Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Shri Gyatadharam Kathaga Sutra Ki Unnis Kathay

2011/03

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DATE श्री ज्ञाताधर्म कथाङ्ग सूत्र उन्नीम कथाए श्रमण भगवान महावीर मामी के गौतम स्वामी आदि ग्या- रह गणधर हुए हैं । "उप्पएण्ड वा विगमेह वा पुड पा" हम विपदी का ज्ञान प्राप्त कर गणधरों ने द्वादशाङ्गी की रचना की, जिममें ज्ञान दर्शन चारित्र ये नीन मोत क उपाय बतलाए गए । मय शास्त्रों क मुख्य रूप से चार विभाग है- द्रव्यानुयोग, गणितानुयोग, चरणकरणानुयोग और धर्मकथानुयोग। छठे श्रङ्ग 'नाताधर्मकथाङ्ग मन में कयानुयोग का वर्णन है भगवान महावीर स्वामी के ग्यारह गणधरों में में पाँचवें गणवर श्री सुधर्मा स्वामी की ही पाट परम्परा चली है। वर्त मान द्वादशागी के रचयिता श्री सुधर्मा स्वामी ही माने जाते हैं। उनके प्रधान शिष्य श्री जम्ब म्वामी ने प्रश्न किये हैं और उन्होंने उत्तर दिये है । उत्तर देते समय सुधमा म्यामी ने प्रत्येक स्थल में ये गन्द कहे हे-हे श्रायुप्मन् जम्मू ! जैसा मैंने भगवान महातीर स्वामी से सुना है, वैमा ही तुझे कहता हूँ।

श्री सेठिया जैन प्रथमाला इसमे यह स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि इस द्वादशागी का कथन मर्वज्ञ देव श्री महावीर स्वामी ने भव्य प्राणियों के हितार्थ किया है। इसमें श्री गौतम स्वामी और श्री सुधर्मासामी की सतन्त्र प्ररूपणा कुछ भी नहीं है । 'जमा भगवान महावीर स्वामी ने फरमाया है वैसा ही मैं तुझे कहता हूँ' इस वाक्य मे श्री सुधर्मा स्वामी ने "श्राणाए धम्मो" अर्थात वीतराग भगवान् की आज्ञा में ही धर्म है और उनके पचन को विनय पूर्वक स्वीकार करना धर्म का मुख्य अग है, इस तत्व का भली भाति प्रतिपादन किया है। श्री अम्बू स्वामी ने चारनार प्रश्न क्येि हैं । इसम यह बतलाया गया है कि शिय को विनयपूर्वक जिज्ञासा युद्धि मे प्रश्न करके गुरु से ज्ञान ग्रहण करना चाहिए क्योंकि विनयपूर्वक ग्रहण किया हुश्रा ज्ञान ही श्रात्मकल्याण में सहायक होता है। जम्बू स्वामी चे प्रश्न के उत्तर में श्री सुधर्मा स्वामी कहते हैं कि छठे अग श्री ज्ञाताधर्मस्था के दो श्रुतस्कन्ध कहे गए हैं- नाता और धर्म कथा । ज्ञाता नामक प्रथम श्रुतस्कन्ध के उन्नीम श्रध्ययन हैं। प्रयेक अध्ययन म एक दृष्टान्त (उदाहरण) दिया गया है और अन्त में दान्तिक के साथ सुन्दर ममन्वय करक धर्म के रिमी एक तत्व शे दृढ़ किया गया है। यह सम्पूर्ण सूत्र गद्यमय है। कहीं कही पर कुछ गाथाए दी गई हैं। इस शास्त्र में नगर, उद्यान, महल, शय्या, समुद्र, स्वम, स्वामी के फल आदि का तथा हाथी, घोड़े, राजा, रानी, सेठ, सेनापति आदि जगम पदार्थों का वर्णन बहुत विस्तारपूर्वक दिया गया है। कथा भाग की अपेचा वर्णन का भाग अधिक है। जहाँ पर पूर्व पाठ का वर्णन फिर से आया है वहाँ "जार ( यावत् )" शब्द देकर पूर्व पाठ की भलामण दी गई है। सामान्य ग्रन्थ की अपेक्षा शास्त्र में गम्भीरता और गुरुगमता ។ ज्ञाता० सून की उन्नीम कथाए निशेप होती है । इस लिए शास्त्र अध्ययन के अभिलापी मुमुक्षु प्रात्माओं को शास्त्र का अध्ययन श्रद्धा पूर्वक गुरु के पास ही करना चाहिए । इस तरह से प्राप्त किया हुअा ज्ञान ही आत्म- कल्याण में विशेष सहायक होता है। (१) मेधकुमार की कथा पहला अध्ययन- प्रिनय का स्वरूप पतलाने के लिए पहला अध्ययन कहा गया है । इसका नाम 'उत्क्षिप्त है। यदि कोई शिष्य अग्निीत हो जाय तो उसे मीठे बचनों से उपालम्भ देकर गुरुं को चाहिए कि वह उसे विनय मार्ग में प्रवृत्ति कराये। इस प्रकार उपदेश देने के लिए पहले अध्ययन में मेधकुमार का दृष्टान्त दिया गयाहै। राजगृह नगर में ग्रेणिक राना राज्य करता था। उसकी रानी का नाम नन्दा देवी या। उसकी कुक्षि से उत्पन्न हुआ अमयकुमार नाम का पुत्र था । वह राजनीति में बहुत चतुर था । औत्पातिकी, पैनयिकी श्रादि चारों बुद्धियों का निधान था । यह राजाकामनी था। श्रेणिक राजा की छोटी रानी कानामधारिणी था। एक समय रानि के पिछले पहर में उसने हाथी का शुभ स्सम देसा। राजा के पास जाकर उसने अपना स्नम सुनाया। राजा ने कहा-देरि! इमशुमस्वम के प्रभाव से तुम्हारी कुक्षि से किसी पुण्यशाली प्रतापी पाला का जन्म होगा । यह सुन कर रानी बहुत प्रसन्न हुई। दसरे दिन प्रातःकाल पमपाठकों को बुला कर राजा ने स्वम का अर्थ पूछा । उन्हान बतलाया कि यह स्वम बहुत शुभ है । रानी की कुक्षि से किमी पुण्यशाली प्रतापी चालक का जन्म होगा। यतनापूर्वक अपने गर्भ का पालन करती हुई धारिणी रानी समय बिताने लगी। तीसरे महीने में रानी को अकाल मेघ का दोइद (दोहला) उत्पन्न हुआ। वह सोचने लगी-निजली सहित श्री मठिया नन प्रमाला - गर्नता हुआ मेघ हो, छोटी छोटी चूदें पड रही हो, मनन हरियाली हो, मोर नाच रह हो प्रादि सारी बाते वर्षाऋतु सी हा | गेम समय म वनक्रीडा करने वाली माताएं वन्य हैं। यदि मुझे भी एसा योग मिले तो भार पर्वत के ममीप क्रीडा करती हुई में अपना दोहद पूर्ण करु। धारिणी रानी की इच्छा पूरी न होने स यह प्रतिदिन दुनल होने लगी। दासिया न जाकर राजा को हम यात मी सूचना दी। राजा न रानी में पूछा-प्रिये ! तुम्हारे दुर्बल होने का क्या कारण है और तुम इस प्रकार प्रातध्यान क्यों कर रही हो ? तर रानी न अपने दोहद की बात कही। राजा ने कहा-मैऐसा प्रयत्न करूँगा जिसमे तुम्हारी इन्छा शीघ्र ही पूर्ण होगी ! इस प्रकार रानी को श्राधासन रेकर राजा वापिस अपने महल म चला आया। रानी केदोहद को पूर्ण करन का वह उपाय मोचने लगा किन्तु उम कोई उपाय न मिला। इससे राना थार्तध्यान करने लगा। इसी समय अभयकुमार अपने पिता के पादवन्दन करन के लिए वहाँ श्राया। अभयकुमार के पूछने पर राना ने उस अपनी चिन्ता का कारण बता दिया। अभयकुमार न महा-पिताजी! आप चिन्ता मत कीजिय । मैं शीघ्र ही एमा प्रयत्न करूँगा निमस मेरी लघु माता का दोहद शीघ्र ही पूरा होगा। अपन स्थान पर श्रार अभयकुमार न विचार किया कि अमाल मेघ का दोहला देवतासी सहायता के बिना पूरा नहीं हो सस्ता । ऐसा विचार कर अभयकुमार पोपयशाला में पाया। अहम तप (तीन उपनास) स्वीकार करक अपन पूर्वभय के मित्र देव का स्मरण करता हुआ वह समय वितान लगा। तीसरे दिन अभयकुमार का पूर्व मिन सौधर्म कल्पवासी एक देव उसा सामन प्रकट हुना। अभयकुमार ने उसके सामन अपनी इच्छा प्रकट की।

झाता सूर की उन्नीस कथा देव ने कहा- हे आर्य ! मैं अकाल में वर्षामतु की रिक्रिया (रचना) कगा जिसमे तुम्हारी लघुमाता का दोहद पूर्ण होगा। एसा कह कर वह देर वापिम अपने स्थान पर चला गया। झरे दिन देव ने वर्षाऋतु की निक्रिया की । श्राकाश में मन मेघ छा गये और छोटी छोटी दें गिरने लगी । हाथी पर बैठ कर रानी धारिणी राजा के माथ वन म गई । भार पर्वत के पास उनकीड़ा करती हुई रानी अपने दोहल को पूर्ण करन लगी । दोहला पूर्ण होने पर रानी को बडी प्रसन्नता हुई । नौ मास पूर्ण होने पर रानी की कुक्षि मे एक पुत्र का जन्म हुश्रा । दामियों द्वारा पुरजन्म की सूचना पार राजा को बहुत हर्ष धुश्रा । गर्भावस्था में रानी को मेघ का दोहला उत्पन्न हुआ था इसलिए पुन का नाम मेघकुमार रमा गया। योग्य वय होने पर मेधकुमार को पुरुप की ७२ कलाओं की शिक्षा दी गई । युवावस्था को प्राप्त होने पर मेघकुमार का विवाह सुन्दर, सुशील और स्त्री की ६४ कलाग्रा में प्रवीण पाट राजकन्यायो क साथ किया गया । एक समय भगवान महावीर स्वामी राजगृह नगर के बाहर गुग्गशील नामक उद्यान में पधार, गान् का आगमन सुन- कर प्रजाजन, राग और मैपकुमार भगवान को चन्दना करन के लिए गये। भगवान ने धर्मोपदेश फरमाया । उपदेश सुन पर मपकुमार को ममार में राग्य उत्पन्न हो गया । घर श्राफर माता पिता में दीक्षा लेने की आता मागी। पडी रठिनाई क माथ माता पिता मदीक्षा की प्राना प्राप्त की। राजा श्रेणिक ने बड़े समारोह और घूमधाम के साथ दीक्षामहात्सव किया। मेघरमार दाता लेकर जानाम्याम करने लगे। रात्रि के समय जब सोन का वक्त आया तर मेघकुमार का विछीना सब साधुओं ६ श्री सेठिया जैन प्रथमाला के अन्त में किया गया क्यों कि दीक्षा में वे मर से छोटे थे। राति में इधर उपर आने जाने वाले माधुओं के पादसंघटन से मेघ कुमार को नींद नहीं आई। नीद न आने से मेघकुमार प्रतिसेदित हुए और विचार करने लगे कि प्रात काल ही भगवान् की आज्ञा लेकर ली हुई इम प्रनज्या को छोड कर वापिस अपने घर चला जाऊँगा। ऐमा विचार कर प्रात काल होते ही मेघकुमार भगवान् पाम आज्ञा लेने को आय । मेपामार विचारों एवं उनके मनोगत भानों को क्वलज्ञान से जान कर भगवान् फरमाने लगे कि हे मेघ ! तुम डम जरा से कट से घबरा गये। तुम अपने पूर्व भर को तो साद करो। पहले हाथी के भर में वन मे लगी हुई दावानल कोदेख कर तुम भयभ्रान्त होकर वहाँ से भागने लगे किन्तु श्रागे जाकर तालान के मीचड में बहुत पुरी तरह से फम गये और बहुत सोशिश करने पर भी निम्ल न सके । इतने में एक दूसरा हाथी आगया और उसके दत प्रहार से मर कर फिर दूसरे जन्म में भी हाथी हुए। एक वक्त नगल में लगी हुई दापानल मोदेस कर तुम्हें जातिस्मरण ज्ञान उत्पन्न हो गया । ऐसे दावानल से बचने के लिए गगा नदी के दक्षिण किनारे पर एक योजन का लम्बा चौडा एक मण्डल बनाया। एस वक्त जगल में फिर आग लगी उममे बचने क लिए फिर तुम अपने मण्डल (घेरा) में आये। वहाँ पहले से ही बहुत से पशु, पक्षी पार ठहरे हुए थे। मण्डल जीवों म पचाखच भरा हुया था। बड़ी मुश्किल मे तुम को थोड़ी सी जगह मिली। कुछ समय पाद अपने शरीर को सुजलाने में लिए तुमने अपना पैर उठाया। इतन में मरे लगान प्राणियों द्वारा घरेला हुया एरशराम (सरगोश) उम जगह आ पहुँचा। शरीर को सुला र जब तुम वापिम अपना पैर नीचे रखने लगे तो एक गणर यो वठा हुआ देसा । तब- ज्ञाता० सूर की उन्नीस कथाए " पाणाणुऊपाए, भूयाणुकंपाए, जीवाणुरूपाए, सत्ताकपाए अर्थात्-- प्राण, भूत, जीर, सचों की अनुकम्पा से तुमने अपना पैर ऊपर अधर ही रखा फिन्तु नीचे नहीं रसा । उन माण (द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय), भूत (घनस्पतिकाय), जीव (पञ्चेन्द्रिय जाय) और सत्नों (पृथ्वीकाय, अपकाय, तेउ- काय, वायुकाय) की अनुकम्पा करके तुमने समार परिच किया और मनुष्य श्रायु का बंध किया। यहाई दिन में यह दावानल शान्त हुआ। मर पशु वहाँ मे निकल कर चले गये। तुमने चलने के लिए अपना पैर लम्बा क्यिा किन्तु तुम्हारा पैर अकड गया जिसस तुम एक्दम पृथ्वी पर गिर पडे और शरीर में अत्यन्त वेदना उत्पन्न हुई । तीन दिन तक वेदना को सहन कर सौ वर्ष की आयुष्य पूर्ण करके तुम धारिणी रानी के गर्भ में पाये। हे मेघ ! तिर्यञ्च के भर में प्राण, भूत, जीव, मत्वों पर श्रनु कम्पा कर तुमने पहले कभी नहीं प्राप्त हुए सम्यक्त्वरत्न की प्राप्ति की। है मेघ ! अब तुम विशाल कुल में उत्पन्न होकर गृहस्था चास को छोड साधु नने हो तो क्या साधुश्रा के पादम्पर्श से होने वाले जरा से कष्ट से घबरा गये । भगवान् के उपरोक्त वचनों को सुन कर मेघकुमार को जाति स्मरण ज्ञान उत्पन्न होगया । फिर मेघकुमार ने सयम में दृढ़ होकर भगवान् की आज्ञा से भिक्षु की बारह पडिमा अगीकार की और गुणरनमवत्सर वगैरह तप किये । अन्त में सलसना सथारा कर के विजय नामक अनुत्तर विमान में ३३ सागरो- पम की स्थिति वाला देव हुआ। वहाँ से चर कर महाविदेह क्षेत्र में पैदा होकर सयम लेगा और मोक्ष जायगा । जिस प्रकार संयम से विचलित होते हुए मेघकुमार को भग- वान् ने मधुर शन्दों से उपालम्म देकर सयम में स्थिर कर दिया ।

श्रा मेठिया जैन प्रन्धमाज्ञा उमी प्रकार गुरुमो चाहिए कि मेयम मे पिचलित होते हुए गिप्य को मधुर शन्दों से समझा कर पुन मयम में स्थिर कर दे। (२) धन्ना मार्थवाह और विजय चोर की कथा दूसरा मघट जात अध्ययन- अनुचित प्रवृत्ति करने वाले को अनर्थ की प्राप्ति होती है और सम्यग् अर्थ गरी प्राप्ति नहीं होती तथा उचित प्रवृत्ति करने वाले को मम्यग् अर्थ की प्राप्ति होती है । यह बतलाने के लिए धन्ना मार्थवाह और विजय नामक चोर का दृष्टान्त दूसरे अध्ययन में दिया गया है। रानगृह नगर में धना नामक एक मार्थनाह रहता था। उमी नगर में विनय नाम का एक चोर रहता था। वह बहुत ही पाप गर्म करन पाला और क्रूर था । एक समय धन्ना मार्थवाह की स्त्री भद्रा ने अपन पुत्र देवदत्त को स्नान मञ्जन करा कर तथा प्राभूषणों में अलंकृत कर अपने दास पथर के हाथ में देकर बाहर सिलाने 7 लिए भेजा। पथक दास देवदत्त को एक जगह मिठा कर दूसर पालकों के साथ खलने लग गया । इतने में विजय नामक चोर वहाँ श्रा पहुंचा और देवदत्त पालक को उठा ले गया। एकान्त में ले जा कर उसे मार डाला और उमा मारे आभूषण उतार लिए। उसय मृत शरीर को एक कुए में डाल कर मालुककच्छ म छिप गया । धन्ना मार्थाह न पुलिस को खबर दी। पुलिस ने विनय चोर को हद र उमे कंदसाने में डाल दिया। एक पार राज्य के कर (महसूल) की चारी करने के कारण धना मार्थवाह राज्य का अपराधी माबित हुआ। इसलिए उसे भी कैद पान में डाल दिया और सयोगवश उमा सोहे में डाला जिसमें आगे विजय चोर था। बाड़ाएक होने कारण दोनों काथाना जाना, उठना पेठना एक ही साथ होता था। जब धन्ना साध- - ज्ञाता० मून की उन्नीस कवाए RE माह टट्टी, पेशान आदि करने के लिए जाने की इच्छा करता तो यह चोर माथ चलने से इन्कार हो जाता । तर दूसरा कोई उपाय न होने के कारण धन्ना मार्थवाह अपने भोजन में से थोडाभोजन उस चोर को भी देता और उसे अपने अनुकूल रसत्ता । जब पन्ना मार्थवाह कैद से छूट कर घर आया तो अपने पुत्र की हत्या करने वाले चोर को भोजन देने क कारण उसकी पत्नी ने उसका तिरस्कार किया और उपालम्भ दिया । तब धन्ना ने उस चोर को भोजन देने का कारण समझाया और अपनी पत्नी के क्रोध को शान्त किया। उपरोक्त दृष्टान्त देर शास्त्रकार ने इसका निगमन (उपनय) इम प्रकार घटाया हैरानगृह नगर के समान मनुष्य क्षेत्र है। धन्नासार्थ- वाह के ममान माधु है। विजय चोर के समान शरीर है। पुत्र के समान निरुपम श्रानन्द को देने वाला सयम है। अयोग्य आचरण करने मे इसका विनाश हो जाता है। प्राभूषणों के समान शब्दादि विषय । इनका सेवन करने मे सयम का विनाश हो जाता है। हडिबन्धन (सोडे) क समान जीव और शरीर का सम्बन्ध है । राजा के समान कर्म परिणाम और राजपुरुषों के समान कर्मों के भेट है। छोटे से अपराध के ममान मनुष्यायु रन्ध के कारण हैं। मलमूनादि की निवृत्ति के ममान प्रत्युपेक्षण (पडिलेहना) श्यादि मार्य हैं अर्थात् जिस प्रकार अपने भोजन में से कुछ हिस्सा विजय चोर को न देने से वह मलमूनादि की निवृत्ति के लिए धन्ना सार्थ- गाह रे साथ नहीं जाताथा इसी प्रकार इस शरीर को भोजन आदि न देने से पडिलेहणा मादि सयम क्रियाओं में सम्यक् प्रवृत्ति नहीं हो सकती । पन्धक दाम में समान मुग्ध (शब्दादि विषयों में श्रामक्त होने वाला) सा Fol के ममान प्राचार्य है। दूसरे माधुओं से सुन- मे पुष्ट शरीर चाले साधु

१०
श्री मठिया न प्रमाला
उपालम्भ देने लगते हैं किन्तु उम माधु के द्वारा वेदना की गान्ति,
यापन प्रादि कारण बतला देने पर ने आचार्य सन्तुष्ट हो जाते हैं।
निम तरह धन्ना मार्थवाह ने मरा उपाय न होन में कारगग
अपने पुत्र को मारने वाल चोर को भोजन दिया इमी तरह माधु
को चाहिए कि सिर्फ मयम र निर्गह र लिए चोर समान इस
गरीर को भोजन दे, शरीर की पुष्टि प्रादि रिमी सो उदेश्य
के लिए नहीं। जिस तरह सराय में ठहरने के लिए मान का
भाड़ा देना पड़ता है उसी तरह मंयम निर्वाह न लिए गरीर को
भोजन रूपी भाडा देना चाहिए।
(३) जिनदत्त और सागरदत्त की कमा
तीसरा अण्डरुमात अध्ययन-ममस्ति की शुद्धि क लिए शरा
दोष का त्याग करना चाहिए। शमा दोपका त्याग करने वाल
पुरुष को शुद्ध समकित रन की प्राप्ति होती है और शरामादि करन
वाले को सममित रन की प्रामि नहा होती । इम पात को बताने
के लिए तीमर अध्ययन में एडे स दृष्टान्त दिग गया है।
चम्पा नगरी के अन्दर जिनदत्त और मागरदत्त नाम के दो
मार्थनाह पुन रहते थे। दोनों चालमित्र थे । जीड़ा र लिए
उद्यान में गए हुए दोना मिना न एक जगह मयूरी क अण्ड
देसे। उन अएडा को उठा कर वे दोनों मित्र अपन अपने घर
ले आय और कृरही के अण्डों के साथ रस दिय ।
सागरदत्त को यह शमा हुई कि इन अण्डों म म मयूरी क
बच्चे पैदा होंगे या नहीं ? इसलिए वह उनको गारवार हिलाकर
देखने लगा। हिलान से वे एडे निीय हो गये। जिसमे
उससे अति सेद् और चिन्ता हुई।
जिनदत्त न उन अण्डों के विषय में कोई शक न की, इसलिए

ज्ञाता० सूर की उन्नीस क्याए उनको हिलाया डुलाया भी नहीं, जिसमे समय पर उन भण्डा मे मयूरी के बच्चे पैदा हुए। फिर वह उन बच्चों को मयूरी पोषक से शिक्षित करा कर नृत्य और कीडाए करवाता हुआ आनन्द का अनुभव करने लगा। उपरोक्त दृष्टान्त देकर शास्त्रकार ने साधु साध्वी श्रारक श्राविका को यह उपदेश दिया है कि वीतराग जिनेश्वर देव के कहे हुए तचों में किसी प्रकार का मन्देह नहीं करना चाहिए क्योंकि सन्देह ही अनर्थका कारण है । जिन वचनों में नि:शक रहना चाहिए। यदि कदाचित् शास्त्र का कोई गहन तत्त्व राबर समझ में न आवे तो अपनी बुद्धि की मन्दता और ज्ञानापरणीय का उदय समझ कर कभी विद्वान् श्राचार्य का सयोग मिलने पर उस तत्त्व का निर्णय करने की बुद्धि रसनी चाहिए किन्तु शकित न होना चाहिए । तहमेन मर्च निस्मक जंजिणेहि पोइय । अर्थात् जो केनली भगवान ने फरमाया है नही सत्य है । ऐसी दृढ श्रद्वा रसनी चाहिए क्योंकि तीर्थकर देशों ने केरल ससार के प्राणियों के परोपकार के लिए ही इन तचों का प्रतिपादन किया है। वे राग द्वेष और मोह से रहित होते हैं इसलिए उनको झठ गोलन का कोई कारण ही नहीं है । अत: वीतराग जिनेश्वर के वचनों में निःशक्षित और निफाक्षित होना चाहिए। (४) कछुए और शृगाल की कथा चौथा 'कर्मज्ञात' अध्ययन-अपनी पाँच इन्द्रियों को वश में रसने से गुण की प्राप्ति होती है और वश में न रखने से अनेक प्रकार के दोष उत्पन्न होते हैं। इसके लिए दो कछुओं और शृगालों का दृष्टान्त इस अध्ययन में दिया गया है ।। वाराणसी नगरी के बाहर गगा नदी के किनारे एक द्रह था । । - (0 श्रा सेठिया जन प्रथमामा उममें दो रछुए रहते थे। उस द्रह के पास ही एक मालुकास्तथा। वहाँ दो पापी शृगाल (मियालिए) रहते थे। एक दिन उन दोनों न उन क्छुपा को देसा गाना कोटगते ही दोना कछुओंन अपन शरीर के मा अगों कोमकोच लिया जिममे भृगाल उनका बल भी नुक्मान नहीं कर सके रितु थोडे समय नाद ही में म एक कछुए ने उन भगालों को दर गए हुए गमझ कर धीरे धीर अपनी गर्दन और पैर नाहर निसले उम परों को बाहर निकाले हुए देख कर वे पापी शृगाल शोधनापूर्वक वहाँ पाए और उम क्छुए के शरीर के अङ्गों को छेद डाला और उसे जीवन रहित कर डाला । दूसरा मधुमा, निसने अपन अङ्ग गुम रखे और बाहर नहीं निकाले, पापी गगाल उमरा मी नही निगाह मके और यह कछुथा उस द्रह में पानपूर्वक रहने लगा । इस रशन्त का उपनय घटाते हुए गासकार ने रतलाया कि दो पछुओं के समान दो माधु समझने चाहिए । चार पैर और ग्रीया के समान पाँच इन्द्रियों हैं। बाहर निकालने में समान शन्दादि विषय हैं। उनमें प्रत्ति करना राग, द्वेष रूपी दो शृगाल है। इन दोनों व वश में होने से सयम का घात हो जाता है। जो माधु इन्द्रियों के विषयों में प्रात्त नहीं होता वह दूसरे कछुए की तरह द्रह सुख के समान मोक्ष सुप को प्राप्त करता है और इन्द्रिय सुस में लोलुप साधु मसार मागर में परिभ्रमण करता हुश्रा अनन्त दुखों को भोगता है। इस लिए साधु को इन्द्रियों के मुसों में तथा शब्दादि विषयों में लोलुप नहीं होना चाहिए। (५) गैलक गजर्षि की कथा पाँचाँशैलकत्रात अध्ययन-यदि किसी कारण से कोई साधु इन्द्रियों के वश में पड़ कर संयम में शिथिल पड़ जाय पान्तु फिर धाता० सून का नीस क्यार अपनी भूल को समझ कर सयम मार्ग में रद हो जाय तो यह भी अग्ने अर्थ की मिट्टि कर सकता है इसके लिए शैलक राजर्पि का दृष्टान्त दिया गया है। द्वारिका नगरी में कृष्ण वासुदेर राज्य करते थे। उनके राज्य में याचापुर नामक एक सार्थवाहपुन रहता था। एक समय भगवान नेमिनाथ स्वामी वहाँ पधार । उनका धर्मोपदेश मुन र थानचापुर को पैराग्य उत्पन्न हो गया और एक हजार पुरुषों के माय मनज्या ग्रहण की। भगवान की पाबा लेपर थावधापुन अन- गार एक हजार मातुश्री के माथ थलग निहार करने लगे। एक चार विहार करते हुए गैलकपुर पधार। यहाँ का राजाशलक अपने पन्थक श्रादि पॉच मौ मन्त्रियों महित उनका धर्मोपदेश सुनने के लिए पाया। प्रतिमोर प्राप्त कर उमने प्रारक यमनगीसाररिया। उस समय शुरु परिनानक एक हजार परिवाजकों सहित अपने मत का उपदेश देता हुया विचरता था। पिचरता हुया वह सौगन्धिका नगरी में आया । उमका उपदेश सुन कर मुदर्शन मह ने गौवधर्म श्रङ्गीकार किया। एक समय ग्रामानुग्राम विहार करते हुए थानचापुर भी मांग विका नगरी में पधारे। उनका धर्मोपदेश सुनने के लिए नगर जनों के माथ सुदर्शन मेठ भी गया। उनका उपदेश सुन कर सुदर्शन सठ ने गौत्रपम का त्याग र दिया और रिनय वर्म म्बीकार कर पापक प्रत अगीकार कर लिये । इम पात को जान कर शुक परिवाजक वहाँ पाया किन्तु सुदर्शन ने उमका श्रादर मत्कार नहीं किया। इसके पश्चात् वह सुदर्शन मेठ को मायलेकर थापञ्चा- पुत्र श्रनगार के पास गया और बहुत से प्रश्न क्थेि । उनका युक्ति युक्त उत्तर सुन कर शुरु परिवाजक को सम्यग तत्व का गांध होगया और अपने हजार शिष्यों सहित थापचापुन अनगा के 7 श्री मेठिया जैन ग्रन्थमाला पाम पमन्या श्रङ्गीगार कर ली। अपने धर्माचार्य श्रीथावचापुर अन- गार की प्राज्ञा लगशुरु निर्घन्य अपन एक हजार शिष्यों महित अलग विहार करन लगे। कुछ समय पश्चात् पापचापुर अनगार मोचलनान उत्पन्न होगया और र मोक्ष में पधार गये । एक ममय विहार करते नए शुफ निर्ग्रन्य शैलस्पुर पधार । शैलक राना ने अपन पुन मण्डक को राज सिंहासन पर विठा कर शुरु निर्गन्थ के पास पथर प्रादि ५०० मन्त्रिया महित तीक्षा अङ्गीकार कर ली और विचरने लगे। शुक निर्गन्य की यात्रा अनुमार गैलक रान िपयर श्रादि ५०० शिष्यो महित अलग विहार करने लगे। कुछ काल पाद शुरु निर्ग्रन्थ को स्वलनान उत्पन्न हो गया और मोक्ष पधार गये। ग्रामानुग्राम विहार कर धर्म का उपदेश करते हुए शैलर राजर्षि के शरीर में पित्त ज्वर की बीमारी हो गई । शैलकपुर के राना मएडसपी श्राज्ञा लेकर ने उसकी दानशाला मठहर गये। राजान चतुर वैद्यों द्वारा उनकी चिरिन्मा करवा जिममे थोडे ही समय में पस्थ हो गये। स्वस्थ हो जाने मनोज्ञ सादिम स्वादिम आदि में मूचि रानपिन यहाँ स विहार नहीं। देस कर दूसरे मर माधुओं ने एक पथक साधु उनी मेवा में रहा। मिर प्रतिक्रमण करक पथानि के लिए उनके चरणा का स्पर्श प्रशन पान आदि का गूप श्राहार पपरों का स्पर्श करन के कारण, जिमसे य कृपित हो गये। यक निद पुज्य ! भान चौमासी पर्व है कार . - * माता० मूत्र की नीम स्थाग मैयापको समाने लिए आया हूँ। मेरी तरफ मे आपको जो कष्ट हुआ है उमस लिए मैं क्षमा चाहता हूँ। पथक मुनि के उपरोक्त पचनों को सुन कर शैलम रानपि को प्रतिरोध हुश्रा और विचार करन लगे कि राज्य का न्याग करक मने दीक्षा ली है श्रर मुझे अशनादि में मूछीमार रस कर मयम म शिथिल न बनना चाहिए। ऐमा विचार कर गैलक रानपि झरे दिन प्रात. काल ही मएड़क राजा को उसके पीठ फलक श्रादि सम्भला कर सयम में दृढ हो र विहार करन लगे । इम वृत्तान्त को मुन कर उनके दूसरे शिष्य भी उनकी मा मे नागये और गुरु की मेरा शुश्रूपा करते हुए विचरन लगे । बहुत वर्षों तक श्रमण पर्याय का पालन र शेलक राजर्षि श्रार पथक श्रादि पाँच सौ ही निर्ग्रन्यों ने मिद्ध पद प्राप्त किया। इम अध्ययन के अन्त मे भगवान् ने मुनिया को उपदेश करते हुए फरमाया है कि जो माधु साधी प्रमाद रहित होकर सयम मार्ग में प्रवृत्ति करेंगे वे टम लाक में पृज्य होंगे और अन्त म मोक्ष पद को प्राप्त करेंगे। (६) तुम्बे का दृष्टान्त छठा 'तुम्बकजात' अध्ययन-प्रमादी को अनर्थ की प्राप्ति और अप्रमादी की अर्थ की प्राप्ति होती है अर्थात् प्रमाद मजीप भारी- र्मा और अप्रमाद से लघुकर्मा होता है । इस बात को बतलाने के लिए छठे अध्ययन में तुम्बे का दृष्टान्त दिया गया है। जैसे किसी तुम्ने पर टाम और कुश लपेट कर मिट्टी का लप कर दिया नाय और फिर उसे धूप म सुसा दिया जाय । इसके पाद क्रमश. टाम और कुश लपेटते हुए पाठ पार उसके ऊपर मिट्टी का लेप कर दिया जाय। इसके पश्चात् उम तुम्बे को पानी १६ श्री मेठिया जैन प्रथमाला में छोड़ दिया जाय तो वह मिट्टी के लेप से भारी होने के कारण पानी से तल भाग में नीचे चला जायगा। पानी में पड़ा रहने में कारण ज्यों ज्यों उमरा लेप गल र उतरता जायगात्या त्या यह ऊपर की तरफ उठता जायगा । जब उस पर मे श्राठा लेप उत्तर जायेंगे तर वह तुम्बा पानी के उपर यानायगा । तुम्मे का दृष्टान्त देकर शास्त्रकार ने यह बताया है किमी प्रकार जीव प्राणातिपात यादि अठारह पापस्थानों का सेवन कर घाट कर्मों का उपार्जन करते हैं निमसे भारी हाफर वे नरकादि नीच गतियों में जाते हैं। आठ की स मुक्त हो जाने के पश्चात् जीन लोकान में स्थित सिद्धस्थान (मुक्ति) में पहुँच जाते हैं। श्रत जीवों को प्राणातिपात आदि पापों म निवृत्ति करनी चाहिए । (७) चार पुत्रवधुओं की कथा सातवा 'रोहिणी ज्ञात' अध्ययन-पॉच महानतों का सम्यग पालन करने वाले भाराधक माधु को शुभ पल शी प्राप्ति होती है और विराधा को अशुभ फल की प्राप्ति । इम यात को बताने क लिए सातवें अध्ययन में रोहिणी नादि का शन्त दिया गया है। रागृह नगर के अन्दर धन्ना नाम का एर सार्थवाह रहता था। उसके भद्रा नाम की भार्या थी। उसके धनपाल, धनदेव, धनगोप और निरक्षित नाम के चार पुत्र थे । इनकी भार्याओं के नाम क्रमश उजिमका, भोगवती, रक्षिका और रोहिणी था । धना मार्थाह ने अपनी पुत्रवधुओं की बुद्धि की परीक्षा करने के लिए मन कुटुम्मी पुरुयों के सामन प्रत्यर को पाँच २ शालिग्ण (छिला सहित चापल) दिये । उनको लकर ज्येष्ठ पुत्रवधू ने तो फा दिया, दुमरी ने यादरपूर्वक सा लिया, तीसरी ने नही हिमानत के साथ अपने जेयरों की पेटी म रस दिया, चौथी ने । E4 शाता० सून की उन्नीस क्याए उन शालिकणों को लेकर अपने वन्धु वर्ग को दे दिया और कहा कि वो होते ही इन शालिकणों को साफ किये हुए सेत में यो देना और बडे होने पर फिर दूसरी जगह वोना इस तरह क्रमशः पोते रहना । नन्धुपर्ग ने उसके कथनानुमार कार्य किया। इस प्रकार पाँच वर्ष बीत गये। एक समय श्वसुर ने पुत्रवधुश्री से रे पॉच शालिकण वापिम माँगे तब उन्होंने अपना अपना वृत्तान्त कह सुनाया। छोटी पुन- वधू ने उन शालिकणों से पैदा हुए शालि धान्य के कई गाड़े भरवा र मगाये और श्वसुर क सामन सारी हकीकत कही । श्वसुर न उन चारों का वृत्तान्त मुन कर उनकी बुद्धि के अनुसार उन को काम सौप दिया अर्थात् बड़ी वह को घर का कचरा कूडा निका लने का, दारी को रसोई बनाने का, तीसरी को भाडागारिणी का यानी घर क माल की रक्षा करने का काम सौंपा और चौथी बहू को अति बुद्धिमती समझ कर उसे घर की मालकिन मनाया। उपरोक्त दृष्टान्त देकर भगवान् ने अपने शिष्यवर्ग को सयो- धित करके फरमाया कि जो साधु साध्वी पाँच महानतों को लेकर पहली और दूसरी बह की तरह उनका त्याग कर देते हैं या रसने- न्द्रिय क वशीभूत हो साने पीने में ही लग नाते है । इस लोक में अयश प्रीति का उपार्जन र निन्दा के पान होते हैं और चतु- गति रूप समार म परिभ्रमण करते रहते हैं। तीसरी और चौथी पुनराध के ममान जो साधु माघी पाँच महानतों को लकर मम्यक् प्रकार से उनका पालन करते हैं तथा अपने गुणों को अधिका- धिक बढ़ाते हैं ये इस लोक में विपुल यश कीर्ति का उपार्जन कर पूज्यपद को प्राप्त करते हैं और अन्त में सिद्धपद को प्राप्त करते हैं। इस दृष्टान्त को जान कर भव्य प्राणियों को पर्म के विषय में अप्रमत्त रूप से प्रवृत्ति करनी चाहिए। . ३ श्री सेठिया जैन प्रन्थमाला (८) भगवान मल्लिनाथ की कथा अाठमाँ 'मल्लि ज्ञात' अध्ययन-पाँच महानता मोरोपर यदि उन्हें किञ्चित् भी माया स्पटाई मे दूपित कर दिया नाय तो उनका यथार्थ फल नहीं होता है। इस बात को पुष्ट करने के लिए पाठमें अध्ययन में भगवान् मल्लिनाथ या दृष्टान्त दिया गया है। भगनान मल्लिनाथ पूर्वभव में महागल नाम के रानाये। उनके अचल, धरण, पूरण, वसु, वैश्रमण और अभिचन्द्र नाम के छ बालमित्र थे। उन मातों मित्रों न एक ही माथ दीक्षा ग्रहण की और यह निश्चय किया कि मर ही मिन एक साथ एक मरीखी तपम्या करेंगे। इसके पश्चात् ने नेला तेला आदितपस्या करते हुए विचरने लगे । आगामी भन में इन छ मित्रों से बड़ा पद पान की इच्छा से महापल मुनि स्पट स अधिस् तपस्या ररने लगे। वे घेले के दिन तेला और तेले के दिन चोला पर लिया करते थे। उन सातों मुनियों न बारह भिक्यु पटिमा बङ्गीकार की। इसके बाद लघुमिह निप्पीडित तप किया जिमकी एक परिपाटी में छ महीन और सात दिन लगे अर्थात् १५४ तपस्या के दिन और ३३ पारणे के दिन होते हैं । इसके पश्चात् महासिंह निधीडित तप अङ्गीकार किया जिसरी एक परिपाटी में एक वर्ष छ महीन और अठारह दिन लगे अर्थात् ४६७ दिन उपनाम के और ६१ पारण के दिन होते हैं। कुल ५५८ दिन होते हैं । इस प्रकार उन्न तपस्या करके श्रीर पीस पोलों में से कई वोलों की उत्कृष्ट वारा धना करवं महारल मुनि न तीर्थङ्कर नामकर्म गाउपार्जन किया। तीर्थकर नाम कर्म उपार्जन करने के नीम बोल ये हैं- (१) अरिहन्त (२)सिद्ध (३) प्रवचन श्रुतज्ञान (४) गुरु-धर्मो- पदेशक (५) स्थविर (६) बहुश्रुत (७) तपस्सी। इन सात की वत्स- माता० सून की -नीस स्थाए १८ लता यानी बहुमान पूर्वक भक्ति करने मे । (८) ज्ञान (8) दर्शन (१०) विनय (११) यारश्यक (१२) गीलगत इन पाँचा का निर- तिचार पालन करने मे !(१३) खणलप-सोग,भारना और ध्यान में। (१४) तप (१५) त्याग (१६) नयापच (१७) समाधि (१८) अपूर्व ज्ञान ग्रहण (१६) श्रुत भक्ति (२०) प्राचन प्रभावना । इन बीम पोलों की उत्कृष्ट अाराधना करने से जीव तीर्थ- कर नाम कर्म उपार्जन करता है । इन बीस तोला की विस्तृत व्याख्या छठे भाग र वीसव नाल संग्रह में दी जायगी । अनेक वर्षों तक अमण पर्याय का पालन करके ये देवलोक म उत्पन्न हुए । वहाँ से चय कर वे छहा मित्र भिन्न भिन्न देश क रानामों क यहाँ राजकुमार रूप में उत्पन्न हुए। महावल राजा का जीन देवलोक में चर र मिथिला नगरीक राजा कुम्भ की रानी प्रभारती क गर्भ में आया। सुप गाया पर सोती हुई प्रभा- पती रानी ने निम्न लिग्मित चौदह महास्वम देसे । यथा-गज, पभ, सिंह, अभिषेक, पुष्पमाला, चन्द्र, सूर्य, ध्वजा, क्लश,पद्म, मरोघर, सागर, निमान, रनराशि, निर्धम अग्नि । स्त्रम पाठकों से समों के फल को सुन कर रानी अतिहर्पित हुई और गर्भ का पालन करने लगी। नौ मास पूर्ण होन पर रानी ने एक पुत्री को जन्म दिया। पुी क नन्म से माता पिता को बहुत प्रमन्नता हुई। तीर्थकर का जन्म हुआ जान कर अनेक देवी और देयों के माय इन्द्र वहाँ उपस्थित हुए । ययाविधि जन्म कल्याण मना कर ये नापिस अपन स्थान पर चले गये। माता पिता ने पुत्री रा नाम मलिकुघरी रपा । पाँच धायों द्वारा लालन पालन की जाती हुई मल्लिईपरी सुरक्षित बेल की तरह बढ़ने लगी। जन मल्लिकु परी की अवस्था लगभग सौ वर्ष की हुई तर एक समय उन्होंने श्राधिज्ञान द्वारा अपने पूर्वभय के छ मित्रों को देखा . . ।

भी सेठिया जैन धमासा - और जाना कि वे इसी मरतक्षेत्र में अलग अलग रानायों क यहाँ राजपुत्र रूप से उत्पन्न हुए हैं। भविष्य में होने वाली घटना को नान द्वारा जान कर मलि- कुपरी ने नौकरों से युला कर प्रशोक वाटिका में अनेक स्तम्भों पाला एक मोहनपर बनाने की यात्रा दी। मोहन घर न जाने के बाद उसके बीच मजिपरीक श्राकार वाली एक मोने की प्रतिमा पनवाई । उसके मस्तक पर एक बिद्र रसा पीर उम पर एक मिलाकार धान लगा दिया। मलिकुवरी जो भोजन रती उममें में एक ग्रास प्रतिदिन उस छिद्र में डाल कर वापिम दान लगा दिया जाता था। भोनन के सड़ने से उत्सम से गाय और सर्प मृन पलंगर में भी अत्यन्त अधिक दुर्गन्ध उठने लगी। मल्लिा वरी अब पूर्ण यौवन अवस्था को प्राप्त हो चुकी थी। उसके रूप लागण्य की प्रशमा चारों तरफ फैल गई। उस समय मातपुर नाम का नगर था। यहाँ प्रतियुद्धि नाम का राना राज्य परता था | रानी का नाम पमारती था। राजा के प्रधानमन्त्रीकानाम सुद्धि था।वह राजनीति में बड़ाचतुर था। एक समय नाग महोत्सव मान के लिये राजा, रानी और मन्त्री सभी उद्यान में गये। यहाँ राना ने एक बडा मिरिदामगड अर्थात् मुन्दर मालाथों का दण्डाकार समूह देखा। उमे देस कर राजा को बड़ा प्राथर्य हुआ । राना ने मन्त्री से पूछा कि क्या तुमने कहीं पहले ऐसा सिरिदामगड देखा है। मन्त्री ने उत्तर दिया- राजन् ! एक समय मैं मिथिला गया था। उस समय यहाँ कैराना चुम्भ की पुत्री मलिवरी का जन्म महोत्सव मनाया जारहा था। मैन यहाँ एक सिरिदामगंड देना था। पद्मावती रानी का यह सिरिदामगड उसकी शोभा के लाए अशकोभीप्राप्त नहीं होता। ---- ज्ञाता० सून की उनीम कथा इसके बाद मन्त्री द्वारा की गई मल्लिक परी के रूप लारण्य की प्रशसा को मुन कर प्रतिद्धि राजा ने एक दूत राजा कुम्भ के पास भेजा और मल्लिक परी की मागणी (याचना) की । दूत शीघ्र ही मिथिला के लिये रवाना हो गया। अङ्गदेश में चम्पा नाम की नगरी थी। यहाँ के राजा का नाम चन्द्रछाय था । उम नगरी में अरणक श्रादि बहुत से श्रावक रहते थे। चनामा द्वारा अपना व्यापार परदेश में करते थे। एक समय अरणक पात्रकन दूसरे नद्भुत म व्यापारियों के माय लवण ममुद्र में यात्रा की। जन जहाज समुद्र के बीच में पहुँच गया तो अकाल ही में मेघ की गर्जना होने लगी और भयकर निनलियाँ चम- क्ने लगी । इसके पश्चात् हाथ में तलवार लिए एक भयर रूप बाला पिशाच उनके मन्मुस आया और अरणरु पारर से कहने लगा कि हे अरणक! तुझे अपने धर्म मे विचलित होना इष्ट नहीं परन्तु मै तुझे तेरे धर्म से विचलित करूँगा । तू अपने धर्म को छोड़ दे अन्यथा में तेर जहान को पासराग में उठा कर फिर समुद्र में पटक दूँगा जिससे तू मर कर पात और गेंद्र ध्यान करता हुआ दुर्गति को प्राप्त होगा। पिशाच के उपरोक्त वचनों को सुन कर जहाज में बंटे हुए दूसरे लोग बहुत पराये और इन्द्र, वैश्रमण, दुर्गा प्रादि देवों की अनेक प्रकार की मान्यताए करने लगे किन्तु अरणक श्रानर रिचिन्मार भी घनराया नहीं और न विचलित ही हुश्रा। प्रत्युत अपने वस्त्र से भूमि का प्रमार्जन करक मागारी सथारा करके धर्म ध्यान करता हुना शान्तचिच से रेट गया । इस प्रकार निश्चल बैठे हुए अरणक श्रावक को देस र यह पिशाच अनेक प्रकार के भयोत्पादक क.अचन कहने लगा। श्ररणा को विचलित न को दो अगुलियों मे उठा देस पिशाच श्री सेठिया जैन प्रथमाला DO और जाना कि वे इसी भरतक्षेत्र में अलग अलग रानानों के यहाँ राजपुत्र रूप से उत्पन्न हुए हैं। भविष्य में होने वाली घटना को ज्ञान द्वारा जान कर मल्लि- कुपरी ने नौकरों से धुला कर अशोक वाटिका में अनेक स्तम्भों वाला एक मोहनपर बनाने की आज्ञा दी। मोहन घर पन जान के बाद उसके नीच मल्लिर परी के श्राकार वाली एक सोने की प्रतिमा रनवाई । उसके मस्तक पर एक छिद्र रसा और उस पर एक रमलाकार ढछन लगा दिया। मल्लिकु बरी जो भोजन करती उममें से एक ग्रास प्रतिदिन उस छिद्र में डाल कर वापिम दछन लगा दिया जाता था । भोजन क सड़न से उसम से गाय और सर्प के मृत फ्लेवर मे भी अत्यन्त अधिक दुर्गन्ध उटने लगी। मल्लिए वरी श्रम पूर्ण यौवन शमम्था को प्राप्त हो चुकी थी। उसके रूप लारण्य की प्रशसा चारों तरफ फैल गई उस समय साकेतपुर नाम रा नगर था। वहाँ प्रतियुद्धि नाम का राजा राज्य करता था। रानी का नाम पद्मारती था। राना के प्रधान मन्त्रीकानामसुद्धिथा।वह राजनीति में नडाचतुर था। एक समय नाग महोत्सव मनाने के लिये राजा, रानी और मन्त्री सभी उद्यान में गये। वहाँ राना ने एक बडा मिरिदामगड अर्थात् सुन्दर मालाओं का दण्डाशर ममूह देसा । उसे देख कर राजा को पड़ा आश्चर्य हुआ । राना ने मन्त्री से पूछा कि क्या तुमन कहीं पहले ऐसा मिरिदामगड देखा है। मन्त्री ने उत्तर दिया- राजन् ! एक समय मैं मिथिला गया था। उस समय वहाँ के राजा कुम्म की पुनी मलिऊँचरीश जन्म महोत्सव मनाया जारहा था। मैन यहाँ एक सिरिदामगंड देगा था। पद्मावती रानी का यह सिरिदामगड उसकीशोभा केलासवें अशको भी प्राप्त नहीं होता। --- ज्ञाता० सूत्र की स्त्रीम कथा २१ इसके बाट मन्त्री द्वारा की गई मलिकुवरी के रूप लारण्य की प्रशसा को सुन कर प्रतियुद्वि राजा ने एक दूत राजा कुम्भ पास भेजा और मल्लिकुवरी की मागणी (याचना) की । दूत शीघ्र ही मिथिला के लिये रवाना हो गया । अङ्गदेश में चम्पा नाम की नगरी थी। वहाँ के राजा का नाम चन्द्रछाय था । उस नगरी में अरणक आदि बहुत से प्रारक रहते थे। वे नौका द्वारा अपना व्यापार परदेश में करते थे। एक समय अरणक थावरुन दूसरे बहुत में व्यापारियों के साथ लवण ममुद्र में यात्रा की । जब जहाज समुद्र के बीच में पहुँच गया तो प्रमाल ही में मेघ की गर्जना होने लगी और भयकर निजलियाँ चम- मन लगी। इसके पश्चात् हाथ में तलवार लिए एक भयकर रूप गाला पिशाच उनके मन्मुस आया और अरणक श्रावक से कहने लगा कि हे अरणक! तुझे अपने धर्म में विचलित होना इष्ट नहीं परन्तु मैं तुझे तेरे धर्म से विचलित करूंगा। तू अपने धर्म को छोड़ दे अन्यथा मै तेर जहान को आकाश में उठा कर फिर समुद्र में पटक दूँगा जिससे तू मर कर पात और रौद्र ध्यान करता हुआ दुर्गति को प्राप्त होगा। पिशाच के उपरोक्त वचनों को सुन कर जहाज में बैटे हुए दूसरे लोग बहुत घबराये और इन्द्र, वैश्रमण, दुर्गा श्रादि देवों की अनेक प्रकार की मान्यताए करने लगे किन्तु अरणकारक विश्चिमात्र भी घबराया नहीं और न विचलित ही हुथा। प्रत्युत अपने वस्त्र से भूमि का प्रमार्जन करक मागारी सथारा करक धर्म ध्यान करता हुआ शान्तचित्त से बैठ गया। इस प्रकार निश्चल बैठे हुए अरणक श्रावक को देख कर वह पिशाच अनेक प्रकार के भयोत्पादक पचन कहने लगा। अरणकको विचलित न होते देरा पिशाच उम जहाज की दो अगुलियों मे उठा कर आकाश

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की मेठिया जैन प्रथमाला
में बहुत ऊंचा ल गया और अरण आवक मे फिर इसी प्रकार
यहन लगा कि तू अपन धर्म को छोह टे । किन्तु वह अपने धर्म स
निश्चित् भी पलायमान नहीं हुया । अरणा श्रारक को इस प्रकार
अपन धर्म म दृढ देश कर रह पिशाच शान्त होगया। अपना असली
देवस्वरूप धारण करके यह भरणा बाराक सामन हाथ जोड
पर उपस्थित हुश्रा और कहने लगा कि-पूज्य! श्राप धन्य है।
थापा जन्म मफल है। पानदेयममा क सन्दरशन्द्र ने श्रापकी
धार्मिक दृढ़ता की प्रशमा की कि बीरानीपादिर नर तत्व का
जाता अरराक बार अपने धर्म के विषय म इतना दृढ़ है रि
उमका देर दाना भी निर्गन्ध प्रवचन म विचलित करने में
श्रीर ममक्ति से प्रष्ट करने में समर्थ नहीं है । मुझे गन्द्र क
वचना पर विश्वास नहा पाया। यत मैं आपकी धार्मिक दृढ़ता
की परीक्षा करन के लिए यहाँ पाया था।
"देवानुप्रिय ! जिम तरह पेन्द्र ने यापकी प्रशसा की थी
वास्तव में श्राप पैसे ही हैं । मने जो आपको कष्ट रिया उसके लिए
आपस क्षमा चाहता हूँ। मेर अपराध को श्राप क्षमा करें, इम
प्रकार वह अपने अपराध की क्षमा याचना परक अरणम भापक
की सवाम एडलों की जोडी रस र थपने स्थान को रला गया।
अपने श्राप को उपमर्ग रहित समझ र अरणक पावक न
राउमग्ग सोला और सागारी संथार को पार लिया। इसके बाद
वेधरणा आदि सभी नौपणिर दक्षिण दिशा में स्थित मिथिला
नगरी के अन्दर श्राय। अरणर ने राजा कुम्भ की बहुत सा द्रव्य
और एक कुण्डल नाड़ी मेट की। गजा कुम्भ से वह कुएउल
जोडी पहुत पसन्द आई और उसी समय मलिकुवरी को बुला
पर उसे पहना दी। अरणक आदि व्यापारियों का बहुन थादर
मत्सर रिया और उनका राज्य महसूल माफ कर दिया।

भाता० मूत्र की उन्नीस कपा 3 । । म न्यापारियों ने अपना मालवा और नहाँ से नया माल परीद कर जहान में भर लिया। ममुद्र यात्रा करते हुए रे चम्पा नगरी पहुँचे । यहाँ के राजा चन्द्रछाय के पूछने पर उन ज्या- पारिया न मल्लिनरी के रूप लावण्य का वर्णन किया । उसे सुन कर चन्द्रछाय राजा ने अपना एकट्त कुम्भ राजा के पास भेजा कि मलिकुवरी का विवाह उसके साथ कर दे कुणाल देश में श्रावस्ती नगरी यी । वहाँ रूपी नाम का राजा राज्य करता था। उसकी रानी का नाम धारिणी और पुनी का नाम सुबाहुकमारी था । एक समय गना ने नही धूमधाम सुगाह्रकुमारी का म्नान महोत्सव मनाया । राजा ने अपने मत्री वर्षधर से पूछा कि इसम पहिल तुमने कही ऐमा म्नान महो- सर देखा है ? मन्त्री ने उत्तर दिया- मिथिला के राजा कुम्भ की पुत्री मल्लिकु परी का म्नान महोत्मर देसा था । यह उसके लासवें अश को भी प्राप्त नहीं होता है मन्त्री द्वारा की गई मल्लिकु परी के रूप लावण्य की प्रशसा को मुन कर राजा उसे प्राप्त करने के लिये प्रानुर होगया। तत्काल एक दूत को बुला कर रानाने उमे मियिना भेजा ओर मलिकुवरी की मागणी (याचना) की । दूत मिथिला के लिए रवाना होगया। एक समय मलिकुवरी के कानों के दिव्य कुण्डलों को सन्धि सुल गई । राजा कुम्भ ने शहर के सारे सुनारों को बुलाया और उन टूटे हुए कुण्डलों की सन्धि जोड़ने के लिये कहा। सुनारों ने बहुत प्रयत्न क्यिा किन्तु ये कुण्डलों की मन्धि नहीं जोड मके। राजा के पास ग्राफर र कहने लगे- गनन् ! यदि श्राप याबादें तो हम नये कुण्डल बना मस्त हैं किन्तु इन टूटे हुए ३५, मन्धि जोडने में नारा की बात सुन कर उमने हो गया। राज्य मनिगल जाने .

श्री मेठिया जैन प्रन्थमाला देदी । ये सब सुनार मिथिला मे निकल कर पाराणमी नगरी में श्राये । वहाँ के राजाशय के पाम जाकर वाराणमी में रहने की याता मागी। राना ने उनमे देशनिकाला देने का कारण पूछा। मुनारों ने सारा वृत्तान्त कहा और मतिर परी कम्पलारण्य की प्रशमा की । उमे सुन पर मल्लियु वरी के साथ विवाह करने की इच्छा से राना शेय ने एक दून मिथिला मैना। मिथिला राना कुम्भ के पुत्र का नाम मनदिन था। वह युग- रान था। एक समय शहर ये सरचित्रशरों कोयुला र मानदिन्न कमार ने अपने ममामान को चित्रित करने की यादी चिर- काराने रानकुमार की आज्ञा स्वीकार पर अपना रामशुरु कर दिया। उन सर चित्रकारों में एक चित्रकार से ऐसी लब्धि थी कि किमी भी पदार्थ का एक अवयव देख कर मार का यह चित्र चना मरता था। एक ममय महल में बैठी हुई मलि परी के पैर मागूठा चित्रकार की नजरों में पर गया। उसने लब्धि के प्रभाव मे मलिकयरी का मह चिर समाभनन में चित्रित कर दिया। जर सभाभवन पूरा चित्रित होगया तो रानकुमार उम देखने क लिये पाया। विविध प्रकार के चित्रों को देख कर वह पडुन प्रसन्न हुआ। धागे बढ़ने पर उसने अपनीचड़ी पहिन मलिक धरी काचिन देखा । उसे देख कर वह उम चित्रकार पर कुपित होगया। उसने उम चिरकार को अपने राज्य में निकल जाने की आज्ञा दी। वह चित्रकार मिथिला मे निम्ल वर हस्तिनापुर में पाया । वहाँ राजा अदीनशन के पास जाकर उमने वहाँ रहने की श्राशामांगी। राजा के पूछन पर चित्रकार न अपना सारा वृत्तान्त कहा और मलिए परी का चित्र उम बताया। चित्र को देख कर राना उम पर मोहित होगया। मल्लिकुवरी के साथ विवाह करने कीन्छा मेराना ने अपना एक दूत मिथिला को भेना। ।

ज्ञाता० सून मी उन्नीस कथा 'एक समय चोता नाम की परिनाजिका मिथिला नगरी में आई। मल्लिकवरी के पास पाकर शुचि धर्म का उपदेश देने लगी। उसने बतलाया कि हमारे धर्मानुसार अपवित्र वस्तु की शुदि जल और मिट्टी द्वारा होती है। मल्लिक नरी ने कहा-परिवाजिके ! रुधिर मे लिप्त वस्त्र कोरुधिर मे घोने पर क्या उसकी शुद्धि हो सकती है ? पारमाजिका ने कहा-नहीं। मलिक वरी ने कहा-हमी प्रकार हिंमा मे हिमा की (पाप स्थानों की) शुद्धि नहीं हो सकती। मल्लि- कुनरी का युक्ति पूर्ण वचन सुन कर चोक्षा परिनाजका निरु तर हो गई । मल्लिकॅरी का दामियों ने उसका उपहास किया। इसमे क्रोधित होकर नोक्षा परिनानिका वहाँ मे निस्ल गई। यह कम्पिलपुर के राजा जितशत्रु के अन्त पुर में गई । रानाने उमका श्रादर सत्कार किया। इसके पश्चात् राजा ने उससे पूत्रा परिवानिके । तुम बहुत जगह घूमती हो। मेरे जैमा अन्त'पुर तुम न कही देसा है ? परिवाजिका ने कहा-राजन ! पाप कृपमण्डूक प्रतीत होते हैं | मैने मिथिला के रानाकुम्भ की पुत्री मल्लिकु नरी को देसा है। वह देवकन्या के समान सुन्दर है। प्रापका मारा अन्त पुर उसके पैर के अंगूठे की शोभा को भी प्रास नहीं हो सकता । मनिपरी के रूप लागण्य की प्रशमा मुन कर राजा नितगा ने अपना एक दूत राना कुम्भ के पास मिथिला भेना और मजि- ॐवरी की मागणी याचना) की। छहों रानाग्रा के दूत एक मार्थ मिथिला में पहुंचे और अपने अपने राजा का सन्देश कुम्भ राना को कह सुनाया। एक कन्या के लिए राजायों की मागणी देय कर कुम्भ राजा को क्रोध भागया। दूतों का अपमान करके उन्हें अपने नगर से बाहर निकाल रिया । अपमानित होकर दूत वापिस चले गये । उन्होंने जाकर मारा वृत्तान्त अपने अपने राना में रहा । उममे रे यहाँ राजा । NaM - M श्री मेठिया जैन प्रथमाला -e-uri कुपित हुए और अपनी अपनी मना मनावर राजा उम्भ के ऊपर चढ़ाई कर दी। इस वृत्तान्त को मुन र राना वृम्म धवराया। मशिनरी ने अपने पिता को श्राधासन दिया और कहा कि आप धनराइये नहीं। मैं सब को समभादंगी। श्राप मर रानाओं में पाम पृथक पृथदत मेन दीगिरा दिगाम को तुम मोइन घर में चले श्राओ। मैं तुम्हें मल्लिकुँवरी दगा। रानाम्म ने ऐमा ही दिया। पृथर पृथक् द्वार स रे छहों राना शाम को मोहन घर में भाग। मल्लिहुँचरीन पहलम मोहन घरमअपन थागारपाली सोने की पुतली बना रखी थी जिसमें उपर छिद्र से प्रतिदित भोजन का एक एक ग्राम डाला था। उस सुवर्ण की पुतली से देख कर वे छहों राना उमे साक्षात् मलिक परी समझ घर उम पर मोहित होगये । इसी समय मवि चरी ने उस पुतली के दवन को उघाड़ दिया जिससे उसमें डाल हुए अन्न की अत्यन्त दुर्गन्ध थाहर निक्ली। उस दुर्गन्ध को न मह सपने के कारण ये छहों राना परामुग्य होपर बैठ गये। इस यवसर को उपयुक्त समझ र मलिऊँयरी न उनको शरीर की अशुचिता बतलाते हुए धर्मोपदेश दिया और अपन पूर्वभर का वृत्तान्त कहा जिम सुन र उन छहों रानाओं से जातिम्मरण ज्ञान उत्पन्न होगया।छहों रानायों ने अपने अपने ज्येष्ठ पुत्र राज्याभिषेक र भगवान् मन्निनाय र माथ प्रत्रज्या अङ्गीकार कर ली। वर्षीदान देने के पश्चात् भगवान् मन्निनाथ ने पाप शुक्ला एकादशी को प्रात माल दीक्षा ली और दमर पहर में उन्हें रेलझान उत्पन्न हो गया। भगवान् मलिनाथ के २८ गण थे और २८ ही गणधर थे। चालीस हजार साधु, पचपन हजार सावियाँ, एक लास चौरासी हजार श्रावक,तीनलाख पैंसठ हजार श्रापिएं थीं। छ सोचौदह पूर्वधारी साधु, दोइनार अवधिशानी, ३२०० फेलज्ञानी, ३५०० ज्ञाता० सून की उन्नीस कथाए क्रियकलब्धिधारी,८०० मनःपर्ययज्ञानी,१४०० वादी, २००० अनुत्तर विमानवामी हुए। भगमन मल्लिनाथ को केवलज्ञान होने के दो वर्ष बाद उनके शासन में से जीव मोक्ष जाने लगे और उनके निर्माण के पश्चात् चीम पाट तक जीव मोक्ष में जाते रहे। भगरान् मल्लिनाथ का शरीर पचीम धनुष ऊचा था,शरीर का वर्ण प्रियगु समान नीला था। केवलज्ञान होने पर वे धर्मोपदेश करते हुए और अनेक भव्य- प्राणियों का उद्धार करते हुए विचरते रहे । भगवान् मल्लिनाथ सौ वर्ष तक गृहस्थापास (छद्मस्थावस्था) में रहे । सौ वर्ष कम पचपन हजार वर्ष श्रमण पर्याय और केरल पर्याय का पालन कर ग्रीष्म ऋतु में समेदशिखर पर्वत पर पधारे और पादपोपगमन सथारा किया। उनके साथ पाँच सौ साधुओं और पॉच सी माधियों न भी सथारा क्यिा। चैत्र शुक्ला चौथ के दिन अर्ध- रानि के समय भरणी नक्षत्र का चन्द्रमा के साथ योग होने पर वेदनीय, श्रायुप्य नाम, गोन इन चार अघाती कर्मों का नाश कर भगवान् मल्लिनाथ मोक्ष पधार गये। (९) जिनपाल और जिनरक्ष की कथा नरा 'माकदी ज्ञात' अध्ययन-काम भोगों में लिप्त रहन वाले पुरुष को दुख की प्राप्ति होती है और काम भोगा मे विरक्त पुरुष से सुख की प्राप्ति होती है। इस निपय की पुष्टि के लिए इस अध्ययन म जिमपाल और जिनरक्ष का दृष्टान्त दिया गया है। चम्पा नगरी में माकढी नाम का सार्थवाह रहता था। उसके जिनपाल और जिनरत नाम के दो पुनथे। उन दोनों भाइयों ने ग्यारह वक्त लरण समुद्र में यात्रा कर व्यापार द्वारा बहुत सा द्रव्य उपार्जन किया था। माता पिता के पर भी वे दोनों भा मेठिया जैप्रथमाला लपण ममुद्र में पारहवी वक्त यात्रा परन लिए साना हुए। जन जहान ममुद्र र पीच में पहुंचा तो तूफान में नष्ट हो गया। जहान का टूटा हुया एक पाटिया उन दोनों भाइयों के हाथ लग गया । निम पर चैट कर तैरते हुए वे दोनों रतद्वीप म जा पहुँचे । उस द्वीप सी सामिनी रयणा देवी न उन्हें देसा । वह उनमे कहने लगी मि तुम दोनों मर माथ कामभोग भोगते हुए यहीं रहो अन्यया मै तुम्ह मार देंगी। इस प्रकार उम देवी क भयप्रद पचनों को सुन कर उन्होंन उमकी नात पीकार र ती और उमक साथ कामभोग भागत हुए रहन लगे। एक समय लपण समुद्र में अधिष्ठायक सुस्थित देव ने रयणा देनी को लपण समुद्र की बीम नार परिक्रमा करके तण, पर्ण, काठ, कचरा, यशुचि आदि को माफ करनी थाना दी। तब उम देवी ने उन दोगा भाडया को कहा -देवानुप्रियो ! मैं वापिस लोट कर पाऊँ तर तर तुम यही पर श्रानन्द पूर्वक रहो । यदि इच्छा हो तो पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशा के वनग्गएड में जाना किन्तु दक्षिण दिशा र वन राण्ड (वीच) म मत जाना । वहाँ पर एक भयकर विषपारी मर्प रहता है यह तुम्हारा विनाश कर डालेगा। ऐसा कह कर देवी चला गई । वे दोनों भाडे पून, पविम और उत्तर दिशा रे नसएड में जान बाद दक्षिण दिशा कपनसएड म भी गय । उमम अत्यन्त दुगन्य पा रही थी। उमर अन्दर जापर देसा कि सैक्डा मनुष्यों की हड्डिया शा देर लगा हुआ है और एक पुस्प शूली पर लटक रहा है। यह हाल देख कर व दोना भाई बहुत घराय और शूली पर लटरते हुए उस पुस्प से उमा वृत्तान्त पृद्धा । उमन कहा कि मैं भी तुम्हारी तरह जहाज के टूट जाने से यहाँा पहुँचा था।मकापन्दी नगरी का रहन वाला घाडों का व्यापारी हूँ। पहल यह देवी मेरे साथ कामभोग भोगती रही।

जाता० सूनी नीम तयार एक समर एक छोटे से अपराध के हो जान पर अपित होकर इम ने मुझे यह दण्ड दिया है। न मालूम यह देवी तुम्हे क्रिम समय और रिस ढग से मार दगी। पहल भी सर्द मनुष्यों को मार पर यह हहियों का ढेर कर रखा है। गली पर लटकते हुए पुरुप के उपरोक्त वचना को सुन र दोनों भाई बहुत भयभीत हुए शोर यहाँ स भाग निक्लने का उपाय पूछने लगे। तब यह पुस्प पहन लगा कि पूर्व दिशा क वन- खएड म शलक नाम का एक यन रहता है। उसकी पूजा करन स प्रसन्न होकर वह तुम्हे इस देवी र पन्दे मे छुड़ा देगा । यह सुन कर दोनों भाई यक्ष के पास जाकर उसकी स्तुति करने लगे और उम दवी के फन्द से छुड़ाने की प्रार्थना करने लगे । उन पर प्रसन्न होकर यक्ष कहन लगा किम तुम्हे तुम्हारे इन्छित स्थान पर पहुंचा दूंगा। किन्तु मार्ग में वह देवी श्राफर अनेक प्रकार क हावभाव करके अनुरुल प्रतिकूल पचन कहती हुई परिपह उपसर्ग देगी। यदि तुम उमर कहने में प्राकर उसमें ग्रामक्त हो जायोगे तो में तुम्हें मार्ग म ही अपनी पीठ पर से फेंक दंगा। यक्ष की इस गर्त का उन दोनों भाइयों ने स्वीमर किया । यक्ष ने अश्व का रूप बनाया और दोनों भाइयों को अपनी पीठ पर बैठा र आकाश मार्ग मे चला । इतने म नह देवी या पहुची । उनको वहाँ न देस र विज्ञान म गेलक यक्ष की पीठ पर जाते हुए देसा। वह शीव वहाँ आई और अनेक प्रकार में हावभाव पूर्वक अनुकूल प्रतिकूल वचन कहती हुई वरुण पिलाप रन लगी। जिनपाल न उमक वचनों पर कोई ध्यान नहीं दिया स्न्तुि जिनरक्ष उसके वचनों में फंस गया। वह उस पर मोहित होर प्रेम के साथ रयणा दशी को देखने लगा। जिमम उम यक्ष ने अपनी पीठ पर से फेंक दिया। नीचे गिरते हुए जिनरक्ष को उमटेयी ने गली में पिरो दिया श्री मेठिया नैन ग्रन्थमाला --- और बहुत कर देकर उमे प्राण रहित करके समुद्र में डाल दिया। निनपाल देवी के वचनों में नहीं फैमा इमलिए यन ने उसको श्रानन्द पूर्वक चम्पा नगरी में पहुंचा दिया। वहाँ पहुँच कर जिन पाल अपने माता पिता मे मिला। कई वर्षों तक मांमारिक सुप भोग र प्रत्रज्या अङ्गीकार की। कई वर्षों तकमयम का पालन कर मोधर्म देवलोक में उत्पन्न हुआ। वहाँ का आयुग्य पूरा कर महा- निदेह क्षेत्र में उत्पन्न होकर मिद्ध, युद्ध यावत मुक्त होगा। अन्त में श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने अपन मुनियों को मम्बोधित कर फरमाया कि- अमणो ! जो प्राणी छोडे हुए काम भोगों की फिर से इच्छा नहा करते वे जिनपाल की तरह शीघ्र ही समार रूपी समुद्र को पार र सिद्ध पद को प्राप्त करते हैं और जो प्राणी रयणा देवी सरीसी अपिरति में फम पर माम भोगों में ग्रामत्त हो जाते हैं ये निनरक्ष की तरह समार रूपी समुद्र में पड़ र अनन्त काल नक जन्म मरण के दुखों का अनुभव करते हुए परिभ्रमण करते हैं। ऐमा समझ कर मुमुक्ष आत्माओं से काम भोगों म निवृत्ति करनी चाहिए । (१०) चन्द्रमा का दृष्टान्त दसवा'चन्द्र नात' अध्ययन-प्रमादी जी के गुर्णा की हानि और अप्रमादी जीरा के गुणों की वृद्धि होती है। यह बताने क लिए गौतम स्वामी द्वारा किय गय प्रश्न के उत्तर में श्रमण भग- वान् महागीर मामी ने चन्द्रमा का दृष्टान्त दिया । यथा- पूर्णिमा के चन्द्रमा की अपेक्षा कारण पक्ष की प्रतिपदाका चन्द्रमा हीन होता है। उसकी अपेक्षा द्वितीया का चन्द्रमा और हीन होता है। इम प्रकार प्रमश हीनता को प्राप्त होता हुआ चन्द्रमा प्रमावस्या को मन प्रभार मे हीन होजाता है अथात् अमावस्या का चन्द्रमा माता० सूत्र की नीम क्याए सर्वथा प्रकाश शुन्य हो जाता है। डमी प्रकार जो साधु क्षमा मार आदि तथा ब्रह्मचर्य के गुणों में शिथिलता को प्राप्त होता जाता है यह अन्त में ब्रह्म- वर्य श्रादि के गुणों मे सर्वथा भ्रष्ट होजाता है। निस प्रकार अमावस्या के चन्द्रमा की अपेक्षा शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा का चन्द्रमा प्रकाश में कुछ अधिक होता है। प्रतिपदा की अपेक्षा द्वितीया का चन्द्रमा और विशेष प्रकाशमान होता है। इस तरह क्रमश बढ़ते बढ़ते पूर्णिमा को असण्ड और पूर्ण प्रभागमान बन जाता है। इसी प्रकार जो साधु अप्रमादी न कर अपन चमा आदिक यापत् ब्रह्मचर्य के गुणों को बढाता है यह अन्त में जाकर सम्पूर्ण अात्मिक गुणों से युक्त हो जाता है और मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। (११) दाउद्रव वृक्ष का दृष्टान्त ग्यारहमा 'टापद्रव ज्ञात' अध्ययन- धर्म सम्बन्धी मार्ग की धाराधना करने वाले को सुख की प्राप्ति और विराधना करने नाले को दु स की प्राप्ति होती है । इसलिए इस अध्ययन में दारद्रव वृक्ष का दृष्टान्त दिया गया है । समुद्र क किनारे 'दापन' नाम के एक तरह के वृक्ष होते हैं। उनमें मे कुछ ऐसे होते हैं जो समुद्र की हग लगने से मुरझा जाते हैं। कुछ ऐसे होते हैं नो द्वीप की हमा लगने से मुरमा कर सूख जाते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जो द्वीप और समुद्र दोनों की दवा से नहीं सूसते और कुछ ऐसे होते हैं जो दोनों की हया न सह सकने के कारण सूस जाते हैं। इस दृष्टान्त के अनुसार साधुओं की चतुर्भङ्गी यतलाई गई है । यथा- होते हैं जो माधु, सावी, २ श्री मेठिया जैन यमाला स्पस्तीथिों रेस्ठोर वचनों को महन कर लेते है परन्तु अन्य तीथिरों रे वचनों से महन नहीं करत ! म माधु देगरिराधा कहलाते हैं। जो माधु अन्य तीथिों के तथा गृहस्थों क कहं हुए कठोर पचनों का मन रम्ते हैं स्न्तुि म्पतीयिरों व कठोर वचनों को महन नहीं करन चे ढग श्राराधक कहलाते हैं । जो साधु स्य- तीकि और अन्य तीथिक स्मिी व मागेर वचनों का सहन नहीं करते थे मधिराधा कहे जाते हैं। जो साधु स्वीपिंक और अन्य तीथिन दोनों कठार पचनाको समभाग महन करते हैं ये मर्म पागधक रह जाते हैं। उपरोक्त दृष्टान्न रर यह रतलाया गया है कि जीराको पाराधक बनना चाहिए, चिराधा नहीं। साराधन बनने म ही जीवा कल्याण होता है (१२) पुद्गलो के शुभाशुभ परिणाम पारहयाँ 'उदर नात' अध्ययन-यभार से मलिन चित्त यान मी भव्य प्राणी मदगुरु सरी मर चारिन र आराधक बन नान । पुद्गल स्मि प्रकार शुभाशुभ रूप में परिवर्तित हो जाते हैं इम पान को बतलाने स लिए म अध्ययन म जल का दृष्टान्त दिया गया है। चम्पा नगरी में नितगनु राजा राज्य स्ता था। उमरे सुबुद्धि नामा मन्त्री था। यह जीपानीमादि नव तचा मा जानकार बार गा। एक समय मोरन रन के पश्चात राजा ने उम भोजन के वणे, गन्ध, रम, म्पश श्रादि की बहुत तारीफ की। राज परिवार न भी राना कपन सा अनुमोदन क्यिा स्न्तुि मुसुद्धि मन्त्री रम ममय मान रहा । तर राना न उसमें इसका कारण पूछा तो मन्त्री ने जगार दिया शिडमम तारीफसी क्या बात है ? प्रयोग झाता० सूत्र की उन्नीस कथाए विशेष म शुभ पुदल अशुभ और अशुभ पुद्गल शुभ रूप से परि- गत हो सकने हैं। राजाने मन्त्री के इन वचनों को सत्य नहीं माना। एक समय सुधुद्धि मन्त्री के माथ राजा बाहर घूमने गया। नगर के बाहर एक खाई के अति दुर्गन्धित जल को देख कर राजा ने उस जल की निन्दा की। दूसरे लोगों ने भी राजा के कथन का ममर्थन किया । मन्त्री को मोन देस कर राजा ने इसका कारण पूछा । मन्त्री ने वही पूर्वोक्त जवाब दिया। राजाने मन्त्री के कथन को सत्य नहीं माना। अपने वचन को सत्य सिद्ध करने के लिए और राजा को तत्त्व का ज्ञान कराने के लिए मन्त्री ने उसी खाई से जल मंगाया और एक अच्छे वर्तन में डाला। फिर अनेक प्रयोग करके उस जल को शुद्ध और अति सुगन्धित बनाया। जलरक्षक के साथ उस जल को राजा के पास भेजा। उम जल को पीकर राना बहुत सुश हुआ और जलरक्षक से पूछा कि यह जल कहाँ माया ? उसने उत्तर दिया कि सुबुद्धि मन्त्री ने मुझे यह जल दिया है । तर राजा ने मन्त्री से पूछा । मन्त्री ने जगार दिया कि यह जल उसी साई का है। प्रयोग करके मैने इमको इतना श्रेष्ठ और सुगन्धित बनाया है। राजा को मन्त्री के वचनों पर विश्वास प्रागया। उसने मन्त्री से धर्म का तच पूछा । मन्त्री ने राजा को धर्म का तत्व पड़ी खूबी से समझाया। कुछ समय पश्चात् राजा और मन्त्री दोनों को संसार मे विरक्ति हो गई और दोनों न प्राज्या अङ्गीकार कर ली। ग्यारह भग का ज्ञान पढ़ा और बहुत वर्षों तक श्रमण पर्याय का पालन कर सिद्ध, युद्ध यावत् मुक्त हुए। जल के प्रशान्त का अभिप्राय यह है कि खाई के पानी की तरह पापी जीव भी मद्गुरु की मंगति करने से अपना प्रात्म.... कल्याण करने में समर्थ हो सस्ते हैं। .

1 श्री सेठिया जन प्रथमाला (१३), नन्द मणियार की कथा .. तेरहनाँ "दर्दुर ज्ञात" श्रध्य -सद्गुरु के अभाव मे नप, नियम, प्रत,पञ्चसाण आदि गुणों की हानि होती है। इस बात को यत- लाने के लिए दर्दुर (मेंढक! श दृष्टा त दिया गया है । एक ममय ग्रामानुग्राम विहार करते हुए भगवान महावीर राजगृह नगर म पधारे। उस समय दर्दुर नाम का देव सूर्याभ टेर समान नाट्यनिधि दिखला कर और भगवान् को वन्दना नमस्कार पर पापिस अपने स्थान को चला गया। उसकी प्रद्धि के बारे में गौतम स्वामी ने प्रश्न पूछा। तब भगवान् न उसका पूर्वमन फरमाया- राजगृह नगर में नन्द नाम का मणियार रहता था । उपदेश सुन कर वह श्रावक बन गया। श्रारक बनने के बाद बहुत समय तक साधुओं का समागम नहीं होने से तथा मिथ्यात्वियों का परिचय होते रहने से वह मिथ्यात्वी बन गया। एक समय ग्रीम भातु में तेला करके यह पापधात कर रहा था। उस समय तृपा का परिपह उत्पन्न हुया जिमसे । उसी यह भारना होगई कि जो लोग युना, वापही श्रादि सुदवाते हैं और जहाँ अनेक प्यास आदमी पानी पीर अपनी प्याम बुझाते हैं वे लोग धन्य है । श्रत मुझे भी एसा ही करना श्रेष्ठ है। प्रात काल पारणा करन के बाद राजा की थाना लेकर नगर क नाहराएक निशाल बावड़ी सुदधाई और याग, वर्गीचे, चित्रशाला, भोजनशाला,वैद्यकशाला अलङ्कार सभा पारि नाई। उनरा उपयोग नगर के सर लोग करने लगे और नन्द मणियार भी प्रशसा करने लगे। अपनी प्रशसा सुन कर यह अत्यन्त प्रसन्न होन लगा। उसका मन दिन रात वावड़ी में रहन लगा। वह उमी में श्रामक्त होगया। एक समय नन्द मणियार के शरीर में चाम, खासी, कोढ़ अादि सोलह ।

३५ ज्ञाता० सूत्र की उन्नीस कथाए गग उत्पन्न हुए। चिकित्सा शास्त्र में प्रवीण वैद्यों ने अनेक तरह में चिन्मिा की बिन्तु उनमें से एक भी रोग शान्त नहीं हुआ। अन्त में प्रार्तध्यान ध्याते हुए उसने तिर्यञ्च गति का आयुर बाँया तथा मरे र मूर्छा के कारण उसी पापडी में मेंहरू रूप मे उपन हुथा । उम बापड़ी के जल का उपयोग करने वाले लोगों के मुरप में नन्द मणियार की प्रगमा सुन कर उस मेंढ़क को जातिम्मररा ज्ञान उत्पन्न हो गया। उसने अपने पूर्वमन के कार्य गम्मरण किया। मिथ्याल का पश्चात्ताप करके मढक के मन म मी उसने पायकत्रत अङ्गीकार किये और धर्म ध्यान की मारना माते हुए रहने लगा । एक ममय मेरा (भगवान् महा- और स्वामी का) अागमन राजगृह में हुआ,उम समय पानी भरने के लिए गारडी पर गई हुई स्त्रियों के मुख में इमै नात को सुन र यह मेंढक मुझे वन्दना करने के लिए बाहर निकला। रास्ते में मुझे रन्दना करने के लिए पाते हुए श्रेणिक राजा क घोडे के पर नीचे दन कर वह मेंढक घायल हो गया । उमी ममय रास्ते में पर तरफ जाकर उसने वहीं से मुझे वन्दना नमस्कार कर सले खना मथारा पिया।शुभ ध्यान धरता हुया वहाँ से मर कर सौधर्म देवलोक म दर्दुरावतमक विमान में दर्दुर नाम का देव हुआ है। यहाँ स चय कर महाविदेह क्षेत्र म उत्पन्न होगा और प्रज्या ग्रगीकार कर मोक्ष म जायगा। दम दृष्टान्त का अभिप्राय यह है कि समस्ति श्रादि गुणों का प्राप्त कर लने पर भी यदि प्राणियों को श्रेष्ठ साधुओं की मगति न मिले तो नन्द मणियार की तरह गुणों की हानि होजाती है। अतः भव्य प्राणियों को साधु समागम को लाम मदा लेते रहना चाहिए। - - A श्री मठिया जैन प्रथमाला (११) तेतली पुत्र की कथा चौदहया 'तेतली जात' अध्ययन-धर्म की अनुकूल सामग्री मिलने में ही धर्म की प्राप्ति होती है। इस बात कोयतलाने के लिए इस अध्ययन में तेतली पुर नाम कमन्त्री का दृष्टान्त दिया गया है। तेतलीपुर नगर में स्नकरथ राना राज्य करता था। उसकी रानी का नाम पद्मावती या तेवली पुन नाम का मन्त्रीथा।वह राजनीति में अति निपुण था। उसकी सी का नाम पोट्टिला था। कनारथ राजा राज्य में अत्यन्त प्रामक्त एप गृद्ध होने के कारण अपन उत्पन्न होन वाले सर पुगों पङ्गों को निहत कर उनसे राज्य पद के अयोग्य बना देता था । इस बात से रानी अति दुखित थी। एक समय उसने अपने मन्त्री में मलाह की और उत्पन्न हुए एक पुत्र को गुप्त रूप से तत्काल मन्त्री के घर पहुंचा दिया । मन्त्री के घर वह भानन्द पूर्वक बदन लगा। उमरा नाम निकजरसा गया।वह कलाओं में निपुण होररयोयन अवस्था को प्राप्त हुआ। तेतली पुत्र मन्त्री अपनी पोट्टिला मार्या के साथ श्रानन्द पूर्वक जीवन व्यतीत करता था किन्तु रिसी कारण से एक समय के पश्चात् वह पोटिला तेतलीपुर को अप्रिय और थनिष्टकारी होगई। वह उसका नाम सुनन मे भी घृणा करने लगा। यह देख पोट्टिला अति दु खिन होकर भार्गध्यान करने लगी। तब तेतलीपुर ने उस से कहा कि तू आध्यान मत कर । मरीनशाला में चली जा। वहाँ श्रमण माहणों को विपुल श्रशन पान श्रादि देती हुई अानन्द पूर्वक रह । पोट्टिला सा ही करने लगी। एक समय सुनता नाम की प्रार्या अपनी शिष्य भएडली सहित वहाँ श्राई । भिक्षा के लिए पाती हुई दो वार्याओं को देरा पोट्टिला ने अपने श्रासन से उठ कर उन्हें वन्दना नमस्कार पिया और साता० सूत्र की उन्नीस क्या आदर पूर्वक श्राहार पानी बहराया। फिर पोट्टिता उनमे पूलन लगी कि कृपा कर मुझे कोई एमी दया, चूर्णयोग या मन्त्र वगैरह बताओ निममे में फिर तेतलीपुर को प्रिय एस इष्ट बन जाऊँ ? पोट्टिला के इन वचनों को सुन कर उन आर्याों ने दोनों हाथों स अपन दोनों कान नन्द कर लिए और कहने लगी कि ऐसी दवा या मन्त्र तन्त्र सताना तो दूर रहा हमें ऐसे वचनों को सुनना भी योग्य नहीं, क्योंकि हम तो पूर्ण नाचार्य को पालने वाली थार्याए हैं । हम तुझे काली प्रापित धर्म कह सकती हैं। उन भार्यानों के पास से चली प्ररूपित धर्म को सुन कर पोट्टिला ने श्राविका के नत अङ्गीकार किये और धर्मकार्य में प्रवृत्त हुई । कुछ समय पश्चात् पोट्टिला ने सुत्रता प्रार्या के पास दीक्षा लेने के लिए तेतलीपुन मे श्राज्ञा मागी। तेतलीपुन ने कहा-'चारिन पालन करके जर तुम स्वर्ग में जानो तर वहाँ मे आकर मुझे सली प्रमपित धर्म का उपदेश देकर धर्म मार्ग में प्रवृत्त करो तो मैं तुम्हें पानादे सकता है।' पोट्टिला ने इस बात को स्वीकार किया और तेतलीपुत्र की आज्ञा लेकर सुनता आर्या के पाम दीक्षा ले ली। बहुत वर्षों तक दीक्षा पाल कर काल कररु देवलोक में उत्पन्न हुई। इधर राजा कनकरथ की मृत्यु होगई तब गुप्त रखे हुए कनक- ध्वज कुमार को राजगद्दी पर निठाया । राजा कनकध्वज अपनी माता पद्मावती रानी के कहन में तेनलीपुत्र मन्त्री काबहुत श्रादर सत्कार करने लगा तथा वेतन श्रादि म वृद्धि कर दी। इमसे तेतली. पुत्र मन्त्री कामभोगों में अधिक गृद्ध एव श्रामक्त होगया। पोट्टिल देव ने तेतलीपुत्र को धर्म का बोध दिया किन्तु उसे धर्म की ओर रुचि न हुई । तर पोट्टिल देव ने देवशक्ति में राजा यह तेतलीपुत्र का किमी प्रकार नहीं करने विमुख होगया।ततली 4 मन फेर दि । ३८ श्री सठिया जैन प्रन्थमाला 1 . । भीत हुआ और यात्मघात करने की इच्छा करने लगा । तर पोट्टिल देव ने उसे प्रतिपोध दिया। शुभ अध्ययमाय से तेतलीपुत्र'को जातिम्मरण ज्ञान उत्पन्न होगया और अपने पूर्वभव में ली हुई दीना श्रादि के उत्तान्त को जान कर उसने प्राज्या ग्रहण की। कछ समय पथात् उनको फेवलवान और केरलदर्शन उपन्न होगए। या न दुन्दुभि वना र कालनान महोत्म किया । कनकध्वज राना भी नन्दना नमस्कार करने गया। तेतलीपुत्र नली न धर्म, स्था रही । धर्मकथा सुन कर राजा कनकध्वन ने श्रापक प्रत अङ्गीकार क्येि । बहुत वर्षों तक पाली पर्याय का पालन कर तेतलीपुन मोच में पधार गये। (१५) नन्दीफल का दृष्टान्त पन्द्रहमा 'नदीपन ज्ञात' अध्ययन-चीतराग देव र उपदेश से निपय का त्याग और मत्य अर्थ की प्राप्ति होती है। उसके पिना नहीं हो सस्ती । यह बतलाने के लिए हम अध्ययन में नन्दीपल सा दृष्टान्त दिया गया है। चम्पा नगरी में धन्ना सार्थवाह रहता था। एक समय वह अहिच्छता नाम सी नगरी में व्यापार करने के लिए जाने लगा। उमने शहर में घोपणा करवाई कि जो कोई व्यापार के लिए मेरे माय चलना चाहें व चलें जिनक पास वस्त्र, पान, भाडा आदि रही है उनका ये मब चीजें में दूँगा और अन्य मारी सुविधायें में गा । इस घोषणा को सुन कर बहुत मे लोग धन्ना सार्थ- पाह ये माथ नान को तय्यार ९ । कुछ दूर जान पर एक अटनी पडी। धन्ना सार्थनाह मा लागा को सम्बोधित कर कहन लगा रि इम अटवी मपल फूल और पना से युक्त बहुत से नन्दीक्ष है । उनर फल देसन म बड़े सुन्दर और मनोहर हे,साने में तत्काल - शाता सून की उन्नीस स्थार ३६ स्वादिष्ट भी लगते हैं किन्तु उनका परिणाम दुःखदायी होता है और अकाल म जीवन में हाथ धोना पड़ता है। इसलिए तुम सर लोग नन्तरी वृत्त के फला कोन साना और यहाँ तक कि उनकी छाया में भी मत वैठना । दूसरे वृक्षों के फल दिसने में तो सुन्दर नहीं है किन्तु उनमा परिणाम सुन्दर है । उनराम्बेच्छानुमार उपभोग कर सकते हो । ऐमा कह कर उन सब लोगों के साथ धना'माथवाह न उस बटनी में प्रवेश किया। फितनक लोगों ने बना सार्थवाह के कथनानुसार नन्दी वृक्षों के फलों को नहीं साया और उनकी छाया में भी दूर रहे । इसलिए तवाल तो वे सुपी नहीं हुए रिन्तु अन्त में बहुत सुखी हए । स्निनेक लोगों ने धन्ना मार्यवाह के बचना पर निश्वास न करके नन्दी वृक्षों क सुन्दर फलों को साया और उनकी छाया में बैठ कर अानन्द उठाया । इममे तत्काल तो उन्हें सुप प्राप्त हुआ किन्तु पीछे उनका शरीर भयकर विप में व्याप्त होगया और अकाल में ही मृत्यु को प्राप्त हुए । इसी तरह जो पुरुप नन्दी फलों के ममान पाँच इन्द्रियों क विषयों का त्याग करेंगे उनको मोक्ष मुरम की प्राप्ति होगी। जो लोग नन्दी वृक्षों के समान इन्द्रियों के विषयसुस में आसक्त होयेंगे। अनेक प्रकार के दुख भोगते हुए संमार में परिभ्रमण केंगे। । . इम पश्चात् मह धन्ना सार्थवाह अहिच्छत्रा नगरी में गया। अपना माल बेच कर बहुत लाभ उठाया और वहाँ में वापिस माल भर कर चम्पा नगरी में आगया। बहुत वर्षों तक ससार के मुरा भोगन के पश्चात् धर्मघाप मुनि रे पास दीक्षा ग्रहण की। प्रज्या का पालन कर देवलोक में गया और वहाँ से चर र महाविदेह क्षेत्र में जन्म लेकर पट प्राप्त करगा।

भी मेठिया जैन प्र यमाला - (१६) श्रीकृष्ण का अपरकका गमन मोलहवा 'अपरकचानात' अध्ययन-विषय सुसक्तिने दुप दायी होते हैं, इममा वर्णन इम अध्ययन में मिया गया है। विषय सुख को न भोगते हुए केवल उनकी इच्छा रसने मान मे अनर्थ की प्राप्ति होती है । इसके लिए अपरकका के राना पद्मोत्तर का दृष्टान्त दिया गया है। इसमें द्रौपदी की कथा बड़े विस्तार के माथ दी गई है। द्रौपदीकाजीप पूर्वभर में चम्पानगरी में नागश्रीनामणी के रूप मेंथा। एक बार उसने धर्मरुचि मुनिरो मामसमण के पारणे के दिन रड़ये तुम्बेका शाम पहराया। उम गाफ को लेकर धर्मरचि नगार अपने गुरु धर्मपाप मुनि के पास पाये और आहार दिखलाया। उस शारोचस पर गुरु ने कहा कि यह तो कड़वे तुम्ने कागाक है। एकान्त म जाकर डमको परट दो गुरु की आज्ञा लकर धर्मरुचि एकान्त स्थान में आये। वहाँ थार जमीन पर एक चूद डाली । गाक में घृनादि पदार्थ अच्छे डाल हुए थे इमलिए उम की सुगन्ध मे बहुत सी मीड़ियाँ उस द पर पाई और उमरेजहरम मर गई। मुनि ने सोचा एक यूँद से इतनी मीड़ियाँ मर गई तो न जाने इस मार शाफ मे स्तिने जीनों का नाश होगा ? इस प्रकार कीडियों पर अनुकम्पा करके उम सारे शाक को धर्मरुचि अनगार स्वयं पी गये । इमसे शरीर में प्राल पीडा उत्पन्न हुई। उमी समय मुनि ने मथारा कर लिया। ममाथि पूर्वक मरण प्राप्त कर ये सथिसिद्ध अनुत्तर पिमान में उत्पन्न हुए । वहाँ चव कर महानिदेह क्षेत्र में उत्पन्न होंगे और प्रवज्या ग्रहण कर मोक्षपर प्राप्त करेंगे। धर्मरुचि मुनिको कड़वा तुम्या बहराने आदिकासारा बत्तान्त शाता० सून की उन्नीस कथाएं ४१ नागपी के पति को मालूम हुआ । इमसे वह अतिकुपित हुआ। पर्जना और ताडना पूर्वक उसने नागश्री को घर से बाहर निकाल दिया, जिममे लोगों में भी उसकी बहुत हीलना और निन्दा हुई। दर दर मटकती हुई नागश्री के शरीर म सोलह रोग उत्पन्न हुए। मर कर छठी नरक में उत्पन्न हुई। यहाँसे निकल कर मत्स्य (मच्छ), माती नरक, मत्स्य, साती नरक, मत्स्य, छठी नरक,उरगादिक के भव बीच में करती हुई पाचर्वी नरक से पहली नरक तक, पादर पृथ्वीकाय आदि सब एकेन्द्रियों में लाखों भव करने के पश्चात् नम्पानगरी में सागरदत्त मार्थवाह के सुकुमालिका नाम की पुत्री रूप म उत्पन्न हुई। यौवन वय को प्राप्त होने पर जिनदत्त सार्थवाह के पुत्र मागर के साथ विवाह किया गया किन्तु उसके शरीर का स्पर्श तल- पार जैमा उग्र और अग्नि सरीखा उप्प लगने के कारण सागरने तत्काल उसमा त्याग कर दिया और अपने घर चला गया। इससे सुकुमालिका अति चिन्तित हुई । तर पिता ने उसको आश्वासन दिया और अपनी दानशाला में उसे दान देने के लिए रस दिया। एक समय गोपालिका प्रार्या से धर्मोपदेश सुन कर उसे ससार स रिरक्ति हो गई। उसने गोपालिका प्रार्या के पास प्रमज्या श्रङ्गी- कार कर ली। वह येला,तेला आदि तप करती हुई विचरने लगी। एक समय अपनी गुरुयानी की आज्ञा के बिना ही शहर के बाहर उद्यान में जाकर सूर्य की प्रातापना लेने लगी। वहॉ उसने देव- दत्ता गणिका के साथ क्रीड़ा करते हुए पाच पुरुषों को देखा। यह देख कर सुकुमालिका भार्याने नियाणा कर लिया कि यदि मेरी तपस्या का फल हो तो भागामी भव में में भी पाच पुरुषों की वालमा (प्रिया) पर्ने । इस प्रकार का नियाणा करक चारिन (संयम) में भी वह शिथिल होगई । अन्त में अर्धमास की संलगना परके में देवी रूप में उत्पन्न हुई। पहा .

को किसी प्रकार का नियाणा नहीं करना चाहिये। ४ प्राप्त किया। द्रोपटीनेभी प्रज्या ग्रहण की अनेक प्रकार की तपस्या कर महानिदेह क्षेत्र में उत्पन होकर सिद्धिपद को प्राप्त करेगी। इस अध्ययन से यह शिक्षा मिलती है कि नागश्री न मुनि और नारकी, वियत्र आदि के भवों में उसे अनेक प्रकार के दुख उठाने पड़े। सुकुमालिका भर में नियाणा किया जिससे द्रौपदी के भर में उमको मोक्ष की प्राप्ति नहीं हुई । इसलिए साधु साध्वी श्री मठिया। नैन प्रथमाला पर गपिन्य नगर में द्रुपद राजा के यहाँ पुरी रूप में उत्पन हुई । उसका नाम द्रोपदी रस्सागया। यौवन गय को प्राप्त होन पर राजा द्रुपद ने द्रौपदी का स्वयपर करवाया जिममें द्रौपदी ने युधिष्ठिर' श्रादि पानों पाण्डवों को यर लिया अर्थात् पति स्प मे स्वीकार कर लिया। एक समय नारद ऋपि पाएडवों के महल में आये । सबने खडे होकर ऋषि का श्रादर सरकार पिया किन्तु द्रौपदी न उनका श्रादर मत्कार नहीं किया। इससे नारदजी को बुरा मालूम हुआ। उन्होंने धातकी सण्ड में अपरसवा नगरी के राजा पद्मोत्तर के पास जाकर उसके मामने द्रौपदी के रूप लावण्य की प्रशसा की। पोचर राना ने देवता की सहायता से द्रौपदी का हरण करवा कर अपने अन्त पुर में मगवा लिया। महासती होने के कारण वह उसको वश में नहीं कर सका। कृष्ण वासुदेन के साथ पाँचों पाण्डव अपरसङ्का नगरी में गये और युद्ध में पद्मोत्तर को पराजित करके द्रौपदी को वापिस ले आये। कई वर्षों तक गृहस्थागास में रहकर पाँचों पाण्टयों ने दीक्षा ली और चारित्र पालन कर सिद्धपद को करक वद्द ब्रह्मदेवलोक में देवरूप से उत्पन्न हुई । वहाँ से ची 'का r - - को कड़ने तुम्बे का गाक बहराया जो महा अनर्थ का कारण हुभा शाता० सून की उन्नीस कथाए में (१७) अश्वों का दृष्टान्त मतरहयाँ 'अश्वज्ञात' अध्ययन-इन्द्रियों को वश में न करने म अनर्थ की प्राप्ति होती है। यह बतलाने के लिए इस अध्ययन में श्रयों का दृष्टान्त दिया गया है। इस्तिशीर्ष नाम के नगर में कनक केतु नाम का राजाराज्य करता था । उम नगर में बहुत से व्यापारी रहते थे । एक समय जहाज माल भर कर चे समुद्र में यात्रा कर रहे थे। दिशा की भूल हो बाने म चै कोलिक नाम के द्वीप में पहुंच गए। वहाँ सुवर्ण और रत्नों की खाने यी और उत्तम जाति के अनेक प्रकार के विचित्र घोड़े थे। वे मनुष्यों की गन्ध सहन नहीं कर सकते थे इसलिए उन व्यापारियों को देखते ही वे बहुत दूर भाग गए। मोने चार रनों से जहाज को भर कर व्यापारी वापिस अपने नगर में पाग, यहाँ के राजा कनककेतु के पूछने पर उन व्यापारियों ने श्राध मारक उन घोडो की हकीकत कही । राजा ने उन घोड़ों शेजने यहाँ मंगाने की इच्छा से उन व्यापारियों के साथ अपने नौक, को भेजा। वे नौकर अपने साथ बहुत से उत्तम उत्तम पदार्थ लेने गए और घोड़ों के रहने के स्थान पर उन मुगन्धित बीडाको विसर दिया और स्वय छिप कर एकान्त में बैंट 1 बाट घूमते फिरते ये घोड़े यहाँभाए। उनमें से स्निना पोटन मुगन्धित पंदायों में प्रासक्त हो गए और कितने बोईनामतन होते हुए दूर चले गए। जो घोड़े उन मुन्द्रियों में श्रामक होगए उनको उन नौकरों ने पार की निकर में राजा के पास ले पाए । राजा पदों पर कर विन यह गर उन घोड़ों को । रापालन कर पीछे मंयम को छोड दे और मामारिक पदार्थों में विशेष प्रामक्त हो जाय तो उमे अनर्थ सी प्राप्ति होती है। यदि उत्कृष्ट भाव में शुद्ध सयम का पालन थोडे ममय तर भी किया जाय तो श्रात्मा का कल्याण हो सकता है। इस बात को बताने के पूर्व महाविदेह के पुष्कलावती विजय म पुण्डरीकिणी नाम की नगरी थी। उममें महापम नाम का राजा राज्य करता था। उमके पुडरी और कुटीम दो पुत्र थे। कुछ समय पश्चात राजा महापमान अपने प्येष्टपुन पुडरीककारानगद्दी पर निठाकर तया श्री सेठिया जैन अन्धमाला एक समय श्रमण भगवान महावीरस्वामी राजगृह नगर के गुणशील उद्यान में पधारे। धर्मोपदेश सुन कर उसे वैराग्य उत्पन्न होगया। भगवान् के पाम दीक्षा ग्रहण की। कई वर्षों तक सयम रापानन कर सौधर्म देवलोक में उत्पन्न हुश्रा । यहाँ मे चर कर महानिदेह क्षेत्र में जन्म लेकर मिद्धिपद को प्राप्त करेगा। जिम प्रकार धन्ना मार्थवाह ने वर्ण, गन्ध, रम, रूप आदि के लिए नहीं किन्तु केवल अपने शरीर निर्माह के लिए और राज गृह नगरी म पहुँचने के लिए ही सु सुमा बालिका के माम प्रार रुधिर का सेवन किया था। इसी प्रकार साधु माध्वियों को मी, इस अशुचिरूप औदारिक शरीर की पुष्टि एवं रूप आरि,क लिए नहा किन्तु केवल सिद्धगति को प्राप्त करने के लिए डी आहार आदि करना चाहिए । ऐसे आत्मार्थी माधु साध्वी एव श्रावक श्राविका इस लोक में भी पूज्य होते हैं और क्रमश' मोक्ष सुख को प्राप्त करते हैं। (१९) पुण्डरीक और कुण्डरीक की कथा उन्नीमा'पुण्डरीकज्ञात' अध्ययन-नो बहुत समय तक मयम लिए इम अध्य० में पु उरीक और कुडरीक काटात दिया गया है। r -- शाता० सूत्र को उन्नीम कथाए -4-1 . अण्डरीक को युरराज बना कर धर्मघोष स्थविर के पास दीक्षा ले सी) नहुन गयोतक मयम का पालन कर मिद्विपद को प्राप्त किया। एक समय फिर वे ही स्थविर मुनि पु डरीकिणीनगरी के नलिनी- उन उद्यान में पारे । धर्मोपदेश सुन कर राजा पुण्डरीक ने तो श्रावक बन अङ्गीकार किये और कुण्डरीक ने दीक्षा ग्रहण की। इसके बाद जनपद में निहार करने लगे । अन्तप्रान्त अाहार करने म उनके शरीर में दाहज्वर की निमारी उत्पन्न होगई । ग्रामा- ग्राम विहार करते हुएएक समय वे पुण्डरीकिणी नगरी में पधारे। स्थविर मुनि को पूछ कर कुण्डरीक मुनि पुण्डरीक राजा की यान- शाला में ठहरे। राजा ने मुनि के योग्य चिकित्मा करवाई । जिमसे व थोडे ही समय में स्वस्थ होगए। उनके साथ वाले मुनि विहार कर गाय किन्तु कुण्डरीक मुनि ने विहार नहीं किया और माधुके प्राचार में भी शिथिलता करने लगे। तर पुण्डरीक राजा ने उन्ह ममझाया। पुण्डरीक के ममझाने पर कुण्डरीक मुनि विहार कर गये। कुछममय वक स्थपिर-मुनि के साथ उग्र विहार करते रहे किन्तु फिर शिथि- लाचारी बन कर ये, अफैले ही पुण्डरीविणी नगरी मेश्रागये। कुण्डरीक मुनि को इस प्रकार शिथिलाचारी देख कर पुण्डरीक गना ने उन्हें बहुत समझाया किन्तु ने ममझे नहीं, प्रत्युत नगदी लेकर भोग भोगने की इच्छा करने लगे। पुण्डरीक राजा ने उनके भागों को जान कर उन्हें गजगद्दी पर स्थापित रिया और स्वयमेव पंचमुष्टि लोच करके प्रमज्या श्रङ्गी- रार की। 'स्थविर भगवान् को वन्दना करने के पश्चात् मुझे आहार रुग्ना योग्य है ऐमा अभिग्रह करक उन्होंन पुण्डरीफिणी नगरी स विहार कर दिया । ग्रामानुग्राम निहार करते हुए वे स्थनिर भग- वान् की मेवा में उपस्थित हुए । गुरु के मुख से महारत अगी फार किये तत्पmne 3 are fart श्री सेठिया जैन प्रथमाला . केलिये गये । भिक्षा में आये हुए अन्तप्रान्त एप रूद अशनादि । का आहार करने मे उनके शरीर में दाहज्यर की पीमारी होगई । अर्ध रात्रि के ममय शरीर में तीन टना उत्पन्न हुई । पालोचना एव प्रतिक्रमण कर मलेखना मंधारा किया ।शुभ ध्यान पूर्वक मरण प्राप्त कर सर्वार्थमिद्ध विमान में उत्पन्न हुए । यहाँ स चन कर महाविदह क्षेत्र में जन्म लेकर सिद्ध पर को प्राप्त करेंगे। उधर रोजगदी पर बैठ कर पुण्डरीक काम भोगों में यामक्त होरर बहुत पुटिकारर और कामोरेतर पदार्थों का प्रतिमाना में सेवन करने लगा। वह थाहार उमे पचा नहीं, जिसमे अर्ध रानि के समय उसके शरीर में अत्यन्त तीन वेदना उत्पन्न हुई । भार्ग, रौद्रध्यान ध्याता हुआ कुण्डरीक मर कर माती नरक में गया। इस दृष्टान्त मे शास्त्रकारों ने यह उपदेश दिया कि जो माधु, माध्वी चारित्र ग्रहण कर शुद्ध पाचरण करने हैं वे थोडे समय में ही श्रात्मा का कल्याण कर जाते हैं ।जमा कि पुण्डरीक मुनि स्वल्प काल में ही शुद्ध शाचरण द्वारा मुक्ति प्राप्त कर लेंगे। जो माधु, माची मयम लेकर पड़ियाडे होनाते हैं अथात् सयम म पतित होजाते हैं और कामभोगों में आसक्त हो जाते हैं। वे कुण्डरीकसी तरह दु स पाते हैं और मर पर दर्गति में जाते हैं । अत' लिये हुए प्रत, प्रत्याख्यानों का प्रकार पालन करना चाहिए। ८५२ (ख) पैनयिकी (विणीया) बुद्धि के १५ दृष्टान्त- निमिरे अत्थमत्थे अ, लेह कणिए अकल अस्मै य । गद्दम (ह) लक्रण गठी, अगए रहिए य गणिया ॥ सीया माडी दीह च तणं, अवमन्वय च कु चस्सा । निव्वोत्ये य गोणे, घोडग पडण च रूक्साश्रो॥ । - चैनयिकी घुद्धि के १५ दृष्टान्त ४६ गाथार्थ:-निमित्त १, अर्थ शास्त्र २, लेस ३, गणित ४, कृप ५, अन ६, गर्दम ७, लक्षण ८, ग्रन्थि ६, अगद १०, रथिक और गणिका ११-१२, सूसी साड़ी को ठडी कहने और तृण को लम्बा कहने, एर कोंच का वाम भाग में घूमने में श्राचार्य का बोध १३, विपमय पानी से जार मरण १४, व मैल का चोरी जाना, घोडे का भरण और वृक्ष से पतन १५,- इन सर उदाहरणों का कथारूप से स्पष्टीकरण इस प्रकार , - -- १ निमिन:निमित्त का दृष्टान्त-जमे-क्सिी नगर में एक सिद्ध पुन अपने दो शिष्यों को निमित्त शास्त्र पढ़ा रहा था। शिप्या में एक जो विनय सम्पन्न था यह गुरु के उपदेश को ययावन नहुमान पूर्वक स्वीकार करता और बाद में अपने चित्त में विचार करते हुए जहाँ भी सन्देह हुआ, तत्काल गुरु के पास जाकर विनय पूर्वक पूछलेता । इस प्रकार निरन्तर विनय और पिक के माथ शास्त्र पढते हुए उसने तीन युद्वि प्राप्त कर ली। दूसरा इन गुणों से रहित होने के कारण केवल शन्ट ज्ञान ही प्राप्त कर मका । एक दिन दोनों गुरु के आदेश से किमी पाम' के गॉर में जा रहे थे। मार्ग म किमी पडे जन्तु के चरण चिन्ह दिसाई देते थे, विनयी शिष्य ने दूसरे मे पूछा कि न्यु! ये किम क पाँव हैं ? उसने कहा इसमें क्या पूछना ? ये साफ हाथी के पाँव के चिन्ह दीसते हैं। विनयी ने कहा-नहीं ऐसा नहीं हो सकता, ये हथिनी के चरण चिन्ह हैं और यह हथिनी वाई श्रॉस से काँणी है तथा उस पर किसी बड़े घर की सधवा स्त्री पेठकर जा रही है और एक दो दिन में ही उसको नालक पैदा होगा क्योंकि उसके मास श्रम पूरे हो गये हैं। विनयी के ऐसा कहने पर दमरे ने पूछा- - .

श्री सेठिया जन प्रथमाला
अनी! यह फिम पर मे समझने हो ? पिनयी नोला-ज्ञान
का सार ही निसाम होना है, चलो प्रागे इसका निर्णय हो
जायगा । ऐमा कहकर दोनों उस गाँव में पचे । जाते ही
देखते हैं कि गाँरक बाहर तालाब के किनारे स्सिी रानी
का डेरा है और हथिनी भी याँ आँख मे कॉणी है. इसी
बीच में बार एक दासी ने मन्त्री से कहा कि स्वामिन् !
राजा को पुन लाम हा है, यधाई दीजिये । बिनयी ने ऐमा
सुनार दूसरे से कहा कि क्यों बन्धु ? ढामी का वचन सुना ?
उसने कहा-हाँ, तेरी सन बात सच्ची है। फिर तालार म
हाथ पॉन धोकर दोनों विश्राम के लिए एक वट वृत के
नीचे बैठे । उधर से मस्तक पर पानी का घड़ा रक्खे हुए एक
युढ़िया जा रही थी उमन इन दोनों की प्राकृति व प्रकृति देस
कर सोचा कि ये दोनों विद्वान् हैं । अत इनसे पूछना चाहिए
कि मेरा देशान्तर में गया हुश्रा पुन कर लौटेगा? मा
सोच कर पाम गई और नम्रता पूर्वक पूछने लगी । उमी
समय मम्तक से गिरकर घडा दुरडे २ हो गया तुरन्त
दूसरा यह देखकर बोल उठा-माँ ! तेरा पुन पड़े की तरह
मर गया है। इस पर विनयी ने कहा-मित्र ! ऐमा मत
कहो । इसका पुन अभी घर पर आया हुआ है और बुढ़िया से
भी बोला कि माँ ! घर जायो और अपने बिछुडे हुए पुत्र का
मुंह देखो।
निनयी की बात से प्रसन्न हुई बुढ़िया उसको आशीर्वाद
देती हुई घर गई और उसी समय घर पर आये हुए पुन,
को
देसा । पुत्र के प्रणाम करने पर आशीर्वाद देर बुढ़िया
ने नैमिचिक का कहा हुआ सप धृत्तान्त पुन से कह
सुनाया। फिर पुत्र को पूछकर कुछ रुपये व वस्त्र युगल
है

वैनयिकी बुद्धि के १५ दृष्टान्त
--
बुढिया ने विनयी को अर्पण किये । तर दूसरा सोचने लगा
कि-अहो ! गुरु ने मुझे अच्छा नहीं पढ़ाया है, अन्यथा
जैमा यह जानता है, वैसा में भी क्यों नहीं जानता ! कार्य हो
जाने पर दोनों गुरु के पास आए । गुरु के दर्शन करते ही
पिनयी ने अञ्जलि जोडे हुए गिर को 'नमा कर प्रानन्दाश्रु
पूर्वक गुरु के चरणों में प्रणाम किया। दूसरा शैलस्तम्भ की
तरह थोड़ा भी पिना नमे मात्मर्य धरता हुअा गुरु के
सामने सडा रहा तर उममे गुरु गोले-अरे ! क्या आज
प्रणाम भी नहीं करता ? वह बोला-जिम को आपने अच्छी
तरह पढाया है वह ही प्रणाम करेगा, हम ऐसे पक्षपाती गुरु को
प्रणाम नहीं करते । गुरु मोले- क्या तुम को अच्छा नहीं
पढ़ाया ? इस पर उसने पहले का सब हाल कह सुनाया।
तर गुरु न विनयी से पूछा-पत्म ! तुमने वह सर कमे
जाना १ कहो ! यह गोला-गुरुदेव ! मैने यापकी कृपा से
विचार करना शुरू किया कि हाथी के तो पॉर दिसते ही हैं
किन्तु विशेषता क्या है ? फिर उमझी लघुशका को देखकर
निश्चय किया कि ये हथिनी के पार हे ! दक्षिण नाज़ के मन
वृक्ष साए हुए थे किन्तु बाई वाज़ के नहीं, इसमे यह
ममझा कि बाँई अाँस मे यह कॉणी है। साधारण मनुप्य
हाथी की सवारी नहीं कर सकता। इससे निश्चय किया कि
इस पर रानकीय मनुष्य है ! वृक्ष पर लगे हुए रंगीन वस्त्र
के भाग गे सपवा रानी और भूमि पर लघुगका करने के
बाद हाथ टेककर उठने से गर्भवती है तथा दक्षिण चरण
और हाथ पर अधिक भार पड़ने से अन्प ममय में ही
पुत्रोत्पत्ति होगी ऐसा समझा । उस वृद्धा के प्रश्न करते ही
जब पड़ा गिरकर टूट गया तर मैने सोचा कि जैसे बड़े का
-

श्री सेठिया जामथमाला । इतने वर्ष तक तुम काम करोगे टी टो घोड़े तुम को परिश्रम से बदले दिये जायेंगे। उसने भी यह स्वीकार कर लिया। रहते २ स्वामी की लगी र माथ उसरा पड़ा स्नेह हो गया। एक दिन उमन पन्या म पृछा- इन मर घोड़ों में कान में दो घोड़े सत्र में अच्छे हैं ? म्यामिस्न्या न कहा-कि यों तो ममी घोह विश्वाम पार हैं, स्न्तुि दो घोड़ जो वृक्षा से गिराए हुए बडे पत्थरों क शन्दों को सुन कर भी नहीं डरत के उत्तम है। उसन उमी प्रसार परीक्षा की और उन घोड़ों को पहचान लिया। फिर वेतन लेने के समय में स्वामी से बोला कि मुझे अनुर • पोडे टीजिय । मामी बोला- अरे! मरे अच्छे २ घोड़े हैं । उनको ले, इन दो मी लार क्या रंगा? ये अच्छे भी नहीं हैं। लेकिन उमन यह बात नहीं मानी । तर मठ में मोचा- इमको घर माई बना लेना चाहिए, नहीं तो इन उत्तम घोड़ों को लके यह चला जायगा । लक्षण सम्पन्न घोड़ों से छुटम्प र अश्यसम्पति की भी वृद्धि होगी। ऐमा मोच कर स्न्या की अनुमति स उन दोनों का विवाह कर दिया। उमको घर जमाई पनाने स लक्षरा सम्पन्न घोडे बचा लिए गये। यह अश्वस्वामी की गिनयजा युद्धि थी। - गठी- ग्रन्थि के द्वारा सममन में पादालप्ताचार्य की उद्धि का दृष्टान्त इस प्रकार है- किमी समय पाटलिपुर में मुरड नाम का राना राज्य रता था। परराष्ट्र राना ने एक दिन कौतुक के लिए उसके पास तीन चीजें भेजी। १ गृह सूत्र- (लिपि गाँठ वाला यूत), २ ममष्टि- समयमाग वाली लाडी, प ३- लाख स चिपकाया हुया छिपे द्वार का दिया। राजा ने अपने सभी दग्यारियों को ये चीज दिखाइ किन्तु :- कोई भी नहीं समझ मरा। तर राजा ने के पाद - वनयिकी बुद्धि क १५ दृष्टान्त श्राचार्य को बुलाकर पृछा- भगवन् ! श्राप इनके ग्रन्थि द्वार जानते हो ? प्राचार्य ने कहा- हाँ जानता हूँ। ऐसा कह कर उसी समय सूत को गरम पानी में डाला, तो उप्ण पानी के सयोग से मूत का मैल हट गया और अन्त- ग्रन्यि का भाग दिस पडा। लकड़ी को भी पानी में गिराया जिममे मालूम हुधा कि मूल भारी है और भारी भाग पर ही ग्रन्थि होती है। फिर डिब्बे को भी गरम करवाया जिससे लास का सर भाग गल जाने पर द्वार प्रकट हो गया। राजा आदि सभी दर्शक इस कौतुक को देस कर सुश हुए फिर राजा ने प्राचार्य से कहा- महाराज ! श्राप भी कोर्ड, ऐसा दुर्जेय कौतुक करिये जिम को मैं वहाँ भेज सर । तर थाचार्य ने किमी तुम्बी के एक प्रदेश में एक सण्ड हटाफर नहाँ रत्न भर दिए तथा उस खण्ड से इस प्रकार सी दिया कि किमी को लक्षित ही नहीं हो । फिर परराष्ट्र के रानपुरुषों को सूचना कर दी कि इसको निना तोडे ही इस से रत्न ले लेरें। किन्तु बहुत प्रयत्न करने पर भी उनको रनों का पता नहीं चला। यह श्राचार्य की विनयजा पुद्धि थी। १०- अगए- अगद, बंद्य की रिपोपशमन उद्वि का पटान्त जैसे- किमी राजा के राज्य को गनुपक्ष के राजाओं ने चारों ओर से घेर लिया छोटे मैन्य से उनका मुकाबला करना अश- क्य है। ऐसा सोचकर रानाने पानी म विपयोग करवाना शुरू किया। सभी लोग अपने अपने पास का निप लान लगे । एक वैद्य यरमार पि लकर राजा को भेट किया। बहुत थोड़ा विष देख कर राजा वैद्य पर बहुत क्रुद्ध हुआ। तब वैद्य बोला- महाराज! यह रिप सहस्ररोधी है। थोड़ा देख कर आप नाराज M श्री मेठिया जैतमयमाला न होयें । इस पर राना ने पूछा- कि इसके सहस्ररोधी होने में क्या सपूत है ? बैद्य मोला - देव किमी पुराने हाथी को मॅगनाईये । में प्रयोग करके दिखाता हूँ। उमो समय एक चूदा हाथी लाया गया और वैद्य ने उसकी पुच्छ का एक पाल उसाड़ कर उस बाल में हाथी के भिन्न भिन्न अंगों में पि प्रयोग किया। निम निस अंग में विप फैलना गया उन २ अंगों को नएसा कर दिया। तर वैद्य चौला-देव ! हाथी विपमय हो गया है अन जो भी इसको सायगा वह भी विप- मय हो जायगा । इस प्रकार यह विप क्रमश हजार तक पहुँ- चता है। हाथी की मृत्यु से राना छ उढाम होरर योला- क्या अब हाथी से जिलाने का उपाय भी है ? वैद्य पोला- जगर । उसी वाल के रत्र- (प) में एक औपर दिया गया जिसमें कुछ ही समय में यह विपविकार शान्त हो गया। हाथी अच्या बन गया और राजा भी धैध पर सन्तुष्ट हुआ। यह वैद्य की विनयजा बुद्धि हुई। ११-१२-उदाहरण रथिर और गणिका'-पाटलीपुर में कोशा नाम की एक वैश्या रहती थी। उसके यहाँ स्थूलभद्र मुनि ने वर्षानाम किया और हारमार से विचलित न होकर उमरी उपदेश से श्रारिमा बनादी, जिमसे राज नियोग के सिमाय उसने भी मैथुन के त्याग कर दिए । किमी समय एक रथिस राजा से प्रसन्न कर कोशा की मागणी की। राजा ने भी उसा माँगन पर कोशा को हुकुम दे दिया, किन्तु जर रथिक उसके पास पहुँचा तो वह पारम्पार म्थूलभद्र मुनि की स्तुति करती, परन्तु उसको नहीं चाहती । रधिर अपने विज्ञान में उससे प्रसन्न करने के लिए अशोक वनिका में ले गया और जमीन पर सदा २ अाम्नयुद्ध से भाम्र की तुम्नी को , वैनयिकी बुद्धि के १५ रटान्त तोडकर अर्धचन्द्र के श्राकार से काटली । फिर भी कोशा सन्तुष्ट नहीं हुई और गोली कि शिक्षित को क्या दुष्कर है, देसी म मर्पप की रागिपर सूई में पोये हुए स्नेर के फूलों पर नाचती हूँ, ऐमा कह कर उमने मर्पप राशि पर नृत्य कर दियाया। रथिक हुलस उसकी बहुत प्रशमा करने लगा, तन श्या ने कहा-"श्रान की तुम्नी को तोडना और सर्पप की देरी पर नाचना दुप्कर नहीं, किन्तु अगदा-समूह में रहकर मुनि जना रहना यह दुष्कर है"। इस पर स्थूलभद्र मुनि का वृत्तान्त कह सुनाया, जिसमे रथिक को भी धैराग्य श्रागया । यह रथिक और गणिका की विनयजा द्धि हुई । १३-माटी प्रादि का दृष्टान्त-जैसे- कुछ राजकुमारों को एक कलाचार्य शिक्षण दे रहा था । राजकुमारों ने भी उपकार के बदले में बहुमूल्य द्रव्यों से समय समय पर प्राचार्य का सम्मान क्थिा । इस प्रकार अपने पुत्रों के बहुमूल्य द्रव्य देने पर क्रुद्ध होर रानाने प्राचार्य को मरवाना चाहा। किसी तरह राज पुनों को यह बात मालूम होगई। उन्होंने सोचा कि निद्या दाता होने में आचार्य भी हमारे पिता है, अतः इनको विपत्ति से बचा लना हमारा कर्तव्य है। थोड़ी देर के बाद प्राचार्य भोजन के लिए पाए और धोती मॉगने लगे। इस पर कुमारों ने सूसी होते हुए भी कहा-धोती गीली है तथा द्वार के सामने एक छोटा तृण सड़ा करके बोले-तृण बहुत दीर्घ-लम्बा है। ऐसे ही कोंच शिप्य पहले सदा प्राचार्य की दक्षिण अोर से प्रदक्षिणा करता किन्तु अभी वह रामभाग से घूमने लगा। इस प्रकार कुमारों के विपरीत कथन और क्रोंच के वाम भ्रमरा से श्राचार्य ममझ गये कि सभी मेरे से विरुद्ध (उलटे) हैं, केवल ये कुमार ही भक्ति सता रहे हैं । ऐमा सोचकर राजा को लक्षित , Pr श्री येठिया जैन प्रथमाला -- मृतक परीक्षा न हो इस प्रकार से ग्राचार्य चले गए। यह प्राचार्य और कुमारों की विनयजा बुद्धि हुई । १४-नियोदए--नीनोदक-कोतवाल की का दृष्टान्त-जैसे-बहुत दिनों से क्रिमी वणिक स्त्री का पति विदेश में गया हुया था । एक दिन उस पणिम् वधूने कामातुर होकर अपनी दामी मे क्मिी पुस्प को लाने के लिए कहा-दासी भी एक युगावस्था सम्पन्न पुरुष को ले आई । फिर नाई मे उसके नस केश आदि का सस्कार करवाया गया। रात में उम पुरुष के साथ मेठानी दूसरे मजिल पर गई। कुछ समय के बाद उम पुस्प को प्यास लगी) उमने तत्काल परमा दुआ मेघ का पानी पीलिया । पानी त्वचा में विप वाले सर्प से छुना गया था । अत. पानी पीने के दूसरे ही क्षण वह पुरुष मर गया । इस आकस्मिक घटना से भयभीत हो, उस वणिक् वधून रात के पिछले भाग में किसी शून्य देवल में नह शव लेगकर रसना दिया। प्रात, काल होते ही लोगों की दृष्टि पड़ी तो तुरन्त कोत बाल को सूचना दी गई । उसन प्रार देसा तो मालूम हुया कि इस मृत पुस्प के नस केशादि थोडे ही समय पहल घनाये गये हैं । इस पर नाइयों से पूछा गया, उन म से एक ने कहा कि स्वामिन् ! अमुक सेठ की दासी के कहने से इसके नस आदि मैने बनाए हैं । दासी से भी इस बात की जाँच करके भेद सुला लिया। यह नगर रक्षक की पिनयजा बुद्धि हुई। १५-गोणे-घोडग (मरण), पडण च स्क्यायो, बैल की चोरी होना, प्रहार से घोडे का मरण और पुराने वस्त्र के टूटने के कारण वृक्ष से गिरना, इनका अभिप्राय निम्न दृष्टान्त से ,

वनयिको बुद्धि के १५ रटान्त
रह उसके
माझे-नसे-किमी गॉर में एक पुण्यहीन पुरुष रहता था।
एक दिन वह अपने मित्र मेरल मॉगकर हल चलाने गया।
कार्य हो जाने पर मन्ध्या के भगय बैल को बाडे मलाकर
छोड दिया। मित्र भोजन कर रहा था । अत
पाम नहीं गया, देवल मित्र ने बैल को देख लिया है, इस
लिये मित्र को बिना कहे ही वह अपन घर चला गया। पैल
असावधानी के कारण बाडे से निकल कर कहीं चला गया
और चोरों ने मौका पाकर उसको चुरा लिया। मिव बाडे
में चल को न देसार उससे मागने लगा, किन्तु वह कहाँ
से देता? क्यों कि वह तो चोरी हो गया था। तर न्याय
कराने के लिए यह मिन पुण्यहीन को राजकुल म ल चला
मार्ग में घोड़े पर चढ़ा हुश्रा एक प्रादमी मामने से आ रहा
था । अस्मात् घोडे क चोंकने से वह उस पर में गिर गया
और घोड़ा भागने लगा। ये लोग सामन पा रहे थे। इस वास्ते
उसने कहा कि घोडे को जरा मार क वही रोक रसना ।
पुण्यहीन ने उसकी बात सुनते ही घोडे के मर्मस्थल पर
एक प्रहार कर दिया । घोडा कोमल प्रकृति का होने से प्रहार
लगते ही मर गया | अब तो घोड़े वाला भी पुण्यहीन पर
अभियोग चलाने को साथ हो गया । जन तक ये लोग नगर
के पास थाये तब तक सूर्य अस्त हो गया । इमलिए रात में
तीनों ही नगर के बाहर ठहर गये । यहाँ बहुत से नट मोए
हुए थे। उसी समय यह पुण्यहीन मोचने लगा कि इस प्रकार
के दुःस मे तो गले में पाश डाल के मर जाना ही अच्छा है,
जिमसे कि सदा के लिए विपत्ति का पिएड ही छूट जाय ।
ऐसा सोचकर अपने पत्र का वृक्ष में पास
बने में
डाल लिया । अन्यन्त जीर्ण होने से वह व

६० श्री मोठया मधमाला - टूट गया। इसमें वह बेचारा नीचे मोए हुए एएनट के मुग्गिया पर जा गिरा, निमसे बह नट मर गया । नटों ने भी उम पुएपहीन से पाड़ा धीर गुबह होते ही तीना पुण्यहीन का लिय हुए सन ल प पहुँचे । रामकुमार ने उन मर्मा की गातें सुनकर पुण्यहीन में पूछा । उसन तीनना के माथ कहा कि महारान! इन सर का कहना मचा है । तर राजकुमार उम पर दया करक उमरे मित्र से बोल कि यह तुमरी रेल देगा, किन्तु, तुम्हारी आँखें उसाड़ देगा, क्योंकि निम समय तुमन अपने सामने पल देख लिया उस समय यह ऋण मुरा हो गया। अगर तुम नहीं देसे होते तो यह भी थपने घर नहीं जाता। क्योंदि जो सिम को जय देने पे लिए पाता है वह बिना उससे सग- झाय अपने घर नहीं जा माता । इमन तुम्हार मामने लाकर चल सहा था। अन यह निप है। पिर घोड़े वाले को मुलाया और कहा कि हम तुम्हारा घोडा दिलायेंगे, लक्नि तुमको अपनी जीभ पाट पर इसको देनी होगी। क्योकि तुम्हारे रहने पर ही इसने घोर पर प्रहार किया है बिना रहे नहीं, अत तुम्हारी जीभ ही पहल दोषी होती है, उससे उखाड कर अलग कर देना चाहिए । इसी प्रकार नटों को उनापर कहा- देगा, उमा पाम कुछ भी नहीं, जो तुम को दण्ड म दिलाए, उन्माए इता ही कहता है कि जैम - गले म पाश डालार यह उत्त स तुम्हार स्वामी पर गिरा, इसी प्रकार तुम्हार में से कोई भी प्रधान इस पर वृक्ष स गिर, यह नीच सो जायगा । युमार की ऐमी बातें सुनकर सभी चुप हो गये और वह पुण्यगीन अभियोग से मुक्त हो गया। यह रानकुमार की वैनयिक बुद्रि हुड। ( 71 हस्तिमालनी ) वृष न

Shri Gyatadharam Kathaga Sutra Ki Unnis Kathay

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Shri Gyatadharam Kathaga Sutra Ki Unnis Kathay
File name
Shri Gyatadharam Kathaga Sutra Ki Unnis Kathay
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Citation
1938
Published
2011/03
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
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59
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Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
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