Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Mrach Katik Bhasa
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1 Tho horoino (náşıká) 18 Vagantisena, a beautiful and trealthy Indy, mlio although " according to the strictest standard ol morality, pot arreprorchablo in character, might still be described as conforming to the Flindu conception of a higli miaded liboral tomon Moreover, her naturalis virtuous disposition becomes strictly 60 from the moment of her first acquaintance with Charadatta" (Moner Williams) "Tho masterpiece of the play, horrevor, 18 Somstbonha, the Raja's brother in las À character so utterly contempuble ling perhaps been scarcely over delineated , his vicce aro ogregious, ho is coldly and cruelly inalicious, and yot be 19 80 frivoloas as scarcolv to excito our indigontion , angor tvero rasted on ono so despicable, and rithuat any feeling of com passion for his fate, to aro quite disposed, whon lio 18 about to Auffor thic merited punishment of lus crimes, to exclain with Oharudatta, Loose him and let him go Ho is an excellent sainple of a genus too common 1: every ago in Asia, whoso proces linro been educated b! sloth and servility, and have boen ordinarily taught to chorish no principle but that of selfisli gratification ** Dr Grierson has mentioned two other Elincli trans lations of the play in lns Modern Veroncular Literature of Elindustan These pain to be out of print The im portance of the play, however, I belsove, will be consi dered sufficient apology for my including a fresh translation of it in the pregont series CATAPORE 28th August, 1899 SITAR4V पहिली आवृति की भूमिका अवधपुरी सुखमाप्रषधि सुखमाप्रषधि तामधि स्वर्गद्वारि। जगपावनि सरय् जहाँ बहत सुहावन पारि॥ तहाँ रह्यो कायस्थ श्रीशिवरत्न उदार। श्रीरघुपतिपदकमल मह ताकी भक्ति छपर। सियरघुपरयुगचरनरत तासुत मीताराम। रासिनाम कवितासुगम धरत भूप उपनाम॥ श्रीसुरसरि के तट नगर कानपूर करि बास। नाटकमाला कीन्हें नारि प्रकास॥ सपत मृतुशरनन्दशशि नम सित २ शनिधार । मृच्छकटिकमाषा विरिचि करत लोकउपहार॥ देशकाजइतिहास जो जानत गर्ने बिकमा से अधिक यह नाटक इहाँ बिलो रसिकजन लोकरीति कुल-चाल । साधारण जन मह रही सब जैसी तेहि काल ॥ दोष न गनत कुलोन करि प्रेम पातुरो मग । देह निवाहत प्रानहूँ पातुर प्रेम अभग। जाय अदालत माह ज्यो दुष्ट प्राति के लोग। मूठ जाल रवि सिध फरत नारिषधनप्रभियोग। सभ्यन सग हाकिम करत ज्या अभियोग विचार । निर्णय परिपाटी सकल दडदेनव्यवहार ॥ युकि अनूठी सहित सव शूद्रक रच्यो सपारि । पर्दै मुदित मन सुजन तेहि मेरे दोप घिसारि॥ चतुर प्रवीन । प्रवीन ।। सीताराम नाटक के पात्र पुरुप- चारुदत्त-एक विगहा रईस मोर नाटक का नायक । रोहसेन-चारुदत्त का लडका । मैत्रेय नाटक का विपक और चारुदत्त का साथी । आर्द्धमानक-चारुदत्त का नौकर । सस्थानक-राजा पालक कामाता और उज्जयिनी का कोतवाल। स्थावरक-सस्थानक का नौकर । पार्यक-एक प्रदीर जोराजा पालक को मारकर पीछे राजा दुमा शर्वितक F---एक ब्राह्मण, प्रार्यक कामिन । सपाहक-एक जुम्मारी, जो पीछे, बौद्धसन्यासी हो गया । मायुर-जुए को नालकाला। दर्दुरक-एक जुधारी। कर्णपूरक बसतसेना के सेवक। कुम्भिक फौजदारी अदालत का हाकिम । सेठ और कायस्थ अदालत के मभ्य ( असेसर)। बीरक चन्दनक नगर की रक्षा के अधिकारी (पुलिस के अफसर) शोधनक-अदालत का नाजिर । स्त्री- बसतसेना-एक परम उदार पातुरी घोर नाटक की नायिका । चुदिया--नायिका की मा। मदनिका-चसतसेना की लौंडी। धृता--चारदत्त की स्त्री।। रदनिका-चारुदत्त की लौडी। घिट ( मुसाहित ), जुआरी, मधुल, सिपाही, चांडाल, चेरिया } श्रादि।
श्रीसीतारामाभ्याजम
मृच्छकटिकभाषा
प्रस्तावना
[ स्थान-एक कमरा]
(नान्दी)
जय घुटनन लपटत भुजङ्ग बैठे योगासन ।
जय रोके निज मान किए निज बस इन्द्रिय मन ॥
जयति करत
सहार सृधि सन द्वष्टि हटाये।
जयति समाधि अभग ब्रह्म निज मार्हि लगाये ॥
जय जयति वैठि साकार प्रभुलाय दृष्टि निज ज्ञानमय ।
निज ब्रह्मरूप प्राकार विन निरखत श्रीगौरीश जय ॥
शम्भुकण्ट जनु श्याम धन, सदा करे कल्यान ।
गौरीभुज सोहत जहाँ, विजुरीरेस समान ॥
(नान्दी के पीछे सूनधार प्राता है)
सून-बस, यस, बहुत हो चुका, लोग उकता गये । श्राप
नागों से हाथ जोड़कर विनती करता हूँ कि अाज हम लोग
पृच्छकटिक नाटक सेलना चाहते है जिसको सम्झत में राजा
युद्धक ने रचा था।
सुघडशरीर चकारद्वग मसिमुख घारनवाल | हाला
द्विजवर शूद्रक नृप रह्यो यल साइ धरत विशाल ॥
सामवेद मृद गणितविधा पदि डारी।
गजशिक्षा सब सीखि, कला वैशिकिह सारी ॥
शिष की कृपा प्रसाद जोति दृग को फिर पाई।
अश्वमेध को यज्ञ की ह निज कीर्ति गुदाई।
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૨ मृत्छकटिकमापा फार पूर्ण काम निज जन्म कर देव राज निज पुत्र कहूँ । मौ परिस दियमदम प्रायु मदि पैठे नृप सार अग्नि मह॥ समर बात तप करत पर जानत येद प्रथा । रिपुरज मे निज भुज भिरै घोशूद्रक नरनाद । पार इनके इस ग्रंथ में चाव एक दिज सो निर्धन गुणी उदार । साद नगरी उज्जेनि में फरत घनिज न्यौपार ॥ यस तमेना तहें दी गनिका बागवत के देखि गुन तापे रदी लुभानि ।। तिन को प्रेमकथा सफल दुष्ट खजन की नीति । राजा शूद्रक यह रची न्यायालय की रीति॥ उम अपूर्घ अन्य का श्री प्रधधधासी सीताराम ने यथाशकि देशभाषा में अनुवाद किया है। प्राशा है कि प्राप सोग कृपा. दृष्टि से हमारा अभिनय देख कर न्यार के परिश्रम को सफल परम सथानि। करेंगे। - (घूम कर देख कर ) अरे ! हमारी संगीतमाला सूनी क्यों देख पढ़ती है ? नट कहाँ चले गए ? (सोच कर ) हो जाना-- पुषधीन घर सून है, मित्रहीन जग खून । मूरप को सर एन है, दारिद सब से.ऊन ॥ गाना हो चुका , पब घडी घर से गाते गाते गर्मी में घाम के सूखे फमल के घोजों की नाई भूत के मारे मेरी प्राा कड़कड़ा रही हैं , तो अब घरपाली को पुताकर पूछु कि कुछ कलेवा है कि नहीं । अरे, अरे, घर से गात गात सूखे कमल के डडे को नाई मेरे हाथ पैर पुम्हलाए जा घर में जाकर देखू कि घरवाली ने कुछ बनाया है कि नहीं। (घूम के देख कर ) है मेरा घर, तो अध चलूँ । (घूम कर देख कर। तो हमारे घर पहा सामान हो रहा है-मार
मृच्छकटिकभाषा
नित्रपुरा रही है, कटाहो के मारे रसोई का घर ऐसा जान पड़ता है माने
धरती के मुंह पर गोदना गोदा गया है, भोजन की सुगध में
मेरे पेट की माग और भी भडक उठी । क्या कोई पहिले का
रपखा धन मिल गया है या हमी को भूख के मारे घर में
मात हो मात देख पड़ता है ! हमारे घर में कलेघा करने को
कुछ है नहीं और भूत के मारे हमारे प्रात निकले जाते हैं।
पौर यहां समान नया हो रहा है, एक रंग पीस रही है,
एक फूल गूध रही है। (सोच कर ) यह क्या है ? अच्छा,
घरवाली को बुलाकर पू (नेपथ्य की ओर देग्म कर)-
प्यारी!घर तो पानो।
(नटी प्राती है)
नटी-कहिए।
खत्र-यहुत अच्छे प्राई।
नटी-हिप क्या श्राक्षा है ?
मूत्र-घडी घेर से गाते २ ( इत्यादि फिर पढ़ता है)-छ
मारे घर में पाने पाने दोहै?
नटी-जी, सब कुछ
क्या क्या है?
मटी-मीठा भात है, घो है, दही हे, जो जो श्राप या ममते
से सब कुछ है, सब तो भगवान ने दिया है।
सूत्र-क्या हमारे घर में सब पुश है!या हसी कर रही दो?
नटी-(प्रापही प्राप) अच्छा लामो हनी ही फळं (मकाश)
में सब है।
-(फोध से ) प्ररे तेरा सायनाश हो! मुझे मिट्टी
की नाई प्राकाश पर चढ़ा कर गिरा रही है।
1-(हाय जोड़फर)इमा फोजिए, मैंने इसी की पी
? - नट ४ मृच्छकटिकभाषा सून-तो श्राज यहां क्या सामान हो रहा है? एक रग पीसती है, इसरी माला गूंधती है, आंगन में फूलों का चौक पूरा हुया है ! नटी-माज व्रत है। सूत्र-क्या नाम है इस व्रत का अभिरूपपति'। सूत्र-इसकी क्या किया? नटी—जिसमे पच्छा पर मिले । सूत्र-इस लोक में या परलोक में ? नटी-जी परलोक मे। सूत्र-(क्रोध से ) देखिये, देखिये, प्राप लोग यह हमारा भात लुटाकर परलोक का भतार मांगती है। नटी-छमा कीजिए, मेने इस लिए किया है कि दूसरे जन्म में भी प्रापही मिले। सूत्र-यह नत किसने बताया है ? नटी-आपके मित्र चूर्णवृद्ध हो ने तो। सूत्र--(क्रोध से ) प्रवे चूर्णवृद्ध ! एक दिन तुझे भी राजा पालक नई पहले जूड़े की नाई बांध देंगे । नटो-उमा कीजिए, प्रापही के लिये यह प्रत किया गया है । (हाथ जोड़ पैरो पर गिरती है)। स्त्र--उठो, उठो, कहो अब इस व्रत में क्या करना चाहिये। नटी-हम लोगेा के बरावर का पाम्हन खिलाना चाहिये । सूत्र-अच्छा, तो तुम जानो, हम, भी अपने घराबर बाम्हन हूँ। नटो-पहुत अच्छा। (बाहर जाती है) सूत्र-(एच चलकर ) अरे इतनी बड़ी उज्जयिनी में बराबर का बाम्हन कहाँ रहें (देखकर ) अरे, चारुदस का मित्र मैत्रेय इधर हो पा रहा है, तो इसी मे पूई-मैत्रेय जी ! पाप का प्राज हमारे घर न्योता है।
मृच्छकटिकमापा
(परदे के पीछे)
अजी, तुम और घासन न्योता, हमे छुट्टो नहीं है ।
सूत्र-सग भोजन तैयार है और यहाँ पापो श्राप होंगे और
कुछ दक्षिणा भी प्राप को मिल जायगी।
(परदे के पीछे)
एक बेर तो तुम को जवाब देही दिया, क्या वार बार इठ कर
सूत्र-यह तो चला गया, अब चलू और किसी से कहूँ ।
(पाहर जाता है)
पहिला अङ्क
[स्थार-चारुदत्त के घर के पागे सड़क ]
(दुपट्टा हाथ में लिए मैनेय प्राता है)
मैनेय-अजी तुम और बाम्हन न्योती , अरहम को और प्रौर
के घर न्योता साना पड़ेगा ।हा, अब ऐमी दशा होगई जय चाय
दत्त की बढ़ती थी तब तो हम दिन रात बिना झगड़े बसेड़े फेमह
फती महकती मिठाइयां साते थे। और फाटक पर बैठे रग रग के
भोजनों से वितेरे की नाई अपनी अंगुजी रगते थे या चौक में सांड
की नाइ के पागुर सी किया करते थे, अब यह दरिद्र हो गये तो
पालतू कपूतर ऐसे इधर उधर दाना चुग चुग कर यहाँ रात को
चसेरा लेने पाते हैं ! प्राज चारुदत्त जी के मिन चूर्णवृद्धि ने
चमेली के फूलों से घसा दुपट्टा दिया है और कहा है कि जय
चारुदत्त जी सध्या पूजा कर चुके तो उनके दे देना । (धूमके
देखकर ) अरे, चारुदत्त जी तो पूजा करके यलि देते हुए इधर हो
मा रहे हैं, तो हम भी इन के पास चलें।
चारु- . मृच्छकटिकमापा [दूसरा स्थान--पारदत्त की बैठक ] (चारुदत्त बलि का कटोराहाय में लिये हुए खड़ा है और रदनिका उसके पीछे नही है) चार-(ऊपर देख कर मांस लेकर) मेरे घर को देहरी घारत सांझ सकार। साई मारस हस जो कि कि चाहिं यार । सेपिलि प्रम द्वारपै जमत घास फैसि जात । ताहि खाय के छाय सघ कीटहुँ नाहिं प्रघात ॥ (धीरे धीरे चल कर बैठ जाता है) (मैत्रेय पाता है) मैत्रे-(भागे बढ़कर ) जय हो, बढ़ती हो! -प्ररे मैत्रेय, प्रायो मानो बेटो। मैने-बहुत अच्छा । (वेठ कर ) अजो प्राप के मित्र चूर्णवृद्ध ने चमेली के फलों का घमा हुमा यह दुपट्टा दिया है और कहा है कि जप चारदत्त जी पूजा कर चुके तप उन्हें दे देना, सेा यह लीजिये (दुपट्टा दे देता है) चार-(दुपट्टा लेकर कुछ सोचता है) मैत्रे-अजी क्या सोचते हो? चारु-माई, सुखरस मिले दुख कछु पाई। घन अधेर दीपक की नई ॥ सुख नहि जे दरिद्र है जाही। ते जीपत मृत सरिस जलाही। मैत्रे-तो आपको क्या अच्छा लगता है,रिद्र रहनाया मरना? चारु-माहि दारिद अरु मरन में दारिद नाहिं साहाय । मरन होत दुख एक ही, दारिद् दुखसमुदाय ॥ मैत्रे -प्राप को सोच करना नहीं चाहिए । अापने अपना धन पाट दिया अब भाप प्रमाषस के से चांद हो गये जिस का अमृत । पी गये हैं।
पर दाना मृच्छकटिकमापा चारु-भाई हमको कुछ धन का सेव नहीं । मो कह एक दुख वड़ लागत । मा घर अतिथि लोग अब त्यागत ॥ सूखत मनहुँ कुम्भ होत हीनमद द्विरद मैत्रे-अजी धन भी बड़ा पाजी होता है कि वरैया के डर के मारे महीरो के लौंडे सा जहां उसे कोई खा न डाले घहीं जाता है। चार-मोहिं धन नास सोच कछु नाही। मिलें भाग सन धन प्ररु जाही एक दुख मोहिं नित्य जरावत । प्रष मित्रहु कछु ढोल जनाधत ॥ और भी- 1-धन नसत उपजत लाज तेहि सन तेज सकल नसात है। बिन तेज परिभव तहत परिभव पाइ मन मरिजात है। मन मरे उपजत सोच बुद्धिहु सोचवस सघ नसत है। पिन बुद्धि को छय होत, दारिद सकल अगरथ पसत है। मैत्रे-ग्रजी धन के लिये कर तक मोच करेंगे? -भाई दरिद्रता भी, चिता घेरे रहत और से लहै अनादर । मित्रहु देवि घिनात व्यर्थही वैर करत पर | सगे पराये होत फरत प्रादर नहिं नारी। सोचत ही दिन पितत रहे नर सदा दुसारी ॥ मैत्रेय, हमने फुल देवताओं को पनि दे दी, अय तुम जाके चौराहे पर घलि दे पामो। मैत्रे-हम तो न जायेंगे। चार क्यों? मैत्रे-अजी पूजा करने से देवता तुम पर प्रसन्न नहीं होते तो क्यो पूजा करते हो? चार- . मृच्छकटिकभाषा चारु-भाई, ऐसा न कहो, यह तो गृहस्थ का धर्म है, तन मन बच बलिकर्म से पूजै सुर ससार । होत प्रसन्न मनुष्य पर, यहि में कोन विचार ॥ तो जायो देवियों को बलि चढा प्रायो। मैत्रे हम न जायँगे और किसी को भेज दीजिये । हम तो पाम्हन है, हमसे सप उलटे का पुलटा हो जाता है, जैसे दर्पनी में परछाई , दहिने का बाया और घायें का दहिना , और एक बात पौर है , रात फी बेर सड़क पर रडी, बटमार, राजा के लग्गू भग्गू सर घूमते फिरते हैं, उनके बीच में जो कहीं पड़े तो मेढक के धोखे साँप के मुह मे मूमे की दशा हमारी हो जायगी , श्राप यहां बैठे बैठे क्या करते है ? चारु-अच्छा ठहरो हम जप करते हैं ? (परदे के पीछे) खड़ी रहो वमन्तसेना, खडी रहो। (बसन्तसेना और उसके पीछे सस्थानक, उसका सङ्गी विट और टहलुमा दौड़ते हुए पाते हैं) विट--खडी रहो बसन्तसेना, खड़ी रहो। क्या डर बस निज अङ्ग की सुकुमारता विहाय । नाच माहितीला करत ढारत मे निज पाय॥ घवरानी चचल नयनि इत उत चकित निहारि । मृगी सरिस भागति चलो पीछे व्याव षिवारि ॥ सस्था-खडी रह, बसन्तसेना, खड़ी रह, गिरति' पड़ति भागी तू जाहि । ठाढी तू मरिहै नाहि ॥ हियरा जरै हमार। जैसे मांस परे अनार॥ टहलुमा-चाई जी ठाढी रहो, डर से मासे भागी जाय । जैसे भारी पूँछ फुनाय ॥ तो पर हाय परी मृच्छकटिकमाषा श्राय गये हमरे सरकार। जैसे कूकुर करै सिकार ॥ पिट-सड़ी रहो, पसतसेना, सड़ी रहो। कदली सी देह फॅपाधत ॥ वायु-वेग निज घन हिलावत ॥ टोकी सन ज्यों मनसिल फारत। लात कमल पद पद पर डारत ॥ सस्था-सड़ी रहो, वसतसेना, खड़ी रहो, मेरे मन मह वाह बढापति । तोरे बिना नींद नहि आवति ॥ माग न तू परिहै मोरे घस, रायन कुन्ती जस ।। सीता घिर-घसतसेना, क्यों भागति वेगहि तू ऐसी। गरुड़ पास सम नागिनि जेमी॥ सकत धाय मै नांधि चयारी मै बाहत नहिँ अपति तुम्हारी / रिलमत्ता सस्था-अजी सुनो, चारन की मनहरनिहारि यह नाचनधारी। महरीखानेदारि काम की रचिर पिटारी॥ परधन नासनहारि घसडूवाधनहारी। सुन्दर गहनेघारि नहीं बैस आपनहारी" यहि पातुर रडी येसवा नाम अनेकन हम कहत । पैनीच पातुरी दुष्ट यह तऊ हमे नाही चाहत । पिट-क्यों डर यस व्याकुल तू धापति । कुडल सन निज गात घसापति ।। घाजत मनः चतुर कर धीना। गर्जत घन इसी - .--- ज्या दाना ।
१० मृच्छकटिकमाषा 1 तें जान ॥ सस्था-पहना चाजति जब तू भागति । राम के उर द्रुपदी अस जागति ।। हरष तुमति जैसे हनुमान। धरी सुमद्रा टहलुपा-प्राउ राजसारे पास। तब मरी मांस॥ जब पापत हैं मछरी मास। तष नहि छुपैं जहास ॥ विट-बसतसेनालाई कटितट सुन्दर किकिनि छाजत । तारागन सम लसत विराजत ॥ मुखकषि संदुररग लजार्धात। यस पुरवषो सम धावति । सस्था-परपराय के भागति नारि । फूकुर से जैसे सीयारि॥ जल्दी जल्दी दौरत जाय। मोरा चित ते लियो चुराय - वसतसेना-पल्लविका! पल्लविका! परभृतिका! परभृतिका! सस्था-माई, कोई और भी है? विट-डरा न, डरेरान, यसत-माधषिका! माधविका ! विट-अजी, वह तो अपनी लौडियो को पुकार रही है। सस्था-भाई, लुगाई हूँढ़ती है। बिट-हो, हो। सस्था-लुगाई तो हम सौ मार सकते हैं हम बड़े सूर हैं। यसत-( सूना देख कर) हाय, हाय, क्या सब पीछे रह गई। हाय, तो अकेली ही हूँ! विट-हँदो, हूँ !
मृच्छकटिकमाया सस्था-बसतसेना, रोरो, परभृतिका को बुला चाहे पल्लविका को, हमसे तुझे कोई छुड़ा नहीं सकता। भीमसेन जमदग्नि का बेटा । कुन्ती सुत पो दसकघर पा॥ प्रय इम झोंटा घरब तुम्हार । दुसासन केरी अनुहार ॥ अरे देख, देख-हम मारव पैनी तरपार । काटव प्रवहीं मूंड तुम्हार ॥ तो भाग, न, जो मरने को होता है सो जोता नहीं। घसत-हम तो अवला है। पिट-जभी तो जीती हो। सस्था-जभी तो न मरेगी। बसत--(भाप ही प्राप) यह सीधी बातें कहता है तब भी जी डरता है, अच्छा यह कहूँ । (प्रकाश) पाप लोग मेरे गहने लेंगे। विट-राम, राम, यसतसेना जो, बाग की लता से कोई फूल चुराता है ? गहनो का नाम न लो। वसतत फिर क्या करोगे? सस्था हम वासुदेव हैं, हमारे पास रह । घसत--चुप रे चुप, ऐसी घात न कह । सस्था-(तालो बजा कर हँसता है) पिट-यसतसेना जी, पाप अपने धेश्यापन के विरुद्ध क्यों बात करती हैं ? ज्यानन के सँग रहनही परमधर्म निज मानु । उगी जता सी राह पे निजहि पातुरी जानु । तेरो तन जोबन मा धन के द्वारा पिकान । नोको लगे कि मा लगै मिल गनि सहि समान । पडित वाम्हन मूरख गीच नहात सवै ला एक तलाई चैठत पायस फूली लता सार पस के भार सो मार नवाई म १२ मृच्छकटिकभाषा वाम्हन छत्रिय वैश्य और शूद्र उतारत एकहि नाव चढ़ाई। तूहे लतासी, तनाईमी, नाघसी, पातुरि है। सबसे मिलु धाई । घसत-गुन देख के मन लगता है, बरजोरो से नहीं। सस्था—यह पतुरिया जब से कामदेव के मन्दिर में गई, तब से दरिद्र चारुदत्त से इस का मन लग गया है, हम नहीं चाहती। उसका घर बायें हाथ है, देखिए यह हमारे हाथ से निकल न. जाय। विट-(माप ही धाप ) जो छोड़ना चाहिये घही गधा कह रहा है। क्या बसतसेना चारुदत्त को चाहती है ? ठीक है, रत रत ही के साथ रहता है, इस मूर्स को लेके क्या करेगी । (प्रकाश) चौधरी का घर क्या बायें है ? सस्था-हो, हो, बाई और घर है। वसत-(आप ही पाप ) अरे, उनका घर बाई पोर है तो इन पापियो ने मेरे साथ बडा उपकार किया जो मुझे पीतम के घर पहुंचा दिया। सस्था-प्रजी, बडा अँधेरा है। बसतमेना ऐसी हेराय गई है जैसे उर्द की ढेरी में मसीका टुकड़ा। विट-बड़ा अंधेरा है। यद्यपि सब कुछ लखि सके परे अंधेरे माहि । पुले तऊ न दे सरिस देखें दूग कछु नाहि ॥ और, घरसै जनु काजल गगनातम लिपटत सब गात । दीठि नीच सेवा सरिस यिफल भईसी जात ॥ सस्था-अजी हम तो बसन्तसेना को हूँढ़ते हैं। बिट-तुम्हे कोई चिन्द मिलता है? सस्या-कैसा चिन्ह घिटाइनों की भझनाहट या फूलों की महक ? ---मनी, हम फलों को महक सुन रहे हैं और नाक में है तो भी गहनों की झनझनाहट साफ देख रहे हैं। ।
Hitis. मृच्छकटिकभापा पिट अलग पसतसेना मे)चाई जी । तुम तम वस लखि पौन कामिनि । चिपी मेघ भीतर ज्या दामिनि ॥ मालगन्ध की धुनि । तुमहि जनापत लेहु हिये गुनि । बाई जी, मापने सुना? असत-( प्रापही प्राप) सुना और समझ भी लिया। (गहने उतार डालती है पौर माला फेंक देती है कुछ चल कर हाथ से छूकर) अरे भीत टटोलने से खिड़की जान पड़ती है से भी योग से बन्द है। चार-(भीतर मे)भा, हमारा जप हो गया है। प्रम तुम चौराहे पर बलि दे जाप्रो। मैत्रे--(भीतर से ) में न जाऊँगा। चार-हाय हाय ॥ दारिद्र बस फोउ तासु कहने माहि नाही रहत है। रिपु धनत नेही मीतह, नित विपति नई से लहत है। धन पटत ताके शोलससि को ज्योति घटि जात है। जो औरत कोउ पाप कीन्हो ताहि सवै सुगात है । साथ नहीं कोट ताको करे अरु प्रादर से नहि पालत कोई। उत्सव में घर लात धनीन के देखें अनादर से सघ लोई। पोरेहि धन धरे तन लाजसे हि चले सर लेग से साई ।। पविही पाप हैं लिखे हम जाने छठो यह दारिद दाई । दारिद सोच दात माहि पहा । हित सम रहत मेरि तुम देवा ॥ है निरि नये मम प्राना। रहिह कहा तुम्हार ठिकाना । मैत्रे (उदास होकर ) अच्छा, जो हमी हो जाना है तो हमारे साथ रदनिका को कर दो।
- म 44 मृच्छकटिकभाषा चार-दनिका, मैत्रेय के साथ जानो। रदनि-बहुत अच्छा। मैत्रे-तुम दिया लेलो और बलि उठालो, हम खिड़की खोलते हैं। (खिडकी खोलता है) बसत--यह मेरे हो लिए खिड़की खुलो है, मैं घर में घुस जाऊँ। (देस कर ) हाय दिया कहां से आया? अचल से दिया उदा करके घुस जाती है)। चार-मैत्रेय, क्या हुआ? मैत्रे-ग्रजी खिड़की खुलते ही वयार का झांका तो लगा तो दिया बुझ गया । रवनिका तुम बाहर चली जाओ, हम भीतर के चौक से दिया वारे लाते हैं। (बाहर जाता है ) सस्था-प्रजी, बसंतसेना को कव से हूँढते हैं, नहीं मिलती। विट-हूँ दिये। सस्था-(पिट को पकड कर) यह पकड़ी, यह पकड़ी। विट-अजी यह तो हम हैं। सस्था-प्रच्छा तो तुम अलग खड़े हो (फिर टटोल के टहलुए को पकड़ कर ) प्रव पकडा। टहलुमा-सरकार, मै तो चाकर हैं। सस्था-उधर चाकर, इधर सगी, सगी चाकर, चाकर सगी तुम एक भोर खड़े हो। ( फिर टटोल कर रदनिका को पकड़ कर) अष पकडा बसतसेना को। भागत निशि अँधियार में सूघि मालतीबास । द्रुपदी को चाणक्य ज्यों घरी पकरि कचपास ॥ विट--यह गयिका जोधनमदमाती। गुनी कुलीन पुरुष रॅगराती। गुधि फूल जेहि नित्य संवारा ।- खंचत गहि सोइ केश शकारा॥
बार मचाउ। मृच्छकटिकमापा सस्था-हम पकरा धरि तोर कपार। मोटा केसा रोड विधरु प्रो सार शिव महदेव युलाउ॥ रदनि-डरके) पाप क्या करेंगे? पिट-मजी यह तो किसी और की बोली है। संस्था-प्रजी जय बिल्ली दही चुराने को होती है तो कैसी घोली बदल लेती है ? पिट- अरे, क्या वाली बदल डालो ? बड़ा अचरज है और अचरज भी क्या है- सिसे बाल बहु सानि के यह नाटक के हेत । नहिं अचरज यानी बदलि जो यह धोखा देत । (मैत्रेय माता है) मैत्रे-अरे, सांझ को घयार मे दिया ऐसा फुरफुराता है जैसे घलिदान के बकरे का जी। (पढ़के ) अरे रदनिका ! सस्था-पिट जी, कोई और नागया। मैत्रे-देखो, यह अच्छी बात नहीं है कि चारुदचजी दरिद्र हो गये तो उनके घर जिसका जी चाहे घुस पावै । रद-देखो मैत्रेय जी हमारी कैसी बेइजती करते हैं। मैत्रे-यह तुम्हारी बेइज्जती नहीं, हमारी है। रद-और क्या आपको तो ही है। मैत्रे तो क्या घरजारी करता है? रद-जी हो। 1 रद-सच। मैत्रे-(क्रोध से लाठी उठाके ) राम, राम, अपने घर में तो कुत्ता भी सेर होता है, हम तो घाम्हन हैं। तो आप इसी लाठी से जो हमारे भाग की नाई टेढ़ी है पाजी का सिर तोड़ डालेंगे।
1 होई॥ २६ मृच्छकटिकभापा विट-देवता! छमा करे। छमा करो। मैत्रे-(विट को देख कर) इसने कुछ नहीं बिगाडा (सस्थानक को देखकर ) प्रवे क्यों वे राजा के साले पाजी ! यह कौन मलमसी है कि प्राज चारद जी दरिद्र हो गये तो क्या उनके गुना से उजयिनी को बड़ाई नहीं है जो तू उनके घर में घुस के नौकर चाकर को सताता है। बुरा होत धन नसे देव सौंह से घुरा सदाचार जो छोड़त लोगा। घनी निन्दनजोगा a विट-(घबड़ा के) महाराज ! छमा करो, छमा करो । और के धोखे ऐसा अपराध किया, कुछ गर्ष से नहीं किया। हम हूँढ़त एक कामिनी- मैत्रे इस को? विट-राम राम जा तन निज प्राधीन । से भागी धोखा परे यह कलक हम लीन । तो अब कृपा करके छमा कीजिए (तलधार रख कर हाय जोद, पैरों पड़ता है) मैत्रे-तुम घडे भले मानुस हो, उठो उठो, हमने बिना जाने तुम्हें कहा, अब जान गये तो छमा मांगते हैं। विटाप भी हमारा अपराध छमा कीजिए। हम तो तब उठेंगे जब आप हमारी एक बात मान लेंगे। मैत्रे-कहो कहो। पिट-रुपा करके यह बात चारुदत्त जो से न कहियेगा। मैत्रे-न कहेंगे। विट-विप्र अनुग्रह तोर यह हम धारै निज माथ। हम हारे गुणशस्त्र से यदपि शस्त्र निज हाथ ॥ प १ 1 -- मृच्छकटिकभाषा सस्था-(रोप से) तुम्हें क्या हुभा जो पाजी बार के हाथ जोड के पाव पड़ते हो? घिट-हम डरते हैं। सस्था-किसको डरते हो? पिट-चारुदत्त के गुणों को। सस्था-उसमें कौन गुण है जिसके घर में खाने को नहीं है? पिट-ऐसा न कहो। हम सम जन पालत भयो, चारुदत्त धनहीन । नहि याचा अपमान तिन, कबहुँ रहे धन कीन । ग्रीपम ऋतु मह जल भरे, विमल तडाग समान । नित प्रति व्याकुल नरन की प्यास बुझाय सुखान । सस्था-(क्रोध से) कौन है लोडी का बच्चा ? श्वेतकेतु यह अमित प्रभाकर पांडव राधापूत जटाऊ॥ कुतीसुत जायो जेहि रामा। धर्मपुत्र अश्वत्थामा ॥ चिट-ग्रजी तुम कैसी मूर्ख की नाई बातें करते हो? यह चारुदत्त है, दीन काज कल्पवृक्ष, गुनन मुके हैं साई, सज्जन के हेत सगे यधु के समान हैं। सभ्यन के दर्पन, कसोटी से चरित्र के हैं, शील के तरगन के सागर महान है। फरते मलाई चित काहू को दुसाईं नाहि, सरल उदार गुनमनि के निधान हैं। गुन प्राधिकार्ड से है जीना उनहीं को धन्य, भाथी से तो और सवे धारतेई प्रान तो यहां से चल दो। सस्या-बिना वसतसेनाको जिये?
मृच्छकटिकमापा बिट-गई घसतसेना । सस्था-कैसे? विट-अन्धे की ज्यों हीति, रोगलागे तन बल ज्यो ।। प्राजस कीन्हें सिद्धि मूर्स की घुद्धि सकल ज्यों । जती पुरुष को पठन कर जो नहि अभ्यासा। रति सी तुम पहँ पाइ गई वैरी के पासा ॥ सस्था-हम तो बिना वसन्तसेना को लिये न हटेंगे। पिट-प्रजो तुमने यह भी सुना है- गज को फन्दा हारि, हय पस कीजे रास गहि। मनही घस फर नारि, जाश्रो न जायदफारिसको॥ सस्था-तुम जाते हो तो जाप हम न जायेंगे। पिट-हम जाते हैं। (चाहर जाता है) सस्था--जाम्रो भाड़ में-(मैत्रेय से) परे पाजी बरुप! तेरे तो कौए के पजे से सिर में बाल हैं , वेठ, बैठ । मैत्रे-हम तो बैठे ही हैं। सस्था-किसने वैठाया ? मैत्रे-दई ने। सस्था-उठ उठ। मैत्रे-उठेंगे। सस्था-कब? मैने-जय फिर भगवान् सोधे होंगे। सस्था-परेरा रो। मैत्रे-सलाए तो जाते हैं। सस्था-कौन रुलाता है। . मैत्रे-प्रभाग। 'सस्था-परे हस हस । । 1-कष?
.
मृच्छकटिकमापा
१६
मैने जब फिर चारुदत्त की बढ़ती होगी।
सस्था हेरे पाजी धरुए! हम तुझ से कहते हैं, तू हमारी ओर
से दरिदी चारुदत्त से कह कि यह सोनेपाली नया नाटक देख कर
उठी सूत्रधारी सी रही की लड़की घसतसेना कामदेव के बाग के
मेले के दिन से तुम्हें चाहती है, हम लोग उसे बरजोरी पकड़ना
चाहते थे सो तुम्हारे घर में घुस गई, उसे तुम प्राके हमारे हाथ
सौंप दो नहीं तो मरते दम तक हमारा तुम्हारा वैर रहेगा। और
देखो-
कुम्हिडा डठल माहि जय गोयर धरो लगाय।
मांस वधारी घीष में धरै जो साग सुताय ॥
पामा चुरभो मृतु हेमत को धरो राति को भात ।
धरो रहै चासी तक कचहूँ नोहि बमात ॥
अच्छी तरह कहना और झट पट कह डालना और ऐसा कहना कि
हम अपने महल में बॅगले पर से बैठे बैठे सुर्ने । न कहोगे तो कैये
के गोले फी गाई तुम्हारा सिर तोड़ डालेंगे।
मैत्रे-अच्छा कह देंगे।
सस्था--(अलग टहलुप से) विटजी गये?
स्थायरक-जी हो।
सस्या-तो हम भी भागे।
स्थाप-लीजिये, तलवार लीजिये ।
सस्या-तुम्हीं लिये रहो।
स्थाप-नहीं सरकार, आप नीजिये।
सस्या-(उल्टी तजपार पकड़ कर)।
अडे रंग खुली तरषारि ।
हारिम्यान मह कांधे धारि॥
जखि फुकुर ज्यों पीछे लागत ।
स्यार सरिस में घर को भागत ॥
२०
मृच्छकटिकभाषा ।
(सस्थानक और स्थाघरक बाहर जाते हैं)
मैत्र-रदनिका तुम अपमा हाल चारुदत्त जी से न कहना
उन्हें धन जाने का याही दुख है और भी उदास हो जायगे ।
रद-मैत्रेय जी मै रदनिका हूँ मेरे मुँह से वात न निकलेगी।
मैत्र-बहुत अच्छा।
चारु-(बसतसेना से ) रदनिका ! राहसेन हवा में से गया
है उसे जाड़ा लगता होगा उसे भीतर पहुँचा के यह दुपट्टा मोदा
दो। (दुपट्टा फेंक देता है)
घसन्त-(पाप ही) मुझे अपनी टहलनी समझ रहे हैं।
(दुपट्टा उठा कर सूंघ कर) अरे चमेली के फूलों से वसा
हुना है , पाप जपानी का सुख भूले नहीं बैठे हैं। (दुपट्टा श्रोद
लेती है।
चारु-अरी रदनिका रोहसेन को भीतर पहुँचा दे ।
घसन्त-(प्रापही प्राप) मेरे ऐसे भाग कहाँ कि श्राप के घर
के भीतर जाऊँ।
चार-प्ररी रदनिका घोलती तक नहीं! हा!
नसी जवै घनसपति सिगरी।
भगवतकाप दशा जब विगरी॥
मित्र होत रिपु, जन अनुरागी।
मे होत विरागी ।
(रदनिका और विपकमाते हैं)
मैत्रे-यह है रनिका।
चारु-और यह कौन है।
अन जाने पूपित करी जेहि मै पस्न उदाय ।
घसत-नहीं, मेरी बड़ाई हुई।
चार-चन्द्रकला सी गरद के धन,से ढकी लम्बाय ॥
स्त्रीही देखना न चाहिये।
रहे सदा
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२२ (गहने देती है, मैत्रे-प्रजी घाई जी को हसा की सी चाल है, तुम जाओगे मृच्छकटिकभाषा जी! पाप मुझ पर कृपा करते हैं तो मै यह चाहती हूँ कि यह गहने आप के यहां छोड़ जाऊँ ये पापी गहनो के लिये मेरे पीछे पड़ते हैं। चारु-यह घर इस कामका नहीं है कि इसमें थाती रक्खी जाय। वसन्त-आप क्या कहते हैं थाती भले मानसों को सौंप जाती है कि घरों को? चारु -मैत्रेय गहने ले लो। वसन्त-मापने घड़ी कृपा की। मैत्रे-(लेकर ) जय हो श्राप की। चार-श्या वफते हो यह थाती है। मैत्रे-(प्रलग ) थाती है, जो इसे चार लेजाय ! चारु-प्राजही कल में। मैत्रे-इस थाती को? चार-हम प्रापही के पास भेजवा देंगे। घसन्त-मै चाहती हूँ कि बाम्हन देवता मुझे चार-मैत्रेय, चले जानो छाप के साथ । तो हस ऐसे लगोगे । हम ठहरे वाम्हन, हमै चौराहे के उतारा ऐसा फुत्ते नोच खोयगे। चार-अच्छा ही प्राप के जलपायो। मैने-बर्द्धमानक ! मशाल जलायो । पर्द्ध-(प्रलग विद्पक से) तेल तो है नहीं मशाल के मैत्रे-(अलग चारुदत्त से ) जो हमारी मशालें दरिद्री या रडियों को नाई घिना सनेह की हो गई। बार-क्या फरोगे मशाल ले के? घर पहुंचा। , - साथ जायेंगे तो मशाल जले?
मृच्चफटिकमापा २५ बसत-क्या नाम है उनका बतायो। मद-जी यही जो सेठी के चौक में रहते हैं। यसत-परीनाम पता। मद-जो उनका तो मला सा नाम है। चारुदत जी! घसत--(हर्ष से) घाह मदनिका पाह! तूने खूब जाना! मद-(पाप ही प्राप) तो यह कहै (प्रकाश) यह तो दरिद्र हैं। घसत-इसीसे तो चाहती हूँ। दरिद्र से श्राख लगने से पातुर को कोई पुरा नहीं कहता। मद-कहीं भौंरी भी धौर के ग्राम के पास जाती है। घसत-तभी तो उन्हें मधुकरी कहते हैं। मद-जो यही है तो चलिये। उनमे प्राप मिजिये। षसत-परी उनके पाम या जाना अच्छा नहीं। पद फुल दे तो सकते नहीं ऐसा न हो उनका मिलना कठिन हो जाय । मद-इसी लिये अपने गहने उनके घर होड़े। पसत-हो। (परदे के पीछे) घरे माई, पकड़ो! पकड़ो ! दस मोहर हार कर जुमारी मागा जाता है !! खड़ा रह रे कहा भाग के जायगा ! (घबराया हुमा सबाहक प्राता है) सपा-जुभारी की भी धुरी गति है। हाय, हाय बन्धन तोड़ कर भागे गधे को नाई मुझे मारते हैं और अव नहीं बचता। मारी मेरे ऊपर ऐसे दौड़ रहे हैं जैसे कर्ण को शक्ति घटोत्कच पर गिरी थी भागी अवसर पाय, लेखफ सन अझत समिक।। राह घोच मह प्राय जाउँ कौन की सरन अब । तो प्रध इस सभिक शुभारी से बचने का यह उपाय उलटे पापों चल कर इस सूने मदिर में देवी बन जाऊँ। -
२४
(बाहर जाती है)
1
मद-तीन राजा, न राजबल्लभ, बाम्हन, न महाजन, तो
मृच्छकटिकमापा
चेरी-बाई जी ! अम्मा ने कहा है कि पूजा कर लीजिये।
घसत प्ररी अम्मा से कह दे भाज न नहाऊँगी, प्राज
बाम्हन पूजा करने।
चेरी बहुत अच्छा।
मद-(हाथ जोड़कर ) बाई जी ! कसुर माफ हो ? जी नहीं
मानता, एक बात पूछती हूँ -प्राज कल श्राप का क्या हाल है ?
वसत-अरी मैं कैसी हो रही हूँ?
मद्-श्राप सुध बुध भूली कुछ सोचा करती हैं इससे जान
पड़ता है कि प्राप का मन किमी से लगा है?
वसत-तूने ठीक जाना, तू और का मन जानने में घड़ी
मदतो बहुत अच्छा है। किस जवान के प्राज भाग खुले!
कोई राजा या राजा का प्यारा है जिसके सेवने का मन है।
घसत-परी सेवना नहीं चाहती, रमना चाहती हूँ।
मट-तो काई पढ़े लिखे बाम्हन से मन लगा है।
बसत-प्ररी धाम्हन को तो मै पूजती हूँ।
मद-तो क्या कोई देश देश घूम कर व्यापार करने वाले
धनी चनिया महाजन से?
घसत-अरी, व्यापार करनेवाले प्रीति लगा के परदेश प्रले
जाते हैं और उनके वियोग में मरना पडता है।
फिर ऐसा कौन है जिसे प्राप चाहती हैं ?
घसंत-धरी, तू मेरे साथ कामदेष के धाग गई थी?
मद-जी हो गई थी।
बसत-तो फिर क्यों अजान ऐसी पूँछती है ?
मद-जो जाना, जिनके घर आप हिप के धची थीं।
-
त मृच्छकटिकमापा २७ माथुर-(पकड फर) क्यों थे, अब तो पकड़ गया!ला दस 'मोहर। सम्बा-दंगे? मायुर-अभी दे। सम्बा-कृपा कीजिये, दे दूंगा। माथुर-नहीं अभी ला। सम्बा-मै तुम्हारे पाचँ पड़ता है (माथुर के पाव पड़ता है दोनों उसे मारते हैं) माथुर-चल तू जुधारिया की मडली में पकडा गया । सम्बा-( उठकर रोता हुआ) हाय, क्या मुझे मण्डली ने पकड़ लिया! हाय, अब क्या करूँ, मयडली से बच कर कहाँ । नाऊँ कहाँ से हूँ। माथुर-~अच्छा जिम्मा करो। सम्बा-अच्छा (जुआरी के हाथ जोड़कर) प्राधा छोड़ दो तो प्राधा हम तुम्हे दे दें। जुभारी-बहुत अच्छा प्राधा हो दो। सम्बा-(माथुर से) प्राधे का में जिम्मा करता है प्राधा आपछाड़ दीजिए। माथुर-क्या हर्ज है, ऐसा ही सही। सम्बा-(प्रकाश) प्राधा प्रापने भी छोड़ा? मायु-छोड़ा। सम्पा-(जुभारी से) प्राधा पापने भी छोडा? माथु-हीं छोड़ा। सम्मा-अच्छा त प्रध में जाता हूँ। माथु-जायगा कहा दस मोहर है। सम्पा-देखते हैं पाप लोग! जिम्मा क्यिा दूसरा,कहता है कि । भी रहे हैं। . T 1 - -- डर - गात। - २६ मृच्छकटिकमापा (मन्दिर के भीतर घुसकर देवता के स्थान पर खड़ा हो जाता है) (माथुर और एक जुपारी प्राता है) सुपारी-नाउ इन्द्र की सरन कै भागि पैटु पाताल । शिप समिक सो नहिं सकै तेहि चाय यहि काल । माथुर-दै समिकाहि धोखा कह जात । से कांपत गिरत परत उठि उठि पुनि धाय । अपने कुल जस कारिख जाय । जुधारी-(पैर के चिढ़ देखकर ) इधर गया है, इधर भागे देखा पैर के चिह नहीं मिलते । माथुर-(देखकर, सोचकर) अरे उलटे पाँव है यह सूनी मठिया है, (मोचकर ) चूर्त जुनारी उपायों से मन्दिर में घुस गया है जुभारी-तो चलो मन्दिर में चलें। माथुर--अच्छा। (मन्दिर में घुसकर देखते हैं और एक दूसरे को इशारा करते हैं जुमारी-प्या काठ की मूरत है ? माथुर-नहीं, नहीं पत्थर की तो है (मूर्ति को हिला चल कर ) भाभी यही जुमा खेलें । (दोनो बैठ कर जुमा सेलते हैं) संबा--(जुषा खेलने की घबराहट जानता हुआ) अर पैसा जाके पास नहि परत दा घबराय । सुनत नगारा और को गये राज जिमि राय ॥ जुभारी-हमारा दोष है हमारा दोष । माथुर-नहीं, नहीं, हमारा दोष है। सपा-(मटझट मागे वद करजी हमारा दोष है। जुमारी-(मघाहक को पकड़ कर)क्यो बचा, आप तो पक गये। - मृच्छकटिकभापा किये जुत्रा से भोग विलासा । भयो जुश्रा मे सर्वसनासा॥ तीये से सर्वस गयो नक्की उपजी प्रास। सूखि दुश्रा मे देह अरु चौक भो सवनात (भागे देख कर ) अरे! यह तो पुराने समिक माथुर इधर ही पा रहे हैं। अब तो हम भाग भी नहीं सकते, तो मुंह लपेट कर अलग खड़े हो जायें (टुपट्टे को देस फर) यदि पट में हैं छेद हजार । यहि के देखि परे सब तार ॥ यह पर प्रोदे फाह छिपावै । यह पट गठरी बॅधी सुहावै ॥ क्या करेगा यह हमारा ? एक पौष भुई मां धरे एक घरे आकाश । तौलों इवा खड़ो रहौं जौलौ दिवसउजास । माथुर-दे या दिला दें। सम्या-कहाँ से दू१ (माथुर उसको फिर घसीटता है) दर्दु-यह क्या हो रहा है ? (आकाश से ) "इस जुपारी को समिक मार रहा है और कोई छुड़ाता नहीं। अच्छा अय दर्दुरफ छुड़ायेगा"(पागे बढ़ कर ) हटो। (देसकर) प्ररे, यह तो माथुर है और बेचारा सबाहक है, यह क्या खाके जुमा सेलेगा। सीस मुकाय समेरे से साझ लो वैठि सके जो जुआ मई नाही। हारे पे मारत सींचत पीठ पे जाफे न ईट के दाग नखाहीं। फूथर ऐसे जुप्रारी सदा मिलि जाकी न जांध को मांस चाही। घपुरा प्रतिक्षामल देव को नाहक प्राय फस्यो यहि माही पच्छा तो अब माथुर को मना करें। (प्रणाम करके) माधुर जी, राम राम माथुर-राम राम! दर्दु-माथुर जी, यह क्या कर रहे हो? मृ०-३
२५
नृच्छकटिकमाया
माथु--(पाद कर ) अरे धूर्त ! हम माथुर है, हमारे
तेरी धूर्ताई न चलेगी, लेपा अभी सब धर दे ।
सम्या-कदा से हूँ।
मायु-बाप को पंच के दे।
सम्बा-मेरे बाप कहा?
माथु-मा को वेंच के दे।
सम्बा-मेरी मां कहां है ?
माथु-अपने को बेच के दे।
सम्मा-प्रच्चा चलिये सड़क पर चलें।
माथु-चल,
सम्पा-बहुत अच्छा (कुछ चल कर ) अरे भाई! इस समिक
के हाथ से मुझे कोई दस माहर हो लेते हो ? (अाकाश में ) क्या
कहते हो क्या करेंगे । । तुम्हारे घर के टहल करेंगे । अरे इन्होंने
तो कुछ उत्तर न दिया और चले गये; तो अब और किसी से करें
(अरे भाई ! इत्यादि फिर कहता है हाय, ए तो मेरी सुनते ही
नहीं ! चारुदत्त जी के कगाल हो जाने से मेरी यह गति हो गई।
सम्बा-कहाँ से दूँ ? (धरती पर गिर पड़ता है-माथुर उसे
घसीटता है)
सम्बा-अरे माई मुझे कोई पचानो।
(दर्दुरक प्राता है)
दर्दु-जुमा भी सिहासन का रा है।।
हरत देत धनही नित साई ।
हार जीत सोइ गनत न कोई॥
राजा सम नित धनहि दिखावत ।
जन अनेक निज साथ नचायत ॥
मिली जुमा से सम्पति सारी! ।
मिले जुम्रा से हित प्रौ नारी ॥
मृच्छकटिकभाषा ३१ दर्द-क्या वे, हमारे पीछे दिक किया तो किया, हमारे सामने भी दिक करेगा। (माथुर सराहक को सीव कर उसकी नाक में एक चूसा भारता है, सथाहक को नाक से लोह निकल पाता है और यह धरती पर गिर पड़ता है, द१रक बीच में पड़ जाता है । माथुर दरक को मारता है) माथु-सवे दिनाज के लड़के पाजी, देस तो तुझे इसका कैसा फल मिलता है। ददु-अवे, प्राज तो हमने तुझे सड़क पर मारा, कल तुझे कचहरा में मारेंगे तब देखना । माथु-अच्छा देखेंगे। दई-कैसे देखोगे? माथु-(पाखें फाड़ कर ) ऐसे देखेंगे। (द१रक माथुर की प्रांस में धूल झोंक देता है और सबाहक से भाग जाने का इशारा करता है, माथुर अखि वद करके बैठ जाता है और सबाहक भाग जाता है) १-(प्राप ही प्राप) माथुर का बड़ा अधिकार है, उससे मेने वर कर लिया तो अब यहां रहना ठीक नहीं, मेरे प्यारे मित्र शक्लिक ने कहा था कि एक सिद्ध का वचन है कि ग्रहीर का लड़का पार्यक राजा होगा और यही समझ कर हम ऐमे बहुत लोग उसके साथ हो रहे हैं तो हम भी उसी के पास चलें । (बाहर जाता है) सा-(हर से देस कर) अरे, यह तो किसी की खिडकी - खुली है, तो इसमें घुस व (घुस कर घमन्तसेना को देख कर) तुम्हारी सरन हूँ। घसन्त-सरलागत को अभय | परी खिड़की बद कर ले। (लौंडो लिडकी बन्द कर लेती है) बसन्त-तुमको किसका डर है? -
मृच्छकटिकमापा
मायु-अजी यह दस मोहर हारा है।
द?-तो कौन बड़ी बात है?
मायु-(द१रक को कोख से दुपट्टा खोव कर) देखते हैं
प्राप लोग, यह सत्तर छेद का दुपट्टा लिये है और कहता है कि
दस मोहर कौन बड़ी बात है।
दर्दु-अवे, हम दस माहर एक दांघ में जीतते हैं और जिसके
धन होता है क्या यह कोख में दाबे फिरता है।
महा नीच ते नष्ट ते दस मोहर के काज ।
पाँच इन्द्रियन को मनुज मारे डारत माज ।
माथुर-भाई, तुम्हें दस मोहर कुछ नहीं हैं हमें तो बहुत
द?-अच्छा तो इसे दस मोहर और दो, यह फिर जुआ खेले
मायुर-तो क्या होगा?
दर्दु-जो जीतेगा तो देगा।
मायुर-जो न जीते?
दर्दु-तो न देगा।
माथु-क्या पकते हो, जे तुम् नहीं अच्छा लगता तो तुम
दे दो। तू बड़ा धूर्त है, मायुर तुझसे घट नहीं, जो दूर हो, हम
तुम ऐसे लुच्चे बहुत देसे हैं।
दर्दु-कोन है लुम्चा ?
माथु-तू है लुचा!
ददु-तेरा बाप है लुचा ! (सराहक से भाग जाने के
इशारा करता है)
माथु-क्यों वे दिनाल के लड़के ! तू इसी लिये जुमान
यना है।
दर्दु-हा, हमने ऐसे ही जुम्रा खेला है।
माथु-प्रये सबाहक, दे दस मोहर ।
सना-देता हूँ (माथुर उसे घसीरता है)
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मृच्छकटिकभाषा एक ऐसे भलेमानुस को मेवा की जो बड़े सु दर है, बहुत ही मीठा बोलते हैं, किसी को कुछ देते हैं तो जनाते नहीं और उनका कोई कुछ विगाढ़े तो चित्त में नहीं लाते । कहां तक कहूँ पराये को भी अपना समझते हैं और जो कोई उनकी सरन प्राजाय उसे तो बहुत ही मानते हैं। मद-उज्जैनी में ऐसा कौन है जो बाईजी के भाषते के गुन चुरा रहा है? घसन्त-वाह रोषाह! मैंने भी अपने मन में ऐसाहो समझाया। मद-जी, तो फिर? सबापा जी! यह दोन दुखियों को अपना धन दे देकर- बसन्त-क्या कगाल होगये? सपा-मापने कैसे जान लिया ? वसन्त-समें जानने की कौन घात है । गुन प्रोर धन इकट्ठा, नहीं रहते। जिस तालाब का पानी पीने लायक नहीं हाता यह सदा ही भरा रहता है। मद-उनका क्या नाम है ? सया--चाई जी! इस ससार के वदमा उनका नाम कौन नहीं जानता? यह सेठों के चौक में रहते हैं। उनका नाम चारुदत्त जी-- सात-(हर्प से प्रासन मे उतर कर ) तप तो यह प्रापही' का घर है। श्ररी प्रापको प्रासन दे और पखाले । प्राप यके जान पड़ते हैं। (चेरी प्रासन लाकर रख देती है और पसा उठा लेती है) सबा-(पापही श्राप ) क्या चारुदत्त जी के नाम लेने ही से इतना पावर बढ़ गया। वाह चारुदत्त जी वाह ! ससार में भापही का सीना ठीक है और सब लोग तो लोहार को मापी को सांस लेते हैं। (यस तसेना के पार पड कर ) पाई , चुका पाप प्रासन पर विराजिये। । 1 ३२ । .. मृच्छकटिकभाषा सपा-धनी का। बसन्त-प्ररी खिड़की खोल दे। संधा--(भाप ही प्राप) अरे, क्यों यह भी धनी से डरती है। लोगों ने ठीक कहा है, अपने बल को जानिकै बोझ उठा जोय। अरपराय सेो सकत नहिं गिरैखड़ नहि सोय । माथु-(प्राखें मीच कर शुभारी से) देवे दे । जुभारी-हम लोग जर दर्दुरक से झगड़ा करते थे तभी घई भाग गया था। मायु-अजी हमने उसकी नाक में चूसा मारा था । से उसकी नाक फूट गई थी, चलो लोह देखते हुए चलें। जुभारी वह घसन्तसेना के घर में घुस गया है। मायुर-तो प्रघ मोह मिल गई। शुभारी-चलो कोतवाली में चल कर कह दें। मायुयहीं सड़े रहो जय बह निकल कर और कहीं जाना चाहेगा तव घेर कर पकड लेंगे। (पसन्तसेना मदनिका को इशारा करती है) मद-याप कौन है, कहाँ से आते हैं, किसके लड़के हैं, कौन उद्यम करते हैं, किसका डर है। सपा-बाई जी सुनिये, मेरा जन्म पटने में हुअा था, एक भलेमानुस का लड़का है, अब मलेमानुसों के हाथ पांच दवा कर पेट पालता है। वसन्त-धापने बहुत अच्छी कला सीखी है । सवा--जी, पहने तो कला समझ के सीखी थी, अब उसी से रोटी मिलती है। घात उदास होकर बोलते हैं, तो फिर? -मैं जब अपने घर ही में था तो लोगों से सुन सुन कर देस देखने को यहां प्राया। यहां उज्जैनी में प्राफर - , .
मृच्छकटिकभाषा मद-उसी के लिये हमारी बाई जी ने यह कड़ा भेजा है, नहीं नहीं, मे भूल गई उही ने भेजा है। माधु-(हर्ष से लेकर ) पारी तुम जाकर उनसे कहो कि तुम्हारी मातबरी हो गई, मानो फिर तुमा सेलें । मद-(बसन्तसेना के प्रागे जाफर) बाई जी | सभिक और शुभारी दोनों खुश होकर चले गये। वसत-तो प्राप भी जाइये, अापके माचिन्द घबरा रहे होंगे। सा-बाई जी, आप कृपा करें तो मै इस कला से प्राप ही की सेघा किया करूँ। बसन्त-मापने जिनके लिये यह कला मीसी थी और जिनके साथ धाप इतने दिन रहे उन्हीं के पास जाइये । सवा-(मापही प्राप) इन्होंने फैसी चतुराई से घहुत ठीक जयाव दिया। अब इनके साथ में कौन सा उपकार करूं जिससे उरिन हो जाऊँ। (प्रकाश) पाई जी ! इस जुए की दुर्गति से में घहुत घरा गया अब मैं बौद्धसन्यासी हो जाऊंगा। जब कभी पौसर पड़े तो पाप न भूलियेगा कि जुधारीसाइक बौद्धसन्यासी हो गया। - घसन्त-ऐसा साहस न कीजियेगा। सगा-मैने अपना मन पका कर लिया है। लजा पति उतराई मारि यह जूया धीच घजार । सिर मुंडाय अब छोडि भय करिहो तहहि विहार । (परदे के पीछे हल्ला होना है) सपा-(सुनकर ) अरे यह क्या हुधा १ (प्राकाश में) "क्या कहते हो, बस तसेना का खुटमोटक दुष्ट हाथी खुता फिर रहा है" तो चलके घाई जी के मतवाले हाथी को देखू । शाह, अन जो निश्चय किया है उसे चलकर करूँ। '(वाहर जाता है) (धयराया हुअा विकट रूप में उजला दुपट्टा प्रोदे कर्णपूरक प्राता है) - 7 - । ३ मृच्छकटिकभापा यसन्त--(प्रासन पर बैठ कर आपका धनी कौन है ? संघ-सजन धन सतकार है धन बहुतन के होइ । पूजन ममुमत है साई पूजा जानत जाइ ॥ बसन्त-कहिये फिर क्या हुया ? सपा---उन्होंने मुझे चाकर रख लिया था । जब उनके धन न रहा तब मै जुना खेलने लगा। प्राज अपने प्रभाग से दस मोहर हार गया। माथु-अरे ठग गये ! लुट गए! सया-यही सभिक जुनारी मुझको रद रहे हैं, इतनी बात है। बसन्त-प्ररी । पेड़ सूख जाने से पछी इधर उधर भटकते फिरते हैं । दोनों जुधारियों के पास जा और कह दे कि यह साने का फड़ा तुमको भेजा है। (इतना कहकर अपने हाथ का कड़ाउतार कर मदनिका को दे देती है) मद--(कड़ा लेकर ) बहुत अच्छा । (घर से बाहर जाती है। माथु-अरे ठग गये। गये। मद-ये लोग ऊपर देखते हैं और लम्बी नदी सासिन रहे हैं और खिड़की की और ताक रहे हैं इससे मै समझती हूँ कि समिक और जुगारी यही हैं । (उनके पास जाकर) आर्य, प्रणाम। माथु-प्रच्ची रहो। -आप लोगों में से सभिक कौन है ? माथुअरी सुदरी फौन तू देवति तिरछे नैन । फटे नोड दिखराय के बोजति मोटे वैन । पास धन नहीं है तुम और किसी को हूँ दो। -माप कैसे जुमारी है जो ऐसा कहते हैं प्रापका काई मद- -
मृच्छकटिकमापा
३७
बसन्त-तूने बहुत अच्छा किया । फिर क्या हुआ ?
कर्ण-तर तो सारी उज्जैनी योझो नाप की नाई हिल उठी
और सब कहने लगे, घाह रे कर्णपुरक घाह ! उस समय एक भले
मानुस यहां खड़े थे उन्होंने जहाँ जहाँ गहने पहने जाते हैं सब
सूना देख कर सांस लेकर यह चादर मेरे ऊपर फेंक दी।
बसन्त-कर्णपूरक, देख तो यह चादर चमेली के फूलों से
पसी तो नहीं है।
कर्ण-मेने नो प्राज इतना मद पिया है कि उमकी गन्ध से
चादर की सुगध नहीं जान पड़ती।
बसन्त-देख तो कहीं नाम है।
कर्ण-यह नाम है। भाप यांच लें (चादर उतार के देता है)
घसत-चारुदत्त-(इतना पढ़ कर चादर प्रोद लेती है)
मद-कर्णपूरक ! घाई जी को चादर कैसी अच्छी जगती है।
कर्ण-हा अच्छी तो लगती है।
घसन्त-कर्णपूरक, यह ले अपना इनाम । ( उमे एक अंगूठी
'कर्ण-(अंगूठी लेकर मत्ये से लगा कर ) प्रय चादर प्रापको
बहुत अच्छी लगती है।
घसत-चारुदत्त जी कहा है ?
कर्ण-उधर ही से घर को लौटे जा रहे हैं।
बसन्त-अरी तो चल अटारी पर चढ़ कर चारुदत्तनी को
(सप बाहर जाते है)
.
देती है)।
दे।
[स्थान-पास के घर के भीतर और बाहर)
तीसरा अङ्क
(य मानक पाता है)
. "- मृच्छकटिकमापा कर्या-कहा है , घाई जी कहां है ? मद-तू सिदी हो गया है, क्यों इतना घबरा रहा है ? घाई जी जामने बैठी है देराता नहीं। कर्ण-(देसकर हाथ जोड़कर ) प्रणाम । बसन्त-तू बदा खुश जान पड़ता है, क्या हुआ ? कर्ण-(अचरज से) बाई जी आज प्रापने कुछ न देखा तो परी घाहादुरी न देखी। वसन्त-क्या, क्या, कहो तो। कर्ण-मुनिये, यह जो श्रापका खुटमोटक हाथी है यह सूट जोड महावत को मार बड़ा गड़बड़ मचाता दुधासडक पर पहुंचा जब तो सब लोग चिल्जाने लगे, देखते नहीं घाजक वेगि हटाउ विगड़ा गज प्रावत इतै । रूस घटा दि जाप भागो अपने प्राण ले ॥ और दृटत है मनि फरधनी छूटत नूपुर पाय । सुन्दर रतनन तें जड़े कगनहूँ गिरि जायें । तघ तो दुए हाथी अपने सुंड पाँव और दांतों से कमल मरे तलाघ की नाई सारी उज्जनी को मथकर एक सन्यासी के पास पहुँचा । उसका दड कमडल तोड़ उसके मुंह पर पानी छिडककर उमे अपने दांतों के बीच में उठा लिया। तव तो सब चिल्लाने लगे 'मरा, सन्यासी मरा'! वसन्त-(घबराकर ) हाय, हाय बहुत पुरा हुप्रा । कर्ण-घबराइये नहीं, सुनती जाइये, मेने जो देखा कि यह अपनी मोटी मोटी सांभरें तोड कर दांतों के बीच सन्यासी को उठाये हुए है तो मुझ कर्णपूरक, नहीं प्रापके जूठन के पले हुए दास ने, जुए के सेज को लात से मार लोहे का एक मोटा डडा लेकर हाथी को जत्तकारा। बसन्त-तव फिर? कर्ण-बिध्याचल चोटी सरिस गज को मारि हटाय। ताके दांतन बीच सन जोगी लियो छुडाय
मृच्छकटिकभाषा
छके कान मनहूँ क्यो, कहें लगि करौं बखान ।
रही से रेभिल देश में मानहु प्रिया समान ॥
मीठो सुरीली गान मिलि माइ चौल के मा चीन के।
पुनि स्वर चढाव उतार गुञ्जत झुड मनटु अलीन के।
स्वर मूछना मह चढ़त होत विराम धुनि पुनि मृदु भई ।
एक राग दोहरा बगत तीला सहित यति रोकी गई ॥
भयो बद कर गान, प्राये एती दूर चलि
तान भरे हैं कान अरह सेई सुनि परे ॥
मैने-पजी, गली में तो इस वेर कुत्ते भी सुख से सो रहे हैं,
वो घर चलें (भागे देखकर ) देखिये, देग्निये, अंधेरे को भी
औकास देते हुए प्राकाश की अटारी मे चन्द्रमा उतर रहे हैं,
चार-तुमने बहुत ठीक कहा ।
पूडत तम कह राह दै कोटि उठाये चन्ट ।
मन निकासे दांत कछु जल महँ घुसी गयद ।
मैत्रे--प्रजी यही तो है घर । बद्ध मानक ! घद्ध मानक ।
कषाद खोल।
पद्ध-(भीतर से) मैत्रेय जी की घोली सुन पड़ती है तो
वारुदत्त जो भा गये । किवाद सोल दूँ (किषाद खोल फर)
लागन ! मैत्रेय जो तुम्हारे भी पालागन ! पलंग पिछे हैं। प्राप
जोग हैं।
(दोनो घर में प्राकर बैठते हैं)
[-पद्ध मानक, ग्दनिका को पुकार दे, पाष धो जाय ।
चार-पयों सोते तो जगाते हो?
पद्ध-मैत्रेय जी में पानी डालता है आप पाप धो दीजिए।
नेय-(मोध मे) देखते ही यह जोडी का पचा पानी डाले।
और
हम घाम्हन है हममे पांव धोको कहता है।
चाय-तुम्ही पा लेना, धद्धमानक पाय यो देगा।
पक्ष मैत्रेय जो, पानो डानिए ।
३८ १ - - मृच्छकटिकभापा पद्ध-मालिक भला गरीब ह मानै सेवक जोइ । सल गसर धनका तरै अंत सवै नहिं साइ ॥ लगी बान की चाट जेहि वर्धन हाँको जात। फॅसो और की नारि से सुनै कौन की बात? परी जुश्रा की चाट जेहि तेहिको सबै हटाय जो सुभाष को योष है तेहि को सके मिटाय? बडी देर हुई । चारुदत्त जो गाना सुनते गये 'अभी तक नहीं लौटे, प्राधी रात हो गई । अब मैं ड्योढ़ी में पड़कर साऊँ (किवाड बन्द करके सो जाता है) (चोरदत्त और मैत्रेय पाते हैं) चारु-धाह, रेमिल ने कैसा अच्छा गाया और कैसा सुन्दर बजाया। बीना भी समुद्र से नहीं निकली तो क्या, एक रत ही है! उतकण्ठित के मन को सग्नि सो यह धीरज दै समुझायती है । जय प्रापत वैर लगावत मीत सकेत म. पहलावती है। जन व्याकुल हैं जो पियोग में भूप तिन्हें यह धीर करापती है। हिय नेह का अंकुर जामो है जो रस सींच के ताहि बदायती है। मैत्रे-चलिए घर मे चलें चार-चाह रेभिल ने कैसा पच्छा गाया। मैत्रे-हमसे जो पूछिये तो हमे तो जब स्त्री संस्कृत पढ़ती है या मर्द झाकली गाता है तो बड़ी हँसी पाती है। नी जो सस्कृत पढ़ने लगती है तो नई व्याई गाय की नाई सू सू करती है और जन मर्द काकली गाने लगता है तो सूखे फूलों की माला पहिने पूढे पुरोहित ऐसा मत्र जपता जान पड़ता है। चारु-भाई रेमिल ने बहुत अन्याया- क्यों माई अच्छा । ? एक एक स्थर सुनि परत ललित भाघ के सग। मधुर मनाइर गान सोइ सुदर सम सब भंग ।।
मृच्छकटिकमापा सरकत बलों घसत निज श्रङ्गा कचुत छोड़त मनहूँ, भुजङ्गा ॥ (श्राकाश को प्रोर देख कर ) अरे, क्या नन्द्रमा इव रहे हैं ? करें पाहरू मोहि नखि शमा । योर महलफोड़न महँ वका ॥ धन अधेर सन जगहि दिपावति । रैन माय सी मोहि अंग लायति । फुजधारी में सेंध लगा के यहां पहुंचा, प्रय इस कोठे मेसेंध लगाऊँ, चारी के काम को नीच कई सप घात लगे नर सेषित पाई। देरफै धोखा हरै परको धन चारी सो कायर रीति कहाई । + नाम पुरो प्रधान न काह के चारो भलो न भली सेवकाई । । द्रोण के पुत्र युधिष्ठिर मैन के मारन के हित सेंध लगाई भीगी है फहुँ भीति अहँ सोदत शन्द न होय । कौन ठाय जहँ भाड़ में सेंध न देसै काय ॥ गली भीतिलोना लगी है पतरी केहि ठाम । सौ जहाँ नतिय परै सिद्ध होय सब काम ॥ तो कहाँ से सेंध फाई (भीत को छुकर ) नित सूर्यनारायण के अर्ध का पानी पडते पड़ते यहां की मिट्टी खुद सो गई है और चूहों ने भी यहां कुर्व खोद डाला है। अब हमारा काम सिद्ध होगया। स्कददेवता के पुनों की सिद्धि का पहिला लच्छन यही है। तो अब कैसी संघ फोडू, कनकक्ति जी ने चार रीतियाँसेंध खोदने की कही-पकी ईंटों को खींच लेना, कच्ची को काट देना, गोंदे को भिगो देना और काठ को काट डालना । तो यहाँ भीत एक ईंट इटाऊँ। सिले कमलसम कूप सरसि नवचन्द्र प्रकारा। स्वस्तिक पूरनकुम्म सूर्य सम सन्धिप्रकारा ॥ सैधि में प्रकट करौं 'अपनो चतुराई । देखि जेहि चकित हाय सब लोग लगाई। .
मृच्छकटिकमापा (मैत्रेय पानी डालता है और बईमानक चारुदत्त के पाप धोर (अलग गड़ा हो जाता है) चार-प्रजी ब्राह्मण देवता के पांच भी धो दो। मैत्रे-ग्रजी हमारा पाँच योन्या होगा हम तो मारे ग की नाई फिर लोटेहोंगे। बर्द्ध-मैत्रेय जी प्राप तो घाम्हन हैं मैत्रेय-प्ररे जैसे सांपों में डोडा होता है वैसे ही हम धाम्हले में बाम्हन हैं। बर्द्ध-मैत्रेय जी, लाइये आपके भी पांव धो दू। (मैनेय के पार धोता है) मैत्रेय जी मैने गहनो का डिब्बा दिन भर रसाया, पर रात को प्राप इसकी रखधारी कीजिये ( मैत्रेय को डिव्या देकर पाहर जाता है)। मैत्रे--(डिया लेकर ) अरे, अभी यही है ! क्या उज्जैनी चार मो नहीं है जो इस नींद के चार को चुरा ले जायें, भाई मै ते भीतर जाता हूँ। बार-यह भूपन हैं पातुर करे। ले न जाहु यह घर मह मेरे ॥ घरो मित्र प्रापहि तुम एही। जोग में सौंपों नहि तेहीं। (सोने का भाव बताता है) -झ्या पापको नींद पा रही है ? सिर मे उतरि प्रावि मह प्राषत । पालम सारे तन पर छायत ॥ अलख रूप जनु चपल चुदाई। भावत नर पर तेज नसाई॥ (किवाद बन्द करके सो जाता है) (शर्षिता प्राता है) गर्षि-चल विद्या दोड सग लगाई। तन प्रमान निज सेंध बनाई। मैत्र- साये।
V . . - मृच्छकटिकमापा (इधर उधर देख कर पानी का लोटा उठा लेता है और पानी छिड़क कर डरता हुमा ) अरे, पानी गिरने से लोग चौक न पढ़ें तो कियाह उतार लू (पीठ के सहारे मे पल्ला उतार लेता है) प्रप इन्हे दे सचमुच सेा रहे हैं या झूठ मूठ (देख कर) वेधड़क सो रहे हैं, देखा, चलत बराबर सांस नहीं शका कळु लागे। मुंदी अाखि नहि सिथिलभाषपुतरी निज त्यागे॥ ढोलो परी शरीर कछुक शय्या के बाहर । दीप महे नहि सौह करे सोधत दल जो नर ॥ (चारों ओर देस कर ) यह ढोल रक्खी है, यह मृदङ्ग है, यह घीना है, यह बाँसुरी है, यह पोथियां है। क्या नाटकवाले का घर है ? हम तो बडा घर देख के घुसे थे, यह तो महादरिदी है, ऐला तो नहीं कि राजा और चार के मारे धन धरती में गाड़े हो। मेरे भी तो धरती में गड़ा है। (बीज फेंकता है) धीज फेंकने से कुछ नहीं जान पडता, यह महादरिद्री है, चलें निकल चलें। मैत्रे-(सपने में बोलता है) माई सेंध लगी है, चोर भी देख पड़ता है, यह डिवा पाप ले लीजिए। 'शर्मि-क्या मुझे पाया जान यह दरिद्री मेरी हँसी कर रहा है, तो इसे मार डालूं । यह सपना देख रहा है (देख कर ) अरे फटी धोती में सचमुच गहने उिया मलक रहा है, तो अब इसे लेढुं। इसकी भी मेरी सी दशा जान पड़ती है, जाने दो क्या किसी भले मानुस को सताधैं । मैत्रे-भाई, तुम्हें गाय और बाम्हन की सीह है जो तुम डिपान लो। शर्वि-माई गौ घाम्हन की सौह तो माननी चाहिये तो इसे लेही जो। दिया पर रहा है मेरे पास दिया घुझाने का कीड़ा भी तो है तो उसी को पहूँ इसी का अवसर है (फोदा ફર मृच्छकटिकमापा जय भगवान कार्तिकेय को जय कनकशक्तिजी की ब्राह्मए देव की जय । जय भास्करनदन की और जय गुरु योगाचार्य की जिन्होंने प्रसन्न होने मुझे योगरचना मिसाइ थी। लखै न चौकीदार यहि के प्रबल प्रभाष से। तन लागे हथियार कटे न पीरा होय कछु ।। (सेंध फोड़ने को वैठता है) अरे, नापने का डारा भूल पाय! (सोच कर ) क्या हुआ, जनेऊ तो है, इसी से नाप लेंगे, भी ब्राह्मणों के बड़े काम का होता है और विशेष करके हम जन ऐसों का, नापि सकै यह सेंधप्रमाना। यही उतारत भूपन नाना ॥ सांकर पोलत, डसत भुजगा। रोकत विष यह घांधत अगा। (नाप के ) अघ लगा लगाऊ (संध फोड़ता है ) अब संध में एक ईट और रह गई | ETCEre, सपना लिया (जनेऊ से उँगली बांध कर विप का चढ़ना जनाता है और प्रौषधि बाँध लेता है ) अब तो नहीं पिरता (फिर खाद कर देख कर ) प्रो दिया जल रहा है। धन अँधेर मह सेंध से निसरति दीपकजोति । पिची कसौटो मनौ सानरेस सी होति । (फिर देख कर ) सेंध तो पूरी होगई तो भीतर चलूं य पहले देसा कोई है तो नहीं (देख कर ) जय कार्तिकेय की। 1 (घुसता है) ३ [ स्थान दूसरा-चारदत्त के घर के भीतर] (शबिलक सेंध से निकल कर पाता है) शर्यि-अरे, दो जने सेा रहे हैं, तो किवाड़ खोल, जिस को राह रहै । अरे घर ऐसा जजल हो रहा है कि किवा करता है । तो पानी इह । पानी कहां मिलेगा . -- - 'मृच्छकटिकभाषा सकट में डुडुम, तुरग है सुयल पर 1 जल बीच नाघ, रात दीपकह हम हैं। गिर सम पिर, भागन भुजग, झपटन में हम बाज । पकरन वृक, इतउत लसग श , बल मह मृगराज । | (रदनिका पाती है) रद-हाय, हाय, ड्योढ़ी पर बर्द्धमानक साता था सो भी नहीं देख पटता, कहा गया । तो प्रय मैत्रेय को पुकार । (भागे चलती है) शर्षि-(रदनिका को मारना चाहता है) अरे नी है, तो भाग चलू। (बाहर जाता है) रद--(डरती दुई) हाय, हाय, घर में सेंध फूट गई चोर माग गया, मैत्रेय को जगाऊँ (मैत्रेय के पास जाकर ) मैनेय जी उठो उठो! घर में मेंध फोड़ के चार भाग गया। मैने-प्ररी तोडी क्या चकती है ! चार फोड़ के सेंध भाग गई। रद-पया धकते हो, देसते नहीं। मैत्रे-भरी लौंडी च्या पकती है? ये केवाड़ किसने उतारे? अरे भाई चारादर जो उठिए उठिप, घर में सेंध फोड़ कर चोर माग गया। चारु-(जाग कर ) माई फ्यो हँसी करते हो ? मैत्रे-प्ररे भाई हसी नहीं है देख लीजिए । चारु-कही। मैने यह क्या है। चार-(देस फर) क्या सुन्दर सेंध है। ऊपर से एक एक रेट जसि पर हटाई। ऊपर सकरी चौडी है फछु घोच बनाई। अति जोग जन जनु कुमासन प्रापत जानी। हरके पस यदि महज देरि छाती पिलगानी॥ मैत्रे-धमारे घर संघ देना या तो किसी नौनिखये म -- , ।
मैत्र- मृच्छकटिकभाषा है) कीड़े ने, देखो, दिवे के अपर उड़ उड़ कर अपने पर्ती की यथार से अंधेरा कर दिया, मैंने भी तो अपने वाहन के कुत्त को अँधेरे में डाल दिया, मेरे वाप चार घेद के पढ़ने वाले दान का पैसा लेने वाले थे, उनका लड़का मै रडी के लिये चारी कर रहा हूँ। घाम्हन देवता की बात तो माननी चाहिये (डिया ले लेता है) आपका हाय ठडा है। शर्षि-अरे, पानी छुने से मेरा हाथ ठडा हो गया है तो इसे कांख में दया कर गरम करलू (चायें हाथ को गरम करके डिब्बा ले लेता है। मैत्रे-गयों भाई ले लिया? शवि-वाम्हन की वात कौन न मानेगा, ले लिया। मैत्रे-तो अब दुकान बेच कर वनिये की नाई .साऊँगा । शार्षि-प्रजी ! तुम सौ बरस सोभो । हाय मैने मदनिका र के लिये बाम्हन के कुल पर कलक लगाया, कुल के क्या लग अपने लगा। दारिद तोहि धिक्कार तू सघ कुछ मकै कराय।। करत जात सो काज नर मन सन निन्दत जाय ॥ तो मदनिका को छुड़ाने के लिये वसन्तसेना के घर चल (देख कर ) अरे, किसी के पौष की प्राटि जान पड़ती पहरेवाला तो नहीं पा रहा है ! चुपचाप खमे की नाई खड़ा जाऊँ । भोर पहरेवाले भी शक्लिक का क्या कर सकते हैं। झपटा के मारन में चील्ह के समान हम जल्दी जल्दी भागने में मृग से न कम है। साये जागे चीन्ह लेत कूकुर की नाई नित बिल्ली के से पायें मेरे चलत नरम हैं। मायारूप धारन में सांप से हैं सर्कन में देश भाषा जानन में पानी के सम है।
स ना 1 मृच्छकटिकमापा मैत्रे-उठिए, उठिए, जो थाती को चार ले गया तो प्राप क्यों घबरा गये? चारु-(मास लेकर ) भाई। दोप लगे हैं मोहि सय, को माने सच पात । बिना तेज दारिद पै सवै, दोष फवि जात ॥ हाय, हाय, मेरे धन के हरन को चाह देव जो कीन्ह । तो अब काह विचारि के पापी अपजस दीन्द । मैत्रे -हम बात बना लेंगे किसने लिया, किसने दिया, कौन सासी है। चार-प्ररे तुम यह जानते हो, क्या हम कमी झूठ घोलेंगे? करि हो थाती देन को भीख मौगि उपाय । इंट को नहि वोलिहो जेहि से धर्म नसाय ॥ रद-अब इसे जाके घाई जो से कहूँ। (बाहर जाती है ) ar TH ที่ร ira [स्थान दूसरा-चारुदत्त के घर के भीतर दूसरी जगह ] (चारुदत्त की खो धूता यैठी है, रदनिका पाती है) धूता-(घरा फर) परी प्रार्यपुत्र को या मैत्रेय जी को चोट तो नहीं पाई। रद-जो चोट तो किसी को नहीं पाई, पर जो गहने पातुर छोड़ गई थी उन्हें चोर ले गया (धूता सुध हो जाती है) रद-उठिए। धूता--(सांस लेकर) भरो क्या कहती है कि उन्हें चोट नहीं पाई। प्ररी हाथ पैर कट गये होते तो कुछ पुरा न था, इस से तो उन पर कलंक लग जायगा, सारी उन्जनो के लोग यही कईंगे कि वायदत्त ने पन के जाल में ऐसा काम किया । (ऊपर देख कर साँस लेकर) भगवान ! तुम इन लोगों 'को पुरहन के पत्ते पर पानी की सूद का मांति पयो नया रहे।
. चौधरी मृच्छकटिकभाषा काम है या कोई नगर मे पाया है, नहीं तो सारी उज्जैनो कौन नहीं जानता कि हमारे कुछ नहीं है। चारु-परदेशी अभ्यास करत को सेंध लगाई। जान्यो नहि बिनधन सोने सव सोच बिहाई ॥ पहिले कीन्हीं श्रास देखि यह महल महाना। सेंध फोरि बहुरि प्रवसि घपुरा पछिताना । यह पिचारा अपने साथियों में जाकर कहेगा कि हम के लड़के के घर गये यहां कुछ न मिला। मैत्रे प्राप भी चोर के लिये सोच करते हैं। उसने देखा होगा कि यह पडा भारी घर है इसमें हीरा मोती का डि- या सोने के गहनों का डिब्बा पाऊँगा । (सोच कर दुख प्रापही पाप ) गहनों का डिब्बा कहां है ? (फिर सेाच का प्रकाश ) भाई, तुम सदा कहते थे कि मैत्रेय मूर्ख है, हम ने के अच्छा किया जो गहनों का डिब्बा तुम को दे दिया नहीं तो था पाजी चुरा ले जाता। चारु-धजी क्या हॅसी करते हो? और मैत्रे-क्या हम ऐसे निरे मूर्ख हैं जो हम हँसी का नहीं जानते। चारु-तुम ने कर दिया ? मैने जब हमने तुमसे कहा था कि तुम्हारा हाथ उढा चारु-कदाचित् दिया हो (चारो और हदकर) भाई यदुत अच्छी बात हुई। मैत्रे-क्या घच गया? चारु-नहीं चार ले गया । मैत्रे-इसमें फौन अच्छी घात हुई? चार-चार हमारे घर से निरास नहीं गया मैत्रे-ग्रजी यह तो पराई थाती थी। चार-अरे ! (बेसुध होकर गिर पड़ता है) - मृच्छकटिकमाषा तुम हित सुख दुप माहित नारि दशाअनुकूल है। सांचहुँ छुटो नाहि, दारिद में नहि सुलभ जो ॥ मैत्रेय जी! सबेरा होने चाहता है, हार लेकर घसन्तसेना के पास जानो और उसमे हमारी भोर से यह कहना कि हम अपना समझ के गहनो का डिपा जुए में हार गए. उसके बदले यह हार ले लीजिये। मेंने-प्राप। ऐसे महंगे रतों का यह हार ऐसे डिब्बे के कारन क्या दे रहे हैं निसे किसी ने साया न पहिना और चार लेगया। चारु-भाई ऐसी बात न कही। दीन्हे भूपन सौंपि सो करि हम पर विश्वास । तेही सो हम हार दै गुरुता करत प्रकाम: भाई तुम्हें हमारे सिर को सौ है बिना दिये न लौटना । बर्द्धमानक, भरी वेगि यहि सेंध को पही ईट लगाय। सेंध लगे को दोप यह घर जेहि सन मिट जाय । भाई मैत्रेय ! तुम भी यहाँ लुन्धता छोड़ कर उदार बन जाना। मैने-अरे कगाल केसे उदार की बात करेगा? चारु-प्रजी हम कगाल नहीं हैं। 'तुम हित सुख'–इत्यादि फिर से पढ़ता है। तुम जाओ, हम भी हाथ मुंह बोकर सध्या करेंगे। (सथ बाहर जाते हैं) - चौथा अंक (पहिला स्थान-बसतसेना का घर) (चेरी प्रातो है) चेरो-प्रम्मा ने मुझे बाई जी के पास भेजा है। वाई -जी यह बैठो चित्र देखती जाती हैं और मदनिका से कुछ कह रही हैं । तो मैं भी उनके पास चलूँ । (बाहर जाती टे 1 । -- । मृच्छकटिकमापा हो ? मेरे पास मैके को एक माला बची है उसे भी प्रार्यपुत्र अपन भनमसी से न लेंगे । प्ररी मैत्रेय जो को बुला तोला। रद-बहुत अच्छा । (मैत्रेय के पास जाकर ) मैत्रेय धाई जी बुलाती हैं। मैत्र-कहां हैं? रद-वह क्या हैं। मैत्रे-आगे बढ़ कर ) जय हो श्राप की! धूता-भाइये प्रणााम, हमारी भोर मुंह कीजिये। मैत्रे-लीजिये मैने पाप की ओर मुंह कर लिया। धूता-इसे लीजिए (माला देती है)। मैत्रे यह क्या है ! धूता-मै रतनछठ उपासी थी उस में वाहन को जितना हो सकै दान देना चाहिये, उस दिन मैंने कुछ नहीं दिया था इसी से धाज यह हार देती हूँ। मैत्रे-(हार लेकर ) प्रापका भला हो, मैं जाकर चारुदत्त जो को दिखाऊँ। धूता-मैत्रेय जी मुझे क्यो लजाते हो? (बाहर जाती है) मैत्रे-वाह वाह कैसी उदार है! चार-मैत्रेय-क्या कर रहे हैं, घड़ी देर होगई है । ऐसा हो कि घबराहट में कुछ अनर्थ कर बैठे। मैत्रेय ! मैत्रेय | मैत्रे-आगे बढ़कर कहिये लीलियार दिखलाता है चारु-यह क्या है? मैत्र-जैसे माप वैसी हो प्रापको स्त्री होने का यही फल है चार-झा ! क्या मेरी ब्राह्मणो भी मुझ पर दया करती है मेरे फंगाल क्षेने में सन्देह महों। अपना धन सन साय, तियसम्पति से पति रही। धनहि पुरप तिय हाय, होत धनहि से तिय पुरुप दरिद्र नहीं हैं। - M . ।
मृच्छकटिकभाषा
वसन्त-तो अम्मा से कहा जो चाहती हैं कि में जीती रहे
तो फिर मुझ से कभी ऐसी बात न कहें।
चेरी-बहुत अच्छा । (बाहर जाती है)
(शविलक प्राता है)
विमल रैन महें दोष लगाई
नींद जीति पहरू पहिराई ॥
उत दिनेश होत छविमदा।
बीते रेन भयो जनु चदा ।।
देखे मोहि प्रवरात चलत जो मग मह धापत ।
के मोहि ठादा देखि पास मेरे चलि प्राधत।
चदा पाप सिर प्रान जात डर लगत सुसाई ।
करत प्रापही पाप प्रापही नाहि डेराई।
मैने मदनिका के लिये ऐसा साहस किया।
चाकर से बतरात एक की प्राखि वचाई।
नारी ही इक गेह देखि तेहिं चलो विहाई ॥
चौखट से है खड़ो देखि पहरे कर फेरा ।
चाल अनेकन चलि कीन्हो कोउ भाति सवेरा॥
घसन्त-भरी यह पट हमारे पलग पर रख दे और पखा
लेकर जल्दी प्रा।
मद-बहुत अच्छा ( पट लेकर बाहर जाती है)
शर्षि-यसन्तसेना का घर यही है, मदनिका को हूँ ।
(परना हाप मे लिए मदनिका पाती है)
शर्वि-(देखकर) यही तो है मदनिका ।
जेते गुन यहि सुदरि माहीं।
ते ते गुन कामहुँ मह नाहीं ॥
है यहि के सत्र श्रग अनूपा ।
रति है खड़ी धरे जनु रूपा॥
यह मोहिजरत काम की ज्वाला।
करति ठढ चदन सम,
१० चेरी-चाई जी | अम्मा कहती हैं कि चादर पोढ लीजिये मृच्छकटिकभाषा [ दूसरा स्थान-यमन्तसेना के घर का एक कमरा] (हाथ में चित्र लिये घसन्तसेना बैठी है, मदनिका खड़ी है। घसन्त-प्ररी, मदनिका चारुदत्त जी का ठोक चित्र उतरा है। सद-जी हाँ ठीक है। घसंत-तूने कैसे जाना? मद-मेने देना कि प्राप इसे बड़े ध्यान से देख रही हैं। घसन्त-परी मदनिका, घेसषापने की चतुराई से ऐस करती है। मद्-चाई जी, फाा वेमषा होने से कोई सच नहीं घोलता! घसत-अरी, वेमरा झूठ न बोले तो क्या करे, उसका र रण के लोगों से काम रहता है। मद-पाप का मन और श्राप दोनो लग गये उसका माप कारन क्या पूछती हैं ? वसन्त-अरी, मैं अपनी सहेलियो की हंसी से धवना चाहती है। मद-याई जी ! ऐसा न कहिए । सखी सहेलियाँ सब प्राप हो के मन की करेंगी। - (चेरी पाती है। बसन्त- खिडकी के पास रथ खड़ा है। -क्या चारुदत्ता जी घुला चेरी-जी नहीं एक और कोई है उन्होंने दस हजार के गहने भी भेजे हैं। बसन्त-यह कौन है? चेरी-जी, राजा के साले सस्थानक । क्रोध से ) चल दूर हो, हमारे सामने ऐसा फिर -बाईजी,मुझे क्षमा कोजिए मै अम्मा के कहने से पाई थी ऐसा सनेसा हो चुरा लगता है । सरेरा .
मृच्छकटिकभापा
मद-अपना शरीर और अपनी भलमसी ।
शर्वि-परी तू नहीं जानती है साहसदी में लक्ष्मी रहती हैं।
मद-अच्छा तुम भले मानुस ही बने रहे? कहीं मेरे कारन
साहस करते करते प्रनरय तो नहीं कर डाला?
शर्षि मूलत हौं गहने पहिने सुकुमारि नहीं फोउ कृती लतासी।
लेत नहीं धन पाम्हन को जो धरो, तिन यज्ञ के काज निकासी।
होना नहीं धन जालचसे कोउ चाल जो गोद सिलावति दासी ।
चारी के काम में में परौ नित योग प्रयोग विचार प्रकासी।
तो अब तुम जाके वसन्तसेना जी से कहो।
मो पर कृपा दिसाय अपनेहि तन की नाप के।
पहिरिय इहैं छिपाय ए भूपन कीजिये ग्रहन ॥
मद-शपिलक | हम बेसपा है । हमारे गहने छिप नहीं
सकते । इस से घन्द डिब्बा देना अच्छा नहीं । खोलो तो देखें इस
मैं क्या क्या है?
शर्षि-लो। (डरता हुमा डिव्या देता है)
मद-अरे, यह गहने तो मेरे देखे हैं ,कहो तो तुमने कहाँ पाये?
शर्वि-मदनिका, तुम यह जान कर क्या करोगी?
मद-(रोप से ) तुम हमै नहीं पतिमाते तो हम को छुड़ा के
क्या करोगे?
शर्षि---प्ररे, फल मेने चौक में सुना था कि चौधरी के हैं।
(घसन्तसेना और मदनिका चेसुध होकर गिर पड़ती है)
शर्वि-उठी मदनिका, क्या है?
छूटत तेरो दासपन, तू दुस से घवराति ।
कॉपति वितपति हैं सडी, हम पर तरस न खाति ।।
मद-(सांस लेकर ) अरे, मेरे कारन तुम ने प्रकाज तो
किया, उस घर मे किसी को मारा तो नहीं ?
शर्यि-मदनिका ! डरे या सेाये को शर्पिलक न मारेगा, वहाँ
न मैने किसी को मारा है न घायन किया है।
- से - . मद-मैंने घाई जी से कहा था तो बाई जी घोली हमारी मृच्छकटिकभाषा मद-(देवकर) परे शर्षिततक, अच्छे पाये, कहो क्या है। शर्वि-काँगे । ( दोनो एक दूसरे को बड़े अनुराग देखते हैं) वसन्त-क्या कर रही है मदनिका ? कहाँ चली गई? (खिड़की से झांक कर) अरे यह तो किसी मर्द से पाते कर रही है और उसे दे धान से टकटको बांधे देख रही है। हो न हो यह इसे छुडाने पाया है तो इन दोनों को छेड़ना न चाहिए ; न पुकारूंगी। मद-शपिलक, कहो। शर्षि-(डरता दुपा चारो ओर देखता है) मद-शविलक, क्या डरते से हो। शर्वि-कुछ चुपके से कहना है, कोई है तो नहीं। मद-कोई नहीं है। घसन्त-(पाप ही प्राप) क्या कोई छिपी बात है ? तो न शर्वि-मदनिका ! भला वसन्तसेना तुम्हें कुछ लेके छोड़ देंगी। वसन्त-(पाप हो श्राप ) क्या कुछ मेरी ही बात कर रहे हैं। तो इस खिडकी की प्रोट हो कर सुने । चले तो हम अपनी 'चेरियां छोड़ दें । तुम तो बताभो तुमने इतना धन कहाँ पाया जो मुझे घाई जी से छुड़ाप्रोगे? शर्षि-पाय सको तव नेह में धन न और कोट भांति । कीन्हो तेरे काज मैं साहस पिछली राति ॥ वसन्त-(पापही प्राप)रूप तो इस का बहुत अच्छा साहस कैसे किया? शालिक, तुमने लुगाई के कारन अपने दोनो ससौ - . -- क्या, क्या ?
. मृच्छकटिकभापा स्त्री तो सदा की चचल होती है और मन में चाहे और को कर और दिसि नैन । डा मंद और पे करें और सँग सैन । किसी ने बहुत ठीक कहा है- गदहा कर न इय कर काम । परवत पर सरोज कब जाम। जय बोये उपजे नहि धान । रद्द न शुचि पातुरसतान ॥ अरे पापी चारुदत्त रह, अघ तू नहीं बच सकता (इतना कह कर दो चार पग चलता है)। मद-(अांचल पकड़ कर ) क्या बेठिकाने की बात कर रहे हो? तुम नाहक विगड़ते हो। शर्विक्यों ? मद-गहने बाई जी के हैं। शर्षि-तो फिर? मद-चारुदत्त के घर छोड़ पाईयों। शवि-क्यो? मद-(कान में कहती है)। शर्षि-(घबड़ा कर)? कठिन धाम मे जरत तन जासु सरन मै जीन्ह । यि पात को रूख मेोह में अनजाने फीद ॥ वसात-(पाप ही प्राप) यह भी पदिता रहा है, तो हो न हो इसने घेजाने यह काम किया। शपि~मदनिका, अय क्या करें ? मद-तुम्ही जाना। ५ शर्वि-मेरी युदि काम नहीं करती। दोह स्वभावहिते सदा नारी चतुर प्रयोन ! पुरुषन की है चतुरई विद्या ३ माघीन । -
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मेल प्रीति इन्धन परम कठिन काम की, ज्वाल।
धन जीवन जह नरन के भसम हात ततकाल
बसन्त-(श्राप हा श्राप मुसुकरा कर) भर, यह वृथा घबरा
महामूद ते लोग जो श्रिय तिय को पतिप्राय।
तिय पर श्रिय नागिनि सरिस मटकत सटकत जाय।
मृच्छकटिकमापा
शाहि सच।
बसन्त-प्रस, बड़ी बात हुई।
मद-बहुत अच्छा प्रा।
शाद--(ई मे) मदनिका! तुम्हारी घात हमारी
में नहीं आती।
शुद्ध शील प्राचार रहे पुरखा सत्र मेरे ।
करत नीच यह काम नेह बस केवल तेरे।।
नसी काम घाल बुद्धि मान अपना मैं राखत।
तूौरन से मिलति मित्र मुख से मोहिभाखत ।
गीचि लेत जवधन सकल छुघे न पुरुष बहोरि ।
तर्जे महाउर के सरिस पातुर रग निवारि
( सोच कर ) सरवस धन फल में से तरखरपुरुष कुलोन।
पातुर चिड़ियन के मखे होत पंशफलहीन ।
रहा है।
शर्षि-रहै सिंधु को जहर सम चंचल नारि सुभाष ।
साँझ समय के मेघ सम इक छिन राग दिखाय ।
बहुत न फॅसिये तियन सग निदरें फंसे सथानि ।
जो मानै तेहि सँग रहे तजिये निदरत जानि ।।
किसी ने ठीक कहा है-
रोष हॅस सदा धन के हित ।
नरहि बिसासि दे धोखा नित ।।
चातुर तर्ज पातुरी कैसे?
जन मसान के फूलन जैसे ।
मृच्छकटिकभाषा मद-चाईजी, क्या मै अपने घर के लोग भी नहीं पहचानती । वसन्त-(पापही प्राप सिर हिलाकर हंस कर ) ठीक है, (प्रकाश) अच्छा बुला ला! मद-बहुत अच्श (शपिलक के पास जाकर ) प्रानो जी गधिलक। शर्षि-(बसन्तसेना के पास जाकर) जय हो प्राप की! यमन्त-पाइप, पालागन, वैठिये। शर्षि चौधरी ने श्रापसे यह बिनती को है कि हमारा घर प्राज का जजन हो रहा है, डिन्चे को सपाली बड़ी कठिन है इसे आप लीजिये । (दिया मदनिका को देकर जाना चाहता है) बसन्त-तो मेरा भी जघायलेते जाइ। शर्षि-(श्राप ही प्राप) प्रब यहाँ कौन जायगा ? (प्रकाश) पाप क्या कहेंगी? बसत-पाप मदनिका को लेते जाइये । शर्वि-बाई जी, श्राप की घात मे ममझा नहीं। वसत-मै समझा हूँ। शर्षिकैसे? यस तमुझ से चारुदत्तजी ने कहा था कि जो तुम्हें गहने दे उसे तुम मदनिका को दे देना, तो यही इसे दिलषा रहे हैं अब याप समझे? शर्वि-(आप ही प्राप) इन्होने जान लिया (प्रकाश)पाह चारुदत्त जी पाह! । गुनही में ला सदा चित नर चतुर सुजान । गुनयुत भलो दरिद्र ह नहिं गुनधिन धनधान । गुन हित करौ यतन सब कोई।. गुन सन कछु-दुर्लभ नहिं होई । गुनधिकाइ हित रजनीसा। पहुँच्यो प्रगम शभु के सोसा। , घोर " . . । गर्षि-नहि विपाद यहि फाल दड को नहि कछु त्रासा। मो सज्जन के सुगुन करी जेहि काज प्रकासा! जेा न कर सा थोर शठन मा सम कर राजा। मृच्छकटिकभाषा मद-शर्षिलक! जो तुम मेरा कहना माना तो गहने या जाकर उन्हीं को देयाश्रो। शर्षि-और जो नहीं यह कोतवाली में कह दें? - मद-कहीं चन्द्रमा से भी गरमी पाती है। बसन्त-(पाप ही प्राप) पाह मदनिका, पाह! सुमिरि नीच यह काज होत मारे मन लाजा। तो भी यह बात नीति के विरुद्ध है और कोई चाल सोचा। मद-प्रच्छा, एक और उपाय है। बसन्त-(प्राप ही प्राप) और क्या उपाय होगा? मद-तुम चारुदत्त जी के भेजे हुए बनो और गहने वाईजी को दे दो। शर्षि-ऐसा करने मे क्या होगा? मद-तुम चार न रह जाओगे, चारदत्तजी उरिन हो जायेंगे। और बाई जी अपने गहने पाजायँगी । शर्षि-घडी दिठाई का काम है। मद-दिठाई है तो कर डालो। वसन्त (पाप ही प्राप) या मदनिका, पाइ, तू ने गिरस्त की सी बात कही है। शर्षि-मै सीखी यह चतुरई सुनि तुम्हारि सल्लाह रात अंधेरी चद्र बिन कौन दिखावै रा६ ॥ मद-अच्छा तो तुम अब कामदेव के मन्दिर में ठहरी , म बाई जी को तुम्हारा प्राना जना दें। मद-(घसन्तसेना के पास जाकर ) चाई जी चारदत्त जी के से एक घाम्हन प्राया है। वसन्त-घरी तू ने कैसे जाना कि उन्हीं का भेजा है। शर्षि-यहुत अच्छा।
मृच्छकटिकभापा
शधि-(सुन कर) क्या मेरे प्यारे प्रार्यक को राजा पालक
ने बांध लिया, मे गृहस्य भी बन गया, अब क्या करूँ!
नर के नारी और हित प्यारे जग में दोय ।
यहिछन सौतिय से अधिक मित्र पियारोहोय ॥
तो अब उत ( रथ से उतरता है)
मद-(प्रासू भर कर हाथ जोड ) आर्यपुत्र । प्राय जाते हैं
तो मुझे अपने घर पहुँचा दीजिये।
शर्षि-थाह । प्रिया पाह! तुमने हमारे मन की बात कही।
(चेरे से ) क्या भाई चौधरी रेमिल का घर जानते हो?
चेरा-जी हो।
शर्षि-प्रिया को वहीं पहुँचा दो।
चेरा-बहुत अच्छा।
मद-पाप सॅमल के जोखम में पड़िएगा (धाहर जाती है)।
शर्वि-पिट भुज पल जो विदित गति के लोगहु सिगरे ।
राजा से अपमान पा सेषक जो विगरे ।
योगॅधरायन कोन्ह भूप उदयन हित जेसे ।
इष्ट मित्र के काज उमारों जन सर तैमे।
नाहक योध्यो मित्र को हर घस रिपुमतिमन्द ।
झपटि छुड़ानो ताहि ष्यों परत राहुमुस चद् ॥
(पाहर जाता है)
[चौथा स्थान-बसन्तसेना का महल )
(चेरी और बधुल के साथ मैत्रेय प्राता है)
मैत्रे-परे ! राधण ने मर मर के तपस्या को तो रातों का
राजा हुमा पुष्पकविमान पर चढ़ चढ़ घूमा, और मैंने न तपस्या
की न कुछ, रडियो के साथ फिरता हूँ।
- २८ 1 मृच्छकटिकमापा बसन्त-कोई रथ है। (एक रथ लेकर चेरा पाता है)। चेरा-रथ हाजिर है। वसन्त-( मदनिका को चादर प्रोढ़ा कर पूँघट खींचकर मदनिका! अब जा तू हमसे घिदा हो, रथ पर सवार हो जा' हमारी सुव रखना। मद-(रोती हुई) वाईजी मुझे क्यो छोड़ देती हैं ? ( पैरों पर गिर पड़ती है)। वसन्त-प्रय तो तुम्ही ऐसी हो गई कि हम तुम्हारे पाव छ । जाके रथ पर सवार हो । हमैं न भूलना। शर्वि -जय हो श्रापकी, मदनिका! बिदा होहु घदौ इन्हें चरनन माथ नवाह । पूर्णकाम जेहि सन भई बधू सुपद तुम पाइ ।। (मदनिका के साथ रथ पर सवार होकर बाहर जाता है) (एक चेरी पाती है) चेरी-बाई जी! वधाई है। चारुदत्त जी के पास से एक थाम्हन पाया है। घसत-माज का दिन भी कैसा अच्छा है ? जा बन्धुल साथ उन्हें प्रादर मे ले प्रा, मै भी फुलपारी में जाकर बैठती हूँ। चेरी-बहुत अच्छा। के (बाहर जाती है। 1 [तीसरा स्थान सहक ] ( रथ पर चढ़े हुए शर्षिलक और मदनिका देख पड़ते हैं ।) (परदे के पीछे) सुनो जी सुनो! कोतघाल साहब की प्राज्ञा है कि जिस अहीर आर्यक को सिद्ध ने कहा था कि राजा होगा उसे राजा ने डर कर घोसियों के गांव से लाकर, अंधेरै धन्दीघर में किया है, तुम लोग भी अपने काम पर चौकस रहना!
.. मृच्छकटिकमाषा ६१ रहा है। इधर अखाड़े से निकले पहलवान की नाई मेढ़े की गरदन मली जा रही है , इधर घोड़ो के बाल मवारे जा रहे हैं, इधर देतो घुड़साल में एक भोर चार ऐसा धन्दर बँधा है । (दूसरी मोर देख कर) और इधर महावत प्राटा सान सान पिंड बना बना कर हागियों को सिला रहे हैं। चलो, आगे चलो। चेरी-प्राइये, तीसरे चौक में प्राश्ये। मैत्रे-(चल कर ) अरे, अरे, तीसरे चोक में तो भन्नेमानुसे। के बैठने के लिये प्रासन रचे हुए हैं। तिपाई पर खुली हुई पाथी रपाखी है । यह देखिये रनों की गाउँ समेत चौसर बिछी है, यह देखो पातुएँ और धूदे विट रग रग के चित्र हाय में लिये हुए इधर उधर टहल रहे हैं। चलो, मागे चलो। चेरी-प्राइये, चौथे चौक में प्राइए । मैत्रे-(चल कर देख कर) अरे चौथे चौक में तो जघान जवान स्त्रिया मृदग बना रही हैं जिन से वादल गरजता सा जान पड़ता है , मजीरा बजने में ऐसा चमक रहा है माना पुन्य घट जाने से प्राकाश के तारे धरती पर छिटक रहे हैं , याँसुरी कैसे मीठे सुर से बज रही है और इधर गोद में रक्सी हुई धीना नरम हाथों में घजती हुई मानयती नायिका की नाई झनझना रही है, और फूल के रस से माती मारियो सी पातुरों की लडकियां गा गा कर नाच रही हैं , कोई नाटक पढ़ रही है और कोई भाष सीख रही है। चेरी-प्राइये , पांचवें चौक में प्राइए । मैत्रे-(चल कर और देख कर ) अरे, अरे, पांच चौक में तो कगालों के जी ललचाने वाली हींग और तेल को गध पा रही है, रसोई के घर से सुगन्ध और धुनो पेसा निकल रहा है जैसे कोई जो जला हुआ सोसले, भांति भाँति के मोजना के गध से मेरे पेट की माग भड़क उठी है और देखिये कसाई का जड़का मैले कपड़े की नाई - - मृ०-५ में - दिला रहे हैं और मेहराब हाथीदांत का बना हुया है, पताकाओं कशिपु की छाती की नाई बज्र ऐसे मोटे मोटे नहरे किवाड़ लगे है , इनको देखने से जो लोग ससार से अपना जी हटाकर खड़े हैं जो अपने मोती की झालरा से सजे हुए मुंह ऐसे झरोखे से मानो उज्जैनी को देख रहे हैं, ड्यादी पर दरपान ऊँचता हुआ ऐसा बैठा है जैसे कोई पडित मत्र जपे, दही चावल की पति हुए भलेमानुस की नाई एक मैसा लबी लषी सांस ६० मृच्छकटिकभाषा चेरी-देखिए हमारे घर की ड्यादी देखिए । मैत्र-(देख कर अचरज से ) वाह, वसन्तसेना के घर के ड्योढ़ी कैसी सुन्दर है, दरिद्र देख हाय मारे । भोतर हरे से रगी है, नीचे मार देकर सब झक कर दिया गया है। अपर पानी छिडका हुआ है, ठोप ठोप पर रग रग के फूल रपये हुये फाटक इतना ऊँचा है मानो माफाश देखने को सिर उठाये हुये फाटक के दोनों ओर बड़े बड़े हाथी अपने दो से वेले के हा की पात सजी हुई है फुसुम रग के अचल वयार में ऐसे हिल रहे मानो मुझे घुला रहे हैं, इनके खमों की टोड़ियों के पास हुरे श्राम के पल्लव पड़े हुए बिलोर के कलश रखे हुए हैं। विरयय वेठे यह भी एक बार टकटको बांध कर देखने लगेंगे। चेरी-प्राइये यह पहिला.चौक है। मैत्रे-(आगे चल कर देख कर ) अरे, अरे, यहाँ तो चौक में चांद, सख और कमल के रंग की धुकनी से रगे हुए जिनकी सुनहरी सीढ़ियों पर रग रग के रन जड़े हैं ऊँचे महरू रक्सी है पर चूना समझ के उसे कौवे नहीं छूते । चेरी-चलिये, दुसरे चौक में चलिये । मैत्रे-(धुस के देस कर) अरे, प्ररे, दूसरे चौक पहली के वैल घास भूसा खाकर कैसे मोटे मोटे धंधे सींगा में तेल चुपड़ा हुमा है, इनके बीच में निराद 1
मृच्छकटिकमापा
नड़े रडी के पीछे अपनी सपति गघाये हुये रडियो मद पी कर
rचुकडो में छोड़ देती हैं उसे बड़े चाव मे पी रहे हैं , चलो
गे चलो।
चेरी-प्राइये, सातवें चौक में प्राइये ।
मैत्रे-(चल कर और देस कर ) प्ररे, सात चौक में तो
दर पीजरी और ढाबलिया में बैठे हुए कबूतरों के जोड़े एक
सरे को चूम रहे हैं । सुमा दूध भात खाकर बारहन की नाई
द पढ़ रहा है। इधर स्वामी मे प्रादर पाकर फूली हुई लौंडो
तो मैना चिल्ला रही है और रग रग के फल साकर कोयल
कि रही है, इधर बटेर लड़ रहे हैं , इधर तीतर घोल रहे
कहीं कहीं कोई पिंजडे में कबूतर लिये जा रहा है और कहीं
रज की किरनो मे जले हुए महनों को मार अपने
न जड़े पखों मे पसा कर रहा है। (दुसरी ओर देख कर )
गैर इधर देखिये पातुरा के पीछे राजहस का जोडा अपनी चाल
सखाता हुआ चला जा रहा है , बत्तस और सारस घर के चूदा
की नाईधर उधर टहल रहे हैं । इस पातुर ने अपने घर में रग
ग की विधियों पाल कर नदनवन बना लिया है। चलिये,
लिये, आगे चलिये।
चेरी-घाइये, पाठचे चौक में प्राइये।
मैत्रे-(चलकर देस कर ) अरे यह कौन है जो रेशमी कपड़े
रहने अंग अंग पर दोहरे तेहरे गहने जड़े इधर उधर टहल
,
।
चेरी-यह पाई जी के माई हैं।
। मैने-प्ररे, कितनी तपस्या करने से गई जी का भाई
होता है । नहीं नहीं यह तो मसान में चम्पा के पेड़ ऐमा है।
सब कुछ अच्छा पर किसी के काम का नहीं । (दूसरी ओर
देख फर) परी यह कौन फूलों से सजी जूता पहिने ऊँचे
पर बैठी है:
वधुन हो? - दै, कोई और सुगन्ध मिला रहा है , कोई पातुरों के गाहकों मृच्छकटिक्रमापा रहा है , रसोइये भौति भांति के भोजन पना रहे है कोई बड़ा बांध रहा है, कोई मालपुमा तल रहा है । (प्रापही प्राप) अरे, यहां ऐसा कोई कहने पाला नहीं कि प्राइये पाप धोकर बैठ जाइये । (दूसरी ओर देख कर) अरे, इधर भांति मा के गहने पहने पातुर और वधुल अप्सरा और गन्धर्व ऐसे टहल रहे हैं । सचमुच यह घर स्वर्ग हो गया है। क्यों जी, तुम लोग घधुल-जी हां, पिता और माता कोड औरहि। रहे जन्मदाता कोड औरहि । पालि पोपि धौरही बढाए। पर सपति भोगत मन भाये। पहिरत खात दद नित पेलत । हाथिन के पाले सम खेलत ॥ वज्ञ मैने-चलिये, प्रागे चलिये। चेरी-प्राइये, प्राइये छठे चौक में प्राइये। मैत्रे-(चल कर देस कर) अरे, अरे, अरे, छठे चौक में तो सोने और रत्ना के फाटक बीच बीच में नीलम जडने से इन्द्र धनुप ऐसे देस पडते हैं । लहसुनिया, मोती, मूगा, पुखराज नीलम, पन्ना, चुन्नी, रत्नपारखी परस रहे है मानिक कुन्दन से जडा जा रहा है , लाल रेशम में सोने के गहने गूंधे जा रहे हैं , कोई मोती पिरो रक्षा है कोई बिल्लौर घिस रहा कोई शख में छेद कर रहा है, काई मृगा खराद रहा है। इधर काई केसर सुग्गा रहा है, कोई कस्तूरी झल रहा है , कोई न खिला रहा है, कोई तिरछी दीठि से ताक रही है, हो रही है और कहीं मोसी करते हुए लोग मद पी । इधर उधर और बहुत से लोग अपने लड़केबानों को । 1 - है । चन्दन घिस --- कहीं । मृच्छकटिकमापा चेरी-मुक के देखो, यह क्या है। मैत्रे (देखकर प्रागे पढ़ कर ) जय हो श्राप की। बसन्त-भरे मैनेय जी प्रागये! ( उठ कर ) प्राइये, इस मासन पर विराजिये। मैत्र- श्राप वैठ जाइये। (दोनो येठ जाते हैं) घसन्त-कहिये, चौधरी जी अच्छे हैं ? मैत्रे-जी बहुत अच्छे हैं। पसन्त-मैत्रेय जी भला कहिये तो अब भी मान फूल, विश्वास जर, शील-डार, गुन-पात । साधुतरहि सा, हितषिहॅग सुख सन सेवत जात n मैने-(प्रापही प्राप) इस दुष्ट ग्डी ने अच्छी बात बनाई ॥ यसन्त-कहिये किधर चले? मैत्रे-जी, चारुदत्त जी ने हाथ जोड के मापसे घिनती की है। घसन्त--(हाथ जोड़ कर ) क्या प्राज्ञा देते हैं। मैत्रे-हम आप के गहने अपने समझ से जुए में हार गये हैं और जिसके हाय हारे यह सभिक या न जाने राजकाज से कहा चला गया। चेरी-बाई जी, घाई है, चौधरी साहब जुमारी हो गये। घसन्त-(प्रापही प्राप) क्या गहने दिखला दें? (सोचकर.) प्रमी ठहर जाय। मैत्रे-श्या पाप यह हार न लेंगी? वसात-हंस कर चेरी का मुंह देख कर) क्यों न लगी। (हार लेकर अपने पास रस लेती है) बौरमारे ग्राम से रस कैसे टपकता है। (प्रकाश) मैत्रेय जी ! मेरी प्रोर से अपने जुमारीजी से विनती कीजियेगा कि रात को उनसे पाऊँगी। । -- , - है! कैसे सुन्दर सुन्दर फुत लगे हैं। बीच बीच हिंडाले गड़े हैं, ६४ मृच्छकटिकमाषा चेरी-यह हमारी घाई जी की प्रम्मा हैं। मैत्रे-इस दाइन का पेट तो बडा भारी है। क्या इसे देव ऐसा बैठा के यह घर बनवाया था या घर के भीतर बनाया था। चेरी-प्ररे इस न माज कल तो वेचारी को चौथिर पाती है। मैत्रे-हे चौथिया देवता । ऐसा प्रासन मिले तो हम पर कृपा करो, हम बाम्हन हैं। चेरो-रे मर जायगा । मैत्रे-(हॅसकर ) अरी, इतने फूले पेट से तो मरा अच्छा पी पी के मदिरा मतधारि। अम्मा ऐसी भई तुम्हारि ।। जो तुम्हारि अम्मा मरि जाय । सौ मियार तो खायँ अघाय ।। मैने यसतसेना को बडाई सुनी थी, प्राज उनका पाठ चौक का घर देख कर समझता है कि स्वर्ग यहीं उतरा है। मै इसका घडाई नहीं कर सकता यह कुबेर का घर है कि रडी का। तुम्हारी बाई जी कहां हैं ? चेरी-चले चलिये, पह देखिये, फुलवारी में बैठी हैं। मैत्रे (चल कर देख कर) Rarr कैसी सुन्दर फुलवारी हैं , सचमुच नदनधन हो रहा है। दूसरी ओर देखकर ) और यह जाल कमलों पर सूरज की किरनो के पड़ने से पोखरी का साफ का सा रग हो रहा है। साह लसो अशोक धरि नये फूल' श्रो पात । लगे रक के पूंद जनु समर सुभट के गात ॥ हैं पाईजी? . L मृच्छकटिफभापा गिरें धनि के ऊपर कैसे। गगनवस्त्र की झालर जैसे॥ मलि चलत चक चकई मन? कहुँ हस अनु उड़ि जात हैं । कहुँ लसत मछरी मगर जनु कहुँ महल उठे नखात हैं । पनि जात रूप अनेक धन के लखहु चाल बतास की। लसि परै सीचे वित्र माना छत्त माहि प्रकास की। मेव से प्रौ तम मे धिरि कै धृतराष्ट्र के राज से माहै अक्षामा । फकत हैं एफ भोर शिखो दुरयोधन से परि गर्घ प्रकासा। जूए में हारि युधिष्ठिर के सम कोकिल वेठी है मौन उदासा । पारध से बन चाहि के हस करें लिपि के प्रय लीन निघासा || (सोचकर) मैत्रेय को बसतसेना के पास गये बड़ी बेर हुई, अभी तक नहीं पाये, क्या करते हैं। (मैत्रेय प्राता है) मैत्रे-पातुर भी कैसी लालची और नसीती होती है। देखो, यसतसेना बोली न चाला, पूछा न गया यार माला ले ली। इतना तो धन मिला पर उसके मुंह मे यह भी 7 निकता कि मैत्रेय जी बैठो, पानो तो पोलो तय माना । मेरी ले तो मै मुंह- जली का मुंह न देखू । (दुत मे ) लोग टोक कहते हैं कि कमज कहां जिसमें मॅसीड नहीं, परियों को जो घोसा न ३. मोनार कहा जो चार न हो, गधारों की भेंट कहां जिसमें लड़ाई दगा न हो और पतुरिया ऐसी कहा जो लालची न हो । तो पर चार एचजी को इस पतुरिया से छुडाने का उपाय फ। (चात कर और देखकर) चारुदत्त जी तो याग में घर बैठे हैं (मागे पढ़ फर) यदती हो। चार-परे मैत्रेय जी मा गये! मानो यही घटी। मैत्र-1 घाय-कदो भाकाम सिदफर प्राये ? पनमा भर्ष सरल में मल भी है।
मैने-(श्राप ही प्राप) प्रब वहाँ प्राके और क्या लेगी। ६६ मृच्छकटिकमापा (बाहर जाता है) . , ( दोनों वाहर जाता है। (प्रकाश ) बहुत अच्छा कह दूंगा (प्रापही प्राप) कि । के फन्द में न पड़ें। यसन्त-अरी यह गहने ले ले, प्राज चान्दत्त जी के चलेगे। चेरी-बाई जी, प्राज बडा दुर्दिन हो रहा है, बसन्त-होय राति बदरा उ घरसैं मुसलधार, पिया मिलन में कौन ए मेरे रोकनदार ? हार लेकर जल्दी श्रा। पाँचवॉ अंक (स्थान-चारुदत्त का घर) (चारुदत्त आसन पर बैठा देख पड़ता है) चारु-(ऊपर देवकर) अरे माजघड़ा दुर्दिन हो रहा है। देखत घरके मोर चाप मन छ फुजाई । मानसरोघर चलत हस देखें घबराई ॥ विना समय के मेघ लखौ नम चहुँ दिसि छावत । विरहिनि के मन माहि काम को पीर उठायत ॥ भीगे भैंसे उदर सरिस भौंरे लसत विज्जु चहुँ और मना पीताम्बर धारे । लसत कड़ाकुलपति शत माना निजकर धरि लांघन चहत प्रकाश एकही पद फिरि जनु हरि । श्याम बरन धरि शपसी कुटिन कड़ाकुलपति। बिजरीपट प्रोढ़े लसै घन केशय की भांति । टपकत गले रूप अनुदारा । ' घन सन गिरत नीर की धारा॥ चमकत बिन्नु कप? दरसाहों। धन अंधेर महँ पुनि विपि जाही। से कारे। । - ७ । मृच्छकटिकभाषा गिरें धनि के ऊपर कैसे। गगनवस्त्र की झालर जैसे ॥ अलि चलत चक चकई मनहुँ कहुँ हस जनु उडि जात हैं हुँ लसत मछरी मगर जनु कहुँ महल उठे नखात हैं। नि जात रूप अनेक धन के जखहु चाल बतास की। जखि परें खींचे चित्र मानदु छत्त माहि प्रकास की। घ से मौतम से घिरि के धृतराष्ट्र के राज से साहै प्रकामा । कूकत है एक अोर शिखी दुरयोधन से फरि गर्घ प्रकासा। जूए में हारि युधिष्ठिर के सम कोकिल वैठी है मौन उदासा । पाडय से बन छाडि केहस कहूँ छिपि के अब लीन निधासा॥ (सोचकर ) मैनेय को बसतसेना के पास गये घड़ी देर हुई, अभी तक नहीं पाये, क्या करते हैं। (मैत्रेय प्राता है) मैत्रे-पातुर भी कैसी लालची पोर नसीती होती है । देखा, पसतसेना बोलो न चाली, पूछा न गा और माला ले ली। इतना तो धन मिला पर उसके मुंह से यह भी न मिकता कि मैनेय जी बैठो, पानी तो पोजो तप जाना । मेरी बलै तो मैं मुंह- जली का मुंह न दे।। (दुख से ) जोग ठीक कहते हैं कि कमल कहा जिसमें मॅसीड नहीं, पनियों कहाँ जो धोखा न दे, सेवार कहां जो चार न हो, गधारों की भेंट कहाँ जिसमे जड़ाई दङ्गा न हो और पतुरिया ऐसी कहा जो लालची न हो । तो अब चार दचजी हो इस पतुरिया मे छुडाने का उपाय करूं । (चल फर और देखकर) गाग्दत्त जी तो बाग में यह बैठे हैं (भागे बढ़ फर) पदती हो। चार-भरे मैत्रेय जी मा गये! प्रानो यहाँ धेठो। मैत्र-बैठे। चार-कहो माई काम सिद्ध कर पाये? * यन का अर्थ सत में जब भी है। ।
-- ८ किसी के खाने में माया पड़ कर पाप मे विनती करते हैं कि पतुरियों की सगति धुरी होती जूते के भीतर को ककडी होती है, घुसने को तो धुस जाती चार-भाई तुम किसी की घुराई क्यों करते हो ? हमार' मृच्छकटिकमाषा मैने-सव चोपट हो गया? चार यया यसतसेना ने हार नहीं लिया? मैत्रे-अजी हम लोगों के भाग ऐसे कहाँ ? उसने तो ऐसे हार्यों से उसे उठा लिया। चार-तो फिर क्यों कहते हो किचौपट हो गया? मैत्रे-चौपट न दुना तो और क्या, न पीने में, चार लेगया और उसके बदले ऐसे बने माल के रही की माला हाथ से जाती रही। चारु-भाई, ऐसी बात न कहो। निज भूपन सौंपे इमहि कारि हमार विश्वास । यह दे ताके मेल को गुरुता कीन्ह प्रकास । मैने-माई एक पात और हुई जिससे और भी जी जल गया कि यह सखी की ओर देखकर बाचल से मुंद वियो फर हम पर हंसी थी । देखिए हम पाम्हन हैं तो भी आपके पार है । इसमे श्राप इस पातुर से अलग हो जाइये । पतुरिया पर निकलती है बड़े दुख से। और मापने सुना होगा कि जा पतुरिया, हाधी, कायध, मिखमगे, धूर्त और गधे रहते हैं पह धुरे लोग भी नहीं जाते। तो दशा ऐसी हो रही है कि नगे तो न हो देखो- घोड़े चाहत है भले पवन से वदिजायें । बलही के अनुसार पेवेगि उठत है पायें । स्वभाष सन चपल है चाहत है सब बात। १९ मानि जब जात तो प्रापहि मरिसमजात ॥ को यह काम जेहि के धन तेहि से मिले । तो । । ३ 11 मृच्छकटिकमाषा 'पही आप) न बसतसेना ऐसी नहीं-जाके गुन तेहि से मिले काश ) हमरे पास न दाम से छूटी है पापही ॥ मैत्रे (नीचे देखकर प्रापही प्राप) यह तो ऊपर देखकर सले रहे हैं, मेरे कहने से तो और भी उसके लिए घबरा ठीक कहा है कि काम बाम होता है। (प्रकाश) प्रजी तिसेना ने कहा था कि सांझ को प्राऊँगी । हो न हो कुछ और चाहती है, हार का दाम कम होगा। चार-प्राने दो, सुखी होकर जायगी । (घर के बाहर फुभिलक प्राता है) मि-परे। 'जैसे केसे घर तोय। पीठिवाम त्यो गलगल होय । जैसे जैसे चले वयार. त्यो त्यों को दिया इमार ॥ हँसकर ) भन भन भन भन बजत बजाओं सात तार की धोना । सात छेद की बसी को मोसो को परवीना ? सीपों सोपों गदहा ऐसा गांवों राग मलारा। मेरे पागे तुम्घरु कैसा नारद कौन घेवारा॥ भाज बाई जो चारुदत्त के घर पा रही हैं से मुझे उन्हें चेताने को पहले ही से भेजा है। (कुछ चल कर देख कर) चायदत जी यह घाग में बैठे हैं और यह घरुमा भी है तो चलूँ । अरे, पाग कियाइ यन्द हैं तो इस पाम्हन को चौका हूँ। एक ककड़ी फेंकता है)। मैत्र-अरे यह फोन ककड़ी मारता है? चार-पाग की मीत पर से कबूतरों ने गिरा दी होगी। मैत्रे-रद रे कबूतर रहु, इसी लकड़ी से हम तुझे पक्के श्राम की नाई मोरे डालते हैं (बाठी उठाता है) चार-(जनेऊ पकड़ कर) बैठो, येवारे को क्यों है, कबूतरी के साथ खेल रहा है।
करता है? खोल हूँ। (किवाड़ सोल कर) अरे कुमिलक! प्रायो, प्रायो मृच्छकटिकभापा कुभि-अरे, मुझे नहीं देखता, कबूतर को देख रहा। दूसरी कुकड़ी फेंकू (फिर फेंकता है) मैत्र-(कुमिलक को देखकर ) अरे, कुभिलक है, तो किया कभि-मैत्रेय जी पालागें। मैत्रे-प्ररे प्राज क्या है जो ऐसे दिन में पाये ? कुभि-ग्रजी यही पही। मैत्रे-भरे कौन कौन? भि-यही पहो। मेवे अब क्या जाड़े में वुड्ढे कगाल की नाई जाँ कुमि-और तुम क्या श्राद्ध में कौषों की नाई कॉप का करते हो। कुभि-(प्रायही प्राप) अच्छा तो ऐसे कहूँ। (प्रकाश एक प्रश्न देंगे तुम्हैं। मैत्रे-हम तेरे सिर पर एक लात देंगे। कुभि-अच्छा तो बतायो पाम कब बोरते हैं ? मेने-गरमी में तो। कुभि-(हस कर) नहीं नहीं। मैत्रे-(प्रापही प्राप) तो या कहें १ (प्रकाश) चाल जी से पूछ ले (चारुदत्त के पास जाकर ) यो भाई मा कब घोरते हैं? चार-बड़े मूर्स हो, "में नहीं जानते। मैत्रे-(कुभिलक के पास जाकर) अवे बसत । कुंभि-अच्छा अब दूसरी यात बताभोबड़े बड़े नगरी कौन करता है? . मैत्रे-कहत। भ घसत - मैन-प्रवे रच्या मृच्छकटिकभाषा ७१ फुमि-(हँस कर ) अजी नहीं। मैत्रे-हम कुछ भूल रहे हैं (सेच फर) चारुदत्त जी से द लें (चारुदत्त के पास जाकर ) क्यों भाई बड़े बड़े नगरों की श कौन करता है? चार-सेना। मैत्रे-(कुभिलक के पास जाकर ) अबे सेना । कुमि-अच्छा दोनो को इकट्ठा करके फुरती से कहो तो। मैत्रे-सेनायसत। कुभि-उलट के कहो। -(बदन से उलटा होकर ) सेनायसत । कुभि-प्रये गधे पद उलट के कह । मैने-(पैर उलट कर) सेनाबसन । कुभि-बड़ा गधा है। अरे अत्तर उलटा । मैने-(सोच कर) बसतसेना । कु-यहो, घाही, माती हैं। मैत्रे-तो जाके चारदत्त जो से कहूँ। (वारदत्त के पास र) अजी चारुदत्त जो आप का धनी धायगा । चारु-हमारे घर में कौन धनी है ? -घर में नहीं है तो माने चाहता है। बसतसेना मैत्र- चारु-क्या जो धापा तो नहीं देते ? मैत्रे-हमारी बात की परतीत न हो तो कुभिलक से पूछ प्रये कुभिजक चल तो। कुभि-(भागे बढ़ कर ) प्रणाम । चार-पाम्रो जो, कहो घसतमेना ना रही हैं ? कुभि-जी हो पहुँचती ही है। चार-(इप से भाई) में प्रच्छी खबर देना कमी प्रकारय हुमा, तो जो यह इनाम (दुपट्टा उतार कर देता है) (बाहर जाता और, मूसल धार गिर जल दादुर ताहि पिये मुख की लगाई। दोप समान कदव लसे कहुँ कृकत मार लस"सुस पाई बैठत है एक ठाघ नहीं विजुरी कुलटा युषतीन को नाई मृच्छकटिकमाषा कुमि-(दुपट्टा लेकर हर्ष से) मैं जाके घाई जोसे मैत्रे-क्यो भाई, कुछ जानते हो क्यों पा रही है ? चारु-हम तो कुछ नहीं समझते। मैत्रे-हम जानते हैं माला का दाम थोड़ा है, गहने थे इस से कुछ और मांगने पाती है। चार-(प्रापही पाप ) उस का सतोप कर देंगे, (प्रकाश प्रच्छा, जाम्रो पागे बढ़ के बसतसेना को ले प्रायो। (मैत्रेय बाहर प्राता (घाग के बाहर चेरियो और पिट के साथ सतसेना पाती है विट-(घसतसेना को दिखा कर) कमल नहीं है लीन्हें श्रिय से न घट तऊ, चमकदमघारी काम को कटारी है। कुसुम कलासी है मनोजतरु डार केरी, लाज न तजे है जापै पातुर की बारी है । डी लीला करि चलती न पुरकुजबधू काऊ, याको छवि देखि जो सुहाग नाहिं हारी है। रंगभूमि चले के संकेतगेह जात जब, लेत प्रियजन नित सग सुकुमारी है ।। घसतसेना देखो देखो, विरहिन के मन से मलिन लसैं सिखर चहुँ श्रोर । उनये लखी पहार पै गर्जत हैं धन घार । नाचि उठे एक सगही मोर पूंछ फेजाय । मनिमय पखे ताड़ के रहे मनौ नभ छाय॥ खोटे मनुष्यन के सम योगिह परत न चदहि भाई । घस- -मापने बहुत ठीक कहा गरजत 4 मृच्छकटिकमापा तेरो कौन प्रकाज कहा चहुँदिशि घन घेरे । मेरो प्रानपियार रमै सॅग में जो मेरे ॥ जो तू बिगडी सौत सरिस मोहि गरजि डराधति । पद पद पापिन रैन राह मेरी तू प्रायति ॥ घिट-अच्छश तो हम इसे भिडकते हैं। घसत-अजी यह बिचारी स्त्री है, भलमसी नहीं जानती रको चुरा न कहना चाहिये । बिट-देखिये, देखिये, धावा करत पधन सम प्रापत । मूसरधार नीर घरसायत॥ डका मनहु बजाधत। विजरी की साइ ध्वजा उडापत ।। हरत मेघ जनु कर हिमकर के। प्रयल भूप परि पुर जिमि पर के॥ यसत-जी हा ठीक है, नी से पेट भरे गज की सी घटा धन की यह प्राधत है। बेग्जु लर्स पगुती मिलसें कहुँ शूल हिये से उठायत है। पर मचाय के दादुर मूद जरे पर लोन लगायत है। तिम से बिछुडी जो तिन्हें बध को जनु ढोल यजावत है ।। बिट-जी, इधर भी देखिए, यगुलन की कलगी घरे बिजुरी चॅवर हिलाय । 'होड़ मत्त गज की करत प्राज प्रकाश लसाय ॥ बसत-देखिए, भीगे तमाल के पातन से धन छाये लखौ रवि तेज निधारी। दीमक के घुस वैठत है शरधार परे गज की छवि धारी। कचन दीपक सी विजरी जनु घूमत है पुर ऊँची अटारी। मेघन देखो जुन्हाई हरी जिमि नीवर की जयरै मिलि नारी विट-पसतसेना २ इधर, धारत। दे सरोज सो निश्चल लेोचन, राति श्री द्यास को मेद मिटाये। विजु लसे भलके सेो दिसामुरा, चादर से माइ मानों छिपाये। कैले प्रकाश के मटिर में बहु, नीरद छन समान लगाये ७४ मृच्छकटिकमापा विजुरीडोर कसे तन गज सम एक एकदिलजकारत। इन्द्रवचन सन घन बरजोरी। खैचत धरनि रूप की डोरी ॥ और, भेंसन के रंग नील भरे सेाइ प्रवल बतासा। बिजुरीपस लगाय सिधु सम हिलत अकासा ॥ गध भरी अरु हरी घास की कुरवारी। छेदत है साइ धरनि मेघ मनिमय शर मारी ॥ घसत-और इधर, पाउ भाउ कहि बारयार तेहि मोर बुलावें । उडि के बगुली पाति ताहि निज अंग लगावें ॥ कमल डॉडि अकुलाय लखै तेहि दुसित। मराजा। करत नीज प्राकाश उठत हैं धन यहि काला ॥ विट-ठीक है, और - - । r मेघ फुहारनगेह में रेख, सावन है जगकाज बिहाये । सत-ऐसाही है, देखिए पाजिन सग उपकार मरिस पिनसे अब तारा । दिशि मजीन कुतियासरिस बिछुरत जप प्यारा !! तपत टेवपतिशस्त्र पत्र की ज्वाल कराना टपकत है आकाश मनहुँ गलि गलि यहि काला प्रार, बरसे गर0 मुकि उ मेघ करें अंधियार नये धनी के सरिस यह लीला करें अपार ।। निट-दो, दा, ग्विलात सम वगै चलत जयहीं बकपाती। चिनुचहुँ प्रोर जरति सी देव लखाती ॥ .
मृच्छकटिकभापा
लरत जगै कर धनुष जिये शरघार गिराषत ।
प्रकट बज्र के शन्द होत जनु शोर मचायत ॥
चलत पौन चूमत लगत सांप सरिस वादर विषम ।
न परत मनहु अकुलात यह लगत धूप के धूम सम ॥
वसत-पिय के घर में जाति हौ मेघन प्रावति लाज ।
छुवत धारकर मन गरजि डरपावत वेकाज ।।
इन्द्र! कबहुँ रही है प्रीति मजा मेरी प्रौ तेरी।
जो तू गरजत सिंह मरिस मोहि यहि छन हेरी ।।
पिया मिलन में जाति मोहि यहि विधि तू टाकत ।
जलधारा परसाप राह मेरी तू रोकत ।
र, सकुचे वोजत झूठ नहि तुम गैातमतिय काज ।
मो मन तेहि समुझि पब मेघ हटापटु पाज ।
रहे इन्द्र विजुरी कोटि गिराउ कै गरजो बरसौ मेह ।
रोकि सकेको तियनको चलत पिया के गेह ।।
वरसै घन तो परसि ले पुरुष होत वेपोर ।
अवलादुख समुझत न क्यों तुह निजुरी वीर ?
विद-आप इसे क्या बुरा कह रही है ? इसने अाप के साथ
कार किया है।
गिरि की चोटी लसत मनहुँ यह सेत ध्वजा सी ।
सुरपतिमदिर बीच फेरि जनु विमल दिया सी॥
पेरावतार हिलत
हेमडारी सी
लाइ देखावत लखो तुमहि प्रियतम को गेहा ॥
पसत क्यों जी! क्या उनका घर यही है ?
रिट-जी हा यही है, और प्राप तो मघ कता जानती हैं,
पको फोन मिखा सकता है, पर स्नेह नहीं मानता, यहाँ जाफर
तमान न कीजिएगा।
रतिरस होत न किये मान प्रति ।
बिना मान लागे फीकी गति ॥
लौट जाय। मृच्छकटिकमापा करिय मान ग्रह मान कराइय । मानिय अरु निज पियहि मनाइय ॥ अच्छा तो अब पुका। अजी कोई है ! चारुदत्त जी मे कह फूल्ने कदव की गंध समेत बयार बहै उनये धन कारे ऐसे में भाई है प्रीतम के घर भोजत मैन के मानों सहारे गर्जत मेघ चकोसो लखै तोहि देखन चाह हिये मह धारे पाय प्रौ पायल कोच भरे तिन्हें धौषत ठाढी दुधार तुम्हारे चारु-(सुनकर ) मैत्रेय जी! देखो तो कौन है ? मैत्रे-( वसतसेना के पास जाकर ) जय हो प्रापकी। बसत-पालागें । (विट से ) यह छतरीवाली श्राप के साथ पिट-(प्रापदी श्राप ) इमी चाल से हमें लौटाती है। (प्रकाश) बहुत अच्छा बाई जी। मान गर्व छल कपट मूठ माया चतुराई । अहें उपजै रति रहैं जहां प्रियजन सुखदाई ॥ नेह उदार स्वभाव सरिच सौदा सुखरा । वेश्यापन के हाट अाज कीजिय बहुतेरा॥ (विट वाहर जाता घसत-मैत्रेय जो तुम्हारे जुमारी कहा है ? मैने-(प्रापही पाप) अरे जुमारी को तो अच्छी पदवी मिन- (प्रकाश) जी सूखे पेड़ो के बाग में है? घसत--आपका सृसे पेड़ो का बाग कहाँ है? मैत्र-जहां न कोई खाय न पिये। (घसन्त सेना मुसकाती है) है मो-तो चलिए, भीतर बलिए । घसन्त-(अलग चेरी से) यहाँ जाके क्या करें ? चेरी-शुभारी! फहिये साम फैसो धीत रही है? पनेगा म से?
७६ म समान। मृच्छकटिकभाषा घसन्त-(प्रापही प्राप) इसी मे तुम पर मरती हूँ। चाव-(अलग)हाँ, जाको धन नसि जाय, ताको मारियो हो भलो। यस नित पछिताय, रोझत सोजत व्यर्थ से । और, ज्या दिनपख विहग, सर जल यिनु, तर पात बिन । ज्यों बिन दाँत भुजङ्ग, तेसहि होत दरिद्र नर । और, रिना पात को कम ज्या जेसे कूप फरान । भये दरिद्र पुरुष लगे सूने गेह होत प्रसन्न दरिद्र नर सके देश का नाहिं । पहिले के हितु वधु सघ तेहि नित ग्रिसरत जाहि ॥ मैने-जी क्यों इतना सोच करते हो। (प्रकाश हँसकर) जो पाई जी मेरो धोती ता दीजिये , ये गहने उसी में पॅधे थे । घसत-चारदच जी, श्राप को यह न चाहिये था कि हार ।न कर हम लोगों का मन परखते । चारु-(मुमकरा कर ) बसतसेना गई, (को करिदे परतीत, यादि फिर पढ़ता है) मैने-भरी! क्या बाई जी भाज यही साधेंगी? चेरी-(हँसकर) मैनेय जो, बड़े भोले घने जा रहे हो। मैके-हम यहाँ सुख से वेठे हैं, हमें यहां से भगाने को मेघ सा पा रहा है। चार-ठीक पहते हो। कमजसवि कीचहि ज्यों फोरत । त्यों जलधार नीरधर तोरत ॥ चन्द्रविपति लखि नभ दुख पावत! तासु प्रासु सम महि पर प्राषत ।। और निर्मल सजनवित्त लगत कठिन ज्यों 'अर्जुनवाना ।। ग्ग धन धार गिराषत । र समाना। घरसाषत॥ ।
७८ - . चेरी-तो जब तक वहददा जाय तय तक यह गहने लीलिये। मृच्छकटिकमापा मैत्रे-(अलग चारुदत्त से ) हमने तुमसे पहिले ही का था कि हार घोड़े दाम का था, गहने मंहगे थे, इस से और छ मांगने पाई है। चेरो-चाईजी उसे अपना समझ के जुए में हार गई और जिस हाथ हारीं वह सभिक था, राजकाज मे न जाने कहाँ चला गया मैत्रे-जी यह तो मैं पहले ही कह चुका था। (गहने दिग्पाती हैं, मैत्रेय बड़े व्यान से देखता है ) चेरी-मैत्रेय जी! आप इन्हें बड़े ध्यान से देख रहे हैं का आपने इन्हें कभी देखा है। मैने-हम इन की कारीगरी को देख रहे हैं। चेरो-अजी, तुम्हारी आँख धोखा खा रही है यह घट पहने हैं। मैत्रे-हर्ष से) भाई, यही गहने हैं जो चोर ले गया था चारु-भाई, मिस तेही अवसर कीन्ह यह याती फेरन हेत सेई खुनो यह झूठ रवि के यह धेखा देत ? मैत्रे-नहीं सत्र है, हम सौह से कहते हैं । चार-बहुत अच्छा हुआ। मैत्रे-(अलग चारुदत्त से ) पूछे फैसे मिला ? चार-हो हो। मैत्रे-(चेरी के कान में कहता है) चेरी-(मैनेय के कान में कहती है) चार-ऐसे क्यों कहते हो क्या हम लोग बाहरी हैं । मैत्रे-(चारुदत्त के कान में कहता है) चारु-क्यों रो, घही गहने हैं ? चेरी-जी हो। चार-हमारे प्रागे अच्छी बात कहनेपाला कभी खानी गया। यह अंगूठी लो (हाथ में अंगूठो नदेसर जाता है) ३ मृच्छकटिकभाषा हो रद-यह चौधरी का लडका रोहसेन है। पसन्त-(दोनों हाथ फैलाकर ) श्रानो वेटा? यहाँ प्राश्री गोद में बैठा लेती है ) अपने माप ही को पड़े हैं। रद-स्वभाष भी उन्हीं का सा है । चारुदत्त जी इन्हीं से अपना जी बहलाते हैं। घसत-क्यों रोते है? रद-यह पड़ोस क एक भलेमानुस के लडके की सोने की गाड़ी से खेलते थे। यह अपनी ले गया, यह फिर मांगने लगे, मैने इन्ह मिट्टी की गाड़ी बनादी, अब यह कहते हैं कि हम मिट्टी की गाड़ी न लेंगे हमें घही गाडी ला दो। घसत-हा। इसे भी कगालपना गल रहा है । भगवान तुम हम लोगो के भाग पुरइन के पत्ते पर पानी की नाई क्यों नवा रहे हो (आँसू भर कर ) वेटा ! राम्रो न, माने को गाडीमा -~- तव जायगी। लडका-रदनिका : यह कौन है ? यसत-तुम्हारे वाप की लौंडी। रद-भेया, यह भी तुम्हारी मा ई लडका-त मूठी है। हमारी मा होती तो इतने गहने कहा पाती? पसन्त-(गहने उतार कर रोती हुई ) बेटा, अव मै तुम्हारी मा हो गई। इन्हें ले जानो सोने की गाडी बनघालो । बहका-जाप्रो हम तुम्हारे गहने नहीं लेते। घसन्त-(धांसू पोंछ कर)न रोऊँगी , जागो सेतो (गाड़ी में गहने मर कर ) जाम्रो बेटा माने की गाडी यनया लेना। (लड़के के साथ रदनिका बाहर जाती है) (घर के बाहर एक पहली लिये यद्धमानक प्राता है) पद्ध-दनिका रदनिका!घसन्तमैना जी से कह दो कि खिड़की के प्रागे पहली खड़ी है। (फिर र ] - U दी है, मैं कैसे ले सकती हूँ मेरे तो सब गहने के गहने घही हैं। ८२ मृच्छकटिकभाषा पसन्त-परी, चारुदत्त जी के घर मेरा रहना किसी ई खला तो नहीं? चेरी-जी सलेगा। बसन्त-परीकर? चेरी-जब धाप चली जायगी। घसन्त-तब तो पहिले मुझो को सलैगा । परी, माला ले और मेरी बहिन धूता जी के पास ले जा के कई । में चारुदत्त जी की लौडी है वैसी ही प्रापको । यह माला आप के गले में सोहै। चेरी-चारुदत्त जी जो उन पर रिस करें? घसन्त-जा, न रिस करेंगे। चेरी-(हार लेकर), बहुत अच्छा। चेरी-घाई जी ! धूता जी कहती हैं कि प्रार्यपुत्र ने प्राप के -- (बाहर जाकर फिर पाती है। मुझे और कुछ न चाहिये। (हाथ से मिट्टी की गाड़ी खींचता हुमा एक लड़का और उसके पीछे रदनिका यातीहै) रद-प्रायो, तुम्हारी गादी हम खींचै । लड़का-इम मिट्टी की गाड़ी न लेंगे, हमे यही सोने के गाड़ी दो। रद-(सांस लेकर ) भैया | हम लोगों के घर में प्रब साग कहा ? जब फिर चौधरी साहब को पता होगी तब फिर से को गाडी खेलना। चलो तुम्हें उस तसेना के पास ले चलें। (भागे बढ़ कर बसन्तसेना के हाथ जोड़ती है) वसन्त-प्रायो जी रदनिका । यह फिसका लडका कुछ नहीं पहने है तो भी इसका चाँद सा मुंह कैसा प्रह है!
मृच्छकटिकभापा अरे तुम पूरय फाटक पर रहो, तुम पछिम के, तुम दक्सिन के, तुम उत्तर के, इस जगह कोट पर चढ़ के चदनक और हम देखेंगे ! प्राणो जी चदनक, इधर ग्रामो! (घबराया हुभा चदनक प्राता है) चन्द-परे प्रो चीरक ! विशल्य, भाग, अगद, दडकाल, दडशूर । राजमक मानो सबै करौ वेगि मे काज। जेहि सन जायन और पै महाराज को राज ॥ और, वाग भीर मै राह में हेरो बीच बजार । जहँ जह शफा होय तह हेरा लाय न पार ॥ कादिखरावत घोर तुम, कहासोलि किन बात। तोरि जजीर अहोर को दो लै भागे जात ? पव' मगल गुरु छठे काके चौथे चन्द ? सूरज केहि के पाठ मरन वह मतिमन्द ? नघं सनीचर गुर भए छटे कौन से प्राज? हरत अहीर जियत मेरे ज्यों पछी ो धान । वीर- -चदनक जी। तेरे सिर की सोह कोउ ताहि बनाये जात । सो अहीर भागा मिसरि आजहि हात प्रभात । पद्ध-चल रे वेल चल ! चद-(देग्न कर) अरे देखो, देवो यहजो ढकी भोहार मे धावत परे लग्नाय । देवो है यह कौन को चढ़ा कौन कहे जाय । बीर-अरे प्रो वे यहलीपाल! रोक पहली। पहली किस की है ? कौन सा है? कहाँ जायगी ? पई-सरकार । चारुदत्त जो की बहली है, वसन्तसेना जी सपार हैं , पुष्पकरड याग जा रही हैं। घदनक-तो जाने दो। पौर-विना देसे? चद्-हा दो।
प्रार्य-(सुनकर ) यह तो ग्डी की पहली है और चादर बर्द्ध-पैर उठाने से घुघुरू यजना बन्द हो गया, यहली भारी धीरक-प्ररे, प्रो जय जयमान, चदनक, मगल, पुष्पमा ८६ मृच्छकटिकभापा लिखी विधाता माथ जो तेहि को सकै विगारि । चलिकै नृपहि मनाइये योग न हि सन रारि । तो अब में प्रभागा कहाँ जाऊँ? किसी भलेमानुस को खिड़की पुली है। होघर बेड़ो बिना फाटे खुले किवार। यह गृहस्थ हैं है कोई दवा विपति के भार । यहीं धुस के राड़ा हो जाऊँ। (परदे के पीछे बहली पाने का शब्द होता है) आर्यफ-(सुन कर ) अरे, यह किसी को बहली पा रही है। जो बाहर कोड जात होय नहिं चढ़े दुए नर । वधू लेन के काज भई ठाढ़ी यहि अवसर।। भले लोग हैं जात सैरको बाहर कोई । पठई मेरे काज देव, सूनी यह होई ।। (चहली लिए वर्द्धमानक पाता है ) बई-मैं गद्दी ले प्राया , दनिका बाई जी से कह दो कि वहली खड़ी है, पाप पुष्पकरड घाग चलें । जायगी, इसी पर चढ़ लूँ। बद्ध-परे घुघुरूजना तो या जोमा गई । धाई जी बैल मरकहा है, पीछे से चदिए । ( आर्यक पीछे से बंद जाता है) हो गई, थाई लो चढ़ चुझी, तो अप चलूँ । चल रे चल (वीरक प्राता है) - (धीरे से जाता है। (रय चलाता है। का सुचिन धेटे करो भागो जात अहीर । फारी छाती भूप की तोरी कड़ी जंजीर।
मृच्छकटिकभाषा वीर-मुनिये, सुनिये, तामा भाई ढोल है माय नगारा याप । ऐनी अच्छी जाति के हैं मेनापति प्राप । चन्द-(कोच से) अच्छा हम चमार हैं देखो भाई । चोर-प्रो पहलीवाले, फेर बदली। (घद्ध मानक वहली फेरता है) वीरक पहली पर चढ़ना चाहता है, च दनक उसका पट्टा पकड कर गिरा देता है और जात मारता है) पोर-(क्रोध से उठकर) अच्छा, तुम ने राजकाज करते ये पहा पकह कर गांचा प्रौर लात मारी । रह तुझे हम चिहरी में चौरङ्ग न करा तो नीरक नहीं । चन्द-प्रवे? कचहरी जा चाहै दरबार जा, तू कुत्ता क्या कर सकता है? (थाहर जाता है) चन्द-(चारो ओर देव कर) जावे पहलीपाले जा। जो कोई पूछे तो कह देना कि च दनक और घोरक ने देख लिया है । घसत- सेना याई । यह विह भी लेती जानो ( तलवार देता है) आर्य-(तलवार लेकर हर्प से) जग्यो हाय हथियार, फरकति है दाहिनी भुजा । विधि अनुज हमार, अब हम बचे सदेह विन ॥ चद-बाई जी, चन को जनि भूलियो विनय करौ कर जोरि । कहौं नहीं कछु नाम से प्रीति हिये महं तारि ॥ आर्य-पनि गये हित सयोग धम चदन चन्द समान । सुधि करि हैं। सच कीन्ह जो सिद्ध यवन भगवान ।। -प्रमय करें त्रिपुरारि , ब्रह्मा रवि हरि चद तोहि। राजिय निज रिपु मारि, शुम निशमहि देवि जिमि ॥ (प मानक पहली लेकर बाहर जाता है) बोर-अच्छा। - ।
6 - मृच्छकटिकभाषा चौर-अच्छा तो हम भी देख लें , राजा को श्राझा है और राजा ने हमारे भरोसे छोडा है। चन्द-तुम्हारा भरासा है, हमारा भरोसा नहीं? धीर-भरोसा सब कुछ है पर राजा , याज्ञा भी तो है। चन्द-(पापही प्राप) अहीर का लडका वास्त जी को वहली पर चढ़ कर भागा जाता है । यह जो कही कदेगा तो चारुदत्त जी को दण्ड होगा, तो प्रब क्या उपाय है। (सेचिर) तो अब कनोटका को सी लडाई करें । (प्रकाश) क्यों बोरक, चन्दनक तो दख चुका अब तुम कोन है। देसने पाले धीर-तुम कौन है? बन्द -तुम अपनी ऊँची जात भूल गये? बीर-(क्रोध से) क्या है इमारी जात ? चन्द-कौन है? धीर-नहीं, नहीं कह डालो। चन्दन करेंगे। जानौं काहिह। नाहि, तेरी जात साव बस ! रहे मेरे मन माहि कैथा तो क्या मिले। बोर-कहो कहा। चन्द-(शारे से बतलाता है) वीर-मुंह से कहो। चन्द-- धरे शिला वै हाय, बैठाये जो जोड़ नित । जीन्हें रोपी साथ, तुम हूँ सेनापति भये ।। वीर-तुम अपनी ऊँची जात भूल गए? चन्द अरे मेरी जात को क्या हुआ है ? बीर-कौन कहै? चन्द-कहो कहो। वीर-(इशारे से बतला है कि चन्दनक चमार है) चन्द-कहो, पुलके क्यों नहीं कहते?
मृच्छकटिकभाषा चारु-मेरी सुधि रासियो आर्य- भूल निजहु कोउ जात? चार-चलत बचाईं सुर तुम्हे, प्रार्य- तुम मोहि लोन बचाय। चारु-अपनी मागन से बचे तुमही रहे सहाय ॥ चार-तो जब तक राजा बहुत मे सिपाहो न दोहार्वे श्राप कल जाइए। - आर्य-बहुत अच्छा , ईश्वर वाहेगा तो फिर मिलेंगे। (घहली पर बाहर जाता है) , चारु-पठे कोन अपराधमै वागी निज रय माहि । उदिन हमै ठहरन इहाँ अब एकछिन नाहि ॥ बेगि पुराने कूप में पेडी देहु बहाय। भेदिन सो चहुँोर की खबरि लेत नित राय ॥ मा श्राप का फड़कना जना कर) मैय। वसन्तसेना के मिलने जो बहुत घबड़ा रहा है। प्रानप्रिया देखे बिना यहि छन दिया सकात । པགསོལ फरकति घाई भासिह प्रसगुन युरो लखात . चलो चले (चज कर ) अरे । सामने ही सन्यासी का प्रस- देख पडा । ( सोच कर) अच्छा, यह इधर से आता है, हम र से चलें। (दोनों बाहर जाते हैं) (स्थान- श्राठवाँ अंक -पुष्पकर याग में दूसरी जगह) (हाथ में भीगा कपड़ा लिए एक पौद्धसन्यासो पाता है) गाता है) मूद धर्म सचय मई लागो बौद्धसन्यासी - २४ बद्ध-बहुत अच्छा । (घडी उतार कर जो, बड़ा प्राय--वरुदत्त जी मैं प्रापकी मनमसी सुन कर बहनी पर चारु-जी उतरिये न, श्राप की घडी अमीकटो है इससे से भागा न जायगा घर से बहुत लोग पाते जाते हैं माली मृच्छकटिकमापा जासु रूप अनुभाष परे लखि अदभुत ऐसे। वेडी तार एक पाय डारी किन कैसे ? माप कौन हैं? आर्य-मैं प्रार्यक ग्रहीर हूँ भापको शरण पाया हूँ। चार-जी वही जिन्हें राजा पालक ने धोसीपुरे से पकड के घाँध रक्खा था? प्रार्य-जी हो। चारु-प्राये सौंह संयोग बस तुम वदि मेरे यान । शरणागत तजिहौं नहीं जायं मेरे घर प्रान । (भार्यक हर्ष जनाता है) चारु-बर्द्धमानक! वेडो उतार तो। उतार दी। प्रार्य-आपने स्नेह की कडा घेडी पहना दी। मैत्रेय-यह तो छुटे । अब हम मागे । चारु-चुप। चढ़ा था। चार-पापने बडी कृपा की। भार्य -अब प्राज्ञा दीजिये तो जाऊँ। चारु-जाइये। मार्य-तो उतरता है। किसी को खटका न होगा बदली हो पर जाइये। - प्रार्य-जोशंप की इच्छा। चार-मिलिये सुख सो हितन सो, पार्य- तुम सम हित को साह मन से मिलती नहीं। भूलता। के लिए कुछ गाऊँ (गाता है) सुना आपने, जो मेने गाया। मृच्छकटिफमापा रंग रंग के फूल सजी सेहै यह धरती। फूल मार सों डार गिरीमी मानहुँ परती। तरुफुनगी सो बेल लसौ नीचे को खाटकें। कटहल के फल सरिस तरुन पेघनार मटके । विट-प्राइये इस पत्थर को चौकी पर बैठे। सस्था वैठिये । (विट के साथ बैठ जाता है) अजी, हम भाग भी घसतमेना को सोच रहे हैं। बुरे की वान ऐसी हमारे विट-(आपही प्राप) इतना झिड़का गया और अब भी नहीं पाय अनादर तियन से नीन-काम यदि जात । सजन मन नहि होय कै होय धोरही बात ॥ सस्या-मजी, हमने स्थायरक से कभी कहा था कि बहली 'ने कर प्रा, अभी तक नहीं आया TM बड़ी भूत्र लगी है, दुपहर हो गई, पेदल भी नहीं चला जायगा, देखिये, देखिये, विगड़े धानर सरिस रघि नभ मै जसो न जाय । जरी जानि महि सुत मरे ज्यों दुरयोधनमाय ॥ मुग्न से गिरायत घास बैठे छह पसु प्रौघान है । धनहरिन प्यासे नीर तातो पियत नहीं प्रधात है ।। पुरराह में काऊ चलत नहिं भा धूप अब ऐमी कड़ी। मजिजरत घरतीोह में कहुँ है अचमिबहली खडी । संस्था-सूरज की किग्नें पड़ी, मेरे सिर यह प्राय । पछी चिड़ियां पेड़ की डारन रही लुकाय ॥ घुस वैरे घर माहिं सघ देग्वि कठिन यह घाम । व्याकुल हाफत हैं माल कोड विधि रितवत याम ॥ भजी, अभी तक लौंडा नहीं पाया अच्छा तो जो बहलाने 1 विट-ठीक है। विट-क्या कहना है, पाप गधर्ष हैं ! - मृच्छकटिकमाषा सस्था-पुखरी का कीचड़ फेंक दे, पानी मेला न होने पाये। बिट-किस से? सस्था-अपने मन मे। विट-अच्छा पड़ा है। सस्था-बेटे मन । राजा मन ! यह सन्यासी जाय कि ठहरे। (पापही ग्राप) न ठहरै नास 11 प्रकाश) आजी हमरे अपने मन से पूछ लिया, हमारा मन यह कहता है- विट-क्या कहता है? सस्थान जाइ न ठहरैन ऊपर की सांस ले न नीचे का यहीं पड़के मरे। सन्या-जय बुद्ध जी की | तुम्हारी सरन । बिट-जाने दीजिये। सस्था-~अच्छा एक काम करके। बिट-कौन काम? ... - - पानी चटोर के कीचड़ फेंकदे । विट-ऐसे भी मुर्ख ससार में होते हैं। उलट ही सममें सदा पाथरखडप्रकार। मूरुख तरु से मांस के बदषत धरतीभार । सन्या-(हाथ से शाप देता है) सस्था-क्या कहता है ? विट-आपके गुन पखानता है। सस्था-सुन वे सुन पिट- देखिये बाग की शोभा देखिये, मई तरपर धाग में धरि फलफूल अधोर। लपटानी गाढ़ी लता जिनके बारहुँ ओर । जागत आपति से बचे अन् नृप के राज । मुग मागत नारिनसहित मान पौर समाज ॥ संस्था-याप ठीक कहते हैं, (सन्यासी बाहर जाता है मृच्छकटिकमापा । स्या-सरकार वेज मर जायेंगे, यहजी टूट जायगी, में भी मर सस्या-प्रवे, हम राजा के साले हैं, येल मरेंगे औरतलेंगे। हिजो टूटेगी और मनपालेंगे, तू मरेगा और रथयान रख लेंगे। स्था-सब हो जायगा में ही न रहूँगा। सस्था-वे सब नस जाय। जिधर दीवार गिरी है उधर ही . स्या- टूट री बहला, मेरो रे वैलो , गोस' भी तुम्हारा । और बहजो भाजायगी। प्रध्धा तो कर (घुम कर) अरे हो दृटो । सरकार यहलो आ गई। सस्या-अवे, न वेज टूटे न रस्सी मरो न तू मरा? स्था-नहीं सरकार। सस्था-माइए बहली सें, नहीं पाप ही देसै अाप बड़े गुरु आप का प्रादर है, आप प्रागे चनिये, प्राप पहिले सवार विट-बहुत अच्छा ( चढ़ना चाहता है)। सस्था-उहरो, ठहरो तुम्हारे पाप की बदली है जो आगे होंगे। बदली मारी है, हम पहले चड़ेंगे। पिट-आप ही ने तो कहा था। सस्था-जो हम कहै भो तो तुम्हें यह कहना चाहिये कि सर- २ श्राप सवार हो। विट-श्राप सघार हो। सस्या-~-अच्छा हम सघार होते हैं। धेटे स्थापरक! पहली यो। स्था-(घुमा फर) सरकार सवार हो जायें। सस्था-(पहली पर सवार होना चाहता है, देख हरता हुआ उतर कर घिट के गले लग - - " क्या बात है ? क्या चारदत्त जी ने पहली के बैलों की रपट बचाने की किसी और की पहली मेज दी है ? मेरी दाहिनी श्राख फडक सस्था-(रथ की घडघड़ाहट सुन कर) अजीबहनीमा सस्था--प्राप देखते नहीं घूढे सुअर को नाई घुरघुरा रहा है। १०० मृच्छकटिकमाया संस्था-गधर्ष न है तो फिर क्या है ? बव औ हींग समेत, मोथा जीरा सोंठ गुड़। सेयों तौ केहि हेत, होत सुरीले हम नहीं ॥ अजी लौडा अब भी नहीं पाया ? पिट-प्रबराइये न, प्राता होगा। (बहली लिये स्थावरक प्राता है) स्था-मै बहुत डरता हूँ, दुपहर हो गई, राजा के साले बहुत खफा होंगे। जल्दी चल ! जल्दी । बसत-हाय, हाय, यह तो बर्द्धमानक को चोली नहीं है । य रही है, कुछ अच्छा नहीं लगता। विट-मापने कैमै जाना? गई। - । -- पिट-(देख कर )जी हां वह प्राई। सस्था-घेटा स्थाघरक प्रागप स्था-जी हो। सस्था-घहली भी श्याई? स्था--जो हो। सस्था-वैल भी पाये? स्था-जो हो। सस्था-तुम भी पाये ? स्था-हाँ सरकार हम भी पाये । सस्या-अच्छा बहली भीतर ले प्रा। स्था-किधर से? सस्था-जिधर दीवार गिरी है। ।
बसत-(कान पर हाथ धर के)राम, राम, यह आप क्या - दरतायो बाम्हना के श्रागे पांव पांच चलेंगे। नहीं, नहीं पहली पर जायगे जिसमे नागपूर हो से देख कर कई कि राजा साले है, अछा तो या कहें (प्रकाश) अजी बसन्तसेना प्राप से मिलने विट-(आपही प्राप) इस विप को औषधि घड़ी कठिन मृन्झटिकभापा (प्रलग वसतपेना से ) बमतमेना । यह तुमने क्या किया? पहिले मान जनाय फिर लालच के माय पस? बसतना (सिर हिलाती है) पिट-मिली मापही पाय, यहो नीच पातुरपना ।। इमने तुमसे पहेलो हो कहा था। नीको लगे कि ना लगे मिलु गनि सहि समान ॥ वसत-बहनो के धारो मे यहाँ प्रा गई, प्राय की सरन हैं। विट-डरो नहीं हम देखो हमे घोसा देते हैं (सस्थानक के पास जाता है) प्रजी, इसमें सचमुच राक्षसी है। संस्था-राक्षसा है तो तुम्हें क्यों नहीं मूसा और चोर है तो -क्या कीजियेगा ज्ञान के ? यही में नगर तक बागही घिट-थोड़ा सा व्यायाम हो जायगा, बैलों की मेहनत वच सस्था-परश स्थायरक! पहनी लेजा । नहीं, नहीं हम तुम्दै क्यो नहों पा गया। विट- है पैदलही चले चले तो क्या बुरा। सस्था--तो क्या हागा ? जायगी। r जा रहे है। पाई है। कहते हैं। सस्था-(हर्प मे ) अजो हम से, ऐसे चली पुरुष वासुदेव मे? पिट-जी हां।
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मृच्छकटिकभाषा
या-भने न करेगा? (स्थापरक को पीटता है)।
-सरकार मारिये चाहै पोटिये, अकाज न करूंगा।
फर्मन को फल पाय भयों जन्म को दास
मैं
अब साह पाप चढाय मोल न हों गति धुरी॥
सन्त-विट, जी तुम्हारी सरन हूँ।
ट-अजीतमा कीजिये, पाह स्थावरक पाह!
यद्यपि दरिद दास यह अहई ।
पुण्य पाप यह मोचत रहई।
धनी फुजीन यही कर स्वामी ।
गनै न कछुक कुमारगगामी ॥
ऐसे कर्म धागि किन लागत ।
बदै प्रयोग योग जो त्यागत ।।
और
का यह विषम देव मन भाषा।
तुमहि स्वामि यदि दास बनाया ॥
यह न खात जो धान तुम्हारा ।
तुम पर करै न यह अधिकारा ।।
सस्था-(पापही प्राप) यह वुड्ढा तो प्रधरम से डरता है
जोडा परलोक से, हम ठहरे राजा के साले, हमे किस का
है ? (प्रमाण) ने लोडेजात कहीं अलग पाड़ में बैठ।
।
-- मृच्छकटिकभाषा पिट-पागल तो नहीं हो गये हो? सस्था-यह बुड्ढा तो प्रधरम को डरता है, अच्छा स्थावरक मे कहूँ । वेटे स्थापरक ! हम तुम्हें सोने के कड़े धनधा देंगे। स्था-मैं पहन लूँगा। सस्था-हम तुम्हें सोने को चौकी बनवा देंगे। स्था- -मै उस पर वेगा। सस्था-जो भोजन खाने से बचेगा सब तुझी को देंगे। स्था-में सब सा जाऊँगा। सस्था-सब चेलों का चौधरी कर देंगे। स्था-मै भी हो जाऊँगा। सस्था-अच्छा तो हमारी बात माना। स्था-सरकार सब कुछ करूँगा, प्रकाज न करूंगा। सस्था-काज की गध भी नहीं है। स्था--तो कहिये। सस्था-यमन्तमेना को मार डाल । स्था-सरकार क्षमा करो, मेरेही गधेपन से यह वेवारी यहाँ पाई है। सस्था-परे लौंडे । तू भी हमारे कहने में नहीं है। स्था-सरकार मेरे हाथ पैर के मालिक हैं, पाप पुन्य के नहीं।' क्षमा कीजिये, मै बहुत डरता है। सस्था-अवे, हमारा नौकर होकर किस को डरता है। स्था-सरकार परलोकको। सस्था-कौन है परलोक। स्था-सरकार भले बुरे कामों का फल । सस्था-भले कामों का फल कैसा होता है ? -जैसे प्राप है सोने से लसे। सस्था--और घुरे काम का कैसा होता है? स्था-जैसे मैं और का दिया खाता है। मैं अकाज न करूंगा। स्था- २०६ पायो वमतमेना ! . हार आम के पास रह कर अब ढाँस के पास कैसे रहे? म दोष कहती है ! टेसू भी नहीं। तू हम को गाली देने में भी सस्था-हरामजादी दरिद्र चारुदत्त को आम बताती है और रिसादरिद्र चौधरी की चाहनेवाली, सड़ो रह । बसत-कह फिर कह, में इस में अपनी बडाई समझती हूँ। मृच्छकर्टिफभाषा धोखा देने के लिए अब यह क (फूल चुन कर वसन्तसेना से) विट-अरे, प्रव तो इस का मन कुछ ओर हो गया । श्रय ठहरने का कुछ काम नहीं। (बाहर जाता है) सस्या-चन देहौं फरिही तोहि प्यार । छुह हो सिर से चरन तुम्हार । तऊ मोहि तुम 'जात विहाई । सेवक सन इतनी निटुराई ? वसन्त-(पापही प्राप) इममें क्या कहना है (सिर नीचा नीच मे जानति ताही। फ्यों धन लोभ दिखापत माही ॥ शुद्धचरित सुन्दर सम अजा। कमल तजै नहिं कबहुँक भृङ्गा ॥ निर्धन है कुलशीलयुत सेइय जतन समेत । जन सुयोग सँग नेह करि पातुर जग जस लेत ॥ असत-जो मन में बसा है यह कैसे भूलेगा? सस्था आज तुझे और तेरे मन में रहनेवाले दोनो को , हिदत्त का नाम नहीं भूलती। N सम्या-अब लोडो का बद्या चारुदत्त तुझे बचाये । वमन्त खते तो बचाते । मस्या- . कै यह द्रोपदपूत जटाऊो रभासुत राऊ॥
(प्रकाश) श्रष जाता हूँ। बसन्त-(उसका आँचल पकड़ कर ) मे तो प्रापही की सरन विट-बसन्तसेना ! डरिये नहीं। संस्थानक जी! १०८ मृच्छकटिकभापा ( मोच कर ) अच्छा, प्रय मैं दूमरा उपाय करूं । इस बुड्ढे ने सिर हिला कर वमन्तसेना से कुत्र कहा है अब इस शहर कर सन्तसेना को मार्स। (प्रकाश) प्रती श्राप क्या कहते हैं। हम इतने बड़े कुज के जन्मे ऐसा अकाज करेंगे। यह तो हमने इस लिये कहा था जिस में यह मान जाय। पिट ऊँचे कुल से होय क्या शील घड़ाई देत। या उपजत हैं घने काटे अच्छे खेत ॥ सस्था-प्रजी, यह तुम्हारे सामने लजाती है, तुम जानो। इस लौंडे का हमने अभी कहा था कि अलग जा, ऐसा न हो भाग जाय, उसे पकड लाइये। बिट-(मापही प्राप) 'नहि पातुर मुररा पह जाती मा कह सौह देखि सकुचाती ॥ कगै एकत दूर मे जाई रतिरस चढत अकेलहि पाई ।। । । । . ७ हम मापको जाते हैं। हमारे हाथ में थाती है। सरसा . र चल कर) अजी, ऐसा न । इसे मार डाले, लामो प्राइ प्राद में पडा हो जाता है) इमे मारूं। पेसा तो न हो में होकर स्यार ऐसा नीच दुष्ट मृच्छकटिकमापा २०६ धोखा देने के लिए अब यह कहें (फूल चुन कर वसन्तसेना से) प्रानो बसन्तमेना! 1 घिट-अरे, अब तो इस का मन कुछ और हो गया। प्रव उहरने का कुछ काम नहीं। (घाहर जाता है) सस्था-चन देहौं फरिहो तोहि प्यार । छुइ हौं सिर मेचरन तुम्हार ॥ तऊ मोहि तुम जात रिहाई । सेधक सन इतनी निटुराई ? वसन्त-(प्रापही आप) इममे क्या कहना है (सिर नीचा फर के) में जानति ताही। क्यों धन लोभ दिसापत माही। शुद्धचरित सुन्दर सब अगा। कमल तजे नहिं कबहुँक भृगा ।। निर्धन है कुलशीलयुत सेइय जतन समेत । जन सुयोग सँग नेह करि पातुर जग जस लेत ॥ और नाम के पास रह कर अब ढाख के पास कैसे रहूँ? संस्था-हरामजादी दरिद्र चारुदत्त को आम बताती है और तुझे ढोस कहती है ! टेस भी नहीं! तु हम को गाली देने में भी चारुदत्त का नाम नहा भूलती। वसन्त-जो मन मे बसा है यह फैसे भूलेगा? सस्था -आज तुझे और तेरे मन मे रहनेवाले दोनों को मारता हूँ। दरिद्र चौधरी की चाहनेवाली, सदी रह । वसन्त-कह फिर कहा मैं इस में अपनी बडाई समझती हूँ। सस्था-प्रब लोडो का बच्चा चारदत्त तुझे बचाये। घसन्त-देसते तो बचाते । सस्था- कै यह द्रोपदपूत जटाऊ। चानक कैरभासुत राऊ॥
(मारता है) । - सस्था-मर हरामजादी (उसका गला घोंट कर मार डालन कैसे वसानो सूरता यह निज प्रचड भुजान की। जो लस्यो नाही पुत्र के निज प्रवल तेज प्रताप को॥ घिट स्थावरक को तो बुला लाया, श्रव सस्थानक इद। अरे, राह में पैरों के चिन्ह से जान पड़ता है कि स्त्री को मार डाला । अरे पापी ! तूने पेसा अकाज ११० मृच्छकटिकभाषा बुधमार त्रिशकु वह होई। इन्द्र बालिसुत कै है सोई॥ और यह भी क्या देखेंगे? भारत में सीता हनी जैसे चानकराज । द्रुपदी हनो जटोउ ज्यों मारौँ तोकहें आज । वसन्त-हाय ! अम्मा कहाँ हो! हाय 'चारुदत्त जी! मेर मन की प्रास मनही मे रहो । अब मैं मारी जा रही है। अब जोर से चिल्लाऊँ । नहीं, नहीं बसन्तसेना को चिल्लाना बड़े लाज की बात है। चारुदत्त जो को प्रणाम ! सस्था-अब भी हरामजादी उसी पाजी का नामालेती है (गल घोट कर )मर हरामजादी। वसन्त- चारुदत्त जी की! है, वसन्तसेना गिर पडती है ) (फिर हर्ष से) यह दोप को मटको सरिस अरु नीचपन की कोठरी । तेहि रमन के हित काल के बस इहां पाई यहि घरो॥ यह मरिगई विन सांस भारत माहि जैसे जानकी !! मै चहत, यह मोहि चहति नहि, यहि हत यह मारी गई। गर घोटि सूने बाग मे डरपाय फटकारी गई । जोधन अकारथ माय मोरी द्रोपदी को, वापको। यह डोकरा पाता होगा ( अलग हटकर खडा हो जाता है) (स्थावरक के साथ घिट आता है) E
मले प्राप।
मस्थानक को बहादुरी देख लो।
मृच्छकटिकभापा
केया ? तुझ पापी के देखने से हम लोगो को भी पाप लगेगा।
कदाचिन् जिस बात को मुझे शदा हो रही है वह झूठी निकले।
भगवान सब कुशल करें। (सस्थानक के पास जाकर ) हम
स्थावरक को बुला लाये।
सस्था-विटजो पाप भले श्राये । वेटे स्थावरक, तुममी
स्था-जी हां।
पिट हमारी थाती दो।
सस्था-कैसी थाती?
पिट-बसन्तसेना।
सस्था-गई।
पिट-कहाँ गई।
सस्था-श्राप के पीछे ही तो।
पिट-(शका से ) उधर तो नीं गई ।
मस्था-तुम किधर गये थे।
सस्था-यह ता दखिन गई ।
पिट-हम भी तो दक्खिन गये थे ।
सस्या-धजी यह उत्तर गई ।
विट-तुम ठोक ठीक नहीं बतलाते, हमारे मन में पही
सस्था-तुम्हारे सिर अपने पैर कीसौंह हमने उसे मार डाला।
विट-(दुख से ) क्या सचमुच तुमने उसे मारही डाला ?
सस्था-हमारी बात का विश्वास न हो तो राजा के साले
पिटाय, हाय घडा अनर्य हुभ्रा (येसुध होकर गिर
गये! उरिये उठिये।
सस्था-परे ! पिटंजी घेसुध
पिट-पूरव ।
-शका होती है।
पहता है)।
- - मृच्छकटिकमाषा स्था-हाय मैने बिना दसे सुने बहली में जाके उन्हें पहले ही मार डाला था। पिट-(सांस लेकर करुणा से) शील सनेह की नीर भरी सरि सो रति प्रानही देस सिधारी हा! प्रति सुन्दरि भूपन? को दई जिन शोमा स्वदेह में धारी। शील स्वभाष को मानो नदी, हमसे जनकी तुम पालनहारी। रूप को सौदा भरी उजरी यह हाय! मनोज को आज बजारी। (आँखों में धांसू मर) के हाय ! हे पापी ते काह विचारा। तै पुरथियहि दोष बिन मारा। (प्रापहो आप ) अरे ऐसा न हो यह पाजी यह पाप मेर सिर ठोंके तो अब यहाँ से चल दू । (चलना चाहता है, सस्थानक उसे पकड लेता है) विट-दूर हा, हमै मत छुप्रो हम जाते हैं। सस्था-अरे, वसन्तसेना को मारके कहाँ भागे जाते हो हम ऐसे अनाथ हो गये। पिट-सिड़ी हुया है? सस्था-सौ रुपये तोहि देशहौ अन्न वस्त्र के साथ। ठोंको यह अपराध तुम और कोऊ के माथ ॥ पिट-दूर हो, तू अपने ही पास रस। स्था-राम राम! सस्था-(हँसता है) पिट-हॅसु जनि, छुटै आज से सग हमार तुम्हार। धिक है ऐसी प्रीति को जेहि थूकै ससार ॥ होय न फिरि यहि जनम में कबहुँ तुम्हारो सग। त्यागत टुटी कमान सम तुमहि होत गुनभग! सस्था अरे प्रानो प्रायो इस पुसरी में हम तुम खेलें । पिट- रहे पतित जौलौ नहीं तौलों सेघत तोहि । - - .
सस्था-पिटराम तो अपना ही जो बचाने को भाग गये जहिको कोठे पर बद का नहीं तो चाल खुल जायगी। प्रव चल । नहीं देस ले मर गई कि फिर मार नहीं इस में सांस नही। अन्य तो दुपट्टे से ढांक दूं। अरे नहीं नहीं मृच्छकटिकभाषा जान्यो पुरजन पतित सम नोच सरिस नित मोहि ॥ ते मारी तिय मै रहो कैसे तेरे सग। आधे द्रुग तोदि तिय लरों डर घस कांपत 'प्रग ॥ करुणा मे) बसन्तसेना । पातुरकुल जनि होय फिरि सुन्दरि जन्म तुम्हार । जमौ ऊँचे वश में जाके चरित उदार ॥ सम्या-हमारे बाग में बसतसेना को मार के कहाँ भागा जाता है। चल हमारे बहनोई के सामने अपनी जवाब- देही कर। घिर-दूर हो पाजी (तलवार खींच लेता है)। सन्था-(डरता हुआ पिछद्ध कर ) अरे डरता है तो जा। विट-(पापही प्राप) यहाँ रहना ठीक नहीं , जहाँ प्रार्यक . गर्विलक हैं वहीं मे भी चलूँ। । (घाहर जाता है) सस्था-जा भाड में जा। अवे लोडे हमने कैसा काम किया ? स्था- सरकार बहुत ही बुरा किया । सस्था-अवे क्या कहता है बुग किया कि अच्छा (अपने दने उतार कर ) यह ने और इन्हें पहिन, जब हम इहें पहनते तभी तुम भी पहनना। म्या-सरकार, यह गहने प्रापही के अच्छे लगते हैं, मे इन्हें के क्या करूँ? पभो पाते हैं। संस्था अच्छा तो जा बहली ले के महल के प्रागे उहर, हम (बाहर जाता है) - स्या-बहुत अच्छा तं मुखाऊँ ? (देसकर) सूखी पत्तियो का ढेर लगा है इसी प क हाथ से दस मोहर देकर मुझे छुडाया था तब तक मे धर्म कर्म सा व्यर्थ है, में तो उस के हाथ विका सा मृच्छकटिकभाषा इस पर मेरा नाम छपा है कोई पहचान लेगा। अजी सूत्री पत्तियों के ढेर में छिपा हूँ।(छिपा कर सोच कर) श्री कचहरी जाके मुकदमा कायम करूं कि गहनों के लिए चौधरी चारुदत्त ने हमारे पुष्पकरड बाग मे जाके वसन्तसेना को मार डाला। फरौ कपट सोइ नास अव चारुदत्त कर होय ऐसे अच्छे नगर में पशुहु न मारे कोय । तो अब चलू (कुछ चलकर देखकर ) अरे । जिधर जाते हैं उधर हो यह पाजी योगो गेरुमा घस्न लिये प्रात है । मैंने इसे बाहर निकाल दिया था, ऐसा न हो मुभ देख के यह सव से कह दे कि इसी ने बसतसेना को मारा, कैसे भाग (देराकर ) जिधर दीवार गिरी है उधर ही फाँ जाँऊँ। लका नगरी को चलत फोदि हनूमतशैल । जैसे गयो महेन्द्र कपि भूपताल की गैल ॥ (जल्दी से योगी प्राता है) योगी-मैं ने अंचला तो फींच लिया अब इसे सुखाऊँ कहा पेड़ की डाल पर डाल दूं, ऊँ हूँ इस पर बन्दर हैं, फाड़ डालगे भुई मे पसार हूँ, हे गर्द बहुत है मैला हो जायगा । क पसार हूँ (अंचला पसार देता है) जय बुद्धकी ! ( वैठ जाता है अच्छा तो अव भजन गाऊँ ( गाता हैसच तो यह है । जय तक उस उपासिका से उरिन न हो जाऊँ जिसने जुआ ( देख कर ) भरे ! यह पत्तियो के नीचे कौन सांस रहा है? (बाहर जाता है . - C घरचना (चलता है) अरे हटो भाई हटो, यह जपा। खी है भोर में योगी, इसके साथ हैं तो मी मेरा धर्म शुद्ध है। मृच्छकटिकभाषा भीजे अंचलानीर से लू के सुग्वे पात । पठी से पानी परे फुलि फुलि उठि जात ॥ (वसतसेना होश में आकर अपना हाथ निकाल देती है ) यागो-अरे, यह तो सोने के गहने पहने स्त्री का हाथ निकला। अरे, दूसग भी है । हमने तो यह हाथ कहीं देखा है, यही तो है जिसने हमै अभय किया था, अच्छा अव देखें। (पत्ते घटाकर देखता है ) यही उपासिका तो है। (बसतसेना पानी मांगती है) योगी-भरे पानी मांगती है, वापली घडी दूर है, क्या करूँ, तो यही चला इस के मुंह में निचोड हूँ। (वस तसेना उठ बैठती है, योगी अपने कपड़े से हया करता है) -प्राप कौन हैं। योगी-उपासिका, भूल गई ? तुमो मुझे दस माहर देकर सन्त--आप को मैंने देखा तो है पर जो पाप कहते हैं उस की मुधि नहीं, मेरा चित्त ठिकाने नहीं। योगी-उपासिका, यह क्या हुआ उसन्त-पातुर की गति । योगी-उपासिका, उठो इस डाल को पकड़ लो ! (हाल झुका देता है वसन्तसे उठ खडी होती है) योगी-इसी मठ में मेरी गुरूवहिन रहती है, चलो यहीं चल चलो धीरे जर जो अच्छा हो जाय तो घर घलना, वसन्त- मान लिया था? ? । कर पेठो; सजम सो निज यम किये कर मुरा इन्द्रिय जोर। हाकिम ताको क्या करे किये स्वर्ग सिधि मार।। (योनी पादर जाते हैं) -- सस्था- मृच्छकटिकमापा नवाँ अंक [ स्थान-कघहरी] (शोधनक आता है) शोध-सरकार का हुकुम है कि कचहरी में जल्दी से इजलास ठीक करो , तो कचहरी चलू । (चल कर) यही तो है कचहरी, सब ठीक कर दूं। सब साफ हो गया तो अव जाकर इत्तिला कर दूं (घूम कर देख कर ) अरे यह पाजी राजा का साला यहीं पा रहा है इसके आगे से हट जाऊँ। (अलग खडा हो जाता है) (उजले कपड़े पहने सस्थानक प्राता है) पानी जल औ सलिल नहाय । बाग बगीचा मे विरमाय ॥ वैठो नारि तियन के सग । गवर्वन से सोहत अग। गांठि कबहुजूरा कबहु कबहुँक छूटे केस। हम राजा के सार का रग रग का भेस॥ बहुत दिनो पर मुझे कमल के टठे के कीड़े की नाई राह मिली तो अब किस को अपनी चाल से गिराऊँ (सोच कर हाँ, हाँ, दरिद्री चारुदत्त को गिराना चाहिये। यह ऐसा कगाल है कि उसको जो कलक लगाऊँ सव लग जायगा। अच्छा कचहरी चल कर लियाऊँ कि चारदत्त ने वसन्तसेना को मा डाला । (चल फर देख कर ) यही तो है कचहरी (फिर देख कर) इजलास तो सजा है जब तक हाकिम न आ जायें तब तक इसी दूध पर वेठा रहे (वेठ जाता है) शोध-(आगे देख कर सरकार या रहे हैं मैं भी उन पाम चलू। (मेठ और कायथ के बीच में हाकिम प्राता है) ते (आगे बढ़ता है गो-यही है, आप लोग निराजे (सब जाकर बैठ जाते है) सस्था--(हप से) हाकिम प्रा गया (अकड के चल कर) भनी धम बहादुर घामुदेय राजा के साले है हमारा मुमादमा दे मृच्छकटिकभापा हाकिम-मेठ जी, लाला जी! से० का-जी। हाकिम-इसाफ बिलकुल औरो के वस है और उनके मन का हाल समझना बहुत कठिन है। तजि न्याय झूठे दोष औरन नीच रोग लगाधही। पुनि क्रोध बस निज दोप हाकिम साह नहीं बतानही ।। दोऊ पक्षसन ह पुष्ट दोष नरेश का लगि जात हे । यहि कठिन नीतिविचार, निन्दा सुलभ मदा ना हे ॥ तजि न्याय झूठे दोष जन करि कोप कबहुं बनायहीं। है नष्ट सजन दोप निज न्यवहार में न जनाव: ॥ दोउ पत्तदोष समेत तिन कह पाप नित लगि जाता है। यहि कठिन न्याय विचार निन्दा सुलम सदा लसात है ॥ समुझि जाय छल कपट शास्त्र में राखै बोधा । हित अनहित सम गने करे काहै नहि कोचा। बात चीत में चतुर धर्म में धर लाभ अति । देखतही जनचरित देह उत्तर सोहदूद मति ॥ दुस देइ सठन, पाले निबज निपुन रहे व्यवहार में। नृपकोप नसा जतन सन लखि सोई न्यायपिचार में ॥ मे० का-आप के गुनो में भी जो दोष बताये ता चाँदनी को हाकिस-शोधनक, चनो अदालत के कमरे की राह बतायो । हा-चाहर जाके पुकारो जिस का कुछ दाया हो तो हाजिर हो। फिरियाद करनी ही हाजिर ही। शो बहुत प्रन्या (बाहर जा जस का नालिश स्योंकि, हाकिम का - धेरेरा कहता है।
. ११८ मृच्छकटिकमापा शो-(घबराहट से ) अरे बापरे ! पहले इसी का मुकदमा होगा ! अन्दा पाप ठहरिये, हम जाके इत्तिला कर दें (हाकिम के पास जाकर ) सरकार ! राजा के साले एक मुकदमा लाये हैं। हा-अरे, पहले राजा के सालेही का मुकदमा है ? सवेरे जो सूर्यग्रहन लगे तो समझा जाता है कि किसी बड़े मारी भलेमानुस का नास होगा । शोधनक! पह मुकदमा ही पुरा होगा। जामो बाहर कह दो कि आज तुम्हारा मुकदमा न होगा। शो-बहुत अच्छा (सस्थानक के पास जाकर सरकार कहते है कि आज मुकदमा न सुना जायगा। सस्था-(क्रोध से) हमारा मुकदमा क्यो न सुना जायगा ? न सुना जायगा तो हम अपने बहनोई राजा पालक से कहेंगे, अपनी बहिन से कहेंगे, अपनी माँ से कहेंगे प्रो इस हाकिम का छुडवा देंगे! दूसरा हाकिम आयेगा। (बाहर जाना चाहता है) शो-ठहर जाइये, मै हाकिम से कह दूं ( हाकिम के पार जाकर) सरकार, राजा के साले यह कहते हैं कि " न सुन जायगा" इत्यादि। हा-यह गधा सब कुछ कर सकता है, जाना कह दो। याप का मुकदमा सुना जायगा। शो-(सस्थानक के पास जाकर) आइये श्राप को चुला सस्था-पहले कहा कि न सुना जायगा, अव कहता है कि सुना जायगा, हाकिम भी हम से डरता है, जो हम कहेंगे पहा उसे मानना पड़ेगा। अच्छा तो चलें (आगे बढ़ता है ) हम लोग अच्छे हैं, आप चाहैं अच्छे रहैं चाहे न रहैं! हा-(आप ही प्राप) बाह, नालिश तो करने आये कैसी करते हैं। (प्रकाश) भाइये वैठिये। ।
कायथ-बहुत अच्छा (लिख कर) लिख लिया। कारन गला घोट कर वसन्तसेना को मार डाला, मेने नहीं a)यह भी लिस लीजिये। मेने नहीं" इस पर भी विचार मृच्छकटिकमापा मस्या-जी, हमारा तो घर है जहाँ हमारा जी बाहेगा वहीं बैठेगे । (सेठ से) यहाँ बैठेंगे (गोधनक मे) नहीं यहां बैठेगे (हाकिम के सिर पर हाथ रखकर) नदी हम यहां ठगे। (आसन पर बैठ जाता है)। हा-पाप का मुकदमा है ? सस्था है। हा-फाहिये। सस्था-कान में कहेंगे ; हम ताड के बराबर बड़े कुरा के हैं। पितु हैं राजा के मसुर हम राजा के सार । पितु के गज दमाद हैं नृप बहोड हमार ।। हा-हम जानते हैं ऊँचे कुल से हाय क्या शोल बड़ाई देत । चाढे फैलत हैं घने कोटे प्राधे खेत ॥ आप मुकदमा कहिये। सस्था-कहते तो है हमारा कुछ कसूर नहीं हमारे बह- नोई ने खुश होकर पा खाने का सा धागो का घाग पुप्पकरड गम को दिया था, यहाँ हम नित सेर करने सुखाने सधारने विधाने कटपाने जाते हैं, यहाँ हमने सयोग से देखा कि एक हा- पाप ने जाना कोन थी? सस्था-हो हम सोने के गहनों से लसी नगर की शोभा में कैसे न जाने किसी जी ने सूने बाग में जाकर धन के इतना कह कर फुरती से मुंह बन्द कर लेता है) हा-पाह ! पहरेवालों को बड़ी भूल हुई। (सेठ और कायथ जुगाई मरी पडी है। केया जायगा।
१२
मृच्छकर्टिकभाता
सस्था-(पाप ही प्राप) अरे बाप रे, अरे जल्दी में मैंने
खीर के लड्ड ऐसा अपने को बिगाड दिया ! अच्छा यह कहूँ
(प्रकाश) अजो हाकिम ! हम ने कहा कि हमने देखा, स्या
गडबड करते हो ? (लिखा हुआ पैर के अगूठे से पोंछ देता।
हा-पाप ने कैसे जाना कि धन के लिए मारी गई ?
सस्था-अजो, हम ने देखा कि गले में कुछ नहीं था और
जहाँ जहाँ गहने पहिने जाते हैं वह सब जगहें खाली थो।
से० का-ठीक है।
सस्था-(पापी हो श्राप ) बड़ी बात, मेरे जो मे जो म
गया।
हा-दो वातों का विचार होना चाहिये।
से० का०-क्या क्या? ।
हा -एक पाक्य के विचार से दूसरा अर्थ के विचार से
पास्य का विचार मुद्दई भुदाले से करना चाहिए, अर्थ हम आप
विचार लेंगे।
मे० का०-अच्छा तो पहिले बसन्त सेना की मां को घुलाना
चाहिये।
हा-ठीक है, शाधनक, जानो बसन्तसेना की मां को बुला
लामो , उससे कह देना कि कुछ घबराने को बात नहीं।
शो-यहत अन्छा ( बाहर जाके पातुर को मां के साथ प्राता
है) आइये वाई जी।
दिया-मेरी लड़की अपने यार के घर अपनी जधानी का
सुस भोगने गई और यह कहता है चलो तुम्हें हाकिम बुजा रहा
है, मेरे हायपविफले जाते हैं और हिया थरथराता है। चलो भैया
गोध-आइये ( दोनों चलते हैं ) इजलास यही है, प्राइये
हाकिम है।
मृच्छकटिकभाषा बुदि-(प्रागे बढ़ कर ) श्राप लोग सुती रहें। हा-पाइये, वैठिये। (बुदिया बैठ जाती है) सस्था-(प्राक्षेप से) आई री कुटनी आई। हा-आप वसन्तसेना की मां है ? गुढ़िया-जी हाँ। हा-बसन्तसेना इस घेर कहां गई? अदि-यार के घर गई । हा-उसके यार का क्या नाम है ? धुदि-(पापही श्राप) हाय हाय, फेसी यातें पूछ रहे हैं ? (प्रकाश) ऐसी वार्ते ओर कोई पूछे तो पचले, हाकिम के पूछने की नहीं है। हा-लाज का काम नहीं हे मुकदमे मे पंछी जा रही है। से० का-मुकदमे में पूछी जा रही है, कुछ दोष नहीं, कहिये । बुदि-अरे मुकदमा है तो सुनिये, यह जो सार्थवाह घिनय- दत्त के पोते, सागर दत्त के लड़के चारुदत्त नाम सेठो के चौक में रहते हैं उन्हीं के पर मेरी रेटी गई है। सस्था-सुना आपने, जिरिये, चारुदत्त ऊपर मुकदमा है से० का०-चारुदत्त अगर। उस के यार हुये तो कौन दोप है? हा-ता भी चारुदत्त से पृनना चाहिये। से० का०-टीक है। हा-धनदत्त ! लिम्पिये वसन्तसेना चारादत्त जी के घर गई थी। क्या। चारुदत्त जी को भी बुलाना पड़ेगा? इसमें क्या करें मुकदमा तुला रहा है। शोधनक ! जानी चारुदत्त जी को बड़े आदर से गुला लामो। घराने न पायें, रहना कि एक काम ऐसा प्रा. पडा है कि हाकिम प्रापसे पुछ पूछा चाहते हैं। शो-बहुत अच्छा। (घाहर जाकर चारुदत्त के साथ फिर पाता है) - ૨૨૨ मृन्छकटिकभापा चारु-(सोचकर)- मेरे कुल अर शील को जानत हैं नरनाह । दशा सोचि शका तऊ उपजत है मन महि । (फिर तक से प्रापही प्राप) गुतो भेद जो ताहि बचाया। जो मेरी पहली चढ़ि पाषा ।। भेदिन भेद भूप सब पाषत। जो यहि विधि मोहि पकरि घुलाषत । फिर विचारने का कौन काम है कचहरी मे चलूं। शोधनक' कहा है हाकिम तुम्हारे शो-पाइये। चार-(शङ्का से ) यह क्या बात है ? कौमा रोग्रत है एक ओरा । टेरत राजपुरुप करि सोरा॥ फरकति घाई आँखि हमारी। हिय डरपत लखि असगुन भारी॥ शो-पाइये, कुछ घबराने की बात नहीं है। --(चल कर आगे देख कर ) सूखे तरु पर काग यह वेठो रवि की ओर । मो दिशि डारत बामदूग है कछु अनरथ घोर ।। (फिर आगे देख कर) अरे, यह सांप कहाँ से निकल आया ? छिटके काजल रङ्ग मेरी दिसि नैन उठावत । उजरे चारहु दांत खोलि निज जीभ लपावत ॥ किये रोप वस कुटिल प्रगनिज पेट फुलापत। परोगैल में सांप हाय क्यो मो दिसि धावत ॥ भोगी हैं धरती नहीं पद क्यों फिसलत जात । फरकति बाई प्रांखिहू कांपत बाएँ गात ॥ यह पछी एक अोर से रोषत वारहिवार। घोर मृत्यु के सगुन ए यहि मे नहीं विचार ।।
मृन्छकटिकभाषा १२३ भगवान कुशल करे। शो-पाइये इजलास यही है, चले प्राइये । चार--(चारा घोर देख कर ) कचहरी को शोभा भी निराली है। व्याकुल चलत दूत शख औ लहर सम, चिन्ता में मगन मनि देखो नौर थोर से। वकवक करें धक सरिस चतुर लोग, कायथ निहारें बैठे भुजग वेपीर से। एक ओर भेटी खड़े नाक औ मगर सम, हाथी घोड़े द्वार डोलैं हिमक अधार से। टेढ़े मेढ़े नीति से विगारे तट सग साह, राजा के विचारभौन नीरधि गभीर से ।। (चल कर सिर में चोट लगने का भाव बताता हुआ) यह दूसरा असगुन हुआ। सौहें रोषत काग फरकति वाई पौखि है। परो गैल में नाग कुशल करें भगवान सब ॥ अन्श भीतर चलें। हा-यही चारुदत्त जी हैं, उठी नाक मुस दग विशाल सुन्दर छवि ऐसे। चारुदत्त से करें पाप कारन पिन कैसे? हाथी घोड़े गाय बैल नरकी यह रीती। अच्छे पहि सन स्वभाष की होय प्रतीती ॥ चार-हाकिम साहब, प्रणाम ! हा-(घबराहट जनाते हुये ) आइये, प्राइये, गोधनक ! मो-(प्रासन लाकर) आइये विराजिये । (चारुदत्त चेठ जाता है) सस्था-(कोप से) आगया ये हत्यारे प्रागया ! फ्यों जी यहाँ न्याय और धर्म होता है ? सो मारने वाले हत्यारे को + आपका पासन दो। 1 १२४ मृच्छकटिकभापा आसन देते हो ? दे दो। (गर्व से) अच्छा कुछ बात नहीं ! हा- चारुदत्त जी! इस बुढ़िया की लड़की से कुछ मेल व्योहार, यारी है? चारु-किस को? हाकि इसकी । (धुढ़िया को देराता है) चारु-(उठ कर )धाई जो प्रणाम ! वुढ़िया-भैया जीते रहो (भापही ग्राप) यही चारुदत्त जो हैं तो बेटी की जवानी मुफत हो गई। हा-चारुदत्त जी ! कहिये पातुर से प्राप की दोस्ती है ? चारु--(लाज का भाष बताता है) सस्था--लाज जनाये उर किये सकै नहीं छिपि पाप । मारी धन के हेत तिय ताहि छिपाधत प्राप ।। से० का०-चारुदत्त जो लाज छोड दीजिये, मुकदमा हो रहा है। चारु-(लाज से ) हम आप लोगो से क्या कहें, रडो से हम से मेल है, इसमें जवानी का दोष है। हाकि-बड़ा कठिन व्यवहार है छोड़ि दीजिये लाज । सच मे वार न लाइये छल, को नाहीं काज । लाज छोड़ दो तुमसे व्यवहार पूछा जा रहा है। चारु-किस के साथ मुकदमा है ? सस्था--(अकड़ कर) मेरे साथ । चारु-तेरे साथ है तो बुरा है। सस्था-अरे हत्यारे ! तूने इतने गहनो से लसी बसतसेनिया को मारा अब छल कपट करके छिपा रहा है। चारु-क्या चैठिकाने की बात कह रहा है। हा-सच कहिये,पातुर श्राप की प्राशना है ? चार -जी हाँ। । हाकि-यसन्तसेना कहाँ है? - चार-घर गई। .
चारादत्त जी ऐसा अकान कैसे कर सकते हैं?
सस्या-अरे क्या न्याय में भी पक्षपात होगा?
मृच्छकटिकमापा
१२५
मे० का०-कैसे गई, कर गई, अकेली गई, या किसी के
साथ गई।
चार-(प्रापही प्राप) क्या कहें कि चुपके से चली गई।
से० काय-कहिये, बोलिये।
चाव-घर गई श्रम और हम क्या कहें।
सस्या-हमारे पुष्पकरउ बाग में ले जाके उसे गला घोटके
मार टाला और अब कहते हो कि घर गई ।
चारु-अरे क्या चकता है।
ऊँचे उडत प्रकाश ज्यो चहापराकी छोर ।
भोगी नीरदनीर सों जोपे मुख नहि तोर ॥
दोप लगायत झूठही उडी जाति है जोति ।
कमल सरिस हेमत के लघु मुसको गति होति ॥
तर सिंधु नविय या हिमगिरि लेइ उठाय ।
चारदत्त में दोष कोड कैसे सके लगाय !
प्रकाश ) चारदत्त भी कही ऐसा अनर्थ कर सकते हैं ?
सस्था-श्राप को मुकदमे में किसी का पच्छ न करना चाहिये।
तू नीच कै श्रुति पढ़त तेरी जीभ फ्यो नहि कटि गिरे।
तू सूर दुपहर को लसत नहिं प्रसि तेरी क्यों फिर ॥
तहाथ डारत पागि में क्यो आँच लागि जरे नहीं।
तू चारुदत्तहि दोप देत है भूमि तोहि हरै नहीं ॥
जिन माग्यो जो दिन विचार सोइ तुरतहि दीदा।
सिंधुहि रतनविहीन निराजलनिधि जिन कीन्हा ।
गुनमगल की खानि परम सजन सो ऐसे।
वैरिहु जोगन कालकर सो धन हित कैसे ?
हाकि-(अत्तग)
हाकि-अरे मूर्ख!
जी की पहली है और वसन्तसेना इस पर पुष्पकरड बाग को बोरक अच्छा तुम्हारा न्याय पीछे होगा बाहर सवार का घोडा मृच्छकटिकमापा बुढ़िया-अरे पापी! जब रात को थाती के गहने चोरी गय तव तो उन्होने चारों समुद्रों का सार मोतियो का हार भेज दिया अन यह उन्हीं गहनों के लिये ऐसा अकाज करेंगे राय घेटी! (रोती है) हाकि चारुदत्त जो! वसन्तसेना पांच पांच गई कि पहली पर गई। चार-हमारे सामने नहीं गई, हम नहीं कह सकते कि पाँध पांच गई कि वहत्ती पर गई। (मुँह विगाड़े हुए बीरफ आता है) वीर- लात मारि अपमान कीन्ह मोर जो चदनक । सोचत भयो विहान कठिन बेर बाढ़ो हिये । अब कचहरी चलू (धुस कर) प्रणाम । हाकि-अरे, नगररक्षा का अधिकारी वीरक है ! धीर फ्यो आये? पोर-जब प्रार्यफ वधन तोड़ कर भागा और मै उसे बढ़ने लगा तो मैंने देखा कि एक बद वाली सड़क पर जाती थी। मैंने चदनक से कहा कि तुम तो देख चुके लामो मै भो देख लूँ इस पर उसने मुझे लात मारी सो भै नालिश करने पाया है। हाकि-तुम जानते हो किसकी बहली थी? वीर-जो बहली हॉकता था उसने कहा था कि चारुदच जाती है। सस्था-सुना आप लोगो ने। हाकि-यह ससि निर्मलज्योति ग्रसन चइत तेहि राहु अब धारा मैली होति निकट है उस पर चढ़ कर अभी पुष्पकर बाग चले जाओ और देखो घहां कोई खोमरी पड़ी है। - करारा कटि गिरत।
गिद्ध खा रहे हैं।
मृच्छकटिकभाषा
वीर-बहुत अन्श (बाहर जाकर फिर जौट प्राता है) मैं
यहाँ गया था, मैंने यहां देखा कि एक स्त्री को लोथ स्यार पोर
से० काo~-तुमने कैसे जाना कि स्त्री की लोध है ?
घोर-मे ने देखा कि उसके बाल पोर हाथ पाप पड़े थे।
हाकि-
-सलार के व्यवहार बढ़े ऐड़े बड़े होते हैं।
छाननीन ज्यों पर विचारा।
त्यो त्यो अरमन यह व्यवहारा॥
न्यायविचार है टेदा प्रति ।
फीच गाय सम होति बुद्धिगति ॥
चार-(पापही प्राप)
झपटत है मे मधुप सिला फून को देसि ।
परति विपति चटुनार मे अनरय होत निमसि ।।
चारुदत्त जी मच नच कद दो पा पात है।
चार-जर जो परगुन देखि रिस प्राधर पाजी ।
परविनास दिन लखे होय कर नहिं राजी॥
लदि ऊंचा पद झूठ मांच जो फनु कति गरे ।
है सोड माननजाग, नहीं कोउ नादि विचार ?
इतनी ह नहिं को फोनि जो हम निटुराई ।
फूज नुनन के छेत बेचि के लता नपाई।
भंवरखरग दीर्घ फेक नो पारि पदारी।
मारी धा के लाभ रापती सरनो नारी!
मस्या-क्यों जोहाकिम,तुम न्याय करने में भोपक्षपात करने
जाइम पापी पादत का मामन पर बैठा दी?
हामि-साधनफ, उठा दो।
(गोधनक समयत कामासन में जाना)
चार-विचार जीजिये जो पुरमाप दो को पिचार
- १२८ मृच्छकटिकमाषा संस्था--(आप ही आप हर्ष मे) मैंने अपना पाप और के माथे ठोका, जहाँ वारदत्त वैठा था वहीं में भी वैट) चारुदत्त के आसन पर बैठ जाता है) चारुदत्त ! देखो, देखो, हमारी ओर देखो, कह दो कि मेने मारा। चारु-हाकिम जी, (" जरै जो" इत्यादि फिर पढ़ताहै ) हाय मित्र मैत्रेय ! जात मै व्यर्थहि मारा। हाय ब्राम्हणी विमल विधाल जन्म तुम्हारा ।। रोहसेन ! तुम हाय लसो नहि सकार मेरा । खेलखेलोनन माहि वृथा उपजे सुख तेरा ।। हमने वसन्तसेना के पास उस की सवर लेने को और गाड के लिये जो उसने गहने दिये थे उन्हें फेरने के लिये मैत्रेय के भेजा था न जाने क्या कर रहा है? (फेंट मे गहने लिये मैत्रेय पाता है) मैत्रे-चारुदत्त जी ने मुझे वसन्तसेना के पास गहने फेर को भेजा था और कहा था कि वसन्तसेना ने रोहसेन को अप गहने देके उसकी माँ के पास भेज दिया था से उसके गई फेर आओ, हम नहीं ले सकते, तो अब चलू वसन्तसेना के पार चलू । (घूमके श्राकाश में) भजी रेमिल जो आप क्यो घबरा हुये हैं १ (सुन कर ) क्या कहते हैं चारुदत्त जी श्राज कचहर मे बुलाये गये हैं। कोई होगा ऐसा वैसा काम तो पहले कचहर चलू । बसन्तसेना के घर पीछे जाऊँगा (चल कर देख कर यही तो है कचहरी (भीतर जाकर ) भला हो श्राप लोगो का चारुदत्त जी कहाँ हैं। हाकि यह क्या सड़े हैं। मैने यो भाई सत्र कुशल है? चार-हो जायगी। मैत्र-क्यो भाई तुम घबराये से क्यों है, तुम यहाँ क्य गुजाये गये हो मने क्या क्या? चारु-(कान में कहता है) मैत्र-यह कौन कहता? - । से तेरा मन कुटिल है वैसी मेरी लाठी भी है, इसी से तेरी सस्था-(गहने उठाकर फुरती से) दोखिये, देखिये, उसी वैचारी के गहने हे (चाग्दत्त से) क्यों, इन्हीं गहनों के लिये मृच्छकटिकभापा ૨૨ चार-भाई, मैं पापी हत्यार नासि लोक परलोक सब। नारी रतिप्रयतार वाकी यह कहि डारि है। चारु-(सस्थानक को देता कर) यही विचारे हमारे लिये काज बन कर हम से कहला रहे हैं। मैने-(अलग चारुदत्त से) तोक्यो नहीं कह देते कि घर गई । चारु-भाई सब कुछ कहा, कौन सुने ? मैने-जिन्होंने वाग मन्दिर विहार बाजार तालाब कुओं मन्दिरों से उजेनी को सज दिया यह अर कगाज हो गये तो धन के लिये ऐमा अकाज करेंगे परे राजा के साले, काणेली के 'पूत, पापों की गठरी, सोने से लसा सजा बन्दर! कह मेरे सामने कह । जिन्होंने फूली लता को भी चल से सींच कर फूल नहीं तोड़े कि कहीं ऐसा न हो कि पल्लव टूट जाय, सो यह लोक -परलोक दानों के विरुद्ध ऐसा काम करेंगे ! रहये हरामजादे ! मोपड़ी अभी तोड़ता है। घरए चुप। मस्या--(क्रोध से) देखिये, देखिये, हमारा दाधा चारादत्त पर है, हमारी सोपड़ी तोड़नेपाना यह कौन है ? चुप रह थे पाजी मे।-(लाठी उठाकर 'कह का किर पढ़ता है। सन्या- क्रोध से उठ कर मैनेय को मारता है, मैत्रेय भी उसे मारता है, मैत्रेय को फेट मे गहने गिर पड़ते हैं) उसे मारा था? (हाकिम, सेठ और कायय सिर नीचा कर लेते हैं।
।
१३०
मृच्छकटिकभाषा
चारु-(अलग मैत्रेय से)
गठरी गहनन को सुली बड़े कुअघमर प्राय।
गिरी निधातायाम उस देहै हमे गिराय॥
मैत्रे-ग्रजी जो सच हाल है उसे क्यो नहीं कह देते ?
चारु-भाई, सोटी है धुधि नृपति की मरम सकै नहि जानि ।
सोई मारो जात, है कहत दीन जो बानि ॥
हाकि-हाय ! हाय !!
सीन बृहस्पति से किया मोम विरोध प्रकास ।
धूमकेतु एक और यह पगल्या ताके पास ॥
से० का०~(देख कर बसन्तसेना की मा मे ) बुड्ढी वाई यह
तो हैं, यह गहनो को देसै घदी है कि दूसरे।
बुदि--(देख कर ) षही है। यह नहीं है।
सस्था-परी दी कुटनी! आँख में पहचान लिया मुंह
कहती है नहीं है।
बुढ़िया-दूर हो कुठे।
से० काम-ठीक ठीक कहो, घही गहने हैं कि नहीं।
बुदि-गहने बहुत अन्छे बने हैं इसी से आँख नही हटो घद
गहने नहीं हैं।
हाकि-बूदी, इन गहनों को पहचानतो हो ?
चुदि-मैने कहा तो, पहचानती है, सोनार ने कदाचित यो
ही और बना दिये हो।
हाकिदेखिये सेठ जी!
भूपन, लखि कछु सिद्धि न होई ।
वैसे और बनाये कोई॥
जो भूपन नर चतुर बनावत ।
ताहि एक में एक मिलाधत ॥
से० का यह गहने चारदत्त जी के होंगे।
से०का०--- मृच्छकटिकभाषा १३१ मे० का०-फिर किस के हैं ? चार-इसी बुढ़िया की लडकी के हैं। उनसे कैसे अलग हुये। चारु-कैसे हो हो गये होगे! से० का०-चारुदत्त जी सच कहिए । देखिये सच से सुसही होय सांचे पाप न लागई। सब के अन्टर दाइ सच न विपाइय झूठ से ॥ चार-हम यह नहीं जानते कि गहने घही हैं कि दूसरे, हाँ इतना कह सकते हैं कि हमारे घर से बाये है। सस्था-चाग में जाके उसे मार डाला अब बातें बना के छिपाते हो हाकि-चारुदत्त जी सच काहिये। हम सर चाहत हैं नहा है हैं अगरथ घोर । परि है तुम्हरी पीठ पर कोड़े परम कठोर ।। चार-धार्मिक कुल में ऊपजे हम सन होय न पाप । जो समुझो पापी हमै मरत न रोकिय धाप ॥ (पापही आप ) अब घसतसेना नहीं है तो हमी जी के क्या करे (प्रकाश) अजो वात यह है- मै पापी हत्यार नासि लोक परलोक निज । नारी रतिनघतार, बाको यह कहि डारि हैं। सस्था-मारी, तुम भी अपने मुँह मे कहो कि मारी। चारु-तुम तो कह चुके । सस्था-सुनिये साहर सुनिये, इस ने मारा है, अब तो मशय न रह गया, अब इस दरिद्री चारदत्त को देवदड देना चाहिये। हाकि-शोधनका राजा के साले ठीक कहते हैं। सिपाहियो! पकडो इसे। (सिपाही चारुदत्तको पकड लेता है) । ।
-
मृच्छकटिंकभापो
बुढ़िया-साहब मेरी भी मुनिये, 'जब चोर ले गया' इत्यादि
फिर पढ़ती है, और मरी तो मेरी लड़की मरी, मेरा लड़का क्यों
मारा जाय ? अव मुकदमा तो मुद्दई मुद्दाले मे होता है, मै मुदई
है मेरा दावा नहीं है, इन्हें छोड दीजिये।
सस्था-दूर हो कुटनी तू कौन है ?
हाकि-धुड्ढी तुम जानो, सिपाहियो इसे निकालदो।
बुदि-('हाय वेटा हाय घेटा' कहती हुई और रोती हुई
वाहर जाती है।)
सस्था-मेने तो अपना काम कर लिया अब जाता है।
(बाहर जाता है)
हाकि चारदत्त जो निर्णय करना हमारा काम है भागे
महाराज मालिक हैं । तो भी शोधनक ! महाराज से बिनती करो,
मनुजी का वचन है-
अपराधी वाम्हन नहीं कबहुँ धवन के जोग ।
दीजे देशनिकारि तेहि भये सिद्ध अभियोग ॥
शोध-बहुत अन्छा (बाहर जाकर फिर आकर आँखों में
आँसू भर कर ) सरकार ! मै महाराज के पास गया था, महा-
राज यह कहते हैं कि जिन गहनों के कारन बसतलेना मारी गई
वेही गले मे बाँध मारे नगर में किराकर ढंढोरा बजाते हुए दीपन
के मसान मे लेजाकर चारदत्त को सूली चढ़ा दो। जो कोई ऐसा
काम करेगा उसे ऐसा ही दम दिया जायगा ।
चार--राजा पालक ने कैसा वैसमझे चूसे हुकुम दिया है।
परत पागि अन्याय के मनिन के बस भूप ।
नहि अचरज जो परत है घोर नरक के कूप ।
ए मुसगुन है राजके उजरे काग समान ।
सहसन पिन अपराध के हरेजात जय प्रान॥
भाई मैनेय ! जानी हमारी ओर से मा को प्रणाम कहना।
-~-के रोहसेन को तुम्ही कोसोपता हूँ।
मृन्छकटिकभाषा
१३३
मैत्रे-जड ही कट गई तो पेड़ कैसे रह सकता है ?
चार-प्रजी ऐसा न हो।
गये लोक परलोक जो पुत्रहि तिनको देह ।
मेरे पीछे कीजिये रोहसेन से नेह ॥
मैने-भाई, हम तुम्हारे होके तुम्हारे बिना कैसे जियेंगे ?
चार अब हम छोडो जो कुछ तुम्हें करना हो रोहसेन के
'साथ करो।
मैने-अन्छा।
हाफि-शोधनक इस धाम्हन को हटा दो।
(शोधनक मैनेय को बाहर निकाल देता है)
हाकि-काई है चांडालों को हुकुम दो।
(चारादत्त और शोवनक को छोड और सर घाहर जाते हैं)
शोध-पाइये चारुदत्त जो!
चारु-(फरणा से ) मैत्रेय ? ('क्या प्राज' इत्यादि फिर
पढ़ता है) (आकाश में)
नीर तराजू ागि चिपट से करो बिचारा।
हाय सिद्ध अभियोग हर तो जोय हमारा ॥
याम्हन को तृ यात बात सुनि जो रिपुकेरी।
पुन
पौन के सग पुगति है है तो तेरी।
चलो हम चलते हैं
(सरयाहर जाते हैं)
दसवाँ अक
[स्थान-उरमैन में ददी सरक]
(दो चाडातों के सार चानपत्त पाता है)
दोनो चाडाल-तुन फा करो विचार, यधुमा एकरन में चतुर ।
का? मिर पर चार, शूल चहार्य तुरत हम
भर हटो भाई यह वारदत्त जी ई,
मृच्छकटिकमापा
हम जल्लाद दोऊ दिसि धारे।
कनयर की माला गल डारे॥
छिन छिन होत छीन यह कैसे !'
घटत तेल के दीपक जेसे ॥
चारु-(दुख से) परी धूरि सब देह पुनि भीगी दूग के नीर।
पहिरे फूल मसान के चारितु अोर शरीर ॥
बलि समान मोहि जानि के रक्तगध तन लाग।
कांघ काँध करि चलत हैं मोहि भसन को काग ॥
दोनों चांडा-हटो जी हटो ! क्या देखते हो,
सजनतर यह कटत है कालकठोर कुठार ।
सुजनपछि सेघत रहे जाकी सुन्दर डार ॥
चल रे चारुदत्त, चल!
चारु-भाग्य में क्या क्या बदा है कोन कह सकता है ? देखो
मेरी क्या दशा हो रही है।
देवीचदन को दिये अंग अंग थाप लगाय।।
आटा डारी देह पर पशु माहि दीन बनाय ॥
(आगे देख कर ) देता लागो का चित्त भी कैसा बदलता है ?
(करुणा से)-
जे जन मेरो दशा निहारत । ते निज मनुज जाति विकारत ॥
मोहि न सबैकोऊ जतन घचाई । कहें स्वर्गसुख भोगह जाई ॥
दोनों चांडा-टो जी हटो! क्या देखते हो?
तारासक्रम, सुजनवध गैया जय बियाय।
इन्द्र विसर्जन जनिलसौभागौ प्रति बचाय ॥
पहिला चाँडा-अरे अहिल, देस, देश,
लिए जात हम चयन हित नगरी को सिरताज ।
रोय उटयो प्राकाश, के परत मेघ विन गाज ॥
दूसरा चौटा-अरे !
-
वैठी हाट मृच्छकटिकभापा रोषत नहिं आकाश यह विन घन विजु न होइ । पुरतिय चढ़ी अरान पै देखि उठी ये रोइ ॥ लिये जात हम बधन हियहिसर लोग निहारि। धूरि दवावत राह को नेनन से जल डारि ॥ चार-(देरा कर करुणा से) पुरनारी। सिरकिन सन मुराकमल निसारी॥ चारुदत्त हा ! हाय ! पुकारत । यांसुधार नयनन से डारत। दोनों चांडा-चल वे नारुदत्त चल ! ढढोरा पीटने की जगह यही है । यजा वे ढोल, सुनो जी नुनो " यह सार्थवाह विनयदत्त का नाती सागरदत्त का लड़का चारुदत्त है। इस पापी ने थोड़े से धन के कारन पुप्पकरउवाग में ले जाके यसतसेना पातुर को गला घोंट कर मार डाला, यह धन के साथ पकडा गया अपने मुंह से भी कहता है , इस पर महाराज ने हमें इसके मारने का हुकुम दिया है और जो कोई ऐसा लोक परलोक के विरुद्ध काम करेगा उसे भी राजा पालक ऐसा ही दड देंगे" चार-(उदास होकर प्रापही प्राप) कीह यज्ञ अनेक बाग मन्दिर बनवाये। जिन पुरखन वैठाय विप्र श्रुति पाठ कराये ॥ मेरे मारन हित लगाय अपजस को टीका। नाम लेत चडाल हाय यहि छन तिनहीं का।। (सोच कर दोनो कानों पर हाथ रखकर)हाय प्यारी सतसेना! ओंठ प्रवाल समान चद किरा मे दांत जह। सो मुखरस करि पान अपजस विष कैसे पिया। दोनों चांडा हटो जी हटो. सज्जाभारतिहरन जो गुनमनि को भडार । श्राज निसारो जात सो किये अशुम सिंगार। on
१३६
मृच्छकटिकभाषा
और, मुख सपति मे करत है सोच फिकिर सव कोय ।
विपति परे पै हित करत जन जग दुर्लभ होय ॥
चार-(चारो ओर देख कर )
पाँचत सन ढाँके मुस फेरे।
जात दूर साथी अव मेरे ॥
सुख के दिन और हित होई।
विपत परे पै हित नहि कोई ।।
दोनो चाँडा-मैने सव को हटा दिया अव इसे ले चलो।
चारु-('मैत्रेय ज्या' इत्यादि फिर पढ़ता है)
(परदे के पीछे हाय चाचा! हाय चारुदत्त जी!
चारु-(सुन कर करणा से ) अरे चौधरी ! हम तुमसे एक
मागन मांगते हैं।
चाँडा-अरे हमसे मांगन माँगते हो?
चारु-राम ! राम ! घेसमझे बूझे काम करनेवाला पातक
चांडाल है, तुम तो उससे अच्छे हा । हम चाहते हैं मरने से पहिले
चेटे कामुंद देख लें।
दोनो चौडा-बहुत अच्छा।
(परदे के पीछे) हाय चाचा, हाय बानू ।
चार-(सुन कर करुणा से) चौधरी, हम अपने बेटे का
मुंह देखना चाहते हैं , यह पा रहा है ।
चौडा-टो जो हटी, चारुदत्त अपने बेटे का मुंह देख लें।
(नेपथ्य को और देख कर ) इधर भाइये, इधर प्रा घे लडके,
(वाहर जाते हैं)
[ दूसरा स्थान-सड़क पर दूसरी जगह ]
(गेहलेन के साथ मैत्रेय माता )
मेषे-चलो भेया चलो, तुम्हारे पाप को मारने के लिये जा-
मृच्छकटिकभाषा रोक्ष-हाय । चाचाजो हाय !! मैत्रे-हाय ! माई तुम्हं कहाँ हदें। (चडालों के साथ चरुदत्त पाता है) चारु-(टे प्योर मैत्रेय को देश फर) हाय घेटे, मैत्रेय, (करुणा से) हाय ! यह लडका रहि हो नित परजाक में पानी फाज अधीर । देन सकिहें पेट भरि गान्हों अंजुरिन नीर ॥ प्रय मेरे पास क्या है जो बेटे को हूँ (जनेऊ देरा कर) यही है। मोती को नहिं सोन को सोहै घाम्हनगात । देवपितरको भाग नित जेहिसन दी होजात ॥ (जनेऊ उतारता है) पहिला घोडा-अरे चारुदत्त, इधर आ। दूसरा चांडा-क्यों रे, चारुदत्त जी को तुकार के पुकारता चार- सपनि में के रिपति में गिना रोक दिन राति । हयिनी मतघारीमरिमनिराझोतन्यनाजाति ॥ पोर, मिटो नाम पदघी, मिटी कै नहिं पूजनजोग ! राष्ट्र ग्रमे जो चढ़ को के नहिं पूजत लोग ॥ रोह-अरे चांडालो!चाचा को कहाँ लिये जाते हो? भैया, गर साहत कनयर की माला । कर शूल . हिय शोक पिशाला || मस मैंह बाग सरिस बलि काजू । जाहुँ मसान मरन हित आजू ॥ चांडा-अर। जन्मे से चडालकुल फोउ चडाज न होय । सजन नासन चहत जो चांडाल नर सोय॥ रोह-अरे तुम चाचा को क्यों मारते हो? t .
१३६
मृच्छकाटकभापा
और, सुख सपति में करत है सोच फिकिर सब कोय ।
विपति परे पे हित करत जन जग दुर्लभ होय ॥
चार-(चारो ओर देख कर)
प्रॉचल सन ढाँके मुस फेरे।
जात दूर साथी अब मेरे ॥
सुरा के दिन और हिन होई ।
बिपत परे पै हित नदि कोई॥
दोनो चाँडा-मेने सव को हटा दिया अब इसे ले चलो।
चारु--('मैत्रेय क्या' इत्यादि फिर पढ़ता है)
(परदे के पीछे हाय चाचा! हाय चारुदत्त जो ।
चारु-(सुन कर करणा मे) अरे चौधरी ! हम तुमसे एक
माँगन मांगते हैं।
चाँडा-अरे हमसे मांगन मांगते हो?
चारु-राम ! राम ! समझे बूझे काम करनेवाला पालक
चांडाल है, तुम तो उससे अच्छे हो । हम चाहते हैं मरने से पहिले
घेटे का मुंह देस लें।
दोनो चौडा-हुत अन्छा।
(परदे के पीछे) हाय चाचा, हाय बाबू ।
चारु-(सुन कर करणा से) चौधरी, हम अपने बेटे का
मुंह देखना चाहते हैं , यह पा रहा है।
चाँडा-टो जा एटो, चारुदत्त अपने बेटे का मुंह देख लें ।
(नेपथ्य को प्रोर देख कर ) इधर प्राइये, इधर पा चे लडके,
इधर।
(बाहर जाते हैं)
[ दूसरा स्थान-सड़क पर दूसरी जगह ]
(रोहसेन के साथ मैत्रेय प्राता है)
मैने-चलो भेया चलो, तुम्हारे बाप को मारने के लिये जा
मृच्छाटिकभापा (नीसरा स्थान-सरकारी सड़क पर सीमरी जगह) (कोठे के ऊपर स्थावरक बँधा सडा है) स्था-(ढढोरा सुन कर धनराहट से) हाय ! हाय ! चार- दत्त बेकसूर मारे जाते हैं। मुझे मेरे मालिक ने यहां बाँध रक्सा है तो यहीं से चिल्लाऊँ। सुनो भाई सुनो ! मुझ पापी ने चहली के हेर फेर से वसन्तसेना का पुप्पकरण्ड वाग मे पहुँचाया, यहाँ मेरे मालिक ने उससे कहा मेरे पास रह । जव उसने न माना तो गला घोट कर मार डाला । इस भलेमानुस ने नहीं। अरे में दूर है इस से मेरी बात कोई नहीं सुनता। अब क्या कलें, कद पहूँ। (सोच कर ) मेरे कृदने से चारुदत्त जो यच जायेंगे। अच्छा तो इसी टूटी सिडको की राह से कूद पह, मेरे मरने से क्या बिगड़ेगा-यह विचारे न रहेंगे तो भले मानुसों को सरन कौन देगा? मर भी जाऊँगा तो मुझे स्वर्ग धरा है (फद कर) अरे, मे तो बच गया बेडी टूट गई ! चलू जहाँ चौडाल ढढोरा पोट रहे हैं, वहीं चलू ( देख कर ) अरे 'प्रो चांडालो! हटो भाई हटो। (दोनो चांडालों के साथ चारदत्त प्राता है) दोनों चांडाल-यरे को हटो हटो करता है ? स्या--("सुनो भाई सुना" इत्यादि फिर पढ़ता है) चारु-अरे, फॅसा काल के फद में सूरो में ज्यों धान । मोहि वचाचन काज को श्रावत मेघ समान ॥ पाप लोगो ने सुना है। केवल उरत कलक को मरत डरत नहिं कोइ । अजस मिटे का मरन? पुनजम सम होइ॥ और, नीच मूद अति वेवस दूपनभरो शरीर । मारो मेरे सुजसपै विष घुमाय यह तीर-॥ दोनों चांडा-स्थापरकसच कहते - १३८ मृच्छकटिकभाषा चाँडा-भैया हम क्या करें, राजा का हुकुम ऐसा ही है। रोह-तो मुझे मार डालो, चाचा को छोड दो। चाँडा-भैया तुम लाख घरस जियो, तुम बहुत अच्छे लड़के हो। चार-(आँसू भरकर लड़के को गले लगाकर ) धनी दरिद सम दुहुन के एकै नेह अधार । हियो करे शीतल सदा चदन की अनुहार ।। ('गर सोहत कनइर' इत्यादि फिर पढ़ता है, देखकर आपही प्राप'आँचल सन' इत्यादि फिर पढ़ता है)। मैत्रे-भाई चाँडालो ! चारदत्त जी को छोड दो, हमें मार डालो। चार-राम ! राम ! यहच्याकहते हो (देख कर आपही प्राप) मुख यह " इत्यादि फिर पढ़ता है । (प्रकाश " वैठी" इत्यादि फिर पढ़ता है) पहिला चांटाटो! त्या देखते हैं। लाग्यो अपजस घोर छोडो आसा जियन की। चूडत दृटत डोर सोने के कलसे सरिस ।। चार-(करुणा से "अोठ प्रपाल समाग" इत्यादि फिर . -- पढ़ता है) दूसरा चांडा-अरे फिर पुकार दे, ढढोरा पीट दे। पहिला चांडा-फिर ढढोरा पीट कर सुनो जी" इत्यादि पढ़ता है। भई हाय मेरी ऐसी गति । प्राणदडह में महिं कछु छति ।। यहै होत सुनि दुख अपारा। कहै जो नीच ताहि में मारा। (सब बाहर जाते हैं) .
१४१ न मृच्छकटिकमाषा स्था-अरे नीच! वसन्तसेना को मारके तेरा पेट नहीं भरा, अव याचकों के कल्पवृक्ष चारुदत्त को भी मारना चाहता है ? सस्था-अये हीरा मोती के डिवे लिये ऐसीलुगाई हम मारेंगे? सब-तुम्हीने तो मारा, चारदत्तजी ने नहीं मारा। सस्था-कौन कहता है। सर-यही भलामानुस। मस्था-(अलग उरता हुआ ) अरे यापर बाप ! मैंने क्या किया ? लौड़े को अच्छी तरह न बांधा था। मेरे पाप का साखी यही है । ( सोचकर ) अन्य तो अब यह करूँ (प्रकाश) प्रजी यह लौंडा झूठ बोलता है, इसने हमारा सोना चुराया था सो हमने इसे मारा पीटा था, यह तो हमारा वैरी है, इसका कहना कैसे सच हो सका है ? (आड़ करके स्थायरक को साने का कडा देता है) बेटे स्थाघरक! यह लो और कह दो कि चारुदत्त ने मारा है। स्था-(कडा लेकर ) देखो लोगो, यह हमे कड़े का लालच दे रहा है। सस्था-( स्थाधरक के हाथ से कड़ा छीन कर) देखिये, यही कडा है जिसके कारन हमने इसे चाँगा था। अजी चौडालो' इमने इसे गहनों के घर में रक्ता था, इसने सोना चुराया. हमने इसे मारा पीटा था, तुम्हें परतीत न हो तो इसको पीट दोनों चांटाल-ही जी, पाप सच कहते हैं, निगडा हुअा नौकर क्या क्या नहीं कहता। स्था-हा! दासपना कैसा बुरा होता है कि सच बोलो तो भी कोई परतीत नहीं करता। (करणा मे) चारुदत्त जो ' मेरा क्या घस है ? (पाँच पड़ता है)। चार-उठहु तात कारन विना मे तुम धधु हमार! करी दया तुम सुजन पै वृडत दुख अपार ॥ मृ०-१० देख लो।
१४० मृच्छकटिकमाषा स्था--सच नहीं तो क्या ? इमी डर से तो मुझे कोठे ऊपर बेडी पहना के का किया कि किसी से कह न हूँ। (तस्थानक पाता है) सस्था-(हर्प से)। महरी साग पात तरकारी। सट्टी कडुई मांस वधारी ।। चीनी के सग भात बनाया। हम सुख सग अपने घर साधा। (सुन कर) फूटे कांसे के बरतन की नाई चांडालो की बोली सुन पड़ती है और ढढोरा पिट रहा है, इससे जान पड़ता है कि चारुदत्त को सूली देने के लिये जा रहे है , तो मै भी चल कर देग्यूँ । वैरी के मरने से मन को बड़ी खुशी होती है। हम ने सुना है कि जो लोग वैरी का मारा जाना देखते हैं उन्हें दूसरे जन्म मे आँख का रोग नहीं होता। हम बहुत दिन से ताक में रहे , विषम गांड में जैसे कोडा घुस जाता वैसे ही अवसर पाकर चारुदत्त के नास का उपाय किया, अपनी अटारी पर चढ़ कर अपना करतब देखें । (चढ़ कर देख कर, अरे) दरिद्र चाल्दत्त को मारने के लिये जाते हैं तो इतनी भीड इकट्ठी हो रही है, जब कहीं हम ऐसे बहादुर को मारने लेजायगे तो कैसा होगा ? (देस कर) अरे, नये बैल की नाई रेंग के इसे दक्खिन ले जा रहे हैं, हमारे महल के नीचे क्यों डढोरा बन्द किया गया । (देस कर) अरे स्थावरक लौडा कहाँ गया ? ऐसा न हो कहीं जाके भौडा फोड दे। देरौं कहाँ गया ( उतर कर चांडालो के पास जाता है)। स्था देखिये यह पागये। दोनों चाँडाल-देहु किवाडे चुप रहौ भागो छाँडो गेल । दुटपने को सींग को प्रापत है यह बैल ॥ सस्था-हटो जो हटो । (आगे बढ़ कर) बेटे स्थापरक प्रामी । चलो। - मृच्छकटिकभाषा १४३ (रोहसे। मैनेय के साथ जाता है) दोनों चाडा-यह तीसरी जगह है, यहाँ ढंढोरा पीटी (फिर ढंढोरा पीट कर सुनो जी इत्यादि कहते हैं) सस्था-लोगो का विश्वास नहीं होता (प्रकाश) अवे चारुदत्त ! लोगों को परतीत नहीं होती, तू अपने मुंह से कह कि मैंने बसन्तसेना को मारा। चार-(चुप रहता है) सस्या-अजी चारदत्त नहीं बोलता तो तुम लाठी से मार के इससे कहलायो। चौडा--(लाठी उठा के) चारुदत्त, कहो । चार-(करणा से) इयो महा पिपति के सागर । नहिं मोहि दुस नहीं मोहि कछु डर ॥ फहन परत प्यारिधि में मारा। यह जराघत हृदय सस्था--अ चारदत्त ! “लोगों को परतीत नहीं" (इत्यादि हमारा॥ फिर पढ़ता है) चारु-अरे, नगर के लोगो में पापी हत्यार" (इत्यादि फिर पढ़ता है) सस्था--मारी। चार-हो। पहिला चांडा-अजी आज तुम्हारी वारी है। दूसरा चांडा-न, तुम्हारी है। पहिला चांडा-अच्छा लिरा के देसो ( बैठकर लिखते हैं) पहिला चांडा-अच्छा, जो मेरी बारी है तो ठहर जानो। दूसरा चौडा-क्यों? पहिला चाँडा-चाप जय मरते थे तो कहने लगे 'बेटा वीरक जब तुम्हारी वारी मारने की हो तो उतावली न करना। दूसरा चाँडा-क्यों? - १४२ मृच्छकटिकभाषा मोहि बचावन हेत तुम कीन्हें बहुत उपाय । सब कुछ कीन्हो तात तुम देव न मानत, हाय ! दोनो चांडा-सरकार ! इस लोडे को मार कर निकाल दीजिये। सस्था-निकल वे (वाहर निकाल देता है) अरे चांडालो! क्यों देर कर रहे हो, मारो इसे । चौडा-तुम्है बडी उतावली है तो, तुम्ही मारो। रोह-अरे चांडालो! चाचा को छोड दो, मुझे मारो। सस्था-अजी इस को भी मारो, इस के लड़के को भी मारो। चारु-यह गधा सब कुछ कर सकता है, वेटा तुम अपनी मां के पास चले जायो। रोह-मैं जाके क्या करूं? चार-चले जाव तीरथ अवे लै माता निज साथ ।' नहि अचरज पितुदोप जो बीते तुम्हरे माथ ॥ भाई मैत्रेय, इसे ले जाओ। मैत्रे-भाई, मै तुम्हारे बिना जी सकता हूँ? चार-भाई, तुम को क्या हुआ, तुम क्यों मरना चाहते हो? मैत्रे-(पापही प्राप) यह ठीक नहीं। बिना चारुदत्त के मैं जी नहीं सकता । लडका ब्राह्मणी को सोप कर मैं भी इनके साथ चनू । (प्रकाश ) भाई, इन्हें पहुंचा पाऊँ (चार- दत्त के पाय पडता है, लडका भी रोता हुआ चारुदत्त के पाप पड़ता है) संस्था-अजी, हम तुमसे कहते हैं कि इसको भी मारो, इसके जड़के की भी मारो। (चायठत्त डर का भाव घताता है) दोनों बांटा-राजा का यह हुकुम नहीं है कि बेटे को भी जाधे जड़के भागना।
मृच्छकटिभाषा
चांडा-चारुदत्त जी, आकाश में सूर्य चन्द्रमा रहते हैं उन पर
भी विपत पड़ती है, हम लोगो को कोन गिनतो, काठ के
गिरता है कोई गिर के उठता है ।
गिरत उठत फिरि फिरि जियत फिरि फिरि मिलत शरीर ।
यह विचारि घबराहु जनि धरो समुझि मन धी।
दूसरा चांडाल-यह ढढोरा पीटने का चौथा जगह है
पोट दो (ढंढोरा पीट कर
सुनो जी सुनों" इत्यादि फिर
पढ़ता है।)
चार-हाय प्यारी बसन्तसेना, "नोट प्रवाल समान
(इत्यादि फिर कहता है ) (चांडालों के साथ बाहर जाता
-
"
[चौथा स्थान-सड़क पर एक दूसरी जगह ]
[वसतसेना के साथ सपाइक योगी प्राता है]
योगी-मेरे इस जोगी के भेस ने भी बना उपकार किया जो
हारी माँदी घसतसेना को चगी करके फिर घर पहुंचाता है।
उपासिका ! तुम को कहाँ पहुँचा हूँ।
घसत-मुझे चारुदत्त जी के घर ले चलिये, जैसे कोकावेली
को चन्द्रमा के देखने से सुख होता है वैसे ही उन्हें देख कर में भी
योगी-(प्रापही प्राप) किस राह चलूँ ? (सोच फर)
ही सड़क से चलू । (प्रकाश ) उपासिका आइये, वडी सड़क
चलें, और प्राज यहाँ इतनी भीड भाड हल्ला गुल्ला क्यों हो
नस्त्री हो जाऊँगी।
यसत-(आगे देख कर ) अरे, आज यहाँ इतनी भीड़ क्यों
जोगी जी पूछिये तो आज क्या है जो सारी उज्जैनीउमडीसी
हती है?
- १४४ मृच्छकटिकभापा पहिला चौडा-कदाचित कोई भलामानुस रुपया दे के छुड़ा ले, राजा के लडका हो जाय और सब बॅधुए छोड दिये जाय, हाथी बिगडे और उसके गड़बड़ मे बंधुआ छूट जाय, राज पलट जाय और बेधुए छोड़ दिये जाय । दूसरा चांडा-अरे, क्या कहता है राज पलट जाय ! पहिला चौडा-अच्छा लामा, फिर लिस के देखें आज किसकी बारी है। सस्था-अजी, चारुदत्त को जल्दी मारो। (इतना कह कर स्थाघरक के साथ एकान्त में खड़ा हो जाता है)! दोनो चाँडा-चारदत्त जी, मालिक का हुकुम है हमारा दोष नहीं है, तुम्हें जिसकी सुध करना हो उसकी सुध करलो। नारु-अपने खोटे भाग बली रिपु की कुटिलाई । लाग्यो तदपि कलङ्क होय जो धर्म सहाई ।। तो सुरपति के धाम औरहें कहुँ जहॅ होई। मेटे शीलस्वभाष दोप मेरे सब साई ॥ अव हम कहाँ जाये? पहिला चाँडा-(प्रागे दिसला कर ) यह देखो आगे दक्सिन का मसान है जिसको देखकर वधुओं के प्रान निकल जाते हैं । देखो, देसा, सीचे प्राधी देह स्यार नीचे से ठाढे । प्राधी सूली रहै टॅगी सीसे सब काढे ॥ चार-हाय में प्रभागा क्या करूँ ? (पेसा कह कर जाता है) सस्था-अभी नजाऊँ, चारुदत्त को मरता देख लूँ तय जाऊँ । (घूम के देस कर) अरे यह तो वैठ गया। पहिला चाँडा-चारुदत्त डर गये। चार-(उठ कर)रे मूर्ख! " केवल डरत कलङ्क १ " दि फिर पढ़ता है।)
मृच्छकटिकमाया
(दोनों चारुदत्त को सूली पर चहाय का
योगी और वसत--परे भरे क्या करते हो! काम
यसत- अरे मेही प्रमागि विरो कर मार
वोडा-(देख कर)
झपटी भापति कौन र पौड के हिला
हां हां हां हां करदि है ही हा
बसत चारुदच जो यह क्या है? (द कर निर पहनी
योगी-वामदत्त जो यह क्या हुआ पैरों पर गिर पटना है।
दिला चांडा-(डरता हुआ घट फर) यसतमैना बहुत
'इमा कि हमने येकसूर को नहीं मारा।
(उर कर ) चारमच जीत है?
चांदा-भजी, श्याम जी मोघरस जिय!
घड़े इर्प से) जोगा।
महाराज मंदिर में दगाहामा
।
..
१४६
मृच्छकटिकमापा
(चारुदत्त दो चाण्डालो के साथ प्राता है)
दोनो चौडा- यह सब से पिछली जगह है, यहाँ पर
ढढोरा पीट दो (ढढोरा पीट कर) चारुदत्त जो सम्हल
जाइये, डरिये नहीं अभी एक छिन में श्राप का काम निपटा
जाता है।
चार-हे भगवान!
योगी-(सुन कर घबराहट से ) उपासिका! चारदत्त जी
को मारने को लिये जा रहे हैं और कहते हैं कि इसने घसन्तसेना
को मार डाला है।
वसत-हाय ! हाय ! मुझ अभागिनी के कारन चारुदत्त जी
मारे जा रहे हैं, जोगी जी जल्दी चलिये।
योगी-भाइये, आइये चारुदत्त जो मरने न पायें, हम लोग
उनके पास पहुँच जायें। अरे हटो भाई ।
बसत-हटो जी हटो!
दोनों चाँडा-चारुदत्त जी! मालिक का हुकुम है जिसकी
सुध फरना हो उसकी सुध कर लीजिए।
चारु-"हम क्या कहैं " (इत्यादि फिर पढ़ता है)
पहिला चाँडा-(तलधार खींच कर) चारुदत्त जी! सीधे
खड़े हो जाइये, एक ही बार मे हम आपको स्वर्ग पहुंचाते हैं ।
(चारुदत्त मीधा सडा हो जाता है, चांडाल उसे मारना चाहता
है पर उसके हाथ से तलवार गिर पड़ती है)
चांडा-अरे, वल करि मूठी से पकरि सैंची गही सम्हारि।
बिजुरीसी क्यों गिरिपरी वरती पर तरपारि ॥
मुझे तो अब जान पड़ता है कि चायदत्त जीवच गये।
भगवती सहवासिनी देवी, चारुदत्त जो छूट जायँ तो चाडाल कुल
पर वडी कृपा हो।
दूसरा चांडा-इम लोगो को जो कुछ हुकुम है सो करो।
पहिजा चौडा-अच्छा।
मृच्छकटिकमापा
वसत-(कान पर हाथ धर कर ) राम, राम! उसी राजा के
साले ने मुझे मारा था।
चारु-(योगी को देखकर ) यह कौन है ?
घसत-उस पापी ने तो अपनी जान मुझे मार ही डाला था
इस साधू ने फिर जिला लिया।
चारु-भाई, तुम कौन हो जो विना कारन हमारे सहाय
हुये?
योगी-आप मुझे नहीं पहचानते १ में आपके हाथ पांव दगाने
बाला सपाहक हूँ। मुझे जुआरियो ने पकड़ा था, सो आपका
सेधक जानके बाई जी ने अपना गहना देकर मुझे छुड़ाया ! जुए
से ऐसा जी घबराया कि मे बुद्धमत का जोगी हो गया। यह बाई
जी बहली के हेर फेर से पुष्पकरडबाग पहुंची, वहाँ उस पापी ने
इनसे कहा कि तू मुझे नहीं चाहती और इनको गला घोट कर
मार डाला। मेने देसा-
(परदे के पीछे हुल्लड होता है)
जय जय श्रीवृषकेतु दक्षमष जिन सहारा ।
जय पटवदन कुमार क्रौंच जिन शैल विदारा॥
जय भार्यक नृप जीति लीन निज शत्रुहि मारी।
ध्वजा सरिस फैलास लसत धरती जिन सारी॥
(घबराया हुआ शर्घिलक प्राता है।
शर्षि ~पालक नृपहि नरक पहुँचाई।
प्रार्यक फहँ नरनाह बनाई ।।
सिरधरि तासुपचन प्रयध्यापों।
चारुदत्त की विपति छुडावौं ।
विना मनि घल नृप मो नासी!
समाधान मन करि पुरयासी ॥
जीन्द राज निज प्रपल प्रमाऊ।
यजाको राज मनहुँसुरराऊ ।
स - मृच्छकटिकमापा घबराहट में देख परी है।। पाही प्रहै फै नहीं मरी है। मोहि जिमावन साह, के उतरी यह स्वर्ग से ? के दूसरि यह कोइ, रूप घही का है धरे ? वसत-(उठ कर पैरों पर पड़ कर ) चारुदत्त जी! मे पही पापिनी है जिसके कारन तुम्हारी यह दशा हुई। (परदे के पीछे) वडा अचरज है कि वसन्तसेना जीती है! चारु-(सुनकर उठकर आँखें बन्द किये हुये हर्प से) प्यारी, तुम वसन्तसेना हो? पसंत-मैं ही अभागिनी हूँ। चारु-(देखाकर हर्प से) यह वसतसेना है ? (प्रानन्द से) आँसुन नहयावत उरज मोहि मृत्युवस देखि। आई च्यावन मोहि जनु विद्या कोउ बिसेखि ॥ प्यारी घसतसेना, तघ हित चलन चहन मम प्राना ।। तुमही प्राय कोन्ह मम घाना ॥ प्रियसगमकर यही प्रभावा। मरि के कौन जीष फिर आधा।। प्यारी, देखो- लाल वस्त्र वधचोन्ह ए फूलन को यह माला' ला, बरसिंगार से दुलहिन भावन काल ॥ चलत बजावत ढोल जो मोहि मारन के हेत। तिनकी व्याहमृदग प्यों बोल सुनाई देत ।। वसत-यह प्रापने क्या किया? चार-प्यारी, मैने तुमको मारा। पहिले को वैरी घली यहि छन प्रौसर पाय । आप नरक में जाय किय मेरे नासउपाय ।। - .
मृच्छकटिकभापा की पहिली बात तो माननी ही चाहिये (घूम कर) अरे, पाजी राजा के साले को पकड तो लायो। (परदे के पीछे ) बहुत अच्छा, सरकार । शर्षि-राजा पार्यक ने कहा है कि हम को यह राज आप ही की कृपा से मिला है, इसे श्रापही सभालें। चारु-हमारी कृपा इसमें क्या थी? (परदे के पीछे) अरे राजा के साले ! चल अपने दुष्टपने का फल ले । (सस्थानक का हाथ पीछे बधा हुया है और उसे दो सिपाही लाते हैं) सस्था-अरे दैया रे दैया! दूर हेराना गदहा जेसे । कृकुर सम लाये मोहि तैसे ॥ (चारों ओर देरा कर ) मे तो चारों ओर से बँध गया अव मेरा बचानेवाला कोई नहीं है-कहाँ जाऊँ क्या करूँ ? (सोच कर) चिपति में पड़े को सरन देनेघाला घही है (आगे पढ़ कर ) चार- दत्त जो दुहाई है ! मुझे वचाइये ! (परदे के पीछे) चारुदत्त जी, इसे हमारे हवाले कीजिये हम इसको मारें। सस्था-(चारुदत्त से) दुहाई है। तुम्हारी सरन हूँ ! चार-(दया से) शरणागत को अभय । शर्षि-(घडा कर) अजी, इसको चारुदत्त के प्रागे से ले जाओ। कहिये इस पाजी को क्या किया जाय? भले वाघि अंग अंग सिंचघाइय? । कै यहि कुचन से नुचपाइय? के यहि की चोटी कटवाइय? कै यदि सूली पर चढ़पाइय? ।
-- १५० मृच्छकटिकभाषा (आगे यह देख कर ) जहाँ यह भीड़ लगी है यही होगे। राजा आर्यक का पहिला काम चारदत्त जी को बचाना है, उसे भगवान सुफल करें। अच्छा (जल्दी चल कर ) हटो रे हटो ( देखकर) चारुदत्त जो जीते हैं ? बसन्तसेना भी यहीं है। हमारे स्वामी के मनोरथ पूरे हो गये। वूडन चाहत महा दुख के सिधु अपारा । प्रिया शील की खानि ताहि निज गुनन उवारा॥ धन्य भाग हम सबन केर देखे यहि अवसर । महापुरुप, यह ग्रहन छुटे चांदनि सँग हिमकर ।। मैंने तो वडा पाप किया है, इनके सामने कैसे जाऊँ ? अजी सिधाई सब जगह अच्छी लगती है। (आगे बढ़ कर हाथ जोड कर) चारुदत्त जो चारु-श्राप कौन हैं? शर्षि-तुम्हरे घर जिन सेंध करि थाती लई चुराय । दोपी से मांगत अभय सरन तुम्हारी प्राय । चारु-आप ऐसा न कहिए, आपने तो बड़ी कृपा की थी। (गले लगाता है) शर्वि-आर्यचरित आर्यक नृपति राखत कुल नौ मान । मारयो पालक भूप को मस महें पशू समान ।। चारु--क्या? शर्षि-यो तुम्हारी सरन जो तुम्हरे रथ चढ़ि जाइ । मारो पालक भूप की मस मह पशु सम सेाइ ।। चार-शर्पिलक, पही जिन्हें राजा पालक ने घोसीपुरे से बुजा. कर विना कारन कैद किया था और तुमने छुडाया था ? शर्षि-जी हाँ। चार बहुत अच्छा हुआ। शर्षि-आपके मिन राजा प्रार्यक ने राज पाते ही वेणा के किनारे कुशावती का राज प्रापको दिया । आपको मित्र , -
मृच्छकटिकमापा
। वाग्दत्त जी की यह धूताबाई प्राचल पकड़े हुए लड़के
क कर जलती आग में कूदना चाहती हैं, लोग उन्हें रो रो
निा चाहते हैं पर नहीं मानती!
- सुन कर नेपथ्य की ओर देख कर) अरे क्या है
-
(चदनक प्राता है)
दिदेखिये, महाराज के महल के दस्सिन कैसी मोड
हो रही है। चारुदत्त जी की यह धूताबाई ( इत्यादि
कहता है) मने तो उनसे कहा कि साहस न कीजिये,
दत्त जो अभी जोते हैं, पर दुख से व्याकुल कौन सुने,
मानेर
वारु-(घबरा कर) हाय प्रिया, तुम ने मेरे जीते जी क्या
लिया (ऊपर देख कर साम लेकर)
चरित तुम्हारे जोग रहे न जो यहि लोक के।
करन स्वर्गसुखभोग पति बिन सती उचित नहीं।
(बेसुध हो जाता है)
गर्षिोह ! सर विगडा जाता है।
जल्दी को तो काज, आप यह बेसुध परे।
सब गिरत है आज, कियो जतन जेहि हेत यह ॥
सत-उठिये, चल कर पाईजी को जिलाइये, श्राप के
नेि से अनर्थ हा जायगा।
चार-(जाग कर जल्दी से उठ कर)हा प्रिया! कहाँ हो
है?
चढ-उधर पाइये, इधर।
मार्वियाईजी प्राग के पास पहुंच गई है, जल्दी चलिये।
चाय--(जल्दी जल्दी चलता है)
(सप बाहर
H
मृच्छकटिकमाषा
पारु-जो हम करेंगे यह कीजियेगा?
शर्षि - इसमे भी कुछ सदेह है ?
सस्था-चारुदत्त जी दुहाई है ! तुम्हारी सरन हूँ ! तुम अपनी
मोर देखो। मैं ऐसा काम फिर न करूंगा।
(परदे के पीछे ) मारो इम पापी को, फ्यो छोडते हो?
(वसन्तसेना चारुदत्त के गले से माला उतार कर सस्थानक
को पहिना देती है)
सस्था--भारी ! अब हम तुझे न मारेंगे, हमे बचा ले।
शवि-अजी हटाओ इस को। वारदत्त जी, कहिये इस पापी
का क्या किया जाय?
चार-जो हम कहेंगे घही कीजियेगा।
शर्वि -इस में भी कुछ सदेह है?
चार-सच?
शर्वि-सच।
चारु-तो इसे जल्दी-
शवि-मार डाले?
चारु-नहीं छोड दीजिये।
शर्षि-क्यों?
चारु-वैरी जय अपराध कर और पैरों पर पड़ कर सरन
मांगे तो उस पर हथियार नहीं उठाना चाहिये।
शर्षि-तो इसे फुत्तों से नुचवा डाले ?
चारु-नहीं, उपकार से मारना चाहिये।
शर्षि-कहिये क्या करें।
चार-छोड दीजिये।
शर्वि-छोड़ दो।
सस्था-अरे वच गये! बच गये!
(सिपाहियों के साथ बाहर जाता है)
(परदे के पीछे हुल्लड़ होता है)
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गोद । खटकती है कसकती है। [१४१] नए-झुके। उनते = उनसे बढ़कर या बड़ा । [१४२] बकसियो-क्षमा करना । और मजरी। १४३] वन = ओर । धो = तो । परमारथ = परमार्थ रूपी औषध । राजदोष प्रबल रोग । [१४४] अनुदिन-प्रतिदिन । [१४६] दै गए- दिए हुएगए । [१४७] बापुरे चारे । छार = धूल । [१४८] आयसु- आदेश, आज्ञा । वारि० == निगवर करके । नव० = नौ टुकड़े करके, टुकड़े टुकड़े करके । [१४९] तर = नीचे । मचु- सुख । [१५१] मुखेत= रणक्षेत्र । नारि-पानी, चमक । [१५२] बाय = बात विकार । पय- निधि = समुद्र। [१५३] अरेः =अड गए हैं। राचे = अनुरक्त । वरु - अत्यत टेढे । सीतल = जिनके सचार (ध्यान) से हृदय ठढे हो गए हैं । अमिय० To = अब ये अमृत से विप में जा पदे। [१५४] बढक्त० = उसकी ओर काला सर्प क्यों बढ़ाते हो । हारे-विवश होने पर । अछत- रहते। [१५५] फूलेल- सुगधित तेल । नगाँठे । भाघोरी- भारी । ताटक-कान का गहना । जोति= शोमा । सार- घनसार, कपूर, असवास =(आश्यास ) सुगधित साँस । आफ%3( अर्क) मदार । [१५६] अधिकार अधिक । सारे तत्य [१५७), बायस = कौआ। अंचयो- पिया । वजी०= एक ही दग के बाजे बजे, सब एक ही रगत के हैं। ताति-तत्री, बाजा । [१५९] कनियों = गोद । [१६०] कलेवर- शरीर । सौरीलेप । पिगरी दुपट्टा 1 [१६१] ज्यों भुवग०% जैसे उस सर्प की 'क जिसकी मणि छीन ली गइ हो। दवा भीषण ज्वाला। [१२] अचर = अच्छे वन्न । गुरु० जो योग के हमारे गुरु हैं वे कुछना ये हाय की माला है। उसके शारे पर नाचनेवाले हैं। [१६३] दाम - रस्सी । रानि : हाथ । चोरी-चोरी न सोलंगी। आनि आफर । हठिौकादेने का हठ न करेंगी। जावक - महावर । बट-सर-सरगद सँकेत - सफेतस्थल । चढ़ाय-बैठाकर । [१६०] निरति. अश्रफी असर पाय यहने लगी। प्रेम प्रेम की व्यथा । खारे% कहुए - बुझी । अतर-गति- हृदय के भीतर । सुचित = स्वस्थ होकर | कमल योगियों के स्टचक्र जो कमल के रूप में माने जाते हैं । [१६९] लाइ % मन लगाकर । सुमति मति = अच्छी बुद्धि । पै - निश्चय । [१७०] गात = गाते हुए । सुनातः सुनाते थे। परसात - छाई है। [१७] सिंपी- सींग का बाजा। [१७३] ल्हनौ = प्राप्य । बर = दूल्हा, पति, प्रिय । सँघाती= साथी, सखा । [१७५] सरै = ( सूर्य के रथ की ओर ) जाता है, उसे प्राप्त करता है। [१७६] उल्लभी प्रेमिका । मधुर = जो मीठी बोली बोलनेवाले हैं। वृक= भेड़िया । बच्छ - वत्स, बछड़े । असन = भोजन । बसन = वल । सत= शत, सैकहो । [१४७] रस =3 बपी करता है। कर० = हाथ में कड़ा और दर्पण लेफर (बड़ा ढीला पड़ गया है। दर्पण मे मुख विवर्ण दिखाई पड़ता है)। एतो मान : इतना अधिक कष्ट सहने पर भी। [१७८] सहियो सहना । मकरध्वज = काम । बहियो- अश्रु -प्रवाह के कारण । [१७९] पय - जल । पय मों - पानी से भी आग लग रही है। हा हरि० 'हा हरि, हा हरि जो कहती है उसी मात्र के पढ़ने के कारण इस आग में जलकर भरम नहीं होती । [१८०] गहरु = देर, बिलय। [१८१) कहा बने हैं = क्या गत । अब हम० - हम चुपचाप वहा पत्र लिए देंगी कि ये तो गोकुल के अहीर है, वह पत्र उन्हें मिलेगा भी नहीं। [२८२] रूपहरी हरि का रूप, सारूप्य मुक्ति । सुरु-शुकदेव । स्यामा- युवती स्त्री। [१८४] भने - कहै। कह० = क्या उन कानों में कड़ी की चोट करते हो । रग चुनै - प्रत्न करने पर भी। [२८६] बकी = पूनना । दोपन: दोष अर्थात् विषमय हो जाने से । तनाव्रत-तृणावर्त । केसी- केशी नाम का दैत्य । [१८७] घाए-घात, चोट । कहि० = पहना पड़ा । [२८८] स्माल = रसमय, कर्णसुखद । तरनि० = सिर का तिलक सूर्य की भाति दाहक है। भुवाल = भूपाल, राजा। [१८९] बहिबी = निर्वाह करना । [१९०] दासनिदासि = दासानुदासी, दासों की दासी । [१९१] चेत० - बेसुध अवस्था। रेती - पाल का मैदान । [१९३] अव- ०%D 3 भोपध काम - (5) गाई-दुख में डूबती है। [१६४] स्याम श्रीकृष्ण को पीडा में पगा हुआ । ऋषि-शुद्ध 'नाज, सीधा। [१६६ ] पुलिन = नट ! [१६७ ] घिरह चीज विरहमय । सरिल० - अधर-माधुरी के नल में मिलाकर । पल न० = औषध का कोई पल नहीं लगता, नहीं करती। परै हो। [१६८] हे = थे । दाम = रस्सो मे । पति = प्रतिष्ठा । रसनिधि - प्रानन्द के सागर । [१६] नह नग%D प्रेमरूपी रत्ल । बुझानी = समझ में आई । [२००] हमरे० = हमारे गुण गांठ में क्यों नहीं बांधे, हमारे गुणों का विचार क्यों नहीं किया। [२०१] देह० == शरीर दुम्ब की सीमा नहीं पाता, दुत्रों का अन्त नहीं मिलता। [२०२] श्रान =शपथ । आमिपमास । हितप्रिय I गिरा = छोटी सारगी, चिकारा । सुर अनि । लग = तक । प्रजभान = प्रज- मानु, श्रीकृष्ण । [२०४] चारी=छेडी | साली-धंसी । प्रजबाली= मन की बालाएँ । [२०५] इतने हतो पक्ष । प्रतिपारे-पाला. पोसा । विहारे-नष्ट कर दिए । कोर - नामिका । कपोत- गर्दन । कोकिला-वाणी । खजन = भाखें । [२०६] सत्वर = शोध । मधु- रिपु-श्रीकृष्ण । जगी= जागरण काय काढा । भूरि-जडी । सुख अनुकून, लाभदायक । [२०८] नियर्ति पूजा करके। [२१०] भराध== भाराधना करे। यरीम - वप । पुरवौ = पूर्ण कर दो। [२११] रीते= रिफ, खाली । कारन = कालों की ! फेरनि = लपे, पहनावा । घेरनि: एकन करना, घराना । कार= कहा। [२१३] घोप बालों का गांव । सपुट पदे । दिनमनि-सूर्य। [२१४ ] रथ पलान्यो - रय पर चढ कर गए। [२१७ ] पाहन =(पापाण) पत्यर, कठिन । [२] जावदेक = यावन्मान, सयको । [२१९] चित० =मन । [२०] विधिo = ब्रह्माकी काहार । घर- घना, शरार। दरसन० = दबने का आशा ही पड़ों का फेरा जाना है। कर० = श्रीकृष्ण के काम आए, उनके लिए शकुन-सूचक हुए। [२२१] काशी-कत्ता, छुरा ! मवाती %3- - - - स्वाती [२२२] निमि लौरोत भरे। सीति-शीत, उठा | पुरवा = पूर्व से आनेवाली वायु, पुरवैया । गए। उसने हमारे शरीर सरलता से जीत लिए है। [२२३] चौरासी = अनेक प्रकार की। हरिहरकर । [ २२४ ] लोकडर-हमारा प्रेम प्रकट करने से श्रीकृष्ण को लोकापवाद का भय है (लोग कहेंगे कि ये गवारों क साथ रहते थे । [२२५] पो कुल-वह वश ( यादयों का), जिससे जन्म लेने पर यिछुड गए थे। गर्ग = गर्ग ने कहा था कि श्रीकृष्ण मथुरा और फिर द्वारका में आ बसेंगे । जो कुल = यह सत्र । जाति-जाति ! [२२६] अनहद = अनाहत नाद। कुमाड-कुम्हडा। भजा-बकरी। अधाना : तृप्त होना । [२२७ ] न परानी नहीं हटा | चम्मति = चचल उद्धिवाली। घेरि० - ठेकतै पिरते है। [२२]-पति-प्रतिष्ठा दुरहु= हटो । असीठ = दृत्त । मति फेरी बुद्धि का फेर । कै सँग मिलकर, जुद्ध कर । श्री निकेत-शोमा के घर । पानिहाथ में। 1ि7= सींग । [२३०] नवतन =(नूतन ) नए ढग से । राचे अनुरस्क हुए । रन- ठोर = श्रीकृष्ण [२३१] पारेकाले; मालिन, कपटी [२३४] ऐन- घर। [२३५ ] कोय० कोन स्त्री थी। राजपध= राजमार्ग ( भक्ति का घोडा मार्ग) । उरक = उलझाने वाला 1 कुबील- कबद खारड, *चा-नीचा | अ = 300 । बदन= मुस। [२३६] कुमोदिनि = कुई । जलजात मिल ! धनमार-कपूर । जीरन - जीर्ण, पुराना [२३७] रिदमान: विद्यमान, उपस्थित । [२३] स्यदन = स्थ । पाय- वात व्याधि से पालो 'सी होकर । { २३६ ] कुम्भ-घडा, जर चरी०= येधारी मछली । [२४१ ] धूरि = मिट्टी, व्यर्थ [२४३ ] कुमा० फूधरी के प्रेम में मतवाले। हेम= थोड़ा भी । परिषद मारपस । म्यामा -पोडशोपा युवती स्त्री, राधिका । कछु०-सुध- उघ यो गई । प्रचाल-नए निकले कोमर पत्तों की भांति , ततन - नरक्षण, तुरन्त । सुहेमः मगल । सुरेस-इन्द्र । रस = मानन्द से - । - N . (१०) भ्रमित गतिवाले होकर, आनन्द में मग्न होकर । सेस =शेषनाग । [२४४ ] अङ्गराज = सुगन्धित लेप । मेदिनो=भूमि । [२४६] बरन = वर्ण, रंग । वा ढग के । मोदि =मलकर । [२४७] समतूरहु- समान । [२४८] बास - वामस्थान । मन्दे = मन्दे यानार में। [२५] बहु० = उसे भस्म रगाने कैसे सुप मिलेगा। [२५०] चौड= अभिलाष । यिसामिविश्वासघाती । तीजो पथ= तीसरा पन्ध ( मुरारेस्तृतीय पन्था )। यह = अधो । साधु = समन, सीधा । [२५२ ] कटु = कही । अनिधि०= श्रीकृष्ण के मगुणरूप के समुद्र से । अनमिल = येमेल (निगुण)। भमोलत= अमूल्य या बहुमूल्य उदरा रहे हो ( मगुण से निर्गुण को बहकर बता रहे हो) [२५३ ] प्रतीत - परे । [२५५] स्याम-सन० = श्रीकृष्ण की ओर देखकर, दाका विचार करके । [ ५६] यारे =यालपन से ही । [२०७] अगाध = भागे अगे। [२८] कचोरा = कटोरा । ताटक, खुभी, खुटिला= फान के गहने । फूली फूल, लौंग ( गहना ) । सारी०= कमल और चन्द्र स अकित साडी । सारस= कमल | गूदर = फटी। [२६] मेद० - पता न चला । यदन को=कहने के लिए निश्चित करने । यायु० - प्राणायाम । ताए = तपाए । [२६० ] संचि० = एकत्र कर रखी थीं । छार धूल | सरवरि० = फूबरी के योग्य । घटी० = बुरा किया । हम जोही हमें देखते रहे, हमें ग्राहक समझते रहे। [२६१] राहत = रहते हैं। कोट= योस की कोठी । [२६२] परेखो = प3. तापा । चारे छोटे । भीर=सकट, कट, कठिनाई । मरयो =पूरा हुआ। घायस० = कौए का भाई, कौमा । [२६३] पत्यानो= विश्वास किया। [२६४] करसायर =मृग । अविधि सो= अन्याय मे । [२६५] सूर = शर, वीर, सूरदास । [.६७ ] यारफ =एक यार । [२६] सोधियो०- नसे पूछना | घात = हत्या । [२६९ ] ज्यो० = जैसे माता अपने जने पच्चे का पालन करती है। [२७०] गुरु०% गुह - - C । २८० ठि- दिग्नाकार पहसासो | को:-किसी प्रकार [२७१] अन्तरमुप भीतर । पाँच० - बामला रोग जिसमें शरीर पर जाता है। गरी = उगमा इभा । उपद = समर । [२७] मदिरा रा पीकर | परागराग की वीफ की रेया । gra पिकुम पपोगुभाम्, पिप का भरा पड़ा, जियो अप हा धारदाने । म कर्म से। [-७४] पुपपुर । नीनिकट । [२७५ ] पि पीछे की भा। 30% यशासी उपकर पी जामिकने । पाछे-पीटते रहीं। कपपहा ममुक्क = मामा करने, मिगो के लिए । [२४६] चितुर =चिपुर, फेश । यह हम प्रकार से । नपन० = नेत्रों को इन पूर्ण करते हुए । यटमारे द्वायू, चोर । [२७] कागर कागा, पर । [२७८ ] ० = कौपट हो मैली माटी है। पाग = पक्षाने से । अनुहारी =सम।। [२७६ ] मीति = दीवार । [: fr= पूर्वक । प्रवेमनि= जल की धारा के प्रवेश | रिसेपनि = विशेष रूप से । [२१] धापन दूत | कदा० - पपावश है। यल = यलदाऊ । [२८२] पातुर = माना जाता है कि वर्षा के प्रथम जल से मरे हुष मेढक जी उठत्ते हैं। निविध= घना। [२३] पारंग: चातय । सूरमा पीर । [२४] नरेतीन । [२५] इते मान = इतना अधिक ! भन्त=मार मत डालो । [२६] सिंधुत्तीर-द्वारका में। [२८७] पा= अयन, बोली । भोपम = भीष्म पितामह की भाति । हाति-विछाकर । दरिन भीष्म पितामह अब युद्ध में घायल हुए तप सूप दक्षिणायण थे, उत्तरायण होने पर उन्होंने प्राण त्यागे। उन्हें इच्छामरण का वरदान पा [२८] तिमेप० = पलकरूपी तट । गोलापुरारी । तर = ओठ और कपोल हो तट का मैदान है। [२८] पोर-पुरा (सोच का विशेषण)। [२९०] एक भर (एकांग ) केरल, निरन्तर । ज्यों मुग्व० = जय वह पूर्ण मुखचन्द्र सामने था । रई = रंगो, यो । सकति गफिमर [ २९१] सारि- - - - = घसा दसन- =पता | गहरु-बिलय । - करता निकालकर, पूरा करक[:२६३ ] कुहू = अावस्या | तमेचुर = तान' मर, मुर्गा। [.९६ ] पारि= प्रह, मुदा बेसन वात । [२९४) बहिश्राग धारण करना है छिपा = रात्रि। [२८] मा=मुझसे । भत्रमाद न ले । [EE) दु०= पेशों का गिरना ही दुर्घ है। मिव= स्तन । [३०० ] तादा) = शरीर का जला | [ ३०१ ] सन =से । [३०३] सोध- अम्बर = आकाश । [३०७] सीरे = उठे सूरमा = पीर । [३१०] राम करन वलराम और श्रीकृष्ण के कारण किसी को कुछ नहीं सम- झता थी। [३११] चिलक = शुद्ध 'तिलक', एक वृक्ष जो वसत में । गपशु = पशुनाति । वलित = युक्त। [३१३ ] दागर= नाशक । [३१५] साधौ = उत्कंठा । [१७] पच्छ =स, पलक । अम्वुअल, सूः। अमृत-अधरामृत । कीर% सुग्गा, नासिका। कमठ शुद्ध 'कमल', 'मुख या नेन । कोकिलो= वाणी । [३१] मन मस्कृत श्लोक यह है-जटा नय वेणी कृतकचकरापो न गरल, कातरीय शिरसि शशिलेखा न कुममम्, इय भूतिना प्रियविरहन मा पवलिमा, पुरारातिभ्रान्त्या कुसुमशर ! कि मां व्यसि । [३२४ ] छपाकर-चत्र, मुम्ब । सारस = कमल ! [३२६] परेखो सोच । पौरिद्वार। [३२] मापति = शिव । सोध= एता पा गया । दमन-दांत से काटने का । नैनन०-सारा होने से। [३३०] भवभूति की रचना यों है-पत्ते चक्षुर्मुलिनि रणकोकिले थालनते, मागे गान क्षिपति पालामादमस्य पायो । दायप्रेम्णा मरमयिमान मारोता , ताम्य मूर्ति यति पहुशो मृत्यवे च पादान् । [३३२ ] यासुनी । सलाका=सलाई (मजन लगानेवाली)। प्रारति = दुम । [३३५] हम= परमहम, प्रज्ञानी । [३३७] कैमे = समान । भागरे= पटकर । [३३८] अल० = मल में शीशी हुयान से बुल्ले निकलते है। मार देर। ।३४०] पास= पाश, गाल । ..