनिह नितिहण , तेरिच्छ एगविर तिविहण मणुय एगहि विहेणं आहागरिव भगाहिय भगएण तम्म भत्ते परिकमामि निंदामि गरिहामि तनहा दाउ, खित्तउ,का- लउ, मावउ, तथदव्बउण इम बंभवयं उपसं पवग्नामि खित्तउण इत्थमा अन्नत्या काउण जापानीवाए भावउण नाव गहाइगा नागिण्हनामि नाव- उलेण न छलिग्नामि, जाव सनिवारण नाभिमरिम्नामि नाव अनेणाण- यरोयाय केण न परिभविग्नामि ताव इम बमचे वय अरिहन सक्सिय देव मरिसय अप्पप्तविषय अणुसरामि ।

६३ यंन सम्पाये (मेहुणनु पञ्चासाग) मेथुन सेवनेका प्रत्याख्यान (जावनी- वाय) सर्व आयु पर्यन्त (देवना देवी सम्बन्धि) देव देवी सम्बन्धि (दु. मिह नितिहण ) हिकरण और तीन योगसे जैसेकि- न करोमि ) मेथुन म स्वय सेसन न करू (न कारयेमि) नाही औरोसे आसेवन कराऊ अ पिनु तीन योगोंसे जेसेकि-(मणसा) मन करके ( वयसा) वचन करके (कायसा) काय करके ( मनुष्य नियंच सम्बन्धि ) किन्तु मनुष्य और निर्यम् सम्बन्धि (एगविह) एक करण और ( एगरिहेण ) एक ही योग करके जैसेकि-(न करेमि) न करू (कायप्ता) काय करके (एहवा चोया थूल मेहुण चिरमण ननना ) ऐसे पूर्वोक्त कथन किए हुए चतुर्थ मेथुन वि. रतिरून नतके (पन)पाच ( अइयारा ) अतिचार ( जाणियव्या) जानने , योग्य है किन्तु (न समायरियन्वा) आचरणे योग्य नहीं हैं क्योंकि इनके आसेवनसे सदार सतोपी स खडिन हो जाता है (तनहा ते आलोउ) जेसेकि- (इत्तरिय परिगहियागमणे ) यह सर्व अतिचार सदार सतोपीको स्वकाया करके ही होते है. इसलिए इनका पदार्थ-श्रीमान् परम पडिन आचार्यवर्य श्री सोहनलालजी महाराननी निम्न प्रकारसे करते है, जिसका कारणव शात् बाल्यावस्थानाली कन्याफे साथ विवाह हो गया है यदि वे अप्राप्य यौवनकालमे स्त्रीसग करे तो प्रथम अनिचाररूप दोप होता है, द्वितीय अ निचार ( अपरिगहियागमणे ) निप्स कन्याके साथ उपविवाह [मागना] तो हो गया है किन्तु आर्य विवाह नहीं हुआ है यदि उसके साथ सग करे तो द्वितीय अनिवार है (अणगकीडा) अनग नाम कामदेवका है कीडा नाम क्रीटा अर्थात् रमण करनेका है सो कामका आशा पर अन्य प्रकारसे उपहास्यादि क्रियायें करनी अथवा यदि नन् समास करें तो नअग अनग अर्थान् अगसे मिन स्थानोपरि कुचेष्टा करना उसका ही नाम अनग क्रीडा है इसी अर्थमे सर्व प्रकारको कुनेष्टाये ममावेशित हो जाती है, सो यदि अनग क्रीडा को हो तो तृनाय अनिचार है, चतुर्थ अतिचार (पर हुएको तोडकर अपना विवाह . . विवाह करणे) यदि . 1 । लेवे तो चतुर्थ अतिचार है। यदि पर विवाहका प्रथमवत् ही अर्थ किया जाए तो वह अर्थ सूत्रानुसार सघटित नहीं होता है क्योंकि जिस बातका श्रावकने नियम ही नहीं किया है तो भला उसका अतिचार कहासे होगा? किन्नु जो स्वदारसनोप बन है उसमें उक्त लिखा हुआ अर्थ युक्तिपूर्वक सिद्ध है, इस लिये किसीके उपविवाहको छीन कर उसे स्वयं विवाह कर लेना सोई चतुर्थ अतिचार है। फिर (कामभोगेसु निव्वाभिलासा) काम भो- गोमे तीव्र अभिलापा को हो तथा कामभोग आसेवनके लिये औषधियोका सेवन करना स्नान, व्यायाम, कामकी आशा पर तथा मादक द्रव्य ग्रहण करने यह पचम अनिचार है। विकार केवल मोहनीय कर्मकी प्रबलतासे उदय होता है उसे वैराग्यादि द्वारा उपशम करना सुपुरुषोका लक्षण है, न कि-उदय करना, इस लिए यदि उक्त प्रकारके अतिचार आसेपन किए हो तो (तस्स ) उनका (मिच्छा मि दुकड) अतिचार रूप पाप मिथ्या हो॥ भावार्थ-श्रावकका चतुर्थ अनुनत स्वदारा संतोष है जिसका अर्थ यही है कि अपनी स्त्री पर सतोर करना तथा परस्त्री वेश्या आदिका प--- रित्याग करना, क्योंकि कामकी उपशानि केवल सतोप पर ही निर्भर है अन्य पदार्थों पर नहीं, सो परदारा वृत्ति अर्थात् स्वदारा 'सतोपी पुरुप देव देवीके साथ मैथुनका त्याग द्विकरण तीन योगसे करे और मनुष्य वा ति- र्यग् सम्बन्धि एक करण एक ही योगसे करे और जिसके सर्वथा ही मेथुन सेवनका परित्याग होवे निस भागे करे उसी भागेकी आलोचना करे, किन्तु इस व्रतके जो पाच अतिचार है उनका स्वरूप पदार्थमें लिख दिया है, कि- नु जो प्रथम अर्थ विधवा प्रमुखका वा वेश्यादिका करते है वह अर्थ युक्ति- पूर्वक सिद्ध नहीं होना है, क्योंकि खदार सतोषी व्रतके ग्रहण करने पर ही उक्त बेश्यादिका परित्याग होता है, इस लिए जो अर्थ श्री आचार्य श्री पूज्यपाद सोहनलालनी महारानने प्रतिपादन किया है वही अर्थ युक्ति सावित है। , m

अथ पंचम
अनुव्रत
विपय॥
पांचमुं अणुवत धूलाओ परिग्गहाओ वेरमणं
खित्त वत्युनु यथा परिमाण हिरण सोवण्णनु यथा
परिमाण धन घाण्णनु यथा परिमाण दुप्पद चउप्पदनुं
यथा परिमाण कुविय घातुन यथा परिमाण ए यथा
परिमाण कोधु छे ते उपरांत पोतानुं करी परिग्रह
राखवानां पञ्चक्खाण जावजोवाय एगविहं तिविहेणं
न करेमि मणसा वयसा कायसा एहवा पाचमा थूल
परिग्रह परिमाण व्रतना पच अइयारा जाणियवान
समायरियव्वा तंजहा ते आलोउं खित्त वत्थु प्पमा-
णाइकमे हिरण सोवण्ण प्पमाणाइकमे धन धाण्ण
प्पमाणाइक्कमे दुप्पट चउप्पद प्रमाणाइक्कमे कुविय
धातु पमाणाइक्कमे जो मे देवसि अइयारो कउ तस्त
मिच्छा मि दुकडं ॥
हिंदी पदार्थ-(पाचमु अणुव्रत थूलाओ परिगहाओ वेरमण
पाचवा अनुव्रत स्थूल [ मोटा] परिग्रहसे धन धान्यादे निवृत्तिरूप उस
विवरण करते है जैसेकि-(खित्त वत्युनु यथा परिमाण) क्षेत्र [खेत
आरामादिकी भूमिका अथवा हह गृहशालादिका यावत् [नितना ]
माण किया हुआ है (हिरण्ण) चादी (सोवण्णनु) सुवर्णका (यय
माग) यावत् परिमाण किया हुआ है (धन) धन और (धा
गोधूमादि धान्यका (यथा परिमाण) यावत् परिमाण किया हुआ
प्पद) द्विपद मनुष्यादि (चउप्पदनु) चतुप्पद गवादिका (यथा
किया हुआ है (कुविय धातुनु) घरकी यावत् स

उनका (यथा परिमाण) यावत् परिमाण किया हुआ है (ए यथा परि- कीधु छे) उक्त लिखे हूए अनुसार यावत् परिमाण किया हुआ है उपरात पोतानु करी) परिमाण उपराति अपनी निश्राय करके (परि राखवाना पञ्चक्खाण) परिग्रह रसनेका प्रत्याख्यान [त्याग ] (जाव वाय) यावत् जीव पर्य्यन्त (एगविहं) एक करण (तिविहेण) तीन गसे जैसे कि-( न करेमि) परिमाणसे अतिरिक्त परिग्रहका सचय न (मणसा) मन करके (वयसा) वचन करके (कायसा ) काय करके हवा) ऐसे (थूल) स्थूल (परिग्रह व्रतना ) परिग्रह ब्रतके (पच) - (अइयारा) अतिचार (जाणियन्वा) जानने योग्य है किन्तु (न समाय यबा ) ग्रहण करने योग्य नहीं हैं (तज्जहा ) तद्यथा (ते आलो उनकी आलोचना करता हू-(खित्त वत्यु पमाणाइक्कम) क्षेत्र (खेत ] शालादि स्थानोका परिमाण अतिक्रम किया हो (हिरण सोवण्ण पमाण क्कमे) चादी सुवर्णका परिमाण अतिक्रम किया हो (धन धाण्ण प्पमाण कमे) धन मुद्रादि धान्य शाल्यादिका परिमाण अतिक्रम किया हो (दुर चउप्पट प्पमाणाइकमे) द्विपद मनुप्यादि चतुष्पद गवादिका परिमाण आ क्रम किया हो (कविय धानु पमाणाइकमे) घरकी सामग्रीका परिमा अतिक्रम किया हो तो (जो) जो (मे) मैने ( देवसि) दिनमे (अ यारो) अतिचार (कर) किया हुआ है ( तस्स) उस (मिन्छा मि: कड) अतिचार रूप पापका नाश हो अर्थात् वे पाप निष्फल हो ॥ भावार्थ-पचम अनुवनको इच्छाप्रमाण व्रत भी कहते हैं और च्छाका निरोध करना ही मुख्य कर्तव्य है जैसे कि-क्षेत्र, वस्तु, हिरण्य सुवर्ण, धन, धान्य, द्विपद, चतुष्पद, अन्य घरकी सामग्री जो कुछ भी हो विनापरिमाण कोई कार्य न होना चाहिये और यह प्रा एक करण ओ तीन योगसे किया जाता है । पाच ही इस व्रतके अतिचार हैं वह ये हैं. जिन पदार्थोंका परिमाण किया गया है उनका उल्लवन करना वही अति चार है, इस लिये उक्त अतिचारोको वनके पंचम अनुव्रत शुद्ध धारण करे अथ पष्टम बत विपय ॥ छटुं दिशिव्रत उर्ध्व दिशानु यथा परिमाण अधो दिशानुं यथा परिमाण तिरिय दिशानुं यथा परिमाण ए यथा परिमाण कीधुं छे ते उपरांत स. इच्छायें कायायें जइने पंच आस्रव सेववाना पञ्च- क्खाण जावजोवाय दुविह तिविहेणं न करेमि न का- रवेमि मणसा वयसा कायसा एहवा छठा दिशि व्र- तना पच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तंजहा ते आलोउं उढ दिसि प्पमाणाइक्कमे अहो दि- लि पमाणाइकमे तिरिय दिसि पमाणाइकमे खित्त बुडि सयंत्तरदाय जो मे देवसि अइयारो कउ तस्स मिछा मि दुक्कड॥ हिंदी पदार्थ-(छहु दिशित) उटा दिवा जो दिशाओका प रिमाण किया जाता है जैसे कि-(उर्व दिशानु यथा परिमाण अधो दि- शानु यथा परिमाण) उर्व ऊची दिशाका यावत् [ जितना] परिमाण किया हुआ है, नीची दिशाका यावत् परिमाण किया हुआ है (निरिय दि- शानु यथा परिमाण) तिर्यग् दिशाओंका जैसे कि-पूर्व पश्चिम दक्षिण उत्तर दिशाओंका यथा परिमाण (ए यथा परिमाण कीधु छे) यह यावत् परिमाण किया हुआ है (ते उपरान्त ) परिमाण भूमिका विना (सइच्छायें) इच्छा करके वा (कायाये) शरीर करके (जइने) जा करके (पच) पाच ( आत्रव) आलव [ कर्म आनेके मार्ग] (सेनवाना ) आसेवन करनेका (पञ्चरखाण) प्रत्यारयान (जावनीवाय) यावत् जीव पर्यन्त (दुविह) हि करण और (तिविहेण ) तीन योगसे करता हू जैसे कि न करेमि आसेवन न करू और (न कारवेमि) आसेवन न कराऊ (मणसा) म करके (वयसा) वचन करके (कायसा) काय करके (एहवा) ऐसे (उट दिशि ब्राना) पष्टम दिग्वतके (पच अइयारा) पात्र आतिचार ( जाणि- यन्वा ) जानने योग्य हैं किन्तु ( न समायरियव्वा) आचरणे योग्य नहीं हैं (तज्जहा) तद्यथा (ने आलोउ) उनकी आलोचना करना हू, जैसे कि- (उह दिसि प्पमाणाइक्कमे) ऊनी दिशाका परिमाण उलयन किया हो (अहो दिसि प्पमाणाइकमे ) नीची दिशाका परिमाण अतिक्रम किया हो (तिरिय दिसि पमाणाइनकम) तिर्यग् दिशाका परिमाग अतिक्रम किया हो (खित्त बुद्धि) क्षेत्रको वृद्धि की हो जैसे कि-कल्पना करो कि-किसी व्यक्किने चारो ओर ५०० पाचसो कोशका परिमाण किया हुआ है, फिर उसने विचारा कि पूर्व दिशामें तो विशेष कार्य रहता है अपितु दक्षिण दिशामे कुछ काम नहीं पड़ता, इस लिये परिमाणसे अधिक पूर्वमे कर लू और दक्षिण दिशामे स्वल्प कर दू इत्यादि कार्य किया हो (सयत्तरद्धाय ) सदेह होने पर फिर भी आगे ही गमण किया हो अर्थात से सो योजन तक जानेका परिमाण किया हुआ है, और मार्गमे जाते २ अनुमानसे ज्ञात किया कि, स्यात् में यथा प्रमित तो आ गया हूगा ऐसा संदेह होने पर भी आगे जाना यह नियममे दोप है । (जो मे देवास अझ्यारो कउ) जो मेरा दिन सम्बन्धि अतिचार रूप पाप हैं ( तस्स मिच्छामि दुक्कड ) वे निष्फल हो और उस अतिचार रूप पापसे मैं पीछे हटता हूँ। भावार्थ-~-पष्टम दिग्ननमे पट दिशाओका परिमाण किया जाता है जैसे कि-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर, उर्च, अधो । परिमागसे बाहिर स्थानोमें पाच आस्तव (हिंसा, असत्य, अदत्त, अब्रह्मचर्य, परिग्रह) इन- के आसेवन करनेका द्विकरण और तीन योगसे प्रत्याख्यान करे, फिर पाच ही अतिचारोको वनें, इस प्रकार पष्टम व्रतकी आलोचना करे। फिर सप्तम नतकी आलोचना करे-- अथ संप्तम व्रत विषये ॥ सातमु व्रत उवभोग परिभोगविहं पच्चक्खा- यमाणे उल्लणियाविहं दतणविहं फलविहं अभ्भंगण विहं उवट्टणविदं मजणविद वत्यविहं विलेवणविई पुप्फविहं आभरणविद धूपविहं पेजविद भक्षण- विह उदनविहं सूपविह विगयविह सागविहं मा. हुरविहं जिमणविहं पाणीविह मुखवासविहं वा हनिविहं पाहनिविद सयणविह सचित्तविहं दव्व विहं इत्यादिकन यथा परिमाण कीधुं छे ते उपरान्त उवभोग परिभोग भोगनिमित्ते भोगववाना पञ्चक्खा- ण जावजीवाय एगविहं तिविदेणं न करेमि मणसा वयता कायसा एहवा सातमा उवभोग परिभोग दु. विहे पन्नते तंज्जदा भोयणाउय कम्मउय भोयणाउ समणोवासयाण पंच अइयारा जाणियव्वा न समा. यरियव्वा तंज्जहा ते आलोउं सचित्तादारे सचित्त प- डिववाहारे अपोलि ओसहि भक्खणयाय दुप्पोलि ओसहि भक्खणयाय तुच्छोसहि भक्खणयाय जो मे देवसि अइयार कउ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥ त. त्यणं जेते कम्मउणं समोवासयाणं पनरस्त क मदाणाई जाणियव्वा न समायरियन्वा तज्जड़ा ते आलोउं इंगालकम्मे वणकम्मे साडीकम्मे भाडीक- म्मे फोडीकम्मे दंतवणिजे लक्खवणिजे रसवणिजे केसवणिजे विसवणिजे जंतपिलणिया कम्मे नि. ल्लंच्छणिया कम्मे दवग्गि दावणिया कम्मे सरदह- तलाय परिसोसणिया कम्मे असईजण पोसणिया कम्मे जो मे देवसि अइयार कउ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥ हिंदी पदार्थ-(सातमु बन) सप्तम बन (उवभोग) उपभोग-जो वस्तु एक ही बार आसेवन करनेमें आवे उसको उपयोग कहते है जैसे कि- अन्नादि तथा (परिभोगविह) परिभोग उसका नाम है जो पदार्थ पुन २ आसेवन करनेमे आवे जैसे कि-वस्त्र और आभरण प्रमुखका (पञ्चक्खाय- माणे ) प्रत्याख्यान करता हुआ निम्नलिखित वस्तुओंका प्रमाण करे * द्रव्य परिमाणमें ग्रहण करने योग्य पदार्थों का ग्रहण करना सिद्ध किया गया है, अन साप ही मनुष्य आहारका भी विवेचन हो गया है क्यों कि-श्री स्थानाग सूत्रके चतुर्थ अध्यायके चतुप उद्देशमें लिखा है कि-मणुस्साण चयिह आहारे पण्णत्ते तज्जहा असणे पाणे खाइम साइमे (इति सूत्रम्) इसका अर्थ यह है कि-मनुप्योंका चार प्रकारसे माहार प्रति पादन किया गया है-जैसे कि-भन्न १ पानी २ खादिम मिहाइ आदि ३ स्वा दिम जैसे ताम्बूलादि ४ । इस सूत्रसे सिद्ध होता है कि मनुष्य मात्रका उक्त चारों प्रकारका ही आहार है किन्तु मासमक्षण तो केवल पशु आहार ही पतलाया गया है। मासमक्षणका फल केरल नरक ही कथन किया है जैसे शि-चउहि ठाणेहिं जीवाणे रतित्तायाम्म पगरेति तज्जहा महारभयाते महापरि- गहताते पदिय पण कुणिममाण ॥ अर्थ -चार कारणोंस जीव नाकायुको पौध लेते हैं जैसे कि-महा हिं सासे १ महा परिप्रहसे २ पचेंद्रिय श्धसे ३ और मास भक्षणसे ४ । भोर माय ७१ जैसेकि-(उल्लणियाविह) स्नानके पीछे निम वस्त्रसे शरीर पूछा जाता है उस वस्त्रकी विधिका परिमाण ( दतणविह ) दातनोंका परिमाण, विधि श- ब्दका अर्थ नाना प्रकारका जानना चाहिये जैसेकि दातनोंके लिये कति- ककी गति फेयल स्वर्गकी होती है इस लिये मांसाहार मनुष्य मात्रके रिये अमक्ष्य है, अत' साथ ही मासके सहचारिणी मदिगपान मी अमश्य है क्यों कि-सूचों में इसके भनेक दोष वर्णन किये गए है तथा पान तो करना दूर रहा किन्तु इसके विक्यिका भी रस बननमें निषेध किया गया है गौर न रकोंमें मासमक्षण और सुरापान करनेवालोंकी गति इस प्रकारसे वर्णन की गई है-जैसे कि- तुह पियाइ मसाइ, खंडाइ सोल्लगाणिय । खाविओमिस मसाई, अग्गिवन्नाइणेगमो ॥ ७० ॥ तुहपिया सुरासीह, मेरओय महणिय । पाइओमिनलनीओ, वसाओ रुहिराणिय ॥ ७१ ॥ उत्तराप्ययन सून अ० १९ ॥ भावार्थ-मृगापुनजी अपने मातापिताजीको कहते हैं कि-ई माता और पिताजी ! मुझको नाकोंमें परमाधर्मियों ने इस प्रकारसे कहा कि-भो नारक ! तुमको मासभक्षण अतिप्रिय था, तू मासके खड और सोले (पका कर) करके खाता था, अब हम तुमको तुम्हारा मास अग्निके समान उष्ण फरके भक्षण कराते हैं । उहोंने फिर उसी प्रकार मेरे साथ वर्ताव किया जैसे कि वे कहते थे, किन्तु एक बार नहीं अपितु अनेकश बार उन्होंने मेरे साप वध किया ॥७०॥ और फिर कहा कि-तुमको सुरा, सिंधु, मेरक, मनि इत्यादि भेदोंकी मदिरा भी प्रिय थी इस लिय अप तुमको उसके स्थान पर चरपी और रुधिर उष्ण करके पीलाया जाता है अपितु उन्होंने जैने कहा पाबमे ही किया ॥७१॥ इन पाठोंसे सिद्ध हुभा कि-मश्याभक्ष्य और पेशापेय आदिका विधार फाके मदिरा तया मामका परित्याग करना चाहिये क्योंकि-मास और मदिरा यह दोनों पदार्थ श्रावके लिये अमक्ष्य है अपितु जो भक्ष्य पदार्थ है उनका प्रमाण अर कहा गया है ।

७२ पय वृक्षोका परिमाण करना इसी प्रकार आगे भी जान लेना (फलविह फल विधिका परिमाण (अम्भगणविह ) आभगण विधिका परिमाण जर तैलादिका (उवणविह) उवटनेका परिमाण (मजणविह) मञ्जन [स्तान] विधिका परिमाण वा पानीका परिमाण (वत्थविह) वस्त्र विधि का परिमाण (विलेवणविह) चदनादि विलेपन विधिका परिमाण (पुप्फ विह) पुप्प विचिका परमाण (आभरणविह ) आभूपोंका परिभाण (धूप विह ) धूप विधिका परिमाण (पेज विह) पीनेवाली वस्तुओंका परिमाण (भरखणविह) खाद्यमादि वस्तुओंका परिमाण (उदन विह ) शाल्यादिका परिमाण (सूपविह) मूगी प्रमुस दालिका परिमाण (विगयविह) विगय [घृत, तैल, दूध, दधि, गुड़, नवनीत (माखन) मधु आदि) का परिमाण (सागविह) शाकादि विधिका परिमाण (माहुरविह) मायुर विधिका परि- माण जैसे कि-आम्रादि फल (जिमणविह) अमुक पदार्थका आहार क- रूगा तथा तिक्त पदार्थीका परिमाण ( पाणीनिह) जल विधिका परिमाण जैसे कि अमुक कूपादिका जल संवन करूगा (मुखवासविह ) लवग सु- पारे प्रमुसका परिमाण (वाहनिविह) रथ, रेलगाडी, अश्व, हस्ती, यक्का, इत्यादि वाहनोका परिमाण ( पाहनिविह) पाटोंकी रक्षा अर्थे जती इत्यादि विधिका परिमाण (सयणविह) शय्या पर्यकादिका परिमाण (सचित्तविह) सचित्त वस्तुओका परिमाण जैसेकि-पाच स्थावरोंका सेवनार्थे परिमाण करना (दव्वविह) द्रव्य विधिका परिमाण जैसे कि-आज दिन कतिपय द्रव्य अगीकार करूगा, कल्पना करो किसी व्यक्तिने ५ द्रव्योके विना और सर्व पदार्थोंका नियम कर दिया है तो फिर पाच द्रव्य यह इस प्र. कारसे ग्रहण करता है, कि-एक द्रव्य अन्न, द्वितीय द्रव्य जल, तृतीय द्रव्य सूप, चतुर्थ द्रव्य शाक, पचम द्रव्य घृत, (इत्यादिकनु यथा परिमाण कीधु छे) इत्यादि पदार्थों का जैसा परिमाण किया हुआ है (ते उपरान्त) उनके विना (उपभोग) जो एक वार आसेवन करने में आवे तथा (परिभोग) नो वस्तु पुन २ आसेवन करनेमे आवे (भोग निमित्ते) भोगनेके वास्ते (भोगाना पञ्चासाण) सानेका प्रत्याख्यान (नावजीवाय) यात्रजीव प- पर्यन (एगविह) एक करण (तिपिहेग) नीनो योगोंस मे कि-(नक- मि) न करु (मणसा) मन करके (स्यता) वचन करके (कायमा) काय करके (एहवा सातमा उपभोग परिभोग) ऐसे सप्तम उपभोग परिभोग (दुविहे) वि प्रकारसे (पण्णत्ते) प्रतिपादन किया गया है (तनहा) त द्यया-जैसे कि-(भायणाय) एक भोजन सम्बन्धि (मायणाउय समणो- वारयाण) भोजन वन सम्बन्धि अमणोपासकाको (पर) पान (अइयारा) अनिचार ( माणिया) मानने योग्य तो हैं किन्तु ( न समायरिया) ग्रहण करने योग्य नहीं हैं (तमहा) तद्यथा (ते आलोऊ) उनकी आगे चना करता हू (सनित्ताहारे) सचित वरतुभोका परियाग होनेपर सनित पातुओका आहार किया हो (सचित पडिबराहारे) सनित्त प्रतिबद्ध पढा योका आहार किया हो जेसे, मृद तत्काल वृक्षोंमे उतार कर सभा करना तथा वनस्पतिक पत्रीपरि कदोई [हलाई ] को हहोपरि वस्तुओका साना (अपालि ओमहि भारपणया) अपसोपधिका आहारकिया हो या नका- लकी अचित्त हुई वस्तुका आहार किया हो (टुप्पोले ओसहि भरवणया) दु पस्योपधिका आहार किया हो जैसेकि होरा प्रमुख, (तुम्छोसहि भारत- गया) जो पदार्थ खाने की अपेक्षा गेरनेमे विशेष आवे उनका आहार किया हो मेसे सपाटक, इक्षु-खड इत्यादि तथा तुच्छऔषधि आहार उसका नाम भी है जिसके अतीव भाणसे भी तृप्ति न होवे असें खममासादि (नो मे) जो मैं ने (देवसि ) दिन सम्बन्धि (अइयारो) अनिवार (क) किए हुए हैं ( तस्स ) उसका (मिच्छामि दुक्ड) जो अतिचाररूपं पाप हैं वह फल हो। (तयण ने ते) उनमेसे जो (कम्मउग) को सम्बन्धि (सम- जोवासयाण) श्रमणोपासकोको दोप लगते हैं वेतन प्रकार से है (पनर- रस कम्मादाणाइ) पचदश कर्मादान जो कर्म आनेके पंचदश मार्ग है वही अनिवार है किन्तु श्रापकोंको ( जागियना) जानने योग्य तो है परतु १० ७४ (न समायरियल्या) आचरणे योग्य नहीं हैं जैसेकि-(तंजहा) तद्यथा (ते आलोउ) उनकी आलोचना करता हूं-(इगालफम्मे) अगार कर्म को- यला प्रमुखका व्यापार ] अग्नि सम्बन्धि व्यापार किया हो (वणकामे ) बन छेदन करना अर्थात् वन कटवाना (साडीकम्मे ) शकटादि वनवाकर विक्रिय किए हो (भाडिकम्मे) शकटादि वा ऊट, अश्व, वृषभ, खर, इत्यादि पशु भाडे पर दिए हो ( फोडीकम्मे ) पृथिवीका स्फोटन कर्म वा पापाणा- दिका स्फोटन कर्म किया हो (ढतवणिजे ) दाँतोका व्यापार किया हो जैसेकि-हस्तीके दॉत, कस्तूरी, मृगचर्म प्रमुख. (लक्खवणिजे ) लाखका वणन किया हो (रसवणिजे ) रसोका वणन किया हो जैसे-दुग्ध, तैलादि वा मदिरादि, (केसवणिजे) द्विपद चतुष्पद जीवोका व्यापार किया हो (विसवणिजे) विपका व्यापार किया हो (जतपिलणिया कम्मे ) यत्र- पीडन कर्म किया हो जैसे कि-वराट, कोल्हू उखल, मूसलादि कर्म (निनु उणिया कम्मे ) निर्लागण कर्म जैसे वृषभादिको नपुसक करना ( वांग दापणिया कम्मे ) वनको अग्नि लगाई हो तथा दावाग्निका उपदेश किया हो (सर) तडाग (दह) द्रह, कुड, (तलाय) तडाग चतुष्कोण प्रमुखके जलको (परिसोसणिया कम्मे) परिशोपण किया हो अर्थात् सुकाया हो (अप्सइ, जग पोसणिया कम्मे) अमती जनोंको पोषणा की हो जैसे-आहेटक काँके वास्ते श्वानादि वा श्येनादि [वान] वा मार्मारादि पोषण किए हो (जो मे देवसि अइयारो कउ) जो मेरा दिवस सम्बन्धि अतिचार किया हुआ है (तस्स मिच्छा मि दुक्कड) उस अतिचार रूप पापका फल निष्फल हो । भावार्थ-सप्तम व्रत उपभोग परिभोग है, जिसका अर्थ है कि जो पदार्थ एक वार ग्रहण करनेमे आवें तथा बारम्बार ग्रहण करनेमें आवे उनकों विना परिमाण न आसेवन करे, जेसेकि-स्नानादि और पचदश कार्य निनसे अधिक कमोंका बन्ध होता है, उनका सर्वथा ही परित्याग करे। कदाचित .

कर्मोदयसे *रसवाणिजादि कर्म करने पड जाये तो अयत्नसे काम कदापि न करे, क्योकि अयत्नसे अनेक जीवोकी बात होना सभव है, अत विना यत्न कोई भी किया न करे । जिन लोगोंको स्नानादि विषय शका रहा क- रती है उनको योग्य है सप्तम व्रतको पठन करनेका अभ्यास करे, फिर इस व्रतके पाचो ही अनिचारोंको वर्नके उक्त व्रतको शुद्धतापूर्वक पालन करे ॥ अथ अष्टम व्रत विपय ।। आठमुं अनर्थदंड विरमण व्रत ते चउविहे अणत्यादडे पण्णते तंजहा अवज्झाणायरिय पमाया यरिय दिसप्पयाणे पावकम्मोवएसे एहवा अनर्थदंड सेववाना पञ्चक्खाण जावजीवाय दुविदं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणप्ता वयता कायसा एहवा आठमा अनर्थदड विरमण व्रतना पंच अइयारा जा- णियव्वा न समायरियव्वा तंजदा ते आलोऊ कंदप्पे कुछइए मोहरिए संजुत्ताहिगरणे उपभोग परिभोग अइरने जो मे देवसि अइयारो कउ तस्स मिच्छा मि दुकाई ॥ हिंदी पदार्थ-(आठमु) अष्टम (अनर्थ दड) अनर्यदड-विना ही कारण जीवोकी हिंमा करना वा अन्य आत्माओंको दडित करना (विर मण अत) इससे निति भूत जो आठवा वा है, (ते) वह (चउविहे) चतुर्विधसे अगत्यादडे) अनर्थ दड (पण्णत्ते) प्रतिपादन किया है (तनहा) * किन्तु मदिरादि पदार्थाका व्यापार तो कभी मी न करे अपितु इनका सधा दी त्याग से॥

-- । तद्यथा (अवज्आणायरिय) अपध्यान करना जैसेकि अन्य आत्माओंके हानि- कारक विचार करने (पमायायरिय) प्रमादाचरण करना अर्थान् धार्मिक कायोंको परित्याग करके अन्य कार्योंमे परिश्रम करते रहना तेया धृतादि- के बरतन अयत्नसे रखना (हिंसप्पयाणे) हिंसाकारी वस्तु ओंका दान करना । जमे शत्रदान इत्यादि (पावकम्मोवएमे) अन्य आत्माओंको विना ही प्रयोजन पापकर्मों का उपदेश करना नित के द्वारा वह पापकर्ममे लग जा. (एहवा ) ऐसे ( अमर्यदड ) अनर्थडके (सेववाना) आसेवन करनेका । (पञ्चक्खाण ) प्रत्याख्यान (जावजीवाय ) यावन् जीव पर्यन (दुनिह) द्विकरण और (निविहे ग ) नीन योगोमे (न करेमि) स्वय अनर्थदडको सेवन न करू (न कारवेमि) नाही अन्य जीवोसे अनर्थदड सेवन कराऊ (मगसा) मनसे (वयसा) पचनस (कायसा) कायसे (एहवा) ऐसे ( आठवा) अष्टम (अनर्यदड विरमग बनना ) अनर्थदंड विरमण वनके (पत्र ) पान ( अइयारा) अनिचार । जाणियचा ) जानने योग्य तो है किन्तु (न समायरियव्वा) आचरणे योग्य नहीं है, (तनहा) तद्यया (ते) उनकी (आलोउ) आलोचना करता हू (कदप्पे) कामको जागृत करनेवाली कथाये को हो, (कुकुइए ) कुचेष्टा को हो जैसेकि-भाडको ' तरह विकृति भाव किया हो (मोहरिए) विचाररहित होकर वार्तालाप किया हो, तथा मुखारिवत् वर्ताव किया हो (सजुताहिगरणे) अधिकर- णका सयोग किया हो अर्थात् विना परिमाण शस्त्रादिका सग्रह किया हो ( उवभाग परिभौग अइरते ) उपभोग वस्तु भो वा परिभोग वस्तुओमे अति मून्छित हो गया हों, तथा परिमा गसे अधिक सग्रह किया हो तब पाठ (उपभोग परिभोग अइरते) ऐसे पढ़ा जाता है (जो मे देवसि अइयारो कउ) जो मेने दिनमें अतिचार किए हुए है (तस्स मिच्छा मि दुकड) उन अतिचाररूप पापोंका फल निष्फल हो । , - - भावार्थ-आठवें अनर्थदंड विरमण व्रतमें विना प्रयोजन काम कर- नेका परित्याग जिसके करनेसे कर्मोंका महा अब न हो और कार्य- सिद्धि कुछ भी न हो, जैसे अपध्यान करना, अथवा धृतादिक भाजनोंकी पूरो रक्षा न करनेसे पिपीलिकादि जोबोकी हिंसा हो जाती है और इस तके भी पान ही अतिनार है जेसेफि-कार्पको वार्ता करनी १ कुचेष्टा करना २ विचारमे शून्य होकर भापण करना ३ अधिकरण ( शस्त्रों)का सग्रह करना ४ उपभोग परिभोग पदार्य प्रमागसे अधिक सेवन करने तथा प्रमाण युक्तम ही अति मच्छिन होना ५ इन पाचो ही अनिचारोंका परि- त्याग करके अष्टम व्रत शुद्ध पाठन करे, अनर्थइड कदाचित् भी सेवन न करे॥ अथ नवम व्रत विषय ॥ नवम् सामायिक व्रत सावज्जजोगर्नु वेरमणं जाव नियमं पज्जुवासामि दुविह तिविहेण न करेमि न कारवेमि मणता वयसा कायसा एहवा सदहणा परूपणा करिये तिवारे फरसनाये करो शुद्ध एडवा नवमा सामायिक व्रतना पंच अइयारा जाणियवान समायरियव्या तजहा ते आलोउं मणदुप्पणिदाणे वपदुप्पणिहाणे कायदुप्पणिहाणे सामाइयस्त (सइ- विहुणे) अकरणियाए सामाइयस्त अणवुठियस्त करणियाए जो मे देवसि अइयारो कउ तस्त मिच्छा मि दुकड ।। हिंदी पढार्थ-नवमु) नवमा (सामायिक बत) समतारूप भाव (सार्वज्जनोगनु) पापयुक्त योगोसे (वेरमण) निवृत्ति करना (नाव, यावत् काल पर्यन्त (नियम) सामायिकका नियम हे तावत्काल पर्यन्त (पज्जुवासामि ) पर्युपासना करता हू अर्थात् सामायिककेकालको सेवन करता हू (दुविह) द्विकरण (तिविहेण) तीन योगोसे जैसेकि-( न करे मि) सावध योगोंको सेवन न करू (न कारवेमि) नाही आसेवन कराउ (मणसा) मन करके (वयसा) वचन करके (कायसा) काय करके (एहवा) इस प्रकारके (सद्दहगा) सामायिककी श्रद्धा [ रुचि] (परूपणा) विवे- चना ( करिये तिवारे फरसनायें करी शुद्ध) जब करी जाये अर्थात् सामा- यिक स्पर्श की जाये तत्र ही शुद्ध होती है (एहवा) ऐसे (नवमा) नवमे (सामायिक व्रतना) सामायिक बनके ( पच) पान (अइयारा) अतिचार (जाणियव्वा) जानने योग्य तो है किन्तु (नसमायरिया) आचरणे योग्य नहीं हैं (तज्जहा) तद्यथा (ते) उनकी (आलोउ) आलोचना करता हू (मणदुष्पणिहाणे) मन दुष्ट वाया हो (वयदुप्पणिहाणे) वचन दुष्ट उचारण किया हो (कायदुप्पणिहाणे) कायका योग दुष्ट धारण किया हो (सामाझ्यस्म अकरणियाए) शक्ति होने पर भी सामायिक न करी हो, तथा, सामायिक करके सामायिकके कालको विस्मृत कर दिया हो फिर (सामाइयस्स) सामायिकको (अणवुष्ठियरस करणियाए) विना काल पार लिए हो (जो मे) जो मैंने (देवसि) दिवस सम्बन्धि (अइयारो कउ) अतिचार किए हुए हैं (तस्स मिच्छा मि दुक्कड) उन अतिचार रूप पापों- का फल निष्फल हो। भावार्थ-नवमे सामायिक व्रतको हिकरण तीन योगोसे धारण करके पाचो ही अतिचारोको छोडे। सम, आय, इक, इनकी सधि करनेसे सामा- यिक शब्द सिद्ध होता है, जिसका अर्थ ही यह है, कि जिसके करनेसे शान्तिका लाभ होवे उसीका ही नाम सामायिक बन है अपितु सावध योगोंका परित्याग कर फिर उस कालको शुभ कियामे ही व्यतीत करे ।। [ 4 - अथ दशम व्रत विषय ॥ दश देसावगासिक व्रत दिन प्रते प्रभात थकी प्रारंभीने पूर्वादिक छ दिशे जेटलो भूमिका मोकली राखी छे ते उपरांत सइच्छाये कायायें जइने पांच आस्रव सेववाना पञ्चक्खाण जाव अहोरनं दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा तथा जेटली भूमिका मोकली राखो छे ते माहिज जे द्रव्यादिकनी मर्यादा कीघो छे ते भोगववी ते उप रात उवभोग परिभोग भोग निमित्ते भोगववाना पञ्चक्खाण जाव अहोर एगविह तिविहेणं न करेमि मणता वयता कायसा एहवा दशवा देशावकाशिक व्रतना पंच अइयारा जाणियया न समायरियव्वा तज्जहा ते आलोउ आणवणप्पओगे, पेसवणप्पओगे, यर्तमान कालमें सवा करनेकी प्रया निमलिखितानुसार है- द्रव्य थकी पान आलव सेपनेका पचरखाण, क्षेत्र थकी लोक प्रमाण तथा यावन्मात्र प्रमाण करना हो । काल थकी यावत्काल पर्यन्त बैठा रह तथा मुहतादि प्रमाण पर्यन्त । भाव थकी उपयोग सहित । गुण थकी निराके हेत । दुविह लिविहेण न करेमि न कारवेमि मणसा, वयता, कायसा, तस्स भत्ते पडिकमामि निदामि गरिहामि अपाण वो सिरामि ॥१॥ फिर पाच नमोकार मत्रको पदकर इसे पार लेते हैं ।

८० सदाणुवाइ, रूवाणुवाइ, वदिया पुग्गल पक्खेवे जो मे देवसि अइयारो कउ तस्स मिच्छा मि दुकर्ड ॥ हिंदी पदार्थ-(दशमु) दशा (देसावगासिक वन) देशावका शिक घन जिसका अर्थ है कि जो प्रथम प्रतोंमें बहुतसे पदार्य अतीव वि स्तारपूर्वक रखे हुए हैं उनको दिन प्रतिदिन सक्षिप्त करते रहना उसीका नाम देशावकाशिक व्रत है जैसेकि-(दिन प्रते प्रभात थकी प्रारमीने पूर्वादिक छ दिशे जेटली भूमिका मोकली राखी छे) दिन प्रति प्रात पालसे भारभ करके पूर्वादि पट् दिशाओम यावत् परिमाण गमन करना रक्या हुआ है (ते उपरान्त) उसके विना (सइच्छायें) स्त्र इच्छा करके वा (कायाये) काय करके (जइने) जाकर (पाच आस्तव सेववाना पञ्चरखाण) पाच आस्रव [हिंसा, असत्य, चौर्य कर्म, मैथुन, परिग्रह, इनके ] आसेवन करनेका प्रत्याख्यान (जाव) यावत (अहोरत) दिन और रात्रि पर्यन्त (दुविह) द्विकरण और (तिविहेग) तीन योगोसे जैसकि-(न करेमि ) स्वय आसेवन न करू (न कारवेमि) अन्य आत्माओसे आतेवन न कराज (मणसा) मन करके : (वयसा) वचन करके (कायसा) काया करके (सथा जेटली भूमिका मोकली राखी तथा यावत् भूमिका परिमाण युक्त है (ते माहीजजे द्रव्या- दिकनी मर्यादा कीधी छे) उसमें जो द्रव्यादिका परिमाण किया हुआ हे (ते भोगवधी ) वही ग्रहण करने (ते उपरान्त) उनके विना (उवभोग) जो एक बार आसेवन करनेमें आवे वा (परिभोग) बारम्बार ग्रहण करनेमे आवे ( भोग निमित्ते) भोगनेके वास्ते (भोगववाना ) भोगनेका--आसेवन परनेका (पञ्चक्खाण) प्रत्याख्यान (जाब ) यावत् (अहोरत्त) दिन सनि । पर्यन्त (एगविह ) एक करण और (तिविहेग) तीन योगासे जैसे कि- .(न करेमि । न करू (मणसा) मन करके (वयसा) वचन करके (कायसा) काय करके (एहवा) ऐमे (दशमा देशावकाशिक व्रतना) दश देशार काशिक व्रतके ( पच) पाच ( अइयारा ) अतिचार (जाणियन्वा) जानने -- - ८१ योग्य तो है, किन्तु (न समायरियन्वा) आचरणे योग्य नहीं है (तजहा) तद्यथा (ते आलोउ) उनकी आलोचना करता हू (आण- वणप्पओगे) परिमाणयुक्त भूमि हे उससे परेकी भूमिकासे आज्ञा देकर वस्तु मगवाई हो, (पेसवणप्पओगे) इसी प्रकार परिमाणसे बाह्य भूमिका- मे वस्तु भेनी हो अर्थात् परिमाणसे नाह्य क्रय विक्रय करना (सद्दाणुवाइ) शब्दानुपानि अर्थात् सीमसे बाहिरके पुरुषोंको शब्द करके अपना ज्ञान करवा दिया हो इसी प्रकार (रूवाणुवाइ ) अपना रूप दिखलाके काम सिद्ध किया हो (वहिया पुगल परखेवे) किसी वस्तुका पुट्टल प्रक्षेप क- रके बतलाया हो वा परिमागसे वाहिर पुरुपोंको पुद्गलादि द्वारा बुलाया हो (जो मे देवसि अइयारो कउ) जो मेरा दिन सम्बन्धि अतिनार किया हुआ है (तस्स मिच्छामि दुक्कड) उन अतिचार रूप पापोंका फल निष्फल हो। भावार्थ-दशवें देशावकाशिक व्रतमे प्रतिदिन भूमिका वा द्रव्यों का प्रमाग करे, फिर अतिचारोसे रहित होकर दश को शुद्ध पालन करे ओर चतुर्दश नियम भो इस बनके हो अतरगत रहने हैं । परिमाण करनेसे महा काँका आगमन बढ हो जाता है किन्तु स्वरप कर्म रह जाते हैं आपतु इस व्रतमे उपयोग विशेप करना पड़ना है, फिर निस भागसे यह जन ग्रहण किया हो उसी प्रकार इसको पूर्ण करे । अथ एकादशम व्रत विषय ॥ इग्यारमु पडिपुण्ण पोपध व्रत असणं पा खाइमं साइम चार आहारतुं पञ्चक्खाण अवभ वननु पञ्चक्खाण अमुक मणि सुवर्ण माला व निलेवणर्नु पञ्चक्खाण सत्य मूसलादिक साल जात अहोरत्त पज्जुवासामि - तिविदेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा एहवो सदहणा परूपणा करीये ते वारें फरसनाये करो शुद्ध एहवा इग्यारमा पडिपुण्णं पोषध व्रतना पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तंज्जहा ते आलोउं अप्पडिलेदिय दुप्पडिलेहिय सेज्जा संधारए अप्पमज्झिए दुप्पमज्झिए सेज्जा संधारए अप्पडिले. दिय दुप्पडिलेहिय उच्चार पासवण भूमि अप्पम- ज्झिए दुप्पमज्झिए उच्चार पासवण भूमि पोसहस्त सम्म अणणुपालणियाय जो मे देवति अइयारो कउ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं । हिंदी पदार्थ-(इग्यारमु ) एकादशवा ( पडिपुण्ण) प्रतिपूर्ण अष्ट याम पर्यन (पोपत्र ) पोपध (व्रत ) उसमे (असम) अन्नादि (पाणं) जलादि (खाइम) साद्यम पकानादि (साइम ) स्वाद्यम लव- गादि (चार आहारनु पञ्चक्खाण) उक्त चतुर् आहारोका प्रत्याख्यान (अबभ सेवननु पञ्चक्खाण ) अब्रह्मचर्य आसेतनका प्रत्याख्यान अर्थात् ब्रह्मचर्य धारण करना (अमुक) गो आभूपण सुम्वपूर्वक उतारे नहीं जाते जैसेकि-कों के आभपण सो उनके विना पोषध ब्रतमे (मणि) हीरा वा चद्रकातादि मणि (सुवर्ण) वर्णके आभूषण रक्सनेका प्रत्या- ख्यान तथा (माला) पुष्पमाला (वन्नग) सुगधयुक्त चूर्णादि और (वि- लेवणर्नु पञ्चक्खाण) विलेपन चदन कर्पूर जलादिसे समर्पण करके मस्त- फादिमे लगानेका प्रत्याख्यान, फिर (सत्य) शस्त्र (मूसलादिक) मूमलादि वा काष्टादि प्रमुख (सावन जोगनु पञ्चरखाण) सावध [पाप] रूप योगोंका प्रत्याख्यान (नाव) यावत् (अहोरत ) दिन और रात्रि पर्यन्त (पज्जुवासामि) पर्युपासना करता ह (दुविह) द्विकरण और (निविहेण) तीन योगोंसे जैसेकि-(न करोमि) न करू (न कारवमि) अन्य आ- त्माओंसे न कराऊ (मणसा) मन करके (वयसा) वचन करके (का- यसा) काय करके (एहवी) इस प्रकार (सदहणा) पोपध व्रत करनेकी श्रद्धा करना और (परूपणा करीये) प्रतिपादन करना (ते वारें फरसनाये करी शुद्ध) निस समय पोषध बन ग्रहण करना तव शुद्धिपूर्वक (एहवा) ऐसे (इग्यारमा) एकादशवा (पडिपुण्ण ) प्रतिपूर्ण अष्ट याम पर्यन्त (पी पध व्रतना) पोपध व्रतके (पन) पान (अइयारा) अतिचार (जाणि- यवा) जानने योग्य तो हैं किन्तु (न समायरियव्वा) आचरणे योग्य नहीं हैं (तनहा) तद्यथा (ते आलोउ) उनकी आलोचना करता हू (अप्पडि- लेहिय दुप्पडिलेहिय सेना सयारए) अप्रतिरेखित वा दु प्रतिलखित शय्या सस्तारक अर्थात् जिस स्थानमें पोषध व्रत धारण किया है वही शय्या और तृणादिका आमन किया है सस्तारक उनोको प्रयम तो देखा ही नहीं यदि देखा है तो सम्या प्रकारसे नहीं इसी प्रकार आगे भी जानना सेकि-(अप्पमग्गिए दुप्पमझिए सेज्जा सथारए ) शय्या सस्तारकको अप्रमानित किया हो वा दु प्रमानित किया हो, प्रथम तो शय्या सस्तारक प्रमानित किया ही नहीं यदि किया है तो दुष्ट प्रकारमे इसी प्रकार (अप्पडिलहिय दुप्पडिलहिय उच्चार पासवण भूमि) प्रथम तो प्रतिलेख नता नहीं की जैसेकि-उच्चार (पूरीप) विटाकी वा (पासवण) [प्रस्त्रवण] मूत्रकी (वण्ण) मलादिककी भूमि फिर (अप्पमन्मिए दुप्पमझिए उच्चार पासवण भूमि) विष्टा और मूत्रकी भूमि प्रमार्जन नहीं की वा दुष्ट प्रकारसे प्रमार्जन की है (पोसहस्स) पोपचको ( सम्म ) सम्यग् प्रकारसे (अण- गुपाल्णयाय) पालन न किया हो जैमेकि-पोपपोपवाममे भोजनकी चिंता वा अन्य प्रकारसे चिंता करनी (जो मे देवसि अइयारो कउ) जो मैंने दिवस सम्बन्धि अतिचार किया हुआ है (म्स मिच्छामि दुकड) उन अतिचारो- का पाररूप फल निष्फल हो ॥

४ भावार्थ-एकादश पोपधोपवास व्रतमे चतुर् आहारका प्रत्याख्यान करके फिर ब्रह्मचर्यको धारण करे। फिर शरीरके शृगारका भी परि- त्याग करे, और शस्त्रादिको भी पास न रक्खे, अष्ट प्रहर पर्यन्त द्विकरण तीन योगोंसे सावध कर्मका त्याग करके धर्म व्यानमें समय व्यतीत करे, और पाचो ही अतिचारोको दूर करके उक्त व्रतको सम्यग् पालन करे ।। अथ द्वादश व्रत विषय ॥ वारमु अतिसिविभाग व्रत समणे निग्गंथे फासुयं एसणिज्नेणं असण, पाण, खाइम, साइमेणं, वस्थ, पडिग्गद, कंबल, पायपुच्छणेणं, पाडिदारिय, पीढ, फलग, सेज्जा संथारएणं ओसह भेसज्जेणं पडि- लामेमाणे विहरामि एहवी सदहणा परूपणा फरस- नायें करीशुद्ध एहवा बारमा अतिथिसंविभाग व्रतना पच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तज्जहा ते आलोउं सचिन निक्खेवणिया सचित्त पिहणिया कालाइकम्मे परोवएसे मच्छरियाए जो मे देवसि अइयारो कओ तस्त मिच्छा मि दुक्कडं ।। हिंदी पदार्थ-(बारमु) द्वादशवा (अतिथि) अतिथि अर्थात् न तिथि अतिथि जिसके आनेकी तिथि नियत न हो, उसका ही नाम अ- निधि है अर्थात् साधु है (सविभाग व्रत) उसके साथ अपने आहारमेसे सविभाग करना सोई अतिथि सविभाग प्रत है (समणे निगथे) श्रमण निमयको (फासय) प्राशूक अपित्त (एसणिज्नेण) एपणीय उद्गमादि टोपोस रहित (असम) अन्न (पाण) पानी (खाइम) खाद्यम् पकानादि (साइमेण) खाद्यम् सुपारी आदि तथा (वत्थ) वस्त्र (पडिग्गह) पात्र (कबल) कवल [लोई प्रमुख ] ( पाय पुच्छणेण) पादपोंटन अर्थात् पादोंकी रजादिके दूर करनेवाला वस्त्रखड (पाडिहारिय) जो वस्तु देने योग्य होनी है अ- र्थात् निसको विहरके साधु फिर दे सक्ता हो, जैसेकि-(पीढ) चौकी (फलग ) फलंग [तखूनपोसादि] (सेना) शय्या (सधारए) तृणादि- का सस्तारक (ओसह ) औषध (भेसज्जेग) बहुतसी औषधियोंके सयो- गसे जो वस्तु निप्पन्न हुई है, उसको भेषज कहते हैं (पडिलामेमाणे) देता हुआ (विहरामि) पिचरता है वा विचरूगा ( एहवी सद्दहणा) इस प्रका- रसे श्रद्वान वा (परूपणा ) उपरेश करना ( फरसनाये करी शुद्ध) वा स्पर्श करनेसे जो शुद्ध होता है (एहवा) ऐसे (बारमा) हादशा ( अतिथिसविभाग ) अतियितविभाग (नतना) व्रतके (पच ) पाच (अइयारा ) अतिचार है, जो (जाणियव्वा ) जानने योग्य तो हैं किन्तु ( न समायरियन्वा ) आवरणे योग्य नहीं है ( तज्जहा ) तद्यथा (ते आलोऊ) उनकी आलोचना करता हूँ (सचित्त निरखेवणिया) न देनेकी बुद्धिसे अचित्त निर्दोष वस्तुको सनित्त वस्तु पर रख दिया हो, जैसे दुग्धको सचित्त जलोपरि रख देना (सचित्त पिहणिया) इसी प्रकार अचित्त निर्दोष वस्तुपर सचित्त वस्तु रग्व दी हो, जसे दुग्यो- परि मचित्त नल रख देना (कालाइकम्मे ) जिन पदायीका समय अनिक्रम हो गया है मुनियोको उनके देनेकी विज्ञप्ति की हो, तथा अकारमे निस समय मुनि मिक्षाको नहीं जा सकने उस कालमे आहारके लिए प्रार्थना करनी (परोपएसे) न देनेकी बुद्धिसे अपनी वस्तु अन्यकी कह दी हो, तथा अपने हाथोंसे दान न देकर अन्यको उपदेश करना कि-स्वामीनी को तू ही अन्न पानी दे दे क्योंकि दान देनेमे ही तात्पर्य है मेरे तेरेसे क्या (मच्छरियार) मत्मरता [इU ] मे दान दिया हो, जैसेकि-अमुक पुरुष दानसे प्रसिद्ध हो रहा है, मैं भी वैना हो जाऊ यो (जो में देवसि अयारो क3) जो मैंने दिनमे अतिचार किए हैं (तस्म मिच्छा मि दुई) उनसे पीछे हटना हू, दुरत मरे अकरणीय है ।।

भावार्थ-द्वादशवें व्रतमें यह अधिकार है, कि-श्रावक साधु निदपि अन्नपानी देवे और जो उन्होंके लेनेयोग्य पदार्थ है, वे भी निदों ही दिलवावें। फिर पानों ही अतिचारोंको वनके उक्त व्रतको शुद्धतापूर्व धारण करे ॥ फिर सलेखनाका पाठ पठन करे। अथ संलेखना विषय ॥ अपच्छिम मारणंतिय सलेदणा झूसणा आ राहणा पोषधशाला पूंजी पूंजीने उच्चार पासवण भूमिका पडिलेही पडिलेहीने गमणागमणे पडि कमि पडिकमिने दर्भादिक संथारो संघरि संथरिने दर्भादिक संथारो दुरूहि दुरूहिने पूर्व तथा उत्तर दिशि पल्यंकादिक आसने वेसी वेसीने करयल सं- परिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजली चिकटु एवं वयासी नमोत्युणं अरिहंताणं भगवंताणं जावसप- ताणं एम अनंता सिद्धजीने नमस्कार करोने जय. वंता वर्तमान तीर्थकरने नमस्कार करीने पोताना धम्माचार्यने नमस्कार करीने साधु प्रमुख चारे तीर्थ खमाचीने सर्व जीव राशि खमावाने पूर्वे जे व्रत आदरचा छे तेना जे अतिचार दोप लाग्या होए ते सर्वने अलोइ पडिकमी निंदा निशल्य थईने सवं पाणाइवायं पञ्चक्रवामि सब मुसावायं पञ्चक्खामि सव्वं अदिन्नादाणं पञ्चक्खामि सव्वं मेहुणं पञ्चक्खा- मि सव्वं परिग्गहं पञ्चक्खामि सव्वं कोह माण जाव मिच्छा देसण सल्ल अकरणिज्जंजोगं पञ्जक्खामि जा. वजीवाय तिविहं तिविहेणं न करोमि न कारवेमि कर- तंपि नाणुजाणामि मणसा वयसा कायसा एम अठारे पापस्थानक पञ्चक्खीने सव्वं असण पाणं खाइमं साइमं च विहपि आहारं पज्ञक्खामि जाव जीवाय एम चारे आहार पञ्चक्खीने जंपियं इम सरीरं इठं कंत्तं पियं मणुन्न मणामं घिजं विसालियं समयं अणुमयं वहुमय भड करंड समाणं रयण क- रंडगभूय माणं सियं माणं उण्डं माण खुदा माणं पिवासा माणं वाला माण चोरा माण देसगा माणं मसगा माण वाहिय पित्तियं करिफयं संभिय सन्नि. वाहिय विविदा रोगायंका परिसहा उक्सग्गा फासा फुसत्ति एवं पीयणं चरिमेदि उस्लास निस्साहिं वोलिरामि तिकट्ठ एम शरीर वोसिरावीने कालं अ. णवक्खमाणे विहरामि एहवी सद्दहणा परूपणा करिए तिवारे फरसनायें करी शुद्ध एहवा अपच्छि- म मारणंतिय संलेदणा झूसणा आराहणाना पंच अइयारा पयाला जाणियव्वा न समायरियव्वा तंज्ज. हा ते आलोउं इह लागा ससप्पओगे, परलोगा सं.

। भावार्थ-द्वादशवें व्रतमे यह अधिकार है, कि-श्रावक साधुको निर्दोष अन्नपानी देवे और जो उन्होंके लेनेयोग्य पदार्थ हैं, वे भी निर्दोष ही ढिलवावे। फिर पाचों ही अतिचारोको वनके उक्त व्रतको शुद्धतापूर्वक धारण करे ॥ फिर सलेसनाका पाठ पठन करे। अथ संलेखना विषय ॥ अपच्छिम मारणंतिय संलेदणा झूसणा आ- राहणा पोषधशाला पूंजी पूंजीने उच्चार पासवण भूमिका पडिलेही पडिलेहीने गमणागमणे पडि- कमि पडिकमिने दर्भादिक संथारो संयरि संगरिने दर्भादिक संथारो दुरूहि दुरूहिने पूर्व तथा उत्तर दिशि पल्यंकादिक आसने वेसी बेसीने करयल सं. परिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजली तिकटु एवं वयासी नमोत्युणं अरिहंताणं भगवंताणे जावसप- ताणं एम अनंता सिद्धजीने नमस्कार करीने जय- वंता वर्तमान तीर्थकरने नमस्कार करीने पोताना धम्माचार्यने नमस्कार करीने साधु प्रमुख चारे तीर्थ खमावीने सर्व जीव राशि खमावोने पूर्वे जे व्रत आदरयां छे तेना जे अतिचार दोप लाग्या होए ते सर्वने अलोइ पडिकमी निंदा निशल्य थईने सवं पाणाइवायं पञ्चक्खामि सम्व मुसावायं पञ्चक्खामि ८७ सव्वं अदिन्नादाणं पञ्चक्खामि सव्वं मेहुणं पञ्चक्खा- मि सव्वं परिग्गह पञ्चक्खामि सव्वं कोहं माणं जाव मिच्छा दसण सल्ल अकरणिज्जंजोगं पञ्चक्खामि जा- वजीवाय तिविह तिविहेणं न करोमि न कारवेमि कर. तंपि नाणुजाणामि मणसा वयसा कायसा एम अठारे पापस्थानक पञ्चक्खीने सवं असणं पाणं खाइमं साइम चउ विहंपि आहारं पञ्जक्खामि जाव जीवाय एम चारे आहार पञ्चक्खीने जंपियं इम सरीर इह कंत्तं पियं मणुन्न मणामं घिजं विसाप्तियं समयं अणुमयं वहुमय भंड करंड समाणं रयण क- रंडगभूय माणं सियं माणं उण्डं माणं खुदा माणं पिवासा माणं बाला माणं चोरा माण दंसगा माणं मलगा माणं वाहिय पित्तियं करिफयं संभिय सन्नि- वाहिय विविदा रोगायंका परिसहा उवसग्गा फासा फुसंत्ति एवं पीयण चरिमेदि उस्सास निस्साहिं वोसिरामि तिकट्ठ एम शरीर चोसिरावीने कालं अ. णवक्रवमाणे विहरामि एहवी सदहणा परूपणा करिए तिवारे फरसनाये करी शुद्ध एहवा अपच्छि- म मारणंतिय संलेहणा झूसणा आराहणाना पंच अइयारा पयाला जाणियव्वा न समायरियव्वा तंज्ज. हा ते आलोउं इह लोगा ससप्पओगे, परलोगा सं.

८८ - . सप्पओगे, जीविया संसप्पओगे, मरणा संसप्पओगे कामभोगा संसप्पओगे जो मे देवसि अइयारो कर तस्स मिच्छा मि दुकडं ॥ हिंदी पदार्थ-( अपच्छिम मारणतिय ) मृत्युके समीप आ जानेपर (सलेहणा) सलेखना करनी चाहिये जोकि (झूसणा) आत्माको कोसे भिन्न करनेवाली है, (आराहणा) आराधना करके फिर (पोपव- शाला) पौषधशाला (पूजी पूजीने) प्रमार्जन करके (उच्चार पासवण भूमिका) उच्चार [विष्टा ] (पासवण) मूत्रकी भूमि (पडिलेही पडिलेहीने) प्रतिलेखन करके (गमणागमणे) फिर आने जानेसे जो विराधना होती है उससे (पडिक्कमिने) पीछे हटके (दर्भादिक सथारो सथरी सथरीने) दर्भा- टिका आसन बिछाकर (दर्भादिक सथारो दुरुही दुरुहिने) फिर दर्भादिक सथारोपरि आरूढ होकर (पूर्व तथा उत्तर दिशि) पूर्व तथा उत्तर दिशाओंमें (पल्यकादिक) पयंकादिक (आसने बेसीने) आसन पर बैठकर फिर ( करयल) दोनो हाथ (सपरिग्गहिय) जोड कर (सिरसावत्त) शिरसे आवर्तन करता हुआ (मत्यए अजली त्तिक१) मस्तक पर दोनो हाथ जोडकर फिर ऐसे करके (एव वयासी) ऐसे कहे (नमोत्युण) नम- स्कार हो (अरिहताण) श्री अरिहतोंको ( भगवताण) भगवतोको (जा- वसपत्ताण) यावत जो मुक्तिको प्राप्त हुए हैं ( एम अनता सिद्धजीने) इसी प्रकार अनत सिद्धोको (नमस्कार करीने ) नमस्कार करके (पछी पोताना ) फिर अपने (धर्माचार्यने) धर्माचार्यजीको (नमस्कार करीने) नमस्कार करके [सा साची आवक श्राविका रूप ] चार तीर्थ समावीने ( साधु प्रमुख ) चारो ही तीयोंको क्षमावणा करके (पू जे व्रन आदरचा छे) पहेले जो व्रत ग्रहण किए हुये है (नेना जे अतिचार दोप लाग्या होए) उनमे जो अतिचार रूप दोप लगा हो (ते सर्व सभारी समारीने गुर्वाधिक पाले ) वह सर्व स्मृति करके गुरु आदिके समीप (आलोइ) आलोचन करके (पडिकमी) प्रतिक्रमण करके (निंदी) आत्मशालिसे निंदा करके (गरहि) गुरुकी माक्षिसे गर्हना करके (नि शल्य थईने ) फिर शल्यसे रहित होकर (सन्न पाणाइवाय) सर्व प्रकारसे प्रागातिपातका (पञ्चक्सामि) मैं प्रत्याख्यान करता हू (सव्व मुसावाय) सर्व प्रकारसे मृपावादका ( पञ्चक्खामि) प्रत्याख्यान करता ह (सज्ज अदिनादाण पञ्चक्खामि ) सर्व प्रकारसे अदत्तादान [ चोरी ] का प्रत्या- रव्यान करता है (सव्व मेहुण पञ्चक्खामि) सर्व प्रकारसे मैथुन कर्मका प्रत्याख्यान करता हू (सव्व परिगह पञ्चक्खामि ) और सर्व प्रकार परिग्रहका भी प्रत्याख्यान करता हू ( सव्व कोह ) सर्व प्रकारसे क्रोध (माग) मान (माया) छल ( लोभ) लोभको (जावमिच्छा देसण सड़) यावत् मिल्या दर्शन शल्य पर्यन्त अष्टादश पापोको छोडता है, तथा ( सव्व अकरणिन ) सर्व प्रकारसे अकरणीय कृतोंका ( पञ्चक्खामि ) मै प्रत्याख्यान करता हू (जापनीवाय ) यावज्जीव पर्यन (तिविह) तीन करण और (निविहेण ) तीन योगोसे जैसेकि-(न करेमि) न करू (न कारवेमि ) नाही औरोसे कराऊ ( करतपि नाणुनागामि ) जो अ- कृत्य कार्य करते हैं उन्होंकी अनुमोदना भी नहीं करू (मणसा) मन करके (वयमा) वचन करके (कायसा) काया करके (एम अठारे पाप स्थानक पञ्चरखीने ) इस प्रकार अष्टादश पापस्थानकोंका प्रत्याग्यान क- रके फिर (सव्व ) सर्व प्रकारसे (असण) अन्न (पाण) नल (खाइम) मेवादि (साइम) मुखवास प्रमुख (चउठिवहपि आहार पञ्चरखामि) इन चारोही आहारोंका प्रत्याख्यान करता हू (जाजीवाय) यावज्जीव पर्यन्त । फिर (जपिय इम सरीर) जो प्रिय है यह प्रयक्ष मेरा शरीर (इ. ) इष्ट कारी है (क्त्त) कातियुक्त है (पीय) प्रीतियुक्त है (मणुन्न) मनोक्ष है (मणाम) अत्यन्त मनोज्ञ है. (घिन) धैर्य रूप है (विमासिय) विश्वा सजन्य है (समय) सम्मत है (अणुमय) विशेष सम्मत है (बहुमय) बहुतही मानने योग्य है (भड करड समाण) आभूपणोके करड [डव्ये] समान है (रयण करड समाण) रत्नोके करडियेके समान है (माण सिय) न मुझको शीत लगे (माण उण्ह) न उष्ण लगे (माण खुहा) न क्षुधा लगे (माण पिपासा) नाही पियास [तृष्णा] लगे (माण वाला) नाही मुझको सर्प सर्श करे (माण चोरा) नाही मुझको चोरोका भय होवे (मा- ण दसगा) नाही मुझको दश मत्सरादि खेदित करे (माण मसगा) न मुझको मशक आदि दुस देवें (माण वाहिय) न मुझको व्याधि और (पित्तिय ) पित्त होवे ( कफिय सभियं ) महान भयकर कफ वा श्लेष्म उत्पन्न होवे ( सन्निवाहिय ) नाही मुझको सन्निपात रोग उत्पन्न होवे (विविहा रोगायका ) नाही मुझको विविध प्रकारके रोगोका उपसर्ग (परिसहा उपप्तग्गा) नाही मुझको परोपहोका उपसर्ग हावे (फासा फुसत्ति ) जो स्पर्श उत्पन्न होते है उनसे रक्षा करता हुआ (एव पियण) मैं ऐसे अपने प्रिय शरीरको (चरमेहिं) अतके (उत्सास निस्सासहि ) श्वासोशस पर्यन्त (वोसिरामि ) जोडता हू (तिकटु) ऐसे कहकर (एम शरीर वोसिरावीने ) और इसी प्रकार शरीरके ममत्व भावको त्याग कर (काल अणवकरखमाणे) जीवन मरणकी आकाक्षा न करता हुआ (विहरामि) वित्ररता हू वा विचरूगा (एहवी सद्दहणा परू- पणा करीए) इस प्रकारसे श्रद्धा वा प्रतिपादनता सदैव काल ही करनी चाहिये, किन्तु (निवारे फर सनायें करी शुद्ध) निस समय सलेखना की जाए तब स्पर्शना करके शुद्ध होती है (एहवा) ऐसे (अपच्छिम ) अ- न्तिम (मारणतिय) मृत्युके समीप (सलेहणाना) सलेखनाके (झूसणा) कौके क्षय करनेके मार्गके (पच) पाच (अइयारा ) अतिचार (जाणि- यव्वा) जाननीय हैं (न समायरियना) किन्तु आचरणे योग्य नहीं हैं (तज्जहा) तद्यथा (ते आलोउ) उनकी आलोचना करता ह (इह लोगा ससप्पओगे) इस लोगमें चक्रवर्त्यादि पदवियोकी आशाका प्रयोग करना

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हिंदी पदार्थ-(एम समकितपूर्वक) इस प्रकार सम्यक्त्वपूर्वक (बार बन सलेखणा सहित ) द्वादश व्रत और सलेखनायुक्त (एहने वि- पय) इनके विषय (जे कोई) यदि कोई (अतिक्रम ) मनके द्वारा नियम किये हुए पदार्थों की इच्छा करना उमका नाम अतिक्रम है (व्यतिक्रम) जो वचनसे कहा जाए कि मै नियमको भग करूगा उसका नाम व्यति क्रम है (अनिचार) जो कायद्वारा वस्तु भोगनेके लिये हाथमे ली जाये, (अणाचार) और भोग ली हो उसका नाम अनाचार हे (जाणता) जान करके (अजाणता) न जानने हुए (मन वचन कायाये करी) मन वचन काय करके (सेव्यो होय ) दोषसेवन किए हों ( सेवराज्यो होय ) अन्य आत्माओको आसेवन करनेका उपदेश दिया हो (सेवता प्रत्ये अणुमोद्यो होय ) जो अतिचाराको सेवन करते है उन्होंकी अनुमोदना की हो (ते अनता सिद्ध केवलीनी साखे) उनको अनत सिद्ध केवलियोंकी साक्षिसे (मिच्छामि दुक्कड) उस दुष्कृतसे पीछे हटता हूँ । भावार्थ-सम्यक्त्वपूर्वक द्वादश बन सलेखनापूर्वक इनके विषय यदि कोई अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार, अनाचार, जानते हुए, वा न जानते हुए मन वचन काया करके यदि आप सेवन किए हो वा अन्य जीवोको उपदेश किया हो जो आसेवन करते हैं उन्होंकी अनुमोदना करी हो तो उस अतिचार रूप दोपसे केवली भगवान् वा सिद्ध भगवानोकी साक्षिसे मैं पाछे हटता हूँ॥ अठारे पापस्थानक-प्राणातिपात १ मृषावाद २ अदत्तादान ३ मैथुन ४ परिग्रह ५ क्रोध ६ मान ७ माया ८ लोभ ९ राग १० देष ११ कलह १२ अभ्याख्यान १३ पैशुन्य १४ परपरिवाद १५ रति अरति १६ मायामोसो १७ मिथ्यात्व दर्शनशल्य १८ एवं १८ पापस्थानक मालुंजे कोई पापस्थानक महारे जीवें मने वचनें कायायें करी सेव्यु होय से. वराव्युं होय सेवता प्रत्ये भलु जाण्युं दोय ते अनंता सिद्ध केवलीनी साखें मिच्छा मि दुक्कड ।। हिंदी पदार्प-( अठारे पापस्थानक ) अष्टादश पापस्थानकोके भेद निम्न प्रकारसे हैं (प्राणातिपात) जीवहिंसा (मृपावाद ) असत्य भा पग करना (अदत्ताशन) चौर्य कर्म (मेथुन) अब्रह्मचर्य (परिग्रह) ध- नादिकी आकासा (क्रोध) रोप करना (मान) अहकार (माया) छल (लोभ) तृष्णाकी वृद्धि (राग) काम रागादि (द्वेप) मनिफूलता (कलह) केपभाव (अभ्याख्यान) असत्य दोपारोपण करना (पैशुन्य) चुगली करना (परपरिवाट) अन्य आत्माओका निंदा करनी (रति अरनि) विषय विकारोकी मातिमें हर्ष और अप्राप्तिमे शोक करना (मायामोसो) कपटसे मृपावाद बोलना (मिथ्या दर्शन शल्य) मिथ्या दशर्नका शल्य रसना (एव अठारे पापस्थानक) इस प्रकारसे अष्टादश जो पापस्थानकोंके भेद है सो यह (माहेलु जे कोई पापस्थानक महारे जीवे मनें वचने कायाये करी) मेसे कोई भी पाप- स्थानक मन नीन योगोंसे (सेन्या होय) सेवन किये हुए हो ( सेवराव्या होय) अन्य जीवोंसे आसेवन करवाये हों, (सेता प्रत्ये भलु जाण्यु होय) नो आसेवन करते है उन्होंकी अनुमोदना करी हो (ते अनता सिद्ध केव लीनी सासें) उन दोपोसे अनन सिद्ध केलियोकी साक्षिसे (मिच्छामि दुकड) मैं पीछे हटना हू॥ भावार्य-अष्टादश पापोंको तीन करण और तीनो योगासे परिहार करे जो पूर्वोक्त लिखे गए है। फिर (इच्छामि ठामि ) का पाठ पढे जो पूर्व लिखा गया है। फिर सडा होकर निम्न प्रकारसे पहे। तरुस धम्मस्स केवलि पण्णत्तस्स अभ्भुष्टि ओमि आराहणाए विरओमि विराहणाए तिविदेणं पडिकतो वदामि जिण चउव्योल ।। हिंदी पदार्थ-(तस्स) उस (केवलि ) श्री केवली (पण्णत्तस्स) भाषित (धम्मस्म) धर्मके विषय (अभ्भुठिओमि) अभ्युत्थित [खडा] होता हू ( आराहणाए ) आराधन करनेके वास्ते ( विरओमि ) निवृत्ति करता हू (विराहणाए) विराधनासे (तिविहेण) त्रिविध मन वचन काय करके ( पडिकतो) पीछे हटता हू ओर ( वदामि जिण चउब्बीस) मे चोवीस तीर्थकरोको वन्दना करता हू ।। भावार्थ-श्री केवलीभापित धर्ममे उपस्थित होकर सयममे लगे हुए अतिचारोंसे निवृत्ति करे, और चतुर्विंशति तीर्थकर देवोको वटना करे । फिर (इच्छामि खमासमणो) के पाठसे दो वार गुरुदेवको वन्दना नम- स्कार करे और यथाशक्ति पाच पदोको वदना नमस्कार करे ।। फिर निम्न लिखित पाठ पढे । अनंत चौवीसोते नमो, सिद्ध अनंता कोड़। केवल ज्ञानी थे वरसभी, वदु वे कर जोड़ ॥१॥ दो कोड़ो केवलधरा, विदरमान जिन वीस । सहस्र यु- गल कोड़ी नमुं, साधु वंदु निसदीस ॥ २ ॥ हिंदी पदार्थ-(अनत चौवीसीते नमो ) अनत चतुर्विशति तीर्थ- करोको नमस्कार करता हू, (सिद्ध अनता कोड) और अनत कोटि प्र- माण सिद्धोको भी नमस्कार करता हू (केवल ज्ञानी ये वरसभी) केवल. ज्ञानके धारक मुनि वा स्थविर पदवाले जो मुनि हैं उन सवोंको (वदु वे कर जोड) दोनों हाथ जोड़कर वदना नमस्कार करता हूँ ॥ (दो कोडी के- वलधरा) जपन्य वर्तमानकालमे महाविटेह आदि क्षेत्रोने दो कोटि प्रमाण केवल ज्ञानके धारी मुनि और (विहरमान जिन वास) वर्तमान जयन्य बीस , . अरिहत है अर्थात जो अतरग विभृनि वा बाह्य विभूतिसे विभूपित है उ- नको भी वदना नमस्कार करता है, किन्तु (सहस युगल कोडी नमु) दो सहस्त्र प्रमाण जो जघन्य पदपाले (साधु वदु निसदीस) साधु हैं उनको भी अहोरात्र वदना नमस्कार करता ह॥ भावार्थ-अरिहत सिद्ध भगवनोको वदना नमस्कार करे, फिर सा केवली सी स्थविर पदधारी मुनियों को भी वदना नमस्कार करे, तद- नतर जोस्तोको स्तोक दो कोड केली तथा बीस अरिहत और दो सहस्त्र मुनि होते है, उनको भी वंदना नमस्कार करे ।। पुन जो ८४ रक्ष प्रमाण जीवोंकी योनिया है, उन मत्रोंमे निम्नलिसितानुसार क्षमावणा करे- सप्त लक्ष पृथ्वी काया, सप्त लक्ष अप काया, सप्त लक्ष तेजु काया, सप्त लक्ष वायु काया, दश लक्ष प्रत्येक वनस्पती काया, चतुर्दश लक्ष साधारण वनस्पती काया, दो लक्ष वेद्रिय, दो लक्ष त्रिइंद्रिय, दो लक्ष चउरिद्रिय, चतुर्लक्ष देव, चतुर्लक्ष नारको, चतुर्लक्ष तिर्यच पंचेंद्रिय, चतुर्दश लक्ष मनुष्य, एवं चौरासो लक्ष जोवा योनिमेसे यदि मैंने कोई जोव हनन किया हो तथा अन्यको मारनेका उपदेश दिया हो, वा हनन कर्ताओंकी अनुमोदना को हो, वे सर्व मन वचन काया करके "१८२४१२० प्रकारे तस्त मिच्छामि दुक्कडं। * जीवतत्त्व ५६३ भेदोंको अभिहयादि दशौं साथ गुणाकार कर से ५६३० भेद होते हैं। पिर इनको गग और द्वेषधे साथ द्विगुणाकार करनेसे ११२६० भेद बनते हैं। फिर इहाँको मन पचन और फायाके साथ - फिर ऐसे पढे- खामे मि सव्वे जीवा । सव्वे जीवा खमंतु मे ॥ मिनी मे सव्व भूएसु । वे मज्झं न केणई ॥ १॥ एवमहं आलोइयं । निंदियं गरहियं। दुगंच्छियं सम्म तिविदेण पडिकतो वदामि जिण चउव्वीसं ॥ २ ॥ हिंदी पदार्थ-(खामे मि सव्वे जीवा) मै खमावना करता हू सर्व जीवोंसे और (सव्वे जीवा खमतु मे) हे सर्व जीवो मेरेपर तुम भी क्षमा करो, क्योंकि (मित्ती मे सम भूएसु) मैत्री भाव है मेरा सर्व जीवोमे (वेर मझ न केणई) वैरभाव मेरा किसी जीवके साथ भी नहीं है। (एवमह) इस प्रकार मैने (आलोइय) आलोचना की (निदिय) आत्मसाक्षिसे निंदा की (गरहिय) गुरु की सालिसे विशेष निंदा की (दुगच्छिय) दुर्गच्छा की (सम्म) सम्यक् प्रकारसे (तिविहेण) तीन योगोसे (पडिकतो) मै पापसे पीछे हटना हू और (वदामि) पदना करता हू (जिण चउव्वीस) चतुर्विशति तीर्थकरोको ॥ भावार्थ-सर्व जीवोके माध क्षमावना करके पापसे सर्वथा ही पीछे हटकर चौवीस तीर्थकरोको वन्दना नमस्कार करे ॥ इस प्रकार सामायिक, चउविसथा, वदना, पडिकमणा, यह चार आवश्यक पूर्ण हुए। फिर "तिवखुत्तो" के पाठसे पाचवें आवश्यककी आज्ञा लेकर निम्न प्रकारसे कायोत्सर्ग करे- गुणाकार करनेसे ३३७८० भेद होते है, अपितु इनको ही तीन करणों के साथ सयोजन करनेसे १०१३४० मे बन जाते है, अपितु इनको भी फिर तीन फार के साथ गुणाकार करनेसे ३०४०२० भेद हो जाते है | फिर इनको अर्हन, सिद्ध, साधु, देव, गुरु, और आत्मा इस प्रकार छै गुणाकार करनेसे १८२४१२० 'भेद बनते है अर्थात् इस प्रकारसे में मिच्छामि दुकट देता हू और फिर पाप धर्म न करनेकी इच्छा करता हू ।।

आवस्तही इच्छाकारेण संदिसह भगवन् देव. सि ज्ञान दर्शन चरित्ताचरित्त तप अतिचार प्रायच्छित विशोधनार्थ करेमि काउस्सग्गं ।। हिंदी पदार्य-(आवरसही इच्छाकारेण सदिसह भगवन्) हे भग- वन् ! मेरी इच्छा है, अवश्य करणीय कार्यकी करनेके लिए, आप आज्ञा दीजिए (देवसि) दिन सम्बन्धि (ज्ञान) ज्ञान (दर्शन) सम्यक्त्व (चरित्ता चरित) देशवृतिमे (तप) तपमे (अतिचार) अतिचारोके (मायच्छित) प्रायश्चित्तकी (विशोधनार्थ) विशुद्धिके वास्ते (करेमि) करता हूँ (काउ- स्सग्ग) कायोत्सर्गको । भावार्थ-फिर अपत्य ही करने योग्य पचम आवश्यकको भगवान्- की आज्ञा लेकर क्षान दर्शन चरित्राचरित्रकी विशुद्धिके अर्थ कायोत्सर्ग (ध्यान) करे। फिर नवकारका' पाठ 'करोम मते सामाइय' का पाठ 'इच्छामि ठामि' का पाठ 'सरसोतरी करणेण' का पाठ, इनको पूर्ण पढ- कर ध्यान करे । देवसोमे चार और राइसीमें दो रोगस्सका ध्यान करे । पक्षिप्रतिक्रमण हादश लोगस्सका ध्यान और चतुर्मासी प्रतिक्रमणमें २० लोगस्सका ध्यान तथा सम्वत्सरी प्रतिक्रमणमे ४० लोगस्सका 'यान करे। यह सप्रदायिक मानना है, अपितु सूत्रमें तपकी चिंत्वना ही कथन की गई है, क्योंकि अतिचारोकी विशुद्धि तपसे ही होती है । फिर नमोकार पदके ध्यान पारे और एक लोगरसका पाठ पढके दो वार 'इच्छामि खमा- समणो' का पाठ पढे । इस प्रकार पाचमा आवश्यक पूर्ण होता है ।। फिर पष्टम पञ्चरखाण आवश्यक करे। यदि गुरुनी हो तो उन्होसे प्रत्याख्यान करा लेवे, नहीं तो यथाशक्ति तप आर ही ग्रहण कर लेवे ।। .

॥ अथ पष्म प्रत्याख्यान आवश्यक पाठ।। मुहूर्तके प्रत्याख्यानका मूल सूत्र । उग्गयसूरे नमुक्कार सहियं पञ्चक्रवामि चउ- व्विहंपि आहारं असण पाणं खाइमं साइमं अन्न- त्यणा भोगेणं सहतागारेणं वोसिरामि ।। हिंदी पदार्थ-(उग्गयसूरे) सूर्य उदयसे एक मुहर्त प्रमाणे (नमुकार सहिय) नमस्कार सहित अर्थात् नमोक्कारके विना पढे पारना नहीं करना इस प्रकारसे ( पञ्चरसामि) प्रत्याख्यान करता हू (चउवि. हपि आहार ) चतुर्विधके आहारका, जैसेकि-(असण) अन्नकी जाति (पाण) पानीकी जाति (खाइम) फलादिकी नाति (साइम ) चूर्णादिकी जाति, किन्तु निम्नलिखित आगार है जैसेकि-(अन्नत्थणा भोगेण) यदि विना उपयोग वस्तु खाई जाए अर्थात् भक्षण करते समय प्रत्याख्यानकी स्मृति न रहे तो तथा (सहरसागारेण ) अकस्मात् कोई वस्तु मुग्वमे जा पडे जैसे दविको मथन करते हुए तक [छाछ ] की विंदु मुखमें जा पडती है, सो इन दोनों आगारोसे चार प्रकारके आहारको (बोसिरामि) छो. क्योकि इन आगारोते प्रत्याख्यान भग नहीं होता। भावार्थ-उक्त पाठ मुहूर्त मात्रके प्रत्याख्यान करनेका है। यदि खयमेव प्रत्याख्यान करना हो तब "पञ्चरखामि" और "वोसिरामि" ऐसे शब्द कहने चाहियें, यदि गुरु करवावे तब वे "पञ्चक्खाइ" और "वोसिरई" ऐसे कहे । इस प्रत्याख्यानमे दो आगार होते हैं जैसे कि (अ. नत्यणा भोगण) विना उपयोग (सहसागारेण) और अकस्मात् , इन आ- गारोसे प्रत्यास्यान भग नही होता है । इसी प्रकार सर्व प्रत्याख्यानोमे जानना चाहिये, और चतुर्विधक आहारका सर्वथा ही इस नियममें प्र- त्याख्यान है॥ डता हूँ - अथ द्वितीय प्रत्याख्यान एक प्रहर वासाई पौरुषीका। *उग्गयसूरे पोरितिं पञ्चक्खामि चउन्विहंपि आहारं असणं पाणं खाइम लाइमं अन्नत्थणा भो- गेणं सहसागारेणं पच्छन्ने कालेण दिसामोहेणं स- व समाहिवति आगारेण वोसिरामि ॥२॥ एवं साइपोरिसिय पञ्चक्खामि । जाव चोसिरामि ॥ हिंदी पदार्थ(उग्गयसूरे पोरिसिं पञ्चक्पामि) सूर्यके उदय होनेपर प्रहर [एक यामका ] प्रत्याख्यान करता हूँ (चउविहपि) चतु- विधके ('आहार) आहारका जैसेकि-(असण) अन्नकी जाति (पाण) पानीकी जाति (खाइम) खादिमकी (साइम) स्वादिमकी जाति, निम्नलि- खित आगारपूर्वक जैसेकि-( अन्नत्यणा भोगेण ) विना उपयोग (सह- सागारेग) अकस्मात्-विना इच्छा (परउन्न कारेण) मेदिक होनेपर सूर्य प्रच्छन्न हो गया हो जैसे सतत वर्षाके होनेपर सूर्य दिखाई नहीं देता तब पारणा कर लेनेस प्रत्याख्यान मग नहीं होता, (दिसामोहण) दिशाके मूढ होनपर मैसेकि-पूर्वको पश्चिम ज्ञात कर लिया पश्चिमको पूर्व ज्ञात किया तब ग्वाना साया गया तो प्रत्याख्यान अभग है (सव्व समाहितत्ति आगारेण) प्रत्याख्यान सर्व प्रकारकी शारीरिक समावि होनेपर ही है। इन आगारों सहित में चारो प्रकारक आहारको (बोसिरामि) ओडता हू॥ इसी प्रकार साई पीरुपीका पाठ जान लेना। भावार्थ -एक यामका प्रत्याख्यान वरना हो वा साई पासपीका नियम करना हो तो पूर्वोक्त पाठ पढे निसमे गृहस्थिके लिये (अन्नत्यणा * इन सई प्रत्यास्यानाके पाठमें जो मुनियों के लिए भागारोके पाठहै ये सप दिए हैं। १ साहुक्यणेण। २ महत्तरागारेण ॥

। भोगेण) (सहसागारेण) (पच्छन्न कालेणं) (दिसामोहेण (सव्य समाहि वत्ति आगारेण) ये पाच आगार होते हैं । अथ तृतीय पुरिमट्ट (दो याम)का प्रत्याख्यान । उग्गयसूरे पुरिमळ पञ्चक्खामि चउम्विहंपि आ. हारं असणं पाणं खाइम साइमं अन्नत्यणा भोगेणं सहसागारेणं पच्छन्न कालेणं दिसामादेणः सव्व स. मादिवति आगारेण वोसिरामि ।। हिंदी पदार्थ-(उग्गयसूरे पुरिमट्ठ पञ्चकखामि) मूर्यके उदय होने पर दो प्रहरका प्रत्याख्यान करता हू (चविहपि आहार) चतुर्विधके आहारका जसेकि ( असण पाण खाइम साइम) अन्नपानीकी जाति खा दिमकी जाति सादिमकी नाति (अन्नत्थगा भोगेण) विना उपयोग भक्षण की जावे (सहसागारण) अकस्मात् ग्रहण की जावे ( पच्छन्न कालेण ) सूर्यके प्रच्छन्न होनेपर (दिसामोहेण) दिग्मूढ होनेपर-दिशा भूलनेपर (सव समाहिवत्ति आगारेण) सर्व प्रकारकी समाधि होनेपर (योसिरामि) उक्त आगारों सयुक्त मै चतुर्विधके आहारको छोडता हू । भावार्थ-पुरिमडके प्रत्याख्यानमे चतुर्विधिके आहारके अन्यतर अन्नत्थणा भोगेण, सहस्सागारेण, पच्छन्न कालेण, दिसामोहण, सव्व स- माहि वत्ति यागारेण, यह आगार होते हैं । अथ विगइ निविगइके प्रत्यारव्यानका पाठ ॥ विगइओ निविगइओ पचक्खामि अन्नत्थणा भोगेणं सहसागारेणं- सव्व समादिवत्ति आगारेणं वोसिरामि ॥ साहुक्यणेण । महत्तसगारेण ॥ * लेशलेषणा। गिदत्य सतहेण । उक्खित्त विधेगेण । पडुच्च भक्विएण । परिवाणियागारेण । महत्तरागारण ।

१०१ हिंदी पदार्य-(विगइओ निविगइओ) विगय जो आत्माको विकृतिभाव करनेवाले हैं जैसेकि-दुग्ध, दधेि, घृत, नवनीत, गुड, तैल इत्यादिक प्रत्या- ख्यानको निविगइ कहते हैं सो निविगइका (पञ्चक्खामि) प्रत्याख्यान करता है तथा वर्तमान कालमे उक्त प्रत्याख्यानका निर्वाह छाछद्वारा किया जाता है। छाउमे रोटी डालकर आसेवन करनेकी प्रथा वर्तमान कालमे है। सो उक्त प्रत्याख्यानमे आगारोंकी सग्या लिसने है यथा (सव समाहि वति आगारेण ) सर्व प्रकारकी ममारिक होनेपर (वोसिरामि) इस प्रका- रमे विगयको छोडता हू॥ भावार्थ-विगयके प्रत्याख्यानमे पूर्वोक्त तीन आगार होते है । अथ विगयका एकासनयुक्त प्रत्याख्यानका पाठ ॥ उग्गयसूरे निविगइ एकासणं पञ्चक्खामि ति- विहंपि आहारं असणं खाइम साइमं अन्नत्थणा भो. गेण सहसागारेण सव्व समाहिवत्ति आगारेणं वा- सिरामि॥ हिंदी पदार्य-(उग्णयसूरे निविगइ पञ्चक्खामि) सूर्य उदयसे निविगइका प्रत्याख्यान करता है, फिर (एकासण ) एक आसनपर अनादि भक्षण करनेका ( पञ्चक्खामि ) प्रत्याख्यान करता हू । पुन (तिविहपि) विविध ( आहार ) आहारका भी प्रत्याग्न्यान करता हू जैसेकि-( असण ) अन्नकी जाति (खाइम ) खादिमकी नानि ( साइम ) मादिमकी जाति ( अन्नत्थणा भोगेण ) विना उपयोग (सहसागारण) अकस्मात् (सन ममाहित्ति आगारेण) सर्व प्रकारको समाधि होनेपर ( वोसिरामि) तीन आहारका प्रत्यायन करता है । भावार्य-एकासनयुक्त तीन आहारका निविगइमें प्रत्याभ्यान करे, ६ बालेवेणश, गिदत्य ससरेण, उवियत्त विवगेप, पदा मकिपण, परिवाशणयागारंग, महत्तरागारेण ॥ ) किन्तु पानी प्राशुक ही आसेवन करे । आगार सर्व प्राग्वत् ही हैं, इसमें विशेष विगयोका ही प्रत्याख्यान है किन्तु वर्तमान कालमे तक्रके साथ इस नियमको पाला जाता है। स्कविगय, धारविगयके प्रत्याख्यानका विवेक होना चाहिये ॥ अथ एकासन दिआसन करनेका पाठ ॥ उग्गयसूरे एगासण वियासणं पञ्चक्खामि दु. विहं तिविहंपि आहारं असणं खाइमं साइमं अन्न- त्यणा भोगणं सहसागारेणं' आउदृण पसारेणं गुरु अभ्भुठाणेणं सव्व समाहिवत्ति आगारेणं वोसिरामि॥ हिंदी पदार्थ-(उग्गयसरे) सूर्य उदयसे (एगासणं) एकासन वा (बियासण) दो आसन, एक वार भोजन करनेको एकासन और द्विवार भोजन करनेको दो आसन कहते हैं, उनके उपरान्त (पञ्चरखामि) प्रत्या- ख्यान करता हू । (दुविह) यदि पानी और स्वादिम ग्रहण करने होवे तो अशन और खादिमका प्रत्याख्यान करे, यदि एकासनके पीछे केवल प्राशुक पानी ही ग्रहण करना हो तो (तिविहपि) तीन प्रकारके आहारका प्रत्याख्यान करे जैसेकि-(असण) अन्नकी जाति (खाइम) खादिमकी जाति (साइम) स्वादिमको जाति, किन्तु निम्नलिखित आगारानुकूल जैसेकि- (अन्नत्यणा भोगेण) विना उपयोग (सहरसागारण) अकस्मात् (आउवण पसारण) शरीरके सकोचन [सुकैडने] और पसारनेपर क्योकि यदि एकासनमें अगोपाग सकोचन और पसारन किये जाए तो प्रत्याख्यान भग न होगा (गुरु अम्भुटाणेण) गुरुके आनेपर यदि विनयके वास्ते उठना पडे (सव समाहिवति आगारण) सर्व प्रकारकी समाधिक रहने पर (योसिरामि) उक आगारोंयुक्त तीन आहारको छोडता हूँ ॥ १ सागारियागारेण । २ परिठावणियागारेण, महत्तरागारेण ॥

२०३ भावार्थ-एकासन वा द्विासनमे द्विविध वा त्रिविधके आहारका प्रत्याख्यान करे किन्तु उपर कहे आगारोंके सयुक्त प्रत्याख्यान करे । अथ एकलठाण करनेका पाठ॥ उग्गयसूरे एगलठाण पञ्चक्खामि चउन्विहंपि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अन्नत्यणा भोगेणं सहसागारेण गुरु अम्भुटाणेण सव्व समा- हिवत्ति आगारेण वोसिरामि ।। हिंदी पदार्थ-(उग्गयसूरे) सूर्य उदयसे (एगलठाण) एक स्थानके विना अन्य स्थानपर गमन करके आहार करनेका (पञ्चकसामि) प्रत्याख्यान करता हू, तथा प्रत्याख्यान करता हू (चउन्विहपि) चतुर्तिविक आहारका जैसकि-(असण) अन्नकी जातिका (पाण) पानीकी जातिका (खाइम) खादि- मकी जातिका (साइम) म्वादिमकी नातिका, किन्तु (अन्नत्थणा भोगेण) इतना विशेष है कि-पिना उपयोग आहारादि आसेवन किया जाये ( सहसा- गारेण) अकस्मात् (गुरु अम्भुटाणेग) गुरुकी विनयके लिए खडा होनेपर (सन्न समाहिवत्ति आगारण) सर्वप्रकारकी समाधिके रहनेपर (योसिरामि) चारो आहारोको जोडता ह॥ भावार्थ-~-एकलस्थानका प्रत्यारयान एकासनके तुल्य ही है, किन्तु विशेप इतना ही है कि-एकासनमें अगोपागके सकोचन पसारनका त्याग नहीं है, एकलस्थानमे अगोपागके सकोनने और पसारनेका परित्याग होता है। अथ आविल करनेका पाठ॥ उग्गयसूरे आविल पचक्खामि तिविपि आ. - १ सागारियागारण। २ परिठायणियागारण, महतरागारेण ।।

१०४ हारं असणं खाइमं साइमं अन्नत्यणा भोगेणं सह. सागारेण सव्व समाहिवत्ति आगारेणं पाणस्स ले- वेण वा अलेवेण वा अच्छेण वा बहुलेवेण वाससित्थे- ण वा असित्रेण वा वोसिरामि ॥ हिंदी पदार्थ-(उग्गयसूरे) सूर्य उदयसे (आबिल) आबिल ग्रहण करता हू ओर (पञ्चरखामि ) प्रत्याख्यान करता हू (तिविहपि) त्रिविधिके (आहार) आहारका जैसेकि-( असण) अन्नकी जातिका (खाइम) खादिमकी जातिका (साइम) स्वादिमकी जातिका (अन्नत्यणा भोगेण) अपितु विना उपयोग ग्रहण की जाए (सहसागारेण ) अक- स्मात् वस्तु ग्रहण की जाए (सव्व समाहिवत्ति आगोरेण ) सर्व प्रकारकी समाविक होनेपर (पाणस्स ) पानीकी अपेक्षा इतने प्रकारके जलके भिन्न अन्य पानीका नियम जैसेकि-(लेवेण ) लेपयुक्त पानी जैसे खजूरादिका (वा) अथवा (अलेवण) अलेप जल जैसे धौवनका पानी (वा) अथवा (अच्छेण ) शुद्ध निर्मल उष्ण पानी (वा) अथवा (बहुलेवेण ) बहु लेप युक्त जैसे तण्डुलोका [ चावरों का धोपन (वा) अथवा (सत्तित्येण) सीत्थयुक्त [कणसहित ] जैसे चूनका पोवन ( असित्येण वा) सीथ रहित जल जैसे प्राशुक नल इनके विना अन्य प्रकारके जलोंको (वोसिरामि) छोडता हू।" भावार्थ---आबिल उसको कहते है जो विगयादिसे रहित केवल प्राशुक जलके साथ ही रोटिया ग्रहण की जावे उसका ही नाम आबिल है, किन्तु आगार पूर्ववत् ही है। केवल पानी पट्प्रकारसे वर्णन किया गया है जैसेकि-लेपयुक्त १ अल्पयुक्त २ शुद्ध उप्ण पानी ३ बहु लेपयुक्त ४ सीथयुक्त ५ असीथयुक्त ६, इनके गिना अन्य जलका परित्याग कर ॥ * लेवालेवेण, गिहत्य ससण, उक्खित्त विवगण, परिठापणियागारण, महत्तरागारेण ॥

अथ चउचिहाहार उपवासका पाठ॥ उग्गयसूरे अभ्भत्तठ पञ्चक्खामि चउन्विहंपि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अन्नत्यणा भोगेणं सहसागारेणं' सव्व समाहिवत्ति आगारेणं वोसि- रामि ॥ ८॥ हिंदी पदार्थ-(उणयसूरे) सूर्य उदयसे (अम्मतठ) अभक्तार्थे अर्थात् अन्नपानीको ग्रहण न करनेके वास्ते (पउन्विहपि आहार ) चार प्रकारके आहारका (पञ्चक्खामि ) प्रत्याख्यान करता ह जैसकि-(असग) अन्नकी नाति (पाण) पानीको जाति (खाइम ) खादिमकी जाति किन्तु (अन्नत्यणा भोगेण ) विना उपयोग आहार ग्रहण किया जाये (सहसा- गारेण) अकस्मात् ग्रहण किया जाए ( सव्व समाहेवत्ति आगारेण) सर्व प्रकारको समाधि होनेपर (वोसिरामि ) चार प्रकारके आहारको त्यागता हूँ ॥ भावार्य-चतुर्विधके आहारके प्रत्याख्यानमें पूर्वोक्त आगार रक्खे जाते हैं इसको चउविहार व्रत भी कहते है । अथ तिविहादार उपवास करनेका पाठ ॥ उग्गयसूरे अभ्भत्तट पञ्चक्खामि तिविहंपि आ- हारं असणं खाइमं साइमं अन्नत्यणा भोगेणं सह- सागारेणं' सव समाहिवत्ति आगारणं पाणादार पोरिसिं पञ्चक्खामि अन्नत्यणा भोगेण सहसागारेणं पारिठावणियागारण, महतरागारेण. १४ १०६ पच्छन्न कालेणं दिसामोदेणं सव्व समादिवत्ति आ- गारेणं पाणस्त लेवेण वा अलेवेण वा अच्छेण वा वहुलेवेण वा ससित्येण वा असित्थेण वा वोसिरामि ॥ हिंदी पदार्थ-(उग्गयरे ) सूर्य उदयसे (अभ्भत्तह) अभ- तार्थे अर्थात् उपवास करनेके वास्ते उपवासका (पच्चरखामि) प्रत्याख्यान करता ह और (तिविहपि आहार) त्रिविधिके आहारका भी प्रत्याख्यान करता हू जैसेकि-(असण) अन्नकी भाति (खाइम) खादिमकी जानि (साइम) स्वादिमकी जाति, किन्तु निम्नलिखित आगार इसमें भी हैं जैसेकि-(अन्नत्यगा भोगेण) विना उपयोग कोई वस्तु आसेवन की जाए वा (सहसागारेग) अकस्मात् ग्रहण की जाए तथा (सब्ब समाहिवत्ति आगारेण ) सर्व प्रकारकी समाधिक होनेपर । और तिविहाहार उपवासमें पानीका त्याग नहीं है, यदि किसीने पानीका त्याग प्रहर वा द्विप्रहरपर्यंत त्याग कर दिया हो तो उसके लिये भी निम्न प्रकारसे आगार होते है । यथा-(पाणाहार पोरिसिं ) पानीके आहारका प्रहर पर्यन्त वा द्वि प्रहर पर्यन्त (पञ्चरखामि) प्रत्याख्यान करता हू, परतु निम्नलिखित आगार पानीके त्यागमे भी होते है जैसेकि-( अन्नत्थणा भोगेण) विना उपयोग पानी पिया गया हो, (सहसागारण) अकरमात् पानीका बिंदु मुखमे चला गया हो (पच्छन्न कालेण) कालके प्रच्छन्न होनेपर जैसेकि-बाद- लादिमे दिनकी धानिन पड़ जाती है (दिसामोहेण) दिग्मूढ होनेपर [दि- शा भूलनेपर ] (सन्न समाहिवत्ति आगारेण) सर्व प्रकारकी समाधि रहने पर, फिर (पागस्त) पानी पटू प्रकारसे ग्रहण करे जैसेकि-(लेण) लेपयुक्त पानी (वा) अथवा (अलेवेण) लेपसे रहित पानी (वा) अथवा (अच्छण) शुद्ध उप्ण पानी (वा) अथवा (बहुलेवेण) बहु लेपयुक्त जेसे चावलोका धोवन (या ) अथवा ( ससित्येण ) कण आदि सहिन जैसे- कि-चूणका धोवन (या) अथवा (असित्येण) प्राशुक जल (वोसि- रामि ) इनके विना और पानीका त्याग करता है | भावार्थ-निविहाहार उपासमें केवल नल्या त्याग नहीं होता है। सो जलके त्यागका विपर्ण मूल अर्यमें दिखाया गया है। आगार सर्व पूर्ववत् ही हैं। अथ रात्रि चउन्विदाहार तथा भवचरमका प्रत्या- ख्यान करनेका पाठ ॥ दिवस चरिमं पञ्चक्खामि चउविहंपि आहारं अलणं पाण खाइमं साइम अन्नत्यणा भोगेणं सह- सागारेण सव्व समादिवत्ति आगारेणं वोसिरामि । हिंदी पदार्य-(दिवस चरिम) उसको कहते हैं नो दिनके साथ ही नार आहारका प्रत्याख्यान किया जाए, यापन काल सूर्य उदय न हो नच तक नार आहारका त्याग ही रहे, परतु जब सस्तारक [अनशन ] करना हो तब भव गरम कहा जाता है, सो दिवसचरममे चार प्रकार के आहारका त्याग होता है जैसेकि-(पञ्चक्खामि) प्रत्याख्यान करता हू (चउविहपि) चतुर्विधिक (आहार) आहारका (असण) अन्नका (पाण) पानीका (खाइम) खाटिमका (साइम ) स्वादिमका किन्तु निम्नलिखित आगार इसमें भी हैं जैसेकि-( अन्नत्यगा भोगेण ) विना उपयोग वस्तु ग्रहण की जाये वा (सहसागारण) अकस्मात् वस्तु ग्रहण की जाये (सन्न समाहिवत्ति आगारण) सर्व प्रकारकी समाधिके रहनेपर (वोसिरामि) उक्त आगारोयुक्त में चतुर्विधिके आहारको छोडता है। भावार्थ-दिवसचरममे अथवा भवचरममें चतुर्विधिके आहारका प्रत्याख्यान किया जाता है जिसमें चार आगार होते हैं लेकि-अन्नत्यणा १ प्रहातरागारणे ।

भोगेण, सहसागारेण, सव्व समाहिवत्ति आगारेण, इनका अर्थ पूर्ववत् ही जान लेना ॥ अथ गठिसह मुठिसद अभिग्रहके करनेका पाठ ॥ सूरे उग्गय गंठिसहियं मुठिसहियं पञ्चक्खामि चउन्विहपि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अ. नत्यणा भोगेणं सहसागारेणं* सव समाहिवति आ- गारेण वोसिरामि ॥ हिंदी पदार्य-(सूरे उम्गय) सूर्य उदयसे (गठिसहिय, मुष्टि- सहिय) ग्रथि सहित वा मुष्टि सहित (पञ्चश्वामि) प्रत्यास्यान करता हूँ (चउबिहपि ) चतुर्विधिक (आहार ) आहारका जैसेकि-( असण) अन्नकी जाति (पाण ) पानीकी जाति (खाइम) ग्वादिमको जाति (सा इम) स्वादिमको जाति ( अन्नत्थणा भोगेण ) अपितु विना उपयोग वस्तु ग्रहण की जाये (सहसागारण) अकस्मात् ग्रहण की जाये (सव्व स- जिस प्रत्याख्यानके पारणका समप आ जाए तय निम्नलिखित सूत्र अवश्य ही पढना चाहिए। समकायेण, न फासिय, न पालिय, मतिरिय,न विष्टिय, न सोहिय, न आराहिय आणाये, अणुपालिता न भवा, तस्स मिच्छामि दुबह ॥ किन्तु जिस प्रत्याख्यानका समय पूर्ण हो उसका नाम अवश्य ही लेना चाहिए ॥ तथा जय गुरोसे प्रत्याख्यान करा लेखे तप निम्नलिखित पाठ भी पटे सामायिक १ चवीसत्या २ वदना ३ परिकमणा ४ पचम काउसग ५ षष्टम पञ्चक्खान ६ अतीत कालकी आलोयना धर्तमान कालका सम्बर अ. नागत कालका पथक्वाण भगवान और गुरांकी भाज्ञा सहित हियाय सुहाय खमाय निसेस्साय अणुगामिताय भविसइ ॥ फिर दो नात्युग पाठोंको पठन करके सामायिक्फे कालको पूर्ण करे । * महत्तगगारेण!

माहित्ति आगारेण) सर्व प्रकारको समाधिके होनेपर (वोसिरामि) आ- हारको छोडता हू॥ भावार्थ-दोरादिकी गठिका अथवा मुष्टिववादिका अभिग्रह करे नैसकि-यावत् काल गाठ न खोलूगा तावत्काल पर्य्यन्त चतुरविधिक आहारका परित्याग करता हू । इसी प्रकार मुष्टि आदिकी भी सयोजना कर लेनी चाहिये ॥ अथ चतुर्दश नियम करनेवालेको दिशावकाशिक अभिग्रह करनेका पाठ॥ देशावगासि उवभोगं परिभोगं पञ्चक्खामि अन्नत्यणा भोगेणं सहसागारेणं वोतिरामि ।। हिंदी पदार्य-(देशावगासिय) देशावकाशिक व्रतका प्रमाण करना हो तथा (उवभाग ) जो एकवार भोगनेमे आवे तथा (परिभोग) जो पुन पुन आसेवन करनेमे आवे (पञ्चक्खामि) प्रत्याख्यान करता हू, किन्तु इतना विशेष है कि (अनत्थणा भोगेण) विना उपयोग ग्रहण की जाये वा (सहसागारेण ) अकस्मात् ग्रहण की जाये (वोसिरामि) सो इन आगारोके साथ त्याग करता हूँ ॥ भावार्थ-नित्यम् प्रति देशावकाशिफ व्रत धारण करना हो वा उपभोग परिभोगका परिमाण करना हो तो पूर्वोक्त आगारोंके साथ करना चाहिए, नित करके नतमे किसी प्रकारसे भी दोष न लगे और चतुर्दश नियम अवश्य ही ग्रहण करने चाहिये । इति श्री प्रत्यारव्यान सूत्र हिदी पदार्थयुक्त सम्पूर्णम्॥ इति श्री पडावश्यक सूत्र सम्पूर्णम् ॥

अथ तीन मनोर्थ विषय ॥ यह तीन मनोर्थ सर्व श्रावक वर्गको विचारने योग्य हैं जो निम्न लिखितानुसार हैं। तिहि ठाणेहिं समणोवासय महाणिजरे महा पजवसागे भवति कयाणं अहं अप्पं वा बहुयं वा परि. ग्गरं चइस्सामि। कयाणं अहं मुंडे भवित्ता आगारिउ अणगारियं पव्वइस्लामि । कयाणं अह अपच्छिम मारणंतिय संलेहणा झुसणा झुसिते भत्त पाण पडि. याखिने पाउवगत कालं अणवकंखमाणे विहरिस्सा- मि एवं समणसा सवयसा सकायला जागरमाणे पा. गडमाणे समोवालय महाणिजरे महापजवसाणे भवति ॥ ठाणाग सूत्र ठाणा ३-उद्देश ४ ॥ अर्य-तीन कारणोंमे श्रावक कोंकी परम निर्जा करके ज्ञानको प्राप्त कर लेता है, जैसेकि-श्रावक यह विचार ना करेकि-कव में अल्प वा बहुन परिग्रहका त्याग करूगा १ और कब मैं ससारको छोडकर दीक्षा ग्रहण करूगा २ तथा कब मैं इस अनित्य ससारको त्यागकर अ- नशन व्रत धारण करके पादोपगमन अनशनके साथ मृत्युको प्राप्त हो- उगा, सो इस प्रकारकी भावना श्रावक मन वचन कापके साथ करता हुआ महाकमोंकी निर्जरा करके मन्यग् ज्ञानको प्राप्त हो जाता है | सो सर्व सुज्ञ श्रावक वर्गको इस मावनाके द्वारा आत्माको विभूपिन करना चाहिये। ,

श्रावकोको मामायिकके ३२ दोष भी दूर करने नाहियें जो निम्न
लिखितानुसार है-
अथ वात्रिंशिनो दोषाणि ॥
दश मनके दोष
१ अविवेक-विवेक न करना यह प्रथम दोष है ।।
२ यशाकाक्षा दोप-यशको आकाक्षा करना दोष ॥
३ धनेच्छा दोप-चनकी इच्छा करना दोप ॥
४ गई दोप-अहकार करना दोष ।।
५ भय दोप-भय करे तो दोष ॥
६ नियागा दोष-किसी वस्तुको आशा करे तो दोष ॥
७ सशय दोप-सामायिकमें सशय करे तो दोष ॥
८ कपाय दोप-सामायिकमें क्रोध मान माया और लोभ करे तो कपाय
टोप होता है।
९ अविनय दोष-विनय न करे तो दोष ॥
१. अपमान दोन-तामायिका अमान करे तो दोर ॥
सो यह दश मनके दोष है ॥
दश वचन के दोष ॥
१ अलीक दोप-असत्य वचनका बोलना ।।
२ सहसाकार दोप-विना विचारे भाषण करना ।।
३ असापारग दोग-सम्यक्त्वके नाश करनेवाले शब्दोका उच्चारना ।।
४ निरापेसा दोप-शास्त्रसे विरुद्ध बोलना ॥
५ मषेप दोप-सामायिकके सूत्रको सक्षेप करना ।
६
लेप दोष केप करना ॥
७ विकथा दोप-वर्मोपदेश न करना ॥
८ हास्य दोष-किसी का हास्य करना ।
९ अशुद्ध दोप-अशुद्ध पाठ पढे ||

११२
१० मुम्मण दोप-कुछ स्पष्ट कुछ अस्पष्ट ऐसे पाठ पढे तो सामायिक में
दोष होता है । सो यह १० वचनके दोष हैं ।।
वारह कायके दोष ॥
१ अयोग्यासन-विना योग्य आसनके ऊपर बैठना ॥
२ चलासन-अस्थिर आसन करना ।।
३ चलदृष्टि दोप-दृष्टिको स्थिर न करे ।
४ सावध क्रिया-सावध कार्य करे ॥
५ आलबन दोप-भीतादिकी सहायतासे बेठे ।।
६ आकुचन पसारण दोप-विना यत्न सागोपाग आकुचन पसारण करे।
७ आलम्य दोप-आलस्य करना ॥
८ मोडन दोप-शरीरको मोडे ।
९ मल दोष-शरीरका मल उतारना ।
१० विमासन दोप-ससारकी चिंता करना ।
११ निद्रा दोष-सामायिक निद्रा लेना।
१२ वेयावृत्य-औरसे अपनी सेवा कराना ।। सो यह सर्व एकत्व करनेस
३२ दोप होते है, किन्तु इन दोषोमे रहित सामायिक करे अपितु
टोष दूर करनेका अधिकारी होवे क्योंकि अभ्यास करनेसे ही कार्य
सिद्ध हो जाता है ।।
फिर श्रावक प्रतिक्रमण करके पश्चात् १४ नियम भी यथाशक्ति
धारण करे---
१४ नियम गाथा सार्थ ॥
सचित्त १ दव्य २ विगई ३ पण्ही ४ तंबोल
५ वत्य ६ कुसुमेषु ७ वाहण ८ सयण ९ विले.
वण १० बंभ ११ दिसी १२ न्हाण १३ भनेसु १४ ॥

हिंदी पदार्थ-सवित्त) पृथ्वी आदि सचित वस्तुका प्रमाण (दव्य) द्रव्याका प्रमाग जैते अगुली विना नो मुखमे डाला जाय वह सर्व द्रव्य हे गया दुघ १ पाड २ इत्यादि (विगई) विगय प्रमाण से दुग्ध १ घृत २ तेल ३ नानीन ४ गुड ५ दधि ६ मयु ७ इत्यादि, (पण्ही) जुत्या विका प्रमाग (तबोर) ताम्बुलादिका प्रमाण ( वत्थ) वस्त्रोंका प्रमाग (कुसुमेह) पुप्पोका प्रमाण (वाहग ) सवारी आदिका प्रमाण यथा रेडादि ( सयण) शय्यादिका प्रमाण (विलवण) विलेपनका प्रमाण जैसे नेत्राअनादि (बम ) ब्रह्मचर्यका धारण करना अब्रह्मचर्यका त्याग करना (दिसी) दिशाओंका प्रमाग (न्हाण) स्नानका प्रमाण यथा एक बार हि- वार इत्यादि (भत्तेसु) सर्व वस्तुके बननका प्रमाण अर्थात् विना प्रमाण न ग्रहण करे ।। भावार्य-उक्त सूत्रमे यह वर्णन है कि गृहस्या नित्यम् प्रति यथाशक्ति तृष्णाका निरोप करता हुआ विना प्रमाग कोई भी वस्तु ग्रहण न करे ।। प्रतिक्रमणका मुख्य आश्य ।। प्रियवरो आवश्यकका आशय यह है कि सर्व प्राणियोसे मैत्रीमान वाग्ग करना और निज आत्माको सम्यर ज्ञान सम्यक् दर्शन सभ्यर चरित्रमे आरूद करना। पुन निन खरूपसे अनुप्रेक्षण करके तृप्गाको निरोच करना, आत्माको सदैव काल समाचारमें लगाना और अपने पूर्व- मत पापोंका पश्चाताप करते रहना किन्तु नृतन पापोसे अपनी आत्माको वमाना। फिर ऐसे प्रार्थना करना कि हे सर्वज्ञ देव मैं आपके मत्योपदेशके प्रभावमे सर्व जीवों का हितेपी बनना ह निज जात्माको अपने स्वरूप में गता है । हे अजर! आपके कथन किए हुए सत्य पदार्थोंको यथावत् ज्ञात करके मय जीवोंको सन्मार्गमे स्थापन करू । इत्यादि अनुप्रेक्षा करके सर्व प्राणियों पर परोपकार करना यही आवश्यकका मुख्य आशय है ।। ॐ शान्ति शान्ति शानि ॥

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* गुर्वावलि *
॥ भाकृत काव्यम् ॥
अणुत्तरे सहस्त गुणेहिं जुत्तो,
सायरोवरवंति दीहदंसीअहियं ।
नाहस्त सण्णा सिरि मोचीराम,
आयरिय आसी विसालकित्ती ॥१॥
तस्तंतेवासी पुण्णपुंजस्सामी,
कुम्म इव दंतो सलीव सोमो।
थेरे मुणि गणवइय नाम,
गणावच्छेइए जिन संघ हिएसी ॥२॥
तस्त सीस्सेय
महाणुभावो,
गुरुभतिकारय पण्णाल धोरो ।
विक्खाय कित्ती जयराम नाम,
रत्तोव्वएसुसयाऽप्पमत्तो ॥ ३ ॥
तस्स दिक्खिओ इंगियागारमंतो,
सुहुम नाणेसु अत्यि विसारय ।
नामथि जस्ति सिरि सालिग्गामं,
तेस्ति पसाएण लिहियोच गयं ॥४॥
गिहीव्वया दप्पणय संतिकत्ता,
आवस्सय सुयं अघतिमिर हत्ता ।
निच किञ्च वोहा वीरेण पण्णता,
चरित्तदाता मुक्ख मग्गनेत्ता ॥५॥
इम्मस्स सुयस्त हिंदी पयत्यं,
तहेव भावह सुयम विसुद्धं ।
लिहियं च अहं गुरु प्पसाओ,
उवज्झाय आयारामेण मया ॥६॥

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Shri Aavshyak Shutra Part-i

Author
Upadhay Shri Jain Muni Aatmaram
Title
Shri Aavshyak Shutra Part-i
File name
Shri Aavshyak Shutra Part-i
Text
OCR done
Citation
1915
Published
2011/01
Publisher
Dwava Educational Press Lahore
Language
Sanskrit
Pages
119
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546424
Barcode
4990010024900.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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