Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shatprabhritadisangrah
Front matter
प्रकरण-सूची
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दर्शनप्रामृत
चारित्रामृत
सूत्रमाभृते
चोधमाभूत
भावप्राभूत
मोक्षमाभत
लिंगप्राभूत ....
शीलप्राभूत
रयणसार
द्वादशानुप्रेक्षा...
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५६-७०
७१-१२७
१२८-३०३
३०४-३७९
३८०-३८५
३८५-३९२
३९३-१२४
१२५-१२५
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भूमिका। इस समहमें भगवरकुन्दकुन्दाचार्य के पदनामृत (दर्शन, चारित्र, सून, योध, भाव और मोक्ष प्राभूत), लिंगमामृत, शीलामृत, रयणसार, और बारह अणुवेक्खा ये पाँच अन्य प्रशशित किये जाते हैं। समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय और नियममार ये चार अन्य पहले कई स्थानों से प्रकाशित हो चुके हैं। अभी तक कुन्दकुन्द स्वामीके बनाये हुए ये नो ही ग्रन्थ उपलब्ध हुए हैं। इनमेसे पद्माभूत सटीक प्रकाशित किया जाता है और शेष र संस्कृत- च्छायासहित । इन पिछले ग्रन्थों की कोई टीका अभीतक देखने सुननेमें नहीं आई। भगवत्कुन्दकुन्द। दिगम्बर जैन सम्प्रदायमें आचार्य कुन्दकुन्द सबसे प्रसिद्ध और सबसे अधिक पूज्य आचार्य गिने जाते हैं। पिछले अधिकांश आचार्योने आपको उन्हीके अन्वय या धाम्नायका बतलाया है। उनकी रचना जैन साहित्य भरमै अपनी तुलना नहीं रखती। अबसे लगभग ६ वर्ष पहले हम उन्के सम्बन्धमें एक विस्तृत लेख प्रकाशित कर चुके हैं। वे द्रविड़ देशके कोण्डकुण्ड' नामक स्थानके रहनेवाले थे और इस कारण 'कोण्डकुण्ड' नामसे प्रसिद्ध थे। ' कोण्डकुण्ड 'का ही श्रुतिमधुर सस्कृत- रूप 'कुन्दकुन्द' हो गया है। 'एलाचार्य 'के नामसे भी ये प्रसिद्ध थे। तामिल भाषाके सुप्रसिद्ध महाकाव्य 'कुरल' के विषयमें महाराजा कालेज विजयानग- रमके इतिहासाध्यापक श्रीयुत एम० ए० रामस्वामी आयंगरने लिखा है कि "जैनियों के मतसे उस ग्रन्थ 'एलाचार्य ' नामक जैनाचार्य की रचना है और तामिल काव्य 'नीलकेशी के टीकाकार समयदिवाकर नामक जैनमुनि कुरलको * देखो जैनहितैषी भाग १०, अक ६-७।
४ अपना पूज्य अन्य बतलाते हैं "1* इससे आश्चर्य नहीं कि कुरलके रचयिता भगकुन्दकुन्द ही हों। कहते हैं एलावार्यने इसे रचकर अपने एक शिष्यको इम लिए दे दिया था कि वह मदुराके कविसंघमें जाकर पेश करे। नन्दिसघकी गुर्वावलीमें लिखा है कि भगवत्कुन्दकुन्दको वि० संवत् ४९ में भाचार्यपद मिला और १.१ में उनका स्वर्गवास हुआ। तामिलदेशके विद्वा- नोंने कुरलकाव्यका रचना-काल भी ईमाकी पहली शताब्दि निश्चित किया है। यदि सचमुच ही वह इन्हीं एलाचार्यका बनाया हुआ है, तो पावलीके समयके साथ उसका रचनाकाल मिल जाता है। हमने अपने पूर्वोल्लिखित लेखमें भगवस्कुन्दकुन्दका ममय विक्रमकी तीसरी शताब्दि निश्चित किया था। उसके बाद जैनसिद्धान्त-प्रकाशिनी संस्थाद्वारा प्रकाशित 'समयप्रामृत' की भूमिकामें दक्षिणके सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ प्रो. के. बी. पाठकका यह मत प्रका- शित हुआ है कि कुन्दकुन्दाचार्य वि• संवत् ५८५ के लगभग हुए हैं। अपने मतकी पुष्टिम उन्होंने लिखा है कि जिस समय राष्ट्रकूट-वंशीय राजा तृतीय गोविन्द राज्य करता था उस समय, शक संवत् ७२४ का लिखा हुआ एक ताम्रपत्र मिला है । उसमें निम्नलिखित पद्य दिये कोण्डकोन्दाम्बयोदारो गणोऽभूवनस्नुत । तदैतद्विपयविख्यातं शाल्मलीग्राममावसन् । भासीद(1)तोरणाचार्यस्तपःफलपरिग्रहः । तनोपशमसंभूतभावनापास्तफल्मप ॥ पण्डितः पुम्पनन्दीति बभूव भुवि विश्रुतः । अंतेवासी मुनस्तस्य सकलचन्द्रमा इच ॥ प्रतिदिवममयदृद्धिनिरस्तदोपो ध्यपेतहृदयमलः । परिभूतचन्द्रविम्बस्तच्छिष्योऽभूप्रभाचन्द्रः । उक्त तृतीय गोविन्द महाराजके ही समयका शक संवत् १९ का एक और ताम्रपत्र मिला है, जिसमें नीचे लिखे पर है 1 - EM देखो जैनहितषी भाग १५ अक १-२ ।
भासीद (1) तोरणाचार्यः कोण्डदाम्बयोदयः । स वैतद्विषये श्रीमान् शामलीग्राममाश्रितः ।। निराकृततमोऽरातिः स्थापयन् सम्पये जनान् । स्वतेजोद्योसितक्षौणिश्चण्डार्विरित यो बभौ ॥ तस्याभूरपुष्पनंदी तु शिष्यो विद्वान् गणामणी । तटिप्यश्च प्रमाचंद्रस्तस्येयं घसतिः कृता ॥ इन दोनों लेखोंका अभिप्राय यह है कि कोण्डकोन्दान्वयके तोरणाचार्य नामके मुनि इस देश शाल्मली नामक ग्राममें आकर रहे। उनके शिष्य पुष्पनंदि और पुष्पनन्दिके शिष्य प्रभाचन्द्र हुए। पाठक महोदयका कथन है कि पिछला ताम्रपत्र जब शक सवन् ७१९ का है तो प्रभाचन्द्र के दादा-गुरु तोरणाचार्य शक संवत् ६०० के लगभग रहे होंगे और तोरणाचार्य कुन्दकुन्दान्वयमें हुए ह-अतएव कुन्दकुन्दका समय उनसे १५० वर्ष पूर्व अर्थात् नक सवत् ४५० लगभग मान लेने में कोई हानि नहीं है। चालुक्यवंशी कीर्तिवर्म महाराजने बादामी नगरमें शक सवत् ४००में प्राचीन कदम्बवंशका नाश किया था और इसलिए इससे लगभग ५० वर्ष पूर्व कदम्ब- वंशी महाराज शिवमृगेशवर्म राज्य करते थे ऐसा निश्चित होता है। पवास्ति- कायक कनड़ी-टीकाकार बालचन्द और सस्कृत-टीकाकार जयसेनाचार्यने लिखा है कि यह प्रन्थ आचार्य कुन्दकुन्दने शिवकुमार महाराजके प्रतिबोधके लिए रचा था और ये शिषकुमार शिवमृगेशवर्म ही जान पड़ते हैं । अतएव भगव- स्कुन्दकुन्दका समय शक संवत् ४५० ( वि. ५८५ ) ही सिद्ध होता है । परन्तु हमारी समझमें भगवत्कुन्दकुन्द इतने पीछेके आचार्य नहीं है। जब तक शिवकुमार और शिवमृगशवर्माके एक होनेके एक दो पुष्ट प्रमाण न दिये जावे तब तक इस समयको ठीक मान दोनेकी इच्छा नहीं होती। तोरणाचार्य कुन्दकुन्दके अन्वयमें थे, अतएव यह नहीं कहा जा सरता कि वे उनके १५० वर्ष बाद ही हुए होंगे। तीनसौ चारसौ वर्ष या इससे भी अधिक पहले हो सकते हैं। इस भूमिकाका कोज हो चुकने पर हमे मालम हुआ कि पंचास्तिकायके अंग्रेजी रीकाकार मो. ए. चक्रवर्ती नायनार एम. ए., एल. टी., ने भग- वकुन्दकुन्दके समयके सम्बन्धमें एक विस्तृत लेख लिखा है । उममें उन्होंने ६ प्रो० पाठकके मतका विरोध करते हुए यह सिद्ध किया है कि शिवकुमार महा- राज कदम्बवशी शिवमृगेशवर्मा नहीं, किन्तु पल्लववंशी शिवस्कन्दवमा होने चाहिए । स्कन्द, कुमार और कार्तिकेय पडाननके नामान्तर हैं । अतएव शिव- स्कन्द और शिवकुमार दोनों निस्सन्देह एक हो सकते हैं। पल्लववंशी राजा- ओंकी राजधानी काञ्चोपुर या वर्तमान् गजीवरम् थी। विद्या और कलाओं के लिए यह स्थान बहुत ही प्रसिद्ध था। दूरदूरके विद्वान् और कवि यहाँके दरबार में आते थे। धार्मिक वादविवाद भी वहाँ हाते थे। पहब राजा जैनी या जैनधर्मके आश्रयदाता थे, इसके भी प्रमाण मिलते हैं। उनकी दरबारी भाषा भी शायद प्राकृत थी। 'मायिडावोली' नामका मुप्रसिद्ध अन्य उसी समयका बना हुआ और प्राकृतमें है । आचार्य कुन्दकुन्द द्रविडदेशके थे। इसके अनेक प्रमाण हैं, अतएव उना शिष्य शिवकुमार यही शिवस्कन्दवमा होगा और उसका अवस्थितिकाल विक्रमकी प्रथम शताब्दि है। श्रीश्रुतसागरसूरि। पटप्राभूत या पदपाहुड़के टीकाकार आचार्य श्रुतसागर बहुश्रुत विद्वान् थे। इस टीकासे और यशस्तिलक-चन्द्रिकाटीकासे मालूम होता है कि वें कलिकाल- सर्वज्ञ, कलिकाल गौतमस्वामी, उभयभाषाकविचक्रवर्ती आदि महती पदवियोंसे भलकृत थे। उन्होंने 'नवनवति'(१९) महावादियों को पराजित किया था। वे मूलसघ, सरस्वतीगच्छ और बलात्कारगणके आचार्य और विद्यामन्दि भट्टारकके शिष्य थे। उनकी गुरुपरम्परा इस प्रकार धी-पयनन्दि--देवेन्द्र- कीर्ति-विद्यानन्दि। परन्तु विद्यानन्दि भहारकके पट्टपर जान पड़ता है उनकी स्थापना नहीं हुई थी। क्यों कि विद्यानन्दिके बादकी गुरुपरम्परा इस प्रकार मिलती है-विद्या- नन्दि-मल्लिभूषण-लक्ष्मीचन्द । स्वर्गीय दानवीर सेठ माणिकचन्दजीके ग्रन्थभण्डारमें पं. बाशाधरके महा- भिषेक नामक प्रन्थकी टीका है। उसके अन्तमें इस प्रकार लिखा है:- श्रीविधानं दिगुरोबुद्धिगुरोः पादपंकजभ्रमर । श्रीश्रुतसागर इति देशवती तिलकष्टीकते स्मेदं । इति प्रझश्रीश्रुतम्मागरकृता महाभिषेकटीका समाप्ता श्रीरस्तु लेखकपाठकयो । गुमं भवतु ॥ श्री॥ . - ७ संवत् १५८२ वर्षे चैत्रमासे शुकपक्षे पचम्या तिथौ रवी श्रीआदिजिन- चैत्यालये श्रीमूलसये सरस्वतीगच्छे बलात्कारगणे श्रीकुन्दकुन्दाचार्यान्वये भक्ष- रकीपद्मनदिदेवास्तत्प? भट्टारकश्रीदेवेन्द्रकीर्तिदेवास्तत? भट्टारकश्रीविद्यानन्दि- देवास्तपट्टे भट्टारकश्रीमहिमपणदेवास्तप भट्टारकश्रीलक्ष्मीचन्द्रदेवास्तेषां शिष्य- वरब्रह्मधीज्ञानसागरपठनार्थ ] आर्या श्रोविमलभी चेली भट्टारक श्रीलक्ष्मीचन्द्र- दीक्षिता विनयप्रिया स्वय लिखित्वा प्रदत्त महामिपेकभाध्यं ।। शुभ भवतु । कल्याणं भूयात् ॥ धीरस्तु॥" इससे मालूम होता है कि विद्यानंदिके पट्टपर मलिणकी और उनके पपर क्ष्मीचन्द्रकी स्थापना हुइ थी। यशस्तिरकटीकामें श्रुतसागरने मलिभूषणको अपना गुरुभ्राता लिखा है। इससे भी मालूम होता है कि विद्यानदिक उत्तरा- धिकारी मलिभूषण ही हुए होंगे। यशस्तिलकचन्द्रिका टीकाके तीसरे आश्वासके अन्त में लिखा है- इतिश्रीपानदिदेवेंद्रकीर्तिविद्यानदिमल्लिभूषणाम्नायेन भद्वारकश्रीमलिभूषण- गुरुपरमाभीगुरुभ्राता गुर्जरदेशसिंहासनभट्टारकधीलक्ष्मीचन्द्रकाभिमतेन मालव. देशभधारकश्रीसिंहनदिप्रार्थनया यतिश्री सिद्धान्तसागरव्याख्याकृतिनिमित नवन वतिमहामहावादिस्याद्वादलब्धविजयेन तव्याकरणछदोऽलकारसिद्धांतसाहित्यादि शाखनिपुणमतिमा प्राकृतव्याकरणाद्यनेकशास्त्रचञ्चुना सूरिश्रीश्रुतसागरेण विर. चितायां यशस्तिलचदिकाभिधानाया यशोधरमहाराज चरितचम्पुमहाराभ्यटोकाया বগমসেততালিনীৰৰলি ব্যস্ত বুনীয়ামেনিস্কা ধৈঞ্চা” इससे मालूम होता है कि उस समय गुर्जर देशके पट्टधर भट्टारक लक्ष्मीय स्थित थे और महिभूपणका शायद स्वर्गवास हो चुका था। लक्ष्मीचद्र के बाद भी श्रीश्रुतसागरके पहाधिकारी होनका कोई उल्लेख नहीं मिलना । जान पडता है वे कभी सिहासनासीन हुए ही नहीं। ये पमनदि, विधानदि आदि सब गुजरातके ही भारक हुए हैं। परन्तु यह मालूम न हो सका कि गुजरातकी किस स्थानकी गद्दीको इन्होंने सुशोभित किया था। ईडर, सूरत, सोजिना आदि कई स्थानों में भहारकों के पट रहे हैं । यश- स्तिलककी रचना के समय मालवेके परपर सिंहनदि भधारक थे। इन्हींची प्रेरणासे श्रुतसागरसूरिने नित्यमहोद्योत या महाभिषेककी भी टीका लिखी थी। ।
श्रुतसागरसूरिके भी अनेक शिष्य रहे होंगे। इसी प्र यमालाके तत्वानुसा- मनादिसमहमें इनके एक श्रीचन्द नामक शिष्यकी रची हुई वैराग्यमणिमाला प्रकाशित हुई है। आराधनाकथाकोश, नेमिपुराण, आदि अनेक अन्यों के की ब्रह्मचारी नेमिदत्तने भी-जो मल्लिभूषणके शिष्य थे-श्रुतसागरको गुरुभाव. नासे स्मरण किया है । नेमिदत्तने भी मल्लिभूषण की वही गुरुपरम्परा दी जो श्रुतसागरके प्रन्यों में मिलती है । उन्होंन सिंहनन्दिका भी उल्लेख किया है। श्रुतसागरका अभी तक टाकामयों के अतिरिक्त कोई स्वतन प्राय उपलब्ध नहीं हुआ है। उनके बनाये हुए प्रधों का परिचय आगे दिया जाता है १ यशस्तिलक्चन्द्रिका। यह निर्णयमागर प्रेसी काम्यमाला में प्रकाशित हो चुकी है। यह टीश अपूर्ण है-५ वे आश्वामके कुछ अशकी और छठे आश्वामकी टीका नहीं है । जान पड़ता है, यही उनकी अन्तिम रचना है। यह टीका अनेक स्थानों के अन्यभण्डारोंमें मिलती है, परन्तु सवत्र ही अपूर्ण है। २ महाभिषेकटीका । सुप्रसिद्ध पडित आशापुरजीक बनाये हुए नित्य महोद्योत या महाभिषक नामक प्रथकी यह टीका है। इसका अन्तिम अश ऊपर उदृत किया जा चुका है। उससे मारम हाता है कि उस समय शुन- सागर देशवती या ब्रह्मचारी थे, सूरि या भाचार्य नहीं हुए 21 ३ सरचार्थटीश। यह श्रुतसागरी टीकाके नामस प्रमिल है। इस टेमक निस समय हमें इसकी प्राप्ति नहीं हो सकी । परन्तु यह दुष्प्राप्य नहीं है- इसका भाषानुवार भी हो चुका है। ४ तत्यनयनकाशिका आचार्य गुमान ज्ञानार्णरके भतर्गत जो गधभाग है, यह उसीकी टीका है। इसकी एक प्रति स्व. सेठ मामिजाक प्रथसमहमें मौजूद है। उसकी प्रशस्ति देखिए . * जीया मे मूरिवर्या प्रतीचमलमापुष्पयुक्त थुताधि ||४ तो पादपयोग युग्मकृपया ...श्यादि। -भाराधनाकपाशत्रशस्ति । प्रथन...
९ " "भाचायरिह शुद्धतस्वमनिभिः श्रीसिंहनद्यादयः, संप्राध्य श्रुतसागरं रोक [कि] तयरं माध्य गुभ कारित । गधानां गुणवस्त्रियं विनयतो ज्ञानार्णवस्यांतरे, विद्यानंदिगुस्लमादजनितं देयादमयं सुखम् ॥ इतिधीज्ञानार्णवस्य ( स्थितगडटीचा तत्वनयप्रकाशिना [ का समाप्त [प्ता] ॥ शुभमस्तु ।। ५जिनसहस्रनाम टीका। यह प. आशाधरकृत जिनमहसनामकी विस्तृत टीका है । इसकी भी एक प्रति सेठजीके प्रथसमहमें मोजूद है । शन्द- बोध और व्युत्पत्तिबोध के अभिलापियों के लिए बड़े कामकी चीज है। इसकी भी प्रशस्ति देखिए "श्रीपानदिपरमात्मपरः पवित्रो, देवेंद्रकीर्तिरथ माधुजनाभिवंधः । विद्यादिनदियरसूरिरनरुपयोध., श्रीमलिभूपण इतोम्सु ध मंगलं मे ॥२॥ अदा पहे महादिकमतघटाघनपटुः, घटद्धर्मध्यान पुटपरमभद्वारकपदः । प्रमापुजः संयद्विजितवरवीरस्मरनरः, सुधीलक्ष्मीचन्द्रश्चरणचतुरोऽसी विजयते ॥ ३ ॥ भात धन सुबिदुपा हृदयांबुजाना, आनन्दनं मुनिजनस्य विमुक्तिहतोः सट्टीनं विविधशास्त्रविचारचार- चेतश्वमस्कृतिकृतं श्रुतसागरेण । ४ ॥ श्रुतसागरकृतिवरवचनामृतपानमंत्रयैर्विहित । जन्मजरामरणहरं निरतरं तैः शिवं लब्धं ॥५॥ भस्ति स्वम्नि समस्तपंनिलकं श्रीमूलमघोऽनघं, वृत्त यत्र मुमुक्षुवर्गशिवद संसेवितं साधुभि । विद्यानंदिगुरुस्त्विहास्तिगुणवद्छे गिरः सांप्रतं, तच्छिप्यः श्रुतसागरेण रचिता टीका चिरं नंदतु ॥६॥ इति सूरिश्रीश्रुतसागरविरचितायो जिननामसहस्रटीकायामंतकृच्छत विवरणो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १०॥ श्रीविद्यानंदिगुरुभ्यो नमः।"
६मारतव्याकरण। यह प्रन्य हमें अभी तक प्राप्त नहीं हुआ। यास्तिला टीकामें एक जगह उन्होंने अपने लिए यह विशेषण भी दिया है-“प्राकृत व्याकरणाद्यनेकशानरचनाचम्चुना।" इमसे और पदाहुइटीकामे जो जगह जगह प्राकृत व्याकरणके सूत्र दिये हैं उनसे भी मालम होता है कि इनक बनाया हुआ कोई प्राकृत व्याकरण अवश्य है। इस प्र.का पता लगाने की बहुत आवश्यक्ता है। इनके सिवाय तदीपक, विक्रमग्रवन्ध, श्रुतस्क धावतार, आशापरात पूजा प्रव-धरी टीका, वृहस्थाकोश आदि और भी कर अन्य इनके बनाये कहे जाते हैं। इन्होंने अपने किसी भी प्रथमें अपने समयका उल्लेख नहीं किया है, पर यह प्राय निचित है कि ये पिकमकी १६ वी शतादिमें हुए हैं। क्यों कि- १-ऊपर जिस महाभिषेकटीकाकी प्रतिरा उस किया गया है यह वि. स. १५८२ की लिखी हुई है और वह महारक मविभूषणके उत्तराधिकारी लक्ष्मीचद्रके शिष्य ब्रह्मचारी ज्ञानसागरके पढ़ने के लिए दान की गई है और इन लक्ष्मीय दका उस श्रुतसागरने स्वयं अपनी टीकानों में कई जगह किया है। -आराधनाच्याशरे कनां प्र. नेमिदास वि. १५७५ के लगभग हुए और चे श्रुतसागरके गुरुभ्राता मणि के शिष्य थे। ३-स्वर्गीय धाबादुलीचन्दजीको स. १९५४ की बनाई हस्तरिचित प्रन्योंकी सूचीमें श्रुतसागरका समय वि. संवत् १५५. लिसा हुआ है। ४--पदप्रामृतटीमें जगह जगह गेंहागच्छर तीम भाक्रमण किये गये है और श्वेताम्बरसम्प्रदायमें से यह मूर्तपूजाका विरोधी पथ वि. संवत् १५.८ क रगभग स्थापित हुआ है । अतएव थुममागरका समय इसकी स्थापनामे अधिक नहीं तो ४.-५. वप पीछे अवश्य मानना चाहिए। प्रन्य सम्पादन इम संग्रहका सम्पादन र सशापन पण्डित पन्नालाल जी गोनीन नीर ग्मिी प्रतियोले पिया है। जिन जिन मननीन इस कार्य के लिए प्रय भेजनकी पा की है, उनके प्रति हार्दिक कृतम्ला प्रहर किये बिना हमसे नहीं रहा जाना।
फ-पदपाहुहकी यह सटीक प्रति जो प्राय शुद्ध है जयपुरके लश्करीमन्दि रके भण्डारसे प० इन्द्रलालजी शास्त्रीके द्वारा प्राप्त हुई थी। यह प्राय शुद्ध है। ख-यह सटीक प्रति पूनेके 'डा० भाण्डारकर प्राच्यविद्यासमोधनमन्दिर 'से प्राप्त हुई थी। यह प्राय अशुद्ध है। ग-यह पदपाहुडका मूल पाठ मान है और बम्बई के तेरहपथी मन्दिरके एक प्राचीन गुटके में लिखा हुआ है। घ-यह प्रति सेठ विनोदीराम बालपदजीके फर्म के मालिक सेठ लालच. “दजी सेठीकी कृपासे प्राप्त हुई थी। इसमें मूलके सिवाय बहुत ही सक्षिप्त संस्कृतटीका किसी अज्ञातनामा विद्वानकी की हुई है। यह वि० सं० १६१० की लिखी हुई है। लिंगमाभृत और शीलप्राभृतका सशोधन श्रीमान् प० धन्नालालजी काशलीवालकी एक ही प्रतिपरसे किया गया है। प्रयत्न करनेपर भी इन प्रा. तोकी दूसरी प्रतियाँ नहीं मिल सकी। रयणसारका संशोधन जैनेन्द्र प्रेसके अध्यक्ष प. कलापा भरमापा निटवे द्वारा प्रकाशित मराठी अनुवादयुक्त प्रतिसे और बम्बइके तेरहपथी मन्दिरकी एक हस्तलिखित प्रतिसे किया गया है। इसकी छाया नई तैयार की गई है। बारह अणुवेक्खा जैनप्रन्यरत्नाकर कायालयकी भाषाटीकासहित मुदि । प्रतिपरसे छपाई गई है। सम्पादक महाशयने प्रथसशोधन करनेमें शक्तिभर परिश्रम किया है।इ। पर भी यदि अशुद्धियाँ रह गई हों तो उनके लिए क्षमाप्रार्थना है। बम्बई। माघसुदी १ स. } निवेदक- नाथूराम प्रेमी, मनी। १९७७ वि.।
ॐ नमः सिद्धेभ्यः । श्रीमत्कुन्दकुन्दाचार्यविरचितं षट्प्राभृतम् । श्रीमच्छुतसागरमूरिविरचितया टीकया सहितम् । ग्वृत्तसूत्रयोधापं भावमोक्षसमायं। पहनामृतमिति प्राहुः कुन्दकुन्दगुरूदित ॥१॥ अथ श्रीविद्यानन्दिभारकपदाभरणभूतश्रीमलिभूपणभट्टारकाणा- मादेशादध्येपणारशाहश प्रार्थनारशात्कालिकालसर्वज्ञविरदावलीविराज- माना श्रीमद्धर्मोपदेशकुशला निजात्मस्वरूपरार्ति पचपरमेष्ठिचरणान् प्रार्थयन्त. सर्वजगदुपकारिण उत्तमक्षमाप्रधानतपोरत्नसभूपितहृदयस्थला भव्यजनजनकतुल्या श्रीश्रुतसागरसूरय श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितपट्- प्राभृतग्रन्थ टीकयन्त स्वरुचिनिरचितसद्दष्टयः सम्यग्दर्शनप्राभृतस्यादौ परापरगुरुप्रवाहमङ्गलप्रसिद्धिप्रार्थनपरा नान्दीस्वस्य विवरणमाहुः- काऊण णमुक्कारं जिणवरवसंहस्स वड्डमाणस्स । दसणमग्गं वोन्छामि जहाकम्मं समासेण ॥१॥ कृत्वा नमस्कार जिनवरवृषभस्य वर्धमानस्य । दर्शनमार्ग वश्यामि यथाक्रम समासेन ।। णमोकार. ग । णमोयारे घ । १ उसहस्स ग।
२ पट्पामृते- अष्टपदा नान्दी। वोच्छामि वक्ष्यामि कथयिष्यामि। क पर्ता, अहं श्रीकुदकुदाचार्य । क, कर्मतापन्न दसणमग्गं सम्यग्दर्शनस्वरूपं । कथ वक्ष्यामि, जहाकम्मं यथाक्रममनुक्रमेण । केन कृत्वा, समासेण सक्षेपेण । किं कृत्वा, पूर्व वइढमाणस्स णमुकार काऊण वर्द्धमानस्य प्रियकारिणीवल्लभश्रीसिद्धार्थमहाराजन दनस्याक्तिमतीर्थकरपरमदेवस्य भ- रतक्षेत्रस्थविदेहदशसम्बधिश्रीकुण्डपुरपत्तनोत्पन्नस्य मुवर्णवर्णशरीरस्य किंचिदधिकद्वासप्ततिवर्षपरमायुष सप्तहस्तोन्नतशरीरस्य निर्भयत्वरंजि तसगमनामधेयदेवकृतस्तमनस्य वीरवर्द्धमानमहावीरमहतिमहावीरसमति- नामपंचकप्रसिद्धस्य । नमुक्कार नमोऽस्विति वचनेन मनसा कायेन वचसा साष्टाङ्ग प्रणाम । काउण कृत्या । कथंभूतस्य वर्धमानस्य, जिणवरव- सहस्स जिनवराणा श्रीगौतमादिगणधरदेवादीना मध्ये वृषभस्य श्रेष्ठस्य । इत्यनेन विशेषणन प्रथमतीर्थकरश्रीमदादिनाथादीनामपि सर्वतीर्थ- करसमुदायस्यापि नमस्कार कृतो भवतीति वेदितव्य । दसणमूलो धम्मो उवइट्टो जिणवरेहि सिस्साणं । त सोण सकण्णे दंसणहीणो णे वदिच्चो ॥२॥ दर्शनमूलो धर्म उपदिष्टो जिनवर शिष्याणाम् । त श्रुत्वा स्वर्ण दर्शनहीनो न वन्दितव्य ॥ दसणमूलो धम्मो दर्शनं सम्यक्त्व मूलमविष्ठानमाधारं प्रासादस्य गर्तापूरवत् वृक्षस्य पातालगतजटापत् प्रतिष्ठा यस्य धर्मस्य स दर्शनमूल एवं गुणविशिष्टा धर्मो दयालक्षण । जिणवरहिं तीर्थकरपरमदेवरपर- केयलिभिश्च । उवइहो उपदिष्ट प्रतिपादित । क्षामुपदिष्ट , सिस्माण शिष्याणा गणधरचक्रधरवनधरादीना भव्यवरपुण्डरीकाणा । तं सोउग सवण्णे त धर्म ध्रुवाऽऽकर्ण्य स्वकर्णे निजधरणे आमसन्दमहे । १ सोदूण ग ! २ न के ।
AmAvM दर्शनप्राभृतं । ३ दंसणहीणो न बंदिवो दर्शनहीनः सम्यक्त्वरहितो न वन्दितव्यो नैव चन्दनीयो न माननीयः । तस्यान्नदानादिकमपि न देयं । उक्तं च- मिथ्याग्भ्यो ददद्दानं दाता मिथ्यात्ववर्धकः। अथ कोऽसौ दर्शनहीन इति चेत् तीर्थकरपरमदेवप्रतिमान मानयन्ति न पुष्पादिना पूजयन्ति । किमिति न पूजयन्ति ! मिध्यादृष्टय. किलवं वदन्ति तीर्थकरपरमदेवः किं देवान् पूजयति ? तथा वयमपि न पूजयाम. । पंचमकाले किल मुनयो न वर्तन्ते तदयुक्तं । उक्तं च- भर्तारः कुलपर्वता इव भुवो मोदं विहाय स्वयं रत्नानां निधयः पयोधय इव व्यावृत्तवित्तस्पृहाः। स्पृष्टा फैरपि नो नभोषिभुतया विश्वस्य विधान्तये सन्त्यद्यापि चिरंतनान्तिकचरा सन्त कियन्तोऽप्यमी ॥१॥ मिथ्यादृष्टयः किल वदन्ति व्रते. किं प्रयोजन, आत्मैव पोषणीय', तस्य दुःखं न दातव्यं, मयूरपिच्छं किल मचिरं न भवति, सूत्रपिच्छं रुचिरं, मयूरपिच्छेन आभेटनं छोतिर्भवति तदसत्यं । उक्तं च भगवत्या- राधनानन्धे-- रजसेदाणमगहणं मद्दवसुकुमालदालहुत्तं च । जत्थेदे पंच गुणा तं पडिलिहणं पसंसंति ॥१॥ शासनदेवता न पूजनीयाः, आत्मैव देवो वर्तते, अपरः कोऽपि देवो नास्ति, वीरादनन्तरं किल केवलिनोऽष्ट जाता न तु त्रयः, महापुराणादिकं किल विकथा इत्यादि ये उत्सूत्र मन्वते ते मिथ्या. दृष्टयश्चार्वाका नास्तिकास्ते । यदि जिनसूत्रमुल्लघंते तदाऽऽस्तिकै. युक्तिवचनेन निषेधनीयाः । तथापि यदि कदाग्रह न मुञ्चन्ति तदा समथैरास्तिकैरुपानद्भि गूलिप्ताभिर्मुखे ताडनीया , तत्र पाएं नास्ति । १ उक्तं चातरपुराणस्य वर्धमानपुराणे-(अप्रे) . -
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पट्प्राभूते-
दंसणभहा महादसणभस्म णत्यि णिवाणं ।
सिझंति चरियभहा सणभहा णे सिज्झति ॥ ३॥
दर्शनभ्रष्टा भ्रष्टा दर्शनभ्रस्य नास्ति निर्वाणम् ।
मिद्धयन्ति चरित्रभ्रष्टा दर्शनभ्रान सिद्धपन्ति ।
दर्शनभ्रष्टा भ्रष्टा सम्यग्दर्शनात्पतिता पतिता उच्यन्ते । दर्शन-
भ्रष्टस्य नास्ति निर्माण सम्यग्दर्शनात्पतितस्य सर्पकर्मक्षयलक्षणो मोक्षो
न भरति कि तु सम्यग्दर्शनात्पतिता नरकादिगतिः परितो दीर्घकाले
पर्यटन्ति । सिझंति चरियमहा सिद्धयन्ति आत्मोपलब्धिमनुभवन्ति
प्राप्नुवन्ति, के, ते चरियभट्ठा-चारित्रापतिता यतिधारफलक्षणब्रह्मचर्य-
प्रत्याख्यानाभ्या स्खलिता , सामग्री प्राप्य श्रेणिकमहाराजादिवत् स्तोकेन
कालेन मोक्ष प्राप्नुवन्ति । दसणभहा न सिझंति सम्यग्दर्शनापतिता
न सिद्धयन्ति मोक्षं न प्राप्नुवन्ति मव्यसेनादिवत् वशिष्ठादिवञ्च
संसारे निमजन्ति इति ज्ञात्वा श्रुतकीर्तिश्रेयासादिप्रमाणपुरुपैरुपप्रार्तित
दानपूजादिसत्कर्म न निषेधनीय, आस्तिकभावेन सदा स्थातव्यमित्यर्थ ।
सम्मत्तरयणभहा जाणंता बहुविहाई सत्थाई ।
आराहणाविरहिया ममंति वत्र वत्थेन ॥ ४ ॥
सोऽपि पाप स्वय क्रोधादरणीभूतवाक्षण ।
उद्यमी दिमाहतुं प्रस्फुरदशनच्छद ॥१॥
सोनु तदक्षम निदसुर गुदा तया।
हनिष्यति तमन्याय शक सन् सहते न हि॥३॥
सोऽपि ररनप्रभा गावा सागरोपमजीवित ।
चिर चतुर्मुखो दुस्स छोभादनुभविष्यति ॥ ३ ॥
धर्मनिमूल विध्वयं सहन्ते न प्रभावका ।
मास्ति मावचलन विना धर्मप्रमावना ॥४॥
धर्मध्वसे सवा घसस्तस्मादमदुकोऽधमान् ।
निवारयन्ति ये मन्तो रक्षित ते सतो मग ॥ ५॥
दर्शनप्रामृतं । सम्यवत्वरस्नभ्रष्टा जानन्तो वहुविधानि शास्त्राणि । आराधनाविरहिता भ्रमति तत्रैव तव ॥ सम्मत्तरयणमहा सम्यक्त्वरत्नभ्रा सम्यक्त्वमेव रत्न सर्वेभ्यो भावेम्य उत्तम वस्तु त्रैलोक्यपस्त्यसमुद्योतकत्यात् तस्माद्रष्टा परिच्युता दानपूजादिकनिषेधका । जाणंता बहुविहाई सत्थाई जानन्तोऽपि बहुविधानि शास्त्राणि तर्कव्याकरणछन्दोलङ्कारसाहित्यसिद्धान्तादीन् प्रन्यान् जानाना अपि । आराहणाविरहिया जिनपचनमाननलक्षणा- माराधनामकुर्वाणा टौंका पातकिन । भमंति तत्थेव तत्थैव तत्रैव तत्रैव नरकादिष्वेव दुर्गतिषु भ्राम्यन्ति न कदाचिदपि मोक्ष लभन्ते इत्यर्थ । सम्मत्तविरहिया णं सुदु वि उग्गं तवं चरता थे। ण लहंति बोहिलाहं अवि वाससहस्सकोडीहिं ॥५॥ सम्यक्त्वविरहिताण मुष्ठ अपि वप्र तप चरन्त । न लभते योधिलाभ अपि वर्षसहस्रकोटिमि ॥ सम्मत्तचिरहिया गं सम्यक्त्वविरहिता सम्यक्त्वात् ये विरहिता पतिता । वाक्यालङ्कारे । सुहु वि उग्गं तवं कुणंता सुष्छु अपि अतीवापि उप तप कुर्वन्तोऽपि मासोपवासादिक तपोविशेषमाचरन्तोऽ- पि।मिति वाक्यालंकारे । न लहंति घोहिलाहं ते पुरपा बोधि- लाभ सम्यग्दर्शनज्ञानचारिनलक्षणोपलक्षिता या चोमिस्तस्पा लाभ न लभते । कियत्कालपर्यतं बोधिलाभ न लभन्त इत्याह-अवि वास- सहस्सकोडीहिं अपि वर्षसहस्सकोटिभि वर्षसहस्रकोटिभिरपि अनन्त फालमपि गमयित्वा ते मुक्ति न गच्छत्तीत्यर्थ । इति ज्ञात्वा दानपूजा- दिक व्यवहारधर्म निश्चयधर्मे प्रधानभूत में वर्जनीयमिति भावार्थ । ।
६ पट्माभृते- सम्मत्तणाणदसणलवीरियवङ्माण जे सब्वे । कलिकलुसपावरहिया वरणाणी होति अइरेणं ॥ ६॥ सम्यक्त्वज्ञानदर्शनबलवीर्यवर्द्धमाना ये सर्वे । कलिकलुषपापरहिता वरज्ञानिनो भवन्ति अचिरेण ॥ सम्मत्तणाणदंसणवलवीरियवड्डमाण सम्यक्त्वज्ञानदर्शनबलवीर्य- वर्द्धमाना । जे सव्वे ये सर्वे भव्यजीगा । सम्यक्त्वेन जिनवचनरुचि- रूपेण, ज्ञानेन पठनपाठनादिना, दर्शनेन सत्तावलोकनमात्रेण, बलेन निजवीर्यानिगृहनरूपेण, वीर्येणात्मशक्तया ये पुरपा वर्धमाना वर्तमाना का वट्टमाणपाठेन ते पुरुषा । वरणाणी होंति केवलज्ञानिनो भवन्ति वरशब्देन तीर्थकरत्वं प्राप्नुवन्तीत्यर्थ । कदा, अइरेण अचिरेण स्तोक- कालेन तृतीये भवे मोक्ष यान्तीत्यर्थ । ते पुरुपा कथभूता, कलिक- लुसपावरहिया कलिसु कर्ममु यानि कलपाणि दुष्टानि पापानि मोहनीयज्ञानावरणीयदर्शनावरणीयान्तरायलक्षणानि दुरितानि तै रहिता क्षय नीतघातिकर्माण इत्यर्थ । अथवा कलौ पचमकाले कलुपाः कश्मलिन शौचधर्मरहिता वर्णान् लोपयित्वा यत्र तत्र भिक्षाप्राहिण. मासभक्षिगृहेष्वपि प्रासुकमन्नादिक गृहन्त कलिकलपास्तै च ते पापा पापमूर्तय श्वेताम्बराभासा ठोकायकापरनामानो लौंका म्लेच्छ- श्मशानास्पदेष्वपि भोजनादिक कुर्वाणास्तद्धर्मरहिता कलिकलुषपाप- रहिता । श्रीमलसधे परमदिगम्बरा मोक्ष प्राप्नुवन्ति लौंकास्तु नरकादौ पतन्ति देवगुरुशास्त्रपूजादिग्लिोपकत्वादित्यर्थ । सम्मत्तसलिलपवहो णिच्च हियए पवट्टए जस्स । कम्मं वालुयवरणं बंधुचिय णासए तस्स ॥७॥ १ अचिरेण ग । २ हिययम्मि ग घ ।
७ nmanN दर्शनप्राभूत । सम्यक्त्वसलिलप्रवाह नित्य हृदये प्रवर्तते यस्य । कर्म वालुकावरण बद्धमपि नश्यति तस्य । सम्मत्तसलिलपवहो सम्यक्त्वसलिलप्रवाह सम्यक्त्वमेव सठिल निर्मलशीतलसुगधसुस्वादुपानीयं ससारसन्तापनिवारकत्वात् पापमलकलं- कप्रक्षालकत्याच्च सम्यक्त्वसलिलं तस्य प्रबह प्रवाह पूर । णिच्च हियए पट्टए जस्स नित्यं हृदये प्रवर्तते यस्य जलपूरनदहतीत्यर्थ । कर्म वालुयवरणं हिंसादिपचपातकपापं वालुकापाली । बंधु- चिय बद्धमपि । नासए तस्स नश्यति तस्य । सम्यग्दृष्टेर्लनमपि पापं बन्धं न याति कौरघटस्थित रज इव न बध याति । परदेवनम- स्कारोऽपि पापमायाति । उक्त च--- एकवार नमस्कारे परदेवे कृते सति । परदारेपु लक्षेषु तस्मात्पाप चतुर्गुण ॥१॥ जे दसणेसु भहा गाणे महा चरित्तमहा य । एदे महविभहा सेसं पि जणं विणासंति ॥८॥ ये दर्शनेषु भ्रष्टा ज्ञाने भ्रष्टा चरित्रनवाच । एते भ्रष्टविभ्रटा शेषमपि जन विनाशयन्ति ।। जे दंसणेसु भट्ठा ये पुरुषा दर्शनेषु सम्यक्त्वेषु द्विविधत्रिविध- दशविधेषु भ्रष्टा पतिता अथवा दर्शने सुष्ट भ्रष्टा । तथा गाणे महा अष्टविधाचारज्ञानादपि भ्रष्टा । चरित्तमहा य योदशप्रकाराचारित्रा- द्भष्टा । एदे भविभहा एते भ्रष्टा विशेषेण भ्रष्टास्त्रिभ्रष्टत्यात् । सेपि जणं विणासंति शेषमपि जनमभ्रष्टमपि लोकं विणासन्ति- विनाशयन्ति भ्रष्टं विकुर्वन्ति । जो को विधम्मसीलो संजमतवणियमजोयगुणधारी। तस्स य दोस कहन्ता भग्गा भग्गत्तणं दिति ॥९॥ जे के विध - + -- । पद्माभृते- य कोपि धर्मशील सयमतपोनियमयोगगुणधारी। तस्य च दोषान् कथयन्त भमा भमत्व ददति ।। जो को वि धम्मसीलो य कोऽपि धर्मशीलो धर्मे आत्मस्वरूपे उत्तमक्षमादिदशलक्षणे च धर्मे, पचप्रकारे त्रयोदशप्रकारे चारित्रे च प्राणिना रक्षणलक्षणे वा धर्म शीलमभ्यास समाधिरम्यासो यस्य स धर्मशीलः । उक्तं च-- धम्मो पत्थुसहावो खमादिभायो य दसविहो धम्मो। चारित्तं खलु धम्मो जीवाणं रफ्षणो धम्मो ॥१॥ संजमतवणियमजोयगुणधारी तथा य कोऽपि सयमतपोनियम- योगगुणधारी वर्तते । सयमश्च पडिन्द्रियपटप्रकारप्राणिप्राणरक्षणलक्षण । तपश्च द्वादशप्रकारं । नियमश्च नियतकालव्रतधारण । उक्त च-- नियमो यमच विहिती द्वेधा भोगोपभोगसहारात् । नियमः परिमितकालो यावजीव यमो ध्रियते ॥१॥ योगश्च वर्षादिकालस्थिति.। अथवाऽऽत्मध्यानं योग उच्यते। उक्तं च वीरनन्दिशिष्येण पद्मनन्दिना- साम्यं स्वास्थ्य समाधिश्च योगश्चतोनिरोधनं । शुद्धोपयोग इत्येते भवन्त्येकार्थवाचकाः॥१॥ गुणाश्चतुरशीतिलक्षसख्या । के ते चतुरशांतिरक्षगुणा इति चेदु- च्यन्ते-हिंसाऽनृतस्तेयमैथुनपरिग्रहक्रोधमानमायालोभजुगुप्साभयारति- रतित्यागा इतित्रयोदश दोषा 1 मनोवचनकायदुष्टत्वमिति पोडश । मिथ्यात्व प्रमाद पिशुनत्व अज्ञान इन्द्रियाणामनिग्रह एतै पंचभिर्मे- लिता एकविंशतिर्दोपा भन्ति तेपा त्यागा एकविंशतिर्गुणा भवन्ति । १ धर्मो वस्तुस्वभाव क्षमादिभावश्च दशविधो धम । चारित्र धर्म जीवाना रक्षण धर्म खलु ॥॥
दर्शनप्रामृत। ९ अतिक्रमन्यतिक्रमातिचारानाचारत्यागेश्चतुभिर्गुणिताश्चतुरशीतिर्गुणा भव- ति ते पृथिव्यादिशतजीवसमासर्गुणिताश्चतुरशीतिशतानि गुणा भवति ते दशशीलगिराधनैर्गुणिताश्चतुरशीतिसहस्राणि गुणा भवन्ति । कास्ता शीलविराधना स्त्रीससर्ग १ सरसाहार २ मुगधसस्कार ३ कोमलशयनासन ४ शरीरमण्डनं ५ गीतबादिनभरण ६ अर्थग्रहणं ७ कुशीलससर्ग ८ राजसेवा ९ रात्रिसचरण १० इतिदशशीलविराधना । ते आकम्पितादिदशालोचनादोपत्यागैर्दशभिर्गुणिता चत्वारिंश सहस्रा- धिकाष्टलक्षाणि गुणा भवति । उत्तमक्षमादिदशधर्मर्गुणिताश्चतुरशीति- लक्षाणि गुणा भवन्ति । अथातिक्रमादयश्चत्वार के अतिक्रमस्तावद्विशि- एमतित्याग । व्यतिक्रम शीलवृत्तिलघन । अतिचारो विषयेषु प्रवर्तन । अनाचारो विपयेष्षत्यासक्ति । के ते दशालोचनादोपा । तदर्थनिरू- पिका गाथेय - आकपिअ अणुमाणिअ ज दिशादर च सुहम च । छन्न सघाउलय यहुजणमन्यत्त तस्सेची ॥१॥ अस्या अयमर्थ -आकम्पित आरम्पो भयमुपद्यते मा बहुदण्ड दासीदाचार्य १ अणुमाणियं अनुमान इयेतावत्पाप कृत भविष्यति निरो नास्ति २ जे दिड य कनचिदृष्ट त प्रकाशयति ३ वायर स्थूल पाप प्रकाशयति ४ सुहुम अल्पं पाप कथयति न महापाप प्रकाशयति ५ उण्ण प्रच्छन्न आचार्याने कथयति न प्रकट ६ । सहा उलय सघादिकृतकोलाहले सति क्थयति पाप ७ बहुजण बहु संघो मिलति तदा पाप प्रकाशयति ८ अव्वत्त अव्यक्त प्रकाशयते स्फुट न कथयति ९ तस्सेनी यापाप प्रकाशितं तदेव पुनरपि करोति १० इति दशालोचनदोपा ! दशकायसयमा के ! पचेद्रियनिर्जय पंचप्राण- रक्षा इति दश । एतान् सयमतपोनियमयोगगुणान् धरती येवमवश्य AMAN पद्माभृते- संयमतपोनियमयोगगुणधारी। तस्स य दोस कहंता तस्य च दोपान् . कथयन्तः केचित्पापिष्टाः। मग्गा भग्गत्तणं दिति स्वयं भग्नाश्चारित्रा- त्पतिता भ्रष्टा अन्येषामपि भ्रष्टत्वमारोपयन्ति ते निन्दनीया इत्यर्थः । जह मूलम्मि विणढे दुमस्स परिवार पत्थि परिवड्डी । तह जिणदसणमहा मूलविणवा ण सिझंति ॥ १० ॥ यथा मूले विनटे द्वमस्य परिवारस्य नास्ति परिवृद्धिः। तथा जिनदर्शनभ्रष्टाः मूलविनष्टा न सिद्धयन्ति ॥ जह मूलम्मि विणहे दुमस्स परिवार णत्यि परिवड्डी यथा मूले पातालगताधारे विनष्टै विनाशं प्राप्ते द्रुमध्य वृक्षस्य परिवारस्य नास्ति परिवृद्धिः शाखापत्रपुष्पालादेधिर्नास्ति वृद्धिर्न भवति । परिवार इत्यत्र पष्टीला "लुक्चेति" वचनात् । दृष्टान्तं दत्वा दार्टान्तं ददाति । वह जिणदसणभट्टा तथा तेन द्रुममूल प्रकारेण जिनदर्शनभ्रष्टा आई- तमतात्पतिताः । मूलविणहा श्रीमूलसंघात्प्रच्युताः । न सिद्धयन्ति-न मोक्ष प्राप्नुवन्ति जन्मशतसहस्रष्यपि संसारे परिभ्रमन्तीति भावार्थः । जह मूलाओ संधो साहापरिवार बहुगुणो हो । तह जिणदंसण मूलो णिहिटो मोक्खमग्गस्स ॥११॥ यथा मूलात् स्कन्धः शाखापरिवारो बहुगुणो भवति । तथा जिनदर्शनं मूलं निर्दिष्टं मोक्षमार्गस्य ॥ जह मूलाओ यथा मूलात् वृक्षस्य मूलात्कारणात् । स्कन्धः शाखा- पधिः प्रकाण्डः ! बहुगुणो होइ प्रचुग्गुणो वृद्धयाचतिशयवान् भवति । तथा साहापरिवार शाखापारवारच उतास्वरूपी कटप्रश्च बहुगुणो भवति पत्रपुष्पलादिमान् भवति । दृष्टान्तो गतः । इदानी दार्टान्त- यहुगुणा हुति. ग. घ..
दर्शनप्राभृतं । माह-तह जिणदंसण मूलो निदिडो मोक्खमग्गस्स तथा तेनैव वृक्षमूलप्रकारेणैव मोक्षमार्गस्य मूलं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रलक्षणस्य मोक्ष- मार्गस्य मूलं कारण, जिणदसणं-जिनदर्शनं मूलं निर्दिए श्रीगौतम- स्वामिना कथितं । श्रीमूलसंघो मोक्षमार्गस्य मूलं कथितं न तु जैना- भासादिक । कि तनाभासं ! उक्त च-- गोपुच्छिकः श्वेतवासा द्राविडो यापनीयक। निपिच्छश्चेति पंचते जैनामासाः प्रकीर्तिताः ॥१॥ ते जैनाभासा आहारदानादिकेऽपि योग्या न भवन्ति कथं मोक्षस्य योग्या भवन्ति । गोपुच्छिकानां मतं यथा, उक्त च-- त्थीणं पुणदिक्खा खुलयलोयस्स धीरचरियत् । ककसकेसग्गहणं छठं च गुणवदं नाम ॥१॥ श्वेतवाससः सर्वत्र भोजनं गृह्णन्ति प्रासुकं मांसमक्षिणा गृहे -दोषो नास्तीति वर्णलोपः कृतः। तन्मध्ये श्वेताम्बराभासा उत्प- मास्ते त्वतीव पापिष्ठाः देवपूजादिक किल पापकर्मेदमिति कथयन्ति, मण्डलयन्सर्वत्र भांडप्रक्षालनोदकं पिबन्ति इत्यादि बहुदोपवन्तः। द्रा- विडा:-सावध प्रासुर्फ च न मन्यन्ते उद्भमोजनं निराकुर्वन्ति । याप- नीयास्तु वैसरा इझोभयं मन्यन्ते, स्नायं पूजयन्ति, कल्प च वाचयन्ति, स्त्रीणां तद्भवे मोक्षं, केवलिजिनाना कवलाहारं, परशासने सग्रन्थानां मोक्षच कथयन्ति । निष्पिच्छिका मयूरपिच्छादिक न मन्यन्ते । उक्तं च ढाढसीगाथासु- १ स्रोणां पुनदीक्षा भुकलोकस्य पौरचयात्वं । शशमहणं पष्ठं च गुणवतं नाम ॥
- . षट्प्राभूते- पिच्छे ण हु सम्मत्त करगहिए मोरचमरदंबरए । अप्पा तारह अप्पा तम्हा अप्पा विझायव्यो।१॥ तथा च सितपटमत-- सेयंवरो य आसयरो य युद्धो य तह य अण्णो य। सममावभावियप्पा लहेय मोसं ण संदेहो ॥१॥ जैमिनिकपिलकणचरचार्वाकशाक्यमतानि तु प्रमेयकमलमार्तण्डा- दिशास्त्रात् ज्ञातव्यानि । जे दंसणेसु भट्टा पाए ण पंडंति दसणधराणं । ते होति लल्लमूआ वोही पुण दुल्लहा तेसि ॥१२॥ ये दर्शनेषु भ्रष्टा पादे न पतन्ति दर्शनधराणाम् । ते भवन्ति लइका बोधि पुनर्दुर्लभा तेषाम् ॥ जे दंसणेसु भट्टा ये पुरुपा दर्शनेषु भ्रष्टा निसर्गजाधिगमजलक्षणाद् द्विविधात्सम्यग्दर्शनात् औपशमिकवेदक्क्षायिकलक्षणात्रिविधा सम्यक्त्व- रत्नात् प्रच्युता । आशामार्गसमुद्भवमुपदेशारसूत्रीजसंक्षेपात । विस्तारार्थीभ्या भवमवपरमावादिगाढे च ॥१॥ इत्यार्याकथितदशविधसम्यक्त्वरत्नात्पपिता । अस्या आर्याया अयमर्थ सूक्ष्म जिनोदित वाक्य हेतुभिर्यन हन्यते । आशासम्यक्त्वमित्याहु न्यथावादिनो जिना." एव जिनसज्ञीतरागवचनमे प्रमाणं क्रियते तदाज्ञासम्यक्त्वं कथ्यते। १। निग्रंथलक्षणो मोक्षमार्गों न वस्त्रादिवेष्टित पुमान् कदा- १ पिच्छे न हि सम्यक्त्व करगृहीते मयुरचमरडबरे । आत्मा तारयत्यात्मान तस्मादात्मा ध्यातव्य.॥१॥ २ स्वेताम्बरश्वाशाम्बरश्च बुद्धश्च तथा चान्यथ । समभावभावितात्मा लभेत मोक्ष न सन्देह ॥२॥ ३ पाएहि घ । ४ पाडति ग ।५होति छ । "
पद्माभते-
ईशदर्शनेषु भ्रष्टास्त्यस्तमयरपिटकमण्डलुपरमागमपुस्तकाः सन्तो
गृहस्थोपधारिण संयमधराणा संयमिना सदृष्टीनां । पाए न पडंति
पादे चरणयुगले न पतन्ति नैर नमोऽस्थिति कुन्ति अभिमानिया-
न्मुशलपत्तिष्ठन्ति। ते किं भवन्ति । ते होंनि लहमा ते भवति रहा
असुटयाचो म्या यक्त धोतुमशिक्षिता. । योही पुण दुल्लहा तेमि योधिः
खल्लु रत्नत्रयप्राप्ति पुनर्जमशतसहस्रष्यपि दुर्टमा कनापि सम्धुम-
शक्या तेमि-तपा जनामासतदाभासाना च मिष्पाष्टीनामिति शेषः ।
जे पि पडंति च तसिं जाणंता रज्जगारमयेण ।
नेसि पि णत्यि चोही पारं अणमोप्रमाणाणं ।। १३ ॥
येपि पतति पदपो जानन्तो सवागौरवमयैन ।
तेषामपि नास्ति बोधि पार अनुमयमानानाम् ॥
जे पि पति च तेसिं ये सम्यग्दर्शनादभ्रष्टा अपि पुरुषा सेसिं-
पा परित्यक्त जिनमुद्राणां मयूरपिउशीचोपकरणज्ञानोपर रणरहिताना
पादे कायधरयुगले पतन्ति नमस्कार पुर्वन्ति पूर्वमुदारग इति । जाणंता
पिदतोऽपि जिनमुद्राविराधका एते इत्यागपछतोऽपि । लनागारव-
भएण टजया प्रपया, गारपेण ग्मदिमातगण, भयेनाय राजमान्यो:-
स्माकं पमप्युपद्रव फारपिश्यतीत्यादिभीत्या च । नेमि पिपत्य
योही सेपामपि योधिनम्ति ते रत्नत्रयं मपा यन्तोऽपि नापाद्धया
इति ज्ञातव्या इति भार ! कथभूताना तेपा, पारं अश्मोपमालागं
जिनदर्शनशायदुपर्न पाएँ पातर्फ सदनुमयमानानामिति शेष । टन
चममन्तभद्रेण गणिना
भयाशास्नेहलोमा पुयागमभिगिनां ।
प्रणाम विनयं चयन युगुमाएयः!!..
दुहिं पि गंयनायं तीमुवि जोण्गु संजमो टादि।
गापम्मि परणसुद्धे उन्ममणे दंम हो? ॥१५॥
- दर्शनप्राभृत। द्विविधमपि प्रथयाग विष्वपि योगेषु संयम तिष्ठति । शाने करणशुद्धे उद्भभी बने दर्शन भवति । दुविहं पि गंथचायं द्विविधोऽपि ग्रन्थत्याग । तीसु वि जोएसु त्रिष्यपि योगेषु गनवचनकायशुद्धिषु । संजमो ठादि सयमश्चारित्रं तिष्ठति भवति । पाणम्मि करणसुद्धे सम्यग्ज्ञाने वृतकारितानुमोद- निर्मले सति । उन्भसपणे उद्भभोजने च सति। दमणं होदि सम्यक्त्वं भवति मुनीनामिति शेष । अथ कोऽसौ द्विविधो प्रय इत्याह-बाधा- भ्यन्तरभेद इति । तत्र बाह्य परिग्रह कथ्यते-- क्षेत्र वास्तु धन धान्यं द्विपद च चतुष्पद । दुध माड हिरण्य च सुवर्ण च यहिदश ॥१॥ क्षेत्र सस्याधिकरणं । वास्तु गृह । धन द्रम्मादि । धान्य गोधूमादि । द्विपद दासीदामादि। चतुष्पद गोमहिपीयेगसरगजाश्वादि । कुप्य कर्पासचदनकुकुमादि । भाड तैलघृतादिभृतं पात्र | हिरण्य ताम्ररू- प्यादि । घटिताघटित मुवर्ण श्रानिकेतन हाटक कनकमिति यावत् । अभ्यन्तरमाथश्चतुर्दशभेद - मिथ्यात्ययेदहास्यादिषट्कपायचतुष्टय । रागडूपौ च सगा'स्युरन्तरमाश्चतुर्दश ॥१॥ सम्मत्तादो णाणं णाणादो सव्वभावउचलद्धी। उवलद्धपयत्थे पुण सेयासेयं वियाणेदि ।। १५॥ राम्यावतः हान ज्ञानत सर्वभावोपलन्धिः । उपलब्धपदार्थे पुन श्रेयोऽश्रेयो विजानाति । सम्मत्तादो णाणं सम्यक्वाज्ञान भवति यस्य सम्यक्त्व नास्ति स पुमानज्ञान एवत्यर्थ । णाणादो सब्वभावउवलद्धि ज्ञानासर्वपदा- १ यान शय्यासन कुप्य माण्ड चेति यहिर्दश । इति पाठान्तरम् ।
१ - पट्याभृते- नामुपलब्धि जीवादितत्याना जीवस्य परिज्ञानं भाति । उवलद्ध- पयत्थे पुण उपलब्धपदार्थे पुन उपलब्धश्चासौ पदार्थ उपलब्धपदार्थ- स्तस्मिन्नुपलब्धपदार्थे सति । किं भरति, सेयासेयं वियाणेदि श्रेयः पुण्य विशिष्टतीर्थकरनामकर्म, अश्रेय पाप चतुर्गतिपरिभ्रमणकारण विशे- पेण जानीते । उक्त च- न सम्यक्त्वसम किंचित्रकाल्ये त्रिजगत्यपि। श्रेयोऽधेयश्च मिथ्यात्वसम नान्यत्तनूभृतां ॥ १ ॥ सेयासैयविदाह उद्बुददुस्सील सीलबंतो वि । सीलफलेणभुदयं तत्तो पुण लहइ णियाणं ॥ १६ ॥ श्रेयोऽश्रेयोवेता उद्धृतदुरशील शीलवानपि । भीलफलेनाभ्युदय तत पुन लभते निर्वाणम् ॥ सेयासेयविदण्हू श्रेयस पुण्यस्य, अश्रेयस पापस्य विदण्हू-येत्ता पुमान् । उद्बुददुस्मील उन्मूलितदु शीलो भवति । सीलवतो वि शीलवान् पुमान् । सीलफलेण शीलफ्लेन कृत्या । अन्भुदयं यहइ. अभ्युदय सासारिक सुखं प्रामोति । तत्तो पुण णिव्याणं लहह तत पुनर्निर्माणं लभते मोक्षं पामोति । जिणवयणमोसहमिण विसयसुहविरेयणं अमिदभूयं । जरमरणवाहिहरणं रायकरणं सयदुक्साणं ॥ १७॥ जिनववनमौषधिमिद विषयमुसविरेचनममृतभूतम् । जरामरणन्याधिहरण क्षयकरणं सर्वदु सानाम् ॥ जिणवयणमोमहमिणं जिनवचनमौपधमिद इदै तलक्षण जिनवचनं सर्वज्ञवीतरागमापित हेतुहेतुमद्धारसहित औषधं वर्तते। कर्य- भूग। ।
दर्शनप्राभृत। भूत जिनवचन औपर, विषयसुखविरेचन विषयाणा पचेन्द्रिमार्थानां स्पर्शरसगधवर्णशब्दाना सम्बधित्नेन यसुखं विषयसुख तस्य विरेचन दूरीकरण । अमिदभूदं अमृतमूतं अविद्यमान मृत मरण या भस्माद्वा भन्याना तदमृतभूत अमृतोपमं । अतएव जरमरणवाहिहरणं जरा- मरणम्याधिहरण विनाशक । सयकरणं सजदुरसाणं क्षपकरण मूलादुन्मूलक सर्वदु खाना शारीरमानसाग तुदु खाना विघसकमि यर्थ । एक जिणस्स रूवं पीयं उकिसावयाणं तु । अपरहियाण तइयं चउत्यं पुण लिंगदंसणं णत्थि ॥१८॥ एक जिनस्य रूप द्वितीय उत्कृष्टधारकानां तु। अवरस्थिताना तृतीय चतुर्थ पुन लिङ्गदर्शन नास्ति ॥ एक्कं जिणस्स रूवं एकमद्वितीय जिनस्य रूप नग्नस्य । वीयं द्वितीय उत्कृयथावकार तु । रक्त च--- आद्यास्तु पड् जघन्या स्युर्मध्यमास्तदनु प्रयः। शेपौ द्वायुत्तमायुक्ती जैनेषु जिनशासने ॥ १ ॥ तेन- "दसणवयसामाइयपोसहसचित्तगयभत्ते य" इति गाथा कथिता श्रापका पड्जघन्या कथ्यत । बमारमपरिम्गह" इति गाथापादो- तात्रय श्रायका मध्यमा उच्यत । शेषौ द्वावुत्तमावुक्तौ जनेषु जिनशा सने " अणुमणमुद्दिट्टदेसविरदो य" अनुमतादुद्दिष्टाद्विरतो देशवि- रतश्च ध्यते उत्कृष्ट श्रावक उच्यते इति । अवरहियाण तइयं अपरस्थिताना आर्यिकाणा तइयं ( तृतीय)! चउत्यं पुण लिंग- दसणं णत्यि अपरस्थितानामार्यिकाणा तृतीय दर्शन चतुर्थं पुन- " पद. ३ पद्माभृते- लिंगदर्शन नास्ति । जीण्येव जिनशासने लिंगदर्शनानि प्रोक्तानि न न्यूनानि नाप्यधिकानीति शेष । छद्दव्य णव पयत्या पंचत्यी सत्त तच्च णिदिवा । सदहइ ताण रूवं सो सद्दिडी मुणेयचो ॥ १९ ॥ पद् द्रव्याणि नव पदार्या पञ्चास्तिकाया सप्त तत्वानि निर्दिष्टानि । अधाति तेषा रूप स सद्दष्टि ज्ञातव्य ॥ छव्व षड्व्याणि जीयपुद्गलधर्माधर्मकालाकाशा पद द्रव्याणि भवन्ति । वर्तमानकाले द्रवन्तीति द्रव्याणि भविष्यति काले द्रोष्यन्ति अतीतकालेऽदुद्रुवन्निति द्रव्याणि जीवपुद्गलधर्माधर्मकाला- काशनामानि ! नव पयत्था नव पदार्था जीवाजीवपुण्यपापास्त्रवबन्धस- वरनिर्जरामोक्षनामान | पंचत्थी पचास्तिकाया जीवपुद्गलधर्माधर्माका- शनामान पचास्तिकाया उच्यन्ते । सत्त तच णिदिवा सप्त तत्वानि निर्दिष्टानि कथितानि जीवाजीवात्रवबन्धसवरनिर्जरामोक्षनामानि । सद्द- हइ ताण रूवं श्रद्दधाति तेषा रूप स्वरूपं । सो सदिट्टी मुणेयव्यो स पुमान् सदृष्टिरिति मन्तव्यो ज्ञातव्य । तेषु द्रव्यादिषु जीव सचेतनः । पुद्गलो धर्मोऽधर्म काल आकाशश्च पचाचेतना । षड्विधोऽपि पुद्गलो मूर्त । इतरे पचामूर्ता । जीवपुद्गलयोर्गत कारण धर्म । सर्वेषा स्थिते कारणमधर्म । सर्वेषामाधारमाकाश । वर्तनालक्षण काल. स्नाना राशिवत् भिन्नपरमाणुक ।धर्माधर्माकाशा अखडप्रदेशा । काल- पुद्गलयोनीपाना च प्रदेशेषु खण्डत्व, न त्वेकजीवस्य प्रदेशाना खण्डत्व । धर्माधर्मकालाफाशाश्चत्वारो गमनागमनरहिता गमनागमने जीवपुद्गला. नामन्यत्र सिद्धीम्य । धर्माधमकजावानामसख्येया प्रदेशा ।संख्ये- यासंख्येयान-तप्रदेश आकोश । पुद्गलोऽनन्तप्रदेशश्च । सर्वाणि द्रव्या- १ तस्स ग । २ अदाकाशस्थाने पुगलेन पुद्गलस्थाने चाकाशेन भवितव्य ।
दर्शनप्रामृत । १९ ण्येकतो मिलितान्यपि निजनिजगुणान जहति । एव तत्वास्तिकायपदा- नामपि स्वरूप ज्ञातव्य । जीवादी सद्दहणं सम्मत्तं जिणवरेहि पण्णत्तं । चपहारा णिच्छयदो अप्पाणं हवइ सम्मत्तं ॥२०॥ जीवादीना प्रधान सम्यक्त्व जिनवरै निर्दिष्टम् । व्यवहारात निश्चयत आत्मा भवति सम्यक्त्वम् ॥ जीवादीना श्रद्धान रुचि सम्यक्त्वमिति जिनपरै प्रणीतं तत्तु सम्यग्दर्शन व्यवहाराज्ज्ञातव्य । णिच्छयदो अप्पाणं हवइ सम्मत्तं निश्चयतो निश्चयनयादा मैव भरति सम्यक्रवं रुचिसामान्यत्वादित्यर्थ । एवं जिगपण्णत्तं दसणरयणं धरेह भावेण । सारं गुणरयणत्तय सोवाणं पढम मोक्सस्स ।।२१।। एव जिनप्रणीत दर्शनरत्न धरत भावेन । सारे गुणरत्नेषु सोपान प्रथम मोक्षस्य ।। एवं पूर्वोक्तप्रकारेण । जिणपण्णत्तं जिनै प्रणीत जिनै कथित । दसणरयणं दर्शनरत्नं सम्यक्त्वमाणिक्य | धरेह भावेण धरत यूर्य भावेन धीतरागसर्वज्ञस्य भक्त्या । उक्तं च- एकापि समर्थेय जिनभक्तिर्दुर्गति निवारयितु । पुण्यानि च पूरयितु दातु मुक्तिधियं कृतिन ॥ १ ॥ कथंभूत दर्शनरत्न, सार उत्कृष्ट । केषु सार, गुणरयणत्तय गुणेषु उत्तमक्षमादिषु तथा रनरये सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेषु । उक्त च- दर्शनं भानचारित्रात्साधिमानमुपास्नुते । दर्शन कर्णधार तन्मोक्षमार्गे प्रचक्षते ॥१॥ पुनरपि कथभूतं दर्शनरत्ने, सोवाणं सोपान पादारोपणस्थानं । कतिसंख्योपेतं, पढम प्रथमं अद्वितीय । कस्य, मोक्खस्स मोक्षस्य पर- मनिर्वाणस्य ।
घट्प्राभृते- जं सकइ तं कीरइ जं च ण सक्केई तं च सद्दहणं । क्वलिजिणेहि भणियं सद्दहमाणस्स सम्मत्तं ॥ २२ ॥ यत् शक्नोति तत् क्रियते यच न शक्नुयात् तस्य च श्रद्धान । वेवलिजिनै भणिल प्रधानस्य सम्यक्त्वम् ।। जं मक्इ तं कीरइ यच्छरोति तत्क्रियते विधीयते । जंच ण सकेइ यञ्च न शक्नुयात् यत्कर्तुं न शक्नोति । तं च सदहणं तस्य श्रद्धान तस्य ज्ञानाचारादे रोचन कर्त्तव्य । केवलिजिणेहिं भणियं केवलज्ञानिमिर्जिनैणित प्रतिपादित । केवलज्ञान रिना तीर्थकरपरम- देवा धर्मोपदेशन न कुर्वन्ति । अन्यमुनीनामुपदेशस्त्वनुवादरूपो ज्ञातव्य । अथवा केलिभि समवशरणमण्डितकेवलज्ञानसयुक्ततीर्थकरपरमदेवै- भणितं जिनैरनगारकेपलिभिर्भणित । किं भणितं । सद्दहमाणस्स सम्मत्तं श्रद्दधानस्य पुरपस्य रोचमानस्य जीवस्य सम्यक्त्व सम्यग्दर्शन भवति । दंसणणाणचरित्ते तवविणये णिचकालपसत्या । एदे दु चंदणीया जे गुणवादी गुणधराणं ॥२३॥ दर्शनशानचारिने तपोविनये नित्यकालग्रस्वस्था । एते तु वन्दनीया ये गुणवादी गुणधराणाम् ।। दंसणणाणचरित्ते दर्शनज्ञानचारिने दर्शन च ज्ञान च चारित्रं च दर्शनज्ञानचारित समाहारो द्वद तस्मिन् दर्शनशानचारिने एतत्रितये । तथा तवविणए तपोधिनये च चतुर्विधारा बनायामित्यर्थ । णिच कालप- मत्यानियका प्रस्स्या नित्यमेव प्रकर्षण स्वस्था एकलोलीभार प्राप्ता । पदे दु चंदणीया एते पुम्पा महामुनयो वन्दनीया नमस्कर्तव्या । एते । १ तस्स हाह सद्दहण ग ।
दर्शनप्राभृतं । के' जे गुणवादी गुणधराणं ये मुनय स्वय सम्पग्दर्शनादीनामारा- धका अपरेया गुणधराणामाराधनाराधकाना। ये मुनयो गुणगदिनो गुणवर्णनशीला न मत्सरिणस्ते पन्दनीया नमस्करणीया इत्यर्थ । महजुप्पण्णं स्वं दर्दु जो मण्णए ण मच्छरिओ। सो संजमपडिवण्णो मिच्छाइट्टी हवइ एसो॥ २४॥ सहनोत्पन्न रूप दृष्ट्वा यो मन्यते न मत्सरी। स संयमप्रतिपम मिभ्याष्टिभवति एप। सहजुप्पण्णं रूवं सहजोत्पन्न स्वभावोत्पन्न रूप नम्न रूप । दहुं दृष्ट्वा विलोक्य । जो मण्णए ण मच्छरिओ य पुमान् न मन्यते नाम- त्वेऽरुचिं करोति नमवे किं प्रयोजन पशव कि नग्ना न भवन्तीति ब्रूते । मच्छरिओ परेपा शुभकर्मणि द्वेपी । सो संजमपडिवण्णो स पुमान् संयमप्रतिपन्नो दीक्षा प्राप्तोऽपि । मिच्छाइहि हाइ एसो मिथ्यादृष्टिर्भवत्येप । अपवादवेष धरन्नपि मिथ्याष्टिज्ञातव्य इत्यर्थे । कोऽपवादवेष । कलौ किल म्लेच्छादयो नग्न दृष्ट्वोपद्रव यतीना कुन्ति तेन मण्डपदुर्गे श्रीवसन्तकीर्तिना स्वामिना चर्यादिवेलाया तट्टीसादरा- दिकेन शरीरमाच्छाद्य चर्यादिक कृत्वा पुनस्तन्मुश्चन्तीत्युपदेश कृत सयमिना इत्यप मादप । तथा नृपादिवर्गोत्पन्न परमवैराग्यवान् लिंग- शुद्धिरहित उत्पन्नमेहनपुटदोष ल्जावान् वा शीतावसहिष्णुर्वा तथा करोति सोऽप्यपवादलिंग प्रोच्यते । उत्सर्गरेपस्तु नग्न एवेति ज्ञातव्यं । सामान्योक्तो विधिरुत्सर्ग । विशेपोक्तो विधिरपवाद इति परिभाषणात्। अमराण बंदियाणं रूवं दद्दण सीलसहियाणं । जे गारवं करति य सम्मत्त विवज्जिया होति ॥२५॥ अमराणां वदितानां रूप दृष्ट्या शीलसहितानाम् । ये गर्व कुर्वति च सम्यस्त्वविवनिता भवन्ति ॥
२ २२ पट्माभृते- अमराण बंदियाणं अमराणा भवनवासिव्यन्तरज्योतिष्ककल्पवा- सिकल्पातीतदेवाना वन्दिताना तीर्थकरपरमदेवाना । स्वं दह्ण रूप वेप दृष्ट्वा विलोक्य । कथभूताना, सीलमहियाणं व्रतरक्षासहिताना । जे गारवं करति य ये पुरुपा जैनाभासास्तथान्ये च गर्ने कुन्ति च. फारात्सेवा न कुर्वन्ति । सम्मत्तपिवजिया हॉति सम्यक्त्वरत्नरहिता भवन्ति, मिथ्यादृष्टया भवन्ति, सम्यक्त्वरत्नच्युता भवन्ति, महापातकिनो भवन्ति, दीर्घकाल संसारमध्ये पर्यटन्ति । उक्तं च- ये गुरु नैव मन्यन्ते तदुपास्ति न कुर्वते । अन्धकारो भवेत्तेपामुदिते पि दिवाकरे ॥१॥ अस्संजदंण वंदे वच्छविहीणो वि सो ण वंदिज । दोणि वि होति समाणा एगो वि णसंजदो होदि ॥२६॥ असयत न वन्देत वनविहीनोऽपि स न पन्धेत । द्वावपि भवत समानौ एकोऽपि न संयतो भवति । अस्संजदं ण वंदे असयत गृहस्थवेपधारिण संयम पालयन्तमपि न वन्देत । वच्छविहीणो वि सोण वंदिज्ज वस्त्रविहीनोऽपि नग्नोपिस संयमरहितो न वन्येत न नमस्क्रियेत । दुषिण वि होति समाणा द्वि- तयेऽपि समाना सयमरहिता भवन्ति । एगो विण संजदो होदि एकोऽपि सयतो न भवति )। गृहस्थ संयम प्रतिपालयन्नप्पसयमी ज्ञातव्य इति भाव । ण नि देहो बंदिजडण ति य कुलो ण विय जाइसंजुत्तो। को बंदमि गुणहीणोण हु सवणो णेये सावओ होइ॥२७॥ नापि देही बन्यते नापि च कुल नापि च जातिसंयुक्त । कव दे गुणहीन न हि श्रवणो नैव श्रावको भवति । पण सावओ होइ ग घ ।
दर्शनप्राभृत् । २३ ण वि देहो बंदिज्जइ नापि देहो वन्द्यते । ण वि य कुलो नापि च कुल पितृपक्षो वन्द्यते । ण वि य जाइसंजुत्तो न च जातिसयुक्तो मातृपक्षशुद्ध पुमान् वन्द्यते । को वंदमि गुणहीणो के वदे गुणहीन अपि तु गुणहीन न कमपि वदे । न हु सवणो णेव सावओ होइ गुणहीन पुमान् न श्रवणो दिगम्बरो भाति नैव धावको भवति देशवती च न भवति । गुणगानेच मुनिर्बन्दनीय इति भाव । वंदामि तवसमेण्णा सीलं च गुणं च बंभचेर च । सिद्धिगमण च तेसिं सम्मत्तेण सुद्धभावेण ॥२८॥ वन्दे तप ममापमान् शील च गुण च ब्रह्मचर्य च । सिद्धिगमन च तेपो सम्यक्त्वेन शुद्धभावेन ॥ वंदामि तरसमण्णा वन्देऽह श्रीकुन्दकु दाचार्य । कान् , मुनी- नित्युपस्कार । करभूतान् मुनीन्, तबसमण्णा तप समापन्नान् । तथा तेसि तेषा मुनीना । सीलं च पूर्णोक्तमष्टादशसहस्रसख्य शीले च धन्दे । गुणं च पूर्वोक्तचतुरशीतिलक्षसंख्य गुण चाहं वन्दे । तथा तेषां मुनीना पूर्वोक्त नाविध ब्रह्मचर्यं च वन्दे । तथा तेपा मुनीना सिद्धि- गमणं च आमोपलब्धिलक्षणं सिद्विगमन मुक्तिप्राप्तिं वदे । केन कृत्वा वन्दे, सम्मत्तेण सम्यक्त्वेन श्रद्धया रुचिरूपेण सम्यादर्शनेन व दे। न केवल सम्मत्तेण बन्दे कि तु सुद्धभावेण निर्मलपरिणामेन अकुटिलतया निर्मायत्वेनेनि तापर्य। चउसहिचमरसहिओ चउत्तीसहि अइसएहि संजुत्तो। अणुचेरबहुसत्तहिओ कम्मरसयकारणनिमित्ते ॥२९॥ १ तवसउण्णा छ । तवममाण । २ अणवर इति घ पाठ तस्याओं निरतरमिति कृत । क ख ग पुस्तके तु उक्त एव पाठ २४ पद्माभृते- चतु पष्ठिवमरसहित चतुस्विरागितिशय सयुक्त । अनुचरबहुमत्वहित कर्मक्षयकारणनिमित्ते ॥ चउसहिचमरसहिओ चतु पष्टिचामरसहितस्तीर्थकरपरमदेवो भवति त वन्दे इति विपमव्याख्या ज्ञातव्या । चउतीमहि अइसएहिं संजुत्तो चतुस्त्रिंशदतिशयै सयुक्तस्तीर्थकरपरमदेवो भवति तं यदे । अणुचरनहुसत्तहिओ अनुचरबहुसत्त्वहित स्वामिना सह ये पृष्टतो गच्छन्ति तेऽनुचरा सेवका तथा बहुसचा अपरेऽपि जीवास्तेभ्यो हित स्वर्गमोक्षदायक इत्यर्थ । कम्मक्सयकारणनिमित्ते फर्मणा क्षयकारण शुक्लथ्यानं तस्य निमित्त प्राप्त्यर्थं तं वन्दे इति क्रियाकारक- सम्बन्ध । अथ कानि तानि कर्मक्षयकारणानि शुलध्यानहेतत्र इति प्रश्ने गाथामिमां चकार श्रीकुन्दकुन्दाचार्य णाणेण दसणेण य तवेण चरियेण संजमगुणेण । चउहि पि समाजोगे मोक्सो जिणसासणे दिहो ।॥३०॥ ज्ञानेन दर्शनेन च तपसा चारित्रेण संयमगुणेन । चतुर्णामपि समायोगे मोक्षो जिनशासने घर ॥ गाणेण ज्ञानेन । दसणेण य दर्शनेन च । तवेण तपसा। चरि- एण चरितेन चारित्रण। संजमगुणेण एतच्चतुष्टय संयमगुण उच्यते । चाहिं पि समाजोगे चतुर्णामपि समायोगे सति एका सामन्या सत्यां । मोक्सो जिणमासणे दिहो मोक्षो जिनशासने दृष्ट कथित । समस्तेन मोक्षो मति न तु व्यस्तैन । उक्तंच धीरनन्दिशिष्येण पम- नन्दिना- घनशिखिनि मृतोऽन्ध संचरन यादमहि द्वितयविषयमूर्तिपक्षमाणोऽपि राज । - दर्शनप्राभूत। २५ अपि सनयनपादोऽथ्रधानश्च तस्माद् हगवगमचरित्रै सयुतैरेव सिद्धिः॥१॥ णाणं णरस्स सारो सारो वि णरस्स होड सम्मत्तं । सम्मत्ताओ चरणं चरणाओ होइ णिव्याणं ॥ ३१ ॥ ज्ञान नरस्य सारं सारमपि नरस्य भवति सम्यक्त्वम् । सम्यक्त्वत चरण चरणतो भवति निर्वाणम् ॥ णाणं परम्स सारो ज्ञान नरस्य जीवस्य सार । सारो वि णरस्स होइ सम्म सम्यग्ज्ञानादपि जीवस्य सम्यक्त्व सारतर भवति । करमात् । समत्ताओ चरण सम्यक्त्वाचरण चारित्र भवति यस्मात्, सम्यक्त्व विना चारित्र प्रतिपालयन्नपि पुमानचारित्रा भवति । चरणाओ होइ णिवाणं चरणाचारित्रानिर्माण सर्वकर्मक्षयलक्षणो मोक्षो भवति । तेन सर्वेभ्यो दर्शनमुकृष्टमिति ज्ञातव्य । णाणम्मि दंसणम्मि य तवेण चरिएण सम्मसहिएण । चोण्ह पि समाजोगे सिद्धा जीरी ण संदेहो ॥३२॥ झाने दर्शने च तपसा चारिपेण सम्यक्त्वसहितेन । चतुर्णामपि समायोगे सिद्धा जीना न स-देह ॥ णाणम्मि ज्ञाने सति । दसणम्मि य दर्शने सति । तवेण तप- सा कृत्वा । चरिएण चरितन चारित्रण कृत्वा । सम्मसहिएण सम्य. क्त्वसहितेन । ज्ञान तपश्चारित्र च व्यर्थं सम्यक्त्व विना । तेन चतुर्णा समायोगे मेलापक सति सिद्धा जीवा ण संदेहो जीया सिद्धा मुक्ति गता अत्र सन्देहो नास्ति । तमा चोक्त- हत ज्ञान क्रियाशून्य हता चाहानिन क्रिया। धावनप्यन्धको नष्ट पश्यनपि च पमुक ॥१॥ १ पउहपि ग य । २ देवा प तीर्थकरा ।
- पटनाभृते- तथा चाहता शान पगौ क्रिया चान्धे नि श्रद्धे नार्थद्वय । ततो ज्ञानक्रियानद्धाप्रय तत्पदकारण ॥१॥ कल्लाणपरपरया लहंति जीवा निसुद्धसम्मत्तं । सम्मदसणरयणं अग्घेदि सुरामुरे लोए ॥३३॥ कल्याणपरम्परया रभन्दे जीवा विशुद्धसम्यत्रत्वम् । सम्यग्दर्शनरल अय॑ते सुरामुरे लोके ॥ कल्लाणपरपरया लहंति जीवा विसुद्धसम्मत्तं कल्याणानां गर्भा- वतारजमाभिषेकनिष्क्रमणज्ञाननिर्वाणाना परम्परया श्रेण्या सह जीवा। भव्यप्राणिनो विशुद्धसम्यक्त्वं निरतिचारसम्यक्त्व प्राप्नुवति । यदैव जीव सद्दष्टिर्भवति तदैव तीर्थकरपरमदेवो भरतीति भार । सम्मईसण- रयणं सम्यग्दर्शनरत्न । अग्घेदि सुरासुरे लोए अर्ध्यत पूज्यते बहुमूल्यं भवति देवदाननभुनने । एतदनमूल्य कोऽपि कर्तुं न श- नोति । करोति चे मूल्य तदा सद्य कुष्टी मुखे भवत् । दहण य मणुयत्तं सहियं तह उत्तमेण गुत्तेण । लक्ष्ण य सम्मत्त अक्संयसुक्खं च मोक्स च ॥ ३४ ॥ दृष्ट्वा व मनुजस्व सहित तथा उत्तमेन गोत्रण। लब्ध्वा च सम्यकरव अक्षयसुख मोक्ष च ॥ दण य दृष्ट्वा च ज्ञात्या। किं, मणुयत्न मनुजन मनुष्यज म अनेक दृष्टान्तदुर्लभ विचार्य महासमुद्रे कराच्युतर नमित्र । महि तह उत्त- मेण गोनेण उत्तमेन गोत्रेण कुलेन सहित सयुक्त । लण य मम्मत्तं सम्यक्य च लब्ध्या । उसयमुक्संच मोसं च एत सामय प्राप्य अक्षयसौरयं निजमुबुद्धपरमामधद्धानज्ञानानुचरणस्त्रमावोत्थ १अक्ख यसोस लहदि मोक्य च घ ।
दर्शनप्रभृतं । परमानन्दलक्षणं मुखं भवति न केवलमक्षयसुखं भवति मोक्षं च द्रव्यकर्मनोकर्मभावकमरहित ऊर्ध्वगमनलक्षणं परमनिर्वाण च चकास्ति। विहरदि जाव जिीणदो सहसदृसुलक्सहिं संजुत्तो। चउतीसअइसयजुदो सा पडिमा थावरा भणिया ॥३५।। विहरति यावजिनेन्दः सहस्राष्टमुलक्षणैः संयुक्तः । चतुर्विंशदतिशययुतः सा प्रतिमा स्थावरा भणिता ॥ विहरदि जाव जिणिंदो विहरति पर्यटति आर्यखण्डे यावत्सम्बो- धन करोति जिनेन्द्रस्तीर्थकरपरमदेवः । स कथंभूतः, सहसुलक्स- हिं संजुत्तो अष्टाधिकसहस्रलक्षणे संयुक्त' । चउतीसअइसय- जुदो चतुस्त्रिंशदतिशययुतः । सा पडिमा थायरा भणिया सा प्रतिमा प्रतियातना प्रतिविम्ब प्रतिकृतिः स्थावरा भाणिता इह मध्य- लोके स्थितत्वात् स्थावरप्रतिमेत्युच्यते । मोक्षगमनकाले एकस्मिन् समये जिनप्रतिमा जंगमा कथ्यते । व्यवहारेण तु चन्दनकनकमहा- मणिस्फटिकादिघटिता प्रतिमा स्थावरा । समवशरणमण्डिता जंगमा जिनप्रतिमा प्रतिपाद्यते । अथ कानि तानि जिनलक्षणानि अष्टाधिकसह- स्त्रसंख्यानीति चेदुच्यन्ते--श्रीवृक्षः । करचरणेषु शंख । अम्भोजे । स्वस्तिकः। अंकुशः । तोरण । चामरं । शेतातपन । सिंहासन । ध्वजः । मस्यौ । कुम्भौ । कच्छप । चक्र । समुद्रः। सरोवर । वि. मानं । भवन | गजः । नरनार्यो । सिंह । बाणधनुपी । मेरु । इदः । पर्वतः । नदी। पुरं । गोपुरे । चंद्रः । सूर्यः । जात्यश्यः । ध्यजनं । येणु । वीणा । मृदंग: 1 पुष्पमाले द्वे । पट्टकूलं । हहः । कुण्टलादि- पोडशाभरणानि । फलिनमुद्यानं । सुपककलमक्षेत्रं । रनद्वीपः । वर्ज । मही । लक्ष्मी । सरस्वती। सुरभी। वृषभः । चूडारन । महानिधिः । कल्पवल्ली । हिरण्यं । जम्बूवृक्ष । गरुडः । नक्षत्राणि ।
२८ पट्माभृते- तारका | राजसदन । महा । सिद्धार्थपादप । अष्टप्रातिहार्याणि । अष्टमगलानि । एवमादीनि अष्टोत्तरशत क्षणानि । तिलकम- सकादीनि नवशतव्यञ्जनानि तान्यपिलक्षणशब्देनोच्यन्ते । अथ के ते चतुस्त्रिशदतिशया ! नि स्वेदता । निर्मलता। क्षीरगौररुधिरता। समचतुरस्त्रसस्थान । वज्रवृषभनाराचसहनन । मुरूपता । सुग- न्धता । सुलक्षणता। अनन्तवीर्य । प्रियहितवादित्व । इत्येते दशा- तिशया जन्मन आरभ्य भवन्ति । तथा घातिकर्मक्षयजा दशातिशया सन्ति, ते के गव्यूतिशतचतुष्टयसुभिक्षता । गगनगमन । प्राणिवधा- भावः । मुक्तरभाय । उपसर्गाभाव । चतुर्मुखत्व । सरियाप्रमुख । प्रतिबिम्बरहितत्व | लोचनपश्मनि स्पन्द । नखकेशानामवृद्धि । इति धातिर्मक्षयजा दशातिशया । देवोपनीताश्चतुर्दशातिशया । तथा हि । सर्वार्धमागधीका भाषा। कोऽयमर्थ ? अर्द्ध भगवद्भापया मगधदे- शभापात्मक । अर्द्ध च सर्वभाषात्मक। कथमेवं देवोपनीतत्वमिति चेत् । मगधदेवसन्निधान तथा परिणामतया भाषया सस्कृतभापया प्रवर्तते ॥१॥ मैत्री च सर्व जनताविपया सर्वे जनसमूहा मागधप्रीतिकरदेवातिशय- वशात् मागधभापया भाषन्ते परस्पर मित्रतया च वर्तन्ते इति द्वारति- शयौ ॥ २ ॥ सर्वर्तना फलस्तवका । सर्वप्ना पल्लवा । सर्वर्तना पुष्पाणि तरीदीना भवति ॥ ३ ॥ आदर्शसदृशी रनमयी भूमिर्भपति ॥ ४ ॥ वायु पृष्ठत आगच्छति ॥ ५ ॥ सर्पलोकस्य परमानन्दो भव- ति ॥ ६ ॥ अग्रेऽने योजनमेक सुगन्धगन्धावहा भूमिभाग प्रमार्जन्ति धूलीकटकखटकीटकर्करपाषाणादिक च दूरीकुर्वन्ति ॥ ७ ॥ तद्भूम्युपरि मेधकुमारा गन्धोदक वर्षन्ति ॥८॥ सुवर्णपत्रपद्मरागमणिकेसरविराजित योजनमेक कमल ताशचतुर्दशकमलवेष्टितं स्वामिन पादाघो भवति तादृशानि पद्मानि सप्ताग्रे भवन्ति सप्त पृष्ठतश्च भवन्ति ||९॥ अष्टादश -- दर्शनप्राभृतं । २९ धान्यानि भूमौ निष्पद्यन्ते ॥१०॥दिश आकाशश्व रजोधूमिकादिग्दाहादिर- हिता भवन्ति ॥११॥ ज्योतिर्देवा व्यन्तरदेवा भवनवासिनश्च देवा सौधर्मे- न्द्राज्ञया सपा देवादीना समाहान कुर्वति ॥ १२ ॥ अप्रेऽग्ने धर्मचक्र गगने गच्छति चम्पतिवक्रमत्॥१३॥चतुर्दशौतिशयोऽएमङ्गलानि॥१४॥ भृगार -मुरालुका । सालो-मजीर 1 कलश कनक्कुम्भ । धज • पताका।सुप्रीतिका विचित्रचित्रमयी पूजाद्रव्यस्थापनार्हा स्तम्भाधारकुम्भी। स्वेतच्छा । दर्पण । चामर च । एतानि प्रत्यकमात्तरशतसख्यानि । एव चतुर्दशातिशया देवोपनीता । अष्टप्रातिहार्याणि च भवति- अशोपवृक्ष. सुरपुष्पवृष्टिर्दिव्यध्यनिश्यामरमासन च। भामण्डल दुन्दुभिरातपत्र सत्प्रातिहार्याणि जिनेश्वराणा॥२॥ वारसविहतवजुत्ता कम्मं सविऊण विहिवलेण स्सं । वोसट्टचत्तदेहा णिव्वाणमणुत्तर पत्ता ॥ ३६ ॥ द्वादश विधतपोयुक्ता कम भपयित्वा विधिवलेन स्वीय । न्युत्सर्गत्यकदेहा निवार्णमनुत्तर प्राप्ताः वारसविहतवजुत्ता द्वादशविधतपीयुक्ता मुनय । कम्मं सविऊण कारविधं क्षपयित्वा । विहिवलेण चारिनमलेन। सं आत्मीय । वोसचत्तदेहा पासनकायोत्सर्गरक्षणद्विविधव्यु सर्गेण त्यक्तशरीरा मुनय । णिब्याणमणुत्तर पत्ता निर्माण गोक्षगनुत्तर सर्वगर्गेभ्य उत्तम प्राप्ता गता सिद्धा इत्यर्थ । सम्यक्त्तमाहात्म्य सर्वमेतज्ज्ञातव्यमिति सिद्ध । इति श्रीपद्मनन्दिकुन्दकुन्दाचायचक्रग्रीवाचायलाचार्यगृपिच्छा चार्थनामपचर विराजितेन सीमन्धरस्वामिज्ञानसम्बोधितमन्यजनेन श्रीजि नचन्द्रसूरिंभहारकपटाभरणभूतेन कलिकालसवरून विरचित्ते पराभूतप थे सर्व मुनिमण्डलीमण्डितेन कठिकागौतमस्वामिना श्रीमलिभूषणेन भट्टार- केणानुमतेन सकलविद्वजनसमाजसम्मानितेनोभयभापाक विचकवर्तिना धीरि धानन्दिगुर्व वेवातिना रिवरश्रीश्रुतसागरेण विरचिता दशनप्रातटीका । समासा चारित्रप्राभृतं । सर्वार्थसिद्धिप्रदमहदीश, विद्यादिनन्द वृपसस्यकन्द । मन्दोऽपि नत्वा विवृणोमि भक्त्या, चारित्रसार शृणुतार्यमुख्या ॥१॥ सन्याहू सव्वदंसी णिम्मोहा वीयराय परमेट्ठी । चन्दिनु तिजगनंदा अरहंता भव्यजीवेहि ॥१॥ णाणं दंसण सम्म चारित्तं सोहिकारणं तेमि । मुक्साराहणहउँ चारित्तं पाहुडं वोच्छे ॥२॥ सवज्ञान सर्वदर्शिन निर्मोहान् वीतरागान् परमेष्ठिन । वन्दित्वा निजगद्वन्दितान् अहत भव्यजीवे ॥ ज्ञान दर्शनं सम्यक् चरित शुद्धिकारण वेषाम् । मोक्षाराधन हेतु चारित्र प्राभृत वक्ष्ये ।। जुगल । सचण्ह सर्वज्ञान् । चंदित्तु वदित्वा । चारित्तं पाहुडं योच्छे चारित्र नाम प्राभूत चारित्रप्राभूत चारित्रसार नाम प्रथ वक्ष्ये। क कर्ता, अह कुन्दकुन्दाचार्य । कथभूतान् सर्वज्ञान्, सव्वदंसी सर्वदर्शिनो लोकालोकावलोकनशीलान् । अपर किं विशिष्टान् सर्वज्ञान, हिम्मोहा निर्मोहान् मोहनीयकर्मरहितान्। भूयोऽपि कि रूपान् , चीयराय वीतरागान् वीत क्षय गतो रागो येषा ते वीतरागास्तान्, अज क्षेपणे इति तानद्धातु " अजेनी " इति सूत्रेण वीरादेश, निष्ठाक्तप्र- त्यये चीत इति निष्पद्यते । वीयराय इत्यत्र शस्लोप । भूयोऽपि कि विशेषणाश्चितान्, परमेही परमेष्ठिन , कोऽर्थ, परमे इन्द्रचन्दनरेन्द्रपू- जिते पदे तिष्ठतीति परमेष्टीति व्युत्पत्ते समवशरणसम्पप्रमण्डितानि- and चरित्रप्राभृक् । त्यर्थ । अपर फर्धभूतान् सर्वज्ञान्, तिजगवंदा त्रिजगद्वन्दितान् त्रिभुवनस्थितमन्पजनपूजितानियर्थ । पुनरपि कर्यभूतान्, अरहंता अरिमोह, रकारेण रजो उभ्यते तत्तु ज्ञानारणदर्शनापरणकर्मद्वयं लभ्यते तपा तेनैव प्रकारेण रहस्यमतराप फापते तेन घातिकर्मचतुष्टय- हननादिन्द्रादिकृतामनन्यसमविनीमहंगा पूनामहन्तीत्यर्ह तस्तानहत । तथा भव्यजीवेहि भन्यजीवैर्वन्द्या इति सम्बध । णाणं देसण सम्म चारितं सोहिकारणं तेसिं तेषां सर्वज्ञानां घातिसघातपातनलक्षणाया शुद्धे कारण हेतु नं दर्शन सम्याचारि च कारण | सम्म इति शब्द एकत्र गृहीतोऽपि निभिर्योग्य तेनायमर्थ सम्यग्ज्ञाने सम्यादर्शन सम्य- चारितं च सपामपि कर्मणां क्षयकारणं मूलादुन्मूलनस्प हेतुरिति भाव । तेन मुक्साराहणहेउं तेन कारणन मोक्षाराधनहेतु कारणं । कि। चारितं चारित्र । पाहुडं प्रामृत सारभूत शाखमह वश्य इति क्रिया- कारकसम्बध । युगल । एतद्गाथाद्वय युगले युग्म वर्तते । एए तिणि वि भाषा हवंति जीवस्स अस्सयामेया। तिण्हं पि सोहणत्ये जिणमणियं दुविह चारित्तं ॥३॥ एते प्रयोपि मावा भवति जीवस्य अक्षया अमेयर । प्रयाणामपि शोधनार्थ जिनभणित द्विविध चारित्रम् ।। एए तिणि वि भावा एते उपोऽपि भावा ज्ञानदर्शनचारित्रपदा- स्त्रिय परिणामा । हवंति जीवस्स जीवस्यामन सम्बधिनी भव- न्ति न तु पुद्गलस्येति भार ! फर्थ भूतानयोऽपि भावा अक्सयामेया अक्षया अविनश्वरा, अमेया अमर्यादीभूता अनंतान ता इत्यर्थ । ज्ञानस्य तावदानन्त्य भवत्येव लोकालोकव्यापकत्वात् । सम्यक्सचारित्रयो कथ- मनन्तवं नियतामप्रदेशस्थितत्वादिति चेन तयोरपि तत्सहचारित्वात्, याव मात्र ज्ञान तापमान सम्यग्दर्शन सम्यक्चारितं च तेपामेकीभार ।
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३२
पट्याभृते--
निश्चयात् । तिण्हं पि सोहणत्थे पाणामपि सम्यग्दर्शनशानचारि-
त्राणा शोधनार्थे शोधननिमित्त । जिणभणियं दुविह चारितं जिनैणि-
तं प्रतिपादित द्विविध चारित्र दर्शनाचारचारित्राचारलक्षण, तद्वक्ष्यति ।
जं जाणइ तं गाणं जं पिच्छइ तं च दंसणं भणियं ।
णाणस्स पिच्छियस्स य समपण्णा होइ चारित्तं ॥४॥
यद जानाति तद् शान यत् पदयति तस्व दर्शन मणिन ।
ज्ञानस्य दर्शनस्य च समापनात् भवति चारिन।
जं जाणइ तं गाणं यजानाति तज्ज्ञान । जं पिच्छइ तं च
दंसणं भणियं यपश्यति तच्च दर्शन मणित । " कृत्ययुटोऽन्यत्रापि च"
इतिवचनारकर्तरि युट्प्रत्यय । णाणस्स दंसणस्स य समवण्णा होइ
चारित्तं ज्ञानस्य दर्शनस्य च समापन्नात् समायोगाच्चारित्र भवति ।
जिणणाणदिदिसुद्धं पढमं सम्मत्तचरणचारित्तं ।
विदियं संजमचरणं जिणणाणसदेसियं तं पि ॥ ५॥ .
जिनज्ञानदृष्टिशुद्ध प्रथम सम्यक्त्वचरणवारिनम् ।
द्वितीय संयमचरण जिनज्ञानसदेशित तदपि ।
जिणणाणदिहिसुद्धं पढम सम्मत्तचरणचारित्तं जिनस्य सर्पज्ञ-
वीतरागस्य सम्बधि यज्ञान दृष्टिदर्शनं च ताभ्या शुद्ध पचविंशति-
दोपरहित प्रथम तारदेकं सम्यक्त्वचरणचारित्र दर्शनाचारचारित भवति।
विदियं संजमचरणं द्विताय सयमचरण चारित्राचारलक्षण चारित्र
भवति । जिणणाणसदेसियं तं पिजिनस्य सम्वन्धि यत्सम्यग्ज्ञान
तेन सन्दशित सम्यनिरूपित तदपि चारित्र भवति । उक्त च-
मूढप्रय मदाश्चाप्टी तथानायतनानि पत्।
अष्टी शकादयश्चेति दृग्दोपा. पचविंशति ॥१॥
३ -- चारित्रामृत । एवं चिय णाऊण य सव्वे मिच्छत्तदोस संकाई। परिहरि सम्मत्तमला जिणभणिया तिविहजोएण ॥६॥ एवं चैव ज्ञात्वा च सर्वान् मिथ्यात्वदोषान् शंकादीन् । परिहर सम्यक्त्वमलान् जिनभणितान त्रिविधयोगेन ॥ एवं चिय पाऊण य एव चैव ज्ञात्वा च । सव्वे मिच्छत्तदोस संकाई सर्वान् मिथ्यात्वदोपान् शंकादीन् । परिहरि परिहर हे जीव ! त्वं परित्यज । कथभूतान् , सम्मत्तमला सम्यक्त्वमलान् पूर्वोक्तश्लोक- कथितान् पंचविंशतिदोपान् । कथंभूतान् , जिणभणिया सर्वज्ञमणि- तान् श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञवीतरागप्रतिपादितान् । तिविहजोएण मनो- वचनकायटक्षणकर्मयोगेन कृत्वा । किं तन्मूढत्रय लोकमूद, पाखण्डि- मूद, देवतामूढ चेति । तत्र लोकमूढ-- सूर्या? ग्रहणस्नानं संक्रान्ती द्रविणव्ययः । सन्ध्यासेवाग्निसत्कारो देहगेहार्चनाविधिः॥१॥ गोपृष्ठान्तनमस्कारस्तन्मूनस्य निषेवणं । रत्नवाहनभूवृक्षशस्त्रशैलादिसेवनं ॥२॥ आपगासागरस्नानमुश्चयः सिकताश्मनां। गिरिपातोऽग्निपातश्च लोकमूढं निगद्यते ॥३॥ वरोपलिप्सयाशावान् रागद्वेपमलीमसाः। देवता यदुपासीत देवता मूढमुच्यते ॥४॥ सग्रन्थारम्भहिंसानां संसारावर्तवर्तिनां । पापण्डिनां पुरस्कारो क्षेयं पापण्डिमोहनं ॥५॥ अष्टौ मदाः के ते - ज्ञानं पूजां कुलं जाति यलमृद्धिं तपो वपुः । अष्टावाश्रित्य मानित्वं स्मयमाहुर्गतस्मयाः॥१॥ पडनायतनानि कानि तानि :- - ३४ पट्माभृते- कुदेवगुरुशास्त्राणा तद्भक्तानां गृहे गतिः। पडायतनमित्येव वदन्ति विदितागमाः ॥ १॥ प्रभाचन्द्रस्त्वेव वदति मिथ्यादर्शनज्ञानचारित्राणि त्रीणि त्रयश्च तद्वन्त पुस्पा पडनायतनानि । अथवा असर्वज्ञ १ असर्वज्ञायतन २ असर्वज्ञज्ञान ३ असर्पज्ञज्ञानसमवेतपुरुप ४ असर्वज्ञानुठान ५ असर्थज्ञज्ञा नानुष्ठानसमवेतपुरुषश्चेति ६ । शकादयोऽष्ट यथा शंका १ काक्षा २ विचिकित्सा ३ मूढदृष्टि ४ अनुपगृहन ५ अस्थितीकरणे ६ अवात्स ल्य ७ अप्रभावना चेति ८ अष्टौ शकादय । हिस्सकिय णिक्कंखिय णिव्यिदिगिंछा अमूढदिट्टी य । उवग्रहण ठिदिकरणं वच्छल्ल पहावणा य ते अहे ॥७॥ नि शकित नि कोक्षित निर्विचिकित्सा अमूढष्टिश्च । उपगूहन स्थितीकरण पात्सल्य प्रभावना च ते अष्टौ ॥ णिस्संकिय इत्यादि। नि शकित निर्भयत्वं परदर्शने जैनाभासे चा मुक्तिमाननत्व, अञ्जनचोरवजिनवचनमाननं च । णिकसिय निष्का क्षितं सम्यक्त्वव्रतादिफलेन राज्यदेवत्वेहभवमुखेप्टजनमेलापकत्वादिनिदा नस्याकरण । सीतानन्तमतिसुतारादिवद्वतदाय च । णिन्विदिगिंछा निर्विचिकित्सा रत्नत्रयपवित्रपारजनशरीरमलादिदर्शनेन शूकाया अफ रणं उद्दायनमहाराजवत् । अमूढदिट्टी य अमूढदृष्टिश्च निनवचनेऽदिश थिलत्वं रेवतीमहादेवीवत् । उवग्रहण उपगूहर्न जिनधर्मस्थवालाशक्तज नदोपझपन जिनेद्रभक्तश्रेष्टिवत् । ठिदिकरणं स्थितीकरण सम्य स्त्वतादेर्भश्यजैनस्प तत्र स्थापन पुष्पदन्तविप्रस्य वारिपेगवत् । वच्छल्ल वात्सल्य धर्मस्थजनोपसर्गनिवारणं अकम्पनादेषिष्णुकुमारमुनिरत् । पहावणा य प्रभारना च जिनधर्मोद्योतनं परधर्मप्रभाविध्वंसन च वनकुमारविद्याधरमुनिवत् । ते अह ते सम्यक्त्वगुणा अष्ट भरन्ति । १पदावणा अह ग घ..
३ -- चारित्रप्राभृतं । तं चे गुणविसुद्धं जिणसम्मत्तं सुमुक्खठाणाय । जं चरइ णाणजुत्तं पढमं सम्मत्तचरणचारित् ॥ ८॥ तचैव गुणविशुद्ध जिनसम्यक्त्व सुमोक्षस्थानाय । पच्चरति ज्ञानयुक्त प्रथम सम्यात्वचरणचारित्रम् ॥ तं चैव गुणविसुद्धं तच्चैव सम्यक्त्वं गुणविशुद्ध नि शंकितादिभिर- टगुणैपिशुद्ध निर्मल । जिणसम्मत्त जिनसम्यक्त्वं जगत्पतिश्रीमद्भग- वदर्हत्सर्वज्ञवीतरागस्य सम्बधिनी श्रद्धा रुद्रादिश्रद्धानरहित जिनसम्य- परवमुच्यते । रद्रादिसम्यक्त्व किं । तदुक्तं- अग्निवत्सर्वभक्ष्योऽपि भवभक्तिपरायणः । भुक्ति जीवन्नवाप्नोति मुक्किं नु लभते मृतः ॥१॥ भवभक्तिपरायणो रुद्रभक्तिपरायण । सुमुक्सठाणाय सुमोक्षस्थानाय तीर्थंकरपरमदेवो भूत्वा सर्वकर्मक्षयलक्षण मोक्षस्थान प्राप्नोति सुमो- क्षस्थान तस्मै सुमोक्षस्थानाय परमनिर्माणप्राप्त्यर्थमित्यर्थ । जं चरइ णाणजुत्त यचरति यत्प्रतिपालयति यति णाणजुत्तं ज्ञानयुक्तं सम्यक्त्व शानसहित सम्यक | अथवा क्रियाविशेषणमिद । तेनायमर्थ ज्ञानयुक्त यथा भवत्येव चरति । पढमं सम्मत्तचरणचारित्त द्वयोर्दर्शनाचारचारि- त्राचारयोर्मध्ये सम्यक्त्त्वाचारचारित्रं पढम-प्रथम भवति । सम्मत्तचरणसुद्धा संजमचरणस्स जइ व सुपसिद्धा । णाणी अमूढदिट्टी अचिरे पावंति निव्वाणं' ॥ ९ ॥ सम्यक्त्वचरणशुद्धा सयमचरणस्य यदि वा सुप्रसिद्धा । शानिन अमूढदृष्टय अचिरं प्राप्नुवति निर्वाणम् ॥ -- १ अस्मादग्रे ग घ मुदित पुस्तके व इद गाथासून वर्तते-- सम्मत्तचरणभट्ठा सजमचरण घरति जद वि णरा । अण्णाणणाणमूढा तह वि पावति णिवाण ॥ ॥ इति ।
पट्माभूते- सम्मत्तचरणसुद्धा सम्यक्त्वचरणे सम्यक्त्वचारित्रे ये सूरयः शुद्धाः सम्यक्त्वदोषरहिताः सम्यक्त्वगुणसहिताश्च भवन्ति । संजमचरणस्स जइ व सुपसिद्धा संयमचरणस्य यदि वा मुप्रसिद्धाः चारिभाचारे च सुप्रसिद्धाः सुष्ठु अतिशयेन प्रकर्पण सिद्धं चारित्रं येषां ते सुप्रसिद्धाः सर्वलोकविदिता वा सम्यक्त्वपूर्वकचारित्रप्रतिपालका इत्यर्थः । गाणी अमूढदिट्टी ज्ञानिनोऽमूढदृष्टयश्च । अचिरे पावंति निव्वाणं अचिरे स्तोककाले निर्वाणं प्राप्नुवन्ति । अत्र चारित्रस्य मुख्यत्वेऽपि सम्य- क्त्वज्ञानयोरपि सामग्र्यमुक्तमिति भावः । वच्छल्लं विणएण य अणुकंपाए सुदाणदच्छाए। मम्गगुणसंसणाए अवगृहण रक्षणाए य ॥१०॥ एएहि लक्खणेहिं य लक्खिज्जइ अज्जवहिं भावहिं । जीवो आराहतो जिणसम्मत्तं अमोहेण ॥ ११ ॥ वात्सल्य विनयेन च अनुकम्पया सुदानदक्षया । मार्गगुणसंशनया उपगूहन रक्षणेन च । एतैः लक्षणः च लक्ष्यते भार्जवैः भावैः । जीव आराधयन् जिनसम्यावं अमोहेन । एएहि लक्खणेहिं य एतैर्लक्षणैः । जिनसम्यक्त्वं । आराहतो आराधयन् । जीवो लक्खिज्जइ जीव आत्मा लक्ष्यते ज्ञायते । न केवलमेतैर्भावैरपि तु अज्जवेहिं भावेहिं आवै वैश्वाकुटि- लपरिणामैश्चौपलक्ष्यते। केन कृत्वा लक्ष्यते ? अमोहेण अमेहिनान- ज्ञानतया ज्ञानेन विचक्षणतया । विचक्षणं विना सम्यक्त्याराधक पुरुष कोऽपि न जानाति सम्यक्त्वपरिणामस्यातिसूक्ष्मत्वात् । अथवा अमो- हेण अमोधेन सफलजन्मना पुरुषेण । एतैः कैरित्याह-वच्छल्क एक तावद्वात्सल्यं धर्मिष्ठजनेषु स्नेहलत्वं सद्यः प्रसूतगौरिव वत्से वत्सलत्वेन ।
चारित्रप्राभृतं । सदृष्टिविचक्षणैर्जायते। विणएण य विनयेन च विनयगुणेन गुरुजनेष्य भ्युथानसम्मुखगमनकरयोटनपादवन्दनादिभिर्गुणै सदृष्टिविचक्षणै- यिते । अणुकंपाए अनुकम्पया दुखित जन दृष्ट्वा कारुण्यपरिणामो- ऽनुकम्पा तया सदृष्टिचिक्षणैर्ज्ञायते ! कथभूतयानुकम्पया, सुदाण- दच्छाए शोभनदानदक्षया दु खितजनयोग्यदानविशिष्टया। मग्गगुण संसणाए मार्गगुणशसनया निर्मथलक्षणो मोक्षमार्ग समन्थो वस्त्रादि- वेष्टित कोऽपि मोक्ष न गच्छति इति मोक्षमार्गस्तवनेन सदृष्टिविचक्ष- गैीयते । अमगृहण उपगूहन बालाशक्तजनजनितदोषाच्छादनेन सद् प्टिविचक्षणैर्ज्ञायते । रक्खणाए य मार्गाद्मश्यजनस्थितीकरणेन सद्द ष्टिविचक्षणीयते इति क्रियाकारकसम्बध । उच्छाहभावणासंपसंससेवा कुदंसणे सद्धा । अण्णाणमोहमग्गे बुव्वंतो जहदि जिणसम्म ॥ १२ ॥ उत्साह्भावनासप्रशसासेवा कुदर्शने श्रद्धर्वा । अज्ञानमोहमार्गे कुर्वन् जहाति जिनसम्यक्त्वम् । उच्छाभावणासपसंससेवा मिथ्यादृष्टिकथिताचारे योऽसावु- त्साह उद्यमस्त, सपसस-सम्यमनसा वचसा च प्रशसनं स्तुति वचनं, सेवा मिथ्यादृष्टे करादिना स्पर्शन । कुर्दसणे सद्धा मिथ्यादर्शने श्रद्धा रुचि । अण्णाणमोहमग्गे न विद्यते ज्ञान पेपा तेऽज्ञानास्तेषा मोघो निष्फलो मोहो वा सशयादिरूपो योऽसौ मार्ग ससारदु खकारी धर्मस्तस्मिनज्ञानमोहमार्गे श्रद्धा रचिं कुर्वन् । जहदि जिणसम्म जि नसम्यक्त्व जहाति मुचति । उच्छाहभावणासपसंससेवा सुदंसणे सद्धा। ण जहदि जिणसम्मत्त कुम्वंतो गाणमग्गेण ॥ १३ ॥ ।
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पट्माभृते-
उत्साह्भावनासप्रशसासेवा मुदर्शने श्रद्धां।
न जहाति जिनमम्यक्त्व दुर्वन् ज्ञानमार्गेण ॥
उच्छाहमारणासपसंमसेवा सुदंसणे सद्धा न जहदि जिणस
म्मत्तं उत्साह-उद्यमस्तं कुर्वन्निति सम्बध
। भावणा-शरीराकर्म
णश्चामा पृथग्वर्तते इति भेदभावना ता । सपसस-सम्यक्प्रकारेण
मनोवचनकायकर्मभि प्रशसामर्हदादीना स्तुतिं कुर्वन् । तथा सेना स्नप
नपूजनस्तपनजपनादिगुर्वादिपादसवाहनादिक च कुर्वन् । मुदसणे-सम्य
ग्दर्शने रत्नत्रयलक्षणमोक्षमार्गे तत्वार्थे च श्रद्धा रुचिं कुर्वन् जिनस-
म्यक्वं न जहाति न यजति । उत्साहादिक केन ना कुर्वन् , णाण
मग्गेण ज्ञानमार्गेण सम्यग्ज्ञानद्वारेण ।
अण्णाण मिच्छत्तं वजहि णाणे विसुद्धसम्मने ।
अह मोहं सारम्भ परिहर धम्मे अहिंमाए ॥ १४ ॥
अज्ञान मिथ्यात्व वर्जय ज्ञाने पिगुद्धसभ्यस्त्वे ।
अथ मोह सारम्भ परिहर धर्मऽहिंसायाम् ॥
अण्णाणं मिच्छत्त वज्जहि णाणे विसुद्धसम्मत्ते अज्ञान वर्जय
दूरीकुरु, कस्मिन् सति गाणे-जाने सम्यग्ज्ञाने सति, अज्ञानस्य ज्ञान
प्रन्यनीक तत । मिथ्यात्वं वर्जय, कस्मिन् सति सम्यक् सति मिथ्या
त्वस्य सम्यग्दर्शनं प्रतिबंधक यत । अह अथान तर । मोहं परिहर
परित्यज । कथभूतं मोह, सारभं सेवाकृपिराणियाद्यारम्भसहित ।
कस्मिन् सति, धर्मे सति चारित्रे सति । तथाऽऽरभ परिहर कस्या
सत्या, अहिसाए अहिंसाया सत्या पचमहाव्रतानि रात्रिभोजनवर्जनप
ठानि सर्वाण्यप्यहिंसानिमित्त कथितानि यत ।
पव्वज संगचाए पयह मुतवे मुसंजमे भावे ।
होइ सुविसुद्धझाणं णिम्मोहे वीयरायत्ते ॥ १५ ॥
चारित्रप्राभृत । ३ प्रव्रज्यायों संगत्यागे प्रवर्तस्व मुतपसि सुसयमे भावे । भवति सुविशुद्धध्यान निर्मोहे वीतरागत्वे ॥ पव्वज्ज संगचाए पयह हे जीव ! त्व प्रव्रज्याया प्रवर्तस्त्र, कस्मिन् सति, सगचाए-सगस्य वस्त्रादिपरिमहस्य त्यागे सति । तया हे आत्मन् ! स्व सुतवे पयट्ट सुतपसि प्रवर्तन । कस्मिन् सति, सुसंजमे भावे शोभनसंयमपरिणामे सति । असयमिनो मासोपवासादियुक्तस्यापि सुत- पोऽसद्भावात्। तथा होइ सुविसुद्धझाणं णिम्मोहे वीयरायत्ते भवति सुविशुद्धध्यान निर्मोहे पुत्रक्लमित्रधनादिव्यामोहवर्जिते पुरुपे, यस्तु पुत्रादिमोहसहितो भवति तस्य विशिष्ट धर्म्यध्यानं शुक्लध्यानदेशोऽपि न भवति यत्त । तथा वीतरागवे सति सुविशुद्धध्यान भवतीति तात्पर्य । उक्तं च योगीन्द्रदेवनाना भट्टारकेण-- जंसु हरिणच्छी हियवडइ तासु न भु विचार। एश्कर के समति रद्ध । ये खडा पडियारि ॥१॥ मूढस्य नालियबढी" इति प्राकृतव्याकरणसून । मिच्छादसणमग्गे मलिणे अण्णाणमोहदोसेहि । बज्झति मूढजीवा मिच्छत्ताधुद्धिउदएण ॥ १६ ॥ मिथ्यादर्शनमार्ग मलिनेऽज्ञानमोहदोधाभ्याम् । बध्यन्ते मूढजीवा मिथ्यात्वाबुद्धभुदयेन ॥ ! यस्य हरिणाक्षी हृदये तस्य मैव विचारय । एकस्मिन् कय समायातौ वद द्वौ खगौ प्रतिद्वारे ॥१॥ २ अन पुस्तके सम्मत्ताबुद्धिउदण इति पाउ किं तु टीकाया मिच्छत्तायुद्धि उदएण इति पाठ । ग घ पुस्तकेऽपि सम्मत्तायुधिउदएण इति पाठ । घ पुस्तके त्वस्याय अर्थ प्रकाशित जीवा सम्यक्त्वबुद्धपदयात् सम्यक्षम (कथा) विप्रकटनात् अज्ञानमोहादिदोषै मलिन कृष्ण मिग्यात्वदर्शन मा त्यजन्ति मुञ्चन्तीति । क पुस्तके तु टीकोक एव मूल पाठ । मह्म
४०
पप्राभूते-
मिच्छादसणमग्गे मलिणे मिथ्यादर्शनमार्गे मलिने पापरूपे सति ।
कै कृत्वा, अण्णाणमोहदोसेहिं अज्ञान पमिथ्यात्यलक्षण, मोह पच
जैनामासलक्षण , अज्ञान च मोहश्चाज्ञानमोही तावेर दोपौ ताभ्यामज्ञान
मोहदोपाभ्या वध्यन्ते पापै वेष्टयन्ते । के ते. मूढजीवा अशानिन । केन
कृत्वा, मिन्छत्ताधुद्धिउदएण मिथ्यात्वस्यायुद्धेश्वाज्ञानस्योदयेन प्रादु
विन।
।
सम्मइंसण पस्मदि जाणदि णाणैण दव्वपज्जाया।
सम्मेण य सदहदि य परिहरदि चरित्तजे दोसे ॥१७॥
सम्यग्दर्शनेन पश्यति जानाति ज्ञानेन द्रव्यपर्यायान् ।
सम्यकत्वेन च श्रद्दधाति च परिहरी चारिनजान् दोषान् ।।
सम्मईसण पस्सदि सम्यग्दर्शनन सत्तारलोकनरूपेण विशेषम
कृत्या निराकाररूपेण पश्यति विलोकते । जाणदि णाणेण जानाति
ज्ञानेन विशेषरूपेण साकाररूपेण ज्ञानेनामा जानाति । कान् पश्यति
कान् जानाति, दवपज्जाया द्रव्याणि जीवपुद्गलधर्माधर्मकालाकाशा
स्तथा पर्यायाश्च जीवस्य नरनारकादय क्रोधमानमायालोभमोहस्नेहपुण्य
पापादयश्व पर्यायास्तान् पश्यति जानाति च। तथा पुद्गटस्प ब्यणुकपणुक-
चतुरणुकपचाणुकादिमहास्क धत्रैलोक्यपर्यता पर्यायास्तान् पश्यति
जानाति च । धर्मस्य येन रूपेण जीवपुद्गलौ गति कुरतस्तद्रूपा पर्याया ।
तथाऽधर्मस्य पर्याया स्थितिरूपा जीवादीनां ज्ञातव्या । काटस्प समया
बलिप्रभृतय पर्याया । उक्त च-
आपलि असखसमया सखेजावलिहिं होइ उस्सासो।
सतुस्सासा थोमो सत्तत्योमो एवो भणिो ॥१॥
आवलिरसखसमया संख्येयावलिभिर्भवति उपवाम ॥
ससोप्यासा स्तोक सप्तस्तोको लवो मणित ॥1॥
चारित्रप्राभृतं ।
अहेत्तीसरया नाली दो नालिया मुहुत्त तु ।
समऊण त भिषण अतगुटुत्त भयावह ॥२॥
एकन समयन यूनो मुहूर्तो भिन्नमुहूर्त कथ्यते। अन्तर्मुहूर्तस्वनेक
प्रकार । के तेऽनेकप्रकारा अतर्महूर्तस्पेयाह आरल्युपरि एक सम
योऽधिको यदा भवति तदा जघन्योन्तर्मुहूर्तो भाति । एवमारत्युपरि
यादय समयाश्चदन्ति ते सर्वेऽप्यतर्मुहूर्ता भपरित याव समयोनो
मुहूर्त । एपमहोरात्रपक्षमासयनवर्षपूर्वपल्योपमसागरोपमावसर्पिण्यु
त्सपिण्यादय कालस्य पर्याया ज्ञातव्या आकाशस्य तु पर्याया घटाकाश
पटाफाश स्तम्भाकाश इयादय । सम्मेण य मदहदि य परिहरदि
चरितजे टोसे सम्यक्त्वेन च श्रद्दधाति रोचते न केवल श्रद्धत्ते परिहरदि
य-परिहरति च कान् , चरित्तजे दोसे चारित्रजान् दोपानिति सम्बध ।
एए तिणि वि भारा हपति जीपस्म मोहरहियस्म ।
नियगुणमाराहतो अचिरेण वि कम्म परिहरइ ॥ १८॥
एते भयोपि भावा भवाति जीवस्य मोहरहितस्य ।
निजगुण आराधयन् अचिरेणापि कर्म परिहरति ॥
एए तिण्णि वि भावा हवति जीवस्म मोहरहियस्म एते त्रयोऽ
पि भारा सम्यग्दशनशानचारित्रलक्षणा परिणामा भपन्ति जीवस्या-
मन । कथंभूतस्य जीवस्य, माहरहितस्य चारित्रमोहापविशतिभे
दादहितस्य वर्जितस्य । नियगुणमाराहतो अचिरेण विकम्म परि
हरइ निजगुण शुद्भबुद्धैकस्वभाषमा मगुण ज्ञानध्यानस्वरूपमाराधयनचि
रेण स्तोककालेन कर्म परिहरति सिद्धो भवति ।
सखिन्नमससिज्मगुण च सासारिमेरुमित्ताण ।
सम्मत्तमणुचरता करति दुक्सक्सय धीरा ॥ १९ ॥
१ भत्रिशालवा नालीद्वे नालिके मुहूर्त ।
समयोन स भिा भन्तर्मुहर्तोऽनेकविध ॥२॥
४२ पट्प्राभूते-- संख्येयामसंख्येयगुणा सर्षपमेहमानों ण । सम्यक्रवमनुचरत कुर्वन्ति दु सक्षय धीरा ॥ संखिज्जं सख्येयगुणा निर्जरा सम्यक्त्वं प्रतिपालय तो धीरा योगी श्वरा प्राप्नुवतीति । असंखिज्जगुणं असंख्येयगुणा निर्जरा । अणुच रंता चारित्र पालयन्तो धीरा योगीश्वरा । करति-कुर्वन्ति । तदनन्तर दुक्सक्सयं करति सर्वकर्मक्षयादन तर मोक्ष प्राप्नुवतीत्यर्थ । कर्थ- भूता संख्येयगुणामसख्येयगुणा च निर्जरा, सासारिमेरुमित्ता णं सर्पपमैरुमात्रा । सम्यक्त्तनिर्जराया सकाशात् चारित्रनिर्जरा बहुतरेति भार । णं इति वाक्यालकारे । दुविहं संजमचरणं सायार तह हवे निरायार। सायार सग्गंथे परिग्गहा रहिय सलु निरायार ।। २० ।। द्विविध सयमवरण सागारं तथा भवेत् निरागारम् । सागार सप्रन्थे परिग्रहादहिते निरागारम् ॥ दुविहं संजमचरणं द्विविध सयमचरण द्विप्रकारचरित्रा. चार । कौ तौ द्वौ प्रकारौ, सायार तह हवे निरायार सागार तथा भनिरागार | सागारं कुत्र भवति, सायार सग्गंधे सागार चारित्रं सग्रन्थे गृहस्थे भवति । तर्हि निरागार चारित्र कस्मिन् भनति, परिग्ग- हा रहिय सलु निरायार परिग्रहादहिते निम्र ये निरम्बरे निरागार चा- रित्र वेदितव्यमित्यर्थ । सायार-अथ सागार चारित्राचार निरूपयन्ति श्रीकुन्दकुन्दाचार्या दंसण वय सामाइय पोसह सचिव रायभत्ते य । घंभारभ परिग्गह अणुमण उद्दि देसविरदो य ॥२१॥ दर्शन व्रत सामायिक ओषध सचित्त रानिमुक्तिश्च । ब्रह्मचर्य भारम्भ परिग्रह अनुमति उद्दिष्ट देशविरतथ। - -~- चारित्रप्राभूत । ४३ अष्टौ मूलगुणा । ते के, वटफलानामभक्षण १ पिप्पलफलवर्जन २ "लक्षो जटी पर्कटी स्यात्। तत्फलनिवारण ३ उदुबरो जघने फलामलयु गूलर इति देश्यात् तत्फलनिषेध ४ कठंजर कठुबर अंजीर इति देश्यात् तत्फलानामभक्षण मद्य ६ मास ७ मधुनिषेध इत्यष्टौ मूलगुणा । अथवा- मद्यपलमधुनिशाशनपचफलीपिरतिपचकाप्सनुती। जीवदया जलगालनमिति च क्वचिदष्टमूलगुणा ॥१॥ सप्तव्यसनवर्जन । उक्त च- मद्यमाससुरावेश्याखेटचौर्यपराङ्गना । महापापानि सप्तव व्यसनानि त्यजेदयुध ॥१॥ सम्यक्त्वप्रतिपालन परशास्त्राणामश्रवणमिति विशुद्धमति । मूलक नालिकापभिनीक दलशुनकन्दतुबकफल्युशुभशाककलिंगफलसूरणकन्द त्यागश्च । अरणीपुष्प वरणपुष्पं सौभाजनकुसुम करीरपुष्प काच नारपुष्पमिति पचपुष्पयाग । लवणतैलघृतधृतफलस धानकमुहूर्तद्वयो- परिनवनीतमासादिसे विभाण्डभाजनवर्जन । चर्मस्थितजलस्नेहर्हिगुपरि हार । अस्थिसुराचर्ममासरक्तपूयमलमूत्रमृताङ्गिदर्शनत प्रत्याख्यातान्न सेवनाचाण्डालादिदर्शनात्तच्छन्दश्रवणाच्च भोजन त्यजेत् । सुललित पुष्पितस्वादचलितमन्न त्यजेत् । पोडशप्रहरादुपरि तक दधि च त्यजेत् । द्विदलानमिश्रं दधि तकं स्वादित सम्यक्त्वमपि मलिनयेत् । ताम्बूलौ पधजल रात्रौ त्यजेत् । एप सर्वोऽपि दर्शनप्रतिमाचार । वय द्वादशवतानि, अहिंसा स्थूलवधाद्विरमण, सत्य स्थूरसत्यवचन, स्थूलमचौर्य, ब्रह्मचर्य स्वदारस तोप परदारनिवृत्ति चित्सर्वत्रीनिवृत्ति , परिग्रहपरिमाणवत, दिग्विदिक्परिमाणविरति , अनर्थदण्डपरिहार , भोगोपभोगपरिमाणमिति गुणवतनय, सामायिक, १ क पुस्तके तु धृतशब्दो नास्ति। कस्य ४४ . पप्राभृते-- प्रोपधोपनास , अतिथिसविभाग, सल्लेखनामरण चेति शिक्षाबतचतुष्टयं । सामाइय त्रिकालसामायिकापोसह पर्वोपवास , सचित्त सचित्तस्याभ- क्षण। रायभत्ते य रात्रिभोजनपरिहारो दिवाब्रह्मचर्य,। बंभ सर्वथा प्रल- चर्य । आरभ सेवाकृपिवाणिज्यादिपरिहार परिग्गह वस्त्रमात्रपरिग्रह- स्वीकार सुपर्णादिवर्जन । अणुमण शिवाहादिकर्मानुपदेश । उद्दिड उद्दिष्टाहारपरिहार । देसविरदो य एव मागारचारित्र । पंचेवणुवयाई गुणव्ययाई हवंति तह तिण्णि । सिक्सावय चत्तारि संजमचरणं च सायार ॥२२॥ पर्चवाणुवतानि गुणवतानि भवति तथा प्रीगि । शिक्षाव्रतानि चत्वारि सयमचरण च सागारम् ॥ पंचेवणुव्वयाई पंचैवाणुव्रतानि भवन्ति । गुणव्ययाई हवंति तह तिणि गुणव्रतानि भान्ति तथा त्रीणि | सिरसावय चत्तारि शिक्षावतानि चत्वारि भवति । सजमचरणं च मायार सयमचरण च सागार भवति । एतानि द्वादशवतानि पूर्वमेयसूचितानि । थूले तमकायवहे थूले मोसे तितिक्सथूले य । परिहारो परपिम्मे परिग्गहारभपरिमाण ॥ २३ ॥ स्थूले प्रसकायवधै स्थूलायां मृपाया तितिक्षास्थूले । परिहार परप्रेम्लि परिप्रहारम्भपरिमाणम् ॥ थूले तसकायरहे स्थूठे प्रसकायस्थे । परिहार इति शब्दश्चतुर्थ सम्बध्यते । धूले मोसे स्थूटम्पावादे परिहार । तितिक्सथूले यति- तिक्षास्थूले चौर्यस्थूले परिहार । परिहारो परपिम्मे परिहार क्रियते कस्मिन् परप्रेम्लि परदारे । परिग्गहारमपरिमाणं परिग्रहाणा मुवर्णा- दीनामारंभाणा सेवापियाणि यादीना परिमाणं क्रियते ।
चारित्रप्राभूत । ४५ दिसिविदिसिमाण पढम अणत्यदंडस्म वज्जणं विदियं । भोगोपभोगपरिमा इयमेवगुणव्वया तिण्णि ॥२४॥ दिग्विदिग्मान प्रयम-अनर्थदण्डस्य वर्जन द्वितीयम् । भोगोपभोगपरिमाण-इदमेव गुणवतानि त्रीणि ॥ दिसिविदिसिमाण पढमं दिग्निदिमानं परिमाणं प्रथम गुणवत ज्ञातव्यं । अणत्यदंडस्स बज्जणं विदियं अनर्थदण्डस्य वर्जनं द्वितीय गुणवतं भवति । भोगोपभोगपरिमा भोगोपभोगपरिमाणं तृतीय गुणवतं भवति । भोजनादिक भोग । यत्रस्त्रीप्रमुखमुपभोग इत्यर्थ । इयमेव गुणव्यया तिष्णि इदमेनाचरणं त्रीणि गुणवतानि भवन्ति। सामाइयं च पढमं विदियं च तहेव पोसहं भणियं । तइयं अतिहिपुज्जं चउत्थ सल्लेहणा अंते ॥२५॥ सामायिकं च प्रथम द्वितीय च तथैव प्रोपधो मणित । तृतीयमतिषिपूज्य चतुर्थ साडेसना ते॥ समाइयं च पढमं सामायिक च प्रथमं शिक्षावतं । चैत्यपचगुरु- भक्तिसमाधिभक्तिलक्षणं दिन प्रति एकवार द्विवार निवारं वा व्रतप्रति माया सामायिक भवति । यत्तु सामायिकप्रतिमाया सामायिक प्रोक्त तत्रीन् यारान् निश्चयेन करणीयमिति ज्ञातव्यं । पिदिय च तहेव पोमहं भणियं द्वितीयं च तथैव प्रोषधोपपास शिक्षात्रतं भणित प्रति पादितं अष्टम्या चतुर्दश्या च । तदपि त्रिविधं, चतुर्तियाहारपरिसन नमुत्कृष्ट, जलसहित मध्यम, आचाम्ल जघन्य प्रोषधोपनास भरति यया शक्ति कर्तव्य । तइयं च अतिहिपुज्जं तृतीयं चातिथिपूर्य, न विद्यते तिधि प्रतिपदादिका यस्य सोऽतिथि । अथा सयमलाभार्थमतति गष्ठति उईडचयों करोतायतिथिति स पूग्यो नवगुणसतगुणसम- वितेन श्रावकेण यस्मिन् शिक्षात्रते तदतिधिपूज्यं । चउत्य सल्लेह - ४६ पद्माभृते- णा अंते चतुर्थे शिक्षात्रतमन्ते मरणकाले सल्लेखना कायकपायतनू. करणमिति तात्पर्य। एवं मापयधम्म संजमचरणं उदेसियं सयलं । सुद्धं संजमचरणं जइधम्मं णिकलं बोच्छे ॥ २६ ॥ एव श्रावकधर्म सयमचरण उपदेशित सकल । शुद्ध सयमचरण यतिधर्म निष्कल वक्ष्ये ॥ एवं सावयधम्मं संजमचरणं उदेमियं सयलं एवममुना प्रकारेण धारकधर्मलक्षण सयमचरण चारित्राचार , उपदेशित भवन्त कुत्विति प्रतिपादित, सकल समन परिपूर्ण, किंचिठिशेपसर्प तु न प्रतिपादित- मित्यर्थ । उक्त च- चिल्वालामुफले च त्रिभुवनविजयी शिपीक न सेवते । आ पचदशतिथिभ्यः पयोऽपि यत्सोद्यात्समारम्य ॥१॥ तथा च-- वृतिप्रायेषु पानीय स्नेह च कुतपादिपु । व्रतस्थो वर्जयेन्नित्य योपितश्चामतोचिताः॥१॥ त्रिभुवनविजयीति भगा तदुपटक्षणं सूक्ष्मकणत्यचाहिफेनादीनां । शि- लीधक गोमयच्छत्र केतकीपुष्पदण्डिका च । चर्मतुलादिधृत गुढादिक नादेयं । अभ्युक्षणाचमनादिक च विशेपशास्त्रोक्तं ज्ञातव्यं । सुद्धं संज. मचरणं जइधम्म णिस्कलं योच्छे शुद्ध परिपूर्णविशुद्धिसहित यतिधर्म निष्कल निकलक यक्ष्ये क्थयिष्यामि । इति वचनाप्छारक- धर्मस्य यतिधर्मस्य च तारतम्पेनोत्कृष्टता सूचिता भवतीति ज्ञातव्यम् । पंचिंदियसंगरणं पंचया पंचसिकिरियासु । पंचसमिटि तयगुत्ती संजमचरणं निरायार |॥ २७ ॥ पञ्चेन्द्रियसंवरण पञ्चवता पञ्चविंशतिकिया । पचसमितय निनो गुमयः संयमवरण निरागारम् ।
४७ चारित्रप्राभृतं । पंचिंदियसंवरणं पचानामिन्द्रियाणां सवरण कूर्मवत्सकोचन पंच- वया पचवता । व्रतशब्दस्य पुनपुंसकत्वमुक्तमस्ति तेनान पुंस्त्वं सू- चित । सास्तु विवरिष्यति । पंचविंसकिरियासु पंचविंशतौ कियासु सती । ते पचवता भान्तीति भाव.। पंचसमिदि पचसमितयो भान्ति । तयगुत्ती तिस्रो गुप्तय । संजमचरण निरायारं निरागार- मनगार चारित्राचारो भवतीति द्वारगाथा वेदितव्या । अमणुण्णे य मणुण्णे सजीवदव्वे अजीवदब्वे य । ण करेड़ रायदोसे पंचिंदियसंघरो भणिओ ॥२८॥ अमनोज्ञेच मनोज्ञे सजीवद्रव्ये अजीवद्रव्ये च । न करोति रागद्वेषौ पचेद्रियसवरो भणित ।। अमणुण्यो य अमनोई चासुन्दरे च। मशुण्णे मनोज्ञे मनोहरे। सजी- वदव्वे इष्टचनितादौ । अजीवदव्वे य अजीवद्रव्ये चाचेतनद्रव्ये अश- नवसनकनककाचादिक । ण करेदि रायदोसे न करोति रागद्वेषौ । मनोज्ञे राग न करोति । अमनोज्ञे द्वेप न करोति । पंचिंदियसंवरो 'भणिओ पंचेन्द्रियसबरो भणित प्रतिपादित । अथ पचवया इत्येतत्पदविवरणार्थमाह- हिंसाविरइ अहिंसा असञ्चविरई अदत्तविरई य । तुरियं भविरई पंचम संगम्मि विरई य ॥ २९ ॥ हिंसाविरतिरहिंसा असत्यविरतिरदत्तविरतिश्च । तुरीयमत्रम्हविरति पञ्चम सगे विरतिश्च ।। हिंसाविरइ अहिंसा हिंसाविरतिरहिंसा प्राणातिपातविरतिर्भवति । असञ्चविरई असत्यविरतिद्धितीय महाव्रतं भवति । अदनविरई य अदत्तविरतिश्चादत्ताद्विरतिरदत्तविरतिस्तृतीयं महावत भवति । तुरियं अमविरई अनाविरतिर्मेथुनाद्विरमण तुरिय-चतुर्थं महानतं ज्ञातव्य ।
४८ पट्याभृते- "चतुरो यदीयौ च लोपश्चेति" सूनसाधुत्वात् । पंचम संगम्मि विरई य पंचम महावतं भवति।का संगे परिग्रहे विरतिश्च परिमाहाद्विरमणमित्यर्थः। साहंति जं महल्ला आयरियं जं महल्लपुवेहि । जंच महल्लाणि तदो महल्लया इत्तहे याई॥ ३०॥ साधयन्ति यन्महान्त भाचरित यमहत्पूर्वैः । यच महान्ति तत महाब्रतानि एतस्माद्धेतोः तानि । साहति ज महल्ला साधयन्ति यद्यस्मात्कारणात्प्रतिपालयन्ति। के ते, महल्ला-महान्तो गुरूणामपि गुरव. पुरपाः । आइरियं जं महल्ल- पुव्वेहिं आचरितमादृतं वा यद्यस्मात्कारणात् महल्लपुञ्बेहि-महद्भिः गुरुभिः पूर्वेः चिरन्तनाचार्य वृपभादिभिर्महावीरपर्यन्तै वृपभसेनगौतमा- न्तगणधरैश्च जम्बूस्वामिपर्यन्तैश्च । जंच महल्लाणि यद पस्मान्कार- णात् महल्लाणि-स्वयं महान्ति गुरुतराणि । तदो महल्लया इत्तहे तत. स्तस्मात्कारणात् इत्तहे-एतस्माद्धेतो. तानि महावतानीत्युच्यन्ते । वयगुत्ती मणगुती इरियासमदी मुदाणणिखेलो। अवलोयमोयणाए हिंसाए मारणा होति ।। ३१ ॥ वचोगुप्तिः मनोगुप्तिः ईयाँसमिति. मुदाननिक्षेप । अवलोक्यमोजनेन अहिंसाया भावना भवन्ति । वयगुत्ती वचोगुतिरेका । मणगुत्ती मनोगुप्तिद्वितीया भावना । इरियाममिदी ईर्यासमितिस्तृतीया भावना । मुदाणणिसेनो आदा- ननिक्षेपः पुस्तककमण्डल्यादिकमुपकरणं पूर्व विलोक्य मृदुना मयूरपि- च्छेन प्रतिटिख्य गृह्यते धियते च सुदाननिक्षेप उच्यते । अवलोयमो. यणाए परलोक्य पुनः पुनः दृष्ट्वा भोजनं क्रियतेऽवलोक्य भोजन तना. वटोक्यभोजनेन । प्रारते लिंगभेदः नपुंसकस्य स्त्रीरं । एता अहिंसा- महावतस्य पचभावना भरन्तीति वैदितव्यं ।
.
-
चारित्रप्राभृतं ।
४९
कोहभयहासलोहामोहा विवरीयभावणा चेव ।
विदियस्स भावणाए ए पंचेव य तहा हाँति ॥ ३२ ॥
क्रोधमयहास्यलोभमोहा विपरीतभावना चैव ।
द्वितीयस्य भावना इमा पचैव च तथा भवति॥
कोहभयहासलोहामोहा क्राधश्च भय च हासश्च लोभश्च मोहश्च
क्रोधभयहासलोभमोहा । विवरीयभावणा चेव विपरीतभावनाश्चैव ।
एतेषां पंचानो विपरीतभावना अक्रोधन , अभय , अहास ,
अहास , अलोम ,
अमोहश्चेति । उक्त च गौतमेन भगवता--
अकोहणो अलोहो य भयहस्सविवजिदा।
अणुवीचीमासकुसलो विदिय बदमस्सिदो॥१॥
अत्रामोहशब्देनानुवीचीमापाकुशल इति लभ्यत । धीची वाग्लहरी
तामनुकृत्य या भाषा वर्तते साऽनुवीचीभाषा, जिनसूत्रानुसारिणी भाषा
अनुवीचीभापा पूर्वाचार्यसूत्रपरिपाटीमनुलध्य भापणीयमित्यर्थ । उक्त च
उमास्वामिभट्टारकेण--
"क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचीभाषण च पच '
विदियस्म भावणाए द्वितीयस्य महावतस्य भावना । ए इमा
पचभावना । होति भवन्ति ।
सुण्णायारनिगासो विमोचिताबास जं परोधं च ।
एसणसुद्धिसउत्तं साहम्मीसविसवादो ॥ ३३ ॥
शून्यागारनिवासो विमोचितावास यत् परोध च ।
एषणाशुद्धिसहित सधर्मसमविसवाद ॥
सुण्णायारनिवासो शून्यागारेषु गिरिगुहातरुकोटरादिषु निवास
क्रियते तथा सति अचौर्यव्रतभावना प्रथमा भवति । विमोचितावास
भाधनोऽलोभश्च भयहास्यविवर्जित ।
भनुवीचीभाषाकुशलो द्वितीय प्रतमाधित ॥1॥
पट्याभूते-
उसमामादिषु निमोचितावासेषु धाब्यादिमिरुद्वसेषु कृतेषु निवास क्रि-
यतेऽचौर्यत्रतस्य भावना द्वितीया भवति । जंपरोधं च परेपामुपरोधो
न क्रियते भाटकाद्यधिक स्वामिना दत्वा स्वय न निरुध्यतेऽचौ
र्यवतभारना तृतीया भवति परोपरोधस्याकरणमित्यर्थ । एसणसुद्धि-
सउत्तं एपणाशुद्धिसयुक्त सहित, आगमानुसारेण भैक्ष्यशुद्धिरचौर्यव्रत
भावना चतुर्धा भवति । साहम्मीसंविसवादो सधमाण समुखो भूत्वा
सम्यकप्रकारेण विसवादो विगतसवादोरिवादोन क्रियतेऽचौर्यवतभावना
पंचमी भवति ।
महिलालोयणपुव्वरइसरणसंसत्त्वसहिविकहाहि ।
पुटियरसेहिं विरओ भावण पचापि तुरियाम्म ॥३४॥
महिलालोकनपूर्वरतिस्मरणसंसक्तवसतिविकथामि ।
पुष्टरसे विरत भावना पचापि तुर्ये ॥
महिलालोयण महिलाया आलोकन स्त्रीमनोहराङ्गनिरीक्षणे तस्मा
द्विरत पराङ्मुख । पुव्वरइसरण पूर्वरतस्मरण पूर्व या स्त्रीभि क्रीय
कृता तस्या स्मरण चितन तस्माद्विरत । संसलवसहि स्त्रीणा समी
पतरे या वसतिनियासस्तस्माद्विरत निजशरीरसस्काररहित इत्यर्थ ।
विकहाहि विकथाया विरत खीरागक्थाविवर्जित इत्यर्थ । पुद्विरसेहि
विरओ पु ( पौ) टिकरसस्य सेवारहित वृष्यरसस्यानास्वादक इत्यर्थ
यस्मिन् रसे सेविते वृषवत् शडवरकामी भवति स रसो दृष्य कथ्यते
वाजीकरणरस न सेवते । भावण पचावि तुरियम्मि एता पचापि
भावनास्तुरीये चतुर्थे ब्रह्मचर्यव्रते भवति ।
अपरिग्गह समणुण्णेमु सद्दपरिसरसरूनगंधेमु ।
रायदोसाईणं परिहारो भावणा होति ॥ ३५॥
AHARA चारित्रामृत। अपरिग्रहे समनोज्ञेषु शब्दस्पर्शरसरूपग धेषु । रागद्वेषादीना परिहारो भावना भवन्ति । अपरिगह समणुण्णेसु अपरिग्रहनते, अब लुप्तविभक्तिकं पर्द। सम गुण्णेसु-समनाज्ञेषु मनोज्ञसहितेषु अमनोज्ञेषु चेति शेप ।सद्दपरिसरसरू वगंधेसु शब्दस्पर्शरसरूपग धेषु पद्रियविषयेषु । रायद्दोसाईणं राग द्वेषादीना रागस्य द्वेपत्य च । आदिशब्दात्पादपूरणमेव । मनोज्ञेषु विप- येषु रागो न क्रियतऽमनोज्ञेषु विपयेषु द्वेषो न क्रियते। इति रागद्वेपप- रिहार पचप्रकार पचभावना भवन्तीति ज्ञातव्य । इरिया भासा एसण जा सा आदाण चेव णिक्खेवो। सजमसोहिणिमित्ते संति जिणा पंच समिदीओ ॥३६॥ ईया भाषा एपणा या सा आदाने चैव निक्षेप । संयमशोधिनिमित ख्याति जिना पञ्च समिती ॥ इर्यासमिति चतुर्हस्तवीक्षितमार्गगमन । भाषासमिति आगमानुसा रेण वचन । एषणासमिति चर्मणाऽस्पृष्टस्योद्गमो पादादिदोषरहितस्य भोजनस्य पुन पुन शोधितस्य प्रासुकस्य भाजनस्य ग्रहण या समिति- र्भवति सा तृतीया समिति । आदाण चेव आदान चैव यत्पुस्तककम- ण्डलप्रभृतिक गृह्यते तत्पूर्व निरीक्ष्यते पश्चामृदुना मयूरपिच्छेन प्रति- लिख्यते पश्चात्वते चतुर्थी समितिर्भवति । णिक्खेवो यत्किचिद्वस्त पुस्तककमण्डलुमुख्य कचिनिक्षिप्यते मुच्यते धियते तनिक्षेपस्थानं दृष्ट्वा तथैव प्रतिलिख्य च ध्रियते मयूरपिच्छस्यासनिधाने मृदुवस्त्रेण कदाचि- तथा क्रियते निक्षेपणा नाम्नी पचमी समितिर्भवति। संजमसोहिनि मिते एतसमितिपच सयमस्य महावतपचकस्य शोधिनिमित्त भवति। यो मयूरपिच्छवर्जित साधु स मासोपपासादिक कुर्वन्नपि न शुद्धय- तीति श्रीकुन्दकुन्दभगवदभिप्राय ।संति जिगापंच समिदीओखति- ।
पटप्राभृते- ख्यान्ति प्रकथयन्ति के, जिणा-तीर्थकरपरमदेवा सामान्यकेवलिन श्रुतकेरलिनश्चेति भाव । किं ख्यान्ति, पचसमिदीओ-पच समितीरिति तात्पर्यार्थ । विस्तरस्तु बट्टकेरलवीरनन्यादिविरचिताचारमन्येषु ज्ञातव्य । मन्वजणवोहणत्यं जिणमग्गे जिणवरेहिं जह भणियं । णाणं णाणसरूवं अप्पाणं तं वियाणेह ॥ ३७॥ भव्यजनबोधनार्थ जिनमार्गे जिनवरैयथा भणितम् । ज्ञान ज्ञानस्वरूप आत्मान त विजानीहि ।। भव्यजणबोहणत्यं सम्यग्दर्शनशानचारित्ररत्नत्रयप्राप्तियोग्या ये ते भव्यजनास्तेपा बोधनार्थ सम्बोधननिमित्तं जिणमग्गे जिनस्य श्रीमद्भग- वदर्हत्सर्वज्ञस्य मार्गे सम्पग्दर्शनज्ञानचारित्रलक्षणोपरक्षिते मोक्षमार्गे। जिणवरेहिं जह भणियं श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञैर्यथा भणित प्रतिपादित। किं तद्भणित, णाणं णाणसरूवं ज्ञान व्यवहारनयेन सम्यग्ज्ञानं तथा ज्ञानस्य स्वरूप स्वभार । उक्त च समन्तभद्रेण महाकविना ज्ञानस्य स्वरूप- अन्यूनमनतिरिक्त याथातथ्य विना च विपरीतात् । नि सन्देह वेद यदाहुस्तज्ज्ञानमागमिनः ॥ १११ ईदृग्विध ज्ञान ज्ञानस्वरूप च निश्चयनयेन । अप्पाणं तं चियाणेह आत्मान तज्ज्ञान ज्ञानस्वरूप च हे भव्य । व विजानीहि सम्पग्विचार- येति क्रियाकारकसम्बन्ध । जीजीपविहत्ती जो जाणइ सो हवेइ सण्णाणी । रायादिदोसरहिओ जिणसासणे मोक्समग्गुत्ति ॥ ३८॥ जीवाजी विभक्ति यो जानाति स भवेत् सज्ञान । रागादिदोषरहिनो जिनशासने माक्षमाग इति । जीराजीवविहत्ती जीवस्यात्मद्रव्यस्य, अजीवस्य पुद्गलधर्माधर्मकाला- काशलक्षणस्य पचभेदस्य विभक्ति विभजन रिहवनमिति देश्यात् ।
ranwwwww चारित्रप्रामृत। जो जाणइ सो हवेइ सण्णाणी यो जानाति स भवेत् सज्ज्ञान रायादिदोसरहिओ स ज्ञानी कथभूत , रागादिदोपरहित रागद्वपमो- हादिदोपरहित । जिणसासणे मोक्खमरगुत्ति जिनशासने मोक्ष- मार्ग इति । दसणणाणचरितं तिष्णि वि जाणेह परमसद्धाए । जं जाणिऊण जोई अइरेण लहंति णिव्याणं ॥ ३९ ॥ दर्शनशानचारित्रीण्यपि जानीहि परमश्रद्धया। यात्वा योगिनो अचिरेण लभन्ते निर्वाणम् ॥ दसणणाणचरितं दर्शनज्ञानचारित्र । तिणि वि जाणेह परम सद्धाए त्रीप्यपि जानीहि परमश्रद्धया प्रकृष्टरुच्या । जं जाणिऊण जोई यदर्शनशानचारित्र ज्ञात्वा योगिन । अइरेण लहंति णिव्याणं अचिरेण स्तोककालेन लभन्ते प्राप्नुवन्ति किं तनिर्वाणं सर्वकर्मक्षयलक्षणे मोक्षमिति । पाऊण णाणसलिलं पिम्मलसुविसुद्धभावसंजुत्ता। होति सिवालयवासी तिढुवणचूडामणी सिद्धा ॥ ४० ॥ प्राप्य ज्ञानसटिल निर्मल सुविशुदभावसंयुका । भवति शिवालयवामिन निभुवनचूडामणय सिद्धा ॥ पाऊण णाणसलिलं प्राप्य ज्ञानसलिल लब्धा सम्यग्ज्ञानपानीय । हिम्मलसुविसुद्धभावसंजुत्ता निर्मली निरतिचार , सुपिशुद्धो रागद्वेष मोहादिरहित , भागो निजात्मपरिणामस्तेन सयुक्ता सहिता पुरुषा । होति सिचालयवासी भवति शिवालयवासिन सर्वकर्मक्षयलक्षणनि- र्वाणपदनिवासिनो भवन्ति । तिहुवणचूडामणी सिद्धा त्रिभुवनचूडा- मणयन्त्रैलोक्यशिरोरत्नानि ते पुरुषा सिद्धा भवन्ति-आत्मोपलब्धिव तो भवन्ति । -
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पद्माभृते-
णाणगुणेहि विहीणा ण लहंते ते सुइच्छियं लाहं ।
इय गाउं गुणदोसं तं सण्णाणं वियाणेहि ॥४१॥
ज्ञानगुणविहीना न लभन्ते ते स्विष्टं लाभम् ।
इति ज्ञास्वा गुणदोषौ तत् सद्ज्ञान विजानीहि ॥
णाणगुणेहि विहीणा ज्ञानभेन गुणो जीवस्योपकारक पदार्थस्तेन
विहीना रहिता | ण लहंते ते सुइच्छयं लाहं न लभन्ते न प्राप्नु-
वन्ति ( ते ) सुष्ठु इष्ट लाभ मोक्ष । उक्त च--
णाणविहीणहं मोक्खपउ जीव म कासु वि जोइ।
बहुयइ सलिलविरोलियई करु चोप्पडन होइ॥१॥
इय पाउं गुणदोसं इति पूर्वोक्तप्रकारेण गुण दोष च ज्ञात्वा
ज्ञानस्य गुण, अज्ञानस्य दोप विज्ञाय । तं सण्णाण वियाणेहि तत्त-
स्मात्कारणात्, सत्समीचीन, ज्ञान विजानीहीति तात्पर्यार्थ ।
चारित्तसमारूढो अप्पामु परं ण ईहए णाणी ।
पावइ अइरेण सुहं अपोवयं जाण पिच्छपदो ५४२॥
चारिसमारूढ आत्मन पर न ईहते शानी।
प्राप्नोति अचिरेण सुख अनुपम जानीहि निश्चयत ॥
चारित्तसमारूढो चारित्रसमारूढचारित्रं प्रतिपाव्यन् पुमान् ।
अप्पासु परं ण ईहए णाणी आत्मन सकाशात्पर इष्ट समनिता.
दिक न ईहते न वाञ्छति कोऽसौ, ज्ञानी ज्ञानवान् पुमान् । उक्त च-
स(श) मसुखशीलितमनसामशनमपि द्वेषमति किमुकामाः।
स्थलमपि दहति झपाणां किमग । पुनरगमनाराः ॥१॥
पावइ अइरेण सुहं प्राप्नोत्यचिरेण स्तोककालेन मुखमनन्तसौख्य ।
अगोवमं जाण णिच्छयदो कथभूत सुख, अनुपममुपमारहित जानी-
हि हे भव्य !त्व णिच्छयदो-निश्चयत नि सन्देहान्निधयनयाद्वा ।
एवं संखेवेण य भणियं णाणेण वीयराएण।
सम्मत्तसंजमासयदुण्हं पि उदेसियं चरणं ॥४३॥
चारित्रप्राभृतं । एव सक्षेपेण च भणित ज्ञानेन वीतरागेण । सम्यक वसयमाश्रयद्वयोरपि उद्देशित चरणम् ।। एवं संखेवेण य एवममुना प्रकारेण सक्षेपेण च । मणियंणाणेण चीयराएण भणित प्रतिपादित णाणण-ज्ञानेन ज्ञानरूपेण ज्ञानस्वभागेन केवलज्ञानिना सर्वशेन वीतरामेण रागद्वेषमोहादिभिरष्टादशदोपरहितेन । कि भणित, सम्मत्तसंजमासयदुण्हं पि सम्यक्त्वसयमानयोर्द्वयोरपि दर्शनाचारचारित्राचारयोईयोरपि । उद्देसियं चरणं उद्देशित मुद्दशमात्र संक्षेपेण चारित्र प्रतिपादित । पिस्तरेण तु वट्टकेरलादौ ज्ञातव्य । भावेह भावसुद्ध फुड़ रइयं चरणपाड्ड चेव । लहु चउगइ चाउण अचिरेणऽपुणब्भा होह ॥४४॥ भावयन भावशुद्ध स्फुट रचित चरणप्राभूत चैव । लघु चतुर्गती त्यक्त्वा अचिरेणाऽपुनर्भवा भवत ।। भावेह भावसुद्धं भावयत भावनाविपयी कुरुत यूर्य ह भव्या ।। फुड रइयं चरणपाहुडं चेव स्फुट प्रकटा रचित चरणप्राभृतं चारि- असार । चेवशब्दादर्शनाचरण चोदेशितं । लहु चउगइ चइऊणं लघु शीघ्रं चतुर्गतीस्त्यक्त्वा नरकतिर्यमनुष्यदेवगताश्चतस्र परिहाय । अचि. रेणऽपुण्णमा होह अचिरेण स्तोककालेन-इतस्तृतीये भवेऽपुन- र्भवा सिद्धा भरत यूय । सिद्धिगति पंचमी गतिं प्राप्नुत यूयमिति भद्रम्। इति श्रीपानन्दिकुन्दकुन्दाचार्यवक्रग्रीवाचायलाचार्यगृद्धपिच्छा चायनामपचकविराजितेन सीमन्धरस्वामिज्ञानसम्बाधितभव्यजोवेन श्री जिनचद्रसूरिभटारकपट्टाभरणभूतेन कलिकालसर्प हेन विरचिते पहाभते प्रथे सर्वमुनिमण्डलीमण्डितेन कलिकालगौतमस्वामिना-श्रीमल्लिभूपणन महार केणानुमतेन सकलविद्वज्जनसमाजसम्म नितेनोभयभाषाकविचकवर्तिना श्रीवि यानन्दिशुव देशसिना सूरिवरश्रीश्रुवसागरेण विरचिता चरणप्राभूतटीका समाप्ता।
सूत्रप्राभृतं । - अरहंतभासियत्थं गणहरदेवहिं गंथियं सम्म । सुत्तत्थमगणत्यं सरणा साहंति परमत्थं ॥१॥ अद्भाषितार्थ गणधरदेवैथित सम्यक् । सूनार्थमार्गणार्थ श्रमणा साधयन्ति परमार्यम् ।। अरहंतभासियत्यं अर्हद्भिस्तीर्थकरपरमदेव पितोऽर्थ सूत्र भवति । गणहरदेवेहि गथियं सम्मं गणधरदेवैश्चतुभि नै सम्पूर्णैरटमहा सिद्धिसहितैस्तीर्थकरयुवराजै गथिय-पदै रचित, सम्म–सम्यक् पूर्वापर- विरोधरहित शास्त्र सून भवति । सुत्तत्थमग्गणत्यं सूत्रार्थमार्गणं सूत्रार्थविचार सोऽर्थ प्रयोजन यस्मिन् सूत्रे तत्सूनार्थमार्गणार्थ । तेन शुक्लध्यानद्वयं भवति । तेन सवणा साहंति परमत्यं सूत्रार्थेन श्रवणा सद्दष्टयो दिगम्बरा परमार्थ मोक्ष साधयत्ति--आत्मरशे कुर्वस्ति तैन फारणेन सूत्र मोक्षहेतुरिति भावार्थ । सुत्तम्मि जं सुदि आइरियपरपरेण मग्गेण । गाऊण दुविहसुत्तं वट्टइ सिवमंग्ग जो भव्यो ।॥२॥ सूने यत् सुदर आचार्यपरम्परेण मार्गेण । झावा द्विविधसून वर्तते शिवमार्गे यो भव्य । सुत्तम्मि जं सुदिदं सूत्रे यत् सुष्छु अतिशयेनानाधिततया वा दृष्ट प्रतिपादित । आइरियपरपरेण मग्गेण आचार्याणां परपरा श्रेणि- यत्र मार्गे स आचार्यपरम्पर आचार्यप्रवाहयुक्तो मार्गस्तेन मार्गेण । कोऽसौ मार्ग इति चेदुच्यते-श्रीमहावीरादनतरं श्रीगौतम सुधर्मो १मगि ग घ । मग्गे. क ।
सूत्रप्रामृत। जम्बूवेति प्रय केरलिन विष्णु नन्दिमित्र अपराजित गोग्र्धन भद्र- चातुश्चेति पंच श्रुतकेटिन । तदन तर, विशाख प्रौष्टिल क्षत्रिय जयस नागसेन सिद्धार्थ धृतिषण विजय पुद्धिल गगदेव धर्मसेन इत्येकादश दशपूर्षिण । नक्षत्र जयपार पाण्ड भूरसेन कसावेति पंचैकादशाहधरा । मुभद्र यशोभद्र भद्रबाह रोहाचार्य एते चत्वार एकागधारिण । जिनसेनय । अद्विलि माधनन्दी धरसेन पुष्पदत भूत बलि जिनचद युदपुन्दाचार्य उमास्वामी समतभद्रस्वामी शिवकोटि शिकापन पूज्यपाद एलाचार्य वीरसेन जिनसेन नेमिचंद्र रामसेनश्चेति प्रथमानपूर्वभागज्ञा । अकलंक अनतंविधान दी माणिक्यनन्दी प्रमा- पद्र रामचन्द्र एते सुताफिका । वासवचन्द्र गुणभद्र एती नानी मते वीराङ्गमथ । पाउण दुबिहमुत्तं ज्ञात्या द्विविध सूत्र अर्थत शब्दतच विविध सूत्र । यह सिवमग्गे जो भन्यो यर्तते शिवमार्गे मोक्षमार्गे यो मुनि स भव्यो रत्नत्रययोग्यो माति मोक्ष प्राप्नोतीति भार । सुत्तं हि जाणमाणो भपस्स भवणासणं च सो चुदि । मुई जहा अनुत्ता णासदि सुत्ते सहा णो वि ॥ ३॥ सूर हि जानान भवस्य भवनाशन चरा करोति । सूची यथा असूश नश्यति सूरेण सह नापि। सुत्त हि जाणमागो भवस्त सूत्र शास्त्रानुक्रम हि निश्चयेन जाना- नो जानन् क्स्य सूर, भवस्स-भवस्य सर्वज्ञवीतरागस्य । भवणासणं च सो पुणदि भस्स ससारस्य नाशनं विनाश स पुमान् करोति विदधाति तीर्थकरा भूत्वाऽऽमान प्रकटयति मुक्तो भवत्तीयर्थ । अमु मेवाथै दृष्टा तेन दृढयति मुई जहा असुत्ता णासदि सूची लोहस विका बनदरकारिका असूना दवरकरहिता नश्यति न लभ्यते। मुत्ते
पद्मामृते--
सहा णो वि सूत्रेण सह वर्तमाना सूत्रेण दोरेण सहिता णो विनापि
नश्यति हस्ते चढति।
पुरिसो वि जो ससुत्तो ण विणासइ सो गओ वि संसारे ।
सच्चेयणपञ्चसं णासदि तं सो अदिस्समाणो वि ॥४॥
पुरुषोपि य ससून न विनश्यति स गतोपि ससारे।
स्वचेतनाप्रत्यक्षेण नाशयति त सोऽश्यमानोपि ।
पुरिसो वि जो ससुत्तो पुरुषोऽपि जीयोऽपि य ससूत्रो जिनसूत्र-
सहित । ण विणासइ सो गओ वि संसारे न विनश्यति स पुमान्
गतोऽपि नष्टोऽपि ससार पतितोऽपि पुनरुज्जीवति मुक्तो भवति ।
सच्चेयणपञ्चसं आत्मानुभवप्रत्यक्षेण णासदि तं सो अदिस्समायो
वि णासदि-नश्यति, अन्तरिनों प्रयोग , तेनायमर्थ नाशयति त ससारं
स आसनभव्यजीव । कथभूत , अदिस्समाणो वि-अदृश्यमानोऽपि
चतुर्विधसधमध्येऽप्रकटोऽप्यप्रसिद्धोऽपि ।
सूत्तत्थं जिणमणिय जीनाजीवादिवहुविहं अत्यं ।
हेयाहेयं च तहा जो जाणइ सो हु सद्दिट्टी ॥५॥
सूत्रार्थ जिनभणित जीवाजीवादिबहुविधमर्थम् ।
हेयाहेय च तथा यो जानाति स हि सहरिः॥
सुत्तत्थं जिणभणियं सूत्रस्यार्थ जिनेन भणितं प्रतिपादित जीवा-
जीवादिनहुविहं अत्यं जोराजी कादिक बहुविध कर्मता पन्न वस्तु ।
हेयाहेयं च तहा हेय पुद्गलादिक पचप्रकार, अहेयमादेय निजात्मानं,
तथा तेनैन पड्मस्तुप्रकारेण । जो जाणइ सो हु मदिट्टी य पुमान्
जानाति यत्ति स पुमान् हु-स्फुट सदृष्टि सम्यग्दृष्टिर्भवति ।
जं सूत्तं जिणउत्तं पाहारो तह य जाण परमत्यो ।
तं जाणिऊण जोई लहइ मुहं सवइ मलपुंजं ॥६॥
सूत्रप्राभृतं । यत् सूध जिनोक्तं व्यवहार तथा च जानीहि परमार्थम् । तत् ज्ञात्वा योगी लभते सुख क्षिपते मलपुजम् ॥ जं सुत्तं जिणउत्नं यत्सूत्रं जिनोक्त ! याहारो तह य जाणपरम- त्यो तसून व्यवहार जानीहि तथा परमार्थ निश्चयरूपं च जानीहि है भव्य ! त्व वेत्थ । तं जाणिऊण जोई तत्सून व्यवहारनिश्चयरूपं ज्ञात्वा योगी ध्यानी पुमान् । लहइ मुहं सवइ मलयुंजं लभते सुख निजा- मोत्यं परमान दलक्षण क्षिपते निर्मूलकाप कपते मलस्य पापस्य पुर्न राशि निपष्टिप्रकृतिसमूह । घातिसघातयातनं कृत्वा केवलज्ञानमुत्पादय- तीति भार । यथा चशाषष्टम्भं कृत्वाऽभ्यासवशेन रज्जूपरि चलति पश्चादत्यभ्यासवशेन वंश त्यक्त्वा निराधारतया रज्जूपरि गच्छति तथा व्यवहारावष्टम्भेन निश्चयनयमलम्बते । तदनतर व्यरहारमपि त्यक्त्वा निश्चयमेवापलबते इति भार । सूत्तत्यपयविणहो मिच्छादिही हु सो मुणेययो। खेडे निण कायच्वं पाणिप्पत्तं सचलेस्म ॥७॥ सूत्रार्थपदविनटो मिथ्यादृष्टि हि स ज्ञातव्य । सेलेऽपिन फर्मव्य पाणिपाने सचेलस्य ।। सुत्तत्यपयविणटो सूत्रार्थपदविनष्ट पुमान् । मिच्छादिही हु सो मुणेयव्यो मिथ्यादृष्टिरिति दु स्फुट म पुमान् मुनितव्यो ज्ञातव्य । खेडे पि खेल ऽपि नीडायामपि न कर्तव्य पाणिपात्रेण भोजन न विधातम्प । कस्य, सचेलस्य गृहस्थस्य । हरिहरतुल्लो वि णरो माग गच्छेइ एड भवकोडी। तह विण पावड सिद्धिं समारत्यो पुणो मणिदो ॥८॥ हरिहरतुल्योपि नर स्वर्ग गच्छति एति भवकोटी । तथापि न प्राप्नोति सिद्धि समारस्य पुन भगित ॥
षट्प्राभूते- हरिहरतुल्लो वि णरो हरिश्च नारायणो हरश्च रुद्रस्ताभ्या तुल्य. समान. ऋद्धिमानि यर्थ । नर प्राणी मनुष्य । सग्गं गच्छेइ एइ भवकोडी दानपूजोपवासादिक कृत्वा स्वर्ग देवलोक गच्छति पश्चाद्भवा तराणा कोटीरसंख्यानि भवान्तराणि अनन्तानि या मवा तराणि प्रामोति दु खीभवति ससारी स्यात् । तह वि ण पावइ सिद्धिं तथापि भवकोटीपर्यटनप्रकारेणापि न प्राप्नोति सिद्धि मोक्ष न लभते । किं तर्हि भवतीत्याह-संसारत्यो पुणो भणिदो संसारस्य संसारी पुनर्भणित सिद्धान्ते प्रतिपादित । जिनसूनाभावामिथ्यादृष्टि सन् ससारदु ख सहते सुखी न भवतीति भाव । उकिटमीहचरियं बहुपरियम्मो य गरुयभारो य । जो विहरइ सच्छंदं पावं गच्छेदि होदि मिन्छत्तं ॥९॥ उत्कृष्टसिंहनरित बहुपरिका च गुरुभारथ। यो विहरति स्वच्छन्द पाएं गच्छति मवति मिथ्यात्वम् ।। उक्किहसीहचरियं उत्कृष्ट सर्पयतिम्पोऽधिक सिंहवनिर्भयत्वेन चरित चारित यस्य स पुमानुस्कृष्टसिंहचरित । प्राकृतत्यादत्र नपुसकत्व। अथवा विहरतीति क्रियाविशेषणत्वाद्वितीयैकाचन नपुसकत्व च । बहुपरिकम्मो य गरुयभारो य बहुपरिकर्मा चानेकतपोविधानमा ण्डितशरीरसस्कारश्च मुनिर्गुरुतरभारश्च राजादिमयनिवारक शिष्याणा पठनपाठनसमर्थों यात्राप्रतिष्ठादाक्षादानायुर्वेदज्योतिष्फशास्त्रनिर्णयका रक पडावश्यकर्मकर्मठो धर्मोपदेशनसमर्थ सपा यताना च नैचिन्त्य- कारको गुरुभार उच्यते, ईदृषिधोऽपि गच्छनायको यति । जो विह. रइ सच्छंदं यो यति सच्छन्द विहरति-जिनसूत्र न प्रमाणयति । पावं गच्छेदि होई मिच्छत्तं स मुनि पापं गच्छति प्राप्नोति-मि- स्यात्वं तस्य भवतीति तात्पर्यार्थ ।
६
१
सूत्रप्राभूत ।
निचेलपाणिपतं उवइदं परमजिणवारदेहि ।
एक्को विमोक्समग्गो सेसा य अमग्गया सव्वे ॥१०॥
निश्चलपाणिपान उपदिष्ट परमजिनवरेन्दै ।
एकोपि मोक्षमाग शेषाश्व अमार्गा सर्वे ।।
निच्चेलपाणिपत्तं निश्चेटस्य मुने पाणिपात्र करयो पुटे भोजन
मुक्तं । उपदं परमजिणपरिंदेहि उपदिष्ट परमजिनपरे ड्रैस्तीर्थकरप
रमदेवै । एक्को हि मोक्समग्गो एक एव माक्षमा निर्मथलक्षण ।
सेसा य अमरगया सब्वे शेषा मृगचर्मवल्कलकर्पासपट्टकूलरोमवस्त्र-
राजगोणीतृणमानरणादि, सरे रत्तवस्त्रादि पीताम्बराइयश्च रिश्त्रे, अमार्गा
ससारपर्यटनहेतुत्वा मोक्षमार्गा न भवन्तीति मन्यजनैतिव्य ।
जो संजमेसु सहिओ आरभपरिग्गहेसु विरओ वि ।
सो होइ बंदणीओ ससुरासुरमाणुसे लोए ॥११॥
य सयमेषु सहित आरम्भपरिग्रहेषु विरत अपि ।
स भवति वन्दनीय ससुरामुरमानुषे लोके ।।
जो संजमेसु सहिओ यो मुनिन तु गृहस्थ सयमेषु सहित इंद्रि
यप्राणसंयमवान् भवति । आरमपरिग्गहेसु विरओ वि आरम्भा सेना.
कृषिवाणिज्यप्रमुखा , परिग्रहा क्षेत्रमास्त्वादयस्तेपु चिरतो रिक्तो
भवति । अपिशब्द समुच्चये वर्तते । तेन ब्रह्मचर्यादयो गृह्यते त-
स्माद्ब्रह्मचर्यधरो यतिरिति वचनात् । सोहोइ वंदणीओस मुनिन्द-
नीयो भवति। क वन्दनीयो भवति, ससुरामुरमाणुसे लोए लोके
त्रिभुवने वदनीयो भवति । कथभूते लोके, समुरामुरमानुप देवदानव
मानरसहिते।
जे वावीसपरीमह सहति सत्तीसएहि सजुत्वा ।
ते होति वंदगीया कम्मक्खयनिज्जरामाहू ॥ १२ ॥
६२ पटनाभृते- ये द्वाविंशतिपरीपहान् सहते शक्तिशते सयुमा । ते भवन्ति वन्दनीया कर्मक्षयनिरासाधव ।। जे वावीसपरीमह सहति ये द्वाविंशतिपरीपहान् सहते । सत्ती- सएहि संजुचा शक्तीना शतै सयुक्ता । ते होति बंदणीया ते भवति वदीया नमोऽस्तु शब्दयोग्या । कम्मक्सयनिज्जरासाहू कर्मक्षयनिर्जरासाधव ये कर्मक्षये निर्जरायो च साधर कुशला भपति योग्या भवन्तीति भार । अवसेमा जे लिंगी देसणणाणेण सम्मसंजुत्ता। चेलेण य परिगहिया ते भणिया इन्छणिज्जाय ॥१३॥ अवशेषा ये निद्रिन दशनशानेन सम्यक्सयुक्ता । चेरेन च परिप्रहीता ते भणिता इच्छाकारयोग्या ॥ अवसेमा जे लिंगी अवनेपा ये लिगिन क्षुलुकगुरष । दसण- णाणेण सम्मसंजुत्ता दर्शनज्ञानेन सम्यक्सयुक्ता । चेलेण य परि- गहिया वस्त्रैकधरा सकोपीनाश्च वनमपि सीमित न भवति किं तर्हि खण्डवस्त्र धरति ते वनपरिगृहीता । ते भणिया इच्छणिज्जाय ते भणिता इच्छाकारयोग्या नमस्कारयोग्या । इच्छायारमहत्यं मुठिो जो हु छडए कम्म । ठाणे द्वियसम्मत्तं परलोयसुहकरो होइ ।। १४ ।। इच्छाकारमहार्थ सूत्रस्थित यः स्फुट त्यजनि कम । स्थाने स्थितसम्यक्त्व पररोक्मुख करो भवति ॥ इन्छायारमहत्थं इच्छाशब्देन नम उध्यते वारशब्दस्तु अध स्थ क्रियते तन नमस्कार इति भवति । क्षुल्लकाना यदा। मुत्तठिओ जो दु छडए कम्मं मुत्तहिओ-सूतस्थित समयं जानन् य पुमान् धर्म त्यजति गृहस्थकर्म न करोति यावृत्य पिना स्वयं रचनादिक न ६ सूत्रप्राभृत। करोति । ठाणे हियसम्मत्तं एकादशस्वपि स्थानेषु सम्यक्त्वपूर्वको भवति । परलोयसुहंकरो होइ स्वर्गसौख्य साधयति पोडशसु स्वर्गे- ध्वन्यतमस्वर्गे उत्पद्यते तत्तश्युत्वा निर्मथो भूत्वा माक्ष गच्छति । अह पुण अप्पा णिच्छदि धम्माई करेदि निरवसेसाई । तह वि ण पावदि सिद्धि संसारत्थो पुणो भणिदो ॥१५॥ भय पुन आत्मान नेच्छति धमान् करोति निरवशेषान् । तथापि न प्राप्नोति सिद्धिं ससारस्थ पुन भणित ) अह पुण अप्पा मिच्छदि अथ अथवा पुनरात्मान नेच्छति आम भावना न करोति । धम्माई करेइ निरवसेमाइ धर्मान् करोति निरव शेषान् दानपूजातप शालादिकानि निरवशपाणि समस्तानि पुण्यानि करोति । सह विण पावदि सिद्धिं तथापि पुण्यर्मप्रकारेणापि सिद्धि मुक्ति न प्रामाति । ससारत्थो पुणो भणिदो ससारस्थ पुनर्भणित संसारी भवतीति सिद्धाते प्रतिपादित । उक्त च दवसेनेन भगवता- अंकुणउ तव पालेउ संजम पढउ सयलसत्थाइ । जाम ण झावई अप्पा तामण मोक्ख जिणो भणई ॥१॥ एएण कारणेण य तं अप्पा सद्दहेह तिविहेण । जण य लहेह मोसं त जाणिज्जह पयत्तेण ।। १६ ।। एतेन कारणेन च त आत्मान श्रद्धन निविधेन । येन च लभेव मोक्ष त जानीत प्रयत्नेन ॥ एएण कारोण य एतेन प्रत्यक्षीभूतेन कारणेन हेतुना । चकार उक्तसमुच्चयार्थ , बहिस्तत्वभूतपचपरमेष्ठिकारणसूचनार्थ इत्यर्थ । तं अप्पा सदहेह तिविहेण तमामान शुद्धबुद्धकम्पभात्र- १ अनिकरोतु तप पालयतु सश्रम पठतु सकलशास्त्राणि । यावस ध्यायति भारमान तावन मोक्ष जिनो मणति ॥1॥ .
घट्नाभृते-- मात्मतत्वं अद्धत्त यूयं रोचत यूयं, विविधैन मनोवचनकायप्रका- रेण । जेण य लहेह मोक्खं येन चात्मतत्वेन लभेष मोक्षं सर्वकर्मक्ष- यलक्षणं परमनिर्वाणं प्राप्नुत यूयं । अत्रापि चकार उक्तसमुच्चयार्थः तेन स्वर्गसौख्यं यथासंभवं सर्वाधीसद्धिपर्यन्तं पूर्व टन्च्या पश्चान्मोक्ष लभेवं । तंजाणिजह पयत्तेण तमात्मानं न फेवलं श्रद्धत्त अपितु जानीत विदांकुरुत चेति कथ, प्रयत्नेन सावधानतया सर्वतात्पर्येणेत्यर्थः । वालग्गकोडिमत्तं परिगहगहणं ण होइ साहूर्ण । झुंजेइ पाणिपचे दिण्णणं इक्कठाणम्मि ॥१७॥ चालानकोटिमानं परिग्रहग्रहण न भवति साधूनाम् । भुंजीत पाणिपात्रे दत्तमन्येन एकस्थाने । वालग्गकोडिमत्तं बालस्य रोम्णोऽप्रकोटिमात्र अप्राप्रमात्र अती- वाल्यमपि । परिगहगहणं ण होइ साहणं परिमहस्य महणं स्वी- कारो न भवति साधूनां निरम्बरयतीनां । मुंजेइ पाणिपत्ते भुञ्जीत भोजनं कुर्वात कुर्यात्पाणिपाने निजकरपुटे 1 दिण्णणं इक्कठाणम्मि श्रावकेण दत्तं न त्वतिना दत्तं भुजीत, प्रामुकमोजनं किल सर्वत्र गृह्यते इति जैनाभासा अनन्ति तदनेन विशेपव्याख्यानेन प्रत्युक्तं भवतीति भावितव्यं । इक्कठाणम्भि-उद्भो भूत्वा एकरारं भुजीतति, यो बहुवार भुंक्ते स चन्दनीयो न भवतीति भावार्थ । जहजायख्वसरिसो तिलतुसमेतं न गिहदि हत्थेसु । जइ लेइ अप्यवहुयं तत्तो पुण जाइ णिग्गोदं ॥१८॥ यथागतरूपमद्दशः तिलनुषमा न गृद्धाति हस्तयोः । यदि लाति अल्पबहुकं ततः पुनः याति निगौरम् ॥ जहजादवसरिसो यथाजातरूपः सर्पज्ञवीतरागस्तस्य रूपस- दृशो नमशरीरः । तिलतुसमेत् ण गिहादि हत्थेसु तिल- सूत्रप्रामृतं । स्य पितृप्रियकणस्य तुपस्स्वमात्र न गृह्णाति हस्तयोरित्युत्सर्गव्याख्यान प्रमाणमेन कि तु- वचित्कालानुसारेण रिव्यमुपाहरेत् । गच्छपुस्तकवृद्धयर्थमयाचितमथाल्पक इतीन्द्रनन्दिभगवतीक्त त्वपवादव्याख्यानं । तत्रापि स्वहस्तेन न स्पृश्य किन्तु श्रावकादिहस्तेन स्थापनीय । जइ लेइ अप्पबहुयं यदि लाति गृह्णात्यल्प बहुक वा निजोदरपोषणबुद्धया च । तत्तो पुण जाइ णि- ग्गोदं ततः पुनर्याति निगोद प्रशंसनीयगति न गच्छतीत्यर्थ । जस्स परिग्गहगहणं अप्पं बहुयं च हवह लिंगस्स । सो गरहिउ जिणवयणे परिगहरहिओ निरायारो ॥ १९ ॥ यस्य परिप्रहमण अल्प बहुक च भवति लिंगस्य । स गहणीय जिनवचने परिग्रहरहितो निरागार ॥ जस्स परिग्गहगहणं यस्य मुने श्वेताम्बरादे परिप्रहाहणं शासने भवति । अप्पं बडयं च हवइ लिंगस्स अल्प अर्द्धफालिकादिक बहुयं च-चतुर्विशल्यावरणादिक भवति लिंगस्य कपटकपटसितपटादेर्वेपे। सो गरहिउ जिणवयणे तल्लिंग स वेपो निन्दितोऽप्रशंसनीयो भवति, क, जिणवयणे-श्रीवर्धमानगौतमादिप्रतिपादितसिद्धान्तशास्त्रे । तथा चोक्त समन्तभद्रेण गुरणा--- त्वमसि सुरासुरमहितो अन्धिकसत्वाशयप्रणामामहित । लोकत्रयपरमहितोऽनावरणज्योतिरुज्वलधामहित ॥१॥ अत्र प्रन्थिकसत्वा सितपटाः प्रभाचन्द्रेण क्रियाकलापटीकाया व्याख्याता , सितपटाभासास्तु लोकायतिका अतीव निन्द्या अशौचव्यव- हारोच्छिष्टान्नभोजिन्यात् । परिगहरहिओ निरायारो परिमहरहितो हि मुनिर्निरागारोऽनगारो यतिर्भवति यस्मात्कारणादिति शेप. पद ५ - पट्यामृते- पचमहव्वयजुत्तो तिहि गुत्तिहि जो स सनदो होइ । णिग्गंधमोक्खमग्गो सो होदि हु वंदणिज्जोय ॥२०॥ पायहायतयुज तिमि गुप्तिभि य स संयत भवति । नियमोक्षमाग समवति हि वन्दनीय प॥ पंचमवयजुत्तो पचमहावतैर्युक्त प्राणातिपातानृतादत्तमुरतप- रिग्रहरहित पुमान् पंचमहाव्रतयुक्त उय्यते । यस्तु स्तोकमपि परिम- हीत करोति सोऽणुव्रत सागारोऽवतो या कप्पते । तेन पत्रादौ परिग्रहे सति तर यूकारिक्षादयस्त्रीद्रिया जीवा उत्पद्यते, यदि ततोऽपनीया पत्र क्षिप्यते ततो नियन्ते कथ प्राणातिपातकरहितो निरागारो भाति, अलमतिविस्तरेण परिप्रवान् महानती न भवति । तिहि गुतिहि जो स सजदो होदि तिसभिलिभियुक्तो यो मुनि स संपत सयमवान् भवति । णिग्गंथमोक्समग्गो निर्मन्यमोक्षमार्ग यो मन्यते । सो होदि हुदणिज्जो स भयति हु-मुन्ट पदनीय । य समयमोक्षमार्ग मन्यते स मिध्यादृष्टिनामासचादनीयो भवतीति भावार्थ । दुइयं च युत्त लिई उकिटं अवरसावयाणं च । मिक्स ममेइ पत्तो समिदीमामेण मोणेण ॥ २१ ॥ द्वितीय चोक हित उत्कृष्ट भवरावयागो च। भिक्षी भ्रमति पान समिविभाषेण मौनन । दुइयं च युत्त लिंगं द्वितीय चोक्त लिंग ३१ । उक्किई अवरसा- वयाण चटर लिंग अवरधारकाणा घागृहस्पायकाणी। सो परमानक मिरसं भमेह पत्तो भिक्षा भ्रमति पात्रसहित फरभोजी या । समिदिमासण मोणेण सिमितिसहित मौनराध, उएनायो दशमफादशप्रतिमा प्रान । उक्त च समभद्रेण महाकविना- १ पुस्तकट्रयेऽपि ईगम पाठ भिस्य स्थान सामदेवनावि युट मागी।
AMAAN सूत्रप्राभृतं । आद्यास्तु पइजघन्याः स्युर्मध्यमास्तदनु प्रयः। शेषौ द्वावृत्तमायुक्तौ नैनेषु जिनशासने ॥१॥ एकादशके स्थान धस्कृष्टः श्रापको भवेद्विविधः । वस्कधरः प्रथमः कौपीनपरिग्रहोऽन्यस्तु ॥२॥ कोपीनोऽसौ राषिप्रतिमायोग करोति नियमेन। लोच पिच्छं धृत्वा मुक्त झुपविश्य पाणिपुटे ॥३॥ वीरचर्या च सूर्यप्रतिमात्रकाल्पयोगनियमश्च । सिद्धान्तरहस्यादिप्यध्ययन नास्ति देशविरताना ॥४॥ लिंगं इच्छीण हवदि मुंजइ पिंडं सुएयकालम्मि । अज्जिय वि एकवत्था वत्थावरणेण भुंजेइ ॥ २२ ॥ लिज स्त्रीणां भवति भुक्ते पिण्ड स्वेककाले। आयोपि एकवना वस्त्रापरणेन भुक्ते ॥ लिंग इत्थीण हयदि तृतीयं लिंग वेप वीणा भवति । भुंजइ पिंडं सुएयकालम्मि भुक्ते पिण्डमाहार सुष्ठु निश्चलतया एककाले दिवसमध्ये एकवार । अज्जिय वि एक्कवत्था आर्यापि एकवस्त्रा भ- चति । अपिशब्दात् क्षुल्लिकापि सध्यानवस्त्रेण सहिता भवति । वत्थावरणेण मुंजेह भोजनकाले एकशाटक धृत्वा भुक्ते सव्यान उपरितनवस्त्रमुत्तार्य भोजन कुर्यादित्यर्थ । ण वि सिज्मइ पत्यधरो जिणसासणे जइ वि होइ तित्थयरो। गग्गो विमोक्समग्गो सेसा उम्मग्गया सव्वे ॥२३॥ नापि सिध्यति वनधरो जिनशासने यद्यपि भवति तीर्थकर । नग्नो विमोक्षमार्ग शेषा उन्मार्गका सर्वे ॥ ण वि सिज्झइ वत्यधरो नापि सिद्धयति नैन सिद्धिमात्मोपलब्धि- लक्षणा मुक्तिं लभते वस्त्रधरो मुनि । जिणसासणे जइ वि होड तित्थयरो जिनशासने श्रीवर्धमानस्वामिनो मते यद्यपि भवति तीर्थ- । पट्माभूते- कर तीर्थकरपरमदेवोऽपि यदि भवति । गर्भारतारादिपंचकल्यागवानपि सिद्धो न भवति, आस्ता तापदन्योऽनगारकैवल्यादिक । जग्गो वि. मोक्समग्गो नग्नो वस्त्राभरणरहितो विमोक्षमार्ग ज्ञातव्य । सेसा उम्मग्गया सव्वे शेपा सितपादीना मार्गा सर्वेऽपि उमार्गका कुत्सिता मिथ्यारूपा मार्गा ज्ञेया जानीया विद्वद्भिरित्यर्थ । लिंगम्मि य इत्थीणं थणंवरे गादिकरसदेसेसु । मणिओ सुहमो काओ तासं कह होइ पव्यन्जा ॥२४॥ लिनेच स्त्रीणां स्तनान्तरे नाभिकक्षादेशेषु । भणित सूम काय तास कय भवति प्रनज्या ॥ लिंगम्मि य इत्थीणं लिंगे योनिमध्ये श्रीणां योषिता । थणंतरे णाहिकासदेसेमु स्तनातरे द्वयो स्तनयोर्मध्ये वक्ष प्रदेशे, नाभिकक्षा- देशेषु, नाभौ तुदिकाया, कक्षादेशयोर्गव्हो मूल्योईयो स्थानयो । मणिओ सुहमो काओ भणित आगमे प्रतिपादित कोऽसौ भणित सूक्ष्म काय सूक्ष्मजीवशरीरं लोचनायगोचर सूक्ष्मपंचेद्रियपर्यन्तो जीववर्ग । तासिं कह होड पन्यज्जा तासां स्त्रीणां कर्य भवति प्रवज्या दीक्षा-अपि तु न भवति । यदि प्रव्रज्या न भवति तर्हि कथ पंचमहानतानि दीयत: सत्यमेतत् सन्नातिज्ञापनार्थ महाप्रतानि उपर्यन्ते स्थापनान्यास कियते इपर्थ । तथा चोक्त शुभचन्द्रेण महा- करिना-- मैथुनाचरणे मूढ ! नियन्ते जन्तुकोटय । योनिराधसमुत्पन्ना लिंगसंघट्टपीडिता ॥१॥ कियन्तो जतमो प्रियन्त इति चेत् धाते घातेऽसंग्न्येपा योदय इति । "धाए घाए असंखना" इति पचनात् ।
ur सूरप्राभृता जइ देसणेण सुद्धा उत्ता मग्गेण सा वि संजुत्ता। घोर चरिय चरितं इत्थीसुण पावया भणिया ॥२५॥ यदि दर्शनेन शुद्धा उक्ता मार्गण सापि सयुक्ता। घोर चरित्या चरित स्त्रीपु न प्रव्रज्या भणिता ॥ जइ दसणेण सुद्धा यदि दर्शनेन सम्यक्त्यरत्नेन शुद्धा निर्मला भवति । उत्ता मग्गेण सा वि संजुत्ता तदा मार्गेण सम्यग्दर्शनज्ञान- चारित्रलक्षणेन सापि स्त्री च सयुक्ता भवति-पचमगुणस्थानं प्राप्नोति, स्त्री- लिंग छित्या स्वर्गाने देवो भवति, ततश्श्युत्वा मनुष्यमनमुत्तम प्राप्य मोक्ष लभते । उक्त च- सम्यग्दर्शनसशुद्धमपि मातङ्गदेहज । देवा देय विदुर्भस्मगूदाङ्गारान्तरौजस ॥१॥ स्वर्गेऽपि गता पुन स्त्रीलिंग न लभते । तदप्युक्त समन्तभद्रेण महा कथिना- सम्यग्दर्शनशुद्धा नारकतिर्यइनपुसकत्रीत्वानि । दुष्कुलविकृताल्पायुर्दरिद्रता च ब्रजन्ति नाप्यवतिकाः॥१॥ • घोर चरिय चरितं घोर कातरजनभौतिजनक चरित्रं चरिता षोडशसु स्वर्गेष्वयतम स्वर्ग यान्ति अहमिन्द्रत्वमपि स्त्रीभवे न लभन्ते कथ मोक्ष स्त्रीभ प्राप्नुवन्ति । तेन कारणेन इत्थीसुण पावया भणिया स्त्रीषु न प्रव्रज्या निर्माणयोग्या दीक्षा भणिता । इत्यनया गाथया सित- पटाना मत स्त्रीमुक्तिप्राप्तिलक्षण प्रयुक्त भवति । मरदेवी-ब्राह्मी सुन्दरी- यशस्वती-मुनन्दा मुलोचना सीता-रात्रि मति चन्दना अनन्तमति-दौपदी- त्यादिका स्त्रिय स्वर्ग गता न तु मोक्षामिति । चित्तासोहि ण तेसि ढिल्लं भावं तहा सहावेण । विजदि मामा तेर्सि इत्थीमु णऽसंकया झाणं ॥२६॥ चित्ताशोधि न तेषां शिथलो भाव तथा स्वमावेन । विद्यन्ते मासा ता नीषु न अशकया ध्यानम् ॥ - - पट्माभते- चित्तासोहि ण तेसिं चित्तस्य मनसः आ समन्ताच्छोधिनिर्मलता न विद्यते तासां स्त्रीणां । दिल्लं भावं तहा सहावेण शिथिलो भावः परिणामस्तथा स्वभावेन प्रकृत्यैव, करिमश्चिततादावतिदाय न वर्तते । विज्जदि मासा तेसिं विद्यन्ते मासा-मासे मासे रुविरसारस्तासां स्त्रीणां । इत्थीसु णऽसंकया झाणं स्त्रीषु न वर्तते कि तत्, अर्श- कया निर्भयतया ध्यानमेकामचिन्तानिरोधलक्षणमिति भावः । "लुक्च" इति प्राकृतन्याकरणसूत्रेणाकारलोपः । गाहेण अप्पगाहा समुद्दसलिले सचेलअत्येण । इच्छा जाहु नियत्ता ताह नियत्ताई सव्वदुःखाई ॥२७॥ प्रायेण अल्पपाहा. समुदसलिले स्वचेलान । इच्छा येभ्यो निता तेषां निवृत्तानि सर्वदुःखानि ।। गाहेण अप्पगाहा ग्राह्येण आहारादिना ये मुनयोऽल्पमाहाः स्तोक गृहन्ति । समुद्दसलिले सचेलअत्येण यथा समुद्रसलिले प्रचुरजला- शये सत्यपि स्वचेलप्रक्षालनार्थमल्पमेव जलं गृह्यते किं क्रियतेऽधिक- जलग्रहणेन । इच्छा जाहु नियत्ता इच्छा तृष्णा लोभलक्षणा येभ्यो मुनिभ्यो निवृत्ता गता 1 ताह नियत्ताई सव्वदुःसाई तेषां निवृतानि नष्टानि सर्वदुःखानि शारीरमानसागन्तूनि कष्टानि नष्टान्यैव समीपतर- सिद्धिसुखसमकादिति भावः। इति थोपभनन्दिकुन्दकुन्दाचार्ययफनीवाचार्यलाचार्यगृडपि. च्छाचार्यनामपंचकविराजितेन धीसीमन्धरस्वामिज्ञानसंबोधितमम्यजनेन भीजिनचन्द्रसूरिभहारकपट्टाभरणभूनेन कलिकालमा झन विरचिते पदमागत. प्रन्ये सर्वमुनिमण्डलमण्डिवेन कलिकालगीतमस्वामिना धीमलिभूषणेन भहारकानुमतेन सकलविननसमाजसम्मानितेनोभयमापाठपिचकनिना थी. विधानन्दिगुर्वन्लेवासिना सूरिवाश्यीयुतसागरेण पिरचिना सूत्रप्रामृतटीय समाप्ता।
बोधप्रामृतं। बहुसत्यअत्थजाणे संजमसम्मत्तसुद्धतवयरणे । वंदित्ता आयरिए कसायमलवज्जिदे सुद्धे ॥१॥ सयलजणयोहणत्थं जिणमग्गे जिणवरेहि जह भणियं । बुच्छामि समासेण य छक्कायहियंकर सुणसु ॥२॥ बहुशास्त्रार्थहायकान् संयमसम्यवत्वशुद्धतपश्चरणान् । पन्दित्वाचार्यान् कदायमलवर्जितान् शुद्धान् । सकलजनवोधनार्थ जिनमार्गे जिनवरैर्यया भाणितम् । वक्ष्यामि समासेन र पट्कायहितकर एणु " वुच्छामि वक्ष्यामि कथयिष्यामि । फ कर्ता मह श्रींकुन्दकुन्दा चार्य । किं तत्कर्मापने, छक्कायहियंकर पकायहिनकर पृथ्व्यप्ते- जोवायुवनस्पत्तित्रसकायहितकारक शास्त्रं बोधप्रामृताभिधानं शास्त्र । कैन कृत्वा वक्ष्यामि, समासेण सक्षेपण । सुणसु शृणु त्वं है भव्य ! "विध्यादिषु त्रयाणामेकर दुसुमुश्च" इत्यनेन प्राकृतव्याकरणसूत्रेण हि- स्थाने सुरादेश बहुवचने तु पचम्या सुणह इयत्रं भवति मध्यमस्य । कथंभूतं बोधप्रामृत, जिणमग्गे जिणवरेहि जह मणियं जिनमार्गे जिनशास्त्रे जिनपरै केवलिभिर्यथा येन प्रकारेणाऽऽयतनादिभिर्भ णित प्रतिपादित । किमर्थ जिनर्भणित, सयलजणमोहणस्थ सर्वभ- व्यजीवसम्बोधननिमित्त । किं कृत्वा पूर्व बुच्छामि, वदिना आयरिए वदित्वाऽऽचार्यान् तृतीयपरमेष्ठिपदस्थान् गुरुन् । कथंभूतानाचार्यान, बहुसत्थअत्यजाणे अनेकशास्त्रार्थशायकान्। पुन कथभूतानाचार्यान् , संजमसम्मत्तमुद्धतक्यरणे सयमश्च चारित्र, सम्यक्त्वं च सम्यग्दर्शन N ७२ षट्प्राभूते- शुद्ध निरतिचार, तपश्चरणं च द्वादशविध तपो येपा ते सयमसम्यक्त्व- शुद्धतपश्चरणास्तान् सयमसम्यक्त्यशुद्धतपश्चरणान् । भूयोऽपि कथ भूतानाचार्यान्, कसायमलवज्जिदे क्रोधमानमायालोभलक्षणचतुष्क- पायमलव जितान् पायोत्पन्नपापरहितानित्यर्थ । अपरं कथंभूताना- चार्यान्, सुद्धे शुद्धान् पत्रिंशद्गुणप्रतिपालनेन निर्मलान् निष्पापान् । के ते पत्रिंशद्गुणा इत्याह- आचारवान् श्रुताधारः प्रायश्चित्तासौदिदः (१)। मायापायकधी दोपामापोधावकोऽपि च ॥१॥ सन्तोपकारी साधूना निर्यापैक हमेऽष्ट च । दिगम्बरोऽप्यनुद्दिष्टेमोजी शोशनीति च ॥२॥ आरोगेभुक क्रियायुक्तो व्रतवान् ज्येष्ठ संगुणः । प्रतिमी च पण्मासयोगी च तद्विनियिक ॥३॥ द्वि-पटतपास्तथा पद चावश्यफोनि गुणा गुरोः। आयदणं चेदिहर जिणपडिमा दंसणं च जिणबिंबं । भणियं सुवीयरायं जिणमुद्दा णाणमादत्थं ॥३॥ अरहतेण सुदिहं जं देवं तिथमिह य अरहंत । पावज गुणविसुद्धा इय णायच्या जहाकमसो ॥ ४ ॥ आयतन चैत्यगृह जिनप्रतिमा दर्शन च जिनबिम्बम् । भणित सुवीतराग जिनमुद्रा ज्ञानमत्मस्थम् ।। अर्हता सुदृष्ट यो देव तीर्थमिद च अईन् । प्रव्रज्या गुणविशुद्धा इति ज्ञातव्या यथाक्रमश । आयदणं आयतन ज्ञातव्य | चेदिहरं चैत्यगृह द्वितीय ज्ञातव्यं । जिणपडिमा जिनप्रतिमा तृतीयोऽधिकारो बोधप्रामृते ज्ञातव्य ।दसणं च दर्शन च चतुर्थोऽधिकारो बोधकरो मन्तव्य । जिणबिंचं जिन- १ व इति ख पुस्तके।
३ बोधप्राभूत। बिम्ब पंचमोऽधिकारो बोधजनको विज्ञेयः । कथंभूत जिनबिम्ब, मणियं सुवीयरायं भणितमागमे प्रतिपादितं मुष्छु अतिशयेन वीतराग न तु ले- क्ष्मीनारायणवद्रागसहित । जिणमुद्दा जिनमुद्रा बोधकरी पष्टोऽधिकारो वैदितव्य. । णाणमादत्यं ज्ञानमात्मस्थं सप्तमो नियोगो बोधप्राभृतस्य बोद्धव्यः । अरहंतेष सुदिहं जं देवं अर्हता सर्वज्ञवीतरागण सुदृष्ट- मबाधं प्रतिपादितं जे देवं यो देवः, प्राकृते लिंगभेदत्वादत्र देवशब्दस्य नपुंसकत्वं सोऽयं देवाधिकारो बोधजनकोऽष्टमोऽवगन्तव्यः । तित्थ- मिह य तीर्थमिह च नवमोऽधिकारस्तीर्थमिह बोधप्राभृतेऽवैतव्यः । अरहतं अर्हरस्वरूपनिरूपकोऽधिकारो दशमः प्रत्येतव्यः । पावज्ज गुणविसुद्धा प्रव्रज्या एकादशोऽधिकारो बोधप्राभृतस्य स्मर्तव्य । फर्थ- भूता प्रव्रज्या, गुणविशुद्धा गुणैरुचला । इय गायव्या जहाकमसो इति ज्ञातव्या यथाक्रमशः । एते एकादशाधिकारा बोधप्राभूतस्य चिन्त- नीयाः। गाथाद्वयेन द्वारं बोधप्रामृतस्य कृत । इदानीं तद्विवरणं कुर्वान्त श्री- मन्तो गृपिच्छाचार्यास्तत्रायतनं निरूपयन्ति- मणवयणकायदव्या आसत्ता जस्स इंदिया विसया । आयदर्ण जिणमग्गे णिदिदं संजय रूवं ॥५॥ मनोवचनकायद्रव्याणि आसका यस्य ऐन्द्रिया विषया। थायतनं जिनमार्गे निर्दिष्टं सोयतं रूपम् ।। मणवयणकायदब्या मनोवचनकायद्रव्याणि हृदयमध्येऽटदलक- मलाकारं मानसदव्यं यस्य मनो भवति । उर प्रभृत्पष्टस्थानाश्रित यस्य वचन वचनशक्तिक वारद्रव्धं भवति । अष्टावङ्गानि अनेकोपाङ्गानि यस्य मुनेः कायद्रव्यं भवति । आसत्ताजस्स इंदिया विसया । आसक्ताः सम्बन्धमायाता यस्य मुनेः एन्द्रिया विषयाः, इन्द्रियेषु स्पर्श- ७४ पट्नामृते- नरसनघ्राणचक्षु श्रोत्रलक्षणेषु हृषीकेषु मा एन्द्रिया तेच ते विषया स्पर्शरसगन्धरूपशब्दलक्षणा यथासभव शक्तिरूपा व्यक्तिरूपाश्च भवन्ति । आयदणं जिणमग्गे आयतन जिनमार्गे। णिहिं संजय रूवं निर्दिष्टमागमे प्रतिपादित सायत रूप सयमिन सचेतन शरीर | मय राय दोस मोहो कोहो लोहो य जस्स आयत्ता । पंचमहव्वयधारा आयदणं महरिसी मणियं ॥६॥ मदो रागों द्वषो मोह कोधो लोभव यस्य आयत्ता । पञ्चमहारतघरा आयतन महर्षयो मनिता।। मय राय दोस मोहो मदोऽष्टविध [ उक्तं च समन्तभद्रेण महा- कविना- शान पूजां कुल जाति बलमृद्धिं तपो वपुः । अष्टावाश्रित्यमानित्य स्मयमाहुर्गतस्मया.॥१॥ राग प्रीतिलक्षण । दोषोऽप्रीतिस्वभार । मोह कलत्रपुत्रमित्रा दिस्नेह । कोहो लोहो य जस्म आयचा क्रोधो रोषस्वभाव , लोभो भूर्ग परिग्रहप्रहणस्वभाव । चकारात्परवचनप्रतिर्माया। एतै पदार्था यस्य महर्षे विविधमुनिसमूहस्याऽऽयत्ता निग्रहपरिग्रहनाथवन्ती भवन्ति । पचमहव्वयधारा पचमहाव्रतधरा अहिंसासत्याचौर्यब्रह्मचर्याकिंचन्यानि रात्रिभोजनवर्जनषष्टानि प्रतिपालयत आयदणं महरिसी भणियं आयतन महर्पयो भणिता । एतेऽभिगमनयोग्या भवति दर्शनस्पर्शन वन्दनाहीश्च भवति । अन्ये विलिंगिनो अटिन पाशुपता एकदण्डत्रि- दण्डधरा मिध्यादृष्टिमुण्डिन शिखिन पचचूला भस्मोद्धलना नग्ना- ण्डका चरकनामानो दिगम्बरसज्ञका हैसपरमहसाभिधाना पशुयाशिका दीक्षिता अध्वर्यर उद्गातारो होतार आथर्वणा व्यासा स्मार्ता जैना- - बोधप्रामृत। भासाध नाभिगम्या न दर्शनीया नाभिवादनीयाश्च भवन्ति । अथ के ते जैनामासा पूर्वमप्युक्ता गोयुग्छिक श्वेतवासो द्राघिडो यापनीयक । निष्पिच्छश्चेति पचैते जैनाभासा प्रकीर्तिता ॥१॥ एते मयूरपिच्छधरा अपि न बदनीया संशयमिथ्या दृष्टित्वात् । तथा च बौद्धमत आयतमलक्षण- पचेद्रियाणि शब्दाचा विषया पय मानस । धर्मायतनमेतानि द्वादशायतनानि च ॥१॥ धर्मायतन शरीरमिति । सिद्धं जस्स सदत्यं विसुद्धझाणस्स णाणजुत्तस्स । सिद्धायदणं सिद्धं मुणिवरवसहस्म मुणिदत्य ॥७॥ सिद्ध यस्य सदयं विशुद्धध्यानस्य ज्ञानयुक्तस्य । सिद्धायतन सिद्ध मुनिवरवृषभस्य ज्ञाताथा ॥ सिद्ध जस्स सदत्थं सिद्ध लब्धिमायातं यस्य मुनिवरवृपभस्य । किं सिद्ध,सदर्थ निजामस्वरूप । कथभूतस्य, विसुद्धदाणस्म णाण- जुत्तस्स विशुद्धध्यानस्य आर्तरौद्रध्यानद्वयरहितस्य धर्म्यशुमध्यानय- सहितस्स गणधरकेरिनो मुण्डकालिनस्तीर्थकरपरमदेवकाग्निो वा । कथंभूतपैतनयाय, ज्ञानयुक्तस्य सफलमिल कलरज्ञानयुक्तस्य । सिद्धायदणं सिद्ध सिद्धायतन सिद्ध सिद्धापता प्रतिपादित । कस्य, मुणिवरवसहस्म मुनियरवृषभस्य मुनिकराणा मध्ये वृपभस्य श्रेष्ठस्य । कथभूतमायतन, मुणिदत्यं मुनिता यथावद्विज्ञाता अर्था पड्व्याणि पंचास्तिकाया सप्ततरानि नवपदार्था । जीवपुद्गलार्माधर्मकालाकाशा इति षद्न्याणि । कालरहिसानि यड्यामि पचास्तिकाया भान्ति ।
- ७८ पट्प्राभूते- म्पर्येण स्वर्गमोक्ष लभते । यजल चैत्यगृहस्य कार्यमायाति तद्वत्तदपि शुभभाग्भवति । यत्तेजोऽग्नि चैत्यगृहनिमित्त प्रबाल्यते तदपि तद्वच्छुभ लभते । यो वायुश्चैत्यगृहनिमित्त वर्हि सधुक्षणार्थ विरा. ध्यते धूपागारहवि पाकाथै चौक्षेपनिक्षेपण प्राप्यते सोऽपि तद्वच्छुभ प्राप्नोति । यो वनस्पति पुष्पादिकश्चैत्यगृहपूजाद्यर्थ लूयते सोऽपि का- ययोगेन पुण्यमुपार्नयति तस्यापि शुभ भरति । उक्त च- फुलं पुकार याडियहि कहिया जिणह चडेसि । धम्मी को विन आवियउ कपिय धरणि पडेसि ॥१॥ अन्यच्च- केणय वाडी वाइया फेणय चीणिय फुल्ल । केणय जिणह चडाविया ए तिणि चि समतुल्ल ॥२॥ चेइयहर-चैत्यगृहाधिकार समाप्त इत्यर्थ । २। सपराजंगमदेहा दंसणणाणेण शुद्धचरणाणं । निग्गंथवीयराया जिणमगे एरिसा पडिमा ।।१०।। स्वपराजङ्गमदेदा दर्शनशानन शुद्धचरणानाम् । निन्यवीतरागा जिनमानें इसी प्रतिमा । सपराजंगमदेहा स्वकीया अर्हच्छासनसम्बधिनी । परा पर- कीयशासनसम्बन्धिनी प्रतिमा भवति । सकायशासनस्य या प्रतिमा सा उपादेया ज्ञातव्या । या परकीया प्रतिमा सा हेया न वन्दनीया। १ तात्स्य्यात्ताजन्यमिति भ्यायेन तस्य जीवा ज्ञानव्या पचस्वपि कायेषु शुभोपार्जका पृथिव्यादीनां केवलाना जड वात्तदसमदात् । २ फुल्ल पुकारयात माली कथ जिनस्य चहमि ।। घी कोऽपि नाऽऽयात कम्पायव धरणी पातयसि ॥1॥ ३ केन च वाटिका उपिता केनच चित नि पुष्पाणि । केन व जिनस्य चाढापितानि एन प्रयाऽपि समनुश्या ।२।।
wununwww चारित्रमाभृत। अथरा सपरा--स्वकीयशासनेऽपि या प्रतिमा परा उत्कृष्टा भवति सा वन्दनीया न तु अनुकृष्टा । का उत्कृष्टा का वाऽनुत्कृष्टा इति चेदुच्यन्ते या पचजैनाभासरञ्चलिकारहितापि नग्नमूर्तिरपि प्रतिष्ठिता भवति सा न चन्दनीया न चार्चनीया च । या तु जैनाभासरहित साक्षादाहतसंधै प्रतिष्ठिता चक्षु स्तनादिपु विकाररहिता नन्दिसघ-सेनसघ-देवसघ- सिंहसघे समुपन्यस्ता सा वन्दनीया । तथा चोक्त इन्दनन्दिना भट्टारकेण- चतुःसंघसंहिताया जन विम्यं प्रतिष्ठितं । नमेनापरसंधाया यतो न्यासविपर्ययः॥१॥ चतुःसंध्या नरो यस्तु विदभ्यानेदभावना। स सम्यग्दर्शनातीतः संसार ससरत्यरं ॥२॥ न्यासविपर्ययस्तु गुरुवचनादेवानगन्तव्यः । तथा चोक्त श्रीवीरन- न्दिशिष्य श्रीपमनन्दिभिराचा . विम्यादलोन्नतियचोन्नतिमेव भत्त्या ये फारयन्ति जिनसघ जिनाकृतिं च । पुण्यं तदीयमिह धागपि नैव शका यक्तुं परस्य किमु कारयितु द्वयस्य ॥१॥ ये तु प्रतिमाया वस्त्राभरणादि कुर्वन्ति प्रतिष्ठापेलाया दधिसक्तुमुखे बध्नन्ति तन्मतनिरासार्थ श्रीगौतमेन महामुनिना पृथ्वीवृत्तमुक्त- निराभरणभासुरं विगतरागवेगोदया- निरम्बरमनोहरं प्रकृतिरूपनिर्दोपतः। निरायुधमुनिर्भयं विगतहिंस्यहिमाक्रमा निरामिषसुतृतिमद्विविधवंदनाना क्षयात् ॥१॥ इक्कहि फुल्लाह माटिदेइ जु मुरनररिद्धडी। पही कर कुसाटिया भोलिम जिणधरतणी ॥१॥ - ८० पट्प्राभूते- एक्काहिं फुलहिं फुल्लसउ वाए फुल सहासु। जिम्ब जिम्य जिणयर पुनियह तिम्य तिम्ब दुरियह नासु ॥२॥ तथा चोक्त समन्तभद्रस्वामिना मुनिवरेण आर्याद्वय- देवाधिदेवचरणे परिचरण सर्वदु खनिर्हरण । कामदुहि कामदाहिनि परिचिनुयादाहतो नित्यं ॥१॥ अर्हच्चरणसपर्या महानुभाव महात्मनामवदत् । मेक. प्रमोदमत्त कुसुमेनैकेन राजगृहे ॥ २॥ अजंगमदेहा-मुवर्णमरकतमणिघटिता, स्फटिकमणिघटिता, इद्र नीलमणिनिर्मिता, पद्मरागमणिरचिता, विद्रुमकल्पिता, चदनकाष्टानु टिता वा अजगमा प्रतिमा कथ्यते । ईदृशी प्रतिमा केपा भवति, दंसणणाणेण सुद्धचरणाणं दर्शनेन ज्ञानेन निर्मलचारित्राणा तीर्थकर- परमदेवाना । कथभूता प्रतिमा, निग्गंथवीयराया निम्र या वस्त्राभरण- जटामुकुटायुधरहिता, वीतरागा रागरहितभारेऽतारिता । जिणमग्गे एरिसा पडिमा जिनमार्गे सर्वज्ञवीतरागमते ईदृशी प्रतिमा भाति । जं चरदि सुद्धचरणं नाणड पिन्छेइ सुद्धसम्मतं । सा होइ वंदणीया णिग्गंथा संजदा पडिमा ॥११॥ य चरति शुद्धचरण जानाति पश्यति शुद्धसम्यक्त्वम् । सा भवति वन्दनीया निप्रथा सांयता प्रतिमा । जं चरदि सुद्धचरणं यो मुनिश्चरति प्रतिपालपति । किं, शुद्ध- चरण निरतिचारचारित्र । जाणइ पिच्छेइ मुद्धसम्मत्तं जिनश्रुत जा- नाति स्वयोग्य वस्तु पश्यति च । शुद्ध पचविंशतिदोपरहित यस्य सूरे सम्यक्त्व भवति । सा होइ वंदणीया सा भाति वन्दनीया नमस्क- रणीया। निग्गंथा संजदा पडिया निग्रन्था चतुर्विशतिपरिप्रहरहिता बोधप्रामृत । सयताना मुनीना दिगम्बराणा प्रतिमा आकारः, जगमा प्रतिमा मुनयो भवन्तीत्यर्थः। दसणअणतणाणं अणंतीरिय अणंतसुक्सा य । सासयसुक्स अदेहा मुक्का कम्मबंधेहिं ।। १२ ।। दर्शनानन्तज्ञान अनन्त वीयां अनन्तसुखा च। शाश्वतसुखा अदेहा मुक्ता कर्मानन्धै ॥ दसणअणंतणाणं दर्शनमनन्त कालदर्शन सत्तारलोकनमात्र- लक्षण | काकाक्षिगोलकन्यायेनानन्तशब्द उभयत्राभिसम्बध्यते तेना- नन्तज्ञान वस्तुयथानस्वरूपप्राहक फेवलज्ञान लोकालोकव्यापक द्वय । तद्योगादर्शनान-तज्ञान अन तदर्शनमनन्तज्ञान च सिद्धा भवन्ति । उक्त चाशाधरेण महाकरिना-- सत्तालोचनमात्रमित्यपि निराकार मन दर्शन साकार च विशेयगोचरमिति ज्ञान प्रवादीच्या। ते नेत्रे क्रमातिनी सरजसा प्रादेशिक सर्वतः स्फूर्जन्ती युगपापुनर्विरजसा युप्माकमगातगा. ॥१॥ तथा च नेमिचद्रसिद्धान्तचक्रवर्तिना चोक्त- दसणपुग्ध णाण छदुमस्थाण ण दोषिण उवगा। जुगत जम्हा केवलिणाहे जुगत्र तु ते दो नि ॥१॥ अणंतवीरिय अणंतसुक्सा य अनन्तवीर्याश्च सिद्धा भवन्ति लोकालोस्वरूपारोकने ज्ञातृत्व च या शक्तिस्तदनन्तबार्य ज्ञातव्य ! अनन्तसौख्याश्च सिद्धा भवन्ति सवस्तुस्वरूपपरिज्ञाने सति तेपा सुख- मुत्पद्यते । तया चोक्त नेमिचद्रेण त्रिलोकसाग्ग्रन्ये वैमानिकाधिकार- पर्यन्ते-- - - - ८२ पट्माभृते- एय सत्थ सव्य सत्थ वा सम्ममेत्थ जाणता। ति व तुस्सति णरा किं ण समत्थत्यतचण्हा ॥१॥ चकिमकुरुफणिसुरेंदसहमिदे ज सुह तिकालभव । तत्तो अणतगुणिद सिद्धाण खणसुह होदि ॥२॥ मासयसुक्ख अदेहा शाश्वतमुखा अविनश्यरसुखा , अदेहा देहर- हिता ज्ञानमयमूर्तय इयथ । मुक्का कम्मरधेहि मुक्ता कर्माट- बधनै । निरुवममचलमसोहा निम्मिवियाजगमेण रूवेण । सिद्धवाणम्मि ठिया वोसरपडिमा धुवा सिद्धा ॥१३॥ निरुपमा अचला अक्षोमा निमापिता अजामेन स्पेण । सिद्धस्थाने स्थिता व्यु सगप्रतिमा ध्रुवा सिद्धा ॥ निरुवममचलमसोहा निरुपमा उपमारहिता । ईदृश पुमान् कोऽपि नास्ति येन सिद्धा उपमीयते । अचला स्वस्थानादासुरीको टितम भागमपि न परतो गच्छन्ति । अखाहा अक्षामा न क्षोभ प्राप्नु- वति । उक्त च सम तभद्रेणा सर्पिणीकाले आगामिनि भविष्यत्तीर्थकर- परमदवेन-- काले क्ल्पशतेऽपि च गते शिवाना न विक्रिया पक्ष्या। उत्पातोऽपि यदि स्यात्रैलोक्यसमातिकरणपटु ॥१॥ निम्मावियानगमेण रूवण स्थिररूपेण निर्मापिता ससारा त्य क्षणेन निष्पादिता एकसमयेन प्रायशिखर प्राना धर्मास्तिकायामा- , एक शास्त्र सर्व शास्त्र या सम्यगन जानन्त । सी सुप्यन्ति नरा किं न समस्तार्थतत्वना ॥" परिवरफणिसुरे नेषु अहमिद्धे यासुख निकालमव । सताउनन्तगुणित सिद्वानां क्षणमुख भवति ॥ २॥ २ सर्पप प्रभागतमा
PAR
बोधप्राभृतं ।
चात्परतो न गच्छन्ति, अजंगमेन रूपेण स्थिररूपेण तिष्ठन्ति निश्चय
स्थिरप्रतिमाभिधाना । सिद्धाणम्मि ठिया सिद्धाना मुक्तात्मना
स्थाने त्रिभुवनामे तनुवातउलये स्थिता -मुक्तिशिलामीपदूनगम्यूतिमधो
मुक्त्वा आकाशे निराधारा स्थिता । वोमरपडिमा धुवा सिद्धा
व्युत्सर्गप्रतिमाः कायोत्सर्गेण पद्मासनेन वा स्थिता ध्रुषा शास्वताः
सिद्धाः प्रतिमा भवन्ति । तेऽपि वन्दनीया भवन्ति ।
पडिमा-प्रतिमाधिकारस्तृतीय समाप्त ।३।
अयेदानी गाथाद्वयेन दर्शनाधिकार कथयन्ति श्रीकुन्दकुन्दाचार्या --
दंसेइ मोक्समग्गं सम्मत्तं संयम मुधम्मं च ।
निग्गथं णाणमयं जिणमग्गे दंसणं भणियं ॥ १४ ॥
दर्शयति मोक्षमार्ग सम्यक्त्व संयम सुधर्म च ।
निम्रन्थ ज्ञानमय जिनमार्गे दर्शन भणितम् ।।
दसेइ मोक्समग्गं दर्शयति प्रकटयति मोक्षमार्ग सम्यग्दर्शनज्ञान-
चारित्रलक्षणं यत्तदर्शन ! "कृत्ययुटोऽन्यत्रापीति"वचनात्कर्तरि युद्प्रत्यय ।
कोऽसौ मोक्षमार्गो य दर्शन कर्तृतया दर्शयति, सम्मत्तं सम्यक्त्वं
तत्यार्थश्रद्धानलक्षण । तथा संयम चारित्र पचमहातपचसमिति-
त्रिगुतिरक्षण दर्शयति । सुधर्म चानशनादि द्वादशविध तपश्च
दर्शयति । कथभूतं दर्शन, निग्गथं बाह्याभ्यन्तरपरिप्रहरहित। भूयोऽाप
कथभूत दर्शन, णाणमयं सम्यग्ज्ञानेन निवृतं । जिणमगे दंसणं
भणियं जिनमार्गे सर्वज्ञवीतरागप्रतिपादिते मार्ग दर्शन सम्यक्त्वरूप
भाणत यतिश्रावकाचार प्रतिपादित, अविरतसय्याधारभूत च ।
जह फुलं गंधमयं भयदि हु खीरं स घियमयं चादि ।
तह देसणं हि सम्मं णाणमय होइ रूवत्थं ॥ १५॥
- Man rrena ward पट्प्राभृते- यथा पुष्प गधमय भवति स्फुट क्षीरं तद्धृतमय चापि । तया दर्शन हि सम्यग्ज्ञानमय भवति रूपस्थम् ॥ जह फुल्लं गंधमयं यथा पुष्पं गधमय भाति । भादि हु सीर म घियमयं चावि भवति हु-पुट क्षीर दुग्ध, स-तत् घृतमय घृत युक्त चापि । अपिशब्दादन्यऽपि कनकपाषाणकाष्टाग्निप्रभृतयो दृ याता ज्ञातव्या । तह दंगणं हि सम्मं तथा दर्शन सम्यक्त्व हि निश्चयेन सम्पाज्ञानमय भाति । रूवत्यं यतिधारकासयतसद्दष्टिमूर्ति- स्थित दर्शन ज्ञातव्यमित्यर्थ । दमण-दर्शनाधिकार एकादशाधिकारेषु नाधप्राभूत चतुर्थ समाप्त ॥४॥ अथदानी जिनवित्रस्वरूप निरूपयन्ति श्रागृपिच्छाचार्या भगात - जिण िणाणमयं सजमसुद्धं सुवीयराय च। जं देइ दिक्खसिरसा कम्ममययकारणे सुद्धा ॥१६॥ जिननिम्त्र ज्ञानमय सयमयुद्ध सुवीतराग च । यद् ददाति दीक्षा शिक्षे कमश्यकारणे शुद्ध। जिण िणाणमयं जिनस्य विन्धमाकारो ज्ञानमय मतिज्ञान श्रुतज्ञानयथासमरारधिज्ञानयथामभरमन एययज्ञानमये भरति तृतीय परमेष्टी आचार्यसको जिनपिन्ध ज्ञातव्य इयथ । संजमसुद्धं मुनी यरायं च गदुक्तलक्षण जिनविम्ब कथभूते भवतीयाह-रायमशुद्ध सयमेन निरतिचारचारित्रण शुद्धं निर्मल, मुष्ठु-अतिशयेन वातरार्ग पीत क्षय गती गग प्रीति क्षणो यस्मादिति वीतराग। अन क्षपणे इति धानो प्रयोगात् । " अजेनी 'इशी वचनादजीत बाराददा । चकारात्तगुणाधिकागेपणा निपचिका च जिनपि भवने। जंदेड दिक्ससिरसा यजिनपिन्बमाचार्य ददाति दीक्षा प्रतारोपणलक्षणों, शिक्षा च द्वादशाक्षारक्षणां ददाते। सम्मासयकारण मुद्धा IAN -- बोधप्राभृत। कर्मक्षयकारण शुद्धा निर्मला ! जीवन्मुक्तनिनवदाचार्यों माननीय इति भावार्थ ! उक्त च सोमदपेन सूरिणा-- शानकाण्डे क्रियाकाण्डे चातुर्वर्ण्यपुर सर । सूरिय इयाराध्य ससाराधितरण्डक ॥१॥ तस्म य करह पणाम सव्य पुजं च विणय वच्छल्लं । जस्य य देसण गाणं अत्यि धुवं चैयणाभावो ॥ १७॥ तस्य र कुरुत प्रणाम सर्वो पूजा विनय वात्सल्य । यस्य च दर्शन ज्ञान, अस्ति ध्रुव चेतनाभाव ॥ तस्स प करह पणामं तस्य च जिननिम्बस्य जिनबिमूर्तेराचा- र्यस्य प्रणाम नमस्कार पचाङ्गमष्टाङ्ग वा कुरुत यूय हे भव्यजीरा , चकारादुपाध्यायस्य सर्पसायोश्च प्रणाम कुरुत तयोरपि जिनबिम्बस्य- रूपत्वात् । सव्वं पुज्जं च विणय वच्छल्लं सनी पूजामष्ट- विधमर्चन च कुरत यूमिति, तथा विनय हस्तयोटन पादपतनै सामु खगमन च दुरुत, वात्सल्य भोजन पान पादमर्दन शुद्धतैलादिनाङ्गा- भ्यधन तत्प्रक्षालन चेत्यादिक कर्म सर्व तीर्थकरनामकर्मोपार्जनहे तुभूत चैयावृत्य कुरुत यूय । उक्त च समन्तभद्रेण महामुनिना- व्यापत्तिन्यपनोद पदयो सवाहन च गुणरागात् । चैयावृत्य यावानुपग्रहोऽन्योऽपि समिना ॥१॥ तथा चकारा पाषाणादिघटिनस्य जिननिम्बस्य पचामृत स्नपन, अष्टविधै पूजाद्रव्यैश्च पूजन कुरुत यूय । वदना भक्तिं च कुरुत। यदि तथाभूत जिनबिम्ब न मानयिष्यथ गृहस्था अपि सन्तस्तदा कुभीपा- कादिनरकादौ पतिष्यध यूय । तथा चोक्त सोमदेवेन स्वामिना- अपूजयित्वा यो देवान् मुनीननुपर्य च। यो मुजीत गृहस्थ सन् स भुजात पर तम ॥१॥ -- पट्माभृते- पर तम इति कोऽर्थ कुभीनरक , सप्तमे नरके पच पिलानि तेषा नामानि यथा-ौरवमहारौरवासिपत्रकूटशाल्मलीकुंभीपाका इति । सप्तमनरके यानि चतुर्दिक्षु चत्वारि पिलानि वर्तते ता पर्धरजु- प्रमाणानि सन्ति तेपा मध्ये याकुंभीपाकसज्ञक पंचम विलमस्ति तदैक- योजनलक्षप्रमाण वर्तते, पचभिरपि रज्जुरेका भूमी रद्धा वर्तत। जस्स य दसण णाणं यस्य पूर्वोक्तलक्षणस्य जिननिनस्य दर्शनं ज्ञाने च वर्तते । अस्थि धुरं चेयणाभावो अस्ति विद्यते ध्रुवं निधन चेतनाभान आत्म स्वरूप स्थापनान्यासनापीति तापर्यम् । तनवयगुणेहि सुद्धो जाणदि पिच्छेइ सुद्धसम्मतं । अरहंतमुद्द एमा दायारी दिक्ससिक्सा य ॥ १८ ॥ तपोक्तगुण युद्ध जानाति पश्यति गुदसम्यक वम् । भहमश एपा दात्री दीक्षाशिक्षाणां च ॥ तरमयगुणहि सुद्धो तपोभिादशभदै , व्रतैहिसासत्यास्तेया- झापरिमहै पचभि , गुण पूर्वोक्तलक्षणैश्चतुरशातिलौ शुद्धो निपला । जाणदि पिच्छेइ मुद्धसम्मत्तं जानाति सम्यग्ज्ञानवान् , पश्यति स्वम्प' वेत्ति कस्य शुद्धसम्यक्त्यस्य पचविंशतिमटरहितस्य । अरहंतमुद्द एमा श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञवीतरागस्य मुद्रा आकार एषा धर्माचार्यलक्षणा पापा- णघटितबिनस्वरूपा यत्रमताराधनगम्या च जिनविम्ब भवति । दायारी दिक्ससिरसा य कर्यभूता मुद्रा, दानी दायका फास, दाहाशि क्षाणां चकागधाराप्रतिपदिकर्मणा च प्रयतिका । निणसिं इति श्रीवोधप्राभृते जिनविश्वाधिकार पंचम समाप्त !!५|| अथेदानामेकया गायया जिनमुद्रां निरूपयति श्रीमदलाचार्या दृढसंजममुद्दाए इंदियमुद्दा कमायदढमुद्दा । मुद्दा इह जाणाए जिणमुदा एरिसा भणिया॥१९॥ ।
बोधप्रामृत। दृढसयममुइया इन्द्रियमुद्रा कपायदृढमुदा। मुदा इह ज्ञानेन जिनमुदा ईदृशी भणिता॥ दढसंजममुदाए दृढया वघटितप्रायया सयममुद्रया पड्जीवनि- कायरक्षणलक्षणया पडिन्द्रियसकोचस्वरूपया च मुद्रया वेषेण जिनमुद्रा भवति । इंदियमुद्दा कसायदढमुद्दा इन्द्रियाणा स्पर्शनरसनवाण- चक्षु.श्रोत्राणा द्रव्येन्द्रियाणा यत्र मुद्रणं कर्मवत्करचरणसकोचनमिन्द्रि- यमुद्रोच्यते सा जिनमुद्रा भवति । कसायदढमुदा कपायाणा दृढ गाढ मुद्रण कपायदृढमुदा । मुदा इह याणाए मुदा इह जिनशासने ज्ञानेन भवति, अर्हनिश पठनपाठनादिना जिनमुद्रा भवति। जिणाद्दा एरिसा भणिया जिनमुद्रेदशी भणिता। मुनीनामाकारो जिनमुद्रा । ब्रह्म- चारिणामाकारश्चक्रवर्तिमुद्रा ते उभये अपि माननाया ( ये ) । यदि कश्चिदुरभिनितेशेन ता न मानयति स पुमान् जिनमुद्राद्रोही विशिष्ट- दण्डनीय इति भावार्थ । शिर कूर्चश्मथुलोचो मयूरपिच्छधर कम- ण्डलकरोऽध केशरक्षण इति जिनमुद्रा सा मान्यते । तदुक्तमिन्द्रन- न्दिना प्रतिष्ठाचार्येण - मुदा सर्वत्र मान्या स्थानिमुद्रो नैव मान्यते। राजमुद्राधरोऽत्यन्तहीनयच्छास्त्र निर्णय ॥१॥ जिणमुद्दा-इति श्रीगोधप्राभृते जिनमुद्राधिकार षष्ट समाप्तः।६। अथैदानी ज्ञानाधिकार प्रारभ्यते- संजमसंजुत्तस्स य सुझाणजोयस्त मोक्समम्मस्स । जाणेण लहदि लक्सं तम्हा णाणं च गायव्यं ॥ २० ॥ सयमयुक्तस्य च सुध्यानयोगस्य मोक्षमार्गस्य । ज्ञानेन लभते लक्ष्य तस्मात् ज्ञान च ज्ञातव्यम् ।। -- ८८ पटनाभृते- संजमसंजुत्तस्स य सयमेनेन्द्रियजयप्राणरक्षणलक्षणेन संयुक्तम्य सहितस्य । सुझाणजोयस्स मोक्समग्गस्म मुष्टु पानयोगस्य आतरौद्रध्यानद्वयरहितस्य ध्यानस्य धHध्यान शुक्लध्यानद्वयस्य योगेन सयोगेन सहितस्य, एव विशेषणद्वयविशिष्टस्य मोक्षमार्गस्य सम्बन्धित्वेन । णाणेण लहदि लक्सं ज्ञानेन करणभूतेन लभते, किं कर्मतापन्न लक्ष्य निजामस्वरूप । तम्हा णाणं च णायचं तस्मात्कारणाज्ञान च ज्ञातव्य, न केवलमायतनादिपटक ज्ञातव्यं किन्तु ज्ञानं च ज्ञातव्यं । चशब्दः परस्परसमुच्चयार्थ । जह ण वि लहदि हु लक्सं रहिओ कंडस्स वेज्जयविहीणो। तह ण वि लसदि लासं अण्णाणी मोक्समग्गस्स ॥२१॥ यथा नापिल्क्षयति स्फुट रक्ष्य रदित काण्डस्य येण्यकविहीन । तथा नापि रक्षयति रक्ष्य अज्ञानी मोशमार्गस्य । जह ण रि लहदि हु लक्स यया येन प्रकारेण नापि नेत्र लभते, हु-पुट, रक्ष्य वेध्य । कोऽसौ वैध्य न रभते, रहिओ कंडस्म वैज्जयविहीणो रहितोऽभ्यासरहित , काण्टस्य बाणस्य, ध्यफपि हीनोऽनभ्यस्तवेध्यन्यधन पुमान् । तह ण पि लक्सदि लास तथा तेन प्रकारेण नापि रक्षयति नानाति लक्ष्य परमामान | अण्णाणी मोसमग्गस अज्ञानी ज्ञानरहित पुमान् मोक्षमार्गस्य सम्यग्दर्श- नज्ञानचारित्रलक्षणस्य रश्यं निजात्मस्वरूपं न लक्षयति । णाणं पुरिमम्म हवदि लहदि सुपुरिसो वि विणयसंनुत्तो। णाणण लहटिलरसं लासंतो मोसमग्गस्म ॥२२॥ ज्ञान पुरुषस्य भवति लभते गुपुरुषोऽपि नियमयुक्त । गानेन रमते रश्य रक्षयन् माशमार्गस्य ।।
wwwarwwwwwwwwww बोधनाभृत। गाणं पुरिसस्स हवदि ज्ञान श्रुतज्ञान पुरपस्यासन्नभन्यजीवस्य भवति सतिष्ठते । लहदि सुपुरिसो वि विणयसंजुत्तो लभते प्राप्नोति ज्ञान मुपुरुषोऽप्यासन्नभव्यजीव । अपिशब्दाब्राह्मी सुदरी रानिमति- चन्दनादिवत् एकादशाङ्गानि लभन्ते, मृगलोचना अपि स्त्रीलिंग ठित्वा स्वर्गमुख भुक्त्वा राजकुलादिपू पद्य मोक्षं तृतीयेऽपि भने लभन्ते । पुर- पास्तु सकल श्रुत लब्ध्वा तद्भरेऽपि मोक्ष यान्ति । ईदृश ज्ञान का प्रामोति विणयसजुत्तो-विनयसयुक्तो गुरुचरणरेणुरजितभालस्थल इति भावार्थ । णाणेण लहदि लक्सं ज्ञानेन श्रुतज्ञानेन लभते लक्ष्य निजात्मस्वरूप । लक्संतो मोपसमग्गस्म लक्षयन् ध्यायन् लक्ष्य लभते, कस्य लक्ष्य-मोक्षमार्गस्य रनत्रयस्य । मडधणुहं जस्म थिर सुदगुण वाणा सुअत्यि रयणनं । परमत्यवद्धलक्सो ण वि चुबदि मोक्समग्गस्प ॥२३॥ मतिधनुर्यस्य स्थिर श्रुतगुणो वाणा सुसन्ति रत्नत्रयम् । परमार्थबद्धलक्ष्य नापि स्खलति मोक्षमार्गस्य ।। मइधणुहं जस्स थिर मतिर्मनिज्ञान यस्य मुंनर्धनुश्चाप स्थिर निश्चल । सुदगुण श्रुतज्ञान गुण प्रत्यचा। वाणा मुभत्यि रयणतं वाणा शरा मुष्ट अतिशयरत सति विद्यन्ते, किं स्नत्रय भेदाभेद- रक्षण रत्नत्रय । परमत्यपद्धलक्सो परमार्थे निजात्मस्वरूपे बद्धलक्ष्य निश्चलीकृतात्मस्वरूपो मुनि । णनि चुक्कदि मोक्समग्गस्स न स्खलति मोक्षमार्गस्य लक्ष्ये इति सम्बन्ध । तथा चोक्त श्रीपोरनन्दि- शिष्येण पद्मनन्दिनाचार्येण- प्रेरिता श्रुतगुणेन शेमुपीकार्मुकेण शरवगादयः । वाह्य ध्यविषय रतश्रमाश्चिद्रणे महतकर्मशत्रय ॥१॥ तथा च सोमदेवस्वामिनापि श्रुतज्ञानस्य गुणस्तुतिकृता- M vi षट्प्राभृते- अत्यल्पायतिरक्षजा मतिरिय योधोऽवधि सावधि। साश्चर्यः क्वचिदेव योगिनि स च स्वल्पो मन पर्यय ॥ दुष्प्राप पुनरय केवलमिद ज्योतिःकथागोचर। माहात्म्य निखिलार्थगे तु सुलभे फि वर्णयाम श्रुते ॥१॥ गाणं-इति श्रीवोधप्राभृते ज्ञानाधिकार सप्तम समाप्त ।७। अथेदानी गाथाद्वयन देवस्वरूप निम्पयन्ति श्रीकुन्दकुन्दचार्या.- सो देवो जो अत्थं धम्म कामं सुदेइ गाणं च । सो देइ जस्स अस्थि दु अत्यो धम्मो य पन्यज्जा ॥२४॥ स देवो योऽध धर्म काम सुददाति ज्ञानं च। स ददाति यस्य अस्ति तु अर्थ धर्मश्च प्रत्रग्या । सो देवो जो अत्यं स देयो योऽर्थे धन निधिग्नादिक ददाति । धम्म कामं सुदेइ गाणं च धर्म चारित्ररक्षण दपारक्षण प्रस्तुस्व- रूपमा मोपलब्धिलक्षणमुत्तमक्षमादिदशभेद मुददाति सुष्टु अतिशयेन ददाति । काम-अधमण्डलिकमण्डलिकमहामण्डलिकालदववासुदेवचक्रर- तीन्द्रधरणन्दभोग तीर्थकरभोग च यो ददाति स दव । मुष्ठु ददाति ज्ञान च केरल ज्योति ददाति । सो देइ जम्स अत्यि दु स ददाति यस्य पुरुपस्य यद्वस्तु वर्तते असत्कथ दातुं समर्थ । अत्यो धम्मो य पव्यज्जा यस्रार्थो वर्तते सोऽधै ददाति, यस्य धर्मो वर्तते स धर्म ददाति, यस्य प्रन या दीक्षा वर्तत स केरलज्ञानहेतुभूता प्रत्रच्या ददादि, यस्य स सुख वर्तते स सर्वसौख्य ददाति । उक्त च गुणभद्रेण गणिना- सर्व प्रेप्सति सासुखाप्तिमचिरात् सा सकर्मक्षयात् सद्वृत्तात् स च तच्च योधनियत सोप्यागमास भुने। - - बोधप्राभृत। सा चाप्तात् स च सर्वदोषरहितो रागादयस्तेऽप्यत स्त युत्तया सचिवार्य सर्वसुखद सत प्रयतु श्रिय ।।।। धम्मो दयाविसुद्धो पव्वज्जा सव्यसंगपरिचत्ता । देवो ववगयमोहो उदयकरो भव्यजीवाण ॥ २५॥ धर्मो दयाविशुद्ध प्रवज्या सर्वसंगपरियका । देवो व्यपगतमोह उदयकरो भन्यजीवानाम् ॥ धम्मो दयाविसुद्धो धर्मो दयया पिशुद्धो निर्मल , यो दया कु- वन्नपि चर्मजलं पिरति, अजिनतेलमास्वादयति, कुतुपघृत भुक्त, भूत नाशनमत्ति तस्य पुसो धर्मो विशुद्धा न भवति स यतिपधार्यपि र छो ज्ञातव्य । पव्वज्जा सबसगपरिचत्ता प्रव्रज्या सर्वसग परित्यक्ता भनति यो दण्ड करे करोति कम्बलमुपदधाति शखकरनारी स्पृष्टमन्नमश्नाति स कथ प्रवज्यावान् भवति । देवो ववग्यमोहो देवो व्यपगतमोह , यो देवोऽ पाङ्गे वनिता दधाति, यो देवो हृदयस्थले लमीमुपरशयति, यो दवा दड धरति, यो दवो वेश्या चापमुक्त, वसिष्ठ पिता भवति स कथ देव । उदयकरो भव्यजीवाण भव्यजी वानामुदयकर उत्कृष्टतार्यकरनामशुभदायक स दवो ज्ञातव्य ! देव-इति श्राबाधप्राभृते दवाधिकारोऽष्टम समाप्त । ८ । अथेदानी गायेन तीर्थ निरूपयन्ति श्रीपद्मनन्दिदेवा- षयसम्मत्तविसुद्धे पचिंदियसजदे णिरावेरखे । व्हाएउ मुणी तित्थे दिक्सासिक्सासुण्हाणेण ॥२६॥ व्रतसम्यक् वविशुद्धे पञ्चेन्द्रियसयते निरपक्षे । स्नातु मुनि तीर्थ दीक्षाशिक्षामुस्तानेन ।
पदमाभूते- चयसम्मत्तविसुद्धे व्रतहिंसासत्यास्तयग्रहापरिमहलक्षणे पचमि महाति , सम्यक् वन च पचविंशतिमलरहितन तत्यार्थश्रद्धानलक्षणेन, पिशुद्ध विशेषण निर्मले चर्म जलाधास्वादनरहिततयाऽकश्मरे सीर्थे । पंचिंटियसंजदे णिरावेसे पचेन्द्रियसयते पचैद्रियाणि स्पर्शनरसन- प्राणचक्षु श्रीरलक्षणानि सपतानि बद्धानि स्पर्शरसगाधरपशन्द- टक्षणपचारिपयरहितानि यस्मिस्तीर्थे तत्तथोक्तस्तस्मिन् पचा प्रयसयते । पुन कथभूते तीर्थ, निरपेक्ष बाहरस्त्यपेक्षारहिते आकांक्षारहित माया- मिथ्यानिदानशल्पपरियजिते। पहाएउ मुणी तित्ये स्नातु स्नान करोतु-अष्टकर्ममलकरप्रक्षालग करोतु-कालज्ञानाधन तचतुण्यस. युक्तो भग्तु, कोऽसौ मुनि प्रत्यक्षपरोक्षज्ञानसयुक्तो महात्मा महानुभाग जीर , तीर्थे शुद्धयुट्टैक्स्वभारलक्षणे निजामस्वरूपे ससारसमुश्तारण- समर्थे ती स्नातु विशुद्धो भातु। केन त्वा स्नातु, दिसासिरसा- मुण्हाणेण दीक्षा पचमहारतपचसमितिपंचयिरोधलीच रडास्यकनि यादयोऽष्टाविंशतिमूलगुणा उत्तमक्षमामार्दपार्जरस यशोचसंपग पम्या गावि चन्यनचर्याणि दशलाक्षणिसे धर्मोऽादशीलसहस्राणि चतु रशीतिलक्षगुणात्रयोदशविध चारित्र द्वादशपिर तपथेनि सक्लसम्पूर्ण दीक्षा भवति, स्वीप्रसंगान द्वादशानुभाचिन्तन शिक्षा जिननाथम्य, मुस्नानेन कर्मशिनिकरणकिहिनिपिनलक्षणेन स्नानन स्नातु । जं निम्मलं मुधम्मं मम्मत्तं संजमं तरं गाणं । तं तित्यं जिणमग्गे हवेह जदि संतिभावेण ॥२७} अनिमल मुधर्म सम्याच संयम तर मन। तनीय जिनमर्गे भवन यरातमावेन ॥ जं निम्मलं मुधम्मं निर्मड निरनिचारं मुयों मुष्ट शोमन चारितार्थ ज्ञातव्यं । मम्मनं संजम न जाणं सम्याई सवार्य बोधप्राभृतं । श्रद्धानलक्षणं तीर्थ भवति । संयम इन्द्रियाणां मनसश्च संकोचनं पृथि- व्यप्तेजोपायुवनस्पतिकायस्थावरजीवरक्षणमविराधनं । द्वौन्द्रियादिपचे. न्द्रियनस जीवदयाकरणं कचिप्रमाददोपण निराधनाया शास्त्रोक्तप्राय- श्चित्तकरणं संयम उच्यते सोऽपि संसारसमुद्रतारकरवातीर्थ भवति । तप इच्छानिरोधलक्षण द्वादशविधं तत्वार्थमोक्षशास्त्रनवमाध्याये पिस्त- रेण निरूपितवान्ज्ञातव्य । ज्ञान च तीर्थ भवति । तं तित्थं जिणमग्गे तजगत्प्रसिद्ध निश्चयतीर्थप्राप्तिकारणं मुक्तमुनिपादस्पृष्टं ताथै जनयन्त- शनुञ्जयलाटदेशपायागिरि-आभौरदेशतुंगीगिरिनासिक्यनगरसमीपवर्तिग- जधजगजाथसिद्धकूटतारापुरकैलासाष्टापदचम्पापुरीशवापुरवाणारसीनग- रक्षेत्रहस्तिनागपत्तनसम्मेदपर्वतसहाचलमेगिरि हिमाचल कापागेरिअयो. ध्याकौशाम्बीविपुलगिरिवेभारगिरिरुप्यगिरिसुवर्णागिरिरत्नगिरिशोर्यपुरचू- लाचलनर्मदातटद्रोणागिरिकुन्थुगिरिकोहि कशिलागिरिजम्बूकवनचलनान- दीतटती करपंच ल्याणस्थानानि चैत्यादिमार्गे यानि तीर्थानि वर्तन्ते नानि कर्मक्षयकारणानि चन्दनीयानि ये न वन्दन्ते ते मियादृष्टयो ज्ञातव्या । तीर्थभ्रमण विनाऽनन्ते ससारे भ्रमिष्यन्ति-अनुमोदनाच तं तरन्ति । उक्त च पूज्यपादेन भगवता- इक्षोविकाररसपृकगुणेन लोके पिष्टोऽधिक मधुरतामुपयाति यद्वत् । तश्च पुण्यरुपैरपितानि नित्य जाताने नि जगतामिह पावनानि ॥१॥ जिनमार्गबाधं यत्तीर्थ जलस्थानादिक तन्न माननीयं तकि? गंगायमु- नांसरयूनर्मदातापीमागधीगोमतीकपीवतारवस्यागभीराकारतोयाकौशिकी- कालमही तोवारणानिमुगलौहित्यसमुद्रकन्धुकाशोणनवी जामेखलोदु- म्बरीपनसातमसाप्रमृशाशुक्तिमतीपपासर छत्रपतीचित्रवतीमाल्यवतीवेणु- - पटप्रामृते- मतीविशालामालिकासि धुपारानिष्बुन्दरीबहुवज्रारम्यासिक्तनी यूहासम- तोयाकजाकपीवतीनिविन्ध्याजम्बूमतीयसुमन्यस्विगामिनीशर्करास्तीसिप्रा कृतमालापरिजापनसाऽचन्तिकामाहस्तिपानीकागधुनीव्याघ्रीचर्मन्बतीश- तभागानदारभवेगिनीक्षुल्लतापीरेवासप्तपाराकौशिकीपूर्वदशनय । उक्त घ ब्राह्मणमते- प्रागुदीच्या विभजते हस क्षीरोदक यथा । विदुपा शब्दसिद्धयर्थ सान पातु शरावती ॥१॥ अथ दक्षिणे-तैला इक्षुमती नकरवा चंगा स्वसना वैतरणी मापरती महिन्द्रा शुष्कनदा सप्तगोदायर गोदावरी मानससर सुप्रयोगा कृष्ण वर्णा सन्नीरा प्ररेणी कुब्जा धैर्या चूर्णी वेला शूकरिका अम्बर्णा । अथ पश्चिमे देशे-भैमरथी दास्वैणा नीरा मूला वाणा केता स्वाक- रीरी प्रहरा मुररा मदना गोदावरी तापी लागला खातिका कारी तुंग- भद्रा साम्रपती महीसागरा सरस्वतीत्यादयो नद्यो न तीर्थ भवति पाप- हेतुत्वात् त मतऽपि विरुद्धत्वात् । गगाद्वारे कुशावतें पिल्पके नीलपर्यते । स्नात्वा कनखले तीर्थे सभवेन्न पुनर्भवे ॥१॥ किमत्रविरोध :- दुएमन्तर्गत चित्त तीर्थस्नानान्न शुद्धयति । शतशोऽपि जलंधीत सुराभाण्डमिवाशुचि ॥१॥ तित्य-इति श्राबोधप्राभृते तीर्थाधिकारो नवम समाप्त । ९ । अथेदानी चतुदशभिर्गाथामिरहस्वरूपमहाधिकार प्रारभते श्री चुन्दकुन्दाचार्या बोधप्राभृतं । ९५ णामे ठपणे हि य सदव्वे भावे हि सगुणपज्जाया । चउणागदि सपदिम भावा भावति अरहत ॥ २८ ॥ नाम्नि स्थापनायो हिच सद्रव्ये भावे च स्वगुणपयाया । च्यवनमागति सपदिम भावा भावयन्ति अहं तम् ॥ णामे नाम यासे सति । उवणे स्थापनान्यासे सति । हि स्पुटे। चकार पादपूरणार्थ । सदव्वे समीचीने द्रव्यन्यास सति । भावे य भार यासे च सति । सगुणपज्जाया स्वगुणा अन तज्ञानान तदर्शना नन्तवीर्यान तमुखसज्ञा अहे तो भातीयुपस्कार । स्वपर्याया दिव्य परमौदारिकशरीराष्टमहाप्रातिहार्यसमरशरणलक्षणा पर्याया अर्ह तो भव तीत्युपस्कर्तव्य । चउण स्वर्गानरकाद्वा च्यवन । आगदि भरतादिक्षेत्रे ध्यागमन । सपत् गर्भावतारापूर्वमेव पण्मासान् र नसुवर्णपुष्पगधी दकवर्पणं मातुरगणे भवति, अतीर्णे सति नवमासपर्यत मुवर्ण रत्नदृष्टिं मातुरङ्गणे सौधर्मेद्रादेशा कुवेर क्राति कनकमयपत्तनं भवति। एत सर्व महापुराणासम्पद्विचरणमहतो ज्ञातव्य । इम अर्हन्त । भावा भव्यजीवा आसन्नतरभव्यचरपुण्डरीका । भारति भावयन्ति निज- हृदयकमले निश्चल धति । क, अरहत श्रीमद्भगवत्सर्वज्ञत्रीतराग । तथा चाक्त-- णामजिणा जिणणामा उयणजिणा तह य ताह पडिमामो। व्यजिणा जिणजीवा भावजिणा समरसरणत्था ॥१॥ दसण अणतणाणे मोरखो गहहकम्मरधेण । णिरुषमगुणमारूढो अरहतो एरिसो होइ ॥ २९ ॥ दाने अन तज्ञाने मोक्षो नाष्टकर्मव धेन निरुपमगुणमारूढ अईन् ईदृशो भवति । नामजिना जिननामानि स्थापनाजिना तथा च तेषां प्रतिमा । द्व्यजिना जिनीवा भावजिना समवशरणस्था ॥१॥ - ९ ६ । पटप्राभूते- दसण अणतणाणे अनन्तदशने सत्तावलोकनमानलक्षण सति । तथा अनन्तज्ञाने विशेषगोचरसाकारे सति मोक्षो भवति तावद्वे- दितव्य । केन कृत्या, कम्मरण नष्टाष्टकर्मनधेन । ननु" मोह- क्षया ज्ञानदर्शनावरणातगयक्षयाच कार" इयुमास्वामिवचनात् चत्वा- येर कर्माण्य तो नष्टानि क्थ नष्टाष्टकर्मवधेने युच्यते । साघूक्त भरता यथा सैन्यनायके पतिते सति जीयत्यपि शन्दे तमृतव प्रतिभासते विकृतिकारकत्वभावाभावत्तपा सर्वेषा कर्मणा मुरयभूते मोहनीयमीण नष्टे सति वेदनीयायुर्नामगोत्रकर्मचतुष्टये सयपि भगवतो पिविधफ्लो- दयाभावादघाती यपि कर्माणि नष्टानी युच्यते । णिरुषमगुणमारूढो निरुपम गुणमनतचतुष्टयलक्षणमारूढोऽहनष्टकमस्ति उच्यते । अर हतो एरिसो होड अहनीशो भरताति मुक्त एवापचयत इति भावार्थ । जरवाहिजम्ममरणं चउगडगमणं च पुण्णपार च । हंतूण दोसकम्मे हुउ णाणमयं च अरहंतो ॥ ३० ॥ जराव्याधिन ममरण चतुगतिगमन च पुण्यपाप च । हवा दोषकर्माणि भूत ज्ञानमय अर्हन् । जर जरा हत्या । वाहि व्याधि हा, एतन परेन य महावीरस्था- मिन पाण्मासिकमतासार गेग कवटज्ञानिन कथयति त मत निरस्त भवति । जम्म जम गर्भवास हत्वा, इदमी पदमन मूचयनि यद्दन- न्दाया ब्राह्मण्या उदराद्वीर निष्काश्य क्षत्रियाया उनो प्रगितानिद्र स्तदप्ययुक्त गतिदाता इद्र एपेति जीरस्य कमा पान र वृथा भवति दोपसद्भावात् । तथा मरणं हवा । चउगडगमण च चनुगतिगमन च हवा । पुण्णपाव च पुण्य पाप च हत्वा । हतूग दोसकम्मे हत्वा पिनास्य दापानष्टादशदोषान् । के त - HaM बोधप्रामृत । क्षुत्पिपासाजरातजन्मान्तकभयस्मया । नरागद्धेपमोहाच यस्याप्त स प्रकीत्यते ॥१॥ चकाराच्चि तारतिनिदापिपादस्वेदखद विस्मया गृह्यते । कम्मे-घाति कर्माणि । हतूण हत्या । हुउ णाणमय च अरहतो भूत सजात कीदृश गोणमय-ज्ञानमय केवलज्ञानवान् , अन् इन्द्रादिकृतामर्हणां पूजामनन्यसभविनीमहतीत्यर्हन् सर्वज्ञ वीतराग । गुणठाणमग्गणेहि य पज्जत्तीपाणजीवठाणेहि । ठावण पंचविहेहिं पणयमा अरुहपुरिसस्स ॥ ३१ ॥ गुणस्थानमागगाभिध पयाप्तिप्राणजीवस्थान । स्थापना पश्च विध प्रणेतन्या अईपुरुषस्य ॥ गुणठाणमग्गणेहि य गुणस्थानेनार्हन् प्रणत यो योजनीय । कानि तानि गुणस्थानानि । तन्निर्देशो गाथाद्वयेन क्रियते- मिछा सासण मिस्सो अविरिय सम्मो य देसचिरोय। विरया पमत्त इयरो अयुव अणियहि मुहमो य॥ ॥ उवसतसीणम हो सजोगकेलिजिणो अजोगीय । चउदस गुणठाणागि य कमेण सिद्धाय णायया ॥२॥ मार्गणाश्चतुर्दश नि क्ष्यति । पज्जत्ती पड्भि पर्याप्तिभिरर्हन् प्रणे. तन्य । ता अपि निर्देश्यति । पाणजीरठाणेहि प्राणैर्दशभिरर्हन् प्रणे. तव्य । तानपि निर्देश्यति । जीवस्थानानि चतुर्दशमु गुणस्मानपु जावा जाणमओ इति पाटातर । २ मिथ्यात्व सासादन मिध अविरतसम्यक्व देशविरत। विरत प्रमत्त इतरोऽपूर्वोऽनिवृत्ति सहमश्च an उपशा तक्षीणमोह सयोगक्वलिजिनोऽयोगी । चतुदशगुणस्थानानि च क्रमेण सिद्धाथ ज्ञातम्या ॥१॥ - m । पद्माभृते- ये सत्ति तानि जीवस्थानानि । तानि गुणस्थाननिर्देशेन ज्ञातव्यानि । ठावण पचनिहहिं एवं गुणस्थानमागणापर्याप्तिप्राणजावस्थानस्थाप नापचविधै स्थापना योटनापचप्रकारै ! पणयव्याअरुहपुरिसस्स प्रणे तव्या योटनीया अहरपुरषस्य अहजीवस्यति । तेरहमे गुणठाणे सनोलिय होइ अरहतो। चउतीमअइसयगुणा होति हु तस्सहपडिहारा ॥३२॥ प्रयोदश गुणस्थाने सयागक्वलिको भवति अहन् । चतुर्विंशदतिशयगुणा भवति हु तस्य प्रातिहार्याणि ॥ तेरहमे गुणठाणे जयादशे गुणस्थाने। सजोइकेनलिय होद अरहतो सयोगकेवलिका भरयर्हन् । चउतीमअइसयगुणा चतुस्त्रि शदतिशयगुणा । होति हु तस्सहपडिहारा भवन्ति हु स्फुर सस्या हत्परमेश्वरस्याप्टप्रातिहार्याणि । क त चतुस्त्रिंशदतिशया इति चेदुच्यत- नित्य नि स्वदव । निर्मलता मलमूत्ररहितता, तपिनुस्त मातुश्च मलमून न भरतिं । उक्त च- तित्थयरा तप्पयरा हलहरचम्कीय अद्धचक्की या देवा य भूयभूमा आहारो अस्थि णस्थि नीहारो॥१॥ तथा तीर्थकराणा श्मश्रुणी कूर्चश्च न भाति, शिरसि कु तलास्तु भगति । तथा चाक्त- देवा वि य नेरइया हलहरचस्की य तह य तित्थयरा। सचे केसव रामा कामा निकुचिया होति 1१॥ १ पूर्वमप्युक्ता अष्ट विंशतितमे पृटे अत्र पुनरप्यु यते । २तीयकरा तपितर हलधाचविणवाधचगिश्च । देवाश्च भोगभूमाल (एतथा ) माहारोऽस्ति नैव नीहार ॥1॥ ३ दवा अपि च नारका हलधरचाणश्च तथा च तीयकरा । सर्व कशवा रामा कामा निकुचिता भवन्ति ।" ४ भोयभुयचक्की इनि ख पुस्तक पाट । -- बोधप्रामृत ! क्षीरगौररधिरमासन । समचतुरस्रसस्थान । वर्षभनारावसंहनन । सुरूपता । सुगन्धता । मुलक्षणत्व । अनन्तपीय । प्रियहितवादित्व चेति दशातिशया जन्मतोऽपि स्वामिन शरीरस्य । गव्यूतिशतचतुष्टयमुभिक्षता । गगनगमन। अप्राणिध । कालाहारो न भवति भोनन नास्ति । उपसर्गो न भवति, केलिनामुपसगै भुक्ति च ये कपयन्ति ते प्रत्युक्ता भवन्ति । चतुर्मुखत्य । सर्वविद्याना परमेश्वरत्न । अच्छायत दर्पणे मुखप्रतिबिंब न भरति शरीरछाया च न भवति । चक्षुपि मेपोन्मेषो न भवति । नखाना केशाना च वृद्धिन भवति, एते दशातिशया घातिकर्मक्षयजा भवति । सर्यार्धमागधीया भापा भवति, कोऽर्थ अर्थ भगवद्भापाया मगधदेश- भाषात्मक, अर्धे च सर्वभापात्मक, कथमेव देवोपनीतत्व तदतिशयस्येति चेत् ? मगधदेवसन्निधाने तथापरिणतया भाषया सस्कृतभाषया प्रवर्तते । सर्वजनता विपया मैत्री भवति सर्वे हि जनसमूहा मागधप्री- तिकरदेवातिशयवशा-मागधभाषया भाषन्तेऽन्यो य मिजतया च धर्तते इति द्वातिशयो । सतना फलग्लुछो प्रमाला पुष्पाणि च भूमी तरको भवति। आदर्शतलसदृशी भूमिमनोहरा सनमयी भवति । वायु पृष्टत आगच्छति शीतो माद मुरभिश्च । सर्वलोकाना परमानन्दो भ- चति । एक योजनमप्रेऽने वाययो भूमि सम्मायन्ति स्वय सुगन्धमिश्रा धूलिकण्टकतृणकीटकान् कर्करान् पापाणाश्च प्रमार्जन्ति । स्तनित. कुमारा गधोदक वर्षात | पादाधोऽम्युजमेक, अग्रत सप्तकमलानि, पृष्ठतश्च सप्तपद्मानि योजनैकप्रमाणानि प्रत्येक सहस्रपत्राणि पद्मराग- मणिकेसराणि अर्धयोजनमानि भाति । सर्वसस्यनिष्पत्तियुता भूमि- । १ गुच्छा इति पाठान्तर ।
। पटनाभृते- भवति । शरत्कालसरोवरसदृशमाकाशं निर्मल भवति । दिश सर्वा अपि तिमिरका धूम्रता त्यजन्ति तमो मुञ्चति शलभा अपि दिशो ना- च्छादयन्ति धूलिनोंडीयते । ज्योतिष्कान् व्यन्तरान् कल्पवासिदेवान् भवनवासिन आयन्ति महापूजार्थे त्वरितमागच्छन्तु भवन्त इति । अर- सहस्त्र रत्नमय रपितेजस्तिरस्कारक वर्मचक्र अप्रेऽग्रे गगने निराधार गच्छति । अष्ट मगलानि भवन्ति, तानि कानि: छर-ध्वज-दर्पण-- क्लश-चामर-मृगार-ताल-सुप्रतीक इत्यष्ट मगलानि चतुर्दशोऽतिशय। एते चतुर्दशातिशया देवोपनीता भवन्ति । तथाप्टप्रातिहार्याणि भवन्ति, कानि तानीत्याह!-- अशोकवृक्ष सुरपुष्पवृष्टिर्दिव्यध्वनिश्चामरमासन च । भामण्डल दुन्दुभिरातपत्र सत्यातिहार्याणि जिनेश्वरागाम् ॥१॥ गइ इंदियं च काए जोए वेए कसाय णाणे य । संजमदंसण लेमा भविया सम्मत्त सणि आहारे॥३३॥ गतौ इन्द्रिये व काये योगे वेदे कपाये ज्ञाने च । सयमे दर्शने रेश्याया भन्यत्वे सम्यक्त्वे समिनि आहारे। गइ नारकतिर्दध्मनुष्यदेवगतीना मध्येऽर्हतो मनुष्यगति । इंदियं स्पर्शनरसनघ्राणचक्षु श्रात्रपचेन्द्रियजातीना मध्येऽर्हन् पचेद्रियजाति । पृथिव्योजागयुनस्पतित्रसकायाना मध्येऽर्हन उसकाय जोए सत्यम- नायोगासत्यमनोयोगोभयमनोयोगानुभयमनोयोगानामर्दत सत्यानुमयम- नोयोगी, सत्यवचनयोगासत्यवचनयोगोभयरचनयोगानुभयवचनयोगाना मध्येऽईत सत्यानुभयरचनयोगी, औदारिककाययोगौदारिकमिश्र काय- योगक्रियिककाययोगनियिक मिश्रकाययोगाहारक्काययोगाहारकमिश्र- कापयोगकार्मणकापयोगाना मध्यस्त सप्त (नि) योगा , सत्यमनो- योगाऽनुभयमनोयोग सत्यवचनयांगोऽनुभयवचनयोग औदारिककायपोग बोधप्राभूत । aur औदारिकमिश्रकाययोग कार्मणकाययोगश्चेति सप्तयोगा । वेए स्त्रीपुल- पुसकवेदत्रयमध्येऽर्हत कोऽपि वेदो नास्ति । कसाय पचविंशति- कपायाणा मध्येऽहत कोऽपि कपायो नास्ति । णाणे य पचज्ञानाना मध्येऽहंत केवलज्ञानमेक । संजम सप्ताना सयमाना मध्येऽर्हत संयम एक एव यथाख्यातचारित । देसण चतुर्णा दर्शनाना मध्ये दर्शनमेकमेव कवलदर्शन 1 लेसा पण्णा लेश्याना मध्येऽहतो लेश्या एकै शुक्लेश्या । भविया भव्यद्वयमध्येऽर्हन् भव्य एव । सम्मत्त पण्णा सम्यक्त्यानामहत सम्यक्त्वमेकमेव क्षायिकसम्यक्त्व । सज्ञिद्वय मध्येऽर्हन सज्ञी होक ए आहारे आहारकद्वयमध्येऽर्हत आहारकाना हरकय। आहारो य सरीरो तेह इदियआणपाणभासा य । पज्जत्तिगुणसमिद्धो उत्तमदेवो हवइ अरुहो ॥ ३४ ॥ आहार च शरीरं तथा इन्द्रियानप्राणभाषाच । पर्याप्तिगुणसमृद्ध उत्तमदेवो भवति अहन् ।। आहारो य सरीरो आहार समय समय प्रत्यनन्ता परमाणवोड़- नन्यजनसाधारणा शरीरस्थितिहेतव पुण्यरूपा शरीरे सम्बधं यान्ति नोकर्मरूपा अहर्त आहार उच्यते न वितरमनुष्यबद्भगवति कवलाहारी भवति तस्मानिद्राग्लानिरुत्पद्यते कथ भगगनर्हन् देवता कथ्यते । कत्र लाहार मुञ्जानो मनुष्य एन । तथा चौक्त समन्तभद्रेण भगरता- मानुपी प्रतिमभ्यतीतवान् देवतास्वपि च देता यत । तेन नाथ । परमोऽसि देवता श्रेयसे जिनवृप । प्रसीद न ॥१॥ क्षुद्वेदनाया कालाहार मुंजानो भगवान् कथमनन्तसौख्यानुच्यते वेदनाया सुखच्छेदत्यादित्यादि प्रमेयकमटमार्तण्डादिषु कालाहारस्य १इदियमण इति पाठातरं । - , - १०२ पद्माभृते- निषिद्ध वात्, स्त्रीमुक्तरपि । शरीरपर्याप्ति । तह इंदियआणपाण- भासा य तथा इद्रियपर्याप्ति , आनप्राणपर्याप्ति कोऽर्थ उच्चासनि श्वासपर्याप्ति , भापापर्याप्ति , चकारा मन पर्याप्ति , एव कायवाम्मनसा सत्ताया सत्यामपि भगवत कर्मनधो नास्ति जीपमुक्तत्वात्तस्य । तथा चोक्तं- कायवाक्यमनसा प्रवृत्तयो नामवस्तय मुनेधिशीर्पया। नासमीक्ष्य भरत प्रवृत्तयो धीर। तायकमचिन्त्यमाहितम् ॥१॥ पज्जत्तिगुणसमिद्धो पटपर्याप्तिगुणसमृद्ध सयुक्त । उत्तमदेवो हवइ अरुहो उत्तमदेवो भव यर्हन् न तु हरिहरहिरण्यगर्भादय उत्तम देवा भगति तेपा दोपसद्भावात् । उक्त च- दुहिणाधोक्षजेशानशाक्यसूरपुर.सरा । यदि रागायधिष्ठान कथ तप्राप्तता भरत् ॥ ॥ रागादिदोपसभूतिशैंयाऽमीपु तदागमात् । असत. परदोपस्य गृहीती पातक महत् ॥ २॥ अजस्तिलोत्तमाचित्त श्रीरत. श्रीपति स्मृत । अर्धनारीश्वर शमुस्तथाप्येपु फ्लिाप्तता ॥ ३ ॥ पंच वि इंदियपाणा मणस्यकाएण तिण्णि रलपाणा । आणप्पाणप्पाणा आउगपाणेण होति दहपाणा ॥ ३५॥ पद्यापि इन्द्रियप्रणा मनोवच कार्य प्रयो घरमाणा । आनप्राणप्राणा आयुकमाणेन भवन्ति दाप्राणा ॥ पंच वि इंदियपाणा इन्द्रियमाणा पच भात्तिामणचिकाएण तिष्णि बलपाणा मनोरच कापैटप्रश्णास्त्रयो भरति । आणप्पा गप्पाणा भानप्राणप्राणा उच्चासनि सासलक्षण एक प्राग । आउ - --- M बोधप्रामृत। गपाणेण होति दहपाणा आयुक् प्राणेन कृत्वा दशप्राणा भवन्ति । यथा आयु शन्द सान्तो नपुसकलिंगे वर्तते तथा आयु इत्युकारान्तोऽ पि नपुसके वर्तते । एर दशप्राणा भवन्तीति ज्ञातव्य । मणुयभवे पंचिंदिय जीरहाणेसु होइ चउदसमे । एदे गुणगणजुत्तो गुणमारूढो हबइ अरुहो ॥३६॥ मनुजभवे पचेन्द्रियो जीवस्थानेषु भवति चतुर्दशे । एतद्गुणगणयुक्तो गुणमारूढो भवति अईन् । मणुयभवे पंचिंदिय मनुजमोऽहन कथ्यते पचेन्द्रियोऽहन्नुच्यते। जीरहाणेसु होइ चउदसमे जीवस्थानेषु मध्ये चतुर्दशे स्थानेऽर्हन् भवति अयोगकेवल्यापर्हन् भवतीति भाव । एदे गुणगणजुत्तो एत- गुणगणयुक्त । गुणमारूढो हवड अरुहो गुणस्थानमारुढोऽर्हन् भवति गुणस्थानात्परत सिद्ध उच्यते इति भाव । जरवाहिदुक्सरहियं आहागणिहारज्जियं विमलं । सिंहाण खेल सेओ णत्यि दुगंछा य दोसो य ॥ ३७॥ जराव्याधिदु खरहित अहारनीहारवर्निन विमल । सिंहाण सेल स्वेद नास्ति दुगधश्च दोपश्च ।। जरवाहिदुक्सरहियं जरारहितो व्याधिरहित शारीरमानसागन्तु दु खरहितोऽर्हन् भपति, प्राकृते लिंगभदयात् जरवाहिदुक्खरहिय इति नपु सकलिंगनिर्देशो ज्ञातव्य एवमुत्तात्रापि । आहारणिहारवज्जियं आहारनिहारवर्जित कालाहारहितोऽन् भवति नीहाररहितो बहिर्भू- मियाधारहित । अनेन यास्येन श्वेतपटमत निराकृत । विमलं शरीरे मलमहतो न भवति । सिंहाण खेल सेओ सिंहाण नासाया विवरिय मूरगाथा पाठ पट्माभृते-- मलो न भवति, सेला निष्ठीवनमर्हति नास्ति, स्सेदश्च शरीरे प्रस्वेदोऽ- ईति न वर्तते । गयि दुगंछा य दोसो य अ यदपि जुगुप्साहेतु- भूत किमपि पिटकादिक (के) अर्हति न वर्तते । दोपश्च वातपित्त- श्रेष्माणोऽर्हति न वर्त्तन्ते । दसपाणा पज्जत्ती असहस्सा य लक्राणा भणिया। गोखीरसंसधवलं मंसं रुहिर च सव्यंगे ॥ ३८ ॥ दशप्राणा पर्याप्तय अष्टसहस्राणि च लक्षणानि भणितानि । गोक्षीरशखधवल मांस रुधिरं च साहे। दसपाणा पज्जत्ती दशप्राणा पूर्वोक्तलक्षणा अर्हति भवन्ति, पट्- पर्याप्तपश्चार्हति भवन्ति । अहसहस्सा य लक्सणा भणिया अष्टा- धिक सहस्रमेक लक्षणानां भणित | तर नशतानि तिलमसमादीनि व्यसनानि भवन्ति, अधाधिक शत रक्षणाना भरति । तथा चोक्त- प्रसिद्धाटसहस्रद्धलक्षण त्या गिरा पतिम् । नाम्नामसहस्त्रेण तोटुमोऽभीष्टसिद्धये ॥ १ ॥ तेपा लक्षणाना मध्ये कानिचिदुच्यन्ते । तथा हि। श्रीवृक्ष , शंख , स्वस्तिक , अनुश , तोरण, चामर, श्वेतच्छन, सिंहासनं, ध्वज , इपी, कुभी, धर्म , चक्र, समुद्र, सरोवर, रिमान, भग्न, नाग, नरनार्यों, सिंह , वाण, धनु , मेर , इद्र, गगा, पुरं, गोपुरं, चन्द्रसूर्यो, जात्य , व्यननं, येणु, वीणा, मृदग , सृजौ, पार्क, आपण , कुडलादीनि पिचित्राभरणानि, उद्यान पटिन, मुपर कलमक्षेत्र, रत्नद्वीप, यज, मही, लक्ष्मी, सरस्वती, मुरभि , सौरभेय , चूहाग्ने, महानिधि , क्ल्पाली, हिरण्य, जंक्ष , गरुड , नक्षत्राणि, तारका, सौध , महा , सिद्धार्थपादपा , मातिहार्याणि, मगलानि, समादीनि अष्टो- - , बोधप्रामृत । त्तर शत लक्षणानि । गोपीरसंसघालं गोक्षौरवच्छखरपलमुज्जल । मंसं रहिरं च सवंगे मास गोक्षीरवद्धवल रुधिर गोक्षारपद्धपल साङ्गे सर्वस्मिन् शरीरे। एरिसगुणेहिं सव्वं अइसयवंत सुपरिमलामोयं । ओरालियं च कायं णायव्वं अरुहपुरिसस्स ॥ ३९ ॥ ईदृशगुणे सर्व अतिशयवान सुपरिमलामोद । आदारिकच काय ज्ञातव्य अहं पुरुषस्य । एरिसगुणेहि सव्वं ईदृशगुणै संयुक्त सर्व कायोऽर्हपुरुषस्य ज्ञातव्य इति सम्बध । अइसयवंत सुपरिमलामोयं अतिशयवान् सुष्टु अतिशयेन परिमटेन विमदोत्थगन्धैन कर्पूरादिना सदृश आमोदो गन्धविशेषो यत्र पाये स सुपरिमलामोद । ओरालियं च कायं पर- मौदारिक काय शरीरमर्हत्पुरुषस्य भरति स्थिर स्थूलरूपश्चक्षुर्गम्य औदारिक उच्यते ! पापच अरुहपुरिमस्म ज्ञातव्यो वेदितव्य कायोऽहपुस्पस्य श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञवीतरागस्य शरीर ज्ञातव्यमित्यर्थ । मयरायदोसरहिओ कसायमलवज्जियो य सुविसुद्धो । चित्तपरिणामरहिंदो केवलभावे मुणेययो ॥ ४० ॥ मदरागदोषरहित क्षायमलवर्जेितश्च सुविशुद्ध । चित्तपरिणामरहित केवलभावे ज्ञातव्य ।। मयरायदोसरहिओ मदरहिता रागरहितो दोपरहित । कमाय मलवन्जिओ य सुविसुद्धो पाया क्रोधमानमायालाभा, मला हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुनपुसकलक्षणा नाकपायास्तैर्तितो हित , मुविशुद्ध शा तमूर्ति । चित्तपरिणामरहिंदो मनोव्यापा- ररहित । केवलभावे मुणेयव्यो क्षायिकमाये मुनितव्यो ज्ञातव्यो ऽईनिति ।
पट्याभूते- सम्मइंसणि पस्मइ जाणदि णाणेण दयपज्जाया । सम्मत्तगुणविसुद्धो भानो अरहस्स पायव्यो ॥४१॥ सम्यद्गर्शनेन पदयति जानाति ज्ञानेन द्रव्यपयांयान् । सम्यक्त्वगुणविशुद्ध भाव अर्हत सातम्य ॥ सम्मइंसणि पस्सइ सम्यग्दर्शनेन पश्यति सम्यग्निस्तुपतया दर्श- नेन सत्तारूपलक्षणेन पश्यति वस्तुस्वरूप गृह्णाति । जाणदिणाणेण दव्वपज्जाया जानाति ज्ञानेन केरलज्ञानन विशेषगौचरण साकार- रूपण सम्यग्जानाति द्रव्याणि जीवपुद्गरधर्माधर्मकाराकाशलक्षणानि । सम्मत्तगुणविमुद्धो सम्यक्त्वगुणेन क्षायिकसम्यकत्येन विशुद्धो निर्मल । भावो अरुहस्म णायव्यो मार स्वरूप अहंत मजस्य ज्ञातव्यो वेदितव्य । अरहंत--इति श्रीबोधमाभृतेऽहंदधिकारो दशम समाप्त ॥१०॥ अयेदानी प्रयास्वरूप निरूपयन्ति श्रीकुदकुन्दाचायी सप्तदश- गाथाभिरिति- मुण्णहरे तरुहि उज्जाणे तह मसाणनासे वा। गिरिगुहगिरिमिहरे या भीमरणे अहव वसिते या ॥४२॥ शून्यगृहे तस्मूले उद्याने तया श्मशानवासे या । शिरिगुहागिरिशिखरे वा भमरने अथवा वमती वा ।। सुण्णहरे तरुहि शून्यगृहे निवास कर्तव्य प्रत्यारते युपत्कार । तरहिटे-वृक्षमूले स्थातव्यं । उजाणे उद्याने निमरने स्थातव्यं । तह मसाणमासे वा तथा श्मशाननासे या पितृयनस्थाने स्थातव्य । गिरि- गुहगिरिसिहरे या गिरगुह गिरेगुहाया स्थातव्यं, गिरिशिखरे वा पर्य- तोपरि स्थातव्य 1 मीमवणे अहम वसिते वा भीमरने भयानकायाम- बोधप्राभृत । व्या स्थातव्य । अथवा वसिते वा ग्रामनगरादौ वा स्थातव्य, नगरे पचरात्रे स्थातव्य, प्रामे विशेषेण न स्थातव्य। सवसा सत्तं तित्थं वच चइदालत्तयं च बुत्तेहि । जिणभरणं अह वेज्ज जिणमग्गे जिणवरा विति ॥४३॥ स्ववशा, सस्व तीर्थ वचचैत्यालय च उक्त । जिनभवन अथ वेध्य जिनमार्ग जिनवरा विदति। सवसा सत्तं तित्य एते प्रदेशा स्ववमा पराधीन वरहिता स्वाध्या यध्यानयोग्या । तत्र स्थित्वा किं कर्तव्यमित्याह सत छिद्यमाने भिद्य मानेऽपि शतखण्ड क्रियमाणऽपि निजशरारे स वमखडितत्रतत्र निश्च- लचारित्रप्रमचर्यरत रक्षणीयमिति सान साहस वैध्य भवति, तथा तीर्थ द्वादशाङ्ग ऊर्जय तादिर्वा वेध्य ध्यानीय ध्यातव्य ज्ञातव्यं । वच चइदा- लत्तयं च वुत्तेहिं वचचै यालयश्च परमागमशब्दागमयुक्त्यागमपुस्तक च वेध्य ध्यातव्य भाति । तथा चोक्त- बारहअगगिजा दसणतिलया चरित्तवच्छहरा। चउदसपुवाहरणा ठावेदव्या य सुअदेवी ॥१॥ उक्तैर्जिनपचनप्रमाणतया | जिणभरणं अह वेज्ज जिनभनन जिन- चैत्यालय , अथ मगलभूत सर्वभव्यजीवमगलकर कृत्रिममकृत्रिम च वेध्य ध्यातव्य । तथा चोक्त नेमिचन्द्रण चामुण्डरायराजमल्लदेवगुरुणा त्रिलोकसारमन्थे- भवणीं वतरजोहसविमाणणरतिरियलोयजिणभवणे। सम्धामरिंदनरपाइसपूजियवादए पदे ॥१॥ सर्वाकृत्रिमचत्यालयसख्यापरिज्ञानार्थ श्रीपूज्यदवैरार्या चक्रे-- , भवनव्यन्तरज्यातिर्विमाननरतियालोकजिनभवनानि । सर्वामरेन्द्रनरपतिसजितवन्दितानि वन्दे ॥१॥ - - १०८ पटप्राभृते- नवनयचतु शतानि च सप्तचनपति सदनगुणिता पट् च । पचाशत्पचवियत्महता पुनरत्र कोटयोऽष्टी प्राता ॥१॥ अकृत्रिमचयालयानां सख्या यथा-एकात्यधिकचत्वारि शतानि सप्तनपतिसहस्राणि पट्पचाशल्लक्षाणि अष्टौ कोटयो भवति । एकैक- चैत्यालयेऽधिक शत प्रतिमाना भाति । तासा संख्या यथा--- णयकोडिसया पणवीसा लपवाछप्पण्ण सहससगयीसा। चउसय तह अडवाला जिणपीडम अकिष्ट्रिम घदे ॥१॥ नशतकोटय पचविशतिकाटयश्च पेंटपचाशल्लक्षा सप्तविंशति सहस्राश्चत्वारि शतानि अप्टचत्वारिंशदधिकानि भवति । ज्योतिषा ज्यन्तराणा च चैयालयाना सख्या नास्ति। जिणमग्गे जिणवरा विति जिनमार्गे जिनशासने जिनरा विदति जानन्ति । सर, तीर्थ, शास्त्र, पुस्तक, जिनभवन, प्रतिमाश्च एत म वैध्य मुनीना पारकाणा च सम्प ग्दृष्टीना वेध्य ध्यानापटम्पनीय वस्वह त कथयीत। तये न मानयत्ति ते मिथ्यादृष्टयो भवतीति भावार्थ । पंचमहच्ययजुचा पंचिंदियसजया निरावेसा । सज्झायझागजुत्ता मुणियरवसहा णिइच्छति ॥४४॥ पञ्च महाप्रतयुक्ता पचेन्दियसयता निराशा। स्वाध्यायल्यानयुत्ता मुनिवरकृषभा नीच्छति ॥ पचमहव्ययजुत्ता पचमहारतयुक्ता पूर्वोक्तपंचमहाव्रतयुक्ता सर्व- जीवदयाप्रतिपाटका ऋषय सत्यरचसाऽचयित्रतधारिण ब्रह्मचर्यवतो. २ नवकोटिशतानि पर्विशति रक्षा पदपंचाशत सहयाणि सरतर्विानि । कसु शतानि तयाऽष्टचत्वारिंशत बिनप्रतिमा प्रकृतिमा बन्दे ॥ २॥ ३ वेवण ४ गवसय ५विचाश• ६ नवरात. येव रूपेग पाठेन भवितव्य।
बोधप्रामृतं । पेता निष्परिमहा अश्रवणप्रायोग्यपरिग्रहपरित्यक्ता रजनिभाजनवर्जिन एतद्वेध्यं वस्तु निश्चयेनेच्छन्ति मानयन्ति जिनपचनप्रमाणकारित्नात् । पंचिंदियसंजया निरावेक्सा पचेंदियाणि संयतानि बद्धानि निज- विषयेषु प्रयतितुं व्यावृत्तानि निषिद्धानि पैस्ते पंचेन्द्रियसंयताः । निरपेक्षाः प्रत्युपकारवाठारहिता भव्यजीवसम्बोधनपरा एतद्वेष्य नीच्छन्ति । सज्झायझाणजुत्ता स्वाध्यायध्यानयुक्ताः । स्वाध्याय. पंचप्रकारः, वाचना-शिष्याणा व्युत्पत्तिलनिमित्तं शास्त्रार्थकथनं, पृच्छना- अनुयोगकरणं, अनुप्रेक्षा-पठितस्य व्याकृतस्य च शास्त्रस्य पुनश्चेतसि चिन्तनं, आम्नाय:-शुद्धपठन, धर्मोपदेशः-महापुराणादिशास्त्रस्य मुनीनां धारकादीनामप्रतो व्याख्यानविधान । ध्यान-आर्तध्यानरौद्रध्यानद्वयं परिहत्य धर्मध्यानशुलप्यानद्वये प्रवर्तनं विधिनिषेधरूप । मुगिवरवस- हा णिइच्छंति मुनिवरवृपमा सर्वपापण्डिभ्योऽधिकश्रेष्ठा. सर्वलोक- प्रशंसनीयाः परमार्थयतय दिगम्बरा नि-अतिशयेनेच्छन्ति वेध्यं वाञ्छन्ति पुन पुनरभ्यास कुर्वन्ति । गिहगंथमोहमुक्का बावीसपरीसहाजि अकसाया । पाचारंभविमुक्का पन्जा एरिसा भणिया ॥४५॥ गृहमन्यमोहमुक्ता द्वाविंशतिपरीपद जिदपाया। पापारम्भविमुक्ता प्रवज्या ईदृशी माता ॥ गिहगंथमोहमुक्का गृहस्य निवासस्प, प्रन्थस्य परिप्रहस्य बाह्यस्य दशप्रकारस्य मोहेन मुक्ता ममेदं भावरहिता प्रत्रज्या दीक्षा भवति । के ते दश बाह्यपरिप्रहा. ! क्षेत्र सस्याधिकरण । वास्तु गृह ! हिरण्य रूप्य- ट्रम्मादि । सुवर्ण काचनें । धन गोमहिष्यादि । धान्य ब्रीह्यादि । दासी कर्मकरी ! दासः धूनपुसका कर्मकर. 1 कुप्य क्षोमकासकौशेयच.
ALL - । पटनाभृते- न्दनागुर्गादि । चतुर्दशाभ्य तरपरिप्रहरहिता । के ते चतुर्दशाभ्यतरप रिमहा :- मिथ्यात्यवेदो हास्यादिषद पपायचतुष्टय । रागद्वेषी च रुगा स्युरन्तरङ्गाश्चतुर्दश ॥१॥ वावीमपरीमहाजि अकमाया द्वारिंशतिपरीपहनिप्राण्या भवति क ते द्वाविंशतिपरीपहा । क्षुधाजय , पिपासा तृपाजप, शीतजय , उष्णजय , दशमशफसर्वोपघातसहन, नग्नत्वसहन, अरतिजय , स्वीप रोपहजय , चर्या-गमन तस्य जय , निपचा-उपरेशन तस्य नय , शय्या सहन, ओक्रोशनय अनिश्वचनसहन, वधसहन, याचनसहन न किमपि याचत, अलाभसहनमन्तरायसहन, रोगसहन, तृणस्पर्शसहन, मलसहने लोचसहन च, सकारपुरस्कार पूजाया अकरणस्य समाना मासनादानस्य च सहन सकारपुरस्कारजय, प्रज्ञापरीपहजयो शानमहानि- रास अज्ञानोऽयमिति पचनसहनमहानपरीपहजय , अदर्शनएरीपह जयो लब्ध्यभावसहन । तथा चौक्तमुमास्वामिना- क्षुत्पिपासाशीतोष्णदशमशफ्नाग्यारतिस्त्रीच:- निषद्याशय्यामोशवधयाचनाऽहामरोगतृणस्पर्श- मल सत्कारपुरस्कारप्रशाऽशानादशनानि । अकसाया-पायरहिता प्रन'या माति । पारभविमुगा पापा- रम्भपिमुक्ता समारपिनाणियादि पापारभास्मादिमुनाइपनन किमुक्त भवति यदाविडसंघा जैनाभासा वदति सप्रयुक्त- थोपसु परिथ जीरो उम्भसण परिथ पामुग स्थि। सावन पहु मण्णरण गणा गिदपिय मई ॥१॥ पसीना नास्ति वाय उहागन मास्ति प्रामुक नास्ति सायच महिमायने म गणयति गृपकसित भात ॥1॥ कक्षा पसत पाणिम्य कारयिया जीवन् । स्नान् शीतरनीरे पापं मनुरी ममपति ॥३॥ - बोधप्राभृत। फच्छ खेत्त चसहि वाणिज कारिऊण जीरतो। पहतो सीयर नीरे पाच पउर समजेदि ॥२॥ पच्चज्जा एरिसा भणिया प्रव्रज्या दीक्षा ईदृशी भणिता। धणधण्णवत्यदाणं हिरण्णसयणामणाइ छत्ताइ । कुद्दाणविरहरहिया पयजा एरिसा भणिया ॥ ४६॥ धनधा यवनदान हिरण्यशयनासनादि छनादि । पुदानविरहरहिता प्रवज्या ईदृशी भणिला ॥ धणधण्णवत्यदाण धन गवादि, धान्य गोधूमादि, वन्त्र पाम्बरादि एतेषा दान विश्राणन मुनया न कुनी त । हिरण्णमयणासणाड छ- त्ताइ हिरण्य रूप्यघटित नाणक सुवर्णघटित नाणक ताम्ररूप्पमिश्रध- टित नागके केरलताम्रादिघटित नाणक हिरण्यमुच्यते तदान मुनयो न कुर्वन्ति । शयन अष्टशल्या खट्ना पल्यन तहान मुनयो न कुनीत । मासन पाठ आदिशब्दात् पाल, छत्रमातपन आदिशब्दापजाचाम गदिक मुनयो न ददति । कुद्दाणविरहरहिया कुसितदानस्य विशे घेण रहस्यागस्तेन रहिता। पयज्जा एरिसा भणिया प्रव्रज्या दीक्षे दृशी भणिता श्रीगीतमस्वामिना वीरेण तीर्थकता प्रतिपादिता। इपनेन येऽनन्तसरस्वतीनरसिंहभारतापामुदनसरस्वतीप्रभृतय सान्यासिका अपि सत कुसितानि दानानि ददति तमत निराकृतमिति भार । सनमित्ते व समा पसंसागिंदाअलद्धिलद्धिममा । तमरुपए समभावा पबज्जा एरिसा भणिया ॥४७॥ शगुमित्रे च समा प्रासादिदाऽलपिलब्धिममा । तृपकनके समभाया धनग्या इशी भगिता, समित्ते व समा शत्रौ वैरिण, मित्र मुहृदि समा रागद्देपरहिता । पससणिदाअलद्धिलद्विसमा प्रशसाया गुणस्तुतौ, निन्दायामवर्णपादे, - ११२ पद्माभृते- रब्धौ निरतरायभोजने, अलब्धी भोजनाद्य तराय च समा सदृशी प्रवघ्या भवति । तणकणए समभावा तृणे, कनके सुवर्णे च, समभाना अना- दरादरहिता। पब्बज्जा एरिसा भणिया प्रत्र या ईदृशी भणिता चिरतनाचार्य प्रतिपादिता। उत्तममज्झिमगेहे दारिदे ईसरे निरावेक्खा । सव्वत्य गिहिदपिंडा पयज्जा एरिसा भणिया॥४८॥ उत्तममध्यमगेहे दरिदे इश्वरे निरपेक्षा। सर्वत्र गृहीतपिण्डा प्रमज्या इशी भणिता॥ उत्तममज्झिमगेहे उत्तमगृहे उत्तगतोरणादिसहिते राजसदनादी, मध्यमगेहे नीचर्गृहे तृणपर्णादिनिर्मिते, निरपेक्षा उच्चैगृह भिक्षार्थ गच्छामि नीचैगृह अह न व्रजामि न प्रविशामीत्यपेक्षारहिता प्रवग्या भवति । दारिदे ईसरे निराबेक्सा दरिद्रस्य निर्धनस्स गृह न प्रति- शामि, इश्वरस्य धनपता गृह भविशाम्यहं निवशे इयपेक्षारहिता प्रवग्या भवति । सव्वत्य गिहिदपिंडा सर्वत्र योग्यगृहे गृहीतपिण्डा स्वीक. ताहारा प्ररज्या ईदृशी भवति । किं तदयोग्य गृह यत्र भिक्षा न गृपने इत्याह- गायकस्य तलारस्य, नीचकोपजीविन । मारिकस्य विहिंगस्य पश्यायास्तलिपस्य च ॥१॥ अस्यायमध -गायकस्य ग धर्मस्य गृहे न मुश्पते । तलारस्य कोट- पालस्य, नीचकर्मोपजारिन धर्मजउराकटादहिरादे प्रारकस्यापि गृहे न भुज्यत । मालिकस्य पुष्पोपजीपिन ,निलिंगस्य मरटस्प, पैश्याया गणिराया, तैटिरस्य घाधिषम्य । दीनस्य हतियाश्च छिपकस्य विशेषत । मद्यविम'यणा मद्यपायिससगिणधन ॥२॥ ।
बोधप्राभृतं ।
दीनस्य प्रारकोऽपि सन् यो दान भायते । सूतिकाया या बाल-
काना जनन कारयति । अयमुगम ।
शालिफा मारिपश्चैव कुमकारस्तिलतुद ।
नाश्तिश्चेति विक्षया पचते पचकारव ॥३॥
रजकस्तक्षाश्चैव अय लवर्णकारक ।
दृषत्कारादयश्चति काग्यो यदव स्मृता ॥४॥
कियते भाजन गेहे यतिना मोतुमिच्छुना ।
पवमादिकमप्यन्यचि तनाय स्वचतसा ॥५॥
वर स्वहस्तेन छत पाको नान्यत्र दुशा।
मन्दिरे भोजन यस्मा ससि यचसगम ॥६॥
णिग्गंथा णिस्सगा णिम्माणासा अराय णिद्दोसा ।
गिम्मम णिरहकारा पयजा एरिमा भणिया ॥४९॥
निम्रया निस्सा निर्मानाशा रागानिदोषा।
निर्ममा निरहकारा प्रवज्या इंशी भणिता ॥
णिग्गथा परिग्रहरहिता अथवा नि आतशपद्भि प्रथै शान सहिता
निप्रथा। णिस्रांगातीप्रमुखसगरहिता, अश्वा निश्चितै शाभने अझैा-
देशाङ्गे सयुक्ता निरसगा, अशा निश्चितैरङ्गाष्टभि शरारुपाय सहिता।
मान शातरकन्यवहतिमानातेन मोहाज्झितेन
प्राग्विशात सुदशो द्वजनृपतिपणिग्वर्णवण्यागपूर्ण ।
भूभृल्लोषाविरुद्ध स्थजनपारेजनान्मे चितो बीतमाह
वित्रापस्माररोवागत तिच ज्ञातिसकीर्तनाही ॥१॥
इति वीरनन्दिाभर त्यात । अथ कान तायटायगानीति चेत्-
नया गहू य तदा णिश्वयुट्टी उरच सीस च ।
अबदु अगइसम उचगाइ दहस्म ॥१॥
१ कालिका स। नि ट! आचारसार द्वितीयपृष्ठे।
४ नल्को बाहू च सभा नितम्पृक्ष उरच शार्प च।
अव तु भगानि शंषानि उपादानि दहस्य ॥१॥
११२ पद्माभृते- लब्धी निरतरायभोजने, अलब्धी भोननाय तराये च समा सहशी प्रनग्या भवति । तणकणए समभावा तृण, कनके मुवर्णे च, समभाना अना दरादरहिता । पबना एरिसा मणिया प्रनया ईदशी भणिता चिरतनाचार्य प्रतिपादिता। उत्तममज्झिमगेहे दारिदे ईमरे निरावेक्सा। सव्यत्य गिहिदपिंडा पमज्जा एरिमा भणिया ॥४८॥ उत्तममध्यमगहे दरिदे श्वरे निरपेक्षा । सरं गृहीतपिण्डा प्रवज्या इशी भपिता। उत्तममझिमगेहे उत्तमगृहे उत्तगतोरणादिसहित राजसदनादी, मध्यमगहे नीचर्गृहे तृणपर्णादिनिर्मिते, निरपेक्षा उचै गृह भिक्षार्थ गच्छामि नागृह अह न व्रजामि न प्रविशामात्यपक्षारहिता प्रत्रग्या भवति । दारिद्दे ईसरे निरावेरसा दरिद्रस्य निर्धनस्य गृहं न प्रति शामि, इश्वरस्य धनातो गृह प्रविशाम्यहं निरश इयपक्षारहिता प्ररम्या भाति । सव्यत्य गिहिटपिंडा सर्वत्र योग्यगृहे गृहीतपिण्डा स्वीह. ताहारा प्राया ईशी भाति । किं तदयोग्य गृह यत्र भिक्षा न गृपने इयाह- गायपस्य तलारस्प, नीचश्मापनीपिन । मालिरस्य चिरिंगस्य पश्यायास्तलिकस्य च ॥१॥ अस्यायमथ --गायकस्य गर्यस्य गृहे न गुपत । सारस्य फोट- पालस्प, नीचमापनारिन धर्मजउशफादाहरादे श्रारकस्यापि गृहे न भुज्यत । मालियस्य पुष्पोपनीविन , निलिंगस्प भररस्प, पैश्यापा गणिराया , सैटिरस्य घांचियाप । दीनस्य ६ तियाश्च पिकस्य विशेषत । माया'यणा मद्यपाथिससनिणथन ॥२॥ ।
बोधप्राभूत । सहत्यकार्येष्विति कोऽर्थ । मुखादिकार्योत्पादकेषु मंत्रतत्रादिसहका- रिकारणेपु मिलित्वा । अथरा गिरहकारा गिरह निरधं निष्पापं सर्वसाव- चयोगरहितत्य यथा भवत्येवकारा, कस्य ? शुद्धबुद्धकस्वभावस्य निजात्म- स्वरूपस्य | आरासमीपतो वर्तते कारा, चिचमत्कारलक्षणायकैकस्व भावटकोत्कीर्णनिजात्मनि तल्लीना प्रव्रज्या भवतीति ज्ञातव्य । "पापकिपा- विरमणं चरणं किलेति" वचनात् । पयजा प्रवश्या दीक्षा । एरिसा ईशी उक्तलक्षणा । भणिया गौतमस्वामिना प्रतिपादिता। णिण्णेहा णिल्लोहा, णिम्मोहा णिपियार णिकलुसा। णिब्भय णिरासभावा पयजा एरिमा भणिया ॥५०॥ नि स्नेहा नि मा निर्मोहा निर्विकारा निष्कलुषा । निर्भया निराशभावा प्रव्रज्या ईदशी भणिता ॥ णिण्णेहा नि स्नेहा पुत्रकलत्रमित्रादिस्नेहराहिता, अथवा तैलायभ्या- रहिता नि स्नेहा । पिल्लोहा हे मुने ! हे तपस्विन् ! तत्रेद वस्तु वस्त्रा- दिक दास्यामि मम गृहे भिक्षा गृह्यता मवतेति लोमरहिता, अया सुवर्ण- रजतताप्रायनपुनागादिभाजनविवर्जिता निर्लोभा। मिम्मोहा दर्शनमोहो मिथ्यात्वं त्रिविधं चारित्रमोह पचविंशतिप्रकारस्तवाभ्यामपि रहिता निर्मोहा, अथवा निश्चिताया अकल कदेवसमन्तभद्रविद्यानन्दिप्रभाचंद्रा- दिभिस्तार्किकैनिधारिताया माया प्रत्यक्षपरोक्षलक्षणोपलक्षिताश प्रमाण- द्वयस्य ऊहो वितर्को विचारणा यस्या प्रवायां सा निर्मोहा। णिधि- यार निर्षिकारा बनाभरणादिवेषविकाररहिता निर्विकारा, अथवा निधितो विचारो विषको भेदज्ञान यस्या सा निर्षिचारा, आरमा पृथक फर्म पृथक् इति विवेकोपेता । उक्त च- निरी . ११४ पट्माभूते- कुरूपिणो हीनाधिकाङ्गस्य कुष्टादिरोगिणच प्रवश्या न भवति । णिम्माणासा निर्माना अष्टमदरहिता, निराशा आशारहिता। उक्तं च- आशागर्त प्रतिप्राणि यस्मिन् विश्वमणूपम । फस्य किं कियदायाति वृथा यो विषयैपिता ॥१॥ अथवा- माशा दासीरता येन तेन दासीफन जगत् । आशाया यो भवेदास सदास सर्वदेहिनाम् ॥ १॥ निरस्त्रा अमरहिता तदुपलक्षणं गजपादीनां । अराय रागरहिता, अथवा प्रत्रयाया राजभि सह स्नेहादिक न कर्तव्यं, तदुपलक्षण मत्र्यादीना प्रत्यक्षनरकपातवद्यारयात रात्, फेविच जिन धर्मप्रभारनार्थ मुनीनां सुस्थियर्थं च तनिषेधे न कुर्वरित म्लेच्छादिपी डानिराकरणहेतुत्वात् । णिद्दोसा अप्रीतिलक्षणद्वैपरहिता, अथवा पात पित्तलेष्मादिदोषरहितस्य प्रवज्या भवतीति निर्दोपा। जिम्मम निर्ममा ममेति शन्दोऽव्यय निर्गतं ममेति यस्या प्रत्यायो सा निर्ममा, अपरा मच मा च ममे निर्गते ममे द्वे यस्या सानिर्भमा मद्यमासमधुमकारनयर- हिता लक्ष्मीस्वीकाररहिता चेयर्थ । तथा चोक्त अकिंचनोहमित्यास्स्व प्रैलोक्याधिपतिर्भवेः। योगिगम्य तव प्रोत रहस्य परमारमनः ॥२॥ णिरहंकारा अहङ्काररहिता कोदयप्रधाना मुसंवा दुसया जीवस्य कर्मोदयेन भवति मयेदं रतमित्यहङ्कारो न कर्त्तव्यमित्यर्थ । तथा चोक्त समतभद्रेण तार्किकशिरोमणिना- अए ध्यशतिर्मरितव्यतेय हेतुयाधिष्टतायरिंगा । अनीश्यरो जतुरह मियातः सहायकायेंजिति साम्पयामि ॥ - - १य आया टी ।२नि टी ।
पद्माभूते- मानुप्य सत्खुले जन्म एक्ष्मीवुद्धि ताता। विवेकन चिना सर्व सदप्येतघ्न चिन ॥१॥ अन्यच- मात्मा भिन्नस्तदनुगतिमाम भिन्न तयोर्या प्रत्यासत्तर्भवति विरति सापि भिना तधव । कार क्षेत्रप्रमुपमपि यत्तञ्च भिन्न मत में भिन्न भिन्न निजगुणकलाल त सर्यमेतत् ॥ १॥ णिक्कलुसा निष्कलुपा निष्पापा। णिमय निर्भया सप्तभयरहिता। गिरासमाना निराशमाना आशारहितस्वभागा। पबना एरिमा मणिया प्रवज्या ईदृशी भणिता श्रावृषभनाथेनेति शेष । जहजायरूवमरिसा अनलंबियभुभ गिराउहा संता । परकियनिलयनिनामा पन्धज्जाएरिसा भणिया ॥५१॥ ययाजातरूपसाशा अवलम्बितभुजा निरायुधा शाता। परकृतनिलयनिवासा प्रवज्या इरशी मणिता। जहजायरूवमरिसा यथाजातरूपसदृशा नाम्पा इत्यर्थ । अवलंबियमुअ अपलम्रितमुजा प्रायण कायो सगस्थिता पद्मासनादि- स्थिता या । पद्मासन किं- सन्यस्ताभ्यामोऽहिन्यामूरपरि युति त । भने समगुल्पाभ्या पनपारमुपासन ॥ १ ॥ तर मुखासनस्येद रक्षण- गुल्फोतानपरागुष्ठोपारोमारिवासित। समहाप्ट समा पुर्याग्नात स्तम्धो न यामन ॥॥ णिराउहा निरायुगा दण्डाद्यायुधरहिता, अयमा निरापुही प्रामुगर १निटी । २ राम्पमा मुमाकुटाय। रापुसके पाठ ।
बोधप्राभृत। प्रव्रज्या दीक्षा ईदृशी भणिता प्रतिपादिता चतुर्विंशतितमेन तीर्थ- कृतेति शेपः। जिणमग्गे पञ्चज्जा छहसंधयणेसु भणिय णिग्गंधा । भावंति भव्यपुरिसा कम्मरसयकारणे भणिया ।। ५४ ।। जिनमार्ग प्रत्रग्या पदसहननेषु भगिता निग्रंथा। भावयन्ति भव्यपुरुषा. कर्मक्षयकारणे भणिता ।। जिणमग्गे पधज्जा निनमार्गे आहतशासने प्रवज्या दीक्षा । छहसंघयणेसु पट्संहननेषु वर्षभनाराचयज्रनाराचनाराचार्धनाराच- कीलिकाप्राप्तामृपाटिकनामसु पटमु संहननेषु । भणिय पिग्गंथा भणिता प्रतिपादिता श्रीन्द्रभूतिनामगणधरदेवेनेति शेप । कथंभूता भणिता, निमन्था यथानातरूपधारिणी यतोऽस्मिन् क्षेत्रेऽन्त्यो निमंन्यो वीराङ्गाजी यो भविष्यति पचमकालस्यान्ते स किलाप्राप्तास्पाटिको संह- ननो भविष्यति तेन पष्टेऽपि संहनने निग्रन्थप्रत्रज्या ज्ञातव्या भावंति भव्वपुरिसा भारयन्ति मानयन्ति एतद्वचन, के ' भव्यपुरुषा आसन्न- भव्य जीवाः । कम्मक्रयकारणे भणिया पारम्पर्येण कर्मक्षयकारणे मोक्षप्रातिनिमित्तं भणिता प्रतिपादिता । तिलओमत्त निमित्तं समवाहिरगंथसंगहो णस्थि । पावज हबइ एसा जह भणिया सव्वदरिमीहि ॥ ५५ ॥ तिलकोशवमात्र समबाह्यग्रन्थसंग्रहो नास्ति । प्रयज्या भवति एषा यथा भणिता सर्वदर्शिभिः॥ तिलओसत्तनिमित्तं तिलस्य पितृप्रियबीजस्य कोशवमात्र तिलतुषमात्रमपि अश्रमणपरिग्रहः । समबाहिरगंथसंगहो पत्थि ३ अबस्थले सवत्र एतारगेव पाठः ।
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११८
पद्माभूत-
विवरीयमूढमावा विपरीतमूढमारा पिशेपेण परि सम तात् इतो
गतो नष्टो मूढमायो जरतास्वरूप यस्या सा विपरीतमदभावा । पणह-
कम्मह जमिच्छत्ता प्रणानि कर्माण्यौ यस्या सा प्रणष्ट फर्माया नए-
मिथ्याना पंचमिथ्यात्वरहिता । उक्त च-
पयत युद्धदरिसी पियरीभो यम तापसो थियो।
दो चिया ससयिदो माडियो चेय अण्णाणी ॥१॥
अस्या अपमर्थ -सर्वथा क्षणविनाशवाटी युद्ध । ब्रह्मयादी विपरीस.
भारमान शाश्वतमेवैका तेन म यते । तापमो वैनयिक सपिनयन मोरा
मन्यते गुणदोषविचारणा त मते नास्ति । इन्द्रचनागेदवादी संशप.
मिष्याटि चतुरपानामामाभ। सरापनादी कि मन्यते-
सेयवरो य आसयरो य पुरोप तह य भयो य ।
समभारभावियप्पा एहेमोक्र्म जसदेदो॥१॥
मस्परपूरण रापर यदति-
अण्णाणादो मोरा पाण परियत्ति मुफ्रजीयाण ।
पुणरागमण भमण भये भये परिप जीया ॥१॥
सम्मत्तगुणविमुद्धा सम्पत्यमेव गुणस्तेन विजुमा निर्मला, अपा
सम्यक्त्यगुणनि नजिनि काशिननिविविसि ताग्दा धुपगृहनस्थिती
करणवात्सल्यमभावनाउणेरमिः मम्पर गुगरिमा विशेषगनिर्मग
पंचशितिदोषरहिता सम्पायगुणविशुद्धा । पपना एरिमा मणिया
, एकाम्तो पुरा सिरीतो माग are विगए ।
एकोऽपि नापिन माती वातानी ॥1॥
२ अस्य धारा पूर्व वारणमे पृोता।
अशामतो मोक्ष मारतीनि मुनी।
पुनरागमन अमर्ग म भ भास्ति जीवावाम् ॥1॥
बोधप्राभूत। ध्यायेन वाचनापृच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदेशलक्षणेन पचविधेन युक्ता प्र. प्रश्या भगति, ध्यानेन धय॑ध्यानशुक्लध्यानद्वयेन युक्ता आर्त्तरौद्रदुर्पान- द्वयरहिता । पञ्चजा एरिसा भणिया प्रवज्या जैनी दीक्षा ईदी एत. लक्षणविराजमाना भणिता प्रतिपादिता अकलकदेवेनेति शेपः । तववयगुणेहिं सुद्धा संजमसम्मत्तगुणविसुद्धा य । सुद्धा गुणेहिं मुद्धा पयजा एरिसा भणिया ।। ५८॥ तपोवतगुणैः शुद्धा संयमसम्यकावगुणविशुद्धा च । शुद्धा गुणेः शुद्धा प्रवज्या ईदृशी भणिता । तवषयगुणेहिं सुद्धा तपोभिरिच्छानिरोधलक्षणैदिशभिः, प्रतैरहि- सादिभिः पंचाभि रात्रिभोजनपरिहारव्रतपढ़ः, गुणैश्चतुरशीतिटक्षलक्षणैः शुद्धा उज्यला । संजमसम्मत्तगुणविसुद्धा य सयमा इन्द्रियप्राणसं- यमलक्षणा द्वादश, सम्यक्त्वानि दशप्रकाराणि द्वित्रिप्रकाराणि च, से च ते गुणा आत्मोपकारकाः परिणामविशेपास्तैपिशुद्धा निर्मला प्रत्रग्या भवति । निसर्गनमधिगमज सम्यक्त्वं द्विविध, उपरामवेदकक्षायिकमे. "दात्सम्यक्त्वं त्रिविधं । 'आशामार्गसमुद्भयमुपदेशात्सूत्रीजसंक्षेपात्। विस्तारार्थाभ्यां भरमवपरमाधादिगाढंच" इत्यापीकथिता: सम्यक्रस्प देशप्रकारा ज्ञातव्या । तद्विपरणं वृत्त. प्रयं यथा- माशासम्यक्त्वमुक्तं यदुत विरुचितं वीतरागाशयय त्यस्तग्रन्थप्रपंच शिवममृतपथं श्रद्दधन्मोहगान्तेः। मार्गश्रद्धानमाहुः पुरुषवरपुराणोपदेशोपजाता. या सझानागमाधिप्रमृतिमिरुपदेशादिरादेशि पिः॥१॥ १ द्वादशमे पृष्टऽप्युक्ता । १ एते प्रय श्लोका त्रयोदशमे पृष्ठेऽप्युक्ताः सविवरणा । - १२० पटप्राभूते- तिलतुपमानसमोऽपि वाह्मग्रन्थस्य साहो नास्ति न विद्यते । पावन हवइ एसा प्रवज्या भरत्येषा । जह भणिया सम्बदरिसीहि यथा मणिता सर्वदर्शिभि सर्वज्ञदवारति । उवसग्गपरिसहसहा णिज्जणदेसे हि णिच अत्येइ । सिल कटे भूमितले सव्वे आरुहइ सम्वत्थ ।। ५६ ॥ उपसर्गपरीवहसहा निर्जनदेशेहि निर्य तिष्ठति। शिलायो काठे भूमितले सर्वाणि आरोहति सर्वत्र । उसग्गपरिसहसहा उपसर्गाश्च तिर्यग्मानरदेवाचेतनभवाश्चतु - प्रकारा , परीपहाश्च पूर्वोत्ता द्वाविंशति उपसर्गपरीपहास्तान् सहते तेषु या सहा सगी उपसर्गपरीवहसहा । णिजगदेसे हि णिच अत्येइ निर्जनदेही मनुष्यरहितप्रदेशे बने हि-पुष्ट नित्य तिप्रति । सिल कडे भूमितले शिलाया दृषदि, काप्टे दारुष डके, भूमितले भूमौ तृणायां था। सव्वे आरुहइ सन्चत्य एतानि सर्याणि, आरोहति उपविशति शेते च सर्वत्र बने प्रामनगरादौ था। पसुमहिलसंडसंग कुमीलसंग ण कुणइ विकहाओ । सज्झायझाणजुत्ता पव्वजा परिसा भणिया ॥ ५७॥ पगुमहिलापत्रसंग कुशौरसंग न करानि विकया। स्वाध्यायध्यानयुत्ता प्राण्या इन्सो मणिता ।। पमुमहिलसंढसंग या पशयो भान्ति तर न स्यं पते, या महिला भवन्ति यत्र पंढा नपुसकानि भान्ति तन न स्थीयते । कुसीलसंग ण कुणइ विकहाओ कुशीलस्य कुत्सिताचारस्य साधुलोकशिक्षापरा मुखस्य स न फरोति-तसंगतो दुर्पानमुपगते, न करोति विकयाय राजकपात्रोक्याभोजनकथाचौरकयावति । मन्झायझापजुत्ता स्था• १२२ षट्माभूते- आकर्ष्याचारसून मुनिवरणविधे सूचन श्रद्दधान सूचासौ सूत्रदृष्टुिरधिगमगतेरर्थसार्थस्य चीजे । कैश्चिजातोपरधरसमशमवशाद्वीजदृष्टि पदार्थान् सक्षेपेणैव वुदमा रुचिमुपगतवान् साधु सक्षेपदृष्टि ॥२॥ य श्रुत्वा द्वादशागीं तरचिरिह त विद्धि विस्ताराष्टिं सातार्यात्कुतश्चित्प्रचनवचनान्यन्तरेणार्थदृष्टि । हए साङ्गागवाह्यप्रवचनमवगाहोस्थिता याऽयगाढा कैवस्यारोक्तिार्थे रचिरिह परमायादिगादेति रूदा ॥३॥ सुद्धा गुणेहि मुद्धा या प्रत्रज्या गुणे कृत्या शुद्धा सा शुद्धा कप्यते. न तु वेपमात्रण शुद्धाच्यते । पव्यज्जा एरिसा भणिया प्रवश्या दी- क्षेदशी भणिता प्रतिपादिता शान्तिनाथेनति शेष । एवं आयत्तणगुणपज्जत्ता बहुविमुद्धसम्मत्ते । णिग्गंधे जिणमग्गे संसेवेणं जहासादं ।। ५९ ॥ एव आत्म वगुणपयाप्ता बहुविशुद्धगम्य बरवे । निम्रथे निनमार्गे संक्षेण यथाल्यातम् ॥ एवं पूर्वोक्तप्रकारेण । आयत्तणगुणपज्जत्ता आमन्वगुणपर्याप्ता. परिपूर्णा, आमभायनागुणरहितेय प्रत्रज्या परिपूर्णा न भवति, भामगुण- भारनासहिता तु स्तोकापि प्रत्रज्या पर्याता सम्पूर्णा भरतीति भाग । बहुविमुद्धसम्मत्ते बहुपिशुद्धसम्यक् मुनी प्रत्रज्या पर्याप्ता भवति मिथ्याबदूषिते तु नग्नेऽपि मुनौ दीक्षा अदीक्षा भाति संसारविच्छदर- हितत्वात् । उत्कृष्टतया नामवेयपद लम्यापि मिथ्यादृष्टयस्तपस्विन पुन संसार पतन्तीति ज्ञात्वा पुन पुन भणामि सम्यात्वता मुनिना भवितव्यं । उक्त चानने मगरत्ता कुन्दकुदाचार्येण- सम्म चेय य भावे मिच्छामा तहेव योद्धया। चहऊण मिच्छमाये सम्मम्मि उहिदे चंदे ॥१॥ १ सम्यष एवं भावा मिथ्यात्वभावा सरवादम्या स्यया मिथ्याश्वमायान् सम्यश्ये उपस्थितान् पदे ।
योधप्रामृत ।
.१२५
उद्यानादिरता छायामपास्थ म्यांसपी ग्यपात् ।
यतोऽयमत पयास्य स्वादशीयमहायुमः॥ १९॥
स्थ स्थापतेयमुचित स्यपत्या निर्ममतामित ।
स्थय निधिमिरम्येय सेप्यते हरिदूरत ॥२०॥
दशीमा एतारक्षा दुर्गाय सपस्पत ।
श्रीमण्डपादिशोम स्य स्थतोऽम्येनि पुगेगता ॥ २१॥
तपोविगाहनादस्य गहनान्पधितिष्ठतः।
निजगमनतास्थानसदस्यादयगादन ॥ २२॥
क्षेत्रधास्तुरमुरसारक्षेपास्यमुपेयुप ।
स्याधीन रिजार प्रमश्यमस्यापजायते ॥२३॥
भाभिमानमुएज्य मानमास्थितमानय ।
प्रामोति परमामाशा सुरापुरशिगंधूता ॥ २४ ॥
स्थामिएमृत्यय-यादिसभामएएचानय ।
परमात्म्यपदमातायप्यास्ते निजगरसभा ॥२५॥
स्वगुणोरकीर्तन रयपत्या त्यत्तयामा महातपाः।
स्तुतिनिन्दासमो भूपा कार्यते भुवनेश्वर ॥ २६ ॥
यन्दिस्वा पन्धमर्द-त यतोऽनुष्ठितवास्तप ।
ततोऽयं यन्धत पन्धरनिन्धगुणसनिधिः ॥२७॥
तपोऽयमनुपन क. पादचारी पिपादनः।
एतयान पनगमेंषु चरण यासमति ॥ २८॥
या गुप्तो दितपारया यतोऽय तपसि स्थितः।
तताऽस्य दिव्यमाया स्यात्मणीय रसमविलासमा । २९ ॥
मनाश्यानियत हारपारणोऽततयत्तप ।
तदस्य दिव्यपिजयपरमामृततृशय ॥३०॥
त्यवफामयसो भूत्वा नपस्यस्थ धिर यतः।
ततोऽय पसाहन रमानन्दधुं भजेस् ॥ ३१ ॥
किमत्रयदुनोत्तन यदिष्ट यथाविध ।
स्यजेन्मानासकल्पस्तत्तत् सूतेऽस्य तत्तपः ॥३२॥
१२६. षट्प्राभूते- प्राप्तोत्कर्षे तदस्य स्यात्तपश्चिन्तामणे: फलं । यतोऽहजातिमूर्त्यादिप्राप्तिः संपानुवर्णिता ॥ ३३॥ जैनेश्वरी परामाज्ञां सूमोद्दिष्टां प्रमाणयन् । तपस्यां यदुपादत्ते पारिवाज्यं तदानसं ॥ ३४ ॥ अन्यच यहुवाग्जाले नियद्धं युक्तियाधितं । पारिव्राज्य परित्याज्यं ग्राह्य चंदमनुत्तरं ॥ ३५॥ पंचत्रिंशच्छ्लोकः प्रत्रज्या वर्णिता। इति श्रीवोधप्राभृते प्रव्रज्याधिकार एकादशः समाप्तः । ११ ॥ अथेदानी बोधप्राभूतस्य चूलिकां गाथात्रयेण निरूपयन्ति-- रूवत्थं सुद्धत्यं णिमग्गे जिणवरेहिं जह भणिय । भन्वजणवोहणत्यं छक्कायहियंकरं उत्तं ।। ६०॥ रूपस्थं शुद्धयर्थं जिनमार्गे जिनवरर्यथा भणितम् । भग्यजनबोधनार्थ पदकायहितकर-उक्तम् ॥ रूवत्यं सुद्धत्यं रूपस्थं निग्रन्थरूपस्थितमाचरणं मयोक्तमितिसं- म्बन्धः । किमर्थे भणित, सुद्धत्थं-शुद्धयर्थ कर्मक्षयनिमित्तं । जिणमग्गे जिणवरेहिं जह भणियं जिनमार्गे जिनशासने जिनयरैतीर्थकरपरमदेवै- गौतमान्तगणधरदेवैश्च यथा येन प्रकारेण भणित । मध्वजणकोहणत्यं आसन्नभव्यजीवसम्बोधनार्थ । छक्कायहियंकरं उत्तं पट्कापहितकर सर्वजीवदयाप्रतिपालनाथै उक्तं निरूपितम् । सद्दवियारो हुओ भासासुत्तेसु जं जिणे कहियं । सो तह कहियं णायं सीसेण य भद्दबाहुस्स ॥६॥ शब्दविकारो भूतः भाषासूचेषु यत् जिनेन कथितम् । तत् तथा कथितं ज्ञातं शिष्येण च भद्रबाहोः ॥ सद्दवियारो हूओ शब्दविकारो भूतोऽधनिनिर्गतः। भासासुत्ते- सुजं जिणे कहियं सर्वार्धमागधीभाषासूत्रेषु यजिनेन कथितं श्री- Auranew- बोधाभृतं । १२७ चौरेणार्थरूप शास्त्र कथित । सो तह कहियं णायं तत्तथा कथित ज्ञातमवगत । सीसेण य भद्दयाहुस्स केन ज्ञातं ' शिष्येणान्तवासिना भद्रबाहुशिष्येण अर्हद्वलिंगुप्तिगुप्तापरनामद्वयेन विशाखाचार्यनाम्ना देश- पूर्वधारिणामकादशानामाचार्याणा मध्ये प्रथमेन ज्ञात । बारसअंगवियाणं चउदसपुवंगविउलवित्थरणं । सुयणाणिभद्दयाहू गमयगुरूभयवओ जयओ ॥६२।। द्वादशाङ्गविज्ञान चतुर्दशपूर्वी विपुलविस्तरण । श्रुतज्ञानिभद्रबाहु गमकगुरु भगवान् जयतु । पारसअंगवियाणं द्वादशाङ्गाविज्ञानयुक्त । चउदसपुव्वंगविउल वित्थरणं चतुर्दशाना पूर्वाङ्गाना पूर्वाणा विपुल पृथु विस्तरण यस्य स चतुर्दशपूर्वाङ्गविपुलविस्तरण । सुयणाणिभद्दबाह पचाना श्रुतकेय- लिना मध्येऽन्त्यो भद्रबाहु । गमयगुरुभयवओ जयओ यादश सूत्रे यस्ताहशो चाक्यास्त जानन्तीति गमकास्तेपा गुरुरुपाच्यायो भगवान् .इन्द्रादीनामाराध्यो जयतु सर्वोत्कर्षेण वर्ततां तम्मायस्माक नमस्कार इत्यर्थ । इति श्रीपद्मनन्दिकुन्दकुन्दाचार्यवक्रमीवाचायलाचार्यद्धपि- च्छाचार्यनामपचकविराजितेन श्रीसीमन्धरस्वामिज्ञानसंबोधितमन्यजनेन श्रीजिनचन्द्रसूरिभट्टारकपट्टाभरणभूतेन कलिकालसवरून विरचिते पदनामृतप्रन्ये सवमुनिमण्ड लिमण्डितेन पलिकालगोतमस्वामिना श्रीमल्लिभूषणेन भतारके णानुमतेन मकलविद्वजनसमाजसम्मानिनेनोभयभाषाकविचक्रवर्तिना श्रीविद्या- नन्दिगुर्वन्तेवासिना सूरिवरश्रीश्रुतसागरेण विरचिता बोधप्रामृतस्य टीका परिसमाप्त। , भस्मादमे "चतुर्थ परिच्छेद " इति पाठ टीकापुस्तके वर्तते ।
भावप्रामृतम् । - अथैदानी भावप्राभृतं दुर्वन्त श्री दादाचार्या इष्टदेयता नम- स्कुर्वन्ति- गमिऊण जिणवारदे परसुरमरणिंदवंदिए मिद्धे । वोच्छामि मावपाहुडमवसेसे संजद मिरमा ॥१॥ नमस्टरवा जिनकोन्दान् नरगुरभवनेन्द्रवन्दितान् शिक्षा। पक्ष्यामि भावप्रामृत-अवसपान् सेयतान् शिरमा ।। णमिण जिणवरिंद नमस्स्य, कार जिनवरदान सप्तप्रतिश- पेण कृत्यैक्दशेन जिना सदृश्य धारकादय एकादशगुणस्थानातिन क्षीणपायाच सयोगकालिपर्यता जिना उप्यन्ते गणधरदेवाच तो मध्ये परा श्रेष्ठा अपरकैगरिनध सेपापिदा स्वामिनस्तीधरपरमदेवा जिनपरेद्रा कथ्यते तान् नत्या । कपभूतान् निनरेद्रान्, पर- सुरमाणिंदवंदिए नरेद्रमुरे दभारने द्रवदितार । सिद्ध सारिशे' पणनिशिष्टान् सिद्धाध नया 1 वोच्छामि मावपाहुडं पश्यामि पथ विष्यामि, किं तदारप्राभूत भावसारमान वेयरमहसिद्धार पदि- त्याऽपि तु असेसे संनद अवशपान् सपनार आच'योपाध्यायसर्थ सापून् त्रिविधान मुनीन् नगा। पन, मिरमा उत्तमान जानुपर शिर पचकन प्रणिप-येयर्थ । मायो य पढमलिंग ण टलिगं च जाण परमत्य। मारो कारणभूदो गुणदोमागं जिणा चिनि' ॥२॥ थरमापूर्व मिसभ्य पार पुस ३ गुप नि ।३विति-यन्ति प ।
भावनामृत । १२९ भावश्च प्रथमलिङ्ग न द्रव्यलिङ्ग च जानीहि परमार्थम् । माव कारणभूत गुणदोषाणा जिना विदति ॥ भावो य पढमालिंगं भावश्च प्रथमलिंग प्रथम दीक्षाचिन्ह भावो भवति । चकाराद्व्यलिंग धृत्वा भावलिंग प्रकटं क्रियते यथाऽपत्योत्पा- दनेन पुरुपशक्ति प्रकटीभवति तथा द्रव्यलिंगिनो मुने वलिंग प्रकट भवति पुरुपशक्तर्भावस्य च लोचनानामगोचरत्वात् । उक्त चेद्रनन्दिना भतारकेण समयभूपणप्रवचने- द्रव्यलिंग समास्थाय भाचलिंगी भवेद्यत्ति विना तेन न वन्द्य. स्यानानाव्रतधरोऽपि सन् ॥१॥ द्रव्यलिंगमिद शेय भावलिंगस्य कारण । तध्यात्महत स्पष्ट न नेत्रविषय यत ॥२॥ मुद्रा सर्वत्र मान्या स्यान्निर्मुद्रो नैव मान्यते। राजमुद्राधरोऽत्यन्तहीनवच्छास्त्र निर्णय ॥३॥ ण दव्वलिंगं च जाण परमत्थं द्रलिंगे सति भाव विना पर- मार्थसिद्धिर्भ भवति तेन कारणेन द्रव्यलिंग परमार्थसिद्धिकर न भवति मोक्षे न प्रापयति, तेन कारणेन द्रव्यलिंगपूर्वक भावलिंग धर्तव्यमिति भावार्थ । ये तु गृहस्थवेपधारिणोऽपि वय भावलिंगिनो वर्तामहे दीक्षा यामन्तर्भावत्वात्ते मिध्यादृष्टयो ज्ञातव्या विशिष्टजिनलिंगविद्वपित्वात् , योझुमिच्छर कातरव स्वय नश्यत्ति, अपरानपि नाशयन्ति, ते मुख्य व्यवहारधर्मलोपकलाद्विशिष्टैर्दण्डनीया । मावो कारणभूदो भाव परममुक्तिकारणभूत । गुणदोसाणं गुणाना फेवलज्ञानादाना, दौपाणा नरकपातादीना च कारणभूतो भाव एव । यदि द्रयलिंग धृता राग- द्वेपमोहादिषु पतति मुनिस्तदा स तस्य भाव ससारकारण भवति । यदि द्रव्यलिंग धृपा नीरागनिर्द्वषनिर्मोहभावना भापति उदा कवल- पट्प्राभूते- ज्ञानादीन गुणानुत्पादयति मुक्ति गच्छति । एतदर्थ जिणा विति केय- लिनो जानन्ति। भावविसुद्धिनिमित्तं बाहिरगंथस्स कीरए चाओ। बाहिरचाओ विहलो अब्भन्तरंगेयजुत्तस्स ॥३|| गावविशुद्धिनिमितं बाह्यमन्यत्य कियते त्यागः । बायत्यागो विफल: अभ्यन्तरप्रन्ययुचात्य ॥ भावविमुद्धिनिमित्तं भावस्पात्मनो विशुद्धिनिमित्त कारणं । घा- हिरगंथस्स कीरए चाओ. वाह्यमन्यस्य क्रियते त्यागः पत्रादे- र्मोचन विधीयते । बाहिरचाओ विहलो बाह्यन्यागो विफलोऽन्तर्ग?- भवति । अन्भंतरगंथजुत्तस्स अभ्यन्तरपरिग्रहयुक्तस्य ननस्यापि य. स्वादेराकांक्षायुक्तस्यैति भावः । तथा चोक्त- याह्यानन्यविहीना दरिद्रमनुजाः स्वपापतः सन्ति । यः पुनरन्तःसंगत्यागी लोके स दुर्लभः साधुः ॥ १ ॥ भावरहिओ न सिज्झइ जइ वि तवं चरइ कोडिकोडीयो। जम्मंतराइं बहुसो वियहत्यो गलियवत्थो १४॥ भावरहितो न सिद्धपति यद्यपि तवरति कोटकोटी। जन्मान्तराणि बहुराः लम्बितहम्तो गलितवनः ।। भावरहिओ न मिज्झइ भवरहित आत्मस्वममायनारहितो विषयक पायभायनासहितस्तपस्वी अपि न सिद्धति न सिद्धि प्राप्नोति । जइ वि तवं चरह कोडिकोडीओ यद्यपि सपथरति करोति कोटी- कोटी । जम्मतराई जन्मान्तराणि । यशोऽनेककोटीकोटीजन्मान्त- राणि । कथंभूतः सन् , लंबियहत्यो अधोमुक्तयाहृदयः । गलिय- बत्यो नामुद्रायरोऽपि सन् । विफलो. ग..२ संग. ग. प.प.टी. । ।
भावप्राभूत । १३१ परिणामम्मि असुद्धे गंथे मुच्चेइ बाहरे य जई । पाहिरगंथचाओ भावविहणस्स कि कुंणड ॥५॥ परिणामे अशुद्धे प्रन्यान् मुश्चति बाह्यान् च यदि। बाम थत्यागो भावविहीनस्य किं करोति ।। परिणामम्मि असुद्धे परिणाम मनोव्यापारेऽशुद्धेऽपि विषय- कपायादिभिर्मलिने सति । गंथे मुच्चेइ बाहिरे ये जई मन्थान् मु- ञ्चति परिग्रहान् वस्त्रादीन् त्यजति यतिनिलिंगधारी मुनि । बाहि- रगंथचाओ बाह्यग्रन्थत्यागो वस्त्रादित्यजन । भावविहूणस्स किं कुणइ भारविहीनस्यात्मभावनारहितस्य बहिरात्मनो जीवस्य किं करोति, न किमपि कर्म सपरनिर्जरालक्षण कार्य करोतीति भावार्थ । जाणहि भावं पढम किं ते लिंगेण भावरहिएण। पंथिय सिवउरिपंथं जिणउवइदं पयत्तेण ॥ ६ ॥ जानीहि भाव प्रथम किं ते लिनेन भावरहितेन । पथिक ! शिवपुरिपय जिनोपदिष्टः प्रयत्नेन ॥ जाणहि भावं पढमं जानीहि भावमात्मस्वरूपभावना प्रथम मुख्य । किं ते लिंगेण भावरहिएण किं तव लिंगेन भावरहितेन किं, न किमपि संवरनिर्जरादिलक्षणं कार्य, अपि तु न किमपि कार्य भगति लिंगेन वस्त्रादित्यजनरक्षणेनात्मस्वरूपभावनारहितेन । पंथिय हे पथिक ! मोक्षमार्गमार्गक सिवउरिपंथं मोक्षनगरीमार्ग । जिण- उवइदं जिनापदिष्ट । प्रयत्नेन यत कारणादिति शेप । भावरहिएण सउरिस अगाइकालं अणवसंसारे। गहिउज्झियाई बहुसो बाहिरनिग्गंथरूवाई ॥७॥ १ विहीणस्म इति मूलगायापाठ । किन्तु टीकाया के ख ग घ पुस्तके विहूणस्त इति पाठ । तदनुसारेण प्रवर्तित । २ करइ इति मूलगाथापाठ । ३३टी । .
Amrawr-ME- १३२ पटप्राभूते- भावरहिवेन सत्पुरण ! अनादिकालं अनन्तससारे । प्रहीतोरिक्षतानि पहुरा बायनिर्ममस्माणि ॥ भावरहिएण सउरिस भाररहितेन सत्पुग्ध ! भारविरिजितेना- स्मरूपभावनारहितेन त्वया । अणाइकालं अणंतसंसारे अनादि- कालमन्न्तसंसारे । गहिउज्झियाई बहुसो गृहीतान्युजितानि च बदुशोऽनेकरारान्। वाहिरनिग्गंवरूनाई बहिनिमन्यरूपाणि आ. स्मरूपभावनारहितानीति भागार्य । भीमणणरयगईए तिरियगईए देवमणुगइए। पतोसि तिव्वदुक्सं भावहि जिणभावणा जी ॥८॥ भीषणनरकगती नियंगतो कुदेवमनुष्याना । प्राप्तोऽमि तीयदुर्म भावय जिनभावना जीव। ।। भीसणणरयगईए भीपणा भयानरा या नरकगतिस्तस्यां भीषण- नरकगत्या । तिरियगईए तिर्यगत्यां । कुदेवमणुगढए पुसितदेव- कुत्सितमनुष्यगन्योविएपे। पनोमि तिव्यदुक्र प्राप्तोऽसि सीबदुस एकान्तेन दु ख । भावहि जिणभावणा जीर या पिना वतीने दुखे प्राप्तचतुर्गतिपु त भाग्य जिनभावनां जिनसम्यक्त्यभायना हे जी हे आत्मन् । बहिरामन मिथ्याटि परित्यग्य सम्पातिर (वं, 1 तेन तर चतुर्गति से विनश्यति स्तोपेन काना-पभा तरण तीर्थक्री भूत्या मुक्ति यास्यसि । तथा चोरी-- पापि समय जिनमचिगति नियारयितु । पुण्यानि च पूरयितु दानु मुरिधिय एशिन ॥m कामो जिनभावन टोर प्रसिद्ध दोधयामिदम्-~- १जीवा गाजीयो च ।
भावप्राभूत) जिण पुजहि जिणवरु थुगहि जिणहं म खंडहि आण । जे जिणधम्मिसु रत्तमण ते जाणिजह जाण ॥ एफ्कहि फुल्लहि माटिदेइ जु सुरनररिडी। पही कर कुसाटियपु भोलिम जिणवरतणी॥ अन्यच्च- सुखयतु सुखभूमिः कामिनं कामिनीव सुतमिव जननी मां शुद्धशीला भुनक्तु। कुलमिय गुणभूषा कन्यका संपुनीता. जिनपतिपदपद्मप्रेक्षिणी दृष्टिलक्ष्मीः ॥१॥ एवमर्थ ज्ञात्वा ये जिनपूजनस्नपनस्तवननवजीर्णचैत्यचैत्यालयोद्धारण- यात्रामतिष्ठादिकं महापुण्य कर्म कर्मविधप्सक तीर्थकरनामकर्मदापकं विशिष्ट निदानरहित प्रभाश्नाङ्ग गृहस्था सन्तोऽपि निषेधन्ति ते पापा- स्मानो मिथ्यादृष्टयो नरकादिदु ख चिरकालमनुभवन्ति अनन्तससारिणो भवन्तीति भावार्थ । सत्तमुनरयावासे दारुणभीसाई असहणीयाई । भुत्ताई मुइरकालं दुक्खाई निरंतरं सहिये ॥ ९॥ सप्तमुनरकवासे दादणभीमाणि असहनीयानि । भुक्तानि सुचिरकालं दु खानि निरन्तरं स्वहित 1॥ सत्तसुनरयागरासे सताना सुनरकाणा महानरकागा वासे निवासे सति हे जीव ।। दारुणभीसाई दारणानि तीवाणि, भीष्माणि भयान- कानि । असहणीयाई असहनीयानि असह्यानि सोढुमशक्यानि । भुत्ताई भुक्तानि अनुभूतानि । सुइरकालं सुष्टु अतीर चिरकाल दीर्घ- कालं एकसागरमारभ्य त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमपर्यन्तमुःकृष्टायुष्कं । दुःखान्य- १ सहिय क. ख. ग. पुस्तके मूलगायापाठ । टीकायां तु सहिय इति पाट । तदनुसारेण प्रवर्तित । भविया इति घ. पुस्तके । नार्थोऽस्य तत्र दत । - १३४ पट्प्राभूते- सातानि कटानि भुक्तानि निरन्तरमविच्छिन्न । सहिय हे स्वहित ! हे आत्महित ! किं त्वया आत्मनो हितं कृतमित्याक्षेप सणणुत्तावणवालणवेयणविच्छेयणागिरोहं च । पत्नोसि भावरहिओ तिरियगईए चिर कालं। । खननोत्तापन ग्वालनव्यजनविच्छेदनानिरोध च । प्रासोऽमि भावरहित निर्यगती चिरं कालम् । खणण पृथिवींकायस्त्वं यदा जातस्तदा खननं कुद्दालादिनाऽवदा रणदु ख स्वया सौढ । उत्तापण अप्कायस्व यदाभूतस्तदाऽग्न्युपर्युत्ता. पनदु ख त्वया क्षमित । वालणे अग्निकायिको जीवो यदा त्य जातस्तदा ज्यालनदु ख त्वयानुभूत । वेयण वायुकायिको जीनो यदा व जातस्तदा व्यजनादिनावीजनदु ख त्वया तितिक्षित ! विच्छेयणा हे जीव ! धन- स्पतिकायिको जीवो यदा व उत्पन्नस्तदा विच्छेदना कुठारादिना कर्पण दुख त्वया मृपित । णिरोहं च शंखशुक्तिवृश्चिकगोमिभ्रमरमक्षिकारली चर्दमहिपादिकम्त्व समुत्पन्नस्तदा निरोधादि दु ख त्वया भुक्तः । इति स्थाव तसदु खानि अनुक्रमेण सूचितानि भवन्तीति ज्ञातव्य । पत्नोमि भान- रहिओ प्राप्तोऽसि भावरहितो निनभक्तिभ्रष्ट आमभाग्नादूरीकृतश्च । तिरियगईए चिरं काल तिर्यगतौ दीर्घ काल असरयातवर्षपर्यत वनस्पतिकायापेक्षयान तकाल चेत्यागमानुसारण ज्ञातव्यम् । आगतुक माणसिय महज सारीरियं च चत्तारि । दुक्साई मणुयजम्मे पत्नोमि अगंतयं कालं ।। ११ ॥ आगन्तुक मानसिक सहा शारीरिक च चवारि । दुखानि मनुजजन्मनि प्राप्तासि अनन्त कालम् ।। तिरय इति मूलगायापाठ ।
भावप्राभृतं । १३५. आगंतुक आगन्तुकं दुःखं विद्युत्पातादिकं । मानसिकदुःखं स्त्रीक- टाक्षादिताडने सति तदप्राप्तौ भवति । तथा चोक्त- संसारे नरफादिषु स्मृतिपथेऽप्युद्वेगकारीण्यलं दुःखानि प्रतिसेवितानि भवता तान्येवमेयासताम् । तत्तायत्स्मरसि स्मरस्मितशितापा रनड्रायुधै- योमानां हिमदग्धमुग्धतस्पद्यत्प्राप्तवानिर्धनः ॥१॥ सहजं व्याधिवेदनोत्पन्न दु खे । सारीरियं छेदनभेदनादिक दुःखं । चकार उक्तसमुच्चपार्थस्तेन खलजनोक्तमिथ्यावचनश्रवणे यदुःखं भवति सत् केनापि सोदु न शक्यते । तदुक्त रुद्रटेन महाकविना- शल्यमपि स्खलदन्तः सोद्ध शक्येत हालाहलदिग्धं । धीरैर्न पुनरकारणकुपितपलालीकदुर्यचनं ॥ १ ॥ चत्तारि एतानि चत्वारि । दुःसाई दु खानि । मणुयजम्मे मनुज. जन्मनि मनुष्यभये । पत्तोसि प्राप्तोऽसि हे जीव ! त्वं प्राप्तवानसि भवसि । अणंतयं कालं अनन्तक कुत्सितमनन्त काल समयमिति । मुरनिलएमु सुरन्छरविओयकाले य माणसं तिच्वं । संपत्तोसि महाजस दुःखं मुहभावणारहिओ ॥ १२ ॥ सुरनिलयेषु मुराप्सरावियोगकाले च मानस तीनम् । सप्राप्तोऽसि महायशः ! दु.खं शुभभावनारहित । मुरनिलएसु स्वर्गेषु । सुरच्छरविओयकाले देवीवियोगावसरे य चकारानं देवी जाता तदा देवयियोगकाले । माणसं तिव्य इन्द्रविभूति दृष्टा मानसे मनसि भव दुःख त्वं प्रातः, तदुःखं तीव्रमन्युत्कृष्टं, हा! मया मनुष्यभवे प्रातेऽपि निर्मल चारित्रं न पालित अनेन तु निरतिचार चारित्रं प्रतिपादितं तेनाय मम किलिपादेरादेश । हालहल. स.।
१३८ पद्मामृते- श्रवणा जिनधर्मबाह्या न वन्दर्नीया । तेषा कार्यशात् किमपि देयं जिनधर्मोपकारार्थमिति । देवाण गुणविहूई इढी माहप्प बहुविह दटुं । होऊण हीणदेवो पत्तो बहुमाणसं दुक्सं ॥ १५॥ देवानां गुणविभूति ऋद्धिं माहात्म्य बहुविधं दृष्ट्वा । भूत्वा हीनदेव प्राप्तो बहुमानस दु सम् ॥ देवाण गुणविहई देवाना गुणान्-- अणिमा महिमा लघिमा गरिमान्त नकामरूपित्य । प्राप्तिकाम्यवशित्वेशित्वाप्रतिहतत्यमिति चैक्रियिकाः॥१॥ इत्यायाक्तलक्षणान् गुणान् दृष्ट्वा । इड्ढी ऋद्धिं इंद्राणीप्रमुखपरिवार । उक्त च- शची पद्मा शिवा श्यामा कालिन्दी सुलसाञ्जया। भान्वारया दक्षिणेन्द्राणा विश्वषामपि कीर्तिता.॥१॥ उदीचां थीमती रामा सुसीमा च प्रभारती। जयसेना सुपेणा च सुमित्रा च बसुन्धरा ॥२॥ पोडशाये सहस्राणि विक्रियोत्था पृषपच ता । द्विगुणा द्विगुणास्तस्मात्परत्र सममात्मना ॥३॥ १६०००-३२०००-६४०००-१२८००० २५६०००-५१२०००-१०२४०००। फमारद्वात्रिंशदष्ट सहनाः पंचरात्यथ । अर्धार्धाश्च निपष्ठिश्च सप्तस्थानेपुवलमाः॥४॥ सप्तस्थानानि कानि: सौधर्मशाना सनमारमाहेन्द्री २ ब्रह्मनलो- त्तरी ३ लान्तरापिष्टी, ४ शुक्रमहाशुक्रौ ५ शतारसहस्रारी ६ आन- तप्राणतारणाच्युताश्व पार स्वर्गा एक स्थानमिति सप्तस्थानानि, इत्यादि देव्याधुद्धिं दृष्ट्वा । माहप्प बहुविहं द९ इन्द्रयाचा दीर्घायु- भावप्राभूत। रपि प्रियते अल्पायुपोऽप्यायुर्न त्रुश्यति इत्यादि माहात्म्य बहुविधं दृष्ट्वा । होऊग हीणदयो हीनदेवो भूत्वा । पत्तो बहुमाणसं दुःसं प्राप्नोऽसि बहुतर प्रचुर मनसि भव मानस दुखं हे जीव ! अमिति कारणात जिनभक्ति कुरिति भावार्थ । चउविहविकहासत्तो मयमत्तो असुहभावपयडत्थो। होऊण कुदेवत्तं पत्तोसि अणेयवाराओ॥ १६ ॥ चतुार्वधविकथासक्त मदमत्त अशुभभावप्रकटार्थ । भूवा कुदेवत्व प्राप्तोऽसि अनेकवारान् ॥ चउविहविकहासत्तो चतुर्विधत्रिकथासक्त आहारकथा-स्त्रीकथा- राजकमा-चौरकथालक्षणामु विकथासु चतुर्विधास्यासक्त । मयमत्तो अष्टमदैमत्तो गर्पित । असुहभावपयडत्यो अशुभभाव पापपरिणाम प्रकर स्फुटीभूतोऽर्थ प्रयोजन यस्य स अशुभावप्रकटार्थ । होऊण कुदेवत्तं अशुगभानप्रकटार्थो भूत्वा कुदेवत्त-सितदेवल । पत्तोसि प्राप्तोऽसि । हे जीव ! असुरादिकुदेरगतारनेकवारान् प्राप्तोऽसि । असुहीवीहत्थेहि य कलिमलमहुलाहि गम्मनसहीहि । वसिओसि चिरकाल अणेयजणणीण मुणिपवरं ।।१७।। अशुचिबीभत्सासु कालेमलबहुलासु गर्भवसतिषु । उपितोसि चिर काल अनेसननीना मुनिप्रवर ।। अमुहीपीहत्येहि य अशुचिषु अपवित्रासु वाम सामु, च पिरूप- कामु । कलिमलबहुलाहि पापबहुगसु । गब्भवसहीहि गर्भगृहेषु उदरवसतिषु । चमिओसि चिर कालं उपितोऽसि स्थितोऽसि चिर १ई ख, ग घ पुस्तके । २ पवरा ग.१ । ५ पुस्तकेऽस्यार्थ प्रचु- रत्वमिति।
१४० पद्माभूते- दीर्घकालमनन्तकालमनादिकाल । अणेयजणणीण मुणिपवर गर्भवस तिपु अनेका अनन्ता अनन्यो जाता, हे मुनिप्रार! हे मुनीनामुत्तम । पीओसि थणच्छीर अणतनम्मतगइ जणणीण। अण्णण्णाण महाजस सायरसलिलादु अहिययर ॥१८॥ पीतोऽसि स्तनक्षीर अनन्तजमान्तराणि जननीनाम् । मायासामन्यासा महायश / सागरसग्लिानधिकतरम् ॥ पीओसि थणच्छीर पीतोऽसि पीतवान् धपितवानसि स्तनक्षीर अपवित्र वक्षोरुहक्षीरं स्तनदुग्छ । अणंतजम्मतराइ अन तजमात राणि अमतभवान्तर । जणणीण जननीनो मन तमातणां । अण्ण “ण्णाण अन्यासामन्यासा । महाजस महत् त्रैलोक्यन्यापक यगो यस्य भवति महायशास्तस्य सम्बोधन नियते हे महायश । मायरसलि लादु अहिययर सागरसलिलादप्यधिकरं अतिशयेनाधिकतरमनन्त सागरजलसमान।
भावप्राभृत। भवसायरे अणते छिण्णुज्झियफेसणहरणालही । पुंजेइ जइ को विजए हयदि य गिरिममधिया रासी ॥२०॥ भवसागरे अनन्ते छिनोज्झितकेशनखरनालास्थीनि । पुन्जयति यदि कश्चित् देवो भवति च गिरिसमधिका राशि ॥ भवसायरे अणते भावसागरेऽनन्ते ससारसमुद्रेऽन्तरहिते । छिपणु- झियकेसणहरणालही छिन्नानि उज्झितानि मुक्तानि क्षुरेण नखलुना छुरिकया पूर्व छिनानि पश्चादुज्झितानि केशनखरनालास्थीनि । पुंजेइ जइ को विजए पुजयति राशीकरोति यदि चेत् कोऽपि शक्रसन्तानागत कश्चिद्देव । हवदि य गिरिसमधिया रासी भवति च गिरेमरोरपि समधिका राशि केशादीना प्रत्येकमनन्तमेरुसमा राशयो भवन्तीति भावार्थ । जलथलसिहिपवयंवरगिरिसरिदरिकुरुरणाई सव्वत्तो। वसिओसि चिर कालं तिहुवणमझे अणप्पवसो ॥२१॥ जलस्थर शिखिपवनावरगिरिसरिहरीतरुवनादिपु सर्वन । उपितोसि चिर्र काल त्रिभुवनमध्येऽनामवश ।। हे जीव ! है चेतनानाथ ! वं जले उदके उपितोऽसि निवास चकर्थ । थल थले भूम्या । सिहि शिखिनि हुताशने। पवण परने शशामारतादौ । अपर अम्बरे विहायसि । गिरि पर्वते । सरि सरिति नधा। दरि दो गुहाया । कुरवणाई देवफसतरखुसत्तमभोगभूमि- कल्पवृक्षपने । आदिशब्दाद्भरतहैमरतहरिविदेहरम्यकहैरण्यातैरातादयो- लम्यन्ते । मलत्तो कि बहुना सर्वत सर्वत्र । यसिओमि चिर कालं उपितोऽसि चिर दीर्घमनन्त कालमनन्तोत्सपिण्यरसर्पिणीकालसमय- पर्यन्त । तिद्वणमझे अणप्परसो त्रिभुवनमध्येऽना मरश । नि- १ना री। ।
पद्माभृते- जशुद्धयुद्धकस्सभारचिचमत्कारलक्षणटकोत्कीर्णतायकैकस्वभावारमभानना जिनस्वामिसम्यक्त्वभावनाभ्रष्ट इत्यर्थ । गसियाई पुग्गलाई भुवणोदरवनियाई सन्वाई । पत्तोसि तो ण तित्तिं पुणवं ताई भुजंतो ॥ २२ ॥ प्रसिता पुगला भुवनौदरवर्तिन सर्व। प्राप्तोसि तन तृप्तिं पुनारूपं तान् भुनान ।। गंसियाई पुग्गलाई प्रसिता पुद्गला. सर्वेऽप्यणय । भुवणोदर- पत्तियाई सव्वाई भुवनोरवर्तिनः सर्वेऽपि । पत्तोसि तो ण तित्ति प्राप्तोऽसि तदपि न तृप्तिं धृति । पुणरूवं ताई मुंजंतो पुनारप पुन- नवमिति सान् पुद्रलान् भुजान । उक्त च पूज्यपादन गणिना--- भुक्तोज्झिता मुटुमदान्मया सर्वेऽपि पुनलाः । उच्छिष्टेघिय तेप्यद्य मम विक्षस्य का स्पृहा ॥१॥ तिहुयणसलिलं मयलं पीय तिहाए पीडिएण तुमे । नो वि ण तिहाछेओ जाओ चिंतेह भवमहणं ॥२३॥ ग्रिभुवनसरिल सकलं पीत तृष्णया पोहितेन स्वया । तदपि न तृष्णाछेदो जात चिन्तय भवमधनम् ॥ तिहुयणमलिलं सयलं विभुवनसाटिलं मफट । पीयं पात त्यया। तिहाए तृष्णया । पीडिएण पीडितेनारगाढेन । तुमे त्वया भयना । तुम तुमाइ तुमे तुमए तुम त (तु)इत (तु) एते दिदे में टया " इति व्याकरणमूत्रेण टायचनेन सह युष्मद तुम आदेशः। तो वि पुरम ग प । २ ता. ग घ.। अत्र एकारस्प प्राामान हम्योपार !३ तण्डाय टी
भावप्राभृतं ।
१४३
तदपि । ण नै । तिहाछेओ तृष्णाच्छेद । जाओ जात चिंतेह
भवमहणं हे जीव ! त्वं चि तय अन्वेषस्व भवस्य ससारस्य मथन वि-
नाशन सम्यग्दर्शनज्ञानचारिजरयमिति भानार्थ ।
गहिउझियाई मुणिवर कलेवराई तुमे अणेयाई ।
ताणं णत्थि पमाण अणन्तभवसायरे धीर ।। २४ ॥
गृहीनोज्झितानि मुनिवर ! कलेवराणि त्वया अनेकानि ।
तेपा नास्ति प्रमण अनन्तभवसागरे धीर ।।
गहि उज्झियाइ गृहीतोज्झितानि। हे मुनिवर मुनिश्रेष्ट! । कलेवराइ
कलेवराणि शरीराणि । तुमे अणेयाई त्वयाऽनेकान्यनन्तानि । ताणं
यात्थि पमाणं तेपा कलेवराणा नास्ति न विद्यते प्रमाण गणनमनन्त-
त्वात् । अणंतभवसायरे धीर अन तभवसागरेऽन्तातीतससारसमुद्रे हे
धीर ! ध्येय प्रति घियमीरयतीति धीरस्तस्य सम्बोधन क्रियते हे धीर ।
हे योगीश्वर | भावचारित्र पिनेति शेष ।
विसवेयणरत्तक्सयभयसत्थग्गहणसंकिलेसाणं ।
आहारस्सासाणं णिरोहणा सिज्जए आऊ ॥ २५ ॥
विषवेदनारक्तक्षयभयशस्त्रग्रहणसंक्लेशानाम् ।
आहारोच्यामाना निरोधनात् क्षीयते आयु ॥
विसवेयणरत्तरसयभयसत्यग्गणसंकिलेसाणं विषवेदनारक्त-
क्षयभयशस्त्रग्रहणसालशाना । आहारुस्मासाणं आहारोच्छ्वासाना ।
णिरोहणा निरोधनात् । सिन्जए आऊ क्षीयते आयु ।
हिमजलणसलिलगुरुयरपव्ययतरुरुहणपडणभंगेहिं ।
रसविजजोयधारणअणयपसंगेहि विविहेहिं ॥ २६ ॥
पट्याभूते- हिम यलनसरिसगुप्तरपर्वततररोगपतनमा। रणविद्यायोगधारणानप्रसेंगे विविध हिम फेपाचिन तूना मानना च शीतेनापम युभरति । जलण केपाविचलनेनाग्निनापमृत्युभवति । मलिल पांचित्सालिडेन समुद्रा- दिजलेनापमृत्युभवति । गुम्यरपव्ययतरहणपडणभंगेहि गुरुतरा अन्युनतशिखरास्ते च ते पर्वतास्तगीगिर्यादय , तथा तरयो पृक्षा गुरुतर- पर्वततररस्तेषां रोहणेन पतनेन च कृत्वा ये भंगा दारीरामर्दनानि ते तथा तै हिम चलनसलिलगुरुतरतपर्वतररोहणपतनभंगे । रमविजजोयधार- अणयपसगेहि रसस्य विपस्य या विद्या विज्ञान तस्या योगोऽनेकोषध. मेलन तस्य धारण सेरनमास्वादन अनयप्रसगवान्यायकरणे ते रसनि. चायोगधारणानयप्रसंगात रसस्चिायोगधारणानपप्रसंग । विविहेहि विविधनानाप्रकारे । तथा चाक्त लक्ष्मीधरण भगरता--- मनाए दालिदियह मरे जिय दुदु माया। एपपड़ियप रिणु गोडयद मग्गु सचिरालु दुग्गु ॥१॥ इय तिरियमणुयनम्मे मुहर उवरग्जिऊण बहुरार । अमिच्नुमहादुक्सं तिवं पत्तोमि तं मित्त ॥ २७ ॥ इति वियत्यनुष्यजन्मनि मुचिर पपथ बहुवारम् । अपमृत्युमहादु रा तीन प्राप्तोऽसि व मित्र इय तिरियमणुयजम्मे इति नोक्तप्रकारेण तिर्यस्यायन मनि। मुहर मुचिरं मुल दीर्घशाल । अरन्जिमण नहुमार उपपय टपा जम गृहीं का यह गायनेकवार । अमिन्नुमहादुपगं अपमृग्युमहा- दुरी । तिव्वं पनोमि ती दुसममहनीयअसा प्रोऽनि ! तं मित्त भानो मित्र! हे वो! हे मुहत् ।।
- भावप्राभृतं । छत्तीसं तिणि सया छावहिसहस्सवारमरणाणि । अंतोमुहुत्तमज्झे पत्तोसि निगोयवासम्मि ॥ २८ ॥ पनिशत त्रीणि शतानि पट्पष्ठिसहस्रवारमरणानि । अन्तर्मुहूर्तमध्ये प्राप्तोऽसि निकोतवासे ॥ छत्तीसं तिण्णि सया पत्रिंशदधिकत्रिशतानि। छावहिस्सहसतार- मरणाणि पट्पष्ठिसहस्रवारान मरणानि ६६३३६। अंतोमुहुत्तमझे अन्तर्मुहूर्तमध्ये । पत्तोसि निगोयवासम्मि प्राप्तोऽसि निकातगासे । वियलिदिए असीदी सही चालीसमेव जाणेह । पंचिंदिय चउवीसं सुद्दभवंतोमुहुत्तस्स ॥ २९ ॥ विकलेन्द्रियाणामशीति पष्ठि चत्वारिंशदेव जानीत । पञ्चेन्द्रियाणां चनुर्विशति भुदभवान् अन्तर्मुहूर्तस्य । वियलिदिए असीदी विकलेन्द्रियाणा द्वीन्द्रियत्रीन्द्रियचतुरिन्द्रियजी- वेषु अनुक्रमेण मरणसख्यामन्तर्मुहूर्तस्य करोति । तथाहि । द्वीन्द्रिया जीवा अन्तर्मुहर्तेन अशीतिगारान् म्रियन्ते । त्रीन्द्रिया जीवा अन्तर्मुर्तेन पष्टि- वारान् नियन्ते। चतुरिन्द्रिया जीवा अन्तर्मुहूर्तेन चत्वारिंशत वारान् नि- यन्ता पंचिंदिय चउवीसं पचेन्द्रिया जीवा अन्तर्मुहूर्तेन चतुर्विशति वारान् नियन्ते । सुद्दभवतोमुहुत्तस्स क्षुद्रभवा अन्तर्मुहूर्तस्य क्रमेण ज्ञातव्याः । रयणत्ते मुअलद्धे एवं भमिओसि दीहसंसारे। इय जिणवरेहिं भणियं तं रयणतं समायरह ॥ ३०॥ रस्न नये स्वलब्धे एवं भ्रमितोऽसि दीघसमारे। इति जिनवरैर्भणितं तत् रत्ननय समाचर॥ स्यणते सुअलई रत्नत्रये सुष्ठु अल्म्धे सनि । एवं भमिओसि दीहसंसारे एवममुनाप्रकारेण भ्रमितोऽसि पर्यटितवान दार्घममारेऽनादौ १६.टी। पद...
१४६ पप्राभूते- ससारे भरे। इय जिणवरेहि भणियं इयेतद्वचन जिनवरैस्तीर्थकरपरम- देवैर्भणित प्रतिपादित । तं रयणतं समायरह तत्तस्मा कारणात् तजगत्प्रसिद्ध वा तत् त्वं वो रत्नत्रय वो समाचर सम्यगाद्रियस्य वा। तं रयणत्तयं केरिसं हवदि । तं जहा। तद्रत्नत्रयं कीदृश भवति । तद्यथा-तदेवनिरूपयति-- अप्पा अपम्मि रओ सम्माइट्टी हवेइ फुड जी। जाणइ त सण्णाणं चरदिह चारित्तमगुत्ति ॥ ३१ ॥ आत्मा आत्मनि रत सम्यग्दृष्टि भवति स्फुट जीव । जानाति तत् सज्ञान चरतीह चारित्रमाग इति ।। अप्पा अप्पम्मि रओ आत्मा आत्मनि रत आमन श्रद्धानपर । सम्माइट्टी हवेइ फुडु जीवो सम्यग्दृष्टिर्भवति स्फुटं निश्चयनयेन, व्यवहारनयेन तु तत्वार्थश्रद्धान सम्यग्दर्शन भवति, जीप आत्मा सम्य- ग्दृष्टिरिति ज्ञातव्य । जाणइ त सण्णाणं जानाति त आत्मान तत्स द्ज्ञान सम्पग्ज्ञान भवति, व्यवहारेण तु सप्तत वानि जानाति त सम्य. ग्दान भवति । चरदिह चारित्तमग्गुत्ति तमामानं जीयो यच्चरति तमयो भवति आम येकलोलीभावो भवति, इहास्मिन् ससारे, चारित्र मार्ग इति, व्यवहारेण तु पापक्रियाविरमण चरण भवति । अण्यो कुमरणमरणं अणेयजम्मतराई मरिओसि । भावहि सुमरणमरणं जरमरणविणासणं जीव ॥ ३२ ॥ क्षयस्मिन् कुमरणमरण अनेकज मान्तरेषु मृतोऽसि । भावय मुमरणमरण जममरणविनाशन जीव !॥ अण्णे कुमरणमरणं अन्यस्मिन् भवसमूहे कुमरणमरण-कुत्सितमरण- मरण यथा भवत्येव । तथा अनेकजमातराण्यन तभपातरेपु। "अन्यार्थे १-२ वाद्य मास्ति व पुस्तके । ३ मग्गोति मूलगायापाठ ।
भावप्राभृतं । अन्या" इति प्राकृतव्याकरणसूत्रेण सप्तम्यर्थे द्वितीया। मरिओसि मृतोऽसि मरण प्राप्तोऽसि । भावहि सुमरणमरणं भावय सुमरण- मरणं पडितपडितमरणं । कथंभूतं मुमरणमरण, जरमरणविणासणं जरामरणविनाशनं परममोक्षदायक। हे जीव हे चेतनस्वभाव ! आत्मन्निति । समुद्रादिकल्लोलवत्प्रतिसमयमायुस्त्रुध्यति तदावीचिकामरणं स्थिति- प्रदेशवीचिकाभेदात्तद्विविधमप्येकविध । भवान्तरप्राप्तिरनन्तरोपसृष्टपूर्व- भवविगमनं तद्भवमरणमुच्यते । तत् त्वनन्तशः प्राप्त जीवेनेति ज्ञातव्य, तेन तद्भयमरणं न दुलर्भ । अवधिमरणं नाम कथ्यते-यो यादृशं मरण साम्प्रतमुपैति तादृशमेव यदि मरण भविष्यति तदवधिमरणं, तर द्विविध देशावधिमरण सर्वावधिमरण चेति । तत्र सर्वावधिमरणं नाम यदायुर्यथाभूतमुदेति साम्प्रतं प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशैस्तथाभूतमेायुः प्रकृत्यादिविशिष्टं पुनर्बध्नात्युदेष्यति च यदि सर्वावधिमरणं । यत्साम्प्र- तमुदेत्यायुर्यथाभूतं भूतमेव वध्नाति देशतो यदि तद्देशावधिमरणं । एतदुक्तं भवति-देशत. सर्वतो वा सादृश्येनावधीकृतेन विशेपितं मरण- मवधिमरणमिति। साम्प्रतेन मरणेनासादृश्यमावि यदि मरणमाद्यन्तमरण- मुच्यते । आदिशब्देन साम्प्रतं प्राथमिकं मरणमुच्यते, तस्यान्तो विनाश- भावो यस्मिन्नुत्तरमरणे तदेतदाद्यन्तमरणमुच्यते। प्रकृतिस्थित्यनुभव- प्रदेशैर्यथाभूतैः साम्प्रतमुपैति मृति तथाभूता यदि सर्वतो देशतो का नोपैति तदाद्यन्तमरण । वालमरणमुच्यते--स च बालः पचप्रकारोऽव्य. तबालो व्यवहारबालो ज्ञानबालो दर्शनवालश्चारित्रबाल। धर्मार्थकाम- कार्याणि न वेत्ति न तदाचरणसमर्थशरीरोऽव्यक्तवाल: लोकवेदसमपन्यव- हारान् न वेत्ति शिशुर्वा व्यवहारवालः । मिथ्यादृष्टयो दर्शनबालाः । वस्तुयाथात्म्यपाहिज्ञानहींना ज्ञानबालाः । अचारित्राश्चारित्रबालाः । दर्श- भाव.क.।
१४८ पटप्राभृते- नबालमरण द्विविध इच्छाप्रवृत्तमनिच्छाप्रवृत्त चेति । तत्रेच्छाप्रहत्तमग्निना धूमेन शत्रण विषेणोदकन मेरुप्रपातेनोच्यासरोधेन शीतपातनोष्णपातेन रज्या क्षुधा तृपा जिव्हात्पाटनेन विरुद्धाहारसेग्नेन च मरणमिच्छामरणं । कालेऽकाले वाऽध्यरसानादिना निना जिजीविपोर्मरणमनिच्छाप्रवृत्त । पंडितमरणमुच्यते पंडितश्चतुर्धा व्यवहारपडित सम्यक्त्वपडितो ज्ञान पंडितश्चारित्रपडितश्चेति । लोकदसमयगतव्यवहारनिपुणो व्यवहार पडित, अथवानेकशास्त्रज्ञ शुश्रूषादिबुद्धिगुणसमन्वितो व्यवहार पंडित । त्रिपिधान्यतमसम्यक्त्व दर्शनपण्डित । पचविधज्ञान परिणतो ज्ञानपडित । पचविधचारित्रान्यतमचारित्रपरिणतश्चा रित्रपडित । नरके भवनेषु विमानेषु “योतिष्कषु वानव्यन्तरेषु द्वीपसमुद्रधु च ज्ञानपडितमरण । मन पर्ययमरणं मनुष्यलोक एव मरण । आसन्नमरणमुध्यते-निर्वाणमार्गप्रस्थितसयतसार्थात् प्रच्युत आसन्न उच्यते, तदुपलक्षण पाश्वस्थस्वच्छदकुशीलससक्ताना। ऋद्धि प्रिया रसेष्वासक्ता दुखभारव सदा दुखकातरा कषायपरिणता संज्ञावशगा पापश्रुत्याभ्यासकारिण त्रयोदशक्रियास्वलसा सदा संक्लिष्ट चेतस भक्ते उपकरणे च प्रतिबद्धा निमित्तमत्रौपधयोगोपजीविन गृहस्थवैयावृयकरा गुणहीना गुप्तिसमितिष्वनुद्यता मदसगा दशधर्मा अकृतबुद्धय शबलचारित्रा आसन्ना उच्यते। त यद्यते आत्मशुद्धि कृत्वा- नियन्ते तदा प्रशस्तमेव मरण | बालपडितमरण श्रावकस्य । सशल्य मरण सुगम । पलायमरणमुच्यते-विनयवैयावृत्यादायकृतादर प्रशस्त क्रियोद्वहनालस त्रयोदशचारित्रेषु वीर्यनिगृहनपरो धर्मचि ताया निद्रा पूर्णित इव ध्याननमस्कारादे पलायत पगयमरणं । इन्द्रियवेदनाकपा यनोकपायातमरण वार्तमरणं । अप्रसिद्धऽन ज्ञाते च मरणे विप्पाण . मरु के पर्वत ।
चरण- भावप्राभूत । समरण, चिप्राणसमरणमुच्यते-गृध्रपृष्टमिति सज्ञिते कृते प्रवर्तते । दुर्भिक्षे कान्तारे दुरुत्तरे पूर्वशत्रुभये दुष्टनुपभये स्तेनभये तिर्यगुपसर्गे एकाकिनः सोढुमशक्ये ब्रह्मव्रतनाशादिचारित्रदूपणे च जाते सचिन पाप भीरु कर्मणामुदयमुपस्थित ज्ञा वा सोढुमशक्त तन्निस्तरणस्यासत्युपाये सावद्यकरणभीर विराधनमरणभीरुश्च एतस्मिन् करणे जाते कालेऽमु- मिन् किं भवेशलमिति गणयता यद्युपसर्गत्रासितोऽह सयमाझ श्यामि तत सयमभ्रष्टो दर्शनादपि न वेदनामसक्लिष्ट सौढु प्रव्रज्या- मुत्सहे ततो रत्नत्रयारायनाच्युतिर्ममेति निश्चितमतिनिर्माय दर्शनविशुद्ध धृतिमान् ज्ञानसहायोऽनिदानोऽर्हदन्तिके आलोचना- मासाद्य कृतशुद्धिलेश्यप्राणापाननिरोध करोति यत्तद्विप्पाणसमरणमुच्यते। शस्त्रग्रहणेन यद्भवति तदृध्रपृष्ठमित्युच्यते मरणविकल्पसभवप्रदर्शनमिद सर्वत्र कर्तव्यतयोपदिश्यते । भक्तप्रत्याख्यान, प्रायोपगमनमरण, इगिनी- मरण, केवलमरण चेति । इत्येतान्यवोत्तमानि पूर्वपुरुषै प्रवर्तितनि सप्तदशसु मध्ये त्रीण्युत्तमानि सुमरणानि । प्रायोपगमन दर्भासने स्थित स्वयमुपसर्ग न निवारयति, चेत्कोपि निवारयति तदा निवारयितु ददाति । इगिनीमरणे निवारयितुमपि न ददाति । केवलिमरण तीर्थकरगणधरा- नगारकेवलिमरण ज्ञातव्यं । एतन्मरणत्रयं सुमरण हे जीव ! त्व भावय। सो णस्थि दच्वसवणो परमाणुपमाणमेचओ णिलओ। जत्य ण जाओ ण मओ तियलोयपमाणिओ सव्यो ॥३३|| स नास्ति इण्यश्रमण परमाणुप्रमाणमाको निलय । यन न जात न मृत त्रिलोकप्रमाणक सव ॥ सो पत्थि स नास्ति न विद्यते । णिलओ गृह स्थान | कथ- भूतो निलय , परमाणुपमाणमेत्तओ परमाणुप्रमाणमात्र अविभागी पनिटी । २यो टी।
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१५०
पटनाभृते-
परमाणुर्यावन्त प्रदेश रुणद्धि त मात्रोऽपि निलयो नास्ति । स क
प्रदेश , जत्थ या प्रदेशे। दव्यसवणो द्रव्यदिगम्बर मिथ्यादृष्टि
स्तपस्वी । ण जाओ न जातो नोपन्न । ण मओ न मृतो न मरणं
प्राप्त । स निलय कियान् , तियलोयपमाणिओत्रियमुवनेनमपित ।
सव्वो समस्तोऽपि ।
कालमणत जीवो जम्मजरामरणपीडिओ दुक्ख ।
जिणलिंगेण वि पत्तो परपराभावरहिएण ॥ ३४ ॥
कालमनन्त जीव ज मजरामरणपीडित दुखम् ।
जिनलिनन अपि प्राप्त परम्पराभावरहिवेन ।
कालमणत जीमो काल समयमनहसमिति यावत्, अनन्तम त
रहित कर्मतापन्न जीव आमा दु ख प्राप्त इति क्रियाकारकसम्बध ।
कालाघदशभावाना कर्मसज्ञा सिद्धेन वर्तते । कथभूतो जीव , जम्म
जरामरणपीडिओ जमजरामरणपाडित चम्पित । जिणलिंगेण
वि अर्हदूपविशिष्टोऽपि, अपिशब्दादविशिष्टोऽपि 1 कथभूतेन
जिनलिंगेन, परपराभावरहिएण परम्परा आचार्यप्रवाहस्तदुपदिष्ट
शास्त्र च परपरा शब्देन लभ्यते तर भावरहितेन प्रतीतिवर्जि
तेन मिध्यादृष्टिना जीवनत्यर्थ । कासौ परपरा अस्यामवसर्पिण्या
तृतीयकालप्रान्त श्रीवृषभनाथेनार्थशास्त्रमुक्त, वृषभसनगणधरेण प्रन्थ
कृत, त परम्परया वीरेण भगरतार्थ प्रकाशित , गौतमेन गणिना
प्रथित , तदनुक्रमण पचमकाले प्रमाणभूतैर्निरम्वराचा रारातीयरुप-
दिष्ट तच्छास्त्र प्रमाणीकतव्य विसवादिभिर्मिध्यादृष्टिमि कृत शास्त्र न
प्रमाणनीय । अथ के त आचार्या यं कृतं शास्त्र प्रमाणीक्रियते इत्याह-
श्रीमद्रयाहु श्रीचन्द्रो जिनचन्द्रो महामति ।
गृध्रपिच्छगुरु श्रीमाल्लोहाचार्यों जितेद्रियः ॥ १॥
ve भावप्रामृत । पलाचार्यः पूज्यपादः सिंहनन्दी महाकविः । वीरसेना जिनसेनो गुणनन्दी महातपाः ॥२॥ समन्तभद्रः श्रीकुभः शिवकोटिः शिवकर । शिवायनो विष्णुसेनो गुणभद्रो गुणाधिकः ॥३॥ अकलको महाप्राज्ञः सोमदेवो विदांवरः। प्रभाचदो नेमिचन्द्र इत्यादिमुनिसत्तमः ॥ ४॥ यच्छास्त्र रचित नूनं तदेवाश्देयमन्यकैः । विसघेरचितं नैव प्रमाणं साध्यपि स्फुटं ॥५॥ पडिदेससमयपुग्गलआउगपरिणामणामकालर्ट। गहिउझियाई बहुसो अणंतभवसायरे जीव ॥३५॥ प्रतिदेशसमयपुद्गलायुपरिणामनामकालस्थम् । प्रहीतोज्झितानि बहुश अनन्तभवसागरे जीव ।। पडिदेस यारन्त प्रदेशा लोकाकाशस्य वर्तन्ते एकेक प्रदेश प्रति शरीराणीति पूर्वोक्तमेव प्राद्य गृहीतोज्झितानि । तथा प्रतिसमय-समय समय प्रति प्रतिसमय शरीराणि गृहीतोझितानि । प्रतिपुद्गल प्रतिपर- माणु-परमाणु परमाणु प्रति प्रतिमरमाणु अनन्तानि शरीराणि गृहीतोज्झितानि । आउगं प्रत्यायु आयु आयु प्रति प्रत्यायु अनन्तानि शरीराणि गृहीतोग्झितानि । परिणाम परिणाम परिणाम प्रति प्रतिपरिणाम क्रोधमानमायालोभमोहरागद्वेपादिपार- गामान् प्रति प्रतिपरिणाम अनन्तानि शरीराणि गृहीतोज्झितानि । णाम नाम नाम प्रति प्रतिनाम प्रतिनाम नपुसक चेति वचनावाऽदन्तो निपात , यापन्ति नामानि गतिजात्यादीनि वर्तन्ते तावन्ति प्रति अन- तानि शरीराणि गृहीतोज्झितानि । कालटं प्रतिकालस्थ उत्सर्पिण्यत्र- सर्पिणीकालस्यं यथा भवत्येव तत्समयाव प्रति प्रतिकालस्थं अनन्तानि १जीवो.घ । जीवा ग, ।
१५२
पट्माभूते-
शरीराणि गृहीतोज्झितानि । गहिउझियाई बहुसो गृहीतोग्झितानि
बहुशोऽनन्तवारान् । अणंतंभवसायरे जीव अनन्तभवसागरेऽनन्ता-
नन्तसंसारसमुद्र हे जीव! हे आत्मन्निति । जिनसम्यस्त्वं विनति भा-
चार्यः जिनसम्यस्वभावेन त्वनन्तसंसार उच्छिचते स्तोककालेन मुक्तो
भवति ।
-
तेयाला तिण्णि सया रज्जुणं लोयखेतपरिमाणं ।
मुत्तूणपएसा जत्थ ण दुरुटुल्लिओ जीयो ।। ३६ ॥
त्रिचत्वारिंशत्पीणि शतानि रग्जूना लोकक्षेत्रपरिमाणं ।
मुक्त्वाऽष्टौ प्रदेशान् यत्र नम्रमितः जीवः ।।
तेयाला तिणि सया त्रिचत्वारिंशदधिकत्रिशतरग्जुधनाकाररग्जूना
च लोकक्षेत्रपरिमाणं भवति । मुत्तूणहेपएसा मुक्त्वाऽष्टौ प्रदेशान्
मेरुदै गोस्तनाकारेण येऽष्टप्रदेशा वर्तन्ते तन्मध्ये जीवो नौत्पनो न मृतः
अन्यत्र सर्वत्र जातो मृतश्चार्य जीवः । तेऽष्टी प्रदेशा निजामशरीरमध्ये
गृहीतास्तन्मध्ये नोत्पन्न इति वृद्धाः । जत्य ण दुरुहुल्लिओ जीवो
पारमा न पर्यटितः स कोऽपि प्रदेशो नास्ति। "पर परी दुस दुम कुम्
गुम् भुम इंप रुंट तलयंट भमाड ममड भम्मड चस्कम्म ढंटल
दुदुल्ल टिरिटिल्ल दुदुल्ल भ्रमेः" इति प्राकृतव्याकरणसूत्रेण भ्रम्धातोः
दुरुल इत्यादेशः । धनपालटतदेशीलक्ष्म्या तु "घोलिय दिलिपाइ
भमियत्ये" सूत्रं ।
एकेकंगुलिवाही छष्णपदी हॉति जाण मणुयाणं ।
अवसेसे य सरीर रोया भण कित्तिया मणिया ।। ३७ ।।
एकागुली म्याधयः पश्यवतिः भवन्ति जानीहि मनुष्यानाम् ।
भोये शरीरे रोमा मश मियन्तो ममिताः॥
पचेव पोटीमो व शेव भासहिलालागि।
गवधि सहरमा पंचमया हानि पुरसीदी ॥1॥
भावप्राभृतं । एकेक्कंगुलिवाही एकैकागुलौ व्याधयो गेगा: । छण्णपदी होति जाण मणुयाणं पण्णवतिर्भवन्ति जीव ! खं जानीहि मनुजानां मनुष्याणां शरीरे । अवसेसे य शरीरे अवशेषे च शरीरे एका- इगुलेरुद्धरितादवशिष्टे शरीरे । रोया भण कित्तिया भणिया रोगा व्याधयस्त्वं भण कथय कियन्तो भणिता इति । ते रोया वि य सयला सहिया ते परवसेण पुन्वभवे । एवं सहसि महाजस किं वा बहुएहि लविएहिं ॥३८॥ ते रोगा अपि च सकला: सोढा खया परवशेन पूर्वभवे । एव सहसे महायशः' कि वा बहुभि लपित. ।। ते रोया विय सयला ते रोगा. सकला अपि सर्वेऽपि । सहिया ते परवसेण पुब्वभवे सोढास्त्वया परवशेन कर्माधीनतया पूर्वभवे पूर्वजन्मा- न्तरसमूहे । एवं सहसि महाजम एवमुनाप्रकारेण त्व सहसेऽनुभवसि हे महायशः। किंचा बहुएहि लविएहिं किं वा बहुभिर्लपितैल्पितः। पित्तंतमूत्तफेफसकालिज्जयरुहिरखरिसकिमिजाले ॥ उयरे वसिओसि चिरं नवदसमासेहिं पत्तेहिं ।। ३९ ।। पित्तान्ममूत्रफेफसयकृठपिरखरिसक्रमिजाले। उदरे वसितोसि चिरं नवदशमासैः पूणे ॥ पित्तं च मायुः अत्राणि च परीतति । मूत्र च प्रस्तावः । फेफसव पीहा । कालिजय यकृत् “उदर्यो जलाधारो हृदयस्य दक्षिणे यकृत् कालखण्ड क्लोम वामे प्लीहा पुष्पसश्चेति" वैद्याः । घरहल इति देश्यां । रुहिर रुधिरं च ।सरिस खरिसश्च, अपक्कविमिधरुधिरश्लेष्मा खरिसः कथ्यते । खउरिय इति देश्यात् । किमि कृमयश्च द्वीन्द्रिया जीवास्तेषां जालं समूहो यत्रोदरे तत् पित्तान्त्रमूत्रपुष्पसकालियकरधिरखरिसयकृमिजाल १पुषस. क. पुष्प.स.।
१५४ पट्मामृते- तस्मिन् । उपरे यसिओमि चिरं उदरे युक्षिम य उपितोऽसि निवास कृतवानसि व चिरं दीर्घकाल, अनन्तगर्भग्रहणापेक्षया चिरमिति विशे पणं । नादसमासेहि पत्तेहि नाभिर्दशभिर्वा मासै प्रातै परिपूर्ण र्जातै तन्मध्ये तदुपरि च कियान् कालो लभ्यते प्राप्तशन्देनेति । दियसंगट्टियमसणं आहारिय मायभुत्तमण्णंते । छद्दिसरिसाण मझे जठरे वमिमोसि जणणीय ॥४०॥ द्विजसझस्थितमशनमाह य मातृभुतमन्नाले । छर्दिसरिमयोर्मध्ये जटरे उपितोनि नया ॥ जीन! त्व जनन्या मातु ।जठरे उदरे उपितोऽसि निवास चकर्थ । कथभूते जटरे, छद्दिसरिसाण मज्झ छर्दिश्च यान्तमन, खरिसथ अप क दर्दर मलं रुधिररितं तेपा छदिखरिसाणं तयो छर्दिखरिसयोर्मध्ये मध्यविशिष्टे । अधवा जठरे उपितोऽपि कुनोपितोऽसि छर्दिरारिसपो- मध्ये समुपितोऽसि । कि कृत्या पूर्व, अमणं आहारिय अशन भोजन आहृत्य आहार कृपा । क्यभूतमशन, दियसंगठियं द्विजानां दन्ताना अस्थ्यकराणा सगे स्थित, चरणलाया मातृमुग्वे दन्ताना समीपे स्थित अस्थिभि स्पृष्टं उच्छिष्टीकृत । क उपितोऽसि, मायभुत्तमण्णंते यमात्रा मुक्त तस्यानस्या ते मध्ये उपितोऽसि । अथरा मारने भुत मुक्त ते. खया। तथा चाक्त- अन्तर्वात पदनवियर क्षुनृपात प्रतीच्छन् फर्मायत्त सुविरमुदरावसरे वृद्धगृपया! निष्पन्दारमा एमिसहचरो जन्मनि शमीनो मन्ये जन्मिन्नपि च मरणानिमित्ताद्विमपि ॥१॥ सिमुकाले य अयाण अमुईमज्दम्मि लोलिओसि तुमं । अमुई असिया यहुसो मुणियर पालनपत्तेण ॥४१॥ - amanna भावप्राभृतं । १५५ शिशुकाले च अज्ञाने अशुचिमध्ये लुठितोसि बम् । अशुचि अशिता बहुश मुनिवर । बालत्वप्राप्तेन ॥ मिसुकाले य अयाणे गर्भरूपकाले स्तनधयायसरऽज्ञान निर्विवेक। असुई मज्झम्मि लोलिओसि तुम अशुचिमध्ये विष्टामध्ये गूथमध्ये रोलिता लुठितस्त्व भान् । असुई असिया बहुसो अशुचिर्विष्टा अमध्यमशिता भक्षिता बहुशोऽनेकपारान् । मुणिवर बालत्तपत्तेण ह मुनिवर ! यतिवराणां ज्ञानिना मध्य श्रेष्ठ! परमप्रशस्य ! बालत्वप्राप्तेन अव्यक्तबालत्व गतना तथा चाक्त- बाल्ये वरिस न किंचिदप्यपरिपूर्णाङ्गो हित वाहिन । कामान्ध खलु कामिनीद्रुमघने भ्राम्यन् वने यौवने। मध्ये वृद्धतृषाजितु वसु पशु क्लिश्नासि कृष्णादिभि- र्वार्धक्येऽर्धमृत व जमफलित धर्मो भवन्निर्मल ॥१॥ मसहिसुक्सोणियपित्ततसवत्तकुणिमदुग्गध । सरिसवमपूयसिभिसभरिय चिंतहि देहउड ॥ ४२ ॥ मांसास्थिशुक्रोणितपित्तान्त्रस्रवत्कुणिमदुर्गधम् । सरिसवसापूयकिल्बिषभरितन्तय देहकुटम् । हे जीन ! शुद्धबुद्धैकस्वभान आमन् ! त्व देहउड कायकुट शरीर घट । चिंतेहि चित्तय विचारय पर्यालोचयस्य । कथभूत देहकुट, मसेयादि मास च पिशित, अस्थीनि च हड्डानि, गुक च सप्तमा धातु -बीज वीर्य चति यावत्, शोणित रविर-रक्त साहितमिति यावत्, पित्त व उष्णविकारो मायुरिति, अंत्राणि च पुरीतति, एतै सवलत कुणिम शरितमृतकं तदुर्गधमसुरनि । पुन कथभूत देहकुट व चिन्तय, खरिसश्च अपकमलरुधिरमिश्रित द्रव्य । वसा च क्या भद इति यावत् शुद्धमासस्वेद इत्यर्थ । पूय च विनष्टरधिर । पूइ इति पाठेs- पवित्र ! किलिप च करमल एतैर्भरित पूरित ।
पटप्राभूते-- भावविमुत्तो मुत्तो ण य मुत्तो वंधराइमित्तेण । इय भाविऊण उज्झसु गंधं अब्भंतर धीर ।। ४३ ।। भावविमुक्तो मुक्त न च मुक्त बाधवादिमात्रेण । इति भावयि वा उज्नय गधमभ्यतरं धीर! भावविमुत्तो मुत्तो बाधादीनां प्रेमलक्षणेन भावेन विमुक्तो रहिता मुनिर्विमुक्त कथ्यते । ण य मुत्तो बंधवाइमित्तेण न च नैय मुक्तो यतिरुच्यते, कीदृश : बान्धवादिकुटुम्बेन मुक्तस्यक्तो मुक्त उच्यते बान्धवादिमात्रण मुक्तो मुनिनोंच्यते, किं तर्हि उच्यते--गृहस्थ एवो. च्यते इति भागार्थ । इय भाविऊण उज्झसु इतीदृशमभावयित्वा सम्यविचार्य उज्झसु-परित्यज परिहर । क, गधं परिमल वासना भावना । कथभूत गध, अभ्यन्तरं मनसि स्थित बाधवादिस्नेह । हे धीर । हे योगीश्वर ! ध्येयं प्रति धिय बुद्धिमीरयति प्रेरयतीति धीर इति व्युपत्ते । देहादिचत्तसङ्गो माणकसाएण कलुसिओ धीर । अनावणेण जादो बाहुवली कित्तियं काल ॥ ४४ ॥ देहादित्यक्तसङ्ग मानक्पायेन पद्धपितो धीर। मातापनेन जातो बाहुबलि वियत कारम् ॥ देहादिचत्तसंगो देह शरीर, आदिशब्दाद्धस्त्यश्वरथपादातिसम्ह पुत्रकलत्रादिवर्गश्च लभ्यते तस्मात्यक्तसगो निष्परिग्रह ! मागकमाएण कलुसिओ धीर सज्वनमानेनेपक्पायेण कलुपितो मलिनित हे धीर । अत्तावणेण जादो आतापनेन योगेन उद्भकायो सर्गेण | पाहूबली किचियं कालं थ्रीबाहुवलिस्वामी कियत कार्ल वर्षपर्यत काल कलुपित इति सम्बध । तथा चोक्त- भावप्राभृतं । चक्रं विहाय निजदक्षिणयाहुसंस्थं यत्प्रावजन्ननु तदेव स तेन मुंचेत् । लेशं फिलाप स हि पाहुबली चिराय मानो मनागपि हतिं महतीं करोति ॥ १ ॥ महापंगो णाम मुणी देहाहारादिचत्तवावारो। सवणतणं ण पत्तो णियाणमित्तण भवियणुय ॥ ४५ ॥ मधुपिनो नाम मुनिः देद्दाहारादित्यक्तव्यापार । श्रमणत्वं न प्राप्त निदानमात्रेण भन्यनुन ।। महुपिंगो णाम मुणी मधुपिंगो नाम मुनि । देहाहारादिचत्त- वावारो शरीराहारादित्यक्तव्यापार. । सवणतणं ण पत्तो श्रवणत्वं दिगम्बरत्वं न प्राप्तः द्रव्यलिंगी बभूवेत्यर्थ. । णियाणमित्तेण भविय- णुय निदानमात्रेण सगर सकुटुम्ब क्षयं नेष्यामीति निदानमात्रणेति है भविकनुत ! भव्यजीवस्तुतमुने । इयं कथा महापुराणादिपु विश्रुता वर्तते। तथा हि। अयेह भरतक्षेने चारणयुगलनगरे राजा सुयाधन , राज्ञी अतिथि , मुता मुलसा । तस्या. स्वयवरे सर्वत्र दूता गता । सर्वे नृपा चारणयुगले पुरे मिलिताः । अयोध्यापतिस्तत्र सगर आगन्तुमुद्यम चकार । पश्चास्नाने सति तैलोपलेपिना समरेण राज्ञा पलित केश दृष्ट्या तत्र गमेने विरक्तेन बभूवे । सत्रावसरे मन्दोदरी धात्री राजान- मुगच । देव ! न पलितमिदं तमापूर्वद्रव्यलाभ वदति । तत्रैर विश्वभू- मंत्री कथयति । हे राजन् ! सुलसा परनृपान् मुक्त्वा स्वाय घरयिष्यति तथाई कुशल या करिष्यामि। तच्छ्रुत्वा दृष्ट्वा राजा तर चतुरङ्गसैन्येन चचाल । तर केचि दरसेषु गतेषु मन्दोदरी सुलसान्तिकं गत्वा है पुत्रि! कुल रूपसौन्दर्यविक्रमनयविनयविभब धुसम्पदादयो ये गुणा वरे १मनास विरक्तन इति स पुस्तके । २ दृयो, इति ख. पुस्तक.। कुल रूप इति क. पुस्तके। ।
राज्ञ मुत, पद्माभूते- स्थास्य किं नामकस्य किं कुल को भार प्राते कस्य का गतिर्भविष्यती- त्युक्ते एक प्राह-अस्मत्समीपगो वसु, तीवरागादिदूपित, हिंसाधर्म विनिश्चित्य नारको भानी । द्वितीयो मुनि प्राह-मध्यस्थितो पर्यत , द्विजपुत्र , दुर्बुद्धि क्रूर ,महाकालोपदेशादर्पण पापशास्त्रं पठित्वा दुर्मार्गदेशको हिंसैव धर्म इति रौद्रध्यानपरायणो बहून् नरके प्रवेश्य स्वयमपि नरके यास्यति । तृतीयो मुनिस्वाच-एप पश्चास्थितो नारद , द्विज , धीमान्, धर्मध्यानपरायणोऽहिंसा लक्षण धर्म श्रितानां व्याकु- र्वाणो भावी गिरितटाख्यपुरस्य स्वामी भूत्वा दीक्षि वा सर्वार्थसिद्धि यास्यति। तमुनित्रयोक्त श्रुतधर श्रुत्वा साधु पठित निमित्त भवद्भिरिति तुष्टाव । क्षीरकदम्ब उपाध्याय समीएतरतत्समाश्रयस्तदाझर्य तदेतविधिचेष्टि- तमशुभ धिगिति भणित्वा किमत्र मया क्रियते इति विचित्य तर- स्थित एव मुनानभिवन्द्य वैमनस्पेन शिष्यै सह नगर प्रविवेश । तदन- न्तरीकरण शास्त्रेण बालवे पूर्णे जाते विश्वासुर्वस रायं दत्वा दीक्षा जग्राह | वसुनिष्कण्टकराय कुन्नेिकदा वन क्रीडितुं गत | तत्रा काशे उड्डीयमाना पक्षिण स्खलित्वा पतितान् दृष्ट्वा चितयामास । आकाशे उद्दीयमाना यत्पक्षिण पतन्ति तत्र किमपि कारणं भविष्य- तीति तस्मिन् प्रदेश वाणं मुमोच । सोऽपि तत्र स्खलित तत्र स्वय जगाम सारथिना सह तत्र पस्पर्श। आकाशस्फटि- स्तभ विज्ञाय परैरविदितं तमानयामास । तस्य पादचतुष्टय पृथु निर्माप्य तसिहासनमारुह्य नृपादिभि सेव्यमान सत्यमाहाम्यात् खे सिंहासने स्थितो वसुरिति विस्मयमानेन लोकेन घोपितोऽत्रेति तस्थौ। एवमस्य काले गच्छति पतनारदापेकदा समित्पुषार्थ वनं गतौ । तत्र नदीतटे मयूरा जलं पीत्वा गतास्त मार्गदर्शनानारद प्राह-ये मयूरा पानाय पीत्वा गतास्तेष्वेको मयूर सप्तमयूर्यो वर्तते । तया पर्वत १व इति स पुस्तके । २दुखेन । - - - भावप्राभृतं । प्राह-मृपा वार्तासौ । मनस्यसहमानः पणितबन्धनं बबन्ध । किंचिदन्तरं गत्वा नारदोक्तं सद्भुतं ज्ञात्वा विस्मित्याने गला करेणुमार्ग ददर्श । 'तं दृष्ट्वा नारद उवाच-एपा हस्तिनी गता, सा वामलोचने- नान्धा, तामारूढा गर्भिणी स्त्री, पट्टाम्बरसहिता, अद्य पुत्रमजीजनत् । अन्धसपीपलप्रवेशवत् पूर्वोक्तं तव वचनं यादृच्छिकं सत्यमभूत्, इदं तु मिथ्या मयाऽदितं किमस्तीति स्मित्वा स सासूयं विस्मयं चित्ते प्राप्य तदसत्यं कर्तुं हस्तिनीमनुगतः पुरं प्रविवेश । नारदोक्तं तथैव ददर्श। गृहमेस पर्वतो मातुरमे जगाद । किं जगाद ! मात: 1 मे पिता पया नारदं शिक्षितवास्तथा मां नापीपठत् , अस्य चेतसि नारदो वर्तते नाह- मिति । तेन वचनेन विप्राया हृदयं विदारितं । पापोदयाद्विपरीतं तपा विचारितं । शोकं च ब्राह्मणी चकार । क्षीरकदम्बस्तु स्नात्या अग्नि- होत्रादिकं कृत्वा मुक्त्वा च स्थितः । तं प्रति ब्राह्मण्युवाच-स्वया पुत्रो न शिक्षितः, लोको व्युत्पादितः । क्षीरकदम्ब उवाच-प्रिये । अहं निविशेषोपदेशः पुरुपं पुरुष प्रति ददामि मतपस्तु भिन्नाः सन्ति । तेन नारदो कुशलो बभूव । प्रिपे ! त्वत्पुत्रः स्वभावेन मन्दो नारदेऽसूयते कि क्रियते । इत्युक्त्वा स्त्रिया विश्वासमुत्पादयितुं पर्वतसमीपे नारदं पप्रच्छ । हे नारद ! त्वं वने भ्राम्यन् फेन कारणेन पर्वतस्य बहुविस्मयं कारितवान् । नारद उवाच-स्वामिन् ! पर्वतन सह चैनं गच्छन् नर्मकथापरः पीतवारा मयूरोणां संधी नया निवर्तने सचन्द्रककलापाम्बुमध्यमजनगौरवात् भीला व्यावृत्य विमुखं कृतपश्चा पदस्थितिः शिखी च गतवानेकः । शेपास्त्वा- पजलादिताः पत्रभाग विधूय अगुः । तं दृष्ट्वाहमुक्तवान्-पुमानेकः शेपाः १ तद् क. २ अभूत् ख.1 ३ बने. ध । ४ मयूरीणा ख.। ५ सयो. ख. । ६ नद्यातिवर्तते ख.। ।
१६२ पट्नाभूते- त्रिय इत्यनुमानात् । ततो वनान्तरात्कश्चिदागत्य पुरसमीपे करिण्यारूढ त्रिप नयन् पुर प्रति पश्चिमपादाभ्या प्रयाणके स्वमूत्रघट्टनात् करिणी मकथय । दक्षिणे भागे तस्वीरुद्धगेन वामलोचनेऽन्धा जगाद । मार्गा. प्रच्युत्य श्रमादारूढयोपित शीतच्छायामिलापेण पुलिनस्थले मुप्ताया उदरस्पर्शमार्गेण गुल्मलग्नदशया स्त्रिय विवेद । करेणुश्रितमार्गे गृहोद्य- सितकेतुदर्शनेन पुत्रजन्मोक्तवान् । तच्छ्रुत्वा विप्रो निजापराधाभाव भार्याया अकथयत् । तदा पर्वतमाता प्रसन्ना जाता । प्रिये ! मुनिना भाषितं यत्पर्वतो नरकं यास्यति । तत्प्रतीत्यर्थ भार्या स्वय च एकान्ते गत्वा पिप्टेन द्वौ बस्ती निर्माय पुत्रच्छात्रभावपरीक्षणार्थ द्विजोत्तम एक पुत्राय द्वितीय छात्राय ददौ । परादृश्यप्रदेशे गत्या गन्धपुष्पमंगलैरचित्वा कर्णध्छेदं कृत्वा एतावद्यैवानयत युवा । तत्र पर्वतः पापी अस्मिन् वने न कोऽपि वर्तते इति को छेदयित्वा पितरमागत्य पूज्य ! यथा त्वयोक्त मया तथैव कृतमित्यत्रदत् । नारदस्त वन गत्वा विचारयति गुरुणोक्त- मदृश्यप्रदेशेऽस्य रण छेदनीयाविति । चन्द्र पश्यति । रविनिरीक्षते । मक्षनाणि रिलोकन्ते । प्रहास्तारकाच पश्यन्ति । देवता निरीक्षन्ते । । सन्निहिता पक्षिणो मृगजातयश्च निपेद्ध न शक्यन्ते इति विचार्य कर्ण- योश्छेदमकृत्या गुरुसमीपमागतो नारदः। यतोऽय भव्यात्मा बनेऽष्टदे- शस्थासंभवात्, नामस्थापनाद्रव्यभावाना विचारचतुर पापापख्याति- कारणक्रियाणामकर्तव्यत्वादहमिर्म छाग विच्छिन्नावयव नाकार्ष- मित्युवाच । तच्छुत्या क्षीरकदम्ब. स्वपुत्रस्य जडत्वभाव ज्ञात्या विचारयामास । यन्मिथ्यादृष्टय एकातेन नुवन्ति कारणात्कार्यसिद्धि- रिति तदसत्य अत्र कारण गुर कार्य शिष्यबुद्धयुत्कर्ष तत्वकान्तेन १ पुस्तकट्रयेऽपि ववेद इति पाठ । २२.स । छाग..
भावप्राभृतं । न भवति यतो मयि पाट्यत्यपि मत्पुत्रो जड इति तेन धिगेकात मत तत्कुमतमेव । कारणानुगत कार्य कचिद्भवत्येव कचिन्न भवत्येवेत्पने- का तमत सत्यमित्यनेकशस्तुष्टाव | नारदस्य योग्यत्व ज्ञात्वा नारद । त्वमेव सूक्ष्मबुद्धिर्ययार्थज्ञाता । अद्यप्रभृत्युपाध्यायपदे त्वं मया स्थापित । सर्वशास्त्राणि स्वया व्याकर्तव्यानि इति त प्रपूज्य प्रापर्धयत् । धीमता सर्वत्र गुणैरेव प्रीति । निजस-मुग्वं स्थित पुत्र जगाद-त्वं विवेकमत रणैव एतद्विरूपक चर्थ, शास्त्रादपि तव कार्याकार्यविवेको नास्ति, मचक्षु परोक्षे त्व अरे कथ जीविष्यसि मूर्ख ! । एव शौकेन दत्तशिक्षो नारदे बद्धवैरो बभूव । कुधियामीदृशी गतिर्भवति । उपाध्यायस्त्वेकदा गृहादिक यजन् वसु गत्वोवाच-पर्वतस्त माता च द्वावपि म दथियौ तथापि मस्परोक्षे त्वया सर्वथा भद्र | पालनीयाविति । वसुरुवाच हे पूज्यपाद ! भवदनमहादह प्रीतोऽस्मि । एतदनुक्तमेव सिद्ध । अस्मिन् कार्ये ममेद किं वक्तव्य । अत्र सन्देहो न कर्तव्य । यथोचित पर- लोक कर्तुमर्हति भवान् । इति मनोहरकथाम्लानमालया द्विजोत्तम नृप आनर्च । क्षीरकदम्ब उपाध्यायस्तु सम्यक्मयम प्राप्य स यास कृत्वो त्तम स्वर्गलोकमाप । पर्वतस्तु पितृस्थानमध्यास्य विश्वादिशिक्षाणा व्याकर्तुं रति चकार । तस्मिन्नेव नगरे नारदो विद्वज्जनान्वित सूक्ष्म बुद्धिर्विहितस्थानो व्यारयाया यशो बभार । एव तयो काले गच्छति सत्येकदा विद्वत्सभाया "अर्यष्टव्यमिति" वाक्यस्यार्थप्ररूपणे महान् वि वादो बभूव । नारद प्राह-अवुरशक्तिरहितं यवबीज त्रिवर्पस्थ अज मिति कथ्यते तद्विकारेण वहिमुखे देवार्चन मिद्वासो यज्ञ वदन्ति । पर्वत उप यसति स्म-अजशब्देन यशुभेदस्तद्विकारेण हिरण्यरेतसि होत्र यज्ञो विधीयते । इति तयो सुधाप्रध्योरपन्यास ध्रुला ब्राह्मण मुख्या साधव प्राहु प्राणिपधार्मो न भाति । नारदे मसरि- १ द्विरुत्तोऽय इति शन्द क पुस्तके।
१६४ पद्माभूते- खात् पर्वतोऽवन्यामधर्म प्रवर्तयितुं दुरामोपन्यास्यत् । पतितोऽ यमयोग्य सहसंभाषणादिषु, इयुक्त्वा चपेटाभिस्ताडित निर्भ fसतोऽयं पापारमा सोफे घोषित । दुर्बुद्धे फलमयदृशं भवति । सर्वरपि बहिष्णतो मानभंगाहनं जगाम । तत्र ग्रामणवेपण कृता तारोहणासनसोपानपदवीमिय बलीरहता अधचभुपेव मुद्र स्खलता विरलेन सितेन मूर्धन ततं राजतं शिरस्त्राणं समीपपम जादयादिव दधता जराङ्गनासमासनमुखनेर मीलचभुषा चलटिनकरण करिणेव कुपितसपेंगेव उर्घशासिना राजाल्ट भेनेवाऽप्रतो पुरै पसता भमपृष्टेन अपटुजल्पितेन असमेन योग्यदण्डेन रानव त्रिगुणीकृतमुपयीन धारपता विसभूटपमुटसामु निज बदमोधं यक्तमित स्याभिमतारंभसिद्धि गपिणा पर्वत पयन पर्वतो महाकालामुरेण इष्ट सन् तमभिगम्यानम्य चाभिशदनमभ्यधात् । महाका स्तं समास्यास्य सादरं तर सस्पस्विर वाच । समविज्ञातपूर्वखाप्राह व कुतस्या बने पर्यटनं करमादिति । पर्वतस्तु निजवृत्तान्तमादित प्राह । तवा महाकाटश्चितयामास । मम गर्नु सगरं निवेशीकर्तुं समर्थ एए स्यात् । भो पर्यंत ! तब पिता स्थडिल सह विष्णुरूपमन्यु । एती द्वारपि भोमोपाध्यायाशियो शानाम्यासम फारिपाता विपिता मम धर्मभ्राता तमह इष्टुमागत ममागमन स्यतर्ग१जातं । पुत्र पर्वत ! मा सं भैपी तब शारेचसे सहायो भविष्यामि । इति क्षीरपदम्यपुरस्सिागुगता अपर्यणगता पष्टि सहस्रप्रमिता पृथर रची वेदरदरपानासि स्वपमुपाय परतमप्पाच्य शान्तिपुण्यभिचारा मनिया वोक्तमानिनिता पयनापैतामियाग- समा इ-टे पमुपादयिम्पन्ति, पशुसया मप इति । सन भावप्रामृतं। १६५ साकेतपुरमध्यास्य शान्तिकादिफलप्रदं हिंसायागं समारभ्य प्रभावं वयं कुर्महे । इति पर्वतमुक्त्वा वैरिविनाशार्थ निजतीवदैत्यान् सगरराष्ट्रस्य बाधां ज्वरादिभिर्पूयं कुरुप्यमिति संप्रेष्य पर्वतेन युतः साकेत महाकालासुरो गतः। पर्वतो मंत्रगर्भिताशीर्वादेनालोक्य सगरस्य स्वप्रभावं प्रकाशितवान् । हे राजन् ! त्वद्देशप्राप्त विषममशिव अहं मुंमित्रेण यज्ञेन लघु शोषयिष्यामि । "यज्ञार्थ पशवः सृष्टाः स्वयमेव स्वयंभुचा। यज्ञो हि वृद्धथै सर्वेषां तस्माद्यज्ञे घधोऽयधः॥" इति कारणात् स्वर्गमहामुखसाधनं पुण्यमेव भविष्यतीति पापी प्रत्याय्य तं जगाद । हे राजन् ! यागसिद्धयर्थे पशूनां पष्ठिसहस्राणि तोग्यमन्यदव्य च संगृहाण । सगरोऽपि सर्प मेलयित्वा तस्मै समर्पि- तवान् । पर्वतो याग प्रारभ्य पशूनभिमंत्रयामास । महाकालासुरस्तान् चपकृतान् शरीरेण सह स्वगै गतोऽयं स्वर्ग गतोऽयमिति विमानारूढा- •नाकाशे नीयमानान् दर्शयामास । देशस्याशिवोपसगै तदैव निराचकार । तद् दृष्ट्वा मुग्धाः प्राणिनस्तद्वंचनया मोहिताः सन्तः स्वर्गगतये स्पृहयन्ती यागमृति भृशमाचकांक्षुः । सुमित्रयज्ञावसाने जात्यश्वमेक विधिपूर्वक हुतमान् , राजाज्ञया सुलसा च खलो वपट्चकार । प्रियकान्तावियोग- दुःखदावानलमालाभिः प्लष्टकायो राजा नगर प्रविष्टः, शय्योपरि शरीरं निचिक्षेप । प्राणिहिंसन महदिदं वृत्तं किमयं धर्मः किमधर्मः इति संश- यानः स्थितः । अन्यस्मिन्नहनि यतिवरनामानं मुनिमाभिवन्ध विज्ञप्तवान् । भट्टारक ! मयारब्धं कर्म पुण्यं पापं वा सम्यकथय ! यतिवरः प्राह- धर्मशास्त्रबाद्यमिदं कर्म कर्तारं सप्तम नरकं प्रापयेत् । स्वामिन्नस्ति १ यस्मिन् यहे चतु.वष्ठिसहस्राणां पशुना वध क्रियते स मुमित्रो यादम्यते। - पद्मामृते- तत्राभिज्ञान । मुनिराह-राजन् सप्तमे दिने तब मस्तकंऽशनि पति- व्यति इत्यभिज्ञानेन त्वं सप्तमे नरक यास्यसि । तदाकर्य राना मोरया परताय निवेदयामास । पर्वत प्राह-राजन्नसो नग्न क्षपणय किं वेत्ति तथापि यदि तव शका वर्तते तदत्र शातिविधीयते इति यवनस्तस्प मन सन्धार्य शिथिलीचकार । पुन मुमित्रमेर यज्ञ प्रारब्धवान् । सत सप्तमे दिने पापामुरस्य मायया मुलसा आकाशे स्थिता दरले प्राप्ता पूर्वपश्वप्रेसरी यागमृत्युस्टेनपा मया देवगतिर्सम्या । ते प्रमोद तर निद- पयितुमह विमानेनागता ।तर यज्ञेन देवा पितरस प्रीणिता इस्यभाषत । तद्वचनात्प्रत्यक्ष यागमृत्युपल दर, जैनमुनेस्पिमसपं जात । सदनु राजा तीव्रण हिंसानुरागेण सद्धर्मदेपेण संगातदुष्परिणामेन मलोतरपि कस्पितात् तप्रायोग्यसमुत्कृष्टदुष्टसंहासाधनात् नरकासुरापरकर्मस्यो- चितस्थिते अनुभागय पनिकाचितरधने सति भीपणासनिरपेण काटासुरे समस्तके पतिते सति यागय सत्त निसिलप्राणिमि सह सगर सप्तमे नरके पपात । स कालामुरस्त शगेन महामोवस्त दण्ः यितुं तृतीयनरकपर्य ते पृष्टतो जगाम | तमाशा साकेतमागत । विश्व- भूप्रभृतिरिवर्गमारणार्थ नि शुक मुलसासयुक्तं सगर विमानमा म्योमि दर्शयामास । पतप्रसादेन यापुण्येनाई स्वर्ग गत मुरे प्राम- वानिति प्रार्शस । सगरपरोक्षे विधभूमचिशे राजा जाय । महामेरे उधम चकार । महाकालामुरेण रिमानगता दया विरचाकाशे सरेंगी ध्यक्त दाता । ते अचु-भो विश्वमस्या महामेर छन पुपमा स्वप्रसादेन ययं सर्वेऽपि यता स्वर्गमु प्राति च । नरदस्तापसाथ तानेन दुरामना र दुर्भागोऽपिरलो छोरम्प पूर्व दे पायो तालेवा मजमप्रेरी मुस्सद प्रसा।
१६८ पनामृते- वधाद्धर्मों वर्तते नान्यति चेन्न वधस्य दुखप्रत्यपत्ये उमपत्र सारस्यात् फलेनापि सदृशेन भान्य । अथ त्वं एवं यक्षि, पशूनां सटि सर्यमुवा यज्ञार्थं कृता सन्न, अन्यथा विनियोगस्यागम्छमानत्वात् । अयमागमोऽ. तिमुग्धाभिलाप विदुपा गर्हित । यदर्थ सृष्ट ततोऽन्यत्र विनियोगेs र्थकृत् कथ स्यात् । श्रेष्मादिशमनौषधं ततोऽन्यत्र पथमुपयोगि स्यात् । क्रयविक्रयादी हलानोभारवाहनादौ महादोष स्यात् । दुर्वले स्वा वादिनं दृष्ट्वा स मुखमागत्य घूम । यथा शस्त्रादिभि प्राणिपाती पा पेन बध्यते तथा मनादिनापि घातपापेन बध्यते एयाविशपत्यात् । हेहो पर्वत ! पक्षादिलक्षणा सृष्टियंग्यतेऽया क्रियते । प्रियते तई खपुष्पादिकमप्यविद्यमान कथं न क्रियते । अथ विद्यमानेर सृष्टि- र्यज्ञार्थ व्यज्यते तहि पूर्ववचन करणप्रतिपादकमनर्यकं स्यात् प्रदीप- ज्वलनमेव घटादे पूर्वमधफारम्पकं यत । अनावृतस्पैर व्यक्ति क्रियते इति चेत् सृष्टियादो भयदि पूर्व नियता । इति नारदेन कृतमुपन्यासमावर्ण्य सर्वेऽपि मभास्तारास्त तुष्टयु । अथ सम्या ऊचु -. दूयोर्नियादो यमुना चेच्छेचते ताई स एच अभिगम्यतो। इति श्रुत्या साभ्यां नारदपर्वताम्या सर्वापि संसत् स्वस्तिमायतीमुपचाल । तर पर्वत सर्ववृत्तान्त स्वमात्र निरेदयामास । सासन युता यमु ददर्श । पुन यसो । पर्वतोऽपरिणीत । तपोयता गुग्णापि तवायमति । नारदेन सह तप प्रयक्षे वादो भविश्यति, सत्र पयस्य भेगी मरिष्यति सदास यमगृहप्रवेशो भविष्यतीति निधिनु अस्प शरणम पनि यर्तत । यसुरुवाच । मात ! गुरुशुश्रूषयोऽ६ यते । "गुस्यद्गुरपुर गुरफट च पश्यत्" इत्यह नीतिज्ञोऽम्य जप करिष्यामि । त्वं मैपीर्मा । अथान्ये- युस्ते तथाविध सिंहासनमार्द्ध यमु दहशु । तर विश्वप्रभृतयः दुबलवंग। - । भावप्राभृतं । संपप्रच्छुः । हे राजन् ! त्वत्तः पूर्वमपि अहिंसाधर्मरक्षणे तत्परा अत्र चत्वारो राजानो हिमगिरिमहागिरिसमगिरिवमुगिरिनामानी हरिवंशजाः पुरा च सजाताः । तत्रैव वंशे विश्वावसुमहाराजः सजातः । ततश्च भवान् संबभूव । तत्राहिंसाधर्मरक्षित्वं किमुच्यते । स्वमेव सत्यवादीति प्रघोपस्त्रिभुवने वर्तते । वस्तुसंदेहे त्व विषवत् पन्हिवत् तुलावत् वर्तसे। प्रत्ययोत्पादी त्वमेव तेनास्माक प्रभो ! संशयं छिद्धि । नारदः खल्व- हिंसालक्षणं धर्म पक्ष कक्षीचकार । पर्वतस्तु तद्विपरीतमाचिक्षेप । तत्क- धयतु भवानुपध्यायस्योपदेशमित्यभ्यर्पितः । गुरुपल्या पुरा प्रार्थित उपा- ध्यायोपदेशं जानन्नपि राजा महाकालोत्पादितमहामोहो दुःपमकालनि- कटवर्तित्वात् विषयसरक्षणानन्दनामरोद्रध्यानतत्परः पर्वतीक्त तत्वं वर्तते । प्रत्यक्षे वस्तुन्यनुपपनता का। पर्वतोक्तयागेन सस्त्रीका सगर. स्वर्गमवाप । ज्वलन्त प्रदीयं कोऽन्यो दीपो यस्ते प्रकाशयेत् । तेन पर्वतोक्त यज्ञं स्वर्गसाधनं भयं त्यक्त्वा यूय कुरुध्व । इति हिंसानृतानन्दबद्धनारकायुर्मिध्यापापादपवादाचाभीजगाद । तदा अ. ह्माण्ड स्फुटितमिवाकाशे ध्वनिः संजात , आकाश खल्वित्याक्रोश चकोर च । किमाकोशयदाकाश अहो नारद! अहो तापसाः पृथिवी- पतेर्मुखादीदृशमपूर्व घोरं वचन सजातमिति । नद्यः प्रतिकूलजलस्रवः संजाता: सरासि सद्यः शुष्काणि । रविरवर्षणमनारतं बभूव । सूर्याशयो मन्दाः संजाताः । सर्वा दिशो मलीमसा. सम्पद्यन्ते स्म । भयविव्हलाः प्राणिनः कम्प॑ दधुः । तदा भूमिर्द्विधा भक्तिं गता । तस्मिन् महारन्ध्रे वसोः सिंहासन ममन । आकाशे स्थिता देवविद्याधरेशा इत्यूचुः-अहो पसुनरेन्द्र महायुद्ध ! धर्मविधसन मार्ग मा त्यमीरी वादीरित्यघोपयन् । सिंहासने निमझे सति पर्वतो वसुश्च परिम्लानमुखौ बभूवतुः । तो महमोहो. क ३चकारेव. क.
पट्यामृते- ताशौ निरीक्ष्य महाकालस्य किंकरास्तापसाकारं गृहीत्वा समूचु -हे पर्वत ! हे वसौ ! युवा भीति मा कार्टामित्युक्त्वा स्वयमुत्यापित सिंहा- सन दर्शयामासु । तत्र स्थितो वसुरुवाच । अह तलचित् कथं निभेमि पर्वतस्य सत्यवचनं जाननिति ब्राण कण्ठपर्यन्त निमप्रवान् । तद् दृष्ट्या साधनो जगदु । अनेन मिथ्यावादेन भूपतेरियमवस्था सजाता। हे राजन् ! अद्यापि मिथ्यामार्ग त्यजेति साधुभि प्रार्थितोऽपि तथापि मूर्यो यज्ञमेव सन्मार्ग कधितवान । भूम्या कुपितया सर्वाङ्गोऽपि निगौर्ण सप्तमं नरक जगाम । तदा कालासुरो लोकप्रत्ययनिमित्त गगने स्थित सगरवसुरूपद्वय दिव्य दर्शयामास । आवा यागश्रद्धया दिवमनापीय यूय नारदस्त वचन मा मानयतेति प्रोच्य अन्तर्दधौ कालामुर । अथ शोकाचर्ययुक्तेन जनेन वसु स्वर्ग गतो न हि न हि नरक गत इति विसं- वदमानेन सह विश्वभू प्रयाग गरवा राजसूयविधि निदधे । महापुराधि- पप्रमुखा लोकस्य मूढत्य निन्दन्त परमब्रह्मनिर्दिष्टमार्गे मनाक् स्थिता स्तस्थु । नारदेन धर्ममर्यादा रक्षितेति त प्रशस्य गिरितटनाम्नी पुर तस्य ददु । तापसास्तु दयाधर्मनाशस्य कारणं कलिकाल कलयन्तो यथास्थिति विधुराशया जग्मु । अथान्यार्नारदो दिनकरदेव विद्याधर निजमभीष्ट प्रत्यु- वाच-पर्वतस्य विरुद्धाचरण लया निवार्यतामिति । सोऽपि तथा करिष्यामीति नागात गत्वा निजविद्यया धारपन्नगानाहूय तत्प्रपव निवेदयामास धारप- नगास्तु सप्रामे कालामुरं भक्त्वा यागविन चकु । विश्वभूपर्वतौ तद् दृष्ट्वा शरणावेपणा यामदासाता तापमहाकालमप्रत स्थितं ददशतु । तदने त वृत्तान्त निदयाश्चतु । कालामुर उवाच-अस्मद्वेपिणो नागास्तै- स्यमुपद्रवो विहित । विद्यानुपवादोक्ता नागविद्यास्तासा विजभण जिन बिम्बानामुपरि न भरति तत सुरूपान् जिनाकारान् चतुर्पु दिक्षु निवेश्य १ अवापिब । १ आदिब्रह्म ।
भावप्राभृतं । १७१ पूजयित्वा च यज्ञविपि युयों कुरुतमिति । तमुपायं श्रुत्वा तौ तथा चक्रतुः। पुनर्षियाधराधिपो यागविघ्नं कर्तुमागत: 1 जिनबिम्बानि दृष्ट्वा नारदाय कथयति स्म । यन्मे पिया अन न झामन्तीति स्वस्थानं जगाम । तद- नन्तरं यज्ञो निषितो बभूव । तदनु विश्वभूः पर्वतश्च सप्तमं नरक गती। दीर्घकालं महादुःखमनुबभूवतुः। अथ महाकालोऽभिप्रेत साधयित्वा निजरूपं धृत्वा लोकान् प्रत्याह-पोदनापुरे पूर्पभवेऽहै मधुपिंगलो नाम राजा आसे । सुलसानिमित्तं मया महत्पापमुपार्जितं । अहिंसालक्षणो धर्मो जिनेन्द्रः कथितः स भवद्भिः कर्तव्यो धर्मिष्ठेरिति संप्रोच्य अन्त- दधौ । पुनर्दयाधीः सन् सुदुश्चेष्टा पापस्य प्रायश्चित्त स्वयं चकार । किं प्रायश्चित्तं ? सम्मोहात्कृतस्य पापस्य निवृत्तिरेव प्रायश्चित्त तोमसौ चकार। अथ दिव्यबोधैर्मुनिभिरित्युक्त-विश्वभूपमुखा हिंसाप्रवर्तका नारका बभूवुः । तच्छुत्या पर्वतोद्दिष्टं दुमार्ग केचित् पापभीरयो नाशिश्रियुः । केचित्त दीर्घसंसारिणस्तस्मिन्नेव दुर्मार्गे स्थिता इति । इति श्रीभारप्राइते मधुपिंगलव्यलिंगिन कथा समाप्ता । अण्णं च वसिमुणी पत्तो दुक्सं नियाणदोसेण । सो णस्थि वासठाणो जत्थ न दुरुङल्लिओजी ।। ४६॥ अन्यच वशिष्टमुनि. प्राप्तः दुःख निदानदोषेण । तमास्ति वासस्थान यन न भ्रान्तो जीव ।। अण्णं च वसिमुणी अन्य मावरहितद्रव्यमुनिदृष्टान्तकथानक वर्तते । तल्कि वसिष्टमुनिः । पत्तो दुक्खं नियाणदोसेण प्राप्तो दुर्ख निदानदोपेण शत्रुवधप्रार्थननिदानदोपण नवमेन विष्णुना यः कंसनामा नृपो मारितः स वसिष्टमुनिचरी मल्लयुद्धे मरणदुःखं प्रातः । मो णस्थि १२ ख । २जीवो ग.घ.।
पट्माभृते- पासठाणो तन्नास्ति वासस्थान जममरणस्थान। जत्य न हुरुङल्लिओ जीव है जीन ! हे आमन् ! यत्र त्व न जातो नोत्पन्नथ दुरुदुरि ओ भ्रा त इति । वसिष्टस्य कथा यथा-गगागधवत्योनद्यो सगमे जठर कौशिक नाम तापसाना पही बभूव । तत्र पसिष्टो नायक पचाग्नि व्रत चरन्नास्ते स्म । तत्र गुणभद्रवीरभद्नामचारणमुनिवरौ जगदतु मज्ञानकृतमिद तप इति । त छत्वा वसिष्ट कुधी सक्रोधै तयो पुरत स्थित्वा पप्रच्छ-कस्मा मेऽज्ञानतेति । तत्र गुणभद्रो भगवानाह-यत सत्पुरुषा हि हितभाषिणी भवन्ति | जटाकलापसजातयूकालिक्षाभिघ दृनं सतप्त स्नानेन जटामध्यरनमृतमीनकान् दह्यमानकाष्ठमध्यस्थित- कीटकान् प्रदश्य इद तवाज्ञानमिति प्राबोधयत् । काललब्धिमाश्रित्य स वसिष्ट सुधीभूत्वा गुणभद्रचरणान्ते तपो निग्रन्थ गृहीत्वा सोपवास मातापनयोग जग्राह । तत्तपोमाहात्म्यात् सप्तम्यन्तरदेवता अग्रत स्थित्वा अति स्म-मुने । आदेश देहीति । मुनिराह-इदानी मम प्रयोजन नास्ति गच्छत यूय । जमान्तरे मच्छिाष्टिं करिष्यथ । एवं तप कुर्वन् वसिष्ट क्रमेण मधुरापुरीमाजगाम । तत्र मासोपासी सनाताप- नयोगे स्थितनान् । स उग्रसेनेन राज्ञा दृष्ट । भक्तिरशेन पुर्या धापणा कारयामास-अय मुनिर्मगृहे एव भिक्षा गृहातु नायति । सोऽपि पारणादिने मथुरा जगाम । तत्राग्निमुस्थित दृष्ट्वा व्याधुव्य बनमाजगाम । पुनर्मासोपवास जग्राह । पुन पारणार्थ मासोपवासावसाने पुर गत । तत्र यागहस्तिन क्षोभ दृष्ट्वा वनमागत । पुनर्मासोपवासपारणाया नगर गत । तदा जरास धपत्रक दृष्ट्वा राजनि व्यप्रचित्ते सति पुनर्वलित । तदा क्षीणशरीर वसिष्टमुनि दृष्ट्वा लोको जगाद-अनेन राज्ञा मुनि- आरित स्वय भिक्षा न ददाति परान् वारयतीति न ज्ञायते कोभिप्रायो नृपस्येति । तच्छ्रुत्वा घसिटो मुनि पापोदयानिदान चकार 1 मम दुष्प- भावप्राभृतं । १७३ रतपःफलादस्य राज्ञः पुत्रो भूत्या अमुं निगृह्य अस्य राज्यं गृह्यास- महमित्यनेन दुष्परिणामेन मृत्वा पद्मावतीगर्भे पुत्रतया स्थित । सा गर्भिकक्रौर्येण दोहदं चकार-राज्ञो हृदयमासमभीति । तदप्राप्नु- वन्ती दुर्बला बभूव । तज्ज्ञात्या मंत्रिणः प्रयोगेण विहितं दोहद पूरयन्ति स्म । विद्वांसः किन कुर्युः । तदा सा पूर्णमनोरथा सुतपातक- मसूत |मातापितरौ दष्टोष्टं सभ्रूभंग बद्धमुष्टिं तं दृष्ट्वान पोपणे योग्योऽय- मिति विचिन्त्य तद्विसर्जनोपार्य चक्रतुः । कंसमयीं मंजूषामानीय सवृत्त कंस तस्यां निधाय यमुनाप्रवाहे मुमुचतुः। कोशाम्बीपुरे मन्दोदरी नाम कल्पपाली, तया प्रवाहे मजूपामध्ये स दृष्टः पुत्रतया पालितश्च। तप- स्विना हीनान्यपि पुण्यानि किं न कुर्युः। कैश्चिदिनभनादिसह वयः प्राप । आकोडमानो निष्कारण सकलबालकान् चपेटया मुष्टिना दण्डा- दिना च प्रहारं ददाति वधपापं बध्नाति । तदुराचारोपलंमान् असह- माना मन्दोदरी त तत्याज पुत्रं । सोऽपि शौर्यपुर गत्वा वसुदेवपदाति- भूत्वा तत्सेवा करोति यावत् । अत्रान्तरे जरासन्धो राजा त्रिखण्डमेदिनी- पतिरपि कार्यशेषवान् ववृते । मुरम्पदेशे पोदनापुराधीश सिंहरथ युद्धे बघा य आनयति तस्मै देशाध मत्सुता कालिंदसेनासं जातां जायशो- नामान ददामीति पत्रमाला राज्ञा समूहान् प्रति प्रेषयामास । तत्पत्र वसुदेवो गृहीत्वा प्रयोचितवान् । निजाइनान् सिंहमूत्रेण भावयित्वा तै. यि रथमारुह्य संग्रामे तं जित्वा कंसेन निजभृत्येन बन्धयित्वा सिंहरथं राज्ञ अर्पयामास । जरासन्धस्तु तुष्ट्वा निजमुर्ता देशाधं च ददौ । पमु- देवस्तु ता कन्यां दुष्टलक्षणां दृष्ट्रोवाच-देव ! नाह सिंहस्थ वद्धवान्, कर्मेदं क.सः कृतवान् , भवत्प्रेपणकारिणेऽस्मै कन्या प्रदीयता । तन्छु जरासन्धः कमस्य कुल विज्ञातुं मन्दोदरीं प्रति दूतं प्रनिधाय । तं दृष्ट्वा जीवयश.स.। २ प्रतापवान् क.. । वा - पनामृत- चासठाणो तन्नास्ति वासस्थानं जन्ममरणस्थान। जत्य न हुरुहुल्लिओ जीव है जीव ! हे आत्मन् ! यत्र त्यं न जातो नोत्पनश्च दुरुदुद्धि- मो-धान्त इति । वसिष्टस्य कथा यथा-गंगागन्धवत्योद्योः संगमे जटर- कौशिक नाम तापसानां पली बभूव । तत्र यसिष्टो नायकः पंचाग्नि- व्रतं चरनास्ते स्म । तत्र गुणभद्रवीरभदनामचारणमुनिवरौ जगदतुः- मज्ञान कृतमिदं तप इति । तात्या वसिष्टः कुधीः सको तयोः पुरतः स्थित्वा पप्रच्छ-करमान्मेऽज्ञानतेति । तत्र गुणभद्रो भगवानाह-यतः सत्पुरुपा हि हितमापिणो भवन्ति । जटाकलापसंजातयूफालिक्षामिघ- हनं सततं स्लानेन जटामध्यलममृतमीनकान् दह्यमानकाप्टमध्यस्थित- कीटकान् प्रदश्य इदं तवाज्ञानमिति प्राबोधयत् । कालसन्धिमाश्रित्य स पसिष्टः मुधीभूत्वा गुणमद्रचरणान्ते तपो निमन्ध गृहीत्वा सोपास- मातापनयोग जप्राह । तत्तपोमाहात्म्यात् सप्तन्यन्तरदेयता अप्रतः स्थित्वा ब्रुवन्ति स्म-मुने ! आदेश देहीति । मुनिराह-इदानी मम प्रयोजन नास्ति गच्छत यूर्य । जन्मान्तरे मच्छिटिं करिष्यथ । एवं तपः कुर्वन् वसिष्टः क्रमेण मथुरापुरीमाजगाम । तत्र मासोपवासी सन्नानाप- नयोगे स्थितवान् । स उग्रसेनेन राज्ञा दृष्टः । भक्तियशेन पुयौं घोषणा कारपामास-अयं मुनिर्मट्टहे एव भिक्षां गृहात नान्योति । सोऽपि पारणादिने मधुरां जगाम । तत्रानिमुस्थितं दृष्ट्वा न्याघुव्य यनमाजगाम । पुनर्मासोपास जप्राह । पुनः पारणार्थ मामोपवासावसाने पुरं गतः । तत्र यागहस्तिनः क्षोभं दृष्ट्वा वनमागतः । पुनर्मासोपवासपारणायां नगर गतः । तदा जरासन्धपत्रक दृष्ट्वा राजनि व्यप्रचित्ते सति पुनर्वलितः। तदा क्षीणशरीर पसिष्टमुनि दृष्ट्वा सोको जगाद-अनेन राज्ञा मुनि- मारितः स्वयं भिक्षा न ददाति परान् पारयताति न ज्ञायते कोभिप्रायो नृपस्पति तत्वा यसिष्टो मुनिः पापोदयानिदान चकार । मम दुष्का- 1 भावप्राभूत । १७३ रतप फलादस्य राज्ञ पुत्रो भूत्वा अk निगृह्य अस्य राज्ये गृह्यास- महमित्यनेन दुष्परिणामेन मृत्वा पळापतीगर्भे पुनतया स्थित । सा गर्भार्भकक्रौर्येण दोहदै चकार राज्ञो हृदयमासमनौति । तदप्राप्नु वन्सी दुर्बला बभूव । तज्ज्ञात्वा मत्रिण प्रयोगेण विहित दोहद पूरयति स्म । विद्वास किन कुर्यु । तदा सा पूर्णमनोरथा सुतपातक मसूत । मातापितरौ दप्टोष्ठ सभ्रूभंग बद्धमुर्भित दृष्ट्वा न पोपणे योग्योऽय- मिति विचिन्त्य तद्विसर्जनोपाय चक्रतु । कसमयीं मजूपामानीय सवृत्तक कस तस्या निधाय यमुनाप्रमाहे मुमुचतु । कोशाम्बीपुरे मन्दोदरी नाम कल्पपाली, तया प्रवाहे मजूपामध्ये स दृष्ट पुत्रतया पालितश्च। तप स्पिना हीनान्यपि पुण्यानि किं न कुर्यु । कैश्चिदिनभनादिसह वय प्राप । आक्रोडमानो निष्कारण सकलबालकान् चपेटया मुष्टिना दण्डा- दिना च प्रहार ददाति षधपाप बघ्नाति । तदुराचारोपलमान् असह- माना मन्दोदरी त सत्पाज पुत्र । सोऽपि शोर्यपुर गत्वा वसुदवपदाति भूत्या त सवा करोति यावत् । अत्रान्तरे जरासन्धो राजा निखण्डमेदिनी- पतिरपि कार्यशेपवान् ववृत । मुरम्यदेशे पोदनापुराधीश सिंहस्थ युद्धे बधा य आनयति तस्मै देशाध मत्सुता कालिंदसेनासजाता जाद्यशो- नामान ददामीति पत्रमाला राज्ञा समूहान् प्रति प्रेषयामास । तत्पत्र वसुदेवो गृहीत्या प्रवाचितवान् । निजावान सिंहमूत्रेण भारयित्वा तै- बर्बाह्य रथमारुह्य सग्रामै त जिया कसैन निजभृत्येन वयित्वा सिंहस्थ राज्ञ अर्पयामास । जरासन्धस्तु तुष्ट्वा निजमुता देशाधं च ददौ। घसु- देवस्तु ता क या दुष्टलक्षणा दृष्ट्रोपाच-देय ! नाह सिंहस्थ पवान्, कर्मेद यस कृतवान् , भवत्प्रेषणकारिणेऽस्मै कन्या प्रदीयता । तवा जरासघ कमस्य कुल विज्ञानु मन्दोदरी प्रति दूत प्रजियाय । त दृष्ट्वा १जीवयास १२ प्रतापवान् क ।
anwA तच्छुत्या मजूपाया १७४ पट्नाभूते- मदोदरी मम पुत्र किं तत्रापि कृतापराध इति भीत्वा समज्पा सत्र जगाम । जरासन्धाने मजूषा निक्षिप्य इयमस्य मातेयुवाच । देव ! कसैमजूपामधिष्ठायाऽर्भक आगतो यमुनाजले मया लन्ध प्रतिपाल्य वर्धितश्च तत एर नाम्ना कंस कृत । अय समावेन शौर्यदर्पष्ट शिशुत्वेऽपि निर्गल पश्चादुपालेभशतैोकाना मया वति । पर गृहीत्वा उच्चैर्वाचयामास । उपसेन- 'पद्मावत्यो सुत विज्ञाय मुतामर्धराज्यं च तस्मै विततार । कसोऽपि जातमात्रोऽह नद्या प्रवाहित इति क्रोधेन मथुरापुर स्वयमादाय मातर पित व घस्थी कृत्वा गोपुरे धृतवान् । विचारविकला पापीयांस कुपिता कि किं न कुर्युरिति । अथ वमुदेवं महीपति पुरमानीय निना- नुजा देवकी दत्वा तत्र तं स्थापितवान् महाविभूतिम तं त चकार । एवं सुखेन कसस्य काले गच्छति सत्येकदाऽतिमुक्तको मुनिभिक्षार्थ राजमन्दिर प्रविष्ट । त दृष्ट्वा जीपयशा हर्षमाणा तं हास्येनोच-- हे मुने ! देवकी तर लधुभगिनी पुष्पजानन्दवस्त्रं तरैतदर्शयति वस्त्रेण स्वचेष्टित प्रकाशयतीति । तच्छुत्वा मुनि कोप प्रत्या वाग्गुमि भित्या जगाद-मुग्धे । किं हृष्यसि देवक्या यो भविष्यति पुन स तय भर्तारमपश्यं हनिष्यति । तच्छुत्वा जीपयशा कोपेन तस्त्रं द्विधा चन। मुनिराह-मुग्धे ! न केवल तर पतिमेव हनिष्ययनेन पितरमपि तय हनिष्यति। इयुक्त सा कुपिनों तद्वस्त्रं पादाभ्याममर्दयत् । तदा मुनि- जंगाद-मुग्धे ! अनेन सागरामा पृथ्वी नारीमित्र पालयिष्यति । जीवधशास्तगुत्वा गरेकार्त भर्ने निवेदयामास । सो भीगा हान्ये नापि प्रोक्त मुने सपल भविष्यतीति यमुदेवं रानानं गत्या सनेहमिद- बमस्य तृणविशेषस्य मद्या तो। २ तव पश्विन । ३ कुपिटास।
भावप्रामृत । मयाचत देवकी मम गृहात प्रसूति कुर्या मतादिति। वसुदेवत्तेनोपरुद्धः सैस्तथास्त्विति जगाद । अवश्यमानिकार्येषु मुनिरपि मुह्यति । अथैकदा स मुनिर्देवकीगेह भिक्षा प्ररिवेश। वमुदेको देवकी च त प्रतिगृह्य भोजयिवों आरयोदक्षिा भविष्यतिति छाना जगदतु 1 मुनिस्त- दिङ्गितं ज्ञात्वोगाव--युवयो सप्त पुत्रा भविष्यत्ति तेषु पट् पुत्रा परस्थाने वृद्धिमित्ला मोक्ष यास्यन्ति सप्तमस्तु पुत्रो निजच्छत्रच्छायया पृथ्वी निर्याप्य चक्रवर्ती दीर्घकाल पालयिष्यति । देवकी ततस्त्रिर्यमान् लेभे । तान् ज्ञानवान् शकश्वरमाङ्गान् झात्वा नैगमर्प देव प्रोवाच- एतास्त्वं रक्ष । स च भदिलपुर अलकाया वणिक्पच्या पुरो निक्षिप्य तत्पुतास्तदा तदा भूतान् गृहीत्वा मृतान् यमान् देवक्यने निचिक्षेप । कसस्तान् मृतान् यमान् दृष्ट्वा किममी मे मृता करिष्यतीति मुने क्यिमसत्यममूदिति प्राच्य साशंक शिलायामास्फालयामास । पश्चादे- चकी सप्तम पुत्र सप्तम एव मासे जनितवती निजगृहे एव महाशुक्रा- रुच्युत निनीमकपर मुनिवरं । वसुदेवो बलभद्रश्च नीतिम तौ, देवकी ज्ञापयि वा गृहीतवन्तौ, बलेन बाल उद्धृत , पित्रा धृत छनो राजावेब निष्कासित । तत्पुण्येन पुरदेवता वृपभमपेणाप्रेऽप्रे निजशृङ्गमणिदी- पिकाकृताद्योता मार्ग दर्शयामास | तद्वालपादस्पर्शाद्गोपुरमुद्राटितौर सद्यो जात । तर बधनस्थित उग्रसेन उवाच कवाटोद्धाटन क करोति । बलदेव उवाच-यस्वा वधामोचयिष्यतीति तूष्णीं तिष्टेति । उग्रसेन एवं भरित्याशीमिरभिनय स्थित । तौ तु यमुनामितौ। सा भविष्य- चक्रिप्रभावन द्विधा भूत्वा मार्ग ददौ । सवर्ण को या बधुता सार्दो न कुर्यात् । तौ विस्मिती यमुना व्यतिक्रम्य बालिकामुन्यागच्छ त न द- गोपतिं ददृशतु । त दृष्ट्वा तावूचतु –भद्र ! त्वमसहायो रामानन कि- १ पूर्वदत्तवरदानात् । ३ अस्मादरे उबाचेति पद । ३ त्रियमल ख.। ।
। १७६ पट्मामृते- मित्यागत । स प्रणम्यौपाच-मम प्रिया युष्मप्रचारिका पुत्रार्धे गन्या- दिमि पूजयित्वा देवता याचितपती-देवि पुत्र मे देहीति । सोच रात्री पुत्री टेभे । सोपाचेति स्त्र्यपत्य ताभ्य एव देहि । तस्या समोसया यचनादिदं स्यपत्य देवताभ्यो दातु मम प्रयासोऽय स्वामिन्निति जगाद। तद्वचन तो श्रुत्वाऽस्म का सिद्धमिति प्रहृष्य तमूचतु -बमस्माकमभी- एस्तेन तय गुह्य कथ्यते, अय बारश्चक्री भविष्यति त्वं पारयति । इसे तु बालिकाऽस्मभ्यं दीयतामिति । ता गृहीत्या गूढतया पुरं गतौ । नन्द- गोपस्तु गृह गत्वा प्रियां प्राह-प्रिये ! देवता तुष्टा महापुण्यं पुत्र तुम्य ददु प्रसन्ना इति प्रोय्य तं पुत्र तस्यै समर्पयामाम । कैसस्तु देवकी पुत्री प्रसूनस्तीति ध्रुवा तत्र गत्वा तो मुतो भन्मनासा चकार । माना तु सा बालिका भूमिगेहे बर्षिता प्रौढयौरना नामादि. कृति विलोक्य आर्थिकापार्वे मुव्रता दीक्षा जप्राह शानौते । विनय. पर्वते स्थानयोग गृहीत्ला स्थिता । यनसिपु देवतैति पूनपिन्या गतेषु रात्री व्याप्रेण भक्षिता स्वर्गलोक जगाम | अथापरस्मिन् दिने म्याधे. हस्ताङ्गुलित्रय दृष्टे । क्षीरखुकुमादिमि पूजितं देशवासिमिरिमूटामा मिरसाचार्या विन्ध्यवासिनी देवतति प्रमाणिता । अथ तस्मिन् पुरे महो- स्पाता प्रसूता । तान् दृष्ट्वा सेन वरण पृष्ट किमपा फलमिति ।स माह-तर शनु समुत्पन्नो महान् इति । नैमितिकाचन ध्रुमारामा चिन्तारस्थो बभूव । तदा योता देवता समागता कि कर्तव्यमिति पप्रग्छु । स आह-मम शत्रु पापिष्ट पचिदुपनमन्निध्य मारयत यूर्य । तच्या सप्तापि गतास्तथास्थिति । तर पूतना विमंगात् सात्या यामु- देवं मारयितुं यशोदात मातृार गृहीत्या विषम्तनपानोपाया दुश मारण चिोदीकिता । तद्वाटपाउनायुता काचिदन्या देवता स्तनदा- यशोदा। ।
भावप्रामृत । १७७ नावसरे बलवत्पीडा चकार । तपीडा सोढुमसमर्था मृताहमियामोर्श कवा पलायिता (१)। द्वितीया देवता शकाकार गृहीवा शिशूपरि धावन्ती तेन पादाभ्या ताडिता नष्टा (२)। अपरेधुर्न दगोपी कव्यामुदूखल बद्घा जलमानेतु गता तथापि शिशुर वगमत् । तदा तं बाल मारयितुं दू देवते अजुनतरूभूवा तदुपरि पतन्यौ मूलादु मूलयामास (३-४)। विष्णो- चक्रमणलायामेका तालतरुभूना त मस्तके फलानि दृपदोऽपि निष्ठुराणि पातयितुमुद्यता (५)। अपरा रासभी भूगा तं दष्टुमागता । ता रासभी चरणे वा तयैन ते वृक्षमताडयत् (६)। अन्यस्मिन् दिनेऽन्या दवता तुरगमो भूत्वा त मारयितुमागता । तस्य घदनं मुएिना जघान (७)। एव सौर देवता कसमागयोचु -ययं तव शत्रुमाह तु न समर्था स्म इति । विद्युत इस पिलीना । देवतानामपि शक्तय पुण्यवजने न समर्था शवपनऽरिशस्त्राणीव । अन्यस्मिन् दिनेऽरिष्टनामा देवस्त पराक्रम दृष्टुं तपुरमागत कृष्णपाकार , तस्य प्रीपाभजने स उद्यम चकारत माता यशोदापि तं तर्जयति स्म-पुत्र! एवमादित एवाफलचेष्टितात् क्लशातर सम्पादकाद्विरमेति पुन पुनर्निवारितोऽपि मदो कटस्तचेष्टित चकार । महौजसोऽपाने निवारयितु न शक्यन्ते । तपौरुष ख्यात लोकरचनादा कर्ण्य देवकीनमुदेयौ तद्दर्शन उ कण्ठितौ । मोमुखीनामोपवासमिपेण सीरिणां सह महत्या विभूया गोदावन गाष्ठं परिवारण सह गतौ । तस्मिन्नेव दर्पवदृपभेद्रप्रीवाभंगारसरे कृष्णं महाबलं समालम्ब्य स्थित दृष्ट्वा ग धमाल्यादिम मानानतरं भूपयामासतु । तदन तरं प्रदक्षिण कुत्या देवक्या शातकुमकुभसदृशयो स्तनयो क्षीरं सुस्राव कृष्णस्याभिषेक दुर्यया इव । बलस्तद्वीक्ष्य मनभेदभयादुपासप १ महौजसौपदानि स । २ शुकर्मणि इयर्थः । ३ बलभदेण । ४ महावि भूत्या ख । ५शुनाव ख । ६ बलदेव । । पद १२ M षट्प्रामृते- रिश्रान्ता माता मर्छितेति जल्पन सुधीः कुंभपूर्णपयोमिस्ता समन्ततोऽ- म्युक्षितवान् । ततो गोष्ठपक्षादीनामपि तद्योग्य पूजन कृत्या गोपाट- कुमारैः सह कृष्णं भोजयित्वा स्पर्य च भुक्त्या माता पिता व विकु. र्याणी पुरं प्रविविशतुः । कदाचिन्महावर्षपाते जाते गोवर्धनाख्य पर्वत- मुदृत्य हरिर्गवामावरण चकार । तेन ज्योत्स्नेय तत्कीतिरखिलं जगत् म्यानोति स्म शत्रुमुखकमलसंकोचकारिणी । तन्नगरस्थापनाहेतुभूतजि. नालयसमीपे पूर्वदिशि देवतागृहे हरिपुण्यातिरेकात् नागशय्या धनुः खिश्च त्रीणि रत्नानि देवतारक्षितानि नारायणस्प भविष्यलक्ष्मीसूच- कानि समुत्पन्नानि । तानि दृष्ट्वा कंसो परणं समयः पप्रच्छ-एतेषा प्रादुर्भूते: किं फलमिति । स प्राह--हे राजन् ! एतानि प्रीणि रत्नानि शास्त्रोक्तविधिना यः साधयति स चक्रवर्ती भविष्यतीति । सहत्या केस: स्वयं तत्रितयं साधयितुमिच्छुरपि साधयितुमशक्तो मनाक् सिनः साथ. नाद्विरराम । उक्तवाच यो नागशप्यामारौकेन हस्तेन शर्स पूरपति विसी- येन फरेण धनुरारोपयति युगपरकार्यप्रर्य करोति तस्मै निमपुत्री दास्या- मीति स्वशत्रु परिज्ञातुं साशंकः पुरे घोषणामत्रीकरत् । तद्वार्ती शुन्या सर्वे रानान मागताः । राजगृहात् सस्याटकः सानुनामा भानुना. मानं स्यपुर्व भानुसाशमादायानगाम । निर्श चिकीर्गोदावनसाये महासर्पनियाससरोवरतटे निवास फर्नुमना गोपालकुमारम्यः शुन्या का पिनाऽस्प सरसो जलमानत परैर्न शक्यमिति तमाद्रय यथारपान स्कन्धाधार निवेशयामास ।कृष्ण उपाच-राजन् ! स्वपाकुन गम्यते इति। स्वर्भानुमथुरागमनप्रपोगर्न सस्पोक्तवान् । पण त्याव-नन् । पत्त. रकर्म किमस्मदिधैरपि का भवेत् । तष्टुत्या स्पर्मानुभिन्तयामाग • यमागे। प्रीपरिप..
भावप्रामृतं । १७९ असौ शिशुः पुण्याधिकः केवलो न वर्तते इति । तस्य कर्मणः शक्त- श्वेदागच्छेति निजपुत्रमिव तं गृहीत्वा सुभान्वपरनामा स्वर्भानुमथुरा जगाम । यथाहै कंसं ददर्श । तत्कर्मकरणे बहून् भग्नमानान् दृष्ट्वा कृष्णः स्वर्भानुसुतं भानुं समीपगं कृत्वा कर्मत्रय समकालं चकार । ततः सु- भानुना दिष्टयादिष्टः कृष्णो गोष्ठं जगाम । कैश्चित्पुरुपैः कंसो भणितः "सत्कर्म भानुना कृतं"। कैश्चित्तदक्षकैवतं "न भानुना तत्कर्म कृतं अन्येन कुमारणेति " तच्छुत्वा कैसः प्राह-सोऽन्योऽन्विष्यानीपता तस्मै कन्या प्रदीयते इति । स कस्य, किं कुलं, कस्मिन्निति । तावन्न- न्दगोपेन सम्यग्विज्ञातं अनेन म पुत्रण तत्कर्म सम्यकृतमिति भीत्या गोमण्डलं नीत्वा पलायांवमूवे । शिलास्तंभमुद्धत तत्र सर्वे जनाः प्रा- तास्ते नाशक्नुवन् । कृष्णेन केवलेनैव समुद्धृतः । तत्साहसात् सर्वे जना विस्मित्य जन्हपुः । परायोशुकाभरणादिदानेन पूजयामासुः । नन्दगोपस्तु ममास्य पुत्रप्रभावेन कुतोऽपि भयं नास्तीति प्राक्तनमेव स्थान गोकुलं निनाय । अन्येपकैस्तु नन्दगोपसुतेनैतत्कर्म कृतमिति राशे निवेद्यते स्म । तथापि तदनिश्चये सहस्रदल कमलमहीशर- क्षितं प्रेष्यतामिति राज्ञा नन्दगोप आज्ञापितः शत्रोर्जिज्ञाशया । तच्छुत्वा नन्दगोपः शोकादाकुलो बभूव "राजानः किल प्रजानां पालका भवन्ति कष्टमेतत् तेऽद्य मारकाः संजाता इति।" निविद्य पुत्र वं याहि राजधिष्ठिरीशी वर्तते इति । त्वयैवोपसर्परक्षितानि कमलानि राज्ञः प्रदातव्यानीति जगाद । कृष्णः प्राह-कोऽपि पदार्थः किं दुष्करो मम घर्तते इत्यपूर्वतजा नागसरो जगाम । त्वरितं तत्र निःशंक प्रविवेश च । त ज्ञात्वा कोपेन वेपमानो लेलिहानः स्वनिःश्वाससमुद्भूतञ्चल- १ ख. पुस्तके नारत्ययं पाठः । २ भाज्ञा ।
पटनाभृते- उज्यालाकणान् किरन् फणारत्नप्रभाभासिफणाप्रकटाटोपभयानक प्रचल- दरसनायुगलो विस्फुरद्वीक्षणाऽयुप्रीक्षण प्रत्युत्थाय कृतान्ताकारस्त निग- रितुमुद्यत । कृष्णस्तु मम वसनमिदमस्य ताडने शुद्धशिला भवनिति जलाई पीतवस्त्रं मुक्त्वा फटाया तं निष्ठुर ताडयामास । तस्माद्वस्त्रपाता- द्वजपातादपि दुर्धरात् पूर्वपुण्योदयाच्च भीत कालियाहि फणी द्रोऽदृश्यता जगाम | हरियथेष्टं कमलानि गृहीत्वा शत्रो समीप प्रापयामास । तानि दृष्ट्वा कसो निजशत्रु दृष्टवानिव नन्दगोपसमीपे मम शत्रुर्वर्तते हात निश्चिकाय । एकदा नन्दगोपालमादिष्टवान् मल्लयुद्धमीक्षितु निज- मल्लै सहाऽऽगच्छेरिति । स च तत्स देश श्रुत्वा कृष्णादिभिर्मले सह प्रविवेश । तर मत्तगज चीतरधन कृतrताकार मन्दगधाकृष्टरु- वहमरसेवित नियमच्युतराजकुमारवत् निरकुशं दन्तमुशलाघातनिर्मिन सुधामन्दिरमाधाय त विलोक्य कश्चित् समुख प्रढौक्य दतमेकमुत्पाय तेनैव त ताडयामास । गजोऽपि भीतो दूर जगाम । तद्दृष्ट्वा हरिभृश तुष्ट सन्नुवाच-अनेन निमित्तेन कुटुम्बप्रकटीकृतो जयोऽस्माक भविष्यतीति गोपान समुत्साह्य कसससद विवेश । वसुदेवोऽपि राजा कसाभिप्राय विदित्वा निजसेना सन्नापैकत्र स्थित | वलभद्रोऽपि कृष्णेन सह रंग प्रविष्ट इव दोर्दण्डास्फालनध्वनि कृत्या समन्तात् परिभ्रमन् कसविनाशेऽद्य तब समय इति समारयाय निर्जगाम । तदा कैसादेशेन विष्णुरिया गोपकुमारा प्रदर्पवन्त भुजानास्फाल्य गृहीतमल्लपरिच्छदा कर्णानद- कारिवादिनचटुलध्वनिभिरेकत्रीभूत्वा चरणोक्षेपपिनिक्षपा प्रोन्नतमुज- द्वयोकटा पर्यायनर्तितप्रेक्षणीयभूभगभयानकशब्दानिवर्तनशतावर्तनसं- भ्रमणवलानप्लवनसमवस्थानरपरैध स्फुटै करणै रगसमीपमलंकृत्य नयन- १रसका क २नेत्र। ३ अवलोकनीय । ४ दूयोरमेश ख ।
भावप्राभृतं । १८१ मनोहरास्तस्थिवांसः। कसमलाश्च प्रौद्धृत्ताश्चाणूरप्रमुखा विक्रमैकरसारंगा- भ्यर्ण समाक्रम्य स्थितवन्तः । विष्णुश्च रंगस्य मध्ये समुदात्तमनः प्रसरो वीर उरुमल्लामणीः प्रतिमलुयुद्धविजयं प्रागेन प्राप्त इव दीप्ततेजा देवोऽ- वतीर्णोऽधुना महत्व प्राप्तो भास्वानिर अहं जेष्यामीति प्रवृद्धपराक्रमै- करसः स्वय संभावयन् निविडपरिगृहीतपरिधान प्रबद्धकोशः स्वभावेन मसृणाङ्गो पिकूर्चश्चित्तवृनिवित्तोऽप्रतिमलैर्निरन्तराभ्यस्तनियुद्धत्वाद- विकललब्धजयलाभः सरपि संभारितोत्साह स्थिरतरपादनिवेशो वन- सारास्थिबन्धो भुजार्गलापरविबाधी मुटिसमायिमध्यप्रदेशः कृतानेककर- णसमूहो लघुसंचरणप्रवीणोऽतिकठिन विस्तीर्णवक्ष स्थलो बृहन्नीलपर्वतो- तुङ्गो दर्पप्रवृद्धिविगुणितनिजमूर्तिलितवलितनेत्रत्वा(निरीक्ष्यसामुख्यो- तिशयेनाशनिपातवदुनो नन्दनन्दनः स्थित सन् यमस्याप्युच्चैर्भयमसहनी- यमुत्पादयन् वरमखिलं शौर्य मूर्तिमन्मिलितमिव समस्त रहो मनुष्या- कारमागतमिव सिंहाकार सहसाकृतसिंहचनि रंगादेगणमिव नभोङ्ग- णमलघत पुनराकाशादशनिवदवनिमापत्य आत्मपादपाताभिघातचलि. ताचलसन्धिबन्धी मुहर्षलगन् परिसरश्च प्रतिजभमाणसिंदूररंजितभुज- दण्डी समुदगौ क्रुद्धः प्रवलयन् श्रोणीद्वितयभागविलंबिपीतवस्त्रो नियु- द्धकुशल पर्वतशिखरोनतं प्रतिमल्ले चाणूरमाहत्य सहसा सिंहवदाब- भासे । तं दृष्ट्वा रधिरोद्मोप्रलोचनः फस' स्वप मल्लता प्राप्यागच्छ- ति स्म । तमुमसेनतनयं जन्मान्तरद्वेषात् करेण चरणे संगृह्याकाशे भ्रामयनल्याण्डमिव यमराजस्य समीप उपायनीकृर्तुमिर स कृष्णो भूमावास्फालयामास । तदा कृष्णमस्तके व्योम्नः कुमुमानि प्रपेतुः देवदुंदुभयो घनि चक्रुः । वसुदेवसेना समुद्र प्रक्षोभणात् कोलाहलव- केसाः, स.१२ अप्रतिमावेगापमह.ख.।
१८२ पट्माभते- निरुत्तस्थे । मुशलीवीरवरो विरद्धनृपतीनाक्रम्य रगे स्थित. । स्वानुर्ज स्वीकृत्य गर्जितं चकार । विष्णुस्त्रिखण्डलक्ष्म्या कटाक्षितः । इति श्रीभावप्राभृते द्रव्यलिंगिनो यसिष्टमुनेः कथा परिसमाप्ता। सो पत्थितं पएसो चउरासीलक्खजोणिवासम्मि। भावविरओ विसवणो जत्थ ण दुरुहुल्लिओ जीरे ॥४७॥ स नास्ति व प्रदेश चतुरशीतिलक्षयोनिवासे । भावविरतोऽपि श्रवणो यान प्रान्त जीव ।।। पदखण्डनारूपेण व्याख्यान क्रियते। हे जीव । हे चैतनस्वर- पात्मन् ! जत्थ या प्रदेशे। तं त्व भवान् । ण दुरुङल्लिओ न भ्रान्त स प्रदेश ससारे नास्ति । कस्मिन्, चउरासीलक्सजोणिवासम्मि चतुरशीतिलक्षयोनिवास स्थान । कथंभूतस्त्व, मारविरओ चि सरणो श्रवणो दिगम्बरोऽपि सन् भावविरतो जिनसम्यस्त्वरहित । उक्तं च गुम्मटसारग्रन्थै नेमिचन्द्रेण गणिना--- णिधिदरधादु सत्य तर दस बियलिदिपसु उधेव । सुरनरयतिरियचदुरो चउदस मणुए सदसहस्सा ॥१॥ अस्या अपमर्थ -निन्यनिकोतजीवानां सप्तलक्षाजातय ७०००००। इतरनिगोदजीवानां जातय सप्तटक्षा७०००००। धातून पृथि- वीकायजीपाना अकायजीवाना तंज कायजीनां वायुकायजीवाना जा- तय. चतुर्णी प्रत्येक सप्तरक्षा पृथ्वी ७०००००।अर ७०००००। तेज ७०००००। वायु ७०००००। तर दह-यनस्पतिकापजीयन जातयो दशरक्षा १०००००० 1 वियलिदिएमु इच्छेव-दीन्द्रिपत्री- न्द्रियपतरिदियजीवाना जातय समुदायेन पटक्षा । द्वीन्द्रिय जीवो ग प.
भावप्राभूत । २०००००। श्रीन्द्रिय २०००००१ चतुरिन्द्रिय २०००००१ सुरनर- यतिरियचदुरो-सुराणा जातयश्चतस्रो लक्षा ४००००। नारका जातयश्चतस्रो लक्षा ४००००० तिरचा जातयश्चतस्रो लक्षा ४०००००। चौइस मणुए-चतुर्दश लक्षा जातयो मनुजे मनुष्यजीवाना १४०००००। सदसहस्सा-शतसहस्रा । भावेण होइ लिंगी ण हु लिंगी होइ दव्वमित्तेण । तम्हा कुणिज भाव किं कीरइ दव्यालिंगेण ॥ ४८ ।। भावेन भवति लिङ्गी न हु भवति द्रव्यमानेण । तस्मात् कुया भाव किं श्यिते द्रव्यलिङ्गेन । भावेण होइ लिंगी भावेन निदानादिरहिततया जिनसम्यक्त्वस हिततया लिंगी सन् लिंगी भवति निदानादिसहितो जिनसम्यक्त्वरहितो लिंगी मुनिलिंगी जिनलिंगी सत्यलिंगी न भवति । ण हु लिंगी होइ दव्यमित्तेण न हु-स्फुटं लिंगी सन्नपि लिंगा न भवति द्रव्यमात्रेण शिरोलोचमयूरपिच्छकमण्डलुग्रहणरस्वत्यजनमात्रेण लिंगी सन्नपि लिंगी न भवति पुन ससारपतनहेतुवात् । तम्हा कुणिज्ज भाव तस्मा का- रणात् कुर्यास्त्वं । क, भान-जिनसम्यक्त्वनिर्मलपरिणाम । किं कीरह दवलिंगेण पूर्वोक्तद्रव्यलिगेन किं क्रियते न किमपि मोक्षसुखं क्रियत इति भार । दडयणयर सयल डहिउ अन्भतरेण दोसेण । जिणलिंगेण वि याहू पडिओ सो रउरवं नरय ॥ ४९ ॥ दण्डकनगर सकलं दावा अभ्यन्तरेण दोषेण । जिनलिङ्गेनापि बाहु पतित स रौरव नरकम् ।।
। १८४ पट्प्राभूते- दंडयणेयरं सपलं दण्डकस्य राज्ञो नगरं सफलं । डहिउँ अभं- तरेण दोसण दग्या अभ्यन्तरेण दोषेण क्रोधेन कृत्वा । जिणलिंगेण वि बाहू जिनलिंगेनापि जिनलिंगसहितोऽपि बाद ममुनिः । पडि. ओ सो रउरवं नरयं पतितो गतः रौरवं नाम नरकं । अस्य कथा- दक्षिणापथे भरतदेशे कुम्भकारकटनगरे दण्डको नाम राजा । तन्म- हादेवी मुवता । बालको नाम मंत्री। तत्र अभिनन्दनादयः पंचश- समुनयः समागताः । खण्डकेन मुनिना वालको मंत्री वाद जितः । ततो रुटेन तेन भंडो मुनिरूपं कारयित्वा सुनतया सम रममाणोदर्शितः। भणितं च तेन देव ! दिगम्बरेषु भक्त्यातिमुल्योऽसि येन भार्यामपि तेभ्यो दातुमिच्छसि । ततो रुप्टेन राज्ञा मुनयो यो निष्पीटिताः । तमुपसमें प्राप्य परमसमाविना सिद्धि गताः । पचाननगर यादुर्नाम मुनिरागतः । स लोकैर्वारितः । अत्र नगरे राजा दुष्टो वर्तते तेन पंच- शतमुनया यंत्र पीडिता भवन्तमपि तथा फरिष्यति । तदचनेन बाद रुपः । तेजोऽशुभसमुदातेन राज्ञा मंत्रिणा च सह सथै नगर भरमीच- कार । स्वपमपि मृतः । रोये नरके पतितं रामानं मंत्रिण चानचेष्टु. मिय तत्र गतः । को नाम रोस्यो नरक इति चेत् ! सप्तमे नरके पंच विटानि वर्तन्ते तेषु पूर्वदिशि सैरयः । दक्षिणेऽतिगरयः । पक्षिमेऽसि पत्रः। उत्तरे कूटशाल्मलि: 1 मध्ये कुंर्भापाक इति । अवरोति दव्यसवणो दंसणवरणाणचरणप-महो। दीवायत्ति गामो अणंतसंमारिओ जानो ॥५०॥ अपर इति दम्य भ्रमणो दानवरक्षानपरणमरः। दीपायन इति नामा अनन्तसारिको जातः । न.टी.। ३. मूलगाया पाटः।
भावप्राभृतं । १८५ अवरोत्ति दव्यसवणो अपर इति द्रव्यश्रवणो भावरहितो मुनि जिनयचनप्रतिरहित । दसणवरणाणचरणपन्भहो दर्शनेन जिनसम्य- क्वेन वर श्रेष्ठ यज्ज्ञान चरण च चारितं तेम्यस्त्रिभ्योऽपि प्रभृष्ट पतित सम्यग्दृष्टीना मुनीनामपाक्तेय । दीवायणुत्ति णामो द्वीपायन इति नामा। अणतससारिओ जादो अनन्तससारिक अन ते संसारे नियुक्त नियो गवान् कर्मपरयश इयर्थ, जातो भवति स्म । द्वीपायनस्य कथा यथा-श्रीने मिनाथो बलभद्रेण पृष्ट स्वामिन् ! इय द्वारवती पुरी किं काला तरे समुद्रे निमक्ष्यति कारणातरण वा विनश्यति । भगवानाह-रोहिणीभ्राता द्वीपाय- नकुमारस्तव मातुलोऽस्या पुर्या रुपा दाहको भविष्यति द्वादशे वर्षे मद्यहेतुत्वात् । तच्छत्वा द्वापायनकुमार इद जैनवचनमसत्यं चिकीर्षु दीक्षा गृहीत्वा पूर्वदेश गत । द्वादशाधिपूरणार्थ तप कर्तुमारब्धवान् । जर कुमारेण कृष्णमरणमाकर्ण्य बलभद्रादयो नेमिनाथ नमस्कृय सर्वेऽपि यादवा द्वारवती विविशु । तत कृष्णो बलभद्रश्च पुर्या घोपण मद्यनि पेधिनी कारयामासतु । ततो मद्यपैमद्याङ्गानि पिष्टविण्यादानि मद्यानि च कदम्बवने गिरिगव्हरे शिलाभाण्डानि आस्फालितानि । सा मदिरा कदम्बवनकुण्डेपु गता। कर्मविपाकहतु नेनावस्थिता । श्रीनमिनाथ पलवदेश गत । जिनन सह भव्यलोक उत्तरापथमुच्चलित । द्वीपाय नस्तु द्वादश वर्ष भ्रान्त्याऽतीत मन्यानो जिनादशा व्यतिकात इति ध्यावा सम्यक्त्वहीनो द्वारवतीमागत्य गिरेनिकटनगरबाह्यमार्गे आता पनयोगे स्थित । वनक्रीडापरिश्रा तास्तृष्णया व्याकुलाभूता काद म्बकुण्डषु जलमिति ज्ञावा शंभवादयस्ता सुरा पिबन्ति स्म । कदम्बव नस्थिता कदम्बकतया स्थितां विसृष्टा कादम्बरीं पीत्वा कुमारा पिका राश्च प्रापु । सा पुराणापि वारुणी परिपाकवशात् तरुणीवत्तरुणान् वशेऽकरोत् । ते कुमारा असबद्ध गाय तो नृत्यन्तश्च स्वस्तिपादा क १८६ पट्माभूते- प्रमुक्तमुन्तला पुष्पकृतावतसाः कण्ठालम्बितपुष्पमाला, सर्प पुरं समागच्छन्तः सूर्यप्रतिमास्थित द्वीपायनमुनि दृष्ट्वा पूर्णमाननयना इत्यूचु.. सोऽय द्वीपायनो यतिर्यों द्वारवती धक्ष्यति सोऽस्माकममत यास्पति बराक इति प्रोच्य सरतो लोटुभिः पापाणैश्च तावत्प्रनम्नु- र्यापद्धूमौ पपात । एवं तैनिस्कैस्ताडित उत्पन्नाधिकक्रोधो दष्टोप्टो यदूना स्वतपसश्च विनाशाय भ्रकुटिं चकार।कुमारास्तु पुरी प्रति गमन चक्रुः कैश्चित्तदुराचारो विष्णोर्बलस्प रघु निवेदित । तछुत्या द्वारपत्या प्रलयं मिनोक्त प्राप्त तदापि मैनाते परिच्छदरहिती मुनिसमीपं गती। अग्निमिव सटन्तं क्रोधेन संक्लिष्यधिर्य अभंग विषमवक्त्र दुर्निरीक्ष्येक्षण क्षीणकण्ठगतप्राण विभीषणस्वरूप ददृशतु । कृताअलिपुटौ महाद- रात्प्रणिपत्य याचना बन्थ्यो जानन्तावपि मोहाचाचितपन्तौ । हे साधो। चिर परिरक्षितस्तपोभार. क्षमामूल क्रोधामिना धक्ष्यते मोक्षसाधने परि- रक्ष्यता परिरक्ष्यता। मूढै प्रमादबहुलैर्दुपिंचेष्टितं भवत कृतं क्षम्यता क्षम्यतो । क्रोधश्चतुर्वर्गशत्रु , क्रोध सपरनाशन , अस्मभ्यं प्रसाद क्रियतां मुने! इति प्रियवादिनौ त पादयोगित्या प्रार्थितन्तो सथापि सोऽनिवर्तक संजातः । सर्वप्राणिसंयुक्तद्वारवतोदाहे पापधीः कृत- निश्चय युगामेर न धक्ष्यामीत्पगुलियैन संज्ञा चकार । अनिवर्तक- क्रोध ज्ञात्वा विपण्णी व्याधुव्य किं कर्तव्यतामूढी पुरी प्रविष्टौ । तदा शंभवाद्याश्वरमाङ्गका यादवा पुर्या निष्क्रम्प दीक्षा गृहीत्या गिरिगुहा- दिषु तस्थिवांस नदीपायनस्तु कोषशल्पेन मृत्रा भवनामो वभूय । सोऽग्निकुमारनामा विमंगेन पूर्वपैर स्मृत्वा द्वारपत्ती यालद्धस्त्रीपशुस. मैनो विश्शुचली मुक्त्या ददाह । तो दक्षिणापथे वनं प्रविष्टौ । तत्र निदेय. । र तदपि सेनादो छ । समीपमागी. ब..
१८८ पट्माभृते- सरोवरं शालिवन निघूमानल प्रचटवाल स्वर्गकुमारसमानीयमाननम्बू- फरानि च स्वप्ने दर्शयित्या महायुतिर्जम्बूनामाऽनावृतदेवाप्तपूजोऽतिवि- रयातो विनीत सुतो भविष्यति । यौरनारम्भेऽपि निििक्रयो भावी। तस्मिन् जम्बूस्वामियौवनकाले श्रीवीरभद्रारक पागपुरे मुक्तिं यास्यति तस्मिन्नेन समये मम केवलज्ञानमुत्पत्स्यते। सुधर्मगणधरेण सह ससारमित साना भव्यप्राणिना धर्मामृतोदकेनाल्हाद करिष्यन्निदमेव राजगृहपत्तनमा गत्यास्मिन्ने विपुलाचलेऽह स्थास्यामि । तत्समाकर्पोचेलनीसुत कुणिको नृप सर्व परिवारेण समागत्य मा मुधर्मं च पूजयित्वा दानशीलोपवासादिक स्वर्गमोक्षसाधक धर्मे महीष्यति । तेन सहागतो जम्बूनामा निर्वेद प्राप्य दीक्षामहगोसुको भविष्यति। त कुटुम्ब वदिष्यति स्तोकेषु वर्षेषु गतेषु त्वया सह वय सर्वेऽपि दीक्षा ग्रहीष्याम इति । तेन प्राक्त सोढुमश क्नुवनिराकर्तुं च तदक्षम पुरमायास्पति । तस्य मोहमुत्पादयितुं मुखर धन' विवाह आरप्स्यते तेन कुटुम्बार्गेण । वाधवा हि श्रेयसो विना । सागरदत्तपद्मावत्यो सुता श्रियो कृया मुलक्षणा पद्मश्री, दुधेरदत्तकन कमालयो मुता मुलोचना कनकधी, वैश्रवणदत्तविनयत्रत्योबूंदों मृगलोचनावलोकनीया विनयश्री तस्यैव वैध्रवणदत्तस्य धनश्रिया मुता रुपश्री एताश्चतस्रो विधिपूर्वक परिणीय सौधागारे समीचीनरनदीप दीतिभिर्निरस्ता धकारे नानारत्नसमर्माचीनचूर्णरगवल्लीसशोभिते विचित्र पुष्पोपहारसहिते जगतीतले स्थास्यति । एतस्य माता अप मे सुतो रागेण प्ररित स्मितहासकटाक्षेक्षणादिना विकृति भजन् किं भवेन या भवेदित्यामाने तिरोधाय पश्यन्ती स्थास्यति । तस्मिन्नवसरे सुरम्यदेश पोदनापुरेशविद्युद्राजविमलवत्यो सुत पापिष्टाना धुरि स्मर्यो दुरात्मना । २ यो ख कर्तृ। ३न ख । ४ सुना ख ।
m- भावप्राभूत । वन्दनीयोऽगुणवानुत्सुकश्च तीक्ष्णो विद्युत्मभनामा केनापि कारणेन निजज्येष्ठभ्राने कुपित्वा पचशतसुभटैर्निर्गतो विद्युचोरनामानमात्मानं कृत्वा चौरशास्त्रोपदेशेन मंत्रतत्रविधानाददृश्यशरीरत्वकपाटोद्घाटनादिक जाननहदासगृहाभ्यन्तररत्नधनादिक चोरयितुं प्रविश्य जिनदास नष्ट निद्रा विलोक्यारमान निवेद्य किमर्थ विनिद्रा त्वमवमिति प्रक्ष्यति । मम एक एव पुत्र प्रातरेवाहं तपोवन गमिष्यामीति सकल्पस्थितो वर्तते तेनाह शोकिनी सती जागर्मि । त्वं बुद्धिमान् दृश्यसे यदि त्यमिममान- हादुपायैरियसि तत्त्वदभीप्सित धन सर्वमह दास्यामीति वदिष्यति । सोऽ- पि तत्प्रतिपयैव सम्पन्नभोगोऽय किल विररस्पति, इह धनमाहर्तुं प्रविष्टं मां धिगिति स्वनिन्दन कुर्वनि शंक तदन्तिक प्राप्य त तासां कन्य- कानां साध्यतयाधिष्ठित कुमार प्रसरत्सद्बुद्धिं पजरगत पक्षिणमिन, जाल- लग्न मृगबालकमिव, अपारकर्दमे मग्न भद्रजातिगजाधिपतिमिन, लोहपं. जरैर्निरुद्ध सिंहमित्र प्रत्यासन्नससारक्षय सम्प्राप्तनिर्वेद समीक्ष्य विद्युच्चोर सुधीरटाख्यानक वदिष्यति । कुमार! त्वया श्रूयता-कश्चित्क्रमेलक स्वच्छया चरनेकदा गिरेन्नतप्रदेशात् तृणं खादन्नत मधुरसोमिन सक- दावाद्योत्सुकस्तादृशमेयाहमाहरिष्यामीति मधुपानाभिवाञ्छया तृणान्तर- चरणातिपराङ्मुखस्तस्थौ मने च तथा त्वमप्यतानुपस्थितान् भोगान- निच्छन् स्वर्गभोगार्थी बुद्धिरहित कमलकापस्था प्राप्स्यसि (१)। इति चौरप्रतिपादित श्रुत्वा कुमार प्रयुत्तर दास्पति-कश्चि पुमान् महादाह- करेण रविणा परिपीडितो नदीसरीवरतडागादिपानीय पुन पुन पीत्वा तथापि न विनष्टतृष्णस्तृणाप्रस्थितजलकण पिवन् किं तृतिं याति तधार्य जावोऽपि चिरकाल दिव्यमुख भुक्त्वाप्यतृप्तोऽनेन मनुष्यभव- १ विलसति स ।
१९० पटनाभृते- जातेन स्वस्पेन गजकर्णास्थिरेणास्त्रादुना तति यायात्-अपि तु न यायात् (२)। इति तद्वाच श्रुवा स एकागारिक कथयिष्यति कथा-एफस्मिन् वने किरातश्चण्डो महातरुमाधार कृत्वा गण्डात धनुराकृष्य बाणेन वारण जघान ! तरुकोटरस्थितसर्पदष्टस्त सर्प मारयित्वा स्वय च मृत । अथ तान् बीन किरातसर्पगजान् मृतान् दृष्ट्वा नोटाऽतिलब्धस्तारदेतोत्री नाभि पूर्व धनुमौवी प्रातस्थिता च स्नसां भक्षयामीति कृतोद्यमस्तच्छेद वैधेयश्चकार । सद्यो धनुरमनिभिन्नगल सोऽपि मृत । ततोऽतिगृध्नुता त्वया त्याज्या (३) । इति श्रुत्वा कुमारश्चितयित्वा सूक्त प्रवक्ष्यति- चतुर्मार्गसमायोगदेशमध्ये सुमह र नराशिं प्राप्य पथिको मूर्खस्तदात्मना दायकेनापि कारणेन गत पुनर्वनादागत्य त देश त रनपुज किं पुन लभते तथा गुणमाणिक्यसचय दुष्प्रापमगृह्णन् ससारसमुद्रे कथं पुन प्राप्नुयात् (४)। तदा मलिम्लुचोऽन्यदन्यायसूचनमुपाक्यान वदिष्यति- कश्चिच्छृगालो मुखस्थितं मांसपिण्डे मुक्या संक्रीडमानं मीनं भक्षित जले पपात | जलवेगवह प्रवाहेण प्रेर्यमाणो मृत । मीनस्तु दीर्घायु जलमध्ये सुखं तस्थौ । एवं शृगालवदतिलुब्धो मरिष्यति (५) । एवं मुख्यतस्करवाच श्रुत्वा प्रत्यासन्नमुक्ति कुमारो भणिष्यति-कश्चिनिद्रा लुको वणिक् निद्रामुखरत परार्घ्यरनगर्भनिजकच्छपुट सुप्त । चौरैर पहते माणिक्यसचये तदु खेन दुर्घतिर्मति प्राप । तधाय जीवो विप याल्पसुखासक्तो रागचौरकैर्दर्शनशानचारित्ररत्नेष्वपढ़तेषु निमूल नश्यति (६)। दस्युरथ गदिष्यति-स्वमातुलानी दुर्वचनकोपेन काचि कया तरुतले सर्वाभरणमण्डिता स्थिता। मरणोपायमजानती व्याकुटमना सुवर्णदारकेण पापिना मार्दङ्गिकण दृष्टा । तदाभरणानि जिघृक्षुणा तस्या १वधयक स । २तदातमना के ।
भावमाभृतं । १९१ लम्बनोपायं दर्शयामास । स्वकीय मर्दले वृक्षतले समुद्र संस्थापयां- बभूव । तस्या गलपाशदानशिक्षणार्थ मदलोपरि पादौ धृत्वा गले पार्श चकार । केनापि कारणेन मर्द पतिते मार्दनिकस्य गले पाशो लग- स्तेनाविलीभूतकण्ठः प्रोद्गतलोचनः शमनमन्दिरं प्राप ! कन्या तद्दृष्ट्र मरणभयात् गृहमागता तथा कुमार ! त्वया लोभो हेय: (७) । इति तस्य वाग्जालमाकर्ण्य जम्बूनामा कुमारोऽसहमानस्तं प्रति भणिष्यति- कस्यचिद्राज्ञो महादेवी ललितागनामधेय घूर्तविटं दृष्ट्वा मदनविव्हला संजाता । तस्य विटस्यानयननिरन्तरोपायनियुक्ता तद्धात्री तं गुप्तमानी- तवती । सा महादेवी यथा भर्ता न जानाति तथैकान्तप्रदेशे यथेष्टं तं रममाणा स्थिता। बहुभिर्दिनैः शुद्धान्तरक्षकै ज्ञाता राज्ञो ज्ञापिता च । उपपत्यपनयनोपायमजानत्यः परिसारिकास्तं खलं नीत्वा पस्करगृहे निक्षि- सवत्यः । स तत्रातिदुर्गन्धेन तरकोटेश्च दुःखं प्राप । पापोदपेनात्रैव नर- फावासं प्राप्तः । तद्वदल्पसुखाभिलापिणो जीवस्यातिघोरनरकादिषु महापदो भवन्ति (८)। कुमारः पुनरप्यके प्रपंचं कथयिष्यति येन श्रुतेन सर्ता लघु संसारनिर्वेगो भवति । जीवोऽयं पथिकः संसारकान्तारे भ्राम्यन् मृत्युमत्तगजेन जिघांसुना रुपानुयातोऽतिमीर: पलायमानो मनुष्यत्व- तस्वरान्तरहितस्तन्मूले कुलगोगादिविचित्रमल्लीसमाकुले जन्मकूपे पतित मायुर्वल्लीलनकायः सितासितदिवसानेकमूषिकोच्छिद्यमानतदल्लीकः सप्त- नरकप्रसारितमुखसप्तसर्पनिकटः तदृक्षेष्टार्थपुष्पोत्पन्नसुखमधुरसलालस- स्तद्ग्रहणोत्यापितसमुप्रापन्मक्षिकामक्षितः तत्सेवासुखं झात्वा सोऽपि विषयलंपटो दुर्बुद्धिजीवति तथा धीमान् दुर्वहं तपोऽकुर्वनत्यक्तसग कथं वर्तते । इति तस्य वचनमाकर्ण्य माता कन्याश्चौरश्च संसारशरीरभोगेश्व- १ अवलंधीभूत. ख. । १ यममन्दिर, ख.।
- पट्माभृते- तिनिरागत्व यास्यन्ति । तदान्धकार निराकृत्य कोक प्रियया कुमार दीक्षयेव योजयन् निजकरै समाक्रम्य कुमारस्य मन कमलमिव रजयन्नुदया। शिखरे रविस्तपसि कुमार इबोदष्यति । सर्वसन्तापकारी तीक्ष्णकरोs. नवस्थित क्रूरो दिवाकुवलयध्वसी तदा सूर्य कुनृपस्योपमा धरिष्यति । निन्योदयो बुधाधीशोऽखण्डविशुद्धमण्डल प्रवृद्ध पमाल्हादी सुराजन वाऽर्यमानेष्यति । अस्य कुमारस्य वान्धवा मनवैमुख्य विज्ञाय कुणिपमहा- राजश्रेणयोऽष्टादशापि देवोऽनावृतश्च सर्वे सगम्य मगलजलैरभिषेक करिष्यन्ति । अथ कास्ता अष्टादशश्रेणय -सेनापतिर्गणको राज- श्रेष्ठी दण्डाधिपो मत्री महत्तरो बलवत्तर चत्वारो वर्ण चतुरन वलं पुरोहितोऽमात्यो महामान्य इति । असौ कुमारस्तत्कालोचितपो देवनि- मिता शिविकामारुध भूरि भूत्या उचैर्विपुलाचलशिखरे स्थित मा महा- मुनिभिनिषेवित समम्पत्य भक्त्या नि परीत्य यथाविधि प्रणम्य वर्ण- त्यसमुत्पन्नैर्भूयोभिर्विनविद्युञ्चोरेण तत्पचशतसेवकैश्च सम सुधर्म- गणघरपादमूले समचित्त सयम ग्रहीष्यति । द्वादशन्ते मयि मोक्ष गते मुधर्मा केवली भविष्यति जम्बूनामा श्रुतकेवली भविष्यति । ततो द्वादशवर्षपर्यन्ते सुधर्मणि निर्माण गते जम्बूनाम्न केरलज्ञानमुत्पत्स्यते । जम्बूनाम्न. शिष्यो भवो नाम चत्वारिंशद्वर्षाणीह भरतक्षेत्र निहरिष्यति । तदाकर्ण्य श्रेणिक स्थितेऽनावृतो देवो मदीयवंशस्यैद माहात्म्यमुद्धृतमी. दृशम यत्र न दृष्टमित्युञ्चैरानदनाटक दृष्ट्वा श्रेणिक उवाच कस्मादनेन- वधुत्वमस्य देवस्येति । भगवान् गौतमो वभाण जम्बूनाम्नो वशे पूर्व धर्म- प्रियश्रेष्टी गुणदेवी श्रेष्टिनी । तयोरहदास सुतो धनयौरनमदेन पिनु शिक्षामगणयन् कर्मक्शात् सतव्यसनेषु निरकुशो बभूव । निजदुरा- १तपतिस भानप्राभूत। पारेण दरिद्री सजात । पश्चादुत्पन्नपश्चात्तापो मपितु शिक्षा मया न श्रुता, उत्पन्नशमभाव किंचि पुण्यमुपार्यानावृतनामा व्यन्तरो जात , तर समुत्पन्नसम्यक्त्वसम्पदिति वधुता प्रीतिरस्य । अथ श्रेणिक माह-वामिनयं विद्युमाली देव कस्मादागत , कि पुण्यं भवे छत- वान्, अस्य प्रभा आयुरन्तेऽप्यनाहतैति । तदनुग्रहबुद्धयेय भगवान् गौतम प्राह-अत्र जम्बूद्वीपे पूर्व विदेहे पुष्फलावतींविषये वीतशोकपत्चने महापमो राजा । त महादेवी वनमाला। तयो सुत शिवकुमार नव- पौवनसम्पन्न सक्योभिर्वनै विद्वत्य पुनरागच्छन् गधपुष्पादिमंगलद्र- व्योत्तमपूजया सह जनानागच्छतो दृष्ट्या समुत्पन्न विस्मयो बुद्धिसागरमंत्रिण पुत्र किमेतदिति पप्रच्छ। सप्राह-कुमार शृणु-सागरदत्तनामा मुनी द्र. श्रुतवली दीप्ततपीमण्डिता मासोपासपारणायै पुरं प्रविष्ट । कामसमुद्री नाम श्रेष्ठी विविपूर्वक मतया दान दत्या पचाश्चर्यं प्राप्य तेनोपन कौतुका पौरास्तं मनोहरोद्यानयासिन पूजपित्या चन्दितु परमभक्त्या यान्तीति। शिनकुमार प्राह-अयं सागरदत्वाख्या सश्रुतो पिरिधीश्च कथ प्राप । मत्रिपुतोऽपि यथा श्रुतं तथा प्राह पुष्कलारतीपिपये पुण्डरीकिणी नगरी, तस्या पतिश्चक्री वनदत्त । तस्य महादेवी यशोधरा गर्भिणी समुत्पन्नदोहदा। सा सीनासागरसगमे महाविमूत्या गवा महाद्वारेण समुद्र प्रविष्टा । जरकेलीरिधाने जलजानना आसन्न निर्वृति पुत्र प्राप। सेन हेतुनास्य सनाभय सागरदत्तारया चनु । अथ सागरदत्त परिप्राप्त- यौन स्वपरिवारमण्डितो हर्म्यनले स्थितो नाटक पश्पन्ननुकूला- दयनाम्ना चेकनोक्त । हे वुमार! त्वमाश्च पश्य मेर्वाकारोऽय १ य पुस्त+ऽस्य स्थाने प्राप्तेनेति पाठ सोऽप्यशुद्धोऽवभाति । अतो स्य स्थाने प्राप्त इनि प्राप इति वा पाटेन भवितव्य । १ पुअपितु इति ख. पुस्तके । एतदेव सभ्यम्माप्ति । ३ गोविण । पर १३ १९४ पट्याभूते- मेघस्तिष्ठति । त मेघ लोचनप्रियं सोन्मुखो निरीक्षितुमैहिष्ट | स मेघ- स्तत्काल एव नष्ट । सागरदत्तश्चिन्तयामास यौन धन शरीर जीवितमन्यच्च सर्व वस्तु विनस्तर वर्तते यशय मेघ इति निर्धेग गत । अपरेधुर्मनोहरोद्याने धर्मतीर्थनायकममृतसागर नाम तीर्थकर वज्रदत्वेन निजवप्ना सह वन्दितुमित । तत्र धर्म श्रुत्वा निश्चितसर्वस्थिति सर्वबन्धुविसर्जन कृत्वा बहुभी राजभि सम सयम जग्राह । मन पर्य- यद्धिसम्पद प्राप्य धर्मोपदेशेन देशान् विहृत्यात्र वीतशोकपुरमागत । इति मत्रिपुत्रवचनानि श्रुत्वा शिवकुमार प्रीतमना स्वय च गत्वा मुनिवर स्तुत्या धर्मामृत तत पीत्वा जगाद । भगवन् ! भरतं दृष्ट्वा मम महान् लेह सजात । तत्र क प्रत्यय इत्यपृच्छत् । भगवान् सागरदत्त प्राह-अत्र जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे मगध- देशे वृद्धग्रामे राष्ट्रकूटो नाम वणिक् । तस्य भार्या रेवती। तयोौं पुत्रौ भगदत्तभवदेवौ । तयोर्मध्ये भगदत्त सुस्थितनामगुरु नत्वा दीक्षा जग्राह । विनयान्वितो गुरणा सह नानादेशान् विहृत्य स्वज मप्राम- माजगाम । तदा तद्वान्धवा सर्वेऽपि हर्षमाणा समेत्य मुनि सुस्थित प्रदक्षिणीकृत्य सपूज्य बागन्तुमुद्यता । तर ग्रामे दुर्मर्पणो नाम गृहपति । तस्य नागवसुर्भार्या । तयो पुत्री नागधी । सा विधि- पूर्वक भवदेवाय ताभ्या ददे । भगदत्तागमन श्रुत्वा भवदेवोऽपि पिकु- र्वाणोऽत्रागत्य भगदत्तं विनयात्प्रणम्य तद्दत्ताशीर्वादेनार्दितमनास्तस्थि- वान् । भगदत्ता धर्मस्वरूप ससारखैरूप्यं व्याख्याय गृहीतकर एकान्ते भ्रात । त्वया सयमो गृहीतव्य इत्याह । भव व उवाच-नागश्रीमोक्षण विधाय भनत उदित करिष्यामि | भगदत्त उवाच-है भ्रात.! ससारे जापादिपाशबदो जीव कथमात्महितं करोति परित्यज मोहमेतमिति । तदा भवदेव उत्तरमपश्यन् ज्येष्टानुरोधेन दीक्षाया मतिं निदधौ । भग- . Aama भावप्राभूत। १९५ दत्त स्वगुरुसुस्मितसमीप त नीत्वा ससारच्छेदनार्थ मोक्षी दीक्षा मैक्षु ग्राहयाबभूव । सता सौदर्यमीहरभवति । भवदेवो द्रव्यसयमी भूत्वा गुरुभि सम द्वादशवर्षाणि विसापरेटुर्विधीरसहायो निज वृद्धमाम गत्या सुनता गणिनी समीक्ष्य ता माह-हेऽम्ब ! काचिनागश्री म काचि- दस्ति । सा तस्येशित ज्ञात्वा जगाद-मुने ! सदुद तमह सम्पन्न वेदेति । नदौदासीन्य प्राप्त त सयमे स्थिरीकर्तुं गुणवृत्यार्यिका प्रति अर्था- ख्यानक जगाद । ससगृद्धनामा वैश्य , तदासीसुतोऽशुचिरुकाभिधेय स्थमात्रा प्रोधे--अस्मच्छेष्टयुच्छिष्टभोजन तु त्वयाऽशनीयमिति । निबन्धा- दोजित । स जुगुप्सया वा तवान् । तत् कसपात्रेण धृत्वाऽऽच्छाद्य धृतं । दारुक पुनर्बुभुक्षु स्वभातर भोजन ययाचे। तया तत्क सपात्र वातभृतमुपदौकित । क्षुत्पीडितोऽपि स आत्मवान्त न जग्राह । सोऽशुचिरपि चेत्तादृशस्तर्हि साधु कथ त्यक्तमभीप्सतीति (१)। गुणवति । पुनरेकमाख्यानक निज मनो निश्चल कृत्या स्व शृणु । मरपालनामा नरेन्द्र एक श्वान कुतूहलेन मृष्टानेन सपोथ्य कनकाभरण- भूपितं सदा पनकीडादौ सुवर्णरचिता शिविकामारोप्यैव मन्दमातस्तम. पालयत् । एकदा शिविकारुढ सरमासुतो गच्छन् बालविष्टामालोक्य तामालेढुमापपात ! तदृष्ट्वा राजा लकुटीताडनेन तमपाचकार । तथा पुनि ! साधु सपा पूजनीय पूर्वत्यक्त पुनर्वाञ्छन् पराभन प्रामोति (२)। हे गुणवति । पुनरेका कथा शृणु-फैचित्कोपि पथिकस्तद्वनान्तरे सुगन्धिफलपुष्पादिसेयया युतस्त तरु त्यक्त्वा सन्मार्ग विहाय महाटवी- सकटे पतित । तत्र जिघामुक बमूरै दृष्ट्वा ततो भीत्वा धापनेकस्मिन् भीगे को विन्यत् पपात । तत्र पापाच्छीतादिमिर्दोपत्रयसभवे वादृष्टि- १माक्षदीक्षा स । २ अज्ञान । ३ तत्पित्राद्युच्छिष्ट• ख ।
पद्माभृते- श्रुतिगतिप्रभृतिहीन सर्पादिनाधानिकट तस्मानिर्गमनोपायमजानन्त त कोऽपि भिपरपरो यदृच्छया गच्छन् दृष्ट्वा दयाईचित्त केनाप्युपायेन महादरानिष्काश्य मत्रौपधिप्रयोगण विहितचरणप्रसारण सूक्ष्मरूपसमा- लोकनोमीटितनेत्र स्फुटाकर्णन विज्ञाननिजशक्तिकर्णयुगल व्यक्त- वाक्प्रसरसयुक्तजिव्ह स चकार । पुन सर्वरमणीय पुर तमार्गदर्शनेन प्रस्थापयामास । निर्मलहृदया कस्योपकार न निदध्यु । पुन स विप- यासक्तमति पथिकदुर्मति प्रकटीकृतदिग्भागमोह प्राक्तनकूपक सम्प्राप्य तस्मिन् पुन पतित तथा क्वचित्ससारे मिथ्यात्यादिकपचोप्रव्याधयो दीप्त्युपागता जन्मकूपे क्षुधादाहायातमगिन वीक्ष्य गुर समितिद्यो दयालुल्याद्धर्माख्यानोपायपण्डितस्तस्मानिर्गमय्य जिननागौपधिनिपेचना (णा) त् सम्यक्त्वलोचनमु मील्य सम्यग्ज्ञानश्रुतियुगलमुद्घाटय्य सवृत्तपादौ प्रसारितौ विधाय दयामयीं जिव्हा व्यक्तां विधाय विधिपूर्वं पचप्रकारस्वाध्यायवचनानि त वादयित्वा स्वर्गापवर्गयोर्मार्ग सुधी साध्वगमयत् । तत्र कैचिदीर्घससारा स्वपापोदयात् भ्रमरा इव सुगन्धिव धुरोद्भिन्नचम्पकसमीपवर्तिनस्तत्सौगन्ध्यारबोधरहिता पार्ट- स्थाख्या सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रसमीपवर्तनात् , क्रोधादिकपायस्पर्शा- दिविषयलौकिकज्ञानचिकित्सादिकुज्ञाना जिव्हायामष्टधा स्पर्शेषु च लम्पटा दुराशया कुशीलनामान , निषिद्धेषु द्रव्येषु भावेषु च लोलुपा संसक्ताव्हया , हीयमानज्ञानादिका अवसानसज्ञा , समाचारवहिर्भूता मृग- चर्पानामवेयका महामोहा निवृत्या कृत्वा आजरजवाऽस्ताघकूपे पेतुर्निप- तन्ति च (३)। भवदव इति ध्रुवा सम्प्राप्तशातभावो बभूव । मुत्रता गणिनी सर्वार्याग्रेसरी तद्विज्ञाय दारिद्योत्पादितदौस्थित्या नागश्चियमा- नाय्य त दर्शयामास । भवदेवोऽपि तां दृष्ट्वा संसारस्थिति स्मृत्वा धि- १ आनवजवागत्वायकूप व पाठ भावप्राभृतं । १९७ गिति निन्दित्वा पुनः संयमं गृहीत्वाऽऽयुःप्रान्ते भ्रात्रा भगदत्तेन सह आराधना शिश्राय । समाधिना मृत्वा माहेन्द्रकल्पे वलभद्रविमाने सामा- निको देवः सप्तसागरोपमायुर्वभूव। अहं भगदत्तचरः सागरदत्तश्चक्रिसुतः संजातः । त्वं भवदेवचरः शिवकुमारोऽत्र बभूविथ। स इति श्रुत्वा संसा- राद्विरक्तो दीक्षा गृहीतुमुद्यक्तो बभूव । वनमालया मात्रा महापद्मन पित्रा च चारितो बीतशोक नगरं प्रविश्य संजातसवित् अप्रासुकाहारं नाहरिष्या- मीति व्रतं गृहीत्वा स्थितः । एतावतीदीक्षा विना प्रासुकाहारः कुत' ? भूपस्तद्वार्ता श्रुत्वा प्राह-य कोऽपि शिवकुमार भोजयति तस्मै संभा- थितमहं दास्यामीति सभायां घोपयामास । तद्विज्ञाय सप्तस्थानसमाश्रयो दृढधर्मनामा श्रावकः समागत्य शिवकुमार माह । अथ कानि तनि सप्त- स्थानानीति चेत्--- सजातिः सद्गृहस्थत्वं पारिवाज्यं सुरेन्द्रता। साम्राज्यं परमाईन्त्यं निर्वाणं चेति सप्तधा ॥१॥ अथ दृढधर्मा किं प्राहेति चेत् ! हे कुमार! तर ज्ञातयः तव शत्रवः पापस्य कारण स्वपरघातका वर्तन्ते । तेन त्वं भावसंयममधा- तमकृत्वा तव प्रामुकाशनं संपाद्य पर्युपासनमहं कुर्वे । बन्धुवियोग विना सयमे प्रवृतिस्तथापि दुर्लभेति हित वचनं जगाद च । सौऽपि तद्विदित्वा आचाम्लनिर्विकृतिरसरहितभोजन सन् दिव्यत्रीसनिधौ स्थित्वापि सदा विकाररहितमना स्त्रियस्तृणाय मन्यमानः खड्गतीक्ष्ण- धारायां संवर्तमानो द्वादशसंवत्सरास्तष कृत्वा सन्यासं गृहीत्वा जीवि- तान्ते ब्रह्मेन्द्रनीन्नि फल्पे विद्युन्माली देहदीप्तिव्याप्सदिक्तटो देवो बभूव । विद्युन्मालिन एवाटदेव्योऽत्रागत्य जम्बूनाम्नः तेत्र चतस्रो १ एतो दीक्षा. ख. २ तासु अष्टम मध्ये ।
१९८ पट्याभृते- मार्या पद्मकनकविनयरूपश्रियो भूत्वा निजभर्ना सह दीक्षित्वाऽच्युत- कल्प गत्वा स्त्रीलिंगच्युता देवा भूला पश्चादत्रागत्य मोक्षं यास्यन्ति । सागरदत्तनामा स्वर्ग गत्यात्रागत्य निर्वाण यास्यति । इति जम्बूस्वामि- चरित्र श्रुत्वा श्रेणिको जहर्प। इति श्रीमानप्राभूते शिवकुमारकथा समाप्ता । अगाई दस य दुण्णि य चउदसपुवाई सयलमुयणाणं । पढिओ अ भव्वसेणो ण भावसवणतणं पत्तो॥५२॥ अङ्गानि दश च द्वे च चतुर्दशपूवाणि सकलश्रुतज्ञानम् । पठितश्च भव्यसेन न भावप्रवणत्व प्राप्त ॥ अगाई दस य दुण्णि य अगानि दश च दै च अड़े। चउदस- पुव्वाडं चतुर्दशपूर्वाणि सकलश्रुतज्ञान । पढिओ अ पठितश्च । भब्वे- सेणो भव्यसेननामा मुनि । ण भावसवणत्तणं पत्तो भाषश्रवणत्व न प्राप्त । जैनसम्यक्त्वं पिनाउन तससारी बमूवेति भावार्थ । अत्र भव्य- सेनो मुनिरेकादशाङ्गानि शब्दतोऽर्थतश्च पठितम्तहलेनैव द्वादशस्या- गस्य चतुर्दशपूर्वाणा चार्यपरिज्ञायकत्वात् श्रीकुन्दकुन्दाचार्येण सकल. श्रुतमधीत प्रोक्तमिति ज्ञातव्य सकल श्रुतेऽधीती ससारे न पततीत्या- गम । भव्यसेनस्य कथा यथा-विजया गिरौ दक्षिणश्रेणी मेघवूटपत्तने राजा चद्रप्रभ सुमतिमहादेवीका तश्चन्द्रशेखराय राज्य दत्वा परोपकारार्धं जिनमुनिवन्दनाभक्त्यर्थे च काश्चन विद्या दधानो दक्षिण- मथुरामागत्य मुनिगुप्ताचार्यसमीपे क्षुल्लको जात । स एकदा जिनमु- निवन्दनाभक्त्यर्थमुत्तरमथुरा चलित सन् श्रीमुनिगुप्तमाचार्य पप्रच्छ-- किं कस्य वध्यत इति । गुप्त उवाच-मुव्रतमुनर्नमोऽस्तु वरुणमहा- १ यो मूलगायापाठ । २ घ पुस्तके तु पूर्वत एव अभध्यसेन इति नाम कृत, रत्नकरण्डकटीकायामत्र च पश्चात् ।
भावप्राभूत। राजमहादेव्या रेवत्या धर्मवृद्धिरिति वक्तव्य त्वया । एव नीन् वारान् पृष्टो मुनिस्तदेवोवाच । क्षुल्लक स्वगत एकादशाङ्गधारिणो भत्र्यसेना- चार्यस्यान्येपा च नामापि भगवान् नादत्ते तत्र प्रत्ययेन भवितव्यमिति विचार्य तत्र गत । सुक्तमुनेर्भट्टारकीया वन्दना कथयित्वा तदीय विशिष्ट वासल्यं च दृष्ट्वा भव्यसेनवसति जगाम । तत्र भव्यसेनेन संभाषणमपि न कृतं । कुण्डिका गृहीत्या भव्यसेनेन सह बहिर्भूमि गत्वा पिकुर्वणा कृत्वा हरितकोमलतृणाङ्करच्छन्नो मागों दर्शित ।त मार्ग दृष्ट्वा भव्यसन आगमे किलेते जीगा कथ्यन्ते इति भणित्वा आगमेऽरुचि कला तृणानामुपरि गत । शौचसमये दुण्डिकाजलं शोष- यित्वा क्षुल्लक उवाच-भगवन्! कुण्डिकायामुदक नास्ति तथा विकृति- श्शेष्टिकादिका कापि नाहमीक्षे । अतोऽत्र निर्मलसरोवरे मृत्स्नया शौच कुरु । ततस्तत्रापि तथैव भणित्वा शौच चकार । ततस्त मिथ्याष्टिं द्रव्यलिगिन ज्ञाचा भव्यसेनस्याभव्यसेनोऽयमिति नामातरं चकार । ततोऽन्यदिने पूर्वस्या दिशि पद्मासनस्थ चतुर्वक्त्रमुपवीतदर्भमुजीदण्ड- कमण्डलप्रभृतिसहित देवदानवन्धमान ब्रह्मरूप दर्शयामास । तत्र राजा- दयो भन्यसेनादयश्च गता । रेवती कोऽय ब्रह्मनाम देव इति भाणावा लोकै प्रेरितापि तत्र न गता । अन्यस्मिन् दक्षिणस्या दिशि गरुडारूढ़ चतुर्भुज चकशखगदादिधारक वामुदेवरूपं दर्शयामास । पश्चिमदिशि वृपभारूढ सार्वचन्द्रजटाजूटगौरीगणोपेत शंकररूप, उत्तरस्या दिशि समवशरणमध्ये प्रातिहार्याष्टकसहित सुरनरविद्याधरमुनिन्दवन्धमान पर्यकरथं तीर्थकररूप दर्शयति स्म । तत्र सर्व लोका गच्छन्ति स्म । खती तु लोकै प्रेर्यमाणापि न गता । नवैव वासुदेवा , एकादशैव रुद्रा, चतुर्विशतिरेव तीर्थकरा जिनागमे प्रतिपादितास्ते तु सर्वेऽ- ।
२०० पटनामृते- प्यतीता । कोऽप्यय मायावी वर्तते इति विचिन्त्य स्थिता । ब्रह्मा तु कोऽपि नास्ति । उक्त च- आत्मनि मोक्षे ज्ञाने वृत्ते ताते च भरतराजस्य । ब्रह्मेति गी प्रगीता न चापये विद्यते ब्रह्मा ॥१॥ अन्यस्मिन् दिन चर्यालाया व्याधिपीडितक्षुल्लकरूपेण रेवतीगृहसमीप- प्रतोलीमार्गे मायामूर्छया पतित । रेवती तदाकर्ण्य भक्त्योत्थाप्य नीत्वोपचार कृत्वा पत्थ्य विधापयितुमारेभे । स च सर्वमाहार भुक्या दुर्गधवमनं चकार । तदपनीय हा! विरूपक पथ्य मया दत्तमिति रेवतीवचनमाक्र्ण्य प्रतोपा मायामुपसहृत्य ता देवी पदिया गुरोराशी- दि पूर्ववृत्तान्त च कथयित्वा लोकमध्ये तस्या अमूढदृष्टिमुच्चै प्रशस्य स्वस्थान चद्रप्रभो जगाम । वरणमहाराजस्तु शिवकीर्तये निजपुत्राय राज्य दत्वा दीक्षामादाय माहेन्द्रकल्पे देवो बभूव । रेवती तु तप कृत्वा ब्रहकल्पे देवो बभूव । इति श्रीभानप्राभृते भव्यसेनमुनिकथा समाप्ता । तुसमासं घोसंतो भावविसुद्धो महाणुभानो य । णामेण य सिरभूई केवलणाणी फुडं जाओ॥ ५३॥ तुपमाप घोपयन् भावविशुद्धो महानुभावश्च । नाम्ना च शिवभूति केवलज्ञानी स्फुट जात ॥ तुसमासं पोसंतो तुपमापशब्द घोपयन् पुन पुनरच्चारयन् मा लि स्मृति यासीदिति कारणात् । भावविसुद्धो भावविशुद्ध । महाणुभागो य महानुमावश्च महाप्रभावयुक्तथ । णामेण य सिरभूई नाम्ना च शिव- भूति चकारादर्थेन च शिवभूति शिवाना सिद्धाना भूतिरेश्वथै अनन्तचतु- एयटक्षण लोक्यनायकत्व यस्य स भपति शिवभूति । केवलणाणी सुडं जाओ केवलज्ञानी देवलज्ञानपान् लोकप्रकाशकपचमशानवान् भावप्राभूत। २०१ स्फुट शमादिदेवै प्रकटीकृतघातिक्षयजातिशयदशक सर्वप्रसिद्ध सजात इति । अस्य कथा यथा-कश्चिच्छिवभूतिनामासन्नभव्यजीव परमरैराग्य चान् कस्यचिद्गुरो पादमूले दीक्षा गृहीत्वा महातपश्चरण करोति पटू- प्रवचनमात्रामात्र जानाति पर वैदुष्य किमपि तस्य नास्ति । आमान शरीरफर्मचयाद्भिन्न जानाति । तेदाध नायाति गुरणा प्रोक्त दृष्टान्त पुन मुनस्तीक्ष्णी क्रोति तुपा मापो भिन्न इति यथा तथा शरीरादात्मा भिन्न इति । त शब्द घोषयन्नपि कदाचिद्विस्मृतवान् । अर्थ जाननपि शब्द न जानाति । एकाकी विहरति च । शब्दविस्मरणलशावर्ती काचि- घुपति पटकादिकपचनार्थे मापान सूपीकृतान् जळमध्येहावितास्तुपेभ्यो भिन्नान् कुर्ष ती दृष्ट्वा पृष्टवान्-किं पुरुष भवति ! इति । सा प्राह-तुप- माषान् भिन्लान् करोमि । स आह मया प्राप्तमिति कचिद्गत । साव न्मात्रद्रव्यभावभुतेनात्मन्येकलोलीभावं प्राप्तोऽ तमुहूर्तेन केवलज्ञान प्राप्य नवकेटलब्धिमान् देशान् पिहृत्य भव्यजीवाना मोक्षमार्ग प्रदर्य मोक्षं गत इति। इति श्राभाषप्राभृते शिवभूतिमु युपारयानं समाप्त । भावेण होइ णगो बाहिरलिंगेण कि च नग्गेण ! कम्मपयडीण णियर णासइ भावेण दवेण ॥ ५४ ॥ भावेन भवति नग्न बहिलिंगन किं च नग्नेन । कर्मप्रकृतीना निकर नश्यति मावेन द्रव्येण। भावेण जिनराजसम्यक्त्वेन । होइ जग्गो भवति नग्नो निमाथ- स्वरूप । बाहिरलिंगेण किं च नम्गेण चहिलिंगेन किं च याह्यन प्रतया न किमपि मोक्षलक्षणं कार्य सिद्धयति पशूनामिन ! कम्मपय- १ तदिति स पुस्तके नास्ति । १ नग्गो इति टोका पाठ - २०२ पद्मामृते- डीण णियर कर्मप्रकृतीना निकर समूह अष्टचत्वारिंशदधिकशतसं- ख्याना वृन्द । णासइ भावेण दव्वेण नश्यति भान द्रव्येण चेति । ये मिध्यादृष्टयो गृहस्था अपि सतोऽस्माक भानो विद्यते इति वदन्ति स्त्रीभि सह ब्रह्मचर्य च भजति ते लोलीका चार्वाकसदृशा नास्तिकास्त- न्मतनिरासार्थमिद वचनमुक्त श्राउ दकुन्दाचार्यस्वामिभि " णासइ भावेण दवण" भाषण-कर्मक्षयो भवति भावपूर्वकद्रव्यलिंगेन गृहीतेन द्वाभ्या भाषद्रव्यलिंगाम्या कर्मप्रकृतिनिकरो नश्यति न त्वेकेन भान- मात्रेण द्रव्यमात्रेण वा कर्मक्षयो भवति । इति व्याख्यानबलेन ते नास्तिका पूर्ववच्छिक्षणीया इति भावार्थ । णग्गत्तण अकज्जं भावणरहिय जिणेहि पण्णत्तं । इय णाऊण य णिच भाविज्ञहि अप्पयं धीर ॥ ५५ ॥ नग्नत्व अकार्य भावरहित जिनै प्रज्ञप्तम् । इति ज्ञात्वा च नित्य भावये आमान धीर।।। णग्गत्तण अकज्जं नग्नत्व सर्ववाहपरिग्रहरहितत्व अकार्य सर्वकर्म- क्षयलक्षणमोक्षकार्यरहित । कथभूत नग्नत्व, भाषणरहियं जिणेहि पण्णत्तं भावनारहित पचपरमेप्रिबाह्यभावनारहित निजशुद्धवुद्ध- कस्वभावात्मा तरङ्गभारनारहित च जिनस्तीर्थकरपरमददैरनगारके- वलिभिर्गणधरदेवैश्च प्रज्ञप्त प्रणीत प्रतिपादित कथित भणितमिति यावत् । इय पाउण य णिच्च इति ज्ञात्वा विज्ञाय नित्य सर्वकाल । भाविजहि अप्पय धीर भावयेस्त्व भात्मान दहिस्तन च हे धीर! योगीश्वर! इति सम्बोधनपदन धेय प्रति धियमीरयति प्रेर- यति इति धीरा योगीश्वरा एव प्राह्या न तु गृहस्थवेषधारिण पापिष्ठ- १नियर. टीकापाठ । २ नासह टीकापाठ । ३ भावेणेति पाठ स पुस्तके नास्ति।
- भावप्रामृत। २०३ बौंका । गृहस्थाना सम्यक्त्वपूर्वकमणुव्रतेषु दानपूजादिलक्षणेषु गुरूणा वैयावृत्यसफलेषु नियोगो ज्ञातव्य इति । तथा चोक्त रश्मीचन्द्रेण गुरुणा- चैयर्याय विरदिउ चयनियरो चिज ठार। सुफसरहो कि हसर लुजतउ धरणह जाइ ॥१॥ तं भावलिंग केरिसं हवदितं जहा-~- तद्भावलिंग कीडश भवति तद्यथा-तदेव निरूपयन्ति भावन्त देहादिसंगरहिओ माणकसाएहि सयलपरिचत्तो। अप्पा अप्पम्मि रओ स भावलिंगी हवे साहू ।। ५६॥ देवादिसंगरहित मानसपाय सकलपरित्यक्त । आत्मा भात्मनि रत समावलिटी भवेत् साधु ।। देहादिसंगरहिओ देह शरीर स आदिपा पुस्तकमण्डलुपि उ- पशिष्यशिष्याछात्रादौना कर्मनोकर्मद्रव्यकर्मभापकर्मादीना संगाना चेतनाचेतनाहिरगान्तरंगपरिप्रहाणां ते देहादिसंगा । अथवाऽऽगम- H भाषया- - क्षेत्र वास्तु धन धान्य द्विपद च चतुष्पदं । हिरण्य च सुवर्णे च पुण्य माड यहिदश ॥१॥ मिथ्यात्ययेददास्यादिषद कपायचतुष्टय । रागडेपी च सगास्युरन्तरङ्गाश्चतुर्दश ॥२॥ इति श्लोकायकथितकमेण चतुर्विशतिपरिप्रहास्तेभ्यो रहितो देहा. दिसंगरहित । माणकमाएहि सयलपरिचनो मानरूपायै सकल- पायेन विरहिते प्रतनिरोऽपि न तिष्ठति । गुपसरसि कप हस...
२०४ पटनामृते- परित्यक्त मनोवचनकायै रहित । अप्पा अप्पम्मि रओ आत्मा आत्मनि स्त । य एव विध स भारलिंगी हवे साहू स साधुर्भागलिंगी भवेत्। ममत्तिं परिवज्जामि निम्ममत्तिमुवहिदो। आलंनणं च मे आटा अपसेसाडं वोसरे ।। ५७।। ममत्व परिवर्नामि निममत्वमुपस्थित । मालम्बन च मे आत्मा अवशेषाणि व्युत्सृजामि ॥ ममति परिवजामि ममप ममता ममेदमहमस्येति भार परिव- र्जामि परिहरामि । निम्ममत्तिमुवहिदो निर्ममत्वमिति भावमुपस्थित आश्रित । आलंचणं च मे आदा यद्येन ममत्व परिहरसि निषेध करोपि तर्हि क विधि श्रयसि "एकस्य निधोऽपरस्य निधि " इति वच- नात् द्वयमत्रेति पृष्टे उत्तर ददाति आलम्बन चाश्रयो मे मम आदा आत्मा निजशुद्धबुद्धैकजीवपदार्थ इति विधि । अवसेसाई वोमरे अवशेपाणि आत्मन उद्धरितानि रागद्वेपमोहादीनि व्युत्सृजामि परिहरामि । आदा मु मज्झणाणे आदा मे दसणे चरित्ते य । आदा पञ्चक्साणे आदा मे संवरे जोगे ॥५८॥ आमा खलु मम ज्ञाने आत्मा मे दर्शने चरिने च। आत्मा प्रत्यास्याने आत्मा मे संवरे योगे। आदा सु मज्झ णाणे आत्मा निजचैतन्यस्वरूपो जौनपदार्थ खु स्पुष्ट मम ज्ञाने ज्ञानकार्य, ज्ञाननिमित्त ममात्मैव वर्तते नान्यत्किमपि ज्ञानोपकरणादिक पुस्तकपट्टिकादिकमिति भाव । आदा मे दसणे चरिते य आत्मा मे दर्शने सम्यक्त्वे सम्यग्दर्शनकार्ये नान्यत्किमपि भावप्राभृतं। २०५ तीर्थयात्राजिनप्रतिष्ठाशास्त्रश्रवणवन्दनस्तवनादिक, इत्यादि सम्यक्त्वोत्प- त्तिकारण। चरित्रे च ममात्मैव चारित्रका ममात्मैव वर्तते न तु नानाविकल्परूप व्रतसमितिगुतिधर्मानुप्रेक्षापरीपहजयादिकमास्त्रवनिरोध- लक्षणभावसवरनिमित्त ! आदा पचासाणे आगामिदोपनिराकरणलक्षण प्रत्याख्यानं प्रत्याख्याननिमित्त ममात्मैप वर्तते । आदा मे संगरे जोगे आत्मा मे मम सवरे सरनिमित्त कर्मालपनिरोधलक्षणसंचरकार्ये ममात्मैन वर्तते । योगस्य ध्यानस्य कार्ये ममात्मैव वर्तते इति भार । एगो मे सस्सदो अप्पा गाणदंसणलक्सणो। सेसा मे चाहिरा भावा सव्वे संजोगलसणा ॥ ५९॥ एको मे शास्वत आरमा ज्ञानदर्शनलक्षण ॥ शेषा मे बाधा भावा सर्वे संयोगलक्षणा ॥ एगो मे सस्सदो अप्पा एको मे शाश्वत आत्मा अपत्सवै मिन- श्वरमित्यर्थ । स आत्मा कथभूत , णाणदसणलक्सणो निश्चयेन केव लज्ञानकेवलदर्शनलक्षण, व्यवहारेणाष्टविधज्ञानचतुर्षिधदर्शनचिन्ह , मतिश्रुतावधिमन पर्ययकेवलानि सम्यग्ज्ञानं पचविध कुमतिकुश्रुतविभ- गलक्षणं मिथ्याज्ञान त्रिविध, इत्यष्टमेदा ज्ञानस्य । चक्षुर्दर्शनमचक्षुर्दर्शन- मवधिदर्शनं केवलदर्शन चेति चतुर्विध दर्शन, इति द्वादशभेद उपयोगी जीवस्य व्यवहारभूतं रक्षण । सेसा मे पाहिरा भावा शेषा ज्ञानदर्श- नयादहिभूता पुत्रकलनमित्रादय पदार्था वाह्या भावा पदार्था भवन्ति। सच्चे सजोगलक्सणा सर्वे सयोगलक्षणा सयोगेन कर्मोदयेन मिलिता इत्यर्थ । भावेह भावसुद्धं अप्पा मुविसुद्धनिम्मलं चेर। लहु चउगइ चइणं जइ इच्छह सासयं सुक्खं ॥ ६०॥ .
4 । २०६ पट्मामृते- भावयत भावशुद्ध आत्मान मुविशुद्धनिर्मलं चैव । लधु चतुर्गतिं त्यक्त्वा यदि इच्छत शास्वतं सुखम् ।। भावेह भावसुद्धं भावयत यूय कथं ? यथा भवति भावसुद्ध- भावशुद्ध परिणामस्य निष्कुटिलत्वं मायामिध्यानिदानशल्यत्रयरहितत्वं यथा भवत्येवं आत्मानमर्हत्सिद्धादिक च हे भव्या ! भावयत । "हजित्था मध्यमस्य" इति सूत्रेण तस्थाने ह । अप्पा सुविसुद्धनि- म्मलं चैव आत्मानं मुविशुद्धनिर्मलं चैत्र । आत्मान कथभूत, मुविशु. द्धनिर्मल सुष्ठु अतिशयेन विशुद्ध कर्ममलकलंकरहित निर्मलं रागद्वेपमो- हमलरहितं । लहु चउगइ चड़ऊणं लघु शीघ्र चतुर्गतिं त्यक्त्वा प्रमुच्य। जइ इच्छह सासयं सुक्खं यदि चेत्, इच्छत यूय शाश्वतमविनश्वर सौख्यं परमानन्दलक्षणमिति । जो जीनो भावंतो जीनसहावं सुभावसंजुत्तो। सो जरमरणविणासं कुणइ फुडं लहइ णिव्वाणं ॥६॥ यो जीवो भावयन् जीवस्वभाव सुभावसयुक्त । स जरामरणविनाशं करोति स्फुट लभते निर्वाणम् ।। जो जीयो भावंतो यो जीव आसन्नभव्यः भावतो-भावयन् भवति । क भावयन् भवति ! जीवसहावं जीवरसभावमात्मस्वरूपं अनन्तज्ञानानन्तदर्शनानन्तगीर्यानन्तसुखस्वरूपं केरलं केवलज्ञानमय वा आत्मानं । कथंभूतः सन्, सुभावसंजुत्तो शोभनपरिणाम- सयुक्तो रागद्वेपमोहादिविभावपरिणामरहितः । सो जरमरणविणासं कुणइ फुडं स जीवोऽन्तरात्मा भेदज्ञानरलेन जरामरणविनाशं करोति पुनर्जराजीर्णो न भवति न च म्रियते, कथं ! फुड-फुट निश्चयेन तीर्थकरो भवति । लहइ णिव्याणं लभते किं निर्वाणं सर्वकर्मक्षय- लक्षणं मोक्षं अनन्तसुखं प्राप्नोतीत्यर्थः।
भावप्राभृतं । २०७ जीयो जिणपण्णत्तो पाणसहाओ य चेषणासाहओ। सो जीयो णायच्यो कम्मक्सयकारणणिमित्ते ॥६२।। जीवो जिनप्रज्ञप्त ज्ञानस्वभाश्च चेतनासहित । सजीयो ज्ञातव्य कर्मक्षयकारणनिमित्ते। जीवो जिणपण्णनो जीव आत्मा जिनप्राप्त श्रीमद्भगवदह सर्वज्ञ- वीतरागेण प्रणीत. कथित । जीवो नास्तीति ये चुंगाक्कुशिष्या वदन्ति तन्मतमनेन पदेन निरस्तं भवतीति ज्ञातव्य ( तथा चोक्त. सदईजस्तनेहातो रक्षोदृष्टेभवस्मृतेः । भूतानन्वयनाजीवः प्रकृतिज्ञः सनातनः॥१॥ कथभूत प्रणीतः, णाणसहाओ य ज्ञानस्वभावो ज्ञानस्वरूपः । तथा चोक्त-- विभावसोरिवोष्णत्व वरपयोरिव चापल। शशास्येव शीतत्वं स्वरूप ज्ञानमात्मनः ॥१॥ इत्यनेन ये साख्या. कापिला सत्कार्यापरनामानो मिथ्यादृष्टयो चदन्ति “जीव. खलु मुक्तः सन् बाह्यग्राह्यरहितो भवति" तन्मत निराकृत भवतीति चेदितव्य । तथा चोक्त-- कपिलो यदि वाञ्छति वित्तिमचिति सुरगुरुगोर्मुकेष्वेव पतति। चैतन्यं बाह्यग्राहारहितमुपयोगि कस्य वद तत्र विदित ॥१॥ चेयणासहिओ चेतनासहित प्रतिपद्विराजमान इत्यनेन लोकायतमत निरस्तमिति ज्ञातव्य । एवं गुणविशिष्टेग जीरेन किं काय भवतीति पर्पनुयोगे सतीद प्राहु-सो जीवो णायव्यो स जीवः १ चार्वाकाकुस । २ वो टी. ३ चरेश्योनुव. स. ।
२०८ पटमाभृते- स आत्मा ज्ञातव्य । कम्मक्खयकारणणिमित्ते कर्मक्षयकारणनिमिते कर्मणा ज्ञानावरणदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नामगोनान्तरायाणां समू- लकाष कपणे जीवपदार्थ एव समर्थ इति ज्ञातव्यं । अनन्तसौख्यदान- हेतुरात्मेति भाव । जेसिं जीवसहावो पत्थि अभावो य मव्वहा तत्थ । ते हॉति भिण्णदेहा सिद्धा वचिगोयरमतीदा ॥ ३ ॥ येपो जीवस्वभावो नास्ति अमावश्य सर्वथा तत्र । ते भवन्ति भिन्नदेहा सिद्धा वचोगोयरातीता ॥ जेसिं जीवसहावो येपामासन्नमव्याना जीवस्वभार आत्मस्वभाव आत्मनोऽस्तित्वमस्ति । णत्थि अभावो य सव्यहा तत्य नास्त्यभावश्च सर्वथा तना तात्मनि अभावश्च नास्ति "अस्त्यात्मानादिवद्ध " इति पच- नात् । ते होंति भिणदेहा ते पुरपा भवन्ति भिन्नदेहा शरीर हित्ता । सिद्धा वचिगोयरमतीदाते पुरुषा किं भाति सिद्धा सिद्धि स्वात्मोपलन्धिर्विद्यते येषा ते सिद्धा प्रज्ञादित्वादस्त्यर्थेऽणप्रत्यय । कथभूता सिद्धा, वचोगोचरातीता याचा गोचरत्वे गम्यत्वेऽतीता अगम्या वक्तुं न शक्पन्ते-तसदृशाना केवलज्ञानिनां गम्या इत्यर्थ । अरममरूपमगंधं अन्यत्तं चेयणागुणसमदं । जाणमलिंगग्गहणं जीवमणिदिसंठाणं ॥ ६४ ॥ अरममरूपमग धमव्यक्त चेतनागुणसमाई। जानीहि भरिप्रहग जीवमनिर्दिष्टसंस्थान । अरसं मधुराम्टकटुतिक्तकपायपचरसरहित हे जीनव जी जानीहि । अरू सेतपीतहरितारणकृष्णलक्षणपचम्परहितं जीपमामानं जानी- १६ क पुस्तरे तोरायां च । १ टी ।
भावप्रामृतं 1 २०९ हीति दीपर्क सम्बन्ध यं । अगंधं सुरभिदुरभिलक्षणगन्धद्वयवर्जितं जीव- पदार्थ जानीहि । अन्वतं अव्यक्त इन्द्रियानिन्द्रियाणामगोचरत्वाद- स्फुटं, केवलज्ञानिना व्यक्तं स्फुटं जीरतत्वं हे जीव ! भेदज्ञानसमृद्धा- न्तरात्मन् ! जानीहि { निषेधं कृत्वा विधि दर्शयन्ति--चेयणागुण- समई चेतनागुणेन ज्ञप्तिमात्रेण सम्यक्प्रकारेणाई परिणतं । समिद्धमिति पाठे चेतनागुणेन ज्ञानगुणेन समृद्धमिति व्याख्येयं । जाणमेलिंगग्गहणं जाण जानीहि त्वं हे जीव ! अलिंगग्रहणं स्त्रीपुंनपुंसकलिंगत्रयग्रहणं स्वीकारस्तेन रहितं जीवमात्मानं विदाकुरु । व्यवहारनयेन यद्यपीयं स्त्री अयं पुमान् इद नपुंसकमिति भण्यते तथापि निश्चयनयेनात्मा शुद्धबुद्ध- कस्वभावो न लिंगत्रयवानिति । जीवमणिदिवसंठाणं जीवमात्मान, अनिर्दिष्टसंस्थान न निर्दिष्टानि जिनागमे प्रतिपादितानि संस्थानानि पडाकृतयो यस्येति अनिर्दिष्टसंस्थानस्त जानीहि । अथ कानि तानि, संस्थानानि यान्यात्मनो निश्चयनयेन नैव वर्तन्ते इति चेत् ! तन्नाम- निर्देशः क्रियते-समचतुरस्त्रसंस्थान (१) न्यग्रोधपरिमण्डलसस्थानं (२) स्वात्यपरनामवाल्मिकसंस्थान (३) कुजकसस्थान (४) वामनसंस्थान (५) हुंडकसंस्थान चेति (६) नामानुसारेण शरीराकारो ज्ञातव्य इति तात्पर्य । भावहि पंचपयारं णाणं अण्णाणणासणं सिग्धं । भावणभावियसहिओ दिवसिवसुहभायणो होइ ॥६५॥ भावय पञ्चप्रकारे ज्ञानं अज्ञाननाशन शीघ्रम् । भावानाभावितसहितः दिशिवसुखभाजन भवति ॥ १.टी.। २नि.टी.। १४ २१० पट्याभूते- भावहि पंचपयारं भावय त्व है जीन । पचप्रकारं पंचविध । !ि गाणं सम्यग्ज्ञानं । कथभूतं ज्ञान, अज्ञाननाशनं अज्ञानस्याविवेकस्य नाशनं विघसके । कथ भाग्य, मिग्यं शीघ्र लघुतया। भावण- भावियसहिओ भावना रुचिः तस्या भारित वासित तेन सहितः संहितः पुमान् सयुक्तो जीयः । दिवासिवसुहभायणो होइ दिवः स्वर्गस्य, शिव- स्प मोक्षस्य, मुखस्य परमानन्दलक्षणस्य, भाजनममत्र, भाति सजायते । पंचज्ञानविस्तरस्तत्वार्थतात्पर्यवृत्ती प्रथमाध्याये ज्ञातव्यः । मतिश्रुताव- धिमन पर्यय विलानि ज्ञानमिति नामनिर्देश । पढिएण वि फि कीरइ किंवा सुणिएण भावरहिएण। भायो कारणभूदो सायारणयारभूदाणं ॥६६॥ पठितेनापि किं कियते किंवा श्रुतेन भावरहितेन । भावः कारणभूत सागारानगारभूतानाम् ।। पढिएण वि किं कीरइ पठितेन ज्ञानेन किं क्रियते-कि स्वर्गमोक्ष विधीयते-अपि तु न क्रियते इन्यर्थ । अपिशब्दादपठितेनापि अनम्य- स्तेनापि जिव्हानेऽकृतेनापि ज्ञानेन स्वर्गो मोक्षच क्रियते इत्यर्थ । किंवा सुणिएण वा अथवा श्रुतेनाकर्णितेन ज्ञानेन किं ! न किमपि, स्वर्गम मोक्षश्च न भवतीत्यर्थः । क्यभूतेन पटितेन श्रुतेन च, भावरहिएण भानरहितेन । भावो कारणभूदो भान आत्मरुचिः जिनसम्यक्त्वकारण- भूतो हेतुभूतः । सायारणयारभूदाणं सागारानगारभूतानां श्रारकाणा यतीना चेति तात्पर्य। दब्वेण सयलनग्गा नारयतिरिया य सयलसंपाया। परिणामेण असुद्धा ण मारसपणचणं पत्ता ॥ ६७ ॥ भो.टी.1२ या.टी.।
M ~~ भावाभृत। २११ द्रव्येण सकलनग्ना नारकतिर्यश्चश्व सक्लसंघाता । परिणामेन अशुद्धा न मावश्रवणत्व प्राप्ता ॥ दव्वेण सयलनग्गा द्रव्येण वाह्यकारणन सका सर्वे जीया नग्ना वस्त्रादिरहिता । के ते, नारय नारका सप्ताधोभूमिस्थितचतुरशीति- शतसहस्रविलसजातसत्या । तिरिया य तियेचश्च पशवो जाना नग्मा एव भवन्ति । तथा सयलसंघाया नारकाणा तिरश्वा च सर्वे समूहा । अथवा सकलसघाता स्त्रीमि सह मिलिता कमनीयकामिनीभिरालि- गिता सर्वे पुरुपसमूहा अपि द्रव्येण नग्ला निर्वस्वादिका भवन्ति । कष भूतास्ते, परिणामेण असुद्धा परिणामेन मनोव्यापारणाशुद्धा रागद्वेष- मोहादिकश्मलिता । भावमवणतणं पना भारश्रवणत्व परिणाम- दिगम्मरत्व न प्राप्ता न कर्मक्षयलक्षणमोक्षनिरीक्षा बभूवुरिति पूर्वसम्बन्ध । नग्गो पावइ दुक्रां नग्गो संसारसायरे भभइ । नग्गो नलहइ बोहिं जिणभावणवज्जिओ सुइर ॥६८॥ नग्न प्राप्नोति दुख नग्न ससारसागरे भ्रमति । नग्मो न लभते घोधि जिनभावनावर्जित । नग्गो पावइ दुक्सं नग्न पुमान् प्रामोति लभते, किं दुखं है. दनभेदनशूलारोपणयत्रपीलनक्रकचपिदारणभ्राष्टक्षेपणतमलोहपुत्तलिका लिंगनवैतरणीनदीविशेषमजनकूटशाल्मलिघर्षणासिपत्रवनच्छायानियेशन- शारीरमानसागन्त्वसात नरकेषु तिर्यक्षु कुमनुष्येषु कुदेवेषु च दुख प्रामोतीपभिप्राय श्रीकुदकुन्दाचार्याणा | नगो संसारसायरे ममइ (नग्न संसारसागरे भ्राम्यति ) मजनोन्मजन करोति । नग्गो न लहइ मोहिं नग्नो जीवो बोधि रत्नत्रयप्राप्ति न लभते-अनन्तानन्तमसारे पर्य- टितोऽपि जन्मशतसहस्रकोटिभिरपि सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षका- रणानि न प्राप्नोतीत्यर्थ । कथभूतो नम, जिणभावणवज्जिओ सुइरं - । २१२ पटनाभृते- जिनस्य श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञवीतरागस्य सम्बधिनी या भावना सम्यक्त्वं तया वजिओ-यर्जित । कथे, सुइर-सुचिरमतिदीर्घकाल । तथा चोक्तं- काल अणाइ अणाइ जिउ भवसायर यि अणतु । जीवे वेषिण न पत्ताह जिणुसामिउसमतु ॥१॥ इति व्यारयान ज्ञात्वा सम्यग्दर्शने दृढभावना कर्तव्येति भाग। अयमाण भायणेण य कि ते णग्गेण पारमलिणेण । पेसुण्णहासमच्छरमायानहुलेण सपणेण ॥ ६९ ।। अयशसा भाजनेन च किं ते नमेन पापमलिनेन । पैशून्यहास्यमन्सरमायापलेन भ्रषणेन ॥ अयसाण मायणेण य अयशसामपफीताना भाननेनामनेणाधार. पत्रिण । किं ते गग्गेण पानमलिणेण हे जीव ! ते तर नाग्न्येन नग्नत्वेन किं-न फिमपि, स्वर्गमोक्षकार्यरहितेन वृथत्यभिप्राय । कथंभू तेन नाग्न्येन, पापमलिनेन पाएर मलिनेन कश्मलिना । अयया पापेति पृथक्पद तेनायमर्थ रे पाप ! पापमूर्ते दिगम्यस्येपानीक! मलिनेन अतिचारानाचारातिक्रमव्यतिममसहितेन नाग्न्येन किन किमपि । तथा चोक्त समासोक्तिना गुणभद्रेण भगता- चन्द्रम ! किमिति एन्छनयानमूस्य तद्वान् भये किमिति सम्मय एप नाभू किंज्योत्स्नया मामल तव घोपयन्या सर्मानुयन्ननु तथा सति नासि एक्ष्य ॥१॥ फ्धभूतेन ता नार पेन, पेमुण्णहासमच्छरमायारहुरेण सवणेण पैन्यहास्यम सरमायायहुलेन । पैसूर्य परदोपहर्ण । उच- कालाऽनादि अनादिनीय भवसागरोऽपि च भनम्त । जीवेनदेन प्राप्त जिनस्वामितम्याय ।। २५ री भावप्राभृतं । मा भवतु तस्य पापं परहितनिरतस्य पुरुषसिंहस्य। यस्य परदोपकथने जिव्हा मौनयतं चरति ॥१॥ हास्यं च वर्वरः। मत्सरश्च परेयां शुमद्वेषः । उक्तं च-- उद्युणस्त्वं तपस्विन्नधिकमभिभवं त्वय्यगच्छन् कपायाः प्राभूद्वोधोऽप्यगाधो जलमिव जलधौ किं तु दुर्लक्ष्यमन्यैः । नियूँढेऽपि प्रधाहे सलिलमिघ मनाग्निम्नदेशेष्यवश्य मात्सर्य ते स्वतुल्ये भवति परवशादुर्जय तजहीहि ॥१॥ माया च परवंचना । उक्तं च- यशो मारीचीयं फनकमगमायामलिनितं इतोऽश्वत्थामोन्या प्रणयिलधुरासीयमसुतः । सकृष्णः कृष्णोऽभूत्कपटयर्डवेपेण नितरा- मपिच्छमाल्पं तद्विपमिघ हि दुग्धस्य महतः ॥१॥ पैशून्पहास्यमत्सरमापाबहुले तेन तथोक्तेन । पुन फवभूतेन नाभेन, श्रवणेन निरन्तरसम्बन्धिना नानाधर्ममिपोपार्जितद्रव्येण । अथवा सवनेन यनवाससहितेन । तथा चोतं- घमेऽपि दोपाः प्रमपन्ति रागिणां गृहेऽपि पंचेन्द्रियनिग्रहस्तपः । अकुत्सिते वर्मनि यः प्रवर्तते पिमुकरागस्य गृहं तपोषन ॥१॥ पयडहिं जिणवरलिंगं अमितरभावदोसपरिसुद्धो। भावमलेण य जीवो याहिरसंगम्मि मयलियइ ॥ ७ ॥ प्रक्टय जिनदररि अभ्यन्तरमावशेषपरिशुक्षः। मावमलेन च जीवो वाह्यमने मलिनः ।। वामगच्छनिति पाठान्तरे । २ स्वतुल्यभवतीति पाठान्तरे।
२१४ पटप्रामृते- पयडहिं जिणवरलिंग है जीव ! हे आत्मन् ! प्रकटय जिनवरलिंग पूर्व जिनवरलिंग त्वं धर नग्नो भव ! पश्चात्कथंभूतो भव, अम्भितर- भावदोसपरिसुद्धो अभ्यंतरभावन जिनसम्यक्त्वपरिणामेन कृत्वा दोप- परिशुद्धो दोपरहितो भव । अयमन तात्पर्य द्रव्यलिंग विना भावलिंगी- सन्नपि मोक्षं न लभत इत्यर्थः, शिवकुमारो भावलिंगी भूत्वापि स्वर्गं गतो न तु मोक्षं, जम्बूस्वामिभवे द्रव्यलिंगी अतिकष्टेन संजातस्तस्मिंश्च सति भावलिगेन मोक्ष प्राप । भावमलेण य जीवो भावमलेनाप- रिशुद्धपरिणामेन जिनसम्यक्त्वरहिततया । बाहिरसंगम्मि मयलियइ बाह्यसंगे सति मइलियइ-मलिनो भवति सम्यक्त्वं विना निग्रन्थोऽपि समन्थो भवतीति भावार्थः । स्याद्भावेन मोक्षी द्रव्यलिंगापेक्षन्यात्, स्याद्यलिंगेन मोक्षो भावलिंगापेक्षत्वात् , स्यादुमय क्रमार्पितोमयत्वात् , स्पादवाच्यं युगपद्वक्तुमशक्यत्वात् , स्याद्भावलिंगं चावक्तव्यं च, स्याव्य- लिंग चावक्तव्यं च, स्यादुभयं चायक्तव्यं चेति सप्तभंगी योजनीया। तथा चोक्त- पयोवतो न दध्यत्ति न पयोत्ति दधिवतः। अगोरसवतो नोमे तस्मात्तत्वं त्रयात्मकं ॥१॥ धम्मम्मि निप्पवासो दोसावासो य उच्छुफुल्लसमो। निष्फलनिग्गुणयारो नडसवणो नग्गरूवेण ।। ७१ ॥ धर्मे निप्रवासो दोषावासश्च इक्षुपुष्पसमः। निष्फलनिर्गुणकारो नटश्रवणो नमरूपेण । घम्मम्मि निप्पवासो धर्मे दयालक्षणे चारित्रलक्षणे आत्मस्वरूप उत्तमक्षमादिदशलक्षणे च । तदुक्तं- १ इ.टी.
भावप्राभृतं । २१५ धम्मो यत्थुसहावोसमादिभावो य दसबिहो धम्मो। चारित्तं खलु धम्मो जीवाण य रफ्षणो धम्मो ॥ १ ॥ एवमुक्तलक्षणे धर्मे निप्पवासो-निरतिशयेन प्रयास प्रगतवास. उद्वस इत्यर्थः । दोसावासो य दोषाणा मातिचाराणामाबासो निवासः । उच्छुफुल्लसमो इक्षुपुष्पसम• इक्षुपुष्पसदृशः । निष्फलनिग्गुणयारो निष्फलो मोक्षरहितः, निर्गुणो शानरहितः । यथा इक्षुपुष्पं निष्फलं फल- रहित भवति सस्यविवर्जितं स्यात् तथा निर्गुण गन्धहीनं भवति तथा परमार्थरहितो दिगम्बरो ज्ञातव्यः । तथा निर्गुणकारः परेपा गुणकारको न भवति सम्बोधको न स्यात् । नडसवणो नग्गरूवेण नग्नरूपेण कृत्वा नटश्रवणः नर्मसचिवसदृशः । स लोकरजना नग्नो भवति तथा- यमपि । इति व्याख्यान ज्ञास्या सम्यक ज्ञाने चारित्रे तपसि च दृढ- तया स्थातव्य। जे रायसंगजुत्ता जिणभावणरहियदयनिग्गंथा । न लहंति ते समाहि वोहिं जिणसासणे विमले ॥७२॥ ये रागसगयुक्ता जिनभावनरहितव्यनिग्रन्थाः । न लभन्ते ते समाधि बोधि जिनशासने विमले। जे रायसंगजुत्ता ये मुनयो गगेण स्त्रीप्रीतिलक्षणेन, सगेन परिग्रहेण युक्ता भवन्ति । अथवा रागेण सग स्त्रीगमन कुर्वन्ति । अथरा राज- संगः अर्हद्भावना त्यक्त्वा राजसेवा कुर्वन्ति राजसेवायुक्ता भवन्ति जिणभावणरहियदबनिगंथा जिनभावनारहितद्रव्यनिग्रन्थाः, जिने भावना रुचिउँपां नास्ति ते जिनभावनारहितास्ते च तं निग्रन्था नग्नरूपधारिणो जिनभावनारहितद्रव्यनिग्रन्थाः 1 अधया जिनस्य भावना तीर्थकरनामकर्मोपार्जनप्रत्ययभूता दर्शनविशुद्धयादयो भावना: पोडश ताभ्यो रहिताः । जिनसम्यक्त्वसहिता व्यस्ताः समन्ता वा भावनास्तीर्थ- पट्याभृते- करनामकर्मदापिका भवति । दर्शनविशुद्धिरहिता अपरा पचदशापि भागनास्तीर्यकरनामकर्म नापयति । तथा चोक्त- पदापि समय जिनमनिर्दुर्गति निवारपितु । पुण्यानि च पूरयितु दातु मुक्तिश्रिय तिन ॥१॥ अथवा द्रव्यनिप्रथा बहुविधधर्ममिपेण द्रव्यमुपार्नयति ये ते द्रष्यनिप्रथा कथ्यते । न लहंति ते समाहि ते मुनय समावि रत्नत्रयपरिपूर्णतो धHशुष्टध्यानद्वर्य वा न लभते न प्राप्नुवन्ति। मोहिं जिणसासणे विमले बोधि सम्यग्दर्शनशानचारित्रलक्षणां न लभन्ते न प्राप्नुवन्ति जिनशासने श्रीमद्भगवदह सर्वज्ञवीतरागमते । कथंभूते, गिमले पूर्वापरविरोधविनिते कर्ममलकटकक्षयहेतुभूते या । भाषण होइ नग्गो मिच्छत्ताई य दोम चइउणं । पच्छा दवेण मुणी पयडदि लिंगं निणाणाए ॥ ७३ ।। भावेन भवति नग्न मिथ्यात्वादीच दोषान् त्यत्तया। पवाददम्येण मुनिः प्रयति रिग जिनालया। भावेण होइ नमो भावेन परमधर्मानुरागरक्षणजिनसम्पन्न भति, कीदृशो भवति । नग्न वनाधिपरिग्रहरहित । किं या पूर्व, मिच्छत्ताई य दोस चाऊणं मिथ्यावादीथ दोपोल्पामा मिध्यान्या- पिरतिप्रमादकपाययोगलक्षणास्पद्वाराणि त्यागा। पन्छादवेण मुणी पश्चात् भारटिंगधरणादन तरं मुनिर्दिगम्बर । पयहि लिंगं जिणा- पाए प्रक्टयति सुटीकरोति, किं तत् । टिंग-मिनमुद्रा, क्या। जिणाणार-निनस्याच्या जिनमम्यवन सम्पान्यभ्रद्धानम्पेगति बीना- पुरन्यायेनोमय सलग्नं दान। भारलिंगेर द्रम्पटिग द्रव्यागेन मायटिंग भरायुभयमेव प्रमाणीकाय! एकान्तमनेन तेन सीन मयताति वेदितव्य | अलं दुराग्रहणेनि।
भावप्राभृतं । २१७ मावो वि दिव्वसिवसुक्राभायणो भाववन्जिओ सवणो। कम्ममलमलिणचित्तो तिरियालयभायणो पावो ॥७४॥ भावोपि दिव्य शिवसुखभान भावरर्जित श्रवण । कमलमलिनचित्त तियंगालयभाजन पाप । भावो वि दिव्वसिपसुक्सभायणो इति विपुलानाम-गाधारक्षण। भावोऽपि, अपिशव्दाद्व्यलिंगमपि । दिव्य दिवि भव दिव्य सौधर्मशान- देवीरतिक्रम्यान्यतरमहद्धिकदेवसुखं सौधर्माद्यच्युतस्वर्गपर्यन्त मुख द्रव्य- लिगमन तरेण भावनीय । तद्युक्तद्रव्यलिंगेन सर्वार्थसिद्धिपर्यत सुखं ज्ञातव्य । कस्यचिदभव्यस्य भारलिंगमन्तरेण द्रव्यलिगेन नवौवे यकपर्यत पुन पुनर्भरपातहेतुभूत सुख ज्ञातव्य । तेनास्य पादस्य पुनरर्थ प्रकाश्यते। भावोऽपि दिव्यशिवसौख्यभाजन स्वर्गमोक्षसौरय भाजनं । भाववज्जिओ सपणो भावर्जित श्ररणा जिन- सम्यक्त्वरहितो दिगम्बर । कम्ममलमलिणचित्तो कर्ममलन अतिचा- रानाचारातिक्रमव्यतिक्रमचेष्टितोपार्जितपापेन दोपेण मलिनचिन मलिन मलपित चित्तगामा यस्य स भाति फर्गमलमलिनचित्त । तिरि यालयभायणो पायो तिर्यगालयभाजन तिर्यग्गतिस्थान भवति, पाप पापारमा विचित्रमतिनाममंत्रिपुत्रवत् । सयरामरमणुयकरजलिमालाहिं च संथुया विउला । चकहररायलच्छी लम्भेइ बोही ण भल्वणुओं ॥७५ ।। १ सयरामरमणुयाण अनलिमालाहि घ पुस्तके पार । २ सुभावेणेनि पाठा तरे ।ध पुस्तके च। ३ अस्मानाथासूत्राइन । पुस्तके इमे गाथासूत्रे समुपलभ्येते । मुद्रित पुस्तके च । न चोपलभ्येते व ग इति प्राचीनलिखितमूलपुस्तके । क ख इति रीका पुस्तके च न स्त एष । टीकाप्यनयोनास्ति । ते च घ पुस्तरोकटोका- सहिते पत्र लिख्यते । (अप्रतनपृष्ठे ) २१८ पट्प्राभूते- खचरामरमनुजानाम जलिमालाभि सस्तुता विपुला । चक्रधरराजलक्ष्मी लभ्यते बोधि न भन्यनुतो ॥ खयरामरमणुयकरजलिमालाहि च इयमपि पिपुला गाथा ज्ञातव्या । अस्या अयमर्थ ---खचरामरमनुजकराअलिमालाभिश्च खे चरन्त्याकाशे गच्छन्तीति खचरा विद्याधरा उभयश्रेणिसम्बन्धिन, न प्रिय ते बहुकालेन प्रच्यवन्तेऽमरा व्य तरदेवा , मय-प्रतिश्रुत्यादिभ्यो जाता मनुजा , खचरामरमनुजारतेपा कराजलय करवुनलानि तेषां मालाभि श्रेणिभिश्च । संथुया-सस्तुता । चक्रवर्तिना च तथा मण्डले. सरमहामण्डलेश्वरार्धमण्डलेश्सराणा राज्ञा लक्ष्मी चम्धरराजलक्ष्मी । लम्मेइ बोही ण भव्यणुओं एतादृशी लक्ष्मीविभूतिलभ्यते प्राप्यते जीवनेति, बोही ण-पर बोधिर्नलभ्यते। कथभूता बोधि , भव्यनुता भाव तिविहपयार सुहासुह सुद्धमेव णादग्व । असुह भट्टरउद्द सुह धम्म जिणवरिंदेहि॥१॥ भाव विविधप्रकार शुभोऽशुभ शुद्ध एव ज्ञातव्य । भशुभ आर्तरोन शुम धयं जिनवरेन्द्र । टीका-भाव निविध प्रकार शुभ अशुभ युद्ध एव निश्चयेन ज्ञातव्य । अशुभ मातेरीद । शुभ धर्मध्यान जिनवरेन्द्र कथितम् । मुद्ध सुद्धसहाव अप्पा अप्पम्मित च णायव । इदि जिणवरेहि मणिय 1 सेप त समायरह ॥२॥ शुद्ध शुद्धस्वभाव आमा भारमनि सच ज्ञातस्य । इति निनवरे भणित पच्छेय तत् समाचर ॥ टीका-हे मुने । शुद्ध निर्मल शुद्धस्वभाव त भात्मान आत्मनि सातम्य । इति जिनवरैमाणित कथित ! यच्छेय कल्याणकारि तत् समावर कुर्विति । 1 अस्य स्थाने मनुष्या इति स पुस्तक पाउ ।२ या टी ।
भावप्राभृत। भव्यपरपुण्डरीकै स्तुता प्रशसनीया । अथग हे भव्यनुत ! आसन्न- भव्यजीव ! त्वमिद जानीहीति शेष । पयलियमाणकसाओ पयलियमिच्छत्तमोहसमचित्तो। पावइ तिहुयणसार बोही जिणसासणे जीवो ।। ७६॥ प्रगलितमानकपाय प्रगलितमिथ्यात्वमोहसमचित्त । प्राप्नोति निभुवनसारां बोधि जिनशासने जीव ॥ पयलियमाणकसाओ प्रगल्तिमानकपायो मानकपायरहित । पयलियमिच्छत्तमोहसमचित्तो प्रगलितमिथ्यात्वमोहसमचित्तो यद्वि- परीत तमिथ्यात्वं, मोहो वैचित्य निर्मिवेकता पुत्रमित्रकला दिनह , प्रगती विनाश प्राप्तौ मिथ्यात्लमोही यस्य स प्रगलितमिथ्यात्वमोह , सम सर्वत्र तृणसुवर्ण-सर्पसृक्-शत्रुमित्र-सुखदु ख-बनभान-पुरारण्यादिषु समान चित्त मनो यस्य स समचित्त । पावइ तिहुयणसार प्राप्नोति लभते । का, बोही बोधि रत्नत्रयप्राप्ति । कथभूता बोधि, तिहुयण सार-त्रैलोक्योत्तमा। जिणसासणे जीरो जिनशासने सर्वज्ञवी तरागस्वामिनो मते । मानमिध्या यमाहरहितो जीयो बोधि प्राप्नोतीति जिनपचन ज्ञातव्यमिति । विसयविरत्तो समणो छ।सवरकारणाई भाऊणं । तित्थयरनामकम्म संघइ अइरेण कालेण ॥७७ ॥ विश्यविरक भ्रमण पोडशवरकारणनि भावयित्वा । तीर्थकरनामकर्म बध्नाति अचिरेण कालेन। विसयविरत्तो समणो विषयेभ्य पंचेन्द्रियार्थेभ्यो चिरक्त पराङ्मुस । स्पर्शरसगधवर्णशब्देश्य श्रमणो दिगम्बर , न तु २२० - पटप्राभृते- खेताम्बरादिक प्रयारयानादिहान , तप क्शसह श्रमण उच्यते न तु बहुपारं जलस्य पाता भोजनस्य भोक्ता च । छद्दसपर कारणाड भाऊण घोडशसरकारणानि भावयिवा । तित्ययरनाम कम्म बधइ तीर्थकरनामकर्म बध्नाति विनवतितमी प्रकृति स्वी कराति यया त्रैलोक्य सचलयति पादाध करोति । अइरेण कालेण अचिरेण कालेन अतमुहूर्तसमयन, यया पचकल्याणलक्ष्मी प्राप्ताति, अनतकालमनन्तसुखमनुभवति, अनायासेन मोक्ष प्राप्नोति । अथ कानि तानि पोडशकारणानि यैस्तीर्थकरनामकर्म बध्यत इति चदुच्यत- दर्शनविशुद्धिविनयसम्पन्नता शीव्रतेप्यनतिचारोऽभीषण शानोपयोगसवेगी शक्तितस्त्यागतपसी साधुसमाधियाय करणमहदाचाययहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभाव ना प्रवचनव सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य इयुमास्यामिसूरिणा प्रोक्त सूत्र । अस्यायमर्थ -इहलोकभय-परलो कभय-वैदनांभय मरणर्भय आमरक्षणोपायदुर्गाद्यभावागुप्तिमय-अत्राणभ यारक्षणभय विद्युपातायाकस्मिकभय इति सप्तभयरहितत्व नि शकितवं निप्रथलक्षणो मोक्षमार्ग इति जिनमत तधेति या नि शकितत्व (१) इहलोकपरलाकभोगोपभोगाकाक्षानिवृत्तिनिष्कांक्षित्वं (२) शरीरादौ शुचाति मिथ्यासंकल्परहित वं निर्विचिकिसता, मुनीना रनत्रयमडितशरीरमलदर्शनादौ निशूर्व तत्र समाढौत्य वैयावृयविधान वाविचिकिसता (३) परत वेषु मोहोम्झकत्वममूरदृष्टिन्च (४ उत्तमक्षमादिभिरामनो धर्मवृद्धिकरणे सघदोपाच्छादन चोपर्वहण मुपगुहन (५) कपायरिपयादिभिर्धमविध्वंसकारणेपु सस्वपिधर्मप्रय्य वनरक्षण स्थितिकरण (६) जिनशासने सदानुरागता पा सल्यं (७) भावप्राभृतं । २२१ सम्यग्दर्शनशानचारित्रतपोभिरात्मप्रकाशनं शासनोद्योतकरणं वा प्रभा- वना (८) एतैरष्टभिर्गुणैर्युक्तत्व चर्मजलतेलघृतभूतनाशनाऽप्रयोग- (वं मूलकगर्जरसूरणकन्दगृजनपलाण्डुपिशदौग्धिकलिंगपचपुष्पसधान- ककौसुभपत्रपत्रशाकमासादिभक्षकभाजनभोजनादिपरिहरण च दर्शनवि. शुद्धि (१) ज्ञानदर्शनचारित्रेषु तद्वत्सु चादरोऽकपायता या विनयसम्पन्नता (२) निरवद्यावृत्ति शीलवतेष्वनतिचार (३) सन्तत ज्ञानस्योपयोगोऽभ्यास अभीक्ष्णज्ञानोपयोग (४) संसारागीरत्वं सवेग (५) स्वशक्त्यनुरूप दान (६) मार्गाविरुद्ध कायश्लेश- स्तप (७) मुनिगणतप सन्धारण साधुसमाधि (८) गुणरता दु खोपनिपाते निरवद्यवृत्या तदपनयन वैयावृत्य (९) अर्हत्सु केव- लिपु अनुरागो भक्ति (१०) आचार्येष्वनुरागो भक्ति (११) बहुश्रुतेष्वनुरागो भक्ति (१२) प्रवचनै जिनसूत्रेऽनुरागो भक्ति (१३) सामायिक सर्वजीवेषु समत्व, चतुर्विशतिजिनाना स्तुति स्तव कथ्यते, एकजिनस्य स्तुतिन्दनाभिधीयते, कृतदोषनिराकरण प्रतिक्रमण, आगामिदोषनिराकरण प्रत्याख्यान । एकमुहूर्तादिषु शरीरव्युत्सर्जन कायोत्सर्ग एतेषा पण्णामावश्यकानामपरिहाणिरेका चतुर्दशी भावना ( १४ ) ज्ञानादिना धर्मप्रकाशन मार्गप्रभावना ( १५) सध- मणि स्नेह प्रवचनवत्सलत्व (१६) एता पोडशभावना समस्ता. स्तीर्थकरनामकारण दर्शनविशुद्धिसहिता व्यस्ता अपि तीर्थकरनामकारणं भवतीति ज्ञातव्यं । वारसविहतवयरणं तेरसकिरियाओ भाव तिविहेण । धरहि मणमत्तंदुरियं णाणांकुसएण मुणिर्पवर ॥ ७८ ॥ १ मणमत्तणार्य ग.। मनोमत्तनाग । २ मुणिपवरा ग. घ ।
२२२ पट्माभृते- द्वादशविधतपधरण त्रयोदशक्रिया भावय निविधेन। धरमनोमत्तदुरित ज्ञानाकुशेन मुनिप्रवर !॥ वारसविहतवयरण द्वादशविध तपश्चरण अनशनमुपास , अवमो दर्यमेकग्रासादिरल्पाहार , वृत्तिपरिसरयान गणितगृहपु भाजन वस्तु सरया या, रसपरियाग पडसविवर्जन, विविक्तपु ज तुस्त्रापशुनपु सकरहितेषु स्थान' शून्यागारादिपु आसन उपवशन शय्या निद्रा स्थानं अमस्थानं वा विविक्तशय्यामन, कायक्लश जलौदनभोजनादि । इदै पड़िध बाह्य तप । बाह्य क्रमादिति चत् । बाह्य भोजनादिकमपेक्ष्य प्रवर्तते, परप्रत्यक्ष वा प्रवतते, परदशन पापन्गृिहस्थैश्च क्रियते सतो बाह्यमुच्यत। एतस्मात्तपस कर्मदहन इद्रियतापकारिय च भवति । सयमो रागोच्छद कर्मनाशो ध्यानादि आशानिवृत्ति शरीरते जाहानि ब्रह्मचर्य दु खसहन सुखानभिष्वङ्ग आगमप्रभावनादिक च फल ज्ञातव्य। पडविधमभ्यतरं तप, यत परतीयैरनालीढ स्वसवेद्य बाह्यद्रव्यानपेक्ष्य ततोऽम्यन्तर तप उच्यत । तकि। प्रायश्चित्तविनय वैयादृयस्वाध्यायव्युसर्गध्यानलक्षण । तत्र नवविध प्रायश्चित्तं, चतुर्विधा विनय , दशविध वैयावृय, पचविध स्वाध्याय , द्विविधो व्यु सर्ग , चतुर्विध ध्यान चेति पडविधमभ्य तर तप इति द्वादशविध तप । कि तन्नाविध प्रायश्चित्तमिति चत् । गुरारने स्वप्रमादनिवेदन दशदोष रहितमालोचन । के ते दशदाषा आलोचनाया इति चेत् ।- . - जरोदनभोजनस्यागादि ख ।
भाषप्राभूत। ૨૨૨ आकपि अणुमाणिअ ज दि वासर च सुहम च । छन्न सघाउलअ बहुजणमन्यत्त तस्सेवी ॥१॥ पुरुषस्यैका ते द्वयाश्रयमालोचन, स्त्रियास्तु प्रकाशे त्र्याश्रयमालोचन, महदपि तपश्चरणमालोचनरहित तप्रायश्चित्तमकुर्वतो वा अभीष्टफलद न भवतीति ज्ञातव्य । दोपमुच्चार्योचार्य मिथ्या मे दुष्कृतमस्तु इत्ये- वमादिरभिप्रेत प्रतीकार प्रतिक्रमण । एतत्प्रतिक्रमणमाचार्यानुज्ञया शिष्येणैर कर्तव्य । आलोचन प्रदाय प्रतिक्रमणमार्येणे कर्तव्य तत्त- दुभयमुच्यते । शुद्धस्याप्यशुद्धत्वेन यत्र सन्देहविपर्ययौ भवत अशु द्धस्य शुद्धत्येन निश्चयो वा यत्र, प्रत्याख्यात यत्तद्वस्तु भाजने मुखे वा प्राप्त, यस्मिन् वस्तुनि गृहीते कपायादिकमुत्पद्यते तस्य सर्वस्य स्पागो विवेक । नियतकालकायमानसा त्यागो व्युत्सर्ग । तपो बाह्यं कथितमैन । दिनपक्षमासादिविभागेन दीक्षाहापन छेद । दिवसादिविभागेनैव दूरत परिवर्जन परिहार । महावताना मूलच्छेदन कृत्या पुनर्दीक्षाप्रापणमुपस्थापना । आचार्यमपृष्ट्वा आता- पनादिकरपणे पुस्तकपिच्छादिपरोपकरणग्रहणे परपरोक्षे परपरोक्षे प्रमादत आचार्या दिवचनाकरणे सवनाथमपृष्ट्वा स्वसघगमने देशकालनिय- मेनावश्यकर्तव्यव्रतविशेषस्य धर्मकथादिव्यासगेन विस्मरणे सति पुन करणे अन्यत्रापि चैवविध आलोचनमेव प्रायश्चित्त । पडिन्द्रियवागादि- दुष्परिणामे, आचार्यादिषु हस्तपादादिसघट्टने, व्रतसमितिगुप्तिषु स्वल्पा- तिचारे, पैशून्यकलहादिकरणे, वैयाऋत्यस्वाध्यायादिप्रमादे, गोचरगतस्य लिंगोत्थाने, अन्यसक्लेशकरणादौ च प्रतिक्रमण प्रायश्चित्त भवति । दिन- । भाकम्पित अनुमानित यदद्दष्ट यादर, च सूक्ष्म घ। स शब्दाकुलित बहुजन अन्यक्त तरसेवी ॥ अस्थाय नवमे पृष्ठे दर्शनीय । ।
। २२४ पटनाभृते- सान्ते राज्यन्ते भोजनगमनादौ च प्रतिक्रमणे प्रायश्चित्तं । लोचनखच्छे- दस्वप्नेद्रियातिचाररात्रिभोजनेषु पक्षमाससव सरादिदोषादी च उभयं आलोचनप्रतिक्रमणप्रायश्चित्त । मौनादिना लोचकरणे, उदरकृमिनिर्गमे, हिममशकादिमहानातादिसहतिचारे, स्निग्धभूस्तितृणकोपरिगमने, जानुमानजलप्रदेशकरणे, अन्यनिमित्तवस्तुस्वोपयोगकरणे, नागदिनदी- तरणे, पुस्तकप्रतिमापातने, पचस्थावरविघाते, अदृष्टदेशतनुमलपिस- गीदौ, पक्षादिप्रतिक्रमणक्रियाया, अन्ताख्यानप्रवृत्यन्तादिषु कायो- सर्ग एव प्रायश्चित्त । उच्चारप्रसवणादौ च कायोत्सर्ग प्रसिद्ध एव । अनशनादिकरणस्थानमागमाद्वोद्धव्य | नाविधप्रायश्चित्ते किं फलं : भावप्रमादोऽनवस्था शल्यामानदाादिक फलं वेदितव्य । अनलसेन देशकालादिपिशुद्धिविधानज्ञेन सबहुमानो यथाशक्ति क्रिय- माणो मोक्षा) ज्ञानग्रहणाभ्यासस्मरणादि ज्ञानविनय तित्वश्रद्धाने नि श- कितत्वादिदर्शनविनय । ज्ञानदर्शनरतो दुश्चरण तद्वति च ज्ञानेऽति भक्तिीवतश्चरणानुष्ठान चरणपिनय । प्रत्यक्षेप्याचार्यादिष्वभ्युत्थान- वंदनानुगमनादिरात्मानुरूप परोक्षष्वपि तेष्वञ्जलिक्रियागुणकीर्तन- स्मरणानुज्ञानुष्ठायित्वादिश्च कायवाड्मनोभिरुपचारविनय । विनयस्य किं फल ! ज्ञानलाभ आचारशुद्धि सम्यगाराधनादिश्च पिनयम्य पलं वैदितव्य । इति चतुर्विधी पिनय । दशविध वैयावृत्य । तथा हि । आचार्यस्य चैयाध्य, उपाध्यायस्य वैयावृत्य, महोपनासाद्यनुष्ठायितपस्विनो वैयावृत्य, शास्त्राभ्यासी शैक्ष स्तस्य वैयावृत्य, रुनादिलिष्टशरीरो ग्लानस्तस्य वैयावृत्य, स्थनिरसन्तति- गणस्तस्य चैयाहत्य, दीक्षकाचार्यशिष्यसप कुठं तस्य यादृत्य, ऋपि १ पुस्तद्वयेऽपीगेव पाठ , अनगारधर्मामृते तु मोनादिना विनालोचनकरणे इति । २ वतो । ३ वरपरणे पाटान्तरं ।
भावप्राभूत । मुनियत्यनगारनिवह सघ, अथवा प्राध्यापिकाधारकश्राविकानिवहः । संघस्तस्य वैयावृत्य, चिरप्रबजित्त साधुत्तस्य वैयाकृप, विद्वत्तारकृत्या- दिलोकसम्मतोऽसंयतसम्यग्दृष्टिी मनोजस्तस्य वैयावृत्य । किं तद्रया- दृत्य । एतेषा दशरिधानामाचार्यादीना व्याधिपरीपहमिथ्यावादे प्रासु- कौपधभक्तादिप्रतिश्रयसस्तरादिभिर्धर्मोपकरण सम्यक्त्वप्रतिस्थापन च प्रतीकारो वैयावृत्य । बासन्याभारे स्वकाये (न) श्लेष्मावतर्मसाप- कर्पणादिस्तदानुकूल्यानुष्ठान च वैयावृत्य । वैयावृत्यकरणे कि फले । समा (ध्या) धान । वाचना-सशयच्छेदाय निश्चितपलाधानाय वा प्रथार्थोभयस्य पर प्रत्यनुयोग । आमोन्नतिपरातिसन्धानोपहासादिवर्जित पृच्छना । अधिगतार्थस्यैकाप्येण मनसाभ्यासोऽनुप्रेक्षा । घोपशुद्ध परिवर्तनमानाय । दृष्टादृष्टप्रयोजनानपेक्षमु मार्गनिवर्तनसन्देहच्छेदापूर्वार्थप्रकाशनाद्यर्थो धर्म- कथानुष्ठान धर्मोपदेश । पचविधस्य स्वाध्यायस्य किं फलं । प्रज्ञाति- शयप्रशस्ताव्यवसायप्राचनस्थितिसयोच्छेदपरयादिशकादाभावसवैगता- इयतिचारविशुद्धादर्थ पवविध स्वाध्याय । नियतकालो यारजीव या कायस्य त्यागोऽभ्यन्तरापधिव्युत्सर्ग । बाधस्त्वनेकप्रायो व्युत्सर्ग । नि संगत्वनिर्भयत्वजीविताशायुदासदोषो- च्छेदमोक्षमार्गभावनापरत्यादि व्युत्सर्गफलम् । अथ ध्यानं नाम द्वादश तप उच्यते तदर्थगिद सूत्रमुमास्वामिनि "उत्तमसहनस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् ।" अस्यायमर्थ -वजऋपभनाराचसहनन, बननाराचसहननं, नाराच- संहनन सहननत्रयमुत्तम सहनन मोक्षादिकारणवात् । प्रथम सहनन मोक्ष्यस्य हेतु ( ध्यानस्य हेतुस्त्रितयमपि भवति । अर्धनाराचस्य कौलि. पद १५ २२६ पटनामृत- काया अप्रातामृपाटिकायाश्च संहननत्रयस्यान्तर्मुहूर्तकाल यावञ्चितानि रोधधारणायामसमर्थत्वात् । गमनभोजनादिक्रियाविशेपेष्वनियमेन प्रवर्त मानस्यात्मन एक्स्या क्रियाया कर्तृत्वनावस्थान निरोध -क्रियान्तर- व्यवधानाभावेन एकक्रियाया सातत्येन प्रवृत्तिनिरोध इत्यर्थ । एकामे एकार्थे एकस्मिन्नने प्रधाने वा वरतुनि चितानिरोध -एफस्मिन् द्रव्ये पर्याये तदुभयात्मके स्थूले सूक्ष्मे या चितानिरोध इत्यर्थ । अथवा सयान, अप्र मुख, एकमग्र यस्य स एकान स चासौ चिन्तानिरोधचै- कामचिन्तानिरोध एकस्मिन्नर्थे वर्तमानचि तानिरोध एकमुख सद्धयान, भनेकनाक्षसूनादौ अनेकमुख सयान न भवति यथा प्रदीपशिखा अनिरावाधेन परिस्पदते तथाऽनिराकुलताया ध्यान न स्यात् । गुप्ति- समितिधर्मानुप्रेक्षापरीपहजयचारित्रादिकं यत्सपरफारण तदेव च्यानका रणमिति ज्ञातव्य । आन्तर्मुहूर्तात् मुहूर्तमध्ये ध्यान भवति । न घाधिक कालो ध्यानस्यास्ति, कस्मात् । चिन्ताना दुर्धरत्वात् अतिवप स्त्वाच । एतावत्यपि काले ज्वरदचलं म्यान मर्मवसाय भवति प्रलयकालमारुतवत् समुद्रजलशोपणवत् । तद्ध्यान हैयमुपादेयं च । तर हेयमा रौदै च । उपादेय धम् शुश च । ती दुखे भवमात । रुदा क्रूराशय प्राणी तत्कर्म रौदें। धर्मो वस्तुस्वरूपं तस्मा दनपेत आश्रित धये । मलरहितात्मपरिणामोद्भर्व गुर। तन धन्य शुक्कं च द्वय मोक्षकारणं । ससारकारणम पवयमारौिद्रमिति ज्ञातव्यं । आर्तममोनजस्य संप्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारो वार या चिन्तन । मनोज्ञस्य विपरीत चितनं तद्विपरीत वेदनाधितन तद्विपरीत निदानस्य चिन्तन । हिंसानृतस्तेयस्यियसंरक्षणेम्यो रोद ध्यानमुपचते। भात अविरतदेशविरतप्रमत्तस्यते समवति । रौद्ध अविरतदेशपिरने, सैभवति । आज्ञापायविपासस्थानविचौHध्यानमुत्पद्यते । तपूर्व- - । भावप्राभूत। २२७ विदो मुने श्रेण्यारोहणापू भवति । श्रेण्योरपूर्वकरणाद्युपशान्ता ताना प्रथम शुक्ल भवति । क्षाणस्पायस्य द्वितीय शुरू । तृतीय शुक्ल चतुर्थ च शुभ वेवलिना भाति । तत्र सयोगस्य तृतीय, चतुर्थमयोगस्येति । पृथ क्ववितर्कवीचार प्रथम शुक्ला एक्लवितर्कापीचार तृतीय शुक्ल । सूक्ष्म क्रियाप्रतिपातिनामक तृतीय शुक्ल । भ्युपरतक्रियानिातिनामधेय चतुर्थ शुक्ल । तर पृथक्त्ववितर्कत्रीचार त्रियोगस्य भगति मनापाकायावष्टम्भै रामप्रदेशपरिस्प दान् बीन् योगानलम्ब्य अष्टभ्य उत्पद्यत इत्यर्थ एक्त्ववितर्काविचार त्रिषु योगेषु मध्ये एकस्य चलनद्वारणा मपरिस्पन्दे सति समुत्पद्यत इयर्थ । काययोगस्य विलिन सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति शुक्ल भवति । अत्र कायावष्टम्भेने मनश्चलन ! अयोग पन्निो व्युपर तक्रियानिवार्त शुक्लध्यान यतोऽत्र कायायपष्टम्भेनात्मप्रदेशचलन न भवति । पृथक्त्ववितर्कवीचारमेकत्ववितर्कनीचार ध्यानद्वय पुष्वीतिन एच । पितर्कपीचारसहित पूर्व । द्वितीय तु चीचाररहित । वाचार कि। अर्थन्यजनयोगसकाति/चार परिवर्तनमित्यर्थ । अर्थसक्राति का? द्रव्य विमुच्य पर्याय गच्छति पर्याय विहाय द्रव्य समुपती यथस क्रान्ति । एक वचन त्यक्या वचना तरमत्रलम्बते तदपि त्यक्त्वाऽयद्वचनमवल म्बते इति व्यञ्जनसक्रान्ति । शाययोग त्यस्त्वा योगान्तर गच्छति सदपि त्यक्त्या काययोग बजतीति योगसक्राति । एव श्रुतज्ञानेन वितर्य समूह्य द्रव्य त पर्याये पर्यायान् पितय॑ ततो द्रव्ये परिवर्तने धीचारे सति पृथक्त्वेन भेदेन अर्थपर्यायये वचनयोगयोर्वा श्रुतज्ञान पर्यालोचनेन सक्राति पृथक्त्ववितर्कवीचार शुक्लध्यान भवति । यद्यप्य र्थव्यागादिसक्रान्तिरूपतया चलन वर्तते तथापि इद ध्यान । यस्मात् । एवविधस्यैवास्य विवक्षितत्वात् । विजातीयानकविकल्परहितस्य अर्था- दिसंक्रमेण चिताप्रबधस्यैव एतद्धधानत्वेनेष्टत्वात् । अथवा द्रव्यपर्या- २२८ पट्प्रामृते- यात्मनो वस्तुन एकत्वात् सामान्यरूपतया व्यञ्जनस्य योगाना चैकीकर- णादेकार्थचिन्तानिरोधोऽपि घटते । द्रव्यात्पर्याय व्यञ्जनाद्वयसनान्तरं योगायोगान्तरं विहाय अन्यत्र चिन्तावृतौ अनेकार्थता न द्रव्यादे पर्या- यादी प्रवृत्तौ । तथा श्रुतज्ञानेन एकाथै रितर्कयत्नविचलितचित्त प्रवृत्त क्षीणकपाय एकत्ववितर्कवान् भवति । वाङ्मनोयोग बादरक- पाययोग च परिहाप्य सूक्ष्मकपाययोगालम्बनोऽन्तर्मुहूर्तशेषायुर्वेद्यनाम गोत्र सूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिभाग्भवति । यदा पुनरायुपोऽधिक वेद्यादि- त्रितय तदा दण्डकपाटादिक चतु समयै कृत्या पुनस्तावत्समय समु- पहृत्य समीकृतकर्मचतुष्टय सूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिध्यान न्यायति । ततोऽ योगिन समुच्छिन्नक्रियानिवृत्तिव्युपरतक्रियानिवृत्यपरनामकं ध्यान भवति । तस्मिन् स्थाने स्थितस्य सर्वास्तवनिरोधात् सर्वशेषकर्मविश्व- सनसमथै सम्पूर्ण यथाख्यातचारित साक्षान्मोक्षकारण सजायते । अन्त्ये शुलध्यानद्वये चिन्तानिरोधाभावेऽपि ध्यानन्यवहार ध्यानकार्यस्प योगा पहारस्य अघातिघातस्य चोपचारनिमित्तस्य सद्भावात् । तथा साक्षात्कृ- तसमस्तरस्तावहति न किंचिद्धयेयमस्ति । ध्यान तु तत्र असमानकर्मणा समानत्वकरणा) या चेष्टा, कर्मसाम्ये तत्क्षययोग्यसमया या अलौकिका मनीपा तदेव सौख्य मोहक्षयाज्ज्ञानावरणदर्शनावरणक्षयाचात्मनो दर्शन ज्ञान च भवति । अन्तरायविनाशादनन्तवीय जीवस्य स्यात् । आयुकर्मविधसनाचतनस्य जन्ममरणाभानो भवति । नामकर्मनिटना- मरस्यामूर्तलं जायते । नीचोच्चगोनपिनासनाकुलद्वयविनाशो भवति । वेदनीयकर्मनिर्मूलकाय कपणात् जीवस्येन्द्रियोत्पन्नमुखाभार संजायते । १-२ पुस्तक्रयेऽपि ईगेव पाट किन्तु कषायस्थान कायेनेति पाठन भवि. तध्य आगमाविरुद्धत्वात् । पायाना तमाभावाच म तेषा हापन सूक्षमीकरणत्व २ सयोगिगुणस्याने घटते।३ समीपकत क १४ ज्ञानावरणक्षय न स ।
। 1 भावप्राभृतं । २२९ एकस्मिनिटे वस्तुनि निश्चला मतिषानं । आर्तरौद्रधर्मापेक्षया तु मति- चंचला अशुभा शुभा वा सा भावना कथ्यते, चित्तं चिन्तनं अनेकन- ययुक्तानुप्रेक्षणं ख्यापन श्रुतज्ञानपदालोचनं वा कथ्यते न तु ध्यान । अत्र संहननलक्षणं यथा यदुदयादस्थिवन्धनविशेषस्तत्संहनन पट्प्रकारं । बजाकारोभयास्थिमध्ये सवलयबन्धनं सनाराच वनपभनाराचसंहननं । तदेय वलयरहितं वमनाराचसंहननं। वनाकारवलयव्यपेतं सनाराचं नाराचसंहनन । एकमस्थि सनाराचं अपरमनाराच अर्द्धनारावसंहनन । उभयास्थिप्रान्ते सकीलकं कालिकासंहनन । अन्तरप्राप्तपरस्परास्थिसन्धि- बहिःशिरास्नायुमांसवेष्टितं असंप्राप्तास्पाटिकासंहननं चेति । अष्टसप्तति- तम्या गाथायी वारसविहतवयरणं इत्यस्य पादस्य व्याख्यानं समाप्त । तेरसकिरिया भावि तिविहेण त्रयोदशक्रिया भावय त्व त्रिविधेन त्रिकरणशुद्धया पचनमस्काराः, पडावश्यकानि, चैत्यालयमध्ये प्रविशता निसिही निसिही निसिही इति वारनयं हृद्युञ्चार्यते, जिनप्रतिमावन्द- नाभक्ति कृत्वा बहिनिर्गच्छता भव्यजीवेन असिही असिही असिही इति धारत्रय हृद्युच्चार्यत इति त्रयोदशक्रिया हे भव्य । त्वं भावय । तथा चोक्तं-- निःसंगोऽहं जिनानां सदनमनुपमं त्रिःपरीरयेत्य भनया स्थित्वा गत्या निषिद्धधुचरणपरिणतोऽन्तः शनैहस्तयुग्मं । भाले संस्थाप्य युद्धया मम दुरितहरं कीतये शक्रान्चं निन्दादूरं सदाप्तं क्षयरहितममुं शानभानुं जिनेन्द्रं ॥१॥ अरे लौंका दुरात्मानो ! यदि भवद्भिर्जिनप्रतिमा चैत्यालपश्च न मान्यते तदेदं वृत्त पूज्यपादैर्जिनवन्दनाविधिः कथमुक्तः । तेन दुराग्रह विमुच्यास्तिकत्वं भारनीयं भगद्रिः । अथवा पंचमहाव्रतानि पंचसमितय- स्तिस्रो गुप्तयश्चेति त्रयोदशक्रियास्त्रयोदशविधं चारित्र हे भव्यवरपुण्ड- पट्मामृते- राकमुने ! ल भाग्य । धरहि मणमत्तदुरयं विषयकपायान् गन्ठतं मनोमत्ताद्वरद मतगत व धर रक्ष । णाणंकुसरण मुणिपरर ज्ञाना- कुशेन निष्ठुरमस्तकप्रहारेण हे मुनिप्रवर ! महामुनिमतल्लिक ! इति शेष । पंचविहलचायं सिदिसयणं दुविहसंजम भिक्ख् । भारं भाविय पुव्वं जिणलिंगं णिम्मलं सुद्धं ॥ ७९ ॥ पथविधचेल याग क्षितिशयन द्विविधसंयम मिक्षो।। भ व भावयित्वा पूर्व जिनालय निर्मल गुखम् ॥ पंचविहवेलचायं पंचविधानि पचप्रकाराणि चेलानि वघाणि तेषां त्याग परिहारो यस्मिन् जिनलिंगे जिनमुद्राया तपचविधचेलत्यागं । उक्त च गौत्तमन गणिना प्रतिक्रमणसूने- अडवा-कोराज तसरिचीर (१) बोंड वा सिपत्र (२) रोमजं वा उमय न एडकोष्टादिरोमनम्न (३) बनवा वल्क वृक्षादिवग्भगादिछट्विस्त्रं तहादिकं चापि (१) चर्मजं वा मृगचर्मव्याधचर्मचित्रकचर्मगजचर्मादिक न परिधानीय (५)" सिदिसयणं दुवि० संजमं मिक्र क्षितिशयन भूमिशयन तृण- काष्टशिलास्थडिल्शयम, द्विविध सयमो यस्मिन् जिनपिगे तद्विविध- संयम । इन्द्रियसयम पचेद्रियसंकाचो मन सकोचश्चेति पविध स- पम | माणसंयम पृधिव्यप्तेजोवायुवनस्पतिरक्षणपचस्थायररक्षण दौद्रिय दियचद्रियपंचेद्रियचतु प्रशारत्रसजीवरक्षणरक्षण विध प्राणसपम । मिक्खू हे भिक्षो। महो तपस्विन् । अथवा उत्तम घ.
भावमाभृत। २३१ मिक्षाभोजन युर्वन् उद्दण्डचर्यायो पर्यटन भिक्षुर्जिनलिंगमुच्यते । सा- भिक्षा पंचविधा-अक्षम्रक्षण, गर्तापूरणं, भ्रामरी, गोचारी, उदराग्निवि- ध्यापन चेति । भावं भाविय पुत्वं भावं आत्मरूप भावयित्या जिन- सम्यक्त्व च भारयित्ता पूर्व जिनलिंगं भवति । जिणलिंग णिम्मलं सुद्धं जिनलिंग नग्नरूपमर्हन्मुद्रामयूरपिच्छकमण्डलुसहित निर्मलं कथ्यते तवयरहित लिंग फरमलमित्युच्यते । अन्यत्र तीर्थकरपरमदेवा- तहविना अवधिज्ञानाहते चेत्यर्थ, शुद्ध चर्मजलतैलघृतमूतनाशना- स्वादरहितमुद्दण्डचर्यमन्तरायमटरहितं शुद्धमित्यभिप्रायः । जहरयणाणं पररं बज्ज जह तरुगणाण गोसीरं । तह धम्माणं परं जिणधम्मं भावि भरमहणं ॥८॥ यथा रत्नानी प्रवरं यन यथा तरुगणानां गोशीरम् । तथा धर्माणां प्रवरं जिनधर्म भावर भवमथनम् ॥ जह रयणाणं पवरं यथा येन प्रकारेण रत्नाना मध्ये प्रवर उत्तम रानं कि यनं हीरक पट्कोण मौक्तिकगोमेदपुष्परागपुलकप्रवालचन्द्रका- न्तरविकान्तजलकान्तहसगर्भमसारगर्भरुचकपारागन्दनीलमहानीलनील- मरकतर्यलशुनकतनेत्यादीना रत्नानां मध्ये व हीरक हि सर्वोत्तम तस्य देवाधिष्ठितस्यात् । जह तरुगणाण गोसीर तरुगणाना मध्ये यथा गोशाप तैलपणिक परमोत्तमचन्दने प्रपरे । तह धम्माणं पवरं तथा धर्माणी मध्ये जिनधर्भ प्रवरं । हे मुने! त्वं मावि भवमहणं भावय रोचप भरमथनं संसारपिच्छेदकम । तं धम्म केरिसं हादि तं तहा- स धर्मः कीदृशो भाति तद्यथा-तमेय निस्पन्ति श्रीकुन्द- कुन्दाचार्या:-- - २३२ पटप्राभृते- पूयादिसु पयसहियं पुण्णं हि जिणेहि सासणे भणियं । मोहक्सोहविहीणो परिणामो अप्पणो धम्मो ॥ ८१॥ पूजादिषु व्रतसहित पुण्य हि जिन शासने भणितम् । मोहक्षामविहीन परिणाम भारमनो धर्म ॥ पूयादिसु वयसहियं पूजादिषु व्रतसहित पूजा आदिपा कर्मणा तानि पूजादानि तपु पूजादिषु व्रतसहित श्रापकवतसहित। पुष्णं हि जिणेहि सासणे भणियं पुण्य स्वर्गसौख्यदायक कर्म जिनस्तीर्थकरपरमदेवैर परकेयलिभिश्च हि स्फुट शासने आर्हतमते उपासकाध्ययननाम्न्य) भणित कर्तृतया प्रतिपादित-इद पर्म करणीयमित्यादिष्ट । तथा चक्ति जिनसेनपादै - पुण्य जिनेन्द्रचरणार्चनसाध्यमाद्य पुण्य सुपात्रगतदानसमुत्थमेतत् । पुण्य प्रतानुचरणादुपचासयोगात् पुण्यार्थिनामिति चतुष्टयमर्जनीयम् ॥ १॥ तथा सम तभद्रस्वाभ्याचार्यरप्यभिहित- देवाधिदेवचरणे परिचरण सर्वदुःखनिहरण । कामदुहि कामदाहिनि परिचिनुयादाहतो नित्य ॥१॥ अर्हचरणसपर्या महानुभाव महात्मनामवदत् । भेक प्रमादमत्त कुसुमेनकेन राजगृहे ॥२॥ यदीद सर्वज्ञवीतरागपूजाटक्षण तीर्थकरनामगोत्रवन्धकारण विशिष्ट निर्निदान पुण्य पारम्पर्येण मोक्षकारण गृहस्थानां श्रीमद्भिर्भणितं तर्हि साक्षा मोक्षहतुभूतो धर्म क इत्याह-मोहक्सोहविहीणो परिणामो अप्पणो धम्मो माह पुत्रकलामित्रधनादिषु मभेदमिति भाव , क्षोभ परीपहोपसर्गनिपाते चित्तस्य चलन ताभ्या विहीनो रहित मोहक्षोभ- - nama भारप्राभूत २३३ विहान एव गुणविशिष्ट आत्मन शुद्धबुद्धकस्वभावस्य विञ्चमत्कारल- क्षणश्चिदानन्दरूप परिणामो धर्म इत्युच्यते । स परिणामो गृहस्थाना न भवति पचसूनासहितत्वात् । तथा चोक्त- सण्डनी पेपणी चुल्ली उदकुमा प्रमार्जनी। पचसूना गृहस्थस्य तेन मोक्ष न गच्छति ॥१॥ यदि मोक्ष न गच्छति तदा जिनसम्यक्त्वपूर्वक दानपूजादिलक्षण विशि- एगुणमुपाजन् गृहस्थ स्वर्ग गच्छति परपरया जिनलिंगेन मोक्षमपि प्राप्नोति । इति पुण्यधर्मयो स्वरूपमुक्त्वेदानी निर्विकल्पसमाधिलक्षण कर्म- क्षयकारण कथयन्ति भगवत- सदहदि य पत्तेदि य रोचेदि य तह पुणो वि फासेदि । पुण्णं भोयनिमित्त ण हु सो कम्मरसयनिमित्त ।। ८२ ।। घधाति च प्रत्येति च रोचते च तथा पुनरपि स्पृशति । पुण्य भोगनिमित्त न हु तत् कर्मक्षयनिमित्तम् ॥ सदहदि य श्रद्दधाति च तत्र विपरीतामिनिवेशरहितो भवति । पत्तेदि य प्रत्येति च मोक्षहेतुभूतत्वेन यथावत्त प्रतिपद्यते । रोचेदि य रोचते च मोक्षकारणतया तत्रैव रुचि करोति । तह पुणो वि फासेदि मोक्षार्थियात्तसाधनतया स्पृशति अगाहयति । पुण्णं भोयनिमित्त एतपूजादिलक्षण पुण्य मोक्षार्थितया क्रियमाण साक्षाद्भोगकारण स्वर्ग स्त्रीणामालिंगनादिकारण तृतीपादिभवे मोक्षकारण निमलिंगेन। ण हु सो कम्मक्सयनिमित्त न भवति हु-स्फुट निश्चयेन साक्षात्तद्भय गृहस्थलिगेन कर्मक्षयनिमित्त-तद्भवे केवलज्ञानपूर्वकमोक्षनिमित्त पुण्य न भवतीति ज्ञातव्य। ।
N २३४ पटनाभृते- अध्या अप्पम्मि रओ रायादिमु सयलदोसपरिचत्तो। संसारतरणहेतुं धम्मोत्ति जिणेहिं णिदिदं ॥ ८३॥ आत्मा आत्मनि रत रागादिषु सकलदोपपरित्यक्त । ससारतरणहेतु धर्म इति जिन निर्दिष्ट । अप्पा अप्पम्मि रओ आत्मा अत सातत्यगमने अतत्यूर्यं व्रज्या- स्वभावेनोर्ध्वमेव गच्छतीत्यामा शुद्धबुद्धैकस्वभार आमनि रतो निज- शुद्धबुबैकस्वभावे एकलोलीभावभूत ।रायादिसु सयलदोसपरिचत्तो रागादिषु रागादिभ्य सकलदोपपरित्यक्त रागद्वेषमोहलोभादिसकलदो- परहित इत्यर्थ । संसारतरणहे, ससारस्य तरणहेतु कारणभूत । धम्मोत्ति जिणेहि णिद्दि धर्म इति जिननिर्दिष्ट प्रतिपादित जिनपू- जादिक पुण्यमिति शेष । तेन कारणेन जिनपूजादिषु द्वेपो न कर्तव्य । उक्त च योगीदवै- देवंह सत्थहं मुणिवरह जो विहेसु करेइ । नियाम पाउ हवे तसु जे ससारु भमे ॥ १ ॥ अस्य दोहकस्याय भार -देवशास्त्रगुरूणा प्रतिमासु निषेधिकादि- पुच पुष्पादिमि पुजादिषु च लौंका द्वेष कुर्वति तेषा पापं भवति तेन पापेन ते नरकादौ पतन्तीति ज्ञातव्य । अह पुण अप्पा णिच्छदि पुण्णाई करेदि निरवसेसाई । तह वि ण पावदि सिद्धि संसारत्यो पुणो भणिदो ॥ ८४॥ अथ पुन आत्मान नेच्छति पुण्यानि करोति निरव शेपाणि । तथापि न प्राप्नोति सिद्धिं संसारस्थ पुनर्भणित ॥ अह पुण अप्पा णिच्छदि अथ पुनरात्मान नेच्छति न भावयति। पुण्णाई करेदि निरवसेसाई पुण्यानि करोति निरवशेषाणि पूजादाना- 1 देवेभ्य शास्त्रेभ्य मुनिवरेभ्य यो विद्वेष करोति । नियमेन पाप भवति तस्य येन ससारे भ्राम्यति ॥१॥ - भावप्राभूत । २३५ दीनि सर्वाणि भागाकाक्षानिदानख्यातिपूजालाभादिकमभिलापुकतया करोति विदधाति पर जिनसम्यक्त्वेनान्त शूया निर्षिक बहिरात्मा जीव । तह वि ण पारदि सिद्धिं तथापि नानापुण्यानि कुर्वन्नपि जीवो न प्राप्नोति न लभते, का ' सिद्धिं आत्मोपलब्धिलक्षणा मुक्ति- मिति-जिनसम्यक् वरहितो दूरभन्योऽगम्पो वा स ज्ञानव्य इत्यर्थ । यदि सिद्धि न प्राप्नोति तर्हि कीदृशो भवति संसारत्यो पुणो भणिदो संसारस्थोऽन तससारी पुनर्भणित आगमे प्रतिपादित । एएण कारणेण य त अप्पा सद्दहेह तिविहण। जेण य लहेह मोक्स तं जाणिजह पयत्तेण ॥ ८५ ।। एतेन कारणेन च तमात्मान थदत्त त्रिविवेन। येन च लभव मोक्ष त जानीत प्रयत्नेन ॥ एएण कारणेण य एतेन कारणेन चात्मनो मोक्षहतुलेन । अप्पा सद्दहेह तिविहेण तमात्मान श्रद्धत्त तत्र विपरीताभिनिवेश- रहिता भवत यूय त्रिविधन मनोरचनकाययागप्रकारेण । जैणय लहेह मोर येन च कारणनात्मश्रद्वानहेतुना लभलं मोक्ष सर्वकर्मप्रक्षय- लक्षण मोक्ष प्राप्नुत यूय । तं जाणिजह पयत्तेण नमा मान जानीत ज्ञानगुणेन भेदज्ञानेन बुध्यध यूप, प्रयनन चारित्रगुणनैकळालीभाव तया तर तिष्ठत यूय। मच्छो वि सालिसित्थो असुद्धमावो गओ महानरय । इय गाउं अप्पाणं भावह जिणभावणा णिचं ॥ ८६ ॥ मत्स्योपि शालिसिक्योऽशुद्धभावी गत महानरकम् । इति ज्ञात्वा धात्मान भावय जिनभावगं नित्यम् । मच्छो वि सालिसित्यो मत्स्योऽपि मीनजातिरपजाव तदुट सिक्थप्रमाणशरीरल्यान्नामा शालिसिक्य ! असुद्धभावो गो महा- ।
. २३६ पट्माभृते- नरयं अशुद्धभाव सन् गत प्राप्त महानरक सप्तम नरक गत । इय गाउं अप्पाणं इति ज्ञात्वात्मान शुद्धबुबैकस्वभावरूप टेकाकीर्ण- स्फटिकविवोपम चिञ्चमत्कारलक्षण मुक्तिगतसिद्धसमान शुद्धनिश्चयनयेन सिद्ध ज्ञायकैकस्यभार हे जीव ! हे आमन् ! भावहि जिण- भावणा णिच भावय व भारताविषय कुरु इय जिनभावनति ज्ञात्वा, अथवा जिनभावना जीगादिसप्तत वश्रद्धान च नित्य सबकाले भाग्य रोचस्व तस्मादिति अपध्यान परिहत्य अन्तस्तत्व बहिस्त व चाश्रयेति भावार्थ । किं तदपध्यान :-- वधय धच्छेदादे रागाद्वेपाच परकलनादेः। आध्यानमपध्यान शासति जिनशासने विशदाः॥१॥ 'पदस्थ मश्याफ्यस्थ पिण्डस्थ स्वामचिन्तन । रूपस्थ सर्वचिद्रूप रूपातीत निरजन ॥" इति पद्योक्त चतुर्विधं ध्यान भावय हे जी!। अथ शालिसिक्थैमत्स्यकथा यथा-श्रीपुष्पदन्तजिनज मभूमौ काकन्दी- पुरे श्रावककुलजमा सौरसेनो राजा बभूव । सकलधर्मानुरोधेन मासत्रत जमाह । पुनर्वेदवैद्यरद्रमतमोहितमति मासभक्षणमति सजाट , अङ्गी- कृतवस्तुनिर्वाहनकारणालोकापवादाच मार्स जुगुप्समान मनोविश्राम हेतु कर्मप्रियनामकेतु सूपकार स्याहूयैकाते निजाभिलाप तमजिज्ञपत् । मिलेंचर स्थलचर जलचरनीनाना मासमानापयनपि अनेकराजकार्या- कुलचित्ततया मासभक्षणानसर न प्राप। कर्मप्रियोऽपि नृपादेश सह निशं कुलेकदा सर्पवालकन दृष्टो मृत स्वयमूरमणसमुदे महामस्यो वभूव । भूप सौरसनोऽपि चिरकालेन मृत्वा मांसभक्षणाशयानुवधा पावागाधेति पाटान्तरमन्यय। २.टी।
भावप्रामृत। २३७ त्तस्मिन्नेव समुद्रे तस्यैव महामत्स्यस्य कर्णबिलमलाशनशील: शालि- सिक्थप्रमाणशरीरो गत्स्यो बभूव । तदन्वेष पर्याप्तव्यभावेन्द्रियः तस्य महामत्स्यस्य मुख व्यादाय निद्रायतो वेलानदीप्रवाहे इव गलगुहानेक- जलचरसमूहं प्रविश्य निष्क्रामन्तं निरीक्ष्य शालिसिक्थश्चिन्तयति-अयं पापकर्या महामत्स्यो निर्भाग्यो यन्मुखे पतन्यपि यादासि भक्षित्तुं न शक्नोति । मम देवेनैतायच्छरीरं यदि भवति तदा सकलमपि समुद्र सत्वसंचाररहितं करोमीति चेतश्चिन्ताबलात्क्षुद्रमत्स्यो निखिलनकचक- भक्षणपापाच महामत्स्योऽपि द्वावपि मृत्वा सप्तमनरके संजातौ। ततस्त्रय- त्रिंशसागरोपमायुपौ तौ द्वावपि परस्परगालाप चक्रतुः। अहो क्षुद्र- मत्स्य ! महापापकर्मणो ममातागमनं सगच्छत एव । त्वं तु मत्कर्ण- मलाजीवनः कथमत्रागतः । शालिसिक्यचरनारक' प्राह-महामत्स्यचे- टितादपि दुरन्तदुःखं ( ख ) सबन्धनादुर्भावनावशात् । इति श्रीभावप्राभृते शालिसिक्थमत्स्योपाख्यान समाप्त । माहिरसंगचाओ गिरिसरिदरिकंदराइ आवासो । सयलोणाणज्झयणो निरत्यओ भावरहियाणं ।। ८७॥ बाह्यसनत्यागः गिरिसारेरीकन्दरादावासः । सकले हानाध्ययन निरर्थक भावरहितानाम् ॥ बाहिरसंगचाओ बाह्यसगत्यागः निरर्थक इति सम्बन्धः । गिरि- सरिदरिकंदराइ आवासो मिस आवास पर्वतोपरि आतापनयोगः पर्वते स्थितिळ, सरित्-नदीतटे तपश्चरण भगीरथवत् , दरी गुहायार मावास, कन्दरी गिर्यादिविधरं तत्रावासः, आदिशब्दात् श्मशानौद्यानादौ आवासः स्थितिः । सयलो णाणज्झयणो सकलं वाचनापृच्छनानुप्रेक्षा- म्नायधर्मोपदेशलक्षण ज्ञानाध्ययनं शास्त्रपठनं । निरत्यओ भावरहि- ।
२३८ पद्माभृते-- याणं भावरहिताना जिनसम्यक्त्यविनिताना निनशुद्धबुद्धकस्वभावा- मभापनाऽप्रच्युताना यतीना (निरर्थक)। उक्त च-- वाह्य ग्रन्थविहीना दरिद्रमनुजा स्वभावत सन्ति। यः पुनरन्तासगत्यागी लोके स दुरंभो जीव. ॥ १ ॥ भंजसु इंदियसेणं भंजसु मणमकडं पयत्तेण । मा जणरजणकरणं वाहिरवयवेम तं कुणसु ।। ८८ ॥ भग्धि इन्द्रियसेना भग्धि मनोमट प्रयत्नेन । मा जनरजनकरण वहिनंतपल कापी ॥ भंजसु इंदियसेणं त्व भग्धि, का' इन्द्रियसेना । भंजसु मणमक्कडं पयत्तेण भजमु व भग्धि आमर्दय विषयकपायेभ्यो गच्छन्त निरुणद्धि, करमणमकड-मनोमर्कट चपटसभावामन एव मफर्टस्त मनोवानर प्रयत्नेन स्त्रीसगपरित्यागात् । मा जणरजणकरणं मा नैर जनाना लोकाना रजनकरण अनुरागोत्पादक कार्य । हे वाहिरवयवेस बहिर्च- तवेष ! हे वाह्याकारदीक्षाचिह्रोद्वाहक ! ते त्व । मा कुणमु मा कापी । णवणोकसायचग्गं मिच्छत्तं चयसु भानसुद्धीए । चेइयपश्यणगुरणं करेहि भत्ति जिणाणाए ॥ ८९॥ नवनोपायवर्ग मिथ्यात्व त्यज भावयुद्धया। चत्यप्रवचनगुहां कुरु मकिं जिनाया ॥ पवणोकसायवर्ग नानोपापपर्ग हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सा. स्त्रीपुनपुसकोदलक्षणान् नोकपायान् ईपकपायान् यथारयातचारित्रधा- मकान् । चयमु त्यति सरन्ध । तथा मिच्छत्तं चयमु भावसुद्धीए मिथ्याल पचप्रकार चयमु-त्यन-- - भावप्राभूतं । एयंत घुद्धदरिसी वियरीयो पंभ तापसी विणओ। इंदो घिय संसयिदो मक्कडिओ चेय अण्णाणी ॥१॥ एकान्तेन क्षणिकैकान्तेन मोक्ष बौद्धो वदति । विपरीतेन हिंसया मोक्ष बंभ-माह्मणो यदति। तापसो विनयेन मोक्षं वदति । इन्द्र इन्द्रचन्द्रनागे- न्द्रगच्छ; संशयेन मोक्षं मन्यते । अपिचशब्दागोपुच्छिको द्राविडो यापनीयाभिधो निष्पिच्छश्च संशयमोक्षो ज्ञातव्यः । मस्करपूरणो मार्क- टिकोऽज्ञानामोक्ष मन्यते । एतन्महापातक गिध्यानपंचकं चयसु-त्यन हे जीव । सं। तथा च समन्तभद्रः प्राह- न सम्यक्त्वसमं किंचित् त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि। थेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्वसमं नान्यत्तनूभृताम् ॥ १ ॥ भावसुद्धीए-तत्वार्थश्रद्धानलक्षणया भावशुद्धया जिनसम्यक्त्वेन खौंकपापसभापणसंगमपरिहारेण शुद्धबुबैकस्वभावात्मरुचिपरिणामैनेति भावार्थः । चेइयपवयणगुरुणं चैत्यानां अर्हसिद्धप्रभृतिप्रतिमानां प्रव- चनस्य जिननाथसूत्रस्य तथेति मस्तकोपर्यारोपणेन सरस्वतीप्रतिमापू- जनेन गुरूणा निर्मन्यदिगम्बराणां भन्यजीवभक्तजनविनेयमातृपितृसदृश- हितोपदेशकाना । करहिं भत्तिं जिणाणाए कुरु व मक्ति पंचामृत- जलेक्षुरसहैयगवीनगोमहिपोक्षीरगन्धोदककलशस्नपनेन जलचन्दनाक्षत- पुष्पचरुदीपधूपफलार्घदानेन स्तवनेन जपेन ध्यानेन श्रुतदेवताराधनेन नित्यं प्रातरुत्थाय सर्वज्ञवीतरागप्रतिमासाङ्गावलोकने भक्तिं कुरु, तथा श्रुतभक्ति श्रुतोक्तप्रकारेण कुरु, तथा गुरूणां पादमर्दनेन वैयावृत्यपथा- संभयाहारदानश्रुतसमर्पणौषधप्रदानवसत्यर्पणाभयदानादिभिर्यथायोग्य भ. तिं कुरु । एतत्सर्वं भक्तिलक्षण कर्म जिनाइया महापुराणभ्रमणेन त्य कुरु हे जीव ! स्वर्ग मोक्षं च प्राप्यसि । लौंकानां महामताकिना वचन मा मानपत्र।
.. २४० पट्प्राभृते- तित्थयरभासियत्यं गणहरदेवेहिं गंथियं सम्म । भावहि अणुदिणु अतुलं विसुद्धभावेण मुयणाणं ॥९॥ तीर्थकरभाषितार्थ गणधरदेवैः प्रन्थितं सम्यक् । भावय अनुदिनं अतुलं विशुद्धभावेन श्रुतज्ञानम् ॥ तित्थयरभासियत्थं तीर्थकरेण श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञवीतरागेण भा- पितः कथितोऽर्थो यस्य श्रुतज्ञानस्य तत्तीर्थकरभापिता) । गणहरदे. वेहिं गंथियं सम्मं गणधरदेवैौतमत्वाम्यादिभिप्रेन्धित द्वादशा- धिकशतकोटियशीतिलक्षाष्टापंचाशत्सहस्रपंचाधिकपदैरानीतमिति प्र. थितं । चतुर्दशप्रकीर्णकैरप्यानीतं श्रुतज्ञानं । सम्मं सम्यक्प्रकारेण पूर्वापरविरोधरहितं । भावहि भावय । अणुदिणु अनुदिनमहर्निशं । अतुलं अनुपमं । विसुद्धभावेण सुयणाणं चलमलिनपरिणामरहिततया। एकस्य पदस्य श्लोका यथा-५१०८८४६२१ अक्षर १६ । उक्त च श्रुतस्कन्धशास्त्रे- पोवनकोडीओ लषखा भट्टेव सहसचुलसीदी। सयछ णायव्वं सड्ढाइगवीसपयगंथा ॥ १॥ पाऊण णाणसलिलं निम्महतिसडाहसोमउम्मुका। होति सिवालयवासी तिहुवणचूडामणी सिद्धा ॥९१॥ प्राप्य ज्ञानसलिलं निर्मभ्यतृपादाहशोपोन्मुक्ताः। भवन्ति शिवालयवासिनः त्रिभुवनचूधामणयः मिद्धाः।। पाऊण णाणसलिलं प्राप्य लन्या, किं ! ज्ञानसलिलं सम्पाज्ञानपा- नीय सिद्धा भवन्तीति सम्बन्धः । कथंभूताः सिद्धाः, निम्महतिसडा- हसोसउमुक्का निर्मथ्या मधयितुमशक्या स चासो तृपा विपयाभिटापः दाहश्च शरीरपरिसन्ताप: शोपच रसादिहानिः निर्मथतृपादाहशोपाःतेह- १ एकपंचाशकोव्यः लक्षा अष्टावेव सहसवनुरशीतिः । शतपद शातध्यं सार्धकविंशतिपदान्याः - .
भावप्रामृत । २४१ न्मुक्ता परित्यक्ता निर्मथतृड्दाहशोपोन्मुक्ता । निम्मलसुविसुद्धमा- वसंजुत्ता इति च कचित्पाठ तमायमर्थ -निर्मलो द्रव्यकर्मभापकर्मनी कर्मरहित योऽसौ सुविशुद्धभाष कर्ममलकलङ्करहित क्षायिको भाव परिणाम निष्पल आत्मा वा तेन संयुक्ता सहिता निर्मलसुविसुद्धभाव- संयुक्ता । होति सिवालयवासी भवन्ति संजायन्ते, के त ? आसनभ- ध्यजीरा , कीडशा संजायते ? शिवालयवासिन ईप प्राग्भारनाम्न्यां शिलाया वसतीति मुक्तिशिलोपरि तिष्ठन्तीत्येवं शीला शिवाल्यवासिन , अथवा शिवाना सिद्धानामालय शिवालय पचचत्वारिंशलक्षयोजन- विस्तारमुक्तिशिलाया उपरि तनुवातनामवातक्लये निरापारा आकाशे तिष्ठतीतिभाव । पुन कथभूता सिद्धा , तिहुर्वणचूडामणी त्रैलो- क्यशिरोरत्नसशा। दस दस दो सुपरीसह सहहि मुणी सयलकाल काएण। सुत्तेण अप्पमत्ता संजमघादं पमोत्तूण ॥ ९२ ॥ दश दश द्वौ सुपरीषहान् सहस्व मुने ! सकलकाल कायेन । सूत्रेण अप्रमता सयमघात प्रमुच्य । दस दस दो दश च पुनर्दश च द्वौ च द्वाविंशतिरित्यर्थ । के ते, सुपरीसह मुष्ठुअतिशयन परिसमन्तात् सह्यन्ते ये ते मुपरापहा "मार्गा च्यवननिर्जरार्थ परिसादव्या परीपहा " ते तु पूर्वोक्तवर्णना ज्ञातव्या । सहहि सहस्त्र। मुणी हे मुने! हो तपस्विन्!। सयलकाल सकर काले सर्वकाल, फायन-शरीरेण वांग्मनश्चात्मनि स्थाप्यते इति भाव । सुत्तेण सूण जिनपचनेन कृत्वा । किं तजिनवचन :-- । १न केवल इति स ।२य टी । ३ दस दस दो सुपरीसह सहति स । पद०१६ २४२ षट्मामृते- "मार्गाच्यवननिर्जराथै परिसोढव्याः परीपहाः इति । अप्पमत्ता अप्रमत्ताः प्रमादरहिता. इत्यर्थः । संजमघादं पमोत्तूण सयमस्य घात प्रमुच्य । जह पत्थरो ण मिज्जइ परिडिओ दीहकालमुदएण। तह साहू ण विभिन्जइ उक्सग्गपरीसहहिंतो ।। ९३ ॥ यथा प्रस्तरोन भिद्यते परिस्थितो दीर्घकालं उदकेन । तया साधुर्न विभियते उपसर्गपरीषहेभ्यः ॥ जह पत्थरो ण भिन्नइ यथा प्रस्तर पाषाणो न विभियते न परिणमति अन्तरार्दो न भवति । परिडिओ दीहकालमुदएण पापणः कथंभूतः, परिस्थित बुडित उदके इति सौत्रसम्बन्धात् । कथं परिस्थितः, दीर्घकालं प्रचुरकालं, केन न विभिद्यते ! उदकेन वारिणा । तह साहू ण विभिज्जइ तथा साधुर्मुनी रत्नत्रयसाधक सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रमण्डितो न विभिद्यते नान्त'क्षुभितो भवति । उवसग्गपरीसहेहिंतो देवमानवतिर्यगचेतनोपवेम्य उपसर्गेभ्यः परी- पहेभ्यः क्षुधापिपासादिभ्यो द्वाविंशतेरपि। "सुन्तो हिन्तो हि दु दो तो भ्यसः" इति प्राकृतव्याकरणसूत्रेण पचमीबहुवचनम्यसः स्थाने हितो आदेशः । डसिस्थाने च "लुक्च हितो हि दु दो तो उसे" इति सूत्रेण भवति । "व्याख्यानतो विशेपप्रतिपत्तिर्न हि सन्देहादटक्षण" इति परिभाषयान बहुवचनस्य म्यसो हिन्तो आदेशो ज्ञातव्य इति । भावहि अणुवेक्साओ अवरे पणवीसभारणा भावि । भाररहिएण किं पुण याहिरलिंगेण कायव्वं ॥ ९४॥ सीवूसहोऽहेऽसो "वि शाकटायनीयेन “सोटः" इति जैनेन्दीयेण पाणिनीयेन प सूण पत्वनिषेध । १ भावप्राभृत। २४३ भावय अनुप्रेक्षा अपराः पञ्चविंशतिभावना भावय । भावरहितेन किं पुन: बहिलिनेन कार्यम् ।। भावहि अणुवेक्खाओ भावय पुनः पुनश्चिन्तय अनुप्रेक्षा अनि- त्यादीः । अपरे पणवीसभावणा भावि अपराः पंचविंशतिभावना भावय। भावरहिएण किं पुण भावरहितेन पुनः किं न किमपि इत्याक्षेपः । बाहिरलिंगेण कायव्यं बहिलिगेन नग्नवेपेण किं साध्य कर्मक्षयशून्यमिद। सव्वविरओ वि भावहि णक्यपयत्थाई सत्ततच्चाई। जीवसमासाइं मुणी चउदसगुणठाणणामाई ।। ९५ ।। सर्वविरतोपि भावय नवकपदार्थान् सप्ततत्वानि । जीवसमासान् मुने । चतुर्दशगुणस्थाननामानि ।। सबविरओ वि भावहि सर्वविरतोऽपि हे जीव । त्वं महावत्यपि सन् भावय । णवयपयत्थाई सत्ततचाई नवपदार्थान् जीवाजीवा- सवबन्धसंवरनिरामोक्षपुण्यपापपदार्थान् । चेतनालक्षणो जीवः । पुद्ग- लधर्माधर्मकालाकाशा अजीवाः । आत्मप्रदेशेषु कर्मपरमाणन आगच्छन्ति स आसनो मिथ्यात्वापिरतिप्रमादकपाययोगरूपः । आत्मप्रदेशेषु आस्त्र- वानन्तरं द्वितीयसमये कर्मपरमाणवः श्लिष्यन्ति स बन्धः प्रकृतिस्थित्युनु. भागप्रदेशभेदाचतुर्विधः 1 आस्रवस्य निरोध. संवर उच्यते । स संवरः से गुप्तिसीमतिदशधर्मानुप्रेक्षापरीपहजयचरित्रैर्भवति । तपसा निर्जरा च भवति संवरश्च भवति । सर्वकर्मक्षयो मोक्षः कथ्यते। ऐते नपपदार्थाः, एतेषा विस्तर आगमाद्वेदितव्यः । सप्ततत्वानि पुण्यपापरहितानि ज्ञातव्यानि । . १ पुस्तकद्वयेऽपि सशन्दो वर्तते। २ पुस्तकद्वयेऽपि पुण्यपापपोर्लक्षणं नास्ति तद्नन प्रचारेण शेप। पुनात्यारमानं तरपुण्यं । पाति रक्षति शमादारमान तपाई।
२४४ पटप्राभृते- जीनसमासाई मुणी हे मुने । जीपसमासान् चतुर्दशसख्यान त्वं भावय । अथ के ते चतुर्दशजीवसमासा इति चेत् :- घोदरसुहमगिदिय पितिचरिदिय असापेण सण्णी य । पजत्त पजत्ता भूदा इय चोद्दसा होति ॥ १ ॥ विस्तरभदैर्जीवसमासा अष्टानवतिर्भवन्ति । तत्रेय गाथा-- थावर घेयालीसा दो सुर दो नरय तिरिय चउतीसा। नव विउले नव मणुए अडणउदी जीवठाणागि॥१॥ अस्या विवरण-पृथ्वीकायिकसूक्ष्म बादर पर्याप्त-अपर्याप्त-लब्ध्यपर्याप्त ६। तथा अप् ६ । तेज ६ । वायु ६। एव २४ । वनस्पतिकायिकभेद २ प्रत्येक साधारण। साधारणभेद १२ नित्यनिगोद सूक्ष्म वादर पर्याप्त- अपर्याप्त-लब्ध्यपर्याप्त ६ तथा इतरनिगोद-सूक्ष्म बादर पर्याप्त-अपर्याप्त- एब्ध्यपर्याप्त ६ एव १२ । प्रत्येकभेद ६ सुप्रतिष्ठितप्रत्येक याटिकादी, अप्रतिष्ठिता स्वयमेव ते च पर्याप्त-अपर्यात-लम्ध्यपर्याप्त । एवं धाव- यालीसा। सुरभेद २ पर्याप्त-अपर्याप्त । नारकभेद २ पर्याप्त-अप- प्ति । पंचेन्द्रियतिर्यग्भेद ३१ । जलचरभेद २ गर्भज-सन्मूर्छन । गर्भ- जभेद २ पर्याप्त-अपर्याप्त । सम्मूर्छनभेद पर्याप्त-अपर्याप्त लब्ध्य- पर्याप्त ५। तथा नभश्चर ५। स्थलचर ५ । एवं १५ संक्षिभेदा । तथा १५ असंज्ञिभेदा । भौगभूमिनतिर्यग्भेद ४ जलचर पर्याप्त-अपर्याप्त । नभश्चर पर्याप्त-अपर्याप्त। एव एवं पंचेद्रियतिर्यग्भेद ३४ विकलर- येभद ९१ द्वीद्रियपर्याप्त-अपर्याप्त लब्ध्यपर्यात, त्रीन्द्रियपर्याप्त अपर्याप्त- लब्न्यपर्याप्त, चतुरिदियपर्याप्त अपर्याप्त-ल ध्यपर्याप्त ! एवं ९। मनुष्य . यादरसूक्ष्मैकेन्द्रियद्वित्रिचतुरिन्द्रियामहिमपिन । पर्याप्तापर्याप्ता भूता इति चतुदर्श भवन्ति ॥ १॥ २ विवरणमिद पुस्तकानुसारि ।
-- भावप्राभूत। २४५ भेद भोगभूमिजभेद २ पर्याप्त-अपर्याप्त, कुभोगभूमिजमनुष्य पर्याप्त-- अपर्याप्त, म्लेच्छखण्डमनुष्य पर्याप्त-अपर्याप्त, आयखण्डमनुष्य पर्याप्त. अपर्याप्त-लब्ध्यपर्याप्त । एव भेद ९ । एवं जीवसमासा अष्टानवति । चउदसगुणठाणामाई चतुर्दशगुणस्थाननामानि । यथा- मिच्छा सासण मिस्सो अविरदसम्मो य देसविरदो य । विरदा पमत्त इयरो अपुध आणियहि सुमो य ॥१॥ उपसत खीणमोहो सजोगवालिजिणो अजोगीय। चउदसगुणटाणाणि य कमेण सिद्धा मुणेअव्या ॥२॥ मिथ्यात्वगुणस्थानं (१) सासादनगुणस्थान (२) मिश्रगुण- स्थान (३) अविरतसम्यग्दृष्टिगुणस्थान (४) देशविरतगुणस्थान (५) प्रमत्तसयतगुणस्थान (६) अप्रमत्तसयतगुणस्थान (७) अपूर्वकरणगुणस्थान (८) अनिवृत्तिकरणगुणस्थान (९) सूक्ष्म- सापरायगुणस्थान (१०) उपशान्तकपायगुणस्थान (११) क्षीणकपाय- गुणस्थान (१२) सयोगकैवलिगुणस्थान (१३) अयोगफेलिगुणस्थान (१४) चेति । चतुर्दशगुणस्थानानां विचरणमागमाद्वेदितव्य । तानि त्वं हे जीव ! भाग्य-रुचिमानय श्रद्धान कुर्षिति । णयविहभं पयडहि अचंभ दसविहं पमोत्तूण । मेहुणसण्णासत्तो भमिओसि भरण्णवे भीमे ॥९६ ॥ नवविधव्रम्हचर्य प्रकटय अवझ दशविध प्रमुच्य । मैथुनसज्ञासक्त भ्रमितोसि भवार्णवे भीमे ॥ णवविहभं पयडहि नवविधं नवप्रकार ब्रह्मचर्य हे जीव 14 प्रकटय सर्वकालमा मप्रत्यक्षं कुरु । मनोवचनकाथाना प्रत्येक कृतकारि- तानुमतानि त्रीणि त्रीणीति नाविध ब्रह्मोच्यते । अथवा--- १ अनयो छाया पूर्व मता।
२४६
पद्माभूते-
इस्थिविसयाहिलासो अंगविमाक्खो य पणिदरससेवा ।
संसत्तव्यसेवा तहिंदियालोयणं चेव ॥१॥
सक्कारपुरषकारो अतीदमुमरणमणागदहिलामो।
इविसयसेवा वि य नयभेदमिदं अयंभं तु ॥२॥
इति नवभेदमब्रह्म तदर्जनं नवभेदं ब्रह्मचर्य ज्ञातव्यमित्यर्थः। अब्बं.
भं दसविहं पमोत्तूण अब्रह्मचर्य दशयिधं प्रमुच्य परिहृत्य । किं तद्दश-
विधमनीति चेत् !-
चिन्ता दिक्षा निश्वासो ज्वरो दाहो रुचिस्तथा।
मूर्योन्मत्तोऽसुसन्देहो मरणं दशधा स्मरः ॥ १॥
मेहुणसण्णासत्तो मैथुनस्य कमनीयकामिन्या आलिङ्गनचुम्बनचूप-
णादिसज्ञायामासक्तो लंपटो हे जीव ।। भमिओसि भवण्णवे भीमे
भ्रमितोऽसि भ्रान्तोऽसि पर्यटितोऽसि च्छेदनमेदनादिदुःखानि मुंजानो
भवार्णवे संसारसमुद्रे चतुर्गतिटक्षणे भीमे भयानके रौद्रस्वमारे, मन-
न्तकाले दुःखी बभूविथेति ।
भावसहिदो य मुणिणो पावई आराहणाचउक्कं च ।
भावरहिदो य मुणिवर भमइ चिरं दीहसंसारे ॥ ९७ ॥
भावसहितय मुनीनः प्राप्नोति धराधनाचतुष्कं च ।
भावरहितश्च मुनिवर । भ्रमति चिर दीर्घसंसारे ॥
भावसहिदो य मुणिणो भावेन जिनसम्यक्त्वलक्षणेन सहिदो-
सहितः संहितः संयुक्तः श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञवीतरागचरणकमलचंचरीकः,
मयया भावः पूर्वोक्तलक्षणः स्वः शुद्धबुद्धकस्वभाव आत्मा हितो पस्य
खीविषयाभिष्टारः अंगविमोशश्च प्रगीतरसमे।।
संसादायमेवा तयेन्द्रियालोमनं चैव ॥१॥
सरकारपुरस्कार: अतीतस्मरणं अनागताभिलाषा
इष्टविण्यसैदापि च मवभेदमिदमग्रम ॥ २ ॥
२४७ भावप्राभूत। यस्मै वा स भावस(स )हित । चकाराने मुनिर येषामपि भव्यजीवाना हित त्रैलोक्यलोकतारणसमर्थत्वात् । यो भावसहित स पुमान् मुणिणो-मुनीनामिन स्वामी मुनीन स मुनिर्मुनिचक्रवर्ती। पावडू आराहणाचउकं च प्रामोति लमते, किं तत् ! आराधनाचतुष्क सम्यग्दर्शनशानचारित्रतपसामाराधकत्व प्राप्नोति । भावरहिदो य मुणि- वर भावरहितश्च जिनसम्यक्वातीतो वेषधारी मुनि हे मुनियर ! हे मुनिश्रेष्ठ!। भमइ भ्राम्यति पर्यटति। चिर दीर्घकाले अनन्तकाल-याव स्काल सिद्धस्वामिनो मुक्तौ तिष्ठन्ति ताव पर्यत स मिथ्यादृष्टिर्मुनि भ्रमति । क्व ? दीहसंसारे दीर्घससारेऽन तभवसकटे ससारसमुद्रे मजनोमजन करोतीति भावार्थ । पावंति भावसवणा कल्लाणपरपराइ सोक्साई। दुक्साई दब्बसवणा नरतिरियकुदेवजोणीए ॥८॥ प्राप्नुवति भावश्रवणा कल्याणपरम्पराणि सुखानि । दु खानि द्रव्य नवणा नरतिर्यककुदेवयोनी ॥ पावंति भावसवणा प्राप्नुवति लभ ते, के तेभावश्रवणा सम्य ग्दृष्टयो दिगम्बरा । कल्लाणपरपराई सोक्खाई कल्याणाना गर्मावता रजन्माभिषेकनिष्क्रमणज्ञाननिर्माणलक्षणा (ना) परपरा श्रणिर्येषु सौरपेषु तानि कल्याणपरपराणि एवविधानि सौख्यानि भावनवणा प्राप्नुवन्ति तीर्थकरपरमदेवा भारित । दुक्साई दन्यसवणा दु खानि प्राप्नुवन्ति, के ते दमसघणा-द्रव्यश्रवणा जिनसम्यक्त्वरहिता नग्ना पशुममाना दिगम्बरा इति भावार्थ । क दु खानि द्रव्यश्रष्णा प्राप्नुवन्तीति चेत् नरतिरियकुदेवजोणीए नराश्च मनुष्या , ठियत्नश्च पशव , कुत्सि- ता देवाच भावनामरा व्यतरा ज्योतिष्काश्च तेषा योनौ उत्पत्तिस्थाने । १ चकारात् न मुनर• इत्यादि प पाठ । पुस्तयेऽपि नकारो वर्तते स च शल्यति।
२४६
पद्माभृते-
इस्थिविसयाहिलासो अगविमोक्खो य पणिदरससेवा ।
ससत्तदव्यसवा तहिंदियालोयण चेवा
सक्कारपुरषकारो अतीसुमरणमणागदहिलालो ।
इरिसयसेवा वि य नयभेदमिद अवम तु ॥२॥
इति नवभदमब्रह्म तद्वर्जन नवभेद ब्रह्मचर्य ज्ञातव्यमित्यर्थ । अब्ध.
भं दसविहं पमोत्तूण अब्रह्मचर्य दशविध प्रमुच्य परिहृत्य । किं तद्दश-
विधमब्रह्मति चेत् --
चिन्ता दिक्षा नि.श्यासो ज्वरो दाहो रुचिस्तथा।
मुझेन्मत्तोऽसुसन्देहो मरण दशधा स्मर ॥१॥
मेहुणसण्णासत्तो मैथुनस्य कमनीयकामिन्या आलिङ्गनचुम्बनचूप-
णादिसज्ञायामासक्ता लेपटो हे जीन । भमिओसि भरण्णवे मीमे
भ्रमितोऽसि भ्रा तोऽसि पर्यटितोऽसि च्छेदनभेदनादिदु खानि भुजानो
भनार्णवे ससारसमुद्रे चतुर्गतिलक्षणे भीमे भयानके रौद्रस्वभावे, अन
न्तकाले दुखी बभूविथैति ।
भावसहिदो य मुणिणो पावइ आराहणाचउक्कं च ।
भावरहिदो य मुणिवर भमइ चिर दीहसंसारे ॥ ९७॥
भावसहितच मुनीन प्राप्नोति थराधनाचतुष्क च ।
भावरहितश्च मुनिवर ! भ्रमति चिरं दोघसंसारे ।।
भावसहिदो य मुणिणो भावेन जिनसम्यक्वलक्षणेन सहिदो-
सहित सहित सयुक्त श्रामद्भगवदर्हत्सर्पज्ञवीतरागचरणकमलचचरीक ,
अथवा भार पूर्वोक्तलक्षण स्व शुद्धबुद्धकस्तभाव आमा हितो यस्य
1 स्त्रीविषयाभिलाष भगविमोक्षश्च प्रणीतरससेवा ।
संसक्तदव्यपेवा तयेन्द्रियालोकन चैव ॥१॥
सरकारपुरस्कार अतीतस्मरण भनागताभिलाया।
इष्टविषयसेवापि नवमेदमिदमझ तु ॥ २ ॥
भावप्राभृतं । २४७ यस्मै वा स भावस(स)हित । चकाराने मुनिरन्येपामपि भव्यजीवाना हित त्रैलोक्यलोकतारणसमर्थत्वात् । यो भावसहितः स पुमान् मुणिणी-मुनीनामिन स्वामी मुनीन स मुनिर्मुनिचक्रवर्ती ! पावई आराहणाचउकं च प्राप्नोति लभते, किं तत् ' आराधनाचतुष्क सम्यग्दर्शनज्ञानचरित्रतपसामाराधकत्वं प्रामोति । भावरहिदो य मुणि- वर भाररहितश्च जिनसम्यक्त्वातीतो वेषधारी मुनि हे मुनियर है मुनिश्रेष्ठ। भमइ भ्राम्यति पर्यटति। चिर दीर्घकाले अनन्तकालं याव- त्कालं सिदस्वामिनो मुक्तौ तिष्ठन्ति तावत्पर्यन्त स मिध्यादृष्टिमुनि. भ्रमति । क' दीहसंसारे दीर्घसंसारेऽन तभवसकटे ससारसमुद्रे मजनोमजने करोतीति भावार्थ । पाचंति भावसवणा कल्लाणपरपराई सोक्साई। दुरपाई दव्वसवणा नरतिरियकुदेवजोणीए ॥९८॥ प्राप्नुवति भावप्रवणा कल्याणपरम्पराणि सुखानि । दुखानि इण्यश्रवणा नरतिर्यककुदेव योनी ॥ पावंति भावसवणा प्राप्नुवन्ति लभन्ते, के ते : भावपणा सम्प- ग्दृष्टयो दिगम्बरा । कल्लाणपरंपराई सोक्खाई कल्याणाना गर्भारता- रजन्माभिपेनिष्कमणज्ञाननिर्माणलक्षणा (ना) परपरा श्रेणिर्येषु सौख्येषु तानि कल्याणपरपराणि एवविधानि सौख्यानि भावश्यणा प्राप्नुवन्ति तीर्थकरपरमदेया भवति । दुक्खाई दबसवणा दु खानि प्राप्नुवन्ति, के ते। दबसवणा-द्रव्यश्रवणा जिनसम्यक्त्वरहिता नग्ना पशुसमाना दिगम्बरा इति भावार्थ । क दुखानि द्रव्यश्रवणा प्राप्नुवन्तीति चेत् 'नरतिरियकुदेवजोणीए नराश्च मनुष्या ,तियेचश्च पशर , कुत्सि- ता देवाश्च भावनामरा व्यत्तरा ज्योतिप्काच तेपा योनौ उत्पत्तिस्थाने। १ चकारात् न मुनर० इत्यादि. ख पाठ । पुस्तकदयेऽपि नकारो वर्तते सशस्यति ।
२५० पद्माभूते- दास्यामि, अस्यामृतौ दास्यामि, अस्मिन् वर्षादौ दास्यामीति नियमेन यदन्न मुनिभ्यो दीयते तत्प्रामृत कथ्यते (७) भगनिद मदीयं गृह वर्तते यौन गृहप्रकाशरण भवति निजगृहस्य गृहिणा प्रकटन क्रियते, अथमा भाजनादीना संस्कार भाजनादीना स्थानान्तरण वा माविष्कृत- मुच्यते (८) विद्यया क्रोत द्रव्यरत्रभाजनादिना वा यत्कीत तक्रीत कथ्यते (९) कालान्तरेणाव्याजेन वा स्तोकमृण कृत्वा यतीना दानार्थ यदर्जितं तमामृष्य मृष्यते (१०) कस्यचिद्गृहस्थस्य ब्रीहीन् दत्वा शालयो गृह्यन्त, अथवा निजं कूर दत्वा परदूरी गृह्यते निजाभ्यूपान् दत्या परेपामभ्यूपा गृह्यन्ते एवं यपरिवर्त्यत यतिभ्यो दीयते दास्यते वा स परिवर्त कथ्यते (११) प्रामात् पाटकात् गृहान्तराद्यदायात तद- मिहित कथ्यते तद्योग्य न भवति । कुतोऽप्यायात योग्य भवतीति चेत् । भवति योग्य यदि अजुत आसन्नादासप्ताहादायात तत् योग्यं । पंक्तिबद्धात् पठागृहायदायात तत्कल्पते सप्तमागृहात यदुपढौकित तन्न कल्पते इत्यर्थ (१२) त्रिमुद्रादिक यदन्नादिक भाति तदुद्भिन्नमु. च्यते-उद्घाटित न भुज्यते इत्यर्ध (१३) मालिकादिसमारोहणेन यदानीत त मालिकारोहणमुच्यते-उपरितनभूमेर्यघृतादिकमधस्तनभूमी समानीन तन्न कल्पते इत्यर्थ (१४) राजभयाचौरमयाधीयत्त तदा- च्छेद्यमुद्यते (१५) ईशानीशानभिमतेन स्वाम्यस्वाम्यनभिमतेन यदी यते तदनिसृष्ट कथ्यते (१६) इत्येते पोडशोद्गमदोपा भरन्ति । अथोत्पादनदोषा पोडश उच्यते तन्नामनिर्देशो यथा। धात्रीवृत्ति (१) दूतव (२) मियावृत्ति (३) निमित्त (४) इच्छारिभाषण (५) पूर्वस्तुति (६) पथास्तुति (७) क्राधचतुष्क (८-९-१०- ११) वश्यकर्म ( १२) स्वगुणस्तवन (१३) विद्योपजीवन (१४) मनोपजीरन (१५) चूर्णोपजीवन (१६)। वाललालनशिक्षादि- भावप्राभृतं । २५१ र्धात्रीत्व (१) दूरवधुजनाना वचनाना नयनमानयन च दूतत्वं (२) गजचिकिसा निपचिकिसा जागुल्यपरनामा बालचिकिसा तादृशान्यचि किसामिरशनाजन भिषग्वृत्ति (३) स्वरा तरिक्षभौमाझव्यञ्जनच्छिन्न- लक्षणस्वप्नाष्टानिमित्तैरशनार्जनं निमित्त (४) कश्चिपृच्छति हे मुने ! दीनहानादीनामन्नादिदानेन पुण्य भवेन वा भवेत् । मुनिरन्नार्थं वदति पुण्य भवदेवेत्यभ्युपगम इच्छाविभाषणगुच्यते (५) अहो जिनदत्त ! त्व जगति विरयातो दाता वर्तसे इयादिभिर्वचनैर्गृहस्थस्यानन्दजनन मुक्ते पूर्व त पूर्वस्तवन (६) एव मुक्ते पथात् स्तवनविधान पश्चा स्तुति (७) क्रोध कृवाऽन्नोपार्जन क्रोध (८) मानेनानाजन मान (९) माययाऽ- मार्जन माया (१०) लोभेनानार्जन लाभ (११) वशीकरणमंत्र- तत्राद्युपदशेन यदन्नापाजन तश्यकर्म (१२) स्वकीयतप श्रुतजा तिकुलादिवर्णने स्वगुणस्तपन (१३) सिद्धविद्यासाधित विद्यादीना प्रद र्शन विद्योपजीवन (१४) अङ्गशृङ्गारकारिण पुरुषस्य पाठसिद्धादि मत्राणामुपदेशन मनोपनीनन (१५) एव चूर्णादेरुपदशन चूर्णोप जीवन (१६) एते पोडशो पादनदापा वदितव्या । अथैपणादशदोपा क्थ्यते। तपामय नामनिर्देश । शकित (१) म्रक्षित (२)निक्षिप्त (३) पिहित (४) उज्झित (५) व्यवहार (६) दात (७) मिश्र (८) अपकं (९) लिप्त (१०) चेति । एतदन्न सेव्यमसेव्य वेति शकितं (१) सस्नेहहस्तपात्रादिना यद्दत्त तन्म्रक्षित (२) सचित्तपद्मपत्रादौ यक्षिप्त तन्निाक्षप्त (३) सचित्तेन पद्मपत्रादिना यपिहित तदन्न पिहित ( ४ ) यच्चूतफलारिक बहु सक्या ल्पसेवन तदुज्झितं,अथवा यपानादिक दीयमानं बहुतरेण गलननाल्पसेवन तदुझितं (५) यद्यतीना सभ्रमादादरतया चेपात्रादेरसमीक्ष्याकर्षण स १वेल०का २५३ पट्माभृते- आगमे व्यवहार उच्यते (६) दातृदोपाः कय्यन्ते-निर्वस्त्रः शौण्डः पिशाचः अन्धः पतितः मृतकानुगः तीब्ररोगी व्रणी लिंगी नीवस्थानस्थितः उच्चस्थानस्थित आसन्नगर्भिणी कोऽर्थ निकटजनितापत्या वेश्या दासी काण्डपटादिनान्तरिता अशुचिः किमपि भक्षयन्ती इत्यादयो दोपा दातृगा ज्ञातव्याः (७) पड्नीयसम्मिश्नं मिश्रः (८) पायकादिद्रव्यैरपरित्यक्त- पूर्वस्वकीयपर्णगन्धरसमपकं (९) लिकिरायेदीयमानमशनादिक लिप्त तथाऽपामुकजलमृत्तिकोल्मुकादिमिलितैर्यद्दीयते तलिप्त (१०)। स्वादनिमित्तं यत्संयोजन शीते उणं उष्णे शीतमित्यादिमेलन तदनेकरोगाणामसंयमस्य च कारणं ज्ञातव्यं (१) कुक्षरर्धमेशमन्नेन पूरयेत् तृतीयमंशं कुक्षेः पानेन पूरयेत् कुक्षेश्चतुर्थमंश यायोः मुखप्रचा. रार्थमवशेपयेत् रिक्त रक्षेत् अस्मात्प्रमाणादतिरेकोऽधिकप्रहण प्रमाण. दोपः। प्रमाणातिक्रमेण किं भवति ! ध्यानभगः, अध्ययनविनाशः, अर्युत्पत्तिः, निद्रोत्पत्तिः, आलस्यादिकं च स्यात् (२) इयानपानादि- प्राप्तौ रागेण सेवनं अंगारदोपः (३) अनिष्टान्नपानादिप्राप्ती द्वेषण सेवा धूमदोपः (४)। अय किमर्थमाहारो गृह्यते इति चेत् ! आहार- ग्रहणे मुनीनां गुणाः सन्ति । उक्तं च वीरनंदिभट्टारकेण- क्षुच्छान्त्यावश्यकमाण-रक्षाधर्मयमा मुनेः चयावृत्यं च पदभुक्तः कारणानीति यन्मतम् ॥ १॥ ततः शरीरसंवृद्धय तत्तेजोरलवृद्धये। स्वादार्थमायुसंवृद्धय नेव भुंजोत संयतः ॥२॥ महोपसर्गतकाङ्गमन्यासादियातपो- ब्रह्मचर्याणि भिक्षोः पदकारणान्यशनोजमने ॥३॥ एतदोपविहीनाममुक्केरन्तरकारिणः। अन्तरायाः कियन्तोऽत्र यण्यन्त घर्णिनामिमे ॥४॥ ध्यपहार इति दोषनाम अन्यत्र । - २५४ पट्यामते- कन्दं मूलं यीज पुष्पं पनादि किंचिद् सचित्तम् । अशित्वा मानगर्दे भ्रमितोति अनन्तससारे । कंदं सूरण लशुन पलाण्डु क्षुद्रबृहन्मुस्ता शाइक उत्पलाल शृङ्ग- धेरै आईवरवर्णिनी आर्दहरिद्रेत्यर्थः । मूलं हस्तिदन्तकं मूलकमित्यर्य । नारंगकंटकं गाजरमित्यर्थ । वीयं चणकादिकं । पुष्फ पुष्प सेमीपुष्प करणबीजपूरपुष्पं । पत्तादि नागवल्लीदलें । किंचि सचिन किमपि ऐौर्यादिक । असिऊण माणगव्वे अशित्वा भक्षयित्वा मानेन मान्य- तया गर्वे सति । ममिओसि अणवसंसारे भ्रमितस्त्र हे जीव ! अन- न्तससारे अपर्यन्तमपसकटे इति भावः। विणयं पंचपपारं पालहि मणवयणकायजोएण । अनिणयणरा सुरिहियं तत्तो मुत्ति न पावंति ॥१०२॥ विनय पंचप्रकार पालय मनोवचनकाययोगेन । अविनतनरा मुविहितो ततो मुक्ति न प्राप्नुवन्ति । विणयं पंचपयारं विनय यथायोग्यं करयोटन-पादपतन-अभ्युत्थान. स्वागत-भाषणादिक पंचप्रकारं ज्ञानस्य, दर्शनस्य, चारित्रस्य, तपसथ विनयं विनीतत्य, उपचारलक्षणे पंचम विनय । हे आमन् ! हे मुने ! हे जीव! हे आसन्नभव्य ! सोपकारिस्टं। पालहि प्रतिपाटय कुर्विति । मणवयणकायजोएण मनोवचनकाययोगेन आरमव्यापारण । अविणय- णरा सुविहियं अविनयनरा अविनतनरा या मुविहिता तीर्थकरनाम- कर्मपूर्वकव धरिशिष्टा। तत्तो मुर्ति न पाति तत कारणान्मुक्ति सर्व. कर्मक्षयलक्षणोपलक्षिता न प्राप्नुवन्ति नैर लभन्ते । णियसत्तीए महाजस भत्तीराएण णिच्चकालम्मि। ते बुण जिणभत्तिपरं रिजापच्चं दसरियप्पं ।।१०३।। 'बालका भावप्राभूत । २५५ निजशवस्या महायश ! भक्तिरागेण नित्यकाले । ल कुरु जिनभक्तिपर वैयाकृत्य दशविकल्पम् ॥ णियसत्तीए महाजम एकारस्योचारलाघवादन पादे द्वादशैव मात्रा पदितव्या । अयथा प्रयोदशमानासद्भावाद्गाथाङ दोभंग स्यात् । तदुक्त प्रारतव्याकरण- " उधारलघुत्यमेदोतोयजनस्थयो" निजशतया हे महायश भित्तीराएण णिचकालम्मि भक्तिरागण नियकाले । त चुण व कुर । जिणभत्तिपर जिनभक्तौ परमुल्ट। विजावच धैयारत्यं । दसत्रियप्प दशविकल्प दशभेद आचार्यादीना पूर्वोक्तानाम् । जं किंचि कर दोस मणवयकाएहि असुहमावेण । तं गरहि गुरमयासे गारव माय च मोत्तूण ।। १०४ ॥ य कश्चिन् कृतो दोष मनवचनकाय अशुभभावेन । त गई गुरुशकासे गारय मायां च मुक्त्वा । ज किचि कयं दोस ५ फधिकृतो दोष व्रतादिष्वतीचार । मणवयकाएहि असुहमारेण मनोवचनकारशुभभावेन रागद्वेपमोहा दिदुष्परिणामेन । तं-दोपमतीचारादिक, गई प्रकाशय। गुरुसयासे गुरु शफासे गुरुपार्धे आचार्यगाराचार्यपादम्ले । गारय मायं च मोत्रण गार रसदिशन्दसातगर्ने मुक्त्वा, मापा च मुक्या कपटं परिहृत्य । मालोचनादशदोपान भगरत्याराधनाकथितान् रिहाय । तदुक्त- आफपिय मणुमाणिय, ज दिट्ट यादर च मुहम च । उन्न सहाउएय, बहुजणमयच तस्सेवी ॥१॥ "तुममाणतुणाशतुक करवाया शयनेन मोपूण इत्यत्र याला तूगादेश ।
૨૫૬ पटप्रामृत- दुजणवयणचडकं निहुरफड्डयं सहति सप्पुरिमा । कम्ममलणामणहं भावेण य णिम्ममा सनणा ॥१०५॥ दुरनवचनचार्ग निष्ठुरक्टुक सहदे सारा । कर्ममलनाशनार्थ मावेन च निर्ममा थवा !! दुजणरयणचडक दुर्जनाना गुग्दयानन्दकाना मिथ्याष्टीना नामश्रायकाणा च वचनमेव चपटा ता । कयभूता, निदुरकडुयं नि छुरा निर्दया, कटुका-पर्णशूलप्राया निष्ठुरफटुका ता निष्ठुरफटुका । सहंति सप्पुरिमा सह ते सत्पुरया महामुनयो दिगम्बरा , सदृष्टयो गृहस्थाश्च । किमर्थं सह ते ' कम्ममलणासणटं कर्माणि-ज्ञानावरणा- दीनि, मलानि-अतिचाराश्च तेषा नाशनार्थ क्षयार्थ परमनिर्याणप्राय च । भावेण य णिम्ममा सवणा मारेन जिनसम्यक्रमासनया निर्ममा ममत्पकारातमध्ययशन्द, ममत्वरहिता श्रवणा दिगम्बरा महा- मुनय । पावं सवड असेस समाए परिमंडिओ य मुणिपवरो। सेयरअमरनराणं पसंमणी धुवं होह ।।१०६॥ पार क्षिपति अशेप क्षमया परिमण्डितय मुनिप्रवर । ऐचरामरमराणी प्रशमनीयो भुवं भवति । पानं रायइ असेसं पाए निपष्टिप्रतिलक्षणं क्षिपते, अशेर्प दास- ततित्रयोदशप्रतिरूपमघातिकर्मलक्षण च प्रतिसमुदाय च क्षिपते । कया, समाए क्षमया पार्श्वनाथरत् उत्तमक्षमाध्क्षणपरिणामेन । परि- मंडिओ य परि समन्ता मनोपचनकायप्रकारेण मडित शोभितम्र मुणिपवरो मुनिप्रारो मुनीना श्रेष्ट । चकार उन्हसमुच्चयार्य । तेना- न्योऽपि फाऽपि गृहस्योऽपि क्षमापरिणामेन स्वर्ग गत्या पारपण मोक्ष याति शी शतव्यं । सेयरअमरनराणं ऐचराणां विद्याधराणा, अम- . भावमाभूत। २५७ राणां भावनव्यन्तरज्योतिप्ककल्पवासिना कल्पातीताना च, नराणा भूमिगोचरनृपादीना च । पसंसणीओ प्रशसनीय स्तवनीय स्तोतव्यः सस्कृन-प्राकृत अपभ्रश सौरसेनी मागधी-पैशाची चूलिकापैशाचीबद्धग- द्यपद्यानपद्यस्तुतिभिर्विशेषेणाभिवादनीय । धुवं होइ ध्रुवं निश्चयेन भवति । अत्र सदेहो नास्ति। क्षमावान् मुनिस्तीर्थकरोभवतीति भावार्थ इय णाऊण समागुण समेहि तिविहेण सयलजीवाणं । चिरसंचियकोहसिहि वरखमसलिलेण सिंह ॥१०७॥ इति क्षात्वा क्षमागुण क्षमस्व निविधेन सकलजीवान् । चिरसचितकोधशिखिन बरक्षमासलिलेन सिञ्च॥ इय गाउण इति पूर्वोक्ततीर्थकरपदप्रापक क्षमाफल ज्ञात्या विज्ञाय । खमागुण हे क्षमागुण ! चतुरशीतिशतसहस्रगुणाना मध्ये प्रधानक्ष- मागुण हे मुने ! । समेहि क्षमस्व । तिविहेण मनोवचनकायलक्षण- त्रिप्रकारेण । सयलजीवाणं सकलजीयान् एकेन्द्रियादिपचेन्द्रियपर्य- न्तान् । चिरसंचियकोहसिहि चिर दीर्घकाल सचित पुष्टित पुष्टि नीत क्रोध एव शिखी वैश्वानर दाहस-तापकारकत्वात् त क्रोधशि- खिन कोपानि । वरसमसलिलेण सिंह वरा उत्तमा क्षमा सर्व. सहनधर्म सैव सलिले पानीयमुदकं आयु स्थिरीकरणमन प्रसादजनक- त्वात् तेन परक्षमासलिलेन कृत्वा सिंच त्व विध्यापय । उक्त च- आकृष्टोऽहं हतो नैव हतो वा न द्विधाकृतः। मारितो न हतो धर्मो मदीयोऽनेन वन्धुना ॥१॥ चित्तस्थमप्यनवयुद्धय हरेण जाड्या. स्क्रुध्वा यहि किमपि दग्धमनङ्गबुद्धया। घोरामवाय स हि तेन तामवस्था क्रोधोदयाद्भवति कस्य न कार्यहानि ॥२॥ - पटू. १७ २५८ पट्मामृते- दिवसाकालाईयं भावहि अवियार दंसणनिसुद्धो । उत्तमोहिनिमित्तं असारसाराई मुणिऊण ।। १०८ ॥ दीक्षाकालरादीय भावय अविचार । दर्शनविशुद्ध । उत्तमबोधिनिमित्त असारसाराणि ज्ञात्वा ।। दिक्खाकालाईयं दीक्षाकाले खलु जीवस्य परमवैराग्य भवति, दीक्षाकाल आदिर्यस्य रोगोत्पत्तिप्रभृतिकालस्य स दीक्षाकालादि दी क्षाकालादौ भवो दीक्षाकालादीयो भावस्त दीक्षाकालादीय निजपरिणा मविशेष हे जीव आत्मन् । हे चैतन्य ! हे मुने ! त्व । भारहि-भाग्य तं परिणाम स्व स्मर । यदहमद्यप्रभृति यनितामुख न पश्यामि, वनि तासु रक्तोऽहमनादिकाले ससारे पर्यटतोऽवाञ्चितमेव दुख प्राप्त अहर्निशमाकाक्षन्नपि सुखलश न लब्धनान् । तदुक्त- अजाकृपाणीयमनुष्ठित त्वया विकल्पमूढेन भवादित पुर। यदा किंचित्सुरालेशमाप्यते तदार्य । विद्धयन्धकवर्तनीयकम् ॥ १॥ अन्यच्च- ससारे नरकादिपु स्मृतिपथऽप्युद्वेगकारीण्यल दु खानि प्रतिसेषितानि भवता तान्येवमेवासताम् । तत्तीवत् स्मरसि स्मरस्मितशितापारनगायुधै र्यामाना हिमदग्धमुग्धतरुयद्यत्प्राप्तवानिर्धन ॥१॥ आतङ्कपावकशिखा सरसावलेखा म्वत्थे मनाडमनसि ते लघु विस्मरन्ति । तरकालजातमतिविस्फुरितानि पश्चा जीवान्यथा यदि भवन्ति कुतोऽप्रिय ते ॥ १ ॥ १ तत्तस्मा स्मरसत्मर इति पुस्तके पाठ ।
भावप्राभृतं । २५९ भारहि अवियार दंसणविसुद्धो दीक्षाकाले दारिद्रयकाले रोगा- दिकाले च ये भावास्या भाविता धर्माश्रयणपरिणामास्तान् भावान् हे जीव ! सदाकालमपि त्व भावय, हे अवियार-हे अविचार निर्विवक- जीव ।। अथवा हे अविकार रागद्वैपमहादिदुष्परिणामपर्जितजीव ! । फयभूत सन् भावय, दसणविसुद्धो-सम्यक्त्वकौस्तुभशोभितनिर्मलहृदय सन् भावय । अथा अक्यिारदसणविसुद्धो इत्येकमेव पदं । तत्रा. यमर्थ -अविकार पचविंशतिदोपरहित यद्दर्शन सम्यक्त्वरत्न तेन विशुद्धोऽ. नन्तभवपापरहित । किमर्थं भावप, उत्तममोहिनिमित्त उत्तमा गण धरचक्रधरकुलिशधरमव्यपरपुण्डरी पूज्यत्वात् उत्तमा चासौ बोधि तनिमित्त उत्तमबोधिनिमित्त । असारसाराइ मुणिण मसाराणि साराणि च मुनित्वा ज्ञात्वा । उक्त च-- अधिरेण थिरामरिण निम्मला निग्गुणेण गुणसारा। फापण जा विढप्पइसा फिरिया किन फायव्वा ॥१॥ अनागोचित असार, आलोचितं सार । परनिदा असार, निजनिन्दा सार । आमदोपाणा गुरोरप्रेऽप्रकथन असार, गुर्वने निजदोपकथन सारै । अप्रतिकमण असार, प्रतिक्रमण सार । विराधनं असारं, आराधन सारे । अज्ञान असार, सम्यग्ज्ञान मार । मिथ्यादर्शनं असार, सम्यग्दर्शनं सारै । कुचरित्र असार, सञ्चरित्र सार । कुतय. असार, मुतप सार । अकृय असार, कृन्य सार। प्राणातिपातोऽसार, अभयदान सार । गृपापादोऽसार , सत्य सार । अदत्तादान असार, दत्त कल्प्य च सारे । मैथुन असार, ब्रह्मचर्य सार । परिग्रहोऽसारं, अस्थिरेण स्थिरमनसा निमला निर्गुणन गुणमारा। कापन या विधीयते सा क्रिया किन कर्नया । २ घिरामणेग स। . ।
२६० पट्माभूते- नैर्मन्थ्यं सारं । रात्रिभोजनमसार, दिवाभोजनमेकमक्ते प्रत्युत्पन्न प्रामुक सारं । आर्तरौद्रध्यानमसार, धर्म्य शुत्रध्यानं सारं । कृष्णनीठकपो- तलेश्या असार, तेज पद्मशुक्लेश्या सार । आरंभोऽसार, अनारंम सार | असयमोऽसार, संयम सार । समयोऽसार, निमन्य सारं । सचेलोऽसार, निश्चेल सार । अलोचोऽसार, लोच सार । स्नान अमार, अस्नान मलधारण सार । अभूमिशयन असार, भूमिशयन सारं । दन्तधापन असार, भदन्तघर्षण सार। उपविश्य भोजन असार, उद्भभो- जन सार। भाजने भोजन असारं, पाणिपाने भोजन सार। क्रोधोऽसारं, क्षमा सार । मानोऽसार, मार्दवं सार | मायाऽसार, आज सारे । लोभोऽसार, सतोप सार । अतपोऽसारं, द्वादारिधं तप सारे । मिथ्यात्वं असार, सम्यक्त्वं सार । अशील असार, शील सार । सश. ल्योऽसार, निशल्य सारं। अनिनयोऽसार, विनय सारे । अनाचाराs. सार, आचार सार । उन्मार्गोऽसार जिनमार्ग सार । अक्षमा असार, क्षमा सार । अगुप्ति असार, गुप्ति सार । अमुक्ति असार, मुक्ति सार । असमाधि असारं, समाधि सार । ममत्वं असार, निर्ममन्य सार । यद्भावितं तदसारं, यन भावितं तत्सारं । इति सारासाराणि ज्ञातव्यानि। सेनहि चउविहलिंग अभंतरलिंगमद्धिमापप्णो । बाहिरलिंगमकज्ज होइ फुडं भावरहियाणं ॥ १०९ ।। सेवस्व चतुर्विधरिश अभ्यतररिद्धिमापन । बाधरिङ्गमकार्य भवति फुट भावरहिताना ।। सेपहि चउविहलिंग सेवस्व है मुने ! चतुधिं लिंग शिर • केशमुखश्मश्रुटोचाऽध देशरक्षण चतुर्विधमिट रिंग पिग्मुण्टी- द्वयमह । अभंतरलिंगमुद्धिमावष्णो अभ्य तरलिंग जिनसम्पाव भावमाभृतं । २६१ तस्प शुद्धिमापन्न प्राप्त । बाहिरलिंगमकज्लं बहिलिग पूर्वोक्त चतुधिलिंगमकार्य मोक्षदायक न भवति । होइ फुडं मावरहियाण अकार्य भवति स्पुटमिति निश्चयेन भारहिताना मिध्यादृष्टीनां दिगम्बराणा। आहारमयपरिगहमेहुणसण्याहि मोहिओसि तुमं । मामिओ संसारवणे अणाडफालं अणप्पयसो ॥११० ॥ आहारमयपरिमहमैथुनसंहामि मोहितोसि त्वम् । भ्रमित संसारवने अनादिकालमनामवरा ॥ आहारमयपरिग्गहमेहुणसण्णाहि मोहिओसि तुम आहार- भयपरिग्रहमैथुनसज्ञाभिर्मोहित आत्मरूपाचालित प्रचलित प्रच्युत , असि-भवसि, तुर्म-त्य हे जीव ! भमिओ संसारवणे भ्रान्त पर्यटीस्त्वं संसारवने नरकतिर्यक्थुमनुष्यसितदेवगहने। अणाइकालं अनादि- काउ पूर्वकाले। अणप्परमो अनात्माश , न आमा मनो वशे यस्प सोऽनात्मश विषयकायान्यायजितहृदय इत्यर्थ । बाहिरसयणनापणतरमूलाईणि उत्तरगुणाणि । पालहि भारविमुद्धो पूयालाहं नईहतो ।। १११ ।। पहिशयनातपनतमूलादीन उत्तरगुणान् । पालय भावविशुद्ध पूजालाभं अनोहमान ॥ पाहिरमयणतारणतरमृलाईणि उत्तरगुणाणि याहे शयनातप. नतरमूलादीन् उत्तरगुणान् पाटयेति सम्बध । शीतजेऽनाहतस्थाने स्थिति युग । उष्णकाले आतपनयोग धर । वर्षाकाले तस्मूले तिष्ठ। वृक्षपर्णोपरि पतिया यजलं ययुपरि पतति तस्य प्रामुकत्याद्विराधनाs- कायिकाना जीगाना न भवति द्विगुणं वावगे च भातीनि कारणात् वर्षामाले तरमलस्थितेरपयोग, अन्यथा कातरत्यप्रसने 1 एते त्रयोडी २६२ पप्राभूते- योगा उत्तरगुणा कय्यन्ते । पालहि भानविमुद्धो ( पालय भाववि शुद्ध ) तवभारनानिर्मग्मना सन्निति भाव । पूयालाह नईहतो पूजालाभल्यायादिकमनाहमानाऽनिच्छन्निति शेप । भारहि पढम तच विदिय तदिय चउत्यपचमय । तियरणसुद्धो अप्प अणाइणिहण तिरग्गहर ॥ ११२ ॥ भावय प्रथम तव द्वितीय तृतीय चतुर्थपञ्चमकम् । त्रिकरणशुद्ध आ मान अनादिनिधन त्रिवर्गहरम् ॥ भावहि पढम तच्च भावय हे जी ! त्व श्रद्धेहि, किं तत् । प्रधर्म तत्वं जावतत्वं । विदिय द्वितीय तत्रमजीवसज्ञ पुद्गल धर्माधर्मका लाकाशलक्षण । तदिय तृतीय नत्वं आस्रपनामधेय । चउत्थपचमय चतुर्थ वधनामधेय, पंचमक तत्व सवराभिधान, निर्जरा पप तक, मोक्ष सप्तम तव । तिरयणसुद्धो अप्प त्रिकरणशुद्ध सन्ना मान भावय, अल्प वा स्तोककाले अन्तर्महूर्तकाल 1 कथभूतमामानं, अणा इणिण अनानिनिधनं आद्य तरहित । तिनग्गहर धर्मार्थकामबर्गत्रय वर्जित सर्वकर्मक्षयरक्षणमोक्षसहित निश्चयात् । जाव ण भारइ तच जाव ण चिंतेड चिंतणीयाड । तारण पावइ जीरो जरमरणनिग्निय ठाण ॥११३॥ यावत्र भावयति तत्व याचन चिन्तयति चिन्तनीयानि । तावन प्राप्नोति पीव जरामरणविवर्जित स्थानम् ॥ जाव पण भानड तच याव काल न भारयति, किं रख सप्तसस्य जीराजावास्रवासवरनिर्जरामाक्षलक्षण,त म य निजामत मोक्षकारण अपरे जीना गुद्धबुक्तिभावा निजा मा च। अजीवत र पुद्गलोधर्मोs धर्म काल आकाशश्च । तत्रष्टसमनितादिरूप पुद्गलपर्याया माहापादको भानप्राभूत २६३ रागजनक , शस्त्रविषकण्टकशत्रुप्रभृतिद्वेषकारकपुद्गलपर्याय । सोऽप्या- स्वानिमित्त कर्मबन्धकारणं शुद्ध आहारादिर्गृहीत शुद्रध्यानाध्ययनका- रणवात् सरनिर्जराकारणात् सोऽपि मोक्षप्रत्यय , अशुद्ध आहारो गृहीत चर्मादिस्पृष्टतया दुर्पानोत्पादकत्वादास्रवबन्धकारण । इत्यादि पुद्गलस्य हेयोपादेययुक्तितया विचारो ज्ञातव्य । अथवा पुद्गलद्रव्यमेव जीवस्य बधारणबाट खकारण परमार्थतया हेय एव । धर्मस्तु नरका- दिगतिसहायकारकत्वाद्धेय स्वर्गमोक्षगतिकारकत्वादुपादेय । अधर्मस्तु स्वर्गमोक्षस्थानादौ मुनीना ध्यानाध्ययनादिकाले स्थिति हेतुत्वादुपादेय । नरकनिकोतादिस्थितिकारणत्वे हेय | कालस्तु सर्गमोक्षादौ वर्तना- प्रत्ययत्वादुपादेय , नरकादिपर्यायवर्तनाकारणत्वाद्धय ।आकाश समवश- रणस्वर्गमोक्षादायवकाशदायकगुणचादुपादेय । नरकनिगोदादिस्थानाव- काशदानदायकत्वाद्धेय । निर्निदानविशिष्टतीर्थकरनामकर्मास्त्रव उपादेयो मोक्षहेतुत्वात् । नरकादिगादिनिपातहेतुत्वादन्य आत्रवो हेय । तीर्थ- करनामकर्महेतुश्चतुर्विधोऽपि बन्ध उपादेय , ससारपर्यटनकारीतरो बन्धो हेय । सवर उपादेय । निर्जरा चोपादेया मुनीना सम्बधिनी । मोक्ष सवर्थाप्युपादेयोऽनतज्ञानादिचतुष्टयकारणत्वादिति सप्तत यानि यावन्न भावयति । जाव ण चिंतेइ चितणीयाई याचन्न चिन्तयति चिन्तनी यानि धHशुक्लध्यानानि अनुप्रेक्षादीनि च । ताव ण पावइ जीवो तावन्न प्राप्नोति जीप आत्मा । जरमरणविवज्जियं ठाणं जरामरण- विवर्जित स्थान परमनिर्यणपदमिति शेप । पावं पर्यइ असंसं पुण्णमसेसं च पयइ परिणामो। परिणामादो गंधो मुक्सो जिणसासणे दिहो ।। ११४ ॥ १ हवइ इति पाटा तर क्वचिस्थाने।
- २६४ पद्माभृते- पाप पचति अशेष पुण्यमशेष च पचति परिणाम । परिणामाद्ध मोक्षो जिनशासने दृष्ट ॥ पाच पयइ असेस पाप पचति अशप, स पाप परिणाम पचति निर्जरपति निजामपरिणामो भावना नि शेप पाप दूरीकराति । उक्तंच नाममात्रकथया परात्मनो भूग्जिमस्तपापसक्षय । घोधवृत्तरुचयस्तु तद्दता पुर्वते हि जगता पति नरम्॥१॥ पुण्णमसेस च पयइ परिणामो पुण्य अशप सर्व च सर्वमपि पचति विस्तारयति मेव्यति, कोऽसौ । परिणाम निजशुद्धयुद्धकस्व भावा मभावना जिनसम्यक र च । तथा चोक्त- एकापि समर्थेय जिनमत्तिति निवारयितुम् । पुण्यानि च पूरयितु दातु मुक्तिश्रिय कृतिन ॥१॥ सद्वद्यगुभायुर्नामगोरलक्षण तीर्थकरनामकर्मासाधारणपुण्य परिणामे नैवोपाद्यंत इयर्थ 1 तथा चोक्तं- परिणाममेव कारणमाहु खलु पुण्यपापयार्निपुणा । तस्मात्पुण्योपचय पापापचयश्च सुविधेय ॥१॥ तथा च समयसार आमत परिणाम निमित्तमात्र प्रपद्य पुनरन्ये । स्वयमय परिणमन्तऽत्र पुग्दा कमभावेन ॥१॥ परिणामादो वधो परिणामाद्ध प्रतिस्थिन्यनुभागप्रदशलक्षण- चतुर्विधो बध-पुण्यसम्बधी पापसम्बधीच बध सजायते । उक्त च- पडिहिदियणुमागप्पदेसवधा दु चदुविधो यो । जोगा पयडिपदेसा ठिदिअणुमागा कसायदो हॉति ॥६॥ १ पुरुषार्थसिद्धयुपायस्यैवतमामा तरे। २ प्रतिस्थिम्यनुभागप्रदेशवधातु धनुर्विघो वध । योगात् प्रकृतिप्रदेशी स्थित्यनुभागौ पायता मवत ॥
-- MA भारप्रामृत । २६५ मुक्सो जिणसासणे दिहो मोक्ष सर्वकर्मप्रक्षयटक्षणोपलक्षित पर- मनिर्वाण जिनशासने श्रीमद्भगवदह सज्ञवीतरागमते दृष्ट प्रतिपादित परिणामादेवेति निश्चय , स मोक्षकारणभूत परिणाम आत्मन्येकलोली- भाव इति भावार्थ । मिच्छत्त तह कसायाऽसंजमजोगेहि असुहलेसेहिं । बंधइ असुहं कम्म जिणवयणपरम्मुहो जीनो ॥११५ ॥ मिथ्यात्व तथा रुपया अमयमयोगरशुभलेश्य । यध्नाति अशुभ कर्म जिनवचनपराङ्मुखो जीव ॥ मिच्छत्त तह कमाया मिथ्याच पंचविध तथा तेनैव पंचप्रकार- मिथ्यात्वप्रकारेण कपाया पचविंशतिभेदा । असंजमजोगेहि असुह- लेसेहि असंपमो द्वादशविध , योगा पचदशभेदा , एव सप्तपचारा- कर्मबन्धप्रत्यया कारणानि आलवभेदा भवन्तीति सक्षेपार्थ । कथ- भूतरेतैरास्त्रचे , अशुभलेश्यै कृष्णनीलकापोतलेण्याबलेन सजाने । बंधह असुई कम्मं बध्नाति अशुभं कर्म । जिणवयणपरम्मुहो जीवो जिन चचनपराङ्मुखी जीवो मिथ्याटिरात्मा । तं निवरीओ पंधर मुहकम्मं भावमुद्धिमावण्णो । दुविहपयार बंधइ संसेवेणेवं वैजरियं ॥ ११६ ॥ तद्विपरीत बध्नाति शुभकर्म भावशुद्धिमापन्न । द्विविधप्रचार बध्नाति संक्षेपणन कथित ॥ तं विवरीओ संघइ तस्माजिनवचनपराङ्मुखान्मिध्यादृष्टिजीगादि- परीत सम्यग्दृष्टिजीव बध्नाति, किं । शुभकर्म पुण्यकर्म-सद्वेधशुभायु- इससेषेण जिणेण वचरिय ग पुस्तके पाठ । सखे जिगण नजरिय व पुस्तके पाठ । २ “कर्ववर-पर-सम्ध-सास-साह-व-जप्प-पिमुगा- गोरोवाला ।" इत्यनन एतेषु रमाइशेषु क्शयतेबरादेशो जात ।
२६६ पट्माभृते- र्नामगोत्रलक्षण तीर्थकरत्वं । कयभूतो जीव , भारसुद्धिमावण्णो मार शुद्धिमापन्न परिणामशुद्धि प्राप्त सद्दष्टिजीर इयर्थ । दुविहपयार वधइ द्विविधप्रचार द्वयोर्भेदयो प्रचार विस्तार यानाति । ससे वेणेर बजरिय संक्षेपणैर कथित प्रतिपादितम् । णाणावरणादीहि य अहविकम्मेहि वेडिओ य अह । डहिऊण इण्हि पयडमि अणतणाणाइगुणचिंता॥११७॥ झानावरणानिभिध अष्टभि कमभि वेष्टितधाहम् । दग्ध्वानी प्रकल्पयामि अनन्तनानादिगुणचेतना । णाणापरणादीहि य ज्ञानापरणादिभिश्च ज्ञानावरणमादिर्येषां दर्श नावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रान्तरायाणा तानि ज्ञानापरणादीनि ते ज्ञानाचरणादिमि । चकारादुत्तरप्रतिभिरष्टच नारिंशदधिकशतप्रक तिमि । तथा उत्तरोत्तरप्रकृतिभिरसरयाताभिरह यष्टित इति सम्बध । अहविफम्मेहि वेडिओ य अह अष्टभिरपि कर्ममिटितचाई । अपिचशब्दादन तानतकर्मभिरहे परितो वर्ते । डहिऊण इण्हि पय- डमि दग्घा भस्मीकृय तानि कर्माणि इयुपस्कार । इव्हि इदानी, प्रकटयामि । अणतणाणाइगुणचिंता अन तज्ञानादिगुणचेतनामिनि तापर्यम् । सीलसहस्मटारम चउगसीगुणगणाण रस्साइ । भावहि अणुदिणु णिहिल अमप्परावण किं पहुणा ॥११८॥ "गीलगमायादा चतुरमीनिगुणगगाना लक्षा। भावय अनुदिन निग्लि अमरापन कि यदुना । १ अविह इति क पुस्तके मूलगायापाठ 1म पुस्तके, क ग पुस्तक य टीकायां च भये इति पार 1 ग घ पुस्तके तुअरने पड़ ।
भारप्राभूत । २६७ सीलसहस्सहारस शीलसहस्राष्टादश शीलाना सहस्राणि अष्टादश भवन्ति तानि ल भावयेति सम्बध । चतुरशीतिगुणगणाना लक्षाणि । भावहि अशुदिणु णिहिलं भावय अनुदिन अनिश निखिलं समन। असप्पलावेण किं बहुणा असत्प्ररापन मिथ्यानर्थकवचनैन बहुना बद्धतरेण कि-न किमपि । अष्टादशशीलसहस्राणा विवरण यधा-अशुभमनोवचनमाययोगा शुभेन मनसा हन्यन्ते इति त्रीणि शीलानि । अशुभमनोवचनकाययोगा शुभेन वचसा हन्य ते इति पट् शीलानि । अशुभमनोवचनकाययोगा शुभेन काययोगेन हयन्ते इति नव शीलानि । तानि चतसृमि सज्ञा- मिर्गुणितानि पशिच्छीलानि भवति । तानि पचभिरिन्द्रियजयगुणि तानि अशीत्यमशत भवन्ति । पृथ्व्यप्तजोवायुवनस्पतिद्वीन्द्रियत्रीन्द्रियचतु रिन्द्रियपद्रियसश्यसज्ञिदयामिर्दशभिर्गुणितानि अष्टादशशतानि भ- वन्ति । उत्तरक्षमादिभिर्दशभिर्गुणितानि अष्टादशसहस्राणि भवन्ति । अथवा अशी याद्विशताधिकसप्तदशसहस्राणि चैत यसम्बन्धीनि भ वति। विशयधिकसप्तशतानि अचेतनसम्बन्धीनि भवन्ति । तत्रा- चेतनकृतभेदा कथ्य ते-काष्ठ पापाण-लेप कृता स्त्रियो मन कायकृत- गुणिता पट् । कृतकारितानुमतगुणिता अष्टादश । म्पशादिपचगुणिता नाति । द्रव्यभावगुणिता अशीयन शत । कपायैश्चतुर्भिगुणिता विंश स्यधिकानि सप्तशतानि । चैतन्यसम्बन्धीनि अशीत्यधिकद्विशतामसप्त दशसहस्राणि, तद्यथा-देवी मानुपी तिरश्ची चेति स्त्रियस्तिस्र कृतकारि- तानुमतगुणिता नर भत्ति । मनोरचनकायगुणिता सप्तविंशतिर्भ वन्ति । स्पर्शरसगधवर्णशब्दैर्गुणिता पंचत्रिंशदधिक शत । द्रव्यभार १ असप्पलावेहिं ग घ पुस्तके पाठ 1 पट्माभते- धर्म्य ध्यानमित्युमास्वामिसूर्चनात् । तथा श्रीगौतमस्वामिवचनाद्धर्य ध्यान दशविधं । तद्यथा । अपायविचयः १ उपायविषयः २ विपाकविचयः ३ विरागविचयः ४ लोकविचय: ५ भवविचयः ६ जीवविचय: ७ आज्ञविचयः ८ संस्थानविचयः ९ संसारविचयश्चेति १०॥ तथा शुक्लध्यान ध्याय पृथक्त्ववितर्कवीचारं १ एक पितर्कवीचार २ सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ३ व्युपरतिक्रियानिवर्ति ४ चेति । अह रउद्दे च झाण मुत्तूण आनै रौद्रं च ध्यानद्वयं मुक्त्वा परित्यज्य । तत्रार्तध्यानं चतुर्विधं इष्टवियोगः १ अनिष्टसंयोगः २ पीडा- चिन्तनं ३ निदानं चेति । रौद्रच्यानं चतुर्विधं हिंसानन्दः १ अनु- तानन्दः २ स्तेयानन्द. ३ संरक्षणानन्दश्चेति ४ । रुद्द झाइयाई रौद्रार्ते द्वे ध्याने ध्यातानि ( ध्याते ) । इमेण जीवेण चिरकालं इमैन प्रत्य- क्षीभूतन जीवनात्मना चिरकाल अनादिकालं । धर्म्य शुक्ल च ध्यानवयं न ध्यातमिति भावार्थः। जे के वि दव्यसवणा इंदियसुहआउला ण छिदंति । छिदंति भावसवणा झाणकुढारेहिं भवरुवयं ॥१२०॥ ये केपि द्रव्यश्रवणा इन्दियसुखाकुला न छिन्दन्ति । छिन्दन्ति भावधवणा ध्यानकुटारेण भववृक्षम् ॥ जे के वि दवसवणा ये केऽपि द्रव्यश्रवणाः शरीरमाण दिग- म्बरा अन्तर्जिनसम्यक्त्वशून्याः । इंदियमुहआउला ण छिदंति इन्द्रियाणा स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोरलक्षणानां विषयाणां मुसेषु आकुटा. । कदा उर्वोरुपरि विवक्षितवनिताया पादौ विन्यस्प स्तन- भाजापायविपायक्सस्थानविचयाय धर्म्य" इति सूनमूचनात् । २ वच. गत् ख. पुस्तके पाठ । ३ भवदुक्सं. .। " १ annamro मावप्राभृतं । कनककलशोपरि करपल्लवी विधृत्य मुखचुम्बनमधरपानमहं करिष्या- गीति स्पर्शनेन्द्रियसुखलम्पट , घृतपानपकानव्यञ्जनशात्यनादिस्वादमहं प्रहीष्यामि, कपरकस्तूरीचन्दनागुरुपुष्पादिपरिमलपान विधास्यामि, स्तन. जघनवदनविलोचनविलोकन प्रणेष्यामि, चीणावशस्वरमण्डलनवयौवन- कामिनीगीतमिश रवं थ्रोष्यामीति पंचेन्द्रियविषयमाकांक्षन् व्याकुलोऽयं जीयो भवति । सत्सर्वं पूर्वमनन्तशोऽनुभूतमेव ससारे, न किमपि दुर्लभ चर्तते अन्यनामस्वरूपसमुत्पन्नसुखामृतपानात् । तथा चोक्ते- अदृष्टं कि किमस्पृष्टं किमनाघ्रातमथुतं । फिमनास्यादितं येन पुनर्नवमियेक्ष्यते ॥१॥ सोंच- अङ्ग यद्यपि योषितां प्रविलसत्तारुण्यलावण्यव- भूपावत्तदपि प्रमोदजनकं मूढात्मनां नो सताम् । उच्छन्नहुभिः शङ्करतितरां कीर्ण श्मशानस्थलं लब्ध्या तुष्यति कृष्णकाकनिकरो नो राजहंसनजः ॥१॥ तथा च--- समसुखशीलितमनसामशनमपि द्वेषमेति किमु कामाः । स्थलमपि दहति झपाणां किम! पुनरन्मगाराः॥१॥ इत्यमृतचन्दः । तथा च शुभचन्द्रभगवान्- घरमालिहिता क्रुद्धा चलल्लोलात्र सर्पिणी । न पुनः कौतुकेनापि नारी नरकपद्धतिः॥१॥ तथाच शुभचन्द्र'- मालतीय मृदून्यासां विद्धि चाहानि योपित्तां। दारयिष्यन्ति मर्माणि विपाके ज्ञास्यसि स्वयं ॥१॥ १ तथा चोक्त, क. । २ उच्छ्नैः ख.।३ विद्धयानि च योषितांखा।
- २७२ पद्मामृते- काक एमियुराकीण करके पुरत रनिम् । यथा तद्वद्वराशोऽय कामी स्त्रीगुराम पने ॥२॥ तथा च सोमदवस्वामी चूर्णिगयेन चराग्यभावनामार--- युवजनमृगाणा य धायानाय इव वनितामु पुस्ताप । पुनर्मपमहीमहारोहणोपाय इव धूरतोलास । ससारसागरपरि. म्रमाय नीयुग्ममित्र होचनयुगए । दु साटोविनिपातरमिर घाचि माधुर्य । मृत्युगजप्रोमनघल पायमधरपलय । स्पर्शविषयम्दानेद इय पयोधरयिनियंश । यमपाशयटनमिय भुजलतारिन । उत्पत्तिनरामरणय में घना य । मोएमन- पुण्डमिर नाभिमण्डल। अपिल गुणयिरगेपनगरेरोष रोमराजीपि निर्गम । पाए यालनिरासभूमिरिय मपणास्थान। ध्यसनागमन तोरणमिचोरनिर्माण । अपि च- भूधनुरटयो याणानिए च पलिप्रयम् । हदय पर्तरी यासा ता पपने नु चविश्वाः॥१॥ गुणग्रामविलोपेषु साशा तय त्रिय । स्वर्गापवर्गमार्गस्य निसर्गादर्गठा प ॥२॥ गूगकीटो यथा ग्ये रतिं पुरत पर दि। तथा स्भ्यमेध्यसजान कामी लीथिईना भयेत् ॥३॥ एवमिद्रियमुखाकुटा इन्द्रियमुग्वविव्हला न छिन्दन्ति मसमिति सम्बध । डिंदति मारमपणा दित्ति विधायुगन्ति राज्यात भववृक्षमिति सम्पर । क छिदन्ति । मारपणा जिनमम्यस्त्वरन मण्डितहदयस्थता । झाणपुढारेण भरगम प्यान धम्पम्यान र. ध्यानं च तदयकुटार पुगर भाइ इनि गुमानि युटार, ध्यानमेव पुरारो ध्यानकुटार फर्मतरम्य विपण या 1 मार मसारतममिति शेर । मरल २मत्र तयार मैदानमान शिरत । H भावप्राभृतं । २७३ जह दीवो गम्भहरे मारुयवाहाविवज्जिओ जलइ। वह यानिलरहिओ झाणपईवो वि पन्जलइ ॥ १२१ ॥ यथा दीप गर्भगृहे मारतबाधाविवर्जितो ज्वलति । तथा रागानिलरहितो प्यानप्रदीपोऽपि प्रज्वलति । जह दीवो गम्भहरे यथा दीपो ज्योति गर्भगृहेऽपवरके स्थित सन्। मारुयवाहावियजिओ जलइ मारुतस्य सम्बधिनी मारुतोपना चायो सजाता, बाधा प्रचलाधि करणलक्षणा पीडा तस्था विवर्जितो ज्वलति चलनकिया कुर्वाण उद्योत करोति । तह रायानिलरहियो तथा रागानिलरहितो वनितालिंगनादिप्रीतिलक्षणरागानिलरहितो रागझं झावातविवर्जितो मुनानप्रदीप प्रज्वलति उद्योत करोति । उक्त च- जसु हिरणच्छी हियक्डइ तासु न बभु वियारि। एपकटि केम समति वढ । ये खडा पटियारि ॥१॥ उक्त च-- वृष्टयाकुलश्चण्डमरज्झझावातः प्रकीर्तित ॥३॥ झायहि पच वि गुरवे मगलचउसरणलोयपरियरिए परसुरखेयरमहिए आराहणणायगे वीरे ।। १२२ ।। ध्याय पञ्चापि गुरून् मङ्गलचतु शरणलोकपरिकरितान् । नरसुरखेचरमहितान् आराधनानायकान् ॥ झायहि पच वि गुरवे ध्याय व हे मुने 1 हे आमन् ! पचापि मर्हसिद्धाचार्योपाध्यापसर्वसाधून् पचपरमेष्ठिन । कथभूतान् पचापि गुरुन्, मंगलचउसरणलोयपरियरिए मगललोकोत्तमशरणभूतानि त्यर्य । मल पाप गालयन्ति मूलादुन्मूल्यक्ति निमूलकाप कपन्तीति मगल । अथवा मग मुख परमानन्दलक्षणं लाति ददतीति मंगलं । १ इय गाथा पूर्व एकोनच वारिंशत्तमे पृ आगता। वास्या छाया वर्तते। पद- 10 -~ २७४ पट्माभृते- एते पचपरमेष्ठिनो मगलमित्युच्यन्ते। लोकेषु भूर्भुव स्वर्लक्षणेषु उत्तमा उत्कृष्या लोकोत्तमा । एते पचगुरख सर्वेभ्योऽपि वर्या उध्यन्ते । तथा शरण-अर्तिमथनसमर्था इमे पचगुरखो जीवाना शरण प्रतिपायन्ते, चउसरणशब्देनामी, अहन्मगल अर्हलोकोतमा अर्हच्छ- रण। सिद्धमगल सिद्धलोकोत्तमा सिद्धशरण । साधुमगलं साधुलो- कोत्तमा साधुशरण | साधुशब्देनाचार्योपाध्यायसर्वसाधनो लम्यन्ते । सधा केवलिप्रणीतधर्ममगल धर्मलोकोत्तमा धर्मशरण चेति द्वादशमंत्रा सूचिता चतु शन्देनेति ज्ञातव्य । एते द्वादशमत्रा प्रणापूर्वमाया- बीजब्रह्मश्रुतबीजाक्षरपूर्वा ललाटपटे गोक्षीरवर्णा लिखिताश्चिन्त्यन्ते । तथा चोक्त- नेत्रद्वन्द्वे श्रवणयुगले नासिकाने ललाटे वक्ने नाभौ शिरसि हृदये तालुनि भूयुगान्ते । ध्यानस्थानान्यमलमतिभिः फीर्तिताम्यत्र देहे तेप्वकस्मिन् विगतविपय चित्तमालम्बनीयम् ॥१॥ लोयपरियरिए लोकोत्तममत्रसहितानित्यर्थ । तथा चानादिसिद्धमत्रो गुरूपदेशान्मन्तव्य । सूरिणा तु सूरिमत्र तिलकमको हलधुश्च निज- गुरुसमीपादुपदेशात् ध्यातव्य इति भावार्थ । णरसुरखेयरमहिए कथं भूतान् पचगुरून , नरसुरखेचरमहितान् नराणा नृपादीना, सुराणा सौध- मन्द्रादीना, खेचराणा विद्याधरचक्रवर्तिना, महितान् अष्टविधपूजाद्रव्य- भर्भावपूजाभिश्च पूजितान् । पुन कथभूतान् पचगुरुन्, आराहणणा- यगे भाराधनाया नायकान् स्वामिन इत्यर्थ । वीरे वीरान् कर्मशत्रु- क्षयकरणसमर्थानिति भावार्थ । णाणमयविमलसीयलसलिलं पाऊण भविय भावेण । वाहिजरमरणवैयणडाहविमुक्का सिवा होति । १२३ ।।
भावप्रामृतं । २७५ ज्ञानमयविमलशीतलसलिल प्राप्य भव्या भावेन । व्याधिजरामरणवेदनादाविमुक्ताः शिवा भवन्ति । माणमयविमलसीयलसलिलं ज्ञानेन निवृत्त ज्ञानमय सम्यग्ज्ञान मेव विमल कर्ममलकलकरहित शीतल परमाल्हादलक्षणसुखोत्पादक एतद्विशेपणत्रयविशिष्ट सलिल जलमिति रूपकं । पाऊण ज्ञानपानीय प्राप्य लब्ध्वा । के ते, भरिय रत्नत्रययोग्या भव्यजीवा । भावेण भावेन जिनमक्त्या । उक्त च- सुखयतु सुखभूमिः कामिनं कामिनीव सुतमिच जननी मा शुद्धशीला भुनक्त । कुलमिव गुणभूषा कन्यका संपुनीता- जिनपतिपदपद्मप्रेक्षिणी दृष्टिलक्ष्मीः ॥१॥ वाहिजरमरणवेयणडाहविमुक्का सिवा होंति व्याधिजरामरण- वेदनादाहविमुक्ता शिया भवन्ति । झानजल पीत्वा ज्ञानजलमाकर्ण्य तन्मध्ये बुडित्या तदवगाह्य परममगलभूता शिवा सिद्धा भवन्ति इति सम्यग्ज्ञानमाहात्म्य भगरता श्रीकुन्दकुन्दाचार्येण सूरिणोद्भावित भवतीति भावार्थ । जह बीयम्मि य दइढे ण पि रोहइ अंकुरो य महिवीढे । तह कम्मत्रीयदइटे भवंकुरो भावसवणाणं ॥ १२४॥ यथा बीजे दग्धे नैव रोहति अकुरश्च महीपीटे । तथा कर्मबीजे दग्धे भाकुरो भावधवणाना ॥ जह बीयम्मि य दड्ढे यथा येनप्रकारेण बीजे दग्धे भस्मीयते । ण वि रोहह अंकुरो य महिवीढे नापि नैव रोहति प्रादुर्भवति। कोऽ- सौ. अकुरः अभिनव उद्भिज उद्भिद्, महीपीठे भूमितले। चकार उक्त- समुच्चयार्थ , तेन रागद्वेषमोहादयो भावकर्मशाखादयोऽपि न रोहाने
२७६
पट्माभृते-
तह कम्मवीयदड्डे तथा कर्मबीजे दग्धे भस्मीकृते । भवंकुरो भाव-
सवणाणं भवाङ्कुरः संसाराङ्कुरो जन्मलक्षणो नापि रोहति न प्रादुर्भ-
वति। केपों, भावसवणाणं-सम्यग्दृष्टिनिरम्बराणां दुर्टक्ष्यपरमात्मभावना-
भाविताना भेदज्ञानवतां । उक्तं च-
दुर्सत्यं जयति परं ज्योतिर्वाचां गणः कवीन्द्राणां ।
जलमिव बजे यस्मिन्नलब्धमध्यो वहिर्लुठति ॥१॥
भावसवणो वि पावइ सुक्खाई दुहाई दव्यसवणो य ।
इय गाउं गुणदोसे भावेण य संजुदो होह ।। १२५ ।।
भावश्रवणोपि प्राप्नोति सुखानि दुखानि द्रव्यश्रवणश्च ।
इति धारवा गुणदोषान् भावेन च संयुतो भव ॥
भावसवणो वि पावइ भाषश्रवणः सम्यग्दृष्टिदिगम्बरोऽपि निश्च-
येन प्राप्नोति लभते । कानि प्राप्नोति, सुक्खाई निजात्मोत्थपरमान-
दलक्षणनिराकुलतासहितपरमानन्तसौख्यानि । दुहाई दव्यसवणो
य प्रामोतीति दोपकोद्योतात् दुःखानि शारीरमानसागन्तुकलक्षणोपलक्षि-
तान्यसातानि द्रव्यश्रवणो मिथ्यादृष्टिदिगम्बरः प्रामोति । चशब्दाह-
स्थोऽपि सावधसयुक्तो दानपूजास्नपनरहितः पर्वोपवासकातरः चलम-
लिनागरहितसम्यग्दर्शनदुर्विधो व्रतातिचारममपुण्यपादो दूरभव्यतया
गुरुचरणनिन्दक आत्महितो न भवति । टौकस्तु महापापी जिनप्र-
तिमोच्छेदको नारको भवति । तथा चोक्त-
सचे धर्ममयं वचिवचिदपि प्रायेण पापात्मक
क्षाप्येतद्वयवत् करोति चरितं प्रशाधनानामपि ।
तस्मादेतदिहान्धरज्जवलनं स्नानं गजस्याथया
मत्सोन्मत्तविचौष्टितं न हि हितो गहाश्रमः सर्वथा ॥१॥
भावप्राभूत । २७७ इय गाउं गुणदोसे इति ज्ञाया गुणदोषान् । भावेण य संजुदो होहे भागेन जिनभक्तिनिजात्मभावनापचगुरुचरणरेणुरजितभालस्थल. सयुती भर । एवं सति श मुस तेन युक्तो भय हे मुने! हे जीवेति सम्बोधन । तिस्थयरमणहराई अन्भुदयपरपराई सोक्सा। पाति भावसहिया संसेवि जिणेहि बजरियं ॥ १२६ तीर्थकरगणधरादीनि अभ्युदयपरम्पराणि सौख्यानि । प्राप्नुवन्ति भावसहिता सक्षेपन जिने कथित ।। तित्थयरगणहराई तीर्थकरगणधरादीनि सौख्यानीति सम्बध । तीर्थकराणां धर्मोपदेशकाले तीर्थंकरा कमलोपरि पादो पस्यन्ति, अशो. कवृक्षच्छायायामुपविशति, तेपामुपरि द्वादशयोजनमभिव्याप्य देवा पुष्प- वर्पण विरचयात, तानि तु पुष्पाणि उपरि मुखानि अधोवृतानि अव- तिष्ठन्ते, जानुपर्यत पतन्ति, मुनीनामागमने मुनिपुगा मागे लभन्ते, भ्रमरपरीतानि क्मलोत्पलकैरवेन्दीवरराजचपकजातिमुक्तपन्धनाइहासरवु. सफेतकमदारमुदरनमेरुपारिजातसन्तानककल्हारशुक्लरक्तसेवरकमुचुकु- न्दवृन्दानि पतत्ति, पचाशलक्षद्वादशकोटिपटहा अपराणि च वादिनाणि वेणुगलकिपणवमृदंगरिथिलतालकाहलकम्वुप्रभृतानि सरयातीतानि अ. म्वरचरकुमारकरास्फलितानि समुतरिक्षलक्षाणि ध्वनन्ति, सजलजल- घरगजितमिव स्वामिनो योजनेक यानद्धनिर्भव्यजनैरायेत, हसांसो- चलानि चतु पष्टिचामराणि पतन्त्युत्पतन्ति च, पचशतधनुस्मत सिंहपिटरं भाति, योजनैकप्रमाण सभामभिव्याप्य कोटिभास्करयुगप दुधोतिशरीरतेनो भवति, तच्च शारदेन्दुपरिपूर्णमण्डलमिर सोचनाना प्रियतम माति, एक्दण्डानि उपर्युपरि त्रीणि च्याणि मस्तकोपरि सभ- २७८ पट्माभूते- वत्ति, इत्यादीनि चतुस्त्रिंशदतिशयपचकन्याणादीनि जिनोत्तमाना सु खानि बाह्यानि भवति, अन तज्ञानान तदर्शनानन्तवीर्यानन्तमुखानि चाम्यन्तरसुखानि भगवता भवति। तथा भारश्रयणा (ना) गराधरदेनाना तीर्थकरयुवराज्यसौख्यानि भवन्ति । अन्भुदयपरपराई मोक्पाई इन्द्र- पदतीर्थकरकल्याणयलक्षणानि कल्याणपरम्पराणि सौरयानि भानश्र वणा अभ्य तरमहामुनयो भुभत इति भावार्थ । पाति मानसहिया प्राप्नुवति लमते, के ते भानसहिता सम्यक्त्वचित्तामणिमण्डित- मन स्थलय खलु दिगम्बरा । संखेवि जिणेहि बजरिय सखेपि- समासेनोक्तमिद वचन जिनै कथितमिति भारार्थ । ते धण्णा ताण णमो दसणवरणाणचरणसुद्धाणं । भावसहियाण णिच्च तिविहेण पणहमायाण ॥ १२७॥ वे घयास्तेभ्यो नम दर्शनवरमानवरणसुद्धेभ्य । भावसस्तेिभ्यो नित्य निविधेन प्रनष्टमायेभ्यः ते धण्णा ताण णमो ते मुनिपुगा धन्या पुण्यात तभ्योऽ स्माफ श्रीकुन्दकुदाचार्याणा नमा नमस्कारो भन्नु नमाऽस्तु स्तात् । दसणवरणाणचरणसुद्धाणं सम्यग्दर्शनसम्यग्ज्ञानसभ्यश्चरणानि शु द्वानि निरतिचाराणि येपा, सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रै ये शुद्धा कर्ममल- कलकरहिता दर्शनपरज्ञानचरणशुद्धा ये मुनिपुगवा तभ्यो नम । कथ भूतेभ्यस्तेभ्य , भावसहियाण भाग्न शुद्धामपरिणामेन लिनसभ्य क्वन च सहिताना सयुक्तम्य इयर्थ । ननु नम स्वस्तिस्वाहास्वधाल- वाड्योगे चतुर्थी भपति त कथमा प्रष्टीनिर्देश ? सत्य, संस्कृते तद्योग चतुर्थी प्रोक्ता, न तु प्राकृते । क्यनित्य-सर्वकाल-नमो- नमोस्तु इत्यस्य विशेषणमिद । केन कृत्वा नम , तिविहेण मनोवाका 1 -- Mammu भावप्रामृतं । २७९ पलक्षणेन नमस्कारेण नमो न तु हास्येन । कथंभूतानां तेपा, पणहमा- माणं प्रणटा विनाशं प्राप्ता माया परवचना येषां ते प्रणष्टमायास्तेषां । इड्डिमतुलं विउन्चिय किण्णरकिंपुरिसअमरखयरेहिं । तेहि विण जाइ मोहं जिणभावणभाविओ धीरो॥१२८॥ ऋद्धिमतुला विकृतो किंनर किम्पुरुपामरखचरैः। तैरपि न याति मोहं जिनभावनाभावितो धीर. ॥ इड्डिमतुलं विउव्जिय ऋद्धिः पूर्वोक्तलक्षणा, अतुला अनुपमा, विकुर्विता विक्रियाकृता निजतद्भयान्यभवतपोमहिमसंजाता। तथा किण्ण- रकिंपुरिमअमरखयरेहिं किन्नरैः, किम्पुरुपैः, अमरैः कल्पयासिप्रभृति- भिश्च निहिता ऋद्धिः । तेहि विणे जाइ मोहं तैरपि किन्नरकिम्पुर- पामरखचरैरपि मोहं न याति लोभ न गच्छति । कोऽमौ, जिणभावण. भाविओ धीरो जिनभाननया निर्मलसम्यक्त्वेन भावितो वासितो धीरो योगीश्वरः । ध्येय प्रति धियमीरयतीति धीरः । किं पुण गच्छइ मोहं परसुरसुक्खाण अप्पसाराणं जाणंतो पस्संतो चितंतो मोक्खामुणिधवलो ॥१२९|| किं पुन गच्छति मोई नरसुरमुखानामल्पसाराणाम् । जानन् पश्यन् चिन्तयन् मोक्षं मुनिधवल ॥ किं पुण गच्छइ मोहं किं पुनर्गच्छति मोह; लोभ । परसुर- सुक्खाण अप्पसाराणं नराणा नृपादीना सम्बन्धिना, मुराणामिन्द्रा- दीनां देवानां सम्बन्धिनां सौख्याना मोह लोभं किं गच्छति अपितु न गच्छति । करभूताना सौख्यानी, अल्पसाराणां स्तोकप्रशस्याना वा अल्पस्वादानामित्यर्थः। जाणतो पस्संतो जाननपि अनुभूय दृष्टा १न, टी.। ३ धीराः क.।
२८० पद्माभूते- जाननपि, परसतो-पश्यन् प्रयक्ष चक्षुभ्यो निरीक्षमाणोऽपि । चितंतो मोक्स मुणिधवलो चिन्तयन्नपि विचारयन्न प, कि ! मोक्ष सर्वकर्म क्षयलक्षण मोक्ष परमनिर्वाणसुख अनन्तसौख्यदायक परमनिर्माणमुखं जाननपीत्यादिसम्बध, मुनिधवल मुनीना मुनिपु या धवलो निर्मल चारित्रमरोद्धरणधुरघरो वृपम श्रेष्ठ इत्यर्थ । उत्थरह जा ण जरओ रोयग्गी जा ण डहइ देहउडिं। इंदियनलं न वियलइ ताव तुमंकुणहि अप्पहिय ॥१३०॥ आफमते यावन्न जरा रोगाग्नि यावर दहति देहकुटिम् । इप्रियवल न विगर ति तावत् त्व कुरु यात्महितम् ।। उत्थरइ जा ण जरओ आक्रमते यापन जरा | "छंदोत्यारोहाया भाक्रमे " इति प्राकृतव्याकरणसूत्रेण आक्रमधातोस्थार इत्यादेश । तर्हि रत्थारइ इतीदर्श रूप स्यात् । प्राकृते म्हत्वदी? मिथ भरत अचामच प्रायेण" इति सूत्रेण, सत्र नास्ति दोप ज्योतिरद्गमे " इति रचादिपाठादामने पद । अथवा उत्यारह जा ण जरा इति च कचित् पाठ । रोयग्गी जाण डहह देहउडिं रोगामि- किन दहति न भस्मीकरोति, का देहबुटि शरीरपर्णशाला । इंदिय चलं न वियलइ इद्रियाणा चक्षुरादीनां वल सामय थायरकार न विगलति । इंदियबल न पियलं इति पाठे इदियरलं याद्विक्ल हीन न भवति । तार तुम कुणहि अप्पहिय तायचं हे मुनिपुगर! दुर विहि, कि आत्महित मोक्ष साधयेयर्थ । उक्त च-- परितच्छलेन देवानिगच्छति शुद्धिरेव तर युद्ध। क्यमिय परणयार्थ जरी घरापस्तदा स्मरसि ॥१॥ स्मरवि पाठान्तरमाया। "आठो ।
भावप्राभृत] २८१ आत्तदशोकभयभोगफलमपुत्रै- र्यः खेदयेन्मनुजजन्म मनोरथाप्तं । नूनं स भस्मकृतधीरिह रत्नराशि- मुद्दीपयेदतनुमोमलीमसात्मा ॥२॥ अधोत्रीय तिरस्कृता परतिरस्कारश्रुतीनां श्रुति- श्चक्षु/क्षितुमक्षम तव दशां दूष्यामिवान्ध्यं गतं । भीत्येवाभिमुखान्तकादतितरां कायोऽप्ययं कंपते निष्कपस्त्वमहो प्रदीनभवनेऽप्यासे जराजर्जरः ॥३॥ छजीवछडायदणं णिचं मणवयणकायजोएहि । कुरु दय परिहर मुणिवर भावि अपुव्वं महासत्त ॥१३॥ पदजीवषडायतनानां नित्य मनोवचनकाययोग । कुरु दयां परिहर मुणिवर । भावय अपूर्व महासत्व !॥ छज्जीवछडायदणं पइजीपाना दया कुरु, पडायतनानि परिहर। कथ, णिचं सर्वकाल | मणवयणकायजोएहिं मनोरचनकाययोगै । कुरु दय परिहर मुणिवर हे मुनिवर मुनीना श्रेष्ठ ।। भावि अपुच्वं महासत्त भावय अपूर्व आत्मभानन हे महासत्व महाप्रसन्नधर्मपरिणाम।। "अभाधियं भावेमि भाषियन मावेमि। इति श्रीगौतमोक्तत्वात् । सविहपाणाहारो अणंतभवसायरे भमंतेण । भोयसुहकारणहं कदो य तिविहेण सयलजीवाणं ॥१३२।। दश विधप्राणादार अनन्तभवसागरे भ्रमता । भोगमुखकारणार्थ कृतश्च निविधेन सकलजीवानाम् ॥ दसविहपाणाहारो दशविधाना प्राणानामाहार पचेन्द्रियाणि मान- वाना तिरश्चा च त्वया कवलितानि, मनोरचनकायलक्षणास्त्रयो बलप्रा- णास्त्वया हे जीव! भक्षिताः, उच्छ्यासप्राणोऽपि त्वया चर्षितः, आयु प्राणश्चोदराग्निभाजन कृतः । अणंतभवसायरे भमंतेण अनन्तानन्त- १नि शक. ख । २जर्जरे अन्यत्र। " २८२ पटप्राभूते- ससारसमुद्रे भ्रमता पर्यटता । भोयमुहकारणहं भोगमुखकारणाथै जिन्होपस्थसंजातसुखहेतवे । कदो य तिनिहेण सयलजीनाणं दश- प्राणाना त्वया आहार कृत त्रिविधेन मनसा वाचा वपुषा चेति सक- लजीनाना चातुगतिकप्राणिना । पाणिनहेहि महाजस चउरासीलक्सजोणिमज्झम्मि। उप्पज्जतमरतो पत्तोमि निरतर दुक्ख ॥ १३३ ।। प्राणिवधै महायश चतुरशीतिलक्षयोनिमध्ये। उत्पद्यमानम्रियमाण प्राप्तामि निरन्तरं दुम्बम् ।। पाणिवहेहि महाजस प्राणिना वधै कृन्वा हे महायश !। चउ- रासीलक्सजोणिमज्झम्मि चतुरशातिलक्षयोनीना मध्ये । उप्पज्जत मरतो उत्पद्यमाना त्रियमाणश्च । पत्तोमि निरतर दुक्स प्राप्तोऽसि लव्यवानसि निर तरमविग्छिन दु ख शारीरमानसागन्तुकलक्षण । चतु- रशीतिल्क्षयोनीना विवरणनिर्देश पूर्वोक्त एर ज्ञातव्य । जीवाणमभयदाणं देह मुणी पाणभूदसत्ताणं । कल्लाणसुहनिमित्तं परपरा तिविहसुद्धीए ॥ १३४॥ जीवानामभयदान दहि मुने। प्राणभूतसवानाम् । कल्याणमुखनिीमन परम्परा निविशुद्धया । जीवाणमभयदाणं जापानामभयदान । देह मुणी पाणभूदसत्ताणं हे मुने ! व देहि प्रयच्छ न केरल जीवाना अभयदान देहि-अपि तु प्राणभूतसवाना । किमर्थमभयदानं दहि ' कल्लाणमुहनिमित्वं तीर्थ- करनामकर्मवधनार्थ गर्भावतारजमाभिषेकनिष्मणज्ञाननिर्माणपचक ल्याणमुखपरपरानिमित्त सुखश्रेणिकारण अभयदानमियर्थ । तिनिह- सुद्धीए त्रिविधशुद्धया मनोरचनकायनिर्मलतया अभयदान देहि । । उक्त च-- - २८३ भावप्राभूत । अभयदाणु भयभीरुह जीव दिण्णु पा आसि । चारवारमरणह डरहि केम्व चिराउ सुहोसि ॥१॥ तथा चाक्त- पका जीवदयैकत्र परत्र सकला किया । पर फर तु सर्वत्र कृपेश्चितामणेरिव ॥१॥ आयुप्मान् सुभग श्रीमान् सुरूप कीर्तिमानर। अहिंसावतमाहात्म्यादेकस्मादेव जायते ॥२॥ द्विभिचतुरिन्द्रिया प्राणा भूतास्ते तरव स्मृता । जीवा पचेन्द्रिया शेया शपा लत्या प्रकीर्तिता ॥१॥ असियसय किरियवाई अकिरियाण च होइ चुलसीदी। सत्तही अपणाणी येणैया होति बत्तीसा ॥ १३५ ॥ अशीतिशत क्रियावादिनाम कयाणा व भवति चतुरणीति । सप्तपष्ठिरज्ञानिना वैनायिकानां भवति द्वात्रिंशत् ॥ असियसय किरियवाई अशीयन शत क्रियावादिना श्राद्धादिक्रि यामन्यमानाना ब्राह्मणाना भवति । अक्किरियाण च होइ जुल- सीदी अक्रियावादिना इ दबदनाम गच्छो पनाना त दुलोदककाथोद कादिसमाचारासमायिणा श्वेतपटाना प्राय कपटाना मायाबाहुलाना चतुरशीति सशयिना मिथ्यारभदा भवन्ति । सनदी अण्णाणी सतष टिरज्ञानेन मोक्ष मनानाना मस्करपूरणमतानुसारिणा भवति । वेणैया हॉति बत्तीसा विनयात् मातृपितृन्पलोकादिग्नियन मोक्षक्षेपिणा साप सानुसारिणा द्वात्रिंशमतानि भरति । एष त्रिपाठयप्राणि जीगि शतानि १ अभयदान भयभीतानां जीवाना वृत्तो नासि। धारचारमरणन विभसि कथ चिरायु सुभवसि ॥ २ नर पुण्यधनेखर ख । ३ द्विमानां स ।४ मा टी।५मोक्षापिणाख। ।
rwww new २८१ पट्प्रामृते- मिथ्यावादिना भवन्ति तानि त्याज्यानी यर्ध । १८०५८४+६७+ ३२-३६३ ण मुयइ पयडि अभव्यो सुहु वि आयपिणऊण जिणधम्म । गुडदुद्धं पि पिता ण पण्णया णिव्विसा होति ॥ १३६ ॥ न मुञ्चति प्रकृतिमभव्य सुष्टु अपि भाकर्ण्य जिनधर्मम् । गुडदुग्धमपि पिबन्त न पत्रमा निर्विषा भवन्ति ।। ण मुयइ पर्यडि अभव्यो न मुशति प्रकृति मिध्याव अभव्यो दूरभव्यो वा लौकादिमिथ्यादृष्टि पापिष्ठ । सहु विआयण्णिउण जिण धम्मं सुष्ठु अपि आकर्ण्य श्रुत्या जिनधर्म दिगम्बरशास्त्र । गुडदुद्धं पि पिता गुडेन मिश्र दुग्ध गुडदुग्ध पिय तोऽपि । ण पण्णया णिव्विसा होति न पन्नगा सर्पा निर्पिपा विपरहिता भवन्ति संजायन्ते । तथा चोक्त- यसत्था जाणिया धम्मु ण चरइ मुवि । दिणयर सउजह उग्गमइ घूहडु अधउ तो चि ॥ १ ॥ मिच्छत्तछण्णादिही दुद्धी रागगहगहियचितेहि । धम्म जिणपण्णत्त अभव्यजीवो ण रोचेदि ॥ १३७ ॥ मिथ्यात्व उन्नदृष्टि दुर्सी रागप्रहगृहीतचित्तै । धर्म जिनप्रणीत अभन्यजीवो न रोचपति ॥ मिच्छत्तछण्णदिट्टी मिध्यावेन छन्ना आवृता दृष्टिीनलोचन यस्य स मिथ्यात्वच्छन्नदृष्टि अज्ञानो मिध्यादृष्टि । दुद्धी दुष्टा धीवुद्धि- यस्य स दुर्धी दुर्बुद्धि । रागगहगहियचित्तेहि रागग्रहगृहीतचिरी रागो दुर्मार्गाश्रिता प्रीति स एव ग्रह पिशाच तेन गृहीतानि चित्तानि अभिप्राया रागमहगृहीतचित्तानि ते रागग्रहगृहीतचित्तै करणभूत ११८०। ८४१६७।३२ एकप्रकृते ३६३ ख । २१ टी ३तहु क।
भायप्राभृत। २८५ नानानयदुष्टपरिणामरित्यर्थः । धम्म जिणपण्यत्तं धर्मे मिनेन फेलिना प्रणीत । अभव्यजीवो ण रोचेदि अभन्यजीवी रस्नग्यायोग्यो जीर आमा न रोचयति न प्रदधाति । कुच्छियधम्मम्मि रओ कुन्छियपासंडिभत्तिसंजुत्तो। कुच्छियतरं कुणंतो कुच्छियगइभायणो होइ ॥ १३८॥ पुस्मितधाम रत कुत्सितपापण्डिभतिसंयुतः । पुरिसततप. कुर्वन् पुस्मितगतिमा जन भवति ।। कुन्छियधम्मम्मि रओ कुसितधर्मे हिंसाधर्मे रतस्तत्परोऽनुरागनगन् । कुन्छियपासंडिभत्तिसंजुत्तो कुत्सिता ऋपिपनीपादपद्मसर ममस्तका ये पापण्डिनो वशिष्टदु:सपाराशरयाइरलपजमदग्निविश्वामित्रभरद्वाग- गौतमगर्गभार्गवप्रभृतय उपनिषत्प्रान्ते उक्ताच अतीता वर्तमानाथ तेषां पापडिनो मक्तिसंयुक्ताः फरयोटनपादपतनभोजनदानादित- स्परमनाः । कुच्छियतनं कुणंतो पुसित सप एकपादेनो. द्धीभूतोर्ध्वहस्तजटाधारणत्रिकालजलस्नानपचाग्निसाधनादियुसतं तपः कुर्वन् । कुच्छियगइमायणो होड युत्सितगतरिय तिर्यग्यो- निमलिनामुरब्यन्तरज्योतिष्यकिल्विपिकाहनदेवादिगते जन स्थान भवति-अनन्तसंसारी च स्यात् । “ब्रह्मणे प्रामणमासभेत" इत्यादि कुत्सितो धर्मो ज्ञातव्यः। इय मिन्छत्तावासे कुणयकुमत्थेहि मोहिओ जीनो। भमिओ अणाइकालं संसारे धीर चिंतेहि ॥ १३९ ।। इति मिथ्यात्वावासे कुनयकुशाने मोहितो जीव. । भ्रान्त अनादिकाल संसारे धीर । चिन्तय॥ इय मिच्छत्तानासे इति अमुना प्रकारेण मिथ्यात्वापासे मिथ्याचा- स्पटे प्रायेण मिथ्यात्यभृते संसारे इति सम्बन्ध | बुणयकृसत्धेहि - २८६ पद्माभूते- मोहिओ जीयो कुनय कुत्सितनये सर्वधैकान्तरूपै , युशास्त्रै चतु- पैदाटादशपुराणाष्टादशस्मृत्युभयमीमांसादिशात्रै मोहितो भ्रान्ति प्राप्तो जीव आत्मा। भमिओ अणाडकालं भ्रातोऽय पीटतो जीरो- नादिकाठ उत्सर्पिण्यवसर्पिणीकार रहल। संसारे धीर चिंतेहि हे धीर! है योगीश्वर ! संसारे भरे भ्रान्त इति चिन्तय विचारय । पासंडी तिणि सया तिसटिभेया उमग्ग मुत्तूण । रुमहि मणु जिणमग्गे असप्पलावेण किं पहुणा ॥१४॥ पापण्डिन प्रीणि शतानि विपष्ठिभदा उमार्ग मुशवा। रद्धि मनो जिनमार्गे असत्यापन किंबहुना ॥ पासंडी तिष्णि सया पापण्डिनस्त्रीणि शतानि। तिसहिमेया उम्मग्ग मुत्तण तथा विपष्ठिभेदा रन्मार्ग मुक्त्वा। रंभहि मणु जिण- मग्गे रद्धि मनो निनमार्गे निनधर्भे व स्थापय | अमप्पलायेण किं बहुणा असत्प्रलापेनानर्थकेन वचसा बहुना प्रचुरतरेण फिन किम पीत्याक्षेप । जीविमुको सबओ देसणमुमो य होइ चलसाओ। साओ लोयअपुजो लोउत्तरयम्मि चलमवओ ॥१४१|| जीवपिमुक्त शव दर्शनमुएच भवति चरमपरः ॥ यो रोशपूज्य शेषोत्तरे चतस्यक ॥ जीवविमुको सवओ जीवषिमुक्तो जीरेन रहित फायो टोके शय उप्यते । दमणमुमो य होइ चलमपो दर्शनमा पुमान् सम्प रहीनो जीवच भरति चलयर युसिस मृतक । सरओ लोया- पुज्जो जीवरहित शरफो लोकानामभ्य , अपवादेव भूमौ निमन्यते, अमिना भस्मीनियते या लोउत्सरियम्मि चलमपो साफौचरे बोके - भावप्राभूत। २८७ जैनलोके चलसवओ-सचेष्टितमृतक मिथ्यादृष्टिर्मुनि लोकोत्तराणां सम्य- ग्दृष्टिलोकाना अपूग्योऽमाननीयो भवति । इति भावप्राभृतस्य गोप्य- तत्वं यत्सदृष्टिना जीवेन भवितव्यमिति । लौकास्तु पापिष्टा मिथ्याह- टयो जिनस्नपनपूजनप्रतिवन्धकत्वात् तेषा समापण न कर्तव्य तत्स- भापणे महापापमुत्पद्यते । तथा चौक्त कालिदासेन महाकविना- निवार्यतामालि ! किमप्यय वटु पुनर्विवक्षुः स्फुरितोत्तराधरः । न फेवल यो महता विभापते शृणोति तस्मादपि यः स पापभाक् ॥१॥ तेन जिनमुनिनिन्दका लौका परिहर्तव्या । तथा चोक्त- सलाना कण्टकाना च द्विधैव प्रतिक्रिया। उपानन्मुखभगो या दूरत परिवजनम् ॥ १॥ जह तारयाण चंदो मयराओ मयउलाण सव्वाणं । अहिओ तह सम्मत्तो रिसिसावयदुविधम्माणं ॥१४२॥ यथा तारकाणां चद्र मृगराजो मृगकुलानां सर्वेषाम् । अधिक तथा सम्यक्व ऋपिधावकद्विविधधर्माणाम् ॥ जह तारयाण चंदो यथा तारकाणा ताराणा मध्ये च द्रोऽधिक इति सम्बन्ध । मयरामो मयउलाण सव्वाणं मृगराज सिंह मृग- कुलाना मध्ये सर्वेषामपि अधिक प्रधानभूत । अहिओ तह सम्मत्तो अधिक तथा सम्यक्च । केपा मध्ये सम्यक्त्वमपिक, रिसिगावयदुवि- हधम्माणं ऋषीणा दिगम्बराणां श्रावकाणां च देशपतीना विविध माणा मध्ये सम्यक्त्वमधिक प्रधानभूतमित्यर्थ । अस्य पप्राभृतप्र- न्यस्य प्रारभपरिसमातिपर्यतं सम्यक्त्वमेव प्रशसितमिति तात्पर्याय ज्ञातव्य इति भाव ।
- २८८ पद्माभृते- जह फणिराओ रेहइ फणमणिमाणिककिरणविप्फुरिओ । तह विमलदंसणधरो जिणभत्तीपश्यणो जीवो ॥ १४३ ॥ यथा पणिराजो राजते फणमणिमाणिक्यकिरणविस्फुरित । तथा विमलदशनघर जिनभक्तिप्रवचनो नीव ॥ जह फणिराओ रेहइ यथा फणिराजा धरणेद्रो राजते शोभते । कथंभूत सन् राजत, फणमणिमाणिककिरणविफरिओ फणाना सहस्रसख्यफटानां सम्बधिनी ये मणयस्तेषु मध्ये यमाणिक्य पद्मरागमणि मध्यपणाया उपरि स्थित यल्लालरत्न तस्य सर्वोत्तमरत्नस्प ये किरणा रश्मयस्तैर्विस्फुरितो धरणे द्र शेपनागनामा पद्मावतीदेवी- प्राणवल्लभ पातालस्वर्गलोकस्वामी या शोभते । तह विमलदंसण धरो तथा तेन प्रकारण विमलदर्शनधरी निर्मलसम्यक्त्वमंडितो मुनि श्रावको वा । जिणभत्तीपवयणो जीवो जिनभक्तिरर प्रचनं गोप्य- तवसिद्धान्त , जीव आत्मा चातुर्गतिकोऽपि पचेद्रियसज्ञिजीन शोभते। तथा चाक्त - सम्यग्दर्शनसम्पन्नमपि मातङ्गदेहज । देवा देव विदुभस्मगूढाहारान्तजस ॥१॥ जह तारायणसहियं ससहरनिं समंडले विमले। भाविय तह वयविमलं जिणलिगं दंसणविसुद्धं ॥१४४॥ यथा तारागणसहित शशधरविम्ब समण्डले विमले। भावित तथा बतविमल निलिम दर्शनविशुद्धम् ।। जह तारायणसहिय यया यन प्रकारेण तारागणसहित । ससहर निं समडले विमले शशधरविन चद्रमण्डल खमण्डले गगनमण्ड। कथंभूते, विमलेऽभ्रपटलादिरहिते । भाविय तह वयविमलं तया तेन भावप्राभृत। २८९ प्रकारेण भावितव्रत व्रतैर्मण्डितं निरतिचारबतसहित । जिणलिंग दंस- गाविसुद्धं जिनलिंग निप्रथमुनिपुगवशेष दर्शनेन सम्यक्त्वेन विशुद्ध निर्मलं जिनशासने शोभते इति शेप । इय गाउं गुणदोसं दसणरयणं धरह भावेण । सारं गुणरयणाणं सोवाणं पढम मोक्सस्म ।। १४५ ॥ इति ज्ञावा गुणदोष दर्शनरत्न धरत भावेन । सारे गुणरलानां सोपान प्रथम मोक्षस्य । इय जाउं गुणदोसं इत्यमुना प्रकारेण ज्ञावा सभ्यग्निचार्य गुण- दोष, सम्यक्रगुणरत्नमण्डित पुमान् गुणगन् मिथ्यात्मन दूषितो जीवो महापातकति विज्ञाय। दंसणरयण धरेह भावण दर्शनरत्न सम्य. क्त्यरत्न धरत यूर्य भागेन शुद्धपरिणामेन क्पट परित्यज्येत्यर्थ । सारं गुणरयमाणं सारे उत्तम गुणरत्नाना मध्ये प्रतसमितिगुप्त्यादीना मध्ये दानपूजोपपामशीलनतादीना च मध्ये सम्यक्त्वरत्नं सारं उत्तम धरत यूर्य हे भव्या ! 1 कथभूत, सोवाणं पढम मोक्सस्म सोपान आरो- हण पादारोपणस्थान पढम प्रथम क्स्प, मोक्षस्य सर्वकर्मक्षयटक्षणोपल- क्षितस्य मोक्षप्रासादस्योपरितनभूम्युपरिगमने, सिद्धपर्यायप्रापणमित्यर्थ । कत्ता मोइ अमुत्तो सरीरमित्तो अणाइणिहणो य । दसणणाणुपओगो णिदिवो जिणवरिंदेहि ॥ १४६ ॥ बता मोगी अमूर्न सरीरमान भनादिनिधन। दर्शनशानोपयोग शिर्दिश जिनवरे ॥ कता भोइ अमुत्तो जीवशन्द ोक्त एस प्राय । तेन जीत आरमा वर्ता यतते । न केवलं कर्ता पुण्यस्प प पस्य च अपि तु भोगी पुष्पस्प पापस्य च फलस्य भोक्ता आस्वादक इति न्याह र , निश्येन पद.१९ २९० पट्माभूते- तु केवलज्ञानस्य केरलदर्शनस्य च कर्ता वर्तते । तथा अनन्तमुपस्य भोक्ता अनन्तवीर्यस्य च । अमूर्तो मूर्ते शरीराद्रहित इति निश्चय , व्यर- हारेण तु कर्मपधप्रबधात् शरीरसयुक्तत्वाञ्च मूर्त इत्युच्यते । शरीरमित्तो अणाइणिहणो य शरीरमात्र शरीरप्रमाण आत्मा वर्तत इति व्यवहार तत्सुखदु खाद्यावेदकत्वात , निश्चयेन तु असरयातप्रदेशवाहोकप्रमाण । अनादिनिधनश्च जीवस्यादिनास्ति निधन विनाशश्च न वर्तते । दस- णणाणुवओगो दर्शनज्ञानोपयोग व्यवहारेण चत्वारि दर्शनानि अष्ट- ज्ञानानि उभयाभ्या द्विविधांपयोग , निश्चयेन तु केवटज्ञानकेटदर्श- नाम्या विविधोपयोग परमनिश्चयेन तु आमा फेवटज्ञानमेव तन्मय- वात् । णिदिहो जिणवरिंदेहि निर्दिष्ट प्रतिपादित कथित आत्मा जिनवरेन्द्र सर्वज्ञवीतरागैरिति तात्पर्यार्थ । दसणणाणावरणं मोहणियं अतराइयं कम्मं । णिवइ भवियजीवो सम्मं जिणमानणाजुत्तो ॥१४७॥ दर्शनज्ञानावरण मोहनीयम तराय कम्मै । निष्टापयति भन्यजीव सम्यग्जिनभावनायुक्त ॥ दसणणाणावरणं दर्शनावरण नवविध, तत्र चक्षुर्दर्शनावरण अचक्षुर्दर्शनावरणं अवधिदर्शनावरण देवदर्शनावरण चेति चतुर्विध दर्श. नावरण निद्रा निद्रानिद्रा प्रचला-प्रचलाप्रचला-स्त्यानगृद्धियति पचविधा निदा एवं पविध दर्शनावरण । मतिज्ञानाररण ध्रुतज्ञानाचरणं अवधि. ज्ञानावरण मन पर्ययज्ञानावरण केरटज्ञानाचरणं चेति पचविधं ज्ञानाप- रण । मोहणियं अतराइयं कम्मं मोहनीय धर्म अष्टाविंशतिभेद, अन्तरायं कर्म पंचभेद । तत्रापिशातिभेदं मोहनीय धर्म यथा-तत्र त्रिविधं दर्शनमोहनीय सम्यक्त्व मिप्यार सम्पम्मिथ्यात्वं चेति। चार- लोभश्चेति चत्वार भावप्राभूत । २९१ मोहनीय पचविंशतिभेद, अकपायभेदा नव हास्य रति अरति शोको भय जुगुप्सा स्त्रीवेद पुवेदो नपुसकोदश्चेति नव नोकपाया अफपाया उच्यन्ते यथाख्यातचारित्रवातकत्वात्। पोडशकपाया । तथाहि-अनन्तानु- बधी क्रोधोऽनन्तानुवधी मानोऽन तानुबधिनी मायाऽनन्तानुनधिनो फपाया सम्यक्वधातका पूर्वोक्त त्रिनिधं दर्शन- मोहनीय च । अप्रत्याख्यानक्रोधोऽप्रत्याख्यानमानोऽप्रत्याख्यानमायाs- प्रत्याख्यानलोभश्चेति चत्वार कयाया श्रावकवतघातका । प्रत्याख्यान- क्रोध प्रत्याख्यानमान प्रत्यारयानमाया प्रत्याख्यानलोभश्चेति चत्वार कपाया महानतघातका । सज्वलनक्रोध सज्वटनमान संज्वलनमाया संज्वलनलोभश्चेति चत्वार फपाया यथाख्यातचारित्रघातका । अन्त- राय पंचविधो दाना तरायो लाभातरायो भोगान्तराय उपभोगान्तरायो वीर्यान्तरायश्चेति । एतत्सर्वे कर्म णिहवइ भवियजीवो निष्ठापयति क्षय नयति, कोऽसौ । भविफजीयो भव्यजन । सम्मं जिणभावणा जुत्तो सम्पग्जिनभावनायुक्तो जिनसम्यक्त्वाराधक इत्यर्थ । चलसोक्सणाणदंसग चत्तारि वि पायडा गुणा होति । णडे घाइचउके लोयालोयं पयासेदि ॥ १४८ ॥ बलसीरयज्ञानदर्शन चत्वारोपि प्रकय गुणा भवन्ति । नटे घातियतुष्के लोकालोक प्रकाशयति । चलसोक्सणाणदंसण बल चानन्तवीर्य केवलज्ञानदर्शनाभ्यामन न्तान तदन्यपर्यायस्वरूपपरिच्छेदकत्वलक्षणा शक्तिरनन्तवीर्यमुध्यते न तु कस्यचिद्घातकरणे भगवान् बल विदधाति सूक्ष्मगुणाभावप्रसक्ते तथा चोक्तमाशाधरेण महाकविना- ययाति न जातु किंचिदपि न व्याहन्यते फेनचिद यनिष्पीतसमस्तयस्त्वपि सदा फेनापि न स्पृश्यते । ।
- - २०२ पदप्राभूत- यत्सर्वज्ञसमक्षमप्यविषयस्तस्यापि चार्थानिय तद सूक्ष्मतम स्वतत्वमभवा भाव्य भयोच्छित्तये ॥१॥ तथा अनन्तसौरय भगवत सदस्य भवति तदप्यनन्तज्ञानगुण सद्भावात् परमानन्दापतिलक्षण वस्तुस्वरूपपरिच्छदकन्वमय पदितव्य । तथा चाक्त विमानपत्त्युपारयानपयते । तथा हि- शास्त्र शास्त्राणि या ज्ञात्वा ताम्र तुष्यन्ति साधय । सवतत्वाथविज्ञानान सिद्धा सुखिन कथ। चक्रिणा कुरजाताना नागेदाणा मरुस्पताम् । अनन्तगुणित सौरयमुत्तरोत्तरीतना ॥२॥ तनिकालभनात् सोण्यादनतगुणित सुख । सिद्धाना तु क्षणार्धन त यो यच्छतु तच्छिर ॥ ॥ तथा ज्ञान कालज्ञान लाकालोकरस्तुपरिज्ञायक दशन चानन्तदर्शन ज्ञानक्षण एव वस्तुसत्तास्वरूपेण ग्रहणलक्षण बोद्धव्य । चत्वारि वि पायडा गुणा होति चवाराऽपि गुणा प्रकग भवति । कस्मिन् सति, णडे घाइचउक्के नष्टे विनाशं प्राप्ने घाइचउक्क-माहज्ञानावरण दर्शनावरणान्तराया मकेवलज्ञानसाम्राज्यवि उसकारके कर्मशत्रुचतुष्टये । लोयालोय फ्यासेदि लोकालोक प्रकाशयति । लायन्ते दृसते जीन पुद्गलधमाधमकायकाशा यास्मिन्निति लोक । ते न लोक्यन्त न दृश्य ते यस्मिन् ससार सर्वतोऽन तानन्तजीनादय पदार्थाश्चाोक । लोक श्वालोकश्च लाकालोकस्त लोकालोक प्रकाशयति जानाति पश्यति चत्यथ । णाणी सिव परमेही सम्वाह विण्हु चउम्रहो बुद्धो । अप्पो वि य परमप्पो कम्मरिमुको य होइ फुड' ।। १४९।। , क्षाका इम अशीतितमे पृष्ट उद्धृतारलोकसारगाथाद्वयमनुवर्तते । १ सुशिरे स।
भावप्रामृतं । २९३ शानी शिव परमेष्ठी सर्वज्ञो विष्णुः चतुर्मुसो वुद्धः । आत्मापि च परमात्मा कर्मविमुत्तश्च भवति स्फुटम् ।। सम्यग्दर्शनप्रभावेणार्य संसारी जीव सिद्धो भवतीति-न केवलं सर्वज्ञो भवतीत्यपिशब्दस्यार्थः । स सिद्धः कथंभूतः तस्य नाममालां प्रतिपादयन्नाह भगवान कुन्दकुन्दाचार्य:-णाणी सिव परमेही ज्ञानी ज्ञानमनन्तकेवलज्ञानं विद्यते यस्य स भवति ज्ञानी । शिनः परम- कल्याणभूतः शिरति लोकाग्रे गच्छत्तीति शिव. । " नाम्युपधप्रोकगृ- ज्ञो कः" । परमेष्ठी परमे इन्द्रचन्द्रधरणेन्द्रवंदिते पदे तिष्ठतीति परमेष्ठी। औणादिकोऽयं प्रयोगः। सव्यण्हू विण्हू चउमुहो युद्धो सर्व लोकालोक जानाति वेत्तीति सर्वज्ञः। वेवेष्टि केवलज्ञानेन लोकालोक व्यामोतीति विष्णुः “पिपे किच्च" इत्यनेन नुप्रत्यय स च फिन् कानुबन्ध- स्वान गुण. । चतुर्मुख. भूतपूर्वनयापेक्षया चतुर्मुख चतुर्दिक्षुसर्य- सम्याना सन्मुखस्य दृश्यमानत्वात् सिद्धावस्थाया तु सर्वत्रावलोकनशी- स्त्वात् चतुर्मुख. । बुद्धयत सर्व जानातीति बुद्धः। ज्यनुबन्धगति- बुद्धिपूजार्थेभ्यः :" इयनेन सूत्रेण वर्तमानकाले क्तप्रत्यय । अप्पो विय परमप्पो आत्मापि च संसारी जीवोऽपि च परमात्मा अर्हन् सिद्धथ भवति । कथभूत सिद्ध., कम्मविमुक्को य होइ फुडं कर्मभ्यो विमुक्तो रहितो भवति सजायते स्फुटं निश्चयेनेति शेपः । एतत् सम्यग्दर्शनस्य महान् महिमा ज्ञातव्य इति भारार्थ । इय घाइकम्ममुक्को अहारहदोसवज्जिओ सयलो। तिहुवणभवणपईवो देउ मम उत्तम बोहं ।। १५० ॥ इति पातिकर्ममुकः अष्टादशोषवर्जितः सकलः । त्रिभुवनभवनप्रदीपः ददातु मनमुत्तमं चोधम् ॥ १ इत्यनेन नाम्युपधशिवधातो. प्रत्ययः ।
पट्माभृते- इय धाइकम्ममुक्को इति पूर्वोक्तलक्षणघातिकर्मभ्यो मुक्त । अट्टा- रहदोसवन्जिओ सयलो अष्टादशदोपवर्जितो रहित , सकल सह कलया शरीरेण वर्तते इति सकल तेन तस्य धर्मोपदेशोऽपि घटते शरीरसयुक्तपरमातत्वात् । एतेनेद यचन प्रत्युक्त भवति-- अष्टविग्रहाच्छान्ताच्छिवात्परमकारणात् । नादरूप समुत्पन्न शास्त्र परमदुर्लभ ॥१॥ अशरीरस्य शास्त्रोत्पतिर्न सगच्छते कूर्मरीमवत् बप्यास्तनन्धपवत् शशपिपाणपत् विष्णुपदटेतातवत् मस्मरीचिकोदकवत् "अष्टौ स्थानानि वर्णान!" इति शब्दाना करेगकारणत्वात्। तिहुवणभवणपईवो लो- क्यगृहस्य दीप प्रद्योतक त्रिभुवनभवनप्रदीप । देउ मम उत्तमं वोहं ददातु मम मह्य उत्तम बोध केवलज्ञान । इतीष्टप्रार्थना श्रीकुन्दाकुन्दा- चार्याणा शास्त्रकरणस्य फलाभिलापित्वात् । अथ के ते अष्टादश दोषा इति चेदुक्ता अप्युच्यन्ते--- क्षुत्पिपासाजरातकजन्मान्तकभयस्मया । न रागद्वेषमोहाच यस्याप्त. स प्रकीर्यते ॥१॥ चकाराचिन्ताऽरतिनिद्राविपादस्वेदखेदविस्मया गृह्यन्ते । निर्दोषपरमाप्त- विचारोऽष्टसहस्त्रीन्यायकुमुदचन्द्रोदयप्रमेयकमलमार्तण्डाप्तपरीक्षातत्वार्थ राजनातिकतत्वार्थलोक्वार्तिक न्यायनिश्चयाटवारादिषु महाशास्त्रेषु वि- स्तरेण ज्ञातव्य । जिणवरचरणंचुल्हं णमंति जे परमभचिराएण । ते जम्मवेल्लिमूलं सणंति वरभावसत्येण ॥ १५१ ॥ १ नि स । २ नादपकजच्छन्न ख १३ मलोतवत् स । ४ करणशब्दो नास्ति स पुस्तके । ५ न्यायविनश्चयेति विश्रुतिरन्यत्र ।
भावप्राभृत। २९५ जिनवरचरणाम्मुराई नमन्ति ये परमभक्तिरागेण । ते जन्मवल्लीमूलं खनन्ति वरभावशस्त्रेण ॥ जिणवरचरणंयुरुहं जिनोऽनेकविषमभवगहनव्यसनप्रापणहेतून कर्मारातीन् जयतीति जिन: "इजिकृषिभ्यो नेक्"। जिनश्वासी वरः श्रेष्टो जिनवरः । अथवा जिनानां गणधरदेयादीनां मध्ये वरः श्रेय- स्करो जिनपरस्तस्य चरणावाम्बुरहं जिनपरचरणाम्बुरुहं श्रीमद्भगवदह- सर्वज्ञवीतरागपादपद्म । णमंति जे परमभत्तिराएण नमन्ति नमस्कु- र्वन्ति ये आसन्नभव्याः परमभक्तिरागेण परमभक्त्यनुरागेणाकृत्रिमस्नेहेन। ते जम्मवेल्लिमूल ते पुरुपा जन्मवल्लीमूलं खनन्तीति सम्बन्ध., जन्मैव वल्ली संसारवीरुत् अनन्तानन्तप्रसारत्वात् तस्या मूलं कन्दं खनति उत्पाटयन्ति उद्धरन्ति समूलकापं कपन्तीत्यर्थ मोहस्य विच्छेदकत्वात्, संसारवल्लीमूलं मिथ्यात्वमोह. तस्य मूलं खनन्ति सम्यग्दृष्टयो भवन्ति । उक्तं च श्रीभोजराजमहाराजेन- सुमोस्थितेन सुमुसेन सुमंगलाय रएव्यमस्ति यदि मंगलमेव वस्तु । अन्येन कि तदिह नाथ तवैव पत्रं प्रैलोक्यमंगलनिकेतनमीक्षणीय ॥१॥ खणंति घरभावसत्येण खनन्ति निमूलकाप कपन्ति, केन कृत्वा ! वरभावशस्त्रेण विशिष्टतावनाकुदालेन दानादिना वा । जह सलिलेण णे लिप्पइ कमलिणिपत्तं सहावपयडीए । तह भावेण ण लिप्पइ कसायविसएहि सम्पुरिसो ॥१५२ ।। यथा सलिलेन न लिप्यते कमलिनीपा स्वभावप्रकृत्या । तथा भावेन न लिप्यते कषायविषय. सत्पुरुष । १ इत्यनेन जिजये इत्यस्य धातोर्नगादेशः के इन् कित्वानेङ् । २ न. मू.।
२९६ पप्राभूते- जह सलिलेण लिप्पइ यथा येन प्रकारेण ( सलिलेन) न लिप्यते न स्पृश्यते । किं तत्कर्मतापन्न, कमलिणिपत्तं सहारपयडीए कमलिनीपत्र पमिनीच्छद सभापप्रकृत्या निजस्वभावेन | वह भावेण पण लिप्पइ तथा तेन प्रकारेण भावन जिनचरणकमलभक्तिलक्षणसम्य- क्वेन करणभूतेन कृत्वा । के कर्तृभूतै न लिप्यत, कसायविसएहि सप्पुरिसो कपायै क्रोधमानमायालोभै , विषय विषयसुखै स्पर्शरस- गन्धवर्णशब्दै सत्पुरुप सम्यग्दृष्टिजीव । तथा चोत- धाचीवालाऽसतीनाथपद्मिनीदलवारिवत् । दग्धरजुवदाभास भुझन् राज्य न पापमाक ॥१॥ ते चिय भणामिहं जे सयलकलासीलसंजमगुणेहिं । बहुदोसाणावासो सुमलिणचित्तोण सावयसमो सो ॥१५३॥ तानेव भणामि अह ये सकलकलाशीलसयमगुणे । बहुदोषाणामावास सुमलिनचित्त न धावकसम स ॥ ते चिय भणामिहं जे तानेव सत्पुरुषानह कुन्दकुदाचार्यो भणामि कथयामि । तान् कान्, ये पुरपा सकलकलासीलसंजमगुणेहिं सकलकला परिपूर्णकलना सम्यक्परीक्षादायिन , के । शीलसयम- गुणै शील निकपक्षमा सयमनिकपक्षमा गुणनिकपक्षमा भवन्ति । तथा चोक्त- यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्पणच्छेदनतापताइन । तथैव धर्मो विदुषा परीक्ष्यते श्रुतेन शीलेन तपोदयागुणः ॥१॥ तथा चोक्त- १ अस्माद मे अय पाठोऽधिक ख पुस्तके । सलिलेन जलेन न लिप्पन कमलिनीदल इति सम्बाघ । • भुजानोऽपि न पापभाक् इत्यपि क्वचित्पाठ ।
भावप्रामृत । २९७ समु सीलु सउच्चु त उसु सूरिहि गुरु सोइ । दाइछेदकसघायग्य, उत्तमु फवणु होइ ॥ १ ॥ बहुदोसाणावासो बहूना दोषाणामतीचारादीनामावासो गृह, अथवा बघूना स्त्रीणा दोष्णां वाहूना आवास आलिंगो मुनि । सुमलिणचित्तो ण सापयसमो सो सुष्टु अतीव मलिनचित्तो राग- द्वेषमोहाइमन्दचता मुनि मुनिनं भवत्यय, सहि किं भवति ' ण सावयसमो सो न श्रावकसम श्रावकेणापि गृहस्थेनापि सम सदृश स न भवति । तस्य दानपूजादिलामसयुक्तत्वादुत्तमत्व । तथा चोक्त--- घर गार्हस्थ्यमेवाद्य तपसो भाषिजन्मन । श्व स्त्रीकटाक्षलुटाकलोप्यवैराग्यसम्पद ॥१॥ "चिअ चा अस्मदीयस्त्यानस्थाणुमूकतूष्णीकदवैकमृदुकसेवानख- नीडनिहितहूतन्याहृतकुतूहलस्थूलव्याकुलेषु था" इत्यनेन प्राकृत- व्याकरणसूत्रण चिों इत्यस्य वा द्विर। चित्र इति कोऽर्थ "अवधा रणे गई च चिअ चेओं।" - अन्यच्च ते चि घण्णा ते चिय साउरिसा ते जियति जियलोप। योद्दहवहम्मि पडिया तरति जे चिय लीलाए ॥१॥ वोद्दह इति कोऽर्थो यौवनम् । १ सयम शील शौचं तप यस्य सूरे गुरु स । दाहच्छेदकपघातक्षम उत्तम कचन भवति । २ कम मूले । कम्मु ख । ३ य क ख । ४ एते चत्वार शब्दा अवध रणायें वर्तत इयर्थ । ५ ते एव पन्या त एव सत्पुरपा त जीवन्ति जीवलोक । यौवनद्रह पतितास्तरन्ति ये चैव लीलया ।
२९८ पद्माभृते- ते धीरवीरपुरिसा खमदमसग्गेण विप्फुरतेग । दुज्जयपरलालुद्धरकसायभड णिज्निया जेहिं ॥१५४|| ते धोरवीरपुरुषा क्षमादमखड्नेन विस्फुरता। दुजयप्रवलबलोद्धरकवायभटा निर्जताय ।। ते धीरवीरपुरिसा ते पुरपा धीरा अनिवर्तका सयमसमामात् कर्मशत्रूणा घातमकृत्वा न पश्चाद्व्याघुटति, वीरा विशिष्टा केवलज्ञान- साम्राज्यलक्ष्मी राति स्वीकुर्वन्तीति वीरा । खमदमसग्गेण विप्पुर तेण क्षमा प्रकृष्टप्रशम , दमो जितेन्द्रियत्व क्षमयोपलक्षितो दम क्षमदम स एर खड्ग कौक्षय करवानोऽसिनिस्त्रिंश घातिकर्मशत्रुसघातवातक- सात् तन क्षमादमखइगेन । किं कुरता विस्पुरता अप्रतिहतव्यापार तया चतुर्वता। दुग्नयपरलबलुद्धर दु खेन महता क्प्ठेन तुम शक्या दुर्जया , प्रबल प्रचुर, बल सामर्थ्य तेन उद्धरा उकटा ये कपायभटा प्राधमानमायालोभसुभटा । कमायभड णिज्निया जेहि एवविधा कपायभटा यौनजिता मारिता भूमौ पातिता । धण्णा ते भयरता दसणणाणग्गपवरहत्यहि । विसयमयरहरपडिया भविया उत्तारिया जेहि ॥ १५५ ॥ घयास्ते भगवतो दर्शनशानाग्रप्रवरहस्ताभ्याम् । विपयमकरघरपतिता भव्या उत्तारिता ये ॥ घण्णा ते भयवता धन्या पुण्यरत त भगवत इद्रादिपूजिता अथवा भय वात त्यक्त यैस्ते भयरता निर्भया सप्तभयरहिता । दसणणाणग्गपपरहत्येहिं दर्शनाने एव प्रवरौ बलवत्तरौ हस्तौ करो दर्शनज्ञानप्रवराग्रहस्तो ताम्या द्वाम्या हस्तान्या वरणमूताम्यो । विम- १आरभ्य रोहिं पयत पाठ पुस्तके एताण एव । २ मा मूलगायापाठ । २ दशनहातो (ना) एव ।
भावप्राभृतं । २९९ यमयरहरपडिया विषय एव मकरधर समुद्र तत्र पतिता ऋडिता । भविया उत्तारिया जेहि भव्यजीया उत्तारिता हस्तायलम्बन दत्ता उत्तारिता ससारमुखक्षारसमुद्रस्य पार नीता , यैारवर्धमानश्रीगौतम- स्वाम्यादिभिरिति मगलाभिप्राय । मायावेल्लि असेसर मोहमहातरुवरम्मि आरूढा । विसयविसपुप्फफुल्लिय लुणं ति मुणि णाणसत्येहि ॥१५६॥ . मायावालीमशेषो मोहमहातरुवरे आढाम् । विषयविषपुष्पपुष्पिता पुनन्ति मुनय ज्ञानशन ॥ मायावेल्लि असेसा माया परवचनस्वभावा सैव वल्ली प्रतानिनी ता मायावल्ली, अशेषां अनन्तानुबधिप्रभृतिचतुर्भेदसमग्रा । मोहमहातरु- वरम्मि आरूढा मोह एव तरुवर पुत्रकलमित्रादिस्नेहमहावृक्षात- मारूढा चटिता । विमयविसपुप्फफल्लिय विषया एव विषपुष्पाणि तै पुष्पिता विषयविषपुष्पपुष्पिता ता । लुणंति मुणि गाणसत्थेहि लनन्ति च्छिन्दति, के ते। मुनय सम्यग्ज्ञानसमुपेता दिगम्बरगुरव इत्यर्थ । केन, ज्ञानशस्त्रेण सम्यग्ज्ञानशस्त्रेण परशुना इति शेप । मोहमयगारवेहि य मुक्का जे करुणभावसंजुत्ता। ते सव्वदुरियसंभं हणंति चारित्तसग्गेण ॥ १५७ ।। माइमदगारवं च मुक्का ये कणभावसंयुक्ता । ते सर्वदुरितस्तभ प्रति चारित्रगड़गेन । मोहमयगारवेहि य मोह कलापुत्रमित्रादिषु स्नेह , मदो ज्ञाना दिर प्रकारो निजौनत्य, गारव शब्दगारवर्द्धिगारवसातगारसभेदेन त्रि विधं । तत्र शम्दगारव वर्णोचारगर्न, ऋद्धिगाव शिष्यपुस्तफ्फमण्ड- लपिच्छपट्टादिभिरात्मोद्भावन, सातगारव भोजनपानादिसमुपनसौख्यली- लामदस्तैोहमदगारवै । चकार उक्तसमुच्चयार्थस्तेन निजपक्षीयसपन- .
पट्माभृते- राजमा यथारकादिभिरभिमान । मुक्का जे करणमानसंजुत्ता पूर्वो तोहादिभिर्ये मुक्ता , करणभाव कारुण्य दयापरिणामस्तेन सयुक्ता । ते सव्वदुरियसंभ त मुनय सर्वदुरितस्तम समस्तमलातिवारादि- समुपन पापस्तभ । ह्याति चारित्तसग्गेण नति चारित्रखट्सन च्छिदन्ति नि ननिर्मलसद्वृत्तनिस्त्रिंशेनेति शप | गुणगणमणिमालाए जिणमयगयणे णिसायरमुणिंदो। तारावलिपरियरिओ पुण्णिमइंदुव्य पवणवहे ॥ १५८॥ गुणगणमणिमालया जिनमतगगने निशाकरमुनीन्द्र । ताराबलिपरिकलित पूर्गिमे दुरिव पवनपथे। गुणगणमणिमालाए गुणा अष्टाविंशतिमूलगुणा दश धर्मा तिस्रो गुप्तय अष्टादशशील्सहस्राणि द्वाविंशतिपरीपहाणा जय एते उत्तर गुणा , गुणानां गणा समूहा गुणगणास्त एवं मणयो रत्नानि तैपा माला मुक्ताफलहारस्तया गुणगणमालया मुनि शोभते इत्युपस्कार । जिणमयगयणे णिसायरमुणिदो विनमतमाहतशासन तदेव गगर्न आकाश पापलेपरहित वात् जिनमतगगन तस्मिन् निनमतगगने सर्वज्ञ शासनाकाशे, निशाकरश्चन्द्र निशा कराति उद्यातयति निशाकरो मुनीन्द्र , तत्र मुनीद्रा दिगम्बर निशार पापाधकारविच्छेदकत्वात्। तारावलिपरियरिओ तारायटिपरिकलितो नक्षत्रमालापरिवेष्टितो नक्ष मण्डलोपेत । पुण्णिमइंदुब्ब पवणवहे पूर्णिमे दुरिव पूर्णिमाचद्रव च्छोमते, परनपथे गगनमार्ग इनि शेष । चक्हररामरेसवसुरवरजिणगणहराइसोक्खाइ । चारणमुणिरिद्धीओ विसुद्धमावा गरा पत्ता ॥ १५९ ॥ चमधररामकेशवसुरवरजिनगणधरादिसरयानि । चारणमु युद्धी विशुद्धभाषा नरा प्राप्ता ॥
भारमाभूत । चक्कहररामरेसवसुरवरजिणगणहराइसोक्साई चक्रधराश्च भर- तादय सकलचक्रवर्तिन , रागाश्च बल्दया , केशवाश्चार्धचक्रवर्तिन , सुरवराश्च सौधर्मेन्द्रायच्युते द्रपर्यन्ता अहमिन्द्रान्ता , जिनाश्च वृषभादि- धीरान्ता , गणधरादयश्च वृषभसेनादय श्रीगौतमातास्तथा सौख्यानि महापुराणादिशास्त्रणितानि । चारणमुणिरिद्धीओ चारणमुनीना आकाशगामिनामृषीणा ऋद्धी अक्षीणमहानसात्यप्रभृती । विशुद्धभावा नरा जीवा प्राप्ता लभन्ते स्म । सिवमजरामरलिंगमणोयममुत्तमपरमविमलमतुलं । पत्ता वरसिद्धिसुहं जिणभावणभारिया जीवा ॥१६॥ शिवमनरामरलि गमनुपममुत्तम परमविमलमतुलम् । शता वरसिद्धिमुस जिनभावनाभाविता डीवा ॥ शिवमजरामरलिंग शिव परमकल्याण परममगलभूत कर्ममलकले- करहितत्वात् , अजरामरलिंग नरामरणरहितचिन्ह । अणोवमं उपमा रहित । उत्तम परममुख्य । परमविमलं द्रव्यकर्मभावमनोरमरहित । अतुलं अन तमित्यर्थ । पत्ता वरसिद्धिसुहं एतद्विशपणावशिष्ट वर श्रेष्ठ सिद्धिसुख परमनिर्वाणसौख्य प्राप्ता लभत स्म। जिणभावण भाविया जीवा जिवभावनया निर्मलसम्यक्त्वेन भाविता वासिता जीवा आसन्नभन्या । ते मे तिहुवणमहिया सिद्धा सुद्धा णिरजणा णिचा । दितु वरमावसुद्धि देसणणाणे चरित्ते य ॥ १६१ ॥ ते मे त्रिभुवनमहिता सिद्धा शुद्वा निरजना नित्या । ददतु वरभावशुद्धि दर्शनशाने च रिने च ॥ ते मे तिवणमहिया ते जग प्रसिद्धा , म मम धाउन्दकुन्दा- चार्यस्य, त्रिभुवनमहितास्त्रैलोक्यपूजिता । सिद्धा सुद्धा गिरजणा - पटप्राभृत- णिचा। सिद्धा मुक्तिस्त्रीवल्लभा , शुद्धा कर्ममलकलकरहिता, निरजना निरुपलेपा, नित्या शाश्वता । दिंतु वरभावसुद्धिं ददतु प्रयच्छन्तु, चरभारशुद्धि विशिष्टपरिणामशुद्धिं । कस्मिन् , दंसणणाणे चरिते य सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञाने सम्यक्वारिने चेयर्थ । किंजंपिएण बहुणा अत्यो धम्मो य काममोक्सो य । अण्णे वि अ वावारा भावम्मि परिहिया सव्वे ॥१६२ ।। किं जलिलतेन बहुना अर्थों धर्मश्च काममोक्षश्च । अन्येपि च व्यापारा भावे परिस्थिता सर्वे ॥ कि जंपिएण बहुणा बहुना प्रचुरतरेण, जल्पितेन किं न किमपि। अत्यो धम्मो य काममोक्सो य अर्थो धन, धर्मो यतिश्रावकगोचर , काम पद्रियमुखदायिनी इष्टवनिता तस्या भोग , मोक्ष सर्वकर्म- क्षयलक्षण । अण्णे नि अवावारा अन्येऽपि च व्यापारा विद्यादेवता साधनादय । भारम्मि परिडिया सव्वे भावे शुद्धपरिणाम परिस्थिता भावाधीना भवन्तीति भारार्थ । उक्त च- न देवो विद्यते काठे न पापाणे न मृन्मये। भावेषु विद्यते देवस्तस्माद्भाचो हि कारण ॥ १ ॥ भावविहूण जीव तुह जइ जिणु वहहि सिरेण । पत्थरि कमलु किं निप्पजइ जइ सिंचहि अमिएण ॥२॥ सीसु नमतह क्यणु गुणु भाउ कुसुद्धउ जाह। पारद्धीदूणउ नमइ टुक्तउ हरिणाह ॥ ३॥ अन्ननपि भवेत् पापी निघ्नन्नपि न पापभाक् । परिणामविशेषेण यथा धीवरकर्षकौ ॥४॥ . भावविहीन जीव । यदि जिन वहति शिरसा। प्रस्तरे किं कमल निष्पद्यते यदि सिंचेत् ममृतेन ॥
i भावप्राभृतं । ३०३ इय भावपाहुडमिणं सव्वं बुद्धेहि देसियं सम्मं । जो पढइ सुणइ भावइ सो पावइ अविचलं ठाणं॥१६॥ इति भावनामृतमिद सर्व युद्धः देशितं सम्यक् । य पठति शृणोति भावयति स प्राप्नोति अविचलं स्थानम् ।। इय भावपाहुडमिण इति-एव प्रकार, भायप्राभृतमिद भावप्राभृतनाम शास्त्र । सव्वं बुद्धेहि देसियं सम्मं सर्च बुद्धैः सर्वज्ञैः, देशितं कथित सम्यनिश्चयन। यथा मया कथितं सर्वं बुद्धरप्येवमेवोक्तमिति भावार्थः । जो पढइ सुणइ भावइ य आरानभव्यो जोन. पठति गुर्गप्रेऽनुशीलपति अभ्यस्यति, सुणइ-एतदर्थमाफर्णयति, भावइ-श्रुत्वा श्रद्दधाति । सो पावइ अनिचलं ठाणं स आसन्नभव्यो मुनिपुगना, प्राप्नोति लभते, अविचलं निश्चल, स्थान मोक्षपदमिति सिद्धम् । इति श्रीपद्धनन्दिकुन्दकुन्दाचार्यचक्रनीवाचायलाचार्यगृधपिच्छा- चार्यनामपचकविराजितेन श्रीसीमन्धरस्वामिसम्यग्वोधसबोधितभव्यजनेन श्रीजिनचन्द्रसूरिभहारकपाभरणभूदेन कलिकालसर्वज्ञेन विरचिते पदप्राभूतभा- वनाप्रन्थे सर्वमुनिमण्डलीमण्डितेन कलिकालगीतमस्वामिनाथीमल्लिभूपणेन भट्टारकेणानुमतेन सक्लविद्वज्जनसमाजसम्मानितेनोभयभाषाकविचक्रवर्तिना श्री- विद्यानन्दिगुर्वन्तेवासिना थीदेवेन्द्रकीर्तिपशिष्येण रिवर श्रीश्रुतसागरण विरचिता भावप्राभूतटीका- परिसमाप्ता।
मोक्षप्राभृतं । अथ देवेन्द्रयशोगुरुविद्यानन्दीश्वरस्य शिष्येण । मुरिप्रियामुखाम्वुजदिक्षुणा शिक्षितेन गुणे ॥ १॥ श्रुतसागरेण करिना विनापि बुद्धया चिरच्यते रचिदा। मोक्षप्राभृतविवृतिष्टीकाऽलीकप्रमुक्तैन ॥२॥ याचकजनकर पतर स्वररपि मिथ्यामताद्विनेषु । भन्यजनजनकतुल्यो विवेकवान् मल्लिभूषणो जयति ॥ ३॥ गीतिरार्या। णाणमयं अप्पाणं उपलद्धं जैण झडियाम्मेण । चइउण य परदचं णमो णमो तस्म देवस्म ॥१॥ ज्ञानमय आत्मा उपलब्धो येन क्षरितकर्मणा । त्य वा च परद्रव्य नमो नमस्तस्मै देवाय ॥ णाणमयं अपाणं ज्ञानमय आत्मा । उवलद्ध जेण झडियकम्मेण उपलब्धो येन क्षरितकर्मणा । चइऊण य परदव्यं त्यक्या च परद्रव्य शरीर कर्म च परियज्य नमो नम -पुन पुनर्नम । तस्य देवस्य-तस्मै देवायेति भावार्थ । णमिऊण य तं देवं अणतपरणाणदंसण सुद्ध । वोच्छ परमप्पाण परमपयं परमजोईण ॥२॥ नत्वा च त देव अनन्तवरज्ञानदर्शन गुद्धम् । वक्ष्ये परमामान परमपद परमयोगिनाम् ।। हादिनी वन्नमस्खी स्यात् कुलिश भिदुर पवि । शतकोटि स्वरु शम्बो दमोलिरशनियो ॥ २ अस्मादप्रे ॐ नम सिद्धभ्य इति पाट । स पुस्तके तु नास्ति । ३ घुच्छ क्वचित् ।
मोक्षप्राभृतं । ३०५ णमिऊण यतं देवं नया च तं देवं सर्वज्ञवीतरागं । कथंभूत देव, अणंतवरणाणदंसणं सुद्धं अनन्तवरज्ञानदर्शनं शुद्धं अनन्तज्ञान- मनन्तदर्शनमनन्तमर्थिमनन्तसौख्यमित्यर्थः, शुद्ध घातिकर्मसघातनेन निर्मलस्वरूप अष्टादशदोपरहितमित्यर्थः । वोच्छं परमप्पाणं वक्ष्यामि कथयिष्यामि । कः कः ? अहं श्रीकुन्दकुन्दाचार्यः, कं वक्ष्ये ! पर- मात्मानं शुद्धगयेन परमात्मानं अर्हसिद्धसमान । कथंभूतं परमात्मान, परमपयं परमपदं परम उत्कृष्ट इन्द्रादिदेव-नरेन्द्रादिमानव-गणधादिमहा- मुनीश्वरस युक्तसमवशरणस्थानमण्डित । अथ केयां परमात्मानं वक्ष्यामि ! परमजोईणं परमयोगिना दिगम्बरगुरुणा । इत्यगेग मुनीनामेव परमा- स्मन्यान घटते । तप्तलोहगोलकसमानगृहिणा परमात्मध्यानं न संगच्छते । तेषां दानपूजापोपवाससम्यक्त्वप्रतिपालनशीलवतरक्षणादिकं गृहस्थधर्म एवोपदिष्टं भवाति भावार्थः । ये गृहस्था अपि सन्ती मनामात्मभाष- नामासाय वय ध्यानिन इति ब्रुवते ते जिनधर्मविराधका मिप्यादृष्टयो ज्ञातव्याः । अयायाचाग गृहस्थधर्मादपि पतिता उभयप्रा वैदितव्याः। ते लोकाः, तन्नाममहणं तन्मुखदर्शन प्रभातकालं न वर्तव्य इश्वस्तुभो. जनादिविघ्नहेतुत्वात् । ते जिनस्नपनपूजादानादिसद्धर्मघातका ज्ञातव्याः। जं जाणिऊण जोई जो अंत्यो जोइऊण अणवरम् । अव्यावाहमणंने अणोरम हवई णिव्याणं ॥३॥ यदसावा योगी यमयं दृष्ट्वाऽनवरतम् । अव्यावधिमनन्ने अनुपम भवते निर्वाणम् ॥ जं जाणिऊण जोई यं अर्थ आमतत्वं ज्ञात्वा हे योगिन् । जो अत्यो जोइऊण अणवरयं (य) अर्धं तत्रं, जोइकण-दृष्ट्वा ज्ञानेन १जीयस्थो ग, । योगस्यो ध्यानस्थ इत्यर्थ । २ लहइ. ग. । पट०२.
- पटमाभते- साक्षाद्वाक्ष्य योगी ध्यानपान् मुनि । अव्यापाहमणंत अव्यागावं वाधा- रहित, अन तमविनश्वर । अणोवमं हवइ णिवाण अनुपम उपमार हित, भरत प्रामाति । "भूप्राप्तामा मनेपदा" इति वचनात् । किं' निर्वाण गुद्धमुख मक्षस्थान | उक्त च- जन्मजराम्यमरण शैर्दु भश्च परिमुत्त । निय ण शुद्धसुख निश्रेयसमिप्यते नित्य ॥२॥ तिपयारो सो अप्पा परभितरनाहिरो टु हेडेणं । तत्य परो झाइज्जड अतोनाएण चयहि बहिरप्पा ॥४॥ निप्रकार स आमा परम तो बहि तु हित्वा । तन परं घ्यायते अतरूपायेन त्यज पहिरात्मानम् ।। तिपयारो सो अप्पा त्रिप्रकार स आत्मा विविध । परमिंत- रवाहिरो दु हेउणं परमामा अन्तरात्मा रहिरामा चेति। तत्र बाहिरो दु हैउण-बनियमान हित्वा परित्यग्य । तत्थ परो झाइज्जइ तत्र पर मामा ध्यायते । कथ परमात्मा ध्यायते । अतोनाएण अतरारमोपा- येन भेदज्ञानबल्नेयर्थ । चयहि पहिरप्पा त्यज्य परिहर त्वं हे मुने ! बहिरप्पा बहिरात्मान-शरीरमेवामेति मत मन्यते बहरामा तमभिप्राय त्व त्यति तात्पर्यार्थ । अक्साणि बाहिरप्पा अतरअप्पा हु अप्पसंकप्पो । कम्मकलंकविमुक्को परमप्पा भण्णए देवो ॥५॥ अक्षाणि बहिरात्मा अतरात्मा स्फुट आत्मसङ्कल्प । कर्मकर विमुक्त परमा मा मण्यते दव ॥ अक्साणि वाहिरप्पा अक्षाणि इद्रियाणि वहिरामा भवति । अतरअप्पा हु अप्पसंकप्पो अतरात्मा हु-रपुट आत्मसक्ल्प शरी- रकर्मरागदपमोहादिदु खपरिणामरहितोऽय ममा मा वर्तते शरीरे तिष्ठ- १मतर. ५। २ देहीण घम् ।
मोक्षप्राभूत । ३०७ नशुद्धनिश्चयनयेन शरीर न स्पृशति, कर्मवधनबद्धोऽपि सन् धर्मर धन- चंद्धा न भवति नलिनीदलस्थितजलवदितीश भेदज्ञान आमसकल्प उच्यते स आत्मस कल्पो यस्य जीवस्य वर्तत साऽ तरा मा वदितव्य । कम्मकलंकविमुक्को परमप्पा भण्णए देवो कर्मक्लङ्कविमुक्तो द्रव्य- फर्मभावकमनोकर्मरहित सिद्धपरमेश्वरी दर परमा मा भव्यते-अनू परमेश्वर सामायकेवली च परमा मा बध्यते तस्य जाव मुक्तत्वात् । उक्त च- भात्मनाताविलोपनात्मचरितैरासीर्दुरात्मा चिर स्वात्मा स्या परमात्मनीनचरितरात्माकृतरात्मनः। आत्मेत्या परमात्मता प्रतिपतन् प्रत्यात्मविद्यारमक स्वात्मोत्थात्मसुखो निपीदसि लसन्नध्यात्ममध्यात्मना ॥१॥ मलरहिओ कलचंत्तो अणिदिओ केवलो विसुद्धप्पा। परमेही परमजिणो सिक्करो सासओ सिद्धो ॥६॥ मलरहित कलत्यक्त अनिन्द्रिय केवलो विशुद्धामा। परमेष्ठी परमजिन शिवङ्कर शाश्वत सिद्ध ॥ मलरहिओ कलचचो मलरहित कर्ममल कलकरहित , कल्या शरीरेण त्यक्त कलत्यक्त । यौकारी स्त्राकृतौ हस्वौ कचित् न्यथा इष्टकचित इपीकतूलमिति । अणिदिओ केवलो विसुद्धप्पा अनि- द्रिय इन्द्रियज्ञानरहित केवलज्ञानन द्रव्यपयायस्वरूप जानन्नि यर्थ । उक्त च पुष्पदन्तेन महाकविना- सबहु अणिदिओ णाणमओ जो मयमुटु न पत्तिया । सोणिदिओ पचिंदियनिरओ यइतरणिहि पाणिउ पियह ॥१॥ चित्तो मूक । २ ई+आ इति छेदोत्र ज्ञातव्य । ३ सर्वज्ञ भनिद्रिय ज्ञानमयो पो मदमूर न प्रत्येति । स निन्दक पचन्द्रियनिरत वैतरण्या पानीय पिचति ॥ - - ३०८ पप्राभृते - अथग-अगिदिओ-अनिदित इन्द्रधरणेद्रनरेन्द्रखग द्रादीना स्तुत्य इत्पर्य । उक्त च मुलाचनाका तेन- शमिताखिएविनसस्तवस्त्वयि तुच्छोऽप्युपयात्यतुच्छता। शुचिशुक्ति देऽम्मुविधृत ननु मुक्ताफलता प्रपद्यते ॥१॥ घटयन्ति न विभागोटयो निक्टे स्वरक्रमयोनिगासिना। पटयोऽपि पद दयाग्निभिर्भयमस्त्यम्मुधिमध्यवर्तिना ॥२॥ हृदये त्वयि सनिधापिते रिपव केऽपि भय विधित्सव । अमृताशिपु सत्सु सन्तत विषभेदार्पितविषय. युत.॥३॥ उपयान्ति समस्तसम्पद निपदो विच्युतिमाप्नुवन्त्यल । वृपम वृषमागदशिन झपरेतुद्विपमायुपा ॥ ४ ॥ इत्थ भवतमतिभक्तिपथाननीपोः, प्रागेवयन्धरलय प्रलय प्रजन्ति। पवादनम्वरमयाचित्तमप्यवश्य,सपरस्यतेऽस्य पिएसद्गुणभद्रभद्र। केवलोऽसहाय के पलज्ञानमयो वो, के परब्रह्मणि निजशुद्धबुद्धक- स्वभाने आमनि बटमनन्तवीर्य यस्य स भरति केवल , अथवा केवते सेवते निजामनि एक्लोलीभावेन तिष्ठतीति केवल । विशुद्धा मा-विशे- पेण शुद्ध कर्ममलकलकरहित आत्मा स्वभावो यस्य स विशुद्धामा । परमेही परमजिणो परमेष्ट्री परमजिन , परमे इन्द्रधरण द्रनरेन्द्रमुनी- दादिवदिते पद तिष्टतीति परमेष्ठी पंचपरमेष्टिरूप , परमजिणो-परा उत्कृष्टा प्रत्यक्षलक्षणोपलक्षिता मा प्रमाणं यस्येति परम , अथवा परेपी भव्यप्राणिना उपकारिणी मा लक्ष्मी समरशरणविभूतिर्यस्यति परम , अनेकविषमभरगहनदु खप्रापणहेतुन कर्मारातीन् जयति समूलकाप कप- तीति जिन परमश्चासौ जिन परमजिन तीर्थकरपरमदेव ! सिकरो शिव परममगल क्राति शिवकर , अथवा शिव मोक्ष करोति भक्तभ- न्यजीमाना मोक्ष निदधाताति शिवकर शिवतातिरपरपर्याय । सासओ , अस्मादने तयाहि इति पाठ स पुस्तके ।
An Armani मोक्षप्रामृतं । शश्वद्भवः शाश्वतोऽविनश्वरः । सासवो-इति च कचित पाठो दृश्यते तत्रायमर्थ:-साशप. भक्तभव्याना आशापूग्णसमर्थ इत्यर्थः । सिद्धो सिद्धिः स्वात्मोपलब्धिर्विद्यते यस्य स सिद्ध परमनिर्वाणपदमारूढ इत्यर्थः । तदुक्तं-तस्य त्रिविधस्यात्मनः स्वरूप शास्त्रान्तरेऽपि प्रोक्तमस्तीति श्रीकुन्दकुन्दाचार्या निरूपयन्ति- आरुहवि अंतरप्पा यहिरप्पा छडिऊण तिविहेण । झाइज्जइ परमप्पा उवइदं जिणवरिंदेहि ॥७॥ मारुह्य अन्तरात्मानं पहिरात्मान त्यक्त्वा विविधेन। ध्याय ते परमात्मा उपदिष्ट जिनवरेन्द्र। आरुहबि अंतरप्पा आरुह्य प्रादुर्भाव्य आश्रित्येति, किं ? अत- रप्पा-अन्तरात्मान भेदज्ञानावलम्बन कृत्येत्यर्थः । बहिरप्पा छंडिऊण तिविहेण त्रिविधेन मनोवचनकायैर्बहिरात्मान त्यक्त्वा । झाइज्जइ पर- मप्पा ध्यायते अहर्निश चित्यते, कोऽसौ । परमात्मा निश्चयनयेन कर्म- मलकर करहित: सिद्धस्वरूप निजपरमात्मा ध्यायते अर्हन्सिस्वरूपोऽ- चलोक्यते द्विविधमभ्यासं कुर्वाणो मुनिः परमात्मानमेव प्रानाति–अर्ह- सिद्धसदृशो भवति । तथा चोक्त- आत्मा मनीषिभिरयं त्यभेदबुद्धया ध्यातो जिनेन्द्र ! भवतीह भवत्प्रभायः । पानीयमध्यमृतमित्यनुचिन्यमान किं नामनो विषविकारमपाकरोति ॥१॥ उवइ जिणवरिंदेहि उपदिष्टं प्रतिपादितं । कै, जिनवरेन्द्रैःश्री- मद्भगवदह सर्वस्वीतरागैरिति शेष ।
३१० पद्माभृते- पहिरत्थे फुरियमणो इंदियदारेण णियसरूवचुओ । णियदेहं अप्पाणं अज्झवसदि मूढदिट्टी ओ ॥ ८॥ बहिरर्थ स्फुरितमना इन्द्रियद्वारेण निजस्वरूपच्युत । निनदेह अमानमध्यवस्यति मूढदृष्टिस्तु ॥ बहिरत्ये फुरियमणो बहिरर्थे इष्टवनितासुतस्यापतेयादौ सुरित चमत्कृत मनो यस्य स इष्टाः स्पुरितमना । इंदियदारेण णियसरू- वचुओ इद्रियद्वारेण इन्द्रियेषु प्रविश्य, निजस्वरूपच्युत आत्मभावनाया. प्रभृष्ट । णियदेह अप्पाणं निजदेह स्वकीयशरीरं आमानमध्यवस्य- तांति सम्बध -शरीरमामान जानातीयर्थ । अज्झवसदि मूढदिही ओ अध्यनस्यति मूढदृष्टिस्तु ममाय काय आ मेति जानाति मूढदृष्टिर्ब- हिरात्मेति भावार्थ । णियदेहसरिस्सं पिच्छिऊण परविग्गह पयत्तेण । अञ्चेयणं पि गहियं झाइज्जइ परमभाएण ॥ ९ ॥ निजहसदृक्ष दृष्ट्वा परविग्रह प्रयत्नेन । अचेतनमपि गृहीत ध्यायते परमभागेन ॥ णियदेहसरिरसं पिच्छिऊण निजदेहसदृक्ष सदृशं पिच्छिऊण- दृष्ट्वा । परविग्गह पयत्तेण परविग्रहं इष्टवनितादिशरीर, पयत्तण-प्रय- लेन मलमूत्रशुक्ररुधिरमासकीकसचर्मरोमादिदुर्गधापवित्रादिपरिणामभा- चैन । अचेयणं पि गहियं अचेतनमपि आमना गृहीत जावेन स्वीकृतं । साइज्जइ परमभाएण ध्यायते शरीरस्वरूप चित्पते परमभागेन पृथक्तया भेदज्ञान-शरार भिन्न आमा भिनो वर्तते इति भेदं कृत्वे- त्यर्थ ।तमा चक्त- । १चआ मूने । २ मिच्छभावेण, ग घ अन्यत्र च ।
मोक्षप्राभृतं । ३११ आत्मा भिन्नस्तदनुगतिमत् कर्म मिन तयोर्या प्रत्यासत्तेभवति पिकात सापि भिना तव । कार क्षेत्रप्रमुपमपि यत्त भिन्न मत मे भिन भिन्न निजगुणकलालडरत समेतत् ॥ १॥ सपरज्झवसाएग देहेसु य अविदिदत्थमप्पागं । सुयदाराईसिए मणुयाणं वडए मोहो ॥ १० ॥ स्वपराध्यवसायेन देहेषु च अविदितार्थमात्मनम् । मुतदारादिविषये मनुमाना वधते मोह ॥ सपरज्झवसाएणं स्वपराध्यवसायेन परवस्तुशरीरादिक समात्मान मन्यते स्वपराध्यवसाय | केपु पदार्थेषु, देहेसु य शरीरपु च, चकाराद्ध- नितादिषु च, शरीर वनितामुक्तस्त्रारतेयादिक वस्तु खलु परकीय वर्तते तत्र । अविदिदत्थं अपिदितार्थ यथारस्वरूपपरिज्ञानरहितार्थ यथा भवत्येव वर्तमान आत्मा । अप्पाणं इति जीर आत्मान जानीते तच्च देहादिक वस्तु आत्मा न भवति । तेन विपरीताभिनिवेशन सुयदा. राईविसए सुतदारादिपिपपे पुत्रकलादिषु । मणुयाणं वड्डए मोहो मनुजाना मानवाना वर्धते मोह -स्नेहनाज्ञानगूल मोहो वैचित्य वृद्धि याति, मोहेन परिणतो जीयो बहिरामा पुन कर्माष्टौ बध्नाति । उक्त च--- जीयकृत परिणाम निमित्तमात्र प्रपद्य पुनरत्ये। स्वयमेव परिणमन्तऽत्र युद्गला कर्ममान ॥१॥ मिच्छाणाणेसु रओ मिच्छाभावण भाविओ संतो। मोहोदएण पुणरवि अंग सं मण्णए मणुओ ॥ ११ ॥ मिथ्याज्ञानेपु रत मिभ्याभावन भावित सन् । मोहोदयेन पुनरपि म प म यते मनुज ॥ मिच्छाणापोसु रओ मिथ्याज्ञानेपुरतोऽय मनु जो जीत मिच्छा. भावेण भाविओ संतो मिथ्यापरिणामेन कुगुरुसुदेवभत्तया भावितो ।
- ३१२ घट्नाभृते- वासित सन् । मोहोदएण पुणरवि महोदयेन मिथ्यामाहस्य त्रिवि धस्योदयेन विपान, पुनरपि भूयोऽपि । अगं स मण्णए मणुओ मग शरीर, स्वमा मान, मयते जानाति, मनुजो मनुष्यो मिथ्याष्टि जीर इत्यर्थ । जो देहे हिरवेक्सो णिद्ददो निम्ममो निरारम्भो । आदसहावे सुरओ जोई सो लहइ णिव्याणं ।। १२ ।। यो दहे निरपक्ष निद्व निर्मम निरारभ्भ । थात्मस्वभावे सुरत योगी स लभते निवाणम् ॥ जो देहे हिरवेक्खो यो योगी दहे शरारे निरपेक्ष उदासीनो ममत्वेन च्युत । णिद्ददो निम्ममो निरारभो नि द्वो निष्कलह केनापि सह क्सहरहित । अथवा निर्द्व द्वा निर्युग्म स्त्रीभोगरहित "द कलहयुग्मयो " इति वचनात् । निर्ममो मम व रहित , ममेति अदतोऽव्ययशब्द निर्गत ममेति परिणामो यस्यति निर्मम । उक्त च- अपंचनाऽहमित्यास्थ लोक्याधिपतिर्भये । योगिगम्य तय प्रोस रहस्य परमात्मन ॥१॥ निरारम सेवाकृषिवाणिज्यादिकर्मरहित । उक्त च- औरमे णस्थि दया महिलासगरण णासए वम । सकाए सम्मत्त पवजा अस्थगणेण ॥१॥ आदसहावे सुरओ आमस्वभारे टको कीर्णज्ञायवैक्स्वभावचिच्च- म कारलक्षणनिजशुद्धबुद्धैक्परिणामे जीवतत्वे मुष्ठु-अतिशयन रत एक- १ नि मू । • नि म् । ३ आस्व इय पेइचिसाठ । . भारभे नास्ति दया महिलासगन नाशयति प्रा । पाकया सम्यव प्रमज्या अथग्रहणन ॥ ५ए टी।
- मोक्षप्राभृत । ३१३ लोलीभाष । जोई सो लहइ णिव्याणं य एवविधो यागी शुद्धो- पयोगरतो मुनि स लभते निर्वाण, सर्वकर्मक्षयलक्षणोपलक्षित मोक्ष लभते प्राप्नोति । अथवा जोईसो-योगा ध्यान विद्यते यस्य स योगी योगिनामीशो योगीश इत्यनेन गृहस्थस्य स्त्रिया परलिंगे च मुक्तिन भव- तीति सूचित ज्ञातव्य । उक्त च--- साम्य स्वास्थ्य समाधिश्च योगश्चिन्तानिरोधनम् । शुद्धोपयोग इत्येते भवन्त्येकार्थवाचका ॥१॥ कथ गृहस्थस्य मुक्तिन भवतीति चत् ? खण्डनी पेपणी चुल्ली उदकुभ प्रमार्जनी। पच सूना गृहस्थस्य तेन मोक्ष न गच्छति ॥।॥ तथा स्त्रीणामपि मुक्तिर्न भवति महावताभावात् । तदपि कस्मान्न भवति । क्षयो स्तनयारन्तर नाभौ योनौ च जावानामुत्पत्ति विनाशलक्षणहिंसासद्भावात् , नि शकत्वाभावात् , वस्त्रपरिग्रहायजनात्, अहमिन्द्रपदमपि न लभन्ते कथ निर्वाणमिति हेतोश्च । यदि च स्त्रियो मुक्ता भवन्ति तर्हि त पर्यायमूर्नय कथ न पूज्य त । सवथा दुर्मत विहाय पुरुषस्यैर मुक्तिर्म तव्येति भार । परलिंग च मुक्तिन भवति मिथ्या वदृषितत्वात्, दण्डकमण्डलुमृगचमकर्माशर्मकारणात् । तद्विस्तरण प्रमेयकमलमार्तण्डादिषु शास्त्रेषु ज्ञातव्य । सजातिज्ञापनार्थ स्त्रीणां महाव्रतान्युपचय ते न परमार्थतस्तासा महाव्रतानि सति तेन मुनिज नस्य स्त्रियाश्च परस्पर व दनापि न युक्ता । यदि ता व द ते तदा मुनि- मिनमोऽस्विति न वक्तव्य, किं तर्हि वक्तव्य : समाधिर्मक्षयोऽस्त्वात । ये तु परस्पर मथएण बदामीति आर्या प्रतिवन्दति तेऽप्यसयमिनो ज्ञातव्या । दिगम्बराणा मत या नीति कृता सा प्रमाणमिति मतव्यं । उक्त च- ३१४ पट्माभूते- वरिसंसयदिक्पियाए, मनाए अज दिक्खिो साह्र । अभिगमण पदण नमसणेण विणएण सो पुजो॥१॥ इति गाथा अप्रमाण भरति यदि स्त्रीणा मुक्ति स्यात् । परदव्यरओ यज्झह विरओ मुच्चेड विविहकम्मेहि । एसो जिणउवएसो समासओ बंधमोक्सस्स ॥ १३॥ परद्रव्यरत बध्यते विरत मुश्चति विविधर्मभि । एप जिनोपदेश समासत वधमोक्षस्य ॥ परयरओ बज्झइ परद्रव्य शरीरादिक तत्र रतो वध्यते बधन मामोति चौरवत् , यथा चौर परद्रव्य चोरयन् पुमान् राजला कैबध्यते यो न परद्रव्य चौरयति स न बध्यते । विरओ मुच्चे विविहक- म्मेहि विरत परद्रव्यपरा मुख पुमान् मुख्यले मुक्तो भपति विविधै - नाप्रकारे कर्मभि नाररणादिभि | एमो जिणउवएसो ऐप जिनो- पदेश । समासओ बंधमोक्सस्स समासत सक्षपात्, यधमोक्षस्य बधेनोपलक्षितो मोक्षो बधमोक्ष तस्य वधमोक्षस्य । अथा बधश्च मोक्षश्च बधमोक्ष समाहारद्वन्द्वस्तस्य । सहव्यरओ सरणो सम्माइट्टी हवेइ णियमेण । सम्मतपरिणदो उण खयेइ दुदृहकम्माणि ॥ १४ ॥ स्वदव्यरत भ्रमण सम्यग्दृष्टिर्भवति नियमेन। सम्यकारिणत पुन हिपते दुष्टरमाणि ॥ , वर्षशतदाक्षितया भार्यया अद्य दीक्षित साधु । भभिगमनन वदनया नमस्कारेण विनयेन स पूज्य ॥ २ सस्य स्थाने एपो जिनोपदेश इति कफ पुस्तके । स पुस्तकेतु एष जिनौ- पदेश इति । अनेनैव पाठेन भवितव्य लक्षण नाविरुदत्वात् ।
माक्षप्राभृत। सद्दव्यरओ सक्णो स्व-परत श्रवण आमस्वरूपे त मयभूतो दिगम्बर । सम्माइट्टी हवेइ णियमेण सम्यादृष्टिभवति नियमेन निश्चयेन, अब स देहा नास्ति । सम्पग्दर्शनस्य आमपरिणाम रेन सूक्ष्म त्वात्, चक्षुराद्रियाणामगोचरस्यात् । सम्मत्तपरिणदो उण सम्य- क्वपरिणत पुन । सवेह दुकम्माणि क्षिपते दुष्टान अष्टकर्माणि ज्ञानावरणादीनि। जो पुण परदव्यरओ मिच्छादिट्टी हवेइ सो साहू । मिच्छत्तपरिणदो उण पज्झदि दुइटकम्मेहे ॥ १५ ॥ य पुन परदब्यरत मिथ्याभिवति स साधु । मिथ्यात्वपरिणत पुन बध्यते दुष्टाष्टकममि ।। जो पुण परदभरओ य पुन साधु परद्रव्यरत इटवनितादि- रत स्तनजधनवदनलोचनादिकायादिपिलोफेनादिलम्पट । मिच्छा दिडी हवेह सो साहू मिथ्यादृष्टिर्भवति सजायते साधु जिनरिंगोप जीवी । मिच्छत्तपरिणदो उण मिथ्या वपरिणत पुन मिध्यादर्शनन वासितो मुनि । बज्झदि दुकम्मेहिं बध्यते दुष्टाष्टकमभि । उक्तं च- फम्मइ दिढघणचिक्कणइ गरुयइ यजसमाह । जाणवियरपणजीवडउ उपदि पाडहि ताद ॥१॥ इति कारणात कमाणि दुध पविशपणविशिष्ट व लभते । परदयादो दुगई सव्वादो हु सुग्गई हाइ । इय णाऊण सदचे कुणह रई पिरह इयरम्मि ॥१६॥ परद्रव्यात् दुगति स्वदन्यात स्फुट मुगति भवति । इति ज्ञ त्वा स्वदन्य कुन रात विरतिमिनरस्मिन् ॥ निटी। २ कर्माणि दृढघनचिकगानि गुरुकाणि वनसमानानि । ज्ञानविचक्षण जीव उत्पये पातयति तानि । - - पटनाभृते- परदव्वादो दुगई परद्रव्यादुर्गतिः परमात्मध्यानं परिहत्य परदव्ये परिणमनानरकादिषु चतसृषु गतिधु पतनं हे जीव । तव भवति । सद्दवादो सुग्गई हवइ स्वद्रव्यादात्मद्रव्ये एकलोलीभावात् सम्य- श्रद्धानज्ञानानुचरणात मुगतिर्भवति मुक्तिर्भवति । इय णाऊण सदग्वे इति ज्ञात्वा ईदृशमर्थ परिज्ञाय स्वद्रव्ये आत्मतत्वे । कुणह रई विरह इयरम्मि कुरुत यूयं रति भावना, विरति विरमणं, इतरस्मिन् परद्रव्ये, मा रज्यत यूपमिति । तं परदवं सद्दवं च केरिस हवदि । तं जहा- तत्परद्रव्यं स्वद्रव्यं च कीदृशं भवति । तद्यथा-तदेव निरूपयंत्या- चार्या:- आदसहावादणं सचित्तापित्तमिस्सिपं हदि । तं परदव्वं भणियं अवितत्यं सव्वदरसीहि ॥१७॥ आत्मस्वमादन्यत् सचित्ताचित्तमिश्रितं भवति । तत् परदव्यं भणितं-अवितथं सर्वदर्शिमिः ॥ आदसहावादणं आत्मस्वभावादन्यत् पुद्गलादिद्रव्यं । सञ्चित्ता- चित्तमिस्सियं हवदि सचित्तं विद्यमानचेतनं इष्टवनितादिकं, अचित्तं अचेतनं धनकनकयसनादिकं, मिश्रितं आभाणवस्त्रादिसंयुक्तं कलत्रा. दिकं भवति। तं परदव्वं भणियं तत्परद्रव्यं भणितं-आगमे प्रति- 'पादितं । अवितत्यं सव्वदरिसीहि अवितथं सत्यरूपं सर्वदर्शिभिः श्रीमद्भगवदहरसर्वज्ञवीतरागैरिति शेपः ! दुदृढकम्मरहियं अणोवमं णाणविग्गहं णिच्चं। सुद्धं जिणेहि कहियं अप्पाणं हेवदि सद्दव्वं ॥१८॥ १ भवदि मूलगाथा पाटः। हवह अन्यत्र । ।
meNN मोक्षप्राभृतं । ३१७ दुष्टाष्टकर्मरहितं अनुपम ज्ञानविग्रहं नित्यम् । शुद्धं जिनः कधित आत्मा भवति स्वद्रव्यम् ॥ दुकम्मरहियं दुष्टाप्टकर्मरहित दुष्टानि पापिष्टानि यानि अष्टक. आणि दुर्गतिसपातहेतुत्वात् ते रहित वर्जितं । अणोपमं णाणविग्गह णिचं अनुपम उपमारहितं, ज्ञानविग्रहं ज्ञानशरीरं केवलज्ञानमय, नित्य शाश्वतं अविनश्वर । सुद्धं जिणेहि कहियं शुद्ध निष्केवल कर्ममलक- लङ्करहितं रागद्वेपमोहादिविभावपरिणामविवर्जित, जि. सर्वज्ञवीतरागैः, कथित-आगमे प्रतिपादितं । अप्पाणं हवदि सद्दव्वं आत्मा भवति स्वद्न्यं आत्मरूप स्वद्रव्यं निजद्रव्यं ज्ञातव्यमिति । जे झायति सदव्वं परदव्यपरम्मुहा दु सुचरित्ता । ते जिणघराण मग अणुलग्गा लहदि णिव्याणं ॥ १९ ॥ ये ध्यायन्ति स्वदव्यं परद्रव्यपरामुखास्तु सुचरित्राः। ते जिनवराणा मार्गमनुलग्ना लभन्ते निवाणम् ।। जे झायति सदव्वं ये मुनयो ध्यायन्ति चिन्तयन्ति स्वद्रव्यं आत्म. तत्वं । परदच्चपरम्मुहा दु सुचरित्ता परद्रव्यात् परामुखा परद्रव्ये शरीरादौ रागरहिताः, तु पुनः, सुचरित्रा शोभन चारित्र अनतिचार- चारित्रसहिताः । ते जिणवराण मग्गं अणुलग्गा ते मुनयो, जिनव- राणा सर्वज्ञवीतरागाणा, मार्ग रत्नत्रयलक्षण, अनुल्माः पृष्टतो लगा भवन्ति-जिनमार्गाराधका भवन्ति । लहदि णिव्याणं निर्वाणमनन्तसुखं परममोक्ष लभन्ते प्राप्नुवन्ति । जिणवरमण्ण जोई झाणे झाएइ सुद्धमप्पाणं । जेण लहइ णिवाणं ण लहइ किं तेण सुरलोयं ॥२०॥ १हिटी.।
पटनामृते-- जिनवरमतेन योगी ध्याने घ्यायति गुद्धमा मानम् । येन स्मते निव ण न लमत किं तेन सुरलोकम् ॥ निणवरमएण जोई जिनपरमतन जिनशासनेन सम्पनद्धानज्ञाना नुभवनरक्षणन र नत्रयण यागा दिगरो मुनि । झाणे झाएइ सुद्धम प्पाण ध्यान एकाग्रचि तानिरा पलभण, ध्यायति चिंतयति, गुद्ध राग द्वेपमोहादिरहित कर्ममलकलकरहित टोकीणस्फटिकमणिविसदृश ज्ञाय करवभाव पिच्चम कारस्वरूप, आमान निजामतत्वं । जेण लहह णिव्वाण यना मध्यनेन लभत निपाण सर्वक्मक्षयटक्षणम क्षमनन्त सौरय । ण लहइ किं तेण सुरलोय तेना मध्यानेन न लभते कि न प्रामोति मुरलाक स्वर्गभाग । तथा चाक्त- तृष्णा भोगेपु चेद्भिक्षो । सहस्वाल्प स्वरेय ते। प्रतीक्ष्य पाक किं पीत्वा पेया मुक्ति विनाशय ॥१॥ जो जाइ जोयणसय दियहेणेकेण लेवि गुरभार । सो कि कोसद्ध पिटु ण सकए जाइ भुवणयले ॥२१॥ यो याति योजनशत दिनेनकेन लावा गुरुभारम् । स कि क्रोशाधमपि हु न शक्यते यातु भुवनतले ॥ जो जाइ जोयणसय या याति य पुमान् याति गच्छति, किं । योजनशत सहस्रयाजनदशमभाग । दियहेणेकेण लेवि गुरुभार दिव सेनकेन लेवि-लावा गृहीवा, क ' गुरुभार महाभार । सो कि कोसद्ध पि हु स पुमान् (किं) क्रोशार्धमपि हु-फुटाणे सकए जाहु भुवणयले न शनोति न समर्थो भवति यातु भुवनतले पृथिवीमण्डले अपि तु गव्यूतिचतुर्थमर्श यातुं शक्नो येव । १पय पाठान्तरे। २नटी।
मोक्षप्राभृत। ३१९ जो कोडिए ण जिप्पड़ सुहडो संगामएहि सव्वेहिं । सो किं जिप्पइ इकिं णरेण संगामए सुहडो ॥२२॥ य कोट्या न नीयते सुभट समाम सर्वे । म किं जीयते एकेन नरेण सग्रामे सुभर ॥ जो कोडिए ण जिप्पइ य मुभट सुभटाना कोत्या न जीयते न पराभूयते । सुहडो संगामएहि सम्बेहि मुभट सग्रामकै सरपि । सो कि जिप्पइ इंकि स सुभट किं जायते एकेन सुभटन अपि तु न जीयते । परेण संगामए सुहडो नरेण एकेन पुस्पेण सप्रामके एकस्मिन् समामे । सगं तवेग सन्यो वि पावए तहि वि झाणजोएण। जो पावइ सो पावइ परलोए सासयं सोक्सं ॥२३॥ स्वर्ग तपसा सपि प्राप्नोति तनापि ध्यानयोगेन । य प्राप्नोति स प्राप्नोति परलोके शाश्वत सौरयम् ॥ सगं तवेण सब्यो वि पाए सगै तपसा कृत्या उपवासादिना कायक्लेशेन सोऽपि भव्यजीवोऽभव्य जीवोऽपि प्रामोति लभते । तहि वि झाणजोएण तत्रापि सर्वेष्वपि जीवेषु मध्ये ध्यानयोगेन कृचा। जो पावइ सो पावइ य प्रामाति स्वर्ग स पुमान् प्रामोति। परलोए सासयं सोक्सं परलोक आगामिनि भवे शाश्वतमविनश्वर सौख्यं परमनिर्माणमिति शेष । परभाव इति च कचित्पाठ तत्रायमर्थ - परमावे भवनं भावो जमोच्यते तस्मिन् परभावे परज मनीत्यर्थ । अइसोहणजोएण सुद्धं हेमं हवेइ जह तह य । कालाईलद्धीए अप्पा परमप्पओ हयदि ।। २४ ।। धतिशोभनयोगेन शुद्ध हेम भवति यथा तथा च । कालादिलच्या आत्मा परमात्मा भवति ॥ एक्के टी ।२ने टी। ।
-- ३२० परप्राभूते- अहसोहणजोएणं अतिशोभनयोगेन सामघ्या अनन्धपापाणादिकं अग्निमध्ये पचित गुम्पदिष्टौपधयोगेन । सुद्धं हेमं हवेइ जह तह य शुद्ध पोडशवणिक हेम सुवर्ण भवति यया तह य-तथा च तथैव च कालाईलद्धीए कालादिलब्ध्या कृया कालारिटन्ध्या सत्या वा । अप्पा परमप्पओ हवदि आत्मा ससारी जीप परमात्मा भाति-अर्हन् सिद्धक्ष संजायते । उक्त च- नागपणीए मूल नागिणितोपण गम्भणाएण। माग होइ सुवण धम्मतंह पुण्णजोएण ॥१॥ अस्या अयमर्थ -नागफणीए मूल-नागौपधि | नागिणितोरण- हस्तिनामूण पिष्ट्वा । गम्मणोएण-गर्भ नाग सीसको यस्य स गर्भनाग सिन्दूर साऽपि मध्य क्षिप्वा मद्यते । नाग होइ सुपण्ण-नाग सीसक । एतत्सर्वं मृत्तिकाभाजने क्षिप्त्या अधोऽग्नि क्रियते खदिरागारे यते सुवर्ण भवति । पुण्ययोगेन पुण्ययोग विना सुवर्ण न भपति ब्रह्मादिभ्रष्ट- स्येति भान तथाय आत्मा कालादिलब्धि प्राप्य सिद्धपरमेष्ठी भरतीति । भावार्थ । वर वयतवेहि सग्गो मा दुक्खं होउ निरई इयरेहि । छायातपहियाणं पडिवालं ताण गुरुमेयं ॥२५॥ बरं व्रततपाभि स्वर्ग मा दु ख भवतु नरके इतरै । छायातपस्थिताना प्रतिपालयता गुरुभेद ॥ वर वयतवेहि सग्गो वर ईपगुचौ वर श्रेष्ठ प्रस्तपोभिश्च स्वर्गों भवति तचारु । मा दुक्सं होउ निरइ इयरेहिं मा दु ख भवतु निरइ-नरकापासे, इतरैवतैरतपेभिश्च । छाया तवहियाणं छायातप- नागेण टी । २ धमता । ३ ए मूलगाथा पाठ ।
AR मोक्षप्राभूत । स्थिताना ये छायाया स्थिता अनातपे वर्तन्ते ते सुखेन तिष्ठन्ति, ये आतपे धर्मे स्थिता वर्तन्ते ते दुखेन तिष्ठति । पडिवालं ताण गुरु- मेयं प्रतिपालयता व्रतानि अनुतिष्टता स्वों भवति तदर ससारित्वे- नापि ते मुखिन । अवतानि प्रतिपालयता नरके दुखमनुभवता अति- निन्दितमिति महान् भेदो वर्तते । तथा चोक्त पूज्यपादेनेष्टोपदशमन्थे- पर प्रतः पद देव नामतैर्वत नारफ। छायातपस्थयोर्मेदःप्रतिपालयतोर्महान् ॥१॥ जो इच्छइ निस्सरितुं संसारमहण्णवस्स रुंदस्स । कम्मिघणाण डहणं सोझायइ अप्पयं सुदं ॥२६॥ य इच्छति निस्मरितु ससारमहार्णवस्य सदस्य । कर्मेन्धनाना दहन स ध्यायति आत्मान शुद्धम् ॥ जो इच्छइ निस्मरिदं यो मुनिवर इच्छति अभिलपति, कि कर्नु । नि सरितु पार यातु । कस्य, संसारमहण्णवस्स रुंदस्स ससारमहार्ण- वस्य संसारमहासमुद्रस्य । कथभूतस्य, रुन्द्रस्य अतिविस्तीर्णस्य । फम्मिघणाण डहणं कर्मेधमाना दहन कर्मकाष्टाना भस्मीकरण । सो झायइ अप्पयं मुद्धं स मुनिया॑यति चिन्तयति, आत्मान शुद्ध कर्ममल- कलंकरहित रागद्वेपमोहादिविभाजितमिति शेप । सब्वे कसाय मोत्तुं गारवमयरायदोसवामोहं । लोयववहारविरदो अप्पा झाएइ झाणत्यो ।। २७ ।। सर्वान् कपायान् मुक्ता गारवमदरागद्वेपथ्यामोहम् । रोकव्यवहारविरत भारमान ध्यायति ध्यानस्थ ॥ सव्वे कसाय मोतुं सर्वान् कपायान् क्रोवमानमायालोभान् मुक्त्वा परित्यज्य क्षीणकपायो मुनिर्भूत्वा । गारवमयरायदोसवामोहं पद.२१ ३२२ पट्माभृते- गारव च शब्दगारवं-अह वर्णोच्चारं रचिर जानामि न त्वेते यतयः, ऋद्धिगारवं-शिष्यादिसामग्री मम वव्ही वर्तते न त्वमीपा यतीनां, सात- गारव-अह यतिरपि सन् इन्द्रत्वमुख चक्रिमुख तीर्थकरसुख भुंजानो वर्ते न विमे यतयस्तपस्विनो वराकाः । मदा अष्ट-अहं ज्ञाननान् सकल- शास्त्रज्ञो वर्ते, अहं मान्यो महामंडलेश्वरा मत्पादसेवकाः । कुलमपि मम पितृपक्षोऽतीयोऽवल. कोऽपि ब्रह्महत्या-ऋषिहत्यादिभिरदोष । जाति:- माता संघस्य पत्युर्दुहिता-शीलेन सुलोचना-सीता-अनन्त- मती-चन्दनादिका वर्तते । बलं-अहं सहस्रमटो टक्षभट• कोटी- भटः । ऋद्धि.-ममानेकलक्षकोटिगणन धनमासीत् तदपि मया त्यक्त अन्ये मुनयोऽधमा सतो दीक्षा जगृहः। तप -अहं सिंहनिष्क्रीटित. विमानपक्तिसर्वतोभद्रशातकुंभसिंहविक्रमत्रिलोकमारवामप्योटीगोल्डीग- मृदगमध्यधर्मचक्रवालरुद्रोत्तरवसतमेरुनन्दीश्वरपक्तिपल्यविधानादिमहात- पोविधिविधाता मम जन्मै तपः कुर्वतो गत, एते तु यतयो नित्य- भोजनरता । यपु.-ममरूपाने कामदेवोऽपि दासत्वं करोतीत्यष्टमदाः। रागश्च प्रीतिटक्षणः । द्वेषश्चाप्रीतिलक्षण, । व्यामोहं पुरकलामिरादि- स्नेह । यामाना स्त्रीणा वा हो वामौह. तत्तथोक्त समाहारो इन्दुः । लोयववहारविरदो धर्मोपदेशादिकमपि न करोति लोकव्यवहारनिरतः। अप्पा झाएड झाणत्यो आत्मानं, ध्यायति चिन्तयति, झाणत्यो- " उत्तमसहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमा-तर्मुहूर्तात्" इत्युक्तलक्षणे ध्याने तीष्ठतांति ध्यानस्थ. | " स्थैश्च " इति कप्रत्ययप्रयोगलात् ध्या- नस्थ उच्यते। १षधांग स.1२ स्नेह. रा. बोपो वामोदक। जैनेन्द्रायद मूध परिज्ञायते । सस्य स्थाने स्थ. क इति शाम्टापनीय सूत्र।
. मोक्षप्राभृत ! ३२३ मिच्छतं अण्णाण पावं पुणं चएवि तिविहेण । मोणव्यएण जोई जोयत्यो जोयए अप्पा ॥ २८॥ मिथ्यात्वमज्ञान पाप पुण्य च त्यक्त्वा त्रिवेधेन । मौनव्रतन योगी योगस्थो द्योतयति आत्मानम् ॥ मिच्छत्तं अण्णाणं मिथ्यात्व बौद्धवैशेषिकचाककणभक्षकापि लभवेदातप्राभाक्रश्वेतपटगौपुच्छिकयापनीयद्रामिलनिष्पिच्छाधनेकैका- न्तामाश्रितमत, अज्ञान मस्करपूरणमत। पानं पुण्णं चएवि तिविहेण पाप पचप्रकार प्राणातिपातानृतचौर्यमैथुनपरिग्रहरात्रिभोजनादिक सप्त व्यसनादिलक्षण च, पुण्य शुभपुद्गलग्रहणरक्षण स्वदु खसहन इत्यादिक त्यक्त्वा परिहृत्य त्रिविधेन मनोवचनकाययोगप्रकारेण । मोणचएण जोई मौनव्रतेन वाग्व्यापाररहिततया योगी दिगम्बर । जोयत्यो योग- स्थित शुद्धोपयोगतहीन । द्योतयति ध्याय यात्मान शरीरप्रमाण निज- जीवस्वरूप। कथ मौनेन तिष्ठतीति प्राकृतपत्रमाह- जं मया दिस्सदे रूप तण्ण जाणादि सव्वहा । जाणगं दिस्सदे गंतं तम्हा जंपेमि केण हं ॥ २९ ॥ यमया दृश्यते रूप तन जानाति सर्वथा । ज्ञायको रयतेऽनन्त तस्माज्जल्पामि केनाहम् ।। जं मया दिस्सदे रूवं यमया दृश्यते रूप यद्रूप स्त्रीप्रभृतिशरी रादिफ दृश्यतेऽप्रलोक्यते रूप रूपिपदार्थ तत् सर्व पुद्गलद्रव्यपर्यायत्वा- (परमार्थतोऽचेतन । तण्ण जाणादि सव्वहा तद्रूप सर्वथा निश्चयन- येन न जानाति, अचेतनेन सह कथ ज पामि । जाणगं दिस्मदे णंतं ज्ञायकमात्मान रूपाधित वस्तु, अन तमामतत्वमनतकेज्ञानसभाव- स्वादनन्त यदह तेन सह जल्यामि स तु जानात्येपालमा । तम्हा जंपेमि ३२४ पटप्राभूते- केण हं तस्मात्कारणात् केन सहाह जल्पामि, अथवा केन कारणेन जल्पामि तेन मे मौनमेव शरण । सव्वासनगिरोहेण कम्म सवदि संचिदं। जोयत्यो नाणए जोई जिणदेवेण भामियं ॥३०॥ सवालवनिरोधेन मकक्षिपयति सचितम् । यागस्थो नानाति योगी जिनदेवेन भाषितम् ।। सव्वासनणिरोहेण सपामास्रवाणा मिथ्यात्वानिरतिप्रमादकपाय- योगलक्षणाना निराधेन निषधेन । कम्मं सवदि संचिदं कर्म क्षिपयति पूर्वोपार्जित तडागऽभिनाजलप्रवेशामा संचितपूर्वजलशोपरत् । जोय त्यो जाणए जोई योगस्थ ध्यानस्थित आ मैक्लोलीभावमिलितो जानाति कवटज्ञानमुत्पादयति योगी शुक्लध्यानविशेषागमभापया केवली भयति । जिणदेवेण भासियं सिद्धार्थनृपन दनेन वीरेण कथितमिति भार। जो सुत्तो यपहारे सो जोई जग्गए सकजम्मि । जो जग्गदि वाहारे सो सुत्तो अप्पणे कज्जे ॥३॥ य मुप्तो व्यवहारे स योगी नागर्ति स्वकार्ये । यो जागर्ति व्यवहारे स सुप्त आत्मन कार्य ॥ जो सुत्तो वहारे यो मुनि मुप्त , क र व्यवहारे व्यवहारमध्ये न पतित । सो जोई जग्गए सकजम्मि स यागी जागति सावधानी भति, सकार्ये आमकार्ये कर्मक्षयविधाने | जो जग्गदि वाहारे यो योगी जागर्ति साधवानो भवति, क र व्यवहारे लोकोपचारे । मो मुत्तो अप्पणे कन्ने स योगी मुनि मुप्तो न वदयतऽसावधानो भवति आमन कार्ये आमस्वरूपे। उक्तं च---- १ सर्वेपामारवागामिति पाठ के पुस्तके नास्ति । स पुस्तकात सयोजित ।
मोक्षप्राभृतं । ३२५ जो निसि सयलह देहियह जोग्गिउ तहिं जग्गेइ । जहि पुणु जग्गइ सयलु जगु सा निसि भणेवि सुपर ॥१॥ इय जाणिऊण जोई क्वहारं चयइ सव्वहा सव्वं । झायइ परमप्पाणं जह भणिय जिणवरिंदेण ॥ ३२ ॥ इति ज्ञात्वा योगी व्यवहार त्यजति सर्वथा सर्वम् । ध्यायति परमात्मान यथा भणितं जिनवरेन्द्रेण ॥ इय जाणिऊण जोई इतीदृशमर्थे ज्ञात्वा, कोऽसौ ? योगी ध्यान- वान् मुनि विवहारं चयइ सव्वहा सव्वं व्यवहारं त्यजति सर्वथा सर्व आत्मना सह एकलोलीभाव गते सति व्यवहार. स्वयमेव तिष्ठति । झायइ परमप्पाणं ध्यायति परमात्मान-निजशुद्धबुदैकस्तभावे आत्मनि तल्लीनो भवति । जह भणियं जिणवरिदेण यथा भणितं प्रतिपादित जिनवरेन्द्रेण प्रियकारिणीप्रियपुत्रेण श्रीवीरवर्धमानस्वामिना । पंचमहन्वयजुत्तो पंचसु समिदीसु तीसु गुची । रयणत्तयसंजुत्तो झाणज्झयणं सया कुणह ॥ ३३ ॥ पञ्चमहानतयुक्तः पंचसु समितिषु तिसपु गुप्तिषु । रत्नत्रयस्युक्तः ध्यानाध्ययनं सदा कुरु ॥ पंचमहव्ययजुत्तो पचमहाव्रतयुक्तो दयावान् सत्यवादी अदत्तादान- विरतः सर्वस्त्रीसोदर. वस्त्रादिपरिग्रहरहित दिवा एकतारं प्रत्युत्पन्न प्रासुकं मुक्तं शुद्धं शोधितं मुंजानः । पंचसु ममिदीसु तीसु गुत्तीसु इर्याया युगान्तरविलोकगमनः, आगेमोक्तभापानिपुण , चर्मजलस्पृष्टभो- जनपरित्यागी हिंगुसंवासितव्यंजनाभोजन. अजिनसंगघृततैलपरिहारी,दृष्ट- मृष्टोपकरणग्रहणनिक्षेपैः, प्रासुकारुद्धभूमिमलमूत्रव्युत्सर्जनकुशलः, अप- ध्यानमनोनिषेधी, मौनवान् , कूर्मवरसंकोचितकरचरणादिकार्यः । रयण- या निशा सकलानां देहिना योगी तस्या जामति । यस्यां पुन: जागर्ति सकलं जगत् ता निशा भणित्वा स्वरिति ।
३२६ पटप्राभूते- तयसंजुत्तो मिथ्यात्वक्दबुद्दाल सम्यग्ज्ञानानुशीलनगल सच्चरित्रप- चित्रगान । झाणज्झयणं सया कुणह ध्यानाध्ययनं मदा सर्वकालं कुन व हे जीव ! इति तात्पर्यार्थ । रयणतयमाराहं जीवो आराहयो मुणेयच्यो । आराहणाविहाणं तस्स फलं केवलं गाणं ॥३४॥ रत्ननयमाराधयन् जीव भाराधको मुनितव्य । आराधनाविधान तस्य फल केवल ज्ञानम् ॥ रयणत्तयमाराहं रत्नत्रयमाराधयन् । जीवो आराहओ मुणे- यव्यो जीप आत्मा आराधको मुनितव्यो ज्ञातव्य । आराहणाविहाणं इदमाराधनाविधन विधि । तस्स फलं केवलं गाणं तस्याराधना विधानस्य, किं फल केवल ज्ञान अनन्तकेवलज्ञानमिति अनन्तचतुष्टय । सिद्धो सुद्धो आदा सव्वाह सबलोयदरसी य । सो जिणवरेहि भणियो जाण तुमं केलं जाणं ॥३५।। सिद्ध शुद्ध आत्मा सवज्ञ सवलोकदर्शी च । स जिनवर भणित जानीहि त्व केवल ज्ञानम् ॥ सिद्धो सुद्धो आदा सिद्ध आत्मापलब्धिमान् । शुद्ध कर्ममल- कलकरहित , ईग्विध आत्मा अतति समयैकेन ऊर्व प्रयास्वभान त्रिभुवनान गच्छतीति आत्मा शुद्धबुद्धकस्वभाव 1 मबण् सव्वलो यदरिसी य सर्वज्ञ त्रैलोक्यालोकस्वरूपज्ञायककेवलज्ञानसमुपेत , सर्व- लोकदर्शी च सर्वशब्देनालोकाकाशो लम्यते लोकशब्देन पद्व्याधार- वत्रिभुवनमुच्यते तद्द्य दृणु अवलोकयितु शीलमस्येति सर्वलोकदी। चकार उक्तविशेषणसमुच्चयार्थ तनानन्तवीर्यान तसौख्योपदादिरनन्त- १ रयणतयमारा अय पाठ क पुस्तके नास्ति, ख पुस्तकात् सयोजित । २ सौख्यादादि इस पुस्तके पाठ ।
मोक्षप्राभृत ! ३२७ गुणोऽपि गृह्यते । सो जिणवरेहि मणिओ स एव गुणविशिष्ट आत्मा जिनवरैस्तार्थकरपरमदेवैर्भणित प्रतिपादित । एष गुणनिशिष्टमात्मानं जाण तुमं केलं जाणं जानीहि त्व केवल ज्ञान, आत्मा खलु केरल ज्ञान-अभेदनयत्वात् ज्ञानमेवामान जानीहि । रयणत्तयं पि जोई आराहड जो हु जिणवरमएण । सो झायदि अप्पाणं परिहरदि पर ण संदेहो ॥ ३६ ॥ रत्नत्रयमपि योगी आराधयति य स्फुट जिनवरमतेन । सध्यायति आत्मान परिहरति परेन स-देह ॥ रयणत्तयं पि जोई रत्नत्रयमपि योगी ध्यानपान मुनि , न केवल गुणिनमारमान तद्गुण रत्नत्रयमपीन्यपेरर्थ । आराहइ जो हु जिणवर- मएण आराधयति य सयमी हु स्पुट जिनपरमनन सर्वज्ञवीतरागकथि तमार्गेण । सो झायदि अप्पाणं स योगी ध्यायति चिंतयति, के ? आत्मान सहजानन्दस्वभाव जीवतत्व । चकाराद्य आमा तद्रत्नत्रयं यद् त्नत्रय स आत्मा गुणगुणिनोरभेदनयात् । परिहरदि परं संदेहो परिहरति परियजति, पर पुद्गलायचेरानद्रव्य, न सन्देहोऽत्रार्थे सशयो नास्ति । कह आदे रयणत्तयं हदि तं जहा- कथमा मनि रत्नत्रय भरतीति चेत् । तद्यथा-तदेव निरूपयति- जं जाणइ तं गाणं जं पिच्छइ तं च दंसणं णेयं । तं चारितं भणियं परिहारो पुग्णपावाणं ॥ ३७॥ यज्जानाति तज्ज्ञान यत् पश्यति तच्च दर्शन ज्ञेयम् । तवारेन भणित परिहार पुण्यपापानाम् । १न टी । २ आदा ग घ अन्यन च पाठ 1 अस्यार्थ आत्मेति ।
मोक्षप्राभूत । ३२९ दसणसुद्धो मुद्धो दंसणसुद्धो लहेइ णिव्याणं । दसणविहीणपुरिसो न लहइ तं इच्छियं लाई ॥३९ ॥ दर्शनशुद्ध शुद्ध दशनशुद्ध लभते निवाणम् । दशनविहीनपुरुष न लभते त इष्ट लाभम् ।। दसणसुद्धो सुद्धो दर्शनेन सम्यग्दर्शनेन सम्यक्त्वेन शुद्धो निर्मलो निरतिचार पचविंशतिदोपरहित पुमान् शुद्ध क्थ्यत । उक्त च- सम्यग्दर्शनसशुद्धमपि मातगदेहज । देवा देव विदुभस्मगुढाङ्गारान्तरौजस ॥१॥ दसणसुद्धो लहेइ णिवाणं दर्शनशुद्ध पुमोल्लभते निर्माण मोक्ष । दसणविहीणपुरिसो दर्शनविहीन पुरुष सम्यग्दर्शनरहित पुमान् सम्यक्त्वविवर्जितो जीव । न लहइ तं इच्छियं लाह न लभते न प्राप्नोति त जगत्प्रसिद्ध योगिना प्र यक्ष इष्ट लाभ सर्पकर्मक्षयलक्षण मोक्षपदार्थ। इय उवएसं सार जरमरणहर खु मण्पाए ज तु । तं सम्मत्तं भणियं समणाणं सावयाणं पि ॥४०॥ इति उपदेश सारो जन्ममरणहर स्फुट मन्यते यत्तु । तत् सभ्यश्व भणित श्रमान श्रावकाशामपि। इय उवएस सार इतीदृश उपदेश सबाधपचन, सारं सार श्रेष्टतर । श्रेष्ठे वले स्थिरस्थान्ते मजाया सार उच्यते । जले न्याय्ये धने विद्भिः सारमुक्त नपुसवे ॥१॥ जरमरणहर सु मण्णए जंतु जरामरणहर जरामरणविनाशक इम उपदेश मन्यते श्रद्दधाति यत्तु यत् पद्धत्ते तु पुन । ते सम्मत्तं भणियं तत्सम्यक्त्व भणित प्रतिपादित । समणाणं सापयाणं पि १ अमरेऽप्युप-" सारो बले स्थिराशे न्याय्य क्लीव वरे निषु ।"
- ३३० पट्याभूते- श्रवणाना दिगम्बराणा अनगारयतीना धारकाणामपि गृहस्थाना । अपिशब्दाचातुर्गतिकजीवानामपि । जीनाजीवविहत्ती जोई जाणेइ जिणवरमएणं । तं सग्णाणं भणियं अवियत्य मन्वदरिसीहि ॥४१॥ जीवानीवविभक्ति योगी जानाति जिनवरमलेन । तत् संज्ञान भाणित अवितथ सर्वदर्शिमि । जीपाजीविहत्ती जावाजीगना विभक्ति भेदस्ता जीवाजीवनि- भक्तिं । जोई जाणेइ जिणवरमएणं यागी दिगम्बरो मुनि , जानाति वेत्ति यथारस्वरूपमवैति, जिनपरमतेन सर्वज्ञशासनेन । तं सण्णाणं भणिय तत्सज्ञान भणित तत्सम्यग्ज्ञान कथित। अवियत्थ सबद- रिसीहि अवितर्थ सत्यभूत, सर्वदर्शिभि सर्वज्ञैरिति शेष । उक्त च- अन्यूनमनतिरिक्त याथातथ्य बिना च विपरीतात् । नि सन्देह घेद यदाहुस्तज्ज्ञानमागमिन ॥१॥ जं जाणिरुण जोई परिहार कुणड पुण्यपावाण । त चारितं भणियं अवियप्पं कम्मरहिएण ॥४२॥ यत् ज्ञात्वा योगी परिहार करोति पुण्यपापयो । तत् चारित भणित अविकल्प कर्मरहितेन । ज जाणिरुण जोई यज्ज्ञापा विज्ञाय योगी जैनो मुनि । परि हार कुणइ पुण्णपाताण परिहार परित्याग करोति पुण्यपापयो । त चारित्तं भणियं तदात्मना सहकलोटीभार तमयर तपरत्वं तनिष्य तदेकतानत्ल चारित्र परमोदासीनतालक्षण भणित प्रतिपा दित । केन, कम्मरहिएण घातिकर्मविधसकेन सर्वज्ञेन । तत्कथंभूतं चारित, अवियप्प अरिकल्प सकल्पविक्रयरहित निरिकल्पसमा- विलक्षणं यथाख्यातनामक ।
मोक्षप्राभृतं । ३३१ जो रयणनयजुत्तो कुणइ त संजदो ससतीए । मो पावइ परमपयं झायंतो अप्पयं सुद्धं ॥४३॥ यो रत्नत्रययुक्त करोति तप सयत स्वशश्त्या । स प्राप्नोति परमपद घ्यायन् आत्मान शुद्धम् ।। जो रणत्तयजुत्तो यो जैनो मुनी रत्नत्रययुक्त सम्यग्दर्शनज्ञान चारित्रसहित सम्यक्शदानज्ञानानुष्ठानसमुपेत । कुणइ तवं संजदो संसत्तीए करोति विदधाति सम्यगनुतिष्ठति, किं तत् : तप इच्छा- निरोधलक्षण आत्मनि ज्ञानयतया तपन, सयतो जैनो मुनि परमोदासी- नतालक्षणसंयम सम्पन्न , स्वशक्त्या आत्मशक्त्यनुसारेण । उक्त च- ज सक्कइ त कीरइ जं च ण सक्केइ त च सद्दहइ । सदहमाणो जीवो पावर अजरामर ठाण ॥१॥ " शक्तितस्त्यागतपसी" इति वचनात् । सो पारड परमपयं स प्रामोति स मुनिर्लभते, किं तत् । परमपद इन्द्रधरणन्द्रमुनीन्द्रनरेन्द्र वदित स्थान परमनिर्वाण । झायंतो अप्पयं सुद्धं ध्यायन् सन् एका- प्रतया चिन्तयन् , क ' आत्मान निजशुद्धबुद्रेकस्वभारात्मतत्य, शुद्ध द्रव्यकर्मभारकर्मनोकर्मरहित रागद्वेपमोहादिविवर्जितं कर्ममलकलकरहित प्रत्यक्षतया प्राप्तमिति तापर्यार्थ । तिहि तिणि धरवि णिचं तियरहिओ तह तिएण परियरिओ। दोदोसविप्पमुको परमप्पा झायए जोई ॥४४॥ निमि ग्रीन धृत्वा नित्य विकरहित तथा निकेण परिकलित । द्विदोपविप्रमुक्त परमात्मान ध्यायते योगी ॥ . १ सशन्दोऽयं टोकायां नास्ति मूलात् सयोजित । ३ यस्नोति सक्रियते यच्च न शश्नुयात् सच श्रद्धीयते । प्रधानो जीव प्रामोति अजरामर स्थान ॥
- ३३० पट्मामृते- श्रवणानां दिगम्बराणां अनमारयतीना श्रावकाणामपि गृहस्थानां । अपिशब्दाचातुर्गतिकीनानामपि । जीवाजीवविहत्ती जोई जाणेइ जिणवरमएणं । तं सण्णाणं भणिय अवियत्यं सम्बदरिसीहिं ॥४१॥ जीवाजीवविभक्ति योगी जानाति जिनवरमलेन । तत् संज्ञानं भणितं अवितधं सर्वदर्शिभिः । जीवाजीवविहत्ती जीवाजीवाना विभक्तिः भेदस्तां जीपाजीववि- भक्ति । जोई जाणेइ जिणवरमएणं योगी दिगम्बरो मुनिः, जानाति वेत्ति यथावत्स्वरूपमवैति, जिनवरमतेन सर्वज्ञशासनेन । तं सणाणं भणियं तसज्ञान भणित-तत्सम्याज्ञानं कथित । अवियत्थं सव्वद- रिसीहिं अवितथं सत्यभूतं, सर्वदर्शिभि. सर्वज्ञैरिति शेपः । उक्त च- अन्यूनमनतिरिकं याथातथ्य विना च विपरीतात् । निःसन्देहं वेद यदाहुस्तरशानमागमिन ॥ १॥ जं जाणिऊण जोई परिहारं कुणइ पुण्णपावाणं । तं चारित्तं भणियं अवियप्पं कम्मरहिएण ॥४२॥ यत् ज्ञात्वा योगो परिहार करोति पुण्यपापयो । तत् चारिनं भणितं अविकल्पं कर्मरहितेन ॥ जं जाणिऊण जोई यज्ञात्वा विज्ञाय योगी जैनो मुनिः । परि- हारं कुणइ पुण्णपावाण परिहार परित्यागं करोति पुण्यपाप्योः । तं चारितं भणियं तदात्मना सहै कलोलीभाषः तन्मयन्वं तत्परत्वं तनिष्ठलं तदेकतानत्वं चारित्रं परमोदासीनतालक्षणं भणिनं प्रतिपा- दित । केन, कम्मरहिएपण घातिकर्मविधसकेन सर्वज्ञेन । तत्कर्थभूत चारित्र, अवियप्पं अपिकल्पं संकल्पविकल्परहितं निर्विकल्पसमा- धिलक्षणं यथारयातनामक ।
। मोक्षप्राभृत । ३३१ जो रयणत्तयजुत्तो कुणइ त संजदो ससतीए । सो पावड परमपयं झायंतो अप्पयं सुद्धं ॥४३॥ यो रत्नत्रययुज करोति तप संयत स्वशक्त्या । स प्राप्नोति परमपद ध्यायन् आत्मान शुद्धम् ।। जो रणत्तयजुत्तो यो जैनो मुनी रत्नत्रययुक्त सम्यग्दर्शनज्ञान चारित्रसहित सम्यक्श्रद्धानज्ञानानुष्ठानसमुपेत । कुणइ तयं संजदो संसत्तीए करोति विदधाति सम्यगनुतिष्ठति, किं तत् : तप इच्छा निरोधलक्षण आत्मनि ज्ञानवत्तया तपन, सयतो जैनो मुनि परमोदासी- नतालक्षणसयम सम्पन्न , स्वशक्त्या आत्मशक्त्यनुसारेण । उक्तं च- ज सफ्फइ त कीरइ ज च ण सकेइ त च सद्दहइ । सदहमाणो जीवो पावइ अजरामर ठाण ॥१॥ " शक्तितस्त्यागतपसी " इति वचनात् । सो पावइ परमपयं स प्रामोति स मुनिर्लभते, कि तत् । परमपद इन्द्रधरणन्द्रमुनीन्द्रनरेन्द्र वदितं स्थान परमनिर्माण । झायंतो अप्पयं सुद्ध ध्यायन् सन् एका प्रतया चिन्तयन् , क ' आ मान निजशुद्धबुद्धकस्यभानामतत्व, शुद्ध द्रव्यकर्मभावकर्मनोकर्मरहित रागद्वेषमोहादिविवर्जित कर्ममलकलकरहित प्रत्यक्षतया प्राप्तमिति ता पर्यार्थ । तिहि तिणि धरवि णिचं तियरहिओ तह तिएण परियरिओ । दोदोसविप्पमुक्को परमप्पा झायए जोई ।। ४४ ॥ निभि प्रौन धृत्वा नित्य निरहित तथा निकेश परिकलित । द्विदोपविप्रमुक्त परमारमान ध्यायते योगी॥ १ सशन्दोऽयं टीकायर्या नास्ति मूलात् सयोनिन । २ यच्छनोति सरिश्यते यञ्च न शक्नुयात् सच श्रद्धीयते । प्रधानो जीव प्रामोति अजरामर स्थान ॥
३३२ पट्याभूत-- तिहि तिमि मनोरचनकायै । तिणि धरवि नीन् वर्षाशीतोष्ण कालयोगान् धृ वा। तुआण तूणार तुम् च क्वाया" इति प्रारत- व्यापरणसूत्रेण क्त्वाम्यानऽव आदा तन धृवा इयस्य स्थाने धरवि इति प्रयोग साधु । णिचं मर्यदा सस्मिन् दाक्षाकाले। तियरहिओ मायामिथ्याचनिदानशल्यविकरहित । तह तिएण परियरिओ तथा तेनैव त्रिकरहितप्रकारण, निकेण सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रण, परिकरितो मटित । दोदोसविप्पमुक्को द्विदोपरिप्रमुक्त विदोषेण प्रयर्पण रागद्वेपदोषरहित । परमप्पा झायए जोर्ड परमात्मान सिद्रस्वरूपमा स्मान ध्यायति चिंतयति योगी ध्यानपान् मुनि । अथवा योगीति योगग्लेन मनोवाक्काययोगावष्टम्भन । मयमायकोहरहिओ लोहेण विपज्जिओ य जो जीवो । निम्मलसहावजुत्तो सो पावड उत्तमं सोक्खं ॥ ४५ ॥ मदमायाक्रोवरहित रोभन विवा तश्च यो जीव । निर्मलस्वभावयुक्त स प्राप्नोति उत्तम सीख्यम् ॥ मयमायकोहरहिओ मदमायामोधरहित । लोहेण विनजिओ य जो जीवो लोभन विवर्तितश्च यो जीव आत्मा । निम्मलसहाय जुत्तो निर्मलस्वभाव रागादिरहित परिणामस्तेन सयुक्त । सो पावइ उत्तम मोसं स जीव प्राप्नोति रमते, कि उत्तम सोरय कर्मक्षय सजात इन्द्रियमुखरहित इन्द्रादीनामपि दुलभ सौख्य परमान दलक्षण । तथा चोक्त- ज मुणि र हइ अणतमुहु नियअप्पा झायतु । त मुहु इदु विन घिलहर देविहि कोडि रमतु ॥१॥ १ को क । २ यन्मुनि लभतऽन ससुख निजारमान ध्यायन्। सत् मुख इन्द्रोऽपि नैव एभते देवीना कोर्टि रममाण ॥ - मोक्षप्राभृतं । ३३३ विसयकसाएहि जुदो रुद्दो परमप्पभाररहियमणो। सो न लहइ सिद्धिमुहं जिणमुद्दपरम्मुहो जीवो ॥४६॥ विषयकाषायैर्युक्त रुद्र परमा मभावरहितमना । स न लभवे सिद्धसुख जिनमुद्रापरामुनो जीव ॥ विसयकमाएहि जुदो विपयै पनिताजनानामालिगनादिस्प शादिपचेन्द्रियमुखै कयायैश्च क्रोधमानमायालोमे युत सहित । रुद्दो परमप्पभावरहियमणो रुद्र सत्यकिमहाराजपुत्र परमात्म- भावरहितमना परमा मभावनाया प्रभृए । सो न लहड सिद्धिसुहं स रुद्रो न लभते न प्राप्नोति, किं ! सिद्धिसुखे आ मोपलब्धि- मुख । तर्हि किं लभते । नरकदु ख लभते इत्यापत्ति । जिण- मुद्दपरम्मुहो जीनो जिनमुद्रापराड्मुखो जीव जिनमुद्रा परित्यज्य भ्रष्टो बभूवेति भावार्थ । रुद्रस्य कथा यथा-अथेह भरतक्षेने विजयार्धपर्वते दक्षिणश्रेण्या किन्नरगीतनगरे रत्नमाली संगनरेन्द्रो मनोहरीविद्याधरीकान्त , तत्पुनो रुद्रमाली । स एकस्मिन् दिने स्वच्छ द वने पिहरमाणो विद्या साध- यती विद्याधरकुमारी ददर्श । तद्रूपमोहितो विद्यया भ्रमरो वमूव । पण्मासपर्यत तद्वदनकमले स्थितिं चकार । पुन सूक्ष्मो भूत्वा स्तन- योधने च तस्यौ । पश्चाप्रकटीकृतनिजशरीर स तया परिगलितों भणित प्रतीक्षप्त क्यित्काल तापत् विघ्न मा काी । शिखिदुर्लभा निया सिद्धयति तस्या सिद्धायां तर जाया भविष्यामि । हे मुभग ! यद्रानुरागाह वर्ते । तदा तेन सा पृष्टा । मद्धे । (व कस्य धूदा । भणित च तपा। अौर पर्वत उत्तरस्पा श्रेणी गवर्षपुरपत्तनापीशो मम पिता महावल । तस्य प्रभाकरी भार्या । तयोर्धीदा प्रसिद्धाहमार्च- अस्मात्सदा सुता इत्यपि पाठ रा पुस्तके वतवे । म च क पुस्तके टिपणरूपेण वनत । धूदा इयत्येव नामान्तर मुतेति । ज्ञायते खनु रेखहरम दोग्य । यत् मूले प्रक्षिप्तोऽयं सुतेति शब्द ।
पटप्राभृते- मालिनी । तयापि पृष्ट त्व क १ । स आह । अत्र गिरी दक्षिणश्रेणी किन्नरगीतपुरप्रभुरत्नमालिमनोहर्यो सुतोऽह रुद्रमाली नाम | बडुमि- दिनै सावितविद्यार्चिमालिनी दुवदना सदन जगाम! मातरपितरौ द्वयो- मनो विज्ञाय तयोविवाह चन्तु । तौ रतिरसर जितौ साधितप्रज्ञप्तिविधी नन्दनपने शातिहेतवे जिनस्नपनपूजनस्तवनानि कृत्वा मुख स्थिती । मनोजयचित्तवेगौ तस्या मैथुनिकापागत्य महाजालिनीविद्यया रद्रमालिन उद्घा प्रगृह्य गतौ। सोऽपि तौ निर्जित्य पुनरागत । अर्चिमालिन्या सह निजपुर प्रविवेश । सानुरागस्तस्थौ । एकदा वैराग्य प्राप्य चारण- चरणमूले समार्यो दिदीक्षे । तौ परस्पर ममाय कान्तो भविष्यति ममेय प्राणप्रिया भविष्यतीति सनिदानौ सौधर्म सन्यासेन गतौ) तत्रापि दीर्घ- काल रतिमुख मुक्ता गधारदेशे माहेश्वरपुर स देव सत्यन्धरमहाराजसत्य- वत्यो सुत सात्यकिर्जात अर्चिमालिनीचरी देवी सौधर्माच्च्युना सिन्धुदेशे विशालीपत्तने चेटकमहाराजसुप्रभादेव्यो सुता ज्येष्टा जाता। सा सात्यक पूर्वमेव दत्ता । पर विवाहो न वर्तते । अग्रान्तरे श्रेणिकमहा- राजपुत्र के यार्थ सार्थवाहो भूत्वा अभयकुमारो नाम धूर्तस्तत्रागत । तत्र राजपुत्र्यो चेलना ज्येष्टा च चालयित्वा उपाय त्वा सुरगया नि सृत । तत्र चेल नया जेष्टा आभरणादिमिषेण व्याघोटिता स्वय श्रेणिक आगता I यावज्येष्टा जिनप्रतिमा गृहीत्या गच्छति तारत्तर कोऽपि न दृष्ट । जेष्ठा तु लजिता " अह वृहद्भगिया वचिता" इति वैराग्यण पितृष्वमुर्यास्वत्योश्चैत्यालये स्थितायाश्चरणमूले दीक्षा जग्राह । कन स्काचनवाया कयाया वार्ता श्रुत्या सयकिर्नाम कुमार ससाराद्विरत्तो राज्यलक्ष्मी परित्यय समाविगुप्त नत्या जिनदीक्षामग्रहीत् । निगुप्तिगुप्त । १ आर्यकाया nmannmannaam anaanim Mn.1Mmma. MAnnnnnn areanA मोक्षप्राभृतं। ३३५ सन् स तपस्तीनं कुर्वाण उत्तरगोकर्णमदि मुक्त्वा कदाचित् राजगृह- नगरसमीपे उच्चप्रीमपर्वते स्थितः । एकस्मिन् दिने तद्गुणानुरागिण्यस्त- व्रत्यास्तिं वन्दितुमागताः । वन्दित्वा यागिरेवतरन्ति तावन्महामेघ- वृष्टिरागता । आर्थास्तु स्तिम्यन्त्यो विव्हलीभूता यत्र तत्र गता.! जैप्टार्या सत्यकिमुनर्गुहा प्रविष्टा । तत्र वस्त्र निष्पीलयन्ती ज्येष्ठा सत्यकिना मुनिना दृष्टा । समुत्पनकामोदेकेण सा तेन भुक्ता । पुनरालोचनां निन्दा गर्हण च कृत्वा श्रवणधर्मे स्थितः । सा सगी शान्त्यार्यया ज्ञात्वा चेलन्याः समर्पिता। तत्र तिष्टन्ती सा पुत्रमसूत । स पुत्रोऽभयकुमारण स्वयंभूगुहाया क्षिप्तः । तत्र रात्री स्वमदर्शनाचेलनया स आनायितः । दर्शनोड्डाह शमयित्वा स्वयंभूनामा कृतः । ज्येष्ठा तु नि.शल्या भूत्या गता | आर्यायाः पार्श्वे सयमनियमान् पालयन्ती स्थिता । स्वयंभूस्तु वर्धमानः शिशूना चपेटादिताडनेन सन्ताप करोति । तद्देव्या चेलनया अपरमपि कालेनायुक्तं दृष्ट्वा स्वयभूरुक्तः। खलो जारजातो निर्लजः किं केनापि स्वभाव गुंचति । भ्रुकुटिं कृत्वा दुर्वचनेन शूलभिन्न इव ताडितः । पुन. स प्रणामं कृत्वा पृष्टवान्-मात: 1 किमेतदुक्त ? चेल. नया तु न किमपिरक्षित यघोत्तामुवाच । निजोत्पत्तिव्यतिकरं ज्ञात्वा उत्तर- गोकर्णपर्वतं गत्या सत्यकिमुनि नत्वा वैराग्येण दिगम्बरो भूत्वा उत्तर- गोकर्णपर्वते स्थितः । गुरुशिक्षया मनो रद्धा स एकादशाङ्गानि शिक्षितः। तत्र रोहिणीप्रभृतयः पंचशतविद्या महातिशया आगताः सिद्धाः । अपरा अपि अंगुष्टप्रसेनाप्रभृतयः सप्तशतक्षुद्रविद्यास्तस्य मिद्धा. । विद्यासामर्थेन सिंहो भूत्वा जन भीपयति । तद्वृत्तान्तः केनचित् सत्यके- निरूपितः । गुरुणा स ऊधे-मुने ! तव स्त्रीहेतुना विनाशो भविष्यति। २ भार्या समस्तापि इति स. पुस्तके एकवचनान्तोऽशुद्ध. पाठ.।
परप्राभृते। तच्छुत्वा यत्र स्त्रीमुख न पश्यामि तत्राहं तप करिष्यामीति कैलासप- चत गत्वा तप कर्तुं लग्न । तारविजयादक्षिणश्रेणी मेघनिवपत्तने क्नकरथो नाम विद्याधरनरेन्द्र । तद्देनी मनोरमा । देवदारुविद्युसनौ द्वो पुत्रौ । एकदा देवदार राज्ये स्थापयित्या विद्युजिव्ह च युवराज कृया कनकर यो गुणधरगुरचरणमूले दीक्षा जाह ! प्रज्ञप्तिविद्याप्रभावेण विद्यु- जिव्हेन देवदारजितो निर्घाटित । कडासमागत्य सपरिवारो विद्यापुर कृत्वा निर्भय स्थित । तस्य देवदारो चतस्रो महादेव्य सत्य योजन- गधा, कनका, तरगरेगा, तरगभामिनी चेति । चतस्रोऽप्यतिमनोहर- शरीरा । योजना धायां गधिला गन्धमालिनी चेति द्वे धीदे जाते अति विनीते | कनकाया कनकचित्रा कनकमाला चेति धूदे द्वे जाते । तरंग- वेगाया तरगसेना तरगपती चेति द्वे कन्ये सजाते । तरगभामिया मुप्रभा प्रभावती चेति द्वे पतियरे वभवतु । एता अष्टावपि दिन्यामर- णमूपिता दिव्याम्बरधरा अमरकुमारिका इस कचुकिपरिवरितास्ति- प्ठन्ति । एकदा कैलासोपरि मानससरसि जलक्रीडार्थमागता पानो- नतस्तनशोभिता स्नान दुर्वतीस्ता रुद्रो ददर्श । मदनपाणै- पक्षास विद्ध । क्षुभितो रुद्रो व्यामोह प्राप। तनासनस्थितेन कामबाणजर्जरितहृदयेन चिन्तित उपाय । विद्यया सरस्तटस्थि- तानि वस्त्राभरणानि हारयति स्म । ता अनुपमा स्नान कृत्वा तटमा- गय वस्त्राभरणानि न पश्यति स्म । व्याधुलितमनोभिस्ताभिर्मुनिस- मीप गत्वा स मुनिमचं। स्वामिन् ! न ज्ञायते देवानामपि प्रियाणि अस्माक वस्त्राभरणानि केनचिट्टहीतानि। भगान् । व ज्ञानपान् जानासि निश्चित क्थय । रद्र उवाच । जानाम्येन, यदि मामिच्छत यूयं तदा दर्शयामि। एतच्छुया विस्मिय नवयौवना विद्याधरसुमार्य ऊचु । मुने! १ अस्य स्थाने सन्तीति पाट स पुस्तके ।
मोक्षप्राभृतं । वयं स्वच्छन्दचारिण्यो न वर्तामहे | अस्मन्मातरपितरौ जानीतः। स्वच्छ- न्दचारिणीनां विद्यामाहात्म्यं कुतः। ततो वस्त्राभरणानि दत्वा शिपि- विष्टः प्राह । निजमातरपितृगणं पृष्ट्वा मम उत्तरं दत्त यूयं । ताभिर्गृह गत्वा पितुर वार्ता कृता । पित्रा तु एक: कंचुकी संदेशहरो हर प्रेपितः। स गत्वा मुनिमुवाच । स्वामिन् ! अस्मत्स्वाम्येवं भणति । यदि मेध- निबद्धं पत्तनं गत्वा मेघनृपं तथा मेघनादं च दायिनं निर्धास्य त्रिकहर्प- दायि त्रिपुरं पुरं प्रवेशयसि मां तदा जनमनोमोहनकारिणीमम सुता अष्टा अपि ददामि । कपर्दिना ओमिति भणिते कंचुकिना चागत्य राखे तथा कथिते खचराधिपो हर्षे चकार । सुहृत्सुजनयर्गेण सर्वेण तत्र गत्वा शर्व स्वमन्दिरमानिनाय । तत्रोपवेश्येश्वरमादितो वृत्तान्तं जगाद' यथा दायिना राज्यमपहृतं । ईशान उवाच । राजन् ! यत्त्वं भणसि तदर्ह साधयामि, फिमेकेन त्रिपुराधिपेन त्रिजगदपि संहरामि। तदनन्तरं सरोपो देवदारुभयरहितो नानाछत्रध्वजचामरसैन्यसहितः शंकर नीत्या तत्र गतः। पुरं वेष्टितवान् । विद्युजिव्हस्तु निर्गतः, चन्द्रशेखरस्तेन सह त्रैलोक्य- चित्तचमत्कारकारकं समनीक चकार । ज्वालिन्या विद्यया ज्यालयित्वा रिपुं भस्मयामास । त्रिपुर गृहीत्वा देवदारुः सुखी बभूव । जामातर निपुरं नीत्वा तस्मै चन्द्रशेखराय अष्टा अपि कन्या अदित । तास्त मैथुनमसहमाना अष्टा अपि मृताः । देवदारुखगस्याप्टचन्द्रैः सुहृद्भिः शत्रुमारकस्य भूतेशस्य मालतीमाला इब कोमलभुजाः पंचशतकन्याः पुनर्दत्ता. । ता अपि खण्डपरशोर्विपमरतेन दिन दिनं प्रति भुक्ता एकैकाः सर्ग अपि मम्रः । तदा तासां मरणे गिरीशश्चिन्ताच्यावुलितमनाः स्थित.। अथ गौर्या सह संयोगो जातस्तत्कथां कथयामि शृणुत भव्याः! । पूर्वभवे खल्वेका क्षान्तिका देशान्तरं यान्ती मार्गश्रमश्रान्ता धीवरेण नदीमुत्तारिता । पद२२ यथा - ३३८ पद्माभूते- तस्प मत्स्यबन्धस्य शीतलशरीरस्पर्शेन सा आप्यायिता। तया विषयाशया कर्मपशेन निदान कृतं-अयस्मिन् भने प्रकटितपरमस्नेहोऽयं मम भर्ता भविष्यतीति । ईदृशं निदान कृत्वा काय मुिच्य सौपर्मे द्रस्य देवी जाता। कैरर्तस्तु ससारे भ्रमित्वा मिथ्यातप कृता ज्येगमुतो जात । अथ सापस्तिपुरे राजा चासर । त महादेवी मित्रवती । तया विद्युन्मती नाम्नी कया जनिता । तडिदष्टस्य रियाधरस्य सा दत्ता । सौधर्मेन्द्रदेवी घ्युत्ता विद्यु मती गर्भे स्थिता । नामे मासे फरेन जनिता । विद्युन्मती विद्याधरी पीडावशेन निर्षिना(णा) सती सौपस्तिनगरे पर्वतगुहाया त्याजिता । तर गुहायां चतस्रो द्विजपुत्र्य क्रीडितु कन्यापुण्येनागता । उमा उमा इति शन्देन रटन्ती तामि। उमेति नाम कृत्वा सा कोमलाङ्गी करणया गृहमानीता । प्रामणपुनी- भिवतसृभि सा कन्या रापुरे वियुमत्या महादेव्या पासरनृपपन्या [सा पालिका] दर्शिता । तथापि गृहीत्वा पुत्र्यों पुत्री निजधाच्या पंडि- ताया पालयितुं दत्ता। अधाटचन्दनपेषु प्रधान ईद्रसैनाभिधानो गगनागणे संबोदितविमान एकस्मिन् दिने सावस्तिमागत । तस्य युद्धस्त्रिया निजभगिन्या अपत्यरहिताया सन्मानपूर्वक मिनर या यासयपभार्यपा गिरियर्णिकानाम्न्या सा उमा दत्ता। तयापि प्रतिपाल्य नवयौरना पता। सा मुन्दरी मुरकूटपुरेशविद्याधरेशतडिद्वेगस्य परिणायिता । सा मदीमत्ता मुलु मुरतानुरागा यदा सुरतमुगमनुभयति तदा तडिगो मृत । उमा तु यौवनमर्दन स्वच्छदा जाता। शिवस्तोमा देवदारनगरे एमस्मिन् दिने गता। देवदारणा तधारे जावा रतिगुणाधिका सा स्थाणोर्षिया सारा । २ सा. रा. । स्या क । पूर्वपाटागारेग (मा) प्रनित । १ पुया। मिदुन्मस्या । ५ उमा। यस । • ग सखा । भयोग्यो।
। मोक्षप्राभृतं । विभवस्यार्धमाननेनार्धासनस्याङ्गीकरणेन च तस्य भार्या पुनर्भूर्जाता । भूतेशस्तु तस्या मुखविशप्रसून निरीक्षमाणोऽहर्निश तिष्ठति । सरित्सु सीतासीतोदादिषु सरस्म पद्मादिपु गिरिपु मेादिषु लरणोदादिपु समुद्रेषु देवारण्यादिषु च वनेषु सर्वमंगलया तथा सार्धमनुदिनं रममाण उर्वरायां पर्यटति । स जटामुकुटषिभूपितो वृपारूढो भस्मोद्धूलितो लोकाने वदति-अहं त्रिजगत्स्वामी, कर्ता, हर्ता, शिवः, स्वयभूः, शभुः, ईश्वरः, हरः, शंकरः, सिद्ध, बुद्धः त्रिपुरारिः, त्रिलोचन., प्रकृतिशुद्धः, सर्वज्ञः, उमापतिः, भवः, ईश , ईशान., मृडः, मृत्युञ्जय , श्रीकण्ठः, वामदेव., महादेवः व्योमकेश इत्यादीनि मम नामानि । अहमेव वर्तेऽपरो नास्ति । मायाची विजयाधै बहूनि दिनान्युपित्वा जनमनासि म रंजयित्वार भरत- क्षेत्रमागत्य तेन शैवशास्त्रं प्रकटीकृत । तद्दीक्षिता. शैवाचार्या बहवो बभूवुः । दर्शितगुणा गणाः प्रभूता मिलिता , तै परिवृतोऽस्वलितप्र- तापोऽनवरतमुमाप्रेमानुरागो द्वादश वर्षाणि विषयसौख्यं मुंजानो मह्या हतविपक्षो भ्रमितः। तत्प्रतापं दृष्ट्वा सर्वेऽपि विद्याधरा अतिभीताः । तैरिचारित एप महाविद्याबलीयानस्मान् मारयित्वा उभये अपि श्रेण्यौ निश्चित प्रहीष्यति । केनोपायेनाय खलो हन्यते यावन्न हन्तीति । लोक चिन्ताकुलं दृष्ट्वा मात्रा गिरिकर्णिकानाम्या निजसुतोमा भेदं पृष्टा- पुनि उमे। मम जामातुर्विद्या कदाचिदपि अशा भान्ति न वेति, उमा प्राह-मातनिरिकर्णिके ! यदाय मगासह मुरतमुखमनुभवति तदा सुरतकाले विद्या अस्य न स्फुरन्ति । इत्युपदेश लब्धा । गन्धारदेशे दुरंड- नगरे वनप्रदेशे सुरतमारढः, विद्याधरैः कान्तासहितस्य शिरथिच्छिदे। तस्मिन् हते तद्विद्याभिर्देश उपयोद्वासितः। गृहे गृहे कृतचौरः प्रविष्टः जीवधनं मुष्णाति । तन्नगरस्य राज्ञा विश्वसेनेन नन्दिपेणो मुनिः पृष्टः । भगवन् ! गरकोपसर्गस्य कः प्रयय. 1 मुनिरुवाच ! रद्रनामा ३४० पटप्राभृते- विद्याधरस्तर नगरे विद्यानामक्षमापणं कुर्वाणो मारितस्तेनोपसर्गो वर्तते। ताहि स्वामिन् । उपसर्गविनाश कथ भविष्यति । तलिंग छित्वा उमो- पस्थे स्थापयिन्या यदि पूजयन्ति भवतस्तदा विद्या उपशाम्यन्ति । उत्पात उपशाम्यतीति तछुत्या विश्वसेनस्तत्र गत्वा सर्वोऽपि जनपदो व्याहत । इएकाभिरुच्चा मचिका कृत्वा तहिंग ठित्वा तदुपरि धृत्वा तलिंगोपरि सुरतसुखक्षोणि तदुपरि धृत्वा तन्मध्ये ऊर्ध्वमाण शिलिंग स्थाएपित्या जटेन प्रक्षाल्य परिमलबहुलेन चन्दनेन विलिप्य पुष्पाक्षतादिभि.कै राजाज्ञया पूजयित्वा तदिद्रिययोर्नमरकार कृत तदा विद्यामि क्षमा कृता, लोकस्योपसर्गस्य विनाशो जात । तदिनमारम्य प्रहतलज छोक- स्येश्वरं लिंग पूज्य जातमित्यज्ञानिमिर्लोके श्रीमद्भगवदई परमेश्वर परित्यज्य स एष देव परमात्मीकृत । इति मोक्षप्राभृते रुद्रोन्पत्युपायानं जिनमुद्रापरिभ्रष्टन्यसूच समाप्तम्। जिणमुदं सिद्धिमुहं हवेइ नियमेण जिणवरुदिया । सिविणे वि ण रुबइ पुण जीना अच्छंति भवगहणे ॥४७॥ जिनमुद्रा सिद्धमुस भवति नियमेन जिनवरोरिष्टा । स्वप्नेपि न रोचते पुन जीवा तिति भवगहने । जिणमुदं सिद्धिसुहं जिनमुद्रा सिद्धिसुखं आत्मोपलब्धिरक्षणमु- तिसुख-सिद्धिसुखयोगाजिनमुद्रव सिद्विमुखमुपचर्यते । हवेइ भवति । नियमेण जिणवरुद्दिद्या नियमेन निश्चयेन, कथंभूता जिनमुद्रा जिन- रोदिया रेवलिप्रतिपादिता । तटक्षण पूर्वमेयोक्तं वर्तते । सिरिणे वि ण रचइ पुण सा जिनमुद्रा जीवस्य स्यमेऽपि निद्रायामपि न । न.री।
मोक्षप्राभृतं । ३४१ रोचते । रुचधातोः प्रयोगे चतुर्थी प्रोक्ता " यस्मै दित्सा रोचते धारयते वा तत्संप्रदानं" इति वचनात् संप्रदाने चतुर्थी तदयुक्तं, कस्मादिति चेत् ! यदा रोचते तदा संप्रदानं यदा तु न रोचते तदा पृष्ठीप्रयोग एव । स्वप्नेऽपि न रोचते पुनर्जीवस्येति सम्बन्धः । जीवा अच्छंति भवगहणे येन कारणेन जिनमुद्रा न रोचते भारचारित्रं भावचारित्रमिति लौकादिभिराम्रड्यते तेनैव कारणेन जीवास्तिष्ठन्ति भवगहने संसारखने । रुद्रादिवद्रष्टजिनमुद्रा नरकादौ पतन्ति । • परमप्पय झायंतो जोई मुच्चेइ मलदलोहेण । णादियदि णवं कम्मं णिदिदं जिणवरिंदेहिं ॥४८॥ परमात्मानं ध्यायन् योगी मुच्यते मलदलोभेन । नादियते नव कम निर्दिष्टं जिनवरेन्द्र ॥ परमप्पय झायंतो परमात्मानं निजात्मस्वरूपं ध्यायन् । जोई मुच्चेइ मलदलोहेण योगी ध्यानवान् मुनिर्मुच्यते परिहियते, केन? मलदलोभेन मलं पाप ददातीति मलदः स चासौ लोमो धनाकाक्षा तेन मलदलोभेन । णादियदि ण कम्मं लोभरहितो मुनि द्रियते न वनाति, नवं फर्म अभिनवं पाप, पूर्वोपार्जितं तु स्वयमेव क्षीयते । णिदिदं जिण- चरिदेहि निर्दिष्ट कथित, जिनवरेन्द्रैः* जिनवरा एव इन्द्रास्त्रिभुवन- प्रभवस्तजिनवरेन्द्रैः* सर्वज्ञवीतरागैरिति शेष.। होऊण दिढचरित्तो दिढसम्मत्तेण भावियमईओ झायंतो अपाणं परमपयं पावए जोई ॥४९॥ भूत्वा दृढचरित दृढसम्यक्त्वेन भावितमति । ध्यायनात्मानं परमपदं प्राप्नोति योगी ॥ * एतचिन्हमध्यगतः पाठः ख. पुस्तके नास्ति । १ जिनेन्द्रेः इति मूलटीका- पाठः मूलपदानुसारेण प्रवर्तितः ।
३४२ पट्यामृते- होऊण दिढपरित्तो दृढचरित्रोऽचलितचारित्रो भूत्वा । दिढ़- सम्मत्तेण भावियमईओ दृढसम्यक्त्वेन चलमलिनतारहितसम्यग्दर्श नेन भावितमतिस्तु वासितमना । झायतो अप्पाण ज्ञानबटेन ध्याय मामान । परमपय पाए जोई परमपद केवलज्ञान निर्माण च प्रामोति, योगा भदमानवान् मुनि । चरण हवड सधम्मो धम्मो सो हवइ अापसमभावो । मो रागरोसरहिओ जीपस्म अणण्णपरिणामो ॥५०॥ चरण भवति स्वधर्म धर्म स भवति भामसमभाव । स रागरोषरहित जीवस्य अनन्यपरिणाम ॥ चरण हाइ सधम्मो चरणं चारित्रं भवति स्वधर्म आमस्वरूपं । धम्मो सो हवइ अप्पममभागो धर्मो भवति, कोऽसौ स एव य स्वधर्म आमस्वरूप,स धर्म कभूत अप्पसमभावो-आमसमभाव आमम सर्व जीवेषु समभाव समतापरिणाम यादृशो मोक्षस्थाने सिद्धो यतते साहश एव ममा मा गुद्धबुद्धकस्वमात्र सिद्धपरमेश्वरसमान याशोऽह केवलज्ञान स्वभानस्तादृश एव सर्वोऽपि जीवराशिरत्र भेदो न कर्तव्य ।मो राग रोमरहिओ जीरस्म अणण्णपरिणामो स मामसमभाय कर्थभूत स्तस्य लक्षण निरूपयन्ति भगवत-स आमसमभागो रागरोपरहितो भवति य प्रति प्रीतिरक्षण रागे करोमि सोऽप्यहमेव, ये प्रति अप्रीति लक्षण द्वेष करोमि सोऽप्यहमव तेन रागरोपरहितो जीरस्यामनोऽनन्य परिणाम एकोलीभार समरमेन परमचारिने ज्ञातव्यमिति । तथा चोक्त- जीवा निणर जो मुणा जिणार जीय मुणे।। मो समभायपरिहियमा एटु मिन्याणु एहे ॥१॥ १ टी । १ सीवान् निसर्ग योजानावि शिनवर जीय ज्ञानानि । म समभावपरिस्थित मधु निवाण समते॥
मोक्षमाभृतं । ३४३ जह फलिहमणि विसुद्धो परदव्वजुदो हवेइ अण्णं सो । तह रागादिविजुत्तो जीवो हवदि हु अणण्णविहो ॥५१।। यथा स्फटिकमणि: विशुद्धः परद्रव्ययुतो भवति अन्य स । तया रागादिवियुक्त जीवो भवति स्फुटमन्योन्यविध. जह फलिहमणि विसुद्धो यथा येन प्रकारेण स्फटिकमणिः स्वभा- घेन विशुद्धो निर्मलो वर्तते । परदव्वजुदो हवेइ अण्णं सो परद्रव्येण जपापुष्पादिना युत , अण्ण-अन्योऽन्यादृशो भवति । तह रागादि- विजुत्तो तथा तेनैव स्फटिकमणिप्रकारेण रागादिभिर्विशेषेण युक्तः स्त्र्यादिरागयुतो रागादिमान् भवति । जीवो वदि हु अणण्णविहो जीव आत्मा भाति हु-स्फुट अन्योन्यविधोऽपरापरप्रकारो भवति-स्त्रीमि- योगे रागवान् भवति शत्रुभियोगे द्रुपवान् भवति पुत्रादिभिर्योगे मोर- वान् भवतीति तात्पर्यार्थ । देव गुरुम्मि य भत्तो साहम्मि य संजदेमु अणुरत्तो। सम्मत्तमुव्वहतो झाणरओ होइ जोई सो ॥५२॥ देवे गुरौ च भक्त. साधर्मिके च संयतेषु अनुरक्तः। सम्यक्त्वमुद्वदन् ध्यानरत भवति योगी स.॥ देव गुरुम्मि य भत्तो देवे गुरौ च भक्तो विनयपर । साहम्मिय संजदेसु अणुरत्तो सामिकेषु समानधर्मेषु जैनेषु, सयतेषु महामुनिपु, अनुरक्तोऽकृत्रिमस्नेहवान् वात्सल्यपर । सम्मत्तमुन्वहंतो सम्यक्त्व सम्य- ग्दर्शनमुद्दहन् मूर्धनि स्थापयन् । झाणरओ होइ जोई सो एव विशे- पणत्रयविशिष्टो योगी अष्टाङ्गयोगनिपुणो मुनिर्व्यानरतो भवति ध्याना- नुरागी भाति सः । विपरीतस्य ध्यान न रोजत इत्यर्थः । तथा चोक्त- सर्वपापावे क्षीणे ध्याने भवति भावना। पापोहतवृत्तीनां ध्यानवार्तापि दुर्लभा ॥१॥ - ३४४ पट्मामृते- अन्यच्च--- स्वयथ्यान् प्रति सद्भावसनायापतर्वतया । प्रतिपत्तियथायोग्यं पात्सल्यमभिलप्यते ॥२॥ उग्गतवणण्णाणी कम्मं सवदि भवहि बहुएहि । तं पाणी तिहिं गुत्तो सवेइ अंतोमुद्दुत्तेण ॥ ५३ ॥ उप्रतपसाऽज्ञानी यत्कर्म धपते भवबहुकै । तग्मानी निभिगुप्त क्षपयति अन्तर्मुहूर्तेन ॥ उग्गतवेण उप्रतपसा तीव्रतपसा कृत्वा । अण्णाणी अज्ञानो मुनि, आत्मभावनाविवर्जितस्तपस्वी । कम्मं सपदि भवहि बटुएहि यत्कर्म पापकर्म क्षिपते महु कैः कोटिमवैः शतकोटिभयः सहस्रको- टिभवैः टक्षकोटिभः कोटिकोटिमवेश्रेत्यादिभि. । तं पाणी तिहिं गुत्तो तत्कर्म ज्ञानी आत्मभावनापरः सूरिः तिहिं गुत्तो-निमिर्गुप्तो मनोवचनकायगुप्तिसहितः । सवेई अंतोमुहुत्तेण क्षपयति क्षयमान- यति, कियति काले ! अन्तर्मुहुर्तेन । कोऽसारन्तर्मुहूर्त इति चेत् :- आंवलि थसंपसमया संजायलिदि होर उस्सासो। सन्तुस्सासो थोओ सत्तायोओ टयो भणियो ॥१॥ अहत्तीसद्धलवा नाली दो मालिया मुटुत्तं तु। समऊणं तं मिणं अंतमुलुत्त योयविहं ॥२॥ इति गाथाद्वयर धिवक्रमेण आपल्या उपरि एकः समपोऽधिको भवति सोऽन्तर्मुहूर्तो जघन्यः पथ्यते । एवं ब्यादिसमपद्धया समपद- यहीनोऽन्तर्मुहूर्त टष्टः कथ्यते । मध्येऽसरयातभेदा अन्तर्मुहुर्तस्य ज्ञातव्याः । तेषु फास्मिचिदन्तर्मुहूर्ते हानी कर्म क्षपयति । एपेन सम- येन हीनो मुहूर्तो भिन्नमुहूर्त उच्यते इति भारः । दि.टी.। र अनयो पाया पूर्व परवारिंशत्तमे भागता ।
मोक्षप्राभतं ।
३४५
सुभजोगेण मुभावं परदव्वे कुणइ रागदो साहू ।
सो तेण दु अण्णाणी पाणी एनो दु विवरीदो ॥५४॥
शुभयोगेन मुभावं परद्रव्ये करोति रागतः साधुः।
स तेन तु मानो ज्ञानी एतस्माद्विपरीतः ॥
सुभजोगेण मुभावं शुभस्य मनोज्ञपदार्थस्येष्टवनितादेः योगेन संयो-
गेन मेटनेनोपदोकनेनाप्रत आगतेन मुभाष-शोभनं प्रीतिलक्षणं भार्य
परिणाम । परदव्वे कुणइ रागदो साहू परदव्ये आत्मनो भिन्ने वस्तुनि
इष्टयनितादौ, करोति निदधाति मुभावमिति सम्बन्धः, रागत: प्रेमपरिणा-
मात् । कः कर्ता, साधुपधारी मुनिः पुष्पदन्तवत् । तथा चोक्त-
अलकपलयरम्य भूलतानर्तकान्तं
नवनयनविलास चारुगण्डस्थलं च।
मधुरवचनगर्ने स्मेरविम्याधरायाः
पुरत इव समास्ते सन्मुसं मे प्रियायाः ॥१॥
फर्णावतंसमुखमण्डनकण्ठभूपा-
घक्षोजपपजधनाभरणानि रागात् ।
पादेयष्टक्तकरसेन च चर्चनानि
पुर्वन्ति ये रणयिनीषु त एव धन्याः ॥२॥
लीलाविलासविलसन्नयनोत्पलायाः
स्फारस्मरोत्तरलिताधरपलवाया।
उनुगपीपरपयोधरमंडलाया-
स्तस्या मया सह फदा ननु संगम: स्यात् ॥३॥
किंच-
वित्रालेयनकर्ममिर्मनसिजव्यापारसारास्मृत-
गोदाम्यासपुरस्थितप्रियतमापादमणामक्रमैः।
स्वप्ने संगमविप्रयोगविषयमीत्यमोदागमे-
तिथं येपमुनिर्दिनानि गमयत्युकिंठित' कानने ॥१॥
३४६ पट्माभूते- इत्यादिसुदतीचिन्तनेनाज्ञानी मूढ कथ्यते । णाणी एत्तो दु विव- रीदो ज्ञानी निर्मोहो मुनि एतस्मादुक्तलक्षणात् साधोपिरीत शुभ- वस्तुयोगे सति राग न करोतीति तात्पर्यार्थ । आसनहेदू य तहा भावं मोक्सस्स कारणं हवदि । सो तेण दु अण्णाणी आदसहावस्स विपरीदो ॥५५॥ आसवहेतुश्च तया भावो मोक्षस्य कारण भवति । स वेन तु अज्ञानी भारमस्वभावान् विपरीत ।। आसवहेद् य तहा आस्रवहेतुश्च तथा यथेटवनितादिविपये राग भास्रवहेतुर्भवति तथा निर्विकल्पसमाधि बिना मोक्षस्यापि रागः कर्मास्त्रवहतुर्भवति । सो तेण दु अण्णाणी स साधुर्मोक्षेऽपि रागभान कुर्षाण तेन कारणेन पुण्यकर्मवन्धहेतुत्वादज्ञानी भवति-मूढ स्यात् आदसहावस्स विग्रीदो आत्मस्वभागनिर्विकल्पसमाधिलक्षणात्म- ध्यानरूपाद्विपरीत । तथा चोक्तमेकत्वसप्तन्या---- स्पृहा मोक्षेऽपि मोहोत्था तनिषेधाय जायते । अन्यस्मै तत्कथ शान्ताः स्पृहयन्ति मुमुक्षव ॥१॥ जो कम्मजादमडओ सहारणाणस्स संडदूसयरो। सो. तेण दु अण्णाणी जिगसासणदूसगो भणिदो ॥५६॥ य कर्मजातमतिक स्वभावज्ञानस्य खण्डदूपणकर । स तेन तु अज्ञानी जिनशासनदूषको भणित ॥ जो कम्मजादमइओ य पुमान् कर्मजातमतिक इन्द्रियानिन्द्रि- याणि खलु कर्मजातानि तदुत्पन्नमतिलेशसंयुक्त । सहावणाणस्म संड- दूसयरोस्वभावज्ञानस्यामोत्थज्ञानस्य केवटज्ञानस्य दूसयरो-दोपदायक ! मात्मन खल्वतीन्द्रियज्ञान नास्ति चक्षुरादौद्रियजनितमेव ज्ञान वर्तते मोक्षप्राभृत । ३४७ इत्येवं स्वभानज्ञानस्य दूपणकरो भवति, अतीन्द्रियज्ञान न मयते । खंड- दूसयरो-खण्डज्ञानेन दूपणकर कश्चिमिथ्यादृष्टि मो तेण दु अण्णाणी स पुमान् तेन तु दूपणदानेन अज्ञानी ज्ञातव्यो ज्ञानीयो ज्ञेयो वेदितव्य इति यावत् । स कथंभूत , जिणसासणदूसगो भणिदो जिनशासन- स्याईतमतस्य दूपको दोपभाषको भणित -स नरकदुख प्राप्स्यति । तथा चोक्त पुष्पदन्तेन महाकविना काव्यपिशाचखण्डकन्यपरनामद्वयन- सैन्धण्हु अणिदिओ णाणमउ जो महमूदु न पत्तियह। सो णिदिउ पचिदियणिर घेतरणिहि पाणिउ पिया ॥१॥ णाणं चरित्तहीणं देसणहीणं तवेहि संजुत्तं । अण्णेसु भावरहियं लिंगग्गहणेण किं सोक्सं ॥ ५७ ॥ ज्ञान चारित्रहीन दशनहीन तपोभि सयुक्तम् । अन्येषु भावरहित लिगमहणेन किं सौख्यम् । णाणं चरित्तहीणं ज्ञान चरित्रहीन सौख्यकर न भवतीति सम्बध । दसणहीणं तवेहि संजुत्तं दर्शनहीन सम्यग्दशनरत्नरहित तपोभि सयुक्त कर्म सौख्यकर न भवतीति सम्बन्ध । अण्णेसु भावरहियं अन्येषु पडावश्यकादिषु भावरहितं कर्म । लिंगग्गणेण कि सोक्स लिंगग्रहणेन वेपमात्रेण आमभावनारहितेन कर्मणा किं सौख्य भवति- अपि तु सर्वकर्मक्षयलक्षण मोक्षसुखं न भवतीति भावार्थ । अचेयणं पि चेदा जो मण्णाइ सो हवेइ अण्णाणी। सो पुण गाणी भणिओ जो मण्णइ चेयणे चेदा ॥१८॥ अचेतनमपि चेतयितारं यो मन्यते स मवति अहानी। स पुन ज्ञानी भणित यो मन्यते चतने चेतयितारम् । १ अस्य छाया पूर्व ३०७ पृछे गता।
३४८ पट्मामृते- अच्चैयणं पि पेदा जो मण्णइ सो होइ अण्णाणी घेतपितार- मात्मानं य पुमान् फापिलमतानुसारी अचेतनमामाने मन्यते स पुमान् ज्ञानी ज्ञानर्मितो मूरों भोन् । मो पुग णाणी भणिो स पुमान् पुनर्ज्ञानी भणित । स क । जो मण्णइ चेयणे चेदा य पुमान् चतने चेतनद्रव्ये चैतयितारमा मान मन्यते । रक्त च- स यदा दुराप्रयोपतप्तचेतास्तद्विधातरतुजियासोसेकितरि- घेकस्रोता स्फाटिकाइमानमिवानन्दात्मानमप्यात्मान मुरादुम्पमो. शायहपरिवतर्महदहकारविवतध पलुपयन्न्या. सत्यरज साम्याव. स्थापरनामयत्या सनातनव्यापिगुणाधिरते. परते स्वरूपमयग' छति तदायोमयगोलपानलतुल्यवर्गस्य योधपदधानरससर्गस्य सति विसर्गे साएशानशेयसम्यन्धवैकल्य फेवरयमयरम्यते सदा gःस्यरूपेऽयस्थान मुचिरिति पापिला विवदन्ता प्रतिपत्तव्या:- कपिलो यदि पाठति पित्तिमचिति सुरगुरगीगुफपंप पतति । चैतन्य पानाधरहितमुपयोगि फत्य पदे तत्र विदित !॥ १॥ तवरहियं जं गाणं गागरिनुत्तो नमो वि अफयत्यो। तम्हा णाणतवणं संजुत्तो लहइ णिचाणं ॥ ५९॥ सपोरहित यन् हान हानपियुक्त तपोऽपि अाता । तस्मत् मानतपणा मेयुका एम नियोगम् ।। तररहियं जणाणं तपोरहित यज्ञानं तदातामिति सम्बध । णाणविजुत्तो तमो वि अकयत्यो ज्ञानवियुक्त ज्ञानरहित अमान तपोऽपि अताध मोक्ष न साधयति । तदा पाणवयेणं संजुत्तो लहह णिच्यागं तस्माकारणा झानतपसा हाने घ तपश्च मानतप समाहारो दस्तेन ज्ञानतपसा। अपग सानेनोपलक्षितं तपोझानगपालन सक्तिन संयुक्तो मुनि भते निर्गि समक्षपक्षण मोक्षमिप । तथा चोक्त- तरीम।
मोक्षप्रामृत । मान्य ज्ञान तपोऽहीन भानहीन तपोऽहित द्वाभ्या युक स देव. स्याद् बिहीनो गणपूरण.॥१॥ धुवसिद्धी तित्थयरो चउणाणजुदो करेइ तवयरणं । पाउण धुवं कुज्जा तवयरणं णाणजुचो वि ॥६०॥ ध्रुवसिद्धिस्तीर्थकर चतुष्कज्ञानयुत क्रोति तपश्चरणम् । ज्ञात्वा ध्रुव कुर्यात् तपधरण ज्ञानयुक्तोपि ॥ धुवसिद्धी तित्थयरो ध्रुवसिद्धिरवश्स मोक्षगामी, कोऽसौ तीर्थकर तीर्थंकरपरमदेव । चउणाणजुदो करेइ तवयरणं दीक्षानन्तरमेयोप- नमन पर्ययज्ञान तथापि तपश्चरण त्रिरात्रादिक तपश्चरणं करोति । पाउण धुवं कुजा तवयरणं णाणजुत्तो वि इति ज्ञावा, ध्रुसमिति निश्चयेन, कुर्याद्विदध्यात्, कि तत् । तपश्चरण ज्ञानयुक्तोऽपि । अर्ह सकालशास्त्रप्रवीण कि ममोपवासादिना तपश्चरणेनेति न वाध्यमिति भाव । उक्तच उचंचासहो एकहो फलेण सयोहियपरिवार । णायदत्तु दिघि देव हुउ पुणरवि णायकुमार ॥१॥ ते कारणि जिय पइभणमि करि उवयासुम्भासु। जाम्रण देहकुडिल्लयहि दुस्का मरणहु यासु ॥२॥ यदज्ञानेन जीवेन हत पाप सुदारुण । उपवासेन तत्सर्व दहत्यग्निरिवन्धन ॥ १॥ तथा चोक्त प्रभाचदेण तार्किकलोकशिरोमणिना- उपवासफ्लेन भजति नरा भुवनत्रयजातमहाविभवान् । खलु कर्ममलप्रलयादचिरादजरामरकेवलसिद्धिसुख ॥ १॥ 1 उपवासस्य एकस्य फलेन सबोधिनपरिवार । नागदत्त दिवि देवो जात पुनरपि नागकुमार ॥ २ तेन कारणेन जीव । प्रभणामि कुरु उपवासाभ्यास । यावन देहकुड्या दौकते मरण यत् ॥
- ३५० पद्माभूते- होइ पणिज्जुन पोलिहिं उयवासे नउ धम्मु । एउ अयाणउ सो घयह जमु कउ भारउ कम्मु ॥१॥ पोट्टरियहि मणिमोत्तियह धणु केत्तियहि ण माइ । योरहि भरिउ यल्हडा त नाहीं ज खाइ ॥२॥ आत्मशुद्धिरिय प्रोता तपसैव विचक्षणः। किमग्निना रिना शुद्धिरस्ति फाचनशोधने ११॥ चाहरलिंगेण जुदो अभंतरलिंगरहिदपरियम्मो । सो सगचरित्तभटो मोक्सपहविणासगो साह ॥ ६१॥ बहिलिगेन युतो अभ्यतरलिंगरहितपरिसम्म । स स्वकचरिनभ्रष्ट मोक्षपथविनाशक साधु ॥ बाहिरलिंगेण जुदो वहिलिंगेन युतो नग्नमुद्रासहित । अब्भतर- लिंगरहिदपरियम्मो अभ्यन्तरलिंगरहितपरिकर्मा आमस्वरूपभावना रहितं परिकर्म अगसस्कारो यस्य सोऽभ्यन्तरलिंगरहितपरिकर्मा । सो सगचरित्तभट्टो स साधु स्वफचरित्रभष्ट । मोरसपहविणा- सगो साहू मोक्षपविनाशक साधु स साधुर्मोक्षमार्गविष्यसको ज्ञातव्यो ज्ञानीयो ज्ञेय । इति भाव ज्ञात्वा निजशुद्धबुद्धैवस्वभावे आत्मतत्वे नित्य भाषना कर्तव्या साधो। मुहेण भाविदं गाणं दुहे जादे विणस्सदि । तम्हा जहानलं जोई अप्पा दुक्सेहि भावए ॥ ६ ॥ मुखेन भावित ज्ञान दुखे जादे विनश्यति । तस्मात् यथावल योगी आत्मानं दुस भावयेत् ॥ सुहेण मानिदं गाणं मुऐन नित्यमोजनादिना भावित वासित ज्ञान आमा। दुहे जादे विणस्मदि दुखे जाते सति भोजनादेर. प्राप्तौ सत्या विनश्यति आमभावनाप्रच्युतो भवति। तम्हा जहा.
। ३५२ पट्याभूते- आत्मा चारितवान् दर्शनज्ञानेन सयुत आत्मा। स ध्यातव्यो नित्य ज्ञात्वा गुरुप्रसादेन । अप्पा चरित्तनंतो आमा चारित्रवान् वर्तते आत्मात्मानमेगनुतिष्ठ- तीति कारणात् यस्य मुनेश्चारित्रे प्रीतिरस्ति स आत्मानमेवाश्रयविति भावार्थ । दसणणाणेण संजुदो अप्पा दर्शनेन ज्ञानेन च सयुत संयुक्त , कोऽसौ ? आत्मा जीवतत्व, अत्रापि स एव भावार्थ -यस्य मुनेर्दर्शने प्रेम वर्तते ज्ञाने यानुरागोऽस्ति स मुनिरात्मानमेवाश्रयतु तद्- यमपि तत्रैव वर्तते यस्मात् । सो झायव्यो णिचं स आत्मा ध्यातव्यो नित्यं सर्वकाल । रत्नाना नयस्योपायभूतस्यात्मलाभे मोक्षलाभे वा प्रीति- मत इत्यर्थ । गाउणं गुरपसाएण गुरोनिप्रथाचार्यस्य शिक्षादीक्षा- चारवाचनादेश्च कर्तु प्रसादन कारण्येन । अय वस्तुस्वभावो वर्तते यदाचार्यप्रसन्नतयात्मलामो भवति तद्विराधने सत्यात्मा न स्फुटी- भवति । तथा चोक्त- गुणेषु दोपमनीपयान्धा दोपान् गुणीकर्तुमथेशते थे। थोतु क्वीना पचन न तेऽर्दा सरस्वतीद्रोहिपु कोऽधिकारः॥१॥ अथवा गुरुणा पचतयाना परमेष्टिना प्रसादादात्मा प्रमुर्लम्पते। तेपा प्रसाद रिना आत्मप्रभुर्न प्राप्यत इत्यर्थ । यथा राजान द्रष्टुवाम कश्चित् पुमान् तत्साम तकादीन् पूर्व पश्यति ते तु राजान मेटयत्ति, तान तरेण तर प्रोष्टुमपि न लम्यते इति कारणात् पूर्व पचदेवता प्रसादनीया आमलाममिष्ठता योगिनेति भावार्थ । दुक्खे णजड अप्पा अप्पा पाउण भावणा दुक्सं । मावियसहावपुरिमो विसएसु पिरचए दुक्र ।। ६५॥ - मोक्षप्राभूत । ३५३ खेन ज्ञायते आत्मा आत्मानं ज्ञात्वा भावना दुःखम् ।। भावितस्वभावपुरुपो विषयेषु विरग्यति दुखम् ॥ दुक्र णजइ अप्पा दुःखेन महता कष्टेन तावदात्माज्ञायते आत्मास्तीति बुद्धिरुन्पद्यते । अप्पा पाऊण भावणा दुक्सं यद्यात्मास्तीति ज्ञात तदा तस्मिन्नात्मनि भावना वासनाऽहनिशचिन्तनं तद्गुणस्मरणादिकं दुखं दुष्प्राप्यं भवति । भाषियसहावपुरिसो विसएसु विरचए दुक्खं भावितस्सभारः पुरुप आत्मभावनासहितोऽपि सूरि• यद्विपयेषु वनिता- जनस्तनजधनवदनलोचनादिविलोचने तद्वार्तालापगोष्ठीषु शरीरस्पर्शनादि- सुखेषु विरज्यति तासुख हालाहलविषास्वादनवजानाति तदतीव दु.खं दुष्करमिति तात्पर्यार्थः। ताम ण णजइ अप्पा विसएसु णरो पवट्टए जाम । विसए विरत्तचित्तो जोई जाणेइ अप्पाणं ॥ ६६ ॥ तावत् न ज्ञायते आत्मा विषयेषु नर प्रवर्तते यावत् । विषये विरकचित्त योगी जानाति आत्मानम् ।। ताम ण णज्जइ अप्पा तात्कालमात्मा न ज्ञायते । तारत्कियत् ! विसएसु रो पट्टए जाम यावत्काल विषयेषु पूर्वोक्तलक्षणेषु नरो जीवः प्रवर्तते व्याप्रियते । विसए विरत्तचित्तो रिपये पूर्वोक्तलक्षणे निरक्तचित्तो निवृत्तचेता यती। जोई जाणेइ अप्पाणं योगी ध्यानवान् पुमान् महामुनिरात्मान जानाति प्रत्यक्षतया पश्यति । अपा णाऊण णरा केई सम्भावभावपमहा । हिंडंति चाउरंगं विसएसु विमोहिया मूहा ॥ ६७ ॥ आत्मान ज्ञात्वा नरा केचित्सद्भावभावप्रभ्रष्टा । हिण्डन्ते चातुरन विषयेषु विमोहिता मूढाः ॥ न.टी. पटू. २१ ३५४ पट्मामृते- अप्पा पाऊण णरा आमानं ज्ञात्या आत्मास्तीति सम्यग्विज्ञाय नरा बहिरात्मजीवा । केई सम्भावभावपन्महा वेचित् सद्भावभाव- प्रभ्रष्टा केचित् विवक्षिता सन् समीचिनो भाव सद्भाव निजात्म- भावना तस्मा प्रभ्रष्टा निजशुद्धयुद्धैक्स्वभावात्मभावनाप्रच्युता विषयसुख- दुर्भावनासु रता इत्यर्थ । हिंडंति चाउरंग हिण्ट ते परिभ्रमन्ति पर्य टन कुर्वन्ति चाउरंग-चतुरंग भव चातुरग चतर्गतिससारससरण यथा भवत्येव । विसएसु विमोहिया मूढा विषयेषु पचेन्द्रियार्थेषु स्पर्शरस- गन्धवर्णशब्देषु विमोहिता लोभ गता , त च पिया अनादिकाले जीये- मास्वादिता, आत्मोत्थरवाधान मुख कदाचिदपि न प्राप्ता । तथा चोक्त- अदृष्ट फि किमस्पृष्ट किमनाघ्रातमथुत । किमनास्वादित येन पुनर्नवमिवेक्ष्यत ॥ १॥ F• • भुत्तोडिझता मुहुर्मोहान्मया सर्वेऽपि पुगसा. । उच्छिऐप्यिय तेवद्य मम विशस्य का स्पृहा ॥२॥ विषयेषु विमोहिता ये ते मूढा अज्ञानिनो बहिरारमान इत्यर्थ । तेन बहिरात्मभाव परित्यज्यात्मभावना कर्तव्या । जे पुण निसयविरत्ता अप्पा गाउण भाषणासहिया । छंडंति चाउरगं तवगुणजुत्ता ण संदेहो ॥ ६८ ॥ ये पुन विषय विरक्ता आत्मान ज्ञावा भावनासहिता । त्यजति चातुरग तपोगुणयुत्ता न सन्देह ।। जे पुण विसयविरत्ता ये पुनरासन्नमव्यजीग विश्यम्यो पिरता पराङ्मुखा पिपयेपूपन्नविषमापना । अप्पा पाऊण मारणासहिया आम'न ज्ञात्या आमभावनासहिता भवन्ति । छंडति चाउरगं ते पुरुषास्त्यजत्ति, किं । चातुरग ससारं । तरगुणजुत्ता ण संदेहो तप चाउरंगटी । २नी।
मोक्षप्राभृत । एव गुणस्तपोगुणस्तेन युक्ता । अथवा तपो द्वादशभेद गुणा अष्टाविं- शतिर्मूलगुणा उत्तरगुणाश्च बहुभेदास्तैर्युक्ता ससार त्यजति अत्र सन्दहो नास्ति संशयो न कर्तव्य । उक्त च गौतमेन महर्षिणा- वर्दसमिदिदियरोधो होचावस्सयमचलमण्हाण । खिदिसयणमदतवण ठिदिभोयणमेगभत्त च ॥१॥ पदे पलु मूलगुणा समणाण जिणवरेहि पण्णत्ता। एत्थ पमादकदादो अइचारादो नियत्तो ह॥२॥ परमाणुपमाणं वा परदव्वे रदि हवेदि मोहादो। सो मूढो अण्णाणी आदसहावस्स विवरीदो ॥६९॥ परमाणुप्रमाण वा परद्रव्ये रतिर्भवति मोहात् । स मूढोऽज्ञानी भात्मस्वभावाद्विपरीत परमाणुपमाणं वा परमाणुप्रमाण वा । परदव्वे रदि हवेदि मोहादो परद्रव्ये रतिर्भवति मोहादज्ञानात् परमाणुमात्रापि रतिर्मोहा- दज्ञानाद्भवति, किमुच्यते बव्ही रति । महती रतिस्तु अज्ञानाद्भवत्येव । सो मूढो अण्णाणी यस्य परद्रव्ये स्यादिपिपये रतिर्भवति स मुनि- मूढ तस्यैव पर्यायोऽज्ञानीति । आदसहावस्स विवरीदो स मुनि- रात्मस्वभावाद्विपरीत परद्रव्यरत इत्युच्यते बहिरामा कथ्यत इति भावार्थ । एव ज्ञावा परमात्मान परित्यज्य परद्रव्ये रतिर्न कर्तव्येति तात्पर्यार्थ । अप्पा झायंताणं दंसणसुद्धीण दिढचरित्ताणं । होदि धुवं णिव्याणं विसऐसु विरत्तचित्ताणं ॥७॥ व्रतसमितीन्द्रियरोधा लोच आवश्यकमचेलमस्नान । क्षितिशयनमदन्तमन स्थितिभोजनमेकभक्त च ॥ एते सलु मूर गुणा श्रमणाना जिनवर प्रणीता । अत्र प्रमादकृतादतिचारानिवृत्तोऽ।
३५६ पट्मामृते- बारमान ध्यायता दर्शन शुद्धीनो दृढचारिनाणाम् । भवति ध्रुव निर्वाण विषयेषु विरक्तचित्तानाम् ॥ अप्पा झायंताणं आत्मानं ध्यायता मुनीना । दसणसुद्धीण दिढ- चरित्ताणं दर्शनस्य शुद्धि मल्यं चलमलिनत्वरहित्सम्यक्त्वाना चर्मजल- घृततैलभूतनाशनादिपरिहरता शरीरमानदर्शनेन परगृहेषु कृतादिदोप- रहिताशनमश्नता दर्शनशुद्धिमता, दृढचरित्राणा ब्रह्मचर्यप्रत्याख्यानादि- दृढचारित्राणा। होदि धृवं णिव्याणं भवति समिति निश्चयेन निर्वाण मोक्षो भवति । विमएसु विरत्तचित्ताणं विषयषु इष्टयनिता- लिङ्गनादिषु विरक्तचित्ताना विषयान् विपं मन्यमानानामिति संक्षेपतोऽर्थों ज्ञातव्यो ज्ञानायो ज्ञेय इति । जेण रागे परे दब्बे ससारस्म हि कारणं । तेणावि जोइणो णिच्चं कुज्जा अप्पे सभावणा ॥७॥ येन रागे परे द्रव्ये ससारस्य हि कारणम् । तेनापि योगी नित्य कुर्य्यादात्मनि स्वभावनाम् ॥ जेण रागे परे दन्वे येन वनितादिना पर्यायेण, रागे सति राग उत्पद्यते, परकीये द्रव्ये आमनो भिन्ने वस्तुनि । संसारस हि कारणं स राग कथभूत , ससारस्य भवभ्रमणस्य, हि निश्चयेन, कारण हेतु । तेणांवि न केवल आत्मनि आत्मभावना कुर्यात् कितु तेनापीष्ट वनि- तादिना । जोइणो यागी। नित्य सर्पकालं । अप्पे अत्मनि। स्वभा- वना-आत्मभावना कुर्यात । कथमिति चेत् । इयमिष्टानिता अनत- केवलज्ञानमपी वर्तते यथा ममा मान तकेलज्ञानमयो धर्तते । इयमह च द्वावपि कालज्ञानिनौ वर्तारहे । तेन इयमप्यामा ममेति को नाम पृथ ग्वर्तते येन सह स्नेह करोमि । तथा चापनिषद् --- १ रहितानशनमिति मूलीकापाठ । ३ तेनापि टी ।। योगिन टी ।
चैव मोक्षप्राभृतं । यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मेचाभूद्विजानतः । तन को मोहः करशोक एकत्वमनुपश्यतः ॥१॥ जिंदाए य पसंसाए दुक्खे य मुहएमु य । सत्तूर्ण चेव बंधूर्ण चारित्तं समभावदो ।। ७२ ॥ निन्दायर्या च प्रशसायां दुखे च मुखेषु च । शत्रूणा बधूना चारित समभावत ॥ जिंदाए य पसंसाए निन्दाया प्रशसाया च समभावतश्चारित्र भव- तीति सम्बन्ध । दुक्खे य सुहएसु ये दुखे च सुखके च समागते- वित्युपस्कार । सत्तूर्ण चे बंधूर्ण शत्रूणा चैव बन्धूना समायोगे इत्युपस्कार । चारितं समभावदो समभारत समतापरिणाम सति चारित्र भरतीति निर्विकल्पसमाधिरूप यथाख्यात चारित्र भवतीति भावार्थ । चरियावरिया बदममिदिवज्जिया सुद्धभावपमहा। केई जंपंति परा ण हु कालो झाणजोयस्स ॥ ७३ ॥ चावरिका मतसमितिवर्जिता शुद्धभावप्रभ्रष्टा । केचित् जल्पन्ति नरा न हि कालो ध्यानयोगस्य ॥ चरियावरिया चर्यायाश्चारित्रस्य आनरिका आवरण येपा ते चर्या वरिका चारित्रमोहनीयकर्मयुक्ता । वदसमिदिवज्जिया व्रतसमितिय- जिंता व्रतरहिता समितिहीनाश्च । सुद्धभावपब्मटा शुद्धभारप्रभ्रष्टा रागद्वेषमोहादिभि परिणामै कश्मलीकृता आत्मध्यानहीना । केई जंपति गैरा केचिद्वहिरात्मानो नरा पुरुषा जल्पति अरन्ति । किं जल्पन्ति ! ण हु कालो झाणजोयस्स ध्यानयोगस्य अष्टाङ्गयोगमध्ये सप्तमो योगो ध्यानयोगस्तस्य कालोऽवसरो न वर्तते । कथ' हि स्पुट। के ते अष्टागयोगा- १च.टी । २न टी ।
। ३५६ पट्प्राभूते- आत्मानं घ्यायर्ता दर्शनशुद्धीनो दृदचारित्राणाम् । भवति ध्रुवं निर्वाण विषयेषु विरचित्तानाम् ।। अप्पा झायंताणं आत्मानं ध्यायतां मुनीनां । दसणमुद्धीण दिढ- चरित्ताणं दर्शनस्य शुद्धिनमल्य चलमलिनत्यरहितसम्यक्त्यानां धर्मजल- घृततैलभूतनाशनादिपरिहरतां शरीरमात्रदर्शनेन परगृहेषु कृतादिदोप- रहिताशनमश्नतां दर्शनशुद्धिमतां, दृढचरित्राणां ब्रह्मचर्यप्रत्याख्यानादि- दृढचारित्राणां । होदि धूर्व णिव्यागं भवति ध्रुवमिति निश्चयेन निर्वाणं मोक्षो भवति । विमएमु विरत्तचित्ताणं विषयेषु इष्टननिता. लिङ्गनादिषु विरक्तचित्तानां रिपयान् पिपं मन्यमानानामिति संक्षेपतोऽर्यो झातव्यो ज्ञानीयो ज्ञेय इति । जेण रागे परे दव्ये संमारस्म हि कारणं । तेणावि जोहणो णिच्चं कुज्जा अप्पे सभावणा ||७१।। येन राजे इम्ये समारस्य हि कारणम् , तेनापि मोगी नित्यं कुर्यादात्मनि स्वभावनाम् ।। जेण रागे परे दव्ये येन पनितादिना पर्यायेण, रागे सति राग उत्पयते, परकीये द्रव्ये आत्मनो भिने यस्तुनि । संसारस्म हि कारणं स रागः कथंभूतः, ससारस्य भयभ्रमणस्य, दि निधन, कारणं हेतुः। तेणावि न केवलं आत्मनि आमभावनां कुर्यात् फिन्तु तेनापीष्ट यनि- तादिना । जोइणो योगी। नित्य-सर्वकार्ट । अप्पे आत्मनि । स्वभा- वना-आत्मभावना कुर्यात् । कयामिति चेत् ! इयमिटवनिता अनन्त- केवलज्ञानमयी वर्तते यथा ममा मानन्तरज्ञानमयो वर्तते । इयमई च द्वारपि करटज्ञानिनौ वर्तारहे । तेन इयमप्यामा ममैति को नाम पृथ- मर्तते येन सह स्नेह करोमि । तथा चौपनिषद् - १ रहितानचनमिति मूलटोकापाठः । २ तेनापि.टी. ३ योगिनः टी.।
मोक्षप्राभृत। ३५७ यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मवाभूद्विजानतः । तत्र को मोह कश्शोक एकत्वमनुपश्यतः॥१॥ जिंदाए य पसंसाए दुक्खे य सुहएसु य । सत्तूणं चेव बंधूण चारित्त समभावदो ॥ ७२ ।। निन्दायां च प्रशसाया दुखे च सुखेषु च । शगुणां चैव व धूना चारिन समभावत ॥ जिंदाए य पसंसाए निदापा प्रशसाया च समभारतश्चारित्रं भव- तीति सम्बध । दुक्खे य सुहएसु यं दुखे च सुखके च समागते- स्वित्युपस्कार । सत्तूणं चेय बंधूणं शत्रूणा चैव बधूना समायोगे इत्युपस्कार । चारित्त समभावदो समभारत समतापरिणाम सति चारित्र भवतीति निर्विकल्पसमाधिरूप यथाख्यात चारित्र भवतीति भावार्थ । चरियापरिया बदसमिदिवज्जिया सुद्धभारपब्भटा। केई जपंति पराण हु कालो झाणजोयस्स ।। ७३ ॥ यावरिका नतसमितिवर्जिता शुद्धभावप्रभ्रटा । केचित् जल्पति नरा न हि कालो ध्यानयोगस्य॥ चरियावरिया चर्यायाश्चारित्रस्य आपरिका आचरण येषा ते चर्या- वरिका चारित्रमाहनीयकर्मयुक्ता । वदसमिदिवज्जिया व्रतसमितिव- जिता व्रतरहिता समितिहीनाश्च । सुद्धभावपन्भहा शुद्धभावप्रभ्रष्टा रागद्वेपमोहादिभि परिणामै करमलीकृता आत्मध्यानहीना । केई जंपंति परा केचिदहिरात्मानो नरा पुरुषा जल्पति हुवति । कि जल्पति ण हु कालो झागजोयस्स ध्यानयोगस्य अष्टाङ्गयोगमध्ये सप्तमो योगो ध्यानयोगस्तस्य कालोऽवसरो न वर्तते। कथ: हि स्फुट । के ते अष्टानयोगा १चरी । २न दी ।
३५८ पट्याभृते- यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधय । इति । सम्मत्तणाणरहिओ अभवजीरो हु मोक्सपरिमुक्को। संसारसुहे सुरदो ण हु कालो भणइ झाणस्स ॥ ७४ ॥ सम्यक्त्वज्ञानरहित अभव्यतीवो हि मोक्षपरिमुक्त ससारसुखे सुरत न हि काले भणति ध्यानस्य । सम्मत्तणाणरहिओ सम्यक्त्वरहितो मिथ्यादृष्टि , ज्ञानरहितोऽज्ञानो मूढजीयो बहिरात्मा । अभव्यजीनो हु मोक्सपरिमुक्को अभव्य जीवो रत्नत्रयस्यायोग्या लोकादिको मोक्षपरिमुक्त तस्य कदाचिदपि कर्मक्षयो न भविष्यति स न से स्यति ककटकमुद्गवत् । संमारसुहे सु- रदो ससारमुखे वनितायोनिमथनमुखे, सुरत सुष्टु अतिशयेन रत तत्पर । ण हु कालो भणइ झाणस्स एव दोपदुष्टो भणति ब्रूते, कि भणति : ध्यानस्य कालो न भवति । कथ' हु फुटं। पंचसु महव्यदेमु य पचसु समिदीसु तीसु गुत्तीसु । जो मूढो अण्णाणी ण हु कालो भणड झाणस्म ॥७५ ॥ पञ्चसु महाव्रतेषु च पञ्चसु समितिषु तिसूपु गुप्तिषु । यो मूढ अज्ञानी न हि कालो भगति ध्यानस्य । पंचसु महव्वदेसु य पचसु महावतेषु च प्राणातिपातमृपावादस्तै न्यमथुनपरिप्रसर्वथापरित्यागो महानतमुच्यते एतेषु पंचसु महारतेषु यो मूढश्चारित्रमोहबलपत्तर । चकारादणुव्रतानामपि अप्रतिपालको रात्रिभो- जननियमरहित चर्मजलघृततैलरामठास्वादनमठ |पंचसु समिदीसुतीसु गुत्तीसु ईर्यासमिति -करचतुष्टय मार्गमवलोक्य गमन, भाषासमिति - आगमाविरुद्धभाषण, एपणासमिति -पूर्वोक्तपट्चत्वारिंशद्दोपरहिताहार- प्रहण, आदाननिक्षेपणासमिति -ज्ञानापकरणशौचोपकरणाना पूर्व दृष्ट्वा मोक्षप्राभृतं । पश्चान्मयूरपिच्छै प्रतिलेल्प ग्रहण रिसर्जन च आदाननिक्षेपणाममिति., प्रतिष्ठापनासमितिः-मलमूत्रशरीरादिकस्पाविरुद्धनिर्जन्तुप्रदेशे विसर्जन एतासु पच समितिषु यो मूढो निर्षिक । तिमृघु गुप्तिपु मनोगुप्ति- वागुप्तिकायगुप्तिपु। जो मूढो अण्णाणी य पुमान् मुढो निर्षिकोऽ- ज्ञानी जिनसूत्रबहिर्भूत । ण हु कालो भगइ झाणस्स न पिद्यते हु स्फुट, कोऽसौ कालोऽरसर , ध्यानस्य सप्तमयोगस्य, एर भणति ब्रूत । भरहे दुस्समकाले धम्मज्झाणं हवेड साहुस्स । तं अप्पसहावठिदे ण हु मण्णइ सो वि अण्णाणी ॥७६।। भरते दुपमझाले धम्यध्यान भवति साधो । तदात्मस्वभावस्थिदेन हि मयत सोऽपि अज्ञानी ।। भरहे दुस्समकाले भरहे-भरतक्षने भारतवर्षे, दु धर्म काले पच- मकाले कलिकालापरनाम्नि काले। धम्मज्झाणं हवेइ साहुस्म धर्मध्यान भवति साधोदिगम्बरस्य मुने । तं अप्पसहावठिदे त ध्यान आत्म- स्वभावस्थिते आत्मभावनात-मये मुनौ भवति । ण हु मण्णइ सो वि अण्णाणी न मन्यते नाङ्गीकरोति सोऽपि पुमान् पापीयान् अज्ञानी जिनसूत्रबाह्य । अन्ज वि तिरयणसुद्धा अप्पा झाएवि लहहि इंदत्तं । लोयंतियदेवत्तं तत्य चुआ णिचुदि जंति ॥ ७७॥ अद्यापि त्रिरत्नशुद्धा आत्मान ध्यात्वा लभन्ते इद्रत्वम् । लौकान्तिकदेवत्व तत च्युवा निर्माण यान्ति । अन्ज नि तिरयणसुद्धा अद्यापि पचमकालोत्पना समनस्का पंचे. न्द्रिया उत्तमकुलादिसामग्रीप्राप्ता वैराग्येण गृहीतदक्षिात्रिरत्नशुद्धा सम्य- क्त्वज्ञानचारित्रनिर्मला वर्तन्त एर, ये कथयन्ति महाबतिनो न विद्यन्त ते नास्तिका जिनसूत्रबाह्या ज्ञातव्याः । ते आसन्नभव्याः किं कुर्वन्ति , ३६० पटनाभृते- अप्पा झाएवि लहहि इंदत्तं आत्मान ध्याना भारयिया लभन्ते इन्द्राय शक्रपदं । न केवलभिद्रत्व लभन्ते, लोयंतियदेवत्तं चिदल्पश्रुता अपि साधव आत्मभावनावलेन लौकातिकत्व लभन्ते पचमार्गस्यान्ते पर्यन्त. प्रदेशेषु तेषा विमानानि सन्ति, तन भगा टोकातिका मुरमुनयश्च कप्यते, ते स्वर्गे स्थिता अपि ब्रह्मचर्य प्रतिपालयन्ति-स्त्रीरहिता भान्ति, तीर्थ- करसम्बोधनकाले मर्त्य गेरुमागच्छन्ति अन्यथा स्वस्थानमेवारतिष्ठ ते । चतुर्लक्षा• सहन्नाणि सप्त चैव शताष्टक । विशतिमलिता एते बुधैलौकान्तिमा मता. ॥१॥ " सारस्वत्यादित्यव हरणगर्दतायतुपिता यावाधारिष्टाश्च" इति तेपा मष्टा जातय । तथा तेषा पोडशजातयश्च वर्तन्ते । सारस्वतादित्यान्तरे अग्न्याभसूर्याभा । आदित्यवहिमध्ये चद्रामसत्याभा । वारणातरे श्रेयस्करक्षेमकरा । अरणगर्दतोयमध्ये वृपभोष्ट्रकामचरा । गर्दतोयतु पितान्तरे निर्वाणरजोदिगतरक्षिता [ तुपिताव्यावाधमध्ये आत्मरक्षित. सर्वरक्षिता । अव्यागाधारिटातरे मरुसर । अरिष्टसारस्वतातरे अश्व विश्वा । तस्य चुआ णिव्वुदि ति तस्माच्च्युता निति निर्माण यान्ति गच्छन्ति । सर्वेऽपि पूर्वधारिण एक गर्भास गृहीत्वा मोक्ष प्राप्नुवन्ति । जे पारमोहियमई लिंग पेत्तूण जिणवरिंदाणं । पानं कुणंति पाना ते चत्ता मोक्समग्गम्मि ॥७८॥ ये पापमोहितमतय लिङ्ग गृहीत्वा जिनवरे द्राणाम् । पाप कुर्वन्ति पापा ते त्यक्ता मोक्षमार्गे ॥ जे पापमोहियमई ये मुनय पापमोहितमतय पान ब्रह्मचर्य- भगप्रत्यारयानभननादिना मोहिता लोभ प्रापिता पापमोहितमतय । लिंग घेत्तूण जिणवरिंदाणं लिंग चिह मुद्रा नग्नल वस्त्रमातोपेत- ।
- मोक्षप्राभूत । क्षुल्लकत्व च चक्रातिलिंग, घेत्तूण गृहीत्वा धृत्या, जिनपरेन्द्राणा तीर्थ करमरमदेवाना यावं शंति पास पाप ब्रह्मचर्यभंगादिक कुति पापा पापमूर्तय पापरूपा । ते चत्ता मोक्समग्गम्मि त जिनलि गोपजीविन त्यता पतिता मोक्षमागादि यर्थ । उक्त च--- अन्यलिंगकृत पाप जिनलिंगेन मुच्यते। जिनलिंगकृत पाप वनलेपो भविष्यति ॥१॥ जे पचचेलसत्ता गंयग्गाहीय जायणासीला। आधाकम्मम्मि रया ते चत्ता मोक्समग्गम्मि ॥७९॥ ये पञ्चचेलसमा प्रथप्राहिम याचनशीला । अध कर्मणि रता ते त्यक्ता मोक्षमार्गे ॥ जे पंचवेलसत्ता ये मुनय पचवेलसत्ता पचरिधरस्खलपटा मंडन- वुडन वल्कज चर्मज रोमजपचप्रकारवस्त्रेवन्यतम वस्त्रप्रकार परिदधत्युप- दधति च । गंयग्गाहीय जायणासीला ग्रयग्राहिणो रिक्थस्वीकारिण, याचनाशीला समावेन याञापरा जिनमुद्रा प्रदर्य धन याच त मातर प्रदर्य माटी गृह्णन्ति त समाना । आधाकम्मम्मि रयाँ आधाकणि अध कर्मणि नि छकर्मणि उपविश्य भोजन कारयि चा भुजते ये तेऽध कर्मरता इयुच्य त । ते चत्ता भोक्समग्गम्मि ते मुनयस्यक्ता पतिता मोक्षमार्गादिति भावार्थ । निगंथमोहमुक्का पावीसपरीसहा जियफसाया । पावारभविमुक्का ते गहिया मोक्समग्गम्मि ।। ८० ॥ निन थ मोहमुक्का द्वाविंशतिपरीपहा जितकषाया । पापारम्भपिमुक्का ते गृहीता मोक्षमार्गे ॥ निग्गयमोहमुक्का निप्रथा परिग्रहरहिता, मोहमुक्ता पुत्रभित्र कलत्रादिस्नहरहिता । बावीसपरीसहा द्वाविंशतिपरीपहा द्वारिंशति- १"द्रव्य वित स्थापतेय रिक्यमृक्थ धन वमु' इत्यमर ।
। ३६० पट्मामृते- अप्पा झाएवि लहहि इंदत्तं आत्मान घ्यावा भारयित्वा लभन्ते इन्द्रत्वं शक्रपद । न केवलमिन्द्रत्व लभन्ते, लोयंतियदेवत्तं केचिदरपश्रुता अपि साधव आत्मभारनावटेन लोकान्तिकत्व लभते पचमवर्गस्या ते पर्यन्त- प्रदेशेषु तेपा विमानानि सन्ति, तत्र भगा लौकान्तिका सुरमुनयश्च क्थ्यते, ते स्वर्गे स्थिता अपि ब्रह्मचर्य प्रतिपालयन्ति-स्त्रीरहिता भान्ति, तीर्थ- करसम्बोधनकाले महँगेकमागच्छन्ति अन्यथा स्वस्थानमेवावतिष्ठन्ते । चतुर्लक्षाः सहस्राणि सप्त चैव शताष्टकं । विशतिमलिता एते बुधैलीकान्तिमा मताः ॥१॥ " सारस्वत्यादित्यवन्ारणगर्दतीयतुपिताव्यावाधारिष्टाश्च" इति तेपा भष्टौ जातय । तथा तेया पोडशजातयश्च वर्तन्ते। सारस्वतादित्यान्तरे अग्न्याभसूर्याभा । आदित्यवहिमध्ये चन्द्रामसत्याभा । वारणातरे श्रेयस्करक्षेमकरा । अरणगर्दतोयमध्ये वृपभौष्ट्रकामचरा । गर्दतोयतु पितान्तरे निर्वाणरजोदिगन्तरक्षिता. । तुपिताब्यावाधमध्ये आत्मरक्षित- सरक्षिता । अव्यानाधारिष्टान्तरे मरुद्वसन । अरिष्टसारस्वतान्तरे अश्व विश्वाः । तत्य चुआ णिव्युदि जंति तस्माच्युता निति निर्माण यान्ति गच्छन्ति । सर्वेऽपि पूर्वधारिण एक गर्भपास गृहीत्वा मोक्षं प्राप्नुवन्ति । जे पारमोहियमई लिंगं घेतूण जिणारिंदाणं । पावं कुणंति पास ते चत्ता मोक्समग्गम्मि ॥ ७८॥ ये पापमोहितमतय लिग गृहीत्वा जिनवरे दाणाम् । पार कुर्वन्ति पापा ते त्याला मोक्षमार्गे॥ जे पावमोहियमई ये मुनय पापमोहितमतय पान ब्रह्मचर्य- भंगप्रत्यारयानभननादिना मोहिता लोभ प्रापिता पापमोहितमतय । लिंगं घेत्तूण जिणवरिंदाणं लिंग चिन्ह मुद्रा नग्नत्य वस्त्रमात्रोपेत- मोक्षप्राभूत । क्षुलकर च चक्रवर्तिलिंग, घेत्तूण गृहीत्वा धृत्वा, जिनपरेन्द्राणां तीर्थ- करपरमदेवाना । पावं कुणंति पावा पापं ब्रह्मचर्यभगादिक कुर्वन्ति पापा पापमूर्तय पापरूपा । ते चत्ता मोक्समग्गम्मि रो जिनलि- गोपजीविन त्यक्ता पतिता मोक्षमागादित्यर्थ । उक्त च-- अन्यलिंगानं पापं जिनलिंगेन मुच्यते। जिनलिंगरुत पापं यजलेपो भविष्यति ॥१॥ जे पंचचेलसत्ता गंथग्गाहीय जायणासीला। आधाकम्मम्मि रया ते चा मोक्समग्गम्मि ॥७९ ये पयलसका ग्रन्थमाहिण याक्नशीला । अप कर्मणि रता. ते त्यत्ता मोक्षमार्गे ॥ जे पंचचेलसत्ता ये मुनय पचचेलसक्ता पचविधवस्खलपटा अडज- चुडज वल्कज चर्मज-रोमजपंचप्रकारवस्त्रध्वन्यतम वस्त्रप्रकार परिदधत्युप- दधति च । गंथग्गाहीय जायणासीला मन्यमाहिणो रिक्थस्वीकारिण, याचनाशीला स्वभावेन यात्रापरा जिनमुद्रा प्रदर्य धन याचन्ते मातरं प्रदर्य भाटी गृह्णन्ति त समाना ) आधाफम्मम्मि रया आधाफर्मणि अध कणि नि धर्मणि उपविश्य भोजन कारयित्या भुजते ये तेऽध - कर्मरता इत्युच्यन्ते । ते चत्ता मोक्समग्गम्मि ते मुनयरत्यक्ता. पतिता मोक्षमार्गादिति भावार्थ । निग्गंथमोहमुक्का बावीसपरीसहा जियकसाया । पावारभविमुक्का ते गहिया मोक्खमग्गम्मि ॥८॥ निप्रन्ध मोहमुक्का द्वाविंशतिपरीपहा जितक्षाया । पापारम्भविमुत्ता ते गृहीता मोक्षमार्गे ॥ निगंथमोहमुफ्का निमन्था, परिग्रहरहिता, मोहमुक्ताः पुत्रमित्र- कलादिस्नेहरहिताः । यावीसपरीमहा द्वाविंशतिपरीपहा द्वारिंशति- "द्रव्य वित्त स्वापतेय वियत्रय धन वसु"इत्यमर ।
३६४ पट्माभूते-- पुष्प कार आमा योगी वरज्ञानदर्शनसमन । यो ध्यायति स योगी पापहरो भवति निद्वन्द्र ॥ पुरिमायारो अप्पा पुरपत्य नरस्याकार आकृतिर्यस्य स पुरुपाकार एव गुण पिशिष्ट छ । आमा चेतनस्वभावो जीवत र, जोई चरणाणदसणसमग्गो योगा मुनि , इयनन गृहस्थस्प माक्ष बुराणा सितपटा प्रयुक्ता भवन्ति । वरज्ञानदर्शनसम्म केवलज्ञानकरलदर्शन परिपूण । इयननाचैतन्यमामानं म यमाना कापिला शुनका इस निराकृता । जो झायदि सो जोई एर गुणनिशिष्टमा मान यो मुनि यिति स योगी ध्यानी भवति । अन्यश्चाको नास्तिको योगिनामा । एवं स्थाने स्थाने मता तराश्रयेण व्यारयान कर्तव्यमिति भार । पावहरो भवदि णिदो पापहरस्त्रिपष्टिप्रकृतिपिच्छदको भनति घाति सघातघातक स्यात् , निद्वद्व समवशरणागतपरस्परविरोधिजतुकलह निषधक इयर्थ । एय जिणेहि कहिय सवणाण सापयाण पुण पुणसु । ससारविणासयर मिद्धियर कारण परम ।। ८५॥ एतत् निनै कथित श्रवणाना श्रावकाणा पुन पुन । ससारविनाशकर सिद्धिकर कारण परमम् । एय जिणेहि कहिय एतद्धातिसघातघातनादिक फल आमध्या नस्य, जिने सबझै कथित प्रमाणभूतवचनै प्रतिपादित | सपणाण सावयाण पुण पुणमु श्रवणाना दिगम्बराणा महामुन्यपरसज्ञानामृपी णामिति, न क्वल श्रवणानां श्रारकाणा सद्दष्टीनामुपासकाना च यतस्ते दीक्षायाम्या ध्यानाधिकारिणो देशत्रता स त आमभावनापरा ससारविरक्तचित्ता आरक्षक्गृहीतचौरवत् गृहपरियागपरिहारमनस पोड शान्यतमस्वगगामिन । पुन पुन भणित तत्वज्ञानविज्ञानार्थ च । ससा माक्षप्राभूत । ३६५ रविणासयर सर्वस्वीतरागवचनमिद कथंभूत ? ससारपिनाशकर मोक्ष प्रदायक । सिद्धियर आमोपलब्धिकर । कारण हेतुभूत । परम उकृष्ट उपदेशानामुपदेशात्तम । गहिजण य सम्मत्त सुनिम्मल सुरगिरीन निकंप । त झाणे झाइजइ सावय दुक्सक्सयहाए ॥८६॥ शरीवा च सम्या व सुनिर्मले सुरगिरिवि निष्कम्पम् । तद् ध्याने ध्यायते धावक दुखक्षयार्थे ।
३६४ पटनाभृते- पुरुषाकार आत्मा योगी वरज्ञानदर्शनसमग्र । यो ध्यायति स योगी पापहरो भवति निर्द्वन्द्र ॥ पुरिसायारो अप्पा पुरुषस्य नरस्याकार आकृतिर्यस्य स पुरुषाकार एव गुण विशिष्ट क । आत्मा चैतनस्वभावो जीवतत्व, जोई चरणाणदंसणसमग्गो योगी मुनि , इत्यनेन गृहस्थस्य मोक्ष बुवाणा सितपटा प्रयुक्ता भवन्ति । वरज्ञानदर्शनसमप्र केवलज्ञानकेवलदर्शन परिपूर्ण । इयनेनाचैतन्यमात्मान मन्यमाना कापिला शुनका इन निराकृता । जो झायदि सो जोई एन गुणविशिष्टमात्मान यो मुनि- ायति स योगी ध्यानी भवति । अयश्वाको नास्तिको मोगिनामा । एव स्थाने स्थाने मतान्तराश्रयेण व्यारयान कर्तव्यमिति भार । पावहरो भवदि णिदो पापहरत्रिपष्टिप्रकृतिविच्छेदको भाति घाति- सघातघातक स्यात्, निर्द्वन्द्व समवशरणागतपरस्परविरोधिजतुकलह- निषेधक इत्यर्थ । एयं जिणेहि कहियं सवणाणं सावयाण पुण पुणसु। संसारविणासयर सिद्धियर कारणं परमं ।। ८५॥ एतत् जिनै कथित श्रवणाना थावकाणां पुन पुन । ससारविनाशकर सिद्धिकर कारण परमम् ॥ एयं जिणेहि कहियं एतद्धातिसघातघातनादिक फल आत्मध्या- नस्य, जिने सबझै कथित प्रमाणभूतवचनै प्रतिपादित । सवणाणं सावयाण पुण पुणसु श्रवणाना दिगम्बराणा महामु यपरसज्ञानामृषी णामिति, न कवल श्रवणाना धारकाणा सदृष्टीनामुपासकाना च यतस्ते दीक्षायोग्या ध्यानाधिकारिणो देशव्रता सत आत्मभावनापरा संसारविरक्तचित्ता आरक्षकगृहीतचौरवत् गृहपरित्यागपरिहारमनस पोड शान्यतमस्वर्गगामिन । पुन पुन भणित तत्वज्ञानविज्ञानार्थ व । संसा- RAMA - मोक्षप्राभृत। ३६५ रविणासयर सर्वज्ञवीतरागवचनमिद कथभूत : ससारविनाशकर मोक्ष- प्रदायक । सिद्धियर आत्मोपलब्धिकरं । कारणं हेतुभूत । परमं उत्कृष्ट उपदेशानामुपदेशोत्तम । गहिऊण य सम्मत्तं सुनिम्मलं सुरगिरीर निकंपं । ते झाणे झाडजइ सापय दुक्सक्सयहाए ॥८६॥ गृरीत्या च सध्या व मुनिर्मल मुरलि रेवि निष्कम्पम् । तद्प्याने प्यायते श्रावक । दुखक्षयार्थे ।
३६८ पदप्रामृते- मगि धरति जटामध्ये गगा चादधाति, ब्रह्मा वशिष्टस्य पितृत्वादुर्वशी- बद्धभत्वात, विष्णुः पोडशसहस्रगोपीभजते गोपनाथस्य दुहितरं च, सूर्यो रण्णादेवी चन्द्रो रोहिणी च मुक्त तनैते रागवन्तोऽपि ज्ञातव्याः। ब्रह्मा गजामुरं द्वष्टि, रुदत्रिपुरदाना भमयति, विष्णु: कसकेशचाणूर- जरासन्धान पिनष्टि तेनैते द्वेषपन्तोऽपि ज्ञातव्या । ब्रह्मा चशिष्टमुखें पश्यति, रुदस्तु स्कन्द निरीक्षते, विष्णुः प्रद्युम्ने नियति तैनेते मोहिनोऽपि ज्ञातव्याः । ब्रह्मण सृष्टिचिन्ता समुत्पना रुद्रस्य नरक. अदालत रिपोरस पशिशुपयादि महतो चिन्ता समुल्पना । ब्रह्मा उझ्या रमते, स्न, पार्वती मुक्त, विष्णु सत्यभामाद्याः कोइति तेनैतेधु रतिदोषोऽपि घटते । ब्रह्मा योगनिद्रा करोति, रद्रः कैलासे शेते गिरीशनामक्त्वात्, विश्णुर्जलशायीति कथ्यते तेनैते प्रमाला- वन्तोऽपि विज्ञयाः निदादापा इत्यर्थः । रोनरकाय घर दत्वा विषादति इत्यादि निपाददोषोऽपि सगच्छते। मैथुनादिषु स्वेदसदारोऽपि लोक- कल्पितदेवानामभ्ययः । खेदस्तु संग्रामादौ । स्मियरतु रूपादिदनि । इत्यादि टोक्देवतानामष्टादशापि दोपाश्चिन्तनीया । सर्वज्ञवीतरागे तु पश्चिदपि दोपो न वर्तते । उक्त च-- रागादिदोपसद्भावो शेयोऽमीषां तदागमात् । असतः परदोपस्य गृहीती पातयं महत् ॥ १ ॥ निग्गंधे पारयण निमन्ये प्रात्रचने प्रवचननियुक्त गुगै । सद्दहणं होइ मम्मत्तं एतेषु धर्मदेवगुरुपु पदार्य श्रद्धानं रचि, अन्येषु स- घातानास्वादनादरचिः सम्पत्यं भवतीति नियाकारसम्बन्ध । जहजायस्वां मुसंजयं मन्यसंगपरिचत्तं । लिंगंश घरावर जो मण्णा तम्म सम्मत् ॥९॥ , पटवणे इति मुरगाथा पाट ।
मोक्षप्राभृतं । ययाजातस्परूप सुसंयत सर्वसंगपरित्यतम् । लिज न परापेक्ष य मायवे तस्य सम्यय बम् ॥ जहजायस्वरूवं यथाजातरूप मानुर्गनिर्गसनालकरूपं तद्रूप- माकारो यस्य लिंगस्य तद्यथाजातरूपरूप । सुसंजय मव्यसगप- रिचत्तं पुन कथभूत लिंग, सुसयत मुष्टु-अतिशयरसयमसहित, सर्व- संगपरित्यक्त सर्वपरिग्रहरहित शिर वर्णकण्ठकरकटीम मप्रभृत्यङ्गाभरण- वस्त्ररहित सर्वथा नन । लिंग ण परावास ईविध लिंग क्थभूत, न परापेक्षं परापेक्षारहित शरीरमात्रपरिग्रह । जो मण्याइ तस्म सम्मत्तं ईदृश लिंग निप्राथवेप य पुमान् मन्यते साधु पक्ति तस्स सम्यक्त्य भषति, य समायटिंगेन मोक्ष वक्ति स मिथ्यादृष्टितिव्य इति । कुच्छियदेवं धम्म कुच्छियलिंग च चंदए जो दु । लज्जामयगारवदो मिच्छादिही हवे सो हु ।।१२।। कुरिसतदेव धर्म युत्सित िच पदते यतु । लज्जाभयगारवत मिथ्याष्टिर्भवेत् सहा कुच्छियदेवं धम्म कुत्सितदेवं श्रीमहादेवं ब्रह्माण नारायण बुद्ध रवि चन्द्रमसं यक्ष त्रिपुरभैरवी चेत्यादिक । कुसित्तधर्मे आलभनकुड- खण्डितपशुचावपट्कारसम्बर्ध शूलपाणिं, झपापातं, बहिप्रवेशे, भर्तु सह गमन, सूर्याधग्रहणस्नान, सक्रान्तिदान, नदीसागरादिमजन, गोयो- निस्पर्शन, तमूत्रपान, शमीतरुपूजन, पिप्पलालिंगन मृत्तिकाविलेपनं, कृष्णसारचर्मवसनं, नक्तभोजन, धूलीदृषदुच्चया दने, रनपूजन, वाह- नार्चन, भूमिपूजन, खड्गपूजन, पर्वतपूजन, घृते मुखवाक्षणमित्यादि कुत्सि- तधर्म । कुच्छियलिंग च वंदए जो दु कुसितलिंग गहाण्डक,जटाधारिण, पचशिख, एकदण्डिन, त्रिदण्डिन, शिखाधारिणं, सौगतपाशुपतयो-पे- १ भी सह गमन ख इदमेव साधु । पद००४ ३७० पटप्राभृते- त्यादि-बुसितलिंग च व दते नमस्करोति अभिवादन विदधाति नमो. नारायणमिति वाचा प्रणमति मस्तकेन व दे इति प्रणमति यस्तु पुमान् । लज्जाभयगारवदो रजया कृत्वा भयेन च गारवेण गर्नेण च यो वन्दते। मिच्छादिट्टी हवे सो हु मिथ्यादृष्टिर्भवति स । कथ हुस्सुटं । सपरावेक्स लिंग राई देव असंजयं वंदे । माणइ मिच्छादिही ण हु मण्णइ सुद्धसम्मत्तो ।।९३॥ स्वपरापेक्ष लिङ्ग रागिण देव असयत वाद। मानयति मिथ्यादृष्टि न हि मानयति गुद्धसम्यक्त्व ॥ सपरावेसं लिंगं स्वपरापेक्ष लिग, स्वापेक्ष ऋषिपनीयुतं परा- पेक्ष रक्तवस्त्रमृगवर्मादि सापेक्ष लिंग वेप । राई देवं असजय वंदे रागिण देव पार्वतीपति टक्षमीका त तिलोत्तमामुखकमलप्रघट्टकचतु- वक्त्र चेत्यादिक देव, असजय वदे-असंयत अनेकमानुपमांसदक्षिणमुख- मक्षक व दे इति यो यक्ति । माणइ मिच्छादिही मानयति मिथ्या. रष्टि -श्रदधाति मिथ्यादृष्टि जिनानामभक्त । ण हुमण्णइ मुद्धस- म्मचो न मानयति न स मान ददाति, कोऽसौ. शुद्धसम्यक्त्यो निर्म- टसम्यक्त्वरत्नमंडित । सम्भाइट्टी सारय धम्मं जिणदेवदेसियं कुणदि । विवरीय कुतो मिच्छादिट्टी मुणयन्वो ॥१४॥ सम्यग्दृष्टि धावा धर्म जिनदेवदतिरोति । विपरीत पुवन् मिथ्याधि ज्ञातव्य ।। सम्माइट्टी साक्य सम्यग्दृष्टि धायक सम्यावरत्नसशोभितो गृहस्थ (अथवा शापयतीति वावको मुनि । अथवा हे सम्यग्दरिवारक! इति सम्बोधनपद । धम्मं जिणदेवदेसियं पुणदि धर्म दुर्गतिपाता- मस्तान यदयति मनिस ।
मोक्षप्राभृतं । ३७१ दुन्य इन्द्रचन्द्रमुनीन्द्रवन्दिते पदे धरतीति धर्मस्त । जिणदेवदेसिपं- जिनदेवदेशित श्रीमद्भगवदह सर्पज्ञवीतरागकथित करोति । निवरीयं कुव्वतो विपरीत दुर्गन् रुद्रजिमिनिकणभक्षकापिलसौगतादिभिरुपदिष्ट धर्म कुर्वन् पुमान्। मिच्छादिट्टी मुणेयव्यो मिथ्यादृष्टिरिति ज्ञातव्य । मिच्छादिही जो सो संसारे संसरेइ सुहरहिओ। जम्मजरमरणपउरे दुक्ससहस्साउले जीवो ॥१५॥ मिथ्यादृष्टि य स ससारे ससरति सुखरहित । जन्मजरामरणप्रचुरे दु खसहस्राकुले जीव ॥ मिच्छादिही जो सोमिध्यादृष्टियों जीव स । किं करोति संसारे संसरेइ मुहरहिओ ससारे भवसागरे ससरति सम्यक्प्रविशति सुखर- हितो दु खसहित । कथभूते ससारे, जम्मजरमरणपउरे जन्मजरा- मरणप्रचुरे बहुले । दुक्ससहस्साउले जीयो दु खाना सहखैरन तदु खैराकुले परिपूर्णे, क ' जीवो मिथ्याष्टिप्राणीति शेष । सम्म गुण मिच्छ दोसो मणेण परिभाविऊण तं कुणसु । जं ते मणस्स रचइ किं पहुणा पलविएणं तु ॥९६ ॥ सम्यक्त्व गुण मिथ्यात्व दोष मनसा परिभाव्य तरकुरु । यत्ने मनसे रोचते किंबहुना प्रलपितेन तु॥ सम्म गुण मिच्छ दोसो सम्यक्त्वं गुणो भवति, मिथ्यात्व दोपो भवति पाप स्यात् । मणेण परिभाविऊण तं कुणमु इममर्थ मनसा चित्तेन परिभाष्य सम्यधिचार्य तदुरु तत्व विधेहि । तत् किं ते मणस्स रुचइ यद्वयोर्गुणदोपयोर्मध्ये ते तर मनसे रोचते ! कि बहुणा पलविएणं तु बहुना प्रपितेन अनर्थवचनेन किं न किमपि। यदि तब मनसे गुणो रोचते तर्हि सम्पक्स विधेहि उत दोपो रोवते - - ।
३७२ पट्माभृते- मिथ्यात्वं विधेहि । अर्थतस्तु सम्यक्त्वं विधेहीति सम्यगुपदेशो भगवतां श्रीकुन्दकुन्दाचार्याणां । बाहिरसंगविमुको ण वि मुक्को मिच्छभाव णिग्गंयो । किं तस्स ठाणमउणं ण वि जाणदि अप्पसमभावं ॥९७॥ बाह्यसंगविमुकः न विमुक्तः मिभ्याभावेन निग्रंन्यः । कि तस्य स्थानमानं नापि जानाति आत्मसमभावम् ।। बाहिरसंगविमुक्को यहिःसंगाद्विमुक्तो रहितो नगरेपः । ॥ वि मुक्को मिच्छभाव णिग्गंथो नापि मुक्तः नैव मुक्तः न विमुक्तो या मिथ्याभावेन-मिथ्यात्वदोपेण रहितो न भवति, कोऽसौ निप्रन्यो दिग- म्बरयेपाजीवी जावः । किं तस्स ठाणमउणं तस्य निग्रन्थस्य स्थान उद्भकायोत्सर्गः किं न किमपि, कर्मक्षयलक्षणं मोक्ष न साधयतीत्यर्थः । तथा मौनं किं-मूकत्वमपि न किमपि, मोक्षानितं कार्य न करोतीत्यर्थः । पवि जाणदि अप्पसमभावं नापि जानीते न लभते न वेत्ति आत्म- समभावं आत्मनां जीवानां समत्त्रपरिणाम-सर्वे जीवाः शुद्धबुद्धकस्व. भावा इति सिद्धान्तवचने न जानाति । मूलगुणं छित्तूण य बाहिरकम्मं करेइ जो साहू । सो ण लहइ सिद्धिमुहं जिणलिंगविराधगो णिचं ॥९८॥ मूलगुणं छित्वा पायर्म करोति यः साधुः । सन लभवे सिरिमुख बिनरिङ्गविराधकः नित्यम् ॥ मूलगुणं छित्तूण य मूलगुणमष्टाविंशतिभेदभिन्नं पंचमहाप्रतानि पंचसमितयः पंचेन्द्रियरोधो लोचः पडावश्यकानि अचेटत्वमस्नान क्षिति- शपने दन्तधारनरहितत्वं उद्भभोजनं एकभक्तं इत्पारिंशतिमूलगुगा- मायः । तत्र पदुक्तः स्नानाभायस्तस्पापमर्थः- 1 मोक्षप्राभृतं । ३७३ नित्यस्नानं गृहस्थस्य देवाचनपरिग्रहे। यतेस्तु दुर्जनस्पर्शात् स्नानमन्यद्विगर्हितं ॥१॥ तत्र यते: रजस्वलास्पर्श अस्थिरपर्से चण्डालस्पर्श शुनकगर्दभना- पितयोगकपालस्पर्श वमने विटोपरि पादपतने शरीरोपरिकाकविग्मोचने इत्यादिस्नानोत्पती सत्या दंडअदुपविश्यते, श्रावकादिकरछात्रादिको वा जलं नामयति, सर्वोगप्रक्षालन क्रियते, स्वय हस्तमर्दनेनाङ्गमलं न दूरी- क्रियते, स्नाने संजाते सति उपनासो गृह्यते, पचनमस्कारशतमष्टोत्तर कायोत्सर्गेण जन्यते एव शुद्धिर्भवति । एवं मूलगुण जित्वा बाहिर- कम्मं करेइ जो साह बहि कर्म आतपनयोगादिक यः साधुः: करोति। सो ण लहइ सिद्धिसुहं स साधुः सिद्धिसुखं मोक्षसौख्य न लभते न मामोति । जिणलिंगविराधगो पिचं स साधुनिनलिंगविराधको भवति, कथ ! नित्य सर्वकाल । किं काहिदि यहिकम्मं किं काहिदि यहुविहं च सवणं च । कि काहिदि आदाचं आदसहावस्त विपरीदो ॥ ९९ ।। किं करिष्यति माह्यकर्म किं करिष्यति बहुविधं च क्षमण च । किं करिष्यति आतापः आत्मस्वभावाद्विपरीतः ।। कि काहिदि पहिकम्मं किं करिष्यति-न किमपि करिष्यति, मोक्ष न करिष्यति, किं तत् ' बहिष्कर्म पठनपाठनादिक प्रतिक्रमणादिकं च । कि काहि दि बहुविहं च सवणं च किं करिष्यति-न किमपि करिष्यति, न मोक्षं दास्यति । किं तत् ! बहुविध नानाप्रकारं क्षमणमुपचासः । कि काहिदि आदावं किं करिष्यति-न किमपि करिष्यति, कोऽसौ ! आतापः धर्मकायोत्सर्गः पूर्वोक्तः समाचारः । कथभूतः, आदसहा- वस्स विवरीदो आत्मस्वभावाद्विपरीत; बाह्यवस्तुसम्मोहित्तमना !
३७४ पद्माभृते- जदि पढदि बहुमुदाणि य जदि काहिदि बहुविहे य चारित्ते। तं बालसुदं चरणं हवेइ अप्पस्स भिवरीदं ॥१०॥ यदि पटति श्रुतानि च यदि करिष्यति यहुविधानि चारित्राणि । तद्वालश्रुत चरण भवति आत्मन विपरीतम् ॥ जदि पढदि बहुसुदाणि य यदि चेत्, पठति व्यक्तमुच्चारयति, बहुश्रु- तानि अनेकतर्कव्यावरणच्छन्दोऽलवारसिद्धा तसाहित्यादीनि शास्त्राणि । चकार उक्तसमुच्चयार्थ एकादशाङ्गानि दशपूर्वाणि च । जदि काहिदि बहुविहे य चारित्ते यदि चेत्, काहिदि-करिष्यति अनुष्ठास्यति, बहुपि- धानि चारित्राणि त्रयोदशप्रकाराणि सामायिकादीनि पचविधानि वा । तं बालमुदं चरणं तत्सर्वं बालश्रुत मूर्खगास्त्र, वालचरण मूर्खचारित । हवेड अप्पस्स विनरीदं भवति वालश्रुतं वालचारिन भवति, कथंभूर्त सत् । आत्मनो निजशुद्धबुबैकस्तभावजीवतत्याद्विपरीत परामुखमात्म- भावनारहितमिति भावार्थ । वैरग्गपरो साहू परदव्यपरम्मुहो य सो होदि । संसारमुहनिरत्तो सगमुद्धसुहेमु अणुरत्तो ।। १०१॥ वैराग्यपर साधु परद्रव्यपरामुखश्च स भवति । समारसुखविरक्त स्वकशुद्धमुखेषु अनुरफ ॥ वेरग्गपरो साहू वैराग्यपर साधु ससारशरीरभोगनिर्विण्ण सम्य- ग्दर्शनज्ञानानामाराधक्वात्साधक आत्मनामान्वर्थवात् । परदव्यपर- म्मुहो य सो होदि य साधु वैराग्यपर स साधु परद्रव्यपराङ्मुखो भवति इष्टनितादिविरक्तो भवति । संसारमुहरिरत्तो ससारस्य मुखं कर्पूरकस्तूरीचन्दनपुष्पमालापट्टवूलमुवर्णमणिमौक्तिकप्रासादपल्यकनवयौ- वनयुवतिपुरसम्पदिष्टसयोगारोग्यदीर्घायुयश कीर्तिप्रभृतिक तस्माद्विरक्त ।
मोक्षप्रामृत । ३७५ सगसुद्धसुहेसु अणुरत्तो पूर्वोक्तात्मशरीरकर्मसमुपनविश्वमुखाद्विरज्य नि- केवललपणखल्यास्त्रादवत् मुखेषु अन तज्ञानादिचतुष्टयेऽनुरक्तोऽनुराग- वान् भरतीति भावार्थ । गुणगणपिहसियंगो हेयोपादेयणिच्छिदो साहू । झाणज्झयणे सुरदो सो पावर उत्तम ठाण ।। १०२ ।। गुणगणविभूपिताल हेयोपादयनिचित माधु । ध्यानाध्ययने सुरत्त स प्राप्नोति उत्तम स्थानम् । गुणगणरिहसियंगो गुणाना ज्ञानध्यानतपारस्नाना गणे समू- भूपिताइ शोभितशरीर । हेयोपादेयणिच्छिदो साहू हेय मिथ्याला- दिक उपादेय ग्रहणीय सम्यक्त्वरत्नादिक तत्र निश्चित निश्चयो यस्य स हेयोपादेयनिश्चित साधू रनत्रयारा को मुनि । झाणम्झयणे सुरदो ध्यानमातरौद्रध्यानद्वयपरित्यागेन धHशुक्लध्यानये रतस्त परस्तनिष्ठस्त देकतान । सो पावइ उत्तम ठाण य एवविध साधु स प्रामोति, कि उत्तमस्थानं नीचस्पान-शरीरलक्षण हीनस्थान परिहन्य उत्तम- स्थान कर्मशरीरबधनरहित व मोक्षं प्राप्नोति लभते सिद्ध प्रसिद्धश्च भवतीति तात्पर्यार्थ । णविएहि जंणविजइ झाइज्जइ झाइएहि अणवरयं। धुव्बतेहि थुणिज्जइ देहत्यं कि पि.त मुणह ॥१०॥ नौ यत् नभ्यत ध्यायते ध्यात अनवरतम् । स्तूयमान स्तूयते देवस्थ किमपि तत् मनुत ।। णविएहि ज णपिजइ नतैवेदादिभिर्यनम्यते । झाइज्जइ झाइ एहि अणवस्य ध्यायतेऽहर्निश चिन्त्यते झाइएहि-च्यातैस्तार्थकरपर- १५ पुस्तकेऽस्य स्थाने भावस्थानमिति पाठ ।
३७६ पट्याभृते- मदेवैर्यद्धयायते अहर्निश शुलथ्यानार्थ सर्वकर्मक्षयाथै तत्पदप्राप्त्यर्थ अनुचिन्त्यते। थुचतेहि थुणिजइ स्तूयमानस्तीर्थक्रपरमर्दवैर्यत् स्तूय- तेऽनन्तगुणोद्भावनतया प्रशस्यते । देहत्य कि पितं मुणह देहस्थ शरीरमध्ये स्थित किमप्यपूर्वमनिर्वचनीयमाससम्मप्राप्त तद्योगिना प्रसिद्ध तत्वं आत्मस्वरूप मुणह-जानीत यूयं । यदुक्त- तिलमध्ये यथा तेल दुग्धमध्ये यथा घृत। काष्ठमध्ये यथावन्हिर्देहमध्ये तथा शिव ॥१॥ शिवशब्दवाच्यम त्मतत्वमियर्थ । इदानी शास्त्रस्यान्ते मगलनिमित्त पचपरमेष्ठिपुरस्सररत्नत्रयगर्भितमा- स्मतत्वमुद्भापयन्ति भगवन्त अरहा सिद्धायरिया उज्झाया साहु पचपरमेही । ते विहु चिहि आदे तम्हा आदा हु मे सरण ॥१०४॥ महत मिद्धा भाचाया उपाध्याया साधव पचपरमेष्ठिन । तेऽपि हु तिष्ठन्ति भात्मनि तस्मादात्मा हु मे शरणम् ॥ अरुहा सिद्धायरिया अर्हत सिद्धा आचार्याश्च । उज्झाया साहु पचपरमेही उपाध्याया , साधय , एते पचपरमप्रिनो देवा ममेष्टदवता । ते विहु चिहि आदे तेऽपि पचपरमेष्टिनो देवा अपि तिष्ठन्ति, कर आमनि निजजीवत । देवलज्ञानादिगुणविराजमानचात् सक्लभव्य जीवसम्बोधनसमर्थ वाच्चामायमर्हन् वर्तते । समक्षयलक्षणमोक्षपद- प्राप्तत्वात् निश्चयनया ममात्मायमेव सिद्ध । दीक्षाशिक्षादायक नात् पच. चाराचरणचारणप्रवीणवात् सूरिमनतिलकमनतमय वा ममा मायमेना- चार्यपदभागा वर्तते । श्रुतज्ञानोपदशक्त्वात् स्वपरमतविज्ञायकत्वात् भव्यजीवसम्बाधकत्वा ममा मायमेवोपाध्याय | सम्यग्दर्शनज्ञानचारिधर मोक्षप्रामृत । ३७७ लत्रयसाधकत्वात् सर्वद्वन्द्वविमुक्तत्वात् दीक्षाशिक्षायात्राप्रतिष्ठायनेकधर्म- कार्यनिश्चिन्ततयाऽऽत्मतत्वसावकतया ममात्मायमेव सर्वसाधुर्वर्तते इति पंचपरमेष्ठिन आत्मनि तिष्ट तीति कारणात् । तम्हा आदाहु मे सरणं तस्मात्कारणादात्मा हु स्फुटं मे मम शरण संसारदु खनिवारकत्वादर्तिम- यनसमर्थ मम शरण गतिरिति । सम्मत्तं सण्णाणं सच्चारित्तं हि सत्तवं चेव । चउरो चिहि आदे तमा आदा हु मे सरणं ॥१०५॥ सम्यक्त्व सज्ज्ञान सच्चारिन हि सत्तपश्चैव । चवार तिष्ठति आत्मनि तस्मादात्मा हु मे शरणम् ॥ सम्मत्तं सण्णाणं सम्यग्दर्शनर न सज्ञान समीचीनमबाधित पूर्वा- परविरोधरहित सम्यग्ज्ञान | सच्चारित्तं हि सत्तवं चैव सचारित्र सम्य- क्चारित्र पापक्रियाविरमणलक्षण परमादासीनतास्वरूप च सम्यक्चारित्र, सत्तव-समीचीन तप इच्छानिरोधलक्षण चेति । चउरो चिहि आदे एते चवारोऽपि परमाराधनापदार्थास्तिष्ठति, कतिष्ठन्ति : आत्मनि निजशुद्धबुद्धकस्यमापजीवतचे तिष्ठन्ति । यदा मन श्रद्धानमात्मेव करोति, आत्मनो ज्ञानमामैव विधते, आत्मना सहैकलोलीमात्रमात्मैव कुरुते, आत्मैवात्मनि तपति, केवलज्ञानेश्वर्यं प्राप्नोति चतुभिरपि प्रकारात्मा- स्मानमेवाराधयति । तम्हा आदा हु मे सरणं तस्मादात्मैव मम शरण- मतिमथनसमर्थ ससारातिनिषेधकत्वात् आत्मैव मे गति , मगल मल- गालने कर्ममलकलङ्कनिधने मंगस्प सुखस्य दाने च समर्थत्वादात्मैव परम मंगलागिति भावार्थ । एवं जिणपण्णतं मोक्सस्य य पाहुडं सुभत्तीए। जो पढइ सुणइ भावइ सो पावइ सासयं सोक्खं ॥१०६॥ - । ३७८ पटमाभृते- एव जिनप्रज्ञप्त मोक्षस्य च प्राभूत सुभक्त्या। य पठति शृणोति भावयति स प्राप्नोति शाश्वत सौरयम् ।। एवं जिणपण्णत्तं एवममुना प्रकारेण जिनप्राप्त सर्वज्ञवीतराग- भावितं । मोक्सस्स य पाहुडं सुभत्तीए माक्षस्य परमनिर्वाणपदस्य प्राभूत सारमिद शास्त्र सुष्ठु-अतिशयेन भक्त्या परमधर्मानुरागेण । जो पढइ सुणइ भावइ य आसन्नभव्यो जीव पठति जिह्वाग्रे करोति, यश्च भव्यजीवः शृणोत्याकर्णयति, यश्च मोक्षाभिलापुको जीयो भावयति एत- च्छास्त्र यस्मे रोचते । सो पावइ सासयं सोकसं स जीव परममु- नीश्वरः, प्रामोति लभते, शाश्वतमविनश्वर, सौरय निजात्मोत्थ परमानन्द- छक्षण सौरय नानाशास्त्रमहार्णवैकतरणे यद्बुद्धिरिधिया पूणां पुण्यरविप्रमोदजननी सारैक्नौकायते । यत्पादाम्बुजयुग्ममाप्य मुनिभिर्भूगेरियापीयते सश्रीमान् श्रुतसागरो विजयतामेनस्तमोऽहपतिः॥१॥ श्रीमत्स्वामिसमन्तभदममलं श्रीकुन्दयुम्दान्य यो धीमानकलङ्कभट्टमपि च धीमत्प्रमेन्दुप्रभु। विद्यानन्दमपीक्षितु कृतमनाः श्रीपूज्यपादं गुरु वक्षित श्रुतसागर सविनयात् विद्यधीमन्नुत ॥२॥ श्रीमलिभूषणगुरोवंचनादलंध्या- मुचिधिया सह समागममिच्छतेय । पदहाभृते सकलसंशयशत्रुनी टीका कृताऽतधियां शृतसागरेण ॥३॥ १ पूर्वापुण्य स..
मोक्षप्राभृतं । ३७९ इति श्रीपद्मनन्दिकुन्दकुन्दाचार्यवक्रानीवाचायलाचार्यगृध्रपिन्स. चार्यनामएचक विराजितेन चतुरगुलाकाशगमनाना पूर्वविदेवपुण्डरी किणी- नगरवदितसीमन्धरापरनामस्वयप्रभजिनेन तच्छुतज्ञानसम्बोधितभरतवर्षभ. व्यजीवेन श्रीजिनचन्द्रसूरिभट्टारकपहाभरणभूनेन कलिकालसर्वज्ञेन विरचिते षट्- प्राभूतमन्थे सर्वमुनीमण्डलीमडितेन कलिकालगौतमस्वामिना श्रीपझनाद- देवेन्द्रीति-विधानन्दिपभधारकेण धीमतिभूपगेनानुगतेन सफल- विद्वमनसमाजसम्मानितेनोभयभाषाकविक्रवर्तिना थीविद्यानन्दिगुर्वन्तेवा. सिना सूरिवरधीश्रुतसागरेण विरचिता मोक्षप्रामतीकर- परिसमाप्ती। । अस्मादले क. पुस्तकेऽय पाटो वर्तते न तु प. पुस्तके । पष्ठ परिच्छेद । शुभं भवतु । श्रीरस्तु । मालमस्तु । श्रीविद्यानन्दिस्वामि महारकश्रीमलिभूषण सूरिवरश्रीश्रुतसागर मम गुभानि कुर्वन्नु । लोकसख्या १... सातव्या ।
लिंगप्राभृतं । काऊण णमोकारं अरहताणं तहे सिद्धाणं । वोच्छामि समणलिंग पाहुडसत्यं समासेण ॥१॥ कृत्वा नमस्कार अर्हता तथैव सिद्धाना । वक्ष्यामि श्रमणलिंग प्रामृतशास्त्रं समासेन ॥ धम्मेण होइ लिंगं ण लिंगमत्तेण धम्मसंपत्ती । जाणेहि भावधम्मं किं ते लिंगेण कायवो ॥२॥ धर्मेण भवति लिंग न लिंगमात्रेण धर्मसमाप्ति । जानीहि भावधर्म किं ते लिंगेन पर्तव्य || जो पावमोहिदमदी लिंगं घेतूण जिणारिंदाणं । उवहसई लिंगि भावं लिंगं णासेदि लिंगीणं ॥३॥ य पापमोहितमति लिंग गृहीत्वा जिनवरेन्द्राणा । उपहसति लिंगी भार लिंग नाशयति लिंगिना ॥ णचदि गायदि सावं वायं वाएदि लिंगस्वेण । सो पारमोहिदमदी तिरिक्संजोगीण सो समणो ॥४॥ तावत् वाट्या ? वाचयति लिंगरूपेण । स पापमोहितमति तिर्यग्योनि न स श्रमण ॥ सम्मूहदि रक्खेदि य अ झाएदि यहुपयत्तेण । सो पावमोहिदमदी तिरिक्सजोणी ण सो समणो ॥ ५॥ १ पु । २ स.. नृत्यति गायति लिंगप्राभृतं । ३८१ समूह्यति रक्षति च आत ध्यायति बहुप्रयत्नेन । स पापमाहितमति तिर्यग्योनि न स श्रमण ॥ कलह वादं जूवा णिचं बहुमाणगन्विो लिंगी। वचदि णरय पाओ करणमणो लिंगिरवेण ॥६॥ कलह बाद धूत निय बहुमानगर्पिता लिंगी। अजति नरक पाप कुर्वाण लिंगिरूपेण ।। पाओपहभावो सेवदि य अवभु लिगिरूपेण । सो पापमोहिदमदी हिडदि ससारकातारे ॥ ७ ॥ पापोहतभार सेरते च अब्रह्म लिगिरूपण । स पापमोहितमति हिंडते संसारकातारे ॥ दसणणाणचरित्ते उवहाणे जड़ ण लिंगरूवेण । अहं झायदि झाण अणंतससारिओ होदी॥ ८॥ दर्शनज्ञानचारित्राणि उपधानानि यदि न लिंगरूपेण । आत ध्यायति प्यान अन तसंसारीको भाति । जो जोडदि विव्वाई किसिकम्मवाणिज्जजीपघादं च । वच्चदि णरयं पाओ करमाणो लिगिरूपेण ॥९॥ य विवाह युनक्ति कृषिकर्मवणिज्यजीवधात च । व्रजति नरक पाप कुर्माण लिंगिरूपेण ।। चोराण समाएण य जुद्ध विवाहं च तिल्यकम्महि । जतेग दिव्यमाणो गच्छदि लिंगी परयवास ॥१०॥ चोराणा मिथ्यावादिना युद्ध विवाद च तीनकर्मभि । यंत्रेण दीव्यमान गच्छति लिंगी नरकवास ! १कीदमान ।
३८२ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचित- . दसणणाणचरित्ते तवसंजमणियमणिकम्मम्मि । पीडयदि-बद्धमाणो पावदि लिंगी गरयवासं ॥११॥ दर्शनज्ञानचरित्रपु तपःसंयमनियमनित्यकर्मणि । पीडयति वर्तमानः प्राप्नोति लिंगी नरफवासं ।। कंदप्प (प्पा ) इय वइ करमाणो भोयणेमु रसगिदि । माई लिंगविवाई तिरिक्खजोणी ण सो समणो ॥ १२ ॥ कंदपादिकं वर्तते कुर्वाणः भोजनेषु रसगाई। मायावी लिंगम्पपायी तिर्यग्योनिः न स भ्रमणः॥ धावदि पिंडणिमित्तं कलह काऊणःमुंजदे पिंडं । अवरुपरूई संतो जिणमग्गि ण होइ सो समणो ।। १३ ।। • धावति पिंडनिमित्तं कलहं कृत्वा मुक्ते पिड । अपरप्ररूपी सन् जिनमार्गी न भवति स भ्रमणः ।। गिण्हदि अदत्तदाणं परणिंदा वि य परोक्ससेहिं । जिलिंगं धारंतो चोरण व होइ सो समणो ॥१४॥ गृह्णाति अदत्तदानं परनिन्दामपि च परोक्षदूपणैः । जिनलिंग धारयन् चोरेणेव भवति स श्रमणः ॥ उप्पडदि पडदि धावदि पुढवीओ खणदि लिंगरूपेण । इरियावह धारतो तिरिक्सजोणी ण सो समणो ॥१५॥ उत्पतति पतति धावति पृथिवी खनति टिंगरूपेण । ईर्यापथं धारयन् तिर्यग्योनिः न स प्रमणः ।।
लिंगमाभृत।
३८३
बध नीरजा सन् सस्य खण्डयति तथा च वसुधामपि ।
छिनत्ति तत्गणं बहुश तिर्यग्योनि न स श्रमण ॥
रागो करेदि णिचं महिलावग्गं पर च दूसेदि ।
दसणणाणविहीणो तिरिक्सजोणी ण सो समणो ॥ १७ ॥
राग परोति नित्य महिलावार्ग पर च दूपयति ।
दर्शनज्ञानविहीन तिर्यग्योनि न स श्रमण ॥
पञ्चजहीणगहिणं णेहं सीसम्मि पट्टदे बहुसो।
आयारविणयहीणो तिरिक्सजोणी ण सो सपणो ।। १८॥
प्रव्रज्याहीनगृहिणि स्नेह शिष्ये वर्तते बहुश ।
आचारविनयहीन तिर्यग्योनि न स श्रवण ॥
एवं सहिओ मुणिवर संजदमज्झम्मि वहदे णिचं ।
बहुलं पि आणमाणो भावविणटो ण सो सवणो ॥ १९ ॥
एव सहित मुनिर सयतमध्ये वर्तते नित्यं ।
बहुरमपि जानान भावपिनष्टो न स श्रवण ॥
दसणणाणचरिते महिलावग्गम्मि देहि वीमहो।
पासत्य वि हु णियहो भावविगहो पोका ॥३०॥
३८४ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितं- पुश्चलीगृहे य मुक्त नित्य संस्तौति पुष्णाति पिंड ! प्राप्नोति बालस्वभावं भावविनष्टो न स श्रवण ॥ इय लिंगपाहुडमिणं सर्व युद्धेहि देसियं धम्म । पालेहि कसहियं सो गाहदि उत्तम ठाणं ॥२२॥ इति लिंगप्राभृतमिद सर्च बुदै देशित धर्म । पालयति कष्टसहित स गाह्ते उत्तम स्थान ।। इति श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितलिंगप्रामृतक समाप्तम्।
शीलमाभृतं । चीर विमालणयणं रत्तुप्पलकोमलस्समप्पोय । तिविहेण पणमिऊणं सीलगुणाणं णिसामेह ॥ १ ॥ वीर विशालनयन रक्तोत्पलकोमलसमपादम् । त्रिविधेन प्रणम्य शीलगुणान् निशाम्यामि ॥ सीलस्स य णाणस्स य णत्थि विरोहो वुधेहि णिद्दिहो। परि य सीलेण विणा विसया गाणं रिणासंति ॥२॥ शलिस्य च ज्ञानस्य च नास्ति विरोधी बुधैर्निदिष्ट । नवरि च शीलेन विना विपया ज्ञान विनाशयति ॥ दुक्खे गजहि गाणं गाणं णाऊण भावणा दुक्सं । भावियमई व जीनो निमएमु पिरजए दुक्खं ॥ ३ ॥ खेन ज्ञायते ज्ञान ज्ञान ज्ञात्वा भावना दुख। भावितमतिश्च जीवा विपयेषु रिज्यति दुख ॥ ताव ण जाणदि गाणं विसयमलो जार वट्टए जीवो । विसए विरनमेतो ण सवेइ पुराइय कम्मं ॥४॥ तापन्न जानाति ज्ञान विषयबल यावत् वर्तते जीव । विषय विरक्तमात्र न क्षिपते पुराणक कर्म ।। १प्पाद मूल पाठ । २ सयराह नवरि प दुत्ति शशि सहसति इकसरिभ च । अविहाविअ इक्वए अत्तक्किय तश्षण सहसा ।" ३ विवज्जए पु। पद००५ ३८६ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितं- णाणं चरित्तहीणं लिंगग्गहणं च दंमणविहणं । संजमहीणो य तो बड चरह गिरत्ययं मन्वं ॥५॥ ज्ञान चारित्रहीन लिंगप्रहण च दर्शनविहीन । सयमहीनथ तप यदि चरति निरर्थक स ।। णाणं चरित्तमुद्धं लिंगरगहणःच दंसगनिमुद्धं । संजममहिदो य नको योगो नि महाफलो होइ ॥ ६॥ ज्ञान चारित्रशुद्ध लिंगप्रहण च दर्शनविशुद्ध । सयमसहितश्च तप स्तोकमपि महाफ मपति ।। जाणं गाऊण गग केई सियाडभानसंसता । हिडंति चादुरगर्दि विमएसु विमोहिया मूढा ॥७॥ ज्ञान ज्ञात्वा नरा फेचिन् विषयादिभारतसता । हिण्तन्ते चातुर्गति विषयेषु रिमोहिता मूढा ॥ जे पुण पिमयविरत्ता णाणं गाऊण भावगामहिढा । छिदंति चादुरगदि तागुणजुत्ता न संदेहो ॥ ८॥ ये पुनम्पियरिरक्ता ज्ञान ज्ञाना भावनासहिता । छिदति चातुर्गति तपोगुणयुक्ता न सदह ।। जह कंचणं निसुद्ध धम्मयं संडियलरणलेषेण । तह जीयो पि निमुद्धं णाणमिलिलेण निमलेण ॥९॥ यया कंचन विशुद्ध धमन् पडिकठयणटेपैन । तथा जीरोऽपि विशुद्ध ज्ञानसरिटेन निमन ।। णाणस्म णत्यि दोसो कापुरिमाणो वि मंदयुद्धीणो। जेणाणगबिदा... होऊणं रिमण्मु रजति ॥१०॥ ज्ञानस्य नास्ति दोष कापायापि मन्दबुद्रे । ये ज्ञानगर्षिता......भूता विषय रम्पति ।
शीलप्राभृतं । गाणेण दसणेण य तयेण चरिएण सम्ममहिएण । होहदि परिणिन्वाणं जीवाणं चरित्तसुद्धाणं ॥ ११ ॥ ज्ञानन दर्शनेन च तपसा चारित्रेण सम्यक्त्वसहितेन । भविष्यति परिनिर्वाण जीवाना चारित्रशुद्धाना || सीलं रक्संताणं दंसणसुद्धाण दिढचरित्ताणं । अत्यि धु णियाणं विसएमु रित्तचित्ताणं ।। १२ ।। शील रक्षता दर्शनशुद्धाना दृढचारित्राणा । अस्ति ध्रुन निर्माण विषयेषु विरक्तचित्ताना ॥ चिसएसु मोहिदाणं कहियं मग्गं पिइदरिसीणं । उम्मग्गं दरिसीणं णाणं पि णिरत्ययं तेसिं ॥ १३ ॥ विषयेषु मोहितानां कथितो मार्गोऽपि इष्टदर्शिना उमार्ग दर्शना ज्ञानमपि निरर्थक तेपा ॥ कुमयकुमुदपसंसा जाणता बहुविहाई सत्याइ । सीलवदणाणरहिदाण हु ते आराधया होति ॥ १४ ॥ कुमतकुथुतप्रशसा (सका ) जानतो बहुविधानि शास्त्राणि। शीलवतज्ञानरहिता न हु ते आराधका भवन्ति । रूपसिरिगचिदाणं जुव्यणलावण्णकतिकलिदाणं । सीलगुणज्जिदाणं गिरत्ययं माणुसं जम्मं ॥१५॥ रूपश्रीगर्विताना यौवनलावण्यकात्तिकल्तिाना। शीलगुणपर्जिताना निरर्थक मानुष जम ॥ वायरणछंदवइसेसिययवहारणायसत्येसु । वेदेऊण मुयतेसु य ते सुय ? उत्तम सोलं ॥१६॥ व्याकणछन्दोवैशेषिकन्यवहार यायशास्त्रेषु। विदित्वा श्रुतेषु च तेषु श्रुत उत्तम शील ॥
- ३८८ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचित- सीलगुणमंडिदाणं देवा भरियाण बलहा होति । मुदपारयपउरा णं दुस्सीला अप्पिला लोए ॥ १७ ॥ शीलगुणमण्डिताना देवा भव्याना वल्लभा भरति । श्रुतपारगप्रचुरा दु शीला अपका लाके । सव्वे वि य परिहीणा रूपाविरूपा नि दिदसुक्या गि। सील जेसु सुसील सुजीपिदं माणुसं तेसिं ॥१८॥ सर्वेऽपि च परिहाना रूपविरूपा अपि पतितमुपयसोऽपि । शील येषु सुशील सुजीवित मनुष्य व तेपा । जीनदया दम सचं अचोरियं बंभचेरसंतोसे । सम्मईसण गाणं तो य सीलस्म परिवारो ॥ १९ ॥ जीवदया दम सत्य अचौर्य ब्रह्मचर्यसन्तोषौ। सम्यग्दर्शन ज्ञान तपश्च शीलस्य परिवार । सील तो पिसुद्धं दसणमुद्धी य णाणसुद्धी य । सील सियाण अरी सील मोक्सस्म सोपाणं ॥२०॥ शील तपो विशुद्ध दर्शनशुद्धिश्च ज्ञानशुद्धिध । शील विषयाणामरि शील मोक्षस्य सोपान ॥ जह निसयलुद्ध रिसदो तह थानरजंगमाण घोराणं । सेव्वेसि पि विणामदि सियविसं दारणं होई ।। २१ ॥ यथा विषयल-धो विपद तथा स्थावरजङ्गमान् घोरान् । सनिमपि विनाशयति विपरिष दारण भरति ॥ वारि एकम्मि य जम्मे सरिज निमयणाहदो जीयो । चिसयनिसपरिहया णं भमंति संमारकांतारे ॥ २२ ॥ "धचिदमादे" इत्यनन द्वितियास्थान पष्ठी । द्वितीयातिविमकीनां गने क्वचिन् षष्ठी स्यादिति मूसार्थ । २ "अस्टासाडी" इत्यनेन दितियास्थाने समी। द्वितीयानृतीयया स्थाने चित् सप्तमी भवतीति मूदपये। (से): १ शीलप्राभृतं । ३८९ वारं एक जम गच्छेत् विपदनाहतो जीव । विषयविषपरिहता भ्रमन्ति संसारकान्तारे ।। णरएसु वेयणाओ निरिक्सए माणुएमु दुपसाई । देवेमु नि दोहग्गं लहंति विमयामता जीवा ॥ २३ ॥ नरकपु वेदना तिरश्चि मानरेषु दु खानि । देवेष्वपि दौर्भाग्य लभन्ते विषयासक्ता जीना ॥ तुमधम्मंतरलेण य जह दव्वं ण हि पराण गन्छेटि । तवसीलमंत कुसली सवंति विसयं विमय व सलं ॥२४॥ तुपध्मलेन च यथा द्रव्य न हि नराणा गच्छति। तपशीलमन्त बुशा क्षिपन्ते शिपय विपमिर खलं ॥ यमुमु य सण्डेसु य मद्देमु य विसालेसु अंगेमु । अंगेमु य पप्पेमु य सव्वेसु य उत्तम सीलं ॥ २५ ॥ वृत्तेषु च खण्डेषु च भद्देपु च विशालेपु अगेषु । अंगेषु च प्राप्तेपू सर्वेषु च उत्तम शील ॥ पुरिसेण वि सहियाए उसमयमूहि विमयलोलेहि । संसारे ममिदव्यं अग्यघरटं व भूदेहिं ॥ २६ ॥ पुरपेणापि सहितेन कुसमयमूरै विषपलोले । संसारे भ्रमितव्यं अरहटघर झ भूतै । आदेहि कम्मगंठी जावद्धा विसयरायमोहेहिं । तं छिदंति कयस्था तरसंजममीलयगुणेण ॥ २७ ॥ आमनि हि कर्ममयि यारसा विषयरागमोहाभ्यां । ता उिन्दति कृतार्या तप संयमशीलगुणेन ॥
- . ३९० श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचित- उदधी व रदणभरिदो तवविणयंसीलदाणरयणाणं । सोहतो य ससीलो णिवाणमणुत्तर पत्तो ॥२८॥ उदधिरिय रत्नभृत तपोधिनयशारदानरत्नाना । शोभेत सशाल निर्वाणमनुतर प्राप्त ॥ मुणहाण गद्दहाण य गोपमुमहिलाण दीमदे मोसो। जे' सोधंति चउत्थं पिच्छिनंता जणेहि सहि ॥ २९ ॥ शुना गर्दभाना च गोपशुमहिलाना दृश्यत मोक्ष । ये साधयति चतुर्थ दर्यमाना जनै सौ ॥ जइ निसयलोलएहि गाणीहि हरिज साहिदो मोक्सो । तो सो मुरत्तपुत्तो दसपुचीओ नि कि गदो नरयं ॥३०॥ यदि विषयडाले ज्ञानिभि भवेत् सापितो मोक्ष । तहि स सात्यकिपुत्र दर्शपूर्षिक कि गतो नर ॥ जह णाणेण निमोहो सीलण विणा उहेहि णिदिहो । दसपुस्विस्म य भागो ण कि पुण णिम्मलो जाटो ॥३१॥ पदि ज्ञानेन पिशुद्ध शीलेन विना युनिदिष्ट । दशपूर्षिण च भागोन किं पुन निर्मग्री जात ॥ जाए विसयनिरत्तो सो गमयदि परयचेयणापउरा । ता लेहदि अरहपय मणियं जिणगड्डमाणेण ॥ ३ ॥ य विषपरिरक्त स गमयति नरकरदनां प्रचुरा। तलमते अई पदं भणितं निनार्धमान।। एवं बहुप्पयार जिणेहि पचासणाणरिसीहि । सीलेण य मोरसपयं आसातीदं च लोयणाणेहि ॥३३॥ जो साम।
---. शीलप्राभृतं । एव बहुप्रकार जिनै प्रत्यक्षज्ञानदर्शिभि । शीलेन च मोक्षपद अक्षातीत च लोकज्ञान ॥ सम्मत्तणाणदंसणवववीरियपंचयारमप्पाणं । जलणो नि पवणसहिदो डहंति पोराणयं कम्मं ॥ ३४॥ सम्यक्त्वज्ञानदर्शनतपोर्यिपचाचारा आमना । ज्वलनोऽपि पवनसहित दहति पौराणक कर्म ॥ गिद्दड्डअटकम्मा पिसयरिरत्ता जिदिदिया धीरा । तवविणयसीलसहिदा सिद्धा मिद्धिगदि पत्ता ॥ ३५ ॥ निर्दग्धाष्टकर्माण विषयपिरता जितेन्द्रिया धीरा । तपोविनयशीलसहिता सिद्धा सिद्धिगति प्राप्ता ॥ लावण्णसीलकुसला जम्ममहीरुहो जस्स सवणस्स । सो सीलो स महप्पा भमित्थ गुणवित्थर भपिए ॥३६ ॥ लावण्यशालकुशला जन्ममहारुह यस्य श्रवणस्य । स शील स महा मा भ्रमेत् गुणविस्तार भव्ये ।। णाणं झाणं जोगो दंसणसुद्धी य वीरियारत्तं । सम्मत्तदंसणेण य लहंति जिणसासणे घोहि ।। ३७ ॥ ज्ञान ध्यान योगो दर्शनशुद्धिश्च वीर्यव । सम्यक्त्वदर्शनेन च यम ते जिनशासने बोधि ।। जिणवयणगहिदसारा विसयपिरता तवोधणा धीरा । सीलसलिलेण हारा ते सिद्धालयमुहं जंति ।। ३८ ॥ जिनरचनगृहीतसारा विषयविरक्ता तपोधना धीरा । शीलसटिलेन स्नाता ते सिद्धालयमुख यान्ति ।।
३९२ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितं- सव्यगुणसीणकम्मा मुहदुक्परिरजिदा मणपिमुद्धा । पप्फोडिय कम्मरया हवंति आराणापयडा ॥ ३९ ॥ सगुणक्षीणकर्माण मुखदु ग्वनिर्जिता मनोविशुद्धा । प्ररपुटितकर्मरजस भरन्ति अराधनाप्रकटा । अरहते सुहमत्ती सम्मत्तं दसणेण मुविसुद्धं । सील विमयनिरागो गाणं पुण केरिसं भणियं ॥ ४० ॥ अर्हति शुभभक्ति सम्पक्य दर्शनेन मुविशुद्ध । शील विषयरिरागो ज्ञान पुन पाहश मणित इति श्रीकुन्दषुन्दाचार्यविरचितशीलमाता समाप्त।
रयणसारः। णमिण चड्ढमाण परमप्पाणं तियेणे सुद्धेण । वोच्छामि रयणसार सायारणयारधम्माण ॥१॥ नत्या वर्धमान परमात्मान त्रिकया शुद्धया । रक्ष्यामि रत्नसार सागारागगारयो । पुव्वं जिणेहि भणियं जहटियं गणहरेहि वित्थरियं । पुयायरियकमेणं जं तं वोलेइ सदिही ॥ २ ॥ पूर्व जिनै भणित यथास्थित गणधरै विस्तारित । पूर्वाचार्यक्रमेण यत्तत् भाषते सदृष्टि । मदिसुदणाणवलेण दु मच्छंदं वोलेंए जिणुत्तमिदि । जो सो होइ कुदिट्टी ण होइ जिणमग्गलग्गरयो ।। ३ ।। मतिश्रुतज्ञानवलेन तु स्वच्छन्द भापते जिनोक्तमिति । य स भवति कुटिन भाति जिनमार्गलनरत ॥ सम्मत्तरयणसार मोसुमहारपसमूलमिदि भणियं । तं जाणिजेंड णिच्छयववहारसरूवदोभेदं ॥४॥ सम्यक्त्वर नसार मोक्षमहावृक्षमूलमिति भणित । तज्ज्ञायते निश्चय यरहारस्वरूपद्विभेद ।। भयवमणमलविवर्जिय संसारसरीरभोगणिचिण्णो। अहगुणंगसमग्गो देसणसुद्धो हुँ पंचगुरुमतो ॥५॥ जिण तिमुझेण स पुग्नके पाठ । २ पम्मीण स । ३ मा त ख. बोला जिगदिए । ५ जाणिनउ स. बी स ! ७ य स ।
३९४ श्रीकुन्दकुन्दाचायविरचितो- भयन्यसनमलविवर्जित ससारशरीरभोगनिर्षिण । अष्टगुणासमन दर्शनशुद्ध हि पचगुरुभक्त ॥ णियसुद्धप्पणुरत्तो बहिरप्पावच्छपजिओ गाणी । जिणमुणिधम्म मण्णइ गयदुरसी होइ सहिद्दी ॥६॥ निजसुद्धात्मानुरक्त बहिरामावस्थार्जित ज्ञाना । जिनमुनिधर्मे जानाति गतदु खो भाति सदृष्टि । मय मूढमणायदणं संकाइ वसण भयमईयार । जेसिं चउदालेदे ण संति ते हुँति सद्दिट्टी ॥७॥ मदो मूढमनायतनं शकादि व्यसनं भयमतिचारम् । येपा चतुश्चत्वारिंशति एतानि न सन्ति ते भवति सदृष्टय ।। उहयगुणवसणभयमलवैरग्गइचारभत्तिविग्यं वा । एदे सत्तत्तरिया दंसणसावयगुणा भणिया ॥८॥ उभयगुणव्यसनमयमलपैराग्याति चारभक्तिविनानि या । एते सप्तति दर्शनधाररुगुणा भणिता ॥ देवगुरममयभत्ता संमारसरीरभोयपरिचत्ता । रयणत्तयसंजुना ते मणुवा मिनमुहं पत्ता ।। ९॥ देवगुरसमयभक्ता संसारशरीरमोगपरित्यक्ता । रत्नत्रयसयुक्तास्ते मनुष्या शिरमुख प्राप्ता ॥ दाणं पूजा सीलं उपासं बहुविहं पि सरणं पि । सम्मजुदं मोक्समुहं सम्म विणा दीहसंसार' ॥१०॥ दानं पूजा शाल पान पश्विमपि क्षमणमपि। सम्पारयुत मोक्षमुग्ष सम्पर चिना दीर्घसंसार । १ नेयं गाया स पुस्त। २ या स । रा ३ रा स ।
स्यणसारः। दाणं पूजामुक्सं सावयधम्मे ण सावयाँ तेण विणा । झाणज्झयणं मुक्सं जइधम्मे तं विणा तहा सो वि ॥११॥ दान पूजा मुख्या श्रापकधर्मे न श्रावकाः तेन विना । ध्यानाध्ययनं मुख्यं यतिधर्मे त विना तथा सोऽपि ॥ दाणु ण धम्मु ण चागुण भोगु ण बहिरप्प जो पयंगो सो। लोहकसायग्गिमुहे पडिउँ मरिउँ न संदेहो ॥ १२ ॥ दान न धर्म. न त्यागो न भोगो न बहिरात्मा यः पतङ्गः। स लोभकपायाग्निमुखे पतित मृतः न सन्देह ॥ जिणपूजा मुणिदाणं करेड़ जो देइ सत्तिरूवेण । सम्माइडी सावयधम्मी सो होइ मोक्खमग्गरवो ॥१३॥ जिनपूजा मुनिदानं करोति यो ददादि शक्तिरूपेण । सम्यदृष्टिः श्रावकधर्मी स भवति मोक्षमार्गरत ॥ प्या (य ) फलेण तिलोके सुरपुज्जो हवेइ सुद्धमगो । दाणफलेण तिलोए सारमुहं भुजदे णियदं ॥ १४ ॥ पूजाफल्न त्रिलोके सुरपूज्यो भमेत् शुद्धमना । दानफलेन त्रिलोके सारमुख भुक्त नियत ।। दाणं भोयणमेनं दिण्णइ धण्गो हवेह सायारो । पत्तापत्तविसेसं सदसणे किं वियारेण ॥ १५ ॥ दानं भोजनमात्रं ददाति धन्यो भवति सागार । पानापात्र विशेष प्रदर्शने किं विचारेण ॥ दिणइ सुपत्तदाणं विसेसतो होइ भोगसगमही । णिवाणमुहं कमसो णिदिदं जिणवरिंदेहिं ॥ १६ ॥ १ धम्मो. ख. २ सावगो । ख. ३-४ यो. ख ।५ पूजा. ख. १६ तिलो- बकेसुर. ख. । ७-८ देण्णइ ख । ९ दो।
३९६ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- ददाति मुपानदान विशेषत भरति भोगस्वर्गमही। निर्गणमुख क्रमश निर्दिष्टं जिनरेन्दै ।। खेत्तनिसेसे काले ववियसुतीय फ्लं जहा निउलं । होइ तहा त जाणडे पत्तविसेसेसु दाणफलं ॥१७॥ क्षेत्रविशेष काले रपितमुनी पलं यथा विपुलं । भवति तथा तजानाहि पाविशेषे सुदानफल || इंह णियमुरित्तवीयं जो वाइ जिणुत्तमनसेत्तेमु । सो तिहुपणरनफलं भुंजदि कल्लाणपंचपल ॥ १८ ॥ इह निजसुपित्तगी यो धपति जिनोक्तसावक्षेत्रषु । स निमुवनरायफल मुनक्ति कल्याणपचपलं ।। मादुपिदुपुत्तमित्तक्लनघणघण्णवत्युवाहरिमयं । संसारसारसोरस सव्वं जाणउ मुपनदाणपलं ॥१९॥ मातृपितृपुत्रमित्रकलाधनधायवस्तुपाहनविपर्य । संसारसारसौर्य सर्व जानीहि मुपायदानपर्छ । सनंगरजणमणिहिमंडारसडंगवलचउद्दहरयणं । छप्णयदिसहासच्छिविहउ जाणह मुपनदाणफलं ॥२०॥ सप्तागरायनानिरिभण्डारपालयतुर्दशरन । पण्णपतिसहस्रनीतिमा जानीहि मुपादाना ॥ मुकुलमुरूपमुलपराणमुमडमुमियरसामुसीरगगुणचरितं । मुहरेसं मुहणाम मुहमा मुपनदाणपलं ॥२१॥ १ जाउ स । २ इय सरका रा । मागमुहाणहग विर्ष प्राण स पुरतरे, सकरारा मुखानुभवन निभद जानीहि।
रयणसार । सुकुटसुरूपसुलक्षणसुमतिसुशिक्षासुशीलसुगुणचरित्र । शुभलेश्य शुभनाम शुभसात सुपात्रदानफले ॥ जो मुणिभत्तवसेसं भुंजइ सो भुंजए जिणुदिदं । संसारसारसोक्सं कमसो णिव्याणवरसोकसं ॥ २२॥ यो मुनिभक्तावशेष भुक्ते स भुक्ते जिनापदिष्ट । संसारसारसौरय क्रमश निर्वाणसौख्य ॥ सीदुण्डं वाउ पिउलं सिलेसिमं तह परीसमं चाहि । कायकिलेमुन्यासं जाणिचा दिण्णए दाणं ॥ २३ ॥ शीताष्ण यातं पित्त श्लेष्म तथा परिश्रम व्याधि । कायक्लेश उपवास ज्ञात्वा दत्त दान ॥ हियमियमणं पाणं गिरवज्जोसहि गिराजलं ठाणं । सयणासणमुचयरणं जाणिों देइ मोक्सरवो ॥२४॥ हितमित अन्न पान निरखद्योपवि निराकुल स्थान । शयनासन उपकरणं ज्ञात्मा ददाति मोक्षरत ॥ अणयाराणं वेज्जायचं कुज्जा जहेह जाणिचा । गम्भ मेव मादा पिदु वा णिचं तहा णिरालसया ॥२५॥ अनगाराणा वैयावृत्य कुर्यात् यथेह ज्ञावा । गर्भोद्भवमिव माता पिता वा नित्य तथा निराल्सक ॥ सप्पुरिसाणं दाणं कप्तरूणं फलाण सोहं वा । लोहीणं दाणं जइ विमाणसोहा सर्व जाणे ॥ २६ ॥ सत्पुरुपाणा दान कल्पतरूणा फलाना शोभामिन लोभिना दानं यदि विमानशोभा शस्य जानीहि ।। १ भुत्त। २ परीसमव्याहिं ख १३ जे ख । ४ जाणिना मोक्खमगरओस । ५ भवे ख । ६ वप्पसुराणविमाणसाह वा स 10 सवस्स जाणेह स ।
३९८ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो-- जसकित्तिपुण्णलाह देड मुबहुगं पि जत्थ तत्र । संम्माडमुगुणभायण पत्नपिसेसं ण जाणंति ॥ २७ ॥ यश कीर्तिपुण्यटा ददति मुबहुक्मपि यत्र तत्रै । सम्यक्त्वादिमुगुणभाजनपाठविशेप न जानन्ति ॥ जंतं मंतं तंतं परिचारियं पक्सवाय पियायणं । पडुच्च पंचमयाले भरहे दाणं ण किं पि मोक्सस्म ॥२८॥ पत्र मत्र तत्र परिचर्या पक्षपात प्रियवचनं । प्रतीय पचमकाल भरते दान न किमपि मोक्षस्य ।। दाणीणं दालिदं लोहीणं कि हवेइ महसिरियं । उयाण पुच्चजियकम्मफलं जार होड थिर ॥ २९ ॥ दानिना दरिद्रत्व लोभिना किं भवेत् महाश्री । उभयो पूर्वाजितर्मपल यावत् भवति स्थिर ।। घणधणाइसमिद्धे सुहं जहा होइ सयजीवाणं । मुणिदाणाइममिद्धे मुहं तहा तं विणा दुरसं ॥३०॥ धनधा यादिसमृद्धे मुख यथा भरति सजीवाना। मुनिदानादिसमृद्धे सुख यथा त पिना दुखं ॥ पत्त निणा दाणं च मुपुत्त निणा बहुधणं महासत्तं । चित्त विणा क्यगुणचारितं णिाकारणं जाणे ॥ ३१ ॥ पात्र पिना दान च मुपुत्र पिना वहन महाक्षेत्र । चित्त विना व्रतगुणमचारि निष्कारणं जानीहि ॥ जिण्णुद्धारपति (दि) हाजिणपूजावित्यरंदणनिमे य घणं । जो भुंजह मो भुंजइ जिणदिहं णिरयगईदुपरां ॥ ३२ ॥ १ किसि। २रोही । ३ दाग न मोक्सरस स दारा। ५ रोहेण स । ६ उदयाण म । 1-८ मिसो पुस्तके पाट । म पुस्तक एप एवारिसयघर्ण स ।
रपणसारः। .................. जीर्णोद्वारप्रतिष्टाजिनपूजातीर्थयन्दनापिये च धनं । यो भुक्त स मुक्त जिनदृष्ट नरकगतिदुःखं ।। पुनकलत्तविद्रो दारिदो पंगु मूक बहिरंधो। चांडालाइकुजादो पूजादाणाइदब्बहरो ॥ ३३ ॥ पुनक्टानिदूरः दारिद्रः पगुः मूकः वधिरोऽन्धः ।' चांडालादिवुजाति- पूजादानादिद्रव्यहरः ।। इंच्छिय फलं ण लमइ जइ लभइ सो ण मुंजदे णियदं । वा हाणमायरोसे पूजादाणाइदव्यहरो ॥ ३४ ॥ इरिउतफलं न लभते यदि लभते स न भुक्ते नियत । पूजादानादिद्रव्यहरः॥ गयहत्थपायनासियकण्णउरंगुलविहाणदिट्टी य । जो तिव्वदुक्समूलो पूजादाणाइदबहरो ॥ ३५ ॥ गतहस्तपादनासिकाकर्णोरोंऽगुलविधानदृष्टिश्च । यः तीबदु.खमूलः पूजादानादिद्रव्यहर ॥ सयकुमूलमूलो लयिमयंदरजलोदरसिसिरो। सीदुण्हवाहिरॉई पूजादाणंतरायकम्मफलं ॥ ३६ ।। क्षयकुष्ठमूलशूलं.. .....भगन्दरजलोदर ..........। शीतोष्णबाह्यानि पूजादानान्तरायकर्मफल ॥ णइतिरियाइदुरईदरिदवियलंगहाणिदुक्खाणि । देवगुरुसत्यवंदणसुयभेयसज्झाइदाणविधणफलं ॥३७॥ नरकतिर्यग्दुर्गतिदरिद्रविकलाङ्गहानिदुःखानि । देवगुरशास्त्रवन्दनाश्रुतभेदस्वाध्यायदानविघ्नपलं ॥ नेय गाथा ख. पुस्तके । २ नेयं गाथा स. पुस्तके । ३-४ रोगविशेषस्य नामनी.। ५ प्रमराइ ख.१६ नेयं गायाख, पुस्तके।
श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- जसकित्तिपुण्णलाहे देड मुनगं पि जत्य तत्थे । सम्माइसुगुणभायण पत्तपिसेस ण जाणंति ।। २७ ॥ यश कीर्तिपुण्यलाभे ददति मुबहुक्मपि यत्र तोर ! सम्यक्त्वादिसुगुणभाजनपानविशप न जानन्ति ॥ जंतं मंतं तंतं परिचरियं पक्सवाय पियवयणं । पडुच्च पंचमयाले भरहे दाणं ण कि पि मोक्सस्स ।। २८ ।। यत्र मत्र तत्र परिचर्या पक्षपात प्रियवचन । प्रतीय पचमकाले भरते दान न किमपि मोक्षस्य ।। दाणीणं दालिदं लोहीणं कि हवेइ महसिरियं । उहयाण पुच्चजियकम्मफलं जाव होड थिर ।। २९ ।। दानिना दरिद्रतल लोभिना किं भरेत् महानी । उभयो पूर्वाजितकर्मफ्लं यावत् भवति स्थिर ॥ धणधण्णाइसमिद्धे सुहं जहा होइ सव्वजीवाणं । मुणिदाणाइसमिद्धे सुहं तहा तं विणा दुक्सं ॥ ३०॥ धनधान्यादिसमृद्धे सुख यथा भपति सजीपाना । मुनिदानादिसमृद्ध सुख यथा त पिना दुख ॥ पत्त विणा दाणं च मुपुत्त विणा बहुधणं महाखेत्तं । चित्त विणा वयगुणचारित्तं णिक्कारणं जाणे ॥ ३१ ॥ पात्र चिना दान च मुपुत्र विना बहुधन महाक्षेत्र । चित्त पिना व्रतगुणमचारित्र निष्कारण जानीहि ।। जिण्णुद्धारपति (दि) हाजिणपूजावित्यवंदर्भिसे य धणं । जो भुंजइ मो भुंजइ जिणदिदं णिरयगईदुक्तं ॥ ३२॥ १ किहि स । २ लोही ५। ३ दाण ण मोक्खस्स स । ४ दाणेण ख । ग्रहण ख । ६ उदयाण स । ७-८ मिद्रो पुस्तके पाट । ख पुस्तके तु एव। विसयधण ख ।
रयणसार । ३९९ जीर्णोद्धारप्रतिगाजिनपूजातीर्थदनापिपये च धन । यो भुक्त स भुक्त जिनदृष्टं नरकगतिदु ख !! पुनकलत्तनिदुरो दारिदो पगु मूक बहिरधो। चाडालाइकुजादो पूनादाणाइदव्वहरो ॥ ३३ ॥ पुत्रपटाविदूर दारिद्र पगु मूक बधिरोऽध । चौडालादिकुजाति पूजादानादिद्रव्यहर ॥ इच्छिय फल ण लब्भड जइ लभड सो ण भुजदे णियद । वा हाणमायरोसे पूजादाणाडदव्बहरो ॥ ३४ ॥ इउितफल न भिते यदि लभते स न भुक्ते नियतं । पूजादानादिद्रव्यहर ॥ गयहत्थपायनासियकण्णउरगुलरिहागदिट्टी य । जो तिव्वदुक्समूलो पूजादाणाहदव्यहरो ॥ ३५ ॥ गतहस्तपादनासिका!रोंऽगुलविधानदृष्टिश्च । य तीबदु खमूल पूजादानादिद्रव्यहर ॥ सयकुटमूलसूलो लबिभयदरजलोदरसिमिरो। सीदुण्हवाहिरॉई पूजादाणतरायकम्मफल ।। ३६ ॥ क्षयकुष्ठमूटशूल भगन्दरजलोदर शीताष्णबाह्यानि पूजादानातरायकर्मफ्ल ॥ णरइतिरियाइदुरईदरिदरियलगहाणिदुक्साणि । देवगुरुसत्यवदणसुयभेयसज्झाइदाणविषणफल ॥३७॥ नरकतिर्य दुर्गतिदरिद्रपिकलाङ्गहानिदु खानि । देवगुरशास्त्रय दनाश्रुतभेदस्या यायदानविनफ्ल ॥ नेय गाथा स पुस्तके । २ नेय गाथा ख पुस्तके । ३-४ सपिपस्य नामनी । ५ अमराइ स । ६ नेयं गाथा ख पुस्तके। १ ४०० श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- सम्मनिसोही तवगुणचारिचमण्णाणदाणपरिही गं। भरहे दुस्ममकोले मणुयाणं जायदे णियदं ।। ३८ ॥ सम्यक्त्वविद्धि तपोगुणचारित्रसंज्ञानदानपरिधय । भरते दुपमकाले मनुजाना जायते नियत ॥ " हि दाणं ण हि पूजा ण,हि सोलंग हि गुणं ण चारिन्। जे जइणा भणिया ते गैरइया होति कुमागुमा तिरिया ॥३९॥ न हि दान न हि पूजा न हि शील न हि गुण न चारित्र। य यतिना भणिता ते नारका भवन्ति कुमानुपा तिरश्च ॥ ण नि जाणड कजमकज सेयमसेयं पुण्ण पाहि । तच्चमत्तञ्च धम्ममधम्म सो मम्मउम्मुरको ॥ ४० ॥ नापि जानाति कार्यमकार्य श्रेयोऽश्रेय पुण्यं पाएं हि । तवमतेन धर्ममधर्म स सम्यन्ये मुक्त ॥ ण निजाणड जोग्गमजोग्ग णिञ्चमणिचं हेयमुवाटयं । मच्चममचं मनमभ म मम्मउम्मुरको ।। ४१ ॥ नापि जानाति योग्यमयोग्यं नित्यमनिय हेयमुपादेय । सत्यमस य भाउमभाई स सम्यागोमुक्त ॥ लोयजणसगादो होड मडमुहरपुडिलदुन्मायो । लोदयसगं तम्हा जो वि तिरिहण मुंचाहो ॥ ४२ ॥ लौकिकजनसगतो भवति मनिमुन्युरकुटि'दुर्भार । लौकिकसग तस्मात् योग्यपि त्रिविधन मुखतात् । उग्गो तिब्बो दुद्दो दुम्मानो दुस्मुदो दुरालारो। दुम्मदरदो विरुद्धो मो जीयो मम्मउम्मुमो ॥ ४३ ॥ १ या स । २ अस्मादप्रति शब्द । तनछ दाभाजायते।बलोना- सारित य पुस्तक नास्त्यपि । ३ गाधेय ४०४१ गावात पूर्व पुस्तके। ४ ओई सिविहेण स । ५ वि स ।
रयणसार । ४०२ उग्न तीनो दुष्टो दुर्भायो दु श्रुतो दुराराप । दुर्मतरतो विरुद्ध स जीवो मम्यक्त्वोमुक्त ।। खुदो रुद्दो रुहो अणि विसुणो सगब्बियो सुडओ। गायणजायणभंडणदुस्सणसीलो दु मम्मउम्मुक्को ॥ ४४ ॥ क्षुदो रुद्र स्ष्ट अनिष्ट पिशुन सगर्पित सूय । गायनयाचनाभण्डनदृपणशीलस्तु सम्यक्योन्मुक्त । दोहा- - वाणरगदहसाणगयवग्यवराहकरहा । पक्सिजल्यसहाव पर जिणवरधम्मुविणासु ॥ ४५ ॥ वानरगर्दभमगजव्याघ्रवराहकरम-- । पक्षिजलौकस्वभावो नर जिनवरधर्मविनाशक || कुतवकुर्लिगिकुणाणिकुवयकुसीले कुदंसणकुसत्थे । कुनिमित्ते सथुइ पधुइ पससणं सम्महाणि होइ णियमं ॥४६॥ कुतप युलिंगिकुज्ञानिकुव्रतकुशीलेषु कुदर्शनकुशास्त्रयो । कुनिमित्त संस्तुति प्रस्तुति प्रशंसन सम्यक्त्वहानि भवति नियमेन ॥ सम्म विणा सष्णाणं सच्चारित्तं ण होइ णियमेण । तो रयणत्तयमज्झे सम्मुगुणुकिमिदि जिणुदिई ॥४७॥ सम्यक्त्व विना सज्ञान सञ्चारित्र न माति नियमेन । सत रनत्रयमध्ये सम्यक्त्वगुण उत्कृष्ट इति जिनदिष्टम् ॥ तणुकुट्टी कुलभंग कुणइ जहा मिच्छमप्पणो नि तहा। दाणाइसुगुणभंगं गईभंग मिच्छत्तमेव हो कई ॥४८॥ १जिणमणिद ख १२ पाटोऽय क पुस्तके नास्ति ख-पुस्तकात् सयोजित । षट्०२६ १०२ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- तनुकुष्ठी कुलभग करोति यथा मिथ्यात्वमापन्नोऽपि तथा। दानादिसुगुणभग गतिभग मिथ्यात्वमेव अहो ! कष्टम् ।। देवगुरुधम्मगुणचारितं तपसारमोक्सगइभेयं । जिणवरवयणसुदिहिं विणा दीसइ किह जाणए सम्मं ॥४९॥ देवगुरुधर्मगुणचारित तप सारमोक्षगतिभेद । जिनवरवचनमुदृष्टि विना दृश्यते कथ ज्ञायके सम्यक्त्व ।। एक्कु सण ण पिचिंतइ मोक्सणिमित्तं णियप्पमन्मावं । अणिस विचिंतह पा यहुलाला मणे विचिंतेइ ॥ ५० ॥ एक क्षण न विचिन्तयति मोक्षानिमित्त निजात्मसद्भाव । अनिश विचितयति पाप बहुलालाप मनसा विचिन्तयति ॥ मिच्छामइमयमोहासवमत्तो वोल्लए जहाँ भुल्लो। तेण ण जाणइ अप्पा अप्पाणं सम्मभावाणं ॥५१॥ मिथ्यामतिमदमोहासवमत्त कथयति यथा विस्मृत । तेन न जानाति आमा आत्मना सद्भावान् ॥ मिहिरो महंधयार मरुदो मेहं महावणं दाहो। वज्जो गिरि जहा विणमिजइ सम्मे जहा कम्मं ॥ ५२ ॥ मिहिर महा चकार मस्त् मेघ महामन दाह । घम्रो गिरि यथा विनाशयति सम्यक्ष तथा कर्म। मिच्छंधयारसहियगिहमज्झम्मिय सम्मरयणदीपकलावं । जो पनलइ से दीसइ सम्म लोयत्तयं जिहि ॥५३॥ मिथ्यागराधकारहृदयगृहमध्ये च सम्यक्चरनदीपकलाप ॥ य प्रग्यालयति स पश्यति सम्यक् लोकाय जिनहष्ट ॥ येन प्रकारेण । तेन प्रकारेण । ३न् ।४ पदिस्मदा ।
रयणसार । ४०३ कामदुहिं कप्पतरं चिंतारयणं रसायणं परमं । लद्धो भुंजइ सुरसं जह डियं जाण तह सम्मं ॥ ५४॥ कामदुह कल्पतरु चिन्तारत्न रसायन परम । लब्ध मुक्त सुख यथा स्थित जानीहि तथा सयक्त्वं ॥ केतकफलभरियणिम्मलववगयकालियसुवण्ण व्य । मलरहियसम्मजुत्तो भब्यवरो लहइ लहु मोक्र ।। ५५ ।। कतकफलभृतनिर्मलव्यपगतकालिकासुवर्णवत् । मलरहितसम्यक्त्वयुतो भन्यवरो लभते लघु मोक्ष ॥ पुवठियं सवइ कम्मं पइसदु णो देइ अहिणवं कम्मं । इहपरलोयमहप्पं देई तहा उवसमो भावो ॥५६॥ पूर्वस्थित क्षपयति कर्म प्रवेष्टुं न ददाति अभिनव कर्म। इहपरलोकमाहात्म्य ददाति तथा उपशमो भाव ) सम्माइट्टी काल वोलइ वेरग्गणाणभावेण । मिच्छाइट्टी वांछादुभावालस्सकलहेहिं ।। ५७ ।। सम्यग्दृष्टि काल गमयति वैराग्यज्ञानभावेन । मिथ्यादृष्टि वाञ्छादुर्भावालस्यकल है ॥ अजवसप्पिणिभरहे पउरा रुझाणया दिवा । गहा दुहा कहा पाविद्या किण्हणीलकाओदा ॥ ५८ ॥ अद्यावसर्पिणीभरते प्रचुरा रुदार्तथ्याना दृष्टा । नष्टा दुष्टा कष्टा. पापिष्ठा कृष्णनीलकापोता ॥ अन्जवसप्पिणिभरहे दुस्समया मिच्छपुब्बया सुलहा । सम्मत्तपुवसायारणयार दुल्लहा होति ॥ ५९ ॥ १ रसपुरुष ख । २ गाथेय ख पुस्तके नास्ति । ३ गाथेय स पुस्तके नास्ति।
४.४ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- अद्यावसर्पिणी भरते दुपमाया मिथ्यावर्षका मुलभा । सम्यक्त्वपूर्वका सागारानगारा दुलभा भगति ॥ अजवमप्पिणिभरहे धम्मज्झाण पमादरहिदुत्ति । जिणुदिदृ ण हुमण्णड मिच्छादिही (हवे) मो (हु)॥६०॥ अद्यावसर्पिणामरत धर्म्यध्यान प्रमादरहितमिति । जिनदिष्ट न हि मन्यत मिथ्यादृष्टि भवत् स हि || असुहादो णिरयाऊ मुहमानादो दु सग्गसुहमाऊँ। दुहमुहभाव जाणड ज ते रच्चेई त कुणहो ॥ ६१॥ अशुभता नरकायु गुभमावतस्तु स्वर्गसुखायु । दु खमुखमा जानीहि यत्तुभ्य रोचते तकु ।। हिंसाहमु कोहाइसु मिच्छाणाणेसु पक्सवाएमु । मच्छरिएमु मएमु दुरहिणिवेसेमु अमुहलेसेसु ॥ ६२॥ हिंसादिपु क्रोधादिपु मिथ्याज्ञानेषु पक्षपात। मसरितेषु मतेषु दुरभिनिवेशेषु अशुभलक्ष्यासु ।। विकहाहमु रुद्द झाणेमु अम्यगेसु दडेमु । सल्लेसु गारवेमु सासु जो वट्टई असुहभागो ।। ६३ ।। पिकथादिमु रुद्रातघ्यानेषु असूयकेषु दण्डषु । शल्येषु गारवेषु रयातिषु यो वर्तते अशुभभाव ॥ दबत्यिकाय छप्पण तचपयत्येसु सत्तणवएसु । घणमुक्खे तकारणरूपे पारसणुवेरसे ॥६४॥ १दो पुस्तके। २ माइ पुस्तके। ३ स्थदश पुस्तके । ४ कुबा स। ५व्वाएमु क । ६ वदे स ।
रयणसार । ४०५ द्रव्यास्तिकायेषु पट्पचसु त पदार्थेषु सप्तनपकैषु । वधनमोक्ष तत्कारणरूपे द्वादशानुप्रेक्षाया ।। रयणत्तयस्त रूपे अजाकम्मे दयाइसद्धम्मे । इच्छेवमाइगे जो वट्टइ सो होइ सुहभावो ॥ ६५ ।। रत्नत्रयस्य रूपे आयकर्मणि दयादिधर्मे । इत्येवमादिके यो वर्तत स भाति शुभभाव ॥ सम्मन्नगुणादो सुगइ मिच्छादो होइ दुग्गई णियमा । इदि जाण किमिह बहुणा जं ते रुच्चइ तं कुणहो ॥६६॥ सम्यक्त्वगुणत मुगति मिथ्यात्वती भवति दुर्गति नियमात्। इति जानीहि किमिह बहुना यत्तुम्य रोचत तत्कुरु ।। मोहु ण छिज्जइ अप्पा दारुणकम्मं करेइ बहुवारं । ण हु पानइ भवतीर कि बहुदुक्सं बहेइ मूढमई ॥ ६७॥ मोह न छिनत्ति आमा दारुणकर्म करोति बहुवार । न हि प्राप्नोति भवतीर किं बहुदु खं वहति मूढमति ॥ धरियउ चाहिरि लिंग परिहरियउ बाहिरक्ससोसं हि । करियउ फिरियाकम्मं मरिऊ जमिऊ बहिरप्पजिऊ ॥६॥ धरति बाह्य लिंग परिहरति बाह्याक्षसौख्य हि । करोति क्रियाकर्म मरति जायते वहिरात्मजीन । मोरसणिमिनं दुरसं वहेइ परलोयदिहि तणुदिट्टी। मिन्छाभाव ण छिज्जइ कि पावइ मोक्ससोसं हि ॥ ६९ ॥ १ कम्मो क । २ वि स । ३ मरियउ जमियउ बहिरप्पजीवो ख ।
४०६ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- मोक्षनिमित्त दुखं वहति परलोकदिष्टि तनुदिष्टि । मिथ्यात्वभावान् न छिनत्ति किं प्राप्नोति मोक्षसौरय हि ॥ ण हु टंडइ कोहाई देहं दंडड कहं सवइ कम्म । सप्पो कि मुवइ तहा वम्मीए मारिए लोएं ॥ ७० ॥ न हि दण्डयति क्रोधादीनि देह दडयति कर्य क्षिपते कर्म। सर्प किं म्रियते तथा वामीके मारिते लोके ।। उर्वसमभवमावर्जुदो णाणी सो भावसंजदो होइ । णाणी कसायवसगो असंजदो होड सो तार ॥७१ ॥ उपशमभवभावयुतो ज्ञानी स भारसयतो भवति । ज्ञानी कपायवशगोऽसयतो भवति स तारत् ॥ णाणी सवेइ कम्मं णाणवलेणेदि सुवोलए अण्णाणी। विजो मेसज्जमहं जाणे इदि णस्सदे वाही ।। ७२ ।। ज्ञानी क्षिपते कर्म ज्ञानबलेनेति सुकथयति अज्ञानी । वैद्यो भेषज अह जानामीति नाशयति वाधि। पुल्वं सेवइ मिच्छामलसोहणहेउ सम्ममेसज्ज । पच्छा सेवइ कम्मामयणासणचरियसम्ममेसजं ॥७३॥ पूर्व सवते मिघ्यावमलशोधनहतु सम्यक्त्वभेषज । पश्चात् सेवते कर्मामयनाशनचरितसम्याभेपर्ज। अण्णाणी विसयविरत्तादो होइ सयसहस्सगुणो। गाणी कमायविरदो विसयासत्तो जिशुदिदं ॥७४॥ १ वम्मिउ मारिट के । २ भस्मादने क-पुस्तके विसहरमणि इति शन्द । ३ तव स । ४ सुदो के ।५ ताव स । ६ण जाणदे णस्सदे वाहिस ।
रयणसारः। ४०७ अज्ञानित: विषयविरक्ततः भरति शतसहस्त्रगुणः। ज्ञानी कपायविरतः विषयासक्तः जिनोद्दिष्टम् ॥ विणओ भत्तिविहीणो महिलाणं रोयणं विणा णेहं । चागो वेरग विणा एदे दोबारिया भणिया ।। ७५ ॥ विनयो भक्तिविहीनः महिलानां रोधन विना स्नेह । त्यागो वैराग्यं विना एते दुर्वारका भगिता ।। सुहडो सूरत विणा महिला सोहग्गरहियपरिसोहा। वेरग्गणाणसंजमहीणा सवणा ण किं वि लभते ॥७६॥ मुभटः शूरत्वं पिना महिला सौभाग्यरहितपरिशोभा । वैराग्यशानसंयमहीना क्षपणा न किमपि लभन्ते ॥ वत्थुसमग्गो मूढो लोहि ये लहिएं फलं जहा पंच्छा। अण्णाणी जो विसर्यपरिचत्तो लहइ तहा चे ॥ ७७॥ वस्तुसमग्रो मूढो लोभी च लभते फलं यथा पश्चात् । अज्ञानी यो विषयपरित्यक्तो लभते तथैव ।। वत्युसमग्गो गाणी सुपत्तदोणी फलं जहा लहइ । माणसमग्गो विसयपरिचत्तो लहइ तहा चेव ॥ ७८ ॥ यस्तुसमग्रो ज्ञानी सुपात्रदानी फलं यथा लभते । ज्ञानसमग्रो विषयपरित्यक्तो लमते तथैव ।। भूमहिलाकण्णाईलोहाहिविसहरं कह पि हवे । सम्मत्तणाणवरग्गोसंहमंतेण जिणुद्दिहं ॥ ७९ ॥ १ सोही. स. । २ सहा. स. । ३ पेच्छा क.I४ विसयासतो. स.१५ दाणे स.। ६ कगार क.७ इ. क.1 ८ कहिप. स.। १ मतेग स.। घरगसहमंतेण क..
श्रीकुदकुन्दाचार्यविरचितो- भूमहिला-पादिलोभाहिनियहरो पथमपि भवत् । सम्यक्त्वज्ञानवैराग्यौपधमत्रेण जिनोदिष्ट । पुव्वं जो पंचेंदियतणुमणुगचिहत्यपायमुंडहरो। पच्छा सिरमुंडहरो सिगइपहणायगो होई ।। ८० ॥ पूर्व य पचेद्रियतनुमनामाग्यस्तपादमुहहर । पश्चात् शिरोमुडहर शिवगतिपथनायको भवति ॥ पतिभत्तिविहीण सदी मियो य जिणसमयभत्तिहीण जई । गुरुभत्तिहीण सिस्मो दुग्गइमग्गाणुलग्गणो णियाँ ॥८१॥ पतिभक्तिविहीना सती भृयश्च जिनसमयभक्तिहीनो यति । गुरुभक्तिहीन शिष्यो दुर्गतिमार्गानुलग्नो नियमात् ।। गुरुभत्तिविहीणाणं सिस्साणं सव्वसगनिरदाण । उसरेछेते पवियसुपीयसमं जाण सव्वणुशाणं ॥ ८२ ॥ गुरुभक्तिविहीनाना शिष्याना सर्वसङ्गविरताना । ऊपरक्षेत्रे उपितमुचीनसम जानीहि सर्वानुष्टान ॥ रज्जं पहाणहीणं पदिहीणं देसगामरबलं । गुरुमत्तिहीणसिस्साहाणं णस्सदे मव्वं ॥ ८३ ॥ राज्य प्रधानहीन पतिहीन देशपामार्थनल । गुरुभक्तिहीनशिष्यानुप्रान नश्यति सौ ॥ सम्माण विणे य रुई भत्ति विणा दाण दया विणा धम्म । गुरुभत्ति विणा तपचरित्त णिलं जाण ।। ८४ ॥ १ मण स ।२ मुडाउ क । ३लग्गदोस । ४शियदा स । ५ खेते स । ६ विण पिणयाई ख । ७ रूपी क ।
रयणसार । सम्मान विना च रुचि भक्ति मिना दान दया विना धर्म । गुरभक्ति विना तपश्चारित्र निष्फलं जानाहि ॥ हाणादाणपियारविहीणदो बाहिरक्ससुक्स हि। कि तजिय कि भर्जियं कि मोक्खु दिदं जिणुदि ।। ८५ ॥ हानादानविचारविहीनत बालाक्षमुख हि । किं त्यक्त किं भजित कि मोक्षो दृष्टो जिनदृष्ट ॥ कायकिलेमुरवासं दुद्धरतरसरणकारणं जाण । तं णियसुद्धसरूपपरिपुण्णं चेदि कम्मणिम्मूलं ॥८६॥ कायलझोपवास दुर्धरतपश्चरणकारण जानीहि । तन्निजशुद्धस्वरूपपरिपूर्ण आत्मनि फर्मनिर्मूल ।। कम्मु ण सर्वइ जो हु पराम्ह ण जाणेइ सम्मउम्मुको। अत्यु ण तत्थु ण जीयो लिंगं घेण कि करई ।। ८७ ॥ कर्म न क्षिपते या हि परब्रम न जानाति सम्यक्त्वोन्मुक्त । अत्र न तत्र न जीवो लिंग गृहीवा किं करोति ।। अप्पाणं पिण पिच्छदण मुणइ ण वि सद्दहइ ण मावेइ । यहुदुक्सभारमूलं लिंग चित्तूण कि करई ॥ ८८ ॥ आत्मानमपि न पश्यति न जानाति नापि श्रद्दधाति न भावयति । बहदु खभारमूलं लिंग गृहीका किं करोति ।। जाप ण जाणइ अप्पा अप्पाणं दुक्समप्पणो तार । तेण अणंतमुहाणं अप्पाणं भाषए जोई ॥ ८९ ॥ १ भणिय छ । २ किं मोक्सो ग दिव सु । ३ मियमुहपहपरिपण ख 1 घाण रा।
श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- यावन्न जानाति आत्मा आत्मानं दु.खमात्मनस्तापत् । तेनानन्तसुखमात्मानं भावयेत् योगी ॥ •णियतञ्चुवलद्धि विणा सम्मत्तुवलद्धि णत्यि णियमेण । सम्मनुपलद्धि विणा णिव्याणं णत्थि जिणुदिहं ॥९॥ निजतत्वोपलब्धि पिना सम्यक्त्वोपलब्धिर्नास्ति । सम्यक्त्वोपलब्धि विना निर्माण नास्ति जिनदृष्टं ॥ पवयणसारन्मासं परमप्पाझाणकारणं झाणं । कम्मक्सवणणिमित्तं कम्मक्सवणेहि मोक्समोसं हि ॥११॥ प्रपचनसाराभ्यासं परमात्मध्यानकारर्ण पान । कर्मक्षपणनिमित्तं कर्मक्षपणे मोक्षसौरपं हि ।। सालविहीणो राउ दाणदयाधम्मरहियगिहसोहा । पाणनिहीपतरो शिय जीन विणा देहसोहं च ॥१२॥ सालविहीनो राजा दानदयाधर्मरहितगृहिशोभा । ज्ञानविहीनतपोऽपि च जी विना देहशोभा च ॥ मक्सि सिलिम्मे पडिओ मुबह जहा तह परिग्गहे पडिउँ । लोही मूढो सवणो कायकिलेसेसु अण्णाणी ।। ९३ ॥ मक्षिका श्लेष्माण पतिता प्रियते यथा तथा परिप्रहे पतितः। लोमी मूढः क्षपणः कायकेशेषु अज्ञानी । णाणमासविहीणो सपरं तचंग जाणए कि पि। झाणं तस्स ण होइ हु तारण कम्मं सह ण हु मोरसो॥९॥ १ नेद गाथासूच. ख-पुस्तके अत्र स्थले किन्तु बहो। २. स. सिनिम्मपहियों स.।४ योस ।
रयणसारः। ज्ञानाम्यासविहीनः स्वपरं तत्वं न जानाति किमपि । ध्यान तस्य न भवति हि तापन कर्म क्षपयति न हि मोक्षः॥ अज्झयणमेव झाणं पंचेंदियणिग्गहं कसायं पि । तो पंचमयाले पक्-यणमारम्भासमेव कुजाहो ॥१५॥ अध्ययनमेव ध्यान पंचेन्द्रियनिग्रहो कपायस्यापि । ततः पंचमकाले प्रवचनसारभ्यासमेव कुर्यात् ।। धम्मज्झाणमासं करेइ तिविहेण जाव सुद्धेण । परमप्पझाणचेतो तेणेव सवेइ कम्माणि ।। ९६ ॥ धर्म्यध्यानाभ्यासं करोति त्रिविधेन यावच्छुद्धेन । परमात्मध्यानचेताः तेनैव क्षपयति कर्माणि ।। पावारंभणिवित्ती पुण्णारंभे पउत्तिकरणं पि । णाणं धम्मज्झाणं जिणभणियं सव्वजीवाणं ।। ९७ ॥ पापारंभानिवृत्तिः पुण्यारंभे प्रवृत्तिकरणमपि । ज्ञानं धर्म्यध्यानं जिनभणितं सर्वजीवाना ।। सुदणाणमासं जो कुणई सम्म ण होइ तवयरणं । कुवं जइ मूढमइ संसारसुखाणुरत्तो सो ॥ ९८ ॥ श्रुतज्ञानाम्यासं यः करोति सम्यक्त्वं न भवति तपश्चरणं । कुर्वन् यतिः मूढमति. संसारसुखानुरक्त- सः ॥ तचवियारणसीलो मोक्खपहाराहणासहावजुदो । अणवरयं धम्मकहापसंगदो होइ मुणिराओ ॥९९ ॥ तत्तो. ख.। २ ग कुणइ. स. ३ कुर्वतो मूढ. स.1 ४ो. क.।
४१२ भीकुन्दमुन्दाचार्यविरचित्तो- तपविचारणशीलो माक्षपथारायनास्यभारयुत । अनवरत धर्मकथाप्रसगता भरति मुनिराज || पिकहाइपिप्पमुक्को आहाकम्माइनिरहिओ णाणी । धम्मुद्देसणकुमलो अणुपेहाभावणाजुदो जोई ॥१०॥ पिकवादिविप्रमुक्त आधाकर्मादिविरहितो ज्ञानी । धर्मदेशनाकुशलाऽनुप्रेक्षाभावनायुतो योगी॥ अवियप्यो णिबंदो पिम्मोहो गिक्कलंकओ गियदो। जिम्मलमहावजुत्तो जोई सो होड मुणिराओ ।। १०१।। अविकल्पो निर्द्वद्वो निर्मोहो निष्कटको नियत । निर्मलस्वमाययुक्तो यागा स भवति मुनिराज || जिंदाचणदूरो परिसहउवमग्गदुक्स सहमाणो । सुहझाणज्झयणरदो गयसंगो होइ मुणिराओ ॥ १०२ ॥ निदारचनादूर परीपहोपसर्गदु ख सहमान शुभधानाध्ययनरतो गतसङ्गो भवति मुनिराज ॥ तिचं कायफिलेसं कुव्वंतो मिन्छभानसंजुत्तो। सवण्णुपएसे सो णिच्वाणमुहं ण गर्छई ॥१०३॥ तोत्र कायाशं पुर्वन् मिथ्यात्वमारसयुक्त । सर्वज्ञोपदेगन स निर्माणमुग्वं न गच्छति ।। रायाडमलनुदाणं णियापरूण दिस्मर किंपि। ममलादरिसे रूण दिस्मए जह नहा णेय ।। १०४।। ४ या रा।
रयणसारः। ४१३ रागादिमलयुक्ताना निजात्मरूपं न दृश्यते किमपि । समलादर्श रूप न दृश्यते यथा तथा ज्ञेयम् ॥ दंडत्तयसल्लत्तयमंडियमाणो असूयगो साहू । भंडणजायणसीलो हिंडइ सो दाहसंसारे ॥१०५ ॥ दण्डत्रयशल्यत्रयमण्डितमानोऽसूयफः साधुः । भण्डनयाचनाशीलो हिण्डते स दीर्घसंसारे ॥ देहादिसु अणुरत्ता विसयामत्ता कमायसंजुत्ता। अप्पसहाये मुत्ता ते साहू सम्मपरिचत्ता ।। १०६ ॥ देहादिपु अनुरक्ता विषयासक्ताः कपयसंयुक्ताः । आत्मस्वभारे सुताः ते साधवः सम्यक्त्वपरित्यक्ता ।। आरंभे धणधण्यो उवयरणे कक्खिया तहा सूया। वयगुणसीलविहीणा कसायकलहप्पिया मुहुरा ॥१०७॥ आरम्भे धनधान्ये उपकरणे कक्षितास्तथा सूयाः । व्रतगुणशीलविहीनाः कषायकलहप्रिया मुखराः ॥ संघविरोहकुसीला सच्छंदा रहियगुरुकुला मूढा । रायाइसेवया ते जिणधम्मविराहिया साहू ॥ १०८ ॥ संघविरोधकुशीला: स्वच्छन्दा रहितगुरुकुला मूढाः । राजादिसेवकाः ते जिनधर्मविरायका. साधवः ॥ जोइसविजामंतोपजीवणं वा य वस्सववहारं । धणधण्णपडिग्गहणं समणाणं दूसणं होई ॥ १०९ ॥ ज्योतिर्विद्यामंत्रोपनीरनं वा च वर्पव्यवहारं ।। धनधान्यप्रतिग्रहण भ्रमणाना दूषण भवति ॥
११४ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- वसहीपडिमोनयरणे गणगच्छे समयजाइकुले। सिस्सपडिसिस्सछत्ते सुतजाते कप्पड़े पुन्छ ।।११०।। वसतिप्रतिमोपकरणे गणगच्छे समयजातिमुले । शिध्यप्रतिशिष्यच्छाने मुतजाते कपटे पुस्तके । पिच्छे संत्थरणे इच्छोमु लोहेण कुणड ममयार। यावंच अट्टरुदं ताच ण मुंचेदि ण हु सोसं ॥१११॥ पिच्छिकाया सस्तरे इच्छामु लोभन करोति ममकार । याच आर्तरोद तापन्न मुञ्चति न हि मुख ॥ जे पावारभरया कसायजुत्ता परिग्गहासत्ता। लोयवनहारपउरा ते साहू सम्मउम्मका ।।११२॥ ये पापारंभरता कपाययुक्ता परिमहासत्ता । लोकव्यवहारप्रचुरा ते साधर सम्यक्त्वोन्मुक्ता ॥ चम्महिममलबलुद्धो सुणहो गजए मुणिं ? दिवा । जह पाविहो सो धम्मि दिदा सगीयहो॥११३ ।। चर्मास्थिमांसलपलब्ध गुनक गर्नति मुनि दृष्ट्वा । यथा पापिष्ट स धर्मिष्टं दृष्ट्वा पा सहति इयरदप्पं थुवंति अप्पाण अप्पमहप्पं । जिम्मणिमित्त कुणंति ते साहू सम्मउम्मुका ॥१२४ ॥ न सहन्ते इतरदपै स्तुवत्ति आ मना ममाहात्म्यं । जिल्हानिमित्त कुर्वन्ति ते साधव सम्यक्रो मुक्ता ॥ १ मुवइचारमु क परिग्रहेषु । ३ तावत्य क.। ३-, 11--11-गाया द्वय मनस्यले नास्ति स पुस्तके। ४ नेद गापासूर्य स-पुस्तके । ५ गुति ये । पप स रयणसार । ४१५ भुंजेइ जहालाहं लहेइ जइ णाणसंजमणिमित्तं । झाणज्झयणणिमित्तं अणियारो मोक्समग्गरवो ।। ११५ ।। भुक्ते यथालाभ लभते यति ज्ञानसयमनिमित्त । ध्यानाध्ययननिमित्त अन्गारो मोक्षमार्गरत । उयरग्गिसमणमक्समक्रण गोयार सम्भपूरण भमर । णाऊण तप्पयारे णिच एव मुंजए भिक्खु ॥ ११६ ॥ उदरानिशमन अक्षम्रक्षण गोचार श्वम्रपूरण भ्रमर । ज्ञात्वा तत्प्रकारान् नित्यमेव भुक्तां भिक्षु ॥ रसरुहिरमंसमेदहिसुकिलमलमुत्तपूयकिमिबहुलं । दुग्गंधमसुइचम्ममयमणिचमचेयणं पडणं ।। ११७ ॥ रसरुधिरमासमेदोऽस्थिशुक्लमलमूत्रपूयकृमिबहुल । दुर्गधमशुचि चर्ममयमनित्यमचेतन पतन ॥ बहुदुक्सभायणं कम्मकारणं भिण्णमप्पणो देही । तं देहं धम्माणुहाणकारणं चेदि पोसए भिक्खू ।। ११८ ।। बहुदु खभाजनं कर्मकारण भिन्न आत्मनो देह । ते देह धर्मानुष्ठानकारण चेति पोषयेत् भिक्षु । कोहेण य कलहेण य जायणसीलेण सकिलेसेण । रुदेण य रोसेण य भुंजइ किं वितरो भिक्खू ॥ ११९ ॥ क्रोधेन च कलहेन च याचनाशीलेन सक्लेशेन । रुद्रेण च रोपेण च मुक्ते कि व्यन्तरो भिक्षु ॥ दिव्युत्तरणसरित्थं जाणिचाहो घरेह जइ मुद्धो । तत्तायसपिंडसम भिक्खू तुह पाणिगयपिंडं ॥ १२० ।। १ देहे ख।
maranMake ४१६ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- दिव्योत्तरणसदृशं ज्ञाला अहो घर यदि शुद्धं । तप्ताय:पिण्डसम भिक्षो! तब पाणिगतपिण्डं ।। संजमतवझाणज्झयविण्याणए मिण्हए पदिग्गहणं । वचइ गिण्हइ भिक्खू ण सक्कदै पजिदं दुकरं ॥ १२१ ॥ संयमतपोध्यानाध्ययन विज्ञानकेन गृह्णाति प्रतिग्रहणं । त्यस्वा गृह्णाति भिक्षु न शक्नोति वजितुं दुःखं । भुत्तो अयोगुलोसइयो तत्तो अग्गिसिखोपमो यजे । भुंजइ ये दुस्साला रत्नप्पिडं असंयत्ती ।। १२२ ।। ..... । अविरददेसमहव्यइ आगमरुदण विचारतचण्डं । पत्तंत्तरं सहस्सं णिदिई जिणवरिंदेहिं ॥१२३ ।। अविरतदेशमहावतिनां आगमरुचीनां विचारतन्यज्ञानां । पात्रान्तरं सहस्रं निर्दिष्टं जिनवरंन्दैः॥ उपसमणिरीहझाणझयणाइमहागुणा जहा दिया । जेसिं ते मुणिणाहा उत्तमपत्ता तहा भणिया ॥ १२४ ।। उपशमनिरीहच्यानाध्ययनमहागुणा यथा दृष्टाः । येषां ते मुनिनाथा उत्तमपात्राणि तथा भणिताः ॥ दसणसुद्धो धम्मज्झाणरदो संवन्निदो णिसल्लो। पत्तविसेसो मणियो तें गुणहीणो विवरीदो ॥ १२५ ॥ दर्शनो धर्म्यध्यानरतः संवर्जितः निःशल्यः । पात्रविशेषो मणितः तेर्गुणः हीनस्तु विपरीतः ।। १ अस्या गाथाया भाची नावगतः पुस्तकयेऽपि अशुदायमाति । २तं पुस्तक येऽपि पाठः ३ नेयं गापा स. पुस्तके।
........ रयणसारः! ४१७ सम्माइगुणविसेसं पत्तविसेसं जिणेहि णिदिई । ..॥ १२६ ॥ सम्यक्त्वादिगुणविशेष: पात्र विशेपो जिनः निर्दिष्टः । ......॥ प वि जाणइ जिणसिद्धसरूव तिविहेण तह णियप्पाणं । जो तिव्वं कुणइ तवं सो हिंडइ दाहसंसारे ।। १२७ ॥ नापि जानाति जिनसिद्धस्वरूप त्रिविधेन तथा निजात्मानं । यः तीनं करोति तपः स हिंडते दीर्घसंसारे । णिच्छयववहारसरुवं जो रयणतयं ण जाणइ सो। जं कीरइ तं मिच्छारूवं सव्वं जिणुद्दिहं ॥ १२८ ॥ निश्चयव्यवहारस्वरूप यो रत्नत्रयं न जानाति स.। यत्करोति तन्मिध्यारूपं सर्व जिनदृष्टं ।। कि जाणिज्य सयलं तचं किच्चा तवं च किं बहुलं । सम्मविसोहि विहीणं णाणतवं जाण भवदीयं ।। १२९ ।। कि ज्ञात्वा सकलं तत्वं कृत्वा तप च किंबहुलं । सम्यक्त्वविशुद्धिविहीन ज्ञानतप. जानीहि भवबीज ।। वयगुणसीलपरीसहजयं च चरियं च तवं छडावसयं । झाण झयणं सव्वं सम्म विणा जाण भवयीयं ।। १३०॥ तगुणशीलपरीपहजयं च चरितं च तप. पडावश्यकानि । ध्यानं अध्ययन सर्व सम्यक्त्वं बिना जानीहि भवत्रीजें साई पूजा लाहं मस्काराई फिमिन्छसे जोई। इच्छसि जड परलोयं हिं किं तुझ परलोयं ॥ १३१ ॥ १ गाथेय रा-पुस्तके नास्ति । ॥
४१८ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचितो- ख्याति पूजा लाभ सत्कारादि किमिच्छसि योगिन् ।। इच्छसि यदि परलोक ते किं तत्र परटोक ॥ कम्मादविहावसहारगुणं जो भाविऊण भावेण । णियसुद्धप्पा रुबड तस्म य णियमेण होइ णिवाणं ॥१३२॥ कर्मात्मरिभाषस्वभारगुण यो भारयित्वा भावेन । निजशुद्धात्मा रोचते तस्मै च नियमेन भवति निर्माण ॥ मूलत्तरुत्तरत्तरदव्याठी मारकम्मदो मुस्को । आसवांधणसंवरणिज्जर जाणेह कि बद्गुणा ।। १३३ ।। मूलोत्तरोत्तरद्रव्यत भाषकर्मत: मुक्त । आस्रवबन्धनसवरनिर्जरा जानीहि किं बहुना ।। विसयविरत्तो मुंचद् विसयासत्तो ण मुंचए जोई । पहिरतरपरमप्पाभेयं जाणेह किं बहुणा ।। १३४ ॥ विपयविरक्तो मुचति पियासक्तो न मुञ्चति योगी। वहिरन्त परमाममेद जानीहि किं वहुना ।। अप्पाण णाणझाणज्झयणसुहमियरसायणप्पाणं । मोत्तूणप्रसाण सुहं जो भुंजइ सो हु बहिरप्पा ।। १३५॥ आमनो ज्ञानव्यानाध्ययनमुखामृतरसायनपान । मुक्त्वा अक्षाणा सुखं यो भुक्ते स हि वहिरात्मा ॥ किंपायफलं पदं विममिस्मिटमोदगिंग चारमुहं । जिन्भमुह दिटिपियं जह तह जाणासमोरसं पि ॥१३६ ॥ रिम्पाकाल रिपमिश्रितमोदक चारमुख । जिन्हामुख दृष्टिप्रिय यथा तथा जानीहि अक्षमुखमपि । भासवसवरपिचरभेय स। २गियअप्पणाण स। ३ मोदविवारगमोहस।
रयणसार । देह कलत्तं पुत्तं मित्ताइ निहारचेदणारूनं । अप्पसरू भावइ सो चेव हवेइ बहिरप्पा ॥१३७॥ देह कलत्र पुत्र मित्रादिक विभावचेतनारूप । आत्मस्वरूप भावयति स एव भरेत् बहिरात्मा । इंदियविसयसुहाइमु मूढमई रमेइ ण लहई तचं । बहुदुक्समिदि ण चिंतइ सो चे हवेइ बहिरप्पा ॥१३८ ॥ इन्द्रियविषयसुखादिषु मूढमति रमते न लभते तत्व । बहुदु खमिति न चिन्तयति स एव भवेत् घहिरात्मा ॥ जं जं अक्साण सुहं तं तं तिव्वं करेइ बहुदुक्सं । अप्पाणमिदि ण चिंतइ सो व हवेइ बहिरप्पा ॥१३९॥ यद्यदक्षाणा मुखं तत्तत्तीव्र करोति बहुदु ख । आत्मानमिति न चि तयति स एव भवेद्वहिरात्मा ।। जेसिं अमेज्झमज्झे उप्पण्णाणं हवेइ तत्थैव रुई। तह बहिरप्पाणं वाहिरिदियनिसएमु होइ मई ॥१४॥ येपा अमेप्यमध्ये उत्पन्नाना भवत् तत्रै रुचि । तथा बहिरामना बहिरिद्रियविपयेषु भवति मति ॥ सिविणे वि ण भुंजइ विसयाई देहाइभिण्णभावमई । 'जइ णियप्परूवो सिवसुहरत्तो दु मज्झिमप्पो सो ॥१४॥ स्वप्नेऽपि न मुक्त विषयान् देहादिभिनभानमति । भुक्ते निजामरूपं शिवसुखरक्त तु मध्यमात्मा स । मलमुत्तघडव्य चिर वासिय दुव्यासणं ण मुंचेइ । पासालियसम्मत्तजलो येण्णाणम्मएण पुण्णो वि ॥ १४२ ॥ १रमइ लहइ ण लहई त ख । २ वि य णाणावियेण पुणो विस।
४२० श्रीकुन्दकुदाचार्यविरचितो- मलमूत्रपटवत् चिरै वासिता दुर्वासना न मुञ्चति । प्रक्षालितसम्यक्त्वजलो यज्ञानामृतन पूर्णोऽपि । सम्माइट्टी णाणी असाण मुहं कहं पि अणुहवइ । केगापि ण परिहारण पाहणविणामण भेमजं ।। १४३ ।। सम्पादृष्टि ज्ञानी अक्षाणा मुव कथमपि अनुभवति । केनापि न परिहारपति व्याधिविनाशार्थ भेषजं ॥ कि वहुणा हो नजि यहिरप्पसरूपाणि सयलभाषाणि । भजि मज्झिमपरमप्पा वत्थुसरूवाणि मागाणि ॥१४४॥ किं बहुना अहो त्यज बहिरामस्वरूपान् सकलभायान् । भज मध्पमपरमात्मना वस्तुस्वरूपान् भानान् ॥ चउगइसंसारगमणकारणभूयाणि दुक्सहेऊणि । ताणि हये पहिरप्पा वत्थुसरूवाणि भावाणि ।। १४५॥ चतुतिसंसारगमनकारणभूता दुखहेतर । ते भान्ति बहिरामा यस्तुस्वरूपा भावा ॥ मोक्सगडगमणकारणभूयाणि पमत्यपुण्णहेउणि । ताणि हवे दुविहप्पा वत्युसरूमाणि भागाणि ॥१४६॥ मोक्षगतिगमनकारणभूता प्रशस्तपुण्यहेतव । ते भगति द्विविधामना पतुस्परूपा भाग। दव्यगुणपजएहि जाणड परममयमममयादिविमेयं । अप्पाणं जाणइ मो मिनगटपहणायगो होई ॥१४७|| द्रव्यगुणपर्यायै जानानि परममपस्यममयादिविभेदं । आमान जानाति स शिरगपथनाययो मरति।। 1वादिमागणदसा रयणसारः। ४२१ बहिरंतरप्पमेयं परसमय भण्णये जिणिदेहि । परमप्पो सगसमयं तब्भेयं जाण गुणठापणे ॥१४८॥ बहिरन्तरात्मभेदः परसमयः भण्यते जिनेन्द्रैः। परमात्मा स्वकसमय तद्भद जानीहि गुणस्थाने ॥ मिस्मोत्ति बाहिरप्पा तरतमया तुरिय अंतरप्पजहण्णा । संतोत्ति मज्झिमंतर खीणुत्तम परम जिणसिद्धा ॥१४९।। मिति बहिरामा तरतमक• तुर्थे अन्तरात्मजघन्यः । शान्तेति मध्यमान्तः क्षीणे उत्तमः परमा: जिनसिद्धाः ॥ मुढत्तयसाइचयदोसत्तयदंडगारवतयेहिं । परिमुको जोई सो सिवगइपहणायगो होई ॥१५०॥ मूढत्रयशल्यत्रयदोपत्रयदण्डगारवत्रौ । परिमुक्तो योगी स शिवगतिपथनायको भवति । रयणत्तयकरणत्तयजोगत्तयगुत्तित्तयविमुद्धहि । संजुत्तो जोई सो सिवगइपहणायगो होई ॥१५१॥ रत्नत्रयकरणत्रययोगत्रयगुप्तिरयविशुद्धैः । सयुक्तो योगी स शिवगतिपधनायको भवति ।। बहिरभंतरगंथविम्मुक्को मुद्धोवजोयसंजुत्तो। मूलुचरगुणपुण्णो सिवगइपहणायगो होई ॥१५२॥ बहिरभ्यन्तरमन्थविमुक्तः शुद्धोपयोगसंयुक्तः । मूलोत्तरगुणपूर्णः शिवगतिपथनायको भवति । जं जाइ जरामरणंदुहदुदृषिसाहिविसविणासयरं । सिवसुहलाई सम्म संभावई सुणई साहएं साहू ॥१५॥ १-२ य.स।ये. स।
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४२२
श्रीकुन्दबुदाचार्यविरचितो-
यजातिजरामरणदुखदुष्टविपाहिविपविनाशकर ।
शिपमुखलाम सम्पक्वं संभाग्य शृणु साधक साधो ! ॥
कि नहुणा हो देविंदाहिदणरिंदगणधारदेहि ।
पुजा परमप्पा जे तं जाण पहाणसम्मगुणं ।।१५।।
किंबहुना अहो देवेन्द्राहीन्द्रनरेन्द्रगणधरेन्द्र ।
पूज्या परमा मान ये तज्जानीहि प्रधानमम्यक्त्वगुण ॥
उपममई सम्मत्तं मिच्छत्त बलेण पेल्लए तस्म ।
परिवहृति कसाया अपसप्पिणिकालदोसेण ॥१५५।।
उपशमक सम्यक्त्व मिथ्यात्वं यटेन क्षिपति तत् ।।
परिवर्त ते पाया अवसर्पिणीकालदोपण ।।
गुणवयतमममपडिमांदाणं जलगालणं अणत्यमियं ।
दसणणाणचरितं किरिया तेवण्ण सानया मणिया ।।१५६॥
गुणवततप समप्रतिमादानं जटगाटनं अनस्तमित ।
दर्शनज्ञानचरिन क्रिया त्रिपंचाशत् प्राधिका भणिता ॥
णापोण शाणसिद्धी झाणादो मव्यकम्मणिज्जरणं ।
मिनरणफलं मोसं पाणन्भासं तदो कुना ॥१५७।।
ज्ञानेन ध्यानसिद्धि प्यानत सकर्मनिर्भरणं ।
निर्भरणपलं मोक्ष ज्ञानाम्याम तत दुर्यात् ।।
कुमलस्म तो णिचुणस्स सजमो समपरस्म बेरग्गो।
सुदभावणेण तत्तिय तम्हा मुदमावणं कुणह ॥१५८।।
१ अस्मादायासूत्रादप्र १२१ भके स्थिता गाथा पुनररि रिखिन-पुस्तके
वर्तते । सान भत्र पुनर्न मुदिता । स पुस्तके तु अव तत, न तु तत्र ।
२ रात्रिभुक्तिन ।
रयणसार । ४२३ कुशलस्य तप निपुणस्य सयम समपरस्य वैराग्य । ध्रुतभावनेन तनय तस्माच्छ्रुतभावना कुर्यात् ॥ कालमर्णत जीवो मिच्छसरूवेण पंचसंसारे। हिदि ण लेई सम्मं संसारब्ममणपारभो ॥१५९॥ कालमनन्त जीवो मिथ्यात्वस्यरूपेण पंचसंसारे । हिण्डते न लभते सम्यक्त्य संसारभ्रमणप्रारम्म । सम्मईसणसुद्धं जाव दु लभते हि ताव सुही। सम्मदंसणसुद्धं जाव ण लभते हि ताव दुही ॥१६०॥ सम्पग्दर्शनशुद्ध पारत्तु लभते हि तावत् सुखी। सम्यग्दर्शनशुद्ध यापन्न लभते हि तावहु खी ॥ कि बहुणा वचणेण दु सव्वं दुक्खेव सम्मत्त मिणा । सम्मत्तेण वि जुतं सव्यं सोक्खेव जाणं सु॥१६॥ कि बहुना वचनेन तु सर्व दु खमेर सम्यक्त्वं चिना। सम्यक्त्वेनापि युक्त सनै सुखमेर जानीहि खलु ।। णिखेवणयापमाणं सदालंकारछंद लहिणं । नाटयपुराणकम्म सम्म विणा दीहसंसार ॥१६२॥ निक्षेपनयप्रमाण शब्दालकारद : नाटकपुराणकर्म सम्यक्त्व विना दीर्वससार ॥ स्यणत्तयमेव गणं गच्छं गमणस्स मोक्समग्गस्म । संघो गुणसंघाओ समयो सड णिम्मलो अप्पो ॥१६३॥ १ लहसा२या स । ३ संमारा खा ४ अश्या अग्रे-वमही इति ११० पिच्छे इति ११ गावावर लिखित पुस्तके वर्तते, तच्च पूर्व ४१४ पूछे आगत । स-पुस्तके तु भनव वर्तते न तु पूर्व। ५ अस्मादले मिहिरो इति, मिच्छध इति, पवयणसार इति, धामन्हाण इति च गाथाचतुष्टय। तच पूर्व क्रमेण ५१-५३- 1-14 अके भागत।
४२४ श्रीदकुदाचार्यविरचिता-- LARunnnnara NAVARAJA रत्नत्रयमेर गण गच्छ गमनस्य मोक्षमार्गस्य । सघो गुणसघात समय ख निर्मल आ मा॥ जिणलिंगधरो जोई निरायसम्मत्तसंजुढो गाणी । परमोवेश्साहरियो सिजगहपहणायगो होई' ॥१६४|| जिनलिंगपरो योगी निरागसम्यक्रसथुता ज्ञानी । परमोपक्षादिरिक्त शिनगतिपथनायको भाति ॥ सम्मं णाणं वेरग्गतवोभा णिरीहरित्तिचारित्त । गुणसीलसहान उप्पजड रयणसारमिण ॥१६५।। सम्यक्त्व ज्ञान वैराग्यतपोभाव निरीहवृत्तिचारित्र । गुणशीलस्वभाव उत्पादयति रत्नसारो॥ गंथमिणं जो ण दिड ण हु मण्णड ण हु मुणेद ण हु पढइ । ण हु चिंतह ण हु मानइ सो व हवेइ कुदिट्टी ॥१६६॥ प्रथमिमं यो न पश्यति न हि मन्यते न हि शृणानि न हि पठति । न हि चिन्तयति न हि भावयति स चैर भोत् कुदृष्टि । इदि सजणपुजं रयणमार गथं णिरालसो णिच्च । जो पढइ सुणइ भावइ पावड़ मो सासय ठाण ॥१६७॥ इति सजनपूय रत्नसारपथ निरीटसी निन्य । य पठति शृणोति मारयति प्रामोति स शाश्वतं स्यान । समाप्तोय रयणसार १ अस्या अग्र ५४ अके स्थिता कामदुहीति गाथा बतत लिखित-पुस्तके । स-पुस्तके तु अव । ३ अस्मादने अनविसप्पिणी यादि ६. अंके स्थिता गाया लिखित-पुस्तके, स-पुस्तके लौव ।
वारस अणुवेक्खा। णमिऊण समिद्धे झाणुत्तमसविददीहसमारे । दस दस दो दो य जिणे दम दो अणुपेहणं वोच्छे ॥१॥ नला सर्वसिद्धान ध्यानोत्तमक्षपितदीर्घससारान् । दश दश द्वौ द्वौ च जिनान् दश द्वौ अनुप्रेक्षा वक्ष्ये ।। अद्धचमसरणमेगतमण्णसंसार लोगममुचितं । आसवसंगरणिज्जरधम्मं चोहि च चिंतेजो ॥२॥ अध्रुवमशरणमेकत्वमन्यससारे लोकमशुचित्व । आत्ररसवरनिराधर्म बोधिं च चिन्तयत् ।। परभवणजाणवाहणसयणासण देवमणुवरायाणं । मादुपिदुसजणभिचसंबंधिणो य पिदिपियाणिचा ॥३॥ घरभवनयानगगहनशयनानानि देवमनुजराज्ञाम् । मातृपितृस्वजनभृन्यसम्बधिनश्च रितृभ्योऽनित्या ॥ सामग्गिदियरूवं आरोग्ग जोवणं बलं तेजे। सोहगं लारणं सुरधणुमिव सस्सयं ण हवे ॥ ४ ॥ समप्रेन्द्रियरूपं आरोग्य यौवन बलं तेज । सौभाग्य लापण्य सुरधनुरिख शाश्वत न भवेत् ।। जलयुघुदसक्यणुसणरुचिषणसोहमिव थिर ण हये। अहमिंदवाणाई बलदेवप्पहुदिपज्जाया ॥५॥ जलबुद्रुदशकधनु क्षणरुचिघनशोभेर स्थिर न भवेत् । अहमि द्रस्थानानि बलदेवप्रभृतिपर्याया ॥
१२६ श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता- जीवणिनद्धं देहं सीरोदयमिर निणस्मदे मिग्धं । भोगोपभोगकारणदवं णिचं कहं होदि ॥६॥ जीपनिबद्ध देह क्षीरोदकमिन विनश्यनि शीघ्रम् । भौगोपभोगकारणद्रव्य निय कथ भवति ।। परमटेण दु आदा देवासुरमणुवरायविहवेहि । वदिरित्तो सो अप्पा सस्मदमिदि चिंतए णिचं ॥ ७ ॥ परमार्थेन तु आत्मा देवासुरमनुजराजविभत्र । व्यतिरिक्त स आत्मा शाश्वत इति चिन्तयेत् नियं ।। इत्यवानुप्रेगा। मणिमतोमहरपसा हयगयरहओ य सयलरिज्जाओ। जीवाणं ण हि सरणं तिमु लोए मरणममयम्हि ॥ ८॥ मणिमन्त्रीपधरक्षा हयगजरथाश्च सकलविद्या । जीगाना न हि शरणं त्रियु लोकेषु मरणसमये ।। सग्गो हवे हि दुग्गं मिया देवा य पहरणं यजं । अइरावणो गइंदो इंदस्स ण सिनद मरणं ॥९॥ स्वर्गो भवेत् हि दुगै मृत्या देवाश्च प्रहरण यन्त्र । ऐरावणो गजेद्र इद्रस्य न विद्यते शरण ।। णमणिहि चउदहरयणं हयमत्तगइंटचाउरगरलं चकेसस्म ण सरगं पेच्छंतो कहिये काले ॥ १० ॥ नवनिवि चतुर्दशरत्न हपमत्तगजेन्द्रचतुरङ्गरम् । चकेशस्य न शरण पश्यत पर्दिते कालेन । १रहर सपन, पुस्तके पाट ।
द्वादशानुप्रेक्षा।
जाइजरमरणरोगभयदो रक्सेदि अप्पणो अप्पा ।
तम्हा आदा सरणं बंधोदयसनकम्मवदिरित्तो ॥ ११ ॥
जातिजरामरणरोगभयत रक्षति आत्मानं आत्मा।
तस्मादामा शरण बधोदयसत्वकर्मव्यतिरिक्त ॥
अरुहा सिद्धाइरिया उबझाया साहु पंचपरमेही।
ते वि हु चेदि आदे तम्हा आदा हु मे सरणं ॥ १२ ॥
अर्हन्त सिद्धा आचार्या उपाध्याया साधन पचपरमेष्ठिन ।
ते पि हि तिष्ठन्ति आत्मनि तस्मात् आत्मा हि मे शरणम् ॥
सम्मत्तं सणाणं सच्चारितं च सत्तयो ।
चउरो चेहदि आदे तम्हा आदा हु मे सरणं ॥१३॥
सम्यक्त्वं सद्ज्ञानं सच्चारित्रं च सत्तपश्चैव ।
चत्वारि तिष्ठन्ति आत्मनि तस्मात् आत्मा हि मे शरणम् ॥
इत्यशरणानुप्रेक्षा।
एको करेदि कम्म एको हिडदि य दीहसंमारे।
एको जायदि मरदि य तस्स फलं भुंजदे एको ॥ १४ ॥
एक करोति कर्म एक हिण्डति च दीर्घससारे ।
एक जायते म्रियते च तस्य फल भुङ्क्त एक ॥
एक्को करेदि पावं विसयणिमित्तेण तिब्बलोहेण ।
गिरयतिरियेसु जीनो तस्स फलं भुंजदे एको ॥१५॥
एक करोति पाप विषयनिमित्तेन तीत्रलोभेन ।
नरकतिर्यक्षु जीवो तस्य फलं भुक्ते एक ॥
एको करेदि पुणं धम्मणिमित्रेण पत्तदाणेण ।
मणुवदेवेसु जीवो तस्स फलं भुंजदे एको ॥ १६ ॥
४२८ श्रीन्दमुन्दाचार्यविरचिता-
एक करोति पुण्य धर्मनिमित्तैन पात्रदानेन ।
मानपदेवघु जागो तस्य फल मुङ्क्ते एक ॥
उत्तमपत्तं भणियं मम्मत्तगुणेण संजुदो साहू ।
सम्मादिही सावय मज्झिमपत्तो हु विण्गयो ।।१७।।
रमत्तपात्र भणित सम्यक्रगुणेन सयुत साधु ।
सम्यग्दृष्टि श्रारको मध्यमपान हि पिझप ॥
णिदिहो जिणसमये अविरदसम्मो जहण्णापत्तोत्ति ।
सम्मत्तरयणरहियो अपत्तमिदि संपरिक्सेन्जो ॥१८॥
निर्दिष्ट जिनसमये अगिरतसम्पत्तर जपायपात्रं इति ।
सम्पकवानरहित अपात्रमिति सपरीक्ष्य"
दसणमठा महा दंसणभहस्स गरिय शिवाणं ।
मिज्झंति चरियमहादसणमहाग मिज्मति ॥ १९ ॥
दर्शनभ्रष्टा भ्रष्टा दर्शनभ्रष्टस्य नास्ति निर्माणम् ।
सिद्धपति चरितभ्रष्टा दशनभ्रष्टा न सिद्धपति ।।
एकोह णिम्ममो सुद्धो पाणदंमणलक्राणो ।
मुद्धयत्तमुपादेयमे चिंतेड संजदो॥२०॥
एकोऽहं निर्मम शुद्ध मानदर्शनलक्षण ।
शुद्धकत्तमुपादेयं एष चितपेन् संपन ॥
इस्पेरवानुभेक्षा।
मादापिदरसहोदरपुतकलत्तादियघुसदोहो।
जीरस्म म संबंधो पियकनवसेग वहति ॥ २१ ॥
द्वादशानुप्रेक्षा।
४२९
मातृपितृसहोदरपुत्रफल्बादिबन्धुसन्दोहः ।
जीवस्यन सम्बन्धो निजकार्यवशेन वर्तन्ते ॥
अण्णो अण्णं सोयदि मदोति मम णाहगोत्ति मण्णंतो।
अप्पाणं ण हु सोयदि संमारमहण्णवे पुढें ॥ २२ ॥
अन्यः अन्य शोचति मदीयोस्ति मम नायक इति मन्यमानः ।
आत्मानं न हि शोचति संसारमहार्णवे पतितम् ।।
अण्णं इमं सरीरादिगपि होज वाहिरं दव्वं ।
पाणं देसणमादा एवं चिंतेहि अण्णत्तं ।। २३ ।।
अन्यदिदं शरीरादिक अपि
यत्
भवति बाह्य द्रव्यम् ।
ज्ञानं दर्शनमाया एवं चिन्तय अन्यत्सम् ॥
इत्यन्यत्वानुप्रेक्षा।
पंचविहे संसारे जाइजरामरणरोगमयप्पउरे ।
जिणमग्गमपेच्छंतो जीवो परिभमदि चिरकालं ।। २४ ।'
पंचविधे संसारे जातिजरामरणरोगभयप्रचुरे ।
जिनमार्गमपश्यन् जीवः परिभ्रमति चिरकालम् ।।
सव्वे वि पोग्गला खलु एगे भुतुझिया हु जीवेण ।
असयं अणतखुत्तो पुग्गलपरियदृसंसारे ॥ २५ ॥
सर्वेऽपि पुद्गला: खल एकेन भुक्तोझिता हि जीवेन ।
असकृदनंतकृत्यः पुद्गलपरिवर्तसंसारे ।।
सम्वम्हि लोयखेत्ते कमसो तण्णत्यि जण्ण उप्पणं ।
उग्गाहणेण बहुसी परिभमिदो खेत्तसंसारे ॥२६॥
४३० श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता- सर्वस्मिन् लोकक्षेने क्रमश तन्नास्ति यत्र न उत्पन्न । अनगाहनेन बहुश परिभ्रमित क्षेत्रससारे ।। अपसप्पिणिउस्सप्पिणिसमयावलियासु गिरवसेसेसु। जादो मुदो य बहुसो परिभमिदो कालससारे ॥ २७॥ अवसर्पिण्युत्सर्पिणासमयानलिकासु निरवशेपासु । जात मृत च बहुश परिभ्रमित कालससारे ।। णिरयाउजहण्णादिसु जाव दु उवरिल्लवा (गा) दु गैवेजा। मिच्छत्तसंसिदेण दु बहुसो वि भवहिदी भमिदो ॥२८॥ नरकायुर्जघन्यादिषु यावत् तु उपरितनानि वेयिकाणि । मिथ्यात्वसश्रितेन तु बहुश अपि भवस्थिती भ्रमित ।। सव्वे पयडिहिदिओ अणुभागप्पदेससंघठाणाणि । जीग्रो मिच्छत्तपमा भूमिदो पुण भाउससारे ॥ २९ ।। सर्ग प्रकृतिस्थितयोऽनुभागप्रदेशवधस्थानानि । जीव मिथ्यात्वशात् भ्रमित पुन भावसंसारे ॥ पुतकलचणिमित अत्यं अजयदि पापबुद्धीए । परिहरदि दयादाणं सो जीको भमदि संसारे ॥३०॥ पुत्रक्लानिमित्त अथै अजयति पापबुद्धया । परिहरति दयादान स जीप भ्रमति ससारे ॥ मम पुत्त मम भजा मम धणधष्णोत्ति तिव्वफसाए। चइजण धम्मबुद्धि पच्छा परिपडदि दीहसंमारे ॥३१॥ मम पुत्रो मम भाया मम धनधा यमिति तीत्रकाक्षया । त्याचा धर्मयुद्धि पश्चात् परिपतति दीर्घससारे ॥
द्वादशानुप्रेक्षा। ४३१ मिच्छोदयेण जीवो जिंदंतो जेण्णभासियं धम्म । कुधम्मकुलिंगकुतित्यं मण्णंतो भमदि संसारे ॥ ३२ ॥ मिथ्यात्वोदयेन जीरः निंदन जैनभापित धर्मम् । कुधर्मकुलिङ्गकुतीर्थ मन्यमानः भ्रमति संसारे ॥ हंतूण जीवरासिं महुमंसं सेविऊण सुरपाणं । परदव्यपरकलत्तं गहिऊण य भमदि संसारे ॥३३॥ हत्या जीवराशि मधुमास सेवित्वा सुरापानम् । परद्रव्यपरकल गृहीत्वा च भ्रमति संसारे ।। जत्तेण कुणइ पावं विसपणिमित्तं च अहणिसं जीवो । मोहंधयारसहिओ तेण दु परिपडदि संसारे ॥ ३४ ॥ यत्नेन करोति पापं विषयनिमित्तं च अहर्निश जीरः । मोहान्धकारसहितः तेन तु परिपतति ससारे ॥ णिचिदरधादुसत्त य तरुदस वियलिदिएमु छच्चेव । सुरणिरयतिरियचउरो चोदस मणुवे सदसहस्सा ।। ३५ ॥ नित्येतरधातुसप्त च तरुदश विकलेन्द्रियेषु पट् चैव । सुरनारकतिर्यक्चतस्र. चतुर्दश मनुजे शतसहस्राः ॥ संजोगविप्पजोगं लाहालाहं मुहं च दुक्सं च । संसारे भूदाणं होदि हु माण तहावमाणं च ॥ ३६ ।। संयोगविप्रयोग लाभालाभ मुखं च दुःखं च । ससारे भूताना भाति हि मानं तथावमान च ॥ कामणिमित्तं जीवो हिंडदि संसारपोरकांतारे। जीवस्स ण संसारो णिचयणयकम्मणिम्मुको ॥ ३७॥ १ ससारे अभूदमाण इति पुस्तके पाठ. ।
श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता- सर्वस्मिन् लोकक्षेने क्रमश तनास्ति या न उत्पन्न । अवगाहनेन बहुश परिभ्रमित क्षेत्रससारे ॥ अपसप्पिणिउस्सप्पिणिसमयावलियासु गिरवसेसेसु । जादो मुदो य बहुसो परिभमिदो कालससारे ॥ २७ ॥ अपसर्पिण्युत्सर्पिणीसमयानलिकासु निरवशेषाम् । जात मृत च बहुश परिभ्रमित कालससारे ।। णिरयाउजण्णादिसु जाव दु उवरिल्लवा (गा) दु गेवेजा। मिच्छत्तसंसिदेण दु बहुसो वि भवहिदी भमिदो ॥२८॥ नरकायुर्जघन्यादिपु यावत् तु उपरितनानि प्रैवेयिकाणि । मिध्यात्वसश्रितेन तु बहुश अपि भवस्थितो भ्रमित । सव्वे पयडिहिदिओ अणुभागप्पदेसनंधठाणाणि । जीनो मिच्छत्तमसा भमिदो पुण भारसंसारे ॥ २९ ॥ सर्वा प्रकृतिस्थितयोऽनुभागप्रदेशव धस्थानानि । जीव मिथ्यापनशात् भ्रमित पुन भावसंसारे ॥ पुत्तकलत्तणिमित्तं अत्यं अजयदि पापबुद्धीए । परिहरदि दयादाणं सो जीनो भमटि संसारे ॥३०॥ पुत्रक्लयनिमित्त अर्थ अजयति पापबुद्धया । परिहरति दयादान स जीव भ्रमति ससारे ॥ मम पुत्तं मम भजा मम धणधण्णोत्ति तिव्यकंसाए। चइग्ग धम्मयुद्धिं पच्छा परिपडदि दीहसंमारे ।। ३१ ।। मम पुत्रो मम भार्या मम धनधान्यमिति तीत्रकाक्षया । त्यक्त्वा धर्मगुद्धि पश्चात् परिपतति दीर्घसंसारे ।।
द्वादशानुप्रेक्षा। मिच्छोदयेण जीरो गिदंतो जेण्णभासियं धम्म । कुधम्मकुलिंगकुतित्थं मण्णंतो भमदि संसारे ॥ ३२ ॥ मिथ्यालोदयेन जीव निंदन जैनभापित धर्मम् । कुधर्मकुलिङ्गतीर्थ मन्यमानः भ्रमति ससारे ॥ हंतूण जीरासिं महुमंस सेविऊण सुरपाणं । परदन्वपरकलत्तं गहिऊण य भमदि संसारे ॥३३॥ हला जीवराशिं मधुमास सेवित्वा मुरापानम् । परद्रव्यपरकलन गृहीत्या च भ्रमति ससारे ॥ जत्तेण कुणइ पानं निसपणिमित्तं च अहणिसं जीनो । मोहंधयारसहिओ तेण दु परिपडदि संसारे ॥३४॥ यत्नेन करोति पाप विषयनिमित्त च अहर्निश जीन । मोहान्धकारसहित तेन तु परिपतति ससारे ॥ णिचिदरधादुसत्त य तरुदस पियलिदिएमु छचेव । सुरणिरयतिरियचउरो चोदस मणुवे सदसहस्सा ॥ ३५ ॥ नित्येतरधातुसप्त च तरुदश पिकलेन्द्रियेषु पट् चैप । सुरनारकतिर्यक्चतस्र चतुर्दश मनुजे शतसहस्राः ॥ संजोगनिप्पजोगं लाहालाहं सुहं च दुक्सं च । संसारे भूदाणं होदि हु माण तहानमाणं च ॥ ३६ ॥ सयोगविप्रयोग लाभालाभ सुख च दु ख च । ससारे भूताना भवति हि मान तथापमान च ॥ कम्मणिमित्तं जीनो हिदि संसारपोरकांतारे । जीवस्म ण संसारो णिच्चयणयकम्मणिम्मुको ॥ ३७॥ १ ससारे अभूदमाण इति पुस्तके पाठ । ।
४३२ धाकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता-
कर्मनिमित्त जीर हिंडति संसारपोरकातारे ।
जीवस्य न ससार निश्चयनयकर्मभिर्मुक्त ।
संसारमदिक्तो जीवोवादेयमिदि विचिंतेनो।
संसारदुहकतो जीयो सो हेयमिदि पिचिंतेनो ॥ ३८॥
ससारमतिकात जीव उपादेय इति विचितनीयम् ।
संसारदु खाकात जीव स हेय इति विचिन्तनीयम् ।।
इति संसारानुप्रेक्षा।
जीवादिपयहाणं समवाओ सो णिरचये लोगो ।
तिविहो हवेड लोगो अहमज्झिमउड्डभेएण ॥ ३९ ॥
जीयादिपदार्थाना समवाय स निरुच्यते लोक ।
त्रिविध भवेत् लोक अधोमध्यमोमेदेन !!
णिरया हांति हेटा मज्झे दीपुरामयोसंखा।
सग्गो तिसहि मेओ एत्तो उडू हवे मोक्सो ॥ ४० ॥
नरका भाति अधस्तनै मच्र्य द्वीपाम्बुराशया असख्या ।
स्वर्ग विपोष्टमेद एतस्मात् ऊप भरेत् मोक्ष ।
इंगितीस सत्त चत्वारि दोणि एकेक छक्क चदुकप्पे ।
तित्तिय एकदियणामा उद्दआदितेमही ।। ४१ ।।
एकत्रिंशत् सप्त च पारि द्वौ एक पट चतु कल्पे ।
रित्रिकमेकैकेद्रकनामानि अगादिविषष्टि ।।
अमुहेण णिरयतिरिय मुहउपजोगेण दिग्निणरमोसं ।
मुद्धण लहड मिद्धि एवं लोयं विचिंतिन्जो ॥ ४२ ॥
द्वादशानुप्रेक्षा। ४३३ अशुभेन नरकतिर्यञ्च शुभोपयोगेन दिविज नरसौख्यम् । शुद्धेन लभते सिद्धिं एक लोक पिचिन्तनीय ॥ इति लोकानुप्रेक्षा। अहीहिं पडिबद्धं मंसविलितं तएम ओच्छण्णं । किमिसंकुलेहि भरिदमचोक्रां देहं सयाकालं ॥४३ ॥ अस्थिभि प्रतिबद्ध मांसविलिप्त त्वचा अपच्छन्नम् । क्रिमिसंकुलै भरितं अप्रशस्त देह सदाकालम् ॥ दुग्गंधं वीभत्थं कलिमलभरिदं अचेयणं मुत्तं । सडणप्पडणसहावं देहं इदि चिंतये णिचं ॥४४॥ दुर्गध बीभत्स कलिमलभृतं अचेतनं मूर्नम् । स्खलनपतनस्वभाव देह इति चिन्तयेत् नित्यम् ।। रसरुहिरमंसमेदहीमजसंकुलं मुत्तपूयकिमिबहुलं । दुग्गंधमसुचि चम्ममयमणिचमचेयणं पडणम् ॥ ४५ ॥ रसरुधिरमासमेदास्थिमजासकुल मूत्रपूयकृमिबहुलम् । दुर्गन्ध अशुचि चर्ममय अनित्य अचेतनं पतनम् ॥ देहादो पदिरित्तो कम्मविरहिओ अणंतसुहणिलयो । चोक्सो हवेड अप्पा इदि णिचं भावणं कुज्जा॥४६॥ देहात् व्यतिरिक्त कर्मविरहित अन्तिमुखनिलय । प्रशस्त भवेत् आत्मा इति नित्यं भावनां कुर्यात् ॥ इत्यशुचित्वानुप्रेक्षा। मिच्छत्तं अविरमणं कसायजोगा य आसवा होति । पणपणचउतियभेदा मम्मं परिकित्तिदा समए ॥ १७ ॥ पद. २८ श्री कुन्दकुदाचार्यविरचिता- मिथ्या अविरमण कपाययोगाश्च आता भनाता पञ्चपञ्चचतु त्रिभेदा सम्यक् प्रकीर्तिता समये ।। एयंतपिणयस्मिरियसंमयमण्णाणमिदि हवे पंच। अग्रिमणं हिसादी पंचपिहो सो हमह णियमेण ॥ ४८ ॥ एकान्तविनयविपरीतसंशय अज्ञान इति भवेत् पञ्च । अविरमण हिंसादि पञ्चविध तत् भाति नियमेन ।। कोहो माणो माया लोहो नि य चउनिहं कसायं खु । मणवचिकाएण पुणो जोगो तिरियप्पमिटि जाणे ॥ ४९ ॥ शोध मान माया लोभ अपि च चतुर्विध कपाय खलु। मनोपच कायेन पुन योग त्रिविकल्प इति जानीहि ॥ असुहेदरभेदेण दु एकेक पण्णिदं हवे दुरिहं । आहारादीसण्णा असुहमणं इदि निजाणेहि ॥ ५० ॥ अशुभेतरभेदेन तु एकैक वर्णित भवेत् द्विविधम् । आहारादिसहा अशुभमन इति विजानीहि ।। किण्हादितिणि लेस्मा करणजसोक्सेमु गिद्दिपरिणामो। ईसाविसादभावो अमुहमणं त्ति य जिणा वेति ॥५१॥ कृष्णादितिस्त्र लेश्या करणनसौग्ये गृद्धिपरिणाम । ईपारिपादभार अशुभमन इति च जिना बुवन्ति ।। रागो दोसो मोहो हास्मादीणोकमायपरिणामो । धूलो या मुहुमो वा अमुहमणो ति य जिणा वेति ॥ ५० ॥ राग दूप मोह हास्यादि नाफपायपरिणाम | स्थूल वा सूक्ष्म या अशुभमन इति च मिना नुमति ।।
द्वादशानुप्रेक्षा।
४३५
भत्तिच्छिरायचोरकहाओ वयणं पियाण असुहामिदि।
बंधणछेदणमारणकिरिया सा असुहकायेति ॥ ५३ ।।
भक्तस्त्रीराजचौरकथा वचन विजानीहि अशुभमिति ।
बन्धन छेदनमारणक्रिया सा अशुभकाय इति ॥
मोत्तूण असुहभावं पुन्युत्तं णिरयसेसदो दव्यं ।
बदसमिदिसीलसंजमपरिणामं सुहमणं जाणे ५४ ॥
मुक्त्वा अशुभभार पूर्वोक्त निरवशेषत द्रव्यम् ।
व्रतसमितिशीलसयमपरिणाम शुभमन जानीहि ॥
संसारछेदकारणवयणं सुहवयणमिदि जिणुद्दिई ।
जिणदेवादिसु पूजा सुहकायं त्ति य हवे चेहा ॥ ५५ ॥
ससारच्छेदकारणवचन शुभवचनमिति जिनोद्दिष्टम् ।
जिनदेवादिपु पूजा शुभकायमिति च भवेत् चेष्टा ॥
जम्मसमुद्दे बहुदोसवीचिये दुक्सजलचराकिष्णे ।
जीवस्स परिव्भमणं कम्मामवकारणं होदि ॥ ५६ ॥
जमसमुद्रे बहुदोपत्रीचिकै दु खजलचराकीर्णे ।
जीवस्य परिभ्रमण कर्मास्त्रपकारण भवति ।।
कम्मासवेग जीरो घडदि संसारसागरे घोरे ।
जण्णाणवसं किरिया मोक्सणिमित्तं परपरया ॥ ५७ ।।
कर्मास्ररेण जीव चूडति ससारसागरे घोरे ।
या ज्ञानशा क्रिया मोक्षनिमित्त परम्परया ।।
आसरहेदु जीवो जम्मसमुद्दे णिमन्जदे खिप्पं ।
आसवकिरिया तम्हा मोक्सणिमित्तं ण चिंतेजो ॥५८॥
श्राकुदकुन्दाचार्यविरचिता- आत्ररहेतो जीन ज-मसमुद्रे निमजति क्षिप्रम् । आसपक्रिया तस्मात् मोक्षनिमित्तं न चितनीया ॥ पारपजाएण दु आमकिरियाए जत्यि णिव्याणं । संसारगमणकारणमिदि जिंदं आसवो जाण ॥ ५९॥ पारम्पर्येण तु आसपरियया नास्ति निर्वाणम् । ससारगमनकारणमिति नि ध आस्तर जानीहि ।। पुव्युत्तासम्मेया गिच्छयणयएण णस्थि जीवस्स । उहयासपगिम्मुकं अप्पाणं चतए णिचं ॥६०॥ पूर्णतावरभेदा निश्चयनयने न सन्ति जीरस्य । उभपासमानर्मुक्त आ मान चिन्तयेत् नित्यं । यावानुप्रेक्षा। चलमलिगमगाटं च यनिय सम्मत्तदिढकराडेण । मिच्छत्तामरदारगिरोहो होदित्ति जिणेहिं णिद्दि६१॥ चरमरिनमगाढ च वर्जवित्या सम्यस्त्वदृढपाटन । मिथ्यात्वालबद्वारनिरोध भपति इति जिन निर्दिएम् ॥ पंचमहत्ययमणसा अविरमणणिरोहणं हवे णियमा । कोहादिआमराणं दाराणि कमायरहियपहगेहि (१) ॥२॥ पचमहायतमनसा अविरमणनिरोधन भवेत् नियमात् । क्रोधादि मात्रागों द्वामणि पायरहितपरिणाम । सुहजोगेसु पवित्ती संवरणं कुणदि अमुहजोगस्म । सुहनोगस्म गिरोहो मुद्धवजोगेण संमनदि ॥६३॥ शुभयोग प्रवृति सरण करोति अशुभयोगस्य । गुभयागस्य निरोध युद्धापयोगेन सम्भवति ॥
द्वादशानुप्रेक्षा।
४३७
सुद्धवजोगेण पुणो धम्मं सुकं च होदि जीवस्स ।
तन्हा संपरहेद झाणोति विचिंतये णिचं ।। ६३ ।।
शुद्धोपयोगेन पुनः धर्म शुक्र च भवति जीवस्य ।
तस्मात् संपरहेतुः ध्यानमिति विचिन्तयेत् नित्यम् ।।
जीवस्स ण संपरणं परमहणएण सुद्धभावादो।
संगरभाव विमुकं अप्पाणं चिंतये णिचं ॥६५॥
जीवस्प न सपरणं परमार्थनयेन शुद्धभागात् ।
समरभावविमुक्त आत्मान चिन्तयेत् ॥
इति सवरानुप्रेक्षा ।
घंधपदेसग्गलणं णिज्जरणं इदि जिणेहि पण्णतम् ।
जेण हवे संवरणं तेण दु णिज्जरणमिदि जाणे ॥६६॥
बन्धप्रदेशगलनं निर्जरणं इति जिनैः प्रज्ञप्तं ।
येन भरसंचरण तेन तु निर्जरणमिति जानीहि ।।
सा पुग दुविहा या सकालपका तरण कयमाणा ।
चदुगदियाणं पढमा वयजुत्ताणं हवे विदिया ॥६७ ।।
सा पुनः द्विविधा ज्ञेया स्वकालपका तपसा क्रियमाणा।
चतुर्गतिकानां प्रथमा व्रतयुक्ताना भरेत् द्वितीया ॥
इति निर्जरानुग्रेक्षा।
एयारसदसभेयं धम्म सम्मत्तपुचयं भणियं ।
सागारणगाराणं उत्तममुहसंपजुत्तेहिं ॥ ६८ ॥
एकादशदशभेदो धर्मो सम्यक्त्वपूर्पको भणितः ।
सागारानगाराणां उत्तममुखसम्प्रयुक्त ।।
दमणक्यसामाझ्यपोसहसचित्तरायभत्ते,य।
बम्हारंभपरिग्गहअणुमणमुद्दिह देसविरदेदे ॥ ६९ ॥
श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता- दर्शनव्रतसामायिकोषधसचित्तरानिभक्ता च । ब्रह्मारभपरिमहानुमतोद्दिष्टा दगविरतस्यैत ।। उत्तमसममद्दवजनसञ्चमउच्चं च संजमं । नवचागमकिचण्हं पम्हा इदि दसविहं होदि ॥ ७० ॥ उत्तमक्षमामाईवार्जरसत्यशोचं च सयम च । तपस्त्याग आविञ्चय ब्रह्म इति दशविध भवति ।। कोहुप्पत्तिस्म पुणो पहिरगं जदि हवेदि सक्सादं । ण कुणदि किचि वि कोह तस्म समा होदि धम्मोति ॥७१।। क्रोधी पत्ते पुन बहिरङ्ग यदि भवेत् साक्षात् । न करोति शिञ्चिदपि मोच तस्य क्षमा भाति धर्म इति । दुलरूपजादियुद्धिसु तपसुदसीलेसु गारवं किचि । जो ण नि कुच्चदि समणो मद्दयधम्मं हये तस्म ॥ ७२ ।। दुलरूपजातियुद्धिषु तपश्रुतशीटेषु गरिचित् । या क्राति श्रमणो मार्दवधर्मों मवेत् तस्य ।। मोनूण कुडिलमा णिम्मल हिंदयेण चरदि जो समणो । अनवधम्मं तडयो तस्म दु समादि णियमेण ॥ ७३ ।। मुक्त वा कुटिटभावं निर्मल हृदयेन चरति य प्रमण । आर्जवधर्म तृतीय तस्य तु सभाति नियमेन ॥ परमंतापयकारणश्यणं मोत्तूण मपरहिदवयणं । जो बददि मिरमु तरियो तस्स दु धम्मो हवे मम ॥७४|| परसतापारणवचन मुक्या स्वपरहितवचनम् । य यदति मिथु तुरीय तस्य तु धर्म भवेत् सम्यम् ॥
द्वादशानुप्रेक्षा।
४३९
कंसाभारणिवित्तिं किचा वेग्गभावणाजुत्तो।
जो वदृदि परममुणी तस्स दु धम्मो हवे सोच्च ॥ ७५॥
काक्षाभानिवृति कृत्वा वैराग्यभावनायुक्त ।
य वर्तते परममुनि तस्य तु धर्म भरेत् शौचम् ।।
चदसमिदिपालणाए दंडच्चारण इंदियजएण।
परिणममाणस्स पुणो संजमधम्मो हवे णियमा ॥ ७६ ।।
व्रतसमितिपालनेन दण्डत्यागेन इद्रियजयेन ।
परिणममानस्य पुन सयमधर्म भनेत् नियमात् ।।
विसयकसायविणिगहभाचं काऊण झाणसज्झाए ।
जो भावइ अपाणं तस्स तवं होदि णियमेण ।। ७७ ॥
विषयकपाय निग्रहभार कृत्वा ध्यानस्वाध्यायेन ।
य मारयति आमान तस्य तप भवति नियमेन ॥
णिव्वेगतियं भावइ मोहं चडऊण सचदव्वेसु ।
जो तस्स हवे चागो इदि भणिदं जिणवरिंदेहि ।। ७८ ॥
नियंगत्रिक भारपेल् मोह त्यक्त्वा सर्नद्रव्येषु ।
य तस्य भवेत् त्याग इति भणित जिनरेन्द्र ॥
होऊण य णिस्मंगो गियभावं णिग्गहित्तु सुहदुहद ।
णिदेण दु वदि अणयारो तस्म किंचण्हं ।। ७९ ।।
भूत्वा च निस्सङ्ग निजभार निगृह्य सुखदु खदम् ।
निधन तु वर्तत अनगार तस्पाकिव पम् ।।
सव्वंग पेच्छंतो इत्थीण तासु मुयदि दुभारं।
सो बम्हचेरभा मुद्दादि सलु दुद्धर घरदि ॥ ८ ॥
द्वादशानुप्रेक्षा।
कंसाभारणिविनि किचा वेग्गभावणाजुत्तो।
जो वदि परममुणी तस्स दु धम्मो हवे सोच्चं ॥७५॥
काक्षाभारनिवृति कृत्वा वैराग्यभावनायुक्त. ।
य वर्तते परममुनि तस्य तु धर्म भरेत् शौचम् ॥
बदसमिदिपालगाए दंडचाएण इंदियजएण ।
परिणममाणस्स पुणो संजमधम्मो हवे णियमा ।। ७६ ।।
व्रतसमितिपालनेन दण्डत्यागेन इद्रियजयेन ।
परिणममानस्य पुन. सयमधर्म भवेत् नियमात् ॥
विसयकसायविणिग्गहभावं काऊण झाणसज्झाए ।
जो भावइ अप्पाणं तस्स तवं होदि णियमेण ॥ ७७ ॥
विषयकवाय निग्रहभाप कृत्या ध्यानस्वाध्यायेन ।
य भारयति आ मान तस्य तप भरति नियमेन ॥
णिवेगतियं भावइ मोहं चइऊण सम्पदव्वेसु ।
जो तस्स हवे चागो इदि भणिदं जिणवरिंदेहिं ।। ७८ ॥
निर्वगनिक भावयेत् मोह त्यक्त्या नद्रव्येषु ।
य तस्य भवेत् त्याग इति भणित जिनपरे-दै ॥
होऊण य णिसंगो णियभावं णिग्गहित्तु सुहदुहृदं ।
णिइंदण दु वदि अणयारो तस्स किंचण्हं ॥ ७९ ॥
भूत्वा च निस्सङ्ग निजभान निगृह्य सुखदु खदम् ।
निद्वन तु वर्तते अनगार तस्याकिञ्चन्यम् ॥
सव्वंग पेच्छंतो इत्थीणं तासु मुयदि दुब्भावं ।
सो पम्हचेरभावं सुक्कदि सलु दुद्धरं धरदि ॥ ८ ॥
१४० श्रीकुन्दकुदाचार्यविरचिता- सर्वाङ्ग पत्यन् स्त्रीणा तासु मुञ्चति दुर्भागम् । स ब्रह्मचर्यभावं मुकृती खलु दुर्द्धर धरति ॥ सावयधम्मं चत्ता जदिधम्मे जो हु बट्टए जीयो । सो ण य वजदि मोसं धम्म इदि चिंतये णिचं ॥ ८१॥ श्रावकधर्म त्यतया यतिधर्मे य यत्तत जीर । स न च वर्जति मोक्ष धर्ममिति चितयेत् नित्यम् ॥ णिच्छयणएण जीयो सागारणगारधम्मदो मिण्णो। मज्झत्थमावणाए सुद्धप्यं चिंतये णिचं ॥ ८२॥ निश्चयनयेन जीप सागारानागारधर्मत भिन्न । मध्यस्थभावनया शुद्धामान चिन्तयेत् नित्यम् ।। इति धर्मानुप्रेक्षा। उप्पजदि सण्णाणं जेण उवाएण तस्सुवायस्म । चिंता हवेइ बोही अञ्चत्तं दुलहं होदि ॥ ८३॥ उत्पचते सज्ञान मेन उपायेन तस्योपायस्य । चिता भरेत् बोधि अत्यतं दुर्लभं भाति ।। कम्मुदयजपजाया हेयं साओनममियणाणं यु। सगदव्यमुवादेय णिच्छित्ति होदि मण्णाणं ॥८४ ॥ कर्मोदयनपर्याया हेय क्षायोपशमियज्ञान खद्ध । सकद्रव्यमुपादयं निश्चिति भरति सझानम् ॥ मूलत्तरपयडीओ मिच्छत्तादी अमंसलोगपरिमाणा। परदव्यं सगढव्वं अप्या इदि णिच्छयणएण ।। ८५ ॥
द्वादशानुप्रेक्षा। ४४१ मूलोत्तरप्रकृतय मिथ्यावादय असंख्यटोकपरिमाणा । परद्रव्य स्वकद्रव्य आत्मा इति निश्चयनयेन ॥ एव जायदि णाणं हेयमुवादेय णिच्छये पत्थि । चिंतेजड मुणि योहिं संमारविरमणहे य ॥ ८६ ॥ एव जायते ज्ञान हेयोपादेय निश्चयेन नास्ति । चितयेत् मुनि बोधि ससारविरमणार्थे च ॥ इति योध्यनुप्रेक्षा। चारसअणुवेक्साओ पञ्चक्साणं तहेव पडिक्कमण । आलोयण समाही तम्हा भावेज अणुवेक्स ॥ ८७॥ द्वादशानुप्रेक्षा प्रयाख्यान तथैव प्रतिक्रमणम् । आलोचन समाधि तस्मात् भावयेत् अनुप्रेक्षाम् ॥ रतिदिव पडिकमण पञ्चक्साण समाहिं सामडयं । आलोयणं पकुव्वदि जदि विजदि अप्पणो सत्ती ॥ ८८ ॥ रात्रिंदिवं प्रतिक्रमण प्रत्यारयान समाधि सामयिकम् । आलोचना प्रकुयात् यदि विद्यते भात्मन शक्ति ॥ मोक्सगया जे पुरिसा अणाइकालेण बारअणुवेकरां । परिभाविऊण सम्म पणमामि पुणो पुणो तेसि ॥ ८९ ॥ मोक्षगता ये पुरुषा अनादिकालन द्वादशानुप्रक्षाम् । परिभाव्य सम्यक प्रणमामि पुन पुन तान् ॥ कि पलवियेण बहुणा जे सिद्धा गरवरा गये काले । सिज्झिहहि जे वि भरिया तजाणह तस्स माहप्पं ।।९०॥ किं प्रलपितेन बहुना ये सिद्धा नरपरा गते काले । सेत्स्यन्ति येऽपि भविका तद् जानीहि तस्या माहात्म्यम् ।।
श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता- इदि णिच्छयववहारं जं भणियं कुंदकुंदमुणिणाहें । जो भावइ मुद्धमणो सो पावइ परमणिवाणं ॥ ९१ ॥ इति निश्चयव्यवहारं यत् भणितं कुन्दकुन्दमुनिनायेन । यः भावयति शुद्धमनाः स प्राप्नोति परमनिर्वाणम् ।। इति श्रीकुन्दकुन्दाचार्यविरचिता द्वादशानुप्रेक्षा समाप्ता। समाप्ताऽयं पटप्राभृतादिसंग्रहः । शुभं भूयात।
पदनाभृतीय-मूलगाथानामकारादिक्रमेण सूची। गाथा: पृष्ठसंख्या. २८३ ... पृष्ठसख्याः गाथा अवसेसा जे लिंगी... ३१९ असियसय किरियवाई ३०६ । असुही वीहत्येहि १९८ । अस्सजदं ण वदे ३४७ अह पुण अप्पा णिच्छदि ... २२ ... ... ... . २३४ ... अइसोहणजोएण अक्खाणि बाहिरप्पा अगाई दस य दुण्णि य अचेयण पिचेदा अज वि तिरयणमुद्धा अण्णाण मिच्छतं अण्णं च वसिद्धमुणी अण्णे कुमरणमरण अपरिग्गह सुमणे अप्पा अप्पमि रओ ... ... १३४ ... ... ... २.४ ... ३८ आ ११ आर्गनुकमाणसिय १४६ / आदसहावादण्ण आदा खु मज्झणाणे १४६ आयदणं चेदिहरं २३४ आठहवि अतरप्पा ३५१ आसवहेदू य तहा ... ३५५ आहारभयपरिग्गह ३५३ आहारासणाणिद्दा ४७ आहारो र सरीरो ... " " ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... १.९ ... . अप्पा चरित्तवतो अप्पा झायंताण अप्पा णाऊण गरा... अमणुष्णे य माण्णे अमराण वंदियाण अयसाण भायणेण भरसमलवमगंधं अरहत्तभासियत्वं अरहतेश सुदि8 अरुहासिद्धायरिया अवरोत्ति दम्बसवणो ... ... ... ... ... २१२ इच्छायारमहस्थ २०८ इड्डिमतुलं विउव्विय ५६ इय उवएसं सारं ७२ इय घाइकम्ममुक्को ३७६ | इय जाणिऊण जोई १८४ । इय गाउ गुणदोसं... ... ... ... ३२५ २ गाथा गाया। पृष्ठसंरयाः .. ... पृष्ठमस्या २५७ | एवं जिगपणात १४४ ३०३ | एवं सावयधम्म २८५ एव संखेवेण य .. इयणाऊण खमागुण इय तिरियमणुयजम्मे इय भावपाहुइमिणं... इय मिच्छत्तावासे इरिया भासा एसण .. ... ... ... उ २८९ . ... ... ... ... ... १ १५. ... ... ... " उक्किद्वसीहचरियं उम्गत येणण्याणी उच्छादमावणाए उत्तममनिममगेहे है"... उत्थरद जाजरओ उद्धद्धमालोए उवसग्गपरिमहगहा उवसमरामदमजुना प एएण कारणेण य... कत्ता भोर भमुत्तो... ६. क्लाणपरंपरया ३४४ काऊग णमुकार ३५कालमर्गत जीवो कि काहि दि बहिकम्म ११२ | किंजंपिएण पहुणा २८. किं पुण गच्छद मोह ३६२ कि यहुणा भपिएण १२. कुरिउयदेव धम्म .. १७कृच्छियधम्माम्मरओ कोहमयहासरोहा ६३ | कंदप्पमाझ्याओ २३५ पीय ... ... ... . ... २८५ ... ... कदं मूल १३६ २५३ ... .. ... एए तिििव ... ... " " " ४१ संगणुत्तावारण... ३६ सयरामरमणुयकर... ... ... ... ... एएहि लमगणेहि एक जिगस्म स्व एकके कालबाही एगो मे सस्पदो आदा एवं निगेहि कहियं एरिसगुणे , गन्ध एक आयतनगुण ... १५२/गद दिय च काये... २०५ | गरियाई पुग्गराई ३६४ | गहिग्मियाद मुगा १.५/ गहिकाय गम्मत... ११२ | गाहेण अप्पगाहा ... गिहनयमोहमुत्रका .. ... ... ०५चिय गाऊग ... ... ...
ar गाथा पृष्ठसख्या. ... गुणगणमणिमालाए... गुणगणविहूसियंगो गुणटाणमग्गणेहि २८८ २७३ २४२ २८८ ... ... . ... ... ८३ २०५ ... ... १० चउविहविकहासत्तो च उसहिचमरसहिओ चराहररामकेसव चरण हवद सधम्मो चरियावरिया वद चारित्तसमारूढो चिता सोही ग तेर्सि चेश्य वध मोक्ख .. .. पृष्टसख्या गाथा जह तारायणसहिय... ३७५ | जह दीवो गम्भहरे... ९७ /जह पत्थरोण भिन्नइ जह फणिराओ रेहद १३९ | जह फलियमणिविमुद्धो २३ जह फुल गधमय ... ३०० जह बीयम्मि य दड्डे ३४२ | जह मूलम्मि विण? ३५५ | जह मूलाओ खधो... ५४ | जह रयणाण पवर ६९ जह सलिलेण प लिप्पड़ जाणहि भाव पढम जाव ण भावहि तच्च २८१ | जिणणाणदिहि सुद्ध १८ २४८ | जिणमग्गे पवना जिणमुद्द सिद्धिसुद्द ६.जिशक्यणमोमहमिय ३७४ | जिणवरचरणबुरुह ९६ | जिशवरमएण जोई. १०३ | जीवविमुक्को सवओ १४१ जीवानीवविहत्ती ... ... . २६२ ३२ . जिष्णविणाणमय .. ८४ ११९ छबीवछडायदण छड्व्व नवपयथा छायालदोसदूसिय ज जर दसपोपा मुद्धा जदि पठदि बहुसुदाणि जरवाहिजम्ममरण... जरवाहिदुक्खरहिय जलयलसिद्दिपवणवर जरस परिग्गहगहण जहजायस्वरूव जहाजायरूवसरिसो जह जायस्वसरिसा जहण वि लहदि अह तारयाण पदो .. ... २८६ . "" " . ... ... २८२ . ३६८ जीवाणमभयदाण जीवादी सद्दहण ११६ जीवो जिणपण्णतो... जे के विद-वसवणा २८७ जे झायति सदब ... ... . ३१७ . ..
10 गाथाः पृष्ठसंख्याः ... ... जेण रागे परे दन्वे जे दसणेमु भट्ठा ... " ... " ... ... ... ... २५३ ... ... ... ... ... २०२ १२८ ... ... ... .. ... जे पावमोहिदमई जे पि पडति च जे पुण विसयविरत्ता जे पंचचेलसत्ता जे रायसगजुत्ता जे पावीसपरीसह जेसि जीवसहावो जो इच्छद निस्सरिढुं जो कम्मजादमदिओ जो कोडिएण जिप्पद जो को विधम्मसीलो जो जाइ जोयणसय जो जीवो मावतो जो देहे गिरवेक्खो जो पुण परदस्बरओ जो रयणत्तय जुनो जो मुत्तो ववहारे जो सजमेमु सहिओ अंकिंचि कय दोस... जं चरदि सुद्धचरण ज जाणइत पाणं... पृष्ठसख्या: गाथा: ३५६ | मया दिस्सदे रूव जं सक्दतं कीरद. १२ ज सुत्तं जिणउत्त झ १४ झायहि धम्म मुस् ३५४ झायहि पंचवि गुरवे ३६१ प २१५ जग्गत्तणं अकग्ज ६१ णमिऊग जिणवरिंदे २.८ मिऊण य तं देव... ३२१ गमुयह पयडि अमनो ३४६ | णवणोक्सायागं ... ३१९ |णवविहवंभ पयदि ७ विएहिं ज णविद ३१८ वि देहो बदिबद २०६ ण पि सिग्झइ पत्य ३१२ / गाणगुणेहि विहीणा... ३१५ णाणम्मि दसणम्मि ३३१ / णाणमयविमलसीयल ३२४ |णाणमय अप्पाणं ६१ गाणावरणादीहि य .. २५५ णाणी सिवपरमेट्ठी ४.णाणेण दसणेण य ... ३२णाण चरितहीण ३२५ णाणं परस्स सारो... ३०५ गाणं दसग सम्म ... ३३०णाश पुरिसस्स ९२ णामे ठवणे हि य .. २८४ २३८ २४५ ३७५ ... ... ... ... ... ... ... ... ... २७४ ३०४ २९७ २९२ ... ... ... ... ... ... ... " " जं जाणिऊण जोई... ... ८८ ... ... " " .... जं निम्मलं मुधम्म... ..
गाथा. पृष्ठसंख्या ... .. ९८ १५३ ... ... .. णिग्गंधा णिसंग्गा... णिरछयणयस्म एवं णिणे हा पिल्लोहा.... णिदाए पसंसाए पियदेहगरिस णियसत्तीए महाजस पिस्सकिय पिकसिय ... २९५ ... .. ... ... ... ... तयई मम्मत सवरहिय ज पाण... सववयगुणेहि २१. २४१ ... ... . पृष्ठसंख्या गाथा ११३ | देरहमे गुणठाणे २६३ रोया वि य रायला ११५ त चेव गुणविमुद्र... ३५७त विवरीओ यधह... ३१० २५४ थूले तसकायवहे द दहश य मणुयत्त ३२८ | दढसंजममुहाए ३४७ दरवेण सयलनग्गा ८६ | दस दस दो मुपरीसद १२१ दसपाणा पचसी ८५ / दस विहपाणाहारो ३५३ | दिश्साशाईय २७७ दियसंगट्टियममर्ण १४.दितिविदितिमाण ३.६ दुइय १ युसलिंग १९दुवो गवद अप्पा ३३१ दुबणयशवपक १४२ [दुरम्मरहिय २..दुहि पि गपचाय १४.] दुविद एंजमनरण २९६ देहादिवत्तसंगो २७८ देहादिसंगरदियो २९६ | देव गुरुम्मिय भत्ता २९८ देवगुण भता ३. देशाग गुण यहाँ १५२ दायरायरे सपल २८१ २५८ ... ३५२ २५६ सस्म य कर तामण णमइअप्पा निस्पयरगगहराद नित्य यरभागिपत्थ.... तिपयारो सो अप्पा लिभोसतीमित तिहिनिणि घरपि निहुमागसगिर चममा घोमतो गुह मरणे दुरोग से चिभमणानिहजे ते पा समो तेपण्या मुध्यम्या से धीरवीरपुरिगा ते में सिमरिया नेपाला विग्गि सा . .. . ... ४२ ... .. ... . .. ... ..
६ गाथा पृष्ठसख्या .. . ३४१ ३१५ १३१ .. . ... .. १२० ... . .. दसण अणतणाण दसण अणतणाणे दमणणाणचरिते दसणणाणचरित्त दसणणाणावरण दसणभट्ठा भट्ठा दसणमूलो धम्मो दसण वय सामाइय. दसणसुद्धो मुद्धो दसेइ मोक्समग्ग ... . . .. " " २८२ ... ... २६३ ... . . पृष्ठसंख्या गाथा ८१ परमापय झायतो ९५ | परमाणुपमाण वा २. परिणामम्मि असुद्धे ५३ | पब्धजसमचार २९. पमुमहिलसदसग ४ पाऊण णाणसलिल ३ ४२पाणिवहेहि महाजस ३२९ पाव खवर असेस .... ८३ | पावति भावसवणा .. पाव पयह असेस १११ पासवभावणाओ २९८ पासडी तिपिश सया २१४ पित्ततमुत्तरेफस ९१पीओ नियणच्छोर ३४९ पुरिसायारो अणा .. पुरिसो विजा समुत्तो २२१ | पूयादिषु वयमहिय ३६१ | पचमहन्वयनुना ६१ | पचमहब्बयजुना ८२ पर वि इदियपाणा १५१ पचविहचलचाय २९० पचमु महन्त्र देमु २१३ पचिदियसंवरण २१९ पचेवणुध्वयाइ ३१४ य ३१५ | पलमोक्खमाणदसण २८६ १५३ ... . १०८ . घणधावत्थदाण घण्णा ते भयवता धम्मम्मि निप्पवासो धम्मो दया विमुद्धो धुवसिद्धी नित्थयरो न नग्गो पावइ दुक्स... निग्गथमोहमुका निच्चेलपाणिपत्त निरुवमचलमखोहा प पडिदेससमयपुग्गल पढिएण वि किं कीरइ पयहि जिणवरलिंग पयाग्यमाणसाआ परवरओ बग्य परदयादो दुगइ ... ... . ३२५ " ... २३. ... . ... .. ..
पृथ्संख्या १२८ गाथा यारमविहावयरण यहिराथे पुरियमणो महुसरथरथजागे बाररावधियाण पाहिरिगेण जुगे মাহিযগাথগ बाहिरसंगरवाओ पाहिरसंगविमुश्को ११२ २१८ २३५ पुरज बोहतो १.३ भ २१२ गरदे दुस्ममकाले भयसायरेक्षणत भपाणयोहरप भावरदिपण सउरिस भावरदिनीनति भावविमुनो मुत्तो भायविमुद्धिनिमित्त भावरापगेर धीरो भायमषगोपि पावत भाषसदिय मुगियो भावहि मधुरसाभो भापति पाम तर भारद पपपयार भाषेण हो पृष्टसष्टया गाथा २९१ भावो य परमालिग ३१.मायो वि दिग्वसिव ७) मीसणपरमगइए १२७ | मनमुइपियसेण ३५. २६१ मध्याह जस्स यिर २३७ मच्छो वि साटिरियो २७२ मगवयगायदव्या ७८मायभवे पंपिनिय ममति परिवरजामि ३५९ मयमायकोहरहिया |मयसयोममाहो ५२मयरायरोगरहियो ११.मलरहिमा कलवता ११० महिलायणपुग १५६ मणिगो गाम मुभी १३. मापावनिमसेमा १८७ मिमी २७६ मिरमात सहगाया २४६ निगान भगाग २१Uणामु रभो १६२ रोमो २.९मारमग २. मूलगुण पिाय ११. माझा पदिय १५ गामाीय २८४ भरमार गुद र " ८ गाया पृष्ठसख्या ... ... रयणत्तय पि जोई ... रयणत मुअलद्धे स्वयं सुद्धस्थ २३३ ३११ ... ... ... ... ... ल ... ... ... ... ... ३५८ ... ។ ... ... ... ... ... ... लिंग इत्थीण हव दि... लिंगम्मि य इत्थीणं घ वन्टल विणएण य वयगुत्ती मणगुत्ती वयसम्मत्तविमुद्धे वरवयतवेहि सम्गो... वालग्गको डिमत विशय पचपयारे वियलिं दिए असीदी विवरीयमूढमावा विसयक्माएहि जुदो विसयविरत्तो समणो बिसवेयणरत्तक्खय... विदरदि जाव जिणिंदो वैरग्मपरो साह वंदामि तवसमण्णा... १५ ३६५ ... ... पृष्ठसंख्याः गाथा ३२७ सद्दहदि य पत्तेदि य १४५/ सपरज्झवसार्पण १२६ सपरा जंगमदेहा सपरावेरखं लिंग ६७ सम्म गुण मिच्छ दोस ६८ [सम्मत्तवरणसुद्धा ... सम्मत्तणाणदंसण ३६ । सम्मत्तणाणरहिओ ४८ सम्मत्तरयणमहा ९१ सम्मत्तविरहिया ३२० सम्मत्तसलिलपवदो ६४ सम्मतादो गाणं २५४ सम्मत्त जो झायदि १४५ | सम्मत्तं सण्याण ११७ | सम्मईसण पस्सदि.. ३३३ / सम्मइसण पस्पद २१९ सम्माइसी सावय १४३ सयलजणवोहणत्य मवसा सत्तं तित्य ३७४ सम्वण्हू सव्वदसी २३ सम्वविरओ वि मावहि सब्बासवपिरोहेण ... ३१९ सब्वे कसाय मोत्तु २५३ सहजुप्पश रूवं १३३ सामाइय च पडम १११ | साइंतिज महल्ला... ३१४ सिद्धो सुद्धो आदा ... १२६ ! सिद्ध जस्स सदत्य... ... ४० ... ... ... १०६ ... ... १०७ .. ... ... ... ... ३२४ .. ... ... सम् तवेण सब्यो... सच्चित्तभत्तपाण सत्तमुनरयावासे सत्तू मित्ते व समा सव्वरओ सवो सवियारो हुओ २१ ४५ ४८ ... ... ३२६ ... ... ... ...
P गाथा पृष्ठसंख्या .. ... ... ... २६. १८२ १४१ ... पृष्ठसंख्या गाथा ३.१ | सेयामेयविदण्डू १५४ | सेवहि चउविहलिंग ०६६ | सो णत्त्यि त पएको सो परिय वसवणो सो देवा जो अग्थ .. ५९ संखिजमसखित ५८ सजमसजुनस्स य .. ... .. ... ... सिवमजरामरलिंग सिमुकाले य श्रयाणे सीलसहस्सद्वारस सुण्णहरे वरहित सुण्णायारनिवासो सुत्तस्थापयविणटो सुत्तस्य जिणभणिय मुत्तम्मि जे सुदिन मुत्त हि जाणमाणो... सुभजोगेण सुभाव . सुरनिलएम मुरच्छर सुहेण भाविद णाण ... ... ... ... . हरिहरतुल्लो वि हिमजलणसलिल. ३४५, हिमाहिए धम्मे १३५ | हिंसाविरद अहिमा ३५० । हाऊण दिनुचरित्ता... ... ... ६. ४. २४" ... इति मूलानुक्रमणिका।
पहनाभृतटीकोक्तोद्धरण-श्लोकानामकारादिक्रमेण सूची। कतुर्नाम प्रन्यनाम पृष्ठसंख्या । अहकुणउ तव श्रीदेवसेनसूरि आराधनासारे अफलहो महा इन्दनन्दी नीतिसारे अकिंचनोह गुणभद्राचार्य मात्मानुशासने ११४ ३१२ भकोहणो अलोहो गौतमर्षि प्रतिकमण सूने ४९ भमिवरसर्वभक्ष्यो ३५ अन्न यद्यपि योषिता २७१ अननपि भवेत् सोमदेवसूरि यशस्तिलके अजस्तिलोत्तमा सामदेवसूरि यशस्तिलके १०२ अजाकृपाणीय गुगभदाचार्य मात्मानुशासने २५८ अट्ठत्तीसद्धलवा " ... ११८ १३८ २६८ ... अण्णाणादो मोक्ख अपिमा महिमा... अतिक्रमो मानस अत्यल्पा यति भय देवेन्द्र अथिरेण मिरा .. भष्ट किं किमस्पृष्ट सोमदेवसूरि श्रुतसागरसूरि यशरितलके अनव प्रन्थे ३०४ ... २७१ भदृष्टविप्रहाच्छान्ता भनाश्वग्नियता अमाए दालिदियह (अन्येषां) जिनसेनाचार्यः लक्ष्मीधर यशस्तिलके महापारणे १२५ ... ...
अतवान्तं वदन अन्यच बहुवार जाले अन्यूनमनतिरिक्त गुगभदाचार्य: जिनसेनाचार्यः समन्तभदस्वामी आत्मानुशासने महायुगणे रलम्रण्डके " सोमदेवसूरिः यशस्तिलके अन्यलिंगकृतं पापं अपूजयित्वा यो अभयदाणु अभाविय भावेमि अर्हचरणसपर्या ८५ २८३ २८१ ... गौतमपि समन्तभदस्वामी प्रतिक्रमणमूने रत्नकरण्डके ८० २३२ " " अलकवलयरम्य अलंध्यशक्ति वि अशोकवृक्ष सुर सोमदेवमूरि समन्तभद्रस्वामी यशस्तिलके। स्वयंभुवि शांतिपाठे ११४ ... " ... वीरनन्दी अश्रूपातच दुःखेन अत्रोनीव तिरस्कृता आ आाचार आचारसारे भारमानुशासने २५३ २८१ गुणभदाचार्य आ गुणभद्राचार्य आत्मानुशासने " " आकृष्टोऽहं हतो शुभ वन्दावार्यः झानार्णवे १३ १२२ ११७ २५७ " " भाकंपिा अणु शिवकोटि भगवत्याराधनायो 11 . " २५५ ... ... आचारवान् आझाभिमानमुत्सृज्य आज्ञामार्ग जिनसेनाचार्य गुणभद्रभदन्तः ७१ १२५ महापुराणे आत्मानुशासने " " " २२ भाशासम्यवत्व गुणमदमदन्त आत्मानुशसाने १३ १२१ .. भात पावक भातशाक भात्मकृत परि २५८ २८१ अमृतचन्द्रसूरि पुरुषाय निदपुराये ३८१ .. सोमदेवसरि यशस्तिलके २०. भात्मनारम मात्मनि माक्षे आत्मशुद्धिरिय ... भारमा भिन्न .. गुणभद्राचार्या भारमानुशासने ११६ " भारमा मनीषिमि आयात पर .. .. समन्तमदस्वामी सोमदेवसूरि. रत्नकरण्ड के यशस्तिल के ३३ २८३ आपगासागर आयुष्मान् आरोगमुक् भारमे स्त्यि श्रावलि असख... ... .. ३१२ ... ३४४ ... " गुणभद्राचार्य आत्मानुशासने भाशागत पाशा दासी ... इ पूज्यपादस्वामी इक्कहि फुल्लाह इक्षोविकार इरिथविषयादिलासो इत्थीण पुण दिवम्ता इत्य मवन्त ... २४६ " दर्शनसारे देवसेनसूरि सुलोचनाकान्त जिनसेनाचार्यः महापुराणे उ उशितानेकसंगीत उदीनां श्रीमती उद्यानादिकृता उद्युकस्वं उपयान्ति समस्त उपवासफलेन उववासदो एकहो उवसंतखीणमोहो महापुराणे आत्मानुशासने १२५ २१३ जिनसेनाचार्यः गुणभदाचार्यः मुलोचनाकान्तः प्रभाचन्द्रदेवः ... ... ... .. नेमिचन्द्रादयः गोम्मटसारादिषु " " " ए 'एकवारे एक्कहि फुल्लहि ७ ८० " एका जीवदय सोमदेवसूरिः सोमदेवसूरिः यशस्तिलके यशस्तिलके २८३ ६७ एकादशके 'एकापि समर्थेयं " " " " " " " " ... एक्कावनकोडीओ एतदोषविहीनान एदे खलु मूल एयंत युद्धदरिसी २४० २५२ वीरनन्दी गौतमर्षिः नेमिचन्द्रसैद्धान्ती आचारमारे प्रतिक्रमणसूत्र जीवकाण्डे " h "एवं सत्यं सवं एलाचार्यः पूज्य ८२ मिलोसारे नीतिसारे इन्द्रनंदी कच्छं खेत वसही देवसेनसूरिः दर्शनसारे १११ कपिलो यदि सोमदेवसरि यशस्तिलके २०७ " ... ३१५ सोमदेवसूरि जिनसेनाचार्य यशस्तिलके महापुराणे २७२ शुभवद्रयोगी समन्तभद्रस्वामी कम्मद दिघण कर्णावतसमुख कर्शयन् मूर्ति काक कृमि कान्दपी कैल्विषी कायवाक्यमनसा काले कल्पशते किमम बहुनोक्तेन कुदेवगुरुशास्त्राणां केण य वाडी वाहिया कौपीनोऽसौ सुच्छात्यावश्यक क्षुत्पिपासारा ज्ञानार्णवे स्वयभूस्तोने रत्नकरंडके महापुराणे १३. १०२ ८२ १२५ जिनसेमाचार्य ... ७८ . २५२ धीरनन्दी समन्तभदस्वामी आचारसारे रत्नकरण्डके जिनसेनाचार्य जिनसेनाचार्य महापुराणे महापुरण्ये २९४ १२५ १२३ .. ... क्षेत्रवास्तुसमुत्सर्ग क्षेनाझे तासभा क्षेत्र वास्तु धन कमाहारिंश क्रियते भोजन कचित्कालानु ख खलाना कण्टकाना खण्डनी पेषणी चुल्ली २०३ १३८ इन्द्रनन्दी नीतिसारे नीतिसारे " ६५ २८७ २३३ ... " ग गाद्वारे गायकस्य तलारस्य ... इन्दनन्दी नीतिसारे ११२ सोमदेवसूरि. यशस्तिलके ३५२ ... ... मोमदेवमूरिः यशस्तिलके गुणप्रामविलोपेषु गुणेषु दोष गुलोत्तान गुपकोटो पहशोभीकता गोपुरिमा श्वेत .. २७२ १२५ जिनसेनाचार्य इन्दनदी महापुराणे नीतिसारे . " गोपुष्टात सोमदेवसूर यशस्तिलके पश्यन्तिन वित मुलोचनाकान्त अधिकारी नेमचन्दीदान्ती त्रिलोसारे कि 56 २९२ पक रिहाय पषसहिता चतु प्यारो इन्दनन्दी नीतिमारे तुर्लक्षाः सद... एमरायण चित्तरपमध्य चिन्तातिरक्षा चित्रालेखन शिवकोटि गुणभद्वारा मामानुरारमने मोमदेवापूरि यशस्तिलके जन्मत्ररामय समन्तभावार्य योगीनदव जमुहिरति रलारण्डके परमात्मप्रकारे " जिनसेरवानी भारिपुरागे १२५ मामालिनमान् आरिमानन्य माशिमूर्तिय मारिन्दी भवर " " १२३ १२३ . " जा निसि सयल वीरनन्दी आचारसारे जानुदहादध सर्श १३३ जिण पुज्जहि जीवकृत परिणाम अमृतचन्द्रसूरि पुरुषार्थसिद्धयुपाये " २६४ ३४२ " जिनसेनाचार्य. महापुराणे ... ... जीवा जिणवर जैनेश्वरी परामाज्ञा ज मुणि लहर समदत हारवा योग्यमयोग्य ज्ञानकाण्डे किया शानं पूजा कुल ३३२ ३२१ २५३ ... वीरनन्दी सोमदेवसूरि समन्तभद्राचार्य श्राचारसारे यतिल के रनकरण्डके . " २६ ... कान पगा क्रिया वकोडिसया जाणविहीणह ५४ गाम जिणा गोम्मटसारे १८२ नेमियासैद्धान्ती निधिदरचादु वीरनन्दी आचारसारे २९२ ... सोमदेवसरि जिनसेनाचार्य यशस्तिलके महापुराणे त ततः शरीरसंहद तधिकालमवात् तदई जस्तनेहातो तपोयनुमपानक्त तपोविगाहनादस्य त्यवतकाममुखो स्यवतशीतातपत्राण स्यत्तस्नादि यवत्वानपत्र १२५ १२ १२५ १२४ " " " ११ " " समन्तभद्राचार्यः स्वयंभूस्तोने स्वमति सुरासुर तित्थयरा तप्पियरा तिलमध्ये यथा ... ... तृष्णा भोगेषु गुणभदाचार्यः भात्मानुशासने ते चिअ धण्या तें कारणि जिय ... थावरवेथालीसा २४४ समन्तभद्राचार्य इन्दनन्दी रत्नकरण्डके नीतिसारे ११२ ... ... दर्शन ज्ञानचारिका दीनस्य सूतिका दुलीय जयति दुष्टमन्तर्गत दृग्यानसूत्रयोध रतिप्रायेषु देवई सत्थई देवाधिदेवचरणे टीकाकर्तृ खोमदेवसूरि योगीन्द्रदेव समन्तभदाचार्य यशस्तिलके परमात्मप्रकाशे रस्नकरण्डके ८० " नेमिचन्द्रसैद्धान्ती इन्दनन्दी न्यसप्रहे नीतिसारे ८१ देवा वि य नेरइया दसणपुर गाणं दष्यलिंगमिद शेय व्यलिंग समास्याय दिणाधोक्षजेशान द्वित्रिचतुरिन्द्रियाः द्विपदतपास्तथा " सोमदेवसूर यशस्तिलके १०२ ... - धात्रीदालासती धम्मो वस्थुसहावो ... ... ८ " . .."
न किंचित्पापाय न देवो विद्यते नलया बाहू य नवनवचतु: न सम्यक्त्वसम नेमिचन्द्रसैद्धान्ती गोम्मटसारे श्रीदेव समन्तभदाचार्य रत्नकरण्डके ३०२ ११३ १०८ " " ३२० श्रुतसागरसूरि. भनव ... ... यशस्तिलके रत्नकरण्डके सोमदेवसूरि समन्तभदस्वामी गौतमर्पि. कालिदास वीरनन्दी आचारसारे २०७ २५३ २२९ २७४ ... नागफणीए मूल नानाशास्त्रमहा नाममान कयया नित्यस्नान गृहस्थ नियमो यमच निराभरण निवार्यतामालि निष्ठीवन सदष्ट्रा नि सगोह जिनाना नेतद्वन्द्वे श्रवणयुगले प पदस्थ मत्रवाक्यस्थ पयडि हिदिअणुभाग पयोव्रतो न दध्य परिणाममेव कारण पलितच्छदेन पादान्तरालात सम्मत्तो पुण्य जिनद्र पोलियहि पंचदियानि नेमिचन्द्रसैद्धान्ती द्रव्यसग्रहे ... ... २१४ सोमदेवसूरि गुणभदाचार्य वीरनन्दी यशस्तिलके थारमानुशासने आचारसारे ढाइसीगाथामु २५३ पिच्छे पहु जिनसेनपादा. ... ... .. ३५. ... ...
जिनसेनाचार्य वीरनन्दी महापुराणे भाचारसारे ... प्रसिद्धारसहलेद्ध प्रहारो प्रामदाहो प्रागुदिच्या विभाते प्राशेन ज्ञातलोक प्राप्तोत्कर्ष तदस्य प्रेरिता श्रुतगुणेन वीरनन्दी जिनसेनाचार्य. पद्मनन्दी भाचारसारे महापुराणे पंचविंशतिसयो ११३ १२६ फुल पुकार ७८ 4. .. २८४ २४४ बहु सत्य बादरसुहमगिदिय बान्ये वेत्सिन बाह्यमन्धविहीना ...गुणभद्राचार्य आत्मानुशासने .. १३. २३८ " पद्मनन्दी रिम्पादलोनति बिल्वालाबु बीएसु नत्यि देवसेनसूरि दर्शनसारे ११० ... १४ भयाशास्नेह भर कुलपर्व भववितर भावविहूणउ भुकोज्झिता समन्तभदाय गुणभद्राचार्य नेमिचन्द्रसैद्धान्ती रत्नकरण्डके आत्मानुशासने त्रिलोकसारे ३ १०७ पूज्यपादाचार्य " भ्रूधनुष्टयो सोमदेवपडिता यशस्तिलके ૨૭૨ म मद्यपलमधु मधमासमुरा मलीमसाहो पडिताशाधर पद्मनन्दी जिनसेनाचार्य सागारधर्मामृते पचविंशतिकार्या महापुराणे २० वीरनन्दी आचारसारे २५२ महोपसगांतता मान्य ज्ञान तपो मानुष्य सत्कुले मानुपी प्रकृति मा भवतु तस्य मालतीव मिच्छा सासण समन्तभद्रदेवा स्वयभूस्तोने... .. २१३ शुभचन्द्राचार्या नेमिचन्दाचार्य गोम्मटसारे " २४५ " मिष्यात्ववेद २०३ मिम्यात्ववेदी मिग्याहरभ्यो मुद्रा सर्वत्र मान्या इन्दनन्दी नीतिसारे १२९ " " १२३ मूढमय मदाचा मूत्यादिप्वपि नेतन्या मैथुनाचरणे लापयनू स्वाङ्ग जिनसेनाचार्य शुभचन्दाचार्या जिनसेनाचार्य महापुराणे शानार्णवे महापुराणे १२४ इच्छास्त्ररचित नीतिसारे १५१ ज्ञार्थ पशव ... २९६ ग्या चतुर्भि दिक्षानेन जीवन यब्धान्तिन यशोमारीचीय यस्मिन् सर्वाणि य श्रुत्वा द्वादशा पडिताशाघरा मुणभद्राचार्य २.१ २१३ आत्मानुशासने उपनिषदि आत्मानुशासने ... गुणभदभदन्ता " " " याचजनकल्प श्रुतसागरसूरय पप्रान्तीकाया २१ गौतमर्षयः ... ... यावन्ति जिनवैत्या ये गुरुं नैव मन्यन्ते १ रजस्तक्षकचैव रजसेदाणमगहण ११२ ३ शिवकोव्याचार्या वहरलाच वीरनन्दी सोमदेवसूरि. भगवत्याराधनाया मूलाचारे च आचारसारे यशस्तिलके रसपूयास्थिर्मासा रागादिदोप ૧૧ " " सोमदेवमूरि यशस्तिलके गौत्तमर्षयः प्रतिक्रमणे जिनसेनाचार्याः महापुराणे समन्तभद्रस्वामिन रत्नकरण्डके पद्मनन्दी १२५ २३६ २४ २१३ २७१ ... ... शुभचन्द्रदेवा लीलाविलास घ बदसमिदिदिय वन्दित्वा वन्धमई वघबन्धच्छेदादे चनशिखिनि मृतो यनेऽपि दोषा घरमालिगिता परिससयदिक्खि घरोपलिप्मया पर गाईस्प वर व्रत पदं देवं पर स्वहस्तेन वारगुप्तो हितवार बारह अगंगिवा विभावसोरिवोष्ण विविधब्यजनत्यागा वीरवर्याच पृष्टयाकुल' समन्तभद्राचार्यः रत्नकरण्डके ... ... .. ३३१ ... पूज्यपादाचार्या इन्दनन्दिनः जिनसेनाचार्यः .. महापुराणे ... ... ... जिनसेनाचार्याः महापुराणे ... ... ". ... ६७ २७३ ... .. .. ...
... .. वैयावच्चे विरहिट व्यापत्तिव्यपनोद २०३ समन्तभद्राचार्य रत्नकरण्डके १३८ सुलोवनाकान्त. ... ... इन्दनन्दी नीतिसारे शची पद्मा शिवा शमिताखिल शल्यमणिस्खलदन्त. शालिको मालिक शान शास्त्राणि... श्रीभवाहु धीचन्दो श्रीमरस्वामिसमन्त श्रीमलिभूषण श्रुतसागरेण श्रेष्ठ बले स्थिर १३५ ११३ १९२ १५० इन्दनन्दी धुतसागरा. नीतिसारे अव " . " -- पोडशाये सहस्राणि स सकारपुरकारो समन्यारंभहिंसा २४६ ... समन्तभद्राचार्य जिनसेनाचायाँ रत्नकरण्डके महापुराणे सज्जाति. सद्गृहस्थ ... सत्तालोचनमान सन्तोपकारी समन्तभदः श्रीकुंभ समसुखशीलित नीतिसारे इन्दमन्दी अमृतचन्द्रमूरि १५१ ५४ २७१ १२४ १२२ महापुराणे स महाभ्युदयं प्राप्य सम्म चेव य भावे सम्यग्दर्शनसंशुद्ध जिनसेनाचार्या कुन्दकुन्दावाया. समन्तभद्राचार्य रनकरण्डके। २८८ " " ३२९ २३ समन्तभदाचार्य रत्नकरण्डके ... ... ... सम्यग्दर्शनशुद्धा सर्वपापासवे सर्व धर्ममयं सर्वः प्रेप्सति सर्वार्थसिद्धि ३२७ ૨૪૨ २७६ गुणभद्राचार्यः आत्मानुशासने टीकाकर्ता अनैव अभिमानमेरुपुष्पदन्त यशोधरचरिते सम्वहु मणिंदियो " ३४७ " साम्यं स्वास्थ्य पद्मनन्दी ८ ... " " सिंहासनोपधाने जिनसेनाचार्य महापुराणे सीसु नमतह सुखयतु मुखभूमि समन्तभदाचार्य रत्नकरण्डके १२३ ३०२ १३३ २७५ २९५ १२ " " " गुप्तोस्थितेन सूक्ष्म जिनोदित भोजराजमहाराज समन्तभद्राचार्य सोमदेवसूरि ... यशस्तिलके सूर्या! ग्रहण सेयबरो य आस ... ... ... १२ ११८ " " " सजमु सील संन्यस्ताभ्यां ससारे नरकादिषु ... गुणभदाचार्य यात्मानुशासने ११६ १३५ " स्पृहा मोक्षेऽपि स्वगुणोत्कीर्तन स्वयूम्यान् प्रति स्वलक्षणमनिर्देश्य स्वामिष्टभृत्य स्वोचितामनभेदा स्वोपधानाधनाइत्य पद्मनन्दी जिनसेनाचार्यः समन्तभद्राचार्यः जिनसेनाचार्य एकत्वसप्तत्या महापुराणे रनकरण्डके महापुराणे १२५ " " १२४ १२५ १२४ " " "
२४
जिनसेनाचार्य
महापुराणे
१२४
१२५
१२४
"
स्व मणिस्नेह
स्व स्वापतेय
स्व साम्यमैहिक
ह
इत ज्ञान क्रियाहीन
हृदये वाय
हे चन्द्रम
होह पणिज्जुन
२५
...
...
..
मुलोचनाकान्त
गुणभद्राचार्य
आत्मानुशासने
३५०
...
...
समाप्तेयमनुक्रमणिका।
प्रकीर्णकसूत्रवाश्यानां सूची। पृष्ठसम्या गाथा: पृष्ठसरयाः गाथा: न ३. नाभ्युपध ८४ प अजेवाः अन्या .. पर परि ... २९४ पापनिया ... अष्टा स्था अइया अवधार २३. ... ... य १८५ ... इणजिक २९५ प्रमणे ... ... उधारल उत्तमर्स :: :: . ... एकस्य नि ... २५५ भूप्राप्ता २२५ मागांच्यव २.४ मूढस्य ८३ | यस्मै दि ११. युवजन ... ३९ कृरययुटो मोघलोम क्षुत्पिपासा ३४१ २७२ : थाए पाए पोलिय ... १५२ घ २९१ विरिष व्याख्यान ... चिअभ २९३ २४२ ... ... १२८ |शक्षितस्या ... व्यनुबन्ध तत्त्वार्य नुभाग तुणा ... नुमरभाण ... सयदा मुंतो हितो ३४८ २४२ दर्शनवि इन्वंस २२. ११२३जिया ... ... ... ...
लिंगशीलप्राभृत-यणसार-द्वादशानुप्रेक्षाणां अकाराद्यनुक्रमणिका । भज्जवसप्पिणिभरहे ... ... "... ... " ... " ४४२ ४२४ ... ... ... ૨૮૪ ... ... ... ... ... ४०३ इगतीससत्तचत्ता ४०३ | इच्छियफल ण लम्मद ४०४ इदि णिच्छयववहार ४११ । इदि सजणपुवं ४३३ | इंदियविसयपुहाइमु ३९७ इय लिंगपाहुदमिणं... ४०६ | इह णियमुवितबीय... उ ४२९ उम्गो तिव्यो दुो. ४२५ | उत्तमखमदम ४१८ ४.९ उदधीव रदणभरिदो ३९२ उप्पनदि सगाणं ४२७ उप्पहदि पडदि ४३. उयरग्गिसमण ४१२ उवसमई सम्मत्त ४१६ | उवसमभवमावजुदो ४०४ उसमणिरीहझाण... ४३२ उहयगुणवसण ४३८ ४२८ ... ... उत्तमपत्त भणियं ... ... अग्झयणमेव झाण अद्वीही पडियद अणयाराणं देना अण्णाणी वियसविरता अण्णो अण्ण सोयदि अण्णं इम सरीरा अद्भुबममरणमेगत्त अप्पाण णाणहाण अप्पाण पिण अरहते सुहभत्ती अरुहा सिद्धाइरिया... अवसप्पिणिउस्सप्पिणि अवियप्पो गिद्ददो अविरददेसमहम्वद असुहादो गिरयाऊ... असुहेण गिरयतिरिय असुहेदरभेदेण दु. या आदे हि कम्मगठी... आरभे घणघण्णे आसवहेदू जीवो ... ... ३८२ ... ... ... ४२२ ४०६ ... ... ... ... ४०२ ... ... ४७ ... ... ३८९ एक्कु खणंग ४१३ | एक्को करेदि कम्म... ४३५ एक्छो करेदि पावं... ०२७ ...
एकमे करेदि पुष्ण ४२ ... .. ... ४३८ ... ... ... ... ... ... ... ... ३९९ .. ... ... ... .. ४१७ ४०१ ३९६ ... ... ... ... ... ४०७ कुसलास तवो णिवुण ४२८ । कोहप्पहुतिस पुगो ४३४ | दोहेण य कलहेण य ४३७ । कोहो माणो माया... ४४१ कंखा भावणिवित्ति ३९. | कंदप्पमाइयाओ ३८३ ख खयकुछमूलसूलो ४०३ | खाई पूजा लाह ४३१ खुदो रुद्दो स्टो ४१८ खेत्तविसेसे काले ४३५ ग ४०९ गयहाथपायनामिय गिण्हदि अदत्तदाण ३८१ गुणवयतवसमपडिमा ३८. गुरुभत्तिविहीणाणं ४.३ गथमिण जो ण दिट्ठा च ४२३ | चउगइससारगमण ४३४ चम्मट्ठिमसलव ४१७चलमलिणमगाढ ४४१ ४१८ ४२१ ज णाणेण विसोहो ४२० जद विसयलोल ४२१ | उत्तण कुणइ पाव ४०१ जम्मसमुद्दे बहुदो ३८७ जलबुबुदमकधम् ४३८ 1 जसकित्तिपुण्णलाहे... एक्कोह जिम्ममो एयारसदसभेय एयतविणयविवरिय एवं जायदि गाण ... एव बहुप्पयार एवं साहिओ मुणिवर क कतकफलभरिय कम्मणिमित्तं जीवो... कम्मादविहावसहाव कम्मासवेण जीवो... क्म्मु ण खवेद कम्मुदयसपनाया कलह वादा काऊण णमोकार कामदुर्हि कप्पत कायकिलेसुवबास कालमणत्त जीवो किण्हादितिणि लेस्सा कि जाणिऊण सयल किं पलविएण बहुणा किंपायफलं पक्क ... किं बहुणा वचणेण किं बहुणा हो तजि किं बहुणा हो देवि कुतवकुलिंगिकुणाणी कुमयकुमुदपससा ... कुलस्वजादियुद्धिम ३८२ ४२२ ... ... ... ४२० ... ... ४१४ ... चोराण समाएण य.. ३८१ .. ... .. ...
२८ ण विजागइ ४०० ... ... ... ३८८ ... ... ... ... ४१७ ४१४ ण सहति इयरदप्प... ... ४०० ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ४२२ ३८७ ... ... ३८६ ... ... ... ... ... जह कचण विसुद्ध ... जह विसयलुद्ध जाइजरमरणरोग जाए विसयविरत्तो जाव ण जाण जिणपूजा मुणिदाणं जिणलिंगधरो जोई जिष्पवयणगहिदसारा जिण्णुद्धारपदिट्ठा जीवणिवद्धं देहं जीवदया दम सर्च... जीवस्स ण संवरणं... जीवादिपयट्ठाण जे पावारेमरया जे पुण विसय जेसिं अमेज्झमझे... जोइसविजामंतो जो जोडदि विवाह जो पावमोहिदमदी जो मुणिमतवसेस... जं जाइजरामरण जं जं अखाण सुहं जंत मंतं तंत ण णचदि गायदि णमिऊण वड्माण •णामऊण सम्वसिद्ध गरइतिरियाइ दुरई ... णरएम वेअणाओ गणिहि चउदह ... ... ... ३९० ४०९ ण हि दाण ण हि ३९५ ण हु दंडद कोहाइ ४२४ | णाणभासविहीणं ३९१ | माणस्स गस्थि दोसो ३९८णाणी खवेद कम्म ४२६ णाणेग झाणसिद्धी... ३८८ णाणेण दंसणेण य ४३७णाणं चरित्तसुद्ध ४३२ | गाणं चरित्तहीण ४१४ णाणं झागं जोगो ३८६ गाणं णाऊण जरा ... ४१९णिखेवणयप्पमाण ४१३ | णिच्चिदरपादुसत्तय ३८१ गिच्छयववहार ३८. णिच्छयणएण जीवो ३९५ | गिद्दड्डअट्टकम्मा ४२१ मिट्टिो जिणसमये ४१९ जिंदा वंचणदूरो ३९८ |णियतच्चुवलद्धि नियसुद्धप्पपुरत्तो गिरयाऊ जहण्णादिसु ३९३/णिरया हवंति हेहा ४३५ पिम्येगतिय भावद... ... ४२३ ४३१ ... ... ... ४२८ .. ... ... ... ... ... ... ... ... ४३. ४३२ ... ... ... ४११ ... १८९ |तञ्चवियारणसीरो ४२६ | तणुकुट्ठी कुठभंग ... ...
२९ ... ताव ण जाणदि निव्वं कायकिलेस तुसधम्मतबलेण ... ... ... ३८२ ... .. ... ४०८ ... ... ४३८ . .. .. ... ... ४१० ३८१ ... ... ... ... दवगुणपजएहि दव्यरिबकायछप्पण दाणीण दालिद्द दाणु ण धम्मु ण दाण पूजा मुक्ख दाण पूजा सील दाणं भोयणमेत दिपणइ सुपरसदाण दिव्युत्तरणसरित्य दुक्खे गजहि गाणं दुग्गंध बीभत्स देवगुरुधम्मगुणचा देवगुरुसमयभत्ता देह कलत्तं पुत्त देहादिमु भारमे देहादो वदिरत्तो दडत्तयसल्लतय ... दसणणाणचरित्ते ४११ ४१४ ... ... ३८५ । धम्मेण होइ लिंग ... ४१२ धरियउ बाहिरि ३८९ धावदि डिणिमित्तं प ४२० पत्त विणा दाण च... ४०४ पतिभत्तिविहीण सदी ३९८ परमटेण दु आदा... ३९५ ] परसतावयकारण ३९५ पम्वजहीणगहिण ३९४ पवयणसारभास ३९५ ] पाओपहदभावो ३९५ पारंपज्जाएण दु ४१५ पावारमाणिवित्ती ३८५ | पिच्छे सधरणे ४३३ पुच्छलि घरि जमु ४०२ | पुत्तकलत्तणिमित्तं ३९४ पुत्तकलतविदूरो ४१९ | पुरिसैण वि सहियाए ४१३ | पुवठियं खवह ४३३ | पुन्वुत्तासवभेयो ४१३ | पुच जिणेहि भणिय ३८१ पुष जो पर्चेदिय ... ३८२ | पुब्ध सेवइ मिच्छा... ३८३ | पूयफलेण तिलोए ४२८ पचमहन्वयमणसा ४३७ पचविहे ससारे घ ३९८ बहिरंतरप्पमेय ४११ बहिरम्भतरगय ... ... ... ४३० ... ... ३८९ ४०३ ... ... ... ... ... ... ... ... ... ४०८ ... ... " " ... ... ... " दसणभाभा दसणवयसामाश्य दसण सुद्धो धम्मो... ... ४३९ ... ... ४२१ धणधण्णा धम्मग्झाणभास ... ...
... ... ... ... वंधो गिरओ सतो यधपदेसग्गलण पहुदुक्खभायणं वारसअणुवेवाओ .. ... . ४३५ ४३८ ... ... ... ... ४०८ ... ... भतिरिछायचोर मयवसमलविवनिय भुजेइ जहालाह भुत्तो अयोगुलोसइयो मूमहिलाकण्णाद ४४१ ... ४२३ . ... ३८२ मोरखगया जे पुरिसा ४३७ मोरखणिमित्त दुक्स ४१५/मोत्तण अमुहभाव .... ४४१ मोत्तूण कुटिलभाव... मोहु ण द्विज्जा ₹ ३९३ रख पहाणहीणं ४१५ | रत्तिदिव पडिक्मण ४१६ रयणत्तयकरण १०७ रयणतयमेव गण ... रयणत्तयस्म हवे ४१-रसरहिरमसभेद ४२६ ३९१ रागो करेदि पिच ४३० रागो दोमो मोहो ३९४रायाइमलजुदाण ४१९ | स्वसिरिगविदाण ४२८ ३९६ रावग्यसीलमुखला... ४३३ / लोइयजणसगादो ४०२ घ ४०२ वहेमु य संडेमु ४३. वत्थुममग्गो ... ... ... ... .. ... ... ४३४ ४१२ ... ... ... .. ... ... मक्सिसिलिम्मे मणिमतोसहरक्खा... मदिमुदणाणवलेग मम पुत्तं मम भवा मयमूढमणायदण मलमुत्तघडव्व चिरं मादापिदरसहोदर मादुपिदुपुत्तमित्त मिच्छत्त थविरमण.... मिच्छामामय मिच्छधयार मिच्छोदएम जीवो... मिस्सोति बाहिरप्पा मिहरो महधयारो मूढसयस तय मूलत्तपनरत्तरत्तर मूलनरपयोभो मोरसगडगमणचारण ... ३८९ ... ... ... ४.७ ... ... ... ... .. .. .. ... ... ... ४०२ पदसनिदिपालणाए ४२१ घयगुणसीलपरीसह दरमवणजाणवाहण वसही डिमोयरणे ४२० बागरगहखाग ४१७ ४२५ ४१४ ... ... ... ... ४०१ ... ...
३१ ३८८ ... ... ... ... ... ४२५ ... ... ... वायरणउद यारि एकम्मि य विहादवियप्पमुको विहहाइसु सदा विणओ भत्तिविहीणो विसए मोहिदाण ... विरायसायविणि विसयविरतो मुचइ... वीर विसालणयण ... ... ३८७ सम्चे वि य परिहीणा ३८८ सन्छग पेच्छनो ४१२ | सा पुण दुविहा या ४०४ | समग्गिदियरूव सावयधम्म चत्ता ४०८ सालविहीणो राओ... ४३९ सिविणे पिण भुंजह ४१८ | सीदुण्ड वाउ पिउल ३८५ | सीलगुणमडिदाण... सीलदाय पाणस्म ४२६ सील तवो विसुद्ध ... .. ... ... ... ३८८ स ... ... ... सील रक्यताण ३८८ ३८७ .. ... ... .. . ... . ... ... ... ... ४१३ .. सम्गो हवेह दुग्ग सतगरजगवनिहि सप्पुरिसाण दाण सम्मसगुगादो मुगह सम्मत्तणाणदराण सम्मत्तरयणसार सम्मस सण्णाण समासणमुख सम्मविसोही तवगुण राम्म विणा सण्याण सम्माइगुणविसेसे सम्माइटी काल सम्माही पागी सम्माणविण पर सम्महरि खेदिय राम्म गार्ग वेग... सम्वम्हि होयते... सम्रे पयतिदिभो सम्दे वि पोग्गा राठ ३९७ सुकुलसुरूव ४.५ मुणहाण गहाण ३९१मुदणाणभास ३९३ सुदुनोगेण पुणो ४२७ मुहको सूरत विणा.. ४२३ ] मुहजोगेमु पवित्ती ४.. | संपविरोहासीला ४.1 संजोगविप्पजोग ४१. संजमतवमाण ४.३ | संसार मदिक्कतो ४२. समारछेदकारण ४.८ २८.] हागदाग वियार १२४ हियमियमण्ण पाग ४०१ हिराइमु कोहामु . ४१. होऊण यस्सिगो... ४२९ । हता जीवराय ... ... ४१६ ... ... ... ... ... ... .. ... ... ... ...
- रयणसारस्य पाठभेदः । रयणसारख्यस्य प्रयस्य मुदणानन्तरं पुस्तकमे ब्रह्मचारिणीतलप्रमाद्वारे लाला हरसुखराय जैनपुस्तकालयस्थ समाप्त । तत्रय पाठभेदोन मुद्यते- पृष्ठसम्या गाथासंध्या मुक्तिपाठ पाठातरम् १९ बाहविसय पाढणविदर। पाहागमायरोसे वाहीगमायरो सो ३५ विहामदिट्ठीय विहीणदिवी सूलो दायि सूलादय सीदुण्हवाहिराइ सीदुण्डवमरोह ३८ परिही ग परिहीगो ४०१ पक्सि मपिख ४.२ तवसार तवायार ४०२ जिणवरवयण जिणवयण ४०२ ५२ जहा विणसिंह जहा वियमि परम पुरुई ४०३ शिमलव जिम्मलाग्द अण्णामी अण्णाणीदो। ४०७ कणाद कणयाह ४.4 मुंदरो मुगओ निरमुहहरो सिरमुडामो ८४ सम्माण विग य २६ सम्माणविणयस्वा सालविहीणो राउ सीर विहीणो पानी ४१६ १२१ याने एवे १२३ आगमहरा आगमनत १२९ त, ट वापिऊण देव गुदाग जो सोहु मोसरी) १२९ जागतय भणाणतय वाहन विभव । २ व्याधीनामाकर स । ३ विहीनधि। निर्मल जलवत् । ५ सम्मानविनयरूपा । ६शील वेहीनस्त्याग । वाला पदानि गुदान यः स हि मोक्षरत । ८ अज्ञानतर । " " " ४१५
३
३
१४.
१४१
मोदगिल बागमुह मोदगिंदवासमोर
मह
मुराई
.
केणावि ग परिहारण तेण विणा पारिहरण
चाहण
वाहीण (ज्याधीना)
१९ पृटे १४० गायासूत्रताऽप्रेहद गाथासूत्रमधिक वर्तते-
मुयसूयरसाणाण सारामियभश्वभरवशाण पि।
मणु जाइ जहो मझ बहिरप्पाण तहा गेय ॥
४२३ पृटे १६२ अ वर्तमान गाथासूत्र तृतीयपुस्तके नास्ति ।
अय विशेषोऽत्र रयणमारारयतृतीयपुस्तके अतिम गाथासूत्रय १५॥
गाथातोऽय वर्तते । तत्पश्चात् उवसमह मम्मत्त इत्यादीनि गाथासूत्राणि यथारम
पनते। अत च पवयणमार मास धम्माणमास अमवसपिगि ६.ली
मानि त्रीणि गाथासूत्राणि प्रागुक्तान्येवात्र पुनरपि सन्ति । अतो प्रयरूया..
प्रमिता सजाता । उक्तसूत्रत्रयेऽपहने १६७ प्रमितेव संख्या संजायो। दिलीय
मुद्रितपुस्तके तु १५५ परिमिता गाया सन्ति
अस्मिन् पुस्तके यानि गया
सूत्राणि नैवोपलभ्य त तेषां तत्र तो लेख कृत एव ।
शुद्धयशुद्धिपत्र। परतय पृथ अशुद्धयः इतिदश मुद्धप इति दश दि भापाया भाषया २८ ५८ सूतत्य पडिया मविचार्य ओकोश २ ९ Y. उक्त मुत्तत्य पडिमा सुविचाय आक्रोश कि उक कीर्तिवंध नावनात हलाना भार विशेषत्वात् पद्धिमिवा १२ कीति वच १४७ सत्वनन्त इलानोमार विशपरवान् वृद्धिमिग्या तिति रात्रायेष मुखाटिन . तीति " . , १८१ मुशलीवीरवरो भवर्ता मबति रामात्र मुरपारित गर्नु मुसली वीरबरो मवती मप्रति बोरि १ "
३
५
गुना
मधर्मणि
गुना
मधमांग
धरमनो
स्पेश्य
योरेत
पर मनी
स्यैत्य
११
उनम
सामादि।
लोकादि
भादेवी
महिय
भादेहि
१९
तामूया
तपासूया
यारा
तहामूया
तथाऽगया
शुद्धयशुद्धिपत्रम्। पश्तय अशुद्धय इतिदश ६ भाषया इति दश दिट्ट भापाया सुत्तत्य पडिमा सुविधाय आक्रोश उविह सूत्तत्य पडिया मविचार्य भोक्रोश उकिह ८. २ उक्त कीति क्य १२२ १२५ १४७ ८ १६८ . कीर्तिवेद्य वरवनन्त हलानी मार विशेषत्वान् वृद्धिमित्वा तीति रानावेव मुरघाटित ६ तत् त्वनन्त इलानोभार विशषत्वात् वृद्धिभिवा तिति रात्रावेव मुदाटित गर्नु मुशलीवीरवरी भवर्ता मनालि बोधि K १७ २३ मुशली दीरवरो भवती मजलि योनि 1 २