Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Tarkikmohaprakash

Shree Paramhans Parivarjak · 2011/08

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तार्किकमोहप्रकाशः
वैशेषिकन्याय नवीनार्यमतादि
खंडनरूपः
श्रीमत्परमहंसपरिव्राजक श्री ब्रह्मानन्द
तीर्थ विरचितः
श्रीमत्परमहंस परिव्राजकत्रीप्रकाशानन्द
पुरिकृत भापानुवादसहितः
तथा दयानन्दमोहप्रकाशश्च
तदनुज्ञया
ज्यन्यन्त्रालयस्थीये प्रयागक्षेत्रसंस्थिते
श्रीचिन्तामणिधोपेणमुद्रितश्चप्रकाशित.
चिफमाारसंघत् १९४९ शके १८१४ फाल्गुन
भापानुषादमाहितस्य प्रथमावृत्तिः ५०० मूल्य
(भयंपन्यः रामनियमानुसारेण राजरहारुदीकर,

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A स्थूलस्थूलतरैरयत्रपुभवैस्सूक्ष्माच सूक्ष्मोत्तमैः नेत्रानन्दविवर्द्धनैक सुभगैःस्पष्टाक्षरैश्शोभिते।लोका नामुपकारकारणकृते वेणीतटेसं- स्थिते नानावर्णविभूषिते वुधनुते यन्त्रालयेमुद्रितः॥१॥ योयोs- शुद्धोमयाचात्रदृष्टस्सोवै सुशोधि तः। योनदृष्टस्तुतं शोध्यपठनी- योमहात्मभिः॥२॥ अनुवादेप्य ऽशुद्धस्याद्यदितर्हिक्षमाधनैः।त- मशुद्धंसुशोध्याथपठनीयो मनी- पिभिः ॥३॥ भाषाऽज्ञानवशा- देव शोधितोनमयात्रसः । भाषा कर्तुं रसान्निध्यात्तस्मिन्दोपोन- विद्यते॥४॥ स्वामी ब्रह्मानन्दतीर्थः

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भूमिका कश्चिद्दाक्षिणात्यः शमादिगुण विद्यापारङ्गतः शारीरकसू- नेश्वरीतिलकाद्यनेक ग्रन्थर- परमहंसपरिव्राजक श्रीब्र- र्थाभिधः पथिवींपर्यटमानः जम्वूनगरंप्रविश्य सुखेनोवास चन्न्यायमदिरोन्मत्तायशा- तं वेदान्तमीमांसाशास्त्रंयु- मिति प्रलपितमुक्तस्वामिनाशु- न पूर्व लवपुरेपि श्रुतमिदंव- मनसिसंचिन्त्यतेपां न्यायम- न्यमहामोहशान्तये अयंतार्कि काशाख्योग्रन्थो रचितः । - क्षिभूतं वेदान्तप्रसिद्धमेकं शुद्धं

याराभासत्वमथोंदनिवेचनीयवा
कर्पत्वं आकाशस्योत्पत्तिमत्वं र
ङ्गादात्मनः स्वतस्सिद्धत्वं रामानु
सिद्धजीवस्वरूपाऽसत्वमात्मनो हि
नानात्व वादिमतेसुखदुःखसाङ्कर
दोषाऽनिर्माक्षत्वंच प्रतिपादितंत
अस्य ग्रन्थस्य मतान्तरप्रसिद्धयुक्त्या
तिरस्कारपूर्वक पदार्थतत्वनिर्णया
त्वात्तत्वजिज्ञासू नामुपकारकत्वम
रप्रयोजनं सूचितंमुख्यंन्तु तदेवयर
न्तसिद्धमोक्षाख्यं तत्संवन्धित्वात्
मुपकारोभाषानुवादेनैवसर्वसाधर
विष्यतीतिमत्वाप्रर्थितेनकेनचिद्गौड
4
*TA

भूमिका संभवेन दयानिधिनाशमादिगुणसंपू- र्णन सकलदर्शनतत्वज्ञेन पांचालदेशा- न्तर्गत जागरूकपुरनिवासिना श्रीमत्प- रमहंसपरिव्राजक श्री प्रकाशानन्दपुरि- स्वामिना भाषानुवादःकृतः पूर्वमप्यय- मिन्द्रप्रस्थेकाशीनाथशर्मणा सूक्ष्मायसा ऽक्षरैर्मुद्रितःपुनरिदानी सएव भाषानु- वादसहितः समीचीनतयामुद्रणाय ग्र- न्थकद्दत्ताधिकारिणा मया बहुजनाप- कारायनिजद्रव्यव्ययेन निजइण्डियन्- यंत्रालये शुद्धसंबद्धसमीचीनस्थूलायसा- क्षरै मुंद्रितःप्रकाशितश्च चिन्तामणि घोप प्रयागक्षेत्रनिवासी

भूमिका ॥
AAL
भूमिका
emama
एक समय में शमादि गुणयुक्त सकलविदाओं के
पार गामी पीर शारीरकसूत्र वृत्ति और भुवनेश्वरी
तिलकादि अनेक ग्रन्योंकी रचनामें चतुर दाक्षिणात्य
परमहंस संन्यासी श्रीब्रह्मानन्द तीर्थ स्वामी पृथिवी
पर घूमते हुए जम्बू नगरमें पाकर सुख पूर्वक नि-
वास करने लगे और वहां उन्होंने न्यायशास्त्र रूप
मदिरासे उन्मत्त हुए कई एक नैयायिकों से यह सुना
कि हमारा शास्त्र युक्ति युक्त है और वेदान्त मीमांसा
शाख युक्ति रहित है और ऐसाही कथन एक काल
में उन्होंने लाहौरमें भी सुनाथा इससे उन्होंने अपने
मन में विचार कर उन लोगों के न्यायशास्त्र रूप
मदिराके पोनेसे उत्पन्न हुए महामोह को शान्ति के
अर्थ यह “तार्किकमोहप्रकाश" नामक ग्रन्थ बनाया है
इसमें सर्वसाक्षिभूत वेदान्तोंमें प्रसिद्ध शुद्ध चैतन्यही
सत्य है उससे भिन्न सकल प्रपञ्च मिथ्या है यह ग्रन्थ
कार का मत है इस की सिद्धि के अर्थ परमाणुवाद
से जीत मे भिन्न ईश्वरका

भूमिका ॥ असत्व नैयायिकी के अनुमानों को दुष्टत्व सत्कार्य- वाद और असत्कार्यवाद के निरास पूर्वक अनिर्व- चनीयवाद का उत्कर्ष आकाश की उत्पत्ति उसके प्रसङ्गसे आत्माको स्वतःसिद्धत्व और रामानुज मत सिद्ध जीव स्वरूप खण्डन और आत्माको विभु और नाना ( अनेक ) मानने वालों के मतमें सुख दुःख साङ्कर्यादि दापों को अवारणीयत्य दिखाया है और तत्यजिज्ञासुओं के निमित्त नाना मतों की कुयुक्तियों का तिरस्कार करके पदार्थतत्त्व का निर्णय इस ग्रंथमे किया है किन्तु विशेष करके वेदान्तसिद्ध मेक्षिही का उपाय तत्वनिर्णयद्वारा बताया है यह ग्रन्थ संस्कृत में था मनमें यह प्राई कि इस ग्रंथ का अनुबाद यदि भाषा में होता तो आधुनिक कम संस्कृत व राजमापा जानने वाले जिज्ञासुओं का बड़ा उपकार होता इस निमित्त पंजाव देशान्तरगत हुशियार पुर निवासी ग्राह्मणकुलोदव दयालु व शम- दमादि गुण संपन्न व सकल दर्शन तत्ववेत्ता श्रीम- त्परमहंसपरिव्राजक श्रीस्वामी प्रकाशानन्दपुरीजी से भापानुवाद करने की प्रार्थना को उन दयालु महा पुरुपने परोपकारार्थ इस ग्रन्य काभापानुवाद किया मैं उन महात्मा को कोटि २ धन्ययाद देता हूं। यह

भूमिका ॥
14-
ग्रन्य पहिरटे दिखीशहर में काशीनाथ शर्मा द्वारा में
स्कृत में छापा गयाथा परन्तु इस ग्रन्य के अक्षर बहुत
छोटे थे इससे यह ग्रंय श्रीस्वामी ब्रह्मानन्द तीर्य ज
के मनोनीत न हुआ इस कारण मुझे इस ग्रन्यके
यड़े २ सपुष्ट व शुद्ध अक्षरों में भापानुयाद सहित मुद्रित
करने का अधिकार दिया उन महात्मा की आज्ञा-
नुसार यह ग्रंथ परोपकार के अर्थ निजद्रव्य व्ययकर
निज इंडियन यन्त्रालयमें छापकर प्रकाशित किया।
चिन्तामणि घोप
प्रयागक्षेत्रनिवासी
.

सूचीपत्रम् ॥
* सूचीपत्रम् *
पृष्ठ
प्रतिपाझविपयाः॥
१ मंगलाचरण, न्यायमतप्रदर्शन
२ परमाणुओं के निमित्तकारण खण्डनमारंभ
३
उनके
दृष्ट
और
अदृष्ट निमित्त का खंडन
४ ईश्वरेछा का निमित्तत्व खंडन प्रारंभ
७ जीव भिन्न ईश्वर का खंडन प्रारंभ
११ नवीनार्य मत सिद्ध ईश्वर खंडन प्रारंभ
२४ रामानुज मत सिद्ध ईश्वर खंडन प्रारंभ
३० ईश्वर सिद्धि के वेद प्रमाण खंडन
३१ परमाणुओं के संयोग खंडन प्रारंभ
३६ परमाणुओं को सावयवत्व प्रतिपादन प्राय
३९ पराभिमत प्रलय खंडन
११ परमाणुओं का जन्यत्वाऽनित्यत्व प्रतिपाद
४३ परमाणुओं को नित्यत्व साधकाऽनुमान सं
४९ कारणगुण का कार्य में सजातीयगुणारंभकत्व
५३ असत्कार्यवाद खंडन प्रारंभ
६६ सत्कार्यवाद संडन और अनिर्वचनीयवाद
६७ कार्यकारण को भिन्नत्व और समवाय खंडन
७६ गुणगुणी का भेद खंडन

बार
८३ साकात्पित्ति प्रतिपादन प्रारंभः
८७ प्रात्मा के निगुंगत्व प्रतिपादन मारंभः
९० आत्मा को स्यतस्सिद्धता प्रदर्शन
९४ कर्यारंभक कारणों का साजात्य नियम संडन
९७ कार्यद्रष्य का स्वन्यून परिमाण द्रव्यारभकत्व खंडन
१०६ रामानुजमतसिद्ध जीवश्यरयारंगाशित्वभायखंडन
१०८ जीयाणुत्व खंडन
१०९ ज्ञानगुणस्य व्यापित्य खंडन
११५ आत्मनानात्य खंडन प्रारंमः
११६अनेकात्मत्ययादिमतमेसुखदुःखसाकार्य दोपप्रदर्शन
(अथदयानन्दमोहम्रकाशः)
१२५ ब्राह्मण भाग का वेदत्व स्थापन प्रारंभः
१३५ नवीनमत सिद्ध संस्कारों के आक्षेप पूर्वक
अवैदिकत्वकथन प्रारंभ
१४३ प्रतीकोपासना का वेदमूलत्वप्रदर्शन प्रारंभ
१४६ वेदान्तकाऽनादित्व प्रतिष्ठापन प्रारंभ
इति
LALLARA

शुद्धाशुद्धपत्रमिदं पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध १ ब्रह्म २/ सेकायत ५/ व्याप्ति १ वुद्धि ९१२ बुद्धौ--बुद्धि ध्यापार १२ ८ वहूनि ११ - ११ ७ बुद्धि ८. वोटुव्यं ६. वाह्य ७वोध्यं १७ सोकामयत व्याप्ति बुद्धि बुद्धौ-युद्धि व्यापार बहूनि बुद्धी बुद्धि घोद्धव्यं घाह्य योध्यं दृष्टा दृष्टाः विशिष्टा घलेन बन्धनः सावयव चतुर्विध याध्य १९ ७ दृष्ठाः २५१ २१ विशिष्ठ १चलेन ३१ १वन्धनः ३७, ९ साववयव ३) चतुविध ५३ ४ बाध्य शुद्ध नोध्योम व्यभिचारात यहुत्यात् यह द्रव्य राष्ट्रपति प्रयुद्ध ५६, ६ नव्योम ५० १ध्यभिचारातू ३ यहुस्यात् ५२५-८ बहु द्रव्य ४ योध्यं १ सत्यचार्य १/वार्य ६७/ २ चोध्यं ६८ सम्बन्ध १ संवद्ध ४ घ्यवहार ५| वाह्य ७६ ४ बाधित १ | वाधात् योध्यं सत्कार्य कार्य योध्यं सम्यन्य सम्यह व्यवहार बाह्य बाधित वाधात् व्यापारे वाधात् प्रमाणादाऽभाव व्यभिचारत् स्वरूपा द्रव्य वीन्द्र अनुप्ठेया रुत्कर्षात ६ व्यापारे ९१ १ वाधात ९२ ६/ प्रमाणाऽदाभाव ९५ ३ व्यभिचारात् ९९ ४स्वरुपा १०१ ६ द्रव्य १२८ | १३/ वीन्द्र १३४ ३ अनुष्टेया १४५ ३ रुकात् ठो नमोगणेशाप। तार्किकमोहप्रकाशः॥ नत्वा गुरुपदाम्भोज ब्रह्मविद्या वि- भाव्य च।तार्किकाणां (महामाहः) संग्र- हेण प्रकाश्यते ॥ १॥ इह खलु तार्कि- काः प्रलयकाले विभक्ताः परमाणवा- निश्चेष्टा आकाशे वर्तन्ते प्रलयावसाने सर्गादौ द्वाभ्यां परमाणुभ्यां वरणुकं गुरुचरण कमलको नमस्कार और ब्रह्मविद्या का चिन्तन करके तार्किकोंके महामोहका संक्षेप से प्रकाश किया जाता है ॥ १॥ नैयायिक लोग कहते हैं कि प्रलय कालमें परमाणु अलग २ और क्रियासे हीन होकर आकाशमें रहते हैं जव प्रलयकाल बीत जाता तब सृष्टिके आदिमें दो परमाणुओं केसंयोग से द्यणुक ओर (मारास दुझिमरान हाल दुमिरहिन कथनी मोरा तार्किकमोहप्रकाशः ॥ त्रिभिःणुकैस्त्रवणुकमिति द्ववणुकादि क्रमेण परमाणुमि जंगदारभ्यत इति प्र- लपन्ति । अत्रवदामः प्रलये विभक्तानां परमाणूनामन्यतरकर्मणोभयकर्मणा वा संयोगोवाच्यः । कर्मणश्च दूषं निमित्तं प्रयत्नादिकं वाच्यं यथा प्रयत्नवदात्म- संयोगाइहचेष्टा वायवाद्यभिघाताव- क्षचलनं तद्वत्परमाणु कर्मणोद्रुष्टनिमि- तीन घणुकोंके संयोगसे न्यणुक उत्पन्न होता है इस रीतिसे द्यणुकादि क्रमसे जगत् उत्पन्न होता है।इसमें हम यह कहते हैं कि प्रलयकालमें अलगर हुए परमाणुओंका जो सृष्टिके आदिमें संयोग होता है वह एक परमाणु वा दो परमाणुओंकी नियासे उत्पन्न हुआ मानना होगा क्योंकि क्रिया के बिना संयोग हो नहीं सकता है और उस क्रियाका कोई असा कारण जैसा कि शरीर की क्रिया का प्रयत्नवदात्मसंयोग और वृक्षादिकों की क्रिया का पयनादिकों का संयोग कारण है, तार्किकमोहप्रकाशः ॥ त्तमभ्युपगम्यते वा नवा नान्त्यः परमा- णुष्वाद्यक्रियारूपकार्यासम्भवात् ना- द्यः प्रयत्नादेः सृष्ट्युत्तरकालीनत्वेना- द्यक्रियाजनकत्वायोगात् । ननुद्रुष्टनि- मित्तासम्भवेपि जीवादृष्टस्य निमित्तत्व- सम्भवइति चेन असम्बदस्य तस्यनिमि- तत्वायोगात् जडत्वेन प्रवर्तकत्वायो- गाच्च। मानते हो वा नहीं यदि न मानों तो कारण के न होनेसे क्रियाकी उत्पत्ति नहीं हो सकेगी और यदि मानों तो सृष्टिसे प्रथम पवनादि उत्पन्न ही नहीं हुये तो वे परमाणु क्रियाके उत्पादक कैसे हो सकेंगे।शङ्का। यद्यपि सृष्टिके आरम्भ समयमें होनेवाली परमाणुक्रियाका कोई दृष्ट कारण नहीं बन सकता तथापि जीवोंके धर्म और अधर्म रूप अदृष्ट कारण हो सकते हैं। समाधान।परमाणुओंसे असम्बद औ जड़ होने से अदृष्ट क्रियाके कारण नहीं हो सकते हैं।

तार्किकमोहप्रकाशः॥ ननु अदृष्टवदात्मसंयोगस्य निमित्तत्व- मितिचेन्न विभुसंयोगस्याणुषु सदा सत्वा- त्प्रलयाभाव प्रसङ्गः। ननु जीवाधिष्ठिता- दृष्टं निमित्तमितिचेन्न प्रलयकालेऽनुत्प- नचैतन्यस्य जीवस्य जडत्वेनाधिष्ठातृत्वा योगात् । ननु ईश्वरेच्छाया निमित्तत्व मितिचेन्न तस्यानित्यत्वेन कादाचित्क- प्रवर्तकत्वायोगात् । ननु ईश्वरेच्छायाः श०(अदृष्ट)वदात्माका संयोगकारण हो सकता है । स० ऐसा होने से विभु आत्माके संयोग को परमाणुओंसे सदा ही विद्यमान होनेसे पर माणु क्रियासे घणुकादि क्रमसे सदा ही सृष्टि होती रहेगी प्रलय कभी न हो सकेगा । श० जीवसे अधिष्ठित अदृष्ट को कारण माने गोस० प्रलय कालमें ज्ञानादिकों के न उत्पन्न होने से जड़ जीव अदृष्टों का अधिष्ठाता नहीं हो सकता है। श० ईश्वर की इच्छा कारण हो सकेगी स० उस को नित्य होने से कादाचित्क परमाणुझिया की ताकिकमाहमकास सृष्टिस्थिति प्रलय कालविषयकैकाकार- तया कादाचित्कप्रवर्तकत्वसम्भव इति चेन्न । विकल्पासहत्वात् तथाहि यस्मि- न्काले सृष्टीच्छातस्मिन् काले प्रलयेच्छा वर्तते वा नवा नाद्यः सृष्टयभावप्रसङ्गात् नान्त्यः अनित्यत्वप्रसङ्गात् किञ्च त्वद- भिमतैतादृशेच्छासत्वे प्रमाणाभावात् कारणता नहीं हो सकती है। शनियत काल में होने वाले सृष्टि स्थिति और प्रलयको विषय करने वाली ईश्वरेच्छाको एकाकार होने से कादाचिक परमाणुक्रियाकी कारणता हो सकती है । स० यह कथन विकल्पों को नहीं सहन कर सकता तथाहि जिस काल में ईश्वर को सृष्टि की इच्छा है उस काल में प्रलय की इच्छा हैवा नहीं है यदि कहो है तोसृष्टि न होनी चाहिये और यदि कहो नहीं है तो प्रलय की कारण ईश्वरेच्छा की प्रलय से पूर्वकाल में उत्पत्ति माननी होगी इससे उसको अनित्यत्व प्रसङ्ग होगा और

साफिकमोहप्रकागः॥
4441ALLLLLLLIATALA
प्रत्युत यज्जानं तन्मनेाजन्यं या इच्छा
सामनेाजन्या इतिव्याप्त्यनुगृहीतसोका-
यतेत्यादिश्रुतिविरोधेन नित्यजानेच्छा-
द्यसिद्धेश्च । नन्यस्त्वीश्वरेच्छाया अनि-
त्यत्वं तथाप्यणुकर्मनिमित्तत्वसम्भवा-
दितिचेन्न अपसिद्धान्तापत्तेः अशरीरा-
मनस्कत्वेन
तुम्हारी मानी हुई ऐसी इच्छा में कोई प्रमाण
नहीं है प्रत्युत जो ज्ञान है वह मनोजन्य है
और जो इच्छा है वह मनोजन्या है इस नियम
से अनुग्रहीत “सोऽकामयत" इत्यादि श्रुतिसे
विरोध होने से नित्य ज्ञान और नित्य इच्छा-
दिकों का असम्भव है । श. ईश्वरेच्छा को
अनित्यही मान लेंगे तब तो वह परमाणु क्रिया
का कारण हो सकेगी।स.ईश्वरेच्छा कोअनित्य
मानने से नैयायिक सिद्धान्त की हानि होगी
क्योंकि नैयायिक लोग ईश्वरेच्छा को नित्यही
मानते हैं अनित्य नहीं। और शरीर और मनके

साक्रम जन्यज्ञानाद्यनुपपत्तेश्च । किञ्चईश्वरो- स्तिनवेति संशयेन तदीयेच्छानिमित्त- कपरमाणुप्रवत्तेर्दूरनिरस्तत्वात् तथाहि ईश्वरो नास्तिप्रमाणाभावा द्वन्ध्यापु- त्रवत् । ननु क्षित्यकुरादिकं कर्तजन्य कार्यत्वाद् घटवदित्यनुमानं प्रमाणमि- तिचेन्न व्याप्तिज्ञानाभावेनानुमानाप्रवत्तेः नहोने से ईश्वरके जन्य ज्ञानादि वन भी नहीं सकते हैं । और ईश्वरकी असिद्धि से जब तक ईश्वर है या नहीं है यह संशय बना हुआ है तब तक ईश्वरेच्छा से परमाणु क्रिया का मानना असङ्गतहै तथाहि ईश्वर नहीं है प्रमाण के न होने से जैसे वन्ध्या पुत्र नहीं है। श. एथिवी और अकुरादि किसी कर्ता से उत्पन्न हुए हैं कार्य होनेसे जैसे घटादि हैं। इस अनुमानसे पृथिव्यादिकों का कर्ता ईश्वर सिद्ध होता है क्योंकि कोई भी जीव इन एथिव्यादिकों को उत्पन्न नहीं कर सकता है।

तार्किकमोहप्रकाशः ॥ तथाहि यद्यप्यकुरादौजीवः कर्ता न भवति तथापि जीवाद्भिन्नस्य घटवदचेत- नत्वनियमादन्यः कर्ता नास्त्येवेतिव्यति- रेकनिश्चयात् यत्कार्य तत्सककमिति- व्याप्तिज्ञानासियाऽनुमानाप्रवृत्तिः। कि- ञ्च घटादौ व्याप्तिग्रहणकाले तदुत्पत्ति स्थानात्परितो वर्तमान तृणाङ्करादी स० यह बात आपकी सत्य है कि इन एथिव्या- देकों का कर्ता जीव नहीं हो सकता परन्तु जसका कर्ता जीव न हो उसका कोई भी कर्ता नहीं हो सकता है क्योंकि हम देखते हैं कि नीवसे भिन्न जो है सो सव जड़ है और हर्ता वही होता है जिसमें ज्ञान इच्छा और पत्न हों और वे चेतनके धर्म हैं जड़के नहीं इससे यह नियम नहीं बन सकता है कि तो कार्य होता है वह किसी कर्तासे उत्पन्न आ होता है जब यह नियमही न बनसका तुम्हारा अनुमान फेसे बनेगा है तार्किकमोहप्रकाशः ॥ तत्कर्तुरप्रत्यक्षत्वेन तार्किकाणां बुद्धिम- तां वुद्धी कथं व्यभिचारखुद्धि त्पन्नति महदाश्चर्य यदि कचित्स्थले व्याप्तिंग- हीत्वासर्वत्राऽनुमीयते तर्हि क्षित्यङ्करा- दिकं दण्डचक्रादिव्यापारजन्यं कार्य- त्वाद् घटवदित्याद्यनुमितेर्दुर्निवारत्वं स्यात्।किञ्च सुखसमवायिकारणस्यात्मनः और यह एक बड़े आश्चर्यकी बात है किघटा- दिकोंमें उक्त नियमके देखनेके समयमें समी- पस्थ तृण और अंकुरादिकों के कर्ताके नदीख- नेसे भी बुद्धिमान तार्किकों को उक्त नियममें व्यभिचार बुद्धि नहीं उत्पन्न होती है। और यदि किसी एकमें नियमको देखकर तदनुसार ही सर्वत्र अनुमान करोगे तो एथिव्यादि दण्ड और चक्रादिकोंके व्यापारसे उत्पन्न हुए कार्य के होने से जैसा घट है ऐसे अनुमानोंसे भी साध्यकी सिद्धिका प्रसङ्ग होगा। और सुखका समवायि कारण जीवात्मा

"
ताकिमहप्रकागः ॥
मुखादिकर्तृत्वाऽसम्भवेन कर्तजन्यत्या
भाववति सुखादीकार्यवहेताविद्यमान
त्वेन व्यभिचारात् अन्यथाऽभिन्ननिमि
तोपादानत्वस्वीकारापत्तेः नापत्तिर
पसिद्धान्तापातात् नहीदमीश्वरकर्तृवं
तस्याऽसिद्धत्वेनाऽन्योन्याश्रयतापत्तेः ।
सुख का कर्ता नहीं हो सकता है इससे कर्टजन्य
त्याभावाश्रय सुखमें कार्यत्व हेतुके विद्यमान
होनेसे पूर्वोक्ताऽनुमानमें व्यभिचार है और यदि
सुखादिकोंका कर्त्ताभी जीवात्माको मानोंगे तो
उपादान और निमित्त कारणकी एकता होजा-
यगी यदि इसको मान लोगे तो तुम्हारा उपा-
दान और निमित्त कारणका भेद, रूप सिद्धान्त
खण्डित होजायगा और यदि ईश्वरको कर्ता
कहोगे तो उसके असिद्ध होनेसे अन्योन्याश्रय
दोष होगा क्योंकि ईश्वरसिद्धिके अधीन सुख
में सकर्तृकत्वकी सिद्धि है और इसके अधीन
ईश्वरकी सिद्धि है।

तार्किकमोहप्रकाशः॥
(नवीन आर्यमत प्रसिद्धेश्वर खण्डनम
अत्रकेचिच्छास्त्रसंस्कारशून्या आधुनि
का दयानन्दिनः प्रजल्पन्ति घटादि
कार्यजीवः कर्ता दूपः वक्षाऽभिघातपर्व
शिखरपतनादौ वाय्वादीनां कर्तृत्वं दू
तद्वत्सकलप्रपञ्चकतैश्वरोभवितुमर्हर्त
ति। तत्तुच्छम् जडस्य कर्तृत्वाभ्युपग
लाघवात् मूलप्रकृतेरेव कर्तृत्वा भ्युप
गमेन।
(दयानन्दमतसिद्दईश्वरका खंडन ) इस
आधुनिक और शास्त्र संस्कार रहित कई ए
दयानन्दी लोग कहतेहैं कि जैसे घटादि कार्यों
जीव और वृक्षोंके टकरने और पर्वतशिखरों
पतन आदिमें पवनादि कर्ता देखे हैं वैसा सका
प्रपञ्चका कर्ता ईश्वर होना चाहिये यह उनव
कनथ तुच्छहै क्योंकि यदि पवनादि जड़ पदा
भी कर्ता हो सके तो लाधव से मूलप्रकृति

१२ तार्किकमोहप्रकाश.॥ वन्ध्यापुत्र तुल्येश्वराभ्युपगमस्य वैय- •पत्तेः। किञ्च ईश्वरः सच्चिदानन्दरूपो निराकारः सर्वशक्तिमान् न्यायकारी द- यालुःअजन्मा अनन्तोनिर्विकारोऽनादि- रनुपमः सर्वाधारस्सर्वश्वरस्सर्वव्यापकः सर्वान्तर्याम्यजरोऽमरोऽभयोनित्यःपवि- त्रः सृष्टिकर्ताचेति प्रलपन्ति तदपेशलम् अत्रवहूनि व्यर्थविशेषणानिसन्ति तेषां स्तुत्यर्थत्वेनोपपत्तावपि। वन्ध्यापुत्र के सदृश ईश्वर की कल्पना करनी व्यर्थ है। और जो यह कहा है कि ईश्वर सच्चि- दानन्दरूप निराकार सर्वशक्तिमान् न्यायकारी दयालु अजन्मा अनन्त निर्विकार अनादि अनु- पम सर्वाधार सर्वेश्वर सर्वव्यापक सर्वान्तर्यामी अजर अमर अभय नित्य पवित्र और सृष्टिकर्ता है वह भी समीचीन नहीं है क्योंकि इस में बहुत से विशेपण व्यर्थ हैं और यदि स्तुति के अर्थ होनेसे उनको सार्थक भी मानलेवे तो भी सच्चिदानन्दरूपत्वनिर्विकारत्वसर्वशक्ति- मत्वन्यायकारित्वदयालुत्वनिराकारत्व- स्रष्टुत्वेकत्वविशिष्टेश्वरव्यक्तः शशवि- पाणकल्पत्वात् तथाहि ईश्वरस्य सच्चि- दानन्दरूपत्वेनैव साकारत्वसिद्धी नि- राकारत्व विशेषणाऽसम्भवः किञ्च नि- राकारस्य स्रष्टुत्वं सर्वशक्तिमत्वं न्याय- कारित्वं दयालुत्व चाऽत्यन्तमसङ्ग- तम् निराकारे वन्ध्यापुत्रेऽप्येतादृश सच्चिदानन्दरूपत्व निर्विकारत्व सर्व शक्तिमत्व न्यायकारित्व दयालुत्व निराकारत्व त्रदृत्व और एकत्व विशिष्ट ईश्वर व्यक्ति शशशृङ्गके तुल्य है। तथाहि सच्चिदानन्दरूप होनेसेही ईश्वर की साकारता सिद्ध हो गई इससे निराकारत्व विशेषणका असम्भव है । और निराकार में स्रष्टत्व सर्वशक्तिमत्व न्यायकारित्व और दया- लुत्व कथन अत्यन्त असङ्गत है जैसे निराकार वन्ध्यापुत्रमें भी उन्मत्त लोग ऐसे धर्मों की ४ साकिंकमोहप्रकागः ॥ AALIALA विशेषणस्योन्मत्तैः उत्प्रेक्षितुं शक्यत्वात् किञ्च यत्र शत्रुमित्रपुत्रादीनां शिक्षा- रक्षारुपं न्यायकारित्वं तत्र परदुः- खप्रहाणेच्छारूपदयालुत्या ऽसम्भवात् प्राणमनश्शरीर शून्यस्यैतादृशधर्मवत्वं मन्दबुद्धीनां वञ्चनायेव प्रजल्पितं ना. स्तिकशिरोमणिना दयानन्देनेति बुद्धि- मता वोद्धव्यम् । कल्पना कर सकते हैं परन्तु वह अत्यन्त अस- ङ्गत होती है। और जिसमें शत्रु मिव और पुत्रादिकों की शिक्षा और रक्षादिरूप न्याय कारित्व है उसमें दूसरोंके दुःखके नाशकी इच्छा रूप दयालुत्वका असम्भव है क्योंकि विना किसीको दुःख दिए उक्त रूपका न्याय वन नहीं सकता है इस से बुद्धिमानों को यह जानना चाहिए कि नास्तिक शिरोमणि दयानन्दका जो ॥ प्राण मन और शरीरसे रहितमें ऐसे धर्मों का कथन है वह मन्दबुद्धि लोगों के वञ्चनार्थही है।

किञ्च एतेधर्माः निराकारे सच्चिदान- न्दरूपे सत्यांशेवर्तन्ते उत चिदंश आ- होस्विदानन्दांशे अथवा अंशत्रयेपि । नाद्यःघटःसन्नित्यत्र सत्यांशे न्यायका- रित्वादि धर्माणामदर्शनेन दृष्टविरुद्ध कल्पनस्पोन्मत्तप्रलापकल्पत्वात् सत्यत्व- स्यापि वस्तुधर्मत्वेन प्रतीयमानत्वात् धर्मधर्माऽभावादितिन्यायविरोधेन तत्र तत्कल्पनायोगाच्च और उक्त धर्म निराकार सच्चिदानन्द रूपके सत्यांशमें रहते हैं वा चिदंश में अथवा आनन्दांश में वा तीनों अशों में ? प्रथम पक्ष तो इससे नहीं बन सकता है कि घट सत् है इस प्रतीतिमें भासमान सत्यांशमें न्यायकारित्वादि धर्म दृष्ट नहीं होते हैं और दृष्टविरुद्ध कल्पना उन्मत्तप्रलापके तुल्य होती है और सत्यत्व भी वस्तु धर्मरूपसे प्रतीत होता है इससे धर्ममें धर्म नहीं रहता है इस न्याय के साथ विरोध होने से

६
साकिमोरप्रकाश
नद्वितीयत्तीयो घटायमितिजाने में
गानन्दादीच न्यायकारित्वादीनामद
भनेनोक्तदोपतुल्यत्वात् नचचतुर्थः अं
शत्रयवतः सच्चिदानन्दस्वरुपिणो धर्मि
णोऽप्रसिद्मा तद्धर्मस्याप्यप्रसिद्धेः। नन्वह
मस्मिज्ञाताऽनन्दवानित्यादिना प्रतीय
माने वस्तुनि न्यायकारित्वादयोधर्माः
प्रतीयन्त इति चेत् ।
तिसमें उक्त धर्मों की कल्पना चन भी नहीं
सकती है और यह घट है इस ज्ञानमें वैपयिक
आनन्द में कथित धर्मों के न देखने से द्वितीय
और तृतीय पक्ष भी नहीं बन सकता है और
तीन अंशों वाले सच्चिदानन्दरूप धर्मीको
अप्रसिद्ध होनेसे उसके धर्म भी प्रसिद्ध नहीं
होसकते हैं इससे चतुर्थ पक्ष भी अनुपपन्न है।
श० मै हूं ज्ञान और आनन्द वाला इस रीति
प्रतीयमान तीन अंशों चाले धर्मीमें न्यायका
धर्म प्रतीत होते हैं।

सत्यम्मतीयन्ते सत्यज्ञानानन्दविशिष्टे जीवे नतु सच्चिदानन्दरूपे तदभावस्य प्रदर्शितत्वात् । ननु जीवः सच्चिदान- न्दरूपः कालत्रयानुसन्धायित्वेन सद्रू- पत्वस्य ईश्वरादि सकलपदार्थसद्भावाs सद्भावसाक्षित्वेन चिदूपत्वस्य वाह्यपु- त्राद्यपेक्षया स्वात्मनोनिरतिशयप्रेमा- स्पदत्वेनानन्दरूपत्वस्यात्मन्यनुभूयमा- नत्वात् । स० प्रतीत तो सत्य होते हैं परन्तु सत्य ज्ञान और आनन्द विशिष्ट जीव में प्रतीत होते हैं सच्चिदानन्दरूप में नहीं उसमें उनका अभाव दिखा चुके हैं। श० जीव सच्चिदानन्दरूप है क्योंकि तीनों कालों के स्मरणका कर्ता होने से सद्रूप है ईश्वरादि सकल पदार्थों के होने न होने का साक्षी होनेसे चिद्रूप और बाह्य पुवा- दिकोंकी अपेक्षा से निरतिशय प्रेमका आश्रय होनेसे आनन्दरूपहें। .

८ तार्किकमोहप्रकाशः ॥ जीवः कर्ता भोक्ता सुखी दुःखीत्यादि- धर्माणां सुषुप्तौ व्यभिचारेण यस्य यो धर्मःस तन्न व्यभिचरतीतिन्यायविरोधेन तेषां जीवधर्मत्वकल्पनायोगात् दीपप्र- काशवद् गुडमाधुर्य्यवच्च तेषां सर्वदा ननुभूयमानत्वात् लोहितःस्फटिक इति वदीपाधिकत्वकल्पनापपत्तेश्च तथाच और जो जीव कर्ता भोक्ता सुखी और दुःखी है इत्यादि व्यवहारसे जीवमें कर्तृत्वादि धर्म प्रतीत होते हैं उनको सुपुप्तिमें व्यभिचारी होनेसे जो जिसका धर्म होताहै वह उससे व्यभिचारी नहीं होताहै इस न्यायके साथ विरोध होनेसे जीव धर्मत्वकल्पना असङ्गतहै और दीपकके प्रकाश और गुड़के माधुर्यके सदृश सदा प्रतीत नहोनेसे स्फटिकमें लोहित्यके तुल्य औपाधिकत्व कल्पना ही समीचीन है इतने कथनसे यह सिद्ध हुआ कि सच्चिदानन्दरूपजीवमें न्याय कारित्वादि धर्म बन सकतेहैं जीवे सच्चिदानन्दरूपे न्यायकारित्वाद- योधर्माः सङ्गच्छेरन्नितिचेन्ना कर्तृत्वादि- वन्यायकारित्वादिधर्माणामपिकल्पित- त्वोपपत्या दृष्टविरुद्धसत्यधर्मकल्पन- स्योन्मत्तप्रलापत्वं दुर्वारमित्यलमतिप्रपं- चेन प्रासङ्गिकेन । एवञ्च दृष्टान्तवलेना- पितादृशेश्वरो न सिध्यतीतिवाध्यम् ए- तेन सर्वसत्यविद्याया ईश्वरमूलत्वमपि- निरस्तमितिमन्तव्यम् ॥ और सच्चिदानन्दरूप में उक्त धर्मोके अभावका कथन असङ्गतहै. स० जिस रीतिसे कर्तृत्वादि धर्मोको औपाधिकत्व मानाहै उसीरीतिसे न्याय- कारित्वादि धर्म भी औपाधिक होसकते हैं फिर उनको जीवधर्म कहना दृष्ट विरुद्ध होनेसे उन्मत्त प्रलापके सदृश है अब इस प्रासङ्गिक विचार को यहां ही समाप्त कर्तेहैं इस कथनसे यह सिद्ध हुआ कि दृष्टान्त वलसे भी उक्त रीतिका ईश्वर सिद्ध नहीं होसकताहै और इतने कथनसे सकल 24 - तार्किकमाहप्रकारा॥ 去是表在4444444走去。 स्यादेतत् अगरीरस्य विभाः जन्यजा- नायोगात् यज्ज्ञानं तन्मनोजन्यमिति व्याप्तिविरोधेन नित्यज्ञानाऽसिद्धेः ज्ञान- शून्यस्य कर्तृत्वायोगेनेश्वरासिद्धेश्च किश अनुमानस्य दूष्ठानुसारित्वेन विपरीत- कल्पनायोगात् यादृशाः कर्तारोलोके दृष्ठास्ताद्दशाएव जगत्कारो रागद्वेपा- दिमन्तः सिद्धयेयुः सत्य विद्या ईश्वर मूलक है इस कथनका भी खण्डन हुआ जानना। और शरीर रहित विभु में जन्यज्ञान हो नहीं सकताहै और जो ज्ञान है वह मनोजन्य है इस नियमके साथ विरोध होनेसे नित्यज्ञान भी नहीं बन सकताहै और ज्ञान शून्य कर्ता भी नहीं हो सकताहै इससे ईश्वरसिद्ध नहीं होसकताहै और अनुमानको दृष्टानुसारी होनेसे दृष्ट विपरीतका वह साधक नहीं होसकता है इससे अनुमानसे भी जैसे रागद्वेपादियुक्त कर्ता लोकमें देखने में आतेहैं .

oun वाचत्रमासादादिकर्तुरेक- वाद्यदर्शनेऽपिजगत्कर्तरिलाघवादेकत्वं नत्यज्ञानं निर्दोषत्वादिकंच कल्प्यते हि ततोऽप्यतिलाघवेन मूलप्रकृतेरेव एविरुद्धसर्वकल्प्यतां किंगुरुतरदूष्टवि- रीतकल्पनयाऽसदीश्वरधर्मिकल्पनेन। जिच विचित्रप्रपञ्चस्य प्रासादादिवदेक- र्तृकतावाधान्नलाघवावतारः । सेही जगत्के अनेक कर्ता सिद्ध होवेंगे और दे कहो कि यद्यपि विचित्र गृहादिकोंका एक निहीं देखनेमें आया है तथापि लाघवसे तका कर्ता एक नित्यज्ञानयुक्त और निर्दोप पना करेंगे तो हम कहते हैं कि इससेभी 7 लाघव होनेसे मूलप्रकृतिमेंही दृष्टविरुद्ध ल धर्मों की कल्पना करलो अधिक दृष्टवि- 1 कल्पना और असिद्ध ईश्वररूप धर्मीकी नासे क्या फलहै और जैसे एक विचित्र एकका बनाया हुआ नहीं होताहै ऐसेही साकिंकमाहप्रकाशः॥ नच सर्वज्ञत्वात्कर्तुरेकत्यसम्भवः । एक त्वज्ञानात्सर्वज्ञत्वज्ञानं ततस्तदित्यन्यो न्याश्रयतापत्तेः एतेन विमतं सेश्वरं का र्यत्वाद् राष्ट्रवत् । कर्मफलं सपरिकरा- भिज्ञदातृकं कालान्तरभाविफलत्वात् यह संसार भी विचित्र होने से एकका बनाया हुआ नहीं होसकताहै इससे तुम्हारा लाघव अकिञ्चित्करहै क्योंकि लाघव भी उसी पदार्थकी कल्पनामें सहकारी होसकता है जो होसके । और यदि कहो कि सर्वज्ञ होनेसे संसारका कर्ता एक होसकता है तो अन्योन्याश्रय दोप होगा क्योंकि जबतक ईश्वरमें एकत्वज्ञान न हो तब तक सर्वज्ञत्व ज्ञान और जब तक सर्व- ज्ञत्व ज्ञान न हो तब तक एकत्व ज्ञान नहीं होसकताहै और यह जो ईश्वरसाधक अनुमान कहेजाते हैं कि संसार ईश्वरसे अधिष्ठित है कार्य होनेसे जैसा देश कार्य होनेसे राजादि- रूप ईश्वरसे अधिष्ठित है। और कर्मोंका फल सेवाफलवत् । ज्ञानेश्वर्याद्युत्कर्षःक्वचि- द्विश्रान्तः सातिशयत्वात् परिमाणवदि- त्याद्यनुमानानि निरस्तानि परिमाणस्य क्वचिद्विश्रान्तत्वमपि न दृष्टं कालाऽऽ- काशाद्यनेकेषु विश्रान्तिदर्शनात्दएव- देवसशरीरत्वादिदोषप्रसङ्गाच्च ॥ * (अथ रामानुजमतसिद्धेश्वर खंडनम्)* : समर्थ चेतनसे दियाजाता है कालान्तरमें होनेवाला फल होनेसे जैसा सेवाका फल है। और ज्ञानेश्वर्यादिकोंका उत्कर्ष किसीमें विश्रान्त है न्यूनाधिकतावाला होनेसे जैसा. परिमाण है। इनका खण्डन भी उक्त युक्तियोंसे जानलेना । और परिमाण किसी एकमें विश्रान्त भी नहीं है क्योंकि काल और आकाशादि अनेकोंमें विश्रान्त देखने में आता है। और दृष्टान्तोंसे ईश्वरकी सिद्धि कर्नेसे उनहीसे उसमें सशरी- रत्वादि दोपोंका प्रसङ्ग होगा। (अब रामानुज मत सिद्ध ईश्वरका खण्डन)

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विकारभिन्नायाः प्रकृतेः शङ्खचक्राद्यायु धविशिष्ठहस्तपादादि विकाररूपशरीर- त्वाऽनुपपत्तेः शरीराणां भौतिकत्वनिश्च- यात्प्रकृतिविकारशून्यशरीरस्यवन्ध्या- पुत्रशरीरवदाप्रसिद्धत्वाच्च । नान्त्यः प्र- कृतिभिन्नस्य चेतनस्यहस्तपादादिविशि- एशरीररूपेण परिणतत्वादानित्यत्वस्य दुर्निवारत्वेन शून्यवादप्रसङ्गात् क्योंकि विकारसे भिन्न प्रकृतिको शल्य और चमादिरूप शस्त्रयुक्त हस्त और पादादि विका- रात्मक शरीर रूपता नहीं बन सकती है और सवशरीर भूतोंके ही कार्य देखनेमें आतेहैं इससे प्रकृतिके विकारोंसे भिन्न शरीर बन्ध्या- पुत्रके शरीरके सदृश अप्रसिद्ध है। और द्वितीय पक्षभी नहीं बनसकताहे क्योंकि प्रकृतिसे भिन्न चेतनको हस्तपादादिविशिष्ट शरीररूपसे परि- णत होनेसे अनित्यत्वप्रसङ्ग होगा और चेत- नको अनित्य होनेसे शून्यवादकी प्राप्ति होगी साकिमहप्रकाशः १४ 9414 अत्रकेचिद्वैष्णवादयः सशरीरत्व ना- नात्वरूपवत्वादिकमभ्युपगच्छन्ति तद- सङ्गतम् अनित्यत्वाऽसर्वज्ञत्वादिदोपस्य दुर्निवारत्वात् ननुतच्छरीरस्याऽप्राकृत- त्वान्नतस्याऽनित्यत्वादिकं सम्भावयितुम् शक्यमितिचेनविकल्पाऽसहत्वात्तथा- हि किन्नामाऽप्रारुतत्वं प्रकृतिविकार- भिन्नत्वम् उत प्रकृतिभिन्नत्वं वा नाद्यः और जो कोई वैष्णवादि लोग ईश्वरको सश- रीर नाना और रूपादिविशिष्ट मानते हैं वह असङ्गत है क्योंकि ऐसा होनेसे ईश्वरमें अनित्यत्व और असर्वज्ञत्वादि दोषोंका वारण नहीं होस- केगा। श० ईश्वरके शरीरको अप्राकृत होनेसे उक्त दोष नहीं होसकते हैं। स. यह कथन विकल्पों को नहीं सहन करसकता है तथाहि अप्राकृत किसको कहतेहो प्रकृतिके विकारसे भिन्नको कहतेहो वा प्रकृतिसे भिन्नको प्रथ" पक्ष तो बनता नहीं विग्रहवादिनामगतिरेवस्यात्। नन्वीश्वर- स्याऽचिन्त्यशक्तिमत्वान्नकोपिदोष इति- चेन्न तस्य जगत्कर्तृत्वाद्यसिद्धदातन्मूलाऽ- चिन्त्यशक्तिमत्वस्याप्यासिद्धेकिञ्चत्वन्मत सिद्धः परमेश्वरोऽनित्यः परिच्छिन्नत्वात् रूपादिमत्वाद् विभक्तत्वाद् भक्तपक्ष- पातित्वेन रागाऽऽदिमत्वात् दृश्यत्वेन जडत्वाच्च घटवत्। एतेन शठकोपशूद्र श० ईश्वरको अचिन्त्यशक्तियुक्त होनेसे कोई भी दोष नहीं होसकता है । स० जगत् का कर्ता होनेसेही ईश्वरकी अचिन्त्यशक्तिविशिष्टता सिद्ध होतीहै अभीतक उसमें जगत्कर्टताही सिद्ध नहीं हुई तो अचिन्त्यशक्ति कैसे सिद्ध होस- केगी और तुम्हारेमतमें सिद्ध हुआ परमेश्वर अनित्यहै परिच्छिन्न रूपादिविशिष्ट विभागा- श्रयं भक्तोंका पक्षपाती होनेसे रागादिविशिष्ट और दृश्यत्वहेतुसेजडहोनेसे जैसा घटहै । इतने कथनसे शठकोपशूद्रके तार्किकमाइमकाशः॥ 在这点是人人人人 शिष्यवर्गान्तःपातिना विजयराघवाचा- रिणा यत्प्रलपितमीश्वरस्य स्वाभाविक- मेश्वर्य निर्विशेषत्वाभावादिकञ्चेति त- निरस्तम् सतिकुडेाचित्रमितिन्यायात् । स्यादेतत् ईश्वरस्य चिदूपत्वं वा जडसू- पत्वं वा नाद्य विभोश्चिद्रूपस्य कर्तृत्वा- ऽयोगात् जीवे कर्तृत्वाद्यभावस्य दया- नन्दमतपरीक्षायां पूर्वपक्षव्याजेन शिप्य समुदायान्तर्गत विजयराघवाचारीने जो यह कहाहै कि ईश्वरका स्वाभाविक ऐश्वर्यहै और वह निर्विशेप नहीं है वहभी खण्डितहुआजान ना क्योंकि भित्तिके होनेसे चित्र होते हैं इस न्यायसे जवतक ईश्वरही सिद्ध नहीं हुआ तव तक उसकेधर्म कैसे सिद्ध होसकेंगे और हम यह पूछते हैं कि ईश्वरको आप चेतन मानते हो वा जड प्रथमपक्ष तो नहीं बन सकताहै क्योंकि विभु चेतन कर्ता नहीं होसकताहै। और जीवमें | कर्तृत्वादिकोंका अभाव दयानन्दमतपरीक्षामें सूचितत्वाद् दूप्टान्तवलेनापि कर्तत्वस्य साधयितुमशक्यत्वाच्च । यारुतिः सा शरीरजन्येति व्याप्तिविरोधेननित्यकृत्या- द्यऽभावनिश्चयाच्च तस्य कर्तृत्वाद्यऽसि- द्वेः । न द्वितीयः जडस्य कर्तृत्वाद्यऽस- म्भवात् ईश्वरत्वाऽयोगाच्च तथाचैतादू- शदोषपरिहाराऽभावादीश्वराऽसिद्धिः । पूर्वपक्षके वहानसे सूचन करआएहैं इससे दृष्टान्तवलसेभी ईश्वरको कर्तृत्वसिद्ध नहीं हो सकताहे और जो कृति होतीहै वह शरीर जन्य होतीहै इस नियमके साथ विरोध होनेसे ईश्वर कीकृति नित्य नहीं होसक्तीहै शरीरके न होनेसे ईश्वरमें अनित्य कृति भी नहीं होसकतीहै इससे वह कर्ता नहीं होसकताहै और जड़में कर्तृत्व और ईश्वरत्वके न वनसकनेसे द्वितीय पक्षभी नहीं बनसकताहै इससे यह सिदहुआ कि ऐसे दोपोंके परिहार नहोनेसे ईश्वरकी सिद्धि नहीं होसकतीहै।

तार्किकमोहप्रकाशः॥ नन्वीश्वराऽस्तित्वे आगमाः प्रमाणमि- तिचेन्न तेषां निर्मूलत्वेनाऽप्रामाणिक- स्वात् नचईश्वराक्तत्वात्प्रामाण्यमिति- वाच्यम् प्रामाण्यसिद्धावीश्वरसिद्धिरी- श्वरसिद्धौ प्रामाण्यसिद्धिरित्यन्योन्याऽऽ- प्रयतापत्तेः तस्मानियतस्य कस्यचित्क- मनिमित्तस्याऽभावान्नाणुष्वाद्यंकर्म स्यात् श० ईश्वरके होने में वेद प्रमाण हैं। स. वेदोंके वनानेवाला कोई नहोनेसे वे प्रमाण नहीं होसकतेहैं क्योंकि शब्द वही प्रमाण होसकताहे जो किसी यथार्थ वक्ताका कहा हुआ हो श०ईश्व रोक्त होनेसे वेद प्रमाणहैं। स०ऐसे कहोगे तो अन्योन्याश्रय दोष होगाक्योंकि वेदमें प्रामाण्य सिद्ध होले तो ईश्वरकी सिद्धि और ईश्चरकी सिद्धि होले तो वेदमें प्रामाण्यकीसिद्धि होसके इतने कथनसे यह सिद्ध हुआ कि किसीकारणके नियत न होसकनेसे परमाणुओंमें आयक्रिया नहीं होसकतीहै ॥

Aarचनः परमाणुदयसं- गः तदभावेद्ववणुककार्याऽनुत्पत्तिःत- मादसङ्गतः परमाणुकारणवादः किञ्च गणोरण्वन्तरेणसंयोगः सर्वात्मना वा देकदेशेनवानाद्यःसंयोगस्पव्याप्यव- त्वेएकस्मिन्नितरस्य सर्वात्मनासंयुक्त- नाऽन्तर्भावात् कार्यस्थपथुत्वाऽयोगेन कार्य परमाणुमात्रस्यात् और उसके न होनेसे उससे होनेवाला परमाणु- संयोगभी नहीं होसकेगा और जव वह न तो घणुकरूप कार्यकी उत्पत्ति नहीं होसक- इससे परमाणुकारणवाद असङ्गतहे। और पहपूछते हैं कि एक परमाणु दूसरे परमाणु साथ सवअवयवोंसे संयुक्त होताहे वा एक ? यदि प्रथम पक्ष मानो तो संयोगको सब से सिद्धहुआहोनेसेएकका दूसरेमें अन्तर्भाव नेसे कार्यमें अधिक परिमाण नहोसकेगा सब कार्योको परमाणुरूपताकाप्रसङ्ग होगा

तार्किकमहिमकागः॥
संयोगस्याऽव्याप्यवत्तित्वं दृष्टं तद्विपर
तमिथ्याकल्पनाप्रसङ्गश्च स्यात् नद्वित
यः परमाणूनामेकदेशाऽवच्छेदेनसंयो
एकदेशाऽवच्छेदेन तदभावइतिसावर
वत्वप्रसङ्गात् । ननु परमाणूनां कल्टि
ताः प्रदेशाः सन्तीतिचेन्न कल्पितस्य
मिथ्यात्वेन कल्पितप्रदेशजन्य संयोग
स्याऽपिमिथ्यात्वं स्यात् नचेष्टापत्ति
और संयोग एक देशके साथही देखने
आता है इससे दृष्टविरुद्ध होनेसे सब अवयवों
साथ संयोगकी कल्पना मिथ्याहे और एकदेश
में संयोग और दूसरे देशमें उसके अभाव
माननेसे परमाणुओंको सावयवत्वप्रसङ्ग होग
इससे द्वितीय पक्षभी नहीं बनसकताहै। श
परमाणुओंके कल्पित अवयव मानलेंगे. । सः
कल्पितको मिथ्या होनेसे कल्पित अवयवोंसे
उत्पन्नहुआ संयोगभी मिथ्याही होगा और
संयोगको मिथ्या. आप मान नहीं सकतेहो

संयोगस्यद्वाणुकाऽसमवायिकारणस्यमि- थ्यात्वेद्वनणुककार्यानुत्पत्तिः उत्पन्नमपि- कार्यम् मिथ्यास्यादित्यऽपसिद्धान्तापत्तेः तथाच पट्पदार्थसप्तपदार्थबन्धमोक्षा- दि नियमा लुप्येरन् सर्वस्य कल्पित- त्वात् एतेनात्ममनस्संयोगाऽसम्भवोपि व्याख्यातः निष्प्रदेशत्वात् प्रदेशवतो- रेवसंयोगदर्शनात् दूएविपरीत कल्पने यदि मानो तो उससेधणुकरूप कार्यकी उत्पत्ति नहीं होसकेगी और उत्पन्नहुआभी कार्य मिथ्याही होगा इससे तुम्हारे सिद्धान्तकी हानि होगी क्योंकि तुमलोग घणुकादिकों को मिथ्या नहीं मानतेहो और सबको कल्पित होनेसे पट्पदार्थ सप्तपदार्थ बन्ध और मोक्ष इन सबके नियम लुप्त होजायेंगे और उक्त युक्तिसे आत्मा और मनके संयोग का असम्भव भी जानलेना क्योंकि दोनों निरवयव हैं और संयोगसावयवोंका ही देखने में आताहै और दृष्ट से विपरीतकी कल्पनामें

तार्किकमाहप्रकागः ॥
AAAAAAAA
मानाभावाच्च किञ्चद्ववणुकंनिरवयव
समवेतं सावयवत्वात् आकाशाऽसम
तभूमिवदित्यनुमानेन द्वरणुकस्य सम
तत्वाऽसिद्धिःननुवरणुकस्याऽसमवेत
तदानितत्वं नस्यात् सम्बन्धविनात
योगात् नच संयोगादाश्रितत्वमितिव
च्यम् प्रतिविकारयोः संयोगायोगात
· कोई प्रमाण नहीं है और द्यणुक निरवयवमेंस
वेत नहीं है सावयव होनेसे जैसी आकाशमें अस
मवेत भूमिहै इस अनुमानसे यणुकं की प
माणुओंमें समवाय सम्बन्धसे विद्यमानताकी में
सिद्धि नहीं होतीहै। श० यदि द्यणुक समवेतन
तो परमाणुओंके आश्रित नहीं होसकेगा क्योंकि
सम्बन्धके विना .आश्रित नहीं होसकताहै।
शङ्का । संयोग सम्वन्धसे आश्रित होजाएगा
समाधान। प्रकृति और विकारका संयोग नहीं
होसकता है इससे कार्य और कारणका आश्रया-
श्रयिभाव समवायके विना बन नहीं सकता है

तथाचकार्यकारणयाराश्रयाययिभावा- ऽन्यथानुपपत्यासमवायसिद्धिस्तत्सिद्धौत दाश्रितत्वसिद्धिरितिचेन्न कार्यकारणयो- रभेदात्तदानयायिभावाऽनुपपत्तेरिष्ट- त्वात् नचतयोर्भदात्तत्सिद्धिरितिवाच्यम् भेदसिद्धावानयायिभावसिद्धि स्तत्सि- द्वौतत्सिद्धिरित्यन्योन्याश्रयतापत्तेः अग्रे- विस्तरेण तट्वेदस्यनिराकरिष्यमाणत्वात् इससे समवाय सिद्ध हुआ और उसके सिद्ध होनेसे घणुकका परमाणुओंमें समवेत सिद्ध हो गया।स कार्यऔर कारणका अभेदहोनेसे आश्र- यायिभावका न बनना इष्टही है । श० कार्य और कारण का भेद होनेसे आश्रयाश्रयिभाव सिद्ध है। समाधान। ऐसे माननेसे अन्योन्याश्रय होगा क्योंकि भेद सिद्ध हो तो आश्रयाश्रयिभाव की सिद्धि और आश्रयायिभाव की सिद्धि हो तो भेदकी सिदि होसके और आगे कार्य और कारणके भेदका विस्तार से खण्डन करेंगे .

३६
तार्किकमोहप्रकाश.॥
कारणस्यैवावस्थाभेदमात्रेण व्यवहारे
पपत्तेश्च तथाचवणुकरूपकार्याऽनुत्
त्तिः। किञ्च परमाणवः सावयवाः अ
ल्पत्वाद् घटवत् नचाऽप्रयोजकता पर
माणूनांदिग्विभागावधित्वं नस्यादात्मक
दितिवाधकसत्वात् ननु परमाण्वपेक्षय
योयं प्राचीदक्षिणेत्यादि दिग्भेदव्यवहा
रः तदवधित्वेन येऽवयवास्त्वयोच्यन्त
और कार्यको कारणका अवस्थाविशेष मान
लेनेसे व्यवहार बनसकताहै इससे भेद मानन
विफलहै इसयुक्तिसे घणुकरूप कार्यकी उत्पत्ति
नहीं बन सकतीहै। और परमाणु सावयवहें अल्प
होनेसे जैसा घट है। और परमाणु यदि सावयक
नहों तो आत्माके सदृश दिग्विभागके अवधि न
होसकेंगे इस तर्कके विद्यमान होनेसे उक्तानुमान
तर्कशून्य नहींहोश०परमाणुकी अपेक्षासे जो यह
पूर्व और दक्षिण इत्यादि दिग्भेद व्यवहारहें ।
उसमें अवधिरूपसे जिनको आप अवयव कहतेहो

सावयवाश्चेत्तद- वयवाएवते इत्येवं यतः परन्नविभागः उएव निरवयवः परमाणुरितिचेन्न आ- नभिन्नस्याऽल्पस्य दिग्विभागार्हत्वेनाऽ- व्यवविभागाऽवश्यम् भावात् यत्सर्वात्म- विभागाऽयोग्यवस्तु सः परमाणुरिति द्युच्येत तर्हि आत्मनएव परमाणुसंज्ञा- जास्यात् तदन्यस्याऽल्पस्य दिग्विभागा- धित्वेनसाववयवत्वस्य दुर्निवारत्वात् ही परमाणु हैं और यदि उनको भी सावयव नों तो उनके अवयवही जिनसे आगे विभाग होसकताहै परमाणु हैं। स०आत्मासे भिन्न अल्पवस्तुओं को दिगविभागकेयोग्य होनेसे यवोंका विभाग अवश्य होना चाहिए और कहो कि जिसमें किसी रीतिसे भी विभाग सके वह वस्तु परमाणु है तवतो आपने नाका ही नाम परमाणु रखलिया क्योंकि बासे भिन्न अल्प पदार्थोंको दिग्विभागके

ताकिंकमाएकांग:
44444AINLALALLANA
यदि पृथिव्यादिजातीयाऽल्पपरिमा
विश्रान्ति भूमिर्यः सपरमाणुरित्युच
तहिं तस्य न मूलकारणत्वं विनाशित्व
घटवत् नच हेत्वासिद्धिः अणयो वि
शिनः पथिव्यादिजातीयत्वात् घट
दित्यनुमानसिद्धत्वात् तथाच निरव
वानां संयोगसमवाययोरसम्भवात्तल
मवेत वगणुककार्याद्यारम्भकत्वासिद्धि-
अवधि होनेसे उनमेंसे सावयवत्व चारित न
होसकता है और यदि कहो कि जो पृथिव्या
सजातीय और अल्प परिमाणका विश्राम स्था
है वह परमाणु है तो वह मूलकारण नहीं हो
कता है विनाशी होनेसे जैसा घटहै और इन
अनुमानमें हेतु की असिद्धि नहीं है क्योंकि पर
माणु विनाशी हैं एथिव्यादिकों के सजातीय होने
जैसाघट है इस अनुमानसे हेतुकी सिद्धि होती
और इससे यह सिद्ध हुआ कि निरवयवोंके से
योग और समवायके न होसकनेसे परमाणुओंक

उ." "परमाणूना वि. नागात्प्रलय इति तदप्यसङ्गतम्युगपद- न्तिपरमाणूनां विभागे नियतस्याऽमि- तादेर्दृष्टस्य निमित्तस्याऽसत्वाद्धर्माध- रूपाऽद्रुष्टस्य सुखदुःखार्थत्वेन सुख- खशून्यप्रलयहेतुकविभागाऽहेतुत्वाच्च* कञ्चपरमाणवः प्रवृत्तिस्वभावावा? नि- त्तिस्वभावा वा ? उभयस्वभावा वा ? स्वसमवेत अणुकरूप कार्यकी आरम्भकता हो सकती है । * और जो संयुक्त पर- गुओं के विभाग से प्रलय कहा है वह भी ङ्गित हैं क्योंकि एक ही कालमें अनन्त पर- गुओं के विभागका कोई नियत अभिघा- देरूप दृष्ट कारण नहीं है और धर्म और मरूप अदृष्टों को सुख और दुःख के अर्थ से सुख और दुःख से रहित प्रलय के ण विभाग की हेतुता नहीं हो सकती है* परमाणुओंको आप प्रवृत्ति स्वभाव वाले " ताकिमहप्रकागः ॥ निमित्ताऽधीनप्रवत्तिनियत्तिस्वभावा वा? नाद्यः प्रलयाऽभावप्रसङ्गात् नद्वितीयः सर्गाऽभावप्रसङ्गात् नतृतीयः विरोधात् नचतुर्थः निमित्तानां कालाऽदृष्टादीनां वक्तव्यानांनित्यसन्निहितत्वेन नित्यमेव प्रवृत्ति र्वा निवृत्ति यं स्यादित्यप्यसङ्गतः परमाणुकारणवादः। किञ्च यदपिसावय- वानांद्रव्याणामवयवशो विभज्यमानानां मानतेहो वा निवृत्ति स्वभाववाले अथवा उभय स्वभाववाले चा निमित्तसे उभय स्वभाववाले? प्रलयाभाव प्रसङ्गसे प्रथमपक्ष सर्गाभाव प्रसङ्ग होनेसे द्वितीयपक्ष और विरोध होनेसे तृतीय- पक्ष नहीं बन सकता है चतुर्थपक्ष भी नहीं बन सकताहै क्योंकि काल और अदृष्टादिकोंको ही आप निमित्त कहेंगे उनको नित्यही विद्यमान होनेसे नित्यही प्रवृत्तिवा नित्तिका प्रसङ्ग होगा इससे भी परमाणु कारणवाद असङ्गतहै। और जो यह कल्पनाहै कि सावयव द्रव्योंके अवयवोंका ३ ताकिकमाहप्रकाशः ॥ यतः परी विभागोन सम्भवति ते. चतु- विधा यथाहं स्पर्शादिमन्तः परमाणवः चतुविधस्य भूतभौतिकस्याऽरम्भका नि- त्याश्चेति कल्पयन्ति तदप्यऽसमञ्जसम् परमाणवः समवायिकारणवन्तः कार- णाऽपेक्षयास्थूला अनित्याचस्पर्शवत्वा- दूपवत्वाद्रसवत्वाद्गन्धवत्वात् घटादिव- दित्यनुमानवाधात् नन्वान परमाणुत्वं विभाग होता हुआ जिनमें जाकर ठहर जाता है वेही स्पर्शादि अपने नियत गुणोंवाले चार प्रकार के परमाणु चार प्रकारके भूत भौतिक प्रपञ्च के कारण और नित्यहैं वह भी असमञ्जस है क्योंकि परमाणु समवायि कारणचाले कारणकी अपेक्षासे स्थूल और अनित्य है स्पर्शवाले रूपवाले रसवाले और गन्ध वाले होनेसे जैसे घटादि हैं इन अनु- मानोंसे परमाणुओंमें कार्यत्वादिसिद्धहोतेहैं।श। परमाणुत्वरूप पक्षतावच्छेदकसे विरुद्ध होनेसे स्थूलत्वकी उक्तानुमानसे सिद्धि नहीं हो सकतीहै।

१२ तार्किकमोहप्रकाशः ॥ पक्षताऽवच्छेदकं तद्विरुद्धं स्थूलत्वं कथं साध्यतइतिचेन्न वायुत्वतेजस्त्वादेःपथ- गवच्छेदकत्वात् नच तर्हि वायुः कार- णवानिति पथक्साधने स्यादिहेतूनां भागाऽसिद्धाभावेपि सिद्धसाधनता स्या- दितिवाच्यम् यत्रस्पर्शस्तत्सकारणं यत्र सूपं तत्सकारणमिति व्याप्तिग्रहणकाले वायुत्वाद्यवच्छेदेन साध्यसिद्धाऽभावात् सवायुत्व और तेजस्वादिकों को पृथक् २ पक्षतावच्छेदक करके अनुमान करेंगे। श० तव तो वायु कारण वाला है इसरीति से एथक् २ अनुमान करनेसे स्पर्शादि हेतुओंमें भागा- सिद्धि तो नहीं होगी परन्तु सिद्ध साधन होगा क्योंकि वायुके कारण वायुके अवयव सिद्धही हैं। स० । जिसमें स्पर्शहै वह कारणवाला है जिसमें रूपहे वह कारणवाला है इस रीति से व्याप्तिज्ञान कालमें वायु मात्रमें साध्यकी सिद्धि के न होनेसे सिद्ध साधन दोष नहीं है 'FER ताकिकमाहप्रकाशः ॥ नचाप्रयोजकता कारणशून्यस्पनित्यस्या- त्मवत्स्पर्शादिमत्वाऽयोगात् यदुक्तं पर- माणवी नित्याःभावत्वेसत्यकारणवत्वा- दात्मवत् प्रागभाववारणायसत्यन्तं वो- ध्यमितितन्नोपपद्यते विशेष्याऽसिद्धेःसा- धितत्वात् यदप्युक्तं नित्यत्वप्रतिषेधःस- प्रतियोगिकः अभावत्वादितिनित्यत्वस्य- और उक्तानुमान में अप्रयोजकता नहीं क्योंकि जिसका कोई कारण नहीं होताहै वह स्पर्शादि विशिष्ट नहीं होसकताजैसा आत्माहै। और जो यह कहा है कि परमाणु नित्यहें भाव और कारण रहित होनेसेजैसा आत्माहै प्रागभाव कारणरहितहै और नित्य नहीं है इससे उसमें व्यभिचारके वारणके अर्थ हेतुमें भावविशेषण कहाहै वह भीअसङ्गतहै क्योंकि पूर्व अनुमान से परमाणुओंको कारण सहित सिद्ध कर आएहैं इससे तुम्हारा अनुमान विशेष्याऽसिद्धहै। और जो यह कहाहै कि नित्यत्व का प्रतिपेध सप्रतियोगिक है अभाव होनेसे साकिमाहप्रकागः ॥ कचित्सिदी कार्यमनित्यमिति विर्भ पतः कार्यनित्यत्यप्रतिपेधात् कारण तपरमाणुपु नित्यत्वंसिद्धाति अन्यथा प्रतियोग्यभावे प्रतिपेधानुपपत्तिरितित दप्यसङ्गतम् नित्यत्वप्रतिपेधप्रतियोगि नो नित्यत्वस्याऽऽत्मनि सिद्धत्वेनाऽन्यथा सिद्धेः नाऽनित्यत्वप्रतियोगिनो नित्य- त्वस्य परमाणुष्वेव पर्यवसानं नान्यत्रेति इस अनुमानसे कहीं सिद्ध होता हुआ नित्यत्व कार्य अनित्य है इस रीति से कार्य में नित्यत्वं के निपेधके होनेसे कारण रूप परमाणुओंमें सिद्ध होताहे क्योंकि यदि कहीं नित्यत्व सिन्द न हो तो उसका निषेधन बन सकेगावहभीअसमञ्जस है क्योंकि नित्यत्वके निषेधके प्रतियोगि नित्यत्व कोआत्मामें सिद्ध होनेसे परमाणुओंमें नित्यत्वके न होनेसे भी उक्तानुमान बन सकताहै और इसमें कोई प्रमाण नहींहै कि अनित्यत्वका प्रति- योगि नित्यत्व परमाणुओंमें ही होवे औरमें नहीं ताकिकमाहनकाशा किञ्चिन्नियामकमस्ति नहि कारणनित्य- त्वस्य प्रमाणान्तरेणज्ञानविना कार्यम- नित्यमिति व्यवहारः सम्भवति नहि प्र- माणान्तरेणमूलज्ञानात्प्राक्शब्दार्थव्य- वहारमात्रेण कस्यचिदर्थस्य सिद्धिर्भवति अन्यथा वटयक्षवन्ध्यापुत्रादि शब्दार्थ व्यवहारेणाऽपि तेषांसिद्धिःस्यात् ननुप- रमाणवोनित्या अप्रत्यक्षत्वेसति कारण- त्वादात्मवदितिचेन्नद्ववणुकेव्यभिचारात् और जबतक किसी प्रमाणसे कारणमें नित्यत्व नहीं ज्ञात होताहै तबतक कार्य अनित्यहे ऐसा व्यवहार नहीं होसकताहै क्योंकि जबतक किसी प्रमाणसे मूल नजाना जावे तबतक केवल बोल चाल सेही किसीपदार्थ की सिद्धि नहीं हो सकती है यदि ऐसा नमानो तो वटयक्ष अर्थात् वटवक्षमें भूत औरवन्ध्यापुत्र की भी सिद्धि होजाएगी। परमाणुनित्यअप्रत्यक्ष और कारण होनेसेजैसा आत्मा है।सायह अनुमानघणुको व्यभिचारीहे तार्किकमोहप्रकाशः ॥ 4AAL नचारम्भकद्रव्यशून्यत्वं हेतुविशेषणमि- तिवाच्यम् विशेष्यवेयर्थ्यापत्तेः विशेषणा- ऽसिद्धेः प्रदर्शितत्वाच्च ननु परमाणवो नित्याः नाशकाभावादात्मवदितिचेन्न प्र- लयकारणभूतकालाऽदृष्टादीनां नाशक- त्वोपपत्तेः "नासीद्रजो नव्योमेति"श्रुत्या क्योंकि घणुक अप्रत्यक्ष और व्यणुकका कारण है परन्तु नित्य नहींहै।श हेतुमें आरम्भक द्रव्य शून्यत्व विशेषण और देदेंगे वह ड्यणुकमें नहीं है क्योंकि ड्यणुकके आरम्भक द्रव्य परमाणुहै इससे उसमें व्यभिचार नहीं है। स० आरम्भक द्रव्य शून्यत्वमात्रकोही हेतु करनेसे कहीं व्यभि- चारादिकोंके न होनेसे विशेप्य भाग व्यर्थ होगा और परमाणु आरम्भक द्रव्य शून्य नहीं है यह पूर्व हम सिद्ध कर चुके हैं। श० परमाणु नित्यह नाशकके न होनेसे जैसा आत्मा है। स०प्रलय के कारण काल और अदृष्टादिकों को नाशक हो सपनेसे परमाणुओंके नाशकका अभाव नहीं है ताकिकमाहनकासा प्रलये तदभावनिश्चयाच्च । सिद्धान्ते परमाणूनामविद्यापरिणामरूपत्वात्पि- ण्डस्वरूपतिरोभावेनाऽविद्यारूपकार- णरूपापत्तिरेव तेषांनाशइत्यभ्युपग- माच्च । स्यादेतत् यद्यस्मादधिकगुणव- त्तत्तस्मातस्थलमिति व्याप्तिसित पथि- व्यप्तेजो वायुषु गुणोपचयापचयवत्वं स्थूलसूक्ष्मसूक्ष्मतरसूक्ष्मतमत्वं च दृष्टं और वेदमें भी लिखाहै कि परमाणु और आकाश नहीं था।और हमारे सिद्धान्त में परमाणुओं को अविद्या का परिणामरूप होनेसे पिण्डस्वरूपका तिरोभाव होकर कारणीभूत अविद्यारूप होना ही उनका नाश है और जो जिससे अधिक गुण वाला होता है वह उससेस्थूलहोताहैं इस नियमसे सिद्ध हुआ कि प्रथिवी जलतेज और वायुमें गुणोंका न्यू- नाधिकभाव औरस्थूल सूक्ष्म सूक्ष्मतर और सूक्ष्म- तमत्व देखने में आयाहे ऐसे ही इनके परमाणुओं में भी गुणोंका न्यूनाधिक भाव मानते होवा नहीं साकिमहप्रकामः AAAAAAAAAAAAAAAAAA तद्वत्तेषां परमाणूनामप्युपचितापचित गुणवत्वंकल्प्यते वा नवा आद्ये पर- माणुत्वाऽभावप्रसङ्गः तथाहि पार्थिवः परमाणुराप्यात्स्थूलःअधिकगुणवत्वात् घटवत् नचाऽप्रयोजकत्वं दूरविरुद्ध- कल्पनस्य वाधकत्वात् द्वितीयेतु स- पां परमाणूनां साम्यार्थमेकेकगुणवत्वं वा स्यात् ? चतुर्गुणवत्वं वा ? आद्ये यदि मानों तो अधिक गुणों वाले परमाणु नहीं होसकेंगे तथाहि पार्थिव परमाणु जलके परमाणुसे स्थूलहै अधिक गुण विशिष्ट होनेसे जैसा घटहै और यदि पार्थिव परमाणुको जलीय परमाणुसे स्थूल न मानोंगे तो दृष्ट विरुद्ध कल्पना प्रसङ्ग होगा इस विपक्ष बाधकके विद्यमान होनेसे उक्तानुमान अप्रयोजक नहीं है और द्वितीय पक्षमें हम यह पूछते हैं कि सब परमाणुओंमें तुल्यताके अर्थ एक २गुण मानते हो. अथवा चार २ यदि प्रथमपक्ष मानो तो 'ताकिकमाहप्रकाशः ॥ ४९ तेजः प्रभृतिषु गुणान्तरानुपलम्भप्रसङ्गः स्यात् द्वितीये वाय्वादिष्वपि गन्धाधु- पलब्धिप्रसङ्गस्यात् तस्मादसङ्गतैषाप्र- क्रिया * स्पादेतत् यदुक्तं कारणगु- णाः कार्य स्वसमानजातीयगुणारम्भ- का इति तन्न परमाणुपरिमाणेव्यभि- चारात् ननु पारिमाण्डल्यमिन्नाना- कारणत्व मित्यभ्युपगमान्नदोषइतिचेन्न तेज आदिकों में अधिक गुणों की प्रतीतिके अभावका प्रसङ्ग होगा और द्वितीय पक्षमें वा- वादिकों में भी गन्धादिकों की प्रतीतिका प्रसङ्ग होगा इससे यह मत असतहै * और जो यह नियम कहाहै कि कारणके गुणं कार्य में स्व- सजातीय गुणोंको उत्पन्न करतेहैं वह परमाणु के परिमाणोंको परमाणु के कार्य द्यणुकमें स्व- सजातीय गुण को न उत्पन्न करनेसे व्यभिचारी हैं । श० । परमाणुके परिमाणसे भिन्नको ही कारण मानतेहैं इससे व्यभिचार नहीं है।

ताकिकमाहप्रकाशः ॥ द्ववणुकगताणुत्वहस्वत्वे व्यभिचारात् ननु विरोधीपरिमाणाऽन्तराक्रान्तत्वाद- णुत्वहस्वत्वयो रम्भकत्वमितिचेन्न उ- त्पन्नहि परिमाणाऽन्तरं विरोधि भवति उत्पत्तेःप्राग्विरोधाभावेनाऽऽरम्भकत्वस- म्भवात् ननु विरोधिपरिमाणेनसहकार्य सद्यणुकके अणुत्व और ह्रस्वत्व को घणुक- के कार्य त्र्यणुकमें स्वसजातीय गुणाऽन्तरोंको न उत्पन्न करने से उक्त नियममें व्यभिचार बना- हीहै ।श०। त्र्यणुकको महत्वरूप विरोधि परि- माणसे विशिष्ट होनेसे अणुत्व और ह्रस्वत्व स्वसजातीय गुणों को उसमें नहीं उत्पन्न कर सकतेहैं। स० । उत्पन्न होकर ही महत्व विरोधि होगा इससे उत्पत्तिके पूर्व विरोधके न होनेसे उक्त गुणोंको स्वसजातीय गुणोकी कारणता होसकती है।श। विरोधि परिमाणसे विशिष्ट हुआही कार्य उत्पन्नहोता है इससे विरोधि परिमाणकी उत्पत्तिसे पूर्व कार्यके नहोनेसे उसमें अणुत्यादि तकिकमाहप्रकाशः ॥ मुत्पद्यत इतिचेन्न उत्पन्नं द्रव्यंक्षणमगुणं तिष्ठतीत्यभ्युपगमादपसिद्धान्तापत्तेःय- तु कारणानांतरणुकानांवहुत्वात्त्यणुके महत्वं मृदोमहत्वात् घटे महत्वं द्वितू- लपिण्डारब्धेऽतिस्थूलतूल पिण्डेश्वयव- संयोगविशेषान्महत्वं द्वगणुके परमाणु- गत द्वित्वसंख्ययाऽणुत्वम् अणुत्व मह- त्वयार्यदसमवायिकारणं तदेव हस्वत्व स्वसजातीय गुणोंको उत्पन्न नहीं करसकते हैं। स०ऐसे माननेसे तुम्हारा जोयह सिद्धान्तहै कि उत्पन्न हुआ द्रव्य एक क्षणभर निर्गुण रहता है उसकी हानि होगी और जो यह कहाहै कि घणुक- रूप कारणोंको बहुत होनेसे ज्यणुकमें मृत्तिका को महत्परिमाण विशिष्ट होनेसे घटमें और दो रुईके पिण्डोंसे बने हुए एक बडे रुईके पिण्डमें अवयवों के संयोग विशेषसे महत्व और परमाणुगत द्वित्व संख्यासे घणुकमें अणुत्व होताहै और अणुत्व और महत्वका जो असमवायिकारणहै वहही इस्वत्व

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ताकिकमेाहप्रकाशः ॥ 4 सः स्वसमानजातीयगुणारम्भकइतिव्या- प्रव्यभिचारित्वमिति तन्मन्दं चित्रपट- हेतुतन्तुगतेषुनीलादिरूपेषुविजातीयचि त्ररूपहेतुषुव्यभिचारात्यत्तुमहदारब्ध- स्यमहत्तरत्वमिति तदपेशलं महद्दीर्घवि- स्तृतपटारब्धरज्जो व्यभिचारात् * यत्यु नरुक्तमुत्पत्तेःपूर्वमसतःकार्यस्यघटपटा- देर्दण्डचक्रादिव्यापारवशादुत्पत्ति रिति वह स्वसजातीयगुणका आरम्भक है इस नियममें व्यभिचार नहींहै वहभी समीचीन नहीं है क्योंकि चित्रपटके हेतु तन्तुओंमें विद्यमान नीलादि रूपोंको अपने विजातीय चित्ररूपके जनक होनेसे उक्त नियमभी व्यभिचारीहें और जो यह नियम कहाहै कि महत्से आरब्ध महत्तर होताहे वहभी बड़े लम्बे चौड़े कपड़े से बनी हुई रस्सीमें व्यभिचारी होनेसे सुन्दर नहींहै * और जो यह कहाहै कि उत्पत्तिसे पूर्व असत घटप- टादिकार्य दण्डचकादिके व्यापारसे उत्पन्न होतेहैं तार्किकमोहप्रकाशः ॥ तदसङ्गतम् दधिघटरुचकाद्यर्थिभिः प्र- तिनियतानिकारणानि क्षीरमृत्तिकासुव- र्णादीन्युपादीयमानानि लोके दृश्यन्ते नतद्विपरीतानि कार्यस्यासत्वेऽसतःसर्व- त्राविशेषात् सर्वस्मात्सर्वोत्पत्तिप्रसङ्गेन दध्याद्यर्थिनां क्षीराद्युपादानेप्रवृत्तिन- स्यात् ननु कार्यस्यासत्वेपि कुतश्चिदति- शयात्प्रवृत्ति नियमोपपत्ति रितिचेन्न वह भी असङ्गतहै क्योंकि दधि घट और कुण्ड- लादिकोंकी इच्छा युक्त लोगउनके जो दुग्धमृत्ति- का और सुवर्णादिनियत कारणहैं उनही को ग्रहण करतेहैं अन्यों को नहीं और यदि उत्पत्तिसे पूर्वका- र्यको असत्मानोगे तोउसके असत्वको सब पदा- ोंमें तुल्यहोनेसे सबसेसवकी उत्पत्तिके प्रसङ्गके होनेसे दध्यादिकोंके अर्थी लोगोंके नियमसेदुग्धा दिकोंके ग्रहणमें प्रत्ति न होनीचाहिए।श० । कार्यके असत्वको सबमें तुल्य होनेसे भी किसी एक अतिशयसे प्रत्तिका नियम होसकताहै।

ताकिकमाहप्रकाशः ॥
विकल्पासहत्वात् तथाहि अतिशयः
कार्यधर्मः?कारणधर्मावा?आद्यधर्मित्वा
त्पागवस्थारूपस्य कार्यस्य सत्वं दुरं
स्यात् द्वितीये कारणस्य कार्यनियमार्था-
कल्प्यमानाशक्तिः कारणाद्भिन्ना वा ?
अभिन्ना वा ? भिन्नाचेदसती वा? सती
वा ? नाद्यः भिन्नायाअसत्याश्च शक्तः
सायह तुम्हारा कथन विकल्पोंको नहीं सहन
कर सकताहै तथाहि वह अतिशय कार्यका धर्म
है वा? कारणका? यदि प्रथमपक्ष मानों तो अति-
शयका आश्रय होनेसे उत्पत्तिसे पूर्वकार्यका
सत्व सिद होगया और द्वितीयपक्ष में कार्यके
नियमके अर्थ कारणमें कल्पना करीहुई शक्ति
कारणसे भिन्नह वा ? अभिन्न? यदि भिन्नहै तो
असतीहे वा? सती प्रथमपक्ष तो धन नहींसकता
है क्योंकि शशशृङ्गके सदृश कारणसे भिन्न
और असती शक्तिको कार्यकी नियामकता नहीं
होसकतीहै। और यदि मानोगे तो शक्तिके तुल्य

शाकिमोहमकायः॥ SHARAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA शणविपागावत्कार्य नियामकत्यायोगा अन्यथा शशविपाणस्यापितदापत्तनहि तीयःभिन्नायासत्याश्चशतमहिपबत्का र्यनियामकत्वायोगात् कारणधर्मत्वायो गाच्च अन्यथा भिन्नत्वाऽविशेपेण महिप स्थापितदापत्तेः अभिन्नाचेदसतोवासित वा ? नाद्यः अभिन्नायाअसत्याश्चशक्त होनेसे शशशृङ्ग को भी कार्य नियामकता का प्रसंगहोगा और द्वितीयपक्ष भी नहीं बन सकता है क्योंकि महिपके सदृश कारणसे भिन्न और सती शक्तिको कार्यकी नियामकता नहीं हो स- कतीहै और जैसे महिप अपनेसे भिन्न किसी पदार्थका धर्म नहींहै ऐसेही शक्ति भी कारणसे भिन्न होनेसे उसका धर्म नहीं हो सकतीहै और यदि मानोंगे शक्तिके सदृश होनेसे महिपको भी कार्यकी नियामकता का प्रसंग होगा और यदि अभिन्नमानों तोवह असती है?चा सती प्रथम पक्ष तो बन नहीं सकताहै क्योंकि कारणसे ताकिकमाहप्रकाशः ।। नरशङ्गवत् कार्यनियामकत्वाभावस्योक्त त्वात् अत्र सर्वत्र नियामकत्वञ्च अस्मि न्नेवेदंकार्यमुत्पद्यतेनान्यस्मिन्नित्येवंरूपं- वोध्यम् नद्वितीयः अभिन्नायाः सत्याश्च शक्तः कारणरूपत्वेन कारणवदेव क- स्यचिद्विशेषस्याऽभावेन कार्यनियामक- त्वाऽयोगात् अपसिद्धान्तापत्तेश्च । अभिन्न और नरश्रृंगके तुल्य असत्यरूप शक्ति को कार्यकी नियामकता का अभाव कह आएहैं इस प्रकरणमें नियामक शब्द का अर्थ वह जा- नना जिससे यह नियम हो कि यह कार्य इसी कारणमें उत्पन्न होताहै दूसरे में नहीं । और द्वितीयपक्ष भी नहीं बन सकताहै क्योंकि कारण से अभिन्न और सती शक्ति को कारणका रूप होने से कारणके सदृश वह भी अति- शय रूप न होनेसे कार्य की नियामक नहीं होसकतीहै और शक्ति को कारणसे अभिन्न मानने से तुम्हारे सिद्धान्त की हानि भी होगी नाकिमहाकायः॥ किञ्च पटश्चलतीत्यत्र चलनक्रियाश्रयः पटो दृष्टः तद्वत्पट उत्पद्यत इत्यत्रापि पटस्योत्पत्तिक्रियाश्रयत्वं वाच्यं तथाच क्रियाश्रयस्य पूर्ववृत्तित्यनियमात्सत्कार्य वादप्रसङ्गः अन्यथा पटस्योत्पत्तेःप्राग- सत्वे उत्पत्तिक्रियायानिर्विपयत्वस्यात् पटउत्पदरत इति व्यवहारोपिनस्यात् क्योंकि तुम्हारे सिद्धान्तमें शक्ति को कारणसे भिन्न मानाहे अभिन्न नहीं। और जैसे पट चलता हे इस वाक्य से चलन क्रिया का आश्रय पट प्रतीत होता है ऐसेही पट उत्पन्न होताहै इस वाक्य से उत्पत्ति क्रिया का आश्रय पट प्रतीत होताहै और क्रिया का आश्रय वही होताहे जो क्रियासेपूर्वस्थितहोइससे सिद्धहुआ कि उत्पत्तिसे पूर्व पट था इससे सत्कार्य बाद का प्रसंग हुआ और यदि उत्पत्ति से पूर्व पट को न मानोंगे तो उत्पत्ति क्रिया निराश्रय हो जाएगी और पट उत्पन्न होताहै यह व्यवहार भी नहीं बन सकेगा ताकिकमाहप्रकाश ॥ स्यादेतत् कानामोत्पत्तिः कार्यस्य स्वका- रणेसमवायोवास्वस्मिन्सत्तासमवायो- वानादनःअलब्धात्मकस्य कार्यस्यका- रणेनसम्बन्धाऽयोगात् सतोर्हिद्वयोःस- म्वन्धः प्रसिद्धः नासतोस्सदसतोर्वा नि- रात्मकस्याऽसतःसम्बन्धित्वायोगात् अ. न्यथा वन्ध्यापुत्रस्यापि सम्बन्धित्वप्रसङ्गः और उत्पत्ति आप किसको कहते हो अपने कारण में कार्यके समवायको कहते हो? वा कार्यमें सत्ता के सम्बन्ध को ? प्रथमपक्ष तो बनता नहीं है क्योंकि जबतक कार्य बना नहीं तबतक उसका कारण के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकताहे क्योंकि विद्यमान दो पदार्थों का ही सम्बन्ध लोक में प्रसिद्ध है अविद्यमानोंकों नहीं और न एक विद्यमानसे दूसरे अविद्यमा- नका क्योंकि स्वरूप हीन असत् पदार्थ सम्ब- न्धि नहीं हो सकताहे यदि ऐसे न मानो तो पन्ध्यापुत्र को भी सम्बन्धित्वका प्रसङ्ग होगा ताकिकमाहप्रकाशः ॥ एतेन द्वितीयोऽपिनिरस्तःअलब्धात्मक- त्वस्य तुल्यत्वात् ननु वन्ध्यापुत्रवत्कार्य सर्वदा सर्वत्रासन्नभवति किन्तु उत्पत्तेः प्रारध्वंसानन्तरज्चासन्मध्येतुसदेवेतिवे षम्यात्सम्बन्धित्वोपपत्तिरितिचेन्न प्रागू- ध्वंचाऽसत्वाऽविशेषात्सम्बन्धित्वानुपप- त्तिरेवमध्येतुसत्वात्सम्बन्धाभावानुक्तेश्च और इसी युक्तिसे दूसरापक्ष भी खण्डित हुआ क्योंकि जबतक कार्य बना नहीं तवतक उसमें सत्ताका सम्बन्ध नहीं होसकताहै। श०। कार्य वन्ध्यापुत्रके तुल्य सब काल और देशमें असत् नहीं होताहै किन्तु उत्पत्तिसे पूर्व और ध्वंससे अनन्तर असत् होता है और मध्यमें सत् ही होताहै इससे वन्ध्यापुत्रसे विलक्षण होनेसे अपने कारणसे सम्बन्धवालाहो सकताहै। साउत्पत्ति सेप्रथम और ध्वंससे उत्तर असत् होनेसे सम्ब- न्धित्व की अनुपपत्ति हम कहतेहैं और मध्यकाल मेंसत होनेसे सम्बन्धके अभावको नहीं कहतेहैं

तार्किकमोहप्रकाशः ॥
६१
उत्पत्तेः पूर्वमसदूपस्याऽभावात्मकस्यका-
र्यस्य कालेनाऽसम्बन्धात्प्रागसदासीदूर्व
मसद्भविष्यतीत्युक्तमयुक्तम् स्यात् नहि
वन्ध्यापुत्रो राजाबभूव प्राकपूर्णवर्मा
ऽभिषेकादित्येवंजातीयकेन प्राकत्वमर्या
दाकरणेननिस्स्वरूपोवन्ध्यापुत्री राजा
बभूवभवतिभविष्यति वा इति विशिष्यते
ननु कारकव्यापारादुर्वभाविनः का-
र्यस्य कथं वन्ध्यापुत्रतुल्यत्वमितिचेन्न
और (कार्यको असत्माननेसे) असत् स्वरूप
अभावरूप कार्यका कालसे सम्बन्धके न होनेसे
कार्य पूर्व असद्रूप था और कार्य आगे असदुप
होगा यह कथन अयुक्त होगा।क्योंकि पूर्णवर्मा के
अभिषेकसे पूर्व वन्ध्यापुत्र राजा था ऐसे किसी के
पूर्वत्वमर्यादा करनेसे यह नहीं सिद्ध हो सकताहै
कि स्वरूप हीन वन्ध्यापुत्र राजा था वा है वा
होगा।शकारणोंके व्यापारसे उत्तरकालमें होने
चाले कार्यको बन्ध्यापुत्र के तुल्य कैसे कहते हो।

तार्किकमाहाकार असतः कारकव्यापारादूध्वंसम्भाव्यत्वे वन्ध्यापुत्रोपि कारकव्यापारादूयं भ- विप्यतितथाच वन्ध्यापुत्रस्य कार्याभाव- स्यचाऽसत्याविशेपादपथावन्ध्यापुत्रका रक व्यापारादुर्य नभविष्यति तथाऽस- कार्यमपि कारकव्यापारादूचं नमवि- प्यति तस्मात्कारक व्यापारादूर्ध्वमुत्प द्यमानं कार्य प्रागपि सदित्येवावसेयम्। स० । यदि असत् की भी कारणों के व्यापार से उत्तर कालमें उत्पत्ति हो सके तो किसी कारणके व्यापारसे उत्तर कालमें बन्ध्यापुत्र की भी उत्पत्ति होनी चाहिए इससे वन्ध्यापुत्र और कार्य इन दोनोंके असत्व को तुल्य होने से जैसे कारणों के पापार से उत्तर कालमें वन्ध्यापुत्र नहीं होता है ऐसेही असत् कार्य भी नहीं हो सकता है इससे यह निश्चय करना चाहिए कि कारण व्यापारोत्तरकालमें होने वाला कार्य उत्पत्तिसे पूर्व भी सद्रूप ही था तार्किकमोहप्रकाशः ॥ यदुक्तमनादिःसान्तःप्रागभाव इति तत्तु- च्छम् प्रागभावाधिकरणस्य मृत्पिण्डादेः सादित्वेन तस्यानादित्वाऽसम्भवात् य- दप्युक्तं सादिरनन्तःप्रध्वंसाभाव इति तदप्यऽसमञ्जसम् पूर्वार्द्धस्तघटकपालि- कादिकमद्य दृष्ट्वा घटा नश्यतीति व्यव- हारापत्तेः तस्यनित्यत्वेन वर्तमानत्वात् और जो यह कहाहै कि अनादि और सान्त (नाशमान)प्रागभावहै वह तुच्छहै क्योंकि प्राग- भाव के आश्रय मृत्पिण्डादिकों को सादि होने से उनमें रहने वाला प्रागभाव अनादि नहीं हो सकताहै। और जो यह कहाहै कि सादि और अनन्त (नाशरहित ) प्रध्वंसाभाव है वह भी असङ्गत है क्योंकि ऐसे कहनेसे पूर्व दिनमें नष्ट हुए घट की कपालिका आदिकोंको आज देख कर घट नष्ट होताहै ऐसे व्यव- हार का प्रसंग होगा क्योंकि ध्वंसको नित्य होनेसे वर्तमान कालमें भी वह विद्यमान है

माकिंकमादप्रकाशः॥
AAAAAAAAAAAAAAAAA
यदप्युक्तं कारगात्रयं विनाकार्य नात्य
दातहति तन परमाणुपु जायमानाद
क्रियाया असमवायिकारणाऽभावेन व्य
भिचारात् नन्वस्त्वेतत् कारकव्यापा
रानर्थक्यं प्रसज्जत प्राकसिद्धत्वात्कार्य
स्येतिचेन्न कारणस्यकार्याकारेण व्यव
स्थापनार्थत्वात् प्रत्युताऽसतः कार्यस
ओर जो यह कहा कि समवायी असम
वायी ओर निमित्त इन तीन कारणोंके विना
कोई भी कार्य उत्पन्न नहीं होताहे वह भी
असंगत ही है क्योंकि परमाणुओंमें उत्पन्न
हुई आद्यक्रियाके असमवायिकारणके न होने
से व्यभिचरित है।शयदि उत्पत्तिसे पूर्व भी
कार्यकी सिद्धि मानोगे तो कारकों के व्यापार
को व्यर्थता का प्रसंग होगा । स० समवायि
कारणको कार्य के आकारसे स्थित करनेके अर्थ
होनेसे कारक व्यापारव्यर्थ नहींहै उलटायह दोप
तुम्हारे ही मतमें होताहै क्योंकि असत् कार्यको

तारककमाहमकामा " MANA कारकव्यापाराविषयत्वात्कारकव्यापा- राऽऽहिताऽतिशयाश्रयत्वायोगेन तवैव कारकव्यापारवेयर्यस्यात् ननु समवा- यिकारणविषयाकारकव्यापार इति चेन्न समवायिकारणात्कार्यस्थभिन्नत्वेऽन्यविष येणकारकव्यापारेणान्यनिष्पत्तावतिप्रस- ङ्गस्यात् अभिन्नत्वेऽपसिद्धान्तापत्तिःस्यात् कारक व्यापारका विषयनहोनेसे कारकव्यापार से जनित विशेषता का आश्रय कार्य नहीं होस- कताहे । श०समवायि कारण विषयक कारक- व्यापार कार्यको उत्पन्न करताहै इससे हमारेमतमें भी वह व्यर्थ नहीं होसकताासनयदि समवायि कारणसे कार्यको भिन्न मानोगे तो अन्य विषयक कारकव्यापारसे अन्यकी उत्पत्तिमाननेकपाला- दि विषयक कारकव्यापारसे पटादिकोंकी उत्पत्ति रूप अति प्रसङ्ग होगा और यदि अभिन्न मानोगे तो तुम्हारे सिद्धान्त की हानि होगी क्योंकि तुम्हारे सिद्धान्तमें कार्य कारणका भेदहै अभेद नहीं।

६ तार्किकमाहप्रकाशः ॥ ननु कारणस्य कार्याकारेण व्यवस्थितिः सती ? वा असती? आद्ये कारकव्या- पारवैययं द्वितीयेतु असत्कार्यवाद- प्रसङ्ग इति चेन्न कार्यस्याऽनिर्वाच्यत्वेन दोषाऽभावात् वस्तुतस्तु असत्कार्यवा- दवत् सत्कार्यवादेपि दोषाः प्रादुर्भव- न्ति तस्मात्कार्यस्य सत्वाऽसत्वाभ्याम- निर्वचनीयत्वात वक्ष्यमाणरीत्या का- र्यस्य कारणानिन्नत्वाऽभिन्नत्वाभ्यां च श० कारणकी जो कार्याकारसे स्थितिहै वह सतीहै? वा असती? आद्य पक्षमें कारक व्यापारको व्यर्थता होगी और द्वितीयपक्षमें असत्कार्यवाद का प्रसंग होगा । स०। कार्यको अनिर्वच- नीय होनेसे उक्त दोपोंका अभावहै वस्तुतः असत्कार्यवादके तुल्य सत्कार्यवादमें भी दोप होते हैं इससे कार्यको सत्व और असत्वरूपसे अनिर्वचनीयहोनेसे और वक्ष्यमाण रीतिसे कार्य को कारणसे भिन्नत्व और अभिन्नत्व रूपसे भी अनिर्वचनीयत्वात्सर्वकार्यमनिर्वचनीय. मिति बोध्यम् * यदुक्तमुत्पन्न कार्य का- रणाट्दिन्नमिति तदसमञ्जसम् मृद्घट इत्याभेदानुभवात् मृद्घटौभिन्नाविति- भेदबुझऽनुदयाच्च ननु तयारन्यत्वेपि समवायवशात्तथाबुद्धि!देतीतिचेन्न का- र्यकारणाभ्यामत्यन्तभिन्नस्य समवाय- स्य तन्नियामकत्वायोगात् समवायस्य अनिर्वचनीय होनेसे सवकार्य अनिर्वचनीय, यह जानना और जो यह कहाहै कि उत्पन्न हुआ कार्य कारणसे भिन्न होताहै वह मृत्तिका ही घटहै ऐसे अभेदानुभवके होनेसे और मृत्तिका और घटभिन्नहै ऐसे भेदानुभवके न होनेसे असंगत है। श०। कार्य और कारणको भिन्न होनेसे भी उनका समवाय सम्बन्धहै इससे उसका भेदा- नुभव नहीं होताहे । स० । कार्य और कारणसे अत्यन्त भिन्न समवाय उनके भेदानुभवके न होनेमें प्रयोजक नहीं होसकताहै और समवाय ताकिमोहप्रकारा॥ वन्ध्यापुत्रतुल्यत्वाच्च तथाहि समवार समवायिभिः सम्बद्धी ? नवा ? या सम्बन्धः किं समवायः ? उत स्वरुपः नाऽऽद्यः अनवस्थाप्रसङ्गात् नद्वितीय मृद्घटयोरपि स्वरूपसम्बन्धेनेव र वहारोपपत्तेः समवायाऽसिद्धेः आद द्वितीये समवायस्य समवायिपु वृत्त सम्वन्धान्तराऽपेक्षाऽभावे संयोगस्याऽपि वन्न्यापुत्रके तुल्य असत् है तथाहि समवाय समवायिओं से सम्बद्ध है? वा नहीं?यदिसम्बद्ध है तो उसका सम्बन्ध समवाय है? वा स्वरूप अनवस्था प्रसङ्गसे प्रथमपक्ष संगत नहीं है। और मृत्तिका और घटका भी स्वरूप सम्बन्ध मान लेनेसे ही व्यवहारके उपपन्न होजानेसे समवाय की असिद्धि का प्रसंग होगा इससे द्वितीयपक्ष भी नहीं बनसकताहै और प्रथम द्वितीय पक्षमें समवायको समवायिओंमें रहनेके अर्थ सम्ब- न्धान्तरकी अपेक्षाके अभाव हुए संयोग को भी

ताकिकमाहप्रकाशः ॥
स्ववृत्ती सम्बन्धान्तराऽपेक्षा नस्यात्
ननु संयोगस्य गुणत्वात्सम्बन्धान्तरा-
ऽपेक्षा समवायस्य तदभावान्तीतिचेन्न
समवायः समवायिषु सम्बन्धविशिष्टो
भवितुमर्हति धर्मत्वात् गोत्ववदित्यनु-
मानप्राप्ताऽपेक्षाकारणस्य तुल्यत्वात्-
नह्यऽसंवद्वस्याऽश्वत्वस्य गोधर्मत्वं दृष्टं
संयोगिओंमें गृत्तिताके अर्थ सम्बन्धान्तर
की अपेक्षा न होनी चाहिए। श० । संयोगको
गुण होनेसे सम्बन्धान्तराऽपेक्षाहै समवायको
गुण न होनेसे नहीं है । स० । समवाय समवा-
यिओंमें सम्बन्ध वाला होना चाहिए धर्म होनेसे
जैसा गोत्वहे इस अनुमानसे प्राप्त हुए धर्मपने
रूप अपेक्षाके कारणको तुल्य होनेसे संयो-
गको अपेक्षा है और समवायको नहीं है यह
कथन असङ्गतहै और जो जिससे सम्बद्ध नहीं
होताहै वह उसका धर्म नहीं होताहे जैसा
गोसे असम्बद्ध अश्वत्व गौका धर्म नहीं है

तार्किकमहिप्रकार AALAMALALA गुगणपरिभापायाश्च गुणत्वाऽभावेपि क- मसामान्यादीनां सम्बन्धाऽपेक्षादर्शने- नाऽप्रयोजकत्वात् किञ्च निष्पापत्या- दयो गुणा इति श्रुतिस्मृत्यादिपु व्यव- हारादिष्टधर्मोगुण इति परिभाषया स मवायस्यापि गुणत्वाच्च जातिविशेपोगु- णत्वमिति परिभापातु समवायसिद्ध्युत्त- रकालीननित्याऽनेकसमवेता जातिरिति इस नियमसे यदि समवाय सम्बद्धन होगा तो धर्मही नहीं होसकेगा और गुण न होनेसे भी कर्म सामान्यादिकोंको सम्बन्धकी अपेक्षाके देखनेसे गुणनामसम्बन्धापेक्षा का नियामक नहीं होसकता है और निष्पापत्यादिगुणहैं ऐसे श्रुतिस्मृत्यादिकों में व्यवहार होनेसे इप्टधर्म का नाम गुणहै ऐसे संकेत कर लेनेसे समवाय भी गुण होसकता है। जाति विशेषका नाम गुणत्वहै यह परिभाषा सम- वायकी सिद्धिके उत्तरकाल में होनेवालेनित्य और अनेकोंमें समवाय सम्बन्धसे वर्तमानधर्मजातिहै तार्किकमोहप्रकाशः॥ ज्ञानाधीना तस्यच समवायज्ञानाधीन- त्वेनसमवायसिद्धेःप्रासंयोगस्यगुणत्व- मसिद्धमितिदिक यदुक्तमयुतसिद्धयोःस भवायइतिअत्रभवान्प्रष्टव्यःकिमुभयोर- युतसिद्धत्वं उतान्यतरस्पानाद्यःप्राक्सि द्वस्य कार्यात्कारणस्यायुतसिद्धत्वानुपप- ते द्वितीये किमसिद्धस्य समवायसम्बन्धः? इस ज्ञानके अधीनहै और यह ज्ञान समवाय ज्ञानके अधीनहै इससे समवायकी सिद्धिसे प्रथम संयोगमें गुणत्व सिद्ध नहीं हो सकताहै इस रीति का खण्डन मण्डन और भी बहुत है यह एक मार्ग मात्र दिखाया है। और जो यह कहाहै कि अयुत सिद्ध पदार्थों का समवाय सम्बन्ध होता है इसमें हम आपसे यह पूछतेहें कि अयुत सिद्ध आप दोनों को मानते हो? वा एक को? कार्यसे प्रथम सिद्ध कारण अयुतसिद्ध नहीं होसकताहे इससे प्रथमपक्ष तो बनता नहीं और दूसरे पक्ष में असिद्ध पदार्थका समवाय सम्बन्ध मानते हो?

हाकिमहप्रकागः॥ HARMAANYAAAAAAAAAAAALMALA उत सिद्धस्य? नाद्यः प्रागसिद्धस्यालव्या- त्मकस्यकार्यस्थकारणेन सम्बन्धायोगेना- ऽयुतसिद्धत्वायोगात् सम्बन्धस्य द्विनिष्ट- त्यात् नद्वितीयः प्राकारणसम्बन्धात्का- र्यस्य सिद्धावभ्युपगम्यमानायामयुतसि- द्वत्यंनस्यात् सतारप्राप्तयोःप्राप्तिःसंयो. गइत्यभ्युपगमेन तन्तुपटयोरपिसंयो- गापत्तिश्च स्यात् किञ्च किन्नामायुसिद्धत्वं वा सिडका प्रथम पक्ष तो वन नहीं सकताहे क्योंकि सम्बन्ध को दो पदार्थों में रत्ति होनेसे उ- त्पत्ति से पूर्व असिद्ध तथा स्वरूपहीन कार्यका कारणकेसाथ सम्बन्धनहीं होसकताहै इससे कार्य अयुत सिद्ध नहीं होसकताहै।और कारणसम्बंधसे प्रथम यदि कार्यकी सिद्धि मानोगे तो कार्य अयुत सिद्ध नहीं हो सकेगा और सत् और अप्राप्तदोप- दार्थों की प्राप्तिकोसंयोगमानने सेतन्तु और पटके भी संयोगका प्रसङ्ग होगा इससे द्वितीय पक्ष भी असङ्गतहै और अयुत सिद्ध आपकिसको कहते हो

तार्किकमोहप्रकाशः॥
?
देशतःअएथसिद्धत्वम् ? उत कालतः?
अथवा स्वभावतः ? नाद्यः शुक्लः पट इ.
त्यत्र तन्तु देशे पटः पटदेशे शुक्लगुणइति
व्यभिचारात् नद्वितीयः सव्यदक्षिणयो-
रपि गोविषाणयोरयुतसिद्धत्वप्रसङ्गात्
न तृतीयः स्वभावस्य स्वरूपाउनतिरेके-
णाऽस्मदिष्टाऽभेदसिद्धेः किञ्च संयोगस्य
क्या देशसे पृथक् सिद्धत्वके अभावको ? वा
कालसे ? अथवास्वरूपसे ? पट और उसका रूप
अयुत सिद्ध हैं परन्तु उनमें देशसे एथक् सिद्धत्व
का अभाव नहीं है क्योंकि तन्तु देशमें पटहे
और पट देश में रूप है इससे प्रथम पक्ष असङ्गत
है और काल से पृथक् सिद्धत्वाभाववाले गौके
वाम दक्षिण शृङ्गोंको भी अयुत सिद्धत्व के
प्रसङ्गसे द्वितीय पक्ष भी असंगतहै और तृती-
यपक्ष में स्वभाव को स्वरूपसे अभिन्न होनेसे
हमारे सम्मत अभेदकी सिद्धिका प्रसंग होगा
इससे वह भी नहीं बन सकताहे और संयोग

4LAL- तार्किक्रमोहप्रकाशः॥ AMAtlast समवायस्य वा सम्बन्धस्य सम्बन्धिभिन्न- त्वेनाऽस्तित्वेप्रमाणाभावात् ननु सम्ब- न्धःसम्बन्धिभिन्न तद्विलक्षणशब्दधीगम्य त्वात्वस्त्वऽन्तरवदित्यनुमानंतत्र प्रमा- णमितिचेन्न एकस्यापि स्वरूपवाह्यरूपा पेक्षयामनुष्यो ब्राह्मणः श्रोत्रियो वदान्य और समवाय सम्बन्धके सम्बन्धिओंसे भिन्न होने में कोई प्रमाण नहीं है । श० । सम्बन्ध सम्बन्धिओंसे भिन्न है सम्बन्धिविषयक शब्द और ज्ञानसे विलक्षण शब्द और ज्ञानका विषय होनेसे। जो जिस विषयक शब्द और ज्ञानसे विलक्षणशब्द और ज्ञानका विषय होताहै वह उससे भिन्न होताहै जैसा घटसे भिन्न पटहै यह अनुमान सम्बंधिओंसे भिन्न सम्बन्धमें प्रमाण है।सकाएक भी वस्तु स्वाभाविक और ओपाधि- करूपकी अपेक्षासे अनेक विलक्षण शब्द और ज्ञानका विषय होताहे जैसे एकही पुरुप मनुष्य ब्राह्मण चेदवेत्ता और दानशूर कहा जाता है तार्किकमोहप्रकाशः ॥ इत्याद्यऽनेक विलक्षणशब्दधीगम्यत्वेन व्यभिचारात् सम्बन्धिनारेव सम्बन्धिश- ब्दप्रत्ययव्यतिरेकेण मनुष्यो ब्राह्मणः श्रो त्रिय इत्यादिवत्संयोगसमवायादिशब्द- प्रत्ययाऽहत्वसम्भवाच्च विलक्षणशब्दधी गम्यत्वादित्युपलब्धिघटितेन लिङ्गेनप्रा प्तस्य वस्त्वन्तरस्यसंयोगादेः सम्बन्धिव्य तिरेकेणाऽनुपलब्ध्या तदभावनिश्चयाच्च इससे उक्त अनुमान व्यभिचारी है और जैसे एकही पुरुष मनुष्य ब्राह्मण श्रोत्रिय आदि अ- नेक विलक्षण शब्दों और ज्ञानों का विषय होता है ऐसे सम्बन्धिही सम्बन्धि शब्द और तजन्य ज्ञानसे विलक्षण संयोग समवायादिशब्दों और तजन्य ज्ञानोंके विषय हो सकतेहैं और विल- क्षण शब्द और ज्ञानका विषयत्वरूप ज्ञानघटित हेतुसे प्राप्त हुए सम्बन्धिओं से भिन्न संयो- गादि सम्बन्धों की सम्बंधिओंसे अलग होकर प्रतीतिके न होनेसेउनके अभावका निश्चय होताहे तार्किकमोहप्रकाश. ॥ एतेन गुणादीनां द्रव्याभिन्नत्वं व्याख्या- तम् गुणादयोद्रव्याभिन्नाःतदधीनत्वात् यन्नवं तन्वं यथाशशभिन्नः कुशः इत्यनु- मानेन तट्वेदस्य वाधितत्वाच्च अन्यथा गु णादीनांद्रव्यधर्मत्वमपिनस्यात् गुणादयो द्रव्यधानस्युःभिन्नत्वात् महिषाश्ववत् इससे उक्त अनुमान सम्बन्धि भिन्न सम्ब- न्धका साधक नहीं हो सकताहै और इनहीं युक्तियोंसे गुणादिकोंमें द्रव्यका अभेद सिद्ध होताहै और गुणादि द्रव्यसे अभिन्न है द्रव्य के अधीन होनेसे जो जिस से अभिन्न नहीं होताहै वह उसके आधीन नहीं होताहे जैसे खरगोशसे भिन्न कुशाहे इस अनुमानसे गुणा- दिकोंमें द्रव्यका भेद बाधितहे और यदि गुणा- दिकोंको द्रव्यसे भिन्न मानोंगे तो वे उसके धर्म भी नहीं होसकेंगे क्योंकि गुणादि द्रव्यके धर्म नहीं होसकतेहैं उससे भिन्न होनेसे जैसा अश्वसे भिन्नमहिप अश्वका धर्म नहीं होसकताहे तार्किकमोहप्रकाशः॥ इत्यनुमानवाधात् किञ्चअन्योऽन्याभाव- रूपभेदाऽसिद्धेश्च तदऽभेदसिद्धिः तथाहि घटःपटो नभवतीतिवत् घटो घटभेदो नभवतीतिप्रतीतिसिद्धस्य घटभेदभेदस्य किंघटरूपत्वं? उतभेदरूपत्वं? अथवा तदुभयभिन्नत्वं नाद्यःअभावरूपस्य भे- दस्य भावरूपत्वायोगात् प्रतियोग्यतिरि क्ताभावासिद्धिप्रसङ्गेनाऽपसिद्धान्तापत्तेश्च इस अनुमानसे भिन्न पदार्थोंकाधर्म धर्मिभाव वाधितहे और अन्योन्याभावरूप भेदकी असि- खिसे भी द्रव्य गुणका अभेद सिद्ध होताहै तथाहि जैसे घट पट नहीं है यह प्रतीति है ऐसे घट घटभेद नहीं है इस प्रतीतिसे सिद्ध हुए घटमें घटभेदके भेदको क्या घटरूप मानतेहो? वा भेदरूप? अथवा दोनोंसे भिन्नरूप? अभा- वको मावरूपता के असम्भव और प्रतियोगीसे भिन्न अभावकी असिडिके प्रसंगसे सिद्धान्तके हानिकी आपत्ति से प्रथमपक्ष संगत नहीं है। TV ? ग्रा साकिंकमाहप्रकागः॥ AAAAAAALAILALAAAAAAAAAAL नद्वितीयः आत्माश्रयात् नतृतीयाअन- वस्थापत्तेः। स्यादेतत् कारणेप्ववयवद्रव्ये पु वर्तमानकार्यमवयविद्रव्यं किं समस्ते. प्ववयवेपु वर्तते? उतप्रत्यवयवम् ोअवयविनःपटादेस्तन्त्वादिप्ववयवेपु त्रित्वादिवत्स्वरूपेण वृत्तिः उत हस्तेका शेच वर्तमानाऽसिवदवयवशो वा? नाद्यः और द्वितीयपक्षमें आत्माश्रय हे क्योंकि अभा- वज्ञानमें प्रतियोगिज्ञानको कारण होने से घट भेद भेद स्वज्ञानमें स्वाभिन्नघट भेद रूप प्रति योगिज्ञानसापेक्ष है और अनवस्था प्रसङ्गसे तृतीयपक्ष भी नहीं बन सकता है। और अवयव द्रव्यरूपकारणोंमें रहता हुआ कार्य क्या सब अवयओंमे रहताहै ? वा एक २ अवयवोंमें ? प्रथम पक्षमें पटादिरूप अवयवी तन्तु आदिरूप अवयओंमें त्रित्वादिकोंके तुल्य स्वरूपसे रहतेहैं? वा हाथ और कोशमें खड्ग के तुल्य अवयओं से रहते हैं? प्रथम पक्ष तो वन नहीं सकता है तार्किकमोहप्रकाशः ॥ व्यासज्यवृत्तिवस्तु प्रत्यक्षस्य यावदान- यप्रत्यक्षजन्यत्वात् संवतपटादेर्यावद- वयवानामप्रत्यक्षत्वादप्रत्यक्षत्वं स्यात् नद्वितीयःअनवस्थाप्रसङ्गात् तथाहि आ रम्भकावयवव्यतिरेकेण यैरवयवैरारम्भ केष्ववयवेष्ववयवशोऽवयवी वर्तत तेऽ- वयवाः कल्पेरन यथा कोशावयवव्यति- रिक्तैरवयवैरसिः काशं व्याप्नोति तद्वत् क्योंकि व्यासज्यवृत्ति पदार्थक प्रत्यक्षको उसके सवआश्रयोंके प्रत्यक्षसे जन्य होनेसे इकट्ठे करे हुए पटादिकोंके सब अवयवोंके प्रत्यक्षके न होने से उनको अप्रत्यक्षत्वका प्रसंग होगा। और द्वियीय पक्षभी नहीं बन सकता है क्योंकि इसमें अनवस्थाका प्रसंग होता है तथाहि जैसे कोशके अवयवोंसे भिन्न अपने अवयवोंसे खड्ग कोशमें रहता है ऐसे ही आरम्भक अवयवोंसे भिन्न जिन अवयवोंसे अवयवी आरम्भक अव- ययों में रहेगा वे अवयव कल्पना करने होंगे सामिाहप्रकाश AAAAAA -Z-4.- तथाच तेषु तेप्वययवेपु वर्तयितुमन्ये- पामन्येपामवयवानां कल्पनीयत्वादन- वस्थाप्रसङ्गः । प्रत्यवयवर्तत इति पक्षे एकस्मिस्तन्ती पटवत्तिकाले तन्त्वन्तरे पटस्य वत्तिर्नस्यात् वृत्तावप्यनेकत्वापत्तेः एकत्र व्यापारेऽन्यत्रव्यापारानुपपत्तेश्च ननु यथायुगपदनेकव्यक्तिपु वत्तावपि जा तेरनेकत्वदोषोनास्ति तथाऽवयविनापि तब फिर उन उन अवयवों में रहनेके अर्थ अन्य अन्य अवयवों की कल्पना करनी होगी इससे अनवस्था प्रसङ्ग होगा। और एक एक अवयवोंमें रहने पक्षमें एक तन्तुमें वृत्ति कालमें पटको दूसरे तन्तुमें वृत्ति नहीं होसकेगा यदि मानोंगे तो पटको अनेकताका प्रसङ्ग होगा और एकमें व्यापार कालमें दूसरेमें व्यापार हो नहीं सकताहै।श जैसे गोत्वादिजातिकोएककालमें होनेसे भी अनेकत्व प्रसंग दोष नहीं होताहै ऐसेही अवयवीको भी ८१ तार्किकमोहप्रकाशः ॥ युगपदनेकावयवेषु वृत्तौ दोषोनास्तीति चेन्न गोत्वादिजातिवदवयविनायुगपदने काऽवयववत्तित्वाऽनुभवाभावात् अन्यथा यथा गोत्वं प्रतिव्यक्तिप्रत्यक्षंगृह्यतेतथा अवयव्यपि प्रत्यऽवयवं प्रत्यक्षंगृह्येत- यदुक्तं घटो मृट्दिन्नः तद्विरुद्धएथुबुना- दिविशेषाकारवत्वात् वक्षवदिति तन्न एक कालमें अनेक अवयवोंमें वृत्ति होनेसे उक्त दोप नहीं होगा । स० जैसे गोवादि जातिके एक कालमें अनेक व्यक्तिओंमें वृत्तित्व का अनुभव होताहै तैसे अवयवीके एक कालमें अनेक अवयवों में वृत्तित्वका अनुभव नहीं होताहै और यदि प्रत्येक अवयवमें अवयवीको मानोंगे तो प्रतिव्यक्तिमें गोत्वके तुल्य अवयवी का भी प्रत्यवयवमें प्रत्यक्ष होना चाहिए। और जो यह कहा कि घट मृत्तिकासे भिन्नहै मृत्तिका के आकारसे विलक्षण विशालोदरादिरूप आका- रवाला होनेसे जैसा वृक्षहे वह समीचीन नहीं है ४२ साकिमहप्रकाण. ALAAALALALALALALALALALA44444 एकस्यैव देवदत्तस्य सङ्कुचितहस्तपा. दादिमत्वेन प्रसारितहस्तपादादिमत्वे- न च विरोपितत्वपि वस्त्वन्यत्वाऽद- नेन व्यभिचारात् किच्च प्रत्यहमेध. मानानां पित्रादिदेहानामवस्थाभेदेपि जन्ममरणयोरदर्शनेन वस्त्वन्यत्वाऽस- म्भवाद्वाभिचारः अन्यथा पित्रादयोम- ता अन्येपित्रादय उत्पन्नाश्चेति प्रत्यहं क्योंकि सङ्कुचित हस्तपादादिरूपऔर प्रसा- रित हस्तपादादिरूप देवदत्तके आकारके भेदक होनेसे भी उसके भेदके न देखने से उक्तानुमान व्यभिचारी है और प्रतिदिन बढ़ती हुई पिता आदिके देहोंकी अवस्था के भेद होनेसे भी उनके जन्ममरण देखने में नहीं आते हैं इससे आकारके भेद मात्रसे वस्तुका भेद नहीं होसकता है इससे भी उत्तानुमान व्यभिचारी है और यदि आकार भेदमात्रसे वस्तुका भेद मानोंगे तो पूर्व पिता आदि मरगए नए उत्पन्न हुए ऐसा प्रतिदिन तार्किकमेाहप्रकाशः। AA व्यवहारः स्यात् नचेष्टापत्तिः सायं मम पिता सोयं मम नाता सेयं मम मा- तेति प्रत्यभिज्ञानात् अन्यथा पित्रादि- व्यवहारलोपप्रसङ्गः स्यात् दृष्टान्तासि- द्वेश्च तस्मात्कारणाद्भिन्न कार्यमित्येतद- सिद्धम् * स्यादेतत् यदुक्तमाकाशोनो- त्पद्यते सामग्रीशून्यत्वात् आत्मवत् व्यवहार होना चाहिए और इस व्यवहारमें आप इष्टापत्तिनहीं कह सकतेहैं क्योंकि यह वहही मेरा पिता है यह वहही मेरा भाई है यह वहही मेरी माताहे इस रीतिसे पूर्व पिता आदिकी ही प्रत्यभिज्ञा होतीहै और उक्त व्यवहारके नमानने सेपिता पुत्रादि व्यवहारकेलोपकाप्रसङ्गभी होगा और दृष्टान्त भी असिद्ध है क्योंकि वृक्षको हम वीज से भिन्न नहीं मानते हैं और दृष्टान्त वहही होताहे जो वादी प्रतिवादीदोनोंको सम्मतहो इस से कार्यको कारणसे भिन्न कहना असङ्गतहै ।* और जोयहकहाहै कि आकाश उत्पन्न नहीं होता ताकिमाहाकाग.॥ LAANAA नचाऽविद्यात्मनाः सत्याद्धत्वसिद्धिरिति वाच्यम् विजातीयत्वेन तयोरारम्भक- त्यायोगात् असंयुक्तत्वात्संयोगस्यद्रव्या- ऽसमवायिकारणस्यचाऽभावात् तथाच समवाय्यासमवायिनोरभावेन हेत्वसि- यऽभावादाकाशस्याऽजत्वसिद्धिरिति त- दपेशलम् आकाशो विकारः विभक्तत्वात सामग्रीके (उत्पन्नकरनेवाले कारणके) न होनेसे जेसा आत्माहे । श० । अविद्या और आत्माको सामग्री होनेसे सामग्री का न होना रूप हेतु असिद्ध है । स० । उन को विजातीय होनेसे वे आकाशके आरम्भक नहीं हो सकते हैं और उनको असंयुक्त होनेसे संयोगरूप अ- समवायिकारणकाभी अभाव है इससे समवायी और असमवायी कारणके न होनेसे हेतुकी अ- सिद्धि नहीं है इससे आकाश को अजत्व सिद्ध हुआ वह समीचीन नहींहै क्योंकि आकाश कार्य है विभागाश्रय होनेसे जो विभक्त है वह कार्यहै ताकिकमाहप्रकाशः 是是是是是是去去去去去去 घटवत् योविभक्तः सविकारः यथा घटः यस्त्वविकारः सनविभक्तः यथा आत्म- त्यनुमानेनाऽऽकाशोत्पत्तिसम्भवात् दि- गादीनांपक्षसमत्वेन व्यभिचाराभावा- च्च ननु आत्मनि विकारित्वाऽभाववति विभक्तत्वहेतास्तत्वाद्वाभिचार इतिचेन्न धर्मिसमानसत्ताकविभागस्य हेतुत्वात् परमार्थात्मनि विभागस्य कल्पितत्वेन जैसा घटहै जो कार्य नहींहै वह विभक्त नहीं है जैसा आत्माहे इस अनुमानसे आकाशकी उत्प- त्तिकासम्भव है और दिगादिकोंको पक्षसमहोनेसे उक्तानुमान में व्यभिचार नहीं है। श० आत्मा कार्य नहीं है और विभागाश्रय है इससे उक्त हेतु व्यभिचारी है। साधर्मिके समान सत्ता वाला विभाग हेतु है आत्माकी पारमार्थिक सत्ता है और उसमें वृत्ति (स्थित) विभागको कल्पित होनेसे उसकी प्रातीतिक सत्ताहै इससे आत्मसमसत्ताक- विभाग आत्मामें न होनेसे व्यभिचार नहीं है साकिकमा प्रकार: ॥ ALLAAA LAAAAAAAAAPAL भिन्नसत्ताकत्वात् निर्गुगाऽऽत्मनिविभा. गाऽसम्भवेन व्यभिचारशङ्काया अप्य- भावात् नचाऽप्रयोजकता द्वाणुकादी- नामपि नित्यत्वापत्तेः । अत्र अजान. स्थाऽनादिभावत्वस्वीकारे तस्मिन्तत्सं- वन्धादा व्यभिचारवारणाय अज्ञाना ऽन्यद्रव्यत्वं विभक्तत्वहेतुविशेपणं वोध्यं और वस्तुतःनिर्गुण आत्मामें विभागका असम्भ वहे इससे व्यभिचारकी शङ्का भी नहीं होसकती है।श।उक्त हेतुमें व्यभिचार शङ्काका निवर्तक कोई तर्क नहींहै इससे वह निज साध्यका साधक. नहींहोसकताहै।सायदि विभागका आश्रयवस्तु भी कार्यनहोतोद्यणुकादि भी नित्य होजाएगे इस तर्कके विद्यमान होनेसे उक्त दोष नहीं है। और अ- ज्ञानको अनादि भाव रूप स्वीकार करे तो उसमें और उसका आत्माकासंबन्ध आदिओंमें अतिव्या प्ति दोष परिहारके अर्थ इस अनुमान के विभक्त त्व हेतु में अज्ञानाऽन्यद्रव्यत्वं विशेपणजान लेना।

तार्किकमोहनकाशः॥ ननु आत्मा कार्यः विभक्तत्वाद्वस्तुत्वा- द्वाघटवदितिचेन्न निर्धर्मिकेआत्मनिव- स्तुत्वाद्यभावेनहेत्वऽसिद्धेः ननु दुःखि- त्वादिधर्माणामात्मनि प्रतीयमानत्वा- कथमात्मनोनिर्धर्मिकत्वमितिचेन्ननाहं विभुः किन्तु परिच्छिन्नीहंस्थूलोहंकृशाह मित्यादिवत्तेषामोपाधिकधर्मत्वोपपत्तेः शआत्मा कार्यहै विभागाश्रय और वस्तु- त्याश्रय होने से जैसा घट है इस अनुमानसे आत्मामें कार्यत्व सिद्ध होताहै।सासकल धर्मों से रहित आत्मामें वस्तुत्वादि धर्मोके न होनेसे उक्तानुमानमें हेत्वऽसिद्धि दोष है। श० । दुःखि- त्वादि धर्मोंको आत्मामें प्रतीयमान होनेसे आत्मा निर्धर्मिक नहीं हो सकताहै। स० जैसे मैं विभु नहीं किन्तु परिच्छिन्न स्थूल और कृश हूं इत्यादि प्रतीतिओंसे आत्मामें विभुत्वादिकों का अभाव और परिच्छिन्नत्वादिधर्म प्रतीत होतेहैं परन्तु वे औपाधिकहें ऐसेही दुःखित्वादिक भी है साफिकमा प्रकाश LATALAJLAAAAALAALAt अन्यथा विभुत्वादिकमपि नस्यात् किञ्च आत्मनो ये दुःखित्वादिकमभ्युपगच्छ- न्ति तेऽत्र प्रष्टव्याः किं आत्मनोदुःखि- स्वादिकं दीपस्यप्रकाशवत् गुडस्यमाधु- र्यवत् स्वाभाविक ? उत स्फटिकेलोहि- त्यवदीपाधिकम् ? नादयः दुःखित्वादी- नांनाशाय तत्वविचारादी प्रवृत्तिनस्यात् और यदि प्रतीतिके अनुरोध से दुःखित्वादिकों को आत्माके धर्म मानोंगे तो उससे आत्मामें विभुत्वाऽभाव और परिच्छिन्नत्वादि धर्म भी मानने पड़ेंगे। और जो लोग दुःखित्वादिकोंको आत्माके धर्म मानते हैं उनसे हम यह पूछते हैं क्या आत्माके दुःखित्वादिधर्म दीपकके प्रकाश, और गुड़के माधुर्यके तुल्य स्वाभाविकहैं ? वा स्फटिक की रक्तताके सदृश औपाधिक हैं ? दुःखित्वादिकोंके नाश के अर्थ तत्व विचारा- दिकों में प्रवृत्तिके अभावके प्रसङ्गसे प्रथमपक्ष असंगत है क्योंकि दुःखित्वादि स्वाभाविक हैं तार्किकमोहप्रकाशः॥ ८९ 去去去去去去去去去去去去去去去 स्वाभाविकत्वात् नहि बुद्धिमता स्वभाव- नाशाययत्नः क्रियते कृतावानाशोभवति स्वस्यैव नाशापत्तेः प्रकाशादिवत् एतेन ये चक्राङ्किता निर्विशेषाऽऽत्मवस्त्वमा- ववादिनः तेस्वात्महननकर्तार इति सि- द्वम् किञ्चसुषुप्तौ तेषामदर्शनेन स्वाभा- विकत्वाऽसम्भवात् नहि दीपस्पप्रकाशः और स्वभावके नाशके अर्थ कोई भी बुद्धिमान यत्न नहीं करताहे और करनेसे स्वभावका नाश भी नहीं हो सकताहे क्योंकि जैसे प्रकाशके नाश होनेसे दीपक का नाश हो जाताहे ऐसे स्वभावका नाश होनेसे अपनाही नाश हो जाएगा इससे यह सिद्ध हुआ कि जो चक्राङ्कित लोग निर्ध र्मिक आत्मवस्तु का अभाव मानते हैं वे आत्म हत्यारे हैं और सुपुप्ति कालमें दुःखित्वादिकोंके न देखने से वे स्वाभाविक नहीं होसकतेहैं क्योंकि जो जिसका स्वाभाविक धर्म होताहै वह सदाही. उसके आश्रित रहताहे जैसा दीपकका प्रकाश है ९० तार्किकमाहप्रकाशः॥ HALtta कदाचिद्दीपाश्रयः कदाचिन्नेतीति वक्तुं- शक्यं नद्वितीयः अस्मदभिमतपारमार्थि- कनिर्धर्मिकत्वोपपत्तेःतथाचहेत्वसिद्धिः किञ्च सर्वसाक्षिणात्मनःकार्यत्वे शून्य- वादप्रसङ्ग स्यात् नचेष्टापत्तिः शून्यस्या- ऽसाक्षिकत्वे शून्यस्याऽप्यसिद्धिः स्यात् किञ्च आत्मा कार्यत्वाभाववान साक्षि- णेाऽभावात् प्रागभावानुभवितुरभावाच्च ऐसा नहीं कह सकतेहैं कि दीपकका प्रकाश कभी दीपकाश्रित है कभी नहीं है क्योंकि यह वात प्रत्यक्ष विरुद्धहै और हमारे सम्मत वस्तुतः निर्धमिकत्वकी आत्मामें सिद्धिके प्रसंगसे द्वितीय- पक्ष भी नहीं बन सकता है इससे उक्तानुमान में हेत्व सिद्धि है और सबके साक्षी आत्माको भी यदि कार्य मानोंगे तो शून्यवादका प्रसंग होगा और यह इष्टापत्ति नहीं हो सकताहै क्योंकि साक्षी के न होनेसे शून्य की भी सिद्धि नहीं हो सके गी और आत्मा कार्य (जन्य ) नहीं है तार्किकमोहप्रकाशः ॥ यन्नैवं तन्नैवं यथाघट इत्यनुमानवाधात् नचहेत्वसिद्धिः अनवस्थादिदोषप्रसङ्गा- तू ईश्वराऽभावस्पोक्तत्वाच्च किञ्च सर्वत्र- कार्यस्य सत्तास्फूर्तिमत्वमन्यापेक्षं दृष्टं साक्षी और प्रागभावके अनुभवकर्ताके अभाव होनेसेजो कार्य होताहै उसके साक्षी और प्रागभाव के अनुभव कर्ता का अभाव नहीं होताहे जैसा घटहै इस अनुमान से आत्मा का कार्यत्व वा- धित है और इस अनुमान में हेत्वऽसिद्धि नहीं है क्योंकि जो आत्माका साक्षी और उसके प्रा गभाव के अनुभव का कर्ता होगा वह भी कार्य ही होगा इससे उसका साक्षी और उसके प्राग- भाव के अनुभव का कर्ता अन्य मानना होगा इस रीतिसे अनवस्था होती है और ईश्वर के अभाव कोहम पूर्व कह चुके हैं इससे वह साक्षी और प्राग भावानुभव कर्ता कहाही नहीं जासकताहै और सब कार्यों की सत्ता और स्फूर्ति अन्योंके अधीन देखी है और आत्माके सत्तादि अन्याधीन नहींहैं ९२ तार्किकार प्रकाश ॥ तदभावेनाप्यात्मनः कार्यत्वाऽसिद्धिः अ- हमस्मिवा नवेतिसंशयाद्यभावात् किञ्च "प्रमाताच प्रमाणंच प्रमेयं प्रमितिस्त- था यस्यप्रसादात्सिद्धान्तितत्सिद्वौकिम- पेक्षत" इत्युक्तत्वादप्यात्मनोऽजत्वसि- द्विः एतेनात्मनःकार्यत्वे प्रमाणाऽद्य- भावस्पष्टीकृतः प्रात्मनःस्वतःसिद्धत्वेन क्योंकि जिसघटादिपदार्थकसत्तादिअन्याधीन होतेहैं उसकेहोने में कभी घटहेवा नहींहै इसप्रकार संशय भी हो जाता है परन्तु आत्मा के होने में कभी किसी को ऐसा संशय नहीं होता है कि मैहूं वा नहीं इससे भी आत्मा कार्य नहीं हो सकताहै। और जिसके प्रसादसे प्रमाता प्रमाणप्रमेय और प्रमिति यह सब सिद्ध होते हैं उसकी सिद्धिके अर्थ किसकी अपेक्षा हो। इस टख वचन से भी आत्मा में अजत्व को सिद्धि होती है और इतनेसे आत्माके कार्यत्वमें प्रमाणादिकों का अभाव स्पष्ट करा है और यहां यह भी जानना चाहिए ताकिकमेाहप्रकाशः ॥ प्रमाणान्तरनिरपेक्षत्वेप्यसिद्धप्रमेयाणा- माकाशादीनां प्रमेयत्वसिद्धयेप्रमाणापे क्षत्वान्नतद्वैयर्थ्यमित्यपि बोध्यम् तथाच नित्यस्याऽऽत्मनाऽविद्यासहितस्योपादान स्याऽदृष्टादिनिमित्तस्यचसत्वादाकाशानु त्पत्तिहेतास्सामग्रीशून्यत्वस्य स्वरूपाऽ- सिद्धः उक्त सत्प्रतिपक्षबाधाच्च आका- शस्य कार्यत्वं निरवद्यम् । अविद्याचात्र कि स्वतःसिद्ध होने से आत्मा को प्रमाणा- न्तर की अपेक्षा के न होनेसे भी जो आका- शादि पदार्थ स्वतःसिद्ध नहीं हैं उनको प्रमेयत्व सिद्धि के अर्थ प्रमाण की अपेक्षाहै इससे वह व्यर्थ नहीं है। और अविद्या सहित नित्य आ- स्माको उपादान और अदृष्टों को निमित्त कारण होनेसे आकाशकी अनुत्पत्तिमें हेतु जो सामग्री शून्यत्वहै वह स्वरूपासिद्ध है और विभक्तत्व हेतुक अनुमानसे आकाशका अजत्व वाधित भी है इससे आकाशका कार्यत्व निर्दोप है।

९४ तार्किकमोहप्रकाशः ॥ 是甚么去玉泉去去去去去 जडप्रपञ्चकार्याऽन्यथाऽनुपपत्या सिद्धस त्वरजस्तमोगुणात्मिका मूलप्रकृतिरिति बोध्या यत्तूक्तमात्माविद्ययार्विजातीय- त्वान्नाकाशारम्भकत्वमिति अत्र भवान् प्रष्टव्यः किं कारणमात्रस्यसाजात्यनि- यमः ? उत समवायिकारणस्य ? नाद्यः घटाद्यऽसमवायिकारणे संयोगादी द्र- व्यगुणयोर्विजातीयत्वेन व्यभिचारात् और जड़ प्रपञ्चरूप कार्यके अन्यथा न बननेसे सिद्ध हुई सत्वरजतमोगुणात्मिका प्रकृति यहां अविद्या शब्दका अर्थजानना।और जोयह कहाहै कि आत्मा और अविद्याको विजातीय होने से | आकाशकी आरम्मकता नहीं हो सकतीहै इसमें हम यह पूछते हैं कि कारणमात्र को सजातीय- ताका नियम है ? वा समवायि कारण को ? घटादिकों के असमवायिकारण संयोगको गुण होनेसे कपालादि द्रव्यरूप कारणोंसे विजातीय- वह इससेव्यभिचार होनेसे प्रथमपक्ष असङ्गतहै तार्किकमोहप्रकाशः॥ ९५ द्वितीये समवायिताऽवच्छेदकधर्मण सा- जात्यं?उत सत्तादिना?नाद्यःएकरज्वारं भकसूत्रगोवालेषुव्यभिचारात् एकविचि त्रकंबलारंभकसूत्रोर्णादिषु व्यभिचाराच्च नचसूत्रगोवालाभ्यांनरज्वादि द्रव्यान्त- रमिति वाच्यम् पटादेरपितथात्वापत्तेः और द्वितीयपक्षमें समवायितावच्छेदकधर्मरूप सेसाजात्य कहते हो? या सत्तादिरूपसे? इन दो पक्षों में से प्रथमपक्ष असङ्गत्तहे क्योंकि एक रस्सी के आरभ्भक सूत्रों और गोवालों में और एक कम्बल के आरम्भक सूत्र और उनमें व्यभिचारहै क्योंकि समवायितावच्छेदक सूत्रत्व गोवालय ऊर्णत्व इन धर्मों में से कोई भी धर्म दोनों में नहीं रहता है इससे समवायिता वच्छेदक धर्मसे एकके आरम्भक सूव गोचालादि सजातीय नहीं है यदि कहो कि वह रस्सी सूत्रों ओर गोचालोंसे भिन्न उनका कार्य नहीं है किन्तु उन्ही का रूपान्तर हे तब तो पटादि भी तन्त्वादिकों के रूपान्तरही ताकिमोहप्रकाश AAAAAAAAA नद्वितीयः सर्वस्यसर्वणसाजात्यान्नियमा नर्थक्यस्यात् आत्माविद्ययोर्वस्तुत्वेन- साजात्यादस्मदिएसिद्धेश्च एतेनाविदया- त्मनाःसंयोगोऽसमवायिकारणमपिव्या ख्यातम् यदुक्तमनेकं समवायिकारणं- कार्यमारभत इति तन्न अणोर्मनसश्च सिद्ध होंगेअवयवी कोई भी नहीं सिद्ध होगा और द्वितीयपक्ष भी नहीं बन सकता है क्योंकि प्रमेयत्वादि धर्मसे सबके सब सजातीय हो सकते हैं इससे नियम करना व्यर्थ होगा और आत्मा और अविद्या को वस्तुत्व धर्म से सजा- तीय होने से वे आकाश के आरम्भक हो सकेंगे इससे हमारे इष्ट की सिद्धि होगी और इसी से अविद्या और आत्मा का संयोग रूप आकाश का असमवायि कारण ही कहा गया और जो यह कहा है कि अनेक सम वायि कारण कार्य का आरम्भ करते हैं वह समीचीन नहीं है क्योंकि अणु और मन की तार्किकमोहप्रकाशः॥ ९७ क्रियासमवायिकारणस्यैकत्वेनतदारब्धा ऽऽद्यक्रियायांव्यभिचारात् (उक्तनियम- भंग इत्यर्थः) यदुक्तं यत्कार्यद्रव्यं तत्सं- योगसचिवस्वन्यून परिमाणाऽनेकद्रव्या- रब्धमिति तन्न दीर्घविस्तृतदुकूलारब्ध- रज्जो व्यभिचारात् नच रज्जुर्नद्रव्यान्त- रमिति वाच्यम् अवयविमात्रविषवापत्तेः क्रियाक समवायि कारण अणु आदिकोंके एक होनेसे उसमें अनेकारभ्यत्व नहींहै इससे व्यभि- चार है (अर्थात् उक्त नियम भंग हुआ) और जो यह कहा है कि जो कार्य द्रव्य होता है वह संयोग सहकृत स्वन्यून परिमाण विशिष्ट अनेक द्रव्यों से आरब्ध हुआ होता है वह भी सङ्गत नहीं है क्योंकि यह नियम लम्बे चौड़े एक वस्त्र से बनाई हुई रस्सी में व्यभिचारी है। श० । वह रस्सी वस्त्र से भिन्न उसका कार्य नहीं है किन्तु वस्त्र का रूपान्तर ही है इससे व्यभिचार नहीं है। सः। ऐसे मानने से घटादि भी कपालादिकों के ताकिमोहप्रकाशः॥ AAAAAAAAAAAAAAAAAAL यत्कार्यद्रव्यं तत् द्रव्यारभ्यमिति व्य प्त्यपेक्षया गौरवाच्च। अथवा उक्तरीत्य परमाणूनांजगदुपादानत्वासम्भवेनज प्रपञ्चकार्यान्यथानुपपत्या अहमजा त्यनुभवेनच सिद्धायास्सत्वरजस्तमार णात्मिकायाः “मायान्तुप्रकृतिविदा दित्यादिश्रुतियोधिताया अविद्याऽज्ञान रूपान्तर ही सिद्ध होंगे अवयवी कोई में नहीं सिद्ध होगा और जो कार्य द्रव्य है या द्रव्यारभ्य है इस नियम की अपेक्षा से उत्त नियम में गौरव भी है। अथवा उक्त रीति से परमाणुओं को जगत् की कारणता के अं- सम्भव से और जड़ प्रपञ्च रूप कार्य के अन्यथा न बन सकने से और मैं अज्ञहूं इस अज्ञान के अनुभव से सिद्ध हुई सत्वरजस्तमोगुण रूपं "माया को जगतका उपादान जाने" इत्यादि श्रुति से चोधनकरी और अविद्या अज्ञान- शक्ति आदि अनेक पदवाच्या जो मूल प्रकृति है तार्किकमोहप्रकाशः ॥ ९९ शक्तादानेकपदवाच्याया मूलप्रकृतेरु- पादानभूताया आत्मादृष्टादिनिमित्तस्य च सत्वादाकाशानुत्पत्तिहेतोस्सामग्री- शून्यत्वस्य स्वरूपासिद्धेः उक्तसत्प्रतिप- क्षवाधाच्च आकाशस्यकार्यत्वं निरवद्यम् यत्तूक्तमुत्पत्तिमतांतेजः प्रभृतीनां पूर्वोत्त- रकालयोरप्रकाशप्रकाशी विशेषी दृष्टी -उसको उपादान और आत्मा और अह- सादिकों को निमित्त कारण होनेसे आकाश की अनुत्पत्ति में जो सामग्रीशून्यत्व हेतु है वह स्वरूपाऽसिद्ध है और कथित विभक्तत्व हेतुक अनुमानसे आकाश की अनुत्पत्ति वाधित भी है इससे आकाशका कार्यत्व निर्दोप है और जो यह कहा है कि उत्पत्तिवाले तेज आ- दिकों के पूर्व और उत्तर काल में प्रकाश और अप्रकाश रूपचिशेप देखे हैं और आकाशके विशेषों के न होनेसे आकाशका प्रागभाव नहीं है इससे आकाश उत्पन्न नहीं होता है

१००
तार्किकमोहप्रकाश. ॥
AR
आकाशस्यपुनः
पूर्वोत्तरकालयोर्विध
षाभावात्प्रागभावशून्यत्वं तथाच अ
काशोनोत्पदाते प्रागभावशून्यत्वादात्म
दिति तन्न शब्दाऽनाश्रयत्वाश्रयत्वया।
शेषत्वेन प्रागभावशून्यत्वहेतोरसिद्धत्व
त् नहि प्रलयेशब्दाश्रयत्वं सम्भव
येन विशेषेण पृथिव्यादिभिन्नत्वं सिद्धो
प्रागभावके न होनेसे जैसा आत्मा है इस
अनुमानसे आकाशको अजत्व सिद्ध होता
वह समीचीन नहीं है क्योंकि आकाश के श
व्दाऽनाश्रयत्व और शब्दाश्रयत्व रूप विशेष
के विद्यमान होनेसे आकाश प्रागभाव शून्र
नहीं है इससे उक्तानुमानमें जो प्रागभाव
शून्यत्व हेतु है वह स्वरूपाऽसिद्ध है और
प्रलयकाल में आकाशमें शब्दाश्रयत्व नहीं
होसकता जिस विशेप से आकाशरथिव्या-
दिकों से विजातीय सिद्ध होवे । और प्रलय.
काल में न परमाणु थे न आकाश था इत्यादि

"नासीद्रजोनोव्योमापरोयदि" त्यादि श्रुत्यापि प्रलये पृथिव्यादिभिन्नाका- शाभावसिद्धिः नन्वाकाशाभावकाठिन्यं- स्यादिति चेत्सुशिक्षितोयं नैयायिक त- नयः नह्याकाशामावस्तद्धर्मावा काठि- न्यं किन्तु मूर्तद्रव्यविशेषस्तद्धर्मोवाकाठि- न्यं तस्यप्रलयेऽभावादिति।यदप्युक्तमा- काशो नात्पदाते विभुत्वादात्मवदिति श्रुतिओं से भी प्रलय में आकाश का अभाव सिद्ध होता है। श० । प्रलय में यदि आकाश न मानोंगे तो सर्वत्र कठिनता होनी चाहिए। स०।वाहरे नैयायिक के बच्चे सम्यक् शिक्षित हुआ है अरे आकाशाभाव वा उसका धर्म क- ठिनता नहीं है किन्तु मूर्तद्रव्य वा उसका धर्म है और प्रलय में कोई मूर्त द्रव्य रहता नहीं इससे कठिनता का प्रसंग नहीं हो सकता है। और जो यह अनुमान कहा है कि आकाश उ- त्पन्न नहीं होता है विभु होनेसे जैसा आत्मा है १०२ मार्किकमोहप्रकागः॥ - 在《杰克在人在意真是太在太太太太太在主 तदसङ्गतम् सर्वमूर्तद्रव्यसंयोगस्य विभु. त्यस्य निर्गुणात्मन्यसम्भवेन दृष्टान्ता- सिद्धः संयोगस्य सावयवत्वनियतस्याऽज- त्वसाध्य विरुद्धतापत्तेश्च स्वरुपापचय- महत्वस्य च परिमाणविशेपस्यत्वयाऽन- भ्युपगमात् अभ्युपगमेवा निर्गुणात्म: न्यसत्वेन इप्टान्तासिद्धेः नाहंविभुरिति वह भी असङ्गत है क्योंकि सर्व मूर्त द्रव्योंसे संयोग रूप विभुत्व को गुण रूप होनेसे निर्गुण आत्मा में वह रह नहीं सकता है इससे उक्त अनुमान का दृष्टान्त असिन्द है और “जो संयो- गाश्रय है वह सावयव है और जो सावयव है वह अज नहीं है" इन नियमोंसे अजत्व साध्यक संयोगरूप विभुत्व हेतु विरुद्ध है और स्वरूप के उपचय रूप अर्थात् परिमाण विशेष रूप महत्व को आप मानते नहीं हो और यदि मानों भी तो वह निर्गुण आत्मा में रह नहीं सकता है इससे उक्ता- नुमान दृष्टान्तासिद्ध है और मैं विभु नहीं हूं प्रतीति विरोधेन दृष्टान्ताऽसिद्धेश्च " ज्यायानाकाशादि" त्यागमबाधाच्च ननु कचिदाकाशसास्यमपि श्रुतमिति चेन्न तस्य इषुरिव सविता धावतीतिवत् आत्मना निरतिशयमहत्व प्रतिपाद- नायोपपत्तेः । नच पूर्वोत्तर विरोधः इस प्रतीति के साथ विरोध होनेसे आत्मामें विभुत्व नहीं है इससे भी उक्त दोप है और आत्मा को आकाश के तुल्य मानना आत्मा आ- काश से बड़ा है इस श्रुति से बाधित है।श। किसी श्रुति आत्माको आकाश के तुल्य भी कहा है। सः । जैसे सूर्य तीर के सदृश दौड़ता है इस वाक्य का सूर्य के अति शीघ्र गामित्व में तात्पर्य हे ऐसे ही आकाश की तुल्यता कहने वाली श्रुति का आत्मा के निरतिशय महत्व में तात्पर्य है । श० पूर्व आपने कहा कि आत्मा में महत्व नहीं है और अब निरतिशय महत्व कहते हो इससे तुम्हारा पूर्वोत्तर कथन विरुद्ध है १४ साकिमहप्रकागः॥ AHMATAARAIAARAARRIALA योक्तिकवेदिकमतयोंर्वपम्यात् । यत्पु. नरुक्तम् अस्पर्शिदव्यत्वात् निरवयव- द्रव्यत्वाच्च आकाशोनोत्पदाते आत्मव दिति तदप्ययुक्तम् । पञ्चीकरणादस्प । शित्वाऽसिद्धः द्रव्यत्वजातेर्निर्गुणात्मन्य- ऽभावेन द्वान्ताऽसिद्धेश्च कार्यद्रव्यत्वा- निरवयवद्रव्यत्वासिद्धेः आकाशोऽनित्यः स० । यौक्तिक और वेदिकमतों को विलक्षण होनेसे योक्तिक मत से महत्व का अभाव ओर वैदिक से महत्व कहा है इससे उक्त दोप नहीं है और जो यह कहा है कि आकाश उत्पन्न नहीं होता है स्पर्श शून्य द्रव्य होनेसे और निरवयव द्रव्य होनेसे जैसा आत्मा है वह भी असंगत है क्योंकि आकाश को पञ्चीकृत होने से स्पर्श शून्यत्व असिद्ध है निर्मिक आत्मा में द्रव्यत्व जाति का अभाव होनेसे दृष्टान्त अ- सिद्ध है और आकाशको कार्य द्रव्य होनेसे निर- वयव द्रव्यत्व असिद्ध है और आकाश अनित्य है वसमानसत्ताकगुणवत्वादनित्यगुणान- रत्वाद्वा घटवत् निर्गुणात्मनि गुणान- रत्वाऽभावेन न व्यभिचारः कल्पितगु- एवत्वेपि स्वसमानसत्ताकगुणाश्रयत्वा- वात् नचाऽप्रयोजकता यदि धर्मि- कारोनस्यात्तर्हि गुणनाशोपि नस्यादि- ग्नुकूलतर्कस्पविद्यमानत्वादितिदिक* स्वसमानसत्ताक गुणवाला और अनित्य गाश्रय होनेसे जैसा घट है इस अनुमान से काश की अनुत्पत्ति बाधित है और निर्गुण त्मा में गुणाश्रयत्व के न होनेसे उक्तानुमान भिचारी नहीं है यद्यपि आत्मा में कल्पित हैं परन्तु आत्मा के समानसत्तावाले गुण है। और उक्तानुमान व्यभिचारशङ्का तक तर्क शून्य नहीं है क्योंकि यदि आ- रूप धर्मी कार्य न हो तो उसके गुणका । भी न होना चाहिए यह तर्क विद्यमान है आकाश के अजत्व खण्डन का मार्ग है * ४ 4ALA सार्किक्रमोहनकायः॥ AAAAAAAA यत्तु रामानुजेनात्मेक्षितं जीवस्येश्वरांश- त्वमणुत्वं चिद्रूपत्वं गुणिव्यतिरिक्तदेश- व्यापिज्ञानगुणवत्वञ्चेति तदसत् निर- वयवयोस्तयोरंशांशित्वाऽसम्भवात् किं. चेश्वरस्यांशित्वे देवदत्तवत् स्वांशदुःखे- दुखित्वं सावयवत्वेनाऽनित्यत्वञ्च स्यात् तथा जीवस्यांशत्ये जन्यत्वेनानित्यत्वं और जो रामानुज ने यह कल्पना करी है कि जीच परमेश्वर का अंश परमाणुरूप चिद्रूप और गुणीसे भिन्न देशमें प्राप्त होने वाले ज्ञानरूप गुण का आश्रय है वह मिथ्या है क्योंकि निरवयव जीव निरवयव ईश्वर का अंश अर्थात् अवयवनहीं हो सकता है और यदि मानोगे तो जैसे देवदत्त अपने हस्त पादादि अंशों के दुःखसेदुःखी होता है ऐसे ही ईश्वर भी जीव रूप अपने अंशों के दुःखसे दुःखी और पटादिकों के तुल्य अंशों वाला होनेसे अनित्य होना चाहिए और कपालादिकों के तुल्य अंशरूप होनेसे जीव जन्य मानना होगा तेनच नोक्षशास्त्रस्याऽऽनर्थक्यं स्यात् ननु जीवस्याणुत्वान्नानित्यत्वमिति चेत्र अणोरप्यनित्यत्वस्य परमाणुविचारप्र- करणे प्रदर्शितत्वात् नन्वस्तु घटा- काशमहाकाशयोरिव तयोरंशांशित्व- मिति चेन्न तयारीपाधिकत्वेनांऽशांशि- त्वयोरप्यौपाधिकत्वापत्तेः नचेष्टापत्तिः और उत्पत्ति वाला होनेसे अनित्य होगा इससे मोक्ष प्रतिपादक शास्त्र व्यर्थ हो जाएंगे क्योंकि जव जीव नष्ट हो गया तो मुक्ति किसकी होगी। श० । जैसे द्यणुक का अंश हुआ भी परमाणु जन्य और अनित्य नहीं होता है ऐसे जीव भी अणुरूप होनेसे जन्य और अनित्य नहीं है। स०। परमाणु विचार प्रकरणमें हम अणुको भी अनित्यत्व दिखा चुके हैं । श० । घटांकाश और महाकाश के तुल्य जीव और ईश्वर का अंशांशिभाव होनेसे कथित दोप नहीं हैं। सजैसे घटाकाश और महाकाश औपाधिक हैं १०८ नाकिमप्रकाश जीवेशयोरभेदप्रसङ्गात् किञ्च जीव- स्थाणुत्वे विभिन्नदेशस्थकरद्वयांगुलिद्वये युगपज्जायमानक्रियानुपपत्तिः सर्वाङ्ग- व्यापिसुखाद्यनुपलब्धिप्रसङ्गश्च स्यात् ऐसे ही अशांशिभावको भी औपाधिकत्व का प्रसंग होगा और इसका आप स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि यदि ऐसे मानोंगे तो जैसे घटा- काशादिकोंको औपाधिक होनेसे वस्तुतः आकाश एक है ऐसे ही अंशांशिभाव को औपाधिक होने से जीव और ईश्वरके अभेद का प्रसंग होगा। और जीव को अणु मानने से विभिन्न देशों में स्थित दोनों हाथों की दो अंगुलिओं में एक काल में उत्पन्न हुई क्रिया की अनुपपत्ति और 'सारे शरीर में होने वाले सुखादिकों की प्रतीति के अंभाव का प्रसङ्ग होगा क्योंकि जितने देश में चेतन रहेगा उतने ही देश में उसका कार्य होगा और जीव चेतन अणुरूप होनेसे एक काल में दोनों हाथों वा सारे शरीर में रह नहीं सकताहै।

तार्किकमोहप्रकाशः॥ १०९ ननु जीवस्याणुत्वेपि तदीयज्ञानगुणस्य व्यापित्वेन सर्वाङ्गव्यापिसुखाद्युपलब्धि- सम्भवइति चेन्न ज्ञानं न गुणिव्यतिरि- क्तदेशव्यापि गुणत्वादूपादिवदित्यनुमा- नेन तस्य गुण्यधिकदेशव्यापित्वबाधात् नच प्रभायां व्यभिचारः सूपाद्याश्रय- त्वेन तस्या द्रव्यत्वात् प्रभाहिनाम श० । जीव को अणुरूप होनेसे भी उसका ज्ञानरूप गुण सारे शरीर में व्याप्त है इससे उक्त दोष नहीं होगा।साज्ञान गुणी से भिन्न देश में व्याप्त नहीं हो सकता गुण होनेसे जैसे रूपादि हैं इस अनुमान से ज्ञान का गुणी से भिन्न देश में व्याप्त होना बाधित है ।श० । दीपक का प्रभारूप गुण दीपक से भित्र गृहादिकों में व्याप्त होता है इससे उक्तानुमान प्रभा में व्यभिचारी है । स० । प्रभा दीपक का गुण नहीं किन्तु द्रव्य है, रूपादि गुणों का आश्रय होनेसे प्रभा दीपक का परिणामरूप द्रव्य है १११ ताकिमहप्रकाराः ॥ दीपादेःपरिगामाया विजातीयसंयोग- सचिवैर्दीपाद्यवयंवेरारव्यंदव्यान्तरमेव वा अतएव निविडावयवंहितेजोद्रव्यंप्र- दीपः प्रविरलावयवन्तु तेजोद्रव्यमेव प्रभेति प्राहुराचार्यश्रीचरणाः। ननु गुण स्सन्नपिगन्धो गुणिनमनानित्य वर्ततएव कथमन्यथा नासिकापुटमननुगताना- मपि चम्पककुसुमादीनांसौरभमनुभूये- त अतोनैकान्तिकमुक्तमनुमानमिति चेद् अथवा विलक्षण संयोग सहकृत दीपक के अवयवों से उत्पन्न हुआ द्रव्यान्तर है इस ही अभिप्राय से परम पूजनीय श्रीमदाचार्य स्वामी जी ने यह कहा है कि सघन अवयवों वाला तेजोरूपद्रव्य दीपक और विरले अवयवों वाला तेजो द्रव्य ही प्रभा है। श० गुण हुआ भी गन्ध गुणी से भिन्न देश में व्याप्त होता है नहीं तो दूर पड़े चम्पे के फूलों के सुगन्ध का अनुभव कैसे होवे इससे उक्तानुमान व्यभिचारी है।

तार्किकमोहप्रकाशः॥ १११ भान्तासि गुणिनमपहायाऽपसरन्हि ग- न्धी युतसिद्धत्वात् क्रियाश्रयत्वाच्च गुणत्वादेव हीयेत किन्तर्हि तदाश्रयाः कुसुमाद्यवयवाएव घ्राणमनुगतास्तम- नुभावयन्ति नच तर्हि कुसुमादीनाम् सायह तुम्हारा कथन भ्रम से है क्योंकि जो जिससे अलग होकर वर्तमान होताहे वह उसका गुण नहीं होता है जैसे घट मठ का गुण नहीं है ऐसे ही यदि गन्ध गुणी से भिन्न देश में वर्तमान होगा तो गुण ही नहीं हो सकेगा और गुणी से भिन्न देश में जाने वाला गंध क्रिया का आशय मानना होगा नहीं तो नासिकादि देशमें कैसे जा सकेगा और जो क्रिया का आशय होता है वह गुण नहीं होता है किन्तु द्रव्य होता है इससे भी गन्धगुणनहीं हो सकेगाइससे यह मानना चाहिए कि गन्ध के आशय दूरस्थ पुप्पों के अवयव वायु की सहायतासेआफर घ्राणसे संयुक्तहोतेहें इससे गन्ध का अनुभव होता है। शंका।पुप्पादिकों के ११२ तार्किक्रमोहनकाशः॥ AAAAA अवयवक्षयेण कर्पूरादिवत्परिमाणन्यून तास्यादिति वाच्यं वक्षस्थानांतेषामवय- वान्तराऽऽविर्भावेन परिमाणन्यूनाऽभावो पपत्तेः। अन्येषान्तुतेषां तथाढूष्टत्वेनेष्ट त्वात् । पुष्पादीनांक:रवैलक्षिण्यमपि अवयव का क्षय होनेसे कर्पूरादिक के सदृश उसका परिमाणको न्यूनता होना चाहिए।स०। वृक्षों में स्थित पुष्पादि के जितने अवयव निकल आतेहैं उतने और उनमें प्रविष्ट हो जाते हैं इससे पुष्पादि के परिमाणादिकों की न्यूनता नहीं होती है और कर्पूरादिकों में अन्य अवयवों का प्रवेश नहीं होता है इससे उनके परिमा- णादि न्यून हो जाते हैं और अन्य पुष्पादिकों के अवयवक्षय रोज २ देखनेसे उसकान्यून परि- माण होना इष्टही है और पुप्पादिकों के कर्पू. रादिकों से किंचिद्वेलक्षिप्य है ये कारण के विलक्षणता से हे ओर कर्पूर कृत्रिम कुसम अ- त्रिम है इससे उसके विलक्षणता को जान लेना तार्किकमोहप्रकाशः॥ ११३ A कारणलक्षिण्यादवगन्तव्यं । किंचात्र ज्ञानस्वरूपस्य जीवस्य ज्ञानगुणत्वं वद न्वादी प्रष्टव्यः किं गुणभूतज्ञानस्य गुणि- भूतज्ञानात् भिन्नत्वं ? उत अभिन्नत्वं? अथवा भिन्नाभिन्नत्वं? नाद्यः मिन्नस्य तस्य शरीरवत् गुणत्वाऽसम्भवात् न- द्वितीयः ज्ञानस्य जीवस्वरूपत्वेन त- द्गुणत्वाऽयोगात् नतृतीयः विरोधात् और यह ज्ञान स्वरूप जीव को ज्ञान गुण कहनेवाले वादियों से यह पूछना चाहिए कि गुणरूपज्ञानको गुणिभूत ज्ञानसे भिन्नमानते हो? वा अभिन्न अथवा भिन्नाभिन्न ? प्रथम पक्ष तो बनतानहीं क्योंकिगुणीसे भिन्न ज्ञान को शरीरके सदृशगुणत्व नहोसकनेसे।जीव का स्वरूपहोनेसे ज्ञान उसका गुण नहीं होसकता हेक्योंकि जो जि- सका स्वरूप होता है वह उसका गुण नहीं होसफ- ताहे घटघटका गुणनहीं है इससे द्वितीयपक्षअस- गत है और तृतीयपक्ष भी समीचीन नहीं है ताकिकमाहप्रकाशः ॥ ननु व्यापिज्ञानस्यगुणत्वाऽभावेऽपिमठा- न्तस्थप्रदीपबद्दीपस्थानीयधर्मिभूतचि- दूपजीवस्य प्रविरलाऽवयवरुप प्रभा- स्थानीयधर्मभूतव्यापिज्ञानद्वारा देहे- व्याप्यवर्तमानत्वात्सर्वाङ्गव्यापिशीताद्यु- पलब्धिसम्भवइतिचेन्न अणुपरिमाणस्य जीवस्याऽनन्तागन्तुकज्ञानाऽवयवकल्पने क्योंकि एक ज्ञानवस्तु में भिन्नत्व और अभि- न्नत्य के परस्पर विरोध होने से । शं०। देह- व्यापिज्ञान को गुणत्व न होतो भी जैसे दीपक गृह के एक देश में स्थित हुआ भी अपने प्रभा रूप से सारे गृह में व्याप्त होता है ऐसाही दीपस्थानीय धर्मिरूप चिद्रूप जीव के फैला हुआ सूक्ष्मावयवरूप प्रभास्थानीय धर्मरूप व्यापिज्ञानद्वारा देहमें सर्वत्र व्याप्य विद्यमान होनेसे सर्वाङ्ग व्यापि शीतादिकों काज्ञान सम्भव है।स०अणुपरिमाणजीव के अनन्त और आग- न्तुक ज्ञानावयव कल्पनामें कोई प्रमणा नहीं है तार्किकमोहप्रकाशः॥ ११५ प्रमाणाऽभावात् एकस्यैव ज्ञानस्य घ- र्मिरूपत्वं धर्मरूपत्वं संकोचविकास- वत्वं नित्यत्वंचेत्याद्यनन्ताऽसंवद्धकल्प- नस्योन्मत्तप्रलापकल्पत्वात् उक्तरीत्याजी वेश्वरयारनित्यत्व प्रसंगेन तव माध्यमि कशिरोमणित्वापत्ते श्चेत्यलमतिप्रपंचे- न दग्धाङ्गमताभासप्रदर्शनेन * ॥ यदु- तमात्माद्विविधःजीवात्मापरमात्माचेति और एकही ज्ञानके धर्मिरूपत्व धर्मरूपत्व संकोचविकासशीलत्व औरनित्यत्व इत्यादि अनंत असंगत प्रलाप उन्मत्त प्रलाप के तुल्य है और उक्तरीति से जीव और ईश्वर को अनित्यत्वादि दोपके प्रसङ्ग होनेसे तुमको शून्यवादियों का शिरोमणि होना पड़ेगा अब इन दग्ध देहियों के मताभास को बहुत न फैलाकर यहीं समाप्त करता हूं* और जो यह कहाहै कि आत्मा दो प्रकार का है एक जीवात्मा दूसरा परमात्मा 去表 怎么怎么总是太太太太是是是是是是是, तदयुक्तम् आत्मा एकः विभुत्वादाका- यदित्यनुमानबाधात् नचाऽप्रयोजक- ता आकाशादीनामपि नानात्वापत्तेः। एतेन विभुजीवात्मनानात्वमपि निर- स्तम् किञ्च आत्मनो नानात्वे विभु- त्येचाऽभ्युपगम्यमाने सुखदुःखसाङ्क-- प्रसङ्गः आत्मनःसर्वगतत्वेन सर्वात्म- वह अयुक्त है क्योंकि आत्मा एक है विभु होनेसे जैसाआकाश हे इस अनुमानसेआत्माकानानात्व बाधित है और कथित हेतु तर्क शून्य नहीं है क्योंकि आकाशादिकों को नानात्व प्रसङ्गरूप तर्क विद्यमान है और इसही से विभु जीवात्मा को जो नाना ( अनेक) मानना है वह भी खण्डित हुआ और आत्मा को नाना और विभु माननेसे सुख दुःख का साङ्कर्य प्रसङ्ग अर्थात् एक को सुख होनेसे सब को सुख और एक को दुःख होनेसे सव को दुःखका प्रसङ्ग होगा क्योंकि सब आत्माओं को सर्वगत होनेसे सबके तार्किकमोहप्रकाशः ॥ सन्निधावुत्पदयमानं सुखदुःखफलमस्यैव नाऽन्यस्येत्यत्र नियामकाऽभावात् ननु तत्तदात्ममनस्संयोगस्य नियामकत्वमि- तिचेन्न सर्वात्मसन्निधौ वर्तमानम्मनो य दैकेनात्मनासंयुज्यते तदा नाऽऽत्मान्त- रित्यत्र नियामकाऽभावेन तत्तदात्मम- नस्संयोगस्य नियामकत्वाऽयोगात् ननु यदाऽऽत्माऽदएकता यो मनस्संयोगः सन्निधान में उत्पन्न हुआ सुख दुःखरूप फल एक आत्मा का हो दूसरे का न हो इसमें कोई नियामक नहीं है।शतिस तिस आत्मा और मन का संयोग नियामक है। स०सव आत्मा के सन्निधानमें वर्तमान मन जिस काल में ए आत्मा से संयुक्त होता है उस काल में अन आत्माओंसे उसका संयोग नहीं होता है इस किसी नियामक के न होनेसे तत्तदात्ममनस्संयो नियामक नहीं हो सकता है। शलजोमनस्संयो जिस आत्मा के अदृष्ट से उत्पन्न होता "N.. सतदात्मनराव नान्येषामित्यदृष्टस्य निया मकत्वमितिचेन सर्वात्मसन्निधावुत्पदन- मानं धर्माधर्मलक्षणमदृष्टं अस्यैव ना- न्येषामित्यत्रापि नियामकाऽभावेनाऽद्र एस्य नियामकत्वाऽयोगात्ननु रागादी- नामदृष्टनियामकत्वमितिचेन्न तेषाम- प्याऽऽत्ममनस्संयोगजन्यत्वेनोक्तदोषस्य वह उसही आत्मा से होता है अन्यों से नहीं इस रीति से अदृष्ट संयोग का नियामक हो सकता है। स० । सव आत्माओं के सन्निधान में उत्पन्न हुआ धर्माऽधर्मरूप अदृष्ट एक ही आत्माका है दूसरों का नहीं इसमें किसी नियामक के न होनेसे अदृष्ट को भी नियामकता नहीं हो सकती है। श० । जिसकी इच्छा से जो कर्म होता है उससे उत्पन्न हुए अदृष्ट उसही के होते हैं दूसरों के नहीं इस रीति से इच्छादि अदृष्टों के नियामक हो सकते।स। इच्छादिकों को भी आत्ममनः संयोग से उत्पन्न हुए होने से T तुल्यत्वात् ननु तत्तच्छरीराऽवच्छिन्ना- त्ममनस्संयोगस्वरागादिनियामकत्वमि- तिचेन्न सर्वात्मसन्निधावुत्पद्यमानंशरी- रमस्यैव नान्येषामित्यत्र नियामका- भावेन तत्तच्छरीराऽवच्छिन्नात्ममनस्सं- योगस्यापिरागादिनियामकत्वायोगात कथित दोप तुल्य है क्योंकि इच्छादिकों के जनकमनस्संयोगकोसव आत्माओं के साथ तुल्य होनेसे एकही आत्मामें इच्छा हो दूसरे में न हो समें कोई नियामक नहीं है। शाजिस आत्मा शरीर में आत्मा से मन का संयोग होता है हउसही आत्मा में इच्छादिकों को उत्पन्न कर्ता है रीति से भिन्न भिन्न शरीरों में होने वाला त्मिमनस्संयोग इच्छादिकों का नियामक होस- ताहे। स०सव आत्माओं के सन्निधान में उत्पन्न मा शरीरएकही आत्मा का हो दूसरे का न हो में किसी नियामक के न होनेसे उक्त संयोग इच्छादिकों का नियामक नहीं हो सकता है

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तार्किकमाहप्रकाशः ॥ १२१ औपनिषदानान्तु नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त- खरू पस्य कर्तृत्वादिशून्यस्य परिपूर्ण- स्य आत्मनोव्यावहारिकं परिच्छिन्नत्वं- पारमा र्थिकन्त्वापरिच्छिन्नत्व मित्य- नवद्यम् ॥ * ॥ अस्मच्छास्त्रं युक्तियु- क्तं युक्तिहीनन्तु वैदिकम् । इतिमाहे- नजल्पन्ति तेषांमाहात्रसूचितः ॥१॥ स्वाभाविक भेद भी माना परन्तु उन दोपों की निरत्ति न हुई और वेदान्तिओं के मतमें नित्य शुद्ध ज्ञानस्वरूप मुक्त कर्तृत्वादिधर्मों से रहित और परिपूर्ण आत्माको उपाधि सम्बन्ध से परि- छिन्नत्व है और स्वभावसेअपरिच्छिन्नत्व है इस से कोई दोप नहीं है।।*॥और जोतार्किक लोग अर्थात् युक्तिसे पदार्थ तत्व को सिद्ध करने वाले भ्रमसे ऐसे कहते हैं कि हमारा शास्त्र युक्ति युक्त है और वेदान्त शास्त्र युक्ति रहितहे उनके भ्रमका इस ग्रन्धमें प्रकाश किया है अर्थात् उन युक्तिओं को आभासकरके उनका भ्रम सिद्ध किया है।

१. " ग्रन्थोयं ब्रह्मविद्यायाः पादप सम- र्पितः । ग्रन्थपुष्पोपहारेण प्रीताभवतु खेचरी ॥२॥ दक्षिणेद्रविडेदेशे शार- दापत्तनेशुभे। ग्रामवृहत्तडागेतुब्रह्मण्य- कुलसङ्कुले ॥ ३ ॥ सुप्रसन्नमुखाम्भोज- पार्वतीगर्भपङ्कजात् । शान्त्यादि गुण पू- र्णस्य वीर्याच्छङ्करशास्त्रिणः॥४॥ जातः सहस्रनामाख्योमुमुक्षुः पुरुषोत्तमः। गुरु शुश्रूषयापश्चाद्येनवमीक्षहेतुकी ॥ ५॥ यह तार्किकमोहप्रकाशनामक ग्रंथ ब्रह्मविद्याके चरणकमलमें अपर्ण किया है इस ग्रंथरूप पुष्पकी भेंट से खेचरी भगवती प्रसन्ना होवे॥२॥दक्षिण द्रविड़देश के पालघाट तासील में ब्राह्मणोंसेव्याप्त पेरुं कोल ग्राममें ॥३॥सुप्रसन्न हे मुख कमल जिन का ऐसी पार्वती जी के गर्भ कमलसे शान्त्यादि गुणोंसे पूर्ण शंकर शास्त्रीजी के वीर्य से ॥४॥ उत्पन्न होकर जिस पुरुष श्रेष्ठ सहस्रनाम नामक मुमुक्षुने गुरु सेवासे मोक्ष की जनकः।। ५ ॥

तार्किकमोहप्रकाशः॥ १२३ वेदान्ताऽऽगमविज्ञेभ्यः शिवस्पेभ्यएव- च । श्रीरामानन्दनाथेभ्यः प्राप्तादी- क्षापराध्रुवा ॥ ६ ॥ सर्वतन्त्रस्वतत्रेभ्यः कृतपुण्यफलात्मिके । गणपत्यभिधा- नेस्यो दीक्षितेभ्योमृतप्रदे ॥७॥ वेदा- न्तयोगजेविये प्राप्तेपूजेभ्यआत्मनः । श्रीमच्छीत्यागराजाख्यैर्दीक्षितैश्शास्त्र- मूर्तिभिः ॥८॥ वेदान्तजा पुनर्विद्यापूरि- ताहृदयाम्बुजे । सोयं हिमालयेऽद्यापि उत्तम दीक्षा वेदान्त और तन्त्रशास्त्र के विज्ञ शिव रूप श्री रामानन्दनाथ जी से पाई ॥६॥ और अपने पूज्य सब शास्त्रोंमें स्वतन्त्र (सब शास्त्रोंमें ग्रन्थ बनावने में चतुर) श्री गणपति दीक्षित जी से पूर्व पुण्योंका फलरूप और अनर्थ निटत्तिरानन्दावाप्ति रूप मोक्षके देने वाली ॥७॥ वेदान्त और योग विद्या पाई। और शास्त्रकी मूर्ति रूप श्रीत्यागराज दीक्षित जीने ॥८॥ फिर जिसके हृदय कमलमें वेदान्त विद्या पूर्ण करी भिक्षुवेषेण वर्तते॥६॥ श्रीमच्छी ब्रह्म- विद्यायाः पादाब्जरुतमानसः। तेनायं रचितो ग्रन्थो मुमुक्ष्वानन्दवर्द्धकः ॥१०॥ ॥ * ॥ इति श्री परमहंसपरिव्राजक श्री दाक्षिणात्यस्वामिना ब्रह्मानन्दती- र्थन विरचितस्तार्किकमाहप्रकाशः सम्पू गः ॥*॥ वह संन्यासी होकर श्रीब्रह्मविद्या के चरण कमल में चित्तको लगाकर आज कल हिमा- लय पर्वत पर वर्तमान है उसने मुमुक्षु जनोंके आनन्द के वढ़ाने वाला यह ग्रन्थ बनाया है ॥ ९॥ १० ॥ * ॥ 'यह तार्किकमोहप्रकाशका अनुवाद समाप्त हुआ ॥ *॥ *इति श्री परमहंस परिव्राजक श्री प्रकाशा नंद पुरि स्वामिकृत तार्किकमोहप्रकाशभापा- नुवादस्समाप्तः॥*॥

अथदयानन्दमोहप्रकाशः॥ इहखलुगुरुशिष्यपारम्पर्योपदेशेनमन्त्र ब्राह्मणयोर्वेदत्वप्रसिद्धम् कात्यायनाप- स्तंवादिकल्पसूत्रकाराश्च "मन्त्रब्राह्म- णयोर्वदनामधेय” मितिसूत्रेणतत्समूल यन्ति नच कापिब्राह्मणभागस्याऽवेदत्वं प्रतिपादयद्वाक्यमद्यापि केनाप्युपलब्ध इस भारत मंडलमें मन्त्र और ब्राह्मण इन दोनों का नाम वेदहै यह वात गुरु शिष्य परम्परासे बिलोगों में प्रसिद्धहै और इसी बातको (मन्त्रबा- प्रणयोर्वेदनामधेयम्)इत्यादि वेदाङ्गकल्प सूत्रों कात्यायन बोधायन और आपस्तम्बादि महर्षि ग दृढ करतेहैं और ऐसा कोईभी महर्षि वाक्य 'संहिता वाक्य नहीं है कि जिसमें यह कहा कि ब्राह्मण भाग वेद नहीं है मन्त्रभाग ही वेद और यदि किसी प्रवल प्रमाणके विनाही प्रमाण द वस्तुका निषेध किया जाए तो धर्मादि सी पदार्थ की भी व्यवस्था न हो सकेगी नहि निषेधवाक्योपलव्धिविना प्रसिद्ध- स्यप्रमाणसिद्धस्य निषेधोभवितुमर्हति अ तिप्रसंगात् मनु व्यास जैमिनि पाणि- निपतञ्जलिप्रभृतिमहर्षयः वेदशब्दप- -यश्रुतिछन्दःप्रभृतिशब्दैःब्राह्मणवा- क्यान्युदाहृत्यव्यवहरन्तो ब्राह्मणानांवे दत्वमववोधयन्तिाजनकयाज्ञवल्क्यादि और मनु व्यास जैमिनि पाणिनि पतञ्जलि प्रभृति महर्पि लोग भी वेद शब्द के पर्याय श्रुति और छन्द आदि शब्दोंसे निज ग्रन्थों में ब्राह्मणभाग को कहते हुए उक्तार्थ को ही पुष्ट करते हैं और जो यह कहा है कि ब्राह्मण भाग में जनक याज्ञवल्क्यादिसंवाद रूप इति- हास के विद्यमान होनेसे वह वेद नहीं हो सकता है। वह कथन आकिचित्कर है क्योंकि मंत्र भाग में भी स्त्रासुर वधादि रूप इतिहास के विद्यमान होनेसे तुम्हारे मतानुसार मंत्र भाग को भी वेदत्व सिद्ध नहीं हो सकेगा।

संवादरूपेतिहासोपन्यासदर्शनाद्ब्राह्म- णभागस्याऽवेदत्वमिति च युक्तः "मंत्रो- हीनःस्वरतो वर्णतोवा मिथ्याप्रयुक्तोनत मर्थमाह । सवाग्वज्जोयजमानंहिनस्ति- यथेन्द्रशत्रुःस्वरतापराधात्" इतिपाणि नीयशिक्षावचनेनाऽऽभासत्वंस्पष्टीकृतं। नवीनोंकी शंका। मंत्र भाग में इतिहास बोधक पंत्र कोई भी नहीं है अगर कोई मंत्र पूर्वाचार्य- कृत भाष्य सहित दिखाया हो तो भी उसकी इम नहीं मान सकते हैं क्योंकि उन भाग्यकारों की बुद्धि में कुछ फरक था उससे वह ठीक नहीं 'हमार स्वामि जी ने जो अर्थ लिखा है वह । ठीक है इससे मंत्र भाग में कथा सिद्ध नहीं । सकेगी। सिद्धांति समाधान। यह आप का पाल टीक नहीं है क्योंकि वेदाङ्ग पाणिनिमहर्षि- शिक्षा ग्रंथ में "मंवोहीनःस्वरतोवर्णतोवामि- प्रियुक्तोनत.मर्थमाह।सवाग्वजोयजमानं हि- स्तयथेन्द्रशत्रुःस्वरतोपराधात्" ऐसा लिखा है

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दयानन्दमोहप्रकाशः ॥
१२
मंत्रमागे इतिहासादीनांविद्यमानत्वेपि
नकापिहानिः तस्यईश्वरोक्तत्वाऽभावात्।
अस्माकंतु पारमार्थिकजीवस्वरूपाऽभि-
नपरमेश्वरस्य “पराऽस्यशक्तिर्विविधैव
इस पद के समास व्यत्यय हो गया है इंद्रस्य
शत्रुः इंद्रशत्रुः ऐसा होना था उलटा इंद्रःशत्रु-
यस्य सःऐसा बहुव्रीही समास हो गया है यह
उदाहत मंत्र तैत्तरीय संहिता के दूसरा कांड का
है और ऋग्वेद अ० ८ अ० ४ मं० १० सूक्त
८६ में इन्द्र इन्द्राणी और रूपाकपी का इति-
हास प्रसिद्ध है और तेत्तरीय शाखा को प्रति-
कूल होनेसे अप्रमाण भी नहि कह सकते हो
क्योंकि उसके "सहनाववतु इत्यादिमंत्र को उत्तम
जान कर शान्ति के अर्थ आपके स्वामीने लिख
दिया है इससे यह सिद्ध हुआ कि दयानंदकृत
अर्थ असंगत है क्योंकि वेदांग के प्रतिकूल है
और निरुक्त शब्दों का अनेकार्थ योधन करने से
सब को अनुकूल है और प्राचीन सायनाचार्यादि

५चा माह श्रूयते स्वाभाविकीज्ञान वलक्रियाच" इ. त्यादिश्रुति सिद्धाऽनाद्यनिर्वचनीयबुद्धि- स्थानीयमायाशक्तौकार्यकरणसंघातादि विशिष्टस्याऽनाद्यनिर्वचनीयस्य बीजांकुर भाष्य ही ठीक है क्योंकि वह वेदांग और मीमांसा के अनुसारी है और यदि इस शिक्षा वचन को न मानो तो सारे वेदाङ्ग अप्र- माण ही हो जावेंगे क्योंकि एक को आपने न माना दूसरे को दूसरे ने न माना इस भांति सब व्यर्थ हो जायेंगे और तुम्हारे मतानुसार वेदों में उदर पोपक पदार्थ विद्योपदेश के सदृश और जड़ पदार्थ और पश्चादि जीवों के नामधेय के सदृश इतिहास के विद्यमान होने में कुछ हानि भी नहीं मालूम होती है क्योंकि बह्म वि. द्योपदेश महर्पियों के नामधेय उससे कम नहीं हैं और वेद का ईश्वर कर्तृत्व भी सिद्ध नहीं होता है। तथाहि । सिद्धान्ती। वेद किसका बनाया है। नवीन । ईश्वर ने बनाया है। सिद्धान्ती ।

५पागन्दमाहप्रकाशः ॥
वदावर्त्तमानस्य जतुपिंडे सुवर्णरेणुवत्
बीजे अङ्करवच्च प्रलयकाले सूक्ष्मरूपेण
वर्तमानस्यैव प्रपंचस्य पुनःसृष्टिकाले उक्त
परमेश्वरस्थाऽनिर्वचनीय बुद्धिस्थानीय
प्राण मन और शरीरसे रहित परिपूर्ण निराकार
परमेश्वरमें आकाशके सदृश क्रियाके असम्भव
होने से उन्हो ने वेद किस तरह बनाया क्योंकि
वेद के पढाने से बा लिख देने से उनका बनाया
सिद्ध हो सकता है वह उक्त ईश्वर में असंभव है
नवीना आपका कथन सत्य है परमेश्वरने यद्यपि
साक्षात् (खुद) अपना आप वेद नहीं बनाया है
किन्तु अग्निवायु और रवि इन ऋपियों के द्वारा
बनाया है। सिद्धान्ती। यह आप का कथन ठीक
नहीं है क्योंकि उक्तपरमेश्वर में क्रिया का होना
असम्भव है इससे कोई भी पदार्थ वह साक्षात्
अपने आप उत्पन्न नहीं कर सकता है किन्तु
किसी न किसी के द्वारा ही सब पदार्थों की
उत्पत्ति करता है ऐसा आप को मानना होगा

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दयानन्दमोहप्रकाशः ॥
पूर्वयोवैवेदांश्च प्रहिणोति तस्मै" इत्य
दि श्रुतिसिद्ध हिरण्यगर्भसृष्टिद्वाराप्राद
र्भावादितिहासादीनां वेदेषु विदयमान
त्वेपि नकोपिदोषः । येतावदाधुनिक
पहिले विद्यमान ब्राह्मणादि लोग किस वेद
अनुसार कर्म करते थे यदि उन उक्त ऋषि
से पहिले वेद को न मानोगे तो मध्य में उत्प
भया हुआ चेद कुरान के तुल्य अप्रमाण ही
जायगा अगर मानोगे तो उक्त ऋषियों के हा
वेद की उत्पत्ति का कथन असंगत होगा -
यदि उक्त ऋषियों की उत्पत्ति सब से पहि
मानोगे तो वह संभव नहीं है क्योंकि सृ
क्रम से विरुद्ध विना माता पिता के वे कैसे
त्पन्न हो सकेंगे।नवीना आप क्या शास्त्रकोन
मानते हो शास्त्रों में उक्त ऋषियों के द्वारा के
की उत्पत्ति लिखी है। सिद्धांती। ठीक लिखाहो
परन्तु युक्तियुक्त होतो हम मान सकते हैं नहीं
नहीं जैसे तुम श्रादादिकों को नहीं मानते

१३२ दयानन्दमाहाकागः॥ मायाशक्तीसृज्यमानप्राणिकर्मवशादिद- मिदानी नएव्यमित्याकारकरत्यनन्तरं "हिरण्यगर्भस्समवर्तताऽग्रे भूतस्य जातः पतिरेकआसीत् ""यो ब्रह्माणंविदधाति इससे यह नियम सिन्द नहीं हो सकता कि पर- मेश्वर ने उक्त ऋपियों के द्वारा वेद बनाया कुरान् वा अन्य ग्रन्यादि दूसरों के द्वारा नहीं बनाया है क्योंकि यह उक्त युक्ति से बाधित है और पुराणादिकों को तुम्हारे मतानुसार वेद होने में कोई भी शंका न रही ययोंकि वे व्या- सादि ऋपियों के द्वारा रचित हैं और आप के मतानुसार ईश्वरेछादिकों की सिद्धि नहीं होस- कती है यह वातमै तार्किकमोहप्रकाश में लिख चुका हूं और ईश्वर की इच्छा जड़ है वा चेतन हे वा उससे भिन्न हे वा अभिन्न है इत्यादि विकल्पों को न सह सकने से वन्ध्यापुत्र के तुल्य है उससे वेदादिकों की उत्पत्ति की आशा भी निरर्थक है और उक्त ऋषियों को उत्पत्ति से ५पान्दमाहप्रकाशः ॥ पूर्वयोवेवेदांश्च प्रहिणोति तस्मै” इत्या दि श्रुतिसिद्ध हिरण्यगर्भसृष्टिद्वाराप्रादु- र्भावादितिहासादीनां वेदेषु विदामान- स्वेपि नकोपिदोषः । येतावदाधुनिकाः पहिले विद्यमान ब्राह्मणादि लोग किस वेदके अनुसार कर्म करते थे यदि उन उक्त ऋपियों से पहिले वेद को न मानोगे तो मध्य में उत्पन्न भया हुआ वेद कुरान के तुल्य अप्रमाण ही हो जायगा अगर मानोगे तो उक्त ऋषियों के द्वारा वेद की उत्पत्ति का कथन असंगत होगा और यदि उक्त ऋपियों की उत्पत्ति सब से पहिले मानोगे तो वह संभव नहीं है क्योंकि सृष्टि कम से विरुद्ध विना माता पिता के वे कैसे उ- त्पन्न हो सकेंगे।नवीना आप क्या शास्त्रकोनहीं मानते हो शास्त्रों में उक्त ऋपियों के द्वारा वेदों की उत्पत्ति लिखी है। सिद्धांती। ठीक लिखाहोगा परन्तु युक्तियुक्त होतो हम मान सकते हैं नहीं तो नहीं जैसे तुम श्रादादिकों को नहीं मानते हो ४ दयानन्दमाहमकागः॥ AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA मन्त्रब्राह्मणयोर्वदत्वन्नाङ्गीकुर्वन्ति कि- न्तु मन्त्रात्मकाएव वेदास्तत्प्रतिपाद्या- एवधर्मा अनुऐया नेतरे धर्माः तस्मात् श्राद्धमूर्ति पूजनादीनांमन्त्रप्रतिपाद्यत्वा भावेन तेधर्मा नानुष्ठेया इति वदन्ति ओर हमको कोई हठ नहीं है और आप लोगों के सदृश किसी मत की पावन्दीभी नहीं है और उक्त प्रकार से यह सिद्ध हुआ कि वेद में इतिहास के विद्यमान होनेसे आप के सिद्धांत की कुछ हानि नहीं है। नवीन।आप हमारे मत को दोप युक्त दिखाया है आपके मत का क्या हाल है । सिदान्ती । हमारे मत में परमेश्वर का " पराऽस्यशक्तिर्विविधैवश्रूयते” इत्यादि श्रुति सिद्ध अनादि अनिर्वचनीय और बुद्धि स्थानीय एक माया शक्ती है उस माया शक्ती में सकल कार्य कारण वेदादि विशिष्ट अनादि अनिर्व- चनीय वीजांकुर के सदृश पुनः पुनः आवर्तमान और प्रलयकाल में बीजों में अंकुर के सदृश तेत्रप्रष्टव्याः के तेयूयमाधुनिकाःशुत्ये- कदेशशरणाःकुतोलोकादस्मदीयधर्मवि ध्वंसनायसमागताः कथंच युष्माभिरु- पनयनादिसंस्कारपूर्वक सन्ध्यावन्दन- सूक्ष्मरूप से वर्तमान ही प्रपंच सृष्टिकालमें उक्त परमेश्वर का उक्त वुद्धि स्थानीय माया शक्ति में सृज्यमान प्राणियों के कर्म के अनुसार अव यह सृष्टि करनी चाहिए ऐसी रत्ति उत्पन्न होती है उससे बाद “हिरण्यगर्भस्समवर्तताये भूतस्य जातः पतिरेकआसीत्" "यो ब्रह्माणं- विदधातिपूर्व योवैवेदांश्चपहिणोतितस्मै" इत्यादि श्रुति सिद्ध हिरण्य गर्भ सृष्टि होती है उनके द्वारा वेदादि सकल पदार्थोंके उत्पन्न होने से वेदों में इतिहासके विद्यमान होने में कुछ दोष नहीं होसकताहै क्योंकि सबके अनादित्व सिद्ध होनेसे नहो तो असतका उत्पत्तिके प्रसंग होगी और जो आप लोग मन्त्रभाग को ही वेद मानते हो ब्राह्मणभाग को नहीं और मन्त्रों में जो लिखा हे

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तेऽत्र प्रष्टव्याः के तेयूयमाधुनिकाःश्रुत्ये- कदेशशरणाःकुतालाकादस्मदीयधर्मवि ध्वंसनायसमागताः कथंच युष्माभिरु- पनयनादिसंस्कारपूर्वक सन्ध्यावन्दन- सूक्ष्मरूप से वर्तमान ही प्रपंच सृष्टिकालमें उक्त परमेश्वर का उक्त बुद्धि स्थानीय माया शक्ति में सृज्यमान प्राणियों के कर्म के अनुसार अब यह सृष्टि करनी चाहिए ऐसी रत्ति उत्पन्न होती है उससे बाद “हिरण्यगर्भस्समवर्त्तताये भूतस्य जातः पतिरेकआसीत्” “यो ब्रह्माणं- विदधातिपूर्व योवैवेदांश्चप्रहिणोतितस्मै" इत्यादि श्रुति सिद्ध हिरण्य गर्भ सृष्टि होती है उनके द्वारा वेदादि सकल पदार्थों के उत्पन्न होने से वेदों में इतिहासके विद्यमान होने में कुछ दोप नहीं होसकताहै क्योंकि सबके अनादित्व सिद्ध होनेसे नहो तो असतका उत्पत्तिके प्रसंग होगी और जो आप लोग मन्त्रभाग को ही वेद मानते हो ब्राह्मणभाग को नहीं और मन्त्रों में जो लिखा है

साह्मणभागापदफयाक्यांनी विद्यमान होनेमे ।
दर्शनेन प्रामणादीनां अब
| स्कारा धर्मतया प्रतिपादिताः।
। सुक्तिधालाना धो बुद्धौ ब्राह्मराज
पातुई या होरही है और प्रति के
से हम पवनों केतल्य क्यों नहीं जान
। देश पयों निगा। और मन्त्रभाग सूचित
हमारे स्वामीने पदमें न कहे हुए धमाके
नयनादि संस्कारों को कर्तव्य और श्राद;
| पूजनादियों को मापभाग सचित होनेते।
अकर्तव्य पाहते एप आप लोगों को लजाम्।
नहीं आती ओर जाप के वेद में घेदापना
'विधायक वाक्य फेनहोने से वेदाध्ययन रहित।
आप लोग येदिक मेगे हो सकोगे? और अ.
येदिक हुए आप आर्यधर्मी क्योंकर बनोंगे।"
और हमारे मनम तो उपनयनादि विधाया।
tadakatadkikLALE
स्वाभिमादयानन्देन जान
शादिसंस्कारधर्माणां मन्त्रमा
HTTY

सस्कारपूर्व- प्रवृत्तिजनकविधिवा पनयनपूर्वक सन्ध्यावन्दनादीप्रवृत्ति त् कथंवा तंत्रप्रवृत्तिर्जाता प्रवत्यभावे इमको वैदिकत्व सम्यक् हो सकता है। और कारादिकों को ऐसाही करना चाहिए ऐसा करना चाहिए ऐसी नियम बोधक विधिवाक्य तो उसमें जायमान शंका कैसे निवृत्ति होगी हिप्रथमतोसंस्कार करना चाहिए वासंस्कार ऐसे विधिवाक्य चाहिए पश्चात् किसको - किस प्रकार और किस वस्तु से करना हुए ऐसा आक्षेप होताहै वह आक्षेप यह है:- हम आपसे यह पूछते हैं कि सव संस्कार को होना चाहिये मनुष्य को वा पशु को? संस्कार करने का फल क्या है ? और सृष्टि दि में संस्कार किसने किसको किया था ? किस तरह करना चाहिये ? खड़े हो कर

ने
वेदाध्ययनादिधर्माः स्वीकृताः “अएमेव
पैब्राह्मणमुपनयीत""अहरहस्सन्ध्या-
मुपासीत" "स्वाध्यायोध्येतव्य"इत्यादि
विधिवाक्यानां मन्त्रात्मकवेदेऽदर्शनात्
वहही करनेके योग्य धर्म है अन्य नहीं इससे
मन्त्रभाग में न लिखे होनेसे श्राद और मूर्ति-
जनादि न करना चाहिए ऐसा कहतेहोयह आप
पूछा जाता है कि भाई आप वेदके एक भाग
को मानने वाले नए कौन हो अर्थात् आप चारौ
र्णकोमानते होवा नहीं? और उन वर्गों के आप
तिरहोवा वाहर? और हमारेधर्मको नष्ट करने
लिये किस लोकसे आए हो अर्थात् आप हम
रीवों की भक्ति याने गंगास्नानादिकों में श्रद्धा
दूर करनेके निमित्त नया विलक्षण मत कहां
। लाये हो? और आप यज्ञोपवीतादि संस्कार
वक सन्ध्यावन्दन और वेदाध्ययनादिधर्मोको
योंकर मानते हो वे तो किसी मन्त्रभागमें करने
ही लिखे हैं और "अष्टमें वर्षे ब्राह्मणमुपनयीत"

कथंच दयानन्दस्य चतुर्थाश्रमसिद्धिः में त्रे "ब्रह्मचर्यसमाथ्यगृहीभवेत् गृहाव- नीभूत्वाप्रव्रजेत्" ब्रह्मचर्यादेवप्रव्रजेत्" इति संन्यासविध्यभावात् एतेन आश्रमा न्तराण्यपिव्याख्यातानि कथञ्चयुष्म- "अहरहःसन्ध्यामुपासीत "स्वाध्यायोध्येतव्यः" इत्यादि विधिवाक्यतोमन्त्रभागमें नहीं दीखते हैं और आप दयानन्द को संन्यासी कैसे कहते हो? मन्वों में तो कहीं संन्यासका विधान नहीं है और ब्रह्मचर्यादि किसी आश्रमका भी विधान नहीं है औरमन्त्रभागमें जातकर्म और नामकरणादिकों के विधानके न होनेसे आपके स्वामी दयानन्दने अवैदिक संस्कारब्राह्मणादिकोंकेधर्म कैसे कहे? ओर बाह्मणभागको वेद न माननेसे युक्ति कुशल आप लोगों को ऐसे विकल्प क्यों नहीं उत्पन्न होते ? कि मन्त्रभागमें उपनयन संस्कार पूर्वक सन्ध्यावंदनादिकोंमें प्रवृत्त करने वाले विधिवाक्य के न होने से उनमें हमारी प्रवृत्ति कैसे होगी “ २७ दयानन्दमाहप्रकाशः ॥ से हम स्वामिनादयानन्देन जातकर्मनामकर- णादिसंस्कारधर्माणां मन्त्रभागे विध्य- ऽदर्शनेन ब्राह्मणादीनां अवैदिकास्सं- स्कारा धर्मतया प्रतिपादिताः कथंच युक्तिकुशलानां वो वुद्धौ ब्राह्मणभागस्य वा हुई वा होरही है और प्रवृत्ति के न होने यवनों के तुल्य क्यों नहो जाएँगे और हमारे स्वामीने वेदमें न कहे हुए धर्मोको उप- देश क्यों किया । और मन्त्रभाग सूचित उप- नयनादि संस्कारों को कर्तव्य और श्राद्ध मूर्ति- पूजनादिकों को मन्त्रभाग सूचित होनेसे भी अकर्तव्य कहते हुए आप लोगों को लज्जा क्यों नहीं आती? और आप के वेद में वेदाध्ययन वेधायक वाक्य के न होने से वेदाध्ययन रहित आप लोग वैदिक कैसे हो सकोगे ? और अ. दिक हुए आप आर्यधर्मी क्योंकर वनोंगे ? मोर हमारे मतमें तो उपनयनादि विधायक राह्मणभागरूपवेद के वाक्योंको विद्यमान होनेसे AAA वेदत्वानङ्गीकारे यज्ञोपवीतसंस्कारपूर्व- कसन्ध्यावन्दनादौ प्रवृत्तिजनकविधिवा क्यस्य मन्त्रात्मकवेदेऽसत्वात्कथमस्माक- मुपनयनपूर्वक सन्ध्यावन्दनादौप्रवृत्ति वेत् कथंवा तत्रप्रवृत्तिर्जाता प्रवृत्यमावे हमको वैदिकत्व सम्यक् हो सकता है। और संस्कारादिकों को ऐसाही करना चाहिए ऐसा न करना चाहिए ऐसी नियम वोधक विधिवाक्य नहो तो उसमें जायमान शंका कैसे निवृत्ति होगी तथाहि प्रथमतोसंस्कार करना चाहिए वासंस्कार करो ऐसे विधिवाक्य चाहिए पश्चात् किसको और किस प्रकार और किस वस्तु से करना चाहिए ऐसा आक्षेप होताहै वह आक्षेप यह है:- याने हम आपसे यह पूछते हैं कि सव संस्कार किसको होना चाहिये मनुष्य को वा पशु को? इस संस्कार करने का फल क्या है ? और सृष्टि के आदि में संस्कार किसने किसको किया था ? और किस तरह करना चाहिये ? खड़े हो कर .

वा कथमस्माकं यवनतुल्यत्वं न भवेत् कथमस्मत्स्वामिना वेदाऽविहिताधर्मा उपदिष्टा इत्यादिविकल्पसमुदायोना- पन्नः कथंचमंत्रभागसूचितानामुपनय- दिसंस्काराणांकर्तव्यत्वं तत्सूचितानां वा बैठ कर वा चलते चलते ? और पूर्वा- मुख वा उत्तराभिमुख वा दक्षिणाभिमुख वा च्छिमाभिमुख वा अधोमुख वा उर्दोमुख हो र? और किस काल में ? प्रातःकाल में चा ध्यान्ह काल वा सायंकाल वा अर्द्धरात्रि में वा नियत काल में वा खा करके वान खा करके? र इन संस्कारों को पिता करेगा? वा माता रेगी? वा दादा करेगा? वा दादी वा नाना 'नानी? कोन करेगा? और शिखा का स्थान र पर कहां होना चाहिये ? सिर के उत्तर [ग में ? वा दक्षिणभाग में? अथवा पूर्व वा च्छमभाग में? वा मध्यभाग में? और शिखा । लम्बाई चौड़ाई कितनी होनी चाहिये ?

. श्राद्धमूर्तिपूजनादीनामकर्तव्यत्वंच वद- तोभवन्तो लज्नांन भजन्ते कथञ्च भव- तांभवदीयवेदे वेदाध्ययनविध्यऽभावेन वेदाध्ययनरहितानांवेदेकशरणत्वंभवेत् कथञ्च - भवतामवेदिकानामार्यधर्मवत्वं उसके स्थानकी आकृति चतुष्कोण होना चा- हिये ? अथवा त्रिकोण वा गोल ? और इस शिखा के धारण करने का फल क्या है ? और जनेऊ धारण करने का क्या प्रयोजन है ? और यह जनेऊ किस चीज का होना चाहिये? सूत का वा रेशम का अथवा उन का वा सन का या मूंज का चा कुशादिकों का ! और जनेऊ की लम्बाई वा मुटाई कितनी होनी चाहिये? और शरीर के किस भाग में धारण करना चाहिये? सिर में वा कान में वाहाथमें चागले में अथवा कमर में या पेर में? और जनेऊ किसके हाथ का बना हुआ धारण करना चाहिये ? ब्राह्मण के हाथका ? या क्षत्री वा वैश्य वा शूद्रके हाथका?

MAHA भवेत् अस्माकन्तु उपनयनादिविधिवा क्यानांब्राह्मणात्मकेवेदे विद्यमानत्वाद्वै दिकत्वं विशिष्टतरम् । किंच संस्कारा- दीनां कंभावयेत् कथंभावयेत्केनभा- वयेदितीतिकर्तव्यताकांक्षाया मितिकर्त- व्यतानियामकविध्यऽभावे कथमित्थमेव अथवा मुसलमानके हाथका वा भंगीके हाथ का? और मृतक संस्कारमें हवन मृतकके ऊपर क- रना चाहिये अथवा अगल बगलमें? अगर मृतक के ऊपर होतो किस अङ्गमें होना चाहिये?पैरमें वा कटिमें अथवा छातीमें वा हाथमें वा मुखमेंवा सिर में? अगर अगल बगल होवे तो किस दिशामें? और मृतकको वैठाकर अथवा खड़े करके वासुला कर फूकना चाहिये? इन सब ऊपर लिखे हुये आ- क्षेपोंको जव तक आप संहिताके मंत्रोसेन सिद्ध करियेगा तब तक यह सब संस्कार वेदोक्त केसे कहे जायेंगे। और हमारे मतमें ब्राह्मण और कल्प सूबादिकोंमें उक्त आक्षेपका परिहार स्पष्टही है।

दयानन्दमाह कर्तव्यं नेत्थमिति नियमसिद्धिः कथंवा तत्रजायमानशंकानिवृत्तिर्भवेत् मंत्रेता दूशविध्यऽनुपलंभात् * किंच"अथय- एषोन्तरादित्येहिरण्मयःपुरुषोदृश्यते- हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्स- र्वण्वसुवर्णः तस्ययथाकप्यासं पुंडरीकं और “अथ य एपोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पु- रुपोदृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेशआप्रणरचात् सर्वएवसुवर्णः तस्य यथा कप्यासंपुण्डरीकमेवम- क्षिणी" "सतस्मिन्नेवाकाशेस्त्रियमाजगामबहुशो- भमानामुमा हेमवती तांहोवाच किमेतद्यक्षमि- ति" "वाचं धेनुमुपासीत" "मनोवूह्मेत्युपासीत" "आदित्यो बृह्मेत्युपासीत ऐसीर बहुतसी वाक्ये बाह्मण भाग में देखी जाती हैं यह सव चाक्ये आपके मतानुसार यदि मंत्र भागको व्याख्यान करने वाली होवें तो प्रतीकोपासना (याने प्रतिमा में ईश्वर की उपासना) भी वेदोक्त सिद्ध होती है और "याते रुद्रशिवातनूः" इत्यादिक मंत्रोंका AALAALAALAALAA एवमक्षिणी""सतस्मिन्नेवाकाशस्त्रियमा नगामबहुशोभमानामुमां हेमवतींतां- होवाचकिमेतदक्षमिति" "वाचंधेनुमु- सीत" "मनोब्रह्मेत्युपासीत" "आदि योब्रह्मेत्युपासीत" इत्यादीनिवहूनिप्र- तीकापासनाविधिपराणिब्राह्मणवाक्या युपलभ्यते तेषां मंत्रव्याख्यानस्यत्वे- पैप्रतीकापासनायाः श्रुतिमूलत्वं सिद्धं अर्थ पूर्वोक्तवाक्योंके द्वारासिद्ध होनाभी उचित और श्रीव्यासकृत ब्रह्मसूत्रमें भी “बृह्मदृष्टिरु- कर्पात्" (अ०४ सू०५) इस सूत्रमें “आदित्यो- ह्मेत्युपासीत" इत्यादि वाक्योंका अर्थ इस प्र- र आक्षेप पूर्वक सिद्ध किया है कि परमेश्वरमें आदित्य भावना करनाचाहियेवा आदित्यमें पर- 'श्वर भावना करनाचाहिये ऐसी शंका करके यह ड किया कि आदित्यमें परमेश्वरकी ही भावना रना चाहिये क्योंकि परमेश्वर उत्कृष्टहै और सब लोंका देनेवालाहै इसमें राजभृत्यका दृष्टान्तभी दयानन्दमाहप्रकाशः ।। १४५ युक्तंच तेपां “यातेरुद्रशिवातनू"रित्या- दिमन्त्रव्याख्यानपरत्वमपि। ब्रह्मसूत्रे- पि (ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात्) (अ०४सू०५) इत्य ब्रह्मणिआदित्यदृष्टिकर्तव्या? वा 'दित्येब्रह्मदपिरितिसंशय्य उत्कृष्टत्वादि- हेतुनाराजमृत्यदूपान्तेनचादित्येब्रह्मद प्टिरितिभगवत्पूज्यपादेर्व्यवस्थाकता अ नेन वेदार्थनिर्णयायप्रवृत्तसूत्रमूलत्व- मपितस्यास्सूचितं अन्यथा ब्राह्मणभा- गप्रवर्तकानामृपीणां मिथ्यापलापित्वं दिया हुआहे इससे यह सिद्ध हुआ कि प्रती- कोपासना सूत्र प्रमाणफ भीहै। अगर आपप्रती- कोपासनाको श्रुति सूव सिद्ध न मानोंगे तो याह्मण भाग प्रवर्तक ऋपियोंको मिथ्या बादित्य प्रसङ्ग होगा अगर यह कहो कि होने दो हमारी पपा हानि है तो आप के स्वामी दयानन्द जी धन की क्या गति होगी ? और उत्तः विधि यायोका दृमरा अर्थ होना असम्भव है।

४६ दयानन्दमोहप्रकाशः॥ प्रसज्येत अस्तु काहानिरितिचेत्तर्हि द- यानन्दप्रलापस्यकागतिर्भवेत् नह्येषाम न्यार्थत्वं कल्पयितुंशक्यं विधिवाक्याना- मनन्यपरत्वात सर्वेषांमंत्राणांसर्वार्थक- त्वकल्पनासंभवेन सर्वषां सर्वाभीष्ट सिद्धि प्रसंगात् स्पष्टार्थकानांवाक्यानांसाहस- मात्रेणाऽन्यार्थत्वकल्पने प्रतारकत्वप्रस- गाच्च।* किंच सर्वेषुशास्त्रेषुस्वमतस्थाप नाय परकीयमतखण्डनप्रकरणे जीवन ह्मणोरभेदरूपं वेदान्तसिद्धान्तमुपन्यस्य अगर खींच खांच कर दूसरा अर्थ किया जावै तो किसी मंत्रोंके भी अर्थकी व्यवस्था सिद्ध न होगी क्योंकि धातुओंके अनेक अर्थ हो सकते हैं इससे स्पष्ट वाक्यों का साहस करके दूसरा अर्थ करना प्रतारणा माव है। और आप वेदा- न्तियों को नवीन वेदान्ती कैसे कहते हो पटु- दर्शनों में अपने मतों के खंडन मंडन प्रकरणों में जीव ब्रह्म के अभेद रूप सिद्धांत को खंडन करते हुये शास्त्रकार उस वेदांत सिद्धांत को दयानन्दमोहमकाशः॥ ११७ खंडयन्तः तस्य नूतनत्वंवारयन्तितेनच तानुद्दिश्य नवीनवेदान्तीति वदतःशास्त्र बुद्धिमान्द्यंस्पष्टीकृत। किंचपराभिमतमं त्रमागे ईशावास्योपनिषदि “योसावसौ- पुरुषस्सोहमस्मि" इत्यत्र अनन्यार्थवा- धकेनोत्तमपुरुषप्रयोगेन(आत्मेतितूपग- च्छन्तिग्राह्यन्तिच) अ०४सू०३इत्यादिसू- त्रैश्चजीवपरयोरभेदाऽवगमात्कथंतत्सि- द्वान्तस्यनवीनत्वं किंचत्वन्मतानुसारेण- अनादित्व सूचन करते हैं ऐसे वेदांतियों को जो नवीन कहते हैं उनकी बुद्धिको क्या कहना चाहिये। और आपके अभिमत मंत्र भागके ईशावास्योप- निपद के “योसावसोपुरुपस्सोहमस्मि"इस वाक्य में अनन्यार्थबोधक "सोहमस्मि" इस उत्तम पुरुप प्रयोगसे जीव बृह्म का अभेद स्पष्ट ही सिद्ध होता हैइससे वेदांतियों कानवीनहोना कैसे सिद्धहोस- कता है और श्रीव्यासकृत ब्रह्मसूत्रके "आत्मेति- तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च" अ० ४सू०३ इस सूत्र में जीवब्रह्म का अभेद स्पष्ट ही सिद्ध हुआहे १४८ दयानन्दमोहप्रकाशः ॥ ब्राह्मणभागस्य मंत्रव्याख्यापरत्वेपि"प्र ज्ञाप्रतिष्ठाप्रज्ञानंब्रह्म 'अहंमनुरभवंसू- र्यश्च""अहंब्रह्माऽस्मि त्वंवाअहमस्मि भगवादेवतेअहंवैत्वमसिदेवते "ब्रह्मवि ब्रह्मैवभवति" "सयश्चायंपुरुषेयश्चा:- सावादित्येसएकः” “तत्वमसि" "शान्तं शिवमद्वैतंचतुर्थमन्यन्तेसात्मा सविज्ञे यः""अयमात्माब्रह्म ""अन्योसावन्योह- मस्मिनसवेद" "उदरमंतरंकुरुते अथत स्यभयंभवति" "मृत्योस्समृत्युमाप्नोतिय इससे वेदांती नवीन कैसे ठहर सकते है और आपके मतानुसार वाह्मणभाग मंत्र व्या- ख्यान रूप होवे तो भी "प्रज्ञा प्रतिष्ठाप्रज्ञानं ब्रह्म,, अहंमनुरभवंसूर्यश्च" "अहंब्रह्मास्मि" "त्वं- चाअहमस्मि देवते अहंवेत्वमसि देवते""ब्रह्मवि- हौवभवति" "सयश्चायं पुरुपेयश्चासाचादित्येस एकः "तत्वमसि" "शांतंशिवमंद्रुतम् चतुर्थमन्यं- ते स आत्मासविज्ञेयः" "अयमात्माब्रह्म"अन्यो- "सावन्योहमस्मिनसवेदः" " उदरमन्तरं कुरुते दयानन्दमोहप्रकाशः॥ १४९ इहनानेवपश्यति" इत्यादीन्यनन्यार्थबोध कानि मध्यमोत्तमपुरुषप्रयोगघटितानि जीवेशयोरभेदबोधकानि तद्भेदनिन्दाप- राणिच वाक्यानि सहस्रशस्तत्रोपलभ्य मानानि केषांमंत्राणामर्थानबोधयन्ति। कथमिव ते मन्त्रव्याख्यातृकामैरेतानि- त्वत्प्रतिपक्षभूतानि वाक्यान्यन्त्रप्रयुक्ता- नि कथमिव तेषांब्राह्मणभागप्रवर्तकानां अथ तस्य मयंभवति "मृत्योस्समृत्यु मानो- ति यइहनानेव पश्यति इत्यादि अनन्यार्थ बोधक मध्यमोत्तमपुरुषप्रयोगघटित जीव ब्रह्म के अभेद बोधक और जीव ब्रह्म के भेद दृष्टि निन्दा बोधक हजारों वाक्ये ब्राह्मण भाग में उपलभ्य मान होती हैं अब हम आपसे पूछते हैं कि यह सव उपरोक्त वाक्य किन २ मंत्रों के अर्थों को योधन करती हैं? और आपके प्रतिपक्षरूप जीव ब्रह्म के अभेद बोधक वाक्ये इस ब्राह्मणभाग में इसके प्रवर्तक ऋषियों ने कैसे डाली हैं ? और इन ऋपियों का यदि भेद वाद इष्ट होवे M भेदवादः सिद्धेवत् कथमिव त्वदीयभेदवा दस्याऽनादित्वंभवेत् कथमिव तैर्जीवप- रभेदबोधकानिस्पष्टानिवाक्यान्यत्र नप्र- युक्तानि प्रयुक्तान्यपिचेट्वेदस्य लोकप्रसि- द्वत्धेनतेष्वज्ञातज्ञापकत्वरुपप्रामाण्या ऽभावात्कथमिव तानि वाक्यानि प्रमा- णपथमारोहेयुः अर्थवत्येसत्याज्ञातज्ञा- पकत्वं प्रामाण्यमितिहि तंत्ररुत्सिद्धांतः तो उसकी सिद्धि कैसे होगी और आप के मतमें भेद वाद अनादि कैसे सिद्ध हो सकेगा? उन ऋषियों ने जीव ब्रह्मके भेद वोधन करने वाली स्पष्ट वाक्यें क्यों नहीं लिखी थी ? अगर लिखा भी हो तो वै प्रमाण सिद्ध कैसे होगी क्योंकि अज्ञातार्थवोधकरूप प्रमाण उनमें नहीं है और लोकप्रसिद्ध भेद को सिद्ध करना भी व्यर्थ है इसी अभिप्राय से शास्त्रकारों ने प्रयो- जन सहित अज्ञातार्थबोधक वाक्यको ही प्रमाण माना है और लोकप्रसिद्ध होनेसे “अग्निर्हिमस्य- भेषजम्" इत्यादि वाक्यों को अनुवाद माना है दयानन्दमोहप्रकाशः ॥ अतएव "अग्निर्हिमस्य भेषज" मित्यादी- नामनुवादकत्वमुपपदरते नादाहृत- वाक्यानां मंत्राऽस्पर्शित्वं कल्पयितुं शक्यं तद्वपाख्या तृणां याज्ञवल्क्यादीनां प्रता- रकत्वमसंगेन तद्वयाख्यानरूपस्य ब्रा- ह्मण भागस्याऽप्रामाण्यापत्तेः नांशतः- प्रामाण्यमंशतो ऽप्रामाण्यमित्यर्द्धजर- तीयं संभवति सर्वेषां सर्वत्र यथाकामं और अगर आप यह कहो कि बाह्मण प्रवर्तक ऋषियों ने उक्त बाक्ये अपने तरफ से लिख दिया है मंत्र के व्याख्यान रूप नहीं है यह आप का कथन ठीक नहीं है क्योंकि उनऋषियों को प्रतारक त्वप्रसङ्ग होनेसे उनका बनाया हुआब्राह्मण भाग भी अप्रमाण होगा और आप यह नहीं कह सकते है कि ब्राह्मणभाग में कोई अंश तो प्रमाण है और कोई अंश अप्रमाण है ऐसा कहने से तो वही मसल होगी कि वृद्धा स्त्री के सव अंग को न चाह कर केवल मुख को चाहना इस अर्ध जरती यन्याय के अनुरागी आप को होना पड़ेगा।

AAAA
प्रामाण्याऽप्रामाण्यकल्पनोपपत्या शा.
स्त्रीयव्यवहारलीपापत्तेरित्यलमर्द्धचार्वा
कमताऽतिप्रपंचेन। वेदोट्सवञ्च युक्त्याढयं
मतमेतन्महोत्तमांइतिमाहेनजल्पंतितेपां
माहात्रसूचितः ॥ इतिश्रीपरमहंसपरि
ब्राजकदाक्षिणात्यश्रीब्रह्मानन्दतीर्थकृत
दयानन्दमोहप्रकाशस्समाप्तः॥*
और यदि सब मनुष्य अपनी इच्छानुसार प्रमा-
ण और अप्रमाण कल्पना करके धर्म व्यवस्था
करने लगेंगेतो शास्त्र व्यवहारही लोपहो जायगा
और जो नवीन लोग हमारा मतवेद मूलकहै
युक्ति युक्त है अत्युत्तम है और वेद वेदाङ्ग
कल्पसूत्रानुयायी लोगपोपहै और वेदान्तअन्धेरा
वेदांती नवीनहै ऐसी बहुतसी वातैभ्रमसे कहतेहैं
उनकथनोका यह भ्रममूलकताअर्थात् वेदवेदाङ्ग
न्याय मीमांसादि शास्त्राऽज्ञानमूलता दिखायी है
इस विषयमें मेरी बहुत कुछ लिखनेकी इच्छा थी
परन्तु हिन्दीभाषाअच्छी तरह न जाननेके कारण
सेइस अईचार्वाकमतकोअवयहींसमाप्त करताहूं।।
इतिश्रीपरमहसपरिजानकदाक्षिणात्य श्रीब्रह्माननतीकृत बयानन्दमोहमहाराभाषानुकासा
महोदनवेन्द्रब्दे घेदेन्दुयसभामते शके च फाल्गुने मासेसितेपोसुसंस्कृत
जप्रन्धको इण्डियनप्रेसने रजिष्टरीकराकर सबमधिकारस्थाधीनहीलाई)

11 पुस्तका का सूचीपत्र । रामायण २) सजन महारायों को स्मरण होगा कि पहिले हम इस विषय का एक विज्ञापन देके कि थोड़े दिनों से हमने संस्कृत और हिन्दी पुरुन पाने का भी प्रबन्ध किया है और उपम श्री गोस्वामि नुनसीदास जी महाराज कृत श्रीमद्रामायण चिकने कागज और बड़े निमप में पद पर भन्नग अलग कर सर्वसाधारण के सुगमतार्थ मनोहर चित्र विचित्र हिन पुट लिस्ट में छपी है। हसरी विपता यह है कि निल्न के ऊपर श्रीहनुमान भी ससवीर रुपहरी लगी हुई रे मोर श्री गोस्वामी तुलसीदासनी की तसवीर अायुत्तम पमही विराजमान र शेर भी सामयिक तसवीर यथा योग्य स्थान पर नगर गई। र पक कथायें साभिन्न है । मूल्य के वन रूपहरी विश्युक्त २॥) रुपया मोर सादी परत की निन्द्र का m) रुपया रकवा है। दुर्गा-सप्तसती कारयावनी मयोग विधि और कोल कवर परांना नवार्ण मा किशि वीसक सुन तस्यनय सहित महुत साफ और मोटे विकने पुष्ट कागम में भोर मो शार या सप्यार॥ विष्णुमहसनाम खोटी साँची भोर पुट कागज मोटे भाग में पीखिने योग्य है। एकमुखीहनुमत्कयच पार की पूर्व पुस्तक हाम पीड़ा काम बहुत है" एकोदिष्टप्राद्धमापाटीकामहित) देखिये यह सा सपकारी पन्म है कि कम परे भी आपण ससे पथरएको. भात का सकते हैं। महोर मोर पस्नु की पारयकता पो २ तर भाषा ना दिपार त्रिवेणीस्तोत्र मल पारय देखिये खन जोग) जिम में कारयकर तपन कर बता कोको श्रीविवेणी जी की रनुनिखिली गोकोसोपा करनेवारने मेगावाहिये। हो भागका मनि) महिमनस्तोत्र पेको कागम और भोट हाईपछी पोर जरा सोची पार करने कोभानमा पारुमका हम निगमकान रंगार बार सरी पाक बारातिय पात्रमा मा tirat ranमामे गरीरभर भोर मानसिक तास भानु में भी गोरी रानाभाये गये मुखinframerarian मौतमविहार NEPARरिसोरमा मौसमीर और सीप रागनी HTEPTim निको पारा गाना frieी ना iiL श्री सिगारमा mitis

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Tarkikmohaprakash

Author
Shree Paramhans Parivarjak
Title
Tarkikmohaprakash
File name
Tarkikmohaprakash
Text
OCR done
Citation
1892
Published
2011/08
Publisher
Prayag, Shree Chintamanighosen
Language
Sanskrit
Pages
178
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
DLI number
310966
Barcode
99999990314402.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
keWLTn7tG1X
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