Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Sathprbutadi Sangrh

Pandit Panalal · 2011/08

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Printed by IN Kalkarpi at bus Karaatak Printing
I'ress, No 434 Thakurd war, Bombay and
Pablished by Nathuram Pretni, Secretary, dlanikchand,
Gratih Wala, Firabag, Bombay, No. 4.

प्रकरण मृची।
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१२८-३०६
२०४-१७६
२८०-६८
२८५-३९
३९३-४२
१२५-१२
भूत
• ..
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पगारा
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हामानुशा...

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भूमिका । - इस संग्रहमें भगवकुन्दकुन्दाचार्य के पट्मामृत ( दर्शन, चारित्र, सूत्र, योध, भाव भीर नोक्ष प्रान्त), लिंगमाभूत, शीलप्राभूत, रयणसार, और बारह अणुवेस्खा ये पाँच अन्य प्रकाशित किये जाते हैं। समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय और नियममार ये चार अन्य पहले कई स्थानोंसे प्रकाशित हो चुके हैं। अभी तक कुन्दकुन्द स्वामीके बनाये हुए ये नौ ही अन्य उपलब्ध हुए ह। इनमेसे पट्झाभूत सटीक प्रकाशित किया जाता है और शेष ४ संस्कृत- छायामहित। इन पिछले प्रन्योरी कोई टीका अभीतक देसने मुनने में नहीं आई। भगवत्कुन्दकुन्द । दिगम्बर जैन-सम्प्रदायमें आचार्य कुन्दकुन्द सबसे प्रसिद्ध और सबसे अधिक पूज्य आचार्य गिने जाते है। पिछले अधिकांश आचार्योने आपको उन्होंके अन्वर या आम्नायका यतलाया है। उनकी रचना जनसाहित्य भरमें अपनी तुलना नहीं रखती। सयसे लगभग ६ वर्ष पहले हम उनके सम्बन्ध में एक विस्तृत लेख प्रकाशित कर पुके है। ये विदेशके 'कोडकुण्ड' नामक स्थानके रहनेवाले ये और इम कारण 'कोण्डकुण्ड' नामसे प्रसिद्ध थे। कोइकुण्ड का ही श्रुतिमधुर संस्कन- रूप 'कुन्दकुन्द' हो गया है। 'एलाचार्य के नामसे भी ये प्रतिद थे। तानिल भाषाके सुप्रसिद्ध महाकाव्य 'पुरत' के विषय में महाराजा कालेज विजयानग. रमके इतिहासाध्यापक श्रीयुत एम. ए. रामस्वानी लागरने लिखा है कि 'सनियोंके मतसे करू अन्य 'एटाचार्य 'नामर जैनाचार्यको रचना है और तालल काम्प नालदेसी'फे टीकासार समपदिवाकर नामक जैनमुनि पुरलको * मोनाहितयो भाग १०, भंक :-७॥

४
अपना पूज्य अन्य बतलाते हैं"।* इससे आश्चर्य नहीं कि करलके रचयिता
भगन्दान्द ही हों। कहते हैं एलाचार्यने इमे रचकर अपने एक शिष्यको
इस लिए दे दिया था कि वह मदुराके कविसंघमें जाकर पेश करे।
मन्दिर्मघकी गुर्वावली में लिखा है कि भगवाकुन्दकुन्दको वि• संवन् . में
भाषा मिला और १.१ में उनका स्वर्गवास हुआ। तामिलदेश के विद्वा.
नौने करलकायका रचना-काल भी ईगाकी पदो शतादि निश्चित किया है।
यदि मयमुन ही वह इन्हीं एलाचार्यका बनाया हुआ है, तो पावलोके समय के
माथ उमा रचनाहाल मिल आता है।
हमने अपने पूर्वानिमिन लेगमे भगवत्कुन्दकुन्दका समय विक्रम की तीसरी
शातिनिधित किया था।
उसके बार जैनगिदान्त-प्रकाशिनी सेस्पाद्वारा प्रकाशित 'समयमाभूत' की
भूभकामे दक्षिण के सुप्रसिद इतिहास प्रो. के.बी. पाठक का यह मत प्रा.
शित हुआ है कि कुन्दनाचार्य वि• संवत् ५८५ के लगभग हुए है। अपर्ने
मनको पिमें लिखा है कि जिस समय राट-वंशीय राजा सूनीर
गोरीय राज्य करता या उग समय, शक मंवत् ७२४ का लिखा हुआ ए.
TATE है। उगमें निम्नलिमित पद्य दिये हुए है.-
कोणकोलायपोदारो गणोजमरनम्नुत ।
এসবিধিশাল হামীমামা।
भाषी(1)ोरणाचायनकलारिमहा।
নামমূসাগৰমণ ॥
पति: पुणनीति बभूव मुवि विशुता ।
निकामी मुनग्नम्य महाभायमा १२ ॥
प्रतिदिषयमवद्धिनिरस्तोगतरयमाणः ।
परिभूपनिमियोभुनभाय।।
Mनीय गाधर महराही गमागमात् १ का एक
पाप माविममें नौनिने-
.
मोरीमन-21
.

भासीद (1) सोरणाचार्यः कोण्डदान्वयोङ्गवः । सधैतदिपये श्रीमान् शाल्मलीग्राममाभितः ॥ निराकृततमोऽरातिः स्थापयन् सम्पये उनान् । स्वतेजोद्योतितौगिशण्डार्विरित यो पभो॥ तस्याभूरपुष्पनंदी तु शिष्यो विद्वान् गगानगीः । तरिया प्रमाचंद्रस्तस्येयं वसतिः कृता ।। इन दोनों लेखा अभिप्राय यह है कि कोडकोन्दान्वयके तोरणाचार्य नामके सुनि इस देश सामली नानक सामने लाकर रहे । उनके शिय पुपनदि और पुपनन्दिके मिप्य प्रभापद हुए। पाउरू महोदया कथन है कि पिछला तामा र शक संवत् ७१९ का है दो प्रमानन्दके दादा-गुरु तोरणापा शE संवत् ६.० के लगभग रहे होंगे और तोरणाचा कुन्दकुन्दान्वयने हुए है-अतएव कुन्दकुन्दका समय उनसे १५० वर्ष पूर्व स्थान शक संवत् ४५. लगभग मान लेनेमें कोई हानि नहीं है। चाडपर्वरी कीर्तिवर्न महाराजने यादानी नगरमें शक संवत् ५००में प्राचीन कदम्य नारा किया था और इसलिए इससे लगभग ५० वर्ष पूर्व कदम्ब- बंरी महाराज शिवसपने राज्य करते थे ऐसा निक्षित होता है। पंचास्ति- का कनको टीकारार यालपद और संस्कृत-दीचार जपतेनावाने लिसा है कि यह अन्य साचार्य कुन्दन्दने शिवकुमार महाराज प्रविरोधके लिए राया और सिरकुमार विशवनं ही जान पड़ते है। अतएव भगव. सन्दकुन्दा सन संबन ४५.(दि. ५८५) ही लिख होता है। परन्तु हमारो समझने भगवत्कुन्दकुन्द इतने पीर आया नहीं है। जब तसिपमार और शिवगेशन के एक होनेके एक दो पुट प्रनाग न दिये जावें तब तक इस समयको टीकमान लेनेशी इच्छा नहीं होती। तोरणापार्य कुन्दकुन्दके भवपर्ने पे, सतएव यह नहीं कहा जा सस्ता कि ये उनके १५. गार ही हुए होगे। तीनला चारली पर्ष या इसने भी अधिक पहले हो . इस भनेरामा कंगोत्र हो चुस्ने पर हमें मालन हुआ पंचारित कार्यक संजीटीमार मो. ए. चमरता नायनार एम. ए., एल.री.,ने भग. बन्नन्दिके समय के सम्बन्धमें एक विस्तृत शहिसा है। इसमें उन्होंने ६ प्रो. पाठक के मागिपराय Entr शिमगरम रात्र कदम्बासी शिवनगरमा नीकिलागी जिनामा चाहिए । स्कन्द, कुमार और सानिमा मामान्तर राशि स्कन्द और हिवरमार दोनों निमो गानेदांजीरार ओंको रामधानी कागोर या मन जीताम् पी।विस और लाभ लिए यह स्थान बहुत ही प्रगिद था। बिहान् मोर की यहाँ के दाम भाते थे। धार्मिक वादविवादमीमहारते थे। मानी मानपा भारयदाता थे, इसके मी प्रमाण है। मदारी माग भी माकत थी। 'माविडायोली' मामा मुनि अन्य मीममयका बना। है और प्राकृत है । भाचार्य कुन्दाद विदेशक थे। इसके भोप्रा हैं, अतएव नाशिम शिकुमार यही शिवदयमा होगा और ठा अवस्थिनिकाल निकमकी प्रथम दानादि। श्रीभुतसागरमरि। पदप्रामृत मा पदपाहुइके रीकाकार भाचार्य श्रुतसागर बहुश्रुत विद्वान् इस टीकासे और यशस्तिलक चन्दिकाटीमासे मालूम होता है कि वे कलि। सर्वश, कलिकाल गौतमस्वामी, उभयमाषाकपिकवता भादि मदनी पदपियान असंकृत थे। उन्होंने ' नवनवति' (..) महावादियोंको पराजित किया था। वे मूलसंध, सरस्वतीगच्छ और बलात्कारगणके आचार्य और विद्यानन्दि भधारकके शिष्य थे। उनकी गुरुपरम्परा इस प्रकार थी-पचनन्दि-देवेन्द- कीर्ति-विधानन्दि। परन्तु विद्यानन्दि महारको पापर जान पाता है उनकी स्थापना नहीं हुई थी। क्यों कि विद्यानन्दिके बादको गुरुपरम्परा हम प्रकार मिलती-विधा. नन्दि-मलिभूषण-लक्ष्मीचन्द्र। स्वर्गीय दानवीर सेठ माणिकचन्दजीके प्रयभण्डारमें प• आशाधरके महा. भिषेक नामक प्रन्यकी टीका है। उनके अन्त में इस प्रकार लिखा है:- श्रीविद्यानं दिगुरोर्बुदिगुरोः पादपंकजभ्रमर । श्रीश्रुतमागर इति देशमती तिलकष्टीकते स्मे । इति महाधीश्रुतसागरकता महाभिषेकटीका समासा॥ धीरस्तु स्टेखकपाटकयोः ॥ शुभं भवतु । श्री।

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श्रुतमागरमूरिके भी अनेक शिष्य रहे होंगे। इसी प्रन्यमालाके तत्वानुमा. सनादिसंग्रह इनके एक श्रीचन्द नामक शिष्यको रची हुई वैराग्यमनिमाला प्रकाशित हुई है। आराधनायाग्रेश, नेमिपुराण, आदि अनेक अन्धो कती अमचारी नेमिदत्तने भी-जो मतिभूषण के शिष्य -श्रुतमागरको गुरुभाव नासे स्मरण किया है । नेमिदत्तने भी मविभूषणको वही गुरुपरम्परा दी है, जो श्रुतसागरके प्रन्योंमें मिलता है। उन्होंने मिनन्दिका भी उजेय किया है। श्रुतसागरका अभी तक टीकाग्रंथों के अतिरिक्त कोई स्वतंत्र प्रन्य उपाय नहीं हुआ है। उनके बनाये हुए प्रन्यों का परिनय भागे दिया जाता है- १ यशस्तिष्टकचन्द्रिका। यह निर्णयसागर प्रेसकी 'काव्यमाला में प्रकाशित हो चुकी है। यह टीका अपूर्ण ४-५ चे भाधामके कुछ भशको और छठे आभागकी टीमा नहा है । जान पाता है, यही उनको अन्तिम रचना है। यह टीका भनेक स्थानों के प्रन्थमनदारों में मिलती है, परन्तु सर्वत्र ही अपूर्ण है। २ महाभिरेकटीका। मुनि पहित आशाधरजीके बनाये हुए नित्य- महीयोत या महाभिषा नामक अन्धकी मह टीका है। इसका अन्तिम अंश कार उदल हिया ना चुका है। उमसे मालूम होता है कि उस समय भुत. भागर देशवती या प्रमचारी थे, गरि या भाचार्य नहीं हुए थे। ३ तस्यायटीका। यह शुनगागरी टीका के माममे प्रसिद्ध सशके हिमा गमय हमें इसकी प्राप्ति नहीं हो सकी। पर मह दुष्प्राप्य नहीं है- मा भाषानुवार भी दो मुका है। ४ तत्पश्यप्रकाशिका । आचार्य गुमवत झामाणे के भन्तर्गत ओ गाभाग , यह उमीको टीका है। इसकी एक प्रति त. सेट माणिकचरजीके प्रेयप्रदम। भोजर है। उसकी प्रशस्ति देखिए:-- - • श्रीमान्मे मूरिवर्या वनिश्चयलगायुध्ययुनः शुनाधिः ॥ दरा पादयोग पुग्मया... ....यादि। -ধমাথায়ীয়াৰঃ।

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१० - ६प्राकृतव्याकरण। यह प्राय हमे अभी तक प्राप्त नहीं हुआ। यशस्निला टीकामें एक जगह उन्होंने अपने लिए यह विशेषण भी दिया है-"प्राकृत. व्याकरणायने शानरचनावचुना।" इससे और पटाहुइटीका, जो जगह जगह प्राकृत व्याकरण के सूत्र दिये हैं उनमे भी मालूम होता है कि इनक बनाया हुआ कोई प्राकृत व्याकरण अवश्य है। इस ग्रन्थका पता लगाने की बहुत आवश्यकता है। इनके मिवाय तर्कदीपक, विक्रमप्रवन्ध, श्रुनस्कन्धावतार, आगाधरकन पूजा प्रबन्धकी टीका, हत्कयाकोश आदि और भी कई अन्य इनके बनाये जाते है। इन्होंने अपने किसी भी अन्धमें अपने समयका उस नहीं किया है, परन यह प्रायः निश्चित है कि ये विकमको १६ वीं शताब्दिमे हुए है । क्यों कि- १-ऊपर जिम महाभिषेकटीकाकी प्रतिमा उल्लेख किया गया है वह वि. सं• १५८२ को लिखी हुई है और यह महारक मशिभूषणके उत्तराधिकारी लक्ष्मीचंद्रके शिष्य ब्रह्मचारी ज्ञानसागरके पदन के लिए दान की गई है और इन लक्ष्मीचन्द्रका उल्लेख श्रुतमागरने स्वय अपनी टीकाओं में कई जगह किया है। २-आराधनास्याकोशके कर्मा प्र. नैमिदत्त वि. १५७५ के लगभग हुए है और वे श्रुतमागरके गुरुभ्राता मलिगके शिश्य थे। ३-पीय बाबादुलीचन्दजीको स. १९५४ की बनाई हुई हस्तलिखित प्रन्योंकी सूची में श्रुतसागरका ममय वि. सवत् १५५. लिम्मा हुभा है। +--पदयाभूतटीका जगह जगह लोहागग्यपर ती आमण किये गये। और नाम्बरमम्प्रदाय से यह मूर्तिपूजाका विरोधी पन्य वि. संवत् १५.८ के लगभग स्थापित हुआ है । भतएव श्रुतमागरका समय इसकी स्थापनामे अधिक नही तो.-५.वयं पीछे अवश्य मानना चाहिए। प्रन्धासम्पादन। इम संपरा मम्पादन और मंशोधन पण्डित पन्नालाल जी मोनीने नीचे लियो प्रतियों ने किया है। जिन जिन मच्चनीने इम लिए प्रश्य मेजनेशी गरा की है, उनके प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रस्ट किये बिना हमझे नहीं रहा जाना।

ܐ ܘܰ a ܕܥܽ: ܐ: ܟ܀ ܚܪܕ:ܬܬܐܪ -?ܝ ܫ.܀ ܙ ܀ ،، ܝܼܢܝ ܀ ܬ ܐܐܐܘܬܐܬ ܐܕܟ ܙ ܙ ܀ ܂' ; ;: 1.1 ܀ ،،، 7 ܐ ܖ ܀ ܀ ::, ܐ ܀ ; ;ܬ܀ ܙܛܽܠ: ܙܬ݁ܐܬ݁ : ܪܢܝܐܠܐܐܪܐܬ ܀ . ܕ܂: .ܙܐ: ܕ، ܃ ܃ ܙ tx- ܙ ܀;:---; ; ܂ F ' - r'xr- , -- vf- : i ' ' rr rr * . * uܐ ܝ - ܫܐ ܨ ܂ܬ ܢܐܨܐ ;: , .' ܙܐܝܚܫܬܐ ܬ ܕ ܪܵܫܝ .ܯ ، ܢ ܢܫܐ1.: ܝܵܐ ܕ & -ܪ.. ܐ܀: ܐܐ ܙܐܝܙ ܬ ܪܨ܀ ܘܽܢ ܢ݈ܝܶ ܝܶ : ܫܐܝܳܐ܆ ܪܚ 1 ;.1.,--

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ॐ
।
मम पिया
श्रीगचन्दन्दाचार्यविचिन
पट्मामृतम् ।
भीमनगागारिविवादा किया गया।
The Himmmms |
REnfett urg
.........."
.:.":.

। २ पाभो- अरपदा नाही। योगकामि वामि कयामि। क: कला,म श्रीमान्दाचार्यः । के, कर्मकारने दंगणमगं माना फर्य यश्यामि, जहासम्म पाकममनुक्रमेण । केन TI, ममामेग संक्षेपण । कि एया, यदमाणम्म णमुसार काऊण गर्दमानश्य नियकारिणीमभीसितापमहागननन्दनम्मानिमती कमरमा म रतक्षेत्रम्यधिदेहदेशसम्बन्धितीगुरपानोपमा गुपर्ण शरीरा किंचिदधिरामप्ततितपरमायुष समतोमा निर्भपतन- ससंगमनामधेयवाहतस्तयनम्प पीसदमानमारमनिमहारसम्मनि- नामपंचकप्रसिद्धस्या नमुहारं नमोऽस्थिति पवनेन मनमा कायेन यचमा साटाई प्रणाम । काउण त्या । कथंभूतम्प बर्षमानस्य, जिगरव- सहस्स जिनवराणा श्रीगौतमादिगणधरवादीना मध्ये पमस्य श्रेष्ठस्य। इत्यनेन विशेषणेन प्रथमयिकरश्रीमदादिनायादीनामपि सर्वतीर्थ- करसमुदायस्यापि नमस्कारः कृती भरतीति वेदितन्यं । दसणमूलो धम्मो उपइटो जिणवरहिं सिस्माणं । ते सोऊण सकण्णे देसणहीणो णं बंदिव्यो ॥२॥ दर्शनमूलो धर्म उपदियो जिनवर शिष्याणाम् । तं धुत्या स्वकर्णे दर्शनहीनो न पन्दितम्य. ॥ दसणमूलो धम्मो दर्शने सम्यक्त्व मूलमविष्टानमाधार प्रासादरम गतीपूरवत् वृक्षस्य पातालगतजटायत् प्रतिष्टा यस्य धर्मस्य स दर्शनमूल एवं गुणविशिष्टो धर्मो दयालक्षणः । जिणवरहिं तीर्थकरपरमदेवैरपर• केवलिभिश्चाउवइडो उपदिष्टः प्रतिपादितः। कंपामुपदिष्टः, सिस्माण शिष्याणां गणधरचक्रधरवनधरादीनां भव्यवरपुण्डरीकाणा । तं सोऊण सकपणे ते धर्म श्रुत्याऽऽकर्ण्य स्वकणे निजावणे आत्मशब्दमहे । सोण. ग.। २ न.क. - . दर्शनप्रामृत । दंसपहीणो न वंदिवो दर्शनहीनः सम्परवरहितो न वन्दितव्यो नैव वन्दनीयो न माननीयः । तस्पानदानादिकमपि न देयं । उक्त व. मिप्पाहम्म्यो ददान दाता मिप्यात्ववर्धकः। भय कोऽसौ दर्शनहीन इति चेत्तीर्थफरपरमदेवप्रतिमा न मानपन्ति न पुष्पादिना पूजयन्ति । फिमिति न पूजपन्ति ! मिप्यारम्पः फिलय यदन्ति तर्षियरपरमदेवः किं देवान् पूजपति ! तथा वपमपि न पूजयामः । पंचनकाले फिट मुनयो न वर्तन्ते तदयुक्त । उक्त च- भर्तारः पुटपर्पता च भुवो मोदं विहाय स्वयं रत्नानां निधयः पयोधर इप व्यावृत्तचित्तरपदाः । स्पृष्टाः फैरपि नो नभौविभुतया विश्वस्य विधान्तये सत्यपापि चिरंतनान्सिफरराः सन्तः फिपन्तोऽप्यनी ॥१॥ मिला: पिट पदन्ति व्रतः कि प्रपोजन, आभैर पोषणीयः, तक दुनिन दातम्य, मरलि फिट गहिरे न भति, सूत्रपिई गरि, मविप्न आमेटन होतिर्भवति तदनपं । उक्तं च मायापा- रससेदालापनदयानुकुमारदारासं च। इत्येदे पंचगुला त पडितिर पसंनि ॥१॥ सासनयता न पूजनीयाः, आमिर देवी पर्सने, भार: योऽपि देवो भाति, धरानता कि वनिो मानव प्रया, दिक चिकिता इसदिसू मरते ते निपा. सारि नजिते। सी निमदो ताऽऽ नि.. दीपदान निधनःपाः । सथानि पहारा न हयन्ति तदा RE -S६१

१
पट्मामृते-
दंसहमहा मा देसणमहस्म त्यि णियाणं ।
सिझंति धरियमहा दसणमहाणे सिझंति ॥३॥
दर्शनभ्रष्टा या दर्शनभ्रस्य नास्ति निर्वाणम् ।
मिस्पन्ति चरिग्रम्रा दर्शनम्रशन मिपन्ति ।
दर्शनभ्रष्टा भ्रष्टा. सभ्यग्दर्शनापतिताः पतिता उय्यन्ते । दर्शन-
भ्रष्टस्य नास्ति निर्वाणं-सम्यग्दर्शनापतितस्य सर्वकर्मक्षयलक्षणो मोक्षो
न भवति किन्तु सम्यग्दर्शनापतिताः नरकादिगतियु परितो दीर्घकाठे
पर्यटन्ति । सिझंति चरियमहा सिद्धयन्ति आत्मोपटन्धिमनुभवन्ति
प्राप्नुवन्ति, के, ते चरियभट्टा-चारित्रात्पतिता यतिधावफलक्षणमचर्य-
प्रत्याख्यानाम्यां स्खलिता , सामग्री प्राप्य श्रेणिकमहाराजादिवत् स्तोकेन
कालेन मोक्ष प्राप्नुवन्ति । दसणभहा न सिझंति सम्यग्दर्शनात्पतिता
न सिदयन्ति मोक्ष न प्राप्नुवन्ति भव्यसेनादिवत् वशिवोदिवच
संसारे निमजन्ति इति ज्ञात्या श्रुतकीर्तिश्रेयासादिप्रमाणपुरुषैरुपप्रवर्तिन
दानधनादिसत्कर्म न निषेधनीये, आस्तिकभावेन सदा स्यातम्यमित्यर्थः ।
सम्मत्तरयणमहा जाणता बहुविहाई सत्थाई।
आराहणाविरहिया ममंति तत्थैव तत्थर ॥ ४॥
सोऽपि पापः स्वर्ष कोपावरणीभूतवीक्षणः ।
सचमी तिमाह प्रस्फुराशनाया ॥1
सोई क्षम. कश्चिदमुरः शुदाक तया।
हनियति तमन्याय शकः सन् सहते हि ॥२॥
सोऽपिएनसमा गत्वा सागरोपमजीवित।
मिरं चतुर्मुग्यो दु: छोभानुपियति ॥५॥
धर्मनिगरिधर्म सहन्ते प्रभावकाः ।
माम्ति मावचलेशेम विमा धर्मप्रभावमा ।।
धर्मध्वंये सत्ता सातस्माश्मदहोऽधमान् ।
निवारयन्ति सम्तो रक्षितं तेः सतो जगत् ॥५॥

दर्शनप्राभृतं । मम्यवापरला जानन्तो महुविपानि शानानि । आरापनाविरदिता भ्रमन्ति तव तव ।। सम्मत्तरयणभट्टा सम्यक्त्वरत्नभ्रष्टाः सम्यक्त्वमेव रत्नं सर्वेभ्यो भाषेभ्य उत्तम वस्तु त्रैलोक्यपस्त्यसमुद्योतक्त्यात् तस्माद्धाः परिय्युता दानपूजादिकनिषेधफाः । जाणंता बहुविहाई सत्याई जानन्तोऽपि बहुविधानि शास्त्राणि तर्कन्याकरणउन्दोलकारसाहित्यसिद्धान्तादीन् प्रन्यान् जानाना अपि । आराहणाविरहिया जिनवचनमाननलक्षणा- माराधनामकुर्वाणा टौंका: पातकिनः । भमंति तत्येव तत्येव तत्रैव तत्रैव नरकादिष्वेव दुर्गतिषु भ्राम्यन्ति न कदाचिदपि मोक्ष लभन्ते इत्यर्थः । सम्मत्तविरहिया णं सुदु वि उग्गं तवं चरंता णं । ण लहति बोहिलाहं अवि वाससहस्सकोडीहिं ॥५॥ सम्यक्त्वविरहिता पंगुष्ठ भपि उप्रं तपः चरन्तः । न लभन्ते योधिलाभ भपि पर्पसहरकोरिनिः । सम्मतविरहिया णं सम्यक्त्वविरहिताः सम्यक्त्वात् ये विरहिताः पतिताः। णं वाक्यालझारे । सुह वि उग्गं तवं कुणंता णं सुष्टु अपि सतीवापि सतपः कुर्वन्तोऽपि मासोपवासादिकं तपोविशेपमाचरन्तोऽ- मिणमिति वाक्यालंकारे । न लहंति वोहिलाहं ते पुरुषा बोधि- लाभं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रटक्षणोपलक्षिता या बोधिस्तस्या लाभ न लभन्ते । फियत्कालपर्यन्तं बौधिलाभं न लभन्त इत्याह-अवि वास- सहस्सकोडीहिं अपि वर्षसहस्रकोटिमिः वर्षसहस्रकोटिभिरपि अनन्त. कालमपि गमयित्वा ते मुक्ति न गच्छन्तीत्यर्थः । इति ज्ञात्वा दानपूजा- दिक व्यवहारधर्म निक्षयधर्मे प्रधानभूतं न वर्जनीयमिति भावार्थः ।

६ पट्माभृते- सम्मचणाणर्दमणपलबीरियडमाण जे सच्चे। कलिकलसपावरहिया वरणाणी होति अहरेणं ॥६॥ सम्यक्त्वज्ञानदर्शनबलवीर्यवर्टमाना ये सर्वे । कलिकलपपापरहिता वरज्ञानिनो भवन्ति अचिरेण ।। सम्मतणाणदंसणबलवीरियड्डमाण सम्पक्यज्ञानदर्शनवळची- पर्द्धमानाः । जे सव्वे ये सर्वे भव्यजीवाः । सम्यक्त्वेन जिनवचनरुचि- रूपेण, ज्ञानेन पठनपाठनादिना, दर्शनेन सत्तावलोकनमात्रेण, बछैन निनवीर्यानिगृहनरूपेण, वीर्येणात्मशतया ये पुरुषा वर्धमाना वर्तमाना का कमाणपाठेन ते पुरुषाः । वरणाणी हॉति केवलज्ञानिनो भवन्ति परशन्देन तीर्थकरत्वं प्राप्नुवन्तीत्यर्थ । कदा, अइरेग अचिरेण स्तोक- कालेन तृतीये भवे मोक्ष यान्तीत्यर्थः । ते पुरुषाः कथंभूताः, कलिक लुसपावरहिया कलिमु कर्ममु यानि कलपाणि दुष्टानि पापानि मोहनीयज्ञानावरणीयदर्शनावरणीयान्तरायठक्षणानि दुरितानि तै रहिता क्षय नीतघातिकर्माण इत्यर्थः । अथवा कलौ पंचमकाले कलपाः करमठिन: शौधधर्मरहिता• वर्णान् लोपयित्वा यत्र तत्र भिक्षाप्राहिणः मांसमशिगृहेश्यपि प्रामुकमन्नादिकं गृहन्तः फटिकलपास्त च ते पापाः पापम्नयः श्वेताम्यरामामा: लोकायकापरनामानो लौका म्लेग्छ- मशानाम्पदेष्वपि भोजनादिक कुर्याणास्तवमरहिताः कटिफलपपाप- रहिताः । श्रीमूलमधे परमदिगम्बग मोक्ष प्राप्नुवन्ति लौकाम्नु नरकादौ पतन्ति देवगुस्थानानादिपिटोपपत्यादित्यर्थः । मम्मत्तमलिलपरहो णिचं हिर्यए पपाए जस्म । कम्मं वालुयररणं बंधुधिय गामए तस्म ॥७॥ अधिरेल, ग.दिवम्मिग. प.। ।

५ing सम्परत्वसजिलप्रमाहः नित्यं हृदये प्रवर्तते यस्य । फर्म यानुसापरणं परमपि नस्पति तस्य । सम्मत्तमलिलपवहो सम्पत्यसालेलप्रवाहः सम्यक्त्वमेव सलिलं निर्मलशीतलसुगन्धमुस्वादुपानीयं संसारसन्तापनिवारकत्वात् पापमलफलं- कप्रक्षालकत्याच सम्यक्त्वसटिलं तस्य प्रबह: प्रवाहः पूरः । णिचं हियए पवट्टए जस्स नित्यं हृदये प्रवर्तते यस्य जलपूरबहतात्पर्यः । कम्मं वालुयवरणं हिंसादिपंचपातफपापं वालुकापाटी। चंधु- चिय बदमपि । नासए तस्स नश्यति तस्य । सम्यग्दृष्टेलगमपि पापं अन्धं न याति कौरघटस्थितं रज इब न बन्धं याति । परदेवनम- स्कारोऽपि पापमायाति । उक्तं च- पफवारं नमस्कारे परदेवे कृते सति । परदारेषु लक्षेपु तस्मात्पापं चतुर्गुणं ॥१॥ जे दंसणेसु भहा गाणे महा चरित्तभहा य । एदे महविभहा सेस पि जगं विणासंति ।। ८ ।। ये दर्शनेषु प्रयाः हाने माः चरित्रनाथ । एते अविभ्रष्टाः शेपमपि जनं विनाशयन्ति । जे दंसणेसु भट्टा ये पुरुषा दर्शनषु सम्यक्त्वेषु द्विविधत्रिविध- दशाविषेषु भाः पतिताः अथवा दर्शने मुष्ठ भ्रष्टाः । तथा णाणे महा भष्टविधाचारज्ञानादपि भ्रष्टाः । चरित्तमहा य त्रयोदशप्रकाराचारित्रा- साः। एदे महविभहा एते भ्रष्टा विशेषण भ्रष्टास्त्रिभ्रष्टत्वात् । सेसं पिजणं विणासंति शेषमपि जनमभ्रष्टमपि सोफ विणासन्ति- बिनाशयन्ति भर चिकुर्वन्ति । जो को विधम्मसीलो संजमतवणियमजोयगुणधारी। तस्स य दोस कहन्ता भग्गा मग्गत्तणं दिति ॥९॥ +

८
पदनामो-
माकोपि पसी: मेरमोनियमपीगगपारी।
तत्य र दोगान् ययतः मा भारी।
जो को वि धम्मसीली यः कोऽदि धर्मशीली धर्मे आमसनको
उत्तमक्षमादिदशलक्षणे घ धर्मे, पंचप्रकारे प्रयोदशप्रकारे सारित का
माणिनो रक्षणटणे या धर्मशीलमपास: समाधिरम्यासो पस्स में
धर्मशीलः । उक्त च-
धम्मो परशुसदायो घमादिमायो य दसपिही अम्मो।
चारितं पलु धम्मो जीयाणं रक्षणो धम्मोnn
संजमतपणियमजोयगुणधारी तथा यः कोऽपि संयमतपोनियम
योगगुणधारी वर्तते । संपमध पहिन्द्रियपद्मकारप्राणिप्राणरक्षणलक्षणः
तपक्ष द्वादशप्रकार | नियमश्च नियतकालत्रतधारणे । उक्त प--
नियमो यमध विदिती देघा भोगोपमोगसंदायत्।
नियमः परिमितकालो यायमीयं यमो भियते ॥१॥
योगच वर्षादिकालस्थितिः। अथवाऽऽत्मभ्यान योग उम्पते। उक्त
वीरनन्दिशिष्येण पमनन्दिना-
सायं स्थास्थ्यं समाधिध योगधेतोनिरोधनं ।
शुद्धोपयोग इत्येते भयस्येकार्पयाचकाः॥१॥
गुणाचतुरशीतिवक्षसंख्या: । के ते चतुरशीतिलक्षगुणा इति चे
च्यन्ते-~हिंसाऽनृतस्तेयमैथुनपरिग्रहकोधमानमायालोभजुगुप्साभयारति
रतित्यागा इतित्रयोदश दोपा । मनौवचनकायदुष्टत्वमिति पोश
मिथ्यात्वं प्रमादः पिशुनाव अज्ञान इन्द्रियाणामनिप्रह एतै पंचभि
लिता एकविंशतिदोषा भवन्ति तेषां त्यागा एकविंशतिर्गुणा भवन्ति
धर्मों वस्नुस्वभाव. क्षमादिमायक्ष दयविधो धम।
चारित्रं खलु प श्रीवानो रक्षण धर्म. ॥1॥

दर्शनप्राभृतं । मतिममन्यतिकमातिचारानाचारत्यागैधतुभिर्गुणिताचतुरशीतिर्गुणा भव- न्ति ते पृथिन्यादिशतजीवसमासर्गुणिताश्चतुरशीतिशतानि गुणा भवन्ति ते दादशीलविराधनैर्गुणिताक्षतुरशीतिसहस्राणि गुणा भवन्ति । कास्ताः शीटविराधना: स्त्रीसंसर्गः १ सरसाहार: २ मुगन्धसंस्कारः ३ कोमलदापनातनं ४ शरीरमण्डनं ५ गीतबादित्रश्रयणं ६ अर्धग्रहणं ७ कुशीलसंसर्गः ८ राजसेवा ९ रात्रिसंचरणं १० इतिदशशीलविराधनाः । ते आकम्पितादिदशालोचनादोपत्यागैर्दाभिर्गुणिताः चत्वारितासहसा- विकाष्टरक्षाणि गुणा भवन्ति । उत्तमक्षमादिदाधर्मर्गुणिताचतुरशीति. रक्षाणि गुणा भवन्ति । अभातिकमादयक्षत्वारः के ! अतिक्रमस्तावविशि. एमतित्यानः। पतिक्रमः शीलवृत्तिलंघनं । अतिचारो पिपये प्रवर्तनं । मनाचारी विपपेयापासक्तिः । के से दसालोचनादोपाः ! तदर्थनिग्य- रिफा गाथे- भाऊंपिम अणुमानिस जंदि पादरं च मुहमं च । जमदाउलयं पापमपत्त तस्सेपी ॥१॥ अस्या असमर्थ:-आर.पितं आप.म्पो भयमुपचतं मा पदण्ड दामोदाचार्यः १ अनुमागिय अनुमान स्पेतापापं कृतं भविष्यति निरो मास्ति २ पियनचित प्रयापति ३ दापर स्पूर्ण पार प्रयासपति ४ मा अल् पाय प.पति ने महापा प्रशासपी ५ लाया पाति नकट ६ । महा. सपा प.पति पाई ७ जण ददुः मंदो हिमा प. पार ८ सय ने सुटे म पनी ससे TRP पुति पनि १. सोय ६२ :- ला। तर परदेशमा पट्माभृते- संयमतपोनियमयोगगुणधारी। तस्स य दोस कहवा तस्य च शेषान् कथयन्तः केचि पापिष्ठाः । मग्गा भग्गत्तणं दिति स्वर्प भनाश्चारित्रा- पतिता भ्रष्टा अन्येषामपि भ्रष्टत्वमारोपयन्ति ते निन्दनीया इत्यर्थः । जह मूलम्मि विणहे दुमस्म परियार गरिय परिषड्डी। तह जिणदसणमहा मूलविणहा ण सिझंति ॥ १० ॥ यया मूले पिनटे द्वमस्य परिवारस्य नास्ति परिनि।। तथा जिनदर्शन मूलविनष्टा न सिद्धपन्ति । जह मूलम्मि विणडे दुमस्स परिवार णत्यि परिवड्डी यथा मूळे पातालगताधारे विनष्टे विनाश प्राप्ते द्रुमध्य वृक्षस्य परिवारस्य नास्ति परिदिः शारापरपुष्पालादेद्धिनास्ति वृद्धिर्न भवति । परिवार इत्यत्र पष्ठीला "लुक्चेति" वचनात् । दृष्टान्तं दत्वा दान्ति ददाति । वह निणदंमणमटा तथा तेन द्रुममूलप्रकारेण जिनदर्शनभ्रटा आई- समतापनिता । मूलविणता श्रीमलसंधाप्रय्युताः । न सिदयन्ति-न मोक्ष प्राप्नुवन्ति जन्मशतसहस्रध्यापि मैसारे परिभ्रमन्तीति भावार्थः । जह मूलाओ संघो माहापरिवार बहुगुणो होइ । वह निणदंमण मूलो णिदिहो मोसमग्गम्म ॥११॥ यथा मूलान न्यः शायापरिवारोबहुगुभो भवति । तपा जिनरगंने पूर्व निद मोक्षमार्गस्य ॥ जह मूलाओ यथा मूग शम्य महाकारणान् । स्कन्धः शासा- बधिः प्रकाण्डः। यहुगुणो होइ प्रचुग्गुणो वृदयायतिशययान् भवति । तया माहापरिवार शामापास्वारन टनापरपा कदमध यहगुणो भापति पाठदिनान् माति। हटान्तो गतः । इशानी दाम. ।

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ष्टमामृते- पिच्ण हु सम्मत्तं करगदिए मोरचमरडंयरप। मप्पा तारर अप्पा तम्हा अप्पा विझायेवो ॥१॥ तया च सितपटमतं-- सेयंयरो य आसंयरो य युद्धो य तह य अण्णो य । सममारमारियप्पा लहेय मोक्संग संदेदो ॥१॥ जैमिनिकपिलकणचरचार्वाकशाक्यमतानि तु प्रमेपफमटमार्तण्डा- दिशानात् ज्ञातम्यानि। जे दमणेमु महा पाए ण पैडति दसणघराणं । ते होनि लबमा योही पुण दुल्लहा तेमि ॥१२॥ अपने घर पादे न पतन्ति दर्शनधराणाम् । ते मस्ति गडगूका बोधिः पुनर्लमा सेषाम् । जे दंगणेगु महा ये पुरुषा दर्शने भ्रया निसर्गनाधिगमजदक्षणात विविवारगम्यग्दर्शनात् औपशमिकयेदकशायिफटक्षणात्रिविधात्मम्पान्य नात् प्रप्युता । मानामार्गममुत्पमुपदेशात्रीजसंक्षेपात । पिम्तापर्याश्यां मयमयपरमायादिगा ॥१॥ इयार्याकथित दशविधमन्यावानात्पपिताः अस्या आर्याया अपमर्थ:-- "माम निमोदितं पापय विभिन्न दम्पते। मामासम्यक्त्वमिन्याहुमोम्पधापादिनी जिनाः" एवं बिनमतगतगगवचनमेव प्रमाण क्रियते तदाज्ञामम्यक कपानिप्रन्याश्चमी मोशमान यादिवेटिन. पुमान् कदा .framentart.ते मयूरचारबरे। मागमारयकरमाननम्मामामा ध्यानमः॥१॥ २टापायाशावर परवाना शान्य ममममArमा मेमोशनमः ॥१॥ पी. पानि.नि..

दर्शनप्राभृतं ।
१३
चिदपि मोक्ष प्राप्स्पति, एवं विधो मनोभिप्रायो निर्मन्यलक्षणमोक्षमार्गे
रुचिर्मार्गसम्यक्त्वं द्वितीयमुच्यते ।२। त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसमाकर्ण-
नेन बोधिसमाधिप्रदानकारणेन यदुत्पन्न प्रदानं तदुपदेशनामकं सम्य-
दर्शन भण्यते ।३। मुनीनामाचारसूत्र मूलाचारशास्त्रं श्रुत्वा यदुत्पद्यते
तसूत्रसम्यक्त्वं कथ्यते । ४। उपलन्धिवशादुराभिनिवेशविर्घसानिरु-
पमोपशमाभ्यन्तकारणादिज्ञातदुर्व्याख्येयजीवादिपदार्थबीजभूतशास्त्रायदु-
स्पद्यते तद्वीजसम्यक्त्वं प्ररूप्यते । ५। तत्वार्थसूत्रादिसिद्धान्तनि-
रूपितजीवादिभ्यानुयोगद्वारेण पदार्थान् संक्षेपेण ज्ञात्वा रुचि चकार य:
स संक्षेपसम्यक्त्वः पुमानुच्यते । ६ । द्वादशाङ्गवणेन यजायते
तद्विस्तारसम्यक्त्वं प्रतिपाद्यते । ७ । अंगबाह्यश्रुतोक्तात् कुतश्विदर्या-
दलबालश्रुत विनापि यत्प्रभवति तत्सम्यक्त्वमर्थसम्यक्त्वं निगद्यते । ८।
सँगान्पगबाखानि च शास्त्राण्यधीत्य यदुत्पद्यते सम्यक्त्वं तदवगाढ-
मुच्यते । ९ । यत्केवलज्ञानेनार्थानवलोक्य सद्दष्टिर्भवति तस्य परमाव-
गाढसम्परत्वं कम्यते । १० । तथा चोक्तं गुणभद्रेण गणिना-
माक्षासम्यक्त्यमुक्तं यदुत विरचितं वीतरागाशयैव
स्यकमन्यप्रपंचं शिवमनृतपथं श्रद्दधन्मोदशान्तः ।
मार्गधद्धानमाहुः पुरुपवरपुराणोपदेशोपजाता
या संज्ञानागमाधिप्रसृतिभिरपदेशादिरादेशि सहिः॥१॥
आकर्याचारसत्रं मुनिवरणविधेः सूचनं श्रद्दधानः
सूकासौ सूत्ररिधिगमगतरर्थसार्थस्य योजः।
कैधिजातोपलन्धेरसमसमयशाद्वोजष्टिः पदार्थान्
संक्षेपेणैव युध्धा रचिमुपगतवान् साधु संक्षेपः॥२॥
याधुत्या द्वाददार्ग शतरचिरय तं विद्धि विस्ताररहि
संजातात्कुितथिमवचनवचनान्यन्तरेणाधिः।
दृष्टिः साङ्गायद्यप्रवचनमवगाहोरियता यावगाढा
कैपल्पामोशिता रचिरिह परमावादिगादति रुदा ॥३॥

पद्मामृने- ईशदर्शने भ्रटाग्यातमयूरविष्टकमाउनुपरमागमगुम्नकाः मन्नो गृहम्योपधारिण. संपमधगणा संयमिना सटीना । पाप न पनि पादे चग्णयुगले न पतन्ति र नमोऽम्निति कुर्वन्ति अभिमानिया- न्मुशलप्रतिष्ठन्ति। ते किं भवन्ति । ने हानि लल्लम्मा ते भान्ति सल्ला भस्फुटयाची मका या श्रोतुमशिक्षिताः । बोही पुण देवहा नेमियोगिः खलु रत्नत्रयप्राप्ति पुनर्जन्मशतमहथापि दुर्लभा कटेनापि सम्धुम. शक्या तेसि-सपा जनामामतदामामानां च मिप्यारीनामिनि शेषः। जे पि पडंति च तेमि जागंता सजगारवमयेण । तेसि पि पत्यि बोही पावं अणमोप्रमाणाणं ॥१३॥ यपि पतन्ति च तेको जानन्तो सजागारवमयेन । तेषामपि नास्ति बोधि पापं अनुमन्यमानानाम् । जे पि पडंति च तेसिं ये मम्यग्दर्शनादभ्रष्टा अपि पुरुषा सेसिं- तेषां परित्यक्तजिनमुद्राणां मयूरपिशाचोपकरणज्ञानोपकरणरहिताना पादे कायघरयुगले पतन्ति नमस्कार कुर्वन्ति पूर्वमुद्राथग इति । जाणंता विदन्तोऽपि जिनमुद्राविराधका एते इत्यवगच्छन्तोऽपि । लज्जागारव- भएण लजया अपया, गारवेण सिदिमातगण, भयेनार्य राजमान्योऽ- स्माकं कमप्युपद्रवं कारयिष्यतीत्यादिभात्या च । तेसि पि पत्यि मोही तैपामपि बोधिर्नास्ति से रत्नत्रयं प्रपालयन्तोऽपि रत्नत्रयाद्भया इति ज्ञातव्या इति भाव ! कथंभूतानां तेषा, पावं अणुमोयमाणाणं जिनदर्शनभ्रंशायदुत्पनं पापं पातक तदनुमन्यमानानामिति शेष. । उक्त च समन्तभद्रेण गणिना भयाशास्नेहलोभाच कुदेधागमर्सिगिनां । प्रणाम विनयं चैव न कुर्युः गुददृष्टयः॥१॥ दुविहं पि गंथचार्य तीमु वि जोपसु संजमो ठादि । णाणम्मि करणसुद्धे उन्मसणे दंसणं होइ ।। १४ ।।

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पद्माभूते- नामुपलब्धि. जीवादितत्याना जीवस्य पारेज्ञान भाति । उपलद्ध- पयत्ये पुण उपलब्धपदार्थे पुन: उपसन्धश्वासो पदार्थः उपरन्धपदार्थ स्तस्मिन्नुपलब्धपदार्थे सति । किं भवति, सेयासेयं वियाणेदि श्रेयः पुष्य विशिष्टतीर्थकरनामकर्म, अश्रेयः पापं चतुर्गतिपरिभ्रमणकारणं रिश- पेण जानीते । उक्त च-- न सम्यक्त्यसमं किंचिकाल्ये त्रिजगत्यपि। अंयोग्यश्च मिथ्यात्यसम नान्यत्तनुभृतां ॥१॥ सेयासेयविदह उद्बुददुस्सील सीलबंतो वि । मीलफलेणन्मुदयं तत्तो पुण लहइ णियाणं ।। १६ ॥ प्रेयोऽयोवेता उदृतदुरशीलःशीलवानपि । शीलफलेनाभ्युदयं ततः पुनः लमते निर्वाणम् ॥ सेयासेयविदाह श्रेयसः पुण्यस्य, अश्रेयस पापस्य विदण्डू-वेत्ता पुमान् । उद्बुददुस्मील उन्मूलितदुःशीलो मवति । सीलवंतो वि शीलयान पुमान् । सीलफलेण शीलफलेन कृत्या । अन्भुदयं लहइ थम्युदर्य सासारिक मुवं प्रामोति । तत्तो पुण णियाणं लहइ ततः पुनर्निर्वाण लभते मोक्ष प्राप्नोति । जिणवयणमोसहमिण विसपमुहविरयणं अमिदभूयं'। जरमरणवाहिहरणं सयकरणं मध्यदुक्खाणं ।। १७ ।। जिनवचनमापधिमिद विषयमुसविरेचनममृतभूतम् । जरामरणच्याविहरण आयकरणं सर्वदुःखानाम् । जिणवयणमोसहमिणं जिनवचनमौषधमिद इदं पूर्वोक्तलक्षणं मिनाचन सर्वज्ञवीतगगभाषित हेतुहेतुमद्भायसहित औषधं वर्तते । कर्थ- दर्शनमाभृतं । दिनाचने और, विषपमुसविरेचन-विषयाणां पंचेन्द्रियार्थानां नावादानां सम्बन्धिततेन यत्नुस विषयमुखं तस्य विरेचनं दयो । अमिदभूदं समृतभूतं सविद्यमानं मृतं मरणं पत्र यस्मादा म्यानां तदन्तभूतं अमृतोपर्म । अतएव जरमरणवाहिहरणं जरा- मलयाविहरण विनायकं । खयकरणं सवदुक्खाणं क्षपकरण दुमूलकं सर्वदुःखाना शारीरमानसागन्तुदुःसानां विपतकमित्यर्थः । एकं जिपस्न स्वं वीर्य उकिहनावयाणं तु । अवरहिवाग नइयं चउत्थं पुण लिंगदंनणं पत्थि ॥१८॥ एक छिनार दिनी उपमानो 51 अपीपदान मृतीय पर्व पुनः निदर्शनं मारिन । एर जिपस्न रुवं एफमद्वितीय जिनस रूप नाराय। पीयं मिना पानातु । उक्त -- यापारख १६ सपदारपुश्यमास्तदनु पयः। मापुस्तमासी अनेषु शिनशासने ॥ १ ॥ "Emperमामिने र .::... " PRASRANAME पद्माभृते- लिंगदर्शनं नास्ति । त्रीण्येय जिनशासने लिंगदर्शनानि प्रोक्तानि न न्यूनानि नाप्यधिकानोति शेष । छदव्य गय पयत्या पंचत्यी सत्त तच णिदिहा। सदहइ तीण रूवं सो सदिही मुणेयन्यो ॥ १९ ॥ पाण्याणि नव पदार्या. पमास्तिकायाः सप्त तरवानि निर्दिष्टानि । भाधाति तेवोस सहष्टि हातव्यः । छदस्य पदव्याणि जीवपुद्गल वर्माधर्मकालाकासाः पद द्रव्याणि भवन्ति । वर्तमानकाले द्रवन्तीति द्रव्याणि भविष्यति फाले द्रोयन्ति अनीतकालेऽदुवनिति द्रव्याणि जीवपुगलधर्माधर्मकाला- कारानामानि । नव पयत्या नव पदार्या. जीवाजीयपुण्यपापासवबन्धस- वनिगमोक्षनामान । पंचधी पंचास्तिकाया जीवपुगलधर्माधर्माका- शनामान पैचास्तिकाया उच्यन्ते । सत्त तय णिदिवा सप्त तत्वानि निर्दिष्टानि कथितानि जीवाजीवाश्यधर्मवरनिरामोक्षनामानि । सह- र ताण प्रत्याति तपास स्वर । मो सदिट्टी मुणेयव्यो स पुमान् मरिति मन्तव्यो ज्ञातव्य । तेनु दय्पादिपु जीयः सचेतनः । पुगको धर्मोऽधर्म काल आकाशव पंचाचेतनाः । षड्विधोऽपि पुलो मर्न । इनर पंचामूर्ना । जीयगरपोर्गने कारण धर्मः । सपा ने कारणमधर्म । सर्वपामाधारमाकाश । वर्तनासक्षण: कारः स्नानो गलियत् मित्रपरमाणुक धर्माधर्माकाशा अपडप्रदेशा, 1 का पुरोधानां च प्रदेश मण्ड, न स्वेकजीवन्य प्रदेशानां सपा । धर्माम कालाकागाश्च वागे गमनागमनादिता । गमनागमने जीवjrat गमन्यय मिदनीयम्य । धर्माधर्मकनावानामध्येया प्रदेशाः । मध्ये. पायगानन्न आश । पुदयोऽनन्तप्रदेशमा सर्वाणि भ्या- सम्म । ३ जागावाने पाले स्याने पाराशेन मदिरा - दर्शनप्राभृतं । परतो मिटितान्यपि निजनिजगुणान जहति । एवं तत्वास्तिकायपदा- नमपि सकपातन्। जीवादी सहहणं सम्मनं जिणवरेहिं पण्णतं । वहारा णिच्छयदो अपाण हबइ सम्मनं ॥२०॥ सीवादी समान सम्पर जिनपर: निर्दिष्टम् । पहास निशतः मान्मा भवति सम्मपन् । कगीनां धनाने रचिः सम्पयामिति जिनवर प्रगति तत्त मन्यादर्शनं पहाराष्ट्रात । णिच्छयदो अप्पाणं हवइ सम्म नियतो निमपनपादाभव भवति सम्पर रचिसामान्यावादित्यर्थः । एवं जिणपण देनणरयणं धरोह भावेण । सारं गुपरयपनय मोवाणं पहम मोपसन्स ।।२१।। निगोरखननं परत भावेन । पर रो मोटाप मोक्षार ॥ एवं मायण। जिप जिन त जिनः कादितं । रंगमरर दरिन सम्पमानिस् । धरह भावेण दात न न सभाला। उसे च--- एकाधिपम जिनभलिई निरारथितुं । पुष्पानिए पूदितुं दातुं मरिधि तिरः।१॥ ४ मारं सायं. गुणरणतः रमे याने ६- सानिमाले । Niraार हामंधाक्ष १. मोरा Rer : - Res":'समोसाद .. ..

२० पट्माभृते- जं सफाइ तं कीरइचण सफेई तं च सदहणं । केवलिजिणेहिं मणियं मद्दहमाणस्म सम्मत्तं ॥ २२ ॥ यत् शक्नोति नन् क्रियते यस न शनुयात् तस्य च प्रधान । फेवलिजिन मणितं प्राधानस्य सम्यश्वम् । जं सका तं कीरइ यष्टमोति तत्क्रियते विधीयते। अंचण सकेइ यच्च न शक्नुयात् यरकर्नु न शानोति । तं च सदहणं तर श्रद्धानं तस्य ज्ञानाचारादे रोचन कर्तव्य । केवलिजिणेहि मणियं केवलज्ञानिभिर्जिनेर्भणित प्रतिपादित । केवलज्ञान विना तीर्थकरपरम देया धर्मोपदेशन न कुर्वन्ति । अन्यमुनीनामुपदेशस्त्वनुवादरूपी ज्ञातव्यः अश्या फेवलिभिः समवशरणमण्डितकेवलज्ञानसंयुक्ततीर्घकरपरमदेव भणितं जिनरनगारफेवटिभिर्भणित । कि भगित ! सदहमाण सम्मत्तं श्रद्दधानस्य पुरुषस्य रोचमानम्य जीवस्य सम्यक्त्वं सम्यग्दर्शन भवति। दंसपणाणचरिते तबविणये णिचकालपसत्या । एद दु वंदणीया जे गुणवादी गुणधराणं ।।२३।। दर्शनशानचारित्रे तपोविनये नित्यकालपरवक्ष्याः । एते तु वन्दनीया ये गुणवादी गुणधराणाम् ।। दसणणाणचरिने दर्शनशानचारित्रे दर्शन च ज्ञाने च चारि = दर्शनशानचारित्र समाहारो द्वन्दः तस्मिन् दर्शनज्ञानचारित्रे एतत्रितये तथा तपविणए तपोपिनपे च चतुर्वियागपनायामित्यर्थ । णिच कालप मत्या नित्यकाअस्वस्या नित्यमेव प्रकर्षण स्वस्था एकलोलीमा प्राप्ताः एदंदु वंदणीया एते पुरुषा महामुनयों यन्दनीया नमस्कर्तव्याः । एते १तम होत राहणं. ग.।

ARA दर्शनप्रामृतं । ३.! जे गुणवादी गुणधराणं ये मुनयः स्वयं सम्यग्दर्शनादीनामारा- ६या भपरेषा गुणधराणामाराधनाराधकानां । ये मुनयो गुणयादिनो उगवर्गनगीला न मत्सरिणस्ते वन्दनीया नमस्करणीया इत्यर्थः । नहजुप्पणं स्वं दहूं जो मण्णए ण मच्छरिओ। मो संजमपडिवाणो मिच्छाइट्टी हवइ एमो ॥ २४ ॥ महजोत रहायो मन्यते न ममरी । 5 मेचमारिसमा मभ्यारम्भिपति एपः॥ मरजुप्पण्यं रूपं सहजोत्पन्न स्वभावोपन सपं न रूप । दहुं पाकिस्म । जोमपए म मच्छरिसओ प: पुमान् न मन्यने ना- मचि मिना कि प्रयोजन पाया कि नहान भवन्तीति । मन्नारो परेषां शुभकर्मणि देशी । सो संजमपटियपो म पतो दीक्षा प्राप्तोऽदि । मिन्हाहि हवा एमो विवारः । अपवाद धमटशि मिपा पन्य पई। पो! यो नरोप पामोनि रामद भारत तालिका सानिमा बागि नगदग- वि. THE का पुतला दुपदेशः इम: पः । शासन བ : , ::: ས:: ༌ ༌ ་ ་ ་ ;, ཨདེཏ་ལ; དག པ; ༣ ༔ : ཥཱཀཱ་ག ཝཱགཱ | – ལg ང ཨཱ༌ཝཎྞཾ ༔ - मग मी तिः। बीमामा९ि५. Cinema पट्माइते- चतुःपरिठचमरसहितः चरित्रशद्भिरतिशयः संयुक्तः । अनुचरबटुसत्वहित कर्मक्षयकारणनिमिते ॥ चउमहिचमरमहिमओ चतुःपष्टिचामरसहितस्तीर्थकरपरमदेवो भगति से बन्दे इति विषमव्याख्या ज्ञातव्या । चउतीसहि असरह संनुगो चस्त्रिंशदतिशयैः संयुक्तस्तीर्यकरपरमदेवो भवति त यादे । अशुचपाहुमतदिओ अनुचरग्रहसस्यहितः स्वामिना सह ये पृटतो गायन्ति तेऽनुचग, सेवकाः तथा बहुसरया अपरेऽपि जीवास्तेभ्यो हितः स्वर्गमोशदायक इत्यर्थः । कम्मरमयकारणनिमित्ते कर्मणा क्षयकारण स्याने तस्य निमिते प्रात्यर्थ से बन्दे इति क्रियाकारफ- सम्पन्ध । - T कानि तानि कर्मक्षयकारणानि शुभयानहेतर इति प्रश्ने गायामिमा चकार श्री कुन्दकुन्दाचार्य गाण दमण य सर्वेण गरियेण संजमगुणेण । यदि पिगमाजोग मोरगो जिणमामणे दिहो॥३०॥ जानेवदर्शनेन बनामा चारित्रेण यमगुणेन । बीमानिसमायोगे मोशी जिनगागने र ॥ गाण इनेन । दंगण य दर्शनेन च । नयेण तपगा। परि. पण भनि धारिया मनमगुण एतचतुष्टयं मयमगुण उपते । गह कि ममाजोग चामनि ममायोगे मति का मामाया मग मोगमा निणमागणे दिवो मांशो निनशामने 2 कविता मसम्मनिन थानन । नच बोग्नदिशियण ना. ना- पांतधिनि मनाइय: मंगान पाकि हिनावानिशानोति ।

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२६ पप्राभृते- तथा चाहता. शानं पंगौ किया चान्ध निःशृद्ध नार्थकद्धयं । ततो मानक्रियाश्रद्धात्रयं तत्पदकारण ॥१॥ कल्लाणपरंपरया लहंति जीवा पिसुद्धसम्मतं । सम्मईसणरयणं अग्घेदि सुरासुर लोए ॥३३॥ कल्याणपरम्परया लमन्द जीवा विशुद्धसम्यक्त्वम् । सम्यग्दर्शनररनं अर्यते सुरामुरे लोके । कल्लाणपरंपरया लहंति जीवा विमुद्धसम्मतं कल्याणानां गर्मा- वतारजन्माभिषेकनिष्क्रमणज्ञाननिर्वाणानां परम्परया घेण्या सह जीवाः भन्यप्राणिनो विशुद्धसम्यक्च निरतिचारसम्यक्त्वं प्राप्नुवन्ति । यदैव जीवः सदृष्टिर्भवति तदैव तीर्थकरपरमदेवो भवतीति भावः । सम्ममण- रयणं सम्यग्दर्शनरत्नं । अग्धेदि सुरामुरे लोए अय॑ते पूज्यते बहुमूल्यं भवति देवदानवभुवने । एतदनमूल्य कोऽपि कर्तुं न श- नोति । करोति चेन्मूल्यं तदा सद्य कुष्टी मुखे भवेत् । दहण य मणुयत्तं महियं तह उत्तमेण गुत्तेण । लखूण य सम्मत्तं असंयमुक्यं च पोकसं च ॥ ३४ ॥ हष्मा च मनुमत्वं सहित तथा उसमेन गोरेण । लम्वा च सम्यक्त्व अक्षय मुसं च मोभं च ।। दहण य दृष्ट्वा च हाया। किं, मणुयत्तं मनुजन्य मनुष्यजन्म अनेक- दृष्टान्तदुर्लभ विचार्य महासमुद्रे करायच्युतरनमिव । महि तह उत्त- मैण गोनेण उत्तमेन गोत्रेण कुलेन महित संयुक्त । लद्वण य मम्मत सम्याय च सव्वा । अपयमुक्यं च मोरयं च एतत्समिय प्राप्य अक्षयसौख्य निजामुद्रधुदपरमात्मप्रदानज्ञानानुचरणस्वभावोत्य अक्खयमोक्र्म महरि मोम बघ । -

दर्शनप्रभृतं ।
मानन्दलाने मुल भवति न येवलमक्षयमुग्न भवनि मोई च
यमिकर्मभायमाहित ऊर्यगमनाक्षणं परमनिर्वान वयामि।
विद्यादि जाय जिनदो महमहानववाहिं संतुनो।
गउतीमामयजुदो ना पटिमा पावरा भणिया ।।३।।
मिनी मानिने र दुगा ।
परिपुन: m sitमा स्थायरा ॥
विदि जाय जिणिदो मिति पनि मार्य या.
पनि निमन्त्री कारपरमाय । पाल, मागलासमा
मंजनो मालिपी गुन । पनीयायम
सदो मरिसादसियत: । गा पटिमा भाग भाग
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- २८ पदमामृते- सारका. | राजमदन । पहा । सिद्धार्थपादपः। अध्यातिहाणि । अश्मंगानि । एयमादीनि अटोतरशतं eणानि । तिखकम- सकादीनि नाशतध्यानानि तान्यपिलक्षणशम्देनोप्यरो | अथ के ते धतुत्रिशदतिशया ! निस्वेदता । निर्मटता। क्षीरगौरविरता। समचतुरलसंस्थान । यद्यपमनारायसहनन । मुम्भपता | मुग. ग्धता । मुटक्षणता । अनन्तवीर्य । प्रियहितादित्य । इयेते दशा. तिशया जन्मन आरम्य भवन्ति । तया घातिकशपना दशातिशयाः सन्ति, ते के ! गव्यूतिशतधनुष्टयमुभिशता । गगनगमन । प्राणिधा. भावः । मुक्तेरभाव | उपसर्गाभाय । चतुर्मुखत्वं । मरियाप्रभुत्वं । प्रतिविम्बरहितत्वे । लोचनपश्मनि स्पन्द । नखकेशानामद्धिः । इति घातिकर्मक्षयजा दशातिशया । देवोपनीताचतुर्दशातिशया । तथाहि । सर्वार्धमागधीका भाषा। कोऽयमर्थ ! अर्द्ध भगवद्भापया मगधदे- शभायात्मक। अद्वै च सर्वभाषात्मक। कथमेव देवोपनातत्वमिति चेत् ! मगधदेवसन्निधान तथा परिणामतया भाषया संस्कृतभाषया प्रवर्तते ॥१॥ मैत्री च सर्वजनताविपया सर्वे जनसमूहा मागप्रीतिकरदेवातिशय- वशात् मागधभाषया भाषन्ते परस्पर मित्रतया च वर्तन्ते इति द्वायति. शयौ ॥ २॥ सर्वप्न फलस्तवकाः । सर्वत्ना पल्लवा पुष्पाणि तर्वादीनां भवन्ति ॥ ३ ॥ आदर्शसशी रत्नमयी भूमिर्भवति ॥४॥ यायुः पृष्ठत आगच्छति ॥ ५॥ सर्वलोकस्य परमानन्दो भव. ति ॥ ६ ॥ अप्रेऽसे योजनमेकं सुगधगन्धावहा भूमिभाग प्रमान्ति घूलीकटकसटकीटकर्फरपापाणादिकं च दूरीकुर्वन्ति ॥ ७ ॥ तम्युपरि मेघकुमारा गन्धोदकं वर्षन्ति ॥ ८॥ सुवर्णपत्रपमरागमणिकेसरविराजित योजनमेकं कमले तादृशचतुर्दशकमलयेष्टित स्वामिन पादाधो भवति ताशानि पमानि सप्ताप्रे भवन्ति सप्त पृष्ठतश्च भवन्ति ॥ ९॥ अष्टादश । सर्वत्नां मुलिमाटेर परिसरातमन्यामिन नदिन दर्शनप्रामृतं । २९ धान्यानि भूमौ निष्पयन्ते ॥१॥दिश आकाशश्व रजोधूमिकादिग्दाहादिर- हिता भवन्ति ॥११॥ ज्योतिर्देवा व्यन्तरदेवा भवनवात्तिनश्च देवाः सौधर्मे- दाइया सर्वेषां देवादीनां समाहानं कुर्वन्ति ॥ १२ ॥ अप्रैऽने धर्मचक्रं गच्छति चक्रवर्तिवकवता१३॥चतुर्दशौतिदायोऽष्टमङ्गलानि॥१४॥ भूगार:-सुवर्णाटका । तालो-मंजीरः । कलश:-कनककुम्मः । बजः- पताका।नुप्रीतिका-विचित्रचित्रमयी पूजादन्यस्यापनाहा स्तम्माधारकुन्मी। स्वतन्छ । दर्पणः । चामरं च । एतानि प्रत्येकमष्टोत्तरदातसंख्यानि । एवं चतुर्दशातिशया देवोपनीताः । अष्टमातिहार्याणि च भवन्ति-- अशोफवृक्षः मुरपुष्पवृष्टिदिव्यम्पनियामरमाननं च। भामण्डलं दुन्दुभिरातपत्र समातिहार्याणि जिनेश्वराणां वारमविहतवजुत्ता कम्म खविलग विहिवाम्म। बोसहवत्तदेहा गिन्यापमणुनरं पना ॥३६॥ द्वादशवपटपुष्टाः कर्न धादिया दिपारेर सार्व म्युचरदेश निदानमा प्रान्त वारसविहतवजुत्ता दयविधतापायुना नुन्यः । कम्म खविसन फर्माविध क्षपपिचा। विहिवलेण चारित्रवलेन । स्सं आनीय । वोमट्टचत्तदहा एमासनकायोत्सर्गउपविधन्युन्नगेंग न्यक्तानंग नुनयः । णिवाणमणुतरं पना निर्वानं मोशननुतरं नकाब टनन प्रामा गताः सिमाप: सम्पस्वमाहाम्यं सर्वदलिद इसी धापनन्दिकुन्दकुन्दाचापयशाचीवावास्याचाद्धपिन्छ- गार्थमनसिविटेन सोनन्धरस्वामिला मगन्मन भाराभापमाना पानन्दारिन बायाधुटमार चारित्रमाभृतं । सर्यार्थसिद्धिमदमईदीशं, विद्यादिनन्दं पसस्यकन्दं । मन्दोऽपि नत्या विवृणोमि भत्तया, चारिपसारं शृणुतार्यमुख्या:०१५ सचण्हू मव्यदंसी णिम्मोहा वीयराय परमेट्ठी । पन्दिनु तिजगवंदा अरहंता भव्यजीवेहिं ॥११॥ गाणं दंमण मम्मं चारित्तं मोहिकारणं तेसिं । मुरसाराहणहे चारित्नं पाहुडं योच्छे ॥२ सर्वमान् मदर्शिनः निर्मोहान् वीतरागान् परमेष्टिन। इन्दिरवा मित्रगन्दितान् महंत मम्यजीवः ।। मानं दर्शन मम्य चरित्र शुदिधारण तेराम् । मोशारराधनहेतु चारित्र प्राभूतं श्ये॥ जुगल । मय्याह सर्वज्ञान् । बंदिशु बन्दिन्या । चारिनं पाई यो पारित नाम प्राभून चारित्रमाभूत चारित्रसार नाम प्रन्य । का वर्मा, अ. कुन्दकुन्द्राचार्यः । कथंभूतान् सर्वझान, मयसी मदाशनो लोकायकायलोकनशीलान् । अपरे कि मिशियान सहान् , गिम्मोहा निर्मोहान् मोहनीयकर्मरहितान् । भूयापि कि पान्, पीयगय वीनगगान्धील पं गतो रागो येगामे वीतमगाम्नान्, मन गो नि मायद्यात् "मी " इति प्रेण वीरादेश, निटाणप्र. स्वये बात सिनियरले । योगगम इयर शम्रः। भूपोनीक रिटपणादिनान्, परमेही परमेष्टिनः, कोथ, परमे दयानन्दा पतित परमेटानि गुणने समवरणगापमानि- चान्त्रिप्राभृतं । पर्यः । अपरं कथंभूतान् सर्वज्ञान्, तिजगवंदा विजगदन्दितान् त्रिभुवनस्थितभव्यजनजितानित्यर्थः । पुनरपि फयंभूतान् , अरहता कर्मोहः, रफारेण रजो लम्यते तत्तु ज्ञानावरणदर्शनावरणकर्मय सम्पते तथा तेनैव प्रकारेण रहस्यमन्तरायः कप्यते तेन घातिकर्मचतुष्प- हननादिन्द्रादिकतामनन्य भविनीमहणां पूजामहन्तीत्यर्हन्तस्तानहतः । सपा भव्यजीवेहि भन्यजीवन्या इति सम्बन्धः । णाणं देसण सम्म चारित्तं सोहिकारणं तेसिं तेषां सर्वज्ञानां घातिसंघातघातनलक्षणाया शुद्धेः कारणं हेतुर्दानं दर्शनं सम्परचारित्रं च कारणं । सम्म इति शन्द एकत्र गृहीतोऽपि विभिर्योग्यः तेनायमर्थः सम्यग्ज्ञानं सम्यग्दर्शनं सम्य- क्वास्त्रिं च सर्वेषामपि कर्मणां क्षयकारणं मूलादुन्मूलनस्य हेतुरिति भावः । तेन मुक्खाराहणहे तेन कारणेन मोक्षाराधनहेतुं कारणं । किं ! चारित्तं चारित्रं । पाहुडं प्राभृतं सारभूतं शास्त्रमहं वक्ष्य इति क्रिया- कारकसम्बन्धः । युगलं । एतद्गायाद्वयं युगले युग्मं वर्तते । एए तिणि वि भावा हवंति जीवस्स अक्खयामेया । तिण्हं पि सोहणत्ये जिणभणियं दुविह चारित्तं ॥३॥ एते प्रलोपि भाषा भवन्ति जीवस्य अक्षया अमेयाः । प्रमाणामपि गोपनार्थ जिननितं द्विविध चारित्रम् ॥ एए तिगि वि भावा एते त्रयोऽपि भाषा ज्ञानदर्शनचारित्रपदा- लियः परिणामाः । हवंति जीवस्स जीवस्यात्मनः सम्बन्धिनो भव- न्ति न तु पुद्गलस्येति भावः। कर्य भूतात्योऽपि भावाः अक्खयामेया सक्षया अविनधराः, अमेया अमर्यादीभूता अनंतानन्ता इत्यर्थः । ज्ञानस्य तावदानन्त्यं भक्त्येय रोकालोकन्यापकत्वात् । सम्यक्त्वचारित्रयोः कय- मनन्तवं नियतात्मप्रदेशस्थितत्वादिति चेन तपोरपि तत्सहचारित्वात्, यावन्मान ज्ञान तायन्मानं सम्पन्दर्शन सम्परचारित्रं च तेषानेकीमाः Aye- पद्माभृत- निश्चयात् । तिण्हं पि सोहणत्थे त्रयाणामपि सम्यग्दर्शनज्ञानचारि- प्राणां शोधनार्थे शोधननिमित्तं । जिणभणियं दुविह चारित्तं जिनर्भणि- ते प्रतिपादित विविध चारित्रं दर्शनाचारचारित्राचारलक्षण, तक्ष्यति । जं जाणइ तं गाणं जं पिच्छद तं च दंसणं भणियं । णाणस्स पिच्छियस्स य समवण्णा होइ चारित्तं ॥ ४ ॥ या जानाति तद शानं यत् पश्यति तच दर्शनं मणिने । ज्ञानस्य दर्शनस्य च समागमात् भवति नारित्रं ।। जं जाणइ तं गाणं यजानाति तम्ज्ञानं । जं पिच्छइ तं च दंगणं मणियं यपश्यति तच्च दर्शन भणित । "कृन्ययुटोऽन्यत्रापि च" निषचनाकार युत्प्रत्ययः । णाणस्म दमणस्स य समयणा होइ चारितं ज्ञानस्य दर्शनम्य च समापन्नात् समायोगाश्चारित्रं भवति । जिणणाणदिहिगुद्धं पदमं मम्मत्तचरणचारित्तं । विदियं संजमनरणं निणणाणमदेसियं न पि ॥५॥ जिनशानादिशुद्ध प्रथम सम्यावरणचारित्रम् । द्वितीय मयमवरण विनमानमरेशितं तरपि। निणगाणदिहिमुद्धं पदम गम्मत्तचरणचारितं निनस्य सह- पीनगमाग सम्बबि यशान दिर्शनं च साम्या मुई पर्तिशति- दीपरहिन यम तावदेक सम्पायवाणचारिय दर्शनाचारचारित भवति। विदियं मंजमारणं द्वितीय मेयमचरण चारित्राचारलक्षणं घार भवति । जिगणाणमदमियं न पिजिनम्प मम्बन्धि यमयाज्ञान हैन मन्नत मानिमापन नापि भारि भवति । उक्त च--- मुदत्रयं मयाधारी नपानापननानि पर। मी शंकादयति रांग: पंचशितिःt.

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पामृते- कुरेयगुरुशास्त्राणां सद्भक्तानां गृहे गतिः । पडायसनमिरयेयं पदन्ति विदितागमाः ॥ १॥ प्रभाचन्द्रम्य पदति-मिथ्यादर्शनशानचारित्राशि प्रीणि प्रपथ सन्त पुरुषा पहनायतनानि । अघया असर्वज्ञः १ असर्यज्ञायतनं २ अमझज्ञान ३ अमर्थज्ञज्ञानसमवेतपुरुष ४ असर्वज्ञानु हान ५ असर्वा मानुपानममोरारुपति ६ । शंकादयोऽर यथा-शका १ फामा २ शिनिकमा ३ राशि अनुपग्रहने ५ अस्थितीकरण ६ माम. स्प ७ अप्रभाषना नि८ अष्टीशकादयः । जिग्गक्रिय णिशसिय णिविदिगिया अमूढदिही य । उपग्रहण टिदिकरणं गाल पहारणा य से अ॥७॥ निनिकाशित मितिमा अगायिक। गहन रिपतीका पागम्य प्रभातना ते भरी॥ निक्रिय यादि। निशक्ति निर्भया परदर्शने जैनाभासे पा. मुनि मानन । मानचीसजिनानगानन गणिमिय निका. far RIP TRAI दिन गणदेव येहभावामुले जनमेलापकरणादिनिया মাগী। পান-নননি।বিশ্বসা শ। সিপিবিতা forf.नमाविमानशरीरमादिदर्शनेन शूगाया था. कपनमा | अम्हादिही य आतमि मिनायनेशि- FATH | उसगरण रहन निगया दागकर An Eशिवन् । टिदिकार्ण गिनीकाण मग inापन पदनिपिग 483 wwATIनि अपनारेमाभिवत् । पशाचा नागजिनमानसपनाममनन matष्ट ने HTTगा मी मानि

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पद्माभूते- सम्मत्तचरणमुद्धा सम्पायचरणे सम्यायचारित्रे ये सूरयः शुद्राः सम्यक्त्वदोषरहिताः सम्यान्वगुणसहिताश्च भवन्ति । संजमचरणस्म जाय सुपसिद्धा संयमचरणस्प यदि वा मुप्रसिद्धाः चारित्राचारे च मुममिमाः मुटु अतिशयेन प्रकर्षेण मिद्ध चारित्रं येषां ते मुप्रसिद्धाः सर्वलोकविदिता था सम्यग्यपूर्वकचारित्रप्रतिपालका इत्यर्थः । गाणी अमूढदिही झानिनोऽदस्यथ । अचिरे पावंति निव्याणं अचिरे लोककाले निर्वाण प्राप्नुयन्ति । अत्र चारित्रस्य मुल्यत्वेऽपि सम्य. कपज्ञानयोरपि सामध्यमुन मिति भावः । यच्छल्लं विणण य अणुकंपाए गुदाणदच्छाए। मागगुणर्मगणाप अवग्रहण गणाए य ॥ १० ॥ पाहि लागणेहि य लरिमजद अजयहि माहि । जी आराहतो जिणगम्मन अमोहण ॥ ११ ॥ वामय विनोन र अनुहम्पया मुहानाया। मागंणमंगन या गगन रक्षणेन ॥ एतं मार्ग मायने भा. भाो.। और भागधयन् जिनमम्मा भमोहेन । प लागाई य पक्षणे । जिनगम्या । आगहतो प्रतापगन् । जीरो मिग्जर और आत्मा एयने हायते । न पर अजयहिं भावे आधार गिमले। केन कया लश्यते ! अमोइंग अमेदिनान. जनता जानन शिमलया। निगम पिना मापा गायक पु कान जाननि मरिणामसतिगमगा | माना अमी पनि मायामना गाने कैरिया-यपदक माय नेम प्रगतीशिल वर्णवमलेन ३

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MAMMAHA
३८
पट्नाभृते-
उत्साहभावनासंग्रशंसामेवा मुदर्शने श्रद्धा।
न जहाति जिनगम्यान्वं कुर्वन् शानमार्गेण ॥
उच्छाहभावणासंपसंमसेवा मुढेमणे मद्धा न जहदि जिणस-
म्मत्तं उत्साह-उद्यमस्तं कुर्वन्निति सम्बन्धः । भावणा-शरीराकर्म-
णश्चामा पृथग्यर्तते इति भेदभावना ता । सपसंस-सम्यक्प्रकारेण
मनोवचनकायकर्मभिः प्रशंसामर्हदाढीना स्तुतिं कुर्वन् । तथा सेवां स्नप-
नपूजनस्तयनजपनादिगुर्वादिपादसवाहनादिक च कुर्वन् । मुदसणे-सम्य.
ग्दर्शन रत्नत्रयलक्षणमोक्षमार्गे तत्वार्थे च श्रद्धा गघि कुर्वन् जिनम-
म्यक्वं न जहाति न त्यजति । उत्साहादिकं केन कृत्या कुर्वन् , णाण-
मग्गेण ज्ञानमार्गेण सम्यग्ज्ञानद्वारेण ।
अण्णाणं मिच्छत्तं वजहि गाणे विमुद्धमम्मने ।
अह मोहं सारम्भ परिहर धम्मे अहिंमाए ॥ १४ ॥
मान मिप्यावं वर्जय शाने विशुद्धगम्यन्ये ।
अथ मोह सारम्भ परिदर धर्मेऽहिंमायाम् ।।
अण्णाण मिच्छत्तं वन्जहि णाणे विसुद्धमम्मने अज्ञान यर्जय
दूरीकुरु, कस्मिन् सति गाणे-जाने सम्यग्ज्ञाने सति, अज्ञानम्य ज्ञान
प्रयनीक ततः । मिथ्याचं वय, कस्मिन् सनि सम्यन्ये सति मिप्या-
त्यस्य सम्यादर्शन प्रतिवन्ध यत । अह अथानन्तरं । मोहं परिहर
परित्यन । कथंभूत मोह, मारंभ सेवाकृयिवाणिग्याचारम्भसहित ।
कास्मिन् सति, धर्मे सति चारित्रे सनि । तथाऽऽरभ परिहर कम्पा
सन्यो, अहिंमाए अहिंमा सन्या पंचमहाप्रतानि गविभो नगवनय-
हानि सर्वाण्यासानिमित्त कथितानि यतः ।
पव्यन्ज संगनाए पयह मुतये गुरांजमे मारे।
होर मुग्मुिसाणं गिम्मोहे पीयरापते ॥ १५ ॥

चारित्रमामृतं । ३९ प्रमका संगमागे प्रयतत्व मुतपनि मुसंगमे भावे । भवति सिम्पानं निर्मोहे यीतरागत्वे ॥ पवन संगचाए पयह हे जीव ! त्वं प्रनध्यायां प्रवर्तस्व, कस्मिन् ले, संगवार-संगम वनादिपरिमहस्य त्यागे सति । तथा हे आगन् । सुनवे पयह मुतपसि प्रवर्तस्व । कस्मिन् सति, सुसंजमे भावे सौमनसंपमापरिणामे सति । असंयमिनो मासोपवासादियुक्तस्यापि सुत- कोऽद्भावात् । तथा होइ सुविसुझाणं णिम्मोहे वीयरायत्ते भवति सुवेदव्यानं निहि पुत्रफलनमित्रधनादिव्यामोहवर्जिते पुरुष, यस्तु पुमादिनौहसहितो भवति तस्य विशिष्ट धप्पानं शुमध्यानलेशोऽपि न भगाने पतः । तथा वीतरागचे सति मुविशुद्धध्यानं भवतीति तात्पर्य । इतं च योगोन्द्रदेवनामा भारफेण- जंसु हरिणच्छी हियवडर तासु न यंभु विवारि । एक्कार्हि फेम समंति यद ! ये संडा पडियारि॥१॥ मूढस्य नालियवहौ" इति प्राकृतव्याकरणसूत्रे । मिच्छादसणभगे मलिणे अण्णाणमोहदोसेहि । यति मृढजीवा मिच्छत्तायुद्धिउदएण ॥ १६ ॥ मिपादर्शनमार्ने मलिनेभानमोहदोपाभ्याम् । पम्पन्ले टीपाः निपात्यायुपुरपेन ॥ १ प हरिलाशी हददे तस्य नेए मह रिचारप । एकस्मिन् कम् ममापाली या बोरगी प्रतिमारे ॥१॥ २ सत्र पुस्तके सम्राधिउदा इति पाठः किटोरापो सिटि. उदासी । ग. प. ऽस्तरेऽपि सन्मत्तादिमी पारः। प. ও শাখা : প্রাণিীষা: বাবুনন (খ) दिनार मानमोहादिदो मारने दर्शन मार्ग स्वन्ति मुगलो. लोहोरो भूटः ।

४० पनामते- मिन्छामणमन्गे मलिण मि यादमानमार्ग मरिने पापम्प मति F", अण्णाणमोहरामहि अज्ञान पान या "क्षण, मोह पर मजा नागनम है। नारदापो नान्यामज्ञान • ...' । ५ । । । । ।, ६ .. मजीवा मानिन । के- 1. मिन्टनादि उटण 'म 4 निम्योरपेन प्राद नैनामाम मण . मम्म गण पदि नाणदि गाणण दलपजाया । मम्मण यमहाटय परिददि वग्निजे दोग ॥१७॥ । मम्मामा पम्गात जाणादिणाणण पान .." पापा .. " . .. + 4 ॥ तय in भाग्य ममममममा संग्रामदatiमामा। मम्मामा थाना मनस्यो मायामा ART शालिमान am मम मममीनी मति

चारित्रप्राभृतं ।
बत्तीसद्धलवा नाली दो नालिया मुहुत्तं तु।
समऊणं तं भिणं अंतमुहुत्तं अणेयविहं ॥२॥
एकेन तमपेन न्यूनो मुहूर्तो भिन्नमुहूर्तः कप्यते। अन्तर्मुर्तस्वनेक-
मकारः । के तेऽनेकपकारा अन्तर्मुहूर्तत्येचाह-आवल्युपरि एकः सम-
पोऽधिको यदा भवति तदा जयन्योन्तर्मुहुर्तो भवति । एवमावल्युपरि
पादयः समपाधटन्ति ते सर्वेऽप्यन्तर्मुहुर्ता भवन्ति यावत्समपोनो
मूर्तः । एवमहोरात्रपक्षमासर्वपनवर्षपूर्वपल्पोपमत्तागरोपमावसर्पिग्यु-
तपिण्यादयः कालस्य पर्याया ज्ञातव्याः आकाशस्य तु पर्याया घटाकाशः
पटाकाश: स्तम्भाकाश इत्यादयः । सम्मेण य सद्दहदि य परिहरदि
चरितजे दोसे सम्यक्त्वेन च श्रद्दधाति रोचते न केवलं श्रद्धत्ते परिहरदि
६-परिहरति च कान्, चरित्तजे दोते-चारित्रजान् दोपानिति सम्बन्धः ।
एए तिषिण विभावा हवंति जीवस्त मोहरहियस्स।
नियगुणमाराहतो अचिरेण वि कम्म परिहरइ ।।१८।।
एते योनि भावा भवन्ति जीवस्य मोहरहितस्य ।
निजगुआराधयन् अचिरेगापि कर्म परिहरति ।
एए तिष्णि वि भावा हवंति जीवस्स मोहरहियस्स एते त्रयोs-
पि भावाः सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रलक्षणाः परिणामा भवन्ति जीवस्या-
त्मनः । कथंभूतत्य जीवस्प, मोहरहितस्य चारित्रमोहापंचविंशतिभे-
दादहितत वर्जितस्य । नियगुणमाराहतो अचिरेण विकम्म परि-
हरइ निजगुणं शुदबुबैकस्वभावमात्मगुणं ज्ञानपानस्वरूपमाराधपत्नचि.
रेण स्तोककालेन फर्म परिहरति सिद्धो भवति ।
संसिज्जमसंखिज्जगुणं च सासारिमेरुभित्ता पं।
सम्मत्तमणुचरंता करति दुक्खरखयं धीरा ॥ १९ ॥
मनितारा नाली है नाटिके मुहूतं ।
समयोनः स मिशः अन्तर्मुहूर्तोऽनेकदिपः ॥२॥

४२ पप्रामृते- संख्येयामसंख्येयगुणां सर्वपमेरमात्रा । सम्यवावमनुचरन्त कुर्वन्ति दुखक्षयं धीरा ॥ संखिज्ज संख्येयगुणां निरा सम्याच प्रतिपालयन्तो धौरा योगी- श्वराः प्राप्नुवन्तीति । असंसिग्जगुणं असंख्येयगुणा निर्जरां । अशुच- रंता चारित्र पालयन्तो धीरा योगीश्वराः । करति-कुर्वन्ति । तदनन्तरं दुक्खक्खयं करंति सर्वकर्मक्षयादनन्तर मोक्षं प्राप्नुवन्तीत्यर्थः । कर्थ- भूतां संख्येयगुणामसंख्येयगुणा च निर्जरी, सामारिमेरुमिना गं सर्पपमेरुमात्रा | सम्यक्त्यनिर्जरायाः सकाशात् चारित्रनिर्जरा बहुतरेति भावः। णं इति वाक्यालंकारे । दुविहं संजमचरणं मायारं तह हो निरायारं । सायारं सग्गंधे परिग्गहा रहिय खलु निरायारं ॥ २० ॥ द्विविध संयमचरणं सागार तथा भवन निरागारम् । सागार सप्रन्ये परिमहादहिते निरागारम् ।। दुविहं संजमचरणं विविध संयमचरणं दिमकारश्चरित्रा- धारः । को तो दो प्रकारी, मायारं तह हवे निरायारं सागार तथा भवेनिरागारं । सागारं कुत्र भवति, सायारं मगथे सागार चारित्र समन्ये गृहस्थे भवति । तर्हि निरागार चारित्रं फस्मिन् भवति, परिग्ग- हा रहिय खलु निरायारं परिग्रहादहित निम्रन्ये निरम्बरे निरागार चा. रित्र वेदितव्यमित्यर्थः। मायारं-अथ सागार चारित्राचार निरूपयन्ति श्रीकुन्दकुन्दाचार्या.- दमण वय मामाइय पोसह सचित्त रायभत्ते य । धमारंम परिग्गह अणुमण उदिड दमविरदो य ॥२१॥ दर्शनं २ मामाथि गोवं मपिनं रात्रिभुक्तिश्च । अनवयं भारम्भ. परिमः अनुमति दिटादेशविरतपण चारित्रप्राभृतं । अधौ मूलगुणाः । ते के, वटफलानामभक्षणं १ पिप्पलफलवर्जनं २ "सक्षो जटी पर्फटी स्यात्" तत्फलनिवारणं ३ उदुंबरो जघने फलामलयुः गूटर इति देश्यात् तत्फलनिषेधः ४ कठंजर कटुबर अंजीर इति देश्यात् तालानामभक्षणं मद्य ६ मांस ७ मधु८निषेध इत्यष्टौ मूलगुणाः । अथवा-- मद्यपलमधुनिशाशनपंचफलीविरतिपंचकातनुती । जीवदया जलगाटनमिति च वचिदएमूलगुणाः ॥१॥ सातव्यसनवर्जन । उक्तं च- मद्यमांसमुरावेदयाखेटचौर्यपराङ्गनाः। महापापानि सतव व्यसनानि त्यजेयुधः ॥१॥ सम्यक्त्वप्रतिपालनं परशास्त्राणामश्रवणमिति विशुद्धमतिः । मूलक- नाटिकापभिनीकन्दलशुनकन्दतुंवफफलयुशुंभशाफकलिंगफलसूरणकन्द- त्पागध । अरणीपुष्पं वरणपुष्पं सौभाजनकुमुमं करीरपुष्पं कांच- नारपुष्पमिति पंचपुष्पत्यागः । लवणतैलघृत तफलसन्धानकमुहूर्तद्वयो- परिनवनीतमांसादिसे विभाण्डभाजनवर्जनं । चर्मस्थितजलस्नेहहिंगुपरि- हारः। अस्थिसुराचर्ममांसरक्तपूपमलमूत्रमृतानिदर्शनतः प्रत्याख्यातान- सेवनाचाण्डालादिदर्शनात्तच्छन्दश्रवणाच भोजनं त्यजेत् । सुललित- पुप्पितस्वादचलितमन्नं त्यजेत् । पौडसमहरादुपरि तकं दधि च त्यजेत् । द्विदलानमिदं दधि तक स्वादितं सम्यक्त्वमपि मलिनपेत् । ताम्बूली- पधजट रात्री त्यजेत् । एप सर्वोऽपि दर्शनप्रतिमाचारः। वय द्वादशमतानि, अहिंसा स्थूलवधाद्विरमणं, सत्यं स्थूलसत्यवचनं, स्थूलमचौर्य, ब्रह्मचर्य स्वदारसन्तोपः परदारनिवृत्तिः चित्सर्परतीनित्तिः, परिग्रहपरिमाणवतं, दिग्विदिक्परिमाणविरतिः, सनदण्डपरिहारः, भोगीपभोगपरिमाणमिति गुणवतत्रयं, सामायिक, क. पुस्तके वादो नास्ति। ,

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१५ दिमिनिटिनिमाणपन्दन यानितिनं । भौगोपभागरिमामेवगणया निषित ।। २४ ।। Furthrii- दिनिविटिभिमा पदम पिसमा गुन FEAणयदंग परजण विदियानवंदाय नदिनी पुन भानि । भोगोपभोगपग्मिा भीगोपभोगाग्मिान पाय गुना भवनि । भोजनावि भोर । पसरतीमागपभोग । स्पमेव गुपचया निरिण वावरणनि गुगालानि मानि। गामात्यं न पटमं पिदियं प नहेय पोनई भभियं । नायं अनिहिपुजं उन्ध गल्लेहणा अंने ॥२५॥ सामाजिक पदिलीप राय प्रोपभो मतिः। समीपमामिपूर म सपना बन्ले ।। समाइयं न पटमं सामावि घ प्रथम सिधामतं । पपपंचगुर- भलिममाधिभगिरमिति (फवार हिवार मिया या मतप्रति मापां मानादिक भवति । पतु मामापिपाप्रतिमायां सामायिक प्रोक्त सनीन् दारान् निश्पन करणीयमिति तय । विदियं च तहेव पोसहं भणियं द्वितीय च तथा प्रोपधोपवासं शिक्षागत भगित प्रति- पादित असम्यां चतुर्दश्यां च । तदपि विविध, चतुर्विधाहारपरिवर्ज- नमुई, जलसहित गप्पम, आचार्य जपन्य प्रोषधोपवास भवति यथा. दाक्ति कर्तव्य । तइयं च अतिहिपुग्जं तृतीय चातिथिम्प, न विद्यते तिथिः प्रतिपदादिफा यस सोऽतिथिः । अथवा संयमसभार्थमतति गमति उदंडनयों करोतीपतिथितिः स प्रयो नवगुगसतगुगतम- वितेन धावफेण यस्मिन् शिक्षानते तदतिथिय । चउत्य सल्लेह- पद्माभृते- णा अंने चतुर्य शिक्षात्रतमन्ते मरणकाले सल्लेखना कायकरायतन- फरणमिति तात्पर्य। एवं मावयधम्म संजमचरणं उदेसियं मयलं । मुद्धं संजमचरण जइधम्म णिकलं वोच्छे ॥ २६ ॥ एक प्रावधर्म संयमचरण उपदेशितं सकलं । शुद्ध सेयमधरणं यतिधर्म निष्कल वक्ष्ये ॥ एवं मावयधम्म संजमचरणं उदमियं मयलं एषममुना प्रकारेण श्रायकेधर्मरक्षण संपमचरण चारित्राचार , उपदेशित भयन्तः कुर्षस्थिति प्रतिपादित, सकले समप्र परिपूर्ण, किंचिद्विशेपर तु न प्रतिपादित- मित्यर्थः । उक्त च- विल्याणातुफलेय त्रिभुयनविनयी शिलीमन सेयते । मा पंचरशानिधिम्या पर्यापि परसोइयारसमारम्य ॥१॥ तथाच-- रतिमायेषु पानीयं स्नेदं च कुतपादिपु । मनम्धो ययेन्नित्यं योषितधामतोयिता॥१॥ विभुवनरियानि भगा दुषलक्षणं गमकणायमाहिनादीन! | शि. सीधक गोमयसम्र केतकीपुष्पदण्डिका च। चतुरि गुहारिक नादेयं । अम्गुशणाचमनादिक च विशेषशास्त्रोक्त हातम्य । गुद्धं गंज. मन जाधर्म णिपाल योन्छे शुद्ध परिपूर्णविशुदिमहिन पनि निजी निकलक ये कथयिष्यामि। इन नायक- मनपतिर्मय चतारतम्यनीता चिता मीनिशातप्यम् । पनिंदियण पंगाया पंपिंगफिरियागु। पंममिदिमयगुमात्रमाण निगया ॥ २७॥ परिपसा पम्मलिया। पाय, रीमा वमना* farma संधियार. THE nafi | नामिनिग्याम मि ...! मारः। पंचमिति Hanfamst गुणी for | जममा निगया frime म तिमामाता। अभी दमणगीवदय अजीबदम्य । पप गायटीग पाइंदियगंवर्ग भणियां ॥२८॥ मन is meaning अगाण्याची चादर चामणुष्ण मनोमनालेमली. चदग्दै यनिता । अजीपदवे य जीपमन्ये पायतन - नवसनकानमावादिने । ॥ करेदि रायदोस न फरोति रामदयो । मनी नगन फोनि। अमनोईन फरोति । पंचिंदियसंयरो भगिनी पचन्त्रिपरी माणितः प्रतिपादितः। अथ पंचरया येतापविवरणार्थमाह-- हिंमाविरइ अहिंसा असाविरई अदत्तविरई य । तुरिय अयंभपिरई पंचम संगम्मि विरई य ॥ २९ ॥ हिंसाविशीतसा अगायविरतिरदत्तविरतिष । गुरीमारपिरतिः पाम संगे पिरतिध ॥ हिमाविरइ अहिंसा हिंसाविरतिरहिंसा प्राणातिपातविरतिर्भवति । असचविरई असत्यपिरतिईितीय महानतं भवति । अदत्तचिरई य अदत्तपिरतिश्चादत्तातिरतिरदत्तपिरतिस्तृतीपं महारतं भवति । तुरियं अभविरई अनाविरतिमथुनाद्विरमणं तुरिय-चतुर्य महामतं ज्ञातव्यं ।

४८ पद्माभूते- "चतुगे यदीपो च लोपभेति" प्रसाधुमात् । नम संगम्मि चिरई य पंचम महावत भवति । या संगे परिप्रहे निरनिम परिमाहनिरमणमित्यर्थः । साहति ज महल्ला आयरियं जं महल्लपुचेहि । जंच महल्लाणि तदो महल्लया इनहे याई ।। ३०॥ साधयन्ति मन्महान्त आवरित यमः। यव महान्ति तत महानतानि एनरमादेनोः तानि । साहंति महल्ला साधयन्ति यस्माकारणान्प्रतिपालयन्ति। के ते, महल्ला--महान्तो गुरुणामपि गुरव पुरपा । आइरियं जं महल्ल. पुवेहिं आचरितमात या ययस्मात्कारणात् महपुञ्चेहि-महन्दिः गुरुभिः पूर्वैः चिरन्तनाचार्य वृषभादिभिर्महावीरपर्यन्त वृषभसेनगौतमा- न्तगणधरैश्च जम्बूस्वामिपर्यन्तैश्च । जं च महल्लाणि यच यस्मात्कार- णात् महल्लाणि-स्वयं महान्ति गुरुतराणि । तदो महल्लया इत्तहे तत- स्तस्मात्कारणात् इत्तहे-एतस्माद्धेतो तानि महातानील्युय्यन्ते । वयगुत्ती मणगुत्ती इरियाममदी मुदाणणिक्खैयो । अवलोयभोयणाए हिंसाए भावणा होति ॥ ३१॥ बचोगुप्तिः मनोगुप्तिः ईयाँसमिति सुदाननिक्षेप । भवलोक्यभोजनेन अहिंसाया भावना भवन्ति ॥ वयगुत्ती वचोगुप्तिरेका । मणगुत्ती मनोगुप्तिद्धितीया भावना । इरियासमिदी ईर्यासमितिस्तृतीया भावना । मुदाणणिक्सेको आदा- ननिक्षेपः पुस्तककमण्डल्लादिकमुपकरण पूर्व विलोक्य मृदुना मयूरपि. छैन प्रतिलिख्य गृह्यते धियते च सुदाननिक्षेप उच्यते । अवलोयमो. यणाए अवलोक्य पुनः पुनः दृष्ट्वा भोजने क्रियतेऽवलोक्य भोजनं तेना- यलोक्यभोजनेन । प्राकृते लिंगभेदः नसकस्य स्त्रीत्व । एता अहिंसा- महावतस्य पंचभावना भवन्तीति वेदितव्यं ।

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गयाभी- उगमामालिनाना पागादिभिATTAनियाम कि- योsanm भानानि मानिए पगेनोनुको नकिगो माफी नाला 1 मनियची. पंतमापना गौपा मानि पनि । एमगगुद्धि- गउरा एपणादिसगुन माहिम, आममानुगारेश भिगोरग- भाषना मी मानि । गाहम्मीगंनिगादी गधर्माण मयो भूया सम्याप्रकारेगमपाद विवादोगदानशियने मौर्यरतभावना पंचमी भरति । महिलालोयणपुचममरणमंमगरमाहिरिकहाहि । पुटियरसहिं विग्यो मारण पंगानि तुरियम्मि ॥३४॥ मरिमालनपूरस्मिरणर्ममवमतियामि । पुरमै विरत मावरा पथापि तु ॥ महिलालोयण महिटाया आफन श्रीमनोहराङ्गानिरीक्षण तस्मा- द्विरतः परामुगः । पुष्वरहमग्ण पूरितस्मरण पानीभिः प्रीडा- कृता तस्याः स्मरण चिन्तने तस्माद्विरत । संमत्तवसदिघीणा समी- पतरे या वसतिनिवासरतम्मारित निजशरीरसम्यारहित इयर्थः । विकहाहि विकाया विरत चौरागफयाविवर्जित इत्यर्थ । पुहिरसेहि विरओ पु(पी) शिकरसस्य सेवारहित नृत्यरसस्यानाम्बादक इत्यर्थः यस्मिन् रसे सेविते वृपयत् संवत्कामी भरति स रसो वृष्य कथ्यते पाजीकरणरसं न सेवते । मावण पंचापि तुरियम्मि एता. पंचापि भाषनास्तुरीये चतुर्थे ब्रह्मचर्यत्रते भवन्ति । अपरिग्गह समषुण्णेमु सहपरिमरमरूपगंधेमु । रायोसाईणं परिहारो भावणा होति ॥ ३५॥ - चारित्रामृत। सपरिप समादेषु पदापरसम्पन्धेषु । गपादीनां परिहारो भावना भयन्ति ।। अपरिग्गह नमणुप्णमु सपरिवहन, बन सप्तत्रिभक्ति का पदं। सम- शुष्णेनु-गगनो मनोरमहिनं अमनोई चेति गोवामपरिनग्नरू- वगंधेनु बनारसमा पवेन्द्रियविपरायदोमाईणका हेपानी गरम्य पस्य च । आदिशदापूरणमय । मनो वि. गान कियलेऽमनोरं विश्वेनी न पियो । निगमले पर हिर: पंचप्रकार: पंचभावना भवन्तीनिहाय । परिया भाना एमण जागा भादाण पंव णियमेरी । संजमनाहिणिमिन संनि जिणा पंच ममिदीनी ॥२६॥ को मापा एपणा सागा भादार नि । kari पति जिनाः ॥ मिनिन मागिमागमः । भारतिमा. : १६ । निर्माता पराजित भोपुन एपिता भोगा पनि ni भादाण पर एक- पस पान मार्ग Trailer हिसकीन कि . :: शि:- ५२ प भरो- व्यान्ति प्रायपन्ति के, निणा-तीर्यफरपरमदेगा: सामान्य केलिन श्रुतकेवलिनति माय । म्यान्ति, पंचममिदीभी-47 ममिनीगिन तात्पर्य । विस्मरस्तु पाकेरल गरिनन्यादिविरचितानाशानन्यः । भय्वजणयोहणत्यं जिणमग्गे जिणवरेहिं जह मणियं । णाणं णाणमरूवं अप्पाणं तं वियाह ॥ ३७॥ भग्यजनोधनाजिनमार्गे जिनवरया मपितम्। मान झानस्वरूप भारमानं तं विमानादि। भव्यजणचोहणत्यं सम्यग्दर्शनज्ञानवारित्ररत्नत्रयप्राप्तियोग्या ये ते भव्यजनास्तेषां योधनार्थ सम्बोधननिमित। जिणमग्गे जिनस्य श्रीमनग- वर्हत्सर्वज्ञस्य मार्ग सम्यादर्शनज्ञानचारिखमणोपलक्षिते मोक्षमार्गे। जिणवरेहिं जह भणियं श्रीमद्भगवदहमर्यया भणित प्रतिपादित। किं तदणित, णाणं गाणसख्यं ज्ञानं व्यवहारनयेन सम्यग्ज्ञाने तथा ज्ञानस्य स्वरूप स्वभाव । उक्तं चसमन्तभद्रेण महाकविना ज्ञानस्य स्वयपं- मन्यूनम नतिरिक्त याथातथ्य बिना च विपरीतात् । निःसन्देदं घेद यदाहुस्तमानमामिनः ॥१॥ ईग्विधं ज्ञान ज्ञानस्वरूप च निश्चयनयेन । अप्पाणं तं वियाणेह आत्मानं तम्ज्ञान झानस्वरूप व हे भभ्य ! त्वं विजानीहि सम्यविचार. येति क्रियाकारकसम्बन्ध । जीवाजीरविहत्ती जी जागइ सो हयेइ सण्णाणी । रायादिदोसरहिओ जिणसामणे मोक्समग्गुत्ति ।। ३८।। जीवाजीविभफियो जानाति स भवेर सज्ञानः । रागादिदोषरहितो जिनशासने मोक्षमार्ग इति । जीवाजीवविहत्ती जीवस्यात्मद्रव्यस्य, अजीवस्स पुद्गलधर्माधर्मकाम- शलक्षणस्य पंचभेदस्य विभक्तिं विभंजन विहचन मिति देश्यात् ।

सार मसानी मनमा गपादिनामी. marini. in बनना, मानसमनि farmire देनमारचरि निषित विजापंह परमनाए । जापिजाई गति मिष्यानं ॥३०॥ arel देनजनापनि दानपनि तिमि मिजाजद परम- महाए का ERRIER | 5 जापिकप जोई पदनगन्य माया योगिन । अन्य सहनि पियाणं अपिण म्नीकरन रमन्ते प्राप्नुवन्ति कि समिनि समस्यामा पाजापानमलिलं गिम्मलनुविमुद्धभावसंजुता । होनि लिवालयवासी तिदुवटामी मिद्धा ॥१०॥ मानले निर्मरमुस्मिारसंदुराः । नपनि मिरववाजिनः दिनुरनधाननः नि:॥ पाजप पापमलिल प्राय शनसाडि वा सम्पदासानाय । गिम्मतमुचिमुटुभावसंजुत्ता निर्मयो नितिकारः, नविशुद्धो रागद्वेष- मोहादितहत , भावो नितानपरिणामन्तेन संयुमाः सहिताः पुरुषाः । होति मिवालयवानी भवन्ति शिवाउपासिनः सर्वकर्मशान- निदानातिनी भवन्ति । तिहुरणचूडामणी सिद्धा त्रिभुवनचूडा- मनपरोस्पमिरोरत्नानि ते पुरुषाः सिद्धा भवन्ति-आनोपसम्विन्तो . मन्ति।

५०
पद्माभृते-
णाणगुणेहि विहीणा ण लहंते ते मुइच्छिये लाहं ।
इय गाउं गुणदोसं ते सग्णाणं वियाणेहि ॥४१॥
ज्ञानगुणविहीना न लभन्ते ते स्विष्टं लामम् ।
इति शास्वा गुणदोषी तत् ससानं विजानीहि ॥
णाणगुणेहि विहीणा ज्ञानमेव गुणो जीवस्योपकारकः पदार्थस्तेन
विहीना रहिताः । ण लहंते ते मुइच्छयं लाहं न लभन्ते न प्राप्नु-
वन्ति (ते) मुष्ठु इष्ट लाभं मोक्ष । उक्त च-
गाणयिदीण मोक्खपउ जीव म कासु चि जोइ ।
पहुयई सलिलविरोलियई कर चोप्पडन हो॥१॥
इय गाउं गुणदोसं इति पूर्वोक्तप्रकारेण गुणं दोपं च ज्ञात्वा
ज्ञानस्य गुणं, अज्ञानस्य दोपं विज्ञाय । तं सण्णाण वियाणेहि तन-
स्मात्कारणात् , सत्समीचीन, ज्ञान विज्ञानाहीति तात्पर्यार्थ ।
चारित्तसमानढो अप्पामु परंण ईहए गाणी ।
पावइ अहरेण सुहं अणोवमं जाण णिन्छयदो॥४२॥
चारित्रसमारूढ भारमनः परेन ईहते झानी।
प्राप्नोति अचिरेण सुख अनुपम आनीहि निधयत ॥
चारित्तसमारूढो चारित्रसमारूढश्चारित्रं प्रतिपाउयन् पुमान् ।
अपामु परंण ईहए णाणी आत्मन सकाशात्पः इष्ट सम्बनिता-
दिकं न ईहते न वाञ्छति कोऽसौ, ज्ञानी ज्ञानवान् पुमान् । उक्त च--
स (श) मसुखशीलतमनसामशनमपि देरमेति किमु कामा।
स्थलमपि ददति सपाणां किमंग ! पुनरङ्गमगाराः ॥१॥
पायइ अइरेण मुहं प्राप्नोत्यचिरेण स्ताकालेन मुखमनन्तसौख्यं ।
अणोयमं जाण णिच्छयदो कभूतं मुर्ख, अनुपममुपमारहित जानी-
हि हे मध्य ! त्वं णिच्छपदो-निश्चयतः निःसन्देहानिश्यनयाता ।
एवं संम्मेवेण य मणियं पाणेण वीयराएण ।
सम्मत्तसंजमासयदुन्हं पि उदेसियं चरणं ॥४३॥

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सूत्रप्राभृतं । अरहंतमासियत्थं गणहरदेवेहिं गंथियं सम्म । सुत्तत्यमगणत्यं सवणा साहंति परमत्यं ॥१॥ भई नापिताय गावरदेवप्रैथितं सम्यक् । मूलार्गमार्गणार्थ श्रमणा माधयन्ति परमार्थम् ॥ अरहंतमामियत्यं अईद्विस्तीर्थकरपरमदेवैर्भापितोऽर्थ सूत्रं भवति । गणहरदेवेहि गथियं सम्म गणधरदेवशतुभिज्ञान सपूर्णरष्टमहा- मिद्धितिम्लीयकरयुवराजे गथिर्य-पदै रचित, सम्ग-राम्पक पूर्वापर विरोधरहिम शास्त्र मून भवति । गुतत्यमग्गणत्यं मूसार्थमार्गणं सूगार्थविचार सोऽध. प्रयोजन यस्मिन् गरे तारानार्धमार्गणार्धे । सेन उमप्यानप भाति । सेन मवणा साईति परमन्यं सूपार्थेन अयणाः सटटयो दिगम्बरा परमार्थ मोक्ष साधयन्ति-आत्मयशे पुर्णन्ति सेन कारणेन मोक्ष नुनि भावार्थ । गुनम्मि जं गुदिई आइरियपरंपरेण मग्गेण । गाऊग दुविहमुत या मिरमेग्ग जो भव्यो ।॥२॥ मूवनमा मायापरणारेण माण। जमा दिपावत विमा याम ॥ मुनम्मि में मुदिई गायन गुरुअतिशयमा मालितया पार प्रतिदिन याग्यिारंगांण मागंण पाचवाणा परंपग ग्रेभि- दंघ मा म आचार्यशापर आमार्यप्रवाहगुमो मानेन मग। ोमो मार्ग न दृष्यन-श्रीमान श्रीगीतमः प्रमों जि.मे...मांग...

सूत्रप्राभृतं। ५७ जम्बोति त्रयः फेवलिनः विष्णुः नन्दिमित्रः अपराजितः गोवर्धनः भद्र- बाहुति पंच श्रुतफेयटिनः । तदनन्तरं, विशाखः प्रौष्टिटः क्षत्रियः जपतः नागसेनः सिद्धार्थः शृतिपेणः विजपः चुद्धिल: गंगदेवः धर्मसेनः इत्पेकाददा दशपूर्षिणः । नक्षत्रः जयपालः पाण्डुः ध्रुवसेनः कसायति पंचैकादशाङ्गधराः । नुभद्रः यशोभद्रः भद्रबाहुः टोहाचार्यः एते चत्वार एकाइयारिणः। जिनतेनासहलि: माधनन्दी धरसेनः पुष्पदन्तः भूत- यतिः जिनचंदः कुन्दकुन्दाचार्यः उमास्वामी समन्तभद्रस्तानी शिवफोटि: शिवापनः पादः एटाचार्यः वीरतेन: जिनतेन: नेमिचंद्रः रामसेनश्चेति प्रयनागपूर्वमानज्ञाः । अफटकः अनन्तविद्यानन्दी माणित्पनन्दी प्रभा- चन्द्रः रामचन्द्रः एते मुताफिकाः । वासचन्द्रः गुणभद्र एतौ नग्नौ अन्ते वीराङ्गजस । पाऊण दुविहनुत्तं ज्ञावा द्विविधं सूत्र अर्थतः रारतस विधि सूत्रं । वह सिवमन्गे जो भग्वो वर्तते शिवमार्गे मोक्षमार्गे यो मुनिः स भन्यो गलायचोग्यो भवति मोक्षं प्राप्नोतीति भावः। मुत्वं हि जापमाणो भवस्त मवणासणं च मो कुणादि । मुई जहा अमुत्ता पासदि सुचे सहा पो वि ।। ३।। सूर्यहि भागनः भवत मानानं घसरोति। भूमी रामानात स्वर सदारि। मुचं हि डापमाणो भवस्त स्वभावानुमान हि निधन जागा- नो मन् यनर वन-मरस हवीतगण । भवनाम तो उपदि पर मर गाने ति म पुमान् कोति विश्थात हा भूपमा प्रगति मुनो मतापर्य: 1 अनु. सनसन-मई बहा अमुना पामदि सूची संग- NET TRA सारारिता नाति म । मुत्ते

५८८
पदमाभूते-
सहा णो वि सूरंग सह वर्तमाना सूरंग दौरेण सहिना जो विनानि
नत्यति हस्ते घटति।
पुरिमो वि जो मगुनो ण विणामइ मो गओ वि संमारे ।
सधेपणपगसं णासदि ने मो अदिस्ममाणो वि ॥४॥
पुरुषोपिय. धसूत्रः न विनश्यति स गोपि संगारे ।
स्वचेतनात्यक्षेण नाशयतित गोडायमानोपि ॥
पुरिसो वि जो समुनो पुरुषोऽपि जीयोऽपिय समूनो जिनमूत्र-
सहितः । ण विणासह मो गओ वि संमारे न विनश्यति स पुमान
गतोऽपि नष्टोऽपि संसारे पतितोऽपि पुनरुज्जीवति मुक्तो भवति ।
सधेयणपञ्चसं आत्मानुभवप्रयक्षेण । णामदि तं सो अदिस्ममाणो
वि णासदि-नश्यति, अन्तरिनों प्रयोग , तेनायमर्थ नाशयति त संसार
स आसन्नभव्यजीव. । कथंभूत, अदिस्समाणो वि-अदृश्यमानोऽपि
चतुर्विधसंघमध्येऽप्रकटोऽप्यप्रसिद्धोऽपि ।
मूतत्यं जिणभणियं जीवाजीवादिबहुविहं अन्यं ।
हेयाहेयं च तहा जो जाणइ मो हु सदिट्टी ॥५॥
मूधार्थ जिनमणि जीवाजीवादबहुविधमर्थम् ।
हेयाहेय च तया यो जानाति स हि सहरिः ।।
मुत्थं जिणभणियं सूत्रस्यार्थ जिनेन भणित प्रतिपादित । जीवा-
जीवादिबहुविहं अत्यं जीवाजीवादिक बहुविधमर्थ कर्मतापन्न वस्तु ।
हेयाहेयं च तहा हेयं पुद्गलादिक पंचप्रकार, अहेयमादेय निजात्मान,
तथा तेनैव पड्वस्तुप्रकारेण । जो जाणइ सो हु सद्दिट्टी यः पुमान,
जानाति वेत्ति स पुमान् हु-फुट सष्टिः सम्यग्दृष्टिपति ।
जं सूत्तं जिणउत्तं ववहारो तह य जाग परमत्यो ।
वं जाणिऊण जोई लहइ मुहं सवइ मलपुंनं ॥ ६॥

"" सन् सूनं जिनो म्पवहार तया च जानोहि परमार्यम् । सत् शाला योगी लभते मुसंक्षिपते मलपुजम् ॥ मुत्तं जिणउत्तं यत्सूत्रं जिनोक्तं । चवहारो तह य जाणपरम- त्यो तासूत्र व्यवहार जानीहि तथा परमार्थ निश्चयरूपं च जानीहि है भन्य ! त्वं कोय । तंजाणिऊग जोई तत्तूचे व्यवहारनिश्चयरूपं ज्ञात्वा योगी प्यानी पुमान् । लहइ मुहं सबइ मलपुंज लभते सुखं निजा- मोत्यं परमानन्दटक्षणं क्षिपते निर्मूलकापं करते मलस्य पापस्य पुंज राशि विपतिमरुतिसमूह । घातिसंघातधातनं कृत्वा केवलज्ञानमुपादय- तीति भावः । यथा शाप शऽभ्यासवदोन रजारि चलति पथादत्यम्पासवदोन वदा त्यक्त्वा निराधारतया सरि गच्छति तथा व्यवहारावटमेन निसपनयमसम्यते । तदनन्तरं व्यवहारमपि त्यक्त्वा निधपमेयायलयते इति भावः । मूतत्यपयविणो मिच्छादिही टु सो मुणेयग्नो। सेंडे विण काय पाणिपत्नं मचलेन ॥७॥ मापदमिनो नियाशि:हिमालतमः। देतेऽपिनपानिया पेलर ॥ गुत्तत्यपपविषहो नत्रापापिनयः पुमान् । मिच्छादिही हुमोमणेयो निष्पासिनि -राट न पुमान् मुनितम्यो हातव्यः । खेडे पिपिपीटापामपि न पार पणिपाय भोजन न किस्म, मसगामा। हरिहन्तुल्लो पिपरो मम गच्छेद भयकोडी। नद विप पापा मिदिमायो पुगो भनिदो ॥८॥ RRRRRRो। reaRITE: 7 :: ॥

पट्माभृते- हरिहरतुल्लो वि परो हरिश्च नारायणो हरश्व रुद्रस्ताभ्यां तुल्य: समानः ऋद्धिमानियर्थ. । नर प्राणी मनुष्य. । सग्गं गच्छेइ एइ भवकोडी दानपूजोपवासादिकं कृत्वा स्वर्ग देवलोकं गच्छति पवाद्भवान्तराणा कोटीरसंख्यानि भवान्तराणि अनन्तानि या भवान्तराणि प्राप्नोति दुखीभवति ससारी स्यात् । तह विण पावइ सिद्धिं तथापि भवकोटीपर्यटनप्रकारेणापि न प्रामोति सिद्धि मोक्ष न लभते । किं तहिं भवतीत्याह-संसारत्यो पुणो भणिदो संसारस्थः संसारी पुनर्भणितः सिद्धान्ते प्रतिपादित । जिनसूत्राभावामिप्याधिः सन् संसारदुःय सहते मुखी न भवतीति भावः । उकिटमीहचरियं यदुपरियम्मो य गम्यमागे य । जो विहरद मच्छंदं पायं गच्छदि होदि मिच्छत्तं ॥९॥ उत्कृटनिहन रित बहुपरिकर्मा च गुरुमारश्च । यो विहरति स्वछन्द पाप गरति माति मिथ्यात्वम् । उरिकहमीहचरियं उमष्ट मर्षयनिभ्योऽधिक सिंहनिर्भयतन चरिन चारित्र यस्य स पुमानुत्तसिंहचरित । प्राकृतम्यादा नमकरये। अथवा विहरतीनि क्रियाविशेषणवाद्वितीयेकाचन नमान्य च । बहुपरिकम्मो य गम्यमारो य बहुपरिकर्मा पानेकनपोरियानम. द्वितशरीरमस्कारच मुनिगुरुतरमारथ रानादिमयनिवारकः शिष्याणां पटनाटनममयों यात्राप्रतिष्ठादीशानायुदिग्योतिकशाप्ननिर्णयका. रकः पहावश्यककर्मकर्मयोधर्मोपदेशनसमर्थ सपा यतीनां च नाचिन्त्य- कारको गुरुमार उप्यत, इंग्थियोऽपि गायनायको यतिः। जो विदा रह मच्छदं यो यतिः अष्टन्द विहरति-निम्न न प्रमाणपनि । पार गच्छदि होइ मिच्छन म मुनि पाप गपनि प्राप्नोनि-मि- थ्या तम्प भवतीति तापर्यायः ।

सूत्रप्राभूत। निचलपागिपत्तं उबइह परमनिणवरिंदेहि । एक्को विमोक्समग्गो सेसा य अमग्गया सन्चे ।। १०॥ निधेतपानिपान उपदि परमजिनवरेन्दः । एफोनि मोक्षमाः सा मागाः सवें।। निच्चेलपाणिपत्नं निधेटस्प मुनेः पाणिपात्रं कन्यो: पुटे भोजन- मुक्त । उवइई परमजिणवरिंदेहि उपदिष्ट परमजिनवरेन्ट्रैस्तीर्थकरप- रमदेवैः । एक्को हि मोसमग्गो एक एव मोक्षमार्गो निर्मन्यलक्षणः । सेला व अमरगया सप्चे सपा मृगचर्मवल्कलकासपाकुलरोमयत. तानोनीतृणप्रापरणादि, स रक्तपरसादि पीताम्बराइपय विश्थे, अमार्गाः सैलारपर्पटहेतुबानमोक्षमाना न भवन्तीति भन्यजनैति। जो संजमेनु नहिजो आरंभपरिग्गहेसु विरओ वि। मो होइ चंदणीओ समुरामुरमाणुसे लोए॥११॥ मरमेड सरितः आरम्मतरिम पिरतः अपि । सभापति पदनीयः समुरामरमानुरे लोके। जो संजमेनु सहिजो दो मुनिनं तु गृहस्सः संपमे सहित: इन्द्रि- पमाणमयमान् भवति । आरंभपरिगहनु विरगोवि आरम्भाः सेवा- रविवानियमानुरागः, परिमाः क्षेत्रसास्वादप शिरतो दिनको भनि । अस्मिन्यः समुरघरे वर्तते । तेन महादियो यसले त. स्मारसचगे तिरिति वचनामोहोड़ वंदपीओन मुदि- मोमो भवति। क वन्दनायो भय ने, ममुरागामाणुसे सोए ग्नुिपने वादनालो भाले । भो रे.. मानुराम देवानर से पानीमामांनिसनीमादि गंडगा। में शनि पंदनीया कम्मरगनिजगनार ।। १२ ।।

६२ पद्माभूते- ये द्वाविंशतिपरीपहान् सहन्ते शनिशन। मेयुकाः । वे भवन्ति वन्दनीया कर्मक्षयनिजेरामाधवः॥ जै पापीमपरीसह महंनि ये दागितिपरीपहान् सहन्ते । सत्ती- साहिं संजुत्ता शक्तीना शर्त संयुक्ताः । ते होति वंदनीया भवन्ति यन्दनीया नमोऽस्तु शब्दयोग्या । कम्मररापनिज्जरामाहू कर्मक्षयनिर्जरासाधवः ये कर्मक्षय निर्जरायां च साधनः कुशला भवन्ति योग्या भवन्तीति भावः । अपसंसा जे लिंगी दंमणणाणेण सम्मसंजुत्ता । चलेण य परिगहिया ते मणिया इच्छणिग्जाय ॥१३॥ अवशेपा ये लिजिन दर्शनज्ञानेन सम्यक्सयुक्ता । घेलेन व परिप्रहीता ते भशिला इण्टाहारयोग्या । अवसमा जे लिंगी अवशेषा ये लिंगिनः क्षुल्लकगुरवः । दसण- णाणेण सम्मसंजुत्ता दर्शनज्ञातेन सम्यक्संयुक्ता । लेण य परि- गहिया वकघर। सकोपीनाश्च वस्त्रमपि सीवितं न भवति किं ताई खण्डवखं धरन्ति ते वस्त्रपरिगृहीता । ने मणिया इच्छणिज्जाय ते भाणता इच्छाकारयोग्या नमस्कारयोग्या । इच्छायारमहत्थं मुत्तठिओ जो हु छंडए कम्मं । ठाणे हियसम्म परलोयसुहंकरो होइ ॥ १४ ॥ इच्छाकारमहा सूत्रस्थित यः शुद्ध त्यनिकर्म । स्याने स्थितसम्यक्त्व परलोकमुखम्रो भवति ॥ इच्छायारमहत्थं इच्छाशब्देन नम उच्यते कारशब्दस्त अधःस्थः क्रियते तेन नमस्कार इति भवति । क्षुल्लकाना बन्दनं । मुत्तठिो जो हु छंडए कम्मं सुत्तहिओ-सूत्रास्थितः समय जानन् यः पुमान् फर्म स्पजति गृहस्थकर्म न करोति यावृत्यं विना स्वयं रचनादिक न सूरमात । करोति । ठाणे हियसम्मत्तं एकादशस्यपि स्थानेषु सम्यक्त्वपूर्वको भवति । परलोयमुहंकरो होइ स्वर्गसौख्यं साधपति पोडशसु स्वर्गे- पन्यतमस्वर्गे जापरते ततध्युत्या निर्मन्यो भूत्वा मोक्षं गच्छति । अह पुण अप्पा णिच्छदि धम्माई करेदि निरवसेसाई । तह वि ण पावदि सिद्धि संसारत्यो पुणो भणिदो ।।१५।। अप पुनः मात्मानं नेरछति धर्मान् करोति निरपशेषान् । तपापि न प्राप्नोति सिद्धि संसारस्पः पुनः भणित: ॥ अह पुण अप्पा गिच्छदि अथ अथवा पुनरात्मानं नेच्छति आम- भावनां न करोति । धम्माई करेइ निरवसेसाई धर्मान् करोति निरव- शेपान् दानपूजातपःदशीलादिकानि निरवशेषाणि समस्तानि पुण्यानि फरोति । तह विण पावदि सिद्धि तथापि पुण्यकर्मप्रकारेणापि सिदि मुक्ति न प्राप्नोति । संसारत्थो पुणो भणिदो संसारस्थः पुनर्भणितः संसारी भरतीति सिद्धान्ते प्रतिपादितं । उक्तं च देवसेनेन भगवता- बेहपुणउ तवं पालेउ संजमं पढउ सयलसत्थाई। जाम ण शाई अप्पा ताम ण मोफ जिणो भणई ॥१॥ एएण कारणेण य त अप्पा सदहेह तिविहेण । जेण य लहेह मोक्खं तं जाणिज्जह पयत्तेण ॥१६॥ एतेन कारणेन च तं आत्मानं परत निविधेन । पेन च सभेवं मोक्षं तं जानीत प्रयत्नेन । एएण कारपोण य एतेन प्रत्यक्षीभूतेन कारणेन हेतुगा । चकार उक्ततमुच्चयाधः, यहिस्तत्वभूतपंचपरमेष्टिकारणसूचनार्थ इत्यर्थः । सद्दहेह तिविहेण तमामानं गुयुद्धकस्वभाव- भितिकरोतु सपः पारयतु संपमं पटनु सफलतालागि। पायर ध्यायति मारमान तायरा मो जिनो भणति ॥1॥ - तं अप्पा ६६ पट्माभृते- पंचमहत्वयजुत्तो तिहि गुनिहि जो स संजदो होइ । णिग्गंयमोक्समग्गो सो होदि हु वंदणिज्जोय ॥२०॥ पचमहामतयुक. तिमभिः गुप्तिभिः यः स सेयतः भवति । निन्थमोक्षमार्ग: स भवति हि वन्दनीय. ॥ पंचमहव्ययजुतो पंचमहाततैर्युक्त प्राणातिपातान्तादत्तमुरतप- रिग्रहरहित पुमान् पंचमहारतयुक्त उप्यते । यस्तु स्तोकमपि परिप्र- हीत करोति सोऽणुनसः सागारोऽवतो या कथ्यते । सेन यादी परिप्रहे सति तत्र यूकालिक्षादयस्वीन्द्रिया जीवा उत्पयन्ते, पदि सतोऽपनीयान्यन शिप्यन्ते ततो नियन्ते कथं प्राणातिपातकरहितो निरागारो भवति, अलमतिविस्तरेण परिग्रहयान् महानती न भवति । निहि गुगिहि जो स संजदो होदि निराभिमुक्षिभिर्युक्तो यो मुनिः स संपत संयमवान् भवति । णिग्गंथमोक्रामग्गो नित्यमोक्षमार्ग यो मन्यते । मो होदिहु वंदणिग्जो स भवति हु-एट यन्दनीयः । 4 सप्रन्धमोक्षमार्ग मन्यते स मिथ्याटिमाभागवावदनीयो भवतीति मावार्य । दुइयं प युरा लिङ्ग उमिदं अपरमात्रपाणं च । मिमं ममेर पनो ममिदीमामेण मोणेण ॥ २१ ॥ द्वितीयं योनि भरधावाया। निशा श्रमति पात्रा समिनिभाषण मीनन ।। पंप पुन लिंगं रिलीय चालिग २१ । उरिक मारमा बयाणं घाट दि अवाधारकाणा चागृहस्पयायकाणा। सोऽ वाश्रापक. मिागं ममेड पमो मिक्षा प्रमनि पावादन करमोनीया। ममिदिमामेण मोर्णा याममिनिमहिन मौनाम, दाहालको दानिमा नाम । उम. व सम-नमद्रग महाकविना- जीव पाट । मा स्थान माम मानी।

सूत्रप्रामृतं । माधास्तु पइजघन्याः स्युमध्यमास्तदनु प्रयः। दोषौ द्वावुत्तमायुक्तौ जैनेषु जिनशासने ॥१॥ एकादशके स्थाने यत्कृष्टः थावको भवेदविविधः । घकधरः प्रथमः कौपीनपरिप्रहोऽन्यस्तु ॥ २॥ कौपीनोसी राधिप्रतिमायोगं करोति नियमेन । लोचं पिच्छे धृत्वा भुक्के घुपविश्य पाणिपुटे ॥३॥ वीरचर्या च सूर्यप्रतिमात्रैकाल्ययोगनियमश्च । सिद्धान्तरहस्यादिप्यध्ययनं नास्ति देशविरतानां ॥४॥ लिंग इच्छीण हवदि भुंजइ पिंडं सुएयकालम्मि । अज्जिय वि एफवत्या वत्यावरणेण भुंजेइ ।। २२॥ लिखो भवति भुस पिई स्वेककाले। भापि एकपमा पलापरणेन मुंके ।। लिंग इत्यीण हवदि तृतीयं लिंग वेपः स्त्रीणां भवति । मुंबई पिंडं सुएयकालम्मि मुंक्त पिण्डमाहारं सुष्ठ निपटतया एककाले दिवसमध्ये एकवार । अन्जिय वि एक्कवत्या आर्यापि एकवस्त्रा भ- वति । अपिशन्दात् क्षुलिकापि संव्यानवस्त्रेण सहिता भवति । वत्यावरणेण भुजेइ भोजनकाले एफशाटकं धृत्वा भुक्ते संन्यान उपरितनवनमुत्तार्थ भोजनं कुर्यादित्यर्थः । ण वि सिज्झइ वत्यघरो जिणसासणे जइ वि होइ तित्थयरो। गग्गो विमोक्समग्गो सेसा उम्मग्गया सन्चे ॥२३॥ नापि शिपति यनपरो जिनशासने पापि भवति तीर्थकरः । नानो चिनोक्षमाग रोपा: उन्मार्गाः सवें। ण चि सिन्झाइ बत्यधरो नापि सिद्धयति नैव सिदिमामोपटन्धि- सक्षणा मुक्ति टमते यसरी मुनिः । जिणसासणे जड़ वि होइ तित्पयरो जिनदासने श्रीवर्षमानस्वामिनो मते यद्यपि भवति तीर्थ- पलामो- कर सीकरपरमदेवोऽपि यदि मयति । गर्भावतादिपवकल्यागवानपि सिद्धो न मपति, आता सापदन्योऽनगारकैवल्यादिक. । जग्गो वि. मोग्रामग्गो नमो यम्राभरणहितो रिमोक्षमार्गः ज्ञातव्यः । समा उम्मग्गया सव्ये शेषा सितपटाना मार्गा. सरेऽपि उन्मार्गकाः कुन्मिता मिथ्याम्पा मार्गा झेया जानीया विधिरित्यर्थः । लिंगम्मि य इत्यीगं गणंतरे णाहिकरसदेसेमु । मणियो सुहमो कालो तासं कह होइ पचना ॥२४॥ लिपीणा स्तनान्तरे नाभिकक्षादेगे। मणित सूक्ष्मः काय तामा कथं भवति प्राया। लिंगम्मि य इत्थीणं लिंग योनिमध्ये स्त्रीणां योषिता । यणंतरे जाहिकक्सदेसेमु स्तनान्तरे द्वयो स्तनयोर्मध्ये यशःप्रदेशे, नाभिकक्षा- देशेषु, नाभी तुन्दिकार्या, कक्षादेशयो व्होः मूलयोर्दयोः स्थानयोः । मणिओ मुहमो काओ मणित आगमे प्रतिपादितः कोऽसौ भगितः मूक्ष्मः काय सूक्ष्मजीवशरीरं लोचनायगोचरः सूक्ष्मपंचेन्द्रियपर्यन्तो जीववर्ग: । तासि कह होइ पव्वज्जा तासां स्त्रीणां कर्ष भवति प्रव्रज्या दीक्षा-अपि तु न भवति । यदि प्रत्रग्या न भवति तर्हि कय पंचमहानतानि दीयन्ते ! सत्यमेतत् समातिज्ञापनार्थ महावतानि उपचर्यन्ते स्थापनान्यास क्रियते इत्यर्थः। तथा चक्ति शुभचन्द्रेण महा- कविना- मैथुनाचरणे मूढ । म्रियन्ते जन्तुकोटयः। योनिरभ्रसमुत्पन्ना लिंगसंघट्टपीडिताः ॥१॥ कियन्तो जन्तयो प्रियन्त इति चेत् घाते घातेऽसंख्येयाः कोटय इति | "घाए घाए असंखंग्जा" इति वचनात् । । .

- सूत्रमाभृत। जइ देसण सुद्धा उत्ता मग्गेण सा वि संजुत्ता। पोरं चरिय चरितं इत्यीसु ण पावया भणिया ॥२५॥ पदि दर्शनेन इक्षा उता माग सापि संयुधा। घोरे परित्या चरि सोधुन प्राय भागता ।। जइ दंसणेण सुद्धा यदि दर्शनेन सम्पस्वरलेन शुद्धा निर्मला वति । उता मग्गेण सा वि संजुत्ता तदा मार्गेण सम्यग्दर्शनज्ञान- गरित्ररक्षणेन सापि स्त्री च संयुक्ता भवति-पंचमगुणस्थानं प्रामोति, स्त्री- लंग छित्या स्वर्गामे देवो भवति, ततश्युत्वा मनुष्यभवमुत्तमं प्राध्य झं लभते । उक्तं च- सम्यग्दर्शनसंशुद्धमपि मातइन्देह। देवा देवं विदुर्भस्मगूदागारान्तरोजसं ॥१॥ स्वर्गेऽपि गता पुनः स्त्रीलिग न लभते । तदप्युक्तं समन्तभद्रेण महा कविना--- सम्यग्दर्शनमुद्धा नारकतिर्यदलसकरनीत्वानि । दुकुलविकताल्पायुर्ददितां च मजन्ति नाप्यमतिकाः॥१॥ घोरं चरिय चरितं घोरं कातरजनभौतिजनक चरित्र चरित्या पोडशमु स्वर्गेध्वन्यतम स्वमै यान्ति सहमिन्द्रत्वमपि स्त्रीभवे न लभन्ते फर्य मोक्षं सोमवे प्राप्नुवन्ति । तेन कारणेन इत्यीमुण पापया भणिया खान मनपा निर्वाणयोग्या दीक्षा भगिता । इत्यनया गाथया सित्त- पटाना मतं सानुक्तिप्राप्तिलक्षणं प्रत्युक्तं भवति । महदेवी-बानी-सुन्दरी- यशस्वती नन्दा-मुलोचना-सीता-रात्रि मति-चन्दना-अनन्तमति-दौपदी- त्पादिकाः लिय: स्वागता न तु मोक्षमिति । चित्तासोहि ण तेर्सि दिल्लं भावं तहा महावेण । विन्जदि मासा तेसिं इत्थीम पसंकया झाणं ॥२६॥ चित्तासोधिः न देस प्रियलो भावः तपा स्वमावेन । विपन्वे माता ता सोडन सरसापानम् ।।

पलाभते-
निसामोहिण मि चित्तस्य मनसः आसमताधिर्मिता
किन्ने तामा स्त्रीणा। दिन मात्र तहा सहायेण शिपिलो भा-
परिणामला भान प्रहत्या, करिमभिावनातिमा न पर्न
जिति मागा गेमियन्ते मासा-मामे मारी हरिरसातार
श्रीगायीगुगामा हाणं प्रीतु न घसरी कितन,
कपा निर्भपामा ध्यानमेशानिन्सानिरोधणमिति भारः । "लान
Manाराणाकारलीप ।
गाढेश पगाता गमुदगलिले गरेलगत्येण ।
हा मार नियना गाह निगलाई गलामा २७
माना गधगतलायन ।
-गो निTHI At नितानि गर्न नपानि ।।
गाहेग पगाहा आहागादिना मे गुनगोगा तो
ग। गमुगलिले गलमधेण या मागुगलि प्रशुरामा
मनाMantra गुणाने किग विष
MOTATE ना, निगना THIोमा म
मwिifeTI ON ! नाह निपना गयामा मानिनानि
Falang THIRaiनि न
मिHिTRA माल ।
* খবিলাশাপাশিগগাব্বানি
सानाnmentara भीमाने
जिनामाRitaininth rn
मा. गोम्पामिना भीमतिमा
amagranepaniभाबमानीमाSetti श्री
frrernamधीतमाग KATTA
।
ममाता

वोधप्राभृतं । पानन्यसत्यजाणे संजमसम्मत्तनुभूतपयरणे । वंदिता आयरिए फसायमलवग्जिदे मुद्दे ॥१॥ सयलजपचोहणत्यं जिणमग्गे जिणवरेहिं जह भपियं । बुच्छामि ममासेण य छयापहियंकर मुणगु ॥ २ ॥ मायान् संयमसम्पयनगपापा । पदिमासादीन् पायमलर्डिनान् पसन् । लमनोभनाई जिनमाने जिनरथा भनितम् । पानि माग प पर। पुच्छामि पश्यामि फरापियामि । २. पर्ता भई धीरन्दान्दा- चार्य । कि त कतारन, एकापहियंकर पकापार सफर पते- गोगनपीसकापतिकारव. गर दोषमातानिधान सारखे। योन समि, ममाण रोपेग । गुणगु गर है भन्न ! "पानिपतावर मुगुम" देगेन मतम्याकरणम्वेग दि मदने पंचम्पा. गुमाइ भने मरमार भू, जिमनग्गे जिपरहि वह भागिरं हिर किन समोर लिमिलजगरोहणल्य - REME FAST. दहिनामा seपापा ! དཔལགས ..བསམས༌པ༑ :མས་ मामला सारच AAA पद्माभते- शुद्ध निरतिचार, तपश्चरणं च द्वादशाविध तपो येषां ते संयमसम्यात- शुद्धतपश्चरणास्तान् संयममम्यक्त्वशुद्धतपथरणान् । भूयोऽपि कर्य भूतानाचार्यान, कमायमलवग्जिद क्रोधमानमापाटोभरक्षणचतुष्का- पायमलयनितान् प.पायोपनपापरहितानित्यर्थः । अपर कर्थमूताना- चार्यान्, सुद्धे गुदान पत्रिंशद्गुणप्रतिपाटनेन निर्मलान् निश्पापान् । के ते पत्रिंशद्गुणा इत्याह-- आचारयान् श्रुतांधारः प्रायश्चित्तासनादिः (१)। मायापार्यकथी दोपामापकोग्धायकोऽपि च ॥१॥ सन्तोषारी साधूनां निर्यापंक इमेट च। दिगम्मरोऽप्यनुदिऐमोजी शोशनीति च ॥२॥ आरोगमुक् क्रियायुक्तो प्रतयोंन ज्येष्ठ सद्वणः । प्रतिकमी च पण्मासंयोगी च तद्धिनिकः ॥३॥ द्वि:पैदेतपास्तथा पट् चाययकानि गुणा गुरोः। आयदणं चेदिहरं जिणपडिमा दंमणं च जिणवि । भणियं सुवीयरायं जिणमुद्दा णाणमादत्यं ॥३॥ अरहंतेण सुदिहं जं देवं तित्थमिह य अरहंतं । पापन्ज गुणविमुद्धा इय पायव्या जहाकमसो ॥ ४ ॥ पायतन चैत्यगृहं जिनप्रतिमा दर्शनं च जिनबिम्बम् । भणित सुवीतराग जिनमुश ज्ञानमत्मस्थम् ॥ भहता सुदृष्टं यो देव तीर्थमिह च अर्हन् । प्रवश्या गुणविशुभा इति ज्ञातम्या यथाकमश ॥ आयदणं आयत्तनं ज्ञातव्यं । चेदिहरं चैत्यगृहं द्वितीय ज्ञातव्य । जिणपडिमा जिनप्रतिमा तृतीयोऽधिकारो बोधप्राभृते ज्ञातव्यः । दसणं च दर्शनं च चतुर्थोऽधिकारो बोधकरो मन्तव्यः । जिणविंचं जिन• पति ख. पुस्तके। ~ fort . ::.:....:..' मनाया भामा एमा नि । शाम ॥५॥ मनपणापाका ६... ... ... | :: प: ५'::: : । आमना जन्म दिशा पिन । पद्माभते- नरसनप्राणचभु श्रोत्रलक्षणेषु हृषीकेतु मया एन्द्रियाः से च ते विषयाः स्पर्शरसगन्धरूपशदलक्षणा यथासंभव शक्तिमपा व्यक्तिरुपाथ भवन्ति। आयदणं जिणमग्गे आयतनं जिनमार्गे। णिदिहं संजय रूपं निदिएमागमे प्रतिपादित मायत मपं सैयमिन. सचेतन शरीर। मय राय दोम मोहो कोहो लोहो य जस्म आयना । पंचमहलयधारा आयदणं महरिसी मणियं ॥६॥ मदो रागो देयो मोहा कोधो लोभथ यस्य भायत्ताः। पसमहावतधरा पायतनं महर्षयो माणिताः ।। मय राप दोम मोहो मदोऽविध । उक्तं च समन्तभदेण महा- करिना- भान मां फुल जानि पलदि तपोधपुर। मायाप्रियमानिय मयमादुर्गतस्मया ॥१॥ गगः प्रीनिलक्षण । टोपोऽग्रीतिरसभार । मोर कलमपुत्रमित्रा. दिनह । कोही लोहो य जम्ग आयता को समायः, लोमो मी परिग्रहप्रणम्यभार | चकारा पचननिर्मापा । एनेपदार्थी पम्पमह निविषमुनिममूहम्याऽऽयना निमपरिमहनायया भवति। पंचमहस्ययघाग पंचमहातधग अहिमामयाचार्यत्रयांचियानि गाविभाजनक भनषष्टानि प्रतिपालपान । आपदणं महरिगी मणियं मायनन माया मणिता । नेभिगमनयोम्या मान्ति दर्शनम्पर्शन. पदनाही मनि। अन्ये विशिनो नदिन. पाशुपता पदण्डनि. दाग मिष्याटिमुन्दिन गिनि, पंचकूलाः मम्मीदलना नग्ना. पहा मगनमानो दिगम्बामाका हमपरमहगाभिधाना पसुपारिका, सविता अव हातागं होना प्रागा म्यागाः समाना- योधप्राभूत । भामाम नाभिगम्या नदर्शनीपा नाभिवादनीयाम भवन्ति । भर के तनाभागाः मनुका गोपुनिराशा येतधामो द्रापिटोपनीयफः । निरिपनि पंचत जनामा प्रनिताः॥१॥ एते मण्डियरा अपि न बदनापा: मदापनियामित्यात् । तथा यौलमते आपतगण- पंचेन्द्रियाणि सादाचा विषयाः पंच मानसं। धर्मायतनमतानिहाशायतनानि च ॥१॥ धर्मापतन समिति । सिद्ध जस्स मदत्यं विमुदाणस्स गाणजुत्तस्स । सिद्धायदणं सिद्धं मुणिवरयसहस्स मुणिदत्यं ॥७॥ निरस्त सदर्थ विमानस्व ज्ञानयुषस्य । गिलायतनं नि मुनिपरापमस्य हातायां ॥ सिद्धं जस्स सदत्यं सिद्ध सन्धिमापातं यस्प मुनियरवृषभस्य । किं सिख,सदत्य-निजामस्वरूपं । कथंभूतस्य, विमुद्धझाणस्स णाण- जुत्तस्स विशुभप्यानस्य आर्तरोदप्यानपरहितस्प धHशुपानाप- साहितस्य गगरफेवलिनो मुण्टफेयलिनस्तीर्थकरपरमदेवफेवलिनी या। कथंभूतस्पैतन्त्रयस्प, ज्ञानयुक्त ज्ञानसुतस्य सकलाविमल केवलज्ञानयुक्तस्य । सिद्धायदणं सिद्ध सिक्षायतनं सिद्धं सिद्धायतनं प्रतिपादितं । कम्य, मुणियरवसहस्स मुनियरयापमस्स मुनिवराणां मध्ये वृषभस्य ग्रेटस्प। कथंभूतमायतनं, मुणिदत्यं मुनिता ययावद्विज्ञाता अर्थाः पद्याणि पंचास्तिकापाः सप्ततचानि नयपदार्थाः । जीवमुद्गलधर्माधर्मकालाफाशा इति पद्व्याणि । कालरहितानि पद्व्याणि पंचास्तिकाया भवन्ति ।

परमाभते- #TTAM निगमोक्षारन यानि मा तान्त पुण्यपापाय- लिनि Rai दिशव्या । मार्ग-AAMA ममातम् । १। अनियन्ति धीमान्दाचार्या:-- पर योगी अपाणं पेश्याई अणं न। पंपाचागु णाणमर्ग जाण गेदिहरे ॥ ८॥ पनामान यानि मान। मनमय बानीहि मायाम् ॥ पूर्व पाईनो पु. का माहतोय मानणे, नयन, इ.स. Ank प्रमाणे याई अर्ग ग भागाने शुक- + rt finakuri amat मामाने या ना मार AmATIR त आमान योगास भाग aam. " { 1-2 यानि कालानि मातानि a' in makitam annी' मा.R FALTA 4.1 मान वानी Jawt in fun aafनाग दिएकाधन arrfan & RE !! Hitg, गमहषयगुर्द गामागे THERE ARE | मग १. मानना 40 min ५ing REATE ATARA म 1 Immu y: RATHI MATTERTREPAIR . Aatman waitant न मानने ७७ wwwm बोधप्राभृतं । उभयतोऽपि भटाः सर्वत्र भोजनमिक्षामाहका जिनधर्मविराधकाः पूर्वाचार्योपदिष्टजिनमूनादिकममानयन्तो न जाने का निन्दितां गति गमिष्यन्ति । चेय चं, मोक्खं दुक्खं सुक्खं च अप्पयंतस्स । चेइहरं जिणमग्गे छक्कायहियंकरं भणियं ।।९।। चैत्वं पन्ध मोक्षं दुःसं मुरांच अपंचतः । चपय जिनमानें पदकासहितकर मणितम् ।। चेहय यंधं मोक्खं चैत्वं चैत्यगृह बन्धं अष्टकर्मबन्धं करोति। पाप- कर्मोपार्जनं कारयति । पुनय किं करोति, मोक्ष सर्वकर्मक्षय लक्षणं मोक्षं च करोति । दुक्खं मुखं च अप्पयंतस्स चैत्यं चैत्यगृहं दुःखं शारीर- मानसागन्तुलक्षणं दुःखमसातं बन्धफलं फरोति । मुक्खं च-मुखं च मोक्षफलं परमानन्दलक्षणं करोति । फस्यैतद्वयं फरोति, अपयंतस्स- अर्पयतः पुरपस्य । य: चैत्यगृहस्प दुष्टं करोति तस्य पापबन्ध उत्पद्यते, पत्यगृहस्प मुष्ठ फरोति शोभनं विदधाति तस्य पुष्पमुत्पद्यते, तदा- धारण मोक्षो भवति, तापटेन यथासंख्यं दुःखं मुखं च भवतीति भाव- नीचं । इहरं जिपमग्गे पैत्यगृहे जिनमार्गे श्रीमद्भगवदहसर्वज्ञवीत- रागशासने पर्तते एव को निष्पादिः पापीयातल्लोपपति । पक्ष चैत्यगृहं न च मानपति स महापातकी भवति । अत एव चोक गौतमेन भारता- पापन्ति जिनोपानि विपन्ने भुवनपये। तापन्ति मततं भगमा निःपरीत्य नमाम्यहं ॥१॥ उपकापहियंकरं भणिय पगृह पदकापान रिनार सौ- घरका माणित जिनामे प्रतिपादितं । वैचमा दा मुनिका सन्दने मा कारनपगार या गुनगुना पनि तेन दुपार. -

पद्माभते-
म्पर्येण स्वर्गमोक्षं लभते। पनले चैत्यगृहप कार्पमायाति सत्तदपि
शुभभाग्भवति । यतेजोऽग्निः चैत्यगृहनिमित प्रयाल्पते तदपि
तदछुभ लभते । यो वायुभेन्यगृहनिमित्त यहिःसंधुणार्थं विग.
प्यते घूपाहारहविःपाकाथै चोभेपनिक्षेपर्ण प्राप्यते सोऽपि ताभ
प्राप्नोति । यो वनस्पतिः पुपादिकचैत्यगृहानायथै दयते सोऽपि का-
ययोगेन पुण्यमुपार्जयति तस्यापि शुभ माति । उक्त च--
फुलं पुकार याटियादि कादियां जिणदं घडेमि।
धम्मी को विन आधियउ कंपिय घरणि पटेसि ॥१॥
अन्यञ्च-
केणय वाडीघाइया केणय पीणिय फुल्ल ।
कणय जिणह चहाविया ए निणि यि समतुल्ल ॥२॥
चेइयहरं-चैत्यगृहाविकारः समाप्त इत्यर्थः । २ ।
सपराजंगमदेहा दंसणणारेण शुद्धचरणाणं ।
निगयवीयराया जिणमग्गे एरिसा पडिमा ॥१०॥
स्वपराजजमदेहा दर्शनज्ञानेन शुद्धचरणानाम् ।
निर्ग्रन्ययीतरागा जिनमागे इरशी प्रतिमा ॥
सपराजंगमदेहा स्वकीया अईच्छासनसम्बन्धिनी । परा पर-
कीयशासनसम्बन्धिनी प्रतिमा भवति । स्वकीयशासनस्य या प्रतिमा
सा उपादेया ज्ञातव्या । या परकीया प्रतिमा सा हेया न पन्दनीया ।
तात्म्यासाच्छयामिनि न्यायेन तत्र जीवा ज्ञातव्याः पचस्वपि कायेषु
शुभोपार्जकाः पृथिव्यादीनो केवलाना जवात्तदसंभात् ।
२ फुल पुकारयति माली कथं जिनस्य चामि।।
चमी कोऽपि नायातः कमायया पाणी पानेष्यामा
केन च वाटिका उपिता केन च चितानि पुष्पाणि ।
केनध जिनस्य चाहापितानि एते प्रपोऽपि समनुस्याः ॥३॥

चारित्रमाभूत।
अथवा सपरा--स्वकीयशासनेऽदिपा प्रतिमा परा या भवति सा
बन्दनीया न तु अनुकया। का उस्का का याऽनुरया इति चेदुष्यन्ते
का पंचनामासमलिफारहितापि नातिरपि प्रतिष्ठिता भवति मा न
चन्दनीपान चार्चनीया च । पातु जनामातरहितः साक्षादाहतसंध:
प्रतिष्टिता चक्षुःस्तनादिषु विकाररहिता नन्दिसंघ-सेनसंघ-देवसंघ-
सिंहसंच समुपन्यस्ता सा यन्दनीया । तथा चोक्तं इन्द्रनन्दिना
भारण-
चतुःसंघसंहिताया जैन यिभ्यं प्रतिष्ठितं ।
नमनापरसंघाया यतो न्यासविपर्ययः ॥१॥
चतुःसंध्यां नरो यस्तु चिदम्याझेदभावना ।
स सम्यग्दर्शनातीतः संसार संसरत्यरं ॥२॥
न्यासविपर्ययस्तु गुरवचनादेवावगन्तव्यः । तथा चोक्त श्रीवीरन-
दिशिष्पैः श्रीपमनन्दिनिराचार्य:-
विम्यादलोरतियचोप्रतिमेय भरया
ये कारयन्ति जिनसन जिनाति च ।
पुण्यं तदीयमिह घागपि नैव शता
घक्तुं परस्य किमु कारयितुं दयस्य ॥१॥
ये तु प्रतिमायां यहाभरणादि कुर्वन्ति प्रतिधावेलायां दधिसक्तमुखे
शान्ति तन्मतनिरातार्थ श्रीमौतमेन महामुनिना पृथ्वोत्तमुक्त-
निराभरणभासुरं विगतरागवेगोदया-
निरम्यरमनोहरं प्रकृतिरुपनिदोपतः।
निरायुधसुनिर्भयं विगहिस्पहिसाक्रमा-
निरामिपमुतृप्तिमद्विविधवेदनानां क्षयात् ॥१॥
पकहि फुल्लाह मारिदेइ तु सुरनररिद्धडी।
पदी फरर कुसाटिया भोलिम जिणवरतपी॥१॥

- "मानriknit nा नीर महागु free far मिर पुझिपर निय नि पिरमाणु ॥२॥ सपा मोर समसभामिना मुनियोण भारिप---- पाधिरंगरणे परिणरण गरि। कामदिकानि परियितुपावरतो मि॥१॥ मईयरषगपर्या महानुभाष महामनामात प्रमारमा कुरामन रामपदं ॥२॥ गजगम देहा-गुपगमरकतमणियटिता, स्फटिकमणिपटिता, इ. मौसमशिनिाना, परागमणिरचिता, मिकपिता, बन्दनकायानु- विता या अजेगमा प्रतिमा कायो।ईसी प्रतिमा के भी दंसणणाणेण मुद्धचरणाणं दर्शनेन मानेन निर्ममारियाणा सीकर. परमदयाना । कर्यभूता प्रतिमा, निग्गंधीयराया निर्मन्या पत्राभरण- जटामुकुटायुधरहिता, यीतरागा रागरहितभाऽयतारिता । जिसमग्गे एरिसा पडिमा निनमार्गे मर्यज्ञयीतरागमते ईदगी प्रतिमा भयति । चरदि मुद्धचरणं जाणइ पिच्छेइ सुद्धमम्मनं। सा होइ बंदणीया णिग्गंया संजदा पडिमा ॥ ११ ॥ यसरति शुरुचरणं जानानि पश्यति शुरुमभ्यस्त्वम् । सा भवति वन्दनीया निप्रन्या सोयता प्रतिमा ।। जं चरदि सुद्धचरणं यो मुनिवरति प्रतिपालपति । किं, शुद्ध- चरण निरतिचारचारित्रं । जाणइ पिच्छेद मुद्धसम्मनं जिनश्रुतं जा- नाति स्ययोग्य वस्तु पश्यति च । शुद्ध पंचविंशतिदोपरहितं यस्य सूरेः सभ्यस्त्वं भवति । सा होइ बंदणीया सा भवति वन्दनीया नमस्क- रणीया। निर्गथा संजदा पडिया निर्मन्या चतुर्विंशतिपरिप्रहरहिता बोधप्रामतं । संपतानां मुनीनां दिगम्बरागां प्रतिमा आकार:, जंगमा प्रतिमा मुनयो भान्लीयर्थः। दंगणअणतणाणं अणंतवारिय अणंतमुक्खा य । सासयमुक्ख अदेहा मुगा कम्मबंधहि ॥१३॥ नमन्तान अनन्तपीया सनन्तमुगाः । भारतमुगा अदेहा मुगा पारायः ॥ दंसणअणतणाणं दर्शनगनन्तं फेवलदर्शन सत्तावलोकनमात्र- लक्षणं । काकाक्षिगोलकन्यायेनानन्तशद उभयत्राभिसम्बध्यते तेना- नन्तनानं वस्तुपयायस्वरूपमाह केवलज्ञानं लोकालोकव्यापकं यं । तयोगादर्शनानन्तज्ञानं अनन्तदर्शनमनन्तज्ञानं च सिद्धा भवन्ति । उक्तं चाशाधरेण महाकविना- सत्तालोचनमामिपि निराकारं मनं दर्शनं साकारं च विशेषगोचरमिांत मानं प्रवादीच्छया। ते ने प्रामवर्तिनी सरजसा प्रादेशिक सर्वतः स्फुर्जन्ती युगपत्पुनर्विरजमा युप्माकमद्गातगाः ॥१॥ तथा च नेमिचदसिद्धान्तकातिना चोक्तं- दसणचं गाणं छदुमल्याणं प दोपिग उपोगा। जुग जम्हा फेवलिणाहे जुगयं तु ते दो धि ॥१॥ अगंतवीरिय अणंतसुक्खा य अनन्तनीधि मिद्धा भवन्ति लोकालोकस्वम्पावलोकने ज्ञातृत्वे च या शक्तिस्तदनन्तवार्य ज्ञातव्यं । अगन्तसौख्याच सिमा भवन्ति सवस्तुसम्पपरिज्ञाने सति तेषां मुख- मुत्पयते । तथा चौ: नेमिचंद्रेण त्रिलोकसामन्य मानिकाधिकार- पर्यन्ते--- ८२ पद्माभृते- देयं सार्थ सव्यं सार्थ या सम्ममेत्थ जाणता। तिम्थं तुस्संति परा किं ण समत्थत्यतचण्हा ॥१॥ चत्रिपुरुफणिमुरेदेसहमिद जं सुदं तिकालभयं । तत्तो अणंतगुणिदं सिद्धाणं खणसुई होदि ॥२॥ सासयमुक्ख अदेहा शाश्वतमुखा अविनश्वरमुखाः, अदेहा देहर- हिता ज्ञानमयमूर्तय इत्यर्थः । मुका कम्मबंधेहि मुक्ताः कर्माट- बन्धनैः । निरुखममचलमसोहा निम्मिवियाजंगमेण रूपेण । सिद्धहाणम्मि ठिया योसरपडिमा धुवा सिद्धा ॥१३॥ निरुपमा अचला अक्षोमा निर्मापिता अनामेन रूपेण । सिदस्याने स्थिता व्युरसगंप्रतिमा धुवाः निद्धाः ॥ निरुखममचलमखोहा निम्पमा उपमारहिता । ईशः पुमान् कोऽपि नास्ति येन सिंडा उपमीयन्ते। अचला. स्वस्थानादारीको- टित भागमपि न परतो गच्छन्ति । अग्बोहा-अक्षोभा न क्षोभ प्राप्नु- पन्ति । उक्तं च समन्तभद्रेणीमर्पिणीकाले आगामिनि भविष्यत्तीर्थकर- परमदेवेन-- काले कल्पतेऽपि च गते शियानां न विक्रिया पापा। उत्पातोऽपि यदि स्थाप्रैलोक्यसंभ्रान्तिकरणपटुः ॥१॥ निम्मवियागमण स्वैग स्थिरमण निर्मापिता. संसारारप- क्षणेन नियादिता एकममयेन पशिब प्राता धर्मास्तिकायामा- एक शाम शानं वा सम्यगत्र जानता। नीर्य तुष्यनि नराममानार्थता ॥ पजिलागि मुग्ने महमिन्दे पात्र विद्यालम। साउनम्नगुणित पिहानी क्षणमुकं भवति ॥१॥ २मकाप्रभागतमा

योधप्राभृतं ।
वापरतो न गच्छन्ति, अजंगमेन रूपेण स्थिररूपेण तिष्ठन्ति निश्चय
स्थिरप्रतिमाभिधाना: । सिद्धाणम्मि ठिया सिद्धानां मुक्तात्मनां
स्थाने त्रिभुवनामे तनुवातबलये स्थिता:-मुक्तिशिलामीपदूनगन्यूतिमधो
मुक्त्या आकासे निराधाराः स्थिताः । वोसरपडिमा धुवा सिद्धा
न्युत्सर्गप्रतिमाः कायोत्सर्गेण पभासनेन वा स्थिता ध्रुवाः शाश्वताः
सिद्धाः प्रतिमा भवन्ति । तेऽपि वन्दनीपा भवन्ति ।
पडिमा-प्रतिमाधिकारस्तृतीयः समातः । ३।
अदानी गाथादयेन दर्शनाधिकारं कथयन्ति श्रीकुन्दकुन्दाचार्या:-
दंसह मोक्खमग्गं सम्म संयम सुधम्मं च ।
निगं णाणमयं जिणमग्गे दंसणं भगियं ।।१४।।
दरांपति मोक्षमार्ग सम्मरत्वं संपने मुधर्म ।
निशान जिनमार्गदर्शनं भनितम् ।।
दंसह मोक्खमग्गं दर्शपति प्रकटपति मोक्षमाग सम्यग्दर्शनतान-
चारित्रलाण पत्तीनं। "कृत्ययुटोऽन्यत्रापनि"वचनात्यर्तरि युट्प्रत्ययः।
फोऽसौ मोशमानों में दर्दानं फर्तृतया दर्शयति, मम्मत्तं सम्यक्त्यं
तत्वावधानलक्षणं । तथा संचमं चारित्रं पंचमहातपंचसमिति-
निगुशिलक्षणं दर्शयति । मुधर्म चानानादि दादाविध तपक्ष
दर्शयति । पर्यभूत दर्शन, निग्गंध वादाभ्यन्तरपरिमहरहित भूयोऽपि
फर्यभूतं दर्शन, पागमयं सम्पादानेन निहतं । जिगमगे देसणं
भपियं जिनमार्ग सहवासानेपादित मागे दर्शन सम्पत्ति
भनित पतितासाचार प्रतिपादित, सलिनमायारभूतं च ।
वह फुई गंधमयं भवदिहु सीरम पियमयं चापि ।
नह दमयं हि मम्म पापमयं होह स्वयं ॥ १५॥

८४ घट्नाभृते- यथा पुर गन्धमयं भवति स्फुलं शीर तरनमयं चापि । तथा दर्शनं हि सम्यग्ज्ञानमयं भवाते रूपस्थम् ॥ जह फुल्लं गंधमयं यथा पुर्ष गन्धमयं भवति । भवदि हु सीरं स घियमयं चावि भवति हु-स्फुट क्षार दुग्ध, स-तत् घृतमयं धृत. युक्त चापि । अपिशन्दादन्येऽपि कनकपापाणकाष्टामिप्रभृतयो - शान्ता ज्ञातव्या । तह दमणं हि मम्मं तथा दर्शनं सम्याय हि नियन मम्याज्ञानमय भवति । रूपन्य पतिश्रावकायतसटिर्ति- स्थित दर्शन ज्ञातव्यमियर्थ । दंगणं-दर्शनाविकार एकादशाधिकारे बोधग्राभूत चतुर्थ ममात ११॥ अर्थदानी जिनविवस्वरूप निरपयन्ति श्रीगृपिठाचार्या भगवन्त:- जिणचि गाणमयं संजममुद्धं मुवीयरायं च । जं देव दिवामिस्सा कम्मरमपकारणे गुद्धा ॥१६|| जिनयि ज्ञानमय संयमशुदगुपीतरागंग। यर दानि दीक्षाशी समक्षयकारणे शुद्ध। बिणविणाणमयं जिनम्य विम्बमाकागे झानमयं मनिशान- शृतज्ञानययामभयायधिज्ञानयथा भयमन पर्पयज्ञानमय भयनि सृतीयः परमेष्टी भावार्यमको निमाविम्य मानव्य इययः । संजमगुढं गुठी. यगयं च मदुन रक्षणं जिनयिचे कान भवनाया-रायममुद्ध मयमन निरनिचारचारित्रण शुई निर्म, मुन्न अनिशयन योरा वीत व ती गग प्रीतिभो पम्मादिनि बालगर्ग । मज झपगे निशाना प्रयोगात् । अनी "सी वचनादने तीन वारदाः। चकामनाविक पत्रिका च मिनयन भर देर दिसमसिमा बिनायिका दलित दी बनाएगी, Prer च द्वादशानुसार मा दान। कम्मरगयकारण गुदा बोधप्रामृतं । कारणे शुलो निर्म। जीवन्मुक्तजिनवदाचार्यों माननीय इनि ६. च सोमदेवेग सूरिणा--- शनशाण्डे क्रियाकाण्डे चातुर्यपुरासरः । दिय बारायः संसाराधितरपडकः ॥ १ ॥ तस्म य फरह पणामं सव्वं पुजं च विणय वच्छल्लं । जस्य य दमण गाणं अन्यि धुर्व चेयणाभावो ॥ १७॥ समर फुरत प्रगान सा जो दिन वात्सल्य स्पर दर्शन शान, पस्ति भुपेतनाभावः ॥ तस्स य करह पणामं तस्य च मिनविन्यस्य जिनवियमूर्तेराचा- प्रणाम नमस्कार पंचाशमान या कुरुत यूर्य हे भन्यायशः ।, रादुपापापस्य सर्वसाधोय प्रणाम कुरत तयोरपि जिनपिन्बान- यात् । मुलं पु च विणय वच्छल्लं सवा पूजाम- मर्चनं च कुरत यूपमिति, तथा विनयं हस्तयोटनं पादपतनं सन्मु- मनं च कुरुत, वासल्यं भोजनं पाने पादमर्दनं शुद्धतैलादिनाङ्गा- ने तन्मकालने चेत्यादिक फर्म सर्व तीर्थकरनामकर्मोपार्जनहे. तं पाहत्यं कुरुत यूपै । उक्तं च समन्तभद्रेण महामुनिना- च्यापत्तिन्यपनोदः पदयोः संवाहनं च गुणरागात् । चयापत्यं यावानुपमहोऽन्योऽपि संयमिनां ॥१॥ तथा चकारा पापाणादिघटितस्य जिनविन्यस्य पंचामृतैः रापन, शियः पूजामयैध पूजनं कुरुत गूर्य । वंदनां भक्तिं च कुरुत। यदि बाभूत जिनविय न मानयिश्यय गृहस्था अपि सन्तस्तदा कुंभीपा- दिनरफादी पत्तिप्पथ यूयं । तथा चोक्तं सोनदेवेन स्वामिना- अपूजपित्या यो देवान् मुनीननुपर्य च । यो जीत गृहस्थः सन् स भुंडीत परं तमः ॥१॥ .

पट्माभूते-
पर तम इति कोऽर्थः कुंमीनरकः, सप्तमे नरके पंच बिलानि
तेषा नामानि यथा-ौरवमहारोरवासिपत्रकूटशाल्मलीकुंभीपाका इति ।
सप्तमनरके यानि चतुर्दिक्षु चत्वारि बिलानि वर्तन्ते तान्यर्धरज्जु-
प्रमाणानि सन्ति तेपा मध्ये याकुंभीपाकसंज्ञक पंचमं बिलमस्ति तदैक-
योजनलक्षप्रमाणे वर्तते, पंचभिरपि रम्जुरेका भूमी रुद्वा वर्तते । जस्स य
दंसण गाणं यस्य पूर्वोक्तलक्षणस्य जिनर्विवस्य दर्शनं ज्ञानं च वर्तते ।
अस्थि धुवं चेयणामावो अस्ति विद्यते ध्रुव निश्चयेन चेतनामाव आत्म-
स्वरूप स्थापनान्यासेनापीति तात्पर्यम् ।
तववयगुणेहिं मुद्धो जाणदि पिच्छेइ सुद्धसम्मत्तं ।
अरहंतमुद्द एमा दायारी दिक्खसिक्खा य ॥ १८ ॥
तपोगतगुणैः शुद्धः जानाति पश्यति शुद्धसम्यक्त्वम् ।
अर्हन्मुदा एषा दात्री दीक्षाशिक्षाणां च ॥
तववयगुणेहिं मुद्धो तपोभिर्वादशभेदैः, तैहिसासत्यास्तेयत्र-
लापरिग्रहै: पंचभिः, गुणैः पूर्वोक्तलक्षणचतुरशीतिरक्षः शुद्धो निष्कलङ्कः।
जाणदि पिच्छेइ मुद्धसम्मत्तं जानाति सम्यग्ज्ञानवान्, पश्यति स्वरूप
वेत्ति कस्य शुद्धसम्यक्त्वस्य पंचविंशतिमलरहितस्य । अरहंतमुद्द एसा
श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञवीतरागस्य मुद्रा आकार एपा धर्माचार्यलक्षणा पापा.
णघटितविवस्वरूपा यंत्रमंत्राराधनगम्या च जिनयिम् भवति । दायारी
दिवससिक्खा य कथंभूता मुद्रा, दात्री दायका कासा, दीक्षाशि-
क्षाणां । चकागयात्राप्रतिष्ठादिकर्मणां च प्रवर्तिका ।
जिणविंबं-इति श्रीयोधमाभते जिनविम्याधिकारः पंचम समाप्तः॥५॥
अदानीमेकया गायया जिनमुद्रां निरूपयन्ति श्रीमदेलाचार्याः-
दढसंजममुदाए इंदियमुद्दा कमायदढमुद्दा ।
मुद्दा इह गाणाए जिणमुद्दा एरिमा भणिया ॥ १९ ॥

-~- बोधप्राभृतं । रसेपमा इन्द्रियमुना कपादनमा । सदानेन जिनमुना इंटमी मानता। दढसंजममुद्दाए दया यमघटितप्रापया संपामुद्रया पड्जीवनि- कापरसपनपा परिन्त्रिपतंकोचस्वरुपया च मुद्रपा वेण जिनमुटा भवति । इंदियमुहा कसापटमुद्दा इन्द्रियाणां स्पर्शनरसनमाग- चक्षुःोमाग पन्द्रियाणां यत्र मुद्रणं गर्मवकरचरणसंकोचनामिन- पामुद्रोपते मा जिनमुद्रा भवति । फसापददमुदा-फरापागां रद गादं मुद्र कापदनुमा । मुद्दा इह पाणाए मुगाह जिनशासने शानेन भाति, सहनिदा पठनपाटनादिना जिनमुना भवति । जिणमुदापरिमा भगिया जिनमुदशी भगिता । मुनीनामाकागे जिनमुः।। प. चारिजानाफारममावलि मुदा से उभरे अपि माननीया (ये)। यदि पामि मिनिधीन ता न मानपनि म पुमान् जिनमुनाही शि- नीय इति भावार्य । रियो मारिसर सस हकमेध: पत दिनमुना सामान्यते । तदुगामिन्टन- दिना शापाग--- এন্না ৰ শাৰহি য় মান। राजगुमायरोलीनानियः १. १ ॥ जिपमा भने गाभरार प.समाः।६। TREE.. मंजमडगाम महानोर मोरयमन्मन्न। पालनादिलवसमा पापपार ॥२०॥ Free Rameries पद्माभूरो- संजमसंनुत्तम य संयनेन्द्रियजयप्राणरशगलक्षणेन संयुकम्प सहितम्य । मुझाणजोयस्म मोरखमग्गस्म मुथु पानयोगस्य आरौद्रध्यानपरी तम्प ध्यानस्य धध्यानसम्पानद्वपस्य योगेन रोयोगेन मरिनस्य, एवं विशेषणपविशिधाय मोक्षमार्गस्य सम्बन्धिरेन। गाणेण लहदि लग ज्ञानेन करणभूतेन लभते, कि कर्मतापन सो निमामा । तम्हा गाणं च णायच्यं सस्माकारणामाने थ हातव्य, न केवलमायतनादिपक ज्ञातव्य किन्तु ज्ञानं च ज्ञातव्य । परामः पारपरमाययार्थः । जह गिलहरि लाग रहिओ कंडस्म पेग्जयविहीणो। तह पनि लागदि ला अम्गाणी मारामग्गरंग ॥२१॥ यथा नाशिलक्ष यति मश्य रहित काण्डरप वैयविहीन. । तयाAFTPीम अज्ञानी मोशमार्गम्य ॥ जहण लिलार्म यया येन प्रकारेगा नाति ने हमने, र माद, १३॥ । कामी ये न समो, गही फंउम्म वाजविहीणी नोपासाहिल, काडा याणस्य, येगी. नीन-imन पुमान । नहलिदिला ME नागनानि र पामामा- प्रणाली मारममगम्ग जानी शनात मान में A- न"NIRAHIMLA परिगण हादियादि गुरिगीति गिर्ग नुनो। मालतमाम लगना मासमागम ॥ २२ ॥ THArt fragrat Timriti .

८९ बोधप्राभृत। णं पुरिसस्म हयदिशानं श्रुतानं पुरपस्सन्नमव्यजीवस्य सन्तिष्ठते । लहदि मुरिमोवि विणयसंजुत्तो लभते प्रामोनि मपुरुषोऽप्यासनभन्यजीवः । अपिशन्दाबामी-मुन्दरी-रात्रिमति- नादिवत् एकादशनि लभन्ते, मृगतोचना अपि सीलिंग छिन्या मुरा भुस्वा राजकुलादिषूपच मोक्ष नृनौयेऽपि भये लभन्ते । पुर- नु सफलं श्रुतं लषा तद्भवेऽपि मोक्ष यान्ति । ईदृशं नानं कः मोति ! विणयसंजुत्तो-विनयसंयुक्तो गुरुचरणरेणुमितभालस्थल इति वार्थः । णाणण लहदि लक्ख हानेन श्रुतज्ञानेन लभते टल्य नेजामस्वरूपं । लपखंतो मोक्समगस्स लक्षयन् प्यायन् लक्ष्य समते, फस्प लक्ष्य-मोक्षमार्गस्य स्नत्रयस्य । मइधणुहं जन्स धिरं मुदगुण वाणा सुअस्थि रयणतं । परमत्यपद्धलपखोण वि नुकदि मोक्खमग्गस ।।२३।। मतिधनुर्यस्य स्थिरं भुनगुनो यानाः मुमन्ति रत्ननयम् । परमार्थपालापः नापि स्वलति मोक्षमार्गस्य ॥ मइधणुहं जस्स विरं मतिर्मतिज्ञानं यस्य मुनर्धनुश्चापं स्थिर निचलं । मुदगुण श्रुतज्ञानं गुणः प्रत्यंचा। वाणा मुअस्थि रयण वाणाः दाराः मुटु अतिशययन्तः सन्ति विद्यन्ते, कि? रत्नत्रयं भेदाभेद- टक्षणं सनत्रयं । परमत्यवद्धलक्खो परमार्थे निजात्मस्वरूप बद्धलक्ष्यः निपलीतानस्वरूपो मुनिः। ण वि नुक्कदि मोक्खमग्गस्स न स्सटति मोक्षमास्न लभ्ये इति सम्बन्धः । तथा चोक्तं श्रीवारनन्दि- शिष्येण पसनन्दिनाचार्येण- प्रेरिताः शुतगुपेन शेमुपी कार्मुकेण शरवगादयः। बाराशेष्यविपये इतधमाधिद्रणे महतकर्मशत्रयः ॥ १ ॥ तथा च तोमदेवस्वामिनापि श्रुतज्ञानस्य गुणस्तुतिकता- पद्माभते- भरयनगरतिरमजा मतिरिय पोधोग्यधिः साषधिः। मामः प्रयोग योगिनिस पस्यरूपो मनापर्ययः । तुम नाप केषामिर ग्योतिकधागोयर। माहा निधिलागे तु सुलो वर्णमामा भुते॥१॥ गाणं-ति शीयामाभने ज्ञानाधिकार रातम समासः । 01 अदानी गालापन देवस्न निमायन्ति धीग्दादचार्या:-- गोदशो जो अन्धं धम्म काम गुदेरणाणं । गोदा जम्ग अस्थिर अग्यो धम्मो र पबग्गा ॥२४॥ मोयोसपबाम मुसानिशाना बीमा भर्गमसपा ॥ गीको जो अन्य गदेसी पोsi धन निधानारिफ ददामि। धम्म काम गुदाणाणं गर्म चारित्रमाण दयाहाण Arr. गमरमादिवशद गुदद पुष मलिशपेन । IRCUTOfe.मRAXIगाडकियोगयासुदेणार. MATION शानिमा गुमानिशान Trk in ति। गोद जग अन्तिम ददाति गम्य Trirat 11 अमरदा मम । यो पम्मी य पत्र मादान या धर्मादान 4. न माना Rataनि, an ki ni1 मम । योग . मनिमगानामिबिगतमा मनिपान मानानियत मायामागा भु।

बोधप्राभृतं । सा चाप्तात् स च सर्वदोषरहितो रागादयस्तेऽप्यत. स्तं युत्या सविचारं सर्यमुपदं सन्तः प्रयन्तु धिये ॥ १ ॥ धम्मो दयाविमुद्धो पन्चज्जा सवसंगपरिचत्ता । देवो ववगयमोहो उदयकगे मन्बजीराणं ।। २५ ।। पर्नो दलावियरः नग्मा मसंगपरित्या देदो सपनामोहः उदरी मम्पजीवानाम् ॥ धम्मो दयाविमुद्धो धर्मो दपया विशुद्धी निर्मलः, यो दया कु- लिपि चर्मजले पिति, अजिनतेलमास्वादपति, कुतुपघृतं भुक्त, भूत- नादानमत्ति तस्य पुसो धर्मो विशुदो न भवति स पतिपचापि स्टे- को हातव्यः । पन्नज्जा नवसंगपरिचत्ता पत्रमा सर्वसंग- परितक्ता भवाते यो दण्डं करे करोति फम्बटमुपदधाति शंसकरनारी- नमसरनाति स कय प्रनयावान् भवति । देवो ववगयमोहो देवो पतनौहः. यो देयोऽधी पनितां दधाति, यो देवो हृदयस्थले ठस्नानुशपति, यो देवो दंदं धरति. यो देवो वैदयां चोरमुले, वसिष्ट- पिता भवति स फर्म देवः । उदयकरो भवजीवाणं भन्यजी- वानामुश्वकरः उरताकनामाभदायफ.. न देवो शतज्यः । देव-दनि श्रीमाने देवाधिकारोSEम. समातः । ८1 प्रदेशमा मापापेन त निस्पन्ति श्रीमन्दिदेवाः- वसम्मनविद पनिंदियनंद पिरावेर । हाएउ ही निन्य दिवमानिनामुम्हाणेन ॥२६॥ पन्दिरले सिके ।

पट्माभूते- वयसम्मत्त विमुद्धे व्रतरहिंसासत्यास्तयब्रह्मापरिग्रहलक्षणैः पंचभि- महारतः, सम्यक्त्वेन च पंचविंशतिमलरहितन तत्वार्थश्रद्धानलक्षणेन, विशुद्धे विशेषण निर्मले चर्मजलाधास्वादनरहिततयाऽकदमले तीर्थे । पंचिंदियसंजदे णिरावेसे पंचन्द्रियसंयने पंचेन्द्रियाणि स्पर्शनरसन- प्राणचक्षुःश्रोत्रलक्षणानि संयतानि बद्धानि स्पर्शरसगन्धरूपशब्द- लक्षणपंचविषयरहितानि यस्मिस्तीर्थे तत्तथोक्तस्तस्मिन् पचन्द्रियसयते । पुनः कथंभूते तीर्थ, निरपेक्षे याययस्यपेक्षारहिते आकांक्षारहिते माया- मिथ्यानिदानशल्यत्रयविवर्जिते । हाएउ मुणी तित्थे स्नातु स्नानं करोतु-अष्टकर्ममलकलकप्रक्षालनं करोतु-कंवलज्ञानाद्यनन्त चतुष्टयम- युक्तो भवतु, कोऽमो मुनि प्रत्यक्षपरोक्षज्ञानसंयुक्तो महात्मा महानुभायो जीवः, ती शुदबुद्धकस्वभावलक्षणे निजात्मस्वरये संसारसमुद्रतारण- समर्थे ती स्नानु विशुद्धौ भवतु। केन कृत्या स्नातु, दिक्सासिरसा- मुण्हाणेण दीक्षा पचमहानतपचममितिचेन्द्रियरोवलोचपदावश्यककि- पादयोऽष्टाविंशतिमूलगुणा उनमक्षमामाश्यावमायशीचमयमनपस्या- माचिन्यब्रह्मचर्याणि दशलाक्षणिको धर्मोन्टादशीलमहम्राणि चमु. रशानियक्षगुणाम्रयोदशाविक चारितं द्वादशविध तपनि सकलमम्पूर्ण दीक्षा भवति, स्वीप्रमंगवर्जन द्वादशानुप्रेक्षाचिन्तन शिक्षा मिननाथम्य, मुम्नानेन कर्मकिद्धिकरणफिहिनिलोपन उक्षणेन स्नानेन स्नातु । जं निम्मलं गुधम्मं मम्मनं संजमं तरं गाणं । नं तिन्यं जिणमग्गे हवेट जदि संतिमावेश ॥२७॥ यतिम मुसम्यावं मेयम नावान। हत्तीय जिनमर्ग भवति यदिशान्तमान । निम्मलं गुषम्मं यनिमं ८ निरनिचार मुधर्म मुख शोभन चारित नत्ता सातव्यं । मम्मनं मंजम तवं गाणं सम्याच मयार्थ- योधाभत । भयानरमग ती मलनि । संयम इन्टियागो मनसा मंचन थि- योजीतावनस्पनियापारीवरक्षगमरिमन । इन्द्रियादिपवे. विपासनावदयारण कषिप्रमादलोपेश शिनायो सातोक्तप्राप. मिनकरण संपम उपते सोऽपि समारसमुद्रतारकन्यानार्थ भवति । तर हानिरोधलक्षणं द्वादशधि तथार्थमोक्षशासनयमाघ्याये विस्त. रेण निगपिनन्याशाराव्यं । शानं च ता भवति। तं तिथं जिगमग्गे तजगाध्यमिक निधयतीर्थप्राप्तिकारर्ण मुकमुनिपादस्पृष्ट तीर्थ जयन्त- शत्रुष्पलादेशपायागिरि आभारदेशतुंगीगिरिनासिक्यनगरसमीपवर्तिग- जबजगजांधसिद्धाटतारापुरकलामायापदचापापुरीरायापुरवागारसीनग- क्षेत्रहस्तिनागपत्तनसम्मेदपर्वतसा चलगिरािहमाचलकापागरिअयो. च्याकौशाम्बीविपुलमिरिवभारगिरिमापगिरिमुवर्णगिरिरत्नगिरिशौर्यपुरचू- सायलनमदातटदार्ग:गिरिकुन्धुगिरिको कशिलागिरिजम्यू रुवनचलनान- दोतरती करपंचकल्याणस्थानानि नत्यादिमागें यानि तीर्थानि वर्तन्ते तानि कर्मक्षयकारणानि चन्दनीयानि ये न वन्दन्ते ते निध्यादृष्टयो हातव्याः । तीर्थभ्रमणं विनाऽनन्तै संसारे भ्रमिष्यन्ति-अनुमोदनाच तं तरन्ति । उक्तं च पूज्यपादेन भगवता- रक्षोविकाररसवृत्तगुणेन लोके पिष्टोऽधिकं मधुरतामु ग्याति यद्वत् । तद्वय पुण्य गपशपतानि नित्य जाताने निजगतामिह पायनानि ॥१॥ जिनमानयाधं यत्ती जलस्थानादिकं तन माननीयं तल्कि ! गंगायमु- नांतरपूनर्मदातापीमागधी गोमतीकवितारवस्यागंभीराकारतोयाकौशिकी- कालमहीनोग्बाऽरणानिभुरालाहित्यसमुद्रकन्धुकाशोणनथ्यो जामेखलोदु- म्वरीपनसातासाभशाशुक्तिमतीपैपास उजवतीचिजयतीमाल्यवतीयः-

.
पमाभते-
नामम्मनविगु समास यायामापरिमहलमाणः पमि.
m, 7 पंगासिममाहितन समाप्रमाणन,
कि शेषगनिमी यामागदरहितराउकामा सी
पनिदिपमंग पिगोग गप्रियसयो पोतियागि निरसन
HTT"नि मातानि ममानि स्पर्शरमगधगपशम्द.
nिema aftuी तमोक्तस्तरिमा पन्द्रयागते ।
'गुन को नाश या शारहित माशाह माया-
Forai Tuel क्षण3 गुणी नित्य स्नान स्नान
का " "r. Tilt या कमज्ञानानसपर्म.
म.
aff Hinानगंगुको महात्मा महानुभा
नामगर समारममाण.
40. Hatat पानातु, दिमागमा
गुहाग IMEAnavaraniपनि
६. ! ! मागोजमगमा
"inetri 1 : मानसीन um
Mr. Maiताना
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th an in.indaiनग्नानन जानु।
र निम्मर गम्म गम्मन म न पाणं ।
नगि हिमतिमा ||२||
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• ११ मा
TREATRE ia Mfrri मन
1.! मम्मन मनमा asartant

पार माये हि सगुणपाजाश।
पटणादि पटिम माया मायनि ॥८॥
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पामा गनि । र AREER Edi
पर गंदच मीनिया गनि। भाद
या मनि । गगुमपाजापा पy WATRit.
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हातुपरकार पनि आगदिमा
मनं । संपन गमागमकामान्
मान्धी
दका मारणे भवति, सीने मी नागपगुवर्ण
मन माम मामाशा पगति परमपर भरनि।
रतन मानसमाती इमं । भारा
भन्मजीका आमनारमार्गकाः । भावंति भापति निज-
पकमले निप पारित । पा, अगहन सीमगरमजिवीतराना
तथा चीन--
লানলিলা লিমা বললা না ধ না ধছিলাম।
दक्षिणा जिपसीवा भापजिणा समयसरमाथा ॥१॥
दमण अपनगाणे मोरसो पEEकम्मरंधा।
पिस्वमगुणमारूडो अरहतो परिमो होइ ।। २९ ।।
नेसनाने मोशी बन्न ।
नियमानमार: मनमो भरी।।
नामसिना निमानि स्थानाजिनाः तमाशेष प्रतिमा !
दारिना बिना भारनिनाः समपरमाः ॥१॥

। पद्माभूते- दसण अणंतणाणे अनन्तदर्शने सत्तावलोकनमालक्षणे सति तथा अनन्नज्ञाने विशेषगोचरसाकारे सति मोक्षो मयताति तायद दितव्य । केन प्रत्या, परकम्मधेण नाष्टकर्मबन्धेन । ननु" माह क्षपा ज्ञानदर्शनावग्णान्तगयक्षयाच केवल " इत्युमास्यामिवचनात् चया- चैव कर्माय तो नानि कथं नष्टाष्टकर्मबन्यनत्युच्यते । साधूक्त भवत या सन्यनायके पतिते सति जीयायपि शन्दे तन्मृतवाप्रनिभासते विशनिकारक यभावाभावनया सर्वेषां कर्मणां मुख्यभूने मोहनीयमीण मष्टे मनि वेदनीयायुनामगोत्रकर्मचतुष्टये मयपि भगा रिविधमल्ली- दयाभावादयानन्यपि कर्माणि नटानीग्युग्यो । णिग्यमगुणमारूढी निरुपम गुणमनन्सचश्यदक्षणमाद्धोऽहमष्ट फर्मासि उपने । अर- हंतो परिमो हो। अहनीहशो मयतानि मुक्त प्रयापवर्यत इनि भावारी । जग्वाहिजम्ममग्णं पउगइगमणं च पुष्णपाय च । ईतूण होगाम्म हुउ गाणमयं च आईनो ॥ ३०॥ बराम्यापितम्ममरण पतुगंनिगम प पु च । हाला दीपकर्माणि भूतः ज्ञानमय अहंन । जर आया। वादि च्या हया, एनेनन यामाया- मिन पालमासिकमनीमा गंग कामानिनः कपनि समय निम्न मानि । जम्म जम्म गर्भवाम पा, मी पदमा यन- दामा त्रासाच्या निकाय क्षप्रियाया उदोगरतगनिन्द्र नदयानिधाना मीनि जीवस्य कमान भवति दगडापात् । न मरण | गागमा च निगम चहा मान तुर्थ कायदया। इंगटोमसम्म हवा विमानतादीनानान-

बोधप्राभृतं ।
क्षुत्पिपासाजरातजन्मान्तफभयस्मयाः।
न रागद्वपमोहान यस्याप्तः स प्रकीत्यते ॥ १ ॥
चफाराचिन्तारतिनिद्राधिपादस्वेदखेदविस्मया गृह्यन्ते । फम्मे-धाति-
कर्माणि । हतूण-हत्या । हुउ गाणमयं च अरहंतो भूत: संजातः
कीदृशः णोणमय-ज्ञानमयः केवलज्ञानवान्, अर्हन् इन्द्रादिकृतामहणां
पूजामनन्यतंभपिनीमहतीपहन सर्वज्ञः वीतरागः ।
गुणठाणमन्गणेहि य पज्जत्तीपाणजीवठाणेहि ।
ठावग पंचविहेहि पणयन्वा अरुहपुरिसस्स ॥ ३१ ॥
गुणस्थानमागगाभिए पपांतिमानजीवस्थानः ।
নাম: না নবম।
गुणठाणमन्गणेहि य गुणस्थानेनाईन् प्रणेतन्यो योजनीयः। कानि
तानि गुणस्थानानि ! तन्निर्देशो गाथादपेन क्रियते---
मिच्छा सासा मिस्सो अतिरिय सम्मो य देसविरमओय।
विरया पमत्त इयरो भयुष्य भणियाहि मुहमो य ॥१॥
उपसंतीपमोदो सजोगकेवलिजिणो अजोगीय ।
चउदस गुपठाणाणि य फमेज सिवाय पापन्या ॥२॥
मार्गगाचतुर्दशा निक्ष्यति । पन्जत्ती पभिः पर्याप्तिभिरहन प्रगे-
तसः। ता सरि निर्देष्यति । पागजीवठाणेहि प्रागैर्दशभिरहन प्रगे-
तयः। तानपि निर्देश्यति । जावस्थानानि चतुर्दशन गुणस्थाने जावा
पामो इति पासमारं।
२ मा सामान मि अधिरतमामस्य देशशिरता।
शिरतः ममत्त इतरोधोऽनिधिः सहमर ॥
उनीलमोर योगशििनरोऽलोगी।
पनुमानानि घोर निराम शनापाः ॥ १ ॥

पद्माभृते- ये सन्ति तानि जीवस्थानानि । तानि गुणस्थाननिर्देशेन ज्ञातव्यानि । ठारण पंचविहेहिं एवं गुणस्थानमार्गणापर्यातिप्राणजीवस्यानरयाप- नापंचविध स्थापना योटनापंचप्रकारे । पणयव्या अरुहपुरिमस्स प्रणे. सध्या योटनीया अर्हपुरुषस्य अई.जीवस्यति । तेरहमे गुणठाणे मजोइफेवलिय होइ अरहंतो। चउतीमअइमयगुणा होति हु तस्मट्टपडिहारा ॥३२॥ प्रयोदशे गुणस्याने सयोगकेवलिको भवति अहंन् । यधिशदतिशयगुणा भवन्ति हुतस्य प्रातिहार्याणि ॥ तेरहमे गुणठापणे त्रयोदशे गुणस्थाने। सजोइफेवलिय होइ अरहंतो सयोगकेवलिको भायर्हन् । चउतीमाइमयगुणा चतुनि. सदनिरायगुणा । हानि हु तस्मटपडिहारा भवन्ति हु-सुन्दै तम्या- है परमेश्वरस्याटमानिहायर्याणि । के ते चतुन्निरादतिशया इति चेदुप्यन्ते-- नित्य नि द व निर्मलता मलमूत्ररहितता, तपितुस्तन्मातुध मठमूत्र न भवति। टकच- तिरपयराजयराणहरचक्की य अनुचककीय। देया य भूयभूमा भादारो अधि परिच नीहारी॥१॥ तथा तीर्थराणा मश्रुणी कूध न भवनि, शिरमि कुन्तास्तु भवन्ति तथा चोन:- देयां वियनराया संदरचाकीय सदयतिरथयरा। मोमय रामा कामा नियकुंचिया दौति ॥ १ ॥ पूर्वमायुक्ता भाशिम रे भत्र पुनरयुग्यन्ने । तीरा तिमश्विामित्र । देवा भोगभूमात्र (at) माहारोलिनैव मीरः ॥ 1 ॥ देवासारवाहमयावनिया बनाया। मोश RT कामा निशिता भवति॥ " मोषनुसनातीनि पुन फार । ---

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१०० पद्माभते- भवति । शरत्कालसरोपरसदशमाकारी निर्मले भनि । दिश. मा अपि तिमिरको घनता स्यन्ति तमो मुचन्ति शलभा अपि दिशो ना. छादयन्ति पूलिनोंडीयने । ज्योतिश्कान् व्यन्नरान् फापयामिदेवान् भवनवासिन आत्यन्ति महापूजा सरितमागग्छन्तु भवन्त इति । अर- सहस्रं रत्नमय रवितेजस्तिरस्कारकं धर्मच अग्रेडसे गगने निराधार गग्छति । अट मंगलानि भवन्ति, तानि कानि ! उप-ध्वज-दर्पण- कलश-चामर-भेगार-ताल-मुप्रतीक इत्यष्ट मंगलानि चतुर्दशोऽतिशयः। एते चतुर्दशातिशया देवोपनीता भयन्ति । तथाटमातिहार्याणि मन्ति, कानि तानीत्याह!-- अशोकवृक्षः सुरपुष्पवृष्टिर्दिष्यध्वनिधामरमासनं च । भामण्डलं दुन्दुमिरातपत्रं सत्प्रातिदार्याणि जिनेश्वराणाम् ॥१॥ गइ इंदियं च काए जोए येए कसाय णाणे य । संजम दमण लेसा भविया सम्मत्त सणि आहारे॥३३॥ गतौ इन्दिये च काये योगे वेदे कषाये माने च । संयमे दर्शने लेझ्यार्या भग्यत्वे सभ्यक्त्वे सेलिनि भादारे।। गइ नारकतिर्यध्यनुष्यदेवगतीना मध्येऽर्हतो मनुष्यगतिः । इंदियं स्पर्शनासनप्राणचक्षुःश्रांजपंचेन्द्रियजानीनां मध्येहन पंचेन्द्रियजातिः । पृथिव्यतेनीवायुवनस्पतित्रसकायाना मध्येऽर्हन बसकायः।जोए सत्यम- नोयोगासत्यमनोयोगोभयमनोयोगानुभयमनोयोगानामर्हत सत्यानुभयम- नोयोगी, सत्यवचनयोगासत्यवचनयोगोभयवचनयोगानुभयवचनयोगाना मध्येऽईतः सत्यानुभयवचनयोगी, औदारिककाययोगौदारिकमिश्रकाय- योगवैक्रियिककाययोगवैत्रियिकमिश्रकाययोगाहारककाययोगाहारकमिश्र- काययोगकामगकाययोगानां मध्येईत. सप्त (वि) योगा., सत्यमनो- योगोऽनुभयमनोयोगः सत्यवचनयोगोऽनुभयवचनयोग औदारिककाययोग बोधमा । १०१ बीमारिक मिश्यापयोगः फार्मनकापलोगोति सतपोगाः। ए खान- तप.सपनऽहतः कोऽपि थेटो नास्ति । फमाय पंचमिति- पापागां मन्येऽति कोऽपि फसायो नास्ति । पाणेय पंचमानानां मादेऽहत. फेवनानमेकं । संजम ससानां संपमानो महत: संगम एक एवं पथारपानचरित्र । दंगण चतुणी दर्शनाना ममें दर्शनमतमेष फेयरदर्शनं । लेसा पा सेवानां मध्येऽहतो रेश्या एकदा मलेया । भविषा भन्य(पमप्येऽईन् मन्य एव । सम्मत्त पल्लां सम्परवानाईत सम्परत्वमेकमेव क्षापिससम्परत्वं । संजिदप- मापेऽईन सही टेक एय। आहारे आहारफद्रयमध्येऽईत आहारकाना- हरफदयं । आहारो यसरीगे तेह इंदियआणपाणभासा य । पन्जत्तिगुणसमिद्धो उत्तमदेवो हबइ अरुहो ।। ३४ ।। माहारः वरोरे तथा इन्द्रियानभागमाराध । पीमिगुगसमसः उत्तमयो भवति अहंन् ।। आहारो यसरीरो आहार. समय समयं प्रत्यनन्ताः परमाणयोs- नन्यजनसाधारणाः शरीरस्थितिहेतवः पुण्यरूपाः शरीरे सम्बन्धं यान्ति नोफार्मरूपा महत साहार उच्यते न चितरमनुष्यबद्भगवति कवलाहारी भवति तस्मानितालानिम्त्परते कर्य भगवानहन देवता फम्पते । कत्र- साहारं भुजानो मनुष्य एव । तथा चोक्तं समन्तभद्रेण भगवता-- मानुपी प्रतिमन्पतीतवान् देवतास्वपि च देवता यतः । तेन नाथ ! परमोऽसि देवता प्रेयसे जिनवृप! प्रसीदनः॥१॥ सुवेदनायां कबसाहारं मुंजानो भगवान् कथमनन्तसौल्यवानुच्यते वेदनापां मुराच्छेदयादित्यादि प्रमेयकममार्तण्डादिशु पावलाहारस्य दिवा इसे पान्तरं ।

१०२ पद्माभृते- निषिद्धत्वात् , स्त्रीमुक्तरपि । शरीरपर्याप्तिः । तह इंदियाणपाण- मामा य तथा इन्द्रियपर्याप्ति , आनप्राणपर्याप्तिः कोऽयः उग्यासनि.. श्वासपर्याप्तिः, भाषापर्याप्तिः, चकारात्मनःपर्याप्तिः, एवं कायवाङ्मनसा सत्तायां सन्यामपि भगवत कर्मचन्धो नास्ति जीवन्मुक्तल्यात्तस्य । तथा चौक्त- काययाश्यमनमां प्रवृत्तयो नामस्तय मुश्विकीया। नासमीक्ष्य भवतःप्रवृत्तयो धीर' तायकमचिन्त्यमादितम् ॥१॥ पजत्तिगुणसमिद्धो पदपर्याप्तिगुणसमृद्ध संयुक्त । उरामदेवो हपइ अम्हो उत्तमदेयो भवत्यर्हन् न तु हरिहरहिरण्यगर्भादय उत्तम- देवा भवन्ति नेपो दोपसद्भायात् । उक्त च मुदिणाधोक्षजेशानशाक्यगूरपुरासराः। यदि रागावधिद्यानं कथं तपासता भयेत् ॥ रागादिदोरमभूतियाऽमीपु सदागमात् । भगतः परपोरस्य गृहीती पातकं महत् ॥ २॥ मजम्तिटोलमाचितः श्रीगना श्रीपतिः स्मृतः। अर्धनारीदारःशमुस्तपाप्येा किलासा॥३॥ पंच वि इंदियपाणा मणवयकारण निणि पलपाणा। आण पाणापाणा पाउगपाणेण होनि दहपाणा ॥ ३५॥ पमानिन्द्रियाणा मनोवय कार्य प्रयोजमणा । भानप्रामाणात भायुयान मन्ति त्राणा' । पंच वि इंदिपपाणा इन्द्रियाणा. पन मन्तिामणविमाएण নিশি ঘষা মনীৰৰ পান্নাসায়ী মনিক। আশা- पयाणा मानप्रमाणा रामनि सामाग एक प्राग । आउ.

योधमागत। १०३ गपाप होनि दहपाणा आयुषप्राशन प्रला सामाणा भवन्ति । पथा सायुःशासन मान्तो ममकालिंगे परीत राया जा चुकारान्तोऽ पि नसके पति । एमाणा भवन्तीति गम्यं । मशुयभवे पंचिंदिय जीवहाणनु होइ चाउदसमे । पदे गुणगणजुनो गुणमारूदो हवइ अरुहो ॥ ३६॥ माजम पंचन्धियों जीपरमानेषु भवति पर। (गायुषो गुनासो गरिन । मणुयभवे पंचिंदिय मनुजमोऽहन कप्पते पंचेन्द्रियोऽहन्नुष्यते। जीवाणे होइ उदममे जीवस्थानेषु मध्ये चतुर्दशै स्थानेऽईन् भवति अयोगवल्याईन् भवतीति भावः । एदे गुणगणजुनो एत. हुणगणयुक्तः । गुणमारूढो हबइ अहो गुणस्थानमारूढोऽर्हन् भवति गुणस्थानापरतः सिर उच्यते इति भावः । जरवाहिदुक्खरहि आहारणिहारवन्जिय विमलं । सिंहाण सेल सेभो पत्थि दुगंछा य दोसो य ।। ३७॥ जरायाधिदुःरारहितः महारनौहारपतिः पिमतः । मिहामः रोज स्पेदः नास्ति दुर्गन्ध दोपथ ॥ जरवाहिदुक्खरहियं जरारहितो व्याधिरहितः दारीरमानसागन्तु- दुःसरहितोऽन् भवति, प्रारते लिंगभेदत्वात् जरवाहिदुक्यरहियं इति नपुं. सकलिंगनिर्देशो झातव्यः एवमुत्तरत्रापि । आहारणिहारवज्जिय आहारनिहारबर्जितः करलाहार हितोऽईन् भवति नीहाररहितो बहिर्भू- मिवाधारहितः । अनेन यास्येन श्वेतपटमतं निराकृतं । विमलं दारीरे मलमहतो न भवति । सिंहाण खेल सेओ सिंहाण: नासायां निधियं. मूरगाथा पाठः - १०४ पद्माभूते- मलो न भवति, सेला निष्ठीवनमर्हति नास्ति, खेदय शरीरे प्रवेदोऽ. ईति न यर्तते । जत्यि दुगंछा य दोसो य अन्यदपि जुगुप्साहेनु भूतं किमपि पिटकादिक (महनि न वर्तते । दोपय यातपित्त, लेष्माणोऽहति न वर्तन्ते। दसपाणा पज्जत्ती अहमहस्मा य लक्सणा मणिया। गोसीरसंसघवलं मंसं रुहिरं च सव्यंगे ॥ ३८॥ दशप्राणा पर्याप्तय. भटमहयाणि च लगानि भगितानि । गोक्षीरशसधवल मास इधिर च सर्व। दसपाणा पज्जत्ती दशप्राणाः पूर्वोक्तलक्षणा अर्हति भवन्ति, पद्- पर्याप्तयश्चाहति भवन्ति । असहस्मा य लसणा मणिया अटा- धिक सहस्रमेकं लक्षणानां भणित। तत्र नवशतानि तिटमसकादीनि व्यञ्जनानि भवन्ति, अष्टाविक शतं टक्षणाना भवति । तथा चोक्तं--- प्रसिद्धाटसहस्रद्धलक्षणं यां गिरां पतिम् । नाम्नामष्टसहनेण तोटुमोऽभीष्टसिद्धये ॥ १॥ तेषां टक्षणाना मध्ये कानिविदुच्यन्ते । तथा हि। श्रीवृक्षः, शखः, अम्ज, स्वस्तिकः, अंकुश , तोरण, चामरे, श्वेतच्छत्रं, सिंहासनं, ध्वजः, झपी, कुंभी, कर्मः, चर्क, समुद्रः, सरोवर, विमानं, भवन, नागः, नरनायौं, सिंह, याणः, धनु , मेरु., इन्द्र, गगा, पुर, गोपुर, चन्द्रसूर्यो, जात्यय, व्यजन, वेणु, वीणा, मृदंगः, सृजौ, पट्टांशुक, आपणः, कुडलादीनि विचित्राभरणानि, उद्यानं फलिनं, मुपककलमक्षेत्रे, नद्वीपः, वनं, मही, लक्ष्मीः, सरस्वती, सुरभि., सौरभेय , चूडारत्ने, महानिधिः, कल्पवही, हिरण्य, जंक्ष , गरुडः, नक्षत्राणि, तारकाः, सौधः, ग्रहाः, सिद्धार्थपादपाः, प्रातिहार्याणि, मगलानि, एवमादीनि अष्टो- .

बोधप्रामृतं । १०५ तरं शतं सक्षणानि । गोखीरसंखधवलं गोक्षारवन्ध्खयबलमुज्जलं । मंसं रुहिरं च सच्चंगे मांसं गोक्षारषद्धयले रुधिरं गोक्षारववलं सङ्गि सर्वस्मिन् शरीरे। परिसगुपोहिं सव्वं अइसयवंत सुपरिमलामोयं । ओरालियं च कायं णायच्वं अरुहपुरिसस्त ॥ ३९ ।। इंसगुलः सर्वः अतिशयपान सुपरिमलामोदः । सादारिकप पारदातम्यः अहंन्पुरवस्य ॥ एरिसगुणेहि सव्वं ईदृशगुणैः संयुक्तः सर्वः कायोऽहत्पुरुषस्य ज्ञातन्यः इति सम्बन्धः । अइसयवंतं सुपरिमलामोयं अतिशयवान् सुष्टु अतिदायेन परिमटेन विमर्दोत्थगन्धेन कर्पूरादिना सश: आमोदो गन्धविदोपो पत्र फाये स सुपरिमलामोदः । ओरालियं च कार्य पर- मौदारकः फायः शरीरमहत्पुरपस्प भवति स्थिरः स्थूलरूपयक्षुर्गम्य सौदारिफ उच्यते । णायचं अरुहपुरिसस्स ज्ञातव्यो वेदितव्यः फापोऽहपुरपस्य श्रीमद्भगवदहत्सर्यशीतरागरय दारी बातम्पमित्यर्थः । मपरापदोसरहिओ कसायमलवजिओ य सुविसुद्धो । चित्तपरिणामरहिदो केवलभावे मुणेपन्यो ।॥ ४० ॥ मदरागोपरितः पायमस्वतिय मुधिरः। रिसपरिपानरहितः रेलमारे पादयः ॥ मपरायदोसरहिओ मदरहिलो रागरहितो दोपरहितः । कमाय- मलपजिओ य मुपिमुद्धो गया: मोपमानमापालीमाः, मटा हास्परस्परतियोकभपउगुप्मारतीपुलसपाट क्षमा नोकपापास्तवातोर- रितः, मुविपुः शारागाति । चित्तपरिणामरहिदो मनोव्यापा- सहितः । केबलभावे सुपेययो क्षापिकामा मुन्तिको हातम्यो मिति ।

१०६ पहाभूते- मम्मदंसणि पस्मइ जाणदि णाणण दव्यपजाया । मम्मत्तगुणविमुद्रो मायो अमहम्म गायल्यो ।। ४१ ॥ मम्यदर्शनेन पश्यनि जानाति मानेन पायर्यायान् । गम्यमत्वगुणनिशुः माय अईत मातभ्यः ।। सम्मदंसणि पस्सइ सम्यग्दर्शनेन पश्यति सम्यनिस्तुपतया दर्श- नेन सत्तारूपलक्षणेन पश्यति वस्तुस्वादपं गृहाति । ज्ञाणदिणाणेण दव्यपज्जाया जानाति ज्ञानेन केवलज्ञानन विशेषगीचरण साकार- रूपेण सम्यग्जानाति द्रव्याणि जीवपुगधर्माधर्मवालाकारालक्षणानि । सम्मत्तगुणविमुद्धो सम्यक्त्वगुणेन क्षायिकसम्यक् येन विशुद्धो निर्मल । भावो अरुहस्स णायन्यो भावः स्वम्प अहंत मर्यज्ञस्य ज्ञातम्यो वेदितव्यः । अरहंत- इति श्रीवोधमा नेऽहंदधिकागे दशम समाप्तः ॥१०॥ अथैदानी प्रत्रभ्यास्वरूपं निरूपपन्ति श्रीकुन्दकुन्दाचार्याः सप्तदश- गाथाभिरिति- सुष्णहर तरुहिहे उजाणे तह मसाणरासे वा । गिरिगुहगिरिसिहरे वा भीमवणे अहव वसिते या ॥४२॥ शून्यगृहे तरूमूले उयाने तथा मशानवासे था। गिरिगुहागिरिशिखरे वा भौमदने अथवा वमती वा ।। मुण्णहरे तरुहितु शून्यगृहे निवास कर्तव्य प्रग्यायतेत्युपस्कारः। तरुहिद-वृक्षमूले स्थातव्यं । उज्जाणे उद्याने कृत्रिमयने स्थातव्य । तह मसाणवासे या तथा इमशानवासे या पितृवनस्थाने स्थातव्यं । गिरि- गुहगिरिसिहरे वा गिरगुह गिरेर्गुहायां स्थातव्ये, गिरिशिखरे वा पर्व- तोपरि स्थातव्यं । मीमवणे अब वसिते या भीमकने भयानकायाम-

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१०८ पद्माभृते- नयनपचतुःशतानि च सप्तचनपतिः सदनगुणितापरच । पंचाशत्पंचवियत्महताः पुनरत्र कोटयोऽष्टी प्रताः॥१॥ भकृत्रिमचत्पालपाना सख्या यधा---एकाशीत्यधिकचत्वारि शतानि सप्तमवतिसहसाण पट्पचा शल्रक्षाणि अष्टौ कौटयो भवति । एकैक चैत्यालयेऽशाधिक शत प्रतिमाना भवति । तासो संख्या पथा-- पंघकोडिसया पणयासा लक्खा छप्पणमसगीसा। चउर्मय तह अडयाला शिणपष्टिम भकिहिम यंदे ॥१॥ नवरातकोटया पंचविशनिकोश्यश्च पेट्पंचाशल्लमा सप्तविंशति- सहसामोरे शतानि अष्टचल्याशिदधिकानि भवन्ति । ज्योति मन्तगणा च च पालयानो माध्या नास्ति। जिणग्गे जिणारा विति जिनमार्गे जिनशामने जिनवग विदन्नि जानन्ति । मल, साथ, शात्र, पुस्तके, मिनमाने, प्रतिमाय एनामयं वन्य मुनीना प्रायकाणां च सम्प. मीना वर्थ ध्यानावलम्पनीय वस्त्वहन कथयन्ति । न न मानयन्ति नमियायो भय नीति भावार्थ । पंचमहलपना पंकिंदिपगंजपा निरावोगा। मम्झायमाणतुला मुणिग्यमहा पिइन्छति ॥४४॥ पमहानयुत्ता पचन्दियमयमा निया। स्वाश्यार यान युग मुनियरातमा मनि । पंचमदय्ययनुमा मतगुना नपा सत्र- जीवस्यामनिपाका काय मयरमा चायावरण प्रायजतो. -- प्रामापिfanानासन सरपाणि शानि। बनानि नामानि प्रतिमा विमा करे॥॥ म. म. ५विनाशनसान होणपाटेन पेता निम्परिहा समायणप्रायोपपरिग्रहपरित्यक्ता रजनिभाजनवर्जिन एत यस्तु नियनेन्जन्ति मानपन्ति जिनवचनप्रमाणकारियात् । पंचिंदियसंजया निगरसा पंचेंद्रियाणि संयनानि बदानि नित- विश्वेषु प्रवतिन पाहत्तानि निपिदानि यस्ते पंचेन्द्रियसंपत्ताः । निरपेक्षाः प्रयुपकारयान्दारहिता भव्य जायसम्बोधनपरा एनद्वेष्ये नासन्ति । मझायझागजुत्ता स्वाध्यायध्यानयुक्ताः । स्वायायः पंचमकारः, वाचना-शिष्याणां व्युत्पत्तिनिमित्त शास्त्रार्थकयनं, पुन्छना- अनुयोगकरण, अनुप्रेशा-पटिनस्य व्याहतस्य च शाखस्य पुनरूतास चिन्तन, आम्नाय:-शुदपठने, धर्मोपदेशः-महापुराणादिशाबस्य मुनीनां श्रावफादीनामप्रती व्याख्यान विधानं । प्यान-आर्तध्यान द्रम्यान परिहत्य धर्मपानरयानवये प्रवर्तनं विधिनिषेधरूपं । मुगियरवस- हा णिइच्छंति मुनियरवृषभाः सर्वपापण्डिम्पोऽधिकोष्टाः सर्वलोक- प्रशंसनीयाः परमार्थपतयः दिगम्यग नि-अतिशयेनेच्छन्ति येध्यं यान्ति पुन:पुनरभ्यास युर्वन्ति । गिहगंधमोहमुका बावीसपरीसहाजि अकसाया। पावारंभविमुशा पला एरिसा भणिया ॥४५॥ महान्यमोहना द्वापिंसानिरीपजिदम्याया। पापारम्भावनुक्षा मनमा इंडसी भनिता ॥ गिहगंधमोहमुक्का गृहस्प नियातत्य, सन्यस्य परिकलस्य बासस्य दशप्रकारस्य मोहेन मुता ममेदं भावरहिता अनन्या दीक्षा भवति । के ते दश बाहापरिहा: । क्षेत्रं सस्याधिकरणं । वास्तु हिय रूप्य- दम्मादि। नुवर्ण कांचन । धनं गोमहियादि । धान्यं प्रासादि । दासी कर्मकरी । दास: धुनसकवर्गः कर्मवरः । हुम्यं क्षौकातिलौशेषत्रammam ११० पद्माभृते- न्दनागुर्वादि । चतुर्दशाम्यन्तरपरिग्रहरहिता । के ते चतुर्दशाभ्यन्तरप- रिग्रहा. -- मिथ्यात्ववेदी हास्यादिषट् कपायचतुष्टयं । रागद्वेषां च संगाः स्युरन्तरद्वाश्चतुर्दश ॥१॥ बारीमपरीमहाजि अकमाया द्वाविंशतिपरीपहनिप्राम्या भवनि के ते द्वाविंशतिपरीपहा । क्षुधाजपा, पिपामा-तृपाजयः, गीतजयः, उष्णजय , दशमशकसर्वोपघातमहर्न, नग्नन्वसहन, अरतिजयः, श्रीप- रीपहजय., चर्या-गमन तम्य जय , निषद्या-उपवेशन तस्य जयः, शघ्या. सहनं, ओक्रोश जय अनिष्ट्यचनमहन, वधसहन, याचनसहन न किमपि याचने, अन्लाभमहनमन्तरायसहन, रोगसहन, तृणस्पर्शसहन, मलसहनं लोचमहन च, मत्कारपुरस्कार पूजाया अकरणस्य सन्माना• ग्रामनादानस्य च सहन मत्कार पुरस्कारजयः, प्रज्ञापरीपहजयो ज्ञानमदनि- राम अज्ञानोऽयनिति वचनमहनमज्ञानपरीपहजय , अदर्शनपरीपह- जयो लन्ध्यभावमहनं । तथा चोक्तमुमास्वामिना- शुरिपागाशीतोष्णशमशकनान्यारतिस्त्रीचयो- নিত্যাঙ্গাত্মঘবান্তনামামলা- मलमत्कारपुरस्कारप्रशाशानादर्शनानि । अकमाया-यापायहिता प्राण्या भवति । पासाग्मविमुका पारा- रम्मचिमुका सेवाशपिचाणिम्यादि पापाभम्तम्मानिमुना। इयनेन किमुर्त भवति याविटमधा जैनाभामा वदन्ति न प्र-युक्त. बीगु गरिधीयो उम्ममण रिय कामुग गि। सावत्रणमाणाण गणा गिदपिय यह ॥१॥ वनानि पीक. इद्राशन नाम्नि प्रामु माहिती माव नदिमम्यते गणयति गाशि wrin कवनि पाजायंकाविया जीवन् । मान शामलनी पार प्रवरं समयनि.

बोधप्रामृतं । फच्छरोत्तं यसाहिं वाणिजं फारिजण जीपंतो। पहंतो सीयलनीरे पाय पर समजेदि ॥२॥ पबन्जा एरिता भणिया प्रनमा दीक्षा ईशी भगिता । घणधण्णवत्यदाणं हिरण्यसयगासणाई छत्ताइ । सुदाणविरहरहिया पवना एरिता भणिया ॥ ४६॥ मनपान्दमदान दिपापनासनानि मादि। मानविरहरहिना नपाली मनिता ।। धगधग्गवत्यदाणं धनं नादि, धान्य गोधूमादि, वसं पटाम्बरादि एतेषां दानं विधार्न गुनयो न कुर्वन्ति । हिरणसपणासणाइ छ- पाइ हिरप गम्पपटित नानक नुवर्णघटितं नागकं तामरूपमिश्रध- टितं नाग फेलामादिघटित नागफ हिरमनप्यते तदानं मुनपो न पुरन्ति । सपनं या पट्ग पल्पसः तदान गुनपो न कुर्वन्ति ! सामने पीर आदिदाशार पालं. मानने आदिशन्दामाजाचाम- गदिक गुन्को न ददति । पदापपिरहरहिया पुस्तितदानस्य विशे- पेजमान रहता। पपन्जा एरिता भलिया प्रनमा दोहे- ती मागिता शो नमस्वामिना दारेज तता प्रतिपादिना। एपनेन थेऽनन्तसरारमितभारतीयादेशमारप्रभृतयः सम्पासिका अपि सन्तः निमानि दानि दाति नम्मत निगइ मिति नाम:। मनमिर्गव नमा पसंतपिंदामल दिलदिनमा । तुरकर नमभारा पाना एरिमा भनिया ॥४॥ मला। पोसnet ममिने व मना तिनु म पसंमपिंदाजनहितालिममा उनको दिमाई, पद्मामृते- सम्धी निरन्तरायभोजने, अठन्धी भोजनाचतराये च समा सहशी प्रतम्या भवति । तणकणम समभावा तृणे, कनके मुवर्णे च, समभाया मना- दरादारहिता । पचम्ना एरिमा मणिया प्रनन्या ईशी मनिता चिरन्तनाचार्य प्रतिपादिता। उत्तममझिमगेहे दारिदे ईमरे निरावेरखा। मयत्य गिहिदपिंडा पन्चज्जा एरिसा मणिया ॥४८॥ उत्तममप्यमगेहे दरिदे ईश्वरे निरपेक्षा। रामगृहीतपिण्डा प्राण्या इरशी मागिता ॥ उत्तममज्झिमगेहे उतमगृहे उत्तगतोरणादिसहिते राजसदनादौ, मध्यमगेहे नीचहे तृणपर्णादिनिर्मिते, निरपेक्षा उई भिक्षार्थ गच्छामि नीचैर्गृह अहं न बजामि न प्रविशामीत्यपेशारहिता प्रत्रया भवति । दारिदे ईसरे निरावेरखा दरिद्रस्य निर्धनस्य गृहं न प्रत्रि- शामि, ईश्वरस्य धनवतो गृह प्रविशाम्यहं निवेशे इत्यपेक्षारहिता प्रवल्या भवति । सव्वत्थ गिहिदपिंडा सर्वत्र योग्यगृहे गृहीतपिण्डा स्वीक. ताहारा प्रवज्या ईदृशी भवति । किं तदयोग्यं गृह यर भिक्षा न गृह्यते इत्याह- गायकस्य तलारस्य, नीचकोपजीविनः । मालिकस्य विलिंगस्य पश्यायास्तलिकस्य च ॥१॥ अस्थायमर्थ-गायकस्य गन्धर्थस्य गृहे न भुज्यते । तलारस्य कोट- पाटस्य, भीचकोपजीविनः चर्मजलशकटादेहिकादेः पावकस्यापि गृहे न मुज्यते । मालिकस्य पुष्पोपनीविनः, विलिंगस्य भरटस्य, वेश्याया गणिकायाः, तैलिकस्य घांचिकस्य । दीनस्य सृतिकायाध ठिपकस्य विशेषतः। मद्यविक्रायणो मद्यपायिसंसर्गिणश्चन ॥२॥ 11 । योधप्राभृतं । ११३ निस्प धारकोऽपि सन् यो दोनं भारते। सूतिकाया या वाठ- जनन फारपति । अन्यत्सुगमं । शालिको मालिकाधव कुंभकारस्तिलंतुदः। नारितधेति विशेया पंचते पंचकारवः ॥३॥ रजफस्तक्षरय अयानुवर्णफारफः एपत्कारादयधेति कारवो यहयः स्मृताः ॥ ४ ॥ रित भोजनं गेहे यतिना मोतुमिच्दुना । पयमादिकमप्यन्यचिन्तनीयं स्वचेतसा ॥५॥ परं स्वहस्तेन एतः पाशो नान्यत्र दुरशां। मन्दिरे भोजन यस्मात्सर्वसापपसंगमः ॥६॥ जिग्गंधा पिस्संगा णिम्माणासा अराय णिहोसा गिम्मम निरहंकारा पचन्जा एरिसा भणिया ।।४९।। निन्या नि निर्माना राणा सिपा। निमा मिरारा प्रमरपाली भनिता ।। पिगंधा पन्द्रिता,जानि-अतिसापयदिः यः शास: सहिता किया। निस्संगातीप्रमुखसमहिना, अथवा निधिनः सोमनः औ- देश संयुका निस्संगा. सध्या निर्मितगामि वागरपाहेष सहिता। प्रागपातलोकपपरतिमतिमा तेन मोदौमितेन प्राधिगत मुदेशो द्विमनृपतिपचिपापाट्रपूर्णः । भभल्लोपादितः म्यमनपरिजनोन्मोदिनी पीतमोहे- मियापरमाररोगापरत ति पनिमंशीर्तनायः॥ ही पीनधिमिरमाया ताबारमाहीति क्षेत्र !- मांपाप तहानियही उरंप नीमच। संपर TET पास्म ॥१॥ ......। YPerrier Red HTTER TARरा.. ..

पद्माभूते- कुरूपिणो हीनाधिकाङ्गस्य कुष्ठादिरोगिणच प्रत्रश्या न भवति । गिम्माणासा निर्माना अष्टमदरहिता, निराशा आशारहिता। उक्त च- आशागतः प्रतिग्राणि यस्मिन् विश्यमणूपमं । कस्य किं कियदायाति पृथा यो विषवैपिता ॥१॥ अथवा-- माशा दामीकता येन तेन दासीहतं जगत् । भाशाया यो मयेदासः स दासा सर्वदेहिनाम् ॥१॥ निरया अवरहिता सदुपलक्षणं गजपादीनो । अराय रागरहिसा, अथया प्राण्यायो रामभिः सह स्नेहादिक न फर्तय, सदुपटक्षण मञ्यादीना प्रत्यक्षनरकपातययाग्यातत्यात, फेविध जिन- धर्मप्रभायनाय मुनीना मुस्थित्यर्थं च तनिषेध न कुर्वन्ति म्लेच्छादिपी- डानिगकरणहेतुयात् । णिदोमा अप्रीतिलक्षण देपरहिता, अथवा यात. पिनमाविदोपहितस्य प्रनया भवतीति निर्योगा। णिम्मम निर्भमा ममेलि शम्दोऽव्यय निर्गतं ममेलि यम्यो प्रनग्यायो सा निर्ममा, भूपया मध माघ ममे निर्गले म दे पाया सा निर्ममा मयमासमधुमकारप्रपर. हिमा मीरवीकारसहिताचेयर्थ । तथा चोक्त-- मायिनीहमिग्यारस्य प्रायोफ्याधिपतिर्मय।। पोनिगम्यतय प्रोगाम्यं परमारमना. गिरईकाग अशाहिना कमरिया गाना मुगावा दुसया जीवस्य कोन मति मां नमन कानाम्यमित्यर्थः । तथा चोक समानदेशाकिमिमणिना- বিগ ব্যােশানা। मनापानी जम्नुरई विधाता मंदापाणिनि गाम्यवारि यादी...।

बोधमाभतं । सहपकाविति फोऽर्थः ! मुखादिकार्योत्पादकोनु मरतंत्रादिसहका- रिकारण मिलिया। सयथा गिरहंकारा-गिरह-निरचं निम्मा सर्वसाय- दपोगरहिताचे यथा भवत्येवंफारा, फस्पा गुस्बुदकस्वभावस्प निजारम- स्वरूपरल । आरासनीपतो पति कारा, चिचमरकारक्षणज्ञापफरत्र भाषटंकोत्पानिजामनि तल्लीना नया भवतीति ज्ञातन्यं । "पापनिया- विरमणं परणं फिलेति" पचनात् । पचना प्राप्पा दीक्षा । एरिसा ईशी तरक्षमा । भणिया गौतमत्वामिना प्रतिपादिता। मिष्णेहा णिल्लोहा, गिम्मोहा णिनियार णिमालुमा । गिन्मय गिरासभावा पबना एरिमा भागया ||५० ॥ निःस्नेहा निभा निर्मोहा निर्विधारा निधन। निर्भमा निराशभावा प्राग्या देशी भांपता ॥ मिष्णेहा निःस्नेहा पुत्रफटत्रमित्रादिस्नेहगीता, अथवा तैलायम्पा- रहिता निःस्नेहा । णिल्लोहा हे मुने ! हे तपस्विन् ! तवेदं वस्तु वसा- दिकं दास्यामि मम गृहे भिक्षा गृमतां भवतेति लोभरहिता, अथवा सुवर्ण- रजततातापतनागादिभाजनविवर्जिता निलोमा। गिम्मोहा दर्शनमोहो मिप्यावं त्रिविध चारित्रमोह: पंचविंशति फारस्ताभ्यामपि रहिता निर्मोहा, अथवा निधिताया सकलंकदेवतमन्तभदविद्यानन्दिप्रभाचंद्रा- दिभित्ताफिनिधारिताया माया प्रत्यारोन क्षगोपलक्षिता प्रमाण- दूपत्य हो वितर्को विचारणा यस्यां प्रनम्मा सानिहा। गिनि. यार निर्विकारा पसाभरणादिवेषविकाररहिता निर्विकारा, अयवा निधितो विचारो विवेको भेदज्ञानं यत्वां सा निर्षि वारा, आमा पृथर कर्म पृथर इति विवकोपता । उक्तं च- निरी.

पद्माभूते- मानुष्यं साकुरो जन्म लक्ष्मीक्षिाकृतमता। घियेकन विना सर्य मध्येतन किचन ॥१॥ भन्यम- मारमा मिन्नस्तानुगतिकम मिन्नं सयो- प्ररयासतभनि पिसता सापि भिन्ना राधेश । काशंत्रप्रापमपि यत्तय नि मतं मे मिनं जिनं निजगुणकलारशतं मयमेतत् ॥ १॥ मिालुमा निकानिपाणिग्मय निर्भया सतभयरहिता। गिगगमा निगमागा आशारहितभावा। पपग्जा परिमा मणिया मापा जी मणिता यापमनानेति शेषः । जानायव्यगरिमा पालं विषमुभ गिराउहा रांगा । परक्रियनिलयनिरागा पयामा परिगामणिया ॥५१॥ यामा माबिमा निराधा शान्ता। यनितामा मायाशी भणिता जहाजायरूरगग्गिा या जानापमाशा नमा पर्यः । प्रारंपियमुत्र यातना प्रायण कार्यालयमा पभागनादि विमान मानापामोदिनुगमगा गुमित । मांगा पीर गुम्बामन ॥१॥ नाएका भण- गुनानामुष्टोमागमालिनानि मा... गमगात्रानिम्नाधो म पान॥ निगरमा निगम engोता, मा निगम प्राणा न. Re Rime .

वोधप्राभूत। प्रदेशान् हन्ति गछतौति निरायुही । संता शान्तपा सरस्वमावा। परकिपनिलपनियामा परेण फेनचिकृते निलये उपाश्रये निवासः स्थितिस्पा सा पाकृतनिलयनिकासा सर्पवत् । पलना एरिसा मणिया प्राण्या दीक्षेसी भणिता प्रतिपादिता प्रियकारिणीपुत्रेगेति शेपः। उपसमखमदमजुचा सरीरसकारवाजिया रुक्खा । मयरायदोसरहिया पवजा एरिसा भणिचा ।। ५२।। रामनारनपुटा सरीरमासारवर्जिता रक्षा। मदतगदोपहिता प्रयास भनिता ॥ उवसमसमदमजुत्ता उपरामेन फर्मक्ष्येण निर्जरपा संवरेण सफर. परिणामन या युक्ता, क्षमपा उत्तमानप युक्ता । क्त व शुभचन्द्रेण योगिना- आपटोऽहं तो नए इतो पान द्विधारतः । मास्तिो न हतो धर्मो मदीगाऽनेन याधुना ॥१॥ दमेन पुता जितेन्द्रिपा प्रतापपना का। सरीरमरकारवज्जिया रिसंस्कारवाहिता दसनसामुग्गय महामहिला । खसा सहायकरिता । मयरापदोनगडिया मदररिता नापाररिता था, प्रतिमहिना निलमदीना दोषी या मनादिष्पताचा- रहतेन हिला । पयजा एनिमा मनिपा सम्माभिकी भनिता प्रतिदिन निरनत रोषः। पिपर्यापमृरभाषा नाकम्मा पहामिदना । मम्मचगुणविमुद्धा चम्चा एरिमा भपिया ।।५।। Farmire

पटनाभृते-
विवरीयमूढमावा विपरीतमूहमावा विशेषेण परि समन्तात् इतो
गतो नटो मूढभावो जडतास्वरूपं यस्याः सा विपरीतमूदभावा। पणह-
कम्म पट्टमिच्छत्ता प्रणष्टानि कर्माण्यष्टौ यस्यां सा प्रणरकाष्टा नष्ट-
मिध्यात्वा पचमिथ्यात्वरहिता । उक्तं च-
श्यंत युद्धदरिसी वियरीओ यंम तावसो धिणो।
रंदो विय संसयिदो मकड़ियो चेव अण्णाणी॥१॥
अस्या अयमर्थ -सर्वधा क्षणविनाशवादी युद्ध । महावादी विपरीतः
आत्मानं शाश्वतमेवैकान्तेन मन्यते । तापसो वैनायिका सविनयेन मोक्ष
मन्यते गुणदोपविचारणा तन्मते नास्ति । इन्द्रचन्द्रनागेन्द्रवादी संशय-
मिष्याष्टिः चतुरपरजैनाभामाश संशयवादी किलैयं मन्यते--
सैयदरो य थासंयरो य धुम्रो य तह य अण्णी य।
समभावमारियप्पा लदा मोर ण संदेहो ॥१॥
मस्करपूरणः खल्वेय बदति-
अण्णाणादो मोक्ख णाणं पास्थित्ति मुकिजीयाणं ।
पुणरागमणं भमण भवे भये रिय जीयाणे ॥१॥
सम्मत्तगुणविसुद्धा सम्यक्त्रमेय गुणस्तेन विशुद्धा निर्मला, अपना
सम्पायगुणनि सकिननिकाशितनिििचकिसितामढदृष्टयुपगृहनस्थिती
करणवात्सल्यप्रभावमालक्षणैरष्टभिः सम्यक्त्वगुणविशुद्धा निरोपण निर्मला
पंचविंशतिदोपरहिता मध्याचगुणविशुद्धा । पन्ना एरिमा मणिया
एकान्तो पुदी विपरीतो माझम तापम. विनय ।
एद्रोऽपि संशयित मम्करी चैबाजानी॥1॥
३ स्या. डावा पूर्व द्वादशमे परे गता।
भामती मोर्श शान मातीनि मुनाजीवान।
पुनरागमन प्रम भवे भवे नामित जीवानाम् ॥1॥

योधप्राभृतं । ११९ च्या दीक्षा ईशी भणिता प्रतिपादिता चतुविशतितमेन तीर्थ- तेति शेषः। जिणमग्गे पन्चज्जा छहसंघयणेसु भणिय णिग्गंधा । भावंति भन्वपुरिसा कम्मक्खयकारणे भणिया ॥५४॥ जिनमागें प्रमग्या पदसंहननेषु भणिता निम्रन्या । भावयन्ति भन्यपुरपाः कर्मक्षयकारणे भनिता ।। जिणमग्गे पव्वज्जा जिनमार्गे आहतशासने प्रवस्या दीक्षा। छहसंघयणेसु पट्सहननेषु वार्षभनाराचवजनाराचनागचार्धनाराच- कालिकाप्राप्तास्पाटिकनामम् पट्तु संहननेषु । भणिय णिग्गंथा भणिता प्रतिपादिता श्रीन्द्रभूतिनामगणधरदेवेनेति शेषः । कथंभूता भगिता, निप्रन्या यथाजातरूपधारिणी यतोऽस्मिन् क्षेत्रेऽत्यो निमन्यो हजो यो भविष्यति पंचमकारस्यान्ते स किलाप्राप्तामृपाटिको संह- । भविष्यति तेन पष्टेऽपि संहनने निग्रन्थप्रवज्या ज्ञातव्या। भावंति वपुरिसा भावयन्ति मानयन्ति एतद्वचनं, के ! भव्यपुरुषा आसन्न- व्यजीयाः । कम्मक्खयकारणे भणिया पारम्पर्येण कर्मक्षयफारणे क्षप्राप्तिनिमित्तं भणिता प्रतिपादिता । तिलओमत्त निमित्तं समाहिरगंथसंगहो पत्थि । पावज्ज हवड़ एसा जह भणिया सव्वदरिसीहिं ॥ ५५॥ तिलकोतवमानं समपाझप्रन्यसंग्रहो नास्ति । प्रममा भवते एपा क्या भनिता सदाभिः ॥ तिलओसत्तनिमित्तं तिटस्य पितृप्रियवीजस्य कोशत्य तिष्ठतुषमात्रमपि अभ्रमणपरिमहः । समवाहिरगंथसंगहो " ३ सत्रस्थले सवम एताहगेर पाठः।

१२० पद्माभृते- तिलतुपमात्रसमोऽपि बाह्यमन्थस्य संग्रहो नास्ति न विद्यते । पावन हवइ एसा प्रव्रज्या भवत्येषा । जह मणिया मव्वदरिसहिं पा भणिता सर्वदर्शिभिः सर्वज्ञदेवैरिति । उवसग्गपरिसहसहा णिजणदेसे हि णिच अत्येइ । सिल कटे भूमितले सच्चे आरुहह सव्यत्य ।। ५६ ॥ उपमर्गपरीषहसहा निर्जनदेशहि नित्यं तिष्ठति । शिलायो काठे भूमितले सखि भारोहति सर्वत्र । उवसग्गपरिमहसहा उपसर्गाश्च तिर्यग्मानवदेवाचेतनमवाचतु:- प्रकाराः, परीपहाश्च पूर्वोक्ता द्वाविंशतिः उपसर्गपरीपहास्तान् सहते ते पा सहा सगा उपसर्गपरीपहसहा । णिनगर्दसे हि णिच अत्य निर्जनदेशे मनुष्यरहितप्रदेशे बने हि-स्फुट निन्य तिष्ठति । सिल कहे भूमितले शिलाया दृषदि, काष्ठे दारफलके, भूमितले भूमौ तृणायां वा । सव्वे आरुहइ मव्यत्य एतानि सर्वाणि, आरोहति उपविशति शेते व सर्वत्र बने प्रामनगरादौ या। पगुमहिलसंढसंग कुसीलसंग ण कुणइ विकहाओ। सज्मायझाणजुत्ता पव्यन्जा एरिमा मणिया ॥ ५७ ॥ पशुमहिलायनसंग शीससर्ग नगेनि दिया स्वान्यायग्यानदुत्ता प्रदायाशी भगिता। पमुमहिलसंढसंग यत्र पशवो भान्ति तत्र नम्पीयने, या महिला भवन्ति पत्र पंढा नपुंसकानि भवन्ति सत्र न स्यीयते । कुमीलसंग ग कुणइ विमहामो कुशीडम्य कुत्सिताचारम्य साधुलोकशिक्षापरा- मुग्वस्य संग न करोति-तसंगती दुनिमुत्परते, न करोति शिकपाश्च बाजकथाम्नीक्याभोजनकथाचौरकथाथेनि। मरझायझाणनुसा स्या- चोधप्राभृत। १२१ प्पापेन याचनान्छनानुप्रेक्षामायधर्मोपदेदालक्षणेन पंचविधेन युक्ता प्र. मम्पा भवति, प्यानेन धम्पध्यानशुमध्यानपेन युक्ता आर्त नदुर्शन- दुपरहिता र पच्चजा परिसा भणिया प्रत्रया जैनी दौला ईदशी एत- क्षणविराजमाना भागिता प्रतिपादिता अफलादेवनात शेपः । तवषयगुणेहिं सुद्धा संजमसम्मत्तगुणाविसुद्धा य । सुद्धा गुणेहि सुद्धा पन्चजा एरिना भगिया ।। ५८ ॥ सपोमतगुतीः शुक्षा संरमपम्पयलगुणविता । गुदा गुणः शुमा प्रमश्या ईरशी भाषिता । तपययगुणेहिं सुद्धा तपोभिरिन्छानिगेधलक्षशैदिशभिः, अरहि- सादिभिः पंचभिः रात्रिभोजनपरिहासनपटः, गुणैश्चतुरशीतिरक्षरक्षणैः शुद्धा सवला । संजमसम्मत्तगुणविसुद्धा य संपमा इन्द्रियप्राणसं- यमलक्षणा द्वादश, सम्यक्त्वानि दशप्रकाराणि द्वित्रिसकाराणि च, तेच ते गुणा आमोपकारकाः परिणामविशेपास्तविदा निर्मश प्रनम्या भवति । निसर्ग:मधिगमज सम्यक्त्वं द्विविध, उपसमवेदकक्षायिक- दासम्परत्वं त्रिविधं । "आशामार्गसमुद्भयमुपदेशात्सूपयोजसं पान् । विस्तारार्थाभ्यां भवमवपरमायादेगादं च इत्पापांकथिता: सम्पस्वस्प देशप्रकारा ज्ञातमाः । तद्विवरण वृत. प्रयं यथा- ব্যায়ামযুক্ত যত্তর বিধান রাখা त्यक्तनन्यप्रपंचं शिवममृतपयं धन्माहशान्तेः। मार्गधशानमाहुः पुरुषवरपुराणोपदेशोपजाता. या ससानागमाधिसृतिभिरुपदेशादिरादेशि दृष्टिः॥१॥ १ द्वादानेऽप्युलाः । २ एते प्रमः भोका प्रपोसामे युकाः समिररमा " १२२ पहाभूते- माझWचारसूत्र मुनिनग्णविधेः मुचनं प्राधान: मुक्कामी मूत्रपिरधिगमगतेरर्धमार्थस्य पीजः । अधिभातोपरग्धरममशमयशादीजधिः पदापान मोगणय पुरमा गिमगतान साधु मंझपादिः॥२॥ य' या बारशाही कृतनिरिह न विद्धि विस्तारहर्षि ममाताप्रियनामनाम्यमाणापि।। रदिगाहापासपगमगायोरिपसा याऽयगाढा कलकता fair परमायादिगादेनि कहा ॥३॥ गुदा गुणहि गुद्धा या auryl . या शुद्धा मा शुद्धा 41 mमाण । पराजा रिमा मणिया प्रापा दी. की नात नाना सर । mm भाषगणगुणपनामा बहरियुद्धगम्गगे। गिय निगमग मरणं जहागादं ॥ ५० ॥ + MATINyand नसनमा मज मागानग। प्रायनणगुणाजमा प्रापमा girit...... 1. मग. मानन ! ना || MAHA माण। पनिगुदगम्मन ... या मावि . ना . पम्न नमानामावगाया। भारनियमनात मात्र १ Baramfarm111 गाना are facanaaNA ARTAINM.

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प्राक5. निमविनाशनमा -
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प्रमातिनाभिपवनायते ॥१॥
मिधासोपंधाने चालविला ।
अशोयूनिधो गृशोमागाहने ॥२॥
क्षेत्रातभा फीति पंरता पानानि च।
भापदिारगुणांनीति जास्पादित सापिततिः ॥ ३ ॥
इति निमिः . समिति प्राध्याममपदानि रातभ्यानि। एतेषा
विवरण तैरेव हतं वर्तते । तथा हि...
जात्पादिफानिमान सप्तविंशति परमेष्टिनाम् ।
गुणानाभंजदीक्षा (क्षा) स्तंपु तेप्पमतादरः ॥ १ ॥
जातिमानप्यनुस्मिताः संभजेदहना की।
पती जात्यन्तरे जात्यां याति जाति चतुष्टपी ॥२॥
जाती भवा पात्या ता जागा उत्तमा जति मुनियोति । कस्मिन्
जायन्तरे चतु:प्रकारजातिभेद । कि कुर्माणः ! अस्कमा भजमानः ।
जातिरेन्द्री भवेहिया चक्रिणां विजयिता।
परमा जातिराहन्त्ये स्वात्मोत्या सिदिमीयुपाम् ॥ ३॥
मूत्यादिप्यपि नेतच्या कल्पनेयं चतुएपी।
पुरागरसंमोहासचिव प्रितयी मता ॥४॥

पट्याभृते-
फर्शयन मूर्तिमात्मीयां रक्षन् मूर्तीः शरीरिणां।
तपोऽधितिष्ठेदिव्यादिमूनाराप्नुमना मुनिः ॥५॥
स्वलक्षणमनिर्देश्यं मन्यमानो जिनशिनां ।
लक्षणान्यभिसंधाय तपस्येशनलक्षणः ॥ ६॥
म्लापयन् स्वाङ्गमोन्दर्य मुनिस्प्रं तपश्चरेत् ।
या छन् दिव्यादिसान्दर्यमनियार्य परं परं ॥ ७ ॥
भलीमसाइोव्युत्एटस्वकायममवप्रमः।
प्रभोः प्रभां मुनिया॑यन् भवेत्क्षिप्रं प्रभास्यरम् ॥ ८॥
स्वं मणिस्नेहदीपादितेजोऽपास्य जिनं मजन् ।
तेजोमयमयं योगी स्यासेजोवलयोज्यलः ॥९॥
त्यपत्वाऽखवनशस्त्राणि प्राक्तनानि प्रशान्तभाक्।
जिनमाराध्य योगीन्द्रो धर्मचक्राधिपो भवेत् ॥१०॥
स्यत्तस्नानादमस्कारः संसृत्य स्नातक जिनं।
मूर्धि मेरोरयामोति परं जन्माभिषेचनं । ११ ।।
स्वं स्वाम्यमदिस्यकत्या परमस्वामिनं जिनं ।
सविस्या मेवनीयस्वमेष्यस्येप सगजनः ॥१२॥
स्योचितामनभेदानां त्यागास्यक्ताम्बरो मुनिः।
सिंह विष्टरमायास्य तीर्थप्रल्पापको भयेत् ॥१३॥
स्योपधानाधनात्य धोऽभूग्निरूपधिमुनिः।
-
स्यत्तशातानपत्राणसकलात्मपरिसदः ।
प्रिमियममुदामिनसमासते स्वयं ॥ १६ ॥
विविधव्यतनस्यागादानुष्ठिनतपोविधिः।
घामपणां धतुस्पष्टया ज्यते जिनपर्यये ॥१७॥
उम्झितान (न) कसंगीतधोरः कृस्या तपोषिपं।
स्यादवादुमिनियापुंन्यमाणमयोदयः ॥ १८॥

Relamic या भाग।
ग्राम: १२
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सेप्रचारनुग्गुम्मामाक्षेत्रामुयुष ।
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पिपाप ॥२३॥
আমিমানুষ নানান।
मामोनि परमामा मुगारक्षिमता ॥ २५ ॥
মিমােম্যােন।
परमात्म्यपदमागययास्त मिजगासमा १२५ ॥
स्यगुपोकात त्यपस्या रयत्नयामी महातपाः ।
स्तुतिनिन्दासमो भूपः फायत भुवयरः ॥ २६ ॥
यन्दिस्या पन्धमादन्तं यतोऽनुष्ठितयास्तपः ।
ततोऽयं मन्यते पन्धरनिरागुणमनिराधः ॥२३॥
तो
ऽयमनुप.न फः पादचारी घिचाहनः ।
छतवान पनग/पु चरण-यासमहति ॥२८॥
पारगुप्तो स्तिवावृत्या यतोऽयं तपसि स्थितः।
ततोऽस्य दिव्यभापा स्थापणीयात्ममषिला सभां ।। २९ ।।
अनास्यापितहारपारपातयत्तपः।
तदस्य दिव्यधिजयपरमामृततृप्तयः ॥ ३०॥
त्यतयाममुसो भूत्वा तपस्यस्थाधिरं यतः।
ततोऽयं रससारतः रमानन्दधुं भजेत् ॥ ३१ ॥
किमयदुनोत्तन यादिष्टं यथाविधं ।
स्यजेन्मानासंकल्पस्तत्ततस्तेऽस्य तत्तपः ॥ ३२ ॥

पद्माभने- शानादीन गुणानुत्पादयति मुक्ति गछति । एतदर्थ जिणा रिति के. पिनो जानन्ति। भारविमुदिनिमिरा बाहिरगंयम कीरा चाओ। पाहिग्गामो बिहलो अम्मन्तरंगयजुत्तस्म ॥३॥ मावविशुमिनिमिनं वाचमन्यस्य कियने त्यागः । पाण्यागो फिला भ-यन्तरप्रयागुतस्य । मारिदिनिमिर्ग भावम्यामनो विशुशिलमित कारणे । मा. हिरयम्म की गाओ याचमन्यस्य क्रियते ग्याग बचाई. गोगन गिने । पाहिग्मानी विहलो वापयागो विकलोऽन्तर्ग भनि। अमंतरगयनुराग अन्तरगरिबहसुलम्प गमस्यापि . नाराकासायनानि मात्र या मोत- भावनाहीना परिनमजा गरित। यः पुनातागंगामापी लोक पुर्णमा गा॥१॥ माही न गिम्मद जद पिन गय कोडिकोडीयो। जम्मतगई यगोलंबियहन्यो गलियसायी ॥४॥ भनागपति सीकोरी। मागीन HिERE AIRATमानामा PRITAITATी भी न मन न infri 'नांना काकाहीभीत कग की- । जम्ननगई मhinghT. मन, मिगहल्या wingsm | गति वली परिमन ।

भावप्राभृत। परिणामम्मि असुद्धे गंधे मुच्चे बाहरे य बई। बाहिरगंधवाओ भावविहणस्म कि कुंणइ ॥५॥ परिमाने अपने अन्यान् मुगति सामान् र पदि। पारायलामो भावविहीनस्पकिरोति।। परिणामम्मि अनुद्धे परिणाने मनोन्यापारेऽगुदेऽपि विषय- कपायादिभिर्मलिने सति । गये मुच्चेइ बाहिरे यंबई अन्यान् मु- शति परिमहान् यतादीन् त्यजति पतिनिलिंगधारी मुनिः । वाहि- रंगयचाओ बासन्यत्यागो यत्रादित्यजनं । भावविहणस्स किं कुणड़ मारविहीनस्पामभावनारहितस्य बहिरात्मनो जीवस्य किं करोति, न फिनपि कर्म संबरनिर्जरालक्षण कार्य करोतीति भावार्थः। जाणहि भावं पडम किं ते लिंगेण भावरहिएण। पंघिय सिवारियं जिणउवइदं पवनेण ॥६॥ मानादि भावं प्रपन देिलिोन मावरहितेन । पथिक ! शिवलियः जिनोपदिष्टः प्रयलेन ॥ जाणहि भावं परमं जानीहि भावमामस्वरूपभावनां प्रथम मुख्यं । किं ते लिंगेण भावरहिएण किं तव लिंगेन भावरहितेन किं, न किमपि संवरनिर्जरादिटक्षगं कार्य, अपि तु न किमपि कार्य भवति लिंगन वतादित्यवनरक्षनामस्वरूपभावनारहितेन । पंथिय हे पधिक! मोशमार्गमार्गक! सिउरिपंथं मोक्षनगरीमार्गः। जिण- उवह जिनोपदियः । प्रपनेन यतः कारणादिति शेषः । भावरहिए सउरिम अगाइकालं अणतसंसारे। गहिउझियाई बहुसो बाहिरनिगंयस्वाई।॥७॥ विहीगाव. इति भूतगापाः। किनु कमांक स... पुस्त মনে র বই। বল মার: সুর দূতাষাঃ म एमाभते- सानिम करना मना मनतामा । पहनमितानि पानिपानि॥ माहिमगि भावालिन राष! मामि ARTHITATRA I अगाणाले গলাই না का"HARARI । गहिझिगाई पदगो गृहीसा शितानि बनेकपागन। पाहिनिगरपाई बाRARIE आ ARTITARAM मापा । मीगणणा निग्गिगग दामणगा। नीति नियमाय माहि निणगाणा जी ॥८॥ TAM trim प्रमाafaat जाय ॥ भीगण भरा गाना वा नगनिना at at fafrek Priment ! दापगए. nai "Haram। पनागि निवागं प्रHI EMAIT' 7.41 माfrमाणा जीरा पानी १HANA मा It famIITED I WAR fAafnail Arifafa SEARTim " at 4 पाम Prastu farak farming Twi To जान मfanfarian भावप्राभूत । १३३ जिप पुजहि जिपवर थुपाहि जिणहंम पंडदि माण । जे जिपधम्मिसु रत्तमण ते जाणिवा जाप पपादि फुल्लहि माटिदेइजु सुरनररिडी। पही फरर कुसाटियपु भोलिम जिपवरतणी ॥ सुसयतु सुसभूमिः कामिनं कामिनीव सुतमिव जननी मां शुदशीला भुनक्तु। कुलमिव गुणभूपा कन्यका संपुनीता. जिनपतिपदपभप्रेक्षिणी टिलक्ष्मीः ॥१ एवमय हावा ये जिनजनस्नपनस्तवननयोर्मचैत्यचैत्यालयोचारण- यात्राप्रतिष्ठादिकं महापुर्य फर्म कर्मविपतकं तीर्थकरनामफर्मदापर्क विशिष्टं निदानरहितं प्रभावनाई गृहस्था: सन्तोऽपि निषेधन्ति ते पापा- मानो मिथ्यादृष्टयो नरकादिदुःख चिरकालमनुभवन्ति अनन्तसंसारिणी भवन्तीति भावार्थः। सत्तमुनरयावासे दारुणभीसाई असहणीपाई। भुत्ताई सुइरकालं दुक्खाई निरंतरं महिये ।। ९ ।। सरस्थाने दारभोमानिसहनीवानि । मुटाने नुचिरलं दुःसानि निरन्तर सहित ।। सचमुनरयावासे सतानां मुनरकानां महानरकाणां वासे निवासे सति हे जीवादारुणमीसाई दारणानि तीनागि, भीमागि भयान- कानि । अमहीयाई असहनीयानि असायनि सोटुमराक्पानि । भुत्ताई मुलानि अनुभूतानि । मुहरकालं नुकतीच चिरकालं दीर्घ- फार्म एफनागरनारम्य अपविरासागरोपनपर्यन्तनुःकायुकं । दुःखान्य- साहे. क. रा. ग. पुस्तके मूगा । साहिल इति पाः । तरसुसारे प्रतिः । मनिषा ति. ५. पुस्तके । नाऽस्म तन दतः।

पद्माभृते- सातानि फटानि मुक्तानि निग्न्तरमविछिन । महिप है स्वहित ! हे आत्महित ! किं त्वया आत्मनो हितं कृतमित्याक्षेपः ! सणणुत्तावणवालणवयणविन्छयणाणिगेहं च । पत्तोमि मावरहिओ तिरियगईण चिरं कालं ॥१०॥ सननोत्तापनग्वालनव्यानपिछेदनानिरोध । प्राप्तोऽमि भावरहितः तिर्यग्गती दिर कालम् ॥ खणण पृथिवीकाययं यदा जातस्तदा खननं कुहालादिनाऽवदा- रणदुःखे त्वया सोढं । उत्तावण अकायस्थ यदाभूतस्तदाऽन्युपर्युता- पनदुः त्वया क्षमितं । वालणं अग्निकायिको जीयो यहा व जातस्तदा उबालनदुखं त्वयानुभूतं । वैयण वायुकायिको जीवो यदा त्वे जातम्तदा व्यजनादिनावीजनदुःखं त्वया तितिक्षित । विच्छेयणा हे जीव ! वन- स्पतिकायिको जीवो यदा त्वं उत्पन्नम्तदा विच्छेदना कुठारादिना कर्पण दुःवं त्वया मृपितं । गिरोहं च शंखशुक्तिश्विकगोमिभ्रमग्मक्षिकावली- पर्दमहिपादिकस्त्वं समुत्पन्नस्तदा निरोधादि दु. त्यया भुक्त । इति स्थाव- रत्रसदुःखानि अनुक्रमेण मूचितानि भवन्तीति ज्ञातव्य । पत्नोमि भार- रहिओ प्राप्तोऽसि भावरहितो जिनभक्तिभ्रष्ट आत्मभावनादूरीकृतथ । तिरियगईए चिरं कालं तिर्यग्गती दी कालं असंख्यातवर्षपर्यन्न घनस्पतिकायापेक्षयानन्तकाल चेन्यागमानुमारेण ज्ञातव्यम् । आगंतुक माणसियं महज मारीरियं च चत्तारि । दुक्साई मणुयजम्मे पत्तोमि अगंनयं कालं ॥ ११ ॥ भागन्तुकं मानसिक सहन शारीरिक व चवारि । दुखानि मनुजजन्मनि प्राप्तोमि अनन्तकं कालम् ॥ १तिरय इति मूलगायापाउः। , भावप्राभूतं । १३५ ........... आगंतुक आगन्तुकं दुःसं विद्युत्पातादिकं । मानसिकदुःख साफ- टासादिताउने सति तदप्राप्ती भगति । तथा चोक्त...-- संसारे नरकादिपु स्मृतिपयेऽप्युद्वेगकारीयलं दुःपानि प्रतिसेषितानि भवता तान्येवमेवासताम् । तत्तापरस्मरसि स्मरस्मितशितापाईपनायुध- र्यामानां दिमदग्धमुग्धतरपद्यत्माप्तवानिर्धनः ॥१॥ महर्ज म्याधिशदनोजनं दुः। भागरिय छेदनभेदनादिकं दुःखं । नफार उसनुभपास्तेन एलजनोतमिप्यावयनवणे पददुः भवति सन् फेनापि सोई न दाम्पते । तदुर रटेन महाकविना- उपमपि सासदन्तः सौटुं शयन हालाहलादिग्धं । धारने पुनरफारमपितनलालीफदुर्वचनं ॥ १ ॥ चनारि तानि चत्वारि । दुःखाई दुःपानि । मणुपजम्मे मनुज- जलनि मनुष्यमेवे । पपोनि प्रासोऽनि है जीव ! ल प्रामरानसि मामि । अपनएं कालं अनन्तक कुसितमनन्तं फार सनपनिति । मुरनिन्दपनु मुरन्धरविओयकाले व माणसं तिवं । सपनोमि महाजन दुमं मुहमारगारहित्रो ।। १२ ।। पुरसिमरामोदर र मला योनिमारममा परिन । गुनिल पो । गुरन्तरवितोपकाले देनोवियोमरे द पर देवी राना सा देवगिरे। माल तिमी र मालन नभई दुः, तदा 3T.: मममम नियमन अननसी नाम रिलिज १३६ पद्मामृते- ददाति स तु दुरितक्रमः कथं मया नानुष्ठीयने झ्यादि मानस तोत्रं दुःख हे जीव ! त्वं संपत्तोमि सम्परप्रकारेण प्रामोऽसि अनुभूतया. नसि । महाजम महन् त्रैलोक्यत्र्यापनशीलं यशः पुण्यगुणानुकीर्तनं यस्य स भवति महायशाः तस्य सम्बोधनं क्रियते कुन्दकुन्दाचार्येण हे महायशः 11 दुक्यं मुह मावणारहिओ ईग्मिय दुःखै कम्मात्यान- मित्याह-मुहभावणारहिओ-गुमस्य विशिष्टपुण्यस्य भावनारहितः । कासौ शुभभावना र दर्शनविशुद्धपादय पोडशमावना गुभास्तीर्थकर- नामकर्मोपार्जनहेतुत्वात् । अतिशयेन गुभाऽत्र जिनमम्यक्त्वभावना, मिथ्यान्वभावना त्यतीव पापीयसी। तथा चोक समन्तभद्रेण महाकरिना-- न सम्यत्वसमं किंचिकाल्ये त्रिजगत्यपि। श्रेयोऽधेयध मिथ्यात्यसमं नान्यत्तनूभृताम् ॥ १॥ सम्यक्त्वभावनया एकयापि सीर्थकरनामकर्म बद्धपते पंचदशापर- भावना विनापि । तस्य सम्पस्वस्य शुद्धता चर्मजलघृततैलहिंगुवर्जनेन भवति । अन्येनाप्युपासकाध्ययनादिशास्त्रेणोक्तेनाचारेण विस्तरेण ज्ञातव्या। नथा चोक्त शिवकोटिनाचार्येण-- धर्मपात्रगतं तोयं पुतं तैलं प्रपयेत् । नवनीतप्रसूनादि शाकं नाचारकदाचन ॥१॥ कंदपाहयाओ पंच वि अमुहादिमावणाई य । माउण दयलिंगी पहीणदेवो दिवे जाओ ॥१३॥ कान्दपोत्यादय पंच अपि अशुभादिभावनाश्च । भावयित्वा द्रव्यलिङ्गी प्रहीणदेव दिर मात ॥ कंदप्पमाइयाओ कान्दपी इत्येवमादिका । पंच वि अमुहादि- पावणाई य पंचापि अशुभशब्दादयो भावनाश्च कान्दीप्रभृतयः दप्पमाहियाभो इति. मूलगायापाठः क. पुस्तके, न तु स. पुस्तके । दपमादियाभो इति, ग. प. पुस्तके ।

भावमाभूतं । १३७ पंचागुभभावना इत्पर्य । भाऊण दव्यलिंगी तास्वं भावपिवा द्रव्य- रिंग: सन् । पहीणदेचो दिचे जाओ प्रहांगदेवा-हानदेवः प्रकरेंग नरदेवः फिलिपादिको देवः दिवे-स्वर्ग है जीप ! वं जात सदनः । फास्ताः पंचाामभावना इत्याह-फान्दपी, कैलिपी, आमुरी, सामोही, भाभियोगिकी चेति एताता नामानुसारेणार्थचिन्तनीयः । उक्तं च शुभचन्द्रेश योगिना--- फादपी फैल्लिपी चच भावना चाभियोगिकी। दानी चापि साम्मोही त्यांच्या पंचती च सा ॥१॥ पामत्यमावणाओ अगाइकाले अणेयवाराओ। भाजप दुहं पत्तो कुमावणाभावचीएहि ॥ १४ ॥ पास्यभापना अनादिकाले बनेस्वारान् । भावपित्या दुःर प्रातः कुमारनामावनिः ॥ पासत्यभावणाओ पावस्थभावनाः । अगाइकाले अणेयवाराओ सनादिकाटमादिरहितकाटपर्यन्तं, अनेकवाराननन्तवारान्। भाऊण दुहं पत्तो भावपित्वा दुःखं हे जी ! त्वं प्रात: मातवान् । कुमावणाभा. वशीएहि कुभावनानां भाषा: परिणामास्त एव बीजान्यं कुरोत्पत्तिहेत- वस्तै कुभावनाभावयोः । कास्त: पावस्यांचभावनाः ! यो यस- ति प्रतिबद्ध उपकरणोपजीवी श्रवणानां पा तिप्रति स पार्थस्थः । मोशादिकपापक पितामा मतगुगशीलैः परिहीनः संचस्पाविनयकारी कुशील उच्यते। वैयकत्रन्यौतियोपजीवी रागादिसेवफः संसक्तः कम्पते । जिनपचनानभिज्ञो मुतचारित्रभारो ज्ञानवरणः करणा- स्सोऽवसन लानाध्यते । त्यस्तगुरुकुल एकाकिन्वेन स्वच्छन्दविहारी दिनपचनाको मगचारित्रः परिटम्यते स्वच्छन्द इति वा, एते पंच- १ तथा च. रा. २ तास पंचतवसा ते पुस्तके पाउामूलपुस्तहाना- मेरे इवातितः। -..

पद्मामृते- दीर्घकालमनन्तकालमनादिकाल । अणेयजगणीण मुणिपवर गर्भवस- ति अनेका अनन्ता जनन्यी जाता:, है मुनिप्रयर! हे मुनीनामुत्तम ।। पीओसि थणच्छीरं अणंतजम्मतराई जणणीणं । अण्णण्णाण महाजम मायरसलिलादु अहिययरं ।। १८ ॥ पीतोऽमि स्तनक्षीरे अनन्तजन्मान्तराणि जननीनाम् । भन्यागामन्यासो महायशः सागररानिलादधिकतरम् ॥ पीओमि थणन्छीरं पीतोऽसि पीतवान् धपितयानसि स्तनौर अपवित्र वाहक्षी स्तनदुग्धं । अणंतजम्मतराई अनन्तजन्मान्त- राणि अनन्तभयान्न । जणणीणं जननीनो अनन्तमातणां । अण्ण- ण्णाण अन्यामामन्यासा । महाजम महत् त्रैलोक्यम्यापक पशो यस्य भयनि महायशाम्नस्य सम्बोधन क्रियते हे महायश । मापग्मलि. लादु अहिययर सागरमलिटादप्यविकतर अतिशयेनाधिकतरमनन्त- मागाजलममान। नुह मरणं दुगणं अण्णण्णाण अणपजणीणं । रुष्णाण णयणणी मायग्मलिलादु अहियपरं ॥ १९॥ ना मरणेषन भग्यामामन्याग भनेकजननोनाम् । दिनाना नयननीर मागामलिसात अधिकतरम्॥ तुह मग्णे दुवागणं नय मग्णे मनि दुःणेन कृत्या "डसाद दे इतने उय उम्म तुम्म सम्ह नुमाइ सुमो गुमे तुम तुप हुई तइ नुहा " नि प्राकृतथ्याकग्णगूप्रेश मयशम्दम्य तुल्यादेशः । अण्णा. प्राण अन्यामामन्यामा मानुपीमिहीन्यात्रीमानगि मृगीगोगरीयहगा. को गुमन्नाना। प्रणयनगीण अनेकजननीनां प्रत्येकमनन्तमातृगा। माग बदिताना गयणी याचनयाशन । मायग्गसिलाद अदियया मागरमदिवारिकता प्र-येक गमुद्रनोवादयविकतामनग्न- मरममा भाति।

भावप्राभृतं । भवसायरे अपते छिप्णुझियसपहरणालही। पुंजेइ जड़ को विजए हवदिय गिरिसमधिया रासी ॥२०॥ भरसागरेअनन्ते हिमोतिमानसरनातास्पोनि। पुसको पदिवि देवो भगति चमिरिनषिमा रातिः ॥ भवनापरे अपते भावसागरेऽनन्ते संतारतमुद्देऽन्तरहिते। डिपशु- झियसमाहरणालही हिनानि शितानि नुक्तानि चरेग नराहना हारिफा हिनानि पक्षादुशितानि फेशनसरनालास्थीनि। पुंजेइ जह को विजए पुंजपति रागीरगति पदि चेत् कोऽपि रामसन्तानामतः फरिदेवः । हवादिय गिरिसमधिया रासी भाति च निरपि समधिया राशि फेसादांना अपेफननन्त मेरसमा रारापो भवन्तीति जलथलमिहिपवयरगिरिसरिदरिकुखणाईनबनो। चमिजोसि चिरं काले तिद्वपमझे जगप्परमो ॥२१॥ बनगलगिरिराना मगा। सरिसोनिक मिनुसन्मान ! हे ! है तनानारो उदके पितोऽति दिवान चकम् । पलको भूया। मिहि हिनि ताने। परन पाने । संबर सोमामि । गिनि पति । नरिमति नारदरिस । घरमाई देवकालमनमामि- एसपने दिमाग मटेरियल दने । पनीर! निमोनिविदा कार नयन- दनि सो विना- । पदनामृते- जशुद्धबुद्धकस्यमावचिचमत्कारटक्षणटकोरकीर्णज्ञायकैकस्वमायात्मभावना जिनस्वामिसम्यक्त्वभावनाभ्रष्ट इत्यर्थः । गसियाई पुग्गलाई भुवणोदरपत्नियाई सवाई। पत्नोसि तो गति-ि पुणवं ताई भुजतो ॥२२ ॥ प्रमिताः पुरला भुवनौदरवर्तिनः सरें। प्राप्सोगि सर सृसिं पुनारूप तान् मुंशानः ॥ गसियाई पुग्गलाई प्रसिताः पुगटाः सर्वेऽप्यणवः । भुवणोदर- पनियाई सम्बाई भुवनारदर्तिनः सर्वेऽपि । पत्तोमि तोगनिति प्रामोऽसि तदपि न तृप्ति धृति । पुणरूयं ताई मुंजतो पुनारूप पुन- नवमिनि तान् पुदलान् भुजान । उक्त च पूज्यपादेन गणिना-- भुनोनिता मुटुमाहात्मया मयेऽपि पुद्राला उछिरिषय तेष्यच मम विमस्य का स्पृहा॥१॥ नियणमलिलं मयलं पीयं तिहाए पीडिपण तुमे । नो विगविग्हाडेश्रो जाओ चिनेह भरमहणं ॥२३॥ त्रिभुवनसिक पोतं तम्या पोहितेन पया। नरिणादो जात. निन्त मययनम् ।। निहुयणमलिलं मयनं त्रिभुवनमटि सकले । पीयं वा सया। निदाए तृणाया। पीडिपण पीडितनावगादेन । तुम म्यया भवता । तुम नुमाद तुमे तुम तुम न (3) (0) ९ ते विदर्भ टया " इनिध्याकग्रेग टापचनेन सह युग्मद तुमे आदेशः मावि , मान... माइग, प.. अत्र MIRL arन पनमा लाय. टी 1

भावनामृत ।
१४३
तदपि । एव । तिहाडेओ तृष्णान्छेदः । जाओ जातः । चितेह
भरमहणं हे जीव ! त्वं चिन्तय अन्येपल भवस्य संसारस्य मयन वि.
नाशनं सम्यग्दर्शनशानचारित्रपमिति भावार्थः ।
गहिजझियाई मुणिवर कलेवराई तुमे अणेपाई।
ताणं पत्थि पमाणं अणन्तभवसापरे धीर ।॥ २४ ॥
रहोलोजिसतानि मुनिवर : स्लेवरानि वसा अनेकानि ।
टेप नास्ति प्रम मनन्तभवसागरे पोर ! ॥
गहिउझियाई गृहीतोझितानिा है मुनिवर मुनिश्रेष्टाकलेवराई
फळेवराणि शरीराणि । तुमे अणेयाई वयाऽनेकान्यनन्तानि । तार्ण
पत्थि पमाणं तेषां फलेवराणां नास्ति न विद्यते प्रमाणं गणनमनन्त-
त्वात् । अणतभवसायरे धीर अनन्तभवसागरेऽन्तातीतसंसारसमुद्र हे
धीर : पेयं प्रति पिपरिपतति धीरस्तस्प सम्बोधनं क्रियते हे धीर !
हे योगीवर! भावचारित्रं विनेति शेषः ।
विसवणरत्तक्खयभयसत्यगणसंकिलेसाणं ।
आहारुस्सासागं गिरोहणा खिजए आऊ ॥ २५ ॥
निवेदनारमपरास्वमहमेशानाम् ।
आहारोमासानो निरोधनान क्षोपवे आयुः ।
चिनवेषणरत्तरखपमयसत्यग्गहणसंकिलेसाणं विषवेदनारत
सपभपातहणतीशानो। आहारुस्सासाणं आहारोव्हवात्तानों
पिरोहणा निरोधनात् । सिन्जए आऊ क्षोपते मायुः ।
हिमजलगसलिलगुरुपरपवयतररहणपडणभंगेहिं ।
रसपिअजोयधारणप्रणयपसंगहि विविहहि ॥ २६॥

. १४४ षट्माभृते- हिमज्वलनसलिलगुरुतरपर्वततरोगपतनभने। रसविद्यायोगधारणानयप्रसंगैः विविधः। हिम केपांचिजन्तूना मानवानां च शीतेनापमृत्युभवति । जलण केपांचिञ्चलनेनाग्निनापमृत्युर्भवति । सलिल केपांचित्सटिलेन समुद्रा• दिजलेनापमृत्युर्भवति । गुरुयरपव्ययतरहणपडणभंगेहिं गुरुतरा अत्युनतशिखरास्ते च ते पर्वतास्तुंगीगिर्यादयः, तथा तरको वृक्षा गुरुतर- पर्वततरवस्तेषां रोहणेन पतनेन च कृत्वा ये भंगा: शरीरामर्दनानि ते तथा तैः हिमचलनसलिलगुरुतरतपर्वतरुरोहणपतनभंगैः । रसविलजोयधार- णप्रणयपसंगहि रसत्य विषस्य या विद्या विज्ञान तस्या योगोऽनेकौषध. मेलनं तस्य धारण सेवनमास्वादन अनयप्रमंगश्चान्यायकरण ते रसवि- द्यायोगधारणानयप्रसंगास्तै रसविद्यायोगधारणानयमसंगैः। विविहेहिं विविध नाप्रकारैः । तथा चोक्त लक्ष्मीधरेण भगवता--- अनाप दालिहिपर भरे जिप दुहु भाषा। लपकडियर णुि खोडयई मग्गु सचिखलु दुग्गु ॥१॥ इस तिरियमणुयजम्मे मुइरं उववग्जिऊण बहुधारं । अयमिच्चुमहावर निव्वं पनोमि तं मित्त ।। २७ ॥ इति नियंधनुष्यजन्मनि मुन्दिर उपपच बहुवारम् । अपमृत्युमहादु मं तीनं प्राप्तोऽगि मि इय तिग्यिमणुयजम्म इनि पूर्वोक्तप्रकारेण निर्यअनुष्यजन्मनि । मुहरं मुचिरं मुश दीर्घकाले । उययग्जिऊण यहुवार उपपय टला जन्म गृहीया बट्टवाग्मनेकवार ! अयमिन्महादुर्ग अपमृग्युमदार दुनिलं पनामि ती दु.मममहनीयप्रमाने प्रानोऽमि । तं मिन व भगर हे मित्र हे अन्धा ! हे मुहुन् ।

भावमाभते । छत्तीसं तिणि मया छावहिसहस्सवारमरगाणि । अंतोमुहुत्तमझे पत्तोसि निगोयवासम्मि ॥२८॥ पतिं मीगि सातानि पट्राहिमदवारमरमानि । सन्तमानमध्ये प्राप्तोऽनि निकोतपासे ।। छत्तीसं तिणि सया पत्रिंशदधिकत्रिशतानि । छावहिस्महसवार- मरणाणि पट्पष्टिमहरूवारान मरणानि ६६३३६। अंतोमुहुत्तमझे अन्तर्मुहुर्तमप्ये । पत्तोसि निगोयवासम्मि प्राप्तोऽसि निकोतवासे । वियलिदिए असीदी सही चालीसमेव जाणेह । पंचिंदिय चउवीसं सुदभवतोमुहुत्तस्स ।। २९ ।। विष्लेन्द्रियामाननीति परिचारिकादेव जानौत । पन्द्रियानां चतुर्विशति भुरभवान् अन्तमुहस्य ।। वियलिदिए असीदी विकलेन्द्रियाणां द्वॉन्द्रियान्द्रियचतुरिन्द्रियजी- देपू अनुक्रमेण मरणसंख्यामन्तर्मुहूर्तस्य कति । तथाहि । द्वीन्द्रिया जीवा अन्तर्मुहर्तेन अशीतिकारान् नियन्ते । श्रीन्द्रिया जीवा अन्तर्मुहर्तेन षष्टि- वारान् निपन्त । चतुरिन्द्रिया जीवा अन्तर्मुहूर्तेन चत्वारिंशतं वारान् नि. पन्ती पंचिंदियचउबीसं पंचेन्द्रिया जीवा अन्तर्मुहूर्तेन चतुर्विशति वारान् निपन्ते । खुद्दभवतोमुहुत्तस्स क्षुद्रभवा अन्तर्मुहूर्तस्य क्रमेण ज्ञातव्याः । रयणते मुअलद्धे एवं भमिओसि दीहसंसारे । इस जिणवरेहिं भणियं तं ग्यणतं समायरह ।। ३०॥ रत्नदेसला एवं प्रमितोऽति दीपसंपारे । इति जिनवरैभनितं तत् रत्नत्रयं ममार ॥ रयणते सुअल? रत्नत्रये मुष्ठ बलधे सति । एवं भमिओसि दाहसंसारे एवममुनाप्रकारेण अमितोऽसि पर्पटितवान दाममारेऽनादौ १६.रो.. पट.१.

- १४६ पद्माभूते- संसारे भवे। इय जिणवरेहि मणियं इत्येतरचनं जिनवरस्तीर्थकरपरम- देवैर्भणित प्रतिपादित । तं रयणत्तं समायरह तत्तस्मात्कारणात् तनगत्प्रसिद्ध या तत्त्वं यो रत्नत्रय वा समाचर सम्यगादियस्य वा। तं रयणत्तयं केरिस हयादि । तं जहा । तदानत्रय कारर्श भवति ! सयथा-तदेवनिरूपयति- अप्पा अप्पम्मि रओ सम्माइट्टी हवेइ फुड जीयो। जाणइ ने मण्णाणं चरदिह चारित्तमग्गुत्ति ॥३१ ।। भारमा भारमनि रत सम्यग्दृष्टिः भवति फुट जीवः। जानाति तत् ज्ञान परतीह चारित्रमार्ग इति । अप्पा अप्पम्मि रमओ आरमा आत्मनि रत मामनः अज्ञानपरः । सम्माइही हवेइ फुड़ जीयो सम्याटिर्भवति स्फुट निश्चयनयेन, म्यवहारनयेन तु तत्यार्यश्रद्धान सम्पादर्शन भवति, जीव भारमा सम्य. ग्रशिनि ज्ञातव्यः । जाणइ तं मण्णाणं जानाति से भारमान तास. दहान सम्यग्ज्ञान भाति, व्यवहारेण तु सप्सतयानि जानाति सत्सम्प- रहान भनि । घरदिह पारिसमग्गुप्ति तमामान जीयो यपरति तन्मयो भवनि पात्मन्येकालोलीभाषो मपति, हारिमन् संसारे, चारित्र. मार्ग इति, व्यवहारेण । पापक्रियाविरमण परणं भवति । अण्णे कुमाणमरणं अणेयजम्मतराई मरिमोमि । मावहि गुमरणमरणं जरमरणरिणामणं जीर ॥ ३२ ॥ अन्यम्मिन् मानमरण अनेकप्रन्मानरेगा। मग मुमानमर्ग जन्ममरविनाशन जीव अग्यो हमाणमाणं अन्यस्मिन् मवमम्हे कुमाणमा कुन्मिनमरण- मार्ग या मकवावा अनेक जन्मान्तराष्पनन्नमवार।"भन्या १-१र्व मानि. पुनमगोनिमूदगाचापा भाषप्राभतं । बन्या" इति प्रारत-पाकरणसूत्रेण सप्तम्यर्थे द्वितीया । मरिओसि मृतोऽसि मरणं प्राप्तोऽसि । भावहि मुमरणमरणं भावय सुमरण- माणं पंदितपैटितमरणं । कथंभूतं मुमरणमरण, जरमरणविणासणं जामरणदिनापाने परममोक्षदायफे। हे जीव है चेतनस्वभाव ! তালাননি। समुद्रादिकटोलयत्प्रतिसमयमायुस्त्रु प्रति तदावीचिकामरण स्थिति- प्रदेशचीचिकाभेदात्तद्विविधमध्येकविध । भवान्तरप्राप्तिरनन्तरोपष्टपूर्य- भवविगमनं तद्भवमरणमुच्यते । तत् त्वनन्तशः प्राप्त जीवनति ज्ञातन्यं, तेन तद्भयमरणं न दुलर्भ। अवधिमरणं नाम कप्पते-यो यादृशं मरणं साम्प्रतमुपैति ताशमेव यदि मरणं भविष्यति तदवधिमरणं, तद् द्विविध देशावधिमरणं सर्वावधिमरणं चेति । तत्र सर्वावधिमरणं नाम पदापुर्पयामूतमुदेति साम्प्रतं प्रकृतिस्थित्पनुभागप्रदेशैस्तथाभूतमेवायुः प्रत्पादिविशिष्ट पुनर्मनात्युदेष्यति च यदि सविधिमरण । यत्साम्प्र- तमुदेत्यापुर्ययाभूतं भूतमेव वनाति देशतो यदि तदेशावधिमरणं । एतदुक्तं भवति-देशतः सर्वतो वा साश्येनावधीकृतेन विशेपितं मरण- मरविमरणमिति साम्प्रतेन मरणेनासाहश्यमावि पदि मरणमाअन्तमरण- मुम्पते । आदिशन्देन सान्प्रतं प्राथमिक मरणमुपते, तस्यान्तो विनाश- भावो यस्मिन्नुत्तरमरणे तदेतदायन्तमरणमुच्यते । मातिस्थित्पनुभव- प्रदेशपिशाभूतः साम्प्रतमुपैति मृति तयाभूतां यदि सर्वती देदातो या नोपैति तदायन्तमरणं । बालमरणमुच्यते स च वाल: पंचप्रकारोऽन्य- तयाटो व्यवहारवालो हानवालो दर्शनवालक्षारित्रवालः। धर्मार्थकाम- कार्याणि न वेति न तदाचरणसमर्थशरीरोऽध्यक्तवाला टोकवेदसमयपय- हारान् न येत्ति शिशुवी व्यवहारबाटः । मिध्यादृटयो दर्शनबालाः । वस्तुपायाम्पमाहिज्ञानहींना ज्ञानवालाः । अचारित्राचारिजवाटाः । दर्श- पगाभृते- नपालमरणं विविध इच्छाप्रवनमनिग्लामवृत्तं चेनि । तष्ठाप्रतममिना धूमेन शस्त्रंण विषेणोदकैन मैग्न्प्रपातेनोग्यामरोन शीतपानेनौष्णपातेन रज्या क्षुधा तृपा जिव्होत्पाटनेन विरुद्धाहारसेवनेन च मरणमिग्छामरणं। कालेऽकाले याऽध्ययसानादिना बिना जिजीविषाभग्णमनिम्छाप्रत । पंडितमरणमुच्यते-पंडितश्चतुर्थी व्यवहारपंडितः सम्यस्त्वपडितो ज्ञान- पंडितश्चारित्रपंडितथेति | लोकोदसमयगतम्यवहारनिपुणो व्यवहार- पंडितः, अथवानेकशास्त्रज्ञः शुश्रूयादिबुद्धिगुणसमन्वितो व्यवहार पंडितः । त्रिविधान्यतमसम्यक्त्वः दर्शनपण्डितः । पंचविधज्ञान- परिणतो ज्ञानपटितः । पंचविधचारित्रान्यतमचारित्रपरिणतश्चा- रित्रपंडितः । नरके भवनेषु विमानेषु ज्योतिष्कपु वानन्यन्तरेषु द्वीपसमुद्रषु च ज्ञानपंडितमरणं । मन:पर्ययमरणं मनुष्यलोक एव मरणं । आसनमरणमुय्यते-निर्वाणमार्गप्रस्थितसंयतसार्थात् प्रच्युतः आसन्न उच्यते, तदुपलक्षणं पार्श्वस्थस्वच्छन्दकुशीलससक्तानां । ऋद्धि- प्रिया रसेवासक्ता दुखभारत्रः सदा दुःखकातराः कपायपरिणताः संज्ञावशगाः पापश्रुत्याभ्यामकारिणः त्रयोदशक्रियास्वलसा सदा मलिष्ट- चेतसः भक्त उपकरणे च प्रतिबद्धा निमित्तमंत्रीपघयोगोपनीविनः गृहस्थवैयावृयकरा गुणहीना गुप्तिसमितिश्वनुयता मन्दसवैगा दशधर्मा- अकृतबुद्धय शवल चारित्रा आसना उच्यन्ते । ते यद्यन्ते आत्मशुद्धिं कृत्वा- नियन्ते तदा प्रशस्तमेव मरणं । बाउपडितमरणं श्रावकस्य । सशल्य- मरणे सुगम । पलायमरणमुच्यते-विनयवैयावृत्यादायकृतादरः प्रशस्त- क्रियोदहनालसः त्रयोदशचारित्रेषु वीर्यनिगृहनपरो धर्मचिन्तायो निद्रा- पूर्णित इव ध्याननमस्कागदेः पलायते पायमरणं । इन्दिपवेदनाकपा. यनोकपायातमाणं वशार्तमरणं । अप्रसिद्धेऽननुज्ञाते च मरणे विप्पाण- म. क. पर्वत

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१५०
पत्मामृते-
परमाणुर्यावन्तं प्रदेश रणदि तन्मात्रोऽपि निलयो नाम्नि । म कः
'प्रदेशः, जत्य यत्र प्रदेशे । दव्यसवणो ठम्यदिगम्बर: मिथ्याइष्टि-
स्तपस्थी । ण जाओ न जातो नोपन्न. । ण मओ न मृतो न मरणं
प्राप्तः। स निलयः कियान्, तियलोयपमाणिो विमुवनेनमपितः।
सब्यो समस्तोऽपि।
कालमणतं जीवो जम्मजरामरणपीडियो दुरी ।
जिणलिंगेण वि पत्तो परंपराभावरहिएण ॥ ३४ ॥
कालमनन्तं जीव जन्मजरामरणपीडित दुःखम् ।
जिनलिन मपि प्राप्त परम्पराभावरहितेन ।
कालमणंतं जीवो का समयमनेहसमिति यावत्, अनन्तमन्त-
रहित कर्मतापन जीय आमा दुःख प्राप्त इति क्रियाकारकसम्बन्धः ।
कालाघदेशभावानां कर्मसंज्ञा सिद्धव वर्तते । कथंभूतो जीवा, जम्म-
जरामरणपीडिओ जन्मजरामरणपीडित चाम्पितः । जिणलिंगेण
वि अहंदूपविशिष्टोऽपि, अपिशव्दादविशिष्टोऽपि । कर्यभूतेन
जिनलिंगेन, परंपरामावरहिएण परम्परा आचार्यप्रयाहस्तदुपदिष्ट
शास्त्रं च परंपरा शम्देन लभ्यते तत्र भावरहितेन प्रतीनियनि-
सेन मिथ्यादृष्टिना जीवनेत्यर्थः । कासौ परंपरा । अस्यामवसर्पिण्या
तृतीयकालप्रान्ते श्रीवृषभनाथेनार्यशास्त्रमुक्त, पृषभसेनगणधरेण प्रन्यः
कृतः, तत्परम्परया धीरेण भगवतार्थ प्रकाशितः, गौतमैन गणिना
मन्धिप्तः, तदनुक्रमेण पंचमफाले प्रमाणभूतैनिाम्बराचार्यशरातीयप-
दिष्ट तथ्यास्त्र प्रमाणीकर्तव्यं विसंचादिभिर्मिध्यादृष्टिभि. कृत शास्त्र न
प्रमाणनीय । अथ के ते आचार्या यैः कृतं शास्त्र प्रमाणीक्रियते इत्पाह--
श्रीमद्रयाहुः श्रीचन्द्रो जिनचन्द्रो महामतिः।
गभपिच्छगुरु श्रीमाँलोहाचार्यों जितेन्द्रियः॥१॥

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पद्माभूते-
शरीराणि गृहीतोनिशतानि । गहिउझियाई बहुमो गृहीतोन्झितानि
बहुशोऽनन्तवारान् । अणंतभवमायरे जीर अनन्तभवसागरेऽनन्ता-
नन्तसंसारसमुद्रे हे जीव ! हे आमनिति । जिनसम्यक्त्व विनति मा-
यार्थः जिनसम्पावभावेन खनन्तसंसार उठियते स्तोककाटेन मुनको
भवति।
तेयाला तिण्णि सया रज्जुणं लोयसेनपरिमाणं ।
मुचूणपएसा जत्य ण दुरुहुलिओ जीवो ॥ ३६ ।।
त्रिचत्वारिंशतप्रीणि शतानि रग्जूनो लोकक्षेत्रपरिमाणं ।
मुक्त्वाऽष्टी प्रदेशान यत्र न भ्रमित जीव ॥
तेयाला तिणि सया विचवारिंशदविकत्रिशतरग्जुघनाकाररम्जूना
च लोकक्षेत्रपरिमाण भवति । मुत्तणटेपएमा मुक्त्वाऽयो प्रदेशान्
मेरुकंदै गोस्तनाकारेण येऽटप्रदेशा वर्तन्ते तन्मध्ये जीवो नोत्पमो न मृतः
अन्यत्र सर्वत्र जातो मृतश्चापं जीयः । तेऽष्टौ प्रदेशा निजामशरीरमध्ये
गृहीतास्तन्मध्ये नोत्पन्न इति वृद्धा । जत्य ण दुरुदुल्लिओ जीयो
पत्रात्मा न पर्यटित. स कोऽपि प्रदेशो नास्ति । "पर परी दुस दुम कुम्
गुम् मुम झंप रुंट तलयट भमाड भमड भम्मड चक्कम्म ढंढल्ल
दुदुल्ल टिरिटिल्ल दुरुकुल्ल भ्रमः" इति प्राकृतव्याकरणसूत्रेण भ्रम्धातोः
दुरुदल इत्यादेशः । धनपालातदेशीलम्या तु “घोलिय दुंदुलियाई
भमियत्थे" सूत्र।
एकेकंगुलिवाही छण्णवदी होति जाण मणुयाणं ।
अवसेसे य सरीरे रोया भण किर्तिया भणिया ॥३७ ॥
एकैकाली ग्याधय. पणवति भवन्ति जानीहि मनुष्यानाम् ।
अवशेषे च शरीरे रोगाभण कियन्तो भणिताः ॥
पंचेव य कोडीमो तह व महमहिलाखाणि ।
शरणार्दिक सहस्सा पंचमया होति मुष्ठसीदी ॥1॥

भावप्राभृत। एफेरफंगुलिवाही एकैफागुचौ च्याथयो रोगाः । छण्णवदी होति जाण मशुपाणं पण्णवतिर्भवन्ति है जीर ! वं जानाहि मनुजाना मनुष्याणां शगरे । अवसेसे य शरीरे अवसोपे च शरीरे एका. गुलेरमरितादयशिष्ट दारे । रोया भण कित्तिया भणिया रोगा व्याधव भण कथय फियन्तो भणिता इति । ते रोया विय सयला सहिया ते परवसेण पुच्चभवे । एवं महमि महाजस किंवा बहुपहिं लविएहि ॥३८॥ ने रोगा क्षपिप समासाः गोदापया परपदोन पूर्वभये । एवं सहसे महायर किया हुमि. लपितः । ते रोया विय मयला से रोगाः सफला अपि सर्वेऽपि । सहिया ने परवसेण पुच्चभवे सोदास्यया परपदोन सर्माधीनतया पूर्वभवे पूर्वजन्मा- सरसनहे । एवं महानि महाजन एवमुनाप्रकारेण स्व सहसऽनुभवसि मापरा:!। किं या बहुपहि लपिपहिं कि यावर निलपित जल्पितः । पिनंतमूगफेफमकालिम्जयरहिररारिमकिमिजाले ॥ उपरे पमिओमि चिरं नवदममासेहिं पचेहिं ।। ३९ ।। दिनपरेपमाधिकामिशत। सरकार RETRI .॥ पिगं च मानुगाणि च पालति । च प्रकारः । प.प.मध नाकालिजय पर "उदयो जलाधार हायस दक्षिणे पात् पामा दाति दाहल इस देशीरहिर मी पापरिणाम अपिनि परसिया परिमः वापते । गलिया। रिमि TARE भाजी པ ་ ཀ ཀཱ ཀ ཀཱ་ གུ་པtrས་པ Trnet.SR..। ।

१५. पद्मामृते- तस्मिन् । उपरे यमियोमि नि उदरे कुशिमध्ये उपिगोऽमि निगम कृतपानसि से चिर दीर्घकाल, अनन्तगर्भप्राणापेक्षया चिमिति विशे- पर्ण । नवदममासेहिं पहिं नाभिर्दशभिर्वा मासैः प्राभैः परिपूण- जतिः तन्मध्ये सदुपरि च क्रियान् कालो सम्पते प्रातरान्देनेति । दियसंगडियममणं आहारिय मायभुत्तमणंते । छदिखरिसाण मज्झे जठरे वमिओमि जणणीए ॥४०॥ द्विप्रसास्थितमशनमाडम्य मातृभुक्तमत्रान्ते । दिसरिमयोर्मध्ये जठरे उपिनोसि जनन्याः ॥ हे जीव ! त्वं जनन्या मातु । जटर उदरे उपितोऽसि निवास चकर्य। कथंभूते जटरे, छदिखरिमाण माझे श्चि वान्तमन्न, खरिसच अप- के दर्दर मलं रुविरलिप्तं तेपा छदिखरिसाण तयो छदिरारिसयोर्मध्ये मध्यविशिष्टे । अथवा जटरे उपितोऽपि कुत्रोपितोऽसि छदिखरिसयो- मध्ये स्वमुपितोऽसि । किं कृत्वा पूर्व, अमणं आहारिय अशनं भोजन आहृत्य आहारं कृत्वा । कथंभूतमशन, दियसंगठियं द्विजानां दन्तानां अस्थ्यकराणां संग स्थितं, चर्वणवेलायां मातृमुखे दन्ताना समीपे स्थित अस्थिभिः स्पृष्ट उडिष्टीकृत क उपितोऽसि, मायभुत्तमण्णंते यन्मात्रा भुक्त तस्यानस्यान्ते मध्ये उपितोऽसि । अथवा मात्र भुत्त-मुक्त से- स्वया। तथा चोक्त-- मन्ये जन्मिन्नपि च मरणात्तनिमित्तादिभोपे ॥१॥ सिसुकाले य अयाणे अमुईमज्झम्मि लोलिओसि तुमं । असुई असिया बहुसो मुणिवर बालत्तपत्तेण ॥ ४१ ।।

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सा पट्मामृते- विलोक्यन्ते ते सर्वेऽपि साकेतपती सगरे सन्तीन्युषाव । सत्या तत्र रक्ता बभूव । अतिथिस्तस्नात्वा युक्तिवचनस्तं दूपयित्वा हे पुत्रि ! मुरम्यदेशे पोदनापुरे बाहुबलिकुले सर्वराजमु ज्येष्ठो मम भ्राता तृणपिंगट, राज्ञी सर्वपशास्तत्पुत्री मधुपिंगल सरगुणैरायो नये ययसि यतते स स्वया यरमालया मदाक्षेपेण माननीयः । साकेतपतिना सपनांदु.स. दायिना किं करिष्यसि ! इत्यवदत् । मुलसा तु तदुपरो ना. मन्यत । अतिथिरुपायेन मंदोदरीप्रवेश तत्र निवारपामास । सा निज- स्वामिन नष्ट कार्य जगाद । राजाह-विश्वभूमन्निन् ! इदं मभ कार्य लया सर्थथा कार्य । तष्ठुत्या तेन विश्वभुवा स्वयरविधान नाम सामुद्रिक शास्त्रं नवीन रचयित्वा तत्पुस्तक मजपायो निशिष्य यथा कोऽपि न जानाति तथा यनमध्ये भू-तिरोहित निदधे । तत्रोधानमूश- धन कारयन् हलाने समा मजूदा समानीय मया लय चिरन्तनशान. संयुना मंजूषा । स्वयमजाननिय राजपुत्राणामले वाचितवान् । परमाद- म्बके कन्या पिङ्गाक्ष मालया न संभावयेत् । संभावपेचेसहि सा कन्या प्रियते। सिङ्गाक्षेण सभामध्ये न प्रोटय । पापभयालजित र प्रानान विमेति च न सजने सदा स पापी निर्घाटनीय । तरस श्रुषा तहगवाहनया निर्गन्य हरिपेणगुरुपादमूले दीक्षा जप्राद । सामान्या मगरी रिश्वभूम मुदं प्रापतः। अन्ये ५ कुटिला मुदै प्रायः। स- स्वातद्वान्धवाथ विवादमा | चनाहत पापमधिनी म पति। असायदिनानि महाजा मिनेशिनामनि घ या स्मातालाना युद्ध निविवादिमनियो कन्या पुरोहितो रथमारोय नागा गुभटारिता महामनामदान् नृपान् सयवरमण्डो यथाक्रम परमायादि विनिदिय विगम। मानु समामना मगर यामाया वरयामाग। दुरी.पुस्त।

भावप्राभृतं । १५९ निर्मत्सरं राजमण्डटं तु तुतोष । अनपोरनुरूपः संगमो विधात्रा कृत इति । विवाहविधौ च जाते सगरः मुलसासहितस्तत्र कानिचिदिनानि तत्र सुखेन स्थित्वा साफेतं गतः । भोगसुखमनुभवन् स्थितः । मधुपि- गटस्त साधुः फरिमक्षिापुरे भिक्षार्थ प्रविशन् फेनचिनेन नैमित्तिकेन छ । राज्याहटक्षणोऽयं भिक्षाशी स्टिक्षणशास्त्रेणेति निनिन्द। तदा. कोपर एवं बभागे। रास्पलक्ष्मी मुंजान एप सगरमत्रिणा वृधा दूषितः कृत्रिम सामुद्रिक रवपित्लेति लजितस्तपो जमाह । तुलसा सगरै च तच्छुत्वा कोपामिदीपितो निदान चो, तपःफलेन सगरकुलं सर्व जन्मान्तरे निर्मटवियामाति । ततोऽसौ मृत्वाऽसुरेन्द्रस्य प्रथममहिपा- नीके चतुःषष्टिसहसानुरस्वामी बभूव। सं महाफालासुरनामा निजदेवैः- हितो विभगेन पूर्वभवसम्बन्ध ज्ञात्वा पापी चेतसा मंत्रिणि तभी सगरे च प्रस्टवरोऽपि तो हन्तुमंनिश्छन्नत्युनं पापं तयोरिटन् तदुपायं सहापांच संचिन्त्य स्थितः। मम महापापं भविष्यतीति नाचिन्तयत् धिग्मूढता । तदभिप्रायसाधनमिदमत्रान्प्रतं । तया हि । अत्र भरते धवलदेशे स्वस्तिकावति पुरे हरिवंशजो राजा विश्वावसुः । देवी श्रीमती । पुनो बनुः । तत्रैव क्षीरकदम्बनामा सर्वशास्त्रज्ञो बामणोऽध्यापकोत्तमः पूग्यो विरुपातच। तत्पुत्रः पर्वतो देशान्तरागतो नारदो विश्वावसुपुत्रो वसुध एते त्रयोऽपि विधानां पार प्रातः । तेनु पर्वतोऽकीर्तिविपरीतार्थ- माही पनुनारदी धोपदिष्टार्थमाहिणौ । ते त्रयोऽपि सोपाध्याया दर्भा- दिक चेतुं वनं गताः । ता नितिशिलोपरि स्थितः श्रुतधणेरुः । मुनित्रय तस्मादयानिमित्तं पपाठ । समान्तौ स्तुति कन्या मुखं तस्यो । तस्स निपुगतापरीक्षार्थ गुरुः पप्रच्छ । मो मुनित्रप! अविधानस्य सानप. सवि रा. पुस्तके नास्ति । २ अभिसमिति रा. पुस्तके। १ से. मीरा. पुस्तके। नाचिन्तदार. स.। सन्... ५ निरनिरा. सके। Pi द । पद्माभृते- स्यास्य किं नामकस्य किं कुलं को भावः प्रान्ते काप का गनिर्मविभ्यती. त्युक्ते एकः प्राह-अस्मन्समीपगो यमुः, राज्ञः मुतः, तोगादिदूषितः, हिंसाधर्म विनिश्चिन्य नारको भावी । द्वितीयो मुनिः प्राह-मध्यस्थिती पर्वत, द्विजपुत्रः, दुर्बुद्धिः क्रः,महाकालोपदेशादपर्वर्ण पापशाम्ने पटिया दुर्मार्गदेशको हिंसैय धर्म इति रौद्रध्यानपरायणो बहून् नरके प्रवेश्य स्वयमपि नरकं यास्यति । तृतीयो मुनिरवाच-एप पश्चास्थितो नारदः, द्विजः, धीमान , धर्मध्यानपरायणोऽहिंसा टक्षणं धर्म निताना व्याकु. वाणी भावी गिरितटाख्यपुरस्य स्वामी भूत्वा दीक्षिया सर्वार्थसिद्धि यास्यति। तन्मुनित्रयोक्त श्रुतधर. श्रुत्वा साधु पठितं निमित्तं भवद्भिरति तुष्टाव । क्षीरकदम्ब उपाध्यायः समीपतरतरुसमाश्रयस्तदाफर्ण्य तदेतद्विधिचेष्टि- तमशुभ धिीित भणित्या किमत्र मया क्रियते इति विचिन्त्य तत्र- स्थित एव मुनीनभिवन्य वैमनस्येन शिष्यैः सह नगरं प्रविश । तदन- न्तरमेकवर्षेण शास्त्रेण बालत्ये पूर्णे जाते विश्वावमुसरे राम्यं दत्वा दीक्षा जप्राह । वमुनिकण्टकराज्यं कुर्वनिकदा यन फ्रीडितुं गतः। तत्रा- काशे उडीयमानाः पक्षिणः स्खलित्वा पतितान् दृष्ट्वा चिन्तयामाम । आकाशे उड्डीयमाना यत्पक्षिणः पतन्ति तत्र किमपि कारण भविष्य- तीति तस्मिन् प्रदेशे वाणं मुमोच । सोऽपि तत्र स्खलितः, तत्र स्वयं जगाम सारथिना सह तत्र पस्पर्श। आकाशस्फटि- कस्तंभ विज्ञाय परैरविदितं तमानयामाम । तस्य पादचतुष्टय पृथु निर्माप्य तसिहासनमारा नृपादिभिः सेव्यमानः सत्यमाहात्म्यात् खे सिंहासने स्थिती वमुरिति विस्मयमानेन लोकेन घोषितोऽति तस्थौ। एवमस्य काले गच्छति पर्वतनारदावेकदा समित्पुषार्थ यन गती। तर नदीतट मयूग जलं पीया गतास्तन्मार्गदर्शनानारदः प्राह-ये मयूराः पानीय पन्विा गतास्तेश्चैको मयूरः सप्तमयूर्यो वर्तन्ते । तछुवा पर्वतः व इति ख. पुस्तके । २ दुःखेन ।

। भावप्राभूतं । प्राह-मा वार्ताती । मनापसहमानः पनितन्धन अन्य। किचिदन्तर काला नारदोतं सस्तं हावा विस्मिापाने गला करेणुमार्ग ददर्ग। 'तं दृष्ट्वा नारद आच-सा हस्तिनी गता, सा वालोचने- नान्धा, तामाख्दा गर्मिगी सी, पायरसहिता, अप पुत्रमजीजनत् । अन्धसपीवटप्रवेशयत् पूर्वोत तय वचनं पाटिक सत्यमभूत्, इदं तु लिया मयाऽविदितं किमस्तीति स्मित्या स सासूपं विस्मयं चित्ते प्राप्य तदसत्यं कर्तु हस्तिनामनुगतः पुरं प्रविश । नारदोतं तथैव ददर्श । गृहमे पर्वतो मातुर जगाद । किं जगाद ! मातः ! मे पिता पया नारदं शिक्षितबाँस्तथा मा नापीपठन, बस्स चेतति नारदो वर्तत नाह- मिति । तेन वचनेन विमापा हृदय विदारितं । पाशेदपाद्विपीतं सपा पिचारित । शोफ च मालनी चकार । भीरकदम्बस्तु सावा अमि- होत्रादिकं कृत्वा मुस्ता च स्थितः । तं प्रति पालन्युवाच-सपा पुत्रो न शिक्षितः, टोको पुस्पादितः । दीरकदम्ब उवाच-प्रिये । अहं निविशेषोपदेशः पुरुष पुरष प्रति ददामि मतपस्तु भिन्नाः सन्ति । तेन नादो कुशटो बभूव । प्रिपे! त्वत्पुनः स्वभावेन मन्दो नरदेऽसूपते कि क्रियते । इत्युक्या लिया विश्वासमुत्पादयितुं पर्वततमीपे नारदं पप्रध। हे नारद! त्वं बने माम्पन् फेन फारणेन पर्वतस्प बहुविस्मयं कारितवान् । नारद उवाच-स्वामिन् ! पर्वतन तह वन गम्छन् नर्मकयापरः पीतधारा मला संधी नया निवर्तने स्वचन्द्रफरलापायुमपनजनगरवात् भोला न्याय विमुख कृतरक्षापदास्थतिः सिसी च गतवानेकः । शेषावा- पजिलादिताः परभाग विड्य सगुः । तं वाहनुलवान्-मानेर: शेषाः । तर. क. २ सा.स.। ३ पने. दा.। ४ मयूरोगां. स. । ५ समो. स.१६ नानिवर्तते स.।

१६२ पनामृते- स्त्रिय इत्यनुमानात् । ततो यनान्तराकश्चिदागत्य पुरसमीपे करिण्यारूढ़ स्त्रियं नपन् पुरं प्रति पश्चिमपादाम्यो प्रयाणके स्वमूत्रघट्टनात् करिणी. मकथय । दक्षिणे भागे तरुवीरुद्गेन वामलोचनेऽन्धा जगाद । मार्गा- रप्रघ्युत्प श्रमादासढयोपित, शीतच्छायाभिलापेण पुलिनस्यले मुमाया उदरस्पर्शमार्गेण गुल्मलमाया त्रिप विवेद । करेणुप्रितमार्गे गृहोद- सितकेतुदर्शनेन पुत्रजन्मोक्तवान् । तष्ठुत्या विनो निजापराधामा भार्याया अकथयत् । सदा पर्वतमाता प्रसन्ना जाता । प्रिये । मुनिना माषित यत्पर्वतो नरक यास्यति । ताप्रतीत्यर्थ भार्या स्वयं च एकान्ते गत्वा पिप्टेन दौ' बस्ती निर्माय पुत्रछात्रभावपरीक्षणार्थ द्विजोत्तम एक पुत्राय द्वितीयं छात्राय ददौ । पराश्यप्रदेशे गत्या गन्धपुष्पमंगरचिया कर्णप्छेदं कृत्वा एतायधैवानयत युवा । तत्र पर्वतः पापी अस्मिन् पने न कोऽपि यतते इति कणों छेदयित्वा पितरमागत्य पूज्य! यथा स्वयोक्त मया तथैव कृतमित्यवदत् । नारदस्तु यन गत्या विचारयति गुरुणोत. मदृश्यप्रदेशेऽस्य की छेदनीयाविति । चन्द्र. पश्यति । रविनिरीक्षते । मक्षत्राणि विलोकन्ते । प्रहास्तारकाच पश्यन्ति । देवता निरीक्षन्ते । सनिहिताः पक्षिणो मृगजातयश्च निपटुं न शक्यन्ते इति विचार्य कर्ण- मोठेदमहत्या गुरुसमीपमागनो नारदः। यतोऽयं भव्यात्मा बनेऽदे. शस्यार्सभयात्, नामस्थापनाद्रव्यभावानां विचारचतुरः पापापल्याति- कारणक्रियाणामकर्तव्यत्वादहमिम छार्ग बिग्छिन्नावयव नाकार्य- मित्युवाच । तच्छुत्या क्षीरकदम्यः स्वपुत्रस्य जडत्वमा झाया विचारयामास । पन्मिध्यादृष्टय एकान्तेन गुवन्ति कारणाकार्यसिद्धि- रिति तदसत्यं भत्र कारणं गुरु, कार्य शिभ्ययुद्धपुत्कर्ष, तस्येकान्तेन १ पुस्तकदयेऽपि वेद इति पाट. . रा. ग. | . भावमाभृतं । १६३ ति यतो मयि पाठयत्यपि मपुत्रो जड इति तेन धिगेकान्तं मतं रतमेव । कारणानुगत कार्य कचिद्भवत्येव कचिन भवत्येवेत्पने- समतं सत्यमित्यनेकरास्तुष्टाय । नारदस्प योग्यत्वं झावा नारद ! य सूक्ष्मबुदिर्यथार्थज्ञाता । अयप्रभृत्युपाप्यायपदे व मया स्थापितः । शास्त्राणि त्वया न्याफर्तव्यानि इति तं प्रपूभ्य प्रावर्धयत् । धीमतां वत्र गुणैरेव प्रीतिः । निजसन्मुग्प स्थितं पुत्र जगाद-त्वं विवेकमन्त- गैव एतद्विरुपकं चकर्थ, शास्त्रादपि तय कार्याकार्यविवेको नास्ति, मचक्षुःपरोक्षे त्वं अरे कयं जीविष्पसि मूर्ख।। एवं शौफेन दत्तशिक्षो नारद पवैरो बभूव । फुधियामीहशी गतिर्भवति । उपाध्यापस्त्वेकदा गृहादिकं त्यजन् वसुं गत्वोवाच-पर्वतस्तन्माता च द्वावपि मन्दथियौ तथापि मत्परोक्षे त्वया सर्वया भद्र | पालन याविति । यमुरुवाच हे पूज्यपाद ! भवदनुमहादहं प्रीतोऽस्मि । एतदनुक्तमेव सिद्ध । अस्मिन् कार्ये ममेदं किं यक्तव्यं । अत्र सन्देहो न कर्तव्यः । यथोचितं पर- लोकं कर्तुमर्हति भवान् । इति मनोहरकथाम्लानमालया द्विजोत्तमं नृप आनर्च । क्षीरफदम्ब उपाध्यायस्तु सम्यक्संपमं प्राप्य संन्यास कृत्यो- त्तम स्वर्गलोकमवाप । पर्वतस्तु पितृस्थानमध्यास्य विश्वदिशिक्षाणां व्याकर्तुं रति चकार । तस्मिन्नेव नगरे नारदो विद्वजनान्वितः सूक्ष्म- बुद्धिपिहितस्थानो व्याख्याया यशो यभार । एवं तयोः काले गच्छति सत्येकदा विद्वत्तभायां "अष्टन्यामिति" वाक्यस्यार्थप्ररूपणे महान् वि- वादो बभूव । नारदः प्राह-अंकुरशक्तिरहितं यवत्री त्रिवर्षस्थं अज- मिति कप्यते तद्विकारेण वन्हिमुखे देवार्चनं विद्वांतो यज्ञं वदन्ति । पर्वत उपन्यसति स्म-अजशब्देन पशुभेदस्तद्विकारेण हिरण्यरेतसि होत्रं यज्ञो विधीयते । इति तयोः सुधीप्रध्योरुपन्यासं श्रुत्वा ब्राह्मण- मुख्याः साधवः प्राहुः प्राणियधाद्धर्मो न भवति । नारदे मसरि ति मन्दः क. पुस्तके।

पद्माभूते- त्वात् पर्वतोऽवन्यामधर्म प्रवर्तयितुं दुरामोपन्यास्थत् । पतितोऽ- यमयोग्यः सहसंभाषणादिषु, इत्युक्त्वा चपेटाभिस्ताडित: निर्भ- सितोऽयं पापात्मा टोके घोषितः । दुयुद्धः फलमत्रैदश भवति । एवं सर्वेरपि यहिष्कृतो मानभंगानं जगाम । तत्र ब्राह्मगषण कृतान्तारोहणासन्नसोपानपदवी मित्र बलीरुद्वहता अन्धचभुपेर मुहः स्खलता विरलेन सितेन मूर्धनेन तसं राजत शिरस्त्राणं समीपयम- नाद्भपादिव दधता जराङ्गनासमासन्नमुसेनेव मीलचक्षुषा चलच्छिनकरेण करिणेव कुपितसर्पणव उर्वश्वासिना राजवल्लभेनेवाऽमतो फुट पश्यता भग्नपृष्टेन अपटुजल्पितेन असमेन योग्यदण्डेन राज्ञेव त्रिगुणीकृतमुपवीत- धारपता विश्वभूनृपमुलसामु निनं यदक्रोधं वक्तुमिव स्वाभिमतारंभसिद्धि- गवेपिणा पर्वते पर्यटन पर्वतो महाकालासुरेण दृष्ट सन् तमभिगम्यानम्प चाभिवादनमभ्यधात् । महाकालस्त समाश्वास्य सादरं तव स्वस्यस्वियु वाच । तमविज्ञातपूर्वस्वात्प्राह त्वं कुतस्त्यो वने पर्यटन कस्मादिति। पर्वतस्तु निजवृत्तान्तमादित. प्राह । तच्छुत्वा महाकालश्चिन्तयामास । मम शर्नु सगर निवेशीकर्तुं समर्थ एप स्यात् । भोः पर्वत । तब पिता स्थंडिलः अहं विष्णुरूपमन्युः । एतौ द्वापि भोमोपाध्यायशिष्यौ शास्त्राभ्यासम- कारिपाता । त्वपिता मम धर्मभ्राता तमहं दृष्टुमागत. ममागमन त्यन्तर्गड जात । पुत्र पर्वत ! मा त्वं भैषीः तव शत्रुविध्वंसेऽहं सहायो भविष्यामि । इति क्षीरकदम्बपुष्टार्थस्यानुगता अवर्षणगता. पष्ठि- सहस्रप्रमिताः पृथक् ऋचो वेदरहस्यानीति स्वयमुत्पाद्य पर्वतमध्याप्य शान्तिपुष्टयभिचारात्मक्रिया: पूर्वोक्तमंत्रणैनिशिता पवनोपेतामिम्बाला- समा ईष्टेः फलमुत्पादयिष्यन्ति, पशुहिंसनात्प्रयुक्ताः सत्य इति । ततः विशिताः स.२१. स..

भावमाभतं । १६५ . साफेतपुरमप्यास्प दान्तिकादिफटप्रदं हिंसापागे समारम्प प्रभाय ययं कुर्महे । इति पर्वतमुक्त्वा वैरिविनाशा निजतीनदैत्यान् सगरराष्ट्रस्प बाधां घरादिभियूयं पुरुषामिति संप्रेय पर्वतन युस: साकेत महाकालामुरो गतः । पर्वतो मंत्रगर्भिताशीदिनालोक्य सगरस्य स्वप्रभायं प्रकाशितवान् । है राजन् ! त्वदेशप्राप्तं विषममशिवं अहं मुंमित्रेण यज्ञेन लघु भोपापयामि। यशार्य पशवः एटाः स्वयमेव स्वयंभुया। यसो दि घृद्ध सर्वेषां तस्माचशे वयोऽवधः ॥" इति कारणात् स्वर्गमहामुखसाधने पुण्यमेव भविष्यतीति पापी प्रत्याप्प तं जगाद । हे राजन् ! यागसिद्धपथै पशूनां पठिसहस्राणि तयोग्यमन्यद्व्यं च संगृहाण । सगरोऽपि सबै मेलपित्वा तस्मै समर्पि- तवान् । पर्वतो पागं प्रारभ्य पशूननिमंत्रपामास । महाकालासुरस्तान् वपकृतान् शरीरेण सह स्वर्ग गतोऽयं स्वर्ग गतोऽयमिति विमानारूढा- नाकाशे नीयमानान् दर्शयामास । देशस्याशिवोपसगै तदैव निराचकार । तद् दृष्ट्वा मुग्धाः प्राणिनस्तद्वंचनपा मोहिताः सन्तः स्वर्गगतये स्पृहयन्तो यागमृति भृशमाचकांक्षुः । मुमित्रपज्ञावसाने जात्यश्वमेकं विधिपूर्वक हुतवान् , राजाज्ञया मुटसां च खलो वपट्चकार । प्रियकान्तावियोग- दुःखदावानलम्बालाभिः प्लष्टकायो राजा नगरं प्रविष्टः, शय्योपरि शरीर निचिक्षेप । प्राणिहिंसनं महदिदं वृत्तं किमयं धर्मः किमधर्मः इति संश- यानः स्थितः । अन्यस्मिनहनि यतिवरनामानं मुनिमाभिवन्य विज्ञप्तवान् । महारक ! मयारम्भं कर्म पुण्यं पापं या सम्यकथय । यतिवरः प्राह- धर्मशातवाहमिदं कर्म कर्तारं सप्तमं नरकं प्रापयेत् । स्वामिन्नस्ति १पस्मिन् यते चतुःषष्टिसहकार्ग पशूनां वधः क्रियतेस सुमित्रो पारम्पते।

१६६ पद्माभृत- सत्राभिज्ञान । मुनिराहनाजन् सप्तमे दिने सत्र मस्तकंऽशनिः पति- पति इत्यभिज्ञानेनय सप्तमे नरक याम्यसि | सदासर्प राना मीत्या पर्वताय निवेदयामास : पर्वत प्राह-राजन्नसो भन्न क्षपणक: कि वेत्ति तयापि यदि सय शंका वर्तते तदव शान्तिविधीयते इति ववनस्तस्य मनः सम्धार्य शिथिलीचकार । पुनः मुमित्रमेव यज्ञं प्रारम्धवान् । ततः सप्तमे दिने पापामुरस्प मापया मुलसा आकाशे स्थिता देवत्वं प्राप्ता पूर्वपश्वप्रेसरी यागमृत्युमलेनया मया देवगतिलब्धा । तं प्रमोद तय निरू. पयितुमहे विमानेनागता । तव यज्ञेन देवा पितरच प्रीणिता इत्यमापन । तवचनात्प्रत्यक्ष यागमृत्युमले दृष्ट, जैनमुनेस्यममत्ये जाते । तदनु राजा तीवेण हिंसानुरागेण सद्धर्मद्रूपेण सगातदुष्परिणामेन मूलोत्तरवि- फरिपतात् तत्प्रायोग्यसमु कृरदुष्टसंशसाधनात् नरकायुरायष्टकर्मस्यो- चितस्थिते. अनुभागबन्धनिकाचितबन्धने सनि भीपणाशनिस्पेण काटासुरे तन्मस्तके पतिते सति यागकर्मासक्तनिखि उप्राणिभि सह सगर सप्तमे नरके पपान । स कालामुस्ताक्षणेन महाकोधस्त दण्ड- यितुं तृतीयनरकपर्यन्त पृष्ठतो जगाम । तमदृष्ट्वा माकेतमागत । विश्व- भूप्रभृत्तिवैरिबर्गमारणार्थ नि:शूक मुलसासंयुक्त सगर विमानमार्ट व्याम्नि दर्शयामास । पर्वतप्रसादेन यज्ञपुण्येनाई स्वर्ग गत मुख प्राप्त- यानिति प्रशशंस । सगरपरोक्षे विश्वभूमचियो राजा जान । महामेधे उद्यम चकार । महाकालामुरेण विमानगता देवा पितरथाका मषा व्यक्त दर्शिता । ते ऊचु --भो विश्वभूकमया महामे। कृत पुण्यक्ता स्वत्प्रसादेन वय सर्वेऽपि वपटकृता स्वर्गमुरा प्राप्ता इति स्तुति चक्रुः । नारदस्तापसाच तच्छुत्वानेन दुरात्मना एप दुर्भार्गोऽधिकृतो छोकस्य ! पूर्व मे पशवो हलास्तेषां मापेऽहमप्रेसरी मुख्यदेवरवं प्राप्ता।

भावप्राभृतं । १६७ प्रकाशितः, धिक् पर्वत, निवारणीयोऽयमुपायैन फेनचित् पापपण्डितोऽ. यमिति साफेतमागताः । यथाविधि विभभुवं विलोक्य ऊचुः-ये पापिनो नरा भवन्ति तेऽपि अर्थार्थ फामार्य च प्राणिनां वधं न कुर्युः । केऽपि कापि धर्मार्थ प्राणिनां घातकाः किं सन्ति । अहो पर्वत ! वेद- विद्धिर्मम्हनिरूपिते देदे अहिंसक एव वेद उक्तः । अहिंसा तु मातेय सखीय कल्पवाटीय जगते हितोक्ता इति पूर्वर्षियाश्यस्य प्रामाण्य वयेन्दता कर्मनिबंधन फर्मतधप्रायं त्याम्पमेयोति तापतैरुक्तं। ते तापसाः सर्वप्राणिहितैषिणः । विश्वभूरवाच-भोस्तापसाः ! साक्षास्वर्गसाधनं दृष्टं कर्म कथं त्याज्यं मयेति । नारदो विश्वभुवं प्रत्याह-सचिवोत्तम ! त्वं विद्वान् किमिदं कर्म स्वर्गसाधनं भवति ! । सपरीवारं सगरं निर्मूल- दिनु कांक्षता फेनविकुहफेनापमुपायः कृतो मुग्धानां मोहकारणं । ततः शीतोपवासादिक कर्म स्वर्गसाधनमागमोक्तं त्वयाप्याचर्यतां । विश्वभूः पर्वतं प्राह-पर्वत ! नारदः किलैयं पक्ति तत्वया भुतं ! पर्वतोऽसुरोक्तेन दशास्त्रेण मोहितो दुर्मतिः प्राह-हहो सचिवोत्तम । दं शास्तं नारदः किं न शुभाय । मम गुरुरस्य च मम पितैवासात् । न चान्यः कोऽपि एष नारदः । तदापि मयि समत्सरः । इदानी किं योग्यते । ममें गुरोर्धर्मसाता स्थविरनामा जगति विख्यातः । सोऽपि पौत रहस्पं यागमृत्युफलमेव प्रतिपादितवान् । मयापि साक्षात्प्रकटीकृतं । यदि तव प्रत्ययो नास्ति तर्हि विश्ववेदसमुद्रपारगं वसुं पृच्छेः । यः सत्येन गगने स्थितो वर्तते । तच्छुत्वा नारद उवाच-को दोपः स एव पृच्छयतां । इदं ताबद्विचारार्ह, चैधोऽत्र धर्मसाधनं तहि अहिंसा- दानशीलादि पापप्रसाधनं भवेत् । एवं चेदस्ति तर्हि दासादीनां परमागतिरस्तु सत्यधर्मतपोब्रह्मचारिणां अधोगतिरस्तु। यज्ञे पशु- १ मदुरोः रा.। ..

१६८ पद्माभृते- वधाद्धों वर्तते नान्यत्रेति चेन्न वधस्य दुःखप्रत्ययत्वे उमयत्र सादृश्यात् फलेनापि सदृशेन भाव्यं । अथ त्वं एवं वक्षि, पशूनां सृष्टिः स्वयमुना यज्ञार्थं कृता तन्न, अन्यथा विनियोगस्यागष्टमानत्वात् । अयमागमोड- तिमुग्धाभिटापः विदुपा गर्हितः । यपदर्थ सृष्टं ततोऽन्यत्र विनियोगेड र्थकृत् कथं स्यात् । श्लेष्मादिशमनौषधं ततोऽन्यत्र कथमुपयोगि स्यात् । क्रयविक्रयादी हलानोमारवाहनादौ महादोप: स्यात् । दुर्बल वा यादिनं दृष्ट्वा सन्मुखमागत्य वूम. | यथा शस्त्रादिभिः माणिधाती पा- पेन बध्यते तथा मंत्रादिनापि घातपापेन बध्यते एवाविशपन्नात् । ईहो पर्वत ! पश्यादिटक्षणा सृष्टिय॑ज्यतेऽथवा क्रियते ! चेन्क्रियते तर्हि खपुष्पादिकमध्यविद्यमानं कथं न क्रियते । अथ विद्यमानैव सृष्टि- यज्ञार्थ व्यज्यते तर्हि पूर्ववचन करणप्रतिपादकमनर्यकं स्यात् प्रदीप- स्यटनमेव घटादेः पूर्वमन्धकारप्ररूपकं यतः । अनादृतस्पैच व्यक्तिः क्रियते इति चेत्तर्हि सृष्टिवादो मवद्भिः पूर्व क्रियतां । इति नारदेन कृतमुपन्यासमाकये सर्वेऽपि सभास्तारास्त तुष्टुवुः । अथ सम्या ऊचुः-- द्वयोविवादो वसुना चेच्छेद्यते तर्हि स एव अभिगम्यता । इति श्रुत्वा ताभ्यां नारदपर्वताच्या सर्वापि संसत् स्वस्तिकावतीमुध्धचाल । तत्र पर्वतः सर्व वृत्तान्त स्वमात्रे निवेदयामास । सा तेन युता वम ददर्श । पुत्र बसो! पर्वतोऽपरिणीतः । तपोयता गुग्णापि तवायमार्पतः । नारदेन सह तय प्रत्यक्षे वादो भविष्यति, तत्र ययस्य भंगो भविष्यनि तदास्प यमगृहप्रवेशो भविष्यतीति निश्चिनु । अस्य शरणमन्यो न वर्तते। वसुरुवाच । मातः 1 गुरुशुश्रूपकोऽहं धर्ते । “गुरुवगुरुपुत्रं गुरुकला च पश्येत्" इत्यहं नीतिज्ञोऽस्य जयं करिष्यामि । ल भैषी । अथान्ये- पुस्ते तथाविधं सिंहासनमारुढ यमु ददृशुः । तत्र विश्वभूप्रभृतयः १दुर्वलत्वं स.।

भावप्राभृतं । १६९ संपप्रच्छुः । हे राजन् ! त्वत्तः पूर्वमपि अहिंसाधर्मरक्षणे तत्परा अत्र चत्वारो राजानो हिमगिरिमहागिरितमगिरिवगिरिनामानो हरिवंशजाः पुरा चं संजाताः । तत्रैव चशे विश्वावसुमहाराजः संजातः। ततश्च भयान संबभूव | तत्राहिंसाधर्भरक्षिवे किमुच्यते । त्वमेव सत्यवादीति प्रयोपत्रिभुवन वर्तते । वस्तुतदेह त्वं विषयत् वन्हिवत् तुलावत् वर्तते । प्रत्ययो पादी त्वमेव तेनास्माकं प्रभो ! संशयं डिद्धि । नारदः खल्व- हिंसालक्षणं धर्भ पक्ष कक्षीचकार । पर्वतस्तु तद्विपरीतमाविक्षेप । तत्क- थपतु भवानुपयायस्योपदेदामित्यभ्यर्थितः । गुरुपन्या पुरा प्रार्थित उपा- म्यापोपदेव जाननपि राजा महाफाटोत्पादितमहामोहो दुःषमकालनि- कटवर्तिवात् विपपसंरक्षणानन्दनामरोभ्यानतत्परः पर्वतीक्तं तत्वं वर्तते । प्रत्यक्षे वस्तुन्यनुपपनता का । पर्वतोक्तयागेन सत्रीकः सगरः स्वर्गमवाप । पटन्त प्रदीपं फोऽन्यो दीपो यस्तं प्रकाशयेत् । तेन पर्वतोक्तं यज्ञ स्वर्गसाधन भयं त्यक्त्वा पूर्व कुरुवं । इति हिंसान्तानन्दबदनारकायुमिप्यापापादपवादाचाभीरर्जगाद। तदा प्र- सार्ड स्पाटितमिवामादो घनिः संजातः, आकाराः सल्वित्यामोदा चार च । फिमामोशायदाफाश: अहो नारद! अहो तापता: पृथिवी- पतर्मुखादीहदामा घोर वचनं संजातमिति । नयः प्रतिकूटजटत्रवः संजाता:। सरांसि सपः शुष्कागि । रुधिरवर्पजमनारतं बभूव । भूपदिावो मन्दाः संजाताः । सर्वा दिशो मलोमता: सम्पयन्ते स्म । भपरिव्हटाः प्राणिनः फाप दधुः । सदा भूमिधा भक्ति गता । तस्मिन् महारधे पतोः सिंहासनं मम । नाकारो स्थिता देशविघाघरेशा इत्यूच:-अहो यमुनरेन्द्र महायुरे! धर्मविषसन मार्गमा वीस पादौरिपोपपन् । सिंहासने निनो सति पर्वतो दनुभ परिम्यानमुखी पभूवनुः । नी ममोरो.. परेव..

पट्माभूते- ताशौ निरीश्प महाकालस्य किंकरास्तापसाकार गृहीत्या समचः-हे पर्वत ! है यसो ! युयो भीति मा कार्यामित्युक्त्या स्त्रयमुत्यापित मिहा- मने दर्शयामामु । सत्र स्थितो यमुच्याच । अहे सत्वरित कर्थ विभेमि पर्वतस्य सत्यवचन जाननिनि प्रयाणः कण्ठपर्यन्त निमाप्तवान् । तद्या मानो जगदुः । अनेन मिथ्यावादेन भूपतेरियमवस्था संजाता। हे गजन् ! अथापि मिथ्यामार्ग स्यनेति साधुभिः प्रार्थितोऽपि तथापि मों पझमेय मन्मार्ग कथितवान । भूम्या कुपितया सगोऽसि निगौर्णः सगम नरक जगाम । तदा कालामुरी लोकप्रययनिमित्त गगने स्थित गगरमगुरुपदय दिव्यं दर्शयामारा। आयो पागदपा दिवमयापार पूर्व नारदम्य वचन मा मानयतेति प्रोग्य अन्तर्दधौ फालामुरः । अय धोकाभयुक्तेन मनेन या मागतो न हि न हि मरकं गत इति पिस. पदमानेन सह विधम् प्रयार्ग गत्या राजगूयविधि विधे। महापुराधि- पप्रमुग्ला लोकस्य मनु निन्दन्त पात्रमानिर्दिष्टमार्गे मनार स्थिता. नाय । नारदेन धर्ममा रक्षितेतित प्राम्य गिरिनटनाम्नी पुरतय दरतापमानुदयाचमनाशाय कारण कालिका का दयन्तो यथास्थिति निपुगा नगा । अगाम्याग्दो दिनकरदेव विद्याधर मिजमभी मान- वास-पर्वतय शिक्षाचणम्पया निवार्यतामिनि। मोनिया करियामीति TIArया निनावमया धापनगानाइय नाप नियामागाधारण. भगात मग्रामे काटामुक्या मागपिन मक विशाला शायणी यातामाता नामाकालमनन गितु सस्पे मान नियाममात । काला उपाच-अपोपिनी नागा रपमुद्रा विरितः । विधानप्रसादौना नाविना विभरिन. বিশ্বাস সাপ সস ঘন মিলান বৃথি A भावप्राभृतं । पूजपित्या च याविधि युवा कुरतमिति । समुपाय भुत्वा तौ तथा चक्रतुः। पुनर्विद्याधराधिपो यागवि कर्तुमागतः । जिनविम्यानि दृष्ट्वा नारदाय कथयति स्म । यन्मे विद्या अन्न न झामन्तीति स्वस्थानं जगाम । तद- नन्तरं यज्ञो निर्विलो बभूव । तदनु विश्वभूः पर्वतश्च सप्तमं नरकं गतौ। दीर्घकालं महादुःखमनुबभूवतुः । अथ महाकालोऽभिप्रेत साधयित्वा निजरूपं धृत्वा लोकान् प्रत्याह-पोदनापुरे पूर्वभवेऽहं मधुपिंगलो नाम राजा आसं । सुलसानिमित्तं मया महत्पापमुपार्जितं । अहिंसालक्षणो धर्मो जिनेन्द्रः फधितः स भवद्भिः कर्तव्यो धर्मिष्टेरिति संप्रोच्य अन्त- दधौ । पुनर्दयाधीः सन् मुदुश्चेष्टा पापस्य प्रायश्चित्तं स्वयं चकार । किं प्रापश्चित्तं ! सम्मोहाकृतस्य पापस्य निवृत्तिरेव प्रायश्चित्तं तोमती चकार। अय दिव्यबोधैर्मुनिभिरित्युक्तं-विश्वभूप्रमुखा हिंसाप्रवर्तका नारका बभूवुः । तन्हत्या पर्वतोद्दिष्टं दुमार्ग केचित् पापभीरवो नाशिश्रियुः । केचित्तु दीर्घसंसारिणस्तस्मिन्नेव दुर्मार्गे स्थिता इति । इति श्रीभाषप्राभते मधुपिंगलद्रव्यलिंगिनः कथा समाता। अण्णं च वसिमुणी पत्तो दुक्ख नियाणदोसेण । सो पत्थि वासठाणो जत्थन दुरुडुल्लिओ जीव ।। ४६।। अन्यय पशिष्टमुनिः प्राप्तः दुःरा निदानदोषेण । तभास्ति वासस्थान यत्र न भ्रान्तो जीव ! ॥ अण्णं च वसिमुणी अन्यञ्च भावरहितद्रव्यमुनिदृष्टान्तकथानक वर्तते । तत्कि यसिष्टमुनिः । पत्तो दुक्खं नियाणदोसेण मातो दुखं निदानदोपेण शत्रुवधप्रार्थननिदानदोपेण नवमेन विष्णुना यः कसनामा नृपो मारितः स पसिष्टमुनिचरो मल्लयुद्धे मरणदुःखं प्राप्तः । सो पत्थि तं स ।२जीवो ग.प. ।

१७२ पट्याभूते- चासठाणो तनास्ति यासस्थान जन्ममरणस्थान। जत्थ न हुरुदुल्लिओ जीव है जीव ! हे आत्मन् ! यत्र त्वं न जातो नौत्पनश्च दुदुद्धि- ओ प्रान्त इति । यसिष्टस्य फया यया-गागन्धरत्योद्योः संगमे जठर- कौशिकं नाम तापसाना पल्ला बभूव । तत्र पसिष्टो नायकः पंचाग्नि- मतं चरनास्ते स्म । तत्र गुणभद्रवीरभद्रनामचारणमुनियरी जगदतः- मज्ञानातमिदं तप इति । तरकृत्या यसिष्ट• कुधीः समो) तयोः पुरतः स्थिवा पाग्छ-कस्मात्मेऽज्ञानतेति । सर गुणभद्रो भगवानाह-पतः सत्पुरषा हि हितमापिणो भवन्ति । जटाकलापसजातकालिक्षाभिध. टन सततं स्नानेन जटामध्यलममृतमीनकान् दामानकाष्टमध्यस्थित- कीटकान् प्रदर्य इदै तयाज्ञानमिति प्राबोधयत् । काललम्धिमाश्रित्य स यसिटः मुधीभूत्वा गुणभदचरणान्ते तपो निमन्ध गृहीत्या सोपयाम- मातापनयोग जग्राह । तत्तपोमाहात्म्यात् सप्तम्यन्तरदेवता ममतः स्थित्वा मुवन्ति स्म-मुने : आदेश देहाति । मुनिराइ-इदानी मम प्रयोजन नास्ति गायन यूर्य । जन्मान्तरे मरिछाई करिश्यप । एवं तपः कुर्यन् यमिट कमेण मथुरापुगेमाजगाम । तत्र मासोपवासी सनामार- भयोगे स्थिनवान् । म उग्रमेनेन राज्ञा दृष्ट. । भक्तियशेन पुर्यो घोषणा कारयामास-अयं मुनिर्भट्टहे एव मिदा गृहातु नान्यनि । सोऽपि पारणादिने मथुरा जगाम । तत्रानिमुदित हवा म्याश्य यनमानगाम । पुनर्मामोपवार्म जमाह । पुन: पारणार्य मामोपयामासाने गुगाः । तत्र यागनिन क्षोभ दृष्ट्वा यनमागत | पुनर्मामापयामपारणापो नगरे गतः । तदा जगमधपरक या गजनि म्यग्रचिने पनि पुनरितः । सदा गाई पमिटमुनि या टोको अगाद-मनेन राज्ञा मुनि- मारितः स्वयं निशा न ददानि परान् पारपतीनि नापने कीभिप्रापी पनि । ताटला पनिटो मुनिः पापोदयात्रिदान धकार । मम दुभ्य-- •- भावप्राभूत। १७३ रतपःसलादस्य राह: पुत्रो भूत्वा अमुं निगृह्य लस्य राज्य गृहास- महमित्यनेन दुप्परिणामेन मृत्वा पभाक्तीगर्ने पुत्रतया स्थितः । सा गर्भार्भकमीण दोहदं चकार-रानो हृदयमांसममोति । तदप्राप्नु- वन्ती दुर्यला बभूव । तम्हाया मंत्रिगः प्रयोगेण विहितं दोहदं पूरयन्ति स्म । हांसः किन कुर्युः । तदा सा पूर्णमनोरया मुतपातक- मनन । मातापितरी दष्टोष्ट सधभगं यदमुष्टिं तं दृष्टान पोपणे योग्योऽप- मिति विचिन्य तद्विसर्जनोपायं चमतुः । कंसमपी मंजूपामानीय सातक कसं तस्व निधाय यमुनाप्रवाहे मुमुचतुः। कोशाम्बापुरे मन्दोदरी नाम कल्पपाली, तपा प्रवाहे मंजूपामध्ये सहएः पुत्रतया पालितभा तप- विना हानान्यपि पुण्पानि किन कुर्युः । मिदिन मनादिसह पर प्राप । आडमानो निष्कारणं सफलवालकान् चपेंटया मुहिना दण्डा- दिना च प्रहार ददाति यधपापं वप्नाति । तहराचारोपलमान असह- माना मन्दोदरी त तपाज पुढे । सोऽपि शीर्पपुरं गाया मुदेवपदाति. भूत्या ताररोति पायत्। जनान्तरे जरासन्धी राजा विसरमेदिनी- पतिरपि कापगन् यते । मुरम्पदो पादनामुगधीसं तिरथ युद्धे भाप सानपति तस्मै देशाधे मागुता फालिदसेनासं जाता जाती- नामाने दामोति माci nां समूहार प्रत्ति प्रेषयामास । तर यमुदधा मीया प्रोचितपान् । निजागन मग भापनिया ते. मा संजिला यमेन निगमन पथविश निय समान समयमा निमनप दी। मनु- दे पर पादप-देश ! सन्. २१, AR PAREEमोदन उसमेन- १७४ पट्मामृते- मन्दोदरी मम पुत्रः किं तत्रापि कृतापराध इति भीत्या समंजूषा सत्र जगाम । जरासन्धाने मैज्या निक्षिप्प इयमस्य मातेल्युवाच । देव ! समपामविष्ठायाऽर्भक आगतो यमुनाजले मया लम्धः प्रतिपाल्प बर्षितश्च सत एव नाम्ना कम कृतः । अयं स्वभायन शायदर्षियः शिशुनेऽपि निरर्गल पधादुपालंभशतैर्लोकाना मया वर्जितः । साला मंजपायाः पर्ने गृहीत्या उधैर्याचयामास । पमावत्योः मुत विज्ञाय मुतामराम्य च तस्मै विततार । कसोऽति जातमात्रोऽह नद्या प्रवाहित इति कोपेन मथुरापुर स्वयमाय मातर- पित बधस्यों कृत्वा गोपुरे धृतवान् । विचारविकलाः पापीयोम. दुरिता कि किन कुरिति । अथ वमुदेव महीपति पुरमानीय निना. नुजा देवकी दया तत्र ते स्थापितवान् महाविभूतिमन्त त चकार। एवं मुगन कमस्य काले गछति सत्येकदाऽतिमुक्तको मुनिभिशार्थ राममन्दिरं प्रविष्ट | संवा जीरचशा हर्षमाणा त हास्पेनीवास- है मुने! देवकी नय लघुभगिनी पुथनानन्दवन सतर्शयति बधेग मशिन प्रकाशयतीनि । नय-या मुनिः कोर्ष हत्या याग्गुल मिया अगाद-मुग्थे ! कि हृयति देवस्या पो भविष्यनि पुर म तर भारमय हनिष्यति । नया मावशा कोपिन त दिया चके । मुनिगम-मुग्ने । न केवल ना पनिमेव हनिष्य यनेन रिनामपि तय हनियनि। पुन, मा पिया नग्नं पाहा याममायन। दादा मुनि- बंगाद-मुरे: अनेन मागराया। पी नाम पालयियनि । पापकाले म निदयामाम । 4.मो भीगाहा. नो मने म भपियनानि यमुदेव गमाया ममत- , समय रस दो dिn P भावप्रामृतं । १७५ मपायत-देवकी मम गृहान्तरे प्रति कुपोन्मतादिति। वसुदेवस्तेनोपरुद्ध संस्तथास्थिति जगाद । अवश्यंभाविकार्येषु मुनिरपि मुह्यति । अथैफदा स मुनिर्देवकोगेहं भिक्षार्थ प्रविवेश। यमुदेवो देवकी च तं प्रतिगृध भोजयित्वो आवयोदीक्षा भविष्यतिति उपना जगदतुः। मुनिस्त- दिहितं ज्ञावोबाद-युषयोः सात पुत्रा भविष्यन्ति तेषु पर पुत्राः परस्थाने वृद्धिमित्या मोक्षं यास्पन्ति सप्तमस्त पुत्रो निजमत्रच्छायया पृथ्वी निर्याय चक्रवर्ती दीर्घकालं पालयिष्यति । देवकी तततिर्यमान् सेभे । तान् ज्ञानवान् शमवरमाङ्गान् ज्ञात्वा नैगमपं देवं प्रोवाच- एतांस्त्र रक्ष । स च भद्रिसपुरे मलकाया वणिकपुन्याः पुरो निक्षिप्य तपुत्रांस्तदा तदा भूतान् गृहीत्वा मृतान् यमान् देवस्यने निचिक्षेप। फंसस्तान मृतान् यमान् दृष्ट्वा किममी मे मृताः करिष्यन्तीति मुने. स्पिमतत्पमदिति प्रोग्य साशंकः शिटायामास्काटयामास । पचाई- वकी सप्तमं पुत्रं सतम एव माले जनितवती निजगृहे एव महाशुक्रा- युतं नि मकवरं मुनिवरं । वसुदेवो बलभद्रय नीतिमन्ती, देवकी ज्ञापयित्वा गृहीतवन्तौ, बलेन बाउ उद्धतः, पित्रा धृतन्त्रो राजावेच निकातितः । तापुग्मन पुरदेवता वृपभरूपेगाप्रेऽप्रे निजगृङ्गमणिदी- पिकाकृतोयोता मार्ग दर्शयामात । तद्वालपादस्पर्शादोपुरमुदाटितारर सयो जातं । तत्र बन्धनस्थित उनसेन उवाच-फबाटोदानं कः करोति ! बलदेव स्वाव-पस्वां बन्धान्मोचयियतीति तूष्णी तिट्रेति । उग्रसेन एवं भवलित्याशीभिरभिनन्य स्थितः । तौ तु यमुनामितौ। सा भविन्य- चक्रिप्रभान विधा भूला मार्ग ददौ । सवर्णः को वा बन्धुता सार्दो न कुर्यात् । तौ विलितो यमुना व्यतिकन्य बालिकामुयागच्छन्तं नन्द- गोपति ददृशानुः । तं दृष्ट्वा ताचतुः-मद ! लमसहायो रात्रात्र कि- १ पूर्वदत्तवरदानान् । २ भस्माद वापति पदं। ३ त्रिपमत. स. ।

१७६ पद्माभृते- मित्यागतः । स प्रणम्योवाच-मम प्रिया युष्मप्रचारिका पुत्रार्थ गन्धा- दिभिः पूजयित्वा देवता याचितवती-देवि! पुत्र मे देहीति । सोच रात्री पुत्री लेभे । सोवाचति रुयपत्यं ताम्य एव देहि । तस्याः सशोकाया वचनादिदं स्त्र्यपत्य देवताभ्यो दातुं मम प्रयासोऽयं स्यामिन्निति जगाद। तद्वचनं तो ध्रुन्याऽस्मन्कार्य सिद्धमिति प्रदृष्य तम्बतु: त्वमस्माकमभी- एस्तेन तव गुई कथ्यते, अयं बालश्चक्री भविष्यति व पारयति । इये तु बालिकाऽस्मभ्यं दीयतामिति । तो गृहीत्वा गूढतया पुरं गतौ । नन्द- गोपस्तु गृहं गत्वा प्रियां प्राह-निये ! देवता तुष्टा महापुर्य पुत्र तुम्यं ददुः प्रसन्ना इति प्रोग्य त पुत्रं तस्यै समर्पयामास । कंसस्त देवकी पुत्री प्रसूतयतीति श्रुवा तत्र गया तो मुतो ममनासा चकार । मात्रा तु सा बालिका भूमिगेहे वर्विता प्रौढयौवना नासावि. कृति विलोक्य आयिकापार्चे सुरता दीक्षा जग्राह शोकेनौते । विन्ध्य. पर्वत स्थानयोगं गृहीत्या स्थिता । यनवासिषु देयतेति पूजयित्वा गते रात्री व्याप्रेण भक्षिता स्वर्गलोक जगाम । अथापरस्मिन् दिने व्याधै। हम्नालिजय दृष्ट । क्षीरकमादिभि पूजित देशवामिभिषिमूदान्म- मिरमानार्या विन्ध्यवामिनी देवतेति प्रमाणिता । अथ मस्मिन् पुरे महो- साता प्रमृता ।मान् दृष्ट्वा कमेन वरण पृष्ट किमंषा फटामिति ।स बाद-तब शत्रु समुत्पन्नी महान इति । नैमितिकवव गगना चिन्ताम्या बभूव । नदा पूर्वोक्ता देवता ममागता कि कर्तव्यमिनि पनामुः । म आर-मम गई पापिष्ट कचिदुपनमा पश्य मारयत पूर्य । तष्ठुया ममापि गताम्नयास्थिति । ना तना विभंगात् ज्ञा-या यागु- दे मारयितुं यगोदातन्माता गृहस्था विपतनपानोपायेन दुष्ट मारण चिकाटीकिता। तद्वारपाटनीयुका काचिदन्या देवता स्तनदा. मनोदा।

.. . भावप्राभरा। नायसरे की चकार । सपोहा मोदमसमी मलाहमियामोरया परमपिता (१)। द्वितीया देवना फटाफार गृहीत्वा निगपरि धावती मोन पादाभ्यां साहिता ना (२) अपरेशुनन्दगोदी कानाराष्ट्र बना जरमाननं गता नयापि सिमुल्यगमत् । सदा संबा मारपितु दयते अर्जुनता भूत्वा तदुपरि पतन्यो भूनगदुल्लयामास (३-४) वियो- मामालायामका तालतरभूबा तामस्तफे फलानि पदोऽपिनिगगि पातपितुमुपता (५)। अपरा रासभी भूत्वा तं दष्टुमागता । सभी चरणे गत्वा तव तं वृक्षमतारपत् (६)। अन्यस्मिन् दिनेऽन्या देवता तुरंगमो भूत्वा तं मारयितुमागता । तस्य यदनं मुष्टिना जघान (७)। एवं सीव देवताः फसमागत्योचुः-ययं तय शत्रुमाग्नु न समर्थाः स्म इति । विगुत छ विलीनाः । देवतानामपि शक्तपः पुष्पयनने न समर्याः राजयोऽरिशखाणीव । अन्यस्मिन् दिनेऽरिटनामा देवरतापरामा तपुरमागतः कृष्णमाकारः, तस्य प्रीवाभजन स धर्म चकार। तन्माता यशोदापि त तर्जयति स्म-पुत्र! एवमादित एवाफाटचेटितात् ऐशान्तर- सम्पादकाद्विरमैति पुनः पुनर्नियारितोऽपि मदोत्कटस्तयेरितं चकार । महीसोऽपदाने निवारयितुं न शस्यन्ते । तत्पौरुष ख्यातं टोकरचनादा- फर्ण देवकीयमुदेवी तदर्शन उत्कण्ठिती। गोमुरीनामोपचासमिपेण सौरिणां सह महत्या विभूत्या गोदायनं गोष्टं परिवारण सह गतौ । तस्मिन्नेव दर्पबद्दपभेन्द्रीवाभंगावसरे कृष्णं महारटं समाजम्म्य स्थित दृष्ट्वा गन्धमात्यादिसन्मानानन्तरे भूपपामासतुः । तदनन्तरं प्रदक्षिणं कुर्वत्या देवस्याः शातकुंभकुंभसारापोः स्तनयोः क्षीरं मुलाब कृष्णस्याभिषेक कुर्वत्या छ । यस्तद्वीक्ष्य मंत्रभेदभयादुपवासप- महाजसापदानि. रा. २ अकमनि इत्यर्पः । ३ मलभदेण । ४ महानि. भूपा. स. । ५ सुभाष, रा.।६ पलदेव ।

। । षट्माभूते- रिश्रान्ता माता मूर्छितेति जल्दन् मुधीः कुमपूर्णपयोमिस्ता समन्ततोऽ- म्युक्षितयान् । ततो गोष्ठपक्षादीनामपि तद्योग्य पूजनं कृत्वा गोपाल कुमारः सह कृष्णं भोजयित्वा स्वर्प च मुक्या माता पिता च विकु- र्याणी पुरं प्रविविशतुः । कदाचिन्महावर्षपाते जाते गोवर्धनाय पर्वत- मुदृत्य हरिपुवामावरणं चकार । तेन योरस्नेव तत्कीतिरखिलं जगत् व्यामोति स्म शत्रुमुखकमलसंकोचकारिणी । तनगरस्थापनाहेतुभूतजि- नालयसमीपे पूर्वदिशि देवतागृहे हरिपुण्यातिरेकात् नागशय्या धनुः शखश्च त्रीणि रत्नानि देवतारक्षितानि नारायणस्य भविष्यलश्मीसूच- कानि समुत्पन्नानि । तानि दृष्ट्वा कसो वरुण सभप पप्रच्छ-एतेषा प्रादुर्भूतः किं फलमिति । स प्राह-हे राजन् ! एतानि त्रीणि रत्नानि शास्त्रोक्तविधिना यः साधयति स चक्रवती भविष्यतीति। तच्छ्रुत्वा कंसः स्वयं तत्रित साधयितुमिच्छुरपि साधयितुमशक्तो मनाक् खिन साध- नाद्विरराम । उक्तवाश्च यो नागशय्यामाम्यैकेन हस्तेन शख प्रयति द्विती- येन करेण धनुरारोपयति युगपत्कार्यत्रयं करोति तस्मै निजपुत्री दास्या- मीति स्वशत्रु परिज्ञातुं साशक पुरे घोषणामचीकरत् । तद्वार्ता श्रुत्वा सर्वे राजान आगताः । राजगृहात् कंसत्यालकः स्वर्भानुनामा भानुना- मानं स्वपुत्र भानुसरशमादायाजगाम । निवेश चिकीर्षुगोदावनसमीपे महासर्पनिवाससरोवरतटे निवासं फर्तुमना गोपालकुमारेभ्यः श्रुत्वा कृष्ण विनाऽस्य सरसो जलमानेतुं परैर्न शक्यमिति तमाडूप यथास्थान स्कन्धाकार निवेशयामास ।कृष्ण उवाच-राजन् ! त्वया कुत्र गम्यते इति । स्वर्भानुमथुरागमनप्रयोजन तस्पोक्तवान् । कृष्ण उवाच-राजन् ! एत- कर्म किमस्मद्विधैरपि कर्तु भवेत् । तच्छुत्वा स्वर्भानुश्चिन्तयामास- १. स. १र्षमाणौ। ३ प्रविशतुः क. । प्रविशतुः ख ।

भावप्राभूतं । मी शितः पुनाविक केली मयत इति । सम्प फर्मनः दाम- दात निजनित ग्रीवा गुभान्यपरनामा पर्भानुमैथुन FIR पं. दी। तमामकरणे यान मामानान् दशा मन माने गमार्ग रया पर नमका घफार । सत: मु. सानुना विष्पादियः हलो जगान | फेमिली: फैसो भनिन सफार्म भानुना कृतं "। फैभित्ताक्षरनं " म भानुना तत्कर्म कृत अन्येन युमारनेति " | तमाया कस माह-सोऽन्योऽपियानीal स्म कन्या प्रदीयते इति । स फरस, कि कुलं, फस्मिन्निति । तायन- दगोपन सम्पम्पिमातं सनेन मात्रेण ताकर्म सम्पत्तमिति माया गोमादल नीवा पलापांचभूवे । शिशास्तभनु तत्र सर्वे जनाः प्रा- तास्ते नाशयन् । फोन केवलेनैव समुदृतः । तत्सारसात् सर्वे जना शिरिमय जन्यः । परापीमुकामरणादिदानेन पूजयामानुः । नन्दनौरस्त ममात्य पुरसमावेन कुतोऽपि भयं नास्तीति प्रास्तनमेर स्थानं गोकुद निनाय । अन्वेषकैस्तु नन्दगोपमुनेनैताकर्म कृतमिति राहे नियते स्म । तथापि तदनिक्षये सहसदले कमलमहीतर- মিন শিলালিৰি ৰা নাৰ মাধব রান্নীহা। तन्दुवा नन्दगोपः शोकादाकुडो बभूव "राजानः फिल प्रजानां पालका भवन्ति कायमेतत् तेऽध मारकाः संजाता इति।" निर्विध पुत्र! लं पाहि राजाधिशशी पर्तते इति । पोतरक्षितानि फमहानि राज्ञः प्रदातन्यानोति जगाद । कृगः प्राहकोऽपि पदार्थः किं दुष्करी मम यतते इत्परतेजा नागसरो जगान | त्वरितं तत्र निःश प्रविवेश च । तं झाचा कोन वेपमानो लोडहानः स्वनिःश्वाससमुद्तम्भल- १ स. पुस्तके नापाः २ आमा ।

पद्मामृते- उज्यालाकणान् किरन् फणारत्नप्रमाभामिफणाप्रकटाटोपभयानक: प्रचद. दरसेनायुगलो विस्फुरद्वीक्षणाऽयुप्रवीक्षणः प्रत्युत्थाय कृतान्ताकारस्तं निग- रितुमुद्यतः । कृष्णस्तु मम वसनमिदमस ताइने शुद्धशिला भवविति जला पीतवस्त्रं मुक्वा फटाया तं निष्टुर ताडयामास । तस्माइनपाता- द्वजपातादपि दुर्धरात् पूर्वपुण्योदयाच्च भीत: कालियाहिः फणीन्द्रोऽस्पता जगाम | हरियथेष्टं कमलानि गृहीत्वा शत्रोः समीपं प्रापयामास । तानि दृष्ट्वा कैसो निजशत्रु दृष्टवानिव नन्दगोपसमीपे मम शत्रुवर्तते हात निश्चिकाय । एकदा नन्दगोपालमादिष्टवान् मल्लयुद्धमीक्षित निज. मल्लैः सहाऽऽगच्छेरिति । स च तत्सन्देश श्रुत्वा कृष्णादिभिर्मलैः सह प्रविवेश । तत्र मत्तगज वीतबन्धनं कृतान्ताकारं मन्दगन्धारष्टर- वहमरसेवित नियमच्युतराजकुमारवत् निरकुर्श दन्तमुशलाघातनिर्मिन- मुधामन्दिरमाधावन्तं विलोक्य कश्चित् समुखं प्रदौक्य दन्तमेकमुत्पान्य तेनैव तं ताहयामास । गजोऽपि भीतो दूर जगाम । तदृष्ट्वा हरि शं तुष्टः सन्नुवाच-अनेन निमित्तेन कुटुम्बप्रकटीकतो जयोऽस्माक भविष्यतीति गोपान समुत्साह्य कंसससद विवेश । वमुदेवोऽपि राजा कैसाभिप्राय विदित्वा निजसेना सन्नाबकत्र स्थित । बलभद्रोऽपि कृष्णेन सह रंग प्रविष्ट इव दोर्दण्डास्फालनपनि कृत्वा समन्तात् परिभ्रमन् कसविनाशेऽद्य तब समय इति समाफ्याय निर्जगाम । तदा कंसादेशेन विष्णुविधया गोपकुमारा प्रदर्पयन्त भुजानारफाल्य गृहीतमद्धपरिच्छदा. फर्णानन्द- फारिवादिनचटुलध्वनिभिरेकत्रीभूत्वा चरणोक्षेपविनिक्षेपा प्रोनतमुज- द्वपोत्कटा पर्यायनर्तितप्रेक्षणीयभूभगभयानकशम्दानिवर्तनशतावर्तनम- भ्रमणवलानप्लवनसमवस्थानरपरश्च पुटैः करण रगसमीपमलंकृत्य नयन- १ रसज्ञा. क. १ नेत्र। ३ अबलोकनीयः । । योरभेषा. स ।

भायमाभृतं । १८१ मनोर राम्नास्यामः। फैसमलाप प्रोतामापूरप्रमुख विक्रमकरसारंगा- पण समास स्थितन्तः । विष्णुधरंगप मध्ये समुदात्तमनः प्रसरो पीर उरमलामणी प्रतिमद्युविजय प्रागेर प्राम व दीप्ततेजा देवोऽ. वीर्णोऽधुना मदर्य प्राप्तो भास्थानिय सह जेप्यामीति प्रसपराक्रम- फरसः न्वय सभायपन् निविदपरिगृहीतपरिधानः प्रयस्कोशः स्वभावेन मसुपाड़ो विर्चभित्तत्तिरित्तोऽप्रतिमनिरन्तराम्पस्तनियुसवाद- विकटरभजपलाम संरपि संभावितोसाहः स्थिरतरपादनिवेशो यम- सारास्थियन्धी भुजार्गलापरवियाधी मुष्टिसमापिमध्यप्रदेशः एतानेककर- पसमूहो रघुसंचरणप्रवीणोऽतिकटिनविस्तीर्णवक्षःस्थटो वृहन्नीलपर्वतो- तुदो दर्पप्रद्धित्रिगुणितनिजमूर्तिमलितपलितनेत्रवानिरीक्षपसांमुल्यो- तिशपेनाशनिपातमो नन्दनन्दनः स्थितः सन् यमस्या युपमसहनी- यमुत्पादयन् घरमसिलं शौर्य मूर्तिमम्मिलितमिव समस्त रहो मनुष्या- कारनागतमिव सिंहाकारः सहसाहतसिंहपनिः रंगादेगणमिव नभोग- जमलंघत पुनराकाशादशनिवदवनिमापस आमपादपाताभिधातचलि. साचलसन्धिबन्धी मुहर्वान् परिसरंथ प्रतिजभमाणसिंदूररंजितभुज- दण्डौ समुदनौ मुद्धः प्रबाटयन् श्रोणीद्वितयभागविलंबिपीतवस्तो नियु- सकुशलं पर्वतशिसरोनतं प्रतिमहं चापमाहत्प सहसा सिंहरदार- भासे । तं दृष्ट्वा रधिरोदमोमलोचनः फंसः स्वयं मद्धता प्राप्यागच्छ- ति स्म। तनुमसेनतनयं जन्मान्तरद्धेपात् करेण चरणे संगृह्माकाशे सामपनल्पाण्डमिय पमराजस्य समीप उपायनीकर्तुमिव स कृष्णो भूमावास्फालपामास । तदा कृष्णमस्तके व्योम्नः कुमुमानि प्रपेतुः देयदुंदुभयो पनि चक्रः । वसुदेवसेना समुद्र प्रक्षोभणात् कोलाहलव- १ः, स.। २ सप्रतिनगरमः, रा.।

१८२ घट्नामृते- निरुत्तस्ये । मुशलीवीरवरो विरुद्धकृपतीनाक्रम्य रंगे स्थितः । स्वानुर्ज स्वीकृत्य गर्जितं चकार । विष्णुस्त्रिखण्डलक्ष्म्या कटाक्षितः । इति श्रीभावप्राभृते द्रव्यलिंगिनो वसिष्टमुनेः कथा परिसमाप्ता । सो णत्थि त पएसो चउरासीलक्सजोणिवासम्मि । भावविरओ वि सवणो जत्य ण दुरुडुल्लिओ जीव ॥४७॥ स नास्ति त्वं प्रदेश चतुरशीतिलक्षयोनिवासे । भावविरतोऽपिप्रवणो यत्र न भ्रान्त जीव 1॥ पदखण्डनारूपेण व्याख्यानं क्रियते । हे जीव ! हे चेतनस्वरू- पात्मन् ! । जत्य यत्र प्रदेशे। तं व भवान् । ण दुरुहुल्लिओ न भ्रान्तः स प्रदेशः ससारे नास्ति । कस्मिन् , चउरामीलक्खजोणिवासम्मि चतुरशीतिलक्षयोनिवास स्थाने । कथंभूतस्त्वं, भावविरओ वि सवणो श्रवणो दिगम्बरोऽपि सन् भावविरतो जिनसम्यक्त्वरहित । उक्त च गुम्मटसारपन्थे नेमिचन्द्रेण गणिना- णिधिदरधादु सत्तय तरु दस वियलिदिपसु उच्च । सुरनरयतिरियघदुरो चउदस मणुए सदसहस्सा ॥१॥ अस्या अपमर्थ:-नित्यनिकोतजीवाना सप्तलक्षा जातय ७०००००। इतरनिगोदजीवानां जातयः सप्तलक्षा. ७००००० । धातूना पृथि- वीकायजीवाना अकायजीवाना तैज कायजीवाना वायुकायजीवानां जा- तयः चतुर्णी प्रत्येक सप्तरक्षा ।पृथ्वी ७०००००। अप ७०००००। तेजः ७०००००1 वायु ७०००००। तर दह-वनस्पतिकायजीवाना जातयो दशलक्षा १०००००० । वियलिंदिएमु छच्चैव-दीन्द्रियत्री- न्दिपचतुरिन्द्रियजीवानां जातयः समुदायेन पक्षाः । द्वीन्द्रिय जीवो. ग...

भावप्राभृतं । १८३ २००००० त्रीन्द्रिय २०००००। चतुरिन्द्रिय २०००००। सुरनर- यतिरियचदुरी-सुराणां जातयश्चतस्रो लक्षाः ४०००००। नारकाणां जातयश्चतस्रो टक्षाः ४००००० तिरक्षां जातयश्चतस्रो लक्षाः ४००००० चौदस मगुए-चतुर्दश लक्षा जातयो मनुजे मनुष्यजीवानां १४०००००। सदसहस्सा-शतसहस्राः । भावेण होइ लिंगीण हु लिंगी होइ दवमित्तण । तम्हा कुणिज भावं किं कीरइ दबलिंगेण ॥ ४८॥ भावेन भवति लिनी न हु भववि द्रव्यमानेन । तस्मान कुराः भावं कि क्रियते द्रव्यालिदान ।। भावेण होइ लिंगी भायेन निदानादिरहिततया जिनसम्यक्त्वस- हिततया लिंगी सन् लिंगी भवति निदानादिसहितो जिनसम्परत्वरहितो लिंगी मुनिलिंगी जिनलिंगी ससलिंगी न भवति । ण हु लिंगी होइ दवमित्तेण न हु-स्फुटं लिंगी तनपि टिंगी न भवति द्रव्यमात्रण शिरोलोचमपूरविष्टकमन्डलमहणवलपजनमात्रेण लिंगी सनपि लिंगी न भवति पुन: संतारपतनहेतुत्वात् । तम्हा कुणिज भावं तस्मात्का- रणात् कुर्यास्त्वं । कं, भाव-जिनसम्परत्वनिर्मटपरिणाम । कि कीरह दवलिंगेण पूर्वोक्तदन्पलिंगेन कि क्रियते न किमपि मोक्षनुख क्रिपत इति भावः । दंडयणपरं मपलं उहि अभंतरेप दोसेण । जिगलिंगेण विबाह पडिओ सो रउरवं नरयं ॥ ४९ ॥ सनगरे सरतमा जन्मन्तरेन दोपण। दिनानादिराः पतिः स रोरवं नरम् ।

१८४ पट्मामृते- दंडयणेयरं सयलं दण्डकास्य राज्ञो नगर सकलं । डहिउँ अर्भ तरेण दोसेण दग्या अभ्यन्तरेण दोषेण क्रोधेन कृत्या जिणलिंगे विवाह जिनलिंगेनापि जिनलिंगसहितोऽपि बाहुर्नाममुनिः । पडि ओ सो रउरवं नरयं पतितो गतः रौरय नाम नरफ । अस्य कथा दक्षिणापये भरतदेशे कुम्भकारकटनगरे दण्डको नाम राजा । तन्म हादेवी सुव्रता । वालको नाम मंत्री। तत्र अभिनन्दनादयः पंचश तमुनयः समागताः। खण्डकेन मुनिना यालको मंत्री यादे जितः ततो रुप्टेन तेन भंडो मुनिरूपं कारयित्वा सुत्रतया सम रममाणो दर्शितः मणितं च तेन देव ! दिगम्बरेषु भक्यातिमुख्योऽसि येन भार्यामा तेभ्यो दातुमिच्छसि । ततो रुटेन राज्ञा मुनयो यत्रे निष्पीलिताः ।। तमुपसर्ग प्राप्य परमसमाधिना सिद्धि गताः । पचात्तनगर पाहुना मुनिरागतः । स लोकरित. । अत्र नगरे राजा दुष्टो वर्तते तेन पंच शतमुनयो यंत्रे पीडिता भयन्तमपि तथा करिष्यति । तद्वचनेन बाई रुष्टः । नेजोऽशुभसमुदातेन राज्ञा मंत्रिणा च सह सर्व नगरं भरमीच कार। स्वयमपि मृतः । रौरवे नरके पतितं रानाने मंत्रिर्ण चानवेषु मिव तत्र गतः । को नाम रौरयो नरक इति चेत् ! सप्तमे नरके पंच विटानि वर्तन्ते तेषु पूर्वदिशि रौरव । दक्षिणेऽतिरौरवः । पश्चिमेऽसि पत्रः। उत्तरे कूटशाल्मलिः | मध्ये कुंभापाक इति । अवरोति दय्यमवणो दंसणवरणाणचरणपन्महो । दीवायणुत्ति णामो अणंतसंमारिओ जामो॥५०॥ भपर इति न्यश्रमशो दर्शनपरझानचरणप्रभष्टः । दीपायन इति नामा अनन्तसंसारिको जातः॥ । न.टी.1 वि. मूलगापा पाठः।

भावप्राभृतं । १८५ अवरोत्ति दबसवणो अपर इति द्रव्यश्रवणो भावरहितो मुनिः जिनववनप्रतिरहितः। दसणवरणाणचरणपन्भहो दर्शनेन जिनसम्प- क्वेन बरं श्रेष्टं यम्झानं चरणं च चारित्रं तेम्पत्रिभ्योऽपि प्रभृष्टः पतितः सम्पधीनां मुनीनामपाक्तेयः। दीवायणुत्तिणामो द्वीपायन इति नामा। अणतसंसारिओ जादोभनन्तसंतारिकः अनन्ते संसारे नियुक्तः नियो- गवान् कर्मपरवश इत्यर्थः, जातो भवति स्माद्वीपायनस्य कथा पया-श्रीने- मिनाथो बलभद्रेण पृष्टः स्वामिन् ! इयं द्वारवती पुरी फि कालान्तरे समुद्रे निमंश्यति कारणान्तरेण वा विनश्यति ! भगवानाह-रोहिणीमाता द्वीपाय- नकुमारस्तव मातुलोऽस्याः पुर्या रुपा दाहको भविष्यति द्वादशे वर्षे मघहेतुत्वात् । तच्छत्या द्वीपायनकुमार इदं जैनवचनमसत्यं चिकीर्षु- दक्षिां गृहीत्वा पूर्वदेशं गतः। द्वादशावधिपूरणार्थ तपः कर्तुमारग्धवान् । जरत्कुमारेण कृष्णमरणमाकर्ण्य बलभद्रादयो नेमिनाथं नमस्कृत्य सर्वेऽपि यादवा द्वारवती विविशुः। ततः कृष्णो बलभद्रव पुर्यो घोपणां मद्यनि- पेपिनी कारयामासतुः। ततो मद्यपैयाङ्गानि पिष्टकिण्वादीनि मयानि च कदम्यवने गिरिगम्हरे शिलाभाण्डानि आस्फाटितानि । सा मदिरा फदम्बवनकुण्डेषु गता। कर्मविपाकहेतुत्वेनायस्थिता । श्रीनेमिनाथः पल्लवदेदो गतः । जिनेन सह भन्यलोक उत्तरापथमुञ्चटितः । द्वीपाय- नस्तु द्वादशं वर्ष भान्याऽतीतं मन्वानो जिनादेशो व्यतिकान्त इति ध्यात्वा सम्यक्त्वहीनो द्वारवतीमागत्य गिरनिकटनगरवासमार्गे आता- पनयोगे स्थितः । वनक्रीडापरिधान्तास्तृष्णया व्याकुल भूताः काद- बकुण्डेषु जलमिति ज्ञात्या शंभवादयस्ता मुरां पिबन्ति स्म । कदन्यत्र- नस्थितां कदम्बकतया स्थितां विष्टां कादम्बरी पीत्वा कुमारा विका- रांश्च प्रापुः । ता पुराणापि वारुणी परिपाकवशात् तरुणीवत्तरणान् वशेऽकरोत् । ते कुमारा असंबद्ध गायन्तो नृत्पन्तध स्वस्तिपादाः १८६ पद्माभूते- प्रमुकान्तला पुपानावतसा: कण्ठालम्बितपुपमाः सारे समागान्त गर्यप्रतिमास्थित दीपायनमुनि दृदा पूर्णमाननयना इतनु:- मोदीपायनो पतियों द्वारपती पश्यति सोऽस्माकममत: पास्यनि न डाले प्रोच्य मतो लोटुभिः पाषाणैम तापानमनु पासपूमी पपात । एवं सैनिकस्ताडित उत्पन्नाधिकशोधो दटोयो पाना स्यताममरिनाशाय माटि चकार। कुमारास्तु पुरी प्रति गमन चक: केभिन चारो णिो स्य लघु निवेदित । सकृत्या द्वारवया मानिनो मा तदापि मनात परिसदाहिनी गसिपी गयी। अतिमिल mant काधन धिय प्रगविषमा गियर्ण HIMATE भाषणम्। दाशत । कमालिटी महाद. पाना या मानानि महागावियानीमायो। fuTufanामार मार मानिना पिते माशमान परि. mat TimTAL | मने प्रमादवहालेदात आतापता 441 सा मानावान, समय प्रमाद 11 प्रगानीबपि मानिक मान । ममतादा. पाहा. निमय TRA पागलपन A का । भनिवर्तक- [art (नागिरता 1441 मन पन मनामा बमूला ISRAHE Immit ami] वामाग. at fukar) नक्षीर 15. ahinालमाननी..।

भावप्राभतं । १८७. विष्णुर्जरत्कुमारमिलेन पादे याणेन ताडितो मृतः प्रथमं नरकं जगाम । दोरापनस्तु सनन्तसंसारी बभूव । भावसरणो य धीरो जुबईयेणवेडिओ विमुद्धमई । पामेण सिवकुमारो परित्तसंसारिओ जादो ॥५१॥ भापथमाए धोरो युवटिजनटितो विगुरमतिः। नाम्नास्टिमारः परीतगंगारिरो जातः॥ भावसवणो र धीरो भावयप जिनसम्परत्वयालितः धारी हदसम्बर वः अविचरितामतिनमनाः। जुबईयण वेटिओ विमुद्धमई युवतिजनदेधितः हावभावविभमविलासोपैतराजकन्या- रमदुवतिमहापरिहतोऽपि विशुसमतिः निर्मलालपनि कदाप- चितः । पामेण निवकुमारो नासा एचा शिवकुमागे नरेन्द्रपुत्रः । परिचरंमारियो जादो संसारिक पल्विक्तसंसार आसलम- सो जातः, १ भरतशेने जम् नामान्ययाती दभूति मिपाकारक- मम्बयः । सिदामास फया पक्षा-अध अंगिकः कीदीर विपुलगिरी नमवस्थित प्रापशीलतमरवामिनं प्रसार भरतशेने पधिन- पेरीको भविष्यति मगलिति । ततः पादः पाखिदिनु भोमो- म उन भनि म तरिमोवापरे मामला प्रकार विना- नदिमागल्पमानतेजविराजमानमः स्वनामा स्वदरनिन पहिलो विद्यममानिगादिनिजदेवमिति मगर रिन दिया सशस्थानस्किारान! सदन मेरोतिर मिनिषि- सकिसान 1 नाममने दिन हन्टः रमन गरी नपिनाकिनारा १........।

whna १८८ पद्माभृते- सरोवर शालिवन निधूमानलं प्रज्वलज्ज्वालं स्वर्गकुमारसमानीयमानजम्बू- फलानि च स्वप्ने दर्शयित्वा महाद्युतिर्जम्यूनामाऽनावृतदेवाप्त जोऽतिवि- ख्यातो विनीतः मुतो भविष्यति । यौवनारम्भेऽपि निर्विक्रियो भावी! तस्मिन् जम्बूस्वामियोवनका श्रीवीरभट्टारकः पावापुरे मुक्ति यास्यति तस्मिन्नेव समये मम केवलज्ञानमुत्पत्स्यते। मुधर्मगणधरेण सह संसारामित. साना भव्यप्राणिनां धर्मामृतोदकेनाल्हादं करिष्यन्निदमेव राजगृहपत्तनमा- गत्यास्मिन्नेव विपुलाचलेऽहं स्थास्यामि । तत्समाकर्ण्य चेलनीमुतः कुणिको नृपः सर्व परिवारेण समागत्य मां मुधर्मं च पूजयित्वा दानशीलोपवासादिक स्वर्गमोक्षसाधक धर्म ग्रहीष्यति । तेन सहागतो जम्धूनामा निर्वेदं प्राप्य दीक्षामहणोत्मुको भविष्यति। तं कुटुम्ब वदिष्यति स्तोकेषु वर्षेषु गते स्वया सह वयं सर्वेऽपि दीक्षा ग्रहीयाम इति । तेन प्रोक्त सोदुमश- क्नुपन्निराफर्तुं च तदक्षमः पुरमापास्यति । तस्य मोहमुत्पादयितुं मुराब- न्धन' विवाह आरप्स्यते तेन कुटुम्यवर्गेण। बान्धवा हि श्रेयसो विमाः । सागरदत्तपमावत्योः सुता श्रियोत्कृष्टा मुलक्षणा पमश्रीः, कुवरदत्तकन- कमालयोः मुता मुलोचना कनकधी:, श्रयणदत्तविनयवत्योबूंदा मृगलोचनावलोकनीया विनयश्रीः तस्यैव वैश्रवणदत्तस्य धनश्रियाः मुता रुपनी: एताश्चतस्रो विधिपूर्वक परिणीय सौधागारे समीचीनरत्नदीप- दीतिभिनिरस्तान्धकारे नानारत्नसमीचीनचूर्णरंगवडीसंशोभिते विचित्र पुष्पोपहारसहिते जगतीतले स्थास्पति । एतस्य माना अर्य मे मुतो रागेण प्रेरित: स्मितहासकटाक्षेक्षणादिना विकृति भजन् किं भवेन या मवेदित्यात्मान तिरोधाय पश्यन्ती स्थास्यति । तस्मिनससरे मुरम्यदेश- पोदनापुरेशविद्युद्वाजविमलवत्योः सुतः पापिष्टाना धुरि स्मयों दुरामना २बोस.न। म.स.I४ मुता... --- भावप्राभूतं । चन्दनीयोऽगुणवानुत्सुकथ तीक्ष्णो विद्युमभनामा केनापि कारणेन निजज्येष्टमाने कुपित्वा पंचशतमुभटैर्निर्गतो विद्युचौरनामानमात्मानं कृत्वा चौरशास्त्रोपदेशेन मंत्रतंत्रविधानाददृश्यशरीरत्वकपाटोद्घाटनादिक जानन दासगृहाम्यन्तररत्नधनादिकं चौरयितुं प्रविश्य जिनदासी नष्ट- निदां विलोक्यात्मानं निवेद्य किमर्थं विनिद्रा त्वमेवमिति प्रस्यति ! मम एक एव पुत्रः प्रातरेवाह तपोवनं गमिष्यामीति संकल्पस्थितो वर्तत तेनाहं शोकिनी सती जागर्मि । वं बुद्धिमान् दृश्यते यदि त्वमिममान- हादुपापैरियसि तत्त्वदीप्सितं धनं सर्वमहं दास्यामीति वदिष्यति । सोऽ- पि तत्प्रतिपद्यैवं सम्पनभोगोऽयं किल विरस्यति, इह धनमाहर्तुं प्रविष्टं मां विगिति स्वनिन्दनं कुर्वनिःशंकं तदन्तिकं प्राप्य तं तासां कन्य- कानां साप्यतयाधिष्टितं कुमार प्रसरत्सद्बुद्धिं पंजरगतं पक्षिणमित्र, जाल- समं मृगबाटकभिव, अपारकर्दमे मनं भद्रजातिगजाधिपतिमिब, लोहप- जरैर्निरुद्धं सिंहमिव प्रत्यासनसंसारक्षयं तम्प्राप्तनिर्वेदं समीक्ष्य विद्युच्चोरः सुधीरयाख्यानकं वदिष्पति । हे कुमार ! त्वया श्रूयतां-कश्चित्क्रमेलकः स्वेच्छया चरनेकदा गिरेरुनतप्रदेशात् तृणं खादन्नेतन्मधुरसोन्मिनं सह- दावाद्यो नुकस्तादृशमेवाहमाहरिष्यामीति मधुपानाभिवाञ्च्या तृणान्तर- चरणातिपराड्मुसस्तस्थी मने च तथा त्वमप्यतानुपस्थितान् भोगान- निन्छन् स्वर्गभोगार्थी बुद्धिरहितः कमेटकावस्यां प्रास्पति (१) इति चौरप्रतिपादितं श्रुत्वा कुमारः प्रत्युत्तरं दास्पति-कथित्पुमान् महादाह- करेण रविणा परिपीडितो नदीसरोवरतडागादिपानीयं पुनः पुनः पीत्वा तथापि न पिनष्टतृष्णस्तृणामस्थित जल फणं पिबन् फि तृप्ति याति तथा जीवोऽपि चिरफालं दिव्यमुप भुक्त्वाप्यतृप्तोऽनेन मनुष्यभव- . पिलसति रा.

-- । पद्माभृते- जातेन स्वस्पेन गजकर्णास्थिरेणास्वादुना तृप्ति यायात्-अपि तु न यायात् (२)। इति तद्वा श्रुत्वा स एकागारिकः कथयिष्यति कथां-एकस्मिन् वने किरातचण्डो महातरुमाधारं कृत्वा गण्डान्तं धनुराकृष्य बाणेन वारण जघान । तरुकोटरस्थितसर्पदष्टस्तं सर्प मारयित्वा स्वयं च मृतः। अथ सान् बीन् किरातसर्पगजान् मृतान् दृष्ट्वा कोष्टाऽतिलुन्धस्तावदेतोत्री नाभि पूर्व धनुमाधी प्रान्तस्थितां च नसां भक्षयामीति कृतोद्यमस्तच्छेद वैधैर्यश्चकार । सद्यो धनुरप्रनिर्मिन्नगल. सोऽपि मृतः । ततोऽतिगृनुता त्वया त्याज्या (३)। इति श्रुत्वा कुमारश्चिन्तयित्वा सूक्तं प्रवक्ष्यति- चतुर्मार्गसमायोगदेशमध्ये मुग्रह रत्नराशि प्राप्य पथिको मूर्खस्तदात्मना दायकेनापि कारणेन गतः पुनर्वनादागत्य तं देशं त रत्नपुजं किं पुन- र्लभते तथा गुणमाणिक्यसंचयं दुष्प्रापमगृहन् संसारसमुद्रे कथं पुनः प्राप्नुयात् (४) । तदा मलिम्लुचोऽन्यदन्यायसूचनमुपाल्पानं वदिष्यति- कश्विरमृगालो मुखस्थित मांसपिण्डं मुक्त्वा संक्रीहमानं मीनं भक्षित जले पपात । जलवेगवहत्प्रवाहेण प्रेर्यमाणो मृतः । मीनस्तु दीर्घायु- जलमध्ये सुखं तस्थौ । एवं शृगालवदतिलुब्धो मरिष्यति (५) । एवं मुख्यतस्करवाचं श्रुत्वा प्रत्यासन्नमुक्तिः कुमारो भणिष्यति-कश्चिनिद्रा- लको वणिक् निद्रासुखरतः परार्यरत्नगर्भनिजकछपुट मुप्तः । चौरैर- पढ़ते माणिक्यसचये तद्दुःखेन दुर्मृतिभृति प्राप। तथार्य जीवो विष- याल्पसुखासक्तो रागचौरकैदर्शनज्ञानचारित्ररत्नेश्वपद्धतेषु निम्ले नश्यति (६)। दस्युरथ गदिष्यति-स्वमातुलानी दुर्वचनकोपेन काचिरकन्या तस्तले सर्वाभरणमण्डिता स्थिता। मरणोपायमजानती व्याकुलमनाः मुवर्णदारकेण पापिना मार्दङ्गिकण दृष्टा । तदाभरणानि जिक्षुणा तस्या वधेयः स..तदातमना क.।

भावप्राभृतं । १९१ लम्बनोपायं दर्शयामास । स्वकीर्य मर्दलं वृक्षतले समुद्रं संस्थापयां- बभूव । तस्या गलपाशदानशिक्षणार्थ मर्दलोपरि पादौ धृत्वा गले पार्श चकार । केनापि कारणेन मर्दले पतिते मार्दगिकस्प गले पाशो लग- स्तेनाविटीभूतकण्ठः प्रोद्गतटोचनः शमैनमन्दिरं प्राप । कन्या तदृष्ट्या मरणभयात् गृहमागता तथा कुमार ! त्वया लोभो हेयः (७)। इति तस्प वाग्जालमाफर्य जन्चूनामा कुमारोऽसहमानस्तं प्रति मणिष्यति- कस्यविदाज्ञो महादेवी ललिताङ्गनामधेयं धूर्तक्टिं दृष्ट्वा मदनविव्हला संजाता । तस्य विटत्यानपननिरन्तरोपायनियुक्ता तदात्री तं गुप्तमानी- तवती । सा महादेवी यथा भर्ता न जानाति तथैकान्तप्रदेशे यथेष्ट तं रममाणा स्थिता । बहुभिर्दिनैः शुद्धान्तरक्षकैः ज्ञाता राज्ञो ज्ञापिता च । 'उपपत्यपनयनोपायमजानत्यः परिसारिकास्त खलं नीत्वावस्करगृहे निक्षि. तवापः । स तत्रातिदुर्गन्धेन तत्कीटच दुःखं प्राप । पापोदपेनात्रैव नर- कावासं प्राप्तः। तद्वदल्पमुखाभिटापिणो जीवस्यातिधोरनरकादिषु महापदो भवन्ति (८)। कुमारः पुनरप्यकं प्रपंचं कथयिष्यति येन ध्रुतेन सता लघु संसारनिगो भवति । जीवोऽयं पधिकः संसारकान्तारे भ्राम्यन् मृत्युमत्तगजेन जिघांसुना रुगानुपातोऽतिभीर: पलापमानो मनुष्यत्व. तरुवरान्तरहितस्तन्मूठे कुटगोत्रादिविचित्रबहीसमाकुले जन्मपे पतित सायुर्वलालमकायः तितासितदिवसानेफपिकोच्छिद्यमानतदल्लीकः सप्त- नरकप्रसारितमुससप्तसर्पनिकटः तदृक्षेधार्थपुष्पोत्पनमुखमधुरसटाटस. स्तमहणोत्थापितसनुमापन्मक्षिकाभक्षितः तत्सेवामुखं कात्या सर्वोऽपि विषयलंपटो दुर्बुद्धिर्जीवति तथा धीमान दुर्वहं तपोऽकुर्वनत्यक्तसंगः कथ वर्तत । इति तस्स पचनमार्प माता कन्यायौरस संतारशरीरभोगेष्व- १ भरतंयोभून. स. २ममन्दिर. स.।

१९२ पद्माभृते- तिविरागत्वं यास्यन्ति । तदान्धकार निराठय कोकं प्रियया कुमार दक्षियर योजयन् निजकरैः समाक्रम्य कुमारस्य मन:कमलमित्र रंजपन्नुदयादेः शिखरे रविस्तपसि कुमार इबोदष्यति । सर्वसन्तापकारी तीक्ष्णकरोऽ. नवस्थितः को दिवाकुवलपध्वसी तदा सूर्प. कुनृपस्योपमा धरिष्यति । निन्योदयो बुधाधीशोऽखण्डविशुद्धमण्डलः प्रवृद्धः पद्माल्हादी मुराजन वाऽर्यमाजेष्यति । अस्य कुमारम्य बान्धवा मववैमुख्य विज्ञाय कुणिपमहा- राजश्रेणयोऽधादशापि देवोऽनावृतश्च सर्वे सगम्य मंगलजलैरभिषेक करिष्यन्ति । अथ फास्ता अष्टादशश्रेणय -सेनापनिर्गणको राज- श्रेष्टी दण्डाधिपी मंत्री महत्तरो बलवत्तरः चत्वारो वर्णः चनुरझं बर्ड पुरोहितोऽमात्यो महामान्य इति । असौ कुमारम्त काटोचितवेपो देवनि- मिता शिविकामारुय भूरि भूत्या उच्चैविपुलाचटशिखरे स्थित मा महा- मुनिभिर्निपवितं समभ्येत्य भक्त्या त्रिःपरीय यथाविधि प्रणम्य वर्ण- प्रयसमुत्पनैर्भूयोभिर्विनविद्युचोरेण तपंचशतसेबकैश्च सम मुधर्म- गणधरपादमूले समचित्त. संयम ग्रहीष्यति । द्वादशवर्षान्ते मयि मोई गते मुधर्मा केवटी भविष्यति जम्धूनामा श्रुतकैवली भविष्यति । ततो द्वादशवर्षपर्यन्ते सुधर्मणि निर्वाण गते जम्बूनाम्नः केवलज्ञानमुत्पत्स्यते । जम्बूनाम्नः शिष्यो भवो नाम चत्वारिंशद्वर्याणीह भरतक्षेत्रे रिहरिष्यति। तदाकर्ण्य श्रेणिक स्थितेऽनावृतो देवो मदीयवंशस्येदं माहात्म्पमुद्धृतमी- दृशमन्यत्र न दृष्टमित्युच्चैरानन्दनाटक दृष्ट्वा श्रेणिक उवाच-कस्मादनेन- बन्धुत्वमस्य देवम्येति ? भगवान् गौतमो बभाण-जम्बूनाम्नो वंशे पूर्व धर्म- प्रियश्रेष्ठी गुणदेवी श्रेष्टिनी । तयोरहंदासः मुतो धनयौवनमदेन पितुः शिक्षामगणयन् कर्मवशात् सप्तव्यसने निरंकुशो बभू । निजदुरा- पति स.

.. भावप्राभृतं । १९३ चारेण दरिद्री संजातः । पश्चादुत्पन्नपश्चात्तापो मपितुः शिक्षा मया न श्रुता, उत्पन्नशमभावः किंचित्पुण्यमुपाया॑नायतनामा व्यन्तरो जातः, तत्र समुत्पनसम्यक्त्वसम्पदिति बन्धुता प्रीतिरस्य । अथ श्रेणिकः प्राह-स्वामिन्नय विद्युन्माटी देवः कस्मादागतः, कि पुण्यं पूर्वभवे कृत- वान्, अस्य प्रभा आयुरन्तेऽप्पनाहतैति । तदनुग्रहबुद्धयैव भगवान् गौतमः प्राह-अत्र जम्बूद्वीपे पूर्व विदेहे पुष्कलावतीविषये वीतशोकपत्तने महापी राजा । तन्महादेवी वनमाला। तयोः सुतः शिवकुमारः नव- यौवनसम्पन्नः सवयोभिर्वनं विदृत्य पुनरागच्छन् गन्धपुष्पादिमंगलद्र- व्योत्तमपूजया सह जनानागग्छतो दृष्ट्वा समुत्पन्नाविस्मयो बुद्धिसागरमंत्रिणः पुत्र किमेतदिति पप्रच्छ । समाह-कुमार! शृणु-सागरदत्तनामा मुनीन्द्रः श्रुतविली दीप्ततपोमण्डितो मातोपवासपारणायै पुरं प्रविष्टः । कामसमुद्रो नाम श्रेष्टी विधिपूर्वकं भतया दानं दवा पंचाध प्राप्य तेनोत्पन- कौतुकाः पौरास्तं मनोहरोद्यानवासिनं पूजयित्वा वन्दितुं परमभक्त्या पान्तीति। शिवकुमारः प्राह-अयं सागरदत्ताख्या सध्रुतां विविधीच कयं प्राप । मंत्रिपुत्रोऽपि यथा श्रुतं तथा प्राह-पुष्कलावतीविषये पुण्डरीकिणी नगरी, तस्याः पतिश्चक्री वजदत्तः । तस्य महादेवी यशोधरा गर्भिणी समुत्पन्नदौहदा। सा सीतासागरसंगमे महाविभूत्या गत्वा महाद्वारेण समुद्र प्रविष्टा । जलकेलीविधाने जलजानना आसन्न निर्वृति पुत्र प्राप । तेन हेतुनास्य सनाभयः सागरदत्ताख्यों चक्रुः । अथ सागरदत्तः परिप्राप्त- यौवनः स्वपरिवारमण्डितो हमेतले स्थिती नाटकं पश्यन्ननुकूला- स्पनाना चेटफनोक्तः । हे कुमार! समाश्चर्य पश्य मैकारोऽयं रा. पुस्तफेऽस्य स्थान प्राप्तेनेति पाठः सोऽप्यशुद्धोऽवमात । अतो- स्प स्थान प्राप्तः इति प्रार इति या पाटन भवितव्यं । २ पुअनि इति स. पुस्तके । एतदेव सम्पम्माप्ति।३ गोविनः।

-- १९४ पद्माभूते- मेघस्तिष्ठति । तं मेघ लोचनप्रिय सोन्मुग्यो निरीक्षितुमहिष्ट । स मे स्तत्काल एव नष्टः । सागरदत्तश्चिन्तयामास यौवनं धनं शर जीवितमन्यच सर्व वस्तु विनश्वरं वर्तते यथार्य मेव इति निवेगं गतः अपरेधुर्मनोहरोद्याने धर्मतीर्थनायकममृतसागरं नाम तीर्थकर वनदचे निजवप्ना सह वन्दितुमितः । तत्र धर्म श्रुत्वा निश्चितसर्वस्थिति सर्ववन्धुविसर्जनं कृत्वा बहुभी राजभिः सम संयम जमाह । मनःपर यद्धिसम्पदं प्राप्य धर्मोपदेशेन देशान् विद्वत्यात्र वीतशोकपुरमागतः इति मंत्रिपुत्रवचनानि श्रुत्या शिवकुमारः प्रीतमनाः स्वयं गत्वा मुनिवर स्तुत्वा धर्मामृतं ततः पीत्वा जगाद । भगवन् भवन्तं दृष्ट्वा मम महान् स्नेह संजातः । तत्र कः प्रत्यय इत्यपृच्छत् भगवान् सागरदत्तः प्राह-अत्र जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे मगध देशे वृद्धमामे राष्ट्रकूटो नाम वणिक् । तस्य भार्या रेवती । तयोद्ध पुत्रौ भगदत्तभवदेवौ । तयोर्मध्ये भगदत्तः मुस्थितनामगुरुं नत्वा दीक्ष जग्राह । विनयान्वितो गुरुणा सह नानादेशान् विहृत्य स्वजन्मग्राम माजगाम । तदा तद्वान्धवाः सर्वेऽपि हर्षमाणाः समेत्य मुनि सुस्थिर प्रदक्षिणीकृत्य संपूज्य चागन्तुमुद्यताः । तत्रैव प्रामे दुर्मर्पणो नार गृहपतिः । तस्य नागवसुर्भार्या । तयोः पुत्री नागधीः । सा विधि. पूर्वकं भवदेवाय ताभ्या ददे । भगदत्तागमनं श्रुत्वा भवदेवोऽपि विकु. hणोऽत्रागत्य भगदत्तं विनयात्मणम्य तदत्ताशा देनादितमनास्तस्थि. वान् । भगदत्तो धर्मस्वरूप संसाररूप्ये व्याख्याय गृहीतकर एकान्ते भ्रातः स्वया संयमो गृहीतव्य इत्याह । भवदेव उवाच-नागत्रीमोक्षण विधाय भवत उदित करिष्यामि । भगदत्त उवाच-हे भ्रातः! संडारे जायादिपाशबद्धो जीवः कथमात्महित करोति परित्यज मोहमैतमिति । तदा भवदेव उत्तरमपश्यन् ज्येष्ठानुरोधेन दीक्षायां मति विदधौ । मग- । ।

.. भावप्राभूत। १९५ दत्तः स्वगुरुमुस्थितसमीपं तं नीत्वा संतारच्छेदनार्थ मोक्षी दीक्षां मंक्षु माहयांबभूव । सतां सौदर्यमीदग्भवति । भवदेवो द्रव्यसंयमी भूत्वा गुरुभिः समं द्वादशवर्षाणि विहत्यापरेशुविधीरसहायो निजं वृद्धप्रामं गत्वा सुमतां गणिनी समीक्ष्य तां माह-हेऽब! काचिन्नागी म काचि. दस्ति । सा तत्यङ्गितं ज्ञात्वा जगाद-मुने ! तदुदन्तमहं सम्यग्न वेदेति । तदौदासीन्यं प्राप्तं तं संयमे स्थिरीक गुणवृत्यार्थिको प्रति अर्था- ख्यानक जगाद । सर्वसमृद्धनामा वैदयः, तदासीसुतोऽशुचिर्दारुकाभिधेयः स्वमात्रा प्रोचे-अस्मद्रष्टयुच्छिष्टभोजनं तु त्वयाऽशनीयमिति । निबन्धा- दोजितः । त जुगुप्सया वान्तवान् । तत् फंसपात्रेण धृत्वाऽऽच्छाय धृतं । दारुकः पुनर्बुभुक्षुः स्वमातरं भोजनं ययावे । तया तत्कं- सपात्रं वान्तभृतमुपढौकितं । क्षुत्पीडितोऽपि स आत्मवान्तं न जमाह । सोऽशुचिरपि चेताहशस्तहि साधुः कथं त्यक्तमभीप्सतीति (१)। गुणवति ! पुनरेफमर्याख्यानकं निजं मनो निश्चलं कृत्वा त्वं शृणु। नरपालनामा नरेन्द्र एक श्वानं कुतूहलेन मृष्टानेन संपोप्य कनकाभरण- भूपितं सदा वनक्रीडादौ नुवर्णरचितां शिविकामारोप्यैवं मन्दमातस्तम- पालयत् । एकदा शिविकारूढः सरमासुतो गच्छन् वालविष्टामालोक्य तामालेदुमापपात ! तदृष्ट्वा राजा टकुटीताडनेन तमपाचकार । तथा पुत्रि! साधुः सर्वेषां पूजनीयः पूर्वत्यक्तं पुनर्वाञ्छन् पराभव प्रामोति (२)। हे गुणपति ! पुनरेका कयां शृणु--कचित्कोपि पथिकस्तद्वनान्तरे सुगन्धिफलपुष्पादिसेक्या युतस्तं तरं त्यक्त्वा सन्मार्ग विहाय महाटवी- संफडे पतितः । तत्र नियां नुकं चनूरं दृष्ट्वा ततो भीचा धापनेकस्मिन् भीमे कूपे विभ्यत् पपात । तत्र पापाच्छीतादिभिदोपत्रपतंभये यादृष्टि- मोक्षदीक्षा. रा. । २ सहानः। ३ तपित्राधिट.. स.।

पनामृते- श्रुतिगतिप्रभृतिहीने सर्पादियाधानिकट तस्मानिर्गमनोपायमजानन कोऽपि भिपायरो यदृच्छया गच्छन् दृष्ट्वा दयाईवित्तः केनाप्युपार महादरानिष्काश्य मंत्रीपधिप्रयोगेण विहितचरणप्रसारण सूक्ष्मरूपस टोकनोन्मीलितने स्फुटाकर्णने विज्ञाननिजशक्तिकर्णयुगढ़ व्यर वारप्रसरसंयुक्तजिन्हें स चकार । पुनः सर्वरमणीय पुरं तन्मार्गदर्शन प्रस्थापयामास । निर्मलहृदयाः कस्योपकारं न विदध्युः । पुनः स वि' यासक्तमति पथिकदुर्मति. प्रकटीकृतदिग्भागमोहः प्राक्तनकूपकं सम्प्रा तस्मिन् पुनः पतितः तथा कचित्संसारे मिथ्यात्यादिकपंचोमव्याध दीप्त्युपागता जन्मकूपे क्षुधादाहायातमगिनं वीक्ष्य गुरु सन्मतिः दयालुत्वाद्धर्माख्यानोपायपण्डितस्तस्मानिर्गमय्य जिनवागौपविनिषेक (णा) त् सम्यक्त्वलोचनमुन्माल्य सम्यग्ज्ञानश्रुतियुगलमुद्घाटर सवृत्तपादौ प्रसारिती विधाय दयामयीं जिन्हा व्यक्ता विधा विधिपूर्व पंचप्रकारस्वाध्यायवचनानि तं वादयित्वा स्वर्गापवर्गयोर्मा मुधी. साध्वगमयत् । तत्र केचिद्दीर्घससारा. स्वपापोदयात् भ्रमरा इ. सुगन्धिवन्धुद्भिन्नचम्पकसमीपवर्तिनस्तत्सौगन्ध्यायबोधरहिताः पार्स स्थाख्याः सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रसमीपवर्तनात् , क्रोधादिकपायस्पर्शा दिविपयलौकिकज्ञानचिकित्सादिकुज्ञाना. जिव्हायामष्टया स्पर्शेषु । लम्पटा दुराशयाः कुशीटनामान., निषिद्धेषु द्रव्येषु भावेषु च लोलुपा संसक्ताव्हयाः, हीयमानज्ञानादिका अवसानसज्ञाः, समाचारबहिर्भूता मृग चर्यानामधेयका महामोहा निवृत्या कृत्वा आजवजवाऽस्ताघकूपे पेतुर्निप- तन्ति च (३)। भवदेव इति श्रुत्वा सम्प्राप्तशान्तभावो बभूव । मुत्रता गणिनी सर्वार्याग्रेसरी तद्विज्ञाय दारिद्योत्पादितदस्थित्यां नागश्रियमा- नाय्य तं दर्शयामास । भवदेवोऽपिता दृष्ट्वा संसागस्थिति स्मृत्वा वि. , भामवंजोगत्वायकूपे स.पाटः।

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पद्मामृते- भार्याः पद्मकनकविनयरूपश्रियो भूत्वा निजम; सह दीक्षित्वाऽच्युत- कल्पं गत्वा स्त्रीलिंगच्युता देवा भूत्वा पश्चादत्रागत्य मोक्षं यास्यन्ति । सागरदत्तनामा स्वर्ग गत्यात्रागत्य निर्वाण यास्यति । इति जम्बूस्वामि- चरित्र श्रुत्वा श्रेणिको जहर्ष। इति श्रीमावप्राभृते शिवकुमारकथा समाप्ता । अंगाई दस य दुणि य चउदसपुवाई सयलमुयणाणं । पढिओ' अ भव्वसेणो ण भावसवणतणं पत्तो।। ५२ ।। अजानि दश च द्वे च चतुर्दशपूर्वाणि सफलश्रुतज्ञानम् । पटितच मध्यसेनः न भावप्रवणत्वं प्राप्त. ॥ अंगाई दस य दुण्णि य अगानि दश च द्वे च अङ्गे । चउदम- पुच्चाई चतुर्दशपूर्वाणि सकलश्रुतज्ञान । पढिओ अ पठितश्च । भव्य- सेणो भव्यसेननामा मुनिः । ण भावसरणतणं पत्तो भावश्रवणले न प्राप्तः । जैनसम्यक्त्वं विनाऽनन्तसंसारी बभूवेति भावार्थः । अत्र भव्य. सेनो मुनिरेकादशाङ्गानि शन्दतोऽर्थतश्च पटितस्तबलेनैव द्वादशस्या- अस्य चतुर्दशपूर्वाणां चार्यपरिज्ञायकत्वात् श्रीकुन्दकुन्दाचार्येण सकल. श्रुतमधीत प्रोक्तमिति ज्ञातव्यं सफलश्रुतेऽधीती संसारे न पततीन्या- गमः । भव्यसेनस्य कया यथा-विजयाईगिरी दक्षिणश्रेणी मेघाटपत्तने राजा चन्द्रप्रमः सुमतिमहादेवीकान्तचन्द्रशेखराय राय दत्वा परोपकारार्थ जिनमुनिवन्दनाभक्त्यर्थं च फाचन विद्या दधानो दक्षिण: मथुरामागत्य मुनिगुप्ताचार्यसमीपे क्षुलको जातः । स एकदा जिनमु. निवन्दनाभक्त्यर्थमुत्तरमथुरा चटितः सन् श्रीमुनिगुप्तमाचार्य पप्रच्छ- किं कस्य कथ्यत इति। गुम उवाच-मुव्रतमुनेर्नमोऽस्तु वरुणमहा- 1 यो. मूलगायापाठः । २ प. पुस्तके तु पूर्वत एव अभयसेन इति नाम कृत, रत्नकरणकटीकायामत्र य पथात् । - भावप्रामृतं । १९९ राजमहादेच्या रेवत्या धर्मतिरिति वक्तव्यं त्वया । एवं त्रीन् वारान् पृटो मुनिस्तदेयोवाच । क्षुद्धकः स्वगतं एकादशाङ्गधारिणी भन्यसेना- चार्यस्पान्येषां च नामापि भगवान् नादत्ते तत्र प्रथयेन भवितव्यमिति रिचार्य तत्र गतः । मुक्तमुने हारफीयां पन्दना करपिचा तदीयं विशि वासल्यं च दृा भन्यतेनयतति जगाम । तत्र भन्यसेनेन संभाषणमपि न कृतं । कुण्डिका गृहीत्या भन्यसेनेन सह यहिभूमि गत्वा विकुर्यणां कृत्वा हरितकोमलणाकरन्छनो. मार्गो दर्शितः । तं मार्ग दृष्ट्या भन्यसेन आगमे फिलैते जीवाः कप्यन्ते इति भणित्या भागमेऽरुचि कृत्या तृणानामुपरि गतः । शौचसमये कुण्डिकाजलं शोप- पित्वा क्षुल्लक उवाच-भगवन् ! कुण्डिकापानुदकं नास्ति तथा विकृति- क्षेटिकादिका कापि नाहनी । अतोऽत्र निर्मलसरोवरे मृत्स्नया शौचं कुर । ततस्तत्रापि तथैव भगिला शौचं चकार । ततस्तं मिथ्याष्टि द्रयलिंगिनं बाबा भन्यसेनस्पाभन्यसेनोऽयमिति नामान्तरं चकार । ततोऽन्पदिने पूर्वस्वां दिशि पमासनत्यं चतुर्वक्त्रनुपीतदर्भमुंजीदण्ड- कमण्डलप्रभृतिसहितं देवदानवयन्दमानं बलरूपं दर्शयामास । तत्र राजा- दपो भव्यतेनादपथ गताः । रेवती कोऽयं ब्रह्मनाम देव इति भणित्वा लोकः प्रेरितापि तत्र न गता । अन्यस्मिन् दक्षिणस्यां दिशि गरुडारूढ़ चतुर्भुज चक्रदर्शसगदादिधारकं वासुदेवरूपं दर्शयामास । पश्चिमदिशि वृषभारूढं सार्थचन्दजटाजूदगौरीगणोपेतं शंकररूपं, उत्तरस्यां दिशि समवशरणमध्ये प्रातिहार्याष्टकसहितं मुरनरविद्याधरमुनिन्दवन्यमान पर्यकरथं तीर्थकररूपं दर्शयति स्म । तत्र सर्वे टोका गच्छन्ति स्म । रेवती लोकैः प्रेमागापि न गता । नवैव वासुदेवाः, एकादसौर रुद्राः, चतुर्विशतिरेव तीर्थकरा जिनागने प्रतिपादितास्ते तु सर्वेs- २०० पटनामृते- प्यतीता: । कोऽप्ययं मायावी वर्तते इति विचिन्त्य स्थिता । ब्रह्मा तु कोऽपि नास्ति । उक्तं च- आरमनि मोक्षे शाने वृत्ते ताते च भरतराजस्य। ग्रह्मेति गीः प्रगीता न चापरो विद्यते ब्रह्मा ॥१॥ अन्यस्मिन् दिन चर्यालायां व्याधिपीडितक्षुलकरूपेण रेवतीगृहसमीर- प्रसोलीमार्गे मायामूर्छया पतितः । रेवती तदाकर्ण्य भक्त्योत्थाप्य नात्योपचारं कृत्वा पथ्य विधापयितुमारेभे। स च सर्वमाहा मुस्वा दुर्गन्धवमनं चकार । तदपनीय हा! विरूपक पथ्य मया दत्तमिति रेवतीवचनमाकर्ण्य प्रतोषान्मायामुपसंहृत्य तां देवी वन्दित्वा गुरोराशी- यदि पूर्ववृत्तान्त च कथयिला लोकमध्ये तस्या अमूढटिमुचैः प्रशस्य स्वस्थानं चन्द्रप्रभो जगाम । वरुणमहाराजस्तु शिवकीर्तये निजपुत्राय राज्यं दत्वा दीक्षामादाय माहेन्द्रकल्पे देवो बभूव । रेवती तु तपः कृत्वा ब्रह्मकल्पे देवो बभूव । इति श्रीभावप्राभते भव्यसेनमुनिकथा समाता । तुसमासं घोसंतो भावविसुद्धो महाणुभानो य । णामेण य सिवभूई केवलणाणी फुडं जाओ॥ ५३ ।। तुपमा घोषयन् भावविशुतो महानुभावश्च । माम्ना च शिवभूतिः केवलज्ञानी स्फुट जात. ॥ तुसमासं घोसंतो तुपमापशब्द घोपयन् पुनः पुनरुमाग्यन् मा वि. स्मृति यासीदिति कारणात् । मायविमुद्धो भावविशुद्ध । महाणुमायो य महानुभावश्च महाप्रभावयुक्तश्च । पामेण य मिवभूई नाग्ना चशिय- भूतिः चकारादर्थेन च शिवभूति शियाना सिद्धानां भूनिश्वर्य अनन्तचनु. एयरक्षण त्रैलोक्यनायकवं यस्य स भवति शिवभूनिः । केवलणाणी फई जाओ केवटझानी केयरज्ञानवान् लोकप्रकाशचमझानयान् .. । -- भावप्राभृतं । २०१ सुटं शमादिदेवैः प्रकटीकृतघातिक्षयजातिशयदशकः सर्वप्रसिद्धः संजात इति । अस्य कथा यथा-कश्चिविभूतिनामासन्नभव्यजीवः परमवैराग्य- यान् फस्पचिगुरोः पादमूले दीक्षां गृहीत्वा महातपवरणं करोति पट्- प्रवचनमात्रामा जानाति परं चैदुष्यं किमपि तस्य नास्ति । आत्मानं दारिकर्मचयादिनं जानाति । तदनन्धं नायाति गुरुणा प्रोक्तं दृष्टान्तं : - पुनः पुनस्तीक्ष्णी करोति तुपान्मापो भिन्न इति यथा तथा शरीरादात्मा भिन्न इति । तं शन्दं घोपयन्नपि कदाचिद्विस्मृतवान् । अर्थ जाननपि सन्दं न जानाति । एकाकी विहरति च । दान्दविस्मरणलेशावर्ती कांचि. पुवति यटकादिरूपचनार्थ मापान सूपीरतान् जलमध्येलावितांस्तुपेन्यो मिनान् कुर्वन्ती दृष्ट्वा पृष्टयान्-किं कुरुपे भवति! इति । साप्राह-तुप- मापान् भिनान् फरोमि । स आह-मया प्राप्तमिति कचिद्गतः । ताव- 'मानमध्यभायभुतेनात्मन्येकलोलीभायें प्राप्तोऽन्तर्मुहर्तेन फेवटज्ञान माय नयफेयटर धिमान् देशान् विहत्य भन्यजीवानां मोक्षमार्ग प्रदर्य मोक्ष गत इति। इति श्रीभावमाभृते शिवभूतिमुन्युपाख्यानं समातं । भावेण होइ पन्गो पाहिरलिंगेण किं च नन्गेण । कम्मपपडीपणियरं पासह भावेण दग्वेण ॥ ५४॥ भादेन भी मानः पहिलिन विपनग्नेन । पप्राटोन निर नारी भापेन इम्पेग ।। भावेण जिनराजनम्पपेन । होइ गंगो भवति नमो निमन्ध- सरपः । बाहिरलिंगे किच नग्गेण पहिलिगेन किं च दापन- मापा न किमपि मोक्षरमाणे कार्य लिपति पानानिय । कम्मपप- तमिलिग. पुरपसास्ति । २ संज्ञा पार २०२ पद्माभृते- डीण णियरं कर्मप्रकृतीनां निकर सम्हः अष्टचत्वारिंशदधिकशतत- ख्यानां वृन्दै । णासइ भावेण दव्येण नश्यति भावेन द्रव्येण चैति । ये मिथ्यादृष्टयो गृहस्था अपि सन्तोऽस्माकं भावो विद्यते इति वदन्ति स्त्रीभिः सह ब्रह्मचर्य च भजन्ति ते लोलीका चार्याकसदशा नास्तिकास्त- न्मतनिरासार्थमिद पवनमुक्त श्रीकुन्दकुन्दाचार्यस्यामिभि: " णाना भावेण दवेण" भावेण-कर्मक्षयो भवति भावपूर्वकदन्यलिंगेन गृहीतेन द्वाभ्यां भायद्रव्यलिंगाभ्यां कर्मप्रकृतिनिकरी नस्यति न वेकेन मार; मात्रेण द्रव्यमात्रेण वा कर्मक्षयो भवति । इति व्याख्यानवलेन ते नास्तिका पूर्ववच्छिक्षणीया इति भावार्थः । जग्गत्तणं अकजं भावणरहिय जिणेहिं पण्णत्तं । इय णाऊण य णिचं भाविजहि अप्पयं धीर ॥ ५५ ॥ नग्नत्वं भकार्य भावरहित जिनः प्राप्तम् । इति ज्ञात्वा च नित्यं भावयेः भान्मानं धीर।। णग्गत्तणं अकजं नमवं सर्वबाह्यपरिमहरहितत्वं अकार्य सर्वकर्म- क्षयलक्षणमोक्षकार्यरहित । कयभूतं नमन्व, मावणरहियं जिणेहिं पण्णतं भावनारहित पचपरमेष्टिबाह्यभावनारहित निजमुखपुर- कस्वभावात्मान्तरङ्गभावनारहितं च जिनस्तीर्थकरपरमदयैरनगारके- पलिभिर्गणधरदेवश्च प्रज्ञप्तं प्रणीत प्रतिपादितं कथित भणितमिति यावत् । इय णाऊण य णिच्चं इति मात्या विज्ञाय नित्से सर्वकाले । भाविन्नहि अप्पयं धीर भावयेस्त्र आमान बहिस्तवं च हे धीर! योगीश्वर ! इति सम्बोधनपदेन धैर्य प्रति विषमीरयन्ति प्रेर- यन्ति इति धीरा योगीश्वरा एव माझा न तु गृहस्यपधारिण. पापिष्ट- नियर. टीकापाठ । १ नाम टाः ३ भावेगेति पारः रा, पुस्तके नास्ति।

पापमाना। remiriti irmir नं भारलिंग निदा दवादिगंगनीमा मापना गयनपरिषगी। पा अपरिग ओम मावलिंगी मार ।। ५६ ।। ran man: । दादिसंगहिजो देर रामयिका पुरतमा पशिष्यानो फर्ममयरममावीदीना मान चैतमान दशादिसा । साउन- ॥ संत्रं पास्तु धन धान्यं हिप ग गनुपदं । हिरवं च मुव च पुप्प मां यदिदंश । मिथ्यात्ययेदवास्यादिपट पापायचतुए। रागपाच संगातुरन्तरडाधतुर्दशा ॥२॥ सर परपापितकालेज चमितिपशिलेदो रहितो देहा- दिसंगरहितः । मापकनापहि मयलपरिचनो मानकापापः सफल- , पारन विहिल प्रतनिरोऽरिन तिनि । गुरमरम एवं हम......... it २०६ पट्नाभूते-- भावयत मावशुदै आत्मानं मुविसुरनिर्मलं चैव । लघु धनुर्गतिं त्यक्त्वा यदि इच्छन शास्वतं सुबम् ॥ भावेह भावमुद्धं भावयत यूप कथं ! यया भवति मारमुर्द्ध- भावशुद्धं परिणामस्य निकुटिलत्वं मायामिथ्यानिदानशल्यत्रयरहितत्व यथा भवत्येवं आत्मानमर्हत्सिदादिक च हे भव्याः ! मावयत । "हजित्था मध्यमस्य" इति सूत्रेण तस्थाने ह । अप्पा मुविमुद्धनि- म्मलं चैव आत्मानं मुविशुद्धनिर्मलं चैव । आत्मानं कथंभूत, मुविशु. द्धनिर्मलं सुष्ठ अतिशयेन विशुद्ध कर्ममलफलंकरहित निर्मल रागद्वेपमो. हमलरहितं । लहु चउगइ चइऊणं रघु शीघ्र चतुर्गतिं त्यक्त्वा प्रमुष्य। जइ इच्छह सामयं मुक्खं यदि चैत्, इच्छत यूय शाश्वतमविनश्चर सौख्यं परमानन्दलक्षणमिति । जो जीवो भावंनो जीवसहावं मुभावसंजुत्तो । सो जरमरणविणासं कुणइ फुडं लहइ णिव्वाणं ॥६॥ यो जीषो भावयन् जीवस्वभावं सुमावसयुक्तः। स जरामरणविनाशं करोति स्फुट लमते निर्वाणम् ॥ जो जीवो भावतो यो जीव आसन्नभव्यः मातो-मावयन् भवति । के भावयन् भवति ! जीवंसहावं जीवस्वभावमात्मस्वरूप अनन्तज्ञानानन्तदर्शनानन्तवीर्यानन्तसुखस्वरूप केवलं केवलज्ञानमय या आत्मानं । कथंभूतः सन्, सुभाषसंजुत्तो शोभनपरिणाम. संयुक्तो रागद्वेपमोहादिविभाषपरिणामरहितः । सो जरमरणविणास कुणइ फुडं स जीवोऽन्तरारमा भेदज्ञानवलेन जरामरणविनाश करोति पुनर्जराजीर्णो न यति न च म्रियते, कथफुडस्फुटं निश्चयेन तीर्घकरो भवति । लहइ णिवाणं लभते किं निर्वाणे सर्वकर्मक्षय- •टक्षणं मोक्ष अनन्तमुखे प्रामोतीत्यार्पः ।

भावप्राभृतं । २०७ जीवो-जिणपण्णत्तो पाणसहाओ य चेपणासाहो ॥ सो जीयो णायन्बो कम्मक्खयकारणणिमित्ते ।।२।। जीयो जिनप्रातः शानस्वभाव चेतनासहितः । स जोयो हातभ्यः कर्मक्षयकारणनिमिते॥ जीवो जिणपप्णत्तो जीव आत्मा जिनप्रज्ञप्तः श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञ- वीतरागेण प्रणीतः कथितः। जीवो नास्तीति ये वाक्कुशिष्या वदन्ति तन्मतमनेन पदेन निरस्तं भवतीति ज्ञातव्यं । तथा चोक्तं- तदर्हजस्तनेहातो रक्षोप्टेर्भवस्मृतेः । भूतानन्वयनाजीवः प्रकृतिशः सनातनः ॥१॥ कथंभूतः प्रातः, गाणसहाओ य ज्ञानस्वभावो ज्ञानस्वरूपः । तया चोक्तं- विभावसोरिवोपत्वं वरण्योरिव चापलं । शशास्येव शीतत्वं स्वरूपं झानमात्मनः॥१॥ इत्पनेन ये सांख्याः कापिलाः सत्कार्यापरनामानो मिथ्यादृष्टयो बदन्ति “जीवः सह मुक्तः सन् बाबमासरहितो भवति" तन्मतं निराकृतं भवतीति वेदितव्यं । तथा चोक्तं- फपिलो यदि याञ्छति वित्तिमविति सुरगुरुगीगुंफेप्वेव पतति । चैतन्यं यायाधरहितमुपयोगि फस्य यद तत्र विदित ॥१॥ चेपणासहिओ चेतनासहितः प्रतिपद्विराजमान इत्यनेन टोकापतमतं निरस्तमिति ज्ञातव्यं । एवं गुणविशिष्टेन जीवेन किं कार्य भवतीति पनुपोगे सतीदं माहुः-मो जी पायवो स जीवः १ पापांकु. स.। २ वो. टो.। ३ रेमोनुर. स.।

२०८ पद्माभृते- स आत्मा ज्ञातव्यः । कम्मक्खयकारणणिमित्ते कर्मक्षयकारणनिमित कर्मणां ज्ञानावरणदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रान्तरायाणा सन् लका कपणे जीवपदार्थ एव समर्थ इति ज्ञातव्य । अनन्तसौख्यदान- हेतुरात्मेति भावः। जेसिं जीवसहायो णत्थि अभावो य मवहा तत्य । ते होति मिण्णदेहा सिद्धा पचिगोयरमतीदां ।। ६३॥ येषो जीवस्वभावो नास्ति अभावश्च सर्वथा तन्त्र । ते भवन्ति भिन्न देहाः सिद्धा वचोगोचरातीता. ॥ जेमि जीयसहायो येपामासन्नभन्याना जीवस्वमाय आत्मस्वभाव आत्मनोऽस्तित्वमस्ति । पत्थि अमावो य सबहा तत्य नाल्यभावश्च सर्वथा तत्र तत्रात्मनि अभावध नास्ति "अस्त्यात्मानादिवतः" इति वच. नात् । ते होति मिष्णदेहा ते पुरुपा भवन्ति भिन्न देहाः शरीरर हिताः। मिद्धा पचिगोयरमतीदाते पुरुषाः किं भवन्ति सिद्धाः सिद्धिः स्वात्मोपलब्धिर्विद्यते येषा ते सिद्धा प्रज्ञादित्यादल्यर्थेऽग्प्रत्ययः । कथंभूताः सिद्धा, यचोगोचरातीता वाचा गोचरचे गम्यत्वेऽतीता अगम्या यक्तुं न शक्यन्ते-त सहशाना केवलज्ञानिना गम्या इत्यर्थः । अग्ममरूवमगंधं अव्यत्तं चेयणागुणसमदं । जाणमलिंगग्गहर्ण जीवमणिदिसंठाणं ॥ ६४ ॥ धरममाएमगन्धमश्यकं घेतनागुणममाई। आनीतिमलिमहर्ग जीवमनिर्दिष्टमस्थान ।। अरसं मधुराम्टकटुनिककपायर्पचरसरहिन हे जीव व जी जानीहि । अहवं श्वेतपीतहरितारणकृष्णलक्षणपंचम्परहिन जीवमा मान जानी- १६... पुलायो । १.टी. ।

२०९ भावप्राभृतं । होति दीपके सम्बन्धनीयं । अगंधं सुरभिदुरभिलक्षणगन्धद्वयवर्जितं जीव- पदार्थ जानीहि । अन्यत्तं भव्यक्तं इन्द्रियानिन्द्रियाणामगोचरत्वाद- फुलं, केवलज्ञानिनां व्यक्त स्फुट जीवतत्वं हे जीव! भेदज्ञानसमृद्धा- न्तरात्मन् ! जानीहि । निषधं कृत्वा विधि दर्शयन्ति--चेयणागुण- समई चेतनागुणेन झप्तिमात्रेण सम्यक्प्रकारेणा परिणतं । समिद्धमिति पाठ चेतनागुणेन हानगुणेन समृद्धमिति व्याख्येयं । जाणमलिंगग्गहणं जाग जानीहि त्वं हे जीव ! अटिंगमहणं त्रीपुंनपुंसकलिंगत्रयग्रहणं स्वीकारस्तेन रहित जीवमात्मानं विदांकुरु । व्यवहारनयेन यद्यपीयं स्त्री अयं पुमान् इदं नपुंसकमिति भण्यते तथापि निश्वयनयेनात्मा शुबुद्ध- कस्वभावो न टिंगत्रयवानिति । जीवमणिदिसंठाणं जीवमात्मानं, अनिर्दिष्टसंस्थानं न निर्दिष्टानि जिनागमे प्रतिपादितानि संस्थानानि पडाकृतयो यस्येति अनिर्दिष्टसंस्थानस्तं जानीहि । अथ कानि तानि संस्थानानि पान्याननो निश्चयनपेन नैव पर्तन्ते इति चेत् ! तन्नाम- निर्देशः क्रियते-समचतुरस्रसंस्थान (१) न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान (२) स्वात्पपरनामवाल्मिफसंस्थान (३) कुञ्जकसंस्थान (४) वामनसंस्थानं (५) हुंडकसंस्थानं चेति (६) नामानुसारेण शरीराकारो ज्ञातव्य इति तात्पर्य भावहि पंचपयारं जाणं अण्णाणणास सिन्ध । भावणभावियसहिओ दिवसिवमुहमायणो होइ ।। ६५॥ भापद परेशान नजाननाशनं शोधम् । भाषानाभारितसहितः स्विमियमुरामाजनं भवति । १.टी.। २नि.टी.।

२१० पट्मामृते- मावहि पंचपयारं भावय वं हे जीव 1 पंचप्रकार पंचवित्र ! णाणं सम्यग्ज्ञानं । कथंभूतं ज्ञान, अज्ञाननाशनं अज्ञानस्याविवइस्प नाशनं विद्यमकं । कथ भावय, सिम्यं शीत्रं लघुतया। मावण- मावियसहिओ भावना रुचिः तस्या मावित वासितं तेन सहितः संदिन पुमान् संयुक्तो जीवः । दिवसिवमुहमायणो होइ दिवः स्वर्गस्य, शि- स्य मोक्षस्य, मुखस्य परमानन्दलक्षणस्य, भाजनममत्र, भवति संजायते । पंचज्ञानवितरस्तत्वार्यतात्पर्यवृत्ती प्रथमाध्याये ज्ञातव्यः । मतिश्रुद्धात्र- चिमनःपर्ययकवटानि ज्ञानमिति नामनिर्देशः । पटिएण वि कि कीरह किं या मुणिएण भावरहिएण । भावो कारणभूदो मायारणयारभूदाणं ।। ६६ ।। परितेनापि कि क्यिों किया श्रुतेन भावरहितेन । मावा कारणभूत सागारानगारभूतानाम् ॥ पढिएण वि किं कीरह पटितेन ज्ञानेन किं क्रियते-कि सर्गम विधीयते-अपि तु न क्रियते झ्यर्थ । अपिशब्दादपठितेनापि अनम्य- स्तेनापि जिल्हाप्रऽहतेनापि हानेन स्वर्गो मोक्षध क्रियते इत्यर्थः। किंवा सुणिएण वा-अया श्रुतेनाकर्णितन ज्ञानेन किं न किमपि, स्वर्गश्च मोक्षश्च न भवतीपः । कथभूतेन पटिनेन श्रुतेन थ, मावरहिएण भावरहितेन । मावो कारणभूदो' भाव आमरुचिः जिनमम्यक्त्यकारण- भूतो हेतुभूत. । मायारणयारभूदाणं मागागनगारभूताना, पात्रका यतीनां चति तात्पर्य। दवेण सयलनग्मा नारयतिरिया य सपलसंघापा। परिणामेण अमुद्धा ण मायसवणधर्ण पत्ता ॥ ६७ ।। १बी.टी, ।या.ट।

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- २१२ पप्राभूते- जिनस्य श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञवीतरागस्य सम्बन्धिनी या भावना सम्यक्त्व तया वजिओ-वर्जितः । कथं, मुइरं-मुचिरमतिदीर्घकालं। तथा चौक- कालु अणार अणार जिउ भय सायर वि अणंतु । जीवें वेणि न पत्ता जिणुसामिउसमतु ॥ १॥ इति व्याख्यानं ज्ञात्वा सम्यग्दर्शने दृढभावना कर्तव्येति भागर्थः । अयसाण भायणेण य किं ते णग्गेण पातमलिणेण । पेमुण्णहासमच्छरमायाबहलेण सवणेण ॥ ६९ ॥ अयशसा भाजनेन च वेनमेन पापमलिनेन । पैशून्यहास्यमत्सरमायाबहुलेन प्रवणेन । अयसाण मायणेण य अयशसामपफीतानां भाजनेनामत्रेणाधार- पात्रेण । किं ते णग्गेण पायमलिणेण हे जीव ! ते तब नाग्न्यैन नग्नत्वेन किं-न किमपि, स्वर्गमोक्षकार्यरहितेन वृधेत्यभिप्रायः । कम- तेन नाग्न्येन, पापमटिनेन पापयन्मलिनेन कश्मलिना । अथवा पापति पृथक्पदै तेनायमर्थः रे पाप ! पापमूर्ते दिगम्बरवेषानीवक! मटिनेन अतिचारानाचारातिक्रमव्यतिक्रमसहितेन नाग्न्येन किन किमपि । तथा चोक्त समासोक्तिना गुणभद्रेण भगरता- हे चन्द्रमः ! किमिति लाभ्यनयानमवं सद्वान् भयेः किमिति तन्मय एप नाभूः। किंज्योत्स्नया मलमलं तय घोषयन्त्या स्पर्मानुयन्ननु तथा सति नासि लक्ष्यः॥१॥ कथंभूतेन तय नाग्न्येन, पेमुण्णहासमच्छरमायावहुलेण सवणेण पैशून्यहास्यमामरमायावहुलेन । शल्पं परोहण । उक्त च-- कालो नाति नाशिजीवः भवसागरोऽपिचभनम्नः । जीवेनम प्राप्ले विनम्वामिसम्याचे २.टी.

भावमाभृतं । २१३ मा भवतु तस्य पापं परहितनिरतस्य पुरुपसिंहस्य । यस्य परदोपकथने जिम्हा मौनव्रतं चरति ॥१॥ हास्यं च वरः । मत्तम परेषां शुभद्वेषः । उक्तं च- उपल्यं तपस्विन्नधिफमभिभयं त्वय्यगच्छन् कपायाः प्राभूद्धोधोऽप्यगाधो जलमिव जलधौ किंतु दुर्लक्ष्यमन्यैः । निदेऽपि प्रयाद सलिलमिव मनाग्निम्तदेशेववश्यं मात्तय ते स्वतुल्ये भवति परवशादुर्जयं तबहीहि ॥१॥ मापाच परवंचना । उक्तं च- यो मारीचीयं फनकमगमायामलिनितं हतोऽश्वत्थामोक्या प्रापिलधुरातीचमसुतः । सहप्पः कृप्पोऽभूत्कपदयहुवेपेण नितरा- मपि उमाल्पं तद्विपमिव हि दुग्धस्य महतः॥१॥ पैरन्पहायमासरमापाबहुलं तेन तयोक्तेन । पुनः कथंभूतेन नाग्नेन, भवन निरन्तरतम्बन्धिना नानाधर्ममियोपार्जितदरेण । अथवा सवनेन वनवातसहितेन । तथा चोतं. घनेऽपि दोपाः प्रभवन्ति रागिणां गृहेऽपि पंचेन्द्रियनिग्रहस्तपः । अफुत्सिते यमनि यः प्रवर्तते विमुसरागस्य गृहं तपोवनं ॥१॥ पयडहिं जिणवरलिंगं अमितरभावदोसपरिसुद्धो। भावमलेग य जीवो बाहिरसंगम्मि मपलियड़ ॥ ७० ॥ प्रारमिनारदिई सभ्यन्तरमापशेरपुरः। मारमटेन र जीवोदपमोमटेनः ।। सामनासमिति सन्तरे । २ सतुवतीति पारान्तरे । ।

पद्माभूते- पगडहिं जिणवरलिंगं हे जीव ! हे आत्मन ! प्रकटय जिनवरलिना र्व जिनवरलिंग व धर नमो भय । पश्चारकर्यभूतो भव, अमिता भावदोसपरिसुद्धो अभ्यंतरमारेन जिनसम्यक्त्वपरिणामेन कृत्वा दोर- परिशुदो दोपरहितो भव । अयमत्र तात्पर्य द्रव्यलिंगं बिना मावलिंगी. सनपि मोक्ष न लभत इत्यर्थः, शिवकुमारो भावलिंगीभूत्वापि वगै गतो न तु मोक्ष, जम्बूरामिभवे द्रव्यलिंगी अतिकटेन सनातरतस्मिन्च सति भागिन मोक्ष प्राप । मावमलेण य जीवो भावमलेनाप- रिशुद्धपरिणामेन जिनसम्यात्वरहिततया। बाहिरसंगम्मि मयलियर बायसगे मनि गइलिया-मलिनो भाति सम्पय विना निप्रन्योती समन्धी भवतीति भावार्थ । स्थादायेन मोक्षी व्यलिंगापेशन्धात्, स्याहव्यागेन मोक्षो मावलिंगापेशवात् , पादुभयं कमार्पितोभयन्यात्, स्पावास्य युगपदक्तमशक्यत्वात् , स्याद्रावलिंग चायक्तभ्य च, स्पाव्य- गि चायतथ्य च, स्पाभयं चायक्तव्य चेति सप्तभंगी योजनीया । तथा चोन,- पयोन्नती न दप्पत्ति न पयोसि दधिमता। भगमत्रता नोमे तम्मात्तर्य प्रसारमः॥१॥ धम्मम्मि निपवामी दीमागगी य उम्दान्तममो। निफलनिग्गुणयारी नहगवणो नग्गस्येण ॥ ७१ ॥ व निवामो दोषणापत्र मम । मिणलाना नराणा ननम्पेन । घम्मम्मि निणयामो धन दयालाण चामिणे अामगर उनमामालिस मणी चा नसून.- भारग्राम। धामो मापा गमाविमा यमतितो पानी। पान्जिट पम्म जीयाण पपपपी धम्मो॥ एगाभा निष्पयामी-- निनान प्रगम, प्रनाकाम न पर्भः । दोगावामी या मनमानामावामी निगमः । उपफलममो पुष्पममः भुपमहा। निफन्ननिग्गुणयागे निकली मोक्षगगः, निगोहानातिः । मानिसले पार- ररित भवति सम्पपिजिया गया निगुंग गत्यहीन भवति तथा परमार्थहिलो दिगो पातम्यः । रामा निर्गुणकार: गुगफारको न भवति सम्बोधको न स्यात् । नटमयगो नगल्यंग गारेग हत्या नटक्षयण. नर्भसपियसामाः । स सोफर जनार्य नारो भवति सथा- पमपि । इति पाल्पानं साया सम्पर. शने चारित्रे सपास घर- सया स्थातव्यं । जे रायसंगजुत्ता जिणभावगरहियदवनिर्गया । न लहंति ते समाहिं घोहिं जिगसासणे विमले ।।७२।। दे रागसंगयुषा जिनभावरलियानन्याः । म लभन्ने ते ममाधि पोधि जिनशासने पिमरे ।। रायसंगजुत्ता ये मुनपो गगेण नीप्रीतिरक्षागेन, संगेन परिगण युक्ता भवन्ति । अथया रागेण संग सीगमनं कुर्यन्ति । अथवा राज- संगः मह.दायनां त्यक्त्वा राजसेवा पुर्यन्ति राजसेवायुक्ता भवन्ति जिणभावणरहियदयनिग्गंधा जिनभावनारहितदम्पनिमन्थाः, गिने भायना रुचिर्येषां नास्ति ते जिनभावनाहितास्ते च से निमन्या नारूपधारिणो जिनभावनारहितद्रव्यानिान्थाः । सपा जिनस्य भावना सार्थकरनामकर्मोपार्जनप्रत्ययभूता दर्शनविगुद्धपादयो भावनाः पोडश ताम्पो रहिताः । जिनसम्परत्वसहिता ब्यस्ताः समस्ता या भावनास्तीर्थ- .

- । २१६ पट्माभृते- करनामकर्मदायिका भवन्ति । दर्शनविशुद्धिरहिता अपराः पंचदशारि भावनास्तीर्थकरनामकर्म नार्पयन्ति । तथा चोक्त- एकापि समर्थेयं जिनभक्तिर्दुर्गति निवारयितुं । पुण्यानि च पूरयितुं दातुं मुक्तिश्रियं कृतिनः ॥१॥ अथवा द्रव्यनिग्रन्थाः बहुविधधर्मनिपेण द्रव्यमुपार्जयन्ति ये ते द्रव्यनिग्रन्थाः कय्यन्ते । न लहंति ते समाहि ते मुनयः समाधि रत्नत्रयपरिपूर्णतां धHशुक्लध्यानद्वयं वा न लभन्ते न प्राप्नुवन्ति। योहि जिणसासणे विमले बोधि सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रलक्षणां न लभन्ते न प्राप्नुवन्ति जिनशासने श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञवीतरागमते । कथंभूते, विमळे पूर्वापरविरोधविवर्जिते कर्ममलकलङ्गक्षयहेतुभूते या। भावेण होइ नग्गो मिच्छत्ताई य दोस चइऊणं । पच्छा दवेण मुणी पयडदि लिंगं जिणाणाए । ७३ ॥ भावेन मवति नग्न मिथ्यावादीथ दोषान् त्यक्तवा। पश्चादग्येण मुनिः प्रस्टयति लि* जिनाज्ञया ॥ भावेण होइ नग्गो भावेन परमधर्मानुरागलक्षणजिनसम्यक्त्वेन भवति, कीडशो भवति । नग्नः वस्त्रादिपरिग्रहरहित । किं कृत्वा पूर्व, मिच्छत्ताई य दोस चइऊणं मिथ्यात्यादींश्च दोषोत्यक्त्वा मिथ्यावा. विरतिप्रमादकपापयोगलक्षणास्त्रबद्वाराणि त्यक्त्वा। पच्छादव्वेण मुणी पश्चात् भावलिंगधरणादनन्तरं मुनिदिगम्बर । पयडदि लिंगं जिणा. णाए प्रकटयति सुटीकरोति, किं तत् ! लिंग-जिनमुद्रो, कया ! जिणाणाए-जिनस्याज्ञया जिनसम्यक्त्वेन सम्यक्त्वश्रद्धानरूपेणेति बीजा. कुरन्यायेनोभय संलग्न हातव्यं । भारलिंगेन द्रव्यलिंग द्रव्यागेन मायटिंग भवतान्युभयमेव प्रमाणीकर्तव्यं । एकान्तमतेन तेन सर्व नष्ट भवतीति वेदितव्य । अर्ड दुराग्रहणेनि।

भावप्राभृतं । २१७ भावो वि दिव्वसिवसुक्खभायणो भाववन्जिओ सवणो । कम्ममलमलिणचित्तो तिरियालयभायणोपावो ॥७४ ।। भावोदि पिपशिवमुखभाजनं भाववर्जितः प्रमः। कमलमलिनचित्तः नियंगालपभाजनं पापः ॥ भावो वि दिव्वसिवसुक्खभायणो इति विपुलानाम-गाथालक्षणं । भावोऽपि, अपिसन्दाढव्यटिंगमपि। दिन्व-दिवि भवं दिन्यं सौधर्मशान- देवीरतिकम्पान्यतरमहर्दिकदेवसुखं सौधर्मायच्युतस्वर्गपर्यन्तं सुखं द्रव्य- लिंगमनन्तरेण भावनाय । तयुक्तद्रव्यलिंगेन सर्वार्धसिद्धिपर्यन्तं सुख ज्ञातव्यं । फत्पचिदमन्पत्य भावलिंगमन्तरेण द्रव्यलिंगेन नववे- पकपर्यन्तं पुनः पुनर्भवपातहेतुभूतं सुखं ज्ञातव्यं । तेनास्य पादस्य पुनरर्थः प्रकाश्यते। भावोऽपि दिव्यशियसौख्यभाजनं स्वर्गमोक्षसौख्य- भाजनं । भाववन्जिओ सवणो भाववर्जितः प्रवणो जिन- सम्परत्वरहितो दिगम्बरः । कम्ममलमलिणचित्तो कर्ममटेन अतिचा- रानाचारातिकमन्पतिकमरितोपार्जितपापेन दोषेण मलिनचित्त: मलिन मलपितं चित्तमामा पत्य स भवति कमलमलिनचित्तः तिरि- चालयभायपो पायो तिर्पगाटपभाजनं तिग्गतिस्थानं भवति, पापः पापाला विचित्रनतिनानमंत्रिपुत्रवत् । खयरामरमणुयकरंजलिमालाहिं च संधुया विउला । चकहररायलच्छी लज्मेइ योही प भवणुओं ॥७५॥ १ सरारमनुमान महिमालाहि. प. पुस्ट के पाठः । २ सुभापति पान्तरं । ५. पुस्तके च। २ बरमहापानमा ६. पुस्तके इने गापासूये सनसन्येवे । मुक्ति. ऽस्तरे पान पोलम्मेवे र ग. इति प्राचीनलितिलपुस्तके । ८. स. सति रोगरा पुस्तके व नस्ल एप । मारनपोनास्ति । ९. पुस्तरोटडोरा- सदिवे लालिरलेते। (बदना) २१८ पटनाभृते- खचरामरमनुजानाम जलिमालाभिः संस्तुना विपुठा। चक्रधरराजलक्ष्मी लभ्यते बोधि न भश्यनुता । खयरामरमणुयकरंजलिमालाहिं च इयमपि विपुला गाया ज्ञातव्या । अस्पा अयमर्थः-खचरामरमनुजकगन्नलिमालाभिश्च से चरन्त्याकाशे गच्छन्तीति खचरा विद्याधरा उभयश्रेणिसम्बन्धिना, न नियन्ते बहुकालेन प्रच्ययन्तेऽमरा व्यन्तरदेवाः, मणुय-प्रतिश्रुत्यादिम्यो जाता मनुजाः, खचरामरमनुजास्तेषां कराअलयः करकुमलानि तपा मालाभिः श्रेणिभिश्च । संयुया-संस्तुताः । चक्रवर्तिनां च तथा श्वरमहामण्डलेश्वरार्धमण्डलेश्वराणां राज्ञां लक्ष्मीः चक्रधरराजलक्ष्मीः । लम्मेइ गोही ण भव्यणु एतादृशी लक्ष्मीविभूतिर्लभ्यते प्राप्यते जीवनेति, बोही ण-परं बोधिर्नलभ्यते। कथंभूता घोषिः, भव्यनुता मण्डले भाव तिविहपयारं सुहामुहं मुद्धमेव गादर्ष। अमुई भट्टरउई मुइ धम्म जिगवरिंदेहि ॥१॥ भावः विविधप्रकारः शुभोऽशुभ शुद्ध व हातम्य । भाभा भासदः शुभः धम्र्य जिनवरेन्द्र ॥ टीका-माव त्रिविधप्रकारे शुभ अशुभं शुद्ध एव निश्चयेन शातम्यं । अशुभ भारी । शुभं धर्मध्यानं जिनवरेन्दै कथितम् । सुदं मुदसहा अप्पा अप्पम्मि तं च णायब। इदि जिणवरेदि मणिय सेयं स समायरद ॥ २ ॥ शुद मुदस्वमाव. भारमा माग्मनि सच ज्ञातम्य । इति जिनवरः भणितः यस्ष्ट्रय सत् समाचर ।। सोडा-हे मुने । दुई निर्मल शुद्धस्वभावं तं ारमान आरमनि हातम्यं । इति निनवरणितं कथितं । यच्छेयं कल्याण सरि तत् ममावर कुर्विति । १ अस्य स्थाने मनुष्या इति स. पुस्तके पार । २ या टी ।

- भावप्राभूत। भन्यवरपुण्डरीकैः स्तुता प्रशंसनीया । अथवा हे मन्यनुत । आसन्न- भन्यजीव ! त्वमिदं जानीहाति शेषः । पथलियमाणकसाओ पयलियमिच्छत्तमोहसमचित्तो। पावइ तिहुयणसारं चोही जिणसासणे जीवो ।। ७६ ॥ प्रगलितमानकपायः प्रगलितमिप्यात्वनोदसमचितः । प्राप्नोति निभुवनसारा योधि जिनशासने जीयः ।। पयलियमापकसाओ प्रगटितमानरुपायो मानकपायरहितः । पयलियमिच्छत्तमोहसमचित्तो प्रगलितमिष्यात्वमोहसमचित्तो यद्वि- परीतं तन्मिथ्यात्वं, मोहो वैचित्यं निर्विवेकता पुत्रमित्रफलादिस्नेहः, प्रगती विनाशं प्राप्ती मिथ्यात्वमोही यस्य स प्रगलितमिध्यात्वमोहः, समै सर्वत्र तृणसुवर्ण-तर्पसक्-शत्रुमित्र-मुखदुःख-यनभवन-पुरारण्यादिषु समानं चित्तं मनो यस्य स समचित्तः। पावइ तिहुयणसारं प्रामोति लभते । कां, घोही बोधि रत्नत्रयप्राप्ति । कथंभूतां वोधि, तिहुयण- सारं-त्रैटोस्योत्तमां। जिणसासणे जीवो जिनशासने सर्वज्ञवी- तरागस्वामिनो मते । मानमिथ्यात्वमोहरहितो जीवो बोधि प्राप्नोतीति जिनवचनं ज्ञातव्यमिति । विसयविरत्तो समणो छद्दसवरकारणाई भाऊणं । तित्ययरनामकम्मं बंधड़ अइरेण कालेण ।। ७७॥ विषयविरकः पमणः पोडरावरकारपनि भावदित्वा । तीर्थकरनामकर्म बनाति अचिरेण कालेन ॥ विसयविरत्तो समणो विषयेभ्यः स्पर्शरसगन्धवर्णशन्देभ्यः पंचेन्द्रियार्थेभ्यो विरक्तः पराङ्मुखः भ्रमणो दिगम्बरः, न तु -- । २२० पद्माभृते- सीताम्बरादिकः प्रत्याख्यानादिहीनः, सपालेशसहः श्रमण उप्पो न तु ययारं जलस्य पाता भोजनस्प भोक्ता च । छमार कारणाई माऊणं पोडशारकारणानि भावयित्वा । नित्यपरनाम कम्मं पंघइ तीर्थकरनामकर्म बनाति विनवतितमी प्रकृति से फगेति यथा गोप संघव्यति पाद: करोति । अपरेण कालेज अचिरेण पाटन अन्तर्गतगर्मपन, यया पंचकल्याणलक्ष्मी प्राप्नोति, अनन्तकालमनन्तमुसमनुमति, अनायासेन मोदी प्राप्नोति । भय कानि सानि पोडशकारणानि यस्तीर्थकरनामकर्म पप्यत इति चेदुष्परी- "দাঁথিযুখিনালগ্নলা মানানসীমা जातोपांगायेगी शक्तितस्रयागतपनी नारामाधिपाय- থাকাকাবহুমঘনাকিয়াহাবিবিএ मा प्रवचनयरगलरय मिति तीर्थकरस्यस्य गुमा मामिगरण प्रो मूत्र । अम्पायमर्थ -इहलोकात-पायो- क.मप-वेदनामय माणभंग-आमाक्षणापायदुर्गागभायागुनिभप-अागभ- याभय रि पानागाकस्मिकभय इति सभागारनिनिकित निप्रणा मोक्षमार्ग इति निमन तनी या निशाना (१) योगायक-गोगोभीगाफाशानिनिनिकामिण (२) rantiनि मिथ्या कामानि मिनिकिगिता, मुनीना स्नानादी निकायमा 11 मोहमालम211) मामा नि मरान (५) AFEIAF1-44 frezn. antaram (T, बिना मदानमा apped (0) भावप्राभूत। २२१ सम्पादर्शनशानचारित्रतपोभिरामप्रकारानं शासनोद्योतकरणं या प्रमा- पना (८) एतरराभिर्गुणयुकचर्मजलस्यतभूतनाशनाऽप्रयोग- वं मूल कगरणकान्दजनपलाग्दुविवादविफटिगपंचमुष्पसंधान- कफीमुभपत्रपदाकमांसादिभक्षकभाजनभोजनादिपरिहणं च दर्शनवि- गुमिः (१) शनदर्शनचारित्र सत्नु चादरोऽयमापना या निपसनता (२) निवधारतिः शीलचनतियारः ( ३ । सन्तत पानम्योपयोगोऽभ्यास: अमीनदानोपयोगः ( ४ ) मंसाराद्वारूब संगः । ५) स्वापनुम दान । ६ ) मानविरुन का स्तपः (७ ) मुनिगणतपसभा नाममाधि. (८) गुगता दोपनिाते निरपपरपा तरपनन पाहाय । ९) अनु र निगमो भक्तिः (१०) आचार्येमुरानो भक्तिः (११) परश्तेवगमो भाग (१२) प्रवचने जिनोऽनुरागी मलि. (१३) सामादिया सर्व समान पनुशिनिजिनाना स्तुनिः स्तव यायत, एयनिय रसुलिवन्दनानियोय. तदोपनिराकर अतिकमर्ग, कामदापनिमय चारपान । एकाधि दारानुनर्जन पास इलेवा पानापानामपहिरामिरेका माता कामानि धर्मपान मानाना (१५)मभ- मर(१६) एत: पोरसमा लान्दा पल मिति का सपना पारमारिदार नेमकिरिपात्रीभार निविहल। धनी मनमरि पाम समिर sal Premart,r.Irrrrti.....

। २२२ पट्मामृते- दादाविधतपश्चरणं प्रयोदशक्रियाः मावय त्रिविधेन। घरमनोमतदुरितं ज्ञानाशेन मुनिप्रवर ।। चारसविहतवयरण द्वादशविध तपश्चरण अनशनमुपयासः, अमो- दर्यमकप्रासादिरल्पाहारः, वृत्तिपरिसंख्याने गणितगृहेषु भोजन पक्ष संख्या या, रसपरित्यागः पड्सविवर्जने, विविक्तेषु जन्तुम्रीपशुना सकरहितेतु स्थाने शून्यागारादिषु आसन उपपैशन शय्या निदा स्थान अवस्थान या विविक्तशय्यामर्न, फापलेश. जटीदनभोजनादि । इदै पनि माझं तपः । या कामादिति चेत् । यार्थ भोजनादिकमपेक्ष्य प्रयत, परप्रत्यक्ष या प्रवर्तते, परदर्शने पाहिगृहस्थैध क्रियते ततो याममुप्यते। एतस्मात्तपस कर्मदहने इन्दियतापकारित प भवति । संयमो रागोच्छेदः कर्मनाशो ध्यानादिः आशानिति शरीरते. जोहानि प्रह्मचर्य दु ग्यमहर्न मुगानभिन्या आगमनभावनादिक च फल ज्ञातव्यं । पत्तियाभ्यन्तरे तप, यतः परताप्रनालीदे स्वर्गवेध बालदम्यानपेय ततोऽम्पन्तर तप उध्यते । तरिक! प्रायमितविनप. या पवाध्यायन्युमर्गच्यानलक्षणं । तत्र नयविध प्रायथित, धतुनिया दिनपः, दविध वैयारय, पंचशियः स्वाध्यायः, विविधो गुग्गर्गः, धविध प्यान पेनि पविधमभ्यन्तर तप इति द्वादश तपः । निमावि प्रायभित्तमिति था! गुरोग्प्रे स्वप्रमानिदिन दशोत. हितमालोचन। के ते दादारा भालोचनाया इति चेत् !- - बन्नभोजनावागाव....

. भावप्राभृतं। २२३ माकंपिंभ मणुमालिम दिई बाबरं च सुमं च । घरं सदाउल यादुजगमन्चत्त तस्सेवी ॥१॥ पुरपस्यकान्ते यानपनालोचन, विपास्तु प्रकाशे यापमालोचनं, महदापि तपधरणनालोचनरहितं तत्प्रापमित्तमकुर्वतो वा अभीष्टफलद न भवतीति शतम् । दोषमुद्यार्बोचार्य निया मे दुष्कृतमस्तु इत्ये- मादिरभिप्रेत: प्रतीफारः प्रतिगमगं । एत-प्रतिममणमाचार्यानुनया शिगैर फर्तव्यं । आलोचनं प्रदाय प्रतिमनगमागेर कर्तव्यं तत्त- दुभपमुम्पते। गुरुस्वाप्पास्त्वेन पत्र सन्देहविपर्ययौ भवतः, अशु- सस्प गुरत्वेन निश्पो वा पत्र, प्रास्पातं यतवस्तु भाजने मुसे या प्राप्तं, यस्मिन् वस्तुनि गृहीते फापादिफमुत्परते तस्य सर्वस्प स्थानी विवेक । निपतकालफापमानसा त्यागो ध्युत्सर्गः । तपो पासं पथितमेव । दिनपक्षमासादिविभागेन दक्षिाहापन ऐदः । दिवसादिविभागेर दूरतः परिवर्जनं परिहारः । महामतानां मूलपोदन वा पुनदशामापनामुपस्थापना । आचार्यमपृष्ट्वा भाता- पनादिकरणे पुस्तफपिछादिपरोपकरणहणे परपरोक्षे प्रमादत: लावादिवदनाकरणे संघनामा स्वसंधगमने देशकालनिट- मेवारपतविशेषस्य धर्मफयादिव्यासंगेन विस्मरणे सविस्तर सरणे सपरि दिधे आलोचनमेय प्रापस्ति । परिन्दि- दुष्परिणामे, साचादिषु हस्तपादादिसपाने, मतसमितिमतिकार- विचारे, पपलादिकरणे, देवारपस्यामा Here लिलोयाने, सतीशपरमादौ च प्रतिम मामि अनुमोनिया:- लिएननं परत : .

- । २२४ पद्मामृते- सान्ते रात्र्यन्ते भोजनगमनादौ च प्रतिक्रमण प्रायश्चित्तं । सोचनम्वत्र दस्यमेन्द्रियातिचाररात्रिभोजनेषु पक्षमामसंवत्मरादिदोषादौ च उम आलोचनप्रतिक्रमणप्रायश्चित्तं । मौनादिना लोचकरणे, उदरकृमिनिर्गः हिममशकादिमहावातादिसंहातिचारे, स्निग्धभूहरिततृणपंकोपरिगम जानुमात्रजलप्रवेशकरणे, अन्यनिमित्तवस्तुस्वोपयोगकरणे, नावादिन तरणे, पुस्तकप्रतिमापातने, पंचस्थावरविधाते, अदृष्टदेशतनुमलविस्: र्गादौ, पक्षादिप्रतिक्रमणक्रियायां, अन्तर्व्याख्यानप्रवृत्यन्तादिषु कायो सर्ग एव प्रायश्चित्तं । उच्चारप्रस्रवणादौ च कायोत्सर्गः प्रसिद्ध एवं अनशनादिकरणस्थानमागमाद्वोद्धव्यं । नवविधप्रायश्चित्ते कि पल भावप्रसादोऽनवस्था शल्यामावदादादिकं फलं वैदितन्य । अनलसेन देवाकालादिविगुद्धिविधानज्ञेन सबहुमानो यथाशक्ति क्रिय- माणी मोक्षार्थ ज्ञानग्रहणाभ्यासस्मरणादि ज्ञानविनय । तत्वश्रद्धाने निःश- कितत्वादिर्दर्शनविनयः । ज्ञानदर्शनवती दुखरणे तद्वनि च मानऽति- भक्तिर्भावतश्चरणानुष्ठान चरणविनय । प्रत्यक्षेत्राचार्यादिष्यम्युल्यान- चंदनानुगमनादिरामानुपः परोक्षध्वपि तेष्वालिक्रियागुणकीर्तन. स्मरणानुज्ञानुष्ठायित्वादिश्च कायबामनोभिरुपचारविनय । विनयस्य किं फळ ! ज्ञानलाम आचारशुद्धि सम्यगाराधनादिश्च विनयम्प फल वेदितयं । इति चतुर्थियो विनयः । दशविध यावृत्यं । तथा हि। आचार्यस्य याश्य, उपाध्यायस्य वैयावृत्य, महोपयासाधनुष्टायितपस्विनी वैया-ये, शास्त्राभ्यामी शैक्ष- तस्य यावृत्य, रजादिमिटशरीरो ग्लानस्तस्य चैयात्य, स्थगिसन्तनि- गणस्तस्य येयाहत्ये, दीक्षकाचार्यशियसंघ. कुल तम्य याय, ऋषि- १ पुस्तस्येऽपीटगेव पार, मनगारधर्माम् तु मानादिना रिनालोचन करणे इति । पला ।। दुश्वावरणे पाटान्तर। । ।

- भावप्राभूत । २२५ मुनिपत्यनगारनिवहः संघः, अथवा ऋष्यार्यिकानायकवाविकानिवहः संवस्तस्य चैयाहत्य, चिरप्रनजित्तः साधुस्तस्य वयात्यं, विद्वत्तावत्कृत्वा- दिलोकसम्मतोऽसंपतसम्यग्दृष्टिी मनोजस्तस्प वैयावृत्यं । किं तद्वैया- वृष ? एसेषां दशविधानामाचार्यादीनां व्याधिपरीपहमिष्याचादेः प्रासु- कौपधमतादिप्रतिश्रयस्तरादिभिर्धर्मोपकरणैः सम्परत्वप्रतिस्थापने च प्रतीकारो वैयावृत्यं । बामदब्याभावे स्वफाये (न)लेष्माचन्तर्मलाप- कर्पणादिस्तदानुकूल्यानुष्टानं च चैपावृत्तं । वैयाहत्यकरणे किं फलं ! समा (प्या) धानं। वाचना-संशपच्छेदाय निधितवलाधानाय वा अन्याझेभयस्य पर प्रत्यनुयोगः । आत्मोलतिपरातिसन्धानोपहासादिवर्जितः पृच्छना । सधिगतार्थस्यैकाम्येण मनसाम्पासोऽनुप्रेक्षा घोषशुद्धं परिवर्तनमानापः। दृयाटप्रयोजनानपेक्षमुन्मानिवर्तनसन्देहच्छेदापूर्वार्थप्रकाशनार्थो धर्म- कथानुशानं धर्मोपदेशः । पंचविधस्प स्वाध्यायस्य किं फलं ! प्रजाति- शपप्रास्ताप्यवसायप्रवचनस्थितिसंयोच्छेदपरवादिशंकाचभावसवेगता- सुपसिचारविशुद्धाद्यर्थः पंचविधः स्वाध्यायः । नियतकालो यावजी वा कापस्म त्यागोऽन्पन्तरोपधिन्युत्सर्गः। बारात्वनेकपायो व्युत्तर्गः । नि:संगवनिर्भयत्वजीवितासायुदातदोपो. दमोक्षमार्गभावनापरत्वादि व्युत्सर्गफलन् । ज्य पान नाम द्वादशं तप उच्यते तदर्थमिदं सूत्रनुमावामिभिः कृत- "उत्तमसंहनस्यैकाप्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहर्तात् ।" अस्पायमर्थ:-वजन्यमनाराचसंहननं, पजनाराचसंहननं, नाच- संहनने संहननत्रयमुत्तमं सेहननं नोज्ञादिकारणत्वात । प्रयमं संहननं मोश्यस्य हेनुः । प्यानल हेतुतितयनारे भाति । बर्धनाराचस्प कीलि- पर.१५ २२६ पद्मामृते- काया मप्राप्तासृपाटिकायाश्च संहननत्रयस्यान्तर्मुहूर्तकालं यावचिन्तानि- राधधारणायामसमर्थत्वात् । गमनभोजनादिक्रियाविशेपेष्वनियमेन प्रवर्त- मानस्यात्मन एकस्याः क्रियाया. कर्तृत्वेनावस्थान निरोधः-क्रियान्तर- व्यवधानाभावेन एकक्रियाया सातत्येन प्रवृत्तिनिरोध इत्यर्थः। एकाग्रे एकार्थे एकस्मिन्नने प्रधाने वा वस्तुनि चिन्तानिरोधः-एकस्मिन् दम्य पर्याये तदुभयात्मके स्थूले सूक्ष्मे वा चिन्तानिरोध इत्यर्थः । अथवा सयानं, अप्रं मुख, एकमनं यस्य स एकामः स चासो चिन्तानिरोध- काप्रचिन्तानिरोध. एकस्मिन्नर्थे वर्तमानचिन्तानिरोधः एकमुखः सद्धपान अनेकनाक्षसूत्रादौ अनेकमुखः सयान न भवति यथा प्रदीपशिर अनिराबाधेन परिस्पन्दते तयाऽनिराकुस्तायां ध्यान न स्यात् । गुति समितिधर्मानुप्रेक्षापरीपहजयचारित्रादिकं यसवरकारणं तदेव ध्यानका रणमिति ज्ञातव्यं । आन्तर्मुहूर्तात् मुहूर्तमध्ये प्यानं भवति । चाधिक. कालो ध्यानस्यास्ति, कस्मात् ! चिन्ताना दुर्धरत्वात् अंतिचप यत्वाच्च । एतावत्यपि काले ज्वलदचले ध्यानं कर्मध्वसाय भर्या प्रलयकालमारुतयत् समुद्रजलशोषणवत् । तद्वयानं हेयमुयादे च । तत्र हेयमात रौद च । उपादेयं धर्य शुलं च । ऋतौ दुः भवमात । रुद्राः फराशयः प्राणी तत्कर्म रौई। धर्मो वस्तुस्वरूप सस्मा दनपेतं आश्रितं धर्म्य । मलरहितात्मपरिणामोद्भवं शुक्र । तत्र धर्म शु च द्वर्य मोक्षकारण । ससारकारणमन्यवयमातरौमिति ज्ञातव्य आतममोनज्ञस्य संप्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारो वारं वारं चिन्तन मनोज्ञस्य विपरीत चितन तद्विपरीत वेदनाचिन्तनं तदिपरीन निदानस्य चिन्तनं । हिसानृतस्तेयाविषयसरक्षणेम्यो रौद्रं प्यानमुत्पद्यते । या अविरतदेशविरतप्रमत्तसयतेषु सभवति । रौई अविरतदेशविरते संभयति । आज्ञापार्यापासस्थान विचयर्धय॑न्यानमुत्पद्यते । तत्पूर्व- . भावप्राभृतं । २२७ विदो मुनेः श्रेण्यारोहणापूर्व भवति । श्रेण्योरपूर्वकरणायुपशान्तान्तानां प्रथमं शुम्भवति । क्षीणकपायस्प द्वितीयं शुम। तृतीयं गुहं चर्थ च सुर केवलिनां भवति । तत्र योगप तृतीय, चतुर्थमयोगस्योते । पृथ- त्यतिकवीचार प्रथमं शु। एकत्वक्तिकोवीचारं तृतीयं मुलं । सूक्ष्म- मिपाप्रतिपातिनामकं तृतीयं शुक्र । व्युपरतक्रियानिवर्तिनामधेयं चतुर्थ गुमं । तत्र पृथक्त्ववितर्कवीचार त्रियोगस्य भवति मनोवाकायावटम्भै- रामप्रदेशपरिस्पन्दान्त्रीन् योगानयटन्य अवष्टम्य उत्पद्यते इत्यर्थः । एकत्यवितर्काविचार त्रियु योगेषु मधे एकस्य चलनद्वारेणामपरिस्पन्दे सति समुपद्यत इत्यर्थः । कापयोगस्य फेवलिनः सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति शुक भवति । अत्र कापावष्टम्भवामनचलनं । अयोगकेवलिनी व्युपर- तक्रियानियात शुश्प्याने यतोऽत्र कायायवष्टम्भेनात्मप्रदेशचलनं न भवति । पृथक्त्ववितर्फवीचारमेकत्ववितर्कवीचारं ध्यानद्वयं पुर्वेष्वीतिन एव । वितर्कयोचारसहितं पूर्व । द्वितीयं तु वीचाररहितं । वीचारः किं ? अर्थन्यानयोगसंझान्ति/चार: परिवर्तनमित्यर्थः । अर्थसंक्रान्ति: का ? द्रव्यं विमुच्य पर्याय गच्छति पर्याय विहाय द्रव्यं समुपतीयर्थसंक्रान्तिः । एफ वचनं त्यक्त्वा वचनान्तरमवटम्यते तदनि त्यक्त्वाऽन्यद्ववचनमवल- म्यते इति स्यज्ञनतंकान्तिः । कापयोगं त्यक्त्वा पोगान्तरं गच्छति तदपि त्यक्त्वा कापयोग मजाति योगसंक्रान्तिः । एवं श्रुतज्ञानेन वितर्प समूल द्रव्यं तत्पर्याय पर्यायान् वितर्य ततो द्रव्ये परिवर्तने वीचारे सति पृथक्त्वेन भेदेन अर्थपर्याययोर्वचनयोगयो; श्रुतज्ञान- पालोचनेन समान्तिः पृथक्त्ववितर्कवीचारः गुष्ठध्यानं भवति। पथप्य- व्यसनादितमान्तिरूपतया चलनं वर्तते तथापि इदं प्यानं ! यस्मात् ! एवविधत्वैवास्य विवक्षितत्वात् । रिजातीयाने विकल्परहितस्य अर्था- दिसकमेग चिन्ताप्रबन्धक एतद्धपानवेनेटत्वात् । अथवा द्रव्यपर्या- २२८ पटनामृते- यात्मनो वस्तुन एकत्वात् सामान्यरूपतया व्यञ्जनस्य योगानां चैरीकर- णादेकार्थचिन्तानिरोधोऽपि घटते । द्रव्यात्पर्यायं व्यसनापानान्तर योगायोगान्तरं विहाय अन्यत्र चिन्ताहतौ अनेकार्थता न द्रव्यादेः पर्या- यादी प्रवृत्तौ । तथा श्रुतज्ञानेन एकाथै वितर्कयत्नविचलितचित प्रवृत्तः क्षीणकपाय एकत्ववितर्कवान् भवति । यात्मनोयोगे बादरक- पाययोगं च परिहाप्य सूक्ष्मकाययोगालम्बनोऽन्तर्मुहूर्तशेषायुर्वेपनाम- गोत्रः सूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिभाग्भवति । यदा पुनरायुपोऽधिक थेपादि. त्रितयं तदा दण्डकपाटादिकं चतुःसमयैः कृत्वा पुनस्तावत्समयै. समु- पहत्य समीकृतकर्मचतुष्टयः सूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिध्यानं ध्यायति । ततोऽ योगिनः समुच्छिन्नक्रियानिवृत्तिव्यपरतक्रियानित्यपरनामक प्यान भवति । तस्मिन् स्थाने स्थितस्य सर्वास्रवनिरोधात् सर्वशेषकर्मविर्व- सनसमथै सम्पूर्ण यथाख्यातचारित्र साक्षान्मोक्षकारणं संजायते । अन्त्ये शुमध्यानद्वये चिन्तानिरोधाभावेऽपि ध्यानन्यवहार. ध्यानकार्यस्य योगा- पहारस्य अघातिघातस्य चोपचारनिमित्तस्य सद्भावात् । तथा साक्षात्क- तसमस्तयस्तावहति न किंचिद्धयेयमस्ति । ध्यान तु सत्र असमानफर्मणो समानलकरणार्थ या चेष्टा, कर्मसाम्ये तत्क्षययोग्यसमया या अलौकिका मनीपा तदेय सौख्यं मोहक्षयाज्ञानावरणदर्शनावरणक्षयाचात्पनो दर्शन जाने च भवति । अन्तरायविनाशादनन्तवीर्य जीवस्य स्यात् । आयुकर्मविध्वंसनाचतनस्य जन्ममरणाभावो भवति । नामकर्मनिर्मूलना- नरस्यामूर्तत्व जायते । नीचोचगोत्रवित्रासनात्कुलद्वयविनाशो भाति । धेदनीयकर्मनिर्मलकार्य कपणात् जीवस्येन्द्रियोत्पन्नमुखाभावः संजायते । १-१ पुम्नकदयेऽपि गेव पाठः किम्नु कषायस्थाने कायेनेत पाटेन मरि- तध्य भागमाविरुदत्वात् । पायानो तत्राभावाचन क्षेत्रो हापन सूक्ष्मीकरण च पयोगिगुणस्पाने परते। ३ समीपत.. मानावरगायत्, स.। ।

- भारप्रामृतं । करिमन्नि? यस्तुनि निमा मशिनि । आतधविक्षपा नु मनि- चला अशुभा शुभा या ना भावना करत, चिन चिन्तन समेकन- पयुगानुमेधार्ण स्थापन भूतानपदालोचनं या कम्यते न तु यान । भार संहननलक्षणं या पदुदयादस्थिन्धनविशेषतसंहनने पट्मकार । पनाकामयास्थिमध्ये सवलपयाधनं सनाराचं मामनारायहनन । तदेव यलपरहितं यानाराचसहनन । यगाकारयलपारपेतं मनारा नाराचसंहनन । मस्थि समाराचं अपरमनाराचं अनारायसंहननं । उभपास्थिमान्ते सकीलक पीलिकासंहनने । अन्तरप्राप्तपरस्परास्थिसदि बहि:शिरास्नायुमांसपेधितं असमासानुपाटिफार्सहननं पैति । भासतति- तम्यां गाथापां चारसविहतपयरणं इत्पस्य पादस्प व्यास्पान समाप्त । तेरसफिरियाो भावि तिविहेण प्रयोदशमिया भावय स्वं विविधन त्रिकरणामया पंचनमस्काराः, पडावश्यकानि, चैत्यालयमध्ये प्रविशता निसिही निसिही निसिही इति धारप हाचार्यते, जिनप्रतिमावन्द- नाभक्ति कृत्या बहिनिप्छता भव्यजीवन अतिही अतिही असिही इति यार हयुचायत इति त्रयोदशमिया हे भव्य ! त्वं भावय । तथा चोक्तं- निःसंगोऽहं जिनानां सदनमनुपमं त्रिःपरीरयेस्य भल्या स्थित्वा गत्या निपिरयुथरणपरिणतोऽन्तः शनैहस्तयुग्मं । माले संस्थाप्य युद्धपा मम दुरितहरं फीतये शक्रवन् निन्दादूरं सदाप्तं क्षयरदितममुं ज्ञानभानु जिनेन्द्रं ॥१॥ भरे लौंका दुरामानो। यदि भवद्भिनिनप्रतिमा चैत्यालपध न मान्यते तदेदं वृत्तं पूज्यपादैजिनवन्दनाविधिः कथमुक्तः । तेन दुरामह विमुच्यास्तिकत्वं भावनीयं भवद्भिः । अथवा पंचमहामतानि पंचसमितप- स्तिलो गुप्तयति त्रयोदशक्रियास्त्रयोददाविधं चारित्रं हे भन्यवरपुण्ड- , पमाभते- पृयादिगु क्यमाहियं पुष्णं हि जिणेहि मागणे मणिपं । मोहरगोपिहीणो परिणामो अपणोधम्मो ॥ ८१॥ मागिहि giजित शागः मतम् । मोइशामविहीनः परिणामः भारमनो धाम । पूमादिगु पयगहियं गुजारिशुवतसहित पूजा आदिमा कर्भगा ! TARAI प्रारमनतमरिता पुणं हि जियोति मागणे मणिय से निगमौर गाय, की निनामी करपरम। पर ARE शाने आमगे मागकागाननान्य मणिप्रतिपादित . का करिता मां नगना गुणगाणार्गमगाया Tyागवानरागमेनन्। Tमतानुभाणामागोगात् तुणानिमामिति मनीयम ॥१॥ या पाना--- माजमा मिर्गानि । जाम दिमागमादारता farm ta मnlmi महानमा महामनामपरता म. प्रारमनपान ॥ at: nxn.mMAMITrtam in Him gratisthat ....... .....माहापोहणणामी अपना नामी-1, ... Tic fantriff AN, भावप्राभृतं । २३३ विहीन एवं गुणविशिष्ट सामनः गुबुद्धकस्वभावस्य विधमत्कारल- क्षणधिदानन्दरूपः परिणामो धर्म इत्युच्यते । स परिणामो गृहस्थानां न भवति पंचसूनातहितत्वात् । तया चोक्तं- पण्डनी पेषणी चुल्ली उदकुंभः प्रमार्जनी। पंचस्ना गृहस्थस्य तेन मोक्षं न गच्छति ॥ १ ॥ पदि मोक्षं न गच्छति तदा जिनसन्यक्त्वपूर्वकं दानजादिलक्षणं विशि- गुगनुपान् गृहस्थः स्वरी गच्छति परंपरपा जिनलिंगेन मोक्षमपि प्रानोति। इति पुष्पधर्मयोः स्वरूप नुस्वेदानी निर्विकल्पतमाधिलक्षणं कर्म- क्षपकार करपन्ति भगवन्तः- सदहदि य पत्तेदि य रोचेदि य तह पुणो वि फासेदि । पुणं भोपनिमित्तं प हु सो कम्मक्खयनिमित्तं ।। ८२ ।। सहयात प्रति च रोचते च सपा पुनरपि सति । पुष भोगनीतं न हु दर रसपानेलेतन् । सदहदि र अधाति च तत्र विपरीताभिनिवेशरहितो भवति । पचेदि च प्रवेति च मोक्षानुभूतत्वेन यथारट प्रतिपद्यते । रोचेदि य रोचते च मौकारमतवा तत्रैव च करोति । तह पुगोवि फासेदि मोक्षादिधात साधनतपः स्पति अवगाहपति । पुष्पं भोपनिमित्तं एतजादिला पुष्य मोक्षातिया नियमार्ग सागभौगफारगं स्वर्ग- सीनानागनादिकारनं तृतीदिन मोशकारनं निन्दागेन। पहु सो कम्मरसपनिमित्तं न भाति हु-सुटं निधन सामावद्भये गरस्परिन फर्मशानिमित्-ताये केवलानावरमोशनिनिनं पुन्न भरततिशत।

२३६ षट्माभूते- नरय अगुदभावः सन् गतः प्राप्तः महानरके सप्तमे नरफ गतः । इय गाउं अपाणं इति ज्ञात्यामानं शुदधुः कस्वभावरूप टकॉर्गि- रटिकरियापी विधमाकारटक्षण मुक्तिगतसिद्धसमान सुनिश्चयनयेन सिद्ध शायककालमा है जीव 1 है भारमन् । । मादि निण. मारणा णि भाप भापनाविषयं कुरु इपं जिनमापनति बागा, अधा जिनमाना जी दिसतत यशद्वान व नित्यं सर्पका भाग रोय तस्मारिति आध्यान परिहाय अन्तस्तस्य वहिस्त व पानि भावार्य कितपण्याने।-- यधयारागापाय परकमबाद। माध्यानमपच्यानं शागति जिनशाराने विशवा ॥१॥ "परम्पयालय स्थि सामचिरतन। कम्य गर्मनिष कपातीत निरंजनं ।" इनिपग पर ध्यान भागय है जीय। भARTI पा-श्रीदन्तभिननगभूमी कामन्दी- प्रायमर लामा मोनोगमा ५ । सकलधर्मानुगन मामात बाद। गुदामनमोहिममनि मागमति गजान, जाननानिमाया वादाला म जुगुणमान मनोरियाम- कायनामाइका निमामि IT! Linानापाना मानमानापन अनेकना- मानना। कनिषाविना मार Categin मना मत भूममम मा बभूबा मानना AHETREPा In Inामपर।

भावप्राभृतं । २३७ तस्मिन्नेव समुने तस्यैव महामत्स्यस्य कर्णविलमलाशनशील: शालि- तिथप्रमाणशरीरो मास्यो बभूव । तदन्वेष पर्याप्तदव्यभावेन्द्रियः तस्य महामास्यस्प मुर्रा व्यादाप निद्रायतो वेलानदीप्रवाहे इस गलगुहानेक- जलचरसमूहं प्रविश्य निष्प्रामन्तं निरीक्ष्य शालिसिस्यचिन्तयति-अये पापकर्मा महामास्यो निर्भाग्यो यन्मुखे पतन्त्यपि यादांसि भक्षित्तुं न शोति । मम देवेनैतावच्छरीरं यदि भवति तदा सकलमपि समुद्र सत्यसंचाररहितं करोमांति चेतश्चिन्ताबलाक्षुद्रमत्स्यो निखिलनकचक- भक्षणपापाच महामस्पोऽपि द्वायपि मृत्या सप्तमनरके तंजाती। ततस्त्रय- खिशसागरोपमायुपौ तौ द्वावपि परस्परमालाप चक्रतुः । अहो क्षुद्र- मस्प ! महापापकर्मणो ममात्रागमनं संगच्छत एव । त्वं तु माकर्ण- मलाजीयनः फयमागतः। शालिसिक्यचरनारकः प्राह-महामत्स्यचे- हितादपि दुरन्तदुःसं (ख ) संबन्धनादुर्भावनावशात् । इति श्रीभावमाभते शाटिसिस्थमास्योपाख्यानं समाप्त । बाहिरसंगचाओ गिरिसरिदरिकंदराइ आवासो। सयलो पाणझयणो निरत्यओ भावरहियाणं ।। ८७ ।। बाबमात्यागः गिरिसारेरीकन्दरादाबासः । सतं ज्ञानाप्ययन निरय भावरहितानाम् ॥ चाहिरसंगचाओ बायसंगत्यागः निरर्थक इति सम्बन्धः। गिरि- सरिदरिकंदराइ आवासो गिय आवासः पर्वतोपरि आतापनयोगः पति स्थिति , सरित-नदीतटे तपक्षरणं भगीरथवत् , दरी गुहाया। मावासः, कन्दरो गिर्यादिविवरे तत्रावातः, आदिशब्दात् श्मशानोपानादौ आवासः स्थितिः । सयलोणाणज्झयणो सकलं वाचनापृच्छनानुप्रेक्षा- म्नायधर्मोपदेशरक्षणं ज्ञानाध्ययन शाखापटनं । निरत्यओ भावरहि- २३८ पनामृत- याणं भावरहिताना जिनसम्यक्त्यविवनितानां निजसुबुबैकस्वभावा- स्मभावनाऽयच्युतानां यतीना (निरर्थक)। उक्तं च-- वाह्य ग्रन्थविहीना दरिद्रमनुमाः स्वभावत सन्ति । यः पुनरन्तःसंगत्यागी लोके स दुलंमो जीवः ॥ १ ॥ भंजमु इंदियसेणं भंजमु मणमकई पयत्तेण । मा जणरंजणकरणं याहिरवयवेस तं कुणम् ॥ ८८ ॥ माग्धि इन्दियसेनो मग्धि मनोमट प्रयत्नेन । मा जनरजनकरण यहियतवेष संकापीः॥ भंजमु इंदियसेगं व भग्धि, को ! इन्द्रियसनां । मंजसु मगमकर्ड पयत्तेण भजन-स्व भंग्धि आमर्दय विषयकपायेभ्यो गच्छन्त निमणद्धि, क! मणमकई-मनोमर्कट चपळस्वभावत्वान्मन एव मकर्टस्तै मनोवानर प्रयत्नेन स्वीसंगपरित्यागात् । मा जणरंजणकरणं मा-नैर जनानां लोकानां रंजनकरणं अनुरागोत्पादक कार्य । हे वाहिरवयवेस यहि- सयेष! हे बायाकारदीक्षाचिोदाहक !। तं त्वं । मा कुणमु मा कार्याः। णवणोकमायवम्गं मिच्छत्तं चयसु भावमुद्धीए। चेदयपययणगुम्णं करहिं मत्ति जिणाणाए ।। ८९॥ नवनाथायवर्ग मिभ्यार त्या मावशुद्धया। चैत्यप्रवचनगुको हमति जिनालया। पवणोकमायरगं नबनोस्पायवर्ग हास्परण्यरतिशोकमयानुगुप्मा. श्रीनार्मकोदलक्षणान् नोकपायान ईपकायान् यथास्यानचारिरथा- तकान् । चपमु योनि मबन्धः। तथा मिच्चत्तं चपगु मारमुद्रीए. विध्यार्थ पचप्रकारे च यमुस्पन- , * भारमामृत। एयंत पुनदरिनी विपरीमो म गायनी विषयी। दो पिय मपिता मपकारियो भष्माणीnt || एकान क्षणिककालीन मोर चीनी यातन हिनया मोई भ-मामी यति। तापमो विनयेन गांव काशिन इन्द्रचन्तनागे- नगालः संयन मोत मन्यो । विचादानोऽपिटको मानिटी पापनामाभिधी निश्चितम संसयमोसो तव्यः । मस्करपूरणी मार्क- टियोऽनामोक्ष मन्यते । एतन्महापात मिप्यायपंचफ घरमुल्यन है जीय ! । तथा च समन्तमनः प्राह- न सम्यक्त्यसमं किंचिर प्रेफाल्ये पिजगत्यपि । धेयोऽथेयध मिथ्यात्वसमं नान्यत्तनूभृताम् ॥१॥ भायमुर्झए-तत्याधसानलक्षणया भायाया जिनसम्परत्वेन लोकपापसभापणसंगमपरिहारेण शुस्वुद्धकस्यभावात्मरचिपरिणामेनेति भावार्थः । चेइयपवयणगुरुणं चैत्याना अहंसिरप्रभृतिप्रतिमानां प्रय- चनस्य जिननाधसूचस्प तधेति मस्तकोपर्यारोपणेन सरस्वतीप्रतिमापू- जनेन गुरूणां निन्यिदिगम्बराणां भन्यजीवभक्तजनपिनेयमातृपितृसश- हितोपदेशकानां । करोहिं भत्ति जिणाणाए पुरु स्वं भक्ति पंचामृत- जलेक्षुरतहैयंगीनगीमहिपक्षिीरगन्धोदकफलशस्नपनेन जलचन्दनाक्षत- पुष्पचरुदीपधूपफलार्घदानेन स्तवनेन जपेन ध्यानेन श्रुतदेवताराधनेन नित्यं प्रातरुत्थाय सर्वज्ञवीतरागप्रतिमासगावलोकने भक्ति कुरु, तथा श्रुतमक्तिं श्रुतोक्तप्रकारेण कुरु, तथा गुरूणां पादमर्दनेन वैयानृत्यपया- संभयाहारदानश्रुतसमर्पणौपधप्रदानवसत्यर्पणाभयदानादिभिर्यधायोग्यं भ- किं कुरु । एतात भक्तिटक्षणं कर्म जिनाज्ञया महापुराणनवणेन त्व युरु हे जीव ! स्वर्ग मोक्षं च प्राप्स्यसि । लौंकानां महापातकिनां वचन मा मानपत्र।

। गणहरदे. २४० पट्माभूते- तित्ययरभासियत्थं गणहरदेवेहिं गंथियं सम्म । भावहि अणुदिणु अतुलं विमुद्धभावेण मुयणाणं ॥९॥ तीर्थकरभाषितार्थ गणधरदेव प्रन्धितं सम्यक् । भावय अनुदिनं अतुलं विशुद्धभावेन श्रुतज्ञानम् ॥ तित्थयरभासियत्थं तीर्थकरेण श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञवीतरागेण मा- पितः कथितोऽर्थो यस्य श्रुतज्ञानस्य तत्तीर्थकरभापितार्थ वेहिं गंथियं सम्म गणधरदेवेगौतमस्वाम्यादिभिर्गन्धित द्वादशा- धिकशतकोटित्र्यशीतिरक्षाष्टापंचाशत्सहस्रपंचाधिकपदैरानीतमिति प्र. न्धित । चतुर्दशप्रकीर्णकैरप्यानीतं श्रुतज्ञान । सम्मं सम्यक्प्रकारेण पूर्वापरविरोधरहित । भावहि भावय । अणुदिणु अनुदिनमहर्निश । अतुलं अनुपम । विमुद्धभावेण सुयणाणं चलमलिनपरिणामरहिततया। एकस्य पदस्य श्लोका यथा-५१०८८४६२१ अक्षर १६ । उक्त छ श्रुतस्कन्धशास्त्रे- एकायनकोडीओ लपसा अहेव सहसचुलसीदी। सय णायव्वं सड्ढाइगयीसपयगंथा ॥१॥ पाऊण णाणसलिलं निम्महतिसडाहमोमउम्मुका । होति सिवालयवासी तिढुवणचूडामणी सिद्धा ॥९१॥ प्राप्य ज्ञानसलिल निर्मभ्यतृषादाहशोपोन्मुक्का। भवन्ति शिवालयवामिन त्रिभुवनपूछमणयः सिद्धा. ॥ पाऊण णाणमलिलं प्राप्य लब्ध्या, किं । ज्ञानसलिल सम्यग्ज्ञानपा- नाय सिद्धा भवन्तीति सम्बन्धः । कर्थभूताः सिद्धाः, निम्महतिमडा- हमोमउमुका निर्मच्या मययितुमशक्या स चामौ तृपा विषयाभिलारः दाहश्च शरीरपरिसन्ताप. शोपथ रसादिहानिः निर्मथतपादाहशोपाः त एकपंचाशाकोन्या लक्षा अष्टावेर सहनश्शुरशीतिः । हातपटकं ज्ञातम्यं सार्थकविंशनिश्प्रन्या ॥१॥ - " ------ ८ भावप्राभूतं । २४१ न्मुक्ताः परित्यक्ता निर्मयतृइदाहशोपोन्मुक्ताः । निम्मलसुविसुद्धभा- वसंजुत्ता इति च कचित्पाठः तत्रायमर्य:-निर्मटो द्रव्यकर्मभावकर्मनो- फर्मरहित: योऽसौ सुविशुद्धभावः कर्ममलकलकरहित: क्षायिको भावः परिणामः निकेवल लामा वा तेन संयुक्ताः सहिता निर्मलमुविशुद्धभाव- संयुक्ताः । होति सिवालयवासी भवन्ति संजायन्ते, के ते! आसन्नभ- व्यजीवाः, कीदृशाः संजायन्ते ! शिवालपत्रासिन ईपवाग्भारनाम्यां शिलापां बसन्तति मुक्तिशिटोपरि तिष्ठन्तीत्येवं दशालाः शिवालयवासिनः, अथवा शिवानां सिद्धानामालयः शिवालयः पंचचत्वारिंशल्लक्षयोजन- विस्तारमुक्तिशिलापा उपरि तनुयातनामवातवटये निराधारा आकाशे तिद्वन्ततिभावः । पुनः कर्यभूताः सिद्धाः, तिहुर्वणचूडामणी त्रैलो- पशिरोरलसदृशाः। दस दस दो सुपरीसह सहहि मुणी सयलकाल काएण । मुत्तेण अप्पमचा संजमघादं पमोत्तूण ।। ९२ ।। दस दस दी सुपरीपदान् सहस्स मुने । सहलसालं कायेन । सूनेगमता संपनपा प्रमुच्य ।। दस दस दो दा च पुनर्दश च दौ च द्वाविंशतिरित्यर्थः । के ते, मुपरीसह मुटुअतिशयेन परिसमन्तात् सहन्ते ये ते सुपरीवहा: "मार्गा- ध्ययननिर्जरा परिसौदव्याः परीपहा" ते तु पूर्वोक्तवर्णना ज्ञातन्याः । सहहि सहल । मुगी हे मुने! हेही तपस्विन् !! सयलकाल सकलकार्ट सर्वफाटे, फापन-शरीरेण वामनामनि स्याप्यते इति भावः । मुत्तेप सूबेग जिनरचनेन हया । किं तमिनरचनं !-- , न देपल दी. रा. २८. टी.1 ३ सदन दो मारो सदि. रा.! .

२४२ पट्मामृते- "मार्गाच्यवननिर्जराये परिसोढण्याः परीपहाः" इति । अप्पमत्ता अप्रमचाः प्रमादरहिताः इत्यर्थः । संनमपादं पमोत्तूण सयमस्य धातं प्रमुग्य। जह पत्थरो ण भिजइ परिडिओ दीहकालमुदएण। तह साहू ण विमिन्जइ उवसग्गपरीसहेहिंतो ॥ ९३ ॥ यथा प्रस्तरोन भिद्यते परिस्थितो दीर्घकालं उदकेन । तथा साधुन विभिदते उपसर्गपरीपहेभ्यः । जह पत्थरो ण भिज्जइ यथा प्रस्तर: पापाणो न विभियते न परिणमति अन्तरार्दो न भवति । परिडिओ दोहकाठमुदएण पापण. कर्थभूतः, परिस्थित· मुडिन उदके इति सौत्रसम्बन्धात् । कथं परिस्थितः, दीर्घकालं प्रचुरकालं, केन न विभिद्यते ! उदकैन वारिणा | तह साहू ण विमिजद तथा साधुर्मुनी रहत्रयसाधक सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रमण्डितो न विभिद्यते नान्तःक्षुभितो भवति । उवसग्गपरीसहेहिंतो देवमानवतिर्थगचेतनोपद्रवेम्य उपसर्गेभ्यः परी- पहेम्यः क्षुधापिपासादिभ्यो द्वाविंशतेरपि। “मुन्तो हिन्तो हि दु दो तो भ्यसः" इति प्राकृतव्याकरणसूत्रेण पंचमीयदुवचनम्पसः स्थाने हितो आदेशः । इसिस्थाने घ "लुक्च हितो हिदु दो तो इसेः" इति सूत्रेण भवति । "व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्न हि सन्देहादलक्षण" इति परिभाषयाऽत्र यहुवचनस्य भ्यसो हिन्तो आदेशो ज्ञातव्य इति । भावहि अणुवेक्साओ अबरे पणवीसमावणा भावि । मावरहिएण किं पुण पाहिरलिंगेण कायव्वं ॥१४॥ "सीयूमहोऽऽसो. "ति शाक्टायभायेन "सोतः" इति जैनेन्दीयेण पाणिनीयेन व सूत्रेण पत्वनिषेधः ।

भावप्राभत । २१३ भावर नुप्रेक्षा लपराः परविशतिमापना मावय। भावरहितेन किं पुनः यदितिीन कापंम् ।। भावहि अणुवेरखाओ भावय पुनः पुनधिन्तप अनुप्रेक्षा अनि- त्यादीः । अवर पणवीसभावणा भावि अपराः पंचविंशतिभावना भावय । भावरहिएण किं पुण भावरहितेन पुनः किं न किमपि स्त्याक्षेपः । बाहिरलिंगेण काय बहिलिगेन नामवेपेण किं साध्य कर्मक्षयशून्यमिदं । सम्वविरओ वि भावहि णवयपयत्याई सत्ततचाई। जीवसमासाई मुणी चउदसगुणठाणणामाई ॥ ९५ ॥ सर्वविरतोपि भावय नवकपदार्थान् सप्ततत्वानि । जीवसमासान् मुने! चतुर्दशगुपस्थाननामानि ॥ सम्बविरओ वि भावहि सर्वविरतोऽपि हे जीव ! त्वं महावत्यपि सन भावय । णवयपयत्याई सततचाई नवपदार्यान् जीवाजीया- सवबन्धविरनिर्जरामोक्षपुण्यपापपदार्थान् । चेतनालक्षणो जीवः । पुद्ग- धर्माधर्मकालाकाशा अजीवाः । आत्मप्रदेशेषु कर्मपरमाणव आगच्छन्ति स भासवो मिथ्यावारितिप्रमादकपाययोगरूपः। आत्मप्रदेशेषु आस- वानन्तरं द्वितीयसमये फर्मपरमाणवः लिष्यन्ति स वधः प्रकृतिस्थित्युनु. भागप्रदेशभेदाचतुर्विधः । आलवस्म निरोधः संवर उच्यते । स संवरः से गुप्तिसमितिदशधर्मानुप्रेक्षापरीपहजयचारित्रैर्भवति । तपसा निर्जरा च भवति संवरक्ष भवति । सर्वकर्मक्षयो मोक्षः कय्यते। ऐते नवपदार्थाः, एतेषां विस्तर आगमाद्वेदितव्यः । सप्ततत्वानि पुम्पपापरहितानि ज्ञातव्यानि । पुस्तकपेऽपि सन्दो वर्तते । २ पुस्तकानि पुष्पपासपोर्टसगं नास्ति तदनेन प्रकारेण शेयं । पुनात्यामानं तत्पुण्यं । पाति रक्षति गुमादारमान तापा।

२४४ पद्मामृते- जीवसमासाई मुणी हे मुने ! जीवसमासान् चतुर्दशसम्यान एवं भावप । अथ के ते चतुर्दशनीवसमासा इति चेत् ! - थांदरमुहमगिदिय विनियरिदिय अमाण सगीय। पसत्तापजत्ता भूदा इय चोदसा होति ॥१॥ विस्तरमैदैर्जीवसमासा अटानवतिर्भवन्ति । तत्रेय गाथा- थावर येयालीसा दो मुर दो नरय तिरिय चइतीसा। नव विउले नव मणुए अडणउदी जीवठाणागि ॥१॥ अस्या विवरण-पृथ्वीकायिकसूक्ष्म बादर पर्याप्त-अपर्यान-लन्थ्यपर्याप्त ६। तथा अप ६ । तेज ६। वायु ६ । एवं २४। वनस्पति कापिकभेद २ प्रत्येक-साधारण । साधारणभेद १२ नित्यनिगोद सूक्ष्म-बादर-पर्याप्त- अपर्याप्त-लन्ध्यपर्याप्त ६ तथा इतरनिगोद-सूक्ष्म-बादर-पर्याप्त-अपर्याद- सन्ध्यपर्याप्त ६ एवं १२ । प्रत्येकभेद ६ सुप्रतिष्ठितप्रत्येक वाटिकादौ, अप्रतिष्ठिताः स्वयमेव ते च पर्याप्त-अपर्याप्त-लन्थ्यपर्याप्त । एवं यौन- खेयालीसा । सुरभेद २ पर्याप्त-अपर्यात । नारकभेद २ पर्याप्त-अप- पर्याप्त ! पंचेन्द्रियतिर्यग्भेद ३४ । जलचरभेद २ गर्भज-सन्मूर्छन । गर्भ- जभेद २ पर्याप्त अपर्याप्त । सम्मूर्छनभेद पर्याप्त अपर्याप्त-उभ्य- पर्याप्त ५। तथा नभश्वर ५। स्थलचर ५। एवं १५ संक्षिभेदाः । तथा १५ असज्ञिभेदा । भोगभूमिनतिर्यग्भेद ४ जलचर पर्याप्त-अपर्यात । नमश्वर पर्याप्त-अपर्याप्त। एवं ४ । एवं पंचेन्द्रियतिखम्भेद ३४॥ विका पेमद ९. द्वादिषपर्याप्त-अपर्याप्त-सम्म्यपर्याप्त, श्रीन्द्रियपर्याप्त-अपर्यान. लम्व्यपर्याप्त, चतुरिन्द्रियपर्याप्त-अपर्याप्त-लमध्यपर्याम । एव ९। मनुष्य मादरम्मैकेन्द्रियविधिचतुरिन्द्रियामहिमशिन. । पर्याप्तापाता भूता इति चतुरयं भवन्ति ॥ १॥ विवरणमिदं पुस्तकानुमारि। +------ - भावनामृतं । २१५ भेद ९ भोगभूमिनभेद २ पड-गाज, कुभोगभूमिजननुप पर्यात- की, म्हातान्नुपात-पात, लार्पसाउन्नुप पर्यात- सात-साता भेद ९ । एवं समाता सधानवतिः । चउदसगुपठागामाई चतुर्दशगुणस्थाननामानि । पया- मिन्या सातर निस्तो सबिरदसलो र देतविरदो य । विदा मित्त परोसपुत कादिया मुहमो य ॥ १ ॥ उपसंत सीपमोहो सजोगशलिजिमो बजोगीय । चासगुपडापामिर कमेष सिसा मुपेजम्मा ॥२॥ निपावत्यानं (१) सातादन्यनत्याने (२) निगुण- स्थान (३) अविरतसमभिगुणस्थान (१) देशविरतगुगत्याने (५) अननसंपतगुगतान (६) समापनगुनस्यान (७) मकरन्युनत्यानं (८) अनिदिजनसान (९) म- सरगत्याने (१०) स्पन्दकागुनस्यान (११) बीनपाय- गुमाने (१२) मोगरवाशिणसानं (१३) सोगवारगुगतान (१७) चेति । दुर्दशगुनस्यानान विवरणमाननादितथा तानितं हे ! भारत-इचिमानप-अदानं कुर्वत । परविहदंभ पपडहि अन्न दसविहं पनोत्तून । मेहुनसपासत्तो भनिनोसि भरपरेमाने ।।९६॥ बार कर। रमेटोले गरे । पजाविहम पपडहि न िनरं मन हे उतं. FE कन्दर कुरा भनेकपानं कवकारे माननीने नावि नपरे । रूप- १ रुपहराया। ।

२४६
पद्मामृने-
इरिथविसयाहिलासो मंगविमोपयो य पगिदरससेवा।
संसत्तव्यसंवा तदिदियालोय येव॥१॥
सरकारपुरषकारो अतीदमुमरणमणागदहिलामो।
विमयसेवा वि य नयभेदमिदं अयंमं तु ॥२॥
इति नवभेदमस तर्जन नवभेद अन्यचर्य ज्ञातव्यमित्यर्थः। अव्व-
मंदसविहं पमोनूण अब्रह्मचर्य दशविध प्रमुय्य परिहत्य । किं तदर-
विधमनीति चेत् -
चिन्ता दिक्षा निःश्यासोज्यरो दादो रविस्तथा।
मुच्छोन्मत्तोऽमुसन्देहो मरणं दराधा स्मरः ॥१॥
मेगुणसण्णासत्तो मैथुनस्य कमनीयकामिन्या आदिङ्गनचुम्बन
गादिसंज्ञायामासक्तो लंपटो हे जीव ! ममिओमि मयप्पावे मीने
अमितोऽसि भ्रान्तोऽसि पर्यौटतोऽसि छेदनभेदनादिदुःखानि मुंजान्ने
भवार्णवे ससारसमुद्रे चतुर्गतिटक्षणे मीमे भयानके रौद्रस्वभावे, अन-
न्तकालं दुःखी वभूविधेति ।
भावसहिदो य मुणिणो पावइ आराहणाचउपकं च ।
भावरहिदो य मुणियर भमइ चिरं दीहसंमारे ।। ९७ ।।
भावसहितय मुनीनः प्राप्नोति धराधनाचतुष्कं च ।
भावरहितश्च मुनिवर ! भ्रमति चिर दीर्घससारे ॥
भावसहिदो य मुणिणो भावेन जिनसम्यक्त्वलक्षणेन सहिदो-
सहित संहित. सयुक्तः श्रीमद्भगवद सर्वज्ञवीतरागचरणकमलचचरीकः,
भयवा भावः पूर्वोक्तलक्षणः स्व. शुद्धबुबैकस्वभाव आत्मा हितो यस्य
स्त्रीविषयामिटायः भंगरिमोशन प्रणीतरसमेवा।
सैमनदायमेवा त्येन्द्रियालोकनं चैव ॥३॥
सरकारपुरस्कारः अतीतस्मरण भनागतामिला।
इष्टविषयमेवापि च नभेदमिदमत्रन॥१॥

भावप्राभूतं । २४७ त्यस्मै वा स भावस(स )हितः । चकाराने मुनिरन्येषामपि भव्यजीवानां हितः त्रैलोक्यलोकतारणसमर्थत्वात् । यो भावसहितः स पुमान् मुणिणी-मुनीनामिनः स्वामी मुनीनः स मुनिर्मुनिचक्रवर्ती। पावइ आराहणाचउर्च च प्राप्नोति लभते, किं तत् ! आराधनाचतुष्कं सम्यग्दर्शनशानचारित्रतपसामाराधकवं प्रामोति । भावरहिदो य मुणि- वर भावरहितक्ष जिनसम्यक्त्वातीतो वैपधारी मुनिः हे मुनिवर ! हे मुनिश्रेष्ट!। भमइ भाम्पति पर्यटति। चिरं दीर्घकालं अनन्तकालं-याव- कालं सिद्धस्वामिनी मुक्ती तिष्ठन्ति तावत्पर्यन्तं स मिथ्याष्टिमुनि. भमति । क! दीहसंसारे दीर्घसंसारेऽनन्तभवसंकटे संसारसमुद्रे मन्जनोमजनं करोतीति भावार्थः। पावंति भावसवणा कल्लाणपरंपराई सोक्खाई। दुक्खाई दव्वसवणा नरतिरियकुदेवजोणीए ॥९८॥ प्राप्नुवन्ति भावभवगाः पल्यागपरम्पराचि सुसानि । दुःसानि दम्पयवगा नरतिकुदेवयोनी।। पावंति भावसवणा प्राप्नुवन्ति लभन्ते, के ते! भावनवणा: सभ्य- म्हएयो दिगम्बराः । कल्लाणपरंपराई सोक्खाई कल्याणानां गर्भावता- रजन्माभिपकनिष्कमणज्ञाननिर्वाणलक्षणा (नां) परंपरा श्रेणिर्थेषु सौख्येषु तानि फल्याणपरंपरागि एवंविधानि सौख्यानि भावप्रवणाः प्राप्नुवन्ति तीर्धकरपरमदेवा भवन्ति । दुक्खाई दज्वसवणा दुःखानि प्राप्नुवन्ति, के ते ! दव्यसवणा-द्रव्यश्वणा जिनसम्परवरहिता नानाः पशुसमानाः दिगम्बरा राते भावार्थः । फ दुःखानि द्रव्यश्रवणाः प्राप्नुवन्तीति चेत् ! नरतिरियकुदेवजोणीए नराध मनुष्याः, निर्यचक्ष पशवः, कुत्सि- ता देवाय भावनामरा व्यन्तरा ज्योतिकाक्ष नेपो योनी उत्पतिस्थाने । चारार न मुनर• इत्यादि. रा. पाठः। पुस्तऽपि नहारो वर्तते समशमी २१८ पद्माभृते- छापालदोसदूसियमसणं गसिउँ अमुद्धभात्रेण । पत्तोसि महापसणं तिरियगईए अणप्पचसो ॥ ९९ ॥ पदचत्वारिशदोषाषितमशन प्रमिस्वाऽशुखभावेन । प्राप्तोसि महान्यमन निर्यग्गता अनात्मवशः। छापालदोसदसियं पट्चत्वारिंशदोपैषित मलिनीकृतं । अमर्ण गसिउं असुद्धभावेण अशनं पिण्डं प्रसित्या अशुद्धभावेन मिथ्यादृष्टि परिणामेन ख्यातिपूनालामकरमलिना परिणामेन | पत्तोसि महावसर्ग प्राप्तोऽसि हे जीव ! महाव्यसन महादुःख । फस्या ! तिरियगईए अणप्पवसो तिर्यग्गत्यामनात्मयशो जिन्होपस्थादिषडिन्द्रियपराधीन इति भावः । अथ के ते पट्चत्वारिंशदशनदोपा अशनस्येति चेत् ! पोडशसंख्या उद्गमदीपाः, तथा पोडशोत्पादनदोषाः, दशविधा एपणादोपाः, संयोजनाप्रमाणागारधूमदोषाचत्वार इति षट्चत्वारिंशदशनदोपाः प्राणिनः प्राणव्यपरोप आरम्भ उथ्यते (१) प्राणिन उपद्रवर्ण उपद्रयः कप्यते (२) माणिनोऽगरछेदादिविद्रायणमभिधीयते (३) प्राणिनः सन्तापकरणं परितापने ग्यान्हियते ( ४ ) एतेचतुभिदोप- निष्पन्नमनमतिनिन्दितमधःकर्म प्रतिपाद्यते । तदधःकर्म मनोवचन- कायानां त्रयाणां प्रत्येक कृतकारितानुमतभेदैर्नवविध भवति । तेनाध:- कर्मणा रहिता उद्गमाख्यषोडशोपैनिता उत्पादनपोडशदांपैः परि. स्पक्ता एपणादरादांपैः परिहता संयोजनप्रमाणाद्गारधूमनामभिश्चताम- दपिशिता ज्ञानाम्यासध्यानधर्मोपदेशमोक्षप्राप्त्यादिकारणोपेता एए. गासमितिप्रोक्तममप्राप्ताशनसेवा भिक्षाशुद्धिर्गुणसमूहाक्षादक्षा वैदि- सय्या | तस्या उद्दिष्टादयः पोडशदीया वर्जनीया.ते के नामनिर्देश:

भावप्राभृतं । २४९ क्रियते । सदिः (१) अप्पवधिः (२) प्रति (३) मिन्नं ( ४) स्थापित (५) बलिः (६) प्रामृत ( ७ ) प्राविष्कृतं (८) कीतं (९) प्रामृष्यः (१०) परिवर्तः (११) अभिहतं (१२) उद्भिनं (१३) मालिकारोहण (१४) आरडे (१५) भनिसृष्टं (१६) चेति पोडशोद्गमदोपाः । ज्योदियादीनां पोडशानामर्थविशेष उच्यते-- पदनं स्वमुद्दिश्य निपनं तदुद्दिष्ट, अथवा संयतानुदिश्य निष्पन्नं, अथवा पापंडिन सदिश्य निष्पन्नं, अथवा दुर्बलानुद्दिश्य निष्पन्नं तदनमुद्दिष्ट- मुष्पते । प्रगता असवः प्राणा यस्मात्ताप्रासुकं चर्मजलादिभिरस्पृष्ट- मचनमामार्य कृतं तत्संयतन सेव्यं । सत्र दृष्टान्तः-पथा मदनोदके मस्पनिनितं कृते मस्या एव माद्यन्ति न तु दुर्दुरा भेका माद्यन्ति तथा पतिरपि दोषसहितमनमुद्दिष्टं न सेवते (१) अथाभ्यवधिर्नाम दोपो द्वितीय उच्यते यतीनां-पाक क्रियमाणे आत्मन्यागते व सति तत्र पाके तन्दुला अन्चु चाधिकं क्षिप्यते सोऽध्यवधियॊप उच्यते, अथवा याव- कालं पाको न भवति तावत्कालं तपस्विनां रोधः नियते सोs- पवधियॊर उत्पद्यते (२ ) अथ पूतिनाम तृतीयं दोपमाह--- पआनुफ पात्र फांस्यपात्रादिकं मिप्याधिप्रातिशैमिप्यागुर्वर्थ दत्तं तत्पावत्थमन्नादिकं महामुनीनामयोग्य पूत्युच्यते (३) ययासु- केन मिश्वं तन्मिय ( ४ ) पाकभाजनागृहीत्या यदन्नं स्वगृहेऽन्यगृहे वा स्थापित, अथवान्यस्मिन् भाजने भाग्डेऽन्नादिकं निष्पनं द्वितीये कां- स्पपासादी क्षिप्त्या शोधनाप तृतीये भाजने मुच्यते तदनं मुनीनाम- पोग्ब फिन्तु भाण्डामुनिभोजनपाने एवं मुच्यते तस्मादृहीचा मुनये दीपते, अन्यथा स्थापितं नाम दोषः (५) पादानां बलिदानोसृतं मनं बटिरुच्यते, या संपतागमनाथै यटिकरण पटि: कप्पते (६) मस्या देखाप दास्पानि, सलिन् दिक्ते दास्पानि, अनिन् मासे २५० पद्माभूते- दास्यामि, अस्यामृतो दास्यामि, अस्मिन् वर्षादौ दास्यागीति नियमेन पद मुनिम्पो दीयते सत्प्राभूत कथ्यते (७) भगालिद मदी गई वर्नने यो गृहप्रकाशकरणे भाति निजगृहस्य गृहिणा प्रकरन क्रियते, अथा भाजनादीनां संस्कार: भाजनादीनां स्थानान्तरण या प्रावियत. मुग्यो । ८)चिपा क्रास द्रव्यात्रभाजनादिना या यकीत तमोत फायने (९) फालासोपाग्याजेन या स्तोकर्ण कृत्वा यतीना दानार्थ यनित सप्रामृज्य गुल्यो (१०) कस्पचिगृहस्थस्य मोहीन का शाटयो गृपने, अथवा निज र दल्या परागे गुयने निनाम्पून द गामापा गृपाले एवं यापरिवर्णने यतिभ्यो दीयो दास्यने या म परिगम कायते । ११ ) प्रामात् पारका गृहान्तरागदापात तर मिति काया मगोप न भाति । पुमोऽध्यायान योग्य भावनि चरभनि योग यदि पर गुस आगन्नादामप्ताहादापात ता योग्य । पनि यान पायापागाने तो गमगादान यदुपटीन तत्र १२ ) विमुद्रात पदमादिक भपनि सदुद्धिमा. ने पुरातन । १३ । माटिकासिमारणेन Art माfaminger-निनभूमेयं गादि मानभूमी ममानी नल कने । १४) गजमगानीमगारा. न मानीमाभिमसेन क्याम्पमापनभिमनन कही. aap? कायन ।।1द्रमा भनिना wwzा पारा यानेजलामनिशाना। पानि ("(२मि (३) (४मा (५) (६)atta '२) प्राम11८...- ११ का २३ yिfTA १.) AMI (१५) भूगोल ५ 14- Ant- , भारनामा २५१ पतिाव ( नाना यानानां नयनमानयनं च तनयं (२) गरविधिमा विविक्षिणा गगुनसानामा बाचिरिमा गारमान्यनि- फिल्मभिमाना मिति: (३ । स्मनभिभीमादन्याननिधन- मामासानिमितमामान लिमिल ( ४ ) फमिति हे. मुने! दीनानादीनामनाभिदानेन पुष्प भयेन या मयेन् ! मुनिग्नार्य यदति पुष भवदेशमन्युपा साथिभाषणगुष्यते ( ५ ) अहा जिनदत्त ! त्वं जगति विख्याती दाता घर्ती दयादिभिर्वचनस्यस्यानन्दजननं मुक्तः तर्वस्त्रयन (६। एवं मुक्तः पक्षात् स्तपनविधान पथास्तुतिः (७) मोथं गयाऽनोपार्जन ग्रोधः (८) मानेनानानं मानः (९) माययाs- जार्जनं मापा ( १० । लोभनाना लोमः (११) यशीकरणमंत्र- तंत्रादुपदौन पदनोपार्जनं तदस्यकर्म । १२) स्यीयतपःशुतजा- तिकुलादिवर्णनं स्वगुणस्तयन (१३ ) सिमविद्यासाधित विद्यादीना प्रद- दानं विद्यौपनीयन ( १४ ) सहारकारिणः पुरुषस्य पाठसिद्धादि- मंत्राणामुपदेशन मंत्रोप-विनं (१५) एवं चूर्णादरपदेशनं चूर्णोप- जीयन (१६) ते पोडशोपादनदाता येदितव्याः । अर्थपणाददादोबा. कध्यन्ते । तपामय नामनिर्देशः। दांकित (१) सक्षितं (२)निक्षितं ( ३) पिहित (४) उशित (५) व्यवहारः (६) दात (७) मि (८) अपर्क (९) लिप्तं (१०) चेति । एतदनं सम्पमसेन्यं देति शकितं (१) सस्नेहहस्तपानादिना यदत्तं तन्नक्षितं (२) सचित्तपापनादी यक्षिप्तं तनिक्षिप्त (३) सचित्तेन पापनादिना यविहितं तदन्नं पिहितं ( ४ ) यच्चूतफल्मादिकं यह त्यक्त्वा- ल्पसेवनं तदुम्झित,अथवा यापानादिकं दीयमानं बहुतरेण गटनेनाल्पसेवनं तदुझितं (५) पयतीनां संभमादादरतया चेलपात्रादेरसमीश्याकर्पणं पत...

कुक्षेरधर्मशमनेन २५२ पट्मामृते- आगमे व्यवहार उच्यते (६) दातृदोपाः कय्यन्त-निर्वस्त्रः शौण्डः पिशाचः अन्धः पतितः मृतकानुगः तीत्ररोगी वणी लिंगी नीवस्थानस्थितः उच्चस्थानस्थित आसन्नगर्भिणी कोऽर्थः : निकट जनितापल्या वैश्या दामी काण्डपटादिनान्तरिता अशुचिः किमपि मक्षयन्ती इत्यादयो दोषा दातृगा ज्ञातव्याः (७) पड्जीवसम्मिश्र मिश्रः (८) पावकादिद्रव्यैरपरित्यक- पूर्वस्वकीयवर्णगन्धरसमपर्क (९) सितैर्दीकरायैदीयमानमशनादिक लिप्त तथाऽप्रामुकजलमृत्तिकोल्मुकादिभिर्यिद्दीयते तहित (१०)। स्वादानिमित्त यासंयोजन शीते रणं उष्णे शीतमित्यादिमेटनं तदनेकगेगाणामसंयमस्य च कारणं ज्ञातन्यं (१) पूरयेत् तृनीयमश कुक्षे. पानेन पूयेत् कुक्षेश्चतुर्थमश यायोः मुखप्रचा- रार्थमवशेषयेत् रिक्त रक्षेत् अस्मात्प्रमाणादतिरेकोऽधिकाहर्ण प्रमाण- दोषः । प्रमाणातिक्रमेण किं भवति ! ध्यानभगः, अध्ययनविनाशः, अर्युत्पत्ति, निद्रौत्पत्तिः, आटस्यादिकं च स्यात् (२) इटानपानादि- प्राप्ती रागेण सेवनं अंगारदोषः (३) मनिष्टानपानादिप्राप्तौ देश सेवा घूमदोषः (४)। अय किमर्थमाहारो गृह्यते इति चेन् ! आहार- महणे मुनीना गुणाः सन्ति । उक्त च वीरनंदिमहारकण- क्षुच्चान्त्यावश्यकमाण रक्षाधर्मयमा मुनेः ययावृत्यं च पामुक्तः कारणानीति यन्मतम् ॥ १॥ ततः शरीरसंवृदय तत्तेजोयल्यदये। स्वादार्थमायुसंवृद्धय नैय मुंजीत संयतः ॥ २॥ महोपसर्गातटकाइसन्यासाट्दियातपो- महचर्याणि मिताः पदकारणाम्पसनोजने ॥३॥ पनदोपविदीनानमुक्केरन्तरकारिणः । अन्तरायाः कियन्तात्रयण्यम्त यकिनामिमे ॥४॥ १ म्याहार इदि दोपनाम मन्यत्र । - 1

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। । २५४ पट्मामृते- कादं मूलं बीज पुर्ष पत्रादि किंचिद् सचितम् । अशित्वा मानगर्ने प्रमिनोसि अनन्तसंसारे। कंदं सूरणं लशुनं पलाण्ड क्षुद्रहन्मुस्तां शाइक उ.पलमूलं गृह- धेरै आईवरवणिनी आर्दहरिद्रेत्यर्थः । मूलं हस्तिदन्तक मूलकमित्यर्थः । नारंगकंटकं गाजरमित्यर्थ । वीयं चणकादिकं । पुष्फ पुष सेवत्रीपुष्प करणवीजपूरपुष्पं । पत्तादि नागवल्लीदर्द । किंचि सचित्तं किमपि ऐािदिक । असिऊण माणगव्ये अशिवा मक्षयित्वा मानेन मान्य- तया गर्ने सति । ममिओसि अणंतसंसारे भ्रमितस्त्र हे जीव ! अन- न्तसंसारे अपर्यन्तभवसंकटे इति भावः । विणयं पंचपयारं पालहि मणक्यणकायजोएण | अविणयणरा मुविहियं तत्तो मुत्तिं न पावंति ॥१०॥ विनयं वचप्रकार पालय मनोवचन शाययोगेन । स्थविनतनरा सुविहितो तनो मुनि प्राप्नुवन्ति ॥ विणयं पंचपयारं विनय यथायोग्य करयोटन-पादपतन-अभ्युत्थान• स्वागत-भाषणादिक पंचप्रकार ज्ञानस्य, दर्शनस्य, चारित्रस्य, सपसथ पिनय विनीतल्य, उपचारलक्षणं पंचम विनयं । हे आत्मन् ! हे मुने । हे जीय ! हे आसन्नभव्य ! सर्वोपकारिस्वं । पालहि प्रतिपालय कुर्विति । मणवयणकायजोगण मनोवचनकायपोगेन आत्मन्यापारेण । अविणय- परा सुविहियं अविनयनरा अविनतनरा था मुविहिता तीर्थकरनाम- कर्मपूर्वकबन्धविशिष्टी। ततो मुर्ति न पानि ततः कारणामुनि सर्प कर्मक्षपलक्षणोपलक्षित न प्राप्नुवन्ति नैव मन्ते । णियसत्तीए महाजम मनीराएण णिच्चकालम्मि । तं कुण जिणमतिपरं विजावर्च दमवियपं ॥ १०३ ।। पारा।

नामात निजस्वला महापरः! भटिरामेन निवाले। त्वं कुरु जिनमतिपरंपार निकलन् ॥ गियसत्तीए महाजन एकसारस्पोच्चारलामवादत्र पादे द्वादशैव मात्रा वैदितभ्याः । सन्यमा प्रयोदशनात्रासदावाहापाउन्दोभंगः स्यात् । तदुक्तं प्राकृतम्याकरणे- "उचारलघुत्वमेदोतोन्यजनस्थयोः" निजल्या हे महापरा:! भत्तीराएग णिचकालम्मि भक्तिरागण नित्यकाले। ते कुण ते पुरु । जिणभत्तिपरं बिनभक्तौ परमुन्कृष्ट । विनावचं वैपाहत्यं । दावियप्पं दशविकल्यं दशभेदं भाचार्यादीनां - पूर्वोतानान्। . किंचि कथं दोतं मणवयकाएहिं असुहभावणं । तं गरहि गुरुमयाले गारव मायं च मोत्तूण ।। १०४ ॥ यःकशि तो दोमनवपनर्पिः भगुमनावेन । तंह गुरशाले गारवं मानां च मुक्त्वा ।। किचि कयं दोसं यः कश्चिकृती दोपः ब्रतादिष्वताचारः । मगवयकाएहिं अनुहभावणं मनोववनकापरशुभभावेन रागदेपमोहा- दिदुरिनामेन । तं दोपताचारादिकं, गह-प्रकाराय। गुरुसयासे गुरु- शकाले गुल्ला लाचार्पालाचार्यपादमूले । गारव मायं च मोत्तृण मारवं रससिदत्तातग मुस्ता, मायां च मुक्त्वा कप परिहत्य । साटोचनाददादोषान् भगवत्याराधनाकरितान् विहाय । तदुक्तं- आकंपिय अणुमाणिय, संदिटुं यादरं च मुहमं च। उस सहाउलयं, यहुउपमन्यत्त तस्सवी ॥१॥ ‘মমানদাষ দাঃ नेन मोग इस्पन क्लारा तासः । " २५८ पप्राभृते- दिवसाकालाईय मावहि अवियार दंसणविसुद्धो। उत्तमयोहिनिमित्तं असारसाराई मुणिऊण ॥१८॥ दीक्षाकालादीयं भावय भविचार | दर्शनविशुद्धः। उत्तमबोधिनिमित्तं असारसाराणि ज्ञात्वा ।। दिक्खाकालाईयं दीक्षाकाले खलु जीवस्य परमवैराग्यं भवति, दीक्षाकाल आदिर्यस्य रोगोत्पत्तिप्रभृतिकालस्य स दीक्षाकालादिः दो- क्षाकालादी भवो दीक्षाकालादीयो भावस्त दीक्षाफालादीयं निजपरिणा- मविशेष हे जीव आत्मन् ! हे चैतन्य ! हे मुने ! त्वं । भावहि-भावय त परिणाम त्वं रमर । यदहमद्यप्रभृति वनितामुर्ख न पश्यामि, वनि- सामु रक्तोऽहमनादिकाले संसारे पर्यटतोऽवाञ्छितमेव दुःख प्रातः, अहर्निशमाकाक्षन्नपि मुखलेश न लब्धवान् । तदुक्त- आजारूपाणीयमनुष्ठितं स्वया विकल्पमूढेन भवादितः पुरा। सद किंचिरमुखलेशमाप्यते तदार्य । विद्धधन्धकवर्तकीयकम् ॥ १॥ अन्यच्च- संसारे नर.फादिषु स्मृतिपयुद्धेगकारीण्यलं दुःखानि प्रतिसेषितानि भवता तान्येयमेवासताम् । तत्सीयत् स्मरमि स्मरस्मितशितापारनहायुधे- र्यामानां हिमदग्धमुग्धतम्यवरमाप्तयामिर्धनः ॥१॥ भातपायकशिपाः सरमायलेया स्वस्थ मनाटमनमि ने लघु यिस्मरन्ति । सरकापजातमतिधिम्पुरितानि पचा जीयाम्यथा यदि भयन्ति कुतीप्रियं ते॥१॥ तत्तम्मानमरमामर इनि पुस्तके पाहः ।

भावनामृतं । २५९ भापति अपियार दंगणविमुद्धोदीशाकाडे दारिद्रयकाले गंगा- दिकाच भावाम्यया भाविना धर्मारपणपरिणामास्तान भावान् । जय ! सदाकालमपि स्वं भावय अधिकार अविचार निर्षियक- जीव । स्थाा हे अधिकार मग पमोहादि दुष्परिणामयजित जीव ।। कम्भूतः सन् भावप, सणाविमुदी सम्बस्यौनुभशोभितनिर्मददयः सन् भावय । अश्या अवियाग्दमणविमुद्धो येफमेव पर्द । तत्रा. समर्थ:-अधिकार पंचविशतितोपरहितं यदर्शन सम्पमत्यरत्न नेन विशुतोऽ. नन्तभरपापरहितः । किमर्थ भावय, उत्तमोहिनिमिनं उत्तमा गण- धरचक्रधरकुलिशधरभव्यबरपुष्टः प्रपन्यात् उत्तमा चासी योधिः सन्निमित्तं उत्तमयोविनिमित्त । अमारमाराई मुणिऊण मसाराणि साराणि च मुनिया हत्या ! उक्तं च-- अधिरप घिरांमलिणेण निम्मला निग्गुण गुपसारा। कारण सा विटप्पर सा किरिया किंन कायया ॥१॥ अनालोचितं असारं, आलोचितं सारं । परनिन्दा ससारं, निजनिन्दा सारं । आत्मदोषाणां गुरोरमेऽप्रकचन असार, गुमे निजदोषकयने सारं । अप्रतिक्रमणं असार, प्रतिक्रमणं सारं । विराधनं असार, साराधनं सारं । अज्ञानं असारं, सम्पाहानं सारं । मिप्यादर्शनं असार, सम्यग्दर्शनं सारं । कुचरित्रं अतारं, सचरित्रं सारं । कुतपः संसार, मुतरः सारं । अर्ष अतार, कृत्यं सारं। प्राणातिपातोऽसारं, समपदानं सारं । मृपावादोऽसारः, सत्यं सारं । पदत्तादानं असारं, दत्तं कल्यं च सारं । नैथुनं असार, बसचयं सारं । परिमहोऽसारं, मस्थिर स्थिरमनसा निर्मला निर्गुन गुनसारा । पायेन या विधीयते सा मिदा किन कर्तव्या ॥ २ विरामनेग स.. - - । २६० पप्राभूते- नैन्थ्यं सारे । रात्रिभोजनमसारं, दिवाभोजनमेकभक्तं प्रत्युत्पन प्रामुरू सारं । आर्तरौद्रयानमसार, धर्म्य शुक्लध्यान सार । कृष्णनीलकपो- तलेश्या असारं, तेज:पमशुमलेयाः सार। आरंभोऽसारं, मनाभः सारं । असयमोऽसारं, संयमः सारं । समन्योऽसारं, निमन्यः सार । सचेलोऽसारे, निश्चलः सारं । अलोचोऽसार, लोचः सारं । स्नान असारं, भस्नानं मल्धारणं सारं । अभूमिशयनं असारं, भूमिशयनं सारे । दन्तधावन असार, अदन्तघर्पण सारं। उपविश्य भोजन असारं, संगमो- जनं सारं । भाजने भोजन असार, पाणिपात्रे भोजनं सारे। क्रोधोऽसार, क्षमा सारं । मानोऽसार, मार्दवं सारं । मायाऽसारं, आर्जवं सारे । लोभोऽसार, सन्तोपः सारं । अतपोऽसारं, द्वादशविध तपः सारं । मिथ्यात्वं असार, सम्यक्त्वं सारं । अशीलं असार, शील सारं । सश- ल्योऽसार, निशल्यः सारं। अविनयोऽसार, विनयः सार । मनाचाराs. सार, भाचारः सारे । उन्मार्गोऽसार जिनमार्गः सारं । अक्षमा असारे, क्षमा सारं । अगुप्ति असार, गुप्तिः सारं । अमुक्तिः असारं, मुक्तिः सारे । असमाधिः असारं, समाधि- सारे । ममत्व असार, निर्मम सारं । यद्भावितं तदसार, यन भावित तत्सार । इति सारासाराणि ज्ञानव्यानि। सेवहि घउविहलिंगं अन्मंतरलिंगगुद्धिमावण्यो । याहिरलिंगमकज्ज होइ फुडं भावरहियाणं ॥१०९ ।। सेवस्त चतुर्विधलि अभ्यंतरविनाशुद्धिमापन । बालिकमकार्य भवति फुलं भावरहितानो ॥ सेवहि चउविहलिंग सेयरव है मुने ! चाय लिंग शिर:- केशमुखश्मश्रलोचोऽध:केशरक्षण चतुर्विधमिदं लिंग पिछयुण्डी- द्वयमहः । अम्भंतरलिंगमुद्धिमावष्णो अभ्यन्तरलिंग जिनसम्याच ।

Pramil : पाहिलिंगमक int म मोलन मायर्गहया यति पनि माग मामाभयपरिगहाणपणा मोहिमोमिनुमं । भमिश्री गंगारणे अणाकानं अणपयनी ॥ ११ ॥ TETaarimarilater ler mari | आहारभयपरिगहमरणमण्णाहि मोहिनामि तुम सागर- मनमामिोटिल समस्यामा प्रतिः प्रातः, समिमनिनयनाय !! भमित्रो संगारयणे : मंमारकने नरपालियर मनुष्यमित्यगा। अगाइकालं अनादि- फार पूर्वमा। अणप्पयनो अनामयाः, न आमा गती यो पम्प मोडनामा शिपकायापागमतादर स्पर्थः । बाहिरमयणचारणतरमलाईणि उनग्गुणाणि । पालहि भावपिगुसो पृयालाई नईहनो ॥ १११ ॥ परिकामतरनतरमूलादीन उसरगुणान् । पालम भापदिएनः पूजालाभं अनोदमानः ।। चाहिरमयानावणतरुमलाईणि उत्तरगुणागि यहि शपनातप- नतरमूलादीन उरगुणान् पाल्पेति सम्बन्धः। शीतकालेऽनातस्थाने स्थिति कुर । उष्णकारे आतपनयोगं घर । यार तस्मूले तिट । दृक्षपर्गोपरि पतिया मजलं पन्युपरि पतति तस्य प्रामुकवाद्विराधनाs. कायिकानां जीवानां न भवति द्विगुणं यकी च भवतीति कारणात् वर्षाकाट सम्मास्थितरुपयोगः, अन्यथा कातरवप्रसक्तः। एते त्रयोऽपि vave । २६२ पटप्राभूते- योगा उत्तरगुणाः कथ्यन्ते । पालहि मावविमुद्धो ( पालय मावधि- शुद्ध. ) तत्वभावनानिर्मलमनाः सन्निति भावः । पूयालाहं नईहतो पूजालामख्यात्यादिकमनीहमानोऽनिच्छन्निति शेषः । भावहि पढमं तचं विदियं वदियं चउत्थपंचमयं । तियरणसुद्धो अप्पं अणाइणिहणं तिबग्गहरं ॥ ११२॥ भावय प्रथम तत्वं द्वितीय तृतीयं चतुर्थपञ्चमकम् । त्रिकरणशुद्ध आरमानं अनादिनिधनं निवर्गहरम् ॥ भावहि पढमं वच्चं भावय हे जीव ! त्वं श्रद्धेहि, किं तत् प्रथमं तत्वं जीवतत्वं । विदियं द्वितीय तत्वमजीवसंज्ञं पुद्गलधर्माधर्मका- लाकाशलक्षणं । तदियं तृतीयं तत्व आस्रवनामधेयं । चउत्यपंचमयं चतुर्थं बन्धनामधेय, पंचमक तत्वं संवराभिधानं, निर्जरा पष्टं तय, मोक्षः सप्तमं तत्वं । तिरयणसुद्धो अप्पं त्रिकरणशुद्धः सनात्मान भावय, अल्प वा स्तोककाले अन्तर्मुहूर्तकालं । कथंभूतमात्मानं, अणा- इणिहणं अनादिनिधनं आद्यन्तरहित । तिवग्गहरं धर्मार्थकामवर्गप- यनित सर्वकर्मक्षयलक्षणमोक्षसहित निधयात् । जाव ण भावइ तचं जाय ण चिंतेइ चिंतणीयाई । तार ण पायइ जीवो जग्मरणविवज्जियं ठाणं ॥११॥ यावन भावयति तत्व यावा चिन्तयति चिन्तनीयानि । तावन्न प्राप्नोति जीवः जरामरणविवर्जित स्थानम् ॥ जाव ण मावइ तचं यावत्काल न भावयति, किं! सत्वं सप्तसव्यं जीवाजीवास्तवबन्धसवनिर्जरामोक्षटक्षण,तन्मध्ये निजात्मतत्वं मोक्षकारण अपरे जीवा गुबुदै कस्समावा निजामा छ । अजीयत पुयोधर्मोऽ. धर्म, काठ आकाशश्च । तरष्टयामनितादिरूपः पुरलपर्यायो मोहोत्पादको भावप्राभूतं । २६३ रागजनकः, शस्त्रविपकण्टकशत्रुप्रभतिद्वेषकारकपुद्गलपर्यायः । सोऽप्या- सवानिमित्तः कर्मवन्धकारणं शुद्ध आहारादिहीतशुध्यानाध्ययनका- रणवात् संघरनिर्जराकारणत्वात् सोऽपि मोक्षप्रत्ययः, अशुद्ध आहारो गृहीतः चर्मादिस्पृष्टतया दुर्यानोत्पादकत्वादानवश्वकारणं । इत्यादि पुलस्य हेयोपादेययुक्तितया विचारो ज्ञातव्यः । अथवा पुद्गलद्रव्यमेव जीवस्य बन्धकारणबाहुःखकारणं परमार्थतया हेय एव । धर्मस्तु नरका- दिगतिसहायकारकत्वाद्धयः स्वर्गमोक्षगतिकारकत्वादुपादेयः । अधर्मस्तु स्वर्गमोक्षस्थानादौ मुनीनां ध्यानाध्ययनादिकाले स्थितिहेतुत्वादुपादेयः । नरकनिकीतादिस्थितिकारणचे हेयः । कालस्तु स्वर्गमोक्षादौ वर्तना- प्रायमचादुपादेयः, नरकादिपर्यायवर्तनाकारण वाद्धेयः साकाश: समवश- रणस्वर्गमोक्षादायकाशदायकगुणवादुपादेयः । नरकनिगोदादिस्थानाव- काशदानदायफवाइयः निनिदानविशिष्टतार्थफरनामकर्मास्त्रव उपादेयो मोक्षहेतुत्वात् । नरकादिगादिनिपात तुत्वादन्य आसतो हेयः । तीर्थ- करनामकर्महतुचतुर्विधोऽपि वध उपादेयः, संसारपर्यटनकारीतरो बन्यो हेयः । सेबर उपादयः । निर्जरा चोपादेया मुनीनां सम्बन्धिनी । मोक्षः মাথাইমাননানাবিয়্যাতাহিনি ময়রানি যামল भावपति । जाव प चिंतेइ चिंतणीयाई यावन चिन्तपति चिन्तनी- यानि धारपानानि अनुप्रेक्षादीनि च । ताव ग पावइ जीवो तान प्रामोति जीव आना। जरमरणविवज्जियं ठाणं जरामरण- विजित स्थान परमनिर्वाणपदमिति दोपः। पात्र पर्यड असे पुण्णमसेसं च पपइ परिणामो । परिणामादो धो मुक्सो जिपमान दिहो। ११४ १६का पारन्दर सिस्थाने। ।

२६१ पद्माभूगे- पार पची अशे पुश्यमशेष व पचति परिणाम | परिणामानुन्ध. मोक्षी जिनशागने हरः। पावं पयइ असेसं पाई पचति अशेष, सर्व पापं परिणाम: पचति निर्जरपति निजात्मपरिणामो भावना नि:शेष पापं दूरीकगति । उन- नाममात्रकथया परात्मनो भूग्जिन्मातापमंशयः। पोधयत्तरुचयस्तु तद्वताः कुर्वते दि जगतां पनि नरम्॥१॥ पुण्णमसेसं च पयइ परिणामो पुण्ये असे सर्व च मर्वमपि पचति विस्तारयति मेटपति, कोऽसौ ! परिणामः निजशुद्धयुबैकम्बल भावात्मभावना जिनसम्यक् च । तथा चोक्त- एकापि समयं जिनमक्तिगीत नियारयितुम् । पुण्यानि च पूरयितुं दातुं मुक्तिश्रियं कृतिन ॥१॥ सद्वेधशुभायुर्नामगोत्ररक्षणं तीर्थकरनामकर्मासाधारणपुण्यं परिणामे- नैवोपार्यत इत्यर्थः । तथा चोक्त- परिणाममेव कारणमाहुः खलु पुण्यपापयोनिपुणाः। तस्मात्पुण्योपचयः पापापचयच सुविधेयः॥१॥ तथा च समयसार---- मात्ममृतं परिणाम निमित्तमा प्रपद्य पुनरन्ये । स्वयमेव परिणमन्तेऽत्र पुद्गलाः कर्मभायेन ॥ १॥ परिणामादो बंधो परिणामाद्वन्धः प्रकृतिस्थिन्यनुभागप्रदेशलक्षण- चतुर्विधो बन्ध -पुण्यमम्बन्धी पापसम्बन्धी च बन्धः सजायते । उक्त च- पयतिद्विदिअणुभागणदेसबंधा दु चदुविधो यंधो। जोगा पयहि पदेसा ठिदिमणुभागा कसायदो होति ॥१॥ १ पुरुषार्थसिद्धयुपायस्यैवैतत्रामान्तर । २ प्रकृतिस्थिस्यनुभागप्रदेशबन्धात्तु चतुर्विधो बन्धः । योगात् प्रकृतिप्रदेशी स्थित्यनुभागौ कयायतो भयत. ॥ - - अपनी जिपमानणे दिहो माया मर्यकर्मप्रयाणापतिं पर- मनिया गिनाने सीमा याची प्रतिपादित परिकामा यति नि:, म मोल्याणभूतः परिणाम सामन्येकागती- मार इति भावार्य । मिश नह कमायागंजमजोगहि अमुहलेमहि । पंधर जमुई फर्म जिणययणपरम्महो जीयो॥११५ ॥ FREE मा समयः । पानी वर्ष जिनपरनपरागीरः ।। मिच्छन तह कमाया मिा पचरिध सभा रोनय पंचप्रकार- मिप्यायप्रकारण कपाया. पंचविसातिभेदा. । असंजमजोगेहि अमुह- रोहिं असंयमी हादसाविध., योगा पंचदाभेदा., एवं सहपचारा- स्फनियन्धप्रत्ययाः कारणानि आग्नपदा भवन्तीति संक्षेपार्थः । फर्थ- मततिरासंधः, मामले. कृष्णनीरफापोतोयाबलेन संजातैः । बंधइ अमुहं कम्मं यम्नानि अशुभं कर्म । जिणवयणपरम्मुहो जीयो जिन- पचनपरामुखी जीवो निष्पाशिरामा । तं विवरीओ पंधर मुहकम्मं भावमुद्धिमावणो । दुविहपयारं बंधड़ संसेवेणे चंजरियं ॥ ११६ ।। तट्रिपरीत. पनाति गुभम भावधिमारन्नः। द्विधिप्रचार सामाति गणेय कपितं ॥ तं चिवरीओ पंधइ समाजिनवचनापरामुसामिप्याटिजीवादि- परीतः सम्पादमिनीयः यानाति, फि ! शुभकर्म-पुष्पकम-सदेद्य शुभायु- संऐवज जिस यसरिय. ग. पुस्तके पाउः । संस- जिग परिध. असारे पाठः। २ "कचर-पवर-सम्प-सास-साह-बब-जप-रिमुष्म पोलो पाता।" रंगन एतेषु दादोपु कपपवेवंजरादेशो जातः ।

२६६ पट्माभृते- र्नामगोत्रलक्षणं तीर्थकरत्वं । कर्यभूतो जीवः, मावमुद्धिमावग्यो भार शुद्धिमापन्नः परिणामशुद्धि प्राप्तः सद्दष्टिजीप इत्यर्थः । दुविहार पंघइ द्विविधप्रचार यो दयोः प्रचार विस्तारै बन्नाति । संवे- वेणेव पन्जरियं संक्षेपणैव कथित प्रतिपादितम् । णाणावरणादाहि य अंहविकम्महि वेदिओ य अहं । डहिऊण इण्हि पयडमि अणतणाणाइगुणचिंता॥११७॥ झानावरणादिभिश्च अमि. कर्मभिः वेटितवाहम् । दरम्वेदानी प्रकटयामि मनन्तज्ञानादिगुणचेतना ॥ णाणावरणादीहि य ज्ञानावरणादिभिश्च ज्ञानावरणमादिरा दर्श- नावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रान्तरायाणां तानि ज्ञानावरणादीनि तै- झानावरणादिभिः । चकारादुत्तरप्रकृतिभिरष्टचत्वारिंशदधिकशतप्रा- तिभिः । तथा उत्तरोत्तरप्रकृतिभिरसख्याताभिरह वेष्टित इति सम्बन्धः। अविकम्मेहि वेडिओ य अहं अष्टभिरपि कर्मभिष्टितचाह । अपिचशब्दादनन्तानन्तकर्मभिरहं वेटिनो वर्ते । डहिऊण इण्हि पय- डमि दग्ध्या भस्मीकृत्य तानि कर्माणि इत्युपस्कारः । इण्हि-इदानी, प्रकटयामि । अर्णतणाणाइगुणचिंता अनन्तज्ञानादिगुणचेतनामिति तात्पर्यम् । सीलसहस्सहारस चउरासीगुणगणाण लक्साई । मावहि अणुदिणु णिहिलं असप्पलावेण किं वहुणा ॥११८॥ शीलसहसाटादश चनुरशीतिगुणगणानो लक्षाणि । भावय अनुदिनं निसिल अमरप्रजापेन किंबहुना ।। भट्टविह इति क पुस्तके मूलगायापार । स. पुस्तके, क. ख. पुस्तका- यस्य टोयो च अवि इनि पाउ । ग. घ. पुस्तके तु आर्हि इति पाठः। -- भायमाभन । मीनसहमहारमा मामाजीनामा महम्माणि या निमानि भावनिम्न । मानिगुणमणानां गमि । हि अदि निहिलं भाय अनविन मानि मिमि नमः। मापनावण कि पापा समापन मियानर्थकारचनेन याना हो कि- किमपि। मादसवालमामागी विवरणं यथा-अशुभमनोवधनकायोगा: मन मनमा यन्त इति प्राणिशीलानि । शुभमनीवचनकाययोगा: भेन यचसा हत्या प्रति पट शीलानि । अनुभमनोवचनकाययोगा: भेन कापयोगेन पन्ते नि नय सांसानि । नानि घतलमिः संहा- भगुणितानि पहावदानीलानि भवन्ति । तानि पंचभिरिन्द्रियजगुणि. नानि अाप भवन्ति । पम्पत्तेजोवायुदनस्पतिहीन्द्रियन्द्रियचतु- टिपपंचन्द्रियमापसजिददाभिर्दशभिगितानि अबादशशतानि भ- न्ति । उत्तमक्षमादिभिर्दशभिर्गुणितानि अपादामहसाणि भवन्ति । थवा अशीयादिदातापिफमतददामहलागि चैतन्यसम्बन्धीनि भ. वन्ति। विशत्यधिकसप्तशातानि अचेतनसम्बन्धीनि भवन्ति । तत्रा- चेतनरतभेदाः परयन्ते-काष्ठ-पापाण-टेप-कृताः त्रियो मन:कायत- गिताः षट् । कृतकारितानुमतगुणिता अपादा। स्पादिपंचगुणिता यासः । द्रव्यभावगुणिता अशीय शतं । कविधतुर्मिगुणिता विंश- पधिकानि सप्तशतानि । चैतन्यसम्बन्धीनि अशात्यधिकद्विशतामसप्त. दशसहस्रागि, तद्यथा-देवी-मानुपा-तिरथी चेति त्रियस्तितः कृतकारि- तानुमतगुणिता ना भवन्ति । मनौवचनकापगुणिताः सप्तविंशतिर्भ- पन्ति । स्पर्शरसगन्धवर्णशन्दैर्गुणिताः पंचत्रिंशदधिक शतं । द्रव्यभार- १ असपनाहि. ग. प. पुस्तके पाः।

- २६८ पप्रामृते- गुणिताः सप्तत्यधिकशते । माहारभयमथुनपरिग्रहचतस्संज्ञाभिमुमिना अशीत्यधिक सहमे । अनन्तानुबन्ध्यप्रन्याख्यान प्रत्यास्यानसंचलनचन: कपोडदशकपायैर्गुणिता अशीत्यधिकद्विशताम सप्तदशमहस्राणि मग्नी- ति चेतनसम्बन्धिभेदाः । ७२०+१७२८०-१८०००। अथ चतुरशीतिलक्षगुणा वित्रियन्ते । तद्यथा-हिंसा, अन्न, स्तेय, मैथुनं, परिग्रहः, क्रोधः, मानः, माया, सोभः, जुगुप्सा भयं, अरनिः, रतिः, मनोदुष्टत्य, यचनदुष्टच, कायदुष्टत्व, मिथ्यावे, प्रमादः पिशुनर्व, अज्ञान, इन्द्रियानिमहत्व, एकविंशतिदोषा वर्जनीयाः। अतिक्रमव्यति- क्रमातिचारानाचारा एते चत्वारो दोपा वर्यन्ते।। अतिक्रमो मानसशुद्धहानिय॑तिक्रमो यो विषयामिलापः। तथातिचारःकरणालसत्वं भंगो खनाचारह प्रतानां ॥१॥ गुणाना चतुरीतिर्भवति । सा चतुरशीतिर्दशकायसयमैर्गुणिता चतुरशीतिशतानि भवन्ति । ते दशशीलविराधनैर्गुणिताः चतुरशीतिमह- स्राणि गुणा भवन्ति । कास्ताः शीलविराधना ! स्त्रीससर्गः १ सर- साहारः २ सुगन्धसंस्कारः ३ कोमलशयनासनं १ शरीरमण्डनं ५ गीतवादिश्रवणं ६ अर्धग्रहण ७ कुशीलससर्ग. ८ राजसेवा ९ रात्रिसचरण १० । ते आकम्पितादिदशालोचनापरिदृतिभिर्दशभिर्गुणिताः चत्वारिंशत्सहस्राधिकाप्टलक्षाणि भवन्ति । ते दशभिर्धमैर्गुणिताचतुर• शीतिलक्षा गुणा भवन्ति । अथ दशकायसयमा. के। पंचेन्द्रियपर्यन्ताना जीवानां रक्षा प्राणसयमः पचविधः । स्पर्शनादीनां एकेन्द्रियादि- , अष्टमनयमपृष्ठेऽपि गुणानां विवरण मागतमस्ति । २ दशकायसंयमभेदः पृथिम्यादिशतजीसमासरित्यर्थः। - भावप्राभूतं । २६९ पंचानामिन्द्रियाणां प्रसरपरिहार इन्द्रियसंयम: पंचविधः । एते दशकाय- संपमा ज्ञातव्याः । दशालोचनदीपा यधा--- आकपिय अणुमाणिय जं दिहं वायरं च सुहमं च । उनं सदाउलयं यजपमरत्त तस्सेवी ॥ १ ॥ अस्या अपमर्थ:---आलोचनां कुर्वन् शरीरे कम्प उत्पद्यते भयं करो- तीत्याकम्पितदोषः । अगुमाणिय-अनुमानेन दोपं कथयति ययक्ति न कथयतीत्यनुमानदोपः। जं दिदं यत्पापं केनचिटं तत्कथयति, अन्य- जाननपि न कथयतीति यदृष्टदोपः । वापरं च-स्थूलं पापं प्रकाशयति सूद न कथ्यतीति बादरदोषः । मुहमं च-सूक्ष्म अल्पं पापं प्रकाश- यति स्थूट पापं न प्रकाशयतीति सूक्ष्मदोपः । उनं--पदा कोऽपि न भवत्याचार्यतमीपे तदैकान्त पापं प्रकाशयतीति उन्नदोपः । सदाटलयं- पदा वसतिकादौ कोलाहलो भवति तदा पापं प्रकाशयतीति शन्दाकु- सदोषः । बहुजणं-यदा बहवः श्रावकादयो मिलिता भवन्ति तदा पापं प्रकारापतीति बहुजनदोपः । अवत्त-अव्यक्तं प्रकाशयति दोपं स्फुटं न कथपतीयन्यक्तदोपः । तस्वी-पपापं गुने प्रकाशितं तत्सर्वधा न मुंचति पुनरपि तदेव कुरुते स तत्सेवी काथ्यते । अथवा य आचा- पर दोपं करोति तदने पापं प्रकाशपति निर्दोपाचार्याने पापं न प्रका- साप्ताति तालेवी दोषः।दश धास्तु प्रतिक्षा वर्तन्ते तेन नव्याख्याताः। झायहि धम्मं मुकं अह रउ च झाण मुत्तण । रुद्द साइयाई इमेण जीवण चिरकालं ॥ ११९ ॥ साप प पतं सात रोई र पानं मुश्त्या । भातप्पिाने अनेन दिन रिघरम् ॥ झापहि धम्म मुक्कं काय-काय चिन्तप । कि.! फर्मता- प धमदिनप्त धम् । भापरिपाका स्थानमा चर्षिय २७० पद्माभूते- धम्य ध्यानमित्युमास्यामिमूर्चनात् । तथा धागौतमस्वामिवचनाद्धय प्यान दशविध । तद्यथा। अपायविचयः १ उपायविचयः २ विपाकविवयः ३ विरागविचयः ४ लोकविचयः ५ भवविचयः ६ जीवविचयः ७ आझाविचयः ८ संस्थान विचयः ९ संसारविचयश्चेति १०॥ तया शुप्रध्यान न्याय पृथक्त्ववितर्कवीचार १ एकन्यवितर्काचार २ सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ३ व्युपरतिक्रियानिति ४ चेति । अह रउदं च झाण मुनुण आतै रौद्रं च ध्यानद्वयं मुक्त्या परित्यज्य । तत्रानध्यान चतुर्विध इष्टवियोग. १ अनिष्टसंयोगः २ पीटा- चिन्तनं ३ निदाने चैति । रौद्रध्यानं चतुर्विध हिंसानन्दः १ अन- तानन्द २ स्तेयानन्द ३ मरक्षणानन्दचति ।। रुद्द झाइयाई रौदातें द्वे ध्याने ध्यातानि ( ध्याते ) । इमेण जीवेण चिरकालं इमेन प्रत्यः श्रीभूतेन जीवना मना चिरकालं अनादिकाले । धय शुक्लच ध्यानद्वय न ध्यानमिति भावार्य । जे के वि दव्यसयणा इंदियसुहआउला ण विंदति । छिदंति भावमयणा झाणकुढारहिं भवरुक्खं ॥१२०॥ ये केपि भ्यश्रयणा इन्द्रियमुखाकुला न विन्दन्ति । छिन्दन्ति भावप्रवणा ग्यान कुटारेण भवसम् ॥ जे के विदव्यमयणा ये केऽपि द्रव्यश्रयणा. शरीरमात्रेण दिग- म्बग अनजिनसम्पयशून्याः । इंदियमुहआउला प छिदंति इन्द्रियाणा पर्शनम्मनबाणचक्षुःोवलक्षणाना विषयाणां मुगे आयु.।। कहा उरिपरि विवक्षितयनिताया पादौ विन्यस्य स्तन. आमापाय पायक मस्थानविषयाय पम्य " इति सूत्रमूबनान् । बच नान म पुस्तके पार । ३ भवन. प.। १ -- . भावनामृतं । २७१ फनफकलशोपरि करपल्लवी विभृत्य मुखचुम्बनमधरपानमहं करिष्या- मीति स्परनिन्दियतुसटम्पटः, घृतपानपकानयजनशाल्पनादिस्वादमहं महापानि, करिफस्तूरीचन्दनागुरुपुम्पादिपरिमटपानं विधास्यामि, स्तन- अपनवदनविलोचनविलोकन प्रणेप्यामि, वीणावंशस्वरमण्डलनवयौवन- कामिनीगीतमि वं श्रोग्यामीति पंचेन्द्रियविषयमाकांक्षन् व्याकुटोऽयं जीवो भवति । तत्तय पूर्वमनन्तशोऽनुभूतमय संसारे, न किमपि दुर्लभ वर्तते अन्यत्रामस्वरूपतमुत्पननुसामृतपानात् । तथा चोक्तं- अर किं किमस्पृष्टं किमनामातमधुतं । शिमनास्वादितं येन पुननंयमिवेक्ष्यते ॥१॥ तथा बई यद्यपि योपितां प्रविलसत्तारण्यलावण्यव- पावत्तदपि प्रमोदजनकं भूदात्मनां नो सताम् । उच्चपर्यटुभिः शरतितरां की दमशानस्थलं लाया तुप्रति शतकाफनिझरो नो राजहंसमजः ॥१॥ तथा च- सममुसालितमनसामानमपि द्वेषमति किमु कामाः । स्थलमपि दहति सपा किमड़ ! पुनरगन्मङ्गराः॥१॥ इसमृतचन्दः । तथा च शुभचन्द्रभगवान्- यरमालिन्तिा मुला चललोला सपिंपी। न पुनः फोनुफेनापि नारी नरफपतिः॥१॥ तथा च गुभवन्त्रः- मालतीय मृदन्यासां विद्धि चानानि योषितां। दारदिप्यन्ति मर्माणि विपाके मास्वसि ॥१॥ १ सपा दो । २ जनस. ३ मिनिटिस।

दुःपाटर्यादिनिपातकामिन
२७२
मनाभन-
--
कार मिलाकी करा करने निम् ।
या नाम का प्रीगुहामम्पने ॥२॥
का..। --II. गम्यमापनामाह-
युय ननमगाणा, गयानाय न यनितामु कुन्तलमारः
पुनमंमय 7 भानीलामः । मंसारमागरपरि.
ममायनागुम्मामय माननगुगल
याचि माधुय । मृत्युगजमलोमनायट स्वायमधरपलयः ।
स्पर्शायादय पयोधरविनिवेश । यमपाशयष्टनामिन
भुजाटनातन उपनिजगमरणयामंग पलीनां य: पोलमन-
कुण्डमिय नाभिमण्डल। अबिलगुणविलोपनगरेवेश रोमराजीति-
निर्गम । काव्याल निशामभूमिरिय मेसमास्थानं। व्यसनागमन-
तोरणमियानगण । अपिच-
भपन एयो याणारिप्रशूलं च पलित्रयम् ।
हृदय कनरी यासां ताः कथं ननु चन्धिकाः॥१॥
गुणग्रामविलोपेषु साक्षाहुनीतयः खियः ।
म्यापगमार्गस्य निसगादर्गला ॥२॥

भाषप्रामृतं । २७५ नमस्मितसतिं प्राद मन्या मायेन। साधिजरामरमवेदनाशामुकाः रिया मन्ति ।। पाणमयविमलसीपलमलिलं मन नितं ज्ञानमयं सम्परज्ञान- मेव विमल कमितकालकरहित सातट परमाल्हादरक्षणमुखोत्पादक एतद्विपापविशिष्ट सलिलं जलामिनि म्पक । पाऊण ज्ञानपानीयं भाप टम्या । के ते, भविय मित्रपयोम्या भन्यजीवा । भावेण भावेन जिनभाया। वक्तं - मुपयनु मुराभूमिः कामिनं कामिनीय सुतमिय जननी मा शुरशीठा भुनक्तु । कुलमिय गुणभूपा कन्यका संपुनीता जिनपतिपदपप्रक्षिपी दृष्टिलक्ष्मीः ॥१॥ चाहिजरमरणवेयणडाइविमुक्का सिश होति व्याधिजरामरण- वेदनादाहविमुक्ता शिया भवन्ति । ज्ञानलं पीत्वा ज्ञानजलमाकर्ण्य तन्मय मुहित्वा तदवाय परममंगटभूता शिवाः सिद्धा भवन्ति इति सम्पन्हानमाहात्म्यं भगवता श्रीकुन्दकुन्दाचार्येण सूरिणोद्भावित भवतीति भावार्थ । जह बीयम्मि य दइडे ण वि रोहइ अंकुरो य महिवीठे। तह कम्मयीयदइंटे भचंकुरो भावसवणाणं ॥१२४॥ या कीजे दग्धे व रोहति र महीपी। तथा कर्मबीजे दग्धे भगांकुरो भावभवमानां ।। जह चीयम्मि य दड्ढे यथा पेनप्रकारेण बौने दग्धे भस्मीकृते । पवि रोहइ अंकुरो य महिवाटे नापि नैव रोहति प्रादुर्भवति । कोड- सौ! संकुरः अभिनव उनि उद्भिद्, महीपीठे भूमितले। चकार उक्त- समुचपार्थः, तेन रागद्वेपनोहादयो भावफर्मशालादयोऽपि न रोहा- - - २७४ पद्माभृते- एते पंचपरमेष्टिनो मंगलमियुष्यन्ते । लोकेषु भूर्भुवः स्वर्लक्षणे उत्तमा उत्कृष्टा लोकोत्तमाः। एते पंचगुरवः सर्वेभ्योऽपि वर्ष उच्यन्ते । तथा शरण-अतिमथनममर्था इमे पंचगुरवी जीवानां शर प्रतिपादन्ते, चउसरणशब्देनामी, अर्हन्मगलं अहलोकोत्तमाः अईन्छ- रणं । सिद्धमंगल सिद्धाकोत्तमा सिद्धशरण । साधुमंगल साधुलो- कोत्तमाः साधुशरणं । साधुशब्देनाचार्योपाध्यायसर्वसाधवो लभ्यन्ते । तथा केवलिप्रणीतधर्ममंगलं धर्मलोकोत्तमाः धर्मशरणं चेति द्वादसमंत्रा सूचिताः चतुःशन्देनेति ज्ञातव्य । एते द्वादशमंत्राः प्रणवर्चमाया- बीमब्रह्मश्रुतबीजाक्षरपूर्वा ललाटपट्टे गोक्षीरवर्णा लिसिताचिन्यन्ते । तया चोक्त- नेत्रद्वन्द भयणयुगले नासिकाने ललाट घक्त्रे नाभौ शिरसि हदये तालुनि भ्युगान्ते । ध्यानस्थानान्यमलमतिभिः कीर्तितान्यत्र देहे सेप्वेकस्मिन् विगतविषयं चित्तमालम्बनीयम् ॥१॥ लोयपरियरिए-लोकोत्तममैत्रसहितानित्यर्थः । तथा चानादिसिद्धभत्रो गुरूपदेशान्मन्तव्यः । सूरिणा तु सूरिमंत्रः तिलकमत्रो बृहलघुश्च निज- गुरुसमीपादुपदेशात् ध्यातव्य इति भावार्थः। णरमुरखेयरमहिए कथं भूतान् पचगुग्मन् , नरसुरग्वेचरमहितान् नराणां नृपादीनां, मुराणां सौध- मन्द्रादीना, खेचराणा विद्याधरचक्रवर्तिना, महितान् अष्टविधपूजाभव्यै- भीवपूजाभिश्च पूजितान् । पुनः कथंभूतान् पचगुरुन्, आराहणणा- यगे आराधनाया नायकान् स्वामिन इत्यर्थ । वीर वीरान् फर्मशत्रु- क्षयकरणसमर्थानिति भावार्थ. णाणमयविमलसीयलसलिलं पाऊण भविय भावेण | वाहिजरमरणवेयणडाहविमुका सिवा होति ॥ १२३ ।। "

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पद्मामृते-
वह कम्मयीयदड्डे तथा कर्मबीजे दग्धै मरमीकृते । मयंगे मा
सवणाणं भवाकरः समाराकुरो जन्मलक्षणो नापि रोहति न प्रादुर
यति। केषां, मावसवणाण-सम्याटिनिरम्पराणा दुर्लक्ष्यपरमात्मभावन
भावितानां भेदज्ञानयतां । उक्तं च--
दुष्यं जयति परं ज्योतिर्याचां गणः कवीन्द्राणां।
जलमिय यजे यस्मिन्नलम्धमभ्यो यद्दिलुंठति ॥१॥
मायसवणो वि पायइ मुक्खाई दुहाई दन्यसवणो य ।
इय जाउं गुणदोसे मात्रेण य संजुदो होह ॥ १२५ ॥
भावप्रवणोपि प्राप्नोति मुखानि दु सानि द्रव्यश्रवणश्व ।
इति ज्ञात्वा गुणदोषान् भावेन च संयुतो भव ।।
भावसवणो वि पावइ भाषश्रवण- सम्यग्दृष्टिदिगम्बरोऽपि निश्च
येन प्राप्नोति लभते । कानि प्राप्नोति, मुक्साई निजामोत्यपरमान
न्दटक्षणीनराकुलतासहितपरमानन्तसौक्ष्यानि । दुहाई दव्वमपणो
य प्रामोतीति दीपकोद्योतात् दुःखानि शारीरमानसागन्तुकलक्षणोपलक्षि
तान्यसातानि द्रव्यश्रवणो मिथ्यादृष्टिदिगम्बरः प्राप्नोति । चशब्दागृह
स्थोऽपि सावरसयुक्तो दानपूजास्नपनरहित. पर्योपवासकातरः चलम-
लिनागरहितसम्यग्दर्शनदुर्विधो व्रतातिधारभमपुण्यपादो दूरभव्यतया
गुरुचरणनिन्दक आत्महितो न भवति । लौकस्तु महापापी जिनप्र.
तिमोच्छेदको नारको भवति। तथा चोक्तं-
सधै धर्ममयं क्वचिवचिदपि प्रायेण पापात्मकं
काप्येतव्ययत् करोति चरितं प्रशाधनानामपि।
तस्मादेतदिहान्धरज्जुवटनं स्नान गजस्याथया
मसोन्मत्तपिचौष्टित न हि हितो गहाश्रमः सर्वथा ॥१॥

भावप्रामृतं ! २७७ ड्य गाउं गुणदोसे इति ज्ञाया गुणदोषान् । भावेण य संजुदो होहे भावेन जिनभक्तिनिजामभावनापंचगुरुचरणरेणुरंजितभालस्थल: संयुतो भव । एवं सति शं नुखं तेन युक्तो भव हे मुने ! हे जीवैति सम्बोधन । तित्ययरगणहराई अब्भुदयपरंपराई मोक्खा। पावंति भावसहिया संखेवि जिणेहिं बजरियं ॥ १२६ तोरणारादीनि सभ्युदयपरम्परानि सोहपाने । प्रामुवन्ति भावतहिताः संशेन जिनः कथितं ॥ तित्ययरगणहराई तीर्थफरगणरादीनि सौल्यानीति सम्बन्धः । तीर्थकराणां धर्मोपदेशकाले तीर्थंकराः कमलोपरि पादौ न्यस्यन्ति, अशो- कक्षच्छायापानुपविदांति. तेषामुपरि द्वादशयोजनमभित्र्याय देवाः पुष्प- वर्ष रिचपन्ति, तानि तु पुष्पाणि उपरि मुखानि अधो तानि सब- तिटन्ते, जानुपर्यन्तं पतन्ति, मुनीनामागमने मुनिपुंगवा मार्ग लभन्ते, भमरपरीतानि कमलोपटकैरवन्दीवरराजचंपकजातिमुक्तबन्धनाहासबकु- स्केतकर्मदारसुन्दरनमरूपारिजातसन्तानफफाहाराबरक्ततेवत्रकमुचुकुं- न्दद्दन्दानि पतन्ति, पंचाशल्लनद्वाददाकोटिपटहा अपराणि च वादित्राणि वेणुवल्लकिपणवमृदंगत्रिविलताटकाहलकम्युप्रभृतानि संख्यातीतानि अ- बरचरकुमारकराकरितानि तमुर्वन्तरिक्षलागि घनन्ति, सजलजल- घरगतिमिव स्वामिनो योजनैकं यावदनिर्भन्यजनैराशप्पते, ऐसांसो- जिलानि चतुःषष्टिवामराशि पतन्युत्पतन्ति च, पंचशतधनुरुनत सिंहविधरं भवति, योजनफरमान सभामनिश्याच कोटिभास्करयुगप दुपौतिकरितैजो भवति, तच शारदेन्दुपरिपूर्णमण्डटामिन टोचनानां प्रिपतन भवति, एकदण्डानि पर्युपरि त्रीणि नागि मस्तकोपरि संभ- , होहस.. - तह कम्मवीपद तथा कर्मवीजे दग्धै मम्मीने । महुगे मार सवगाणं भवाकर समागदरी जन्मशानो नापि गेहति न प्रदुई बति। केयां, मावसरमाण-मम्माधिनिम्म्बगो दुर्लयामानानन्दः भावितानां भेदज्ञानातां । टनं च- दुलंश्यं जयति पर ज्योनिर्वावांगनः कर्यान्द्रागां। जलमित्र यत्रे यस्मिन्नलायनम्यो पहिलुटति ॥१॥ मावसवणो वि पावह मुम्साई दुहाई दव्यमानो य । इय पाउं गुणदोसे माग य संजुदो होह ॥ १२५ ।। मावागोपि मानोति मुखाने दुखाने श्याम । इविमान्दा गुणदोशन् मावेन च मदुनो भव । मावसवणो वि पावइ भावप्रवणः सम्यष्टिदिगम्दोऽपि निध पेन प्राप्नोति लमते । कानि प्राप्नोति, मुक्खाई निजामोधारमा न्दटक्षणनिराकुटतासहितपरमानन्न सौन्यानि । दुहाई दव्वमानो य प्रामौनीति दीपकोदोतात् दुखानि शारीरमाननागन्तुकलमगोपक तान्यसातानि द्रव्यप्रवणो मिय्याटिदिगम्बरः प्राप्नोति । चसन्दाहर स्थोऽपि सावधर्मयुनो दानवास्नपनरहित. पोवानकातरः बदर लिनागरहितमम्यग्दर्शनदुर्विधो द्रतानिधारमाश्यपादो दूरनपतर गुरुचरगनिन्दक आमहिती न भवति । टोक्नु महापापी दिन्न तिमोप्छेदको नारको भवति । तथा चौक- सर्व धर्ममयं चिड़चिदपि प्रायेण पापात्मक छाप्येतद्धययत् करोनि चरितं महाघनानामपि । तस्मादतदिहान्धरमयटन स्नान गजस्यायवा मसोन्मत्तविचशित न हि हिलो गद्दाश्रमः सर्वपा।१॥ -

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२७८ पदसामने- पन्ति, इत्यादीनि चतुधिशदनिगयोचकन्याणादीनि निनोनमानों मु- खानि याद्यानि भान्नि, अनन्तज्ञानाननदर्शनानन्तवीर्यानन्नमुनानि चाभ्यन्तरमुगानि भगवना भवन्ति। तथा भावपणा (ना) गणधग्देवाना तीर्थकरयुवगम्यमाख्यानि भवन्ति । अन्भुदयपरंपराई मोरसाई इन्द्र पदतीर्थकरकल्याणत्रपटक्षणानि कल्याणपरम्पराणि मौल्यानि भाव- वणा अय्म्यन्तरमहामुनयो भुमत इति भावार्थः । पानि मावसहिया प्राप्नुवन्ति लभन्त, के ते. भावसहिताः सम्यक्त्वचिन्तामणिमण्डिन मनःस्थलयः खलु दिगम्बराः । संसेवि निहिं बजरिय संवेति- समासेनोक्तमिदं वचन जिनः कथितमिति भावार्थः । ते घण्णा नाण णमो दंमणवरणाणचरणमुद्धाणं । भावसहियाण णिच्चं तिविहण पणहमायाणं ॥ १२७॥ ते पन्यास्तेभ्यो नमः दर्शनवरझानचरणशुदेभ्यः। भावसहितेभ्यो नित्य विविधन प्रनटमायेभ्यः ते धण्णा ताण णमो ते मुनिपुंगवा धन्या पुण्यवन्तः तम्योऽ. स्मा श्रीकुन्दकुन्दाचार्याणा नमो नमस्कारो भवतु नमोऽस्तु स्तात् । दंसणवरणाणचरणमुद्धाणं सम्यग्दर्शनसम्यग्ज्ञानसम्याचरणानि शु- सानि निरतिचाराणि येषां, सम्यग्दर्शनशानचारित्रैर्वा ये शुद्धाः कर्ममल- कलकरहिता दर्शनवरज्ञानचरणशुद्धा ये मुनिपुंगवा. तेभ्यो नम:! कथं- भूतेम्पस्तेभ्यः, भावमहियाण भावेन शुद्धामपरिणामैन जिनमम्म- कत्वेन च सहिताना संयुक्तेभ्य इयर्थ । ननु नम स्वस्तिस्वाहास्वधाल- षषड्योगे चतुर्थी भवति तत्कथमत्र पष्टीनिर्देश । सत्य, संस्कृते तयोगे चतुर्थी प्रोक्ता, न तु प्राकृते । कयं नित्यं सर्वकाल-नमो- नमोस्तु इत्यस्य विशेषणमिदं । केन कृत्या नम , तिविहेण मनौवाका- --

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जाननपीत्यादिमम्बन्ध, मुनियरल मुनीना मुनि वा धवनो निन इदियरल न वियलइ साय तुमं कुणहि अपहियं ।।१३०॥ जरा इति च कचित् पाठः। रोयगी जापडहइ दार्डिरोगामि चलं न वियलइ इन्द्रियाणां चक्षुरादीनां वलये अमर्य पापकार्ट गवाः ते दिया यादि कुरु विधेहि, कि! भात्महित मोझे साधयेत्य नमः कथमिय परलोका जरी घराकस्ता पुर। २८० परमामने- जाननपि, परमंती-पश्यन् प्रयों नभुम्यो निर्गशमायोऽपि । चित मोरर मुणियलो चिदमपि विचाग्यप, कि मोक्ष मई क्षपटक्षण मोई परनिर्वाणमुर। अनन्तसौयदायक परनिर्वाचन चारित्रमरोद्धरणधुरंधो पृषभः श्रेष्ट इत्यर्थ । उत्थरइ जाण जरओ रोयागी जाग डहई दहउर्डि। आक्रमते यावन जरा रोगामिः यावर दहति देटिन् । इन्दियवले न विगलति सावन हवं कुरु मारमादितम् । उत्थरह जाण जरओ माक्रमते यावन जरा। "हुँदोत्यारोहवा आक्रमः" इति प्राकृतव्याकरणम्त्रेण आक्रमधातोरत्यार इत्यादेशः। तहि उत्थारइ इतीश रूपं स्यात् ! प्राकृत हस्वदौ? मिथः भात: अचामचः प्रायेण" इति सूत्रेण, तत्र नास्ति दोषः " मादी ज्योतिरुद्मः " इति रुचादिपाटादामने पद । अथवा उतारा विन दहति न भस्मीकरोति, को ! देहदि शरीर विगलति । इंदियपलं न वियलं इति पाठे, हीनं न भवति । ताव तुमं कुणहि अपहि पलितच्छलेन देवानिगच्छति सुविधीनिर्देश. स्मरति. पाठान्तरमपत्र। " | इंदिर 'सम्पवासाला द्वात्मपरिक तत्त्व हे मुनि से नमः, तिमसि ॥१॥ 1

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२८२ पप्राभृते- संसारसमुद्र भ्रमता पर्यटता । भोयसुहकारण भौगमुखकारणार्थ जिन्होपस्थसजातमुखहेतये । कदोय तिविहेण सयलजीवाणं दश- प्राणानो त्वया माहार कृतः विविधन मनसा याचा यपुषा चेति सक- लजीवानां चातुर्गतिकपाणिनी । पाणियहेहि महाजम चउरासीलपसजोणिमन्झम्मि । उप्पग्जंतमरंतो पत्तोमि निरंतरं दुपरां ।। १३३ ॥ प्राणिपणे महायशः । चतुरशीतितक्षयोनिमध्ये । उपयमाननियमाण प्राप्तोगि निरन्तर दुसम् ॥ पाणिपहेहि महाजम प्राणिनो क्यैः कृ या हे महायशः 1 23. गीलापजोणिमज्झम्मि चतुरशीतिलायोनीना मध्ये । उप्परग्न मरंतो उत्पयमानो विपमण । पनोमि निरंतर दुवयं प्राप्तोऽमि टम्पयामि निरन्तरमविन्छिन दु ये सागरमानसागन्तुकन्ददाण । चतुः शीति रक्षयानीनो विवरणनिर्देश पूर्वोक्त पय ज्ञामध्य । जीवाणममयदाणं देह मुणी पाणभूदगनाणं । कदाणगुहनिमित्तं परंपग निरिहगुदीए ॥ १३४ ॥ जापानामभयदान मु! प्राणभूतमरवानाम । कल्याणगुनिमिदं परमरा पिपYAT जीवाणमभयदाणं नामभयदान दे मुणी पाणभूदगना मनन कर सीमाना अभयदान दलि-अपि बाभूतमान मगदान दी। कटाणगुहनिमिनं ना. करनाम.in नाम- मानिकामनन- पागल 14न मुपयामि अभय नाम २ | निति मुदीप मिस मनामचनका अभयदान ।

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--- - मिग्नदिही मिथ्यावेन एन्ना आता टिझोनलोचन २८१ पप्राभूते- मिथ्यावादिनों भवन्ति तानि त्याग्यानीत्यर्थः । १८०+८४+६७+ ३२-३६३ ण सुयइ पयडि अभव्यो मुटु दि आयण्णिऊण जिणधर्म । गुडदुद्धं पि पियंता ण पण्णया णिन्निसा होति ॥ १३६ ॥ न मुमति प्रकृतिमभव्यः सुमपि भाग्यं जिनधर्मम् । गुदुग्धमपि पिबन्तान पनगा निर्विषा भवन्ति । ण मुयइ पर्यडि अभव्यो न मुयति प्रति मिथ्यात्वं मभन्यो दूरभव्यो या लोकादिमिथ्याष्टिः पापिष्टः। सह विआपण्णिऊण जिग धम्म मुष्टु अपि आकर्ण्य श्रुया जिनधर्म दिगम्बरशान् । गुडदुद्धं वि पिता गुडेन मिश्र दुग्धं गुडदुग्ध पियन्सोऽपि । ण पप्णया णिज्यिमा हानि न पनगा सर्पा निर्षिया विपरहिता भवन्ति सजायन्ते । तथा चोले- बहुगस्थर जाणियह धान घर मुणेपि । रिणयर सउद उग्गमा घूहा अंध तो विn. मिन्ससाणदिही दुद्धी गगगहगहियचितेहि । पम्म निणपाल अभयनीयो नगेयेदि ॥ १३७ ।। मध्यावाशित दुरागप्रहगृहीतलिने । धर्म बिनणीन मध्यजीशनवमी । । पम्प म मिया Aer अनाना मियादृष्टि । ददी धादि यम दुर्ग । गगगगहियगिदि गीतावित मी मंश्रिता प्रानि म शान गृहीतानि full নাসা re-ধশান ও বায়াল কস ....... या 0

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२८६ पद्माभूते- मोहिओ जीवो कुनयः कुन्मितनयः सर्वथैकान्तरूपैः, कुशाग्नः चतु- र्वेदाष्टादशपुराणाटादशस्मृत्युभयमीमांसादिशास्त्रैः माहिती भ्रान्ति प्राप्ती जीव आत्मा । भमिओ अणाइकालं भ्रान्तोऽय पर्यौटतो जीवो नादिकाल उत्सर्पिण्ययसर्पिणीकाटबहुलं । संसारे धीरचिंतेहि हे धीर! हे योगीश्वर ! ससारे भवे भ्रान्त इति चिन्तय विचारय । पासंडी तिणि सया तिसहिमेया उमग्ग मुत्तूण । रुंभहि मणु जिणमग्गे असप्पलावेण किं बहुणा ।।१४०॥ पापण्डिन ग्रीणि शतानि त्रिषष्ठिभेदा उन्मार्ग मुरवा । रुद्धि मनो जिनमार्गे असत्प्रलापेन किंबहुना ॥ पासंडी तिणि सया पापण्डिनस्त्रीणि शतानि। तिसहिमेया उम्मग्ग मुत्तूण तथा त्रिपष्ठिभेदा उन्मार्ग मुक्त्या। रुमहि मणु जिण मग्गे रुन्द्धि मनो जिनमार्गे जिनधर्मे त्य स्थापय । असप्पलावेण किं बहुणा असत्प्रलापेनानकन वचसा बहुमा प्रचुरतरेण कि ! न किम पीत्याक्षेपः। जीवविमुको सबओ दंसणमुक्को य होइ चलसवओ। सवओ लोयअपुजो लोउत्तरयम्मि चलसपओ ॥१४१॥ जीवविमुक्तः शवः दर्शनमुकश्च भवति बलशवकः ॥ पारको लोकापूरय लोकोत्तरे बलशवक ॥ जीवविमुक्को सवओ जावविमुक्तो जीवेन रहितः कायो लोके शव उच्यते । दमणमुको य होइ चलमयओ दर्शनमुक्त पुमान् सम्य- क्वहीनो जीयश्च भवति चटदायक कुत्सित मृतक । सबओ लोया- पुज्जो जीवरहितः शयको लोकानामपूज्य , अपूज्यत्वादेव भूमौ निखन्यते, अग्निना भस्मीक्रियते या। लोउत्तरियम्मि चलमयो लोकोतरे लोके * ... ............ ! ! " :::::::: 13 :::. Here : नाम: गर्षियतापपर। नयामानामा rift गरमाया पापमा !" महिनामिना गया. पमिय। या पत्र- না ধান বা সময়। उपानगुगोपादनः परियसनम् ॥ १॥ এ বাণ মা ষণা না নবাণ । अहिजो नह मम्मनो रिमिमाषपदुविधम्मापं ॥१४२॥ पया ताररान मराज गापाम् । afte: स्पा गिरिरायमांगम् ॥ सह तारपा नंदो या तारकामा तागणां मध्ये चन्नोऽधिक इति सम्बन्धः । मपराओ मपउलाण मन्वाग: सिंहः मृग- पुटान मध्ये समावि अधिकः प्रधानभूतः । अहिओ तह सम्मत्तो अधिक तथा नम्बर फेम सम्पत्त्यमविक, रिमिसावपति- हयम्मा दिनबगम भावका च देशपतीनां विविध मांगांमध्ये समात्यधिक प्रधानभूतमिपर्यः । अस्प पप्राभूतप्र- सत्य प्रारंभपरिसनसिपन्तं सम्परमेव प्रस्तिमिति तापार्यो ज्ञातम्प इति भारः।

. राजते, २८८ पद्मामृते- जह फणिराओ रेहद फणमणिमाणिककिरणविप्फुरियो । तह विमलदसणधरो जिणभत्तीपययणो जीयो ॥ १४३ ॥ यथा फणिराजो राजते फणमणिमाणिक्यकिरणविस्कुरितः। तथा विमलदर्शनघर: जिनमक्तिप्रवचनो जीवः। जह फाणिराओ रेहइ यथा फणिराजो घरणेन्द्रो राजते शोभते । कथंभूतः सन् फणमणिमाणिककिरणविष्फुरिओ फणानां सहस्रसंख्यफटानां सम्बन्धिनो ये भणयस्तेषु मध्ये यन्माणिय पद्मरागमणिः मध्यफणाया उपरि स्थितं यल्लालरत्नं तस्य सर्वोत्तमरत्नम्प ये फिरणा रस्मयस्तविस्फुरितो धरणेन्द्रः शेषनागनामा पद्मावतीदेवी- प्राणवल्लभः पातालस्वर्गलोकस्वामी यथा शामते । तह विमलदंगण- घरो तथा तेन प्रकारेण विमलदर्शनधरो निर्मटसम्यक्त्वमंडितो मुनिः श्रावको पा। जिणभत्तीपश्यणो जीवो जिनभक्तिरेव प्रवचन गोप्य- तत्वसिद्धान्तः, जीव आत्मा चातुर्गतिकोऽपि पंचेन्द्रियसज्ञिजीवः शोमते। तथा चोक्त सम्यग्दर्शनसम्पन्नमपि मातङ्गदेहज । देवा देयं विदुभंस्मगूढाहारान्तरोजमं ॥१॥ जह तारायणसहियं समहरविं समंडले विमले। भाविय तह वयविमलं जिणलिंग दंमणविमुद्धं ॥१४॥ यथा तारागणमदिन शशधरबिम्ब समण्डले विमले। भावितं तथा प्रतविमलं जिनलिन दर्शन विशुद्धम् ॥ जह तारायणमहियं यया येन प्रकारेण तारागणसहितं । समहर' वित्र रामंडले विमले शशधरवियं चन्द्रमण्डल ग्वमण्डले गगनमण्डले । फथंभूते, विमलेऽभ्रपटटादिरहिते । माविय तह वयविमलं तथा तेन भावप्राभूत । २८९ प्रकारेण भाषितरतं तैमण्डित निरतिचारमतसहितं । जिणलिंग दंस- परिसुद्धं जिनलिंग निमन्यमुनिपुंगववेषः दर्शनन सम्यक्तेन विशुद्ध निर्म जिनशासने शोभते इति दोषः। इस पाउं गुणदोस देसणरयणं धरेह भावेण । सारे गुणरयणापं सोवाणं पदम मोक्खस्स ।। १४५ ॥ शीशाला गुणदो दर्सनरले धरत मावेन । सारं गुमरलाना सोपान प्रपनं मोक्षस्य ॥ इस पाउं गुणदोसं इसमुना प्रकारेण बाबा सम्पविचार्य गुण- दोष, सम्यक्त्वगुणरत्नमण्डितः पुमान् गुणवान्-मिथ्यात्वेन दूषितो जीवो महापातकति विज्ञाप। देसणरयणं धरेह भावेण दर्शनरत्नं सम्प. स्वरत्न धरत सूर्य भावन गुरपरिणामेन कपट परित्यापे.पर्थः। सारं गुगरपणाणं सार उत्तम गुणरत्नानां मध्ये प्रतसमितिगुप्यादीनां मध्ये दानाजोपकासशीलतादीनां च मम्मे सम्पत्याने सारं उत्तम परत पूर्व है भन्याः!। कथंभूतं, सोवाणं पडम मोक्खस्स सोपानं मारो- हलं पादारोपणस्थानं पदम-प्रयन फरम, मोक्षप सर्वकर्मयटक्षणोपल- शितल मोमासादस्वोपरितनभूम्युपरिगनने, सिमपर्यापमाणमित्यर्थः। कचा भोइ अमुत्तोमरीरमिनो अगाइनिहपोय। दमणगाणुरोगो पिट्टिो जिपवरिदेहि ॥ १४६ ॥ सामगो सन्नः दरोरारनानेपन । नमोनिशजिनरेन्यो । कत्ता भोइ अमुत्तो पसन्दः वो एक माः । तेन जीर मा कर्मा दर्तते । न कर पा पुल पागल व.अपि तु भोगी पुलरूपा च पर भोज काकादक इनियार, निष्पेन २९० पट्याभूते- तु केवलज्ञानस्य केवलदर्शनस्य च कर्ता वर्तते । तथा अनन्तमुखम्प मोक्ता अनन्तवीर्यस्य च। अमूर्तो मूर्तेः शरीरादहित इति निश्चयः, व्यक- हारेण तु कर्मबन्धप्रबन्धात् शरीरसंयुक्तत्वाच्च मूर्त इत्युच्यते । शरीरमित्तो अणाइणिहणो य शरीरमात्रः शरीरप्रमाण आत्मा वर्तत इति व्यवहारः तत्मुखदुःखाद्यावेदकत्वात , निश्चयेन तु असल्यातप्रदेशत्वालोकप्रमाण अनादिनिधनश्च जीवस्यादिर्नास्ति निधनं विनाशच न वर्तते । दंस- गणाणुवओगो दर्शनज्ञानोपयोगः व्यवहारेण चत्वारि दर्शनानि अट. ज्ञानानि उभयाभ्या द्विविधोपयोगः, निश्चयेन तु फेवलज्ञानकेवटदर्श- नाम्या विविधोपयोगः परमनिश्चयेन तु आत्मा केवलज्ञानमेव तन्मय- स्वात् । णिदिटो जिणवरिंदेहि निर्दिष्टः प्रतिपादितः कथित आत्मा जिनबरेन्द्रः सर्वज्ञवीतरागैरिति तात्पर्यार्थः । दमणणाणावरणं मोहणियं अंतराइयं कम्मं । णियइ भवियजीवो सम्मं जिणमावणानुत्तो ॥१४७ ॥ दर्शनशानावरण मोहनीयमन्तराय कर्म । निटापयति भष्यजीव सम्यग्जिनभावनायुक्तः॥ दमणणाणावरणं दर्शनावरण नवविध, तत्र चक्षुर्दर्शनावरण अचक्षुर्दर्शनावरणं अवविदर्शनावरण व्यदर्शनावरण चेनि चतुविध दर्श- नावरण न्दिा निद्रानिद्रा-प्रचन्ला-प्रचन्ताप्रचला-स्थानगृद्धिधति विस- निद्रा एवं नवविध दर्शनावरण । मतिज्ञानायरणे श्रुतज्ञानायरण अवधि झानावरण मन पर्ययज्ञानापरणं फेयरमानायाण चेति पंचविध ज्ञानाल. ग्ण । मोहणियं अंतगइयं कम्मं मोहनीय कर्म अष्टाविंशति, अन्तगयं कर्म पंचभेद। तत्रास विशतिभेद मोहनीय कर्म यथा-तत्र विविध दर्शनमाहनाय मम्या मिण्यार्य सम्यग्मिध्यात्य नि। था.. ।

भारमानना भनी पंचशिानिभेट, अय.पाया गय TIPS नः अति को बहुगुमा रविता को नागरिकतामा अगाया उयन्त पचाम्सनचाम्बियानका कारनामनग्नान- पन्धी ग्रोधोऽनन्तानुबनी मानोऽनन्तानन्भिनी माराममानवानी मोति साधारः पापापा मम्माया पुनो, दिन- मोहनीदं च । अनन्या मानसोधोऽनया मानमानोऽप्रसाधानमापाऽ. पायानटोमोति पवार: कामाः सायकलतबारा माः । प्रत्याभ्यान. मोरः प्रचारपानमानः प्रन्यायानमाया प्रमादानलीभनि चन्चारः क.पापा महातघातका: 1 संचलमनोध संबटनमान मंचलनमाया संबसन्लोमति पवार: कपाया पक्षाल्यासचारित्रचातपाः । अन्त- राप: पंचविधो दानान्तरायो सामान्तरायो भोगान्तराप उपभोगान्तरायो चार्यान्तरायति । एतासर्व कर्म णिवइ भवियजीवो निधापयति क्ष्य नपति, कोऽतो ! भविफजीयो भन्यजनः । सम्मं जिणभावणा जुत्तो सम्पन्जिनभावनायुक्तो जिनसम्पत्याराधक इत्यर्थः । चलसोक्खणाणदसण चनारि वि पायडा गुणा होति । पट्टे पाइचउन लोयालोयं पयासेदि ॥ १४८ ॥ पलमापमान दर्शन पसारोपि प्रस्टा गुणा भवन्ति । नटे पातियतुष्फे लोकालोकं प्रकाशयति । चलसोक्खणाणदंसण बलं चानन्तवार्य केवलज्ञानदर्शनाभ्यामन- न्तानन्तद्रव्यपर्यायावरूपपरिच्छेदक्त्वटक्षणा शक्तिरनन्तवीर्यमुच्यते न तु कम्पचिद्घातकरणे भगवान् वडं विदधाति सूक्ष्मगुणाभावप्रसक्तः तया चौक्तमाशाधरेण महाकविना- ययाति न जातु किंचिदपि न व्याहन्यते फेनचिद यक्षिप्पीतसमस्तवस्त्वपि सदा केनापि न स्पृश्यते ।

- २०२ परमामले- মামামালা খানি गया मामतम स्तम्यममा मा मनोनित तथा अनन्नमाम्ये मयत: मिनाय भाति तदप्यानलहानगुना समायात परमानन्दोपनिमा यस्तुमाएदारमेर वेदितम् । सपा चाक विमाननगुपाख्यानपर्यने । तया हि- शानिशानागि या मारा तानं तुष्यन्ति साधयः। सपनापापविमानान मिनाः मुधिन कयं । प्रक्रियां कुरुजातानां नागेन्द्राणां मगराताम् । अनन्तगुणितं सीतामुत्तरोत्तरनितां ॥२॥ तमिलमयात मोवादनात गुणितं मुख्। मिदानां तु क्षणार्धेन से यो यच्छन्तु तच्छिवं ॥ तथा ज्ञान के ज्ञान लोकालोकयस्तुपरिज्ञायक, दर्शनं चानन्तदर्शने झानक्षण एय वस्तुसत्तास्वरूपेण प्रहणक्षम बौद्धम् । चत्तारि ति पापडा गुणा होति चत्वारोऽपि गुणाः प्रकटा मरन्ति । कस्मिन् सति, णहे घाइचउके नटे विनाशं प्राप्ने घाइचउमे-मोहझानावरण- दर्शनावरणान्तरायात्मफेवलज्ञानमाम्राग्यविधसकारके कर्मशचतुष्टये । लोयालोयं पयासेदि लो कालो प्रकाशयति । टोक्यन्ते दृश्यन्ते जीव- पुद्गलधर्माधम कालाकाशा यास्मिन्निति लोकः । ते न लोक्यन्ते न स्यन्ते यस्मिन् ससरि सर्वतोऽनन्तानन्त जीवादयः पदार्थाचालोकः । लोक- सालोकश्च लोकालोकस्त लोकालोक प्रकाशयति जानाति परपति चैत्पधः। णाणी सिव परमेट्टी सव्याह विण्हु चउमुहो युद्धो । अप्पो वि य परमप्पो कम्मविमुक्को य होइ फुडं ॥ १४९ ॥ । सोका इमे यातितमे पृष्ठे उदृतग्रिलोकसारगाथाइयमनुवर्तन्ते । २ मुशिरे, स.. । ,

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२९१ षट्प्रामृते- इय घाइकम्ममुरको इति पूर्वोक्तटक्षणघातिकर्मभ्यो मुकः । अर रहदोसवज्जिओ सयलो अष्टादशदोपवर्जितो रहितः, सकलः स. फलया शरीरेण वर्तते इति सकल; तेन तस्य धर्मोपदेशोऽपि घर शरीरसयुक्तपरमाप्तत्वात् । एतेनेद वचनं प्रत्युक्त मवति- अएविग्रहाच्छान्ताच्छियात्परमकारणात् । नादरूपं समुत्पन्नं शास्त्रं परमदुर्लमं ॥१॥ अशरीरस्य शास्त्रोत्पतिर्न संगच्छते कूर्मरीमयत् भ्यास्तनन्धयत्र शशविषाणवत् विष्णुपदलतातयत् मस्मरीचिकादकवत् "अष्टौ स्थाना वर्णान!" इति शम्दानां करेंणकारणत्यात्। तिहुदणमवणपईयो त्रैटो क्यगृहस्य दीप प्रद्योतकः त्रिभुवनभवनप्रदीपः । देउ मम उत्तमं बोर ददातु मम मह्यं उत्तम बोय केवलज्ञानं । इतीष्टप्रार्थना श्रीकुन्दाकुन्दा चार्याणां शास्त्रकरणस्य फलाभिलापिन्वान् । अथ के ते अष्टादश इति चैदुक्का अप्युन्यन्ते- क्षुत्पिपासाजरातडकजन्मान्तकमयस्मयाः। न रागद्वेषमोहाच यस्याप्तः स प्रकीरयते ॥ १॥ चकाराचिन्ताऽरतिनिद्राविपादस्वेदखेदविस्मया गृह्यन्ते । निर्दोषपरमाप्त विचारोऽयमहसीन्यायकुमुदचन्द्रोदयप्रमेयकमलमासण्डामपरीक्षातत्यार्थ- राजवातिकत वायक वानिकन्यायनिश्चयालवादिषु महाशास्त्रेषु वि स्तरेशानन्य। जिणवरचरणंयुम्हें णमंति जे परममत्तिरारण । ते जम्मयेल्लिमूलं सगंति यरमावसत्वेण ॥ १५१ ॥ १नि.स. । १ नाRELEXI. । मलानन्, य.। कर नास्ति स. पुस्तके । ५ न्यायविनश्वयेति मिश्रुतिरन्यत्र -

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। 1 २९६ पप्राभृते- जह सलिलेण ण लिप्पड़ यथा येन प्रकारेण ( सलिलेन) लिप्यते न स्पृश्यते । कि तत्कर्मतापन्नं, कमलिणिपत्तं सहावपयई कमलिनीपत्रं पद्मिनींच्छदः स्वभावप्रकृत्या निजस्वमायेन | तह मारे ण लिप्पइ तथा तेन प्रकारेण भावेन जिनचरणकमलमक्तिलक्षणसम्- क्वेन करणभूतेन कृत्वा । कैः कर्तृभूतै. न लिप्यत, कसायविमए- सप्पुरिसो कपायैः क्रोधमानमायालोभै , विषयैः विषयमुसैः स्पर्शर गन्धवर्णशम्दैः सत्पुरुषः सम्यग्दृष्टिजीयः । तथा चोक्तं- धात्रीवालाऽसतीनाथपद्मिनीदलवारिवत् । दग्धरजुवदाभासं मुझन् राज्यं न पापभाक् ॥१॥ ते चिय भणामिहं जे सयलकलासीलसंजमगुणेहिं । पहुदोसाणावासो सुमलिणचित्तोण सावयसमो सो ॥१५३ तानेव भगामि भह ये सकलकलाशीलसयमगुणः । यहुदोषाणामावामः सुमलिनचित्तः न धावकसमः सः॥ ते चिय भणामिहं जे तानेव सत्पुरुषानहं कुन्दकुन्दाचार्यो कथयामि । तान् कान्, ये पुरुषा सकलकलासीलसंजमगुण सकटकला; परिपूर्णकलना. सम्यकपरीक्षादायिन , के. ! शीलसंयम गुणः शीलनिकपक्षमाः संयमनिकपक्षमा गुणनिकपक्षमा भवन्ति तथा चीन- यथा चतुर्भिः कनक परीक्ष्यते निघणच्छेदनतापताइने । तष घमा विदुषा परीक्ष्यते श्रुतन शीलेन तपोदयागुणः॥१॥ तथा चीन- मम्मा भयं पाठोऽधिक: स. पुस्त। महेन असेन न शिष कमलिनीदल इति मम्बन्धः। आनोमिन पापमा इस्यपिपिराः ।

२९७ भानामत 1 संभु सी मान्य नयु जानु मरिदि गुग मोह। दादकमयायग, उत्तमु कंत्रणु होर।। १ ॥ बहुदोमाणावासो यहना दोषागामाचागदीनामायामो गृहे, भयका पना होगा दोगा बाहनां आबास माल्मिको मुनि । सुमतिपचिनो माधयममो मो मुष्ट अतीव मलिनचित्तो राग- देपोहरमचेता मुनिः मुनिनं भवत्येय, सहि किं भवति ! | तारपतमी सोन शाकमम शायणापि गृहस्थेनापि समः सदृशः से न भवति । तस्य दानामादिसामसंयुक्तत्यादुत्तमात्र । तथा चोक्तं- घरं गार्हस्थ्यमेवार तपसो भाषिजन्मनः । दयात्रीकटाक्षलंटायटोप्यराग्यसम्पदः॥५॥ “चि चा अस्मदीयवानस्थाणुनूकतूष्णीकदकमृदुफसेवानस- मोदनिहितहतव्याहतकुदहटस्टमाकुलेषु वा " इत्यनेन प्राकृत- व्याकरणसमेण चि इसस या द्विन्यं । विभ. इति कोऽर्थः "अवधा- रणे पाई चचिस औः।" - ते घि घण्णा ते चिय साउरिसा ते जियति जियलोए । घोहहदरम्मि पडिया तरंति के घिय लीलाए ॥१॥ घोरह इति कोऽर्थो पौवनम् । १ संपनः शीलं शौचं तपः यस्य सूरे गुरुः सः। दाहररुपधातक्षम उत्तम कंचने भवति । २ म.ले. । कम्नु. रा । ३२. क. स.।। एते चत्वारः सदा अवधारणाय वनन्त इ.सः । से एवं धन्याः से एव सरपुरात जीवन्ति जीवलो। पौवनाहे पतितास्तरन्ति ये चैव लीलया।

३०० पट्याभृते- राजमान्यभावकादिभिरभिमानः । मुक्का जे करुणभावसंनुत्ता पूर्वो, तैर्मोहादिभिर्ये मुक्ताः, करुणभावः कारुण्यं दयापरिणामस्तेन संयुक्ताः । ते सव्वदुरियसभं ते मुनय सर्वदुरितस्तंभं समस्तमलातिचारादि- समुत्पन्न पापस्तंभं । हणंति चारित्तसग्गेण मन्ति चारित्रखन च्छिन्दन्ति नि जनिर्मलसदृत्तनिस्त्रिशेनेति शेषः । गुणगणमणिमालाए जिणमयगयण णिसायरमुणिंदो। तारावलिपरियरिओ पुण्णिमइंदुव्य परणवहे ।। १५८॥ गुणगणमणिमालया जिनमतगणने निशाकरमुनीन्द । सारावलिपरिकलितः पूर्गिमेन्दुरिव पवनपथे । गुणगणमणिमालाए गुणा अष्टाविंशतिमूलगुणाः दश धर्माः तिम्रो गुप्तयः अष्टादशगीलसहस्राणि द्वाविंशतिपरीपहाणा जय एते उत्तर- गुणाः, गुणानां गणाः समूहा गुणगणास्त एव मणयो रनानि तेगा माला मुक्ताफलहारस्तया गुणगणमालया मुनिः शोमते इत्युपरकारः । जिणमयगयणे णिमायरमुणिंदो जिनमतमाहतशासनं तदेव गगने आकाश पापलेपरहित वात् जिनमतगगर्न तस्मिन् जिनमतगगने सर्वश. शासनाकाशे, निशाकरश्चन्द निशा करोनि उयोतयति निशाकरी मुनीन्द्र , नत्र मुनीन्द्रो दिगम्बर: निशाकरः पापान्धकारविच्छेदकास्यात् । तागवलिपरियरिओ नाराबलिपरिकरिती नक्षत्रमालापरिवटितो ना. अमण्डीपत । पृणिमइंदुस्य पवणयह पूर्णिमेन्दुरिक पूर्णिमाचन्द्रय स्छौभने, पवनपये गगनमार्ग इति शेष । चादग्गममयमुरवरजिणगणहगइमोरमाई। चारणमुणिरिडीओ निमुद्धमारा णग पना ॥ १५९ ॥ चपररामशरपुररविनगणधरामियानि। चारसमुन्नीः विस्माता नराः प्राप्ता ॥

, - भावप्रामृत । २०१ चकहररामसवसुरवरजिणगणहराइसोक्खाई चक्रधराश्च भर- दादपः सकलचक्रवर्तिनः, रामाक्ष बलदेवाः, केशवाचार्धचक्रवर्तिनः, मुखराम सौधर्मेन्द्रायच्युतेन्द्रपर्यन्ता अहमिन्दान्ताः, जिनाच वृषभादि- बोरान्ताः, गणधरादयय वृपभसेनादयः श्रीगौतमान्तास्तेषां सौख्यानि महापुराणादिशाखवागतानि । चारणमुणिरिद्धीओ चारणमुनीनां माफारागामिनापीणां ऋद्धीः भक्षीणमहानतालयप्रभतीः। विशुद्धभावा नराजीवाः प्राप्ता लभन्ते स्म । सिवमजरामरलिंगमणोवममुत्तमपरमविमलमतुलं । पत्चा चरसिद्धिसुहं जिणभावणभाविया जीवा ॥१६०॥ शियनजरामरतिशमनुपममुत्तमं परनविनलमतुलम् । प्राप्ता रसिटिमु जिनभावनामाविता जीवाः ।। शिवमजरामरलिंगं शिव परमकल्याणं परममंगलभूत कर्ममलफलं- परहितत्वात् , अजरामरलिंग नरामरणरहितचिन्हें । अणोवमं उपमा- रहितं । उत्तम परममुस्य । परमविमलं ब्रम्पकर्मभाव मनोकमरहितं । अनुलं अनन्तमित्यर्थः । पत्ता वरसिद्धिमुहं एतविशेषणविशिष्ट पर स सिलिनुहं परमनिर्वाणसौख्यं प्राधा लभन्त स्म। जिणभावण- भाविया जीवा जियभायनपा निर्मटसम्पयन भादिता यासिता जीवा सामनमनमः। ने मे तिहुवणमाहिया सिद्धा मुद्धा निरंजना निशा । दिनु परभावमुदि दंनपगाणे चरिने ॥ १६ ॥ सेमे निमुन्नEिET निरंजन किया। दएपपाने र रिने । ने ने नियममाहिया ने हरिद्वाः, म मोन्मादा र सिपमहिलासरिताः। निदा मुद्धा चिरंजना .....

MA ३०२ पनाम णिया। सिदा मुनिम्रीयलमाः, गुदाः फर्ममलफटकरहिता, निरंजना निम्पलेपाः, नित्याः शाधना । किंतु वरमावमुदि ददतु प्रान्तु, वरभाषशुद्धि विशिष्टपरिणामना । कस्मिन् , दमगणाणे चरिने य सम्यादर्शने सध्याजाने सम्याचारिये धेयर्थः। कि जंपिएण यहुणा अन्यो धम्मो य काममोम्यो य । अण्णे वि अ बाबारा मावम्मि परिहिया मव्वे ॥ १६२ ॥ कि जतिन बहुना भयो धर्म काममोक्षर। अन्येपि मध्यापारा भावे परिस्थिना: ॥ किं जंपिएण बहुणा बहुना प्रचुरतरेण, जल्पितन किन किमपि। अत्यो धम्मो य काममोरसो य अर्थो धन, धर्मो यतिमायकगोचरः, कामः पचेंद्रियमुखदायिनी इष्टवनिता तस्या भोगः, मोक्षः सर्वकर्म- क्षयलक्षणः । अण्णे वि अवाबारा अन्येऽपि च व्यापारा विद्यादेवता- साधनादयः । भावम्मि परिहिया सव्वे भावे शुद्धपरिणाम परिस्थिता भावाधीना भवन्तीति भावार्थः । उक्त च- न देयो विद्यते काठे न पापाणे न मृन्मये। भायेपु विद्यते देयस्तस्मादायो हि कारणं ॥१॥ भावविहणउ जीव तुई जा जिणु वद्दहि सिरेण । पथरि कमलु किं निप्पजइजर सिंचहि अमिपण ॥२॥ सीसु नमंतह कयणु गुणु भाउ कुसुदउ जाएं। पारद्धीदूणउ नमा दुतउ हरिणाहं ॥ ३ ॥ भननपि भवेत् पापी निनग्नपि न पापभाक् । परिणामविशेषेण यथा धीपरकर्पकौ॥४॥ य भावविहीन जीव ! यदि जिनं वहति शिरसा। प्रस्तरे कि कमलं निष्पचते यहि सिंचेत् अमृतेन ॥

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www ३०२ पमान- णिया। सिद्धा मुक्तिनीयलभाः, शुदाः कर्ममल कलकरहिता,निरंजना निरुपलपाः, निन्याः शाश्वता । दितु परमावमुद्धि दस्तु प्रपन्न, परमाय शुदि विशिष्टपरिणामशनि । फस्मिन् , दमणगाण गरिने य सम्यग्दर्शने सम्यग्ज्ञाने मम्याचारित्रे घेयर्थः । किं पिएम पहुणा अत्यो धम्मो य काममोरयो य । अण्णे वि अवाबारा मावम्मि परिहिया सव्वे ॥१६२ ।। कि शिवेन बहुना अर्थों धर्मच काममोक्ष । अन्येपि च व्यापारा माने परिस्थिताः सर्वे ।। कि पिएण यहुणा बहुना प्रचुरतरेण, जल्पितेन किन किमपि। अत्यो धम्मो य काममोक्सो य अर्थो धन, धर्मो पत्तिप्रायकगोवरः, कामः पद्रियमुखदायिनी इष्टयनिता तस्या भोगः, मोक्षः सर्वकर्म- क्षयलक्षणः । अण्णे वि अ वावारा अन्येऽपि च व्यापारा विद्यादेवना- साधनादयः । मावम्मि परिडिया सव्वे भावे शुद्धपरिणाम परिस्थिता भावाधीना भवन्तीति भावार्थ. । उक्त च- नदेयो विद्यते काष्ठे न पापाणे न मुन्मये। भाषेपु विद्यते देयस्तस्माद्भायो हि कारणं ॥१॥ भोयविहणउ जीव तुहं जइ जिणु पहाहि सिरेण । पत्थरि कमलु कि निप्पजइ जा सिंचदि अमिएण ॥२॥ सीमुनमंतह कवणु गुणु भाउ कुमुद्धउ आई। पारधीदूणउ ममर दुईत परिणाह ॥ ३ ॥ अनन्नपि भवेत् पापी निनग्नपि न पापभाक् । परिणामविशेषेण यथा धीवरफर्षकी ॥ ४ ॥ , भावविहीन' शीव ! ५ यदि जिनं बइति शिरसा। प्रस्तरे किं कमलं निदपद्यते यदि सिंचेत् ममृतेन ॥

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भावप्राभृतं ।
३०३
इय भावपाडमिणं सर्व युद्धेहि देसियं सम्मं ।
जो.पढइ सुणइ भावइ सो पावइ अविचलं ठाणं।।१६३।।
इति भावप्रामृतानेदं सर्व युद्धः देशितं सम्परू ।
२ः पठति भणोति भावति स प्राप्नोति अविचलं त्यानम् ॥
इय भावपाहुडमिणं इति-एव प्रकार, भावप्राभृतमिदं भावप्राभृतनाम
मात्र । सल्लं युद्धहि देसियं मम्म सबै वुः सर्वज्ञः. देशितं कथितं
सम्पत्नियन। यथा मया कथितं सर्व युद्धाप्येयमेवोक्तमिति भावार्थः ।
जो पटइ मुगइ भावइ य सात
यो जावः पठति गुर्वप्रेऽनुशीलयति
कन्यस्पति, मुणइ-एतदर्थमाकर्णयनि, भावइ-श्रुवा प्रदधाति । सो
पावइ अविचलं ठाणं स आसन्नभव्यो मुनिपुंगवः, प्राप्नोति लभते,
अाश्चिदं निभट, स्थानं मोक्षपदमिति सिन् ।
इले धोपमनन्दिकुन्दकुन्दानार्यवानीवाचायलाचार्यगृधपिच्छा-
पानामानिराश्रितेन धीसीमन्धरस्वामिसम्बग्योधसोधिनमम्पननेन
घोजिनचन्द्रसूतिभाकपाभरणभूतेन पलिकालसर्पहन पिरचिते पदप्राभूतभा-
नान्दे समिरमानकालगीतमस्वामिनाधीमहिभूषणेन
भारपेभानुमसेन मालरिद्वग्नसमाजसम्मानितेनोभभापारवियफर्निना श्री.
विधानन्दिपुर्वन्टेमानिना धौदेवेन्द्रकीर्तिप्ररिप्य मूरियरधीभुतसागरण
रिपिता भारतातटीका-
।
परितमाता।

मोक्षमाभृतं । भय देयन्द्रयशोगुरुविधागलीयरस्थ शिष्येण । मुक्तिप्रियामुगाम्युजदिगुणा शिशिनेन गुणे ॥१॥ भुतसागरण कायना पिनापि गुरपा विरख्यने गनिदा। मोक्षप्राभृतथितिष्टीकाउलीकममुतेन ॥२॥ यायकजनकल्पतमः म्यगरपि मियामतादि। भव्यजनजनकनुल्यो यियेकयान मलिभूषणो जयति ॥ ३॥ मोतिराया। णाणमयं अप्पाणं उपलद्धं जेण शडियकम्मेण । चइऊण य परदव्यं णमो णमो तम्म देव्यस्म ॥१॥ मानमय भारमा उपलब्धो येन क्षरितकमगा। स्यावा य परदम्य नमो नमस्तस्मै देवाय ॥ णागमयं अप्पाणं ज्ञानमय आत्मा । उपलद्धं-जेण-झडियकम्मे उपलब्धो येन क्षरितकर्मणा । चइऊण य परदव्वं त्यक्त्वा च परद्र शरीरं कर्म च परित्यग्य नमो नम -पुनः पुनर्नम । तस्य देवस्य-तस् देवायेति भावार्थ: णमिऊण य तं देवं अणंतवग्णाणदंसणं सुद्धं । वोच्छं परमप्पाणं परमपयं परमजोईणं ॥ २॥ नत्वा च तं देव अनन्तवरज्ञानदर्शन शुद्धम् । वक्ष्ये परमामानं परमपद परमयोगिनाम् ।। हादिनी पनमस्त्री स्यात् बुलिश भिदुर पवि. शतकोटिः स्वरुः शम्बो दभोलिरशनियो । १अस्मादमे ॐनमः सिदेभ्यः इति पाठ. । स. पुस्तके तु नास्ति । ३ पुच्छं. क्वचित् ।

मोक्षप्राभूतं । ३०५ पामिऊपय तं देवं नया च तं देवं सर्वजीतरान। कथंभूत F, अगंतवरणाणदंतणं सुद्धं बनन्तरज्ञानदर्शनं सुदं अनन्तज्ञान- नन्तदर्शनमनन्तवामनन्तसीस्पमिचर्थः, एवं घातिकर्मसंघातनन नर्मटस्वरूपं असादादापरहितमित्यर्थः । वोठं परमप्पागं वक्ष्यामि थपियामि । क: कता ! हे श्रीकुन्दकुन्दाचार्यः, कं यो! पर- मामानं शुरन्दन परमात्मानं सहसतमानं । फर्यभूतं परमामाने, परमपयं परमपदं परमं उस इन्द्रादिदेव-नरेन्द्रादिमानव-गगधगदिमहा- मुनीश्वरसंयुक्त समयभारणस्थानमन्डित । अप के परमात्मानं यस्यामि ! परमजोई परम्यौगिनां दिनबरगुरूणां । इत्यनेन मुनीनामेव परमा- मपानं घटते । दलोहगोलकनमानगृहिला परमानपान न संगच्छने । तेषां दान जापर्योपवाससम्परत्वप्रतिपाटनशीटपतरक्षणादिक गृहस्थधर्न एवोपदिष्ट भवतीति भावार्थः । ये गृहस्था अपि सन्तो मनागानमार- नानासाद वर्ष मानिन इति मुरते ते जिनधर्मविराधका निप्पाटप्पो ज्ञातपाः । सपपाचारा गृहस्यवदिदि पतिता रमपमा वैदितव्याः। ते लोकाः, तनामनहणं तन्मुखदर्शनं प्रमाताले न पर्तन्य इटवस्तुभो- जनादिविहेतुत्वात् । ते जिनलपन्जादानादिसर्मचातका ज्ञातन्याः । जाणिऊण जोई जो अंत्यो जोहऊप अपवर । अवाबाहमणतं अणोवर्म हबई णिव्वाणं ॥३॥ पदावा योगी पन रवाऽनवरतम् । समाराधमनन्तं अनुपनं मवले मिला । जंजाणिऊण जोई यं अर्थ लानत ज्ञात्वा हे योगिन् ! जो अत्यो जोइऊण अपवरयं (2) अर्थ त्वं, ओइज-दृष्ट्या जोपयोग. योगस्पो पानर इन २ सदर. म. ।

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मोशनामृतं । ३०७ नाभनिछपनयन शरीरं न स्पृशति, फर्मवन्धनवाऽपि सन धर्मवन्धनै- पो न भवति नलिनीदलीयनजल्यदितीय भेदलाने आमसंकल्प उक्त स मामफापो पत्य जीवस्म पर्तत सोऽन्तरामा वदितन्यः । कम्मफलंफविमुको परमप्पा भष्णए देवो कर्मकटाविमुक्तो व्य. फभावकर्मनाकमाहित: सिम्परमेरो देव मामा भव्यते-ईन् परमेश्वर: सामान्य केली च परमामा पापने तस्य जीवन्मुक्तावात् । उक्त च . आत्मनात्मविलोपनात्मचरितरासार्दुरात्मा चिरं स्वात्मा स्याः परमात्मनीनचरितरात्माहतैरात्मनः। आत्मेत्यां परमात्मतां प्रतिपतन् प्रत्यात्मविद्यात्मकः स्वात्मोत्यात्मसुमोनिपादसि लसनध्यात्ममध्यात्मना ॥१॥ मलरहिओ कलचंत्तो अणिदिओ केवलो विमुद्धप्पा । परमेही परमजिणो सिवंकरो सासओ सिद्धो ॥६॥ मलरहितः कलत्यतः भानेन्द्रियः केवलो विभुसामा । परनेटो परमजिनः शिवारसातः सिद्धः ।। मलरहिओ कलचत्तो मलरहितः कर्ममलकलंकरहितः, कलया शारीरेण पक्तः फटत्यक्तः । यौकारौ स्त्रीकृती हरवौ फचित् यथा इसकचितं इफ्तूिलमिति। आणिदिओ केवलो विसुद्धप्पा अनि- न्द्रिय इन्द्रियज्ञानरहित: फेवल ज्ञानेन द्रव्यपर्यायस्वरूप जाननित्यर्थः । वक्तं च पुष्पदन्तेन महाकविना- सबहु अपिदिनो पाणमओ जो मयमुदु न पत्तिया। सोलिदिओ पंचिदियनिरओ पदतरणिहि पाणिउपियइ ॥१॥ चित्तो. म.क. 1 २ईमा इति छेदोन मातम्मः। २ सर्वशः भनिन्द्रियः ज्ञानमयो पो मदम् न प्रत्येति । म निन्दरः चन्द्रियनिरतः चैतरण्या: पानी पिरति ।

पद्माभ्ने - अयग-अणिदिओ-अनिंदित इन्द्रधरणेन्द्रनरेन्दखगेन्द्रादीनां स्तुत्य इत्यर्थः । उक्तं च मुलोचनाकान्तेन- शमिताबिलबिमसस्तवस्त्ययि नुच्छोऽप्युपयात्यनुच्छतां । सुचिमुक्ति टेऽम्युविधृत ननु मुक्ताफलता प्रायते ॥१॥ घटयन्तिम विनकोटयो निकटे स्वत्क्रमोनियामिनां। पटयोऽपि पदं याग्निमिभयमस्स्यम्युधिमध्ययतिनां ॥२॥ हदये त्वयि सन्निधापित रिपयः केऽपि भयं विधिरमय । अमृताशिपु सत्पु सन्ततं विरभेदार्पितयिष्टयः कुतः ॥ ३॥ उपयान्ति समस्त सम्पद विपदो पिच्युतिमानुयन्त्यलं । पमं वृषमागंदेशिनं झपकेतुद्विपमायुषां ॥४॥ इत्यं भयतमतिभक्तिपधाननीपो, प्रागययन्धकलयाप्रलयं यान्ति। पश्चादनभ्वरमयाचित्तमप्ययश्यं,संपत्स्यतेऽस्य विलसदृणमद्रम। केवलोऽसहाय. केवलज्ञानमयो वो, के परब्रह्मणि निजगुबुद्धक- स्वभावे आत्मनि बलमनन्तवीर्य यस्य स भवति केवलः, अथवा केवते सेवते निजामनि एकलोलीभावेन तिम्रतीति केवल । विशुद्धामा-विशे- पेण शुद्ध कर्ममटकलकरहित आत्मा स्वभायो यस्य स विशुद्धामा। परमेही परमजिणो परमेष्टा परमजिनः, परमे इन्द्रधरणेन्द्रनरेन्द्रमुनी- न्दादिवंत्रित पदे तिष्ठतीति परमेष्ठी पंचपरमेष्ठिमप, परमजिणोपरा उत्कृष्टा प्रत्यक्षलक्षणोपलक्षिता मा प्रमाण यस्यैनि परम , अथवा परेपों भष्यप्राणिनां उपकारिणी मा लक्ष्मी समवशरणविभूतिर्यस्येति परमः, अनेकविषमभवगहनदु ग्यप्रापणहेतून कर्मागतीन् जयति समूलकार्य कप- तांति जिन परमश्वासी जिन परमजिन तीर्थकरपरमदेवः । सिबंकरो शिव परममगलं करोति शिर्यकर , अथवा शिव मोक्षं फोति भक्तम• न्यजीवाना मोक्षं विधातीति शिवकर शिवतातिरपरपर्याय । सासो १ मामा तपाहि-इति पाठ स. पुस्तके । । । --- मोक्षप्राभूत । दाचिद्भवः दायतोऽपिनश्वरः । सासयो-इति च पचित पाटो एयते तत्रापर्थ:-ताशपः भातभयानां आशापूग्णसमर्थ इत्पर्धः । सिद्धो सिदिः स्वामोपलधिचितं यस्य स सिद्धः परमनिर्वाणपदमारूड इत्यर्थः। तदुक्तं-तस्य त्रिविधस्पात्मनः स्वरूपं शास्त्रान्तरेऽपि प्रोक्तमस्तीति श्रीकुन्दकुन्दाचार्या निरूपयन्ति----- आरुहवि अंतरपा पहिरप्पा छडिऊण तिविहेण । झाइज्जइ परमप्पा उवइ जिणवरिंदेहि ॥७॥ क्षारय अन्तरात्मानं पहिरालानं सपा प्रिविधेन । ध्यायवे परमाला उपदिर जिनपरन्दः।। आरुहवि अंतरप्पा मात्र प्रादुर्भाव्य आनित्यति, किं ! अंत- सपा-अन्तरामानं भेदज्ञानावटम्बनं कृत्वेत्यर्थः । बाहिरप्पा छंडिऊण तिविहेण त्रिविधेन मनोवचनकायैर्वहिरामानं पक्या । झाइज्जइ पर- मप्पा पायते अहर्निशं चित्यते, कोऽसौ ! परमात्मा निधयनयन फर्म- मटकलंकरहित: सिद्धस्वरूपः निजपरमात्मा घ्यायते अहंसिद्धस्वरूपोऽ- बलोक्यते द्विविधनभ्यातं कुर्वाणो मुनिः परमात्मानमेव प्रामाति-बह- सिदतशो भवति । तथा चोक्तं- मारमा मन पिभिरपं त्वदभेदयुद्धपा ध्यातो जिनेन्द्र ! भवताह भवत्प्रभारः। पानीयमप्यमृतमित्यनुचिन्यमान किं नामनो विपविकारमपाकरोति ॥१॥ उवइदं जिणवरिंदेहि उपदिष्टं प्रतिपादितं । फैः, जिनवरेन्द्रःप्री- महगवदह सर्वज्ञवीतरागैरिति शेपः ।

पद्माभूते- पहिरत्ये फुरियमणो इंदियदारेण णियसरुवनुओ। णियदेई अप्पाणं अज्झयदि मूइदिट्टी ओ॥ ८ ॥ बदित्य स्फुरितमना इन्दियद्वारेण निजावस्पच्युत । निजदे मामानमध्यवस्यति मूनि ॥ पहिरत्यै फुरियमणो बहिरये इश्यनितामुतस्यापलेयादी सी चमत्कृतं मनो यस्य स इटार्थे स्फुरितमनाः । इंदियदारेण णियस वचुओ इन्द्रियद्वारेण इन्द्रियेषु प्रविश्य, निजस्वरूपच्युत भात्मभावना मभृष्टः। णियदेहं अप्पाणं निजदेहं स्वकीयशरीर आत्मानमध्यवः सीति सम्बन्धः-शरीरमामानं जानातीयर्थः । अझवसदि मूढदि ओ अध्ययस्यति मूढदृष्टिस्तु ममापे काय आत्मेति जानाति मूढदृष्टि हिरात्मेति भावार्थ. णियदेहसरिस्सं पिच्छिऊण परविग्गहं पयत्तेण । अचेयणं पि गहियं झाइजह परमभाएण ॥९॥ निजदेहसदृक्षे हटा परविग्रह प्रयत्नेन । अचेतनमपि गृहीत ध्यायते परमभागेन । णियदेहमारिरस पिच्छिऊण निजदेहसदृक्ष सश पिच्छिक दृष्ट्वा । परविग्गहं पयनेण परविग्रहे इष्टयनितादिशरीर, पयतण-प्र- ग्नेन मरम्बाकरविरमासीकसचर्मरोमादिदुर्गन्धापवित्रादिपरिणाम धेन । अचेयर्ण पि गहियं अचेतनमपि आत्मना गृहीत जावन स्वीकार साइजइ परमभाएण ध्यायते शरीरस्वरूपं चिन्त्यते परमभा पृथक्तया भेदज्ञानेन-शगैरे भिन्न आत्मा भिन्नो वर्तते इति भेद कृष्ट त्यर्थः। तथा चक्त- १ घओ. मूले. । ३ मिच्छमावेण. ग. प अन्यत्र ।

मोक्षप्राभृत। ३११ आत्मा भिन्नस्तदनुगतिमत् फार्म भिन्नं तयोर्या प्रत्यामतेर्भयति विशातः सापि भिना तयच । फालक्षेत्रप्रमुखमपि यत्तध भिसं मतं मे भिनं भिन्नं निजगुणकलालहकृतं सर्वमेतत् ॥१॥ सपरज्झवभाएगं देहेसु य अविदिदत्यमप्पागं । सुयदाराई विसए मणुयाणं वड्डए मोहो ॥ १० ॥ स्वपराध्ययमान दहेषु च अविदितार्थमात्मनम् । सुनदागतिविपये मनुजानां वर्धते मोहः॥ सपरज्झवसाएणं स्वपराध्यवसायेन परवस्तुशरीरादिकं स्वमात्मानं मन्यते स्वपराप्यवसायः। केषु पदार्थेषु, देहेसु य शरीरेषु च, चकाराद- नितादिषु च, शरीरं वनितासुतस्वारतेयादिकं यस्तु खलु परकीयं वर्तत तत्र । अविदिदत्यं अविदिता यथावस्वरूपपरिज्ञानरहितार्थ यथा भवत्येवं वर्तमान आत्मा । अपाणं इति जीवः मात्मानं जानीते तच देहादिकं वस्तु आत्मा न भवति । तेन विपरीताभिनिवेशेन सुयदा- राईविसए सुतदारादिविषये पुत्रकलत्रादिषु । मणुयाणं बडए मोहो मनुजानां मानवानां वर्धते मोहः-स्नेहनाज्ञानमूलं मोहो वैचित्य वृद्धि पाति, मोहेन परिणतो जीयो बहिरामा पुनः कर्माटो बघ्नाति । उक्तं च- जीवत परिणामं निमित्तमा प्रपद्य पुनरन्ये । स्थयमेव परिणमन्तेऽत्र पुनलाः फर्मभान ॥१॥ मिच्छागाणेसु रओ मिच्छाभावेण भाविभो संतो। मोहोदएण पुणरवि अंग सं मण्णए मणुओ ।। ११ ।। नेपुरतः मियाभावेन भावितः सन् । मोहोदन पुनापि आ स्वं मन्यते मनुजः ।। मिच्छाणाणेसु रओ मिध्यज्ञानेपु स्तोऽयं मनुजी जीया मिच्छा- भाषण भाविओ संतो मिथ्यापरिणामेन कु.गुरुकुदेवभतपा मारितो - पनामृते- वासित मन । मोहीदाण पुगरवि मोहोदयेन मिथ्यामोहस्य त्रित धस्योदयेन विपाकेन, पुनरपि भूयोऽपि । अंग सं मण्णए मशुओं अगं शर, म्यमा-मानं, मन्यते जानाति, मनुजो मनुष्यो मिथ्या जीव इयर्थ । जो देह जिरवेखो णिईदो निम्ममो निरारम्भो। आदमहावै मुरओ जोई सो लहइ णियाणं ॥ १२ ॥ यो देदे निरपेक्ष. निन्दूः निर्ममा निरारम्भ । भामस्वभावे मुरत. योगी स लभते निर्माणम् ॥ जो देहे गिग्वेक्सो यो योगी देहे शरीरे निरपेक्ष उदासीन ममत्वेन न्युन । णिदंदो निम्ममो निरारंभो निन्द्रो निष्फलह केनापि सह कलहरहिन । अथवा निन्दो निर्युग्मः श्रीभोगरहितः "द्वन्द्व कलह युग्मयो " इति वचनात् । निर्ममो ममत्व रहितः, ममेति अदन्तोऽव्ययनब्द निर्गत ममेति परिणामो यस्यति निर्भमः। उक्तं च-- अचनोऽहमिन्यास्व लोक्याधिपतिर्भवः। योगिग तय मोक्तं रहस्यं परमात्मनः ॥१॥ निगरभ संवापिय गिज्यादिकमरहितः । उक्त च- आग्भे णरि दया महिलासंगपण णासए धर्म। माप सम्बर्स पश्यना अस्थगणेण ॥१॥ आदमहाये मुरी अ' मनभाये टंकोरकीर्णनायकैकस्वभावविश्व- मत्कार पनि बुझ परिणामे जीवतत्वे मुष्ठु-अतिशयेन रत एफ- १ नम • नमू । ३ आ. इत्याप करिसाउ.. ४ भारभे नास्ति दया महिलासंगन नाशयति ब्रह्म । शकया सम्यव प्रमाया अर्थप्रहशन ।। ५९ टो।

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पट्माभूते- धरिसंसदिक्रियाए अनार यस दिक्विमा साह अभिगमण यंदण नमसणण विणएण मो पुजो१॥ इति गाथा अप्रमाणं भवति यदि स्त्रीला मुक्तिः स्यार। परदव्यरो यज्झइ विरो मुइ विविहकम्मेहि । एसो जिणउवएसो समासओ बंधमोरखस्स ॥ १३ ॥ परमध्यरतःच्यते विरतः मुथति विविपरमभिः। एप जिनोपदेशः समारातः धमोक्षस्य ।। परदव्याओ यज्झइ परदव्यं शरीरादिक सत्र तो यभ्यते । मामानि चौरयत्, यथा चौर: परदय चौरयन् पुमान् गजनी कई थो न परदव्य चौरपति स न यग्यते । बिरओ मुच्चे विविह म्मेहि विरतः पाद्रव्यपरान्मुसः पुमान् मुग्यते-मुक्तो भयति विविध नामकारः भिनाशादिभिः । एमोजिमउगएमा पनि पदेशः । ममामी बंधमोरसस्म समासत सोपान, बन्धमोद बयेनोपरक्षिता मोसो बन्धमाशः तम्य बन्धमोक्षस्य | अथवा बन मोक्षध मन्धमाश समाहारस्तम्य । महवाओ सवणो मम्माइही हवेर गियमेण । मम्मनपरिणदो उण सये दुष्कम्माणि ॥१४॥ वयात अमन सम्यान नियमेन। मम्या कामात पुन क्षिात रामगि । .वर नियामाया अचवीमिन मा । अभिगमनमाया ममम्मान विनयेन हानि 4 Tera Butr पोशीस पाटेर पिया .

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पट्नामृते- परदबादो दुगई परद्रज्यादुर्गतिः परमात्मध्यान परिहत्य परदन्ये परिणमनानरकादिषु चतसृषु गति पतनं हे जीव ! तब भवति । सद्दव्यादो सुग्गई हवइ स्वद्रव्यादामद्रव्ये एकलोलीभावात् सम्य- प्रधानज्ञानानुवरणात् सुगतिर्भवति मुक्तिर्भवति । इय णाऊण सदने इति झात्या ईदृशमधे परिज्ञाय स्वद्रव्ये आत्मतत्यै । कुणह रई विरह इपरम्मि कुरुत यूयं रति भावना, विरति विरमणे, इतरस्मिन् परद्रव्ये, मा रग्यत यूमिति । तं परदव्वं सद्दवं च केरिसं हवादि । तं जहा- सत्परदन्यं स्पद्रव्य च की भवति । तद्यथा-तदेय निरूपपत्या- चार्या आदसहापदणं मचिताचित्तमिस्मियं हयदि । तं परदव्यं भणियं अश्वित्थं सव्यदरसीहि ॥ १७॥ मारमा भादग्य चितापित्तमिश्रितं भवति । तत् पाध्य भणित-अपितय सर्वसिमित आदमहावादणां आमसभापदन्यत् पुलादिदम्य । सगिना. चिमिस्मियं यदि सचित्तं विद्यमानचेतन इष्टयनितादिक, भवित अचेतन धनकनवसनादिक, मिश्रित आमाणपत्रादिसंयुक करावा. रिक भवति । नं पादयं मणियं नपरद्रय मणित-मागमे प्रति पादिन । अविनत्यं सचटग्मिीहि अयितर्थ ग यह सदामि: श्रीमद्रावदा मबन्न नगिनिशेष । दुहकम्मर्गहयं अणोरम नागरिग्गरं णिच्नं। मुई जिपदि कहिय अशाण गदि मइयं ।। १८॥ मनिमुनगाथा पास मम्यः ।

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पद्माभृते- जिनवरमतेन योगी ध्याने प्यायति शुद्धनात्मानम् । येन समते निवाण न लभते कि तेन मुररोम् ॥ जिणवरमएण जोई जिनबरमतेन जिनशासनेन सम्यक्प्रदान्जान नुभवनलक्षणेन स्नत्रयेण योगी दिगंबरो मुनिः । झाणे झाएइ मुद्ध प्पाणं ध्याने एकाग्रचिन्तानिरोधलक्षणे, ध्यायति चिंतयति, शुद्ध । द्वेषमोहादिरहित फर्ममटकटकरहितकोत्कीर्णरकटिकममिश्विमा झापकिरयभार चिच्चमत्कारस्वरूप, आमान निजामतन्त्र । जेगल णिव्वाणं येनात्मध्यानेन लभते निर्वाण सर्वकर्मक्षपलक्षणोक्षमन सौख्यं । ण लहइ किं तेण सुरलोयं तेनात्मध्यानेन न लमते किं प्राप्नोति मुरलोक स्वर्गभोगे । तथा चौक्त- तृष्णा भोगेपु चेद्भिक्षो ! सहस्वाल्पं स्वरेव ते। प्रतीक्ष्य पार्फ कि पीत्या पेयां मुक्ति विनाशयः ॥ १॥ जो जाइ जोयणसयं दियहेणेकेण लेवि गुरुभारं । सो किं कोसद्धं पि हुण मकए जाहु भुवणयले ॥ २१ यो याति योजनशत दिनेनकेन लास्वा गुरुभारम् । रा िकोशार्धमपि हुन शमते यातुं भुवनतले ॥ जो जाइ जोयणसयं यो याति य पुमान् याति गच्छति, किं ! योजनात सहस्तयोजनदशमभागं । दियहणेकेण लेवि गुरुभारं दिव. सेनैकेन लेवि-लात्वा गृहीत्या, के ? गुरुभार महाभार । सो किं कोसद्धं पिहु स पुमान् (किं) मोशार्धमपि दु-रफुट। मकए जाई सुवणयले न शक्रोति न समों भवति यातुं भुवनतले पृथिवीमण्डले अपि तु मव्यूनिचतुर्थमा यार्नु शमोत्येव । पैर्य पाठामार।१३.स।

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३२० पटनाभते- अइसोहणजोएणं अतिशोमनयोगेन सामग्या अनन्धपापागादिक अग्निमध्ये पचितं गुरुपदिष्टौपधयोगेन । मुद्धं हेमं हवेइ जह तह में शुद्ध पोडशवणिक हेम मुवर्ण भवति यथा तह य-तथा च तथैव च कालाईलद्धीए कालादिटब्ध्या कृत्या कालादिलच्या सत्यो वा । अपा परमप्पओ हयदि आत्मा संसारी जीयः परमात्मा भवति-मईन् सिद्ध संजायते । उक्तं च- नागफणीर मूलं नागिणितोपण गम्भणारण। नाग हो। सुवर्ण धम्मतंद पुषणजोएप ॥१॥ अस्या अपमर्थः-नागफणीए मूल नागौषधिः। नागिणितोएण- हस्तिनीमूत्रेण पिष्ट्वा । गभणारण-गर्भे नागः सीसको यस्य स गर्भनाग: सिन्दूरः सोऽपि मध्ये क्षिप्या मर्यते । नागं होइ सुवणं-नागः सीसकः । एतत्सर्वं मृत्तिकाभाजने क्षिप्या अधोऽग्निः क्रियते खदिराशरिर्मायते मुवर्ण भवति । पुण्ययोगेन पुण्ययोग विना सुवर्णे न भवति ब्रह्मादिभर- स्वैति भावः तथा आत्मा कालादिलीध प्राप्य सिद्धपरमेष्टी भवतीति । भावार्थः। वर धपतयेहि सग्गो मा दुपखं होउ निरई इयरहिं । छायातवाहियाणं पडियालं ताण गुरमेयं ।। २५॥ वरे ग्रततपोमि. स्वर्ग मा दुःख भरतु नरके इतरः । डायातपस्थिताना प्रतिपालयतो गुरुमेहः॥ वर वयतवेहि सग्गी पर ईपगुचौ वर श्रेष्ठं बस्तपोभिच स्वर्गो । भवति तयार । मा दुर होउ निरइ इयरहिं मा दुःखं भक्त निरह-जरकारासे, इतरैवतैरतपोभिश्च । छाया दरहियाणं छापानप- नागटी, ।१ धमता । ३. मूलगाथा पारः ।

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३२२ पदनामते- मम गारच शम्भगार-अई या चार रुचिर जानामि नसते यन, दिगारव-शिष्यादिमामग्री मग यही यतते न मी यतीना, सात- गारग-अ पनिरपि सन् इन्सागुम्ने यक्रिगुप तीर्थकरमुग मानो वो नमे पायम्नास्तिनो पराकाः । महा अा-अहे ज्ञानया सा शाशी का, असे मान्यो महामंडरा मत्पादरीरकाः । कुन्दा मावासोती. कोऽपि मानहाया-प्रापिहायादिभिरदोष जानि:- माया यस्य फगुहिता-शीन गुऔचना-साना-अनान पती-गमनादिका यसते। 4-3 सहयभटो लसभा: कोरी. भः । यि -ममानेकालोरिगणा धनगागीर तदपि गया स्यान भन्ने गुनगोमणा तो दीक्षा गृह । तप.-मह नि मोहित fruarमतामगाव मागविक्रमविदोकमारपनायो लोगोषण- मगमयमालानरमाननादीपति-परिवानादिमहान. ififal) मम माता गते, पनेतु यतको निप. । HARTH फायदाम कामा | मwittan । एमाण | मा. पुक पनि र । वामान ! कामा वामोर AR HI मान। दोगदारही मोगामिपि न .गति ANA.I प्रया प्राण: माणधी मापान, Amit formall, sit- :... nainl सान !!!" : पुन, .. .." Enrotiman RRATI

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३२४ पटनाभृते-- केण हं तस्मारकारणात् केन सहाह जल्पामि, अथवा केन कारणेन जल्पामि तेन मे मौनमेव शरणं । सव्वासवणिरोहेण कम्मं सवादि संचिदं । जोयत्यो जाणए जोई जिणदेवेण भासियं ॥३०॥ सर्वानवनिरोधेन मैकक्षिपयवि मंचितम् । योगस्थो जानाति योगी जिनदेवेन भाषितम् ।। सव्वामवणिरोहेण सāपामास्रयाणा मिथ्यात्याविरतिप्रमादकपाय- योगलक्षणानां निरोधेन निषेधेन । कम्म खयदि संचिदं कर्म शिपयति पूर्वोपार्जित तडागेऽभिनयजलप्रवेशाभावे संचितपूर्वजलशोषयत् । जोय- त्थो जाणए जोई योगस्थः ध्यानस्थित आमकलोलीमावमिलितो जानाति केवलज्ञानमुत्पादयति योगी शुम्लध्यानविशेषागमभापया केवली भवति । जिणदेवेण मासियं सिद्धार्थनृपनन्दनेन वीरेण कथितमिति भावः। जो मुत्तो ववहारे मो जोई जग्गए सकअम्मि | जो जग्गदि ववहारे सो मुत्तो अप्पणे कज्जे ॥३१॥ यामुप्तो व्यवहारे स योगी जागर्ति स्वकार्य । यो जागर्ति म्यवहारे स सुप्त भात्मन कार्ये ।। जो मुत्तो क्वहारे यो मुनिः मुप्त , फ! व्यवहारे व्यवहारमध्ये न पनितः । मो जोई जग्गए मकजम्मि म योगी जागनि मावधानो भवति, स्वकार्ये आत्मकार्ये कर्मक्षयविधाने । जो जग्गदि पाहारे यो योगी जागर्ति सावधानो भवति, क व्यवहारे लोकोपचारे । मो मुनो अप्पणे कन्ने स योगी मुनि मुनी न वेदयतेऽमावबानो भवति आमन: कार्य आत्मस्वरूपे । उक्त च- १ मचामानवाणामिति पाठ क. पुस्तके नास्ति । स पुस्तकान मेयोजितः । । । -

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AA ३२६ पामते- त्तयसंगुत्तो मिथ्यावकंदाहालः मम्यग्नानानुशीलनगठः मरित्रा- विगात्रः । झाणझयणं मया कुणह ध्यानाध्ययन मदा सर्वकार्ड कुम व हे जीव ! इति तात्पर्यार्थः । ग्यणनयमाराहं जीयो आगो मुणयन्यो । आराहणाविहाणं तस्म फलं केवलं गाणं ॥३४॥ नत्रयमाराधयन् जीव आराधको मुनितम्यः। आराधनाविधान तम्य फल केवलं ज्ञानम ।। रयणत्तयमाराई रत्नत्रयमाराधयन् । जीवो आराहो मुणे- यव्यो जीव आत्मा आराधको मुनिनव्यो ज्ञातव्य. । आगहणाविहागं इदमाराधनाविधनं विधिः । तम्म फलं केवलं गाणं तस्याराधना- विधानस्य, किं फल केवलं ज्ञान अनन्तकेवलज्ञानमिति अनन्तचतुष्टयं । सिद्धो मुद्धो आदा मध्याह मव्यलोयदरसी य । मो:जिणवरहिं मणियो जाण तुमं केवलं जाणं ॥३५॥ सिद्ध शुद्ध भारमा सर्वश. सर्वलोकदी च । स जिनवर भमित जानीहि स्व केवल ज्ञानम् । सिद्धो मुद्धो आदा सिद्ध आत्मोपलब्धिमान् । शुद्धः कर्ममल- कलकरहितः, ईदृग्वित्र आत्मा अतति समयैकेन ऊर्ध्वं व्रज्यास्वभावेन त्रिभुवनाम गच्छतीति आत्मा शुद्धयुबैकम्यभाव । मयाह सबलो. यदरिसी य सर्वज्ञ त्रैलोक्यालोकस्वरूपज्ञायककेवलज्ञानसमुपेत., सर्व- लोकदर्शी च सर्वशन्दनालोकाकाशो लम्यते लोकशब्देन पइद्रव्याधार- पत्रिभुवनमुच्यते तद्द्य दृष्टुं अवलोकयितु शीडमस्येति सर्वलोकदर्शी । घफार उक्तविशेषणसमुच्चयार्थ तेनानन्तवीर्यानन्तसौख्यविदादिरनन्त- १ रयणतयमाराई अयं पाठः क. पुस्तके नास्ति, म पुस्तकात् संयोजित । ३ माख्यादादि इ. स. पुस्तके पाठ।

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३२८ पट्माभूते- जं जाणइ न जाणं यजानाति तज्ञानं आमय जानाति तैनात्मैव ज्ञानमित्यर्थः । “त्ययुटोऽन्यत्रापि" इति वचनात् कर्तरि युट् । पिच्छइ तं च दंसणं गेयं यत्कर्तृभूत, पश्यति तदर्शनं ज्ञेयं ज्ञातय आत्मैव पश्यति तेन कारणेनात्मैव दर्शन। अत्रापि यत् कर्तरि युद् । चारितं भणियं परिहारो पुण्णपावाणं तदरित्रं भाणित प्रति पादित, तरिक ! परिहारः पुण्यपापानां आत्मैव पुण्यं पापं च परिहगति तेनात्मैव चारित्र । “पापक्रियाविरमण चरण किल" इति वचनात् । तथा चोक्त न किचित् पापाय प्रभयति न या पुण्यततये प्रसिद्धां शुदि समधियसतो वसविधुरा। मयेत् पुण्याययाखिलमपि विशुद्धषंगमपर मत पापाययेश्युदितमयतादो मुनिपतेः ॥१॥ मुनिपतिरत्र विद्यानन्दी समन्तभद्रो या मंतव्यः । अण्णं च-अन्यच वचनमस्तीनि भगवती निम्म्पयन्ति- तथाई मम्म तगगहणं च हवइ मण्णाणं । चारिन पग्हिागे पयंपियं जिणवरिंदेहि ॥३८॥ सनधि गभ्यकई तस्वग्रहण च भवति संज्ञानम् । चारित्र परिहार प्रतिशत जिनरेन्द।। तगई मम्मतं सत्याचे सम्या व सावाना जीवानीवालय यन्त्र मरनिरामशिक्षणापलशिताना मनाना रुचि प्रदा सम्पत्यमुष्यने । "तपायदान सम्यग्दर्शन " इति वचनात । तमगहणं च हवा मगाणं नत्याना योन.मनपायांना ग्रहण मम्पपिज्ञानमनि मनाने मम्पशान । चारित परिहाग चयि पारिया पनिहार: मम्माचार मानि । पयंपियं नियरिंदहि प्रमापन कति मिनवान्त ।

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- । ३३० पट्याभूते- श्रवणानां दिगम्बराणी अनगारपतीना पारकाणामपि गृहायानों अपिशब्दाचातुर्गतिकनीयानामपि । जीवाजीवविहत्ती जोई जाणेइ जिणवरमएणं । २ सणाणं भणियं अवियत्यं सब्बदरिसीहिं ॥४१॥ जीवाजीवविभक्ति योगी जानाति जिनवरमतेन । सन् संज्ञानं भणितं अपित गर्वसिभिः ॥ जीनाजीवविहली जीवाजीयानां विभक्तिः भेदस्ता जीगजीवरि भक्ति । जोई जाणइ जिणवरमएणं योगी दिगम्बी मुनिः, जानाति येत्ति यथायाम्पम्पमनि, जिनारमोन सर्पज्ञशामनेन । तं मण्णाण मणियं तभंज्ञानं भणित-तत्सम्याज्ञान कथितं । अवियत्यं मयद रिसीहिं अवितर्थ सत्यभूने, सर्वदसिमि महरिनि शेष. । उक्त ध- अन्यूनमनतिरिक्तं याथातथ्य यिना ध विपरीताम् । निःमन्देहं येद यदाहुम्तमानमागमिग ॥१॥ जं जाणिऊण जोई परिहारं कुणा पुणपापाणं । नंगाग्निं मणियं अवियापं कम्मरहिएण ॥४२।। यसमा योगो परिहार करोति पुण्यायो । नन् नारि भगिनं भविम्मनि ।। जं शामिण जोई याज्ञा या विज्ञाय योगी नो मुनि । परि- दार कृष्णा पुगपाराण परिहार परित्याग योनि पुष्पपासपीः नं चारिमं मणियं नहामना मकटी-टीमार नाम पर नबिटकमटेकताना भारि मादामनमान: मणित प्रतिमा दिन । केन कम्मरहिरण वानिकमपिगमेन गजेन । काभूत धारित, अगिपं अधिक मागरिकमारित गमः- Fort पाम्यातनामके ।

मी नाम। मी पाय ग ।।४॥ , जो पिगमगुगी : IT Train in । णा गई मंजही मंगाए पनि Haris किना गर EिREmi Azit नि: परम- गाया गया. मामांगा - पपदापमा पर। परमाणोजीपी पायर असरामर टापं ॥१॥ जिम्यागलपमी" रति यमना। मो पारद परमपयं में प्रागनिम मुभिसे, कि.गा। परमपावणेप्रमुनीन्तनन्द- वहितं स्थान परमनियांण । शायनी अप्पयं मुखं पाया गन् एका- नया चिन्तपन्, ६.! आमान निजामुदस्वभाषागतय, शुन द्रव्यधर्मभापकर्मनीफर्मरहितं रागोपमोहादिविवर्जित कर्ममा कागति अपमतमा प्राप्तमिति तापपर्धः । तिदि तिष्णि धरवि णिचं तियरहियो तह तिएण परियरिओ। दोदोमविप्पमुनो परमप्पा शायए जोई ।। ४४ निमिःोन प्रापा नित्य मिरहितः तथा निकेश परिजितः । दिवोपरिप्रमुषः परमारमान प्यायते योगी ॥ १ सालोऽयं टोमायो मास्ति मूलान् संसोजितः । २ परजोति तक्रियते पप न दारनुपात् तर पदीयते । प्रधानो जीयः प्रामोति भरामरं स्थानं ।।

। ३३४ पद्माभृते- मालिनी । तयापि पृष्टः स्वं कः ! 1 स आह । अब गिरी दक्षिणप्रेगो किन्नरगीतपुरप्रभुरत्नमालिमनोहयो: मुतोऽहं रुद्रमाली नाम । बहुमि- दिनः साधितविद्यार्थिमालिनीन्दुवदना सदनं जगाम । मातरपितरौ यो. मनो विज्ञाय तयोपियाहे चमतुः । तौ रतिरसरजितौ साधितप्रज्ञनिविदा नन्दनयने शान्तिहेतवे जिनस्नपनपूजनस्तयनानि कृत्या मुसे स्थितौ । मनोजयचित्तगौ तस्या मैथुनिकावागत्य महाजालिनीविद्यया रुमानिने या प्रगृध गती। सोऽपि सौ निर्जित्य पुनरागतः । धिमालिन्या सह निजपुरं प्रश्वेिश । सानुरागस्तस्यौ । एकदा राम्यं प्राप्य चारण- चरणमूले सभार्यो दिदीक्षे । तो परस्पर ममाय कान्ती भविष्यति ममेय प्राणप्रिया भविष्यतीति सनिदानौ सौधर्म सन्यासेन गती। तत्रापि दीर्घ- का रनिगु गुमला गन्धारदेशे माहेश्वरपुर स देय सम्पन्धरमहाराजमय- वयो: गुन, सात्यकिर्जातः । अबिमालिनीचरी देवी सौधर्माया मिन्धुदेश विशाटीपतने चेटकमहाराजसुप्रभादेव्योः सुना पेटा जाता ।सा मा पये मेव दत्ता । पो विवाहो न यते । भवान्तरे श्रेणिकहा- गनपुत्र कन्या मागाही भून्या अभयकुमारो नाम पूर्तस्तत्रागतः । तत्र गजाश्या चलना येष्टी य चालविया उपाय ला मुरंगया नि. मृतः। तत्रया जेष्टा भाभरणादिमिरण व्याधारिता स्वयं प्रेणिक भारा या जिनप्रतिमा गृही या गति तामत्र को न” । अरता " अ वृदागिन्या विना" इति मग fraमाया तापामणले दश जना । कन. न] कन्याया पानी या मनाम कुमार मगामी गया परयय ममागुन दिशामग्री नितिन सन् त तपस्तीमै पुर्वाण उत्तगोकर्णमनि मुक्त्वा कदाचित् राजगृह- नगरसमीपे उचगावपर्वते स्थितः । एकस्मिन् दिने तद्गुणानुरागिण्यस्त. ऋयास्ति बन्दितुमागताः । वन्दित्वा यावद्विरेवतरन्ति तावन्महामेघ. वृष्टिगता । आर्यास्तु स्तिन्यन्त्यो विव्हलीभूता यत्र तत्र गताः । जेठार्या सत्यकिमुने ही प्रविष्टा । तत्र वस्त्रं निष्पीलयन्ती ज्येष्टा सत्यकिना मुनिना दृष्टा । समुत्पनकामोदेकेण सा तेन भुक्ता । पुनरालोचनां निन्दा गर्हणं च कृत्वा श्रवणधर्मे स्थितः । सा सगी शान्त्यार्यया ज्ञात्वा पेटन्याः समर्पिता । तत्र तिष्ठन्ती सा पुत्रनसूत । स पुत्रोऽभयकुमारण स्वयंभूगुहायां क्षिप्तः । तत्र रात्रौ स्वप्नदर्शनाचेलनया स आनायितः । दर्शनौशाहं शमपित्वा स्वयंभूनामा कृतः । ज्येष्ठा तु निःशल्या भूत्वा गता । आर्यायाः पार्वे संपनियमान् पालपन्ती स्थिता । स्वयंभूस्तु वर्धमानः शिशूनां चपेटादिताडनेन सन्तापं करोति । तद्देव्या चलनया अपरमपि काटेनायुक्तं दृष्ट्वा स्वयंभूरक्तः । सलो जारजातो निर्टन किं केनापि स्वभावं मुंचति । सुकुटिं कृत्वा दुर्वचनेन शूलभिन्न इव ताडितः । पुनः स प्रणानं कृत्वा पृष्टयान्-मातः ! किमेतदुक्तं ! चेल- नपा तु न किमपि रक्षितं पधोक्तमुवाच । निजीपतिव्यतिकरं ज्ञात्वा उत्तर- गोकर्णपर्वतं गत्वा तत्सकिनुनि नत्वा वैराग्येण दिगम्बरो भूत्वा उत्तर- गोकर्णपर्वते स्थितः । गुरुशिक्षया मनोरट्वा स एकादशाङ्गानि शिक्षितः। तत्र रोहिणीप्रभृतयः पंचरातविया महातिराया आगताः सिद्धाः । अपरा अपि अंगुष्टनसेनाप्रभृतयः सप्तरात द्रविद्यास्तस्य सिद्धाः । विधातामन तिरो भूत्वा जन भीपयति। तदृत्तान्तः केनचित् सत्यफे- निरूपितः । गुरमा स उप-मुने ! तब तहेतुना विनासो भविष्यति । २ आदी समापि ही रा, पुस्तके एक्सरनान्तोऽपुर:

। पट्माभूते- तस्य मत्स्यबन्धस्य शीतटशरीरस्पर्शेन सा आप्यायिता। तया विषयाशया कर्मवशेन निदानं कृतं--अन्यस्मिन् भये प्रकटितपरमन्नेहोऽयं मन भर्ता भविष्यतीति । ईदृश निदानं कृत्वा काय विमुच्य सौधर्मेन्द्रस्य देवी जाता। कैवर्तस्तु संसारे भ्रमित्वा मिथ्यातपः कृत्वा ज्येष्टामुनो जातः । अथ सावस्तिपुरे राजा वासयः । तन्महादेवी मित्रवती । तमा विद्युन्मती नानी कन्या जनिता । तडिइट्स्य विद्याधरस्प सा दत्ता । सौधर्मेन्द्रदेवी ध्युत्वा विद्युन्मती गर्ने स्थिता । नयमे मासे कटेन जनिता । विद्युन्मती विद्याधरी पीडावशेन निर्विन्ना(प्णा) सती साँवस्तिनगरे पर्वतगुहायां त्याजिता । तत्र गुहायां चतस्रो द्विजपुत्र्यः श्रीडितुं कन्यापुण्येनागताः । उमा उमा इति शब्देन रटन्ती ताभिर्दया । उमेति नाम कृत्या सा कोमलागी कम्णया गृहमानीता । ब्राह्मणपुत्री- भिश्चतसभि सा कन्या राजकुले विद्युन्मत्या महादेच्या वासवनुपपल्याः (सा बालिका] दर्शिना । तयापि गृहीत्वा पुत्र्योः पुत्री निजधायाः पडि- सायाः पालयितु दत्ता । अथाष्टचन्द्रनृपेषु प्रधान इंद्रसेनाभिधानो गगनागणे सचोदित विमान एकस्मिन् दिने साँवस्तिमागत, । तस्य कुलस्त्रियाः निजभगिन्या अपत्यरहितायाः सन्मानपूर्वक मित्रवत्या वासयनृपभार्यपा गिरिकर्णिकानाम्न्याः सा उमा दत्ता। तयापि प्रतिपाल्य नवयौवना कृता। सा मुन्दरी मुरक्टपुरेशविद्याधरेशत डिगस्य परिणायिता । सा मदोन्मत्ता मुष्ठ मुरतानुरागा यदा सुरतमुखमनुभवति तदा तडिद्वेगो मृतः । उमा तु यौवनमर्दन स्वच्छन्दा जाता। विश्वस्तीमा देवदारुनगरे एकस्मिन् दिने गता । देवदारुणा तच्चारं ज्ञावा रतिगुणाविका सा स्थाणोविधा. १ सा. स. । २ सा. स. । स्वा. क. 1 पूर्वपादानुमारेग (सा) प्रवर्तितः । पुश्याः।४ विद्युन्मस्या.। ५ उमा। ६ , स. 1 ७ या. स., स्वा.. भयोध्यो ।

मोक्षप्रामत। ३३९ विभवस्वार्थमानमेनालिनस्याफारणेन च तस्य भार्या गुगर्भूनाना । भूतेदान्तु तस्या मुगाविदाप्रमून निरीक्षमाणोनि तिष्ठने । मरिमु सीतासीलोदादिषु सरनु मादिगु निरिध मे पिय व्यणोदादिमादेषु देवारमादिषु च बने सर्वमंगलया तथा सार्धमनुदिनं रममाण उबंगयां पर्यटति । स जटामुकुटपिभूपितो पाटो भरमौलिलो लोकान वदति-बहं बिजास्वामी, कर्ता, हर्ता, सिषः, स्वयंभूः शंभु , ईश्वर , १ः, शफर., तिस., पुसः त्रिपुरारिः, त्रिलोचनः, प्रतिगुद्धः, सर्वज्ञः, उमापतिः, भवः, ई., ईशानः, मुडः, मृत्युशयः, श्रीकण्ठः, बामदेव , महादेवः व्योमकेश इत्यादीनि मम नामानि । सहमेव यत्तेऽपरो नास्ति । भायात्री विजया बहूनि दिनान्युपिया जनमनासि मंत्रे रंजयित्वात्र भरत- क्षेत्रमागप तेन शैवशालं प्रकटीकृतं । तदीक्षिताः दोवाचार्या वहयो बभूवुः । दर्शितगुणा गणाः प्रभूता मिलिताः, तैः परिवृतोऽस्वलितप्र- तापोऽनवरतनुमाप्रेमानुरागो द्वादश वर्षाणि विषयसौख्यं भुंजानो मयां हतविपक्षो भमितः । तप्रतापं दृष्ट्वा सर्वेऽपि विद्याधरा अतिभीताः । तैविचारित एप महाविद्याबलीयानस्मान् मारपित्या उभये अपि श्रेण्यौ निक्षितं महीन्यति । फेनोपायेनायं खलो हन्यते पावन हन्तीति । सौफै चिन्ताकुलं दृष्ट्या मात्रा गिरिकर्णिकानाम्न्या निजमुतोमा भेदं पृष्टा- पुत्रि उमे ! मम आमातुर्विधाः कदाचिदपि अयशा भवन्ति न येति, उमा प्राह-मातनिरिकर्णिके ! यदायं मया सह मुरतमुखमनुभवति तदा मुरतकाले विद्या सस्प न स्फुरन्ति । इत्युपदेश रब्धा । गन्धारदेशे दुरंड- नगरे वनप्रदेशे मुरतमारदः, विद्याधरैः कान्तासहितस्य शिरथिच्छिदे। तस्मिन् हते तद्विद्याभिर्देश उपद्र्योद्वासितः । गृहे गृहे कृतवारः प्रविष्टः जीवधनं मुम्गाति । तमगरस्य राज्ञा विश्वसेनेन नन्दिपेणो मुनिः पृष्टः । भगवन् ! मरकोपसर्गस्य कः प्रत्ययः । मुनिरुवाच । रदनामा पद्माभूते- विद्यापरस्ता नगरे विधानामक्षमापणं कुर्वाणो मारितस्तेनोपम! पत।। ताई सामिन् ! उपसर्गविनाशः कथं भविष्यति ! सस्लिग विचारमो. पश्ये स्थापयिन्या यदि पूजयन्ति भवतस्तदा विया उपशाम्यन्ति। टपात उपशाम्यतीति तल्या शिवसेनस्तत्र गत्या सोऽपि जनपदी म्याइन । कामिया मचिका कृया सहिग रित्या तदुपरि मृन्या सागर गुरमगुपक्षोणि सदुपरि भृत्या तामध्ये ऊर्धमाण गिग स्थापयिता अटेन प्रक्षाव्य परिमलयलेन चन्दनेन यि पुष्पातादिमित्रों के राजाज्ञया पूजयिया दिन्त्रिपयोनमस्कारः कृतः तदा पियामिः क्षमा ता, झोकायोपरस्य विनाशी जातः । दिनमारभ्य प्रस्तान लोक- स्पेशा य जातमि यज्ञालिम कः श्रीमत्रायदई परमेश्वर परिणममदेव परमानीत । इति मोक्षप्राभने दीप पाम्यान जिनमुनापरिचायक समामग। त्रिण मिद्विगुई होर नियमेण जिग्णवादिता। मिरिण शिण हाइ पूण जीया प्रगति भयगहणे ॥ ४॥ शिद्धगुमति नियमेन निगि। wainन पुन श्रीमान भने । रिममिदिम निद्रा After : NAAMR iraniaHAT FAK न हो मानिस नियमान मन न करता निनन. का मेय. बीत पण म! Lating Aani PER - मोक्षाभूत । ३४१ रोचते । रातोः प्रपोगे चतुर्थी प्रोता “पम दिला गेवने धारपते या तसंसान" इति वचनात् संप्रदाने चतुर्थी तन्युन्, मारमादिति चन् । ददा रोचते तदा संप्रदान दातुन सेचते तदा पटोपोग एव । स्वोऽपि न रोचते पुनजीवरसेति सम्बन्धः । जीवा अच्छंति भवगहणे पेन कारणेन जिनमुना न रोचते भाषचारि भाषचारित्रमिति तोकादिमिरावते सेनेव कारणेन जीवास्तिष्ठन्ति भवगहने संतारवन । रदादिवन्यजिनमुद्रा नरकादौ पतन्ति । परमप्पय झापंतो जोई मुच्चइ मलदलोहेण । पादियदि णवं कम्मं णिदिदं जिणवरिंदेहिं ॥४८॥ परमामानं पापन योगी मुच्यते मलातीभेन । नादिष्टे नवं कर्म निर्दिष्ट जिनपरेन्दः ॥ परमप्पय झायंतो परमात्मानं निजामस्वरूपं प्यायन् । जोई मुचेइ मलदलोहेण योगी पानवान् मुनिर्मुच्यते परिहियते, फैन ! मलदलोभेन मलं पापं ददाताति मरदः तचासौ लोभी धनाफांक्षा तेन मलदलोभेन। णादियदि पवं कम्मं लोभरहितो मुनि दियते न वनाति, नर्व फर्म अमिन पापं, पूर्वोपार्जितं तु स्वयमेव क्षीपते । णिदिदं जिण- वरिंदेहिं निर्दिष्ट कथितं, जिनवरेन्द्रः जिनवरा एव इन्द्रात्रिभुवन- प्रभवस्तैनिनवरेन्द्रः सर्वधीतरागैरिति शेषः। होऊण दिढचरित्तो दिवसम्मत्तेण भावियमईओ। झायंतो अप्पाणं परमपयं पावए जोई ॥ ४९ ।। भूचा परिमः सम्यम्पेन मावितमतिः । पापमानानं परमादं मानोति योगी॥ * एतचिन्दनप्पगतः पास. पुस्तके नास्ति दिनेः इवि मूलटीका- मूतपदानुसारेण प्रशासितः। .

३४२ पद्माभृते- होऊण दिढचरित्तो दृढचरित्रोऽचलितचास्त्रिो भूत्वा । दिड सम्मत्तण भावियमईओ दृढसम्यक्त्वेन चलमलिनतारहितसम्यादर्श नैन भावितमतिस्तु यासितमनाः। झायंतो अप्पाणं झानवलेन ध्यान- नात्मानं । परमपयं पावए जोई परमपदं केवलज्ञानं निर्वाण च प्राप्नोति, योगी भेदज्ञानवान् मुनिः । चरणं हवइ सधम्मो धम्मो सो हवह अपसममायो । मो रागरोमरहिओ जीवस्म अणण्णपरिणामों ॥५०॥ चरणं भवति स्वधर्म धर्म स भवति भारमसमभाव । स रागरोपरहित. जीवस्य अनन्यपरिणाम:। चरणं हवइ सधम्मो चरणं चारित्रं भवति स्वधर्म आमस्वरूप । धम्मो सो हवइ अप्पसमभावो धर्मो भवति, कोऽसौ स एव यः स्वधर्म आत्मस्वरूप,स धर्म. कथंभूतः पप्पसमभावो-आमसमभाव आत्ममु सर्व- जीवेषु समभावः समतापरिणामः,याशी मोक्षस्थाने सिद्धो वर्तते ताश एक ममारमा शुदबुद्धकस्वभाव सिद्धपरमेश्वरसमान. यादृशोऽहं केवलज्ञान- स्वभावस्तादृश एव सर्योऽपि जीवराशिस्त्र भेदो न कर्तव्यः । मोरा रोसरहिओ जीवस्म अणण्णपरिणामो स आत्मसमभावः कथम स्तस्प टक्षण निरूपयन्ति भगवन्तः स आत्मसमभायो रागरोपरहि भवति य प्रति प्रीनिलक्षण रागं करोमि सोऽप्यहमेव, ये प्रति अप्री लक्षण द्वेष करोमि मोऽप्यहमव तेन गगरोपरहितो जीवस्यात्मनोऽन परिणाम एकलोलीभाव समत्वमेव परमचारित्रं झातव्यमिति । तर चोतं,- जीयां जिणयर जो मुणा जिणयर जीत्र मुणे। सो समभायपरिहिया सहुणियाणु लदे ॥१॥ १.टी. २जीवान् मिनवरं यो जानाति दिनवर जी जानानि। स सममावपरिस्थित. सधु निर्वाण लभते ।।

मोक्षप्राभतं। ३४३ जह फलिहमणि विमुद्धो परदग्वजुदो हवेद अण्णं मो। तह रागादिविजुत्तो जीयो हदि अणणविहो ॥५१॥ पमा पाटिमति: नि: परग्ययुतो भी अन्यःमः । सपा रागपिपिपुरः जीयो भशी रटमन्योन्यविधः । जह फलिहमणि विमुद्धो यथा येन प्रकारण पाटिकमणिः स्वभा- पेन विशुद्धो निर्मली वर्तते । परदवजुदो हवेइ अण्णं सो पदयण जपापुष्पादिना युतः, wri-अन्योन्याशो भवति । तह रागादि- विजुत्तो तया तेनैव स्तटिकमणिप्रकारेण रागादिभिर्विशेपेण युक्तः स्त्र्यादिरागयुतो रागादिमान् भवति । जीवो हवदि हु अणण्णविहो जीव लामा भवति दु-स्फुटं अन्योन्यविधोऽपरापरप्रकारो भवति-स्त्रीमि. योग रागवान् भवति शत्रुभियोग द्वेषयान् भवति पुत्रादिभियोग मोह- वान् भवति तात्पर्थिः । देव गुरुम्मि य भत्तो साहम्मि य संजदेसु अणुरत्तो। सम्मत्तमुन्वहंतो झाणरो होइ जोई सो ॥५२॥ देवे गुरौ च भरः सार्मिके च संपतेषु अनुरतः। सम्परपमुहान् प्यानरतः भवति योगी सः॥ देव गुरुम्मि य भत्तो देवे गुरी च भक्तो विनयपरः । साहम्मिय संजदेन अणुरत्तो सार्मिक समानधर्मेषु जैनेषु. संयते महामुनिपु, अनुरक्तोऽत्रिमस्नेहवान् वात्सल्पपरः। सम्मत्तमुबहतोसम्यक्त्वं सम्प- ग्दर्शनमुदहन मूर्धनि स्थपयन् । झागरओ होइ जोई सो एवं विशे- पणत्रयविशिष्ठ योगी अद्यागयोगनिपुणो मुनिर्यानरतो भवति ध्याना- नुरागी भवति तः। विपरीतस्प ध्यान न रोजत इत्यर्थः । तथा चोक्तं- सर्वपापालवे क्षीणे भ्याने भवति मावना । पापोहतवृत्तीनां ध्यानवातोपि दुर्लभ षमाभृते- । अन्यच्च- स्थयूथ्यान् प्रति सद्भावसनाथापतकतया। प्रतिपत्तियथायोग्यं यात्सल्यममिलप्यते ॥ २॥ उग्गतवणण्णाणी जं कम्मं सपदि मवहि बहुएहि । तं पाणी तिहिं गुत्तो सर्वइ अंतोमुहुत्तेण ।। ५३ ॥ उप्रतपसाजानी यत्कर्म क्षपते भवबंदु । तज्ज्ञानी ग्रिभिगुप्त क्षपयति भन्तर्मुहतेन ॥ उग्गतवेण उग्रतपसा तीव्रतपसा कृत्या । अण्णाणी अज्ञानो मुनिः आत्मभावनावियजितस्तपस्थी । कम्मं सवदि भवहि बहुपहि यत्कर्म पापकर्म क्षिपते भवैर्वहुक: कोटिमयैः शतकोटिभः सहस्रको- टिमः लक्षकोटिभः कोटिकोरिभवेत्यादिभिः । तं पाणी तिहिं गुत्तो तत्कर्म ज्ञानी भारमभावनापरः सूरिः तिहिं गुत्तो-निमिर्गुनी मनोवचनकायगुप्तिसहितः । सवेई अंतोमुहत्तेण क्षपयति दापमान- यति, कियति काले ! अन्तर्मुहूतन । कोऽसायन्तर्मुहूर्त इति धेत् :- आंधलि असंखसमया संशेजायटिदिदार उरसासी। ससुस्मासोथोओ सत्तरथोमो यो मणिभो॥१॥ भरतीसहया नाली दो नालिया मुदत्तं तु। ममऊणं नं मिर्ण अंतमुत्त अणेययिहं ॥२॥ इति गाथादयकयिनकमेण आयल्या उपार एक समयोऽधिको भवनि मोऽस्लमहूनों जघन्य कथ्यते । एवं ब्यादिसमपद्धपा समय- यहीनोऽग्नर्मुहर्न उन्? कथ्यते । मध्ये ऽमन्यानभेदा अन्तमर्मस्प झातम्या । नेयू कम्मिचिदन्नर्मुहमें ज्ञानी कर्म क्षपयति । एकेन सर- नदीनो मतो भिन्नमत उथ्यते इति भाव । दि.टी.धनयो छाया पूर्वजावारिशन पटे भागता।

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मोक्षप्राभृतं ।
३४५
सुमनोगेण मुभावं परदब्वे कुणइ रागदो साहू ।
सो तेग दु अगाणी पाणी एनो दु विवरीदो ॥५४॥
उभयोगेन मुभाव परदो करोति रागतः साधुः ।
स तेन तु मानो हानी एतस्माद्विपरीतः ॥
मुमजोगेण मुभावं शुभस्य मनोज्ञपदार्यस्पेटवनितादेः योगेन संयो-
गेन मेलनेनोपदौफनागत लागतेन सुभावं--शोभनं प्रीतिलक्षणं भावं
परिणाम । परदव्वे कुणइ रागदो माह परद्रले सामनो मिन्ने वस्तुनि
इबनितादो, फरोति विदधाति मुभावमिति सम्बन्धः, रागतः प्रेमपरिणा-
मात् । कः फी, साधुर्वेपधारी मुनिः पुष्पदन्तात् । तथा चोक्तं-
असायलयरन्यं भूलतानतकान्तं
नवनयनविला बारगण्डस्थलं च।
मधुरबचनगर्ने स्मेरविम्याधरायाः
पुरत व समास्ते तन्मुख मे प्रियायाः ॥१॥
फर्णावतंसमुखमण्डनकण्ठभूपा-
पक्षोजपत्रजयनामरणानि रागात् ।
पादेवलक्तरसेन व चर्चनानि
कुर्वन्ति ये प्रणयिनीपु त एव धन्याः ॥२॥
सोलाविष्टासपिलसमपनोत्पलायाः
হাতেনাঘঘোষ।
गपीपरपयोधरमंदसाया-
लस्था मा सहकदा ननु संगम: स्यात् ॥३॥
विच---
चित्रापनामभिर्मनमिजम्पापारसारामृत-
मादाम्बामपुरस्थितमिपतमापादमणाममः ।
समें मंगलदिभयोगविनयभीत्यमादागर्म-
सि मुनिदिनानि गमपरपुरकंठितः फानने ॥१॥

३४६ पद्माभृते- इत्यादिमुदतीचिन्तनेनाज्ञानी मूढः कय्यते । णाणी एनोदु विष- रीदो ज्ञानी निर्मोहो मुनिः एतस्मादुक्तलक्षणात् साविपरीतः शुभ- पस्तुयोगे सति राग न करोतीति तात्पर्यार्थः । आसबहेदू य तहा भावं मोक्षस कारणं हयदि । सो तेण दु अण्णाणी आदमहायस्स वियरीदो ॥५५॥ आसवहेतुश्च तया भावो मोक्षस्य कारणं भवति । स तेन तु अज्ञानी आत्मस्वभावात् विपरीतः ॥ आसवहेद् य तहा आस्रवहेतुध तथा यथेष्टवनितादिविषये राग मानवहेतुर्भवति तथा निर्विकल्पसमाधि विना मोक्षस्यापि रागः फर्मास्रवहेतुर्भवति । सो तेण दु अण्णाणी स साधुर्मोक्षेऽपि रागमा कुर्वाणः तेन कारणेन पुण्यकर्मबन्धहेतुन्वादज्ञानी भवति-मूढः स्यात् आदसहावस्स विवरीदो आत्मस्वभावानिर्विकल्पसमाधिलक्षणात्म- प्यानरूपाद्विपरीतः । तथा चोक्तमेकत्वसप्तत्या-- स्पृहा मोक्षेऽपि मोहोत्था तन्निधाय जायते। अन्यस्मै तत्कथं शान्ताः स्पृहयन्ति मुमुक्षयः ॥१॥ जो कम्मजादमइओ सहावणाणस्स संडदूमयरो। सो तेण दु अण्णाणी जिणमासणदूसगो भणिदो ॥५६॥ य कर्मजातमतिक स्वभावज्ञानस्य राजदूषणकर । स तेन तु अज्ञानी जिनशासनदूषको भणित ॥ जो कम्मजादमइओ यः पुमान् कर्मजातमतिक इन्द्रियानिन्द्रि- याणि खलु कर्मजातानि तदुत्पन्नमतिलेशसंयुक्तः । सहावणाणस्म खंड- दूसयरोस्वभावज्ञानस्यामोत्थज्ञानस्य केवलज्ञानस्य दूसयरो-दोपदायकः। 1) भात्मनः खल्वतीन्द्रियज्ञानं नास्ति चक्षुरादीन्द्रियजनितमेव ज्ञान वर्तते मोक्षप्राभृतं । ३४७ इत्येवं स्वभावशानस्य दागकरो भवति, अतीन्द्रियासानं न मन्यते । दड- दूसयरोभारमानेन दृपणकरः कम्मिनिष्पादधिः।मोतेण दुअण्णाणी स पुमान् तेन तु पणदानेन अज्ञानी जातन्यो शानीयोहयो वेदितव्य इति यायत् । स कथंभूतः, जिणमायणनगो भणिदो जिनशासन- स्याहतमतस्प दूपको दोपभाषको भणित:-स नरकदुरा प्राप्स्यति । तथा चोक्तं पुष्पदन्तेन महाकविना काव्यपिशाचखण्डकपपरनामदयेन- अणिदिओ पाणमउ जो मामूदुन पत्तिया । सो किंदिउ पंचिंदियणिरउतरणिहिं पाणिउ पिया ॥१॥ णाणं चरित्तहीणं देसणहीणं तवेहि संजुत्तं । अण्णेसु भावरहियं लिंगरगहणेण किं सोखं ॥ ५७ ॥ ज्ञानं चारित्रहीनं दानहीने तपोभिः संयुक्तम् । अन्येषु भापरहितं लिङ्गप्रदान कि सारपम् ॥ गाणं चरित्तहीणं ज्ञानं चरित्रहीनं सौख्यकरं न भवतीति सम्बन्धः दसणहीणं तवेहि संजुत्तं दर्शनहींने सम्यग्दर्शनरत्नरहित तपोमि संयुक्तं कर्म तौल्यकर न भवतीति सम्बन्धः । अण्णेमु भावरहिर मन्येषु पडावश्यकादिषु भायरहितं कर्म । लिंगग्गहणेण किं सोक्र्स लिंगमहणेन वेपमात्रेण आमभावनारहितेन कर्मणा किं सौख्यं भवति- अपि तु सर्वकर्मक्षयलक्षणं मोक्षनुखं न भवतीति भावार्थः । अञ्चेवणं पि चेदा जो मण्णइ सो हवेइ अण्णाणी । सो पुण णाणी भणिओ जो मण्णइ चेपणे चेदा ॥५८। अचेतनमपि चेतपितारं यो मन्यते स भवति अज्ञानी। स पुन ज्ञानी भनितः यो मन्यते चेतने चेतवितारम् । मस्त मापा पूर्व ३०० गता।

पनामृते- होर पनिग्नु न पोलिहिं उपयाम नउ घम्मु । पउ अयाणउ सो पया जमु कर भारउ कम्मु ॥१॥ पोलियहि मणिमोत्तिया घणु केत्तियदि मार। योरदि गरिउ यमद्दडा तं नाहीं अंगार ॥२॥ आत्मशुद्धिरियं प्रोक्ता तपसय विचक्षणः। किमिना बिना गुद्धिरस्ति कांचनशोधने । १॥ बाहरलिंगेण जुदो अभंतरलिंगरहिदपरियम्मो । सो सगचरित्तमहो मोक्सपहविणासगो साह ॥ ६१ ।। पहिलिगेन युतो अभ्यतरलिंगरहितपरिकम्मा । स स्वचरित्रनर मोक्षपथविनाशक साधुः ।। बाहिरलिंगेण जुदो बहिलिंगेन युतो नममुद्रासहितः। अभंतर• लिंगरहिदपरियम्मो अभ्यन्तरलिंगरहितपरिकर्मा आत्मस्वरूपभावना- रहित परिकर्म भंगसंस्कारो यस्य सोऽभ्यन्तरलिंगरहितपरिकर्मा । सो सगचरित्तभहो स साधुः स्वकचरित्रभ्रष्टः । मोक्खपहविणा- सगोसाहू मोक्षपथविनाशक साधुः स साधुर्मोक्षमार्गविध्वंसको ज्ञातव्यो ज्ञानीयो ज्ञेयः । इति भाव ज्ञात्या निजशुद्धबुद्धकस्वभावे आत्मतत्वे नित्यं भाषना कर्तव्या साधोः। मुहेण भाविदं गाणं दुहे जादे विणस्सदि । तम्हा जहारलं जोई अप्पा दुक्सेहि भावए ॥ ६२ ॥ सुरसेन भावित ज्ञान दुखे जाते विनश्यति । तस्मात् ययावलं योगी भात्मानं दु सै भावयेत् ॥ सुहेण भाविदं गाणं मुसेन नित्यभोजनादिना भावित वासित ज्ञान आमा । दुहे जादे विणस्सदि दुःखे जाते सति भोजनादेर- प्राप्तौ सत्यां विनश्यति आत्मभावनाप्रच्युतो भवति । तम्हा जहा- ।

मोक्षप्राभूतं । ३५१ चलं जोई तस्माकारणायथायलं निजामपनुसारेण योगी मुनिः । अप्पा दुपखेहि भावए सामानं दुःसैरनेकतपःशैः भावयेद्रासयेत् दुःसान्यातं कुर्यादित्यर्थः । आहारासमणिदाजयं च काऊण जिणवरमएण । झायव्यो णियअप्पा पाऊणं गुरुपसाएण ॥ ६३ ।। आहारासनन्दिाजपं च कृत्वा जिनपरमवेन । प्पातयो निजामा झाल्या गुरप्रसादेन । आहारासणणिद्दा जयं च काऊण जिणवरमएण आहारासन- निदाजपं च कृत्या जिनपरमतेन, शनैः शनैः आहारोज्य: कियते । शनैः शनैरातनं पसातनं उद्धासन चाम्पस्यते । शनैः शनैः निद्रापि स्तोका स्तोका निपते एकस्मिन्नेव पार्चे पार्श्वपरिवर्तनं न क्रियते। एवं सति सर्वोऽप्याहारस्यतुं शक्यते। आसनं च फटाचिदपि त्यक्तुं (न) शक्यते। निद्रापि कदाचिदपक शक्यते । अभ्यासात् किं न भवति ! तस्मादेव- कारणास्वलिभिः कदाचिदपि न भुज्यते । पमासन एव वर्षाणां तह- तैरपि स्थापते, निद्राजयेनाप्रमतर्भूयते, स्वप्नो न दृश्यते । एवं जिनवर- मतेन वृपभस्वामिवीरचन्द्रशासनेनानुशील्यते । झायवो णियअप्पा ध्यातव्यो निज आत्मा। पाऊणं गुरुपसाएण आत्मानमष्टाङ्ग च जावा गुरुप्रसादेन निमन्याचार्पवर्यस्प कारुपेना गुरुप्रसादं विना "द्र- प्रन्यो रेऽपमात्मा प्रोतव्योऽनुमन्तव्यो निदिच्यासितव्य" इति ब्रुवदभिरपि वेदान्तवादिभिर्निरत्तैः केनापि जनेन याज्ञवल्ल्यादिना न प्राप्त इति भावार्थः। अप्पा चरित्तवंतो दंसणणाणेण संजुदो अप्पा । सो झायचो णिचं णाऊग गुरुपसाएण ॥ ६४ १नि.टी.

।
३५२
पप्राभूते-
आत्मा चारित्रवान् दर्शनज्ञानेन संयुत भारमा ।
सध्यातम्यो नित्यं ज्ञात्वा गुरुप्रसादेन ।
अप्पा चरितवंतो आत्मा चारित्रवान् वर्तते आत्मात्मानमेवानुतिष्ठ.
तीति कारणात् यस्य मुनेश्चारित्रे प्रीतिरस्ति स आत्मानमेवाप्रपालति
भावार्थः । दसणणाणेण संजुदो अप्पा दर्शनेन ज्ञानेन च संयुतः
संयुक्तः, कोऽसौ । आत्मा जीवतत्वं, अत्रापि स एव भावार्थ:-पस्य
मुनेर्दर्शने प्रेम वर्तते ज्ञाने यानुरागोऽस्ति स मुनिरात्मानमेवाश्यतु तद्-
पमपि सौय वर्तते यस्मात् । सो झायच्यो णिधं स आमा ध्यातव्यो
नित्यं सर्वकाले । रत्नाना त्रयस्योपायभूतस्यात्मलामे मोक्षलाभे या प्रीति.
मत इत्यर्थः । णाऊणं गुरुपमाण्ण गुरोर्निप्रन्याचार्यस्य शिक्षादीक्षा-
चारवाचनादेध कर्तुः प्रसादेन यारण्येन । अयं यस्नुस्वभागो यतते
यदाचार्यप्रसन्नतयात्मलाभो भाति तद्विराधने सयामा न फुटी-
मवति । तथा चोक्तं-
गुणेषु दोषमनीपयाग्धा
दोषान् गुणाकर्तुमधेशते थे।
श्रोतुं कयीनां पचन न तेऽदा
सरस्वतीदोदिपु कोऽधिकारा॥
अथवा गुमणो पचतयानो परमेटिनो प्रमादादामा प्रमुर्लभ्यते।
तेपो प्रमाद विना मामाभुन प्राप्यत इयर्थ । यया गजान पाम:
कथित् पुमान नामान्त कादीन ग पश्यनि नेतु गनान मेश्यन्ति,
नाननाय नमशिन लभ्यते इति काणा 1 पंचदेवताः
प्रमादनीया आमामा दना योगिनि मापा ।
दामे पाइ अया अप्पा गाण मागा दुसर्ग।
माविषमहारम्गिो पिमान गिल पर ।। ६५॥

मोक्षप्राभृतं ।
३५३
दुःरोन हारते साना सानानं जाया भावना दुःराम् ॥
भावितरपनायास्मो विपप्पु रिस्पति दुःराम् ।।
दुरखं पसइ अप्पा दुःसेन महता कन तापदामाज्ञायते मामास्तीति
बुद्धिरूपयते । अप्पा पाऊण भावणा दुक्खं पयामास्तीनि ज्ञातं तदा
तस्मिनात्मनि भावना वासनाऽहनिशचिन्तनं तद्गुणस्मरगादिकं दुःखं
दुभाष भवति । भावियसहावपुरिसो चिसएस विरचए दुक्खं
भावितस्वभावः पुरुष आमभावनासहितोऽपि तरिः यद्विपपेषु वनिता-
जनस्तनजधनबदनलोचनादिषिलोचने तहार्तालापगोष्टी शरीरस्पर्शनादि-
सुखेषु विरस्पति तानुसं हालाहलविपास्वादनानानाति तदतीव दुःख
दुष्करमिति तात्पर्थिः।
ताम ण णजइ अप्पा विसएमु गरो पवट्टए जाम ।
विसए विरत्तचित्तो जोई जाणेड़ अप्पागं ।। ६६ ।।
तापत् न ज्ञापते आत्मा विषयेषु नरः प्रवर्तते यावत् ।
निरपे रिलचित्तः बोगी जानाति बारमानम् ॥
ताम प पजड़ अप्पा ताकाटमात्मा न ज्ञायते । तापस्किपत् !
विसएसु परो पवट्टए जाम यावका विषयेषु पूर्वोक्तलक्षणेषु नरो
जीयः प्रवर्तते न्याप्रियते । विसए विरत्तचित्तो विषये पूर्वोक्तलक्षणे
विरक्तचित्तो निवृत्तचेता यती। जोई जाणेइ अपाणं योगी पानवान्
पुमान् महामुनिरामानं जानाति प्रत्यक्षतपा पक्ष्या ।
अप्पा पाऊण परा कई सम्भावभावपमहा।
हिंडेति चाउरंगं विसएमु धिमोहिया मूढा ।। ६७ ।।
भारमान शाया नराः कचिसापभावनाः ।
हिन्दन्द सादुर सिमेनु विमोहिता भूताः ॥
न.रो.

- । ३५४ पद्मामृते- अप्पा पाऊण गरा आत्मानं झात्या आत्मास्तीति सम्पग्विज्ञाय नरा बहिरात्मजीवाः । केई सन्भावभावपन्भट्टा केचित सद्भावभाव- प्रभ्रष्टाः केचित् विवक्षिताः सन् समीचिनो भावः सद्भायः निजाम- भावना तस्माप्रभ्रष्टा निजशुद्ध बैकस्वभावात्मभावनाप्रय्युता विषयमुस- दुर्भावनामु रता इत्यर्थः । हिंडंति चाउरंग हिण्डन्ते परिभ्रमन्ति पर्प- टन फुर्वन्ति चाउरंग-चतुरंग भवं चातुरंग चतर्गतिसंसारसंसरण पया भवत्येव । विसएसु विमोहिया मूढा विषयेषु पंचेन्द्रियार्थयु स्पर्शरस- गन्धयर्णशब्देषु विमोहिता लोभं गताः, ते च विषया अनादिकाले जीवे. नास्वादिसाः, आत्मोत्यस्वाधीन मुख कदाचिदपि न प्राप्ताः । सया चौक- महष्ट किं किमस्पृष्ट किमनाघ्रातमभुतं । किमनास्यादितं येन पुनर्नयमियेक्ष्यते ॥ १॥ भुक्तोनिक्षता मुटुमोहान्मया सऽपि पुद्रलाः । उस्रिग्विय तेष्यच मम यिनस्य का स्पृक्षा॥२॥ विषये विमोहिता येते मूढा अज्ञानिनो यहिरामान इत्यर्थः । तेन बहिरामभाय परियश्यामभायना फर्नध्या । जे पुण विमयविरत्ता अप्पा णाऊण मावणामहिया । ठंडनि घाउरंग नवगुण नुता ण संदही ।। ६८ ॥ ये पुन विषयविरमा आन्मानं मावा भावनामहिताः । स्यन्ति वारस तपोगुगयुक्तान गन्देह ॥ में पूण विमयविरता ये पुनगगनभव्य जीवा शिपयन्यो विरता: पगड्मया मिष पनविषभावना । अपा माऊग मारणामाहिया आत्मान बाया बाम वन महिना भनि। एंडनि पारंगते दुरपाम्यन्ति, कि • पाना ममा । नरगुणनुमा ग संदेरी तर बाग.टी.ना । ।

मोक्षप्राभृतं । ३५५ एवं गुणस्तपोगुणस्तेन युक्ताः । अथवा तपो द्वादशभेदं गुणा अष्टाविं- शतिर्मूलगुणा उत्तरगुणाय बहुभेदास्तैयुक्ताः संसारं त्यजन्ति अत्र सन्देहो नास्ति संसपो न कर्तव्यः । वक्तं च गौतमेन महर्षिणा- पदंसमिदिदियरोधो स्टोचावस्सयमचेलमदाणं । खिदिसयलमदंतवणं ठिदिमायणमेगमत्तं च ॥१॥ एदे पलु मूलगुणा समगाणं जिपयरेदि पण्णता। पत्य पमादपदादो याचारादो नियत्तो हं॥२॥ परमाणुपमाणं वा परदव्वे रदि हवेदि मोहादो। सो मृढो अण्णाणी आदसहावस्त विवरीदो ॥६९।। परमाप्रमाणे या परदम्यै रविभवति मोहार । समूहोनी बारमरयमावादिपरीतः परमाणुपमाणं या परमाणुप्रमाणे पास परदचे रदि हवेदि मोहादो परद्रय रतिर्भवति मोरादज्ञानात् परमाणुमात्रापि रतिर्मोहा- दरानागपति, किमुच्यते यव्ही रतिः ! महती रतिस्तु अदानाद्भवत्येव । सो मृटो अपाणी यस्य पदन्ये रुपादिविषय रतिर्भवति स मुनि- मुंहः सत्य पचोऽजानाति । जादसहावस्त विवरीदो त मुनि- रामसभापतिपतीतः परम्परत गुप्यते बहिराना पाप्यत इति भावार्थः । एवं हा परमानानं परिवार परदन्ये रतिर्न पर्तव्यति सारथिः। सपा ज्ञापतापं देनगमुदीप दिढचरिना। होदि धुरं पिया मिण विरनचिना ॥७०}} TERRENT: : मामाग। EHREETभारसम TURE मा । Pारि पद्माभृते- मात्मानं प्यायतो दर्शनशुद्धीना हटवारित्राणाम् । भवति धुवं निर्वाण विषयेषु विरक्तचित्तानाम् ॥ अपा झायंताणं आत्मानं ध्यायता मुनीना । दसणमुद्दीण दिव. चरित्ताणं दर्शनस्य शुद्धिमन्य चलमदिनत्वरहितसम्यक्त्वानां चर्मजर- मृततेलभूतनाशनादिपरिहरतो शरीरमाप्रदर्शनेन परगृहेषु कृतादिदोष- रहिताशेनमश्नता दर्शनशुद्धिमता, दृढचरित्राणां ब्रह्मचर्पप्रपामयानादि- ढचारित्राणां । होदि धूर्व णिव्याणं मरति ध्रुवमिति निधन निर्वाण मोक्षो भवति । विमएमु विरचचित्ताणं विषयेषु इवनिता- लिङ्गनादिपु विरक्तचित्ताना विषयान् विष मन्यमानानामिति संक्षेपनोऽयों पातम्यो ज्ञानीयो य इति । जेण रागे परे दव्ये संमारम्म हि कारणं । नेणावि जोइणो णिच्चं कुज्जा अप्पे ममावणा ॥७१॥ येन रागे परे दम्ये मंगारस्य दिकारणम् । देनानियोगी निरय कुश्यांदरमनि स्वभावनाम् । जेण गगे पर दव्ये येन वनितादिना पर्यायण, रागे सनि राग टपाने, पाकीये दय्ये आमनो भिन्ने यातुन । संमारग दि कारण स राम कार्यभूना, ममाराय भवभ्रमणम्य, दिनिमयेन, कारण हेतुः । तणांवि न केल या मनि आ गभावना पुर्यात् फितु तेनार यनि- नादि।। जांदणी य। नियगर्वका अपमत्मनि। समा- पना आममानाकुयान। कामिनि चेतापनियनिता अनन्त- के.सारमा ममा माननालयानमयोग, । कनाननी वनानेन यमणाम! R40 का नाम - मनयन मरकाना नया चालनिपत १५ । । ४. योगा।

मोक्षप्रामृते । ३५७ यस्मिन् सर्याणि भूतानि भात्मयाभूद्विजानतः । तमको मादफरशाय एफस्यमनुपश्यतः ॥१॥ जिंदाए य पसंसाए दुपसे य मुहएमु य । सत्तूण चैव पंधूर्ण चारित्तं समभावदो ॥ ७२ ।। निमालीप प्रमादुरो समुपु च। गुना सन्धून चारि समभापतः । णिदाए य पसंसाए निन्दायां प्रशंसायां च समभावतक्षारित भव- तीति सम्बन्धः । दुक्से व मुहएमु ये दुखे च मुराके च समागते. भियुपस्कारः। सत्तृणं व बंधृणं पाणां चैव धूनां समायोगे रत्युपस्कारः । चारित्तं समभावदो समभावतः समतापरिणाम सति चारित्रं भवतीति निर्विकल्पसमाधिरूपं पयाख्यातं चारित्रं भवतीति भावार्थः चरियावरिया वदसमिदिवज्जिया मुद्धभावपमहा। कई पंति पराग हु कालो झाणजोयस्स ॥ ७३ ॥ चावारिस प्रतसमितिवर्जिता गुदभावप्रश्रयाः । ऐति उत्सन्ति नराः न हि कालो प्यानयोगस ॥ चरियावरिया चर्यायाधारित्रस्य आवरिका आवरणं येषां ते चर्या- परिकाः चारित्रमोहनीयकर्मयुक्ताः । वदसमिदिवज्जिया व्रतसमितिर- जिता नतरहिताः समितिहीनाथ । सुद्धभावपन्भहा शुद्धभावप्रभ्रष्टा रागद्वेपनोहादिभिः परिणामः फरमलीकृता आनध्यानहीनाः । केई जंपति परा फेचिद्वहिरानानो नराः पुरुषा जल्पन्ति युवन्ति । किं जल्पन्ति ! ण हु कालो झाणजोयस्स ध्यानयोगस्य अटागयोगमध्ये सप्तमो योगो पानयोगस्तस्य कालोऽवसरो न वर्तते । कथं! हि-सुटं । के ते महागयोगा:- १च. टी.। २न..!

३५८ पद्मामृते- यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाभ्यानसमाधयः । इति । सम्मत्तणाणरहिओ अमव्यजीवो हु मोरंखपरिमुको। संसारमुहे मुरदोण हु कालो भगइ झागरम ॥ ७४ ।। सम्यक्त्वज्ञानरहितः अमस्यजीवो हि मोक्षपरिमुफः संसारपुसे मुरतः न हि कारी भगति प्यानस्प। सम्मत्तणाणरहिओ सम्यम्वरहितो मिध्यादृष्टिः, ज्ञानरहितोऽज्ञानो मूढजीयो बहिरामा। अभबजीयो हु भोरखपरिमुक्को अभन्य- जीवो रत्नत्रयस्यायोग्यो लौकादिको मोक्षपरिमुक्तः तस्य कदाचिदपि कर्मक्षयो न भविष्यति स न सेत्स्यति कंकटूकमुद्गवत् । संसारमुहे सु रदो संसारसुखे पनितायोनिमधनमुग्वे, सुरत: सुलु अतिशयेन रतः तत्परः । ण हु कालो भणइ झाणस्स एवं दोपदुष्टो भणति बने, कि भणति ! ध्यानस्य कालो न भवति । कथं ! हु-स्फुट। पंचमु महबदेमु य पंचमु समिदीम तीमु गुत्तीम् । जो मूढो अण्णाणी ण हु कालो भगद झाणस्स ॥७॥ पञ्चसु महारतेषु च पधमु समिति निस्पु गुप्तिः । यो मूह, अज्ञानी न हि कालो भगति ध्यानस्य । पंचमु महव्वदेसु य पंचमु महावतेषु च प्राणातिपातमृपावादस्तै- न्यमैथुनपरिग्रहसर्वथापरित्यागो महानतमुच्यते एतेषु पंचमु महानतेपु यो मुदश्चारित्रमोहबलवत्तर । चकारादणुतानामपि अप्रतिपालको रानिमो- जननियमरहित चर्म जलघृततैटरामठास्वादनमठ 1पंचमु समिदीसुखीमु गुत्तीमु ईयाममिति:-करचतुष्टयं मार्गमवलोक्य गमनं, मापासमिति:- आगमाविरुद्धभाषण, एपणासमिति.-पूर्वोक्तपट्चत्वारिंशदोपरहिताहार- प्रहणं, आदाननिक्षेपणासमिनि -ज्ञानोपकरणशौचोरकरणान पूर्व दृष्ट्वा " मोक्षमाभृतं । ३५९ पक्षान्मयूरपिकः प्रतिलेख्य इणं वितर्जनं च आदाननिक्षेपगासमितिः, प्रतिष्ठापनासमितिः मलमूत्रशरीरादिकस्याविरुद्धनिर्जन्तुप्रदेशे विसर्जन एतासु पंचनु समितियो मूढो निविवेकः । सिपु गुति मनोगुति- बाग्गुति कारगुतिः। जो मृढो अगाणी यः पुमान् मदो निर्विवकोऽ- ज्ञानी गिनतूत्रहितः । गहु कालो भगड़ साणस्त न विद्यते हु-स्कुटे, कोऽसौ ! कालोऽवसरः, पानस्य सप्तमयोगस्य, एवं भगति दूत । भरहे दुस्समकाले धम्मझागं हवेइ साहुस्त । तं अप्पसहावठिदे ण हु मण्नइ सो वि अगाणी १७६।। भरते दुःमले धम्यान भाति सायोः । तदानसभापरिपतेनहमन्यते सोऽपि ज्ञानो। भरहे दुस्समकाले मरहे-भरतक्षेत्रे भारतवर्षे, दुःपमे काले पंच- मकाई कठिकाअपरनानि फाले। धम्मज्ञाणं हवेइ साहुस्म धर्मपान भवति साधोदिगन्धरस्य मुनेः । तं अप्पसहावठिदे तद्धर्भपानं साम- स्वभावस्थिते आमभावनातन्मये नुनो भवति । पहु मगइ सो वि अनापीन मन्यते नाहीकरोति सोऽपि पुमान् पापीयान् सज्ञानी जिनमबाह्यः । अन्ज वि तिरयपसुद्धा अप्पा झाएवि लहहि इंदनं । लोयंतिपदेवतं तत्य चुआ पिनुदि ति ।।७७॥ सात दिलाननं वाला समन्डेसन् । शनिदेश दतः पुमा निसंग पान्ति । जज वि तिरवपमुद्धा महार पंचममोपला समना पचे- निद्रपा उत्तम दिसामानमाता दैराग नहीलदशालिनदाः सम्प- काशनचाविनिर्मा पन्त , ये पापन्नि महानतिनो नन्त से नालिस मिनन्नता जताः । ते मनमा पुर्वन्ति !

- ३६० पद्माभृते- अप्पा झाएवि लहहि इंदत्तं आत्मानं घ्याला भावयित्वा लभन्ते इटाई शकपदं । न केवलमिन्द्रत्वं लभन्ते, लोयंतियदेवत्तं केचिदल्पश्रुता अपि साधय आत्मभावनाबलेन लौकान्तिकाव लभन्ते पंचमवर्गस्यान्त पन्त. प्रदेशेषु तेषां विमानानि सन्ति, तत्रभवा लौकान्तिका: मुरमुनयन कश्यन्ते, ते स्वर्ग स्थिता अपि ब्रह्मचर्य प्रतिपालयन्ति-स्त्रीरहिता भवन्ति, ताथ- फरसम्बोधनकाल मय शेकमागग्छन्ति अन्यथा स्वस्थानमेवापतिष्यन्ते । चतुर्लक्षाः महन्नाणि सप्त चंय शताटक। विशनिलिता पते युधैलाशस्तिका मताः ॥१॥ " सारस्यत्यादिस्ययनमरणगर्दतायनुपिताठयायाधरिष्टाच" इति तेषा भटी जाराय. । तया तेषां पोडशजातयश्च वर्तन्ते। सारस्वतादित्यान्तरे अग्न्याभसूर्याभा. | आदित्ययहिमध्ये चन्द्राभमन्यामाः । पन्धरणान्दो श्रेयस्करक्षेमकरराः । अरुणगर्दसीयमध्ये गृपभोष्ट्रकामचरा | गर्दसौपनु- पिनान्तरे निर्वाणर जोदिगन्तरक्षिताः । तुपिताम्यायाधमध्ये बारमरहित. साशिता । अन्यायाधारियातर मरुद्वमय । अरिटसारस्तान्तरे मा. विश्वाः । मन्थ गुप्रा णिदि जंनि सस्मारयुता निति निर्माण पानि गछति । स पूर्वधाणि एकं गर्भवास गृहीत्या मोक्ष मानुपन्ति । जे पावमोदिपमई लिंग घेतृण जिणवरिंदाणं। पावं कृणनि पारा ने चला मोगामग्गम्मि ॥७८॥ ये पापमालमतय त्रिीला प्रिोग्राम। पाला ने ग्यना माम॥ जे पावमांदियमई 4 मुन्य पापमHARAT पापेन प्रा. मंगवामाननबनाना माना काम पिता पारमारिनमः । लिंग अंग विदार्ण ii चिनमा नन । यत्रमा ।

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पट्मामृते- परोपहसहनशीला । जियकमाया फ्रोधमानमायामापापरहिताः । पावारंभविमुक्का पापाभेम्यो विमुक्ता रहिता हिंसादिपंचपात रुषि- होना. सेवापियाणिभ्यादिप्राणातिपातहेतुभूतारम्भरहिताः । ते गहिया मोग्रामग्गम्मि ते गृहीता अङ्गीकृता, मोक्षमार्गे नत्रपक्षणे । उद्धद्धमझलोए केई मज्झं ण अहयमेगागी । इय मावणाए जोई पावंति हु मामयं मोरसं ॥८॥ अवधिोमध्यलो के केचित् मम न महकमेकाली। इति भावनया योगिन प्रान्ति हि शाश्वत सौरयम् ॥ उद्धमझलोए ऊर्यलोकेऽधोलोके मध्यलोके । केई मग्न अयमेगागी कविजीया मम न वतन्ने, अहो असे एकाकी एक एप वर्ने । इय भावणाग जोई इति भागनया योगिनो मुनयः । पानि गामयं गोरगं प्राप्नुवन्ति लभन्ते हुए शाधन मौन्य अधिनन्धर पानिर्वाणमुप। ठाणं इति पाठे शाश्वत अग्निधा याने मात्र प्रानुबनी। दागुरुग मना णि-सपा चिनिनना। माणग्या गुरिमा नै गहिया मांसामग्गम्मि ।। ८२ ॥ - मनशाण विनियन बाना पचाया दीना मोशमा।। वारण मनापानामगर माना... *. FIना अपमानानिहाशमिता या मानान-नागा." प्र.पणाममुद्रपा' ' ANNEL पानाताना निम.. १॥जोशाप. infeftना गा" ..नजामानातान गौर:- । . .

मोक्षप्राभूत। मणिमयानामपापकानां गौवधं कृत्या संवत्सरे मातृभगिन्यादिभोगालम्प- टानो भव्यजीवसंबोधने मातृपित्यारितोपदेशकानां पापघटामाहकाणां, इत्यादिसावयकर्मरहितानां प्रासुफपरगृहयोग्यभोजनभोजकानां अवर्णलो- पकानामनुरिउम्भुक्तिमहणमार्गाणा इत्यादिगुणगणगरिष्ठानां जगदिष्टानां गुरुणां ये भक्ताः पादपंकजमधुलिहाः (हः) देवगुरूणां भक्ता इत्युच्यन्ते । पिवयपरंपरा विचितता निर्वेदः संसारशरीरभोगविरागता तस्य परं- परा नानाविधोपदेशस्ता विशेषेण चिन्तयन्तः पर्यालोवयन्तः नरका- दिगतिगर्तपातिपातफभयभीतमूर्तयः । झाणरया सुचरित्ता भ्याने धर्म्याटप्यानद्वये रतास्तापराः, सुचारित्राः शोभनाचाराः । ते गहिया मोक्खमग्गम्मि ते मन्यवरपुण्डरीका गृहीता अङ्गीकृता मोक्षमार्ग इति । णिच्छयणयस्स एवं अप्पा अप्पम्मि अप्पणे सुरदो। सो होदि हु मुचरित्तो जोई सो लहड़ णिन्वाणं ॥८३॥ निधवनय आमापनि भात्मने मुरतः । स भवति हि मुचरित्रः योगी स लभते निवांगम् ।। पिच्छयणयस्स एवं निभयनस्यैवमभिप्रायः । एवं फयमिति चेत् ! अप्पा अप्पम्मि अप्पणे सुरदो आत्मा कर्ता, आत्मन्यधिकरण- भूते, आत्मने आमार्थमिति संप्रदाने तादर्थचतुर्थी, मुटु अतिसयेना- शैकिफप्रकारेण रतः तन्मयीभूत एकटीटीभावं गतः । सो होदि हु सुचरित्तो स आमा भवति, कथंभूतो भवति ! मुचरित्रः निधय. चारित्रः । जोई सो लहइ णियाणं योगी ध्यानयान् पुमान् लभते मानोति, कि तत् ! निर्वाणं परमसुखं मोक्षमिति, अथवा योगीशो योगिनां ध्यानिनामीश: स्वामी निर्वाण लभते इति सम्बन्धः । पुरिसापारो अप्पा जोई धरणाणदसणसमग्गो। जो झापदि सो जोई पाबहरो भवदि गिदंदो ॥८॥ - ।

३६४ घट्नाभूते-- पुषाकार भात्मा योगी वरज्ञानदर्शनममनः । मो ध्यायति स योगी पापहरो मवति निन्द्रः॥ पुरिमापारी अप्पा पुरुषस्य नरस्याकार आकृतिपस्य स पुरुषाकारः, एवं गुण विशिष्टः कः ! आमा चेतनयभायो जीवतले, जोई वरणाणदंसणसमग्गो योगी मुनिः, इत्यनेन गृहस्थस्य मोशे युवाणाः सितपटाः प्रयुक्ता भवन्ति । वरज्ञानदर्शनसमप्र: केवलज्ञानरलदर्शन• परिपूर्णः । इत्यनेनाचैराग्यमात्मानं मन्यमानाः पापिला: गुनका इव निराहताः । जो झायदि सो जोई एवं गुणमिशिधमामान यो मुनि- यिति स योगी ध्यानी भवति । अन्यथाको नास्तिको योगिनामा । एवं स्थाने स्थाने मतान्तराश्रयेश व्याल्याने कर्तव्यमिति भारः । पायहरो भयदि णिदो पापहरत्रिपठिप्रातिविछेदको भाति घाति- संघातघातकः स्यात, निन्द्र समवशरणागतपरस्परविरोचिजन्तुकलह- निरोधक इत्यर्थ । एयं जिणेदिकहिय मरणाणं मापयाण पुण पुणगु। संमागविणामयर मिद्धिपरं कारणं परमं ।। ८५॥ एलन जिन कथित श्रवणाना श्रावणी पुनः पुनः। मैमार विनायर गिरिर कारण परमम् । एवं जिणेहि कहियं एतदातिमघातयातनादिक पर आमभ्या- नस्य, मि मबई करित प्रमाणभूतयचने, प्रतिपादित मागागं मावयाण पुण पृगमु प्रयणाना दिगम्बराणा महामुन्यापासवानाभूपी- नामिति, न केवलं प्रवणानो प्रायकागा मदृष्टीनामुपागमाना च यनाने टीशायोग्या यानाधिकारियो देशमा सन्न आममाषनारा: ममाविग्नचिना शुक गृहीतचीवन गृहरियागमनमः पौर. वन्दनमवमानन । पुन गुनः मागत यज्ञानविज्ञानाने यासमा

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३६६ पट्मामृते- म्माणि क्षिपते विनाशयति दुष्टानि दुःखदायीनि अष्टकर्माणि झानाव रणादीनि । किं पहुणा मणिएणं जे सिद्धा नरबरा गए काले । सिन्दिाहहि जे वि मविया तं जाणह सम्ममाहप्पं ॥८॥ किंबहुना मणितेन ये विद्धा नरवरा गते काले । सेत्स्यन्ति येऽपि मध्या तब्बानीत सभ्यश्वमाहाम्॥ किं पहुणा मणिएणं कि पहुना भणितेन फि प्रचुरेण जल्पिते न किमपीत्याशेपः । जे सिद्धा नरवरा गए काले ये किंचिसिद्धा मुनि गता मोक्ष प्राप्ता, नरवरा भव्ययरपुण्डरीका भरतसगररामपाण्यादयः तरा सम्यान्यमाहात्म्य जानीत यूयमिति सम्बन्धः, गते काले छाती काले । सिन्झिहाहि जे वि भविया सेत्स्यन्ति भविष्यति फाले सिर्सि यास्यन्ति मोक्ष प्रास्यन्ति येऽपि भव्याः । तं जाणह सम्ममाहप तनानीत सम्यक्त्यस्य माहात्म्ये प्रमाये । ते घण्णा गुरुयन्था ने गूग ने वि पंडिया मणुया। मम्मत्तं मिद्विपरं गिवणे वि ण मइलियं जेहिं ।। ८९॥ ने पन्या. मुश्ता ते धरा तेगि पनिता मनुमा। मायकनिदिनेपिन मतिनिय॥ ने घणा मुकयत्या ने पुरपा धन्या पुण्यात , से पुरुषाः मुह तार्था मु? निदायेन एता. माया मानचा पुरवाया। ने गगन वि पंडिया मणुया न पुगा नग, गुभटा पापकर्मशा- विधमकाया, ने पुरपा पद्धता विधाममाया अपि मनुभा मानवा अति मन्ना दवा हय मम्म मिदिया मिग शिण मालियं हि मदाय मदन, ARSHI Hat, अरिदा.

मोक्षप्राभृतं । ३६७ जामदयस्थापामपि, यः पुरुषैः, सम्यक्त्वं सम्यग्दर्शनरत्ने, न मटिनीकृत निरतिचार प्रतिपालितं । कयंभूतं सम्पक्ष, सिसिपरं-सिद्धिकरं आत्मो- पटन्धिरक्षणमोक्षकारकमिति । तं सम्मत फेरिसं हवदितं जहा तत्सम्यस्त्वं कीदृशं भवति तपथा- हिंसारहिए धम्मे अहारहदोमवज्जिए देवे। निग्गंथे पावयणे सद्दहणं होइ सम्मतं ।।९०॥ सारहिते धने महादरादोपवर्जिते देवे। विन्य प्रापरने असानं भवति सम्परत्वम् ।। हिंसारहिए धम्मे हितारहिते धर्मे श्रद्धानं सम्यक्त्वं भवतीति सम्बन्धः, हिंसारहितो धर्मों जैनधर्मः । पत्र धर्मे प्राक्षणक्षत्रियवैश्य- दाचपधादिको जीयो वध्यते सोऽधर्म इति तवार्थः । अहारहदोस- चन्जिए देचे अहाददादोपवर्तिते देवे भवानमिति सम्बन्धः । रुद्रः किल दृशगारष्टिनः पुत्रं भक्षितवान् तत्र क्षुधादोपः हिंसादोपक्ष । ब्रह्मणः कमण्डलुमहणात् पिपासादोपः, जीर्णशरीरत्वात्तस्य जरादोपः । गज- चर्म! याप्टेकाटत्वं रुदै रुग्दोषः, सूर्ये पादकुष्पत्याइग्दोषः । दशावतारसंयुतत्वात् कृष्णे जन्मदोषः वसुदेवदेवकीनन्दनवाच । त्राणामपि मृत्युतदायी वैदितम्यः । नरफानुरभयानः सह श्रीमहा- देवस्ता भपदोपः, असा दंड धरति, रदः शूटं खण्डपरां शिनाएं धनुश्चेत्यादिक धत्ते, विष्णुशक सुदर्शन कौमोदकी गदा चैत्यादिक गृह्णाति तेन अपाणामपि भपतझायो बुधवयुद्धपते । सृष्टिकर्तृत्व- संहर्तृत्वादिकस्ता लयो मदद निधीयते विपचितिः। रुद्रः पार्वती- मरट रा. पुस्तके।

पद्माभृते- मर्धा धरति जटामध्ये गंगां चादधाति, ब्रह्मा यशिष्टस्य पितृलादुर्दशी- वल्लभत्वात् , विष्णुः पोडशसहस्रगोपीभेजते गोपनाथस्य दुहितरै च, सूर्यो रण्णादेवी चन्द्रो रोहिणी च मुंक्त तेनैते रागवन्तोऽपि ज्ञातव्याः । ब्रह्मा गजामुर द्वेटि, रुदत्रिपुरदान भस्मयति, विष्णुः कंसकेराचाणूर- जरासन्धान पिनष्टि तेनैते द्वेषयन्तोऽपि ज्ञातव्याः । ब्रह्मा यशियमुखं पश्यति, रुदस्तु स्कन्दं निरीक्षते, विष्णुः प्रद्युम्ने नियति तैनेते मोहिनोऽपि ज्ञातव्याः। ब्रह्मणः सटिचिन्ता समुन्पन्ना रुद्रस्य नरक- वरदानात् विष्णोर्जरासन्धशिशुपालादिवधै महती चिन्ता समुत्पना । ब्रह्मा उभ्या रमते, रुद्रः पार्वती मुक्त, विष्णुः सत्यभामाद्याः क्रीडति तेननेषु रनिदोषोऽपि घटते । ब्रह्मा योगनिद्रा करोति, रुद्रः कैलासे शेने गिरीशनामकत्वात् , विष्णुर्जलशायीति कथ्यते तेनैते प्रमाला- वन्नोऽपि विज्ञेयाः निद्रादीपा इत्यर्थः । रुद्रो नरकाय यर दत्वा विपदिति इत्यादि विषाददोषोऽपि संगच्छने। मैथुनादिपु स्वेदसद्भावोऽपि लोक- को पनदेवानामभ्यूधः । खेदस्तु समामादो। विस्मयस्तु रूपादिदर्शने । इ.या टोकदवतानामटादशापि दोपाधिन्तनीया । सर्वज्ञवीतरागे तु कचिदपि दोनो न यतते । उक्त च- गगादिदोपसझायो शेयोऽमीपां तदागमात् । अमतः परदीपस्य गृहीती पातकं महत् ॥१॥ निगं पावयणे निन्धे प्रायचने पचननियुक्त गुगे । सदहणं हो: मम्मन गर्ने धर्दियामा पदापु प्रदान गरि अन्येषु स्य- वन निबटाचि सम्पपल्य भवतीति नियावाकसम्बन्ध । जहाज्ञायम्यस्यं गुमंजयं मय्यगंगपरिचनं । लिगणवरात्राओ मष्णा तम्म गम्मत् ॥११॥ - . -44नि मूलगाया पाट।

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'३७० पटप्राभूते- त्यादि-कुत्सितलिंग च यन्दते नमस्करोति अभिवादनं विदधाति नमो. नारायणमिति याचा प्रणमति मस्तकेन वन्दे इति प्रणमति यस्तु पुमान् । लज्जाभयगारवदो टजया कृत्या भयेन च गारवेण गण च यो यन्दते। मिच्छादिही हवे सो हु मिथ्यादृष्टिर्भवति सः। कथं ! हु-स्फुट । सपरावेवसं लिंग राई देवं असंजयं वंदे । माणइ मिच्छादिही ग हु मण्णइ सुद्धसम्मत्तो ॥९॥ स्वपरापेक्ष लि रागिणं देवं असंयत वन्दे । मानयति मियादृष्टि नदि मानयति सुद्धमम्यवरवः। सपरावेखं लिंगं स्वपरापेक्षं टिग, स्वापेक्षे पिपन्नायुतं परा• पेक्ष रक्तयत्रमृगचर्मादि सापेक्षं लिंग वेई । राई देवं असंजयं चंदे रागिणं देये पार्वतीपति टक्षमीकान्त तिलोत्तमामुखकमलप्रपाकचतु. यक चेत्यादिक देवं, असंजय वंदे-असंयत अनेकमानुपमासदक्षिणमुख- मक्षक यन्दे इति यो यक्ति । माणइ मिच्छादिदी मानयति मिथ्या. रटि:-श्रयानि मिथ्याष्टिः जिनानामभक्तः । ण हुमण्णइ सुद्धस- म्मचो न मानयति न सन्मान ददाति, कोऽसौ। शुद्धसम्यक्त्यो निर्म- ससम्यमवरनमंडितः। सम्माइट्टी मात्रय धम्मं जिणदेवदेसिपं पुणदि । विवरीपं कुर्वतो मिन्छादिही मुणेयच्यो ॥१४॥ सम्याटिभाव. धर्म जिनदेवदेशिने करीनि। विपरीत हुन् मिष्याटि सातम्प ॥ मम्मादडी मारय मम्यादृष्टिः श्रावक सम्यायामशमिती गृहस्थ. । अथवा पाययनीति पात्रको मुनिः। अथवा हे गम्याष्टिधारक! इति सम्बोधनप । धम्म निणदयदेमियं कुणदि ध दुर्गनिपाना- मनन बदन प्रतिस.

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। ३७२ पट्मामृते- मिथ्यात्वं विधेहि । अर्थतस्तु सम्यक्त्वं विवेहीति सम्यगुपदेशो भगवद श्रीकुन्दयुन्दाचार्याणां । पाहिरसंगविमुकोण वि मुको मिच्छमार णिग्गयो । किं तस्स ठाणमउणं ण वि जाणदि अप्पमममा ॥९७॥ याप्रसंगविमुक्तः न विमुक्तः मिथ्यामान निफ्रन्थः । कि तस्य स्थानमान नापि जानानि आत्मममभावम् ॥ पाहिरसंगपिमुक्को बहि:संगाद्विमुक्तो रहितो नगवेपः । ण मुस्को मिच्छमाव णिगंथो नापि मुक्त नैव मुक्त न विमुक्को व मिथ्याभावेन-मिथ्यात्वदोपेण रहितो न भवति, कोऽसौ ! निप्रन्यो दिग म्बरक्षेपानीवी जीवः । किं तस्म ठाणमउणं तस्य निप्रन्यस्य स्थान उद्भकायोत्सर्गः किं-न किमपि, कर्मक्षयलक्षण मोझ न साधयतीत्यर्थः सथा मान कि मूकत्वमपि न किमपि, मोक्षाश्रितं कार्य न करोतीत्यर्थः ण वि जाणदि अप्पमममा नापि जानीने न लभते न वेति मात्म- समभावं आत्मनो जीवाना समत्वपरिणाम-स. जीवा शुयुद्ध कम्म भावा इति मिद्धान्तवचन न जानाति । मूलगुणं छित्तूण य पाहिग्कम्मं करेइ जो माह । मीण लहह मिद्विमुई जिणलिंगरिंगधगो णिगं ॥९८॥ मूलगुण छिम्या बायकमै करोति य गry . मन मिदिम जिननि विगवा शिवम् ॥ मूलगुणं ठिण य मूलगुणमारितिभेदभिन्न क्यमहानानि पंचमनिलय पचन्द्रियगधो योच पहायश्यकानि अटायमम्नान शिति- सयन दनवारनहिन समीजन एकमक पारिगतिमदगुणा- माय ।नत्र पन. नानाभावानरायम - Pornemom मोक्षप्रामृतं । नित्यस्नानं गृहस्थस्य दयानपरिप्रदे। पत्तेस्तु दुर्जनस्पर्शात् स्नानमन्यद्विगतिं ॥१॥ सा यते: रजस्वलारशे अस्थिरपर्से. चहालपो गुनफागर्दभना- पितयोगफपारो यमने विवोपी पादपतने शारीरोपरिफायविमोचने पादिस्नाना पत्ती सन्या दंश्यदुपविश्यते, श्रावकादिकाहानादिको या जलं नामपति, सागप्रशासन नियने, स्प हस्तमर्दनेनाइमलन दुर्ग- जिपले. स्नाने संजाले सति उपासो गृहरो, वचनमस्कारमतमोर पायोसगेम जयते एव निर्भवति । एवं मूलगुण लिपा पादिर- कम्म फन्द जो माह पहि:यम आतपनपोगादिक यः साधु:: फोति । मोपलाद सिदिनुहं स साधुः सिनिपुर मोसोय न लमतेन प्राप्नोति । जिपलिंगपिराधगो पिएं स साजिनलिगविराधको गति, फर ! नि सका। कि काहिदि पदिकम्भ किफाहिदिवाविहं च सवर्ण च । किफारिदि आदार आदमहायम विपनदो ॥ ९९ ।। Farmer विवि मार। EKAR: मामा रिफाहदि पहिफम्म किनकिमपि करिष्यति. मोर ..रि.पादित च। वि.काहिदिवापिस परि एपिपनि रिपति, रसुतिसमपान किं. ........... एक आदमदा- सकियो।

३७४ पद्मामृत- जदि पढदि बहुमुदाणि यजदि काहिदि बहुविहे य चारिते। तंबालमुदं चरणं हवेइ अप्पम्म विवरीदं ॥१०॥ यदि पटति श्रुतानि च यदि करिष्यति बहुविधानि चारित्राणि । तालश्रुतं चरणं भवति मात्मनः विपरीतम् ।। जदि पढदि बहुमुदाणि य यदि चेत् , पठति व्यक्तमुबारयति, बहुश्रु. तानि अनेकतर्कय्याकरणच्छन्दोऽलङ्कारसिद्धान्तसाहित्यार्दानि शास्त्राणि । चकार उक्तसमुच्चयार्य एकादशाङ्गानि दशपूर्वाणि च । जदि काहिदि बहुविहे य चारित्ते यदि चेत्, काहिदि-करिष्यति अनुष्टास्यति, बहुवि- धानि चारित्राणि प्रयोदशप्रकाराणि सामायिकादीनि पंचविधानि वा । तं पालमुदं चरणं तत्सर्वं बालश्रुतं मूर्खशास्त्र, वालचरणं मूर्खचारित्र । हवेइ अप्पस्स विवरीदं भवति बालश्रुतं बालचारित्रं भवति, कथंभूत सत् ! आत्मनो निजशुद्धबुद्धकस्वभावजीवतत्वाद्विपरीतं पराङ्मुखमाम- भावनारहितमिति भावार्थः। वेग्ग्गपरो माहू परदव्यपरम्मुहो य सो होदि। संसारमुहविरत्तो सगमुद्धमुहेसु अणुरत्तो ॥ १०१ ॥ वैराग्यपर साधु: परदव्यपरासश्च स भवति । समारमुखविरक्त स्वशुदमुखेषु अनुरकः। वेरग्गपरो साहू वैराग्यपर' साधुः ससारशरीरभोगनिपिण्णः सम्प ग्दर्शनज्ञानानामाराधकस्यात्साधक आत्मनामान्यर्थत्वात् । परदव्यपर- म्मुहो य सो होदि य. साधु वैराग्यपर. स माधुः परद्रव्यपराङ्मुखो भवनि इष्टवनितादिविरक्तो भवति । संसारमुहविरत्तो संसारस्य मुखे फरकस्तूरीचन्दनपुष्पमालापट्टालमुवर्णमणिमाक्तिकयासादपल्यंकनवयौ- पनयुबतिपुत्रसम्पदिष्टसंयोगारोग्यदीर्घायुपश कीर्तिप्रभृतिक तस्माद्विरक्तः।

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३७६ पटनामृते- मदेवैर्यद्वयायते अहर्निशं शुक्रध्यानार्थ सर्यकर्मक्षयार्थ तत्पदमान्यर्थ अनुचिन्त्यते। थुब्बतेहि थुणिन्नइ स्तूयमानस्तीर्थकरपरमदेवैर्यत् स्तूय- तेऽनन्तगुणोद्भावनतया प्रशस्यते । देहत्यं किंपितं मुणह देहस्य शरीरमध्ये स्थितं किमप्यपूर्वमनिर्वचनीयमासंसरमप्राप्त तयोगिनां प्रसिद्ध तत्व आत्मस्वरूपं मुणह-जानीत यूर्म । यदुत- तिलमध्ये यथा तैलं दुग्धमध्ये यथा घृतं । काठमाय यथावन्दिदेदमध्ये तथा शियः ॥१॥ शिवशब्दवाच्यमात्मतत्यमित्यर्थः । इदानी शास्त्रस्मान्ते मंगलनिमित्त पंचपरमेष्टिपुरस्सररत्नत्रयमर्मितमा- रमतत्वमुद्भावयन्ति भगवन्तः- अरुहा सिद्धायरिया उज्झाया साहु पंचपरमेही । ते विहु चिहि आद तम्हा आदा हु मे सरणं ॥१०४॥ महन्त मिदा चायाँ उपाध्यायाः सापकः पंचपरमेष्ठिनः । तेऽपि हतियन्ति आत्मनि तस्मादारमा मे शरणम् ॥ अरुहा सिद्धायरिया अर्हन्तः सिद्धा आचार्याचउज्झाया साहु पंचपरमेही उपाध्यायाः, साधरः, एते पंचपरमेष्टिनो देया ममेटदेवताः। ते विहु चिहि आद तेऽपि पंचपरमेशिनो देवा अपि तिष्ठन्ति, क! आत्मनि निजजीवतत्वे । केवलज्ञानादिगुणविराजमानत्वात् सकलभव्य- जीवसम्बोधनसमर्थवाचामायमर्हन् वर्तते । सर्वकर्मक्षयरक्षणमोक्षपद- प्राप्तत्वात् निधयनयान्ममारमायमेव सिदः । दीक्षाशिक्षादायकत्वात् पंच- चाराचरणचारणप्रवीणत्वात् सूरिमंत्रतिटकमंत्रतन्मयत्यान्ममामायमेवा- चार्यपदभागी वर्तते । श्रुतज्ञानोपदेशकल्यात् स्वपरमनविज्ञायकचात् भव्यजीवमम्बोधकत्वान्ममामायमेवोपाध्यायः । सम्पादर्शनशानचारित्रर-

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। । । पट्यामृते- एवं जिनप्रजप्तं मोक्षस्य य ग्रामृतं मुभवत्या । यः पठति शृणोति भावयति स प्राप्नोति शाधन सत्यम् ।। एवं जिणपण्णत्तं एवममुना प्रकारेण जिनप्रज्ञप्तं सर्वज्ञवांतराग भावितं । मोक्सस्स य पाहुडं मुमत्तीए माक्षस्य परमनिर्वाणपद प्राभृतं सारमिदं शास्त्रं मुष्ठु-अतिशयेन मक्त्या परमधर्मानुगगेण । जो पढइ सुणइ भावइ य आसन्नमव्यो जीव. पठति जिह्वाग्रे करोति, यश्च भन्यजीवः शृणोत्याकर्णपति, यश्च मोक्षाभिलापुको जीवो भावयति एत. च्छास्त्रं यस्मै रोचते । सो पावइ सासयं सोखं स जीवः परममु- नीश्वरः, प्रामोति लभते, शाश्वतमविनश्वरं, सौख्यं निजात्मोत्यं परमानन्द- रक्षण सौख्यं । नानाशास्त्रमहार्णवैकतरणे यदुद्धिरिधिया पूर्णां पुण्यकविप्रमोदजननी सरिकनौकायते । यत्पादाम्युजयुग्ममाप्य मुनिमि गैरियापीयते सधीमान् श्रुतसागरो विजयतामेनस्तमोऽहप्पंतिः ॥१५ श्रीमत्स्यामिसमन्तभद्रममलं श्रीकुन्दकुन्दाव्हयं यो धीमानकलरमट्टमपि च धीमत्प्रभेन्दुप्रभु। विद्यानन्दमपीक्षितुं कृतमनाः धीपूज्यपाद गुरु यर्थित श्रुतसागरं सविनयान् विद्यधीमन्नुतं ॥२॥ श्रीमलिभूषणगुरोवंचनादलंग्या- नमुक्तिश्रिया सद्द समागमामिच्छतेय । पदमाभृते सकलसंशयशत्रुत्री टीका ताऽतधियां चतसागरेण ॥ ३॥ , पूर्वापुण्य स..

मोक्षप्राभृतं । दाले थापभनन्दिकुन्दकुन्दाचार्यवसनीवाचायलाचायधपिच्छा. चायनाचकपिराजितेन चतुरगुताहारामनाना पूर्व विदेहपुग्दरोकिनी- नगरपंक्तिसीमन्धरापरनामस्वयंप्रभजिनेन ततज्ञानसम्बोधितभरतवर्षभ- मजोयेन धीजिनचन्द्रमरिनारकाभरणभूतेन कापलसवंशेन विरचिते पट्- प्रास्तान्ये समुनोमन्डलोमंडितेन कलिकालगौतमस्वामिना श्रीपानान्द- देवेन्द्रकीर्ति-विधानन्दिपामारकेन धीमतिभूपगेनानुमतेन सस्त- सिरहनसमाजसम्मानितेनोमयभागाकरिवभवतिना श्रीविद्यानन्दिगुर्वन्तेवा- सिना सूरियरधीश्रुतसागरेण विरचिता मोक्षप्रात्तटोका---- परिसमाप्ता। C , अस्मादमे क पुस्तकऽयं पाटो वतंते न तु रू. पुस्तके। पहः परिग्वेदः । शुभं भवतु । धीरस्तु । मालमस्तु । धीविधानन्दिस्वानि-भारतश्रीमविभूषण सूरिवरधीश्रुतसागराः मम इमानि कुर्वन्नु। सोकसंख्या ६... ज्ञातम्या ।

लिंगमाभृतं । काऊण णमोकारं अरहंताणं तर सिद्धाणं । वोच्छामि सभणलिंग पाहुडमत्यं समासेण ॥ १॥ कृत्या नमस्कार अर्हतां तथैव सिद्धाना । वक्ष्यामि श्रमणलिंग प्राभृतशास्त्रं समासेन ॥ धम्मेण होइ लिंगंण लिंगमत्तेण धम्मसंपत्ती। जाणेहि भावधम्मं किं ते लिंगेण कायव्यो॥२॥ धर्मेण भवति लिंगं न लिंगमात्रेण धर्मसप्राप्तिः । जानीहि भावधर्म कि ते लिंगेन कर्तव्यं ।। जो पायमोहिदमदी लिंगं घेत्तूण जिणयरिंदाणं । उवहसई लिंगि भावं लिंगं णासेदि लिंगीणं ॥३॥ यः पापमोहितमतिः लिंग गृही या जिनवरेन्द्राणां । उपहसति लिंगी मात्र लिंग नाशयति लिगिना ।। णयदि गायदि तावं वायं पाएदि लिंगरूवेण । सो पापमोहिदमदी तिरिक्संजोणी ण सो समणो ॥४॥ नृत्यति गायति तावत् वाया । वाचयति लिंगरूपेण । स पापमोहितमति तिर्यग्योनि न स श्रमण ।। मम्मूहदि रक्गेदि य अहं झापदि यहुपपत्तेण । सो पाबमोहिदमदी निरिक्सजोणी णमो समणो ॥५॥ १६.२ म.पु.।

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३८२ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचित- दसणणाणचरिते तवसंजमणियमणियाम्मम्मि। पीडयदि बद्धमाणो पारदि लिंगी गरयगासं ॥ ११ ॥ दर्शनशानचरितु सप मेयमनियमनित्यकर्मणि । पीडयति यतमान. प्रामोतिलिंगी नरकयाम। कंदप्प (पा) इय यह करमाणो मोयणेमु रमगिदि । माई लिंगवियाई तिरिसिजोणी ण मो ममणी ॥ १२ ॥ कदादिक यतते युर्याण: भोजनेत रसद्धि । मायावी लिंगव्यपायी निर्यग्योनि. न सश्रमण. ।। धावदि पिंडणिमित्तं कलहं काऊण. भुंजदे पिंडं । अवरुपरूई संतो जिणमग्गिण होइ सो समणो ॥१३॥ धायति पिंडनिमित्तं कलह कृत्वा मुंक्त पिर्ड। अपरप्ररूपी सन् जिनमार्गी न भवति स धमणः ॥ गिण्हदि अदत्तदाणं परणिंदा पि य परोसोहि । जिणलिंग घारंतो चोरेण व होइ सो समणो ॥ १४॥ गृह्णाति अदत्तदान परनिन्दामपि च परोक्षदूपणः । जिनटिंग धारयन् वोरेणेव भवति स श्रमणः ।। उप्पडदि पडदि धावदि पुढवीओ सणादि लिंगरूवेण । इरियावह धारतो तिरिक्सजोणी ण सो समणो ॥ १५॥ उत्पतति पतति धावति पृथिवी सनति लिंगरूपेण । ईपिचं धारयन् तिर्यग्योनिः न स भ्रमणः॥ वंधो गिरओ संतो सरसं खंडेदि तह व यमुहं पि। छिंददि तरुगण पहुसो तिरिपसजोणी ण सो समणो ॥१६॥ अयथावादी। -

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श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचित- पुंश्चटीगृहे यः मुंक्ते नित्यं संस्तौति पुष्माति पिंडं । प्रामोति बालस्वमा मावविनष्टो न स प्रवणः ॥ इय लिंगपाहुडमिणं सवं युद्धेहि देसियं धम्म । पालेहि कसहियं सो गाहदि उत्तमं ठाणं ॥ २२ ॥ इति लिंगप्राभृतमिदं सर्व युद्धः देशितं धर्म । पालयति कटसहितं स गाहते उत्तम स्थान । इति श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितलिंगप्रामृतक समाप्तम्।

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1 श्रीन्दकुन्दाचार्यविरचिन- जाणं चरितहीगं लिंगरगहणं च दंमगहिणं । संजमहीणो य तो जइ नगद गिरत्ययं मलं ॥५॥ ज्ञान चारित्रहीने दिगग्रहण च दर्शनरिहाने । संयमहीनध तप. यदि चरतिनिधि म॥ णागं चरित्तमुई लिंगम्गहगान मगविगुई। संबमसहिदो य तो थोमो रि महाफली होइ ॥ ६ ॥ ज्ञानं चारित्रशुदै लिंगाणं च दर्शनारगुद। संयमसहितध तपः स्तोकमपि महाफ भगत ।। णाणं णाऊण णरा केई विमयाइभारसंसत्ता । हिंडंति चादुग्गदि बिमएमु विमोहिया मुढा ॥ ७॥ ज्ञानं ज्ञात्वा नराः केचित् विषयादिभारममता । हिण्डन्ते चातुर्गति पिपये चिमोहिता मूढाः ।। जे पुण विमयविरना गाणं गाऊण भावगामहिदा । छिंदंति चादुरगदि तवगुणजुत्ता न संदेहो ॥ ८॥ ये पुनर्विषयविरक्ता ज्ञान ज्ञापा भावनामहिता । छिन्दन्ति चातुर्गतिं तपोगुणयुक्ता न सन्देह ॥ जह कंचणं विमुदं धम्मइयं संडियलवणलेवेण । तह जीवो वि विमुद्धं पाणविमलिलेण विमलेण ॥९॥ यथा कचन विशुद्ध वमन् सडिकलपणलेपेन । तथा जीवोऽपि विशुद्ध ज्ञानसलिलेन विमलेन ॥ णाणस्म पत्थि दोमो कापुरिमाणो मि मंदबुद्धीणो। जेणाणमबिदा......होऊणं विमएमु रजंति ॥ १० । ज्ञानस्य नास्ति दोष कापुरुषस्यापि मन्दबुद्धे । ये ज्ञानगर्विता......भूत्वा विषयेषु रज्यन्ति ।

- - ३८८ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचित- सीलगुणमंडिदाणं देवा भरियाण यल्लहा होति । मुदपारयपउरा णं दुमीला अप्पिला लोए ॥ १७ ॥ शीलगुणमण्डिताना देवा भव्यानां यड़भा भवन्ति । श्रुतपारगप्रचुरा दुःशीला अल्पका: लोके ।। सच्चे वि य परिहीगा रूपविरुवा वि यदिदमुथया गि। सीलं जैमु मुमीलं मुजीविदं माणुसं तसि ॥ १८ ॥ सर्वेऽपि च परिहीना रूपविरूपा अपि पतितमुवयसोडकि। शीलं ये मुशीट मुजीवित मनुष्यन्वं तेषां ॥ जीवदया दम सचं अचोरियं भरसंतोसे। मम्मइंमण गाणं तओ य सीलस्स परिवारो ॥ १९ ॥ जीवदया दम सत्य अचौर्य ब्रह्मचर्यसन्तोषौ सम्यग्दर्शन ज्ञानं तपश्च शीलस्य परिवार.॥ सीलं तवो विमुद्धं दसणसुद्धी य णाणमुद्धी य । सील विमयाण अरी सीलं मोरखस्म सोपाणं ॥२०॥ शील तपो विशुद्ध दर्शनशुद्धिश्च ज्ञानशुद्धिश्च । शील विषयाणामरिः शील मोक्षस्य सोपान ॥ जह विमथलुद्ध विसदो तह थावरजंगमाण घोराणं । सम्वेसि पि विणामदि विमयविसं दारुणं होई ॥२१॥ यथा विषयलुब्धो विषद, तथा स्थावरजङ्गमान् घोरान् । सर्वानमपि विनाशयति विषयविष दारुणं भवति ।। वारि एकैम्मि य जम्मे मरिज विमवेयणादो जीयो । विसयविसपरिहया णं भमंति संसारकांतारे ॥ २२॥ अचिदसादे इत्यनेन द्वितियास्थाने पष्ठी । द्वितीयादिविभकीन, स्थाने कचित् षष्ठी स्यादिति मूत्रार्थ. । २ "अस्टासोडौं" इत्यनेन द्वितियास्थाने सप्तमी । द्वितीयातृतीययो. स्थाने क्वचित् सप्तमी भवतीति सूत्रदंपर्य। (सं.) " शीटप्राभृतं । ३८९ वार एक जन्न गच्छेत् विषवेदनाहतो जोत्रः । विपपरिपपरिहता समन्ति संसारकान्तारे॥ परएसु वेषणाओ तिरिक्खए माणुएमु दुक्खाई। देवेनु वि दोहन्ग लहति विसयासता जीवा ॥ २३ ॥ नरक वेदनाः तिरवि मानवेषु दुःखानि । देवैयपि दौर्भाग्यं लभन्ते विषयासक्ता जीवाः ॥ तुतधम्मंतवलेण य ह दव्यं ण हि णराण गच्छेदि । विसीलमंत कुमली खवंति विसयं विसय व खलं ॥२४॥ तुमनलेन व यथा द्रव्यं न हि नराणा गाडति। तपःशीलमन्तः कुशला क्षिपन्तै विषयं विपमित्र खलं ! ॥ चट्टेसु च खण्डेसु य भद्देसु य विसालेमु अंगेसु । अंगेमु य पप्पेसु य सम्वेसु य उत्तम सीलं ।। २५ ।। वृत्तेषु च साडेषु च भद्रेषु च विशाले अंगेषु । अंगे च प्राते सर्वेषु च उत्तमं शीलं ॥ पुरिसेण वि सहियाए कुसमयमूहि विसयलोलेहि । संसारे भमिदव्वं अरयघरटं व भूदहिं ।। २६ ।। पुरमेणापि सहितेन कुसमपन्ः विपपलोः । संतार भनितम्यं बरहटघर झ भूतैः ।। आदेहि कम्मगंटी जायद्धा विसयरायमोहेहिं । तं हिंदंति करत्या तबसंजमलीलपगुणेण ॥ २७ । आननि हि कर्माधिः पारसा विपपरागोहाम्रो । नां छिन्दन्ति कृतार्याः तपःसंपमसीलगुणेन ॥ ११.मू..

श्रीकुन्दानाचार्यविरनिन- उदधी य रदणमरिदो ताधिणयंसीलदाणपणाणं । मोहतो य मसीला णिल्याणमणुनरं पनो ॥ २८ ॥ उदविरिय गनभरा सपोनिनयीदानरत्नाना । शोभेत सशीलः निर्माणमनुनाई प्रातः ।। गुणहाग गदहाण.य गोपगुमहिलाग दीगदे मोरसो। में सोचंति उत्यं पिच्छिन्ता:जहि मवेहि ॥ २९ ॥ गुना गर्दभानां च गोपशुमहिलाना श्यते मोश। ये साधयन्ति चतुई दर्यमानाः जनैः सः॥ जइ विसयलोलपहिं पाणीहि हरिन साहिदो मोरयो । तो मो मुश्त्तपुतो दमपुवीओ वि किं गदो नरयं ॥३०॥ यदि विषयलोले शानिभिः भवेत् साधितो मोशः । ताई स सात्यकिपुत्रः दर्शविक. कि गतो नरकं ॥ जह णाणण विमोहो सीलण विणा युहेहि मिदिहो। दमपुचिस्म य भावो ण किं पुण णिम्मलो जादो ॥३१॥ यदि ज्ञानेन विरादः शीलेन विना मुधैनिदिधः । दशपूर्विण च भावो न कि पुनः निर्मलो जातः॥ जाए विमयविरसो सो गमयदि परययणापउरा । ता लेहदि अरुहपयं भणियं जिणवड्डमाणेण ॥३२॥ य विषयविरक्त स गमयति नरकवेदना प्रचुर । तल्लभते अर्ह-पद भणितं जिनवर्धमानेन ॥ एवं बहुप्पयारं जिणेहि पञ्चक्राणाणदरिसीहि । सीलेण य मोक्सपयं अासातीदं च लोयणाणेहिं ॥३३॥ १ जो २ सो।।द ।

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metarmon- श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविचित-- सव्यगुणगीणकम्मा मुहदुरसरिसजिदा मणविमुद्वा । पप्फोडिय कम्मरया हाति आराहणापपडा ।। ३९ ॥ सर्वगुणशीणकर्माण. मुखदुःराविनिता मनोविगुदाः। प्रस्फुटितर्मरजसः भवन्ति अराधनानकटाः। अरहते मुहमती सम्मत्तं दमणेण मुरिमुवं । सीलं विसयविरागो गाणं पुण केरिसं मणियं ॥४० । मर्हति शुभभाक्तिः सम्याच दर्शनेन मुविशुद्ध । शीलं विषयविरागो ज्ञानं पुनः कीररी भणित ॥ इति धीकुन्दपुन्दाचार्यविरचितशीलाभृतक समाप्त।

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श्रीदरुन्दामागीवितो- मागगनगगीत समारमगरभागनिमयः । अरगुमाइमममः दर्शनशुल.पिंगगुरामकः ।। गिपगुद्वपशुरली पहिम्पापलानिओ गाणी । जिणमुगिधम्म मगर गयदुरगी होइ गदिदी ॥ ६ ॥ निजामानुरक पहिरामायण झानी। मिनमुनिधर्म जानानि गनदुग्यो भनि सरसतिः ॥ भप मूढमणायदणं संफाइ यमय भयमईयारं । जासिं उदालेदे ग मंति ने हुँति मदिही ॥७॥ मदो मूहमनायतन सकादि व्यसने भपमनियारम् । येपो चतुश्चयाशिनि एनानि न सन्ति ते भान्ति सध्यः।। उहयगुणवमणमयमलवैरग्गइनारमतिविग्यं या। एदे सत्तत्तरिया दंमणमाययगुणा मणिया ॥८॥ उभयगुणव्यमनभयमराम्यातिचारभक्तिविनानि वा । एने सप्तति दर्शनधायकगुणा भणिताः ॥ देवगुरुममयभना संमाग्मगैरभोयपरिचत्ता। रयणत्नयसंजुत्ता ते मणुवा सिवमुहं पत्ता ॥९॥ देवगुरुसमयभता समारशरीरभोगपरित्यक्ताः। रत्नत्रयसयुक्तास्ते मनुष्या शियमुख प्राप्ताः ॥ दाणं पूजा सीलं उपवासं बहुविहं पिसवणं पि । सम्मजुदं मोक्समुहं सम्म विणा दीहसमारं ॥१०॥ दान पूजा शॉल उपनाम बहुविधमपि क्षमणमपि । सम्यक्श्युत मोक्षमुम्ब सम्यक्त्वं विना दीर्घसंसार ।। नेयं गथा स. पुस्तके । २ या स । स ३रा.स.।

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श्री हुन्दगन्दाचार्यविरचितो- दा माहान पिगात भानि भोगवर्गमही। निमाणमा प्रम निधि निनवान्नैः।। मेननिममें काले रियमुवीयं फलं जहा विउलं । होड नहा नं जाणड पनविसेमेगु दाणफलं ॥ १७॥ भविप कार उपितमुनि फलं यथा पिपुलं । अनि ... तमानाहि पात्र विशेषे मुदानाल !! इंह णियमुविनीयं जो याइ जिणुनमननम् । मो निहवणरजफलं भुंजदि कल्लाणपंचफलं ॥१८॥ ३. नि मन यो यपति जिनोकसत्यक्षेत्र । म त्रिपा-यफल मुनक्ति कल्याणपंचफल || मादुपिदपूनमिनकलनधणधण्णवत्थुवाहविमयं । संमारमाग्मोम्यं मव्वं जाणउ मुपत्तदाणफलं ॥ १९ । मापित गर्मि पालनधनधान्यवस्तुवाहनविषयं । मसारमा य म जानीहि सुपात्रदानफल ।। मनंगग्जणणिहिभंडारराडंगवलचउद्दहरयणं । टण्णवदिमहमिन्छिविहउ जाणह मुपत्तदाणफलं ॥२० मनाङ्गा पाना भण्डारपडङ्गवटचतुर्दशरत्ने । पाण। • हयात्रीविभय जानीहि मुपादानकले ॥ मुकुलगुम्बमुलकग्यणमुमइमुसिक्खोमुसीलमुगुणचरितं । गृहलेस मुरणामं मुहमादं मुपत्तदाणफलं ॥ २१ ॥ - १ जाणम • प य । ३ क्यो. म. ४ सयलपगमुदाणुवर्ण । जाण र पुमा सफल'.अमावानुभवनं विभवं जानीहि।

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१०० ग्रीन्दान्दायार्गविलो- सम्मविमोही तागुणनाग्निमण्णाणदाणपरिही गं। मरहे दुम्पमझोले मशुयाणं आयद गियदं ॥ ३८ ॥ सम्पावविशुदि गोगुणचारित्रमशानदानपरिषयः । भर दुःपमकाले मनुजाना जागने नियत ॥ पाहि दाणं न हि पूजा नाहि सोलंग हि गुणं ण चारित ! जे जइणा मणिया ते पेरझ्या हानि कुमाणुमा तिरिया ॥३९॥ नहि दान न हि पूजा न हि शाई न हि गुणः न चारित। ये यतिना भणिता. ते नारका मान्ति कुमागुपः निराधः ॥ ण वि जाणइ कजमकन्न सेयमसेयं पुण्ण पारं हि । तयमन धम्ममधम्म मी मम्मउम्मुरको ॥ ४०॥ नापि जानाति कार्यमकार्य श्रेयोऽश्रेयः पुण्यं पाहि। तत्यमते धर्ममधर्म स मम्यायोन्मुक्तः ।। ण वि जाणइ जोग्गमजोरगं णिचमणिचं हेयमुवादेयं । सच्चममचं भवमभयं म गम्मउम्मुक्को ॥४१॥ नापि जानानि योग्यमयोग्ये नित्यमनित्य हेयमुपादेये । सत्यममत्य भावमभाव स सम्यक योन्मुक्तः ॥ लोईयजणसंगादो होइ मदमुहरकुडिलदुभावो । लोइयसंग तम्हा जोई वि तिविहेण मुंगाहो ॥ ४२ ॥ लौकिकजनमागतो भवति मतिमुखुरकुटिलदुर्भावः । लौकिकसग तस्मात् योग्याप त्रिविधैन मुचतात् । उग्गो तिव्यो दुद्दो दुभायो दुम्गुदो दुरालायो । दुम्मदग्दो विरुद्धो सो जीवों मम्मउम्मुरको ॥ ४३ ॥ १ या.स. । २ अस्मादप्रे हि इन शब्दः। तेन सन्दोभगो जायते मनोनि:- सारित स, पुस्तके नास्त्यपि । ३ गाथेय ४.. गापातः पूर्व स. पुस्तके । 1 जोई लिविहेण. स. ५ वि स ।

रदणसारः । म तीनो दुष्टो दुर्भावो दु भनो दानाप । दुर्मतरतो विरुद्धः त जीवी मानवोन्मुन । बुद्दो रहो रहो अणि विमुणो नगनियो नहो। गायगजायणभंडणदुम्मणसीलो दु मम्मउम्मुक्के ।। ४४ ।। शुद्रो दः अनिष्टः पिशुन माविन मर गापनपाचनाभण्डनदुपणशीलस्तु सम्यक्त्रोन्मन । दोहा- वापरगद्दहमाणगयवन्यवराहकरहा । पक्खिजल्यमहाव पर जिणवरधम्मुविणाम् ।। ४५ ॥ वानरगर्दभश्वगजन्याप्रवराहकरम- । पशिजलौकस्वभावो नरः जिनवरधर्मविनाशकः ।। कुतबकुलिंगिकुणाणिकुवयकुत्तीले कुदमणकुमन्थे । कुनिमित्ते संथुइ पधुइ पसंमणं सम्महाणि होइ णियमं॥४६॥ कुतप कुलिगिहानिकुजतकुशीले कुदर्शनशासयो । कुनिमित्त संस्तुति प्रस्तुतिः प्रशंसने सम्यावहानि भवति नियमेन ॥ सम्म विणा मागापं मचारित्तं प होइ पियमेण । तो रयणत्तयमज्झे मम्मुगुणुकिहमिदि जिणुदिई ।। ४७ ।। सम्परवं विना साशनं सधारित्रं न भवति निपनेन। ततः लापमा सम्पयगुण उकर इति जिनविष्यन् ।। तपुङही कुलभंग कुपइ जहा मिच्छमप्पणो वि तहा । दागाइमुगुणभंग गईभंग मिच्छत्तमेव हो कह ॥ १८॥ १निमावि रा. साये -पुस्तके वालि रा-पुस्तकारोक्तिः।

१०२ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- तनुकुष्टी कुलभंग करोति यथा मिथ्यायमापनोऽपि तया। दानादिमुगुणभंगं गतिभंग मिथ्यायमेव अहो ! करम् ।। देवगुरुधम्मगुणचारित्नं तपमारमोरखगइमेयं । जिणवरवयणमुदिहि विणा दीसह किह जाणए मम्मं ॥४९॥ देवगुरुधर्मगुणचारि तपःमारमोक्षगतिभेदं । जिनयरवचनमुटि विना दृश्यते कर्थ ज्ञायके सम्यादै ॥ एक्कु सण ण विचिंतइ मोरखणिमिनं णियप्पसम्भावं। अणिस विचितह पावं यहुलालावं मणे विचितेइ ॥ ५० ॥ एर्फ क्षणं न विचिन्तयति मोक्षनिमित्त निजात्मसद्भावे । अनिशं विचिन्तयति पापं बहुलालापं मनमा विचिन्तपति ।। मिच्छामइमयमोहासवमनो योल्लए जही भुल्लो । तेण ण जाणइ अप्पा अप्पाणं सम्ममावाणं ॥५१॥ मिथ्यामतिमदमोहासवमत्तः कथयति यथा विस्मृतः । तेन न जानाति आग्मा आत्मनां सद्भावान् । मिहिरो महंधयारं मरदो मेहं महावणं दाहो। वजो गिरिं जहा विणसिंजइ सम्मे जहा कम्मं ॥५२॥ मिहिर: महान्धकार मरुत् मे महापर्न दाहः । वज्रो गिरि यथा विनाशयति सम्यक्ष तथा कर्म। मिच्छंधयारसहियगिहमज्झम्मिय सम्मरयणदीपकलायं । जो पजलइ म दीसइ मम्मं लोयत्तयं जिणुदिई ॥५३ ।। मिथ्यात्वान्धकारहृदपगृहमध्ये च सम्यक्त्वरत्नदीपकलापं ॥ यः प्रज्वालयति स पश्यति सम्यक् लोकत्रयं जिनदृष्टै ॥ १ येन प्रकारेण । २ तेन प्रकारेण । ३ ।। पदिस्मइ. स.। -

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४०६ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- मोक्षनिमित्त दुःख वहति परलोकदिष्टिः तनुदिष्टिः । मिथ्यात्वभावान् न छिनत्ति किं प्राप्नोति मोक्षसौख्यं हि ॥ ण हु दंडइ कोहाई देहं दंडइ कहं सबइ कम्मं । सप्पो किं मुबइ तहा वम्मीए मारिए लोएं ॥ ७० ॥ न हि दण्डपति क्रोधादीनि देहं दंडयति कथं क्षिपने कर्म । सर्पः किं म्रियते तथा वल्मीके मारिते लोके ।। उर्वसमभवभाव दो णाणी सो भावेसंजदो होइ । णाणी कसायवसगो असंजदो होइ सो तार ॥७१ ॥ उपशमभवभावयुतो ज्ञानी स भावसंयतो भवति । ज्ञानी कपायवशगोऽसंयतो भवति स तावत् ॥ णाणी सवेइ कम्मं णाणलेणेदि मुबोलए अण्णाणी। विजो मेसज्जमहं जाणे इदि णस्मदे वाही ।। ७२ ॥ ज्ञानी क्षिपते कर्म ज्ञानवलेनेति सुकथयति अज्ञानी । वैद्यो भेषज अह जानामीति नाशयति वार्षि। पुव्वं सेवइ मिच्छामलमोहणहेउ सम्ममेमनं । पच्छा सेवइ कम्मामयणामणचरियसम्ममेमज ॥७३॥ पूर्व सेवते मिथ्यात्वमलशोधनहेतुः सम्यक्त्यभेषज । पश्चात् सेवते कर्मामयनाशनचरितसम्यम्भेषज ॥ अण्णाणी विमयविरत्तादो होइ मयमहस्मगुणो। पाणी कमायविरदो विमयामत्तो जिणुदिहं ॥७४॥ ..वम्मिा मारिउ ३.। २ अस्मादले क-पुस्तके विमहरमति इति पमा तव समुदो...।५ ताब. स.नगदे गम्मदे पाई... --

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४०८ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- भूमहिलाकन्यादिटोमाहिविपहरो कथमपि भवेत् । सम्यकन्यज्ञानवैराग्यौपधमत्रेण जिनोदिटें ।। पुवं जो पंचेंदियवणुमणुवचिहत्यपायमुंडहरो। पच्छा सिरमुंदुहरो सिबगइपहणायगो होई ॥ ८०॥ पूर्व यः पंचेन्द्रियतनुमनीकाग्यस्तपादमुंडहरः । पश्चात् शिरोमुंडहरः शिवगतिपथनायको भवति । पतिमत्तिविहीण मी मियो य जिणसमयमनिहीण जई । गुरुमनिहीण सिस्मो दुग्गइमग्गाणुलग्गणो णियों ॥८॥ पतिभक्तिविहीना सती भृत्यश्च जिनसमयभक्तिहीनो पतिः । गुरुभक्तिहीन शिष्यो दुर्गतिमार्गानुलग्नो नियमात् ॥ गुरुमनिविहीणाणं सिस्माणं सव्वसंगरिरदाणं । ऊमरेंछते यत्रियमुवीयममं जाण सव्वणुहाणं ।। ८२ ॥ गुरुभक्तिविहीनाना शिष्याना सर्वसङ्गविरतानां । अपरक्षेत्र उपितमुवीजमर्म मानीहि सर्यानुष्ठान ।। रनं पहाणहीणं पदिहीणं देमगामरहवलं । गुरुमतिहीणसिम्माणुहाणं पस्मदे मव्यं ।। ८३ ॥ गम्य प्रधानहीन पनिहीने देशप्रामार्थवः। गुरुमतिहीनशिश्यानुष्टान नभ्यति म । मम्माण रिर्णय रुई मनि रिणादाण दया विमा धम्म । गुम्मनि विणा नपचारिनं गिफलं जाण ॥ ८१ ।। मत्र स ।। मुहार मागयोन. यो स. ५ ..दिन नयीच.। ...

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1 श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- पारन जानाति आ मा आमा दुःपमा मनम्नावर । रोनानन्न मुगमात्मानं भारयेत् योगी ॥ णियारादि विणा सम्मगुलद्धि णयि गियमेग । मम्मगुलदि विणा णियाणं गस्थि निशुदिई ॥१०॥ नितानोपना सम्पागोपालपारित। गम्पोरगना निर्माण नातिन। पापगमारामारी परमपामाण कारणं झाणं । कम्मरमाणिमितं फम्मागाणेहि मोगोर हि॥११॥ वाचनमायाग परमात्मणानकारण पाना मनियन कपणे मोसमीप गाहीगी गरदाणदगापमहियगिरगोहा। मागतोय मी पिणा देवगोई गं ॥९२ ॥ मना गमावानमाहितगृहिशीमा । 11/17ीसनादेशोभा ग॥ मालगिलिम परिश्री मा मदाना परिमोपति। लोदी मही गाणी कालिगेगु अगाणः ॥ १३ ॥ nuaH 111111111 Tht: पण काय अशानी॥ नाममार्गहीना मान माण ftire मना गर्म गोणमाको

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४१२ शाकुन्दकुन्दाचायोवराचता- तत्यविचारणशीली मोक्षपथारायनास्वभावयुतः । अनवरतं धर्मकयाप्रसंगतो मपति मुनिराजः ॥ विकहाइविप्पमुक्को आहाकम्माइविरहिओ गाणी। धम्मुद्देसणकुसलो अणुपेहामावणाजुदो जोई ॥ १० ॥ विकथादिविप्रमुक्तः आधाकर्मादिविरहितो ज्ञानी । धर्मदेशनाकुशलोऽनुप्रेक्षाभावनायुतो योगी ।। अवियप्पो णिबंदो णिम्मोहो णिस्कलंकमओ णियदो। हिम्मलमहायजुत्तो जोई सो होइ मुणिराओ ॥१०१॥ अविकल्पो निन्द्वन्द्वो निर्मोहो निष्कलको निपतः । निर्मलस्वभावयुक्तो योगी म भाति मुनिगनः ॥ जिंदाचणद्गे परिमहउरमगदुपय सहमाणो । मुहमाणज्यणग्दो गयसंगो होइ मुणिगओ ॥ १०२ ।। निन्दावचनादुर पीपदोपमर्गदुर्ग सहमानः । शुभपानाध्ययनरनो गतमङ्गो भयनि मुनिराज ॥ निव्वं कायकिलेग मुल्छतो मिन्छमावसंतुनो। मध्यपणुवासे मोणियाणमुई ग गई।१०३।। नीत्र कायम् कुर्वन् मिथ्यायभायम युक्त । मनीपोंगन म निवागन मनि ।। रायादमलनुदाणं शियापण दिम्मए कि पि। ममलादग्मि म्यण टिम्गए जह नहा गेयं ।।१०४॥ ६

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११४ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- वसहीपडिमोवयरणे गणगन्छे समयजाइकुले । सिस्मपडिसिस्सछत्ते गुतजाते कापड पुच्छै ।। ११० ॥ वसतिप्रतिमोपकरणे गणगच्छे समयगातिकुले । शिष्यप्रतिशिष्यच्छा सुतजाते कपटे पुस्तके ।। पिच्छे संत्थरणे इच्छोमु लोहेण कुणइ ममयारं । यावंच अहरुदं तार ण मुंचेदि ण हु मोक्स' ॥ १११ ।। पिस्टिकायां संस्तरे इच्छामु लोभन करोति ममकार । यावच्च आर्नरौद्रं तावन्न मुवति न हि मुखं ।। जे पावारंभरया कसायजुत्ता परिग्गहासत्ता। लोयववहारपउरा ते साहू सम्मउम्मुका ॥ ११२॥ ये पापारभरताः कपाययुक्ता, परिग्रहासक्ताः । टोकन्यवहारप्रचुरा: ते साधवः सम्यक्त्वोन्मुक्ताः ॥ चम्महिमंसलवलद्धो सुणहो गजए मुणि ? दिद्या । जह पाविहो सो धम्मिदं दिहा सगीयहो॥११३॥ चर्मास्थिमासलबलन्धः शुनक गर्जति मुनि दृष्ट्वा । यथा पापिष्ठः स धर्मिष्ठ दृष्ट्वा............॥ ण सहति इयरदप्पं घुवंति अप्याण अप्पमहप्पं । जिब्भणिमित्न कुणंति ते साहू सम्मउम्मुक्का ॥ ११४ ॥ न सहन्ते इतरदपै स्तुवन्ति आत्मनात्ममाहात्म्ये। जिव्हानिमित्त कुर्वन्ति ते साधवः सम्यक्त्वोन्मुक्ताः। मुबहवालमु क. परिग्रहेषु । २ तावस्य. क.।३-, ११.-111-ग द्वयं पत्रस्य नास्ति स पुस्तके। ४ ने गायाभूत्रं. स-पुस्तके । ५ थुर्व हप.।

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४१८ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- ख्याति पूजा लाभ सत्कारादि किमिच्छसि योगिन् ।। इच्छसि यदि परलोक तैः किं तव परलोक ॥ कम्मादविहावसहायगुणं जो माविऊण मावेण । णियसुद्धप्पा रुबइ तस्म य णियमेण होइ णिल्याणं ॥१३२॥ कर्मान्मविभावसभावगुणे यो भावयिचा भावेन । निजसुद्धामा रोचते तस्मै च नियमेन भवति निर्वाण ।। मूलरूत्तरुत्तरदव्यादी भावकम्मदो मुरको । ओसवबंधणसंगरणिजर जाणेह किं यणा ॥ १३३ ।। मूलोत्तरोत्तरद्रव्यतः भावकर्मत: मुक्तः । भारपयन्धनर्मपरनिर्जरा जानीहि किं पहना ॥ विमपविरगो मुंबई विमपामतो ण मुंनग जोई। पहिरंतरपग्मप्पामेयं जाणेह किं पहुणा ।। १३४ ॥ विपरितो मुंधति विषयासक्तो न मुवति योगी । पहिरन्त:पामामभेद जानीहि कि यहुना ॥ अंपाण णाणझाणायणगुहमियरमापण पाणं । मोगुणनमाण मुहं जो भुंजद मी हु मदिरप्पा ॥१३५॥ आमनोमानध्यानाध्ययनमुपागृतम्गायनपान । मुरका अायो मुगयो म हियरिग मा॥ किंवायफलं पर विममिम्मिदमोटार चारगुई। जिम्मा दिदिपियं जहमद जाणगगोगं पि॥१३६॥ मा. मितिम , RAEL FOf M-1, भागुमी !! TRAIPURARI • यमया मामा .

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--- । १२० श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- मलमूत्रपटयत् चिरै यासितो दुर्वासना न मुवति । प्रक्षाउितसम्यात्वजलो याज्ञानामृतन पूर्णोऽपि ॥ सम्माइही गाणी खाण मुहं कहं पि अणुबइ । केणाविण परिहारण वाहणविणामणह मेसनं ॥ १४३ ॥ सम्पदृष्टिः ज्ञानी अक्षाणां मुर्ग कथमपि अनुभवति । केनापि न परिहारयति व्याधिविनाशाय भेषज ।। कि यहुणा हो तजि पहिरप्पमस्याणि सयलमावाणि । भजि मझिमपरमप्पा यत्युमरूवाणि भावाणि ॥१४॥ किंबहुना हो स्पन बहिरात्मस्वरूपान् सकलभावान् । भज मध्यमपरमात्मना वस्तुप्तरूपान् भाषान् ॥ पउगइर्गमारगमणकारणभूपाणि दुरगहेअणि । साणि हवे पहिरपा क्त्युमरूवाणि मागणि ॥ १४५ ॥ चतुर्गनिर्ममारगमनकारणभूता दुहेतरः । ते भवन्ति यहिगत्मना बस्तुस्वरा भावाः ॥ मोरगगइगमणकारणभूयाणि पगत्यपूणा हेऊणि । नाणि हवे दुरिहापा यत्युमम्याणि माराणि ॥१४६।। मोक्षगतिगमनकारणमृगाः प्रशस्तस्यहे,तर । ने भन्नि शिधामनी वस्तुमा भारः॥ दखगुणपत जाणइ परममयसमयादिरिमेयं । अपार्ण जागा मी गिगाहणागगी होई ॥१४॥ गगन नानि पागमयागमयादिलासा वामन जानामिनाया भी।

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४२२ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- पजातिजरामरणदुःपदुष्टविपाहिनिपविनाशकरं । शियमुराला सम्याच संभावप शृणु सापक साधो ! ॥ कि यहुणा हो देविंदाहिंदणरिंदगणपरिदहिं । पुन्ना परमप्पा जे तं जाण पहाणमम्मगुंणं ॥१५४॥ किंबहुना अहो देवेन्द्राहीन्द्रनरेन्द्रगणधरेन्द्रः । पृश्या: परमा मानः ये सजानीहि प्रधानमम्पायगुण । उपममई मम्म मिच्छन यलेण पल्लाए तस्म । परिगति कमाया आमरिपणिकालदोमेण ॥१५५।। उपशम सभ्य मिथ्यात्य यन शिपति मत् ।। पग्विन्ति पाया अवमर्पिणीकालदोपण ॥ गुणवयनाममपडिमादाणं जलगालणं अणन्यमियं । दंगणणाणचरिम फिरिया तेवण माया मणिया ॥१५६।। गुणतनता ममत्रतिमादानं जगालन अनतमिल नजान-11निया विचारात धारिका भणिता ॥ णाण माणसिद्धी माणादो गयाम्मणि नाणं । मिमग्णाले मागणाणम्मामं नदी कुन्ना ॥१५॥ हानेन यानमिदियानन ममनि नाणे। नमा नाना- यानT.41111 हुगलम्प न गिगुणम्ग मंजमी गमप येगी। मुहमा ननिय नाहा गुहमा हुणा ॥१५८।। मम ... RL 41 गाया ना wintrigort मार T4 MIRE 11 41, .fail

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१ 44 -- १२१ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता- स्नापमेय गणः गरछ: गगनस्य मोक्षमार्गस्य । संघो गुणसघात: समयः रातु निर्मल आमा । जिलिंगधरो जोई गिरायसम्मत्तसंजुदो गाणी। परमोयेग्गादरियो मिवगइपहणायगो होई ॥१६॥ मिनलिंगधरी योगी विरागसम्पाययुतो ज्ञानी । परमोपेक्षातिरिक्तः शियगतिपधनायको भवति ।। गम्म जाण येग्गनयोमा णिरीदवित्तिचारिन् । गुणमीलमहा उप्पमइ ग्यणमारमिणं ॥१६५।। मम्या ज्ञान वगम्यतपोभा निगह वृत्तिधारित । गुणशीलम्बमात्र उत्पादयति गनसारी॥ गथमिणं जीण दिहण मण ण गुणेरणा पाए। ज, निताण मानइ मो और येइ हुदिही ॥१६६।। प्रन्नभिन यो न पश्यति न हि मन्यते न हि शृणोति न हि पनि । नहि चिन्नानि - हिमायनि मचा मोरधिः ॥ इदि मनगम ग्यणगार गंध गिगलगो पि । जो पागणमार: पार गो गागय टाणं ॥१६७ ।। th नामप्रिमियरमा नि. • गत मायनि प्रामानि मा शान ममा144 - मा... RITTA ब-41. १ मामले ममाय ...

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१२६ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता- जीपणिपद्धं देहं गीगेदयमिर विणम्मद मिय। भोगीपमोगकारणदयं णियं कई होदि ॥६॥ जीपनि देह क्षीरोदकामिन शिनपनि शोषम् । भौगोपभोगकारणस्य नि फर्य भगति ॥ परमण दु आदा देयागुरमणुवरायविहयेहि। यदिरिगो गो अपा मम्गदमिदि चिंता णिशं ॥ ७ परमान तु आमा देशमुग्मनुजराजानमः। प्यनिकि गारमा शाश्वत इनि गित निर्थ ॥ PAYषानुपेक्षा। मणिमतीगहागा हयगपरही य गयरिनाभी। जाणं हि गण निगु लोग माणगमयहि ॥ ८॥ मशिन्यो मायमरीमा । जीना दो माणसमये ॥ मागी हरिदुर्ग मिणा दा य पदग्र्ण यन। प्राणी गयी हगण जिदं गाणं ।।१।। written 4 | गगन शा॥ मानित शायण यमनगमागम पागमनमाण पतीककार..!

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४२८ श्रीकुन्दसुन्दाचार्यविरचिता-
एक करोति पुष्पं धर्मनिमित्तेन पारदानेन ।
मानदेवे जीरो सस्य फले मुक्ते एकः ॥
उगमपनं मणियं मम्मगगुणेण संजुदो माह ।
मम्मादिही सापय मग्झिमपोहु विष्णयो ॥१७॥
उमत्तपा भणित सम्पालगुणेन संयुतः साधुः ।
सम्याति प्रापको मध्यापारिरिज्ञेयः॥
णिविही जिणसमये अविरदमम्मो जहण्णपणोनि ।
मम्मनग्यणरदियो अपगमिदि संपरिसमेजो ॥ १८॥
निरि जिनममये अविसमापारजघन्यपान इति ।
सम्पावनाहित अपात्रमिति मेपश्यः ॥
दंगणमट्टा मटा दंगणमहरण गरिय गिया ।
गिमंनि गरियमहा दंगणमहा ण मिति ।। १९ ।।
नियामा दशनमय न निवाणम् |
मिनिस्वादशनानमिदान॥
मोह गिम्ममी गुदी गाणदंगणलपगणी।
गुदयनमुपादयमे निमंजती ॥२०॥
12156 निमम शुद्ध प्रानाशन ।
मुपातिगत ॥
Mमानुप्रया।
मातापिटगदाणाननादियो।
नीलम न माया पियामेण पति॥२१॥

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-- ४३० श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता- सर्वस्मिन् लोकक्षेत्रे क्रमशः तनास्ति यत्र न उत्पन्नः । अवगाहनेन बहुशः परिभ्रमितः क्षेत्रसंसार ।। अवसप्पिणिउस्मप्पिणिसमयावलियासु णिरवसेसेमु । जादो मुदो य बहुसो परिभमिदो कालसंसार ॥ २७ ॥ अवसर्पिण्युत्सर्पिणीसमयावलिकासु निरवशेषाम् । जातः मृतः च बहुशः परिभामितः कालसंसारे ।। णिरयाउजहण्णादिसु आव दु उवरिष्ठया (गा) दु गेवेन मिच्छत्तसंसिदेण दु बहुमो वि महिदी ममिदो ॥२८ नरकायुघन्यादिषु यावत् तु उपरितनानि विकागि । मिश्यायसंश्रितेन तु बहुशः अपि भवस्थिती अमितः॥ मधे पयडिहिदिओ अणुभागप्पदमपंधठाणाणि । जीयो मिन्छनयमा ममिदो पुण मावसंमार ॥ २९ ॥ गर्वा प्रतिस्थितयोऽनुभागप्रदेशअन्धस्थानानि । जीव मिथ्या यशात अमिन पुन भायमसारे । पुनकलमणिमिनं अन्य अजयदि पापयुद्धीप । परिहद दयादाणं मी जीवो ममदि समारे ॥ ३०॥ 'पुराल निमिन अर्थ अननि पापनुदया । परिनियादान म जी भ्रमनि मममी । मम पूनं मम मना मम घणयाणागि निमगाए। मा धम्मादि पगडा परिपदीधर्ममारं ॥ ३१ ॥ मन म मा मम बन गयमिति ! | या का धर्म पथान पनि गरे ।

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F ४३२ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता- कर्मनिमित्तं जीरः हिंडति संसारचौरकांतारे । जीवस्य न संसारः नियनयकर्मनिर्मुक्तः ॥ संसारमदिक्कतो जीवोवादयमिदि विचिंतन्नो। संसारदुहकंतो जीयो मो हेयमिदि विचिंतनो ॥ ३८ ॥ संसारमतिकान्तः जीव टपादेय इति विचिन्तनीयम् । संसारदुःखाकान्तः जीवः स हेय इति विचिन्तनीयम् ॥ इति संसारानुप्रेक्षा। जीवादिपयहाणं समवायो सो णिरुचये लोगो। तिविहो हवेइ लोगो अहमज्झिमउड्डमेएण ॥ ३९ ॥ जीवादिपदार्याना समवायः स निरुय्यते लोकः । त्रिविधः भवेत् लोकः अधोमध्यमोर्चमेदेन । गिरया हवंति हेहा मज्झे दीयुरासयोसंखा। सग्गो तिसहि मे एनो उ९ हये मोक्सो ॥४०॥ नरका भवति अधस्तने मध्ये द्वीपाम्राशया' असंख्या। स्वर्ग. विपष्टिभेदः एतस्मात् ऊर्चे मवेत मोक्षः ।। इंगितीम सत्त चत्तारि दोणि एक छक पदुकप्पे । तित्तिय एकदियणामा उद्दआदितेमट्टी ॥ ४१ ।। एकत्रिंशत् सप्त चचारि दो एकै पट चतु:कल्ये । त्रिविस्मकैकेन्द्रकनामानि ऋवादित्रिपटिः ॥ अगुहेण णिग्यनिग्यिं मुहउवनोगेण दिविजणरमोरखं । मुद्रण लद्दद मिद्धिं एवं लोयं निचिंतिजो ॥ ४२ ॥ .

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४३४ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता- मिपाच अविरमण कपायपोगाध आस्रथा भवन्ति । पञ्चपञ्चचतु:त्रिकभेदाः सम्यक् प्रकीर्तिताः समये ।। एयंतविणयविवरियसंमयमण्याणमिदि हवे पंच । अविरमणं हिंसादी पंचविहो सो हवइ णियमेण ।। ४८ ॥ एकान्तविनयविपरीतसंशयं अज्ञानं इति भवेत् पञ्च । अविरमणं हिंसादि पञ्चविधं तत् भवति नियमेन ॥ कोहो माणो माया लोहो विय चउविहं कमायं तु । मणवचिकाएण पुणो जोगो तिवियप्पमिदि जाणे ।। ४९ ॥ कोयः मान: माया लोभः अपि च चतुर्विध. कपायः सह। मनीवच:कायेन पुनः योग त्रिविकल्प इति जानीहि ।। असुहेदरभेदेण दु एकेकं वण्णिदं हवे दुविहं । आहारादीसण्णा असुहमणं इदि विजाणेहि ॥५०॥ अशुभेतरभेदेन तु एकैकं वर्णितं भवेत् द्विविधम् । आहारादिसज्ञा अशुभमन इति विजानीहि ॥ किण्हादितिष्णि लेस्सा करणजमोक्सेमु गिदिपरिणामो। ईसाविसादमावो असुहमणं ति य जिणा चेति ॥५१॥ कृष्णादिनित लेश्या करण जसौख्ये गृद्धिपरिणाम. | ईपारिपादभार अशुभमन इति च जिना युवन्ति ।। गगो दोमो मोहो हास्मादीणोकमायपरिणामो। थूलो या मुद्रुमो वा अमुहमपो ति य जिणा येति ॥ ५२ ।। रागः द्वेप मोद हास्यादि-नोकपायपरिणाम | स्थूल: या सूक्ष्म. या अशुभमन इति च मिना यन्ति ।।

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४४२ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता- इदि णिच्छयववहारं जं भणियं कुंदकुंदमुणिणाहें । जो मावइ सुद्धमणो सो पावह परमणिब्याणं ॥ ९१ ॥ इति निश्चयव्यवहारं यत् भणितं कुन्दकुन्दमुनिनाथैन । यः भावयति शुमनाः स प्रामोति परमनिर्वाणम् ॥ इति श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता द्वादशानुप्रैशा समाता। समाप्तोऽयं पट्माभृतादिसंग्रहः । शुभं भूयात्।

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२ गाथा: प्रासंहा ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ५ ... ... ... . इयणाऊण खमागुण इय तिरियमणुयजम्मे इय भावपाहुडमिण... श्य मिच्छतावासे इरिया भासा एराण उ किसीहचरियं उग्गतबेणण्णाणी उच्छाइभावणाए उत्तममनिमगेहे"... उत्थर जाग जरओ उदमझलोए उपमम्मपरिमहरा उवममयमदम जुना ... ... पृष्ठसंख्याः गाथा: २५७ एवं जियपणतं १४४ ३.३ / एवं सावयधम्म २८५ / एवं संखेवेण य ५१ क कता भोइ भमुत्तो... ६. कलाणपरंपरया ३४ | काऊण गमुकार कालमणतं जीवो किकाहि दि बहिकम्म ११२/किंजंपिएण यहुणा २८./किं पुण गच्छर मोई ३६२ किंबहुना भणिएण... १२. कुच्छियदेवं धम्म .. ११७कुच्छियधम्मम्मिरओ कोहभयहासोहा कंदापमाझ्याओ २२५ / कद मूल बीयं ... ... " ... ... ... ... ... .. ... ... ... एएण कारणेण य ... ... ... ... ... ... ए" निणि वि ... ... " ... ... "सणणुनावणवालण .. ३६मयरामरमगुपकर . .. एलमान एक जिम्म... एमाही एगो में मम्मदी भादा एवं विडिय गुणे मश्च... एवं भायमान ... ... .. . १५२/गाइदिय बकाये... २.५ गमियाइ पुग्गलाई ३६४ दिशिया मुणिमा १.५त्रिय मम्मन .. १११ माग भगाहा निगमोहमुराध .. . ... ... --

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४ गाथा जेण रागे परे दम्वे जे दंसणेमु महा १३ ... ... पृधसस्याः गायाः ३५६ जे मया दिस्मदेव ज साइतं कीरद... १२ | पुजिगउत्तं ७ २ ... . " ... ... ... २१ ... ... ... ... ... ... ११ ... A ... २२ ... जे पावमोहिदमई जे पि पति च जे पुण विसयविरता जे पंचचेलसत्ता जे रायसंगजुत्ता जे यावीसपरीसह जेसि जीवसहावो जो इच्छद निस्सरि जो कम्मजादमदिओ जो कोहिएण जिप्पर जो को विधम्मसीलो जो जादजोयणसय जो जीवो भावतो... जो देहे हिरवेक्खो जो पुण परदय्वरओ जो रयणतयजुत्तो जो मुसो ववहारे जो सजमेमु रादिओ जकिंचि कयं दोस... अंघरदि मुदचरण जाणतणाण... ... " ... ... १४ | सायहि धम्म मुकं ३५४ शायहि पंचवि गुरवे ज २१५ णग्गत्तणं अकग्ज १गमिऊग जिणवरिद २.८ गमिऊण य तं देवं... ३२१ | मुयह पयडि अमञ्चो ३४६ गवणोकमायवग्गं ३१९ गवविदयभं पयदि गविएहिं ज णविद ३१८ वि देहो वंदिनद गवि मिग्झइ वन्य ३१२ गाणगुणेहि विहीणा... ३१५ णाणम्मि दंसम्मि ३३१ जाणमयविमलसीयल णाणमय अप्पाण ६१ गाणावरणादीहिय २५५ गाणी मिवपरमेट्ठी.. ८. जाणेण दसणेण य... १२णाणं चरितहीण णाणं परस्म सारो. ३.५ गाण देसण सम्म ३३.गाण पुरिसस्स ९२ 'गामे ठवणे हि य .. ... ५४ २५ २०४ २०४ .. ... १९२ ... ... ... " " " २५ आणिऊण जोई... ... ... 4 " "... जं निम्मलं मुधम्म... ... ...

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८ गाथा पृधमत २ ... रयगत्तय पि ओई. रयणने मुअल रूवर सुदर ... ३ ३ ... ... ... 44. ... ... ... M ... - ... . ... 4.. १५ ... 4. ... ... . ... पृष्ठसंख्याः माया ३२७ मडदिय पदिय १४५ सपरसवमाएणं १२, मपरा जंगमदेहा सपरावेपर्म लिग ७ि) सम्म गुण मिच्छ दोस १८ सम्मलचरण मुद्धा सम्मनणाणदंराण ३६सम्मत्तणाणरहिओ ४८ सम्मारयणमा "सम्मत्तविरहिया ३२. सम्मत्तसदिलपवही ६४ सम्मत्तादोणाणं २५. सम्मत जो सायदि १४५ सम्म सम्याग ... "0 सम्मदसण परमदि... १०३ सम्मदसण पस्सइ ... २१५ सम्माइही मायय १४३ सयलमणबोहण २७ | सवसा सत्तं तित्थ ... १७४ | मम्वण्ट सम्वदंसी ... २१ सम्बरिरओ वि भावहि सम्वासवाणिगेहेण ... २१९ सम्वे कसाय मोत्तु २५३ । सइजुप्पणं व लिंग दरवीण दवदि.... लिंगम्मिय चीर्ण प पहले विणएप य वगुत्ती मगगुती षयसम्मत्तविमुझे परययतयेहि सम्गो... पालगाकोडिमरी विणयं पंचपयारे ... वियलिपिए असीरी विपरीयामाषा विरायकगाएहिजो विरायविरतो समणो विगपेयगरतासय... पिहरदिजाय जिजिरो पेरगपरो शाहू वदामि तवरामण्णा... .. ... ४. ... ... ... . ... ... ... .. ... ." २. १० ... १४ . . ... ४५ ... .. राग तपेण सम्पो... राषितमत्तपार्थ सतगुनस्याबासे सतमिलेर रामा सम्परभो सबगो .पियारो हुओ सामादय व पदभ... ' ... "साहति ज महल्ला.... ११४ विद्रो सुझो भादा ... १२ शिजस्म सदस्थ... ." ७९ ..

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" पदनाभृतटीकोक्तोद्धरण-श्लोकानामकारादिक्रमेण सूची। अ कर्नाम प्रन्यनाम पृष्ठसंख्या भइकुणउ तव यावसेनमूरिः आराधनामारे अकलको महा इन्दनन्दी नीतिसारे अकिंचनोऽह गुगभदाचार्यः भारमानुशामने अकोहणो अलोहो गीतमा प्रतिक्रमण ४९ भमिवत्मवैभश्या अझ यद्यपि यापिता अन्ननपि भवेत् मोमदेवसूरिः यशस्तिल के अजस्तिलोत्तमा मामदेवसूरिः यशस्तिलके अजाकृपाणीय गुणभदाचार्यः मात्मानुशासने २५८ अहमीमहलवा ४१ ... भण्णाणादा मोक्स अणिमा महिमा अतिकमो मानम २१८ भत्यल्पा यति सोमदेवमूहि यरितलके शुनमागरसूरिः अत्रय प्रन्ये ३०४ अचिरेण पिरा बहकिमस्पृष्ट २४ 114 भय देवेन्द २५९ ... " অবিসান্তোনা भनाभप्रियता अभाए दालिहियह ( अन्येषा) जिनसेनाचायः माधर यशस्तिके महापारणे २१४ १२५ ...

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१२ भाज्ञासम्यवत्व गुणमदमदन्तः आत्मानुशसाने " " आतापाव भातशोक भात्मकृतं परि २५८ २८१ २४ ... अमृतचन्दमूरि पुरुषार्थ निद्धपुराये " " ... ... भारमनारम भारमनि मोक्षे भारमशदिरियं ... मात्मा भित्र सोमदेवसूरि यद्यस्तिलके ... पुणमद्राचार्याः मात्मानुशासने . " " मात्मा मनीपिमि भावास्तु पद्र ... ... " समन्तभदस्वामी मोमदेव सूरिः रत्नकरण्डके यशस्तिल धापगासागर भायुष्मान् बारोगभुत भारमे गरिय भारलि असंख... ... ... ... ... ४० . ... २४ १४ गुणमदाबायः वाशागतं. माशा दासी मात्मानुशासने ... ... पूण्यशदस्वामी ... एसोविकार इस्थिविषयादिलासो इस्पीणं पुण दिशा इत्पं भवन्त नसारे देवसेनसरः सुलोचनान्त:

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कपिलो यदि सोमदेवसरिः यशस्तिल के २०७ १४ " " " ... सोमदेवसूरिः जिनसेनाचार्यः यशस्तिलके महापुराणे ... ... ... ... शुभचंदयोगी समन्तभदस्वामी कम्मइ दिढ़षण कर्णावतंसमुख कायन् मूर्ति काकः कृमि कान्दी कैल्लिषी कायवाक्यमनमा काले कल्पशते किमत्र बनोक्तेन कुदेवगुदशास्त्राणा केण य बाडी वादिया कोपीनोऽसौ भुत्यावश्यक ৪sfeবাভাস हानार्णवे स्वयंभूस्तो रनकरंडके महापुराणे ८१ जिनसेनाचार्य ve २५२ वीरनन्दी समन्तभवस्वामी आचारसारे रत्नकरण्डके २९४ " जिनसेनाचार्यः जिनसेनाचार्य: महापुराणे महापुरणे क्षेत्रवास्तुसमुस्मर्ग क्षेत्राक्षे तत्मभा मे वास्तु धनं कम दानिश कियते भोजन बचिकालानु ... १३८ नीतिमारे नीतिमारे " ... सलानशाना सहनी पेषगी चुम्ली ... " ग ... मावस्यतलारस्थ इन्दरदी नीतिमारे

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... ... ... दोरनन्दी भावारसारे जा निमि सयलह जानुदेहादधःसर्श जिण पुरजदि जीवकृतं परिणाम २५१ .. अमृतवन्दसूरिः पुरुषार्थसिद्धयुपाये " ३२ ... जिनसेनाचार्यः महापुराणे जीवा जिणवर जनेश्वरी परामाज्ञा में मुणि लहर जंसदत शारवा योग्यमयोग्य ज्ञानकाण्डे किया ज्ञानं पूजा कुलं ... वीरनन्दी सोमदेवसूरि समन्तभदाचार्यः आचारसारे यशस्तिलके रानकरण्डके १ " १६ ... शानं पंगी किया ण गवकोसिया गाणविहीगई ... - नाम जिया नेमियमैदान्ती गोम्मटसारे १८१ वीरनन्दी भावारसारे ०५२ २९२ मिचिदरधातु त ततःचारीरसंपदय aधिकालभवात् सद जस्तनेहातो तपोयनुमपानक तगोविगाहनादस्य स्वनाममुखो त्यातचीतातपत्राण स्वतस्नादि यकवाष्ट्र सोमदेवमूरि- जिनसेनाचार्य- यशस्तिलके महापुराणे " " U १४ . " "

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२० वीरनन्दी आचारमारे २५१ .. ... ... ... महोपसगांता मान्य ज्ञानं तपो मानुष्यं सस्कुले मानुषी प्रकृति मा भवतु सस्य मालतीद मिच्छा सामण समन्तभददेवा स्वर्यभूम्नोग्रे... ." २१३ ... शुभवरदाचार्या नेमिवन्दाचार्यः ... गोम्मटमारे २४५ " . " मिभ्याम्बवेद २०३ " . मिथ्यात्ववेदी मिम्याहरभ्यो मुद्रा सर्वत्र मान्या इन्दनन्दी नीतिसारे " " मात्रय मदाचा मृत्यादिष्वपि नेतम्या मैथुनाचरणे म्सापयन् स्वात य यच्छावरचित यहाथ पशयः जिनसेनाचार्यः शुभचन्दाचार्या जिनसेनाचार्यः महापुराणे मानार्णवे महापुराणे ११४ M इन्दनन्दी नीविसारे ... यथा चतुर्भिः ... यदज्ञानेन जीवेन यम्बाहन्ति न यशोमारीवीयं यस्मिन् सर्वाणि पंडिताशाधराः गुणभद्राचार्यः ... भात्मानुशासने ...उपनिषदि भास्मानुशासने यः भुवा दादा गुणभदभदन्ताः १३ १२२ ३.४ " " " यापजनकल्प श्रुतमागरसूरय. पप्रामृतटीडायो

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.. এসমবায় armarvart ११८ ... vषा सुलोचनाकान्तः इन्दनन्दी मीतिमारे मानिसलपन्त कालिका मालिक पात्र मात्राणि... भीममा श्रीचन्यो नीतिसारे अत्रैव श्रुतसागराः " " भीमास्वामिसमन्त মিথিগ श्रुतसागरेण " टेबले स्थिर ... .. पोशाय महमाणि २४१ समन्तभद्राचार्य जिनसेनाचाया रत्नकरण्डके महापुराणे सहारपुरचारो मप्रन्यारमहिंगा मामातिः सदास्प सत्तालोवनमात्र सन्दीपकारी ममन्नमद्राधीईमः मममममीटिन नीतिमारे इदनन्दी अमृतवदरिः ५४ ... -- महापुराणे महाभ्युस्य प्राय मम्म घेर मारे मम्यादानमरर जिनमेगावा दादावायां: समन्नमवावरायः १२. ११२ ... ... एनसके।

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२४
जिनसेनाचार्य
महापुराणे
स्वं मणिस्नेह
स्वं स्वापतेय
स्वं साम्यमैहिक
.
१२४
२५
हतं ज्ञान कियाहीनं
हृदये स्वयि
हे चन्द्रम.
होई वणिज्जुन
सुलोचनाकान्तः
गुगर्भाचार्यः
आत्मानुशामने
...
...
ममायमनुक्रमणिका।

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२७ पर पुणे ... ... Item RE ristiane ... Prernet riritगियर - ४२७ पलाम तवो नियुप ४२८ बोहमस्मि पुगो ४३४ कोहेणय पलण र ४.पोरी माणी माया... हा भावतिविति... १९. पंदणमासाश्री ३८॥ मामूलागलो साई पूमा रहो रही ४१८ तादा ... PATRNER surpो... ar Errrtोरो... पाया गुगएपरिमा rekhet +7 Free + ५ 4.

जा: . गम नइयर ... ... .. ... .. . . ग.. T 7 ... .. In जग 1 जाजरमाग तापमयान जावना निणपजा मुणिदा। जिणारगगनाड जिगावगारदमाग जिमा द्वारपादा जावा जावेदयाममन जायमण मगर सावरियाण जे पावारभर या ने पुण पिमय मि अमनम जादमारनामना जो जाडदिबिबाह जी पावमोहिदमदी जा पुणिभमवमम , जजाजरामरण जनअपना मुद जन मेनन प शाद गायदि Mr. . . . - ... 141 T 1 ४ 17,अमा 1.1 पादाम ४२ य1. यदि नयमुप्पशुरत्तो रियाज अहणाविमु जिरयानि देखा ३८ नामिका बहुमाग ... वेगति माया... ... जमिन नरपति रियादब .. गरएम वेअभाभी v1 .. १८९ ताधियारसीली... १२१ IITant ..

२२ ... ३८५ पम्न होइ लिग ४१२ , धरि बाहिारे ३८९ धावति । डामिनं ... पनपते ... ३२८ ... दमन्तवार दपिकापमान दमी दाल ... ३८३ ... पूजा मुरां दानं जाती ... ३८१ ... ... ... ... ... ... ... दिग्द-मुपत्तदान दिन्बुप्तरणसरित्य से पदहि पानं पुग्ध सोमस বেনুষ देवगुरमममता ३८३ ... ४२० पत्त विमा दागं ... ४०४ पतिभनिविहीग सदो ३९८ परमग दु भादा परसंतावसकारण ३९५ पदवहीगगहिगं ३९४ पवरपसारम्भासं ३९५ पाओपहदमावो ३९५ पारंपदाएन दु ४१५ पाचारमनिवित्ती ३८५ पिच्छे संपरणे ४३३ पुच्चलि परि जमु ४.२ | पुतस्तत्तनिनितं ३९४ पुत्तस्ततविरो १९ पुरिसेन वि सहिपाए ४१३ [पुषठिये सवा ४३३ पुग्नुत्तासवभेपो १३ पु जिहि भनि ३८. जो पंचेदिद ३०२ पुर्ण सेवामिछा... ३८३ पूरमलेग जिलोए ४२८ समायरमगड़ा ४३७ पपलिहे मारे य ३९८ गहरेटरलने ४१ बरिरम्भंदर ... ... ... दर रहतं पुत ... ... ... ... देशादेनु मारने देहादो वदेतो दरसरसल्लतप दंसम्मानपते ... ४.८ ... " ... नगभाभा ... संबन दो पम्नो... घ ... ... ...

पनामग मग +13.772' . 17 . बहसमा . . सन -- न T • ।' 9 " . न 1" १ 1 . . 1 १. ३ २ . . नाना भयरमणमलताना भनट जहाला भुना पागु गमइया भूमहिलाकणार म मयिनिटिम्म मणिमनागहरक्या मदिमुदणाणलेग मम पुन मम भना मय मूढमणायदण मलमुम्नपाडव चिर मादापिदरमहोदर मादुपिदु मुस्तमिन मिरछत्त अविरमण, मिच्छामामय मिन्छधयार मिन्छोदपण जीवो निस्मोन बाहिर मिहगे महवया मूदलयसवनय मून्द्रतहकहनाभर मुदमरपयोगी मोसादमणकारण - 111 पाइसजगमग" प . २ मममा. वदममरपालगाए .१ वयगुभमीलारीमद १८ बरभवगमागवाहण ./महीपरिमोयरन ४३. नागामायाण .4. . ... ... ... ४.1 ३८८ ... ... विपदो ३८७ सच्चे विय परिहीणा ३८८ सवंग ऐच्छंनो मा पुष दुविहा या सममिदियरूव सावधम्म यस्ता मालविहीजो राओ... ... ... को मागविहीगो किस्मोहिदा. FIRविनि रको मुंगर.. ४८८ निविणे व - ... -- ... दुर्ग निति Pkm दोगड Pri गरपार Pri Post ४१८ मीदुष्प का? पिउल १८५ सीलगुणमहिदास सीलाग गीत सो विne सील या ३९० । गुरगुरुव पुणताण पराएप मदनापामा १९१ . एरवी पुणे १२.गरसे सूरत दिशा... .१३ . परगर दिनो... रोवर ... ... -- m रयणसारस्य पाठमेदः। रपणगारात्यस्य प्रन्यस्य मुशानन्तरं पुस्तकमे ब्रह्मवारिशीतलप्रमाद्वारेण लाला हरमुखराय जैनपुस्तकालयस्थ संप्राप्तं । तप्रायः पाठभेदोऽय मुमने-- पृपसंख्याः गाथासंड्या. मुदितराठः पाटान्तरम् वाह विसय वारि। पाहाणमायरोसे वाहीगमायरो मो विट्ठागदिट्ठीय बिडीगादिही मूलो क्षयि सूतालय ३९७ ३६ सीदुहवाहिराई सौनुहमरोई परिही गं परिहीगो परित मक्खि ४०२ तवसार तवावार जिगवरवण जिगवयण ४.२ ५२ जहा विणमिजद जहा वि य सिंह परम पुरुस गिम्मलव निम्मलजलग्द अण्णाणी अण्णाणीदो। ४.७ कण्यात फणयाइ मुंडहरो मुंगओ मिरर्मुहरो सिरमुंडाओ.. ८४ सम्माण विश य कई सम्माणविणयकेदा १२ सालविहीगो राज सीलविहीणो चाभी १२१ याजे आगमहर्ण भागम उत्तं तं, त आणिझण, मुदा जो सोहु मोक्खरओ। णाणत श्रणातवं.-- १ वाहनविभव । २ व्याधीनामाकरः सः। विहीनहरिश्च । निर्मक जलवत् । ५ सम्मानविनयरूपाः । । शीलविहीनस्त्यामः । ७ तंजावा ददाति मुदान यः स हि मोक्षरतः। ८ अज्ञानतरः । " " . " ." 4.

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शुद्धयशुद्धिपत्रम्। पश्तय 7 अशुद्धयः इतिदश दि शुद्धपः इति दश ६ भाषया १२ २८ ५८ ८. भाषाया मुत्तत्य पडिमा मुदिवाय भाकोश २५ २ उचित २३ १२५ सूतत्थ पडिया मविचार्य भोकोश उकिर उक्त कीर्तिवंग सत्यनन्त हलानोभार विशवरयात् वृद्धिभिरवा विति रामावर मुदारित १७ " कीतिबंध नरवनन्त हलानी मार विशेषत्वात् दिमिरवा नीति राधारेव मुखाटित " " - १८१ मुशलीवीरवरो भवता मनति मुशलो वीरवरो भवनी २१६ १ २१८ बोषित २ "

३५
पामने
नुता
सपनी
पर मनो
पेशित
सौकात
साद
महामूर
नयाऽमुदत

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Sathprbutadi Sangrh

Author
Pandit Panalal
Title
Sathprbutadi Sangrh
File name
Sathprbutadi Sangrh
Text
OCR done
Citation
1944
Published
2011/08
Publisher
Poona,hanumam Press
Language
Sanskrit
Pages
458
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313845
Barcode
99999990311232.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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