Sanmati Library, Jaipur

Charudatcharitr Bhasha

2009/11

PDF Proofread

Front matter

(१) चारुदत्तचरित्र भाषा। अभिनंदन सेवौं जगदीश जोरिहाथ चरनन धरि शीश ।। सुमतिसुमतिमतिकरणमहंत कुमतबुद्धिनाशनशुभसंता॥ पदमप्रभ बंदो जगसार । लहौं ज्ञान पाऊं शिवद्धार ॥ श्रीसुपार्श्व पूजों मनलाय । हरितवरण शोभे जिनकाय ॥९॥ चंद्रप्रभ बंदौं धरि ध्यान । करम काटि पहुँचे निखान । पुष्पदंत परमेश्वर देव । सुर नर सेव करें खगएव ॥१०॥ नमों नाथ शीतल जिनराय । पापहरण भव भव सुखदाय ॥ श्रीश्रेयांश नमों करजोरि।वरीमुक्ति सबपरिगहछोरि॥११॥ बंदों वासुपूज्य भगवान । चंपापुरि पहुंचे शिवथान ॥ नमो नमो जिनविमल जिनेशहरोसबहि संसारकलेश ॥१२॥ अनंतनाथ बंदों जिनराज । विधनहरण सारन शिवकाज॥ घरमनाथ सेवौं मनलाय । बाढ़े धर्म असुभ क्षयजाय॥१३॥ जय जय स्वामी शांति जिनंद। नामलेत भाजै दुखदंद ॥ कुंथुनाथ सेवौं अरहंत । कनक बरनतन अति सोभंत॥१४॥ अरजिनवरकी सेवा करौं । मनवचकाय चित्तमें धरों॥ नमो देव श्री मल्लिजिनंद ।सुमरत होय सिद्ध आनंद ॥१५॥ मुनिसुव्रत बंदों जिनराय । वंदत पाप दूरि सब जाय ॥ नमिजिनवर बंदौं विख्यात स्वामी करौकरमको घात॥१६॥ बंदों नेमिनाथ गिरिनारि बरीमुकति, तजिंराजुलनारि॥ पार्श्वनाथजिन त्रिभुवनचंद। सुमिरत कटें पापके वृंद॥१७॥ महावीर बंदों जगसार । धर्मतनों राख्यो व्यौहार ॥ अंतिम जिनवर जग आधार। पंचनामजाके सुखकार॥१८॥ तिनहींने उपदेश्यो धर्म । अबलों व्यापि रह्यो जगपर्म ॥

चारुदत्तचरित्र भाषा । सिद्धारथ कुंडलपुरपती । प्रियकारिनिजाके घर सती ॥१९॥ ताके उदरथकी जिनराज । उपजे तारन तरन जिहाज ॥ बालपने जिन दीक्षाधरी। कीरति जिनकीजगविस्तरी॥२०॥ दो। पंच नाम जिनके कहे, जग तारण सुखकार । सो सुनिये मनलायकें, भव्य जीव-चितधार ॥२१॥ सोरठा।। प्रथम नाम है वीर, वर्द्धमान जिन राज है। सन्मति अरु अतिवीर, महावीर पंचम करो ॥२२॥ चौपाई। पंच नाम जिनके सुखकार । जपें जीव पावें शिवदार ॥ चारिबीस बंदों जिनराय । बिहरमान बंदों सुखदाय२३॥ जय जय सीमंधर भगवान । सुमिरत होय पापकी हान। अंतम अजितवीर्य जगदीश देकर जोरिनमौ धरशीशरा काल चतुर्थ सदा जहँ रहै । भविजन मोक्ष संदाही लहै ।। बीस तीर्थकर जपि गुणमाल। प्रणमत होय दूर भ्रमजाल२५॥ दीप अढ़ाई में मुनि भए । निर्भय अभय अगोचर ठए । तिनके चरण नमो करजोरि। जातें कटै सकल भ्रमडोरि२६॥ पुनि पंच परम परमेष्टि देव । मनवचक्रमकरि नित करों सेव ॥ जयनमो देव अरहंत ईशातसु गुण अनंत प्रगटे सुदीश ॥२७॥ जय नमो सिद्धवर देवनाथ।जय अलखरूप त्रिभुवन सनाथ। जयजयआचारजगुणगहीर पूजतसुरनरखगमुनिशरीरका जय नमो परम उवझाय देव । तसु उदित गुण जगमैं सुएव॥ पद्धड़ी छंद ।

6406666004
(४)
चारुदत्तचरित्र भाषा ।
जयसाधुनमौ करजोरिवीर। अम्मृतसम वचनमहागहीर२९॥
तिनको बंदों कर जोरिजोरि । का, भवभव भ्रमजाल डोरि॥
अरु प्रणमौं गणधर गुणगहीर।चौदहसे त्रेपन धीर वीर॥३०॥
गुरदेव शास्त्र बंदौं महान । मति लहौं कुमतिकी होय हान॥
गुरुवंदौनिजमनत्यागिमान। उपजैबुधितिनतॆबहुनिधान३१॥
दोहा।
जिनमुखअम्बुजत कड़ी, त्रिभुअनमें विख्यात ।
द्वादशांग भापन कही, नमौं शारदा मात ॥ ३२ ॥
चौपाई।
विमलवरण वेदनमें कही । स्यादवाद गुण लच्छन सही।
जासुप्रसाद विमलमति लहैं । गुणकी खानिसुधीसव कहैं३३॥
पटदरशन मुखमंडन सार । गलें सांकरी मुक्ताहार ॥
कानन कुंडल मणिमय सार। मुक्तामाणिक मांग सम्हार ३४॥
पग नेवर बाजै पैंजनी । लागे माणिक हीरा कनी॥
पहिरे उज्वल वरण सुचीर। कनककांतिसम दिपै शरीर ३५॥
लिये बीन कर चड़ीमराल । भारति शारद गुणह विशाल ॥
मूरख सुमिरे पंडित होय । पापपंकको डारै धोय ॥ ३६ ॥
बार बार प्रणमूं धरि भाउ । शारद मोपर करौ सहाउ ॥
हीनबुद्धि मेरी अतिमंद । करिनो चहों चौपईबंद ॥ ३७ ॥
चारुदत्त श्रेष्ठीकी कथा । सुनत मजै पातक सरबथा ॥
मूरख हौं अति अपढ़ अजानालघुदीरघ जानौं नहिं वान ३८॥
भारति मोपर कर उपगार । उपजै बुद्धि होय विस्तार
तुम प्रसाद कर लेखनि गहौं। सेठकथा विधसेती कहीं ॥३९॥

चारुदत्तचरित्र भाषा। (५) सोरठा। कुंडलिया माय शारदा सुमति दै, कहाँ चरित्र बनाय ॥ हीनबुद्धि निज ध्याव ही, कृपा करो बिहसाय ॥ कृपा करो बिहसाय माय तुम सब सुख करनी ॥ दीजै बुद्धि गणेश शेश खग मुखतें वरणी ॥ हाथ जोरि करि कहौं भाग्य” हमने पाई। बुद्धि हमारी हीन सुमति दै शारद माई ॥ ४०॥ विद्या अरु भंडार, जो मांगै सो पाइये । किमि आयो संसार, जापै वरु तेरों नहीं ॥ ११ ॥ दोहा। जोरि पाणि तुम चरनकों, नमत सु बारंबार । करौ सुमति जनमल्लकों, होय कथन विस्तार ॥ ४२ ॥ देवशास्त्र गुरु बंदना, करि मनमें सुखपाय । चारुदत्त चारित्र इह, कहाँ सुनौ भवि भाय ॥ ४३ ॥ आगें आचारज भये, सोमकीर्ति गुणराशि । तिन यह कीनो चरितवर, स्वयं शक्ति परकाशि ॥४४॥ चौपाई। ज्यौं उन रच्यो चरित सुखदाय । गुरुबुधि नाना भेद बताय॥ त्यों उनकी सरबर नहिं होय । वेतौ ज्ञानवान बहु लोय ॥१५ पर हों तुच्छ बुद्धिधरिचित्त । निजबुधि माफक रचहुँ चरित्त। जैसे जल गंगाको लेय । फेरि धार गंगाको देय ॥४६॥ बड़े पुरुष जे जगमैं कोय । तिन सरवरि तुछ बात नहोय॥ १गणघर । २ श्रेष्ठ।

(६) चारुदत्तचरित्र भापा। तौबे आचारज गुणवाना कीनौ अनुपम चरित बखान॥४७॥ हों पुनि निजबुधि के अनुसार । रविहीं चारुदत्त गुण सार॥ मैं संक्षेप चरित अव कहाँ। पूरवरचित अनुक्रम लहौं ॥४८॥ भव्यजीव सुनिये मनलाय । महापुण्य फलदाइक भाय ॥ सुनत चरित सुर शिव सुखहोयामहिमा और बतावै कोय॥४९॥ सारठा । लोक तीनिपरकार, सुरपुर नरपुर नागपुर । तिनमैं है शिरदार, मध्यलोक महिमा अतुल ॥५०॥ अडिल्ल। द्वीप अढ़ाई जासुमझार विराजहीं। उपजें जहँ सुभलोय मुकतिके काजहीं । तिनके मध्य जु द्वीप होय शिरदार है। जंबू दीप जु सोय कहावै सार है ॥५१॥ चौपई। असंख्यात दीपनमें जान । जंबूदीप मध्य परवान ॥ ज्यौं चक्री नृपगणमें आय । त्यों इह दीपनमें सोभाय॥५२॥ जंबुदीप जाने सब कोय । सब दीपनमें उत्तम सोय ॥ ताके मध्य सुदर्शन मेर । ताहि रह्यो लवणोदधि घेर॥५३॥ सोभै जोजन लाख प्रमान । जोजन सहसदश मोटो जान ॥ षोड़श जिनपर बने अवास। सोभत चारौं वन चहुँपास ॥५४॥ भद्रशाल नंदन सुभ जान । अरु सौमानश पांडु बखान ॥ तिनकी महिमा अगम अपा। कबलग भाषौं सब विस्तार॥५५॥ दोहा। पूरब पश्चिम मेरुकी, क्षेत्र विदेह बखान ।

1०००००० चारुदत्तचरित्र भापा। , पखड़ी छन्द । (७) उत्तर ऐरावत कह्यो, दक्षिण भरत प्रमान ॥५६॥ यह भरतक्षेत्र क्षेत्रनप्रधान । ता मधि पटखंड विराजमान । आरज इक पंच मलेच्छ जानाभाखेश्रीजिनवर गुणनिधान। जिनवर चौबीस जहाँ सु होय । चक्री हरि इत्यादिक जुलाय॥ अरुआरजअवरजुहोयजीवातसुआरजनामकहेंसदीव ॥५८॥ सो आरजखंड महाप्रधान । तामध्य देश नाना महान ॥ जहँमुनिवरकरतविहारनित्त। उपदेशदेतभविजनसुचित्त॥५९॥ दोहा । सुरग मुकति जहते लहें, भव्यजीव सुखकार । पूजनीक तहकी मही, सबदेशन शिरदार ॥६०॥ तामधि देश मगध शिरमौर। जहां बने बहु अदभुत ठौर ॥ वापी कूप बने बहु बाग। करें कोकिला पंचम राग ॥६॥ ताल तोयानरमलसों भरे । कमल कुसुमसौं सोभित खरे ॥ बन उपवन सर सोभा धनी। वृच्छजाति सोजाय न गनी॥ फल अरु फूल लगे बहु भाय । पंथीजनकी भूख पलाय॥ उपमा कहत न आवै पार । बाड़े कथा होय विस्तार ॥६३॥ बस्तु मनोहर दीखे भली । अरु सेवक मन उपजै रली ॥ नगर बसहि राजग्रहि थान । सोभैजसे सुरग बिमान ॥६४॥ गढ़ मढ़ खाई कोट उतंग । तोरन चारौंदिशि सुभ रंग ॥ मुनिवरनाथ धरहिं तहँ ध्यान।कंचनत्रण जिन एक समान ॥ ऋद्धिवंत जोगीश्वर धीर । परिगहत्यागि बसे बन वीर ॥ करें घोर तप मनबचकाय । सहें परीषह वाइस भाय ॥६६॥ चौपाह। - . MAAWA (८) चारुदत्तचरित्र भापा। केवल पाय मुकति सो जाय । फेरि न आवागमन कराय ॥ नगर मध्य सोभत जिनथान । कंचनकलश धरे असमान६७॥ चमर छत्र सिंहासन सार । सोभित तोरण बंदनवार ॥ जिनवरबिंब धरे तिनमाहि। पूजत श्रावकजन हुलसाहिं६८॥ घर घर बिंबप्रतिष्ठा होय । खरचैं द्रव्य सवै भवि लोय ॥ ऊंचे मंदिर पौरि पगार । सात भूमि ऊपर विस्तार ॥ ६९ ॥ और कहा महिमा बहु कहैं । देव जहांपर उतपति चहैं । पुरकी महिमा है बहु धनी। सोमोपर सबजाय न भनी ७०॥ राज करै श्रेनिक नृप जहां । सुखकरि राजत हैं सुभतहां ॥ पालै परजान्याय समान। सबकों मनवांछित सुखदान॥७९॥ धर्म सुभावी श्रुत आचार । नीतिशास्त्रको जाननहार ॥ कल्पवृक्ष सम दाता जान । भोगी जानौ इंद्र समान ॥ ७२ दोहा। सूरज सम परताप जस, रूप जिस्यौ वर काम । बुद्धि जिसी-शारद सुता, कांति जिसी शशिधाम ॥७३॥ पररमनी परद्रव्यको, जाकें त्याग सदीव । इत्यादिक गुण जावि., कहि नहिं सकौं अतीव ॥७४ ॥ पुहमिपाल ऐसो नृपति, राज करै सुखकारि। सती चेलना तासुघर, रानी है पटनारि ॥ ७५ ॥ डिल्ल। सर्व कला संयुक्त रूपगुण सोहनी । चंद्रमुखी मृग नयनि सबन मन मोहनी ॥ . सोभत चालिमराल बचनपिक चातुरी। लक्षण सिंधुसमान शीलगुण गातुरी ॥७६॥ . 1 चारुदत्चचरित्र भाषा। (१) चौपाई। कामदेवके ज्यौं रतिनारि । ज्यौं शाशके रोहिनि शिरदार। ज्यों हरिके इंद्रानी कही। त्यों नपघर जु चेलनासही ॥७७॥ शीलवती अरुगुणकी खानि। पतिकी प्यारी अधिक सुजानि। धर्मध्यानमें राखै चित्त । जिनयात्रादि उछाह पवित्त ॥७॥ नितप्रति चारौं दान कराय । तासौं लहै सुरगपद जाय ताके गुणको वरणन कहीं। बढ़े कथन कछु अंतन लहों ॥७९॥ नगरीमार्हि बसें बहु लोय । दीन दुखी दीखै नहिं कोय ॥ ताके राज करें सब भोग । पानफूल रस नाना जोग ।।८०|| सकल प्रजा निज सुखमैं रहै । कास्की भय नाहीं लहै । निरभय सर्व सुखीजन सदा। नृपआज्ञा मानै सर्वदा ।।८९॥ एक दिना निजसभामझार । बैठे नृपति जोरि दरबार । सिंहासन बैठे विहसाय । ऊपर चंदवा छत्र तनाय ॥२॥ दोहा। राजमंत्र सब करत जह, सोभित श्रेणिकराय । बनपालक आयो तबै, शिरनायो बहु भाय ॥३॥ पटऋतुके फल फूल, अवर हरी इत्यादि बहु । धरेरायके कूल, हाथ जोरि लाग्यो कहन ॥४॥ हे राजनके शिर राजान । विपुलाचल परवत सुभथान ॥ आयो समवशरण भगवंत । बर्द्धमान खामी अरहंत ॥८॥ दर्शन करत पाप सबजाय । अमरलोक तिहठां रह्योआय ॥ इंद्र चंद्र खग सेवत शेश। तिनकों नमत बहुत अमरेश ॥८६॥ सोरहा। चौपाई। ३

सोरठा।
चारुदचरिन भाषा।
जिनथुति करत देव बहुभाय । खड़गासन सब सोभित राय॥
तिनकी महिमा कही न जायाअतिशय और सुनौ होराय८७॥
पटऋतुके फलफूल अपार । सब फूले नाना परकार ॥
ताल तमाल भरे सब तोय । सोभा देखत बहुसुख होय ॥८॥
गऊ सिंघ इकथान, बैठे बहुत सनेहसौं ।
मंजारी अरु खान, मूषकादि बहु जीव तहँ ॥ ८९ ॥
नेह सबनमें परस्पर, बेरभाव नहिं कोय ।
आनँद बहु राजें सकल, निज निज कोठा सोय ॥९०॥
होत कौतूहल सु बहुविध बजत दुंदभि जोर हैं
तह अमर खेचर नटत गंध्रव करत भक्ति जु घोर हैं।
जहँ तीनलोक विभूति राजत बंदने सब आवहीं ।
महिमा बड़ाई कहत जिनकी पार को नर पावहीं ॥११॥
दोहा।
गीता छन्द ।
चाल छंद।
१
ऐसी सुनि श्रेणिकराई । आनंद्यो अंग न माई ।।
तब ताहि पसाव जु कीनो । तसु दान ततक्षण दीनो ॥१२॥
भूषण आभरण अपार । बहु दीने लागि न बार ।।
आसन तै उठि जब राई । उपज्यो सुख बहु मनमाहीं ॥२३॥
आगे चाल्यो पद सात । कर जोर नम्यो जिननाथ ॥
पुर आनंद भेरि दिवाई। चलिये पूजन जिनराई ॥१४॥
राजा निज सैना साजी। जिन पूजन मन अहलादी॥
पटबंध चेलना रानी। परिवार सहित अगवानी ॥१५॥

चारुदपचरित्र भाषा। (११) परमा लीनी सब साथ । पूजन चाले जिननाथ ॥ सब द्रव्य सम्हार जु लीनी । जिनपूजनजोग भलीनी ॥१६॥ चौपाई। गुण बरनत सब पहुंचे तहां । समवशरण जिनवरको जहां ॥ निजवाहनतें उतरे सबै।मानस्थंभ देखियो जबै ॥ ९७ ॥ बारह कोठा सोभित खरे । कनक कुंभ तिन ऊपर धरे । धनपति आय आप निर्मयो। चहिये जहां तहां सोठयो॥९॥ मणि माणिकमय खचित अपार। तीनकोट सोभित दरबार।। जाकी सोभा बरनि जुकहौं। बाकथा अंत नहिं लहौं ॥१९॥ दोहा। जय जय जय सब करतनर, कीनो तहां प्रवेश । बहु आनंद मनमें लयो, छबि अविलोक नरेश ॥१०॥ श्रीजिन अतिशय वंत, ज्ञान उपायो जगतमें। प्रातहार्य वसु भंत, सोभित जिनसमवोशरण ॥१०१॥ सिंहपीठ सोभंत, मणिमय कंचन जड़ितसो । अतरीक्ष अरहंत, सोभित जिनमूरति सुभग ॥१२॥ भडिल्ल। चौसठि चमर दुरंत सु भामंडल महा । तनकी क्रांति निहारि कोटि रवि लुकि रहा ॥ सर्व शोक अपहारि अशोक निहारियै । कल्पवृक्ष के फूल सुवृष्टि अपारियै ॥ १०३ ॥ साडेबारह कोटि जाति बाजे बजे। तिनके सोर अपार होत जगमें गजें। सोरठा।

- (१२) चारुदत्तचरित्र भाषा। सब संदेह निवारि जु भाषा देवकी बानी खिरै त्रिकाल जिनेश्वर देवकी ॥ १०४ ॥ दोहा। निज निज कोठा जीव सब, बैठे आनंद रंग। भाषा उछरे देवकी, समझे सबजिय अंग ॥ १०५ ॥ सोरठा। दई प्रदक्षिण तीन, भूपधोक करजोरिके। बहु आनंदमें भीनि, नृप अस्तुति लाग्यो करन ॥१०॥ पड़ी छंद। जथ जरामरणभौ हरण देव ।जय मुक्तिवधू परमेश एव॥ जयउद्यतज्योति जुजगप्रचंड जयगुणअनंत छयालीसमंड। अतिशय चौतीस विराजमान।जय केवलज्ञान प्रकाशमान जयदोष अठारह रहितएव । जयमानरहित अरहंतदेव॥१०॥ जयसहनपरीसह बीसदोय। जयनिराभरण मलरहित सोय॥ जयभवनाशनदुखकरमत्रास। जयमुकतिसुःखकरज्ञानभास ॥ जय मोहमल्ल दलमलन ईस । वंशकरन काम विश्वा जु बीस ॥ जयं धरमधुरंघरजगतराय। सुरअसुर शेषखग परैपाय ॥११०॥ जय तीनलोकशोभाधरंत। ताछबिलखिकोटिसुरविछिपंत ॥ नृपअस्तुतिकरतनहींअघायांकरजोरिशीशनिजनायनाय १११ महिल। गौतमं गणधर स्वामि महा गुणआगरे । तिनहिं नमो करजोरि नृपतिपग लागरे ॥ और मुनिनके बंद तिनहिं अवलोकिके । नमस्कार करजोरि कियो नृप धोकिके ॥११२॥ 1 - चारुदत्तचरित्र भाषा। (१३) चौपाई। दिव्यध्वनि जिनवरकी भई । गणधर परखि ततक्षण लई ।। मनुष देव खग पशु सबकोय । अमृतवानी पीवें सोय ॥११३॥ उत्तम छमाआदि दशअंग । ते गणधर भाषे सरवंग ॥ चारित तेरहविध यतिधर्म। गणधर कह्यो सबै व्रतमर्म ॥११॥ गृहवासी श्रावक आचार । गौतम कह्यो सबै विस्तार ॥ सुने बचन तिनके जु नरिंद । मनमैं लयो परमआनंद ॥११५॥ तव श्रेणिक निजशीशनमाय। बोले मनवचकर विहसाय ॥ हे! स्वामीगौतमजिनईश। वेश्यारतफलकहिजगदीश।।११।। गणिकाव्यसन गह्यो किनिचाहि। कहाभयोफल निश्चैताहि॥ किहप्रकार वेश्याघर गयो। किहप्रकार ताको दुखभयो ११७॥ सो कहिये जगतारण देव । तब गणधर बोले स्वयमेव ॥ चारुदत्त इक सेठकुमार।तिन सेयो गणिका दरबार ॥१९॥ ताको कहाँ सबै विरतंत । सुन भूपति तू मनधर संत ॥ वेश्याव्यसन फलभयोनिदान। सोसुनिये राजन देकान ११९॥ जम्बूद्वीप दीपन शिरदार । जोजनलाख जासु विस्तार ॥ चहूंफेरि तहँ सागर बहै। अति अथाह कोउ पारन लहै १२०॥ भरतक्षेत्र तामधि सुखकार । सबक्षेत्रनमें है शिरदार ॥ तामधि आरजखंड प्रधान । ताकी महिमा कही महान १२१॥ कालचतुर्थ होय शुभ जबै । पुरुष सलाका उपजै तबै ॥ तामधिदेशअनेकदिपंत । कहतसुनतजिनकोनहिअंत १२२॥ अंगदेश देशन शिरमौर । शोभा कहत बनैं नहिं और।। चंपापुरि नगरी तहँ बसे। सुरगपुरी सम शोभा लसै॥१२॥ गढ़ मढ़ खाई कोट उतंग । दरवाजे सोहे नवरंग ।।

(१४) चारुदत्तचरित्र भाषा। बन उपवन सरसी बहुबाग। देखत मनवाडै अनुराग ॥१२४॥ बरनों कहा तहांकी रीति । बहुत गुणीसों राखें प्रीति ॥ सबै लोग से जिनधर्म। पूजा दान करें तजिभर्म ॥१२५।। धन कन पूरण शोभित सोय । दीन दुखी दीपेनहि कोय ।। घर घर आनंद मंगल करें। भोग विलास सुक्ख विस्त ॥१२॥ घर घर सब वेदध्वनि करें । शास्त्र पुराण कंठ उच्चरें ॥ सामुद्रिक व्याकरण अपार । सबके अर्थ करें निर्धार ॥१२७॥ कहूं विविध विद्याधर करें । कहुं संगीत कला उच्चरें ॥ कई गुनीजन गावेंगीत। कहूं तमासे अदभुत कीते ॥१२॥ शोमैं शोभावत बजार । महिमा बहुत न आवै पार ॥ कहुं हीरा मुक्ता मणि धरे। कहुं गहने रतननसों जरे॥१२९॥ कहुं मेवा कहुं मधुरसुवास । लगत हृदय जन अधिकहलास। अतिउतंगशोभित जहँधाम । तोरनपौरि बंधेअभिराम१३०॥ उज्वल अति शोभित सतखने । मानो स्वर्गपुरी तैं बने । चित्रलिखे सोभितहैं दारघर घरहोत उछाहअपार ॥१३१।। कहूं जिनेश्वरभवन उतंग । उज्वल वरन दिपै सरबंग ।। कंचनकलश धरे असमान । फहराती तहँ धुजा महान १३२॥ दोहा। रतनमई प्रतिमा सुभग, राजै तिनमधि सोय । मानो शक्रविमान यह, रच्यो विधाता कोय ॥१३३॥ जैनधर्ममें रत सबै, दिनप्रति दान कराय।। जिनपूजा उत्साह बहु, खरचत धन निजभाय ॥१३४॥ तालतमाल बने चहुंपास । निर्मल जल कमलिनी विकाश।। चौपाई। १कीर्तन।

चारुदत्तचरित्र भाषा। (१५) पावसऋतु बरषै जलधार फूलै फलै लाखदश बार ॥ १३५॥ भोगभूमिके सुख हैं जहां । पौनि छतीस बसें शुभ तहां ॥ शोभाकहत न आवै पार। बाकथा होय विस्तार ॥ १३६ ॥ राजकर अवनीपति राय । नाम विमलबाहन सुखदाय ॥ नीतिनिपुण नरराजहि करै। बैरी कोइ नधीरज धरै॥१३७॥ ताके राज करें सबभोग । पान फूल आदिक संयोग । ताविभूति बरनीनहिं जाय।दलबलकरि शोभितअधिकाय॥ भपिल्ल। महा गुणनकी धाम जासुघर कामिनी। विमलमती पटनारि सबन मन भामिनी ॥ रूपकला संयुक्त वदन शशि रोहिनी॥ कनकक्रांति समगात दिपै मृगलोचनी ॥१३९॥ विमलमती नृपके घर तिया। जैसे रामचंद्र घर सिया ॥ जैसे शंकर गौरी नेह । तैसे नृपके रानी गेह ॥ १० ॥ ता सम रूप न दूजी बाम । निजपति प्रेम बढ़ावै काम ॥ शीलादिकगुणजामैंसार । करहिकेलिसुखनिजभरतार १४१॥ पांचपुत्र ताके घर भये । तिनके नाम सुजन इम दये ॥ प्रथम नंद हरिसिंह कुमार।गोमुख दूजो जान कुमार ॥१४२॥ कहो बराहक तीजो बाल । चौथो परतप जानोलाल । पंचम नाम कह्यो मरुभूत ।या विध सबके नाम सजूत।।१४३॥ भूप लखे पांचौ निजनंद । मात पिता बहु पाय अनंद ।। विद्याभ्यास करेंये तब शस्त्र शास्त्र छत्रिय विध सबै॥१४॥ जिनके गुणको बर्णन कहों । बादै कथा खेद बहु लहों । चौपाई।

सोरठा।
(१६)
चारुदत्तचरित्र भाषा।
ऐसी विध राजै भूपाल। सुखमैं जात नजान्यो काल॥१४॥
ता पुर मध्य बणिक इक बसै । राज दुवार बढ़ाई लसै।
भानुदत कोटीधुज साह । आदर बहुत करैनरनाह ॥१४॥
बनिजै हीरालाल दिनार । बेचै माणिक मुक्ताहार ।।
मणिकंचन भूषन अभिराम आदर बहुत रायघर ताम॥१४७॥
सेठि महाधनवान, नारी देवल तासु गृह ।
प्यारी पान समान, पति आज्ञा चलतिसो ॥१८॥
रतिरंभा उनहारि, रची विधाता रूप मय ।
चंद्रमुखी सो नारि, निजपिय प्रेम बढ़ावही ॥१४९॥
शशि रवि किरनि कपोलछबि, शुक नासा पिकबैन ।
अलि अलके आनन कमल, मृगलोचन छवि ऐन ॥१५०॥
उर उतंग कंचन कलश, नाभि गहिर कटि छीन ॥
कंचन सम तन ज्योति है, सुंदर रति छबिछीन ॥१५१॥
दोहा।
चौपाई।
सोई नारि सदा सुंदरी । पतिसौं प्रेम शीलगुन भरी ॥
पतिके वचन लेयनिजमानिासोईकामिनिगुनकीखानि॥१५२॥
शील सरूप नाथके नेह । विना पुण्य को पावै एह ॥
जे उत्तम गुन नारिन तने। ते सबरे सेठिनिमें घने ॥१५३॥
पतिसों प्रेम आन सब तात । जानै नहीं रैनदिन जात ॥
सेठिनिसेठदेखि सबलोग। विधना भलो कियोसंयोग ॥१५॥
नारिपुरुष बहु सुखमै रहैं । मुखतें कटुकबचन नहिं कहैं ।
पुत्र नाहिं ताके घर कोय। पुत्र बियोग धरै बहु सोय ॥१५५॥

दोहा। 64866600 चारुदत्तचरित्र भाषा। (१७) पुत्रअर्थ पूजे सु कुदेव । यक्ष यक्षणी मनबच एव ॥ एकदिनाकी कहीनजाय।सुमति नाम आएमुनिराय ॥१५७॥ पूजति सेठिनि यक्षबनाय । देखी पूजत तब मुनिराय ॥ निरखि ताहि पूजत मिथ्यात।तव मुनिवर इमबचन कहात॥ मुनिवर बोले बचन तब, सुनि सेठिनि मनलाय । क्यों पूजति मिथ्यात तू, कहु पुत्री समझाय ॥१५९॥ चौपाई। देकरजोरि नई मुनिपाय । तब बोली सेठिनि शिरनाय॥ हे खामी ! मैं कैसे करौं । पुत्र वियोग बहुतदुख धरौं ॥१६०॥ मेरे गेह पुत्र नहीं कोय । तात. दुख मोको बहु होय ॥ पुत्रशोक मो भयोकुभाय।तब पूजति मिथ्यात अवाय ॥१६१॥ फिरि बोले तब मुनिवर धीर । पुत्री दुखमति करौ सरीर ॥ तेरे पुत्र होय परधान । पै कछुकाल गये दिनमान ॥१६॥ तेरे नंद होयसी एव । हे पुत्री ! मति पूजि कुदेव ॥ जे दुर्काज विचारें कोय । बहु दुख लहैं अंतमें सोय ।।१६३।। पूजत सुता कुदेवकौं, जिय सम्यक्त विलाय । धर्म कर्म सब बीसरे, जाप क्रिया सब जाय ॥१६॥ जिनके जिय समकित नहीं, ते सठ दुष्ट सुभाय ॥ खम मात्र नहिंसुख लहैं, अंत नरक गति जाय ॥१६५॥ ध्यावत जे मिथ्यातकों, छोड़ि आपनो देव । नरक तनौ ते दुख लहैं, नीच वास फिर एव ॥१६॥ ताते श्रीजिनबिंबको, सेवौ मन बचकाय । जैन धर्म सेवौ सदा, भव भव मैं सुखदाय ॥१६७॥ दोहा। 00000 ३ awa (१८) चारुदत्तचरित्र भाषा। चौपाई। पुत्री मन राखो तुम धीर, तुमरे नंद होय बलवीर ॥ मुनि बच सुनि सेठिनि तिहबार। तबही उपज्योसुख अतिसार मुनि वचकी परतीति उपाय। जानी जिनवच सत्तिबनाय॥ मुनिकौं नमस्कार करि भाय । तब मुनि गये शैल हरखाय॥ सोरठा। । । मुनिवर बचन प्रमान, लिये गांठि तिन बांधिके । पश्चिम ऊगै भान, झूठ न करें वखान मुनि ॥१७०॥ दोहा। नितप्रति श्रीजिन बिंबकों, पूजे मनबच सोय । घरै ध्यान दृढ़ चित्तकर, व्रत उपवाशक जोय ॥१७॥ अडिल्लं। कर जु ओंग विलास सदा निजधाम जू । सुखसौं बीतत काल रहे पति बाम जू ॥ गर्भ देविला जोग रह्यो सुखदाय है। लह्यो महा आनंद कह्यों नहिं जाय है ॥१७॥ जननी उर कछु कियो,जनाब जु आनिके। चलै पसेव जु देह सिथल तब जानिके ॥ मंद मंद गति सोय चरण भूपर धरे । बढ़त जु ऊचे ठौर अधिक तसु मन डरै ॥१७३॥ चौपाई। अधिक सुहाय फूलकी बास । मधुर सरस मुख दीजै ग्रास ॥ दिन दिन गर्भ वृद्धि. तब-भई। कनक बरन ताकी छबि छई। नितप्रति आनँद -भोग-विलास । पूरण गर्भ भये नवमास ॥ 000000000 ०००००० चारुदत्तचरित्र भापा। (१९) नव मैं मास भयो सुतसार। सब लक्षण पूरन गुन धार॥१७५॥ सुतमुखलाख माता सुखि भई।सुनिकरि भानु खुसी अधिकई पुत्र महोत्सव सेठि जु करें । खरचैं धन बहुआनंद भरें।१७६॥ दुखी दरिदिनिकौं दे दान । सज्जन लोक करै सनमान ॥ करे वधाई मंगलचार । पुत्र जनम को जो व्योहार ॥१७७॥ जे जन आय बधाई देत । तिनकौं धन दे हरख समेत ॥ जो मांगेताको सो देय । दान देत जगमैं जस लेय ॥१७८॥ दान समान न जगमें कोय । भोग भूमि दानहिं तें होय गावेंगीत नारि रस भरी । देय तमोल सेठितिस घरी॥१७९॥ वाजे बाजें मंगल रूप। जनम -उछाह इत्यादि अनूप ॥ दान साहने वहविध दयो। सवही कों नाना सुखभयो॥१८०॥ बालक बादश दिनको भयो । सेठि तबै मनमें सुख लयो ।। ज्योतिष श्रुत के जानन हार। पंडित बुलवाये तिहबार॥१८॥ पंडितजन दीनो तब नाम । चारुदत्त सब गुण अभिराम ॥ मात पिताको बहु सुख भयो। स्वजन लोगबहुआनंद लयो । बाढ़े बालक कर संचरे । दिन दूनी तन शोमा धरै ।। अन्नपान रस पोखैबाल। बैज चंद्र सम बढ़े विशाल । १८३॥ बालक बरप सात को भयो । पंडित आगे पढ़ने गयो । कियोमहोच्छव जिनवर थानासजनजन दीनों बहु दान१८४|| गुरुकी विनय कराय, त्यो त्यो बुधि अधिकी बढ़े। पढ़े शास्त्र अधिकाय, सब विद्यामें निपुण है ॥१८५|| दोहा। अलंकार अरु छंद बहु, सामुद्रिक गुण लीन । वेद न्याय अरु तरक शुभ, पढ्यो कला परवीन ॥१८॥ सोरठा ।

44444 6644444666 (२०) चारुदत्तचरित्र भाषा। नीति शास्त्र ज्योतिप गणित, नाद गीत बुधिवान । आगम वैद्यक वाद बहु, दूत शास्त्र गुणखान ॥१८७॥ कोक आदि लक्षण पुरुप, तिय लक्षण शुभसार । शस्त्र आदि विद्या अतुल, पढ़ी सबै सुखकार ॥१८॥ ग्रंथ आदि तिन व्याकरन, पड़े सर्व गुरु पास । जेनशास्त्र सिद्धांतमें, निपुन भयो गुनरास ।। १८९ ॥ नृपके पंच प्रधान सुत, तिन सँग खेले वाल । शस्त्र शास्त्र विद्या सबे, सीखी सर्व रसाल ॥ १९ ॥ अदिल्ल। सव विद्यामें निपुन सोय बहुविध भयो । तर्क छन्द इत्यादि महाचातुर ठयो । भूप सुतनके संग केलि निशिदिन करें। परस्परस्पर नेह सबै निज उर धरै ॥ १९१ ।। श्रीजिनवरकी भक्ति करे चितचाबसों। पूजा तीरथ जाप दान दे भावसी ।। राखे मनमें सदा मंत्रनवकार है। तात इंह सुख होय लहे शिवदार है ।। १९२ ।। ऐसी विध वह आनंद करें । भांति भांति क्रीड़ा विस्तरै ।। अब इहकथा रही इसठौर। आगे कथनसुनौ अवऔर १९३।। चंपापुरि नगरीके अंग । वाहिर परवत महाउतंग ।। गिरिमंदार तासुको नाम।तापर वने, जिनेश्वर धाम ॥१९॥ ताऊपर जमधर मुनिराय । लही मुक्ति वसुकर्म खिपाय ॥ पूजनीक है जहँकी मही जात निमित आवें सब नहीं ॥१९५॥ 40000000000000000000000 चंपा।

चारुदत्तचरित्र भाषा। (२१) मंगसरमास पक्ष शशि भ्राता हरिहरि बरस लगे तहँ जाते। आयोजबहीं मंगसरमास। तबसब परिजन हियेहुलास१९६॥ पूजन योग द्रव्यले सबै । निज निजवाहन चड़िकरि तबै ।। राजादिक सव परजा लोग गए सर्वजन जात्रा जोग॥१९७॥ चारुदत्तभी तिहठां गयो । करी जात बहु आनंद लयो॥ जात्राकरि फिर उतरयो सोय । मंत्रीसाथ और नहिं कोय ॥ क्रीड़ानिमित.गयो सो तहां । सरिता तीर बाग इक जहां। देखि मनोहर बाग रसाल।चारुदत्त अतिभयो खुसाल १९९॥ तरुवर सवफूले अधिकार । शीतलछाया बहु सुखकार ॥ फरे नारियर जहांअभंग। फरीं नरंगी बहुत सुरंग॥ २०० ॥ बहुत भांति अमृतफल केर। सघन दाख दारों द्रुम र ॥ नीबू हरे विजौरा नेक। ताल खजूर सुपारी एक ॥ २०१ ॥ फरे कदम तरुवर बहुताम । अनन्नास आडू अरु आम ॥ कटहर बड़हर वर आचार । कैथ सदाफल तूत अनार ।।२०२।। फूली केतकि चंपोबेलि । रायचमेली खूजा केलि ॥ दौना सदागुलाब निवारि। गुलहर कनइल हारसिंगार २०३॥ और फरे वहुभांतिन फूल । तरुसाखा गिनती नहिंमूल ॥ पत्र पुहप फूले अधिकाय।ताकी शोभा कही न जाय ॥२०॥ सरबर नीर भरे चहुँपास । तिनमैं कमलिनिधरै विकास ॥ बौलें कोकिल मधुरे बैन । बोलत सारो हरियल ऐन ॥२०५॥ चकई चकवा और चकोर । बिच विच बोलें खुमरी मोर जोसब शोभा वरनन कहाँ। कहतकथा कछुअंत न लहौं२०६॥ बागबन्यो बहुतै अभिराम । सेठिकुमर करि क्रीड़ा ताम ॥ भ्रमनकरत फिरतो तिहँठौर। देख्योतरु ऊंचो इकऔर२०७॥ १ यात्रामला।

००६ 6666 चारुदत्तचरित्र भाषा । (२२) सोरठा। ऊंची दृष्टि निहारि, चारुदत्त देखत भयो । तरुकी साखालार, कील्यो एक पुरुष तहां ॥ २०८ ॥ मूर्छावंत अपाय, खबरि नहीं तनकी तिसै । दयाभई तसु आय, चढ्यो विरछ साखा तबै ॥ २०९ ॥ दोहा। देखिविमान रसाल तहँ, मनमैं चिसो सोय । इह विद्याधर है सही, वैर कियो किनि लोय ॥ २१० ॥ तिनयह कील्यो आनकर, जीवघातके भाय । अबतक प्रान बचे सही, कीजै कछु उपाय ॥ २११ ॥ तसु विमान ढूंड्यो तबै, देखी गुटिका तीन । तिसको गल्यो शरीर सब, पीड़ा बह तनकीन ।।२१२॥ कीलोद पाटनी प्रथमहै, दितिय संजीवनि नाम तीजी गुटिका है सही, व्रण सरोहिनी नाम ॥ २१३ ॥ मडिल्ल। गुटिका लेकर सर्व चारुदत पानमें । सुमिरिमंत्र जिननाम निरंतर ध्यानमें । कीलोदपाटनी गुटिका तासु प्रतापते । ततछिन खगको गात उकील्यो आपते ॥ २१४ ।। चौपाई। गुटिका द्वितिय संजीवनिनाम । ता समर्थता करिअभिराम॥ मूर्छादूरि भई तिहबार । भयो सचेत सोय ततकार ॥२१५॥ तीजी व्रणसरोहिनी नाम | तासमर्थता करि छिन ताम।। घावदेहको आछो कियो। तबतिन बहुसुखमनमेंलियो २१६ ॥

चारुदत्तचरित्र भाषा। (२३) है सचेत उठिबैठ्यो सोय । देखे चारुदत्त हग जोय ॥ उठिकरि नमस्कार खग कियो। विनै भक्तिकरि इनहूंलियो। चारुदत्त बोले तब तासु । को तुम माततात कहँ वासु ॥ आए कौनकाज इसठाय । पीड़ा बहुतकरी किनभाय ॥२१८॥ तब बोल्यो नभचर शिरनाय । कहूं बात अपनी सुनभाय॥ विजयाधरपरबत शुभथान । ताकीदक्षिन श्रेनिबखान ।२१९॥ शिवमंदिरपुरि नगरी बसे । मानो सुरगपुरी छविलसै ॥ भूप महेंद्रदत्त राजंत । विक्रम पटरानी को कंत ॥ २२० ।। अमितवेग हौं तासुत जान । सुखसों रहों सदा निजथान घूमशिखाखगपतिइकनाम । वसैसोय बिजयारधधाम ॥२२॥ सो खग मेरो मित्र महंत । मोऊपर अति नेह धरंत ॥ निशिदिन दोनों क्रीड़ा करें। भांतिभांतिके सुख विस्त।।२२२॥ एकदिवस दोउ मित्र, क्रीड़ा करिवेकौं चले। रच्यो विमान विचित्र, ध्वजा पताका सहित सो ॥२२॥ दोनौ वैठिविमान, बहु प्रमोद आनंद भरे । नभमें कियो पयान, अवनी सब देखत चले ॥२२॥ चलतचलत पहुँचे हम तहां । हिमगिरि पर्वत राजै जहां ॥ तहां बने बहु सुंदर ठौर। शोभा कहत बने नहिं और ॥२२५॥ तहां करी क्रीड़ा बहुभाय । दोऊमित्र महासुख पाय ॥ तहामिल्योइकनरगुणलीय। नामहरीयजातिछत्रीय ॥२२६।। तिनके कन्या बहुगुणखानि । सुरकन्या जीती छवि मानि॥ सुरकुमारिका ताको नाम।तासम रूप न दूजी बाम ॥२२७॥ सोरठा। चौपाई।

। 10000000000 (२४) चारुदत्तचरित्र भाषा। अडिल्ला कनक वरन तसु देह दिपै बहु नागरी । चंद्रबदन मृगनयन रूपगुण आगरी । हंसचालि गुनमाल कोकिला बैन है। केहरिके सम लंक मनो रति ऐन है ।। २२८ ।। ताकी छवि मैं देखि सुःख मनमें लह्यो। बहुत विमोहित होय मैनसर तन दह्यो । परयो प्रेमके फंद ताहि अवलोकि कैं। मांगी तव तिह पास विनोकरि घोकिकें ।। २२९ ।। तिनहूं करि बहु नेह हमारे ऊपरें। तिलक खांचि तिहँवार लियो जस भूपरें । चौंरी मंडप साजि व्याहि हमकों दई । गए लेय निजधाम भये सब सुखमई ॥ २३० ।। सुखसों बीतत काल रहें निजगेह हैं। करें भोग उपभोग बहुत असनेह हैं । देखि नारिको रूप धूमशिख खगपती । भयो वहुत आशक्त धरी खोटी मती ॥ २३१ ॥ मनमें औरहि मति ठानी। हरिबेकी बांछा आनी ॥ जान्यो नहींमैं कछु भेद । जाके मनमैं है क्या खेद ॥३२॥ इकदिनकी कहिय न जाई । रचियो विधि और उपाई। घूमाशिख हमरै आयो । हमहूं मनमैं सुख पायो ॥२३३॥ क्रीड़ा करिवेकों चाले । निज नारि लई मैं लारे ॥ रचियो अभिराम विमान। कीनीनभ माहिं पयाने ॥२३॥ छद। १कामवान २ गमन। 00000000000000 । चारुदत्तचरित्र भाषा। (२५) इस बाग माहिं जब आये । क्रीड़ा कीनी मन भाये ॥ सुप्रमादअवस्था तामै । कील्यो तिन दुष्ट अयाने ॥२३५॥ पछड़ी छन् । ताको उपजी कछु दया नाहिं । मोपान बचेकै अबहिं जाहिं । मोतिय छिनमें लेगयो सोय। हम जु उपायनबन्यो कोय२३६।। दुख सह्योइहां बहुतै जुघोर। देख्यो नहीं कोई सरन और शुभदशा हमारी भईआय।तुमगमनभयो इसथानभाय२३७॥ मोप्राण बचे तुमही प्रसाद । पायो तुमतें बहु सुख अगाद ॥ पूरवविधि भाललिखी जु सोय । ताकौं नहिं मेटि सकै जुकोय॥ तुमदयावंत जगमैं सु धीर । परकारज कारन महगहीर ॥ खगबोल्यो फिरशिरधारिहाथ । अबहुकमहोय घरजाउंनाथ। तुरत आपनी नारि, लेउं छुड़ाय जु दुष्टतें । देहुँ तासमुख छार, काढ़ि देश बाहिर करौं ॥ २४० ॥ नमस्कार करके चल्यो, अमितवेग खगबाल । वैठि विमान आनंदसौं, गयो गेह ततकाल ॥ २४१ ॥ चौपाई। धूमशिखहि बांध्यो तिन जाय । भामिनि लीनी तुरतछड़ाय।। ततछिनमाहिं सबै गुनरास । आए चारुदत्तके पास ॥२४२॥ हाथजोरि बोल्यो खग वात । हेस्वामी ! सुनिये अवदात ॥ लायो छीनि आपनी नारि।आन्यो पकरि दुष्ट तुमलार २४३॥ देहु दंड चाहौँ सो धीर । इन मोकौं कीनी बहु पीर । तुम प्रसाद मो बचियो प्रान। मैं तुमरो चाकर गुनवान ॥२४४॥ सोरठा। दोहा।

(२६) 2006 चारुदत्तचरित्र भाषा। तुम मेरे साहिब सुखदैन । वहुत बात कह कहिये ऐन ॥ चारुदत्त बोले सुन वीर ऐसी बात कही मति धीर॥२४५॥ तुम मोप्राता निह● जान । यही राखियो मनमैं आन ॥ अब पाको दीजै छुटकाय। यहो दुष्ट अपने घरजाय ॥२४॥ सुनी वात आनंदित भयो।ततखिन खगको छोड़ि जु दयो। अमितवेग तब आज्ञापायाभामिनिसहित गयोघरधाय२४७॥ दोहा। बहु आनंद मनमैं लयो, चारुदत्त तिहँ ठाम । मंत्री सहित जु बागते, गयो आपने धाम ॥ २४८ ॥ रह्यों गेह सो आपने, सुखसौं वीतत काल । कथा रही इसठौर यह, आगे सुनो रसाल ॥ २४९ ॥ चौपाई। वाही नगर सेठि इक वसै । नाम सिद्धारथ धनकर लसै॥ देवल सेठिनि भ्राता जोय । चारुदत्तको मामा सोय ॥२५०॥ ताके सदन सुमित्रा नारि । गुनलावन्य शचीउनहारि ।। सेठि सेठिनी मुंजै भोग। पुत्री भई करम संयोग ॥ २५१ ॥ मित्रवती शुभ ताको नाम ।वनी सबै सामुद्रक धाम ॥ रूपकलाअरु गुनसौं भरी।शोभै जिसी वर्ग किन्नरी ॥२५२॥ जौबनवंत भई सो वाल । देखी मात पिता गुणमाल ।। तब मनमें चिंता तसु ठई। पुत्री व्याह जोग अब भई ॥२५३॥ पुत्री पिता देखि बहुजोय । कुल शुभ दोय बराबर होय ॥ घरवर देखि भलीविध चाहि। पुत्री पिता विवाहै ताहि ॥२५४॥ सेठि बात मनमैं चिंतेय । पुत्री चारुदत्तकौं देय ॥ कुलऊंचे लक्षण शुभसार। अरु भनेज भगनीसुतसार २५५॥

सोरठा। चारुदत्तचरित्र भाषा। (२७) टीका चारुदत्तकें कियो । दुहुँओर बहु आनंद लियो । ज्योतिषवन्तपुरुषतिहँघरी। लीनीशोधिलगनशुभधरी २५६।। मित्रवती सुंदरि सुकुमारि । पाणिग्रहणको दिन शुभसार ॥ लगनथापिज्योतिषिघरगयोदोनोकुलकारजशुभठयो २५७॥ कामिनि गावें मंगलचार । पूरहिं चौक ब्याह ब्योहार ॥ बाजें भेरि झांझ झालरी। ताल कँसाल ढोल दुम सुरी ॥२५॥ वीनउपंग और मुहचंग । बाजे बहुत वर्जे नवरंग ॥ जाचकजनकौं दीजत दान करें सुपरिजनको सनमान२५९॥ कर कंकन शिर मौर, चारुदत्त ब्याहन चले। बनी बराइत और, वरनौ तौ विस्तर बढ़े ॥२६०॥ गए सेठि दरवार, आगौनी बहुविध करी ॥ मंडप वेदी सार, रच्यो महा अभिराम सो ॥२६॥ अघिल्ल। कामिनि गावे गीत सबहिं निज रस भरीं। वर कन्या शृंगार रचें पट सुन्दरी ।। बेदी पंडित आय बेदधुनि तह करें। भयो अमिदै शाखि व्याह आनंद भरै ॥ २६२ ॥ चौपाई। पुत्रीवरको दीनो दान । कंचन भरन वस्त्र सनमान ॥ भई बिदा आए निजधाम।आनँद भयो सेठिनी ताम॥२६३॥ खरचै द्रव्य बधाई करी । अरु सबही मन पूरी ररी ॥ लायनारि राखी निजगेह । ताहीदिन तैंतज्यो सनेह ॥२६॥ चारुदत्त सुध लेय न तासु । छिन नहिं जाय नारिके पास ॥ सखी एक दोसाथ जुरहैं। सूने मंदिर बहुदुख लहैं ॥ २६५ ।।

(२८) चारुदत्तचरित्र भाषा। अडिल्ल। भई दुहागिल करै विलाप । पूरवलो आयो मो पाप ॥ नाहवियोग बहुत दुखधरै। तज्यो तमोर शिंगार न करै २६६॥ मस्तकधुनै जु लेय उसास । हे विधना! ते करी निरास ॥ नैनन झरै नीर असरारि। दुखसौं काल गमावै नारि ॥२६७॥ चारुदत्त गुणमंडित वाल । सीखै विद्या सर्व रसाल ॥ पढ़े निरंतर काव्य पुराण। तरक छंदको करै बखान ॥२६८ ॥ नारितनी सुधिलेय न सोय । पढ़िवा काल गमावै जोय ॥ एकदिनाकी कही न जाय। रचियो विधना और उपाय २६९॥ चारुदत्तकी सास सु जान । नाम सुमित्रा कह्यौ वखान । भयो प्रात उग्यो नहिं भान आई सो जु सुताके थान ।।२७०॥ देखि मातकों सुता बहुत आदर कियो । कुशल क्षेम सब पूँछि उच्च आसन दियो । मित्रवतीकौं देखि सुमित्रामाय जू। बहुत चिंत मनमाहि भई अधिकाय जू ॥ २७१ ॥ अति दुर्बल देखी जु शरीर । पहिरें मैले अंग जु चीर ॥ मैलोवदन दुःखकरि मंद। मानो श्यामघटामें चंद ॥२७२॥ द्वादशभूषण रहित जु नारि ।रहित तमोर सोरह सिंगार॥ ऐसीविध देखी तिन धिया। पूंछति भई सुमित्रा तिया।२७३॥ हे पुत्री! तू मैले भेष । रहै कहा मो कहो विशेष ॥ सोवत नहीं संग भरतार कै कछु चिंता करत अपार ॥२७४॥ काहे रहै मलिन तुम गात । सांची कहु तू मोसौं बात ॥ मायबात सुनि सकुची सोय । वदन रही नीचो करि जोय२७५ चौपाई। १ ताम्बूल।

WMM चारुदत्तचरित्र भाषा। (२९) बात न आवै लेय उसास । फेरि सुमित्रा बोली तास ॥ सुताबेगिनिज सुखदुख कहौ। मेरे मनको संसौदहौ ॥२७६॥ तुम सुखते हमको सुखधिया । तुमदुखः हमबहुदुख जिया। कौनदुःख पुत्री है तोहिारहैमलिन किमि कहि सबमोहि२७७॥ माताहठ जान्यो तिहॅकाल । करि ग नीचे बोली बाल॥ जादिनतें तुम दीनी व्याहि । आई गेहससुरके माहिं ॥२७८॥ ताहीदिन” मो भरतार । हमसुधिलई न आयो लार ॥ कबहुं नादि करे मोनाहिं। रहौं अकेली इसघर माहिं ॥२७९॥ पढ़िवमें राखै सो चित्त । भोगविलास न जानै हित्त ।। कालगमावै इसविध सोय । तिय व्योहार न जानकोय।।२८०॥ यहदुख मो मनमैं है माय । नाहवियोग महा दुखदाय ॥ तातैमोकौं सबसुधि गई। भयो उदास चित्त अधिकई ॥२८१॥ भाख्यो सब विरतंत कुमारि। सुताबचन सुनि सब तिहँवार॥ बोलीतवै सुमित्रा माय । हे पुत्री ! मतिमन अकुलाय ॥२८२॥ विधना रचित न मेटे कोय । होनहार सो निह. होय ॥ कुलकीरीति गहें कुलनारि। नीचवंशकी नीच विचारि२८३॥ तातें जपिये जिनके चरन । जिनको धर्म जीवके सरन ॥ सबविध पुत्रीकौं समझाय।तामनमैं दुख भयो अघाय॥२८४॥ उठी तहातै सो तिहवार । मनमैं क्रोध कियो अधिकार ॥ क्रोधभरी पहुँची सोतहां। भानुदत्तकी भामिनि जहां ॥२८५॥ चारुदत्तकी माता जबै । आदर विनय कियो अति तबै ॥ आसनऊंचो वैठन दयो। तवे सुमित्रा बोल जु चयो॥२८६॥ कहै सुमित्रा बैन, सेठिनि तेरो नंदवर। पन्यो मुड़ है ऐन, निहचय करि जानौ सही ॥२८७॥ सोरठा।

MAN
।
(३०)
चारुदत्तचरित्र भाषा!
दोहा।
तियव्योहार न जानही, भोगविलास न कोय ।
पब्योमूढ़ जानो तिसै, तियढिग जाय न सोय ॥२८॥
चौपाई।
जानति है याकी रीति । पढ़िवमैं राखै बहुप्रीति ॥
तौतुम टीका काहे लियो। काहेको ताब्याह जुकियो२८९॥
क्रोधवान हुइ बहुबच कहे । ते सब भानुतियाने सहे ॥
तबहि देवला बोली बात। अपनी विनती करि अवदात २९०
अरु कीनो ताको सनमान । अपनी लघुताई जु वखान ॥
ताको ततछिन क्रोधनिवारि। वेगपठाई घरकौं नारि ॥२९१॥
चारुदत्तकी माता तबै । मनमें बहुदुख पायो जबै ॥
फेरि बिचारकरै मनलाय । वेगहिं कीजै कोई उपाय ॥२९२॥
अडिल्ला
चारुदत्तकी माता अपने धाम है।
निज देवरको टेर रुद्रदत्त नाम है ॥
लीनों ताहि बुलाय तासु मन पायौं ।
तासों सब विरतंत कह्यो समुझायक ॥ २९३ ॥
चारुदत्तको आप कछू शिख दीजिये।
भोगलुब्ध जिहभांति होय सो कीजिये ।।
और न दूजी बात सु मनहिं बिचारियै ।
खरचो धन निजहात काज यह सारिये ॥२९॥
चौपाई।
भावजवचन सुने बहु भाय । तब मनमाहिं विचार कराय॥
नगरमाहिंगणिकाकोधाम। है वसंतमाला तसुनाम॥२९५॥

००००००००००००
AN-
चारुदत्तचरित्र भाषा।
(३१)
ताकीपुत्री बहु गुणवान । वसंततिलका नाम सु जान ।
ताके रूपन दूजीवाम । तासम चतुर न दूजीवाम ॥२९६॥
वह वश करिहै छिनमें जाहि । मंत्र तंत्रकर भाव बताय ।।
तासों कहियसब बचजाय । अरु कछुदीजै दाममंगाय।।२९७॥
गयो सोय वेश्या के थान । तासों जाय कही सब वानि ॥
चारुदत्त ल्याऊं तोपास।ज्यों जाने त्यों वशकर तास ॥२९८॥
कामवात जाने नहिं सोय । तू शिखराव तासुकौं जोय ॥
यहकहि रुद्रदत्त घरआय। मनमैं सुखपायो अधिकाय॥२९९॥
एकदिनाकी कही न जाय । कुमर रुद्रने लियो बुलाय ॥
लेकरसाथ नगर दिखराय । वेश्यागली सु पहुंच्योजाय ३००।
लाग्यो कुमर बात तब कहन । गणिकागली नाहि मो रहन ।
वेश्याके घरकामीजाय। सात व्यसन जो करै अघाय॥३०१॥
चल्यो चारुदत्त पहुंच्यो तहां। मातपिताको मंदिर जहां ॥
फिरइन रचियो औरउपाय । हाथीवान लियो बुलवाय॥३०२॥
तिनकौं देकर कछुजो दाम । तिनसौं वातकही सब ताम॥
दोनोंहाथी दोनों ओर रहौ झुकाय गलीके छोर ॥ ३०३ ॥
हम गणिकाके दारे जाय । दुहुके दांत भिड़ें तहँ आय ॥
कहियो टेरि जु बारम्बार।हाथी खूनी हैं अधिकार ॥३०॥
ऐसीविध तिनकों समुझाय । मनमें सुखपायो अधिकाय ॥
पीछे चारुदत्तकौं टेरि। चाले नगर दिखावम फेरि ॥३०५॥
चलत चलत सो पहुँचे तहां । वेश्याको मंदिर है जहां ॥
पहुँचे गणिका मंदिरद्वार। आनिलगे दोनों गजलार ॥३०६॥
कहें पुकारि भजो तुम भाय । हाथी खूनी हैं अधिकाय ॥
कहे हमारे मैं हैं नहीं। सब पर चोट करत हैं सही ॥३०७॥

184688
14
(३२)
चारुदत्तचरित्र भाषा।
तातें भजौ बीर इस बार । नाहीं तो दुख होय अपार ॥
भजिवेको नहिं देखें ठांय । तब बे लागे कहन सुभाय ३०८||
जा मंदिरमैं चलिये बीर । चारुदत्त तुम साहस धीर ॥
चलिये प्राण बचें होभ्रात।हाथी बिगड़ि करैंजियघात॥३०९॥
बोलि ठोलि में मंदिर गये । घरकी शोभा देखत भये ॥
उज्वल महाउतंग अवास । तोरण पौरि बंध चहुँपास॥३१०॥
देखे रतनन खचित किबार । तिनकी जगमग ज्योति अपार
लगे थंभ बहु नाना वरन । झांकी टोड़ा शोभा धरन।।३११॥
आंगन शोभा बहुविध रची। कंचन वरन ताकी छबिसची॥
चित्रआदिबहु लिखे लिखाय। चीते मोर कोकिला भाय ३१२
चीते राग रागिनी संग । चौरासी आसन बह रंग ॥
और महल बहु नाना भांतिादेखत तिनहिं शूप सब जाति३१३
भले बिछौना बिछे अनेक । परदा आदि चंदोबा नेक ॥
देखत मोहि रहत नर नार।शोभा कहिये कहा अपार॥३१४॥
वनो जु ऐसो गनिका ठौर । तासम नाहिं नगरमैं और ॥
बहुत उतंग महाअभिराम । उज्वल वरन दिपै सब धाम॥३१५॥
सब जन भीतर बैठे जाय । आदर बहुत कियो गणिकाय॥
तव गनिका चौपडिले हाल। रुद्रदत्तसौं माड्यो ख्याल॥३१६॥
रुद्रदत्त तब बारम्बार । हारत भये बेर दुइ चार ॥.
चारुदत्त देखत तहँ बाल । हारत चचायत के ख्याल||३१७॥
अडिल्ल।
चारुदत्त तब बात रुद्रदतनों कहैं।
हम खेलेंगे सारि जीति तुम्हरी लहैं ।
तब सुनिकरि सब बात बसंत जु माल है।
कहै लाल तुम रचौ कुमरिसों ख्याल है ॥३१॥

सोरठा । चारुदत्तचरित्र भाषा। (३३) चौपाई। जो तुम खेलो चाहों ख्याल। रचौ वसंततिलकासों लाल॥ मो सँगजुगति नहीं तुम वीर। तुम कुमारसुंदर गुनधीर॥३१९ में हों वृद्ध जानिये वीर । तुमही यौवनवंत गहीर ॥ जो खेलनकोतुममन भाव। तौ वसंततिलकाढिग जाव।।३२० जैसे तुम चातुर गुनलीन । तैसी कुमरि महापरवीन ॥ तब बसंतमाला तिहँघरी । लई टेरि तिलकासुंदरी ॥३२॥ सेठिनंद तब देखत भये। गणिका लोचन तासौं ठये ।। चारुदत्त देख्यो तसुरूप । सुररंभाते अधिक अनूप ॥३२२॥ सरस श्याम शिरकेश, सींचे तेल फुलेलसौं । नवल किशोरी वेश, तन शोभा कहिये कहा ॥३२३॥ हग हैं जिमि फूले कमल, खंजन मीन अधीन । भौंह जु बंक बनी धनुष, सर्वकला परवीन ॥३२॥ चौपाई। शुकनाशिका कामगढ़ रच्यो। कारीगर करता अतिपच्यो॥ बदन चंद्रसम तसुअभिराम । दसन चमक जिमि चपला धाम।। अधर अरुन अधिकी छविध।मानो कूट कामकी करें । कुचउतंग मंदिरके भाय। विरम्योआयकाम तिसठाँय ३२६॥ क्षीनलंक महि अतिही खाम जंघाजुगल केलि अभिराम।। कोमल अरुण बने तसुपाय। चालमराल मंदगति जाय ३२७॥ भुजकोमल छीनो अतिअंग। मोतिनसौं जु सम्हारे मंग॥ पहिरेअंग कसुमी चीर गढ़ी कंचुकी दिपै शरीर ॥३२८॥ दोहा। रारावरी।

A
(३४)
चारुदत्तचरित्र भाषा।
सोरह भांति करै सिंगार । वारह आभूषन सजि सार ।
मधुरवचन बोले विहसाय। कोकिल कंठ श्रवनसुखदाय ३२९॥
रातदिवस लीलामै रहै । राग रंगमैं बहुविध बहै ॥
ताकी छविको वरनि जुकहों। बाकथा खेद बहुलहौं ३३०॥
नयनमिलाप तासुको भयो।मानो काम विरह विष दयो।
तिलका कहै पुण्य हमकरयो। मेरेगेह कुमर संचरयो॥३३१॥
कछुकद्रव्य तापर तिन वार । गहि डारे अरु बकसै सार ।।
चौपडिख्याल माड़ियो तबै। जाम एक दो खेले जबै ॥३३२॥
चारुदत्तकौं लागी प्यास । पानी तब मांग्यो तिन पास ॥
वेश्या मोहन चूरण डार। पानी प्यायो सेठिकुमार ॥३३३।।
तबसो अतिही विहवल होय । चारुदत्त जलपीवत सोय ॥
कामवान कर पीड़ित भयो। मोह विकलकरि अति तनहयो।
जिहतिह भांति कियो वशसोय।वेश्यासहित रह्यो तहँ जोय॥
होनहार सोनिहचै होय । विधिका लिखा न मेटै कोय ॥३३५॥
तबसो वेश्यावश यों भयो ।ज्यों पतंग दीपक तन दह्यो।
सुरति नाहिं ताकौं कछु और। रह्यौसोय रमिवेश्या पौर३३६।।
चारुदत्त तब बोले ऐन । सुन बसंततिलका मो बैन ।
मोधन नहिंसंख्या परवान। आभूषण गहने करथान॥३३७॥
चाही सो लीजै मँगवाय । खरचौ खाउ महासुख पाय ॥
तबगणिका ताकी सुनिबात।खुसीभई मनमाहि सुगात.३३०
रंभासहित नृत्य जब करै । ज्यों विषधर बादीवश परे ॥
गनिकासहित महल ऊपरें। रमिवा लाग्यो आनंदकरें ॥३३९॥
रुद्रदत्त छोड्यो तिसथान । अपने गेह गये जनवान ।।
बोले सेठि तबै सतिभाय । मेरोपुत्र कहां छुटकाय ॥३४०॥

- चारुदत्तचरित्र भाषा। (३५) चारुदत्त हैगो तिस ठौर । रुद्रदत्त तब बोले और ॥ तिनसोको सबै व्योहार।तब सो सेठिदेय तसु गारि ३४१॥ अरे दुष्ट तें कीनो कहा । अपने शीश पाप धरि लहा ॥ तसु संगतिते नरकहिं जाय ।ताती पुतरी देहजराय ॥३४२॥ अरु बहुविधसौं क्रीड़ा करें । वेश्यादासी सो संचरें ॥ उत्तमघर ताको अवतार । बड़ेवंशको होय गमार ॥३४३॥ धनविन कामरूप जो धरै । तो वेश्याघर पानी भरै ।। ऐसें कहिकहि मनपछिताय।कर्मदोषसो खोर लगाय॥३४४॥ * वेश्यादासी आवै तहां । भानुदत्तको मंदिर जहां ॥ तिनसौं बात कहै समुझाय । चारुदत्तने मोहि पठाय॥३४५॥ मांगी खरची विलसन काज । सो दीजै मोकों महाराज ॥ जोकछु खरची मांगी आय। ततछिन ताकों दई बँधाय३४६॥ ऐसें कछ बीते दिनमास । सब घर सेठि करें उसवास ॥ . दोहा। खोटे व्यसन लग्यो सही, चारुदत्त करि नेह । ताते कळू उपायकर, जो आवै निजगेह ॥ ३४८ ॥ चौपाई। मोहविकल तसु भयो शरीर । ताकौं कछू और नहिं पीर । सबपरिजनकी सुधिविसराय। अपनेरंगरच्योमनभाय ३४९॥ तब इककिंकर लियो बुलाय । तासौं वचन कहे समुझाय॥ चारुदत्तके जावो पास । तासौं कहिये निज अरदास ३५०॥ अरु पह कहिये ताहिसुनाय । चालोलाल बुलाई माय ॥ तुमबिन दुक्खकरत सबलोग। तुमविन धरहिं शरीरहिं रोग।

(३६) चारुदत्तचरित्र भाषा। अरु कहिये जुबचन समुझाय । मोहविकल हजै नहिं भाय। मोह जुशुभगति छेदनहार।मोह कुगतिको जानौदार ३५२|| मोह जु वश कछुहोय न सिद्धि । मोहविनाशै केवलऋद्धि मोही जिय भवमैंदुख सहै ।मोहीजीव सुक्ख नहिं लहै॥३५३॥ मोह गहें प्राणी जड़कूर । मोह जु सर्व पापका मूर ॥', ऐसोमोह छोडि गुनरेह । रहसवंत हो! आवौ गेह ॥३५४॥ और जु तोमन आवैवात । सो कहिये सब अपनीभ्रात ।। जिहतिहभांति ताहि समुझाय। लेआवौअपनेघरभाय३५५।। किंकर ऐसीविध समुझाय । चारुदत्त दयो पठाय ॥ सोनर ततछिन पहुँच्योतहां । चारुदत्तबैठो है जहां ॥३५६॥ देखिताहि कीनो परनाम । तासौं बचन चये अभिराम'। अहोलाल मैं चाकर तोहि। पठयो भानुदत्तने मोहि ॥३५७॥ कही बात सब तात कानदेकर सुनो। मैं हूं करत बखान आपने जिय गुनो ॥ चलोगेह ततकाल बुलाये मायने। करत बहुत दुख सरब तुम्हारे लायने ॥ ३५८ ॥ जो जो बात कहींथीं भान । ते सब किंकर कहीं निदान सुनकर चारुदत्त सबबात । उत्तर दयो न एकौभ्रात ॥३५९॥ रह्यो मौनधर सो तिहँकाल । उत्तर दयो न कछु तसुहाल॥ तबसो किंकर विलखित भयो।ततछिन भानुदत्तपे गयो॥३६०॥ तिनसो बात कही सबजाय । चारुदत्त आवै नहिं भाय। टेरते बोले नहिं बैन । पग्यो मोहकरि पीड़ित मैन ॥३६॥ अडिल। चौपाई।

सोरठा । चारुदत्तचरित्र भाषा। (३७) सुनी सेठने किंकर बात । बहुत भयो दुख ताके गात ॥ चारुदत्त वेश्याके गेह । रहैसोय सुख परम सनेह ॥ ३६२ ॥ गनिका खरची लेय मंगाय । भानुदत्त तसु देय पठाय ॥ ऐसीविधवीलोकछुकालानिघटन लग्योद्रव्य घरमाल३६३।। तबसो सेठि विचार कराय ।अब कछु कीजै फेरि उपाय ।। तातें आवै गेह कुमार । सो अब कांजै कछू विचार॥३६४॥ ततखिन चाकर टेरि, ताको समझावत भये । बचन कहे तिन फेरि, चारुदत्तपै जाउ अब ॥३६५॥ दोहा। तासौं यह कहियो अबै, हेकुमार ! तुमतात । रोग भयो तिनकों अधिक, पीड़ित सो बहुगात ॥३६६॥ तुम देखनकी आस नित, रही नयन भरपूर । ताते चलिये अब सही, करि विभ्रम सब दूर ॥३६७॥ ऐसीविध समझाय सो, पठयो तिन ततकार । आयो किंकर बेगि तहँ, राजै सेठिकुमार ॥३६॥ चौपाई। नमस्कारकर बोलत भयो । खामी मोहि सेठि पाठयो। भानुदत्त बहु विकलशरीर पीड़ितरोग महागंभीर ३६९॥ पीड़ाकरि पायो दुखगात । है संताप बहुत तुम तात ॥ तुमदेखनकी बहुतै आस । ताते चलो तातके पास ॥३७०॥ बहुतभांतिकरि तिन बच चये। चारुदत्त बोलततब भये ॥ बड़े बड़े जो वैद्यमहानोराजवैद्य वैद्यन परधान ॥३७१॥ रस औषधके जाननहार । गुनकर लीन चतुर सरदार ॥ तिनहिबुलाय लेह करिनेहु। तिनको मनवांछित घनदेहु३७२॥ woo.

क (३८) चारुदत्तचरित्र भाषा। विविधभांति औषध बनवाय । नीकीकरौ पिताकी काय दूरहोय तासौं सबरोग। करौजाय सोततखिन जोग ॥३७३॥ और विचारो मनमति भाव।द्रव्यखरचि गद दूर कराव ।। हमकहआयकरें उनतीर ।आवत बनै नाहिं मोवीर ॥३७॥ यहकह रह्यौ मौनधरि सोय । उत्तर बहुर दयो नहिंकोय। तबसो किंकर मनपछिताय।गयोसेठिपै बहुअनखाय॥३७५॥ जो जो बात चारुदत कही । सो सो सरब प्रकाशन ठई ॥ सुनतबात विकलसो भयो। मानो बजवायुको दह्यो ॥३७६।। मनमैं सोचै बहुपछिताय । कर्मदोषसो खोरि लगाय ॥ दुखकरि सोराजै जिहँठौर।यहविध कालगयो कछुऔर३७७ फिर तामनमें उपज्यो सोच । देखन बदन पुत्रको रोच ॥ तब अकुलाय दासकोटेरि गहभरि तासौं बोल्यो फेरि३७८॥ और जाह तूं अबकी बार । ततखिन चारुदत्तकी सार ॥ तासौं कहिये सबसमुझाय। अरेदुष्ट तूं छोड़कुभाय ॥३७९॥ अर तासौं कहियै यह साज । तेरोपिता गयोमरि आज ॥ तिनको काज़करोचलि हाल ।तुमही घरके हो रछपाल ३८०॥ जिह तिहँ विध समझाय, लाव टेर घर नंदको । किंकर दयो पठाय, भानुदत्तने तुरत ही ॥३८॥ किंकर पहुंच्यो धाय, चारुदत्त बैठो जहां । नम्यो तासुके पाय, हाथजोरि लाग्यो कहन ॥३८२॥ हे कुमार! सुनिये मोबात । मरण भयो अबही तुमतात। तातेचलिये घरमहाराज। तिनको बेगि सम्हारोकाज ॥३८३॥ सोरठा। - चौपाई। १ रोग।

.00000000000000
चारुदत्तचरित्र भाषा।
दागदेहु किरिया चलिकरौ । औरवात मति मनमेंधरौ ॥
औरवचन बहुकहे बखान । तेसब सुने चारुदतकान ॥३८४॥
तवसुन बचन सेठिको नंद । किंकरसौं बोल्यो बचमंद ॥
श्रीखंड चंदन घनसार। कुमकुम अगर सुगंध अपार ॥३८५॥
इन्है आदि बहु वस्तु मंगाय । नानाभांतिन बसनउदाय ॥
अरु सबसजन मिलिपरिवार। करोपिताजीको सँस्कार३८६॥
आवत नाहिंबनै मोवीर । सबसौं यह कहियो घरधीर ॥
तब किंकर बहुविध समुझाय। मानीबात न एको भाय ३८७॥
तब किंकर बहुविलखित भयो।ततखिन भानुदत्तपै गयो ।
कहतभयो सुन खामीबात। चारुदत्त आबैनहिंभ्रात ॥३८॥
तुम जो मोसैं बातें कहीं । ते मैं सर्व प्रकाशी सही ॥
अरुमैं बहुतभांति समुझाय। माने बचन न एकोभाय॥३८९॥
चारुदत्त भाषी जे बात । ते सब कहीं सेठिसौं गात ॥
सुनतसेठिकौं अति दुखभयो।मानो बज्रघावसौं दह्यो।।३९०॥
पश्चाताप करै अत्यंत । विकल भयो सो तनमन संत ॥
दुखकरिसेठि गेहनिजरहै । अबयह कथन कुमरपै बहै ॥३९१॥
चारुदत्त वेश्याके धाम । भोग भोगवै सुखसों ताम ॥
गनिकादासी नितप्रति आय। मांगेधनसो लेयबंधाय ।।३९२॥
ऐसीविध बरर्षे छह भई। आधो धन ताको निघटई ॥
सोरह कोड़ितासुसौं खाय। ऊपर कछूलाख अधिकाय ३९३॥
अडिल्ल।
पिता श्रेष्टी भानु बहुत पछिताय है।
खोटे व्यसनमें देखि नंद अधिकाय है ।
बहु विपरीति सु देखि तासु तब दुख भयो।
करे विचार जु सेठि सु कातर मन ठयो ॥३९४॥

(४०)
चारुदत्तचरित्र भाषा।
चौपाई।
सेठि विचारी मनमैं भाय । चारुदत्त हमको दुखदाय ॥
अब नहिंबनत और कछुवात दीक्षाग्रहन करोंपरभात ३९५॥
अब जाने धौं कैसी होय । कर्मरीति जाने नहिं कोय ॥
असुर यक्ष अरु खगपति शेश। नारायण चक्रेश दिनेश ३९६॥
ए नवि पग आगे चलि धरें । कर्म करावै सोई करें।
जो विधि अक्षर लिखेलिलार।ताकोकोइ न मेटनहार ३९७॥
मडिल्ल ।
कर्म बली संसार लग्यो या जीवसौं ।
दुख सुख ता परमान छुटत नहिं ग्रीवसौं ॥
कर्महिं जिय जगमाहिं भटक तु वायकें।
कर्म लग्यो अव आय देखिये चायकें ॥ ३९८ ॥
चौपाई।
ताते और न कछू विचार । जिन दीक्षा परिये ततकार ॥
यह दुखधाम महा संसार।भ्रमत जीव नहिं पावै पार॥३९९॥
मनमें निहचै करि आचरन । चलिये प्रात जिनेश्वर सरन ।
ततलिन नारी लई बुलाय। तासों कहत भये समझय ॥४००}
तबहीं बधू बुलावत भये । हृदय खोलि तासौं बच चये ॥
संयम शील धरोदृढ़ चित्त। श्रावकके व्रतपालो नित्त॥४०॥
हम तो कहूँ जाय जिन शरन । नाशै जन्मजरा अरु मरन॥
चारुदत्त मागै दिन सार । दीजैताको धन नर नार 18०२॥
सेठि जायकरि बनमें ठयो । गुरुके पास महाव्रत लयो ।
भानुदत्तने मुनिव्रत घरे । जन्म जन्मके पातिक हरे ॥४०॥
सुनिये कथा भविक अब और चारुदत्त राजे तिहँ ठौर॥
निशिदिन बहु लीलामें रहे। रागरंगमें बहुविध बहे ॥४०४॥

चारुदत्तचरित्र भाषा। (४१) और खवरि ताकौं कछु नाहिं । भोग भोगवै करै उछहिं॥ वेश्यादासी नितप्रति आय । जो मागै सो लेय वधाय॥४०५॥ ऐसे करत रहै दिनमान । बीती और बरष छह थान ॥ सोरह कोटि द्रव्य तिन और खोयो रमि वेश्याकी पौर।४०६॥ घरको द्रव्य सर्व ही गयो। पाठे सुनो और जो भयो । बारह सहस जानियो सार । सुवरन के लीने दीनार॥ ४०७॥ गहने धरी हवेली तवै । रह्यो नाहिं धन ताघर जबै ॥ सो भी धन वेश्याके गयो। सासुबहको बहु दुख भयो ॥४०८॥ तव नारी अपने आभरन् । देय तासुको नाना बरन् । गहनोवहु गजमोतिन हार। जो घरमैं सो देय अपार ॥४०९॥ दुखकरि बहुत रहैं घर माहिं । कर्मदोष सो खोरि लगायं॥ एक दिवस इक भामिनि कोय।बोली सेठिबधूसौं जोय॥४१०॥ अब तूं देय कळू मति दाम । दासी भक्ति करौ निज ताम॥ अरु तासौं अपना दख जोय। कहिये मोपर कछू न होय॥४११॥ सूत वेचि आवै जो कोय । तव घरको प्रतिपालन होय ॥ कहियो दासीतें सब तोय । भामिनि मनमैं ऐसो जोय ॥४१२॥ तौलों दासी आई तहां । सेठिवहू मनसोचै जहां ॥ लागी कहन द्रव्य मो देहु । चारुदत्तने पठई एहु ॥४१३॥ बोली चारुदत्त की नारि । दासीकी बहु करि मनुहारि ॥ पटरस भोजन ताहि जिमाय। ताकी विनयकरी अधिकाय॥ अरु तासों यह लागी कहन । रहटासूत विकानो जहन ॥ जो मैं उनको कारज होय । बेबी देह समपौ सोय ॥४१५॥ दासी मिहरवान तव भई । हुइ प्रसन्न तासौं बच चई ॥ तूं जिय दुखमति मान कोय । अव त देखि कहाघों होय १६ (४२) चारुदत्तचरित्र भाषा। दासी बहुरि गई तब तहां । चारुदत्त अरु गनिका जहां ॥ तासौं बात कही समुझाय । पूनी रहँटा सूत बिकाय ॥४१७॥ द्रव्य न रही तासुके धाम । भूखनमरै मात अरु भाम ॥ तिनको दुख अब कह्योन जाय। धाम माल सब गयो बिकाय गणिका सुनत विकल बहु भई। यह विभूति कहँ छिनमें गई । तब बसंतमाला हरषाय । बोली चारुदत्तसौं आय ॥४१९॥ चारुदत्ततूं इहँतें जाहु । तेरेघर दुख होत अथाहु ॥ धन नहिं रह्यो जु एकहु दाम।तातें अबहिं जाव निज धाम ॥ जौलौं काल फिरै तुमगेह । तौलौं फिर मति आवो एह ।। रह्यो मौन हुइ ज्वाब नदेय। अरु नहिं घरकी खबरि करेय४२१ ऐसो भयो गरक तासंग । सुधिबुधि गई भई मति भंग ॥ खबरि नाहिताकौं कछु और। रहै परयो वेश्याकी पौर।।४२२ अरु वेश्याकी धीय, चारुदत्तसौं नेह बहु । राखै अपने जीय, पलक एक छोड़े नहीं ॥४२३॥ रात्रिदिवस निज गेह, रमै चारुदत संग सो। नेक न छोड़े नेह, तब बसंतमाला झुरै ॥ ४२४ ॥ दोहा। वंश विगोवै तासुकों, छिन छिन गारी देय । अरु बसंततिलका तिस, छोड़े नेक न नेह ॥४२५॥ वह बसंतमाला तबै, देखि:प्रीतिकी रीति । तब बसंततिलका कने, कहति भई सब नीति ॥४६॥ हे पुत्री! सुनि मोहि शीख तोसौं कहीं। हीनधनीसौं प्रीति छोड़िये यह कहौं । सोरठा। अडिल्ल।

चारुदत्तचरित्र भाषा।
(४३)
होय कोइ धनवान नेह तासौं करो।
वेश्यनकी यह रीतिजानि मनमें धरो ॥४२७॥
गनिकाकी यह रीति शास्त्रमें है कही।
द्रव्यहीन जो पुरुष ताहि सेवै नहीं ॥
कामदेवसमरूप होय धनहीन है।
तो भी प्रीति न करै तासु यह लीन है ॥४२॥
चौपाई।
वेश्या धनियनकौं भोगवै । हीन पुरुष किनि कैसो अवै ॥
द्रव्यहीन कामछबि धरै। अंगीकार कदापि न करै ॥४२९॥
गनिकाकी यह जानोरीति । तातें छोडि जु यासों प्रीति॥
जाकेगेह दुखितसब लोग। धनबिनकरत सरवही शोग४३०॥
भूखनमरत रातदिन जाय । खानपानको नाही पाय ॥ .
तूनेकरीताहिसौं प्रीति।गणिकनकी यहनाही रीति ॥४३१॥
तातें तजहु सुता तुम नेह । चारुदत्त पहुंचे निजगेह ॥
मिले जाय अपने परिवार।बात हमारी मानो सार ॥४३२॥
ऐसें कही बहुतसी बात । पुत्रीकों समझावति मात ॥
तब बसंततिलका निजकान।माताबचनसुने मनआन४३३॥
जो जो बातकही सबमाय । सुनी सरब तानै मनलाय ॥
उत्तर तबहिं सु लागीदैन।मुखतें बोलति मधुरेबैन ॥४३४॥
तब बसंततिलका कहै, मातबचन सुन सार ।
इसभव तो मेरै सही, चारुदत्त भरतार ॥४३५॥
और सरब जानौ सही, भाई पिता समान ।
चारुदत्त ही रमन मो, इसभव ठीक निदान ॥ ४३६ ॥

(४४)
चारुदत्तचरित्र भाषा।
तब वसंतमाला वचन, सुने सुताके ऐन ।
फेरि सुता समुझाइ है, मानै एक न वैन ॥ ४३७ ॥
चारुदत्तको पलक इक, छोड़े नाही सोय ।
तब बसंतमाला झुरै, मनमैं कोपित होय ॥४३८॥
चौपाई।
अधिको नेह लगायो जबै । करि थिरता मनमाहीं तबै ॥
जानी गनिका अधिकीप्रीति । छूटतिनाहिं नेहकी रीति ४३९॥
अरु जाने मन औरै ठई । जनमप्रीति अब छुटै नहीं।
ताते काजै कछु उपाय । चारुदत्त मोघरतें जाय ॥४४०॥
ऐसो मनमैं कियो विचार । छिन छिन ताको देती गारि॥
एकदिवसकी कही न जाय । विधिने जैसोरच्यो उपाय ॥४४१॥
कमालखी सो निहचे होय । ताको मेटि सकै नहिं कोय ॥
तबगनिका यहकियो विचार। चारुदत्त घरजाय न सार॥४४२॥
अरु बसंततिलका सुंदरी । छोड़ति नाहिं ताहि पलघरी॥
तातैकीजै वेगिउपाय । चारुदत्तमो घरतें जाय ॥४४३॥
तव गनिका करि चित्तविचार । दोनोंकों दीनो अहार ॥
तामैंदयो अमलकछ घोरि।दीरधभोजन दयोबहोरि ॥४४४||
करि अहार दोनौ निशिमाहिं । गएसोय कछु खबरि जुनाहिं।
रजनी गई एक दो जाम । मायबसंत विचारै ताम ॥४४५॥
अव तौ दाव बन्यो है आय । कीजे अबही वेग उपाय ॥
सोवे चारुदत्त तहँजाय। ततखिन लीनोकुमर उठाय ॥४४६॥
ताको निराभरण तिन कियो।ताके हातपांव बांधियो ।
अरुसो ततखिन कंवललाय।तामें गठरी बांधी आय ॥४४७॥
ताकौं खबार नेकडू नाहिं । मदमैं छकित बहुत तिहँठाहिं॥
सो गठरी वेश्या ले आय । विष्टाधाम धरी तब जाय॥४४८॥

चारुदत्तचरित्र भाषा। (४५) सारठा। दोहा। ततखिन गनिका पकरिके, विष्टौगृह के माहि । डारयो विष्टामध्य सो, संक करी कछु नाहिं ॥४४९॥ नरकघोर दुख तहँ सहै, विष्टागृह की सीव । के जाने करता सही, के जाने वह जीव ॥४५०॥ सरवदेह ताकी बँधी, उठयोजाय नहिं तासु । कछुयक मदमैं गहलजौ, सुधिबुधि नाही जासु ॥४५१॥ विष्टागृह के माहि, विष्टा भखिवा सूकरी । आई मिथ्या नाहि, ताको मुख चाटन लगी ॥४५२॥ चारुदत्त तिहँ थान, बोल्यो हातपसारि के। हे बसंततिलकान !, तूं मेरे सुन बचन अब ॥४५३॥ आवति नींद अपार, छायरही मो देहमें । अलग बैठ तूं नारि, जब जागों तब बोलियो ॥४५४॥ यही ताहि रटना लगी, हे बसंततिलकान !। और विसरिसब सुधि गई, अपनी दशा निदान ॥४५५॥ अहो करमकी रीति यह, देखौ नर गुणवान । कहां जु वे चतुराईयां, कहां जु यह अपमान ॥४५६॥ अडिल। चारुदत्त तिहँथान बहुत दुख ही सहै । पर मनमैं यह ध्यान बसंततिलका कहै ॥ और न दूजी बात कछु मन आनही टेरि टेरि तसुनाम सुक्खकर मानहीं ॥४५७॥ दोहा। - १पायखानेमे।

(४६) चारुदत्तचरित्र भाषा। चौपाई। चारुदत्त विष्टाके धाम । नरकघोर दुख देखतं ताम ॥ यहतो कथारही इहँठौर। आगै कथन सुनो अब और॥४५८॥ नगर मध्य पुरको रखवाल । चौकी देत फिरै कुतवाल । फिरत फिरत सो आयो तहां। गणिकाको मंदिरहै जहां॥४५९॥ चारुदत्त विष्टाके धाम । तिलका रटन लगी तिसठाम ॥ तबसुनि कोतवाल इमकही। कौन पुरुष इहँ बोले सही॥४६०॥ तब बोल्यो किंकरसों बात । विष्टाधाम कौन है भ्रात ॥ देखौती नीके को लोयोलावो वेगि जु कोई होय ॥४६१॥ तब किंकर देखै निज नैन । ताको पूछ कहि कहि बैन ।। कोहै बोल कहा तोनाम। कौन जाति अरु कहँ तो धाम ४६२॥ कोहै तात मात कहँ थान । काहेकौं आयो इस ठाम ॥ रजनीसमय डारिको गयो । काहेकौंदुखदेखत भयो ॥४६३॥ वेगि बात कह अपनी वीर । कौनै वांध्यो तोहि शरीर ॥ चारुदत्त तब बोल्यो ताम। याही नगरमाहिं मोधाम ॥४६४॥ भानुदत्त श्रेष्टीको नंद । चारुदत्त मोनाम गुनंद ।। गणिका डारिदियो इसठांय । अमल उतरि तबगयो बनाय॥ भयो सचेत सोय तिहँवार । कहत भयो बचसोततकार ॥ कोतवालसौं सब बिरतंत। कहोजासु पहिलो अरुअंत ॥४६६॥ कोतवाल सुनि ये सब बैन । जानी चारुदत्त है ऐन ॥ काढिलियो ताकौं तिसकाला ताके बंधन छोड़ेहाल ॥४६७॥ अरु ताकी निंदा बहुकरी । सबमें अपकीरति उच्चरी ।। बुरीबात तासौं बहुकही। अरु तासौं बोल्यो,इमसही ॥४६॥ धर्मवंत सजन तो तात । ताकेसुत उपज्यो दुखदात ॥ कोटिबतीस द्रव्यको धनीताविभूति कछु जायनगिनी ४६९॥

चारुदत्तचरित्र भाषा। (१७) सोधन तैने दियो गमाय । लागो कुकरममें अधिकाय ॥ जन्म जन्मको अपजशलयोखोटे व्यसनमाहिं लगगयो॥४७० कुंडलिया। सुखरासी सजन सुनो, तजो पराई नारि । कहि भारा यह बीनती, विहवल बुद्धि निवारि ॥ विहवल बुद्धि निवारि मारि मकरध्वज भाई। बारबार शिख तोहि छाँडि मूरख लरकाई ।। हसि हैं जगके लोग कानि पति सगरी जासी। परकामिनि परिहरी अहो! सजन सुखरासी ॥४७१॥ हा हा ! करि बिनती करों, सीख कहों यह मूल । जे नर परदारा रमें, तिनके मस्तक धूल ॥ तिनके मस्तकधूल और धृग जीवन तिनको। करें नेह पररमनि छोड़ि मूरख निज तियको । प्रगट भये पतिजाय सुजन यह कौन सलाहा। परकामिनि परिहरौ करौं बिनतीअरु हाहा ।।४७२॥ दोहा। होसी यहगति तासुकी, चारुदत्त जिहभांति । जे नर निजधन देयकैं, परदारा जु रमात ॥४७३॥ अंतसमय दुरगति लहें, महा दुखनको घाम । जे नर शील गमावहीं, होय रहे वशकाम ॥४७॥ चौपाई। कोतवाल मनमें दुखकारि । चारुदत्तकी दशा निहारि ॥ मनमें विकलप बहुत उठायांकरमदोषसो खोरि लगाय॥४७॥ १कामदेव।

-
चौपाई।
(४८)
चारुदत्तचरित्र भाषा।
जोकछु विधिने लिख्यो लिलार।ताकों कोइ न मेटनहार ॥
करमलिखी सो निहचे होय। ताकमेटिसकै नहिंकोय १७६॥
संवैया।
कवहूं नृपराज चढ़े गजराज चलें दलसाज सबै सुखजोई।
कबहूं फिर रंकभये बहुनेक सु मांगत भीख फिरै कनदोई।।
कबहूं फिर नर्क महादुख है कबहूं बहु इंद्रिनके वशहोई।
भारामल निहचै जान यही पर कर्मकरै सुकरै नहिंकोई४७७॥
सोरठा।
जो ढूंडो सब ठौर, सुरपुर नरपुर नागपुर ।
यासम कोऊ न और, बली करम सो जीयरा ॥४७८||
यहकहि कोतवाल गयोकाम। चारुदत्त तब पठयो धाम
चारुदत्त पाठे सु कुमार। निजघरकोंचाल्यो तिहबार ॥४७९॥
गयोसोय निज मंदिर तहां । लाग्यो भीतर पैठन जहां ॥
जाकें गहने मेल्यो धाम । ताके चाकर बैठे ताम ॥४८०॥
तिन दरवाजे रोक्यो सोय । घरमैं जान न देशी कोय ॥
चारुदत्त बोल्यो तिहबार।भानुसेठको यह दरबार ॥४८१॥
तब किंकर बोल्यो तसुबात । गहने मेलि खाइयो भ्रात ।।
तिनकेबचन सुने बलबीर ।भयोदुक्ख थरहरयो शरीर४८॥
तिनसौं बात कुमर फिरि कहै। मेरी माता किसथल रहै ।।
अरु मेरीनारी किसठाय।मोसो बात कहौ समुझाय ॥४८३॥
और कहां निर्धन हैं वीर । बेगि बतावहु मोको धीर ।
तब दरवानी तिनमैं कोय। चलोलिवाय कुमरकों सोय ॥४८४॥
चलत चलत सो पहुँच्यो तहां। माता नारि रहैं तसुजहां ॥
एक झोपरी जीरन महा। सो दिखायदीनी बचकहा॥४८५॥

wwv
चारुदत्तचरित्र भाषा।
(४९)
यामें रहें मात तो वाम । काल वितीत करें इस ठाम ॥
चारुदत्त तब सुनिकर सबै गयोपास माताके तबै ॥४८६||
देखि अवस्था ताकी सोय । ताके अंग बास बहु होय ॥
माता नारि बहुत दुखलयो।सोमोपर सबजाय न कहो४८७॥
पाछे माता नीर मंगाय । और सुगंध अनेक डराय ॥
सुचि लेपनकर तन उवटाय। चारुदत्त असनान कराय॥४८॥
पहिरनवसन दयेता योग । तब मनमें बहु कियो वियोग ।
लागोकंठ मायके सोय। दईधाह तिन बहुतेरोय ॥४८९॥
अरु अपनी बहुनिंदा करी । हाहाकार कियो तिहँघरी ॥
माता हौं पापी परवान । अरु में ही मतिहीन अयान।।४९०॥
अपयश सकललोकमें भयो।मातासौं इमि कहतो भयो।
अरु दुखसुखकी बातें जोय । कहतभयो मातासौं सोय४९१॥
तव माता सुनि ताके बैन । बोलति भई तोयभरि नैन ।
कोड़ि बतीस द्रव्य मोसार । सोतू लेय रम्यो तसुद्वार ॥४९२॥
अरु तूने बहु अपयश लयो । तेरो तात तोहि दुख गयो।
तवसुनि दुक्ख पाछिलो कियो।ततखिन नारिपास पहुंचियो।
नारि बहुतदुख तासोंजोय । कहतिभई अपनो दुखरोय ॥
नारिबचन सुनियों अवदात। तब सो लाग्यो कहन जुबात।
हे भामिनि तूं गुनन निधान । शील धुरंधर परम सुजान ।।
तोसम तिया न दूजी कोय। देख बल्लमा मनमें जोय ॥४९५॥
हौं पापी पापनकी खानि । तोकौं बहुदुख दिये सुजान ॥
कियोजाय गनिकासों नेह । हे भामिनि तजि तेरोगह ॥१९६॥
ताने मेरो सबधन हरयो । अरु मोको विष्टागृह धरयो ।
तिनमोकों ऐसो दुखदयो।नरकसमान जाय नहींकह्यो॥४९७॥

कविता सोरठा। (५०) चारुदत्तचरित्र भाषा। पूरवकरम लिखी जो होय । ताकों मेटि सकै नहिं कोय ॥ करमवली जगमें सरदार। ताकौं कोऊन मेटनहार ॥४९८॥ कबहूं रवि आन उगैदिशवारुन, सागर थाह किनी जु धरै। मेरुपै फूल कदाचित अंबुज, इन्दुकलाहमें आग जरै ॥ अमृत वाश करै अहिकेमुख, तूल हुतासनमें न जरै । कोडिउपाय करोभारामल, करमलिखी कवहून टरै॥४९९॥ अनहोनी नहिं होय, होनहार छूटे नहीं। लाख करो जो कोय, चतुराई बुध कोटिहू ॥५००॥ चौपाई। याहीने मोकौं दुख दयो । पूरवकरम सु सांचौ भयो । अब हौं देखौं अवर जुकर्म । निकसिविदेश जु पाऊंपर्म ५०१॥ तहां करौं व्यापार अघाय । लाऊं जहते द्रव्य कमाय ॥ देशांतर जाऊँमै प्रात । तब भामनि बोली सुनवात ॥५०२॥ चाल भैरवी की। बोली नारि सुलछनी पिय प्यारे हो। कंथ सुनो मोबात लाल पिय प्यारे हो । हात मोहि दुखगात लाल पिय प्यारे हो ॥५०३॥ नामलेह मति देशको, पिय प्यारे हो । घरहिं करो व्योपार सुनो पिय प्यारे हो । कहा विदेशहि जात लाल पिय प्यारे हो। सूत कातिहूं मैं सही, पिय प्यारे हो। पोषो तुम निजगाते लाल पिय प्यारे हो ॥५०४॥ १ पश्चिमादेशा में। 186 चारुदत्तचरित्र भाषा। (५१) मिहनत मेरे सूतकी पिय प्यारे हो। आनंदसों विलसेय लाल पिय प्यारे हो। इह मति मनहिं विचार हो पिय प्यारे हो । देशगमनको भेव, लाल पिय प्यारे हो ॥५०५॥ दुखसुखसौं निज सदनहीं पिय प्यारे हो । काल गमावौ सार लाल पिय प्यारे हो । बाहिर क्याजाने सही पिय प्यारे हो। दुखसुख परत अपार लाल पिय प्यारे हो ॥५०६।। तातें दासीकी कही पिय प्यारे हो। मानो मनबचकाय लाल पिय प्यारे हो । यह तुमको चहिये नहीं पिय प्यारे हो । तजि कर मोकों जाहु लाल पिय प्यारे हो ॥५०७॥ चारुदत्त लाग्यो कहन, सनो बल्लभा बात। धनबिन एको काजहू, होय-नहीं तुछमात ॥५०॥ चौपाइ। धनबिनमानमहत नहिं होय । धनबिन बात न पूछ कोय ॥ धनबिन महाकपूत कहाय। धनबिन सबही सुघि बुधिजाय। धनबिन सेवक सेव न करे। धनबिन भूपति नागो फिरे धनबिन एकोकाजन होय।धनबिन शत्रु मिलापीसोय॥५१०॥ भूखमरै भोजन क्या करै । दुख पांऊ क्यों सुख संचरै ।। निकसिविदेश नहीं संदेह । द्रव्यकमाय आउं पुनिगेह ॥५११॥ कहैनारि सुनकंत विचारि । चाचा पूछि शीख अवधारि ॥ माता चचापास तुमजाय। देयशीख सो करियो आय॥५१२॥ दोहा। - m - wwwe (५२) चारुदत्तचरित्र भाषा। चारुदत्त गुण पूरनधीर । मातापास गयो बलबीर ।। कहतभयो मातासों सोय। जाउंविदेश हुकम जो होय॥५१३॥ तहां करौं उद्यम कछुजाय । तहत लाऊं द्रव्य कमाय ।। तब सबकाज होय सुनमात। तातें चलौं दिशांतर प्रात।।५१४॥ सुनतबात मातहि दुख भयो । चारुदत्तसौं तब इम कह्यो। अहोपुत्र अजुगत कह कहौ । मेरेमनको संशय दहौ ॥५१५॥ बहुरौ यहमति कहो गुणाल । मो मनमैं दुख व्यापत लाल। कहाधरचो परदेश तुम्हार।करिये उद्यम गेह कुमार ॥५१६॥ बारहबरस पीछे मो मिले । देखत दुख मनके सबदले ॥ और विसार दई सबबात । तुमदेखे नंदन कुसलात ॥५१७॥ तातें गेह करो व्यापार । बात हमारी मानो सार ॥ जयै चारुदत्त तब बाल । हे माता सुनिये ततकाल ॥५१८|| अपजस जगमें बहुलह्यो।अरु मो घरमें धन नहीं रह्यो। मोपर मुख न दिखायो जात।लजावान भयोबहु मात ॥५१९॥ कैसे बदन दिखाऊं मात । तातें जाउं दिसंतर मात ॥ जव कमाय ल्याऊं धनसार। तबही गेह करौं पैसार ॥५२०॥ यह माता तूं निहचै जान । द्रव्य कमाय आय हौं थान ॥ बहुतभांति समझाई माय।तबसुनि मात विचार कराय ५२१॥ माता चलत जानियोसोय। तब निजमातहि टेरयो जोय ॥ तासौं बात कही समुझाय। चारुदत्त परदेशहिं जाय ॥५२२॥ मैं समुझायो ताको नेक । मानत नाही मो बच एक ॥ तेरो सोइ जमाई भाव । ताको तूले निज समुशाय ॥५२३॥ तबसुनि सिद्धारक सुनि बैन । चारुदत्तसौं बोल्यौ ऐन ॥ सुनियो कुमर मोहिवच धीर । क्यों परदेश जात हो वीर ५२४॥ फिर भी। २-गुग-लय-गुण-का-घर।३ करे।४-प्रवेश।

RAMAnike- ArmwMAN- चारुदत्तचरित्र भापा । (५३) जोधन तुमको चहिये तात । लेहु द्रव्य तो मनहिं समात॥ मेरेघरमैं धन अत्यंत । सोरहकोटि द्रव्य गुणवंत ॥५२५॥ तुम धन लेकर मनवच सोय । कर व्यापार निसंकित होय॥ जवविढ़वो तवदीज्योमोहि । छाड़त नारि लाज है तोहि ५२६॥ दोहा। बहुत भांति समुझाइयो, चारुदत्तकों बात । तव सुनि सेठकुमार फिर, कहत भयो अवदात ॥५२७॥ अडिल्ल । सिद्धारथ मो वचन कान देके सुनो। मैहूं करौं वखान आपने जिय गुनो। अब हमको इम ठौर जोग रहनो नहीं । चलं दिसंतर बेगि वात निह. सही ॥५२८॥ करिहौं तहँ व्योपार आपने चाव स्यौं । द्रव्य कमाऊं सार तबहिं घर आव स्यौं । उद्यम या संसार माहिं सुखदाय है। उद्यमतें सवकाज सरै मनभाय है ।।५२९॥ पद्धड़ी छन् । बिनउद्यम कछुय न होइ जाम। उद्यमविन कहा करै जुकाम। उद्यमविन नरबहुदुख लहंताउद्यमविन दालिदनहिंदहत५३१ उद्यमबिन नर बैठे जु खाय। अगलो तिन धन निहचै सु जाय।। उद्यमबिन नाहीं होयमान। उद्यम है जगमैं गुरु प्रधान ५३१॥ बातें बहु कौन करै बखान निहचै चलिहों परदेश थान ॥ यहसुनि सिद्धारथ रह्योचाय । तबदीनो ज्वाब न फेरिताय॥

+ 488600 चारुदत्तचरित्र भाषा । (५४) चौपाई। सुनकरिबचन मात दुखलह्यो। भरिलोचन तासौं इम कहो। तें वेश्या घर कीनो वास। तो बिनमैं कीनो दुख त्रास ॥५३३॥ किम किम करि जु देखियो नैन। अबतें बुरे सुनाये चैन ।। काहेकौं परदेशहिं बहै । बार बार माता यौं कहै ॥५३४॥ चारुदत्त इम कहैं पयासि । मातासौं निजकरि अरदास ॥ रहतबनै मोसौं नहिं माय । बहुतवचन मो कहा कहाय॥५३५॥ मातासेव बहूके पास । करवइयो सो बचन पयास ॥ यहकहि नमसकार तबकियो। भामनि वाहि माय सौंपियौ। बोलिज्योतिषी उत्तम कोइ । सगुन विदेश पूंछियो सोय ॥ सोधिदिवस तिन नीकीघरीगमनविदेश कियो मनररी ५३७॥ खरचीलई नारिके पास । मारग गमन चलनकी आस ॥ घरतें चल्यो महा गुनवंत। मनमैं सुमरन करि अरहत॥५३८॥ तस मामा सिद्धारथ नाम । सुन्योकुमार गमन तिहठाम ॥ ताकेमन उपज्यो बहुमोह । आतिही भयो तासकौं छोह ५३९॥ सोघरतें निकरयो अकुलाय । चारुदत्तके पीछे जाय ॥ दोऊवीर भये तब संग । चले विदेश आपने रंग ॥५४॥ तजत चले पुरगाम सुदेश । नांधत परबत नाहिं कलेश ॥ मारगमाहिं चले सोजाहिं । देखत कौतुक महाउछाह ॥५४॥ दोहा।। देश बलाकाके विर्षे, पहुँचे दोऊवीर । सीमावति सरिता तहां, टिके तासुके तीर ॥५४२॥ १ प्रकाश करके।२ बुलाकर ।

चारुदत्तचरित्र भापा। (५५) चौपाई। दोऊ मनमें चक्रित भये । कारज कहा विधाता ठये ॥ खरचीतुच्छ बनज नहिंहोय। तातें करौ उपाय जु कोय ५४३॥ तवदोनों मिल कियो विचार जैसो धन तैसो व्योपार ।। तव तिन मूरा करे खरीद । बांधगाठरी तहां धरीदि॥५४४॥ निजनिज शीश धरी स्वयमेव । चले तहांतें दोनों एव ।। चलत चलत सो पहुँचे तहां। नगर पलासपुर राजैजहां ५४५॥ पूरन धनकरि ऋद्धिअपार । शोभित नीके हाट बजार ।। मंदिरधवल उतंग अपार । बहुत दिपै छबि तिनके द्वार ५४६॥ कनककलश तिन सीसदिपंत । कुरीछतीस बसै धनवंत ॥ - दोनोंवीर कियो परवेस । नगरमध्य सुख कियोअसेस ५४७॥ ताही नगर सेठ इक बसै । धनकन करि शोभा बहुलसै॥ वृषभध्वज है ताको नाम । ताकेगेह गये दोऊ ताम ॥५४८॥ तासौं अपनो सब विरतंत। कहत भये दोनों नरसंत ॥ चारुदत्तके सुन सो बैन। मनमें अधिकलियो तिनचैन ॥५४९॥ आदरकरि घरमैं लेगयो । पटरस भोजन जीमन दयो॥ रहिबेजोग्य दियो निजधामातब दोन्यौं लीनौ विसराम ५५०॥ तिसही घरके कोने थान। मूरनकी तिन करी दुकान ॥ दिनप्रति मूरे वेचत रहै । आठपहर धंधेमैं बहै ॥ ५५१ ॥ इहविध कछुदिन बीते तामामसकतिकरि कछुबिढ़ये दाम ॥ तिनदामनकीलई कपास।दोऊवीर नफाकी आस ॥५५॥ इमि देवा लेई करें, द्रव्य कमाऐं सार । अवर कथा आगे सुनौ, भव्य जीव चितधारि ॥५५३॥ १जाति । २ मिहनत करके। दोहा।

Rokkass 'चारुदत्तचरित्र भाषा। (५६) चौपाई। ताही नगर एक वनिजोर । कंजननाम कह्यो सिरदार ॥ चाल्यो सोइ दिशांतर धीर नाना वस्तु लेय गुनवीर ॥५५४॥ ताके संग बहुत अवैवेस । वस्तु मनोहर भरी असेस । ताकेचलत भयो कुहराव । बजतभये वाजे अधिकाउ ५५५॥ चारुदत्त सुनियो सब भेर्दै । कहत भयो मामासौं एव ॥. नायक एकजातु परदेस ।वस्तु मनोहर भरत असेस ॥५५६॥ ताकेसंग साथमैं वीर । चलिये वेगि वस्तु ले धीरं ॥ तब दोनोंने कियो विचार करे खरीद बैल तिन चार ५५७॥ भरी कपास लादिये बैल । चलत भये देशांतर गैल ॥ टांडेसंग चले सो जाहिं। करत मुकाम पंथके माहि ॥५५८॥ एकदिनोंकी कही न जाय । विधना जैसो रच्यो उपाय ॥ मारगमाहिं चलेसोजाहि। भीलनगन आयोतिहँठांय ५५९॥ तिनसब लूटलये जनबान । चारुदत्त सिद्धारथ जान ।। अबर कपास बारि तिनदई । होत भये सबही दुखमई ॥५६०॥ तब सिद्धारथ मन पछिताय ! द्रव्य न रही गांठमैं भाय ।। फिर विचार दानो मन करयो। धीर मांडि आगे पगुधरयो ।। भ्रमन करत दोऊ चीर, बन उजाड़ सरिता अतुल । पहुंचे इक थल तीर, देख्यो एक पहार तहँ ॥५६२॥ मलयागिर तसु नाम, परबत महा उतंग है। चढे तासु सिर ताम, ऊपर सों पहुँचत भये ॥५६३॥ १ बिनजारा । २ माल लैजाने के लिये बैल अथवा गाड़िये । ३ हल्ला। ४ भेद । ५ दिन । ६ मनुष्यों और धैलो को। ७ यान सवारी वैल। सोरठा।

चारुदत्तचरित्र भाषा। (५७) अडिल्ल। 60000०००००० रतन खानि तहँ देखियो, मनमै भये खुशाल । ततखिन दोनो खानतें, लये पदारथ लाल ॥५६४॥ उतरे तबहि पहारतें, चले जात पथमाहि । तहां भील आए तुरत, निडर शंक कछुनाहिं ॥५६५॥ लीने रतन छुराय तुरत तिन पासते । बहुत संक दिखराय गये निज वासतें ॥ चारुदत्त तिहँठौर बहुत दुखही लयो । करम दोष बहु देइ मतो औरै ठयो ॥५६६।। चौपाई। दोनों चितकरि फेरि विचार । चलंत भये सो राह मझार ।। मनमैं जपत पंच नवकार।नांधत कानन महाउजार ॥५६७॥ चलत चलत कछुवांसर भये । प्रियंगुबेला पट्टनगये ।। तिहँपुरमें कीनो परवेस। दूरिभयो मन सबहि कलेस॥५६८॥ पट्टन शोभा देखि अपार । मनमैं सुख पायो अधिकार ॥ देखत चाले हाट बजार । नाना वस्तु दिपै तहँ सार॥५६९।। देखत महा उतंग अवास । उज्वलवरन धरे छवि पास ॥ । देखत कौतुक चालेजात।आगेअवर सुनोअब बात ॥५७०॥ तिहँ प्रियंगु पट्टनमें जान । बसें जु एक सेठ धनवान ।। चारुदत्तको पिता सुमित्र। भानुदत्त ताको है मित्र ।।५७१॥ सुरिंद्रदत्त शुभ ताको नाम । पट्टन रहै सोइ गुनधाम ॥ ताके ग्रेह गये दोऊ वीर। चारुदत्त सिद्धारथ धीर ॥५७२॥ देख सेठको कियो जुहार। तब तिन वरनन कियो विचार।। १बन । २ दिन । ३ घर।

4666666666666666666 (५८) चारुदत्तचरित्र भाषा। जानी चारुदत्त है यही । मोयमित्रको सुत है सही ।। ५७३।। तब सो सेठ मिल्यो उठिंधाय । कुशलछम पूंछी बहु आय ॥ मुखत मधुरे बचन कहात । हेसुत कुशलछेम तुमगात ५७४।। चारुदत्त तब बोलत भयो । सब विरतंत पाछलो चयो । तबतिन बंह कीनो सनमान। मंजन करवायोअसनान५७५॥ पठरस भोजन दीनो असन पहिरनजोग दिये तिन बसन॥ सेठ जुबनिज गमन तवठयो। बहजलजंत भरावत भयो ५७६॥ वस्तुअनूपम बहुतै धनी । जाकी गिनती जाय न गनी ॥ लीनो लसकर संग असेस । जोधा बाहन वस्तुविसेस ५७७॥ इंधन अन्न नीर बहु लयो । निहचौ बरषबारहको ठयो॥ बाजे तहँ बाजंत अपार । पटह भेरि तुरही सहनार ॥५७८॥ पूजे तब जलदेव अनंत । सुरिंद्रदत्त तब चल्यो तुरंत ॥ चारुदत्त सिद्धारथ दोय । लयेचढ़ाय परोहन सोय ॥५७९॥ लहर झकोरन चले जहाज । सागरमधि सब एक समाज ॥ मनमें जपत पंचपरमेठि। चारुदत्त आदिक सब सेठि ५८०॥ चाले बहुतदिवस बलबीर । नांघत देस घाट बहु तीर ॥ चलत चलत कछु वासर भये। काहू दीप मध्य सब गये।।५८१॥ उतरे सागरतट गुनधाम । दीपमाहिं लीनो विसराम ॥ वस्तुभरी निजदेश मझार ।सो बेची नाना परकार ।।५८२॥ ऐसे बनिज कियो तिहदेस । द्रव्य कमाई तहां असेस ॥ ऐसें रहत बहुतदिन भये । बारहबरस तहां बीतये ॥५८३॥ तहां खरीदी वस्तु अपार । भरे परोहन धनकरि सार ॥ रतनआदि जे नाना वस्तु । भैरे परोहन लेय समस्त॥५८४॥ १कहा। जहाज।

००००० ००००००००० चारुदत्तचरित्र भाषा। Animamar NAAMRPw (५९) चारुदत्त बहुद्रव्य कमाय । ताकी गनती गनी न जाय ॥ लेयद्रव्य सब चढ़े जहाज। चाले सब देशै सजि साज५८५॥ पवन जोर चाले जलजत । पहुँचे सागर वीच तुरंत ॥ लहरिशकोरनि हालै जबै । सबरेजन दुख पावें तब।।५८६॥ एक दिनाकी कही न जाय । विधना जैसो रच्यो उपाय ॥ करमलिखी सो निहचै होय । ताकों मेटि सकै नहिंकोय५८७॥ करम अशुभ कछु आयो तासु। मारयो पोत मच्छने जासु ॥ मारत फाटगये जलजंत । खंड खंड हुइ गये तुरंत ॥५८८॥ काहू एक खंडके सीस । चारुदत्त रहगयो गुणीस ॥ एक लाकड़ी ऊपर सोय । रह्यो सिद्धारथ निहचै जोय ५८९॥ बहत बहत लाग्यो जब तीर । निकस्यो सागरते गुणधीर॥ चारुदत्तको दुख तिन कियो। हाहा करि रोवत मन भियो। तब सिद्धारथ बहुदुख पाय । अपनेगह गयो अकुलाय ॥ देशवृतांत सबनौं कह्यो । परिजन मनमें बहुदुख लह्यो५९१॥ सिद्धारथ दुचितो बहुत, रहै आपने थले । और कथा आगे सुनो, भाषे भारामल्ल ॥५९२॥ चौपाई। चारुदत्त सागरके माहिं । निकस्यो लकड़ा चढ़ि तिहँठाय॥ खवर नहीं मामाकी ताहि । चारुदत्तकी खबर न वाहि।।५९३॥ चारुदत्त दुख कियो असेस । मामा खबर न पाई लेस । तबसो चल्यो तहांनैं धीर । मनमैं मंत्र जपत गुनवीर ॥५९४॥ उदवरावति नगर जु गयो । देख नगर मनमें सुख भयो । तहां खवर पाई तिन तंतं । सिद्धारथ घर गयो तुरंत ॥५९५॥ १सब अने। २ अपने देशको । ३-४ जहाज । ५ ग्राम । ६ ठीक २, चौकस । थाहा। - I amraphy (६०) चारुदत्तचरित्र भाषा। घर जैकी पाई खवर । मनमैं बहसुख लीनो कुमर ॥ तवं सो वीर अकेलो होइ । चल्यो तहांतें मनवच सोय५९६॥ मनमैं और विचार जु ठयो । तव सो सिंधु देशमै गयो । संवर गाम तहां सो वसै । इंदपुरी सम शोभा लसै ॥५९७॥ चारुदत्त नगरीमें गयो । महिमा देखत बहु सुख भयो । चारुदत्तको पिता सुजान । भानुदत्त श्रेष्ठी गुनवान ॥५९८॥ ताको मेल्यो द्रव्य अपार । कोड़ि अठारहको भंडार ॥ सोधन चारुदत्त सब लयो। तसु मनमाहिं बहुत सुखभयो ५९९॥ तव बनवायो जिनको धाम। तिसपर कलश धरे अभिराम ॥ नानाभांति रचे उपकरन । खरचै द्रव्य सोइनिजकरन॥६००॥ चार प्रकार देय सो दान । सज्जन जनको राखै मान । ओरहु दुखित भुखित जे जीव। तिनको लछमी देइ अतीव ।। जाचकजन जो मांगै आय । तिनकौं देय द्रव्य अधिकाय॥ इहविध दान जु देने लग्यो। अरु समिकतमैं तसु मन पग्यो। भयो प्रसिद्ध सोइ दातार । देशदेशमें नाम अपार ॥ पूजा दान करै धरचित्त । गुरुकी भक्ति जु करै पवित्त ॥६०३॥ मनगंभीर उदार अपार । सुंदरता अतिही सुकुमार ॥ सरव गुननिको सोइ निधान । धरमसुभावी मधुरबखान६०४॥ लजावंत दयाजुत सही-। छमा सत्य जोरी उरलही ॥ महादान देतो जस लहै। बंदीजन. मुखतें गुनकहें ॥६०५॥ दुखीदीन लखि करना लाय। तिनकौं पोखै मनवचकाय ॥ इहविध काल वितीत जु करै। पुण्यदान करि सुख विस्तरै ॥ दानदेत जगमें जस लयो। नाम प्रसिद्ध पुहमि पर भयो । चारुदत्त सम अवर न दान। देश देश सब करै बखान ६०७॥ १ जिनमंदिर । २ पृथिवीपर ।

www सोरठा। दाहा। ॥ चारुदत्तचरित्र भाषा। (६१) जो मांगै ताकौं सो देय । काहू विमुख न जान सु देय ॥ इहविध दान करै अत्यंत ।आगें अवर सुनो विरतंत ॥६०८।। सुनिकरि दान प्रसिद्धि, एक जक्ष भुविपर अतुल । तिन रचि मनमें बुद्धि, देखन चाल्यो कुमरकों॥६०९॥ नाम वीर प्रनतेश, दान परीक्षाके निमित । करि मानुषको भेष, आयो सो ता नगरमें ॥ ६१०॥ महारंकको भेषधर, अरु पीड़ित बहुगात । दुखितदेह बहु सिथलकर, आयो जक्ष सु प्रात ॥६११॥ वस्तीमें मांगत फिरे, टेरि टेरि करि बैन । आगें अवर कथा सुनो, भवजीव सुखदैन ॥६१२॥ डिल्ल। चारुदत्त जिहबार जातु जिनधामकौं । दरसन प्रभुको करन जपत जिननामकौं ॥ ताही अवसर जक्ष समुहिं आवत भयो । दुखित देख तसु कुमर तबहिं पूंछत भयो ॥६१२॥ तू दुख काहे करै विथा कह तोहि रे!। कैकछु चाहत द्रव्य बात कहि मोहि रे !॥ तबही सुनि सब बात जक्ष इम कहत है। मोहि पेटमैं पीर मूलकी बहुत है ॥ ६१४॥ काहू तरह न नीकी होइ । तब इक वैद्य मिल्योमो सोइ ॥ तानै दारुन रोग बताय । मानुषकी पसुरी मँगवाय ।। ६१५ ॥ 000000000000 चौपाई। १ समुन।

१ चारुदत्तचरित्र भाषा। ताको सेंक बतायो मोहि । उदरपीर तब नीकी होय ॥ रंकमहा मैं स्वामि अनाथ । पसुरी प्रापति होय न नाथ ६१६॥ तबमैं सुन्यो तुमारोनाम । अरु तोदान सुन्यो अभिराम ॥ महिमा सुनि आयो इह ठौर । तू कहिये सबमें शिरमौर ६१७॥ अवर तु त्यागी महासुजान । जो तू देतो दे गुनवान ॥ अवरकछु चहिये नहिंमोहि। अपनी बात प्रकाशी तोहि६१८॥ चारुदत्त तब सुन सब बात । तासौं मुखत वचन कहात॥ मैं तोकौं दैहौं बलवीर । तू कछु दुख मत करै शरीर ॥६१९॥ छुरी हाथमैं ततछिन लई । पसुरी काटि कादि तिस दई ।। तबसोदेव सुदेखि चरित। अचिरजवान भयो निजचित्त६२०॥ मानुषरूप कियो तिन दूर । प्रगट भयो तब देव हजूर ॥ चारुदत्तकी पूजाकरी। अरु ताकी बहु थुति उच्चरी ॥६२१॥ धन्यतात जाकै अवतरयो। धनि तोमाय गरभ जिहँ धरयो। धनिसो वंशजहां तुभयो। धनि वहगेह जन्म जहँ लयो ६२॥ धनि वहघटी धन्यतिथिवारा धनिरंजनी धनि वासर सार । धन्यधन्य तो नाम मुखार।धन्यधन्य तू जगमैं सार॥६२३॥ तोसम अवर न दूजो कोय । सबकौं सुखकारी शुभलोय ॥ इहविध बहुत करीथुति तास। फिर बैठोसो ताके पास ॥६२४॥ घाव छुरीको आछो कियो । निरमल देह तासु देखियो । जोकछ द्रव्य रह्यो भंडार। सोभी सबदीनो ततकार ॥६२५॥ रह्यो जु फेर अकेलो होइ । चल्यो तहांत मनबच सोय ॥ भ्रमनकरत पुहमीपर भयो। चलत चलतराजगृहिगयो६२६॥ चारुदत्त पुर कियो प्रवेस । देखी शोभा नगर अशेस । काहूथान कियो विससम । दंडी एक मिल्यो तिहँठाम ॥६२७॥ ५राति । २ दिन।

डल्ला चारुदत्तचरित्र भाषा। विष्णुदत्त ताको पुनि नाम । दुष्ट महा पापनको धाम ॥ ताकी विनयभक्ति बहु करी।ताकू अपनी विधि उच्चरी ६२८॥ आदिअंत सबरो विरतंत । दुखसुख बात कही सवतंत । तबदंडीबोल्यो हरषाइ। चारुदत्त मो बचन सुनाय ॥६२९॥ मेरेसंग चलो तुम वीर । धन चाहो तो साहस धीर ॥ रसको कूप जहाँ है भाय । रसपाये मनवांछित थाय ॥६३०॥ होइ रसाइन ताकी वीर । तासौं द्रव्य होय गंभीर ॥ चारुदत्त सुनि हरषित भयो।तासो फेर बचन इमचयो।६३१॥ बेगि चलौ तिहठौर बार मति ल्यावहू । कै मोहि देहु बताय ईखे ले आवहू ।। सुनि तव दंडी बैन चैन मनमें लयो। ततखिन चाल्यो संग बनीमैं लेगयो ॥ ६३२ ।। गयेजु कानन महा उजार । जहां मनुषको नहिं संचार ॥ दोनों बीर पहूंचे तहां । बन उजार कूप इक जहां ॥६३३॥ दोनों बैठि कूपकी पार । विष्णुदत्त तब करे विचार ॥ चौकीसौं इक रेसरीबांधि । चारों कोन एकसे सांधि ॥६३४॥ तापर चारुदत्त बैठार । तूंबी दीनी हाथ मझार ॥ अरुतासों लाग्यो इम कहन विष्णुदत्त पापी अघगहन६३५॥ अहो चारुदत्त गुनरासि । तुमसों बचन कहों परकासि ॥ 'जब तुम पहुँचौ कूप मझार । यह तूंबी भरलीजै सार ॥६३६॥ घरदीजे चौंकी ऊपरें । तूं टिकियो तन निरभय करै । अरु दीजे तूं रसरी तान। तबहीं खेंच लेहुंगो जान ॥६३७॥ चौपाई। -- १ कहा।२रस।

सांगठा । (६४) चारुदत्तचरित्र भाषा। पार्छ फेरि फांसिहौं डोरि। तापरतूं बैठियो बहोरि॥ तब हम तोकौं लेहैं कादि । चारुदत्त बोल्यो मनबाड़ि॥६३८॥ जोतुम कही बात बलबीर । सो सब करिहौं साहस धीर ॥ यह मनमें भोरो अधिकाय। जानें नहीं दुष्टको भाय ॥६३९।। तब दंडी ततखिन तिहबार । फांसदियो तिन लगीन बार॥ चारुदत्त तब भीतर कूप । पहुँच्यो ततखिन जाय अनूप ६४०॥ देखी तहां एक पटकुई। बैठो जाय तहां तट सुई। चारुदत्त लेतूंबी करन । लाग्यो सोइ तव रसभरन ॥६४१॥ तहां एक नर राजै और । डरयो बहुतदिनको तिस ठौर ।। बोलि उठ्यो सोई तिहबार । चारुदत्तकौं तवे निहार ॥४॥ हे परदेशी मित्र, सुनौ वचन मेरे सरव । कहाँ बात धरि चित्त, हे सुजान गुन आगरे ॥६४४॥ यह मैं जानतु बीर, विष्णुदत्त तोकौं मिल्यो। तिहँ डारयो इस तीर, निह● करि जानी सही ॥६४४॥ चारुदत्त तिस बचन सुनि, पूंछत भयो सुजान। , अहो भ्रात तुम कौन हो, कहां तुम्हारो थान ॥६४५॥ तुम आये इहठौर किम, कहौ मोहि परकासि । किम जानो दंडी मिल्यो, हमै महा गुनरासि ॥६४६॥ तब मानुष तस बचन सुनाय कहत भयो तासों समुझाय॥ मेरे बचन सुनौ दै कान। नीकै करि हौं करौं बखान ॥६४७॥ नगर उजैनी अदभुत बसै । शोभा इंदपुरी सम लसे॥ 4 दोहा। चौपाई। १भोला । २ भाव-परणाम । ३ सुधी-झानी।

योरुद्रसचरित्र भाषा। (६५) innt - तहां हमारो बास सुजान। बनिकपुत्र निहले करिजान॥६४८॥ सोहम अशुभ करमके जोग। निरधन रहैं सदा करि सोग । तहां दुष्ट वह तपसीजाय । मिलत भयो मोको पुर भाय॥६४९॥ मधुरवचन तिन मोहिसुनाय।अरु मोकौं बहुलोभ दिखाय ॥ तबमैं लोभधरचो मनमाहिं । दुष्टभाव तसुजाने नाहिं ॥६५०॥ मोहि संगले आयो सोइ । महाउजार संग नहिं कोय ॥ तब आए इस विलकी पार। मोसौं सरब कयोब्यौहार॥६५१॥ इतब दीनी तूंबी मो पाने । बेगि फांसि दीनो इह थान ॥ तब तूंबी रसभरि सोय। दई गहाय तासुकौं जोय ॥१५॥ पा, फिर तिन फांसी डोरि। तापरि में बैठियो बहोरि ॥ आधी दूर बैंचि मोजवहि । रसरी काटिदई तिन तवहि।।६५३॥ई गिरयो तहांतें तबमैं भ्रात । चोटलगी मेरे बहु गात ॥ यह तापसी महा निरदई । दया नहीं ताके कछु रही ॥६५॥ तिनि मोकों रसकी बलि दयो।आपन दुष्ट ईख लेगयो । इसोअबमें या रसकरिभ्रात । अर्द्धदग्ध मेरो भयोगात ॥६५५|| अवमो प्रान कंठगत जान । रहे होहि निहचै तुम जान ।। चारुदत्त सुनिकें यह बैन । बोलत फेरि भयो सुखदैन ॥६५६॥ मेरे बचन सुनो हो भायें । अब हम कैसो करें उपाय ॥ सोहमसौं कहिहो बलबीर। तब वह नर बोल्योधरिधीर६५७॥ सुनो बात तुम नाथ कहाँ परकास में ! तूंबी रसभरि लेहु देहु धरि पास में ॥ पा, अपनी ठौर जु पाथर डारियो। रहियो बगल जु तिष्टि मतो यह पारियो ॥६५८|| शोक । हाथमै । ३ रस । ४ भाई। ५ मनसूबा $$$ अड़ि।

(६५) पारुदत्तचरित्र भाषा। चौपाई। तब तुम पान बचेंगे वीर । निहचे करि जानों यह धीर । चारुदत्त सुनिकरि यह बात। हरख्यो चित्त सु विगस्योगात ॥ तूंबी तब रससौं भरलई । चौकी माहिं तबहि धरदई । अरु तिन दीनीरसरीतानि। तपसी बँचलई तव जानि॥६६॥ तूंबी ले निज हाथ मझार । फांसी डोरि दूसरी बार ॥ चारुदत्त तब अपनी ठौर । धरदीनो इक पाथर और ॥६६१॥ रसरी तानदई तिन जबे । आपुन बगल रह्यो टिक तबै॥ रसरी खेंची तपसी ताम। अघबिच रूप आइयो जामः ॥६६२।। तब तिन दुष्ट छुरी ले पान । दईकाटि रसरी अज्ञान ।। चोकी जाय रूपमैं परी । आपन तूंबी ले तिन धरी ॥६६॥ गयो तहांतें दुष्ट गमार । आगै अवर सुनो विस्तार । चारुदत्त तब भीतर कूप । जपे जिनेश्वरनाम अनूप ॥६६४॥ कायर नेक न होइ शरीर । मनमैं हरख धरे बलबीर ।। कहे बलीसबतें विधिकार । करसा पास न कहूं उवार॥६६५॥ जैसो उदय करम है आय । सोई सहै जीव अधिकाय ॥ ताको कहा सोच कीजिये। जैसो उदय तेसो लीजिये॥१६॥ चारुदत्त तिहँ थान, वा नरसों बोलत भये । सुनियो मित्र सुजान, मोहि बचन तुम कानदै ॥६६७॥ ऐसी कठिन जुठोर तें, कोई बने उपाव । मोहि निकसिबेको सही, कहो तुरत सो दाव ॥६६८॥ सोरठा। दोहा। १तिस समय । २ जिस समय।कर्म ।

चारुदत्तचरित्र भाषा। (६७) चौपाई। तब सुनि बचन सुबोलतु भयो। चारुदत्तसो तिन इम चयो । हे परदेसी मित्र सुभाइ । एक गोहे आवै इह ठाइ ॥६६९॥ कूपमाहिं रस पीवन पान । आवतु निहचै बेर मध्यान ॥ ताकी पूंछ पकरि नीकरो। अवर उपाय नहीं दूसरो॥६७०॥ चारुदत्त तब बोलत भयो। सुनियो मित्र वचन मो कह्यो। निकसनकी विधि कहीप्रकासितुम क्योनहिं निकसेगुनरासि॥ सुनि परदेसी मेरी बात । मेरे चोट लगी बहु गात ॥ तातै पीर बहुत है सही। शक्ति नहिं निकसनकी रही॥६७२॥ यहसुनि चारुदत्त गुनमाल । मनमें बहुत जु भयो खुशाल॥ फिर बान्यों बोल्यो तिहँ बार। हे परदेसी सनिहो यार॥६७३॥ छिनमें कढ़त हमारे प्रान । यह मनमें निहवे तुम जान ॥ तबसोचारुदत्त तिहबार । दीनो ताहि पंचनवकार ॥६७४॥ पद हैं पांच बरन पैंतीस । ताहि सुनाये मनबचईस ॥ सोहू मनमैं बहु हरषाय ।जपियो मंत्रमहा सुखदाय ॥६७५॥ चारप्रकार लियो सन्यास । जातें लहिये पद अविनास ॥ हिरदेमाहिं पंचनवकार । विसरयो नाहिं सोय तिहबार ६७६॥ तब तिन उपसम करि परिनाम । प्रान तजे मानुष तिहठाम ॥ मंत्रप्रभाव तुरतही सोइ । पहिले सुरगदेव भयोजोय ॥६७७॥ मंत्रप्रभाव कहा नहिं होय । पापपंककों डालै धोय ॥ तातें भविजन जपिये मंत्र। त्रिभुवनमें जो सार महंत॥६७८॥ मंत्रप्रभाव लहै सबसिद्धि । मंत्रप्रभाव होय बहुऋद्धि ॥ महामंत्रफल सुरसेवंत । महामंत्रफल भवदुख हंत ॥६७९॥ १चंदनगोह अथवा पाटा गोह एसी बलवान होती है कि वह एक मादमीका बोझ उठाकर दीवार पर घट सकती है। २ वनियां।

(६८) चारुदत्तचरित्र भाषा। तातै जपिये मंत्र गंभीर । शुभगतिकर नाशन भवपीर । जगमें महामंत्र सिरदार। तातें जपिये मंत्र जुसार ॥ ६८०॥ आगे कथा सुनो अब और । चारुदत्त राजै तिहँ गैर ॥ ताही समय जुआई गोह। देखी चारुदत्तने सोह ॥६८१॥ बैठि कुईतट तिन रस पियो । बहुरि चलनको उद्यम कियो । चारुदत्त तसु पकरीपुच्छ । चलत भयोतासँग गुणगुच्छ६८२|| ज्यों ज्यों गोहचले ऊपरे । त्यो त्यों चारुदत्त नीकरै । चलत चलत सो पहुंच्यो तहां। रही कमनि ऊपरजहां६८३॥ हाथ एक ऊपर रहिपार । जहां बिराजै एक कुलारि ॥ तामैं गोह गई धसि जवै। चारुदत्तभी पहुँच्यो तबै ॥६८४॥ तहां एक छिद्र भूपरे । तामें गोह चली ऊपरे । हाथप्रमान तहाँ है राह । मानुषपै निकस्यो नहिंजाह॥६८५॥ तब तिन पूंछ गोहकी छांड़ रह्यो तिष्ठ जिननामहिमांड ॥ दादशअनुप्रेक्षा जो सार।तिन चितवन कीनो तिहबार६८६॥ जप मंत्र बेठो तिहँ ठौर । आगे कथा सुनो अब और ॥ ताहीबार अजोगन तहां। चरन जात सो तिसवन महा६८७॥ कूपपारि सब निकसी आइ । तहां एक छेरीको पाइ॥ बाही छिद्रमाहिं गिर परयो। चारुदत्त ततछिन पाकरयो६८॥ अडिल्ल। राख्यो भीतर पकरि छागको पविजू । तब अजिया इकबार मिमानी सावजू ॥ सुनकर ताकी टेर ग्वाल आयो तहीं। देखि छिद्र तसुपांव लग्यो खोदन मही ॥६८९॥ १ बिल महार धकरियों 7 समूह । .

चौपाई। चारुदत्तचरित्र भाषा। (६९) चारुदत्त तिसबार बचन बोलत भये । होले होले खोदि वीर सुनि गुनमये । तब सुनि बचन रसाल ग्वाल निज कान । बहुत भयो तिहँकाल सु अचरजवानजू ॥६९०॥ पूंछत भयो जु तबइ अहीर । बोलत कौन भूमितें वीर ॥ कोहै निहचै कह निजबात । चारुदत्त तब वचन कहात६९१॥ हम, निहचै मानुष भाय । हमे बेगि काढौ गुनराय ॥ तबही ग्वाल सुने तस बैन । हिरदे बहुत लियो तिहँचेन६९२॥ ताही समय खोदियो थान । चारुदत्त काढ्यो गुनखान ॥ तब सो सेठ नंदनीकल्यो। फेरि तबै आगेको चल्यो ॥६९३॥ महासघन काननके माहि। इकलो वीर चल्यो तिहँ जाय॥ बनमें भीत अधिक असुरारिफिरें सुअर तहँ रोझ सियार ६९४ चीता सिंह डकारें घना । बांदर रीछ महिष माना । गजमदमत्त फिरइ असराल। सारदूल सिंहनके लाल ॥६९५॥ हिरना अजगर अहि संचरें। चारुदत्त तिहँ बममें फिरें। इहविध कुमर चल्यो तहँजाहि।आरणमहिष मिल्योइक ताहि॥ महाभयानक बलकरि मंत।मारन ताहि दौरियो तंत ॥ चारुदत्त समुहानो देख। भयो बहुत भयभीत विशेष ॥६९७॥ भजतुभयो आगेकों सोय। भैंसा पस्यो पिछारी जोय ॥ भजत भजत सो पहुँच्यो तहांगुफाएक परबतकी जहां ६९८॥ देखगुफा चाल्यो समुहाय । तहां एक अजगर दिखराय॥ गुफादार सोवे जु निशंक।मानो कालगेह बहुबक ॥६९९।। १लंगूर २-३ सामने। m.in. .

दोहा। (७०) चारुदचचरित्र भाषा। भ्यानक सोय महाविकराल। सोवै सोय गुफा दरवार ॥ चारुजु दत्त चरित यह देखि। पाछै भैसाक्रोधविशेषा७००॥ तब तिहिं कछुनहीं कियो विचाराततखिन चल्यो गुफाके दार। तब निजपग घर अहिके भाला जायपरचो सु गुफा दरहाल ॥ कुमर कंदरा भीतर गयो । अजगर तबही जागतु भयो। क्रोधवंत है इसपर जरत्यो।मानो तेल हुतासन परचो ॥७०२॥ समुहें आरणमहिष जु देखि। अजगर जानी चित्त विशेष ॥ जाही मोशिर धारयो पांउं। अवर न कोऊ है इस ठाउं ॥७०३॥ तव अहि ततखिन उठ्यो रिसाइ । कोपारूढ़ चल्यो समुहाय॥ भैंसा सहित लग्यो जुधकरनाआगे कथा सुनो दुख हरन७०४।। गुहावीचतें चारुदत, देखत भयो निहारि। अजगर महिषा जुद्ध बहु, करें पुकारि पुकारि ॥७०५॥ बलकार दोनों जुक्तवर, करहिं अखारो गाजि। हारजीत नहिं को लहैं, भिरै पराक्रम साजि ॥७०६॥ भ्यानक महा डरावने, जुद्ध करें विकराल ॥ चारुदत्त जुध देखिकरि, निकस भज्यो ततकाल ॥७०७॥ चल्यो अगारूं वीर, कानन महा उजारमें! जपत मंत्र गंभीर, मनतें नेक न विसरतो ॥७०८॥ आगे महिषा दोय, और ताहि सनमुख मिले। मारन दौरे सोय, चारुदत्त तब-भाजियो ॥ ७०९ ॥ अरणा जाके पीछे परे। क्रोध अधिक करि तनमन भरे॥ सेठनंद तिनको भयमान । आगे भाजतु भयोसुजान ७१०॥ सोरठा। चौपाई।

चारुदत्तचरित्र भाषा।
(७१)
विरख एक देख्यो तिहिबार । महासघन ऊंचो असरार ॥
तापरगयो तबहिं चढ़िसोय। आये महिषा तरेंबहोय ॥७१९॥
झीकझांक जात सब रहे । चारुदत्त मन थिरता लहे ॥
तरुशाखातें उतरचो सोय ।चल्यो फेरि आगेकों जोय ॥७१२॥
चलत चलत सो पहुँच्यो तहां। सरिता एक बहै शुभ जहां ।
ताकेतट लीनोविसराम।आगे कथा सुनोअभिराम ॥७१३॥
रुद्रदत्त, पांचों नृपनंद। हरिसिख, गोमुख, सुखके कंद ।।
बाराहक परतेप मरूभूत।चारुदतके मित्र सँजूत ॥७१४॥
तेसब याको ढूंढत फिरें । पावें नहीं न थिरता धरै ॥
चलत चलत सब आये तहां। चारुदत्त सरितातट जहां ७१५॥
देखि कुमरकों हरषित भये । मिले नेहकरि मस्तक नये ।।
पूंछी सबनि छेम कुशलात । चारुदत्त तुम नीके गात ।।७१६।।
चारुदत्त तब निज विरतंत। भाख्यो सकल आदिलौं अंत ॥
सातौवीर फेरि तिसधान। नदीमाहिं कीनो असनान ॥७१७॥
तिष्टि सबनि तह भोजनकियो।छान जुनीर आचमन लियो।
पा सातौ वीर अभंग।चले तहति करि इकसंग ॥७१८॥
एक नगर देख्यो शुभ सार । शोभा कहत न आवै पार ॥
श्रीपुर ताहि नगरको नामागढ़ मठ तहां बने अभिराम ७१९॥
तापुरमैं कीनो परवेश । देखी शोभा नगर असेश ॥
ताही नगर बनिक इकबसे । धनकन करि सो पूरनलसै ७२०॥
नाम प्रियादत तिहँ गुणवान । भानुदत्तको मित्र सुजान ॥
ताकेगेह गये सबबीर। चारुदत्त आदिक तब धीर ।।७२१॥
निज विरतंत तासुप्रति चयो।तिन सुनकर मनमें सुखलयो।
अरु सबको कीनों सनमानालेयगयोतबअपनेथान ॥७२२॥

AA (७१) चारुदत्तचरित्र,भाषा। पंचामृत दीनी ज्योनार । विनय भक्ति तिन करी अपार ॥ बनिजजोग तिन खरचीदई। होतभये तबही सुखमई ७२३।। मडिल्ल। तब विचार करि सरब आपने मनमहीं। वहै लेय सो द्रव्य गये हाटन सही ।। चुरियां करी खरीद काचकी एव हैं। बोधि गांठ शिर धरी. सबनि खयमेव हैं ।।७२४॥ चले तहांते सोय बनिज के कारने । गये देश गंधारमार्हि सब यारने ॥ खुड़ियां बेची जहां सबनि मनभावसों। लियो तहां विसराम आपने चावसों ॥७२५॥ चौपाई। मिल्यो एक नर कोई और । रुद्रदत्तकों सो तिसठौर ।। देखि रुद्रकों बोल्यो बात। कोहे बीर कहांतें आत ॥७२६॥ काहें हीन बनिज तुम करौ। छाजतु नाहिं तुम्हे चितधरौ । तुम अतिरूपवंत गुनधाम । अरु तुमरो शुभ उत्तमनाम७२७॥ अरु तुम दीखत साहसधीर। उत्तमकुल अरु गुनगंभीर ॥ काहें भूमिविर्षे तुमफिरो। गुनकरि लीन बहुतदुख करौ७२८॥ सो मोसों कहिये परकास।कहा फिरो तुम चित्त उदास ॥ रुद्रदत्त सुन ताके बैन । पायो मनमाही बहु चैन ।।७२९॥ तब निजमुखतें लाग्यो कहन।दुखसुख बात सबै विधतईन। आदिअंतलों जोजो भयो।सो सब ताहिपुरुषसों चयो७३०॥ जाकारन फिरते भूमाहिं । सो सब भाख्यो ततखिन ताहिं। तबतिन सुनी हृदयकी बात।बोलतु भयो फेरि अवदांत७३१॥

00000 4mmmmm चारुदत्तचरित्र भाषा सुनियो मित्र मोरवच कान । नीकै करिहौं करौं बखान ।। इसजागातें आगेंबीर । परबत एक महा गंभीर ॥७३२॥ राजतुहै सो महा उतंग। मारग तासु बहुत है तंग ॥ बकराही को गेलो जहां। और न विध जानेकी तहां ॥७३३॥ बकरा पीठि होय असवार । क्रमक्रम करि चदिजाय पहार॥ तब तहँ छागमारिकर बीर। मसैक बनावो ताकी धीर७३४॥ तामैं बैठरहै मनलाय । मुहरी सीमदेय तस भाय । थिरकर तिष्टिरहा सो तहां । भैरँडपक्षी आवतजहां ॥७३५॥ मांसपिंड वे पक्षी जान । लेत उठाय.चोंचकरि आन ॥ तहत उढ़कर पक्षीभ्रात । रतनदीप माहीं लेजात ॥७३६॥ जब बे मसक भूमिपर धरै । भखिबेको उद्यम तब करें । तबसो छुरी लेय करमाहितितखिन मसक बिदारै ताहि७३७॥ आवै निकरि तासुतै तबै । पक्षी मानुष देखें जबै ।। है भयभीत सोय उदिजाय। निहचै करि जानो मोबाय ७३८॥ तब सो रतनदीपत बीर । चाहो सो नग ल्यावो धीर ॥ यहसुनि नरमुखः विरतंत। रुद्रदत्त मनअति हरूषत।। ७३९॥ फिर तब रुद्र विचार कराइ । चारुदत्तसों कहिये जाय ॥ चढ़िपहार मारेंगे छल । रतनदीप तब पहुंचें गैल ॥७४०॥ जो चालैगो नाहिं कुमार । याके मनमैं दया अपार ।। अरु जामनमें जिनवरसेव । पाले करुणा समिकित एव७४१॥ तातें कहिये एबच ताम । इस पहारपे जिनके धाम ॥ तिनको बंदन चलिये वीर। तबसो चलिहे निहचैधी।७४२ आयो रुद्र तुरतही जहां । चारुदत्त शुभ तिष्टै तहां ॥ तासोंलाग्यो कहन जुबात।चारुदत्त बचसुनि मोभ्रात ७४३॥ १ रस्ता ।२ भातड़ी।संचन ।

(७४) धारदत्तचरित्र भाषा। इस परबतके ऊपर अंगे। बने जिनेश्वरभवन उतंग ॥ तहां जातराअदभुत वीर । बंदन तिनहिं चलो गुणधीर७४४॥ चारुदत्त कछु जानै नाहिं । यानै कहा रच्यो मनमाहि ।। कुमर रुद्रके सुनि ये बैन । तब मनमैं पायो अतिचैन।।७४५॥ कहत भयो अबही चल बीर । करें वंदना जिनकी धीर ।। रुद्रदत्त सुनि तसु वच तवै। बकरा सात ल्याइयो जवै।।७४६॥ सोरठा। चढ़ि छैला सब बीर, कढ़त भये तिहँ नगर तें। एक मतो धर धीर, चलत चलत पहुंचे जहां ॥७४७॥ परवतके मगपास, खड़े भये सातों पुरुष । देखि राहको फांस, चउरी अंगुर चारकी ॥७४८॥ दोहा। दोनों तरफ पताल सम, नीची अंत न ताहि । अवर सहारो तहँ नहीं, टिकि रहने को आहि ॥७४९॥ महातंग मारग निराखि, बोल्यो सेठिकुमार। सुनहु वीर मेरे बचन, अपने चित्त विचार ।।७५०॥ खड़े रहो इसठौर तुम, छहों वीर हरषाइ । आगें सकरी गैल यह, देख आउं अब जाय ॥७५१॥ यह मारग कहलौं गयो, सकरो बहु भयभीत । मैं आऊं तिहि देखकरि, तबलग तिष्टौ मीत ॥७५२॥ तब सब नर बोले एमवात । हमहूं देखेंगे गैल भात ॥ तुमही तिष्ठो अव थानएह । यहतौ कारज सबको गिनेह७५३॥ १हे अंग, हे तात ये छोटे भ्राता के लिये भी संबोधन है। पद्धड़ी छंद। -- चौपाई। चारुदत्तचरित्र भाषा। अरु हम गिरहें तो कहा वीर। तुमजीवो जगमें गुनगहीर॥ तुमतें सबको सम्हरे जुकाजातुमपुण्यवंत करता समाज ७५४॥ तिनके सुनि बचनजु सेठिनंद । बोलत फिर सबसों बचनमंद ॥ यहबात कहातुम कहोसंत। तुम साहिबहो हम सेववंत७५५॥ में एक मुयो तौकहा भाय । तुम पट जीवो तो भलीआय ॥ अब औरबात मतकहो भ्रातामैं गैलदेख अबही अवात ७५६॥ यहकहि चारुदत्त चढ़ि छैल।चलत भयो सो सकरी गेल । अंगुलचार गैलहै जहां । औरसहारो कोउ न तहां ॥७५७॥ दोनों तरफ पताल समान । नीची जागहँ बहुत भयान॥ चढतो जाय तहाँ सो बीर। नेक न शक धरै मन धीर ।।७५८॥ चल्यो जाय जपतो जिन नाम । और न कोई सहाई ताम।। क्रमक्रम करि चढ़ि ऊपर गयो।आछो थल जहँ देखत भयो। तब मनमाहि बिचार कराय । अब सबकौं लीजे बुलवाय॥ तबबकरा चढ़ि फेरिसुजान। अरुनी.कोकियो पयान७६०॥ वह उतरत आबै मन रली । आगे कथा सुनौ जो चली। रुद्रदत्त आदिक सब बीर । नीचें तिष्ठत साहस धीर॥७६१।। ते सब लागे करन बिचार । चारुदत्त आयो नहिं यार ॥ बड़ी बार लागी पुनि ताहि । कारण कहा मित्र नहिं आहि॥ उपजत है यह मनमें बीर । कछू ताहि तन व्यापी पीर ताते चलिये अबही भाइ। निज लोचन दखें तसु जाय।।७६३।। तब वे करिमन छहों बिचार।छेलनि चढ़ि वाले तिहबार, अधबिच राह पहूँचे जबै । चारुदत्त तहँ मिलियो तब।।७६४॥ देखि सेठिसुत सबको तहाँ । हाहाकार कियो तिनि जहाँ । और कही तिनसौं यह बात ।अरे अयाने मूरख गाता७६५॥

(७६) चारुदत्तचरित्र भाषा। काहें नहिं तिष्टे उस थान । में जबलौं आवतहौं जान ॥ तुमने बरी करी बहु भाइ। सरब फसे इस थानक आइ॥७६६|| गैलो बहुत तंग इस ठाँय । फिरवेको नहिं कछू उपाय ॥ हम बहुरें तो नास हमार । तुम जो फिरौ तौमरन तुमार॥ अब इस ठौर कीजिये कहा । तब वे छहौं मित्र बोलहा॥ कहा करें हम सुनिये वीर। तुमको देर लगी बहुधीर।।०६८॥ तब हमको दुख भयो अत्यंत। तुम विन सब मित्रन को संत।। सोई दुख सुनिये गुणरेह । आन भयो दुख प्रापति एहा७६९॥ अब तो हम आये गुणवंत । अब इक वचन सुनो हम संत ॥ हीनपुण्य हम हैं सब बीर । मरिहैं तो कहा होसी धीर॥७७०॥ चिरंजीव तुम होहु सुखार । हम ही फिर, गे इसबार ।। चारुदत्त सुनि सबके बोय । बोलत भयो तबहि हरपाय।।७७॥ अडिल। यह फेरि मति कहौ मित्रजी बात हो । एक मरे तो कहा सुनीजे भ्रात हो। सबरे ही कहा मरै एककै कारने। चिरंजीव तुम होहु जीव सब यारने ॥ ७७२ ॥ मित्र कहा तुम करो हुती जहँ इसतरें। जैसी जहँ लहनाति होय सो तिस तरें ।। होनहार जो होय बसइ जिय आन है। अवर विसरि सब जाइ चित्त बान है ॥७७३|| शुभ अरु अशुभ उपायो होय । ताको फल नर मुंजै सोय ॥ करम बिना नहिं कोऊदातार करम बिना नहि लहै लगार।। - चोपाई। १बचन।

(७७) www MMA चारुदत्तचरित्र भाषा। जैसो करम उदय है आइ । तैसो ही तहँ जीव सहाइ ॥ सुख दुख दाता को नहिं जान।दीखै विधिको सरब बिनान॥ चहुँगति मध्य जीव संचरै । पाप पुण्य ता साथहि फिरे । भावी होनहार जो होइ । ताकौं मेट सकै नहिं कोय॥७७६॥ जो कछू जीव उदय हो आइ । तैसौ सहिये मन बचकाय।। जे कहि वचन तबइ बलबीर।जपियोचित्त मंत्र धरि धीर॥ घो। अपने पगकी आँगुरी, मारग माहिं टिकाइ । साधि देह निज शक्ति करि, फेरयो लोके तहाँह ॥७७८॥ सातौ मित्र पहार पैं, गये तुरित चढ़ि तब्ब। बहु आनंद मनमैं लह्यो, टिके एक थल सब्ब ॥७७९॥ चारुदत्त तिहँ ठाम, रुद्रदत्तसौं इम चयो। कहां जिनेसुर धाम, चलौ तिनहिं बंदन करें ॥७८०॥ रुद्रदत्त मनमाहि, इम बिचारि तब ही करें। जो हम इन्है कहाहिं, ए बकरे सब मारि हैं ॥७८१॥ तो यह मनमैं दुख लेसी । बकरा नहिं मारन देसी ॥ याके मन दया समाज । यह करन न देसी काज॥७८२॥ तातें कछू करि हे उपाई । बकरा मारे इस ठाँई । बोल्यो सो तब तिहबार । सुनिये मो बैन कुमार ॥७८३॥ इस थानकतें कछु अन्त । सोहैं जिनमन्दिर संत ॥ सकरे मग चलते भ्रात । कछु सिथल भयो हम गात॥७८४॥ तातें इक छिनभर बीर । रहिहों निद्रा करि धीर॥ सारठा । छन्द चाला (७८) चौपाई। चारुदत्तचरित्र भाषा। पाछै चलिहें उसठाम । वंदन जिनवरको धाम ॥७८५॥ तब चारुदत्त सुनिबात । मनमें लीनो शुभ सात ॥ द्रुमतलें देख इक थान । तिष्टे तहँ सबहि जवान ॥७८६॥ दोहा। सोवत भयो कुमार तब, मनमैं हरष उपाय । अवर कथा आगे सुनो, भई जु सो तिहठांय ॥७८७॥ रुद्र आदि जे पट पुरुष, महा अधर्मी सब्ब । अपने अपने बोक तिन, मार डारिये तब्व ॥७८८॥ जीवघात तिनने कियो, खालवासतें वीर। कछु न दया उपजी तिनै, मोहत भयो शरीर ॥७८९॥ लोभअंध जो मानुष होय । पापपुण्य नहीं देख सोय ॥ लोभअंधके दया न चित्त । लोभअंधके कुकरमहित॥७९०॥ लोभअंधके क्रिया न कर्म । लोभअंधके बुद्धि न मम ।। लोभअंधके धर्म न ध्यान । लोभअंधके सत्य न ज्ञान।।७९१॥ लोभअंध जीवनको हनै। लोभअंध नहिं सुखदुख गिनै।। तैसे लोभ रुद्रमन धरयो। मारतजीव न शंका करयो॥७९२|| छह छेलाको कीनो घात । चारुदत्तको बोक रहात.॥ ताकों लेइ रुद्र निजपान। धरी छुरी ताके गलवान ॥७९३॥ आधो गलो ताहि कटिगयो। तब बकरो मिमियातो भयो। तब निजबकराकी सुनिटेर। चारुदत्त जाग्यो तिहिबेर ७९४॥ देख सु बकराको यहहाल । निंदा बहुत करी तिहँकाल । और तबै निजबकरा देख रहे कंठगत पान विशेष ॥७९५॥ अत,करन। 1010 - चारुदत्तचरित्र भाषा। (७९) चारुदत्तने तब तिहँबार । बकराकों दीनो नवकार ॥ महामंत्रके सो परभाव । ततखिन लीनो उत्तमठांव ॥७९६॥ पहिले सुरगदेवता ठयो । बहुत ऋद्धिधारी सो भयो । मंत्रमहा जगमैं सिरदार । मंत्रप्रभाव होइ भवपार ॥७९७॥ अडिल्ल। महामंत्र नवकार जपत बहु दुख टरै । महामंत्र नवकार जपत बहु सुख करै ।। महामंत्र नवकार जपत जग जस लहै । महामंत्र नवकार जपत पातक दहै ॥७९८॥ महामंत्र नवकार पार नहिं जासको। आदि अंत नहिं करता कोउ न तासको ।। भौजल मोहन तरन महा शुभ जानियो। कर्म काठ गन दहन अगनिसम मानियो ॥७९९॥ ताते जपिये श्रीजिनमंत्र । जासम अवर न दूजो तंत्र ॥ सुरग मुकति को दाता जान।चौदह पूरव माहिं महान॥८००।। श्रीअरहंत सिद्ध परमेस । आचारज उवझाय जिनेस । साधु सुगुरु हैं शिव सुखदान । जेई पूज्य महा परधान ॥८०१॥ कीजै इनको सुमरन हिये । तातें भव भव सुख हूजिये । यातें जपिबोजोग्य जु साराभव्यजीव सुमिरो चितधार ८०२॥ चारुदत्त परवतके थान । निंदा करत भयो नरवान ॥ रुद्रदत्त तब बोलत भयो । वानरबचन तेजसों चयो ।८०३॥ तब ये सगरे नर तिसठाम । लीनो ततछिन छेलनिचाम ॥ ता चमड़ाकी मसक बनाय। उलटी करी सबन तिहठाय८०४॥ चौपाई।

(८०)
चारुदत्तचरित्र भाषा।
कw
MAN
सोरठा।
,
भीतर रोंमा कीय, ऊपर रक्त समान है।
तिनमें तब बैठीय, चारुदत्त आदिक सरब ।।८०५॥
दोहा।
मसकनि मुहरी मूंदकरि, तिष्टे सब तिहँ थान ।
तबलग ताहि पहार, ताही समय सुजान ||८०६॥
भेरँडपक्षी गमनकरि, आये सात पहार।
तिनमें कानों एक है, पट जुगनैन निहार ॥८०७॥
तिनने देखी भातड़ी, पड़ी सैलपर खास ।
तब तिन मनमें जानियो, निहचे पिंडामास ॥८०८॥
एक एक निजचोंचसौं, छह लीने सु उठाय ।
पाछे पंछी कानियो, चारुदत्त ढिगजाय ॥८०९||
सेठनंदकी मसक तिन, ततखिन लई उठाय ।.
चलेदेश उड़ि आपने, सातों मन हरषाय ॥८१०॥
चौपाई।
तिन अंवरमैं कियो पयान। समुदबीच जब गये सुजान ॥
तह इक पंछी भेरँड और। चल्यो जात सो नभमैं ठौर ।।८११॥
देखत भरे सातोंके सोय । खालीमुख नहिं देख्यो कोय ।
और छुपा उपजीतिहँआयातातें चल्योतिनहिं समुहाय ८१२॥
अवर सबै देखे बलवंत । काने पास सु गयो तुरंत ॥
तासों लरतभयो तिहँवार। तबसोकानो भज्यो विचार॥८१३।।
जान्यो पाछै बहुत दवाव । मसक छोढ़दीनी तिहँठांव ।।
सागरमाहिं मसक छिटकाय । लीनी मुखसों फेर उठाय।।८१४॥
पाछे आन पंछी फिर लग्यो । तब सो फिर आगेकों भग्यो।।
ऐसीतरह सोइ त्रयबार । आनलग्यो पंछी तालार ॥८१५॥

चारुदत्तचरित्र भाषा। (८१) तब तिहँ सेठनंदकी मसक । डार डार दीनी दधि तलक । चौथीबार सुलेय उठाय । उड़त भयो मुखमैं दे ताय।।८१६॥ चलत चलत सो रतनहि दीप । गयो रत्नपरबतहि समीप। गिरिकी शिखरऊपर जाय।मसक धरी पक्षी तिहँठाँय।।८१७॥ भखिबेको उद्यम तिहँ थान । करन लग्यो पंछी सो कान।। तव सो चारुदत्त गुनरास । छुरी लई निज करमैं तास॥८१८॥ मसक फार डारी तिहबार । ततखिन निकस्यो सेठ कुमार।। भैरुंड पक्षी ताकौं देख । मनुषरूप भय कियो बिशेख।।८१९॥ भयकर सो ततखिन उढ़िगयो । चारुदत्त तहँ तिष्ठत भयो। अब तौ कथा गई यह तहां। छहों मित्र भेरुंड मुख जहां८२०॥ भेरुंड छहाँ मित्रको लेइ । गये जु औरहि थानक लेइ ॥ छहौं मसकधारी तिन जायाभखिबेको मन कियो बनाय८२१॥ तब तिन छुरी लई कर माहि । मसक बिदार दई तिह ठाँहिं।। छहौं निकस आये बलबीर। चारुदत्त नहिं देख्यो तीर॥८२२॥ तबतिन दुख कीनों अति घनों।हाहाकार कियो शिर धुनो। रुद्रदत्त आदिक सब मित्र। फिरै पहार दुःख कर चित्त ।।८२३॥ इनकी खबर न बाकौं भाय । बाकी खबर न इन्है सुनाय॥ क्षुधावंत तब बनफल तोकिरै असन सब मित्र बहोरि ८२४॥ मन मन सोचत छिन न बिहाँइ । चारुदत्त को शोग कराँइ। कबहूं सब लोचन भरि लें।।कबहूं दोष करमकौं देह॥८२५॥ या विध दुखकर सब मनुष, राजें एकहि ठाँइ । अवर कथा आगे सुनो, चारुदत्त पै जाय ॥ ८२६ ॥ रतन शिखर के शैलतें, उठ्यो सेठ को नंद। मंद मंद पग धारतो, चलत भयो सुख कंद ॥ ८२७ ॥ दोहा ।

, (८२) चारुदत्तचरित्र भाषा। देखि रत्नराशी तहां, बरन बरन तिन जोत ॥ जगमगाट तिनको अधिक, रवि किरननि सम होता॥८२८॥ चौपाई। इह विध शोभा निरखत वीर । चल्यो जाय आगे को धीर।। तहां एक देख्यो जिनधामासुरनर मनमोहन अभिराम ८२९॥ कंचन भीत बनी शुभ वास । जड़े रतन मणि करें प्रकास।। पन्ना लाल भले नग सैं । तिहँ उद्योतकिरन तम नसै॥८३०॥ मुक्ता फल की बंदनवार । लसैं सोइ नाना परकार ।। शोभा बहु चरनी नहिं जाय । तुच्छ बुद्धि मोमै सुनभाय॥८३१॥ दोहा। चारुदत्त दर्शन निमित, मंदिर कियो प्रवेस । शोभा भीतर की निरखि, पायो सुक्ख अशेस ।।८३२॥ चारुदत्त अवलोकि जिन, रोम रोम हरपंत । जैसे सूरजके उदय, कमल जूथ विकसंत ॥८३३॥ अति मनोज्ञ प्रतिमा निरखि, मनमें बहु सुख पाय । शीश नम्यो कर जोरि कैं, जय जय शब्द कहांय।।८३४॥ दई प्रदक्षण तीन, जनम सफल कर मानियो । बहु आनंद मैं भीन, तब थुति करनेको लग्यो ॥३५॥ पद्धड़ि। जय जय परमेश्वर परमदेव । मनबचतन करिनित करौं सेव। कीनो छिनमें अघकरम नाशि।जीते अष्टादश दोपराशि८३६ शुभ समवशरन शोभा अपार। जिन इन्द्रनमंतकर सीसधार।। देवाधिदेव अरहंत देव । बंदों मनवच तन करों सेव ॥८३७॥ सोरठा।

चारुदत्तचरित्र भाषा। (८३) जय जय मिथ्यातम हरन सूर। जयजय शिव तरुवरके अंकूर जय काम बिनाशनहार देवाजय मोहमल्ल मलदलन देवः३०॥ तुम दर्शनतें सुख है अनंत । तातें बंदी शिवरमनि कंत ॥ जयसुरगमुकतिदाताजिनेश।जयकुगतिहरनभवभवकलेश॥ जयजय कंचनसम तनदिपंत। जयकोट दिवाकर मलिनकांत। ऐसे श्रीजिनके दरश पाय ।अघवृंद दूर छिनमैं पलाय।।८४०॥ ऐसे श्रीजिनको वदन देख ।मो गयो आज पातक विशेख। तुम धन्य जिनेश्वर देव आय। तिनके सुरनर खग परत पाय॥ धन आज मोहि लोचन विचार। तुम मूरत देखी हम निहार॥ धन मस्तक आज पवित्र मोहि।नमियों पदकमलनि देव तोहि धनिधन्य आज मेरेजु पाँयातुमलौं प्रभु पहुंच्यो आजु आय।। धन मेरे आज पवित्र हाथातुम परसे त्रिभुवन के सुनाथ८४३. धन आनन मोहि पवित्र आजारसनाकर गुन गाये समाज ॥ प्रभु आजहि गयो कलंक मोय । देखी मूरत सुखकार तोय ॥ अतिमुदितभयोमुझहियोसंत।बहुविधअस्तुतिजिनकीकरता : अस्तुति करतें नहिं उर अघायाकरजोरि भाल निज नाय नाय दोहा। जिन पूजा बहुविध करी, मनमै हर्ष उपाय । कछु काल तहँ तिष्टिकरि, उठियो फेरि सुभाय ॥८४६॥ जिनमंदिरतें निकासि करि, चल्यो अगारूं वीर। और न कोई पुरुष तहँ, परै दिखाई तीर ॥८४७॥ महिला जपत मंत्र जिननाम चल्यो आगें जहाँ । देखी गुफा पहार जती तिष्टे तहाँ ।

(८४) चारुदत्तचरित्र भाषा। छदचाल। देखि मुनीश्वर दरश कुमर हरषित भयो। मंद मंद पग धरत गुफा भीतर गयो ।।८४८॥ कर जोरि नौं मुनि पाई । लाग्यो अस्तुति करनाई ॥ जय जय गुरु भव अघहरना । जय जय सुख संपति करना जय जय कंदर्प जु दलना । जय मोह महामद मलना ॥ जय जय इंद्री दे दंड । जय पंच महाव्रत मंड ॥८५०॥ जय परिगहतें सु उदासी । जय सप्त तत्वारथ भासी ॥ जय समता राखन चित्त। देखत इकसे अरि मित्त ॥८५१॥ अठ बीस मूलगुण धारी । पुनि सहन परीपह भारी। जिनके बच हैं सुखखानी। जिनसंग कुगतिकी हानी ॥८५२॥ तजिकुमति सुमति चित गहिये।तुम संगति शिवसुख लहिये। गुरु बिन नहिं और सहाई । तुमही परमारथ भाई ॥८५३॥ मारठा। चौपाई। जय जय जन आनंदकारी।जयजय करुनानिधि धारी ८५४॥ इत्यादिक थुति गाय, रोम रोम आनंद भयो । तब ही श्रीमुनिराय, धर्मवृद्धि दीनी तिसै ॥ ८५५ ॥ अरु मुनिवर बोले इम बात । चारुदत्त तूं है कुशलात ॥ अरु तोआमन कैसे भयो। काहें काज गमन इहँ ठयो८५६॥ चारुदत्त सुनि मुनिक बाय । अचिरजवान भयो अधिकाय॥ तब फिर बोल्यो सेठ कुमार! हे मुनिनाथ जगत आधार८५७॥ हे प्रभु मुझकौं आगे कहां । देख्यो है मुनिवर किस ठहां। सो मोसौं कहिये मुनिराय। मेरे जियको संशय जाया।८५८॥

- चारुदत्तचरित्र भाषा। (८५) तब मुनिवर बोले गुणखान । चारुदत्त तूं सुनि दै कान ॥ में हों वह विद्याधर वीर। मेरो नाम अमित गति धीर॥८५९॥ चंपापुर के बागमझार । मैं कील्यो थो तरुकी डार ॥ तब तुम छोड़ि दियो तोआय। दूर करी मोबाधाधाइ।८६०॥ तुम प्रसाद मो बचिये प्रान । तब मैं नारि छुड़ाई आन।। तुमप्रसाद हमने सुखलयो। तुमप्रसाद बहु आनंद भयो८६१॥ तुम प्रसाद मिलियो परिवार । तुम प्रसाद कीनो दुख छार ॥ बहुतकाल कीनो तबराज । हयगय दलबल बहुत समाज८६२॥ और जु पुत्रपौत्र घरभये । तिनके सुखबहु देखत भये फेरितवै कछु कारनपाय । मन वैराग्य ऊपनो आय।।८६३॥ तबही सगरो परिगृह छांडि । जती भयोदिढ़ जिनव्रतमांडि इहविध मुनि आफ्नो सरूप। कह्यो कुमरसों सरब अनूप ८६४॥ फेरि ताहाँ ही अवसरपाय । मुनिवरके जुगपुत्र जु आय ॥ सिंघग्रीव प्रीवबाराह । आये चड़ि विमान उत्साह ॥८६५॥ वंदनश्रीजिन मुनिबर जोग।आये दोनों पुरुष मनोग । तिनशिर मुकुट जु करैप्रकास।उतरे सो चैत्यालय पास॥८६६॥ महिल। श्री भगवंत जु चरन जोरि कर सीस हैं। नमे तबै ततकाल खगनके ईस हैं। करी भगति थुति बहुत जिनेश्वर पायहें । करयो नृत्य अत्यंत चित्त विगसाय हैं ॥८६७॥ पूजाकरि शुभचित्त जिनेश्वरकी तबै । हर्षवंत बहु होय चले दोनों जबै ॥ मंदमंद पगधरत गये मुनिपास हैं। जोरिहाथ धरि सीस करें अरदास हैं ॥८६॥ - ।

०००००००००००००००००००८ (८६) चारुदत्तचरित्र भाषा। 1 चालछंद। दाहा। खग कहें धन्य मुनिराज । भवसागर तरन जहाज ॥ तुम चरनों जेजन लागें। ततकाल अशुभ तजिभागें८६९॥ तुम जपहि जोइ निसदीस । निहचें होबै जगदीस ॥ यामैं कछु धोखो नाहीं । तुमसाहिब हो जगमाहीं।।८७०।। तुमसेवा पाप विनासै । सुर मुकति पंथको भासै ॥ जगमैं तुमकरुना सागर । गुरुबुद्धि गुननिके आगर ८७१।। मद रागदोष करि रहित । दाबीस परीषह सहित । समभाव सहजसुख लीनो । बसुकर्मजीत रजकीनो॥८७२॥ गिरशिखर कंदरावासी । मुनिवर सुख जगत उदासी ॥ तारक तुमबिन कोऊनाहीं। सुखकारक सबजगमाहीं८७३॥ इहविध अस्तुति भगति बहु, कीनी जुग खगबाल । मुनिवर धरमुपदेश दिय, सुखकारन तिहँकाल ॥८७४॥ करि तपसीकी वंदना, दोनों बैठे पास । तब मुनिवर बोले बचन, निजनंदनसों भास ॥८७५॥ अहोपुत्र सुनियो मोबात । चारुदत्तजी इह गुनगात ॥ इनकी इच्छा पूरन करौ। कहैं सोइ ये निजचित धरौ ८७६॥ तब सुनिखग मुनिवरकी बात बोलतभये बचन अवदात ॥ हे प्रभु चारुदत्त इहकौन । को इन मातपिता कहँ भौन८७७॥ कौनकाज आये इस ठाइ । तुम किमि जानो इन्हें बनाइ॥ सो हमसों कहिये गुनगेह। तातें हम भाजे संदेह ॥८७८॥ तब मुनिवर सबरो विरतंत। कयो प्रगटकरि तिनहिं तुरंत ॥ तब सुनि सिंघग्रीव वाराह मनमें इकियो खगनाह।८७९॥ चौपाई।

चारुदत्तचरित्र भाषा। (८७) यह तो कथन रह्यो इह ठौर । आगे कथन सुनौ अब और मानुष अरबकराको जीव । पहिले सुरगगमन तिनकीव०८०॥ देव भये दोनौ इक ठौर । पहिले स्वर्गमाहिं शिरमौर ॥ अवधिज्ञानतें पूरब बात । परताछ जानी सब उतपात ॥८८१॥ ते मनमें बहुते सुख पाय । देखि संपदा मनवच काय ॥ जानी चारुदत्त परसाद । लही संपदा सुख अहलाद ।।८८२ तातें उनके देखें चरन । वेई हमरेहैं दुख हरन ॥ सार विमानरच्योततकार। कनकरतनमयि शोभ अपार८८३॥ जाके घंटागन सोहंत । रुन झुनकार सु नाद करत ॥ लहकति धुजामाल बह पासि ऐसोरचि विमान सुखराशि८८४ जिनकी करि असवारी देव । आये रतनशैल स्वयमेव ॥ जिनवर पूजा भक्ति उपाय।चले तहांतें मन हरवाय ॥८८५॥ जहां जतीखग कुमर दिपंत । गये तहां सो देव तुरंत ॥ पहिले चारुदत्तको ताम।हाथ जोरि तिन कियो प्रणाम।।८८६॥ पाछे श्रीमुनिवरके पांय । कीनों नमस्कार तिहठाय ॥ सिंघग्रीव देखि तब नैन। बोलत भयो बचन मुख ऐन ॥८८७॥ भडिल्ल । सुनो खामि मुझ बात देव हो तो कहा। परि कछु सुरगमझार विवेक न तुम लहा । तब सुनि खगके बैन देव बोलत भये । किमि तुम जानी बीर विवेक न हम लये ॥८॥ सो हमसों कहिये समुझाय। कहा जानि तुम कही गुणाहि॥ सिंघनीव तब वोलत भयो।अपने मुखतें खग इम चयो॥८८९॥ चौपाई।

सारठा।
चौपाई।
(८८)
चारुदत्तचरित्र भाषा।
पहिले तुम गृहस्थकौं वीर । कियो प्रणाम जोरि कर धीर॥
पा, गुरुकौं कियो प्रणाम । तिनसेये पावै सुरधाम ॥८९०॥
यातें तुमसों हमने कही । नाहिं विवेक तुमै है सही ॥
कारन कौन सोय बलबीर । पाछै मुनिकौं नमे सुधीर ॥८९१॥
सो हमसों कहिये समुझाय । हमरे जियको संशय जाय।।
देव कहै खग सुनि दे कान। नीके करि हम करत बखान॥८९२॥
जो बकराको जीव, देव भयो थो सुरगमें ।
सो खगजुगसौं ईव अपने भव लाग्यो कहन ॥८९३॥
नगर बनारस अदभुत बसे । धनकन करि सो पूरन लसे॥
पौनि छतीस बसे शुभ जहाँ।राति दिवस सुख भोगें तहाँट९४॥
ताही पुर इक ब्राह्मण वसै । नाम सोमशर्मा तसु लसै ॥
ताके गेह सुमिल्या बाम। सुखसों रहै सदा निजधाम ॥८९५॥
पुत्री दोय भई ता गेह । प्रथम सुभद्रा सुलसा तेह ॥
दोनौं सुता बड़ी जब भई।पाड़े तबै पढावन लई ॥८९६॥
विद्या पढ़ि बहु भई प्रवीन । लागी वाद करन गुणलीन ॥
सो विद्या मद गर्वित भई । कुंवारेही सन्यासिनि ठई।।८९७॥
लई प्रतिज्ञा इह मन माहि । जीते वाद विवाहें ताहि ॥
तिन प्रसिद्धिता महि पर भई ।तब इक तपसीने सुनलई। ८९८॥
याज्ञवल्य ता तपसी नाम । विद्याधर बहु गुण अभिराम ॥
तर्क छंद वेदादिक लीन । जीतनवाद बहुत परवीन ॥८९९॥
सो तपसी जु बनारस गयो। बाह्मणसुता वाद तहँ ठयो॥
जीतीवाद माहिं इक नारि।ब्याही सुलसा नाम कुमारि॥९००॥

सोरठा। चारुदत्तचरित्र भाषा। (८९) दोनों रहैं सदा इक धाम । भोग भोगबें सुखसों ताम ॥ ताके घर इक बालक भयो। तब तपसी मनमें चिंतयो९०१॥ सो बालक लेकरि तिहिंकाल । पीपर नीचें दीनो डाल ॥ आपुन नारि पुरिस रमिगये । काहू देश विर्षे तिष्ठये॥९०२॥ दूजी बहिनि सुभद्रा नाम । सुलसा की जानौं अभिराम ॥ सो पीपरके नीचें गई। बालक डरचो जु देखति भई।९०३॥ तब तिन निजकर लियो उठाइ । अपने घर लाई हरषाइ । पीपर नीचेंडरयोसुदेखि। पिपलादित्य सुनाम बिशेखि॥९०४ अरु ताको पाल्यो बहु भाइ । बड़ो कियो बहु सुख दिखराइ। तब तिन नारि पढ़ायो बाल। तरक छंद बहु वेद रसाल॥९०५॥ मिथ्या शास्त्र अनेक, होम जज्ञ तिन बहु पढ़े । वाद- करनकी टेक, सब विद्यामैं निपुण है ।।९०६॥ एक दिना तिन बाल, कह्यो सुभद्रासों वचन । इह मो नाम गुणाल, हे माता किहविध धरचो ॥९०७॥ मोसों कहि समुझाइ, तब मेरो संशय भजै । तबै सुभद्रा वाहि, पिपलादितसौं बोलई ॥ ९०८ ॥ ज्यों ब्योरा पूरव भयो, आदि अंत लौ बीर । सो जु सुभद्रा नारि ने, कह्यो बालके तीर ॥९०९॥ तब जु सुभद्रावचन सुनि, चल्यो तहांत बाल । जहाँ मात अरु तात थे, गयो तहाँ ततकाल ॥९१०॥ तिनसौं कीनों बाद बहु, जीयो तब सो बाल ।। तब स्वरूप तिन आफ्नो, सब सौं कह्यो रसाल॥९१९॥ दोहा। - .00 (९०) चारुदत्तचरित्र भाषा। अपनी विद्या प्रगट बहु, करी जगतमें सार । सो प्रसिद्ध सब जगतमै, भयो सबनि सिरदार ॥११॥ अडिल्ल। हों तो बाको शिष्य जाज्ञवाल नाम है। विद्या बहुत पढाइ कियो बुधिधाम है ।। तवमें मिथ्या जज्ञ जगतमैं बह करयो । बहुत बोक अरु जीव होममें हत करयो ॥९१३॥ मिथ्या शास्त्र जु प्रघट जगतमैं वह करयो । रुद्रध्यान करि वाद पापधरि मैं मरयो । तिन पापनके जोग नरककों गम कियो। गये श्वभ्रगतिमाहिं तहाँ बहु दुख लियो ॥९१४॥ छेदनि भेदनि आताप । सूली रोहन संताप । शस्त्रनि करि देहविदाएँ । दुख देहिं तहां अति मारें ॥९१५॥ तातो करि तेल कराही । डारत गहि तन तामाही ।। पावक सीसो औटावें । जल मांगे ताहि पियावें ॥९१६॥ तन छेदि करें बहु पीरा । छिरकें तव खारी नीरा ॥ तिस ठौर नहीं सुखलेस । उपजै जिय अधिक कलेस।।९१७॥ करुणा नहिं हिरदै धारै । मिलि नारकि सबरे मारें । इत्यादि महा दुख भारी। सहे दीरघकाल अपारी ॥९१८॥ तब कष्ट पाय तहँ भारी । निकस्यो मो जीव दुखारी ॥ तब बोक भयोभुवि आनी। दुख सह्यो छुधा अरुपानी॥९१९॥ तहाँ जज्ञमें होम्यो गयो । फेरि आनि बकरा ही भयो । चालछंद चौपाई। १ नरक गति ००००० चारुदत्तचरित्र भाषा। (९१) फेरि जज्ञमैं होम्योसोय । फिरि यह देह छागही होइ ।।९२०॥ ऐसी भांति भयो छै बार । होम्यो गयो सु जज्ञमझार ॥ फेरि जुमरयो सातमीबार।जनम्योपाटकदेश मझार ॥२१॥ तहां जाय मैं बकरा भयो । चारुदत्त तहँ आमन ठयो । कछुक पुण्य करि सुनिये नाथ। रुद्रदत्तके परियोहाथ ॥९२२॥ तिन पहारके ऊपरि मोह । मारयो छाग बहुत करि कोह ॥ चारुदत्त देख्यो तिहँ बार । दीनो ताहि पंचनवकार ॥९२३। मंत्रप्रभाव देव मैं भयो । बहुत ऋद्धिधारक तहँ ठयो॥ उपजी अवधि मोहि तब आइ। तब ततखिन आयो इस ठाइ॥ प्रथम हमारो गुरु है यही । तातें करी बंदना सही ॥ तब फिर दूजो देव तुरंत । कहन लग्यो अपनोविरतंत ॥९२५॥ मंत्रप्रभाव सुनो हो भाइ । पहिले सुरग भयो सुर जाइ । बहुतऋद्धि पाई तहँ सार । चारुदत्त ही के उपकार ॥९२६॥ तातें हम दोनोंके बीर । पहिले गुरु हैं इहै सुधीर । ताते हम उपकार सुजान । नमस्कार कीनो धरि पान॥९२७॥ दोहा। अरु तिन. हमको सही, इतने बड़े सु कीन । तिनकों हम क्यों नहिं नवें, पहिले सुनि परबीन ॥९२८॥ एक जु अक्षरको सुनि जोय । आधे पदको दाता होय॥ अथवा एकहि पदको सोइ। तिह नहीं भूल्यो पापी कोइ ।।९२९॥ और धरम उपदेशको, देवावालो होइ । ताकौं भूले चित्तमें, पापी कहिये सोय ॥९३०॥ ww चौपाई। दोहा। १ क्रोध।

(९२) चारुदत्तचरित्र भाषा। ताते हमकौं नाथजी, जापिवो जोग जु मंत्र । और न दूजी वात को, तुम उपकार महंत ॥९३१॥ देव कह्यो विरतंत सब, धरि मनमें उत्साह । तव सुनिके हरषित भये, सिंहग्रीव बाराह ॥९३२॥ डिल्ल। तब बोले जुगदेव चारुदतजी सुनो। हमहूँ करत बखान आपने जिअगुनो । हमकों अपनी टहल बतावो कोइ जू । तब बपु होय कृतार्थ स्वामि हम दोई जू ॥ ९३३ ॥ सुनि देवनि के वैन चारुदत ने कही। रुद्र आदि छह मित्र तिने ल्यावो सही ॥ सुनि करि देव जु बात गये आकाश हैं। ल्याये सबको बेगि चारुदत पास हैं ॥ ९३४ ॥ सातौ मित्र भये इक ठाँइ । मनमें सुख पायो अधिकाइ। भुजा जोरिकंठ लगि मिले। करि असनेह चित्त सबखिले९३५ अर सबने पूंछी कुसलात । आनंद कंद विनोद सु गात । चारुदत्तसौं तब जुग देव । बोलत भये बचन स्वयमेव ॥९३६ जेतो द्रव्य चाहिये तुम्हें । सोय प्रकासौ साहब हमें ।। देहि द्रव्य हम तुमको बीर। तुम परकारज करन गहीर॥९३७ सिंधग्रीव बाराहक जबै । नभचर सुरसों बोले तबै । हे स्वामी सुनिये हम बात। हमहीं इनकी इच्छा भात ॥९३८॥ पूरन करि हैं मनबचकाय । अरु चित सेवा धरि हैं आय। बहुत द्रव्य देकरि हरषाइ । चंपापुर दे हैं पहुँचाय ॥९३९॥ चौपाई।

पद्धरि छद। चारुदत्तचरित्र भाषा। (९३) तब बहु सीख देइ करि देव । गये बेगि निज घरकों एव । पाछै और सुनो विख्यात खग अरु कुमर जहाँ वे भ्रात॥९४०॥ तब सिंघग्रीव बाराहग्रीव । रचियो विचित्र तिनरथ अतीव । मणिमय कंचन शोभा अपार लागे धूंधर घनघंट सार॥९४१॥ लटकती पताका बहुत माल। रुनझुन करि शब्द करै विशाल।। तब मुनिके बंदे चरन दोय। सबरे असवार विमान होय ॥९४२॥ कीनोअकाशमैं तब पयान। पहुँचे नभचर निजनिकट थान ॥ तब नगर तनी शोभा अपार । कीनीनभचर छायोबजार९४३॥ घर घर शोभा कीनी असेस । तब चारुदत्त कीनो प्रवेस ॥ तहँ देखि महाउज्वल अवास।सुखपायो बहुछबि निरखितास। नभचर मंगल कीनों अपार। तब लेइ गयो अपने जुदार॥ तिनकोसनमान कियो असंतोइनहूमन आनँद बहुलहंत ९४५ तब चारुदत्त गुणवंत बाल । साधी अनेक विद्या रसाल। अर जहाँ खगनकी शुभकुमारि।व्याही तिननें बत्तीस नारि॥ अति रूपवंत गुणकरि प्रवीन । लक्षण उत्तम संयुक्त लीन । अरु नूतन महल दिये कराय। तहँ अंतेवर सब रहेजाय ॥९४७ चौपाई। तियनसहित तहँ भुजें भोग । पूरब पुण्य तनो संजोग । नारिन सहित सु क्रीड़ा करें। भाँति भाँतिके सुख विस्तर ९४८ इंद्र समान करै सो भोग । व्यापै नहिं कछु पीड़ा रोग ॥ सुख सागरमैं मगन जु रहैं। सब खग ताकी सेवा बहैं।९४९॥ इस विध काल गमाईसोइ ।श्रीजिन भगति करें मनलोह ॥ अरु बत्तीस भामिनी संग । चारुदत्त भुंजै बहुरंग १९५०॥ 1 " (९४) चारुदत्तचरित्र भाषा। एक रयन सोवत सुखपाय । चिंता भई ताहि मनआय ॥ चलिये वेगि आपने देश। बीते वासर इहां अशेश ॥९५१॥ मात नारि क्या जानै सही । कैसे उपजेति होहै सही ॥ तातें अब कीजिये विचार । वेगहि चलिये मातालार।।९५२॥ इह चिंतत ही भयो प्रभात । सिंहग्रीवसौं विनयो तात ॥ हेराजनके शिरराजान। हमपर कीजे कृपा सुजान ॥९५३॥ हम घरचलें सु आईसु देहु । इह जस शुभ पुहुमिपर लेहु जिहँ सुनि करिनभचर दुखलह्यो।हे कुमार तुम अजगुतकह्यो दोहा। राजभार सब लेहु तुम, हम सेवक तुम पाय । बहुरि बात कडमति कहो, होत हमै दुख भाय ॥९५५॥ चारुदत्त खगबचन सुनि, बोले तब हरपंत । अब हम ऊपर नेहकरि, विदा देहु गुणवंत ॥९५६॥ भा बहुत कहा बचन, तुम आगे राजान । तुमप्रसाद हम सुखलह्यो, बहुत भाँति सु निदान ॥९५७॥ तब हठ जान्यो कुमरको, सब नभचरने संत । तब आइस दीनो तुरत, करि तैयारी तंत ॥९५८॥ फिरि नभचर बोले हरषाइ । सिंघग्रीव भ्राता शिरनाइ । चारुदत्त बच सुनो सुजान । नीकेकरि मैं करौं बखान ॥९५९॥ मेरे कन्या रतन प्रमान । गुण लावण्य रूपकी खानि ॥ गंध्रबसेना ताको नाम । लक्षनवतं रूपकी धाम ॥९६०॥ वीनवादमें बहुत प्रवीन । कला सहित गानेमें लीन ॥ ताने धरी प्रतिज्ञा एह । निहचे करनिज मनमें नेह ॥१६॥ चौपाई। १गुजारा। २आशा।

०००००००००० (९५) W चारुदत्तचरित्र भाषा। जो कोइ वीन बादमें मोय । जीते सो मम भरता होय ।। देश देशके खगनृप आय। गुण पावै नहिं चले खिसाय॥९६२|| वीनावाद न कोई धरै । हारै सो खिसियाने परें । ता जीतनको समरथ वीर। भयोन कोऊ इस थल तीर।।९६३॥ हियां खगनमैं इस्यो न कोय । वीना धरि परने इस जोय॥ एक दिनाकी सुनिये नाथ। पूछी निमतीको नाममाथा॥९६४॥ गंध्रव सेनाकों को वरै। कौन वाद वीनाकों धरै ।। तिननै मोसौं कही विचार । चारुदत्त जो सेठि कुमार॥९६५॥ जब वह अपने घरकौं जाय ।वीनवाद नरमिलि है ताहि ॥ सो व्याहै गो कन्या भ्रात । इह मोसौं भाषी तिन वात॥९६६॥ सो तुम बड़े पुरुप हो वीर । परके कारज करन गहीर ॥ तातें तुम याकौं लेजाउ । वीना सहित आपने गांउ ॥९६७॥ ऊंच वंश शुभ लक्षण चाहि । दीज्योतुमही तिसहि विवाहि ॥ जौबनवंत भई परवान। पावत कामबिरह दुख जान॥९६८|| इह कहि सौंपी सो तिसघरी । चलिबेकी तब त्यारी करी।। भामिनि पीहर दई पठाइ । बिदा मागिको बिहसाइ॥९६९॥ खगपतिको मन पायो तबै । भानुदत्त सुत चलियो जबै ॥ चलत सेठ खग सब बिहसंत । निज र कन्या समधीतंत॥९७०॥ काहू हय गय अधिक दिये दल साज हैं। काहू दासी दास जु रथन समाज हैं। करकंकन मनिजड़ित सु मुक्ता हार हैं। छत्र चमर गजराज दिये भंडार हैं ॥९७१॥ अडिल्ल। १-२ चारुदत्त। . 400 (९६) चारुदत्तचरित्र भाषा। भूषन रतनन जड़ित बहुत आभरन हैं। दीनों याविध जोर छत्र छवि करन हैं ।। काहू दिये सिंहासन रतननसौं जरे । काह मुकुट विशाल दिये मणिमय खरे ॥९७२॥ दीने नग अनमोलक भर जु विमान हैं। बस्त्र अनूपम बह पाटंबर थान हैं । दियो सैन्य बहु ताहि जु सुंदर बस्त हैं। अरु करि निज अरदास जोरि जुग हस्त हैं ॥९७३|| वाजे बहुत निसान बजे गलगाज हैं। दीने बहु चंडोल लगे नग साज हैं। जेतो शोबो दियो खगन मन आन है । तेतो भारामल किमि कहें बखान है ।।९७४॥ निज निज पुत्रिन की बिदा, करत भये खगईश । बहु भूषन आभरन दे, बहु सनमान करीस ॥९७५॥ सिंघग्रीव बाराह तसु, तिलक कीन नर नाह । गंधवसेनाकी बिदा, करत भये उत्साह ॥९७६॥ चलत देखि माता सुता, उमग्यो हियो बनाइ । कंठ लागि अलंबियो, बारबार बिलखाइ ॥९७७॥ अहो सुता परदेसिनी, भई करै दुख छोह । बहुरि जु कब मिलिहै हमें, कब देखौंगी तोह ॥९७८॥ इह कहि कहि विलखति अधिक, कंठ लागि अकुलाइ । सो उर माता मोह करि, रोवति बहु अकुलाइ ॥९७९॥ दोहा। , १ दहेज।

चौपाई। पारुदत्तचरित्र भाषा। (९७) निज निज पुत्रिनि सीख तिनि, दीनी करि सनमान । हे पुत्री ! कुलरीति गहि, चलियो यही सथान ॥९८०॥ चारुदत्त चलियो तिस वार। सबके मनदुख भयो अपार ॥ नगरलोग सब रुदन कराहिं। वारवार मनमें विलखाहिं ९८१ भरि भरि अंक भेटि परिवार। चारुदत्त चलियो तिहवार । चढ़ेविमान मुकट धारिशीश । पायक भये सबै खगईश ॥९८२॥ विद्याधर निजसेना लेइ । सिंघग्रीव आदिक गुणगेहि ॥ चवरंगहि दललेइ अपार।चले सबहि आकाश मझार ॥९८३॥ अति गंभीर बजे सुनिसान बात न और सुने कोउकान इतनोविभौ लिये निजसंग। ताकी गिनतीनाहि अभंग ९८३ बहुत बात को कहे बनाय । पहुंचे चंपापुर ढिगजाय ॥ सर्व मित्र विद्याधर संग। तिनको दलबहु नानारंग ॥९८४॥ गहिरे शब्द बजे सु निसान । उतरे निकट नगरके थान । सुनि ताके दलको कुहराव ।आयो मिलन नगरको राव ९८६ भूप विमलबाहन तसु नाम । महाविवेकी गुणको धाम ॥ आयो चारुदत्तके पास।मिलत भये दोनों गुणरासि ॥९८७॥ चारुदत्त तब सेठ कुमार । बस्तु अनूपम लै तिहि बार ॥ कीनी नजर भूपकी तबै । राजा खुसी भयो बहु जबै ९८८॥ अडिल। देखि नजर बहु भांति भूप हरषित भयो । चारुदस गुण निरखि सुक्ख मनमें लयो । तब आसनपर थापि तिलक निजकर कियो। आधो राजपाट चारुदतकौं दियो।।९८९॥ . १३ 66 . चौपाई। (९८) चारुदत्तचरित्र भाषा। हरपित भयो नरेश विमलवाहन तव । कीनी शोभा नगर बहुत विध निज तबै ॥ पाटंबर जरवाफ बजार जु छाइयो । रोपी बंदनवार सबन सुख पाइयो ।९९०॥ बाजे तहँ बाजें अधिकार । भेरी तूर पटह सहनार ॥ बाजनके जहँ बजे समाज । और निसान बजैगलगाज ९९१॥ हरष कियो सबने असमान।जाचकजनको दीनों दान ॥ नगरमाहिं कीनों परवेश। चतुरंगनिदल सहित अशेश ९९२|| नगर उछाह भयो बहु जबै । लोग परस्पर जंपै सबै ।। देखो पुण्यतनों परभाव । आयो चारुदत्त सुखराव ॥९९३॥ भानुदत्त श्रेष्ठी को नंद । घरतें कढिकरि गयो जु मंद ।। लायो सो जु विभूति अपार। देखो पुण्यतनो विवहार ॥९९४ पुण्य महातम कह्यो न जाय । पुण्य महातम शुभगतिपाय॥ पुण्य एक त्रिभुवनमें सार। पुण्य महातम विभव अपार ९९५॥ पुण्य महातम शिरधरि छत्रु । पुण्य महातम नाशै सत्रु ॥ पुण्य महातम जस विस्तरे। पुण्य महातम सुख बहु करै ९९६॥ पुण्यप्रसाद दास बहु रहें । पुण्यप्रसाद भली सब कहें ॥ पुण्यप्रसाद शोक सब भजे। पुण्यप्रसाद सबनिशिर गजै९९७ पुण्यप्रसाद काम छबि धरै । पुण्यप्रसाद बुद्धि विस्तरै ॥ पुण्यमहातम विधिको नाश । पुण्य महातम ज्ञान प्रकाश ९९८ पुण्य महातम को बहु कहै । पुण्य महातम शिवपुर लहै । पुण्य बड़ो या जगमें जोयो तातें पुण्यकरो सबकोय ॥९९९॥ १कोका।

सोरठा। चारुदत्तचरित्र भाषा। (९९) चारुदत्त पुर कियो प्रवेश । तब सुख मनमें लियो अशेश ।। सब अंतेवर संग लिबाय। जिनमंदिर सो पहुँच्यो जाय१००० गहने मेल्यो हतो जु धाम । लियो छुड़ाइ ताहि दे दाम ॥ तामैं माता भामिनि आइ। पहुँच्यो चारुदत्त तहँजाय १००१|| नमसकार करि वंदी मात । मिलत भयो सो करि कुशलात तिन देख्यो सुत लोचन लाय। दई असीस चित्त विगसाय ।। चारुदत्त देखी तब भाम । बहु प्रमोद लीनो तन ताम ॥ मातहि सिंघासन बैठाद । प्रथमनारि तिह तलें रहाइ ॥१००३ सब अंतेवरनें हरपाइ । वंदे चरन दुहुन के आइ ॥ तिन मनमैं बहुतै सुख लयो। मानों जनम सुफल तब भयो। पट बांध्यो तब शीश, नारि सुमित्राके जबै । सबपरि कीनी ईश, अवर कथा आगे सुनों ॥१००५॥ दोहा। वह बसंततिलका जबे, जो गणिकाकी धीय । रही प्रतिज्ञा करि तहां, वेश्या अपने जीय ॥१००६॥ या भव तो मेरे सही, चारुदत्त भरतार । और तातसम जानिये, यौं करि रही विचार ॥१०१७॥ तब राजादिक लोग बहु, चारुदत्त पै जाइ । गणिकाकी अरदास करि, अंगीकार कराइ ॥१००८॥ राजादिक सबके कहें । कीनी अंगीकार ॥ बहु प्रमोद आनंद सों, दूजी करि पटनारि ॥१००९॥ अरु नभचरकी कन्यकां, ब्याही जो जिस भांति ॥ तिनकौं पट दे तीसरो, करि सनमान जु ख्याति ॥१०१० (१००) चारुदत्तचरित्र भाषा। चौपाई। चारुदत्त शुभराज कराह । सुख निवसै दुख गयो भुलाइ।। विलसै विभव चित्तसुखधरै कामभोग मनबाँछित करै।।१०११ जे नभचर आये थे संग । तिनसों नेह कियो बहुरंग ॥ अरुसबको कीनों सनमान।हरषे सबै चित्तजनवान ॥१०१२॥ पंचामृत दीनी ज्योनार । बहु व्यंजन बनवाये सार ।। अरुसबको बहुआदर कियो।या विध सव संतोस्यो हियो॥ सिंघ जु ग्रीव श्रीव बाराह । चारुदत्त जान्यो नरनाह ॥ पल पल तिस विसरै नहिं नेह । रहैं जु सरब एकही गेह ।। दिन दिन प्रीति बढ़े चौगुनी। करै राजनिधि भोगें घनी ॥ एकदिना नभचरके ईश । चारुदत्तकोंनायो शीश ॥१०१५॥ जोरि हाथ खगबोले सोइ । अब हमकौं प्रभु आयसु होय ॥ हमहूंचलैं आपने देश।बहुत दिना इहँ भये नरेश ॥१०१६॥ चारुदत्त सुनि खगके बैन । कहत भये तासौं बच ऐन ॥ यह मति कहो फेरि खगबात । होय दुःख हमको तुमजात॥ तब खगपति हट कीनो घनो।लई विदा सजिदल आपनो॥ चले देश अपनेकौं सोय।करि मनुहारि हरपबहु होय ॥१०१८ चारुदत्तसौं फिरि कहि ताहि । गंध्रबसेना दीज्यो व्याहि ॥ खगपति निजथानक सब गये।चारुदत्तघर आवत भये १०१९ रची स्वयंबर शाल बनाइ । देश देश कौं दूत पठाइ ॥ तिनसों कह्यो सबहि न्योहार।दत गयेराजनदरबार ॥१०२० दृतन करी जाय तहँ टेर । सबकौं यही जनाई हेरि ॥ चलिकरि वीणावाद जु करौ। ग्रंध्रबसेना नृपधीबरौ॥१०२१ .

दोहा। चारुदत्तचरित्र भाषा। (१०१) यह सुनि देशदेशके भूप । आये इक एक अनूप ।। तहँ आये वसुदेव कुमार। जादोंबंश काम उनिहार ॥१०२२ बैठे सब शालामें आय । अब यह कथन कुमरिपै जाय ॥ दासीकही कुमरिसों बात । चलिये बाल बेगि अवदात१०२३ देशदेशके आये भूप । देख एकतें एक अनूप ॥ वीनावाद करन तुमसंगशालमाहिं सबआनंदरंग॥१०२४ तब कुमारि बोली स्वयमेव । सुनि दासी मेरे बच एव ।। कोइ न जीतै वीनाबरौं । तब हौं जिनकी दीक्षा घरौं॥१०२५ यह कहिके ठाढ़ी भई, वीणा लीनी पानि । चली तबहि शाला विर्षे, रूपकलाकी खानि ॥१०२६।। निकसी मारगके विर्षे, पुरजन देखी सोय । रूपरंग अवलोकि करि, कहत भये सब लोय ॥१०२७॥ कोई मुख” इमि कहैं, सुरकन्या है एव । कोई नागसुता कहें, देखि रूपकी टेव ॥१०२८॥ कोई विद्याधर सुता, भारे देवी जोय । जौवन करि संयुक्तसो, रूप न पूजे कोय ॥१०२९॥ अडिल्ल। जाको सोहे बदन जु पूनम चंद है। कनककांति समगात मनो मकरंद है। लोचन अरुण विशाल सुखद अतिही बने । चंचल मीनसमान जिसे सारंग तने ॥१०३०॥ चौपाई। करे कटाक्ष दृष्टि जनवान।भ्रकुटी कुटिल जु मनोकमान॥ माथैमांग विराजें बार।अतिकोमल बहुश्याम सुढार॥१०३१॥ १ मृग के समान।

(१०२)
चारुदत्तचरित्र भापा।
ऊंचीनाक इसी उनहारि । मनु कंचनकी धरी सम्हारि ।।
दशनपांति दीखत चमकांति। कुंदकली दाडिमकी भांति ॥
कानन कुंडल रतननि जड़े। मानो आप विधाता घड़े ॥
सोहैकंठ मोतियनमाल। जाकी जगमग जोति विशाल ॥
उर उरोज घटकनक सुढार । केहरिकी समलंक निहार ॥
कोमल कमलपानि ता बाल। बाहुजुगल सोभियो विशाल ।
जंघा जुगल प्रबल अभिराम । मानो कोमल कदलीथाम ॥
अरुणमहा अतिकोमल पाय । हंसचालिसम चालचलाय ।
अतिसुगंध ताको जु शरीर । आबैलपट जु चले समीर ॥
दिव्याभरण जु पहरेअंग। बहुतभांति आभूषण रंग ॥
मंदमंद पगधरती बाल । लिये सोय कर वीन रसाल ॥
गंधवसेना आई तहां । सबरेभूप जुरे हैं जहां ॥१०३७॥
देखि कुमरिको महासरूप। अचरजवान भये सब भूप ।।
एक जुदृष्टिपरेंगिरिजाइ । वीना गहिकर खरे रहाय॥१०३८
एक जु भाजि पिछारे परें । लजित होके आंसू भरें ।
वीनाले इक सन्मुखजांयागुणपावे नहिं चले खिसियांइ १०३९
एक कहें यह धन्य कुमारि । ऐसोबत जिन धरयो विचारि॥
ऐसें बहुत वितीयोकालाजीते कोउ न वीणाख्याल॥१०४०॥
तब बोले वसुदेव कुमार । जान्यो नहीं रागधुनिसार ॥
करती कहावाद तुमनारि।जा वीणागुण कहो विचार॥१०४१
के पंकतिको वीणा होय । कौनसमय बाजै कहि कोय ॥
लजित बोली सु कुमारि।वीणाके गुणलहे न सार॥१०४२॥
अहोनाथ ! तुमही उच्चरो । वीनराग कीरति विस्तरो॥
केतीभांति सुनी गुरुपास।सो कहिये मोपूजेआस ॥१०४३॥

चारुदत्तचरित्र भाषा। (१०३) तब वोले वसुदेवकुमार । इकदश भांति वीन गुणसार ॥ सवविध ताहि बताईतवे । कीरति महिपर प्रगटीजवे ॥१०४४ तब कुमारि लजित हुइगई । चूंघटकाढ़ि जु ऊभी भई ॥ तब वसुदेव लियो करवीन। कियो रागनाना परबीन १०४५॥ पशुपंछी सबमोहे सोय । कालभुजंग विषम जो होय ॥ मोहे सवनर नरपतितीव विकलत्रय मोहे सब जीव ॥१०४६।। मांगीविदा लोग सब गये । चारुदत्त गृह उत्सव ठये ॥ पंचशब्द वाजें अनिवार। ढोल मृदंग तूर सहनारि ॥१०४७॥ हरे वसनसौं मंडप छाय। चारों कंचनखंभ लगाय ॥ मुक्ताफलकी बंदनवार। निरमोलिक नगलागे सार ॥१०१८॥ वरन चरनकी कनी अपार । तिनको पूरो चौक सम्हार ॥ अतिउज्वल देखियेअभंग । शोभाकहत बने नहिरंग १०४९॥ जुवतीगावें मंगलाचार । विप्र वेदधुनि करें अपार ॥ दुलहा ब्याहनचलियो जब। पहरेभूषण पट तिन तबै १०५०॥ रतनजड़ित शिर राजैछन । दुरेचमर ऊपर जु पवित्र ॥ आयो वेदीमाहिं कुमार। सवमन आनंद भयो अपार ॥१०५१।। सोहें कामदेव छवि धारि । उत खगकन्या रतिउनहारि अगिनिसाखिदै कीनो ब्याह। दोनों तरफ भयो उच्छाह ॥ करि विवाह समदी सुंदरी। शोबोबहुत दयी तिस घरी ॥ करकंकन मणिमंडित हार दीने चमर छत्र भंडार १०५३॥ हय गय पट्टन दिये अपार । अरु अपनी कीनी मनुहार॥ करि सनमान विदा तब दई । होत भये सबही सुखमई १०५४ दोहा। चारुदत्त राजहि करे, पालै परजा न्याय । चारैतीस भामिनिसहित करहि भोगअधिकाय॥१०५५।।

(१०४) चारुदत्तचरित्र भाषा। कीनो जस सब लोकमैं, सकल जीव हितकार। राज करै विलसै विभौ, चारुदत्त नृप सार ॥१०५६॥ नाना सुख भुंजै अतुल, दयादानपर चित्त । करै उछाह अनेकविध पूजे जिनवर नित्त ॥१०५७।। महा सुक्ख जस लोकमै, होय मिटै सब सल्ल । एक पुण्यतें जानिये, भा भारामल्ल ॥१०५८॥ राज कियो बहु दिवसतिन, बढ्यो बहुत परिवार । कीरति प्रगटी लोकमैं, चारुदत्तकी सार ॥१०५९॥ पद्धड़िछंद। इक दिना आप हरख्यो नरेश । बैठो सिंहासन सुख अशेश ताकी छवि है अतिही अनूप । अर पायक ठाढ़े सकल भूप॥ मणिमुकुट महारविनै प्रकास राजै तसु शीश महा उचास।। सोहैं बहु भूषन अंगमाहि। राजै सो इम जिम इंद्र आहि॥ बहु चमरदुरै शुभतायशीश । अलवेस सहित सोहै नरीश। तब कोई एक निमित्त पाय। उपज्यौउरमैं वैराग्य आय ॥१०६२ तब चारुदत्त चिन्यो सुभूप । अब त्यागीजे संसार कूप ॥ कीजै मुनिसंगति भली आहिलीजै संजमवत चित्तचाहि१०६३ सबराजभार तिहबार । सौंप्यो ततखिन परिवार ।। आपन वनको पगधारयो।निजमत अंगीकृत कारयो १०६४ बहुजीव सहित नृपधीर । पहुंचे वनमें गुरुतीर ।। भवभोगसों विरकत होय। दीक्षाधारी मलखोय ॥१०६५ ।। त्याग्यो जिन कपट कषाय । प्रगट्यो समता रस भाय ॥ छाडियो राग अरु दोष। हिंसा अदया भई मोष ॥१०६६।। चालछंद।

चारुदत्तचरित्र भाषा। (१०५) किये मास मास उपवास । कीनो सम्यक उरवास ।। धनिधन्य मुनी उपगार।जाच्यो अपनो सुखसार ॥१०६७।। चौपाई। दर्शन ज्ञान चरित तपधार।चारुदत्त आराधै सार ॥ तीनकालके योग सुधरे। अधिक तपस्या मनबच करै १०६० पाले दशधा धर्म विचार । अंतसमाधि भाव उरधारि ॥ और सरन जियको कोउनाहिं। पंचपरम गुरुसरन कहाहि ॥ निज आतमकों ध्यावे सोय । तातें कर्म निर्जरा होय ॥ रागदोष तजि समताआनि । अंतसमाधि थकी तजिप्रान१०७० निर्मलसार समाधि उपाय । अहिमिंदरपद पायोजाय ॥ सारथसिधिके जु विमान।महापुण्यके उदय प्रमान १०७१॥: दिव्यमहा उतपाद सुजान। मणिमय सेज जहांशुभथान ॥ अंतमुहूरत माहिं सुभाय । पूरनजीवन तिहिंठो पाय१०७२॥ भूषन वसन सहित श्रृंगार । रतनमयी नाना परकार ॥ भयो जुचारुदत्त अहमिंद्र । पूरवपुण्य तनोफल वृंद॥१०७३।। अडिल्ल। श्रेनिक निज करजोरि भूप लागे कहन । हे गुरु ! सुखकी रासि सवनि संशय दहन ॥ अहिमिंदर पदमाहिं होति किहँ रीति है। सो कहिये विस्तार मोहि धरि प्रीति है ॥१०७४॥ चौपाई। गणधर कहें सुनो नरराय। अहिमिंदर गुण चित्तलगाय ॥ एकहाथको जान शरीर।सप्तधातु वर्जित गुणधीर ॥१०७५॥ जौवन सदा खच्छ शुभसार।मालादिक पहरें सिंगार ॥ लोक नाड़िके सोय प्रमान । ज्ञानवान राजत है जान१०७६॥ १४ - . पारुदसचरित्र भाषा। ताहीके जु समान विचार । तिनहिं विक्रिया तनो विथार॥ वीतरागभावनपरसाद । करै न सोविक्रया सु वाद ॥१०७७॥ दोहा। जानि विपाक सु धर्मको, सबहि धर्म सेवंत । नित्य शुद्ध जियद्रव्यको, जहाँ विचार लहंत ॥१०७८॥ सवैया इकतीसा। जा विमानगेहमें जिनेंद्रधाम शोभित हैं, तहां जिनराजकी सु पूजा करें चावसों। मूलथान छोड़िके न तीनलोकके मझार, जात न जिनेशथान तीर्थबंदै भावसों ॥ जबै ढाईदीपमैं कल्यान प्रभुके जु होइ, आसनादि कंपत नमैं तहां उछावसों । माहो अहमिंद्र मिलें धर्महूकी गोष्टि करें, शेष कर्मबंध खिरै आतमा स्वभावसों १०७९॥ अडिल्ल। आयु तहां तेतीस उदधिकी जानिये । साढ़े सोरह मास उसास बखानिये ॥ बरष गये तेतीस सहस्र अहारकी । मनसा उपजनिमात्र तृपति बलभारकी ॥१०८०॥ लेश्या सुकल सुभाव विशुद्धभनी महा । इत्यादिक महिमा निदान पदसो कहा ॥ धन्य जती तप ठानि भये अहमिंद्रजी। कलमष सर्व निवार पुनीत अबंधजी ॥१०८१॥ अवर जहां अहमिंद्र बहु, सम्यक वान पुनीत । G दोहा।

चौपाई। चारुदत्तचरित्र भाषा। (१०७) धर्मगोष्टि तिन सहित सो, करहिं परस्पर मीत ॥१०८२|| परमप्रीति राखें सकल, ऐसो सार सुथान । महासुक्खकर जानिये, महिमा धर्म महान ॥१०८३॥ चारूदत्त मुनींद्रसो, अहमिंदरपद होइ । तिनकौं हम सुमिरै सदा, करिआनंद चित जोइ ॥१०८४॥ तहां थकी सो भव्य चय, निरमल नरभव पाय । जिनमुद्रा तपधारिके, करम खेपि शिवजाय ॥१०८५॥ अवर जीव बहु ताके संग । लीनी तिन दीक्षा मनरंग ॥ ते सब निज निज तप अनुसार। पद पायो तिननै सुखकार॥ सकल मूल यह ग्रंथ सुभाय।जानो भविजन मनबचकाय॥ दयाधरममनकीजे चित्त।जीवसुखातम ध्याय पवित्त १०८७॥ धर्म समान न सुखदातार । धर्म भवोदधि तारनहार ॥ यह लखि कीजै धर्म सदीव । जामें गर्भित सर्व अतीव ॥१०८८ चारुदत्त बहु पुण्य उपाय । ताफल अहमिंदरपद पाय ।। अब सोई चय तहते बीर । निरमल नरभव पाय शरीर॥ धरि तपसार करमगण जार । बसि हैं शिवपुर सिद्धमझार ॥ धर्म तनी महिमा जु अपार । कहत न आवै ताको पार॥ सवैया तेईसा। चारुजुदत्त मुनिंदतनो विरतंत रच्यो संछेप बनाइ। पुण्य उपाय महीपर सोई लह्यो फल तास महाअधिकाइ । और कहा अधिकार कहें अब मोक्ष लहै एकहि भवपाइ। जे पदिहैं सुनिहेंजुचरित्र लहें सुखसंपति सो अधिकाइ १०९१ आडिल्ला आगे बुधिधर भये सु आचारज महा ।

चौपाई। चारुदत्तचरित्र भाषा। सोमकीर्ति गुणराशि चरित यह तिन कहा ॥ तिनहीके अनुसार अरथ को लाय के। संघई भारामल्ल जु कियो बनाय के ॥१०९२॥ फरकाबाद नगर हम तनो । धरम करमकरि सुंदर बनो। तहां हमारोवास सुथान । जाति खरौवा कुल शुभवान१०९३ दूजो देश भदावर वास । जहाँ धरमको महा प्रकास ॥ भिंड जु नगर दिपै शुभतहां। वसत लयो हम बहुसुख जहां। एक दिवस चिंत्यो मन एह । चरित जु चारुदत्त गुणगेह ॥ कीजे भाषा सुखदातार । तब कीनो चौपई विचार १०९५॥ भन्यो चरित यह चित विकसाय। पुण्यहेत जानो भवि भाय॥ अवर सुनो यह जाविध भयो।सो कारन भाषत निहचयो । नगर जहानाबाद रहाय । पदमावतिपुरबार कहांय ।। विश्वनाथ संगति शुभपाय । तब यह कीनो चरित बनाय१०९७ होनहार कारण मिल्यो, तिनहीको उपदेश । कारन बिना न भव्यजन, काज होय लवलेश ॥१०९८॥ चौपाई। सँगही परसराम गुणवान । तिनसुत भारामल्ल सु जान ॥ तासम हीनबुद्धि नहिं आन । तिन कीनो चौपई बखान ॥ छंद भेद कछु जान्यो नहीं । पिंगल में न देखियो कहीं। नाममाल ब्याकरन सुभावापढ्यो न काव्य एकहू भाव ११००६ अक्षर अर्थ भंग तुक होय। लेहु सम्हारि तहाँ बुधि लोय॥ बार बार जपों करजोरि। बुधिजन देहु मोहि मति खोरि ११०१ दोहा। , "

-~
चारुदत्तचरित्र भाषा।
संबत बिक्रमराय जान । बरस अठारहसै परवान ।
तेरह ऊपर बर्ष पवित्र । श्रावनबदी पंचमी मित्र ॥११०२॥
शुक्र सुवार नखत शुभसार । तादिन कियो पूर्न हितधार॥
जो यह कथा सुनैधरिभाव। बहुसंपति सुखपावै ठांव ११०३
पुत्र जन्म शुभ ताके होय । महिमा आन बतावै कोय ॥
बार बार कहा कहौं बढ़ाय।पालोजीव दया सुखदाय ११०४
भारामल्ल कहै चितलाइ । ते ज्ञानी समझें निज़ पाय ।
शुद्धातम लौ लावत भ्रात अशुभ करम सबही मिट जात ॥
कुंडलिया।
गणिका संगति दोष करि, चारुदत्त गुणखानि ।
बहु दुखको प्रापति भयो, गूथे चमरा जान ।
गूंथे चमरा जान लोभ करि वेश्या मंडित ।
प्रीति लगावति बहुत औरसों गुण करि खंडित ॥
निंद्य महा जगमाहि जाहि जिय दया न तनिका।
तातें भविजन जानि जोग्य तजि दीजै गनिका॥११०६॥
साई जो सर्वज्ञने भाषे बचन जु सार ।
धर्म या संयुक्तसो, कह्यो परम हितकार ॥
कह्यो परम हितकार गुननिकी निधिसो जानौ ।
जो कोई नर याहि करत अंगीकृत मानौ ॥
पुरुष तेइ जगमाहिं सबनि शिरऊपर भाई।
गुनसौं प्रीति लगाइ सदा सो पूजहु साँई ॥११०७॥
दोहा।
चारुदत्त नृपकी कथा, पढ़े सुनै जो कोइ ।
पहिलै पावै देवपद, पाछे शिवसुख होइ ॥११०८॥

(११०)
चारुदत्तचरित्र भाषा।
छप्पया
इति श्रीसेठिकुमार चारुदत्तोऽपि चरित्तर।
सोमकीर्ति गुणराशि विरचितिन कियो प्रथम वर॥
तिह अनुसार विचार करी भाषा बुधिसारू ।
सँघई भारामल्ल कहत सबकौं सुखकारू ॥
चारुदत्त संपति विभौ अहिमिंदरपद कहि वरन ।
इस भांति चरित बाँचौ सुनौ सकल संघ मंगल करन॥११०९
जैसी पुस्तक मो मिली तैसी छापी सोय ।
शुद्ध अशुद्ध जु होय कहुं दोष न दीजै मोय ॥
श्रीचारुदत्तचरित्र भाषा समाप्त ।
--
-

* लावनी मत करोमीति वेश्या विषबुझी कटारी, है यही सकल रोगोंकी खानि हत्यारी ॥ औपधि अनेक है सर्प डसेकी भाई, पर इसके काटेकी नाही कोई दवाई ॥ तनलगे बान तो जीवित हू पच जाई, पर इसके नैनके पानसे होय सफाई। है रोम रोम विषभरी करो ना यारी, है यही सकल रोगोंकी खानि हत्यारी ।। यह तन मन धन हर लेय मधुरघोलीमें, बहुतोंका करे शिकार उमर भोलीमें ।। कर दिये हजारों लोट पोट होलीमें, लाखों का मन कर लिया कैद चोलीमें । गई इसी कर्ममें लाखोंकी जिमिदारी, है यही सकल रोगोंकी खानि हत्यारी॥ हो गये हजारों के बल धीरज छारा, लाखोंका इसने वंशनाश कर डारा॥ गठिया प्रमेह आदिकने देश विगारा, भारत गारत हो गया इसीका मारा ।। करदिये हजारों इसने चोरअरु ज्वारी, है यही सकल रोगोंकी खानि हत्यारी॥ इसही ठगनीने मघमांस सिखलाया, सब धर्म कर्मको इसने धूर मिलाया ॥ अरु दया क्षमा लज्जाको मार भगाया, ईश्वरकी भक्तिका मूलनाश करवाया। हैं इसके उपासक रौरव(नक)के अधिकारी,है यही सकल रोगोंकीखानि हत्यारी वह नव युवकों को नैन सैन से खावे, अरु धनवानोंको चट्ट गट्ट कर जावे ॥ धन हरण करे अरु पीछे राह बतावे, करे तीन पांच तो जूते भी लगवावे ।। पिटवाकर पीछे लावे पुलिस पुकारी, है यही सकल रोगोंकी खानि हत्यारी ॥ फिरकियापुलिसनेखूवअतिथि सत्कारा, हो गईसजा मिलामजाइश्ककासारा॥ जो झूठ होय तो सज्जन फरो विचारा, दोत्यागझूठ करोसत्यवचन खीकारा ।। अवतजो कर्मयहअतिनिदित दुखकारी, है यही सकल रोगोंकीखानि हत्यारी।। समाप्त।

हमारी खासकी छपी पुस्तकें। II ... - つ州がっつっ . ) भद्रबाहु चरित्र-भाषानुवाद सहित धन्यकुमार चरित्र-भाषानुवाद पंचमंगल-रूपचन्द्रकृत शुद्धपाठ लघुअभिषेक-जन्मपूजा तथा आरती और फूलमाल समेत सम्मेदशिखरमाहात्म्य-पूजन सहित जवाहरलाल कृत पंचकल्याणक पूजा-भाषा वखतावरलाल कृत नेमिचंद्रिका प्राचीन आसकरन कृत नेमीश्वरविवाह-दोप्रकारके खेमचन्द और विनोदीलाल कृत नेमिनाथका तेरहमासा तथा राजुलकी वारहमासी राजुलपचीसी-विनोदीलाल कृत बाबुलपचीसी और नेमिराजुलके प्रश्नोत्तरकी धारहमासी समाधिमरण दोनो-५० सूरचन्द और धानतराय कृत निर्वाणकांड-प्राकृत और भाषा महावीरखामीकी पूजा सहित हुक्कानिषेध-५० भूदरदास कृत निशिभोजन कथा-निशिभोजननिषेधकी लावनी समेत अहिक्षेत्रविधान-(पार्श्वनाथस्तुति ) दूसरी भूदरदास कृत स्तुति बारहभावना-मुन्शी मंगतराय कृत बारह भावनासंग्रह-छै कवियोंकी बनाई भावनावों का संग्रह आलोचना पाठ- कठिन शब्दों पर टिप्पणी सहित वैराग्यभावना-और समाधि मरण गुर्वावली-और मंगलाष्टक साधुबन्दना-पं० वनारसीदास और भूदरदास कृत मोक्षपैड़ी- शिवपचीसी-और तेरह काठिया शानपचीसी-और धर्मपचीसी नरकदुक्त कथन-भूदरदास कृत शारदा अष्टक-और शास्त्रभक्ति समेत मुनिराज का बारहमासा-१० जियालाल कृत .. DH ॥ ॥ ॥ .. ... ار m Dn ... OM ... :::: ॥ Dil ॥ Dil फूलमाल पचीसी- ... । उपरकी उनतीस पुस्तकोंमें से एक किसमकी पांच लेने से और दस लेने से तेरह दी जावेगी। ६

No text on this page.

Charudatcharitr Bhasha

Author
Not Available
Title
Charudatcharitr Bhasha
File name
Charudatcharitr Bhasha
Text
OCR done
Citation
1912
Published
2009/11
Publisher
Benares, Chandraprabha Press
Language
Sanskrit
Pages
112
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Charudutt - charitra
DLI number
344232
Barcode
99999990234109.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
kaApRrCWyn8
Download PDF

Charudatcharitr Bhasha