Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Tatvarthsutra Jainagam Samanvai Bhashatika Sahit

Muni, Atmaramji Maharaj · 2010/06

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लाला गोकल चन्द जी नाहर जाहरी
अाप अखिल भारतीय एम. एस. जैन कांफ्रेम के भूतपूर्व प्रधान,
प्रधान, गवं महावीर जैन
हाई स्कुल, महावीर दायत्रं री आदि अनेक संस्थानों के जन्मदाता
नया देहली को जैन जनता के जीवन प्राग है।

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लाला गोकलचन्द जी नाहर जौहरी संक्षिप्त परिचय का इस खानदान के पूर्वजों का मूल निवास स्थान लाहौर था यहां से इस खानदान के पूर्व पुरुष पूज्य लाला निधूमल जी देहली आये । तबही से यह खानदान देहली मे ही निवास कर रहा है । तथा आज भी लाहौरी के नाम से प्रसिद्ध है । लाला निधूमल जी के पुत्र लाला सीधूमल जी नामक हुवे । आपके पुत्र जीतमल जो के बुधसिंह जी तथा चुन्नीलाल जी नामक दो पुत्र हुवे । लाला बुधसिंह जी के शादीराम जी नामक एक पुत्र हुवे । लाला शादीराम जी का स० १८८५ में जन्म हुआ आपने छोटी उमर से ही अपने व्यापार मे भाग लेना प्रारम्भ कर दिया था । आपने गोटे किनारी का काम शुरू किया इस व्यापार मे आपको बहुत लाभ हुआ । आपका सं० १९३८ मे स्वर्गवास हुआ। आपके २ पुत्र लाला भैरोप्रसाद जी व लाला गोकलचन्द जी हुवे, लाला भैरोंप्रसाद जी का जन्म सं० १९१७ में हुआ। लाला गोकलचंद जी का जन्म सं० १९२४ मे हुआ, आप स्थानकवासी समाज में बड़े प्रतिष्ठित सज्जन हैं। आपने सं० १९४६ में जवाहरात का व्यापार शुरू किया। इस व्यापार मे आपको काफी सफलता प्राप्त हुई। इस समय आपकी फर्म पर जवाहरात तथा किराये व्याज का व्यवसाय होता है। आपकी धार्मिक भावना बढ़ी चढ़ी है आपने कई धार्मिक कार्यो मे सहायताये प्रदान की हैं। आपको स० १९६२ मे दिल्ली की जैन समाज ने जैन बारादरी का काम सुपुर्द किया। जिस समय यह काम सापा गया था, उस समय उस सस्था मे १८) रु० मासिक v [ २ ] की आमदनी थी, आपने अपनी बुद्धिमानी से आमदनी बढ़ाकर करीव १२००) महीना की करदी तथा देहलो में बहुत विशाल स्थानक वनवाया इस स्थानक के लिये आपने किसी से भी चन्दा नही लिया । अब तक इस स्थानक में दो लाख रुपये लग चुके हैं, यभी मकान बन रहा है। धार्मिक प्रेम के साथ ही साथ आपका विद्यादान की तरफ विशेष लक्ष्य रहता है आपने सन् १९२० मे महावीर जैन मिडिल स्कूल स्थापित किया । जो सन् १९२८ में हाई स्कूल हो गया । जिसका मासिक खर्च १२००) है । इस प्रकार श्रापके प्रयत्नों से महावीर जैन लाइब्रेरी, महावीर जैन कन्या पाठशाला, महावीर जैन विद्यालय आदि सार्वजनिक संस्थाये स्थापित हुई। जिनसे देहली की जनता बहुत लाभ उठा रही है। आपने सोनीपत मे वहां के स्थानकवासी भाईयो के लिये ११५००) रु० मे एक मकान खरीद कर स्थानक स्थापित किया। महावीर जैन लाइब्रेरी (महावीर भवन) चांदनी चौक मे सन् १९२४ में स्थापित की गई, पुस्तकालय मे करीव ५००० पुस्तके और हस्त लिखित ग्रन्थ हैं । ४०० वर्ष पहिले के हस्त लिखित शास्त्र है, और १०० साल तक के छापे के ग्रन्थ हैं । पुस्तकालय के व्यवस्थापक सर्व श्रीमान् लाला गोकलचन्द जी साहब की हार्दिक शुभ कामनायो से इस वर्ष से बहुत उन्नति की है और आशा है कि आगामी को भी ऐसी ही उन्नति होती रहेगी।

तत्त्वार्थसूत्र- जैनाऽऽगम-समन्वय [जैनागम मूलपाठ, संस्कृतच्छाया, भाषाटीका सहित] समन्वय कत - जैन धर्म दिवाकर उपाध्याय मुनि श्री आत्मारामजी महाराज (पंजाबी) तस्वार्थ भाषाकार- प्रोफेसर चन्द्रशेखर शास्त्री M O Ph, काव्य-साहित्य-तीर्थ-प्राचार्य, प्राच्यविद्यावारिधि, आयुर्वेदाचार्य, भूतपूर्व प्रोफेसर काशी हिंदू विश्वविद्यालय प्रकाशक लाला शादीराम गोकुलचंद जौहरी चांदनी चौक, देहली. मुद्रक- पं० सीताराम भार्गव, लक्ष्मी प्रेस, एस्प्लेनेड रोड, देहली. महावीर निर्वाण सम्वत् २४६१. प्रथमबार मूल्य सजिल्द २॥ बिना जिल्द २) सन् १९३४ ईस्वी. है ta

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तत्त्वार्थ भाषाकार के दो शब्द तस्वार्थमूत्र के सूत्रों की जैन आगम पाठों से तुलना करने वाले इस " तत्त्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वय" ग्रन्थ को पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया जाता है। पूज्य उपाध्याय जी महाराज का यह प्रयत्न अत्यन्त प्रशंसनीय है। क्योंकि आगम ग्रन्थों से तत्त्वार्थसूत्र के समन्वय करने का यह सौभाग्य सत्र से प्रथम आप को ही प्राप्त हुआ है। आशा है कि आप के इस प्रयत्न से स्थानक वासियों तथा श्वेताम्बरों में तत्त्वार्थसूत्र का अधिक परिशीलन और दिगाम्बरों में जैन आगमों के अध्ययन एवं स्वाध्याय का अच्छा प्रचार हो जायेगा। इस ग्रन्थ में इस बात के लिये विशेष प्रयत्न किया गया है कि यह विद्यार्थियों और स्वाध्याय प्रेमी दोनों के लिये उपयोगी हो सके। अतएव इसको संस्कृत छाया में अत्यन्त सुगम सन्धियां ही दी गई हैं। प्रायः स्थल, विना संधियों के ही रखे गये हैं। मूल ग्रन्थ में ऊपर तत्वार्थसूत्र के सूत्रों को देकर उनके नीचे प्राकृत आगम प्रमाण दिये गये हैं। उनके नीचे उन पाठों की संस्कृत छाया, फिर उनकी भाषा टीका और अन्त में आवश्यक स्थानों पर सूत्र और आगम पाठों का समन्वय करने वाली संगति दी गई है। जो भागम पाठ शीघ्रता के कारण मूल ग्रन्थ में छपते समय नहीं दिये जा सके थे, उनको परिशिष्ट नं० १ में दिया गया है। परिशिष्ट नं० २ में मेरा लिखा हुआ, तत्वार्थ सूत्र भाषा है । इसमें तत्त्वार्थसूत्र के सूत्रों का अर्थ सरल हिन्दी भाषा में सूत्रों के अंक दे २ कर इस प्रकार से लिखा गया है कि वह भी एक स्वतन्त्र ग्रंथ सा ही बन गया है। इसमें भाव खोलने वाले शब्द छोटे कोष्टक -()- में और वाक्य पूरे करने वाले शब्द बड़े कोष्टक -[]- में दिये गये हैं। परिशिष्ट नं०३ में दिगम्बर सूत्र पाठ और श्वेताम्बर सूत्रपाठों का अंतर दिखलाया गया है।

[ घ ] N इस ग्रंथ की विपानुक्रमणिका भी एक विशेषता है । सूत्रों की विषयानुक्रमणिका में प्रायः सूत्रों को ही देने की एक परिपाटी है। किंतु यहां प्रत्येक अध्याय का मोटे २ विषयों में विभाग करके वही विषय विषयानुक्रमणिका और परिशिष्ट नं० २ दोनों स्थान में दिये गये हैं । इससे एक बड़ा लाभ यह भी है कि अन्य का विषय ( Analysis ) बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है। अन्त में इतना निवेदन है कि इसमें कहीं मेरे प्रमादवश तथा कहीं प्रेस की कृपा से अफ सम्बन्धी भूलें रह गई हैं । आशा है कि पाठक उनके लिये क्षमा करेंगे। इसके अतिरिक्त यदि कोई महानुभाव इस समन्वय के विषय में आगम पाठ संबंधी या और कोई विशेष सूचना दें तो उसका भी स्वागत किया जावेगा। इस प्रकार को त्रुटियों को सूचना मिलते रहने से उनको इस ग्रन्थ के अगले संस्करण में दूर करने का प्रयत्न किया जावेगा। देहली, ता० १ नवम्बर सन् १९३४ ई० चन्द्रशेखर शास्त्री M 0 Ph., काव्य-साहित्य-तीर्थ-आचार्य, प्राच्यविद्यावारिधि, आयुर्वेदाचार्य भूतपूर्व प्रोफेसर बनारस हिन्दू यूनीवर्सिटी.

प्रस्तावना प्रिय सुज्ञपुरुषों! इस अनादि संसार चक्र में परिभ्रमण करते हुए आत्मा को मनुष्य जन्म और आर्यत्व भाव की प्राप्ति हो जाने पर भी श्रुतिधर्म की प्राप्ति दुर्लभ ही है । इसके अतिरिक्त सम्यग्दर्शन की निर्भरता भी सभ्यक श्रुत पर ही है। अतएव उक्त सर्व साधन मिल जाने पर भी सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिये सम्यक् श्रुत का अध्ययन अवश्य करना चाहिये । अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि उक्त प्राप्ति के लिये अध्ययन करने योग्य कौन २ ग्रन्थ ऐसे हैं जिनको सम्यकश्रुत का प्रतिपादक कहा जाना चाहिये । इसके लिये यह उत्तर अत्यन्त युक्ति पूर्ण है कि जिन ग्रंथों के प्रणेता सर्वज्ञ अथवा सर्वत्र सदृश महानुभाव हैं वह आगम ही अध्ययन करने योग्य हैं। क्योंकि जिसका वक्ता प्राप्त (सर्वज्ञ) होता है वही आगम सम्यग्दर्शन की प्राप्ति में कारण होता है। यद्यपि सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति क्षायिक, वायोपशमिक अथवा औपशमिक भाव पर निर्भर है तथापि सम्यक् श्रुत को उसकी उत्पत्ति में कारण माना गया है। अतएव सिद्ध हुआ कि सम्यक् श्रुत का अध्ययन अवश्य करना चाहिये। श्वेताम्बर-स्थानकवासी सम्प्रदाय के अनुसार सम्यक् श्रुत का प्रतिपादन करने वाले ३२ श्रागम ही प्रमाणकोटि में माने जाते हैं, जो निम्न प्रकार हैं :- ११ अङ्ग, १२ उपाङ्ग, ४ मूल, ४ छेद और ३२ वां आवश्यक सूत्र । इनके अतिरिक्त इन आगमों के आधार से एवं इनके अविरुद्ध बने हुए ग्रंथों को न मानने में भी उक्त सम्प्रदाय आग्रहशील नहीं है। उक्त शास्त्रों के विषय में विशेष परिचय प्राप्त करने के लिये इस विषय के जैन ऐतिहासिक ग्रंथ देखने चाहिये अनेक महानुभावों ने उक्त आगमों के आधार पर अनेक प्रकार के ग्रन्थों की रचना की है । जिनका अध्ययन जैन समाज में अत्यन्त आदर और पूज्य भाव से [ च ] किया जा रहा है इन लेखकों में से भी जिन महानुभावों ने भागों में से श्राव- श्यक विषयों का संग्रह कर जनता का परमोपकार किया है उनको अत्यन्त पूज्य दृष्टि से देखा जाता है और उनके ग्रंथ जैन समाज में अत्यन्त श्रादरणीय समझे जाते हैं। वर्तमान ग्रंथ तत्त्वार्थसूत्र (मोक्ष शास्त्र ) की गणना उन्हीं आदरणीय ग्रंथों में है । इस ग्रंथ में इसके रचयिता ने आगों में से आवश्यक विषयों का संग्रह कर जनता का परमोपकार किया है। इसमें तत्त्वों का संग्रह समयोपयोगी तथा सूक्ष्म दृष्टि से किया गया है । इसके कर्ता ने आगों की मूल भाषा अर्द्ध मागधी से विषयों का संग्रह कर उनको संस्कृत भाषा के सूत्रों में प्रगट किया है । इससे जान पड़ता है कि उस समय संस्कृत भाषा में सूत्र रूप में लिखने की प्रथा विद्वानों में आदर पाने लगी थी। सूत्रकार ने अपने ग्रंथ में जैन तत्त्वों का दिग्दर्शन विद्वानों के भावानुसार संस्कृत भाषा में किया। प्रायः विद्वानों का मत है कि तत्त्वार्थसूत्र के रचयिता का समय विक्रम की प्रथम शताब्दो है। संस्कृत भाषा उस समय विकसित हो रहो थी । जिस प्रकार इस ग्रंथ के कर्ता ने इस संग्रह में अपनी अनुपम प्रतिभा का परिचय दिया है, उसी प्रकार अनेक विद्वानों ने इसके ऊपर भिन्न २ टीकात्रों की रचना करके जैन तत्त्वों का महत्व प्रगट किया है । और इस ग्रंथ को आगम के समान ही प्रमाण कोटि में स्थान देकर इसके महत्व को बहुत अधिक बढ़ा दिया है। पूज्यपाद उमास्वाति जी महाराज ने जैन तत्वों को आगों से संग्रह कर जैन और जैनेतर जनता का बड़ा भारी उपकार किया है । यद्यपि इस सूत्र को संग्रह ही माना गया है, किन्तु यह ग्रन्थ सूत्रकार की काल्पनिक रचना नहीं है । कारण कि इस ग्रन्थ में जिन २ विषयों का संग्रह किया गया है उन सब का आगमों में स्पष्ट रूप से वर्णन है । अतः स्वाध्याय प्रेमियों को योग्य है कि वह भक्ति और श्रद्धा पूर्वक आगम तथा सूत्र दोनों का ही स्वाध्याय करें । जिससे भेद भाव मिटकर जैन समाज उन्नति के शिखर पर पहुँच जावे। भव रहा यह प्रश्न कि क्या यह ग्रन्थ वास्तव में संग्रह ग्रंथ है ? सो - [ छ । २ । ३४ आगमों का स्वाध्याय करने वाले तो इस ग्रन्थ को आगमों से संग्रह किया हुआ मानते ही हैं । इसके अतिरिक्त प्राचार्यवर्य हेमचन्द्रसूरि ने अपने बनाये हुए 'सिद्धहेमशब्दानुशासन' नाम के व्याकरण में पूज्यपाद उमास्वाति जी महाराज को संग्रह कर्ताओं में उत्कृष्ट संग्रह कर्ता माना है। जैसा कि उन्होंने उक्त ग्रन्थ की स्वोपत्ति में कहा है। उत्कृष्टऽनूपेन २। उत्कृष्टार्थादनूपाभ्यां युक्ताद्वितीया स्यात् । अनुसिद्धसेनं कवयः । उपोमास्वाति संग्रहोतारः ।। ३४॥ स्वोपज्ञ वृहद्वृत्ति में भी उक्त आचार्यवर्य ने उक्त सूत्र की व्याख्या में कहा है:- "उत्कृष्टऽथें वर्तमानात् अनूपाभ्यां युक्ताद् गौणानाम्नो द्वितीया भवति । अनुसिद्ध- सेनं कवयः । अनुमल्लवादिनं तार्किकाः । उपोमास्वाति संगृहीतारः । उपजिनभद्रतमाश्रमण ग्याख्यातारः । तस्मादन्ये हीना इत्यर्थः ॥ ३६॥" आचार्य हेमचन्द्र का समय विकम को १२ वीं शताब्दी सभी विद्वानों को मान्य है। आपके कथन से यह भलीप्रकार सिद्ध हो जाता है कि पूज्य पाद उमास्वाति संग्रह करने वालों में सबसे बढ़कर संग्रह करने वाले माने गये हैं । आगमों से संग्रह किया जाने से यह ग्रन्थ भी संग्रह ग्रंथ माना गया है। अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि भगवान् उमारवाति ने संग्रह किस रूप में किया है । सो इसका उत्तर यह है कि इस ग्रन्थ में दो प्रकार से संग्रह किया गया है । कहीं पर तो शब्दशः संग्रह है, अर्थात् आगम के शब्दों को संस्कृत रूप दे दिया गया है और कहीं पर अर्थसंग्रह है, अर्थात् आगम के अर्थ को लक्ष्य में रखकर सूत्र की रचना की गई है। कहीं २ पर आगम में आये हुए विस्तृत विषयों को संक्षेप रूप से वर्णन किया गया है । आगमों से किस प्रकार इस शास्त्र का उद्धार किया गया है ?' इस विषय को स्पष्ट करने के लिये ही वर्तमान ग्रन्थ विद्वत्सयाज के सन्मुख रखा मा रहा है । इस का यह भी उद्देश्य है कि विद्वान् लोग आगमों के स्वाध्याय का लाभ उठा सकें।

[ ज ] के शब्द इस ग्रंथ में सूत्रों का आगमों से समन्वय किया गया है। इसमें पहिले तत्त्वार्थ सूत्र का सूत्र, फिर आगम प्रमाण, उसके पश्चात् उस आगम पाठ की संस्कृत छाया और अंत में प्रागम पाठ की भापा टीका दी गई है, जिससे पाठकवर्ग आगम और सूत्र और अर्थों का भली प्रकार ज्ञान प्राप्त कर सकें। सूत्रों के सामान्य अर्थ इस ग्रंथ के अंत में परिशिष्ट नं० २ में दे दिये गये हैं। यहां यह वात ध्यान देने योग्य है कि इस ग्रन्थ में दिये हुए आगम प्रमाण आगमोद्धार समिति द्वारा मुद्रित हुए आगमों से दिये गये हैं। पाठकों के सन्मुख सूत्र के पाठ से आगमों के पाठ का यह समन्वय उपस्थित किया जाता है। यदि आगम ग्रंथ के कोई विद्वान् समन्वय में कहीं त्रुटि समझे तो उसको स्वयं समन्वय कर पूर्ण पाठ से अवगत करने की कृपा करें । क्योंकि-'सारम्भाहि दोषेण धूमेनाग्निरिवाटताः ।' यह ग्रन्थ इतना महत्त्वपूर्ण है कि प्रत्येक व्यक्ति के स्वाध्याय करने योग्य है । वास्तव में यह तत्वार्थसूत्र आगमग्रन्थों की कुंजी है । अतः जिन २ विद्यालयों, हाईस्कूलों और कालेजों में तत्त्वार्थसूत्र पाठ्य क्रम में नियत किया हुआ है उन २ संस्थाओं के अध्यक्षों को योग्य है कि वह सूत्रों के साथ ही साथ वालकों को आगम के समन्वय पाठों का भी अध्ययन करावें । जिससे उन वालकों को आगमों का भी भली भांति ज्ञान हो जाये। कुछ लोग यह शंका भी कर सकते हैं कि 'संभव है कि श्वेताम्बर आगमों में तत्त्वार्थसूत्र के इन सूत्रों की ही व्याख्या की गई हो ।' सो इस विषय में यह बात स्मरण रखने की है कि जैन इतिहास के अन्वेषण से यह वात सिद्ध हो चुकी है कि आगम ग्रन्थों का अस्तित्त्व उमास्वाति जी महाराज से भी पहिले था। इसके अतिरिक्त तत्त्वार्थसूत्र और जैन आगमों का अध्ययन करने से यह स्वयं ही प्रगट हो जावेगा कि कौन किस [ झ ] का अनुकरण है । अतएव सिद्ध हुआ कि आगमों का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिये, जिस से सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र की प्राप्ति होने पर निर्वाणपद की प्राप्ति हो सके । श्री श्री श्री १००८ श्राचार्यवर्य श्री पूज्य पाद मोतीराम जी महाराज, उनके शिष्य श्री श्री श्री १००८ गणापच्छेदक तथा स्थविर पद विभूषित श्री गणपति राय जी महाराज, उनके शिष्य श्री श्री श्री १०८ गणावच्छेदक श्री जयराम दास जी महाराज और उनके शिष्य श्री श्री श्री १०८ प्रवर्तक पद विभूषित श्री शालिग्राम जी महाराज की ही कृपा से उन का शिष्य में इस महत्त्वपूर्ण कार्य को पूर्ण कर सका हूँ। गुरुचरणरज सेवी जैनमुनि-उपाध्याय-आत्माराम.

- आवश्यक सूचना पाठकों से सविनय निवेदन है कि सम्पादक जी की रुग्णावस्था के कारण प्रूफ आदि के ठीक न देखने से, कतिपय स्थलों में त्रुटिये रहगई है, अतः यदि सुज्ञ पाठकों द्वारा हमें सूचनाएं मिलती रहें तो हय द्वितीय संस्करण में ठीक करने की चेष्टा करेंगे। तथा--यदि कोई आगमाभ्यासी आगम पाठों से और भी सुचारु रूप से समन्वय करने की कृपा करें, तो हमको सूचित करदें जैसे कि--तत्त्वार्थसूत्र के ५ अध्याय के २६ वाँ सूत्र, एगत्तेण पुइत्तेण खंधाय परमाणु य- ( एकत्वेन पृथक्त्वेन स्कन्धाश्चपरमाणावश्च ) उत्तराध्ययन सूत्र अ० ३६ गाथा ११--इस पाठ से सम्बन्ध रखता है । इसी प्रकार की अन्य सूचनाओं से भी सूचित करें, ताकि उन पर आवश्यक ध्यान दिया जा सके । ग्रन्थ के अंतिम भाग में तत्त्वार्थ सूत्र भाषा के नाम से परिशिष्ट दिया गया है । उसमें तत्त्वार्य के मूलसूत्रों का अर्थ किया गया है । परन्तु सत्व- रतादि कारणों से अर्थ सम्बन्धी कतिपय स्थल संदिग्ध एवं अस्पष्ट से रह गये हैं । अतः वाचक महोदय उन २ स्थलों को सावधानी से पढ़ें। समन्वयकर्ता ने जो दिगम्बर सूत्र पाठों के साथ समन्वय किया है, वह उनके अपने उदार भावों का संसूचक है। जिससे दिगम्बर विद्वान् भी आगों के स्वाध्याय से लाभ उठायें और परस्पर प्रेमभाव सम्पादन कर जैन धर्म का संगठित शक्ति से प्रचार करें । जिस से जनता जैनधर्म के तत्वों को भली भाँति धारण कर सके। प्रकाशक.

श्री तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय विषयानुक्रमणिका की पृष्ठ त० जैना विषय सूत्र संख्या ऽऽगम- समन्वय पृष्ठ भाषा सूत्र १-३३ २४४ प्रथम अध्याय मोक्ष मार्ग का वर्णन सम्यग्दर्शन १ २--३ ६ ... ६ " ३४५ २४७ सात तत्त्व उनको जानने के साधन पांचों ज्ञान का वर्णन तीन अज्ञान सात नय द्वितीय अध्याय जीव के पांच भाव जीव का लक्षण जीवों के भेद इन्द्रियाँ पांचों इन्द्रियाँ और उनके विषय ९-३० ३१-३२ ३३ १-५३ २६ २७ २८ " २८ २४८ ... ४५ २४६ १५---१८ २४-२१ ... षट्काय जीव २२-२४ ४८ विग्रहगति .. ४६ ૨૫૦ तीन जन्म २५-३० ३१-३५ ३६-४९ ५३ ५५ २५१ पांच शरीर जीवों के वेद परिपूर्ण आयु वाले जीव પૂ૦–પૂર રપૂર ६४ ខ្ញុំប ५३ पृष्ठ त. जैना विषय सूत्र संख्या ऽऽगम- समन्वय पृष्ठ भाषा सत्र तृतीय अध्याय ६७ ६७ २५३ सात नरक ७-८ ७३ ९-३२ २५४ ... २५६ ३३-३६ १-४२ १-३ ६५ " मध्यलोक का वर्णन जम्बूद्वीप अढाई द्वीप का वर्णन चतुर्थ अध्याय चार प्रकार के देव देवों के इन्द्र आदि दश भेद देनों का काम सेवन देवों के भावान्तर भेद स्वर्ग और उनके ऊपर की रचना लौकान्तिक देव तियेच जीव ६६ २५७ २५७ ... १०२ १०-१७ १८-२३ २४-२६ २५८ २७ ११२ २५8 देवों की आयु " - २८-४२ १-४२ पञ्चम अध्याय १२३ २६० के द्रव्य - ८-११ १२-१५ १२५ १२७ द्रव्यों के प्रदेश द्रव्यो का अवगाह जीव के छोटे बड़े शरीर को ग्रहण करने का दृष्टान्त द्रव्यों का उपकार २६१ पुद्गल द्रव्य का वर्णन १७-२२ २३-२८ २९-३२ ३३-३७ ३८ द्रव्य का लक्षण स्कन्धो के कन्ध का वर्णन द्रव्य का दूसरा लक्षण काल द्रव्य १२७ १२६ १३३ १३६ १३७ १३८ २६२ ... ३६-४० २६३ पृष्ट त० जैना विषय सूत्र संख्या Sऽगम- समन्वय पृष्ठ भाषा सुत्र गुरण का लक्षण ४१ १४० पर्याय का लक्षण ४२ " १-२७ १४१ १-४ " १४२ १४५ ७ २६४ : १४६ षष्ठ अध्याय प्रास्त्रव का वर्णन साम्परायिक आस्रव के भेद श्रास्रव के अधिकरण जीवाधिकरण के १०८ भेद अजीवाधिकरण आठों कर्मों के प्रास्रव के कारण सप्तम अध्याय पांचो व्रत और उनकी भावनोए पांचो पापो के लक्षण अणुव्रती श्रावक व्रतों और शिलां के अतीचार " १०-२७ १५७ २६६ १-१२ १३-१९ २६७ २०-२२ १६३ १६५ १६७ २६८ २३-३७ ३८-३६ दान का वर्णन २६४ अष्टम अध्याय १-२६ १७६ २७० १ २ बंध के कारण बंध का स्वरूप बंध के भेद प्रकृतिवध-आठों कर्मो की प्रकृतियां स्थितिबन्ध ३ १८० " .. २७२ १४-२० २१-२३ अनुभाग बन्ध . १९४ १६६ १९७ " प्रदेश बन्ध J [6] पृष्ट त० जना विषय सूत्र सख्या SSगम- समन्वय पृष्ट भाषा सूत्र पुण्य तथा पाप प्रकृतियां २५-२६ १९८ २७३ नवम अध्याय १-४७ संवर का लक्षण संवर के कारण निर्जरा के कारण तीन गुप्तियां पांच समितियाँ ३ ४ २०१ ५ " दश धर्म ६ २०२ ७ २७४ ८-१७ २०५ २७५ बारह भावनाएं बाईस परीषह जय पांच प्रकार का चारित्र बारह प्रकार के तपों का वर्णन ध्यान का वर्णन चार प्रकार के प्रार्तध्यान चार प्रकार के रौद्रध्यान १९-२६ २१३ २१४ २१८ . २७-२६ २७६ ३०-३४ २१६ ३५ धर्म ध्यान के चार भेद ३६ २२२ ३७.४४ २२३ .. ४५ २२७ २७७ ... ४६-४७ चार प्रकार के शुक्ल ध्यान का वर्णन निर्जरा का परिमाण मुनियो के भेद दशम अध्याय केवल ज्ञान का उत्पत्ति क्रम मोक्ष प्राप्ति क्रम ऊर्च गमन का कारण २२६ २७८ २-५ २३० ६-७ २३१ " [ ण ] । पृष्ट त० जैना विषय पृष्ट सूत्र संख्या Sऽगस- समन्वय भाषा सूत्र २३५ २७८ २३६ अलोक में न जाने का कारण सिद्धों के भेद परिशिष्ठ नं. १ परिशिष्ट नं. २ परिशिष्ठ नं. ३ २४४ २७६ [ त ] शुभ-संवाद अतीव हर्ष के साथ, सूचित किया जाता है कि-विक्रमाब्द १६६१ कार्तिक शुक्ला चतुर्दशी-चातुर्मास्य समाप्ति के दिन महावीर भवन में, प्राकृत साहित्य एवं जैनागमों के प्रतिष्ठा प्राप्त विद्वान उपाध्याय जैनमुनि श्री आत्मारामजी महाराज (पंजाबी), श्री श्वेताम्बर स्थानक वासी जैन संघ देहली द्वारा 'जैनधर्म दिवाकर' पद से विभूषित किये गये हैं। निवेदक- शादीराम गोकुलचंद जौहरी धन्यवाद [१] २५०) रु. के मूल्य को पुस्तकों के ग्राहक श्रीमान सेठ छोटेलाल जी पहलावत, अलवर। [२] ५०० प्रति के कागज का मूल्य श्रीमान् लाला कुन्दनलाल जी पारख सुपुत्र लाला शादीराम जी मालिक फर्म मानसिंह जी मोतीराम जी जौहरी मानीवाड़ा देहली ने दिया । [३] शेष सम्पूर्ण व्यय श्री महावीर जैन भवन चांदनी चौक देहली के कोष में से दिया गया भवदीय- गोकुलचंद नाहर ।

॥ नमोऽत्यु णं समणस्स भगवो महावीरस्स ।। जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम महाराज- संगृहीतः तत्त्वार्थसूत्र- जैनाऽऽगमसमन्वयः। प्रथमाध्यायः। , सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः । वत्वार्थसूत्र अध्याय १, सूत्र १, नादंसणिस्स नाणं, नाणेण विणा न हुन्ति चरणगुणा । अगुणिस्स नत्थि मोक्खो, नथि अमोक्खस्स निव्वाणं ॥ उत्तराध्ययन सूत्र अध्ययन २८ गाथा ३० तिविधे सम्मे पएणते, तंजहा-नाणसम्मे दंसणसम्मे चरित्तसम्मे। स्थानाङ्गसूत्र स्था० ३ उद्देश ४ सूत्र १६४. + सम्मदंसणे दुविहे पएणत्ते, तं जहा-णिसग्गसम्मइंसणे चेव अभिगमसम्महसणे चेव । णिसग्गसम्मइंसणे दुविरे पएणते, तं जहा-पडिवाई चेव अपडिवाई चेव । अभिगमसम्मईसणे दुविहे पएणत्ते, तं जहा-पडिवाई चेव अपडिवाई चेव । स्थानाङ्ग सूत्र, स्थान २ उद्दे० १ सूत्र ७०.

२ ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : ... PATAL मोक्वमग्गगई तच्चं, सुणेह जिणभासियं । चउकारणसंजुत्तं, नाणदंसणलक्खणं ॥ नाणं च दंसणं चेव, चरित्तं च तवो तहा। एस सरगु त्ति पन्नत्तो, जिणेहि वरदसिहि ।। लाणां च दंसणं चेव, चरित्तं च तवो तहा। एवं मगमगुप्पत्ता, जीवा गच्छन्ति सोग्गई ॥ उत्तराध्ययन सूत्र अध्ययन २८ गाथा १-३ दुविहे नाणे पएणते, त जहा- पञ्चक्खे चेव परोक्खे चेव १ । पञ्चक्खे नाणे दुविहे पन्नने, त जहा- केवलनाणे चेव णोकेवलनाणे चेव २ । केवलणाणे दुविहे पएणत्ते. त जहा - भवत्थकेवलनाणे चेव सिद्धकेवलणाणे चेव ३ । भवत्थकेवलणाणे दुविहे पण्णत्ते, त जहा-सजोगिभवत्थकेवलणाणे चेव, अजोगिभवत्थकेवलणाणे चेव ४ । सजोगिभवत्थ- केवलणाणे दुविहे पएणते, तं जहा-पढमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणे चेव, अपढम- समयसजागिभवत्थकेवलणाणे चेव ५, अहवा चरिमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणे चेव अचरिनसमयसजोगिभवत्यकेवलणाणे चेव ६। एवं अजोगिभवत्थकेवलनाणेऽवि ७- सिद्धवेवलणाणे दुविहे पएणत्ते, तं जहा-अणतरसिद्धकेवलणाणे चेव परंपरसिद्धकेवल- णाणे चेव ।। अणतरसिद्धकेवलनाणे दुविहे पएणत्ते, तं जहा-एक्काणंतरसिद्धकेवलणाणे अणक्काणतरसिद्धकेवलणाणे चेव १० । परंपरसिद्धकेवलणाणे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा एक्कपरंपरसिद्धकेवलणाणे चेव अणेक्कपरपरसिद्धकेवलणाणे घेव ११ । णोकेवलणाणे दुविहे परणत्ते, तं जहा- ओहिणाणे चेव मणपज्जवणाणे चेव १२ । ओहिणाणे दुविहे पएणते, तं जहा-भवपञ्चइए चेव खोवसमिए चेव १३ । दोण्ह भवपञ्चइए पन्नत्ते, तं जहा-देवाणं चेव नेरइयाणं चेव १४ । दोण्हं खोवसमिए पएणते, तं जहा- मणुस्साण चेव पचिंदियतिरिक्खजोणियाणं चेव १५ । मणपज्जवणाणे दुविहे पएणत्ते, तं जहा-उज्जुमति चेव विउलमति चेव १६ । परोक्खे णाणे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा- आभिरिणवोहियणाणे चेव सुयनाणे चेव १७ । आभिणिबोहियणाणे दुविहे पएणत्ते, - प्रथमाध्याय: [ ३ छाया नादर्शिनिनो ज्ञानं, ज्ञानेन विना न भवन्ति चारित्रगुणाः । अगुणिनो नास्ति मोक्षः, नास्त्यमोक्षस्य निर्वाणम् ।। त्रिविधं सम्यग् प्रज्ञप्तं तद्यथा ज्ञानसम्यम् दर्शनसम्यक् चारित्रसभ्यम्। मोक्षमार्गगतिं तथ्यां, शृणुत जिनभाषिताम् । चतुःकारणसंयुक्तां, ज्ञानदर्शनलक्षणाम् ।। ज्ञानं च दर्शनं चैव, चारित्रं च तपस्तथा । एष मार्ग इति प्रज्ञप्त:, जिनैर्वरदर्शिभिः ।। ज्ञानं च दर्शनं चैव, चारित्रं च तपस्तथा । एतं मार्गमनुप्राप्ता :, जीवा गच्छन्ति सुगति ।। तं जहा-सुयनिस्सिए चेव असुयनिस्सिए चेव १८ । सुयनिस्सिए दुविहे पएणन्ते, त जहा- अत्थोग्गहे चेव बजणोग्गहे चेव १६ । असुयनिस्सितेऽवि एमेव २० । सुयनाणे दुविहे पएणते, तं जहा - अगपविट्ठ चेव अगबाहिरे चेव २१ । अगबाहिरे दुविहे परणते, तं जहा - आवस्सए चेव आवस्सयवइरित्ते चेव २२ । आवस्सयवतिरित्ते दुविहे पएणते, त जहा - कालिए चेव उक्कालिए चेव २३ ॥ स्थानागसूत्र० स्थान २, उद्दे० १ सूत्र ७१ दुविहे धम्मे परणत्ते, तं जहा - सुयधम्मे चेव चरित्तधम्मे चेव । सुयधम्मे दुविहे पण्णत्ते, त जहा-सुत्तसुयधम्मे चेव अत्थसुयधम्मे चेव । चरित्तधम्ये दुविहे पण्णते, तं जहा- आगारचरित्तधम्मे चेव अणगारचरित्तधम्मे चेव । दुविहे संजमे पएणते, तं जहा - सरागसंजमे चेव वीतरागसंजसे चेव । सराग- सजसे दुविहे पण्णते, तं जहा - सुहुमसंपरायसरागसंजमे चेव बादरसपरायसरागसजमे चेव । सुहुमसंपरायसरागसंजमे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-पढमसमयसुहुमसपरायसरागसजमे चेव अपढमसमयसु० । अथवा चरमसमयसु० अचरिमसमयसु० । अहवा सुहुमसंपराय- सरागसजमे दुविहे पएणत्ते, तं जहा - सकिलेसमाणए चेव विसुज्झमाणए चेव । वादर- अणगारचरित्तधम्मे दुविहे पण्णत्ते,' इत्यपि पाठान्तरम् ।

४] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : भाषाटीका-सम्यग्दर्शन के विना सम्यग्ज्ञान होना असम्भव है, ज्ञान के विना चारित्र के गुण प्रगट नहीं हो सकते, चारित्रगुण हीन का कर्मो से मोक्ष नहीं हो सकता और विना कर्मों का मोक्ष (छुटकारा) हुए निर्वाण होना असम्भव है। सम्यक् तीन प्रकार का कहा गया है । ज्ञानसम्यक् , दर्शनसम्यक् और चारित्र- सम्यक् । जिनेन्द्र भगवान् की कही हुई वास्तविक मोक्ष मार्ग की गति को सुनो । वह गति निम्नलिखित चार कारणों से युक्त है और ज्ञान तथा दर्शन उसके लक्षण हैं। लोकालोक को देखने वाले जिन भगवान् ने ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप यह चार कारण उस मोक्ष मार्ग के बतलाये हैं। उन ज्ञान, दर्शन, चारित्र, और तप के मार्ग को प्राप्त करने वाले जीव उत्कृष्ट गति (मोक्ष) को प्राप्त करते हैं। संपरायसरागसंजमे दुविहे पएणते, तं जहा-पढमसमयवादर० अपढमसमयचादरसं० । अहवा चरिमसमय० अचरिमसमय० । अहवा वायरसंपरायसरागसंजमे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-पडिवाति चेव अपडिवाति चेव । वीयरागसंजमे दुविहे पएणत्ते, तं जहा- उवसंतकसायवीयरागसंजमे चेव खीणकसायवीयरागसंजमे चेव । उवसंतकसायवीयराग- संजमे दुविहे परणत्ते, तं जहा-पढमसमयउवसंतकसायवीतरागसंजमे चेव अपढमसमय- उव० । अहवा चरिमसमय० अचरिमसमय० । खीणकसायवीतरागसंजमे दुविहे पएणत्ते, तं जहा- छमत्यखीणकसायवीयरागसंजमे चेव केवलिखीणकसायवीयरागसंजमे चेव। छउमत्थखीणकसायवीयरागसंजमे दुविहे पएणते, तं जहा-सयंबुद्धछउमत्थखीणकषाय० बुद्धचोहियछउमत्य० । सयंबुद्धछउमत्य० दुविहे पण्णत्ते, तं जहा- पढमसमय० अपढम- समयः । अथवा चरिमसमय० अचरिमसमय० । केवलिखीणकसायवीतरागसंजमे दुविहे पएणते, तं जहा-सजोगिकेवलिखीणकसाय० अजोगिकेवलिखीणकसायवीयराग० । सजोगिकेवलिखीणकसायसंजमे दुविहे पएणते, तं जहा-पढमसमय० अपढमसमय० । अहवा चरिमसमय० अचरिमसमय अजोगिकेवलिखीणकसाय० संजमे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-पढमसमय० अपदमसमयः। अहवा चरिमसमय. अचरिमसमय०॥ स्थानांगसूत्र स्थान २ उद्दे०१ सूत्र ७२.

प्रथमाध्यायः [ ५ - तत्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ॥ त०सू. अ० १, सू०२ तहियाणं तु भावाणं, सब्भावे उवएसणं । भावेणं सदहन्तस्स, सम्मतं तं वियाहियं ।। उत्तरा० अ०२८ गाथा १५ छाया तथ्यानां तु भावानां, सद्भाव उपदेशनम् । भावेन श्रद्दधत : सम्यक्त्वं तद् व्याख्यातम् ।। भाषा टीका-वास्तविक भावों के अस्तित्व के उपदेश देने तथा उसी भाव से उसका श्रद्धान करने को सम्यक्त्व कहा गया है। संगति-नीव, अजीव आदि तत्त्वों के उसी स्वरूप का उपदेश देना जो वास्तविक है और जिसका जैन शास्त्रों में वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त जिस रूप से उसको जानकर उनका उपदेश किया जाता है उसी भाव से उनमें श्रद्धान रखना सम्यग्दर्शन है। तन्निसर्गादधिगमाद्वा॥ त० सू० अ० १, सू०३ सम्मइसणे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-णिसग्गसम्मदसणे चेव अभिगमसम्मसणे चेव ॥ स्थानाङ्ग सूत्र स्थान २, उद्देश १, सूत्र ७० सम्यग्दर्शनं द्विविध प्रज्ञप्तं, तद्यथा-निसर्गसम्यग्दर्शनं चैव अभिगमसम्यग्दर्शनं चैव ॥ भाषा टीका-वह सम्यग्दर्शन दो प्रकार का होता है, एक निसर्ग सम्यग्दर्शन दूसरा अभिगम सम्यग्दर्शन। संगति-निसर्ग शब्द का अर्थ स्वभाव है, और अभिगम शब्द का अर्थ ज्ञान है। जो सम्यग्दर्शन पिछले भव अथवा उत्तम संस्कार आदि के स्वभाव से स्वयं ही आत्मा में प्रगट हो उसे निसर्ग सम्यग्दर्शन कहते हैं, किन्तु जो सम्यग्दर्शन भाचार्य, ६ ] ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : गुरु, उत्तम उपदेश देने वाले आदि के द्वारा जान प्राप्त करके हो उसे अभिगम अथवा अधिगम सम्यग्दर्शन कहते हैं। जीवाजीवात्रवबन्धसंवरनिर्जरामोदास्तत्त्वम् । , . अ० १, सू०४ नव सब्भावपयत्था पण्णत्ते, तं जहा-जीवा अजीवा पुण्णं पावो आसवो संवरो निजरा बंधो मोक्खो स्थानाङ्ग स्थान ६, सूत्र ६६५ छाया नव सद्भावपदार्थाः प्रज्ञप्तास्तद्यथा जीवा : अजोवा : पुण्यं पाप : आस्रव : संवर: निर्जरा वन्ध : मोक्षः ।। भाषा टीका सद्भाव पदार्थ नौ प्रकार के वतलाये गये है और वह इस प्रकार हैं-जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, वन्ध और मोक्ष । संगति - 'तत्त्व' शब्द का मूल 'तत्' है । जिसका अर्थ वह होता है। अतएव तत् पना' अथवा 'वह पना' 'तत्त्व' है। दूसरे शब्दो मे तत्त्व शब्द का अर्थ सद्भाव अथवा अस्तित्व है । संक्षेप से सात तत्त्व रूप से वर्णन किये जाने मे यह तत्त्व कहलाते हैं और विशेष रूप से वर्णन करने में यह पदार्थ कहलाते है । उस समय आस्रव और वन्ध से पाप और पुण्य प्रथक् कर लिये जाते हैं । संक्षेप विविक्षा में पाप और पुण्य का आस्रव और वन्ध मे अन्तर्भाव कर दिया गया है । स्थानाड़ में विस्तृत कथन होने से नौ पदार्थों का वर्णन किया गया है। किन्तु सूत्रो मे संग्रह नय के आश्रित होकर ही संक्षेप से कथन किया गया है । अत: यहां सात तत्वो का वर्णन है नामस्थापनाद्रव्यमावतस्तन्न्यासः॥ अ० १, सू० ५ जस्थ य जं जाणेज्जा निक्खेवं निक्खिवे निरवसेसं । जस्थवि अन जाणेजा चउकगं निविखवे तत्थ ॥ आवस्सयं चउव्विहं पण्णते, तं जहा-नामावस्सयं ठवणा- वस्तयं दव्वावस्सयं भावावस्सयं ॥ अनुयोगद्वार सूत्र, सूत्र ८ प्रथमाध्याय: [ ७ ७ छाया यत्र च यं जानीयात् निक्षेपं निक्षिपेत् निरवशेष । यत्रापि च न जानीयात् चतुष्कं निक्षिपेत् तत्र ।। आवश्यक चतुर्विध प्रज्ञप्त, तद्यथा-नामावश्यक, स्थापनावश्यक, द्रव्यावश्यक, भावावश्यक । भाषा टीका --- जिसका ज्ञान हो उसको पूर्ण रूप से निक्षेप के रूप मे रक्खे। किन्तु यदि किसी वस्तु का ज्ञान न हो तो उसको भी निम्नलिखित चार प्रकार से वर्णन करे -आवश्यक चार प्रकार के कहे गये हैं-नामावश्यक, स्थापनावश्यक, द्रव्यावश्यक और भावावश्यक। संगति -निक्षेप रखने' अथवा 'उपस्थित करने को कहते है। जैन शास्त्रों मे वस्तु तत्त्व को शब्दो में रखने, उपस्थित करने अथवा वर्णन करने के चार ढंग बतलाये गये हैं। जिन्हे निक्षेप कहते है । अनुयोग द्वार सूत्र का इतना विशेप कथन है कि जिसको जाने उसका भी निक्षेप रूप मे वर्णन करे और जिसको न जाने उसको जितना भी समझे कम से कम उतने का अवश्य चार निक्षेप रूप में वर्णन करे । क्यों कि इस प्रकार वस्तुतत्त्व अच्छा समझ मे आ जाता है। प्रमाणनयैरधिगमः॥ अ० १, सू०६ दव्वाण सव्वभावा, सव्वपमायोहिं जस्स उवलद्धा । सव्वाहिं नयविहीहि, विस्थाररुइ ति नायव्यो । . उत्तराध्ययन अ०२८ गा०२४ छाया- - द्रव्याणां सर्वेभावाः, सर्वप्रमाणैर्यस्योपलब्द्धाः। सवैयविधिभिः विस्ताररुचिरिति ज्ञातव्यः ।। भापा टीका-जिसको द्रव्यों के सब भाव सब प्रमाणों और सब नयों से प्राप्त (ज्ञात) हो चुके हैं, [उसको] विस्तार रुचि जानना चाहिये। संगति-सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रय तथा जीव आदि सात तत्वो को चारो निक्षेपो के अतिरिक्त प्रमाण और नय भी जान सकते है। किन्तु प्रमाण मे समग्र कथन = ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय: होता है और नयो में विशेष कथन होता है। एक २ नय में एक २ अपेक्षा से बहुत विशेष कथन किया जाता है। अत: प्रमाण से विचार करने के उपरान्त विस्तार से विचार करने के लिये नयो के सब भेदों से विचार करे । क्योंकि प्रमाण वस्तु के सर्वदेश का सामान्य वर्णन करता है और नय वस्तु के एक देश का विशेष वर्णन करती है। अब रत्नत्रय तथा सात तत्वों पर विचार करने का एक और प्रकार बतलाते हैं। निर्देशस्वामित्वसाधनाधिकरणस्थितिविधानतः॥ भ०१, सू०७ निद से पुरिसे कारण कहि केसु कालं कइविहं ।। अनुयोगद्वार सूत्र सू० १५१ छाया निर्देशः पुरुषः कारणं कुत्र केषु काल: कतिविधं । भाषा टीका-निर्देश, पुरुष, कारण, कहाँ (किस स्थान में), किनमें, काल, कितनी प्रकार का। संगति-सूत्र में निर्देश, स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति और विधान का वर्णन है, अनुयोगद्वार सूत्र में पृष्ठ २६४ में इस विषय का बहुत अधिक विस्तार से वर्णन किया गया है, यहां तो केवल थोड़े से नाम छांट लिये गये हैं, किन्तु तो भी इनमें और उनमे विशेष भेद नहीं है। निर्देश तो दोनों में है ही, स्वामित्व और पुरुष मे, साधन और कारण में, अधिकरण और कहाँ में, स्थिति और काल में तथा विधान और कितनी प्रकार में कोई विशेष अन्तर न होकर केवल शाब्दिक अंतर है। तो भी अनुयोग के द्वार वाक्यो में 'किनमे' शब्द अधिक है। क्योकि आगम में विशेष कथन और सूत्र मे सूक्ष्मकथन होता है। सत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनकालान्तरभावाल्पबहुत्वैश्च ॥ अ०१, सू०८ से किं तं अणुगमे ? नवविहे पण्णत्ते, तं जहा-संतपयपरू- वणया १ दव्वपमाणं च २ खित्त ३ फुसणा य ४ कालो य ५ अंतरं ६ भाग ७ भाव ८ अप्पाबहुँ चेव । अनुयोग द्वार सू०८० । प्रथमाध्याय : [ ९ 4 छाया- अथ किं तत् अनुगम: १ नवविध प्रज्ञप्तं, तद्यथा-सत्पदप्ररूपणता द्रव्यप्रमाणं च क्षेत्रं स्पर्शनं च कालश्च अन्तरं भाग : भाव : अल्पबहुत्वं चैव । अनुगम (ज्ञान होने का प्रकार) क्या है वह नौ प्रकार का कहा गया है सत्पदप्ररूपणता, द्रव्यप्रमाण, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाग, भाव प्रश्न . - और अल्पवहुत्व । संगति - सत् और सत्पदप्ररूपणता मे भेद नहीं है । द्रव्यप्रमाण और संख्या भी प्रथक् भाव वाले नहीं हैं । तत्वार्थसूत्र के शेष पद आगम में वैसे के वैसे ही हैं। आगम वाक्य मे भाग अधिक है, जिसका सुत्रकार ने संक्षेप से वर्णन करने के कारण द्रव्य प्रमाण के साथ संख्या मे अन्तर्भाव किया है। इस प्रकार आगम तथा सूत्र दोनो में कुछ भी भेद नहीं है। मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानि ज्ञानम् ॥ अ०१ सूत्र पंचविहे गाणे पण्णत्ते, तं जहा-आभिणिबोहियणाणे सुय- नाणे ओहिणाणे मणपजवणाणे केवलणाणे ।। स्थानांगसूत्र स्थान : उद्दे० ३ सू० ४६३ अनुयोगद्वार सूत्र १ नन्दिसूत्र १ भगवतीसूत्र शतक ८ उद्देश २ सूत्र ३१८ पञ्चविधं ज्ञानं प्रज्ञप्तं, तद्यथा--आभिनिवोधिकज्ञानं श्रु तज्ञानं अवधिज्ञानं मनःपर्ययज्ञानं केवलज्ञानम् ।। भापा टीका ज्ञान पांच प्रकार का कहा गया है-आभिनिवोधिक ज्ञान, श्रुत ज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यय ज्ञान और केवलज्ञान । सगति- इस श्रागम वाक्य तथा सूत्र मे मतिज्ञान के अतिरिक्त और कोई अन्तर नहीं है । सो यह अन्तर भी कुछ अन्तर नहीं है । क्योकि तत्वार्थसूत्र के इसी छाया - १० ] तत्त्वार्थसून नाऽऽगमममन्वय : - अध्याय के तेरहवें सूत्र में मति का नाम अभिनिवोध भी माना गया है। अनाव अभिनि- बोध सम्बन्धी ज्ञान स्वभाव से ही आभिनिवोधिक ज्ञान हुआ। तत्प्रमाणे। अ० १, सृ० १० आये परोक्षम्। अ० १ सू०११ प्रत्यक्षमन्यत् । अ० १सू० १२ से किं तं जीवगुणप्पमाणे?, तिविहे पएणत्ते, तं जहा- गाणगुणप्पमाणे दसणगुणप्पमाणे-चरित्तगुणप्पमाणे । अनुयोगद्वारमूत्र १४४ दुविहे नाणे पण्णत्तं,तं जहा-पच्चक्खे चेव परोक्वे चेव १, पच्चक्खे नाणे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा केवलणाणे चेव णोकेव- लणाणे चेव २, णोकेवलणाणे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा- ओहिणाणे चेव मणपज्जवणाणे चेव,...... .परोक्खे गाणे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-आभिणिवोहियणाणे चेव, सुयणाणे चेव । स्थानांगसूत्र स्थान २ उद्दे० १, सू० ७१. छाया- अथ किं तत् जीवगुणप्रमाणम् ? त्रिविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-ज्ञानगुण- प्रमाणं दर्शनगुणप्रमाणं चारित्रगुणप्रमाणम् ।। द्विविधं ज्ञानं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-प्रत्यक्षं चैव परोक्षञ्चच । प्रत्यक्ष ज्ञानं द्विविध प्रज्ञप्तं, तद्यथा-केवलज्ञानञ्चैव नोकेवलज्ञानञ्चैव । नोकेवलज्ञानं द्विविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-अवधिज्ञानं चैव मन:- पर्ययज्ञानञ्चैव । परोक्षं ज्ञानं द्विविध प्रज्ञप्तं, तद्यथा-आभिनिवोधिक- ज्ञानं चैव श्रुतज्ञानं चैव ॥ प्रश्न-जीव का गुण प्रमाण क्या है ? उत्तर-वह तीन प्रकार का है, ज्ञानगुणप्रमाण, दर्शनगुणप्रमाण, और चारित्र- गुणप्रमाण । - प्रथमाध्यायः [ ११ ज्ञान दो प्रकार का कहा गया है-प्रत्यक्ष और परोक्ष ।। प्रत्यक्ष ज्ञान भी दो प्रकार का कहा गया है केवल ज्ञान और नोकेवलज्ञान । नोकेवलज्ञान भी दो प्रकार है-अवधिज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान । परोक्षज्ञान दो प्रकार का कहा गया है-श्राभिनिबोधिकज्ञान और श्रुतज्ञान । संगति-सूत्रकार की अपेक्षा आगमों में सदा ही विस्तार से वर्णन किया गया है। सूत्रकार केवल ज्ञान को ही प्रमाण मानते हैं। किन्तु आगम ने ज्ञान, दर्शन और चारित्र तीनो को ही प्रथक् २ प्रमाण माना है। अनेकान्त नय को मानने वाले जैनधर्म की यह कैसी उत्तम सुन्दरता है । प्रमाण रूप मे ज्ञान के भेदों मे आगम और सूत्र में कुछ भी अन्तर नहीं है । आगम में एक सुन्दरता विशेष है, वह हैं प्रत्यक्ष के दो भेद-केवलज्ञान और नोकेवलज्ञान । क्योंकि जैन शास्त्र के अनुसार निश्चय नय से तो केवलज्ञान ही प्रत्यक्ष हो सकता है। अवधि और मनः पर्ययज्ञान वास्तव में नोकेवलज्ञान ही है । अतः यह निश्चयनय से नहीं, वरन् सद्भूत व्यवहार नय से प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। प्रत्यक्ष के क्षेत्र को विधर्मियों की दृष्टि से सदा बढ़ाने की आवश्यकता पड़ती रहो । यहां तक कि कालान्तर में परोक्षज्ञान मति ज्ञान के एक रूप को भी व्यवहारनय से संव्यवहारिक प्रत्यक्ष कह कर मानना पड़ा । अतः यहां सूत्रकार और आगम में कुछ भी अन्तर नहीं है। मतिः स्मृतिः संज्ञा चिन्ताऽभिनिबोध इत्यनान्तरम्" ॥ १.१३. 'ईहाअपोहवीमंसामग्गणा य गवेसणा। सन्ना सई मई पन्ना सव्वं आभिणिकोहिअं॥ नन्दिसूत्र प्रकरण मतिज्ञानगाथा ८० छाया- ईहाऽपोहविमर्शमार्गणाः च गवेषणा । संज्ञा स्मृतिः मतिः प्रज्ञा सर्व आभिनिवोधिकम् ।। भाषा टीका-ईहा, अपोह, विमर्श, मार्गणा, गवेपणा, संज्ञा, स्मृति, मति, और प्रज्ञा यह सब आभिनिबोधिक ज्ञान ही है। संगति-आगम वाक्य और सूत्र में मति, स्मृति, संज्ञा, और अभिनिवोध तो दोनो + १२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वयः . , है " जगह मिलते हैं । आगम के शेष वाक्यो का स्वरूप एक प्रकार के विचार करने का है। क्यो कि 'ईहनमीहा' जानने को विशेष इच्छा करना ईहा, विशेष तलाश करना अपोह, विशेष विचारना विमर्श तथा विशेष तलाश करना मार्गणा कहलाता है। किसी वस्तु के ऊपर 'चिन्तनम् ' चिन्ता करना-विचार करना चिन्ता कहलाता है। अतएव जान पड़ता है कि सूत्रकार ने चिंता पद से उपरोक्त सब शब्दो को प्रगट किया है। आगमवाक्य मे विशेष कथन होने के कारण प्रज्ञा शब्द अधिक है, किन्तु वह भी मति का ही पर्याय वाची है। तदिन्द्रियाऽनिन्द्रियनिमित्तम् ॥ १. १४. से किं तं पच्चक्खं ? पच्चक्खं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा- इन्दियपच्चक्खं नोइन्दियपच्चक्खं च । नन्दिसूत्र ३, अनुयोगद्वार १४४, अथ किं तत् प्रत्यक्षं ? प्रत्यक्ष द्विविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-इन्द्रियप्रत्यक्ष नोइन्द्रियप्रत्यक्षश्च ।। प्रश्न-वह प्रत्यक्ष क्या है ? उत्तर-वह प्रत्यक्ष दो प्रकार का है-इन्द्रियप्रत्यक्ष और नोइन्द्रियप्रत्यक्ष । संगति-सूत्र मे मतिज्ञान के उत्पन्न होने के कारण बतलाये गये हैं कि वह मतिजान इन्द्रिय (पांच) और अनिन्दिय (मन) से उत्पन्न होता है । फिर यही छै कारण मतिज्ञान के ३३६ भेदो मे गिन लिये गये हैं। आगम ने कारण विविक्षा न देकर भेदविविक्षा से वही कथन किया है । यह ऊपर दिखला दिया गया है कि मतिनान को (साव्यवहारिक) प्रत्यक्ष भी कहा जाने लगा था। अवग्रहावायधारणा ॥ से किं तं सुअनिस्सिनं ? चउव्विहं पगणतं, तं जहा- उग्गह १ ईहा २ अवानो ३ धारणा ४ नन्दिसूत्र २७ छाया- " १. १५ प्रथमाध्यायः [ १३ - । - छाया अथ किं तत् श्रुतनिःसृतम् ? चतुर्विध प्रज्ञप्तं, तद्यथा--अवग्रह ईहा अवायः धारणा। भाषा टीका-वह श्रुत निःसृत क्या है ? वह चार प्रकार का कहा गया है- अवग्रह, ईहा, अवाय, और धारणा। संगति---यहां इन चारों का ज्ञान होने की अपेक्षा से मतिज्ञान को श्रुतनिःसृत अर्थात् सुन कर निकला हुआ अथवा शास्त्र सुन कर जाना हुआ माना गया है। “बहुबहुविधक्षिप्रानिःसृतानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम्। छविहा उग्गहमती पण्णत्ता, तं जहा-खिप्पमोगिण्हति बहु- मोगिरहति बहुविधमोगिण्हतिधुवमोगिणहति अणिस्सियमोगिण्हइ असंदिद्धमोगिण्हइ । छव्विहा ईहामती पराणत्ता, तं जहा- खिप्पमीहति बहुमीहति जाव असंदिद्धनीहति । छविधा अनायसतो पण्णत्ता, तं जहा-खिप्पमवेति जाव असंदिद्धं अवेति। छविधा धारणा पणत्ता, तं जहा-बहुं धारेइ पोराणं धारेति दुद्धरं धारेति अणिस्सितं धारेति असंदिद्धं धारेति । स्थानांग स्थान ६, सूत्र ५१० जं बहु बहुविह खिप्पा अणिस्तिय निच्छिय धुवे यर विभिन्ना, पुणरोग्गहादो तो तं छत्तीसत्तिसयभेदं । इयि भासयारेण, पविधा अवग्रहमतिः प्रज्ञप्ता, तद्यथा-क्षिप्रमवगृह्णाति वहुमव- गृह्णाति बहुविधमवगृह्णाति ध्रुवमवगृह्णाति अनिःसृतमवगृह्णाति असंदिग्धमवगृह्णाति । षड्विधा ईहामतिः प्रज्ञप्ता,तद्यथा-क्षिप्रमीहति वहुमीहति यावदसंदिग्धमीहति । पड्विधा अबायमतिः प्रज्ञप्ता, तद्यथा-क्षिप्रगति याबदसंदिग्धम वैति । पड्विधा धारणा प्रज्ञप्ता, छाया- १४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : तद्यथा-पहुं धारयति बहुविधं धारयति पुराणं धारयति दुर्द्धरं धारयति अनिश्रितं धारयति असंदिग्धं धारयति । यत् वहुवहुविधक्षिप्रानिश्रितनिश्चितध्रुवेतरविभिन्ना । यत्पुनरवग्रहादयोऽतस्तत्पत्रिंशदधिकत्रिशतभेदं ॥ इति भाष्यकारेण. भाषा टीका-अवग्रह मति ज्ञान छै प्रकार का होता है-क्षिप्र, बहुविध, ध्रुव, अनिःसृत और असंदिग्ध । इसी प्रकार ईहामति के भी छै भेद होते हैं । अवायमति के भी यही छै भेद हैं और धारणा के निम्नलिखित छै भेद हैं-वहु, बहुविध, पुराण, दुर्द्धर, अनि:श्रित और असंदिग्ध । अवग्रह आदि के इन छै भेदों के अतिरिक्त के इनके उलटे भेद् भी हैं-बहु का अल्प, बहुविध का एकविध, क्षिप्र का अक्षिप्र, अनिःसृत का निःसृत, निश्चित का अनिश्चित तथा ध्रुव का अध्रुव । इन सव भेदों को जोड़ने से मतिज्ञान के ३३६ भेद होते हैं। ऐसा भाष्यकार ने कहा है। संगति-उपरोक्त भेदो में धारणा के भेदों में क्षिप्र तथा ध्रुव के स्थान में पुराण और दुर्द्धर आता है । भाष्यकार के भेदों में अनुक्त के स्थान मे निश्चित आता है। किन्तु यह भेद कोई बड़ा भेद नहीं है। मतिज्ञान से वाहिर न यह हैं न वह हैं। मुख्य बात मति- ज्ञान के भेद सम्बन्धी है, जिसके विषय मे पागम और तत्त्वार्थसूत्र दोनो एक मत हैं। अतएव इसमे कुछ भी भेद नही समझना चाहिये । अर्थस्य" ॥ १.१७. से किं तं अत्युग्गहे ? अत्युग्गहे छविहे पण्णत्ते, तं जहा- सोइन्दियनत्थुगहे, चक्खिदियअत्युग्गहे, घाणिदियअत्युग्गहे, जिभिदियअत्थुग्गहे, फासिदिय अत्युग्गहे, नोइन्दिय अत्युग्गहे। नन्दिसूत्र ३० अथ किं सः अर्थावग्रहः? अर्थावग्रहः षड्विधः प्रज्ञप्तस्तद्यथा- श्रोत्रेन्द्रियार्थावग्रहः, चक्षुरिन्द्रियार्थावग्रहः, घ्राणेन्द्रियार्थावग्रहः, जिओ- छाया- - -- प्रथमाध्यायः [ १५ न्द्रियार्थावग्रहः, स्पर्शनेन्द्रियार्थावग्रहः, नोइन्द्रियार्थावग्रहः ॥ प्रश्न-अर्थावग्रह क्या है। उत्तर-अर्थावग्रह छै प्रकार का कहा गया है-कर्ण इन्द्रिय अर्थावग्रह, चतु इन्द्रिय अर्थावग्रह, नासिका इन्द्रिय अर्थावग्रह, रसना इन्द्रिय अर्थावग्रह, स्पीन इन्द्रिय अर्थावग्रह और नो इन्द्रिय (मन) अर्थावग्रह । सगति-मतिज्ञान के उपरोक्त सब भेद 'अर्थ' अथवा प्रगटरूप पदार्थ के हैं। सूत्र में अर्थ को प्रगटरूप पदार्थ और व्यञ्जन को अप्रगट रूप पदार्थ कहा गया है। इस सूत्र में प्रगट रूप पदार्थ का उपसंहार किया गया है। अस्तु, प्रगट रूप पदार्थ के भेदो का विस्तार निम्नलिखित है। मतिज्ञान के अवग्रह, ईहा, अवाय, धारणा यह चार भेद हैं । फिर प्रत्येक के बहु बहुविध श्रादि के भेद से चारह २ भेद हैं, जो बारह को चार से गुणा देने से अड़तालीस हुए। इनमें से प्रत्येक भेद का ज्ञान पांचों इन्द्रिय और मन की अपेक्षा छ २ प्रकार से होता है । अस्तु अड़तालीस को छै में गुणा देने से २८८ भेद प्रगट रूप (अर्थ) मतिज्ञान हुए। अगले सूत्रो मे बतलाया जावेगा कि अप्रगट रूप पदार्थ के ४८ भेद होते हैं । जिनको २८८ में जोड़ने से मतिज्ञान के कुल भेद ३३६ होते हैं। व्यञ्जनस्यावग्रहः” । १. १८ के "न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम्" ॥ १. १६ सुय निस्सिए दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-अत्थोग्गहे चेव बंजणोवग्गहे चेव ।। स्थानांग स्थान २ उद्देश १ सूत्र ७१ से किं तं बंजणुग्गहे ? बंजणुग्गहे चउविहे पणगत्ते, तं जहा- सोइन्दियबंजगुग्गहे, घाणिदियबंजणुग्गहे, जिभिदियवंजणुग्गहे, फासिंदियबंजणुग्गहे सेतं बंजणुग्गहे ।। नन्दिसूत्र सूत्र २६ “ , १६ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वयः छाया- 'श्रुतनिस्रित द्विविधः प्रज्ञप्तस्तद्यथा--अर्थावग्रहश्चैव व्यञ्जनावग्रह- श्चैव। - अथ किंसः व्यञ्जनावग्रहः १ व्यञ्जनावग्रहश्चतुर्विधः प्रज्ञप्तस्तद्यथा- श्रोत्रेन्द्रियव्यञ्जनावग्रहः, घ्राणेन्द्रियव्यञ्जनावग्रहः, जिव्हेन्द्रिय- व्यञ्जनावग्रहः, स्पर्शनेन्द्रियव्यञ्जनावग्रहः, सोऽयं व्यञ्जनावग्रहः ।। भापा टीका- शास्त्र के अनुसार वह ज्ञान दो प्रकार का होता है - अर्थावग्रह और व्यंजनावग्रह। प्रश्न-व्यञ्जनावग्रह क्या है ? उत्तर-व्यञ्जनावग्रह चार प्रकार का होता है- कर्ण इन्द्रिय व्यञ्जनावग्रह, प्राण इन्द्रिय व्यञ्जनावग्रह, रसना इन्द्रिय व्यञ्जनावग्रह, स्पर्शन इन्द्रिय व्यञ्जनावग्रह । यह व्यञ्जनावग्रह है। संगति-इस सूत्र में बताया गया है कि यद्यपि अर्थ (प्रगट रूप पदार्थ) के अवग्रह ईहा, अवाय और धारणा चार भेद होते हैं, किन्तु अप्रगट रूप पदार्थ का केवल अवग्रह ही होता है। अन्य ईहा आदि नहीं होते। अप्रगट रूप पदार्थ की दूसरी विशेषता यह होती है कि यह पांचों इन्द्रियो और छटे मन सभी से नहीं होता, वरन् चक्षु के अतिरिक्त केवल चार इन्द्रियो से ही होता है। व्यञ्जनावग्रह में चतु और मन से काम लेना नही पड़ता। अस्तु व्यञ्जनावग्रह बहुविध आदि के भेद से वारह प्रकार का होता है। उनमें से प्रत्येक भेद का ज्ञान चार इन्द्रियो (स्पर्शन-रसन-घ्राण और कर्ण) से हो सकता है। अतः बारह को चार से गुणा देने पर अप्रगट रूप पदार्थ (व्यञ्जन) के अड़तालीस भेद हुए। जिनको प्रगट रूप पदार्थ के २८८ भेदो मे जोड़ने से मतिज्ञान के कुल ३३६ भेद होते हैं। श्रुतं मतिपूर्व द्वयनेकद्वादशभेदम् ॥ मईपुव्वं जेण सुअं न मई सुअपुव्विा ॥ नन्दि० सूत्र २४ सुयनाणे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-अंगपवितु चेव अंग बाहिरे चेव ॥ स्थानांग स्था० २, उद्देश १, सू० ७१. १ २०.

प्रथमाध्याय: [ १७ से किं तं अंगपविठं ? दुवालसविहं पण्णत्तं तं जहा- आयारो १ सुयगडे २ ठाणं ३ समवाओ ४ विवाहपएणती ५ नायाधम्मकहाओ ६ उवासगदसाओ ७ अंतगडदसाओ ८ अगुत्तरोववाइअदसाओ ६ पाहावागरणाई १० विवागसुअं ११ दिद्विवाओ १२॥ नन्दि० सूत्र ४४. छाया- मतिपूर्व येन श्रुतं न मति : श्रुतपूर्विका । श्रुतज्ञानं द्विविध प्रज्ञप्तं, तद्यथा-अङ्गप्रविष्ठश्चैव अङ्गबाह्यश्चैव ॥ अथ किं तदंजपविष्ठं १ द्वादशविध प्रज्ञप्तं, तद्यथा-श्राचाराङ्गः १ सूत्रकृताङ्गः २ स्थानांगः ३ समवायाङ्गः ४ व्याख्याप्रज्ञप्त्यंगः ५ ज्ञातृधर्मकथाङ्गः ६ उपासकदशाङ्गः ७ अन्त्कृशाङ्गः ८ अनुत्तरोप- पादिकदशांङ्गः ९ प्रश्नव्याकरणाः १० विषाकश्रुताङ्गः ११ दृष्टिवादाङ्गः १२॥ भाषा टीका-श्रुत ज्ञान मतिपूर्वक होता है। मतिज्ञान भुतज्ञान पूर्वक नहीं होता । श्रुतज्ञान दो प्रकार का कहा गया है-अङ्ग प्रविष्ठ और अङ्गवाह । प्रश्न-अङ्गप्रविष्ठ क्या है ? उत्तर-वह बारह प्रकार का है-१ आचारांग, २. सूत्रकृतांग, ३. स्थानांग, ४. समवायांग, ५. व्याख्याप्रज्ञाप्ति अंग, ६. ज्ञाताधर्मकथांग, उपाशकदशांग, ८ अन्तकृत् दशांग, ६ अनुन्तरोपपादिकदशांग, १० प्रश्नव्याकरणांग, ११ विपाक- श्रुतांग, और १२ दृष्टिवादांग हैं। अङ्ग बाह्य में कालिक आदि अनेक भेद तथा आवश्यक के छ भेद वर्णन किये गये हैं। सगति-यहां सूत्रकार और श्रागमप्रमाण में तनिक भी भेद नहीं है। "भवप्रत्यत्योऽवधिर्देवनारकाणाम् ॥ " १८ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : 14 दोण्हं भवपच्चइए पएणत्ते; तं जहा-देवाणं चेव नेरइयाणं चेव । स्थानांग स्थान २, उद्देश १, सूत्र ७१. से किं तं भवपच्चइनं ? दुण्हं, तं जहा-देवाण य नेइरयाण य ॥ नन्दि० सूत्र ७ छाया- द्वयोः भवप्रत्ययिकः प्रज्ञप्तस्तद्यथा-देवानां चैव नारकाणां चैव ।। भाषा टीका-भवप्रत्ययिक अवधिज्ञान दो के ही होता है-देवों के और नारकियो के। "क्षयोपशमनिमित्तः पडिवकल्पः शेषाणाम् ॥' से किं तं खाओवसमिअं? खामोवसमिअं दुण्हं, तं जहा- मणूसाण य पंचिंदियतिरिक्खजोणियाण य । को हेऊ खाओ- वसमिअं? खाअोवसमियं तयावरणिज्जाणं कम्माणं उदिण्णाणं खएणं अणुदिण्णाणं उवसमेणं ओहिनाणं समुपज्जइ ।। नन्दिसूत्र सूत्र दोराहं खोवसमिए पण्णत्ते, तं जहा-मणुस्साणं चेव पंचिदियतिरिक्वजोणियाणं चेव । स्थानांग स्था० २, उद्दे० १ सूत्र ७१. छव्विहे ओहिनाणे पण्णत्ते, तं जहा- अणुगामिए, अणा- णुगामिते, वड्ढमाणते, हीयमाणते, पडिवाती अपडिवाती ॥ स्थानांग स्थान ६ सूत्र ५२६. अथ किं तत्क्षायोपगमिकं ? क्षायोपशमिकं द्वयोः, तद्यथा- मनुष्याणाश्च पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिकानाञ्च । को हेतु : क्षायोपश- मिकं ? बायोपशमिकं नदावरणीयानां कर्मणाम् उदीर्णानां क्षयेण अनुदीनाप्नुपशमेनावधिज्ञानं समुपद्यते ॥ छाया प्रथमाध्यायः [ १६ द्वयोः क्षायोपशमिक: प्रज्ञप्तस्तद्यथा--मनुष्याणाञ्च पन्चेन्द्रिय- तिर्यग्योनिकानाव। पविधमवधिज्ञानं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-अनुगामिकः, अननुगामिक :, चर्द्ध मान :, होयमान:, प्रतिपाती, अप्रतिपाती, प्रश्न-क्षायोपशमिक अवधिज्ञान क्या होता है ? उत्तर-क्षायोपशमिक दो के ही होता है-मनुष्यों के और तिर्यञ्चों के। प्रश्न-यह क्षायोपशमिक किस कारण से कहलाता है ? उत्तर-पके हुए अवधिज्ञानावरणीय कर्म के क्षय से और विपाक को प्राप्त न होने वाले अवधिज्ञानावरणीय कर्म के उपशम से क्षायोपशमिक अवधिज्ञान उत्पन्न होता है। क्षायोपशमिक अवधिज्ञान दो के ही होता है-मनुष्यों के तथा पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चों के। यह अवधिनान छै *प्रकार का होता है-अनुगामिक, अननुगामिक, वर्द्धमान, हीयमान, प्रतिपाती और अप्रतिपाती। संगति-आगम बिलकुल स्पष्ट है, उसमें विशेष कथन है । सूत्र में तो सूक्ष्म कथन हुआ ही करता है। १ "ऋजुविपुलमती मनःपर्ययः॥ १. २३ मणपज्जवणाणे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-उज्जुमति चेव विउलमति चेव ॥ स्थानांगसूत्र स्थान २ उद्दे० १, सू० ७१ मन:पर्ययज्ञानं द्विविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा ऋजुमतिश्चैव विपुल- मतिश्चैव । भाषा टीका-मनःपर्यय ज्ञान दो प्रकार का होता है--ऋजुमती और विपुलमति । विशुद्धयप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः॥ छाया- पन्नवणासूत्र पद ३३वे मे अवस्थित और अनवस्थित भेद भी आते हैं।

२० ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : उज्जुमई णं अणंते अतिपएसिए खंधे जाणइ पासइते चेव विउलमई, अब्भहियतराए विउलतराए विसुद्धतराए वितिमिरत- राए जाणइ पासइ, इत्यादि ।। नन्दिसूत्र सूत्र १८. छाया- ऋजुमति : अनन्तान् अनन्तप्रदेशकान् स्कन्धान जानाति पश्यति तांश्चैव विपुलमति :, अभ्यधिकतरं विपुलतरं विशुद्धतरं वितिमि- रतरं जानाति पश्यति, इत्यादि । भाषा टोका-ऋजुमति मनःपर्ययज्ञान अनन्तप्रदेश वाले अनन्त स्कन्धों को जानता और देखता है । विपुलमति भी उन सवको जानता और देखता है। किन्तु यह उससे बड़े, अधिक, विशुद्धतर तथा अधिक निर्मल को जानता और देखता है। संगति-सूत्रकार का कथन है कि विपुलमति मनःपर्ययज्ञान ऋजुमति की अपेक्षा अधिक विशुद्ध है तथा अप्रतिपाती होता है । चरित्र से न गिरने को अप्रतिपाती कहते हैं। अर्थात् विपुलमति सनःपर्यय ज्ञान प्राप्त करने पर उपशम श्रेणि न बांधकर क्षपक श्रेणि पर चढ़ता है और क्रमशः चार घातिया कर्मों को नष्ट कर मोक्ष प्राप्त करता है। सारांश यह है कि विपुलमति मनःपर्यय ज्ञान वाला चारित्र से कभी नहीं गिर सकता। अतएव उसको अप्रतिपाती कहा है। जब कि ऋजुमति मनःपर्यय ज्ञान वाले की चारित्र से गिरने की आशंका हो सकती है। आगम में इन दोनों में विशुद्धि का ही भेद माना है । अप्रतिपात से वह सहमत नहीं है। जान पड़ता है कि अप्रतिपाती सिद्धान्त मतान्तर सिद्धान्त है। "विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्यययोः। " २५ इड्ढीपत्त अपमत्त संजय सम्मदिट्टि पज्जतग संखेजवासाउन कम्मभूमिश्र गन्भवक्कंतित्रमणुस्साणं मणपजवनाणं समुप्पज्जइ ।

प्रथमाध्यायः [ २१ 1 तं समासस्रो चउव्विहं पगणतं, तं जहा-दव्वओ खित्तओ कालो भावओ इत्यादिकम् ॥ नन्दिसूत्र मनःपर्ययज्ञानाधिकार. छाया- ऋद्धिमाप्ताप्रमत्तसंयतसम्यग्दृष्टिपर्याप्तकसंख्येयवर्षायुष्ककर्मभूमिक- गर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्याणां मनःपर्ययज्ञानं समुत्पद्यते । तत्समासतश्चतुर्विधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-द्रव्यत : क्षेत्रत : कालत: भावत : इत्यादिकम् ।। भाषा टीका-मनःपर्यय ज्ञान केवल उन जीवों के ही होता है जो गर्भन मनुष्य हों, उनमें भी कर्म भूमि के हों, उनमें भी संख्यात वर्ष की आयु पाले हों-असंख्यात वर्ष की आयु वाले नहीं ; फिर उनमें भी पर्याप्तक हों अपर्याप्तक न हों, उनमें भी सम्यग्दृष्टि हों, फिर उनमें भी सप्तम गुणस्थान अप्रमत्तसयत वाले हों, और फिर उनमें भी ऋद्धिप्राप्त हों। संक्षेप से मनःपर्यय ज्ञान चार प्रकार से होता है-द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से और भाव से इत्यादि । सगति- सूत्र बतलाया गया है कि अवधि और मनःपर्यय ज्ञान में क्या भेद है। मनःपर्यय ज्ञान अवधिज्ञान की अपेक्षा अधिक विशुद्ध होता है। अवधिज्ञान का क्षेत्र तीन लोक हैं, जब कि मनःपर्यय ज्ञान का क्षेत्र केवल मध्यलोक, उसमें भी अढाई द्वीप और उसमें भी वह कर्मभूमियां हैं जहां केवल चौथा काल या उसकी सन्धि हो । अवधि- ज्ञान के स्वामी चारों गतियों में हैं, किन्तु मनःपर्यय ज्ञान के स्वामी ऊपर आगम वाक्य के अनुसार बहुत थोड़े होते हैं । अवधि ज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान के विषय में भी बड़ा भेद है जैसा कि अगले सूत्रो से प्रगट होगा । आगम में यह सब बातें बड़े विस्तार से आई हैं। यह सम्भव नहीं हो सका कि इन सब बातों को दिखलाने वाले छोटे वाक्य उद्धृत किये जाते । किन्तु यह अवश्य है कि आगम और सूत्र दोनों में इस विषय पर मत भेद नही है। में - - 'मतिश्रुतयोनिबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेछु, १.२६.

२२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : , , तत्थ दव्वोणं आभिणिबोहियणाणी आएसेणंसवाई दव्वाई जाणइ न पासइ, खेत्तत्रोणं आभिणिवोहियणाणी आए- सेणं सव्वं खेत्तं जाणइ न पासइ, कालोणं आभिणिवोहिय- रणाणी आएसेणं सबकालं जाणइ न पासइ, भावोणं आभि- णिबोहियणाणी आएसेणं सव्वे भावे जाणइ न पासइ । नन्दिसूत्र सूत्र ३७. से समासओ चउबिहे पण्णत्ते, तं जहा-दव्वनओ खित्तो कालो भावभो । तत्थ दव्वओणं सुप्रणाणी उवउत्ते सव्वदवाई जाणइ पासइ, खित्तओणं सुअणाणी उवउत्ते सव्वं खेत्तं जाणइ पासइ, कालोणं सुअणाणी उवउत्ते सव्वं कालं जाणइ पासइ, भावओणं सुअणाणी उवउत्ते सव्वे भावे जाणइ पासइ। नन्दिसूत्र सूत्र ५८. छाया- तत्र द्रव्यत: आभिनिबोधिकजानी आदेशेन सर्वाणि द्रव्याणि जानाति न पश्यति । क्षेत्रत : आभिनिवोधिकज्ञानी आदेशेन सर्व क्षेनं जानाति न पश्यति । कालत : आभिनिवोधिक ज्ञानी आदेशेन सर्व कालं जानाति न पश्यति, भावतः आभिनिवोधिकज्ञानी श्रादेशेन सर्वाणि भावानि जानाति न पश्यति । अथ समासतश्चतुर्विध : प्रजप्तस्तद्यथा-द्रव्यत: क्षेत्रनः कालन: भावतः। तत्र द्रव्यत : श्रुतज्ञानी उपयुक्तः सर्वद्रव्याणि जानाति पश्यति, क्षेत्रत : श्रुतज्ञानी उपयुक्तः सर्व क्षेत्रं जानाति पश्यति, कालनः श्रुतज्ञानी उपयुक्त : सर्व कालं जानाति पश्यति, भावत: श्रुतज्ञानी उपयुक्तः सर्वाणि भावानि जानाति पश्यति । भाया टीका-~-द्रव्य की अपेक्षा मतिज्ञान वाला आदेश से सब द्रव्यों को जानता है किन्तु देखता नहीं । क्षेत्र की अपेक्षा मतिन्नान वाला आदेश से सब क्षेत्र को जानता प्रथमाध्याय: [ २३ है किन्तु देखता नहीं। काल की अपेक्षा मर्तिज्ञान वाला आदेश से सभी काल को जानता है किन्तु देखता नहीं। भाव की अपेक्षा मतिज्ञान वाला आदेश से सब भावो को जानता है, किन्तु देखता नहीं। श्रुतज्ञान संक्षेप से चार प्रकार से होता है-द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से और भावसे । द्रव्य की अपेक्षा उपयोग युक्त श्रुतज्ञानी सब द्रव्यो को जानता और देखता है । क्षेत्र की अपेक्षा उपयोग युक्त श्रुतज्ञानी सव क्षेत्र को जानता और देखता है। काल की अपेक्षा उपयोग युक्त श्रुतज्ञानी सब काल को जानता और देखता है । भाव की अपेक्षा उपयोग युक्त श्रुतज्ञानी सब भावों को जानता और देखता है। सगति-आगम मे उसी बात को विस्तार से कहा गया है, जिसको सूत्र मे संक्षेप से कहा है । सूत्र कहता है कि मति तथा श्रुत ज्ञान के विषयों का निवन्ध द्रव्य की थोड़ी पर्यायो में है, अर्थात् मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञान जानते तो सब द्रव्यों को है किन्तु उनकी सब पर्यायो को नही जानते, वरन् थोड़ी पर्यायो को जानते हैं। "रूपिष्ववधे। १२७ ओहिनाणी जहन्नेणं अणंताई रूविदव्वाइं जाणइ पासइ । उक्कोलेणं सव्वाइं रूविदवाई जाणई पासइ । नन्दिसूत्र सूत्र १६ छाया अवधिज्ञानी जघन्येन अनन्तानि रूपिद्रव्याणि जानाति पश्यति । उत्कर्षेण सर्वाणि रूपिद्रव्याणि जानाति पश्यति । भाषा टीका-~अवधिज्ञानी जघन्य रूप से अनन्त रूपी द्रव्यो को जानता और देखता है। उत्कृष्ट रूप से वह सभी रूपी द्रव्यो को जानता और देखता है। ” संगति-अवधिनान केवल रूपी द्रव्य को ही जानता है, अरूपी द्रव्यो को नही जान सकता । रूपी द्रव्यों मे अवधिज्ञान अधिक से अधिक परमाणु तक को जान तथा देख सकता है।

२४ ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वयः " . तदनन्तभागे मन:पर्ययस्य। १.२८, सब्वत्थोवा मणपज्जवणाणपजवा। ओहिणाणपज्जवा अरणं- तगुणा इत्यादि। भगवती सूत्र शत० - उद्देश २ मूत्र ३२३. छाया- सर्वस्तोकाः मनःपर्ययज्ञानपर्यवाः। अवधिज्ञानपर्यवा: अनन्तगुणा: इत्यादि। भाषा टीका मन:पर्यय ज्ञान की पर्याय सव से कम होती हैं। किन्तु अवधिज्ञान की पर्याय उससे अनन्त गुणी होती हैं । संगति-जिस द्रव्य को अवधिज्ञान जानता है। मनःपर्यय ज्ञान उससे भी अनन्त भाग सूक्ष्म पदार्थ को जानता है। 6 सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य।” , १.२९ तं समासओ चउन्विहं अह सव्वदव्वपरिणाम- भावविएणत्तिकरणमणंत, सासयमप्पडिवाई एगविहं केवलं णाणं। नन्दि० सूत्र २२ छाया- तत्समासतश्चतुर्विधं ........"। अथ सर्वद्रव्यपरिणामभावविज्ञप्ति- करणमनन्तं, शाश्वतमप्रतिपाती एकविधं केवलं ज्ञानम् । भाषा टीका-सक्षेप से वह चार प्रकार का होता है- केवल ज्ञान सब द्रव्यो के परिणाम और भावों को बतलाने का कारण है, अनन्त है, निरन्तर रहता है, अप्रतिपाती है अर्थात् इसको प्राप्त करके गिर नही सकते । इस प्रकार केवल ज्ञान एक प्रकार का होता है। संगति-सारांश यह है कि केवल ज्ञान सब द्रव्यों की सब पर्यायो को जानता है।

प्रथमाध्यायः [ २५ " १ ३०. एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्व्यः।" जे णाणी ते अत्थेगतिया दुणाणी अत्थेगतिया तिणाणी, अत्थेगतिया चउणाणी अत्थेगतिया एगणाणी । जे दुणाणी ते नियमा आभिणिबोहियणाणी सुयणाणी य, जे तिणाणी ते आभिणिबोहियणाणी सुतणाणी ओहिणाणी य, अहवा आभि- णिबोहियणाणी सुयणाणी मणपज्जवणाणी य, जे चउरणाणी ते नियमा आभिणिबोहियणाणी सुतणाणी ओहिणाणी मणपज्जव- णाणी य, जे एगणाणी ते नियमा केवलणाणी । जीवाभि० प्रतिपत्ति १ सूत्र ४१ ये ज्ञानिन. ते सन्त्येकका : द्विज्ञानिन: सन्त्येकका: त्रिज्ञानिन: सन्त्येकका: चतुर्सानिन: सन्त्येकका : एकज्ञानिनः । ये द्विज्ञानिन: ते नियमात् आभिनिबोधिकज्ञानी श्रुतज्ञानी च, ये त्रिज्ञानिनस्ते आभिनिवोधिकज्ञानी श्रुतज्ञानी अवधिज्ञानी च, अथवा आभिनि- बोधिकज्ञानी श्रुतज्ञानी मन पर्ययज्ञानी च, ये चतुर्जानिनस्ते नियमात् आभिनिवोधिकज्ञानी श्रुतज्ञानी अवधिज्ञानी मनःपर्ययज्ञानी च, ये एकज्ञानिनस्ते नियमात् केवलज्ञानी। भाषा टीका ज्ञानियो मे किन्हीं के दो ज्ञान होते हैं, किन्हीं के तीन ज्ञान होते हैं, किन्ही के चार ज्ञान होते हैं और किन्हों के केवल एक ज्ञान ही होता है। दो ज्ञान वालों के मति और श्रुति होते हैं। तीन ज्ञान वालों के मति, श्रुति और अवधि होते हैं अथवा मति, श्रुति और मनःपर्यय ज्ञान होते हैं । चार ज्ञान वालों के मति, श्रुति, अवधि और मनःपर्यय ज्ञान होते हैं। एक ज्ञान वालो के केवल ज्ञान ही होता है। छाया- - संगति एक आत्मा मे एक समय कम से कम एक और अधिक से अधिक चार ज्ञान तक हो सकते हैं। पांचो कभी एक आत्मा में एक साथ नहीं हो सकते।

२६ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : 4- १. ३१. १. ३२. मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च ॥ सदसतोरविशेषाद् यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥ अणाणपरिणामेणं भंते कतिविधे पण्णत्ते? गोयमा! तिविहे पएणत्ते, तं जहा-मइअणाण परिणामे, सुयप्रणाण परिणामे, विभंगणाणपरिणामे॥ प्रज्ञापना पद १३ बानपरिणामविषय स्थानांग सूत्र स्थान ३ उद्दश्य ३ सूत्र २८७ से किं तं मिच्छासुयं ? जं इमं अण्णाणिएहिं मिच्छादिद्वि- एहिं सच्छंदबुद्धिमइ विगप्पिअं, इत्यादि। नन्दि० सूत्र ४२. अविसेसिआ मई मइनाणं च मइअन्नाणं च इत्यादि । नन्दि० सुत्र २५. छाया- अज्ञानपरिणाम : भदन्त ! कतिविधः प्रज्ञप्त:१ गौतम! त्रिविध : प्रज्ञप्तस्तद्यथा-मत्यज्ञानपरिणामः श्रुताज्ञानपरिणामः, विभंगज्ञान- परिणामः। अथ किं तन्मिथ्याश्रुतं ? यदिदं अज्ञानिभिः मिथ्यादृष्टिभि: स्वच्छन्दबुद्धिमतिविकल्पितम् । अविशेषिका मति: मतिज्ञानं मत्यज्ञानश्च इत्यादि। भगवन् अज्ञान परिणाम कितने प्रकार का कहा गया है ? गौतम ! वह तीन प्रकार का कहा गया है-मति अज्ञान अथवा कुमति, श्रुताज्ञान अथवा कुश्रुत, तथा विभंग ज्ञान अथवा कुअवधि । वह मिथ्याश्रुत क्या है ? स्वच्छन्द बुद्धि वाले अज्ञानी मिथ्याष्टियों के बनाये हुए शास्त्र को मिथ्याश्रत कहते हैं। प्रश्न उत्तर - प्रश्न उत्तर

प्रथमाध्यायः
[ २७
.
सामान्य रूप से मति मतिज्ञान भी होता है.और अज्ञान भी होता है।
संगति;-मति, श्रुत और अवधि ज्ञान तो होते ही हैं, अज्ञान भी होते हैं । इनके
अज्ञान होने का कारण सूत्र में शराबी का उदाहरण देकर स्पष्ट किया है । जिस प्रकार
शराबी मद्य पीकर अच्छे या बुरे के ज्ञान से शून्य होकर माता तथा पत्नी को समान) -
समझता है उसी प्रकार अज्ञानी के मति, श्रुत अथवा अवधि यदि पंचाग्नि आदि तप के
कारण प्रगट हो भी जावें तो वह कुमति, कुश्रुत और विभग कहलाते हैं । आगम
में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है और सूत्र मे इसी को कुछ अक्षरों मे ही समाप्त
कर दिया गया है। मो:
।
नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्द-
समभिरूढैवम्भूताः नयाः॥
१. ३३.
सत्तमूलणया पण्णत्ता, तं जहा - णेगमे, संगहे, ववहारे,
उज्जुसूए, सहे, समभिरूढे, एवंमुए।
अनुयोगद्वार १३६.
स्थानांग स्थान ७ सूत्र ५५२
छाया-- सप्तमूलनया: प्रज्ञप्तास्तद्यथा- नैगम:, संग्रह :, व्यवहार :,
ऋजुसूत्र :, शब्द:, समभिरुढ :, एवंभूतः ।
भाषा टीका
मूल नय सात कही गई हैं-नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र,
शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत ।
सगति -- यहां आगम और सूत्र के शब्द प्राय : मिलते जुलते हैं।
इति श्री जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम महाराज-संग्रहीते
तत्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वये
* प्रथमाध्यायः समाप्तः॥१॥

द्वितीयाऽध्यायः " औपशमिकनायिको भावी मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ च ॥ अध्याय २ सूत्र १ छविधे भावे पण्णत्ते, तं जहा-ओदइए उपसमिते खत्तिते खतोवसमिते पारिणामिते सन्निवाइए। स्थानांग स्थान ६, मूत्र ५३७. छाया- पड्विधःभावः प्रजप्तस्तद्यथा-औदयिकः, औपशमिकः, क्षायिकः, भायोपग्रमिकः, पारिणामिकः, सन्निपातिकः ।। भाषा टीका भाव छै प्रकार के होते हैं- औदयिक, औपशमिक, क्षारिक, नायोपशमिक, पारिणामिक और सन्निपातिक । संगति -सूत्र में पांच भाव होते हुए भी आगम में छै भाव विशेष कथन की अपेक्षा से हैं। द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम्" ॥ "सम्यक्त्वचारित्रे॥" २३. ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च ॥' 'ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्त्रित्रिपञ्चभेदाः सम्यक्त्वचारित्रसंयमाऽसंयमाश्च ॥ “ २ २ २ ४. २. ५.

द्वितीयाध्यायः [ २९ "गतिकपायलिङ्गमिथ्यादर्शनाज्ञानासंयता- सिद्धलेश्याश्चतुश्चतुस्न्येकैकैकैकपड्भेदाः॥" जीवमव्यासव्यत्वानि च ॥ २. ७ से किं तं उदइए ? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा- उदइए अ उदयनिप्फरणे अ । से किं तं उदइए ? अट्ठण्हं कम्मपयडीणं उदएणं, से तं उदइए । से किं तं उदयनिप्फन्ने? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-जीवोदयनिप्फन्ने अ अजीवोदयनिष्फन्ने अ। से किं तं जीवोदयनिप्फन्ने? अणेगविहे पण्णत्ते, तं जहा-णेरइए तिरिक्खजोगिए मणुस्से देवे पुढविकाइए जाव तसकाइए कोह- कसाई जाव लोहकसाई इत्थीवेदए पुरिसवेदए णपुंसगवेदए करहलेले जाव सुकलेसे मिच्छादिट्ठो अविरए असण्णी अण्णा- णी आहारए छउमत्थे सजोगी संसारत्थे असिद्धे, से तं जीवोदयनिष्फन्ने । से किं तं अजीवोदयनिप्फन्ने? अणेगविह पराते, तं जहा-उरालि वा सरीरं उरालिअसरीरपोग- परिणामि वा दव्वं, वेउवि वा सरीरं बेउव्वियसरीरपोग- परिणामि वा व्वं, एवं आहारगं सरीरं तेअगं सरीरं करमग- सरीरं च माणिअव्वं, पोगपरिणामिए बण्णे गंधे रसे फासे, से तं अजीवोदयनिष्फरणे । से तं उदयनिप्फरणे, से तं उदइए। से किं तं उवसमिए ? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा- उवसमे , ३० ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : अ उवसमनिप्फणे - अ । से किं तं उवसमे? मोहणिजस्स कम्मरस उक्समेणं, से तं उसमे । से किं तं उसमनिप्फरणे ? अयोगविहे पण्णत्ते, तं जहा- उवसंतकोहे जाव उवसंतलोभे उपसंतपेजे उवसंतदोसे उवसंतदसणमोहणिज्जे उवसंतमोह- णिज्जे उपसमिआ सम्मत्तलद्धी उवसमिआ चरित्तलद्धी उवसंत- कसायछउमस्थवीयरागे, सेतं उसमनिप्फरणे । से तं उपसमिए । से किं तं खइए ? दुविहे पण्णत्ते तं जहा-खइए अ खय- निप्फरणे अ । से किं तं खइए ? अट्टरहं कम्मपयडीणं खए रणं, ले तं खइए । ले किं तं खयनिष्फरणे ? अणेगविहे पराणत्ते, तं जहा-उप्पराणणाणदसणधरे अरहा जिणे केवली खीण- आभिणिबोहियणाणावरणे खीणसुअणाणावरणे खीणोहिणाणा- वरणे खीणमणपजवणाणावरणे खीणकेवलणाणावरणे अणा- वरणे निरावरणे खीणावरणे णाणावरणिज्जकम्मविप्पमुक्के केवलदंसी सव्वदंसी खीणनिदे खीणनिहानिदे खीणपयले खीणपयलापयले खीणथीणगिद्धी खीणचवखुदंसणावरणे खीण- अचक्खुदंसणावरणे खीणोहिदसणावरणे खीणकेवलदसणा- वरणे अणावरणे निरावरणे खीणावरणे दरिसणावरणिज्नकम्म- विप्पमुको; खीणसायावेअणिजे खीणअसायावेअणिजे अवे- अणे निव्वेअणे खीणवेअणे सुभासुभवेअणिज्जकम्मविप्पमुक्के; खीणकोहे जाव खीणलोहे खीणजे खीणदोसे खीणदंसण- मोहणिजे खीणचरित्तमोहणिजे अमोहे निम्मोहे खीणमोहे मोह- द्वितीयाध्याय : [ ३१ . JM णिजकम्मविप्पमुक्के; खीणणेरइआउए खीणतिरक्खजोणि- आउए खीणमणुस्साउए खीणदेवाउए अण्णाउए निराउए खीणा- उए आउकम्मविप्पमुक्के; गइजाइसरीरंगोवंगबंधणसंघयण संठाणअणेगोंदिविंदसंघायविप्पमुक्के खीणसुभनामे खीण- असुभणामे अणामे निण्णामे खीणनामे सुभासुभणामकम्म- विप्पमुक्के; खीणउच्चागोए खीणणीआगोए अगोए निग्गोए खीणगोए उच्चणीयगोत्तकम्मविप्पमुक्क; खीणदाणंतराए खीण- लाभंतराए खीणभोगंतराए खीणउवभोगंतराए खीणविरियंतराए अणंतराए णिरंतराए खीरांतराए अंतरायकम्मविप्पमुक्के; सिद्ध बुद्धे मुत्ते परिणिव्वुए अंतगडे सव्वदुक्खप्पहीणे,से तं खयनिष्फ- गणे, से तं खइए। से किं तं खोवसमिए ? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-खो- वसमिए य खोवसमनिप्फराणो य । से किं तं खोवसमे ? चउराहं घाइकम्माणं खोवसमेणं, जहा-णाणावरणिजस्स दसणावरणिज्जस्स मोहणिज्जस्स अंतरायस्स खोवसमेणं, से तं खोवसमे । से किं तं खओवसमनिप्फरणे ? अणेगविहे पण्णत्ते, जहा- -खोवसमिश्रा आभिणिबोहिअ-णाणलद्धी जाव खो- वसमिश्रा मणपज्जवणाणलद्धी खोवसमिआ मइअण्णाणलद्धी खओवसमिया सुअ-अण्णाणलद्धी खोवसमिआ विभंगणाण- लद्धीखोवसमित्रा चक्खुदंसालद्धी अचक्खुदंसणलद्धी ओहि- दसणलद्वी एवं सम्मदंसालद्धी मिच्छादसणालद्धी सम्ममिच्छा- तं तं ३२ ] तत्त्वाथ सूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : दसणलद्धी खोवसमिआ सामाइअचरित्तलद्धी एवं छेदोवट्ठा- वणलद्धी परिहारविसुद्धिअलद्धी सुहुमसंपरायचरित्तलद्धी एवं... चरित्ताचरित्तलद्धी खोवसमिश्रा दाणलद्धी एवं लाभ० भोग उपभोगलद्धी खओवसमिश्रा वीरिअलद्धी एवं पंडिअवीरिअलद्धी बालवीरिअलद्धीबालपंडिअवीरिअलद्धी खोवसमिआ सोइन्दिय- लद्धी जाव खोवसमिश्रा फासिंदियलद्धी खोवसमिए आया- रंगधरे एवं सुअगडंगधरे ठाणंगधरे समवायंगधरे विवाहपण्णत्ति- धरे नायाधम्मकहा० उवासगदसा० अंतगडदसा० अणुत्तरोववाई- अदसा० पाहावागरणधरे विवागसुत्रधरे खोवसमिए दिट्टिवा- यधरे खोवसमिए णवपुव्वी खनोवसमिए जाव चउदसपुवी खोसलिए गणी खोवसमिए वायए, से तं खोवसमनिष्फ- गणे । से तं खोवसमिए । से किं तं पारिणामिए ? दुविहे पण्णत्ते,तं जहा-साइपारि- णामिए अ अणाइपारिणामिए अ। से किं तं साइपारिणामिए ? अणेगविहे पराणते, तं जहा- जुगणसुरा जुगणगुलो जुगणघयं जुगणतंदुला चेव । अम्मा य अब्मरुक्खा संका गंधव्यणगरा य ॥२४॥ उहावाया दिसादाहा गजियं विज्जूणिग्घाया जूवया जक्त्रादित्ता धूमिआ महिना रयुग्घाया चंदोवरागा सूरोवरागा चंदपरिवेसा सूरपरिवेसा पडिचंदा पडिसूरा इन्दधणू उद्गमच्छा कविहसिया असोहा वासा वासधरा गामा णगरा घरा पव्वता दितीयाध्यायः [ ३३ छाया पायाला भवणा निरया रयणप्पहा सकरप्पहा वालुअप्पहा पंकप्पहा धूमप्पहा तमप्पहा तमतमप्पहा सोहम्मे जाव अच्चुए गेवेज्जे अणुत्तरे ईसिप्पभाए परमाणुपोग्गले दुपएसिए जाव अणंतपएसिए, से तं साइपरिणामिए । से किं तं अणाइपरि- णामिए ? धम्मत्थिकाए अधम्मत्थिकाए आगासत्थिकाए जीव- थिकाए पुग्गलत्थिकाए अद्धासमए लोए अलोए भवसिद्धिा अभवसिद्धिा, से तं अणाइपरिणामिए । से तं परिणामिए । अनुयोगद्वार सूत्र षटभावाधिकार । अथ किं सः औदायिकः ? द्विविधः प्रज्ञप्तस्तद्यथा-औदायिकश्च उदयनिष्पन्नश्च । अथ किं सः औदयिकः ? अष्टानां कर्मप्रकृतीनां उदयेन अथ सः औदयिकः । अथ किं सः उदयनिष्पन्नः १ द्विविधः प्रज्ञप्तस्तद्यथा-जीवोदयनिष्पन्नश्च अजीवोदयनिष्पन्नश्च । अथ किं सः जीवोदयनिष्पन्नः ? अनेकविध : प्रज्ञप्तस्तद्यथा-नैरयिकः तिर्यग्योनिकः मनुष्यः देवः पृथ्वीकायिकः यावत् त्रसकायिका क्रोधकपायी यावत् लोभकषायी स्त्रीवेदकः पुरुषवेदक: नपुंसकवेदकः कृष्णलेश्यः यावत् शुक्ललेश्यः मिथ्याष्टिः अविरतः असंज्ञी अज्ञानी आहारकः छद्यस्थः सयोगी संसारस्थोऽसिद्धः। अथ सः जीवोदयनिष्पन्नः । अथ किं सः अजीवोदयनिष्पन्नः १ अनेकविधः प्रज्ञप्तस्तद्यथा--औदारिक वा शरीरं औदारिकशरीरप्रयोगपरि- यामिकं वा द्रव्यं, वैक्रियिकं वा शरीरं चैक्रियिकशरीरमयोगपरि- पामिकं वा द्रव्यं, आहारकं शरीरं तैजसं शरीरं कार्माणशरीरं च भणितव्यम्, प्रयोगपरिणायिकः वर्णः गन्धः रसः स्पर्शः, अथ सः अजीवोदयनिष्पन्नः । अथ सः उदयनिष्पन्नः, अथ सः औद- यिकः।

३४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : अथ किं सः औपशमिकः? द्विविथः प्रज्ञप्तस्तद्यथा-उपशमश्च उपशमनिष्पन्नश्च । अथ किं सः उपशमः १ मोहनीयस्य कर्मणः उपशमः, श्रथ सः उपशमः। अथ किं सः उपशमनिष्पन्नः१ अनेक- विधः प्रज्ञप्तस्तद्यथा-उपशान्तक्रोधः यावत् उपशान्तलोभः उपशान्त- प्रेम उपशान्तदोपः उपशान्तदर्शनमोहनीयः उपशान्तमोहनीयः उपशमिका सम्यक्त्वलब्धिः उपशमिका चारित्रलब्धिः उपशान्त- कषायछद्यस्थवीतरागः, अथ स उपशमनिष्पन्नः। अथ सः उपशमिकः। अथ किं सः क्षायिकः? द्विविधः प्रज्ञप्तस्तद्यथा-क्षायिकश्च क्षय- निष्पन्नश्च । अथ किं सः क्षायिकः १ अष्टानां कर्मप्रकृतीनां क्षयः, अथ सः क्षायिकः । अथ किं सः क्षयनिष्पन्नः ? अनेकविधः प्रज्ञप्तस्तद्यथा-उत्पन्नज्ञानदर्शनधरः अहन्जिनः केवली क्षीणाभि- निवोधिकज्ञानावरणः क्षीणश्रुतज्ञानावरणः क्षीणावधिज्ञानावरण: क्षीणमनःपर्ययज्ञानावरणः क्षीणकेवलज्ञानाचरणः अनावरणः निरा- वरणः क्षीणावरणः ज्ञानावरणीयकर्मविप्रमुक्त; केवलदर्शी सर्व- दर्शी, क्षीणनिद्र क्षीणनिद्रानिद्र क्षीणप्रचल. क्षीणमचलाप्रचल क्षीणस्त्यानगृद्धी, क्षीणचक्षुदर्शनावरण क्षणाचक्षुदर्शनावरणः भीणाऽवधिदर्शनावरण क्षीणकेवलदर्शनावरण अनावरणः निरावरण दर्शनावरणीयकर्मविप्रमुक्तः क्षोणसातावेदनीयः क्षीणासाताचेदनीयः अवेदन निर्वेदनः क्षीणवेदनः शुभाशु- भवेदनीयकर्मविप्रमुक्तः, क्षीणक्रोधः यावत् क्षीणलोभः क्षीण- मेम श्रीणदोपः क्षीणदर्शनमोहनीयःक्षीणचारित्रमोहनीयः अमोह निर्मोहः क्षीणमोहः मोहनीयकर्मविप्रमुक्त; क्षीणनैरयिका- युकः क्षीणतिर्यग्योनिकायुक. क्षीणमनुष्यायुष्कः क्षीणदेवायुका अनायुष्क: निरायुष्कः क्षीणायुफः आयुकर्मविप्रमुक्त, गति- जातिशरीरांगोपाबंधनसंघातनसंहननसंस्थानानेकशरीर-(बोंदि) ..

प्रथमाध्यायः [ ३५ 4 निर्नामः क्षीणनामः शुभाशुभनामकर्मविप्रमुक्तः; क्षीणाचगोत्रः क्षीणनीचगोत्रः अगोत्रः निर्गोत्रः क्षीणगोत्रः उच्चनीचगोत्रकर्म- विप्रमुक्तः; क्षीणदानान्तरायः क्षीणलाभान्तरायः क्षीणभोगान्त- रायः क्षाणापभोगान्तरायः क्षीणवीर्यान्तरायः अनन्तरायः निर- न्तरायः क्षीणान्तरायः अन्तरायकर्मविप्रमुक्तः, सिद्धः बुद्धः अन्तकृत् सर्वदुःखमहीणः, अथ सः क्षयनिष्पन्नः। अथ सः क्षायिकः । प मुक्तः परिनिवृतः अथ किं सः क्षायोपशमिकः ? द्विविधः प्रज्ञाप्तस्तद्यथा-क्षायोप- शमिकश्च क्षायोपशमनिष्पन्नश्च । अथ किं सः क्षयोपशमः? चतुणी घातिकर्मणां क्षयोपशमः, तद्यथा-ज्ञानावरणीयस्य दर्शना- वरणीयस्य मोहनीयस्य अन्तरायस्य क्षयोपशमः, अथ सः क्षयोप- शमः। अथ किंसः क्षयोपशमनिष्पन्नः। अनेकविधः प्रज्ञप्तस्तद्यथा -क्षयोपशमिका आभिनिवोधिकज्ञानलब्धिः यावत् क्षयोपशमिका मनःपर्ययज्ञानलब्धिः क्षयोपशमिका मत्यज्ञानलब्धिः क्षयोपशमिका श्रुताज्ञानलब्धिः क्षयोपशमिका विभंगज्ञानलब्धिः क्षयोपशमिका चक्षुदर्शनलब्धिः अचक्षुदर्शनलब्धिः अवधिदर्शनलब्धिः एवं सम्य- ग्दर्शनलब्धिः मिथ्यादर्शनलब्धिः सम्यमिथ्यादर्शनलब्धिः क्षयोपशमिका सामायिकचारित्रलब्धिः एवं छेदोपस्थापनालब्धिः परिहारविशुद्धिकलब्धिः सूक्ष्मसाम्परायचारित्रलब्धिः एवं चरित्रा- चरित्रलब्धिः क्षयोपशमिका दानलब्धिः एवं लाभ० भोग० उपभोगलब्धिः क्षयोपशमिका वीर्यलब्धिः एवं पंडितवीर्य- लब्धिः बालवीर्यलब्धिः वालपण्डितवीर्यलब्धिः क्षयोपशमिका- श्रोत्रंद्रियलब्धिः यावत् क्षयोपशमिका स्पर्शनेन्द्रियलब्धिः क्षयोप- शमिकः आचाराङ्गधरः एवं सूत्रकृतांगधरः स्थानाङ्गधरः समवा- याङ्गधरः व्याख्यामप्तिधरः ज्ञाताधर्मकथाङ्गधरः उपासकदशाङ्ग- ३६ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : . धर : अन्तकृद्दशाङ्गधर अनुत्तरोपपातिकदशाङ्गधरः प्रश्नव्याक- रणाङ्गधर विपाकश्रुतधर · क्षयोपशमिक : दृष्टिवादधर भयोप- शमिक . नवपूर्वी यावत् क्षयोपशमिक · चतुर्दशपूर्वी क्षयोपशमिक गणिः क्षयोपशमिक • वाचक अथ स . क्षयोपशमनिष्पन्न अथ स : क्षयोपशमिक । । : : : .. अथ किं स पारिणामिक • ? द्विविध. प्रज्ञप्तस्तद्यथा-सादिपारि- पामिकश्च अनादिपारिणामिकश्च । अथ किंस- सादिपारिणामिक.? अनेकविध प्रज्ञप्तस्तद्यथा - जीर्णसुरा जीर्णगुड . जीर्णघतं जीर्णतंदुलाश्चैव । अभ्राणि च अभ्रक्षा : सन्ध्या गन्धर्वन- गराणि च । उल्कापाता दिग्दाहा : गर्जितविद्यु निर्धाता यूपका : यक्षादीप्तकानि धूमिका महिका रज उद्घात : चन्द्रोपरागा : सूर्योपरागा : चन्द्रपरिवेषा · सूर्यपरिवेपा प्रतिचन्द्र प्रतिसूर्य इन्द्रधनु . उदकमत्स्याः [इन्द्रधनु: खण्डानि ] कपिहसितानि अमोघा वर्षा वर्षधरा नगरा. गृहाणि पर्वता. पाताला भूवनानि नारका . रत्नप्रभा शर्करप्रभा वालुकप्रभा पङ्कममा धूमप्रभा तम प्रभा तम.तम प्रभा सौधर्म : यावत् अच्युत धेयक. अनुत्तर ईपित्मागभारा परमाणुपुद्गल : द्विप्रदेशिक यावत् अनन्तमदेशिक , सादि- पारिणामिक । अथ किस अनादिपारिणामिक ? धर्मारित- काय अधर्मास्तिकाय. आकाशास्तिकाय. जीवास्तिकायः पुद्ग- लास्तिकाय. अद्धासमयः लोक : अलोक भव्यसिद्धिका अथ स : अनादिपारिणामिक । अथ स . पारिणामिकः । ग्रामा : अथ स. भाषा टीका-ओदयिक किसे कहते है वह दो प्रकार का होता है - औदयिक और उदयनिप्पन्न । औदयिक किसे कहते हैं ? आठों कर्मों की प्रकृतियो के उदय से श्रौदयिक भाव होता है । 'उदयनिष्पन्न किसे कहते हैं? वह दो प्रकार का होता है द्वितीयाध्यायः [ ३७ जीवोदय निष्पन्न तथा अजीवोदय निष्पन्न । जीवोदय निष्पन्नं किसे कहते हैं? वह अनेक प्रकार का कहा गया है - नारकी, तिर्यंच मनुष्य, देव, पृथ्वी कायिक से लगाकर अस काय तक, क्रोधकपाय वाले से लगाकर लोभ कपाय थाले तक, स्त्री वेद वाले, पुरुषवेद वाले, नपुसक वेद वाले, कृष्णलेश्या वाले से लगाकर शुक्ललेश्या वाले तक, मिथ्याष्टि, अविरत, असंजी, अज्ञानी, आहारक, छद्मस्थ, सयोगी, ससारी और असिद्ध । इसको जीवोदय निष्पन्न कहते हैं। श्रजीवोदय निष्पन्न किसे कहते है ? वह अनेक प्रकार का होता है --- औदारिक शरीर अथवा औदारिक शरीर के प्रयोग के परिणाम वाला द्रव्य, वैक्रियिक शरीर अथवा वैक्रियिकशरीर के प्रयोग के परिणाम वाला द्रव्य, इसी प्रकार आहारक शरीर, तेजस शरीर और कार्माण शरीर भी अजीवोदय निष्पन्न हैं। प्रयोग के परिणाम वाले वर्ण, गध, रस और स्पर्श भी अजीवोदय निष्पन्न हैं । यह उदय निष्पन्न है । इस प्रकार श्रादयिक भाव का वर्णन किया गया ।। औपशमिक किसे कहते है? वह दो प्रकार का कहा गया है उपशम निष्पन्न । उपशम किसे कहते हैं ? मोहनीय कर्म के उपशम (दबजाने) को उपशम जहते हैं। उपशम निष्पन्न किसे कहते हैं ? वह अनेक प्रकार का कहा गया है। उपशान्त क्रोध से लगाकर उपशान्त लोम तक, उपशान्त राग, उपशान्त दोप (द्वप), उपशान्त दर्शन- मोहनीय, उपशान्त मोहनीय, उपशमिक सम्यक्त्वलब्धि, उपशमिक चारित्रलब्धि और उपशान्तकपाय छद्यस्थ वीतराग । इसको उपशम निप्पन्न कहते हैं। इस प्रकार उपशमिक भाव का वर्णन किया गया। उपशम और , , , क्षायिक किसे कहते हैं ? वह दो प्रकार का होता है.- क्षायिक और क्षयनिष्पन्न । क्षायिक किसे कहते हैं ? आठो कर्म प्रकृतियो के क्षय को क्षायिक कहते है । क्षय- निष्पन्न किसे कहते हैं ? वह अनेक प्रकार का है --- उत्पन्न हुए ज्ञान और दर्शन के धारक, अहन्तजिन, केवली, मतिज्ञानावरणीय को नष्ट करने वाले, श्रुतज्ञानावरणीय को नष्ट करने वाले, अवविज्ञानावरणीय को नष्ट करने वाले, मनःपर्ययज्ञानावरणीय को नष्ट करने वाले, केवलज्ञानावरणीय को नष्ट करने वाले, केवलदर्शी, सर्वदर्शी, निद्रादर्शनावरणीय को नष्ट करने वाले, निद्रानिद्रा को नष्ट करने वाले, प्रचलादर्शनावरणीय को नष्ट करने वाले, प्रचलाप्रचला को नष्ट करने वाले, स्त्यानगृद्धि को नष्ट करने वाले, चक्षुदर्शनावरणीय को नष्ट करने वाले, अचक्षुदर्शनावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय को नष्ट करने वाले, केवल- ३८ ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : , दर्शनावरणीय को नष्ट करने वाले, आवरणरहित, आवरण को निकालने वाले, इस प्रकार दर्शनावरणीय कर्म से सब प्रकार छूटे हुए; साता वेदनीय को नष्ट करने वाले असाता वेदनीय को नष्ट करने वाले, वेदना रहित, वेदना को दूर करने वाले, वेदना को नष्ट करने वाले, शुभ और अशुभ वेदनीय कर्म से सब प्रकार छूटे हुए; क्रोध मान, माया लोभ को नष्ट करने वाले, प्रम (राग) को नष्ट करने वाले, दोष को दूर करने वाले, दर्शन मोहनीय को नष्ट करने वाले, चारित्रमोहनीय को नष्ट करने वाले, मोह रहित, मोह को दूर करने वाले, मोह को नष्ट करने वाले इस प्रकार मोहनीय कर्म से सब प्रकार छूटे हुए; नरक आयु को नष्ट करने वाले, तिर्यंच श्रायु को नष्ट करने वाले, मनुष्य आयु को नष्ट करने वाले, देव आयु को नष्ट करने करने वाले, आयु कर्म रहित, आयु कर्म को दूर करने वाले, इस प्रकार आयु कर्म से सब प्रकार छूटे हुए; गति, जाति, शरीर, अङ्गोपाङ्ग, बन्धन, संघात, संस्थान और अनेक शरीरो के समूह के संघात से छूटे हुए, शुभ नाम कर्म को नष्ट करने वाले, अशुभ नाम कर्म को नष्ट करने वाले, नाम कर्म रहित, नाम कर्म को दूर करने वाले, नाम कर्म को नष्ट करने वाले और इस प्रकार शुभ तथा अशुभ नाम कर्म से छूटे हुए; उच्च गोत्र कर्म को नष्ट करने वाले, नीच गोत्र कर्म को नष्ट करने वाले, गोत्र रहित, गोत्र कर्म को दूर करने वाले, गोत्र कर्म को नष्ट करने वाले, और इस प्रकार उच्च तथा नीच गोत्र कर्म से सब प्रकार छूटे हुए; दानान्तराय को नष्ट करने वाले, लाभान्तराय को नष्ट करने वाले, भोगान्तराय को नष्ट करने वाले, उपभोगान्तराय को नष्ट करने वाले, वीर्यान्तराय कर्म को नष्ट करने वाले, अन्तराय कर्म रहित, अन्तराय कर्म को दूर करने वाले, अन्तरायकर्म को नष्ट करने वाले इस प्रकार अन्तराय कर्म से सब प्रकार छूटे हुए; सिद्ध, बुद्ध, मुक्त, निर्वाण प्राप्त, कर्मों का अन्त करने वाले, सब प्रकार के दुःखो से सर्वथा मुक्त भाव को क्षय निष्पन्न कहते हैं, इस प्रकार क्षायिकभाव का वर्णन किया गया। क्षायोपशमिक भाव किसे कहते हैं ? वह दो प्रकार का होता है-क्षायोपशमिक और क्षयनिष्पन्न । क्षयोपशम किसे कहते हैं ? चार घातिया कर्मो के क्षयोपशम होने को क्षायोपशमिक कहते हैं । वह इस प्रकार हैं-ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तराय का क्षयोपशम क्षयोपशम कहलाता है। क्षयोपशम निष्पन्न किसे कहते हैं ? वह अनेक प्रकार का कहा गया है-क्षयोपशमिक मतिजान लब्धि से लगाकर क्षयोपशम मनःपर्यय ज्ञान लब्धि तक, क्षयोपशमिक मत्यज्ञान लब्धि, क्षयोपशम श्रुताज्ञानलब्धि, क्षयोपशमिक द्वितीयाध्यायः 3. विभंगज्ञानलब्धिः क्षयोपशमिक चजुदर्शनलब्धि, अक्षुदर्शनलब्धि, अषधिदर्शनलब्धि, सम्यन्दर्शनलब्धि, मिथ्यादर्शनलब्धि, सम्यमिथ्यादर्शनलब्धि, सामायिकचारित्रलन्धि, : छेदोपस्थापनालब्धि, परिहारविशुद्धिकलब्धि, सूक्ष्मसाम्परायचारित्रलब्धि, चारित्राचारित्र- लब्धिः क्षयोपशमिक दानलब्धि, लाभलब्धि, भोगलब्धि, उपभोगलब्धि, क्षयोपशमिक वीर्य- लब्धि, इसी प्रकार पडितवीर्यलब्धि, बालवीर्यलब्धि, घालपडितवीर्यलब्धि; श्योपशमिक कर्णेन्द्रियलब्धि से लगाकर क्षयोपशमिक स्पर्शनेन्द्रियलब्धि तक; क्षयोपशमिक आचा- गंगवारी, इसी प्रकार सूत्रकृतांगधारी, स्थानांगधारी, समवायांगधारी, व्याख्याप्रज्ञप्ति- धारी, नाताधर्मकांगधारी, उपासकदशांगधारी, अन्तकृद्दशांगधारी, अनुत्तरोपपातिक- दशांगधारी, प्रश्नव्याकरणांगधारी, विपाकश्रुतधारी, क्षयोपशमिक राष्टिवादधारी, क्षयोपशमिक नवपूर्व से लगाकर क्षयोपशमिक चतुर्दश पूर्व तक धारण करने वाले, क्षयोपशमिक गणि और क्षयोपशमिक वाचक । यह क्षयोपशम निष्पन्न है। इस प्रकार क्षयोपशमिक भाव का वर्णन हुआ। पारिणामिक भाव किसे कहते हैं ? वह दो प्रकार का होता है-सादि पारिणा- मिक और अनादि पारिणामिक | सादि पारिणामिक किसे कहते हैं ? यह अनेक प्रकार का बतलाया गया है ---पुरानी शराव, पुराना गुड़, पुराना घी और पुराने चावल, बादल, अभ्रवृक्ष (झाड़ के आकार में परिणमित वादल), सन्ध्या, परिणमित बादल), सन्ध्या, गन्धर्वो के नगर, उल्कापात, दिशाओ का जलना, गरजती हुई बिजली का शब्द, शुक्लपक्ष के प्रथम तीन दिन मे सन्ध्या समय सूर्य की प्रभा तथा चन्द्रमा की प्रभा का एकत्र होना (यूपक), एक ही दिशा में थोड़े थोड़े अन्तर से विजली की सी चमक का दिखाई देना-भूत प्रत आदि का चमत्कार (यक्षादीप्तक), धुए के समान दूर से धुंधला दिखाई देने वाला पदार्थ कुहरा (धूमिका), पाला (महिका), धूल के उड़ने के कारण उत्पन्न हुआ अन्धकार- गांधी (रज उद्घात), चन्द्र ग्रहणे, सूर्य ग्रहण, चन्द्रमा के आसपास का मण्डल (चन्द्रपरिवेप), सूर्य के आस पास का मण्डल (सूर्यपरिवेष), चन्द्रमा के सामने दूसरे चन्द्रमा का दिखलाई देना-चन्द्रमा की परछाई या प्रतिबिम्ब (प्रतिचन्द्र), सूर्य के सामनं दुसरे सूर्य का दिखलाई देना-सूर्य की परिछाई या प्रतिविम्ब (प्रतिसूर्य ), इन्द्र धनुप, इन्द्रधनुष के टुकड़े, आकाश में अकस्मात् दिखाई देने वाली भयङ्कर ज्वाला (कपिहसित), बिना बादलों की बिजली (अमोघ); भरत आदि क्षेत्र. भरत आदि ४०.] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय: , + क्षेत्रो की मर्यादा बांधने वाले कुलाचल पर्वत (वर्षधर पर्वत) ग्राम, नगर, घर, पर्वत, पाताल, लोक, नारकी, रत्नप्रभा, शकरप्रभा, बालुकाप्रमा, पङ्कप्रभा, धूमप्रभा, तमप्रभा, तमतम प्रभा, सौधर्मस्वर्ग से लगाकरा अच्युत स्वर्ग तक, वेयक, अनुत्तर, सिद्धशिला (ईपित्प्रागभार), पुद्गल परमाणु, दो प्रदेश वाले से लगाकर अनन्तप्रदेश वाले तक । इन सबको सादि पारिणामिक कहते हैं। अनादिपारिणामिक किसे कहते हैं ? धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, अद्धा समय, लोक, अलोक, भव्यत्व, और अभन्यत्व । यह अनादि पारिणामिक भाव हैं । इस प्रकार पारिणामिक भाव का वर्णन किया गया। संगति-सूत्र मे और पागम में दोनों ही स्थानों पर भावों का अपनी २ अपेक्षा दृष्टि से बड़ा सुन्दर वर्णन किया गया है । सूत्र में भावो को केवल जीव द्रव्य की अपेक्षा से लिया गया है । किन्तु आगम में अजीव द्रव्यों की अपेक्षा का भी ध्यान रक्खा गया है। औपमिक, क्षायिक, और क्षायोपशमिक केवल जीव के ही हो सकते हैं । अतः इन तीनो का वर्णन जीव की ही अपेक्षा से किया गया है । औदायिक तथा पारिणामिक में जीव और अजीव दोनों ही अपेक्षाओ की गुंआयश होने के कारण दोनों अपेक्षादृष्टियो से वर्णन किया गया है। श्रागम के औपशमिक भाव के वर्णन में जितने विशेष भेद दिखलाये सूत्र में सम्यक्त्व तथा चारित्र उनका ही विस्तार हैं, जो कि विस्तार दृष्टि वाले आगम की सुन्दरता का ही कारण है। क्षायिक भाव का वर्णन श्रागम में सिद्धो की अपेक्षा से किया गया है। क्योंकि परम सिद्ध भगवान् ही उत्कृष्ट क्षायिक भाव के धारक हो सकते हैं। श्रागम मे श्रारम्भ में अर्हन्त भगवान् को भी क्षायिक भाव का धारक माना है और इसी मत का वर्णन मूत्र मे किया गया है । अतः इस वर्णन में भी विशेष कथन ही है। क्षयोपशम केवल कर्मो को सर्वघाती प्रकृतियो का ही हुआ करता है । सर्वघाती प्रकृतियां केवल घातियाकर्मो की कहलाती हैं। अतः आगम तथा सूत्र दोनों ने चारो घातिया कर्मों के क्षयोपशम को ही क्षयोपशमिक भाव माना है। श्रागम मे उन भेदो श्रावान्तर भेदो का भी वर्णन करके विषय को विस्तार पूर्वक लिखा है। SU ।

द्वितीयाध्यायः [.४१ औदयिक भाव के वर्णन में आगम के जीवोदय निष्पन्न में से जीव की अपेक्षा कथन करते हुए सूत्र ने संक्षेप से इक्कीस भेदो का वर्णन किया है। अन्तर केवल इतना है कि सूश के अज्ञान के स्थान मे श्रागश्र ने अज्ञानी और छद्मस्थ को विशेष दृष्टि से प्रथक् २ माना है । असंयत को अविरत नाम दिया गया है। इनके अतिरिक्त आगम मे छै काय, असंज्ञी, आहारक, सयोगी और संसारी को भी प्रथक् भेद माना है जो केवल विस्तृत वर्णन की अपेक्षा से है। तात्विक अतर सूत्र का आगम से इस विषय मे भी नहीं है। श्रजीवोदय निष्पन्न का वर्णन करते हुए पागम ने पांचों शरीर, उनकी पर्याय तथा उनमे रहने वाले स्पर्श रस, गंध और वर्ण का वर्णन भी किया है जो जीव की अपेक्षा न होने के कारण सूत्रकार ने नहीं लिया है। परिणामिक भाव के वर्णन मे आगम ने पांचों अजीव द्रव्य, उनकी अनेक विविध पर्याये तथा उन सब के रहने के स्थानों का वर्णन करते हुए अन्त में जीव के भव्यत्व और अभव्यत्व का वर्णन किया है। अत: इन पांचो भावो के वर्णन मे भी सूत्र और आगम में अन्तर नहीं कहा जा सकता। सूत्रकार ने सुखबोध के लिये केवल जोव के ही पारिणामिक भावो का आगम से ग्रहण किया है। "उपयोगो लक्षणम् २८. उवोगलक्खणे जीवे । भगवती सूत्र शत० २, उद्देश्य १०. जीवो उवोगलक्षणो। उत्तराध्ययन सूत्र अध्ययन २८, गाथा १०. छाया- उपयोगलक्षण : जीव:। जीव : उपयोगलक्षण:। भाषा टीका-जीव का लक्षण उपयोग है। संगति-आगम तथा सूत्र के शब्दों मे कितना शब्द साम्य है।

४२ ] . तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : सद्विविधोऽष्टचतुर्भेदः। कतिविहे णं भंते! उवओगे पएणते? गोयमा! दुविहे उवओगे पगणत्ते, तं जहा-सागारोवओगे, अणागारोवओगे य ॥१॥ सागारोवओगे णं भंते! कतिविहे पण्णत्ते? गोयमा! अट्ठविहे पण्णते। प्रजापना सुन पद २६ अणगारोवओगे एं भंते! कतिविहे पएणते? गोयमा ! चउविहे पण्णत्ते। प्रज्ञापना सूत्र पद २६ छाया- कतिविधः भदन्त ! उपयोगः प्रज्ञप्तः ? गौतम ! द्विविधः उपयोगः प्रज्ञप्तः, तद्यथा- साकारोपयोगः, अनाकारोपयोगश्च । साकारोपयोगः भदन्त कतिविधः प्रजप्तः ? गौतम! अष्टविधः मजप्तः? उत्तर अनाकारोपयोगः भदन्त ! कतिनिधः प्रजप्तः ? गौतम! चतुर्विधः मज्ञप्तः । प्रश्न-भगवन् ! उपयोग कितने प्रकार का बतलाया गया है ? गौतम ! उपयोग दो प्रकार का क्तलाया गया है-साकारोपयोग और अनाकारोपयोग। भगवन् ! साकारोपयोग कितने प्रकार का कहा गया है ? गौतम । वह आठ प्रकार का कहा गया है । भगवन् ! अनारोपयोग कितने प्रकार का कहा गया है ? गौतम ! वह चार प्रकार का कहा गया है । संगति -- यहा भी सूत्र और आगम बिलकुल एक ही बात को बतला रहे हैं। आठ प्रकार का सकारोपयोग पांच ज्ञान तथा तीन अज्ञान रूप है और चार प्रकार का अनाकारोपयोग चार प्रकार का दर्शन है। उत्तर प्रश्न द्वितीयाध्यायः [ ४३ 4 मुक्ताश्च ॥" संसारिणो २ १०. दुविहा सव्वजीवा पण्णता, तं जहा-सिद्धा चेव असिद्धा चेव। स्थानांग स्थान २ उद्दे० १ सूत्र, १०१. संसारसमावन्नगा चेव असंसारसमावन्नगा चेव ।। स्थानांग स्थान २, उद्दे० १, सूत्र ५७ छाया- द्विविधाः सर्वजीवाः प्रजाताः, तद्यथा-सिद्धाश्चैव असिद्धाश्चैव । संसारसमापनकाश्चैवासंसारसमापनकाश्चैव ।। भाषा टीका सब प्रकार के जीव दो प्रकार के होते हैं - सिद्ध और प्रसिद्ध, अथवा संसारी और अससारी। संगति सिद्ध और मुक्त तथा प्रसिद्ध और संसारी का शाब्दिक अन्तर बिलकुल स्पष्ट है। समनस्काऽमनस्काः॥ २, ११ दुविहा नेरइया पण्णत्ता, तं जहा - सन्नी चेव असन्नी चेव, एवं पंचेदिया सव्ये विगलिंदियवजा जाव वाणमंतरा वेमाणिया। स्थानाङ्ग स्थान २ उद्दे० १ सूत्र ७६ छाया- द्विविधौ नैरयिकौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा - संज्ञी चैव अंसज्ञी चैव । एवं पञ्चेन्द्रियाः सर्वे विकलेन्द्रियवाः यावत् व्यन्तराः वैमानिकाः। भाषा टीका -नारको दो प्रकार के होते है - संज्ञी और असंझी। इसी प्रकार विकलेन्द्रिय के अतिरिक्त व्यन्तर और वैमानिक तक सभी पचेन्द्रियो के संज्ञी और असंज्ञी भेद होते है। सगति - जिनके मन हो उनको समनस्क अथवा सज्ञी कहते है और जिनके मन न हो उनको श्रमनस्क अथवा असंज्ञी कहते हैं । इस विषय में सूत्रकार और श्रागम का केवल शाब्दिक भेद है। एक इन्द्रिय से लगाकर चौइन्द्रिय सक के जीव विना मन वाले ४४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : " अमनस्क अथवा असंज्ञी ही होते हैं । अतएव उनमे सज्ञी असंज्ञी को भेद कल्पना नहीं होती। पचेन्द्रियो मे सभी गतियो मे यह दोनो भेद होते है । सारांश यह है कि संसारी जीवो के भी दो भेद हैं। समनस्क और अमनस्क अथवा संज्ञी और असंही। संसारिणत्रसस्थावराः।' २. १२. संसारसमावन्नगा तसे चेव थावरा चेव । स्थानाङ्ग स्थान २ उद्देश्य १ सूम ५७ छाया- संसारसमापनकाः त्रसाश्चैव स्थावराश्चैव । भाषा टीका संसारी जीवों के दो भेद होते हैं-उस और स्थावर । सगति --- यहां आगम वाक्य और सूत्र अक्षर लगभग एक से ही हैं। - के " पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः। . २ १३ पंच थावरा काया पण्णता, तं जहा-इंदे थायरकाए (पुढवी- थावरकाए) वंमेथावरकाए (आजथावरकाए) सिप्पे थावरकाए (तेऊ थावरकाए) संमती थावरकाए (वाजथावरकाए) पाचा- बच्चेथावरकाए (वणस्सइथावरकाए)। स्थानाङ्ग स्थान ५ उद्देश्य १ सूत्र ३६४ छाया- पञ्च स्थावराः कायाः प्रजाताः, तद्यथा – पृथिवीस्थावरकायः अप्स्थावरकायः तेजःस्थावरलायः वायुस्थादरकाय: स्पतिस्थावरकाय:। भापा टीका- उनमे से भी स्थावर कायो के पांच भेद होते हैं-पृथिवी स्थावर काय, जल स्थावरकाय, अग्नि स्थावरकाय, वायु स्थावरकाय, और वनस्पति स्थावरकाय। द्वीन्द्रियादयनसाः। २, १४ वन- द्वितीयाध्यायः [ ४५ - से किं तं ओराला तसा पाणा? चउन्विहा पण्णत्ता, तं जहा-बेइंदिया तेइंदिया चउरिदिया पंचेंदिया । जीवाभिगम प्रतिपत्ति १ सूत्र २७ छाया अथ किं ते उदाराः नसाः प्राणिनः १ चतुर्विधाः प्रज्ञप्तास्तद्यथा- द्वीन्द्रियाः, त्रीन्द्रियाः, चतुरिन्द्रियाः पञ्चेन्द्रियाः। वह बड़े त्रसजीव कौन से होते हैं ? उत्तर- वह चार प्रकार के कहे गये हैं - द्वीन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय और पंचेन्द्रिय । पञ्चेन्द्रियाणि। प्रश्न - २. १५ " " कति णं भंते! इंदिया पएणत्ता? गोयमा! पंचेदिया पएणत्ता। प्रज्ञापना सूत्र १५ इन्द्रियपद उद्दे० १ सू० १९१ छाया-कति भदन्त ! इन्द्रियाणि प्रज्ञप्तानि । गौतम! पञ्चेन्द्रियाणि प्रज्ञतानि । भगवन् ! इन्द्रियां कितनी बतलाई गई हैं? उत्तर-गौतम ! इन्द्रियां पांच यतलाई गई हैं। द्विविधानि । २. १६ कइविहा णं भंते! इंदिया पण्णत्ता ? गोयमा! दुविहा पएणत्ता, तं जहा- दबिंदिया य भावव्विंदिया य । प्रज्ञापना पद १५ उद्देश्य १ छाया- कतिविधानि भदन्त ! इन्द्रियाणि प्राप्तोनि ? गौतम! द्विविधानि तद्यथा- द्रव्येन्द्रियाणि च भावेन्द्रियाणि च । भगवन् ! इन्द्रियां कितने प्रकार की बतलाई गई हैं उत्तर-गौतम ! इन्द्रियां दो प्रकार की बतलाई गई हैं-द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय। प्रश्न तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वयः २ १७ प्रज्ञापना 3०२पद १५. संगति -- इन सभी आगम वाक्यो और सूत्रों के अक्षर प्रायः मिलते हैं ! “निर्वृत्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् । कएविहे णं भंते! इंदियउवचए पण्णत्ते ? गोयमा! पंचविहे इंदियउवचए पएणत्ते । ... . ...... कइविहे रणं भंते! इन्दियणिवत्तणा पण्णत्ता? गोयमा ! पंचविहा इन्दियणिवत्तणा पण्णत्ता । छाया- कतिविधः भदन्त ! इन्द्रियोपचयः प्रज्ञप्तः१ गौतम! पंचविधः इन्द्रियोपचयः प्रज्ञप्तः । कतिविधा भदन्त ! इन्द्रियनिर्वतना प्रज्ञप्ता ? गौतम! पञ्चविधा इन्द्रियनिर्वतना प्रज्ञप्ता। भगवन् ! इन्द्रियोपचय कितने प्रकार का कहा गया है ? उत्तर- गौतम ! इन्द्रियोपचय पांच प्रकार का कहा गया है। भगवन् ! इन्द्रिय निर्वतना कितने प्रकार की कही गई है ? उत्तर-गौतम ! इन्द्रिय निर्वतना पांच प्रकार की कही गई है। संगति-सूत्र में द्रव्येन्द्रियो के दो भेद माने हैं-निर्वृति और उपकरण । आगम वाक्य में उपकरण को ही इन्द्रियोपचय कहा गया है। लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम्।" २, १८. कतिविहा णं भंते ! इन्दियलद्धी पण्णत्ता ? गोयमा! पंच- विहा इन्दियलद्धी पण्णत्ता। प्रज्ञापना उ०२, इन्द्रियपद १५. कतिविहा णं भंते! इन्दिय उवउगद्धा पण्णता ? गोयमा ! पंचविहा इन्दियउवउगद्धा पपणत्ता। प्रज्ञापना उ० २. इन्दियपद् १५ प्रश्न द्वितीयाध्यायः [ ४७ . २. १६ " छाया- कतिविधा भदन्त इन्द्रियलब्धिः प्रहप्ता ? गौतम! पंचविधा इन्द्रिय- लब्धिः प्रज्ञप्ता। कतिविधः भदन्त इन्दियोपयोगः प्रज्ञप्तः१ गौतम! पञ्चविध इन्द्रियोपयोगः प्रज्ञप्तः। प्रश्न-भगवन् ! इन्द्रिय लब्धि कितने प्रकार की वतलाई गई है। उत्तर-गौतम ! इन्द्रियलब्धि पांच प्रकार की चवलाई गई है । प्रश्न-भगवन् ! इन्द्रियोपयोग कितने प्रकार का बतलाया गया है ? उत्तर-गौतम ! इन्द्रियोपयोग पांच प्रकार का बतलाया गया है। संगति-भावेन्द्रिय के दो भेद होते हैं-लब्धि और उपयोग। स्पर्शनरसनघ्राणाचक्षुः श्रोत्राणि।" स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तदर्थाः : सोइन्दिए चक्खिदिए घाणिदिए जिभिदिए फासिदिए। प्रज्ञापना इन्दिय पद १५ पंच इन्दियत्था पण्णता, तं जहा-सोइन्दियत्थे जाव फासिंदियत्थे। स्थानाङ्ग स्थान ५ उद्देश्य ३ सूत्र ४४३ छाया- श्रोत्रेन्द्रियश्चक्षुरिन्द्रियः घ्राणेन्द्रियः जिव्हेन्द्रियः स्पर्शनेन्द्रियः । पञ्चेन्द्रियार्थाः प्रज्ञप्तास्तद्यथा श्रोत्रेन्द्रियार्थः यावत् स्पर्शने- न्द्रियार्थः। भाषा टीका - (इन्द्रियां पांच होती हैं) कर्ण इन्द्रिय, नेत्र इन्द्रिय, घ्राण इन्द्रिय, जिव्हा इन्द्रिय और स्पर्शन इन्द्रिय । पांचों इन्द्रियों के विषय भी पांच ही होते हैं -शब्द, रूप, गंध, रस और स्पर्श। संगति - दोनों सूत्र और आगम वाक्य के अक्षरों में कुछ अन्तर नहीं है। २ २० ४८] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : श्रुतमनिन्द्रियस्य। -- २. २१ सुणेइत्ति सुझं। नन्दि सूत्र २४ छाया- शृणोतीति श्रुतं । भाषा टीका-जिसको सुना जावे उसे श्रुत कहते हैं। सगति व्यवहार पक्ष मे सुनने योग्य पदार्थ को बिना मन के पूर्ण उपयोग के ग्रहण नहीं किया जा सकता है। अतः श्रुत ज्ञान केवल मन के विषय द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है। - " " वनस्पत्यन्तानामेकम् । २. २२. से किं तं एगिदियसंसारसमावन्नजीवपण्णवणा? एगिदिय- संसारसमावण्णजीवपण्णवण्णा पंचविहा पण्णत्ता, तं जहा - पुढवीकाइया, आउकाइया तेउकाइया वाउकाइया वणस्सइ- काइया। प्रज्ञापना प्रथम पद। छाया अथ किं सा एकेन्द्रियसंसारसमापन्नजीवप्रज्ञापना? एकेन्द्रिय- संसारसमापन्नजीवप्रज्ञापना पश्चविधा प्रज्ञप्ता, तद्यथा-पृथिवी- कायिका अपकायिका तेजःकायिका वायुकायिका वनस्पतिकायिका। एकेन्द्रिय संसारी जीव किन्हे कहते हैं ? वह पांच प्रकार के होते हैं -पृथिवी काबिक, जल कायिक, अग्नि कायिक, वायु कायिक और वनस्पति कायिक। प्रश्न उत्तर “कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि। २. २३.

द्वितीयाध्यायः [.४६ किमिया-पिपीलिया-भमरा-मणुस्स इत्यादि । प्रज्ञापना प्रथम पद । छाया कृमिका - पिपीलिका - भ्रमरो - मनुष्यः इत्यादि । भाषा टीका - कीड़ा, (लट अथवा चावलो का कीड़ा), चींटी, भौरा और मनुष्य आदि । संगति -- इनके एक २ इन्द्रिय अधिक होती है। संज्ञिनः समनस्काः . ।' २ २४. छाया- - जस्सणं अस्थि ईहा अवोहो मग्गणा गवसगा चिंता वीमंसा से णं असरणीति लब्भइ । जस्स णं नथि ईहा अबोहो मगणा गवेसगा चिंता वीमंसा से णं असन्नीति लब्भइ । नन्दिसूत्र सूत्र ४० यस्य अस्ति ईहा अपोहो मार्गणा गवेपणा चिंता विमर्शः अथ संज्ञीति लभ्यते । यस्य नास्ति ईहा अपोहो मार्गणा गवेषणा चिन्ता विमर्शः अथ असंज्ञीति लभ्यते । भाषा टीका-जिसमें ईहा, अपोह, मार्गणा, गवेषणा, चिन्ता और विमर्श करने की योग्यता हो उसे संज्ञी कहते हैं । जिसमे ईहा, अपोह, मार्गणा, गवेषणा, चिन्ता और विमर्श की योग्यता न हो उसे असंज्ञी कहते हैं। सगति -- ईहा, अपोह, मार्गणा, गवेषणा, चिन्ता और विमर्श करने की योग्यता को ही मन कहते हैं । अतः मन सहित अथवा समनस्क को संज्ञी और मन रहित अथवा अमनस्क को असंजी कहते हैं। विग्रहगतौ कर्मयोगः।' २ २५ कम्मासरीरकायप्पओगे। प्रज्ञापना पद १६.

. ५० ] -तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : छाया- कार्माणशरीरकायप्रयोगः । भाषा टीका-(विग्रह गति में) कार्माण शरीर के काय का प्रयोग होता है। संगति-दूसरा शरीर ग्रहण करने के लिये की जाने वाली गति को विग्रह गति कहते हैं। जिस प्रकार चारो गतियों में से मनुष्य तिर्यञ्च गति में औदारिक शरीर तथा देव नरक गति में वैन्नियिक शरीर साथ रहता है, उसी प्रकार विग्रह गति मे कार्माण शरीर का ही काय बनता है और उसी का प्रयोग जीव करता है। अनुश्रेणिः गतिः। २. २६ परमाणुपोग्गलाणं भंते ! किं अणुसेढी गती पवत्तति विसेडिं गती पवत्तत्ति ? गोयमा ! अणुसेढी गती पवत्तति नो विसेटिं गती पवत्तति ? दुपएसियाणं भंते! खंधाणं अणुसेढी गती पवत्तति विसेढी गती पवत्तति एवं चेव, एवं जाव अणंतपएसि- याणं खंधाणं । नेरइयाणं भंते! किं अणुसेढी गती पवत्तति एवं विसेढी गती पवत्तति एवं चेव, एवं जाव वेमाणियाणं । व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक २५, उ० ३ सू०७३.. छाया- परमाणुपुद्गलानां भदन्त ! किं अनुश्रेणिं नतिः प्रवर्तते विश्रेरिणं गतिः प्रवर्तते ? गौतम! अनुश्रेणिं गतिः प्रवर्तते नो विश्रेणिं गतिः प्रवर्तते । द्विपदेशिकानां भदन्त! स्कन्धानां अणुश्रेणिं गतिः प्रवर्तते विश्रेणिं गतिः प्रवर्तते एवं चैव, एवं यावत् अनन्तप्रदेशिकानां स्कन्धानाम् । नेरयिकाणां भदन्त, किं अनुश्रेणिं गतिः प्रवर्तते एवं विश्रेणिः गतिः प्रवर्तते एवं चैत्र, एवं यावत् वैमानिकानाम् । प्रश्न - भगवन् ! परमाणु और पुद्गलो को गति अनुप्रणि होती हैं अथवा विश्रेणि (श्रेणि विरुद्ध) होती है। उत्तर-गौतम ! उनकी गति अनुश्रेणि ही होती है विश्रेणि नहीं होती। प्रस्त-भगवन् ! दो प्रदेश वाले पुद्गल स्कन्धों को गति अनुश्रेणि होती है भधवा विश्रेरिण?

द्वितीयाध्यायः [ ५१ - प्रश्न उत्तर " ऐसी ही अनुश्रेणि होती है । और इसी प्रकार अनन्त प्रदेश वाले स्कन्धों तक की भी अनुश्रेणि गति ही होती है। भगवन् ! नारकियों की गति अनुश्रेणि होती है, अथवा विश्रेणि। इसी प्रकार अनुश्रेणि गति होती है। और इसी प्रकार वैमानिकों तक की भी अनुश्रेणि गति होती है। संगति आगम का कथन विशेष हुआ करता है। अतः इनमें जीव और पुद्गल दोनों की ही गति का वर्णन किया गया है। अविग्रहा जीवस्य।' २, २७. उज्जूसेढीपडिवन्ने अफुसमाणगई उड्ढे एकसमएणं अवि- ग्गहेणं गंता सागारोवउत्ते सिज्झिहिइ । औपपातिक सून सिद्धाधिकार सू० ४३ छाया- ऋजुणिप्रतिपन्नः अस्पृशद्गतिः उद्ध्वं एकसमयेन अविग्रहेण गत्वा साकारोपयुक्तः सिध्यति । आकाश प्रदेशों की सरल पक्ति को प्राप्त होकर, गति करते हुए भी किसी का स्पर्श न करते हुए विना मोड़ा लिये हुए साकार उपयोग युक्त एक समय में ऊपर को जाकर सिद्ध हो जाता है। संगति आगम वाक्य का मी सूत्र के समान यही आशय है कि सिद्धमान् जीव की गति मोड़े रहित (एक समय वाली) होती है। विग्रहवती च संसारिणः प्राक् चतुर्व्यः ।' २, २८. णेरइयाणं उकोसेणं तिसमतीतेणं विग्गहेणं उववज्जति एगिदिवज्जं जाव वेमाणियाणं । स्थानांग स्थान ३ उद्दे० ४ सूत्र, २२५.

५२ ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : कइसमइएणं विग्गहेणं उववज्जति? गोयमा! एगसमइएण वा दिसमइएण वा तिसमइएण वा चउसमइएण वा विग्गहेणं उक्वजन्ति । व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक ३४ उ० १ ० ८५१. छाया- नेरइकानां उत्कृष्टेन त्रिसमयेन विग्रहेण उत्पद्यन्ते एकेन्द्रियवयं यावत् वैमानिकानाम् । कतिसमयेन विग्रहेण उत्पद्यन्ते? गौतम ! एकसमयेन वा द्विसमयेन वा त्रिसमयेन वा चतुःसमयेन वा विग्रहेण उत्पद्यन्ते । भाषा टीका-नारकी लोग अधिक से अधिक तीन समय विग्रह गति में लेकर उत्पन्न होते हैं। विग्रह गति में कितना समय लेकर उत्पन्न होते हैं। उत्तर - गौतम! एक समय, दो समय, तीन समय अथवा चार समय में मोड़ा लेकर उत्पन्न होते है। प्रश्न संगति-सूत्र और आगम वाक्य मे बात एक ही कही है, केवल कहने का ढंग भिन्न है। एकसमयाऽविग्रहा॥' २, २९. एगसमइयो विग्गहो नत्थि । व्याख्याप्रज्ञप्ति शत० ३४, सू०८५१. छाया एक समयका विग्रहो नास्ति । भाषा टीका एक समय वाले को मोड़ा लेना नहीं पड़ता। संगति-सिद्ध एक समय में ही मोक्ष जाते हैं। अत. उनकी गति सीधी होती है और उस गति में मोड़ा नहीं होता। एकं द्वौ त्रीन्वाऽनाहारकः ॥' २,३०.

द्वितीयाध्यायः ५३ * , प्रश्न अणाहारे णं भंते ! अणाहार एत्ति पुच्छा ? गोयमा ! अणा- हारए दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-छउमत्थअनाहारए, केवलीअणा- हारए, गोयमा! अजहएणमनुकोसेणं तिरिणसमया । प्रज्ञापना पद १८, द्वार १४. छाया अनाहारः भदन्तः अनाहारः इति पृच्छा ? गौतम! अनाहारका द्विविधः प्रज्ञप्तः, तपथा छमस्थानाहारकः केवल्यनाहारकः । अजघन्यानुक्रोशेण त्रिसमया । भगवन् ! अनाहार किसे कहते हैं ? उत्तर - अनाहारक दो प्रकार के कहे गये हैं, छद्मस्थ अनाहारक और केवली अनाहारक । अधिक से अधिक तीन समय तक यह जीव अनाहारक रह सकता है । सम्मुईनगर्भोपपादाजन्म। २, ३१. गम्भवकन्तिया......... उत्तराध्ययन ३६ गाथा ११७ अंडया पोतया जराउया समुच्छिया उववाइया। दशवैकालिक अध्याय ४ त्रसाधिकार छाया गर्भव्युत्क्रान्तिकाः ] अंडजाः पोतजाः जरायुजाः सम्मू- छनाः औपपादिकाः। भाषा टोका - गर्भज (अंडज, पोतन और जरायुज) सम्मूर्छन और औपपादिक जन्म होते हैं। सचित्तशीतसंवृताः सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः कइविहाणं भंते! जोणी परणता ? गोयमा! तिविहा जोणी पण्णता, तं जहा- सीया जोणी, उलिणा जोगी सीमोलिया ५४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : - जोणी । तिविहा जोणी परणत्ता, तं जहा-सचित्ता जोणी, अचि- ता जोणी, मीसिया जोणी । तिविहा जोणी पण्णता, तं जहा - संवुडा जोणी, वियडा जोणी; संयुडवियडा जोणी । प्रज्ञापना योनिपद है. छाया- कतिविधा भदन्त ! योनिः प्रज्ञप्ता ? गोतम! त्रिविधा योनिः प्रजासा तद्यथा-शीता योनिः, उण्णा योनिः, शीतोष्णा योनिः । त्रिविधा योनिः प्रज्ञप्ता, तद्यथा ----- सचित्ता योनिः, अचित्ता योनिः, मिश्राः योनिः। त्रिविधा योनिः प्रज्ञप्ता, तद्यथा -- संहता योनिः, विकृता योनिः, संवृतविकृता योनिः । -भगवन् ! योनियां कितने प्रकार की कहीं गई है? उत्तर - गौतम! गेनि तीन प्रकार की कही गई है - शीत योनि, उष्ण योनि, और शीतोष्ण योनि । तीन प्रकार की योनि कही गई हैं - सचित्त योनि, अचित्त योनि और मिश्र योनि। तीन प्रकार की योनि कही गई है- संवृत योनि, विवृत योनि, और संवृतविवृत योनि । जरायुजाण्डजपोतानां गर्भः। २, ३३. अंडया पोतया जराउया । दशवकालिक अध्याय ४. गब्भवक्कंतियाय। प्रश्न प्रज्ञापना १पद. छाया- अण्डजाः पोतजाः जरायुजाः, गर्भव्युत्क्रान्तिका च । भाषा टीका अण्डज, पोतज और जरायुज गर्भ जन्म वाले होते हैं। देवनारकाणामुपपादः॥ २, ३४.

H द्वितीयाध्यायः [ ५५ . दोण्हं उववाए पएणत्ते देवा चेव नेरइयाणं चेव । स्थानांग स्थान २ उद्दे० ३, सूत्र ८५. छाया- द्वयोः उपपादः प्रज्ञप्तः-देवानां चैव नेरयिकानां चैव । भापा टीका- उपपाद जन्म दो के होता है - देवो के और नारकियों के। संगति - उपरोक्त सूत्रो का आगमवाक्य से केवल शाब्दिक भेद है। शेषाणां सम्मूर्च्छनम् ॥ २, ३५. संमुच्छिमोय इत्यादि । प्रज्ञापना पद १. सूत्रकृतांग द्वितीय श्रुत स्कन्ध, तृतीयाध्ययन छाया- सम्मूर्च्छनानि च । इत्यादि । भापा टीका - (गर्भ तथा उपपाद जन्म वालो से शेष जीव) सम्मूर्छन होते है। संगति-श्रागमवाक्य में इस स्थल पर सम्मूर्छनो का बड़े विस्तार से वर्णन किया है। औदारिकवैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणानि शरीराणि ॥ २, ३६ कति णं भंते! सरीरया पण्णत्ता? गोयमा! पंच सरीरा पण्णत्ता, तं जहा- "औरालिते, वेउविए, आहारए, तेयए, कम्मए। प्रज्ञापना शरीरपद २१ छाया- कति भदन्त ! शरीराणि प्रज्ञप्तानि ? गौतम! पञ्च शरीराणि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा- औदारिका, वैक्रियिकः, आहारक, तैजसः, कार्मणम् ।

५६ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय: प्रश्न २. ३७. २, ३८. भगवन् ! शरीर कितने होते हैं ? उत्तर – गौतम् ! शरीर पांच कहे गये हैं -औदारिक, वैक्रियिक, श्राहारक, तैजस और कार्मण। परं परं सूक्ष्मम् । 'प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक्तैजसात् ।' अनन्तगुणे परे। २, ३६. सव्वत्थोवा आहारगसरीरा दवट्ठयाए वेउव्वियसरीरा दव- ठुयाए असंखेज्जगुणा ओरालियसरीरा दव्वठ्ठयाए असंखेज्जगुणा तेयाकम्मगसरीरा दोवि तुल्ला दवट्ठयाए अणंतगुणा, पदेसट्टाए सव्वत्थोवा आहारगसरीरा पदेसठ्ठाए उब्वियसरीरा पदेसट्टाए असंखेजगुणा ओरालियसरीरा पदेसट्ठाए असंखेज्जगुणा तेयग- सरीरा पदेसट्ठाए अणंतगुणा कम्मगसरीरा पदेसट्ठाए अणंत- गुणा इत्यादि। प्रज्ञापना शरीर पद २१ छाया- सर्वस्तोकानि आहारकशरीराणि द्रव्यार्थतया वैक्रियिकशरीराणि द्रव्यार्थतया असंख्येयगुणानि औदारिकशरीराणि द्रव्यार्थतया असं- ख्येयगुणानि तैजसकामणशरीरे द्वे अपि तुल्ये द्रव्यार्थतया अनन्त- गुणे । प्रदेशार्थतया सर्वस्तोकान्याहारकशरीराणि प्रदेशार्थतया वैक्रियिकशरीराणि प्रदेशार्थतया असंख्येयगुणानि औदारिक- शरीराणि प्रदेशार्थतया असंख्येयगुणानि तैजसशरीरोणि प्रदेशार्थ- तया भणंतगुणानि कार्मणशरीराणि इत्यादि । ..

द्वितीयाध्यायः [ ५७ भाषा टीका-द्रव्यार्थ की अपेक्षा आहारक शरीर सबसे कम होते है। द्रव्यार्थ की अपेक्षा वैक्रियिक शरीर उससे असख्यात गुणे होते हैं। द्रव्यार्थ की अपेक्षा औदारिक शरीर वैक्रियिक से भी असंख्यात गुणे होते हैं। तैजस और कर्माण दोनों ही शरीर द्रव्यार्थ की अपेक्षा बरावर होते हुए औदारिक शरीर से भी अनन्त गुणे होते हैं। प्रदेशों की अपेक्षा आहारक शरीर सबसे कम होते हैं। वैक्रियिक शरीर प्रदेशो की अपेक्षा आहारक से असंख्यात गुणे होते हैं। उनसे औदारिक शरीर प्रदेशों की अपेक्षा असंख्यात गुणे होते हैं उनसे प्रदेशो के अर्थ की अपेक्षा तैनस शरीर अनन्त गुणे होते हैं। प्रदेशों के अर्थ की अपेक्षा कार्मण शरीर भी उनसे अनन्त गुणे होते हैं। संगति- यहां सूत्र और आगम वाक्य मे शाब्दिक अंतर ही है। अप्रतीघाते । २, ४०. अप्पडिहयगई। राजप्रश्नीसूत्र, सूत्र ६६. छाया अप्रतिहतगतिः। भाषा टीका--(इनमें से अन्त के दो तैजस और कार्मण शरीर) की गति किसी वस्तु से नहीं रुकती। अनादिसम्बन्धे च। २, ४१. सर्वस्य । - २, ४२. तेयासरीरप्पयोगबंधे णं भन्ते! कालओ कालचिरं होइ ? गोयमा! दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-अणाइए वा अपज्जवसिए अणाइए वा सपज्जवसिए । व्याख्याप्रज्ञप्ति सप्तक ८ 3०६ सू०३५०.

५८ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : कम्मासरीरप्पयोगबंधे अणाइए सपज्जवसिए अणा- इए अपज्जवसिए वा एवं जहा तेयगस्स । व्याख्याप्रज्ञप्ति सप्तक ८ उ० ९ सू०३५१. छाया- तैजसशरीरप्रयोगवन्धः भदन्तः! कालतः कियच्चिरं भवति? गौतम ! द्विविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा - अनादिकः वा अपर्यवसितः अनादिकः वा सपर्यवसितः। कार्मणशरीरप्रयोगवन्धः ........अनादिकः सपर्यवसितः अनादिकः अपर्यवसितः वा एवं यथा तैजसः । भगवन् ! तैजस शरीर का प्रयोग बंध समय की अपेक्षा कितनी देर तक होता है। उत्तर- गौतम ! वह दो प्रकार का होता है । अनादिक और अपर्यवसित (अनन्त) तथा अनादिक सपर्यवसित (सान्त) तैजस शरीर के ही समान कार्मण शरीर का प्रयोगबंध भी समय की अपेक्षा दो प्रकार का होता है। (अभव्यो के) अनादि और अनन्त तथा (भव्यो के) अनादि तथा प्रश्न ! सान्त । संगति- तेजस और कार्मण शरीर सभी संसारी जीवों के होते हैं । यह भव्यो के अनादि और सान्त होते हैं। किन्तु अभव्यो के यह अनादि और अनन्त होते हैं। तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्याऽऽचतुर्म्य" २, ४३. जस्त भंते! ओरालियसरीरं ? गोयमा! जस्स ओरालिय- सरीरं तस्स वेउव्वियसरीरं सिय अस्थि सिय णत्थि, जस्स वेउ- व्वियसरीरं तस्स ओरालियसरीरं सिय अस्थि सिय रणत्थि । जस्स णं भंते! ओरालियसरीरं तस्स आहारगसरीरं जस्स आ- हारगसरीरं तस्स ओरालियसरीरं? गोयमा! जस्स ओरालिय- द्वितीयाध्यायः [ ५६ सरीरं तस्स आहारगसरीरं सिय अस्थि सिय णस्थि, जस्स आहारगसरीरं तस्स ओरालियसरीरं णियमा अस्थि । जस्स णं भंते! ओरालियसरीरं तस्स तेयगसरीरं, जस्स तेयगसरीरं तस्य ओरालियसरीरं? गोयमा! जस्स ओरालियसरीरं तस्स तेयगसरीरं णियमा अस्थि, जस्स पुण तेयगसरीरं तस्सोरालियसरीरं सिय अस्थि सियणस्थि । एवं कम्मसरीरे वि। जस्स णं भंते! वेउव्वि- यसरीरं तस्स आहारगसरीरं, जस्स आहारगसरीरं तस्स वेउव्वि- यसरीरं? गोयमा! जस्स वेउव्वियसरीरं तस्स आहारगसरीरं णस्थि, जस्स पुण आहारगसरीरं तस्स बेउव्वियसरीरं पत्थि। तेयाकम्माई जहा ओरालिएणं सम्मं तहेव, आहारगसरीरेण वि सम्मं तेयाकम्माई तहेव उच्चारियव्या । जस्स णं भंते! तेयग- सरीरं तस्स कम्मगसरीरं जस्स कम्मगसरीरं तरस तेयगसरीरं? गोयमा! जस्स तेयगसरीरं तस्स कम्मगसरीरं णियमा अस्थि, जस्स वि कम्मगसरीरं तस्स वि तेयगसरीरं णियमा अस्थि । प्रज्ञापना पद २१. छाया- यस्य भदन्त ! औदारिकशरीरं ? गौतम! यस्य औदारिकशरीर तस्य चक्रयिकशरीरं स्यादस्ति स्यान्नास्ति । यस्य वैक्रयिकशरीरं तस्य औदारिकशरीरं स्यादस्ति स्यान्नास्ति । यस्य भदन्त ! औदारिकशरीरं तस्य आहारकशरीरं, यस्य आहारकशरीरं तस्य औदारिकशरीरं ? गौतम! यस्य औदारिकशरीरं तस्य आहारक- शरीरं स्यादस्ति स्यान्नास्ति । यस्य आहारकशरीरं तस्य औदा- रिकशरीरं नियमादस्ति । यस्य भदन्त ! औदारिकशरीरं तस्य तैजसशरीरं, यस्य तैजसशरीरं तस्य औदारिकशरीरं १ गौतम !

47 ६० ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : यस्य औदारिकशरीरं तस्य तैजसशरीरं नियमादस्ति । यस्य पुनः तैजसशरीरं तस्य औदारिकशरीरं स्यादस्ति स्यान्नास्ति । एवं कार्मणशरीरेऽपि । यस्य भदन्त ! वैक्रियिक शरीरं तस्य आहारक- शरीरं यस्य आहारकशरीरं वस्य वैक्रियिकशरीरं ? गौतम ! यस्य वैक्रियिकशरीरं तस्य आहारकशरीरं नास्ति । यस्य पुन: आहारकशरीरं तस्य वैक्रियिकशरीरं नास्ति । तैजसकामणे यथा औदारिकः सम्यक् तथैव । आहारकशरीरेणापि सम्यक् तैजसकार्मणे तथैव उच्चारितव्ये । यस्य भदन्त ! तैजसशरीरं तस्य कार्मणशरीरं यस्य कार्मणशरीरं तस्य तैजसशरीरं ? गौतम ! यस्य तैजसशरीरं तस्य कार्मणशरीरं नियमादस्ति, यस्यापि कार्मणशरीर तस्यापि तैजसशरीरं नियमादस्ति । भगवन् ! जिसके औदारिक शरीर हो उसके और क्या २ हो सकते हैं ? उत्तर- गौतम ! जिसके औदारिक शरीर हो उसके वैक्रियिक शरीर हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता । जिसके वैक्रियिक शरीर हो उसके औदारिक शरीर हो भी और न भी हो। भगवन् ! जिसके औदारिक शरीर हो क्या उसके आहारक शरीर होता है, और क्या आहारक शरीर वाले के औदारिक शरीर होता है ? गौतम ! जिसके औदारिक शरीर हो उसके अहारक शरीर हो भी या न भी हो, किन्तु जिसके आहारक शरीर हो उसके औदारिक शरीर भी नियम से होता है। प्रश्न- भगवन् ! क्या औदारिक शरीर वाले के तैजस होता है और तैजस वाले के औदारिक शरीर होता है। गौतम ! जिसके औदारिक शरीर हो उसके तैजस नियम से होता है, किन्तु जिसके तैजस हो उसके औदारिक शरीर हो भी अथवा न भी हो । इसी प्रकार कार्मण शरीर का भी नियम है। भगवन् ! क्या जिसके वैक्रियिक शरीर हो उसके आहारक शरीर होगा और जिसके आहारक शरीर हो उसके वैक्रियिक शरीर होगा ? प्रश्न - उत्तर उत्तर द्वितीयाध्यायः na [ ६१ उत्तर-गौतम ! जिसके वैक्रियिक हो उसके श्राहारक नहीं होता । जिसके आहारक हो उसके वैक्रियिक शरीर नहीं होता। तैजस और कार्मण शरीर औदारिक वाले के समान वैक्रियिक वाले के भी होते हैं, माहारक शरीर वाले के साथ भी तैजस कार्मण होते हैं। प्रश्न - भगवन् ! क्या तैजस शरीर वाले के फार्मण शरीर होता है और कार्मण शरीर वाले के तैजस शरीर होता है ? गौतम ! तैजस वाले के कार्मण शरीर नियम से होता है और कार्मण वाले के तैजस शरीर नियम से होता है। निरुपभोगमन्त्यम्। उत्तर 'It विग्गहगइसमावन्नगाणं नेरइयाणं दोसरीरा पण्णत्ता, • जहा-तेयए चेव कम्मए चेव । निरंतरं जाव घेमाणियाणं । स्थानांग स्थान २ उद्दे० १ सूत्र ७६. जीवे णं भंते! गब्भं वक्कममाणे किं ससरीरी वकमइ, असरीरी वक्कमइ ? गोयमा! सिय ससरीरी वकमइ सिय असीरी वकमइ । से केण?णं? गोयमा ! ओरालियवेउविय-आहारयाई पडुच्च असरीरी वकमइ। तेयाकम्माइं पड्डच्च ससरीरी धक्कमइ। भगवती० शतक १ उद्दे० ७. छाया- विग्रहगतिसमापनकानां नैरयिकानां द्विशरीरे प्रज्ञप्ते, तद्यथा - तैजसश्चैव, कार्मणञ्चैव, निरंतरं यावत् वैमानिकानां । जीवो भगवन् ! गर्भ व्युत्क्रामन् किं सशरीरीव्युत्क्रामति, अशरीरी व्युत्क्रामति ? गौतम ! स्यात् सशरीरी व्युत्क्रामति स्यात् अशरीरी व्युत्क्रामति । तत् केनार्थेन ? गौतम ! औदारिक-वैक्रियिक-श्रा- हारकाणि प्रतीत्य अशरीरी व्युत्क्रामति । तैजसकामणे प्रतीत्य सशरीरी व्युत्क्रामति ।

६२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : भाषा टीका-विग्रहगति को प्राप्त करने वाले नारकियोंके दो शरीर होतेहैं। तेजस और कार्माण । इसी प्रकार सव गतियो मे वैमानिक देवो तक के तैजस और कार्मण होते हैं। प्रश्न भगवन् ! जीव गर्भ धारण करने के लिये शरीर सहित जाता है अथवा शरीर रहित जाता है ? उत्तर गौतम ! कथञ्चित् यह शरीर सहित जाता है और कथञ्चित् यह शरीर रहित जाता है। प्रश्न वह किस कारण से ? उत्तर- गौतम ! औदारिक, वैक्रियिक, श्राहारक की अपेक्षा से शरीर रहित गमन करता है तथा तैनस कार्मण की अपेक्षा से शरीर सहित गमन करता है। संगति - उपरोक्त कथन से प्रगट किया गया है कि यद्यपि कार्मण भी शरीर है किन्तु वह उपभोग रहित है। - गर्भसम्मूर्च्छनजमाद्यम्। २, ४५ उरालिअलरीरे णं भंते कतिविहे पण्णत्ते? गोयमा! दुविहे पराणत्ते, तं जहा - समुच्छिम: गब्भवक्कंतिय । प्रज्ञापना पद २१. छाया- औदारिकशरीरं भगवन् कतिषिधं प्रज्ञप्तं? गौतम ! द्विविधं प्रज्ञप्त, तद्यथा - सम्मूर्छनम्........ गर्भव्युत्क्रांतिकम् । भगवन् ! औदारिक शरीर कितने प्रकार का वतलाया गया है। उत्तर - गौतम | वह दो प्रकार का बतलाया गया है --सम्मूर्छन जन्म वालो के और गर्भ जन्म वालो के औपपादिकं वैक्रियिकम् । २, ४६. गोरइयाणं दो सरीरगा पण्णत्ता, तं जहा-अभंतरगे चेव प्रश्न -- द्वितीयाध्यायः [ ६३ TITLEEN बाहिरगे चेव, अब्भंतरए कम्मए बाहिरए वेउदिए, एवं देवाणं । स्थानांग स्थान २, उद्देश्य १ सूत्र ७५. छाया- नारकाणां वै शरीरके प्रज्ञप्ते, तद्यथा-आभ्यन्तरं चैव बाह्य चैव, आभ्यन्तरं कर्मकं वाह्य वैक्रियिकं, एवं देवानाम् । नारकियों के दो शरीर कहे गये हैं-आभ्यन्तर और बाह्य । आभ्यन्तर शरीर कार्मण होता है । और बाह्य वैक्रियिक होता है । इसी प्रकार देवो के भी होता है। लब्धिप्रत्ययञ्च । भापा टीका २,४७. वेउव्वियलद्धीए। औपपातिकम् सूत्र ४०. छाया- बैंक्रियिकलब्धिकम् । भाषा टोका-- वैक्रियिक शरीर ऋद्धि के द्वारा भी प्राप्त होता है। तैजसमपि । २, ४८. तिहिं ठाणेहिं समणे णिग्गंथे संखित्तविउलतेउलेस्से भवति, तं जहा-आयावणताते १ खंतिखमाते २ अपाणगेणं तवो कम्मेणं ३ । स्थानांग स्थान ३ उद्देश्य ३ सूत्र १८२. छाया- त्रिभिः स्थानः श्रमणः निर्ग्रन्थः संक्षिप्तविपुलतेजोलेश्यः भवति - तद्यथा, आतापनतया, शान्तिक्षमया, अपानकेन तपाकर्मणा । भाषा टीका-तीन स्थानों से श्रमण निर्ग्रन्थ सक्षेप की हुई अधिक तेज लेश्या वाले होते हैं -- धूप में तपने से, शान्ति और क्षमा से और जल बिना पिये हुए तप करके। संगति इन आगमवाक्यो में सूत्रो से केवल कुछ शब्दों का ही भेद है।

६४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वयः शुभं विशद्धमव्याघाति चाहारकप्रमत्तसंयतस्यैव । २,४१. ... उत्तर आहारकसरीरे णं भंते! कतिविहे पएणत्ते? गोयमा! एगागारे पण्णत्ते प्रमत्तसंजय समदिट्टि समचउरंस संठाण संठिए पण्णत्ते । प्रज्ञापना पद २१ सूत्र २७३. छाया आहारकः भगवन् ! कतिविधः प्रज्ञप्तः ? गौतम! एकाकारः प्रजातः .........प्रमत्तसंजयसम्यग्दृष्टिः...... .. समचतुरस्रसंस्थानसंस्थितः मज्ञप्तः। भगवन् ! आहारक शरीर कितने प्रकार का होता है ? गौतम ! आहारक का एक ही आकार होता है। यह प्रमत्त संयत सम्यग्दृष्टि के ही होता है तथा इसका आकार समचतुरस्रसंस्थान रूप होता है। नारकसम्मूच्छिनो नपुंसकानि। तिविहा नपुंसगा पण्णत्ता, तं जहा -णेरतियनपुंसगा तिरिक्खजोणियनपुंसगा मणुस्सनपुंसगा। स्थानांग स्थान ३ उद्दे० १ सूत्र १३१. छाया- त्रिविधानि नपुंसकानि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा- नारकनपुंसकानि, तिर्यग्योनिनपुंसकानि मनुष्यनपुंसकानि । भाषा टीका-नपुंसक तीन प्रकार के होते हैं- नारक नपुंसक, तिर्यंच नपुंसक और मनुष्य नपुंसक। न देवाः। २. ५०. २. ५१. मसुरकुमारा णं भंते ! किं इत्थीवेया पुरिसवेया नपुंसग- द्वितीयाध्यायः [ ६५ छाया- प्रश्न वेया.? गोयमा ! इत्थीवेया पुरिसवेया णो नपुंसंगवेया जहा असुरकुमारा तहा वाणमंतरा जोइसिय वेमाणियावि । समवायाङ्ग वेदाधिकरण सूत्र १५६ असुरकुमाराः भगवन् ! किं स्त्रीवेदाः पुरुषवेदाः नपुंसकवेदाः ? गौतम ! स्त्रीवेदाः पुरुषवेदाः नो नपुंसकवेदाः.........यथा असुर- कुमारा तथा वानव्यन्तराः ज्योतिष्कवैमानिकारपि । भगवन् ! असुरकुमार स्त्रीवेद वाले होते हैं, पुरुषवेद वाले होते हैं अथवा नपुंसक वेद वाले होते हैं। उत्तर-गौतम! स्त्री और पुरुष वेद वाले ही होते हैं नपुंसक नहीं होते। असुरकुमारों के समान ही शेप भुवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक भी स्त्री तथा पुरुष वेद वाले ही होते हैं, नपुंसक नहीं होते। शेषास्त्रिवेदाः। २, ५२ भाषा टीका - इनसे बचे हुए शेष जीव तीनों वेद वाले होते हैं। संगति आगम ग्रन्थों में इस विपय का बहुत विस्तार से विवरण दिया गया । छोटी पंक्ति उपलब्ध न होने से कोई भी पंक्ति न उठायी जा सकी। औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसंख्येयवर्षायुषो- ऽनपवायुषः। है २, ५३. दो अहाउयं पालेंति देवाण चेव णेरइयाणं चेव । स्थानांग स्थान २, ३० ३, सूत्र ८५. देवा नेरइयावि असंखवासाउया य तिरमणुआ। उत्तमपुरिसा य तहा चरम सरीरा य निरुवकमा । इति ठाणांगवित्तीए तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वयः छाया- द्वौ यथायुकं पालयतः देवानां चैव नैरयिकाणाञ्चैव । देवाः नैरयिकारपि च असंख्यवर्षाऽऽयुकाश्च तिर्यग्मनुष्याः ।। उत्तमपुरुषाश्च तथा चरमशरीराश्च निरुपक्रमाः ॥ भाषा टीका-दो की पूर्ण आयु होती है - देवों की और नारकियों की । देव, नारकी, भोगभूमि वाले तिर्यंच और मनुष्य, उत्तम पुरुष और घरमशरीरियो की बंधी हुई आयु नही घटती। संगति- इन सभी आगम वाक्यो का सूत्र वाक्यो के साथ केवल मात्र शाब्दिक भेद है। इति श्री-जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम महाराज-संगृहीते तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वयेः द्वितीयाऽध्यायः समाप्तः॥२॥ '०:

तृतीयाऽध्यायः रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमतमोमहातमः प्रभा भूमयो घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताधोऽधः ॥ ३. १. कहि णं भंते ! नेरइया परिवसंति ? गोयमा! सट्टाणे णं सत्तसु पुढवीसु, तं जहा- रयणप्पाए, सकरप्पभाए, बालुयप्प- भाए, पंकप्पभाए, धूमप्पभाए, तमप्पभाए, तमतमप्पभाए । प्रज्ञापना नरकाधिकार पद २. अत्थि णं भंते! इमीसे रयणप्पभाए पुडवीए, अहे घणो- दधीति वा घणवातेति, वा तणुवातेति वा ओवासंतरेति वा। हता अस्थि एवं जाव अहे सत्तमाए। जीवाभि० प्रतिप०२ सू०७०-७१ छाया- कुत्र भगवन् ! नैरयिकाः परिवसन्ति ? गौतम ! स्वस्थाने सप्तसु पृथ्वीपु तद्यथा-रत्नप्रभायां, शर्करप्रभायां, वालुकप्रभायां, पङ्क- प्रभायां, धूमप्रभायां, तयामभायां, तमातमाप्रमायाम् । आस्ति भगवन् ! अस्याः रत्नप्रभायाः पृथिव्याः अधस्तात् घनोदधीति वा घनवातेति वा तनुवातेति वा आकाशान्तरः इति वा । हन्त ! अस्ति एवं यावत् अधस्तात् सप्तमा । भगवन् ! नारकी कहां रहते हैं ? उत्तर - गौतम ! वह अपने स्थान सातों पृथिवियो मे रहते हैं। जिनके नाम यह है - रत्नप्रभा, शर्करप्रभा, वालुकाप्रभा, पङ्कप्रभा, धूमप्रभा, तम.प्रभा, तमतमप्रभा । प्रश्न - ६८ ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : इस रत्नप्रभा पृथिवी के वाहिर घनोदधिवालवलय है, उसके वाहिर घन वातवलय है, उसके भी वाहिर तनु वातवलय है और सबसे बाहिर आकाश है, इसी प्रकार नीचे २ सातवी पृथ्वी तक है। संगति आगम वाक्य तथा सूत्र में शाब्दिक भेद ही है। तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रि- पञ्चोनैकनरकशतसहस्राणि पंच चैव यथा- क्रमम्। ३.२ तीला य पन्नवीसा परणारस दसेव तिरिण य हवंति । पंचूणसहसहस्सं पंचेव अगुत्तरो गरगा। जीवाभिगम प्रतिपत्ति ३ सूत्र ६६ प्रज्ञापना पद २ नरकाधिकार छाया- त्रिंशतश्च पञ्चविंशतयः पञ्चदशाः दशाः एव त्रयश्च भवन्ति । पञ्चोनशतसहस्राः पञ्चैव अनुत्तराः नरकाः॥ भाषा टीका प्रथम नरक में तीस लाख, द्वितीय में पच्चीस लाख, तृतीय में पन्द्रह लाख, चतुर्थ मे दस लाख, पश्चम मे तीन लाख, छटे मे पांच कम एक लाख और सातवे मे कुल पांच ही नरक हैं । नारकाः नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेह- वेदनाविक्रियाः। पस्परोदीरितदुःखाः। अण्णमण्णस्य कायं अभिहणमाणा वेयषं उदीरेंति इत्यादि। जीवाभिगम० प्रतिपत्ति ३ उद्दे० २ सूत्र ८९ ३.३ ३. ४.

तृतीयाध्यायः 1.६६, .. ' MAN.. इमेहिं विवहेहिं आउहेहि किं ते मोग्गरभुसंढिकरकय सत्ति हलगय मुसल चक्क कुन्त तोमर सूल लउड भिंडिमालि सव्वल पट्टिस चम्मिट्ट दुहण मुट्ठिय असिखेडग खग्ग चाव नाराय कणगकप्पिणि वासि परसु टंकतिक्व निम्मल अगणेहिं एवमा- दिहिं असुभेहिं वेउव्विएहिं पहरणसत्तेहिं अणुबन्धतिव्ववेरा परोप्परं वेयणं उदीरन्ति । प्रश्नव्याकरण अध्याय १ नरकाधिकार ते णं गारगा अंतोवट्टा बाहिं चउरंसा अहे खुरप्पसंठाणा संठिया णिच्चंधयारतमसा ववगयगहचंदसूरणक्खत्तजोइसप्पहा, मेदवसापूयपडलरुहिरमंसचिखललित्ताणुलेवणतला, असुईवीसा परमदुभिगंधा काऊगगणिवण्णाभा कक्खडफासा दुरहियासा अलुभा रणरगा असुभाओ रणरगेसु वेत्रणाश्रो इत्यादि । प्रज्ञापना पद २, नरकाधिकार. नेरइयाणं तो लेसाओ पण्णता, तं जहा-कराहलेस्सा नीललेस्सा काऊलेस्ला । स्थानांग स्थान ३, उ० १, सूत्र १३२ अतिसीतं, अतिउण्हं, अतितराहा, अतिखुहा, अतिभयं वा; णिरए णेरइयाणं दुक्खसयाई अविस्सामं । जीवाभिगम० प्रतिपत्ति ३, सूत्र ९५ अन्योन्यस्य कायं अभिहन्यमानाः वेदनांउदीरयन्ति इत्यादि। एभिः विविधैः आयुधैः किं ते मुद्गरभुसण्डिक्रकचशक्तिहलगदा- मुशलचक्रकुन्ततोमरशूललकुटभिडिमालसदलपट्टिशचर्मवेष्टितद्रुघण- मुष्टिकासिखेटकखड्गचापनाराचकनककल्पिनी-कासीपरशुटंकतीक्ष्ण- छाया- - ७० तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वयः M निर्मलान्यैः एवमादिभिः अशुभैः विक्रियैः प्रहरणशतैः अनुबद्ध- तीब्रवैराः परस्परं वेदनं उदीरयन्ति । ते नरकाः अन्तर्वृ त्ता बहिश्चतुरस्रा अधस्तात् क्षुरप्रसंस्थाना संस्थिता नित्यान्धकारतमसाव्यपगतग्रहचन्द्रसूर्यनक्षत्रज्योतिष्कप्रभा मेदवसा- पूतिपटलरुधिरमांसचिक्खललिप्तानुलेपनतला अश्रुचिविश्राः परम- दुर्गन्धाः कापोताग्निवर्णाभाः कर्कशस्पर्शाः दुरधिसहाः अशुभाः नरकाः अशुभनरकेषु वेदनाः इत्यादि। नैरयिकाणां तिस्रः लेश्याः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा-कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या। अतिशीतं अत्युष्णं, अतितृष्णा, अतिक्षुधा, अतिभयं वा नरके नैरयिकाणां दुःखमसातं अविश्राम इत्यादि । भाषा टीका -वहां परस्पर एक दूसरे के शरीर को पीड़ा देते हुए वेदना उत्पन्न करते हैं। अनेक प्रकार के शस्त्र मुद्गर, भुसण्डि (बन्दूक), क्रकच (बारा) शक्ति, हल, गदा, मूसल, चक्र, कुंत (बी), तोमर, शूल, लकड़ी, भिडिपाल, सद्वल, पट्टिश, चमड़े में लिपटा हुआ मुद्गर, मुस्टिक, तलवार, खेटक, चङ्ग, धनुष वाण, कनक कल्पिनी नाम का वाण भेद, कासी (बिसौला), परशु (कुल्हाड़ा) की तेज धार तथा अन्य अशुभ विक्रि- याओं से सैकड़ो चोट करते हुए तीव्र वैर का बन्धन करके एक दूसरे को वेदना उत्पन्न करते हैं। यह नरक के विल अन्दर से गोल, बाहिर से चौकोर, तथा नीचे छुरी की रचना के समान हैं। वहाँ सदा गहन अन्धकार रहता है-ग्रह, चन्द्र, सूर्य और नक्षत्र ज्योतिष्कों का प्रकाश कभी नही पहुँचता । चर्वी, राध, रुधिर और मांस की कीचड़ से सब ओर पुते हुए, अपवित्र आसन वाले, परम दुर्गन्ध वाले, मैली अग्नि के समान वर्ण की कान्ति वाले, कर्कश स्पर्श वाले, कठिनता से सहे जाने योग्य, अशुभ होतेहैं। उनके कष्ट भी अशुभ ही होते हैं। इत्यादि। नारकियो के तीन लेश्या होती हैं-कृष्णलेश्या, नीललेश्या, और कापोतलेश्या ।

तृतीयाध्यायः ३, ५. नरक में नारकियों को शीत लगता है, अत्यन्त गर्मी लगती है, अत्यन्त प्यास लगती है, अत्यन्त भूख लगती है और अत्यन्त भय लगता है। यहां तो केवल दुःख, असाता और अविश्राम ही है। संक्लिष्टाऽसुरोदीरितदुःखाश्च प्राक्चतुर्व्यः । प्र०-किंपत्तियं णं भंते! असुरकुमारा देवा तच्चं पुढविं गया य गमिस्संति य? उ०-गोयमा! पुन्बवेरियस्स वा वेदणउदीरणयाए, पुव्व- संगइस्स वा वेदगउवसामणयाए, एवं खलु असुरकुमारा देवा सच्चं पुढविं गया य, गमिस्संति य। व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक ३, उ० २, सू० १४२. छाया-- प्र०-किं प्रत्ययं भगवन् ! असुरकुमारा देवास्तृतीयां पृथिवीं गताइच, गमिष्यन्ति च । उ०-गौतम ! पूर्ववैरिकस्य वा वेदनोदीरणतया, पूर्वसंगतस्य वा वेदनोपशमनतया, एवं खलु असुरकुमाराः देवास्तृतीयां पृथिवीं गताश्च गमिप्यन्ति च । भगवन् ! असुरकुमार देव तृतीय पृथिवी तक किस कारण से गये थे जाते हैं तथा किस कारण से जायंगे? गौतम ! पूर्व वैर की वेदना की उदीरणता से तथा पूर्व वेदना को उप- शमन करने के लिये असुरकुमार देव तृतीय पृथ्वी तक जाया करते हैं। तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रि- शत्सागरोपमा सत्वानां परा स्थितिः । ३, ६. सागरोवममेगं तु, उक्कोसेण वियाहिया । पढमाए जहन्नेणं, दसवाससहस्सिया ॥ १६०॥ प्रश्न - भी ७२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : तिणणेव सागरा ऊ, उक्कोसेण वियाहिया । दोच्चाए जहन्नेणं, एगं तु सागरोवमं ॥ १६१ ॥ सत्तेव सागरा ऊ. उक्कोसेण विवाहिया । तइयाए जहन्लेणं, तिण्णेव सागरोवमा ॥ १६२ ॥ दस सांगरोवमा ऊ, उक्कोसेण वियाहिया । चउत्थीए जहन्नेणं, सत्तेव सागरोवमा ॥१६३ ॥ सत्तरस सागरा ऊ, उस्कोलेरण वियाहिया । पंचसाए जहल्लेणं, दस चेव सागरोपमा ।। १६४ ॥ बावीससागरा ऊ, उक्कोलेण नियाहिया । छट्ठीए जहन्नेणं, सत्तरस सागरोलमा ॥ १६५ ॥ तेत्तीस सागरा ऊ, उक्कोलेण वियाहिया । सत्तमाए जहन्नेणं, बावीसं सागरोवमा ॥ १६६ ॥ म उत्तराध्ययन अध्याय ३६. छाया- सागरोपममेकं तु, उत्कर्षेण व्याख्याता । प्रथमायां जघन्येन, दशवर्षसहस्रिका ॥ १६० ।। त्रीण्येव सागरोपमाणि तु, उत्कर्षेण व्याख्याता । द्वितीयायां जघन्येन, एकं तु सागरोपमम् ।। १६१ ॥ सप्तैव सागरोपमाणि तु, उत्कर्पण व्याख्याता । तृतीयायां जघन्येन, त्रीण्येव सागरोपनाणि ।। १६२ ।। दश सागरोपमाणि तु, उत्कण व्याख्याता । चतुर्थ्यां जघन्येन, सप्तैव तु सागरोपमाणि ॥१६३ ॥ सप्तदश सागरोपमाणि तु, उत्कर्षेण व्याख्याता । पञ्चमायां जघन्येन, दश चैव सागरोपमाणि ।। १६४ ।।

तृतीयाध्यायः [ ७३. द्वाविंशतिः सागरोपमाणि तु, उत्कर्पण व्याख्याता । पष्टयां जघन्येन, सप्तदश सागरोपमाणि ॥ १६५ ॥ त्रयस्त्रिशत्सागरोपमाणि तु, उत्कण व्याख्याता। सप्तम्यां जघन्येन, द्वाविंशतिः सागरोपमाणि ॥ १६६ ।। भाषा टीका-प्रथम नरक की जघन्य स्थिति दश सहस्र वर्ष तथा उत्कृष्ट आयु एक सागर है ॥ १६० ॥ द्वितीय नरक की जघन्य आयु एक सागर तथा उत्कृष्ट आयु तीन सागर है ॥ १६१ ॥ तीसरे नरक की जघन्य आयु तीन सागर तथा उत्कृष्ट आयु सात सागर है ॥ १६२ ।। चौथे नरक की जघन्य आयु सात सागर तथा उत्कृष्ट आयु दश सागर है ॥ १६३ ।। पञ्चम नरक की जघन्य आयु दश सागर तथा उत्कृष्ट आयु सतरह सागर है ।। १६४ ॥ छटे नरक की जघन्य आयु सतरह सागर तथा उत्कृष्ट श्रायु बाईस सागर है ।। १६५ ॥ सातवे नरक की जघन्य आयु बाईस सागर है तथा उत्कृष्ट श्रायु तेतीस सागर है ।। १६६ ।। सगति इस प्रकार नरको के वर्णन में सूत्र और आगम वाक्यो में सक्षेप विस्तार के अतिरिक्त और कुछ भेद नही है। जम्बूद्वीपलवणोदादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्राः । , असंखेजा जंबुद्दीवा नामधेज्जेहिं पण्णत्ता, केवतिया भंते ! लवणसमुद्दा पराणत्ता ? गोयमा ! असंखेज्जा लवणसमुद्दा नाम- धेज्जेहिं पण्णता, एवं धायतिसंडावि, एवं जाव असंखेजा सूर- दीवा नामधेज्जेहि य । एगे देवे दीवे पण्णत्ते एगे देवोदे समुद्दे पएणत्ते, एवं रणागे जावे सूते जाव एगे सयंभूरमणे दीवे एगे सयंभूरमणसमुद्दे णामधेज्जेणं पण्णत्ते। जीवाभिगम प्रतिपत्ति ३, उ० २, सू० १८६ द्वीपसमुद्राधिकार ७४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : जावतिया लोगे सुभा गामा सुभा वएणा जाव सुभा फासा एवतिया दीवसमुद्दा नामधेज्जेहिं पपणत्ता। जीवाभिगम प्रतिपत्ति ३, २०२ सू० १८९. छाया- असंख्येयाः जम्बूद्वीपाः नाम्ना प्राप्ताः । कियन्तो भगवन् ! लवण- समुद्राः प्राप्ताः ? गौतम ! असंख्येयाः लवणसमुद्राः नामधेयः प्रसप्ताः, एवं धातकीपण्डाः अपि, एवं यावत् असंख्येयाः सूर्यद्वीपा: नामधेय च । एकदेवद्वीपः प्राप्तः, एकः देवोदधिसमुद्रः प्रज्ञप्तः, एवं नागः यक्षः भूतः यावत् एकः स्वयम्भूरमणः द्वीपः एकः स्वयम्भूरमणसमुद्रः नाम्ना प्राप्तः । यावन्ति लोके शुभानि नामानि शुभा वर्णाः यावत् शुभाः स्पर्धा एतावन्तो द्वीपसमुद्राः नामधेयः प्राप्ताः । भाषा टीका - जम्बूद्वीप नाम के असंख्यात द्वीप कहे गये हैं। भगवन् ! लषण समुद्र कितने हैं ? लवणसमुद्र नाम के असंख्यात द्वीप कहे गये हैं। इसी प्रकार घातकी- खण्ड नाम के असंख्यात द्वीप कहे गये हैं। इसी प्रकार सूर्यद्वीप तक असंख्यात नाम वाले । देवद्वीप नाम का एक ही द्वीप है। देवोदधि समुद्र भी एक ही है। इसी प्रकार नाग, यक्ष, और भूत से लगाकर स्वयंभूरमण द्वीप तक एक २ ही हैं। स्वयंभूरमण नाम का समुद्र भी एक ही है लोक में जितने भी शुभ नाम और शुभ वर्ण से लगाकर शुभ स्पर्श तक है उतने ही द्वीप और समुद्र कहे गये हैं। द्विििवष्कम्भाःपूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः । ३, ८. जंबूद्दीवं णाम दीवं लवणे णामसमुद्दे वट्टे वलयागारसंठाण- संठिते सव्वतो समंता संपरिक्खत्ता णं चिट्ठति । जीवाभिगम प्रतिपत्ति ३३०२०१५४. - तृतीयाध्यायः [ ७५ जंबूद्दीवाइया दीवा लवणादीया समुद्दा संठाणतो एकविह- विधाणा वित्थारतो अणेगविधविधाणा दुगुणादुगुणे पडुप्पाएमाणा पवित्थरमाणा ओभासमारावीचीया। जीवाभिगम प्रतिपत्ति ३, उ० २, सू० १२३. छाया जम्बूद्वीपः नाम द्वीपः लवणो नाम समुद्रः वृत्तः वलयाकारसंस्थान- संस्थितः सर्वतः समन्ततः संपरिक्षिप्य तिष्ठति । जम्बूद्वीपादयो द्वीपा लवणादिकाः समुद्राः संस्थानतः एकविध- विधानाः विस्तारतः अनेकविधविधानाः द्विगुणद्विगुणं प्रत्युत्पद्य- मानाः प्रविस्तरन्तः भवभासमानवीचयः। भाषा टीका - जम्बूद्वीप नाम का द्वीप है और लवण समुद्र नाम का समुद्र है। वह गोल बलय के आकार मे स्थित है और जम्बूद्वीप को चारों ओर से घेरे हुए है। जम्बूद्वीप आदि द्वीपों और लवण आदि समुद्रों का रचना की अपेक्षा एक ही भेद है, किन्तु विस्तार से अनेक प्रकार के भेद हैं । यह दुगने २ उत्पन्न होते हुए विस्तार को प्राप्त होते हुए शोभित होते हैं। संगति -- सारांश यह है कि सब द्वीपों का विस्तार पहिले २ से दुगना २ है और बह गोल आकृति को धारण करते हुए पूर्व २ को घेरे हुए हैं। मेरुनाभिर्वृत्तो योजनशतसहस्र- विष्कम्भो जम्बूद्वीपः। तन्मध्ये ३,९. जंबुद्दीवे सव्वद्दीवसमुदाणं सव्वन्भंतराए सव्वखुड्डाए वद्दे एगं जोयणसहस्सं आयामविक्खंभेणं इत्यादि। जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति सू०३ जंबुद्दीवस्य बहुमज्झदेसभाए एत्थ संजम्बुद्दीवे मन्दरेणाम्म ७६ ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमममन्वय : 14. पव्वए पगणत्ते । णवणउतिजोअणसहस्साई उद्धं उच्चतेणं एगं जोअणसहस्सं उव्वेहे। जम्बूद्वीप० सू० १०३ छाया- जम्बूद्वीपः सर्वद्वीपसमुद्राणां सर्वाभ्यन्तर सर्वक्षुल्लकः वृत्तः ..... एक योजनशतसहस्रं आयामविष्कम्भेन । जम्बूद्वीपस्य बहुमध्यदेशभागे अत्रान्तरे जम्बूद्वीपे मन्दरो नाम पर्वतः प्रजप्तः । नवनवतियोजनसहस्राणि ऊर्बोच्चत्वेन एक योजनसहस्र- मुद्वेधेन । भाषा टीका - गोल आकार का जम्बूद्वीप सव द्वीप समुद्रो के बीच में सव से छोटा है, इसका विस्तार एक लाख योजन है। जम्बूद्वीप के ठीक बीचोबीच सुमेरु नाम का पर्वत है, यह पृथ्वी के ऊपर ६६ हजार योजन ऊंचा है, एक हजार योजन यह पृथ्वी के अन्दर है। भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहरण्यवतैरावत वर्षाः क्षेत्राणि । ३, १० जम्बुद्दीवे सत्त वासा पण्णत्ता तं जहा-भरहे एरवते हेमवते हेरन्नवते हरिवाले रम्यवासे महाविदेहे । स्थानांग स्थान ७ सूत्र ५५५. छाया- जम्बूद्वीपे सप्त वर्षाः प्रज्ञप्ताप्तद्यथा-भरतः ऐरावतः हैमवतः- हरिवर्षः रम्यकवर्षः महाविदेहः । भाषा टीका-जम्बूद्वीप मे सात क्षेत्र है - भरत, ऐरावत, हैमवत, हैरण्यवत, हरिवर्प, रम्यक वर्ष और महाविदेह । तहिभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहि- मवन्निषधनीलरुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वताः ।

तृतीयाध्यायः [ ७७ विभयमाणे। जम्बूद्वीप० सूत्र १५ जम्बुद्दीवे छ वासहरपव्वता पण्णत्ता, तंजहा-चुल्लहिमवंते महाहिमवंते निसढे नीलवंते रुप्पि सिहरी । स्थानांग स्थान ६ सूत्र ५२४. छाया- विभज्यमानः । जम्बूद्वीपे पट वर्पधरपर्वताः प्रज्ञप्तान्तद्यथा-क्षुद्रहिमवान्, महा- हिमवान , निषिधः, नीलवान, रुक्मिः, शिखरी। भाषा टीका - जम्बूद्वीप में उन सात क्षेत्रो को बांटने वाले (पूर्व से पश्चिम तक लम्बे) छै कुलाचल पर्वत है । वह इस प्रकार है - छोटा हिमवान् , महाहिमवान्, निपिध, नील, रुक्मि और शिखरी । हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः । मणिविचित्रपार्था उपरि मूले च तुल्यविस्ताराः। चुल्लहिमवंते जंबुद्दीवे.......सव्वकणगामए अच्छे सण्हे तहेव जाव पडिरूवे । इत्यादि । जम्बू० वक्षस्कार ४ सू० ७२ महाहिमवंते णाम......सव्वरयणामए । जम्यू० सू० ७६ निसहे णाम.......सव्वतपणिज्जमए । जम्बू सू० ८३ णीलवंते णामं .. ...सव्ववेरूलिआमए । जम्बृ० सू० ११० रूप्पिणामं..., सव्वरूप्पामए । जम्बू० सू० १११ ३ १२ ३. १३.

५८. ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : सिहरी णाम......सव्वरयणामए । जम्बू० सू० १११. बहुसमतुल्ला अविसेसमणाणत्ता अन्नमन्नं णातिवट्ठति आयामविक्खंभउव्वेहसंठाणपरिणाहेणं । स्थानांग स्थान २, उ०३, सू०८७. उभओ पांसि दोहिं पउमवरवेइहिं दोहि अ वणसंडेहि संपरिक्खत्ते । -जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति सृ० ७२. छाया क्षुद्रहिमवान् जम्बूद्वीपे सर्वकनकमयः अच्छः श्लक्ष्णः तथैव यावत् प्रतिरूपः महाहिमवान् नाम 'सर्वरत्नमयः। निषषः नाम सर्वतपनीयमयः। नीलवान नाम 'सर्ववैडूर्यमयः । रुक्मिः नाम "सर्वरौप्यमयः। शिखिरी नाम .....""सर्वरत्नमयः । बहुसमतुल्या अविशेष अनानात्वा अन्योन्यं नातिवर्तन्ते आयाम- विष्कम्भोत्सेधसंस्थानपरिणाहाः । उभयतो पार्श्वयोः द्वाभ्यां पद्मवरखेदिकाभ्यां द्वाभ्याञ्च वनखण्डाभ्यां संपरिक्षिप्तः। भाषा टीका - जम्बूद्वीप में छोटा हिमवान् पर्वत सुवर्णमय अर्थात् पीत वर्ण का है । यह इतना चिकना है कि अपना प्रतिरूप स्वयं ही है । महाहिमवान् सब रत्न मय है तीसरा निषध पर्वत ताये हुए सुवर्ण के समान है। चौथा नील पर्वत वैडूर्यमय अर्थात् मयूर के कंठ के समान नीले रङ्ग का है। पांचवाँ रुक्मि पर्वत चांदी के सदृश शुक्त वर्ण का है। और छटा शिखरी पर्वत सब प्रकार के रत्नो रूप है ।

. तृतीयाध्यायः यह पर्वत चौकोर इकसार है, और सामान्य रूप से भेद रहित है। यह एक दूसरे का उल्लंघन नहीं करते । यह लम्बाई, चौड़ाई, रचना और परिणाह वाले हैं। इनके दोनों ओर कमल की बनी हुई वेदिका है, जो दोनो ओर दो बनखण्डों से घिरी हुई है। . पद्ममहापद्मतिगिलकेसरिमहापुण्डरीकपुण्ड- रीका ह्रदास्तेषामुपरि। ३, १४. - जंबुद्दीवे छ महदहा पण्णत्ता, तं जहा-पउमदहे महापउमदहे तिगिच्छदहे केसरिदहे पोंडरोयदहे महापोंडरीयदहे । स्था० स्थान ६, सू० ५२४. छाया जम्बूद्वीपे पट महाहूदाः प्रज्ञप्तास्तद्यथा -- पद्महद : महापद्मादः तिगिच्छदः केसरिहदः पुण्डरीकह दः महापुण्डरीकहूदः । भाषा टीका-जम्बूद्वीप में छै महाह, द (तालाव) बतलाये गये हैं- पद्महद, महा- पद्मह,द, तिगिछ, केसरि, पुण्डरीक और महापुण्डरीक । प्रथमो योजनसहस्रायामस्तदईविष्कम्मो हृदः । ३, १५ दशयोजनावगाहः । ३, १६ तरस णं बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेस- भाए इत्थ णं इक्के महे पउमड़हे णामं दहे पण्णत्ते पाईणपडिणा- यए उदीणदाहिणविच्छिण्णे इक्कं जोयणसहस्सं आयामेणं पंच जोअणसयाई विक्खंभेणं दस जोअणाई उव्वेहेणं अच्छे । जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति पाहदाधिकार- तस्य बहुसमरमणीयस्य भूमिभागस्य बहुमध्यदेशभागे अत्रावकाशे छाया- -- ८० ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय: एको महान् पद्मदो नाम हदः प्रज्ञप्तः पूर्वापरायतः उत्तरदक्षिण- विस्तीर्णः एक योजनसहस्रायामेन पञ्चयोजनशतानि विष्कम्भेन दशयोजनान्युद्वेधेन अच्छः। भाषा टीका उस बहुत सुन्दर पृथ्वी भाग के ठीक बीचों बीच एक पद्महूद नाम का बड़ा भारी तालाव है । यह पूर्व से पश्चिम तक एक सहस्र योजन लम्बा और उत्तर से दक्षिण तक पांच सौ योजन चौड़ा है, और दश योजन गहरा है । तन्मध्ये योजनं पुष्करम् । छाया तस्स पउमद्दहस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थं महं एगे पउमे पएणते, जोअणं आयामविक्खंभेणं अद्धजोअणं बाहल्लेणं दसजो- अणाई उव्वेहेणं दोकोसे असिए जलंताओ साइरेगाइं दसजो- अणाई सव्वग्गेणं पण्णत्ता। जम्बू० पद्मदाधिकार सू० ७३. तस्य पाहू दस्य बहुमध्यदेशभागः अत्रान्तरे महदेकं पद्म प्रज्ञप्तं, एक योजनमायामतो विष्कम्भतश्च अर्द्धयोजनं बाहुल्येन दशयोज- नान्युद्वेधेन द्वौ क्रोशावुच्छितं जलान्तात्, एवं सातिरेकाणि दश योजनानि सर्वाग्रण प्रज्ञप्तानि । भाषा टीका इस पद्म सरोवर के ठीक बीचो बीच एक बड़ा भारी कमल बतलाया गया है । इसकी लम्बाई एक योजन है और चौड़ाई आधा योजन है। इसकी ऊंचाई दश योजन है, और दो कोस यह जल के ऊपर है। इसी वास्ते इसके सब अवयवों को दश योजन से कुछ अधिक मानते हैं। तद्विगुणद्विगुणा हृदाः पुष्कराणि च । ३, १८. महाहिमवंतस्य बहुमज्झदेसभाए एत्थ णं एगे महापउम- तृतीयाध्याय : [ ८१ दहे णाम दहे परणत्ते, दोजोअण सहस्साइं आयामेणं एगं जो- अणसहस्सं विक्खंभेणं दस जोअणाई उव्वेहेणं अच्छे रययामय- कूले एवं आयामविक्खंभविहणा जा चेव पउमदहस्स वत्तव्वया सा चेव णेअव्वा, पउमप्यमाणं दो जोअणाई अट्ठो जाव महापउ मदहवण्णाभाई हिरी अ इत्थ देवी जाव पलिओवमहिइया परि- वसई । जम्बू० महाहिमवन्ताधिकार सूत्र०८० तिगिछिदह णामं दहे पण्णत्ते चत्तारिजोअणसहस्साई आयामेणं दोजोअणसहस्साइं विक्खंभेणं दसजोअणसहस्साई उव्वेहेणं...... धिई अ इत्थ देवी पलिओवमट्टिइया परिवसइ । जम्बू० सू० ८३ से ११०. षड्ह दाधिकार छाया- महाहिमवतः बहुमध्यदेशभागः अत्रान्तरे एकः महापद्महदः नाम हृदःप्रज्ञप्तः । द्वियोजनसहनमायामतः एकयोजनसहस्र विष्कम्भतः दशयोजनान्युद्वेधेन अच्छः रजतमयकूलः एवं आयामविष्कम्भ- विहीनः या चैव पाहदस्य वक्तव्यता सा चैव ज्ञातव्या । पद्मप्रमाणं वे योजने अर्थः यावत् महापाहू दवर्णाभः ही: च अत्र देवी यावत् पल्योपमस्थितिका परिवसति । तिगिछिहूदः नाम हृदः प्रज्ञप्तः ..... .. चत्वारियोजनसहस्राणि आयमतः द्वे योजनसहरी विष्कम्भतः दशयोजनसहस्राणि उद्व धेन धृतिश्च अत्र देवी पल्योपमस्थितिका परिवसति । भाषा टीका ---महाहिमवान् के बीचों बीच एक महापद्म नाम का सरोवर है। इसकी लम्बाई दो सहस्र योजन और चौड़ाई एक सहस्र योजन की है, और गहराई दस योजन है। इसके किनारे चांदी के बने हुए हैं। लम्बाई चौड़ाई के अतिरिक्त शेष बाते पदा ८२. ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : सरोवर के समान हैं। इसके अन्दर दो योजन का कमल है। जिसके अन्दर एक पल्य श्रायु वाली ही देवी रहती है। (तीसरा) तिगिंछ सरोवर है। यह चार योजन लम्या, दो योजन चौड़ा और दस हजार योजन गहरा है । इसमे एक पल्य की आयु वाली धृति देवी रहती है । तन्निवासिन्यो देव्यः श्रीहीधृतिकीर्तिबुद्धि- लक्ष्म्यः पल्योपमस्थितितयः ससामानिकपरिपत्काः। ३, १६. छाया- - तत्थ णं छ देवयाओ महड्ढियाओ जाव पलिओवमद्विती- तातो परिवसंति ।तं जहा-सिरि हिरि घिति कित्ति वुद्धि लच्छी। स्थानांग स्था० ६, सू० ५२४ तत्र पट देव्यः महर्द्धिकाः यावत् पल्योपमस्थितिकाः परिवसंति । तद्यथा-श्रीः ही धृतिः कीर्तिः बुद्धिः लक्ष्मीः । उन (फमलो) मे बड़े ऐश्वर्य वाली तथा एक पल्य आयु वाली छै देवियां रहती है। वह यह है -श्री, ही, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी । गंगासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकांतासीता- सीतोदानारीनरकान्तासुवर्णरूप्यकूलारक्तारक्तोदाः सरितस्तन्मध्यगाः। भाषा टीका ) ३, २० द्वयोईयोः पूर्वाः पूर्वगाः॥ ३, २१. शेषास्त्वपरगाः॥ ३, २२, तृतीयाध्यायः [ ८३ जंबुद्दीवे सत्त महानदीओ पुरत्थाभिमुहीओ लवणसमुदं समुप्पेंति, तं जहा-गंगा रोहिता हिरी सीता हरकता सुवणण- कूला रत्ता । जंबुद्दीवे सत्त महानदीओ पञ्चत्थाभिमुहीओ लवण- समुदं समुप्पेंति, तं जहा-सिंधू रोहितंसा हरिकता सीतोदा णारीकंता रुप्पकूला रत्तवती । स्थानांग स्थान ७ सूत्र ५५५. छाया- जम्बूद्वीपे सप्त महानद्यः पूर्वाभिमुख्यः लवणसमुद्र समुपयान्ति, तद्यथा-गंगा रोहित हरित् सीता नारी सुवर्णकूला रक्ता। जम्बू- द्वीपे सप्त महानद्यः पश्चिमाभिमुख्यः लवणसमुद्र समुपयान्ति, तद्यथा-सिन्धु रोहितास्या हरिकान्ता सीतोदा नरकान्ता रूप्यकूला रक्तोदा। भाषा टीका - जम्बूद्वीप में सात महानदियां पूर्वाभिमुख होकर लवण समुद्र गिरती हैं। वह यह हैं -- गङ्गा, रोहित, हरित, सीता, नारी, सुवर्णकूला और रक्ता। जम्बूद्वीप मे सात महानदियां पश्चिमाभिमुख होकर लवण समुद्र मे गिरती हैं। वह यह हैं- सिन्धु, रोहितास्या, हरिकान्ता, सीतोदा, नरकान्ता, रूप्यकूला, और रक्तोदा । चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता गंगासिन्ध्वा- दयो नद्यः ॥ " में , - ३, २३ जंबुद्दीवे भरहेरवएसु वासेसु कइ महाणइओ पण्णत्ताओ । गोअमा! चत्तारि महाणईओ पगणताओ, तं जहा-गंगा सिंधू रत्ता रत्तवई । तत्थ णं एगमेगा महाणई चउद्दसहिं सलिलासह- स्सेहिं समग्गा पुरथिमपञ्चत्थिमे णं लवणसमुदं समुप्पेई । छाया- जम्बूद्वीपे भरतैवरावतयोः वर्पयोः कति महानद्यः प्रज्ञप्ताः । गौतम! जम्बु० प्र० वक्षस्कार ६ सू० १२५ ८४. ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : चतस्त्रः महानद्यः प्राप्ताः, तद्यथा-गंगा सिन्धुः रक्ता रक्तोदा। तत्र एकैका महानदी चतुर्दशाभिः सलिलासहस्राभिः समग्राः पौरस्त्यपाश्चात्ययोः लवणसमुद्र समुपयान्ति | प्रश्न - नम्वृद्वीप के भरत और ऐरावत क्षेत्रों में कितनी महा नदियां हैं ? उत्तर -- गौतम ! वहां चार महा नदियां हैं, वह यह हैं - गङ्गा, सिन्धु, रक्ता, रक्तोदा। इनमे से एक २ महानदी चौदह २ हजार नदियों सहित पूर्व और पश्चिम लवण- समुद्र में जाती हैं। भरतः पडविंशतिपञ्चयोजनशतविस्तार षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य । ३, २४ जंबुद्दीवे दीवे भरहे णामं वाले...जवुद्दीवदीवणउयसयभागे पंचछब्बीसे जोमणसए छच्च एगूणवीसइभाए जोअणस्तविक्खंभेणं । जम्बू सू० १०. छाया- जम्बूद्वीपे द्वीपे भरतः नाम वर्षः जम्बूद्वीपट्टीपनवतिशतभागः पञ्च पड्विंशतियोजनशतः षट् च एकोनविंशतिभागः योजनस्य विकम्भः । भाषा टीका-जम्बूद्वीप मे भरतक्षेत्र उसका एक सौ नव्वेवां भाग है। इसका विस्तार ५२६६ योजन है। संगति अनुवाद है। इन सब आगम प्रमाणो से सिद्ध होता है कि सूत्र श्रागम का ही संक्षिप्त तद्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ताः । जंबुद्दीपपण्णत्तीए वासावासहराणं महाविदेहपेरंतं विउण- विउणवित्थारेणं वरिणो । पस्संतु उत्तसुत्तं । ३, २५.

तृतीयाध्यायः [ ८५ , छाया- जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तौ वर्पवर्षधराणां महाविदेहपर्यन्तं द्विगुणद्विगुणविस्तार वर्णितः पश्यन्तु उक्तसूत्रं वर्षाधिकारे चतुर्थवक्षस्कारे । भाषा टीका -~-जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति मे महाविदेह क्षेत्र तक के क्षेत्र और पर्वतों का विस्तार पूर्व २ से दुगुना २ बतलाया गया है। वर्षाधिकार ४ थे वक्षष्कार में इस प्रकरण का बड़े बिस्तार से वर्णन किया गया है। उत्तरा दक्षिणतुल्याः। ३, २६. जंबुमंदरस्स पव्वयस्स य उत्तरदाहिणे णं दो वासहरपव्वया बहुसमतुल्ला अविसेसमणाणत्ता अन्नमन्नं णातिवट्टति आयाम- विक्खंभुच्चतोव्वेहसंठाणपरिणाहेणं, तं जहा-चुल्लहिमवंते चेव सिहरिचेव, एवं महाहिमवंते चेव रुप्पिञ्चेव, एवं णिसढे चेव णीलवंते चेव इत्यादि। स्थानांग स्थान २ उद्देश्य २ सूत्र ८७ छाया- जम्बूमन्दिरस्य पर्वतस्य च उत्तरदक्षिणयोः द्वौ वर्षधरपर्वतौ बहु- समतुल्यौ अविशेषौ अनानात्वौ अन्योन्यं नातिवर्तन्ते आयामविष्क- म्भोचतोद्वेधसंस्थानपरिणाहेन, तद्यथा-क्षुद्रकहिमवान् चैव शिखरी चैव, एवं महाहिमवान् चैव रुक्मिश्चैव, एवं निपिधश्चैव नीलवन्त- श्चैव । इत्यादि । भाषा टीका --सुमेरु पर्वत के उत्तर तथा दक्षिण मे दो पर्वत सब प्रकार से बरावर २ है । वह सामान्य रूप से एक से हैं। तथा लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई, रचना तथा परिणाह से भिन्न २ नहीं है । समानता इस प्रकार है-क्षुद्रहिमवान् और शिखरी बरा- बर २ हैं । महाहिमवान तथा रुक्मि बराबर २ हैं। तथा निषिध और नील पर्वत समान हैं। इत्यादि। भरतैरावतयोर्वृद्धिह्रासौ षट्समयाभ्यामु- ८६ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाउंगमसमन्वय: त्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् । ताभ्यामपरा भूमियोऽवस्थिताः । ३,२७. ३, २८. जंबुद्दीवे दीवे दोसु कुरासु मणुआसया सुसमसुसममुत्त- मिडिंढ पत्ता पचणुभवमाणा विहरति, तं जहा-देवकुराए चेव, उत्तरकुराए चेव ॥१४॥ जंबुद्दीचे दीवे दोसु वासेसु मणुयासया सुसममुत्तमिडिंढ पत्ता पचणुभवमाणा विहरति, तं जहा-हरिवासे चेव रम्मगवासे चेव ।। १५ ॥ जंबुद्दीवे दीवे दोसु वासेसु मणुयासया सुसमदुसममुत्त- ममिड्ढि पत्ता पञ्चगुन्भवमाणा विहरंति, तं जहा-हेमवए चेव एरन्नवए चेव ॥ १६ ॥ जंबुद्दीवे दीवे दोसु खित्तेसु मणुयासया दुसमसुसममुत्त. ममिडिंढ पत्ता पचणुब्भवमाणा विहरंति, तं जहा - पुवविदेहे चेव अवरविदेहे चेव ॥ १७॥ जंबुद्दीवे दीवे दोसु वासेसु माया छन्विहं पि कालं पञ्च- गुन्भवमाणा विहरति, तं जहा-भरहे चेव एरवए चेव ॥ १८ ॥ स्थानांग स्थान २ सून ८६ जंबूदीवे मंदरस्स पव्वस्स पुरच्छिमपञ्चस्थिमेणवि, णेवस्थि, ओसप्पिणी नेवत्थि उस्सप्पिणी अवट्टिए णं तत्थ काले पन्नत्ते । व्याख्या प्रज्ञप्ति शतक ५ उद्देश्य १ सूत्र १७८ तृतीयाध्याय : [ ८७ छाया-- जम्बूद्वीपे द्वीपे द्वयोः कुर्योः मनुष्याः सुखमसुखममुत्तमद्धि प्राप्ताः प्रत्यनुभवन्तः विहरन्ति, तद्यथा-देवकुरौ चैवोत्तरकुरौ चैव॥१४॥ जम्बूद्वीपे द्वीपे द्वयोः वर्पयोः मनुष्याः सुखममुत्तमद्धि प्राप्ताः प्रत्य- नुभवन्तः विहरन्ति, तद्यथा-हरिवर्षे चैव रम्यक् वर्षे चैव ॥१५॥ जम्बूद्वीपे द्वीपे द्वयोः वर्षयोः मनुष्याः सुखमदुःखममुत्तमदि प्राप्ताः प्रत्यनुभवन्तः विहरन्ति, तद्यथा-हैमवते चैवैरण्यवते चैव १६ जम्बूद्वीपे द्वीपे द्वयोः क्षेत्रयोः मनुष्याः दुःखमसुखममुत्तमर्द्धि प्राप्ताः प्रत्यनुभवन्तः विहरन्ति, तद्यथा-पूर्व विदेहे चैवापरविदेहे चैव ॥१७॥ जम्बूद्वीपे द्वोपे द्वयोः वर्षयोः मनुष्याः पड्विधमपि कालं प्रत्यनु- भवन्तः विहरन्ति, तद्यथा-भरते चैवैरावते चैव ॥१८॥ जम्बूद्वीपे मन्दिरस्य पर्वतस्य पौरस्त्यपश्चिमाभ्यामपि, नैवास्ति अवसर्पिणी नैवास्ति उत्सर्पिणी अवस्थितः तत्र कालः प्रज्ञप्तः । भाषा टीका - जम्बूद्वीप के देवकुरु तथा उत्तरकुरु के मनुष्य प्राप्त की हुई सुखम- सुखम की उत्तम ऋद्धि को अनुभव करते हुए विहार करते हैं । (यह उत्तम भोगभूमि है) जम्बूद्वीप के हरिवर्प और रम्यक्वर्प नाम के दो क्षेत्रों के मनुष्य सुखमा नाम की उत्तम ऋद्धि को प्राप्त कर अनुभव करते हुए विहार करते हैं। (यह मध्यम भोग भूमि है) जम्बूद्वीप के हैमवत और हैरण्यवत नाम के दो क्षेत्रों के मनुष्य सुखमदुःखमा नाम की उत्तम ऋद्धि को प्राप्त कर अनुभव करते हुए विहार करते हैं। (यह जघन्य भोग भूमि है) जम्बूद्वीप के पूर्व और पश्चिम विदेह नाम के दो क्षेत्रों के मनुष्य दुःखमसुखम नाम की उत्तम ऋद्धि को प्राप्त कर अनुभव करते हुए विहार करते हैं, (यहां सदा चौथा काल रहने से कर्मभूमि रहती है।) जम्बूद्वीप के भरत और ऐरावत नाम के दो क्षेत्रो के मनुष्य छहों प्रकार के काल का अनुभव करते हुए विहार करते है। जम्बूद्वीप में सुमेरु पर्वत के पूर्व तथा पश्चिम में भी उत्सर्पिणी अथवा अवसर्पिणी नहीं है, वरन् एक निश्चित काल है।

मम ] तस्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवतकहारिव- र्षकदैवकुरवकाः। तथोत्तराः। २९. ३, ३०. जवुद्दीवे दीवे मंदरस्स पव्वयस्स उत्तरदाहिणेण दो वासा परमत्ता हिमवए चेव हेरन्नवते चेव हरिवासे चेव रम्मय- वाले चेव' 'देवकुरा चेव उत्तरकुरा चेव ... .""एगं पलिओव- मं ठिई पएणत्ता' 'दो पलिओवमाइं ठिई पण्णत्ता, तिरिण पलियोवमाइं ठिई पण्णता । जम्बू द्वीप० वनस्कार ४ छाया- जम्बूद्वीपे द्वीपे मन्दरस्य पर्वतस्य उत्तरदक्षिणयोः द्वौ वर्षों प्रज्ञप्ती ......"हैमवतश्चैव हैरण्यवतश्चैव हरिवर्षश्चैव रम्यग्वर्षश्चैव "देवकुरुश्चैवोत्तरकुरुश्चैव एक पल्योपमं स्थितिः प्राप्ता..."द्विपल्योपमं स्थितिः प्रजप्ता त्रिपल्योपमं स्थितिः मज्ञप्ता। भाषा टोका-जम्बूद्वीप में सुमेरु पर्वत के उत्तर दक्षिण मे दो क्षेत्र बतलाये गये हैं- हैमवत और हैरएयवत । हरिवर्ष और रम्यक् वर्ष । देवकुरु और उत्तरकुरु । इनकी आयु क्रमश एक पल्य, दो पल्य और तोन पल्य होती है। संगति -जघन्य भोगभूमि हैमवत और हैरण्यवत में एक पल्य आयु होती है । मध्यम भोगभूमि हरिवर्प और रम्यक् वर्ष में दो पल्य की आयु होती है । तथा उत्तम भोग भृमि देवकुरु और उत्तर कुरु में तीन पल्य की भायु होती है । विदेहेषु संख्येयकालाः। ३,३१.

तृतीयाध्याय : [ ८९ A महाविदेहे ....."मणुआणं केविइयं कालं ठिई पण्णता ? गोयमा! जहणणेण अंतोमुहुत्तं उकोसेण पुव्वकोडी आउभं पालेति। प्रश्न उत्तर जम्बू० वक्षस्कार ४ सूत्र ८५ छाया- महाविदेहे मनुजानां कियच्चिरं कालं स्थितिः प्रज्ञप्ता? गौतम! जघन्येन अन्तर्मुहुर्त उत्कर्षण पूर्वकोटि आयुष्कं पालयन्ति । महाविदेह क्षेत्र में मनुष्यों की कितनी आयु होती है ? गौतम - वहां की जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ण आयु पूर्व कोटि होती है। संगति -पूर्व कोटि श्रायु को संख्यात वर्ष की आयु भी कहते है। भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभागः। ३, ३२. जंबुद्दीवे णं भंते! दीवे भरहप्पमाणमेत्तेहिं खंडेहिं केवइयं खंडगणिए णं पण्णत्ते ? गोयमा! उअं खंडसयं खंडगणिएणं पण्णत्ते । जम्बू० खडयोजनाधिकार सूत्र १२५ छाया- जम्बुद्वीपे भगवन् ! द्वीपे भरतप्रमाणमात्रैः खण्डः कियान् खण्ड- गणितेन प्रज्ञप्तः १ गौतम! नवत्यधिक खण्डशतं खण्डगणितेन मज्ञप्तः। भगवन् ! जम्बूद्वीप का भरतक्षेत्र कितनेयाँ भाग है ? गौतम! एकसौ नन्वे वा भाग है। संगति ---- इन सूत्रों और आगम वाक्य के शब्द २ मिलते हैं। द्विर्धातकीखण्डे। प्रश्न उत्तर ३, ३३.

६० ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : धायइखंडे दीवे पुरच्छिमद्धे णं मंदरस्त पव्वयस्स उत्तर- दाहिणे णं दो वासा पन्नत्ता, बहुसमतुल्ला जाव भरहे चेव एरवाए चेव ....."धाततीखंडदीवे पञ्चच्छिमद्धे णं मंदरस्स पव्वयस्स उत्तरदाहिणे णं दो वासा पण्णत्ता बहुसमतुल्ला जाव भरहे चेव एरवए चेव । इच्चाइ। स्थानांग स्थान २ उद्देश्य ३ सूत्र १२ छाया- धातकीखण्डे द्वीपे पूर्वार्द्ध मन्दिरस्य पर्वतस्य उत्तरदक्षिणयोः द्वौ वर्षों प्रज्ञप्तौ । बहुसमतुल्यौ यावत् भरतश्चैव ऐरावतश्चैव धातकीखण्डद्वीपे पश्चिमार्दै मन्दिरस्य पर्वतस्य उत्तरदक्षिणयोः द्वौ वर्षों प्रज्ञप्तौ वहुसमतुल्यौ यावत् भरतश्चैव ऐरावतश्चैव । इत्यादि । भाषा टीका - धातकी खण्ड द्वीप के पूर्वार्द्ध मे सुमेरु पर्वत के उत्तर दक्षिण में दो २ क्षेत्र हैं। भरत से ऐरावत तक वह सब प्रकार से बराबर हैं। धातकी खण्ड द्वीप के पश्चिमार्द्ध में सुमेरु पर्वत के उत्तर दक्षिण मे दो २ क्षेत्र हैं। वह भरत क्षेत्र से लगाकर ऐरावत तक सब प्रकार से बराबर है। संगति धातकी खण्ड के पूर्वार्द्ध मे भरतादि ऐरावत पर्यंत सात क्षेत्र हैं और पश्चिमार्द्ध में भी इसी प्रकार सात क्षेत्र हैं। जिससे वहां दो भरत दो ऐरावत आदि होतेहैं। पुष्करा च। पुक्खरवरदीवड्ढे पुरच्छिमद्धे णं मंदरस्स पव्वयरस उत्तर- दाहिणे णं दो वासा पण्णत्ता बहुसमतुल्ला जाव भरहे चेव एरवए चेन तहेव जाव दो कुडाओ पण्णत्ता । स्थानांग स्थान २ उद्देश्य ३ सूत्र ६३ छाया- पुष्करवरद्वीपाढे पूर्वार्द्ध मन्दिरस्य पर्वतस्य उत्तरदक्षिणयोः द्वौ वर्षों तृतीयाध्यायः [ ९१ nama प्रज्ञप्तौ बहुसमतुल्यौ यावत् भरतश्चैव ऐरावतश्चैव । तथैव यावत् द्वौ कूटौ प्रज्ञप्तौ । भाषा टीका ----पुष्कर द्वीप के पूर्वाई में सुमेरु पर्वत के उत्तर दक्षिण में दो २ क्षेत्र हैं, वह भरत क्षेत्र से लगाकर ऐरावत तक सब प्रकार से वरावर हैं। उसी प्रकार पश्चि- माई में भी रचना है। प्राङ्मानुषोत्तरान्मनुष्याः। ३,३५. माणुसुत्तरस्स णं पव्वयस्स अंतो मणुआ। जीवाभिगम प्रतिपत्ति ३ मांनुपोत्तराधिकार उद्दे० २ सूत्र १७८ छाया- मानुपोत्तरस्य पर्वतस्य अन्तः मनुष्याः। भाषा टीका-~-मनुष्य मनुष्योत्तर पर्वत के अन्दर २ ही रहते हैं। आगे नहीं रहते। आर्या म्लेच्छाश्च। ३,३६. ते समासओ दुविहा पएणत्ता, तं जहा-आरिआ य मिल- क्खू य। प्रज्ञापना पद १ मनुष्याधिकार छाया- तौ समासतः द्विविधौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा-आर्याश्च म्लेच्छाश्च । भापा टीका-~-मनुष्य सोप से दो प्रकार के होते है -आर्य और म्लेच्छ । संगति-यहां सूत्र और आगम के शब्द २ मिलते हैं। भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरू- त्तरकुरुभ्यः। ३, ३७. से किं तं अकम्मभूमगा? कम्मभूमगा पगणरसविहा १२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : छाया- पण्णत्ता; तं जहा-पंचहिं भरहेहिं पंचहिं एरवएहिं पंचहिं महाविदेहहिं। से किं तं अकम्मभूमगा ? अकम्मभूमगा तीसई विहा परणत्ता, तं जहा- “पंचहि हेमवएहिं पंचहि हरिवासेहिं पंचहिं रम्मगवासेहि, पंचहिं एराणवएहिं, पंचहिं देवकुरुहिं पंचहिं उत्तरकुरुहिं । सेत्तं अकम्मभूमगा। प्रज्ञापना पद १ मनुष्याधिकार सूत्र ३२ अथ किं तत् कर्मभूमयः ? कर्मभूमयः पञ्चदशविधाः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा-"पञ्चभिः भरतैः पञ्चभिः ऐरावतैः पञ्चभिः महाविदेहेः" अथ किं तत् अकर्मभूमयः १ अकर्मभूमयः त्रिंशद्विधाः प्रज्ञप्ताः । तद्यथा-पञ्चभिः हेमवतैः, पञ्चभिः हरिव(ः पञ्चभिः रम्यग्वः पञ्चभिः हैरण्यवतैः पञ्चभिः देवकुरुभिः पञ्चभिरुत्तरकुरुभिः । सोऽयमकर्मभूमयः। प्रश्न- कर्म भूमि कौनसी हैं ? उत्तर-कर्म भूमि पन्द्रह कही गई हैं। (अढाई द्वीप के) पांच भरत, पांच ऐरावत और पांच महाविदेह । प्रश्न-अकर्म भूमि अथवा भोगभूमि कौन सी हैं ? उत्तर-भोगभूमि तीस होती हैं—पांच हैमवत, पांच हरिवर्ष, पांच रम्यक् वर्ष, पांच हैरण्यवत, पांच देवकुरु और पांच उत्तर कुरु । यह सब भोग भूमियां हैं। संगति-यहां सूत्र और आगम वाक्य मे कोई अन्तर नही है। प्रागम वाक्य में नियमानुसार थोड़ा विशेष कथन है। नृस्थिती परावरे त्रिपल्योपमान्तर्महुर्ते । ३,३८ तृतीयाध्यायः [ ६३ पलिनोवमाउ तिन्नि य, उक्कोसेण वियाहिया । आउट्टिई मणुयाणं, अंतोमुहुत्तं जहन्निया ॥ उत्तराध्ययन अध्याय ३६ गाथा १९८ मणुस्साणं भंते! केवइयं कालट्ठिई पण्णता ? गोयमा! जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं तिगिणपलिओवमाइं। प्रज्ञापना पद ४ मनुष्याधिकार पल्योपमानि त्रीणि च, उत्कर्षेण व्याख्याता । श्रायुः स्थितिर्मनुजानां अन्तर्मुहुर्त जघन्यका ॥ मनुष्याणां भगवन् ! कियति कालः स्थितिः प्रज्ञप्ता ? गौतम ! जघन्येनान्तर्मुहुर्तमुत्कर्पण त्रीणि पल्योपमानि । भाषा टीका-मनुष्यो की जघन्य आयु अन्तर्मुहुर्त तथा अधिक से अधिक आयु तीन पल्य होती है। तिर्यग्योनिजानाञ्च । छाया- ३,३६. पलिओवमाइं तिरिण उ उक्कोसेण वियाहिया । आउठिई थलयराणां अन्तोमुहत्तं जहन्निया ॥ उत्तराध्ययन अध्याय ३६ गाथा १८३ गब्भवतिय चउप्पय थलयर पंचदिय तिरिक्ख जोणियाणं पुच्छा ? जहणणेणं अन्तोमुहुत्तं उक्कोसेणं तिरिण पलिओवमाई। प्रज्ञापना स्थितिपद ४ तिर्यगधिकार पल्योपमानि त्रीणि तु, उत्कर्पण व्याख्याता । आयुः स्थितिः स्थलचराणां अन्तर्मुहूर्त जघन्यका ॥ छाया १४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : गर्भव्युत्क्रान्तः चतुष्पदस्थलचरपञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिकानां पृच्छा? जघन्येन अन्तर्मुहृत उत्कर्पण त्रीणि पल्योपमानि । भाषा टीका-स्थलचरो की जघन्य आयु अन्तर्मुहुर्त तथा उत्कृष्ट आयु तीन पल्य होती है। प्रश्न-गर्भ जन्म वालो, चौपायो, स्थलचरो, पंचेन्द्रियो तथा अन्य तिर्यचो की कितनी आयु होती है ? उत्तर-जघन्य अन्तर्मुहुर्त तथा उत्कृष्ट तीन पल्य । संगति-यहां भी सूत्र और पागम वाक्य मे विल्कुल एक प्रकार के ही शब्द कहे , गये हैं। इति श्री-जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम महाराज-सगृहीने तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वये तृतीयाऽध्यायः समाप्तः ॥३॥ - चतुर्थाऽध्यायः . ::. ४, १ देवाश्चतुर्णिकायाः। चउन्विहा देवा पएणत्ता, तं जहा -भवणवई वाणमंतर जोइस वेमाणिया। व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक २ उद्देश्य ७ चतुर्विधाः देवाः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा- भुवनपतयः वाणमन्तराः ज्योतिषकाः वैमानिकाः। भापा टीका-देव चार प्रकार के होते हैं-भुवनवासी, ब्यन्तर, ज्योतिष्क और छाया- वैमानिक । संगति-यहां श्रागम वाक्य और सूत्र में कुछ अन्तर नहीं है। केवल व्यन्तर का नाम आगम मे वाणमन्तर दिया गया है, जो केवल शाब्दिक भेद है। आदितस्त्रिषु पीतान्तलेश्या। ४, २ भवनवइवाणमंतर'.. 'चत्तारि लेस्साओ' जोतिसि- याणं एगा तेउलेसा' 'वेमाणियाणं तिन्नि उवरिमलेसाओ। स्थानांग स्थान १ सूत्र ५१ छाया- भुवनपतिवाणमन्तरयोः चतस्रः लेण्या ...... ज्योतिष्काणां एका तेजोलेश्या (पीतलेश्या)..."वैमानिकानां तिस्रः उपरिमलेश्याः। भापा टीका-भुवनवासी और व्यन्तरों के चार लेश्या (कृष्ण, नील, कापोत और पीत) होती हैं। ज्योतिष्का के अकेली पीत लेश्या होती है और वैमानिको के ऊपर की तीन लेश्या (पीत, पदा, और शुक्ल) होती हैं। , १६ ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : संगति-बागम तथा सूत्र मे ज्योतिष्क देवो के सम्बन्ध में थोड़ा मत भेद है। सूत्रो में भुवनवासी तथा व्यंतरो के समान ज्योतिष्को मे भी चार लेश्या मानी हैं । किन्तु आगम ग्रन्थ ज्योतिप्को में कृष्ण, नील, और कापोत का अस्तित्व न मानकर उनमे केवल चौथी पीतलेश्या ही मानते हैं। इसलिये यह विषय विद्वानो के विचारने योग्य है। दशाष्ट्रपञ्चद्वादशविकल्पाः कल्पोपपन्नपर्यन्ताः । ४, ३. भवणवई दसविहा पण्णत्ता 'वाणमन्तरा अविहा पएणत्ता, 'जोइसिया पंचविहा पन्नत्ता'' 'वेमाणिया दुविहा पएणत्ता, तं जहा-कप्पोपवण्णगाय कप्पाइया य । से कि तं कप्पोपवण्णगा ? बारसविहा पण्णत्ता, तं जहा- सोहम्मा, ईसाणा, सणंकुमारा, माहिंदा, वंभलोगा, लंतया, महासुक्का, सहस्सारा, आणया, पाणया, आरणा, अञ्चुत्ता। प्रज्ञापना प्रथम पद देवाधिकार छाया भुवनपतयः दशविधाः प्रज्ञप्ताः वाणमंतराः अष्टविधा प्रज्ञप्ताः ......""ज्योतिष्काः पञ्चविधाः प्रज्ञप्ताः । वैमानिकौ द्विविधौ प्रज्ञप्ती, तद्यथा-कल्पोपत्रकाच कल्पातीताश्च । अथ किं तत् कल्पोप- पन्नकाः १ द्वादशविधाः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा - सौधर्माः ईशानाः सनत्कुमाराः माहेन्द्राः ब्रह्मलोकाः लान्तकाः महाशुक्राः सहस्राराः आनताः प्राणताः प्रारणाः अच्युताः । भाषा टीका--भुवनवासी दस प्रकार के होते हैं। व्यंतर आठ प्रकार के होते हैं । ज्योतिपक पांच प्रकार के होते हैं और वैमानिक दो प्रकार के होते है। वैमानिको के दो भेद यह हैं-कल्पोपपन्न और कल्पातीत । प्रश्न-कल्पोपपन्न किनको कहते हैं ? उत्तर-फल्पोपपन्न बारह प्रकार के होते हैं-वह यह हैं-सौधर्म, ईशान, सानत्कुमार माहेन्द्र, बहालोक, लान्तक, महाशुक्र, सहस्रार, आनत, प्राणत, आरण और अच्युत । , + J तृतीयाध्याय : [ ६७ इन्द्रसामानिकवायस्त्रिंशपारिषदात्मरक्षलो- कपालानीकप्रकीर्णकाभियोग्यकिल्विषिकाश्कशः। " ४,४. देविंदा एवं सामाणिया 'तायत्तीसगा लोगपाला परिसोववन्नगा' 'अणियाहिवई आयरकला । स्थानांग स्थान ३, उ० १, सू० १३४ देवकिव्विसिए' आभिजोगिए । औपपा० जीवोप० सू० ४१ चउव्विहा देवाण ठिती पण्णत्ता, तं जहा-देवे णाममेगे देवसिणाते नाममेगे देवपुरोहिते नाममेगे देवपज्जलणे नाममेगे । स्थानांग स्थान ४, उ० १, सू० २४८. छाया देवेन्द्राः एवं सामानिकाःत्रायस्त्रिंशकाः लोकपालाः परिषदुत्पन्नकाः अनीकपतयः यात्मरक्षाः । देवकिल्विपिकाः आभियोग्याः । चतुर्विधा देवानां स्थितिः प्रज्ञप्ता, तद्यथा- देवः नामैकः देव- स्नातकः नामकः देवपुरोहितः नामकः देवप्रज्वलनः नामैकः । भापा टीका-देवेन्द्र, सामानिक, त्रायस्त्रिंश, लोकपाल, पारिपद् अथवा परिषदुत्पन्न अनीकपति अथवा अनीक, आत्मरक्ष, देवकिल्बिप और आभियोग्य । (एक एक के भेद .. देवो की स्थिति चार प्रकार की होती है-देव, देवस्नातक, देवपुरोहित और देव प्रज्वलन। सगति--सूत्र मे देव समूहों के दश भेद बतलाये गये है। उपरोक्त आगम वाक्य मे थोड़े शाब्दिक हेर फेर के साथ नौ भेद तो बतला दिये हैं। दसवे भेद प्रकीर्णक के स्थान १८ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वयः मे उन्होंने देवों के एक समूह की देव, स्नातक, पुरोहित और प्रज्वलन यह चार संज्ञाएँ की हैं, जो कि प्रकीर्णक से प्रथक कुछ प्रतीत नहीं होते। त्रायस्त्रिंशलोकपालवा व्यंतरज्योतिष्काः । ४, ५. भाषा टीका वाणमंतरजोइसियाणं तायतीसलोगपाला नत्थि । पण्णवणाए वीओ पए पस्संतु अहवा जंबुद्दीवपण्णत्तीए जिणमहिमाहियारे वाणमंतरजोइसियाणं च विसए पासियव्यो। छाया- व्यन्तरज्योतिकानां प्रायस्त्रिंशलोकपालौ न स्तः । प्रज्ञापनायाः द्वितीये पदे पश्यन्तु । अथवा जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तौ जिनमहिमाधिकारे व्यन्तरज्योतिष्कयोश्च विपये द्रष्टव्यः । व्यन्तर तथा ज्योतिष्कों मे त्रायस्त्रिंश और लोकपाल नहीं होते। इस विषय को प्रज्ञापना सूत्र के द्वितीयपद अथवा जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति के जिनमहिमाधिकार में व्यन्तर और ज्योतिष्कों के विपय मे देखना चाहिये । पूर्वयो:न्द्राः। ४,६ दो असुरकुमारिंदा पन्नता, -चमरे चेव बली चेव। दो णागकुमारिंदा पाणत्ता, तं जहा-धरणे चेव भूयाणंदे चेव । दो सुवन्नकुमारिंदा पण्णत्ता, तं जहा-वेणुदेवे चेव वेणुदाली चेव । दो विज्जुकुमारिंदा पण्णत्ता, तं जहा-हरिच्चव हरिसहे चेव । दो अग्गिकुमारिंदा पन्नत्ता, तंजहा-अग्गिसिहे चेव अग्गिमाणवे चेव दो दीवकुमारिंदा पण्णत्ता, तं जहा-पुन्ने चेव विसिटे चेव । दो उदहिकुमारिंदा पण्णत्ता, तं जहा-जलकते चेव जलप्पभे चेव । दो दिसाकुमारिंदा पण्णता, तं जहा-अमियगती चेव अमितवा- तं जहा- तृतीयाध्यायः [ RE FICE - हणे चेव । दो वातकुमारिंदा पेण्णत्ता, तं जहा-वेलंबे चेव पभंजणे चेव। दो थर्णियकुमारिंदा पण्णत्ता, तं जहा-घोसे चेव महाघोले चेव । दो पिसाइंदा पत्नत्ता, तं जहा-काले चेव महाकाले चेव । दो भूइंदा पण्णत्ता, तं जहा-सुरुवे वेव पडिरूवे चेव । दो जक्खिदा पन्नत्ता, तं जहा-पुन्नभद्दे चेव माणिभद्दे चेव । दो रक्खसिंदा पन्नता, तं जहा-भीमे चेव महाभीमे चेव । दो किन्नरिंदा पन्नत्ता, तं जहा-किन्नरे चेव किंपुरिसे चेव । दो किंपुरिसिंदा पन्नत्ता, तं जहा--सप्पुरिसे चेव महापुरिसे चेव । दो महोरगिंदा पन्नत्ता, तं जहा-अतिकाए चेव महाकाए चेव । दो गंधव्विंदा पन्नत्ता, तं जहा-गीतरती चेव गीयजसे चेव । स्थानांग स्थान २ उ० ३ सू० ६४ द्वौ असुरकुमारेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा - चमरश्चैव वलिश्चैव । द्वौ नागकुमारेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा- धरणश्चैव भूतानन्दश्चैव । द्वौ सुपर्णकुमारेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा - वेणुदेवश्चैव वेणुदारी चैव । द्वौ विद्युत्कुमारेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा - हरिश्चैव हरिसहश्चैव । द्वावग्निकुमारेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा- अग्निशिखश्चैवाऽग्निमाणव- श्चैव । द्वौ दोपकुमारेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा - पूर्णश्चैव वशिष्टश्चैव । द्वावुदधिकुमारेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा - जलकान्तश्चैव जलप्रभश्चैव । द्वौ दिकुमारेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा - अमितगतिश्चैवाऽमितवाहनश्चैव । द्वौ वातकुमारेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा-वेलम्बश्चैव प्रभञ्जनश्चैव । द्वौ स्तनितकुमारेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा - घोपश्चैव महाघोपश्चैव । (व्यन्तराणां मध्ये) द्वौ पिशाचेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा - कालश्चैव महाकालश्चैव । छाया- ~ १०० ] तत्त्वार्थ सूत्रजैनाऽऽरामसमन्वय : द्वौ भूतेन्द्रौ प्रजप्तौ, तद्यथा - सुरूपश्चैव प्रतिरूपश्चैव । (प्रतिरूपोऽतिरूपश्च) द्वौ योन्द्रो प्रज्ञप्तौ, तद्यथा - पूर्णभद्रश्चैव मणिभद्रश्चैव । द्वौ राक्षसेन्द्रौ प्रज्ञप्ती, तद्यथा- भीमश्चैव महाभीमश्चैव । हौ किन्नरेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा -- किन्नरश्चैव किम्पुरुपञ्चैव । दो किम्पुरुपेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा - सत्पुरुषश्चैव महापुरुषश्चैव । हो महोरगेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा अतिकायश्चैव महाकायश्चैव । द्वौ गन्धर्वेन्द्रौ प्रज्ञप्तौ, तद्यथा - गीतरतिश्चैव गीतयशश्चैव । भाषा टीका-(भुवनवासियों के अन्दर) १. असुर कुमारो के दो इन्द्र होते हैं-चमर और वलि । २. नागकुमारों के दो इन्द्र होते हैं - धरण और भूतानन्द । ३ सुपर्णकुमारों के दो इन्द्र होते हैं-घेणुदेव और वेणुदारी। ४. विद्युत्कुमारों के दो इन्द्र होते हैं ~ हरि और हरिसह । ५. अग्निकुमारो के दो इन्द्र होते हैं - अग्नि शिख और अग्नि माणव । ६. द्वीपकुमारों के दो इन्द्र होते हैं -- पूर्ण और वशिष्ट । ७. उद्धिकुमारो के दो इन्द्र होते हैं - जलकान्त और जलप्रभ । ८. दिक्कुमारो के दो इन्द्र होते है -अमितगति और अमितवाहन । ६ वातकुमारो के दो इन्द्र होते हैं - वेलम्ब और प्रभञ्जन । १०. स्तनित कुमारी के दो इन्द्र होते हैं - घोष और महाघोष । (इस प्रकार भुवनवासियो के वीस इन्द्रो का वर्णन किया गया। अव व्यन्तरों के इन्द्रों का वर्णन किया जाता है। १. पिशाचों के दो इन्द्र होते हैं काल और महाकाल। २. भूतों के दो इन्द्र होते हैं -सुरूप और प्रतिरूप (अथवा प्रतिरूप और अतिरूप) ३ यक्षों के दो इन्द्र होते हैं - पूर्ण भद्र और मणिभद्र । ४ राक्षसो के दो इन्द्र होते हैं -भीम और महाभीम । ५ किनरा के दो इन्द्र होते हैं किन्नर और किम्पुरुप ।

चतुर्थऽध्यायः [ १०१ ६ किम्पुरुषों के दो इन्द्र होते हैं - सत्पुरुष और महापुरुष । ७. महोरगों के दो इन्द्र होते हैं:-अतिकाय और महाकाय । ८. गन्धर्वो के दो इन्द्र होते हैं - गीतरति और गीतयश । कायप्रवीचारा आ ऐशानात् । ४, ७. शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचाराः । ४, ८ परेऽप्रवीचाराः। , कतिविहा णं भंते ! परियारणा पण्णता ? गोयमा! पञ्चविहा पण्णत्ता, तं जहा - कायपरियारणा, फासपरियारणा, रूवपरिया- रणा, सदपरियारणा, मनपरियारणा 'भवणवासिवाणमंतर- जोतिसि सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु देवा कायपरियारणा, सणंकुमारमाहिंदेसु कप्पेसु देवा फासपरियारणा, बंभलोयलंतगेसु कप्पेसु देवा रूवपरियारणा, महासुक्कसहस्सारेसु कप्पेसु देवा सहपरियारणा, आणयपाणयभारणअचुएसु देवा मणपरियारणा, गवेज्जग अगुत्तरोववाइया देवा अपरियारगा। प्रज्ञापना पद ३४ प्रचारणा विषय स्थानांग स्थान २, उ०४, सू० ११६ कतिविधा भगवन् प्रचारणा प्रज्ञप्ता ? गौतमः पञ्चविधा प्रज्ञप्ता, तद्यथा-- कायप्रचारणा, स्पर्शप्रचारणा, रूपप्रचारणा, शब्दमचा- रणा, पनःप्रचारणा । भवनवासिव्यन्तरज्योतिष्कसौधर्मशानेषु कल्पेषु देवाः कायप्रवीचारकाः । सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः कल्पयोः देवाः स्पर्शभचारकाः । ब्रह्मलोकलान्तकयोः कल्पयोः देवाः रूप- छाया १०२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : प्रश्न प्रचारकाः । महाशुक्रसहस्रारयोः कल्पयोः देवाः शब्दप्रचारकाः । आनतप्राणताऽऽरणाऽच्युतेषु कल्पेषु देवाः मनाप्रचारकाः। पँधेयकाऽनुत्तरोपपादिकाः देवाः अप्रचारकाः। भगवन् ! प्रचारणा कितने प्रकार की होती है ? उत्तर – गौतम ! पांच प्रकार की होती है - काय प्रचारणा, स्पर्श प्रचारणा, रूप प्रचारणा, शब्द प्रचारणा और मनःप्रचारणा । भवनवासी, व्यन्तर ज्योतिष्क, तथा सौधर्म और ईशान कल्पो के देव [मनुष्यों के समान ] शरीर से प्रवीचार अथवा मैथुन करते हैं । सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्पो के देव स्पर्श मात्र से ही मैथुन के सुख को भोग लेते हैं। ब्रह्मलोक और लान्तक कल्पो मे देव रूप देखने मात्र से मैथुन के सुख को भोग लेते है । महाशुक्र और सहस्रार कल्पो मे देव मन में स्मरण करने मात्र से मैथुन के सुख को भोग लेते है । नौ वैयक तथा अनुत्तरो मे उत्पन्न देवो मे कामवासना न होने से वह अप्रवीचार कहे जाते है। संगति - प्रवीचार, प्रचारणा, तथा प्रचार यह सब मैथुन के ही नामान्तर हैं । इन सूत्रो में देवो के मैथुन का सुख प्राप्त करने का ढंग बतलाया गया है । आगमवाक्य तथा उपरोक्त सूत्रो के शब्दो का साम्य ध्यान देने योग्य है । भवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्निवात- स्तनितोदधिद्वीपदिक्कुमाराः। ४, १० भवणवई दसविहा पण्णता, तं जहा-असुरकुमारा, नाग- कुमारा, सुवण्णकुमारा, विज्जुकुमारा, अग्गीकुमारा, दीवकुमारा, उदहिकुमारा, दिसाकुमारा, वाउकुमारा, थणियकुमारा । प्रज्ञापना प्रथम पद देवाधिकार भवनवासिनः दशविधाः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा-असुरकुमाराः, नाग- कुमाराः, सुपर्णकुमारा, विद्युत्कुमाराः अग्निकुयाराः, द्वीपकुमाराः, उदधिकुमाराः, दिक्कुमाराः, वातकुमाराः, स्तनितकुमाराः । , छाया - चतुर्थऽध्याय: [ १०३ और स्तनित कुमार। ४, ११. - भापा टीका-भवनवासी दस प्रकार के होते हैं - असुरकुमार, नागकुमार, सुपर्णकुमार, विद्युत्कुमार, अग्निकुमार, द्वीपकुमार, उदधिकुमार, दिक्कुमार, वातकुमार, व्यन्तराः किन्नरकिम्पुरुषमहोरगगन्धर्षयक्ष- राक्षसभूतपिशाचाः। वाणमंतरा अट्ठविहा पण्णत्ता, तं जहा-किरणरा, किंपुरिसा, महोरगा, गंधव्वा, जक्खा, रक्खसा, रक्खसा, भूया. पिसाया। प्रज्ञापना प्रथमपद देवाधिकार. छाया व्यन्तराः अष्टविधाः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा- किन्नराः, किम्पुरुषाः, महो- रगाः, गन्धर्वाः, यक्षाः, राक्षसाः, भूताः, पिशाचाः । भापा टोका व्यन्तर आठ प्रकार के होते हैं-किन्नर, किम्पुरुष, महोरग, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, भूत और पिशाच. ज्योतिष्काः सूर्याचन्द्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकी- पर्णकतारकाश्च । ४, १२ जोइसिया पंचविहा पण्णत्ता, तं जहा-चंदा, सूरा, गहा, रणक्खत्ता, तारा। प्रज्ञापना प्रथम पद देवाधिकार. छाया ज्योतिष्काः पञ्चविधाः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा -- चन्द्रमसः, सूर्याः, ग्रहाः, नक्षत्राणि, तारकाः। भाषा टीका - ज्योतिष्क पांच प्रकार के होते हैं--- चद्रमा, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, और तारे मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो लोके। ४, १३. , - १०४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वयः भाषा टीका - ते मेरु परियडता पयाहिणावत्तमंडला सव्वे । अणवहियजोगेहिं चंदा सूरा गहगणा य ॥१०॥ जीवाभिगम, तृतीय प्रतिपत्ति उहे० २ सू० १७७. छाया- ते मेरु पर्यटन्तः प्रदक्षिणावर्त्तमण्डलाः सर्वे । अनवस्थितयोगैः चन्द्रमसः सूर्याः ग्रहगणाश्च ।। वह चन्द्रमा, सूर्य, और ग्रहो के समूह स्थिर न रहते हुए नित्य मण्डलाकार मे सुमेरुपर्वत की प्रदक्षिणा दिया करते हैं। तत्कृतः कालविभागः। ४, १४ से केण?णं भंते! एवं वुच्चइ-"सूरे आइच्चे सूरे" गोयमा! सूरादिया णं समयाइ वा आवलयाइ वा जाव उस्स- प्पिणीइ वा अवसप्पिणीइ वा से तेण?णं जाव आइच्चे । व्याख्या प्रज्ञप्ति शत०१२ उ०६ से किं तं पमाणकाले ? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-दिवप्प- पाणकाले राइप्पमाणकाले इच्चाइ। व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक ११ उ०११ सू०४२४. जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति, सूर्य प्रज्ञप्ति, चन्द्रप्रज्ञप्ति । छाया अथ केनार्थेन भगवन् एवं उच्यते – “ सूर्यः आदित्यः सूर्यः" गौतम ! सूर्यादिकाः समयादयः वाऽऽवलिकादयः वा यावत् उत्सर्पिण्यादयः वाऽवसर्पिण्यादयः वाऽथ तेनार्थेन यावदादित्यः । अथ किं तत्प्रमाणकालः १ द्विविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा - दिवसप्रमाण- कालः रात्रिप्रमाणकालः इत्यादि । भगवन् ! सूर्य को आदित्य किस कारण से कहते हैं उत्तर- गौतम ! श्रावलि आदि से लगाकर उत्सर्पिणी अथवा अवसर्पिणी तक के समय की आदि सूर्य से ही होती है, इस कारण से उसे आदित्य कहते हैं प्रश्न चतुर्थऽध्यायः [ १०५ प्रश्न-प्रमाण काल किसे कहते है ? उत्तर-वह दो प्रकार का होता है--दिवस प्रमाण काल और रात्रि प्रमाण काल । इत्यादि। बहिरवस्थिताः। ४, १५ अंतो मणुस्सखेत्ते हवंति चारोवगा य उववण्णा । पञ्चविहा जोइसिया चंदा सूरा गहगणा य ॥ २१ ॥ तेण परं जे सेसा चंदाइचगहतारनखत्ता । नत्थि गई नवि चारो अवट्ठिया ते मुणेयव्वा ॥ २२ ॥ जीवाधिगम तृतीय प्रतिपत्ति उद्दे० २ सूत्र १७७ अन्तः मनुष्यक्षेत्रे भवन्ति चारोपगाश्च उपपन्नाः । पञ्चविधाः ज्योतिष्काः चन्द्रमसः सूर्याः ग्रहगणाश्च ॥ तेन परं यानि शेषाणि चन्द्रमसादित्यग्रहतारकनक्षत्राणि । नास्ति गतिः नापि चारः अवस्थितानि तानि ज्ञातव्यानि ॥ भाषा टीका-मनुष्य क्षेत्र के अन्दर उत्पन्न हुए पांचो प्रकार के ज्योतिष्क चन्द्रमा, सूर्य, और ग्रहों के समूह चलते रहते हैं। किन्तु मनुष्य क्षेत्र के बाहिर के शेष चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र और तारे गति नहीं करते, न चलते हैं । परन् उनको निश्चल समझना चाहिये। सगति-इन सब आगम वाक्यो और सूत्र के पदों मे विशेष कथन के अतिरिक्त और कुछ भेद नही है. वैमानिकाः। छाया ४, १६. वेमाणिया व्याख्याप्रज्ञप्ति० शतक २० सूत्र ६७५-६८२ छाया- वैमानिकाः। भाषा टीका-[ज्योतिष्क देवों से ऊपर रहने वाले देवो को वैमानिक कहते हैं।

१०६ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वयः कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च । ४, १७ ४, १८ वेमाणिया दुविहा पण्णत्ता, तं जहा-कप्पोपवएणगा य कप्पाईया य ॥ प्रज्ञापना प्रथम पद सूत्र ५०. छाया- वैमानिकाः द्विविधा : प्रज्ञप्तास्तद्यथा-कल्पोपपन्नकाश्च कल्पातीताश्च । भाषा टीका-वैमानिक दो प्रकार के होते हैं-कल्पोपपन्न और कल्पातीत । उपर्युपरि। ईसाणस्स कप्पस्स उप्पिं सपक्खि इत्यादि । प्रज्ञापना पद २ वैमानिकदेवाधिकार । छाया- ईशानस्य कल्पस्य उपरि सपक्षं इत्यादि भाषा टीका-ईशान कल्प के ऊपर २ बाकी सब रचना है। सौधर्मेशानसानत्कुमारमाहेन्द्रब्रह्मब्रह्मोत्तर- लान्तवकापिष्टशुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेष्वानत- प्राणतयोरारणाच्युतयोर्नवसु ग्रैवेयकेषु विजय- वैजयन्तजयन्तापराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च । सोहम्म ईसाण सणंकुमार माहिंद बंभलोय तग महा- सुक्क सहस्सार आणय पाणय आरण अच्चुय हेछिमगेवेज्जग मज्झि- मगेवेझग उपरिमगेवेझग विजय वेजयंत जयंत अपराजिय सवठ्ठसिद्धदेवा य । प्रज्ञापना पद ६, अनुयोगद्धार सू० १०३ औपपातिक सिद्धाधिकार । ४, १९ चतुर्थऽध्याय: [ १०७ 4. , . छाया सौधर्मेंशानसानत्कुमारमाहेन्द्रब्रह्मलोकलान्तकमहाशुक्रसहस्रारऽऽन- तपाणताऽऽरणाऽच्युताधस्ताद्वेयकमध्यमवेयकोपरिमग्रैचेयकवि- जयवैजयन्तजयन्तापराजितसर्वार्थसिद्धदेवाश्च । भाषा टीका-सौधर्म, ईशान, सानत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्मलोक, लान्तक, महाशुक्र, सहस्रार, आनत, प्राणत, आरण और अच्युत, अधोग्रौवेयक, मध्यम वेयक, उपरिम प्रैवेयक, विजय, वैजयंत, जयंत, अपराजित और सवार्थसिद्धि के देव [वैमानिक कहलाते हैं। संगति-दिगम्बर ग्रन्थो से श्व ताम्बर तथा स्थानकवासी आगमो का स्वर्गो के विषय मे मतभेद है। दिगम्बर ग्रन्थ सोलह स्वर्ग मानते है। जैसा कि सूत्र मे लिखा है। किन्तु आगमो मे ब्रह्मोत्तर, कापिष्ट, शुक्र और शतार इन चार स्वर्गों के अस्तित्व को नही माना। लान्तव का नाम आगमो में लान्तक मिलता है। अत: इन भेदो मे साम्प्रदायिकता होने के कारण यह समन्वय मे बाधक सिद्ध नहीं होते । इसी कारण से दिगम्बर आम्नाय के सूत्रों मे सोलह तथा श्वेताम्बर आम्नाय के तत्वार्थसूत्र मे बारह स्वर्ग मिलते है। स्थितिप्रभावसुखद्युतिलेश्याविशुद्धीन्द्रिया- वधिविषयतोऽधिकाः। ४, २० गतिशरीरपरिग्रहाभिमानतो हीनाः । ४, २१. सोहम्मीसाणेसु देवा केरिसए कामभोगे पञ्चगुब्भवमाणा विहरंति ? गोयमा! इट्ठा सदा इट्टा रूवा जाव फासा एवं जाव गेवेज्जा अणुत्तरोववातिया णं अणुत्तरा सदा एवं जाव अणुत्तरा फासा। जीवाधिगम० प्रतिपत्ति ३ उद्दे० २ सूत्र २१६ प्रज्ञापना पद २ देवाधिकार ।

१०८ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : 'महिड्ढीया महजुइया ज़ाव महाणुभागा इड्ढीए पण्णत्ते, जाव अच्चुओ, गेवेज्जणुत्तरा य सव्वे महिड्ढीया':' । जीवाभिगम० प्रतिपत्ति ३ सूत्र २१७ वैमानिकाधिकार । छाया- सौधर्मेशानयोः देवाः कीदृक् कामभोगान् प्रत्यनुभवमानाः विहरन्ति ? गौतम! इष्टाः शब्दाः इष्टाः रूपाः यावत् स्पर्शाः एवं यावत् अवेयकाः अनुत्तरोपपातिकाः अनुत्तराः शब्दाः एवं यावत् अनुत्तराः स्पर्शाः। महर्द्धिकाः महद्द्युतिकाः यावत् महानुभागाःऋद्धयः प्रज्ञप्ताः, यावत् अच्युतः, अवेयकाः अनुत्तराश्च सर्वे महर्द्धिकाः... प्रश्न-सौधर्म तथा ईशान स्वर्गो मे देव कैसे २ काम भोगो को भोगते हुए विहार करते है। ग्र उत्तर-गौतम । वह इष्ट शब्द, इष्ट रूप, इष्ट गंध, इष्ट रस और इष्ट स्पर्श का वैयक तथा अनुत्तरों तक आनन्द लेते हैं। अच्युत स्वर्ग तक वह महानुभाग व भारी ऋद्धि वाले और महान् कान्ति वाले होते हैं । वेयक और अनुत्तरो के निवासी देव भी महान् ऋद्धि वाले होते हैं संगति-यह पीछे बतलाया जा चुका है कि आगमों में सभी विषयो का प्रतिपादन विस्तार से किया गया है । जिवाधिगम प्रतिपत्ति सूत्रमे तथा प्रज्ञापना सूत्र मे देवों के ऊपर २ अधिक तथा हीन गुणो पर भी बड़े विस्तार से प्रकाश डाला गया है। किन्तु किसी छोटे वाक्य के न होने से यहां किसी उपयुक्त पद का उद्धरण न किया जा सका। सूत्र मे वतलाया है कि ऊपर २ देवो की अधिकाधिक आयु होती है, प्रभाव भी अधिकाधिक ही होता जाता है, सुख भी एक कल्प से दूसरे आदि में अधिक २ ही है, कान्ति भी अधिक २ होती जाती है, लेश्या अधिकाधिक विशुध्द होती जाती है, इन्द्रियो की विषय ग्रहण करने की शक्ति भी बढ़ती जाती है। और अवधि ज्ञान का विषय भी उनका अधिक २ ही होता जाता है।

चतुर्थऽध्याय : [ १०६ इसके विरुद्ध ऊपर २ के देवो की गति कम होती जाती है। अर्थात् जितने २ ऊपर जाइये देव कम चलने है। वेयकों के अहमिन्द्र तो अपने स्थान से कहीं भी नहीं जाते। शरीर भी उपर २ छोटा होता जाता है, परिग्रह भी ऊपर २ कम रखते जाते है, और अभिमान भी ऊपर २ कम होता जाता है। पीतपद्मशुक्ललेश्या द्वित्रिशेषेषु । ४, २२ सोहम्मीसाणदेवाणं कति लेस्साओ पन्नताओ? गोयमा! एगा तेजलेस्सा पण्णत्ता। सणकुमारमाहिदेसु एगा पम्हलेस्सा एवं बंभलोगे वि पम्हा। सेसेसु एका सुक्कलेस्सा अणुत्तरोववा- तियाणं एका परमसुक्कलेस्सा । जीवाभिगम० प्रतिपत्ति ३ उद्दे० १ सूत्र २१४ प्रजापना पद १७ उद्दे० १ लेश्याधिकार । छाया- सौधर्मेशानदेवानां कतिलेश्याः प्रज्ञप्ताः ? गौतम ! एका तेजोलेश्या प्रज्ञप्ता । सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः एका पद्मलेश्या एवं ब्रह्मलोकेऽपि पद्मलेश्या । शेषेषु एका शुक्ललेश्या अनुत्तरोपपातिकानामेका परम- शुक्ललेश्या । प्रश्न-सौधर्म और ईशान स्वर्ग वालो के कितनी लेश्या होती हैं ? उत्तर-गौतम ! उनके केवल एक पीत लेश्या (तेजोलेश्या) ही होती है। सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग में अकेली पद्म लेश्या होती है। ब्रह्मलोक में भी पद्मलेश्या होती है। शेप स्वर्गों मे केवल शुक्ल लेश्या ही होती है । अनुत्तरो मे उत्पन्न हुओ के परम शुक्ल लेश्या होती है। संगति-आगम के इस वाक्य का दिगम्बरो से थोडा मतभेद है। उनके लेश्या क्रम के अनुसार सौधर्म ईशान मे पीत लेश्या, सानत्कुमार और माहेन्द्र में पीतपद्म दोनो, ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लांतव और कापिष्ट मे पद्मलेश्या; शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहस्त्रार में पद्म ११० ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : और शुक्र दोनों; तथा आनत आदि शेष स्वर्गों में शुक्ल लेश्या होती है। परंतु अनुदिश और अनुत्तर इन चौदह विमानो में परम शुक्ल होती है। प्राग्रॅवेयकेभ्यः कल्पाः। ४, २३. कप्पोपवण्णगा बारसविहा पण्णत्ता । प्रज्ञापना प्रथम पद सूत्र ४६ छाया- कल्पोपपन्नकाः द्वादशविधाः प्रज्ञप्ताः । भाषा टीका-नवेयकों से पहिले के कल्पोपपन्न जाति के देव बारह प्रकार के कहे जाते हैं। ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः। ४, २४ बंभलोए कप्पे लोगंतिता देवा पण्णता । स्थानांग० स्थान - सूत्र ६२३ छाया ब्रह्मलोके कल्पे लौकान्तिकाः देवाः प्रज्ञप्ताः। भाषा टीका-ब्रह्मलोक कल्प के अन्त मे रहने वाले लौकान्तिक देव कहलाते हैं। सारस्वतादित्यवन्यरुणगर्दतीयतुषिताब्याबा- धारिष्टाश्च । ४, २५ सारस्सयमाइच्चा वण्हीवरुणा य गद्दतोया य । तुसिया अव्वावाहा अग्गिच्चा चेव रिद्वा च ॥ छाया- सारस्वताऽऽदित्याः बन्हयो वरुणाश्च गर्दतोयाश्च । तुपिता अव्याबाधा आग्नेयाश्चैव रिष्टाश्च ।। स्थानांग स्थान० ८ सूत्र ६२३ मे इसी गाथा मे 'रिट्ठा च' के स्थान में 'बोद्धव्वा' पाठ देकर आठ भेद ही माने है।

चतुर्थऽध्यायः [ १११ भाषा. टीका-सारस्वत, आदित्य, वन्हि, वरुण, गर्दतोय, तुषित, अव्यावाध आग्नेय और रिष्ट यह सब के सब लौकान्तिक होते हैं। संगति-सूत्र में संक्षेप से आठ भेद लिखे हैं। किन्तु आगम में विस्तार से नौ भेद लिखे गये हैं। आगम के वन्हि और आग्नेय को सूत्र मे केवल वन्हि मे ही अन्तर्भाव कर लिया है। आगम मे अरुण को वरुण और अरिष्ट को रिष्ट नाम दिया गया है, जो कि कोई वास्तविक भेद नहीं है विजयादिषु द्विचरमाः। ४, २६. विजय वेजयंत जयंत अपराजिय देवत्ते केवइया दवि- दिया अतीता पण्णत्ता ? गोयमा ! कस्सइ अस्थि कस्सइ णत्थि, जरसस्थि अट्ट वा सोलस वा इत्यादि । प्रज्ञापना० पद १५ इन्द्रियपद छाया- विजयवैजयन्तजयन्तापराजितेषु देवत्त्वे कियान्ति द्रव्येन्द्रियाणि अतीतानि प्रज्ञप्तानि ? गौतम ! कस्यास्ति कस्य नास्ति, यस्यास्ति अष्ट वा षोडश वा इत्यादि । प्रश्न-विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित के देवपने में कितनी द्रव्येन्द्रियाँ बीत जाती है। उत्तर-गौतम ! किसी के होती हैं और किसी के नहीं भी होती? जिनके होती हैं तो आठ या सोलह होती हैं। संगति-एक जन्म की आठ द्रव्येन्द्रिय (स्पर्शन, रसना, दो नाक, दो आंख और दो कान) मानी गई हैं । अतएव दो जन्मों की सोलह द्रव्येन्द्रियाँ हुई। उपरोक्त विमानो से आने वाले प्रायः तो उसी भव मे मोक्ष को प्राप्त होते है। जिनको उसीभव में मोक्ष नहीं होती वह दूसरे भव में मोक्ष चले जाते हैं। किन्तु दो बार चार अनुत्तर विमानो मे जाकर मोक्ष जाना तो उनका बिलकुल निश्वित है।

११२ ] तत्त्वार्थसूत्रजेनाऽऽगमसमन्वय : औपपादिकमनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः । ४, २७. उववाइया 'मणुआ (सेसा) तिरिक्खजोणिया। दशवैका० अध्याय ४ पट कायाधिकार । छाया- उपपादकाः मनुजाः (शेपाः) तिर्यग्योनयः । भाषा टीका-औपपादिक (देव नारकियों) और मनुष्यों के अतिरिक्तशेप जीव तिर्यच कहलाते हैं। स्थितिरसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां सागरोप- मत्रिपल्योपमाईहीनमिता। ४, २८. असुरकुमाराणं संते ! देवाणं केवइयं कालट्ठिइ पण्णत्ता? गोयमा! उक्कोसेणं साइरेगं सागरोवमं नागकुमाराणं देवाणं भंते! केवइयं कालं ठिई पन्नता ? गोयमा! उकोसेणं दोपलिओवमाइं देसूणाई सुवरण- कुमाराणं भंते! देवणं केवइयं कालं ठिई पन्नता ? गोयमा! उकोसेणं दोपलिओवमाई देसूणाई। एवं एएणं अभिलावेण जाव थणियकुमाराणं जहा नागकुमाराणं । प्रज्ञापना० पद ४ भवनपत्यधिकार । स्थिति विषय । असुरकुमाराणां भगवन् ! कियती कालस्थितिः प्रज्ञप्ता ? गौतम ! उत्कर्षेण सातिरेकं सागरोपमम् । नागकुमाराणां देवानां भगवन्! कियती कालस्थितिः प्राप्ता ? गौतम ! उत्कण व पल्योपमे देशोने | सुपर्णकुमाराणां भगवन् ! देवानां कियती कालस्थितिः प्रज्ञप्ता ? गोतम! उतकण द्वे छाया- - चतुर्थाध्याय : [ ११३ पल्योपमे देशोने। एवं अनेन अभिलापेन ........यावत् स्तनित- कुमाराणां यथा नागकुमाराणाम् । प्रश्न-भगवन् ! असुरकुमारो की कितनी आयु होती है ? उत्तर-गौतम! उनकी अधिक से अधिक आयु कुछ अधिक एक सागर होती है ! प्रश्न-भगवन् ! नागकुमारो को कितनी आयु होती है ? उत्तर--गौतम! अधिक से अधिक कुछ कम दो पल्य होती है ! प्रश्न-भगवन् ! सुपर्ण कुमारों की कितनी श्रायु होती है ? उत्तर-गौतम ! अधिक से अधिक कुछ कम दो पल्य होती है ! इसी प्रकार से स्तनिक कुमारो तक की आयु नागकुमारो की आयु के समान होती है ! संगति-इस विषय मे आगमों का दिगम्बर ग्रथो से थोड़ा मत भेद है । सूत्र में कहा गया है कि असुर कुमारो की आयु एक सागर की है, नागकुमारो की तीन पल्य है, सुपर्ण कुमारो की आयु अढ़ाई पल्य है, द्वीप कुमारो की दो पल्य है, और शेष रहे जो छह कुमार उनकी आयु डेढ़ २ पल्य की है ! सौधर्मेशानयोः सागरोपमेऽधिके । सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः सप्त। त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधिकानि तु। ४, ३१. आरणाच्युतादूर्ध्वमेकैकेन नवसु |वेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धौ च । अपरा पल्योपमधिकम् । ४, २६. ४, ३०. ४, ३२. ४, ३३.

११४ ] तत्त्वार्थमूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : परतः परतः पूर्वा पूर्वाऽनन्तरा। ४, ३४. - - दो चेव सागराई, उक्कोसेण वियाहिआ। सोहम्मम्मि जहन्नणं, एगं च पलिओवमं ॥ २२० ॥ सागरा साहिया दुन्नि, उकोसेला वियाहिया । ईसाणम्मि जहन्नणं, साहियं पलिओवमं ।। २२१ ।। सागराणि य सत्तेव, उक्कोसेणं ठिई भवे । सणंकुमारे जहन्नेणं, दुन्नि ऊ सागरोवमा ।। २२२ ।। साहिया सागरा सत्त, उक्कोसेणं ठिई भवे । माहिन्दम्मि जहन्नेणं, साहिया दुन्नि सागरा ॥ २२३ ॥ दस चेव सागराइं. उक्कोसेणं ठिई भवे । बम्भलोए जहन्नणं, सत्त ऊ सागरोवमा ॥ २२४ चउदस सागराइं, उक्कोसेख ठिई भवे । लन्तगम्मि जहन्नणं, दस उ सागरोवमा ॥ २२५ ॥ सत्तरस सागराई, उक्कोसेण ठिई भवे । महासुके जहन्नेणं, चोदस सागरोवमा ॥ २२६ ॥ अट्ठारस सागराई, उक्कोसेण ठिई भवे । सहस्लारम्मि जहन्नेणं, सत्तरस सागरोवमा ॥ २२७ ॥ सागरा अउणवीसं तु, उक्कोसेणं ठिई भवे । आणयम्मि जहन्नणं, अट्ठारस सागरोवमा ॥ २२८ ।। N चतुर्थाध्यायः [ ११५ - वीसं तु सागराइं; उक्कोसेण ठिई भवे । पाणयम्मि जहन्नेणं, सागरा अउणवीसई ॥ २२६ ॥ सागरा इक्कवीसं तु उक्कोसेण ठिई भवे । मारणम्मि जहन्नेणं, वीसई सागरोवमा ॥ २३०॥ वावीसं सागराइं, उक्कोसेण ठिई भवे । अचुयम्मि जहन्नेणं, सागरा इक्कवीसई ॥ २३१ ॥ तेवीस सागराइं, उक्कोसेण ठिई भवे । पढमम्मि जहन्नणं, बावीसं सागरोवमा ॥ २३२॥ चउषीस सागराइं, उक्कोसेण ठिई भवे । विइयम्मि जहन्नणं. तेवीसं सागरोवमा ॥२३३ ॥ पणवीस सागराइं, उक्कोसेण ठिई भवे । तइयम्मि जहन्नणं, चउवीसं सागरोवमा ॥ २३४ ॥ छवीस सागराइं, उकोसेण ठिई भवे । चउत्थम्मि जहन्नणं, सागरा पणुवीसई ॥ २३५ ।। सागरा सत्तवीतुं तु उकोलेण ठिई भवे। पञ्चमम्मि जहन्नणं, सागरा उ छवीसइ ।। २३६ ॥ सागरा अट्ठवीसं तु, उक्कोसेण ठिई भवे । छम्मि जहन्नेणं, सागरा सत्तवीसइ ॥ २३७ ॥ सागरा अउणतीसं तु, उक्कोलेण ठिई भवे । सत्तमम्मि जहन्नेणं, सागरा अट्ठवीसइ ।। २३८ ॥ .

११६ ] तत्त्वार्थमूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : छाया तीसं तु सागराइं, उक्कोसेण ठिई भवे । अट्ठमम्मि जहन्नेणं, सागरा अउस तीसई ॥ २३६ ।। सागरा इक्कतीसं तु, उक्कोसेण ठिई भवे । नवमम्मि जहन्नेणं, तीसई सागरोवमा ॥ २४० ॥ तेत्तीसा सागराइं, उक्कोसेण ठिई भवे । चउसुपि विजयाईसु, जहन्नेणेक्कत्तीसई ॥ २४१ ॥ अजहन्नमणुक्कोसा, तेत्तीसं सागरोवमा । महाविमाणे सव्वट्ठे ठिई एसा वियाहिया ॥ २४२ ।। उत्तराध्ययनसूत्र अध्य०३६ द्वै चैव सागरोपमे, उत्कण व्याख्याता । सौधर्म जघन्येन, एकं च पल्योपमम् ।। २२० । सागरोपमे साधिके द्वे, उत्कर्पण व्याख्याता । ईशाने जघन्येन, साधिकं पल्योपमम् (एक) ॥ २२१ ॥ सागरोपमाणि च सप्तैव, उत्कपण स्थितिर्भवेत् । सानत्कुमारे जघन्येन, द्वे तु सागरोपमे ॥ २२२ ।। साधिकानि सागरोपमाणि सप्त, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । माहेन्द्र जघन्येन, साधिके द्वे सागरोपमे ॥२२३॥ दश चैव सागरोपमाणि, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । ब्रह्मलोके जघन्येन, सप्त तु सागरोपमाणि ॥ २२४ ॥ चतुर्दश सागरोपमाणि, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । लान्तके जघन्येन, दश तु सागरोपमाणि ॥ २२५ ।। सप्तदश सागरोपमाणि, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । महाशुक्र जघन्येन, चतुर्दश सागरोपमाणि ॥ २२६ ।। , - चतुर्थाध्याय : + TF अष्टादश सागरोपमाणि, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । सहस्रारे जघन्येन, सप्तदश सागरोपमाणि ॥ २२७॥ सागरोपमाणां एकोनविंशतिस्तु, उत्कर्षण स्थितिर्भवेत् । आनते जघन्येन, अष्टादश सागरोपमाणि ॥ २२८ ॥ विंशतिस्तु सागरोपमाणि, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । पाणते जघन्येन, सागरोपमाणां एकोनविंशतिः ॥ २२९ ॥ सागरोपमाणां एकविंशतिस्तु, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । आरणे जघन्येन, विंशतिः सागरोपमाणि ॥ २३०॥ द्वाविंशतिः सागरोपमाणि, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । अच्युते जयन्येन, सागरोपमाणां एकविंशतिः ॥ २३१ ॥ प्रयोविंशतिः सागरोपमाणि, उत्कर्षण स्थितिर्भवेत् । प्रथमे (अधेयके) जघन्येन, द्वाविंशतिः सागरोपमाणि ॥ २३२॥ चतुर्विंशतिः सागरोपमाणि, उत्कर्पण स्थितिर्भवेत् । द्वितीये जघन्येन, त्रयोविंशतिः सागरोपमाणि ॥ २३३ ॥ पञ्चविंशतिः सागरोपमाणि, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । तृतीये जघन्येन, चतुर्विशतिः सागरोपमाणि ॥ २३४ ।। षड विशतिः सागरोपमाणि, उत्कर्षण स्थितिर्भवेत् । चतुर्थे जघन्येन, सागरोपमाणि पञ्चविंशतिः ॥ २३५ ।। सागरोपमाणां सप्तविंशतिस्तु, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । पञ्चमे जघन्येन, सागरोपमाणां तु पड्विंशतिः ॥ २३६ ।। सागरोपमाणामष्टाविंशतिस्तु, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । षष्ठे जघन्येन, सागरोपमाणां सप्तविंशतिः ।। २३७ ।। सागरोपमाणामेकोनत्रिंशत्तु, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । सप्तमे जघन्येन, सागरोपमाणामष्टाविंशतिः ॥ २३८ ।। " , ११८ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय: त्रिंशत्तु सागरोपमाणि, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । अष्टमे जघन्येन, सागरोपमाणामेकोनत्रिंशत् ॥ २३९ ॥ सागरोपमाणामेकत्रिंशत्तु, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । नवमे जघन्येन, त्रिंशत्सागरोपमाणि ॥ २४०॥ त्रयस्त्रिंशत् सागरोपमाणि, उत्कर्षेण स्थितिर्भवेत् । चतुर्धपि विजयादिषु, जघन्येनैकत्रिंशत् ॥ २४१ ।। अजघन्यानुत्कृष्टा, त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि । महाविमाने सर्वार्थे , स्थितिरेषा व्याख्याता ॥ २४२ ॥ भाषा टीका-सौधर्म स्वर्ग की जघन्य आयु एक पल्य तथा उत्कृष्ट आयु दो सागर की है ॥ २०० ॥ ईशान स्वर्ग की जघन्य आयु एक पल्य से कुछ अधिक तथा उत्कृष्ट दो सागर से कुछ अधिक है ॥२२१।। सानत्कुमार स्वर्ग की जघन्य आयु दो सागर तथा उत्कृष्ट आयु सात सागर है ॥ २२२ ॥ माहेन्द्र स्वर्ग की जघन्य आयु दो सागर से कुछ अधिक तथा उत्कृष्ट आयु सात सागर से कुछ अधिक होती है ॥ २२३ ॥ ब्रह्मलोक की नघन्य आयु सात सागर तथा उत्कृष्ट आयु दश सागर होती है ।। २२४ ॥ लान्तक में जघन्य आयु दस सागर तथा उत्कृष्ट आयु चौदह सागर होती है ॥२२५ ॥ महाशुक्र की जघन्य आयु चौदह सागर और उत्कृष्ट आयु सतरह सागर होती है ।। २२६ ॥ सहस्रार की जघन्य आयु सतरह सागर तथा उत्कृष्ट आयु अठारह सागर होती है ।। २२७ ।। आनत स्वर्ग की जघन्य आयु अठारह सागर होती है तथा उत्कृष्ट आयु उन्नीस सागर होती है ।। २२८ ।। प्राणत स्वर्ग को जघन्य आयु उन्नीस सागर तथा उत्कृष्ट आयु वीस सागर होती है ।।२२।। आरण स्वर्ग को जघन्य आयु वोस सागर और उत्कृष्ट आयु इक्कीस सागर होती है ।। २३० ॥ अच्युत स्वर्ग की जघन्य आयु इक्कीस सागर तथा उत्कृष्ट आयु वाईस सागर होती है ॥ २३१ ॥ प्रथम वेयक की जघन्य श्रायु वाईस सागर की तथा उत्कृष्ट आयु तेईस सागर है ॥ २३२ ॥ दूसरे वेयक की जघन्य आयु तेईस सागर तथा उत्कृष्ट आयु चौवीस सागर होती है ॥ २३३ ॥ तीसरे वैयक की नघन्य आयु चौवीस सागर तथा उत्कृष्ट प्रायु पच्चोस सागर होती है ।।२३४।। चतुर्थ वेयक की जघन्य आयु पच्चीस सागर तथा उत्कृष्ट आयु छब्बीस सागर होती है चतुर्थाध्याय : [ ११९ {॥२३५।। पंचम वेयक को जघन्य आयु छब्बीस सागर तथा उत्कृष्ट आयु सत्ताईस सागर होती है ॥२३६ ॥ छटे वेयक को जघन्य आयु सत्ताईस सागर तथा उत्कृष्ट आयु अट्ठाईस सागर होती है ॥ २३७ । सातवें वेयक की जघन्य आयु अट्ठाईस सागर तथा उत्कृष्ट आयु उनतीस सागर है ।। २३८ । आठवे वेयक की जघन्य आयु उनतीस सागर तथा उत्कृष्ट आयु तीस सागर होती है ॥ २३ ॥ नौवे वैयक की जघन्य आयु तीस सागर तथा उत्कृष्ट आयु इकत्तीस सागर होती है २४०॥ विजय वैजयन्त जयन्त और अपराजित नाम के अनुत्तर विमानो की जघन्य आयु इकत्तीस सागर तथा उत्कृष्ट आयु तेतीस सागर होती है ।। २४१॥ सर्वार्थ सिद्धि नाम के महाविमान की उत्कृष्ट और जघन्य आयु तेतीस सागर होती है। इस प्रकार वैमानिक देवो की स्थिति का वर्णन किया गया ।। २४२ ॥ सगति-यह पीछे दिखलाया जा चुका है कि श्रागमो के इस वर्णन मे सूत्रो से थोड़ा वर्गों की संख्या के विषय मे मत भेद है। श्रागमो ने बारह स्वर्ग और उनके बारह ही इन्द्र माने है। किन्तु सूत्रो मे सोलह स्वर्ग और उनके बारह इन्द्र माने गये है। आगमो ने ब्रह्मोत्तर, कापिष्ट, शुक्र और शतार स्वर्ग के अस्तित्व को नही माना है। अतएव स्वर्गो की श्रायु के विषय मे भी नाम मात्र का थोड़ा भेद आगया है। सूत्र तथा दिगम्बर ग्रन्थो में महाशुक्र की उत्कृष्ट आयु सूत्र में सोलह सागर से कुछ अधिक और आगम मे सतरह सागर मानी गई है। सूत्र मे आनत प्राणत की उत्कृष्ट आयु बीस सागर की तथा आगम मे भानत की उन्नीस सागर और प्राणत की उत्कृष्ट आयु बीस सागर मानी गई है। सूत्र मे श्रारण अच्युत की उत्कृष्ट आयु बाईस सागर तथा आगम मे आनत की इक्कीस और प्राणत की उत्कृष्ट आयु वाईस सागर मानी गई है। नव प्रैवेयक की आयु दोनो की समान है। दिगम्बरों में नव वेयकों के पश्चात् एक पटल नव अनुदिश का माना गया है और उसके उपर एक पटल विजयादिक पांच अनुत्तर विमानो का माना गया है। सूत्र के 'च' पद से उन्ही नव अनुदिशो का ग्रहण करना सर्वार्थसिद्धि आदि तत्वार्थसूत्र की टीकाओं में माना गया है। दिगम्बरो के अनुसार नव अनुदिशों की उत्कृष्ट आयु बत्तीस सागर तथा पांच अनुत्तरो की उत्कृष्ट श्रायु तेतीस सागर मानी गई है। किन्तु आगम ग्रन्थो ने नव अनुदिशो का अस्तित्व नही माना है। अत उनमे विजयादि चार विमानो की उत्कृष्ट आयु वत्तीस सागर और सर्वार्थसिध्दि की उत्कृष्ट आयु तेतीस सागर १२० ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : ४, ३५. मानी गई है। उत्कृष्ट आयु के समान जघन्य आयु का भेद स्वयं - लगा लेना चाहिये। किन्तु यह आयु का अन्तर मतान्तर है। इसके अतिरिक्त आयु का विषय तात्विक विषय भी नहीं है कि उसका भेद वास्तविक भेद समझा जावे। नारकाणां च द्वितीयादिषु । दशवर्षसहस्राणि प्रथमायां। ४, ३६. सागरोवममेगं तु, उक्कोसेण वियाहिया । पढमाए जहन्नणं, दसवास सहस्सिया ॥ १६०॥ तिरणेव सागरा ऊ, उक्कोलेण वियाहिया । दोच्चाए जहन्नेणं, एगं तु सागरोवमं ॥ १६१ ॥ उत्तराध्ययन सूत्र अध्ययन ३६। एवं जा जा पुवस्स उक्कोसठिई अस्थि ता ता परओ परो जहण्णठिई अव्वा । सागरोपममेकं तु, उत्कर्षेण व्याख्याता । प्रथमायां जघन्येन, दशवर्पसहस्रिका ॥ १६० ।। त्रीण्येव सागरोपमाणि तु, उत्कर्षेण व्याख्याता। द्वितीयायां जघन्येन, एकं तु सागरोपमम् ॥ १६१ ॥ एवं या या पूर्वस्य उत्कृष्टस्थितिरस्ति सा सा परतः परतः जघन्य- स्थितिः ज्ञातव्या भाषा टीका-प्रयम नरक भूमि की जघन्य आयु दश सहस्र वर्ष की होती है। और उत्कृष्ट श्रायु एक सागर होती है ।। १६० ।। दूसरे नरक की जघन्य आयु एक सागर होती है और उत्कृष्ट आयु तीन सागर होती है ।। १६१ ॥ छाया- " चतुर्थाध्यायः [ १२१ - इसी प्रकार जो पहिले २ की उत्कृष्ट स्थिति है वह बाद २ वाले की जघन्य स्थिति है ॥ १६१ ॥ सगति-इन सूत्रों में और आगम वाक्य मे कोई भी अन्तर नहीं है। भवनेषु च। ४, ३७ भोमेजाणं जहणणेणं दसवाससहस्सिया । उत्तरा० अध्यन ३६ गाथा २१७ छाया- भौमेयानां जघन्येन दसवर्षसहस्रिका । भाषा टीका-भवनवासी देवों की भी जघन्य श्रायु दश सहस्त्र वर्ष होती है। व्यन्तराणाञ्च । ४, ३८. परा पल्योपमधिकम् । ४, ३६. वाणमंतराणं भंते ! देवाणं केवइयं कालं ठिई पण्णता? गोयमा! जहन्नेणं दसवाससहस्साई उक्कोसेणं पलिओवमं । प्रज्ञापना०स्थितिपद ४. छाया व्यन्तराणां भगवन् देवानां कियती स्थितिः प्रज्ञता ? गौतम! जघन्येन दशवर्षसहस्रिका उत्कणेरण पल्योपमा । प्रश्न-भगवन् व्यन्तरो की आयु कितनी होती है ? उत्तर-जघन्य दशसहस्र वर्ष और उत्कृष्ट एक पल्य। ज्योतिष्काणाञ्च। ४, ४०. तदष्टभागोऽपरा। ४,४१. - १२२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : पलिओवममेगं तु. वासलक्खेण साहियं । पलिओवमट्ठभागो, जोइसेसु जहन्निया ॥ २१६ ॥ उत्तरा० अध्यन ३६. छाया- पल्योपममेकं तु, वर्षलक्षण साधिकम् । पल्योपमस्याष्टमभागः, ज्योति केषु जयन्यिका ॥ २१९ ।। भाषा टीका-ज्योतिष्क देवो की उत्कृष्ट आयु एक लाख वर्प अधिक एक पल्य होती है। और जघन्य आयु पल्य का आठवां भाग प्रमाण होती है। लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषाम् । ४, ४२ लोगतिकदेवाणं जहण्णमणुक्कोसेणं अट्ठसागरोवमाई ठिती पराणत्ता। स्थानांग स्थान सूत्र ६२३. व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक ६ उद्देश्य ५. छाया- लौकान्तिकदेवानां जघन्यानुत्कर्गेण अष्टसागरोपमा स्थितिः प्रज्ञप्ता। भाषा टीका-लौकान्तिक देवो की उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति आठ सागर होती है। संगति-इन सब सूत्रो में आगमो से नाम मात्र का ही अन्तर है। कई स्थलो पर तो शन्द २ मिलते हैं। इति श्री-जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम-महाराज-सगृहीते तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वये चतुर्थाध्या व्यायः समाप्तः॥४॥ * पञ्चमोऽध्यायः अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः। ५, १ चत्तारि अस्थिकाया अजीवकाया पण्णत्ता, तं जहा धम्मत्थिकाए, अधम्मत्थिकाए, आगासत्थिकाए पोग्गलत्थिकाए। स्थानांग स्थान ४, उद्दे० १ सूत्र २५१ व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक ७ उद्दे० १० सूत्र ३०५ चत्वारः अस्तिकायाः अजीवकायाः प्रज्ञप्ता:- तद्यथा - "धर्मास्ति- कायः, अधर्मास्तिकायः, अकाशास्तिकायः, पुद्गलास्तिकायः ।" चार अजीव अस्तिकाय होते हैं-धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय और पुद्गलास्तिकाय । द्रव्याणि । जीवाश्च। छाया- भाषा टीका ५, २. कइविहाणं भंते! दव्वा पण्णत्ता? गोयमा ! दुविहा पण्णता, तं जहा - "जीवदव्वा य अजीवदव्वा य । अनुयोग० सूत्र १४१. छाया कतिविधानि भगवन् ! द्रव्याणि प्रज्ञप्तानि ? गौतम ! द्विविधानि प्रज्ञप्तानि । तद्यथा-जोवद्रव्याणि अजीबद्रव्याणि च । भगवन् ! द्रव्य कितने प्रकार के होते है ? उत्तर- गौतम ! द्रव्य दो प्रकार के होते हैं - जीव द्रव्य और अजीव द्रव्य । सगति इस आगम वाक्य के शब्दो मे सूत्रो से सकोच विस्तार के अतिरिक्त प्रश्न - १२४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : और कोई भेद नहीं है। इसके अतिरिक्त इस आगमवाक्यं ने प्रथम सूत्र के भाव को तो खोलकर दर्शा दिया है। नित्यावस्थितान्यरूपाणि । ५, ४ रूपिणः पुद्गलाः। . ५,५ पंचत्थिकाए न कयाइ नासी न कयाइ नस्थि न कयाइ न भविस्सइ भुविं च भवइ अ भविस्सइ अ धुवे नियए सासए अक्वए, अव्वए. अवट्ठिए. निच्चे अरूबी। नन्दिसूत्र० सूत्र ५८. पोग्गलत्थिकायं रूविकायं । व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक ७ उद्देश्य १०. छाया- पञ्चास्तिकायः न कदाचित् नासीत् , न कदाचित् न भवति, न कदाचित् न भविष्यति, अभूत च, भवति च, भविष्यति च, ध्रुवः नियतः शाश्वतः अक्षतः अन्ययः अवस्थितः नित्थः अरूपी। पुद्गलास्तिकायः रूपिकायः। भाषा टीका यह असम्भव है कि पांच अस्तिकाय किसी समय मे न थे, या नही होते, या कभी भविष्य में न होगे। यह सदा थे, सदा रहते हैं और सदा रहेगे । यह ध्रुव, निश्चित, सदा रहने वाले, कम न होने वाले, नष्ट न होने वाले, एक से रहने वाले, नित्य और अरूपी हैं। इनमें केवल पुद्गल अस्तिकाय रूपी द्रव्य है। आ आकाशादेकद्रव्याणि । निष्क्रियाणि च। ५, ७.

पश्चमोध्याय: [ १२५ धम्मो अधम्मो आगासं दव्वं इक्विकमाहियं । अणताणि य दव्वाणि कालो पुग्गलजंतवो।। उत्तराध्ययन० अध्य०२८ गाथा ८. अवट्टिए निच्चे। नन्दि० द्वादशाङ्गी अधिकार सून ५८. छाया- धर्मः अधर्मः आकाशं द्रव्यमेकैकमाख्यातम् । अवस्थितः नित्यः । अनन्तानि च द्रव्याणि, कालः पुद्गलजन्तवः । भाषा टीका-धर्म, अधर्म और आकाश द्रव्य एक २ हैं । क्रिया रहित निश्चित और नित्य हैं। काल और पुद्गल द्रव्य अनत होते हैं। असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधर्मकजीवानाम् । ५, चत्तारि पएसग्गेणं तुल्ला असंखेजा पण्णत्ता. तं जहा- धम्मस्थिकाए, अधम्मस्थिकाए, लोगागासे, एगजीवे । स्थानांग० स्थान ४ उद्देश्य ३ सूत्र ३३४ छाया चत्वारः प्रदेशाग्रेण (प्रदेशपरिमाणेन) तुल्याः असंख्येयाः प्रज्ञप्ताः। तद्यथा- धर्मास्तिकायः अधर्मास्तिकायः, लोकाकाशः, एकजीवः । भाषा टीका-प्रदेशों की सख्या की अपेक्षा से चार के बराबर २ असंख्यात प्रदेश होते हैं। धर्मास्ति काय, अधर्मास्तिकाय, लोकाकाश और एक जीव द्रव्य के आकाशस्याऽनन्ताः । ५, ६. आगासत्थिकाए पएसट्टयाए अणंत गुणे । " प्रज्ञापना पद ३ सुत्र ४१ १२६ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : छाया आकाशास्तिकायः प्रदेशापेक्षयाऽनन्तगुणः। भाषा टीका - प्रदेशो की अपेक्षा आकाश अस्ति काय अनन्त गुणा है, अर्थात आकाश द्रव्य के अनंत प्रदेश होते हैं। संख्येयाऽसंख्येयाश्च पुद्गलानाम् । ५, १०. नाणोः। ५, ११. रूवी अजीवदव्वाणं भंते! कइविहा पण्णत्ता ? गोयमा! चउविहा पण्णता. तं जहा - "खंधा, खंधदेसा. खंधप्पएसा परमाणुपोग्गला....."अणंता परमाणुपुग्गला, अणंता दुपएसिया खंधा जाव अणंता दसपएसिया खंधा अणंता संखिज्जपएसिया खंधा, अणंता असंखिज्जपएसिया खंधा, अणंता अशंतपएसिया धा। प्रजापना ५ वां पद छाया- रूपिणः अजीवद्रव्याणि भगवन् ! कतिविधानि प्रजातानि? गौतम ! चतुर्विधानि प्रज्ञप्तानि। तद्यथा-स्कन्धाः, स्कन्धदेशाः, स्कन्धप्रदेशाः, परमाणुपुद्गलाः॥ अनन्ताः परमाणुपुद्गलाः, अनन्ताः द्विप्रदेशिकाः स्कन्धाः, यावत् अनन्ताः दशप्रदेशिकाः स्कन्धाः, अनन्ता संख्यातप्रदेशिकाः स्कन्धाः, अनंताः असंख्यातप्रदेशिकाः स्कन्धाः, अनन्ताः अनन्तप्रदेशिकाः स्कन्धा । भगवन् ! रूपी अजीव द्रव्य कितने प्रकार के होते हैं ? गौतम ! चार प्रकार के होते हैं - स्कन्ध, स्कन्ध देश, स्कन्ध प्रदेश और परमाणु पुद्गल। परमाणु पुद्गल अनन्त होते हैं। दो प्रदेश वाले स्कन्धो से लगाकर दश प्रदेश प्रश्न उत्तर पञ्चमोऽध्याय: [ १२७ वाले स्कन्ध तक सब अनन्त होते हैं। संख्यात प्रदेश वाले स्कन्ध अनन्त होते हैं, असंख्यात प्रदेश वाले स्कन्ध भी अनन्त होते हैं और अनन्त प्रदेश वाले स्कन्ध भी अनन्त होते हैं। संगति सूत्र में पुद्गलो के चार भेद दिये हुए हैं । परमाणु, संख्यात प्रदेश वाले पुद्गल (स्कन्ध), असंख्यात प्रदेश वाले पुद्गल (स्कन्ध ) और 'च' पद से अनन्त प्रदेश वाले पुद्गल (स्कन्ध)। आगम वाक्य में यह भेद दिखलाने के अतिरिक्त स्कन्धो की सख्या भी दे दी है। परमाणु के एक प्रदेश होने के कारण से प्रदेश नहीं माने गये हैं। यह सभी श्रागम वाक्य सूत्रों के साथ बिलकुल मिलते जुलते हैं। लोकाकाशेवगाहः । ५, १२, धम्मो अधम्मो आगासं कालो पुग्गजंतवो । एस लोगुत्ति पण्णत्तो जिणेंहिं वरदंसहि ।। उत्तराध्ययन अध्य०२८ गाथा ७ छाया- धर्मोऽधर्मः आकाशः कालः पुद्गलजन्तवः । एषः लोक इति प्रज्ञप्तः जिनैर्वरदर्शिभिः ॥ भाषा टीका-जिसके अन्दर धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पुद्गल और जीव रहते हों उसको सर्वदर्शी जिनेन्द्र भगवान् ने लोक कहा है। अर्थात् लोकाकाश में सब द्रव्य रहते हैं। धर्माधर्मयोः कृत्स्ने । - धम्माधम्मे य दो चेव, लोगमित्ता वियाहिया । लोगालोगे य आगासे, समए समयखेत्तिए । उत्तराध्ययन अध्ययन ३६ गाथा ७ छाया- धर्माधौं च द्वौ चैव, लोकमात्रौ व्याख्यातौ । लोकेऽलोके चाकाशं, समयः समयक्षेत्रिकः ॥

१२८ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : - भाषा टीका - धर्म और अधर्म नाम के दो द्रव्य सम्पूर्ण लोक भर में व्याप्त आकाश लोक भर में है और उसके बाहिर अलोक में भी सर्वत्र है। व्यवहार काल समय क्षेत्र में है। एक प्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानाम् । ५. १४. एगपएसो गाढा..."संखिजपएसोगाढा असंखिज्ज- पएसो गाढा। प्रज्ञापना पञ्चम पर्यायपद अजीवपर्यवाधिकार। एकप्रदेशावगाहाः संख्येयप्रदेशावगाहाः असंख्येय- प्रदेशावगाहाः। भाषा टीका -पुद्गलों के स्कन्ध [अपने २ परिमाण की अपेक्षा] आकाश के एक प्रदेश मे भी हैं, संख्यात प्रदेशो मे भी हैं और असंख्यात प्रदेशों को भी घेरे हुए हैं। असंख्येयभागादिषु जीवानाम् । ५, १५. लोअस्स असंखेजइभागे। प्रज्ञापना पद २ जीवस्थानाधिकार । छाया- लोकस्य असंख्येय भागे (जीवानाम् ) भाषा टीका - जीवों का अवगाह लोक के असंख्यातवे भाग में है। प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् । ५, १६. दीवं व.....''जीवेवि जं जारिसयं पुवकम्मनिवद्धं बोदिं णिवत्तेइ तं असंखेजेहिं जीवपदेसेहि सचित्तं करेइ खुड्डियं वा महालियं वा। राजप्रश्नीय सुन सूश ७४ पश्चमोऽध्याय: [ १६ छाया-. दीप इव..... जीवोऽपि यद्यादृश्यक पूर्वकर्मनिबद्धं शरीरं निर्वतयति वत् असंख्येयः जीवप्रदेशैः सचित्तं करोति मुद्रं वा महालयं वा। भाषा टीका- अपने पूर्व बांधे हुए कर्म के अनुसार प्राप्त किये हुए शरीर भर को जीव अपने असख्यात प्रदेशों से दीपक के समान सचित्त (सजीव) कर लेता है। फिर चाहे बह शरीर छोटे से छोटा हो या बड़े से बड़ा हो। गतिस्थित्युपग्रही धर्माधर्मयोरुपकारः। आकाशस्यावगाहः। शरीरवाङ्मनःप्राणापानाः पुद्गलानाम् । सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च । परस्परोपग्रहो जीवानाम्। ५, २०. ५, २१. धम्मस्थिकाए णं जीवाणं आगमणगमणभासुम्मेसमणजोगा वइजोगा कायजोगा जे यावन्ने तहप्पगारा चला भावा सव्ये ते धम्मस्थिकाए पवत्तंति। गइलक्खणे णं धम्मत्थिकाए । अहम्मत्थिकाए णं जीवाणं किं पवत्तति ? गोयमा! अहम्म- स्थिकारणं जीवाणं ठाणनिसीयणतुयणमणस्स य एगत्तीभाव. करणता जे यावन्ने तहप्पगारा थिरा भावा सव्वे ते अहम्मस्थि- काये पवत्तंति । ठाणलक्षणे णं अहम्मस्थिकाए ।

-१३० ]- तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वयः : " भागासस्थिकाए णंभंते! जीवाणं अजीवाण य किं पवत्तति? गोयमा! आगासस्थिकारणं जीवदव्वाण य अजीवदव्वाण य भायणभूए एगेण वि से पुन्ने दोहिवि पुन्ने सयंपि माएज्जा। कोडिसएणवि पुन्ने कोडिसहस्संवि माएज्जा ॥१॥ अवगाहणा- लक्खणे णं आगासस्थिकाए। जीवस्थिकारणं भंते ! जीवाणं किं पवत्तति? गोयमा! जीव- स्थिकारणं जीवे अणंताणं आभिणिबोहियनाणपज्जवाणं अणंताणं सुयनाणपज्जवाणं, एवं जहा बितियसए अस्थिकायउद्देसए जाव उवओगं गच्छति, उवोगलक्षणे णं जीवे । व्याख्या प्रज्ञप्ति शतक १३ ७०४ सू० ४०१. "जीवे णं अणताणं आभिणिबोहियनाणपजवाणं एवं सुय- नाणपजवाणं ओहिनाणपजवाणं मणपज्जवनाणप० केवलनाणप० मइअन्नाणप० सुयअण्णाणप० विभंगणाणप० चक्खुदंसणप० अचक्खुदंसणप० ओहिदंसणप० केवलदसणपजवाणं उवोगं गच्छइ०॥ व्याख्या प्रजाप्ति शतक २ उद्देश्य २० सूत्र १२० जीवो उपभोगलक्णो। नाणे दंसणे च सुहेणय दुहेण य। " उत्तराध्ययन अध्य०२८ गाथा १० पोग्गलस्थिकाए णं पुच्छा? गोयमा! पोगलस्थिकाए रणं जीवाणं ओरालियवेउव्वय आहारए तेयाकम्मए सोइंदियचक्खिदि- यघागिदियजिभिदियफासिंदियमणजोगवयजोगकायजोगाणा- पश्चमोऽध्याय: पाणूणं च गहणं पवत्तति । गहणलक्खणे णं पोग्गलस्थिकाए। व्याख्या प्रज्ञप्ति शतक १३ उद्दे० ४ सूत्र ४८१ छाया- धर्मास्तिकायः जोवानां श्रागमनगमनभाषोन्मेषमनःयोगाः वाग्यो- गाः काययोगाः ये चाप्यन्ये तथाप्रकाराः चलाः भावाः सर्वे ते धर्मास्तिकाये सति प्रवर्तन्ते। गतिलक्षणः धर्मास्तिकायः। अधर्मास्तिकायः जीवानां कि प्रवर्तते ? गौतम ! अधर्मास्तिकायः जोवानां स्थाननिषीदनत्वग्वर्तनमनसश्च एकत्वीभावकरणता ये चाप्यन्ये तथामकाराः स्थिराः भावाः सर्वे ते अधर्मास्तिकाये सति प्रवर्तते । स्थितिलक्षणोऽधर्मास्तिकायः। आकाशास्तिकायः भगवन् ! जीवानामजीवानान कि मवर्तते गौतम! आकाशास्तिकायः जीवद्रव्याणाश्चाजीवद्रव्याणाच भाजन- भूतः एकेनापि असौ पूर्ण: द्वाभ्यामपि पूर्णः शतमपि माति। कोटि- गतेनापि पूर्ण: कोटिसहस्रमपि माति ॥१॥ अवगाहनालक्षण: आकाशास्तिकायः। जोवास्तिकायः भगवन् ! जीवानां कि प्रवर्तते १ गौतम ! जीवास्ति- कायः जीवान् अनन्तानां श्राभिनिवोधिकज्ञानपर्यवानां अनन्तान श्रुतज्ञानपर्यवानां एवं यथा द्वितीयशते अस्तिकायोद्देशके यावत् उप- योगं गच्छति, उपयोगलक्षणः जीवः। “जीवो अनन्तानां आभिनि- चोधिकज्ञानपर्यवानां एवं श्रुतज्ञानपर्यवानां अवधि० मनःपर्ययज्ञानप० केवलज्ञानपर्यवानां मत्यज्ञानप० श्रुताज्ञानप० विभंगज्ञानप० चक्षु- दर्शनपर्यवानां अचक्षुदर्शनपर्यवानां अवधिदर्शनपर्यवाना केवल- दर्शनपर्यवानां उपयोगं गच्छति ।" जीवः उपयोगलक्षणः । ज्ञानेन दर्शनेन च, सुखेन च दुःखेन च । पुदगलास्तिकायः पृच्छा ? गौतम ! पुद्गलास्तिकाय: जीवाना , १३२ ] सत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वयः प्रश्न औदारिकवैक्रियिकाहारकतैजसकामणश्रोत्रिंद्रियचक्षरिन्द्रियघ्राणेन्द्रि- यजिव्हेन्द्रियस्पर्शनेन्द्रियमनःयोगवचनयोगकाययोगाऽऽनाप्राणानां च ग्रहणं प्रवर्तते । ग्रहणलक्षणः पुद्गलास्तिकायः । भाषा टोका-धर्मास्तिकाय जीवों के गमन, आगमन, भाषा, उन्मेष, मनोयोग, पचनयोग, और फाययोग के लिये निमित्त होता है ] । इनके अतिरिक्त और जो भी इस प्रकार के चल भाव है वह सब धर्मास्तिकाय के होने पर ही होते हैं, क्योंकि धर्मास्ति- काय गति लक्षण वाला है। अधर्मास्तिकाय जीवों के लिये क्या करता है ? उत्तर--गौतम ! अधर्मास्तिकाय जीवों के लिये ठहरना, बैठना, त्वग्वर्तन (करवट बदलना), और मन की एकाग्रता करता है । इनके अतिरिक्त और जो भी इस प्रकार के स्थिर भाव हैं यह अधर्मास्तिकाय के होने पर ही होते हैं, क्योंकि अधर्मास्तिकाय स्थिति लक्षण वाला है। प्रश्न -भगवन् ! आकाशास्तिकाय जीव और पुद्गलो के लिये क्या करता है ? उत्तर- गौतम ! आकाश द्रव्य जीवद्रव्यो और अजीवद्रव्यों को स्थान देने वाला है । यह एक से भी भरा हुआ (पूर्ण) है, दो से भी भरा हुआ है, एक करोड़ और अरब से भी भरा हुआ है तथा एक खरव जीव तथा पुद्गल स्कन्धों से भी भरा हुआ है । क्यो कि आकाशास्तिकाय अवगाहना लक्षण वाला है। प्रश्न- भगवन् ! जीवास्तिकाय जीवों के लिये क्या करता है ? उत्तर- गौतम जीवास्तिकाय अनन्त मतिज्ञानपर्याय वाले जीवों के, इसी प्रकार श्रुतज्ञान पर्याय वाले जीवो के, अवधि ज्ञान पर्याय वाले जीवों के, मनःपर्यय ज्ञान पर्याय वाले जीवों के, केवल ज्ञान पर्याय वाले जीवों के, मतिअज्ञान पर्याय वाले जीवों के, श्रुत अज्ञान पर्याय वाले जीवों के, विभंगज्ञान पर्याय वाले जीवो के, चक्षुदर्शन पर्याय वाले जीवों के, अचक्षुदर्शन पर्याय वाले जीवों के, अवधि दर्शन पर्याय वाले जीवों के और केवल दर्शन पर्याय पाले जीवो के उपयोग को प्राप्त होता है । ज्ञान, दर्शन, सुख और दुख के द्वारा भी [जीय उपकार करता है ] जीव का लक्षण उपयोग है पुगतास्तिकाय म्या करता है ? -- पञ्चमोऽध्याय: [ १३३ - संगति-सूत्र उत्तर- गौतम!- पुद्गलास्तिकाय जीवों के लिये औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस, कार्मण, कणेन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, घाणेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, स्पर्शनेन्द्रिय, मनोयोग, बचन योग, काय योग और श्वासोच्छास का ग्रहण कराता है। पुद्गलास्तिकाय प्रहण लक्षण वाला है। वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य। ५, २२. वत्तना लक्षणो कालो० । उत्तराध्यवनप्पयन २८ गाथा १० छाया- वर्तनालक्षणः कालः । भापा टीका काल वर्तनालक्षण वाला है। सूत्र और आगम के इस पाठ को मिलाने से धर्म और अधर्म द्रव्य की परिभाषाओं की कुजी खुल जाती है। श्रागम में विशेष अवश्य है, किन्तु वह जितना भी है अत्यन्त आवश्यक है । काल द्रव्य के परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व का वर्तना में ही अन्तर्भाव हो जाता है । अतः आगमवाक्य मे कालद्रव्य को केवल वर्तना "लक्षण मे ही समाप्त कर दिया गया है। स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः। ५, २३ पोग्गले पंचवाणं पंचरले दुगंधे अट्ठफासे पराणते । व्याख्या प्रज्ञप्ति शतक १२ उद्दे० ५ सूत्र ४५०. छाया- पुद्गलः पञ्चवर्णः पञ्चरसः द्विगन्धः अष्टस्पर्शः प्रज्ञप्तः । भाषा टीका --- पुद्गल में पांच वर्ण, पांच रस, दो गध और आठ स्पर्श होते हैं। शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतम- श्छायातपोद्योतवन्तश्च। , ५, २४ १३४ ] सत्त्वार्थसूत्रजेनाऽऽगमसमन्वय : सहन्धयार-उज्जोओ, पभा छाया तवो इवा । वरणरसगन्धफासा, पुग्गलाणं तु लक्खणं ॥ १२ ॥ एगत्तं च पुहत्तं च, संखा संठाणमेव च । संजोगा य विभागा य, पजवाणं तु लक्खणं ॥ १३ ॥ उत्तराध्ययन० अध्ययन २८. . छाया- शब्दोऽधकार उद्योतः प्रभाच्छायातम इति वा । वर्णरसगन्धस्पर्शाः, पुद्गलानां तु लक्षणम् ।। १२ ।। एकत्वं च पृथकत्वं च, संख्या संस्थानमेव च । संयोगाश्च विभागाश्च, पर्यवाणां तु लक्षणम् ॥ १३ ॥ भाषा टीका-शब्द, अन्धकार, उद्योत, प्रभा, छाया, पातप, वर्ण, रस, गंध और सर्श पुद्गलों के लक्षण हैं ।। १२ ।। एकत्व, पृपस्त्व, संख्या, संस्थान, संयोग और विभाग 'पुद्गल पर्यायों के सक्षम है।।१३॥ संगति - इसमें सौक्ष्म्य तथा स्थौल्य के अतिरिक्त अन्य सभी शब्द आ जाते हैं। किन्तु यह दोनों शब्द इतने महत्व पूर्ण नहीं हैं कि इनका विशेष रूप से वर्णन किया ५, २५. अणवः स्कन्धाश्च। दुविहा पोग्गला पण्णात्ता, तं जहा-परमाणुपोग्गला नोपर- मारणुपोग्गला चेव । स्थानांग स्थान २ ३०३ सू० ८२ छाया- द्विविधौ पुदगलौ प्राप्तौ। तद्यथा-परमाणुपुद्गलाश्च, नोपरमाणु- पुद्गलाश्चैव । भाषा टीका --- पुद्गल दो प्रकार के होते हैं- परमाणुपुद्गल और नोपरमाणु पुगढ़।

पञ्चमोऽध्यायः [ १३५ संगति- अणुं तथा परमाणु पुद्गल और स्कन्ध तथा नोपरमाणु पुद्गल में नाम मात्र का ही भेद है। तात्विक भेद नहीं है। भेदसङ्घातेभ्यः उत्पद्यन्ते। ५, २६. भेदादणुः। h दोहिं ठाणेहिं पोग्गला साहाणंति, तं जहा-सई वा पोग्गला साहन्नंति परेण वा पोग्गला साहन्नति । सई वा पोग्गला भिजति परेण वा पोग्गला भिजति । स्थानांग स्थान २, ३०३, सूत्र २. छाया द्वाभ्यां स्थानाभ्यां पुद्गलाः संहन्यन्ते । तद्यथा- स्वयं वा पुद्गलाः संहन्यन्ते परेण वा पुद्गलाः संहन्यते । स्वयं वा पुद्गलाः भियन्ते परेण वा पुद्गलाः भियन्ते । भाषा टीका - दो प्रकार से पुद्गल एकत्रित होकर मिलते हैं-या तो स्वयं मिलते हैं अथवा दूसरे के द्वारा मिलाये जाते है, या तो पुद्गल स्वयं भेद को प्राप्त होते है अथवा दूसरो के द्वारा भेद को प्राप्त होते है । संगति - पुद्गलो के अणु और स्कन्ध भेद और संघात दोनो से ही बनते है । चाहे वह भेद या संघात स्वय हो अथवा दूसरे के द्वारा हो । अणु केवल भेद से ही होता है, सघात से नहीं होता। भेदसंघाताभ्यां चाक्षुषः । ५, २८ चक्खुदंसणं चक्खुदंसणिस घड पड कड रहाइएसु दव्वेसु । अनुयोग० दर्शनगुणप्रमाण सू० १४४. छाया- चक्षुदर्शन चक्षुदर्शिनः घटः पट: कटः रथादिषु द्रव्येषु ।

१३६ ] तस्वार्थसूत्रजैमाऽऽगमसमन्वय : भाषा टीका-चक्षु दर्शन पाले को घट, पट, रथ आदि द्रव्यों में चक्षु, दर्शन होता है। संगति -- यह सभी द्रव्य चक्षु दर्शन द्वारा जाने के कारण चाक्षुष कहलाते हैं। थाशुष ट्रटम भी भेद भौर संघात दोनों से ही बनते हैं। सद्रव्यलक्षणम् । २६ - सहव्वं था। व्याख्या प्रज्ञप्ति शत०८ उ०१ सत्पदद्वार. लाया- सद्व्यं वा । भाषा टीका द्रव्य का लक्षण सत् है। उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् । ३०. माउयाणुओगे (उपन्ने वा विगए वा धुवे वा।) स्थानांग स्थान १०. छाया-- मातृकानुयोगः (उत्पन्नः वाः विगतः वा, ध्रुवः वा)। भाषा टीका उत्पन्न होने वाले, नष्ट होने वाले और ध्रुव को मातृकानुयोग कहते हैं। [और वही सत है। तभावाऽव्ययं नित्यम्। परमाणुपोग्गलेणं भंते! किं सासए असासए ? गोयमा! दवट्ठयाए सासए वन्नपज्जवेहिं जाव फासपजवेहि असासए । व्याख्याप्रब्रप्ति० शतक १४ उहे०४ सूत्र ५१२, जीवाधिगम० प्रतिपत्ति ३ उद्दे० १ सत्र ७७ छाया परमाणुपुद्गलः भगवन् ! कि शाश्वतः अशाश्वतः गौतम! द्रव्या- वर्णपर्यायः यावत् स्पर्शपर्यायैः प्रशाश्वतः ।। ? तया शाश्वत:, पञ्चमोऽध्याय: प्रश्न A भगवन् परमाणु पुद्गल नित्य है अथवा अनित्य ? उत्तर-गौतम! द्रव्यार्थिक नय से नित्य है तथा वर्ण पर्यायों से लेकर स्पर्श पर्यायों तक की अपेक्षा अनित्य है। संगति- सूत्र में कहा है कि जो तद्भावरूप से अव्यय है सो ही नित्य है। सूत्र- कार का आशय यहां द्रव्यो से है कि द्रव्य नित्य हैं। किन्तु आगमवाक्य ने द्रव्य के नित्य और अनित्य दोनो रूपो को स्पष्ट कर दिया है। अर्पिताऽनर्पितसिद्धः। ५, ३२. अप्पितणप्पिते । स्थानांग० स्थान १० सूत्र ७२७. छाया अर्पितानर्पिते । भाषा टीका-जिसको मुख्य करे सो अर्पित और जिसको गौण करे सो अनर्पित है । इन दोनो नयो से वस्तु की सिद्धि होती है। स्निग्धरूक्षत्वाद्वन्धः। ५, ३३ न जघन्यगुणानाम् । ५, ३४ ५, ३५. गुणसाम्ये सदृशानाम् । द्वयधिकादिगुणानान्तु । बन्धेऽधिको पारिणामिको च। ५, ३६. ५, ३७. बंधणपरिणामेणं भंते! कतिविधे पण्णत्ते ? गोयमा! दुविहे १३६ वयार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : पएणते, तं जहा--णिद्धबंधणपरिणामे लुक्खवंधणपरिणामे य,- 'समणिद्धयाए बंधो न होति समलुक्खयाएवि ण होति । मायणिद्धलुक्वत्तणेण बंधो उ खंधाणं ॥ १ ॥ णि शस्त णिद्धण दुयाहिएणं, लुक्वस्त लुक्खेण दुयाहिएणं। निद्धल्स लुक्वेण उवेइ बंधो, जहण्णवजो विलमो समो वा ॥२॥ प्रज्ञापना० परिणाम पद १३ सूत्र १८५. छाया- बन्धनपरिणामः भगवन् कतिविधः प्रज्ञप्तः ? गौतम! द्विविधः प्रज्ञप्तस्वद्यथा, --स्निग्धवन्धनपरिणामः रुक्षबन्धनपरिणामश्च,- 'समस्निग्धतायां वन्धो न भवति, समक्षतायामपि न भवति । वैमात्रस्निग्धरूक्षत्वेन बंधस्तु स्कन्धानाम् ॥१॥ स्निग्धस्य स्निग्धेन दयधिकादिकेन, रूक्षस्य रूक्षेण घधिकादिकेन । स्निग्धस्य रूक्षेण (सह) स्पैति बन्धः, जघन्यवयः विपमः समो वा ॥२॥ भगवन् ! बन्धन परिणाम कितने प्रकार का बतलाया गया है ? गौतम ! दो प्रकार का बतलाया गया है। स्निग्धवन्धन परिणाम और रुपन्धन परिणाम । घरावर स्निग्धता होने पर बंध नहीं होता। बराबर रूक्षता होने पर भी बन्ध नहीं होता। स्कन्धों का बन्ध स्निग्धता और रूक्षता की मात्रा में विषमता से होता है। दो गुण अधिक होने से स्निग्ध का स्निग्ध के साथ बन्ध हो जाताहै, तथा दो गुण अधिक होने से सक्ष का रूक्ष के साथ भी बन्ध हो जाता है। स्निग्ध का रूक्ष के साथ बन्ध हो आता है। किन्तु जघन्य गुण वाले का विषम या सम किसी के साथ भी बन्ध उत्तर नहीं होता। संगति इन सूत्रो और भागमवाक्य का साम्य देखने योग्य है। गुणपर्यायवद्दव्यम्। ३८ है पञ्चमोऽध्यायः [ १३६ गुणाणमासओ दव्वं, एगदव्वस्सिया गुणा। लक्षणं पजवाणं तु, उभओ अस्सिया भवे ।। उत्तराध्ययन सूत्र अध्ययन २८ गाथा ६. छाया- गुणानामाश्रयो द्रव्यं, एकद्रव्याश्रिता गुणाः । लक्षणं पर्यवाणां तु, उभयोराश्रिता (स्युः) भवन्ति ॥६॥ भाषा टीका --द्रव्य गुणो के आश्रित होता है, गुण भी एक द्रव्य के आश्रित होते हैं। किन्तु पर्याय द्रव्य और गुण दोनो के आश्रय होती है । सारांश यह है कि द्रव्य मे गुण और पर्याय दोनो होती है। कालश्च। ५,३६. छविहे दव्वे पण्णत्ते, तं जहा-धम्मस्थिकाए, अधम्मस्थि- काए, आगासत्थिकाए, जीवत्थिकाए, पुग्गलत्थिकाए, अद्धासमये अ, सेतं दव्वणामे। अनुयोगद्वार० द्रव्यगुणपर्यायनाम सू० १२४. छाया- पड विधानि द्रव्याणि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा-धर्मास्तिकायः, अधर्मा- स्तिकायः, आकाशास्तिकायः, जीवास्तिकायः, पुद्गलास्तिकायः, श्रद्धासमयश्च, तत् द्रव्यनाम । भाषा टीका द्रव्य छै प्रकार के कहे गये है-धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय और अद्धा समय (काल)। संगति-आगम मे कालद्रव्य को अद्धा समय भी कहा गया है। सोऽनन्तसमयः। ८ ५, ४०. अणंता समया । व्याख्या प्रज्ञप्ति शत० २५ उ० ५ सू० ७४७.

१४० ] तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वयः द्र छाया अनन्ता: समयाः । भाषा टीका-कालद्रव्य में अनन्त समय होते हैं। द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः। इब्धस्सिया गुणा। उचराध्ययन अध्ययन २८, गाथा ६. द्रव्याश्रयाः गुणाः। भाषा टीका---गुण द्रव्य के श्राश्रय होते हैं [और स्वयं निर्गुण होते हैं । तझावः परिणामः। दुविहे परिणामे पएणते, तं जहा-जोवपरिणामे य अजोव- परिणामे या प्रज्ञापना परिणाम पद १३ सू० १८१. पा- विविधः परिणामः प्रज्ञप्तः, तद्यथा--जीवपरिणामश्च अजीव- परिणामश्च । परिणामो हार्थान्तरगमर्न न च सर्वथा व्यवस्थानम् । म च सर्वथा विनाशः परिणामस्तद्विदामिष्टः ।। इति वृत्तिकार. भाषा टीफा-परिणाम दो प्रकार का होता है-जीव परिणाम और धजीव परिपामा वृत्तिकार ने कहा है कि एक अर्थ से दूसरे अर्थ में प्राप्त होने को परिणाम कहते हैं। सब प्रकार से दूसरा रूप भी नहीं हो जाता और न सब प्रकार से प्रथम रूप नष्ट ही होता है, से परिणाम कहते हैं। संगति- इन सूत्रों का आगमवाक्यों के साथ साम्य सष्ट है। इति श्री-जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम महाराज-संगृहीते हस्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्धये पञ्चमोऽध्यायः समातः ॥ ५ ॥ * in षष्ठोऽध्यायः कायवाङ्मनः कर्म योगः। ६, १. तिविहे जोए पण्णत्ते । तं जहा-मणजोए, वइजोए, कायजोए। व्याख्या प्रज्ञप्ति० शतक० १६ उद्दे० १ सूत्र ५६४ छाया त्रिविधः योगः प्रज्ञप्तः । तद्यथा - मनःयोगः वाग्योगः काययोगः। भाषा टीका-योग तीन प्रकार का होता है -मन योग, वचन घोग और काय योग! सास्त्रवः । - पञ्च आसवदारा पण्णत्ता, तं जहा-मिच्छत्तं, अविरई, पमाया, कासाया, जोगा। समवायांग समवाय ५. छाया- पञ्च श्रास्रवद्वारा: प्रज्ञप्ताः तद्यथा - मिथ्यात्वं, अविरति :, प्रमादाः, कपायाः, योगाः । भाषा टीका-आस्रव के पांच द्वार होते हैं -मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग। संगति- यहां सूत्र और आगम वाक्य में सामान्य तथा विशेष कथन का भेद है। सूत्रकार ने योग को ही आस्रव माना है, किन्तु श्रागम वाक्य में भेद विवक्षा से प्रास्रम के पांचों कारणों को ही प्रासप माना है, जिनमें मोग भी एक कारण है।

१४२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : शुभः पुण्यास्याऽशुभः पापस्य । पुण्णं पावासवो तहा। उत्तराध्ययन अध्ययन २८ गाथा १४ छाया- पुण्यं पापासवस्तथा। भाषा टीका उस आस्रव के दो भेद होते हैं, शुभ कर्मों का पुण्य रूप शुभ भास्त्रव होता है और अशुभ कर्मों का पाप रूप अशुभ आस्रव होता है । सकषायाऽकषाययोः साम्परायिकर्यापथयोः । ६, ४. जस्स णं कोहमाणमायालोभा वोच्छिना भवन्ति तस्स णं ईरियाबहिया किरिया कज्जइ नो संपराइया किरिया कज्जइ, जस्स णं कोहमाणमायालोभा अवोच्छिन्ना भवन्ति तस्स णं संपराय- किरिया कजइ नो ईरियाबहिया । व्याख्या प्रज्ञप्ति शतक ७ उहे० १ सूत्र २६७. यस्य क्रोधमानपायालोभाः व्यवच्छिन्नाः भवन्ति तस्य ईर्यापथिका क्रिया क्रियते, नो साम्परायिका क्रिया क्रियते। यस्य क्रोधमान- मायालोमा अव्यवछिन्ना भवन्ति तस्य साम्परायिका क्रिया क्रियते नो ईर्यापथिका। भाषा टीका--जिसके क्रोध, मान, माया और लोभ नष्ट हो जाते हैं उसके ईर्या- पथिका क्रिया (आसूव) होती है उसके साम्परायिक क्रिया नहीं होती। किन्तु जिसके क्रोध, मान, माया और लोभ नष्ट नही होते उसके साम्परायिका क्रिया (आस्रव) होती है। उसके ईर्यापथिका क्रिया नहीं होती। इन्द्रियकषायाव्रतक्रियाः पञ्चचतुःपञ्च- १ छाया- पष्टोऽध्याय: [ १४३ पञ्चविंशतिसंख्याः पूर्वस्य भेदाः । & ६. ६, ५ पंचिदिया पण्णत्ता' चत्तारिकषाया पण्णता पंच अविरय पण्णता "पंचवीसा किरिया पगात्ता' स्थानांग स्थान २ उद्देश्य १ सूत्र ६० छायां-- पञ्चेन्द्रियाणि प्रज्ञप्तानि-चत्वारः कपायाः प्रज्ञप्ताः, पञ्चावताः प्रज्ञप्ताः पञ्चविंशतयः क्रियाः प्रज्ञप्ताः। भाषा टीका - इन्द्रियां पांच होती हैं, कषाय चार होती हैं, अविरत पांच होते हैं। और क्रिया पच्चीस होती है, [यह प्रथम साम्परायिक आस्रव के भेद हैं ] । तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेषे- भ्यस्तद्विशेषः । जे केइ खुदका पाणा, अदु वा संति महालया । सरिसं तेहिं वेरंति असरिसं ती व वदे ॥६॥ एएहिं दोहि ठाणेहि, ववहारो ण विजई। एएहिं दोहिं ठाणेहिं, अणायारं तु जाणए ॥७॥ सूत्रकृताग, श्रुतस्कन्ध २ अध्याय ५ गाथा ६-७ व्याख्या-ये केचन क्षुद्रकाः सत्त्वाः प्राणिनः एकेन्द्रियद्वीन्द्रियादयोऽल्पकाया वा पञ्चेन्द्रिया अथवा महालया महाकाया सति विद्यन्ते, तेषां च क्षु द्रकाणामल्प- कायानां कुन्थ्वादीनां महानालय शरीर येषां ते महालयाः हस्त्यादयस्तेषां च व्यापादने, सदृशं, वैरमिति, वन कर्मविरोधलक्षण वा वैरं तत् सदृश समान, अल्पप्रदेशत्वात्सर्व- जंतूनामित्येवमेकान्तेन नो वदेत् । तथा विसदृशं असदृशं तद्व्यापत्तौ वैरं कर्मवन्धो विरोधो वा इन्द्रियविज्ञानकायानां विसहशत्वात् । सत्यपि प्रदेश अल्पत्वेन सदृशं वैर- मित्येवमपि नो वदेत् । यदि हि वध्यापेन एव कर्मवन्धः स्यात्तदा तत्तद्वशात्कर्मणोऽपि १४४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्धय: छाया- ये केऽपि क्षुद्रकाः माणाः, अथवा सन्ति महालयाः । सदृशं तैः वैरं इति, असदृशं इति वा नो वदेत् ॥ ६॥ एताभ्यां द्वाभ्यां स्थानाभ्यां, व्यवहारो न विद्यते । एताभ्यां द्वाभ्यां स्थानाभ्यां, अनाचारं तु जानीयात् ॥ ७ ॥ भाषा टीका जो कोई भी छोटे अथवा बड़े जीव हैं उनके मारने का पाप बराबर होता है । बराबर नहीं होता ऐसा न कहे । इन दोनो स्थानों से व्यवहार नहीं होता। और इन्हो दोनो स्थानो से अनाचार का ज्ञान होता है। - सादृश्यमसादृश्यं वा वक्तुं युज्यते । न च तद्वशादेव बंधः, अपि त्वध्यवसायवशादपि । ततश्च तोत्राध्यवसायिनोऽल्पकायसत्त्वव्यापादनेऽपि महवरं । अकामस्य तु महाकायसत्त्वव्यापादने ऽपि स्वल्पमिति ॥६॥ एतदेव सूत्रेणैव दर्शयितुमाह श्राभ्यामनन्तरोक्ताभ्यां स्थानाभ्यामनयोर्वा स्थान- थोरल्पकायमहाकायव्यापादनापादितकर्मबन्धसदृशत्वयोर्व्यवहरणं व्यवहारो नियुक्तिक- त्वान्न युज्यते । तथाहि, न वध्यस्य सहशत्वमसदृशत्वं चैकमेव । कर्मबन्धस्य कारणं । अपि तु वधकरच तीव्रभावो मन्दभावो ज्ञातभावोऽज्ञातभावो महावीर्यत्वमल्पवीर्यत्वं चेत्येतदपि । तदेवं वध्यवध्यकयोर्विशेषात्कर्मवन्धविशेष इत्येवं व्यवस्थिते । वध्यमेवाश्रित्य, सहशत्वासहशत्वव्यवहारो न विद्यत इति । तथाऽनयोरेव स्थानयोः प्रवृत्तस्यानाचारं, विजानीयादिति । तथाहि, यज्जीवसाम्यात्कर्मवन्धसहशत्वमुच्यते, तदयुक्त, यतो न हि जीव- व्यापत्या हिसाच्यते, तस्य शाश्वतत्वेन व्यापादयितुमशक्यत्वात् । अपि त्विंद्रियादिव्यापत्या तथा चोक्त, पञ्चेद्रियाणि, त्रिविधं बल च उच्छ्वासनि.श्वासमथान्यदायुः प्राणा दर्शते भगवद्भिक्ता, स्तेषां वियोजोकरणं तु हिसा ॥ १॥ इत्यादि, अपि च भावसव्यपेक्षस्यैव, कर्मबन्धोऽभ्यपेतु युक्त, तथाहि, वैद्यस्यागमसव्यपेक्षस्य, सम्यक् क्रियां कुर्वतो, यद्यप्यातुर- विपत्तिभवति, तथापि, न वैरानुषड्गो भावदोषाभावाद् । अपरस्य तु सर्पबुद्धया रज्जुमपि घ्नतो भावदोषात्कर्मवन्धः । तद्रहितस्य तु न बन्ध इति । उक्त चागमे, उच्चालयमिपाए । इत्यादि तण्डुलमत्स्याख्यानकं तु सुप्रसिद्धमेव । तदेवंविधवभ्यवधकभावापेक्षया स्यात् । सदृश स्याद- महशत्वमिति । अन्यथाऽजाचार इति ।।७।। वृत्ति शीलााचार्य वृत. . , पष्ठोऽध्याय: [ १४५ संगति - सूत्र में कहा है कि तीव्र भाव, मन्द भाव, ज्ञात भाव, अज्ञात भाव, अधिकरण और वीर्य की विशेषता से उस श्रासूव मे विशेषता (न्यूनाधिकता) होती है। आगम वाक्य में इसी बात को बिलकुल बदले हुये शब्दो में और प्रकार से कहा गया है । अधिकरणं जीवाऽजीवाः । ६, ७. जीवे अधिकरण। व्याख्या प्रज्ञप्ति श०१६, उ० १. एवं अजीवमवि । स्थानांग स्थान २, उ० १, सू०६०. छाया- जोवोऽधिकरणं, एवमजीवमपि । भाषा टीका- आसूव का अधिकरण (आधार ) जीव और अजीव दोनो हैं। आद्यं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारिता- ऽनुमतकषायविशेषैस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः। संरम्भसमारम्भे आरम्भे य तहेव य । उ० अध्य०२४ गाथा २१. तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कार- वेमि करत पि अन्नं न समणुजाणामि । दशवैकालिक अ०४ जरस णं कोहमाणमायालोभा अवोच्छिन्ना भवंति तस्स णं संपराइया किरिया। व्याख्या प्रज्ञप्ति श०७, ७० १, सू० १८. छाया संरम्भः समारम्भः आरम्भश्च तथैव च । त्रिविधं त्रिविधेन मनसा वाचा कर्मणा न करोमि न कारयामि करन्तमप्यन्यं न समनुजानामि । यस्य क्रोधमानमायालोभाः अव्यवच्छिन्ना भवन्ति तस्य साम्प- रायिका क्रिया - १४६ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : भाषा टीका-संरम्भ, समारम्भ और आरम्भ । फिर इन तीनो भेदो को मन, वचन और काय के द्वारा तीन प्रकार करने से नौ भेद हुए। फिर इन नौ को न करना (कृत), न कराना (कारित) और न करते हुए अन्य व्यक्ति का समर्थन करना (अनु- मोदना)। सो यह नौ तिया सत्ताईस भेद हुए। फिर इन सत्ताईसों मे क्रोध, मान, माया और लोभ के होने से [ सत्ताईस चौक एक सौ आठ भेद जीवाधिकरण के होते हैं। संगति इन सब सूत्रो का आगम वाक्यों के साथ नाम मात्र का ही भेद है। निर्वतनानिक्षेपसंयोगनिसर्गाद्विचतुर्द्वित्रि- भेदाः परम् । णिवत्तणाधिकरणिया चेव संजोयणाधिकरणिया चेव । स्थानांग स्थान २, सू० ६०. आइये निक्खिवेजा। उत्तराध्ययन अ० २५, गाथा १४. पवत्तमाणं । उत्तराध्ययन अ० २४, गाथा २१-२३. छाया- निर्वर्तनधिकरणिका चैव संवोगाधिकरणिका चैव । आददीत निक्षिपदा । प्रवर्तमानम् (मनोवचः काये)। भापा टीका - निर्वतनाधिकरण, संयोगाधिकरण, निक्षेपाधिकरण और प्रवर्त- मानाधिकरण (मन, वचन, काय मे प्रवर्तमान) [यह चार भेद अजीवाधिकरण के होतेहै] संगति -प्रवर्तमानाधिकरण और निसर्गाधिकरण मे केवल शाब्दिक भेद ही है, तात्विक भेद विलकुल नहीं है। तत्प्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाता ज्ञानदर्शनावरणयोः। ६, १०.

षष्टोऽध्यायः [ १४७ प्रश्न णाणावरणिज्जकस्मासरीरप्पोगबंधेणं भंते ! कस्स कम्मरस उदएणं? गोयमा! नाणपडिणीययाए णाणनिण्हवणयाए णाणं- तराएणं णाणप्पदोलेणं गाणञ्चासायणाए णाणविसंवादणाजोगेणं, "एवं जहा णाणावरणिज्जं नवरं दसणनाम घेत्तव्वं । व्याख्या प्रज्ञप्ति श० ८. उ० ६. सू० ७५-७६ छाया- ज्ञानावरणीयकार्मणशरीरप्रयोगवन्धः भगवन् ! कस्य कर्मणः उदयेन ? गौतम! ज्ञानप्रत्यनोकतया ज्ञाननिन्हवतया ज्ञानान्तरायण ज्ञानप्रदोषेण ज्ञानात्याशातनया ज्ञानविसंवादनायोगेन एवं यथा ज्ञानावरणीयं नवरं दर्शननाम ग्रहीतव्यम् । भगवन् । किस कर्म के उदय से ज्ञानावरणीय कार्मण शरीर का प्रयोगबन्ध होता है? उत्तर-गौतम ! जानी को शत्रुता करने से, ज्ञान को छिपाने से, बान मे विघ्न डालने से, ज्ञान मे दोष निकालने से, ज्ञान का अविनय करने से, ज्ञान मे व्यर्थ का वाद विवाद करने से ज्ञानावरणीय कर्म का आसूव होता है । इन उपरोक्त कार्यो मे दर्शन का नाम लगाकर कार्य करने से दर्शनावरणीय कर्म का आसूव होता है। दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरिदेवनान्यात्मप- रोभयस्थान्यसहेदस्य। ६, ११. परदुक्खणयाए परसोयणयाए परजूरणयाए परतिप्पणयाए परपिट्टणयाए परपरियावणयाए बहणं पाणाणं जाव सत्ताणं दुक्ख- रणयाए सोयणयाए जाव परियावणयाए एवं खलु गोयमा! जीवाणं अरसायावेयणिज्जा कम्मा किज्जन्ते । व्याख्याप्रज्ञप्ति श०७ उ०६ सू० २८६ छाया- परदुःखनतया परशोकनतया परझुरणतया परतृपणतया परपि- १४८ ] तत्त्वार्थसूत्रजेनाऽऽगमसमन्वय : हनतया परपरितापनतया बहनां प्राणिनां यावत् सत्त्वानां दुःखनतया शोचनतया यावत् परितापनतया एवं खुल गौतम ! जीवानां असातावेदनीयकर्माणि क्रियन्ते । भाषा टीका - हे गौतम ! दूसरे को दुःख देने से, दुसरे को शोक उत्पन्न कराने से, दूसरे को झुराने से, दूसरे को रुलाने से, दूसरे को पीटने से, दूसरे को परिताप देने से, वहुत से प्राणियो और जीवों को दुःख देने से, शोक उत्पन्न कराने श्रादि परिताप देने से जीव साता वेदनीय कर्मों का पासव करते हैं। भूतनत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगः दान्तिः शौचमिति सददस्य । ६, १२. पाणाणुकंपाए भूयाणुकंपाए जीवाणुकंपाए सत्ताणुकंपाए बहूणं पाणाणं जाव सत्ताणं अदुक्खणयाए असोयणयाए अजर- रणयाए अतिप्पणयाए अपिट्टणयाए अपरियावणयाए एवं खलु गोयमा! जीवाणं सायावेयणिज्जा कम्मा किजति । व्याख्या प्रज्ञाप्ति शतक ७ उ०६ सूत्र २८६. प्राणानुकम्पनतया भूतानुकम्पनतया जीवानुकम्पनतया सत्त्वानु- कम्पनतया बहूनां प्राणिनां यावत् सत्वानां अदुःखनतया अशोचनतया अझूरणतया अतपणतया अपिट्टनतया अपरितापन- तया एवं खलु गौतम ! जोवानां सातावेदनीयकर्माणि क्रियन्ते । भाषा टोका-हे गौतम! प्राणो पर अनुकम्पा करने से, प्राणियो पर दया करने से, जीवो पर दया करने से, सत्त्वो पर दया करने से, बहुत से प्राणियो को दुःख न देने से, शोक न कराने से, न झुराने से, न रुलाने से, न पीटने से, परिताप न देने से जीव साता वेदनीय कर्मो का पासूव करते है। छाया- केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य । ६, १३.

षष्ठोऽध्यायः [ १४६ छाया- पंचहिं ठाणेहिं जीवा दुल्लभबोधियत्ताए कम्म पकरेंति, तं जहा-अरहताणं अवन्नं वदमाणे १, अरहंतपन्नतस्त धम्मस्त अवन्नं वदमाणे २, आयरियउवज्झायाणं अवन्नं वदमाणे ३, चउवण्णस्स संघस्स अवाणं वदमाणे ४, विवकतवबंभचेरा देवाणं अवन्नं वदमाणे । स्थानांग स्थान ५, उ०२ सू० ४२६ पञ्चभिः स्थानैः जीवा दुर्लभवोधिकतया कर्म प्रकुर्वन्ति । तद्यथा- अर्हता अवर्ण वदन, अर्हत्प्रज्ञप्तस्य धर्मस्य अवर्ण वदन, प्राचार्यो- पाध्यायानां अवर्ण वदन, चातुर्वर्णस्य संघस्य अवर्ण बदन्, विपकतपोब्रह्मचर्याणां देवानां अवर्ण वदन् । भाषा टीका-पांच स्थानों के द्वारा जीव दुर्लभ बोधि (दर्शन मोहनीय) कर्म का उपार्जन करते है --अहेत का अवर्णवाद करने से, अर्हत के उपदेश दिये हुए धर्म का अवर्णवाद करने से, आचार्य और उपाध्याय का अवर्णवाद करने से, चारो प्रकार के धर्म का अवर्णवाद करने से, तथा परिपक्व तप और ब्रह्मचर्य के धारक देव जो जीव हुए हैं उनका अवर्णवाद' करने से कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य । ६, १४. मोहणिजकम्मासरीरप्पयोगपुच्छा, गोयमा तिव्यकोहयाए तिव्वमाणयाए तिव्वमायाए तिव्वलोभाए तिबदसणमोहणिज- याए तिव्वचारित्तमोहणिजाए। व्याख्या प्रज्ञप्ति० शतक ८ उ० ९ सू० ३५१ छाया- मोहनीयकर्मशरीरप्रयोगपृच्छा ? गौतम ! तोक्रोधनतया तीव्रमान- जो दोष न हो उनका भी होना बतलाना, निन्दा करना अवर्णवाद है।

१५० ] तत्त्वार्थसूनजैनाऽऽगमसमन्वय : उत्तर ६ १५ तया तीव्रमायातया तीव्रलोभतया तीब्रदर्शनमोहनीयतया तीत्र- चारित्रमोहनीयतया प्रश्न - [चारित्र] मोहनीय कर्म के शरीर का प्रयोगवन्ध किस प्रकार होता है ? गौतम । तीव्र क्रोध करने से, तीव्र मान करने से, तीव्र माया करने से, तीन लोभ करने से, तीव्र दर्शन मोहनीय से और तीन चारित्र मोहनीय से । वहारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुषः । चउहिं ठाणेहिं जीवा रतियत्ताए कम्मं पकरेति, तं जहा- महारम्भताते महापरिग्गयाते पंचिदियवहेणं कुणिमाहारेणं । स्थानांग० स्थान ४ उ०४ सूत्र ३७३ छाया- चतुर्भिः स्थानः जीवा नैरयिकत्वाय कर्म प्रकुर्वन्ति । तद्यथा-महारम्भतया, महापरिग्रहतया, पञ्चेन्द्रियवधेन,कुणपाहारेण । भाषा टीका-जीव चार प्रकार से नरक आयु का वन्ध करते हैं :-बहुत प्रारम्भ करने से, बहुत परिग्रह करने से, पचेन्द्रिय जीव के बध से, और (मृतक) मांस का आहार करने से। संगति – यहां सूत्र की अपेक्षा विशेष कथन किया गया है। माया तैर्यग्योनस्य । ६, १६ चउहिं ठाणेहिं जीवा तिरिक्खजोणियत्ताए कम्पगरेंति, तं जहा-माइल्लताते णियडिल्लताते अलियवयणेणं कूडतुलकुडमाणेणं । स्थानांग स्थान ४ उद्देश्य ४ सूत्र ३७३. चतुर्भिः स्थानः जीवाः तिर्यग्योनिकत्वाय कर्म प्रकुर्वन्ति । तद्यथा- मायितया, निकृतिमत्तया अलीकवचनेन कूटतुलाकूटमानेन । भाषा टीका चार प्रकार से जीव तिर्यश्च आयु का बन्ध करते हैं-छल कपट से, छल को छल द्वारा छिपाने से, असत्य भाषण से और कमती तोलने और नापने से । ... छाया - षष्ठोऽध्यायः [ १५१ अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य । ६, १७ स्वभावर्मादवञ्च । ६, १८. चउहिं ठाणेहिं जीवा भणुस्सत्ताते कम्म पगरेंति; तं जहा- पगतिभदताते पगतिविणीययाए साणुकोस्याते अमच्छरिताते । स्थानांग० स्थान० ४, उ०४, सू० ३७३. वेमायाहिं सिक्खाहिं जे नरा गिहिसुव्वया उर्वति माणुस जोणिं कम्मसच्चाहु पाणिणो । उत्तराध्ययन सूत्र अध्ययन ७ गाथा २०. छाया- चतुर्भिः स्थानैः जीवा मानुपत्वाय कर्म प्रकुर्वन्ति । तद्यथा-प्रकृति- भद्रतया प्रकृतिविनयतया सानुक्रोशतया अमत्सरिकतया । विमात्राभिः शिक्षाभिः ये नराः गृहिसुव्रताः उपयान्ति मानुषी योनि कर्मसत्याः पाणिनः। भाषा टीका-चार प्रकार से जीव मनुष्य आयु का बन्ध करते हैं-उत्तम स्वभाव होने से, स्वभाव मे विनय होने से, स्वभाव में दया होने से, स्वभाव मे ईर्ष्याभाव न होने से । जो प्राणि विविध शिक्षाओ के द्वारा उत्तम व्रत ग्रहण करते है वह प्राणि शुभ कर्मों के फल से मनुष्य योनि को प्राप्त करते हैं। निःशीलव्रतत्वं च सर्वेषां । ६, १६. एगंतबाले णं मणुस्से नेरइयाउयंपि पकरेइ तिरियाउयंपि पकरेइ मणस्साउयंपि पकरेइ देवाउयंपि पकरेइ । व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक १, उ०८, सू०६३.

१५२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : छाया- . - एकान्तवालः मनुष्यः नैरयिकायुमपि प्रकरोति निर्यगायुमपि प्रकरोति मनुष्यायुमपि प्रकरोति देवायुमपि प्रकरोति । भाषा टीका-एकान्तबाल (विना शील और व्रत वाला) मनुष्य नरक आयु भी बांधता है, तिर्यञ्च आयु भी बांधता है, मनुष्य आयु भी बांधता है और देवायु का भी बन्ध फरता है। सरागसंयमसंयमाऽसंयमाऽकामनिर्जरावा- लतपांसि दैवस्य । ६, २०. चउहि ठाणेहिं जीवा देवाउयत्ताए कम्मं पगरेंति, तं जहा- सरागसंजमेणं संजमासंजमेणं बालतवोकम्मेणं, अकामणिज्जराए। स्थानांग स्थान ४ उ०४ सू०३७३. छाया- चतुर्भिः स्थानैः जीवाः देवायुत्वाय कर्म प्रकुर्वन्ति, तद्यथा-सराग- संयमेन, संयमाऽसंयमेन, बालतपकर्मणा, अकामनिर्जरया । भाषा टीका - चार प्रकार से जीव देवायु का वन्ध करते हैं- सरागसयम से, संयमासयम से, वाल तप से और अकामनिर्जरा से। सम्यक्त्वं च । ६, २१. वेमाणियावि''जइ सम्मदिठ्ठीपज्जतसंखेजवासाउयकम्म- भूमिगगन्भवतियमणुस्सेहिंतो उववज्जति किं संजतसम्मद्दिठ्ठीहिं- तो असंजयसम्मदिट्ठीपजत्तएहितो संजयासंजयसम्मट्ठिीपजत्त- संखेज. हिंतो उववज्जति? गोयमा तीहिंतोवि उववज्जति. एवं जाव अचुगो कप्पो। प्रज्ञापना० पद ६.

षष्ठोध्याय: [ १५३ छाया- वैमानिकाः अपि यदि सम्यग्दृष्टिपर्याप्तसंख्येयवर्षायुष्कर्म- भूमिकगर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्येभ्यः उत्पद्यन्ते कि संयतसम्यग्दृष्टिभ्यो ऽसंयतसम्यग्दृष्टिपर्याप्तकेभ्यः संयतासंयतसम्यग्दृष्टिपर्याप्तकसंख्येय- वर्षायुष्केभ्यः उत्पद्यन्ते ? गौतम ! त्रिभिः उत्पद्यन्ते, एवं याव- दच्युतः कल्प: प्रश्न-यदि वैमानिक देवों में सम्यग्दृष्टि पर्याप्तक, संख्यात वर्ष की आयु वाले, कर्म भूमिक, गर्भज मनुष्य उत्पन्न हों तो क्या संयत सम्यग्दृष्टियों से, असंयत सम्यग्दृष्टि पर्याप्तकों से, सयतासंयत सम्यग्दृष्टि पर्याप्तक संख्यातवर्ष की आयुवालो मे से उत्पन्न होते हैं ? उत्तर-हे गौतम ! तीनों ही में से अच्युत स्वर्ग तक उत्पन्न होते हैं। संगति- इस कथन से प्रगट होता है कि सम्यग्दृष्टि देवलोक में जा सकता है। योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः । ६, २२ तद्विपरीतं शुभस्या सुभनामकम्मा सरीरपुच्छा ? गोयमा! कायउजुययाए भावु- जुययाए भासुज्जुययाए अविसंवादणजोगेणं सुभनामकम्मा सरीरजावप्पयोगबन्धे, असुभनामकम्मा सरीरपुच्छा ? गोयमा! कायअणुज्जुययाए जाव विसंवायणाजोगेणं असुभनामकम्मा जाव पयोगबंधे। व्याख्या० श० ८ उद्दे०६ छाया– शुभनामकर्माणि शरीरपृच्छा ? गौतत ! कायर्जुकतया भाव - कतया भाषर्जुकतया अविसंवादनयोगेन शुभनामकर्माणि शरीर- यावत्प्रयोगबंधः । अशुभनामकर्माणि शरीरपृच्छा ? गौतम ! का- यानर्जुकतया यावत् विसवादनयोगेन अशुभनामकर्माणि यावत् प्रयोगवन्धः । ६, २३.

१५४ ]
तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय :
प्रश्न-शुभ नाम कर्म का शरीर किस प्रकार प्राप्त होता है ?
उत्तर-हे गौतम ! काय की सरलता से, मन की सरलता से, वचन को सरलता
से तथा अन्यथा प्रवृत्ति न करने से शुभ नाम कर्म के शरीर का प्रयोग बंध होता है।
प्रश्न-अशुभनाम कर्म के शरीर का प्रयोग बंध किस प्रकार होता है ?
उत्तर-इसके विपरीति काय, मन तथा वचन की कुटिलता से तथा अन्यथा प्रवृत्ति
करने से अशुभ नाम कर्म के शरीर का प्रयोग बंध होता है।
दर्शनविशुद्धिविनयसम्पन्नता शीलवतेष्वन-
तिचारोभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्याग-
तपसी साधुसमाधियावृत्यकरणमर्हदाचार्यबहु-
श्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्गिप्रभावना
प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ।
६, २४.
अरहंत-सिद्ध-पवयण-गुरु-थेर-बहुस्सुए तवस्सीखें ।
वच्छलया य तेसिं अभिक्ख णाणोवोगे य ॥१॥
दसण विणए आवास्सए य सीलव्वए निरइयारं ।
खणलव तव चियाए वेयावच्चे समाही य ॥२॥
अप्पुव्वणाणगहणे सुयभत्ती पवयणे पभावणया ।
एएहिं कारणेहिं तित्थयरत्तं लहइ जीवो ॥ ३ ॥
ज्ञाताधर्म कथांग अ०८, स० ६४.
छाया- अर्हत्सिद्धप्रवचनगुरुस्थविरबहुश्रुततपस्विवत्सलताऽभीक्ष्णं झानो-
पयोगश्च ॥ १॥
दर्शनं विनय आवश्यकानि च शीलवतं निरतिचारं ।
क्षणलवस्तपः त्यागः चैयामृत्यं समाधिश्च ॥२॥

षष्ठोऽध्यायः [ १५५ -- , अपूर्वज्ञानग्रहणं श्रुतभक्तिः प्रवचने प्रभावना । एतैः कारणैः तीर्थकरत्वं लभते जीवः ॥३॥ भाषा टीका-१. अर्हत भक्ति, २. सिद्ध भक्ति, ३ प्रवचन भक्ति, ४ स्थविर (आचार्य) भक्ति, ५. बहुश्रुत भक्ति, ६. तपस्वित्सलता, ७ निरन्तर ज्ञान मे उपयोग रखना, ८. दर्शन का विशुद्ध रखना, ६ विनय सहित होना, १० आवश्यकों का पालन करना, ११. अतिचार रहित शील और व्रतो का पालन करना, १२. ससार को क्षणभंगुर समझना, १३ शक्ति अनुसार तप करना. १४. त्याग करना, १५. वैयावृत्य करना, १६ समाधि करना, १७ अपूर्व ज्ञान को ग्रहण करना, १८ शास्त्र में भक्ति होना,१६ प्रवचन में भक्ति होना, और २० प्रभावना करना । इन कारणो से जीव तीर्थकर प्रकृति का बध करता है। संगति-सूत्र मे सोलह तथा आगम वाक्य में बीस कारण बतलाये गये है। किन्तु विचार कर देखने से पता चलता है कि आगम के बीस केवल विस्तार दृष्टि से ही हैं। अन्यथा सूत्र के सोलह से अधिक उनमें एक भी बात नहीं है । सूत्रकार ने उसी को अत्यंत संक्षेप से लेकर सोलह कारण भावनाओं की रचना की है। परात्मनिन्दाप्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्धा- वने च नीचैर्गोत्रस्य । ६, २५. जातिमदेणं कुलमदेणं बलमदेणं जाव इस्सरियमदेणं गीयागोयकम्मासगरजावपयोगबन्धे । व्याख्या० शत०८, उ०६, सू०३५१ छाया- जातिमदेन कुलमदेन बलमदेन यावत् ऐश्वर्यमदेन नोचगोत्रकर्माणि यावत् प्रयोगवन्धः। भाषा टीका-जाति के मद से, कुल के मद से, बल के मद से, तथा अन्य मदो सहित ऐश्वर्य के मद से नीच गोत्र कर्म के शरीर का प्रयोग वध होता है । सगति-यद्यपि इस सूत्र के और आगम वाक्य के शब्द आपस मे नहीं मिलते। किन्तु भाव फिर भी दोनो का एक ही है। क्योकि अभिमानी सदा अपनी प्रशसा करता १५६ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय. है और दूसरों की निन्दा करता है। अभिमानी सदा अपने न होने वाले गुणो को भी प्रकाशित करता है और दूसरे के होने वाले गुणो को भी छिपाता है। तद्विपर्ययो नीचैत्यनुत्सेको चोत्तरस्य । . २, २६ जातिअमदेणं कुलअमदेणं बलअमदेणं रूवअमदेणं तन- अमदेणं सुयअमदेणं लाभअमदेणं इस्सरियअमदेणं उन्धागोय- कम्मासरीरजावपयोगबंधे। व्याख्या० शतक ८ उ० ९ सू० ३५१ छाया- जात्यमदेन कुलामदेन बलामदेन रूपामदेन तपसमदेन श्रुतामदेन लाभामदेन ऐश्वर्यामदेन उच्चगोत्रकर्माणि यावत् प्रयोगवन्धः । भाषा टीका-जाति, कुल, बल, रूप, तप, विद्या, लाभ और ऐश्वर्य का घमंड न करने से उच्च गोत्र कर्म के शरीर का प्रयोग बन्ध होता है। संगति-यहां भी उपरोक्त सूत्र के समान सूत्र और आगम को मिला लेना चाहिये। विघ्नकरणमन्तरायस्य। ६, २७. दाणंतराएणं लाभंतराएण भोगंतराएणं उवभोगंतराए वारियंतराएणं अंतराइयकम्मा सरीरप्पयोगबन्धे । व्याख्या प्रज्ञप्ति श०८, उ०९, सू० ३५१. छाया- दानान्तरायेन, लाभान्तरायेन, भोगान्तरायेन, उपभागान्तरायेन, वीर्यान्तरायन अन्तरायकर्माणि शरोरप्रयोगवन्धः । भाषा टोका-दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य में विघ्न करने से अन्तराय कर्म के शरीर का प्रयोगवन्ध होता है। इति श्री-जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम महाराज-संगृहीते तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वये * षष्ठोऽध्यायः समाप्तः ॥६॥ - , सप्तमोऽध्यायः :: ७, २. हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिव्रतम् । ७, १. देशसर्वतोऽणुमहती। पंच महव्वया पण्णत्ता; तं जहा-सव्वातो पाणातिवायाओ वेरमणं । जाव सव्वातो परिग्गहातो वेरमणं । पंचागुव्वता पण्णत्ता, तं जहा-थूलातो पाणाइवायातो वेरमणं थूलातो मुसा- वायातो वेरमणं थूलातो अदिन्नादाणातो वेरमणं सदारसंतोले इच्छापरिमाणे। स्थानांग स्थान ५, उ० १, सू० ३८६. छाया पञ्चमहाव्रताः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा-सर्वतः प्राणातिपातात् वेरमणं, यावत् सर्वतः परिग्रहात् वेरमणं । पश्चाणुव्रताः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा- स्थूलतः प्राणातिपातात् वेरमणं स्थूलतः मृषावादावरमणं स्थ- लतोऽदत्तादानाद्वरमणं स्वदारसन्तोषः इच्छापरिमाणः । भाषा टीका महाव्रत पाच होते हैं-सब प्रकार को प्राणि हिंसा से बचने से लगाकर सब प्रकार के परिग्रह से बचने तक । अणुव्रत भी पाच होते हैं-स्थूल प्राणिहिसा से बचना, स्थूल असत्य भाषण से बचना, स्थूल चोरी से बचना, स्वदारसतोष और इच्छा को नाप तोल के रखना। तत्स्थैर्यार्थं भावनाः पञ्च पञ्च । पंचजामस्य पणवीसं भावणाओ पण्णत्ता। समवायांग, समवाय २५ - ७, ३.

१५८ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : ७,४ छाया- पञ्चयामस्य पञ्चविंशतयः भावनाः प्रज्ञप्ताः । भाषा टीका-पांचों ब्रतों की पांच २ के हिसाब से पच्चीस भावनाएं कही गई है। वाङ्मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकि- तपानभोजनानि पञ्च । ईरिया समिई मणगुत्ती वमगुत्ती आलोयभायणभोयणं आदाणभंडमत्तनिक्खेवणासमिई। समवायांग, समवाय २५. छाया- ईर्यासमितिः मनोगुप्तिः वचोगुप्तिः आलोकभाजनभोजनं आदान- भण्डमात्रनिक्षेपणासमितिः । भाषा टोका-ईर्या समिति, मनोगुप्ति, वचन गुप्त, आलोकभाननभोजन, आदान- भण्ड मात्र निक्षेपणा समिति (आदान निक्षेपण समिति)। यह पांच अहिंसा महाव्रत की भावनाएं हैं। क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवी- चिभाषणं च पंच । अणुवीति भासणया कोहविवेगे लोभविवेगे भयविवेगे हासविवेगे। समवायांग, समय २५. छाया- अनुविचिन्त्यभाषणता क्रोधविवेकः लोभविवेकः भयविवेकः हास्य- विवेकः । भाषा टोका-सोच समझ के वोलना, क्रोध का त्याग, लोभ का त्याग, भय का त्याग और हास्य का त्याग [यह पांच सत्य महाव्रत की भावनाएं हैं।] शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभै- क्ष्यशुद्धिसद्धाऽविसंवादाः पञ्च । ७, ६.

सप्तमोऽध्याय: [ १५६ छाया- , उग्गहअणुगणवणया उग्गहसीसजाणणया सयमेव उग्गह अणुगिरहणया साहम्मियउग्गहं अणुण्णविय परिमुंजण्या सा- हारणभत्तपाणं अणुण्णविय पडिभुंजणया । समवायांग समय २५ अवग्रहानुज्ञापना, अवग्रहसीमापरिज्ञानता, स्वयमेव अवग्रहः अनु- ग्रहणता, साधर्मिकावग्रहः अनुज्ञाप्य परिभोजनता, साधारणभक्तपानं अनुज्ञाप्य परिभोजनता । भाषा टीका-ठहरने की आज्ञा लेना, ठहरने की सीमा को जानना, स्वयं ही ठहर कर स्थान को स्वीकार करना, साधर्मियों को ठहराना और उनकी आज्ञा से भोजन करना, साधारण भोजन और पीने की वस्तु के विपय मे अनुमति लेकर भोजन करना । संगति सूत्र मे और इनमें केवल शाब्दिक भेद ही है। यह पांच अचौर्यमहावत की भावनाएं हैं। , स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहराङ्गनिरीक्षण- पूर्वरतानुस्मरणवृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कारत्यागाः पञ्च । ७, ७. इत्थीपसुपंडसंसत्तगसयणासणवज्जणया इत्थीकहववञ्ज- णया इत्थीणं इंदियाणमालोयणवजणया पुव्वरयपुव्यकोलिआणं अणणुसरणया पणीताहारववजणया । समवायांग समय २५. छाया- स्त्रीपशुपण्डकसंसक्तशय्यासनवर्जनता स्त्रोकथाविवर्जनता स्रोणामि- न्द्रियाणामालोकनवर्जनता पूर्वरतपूर्वक्रीडानां अनुस्मरणता प्रणी- ताहारवर्जनता । भाषा टीका-स्त्री, पशु तथा नपुसकों से लगे हुए शय्या तथा श्रासन को छोड़ना,

१६० ]
तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय :
स्त्रियो की कथा का त्याग करना, स्त्रियो की इन्द्रियो के देखने का त्याग करना, पहिले
भोगे हुए भोग और पहिले की हुई क्रीड़ाओ को स्मरण न करना, पौष्टिक आहार का
त्याग करना, [यह पांच ब्रह्मचर्य व्रत की भावनाएं हैं।
मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि पंच ।
सोइन्दियरागोवरई चक्खिदियरागोवरई घाणिदियरागोवरई
जिभिदियरागोवरई फासिंदियरागोवरई ।
समवायांग समय २५.
छाया- श्रोत्रंद्रियरागोपरतिः चक्षुरिन्द्रियरागोपरतिः घाणेन्द्रियरागोपरतिः
जिव्हेन्द्रियरागोपरतिः स्पर्शनेन्द्रियरागोपरतिः ।
भाषा टीका - कर्ण इन्द्रिय के राग उत्पन्न करने वाले विषयों का त्याग, नेत्र
इन्द्रिय के राग का त्याग, घ्राण इन्द्रिय के राग का त्याग, जिव्हा इन्द्रिय के राग (शोक)
का त्याग, तथा स्पर्शन इन्द्रिय के राग का त्याग [यह पांच परिग्रह त्याग महाव्रत की
भावनाए हैं]
हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम् ।
७, १.
दुःखमेव वा।
७, १०
संवेगिणी कहा चउविवहा पण्णत्ता, तं जहा-इहलोगसंवे-
गणी परलोगसंवेगणी आतसरीरसंवेगणी परसरीरसंवेगणी। णिव्वे-
गणी कहा चउन्विहा पण्णत्ता, तं जहा-इहलोगे दुचिन्ना कम्मा
इहलोगे दुहफलविवागसंजुत्ता भवंति ॥१॥ इहलोगे दुच्चिन्ना
कम्मा परलोगे दुहफलविवागसंजुत्ता भवंति ॥२॥ परलोगे
दुन्चिन्ना कम्मा इहलोगे दुहफलविवागसंजुता भवंति ॥ ३ ॥

सप्तमोऽध्याय: [ १६१ परलोगे दुञ्चिन्ना कम्मा परलोये दुहफलविवागसंजुत्ता भवंति ॥४॥ इहलोगे सुचिन्ना कम्मा इहलोगे सुहफलविवा- गसंजुत्ता भवंति ॥१॥ इहलोगे सुचिन्ना कम्मा परलोगे सुहफलविवागसंजुत्ता भवंति, एवं चउभंगो। स्थानांग स्थान ४ उद्दे० २ सूत्र. २८२ छाया- संवेगिनी कथा चतुर्विधा प्रज्ञप्ता, तद्यथा-इहलोकसंवेगनी परलोक- संवेगनी, श्रात्मशरीरसंवेगनी परशरीरसंवेगनी । निवेदनी कथा चतुर्विधा प्रज्ञप्ता, तद्यथा-इहलोके दुश्चीर्णानि फर्माणि इहलोके दुःखफलविपाकसंयुक्तानि भवन्ति ॥ १॥ इह- लोके दुश्चीर्णानि कर्माणि परलोके दुःखफलविपाकसंयुक्तानि भवन्ति ॥ २॥ परलोके दुश्चोर्णानि कर्माणि इहलोके दुःखफल- विपाकसंयुक्तानि भवन्ति ॥३॥ परलोके दुश्चीर्णानि कर्माणि परलोके दुःखफलविपाकसंयुक्तानि भवन्ति ॥४॥ इहलोके सुचीर्णानि कर्माणि इहलोके सुखफलविपाकसंयुक्तानि भवन्ति ॥१॥ इहलोके सुचीर्णानि कर्माणि परलोके सुखफलविपाक- संयुक्तानि भवन्ति ॥ २॥ एवं चतुर्भङ्गाः । भाषा टीका-सवेगिनी कथा चार प्रकार की कही गई है-इहलोक संवेगिनी, परलोक सवेगनी, श्रात्मशरीर संवेगनी, परशरीर सवेगनी। निवेदनी कथा भी चार प्रकार की कही गई है---इस लोक में बुरी तरह एकत्रित किये हुए कर्म इस लोक मे दुख, फल और विपाक देते हैं ।। १ ।। इसलोक में बुरी तरह एकत्रित किये हुए कर्म परलोक में दुख, फल और विपाक देते हैं ॥२॥ परलोक में बुरी तरह एकत्रित किये हुए कर्म इस लोक में दुःख फल और विपाक से संयुक्त होते हैं ।।३।। परलोक में बुरी तरह एकत्रित किये हुए फर्म परलोक में ही दुख, फल और विपाफ से संयुक्त होते हैं ॥४॥ इस लोक में अच्छी तरह किये हुए कर्म लोक मे सुख, फल और विपाक से इस सत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : - संयुक्त होते हैं ॥ १ ॥ इस लोक में अच्छी तरह किये हुए कर्म परलोक में सुख, फल और विपाक से संयुक्त होते हैं ।। २ ।। इस प्रकार चार भंग हैं। संगति-विचार कर देखने पर पता चलेगा कि उपरोक्त श्रागम वाक्य भी यही सह रहे हैं कि हिंसा आदि पांचों पाप इस लोक और परलोक मे पाप और दुःख को ही देने वाले हैं और स्वयं दुःख रूप हैं । सूत्र और आगम वाक्य में केवल कहने के ढंग क, भेद है। मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थानि च सत्वगु- एणाधिकक्लिश्यमानाचिनयेषु । ११. मित्तिं भूणहिं कप्पए सुन्न कृतांग प्रथम अतिस्कंध अध्याय १५ गाथा ३ । सुप्पडियाणंदा। भोपपातिक सूत्र १ प्रश्न २० ताणुकोरसयाए। औपपातिक भगवदुपदेश। मज्झत्थो निजरापेही समाहिमणुपालए । याचारांग प्रथम श्रुतस्कंध अध्याय - बहे० ८ गाथा ५ छाया- मैत्री भूतैः कल्पयेत् । सुष्ठप्रत्यानन्दः। सानुक्रोशः । मध्यस्थः निर्जरापेक्षी समाधिमनुपालयेत् । भापा टीका समस्त प्राणियो में मैत्री भाव रखे, अपने से अधिक गुण वालों को देखकर आनन्द में भर जावे, दुखी जीवों पर दया करे और अविनयी लोगों में समाधि फा पालन करता, निर्जरा फी अपेक्षा करता हुआ माध्यस्थ भाव रखे।

सप्तमोऽध्यायः . : जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैराग्यार्थम् । ७, १२. भावणाहि य सुद्धाहिं, सम्म भावेत्तु अप्पयं । उत्तराध्ययन अध्यय १६ गाथा ९४. अणिच्चे जीवलोगम्मि। जीवियं चेव रूवं च, विजुसंपायचंचलम् । उत्तराध्ययन अध्ययन १८ गाथा ११, १३ छाया- भावनाभिश्च शुद्धाभिः सम्यग् भावयित्वाऽऽत्मानम् । अनित्ये जोवलोके.."जीवितं चैव रूपं च विद्युत्संपातचंचलम् । भाषा टीका-शुद्ध भावनाओं से अपने आप को अच्छी तरह चिन्तवन करके अनित्य जीव लोक मे जीवन और रूप को विजली के गिरने के समान चचल चिन्तवन करे। संगति-यह वाक्य भी दूसरे शब्दों मे यही कह रहे हैं कि संवेग और वैराग्य के पासते जगत् और काय के स्वभाव का चिन्तवन करे। प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा । तत्थ णं जेते पमत्तसंजया ते असुहं जोगं पडुच्च आयारंभा परारंभा जाव रणो अणारंभा। व्याख्या प्रज्ञप्ति शतक १ उद्दे० १ सूत्र ४८ छाया तत्र ये ते प्रमत्तसंयतास्तेऽशुभं योग प्रतीत्य आत्मारंभा:अपि परारम्भाः यावत् नो अनारम्भाः । भाषा टीका-प्रमत्तसंयत गुण स्थान वाले मुनि भी अशुभयोग को प्राप्त होकर आत्मारम्भ होते हुए भी परारम्भ हो जाते हैं और पूर्ण आरम्भ करने लगते हैं। संगति-इस भागम वाक्य मे बतलाया गया है कि प्रमत्त संयत गुण स्थान वाले मुनि प्रमाद के योग से प्राणव्यपरोपण रूप हिंसा मे फिर भी लग सकते है। अन्य लोगों के विषय मे तो क्या कहा जावे ।

१६४ ] मत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वयः असदभिधानमन्तम् । ७ १४ अलियं असचं संधत्तणं असब्भाव अलियं प्रश्न व्याकरणांग आस्रवद्वार २ छाया अलीकमसत्यं संधत्तणं असद्भावः अलीकम् । भाषा टीका - जैसा न हो वैसा असत्य स्थापित करना असत्य कहलाता है । अदत्तादानं स्तेयं । ७, १५ अदत्तं तेणियो। प्रश्न व्या० धास्रवद्वार ३ छाया अदत्तं स्तेनः। भाषा टीका-विना दिये हुए को लेना चोरी है। मैथुनमब्रह्म। प्र० व्या० आनवद्वार ४ अवम्भ मेहुणं । छाया अब्रह्म मैथुनम् । भाषा टीका-मैथुन करना श्रब्रह्म पाप कहलाता है । मूळ परिग्रहः । मुज्छा परिम्गहो धुत्तो। दश० अध्ययन गाथा २१ छाया-- मृर्छ परिग्रहः उक्तः ।

सप्तमोऽध्याय: [ १६५ भाषा टीका-चेतन अचेतन रूप परिग्रह मे ममत्व परिणाम रूप मूर्या को परिग्रह कहा गया है। निश्शल्यो व्रती। ७, पडिकमामि तिहिं सल्लेहि-मायासल्लेण नियाण सल्लेणं मिच्छादसणसल्लेणं । आवश्यक० चतु० आवश्य० सूत्र ७ छाया-- प्रतिक्रमामि त्रिभिः शल्यैः-मायाशल्येन निदानशल्येन मिथ्या- दर्शनगल्येन । भाषा टोका-मैं तीन शल्यों से प्रतिक्रमण करता हू-माया शल्य से, निदान शल्य से और मिथ्यादर्शन शल्य से । इस प्रकार प्रतिक्रमण करना ही व्रती का लक्षण है। आगार्यनगारश्च । चरित्तधम्मे दुविहे पन्नत्ते, तं जहा-आगारचरित्तधम्मे चेव, अणगारचरितधम्मे चेव । स्थानांग स्थान २, उ०१. छाया-- चारित्रधर्मः द्विविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-श्रागारचारित्रधर्मश्चैवानागार- चरित्रधर्मश्चैव । भाषा टीका - चारित्र धर्म दो प्रकार का होता है-श्रागार चारित्रधर्म अथवा गृहस्थ धर्म और अनागार चारित्र धर्म अथवा मुनिधर्म । अणुव्रतोऽगारी। ७, २० आगारधम्म 'अणुव्वयाइं इत्यादि। औपपातिक सुन्न श्रीवीर देशना.

तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : छाया- आगरधर्मोऽणुव्रतादिः इत्यादि। अणुव्रत आदि का धारण करना श्रागार धर्म कहलाता है। आपा टीका दिनदेशानर्थदण्डविरतिसामायिकोषधोप- वासोपभोगपरिभोगपरिमाणातिथिसंविभागवत ७, २१. आगरधम्म दुवालसविहं आइक्खइ, तं जहा-पंच अणुव्व- पाइं तिगिण गुणवयाइं चत्तारि सिक्खावयाइं । तिरिण गुणबाई, तं जहा-अणत्थदंडवेरमणं दिसिव्वयं, उपभोगपरिभोगपरिमाणं । चत्तारि सिक्खावयाइं तंजहा-सामाइयं देसावगासियं पोसहोववासे अतिहिसंविभागे । औपपातिकम् श्रीवीरदेशना सूत्र ५७ छाया--- आगारधर्मः द्वादशविधः आचक्षते, तद्यथा-पश्चाणुव्रतानि त्रीणि गुणवतानि चत्वारि शिक्षात्रतानि । त्रोणि गुणवतानि, तद्यथा-अनर्थदंडवेरमणं, दिग्वतं, उपभोग- परिभोगपरिमाणं। चत्वारि शिक्षावतानि-तद्यथा-सामायिक देशावकाशिक, प्रोषधो- पवासः, अतिथिसंविभागश्च । भाषा टीका आगार धर्म वारह प्रकार का कहा जाता है -पांच अणुव्रत, हीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत । तीन गुणव्रत यह हैं-अनर्थदड त्याग, दिग्बत और उपभोग परिभोग परिमाण । चार शिक्षात यह हैं-सामायिक, देशावकाशिक, प्रोषधोपवास और अतिथि संविनाग । .

सप्तमोऽध्यायः [ १६७ मारणान्तिकी सल्लेखनां जोषिता। छाया अपच्छिमा मारणंतिआ संलेहणा जूसणाराहणा । औपपा० सू० ५७. अपश्चिमा मारणांतिकी सल्लेखनां जूपणा आराधना । भाषा टीका-अन्तिम समय मे मरते समय सल्लेखना को आराधना करे। शङ्काकांक्षाविचिकित्साऽन्यदृष्टिप्रशंसास- स्तवाः सम्यग्दृष्टेरविचाराः। ७, २३. सम्मत्तस्स पंच अइयारा पेयाला जाणियव्वा, न समायरि- यव्वा, तं जहा-संका कंखा वितिगिच्छा, परपासंडपसंसा, परपा- संडसंथवो। उपासकदशांग, अध्याय ३ सम्यक्त्वस्य पश्चातिचाराः प्रधाना, ज्ञातव्याः। न समाचरितव्या, तद्यथा-शङ्का, कांक्षा, विचिकित्सा, परपाखण्डप्रशंसा, परपा- खण्डसंस्तवः । भाषा टीका- सम्यग्दर्शन के पांच प्रधान अतिचार होते हैं । उनको न करे। वह यह हैं-शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, दूसरे के पाखंडी प्रसंशा करना, पाखंडी का ससर्ग छाया- - -- करना। व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम् । ७, २४ भाषा टीका - इसी प्रकार पांच २ अतिचार पांच व्रतों, तीन गुणव्रतों और चारों शिक्षाप्रतों के क्रमशः हैं।

१६. ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्यय: बन्धबधच्छेदातिभारारोपणानपाननिरोधाः ७, २५. थूलस्स पाणाइवायवेरमणस्स समणेवासएणं पंच अइयारा पेयाला जाणियव्वा, न समायरियव्वा । तं जहा-वहबंधच्छविछेए भइभारे भत्तपाणवोच्छेए । उपा० अ०१. छाया- स्थूलस्य प्राणातिपातवेरमणम्य श्रमणोपासफेन पञ्चातिचाराः प्रधानाः ज्ञातव्याः ।न समाचरितन्या। तद्यथा-वधवन्धछविछेदः अतिभारः भक्तपानव्यपछेदः । भाषा टीका- स्थूल हिंसा का त्याग करने वाले श्रावक को पांच प्रधान अतिचार जानने चाहिये । उनको कभी न करे । वह यह हैं-मारना, बांधना, शरीर छेदना, मस्यन्त भोमा लादना और अपने आधीन को अन्न पानी न देना। मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रिया- न्यासापहारसाकारमंत्रभेदाः । थूलगमुलावायरस पंच अइयारा जाणियव्या।न समारियव्वा। तं जहा-सहसाभक्खाणे रहसाभक्खाणे, सदारमतभेए मोसो- वएसेए कूडलेहकरणे य । ७, २६. उपा० अ०१. छाया- स्थूलमृषावादस्य पञ्चातिचाराः ज्ञातव्याः, न समाचरितव्याः । तद्यथा-सहसाभ्याख्यानं, रहोभ्याख्यानं, स्वदारमंत्रभेदामृषोपदेशः कूटलेखकरणश्च । भाषा टीका- स्थूल झूठ के पांच अतिचार जानने चाहियें । उनको कभी न करे । वह यह हैं-विना सोचे एक दम कह देना, गुप्त बात कह देना, अपनी स्त्री के गुप्त भेद को प्रगट करना, झूठ बोलने का उपदेश देना, झूठी दस्तावेज लिखना। - + सप्तमोऽध्याय: [ १६ स्तेनप्रयोगतदाहृतादानविरुद्धराज्यातिक्रम- हीनाधिकमानोन्मानप्रतिरूपकव्यवहाराः। ७, २७. थूलगनदिण्णादाणस्स पंचअइयारा जाणियव्वा, न समा- यरियव्वा, तं जहा- तेनाहड़े, तकरप्पउगे, विरुद्धरजाइकम्मे, कृडतुल्लकूडमाण, तप्पडिरूवगववहारे । छाया- स्थूलादत्तादानस्य पञ्चातिचाराः ज्ञातव्याः, न समाचरितव्याः, तद्यथा-स्तेनाहतं, तस्करप्रयोगः, विरुद्धराज्यातिक्रमः, कूटतुला- कूटमानः, तत्पतिरूपकव्यवहारः । भाषा टीका- स्थूल चोरी के पांच अतिचार जानने चाहिये । उनको कभी न करे वह यह हैं-चोरी का माल लेना, चोरी की तरकीब बतलाना, राज्य विरुद्ध कार्य करना, देने तोलने के नाप बाट तराजू आदि का कम बड़ती रखना और असली माल मे नकली माल अथवा कम मूल्य की वस्तु मिलाकर बेचना। परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीता- गमनाऽनङ्गक्रीडाकामतीब्राभिनिवेशाः । सदारसंतोसिए पंच अइयारा जाणियव्वा, न समायरियव्वा, तं जहा-इत्तरियपरिग्गहियागमणे अपरिग्गहियागमणे, अणग- कीडा, परविवाहकरणे कासमोएसु तिव्वाभिलालो। ~ उपा० अध्याय १ छाया- स्वदारसंतुष्टे पञ्चातिचाराः ज्ञातव्याः, न समाचरितः याः, तद्यथा इत्वरपरिग्रहीतागमनं, अपरिग्रहीतागमनं, अनङ्गक्रीडा, परविवाह- करयां, कामभोगेषु तीवाभिलाषः ।

१७ ] सत्त्वार्थसूनजैनाऽऽगमसमन्वय भाषा टीका - स्वदारसंतोष व्रत के भी पांच अतिचार जानने चाहिय । उनको कभी न करे । मह यह हैं- १. इत्वरिकापरिग्रहीतागमन-दूसरे की विवाह की हुई कुलटा खी से गमन करना । अथवा छोटी अवस्था मे विवाह की हुई किन्तु संभोग के याग्य अवस्था न होने पर भी ध्यपनी स्त्री से विषय करना। २ अपरिग्रहीतागमन-अविवाहिता कुमारी अथवा वेश्या आदि के साथ गमन करना अथवा किसी कन्या के साथ अपनी मंगनी होजाने पर उसके एकान्त में मिलने पर उले अपने भावी स्त्री जानकर विवाह के पूर्व ही उससे भोग करना । ३ अनंग क्रीडा-काम के अंगों से भिन्न अंगों में क्रीड़ा करना। ४. पर विवाह करण-कुमारी कन्या का विवाह पुण्य समझ कर या अन्य कारण से दूसरे का विवाह करना । अथवा दूसरे की मंगनी तुड़वा कर अपना विवाद करना। काम भोग तीवाभिलाषा-काम भोग सेवन की तीन अभिलाषा रखना । पू चेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदास- कुप्यप्रमाणातिक्रमाः। ७, २९ इच्छापरिमाणस्स समणोबासएणं पंच अइयारा जाणियव्या, न ललायरियया । तं जहा-धणधनपमाणाइलमे खेतवत्युप्य- माणाइकाने हिरणपुवरणपरिमाणाइकरने दुपयच उपयपरिमाणा- इनमे कुवियपलाणाइकमे। उपासक० अध्याय १. इच्छापरिमाणस्य श्रमणोपासकेन पञ्चातिचाराः ज्ञातव्याः, न समाचरितव्याः, तद्यथा-धनधान्यप्रमाणातिक्रमः, क्षेत्रवास्तुप्रमा- पतिक्रमः, हिरण्यसुवर्णपरिमाणातिक्रमः, द्विपदचतुष्पदपरिमाणाति- क्रमः, कृप्यममाणातिक्रमः । छाया- , सप्तमोऽध्यायः [ १७१ - भापा टीका ---इच्छा परिमाण व्रत के भी पांच अतिचार जानने चाहिये । उनको कभी न करे। वह यह हैं- १. धनधान्यप्रमाणातिक्रम-किये हुये धन और धान्य (अनाज) के परिमाण को उल्लंघन करना। २. क्षेत्र वास्तु प्रमाणातिक्रम-किये हुए भूमि तथा गृह श्रादि के परिमाण का उल्लघन करना। ३. हिरण्यसुवर्णपरिमाणातिक्रम--- किये हुए चांदी सोने के परिमाण का उल्लघन करना। ४. द्विपदचतुष्पदपरिमाणातिक्रम-किये हुए दासी दास पशु आदि के परिमाण का उल्लंघन करना। ५. कुप्यप्रमाणातिक्रम-किये हुए घर के उपकरणों के परिमाण का उल्लघन करना। ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्तराधानानि ७, ३०. दिलिव्वयस्ल पंच अइयारा जाणियव्वा । न समायरियव्वा, तं जहा-उड्ढदिलिपरिमाणाइकसे, अहोदिसिपरिमाणाइकले, तिरियदिलिपरिमाणाइकामे, खेत्तुवुढिरस, सअंतरड्ढा । उपा० अध्या १ छाया . दिव्रतस्य पञ्चातिचाराः ज्ञातव्याः, न समाचरितव्याः, तद्यथा- ऊर्ध्वदिग्परिमाणातिक्रमः, अधोदिग्परिमाणातिक्रम, तिर्यग्दिगप्रमा- णातिक्रमः, क्षेत्रवृद्धिः, स्मृत्यन्तराधानम् । भाषा टीका-दिग्बत के पाच अतिचार जानने चाहिये । उनको कभी न करे । वह यह हैं-ऊर्ध्व दिशा मे जाने को किये हुए परिमाण का उल्लंघन करना, नीचे की दिशा मे जाने के लिये किये हुए परिमाण का उल्लंघन करना, तिरछी दिशा मे जाने के लिए किये हुए परिमाण का उल्लघन करना, किये हुए क्षेत्र के परिमाण को बढ़ा लेना, किये हुये परिमाण को भूल जाना।

सत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : १७३ ] आनयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेपाः । ७, ३.. देशावगासियरस समणोवासएण पंच अइयारा जाणियब्वा, न समायरियम्बा, तं जहा-आणवणपयोगे, पेसवणपओगे. सहाणुवाए, रूवाणुवाए, वहियापोग्गलपक्खवे । उपा० अध्या०१ छाया देशावकाशिकस्य श्रमणोपासकेन पश्चातिचाराः ज्ञातव्या', न समाचरितव्याः, तद्यथा-श्रानयनप्रयोगः प्रेष्यप्रयोगः, शब्दानुपात:, रूपानुपातः, वहिपुद्गलप्रक्षेपः । भाषा टीका-श्रमणोपासक को देशावकाशिक के पांच अतिचार जानने चाहिये। फिन्तु इन पर आचरण न करना चाहिये । यह यह हैं आनयन प्रयोग-सीमा के बाहर से किसी वस्तु को मगवा लेना। प्रय प्रयोग- अपने न जाने के प्रदेश से बाहिर किसी वस्तु को भेजना। शब्दानुपात-नियत देश से वाहिर न जाते हुए भी शब्द के द्वारा अपना काम निकाल लेना। रूपानुपात-इसी प्रकार सीमा से बाहिर कोई सकेत श्रादि दिखाकर अपना काम निकाल लेना। बहिपुद्गल प्रक्षेप-इसी प्रकार परिमाण से बाह्य देश में ढेला पाषाण आदि फेंक कर अपना काम चलाना। कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्याऽसमीक्ष्याधिकरणो- पभोगपरिभोजानर्थक्यानि । अणट्ठादंडवेरमणस्स समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा, न समायरियव्वा, तं जहा-कन्दप्पे कुकुइए सप्तमोऽध्यायः [ १७३ मोहरिए संजुत्ताहिगरणे उपभोगपरिभोगाइरित्ते । उपा० अध्या १ छाया- अनर्थदण्डवेरमणस्स श्रमणोपासकेन पञ्चातिचाराः ज्ञातव्याः, न समाचरितव्याः, तद्यथा-कन्दर्पः, कौत्कुच्यः मौखर्य, संयुक्ताधि- करणम् उपभोगपरिभोगातिरिक्तः। भाषा टीका-अनर्थदण्ड विरति व्रत के श्रमणोपासक का पांच अतिचार जानने चाहियें । किन्तु उन पर आचरण नहीं करना चाहिये । वह यह हैं- कन्दर्प - स्वभाव की उत्कटता से हास्य मिश्रित भएड वचन बोलना। कौत्कुच्य - हास्य मिश्रित भण्ड वचन बोलना तथा शरीर से भी निन्दनीय क्रिया फरना। मौखर्य - बहुत निरर्थक प्रलाप करना । संयुक्ताधिकरण -विना विचारे आवश्यकता से अधिक हिंस्र सामग्री एकत्रित करना। उपभोग परिभागोतिरिक्त ---भोग उपभोग के जिन पदार्थों से अपना काम चल जाता है उनसे अधिक सग्रह करना। योगदुष्प्रणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि । सामाइयस्त पंच अइयारा समणोवालएणं जाणियव्वा । न समारियव्वा, तं जहा मणदुप्पणिहाणे, वएदुप्पणिहाणे, कायदुप्पणिहाणे, सामाइयरस सति अकरणयाए, सामाइयरस अण्णवढियस्स करणया । उपा० अध्या छाया सामायिकस्य पञ्चातिचाराः श्रमणोपासकेन ज्ञातव्याः, न समा- चरितच्याः, तद्यथा - मनःदुष्पणिधानं, वचःदुष्पणिधानं, कायदुष्पणिधानं, सामायिकस्य स्मृत्यकरणना, सामायिकस्यान- चस्थितस्य करणता ।

१७४ ] तत्त्वार्थसूत्रजेनाऽऽगमसमन्यय : भापा टीका-श्रमणोपासक को समायिक व्रत के पांच अतिचार जानने चाहिये, किन्तु उनपर आचरण न करना चाहिये । वह यह हैं- १. मनो दुष्प्रणिधान - सामायिक के समय मनको अन्यथा चलायमान करना। २. वाग्दुष्प्रणिधान - सामायिक के समय वचन को चलायमान करना । ३, कायदुष्प्रणिधान - सामायिक के समय काय को चलायमान करना । ४. स्मृति अकरण -सामायिक के समय आदि को भूल जाना। ५. अनवस्थितकरण समायिक के काल और उसकी क्रिया का निश्चित रूप ले पालन न करना। अप्रत्यवेक्षिताऽप्रमार्जितोत्सर्गादानसंस्तरोप- क्रमणानादरमृत्यलुपस्थानानि । ७, ३४. पोसहोववासस्स समणोवासपणं पंच अइयारा जाणियव्वा न लमारियव्वा, तं जहा-अप्पडिलेहिय दुप्पडिलेहिय सिज्जा- खंथारे, अप्पसजियदुप्पमजि यसिज्जासंथारे, अप्पडिलेहियदुप्प- डिलेहिय उच्चार पासवणभूमी, अप्पमज्जियदुप्पमजिय उच्चारपास- वणसूसी, पोलहोववासस्स सम्म अणणुपालणया । उपा० अध्या छाया- प्रोषधोपवासस्य श्रमणोपासकेन पञ्चातिचारा ज्ञातव्या, न समा- चरितव्याः, तद्यथा - अप्रत्युपेक्षितदुष्प्रत्युपेक्षितशय्यासंस्तारः, अप्रयाजितदुधमार्जितशय्यासंस्तारकः अप्रत्युपेक्षितदुष्प्रत्युपेलितो- चारप्रस्रवणभूमिः, अप्रमार्जितदुष्प्रमार्जितोचारप्रस्रवणभूमिः, मोप- धोपचासत्य सम्यक् अननुपालनता । भापा टीका प्राषधोपवास के पांच अतिचार श्रमणोपासक को जानने चाहिये, जिन्तु उनका आचरण नहों करना चाहिये । वह यह हैं- १ अप्रत्युपेक्षित दुष्प्रत्युपेक्षित शय्यासंस्तारक प्रोषधोपवास किए हुये स्थान .

सप्तमोऽध्यायः [ १७५ पर शय्या और सस्तारक को भली प्रकार विशेष रूप से निरीक्षण न करना । यदि फरना तो अस्थिर चित्त से । २. अप्रमार्जित दुष्प्रमार्जित शय्यासंस्थारक--शय्या और संस्तारक को भली प्रकार विशेष रूप से रजोहरणादि द्वारा प्रमार्जित न करना । यदि करना तो अस्थिर चित्त से। ३. अप्रत्युपेक्षित दुष्प्रत्युपेक्षित उच्चारप्रस्रवण भूमि-भलीप्रकार विशेष रूप से उच्चार (मल) प्रस्रवण (मूत्र ) के त्यागने की भूमि को निरीक्षण न करना । यदि करना तो अस्थिर चित्त से। ४ अप्रमार्जित दुष्प्रमार्जित प्रस्रवण भूमि भलीप्रकार विशेष रूप से मल मूत्र के त्यागने की भूमि को प्रमार्जित (शुद्ध) नहीं करना । यदि करना तो अस्थिर चित्त से। प्रोषधोपवासस्य सम्यगननुपालनता-प्रोषधोपवास का भली प्रकार पालन न करना। उसमे चित्त को अस्थिर रखना। ५ सचित्तसम्बन्धसस्मिथाभिषवदुःपकाहाराः । , ७, ३५. भोयणतो समणोवासएणं पञ्च अइयारा जाणियव्वा, न समायरियव्वा, तं जहा-सचित्ताहारे सचित्तपडिबद्धाहारे उप्प- उलियोसहिसकावणया दुप्पोलितोसहिमक्खणया, तुच्छो- सहिभक्खणया। उपा० अध्या० १ छाया- भोजनतः श्रमणोपासकेन पञ्चातिचाराः ज्ञातव्याः, न समाचरि- तव्याः, तद्यथा-सचित्ताहारः, सचित्तप्रतिवद्धाहारः, अपकौषधिमक्ष- णता, दुःपकौषधिभक्षणता, तुच्छौषधिभक्षणता। भाषा टीका - श्रमणोपासक को भोजन (उपभोगपरिभोगपरिमाण) के पाच अतिचार जानने चाहियें । किन्तु उनका आचरण नहीं करना चाहिये । वह यह है- १. सचित्ताहार-त्यागहोने पर जीव सहित पुष्प फल आदि का आहार करना ।

तस्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्यय: २. सचित्तप्रवद्धाहार - सचित्त वस्तु से स्पर्श हुए पदार्थो का आहार करना । ३. अपक्वाहार-अग्नि से न पकाये हुये तथा औषधि श्रादि मिश्र पदार्थों का साना । दुपक्वाहार भलीप्रकार न पके अथवा देर से परिपक्व होने वाले पदार्थो या भोजन करना। ५. तुच्छौषधिभक्षणता - ऐसे पदार्थ को खाना जिसके खाने से हिंसा विशेष होती हो किन्तु उदर पूर्ति न हो सके। सचित्तनिनेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यका- लातिकमाः। अहासंविभागस्त पंच अइयारा जाणियव्वा, न समायरि- यव्या. तं जहा-सचित्तनिवेवणया, सचित्तपेहण्या. कालाइका- मदाणे परोवएले सच्छरया । उपा० अध्या०२ डाया- अतिथिसंविभागस्य पञ्चातिचाराः ज्ञातव्याः, न समाचरितव्याः, तद्यथा-सचित्तनिक्षेपणता, सचित्तपिधानता, कालातिक्रमदानं, परव्यपदेशः, मत्सरता। भाषा टीका-अतिथिसंविभाग व्रत के पांच अतिचार जानने चाहियें। किन्तु पन एस प्रापरण नहीं करना चाहिये । वह यह हैं- १. सचित्तनिक्षेपणता न देने की बुद्धि से जल अन्न अथवा बनस्पति श्रादि से अचित्त श्राहार रखना । २ सचित्तपिधानता-सचित्र कमलपत्र आदि से ढक कर आहार को रखना। ३ फालातिक्रमदान दान देने के काल को उल्लवन करके अकात में विनती करना । अथवा वीते हुए समय घाली वस्तु का दान करना। ४ परव्यपदेश न देने को बुद्धि से साधु को अन्य की वस्तु बतला देनी धमा अत्य की वस्तु फा उसकी बिना प्राज्ञा दान करना । - सप्तमोऽध्यायः [ १७७ ५. मत्सरता अमुक ग्रहस्थ ने इस प्रकार का दान दिया है तो क्या मैं उससे किसी प्रकार न्यूनता रखता हूँ१ नहीं, अतः मैं भी दान दूंगा। इस प्रकार असूया वा अहंकार पूर्वक दान करना । जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्धनिदानानि। ~ अपच्छिममारणंतियसंलेहणा भूसणाराहणाए पंच अइ- यारा जाणियव्वा न समायरियव्वा, जहा-इहलोगासंसप्पओगे, परलोगासंसप्पओगे, जीवियासंसप्पओगे, मरणासंसप्पभोगे, कामभोगासंसप्पओगे । उपा० अध्याय १ छाया- अपश्चिममारणान्तिकसल्लेखनाजूषणाऽऽराधनायाः, पञ्चातिचाराः ज्ञातव्याः, न समाचरितव्याः, तद्यथा-इहलोकाशंसाप्रयोगः, पर- लोकाशंसाप्रयोगः, जीविताशंसाप्रयोगः, मरणाशंसाप्रयोगः काम- भोगाशंसाप्रयोगः । भाषा दीका आयु के अन्तिम भाग मरण समय में होने वालीसल्लेखना के पांच अतिचार जानने चाहिये। उन पर आचरण न करना चाहिये । वह यह हैं १. इहलोकाशसाप्रयोग-मरने के पश्चात् इहलोक के सुखों की इच्छा करना। २ परलोकाशंसाप्रयोग-मरने के पश्चात् उत्तम देवलोक आदि के सुखों की इच्छा करना। ३ जीविताशंसाप्रयोग-जीवित ही रहने की इच्छा करना। मरणाशंसाप्रयोग-दुख आदि से छूटने के लिये शीघ्र मरने की इच्छा करना। ५. काममोगाशंसाप्रयोग-विशेष काम भोग की इच्छा करना। अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसों दानम् । समणोवासए णं तहारूवं समणं वा जाव पडिलामेमाणे ४ १७८ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : dear तहारूवस्स समणरस वा माहणस्स वा समाहिं उप्पाएति. समाहिकारएणं तमेव समाहिं पडिलभइ । व्याख्या० शत०७, उ०३, सू०२६३. छाया- श्रमणोपासकः तथारूपं श्रमणं वा यावन् पनिलाभ्यन नथा- रूपस्य श्रमणस्य वा माहनस्य वा समाधि उत्पादयति, समाधिका- रकेण तमेव समाधि प्रतिलभते । भाषा टीका-श्रमणोपासक तथारूप श्रमण अथवा माइन (धावक) को यावत. आहार आदि देता हुआ तथा रूप श्रमण अथवा माहन को समाधि उत्पन्न करना है। समाधि ही के कारण से उसको भी समाधि की प्राप्ति होती है। सगति-उपरोक्त आगम वाक्य मे दान का लक्षण करते हुए उसका महत्व भी बतलाया है। जो कि सूत्र के " अनुग्रहार्थ " पद से स्पष्ट है। विधिद्रव्यदातपात्रविशेषात्तद्विशेषः । ७, ३४ दव्वसुद्धणं दायगसुद्धेणं तवस्सिविसुद्धेणं तिकरणसुद्धणं पडिगाहसुद्धणं तिविहेणं तिकरणसुद्धेणं दाणेणं । व्याख्या प्र० श० १५, सू० ५४१. छाया- द्रव्यशुद्धेन दायकशुद्धेन तपस्विशुद्धेन त्रिकरणशुद्धन प्रतिगाइ- शुद्धन त्रिविधेन त्रिकरणशुद्धन दानेन । भाषा टीका-द्रव्य शुध्द से, दातृ शुध्द से, तपस्वि शुध्द से, त्रिकरण (मन वचन काय) शुध्द से, पात्र शुध्द से दान की विशेषता होती है। संगति-इन सभी सूत्र और आगम वाक्यो के अक्षर प्राय मिलते हैं। जहां कहीं भेद है तो वह शाब्दिक ही है। तात्विक बिल्कुल नहीं है। इति श्री-जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम-महाराज-सगृहीत तत्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वये * सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ७॥ मैं अष्टमोऽध्यायः मिथ्यादर्शनाऽविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः। छाया- -- पंच आसवदारा पण्णत्ता, तं जहा-मिच्छत्तं अविरई पमाया कसाया जोगा। समवायांग, समय पू. पञ्च प्रास्रवद्वाराणि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा-मिथ्यात्वमविरतिः प्रमादाः कपायाः योगाः। भाषा टोका-आस्रव के द्वार पांच वतलाये गये हैं-मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कपाय और योग। सकपायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान पुद्ग- लानादत्ते स बन्धः। जोगबंधे कसायबंधे। समवायांग समवाय . दोहिं ठाणेहिं पापकम्मा बंधति, तं जहा-रागेण य दोसेण य । रागे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-माया य लोभे य । दोसे दुविहे पएणत्ते, तं जहा-कोहे य माणे य । स्थानांग स्थान २, उ०२ ६, २. प्रज्ञापना पद २३, सू० ५. छाया- योगवन्धः कपायवन्धः । द्वाभ्यां स्थानाभ्यां पापकर्माणि वध्नन्ति, तद्यथा-रागेण च द्वेपेण च ! रागः द्विविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-माया च लोभश्च द्वेषः द्विविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-क्रोधश्च मानश्च ।

१०० ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : - भाषा टीका-बन्ध योग से होता है और कषाय से होता है। दो स्थानों से पाप कर्म बंधते हैं-राग से और द्वीप से ! राग दो प्रकार का कहा गया है-माया और लोभ । द्वष दो प्रकार का कहा गया है-क्रोध और मान । संगति-उपरोक्त आगम वाक्य से स्पष्ट है कि बंध जीव के कषाय युक्त होने पर ही होता है। कर्म के योग्य पुद्गलों का ग्रहण करना स्पष्ट ही है। प्रतिस्थित्यनुभागप्रदेशास्तद्विषयः । चउबिहे धन्धे पण्णते, तं जहा-पगड़बंधे ठिबन्धे अणु- भावबन्धे पएलबन्धे । समवायांग समवाय ४ छाया- चतुर्विधः बन्धः प्रज्ञप्तस्तद्यथा-प्रकृतिबन्धः, स्थितिबन्धः, अनुभाग- बन्धः, प्रदेशवन्धः। भाषा टीका-बन्ध चार प्रकार का बतलाया गया है-प्रकृतिबंध, स्थिति बंध, अनुभागवन्ध और प्रदेशबंध। आयो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायु- नालगोनान्तरायाः । ८,४ अट्ठ करमपगडीनो पाताओ. तं जहा-पाणावरणिज, दसणावाणिज,वेदगिज.सोहणिज्ज, प्राज्यं नामं, गोयं, अंतराइयं । प्रज्ञापना पद २१, उ०१. सु० २८८ छाया- अष्टौ कर्मप्रकृतयः प्राप्ताः, नद्यथा-ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनोयं, मोहनीयं, आयुः, नाम, गोत्रं, अन्तरायः । भाषा टीकाकर्मप्रकृतियां आठ प्रकार की बतलाई गई हैं । वह यह शानावरतीय, दर्शनायरणीय, वेदनीय, मोहनीय, यायु, नाम, गोत्र और मन्तराय । - अष्टमोऽध्याय: [ १८६ पंचनवहयष्टाविंशतिचतुर्डिचत्वारिंशदहिप- चमेदा यथाक्रमम् । ८, ५ भाषा टीका-उनके भेद क्रम से पांच, नव, दो, अट्ठाईस, चार, बयालीस, दो और पांच होते हैं। मतिश्रुतावधिमनःपर्ययळेवलानाम् । ८,६ पंचविहे गाणावरणिजे कम्मे पत्ते, तं जहा-आभिणि- बोहियणाणावरणिज्जे सुयणाणावरणिजे, ओहिणाणावरणिजे मणपज्जवणाणावरणिज्जे केवलणाणावरणिज्जे । स्थानाग स्थान ५, उ० ३, सू०४६४ छाया-- पञ्चविधं ज्ञानावरणीयं कर्म प्रज्ञप्तं, तद्यथा-आभिनियोधिकज्ञाना- दरणीयं, श्रुतज्ञानावरणीयं, अवधिज्ञानावरणीयं, मनःपर्ययज्ञाना- वरणीयं, केवलज्ञानावरणीयं । भापा टीका-बानावरणीय कर्म पांच प्रकार का होता है-श्राभिनिबोधिक जानावरणीय (मतिज्ञानावरणीय), श्रुतज्ञानावरणीय, अवधिज्ञानावरणीय मनः पर्यय ज्ञानावरणीय और केवल जानावरणीय। चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रानिद्रा- प्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यानद्धयश्च । गवविधे दरितणावरणिज्जे कम्मे पण्णते, तं जहा-निदा निदानिदा पयला पयलापयला थीणगिद्धी चनखुदलणावरण अचखुदसणावरणे, अवधिदसणावरणे केवलदसणावरणे । . स्थानांग स्थान ६, सू०६६८, १७२ ] तत्त्वार्थसूनजैनाऽऽगमसमन्वय : , छाया- नवविधं दर्शनावरणीयं कर्म प्रजप्तं, तद्यथा-निद्रा निद्रानिद्रा प्रचला प्रचलाप्रचला स्त्यानगृद्धिः चक्षुदर्शनावरणोऽचक्षुदर्शनावरणो ऽवधिदर्शनावरणः केवलदर्शनावरणः । भापा टीका-दर्शनावरणीय कर्म नौ प्रकार का होता है-निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचला प्रचला, स्त्यानगृध्दि, चक्षु दर्शनावरण, अचक्षु दर्शनावरण, अवधिदर्शना- वरण और केवलदर्शनावरण | सदसहये। ८,८ सातावेदणिज्जे य असायावेदणिज्जे य । प्रजापना पद २३, उ०२, सू० २६३ छाया- सातावेदनीयश्चासातावेदनीयश्च । भाषा टीका-वेदनीय कर्म दो प्रकार का होता है-साता वेदनीय और असाता वेदनीय दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीया- ख्यास्त्रिद्विनवषोडशभेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदु- भयान्यकषायकषायौ हास्यरत्यरतिशोकमयजुगु- प्सास्त्रीपुंन्नपुंसकवेदा अनंतानुवन्ध्यप्रत्याख्यान- प्रत्याख्यानसंज्वलनविकल्पाश्चैकशः क्रोधमा- नमायालोमाः। ८, ६. मोहणिजे णं भंते! कम्मे कतिविधे पणगाते? गोयमा दुविहे पण्णत्ते; तं जहा-दसणमोहणिजे य चरित्तमोहणिज्जे य। दंसणमोहणिज्जे णं भंते! कम्मे कतिविधे पण्णते? गोयमा! - अष्टमाऽध्यायः [१ तिविहे परणत्ते, तं जहा-सम्मत्तवेदणिज्जे, मिच्छत्तवेदणिज्जे, सम्मामिच्छत्तवेयणिज्जे । चरित्तमोहणिज्जे णं भंते! कम्मे कतिविधे पराणते ? गोयमा! दुविहे पण्णते, तं जहा-कसायवेदणिजे नो- कसायवेदणिजे । कसायवेदणिज्जे णं भंते ! कतिविधे पण्णते? गोयमा! सोलसविधे पण्णत्ते, तं जहा-अणंताणुबंधीकोहे अणंताणुबंधी माणे अ० माया अ० लोभे, अपञ्चक्खाणे कोहे एवं माणे माया लोभे, पञ्चक्खणावरणे कोहे एवं माणे माया लोभे संजलणकोह एवं माणे माया लोभे । नोकसायवेयणिज्जे णं भंते! कम्मे कतिविधे पण्णते? गोथमा! णवविधे पण्णत्ते, तं जहा-इत्थीवेयवेयणिज्जे, पुरिसवे० नपुंसगवे० हासे रती अरती भए सोगे दुगुंछा । प्रज्ञापना कर्मवन्ध पद २३, उ० २ मोहनीयं भगवन् ! कर्म कतिविधं प्रज्ञप्तं ? गौनम! विविध प्रज्ञप्तं, तद्यथा-दर्शनमोहनीयश्च, चारित्रमोह- नीयश्च । दर्शनमोहनीयं भगवन् ! कर्म कतिविधं प्रज्ञप्तं ? गौतम ! त्रिविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-सम्यक्त्ववेदनीयः, मिथ्यात्ववेद- नीयः, सम्यङिमथ्यात्ववेदनीयः । चारित्रमोहनीयं भगवन् ! कर्म कतिविधं प्रज्ञप्तं ? छाया- १८४ ] तत्स्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वय : गौतम ! द्विविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-कपायवेदनीयः नोकपायवेदनीयः। कषायवेदनीयः भगवन् ! कतिविधः प्रज्ञप्तः? गौतम ! पोडशविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-अनन्तानुवन्धीक्रोधः, अन- न्तानुबन्धीमानः, अ० माया, अ० लोमः; अप्रत्याख्यानक्रोधः, एवं मानः, माया, लोमा, प्रत्याख्यानावरणक्रोधः, एवं मानः, माया, लोभः; संज्वलनक्रोधः, एवं मानः, माया, लोभः । मोकषायवेदनीयं भगवन् ! कर्म कतिविध प्रज्ञप्तं ? गौतम ! नवविध प्रज्ञप्तं, तद्यथा-स्त्रीवेदवेदनीयः, पुरुपवेदवेदनीयः, नपुंसकवेदवेदनीयः, हास्यः, रतिः, अरतिः, भयः, शोकः, जुगुप्सा। प्रश्न-भगवन् ! मोहनीय कर्म कितने प्रकार का कहा गया है ? उत्तर-गौतम ! वह दो प्रकार का कहा गया है--दर्शन मोहनीय और पारिन मोहनीय। प्रश्न-भगषम् ! दर्शन मोहनीय कर्म कितने प्रकार का कहा गया है ? उत्तर-गौतम! तीन प्रकार का कहा गया है- सम्यक्त्व वेदनीय, मिथ्यात्व वेदनीय, सम्यमिध्यात्ववेदनीय । प्रश्न-भगवन् । चारित्र मोहनीय कर्म कितने प्रकार का कहा गया है ? उत्तर--गौतम दो प्रकार का कहा गया है-कषाय वेदनीय और नो कषायवेदनीय । प्रश्न-भगवन् ! कषायवेदनीय कर्म कितने प्रकार का कहा गया है ? उत्तर-गौतम ! वह सोलह प्रकार का कहा गया है:--अनन्तानुबन्धी क्रोध, अनन्तानुबन्धी मान, अ० माया, अ० लोभ; अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, लोभ , प्रत्याख्यान कोष मान माया लोभ और संज्वलन क्रोध मान माया लोभ । प्रश्न-भगवन् ! नो कषाय वेदनीय कर्म कितने प्रकार का कहा गया है ? उत्तर--गौतम ! वह नौ प्रकार का कहा गया है :-स्त्रीवेदनय, पुरुषवेदनय, नपुंसक वेदनय, हास्य, रति, अरति, भय, शोक, और जुगुप्सा।

अष्टमोऽध्याय: [ १८५ mmmmmmmm ८, १०. प्रज्ञापना पद २३, उ०२ .. नारकर्यगयोनमानुषदैवानि । आउएणं भंते! कम्मे कइविहे पण्णत्ते? गोयमा! चउविहे पण्णत्ते, तं जहा - णेरइयाउए, तिरियाउए, मनुस्साउए, देवाउए। छाया- आयुः भगवन् ! कर्म कतिविधं प्रजप्तं ? गौतम! चतुर्विधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-नैरयिकायुः, तिर्यगायुः, मनुष्यायुः, देवायुः । प्रश्न-भगवन ! श्रायु कर्म कितने प्रकार का कहा गया है ? उत्तर-गौतम । वह चार प्रकार का कहा गया है :--नरक आयु, तिर्यश्च आयु, मनुप्य आयु और देव आयु ! गतिजातिशरीराङ्गोपाङ्गनिर्माणबन्धनसंघा- तसंस्थानसंहननस्पर्शरसगंधवर्णानुपूर्व्यागुरुलघूप- घातपरघातातपोद्योतोच्छवासविहायोगतयः प्रत्ये- कशरीरत्रससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्तिस्थिरादेय- यश-कीर्तिसेतराणि तीर्थकरत्वं च । ८. ११. णामेणं भंते! कम्मे कतिविहे पण्णते? गोयमा! पायाली- सतिविहे पण्णत्ते, तं जहा-गतिनामे १, जातिनामे २, सरीरणामे ३, सरीरोवंगणामे ४, सरीरबंधणणामे ५, सरीरसंघयणनामे ६, संघायणणामे ७, संठाणणामे ८. वराणणाम है, गंधणामे १०, रसणामे ११, फासणामे १२, अगुरुलघुणामे १३, उपघायणामे १४, पराघायणामे १५, आणुपुवीणामे १६, उस्सासणामे १७, आय- १८६ ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : वणामे १८, उज्जोयणामे १६, विहायगतिणामे २०, तसणामे २१, थावरणामे २२, सुहुमनामे २३, वादरणामे २४, पजत्तणामे २५, अपजत्तणामे २६, साहारणसरीरणामे २७, पत्तेयसरीरणामे २८, थिरणामे २६, अथिरणामे ३०, सुभणामे ३१. असुभणामे ३२, सुभगणामे ३३. दुभगणामे ३४, सूलरनामे ३५, दूसरनामे ३६, आदेजनामे ३७, अणादेजनामे ३८, जसोकित्तिणामे ३६, अजसोकित्तिणामे ४०, णिम्माण णामे ४१, तित्थगरणामे ४२ । प्रज्ञापना, उ० २, पद २३, सू० २२३ समवायांग० स्थान ४२. छाया नाम भगवन् ! कर्म कतिविधं प्रज्ञप्तं ? गौतम ! द्विचत्वारिंशद्विधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा -१ गतिनाम, २ जातिनाम, ३ शरीरनाम, ४ शरीराङ्गोपांगनाम, ५ शरीरवन्धननाम, ६ शरीरसंघातनाम, ७ संहनननाम, ८ संस्थाननाम, ९ वर्णनाम, १० गन्धनाम, ११ रसनाम, १२ स्पर्शनाम, १३ अगुरुलघुनाम, १४ उपघात- नाम, १५ परघातनाम, १६ आनुपूर्वीनाम, १७ उच्छ्वासनाम, १८ आतपनाय, १९ उद्योतनाम, २० विहायोगतिनाम, २१ त्रस- नाम, २२ स्थावरनाम, २३ सूक्ष्मनाम, २४ वादग्नाम, २५ पर्याप्तनाम, २६ अपर्याप्तनाम, २७ साधारणशरीरनाम, २८ प्रत्येकशरोरनाम, २९ स्थिरनाम, ३० अस्थिरनाम, ३१ शुभनाम ३२ अशुभनाम, ३३ सुभगनाम, ३४ दुर्भगनाम, ३५ सुस्वरनाम, ३६ दुःस्वरनाम, ३७ श्रादेयनाम, ३८ अनादेयनाम, ३९ यश:- कीर्तिनाम, ४० अयशःकोर्तिनाम, ४१ निर्माणनाम, ४२ तीर्थ- करनाम। भगवन् ! नामकर्म कितने प्रकार का कहा जाता है ? गोतम ! वह वयालीस प्रकार का कहा गया है :- , - , प्रश्न उत्तर अष्टमोऽध्याय: [ १८७ . , संगति-१. १. गतिनाम, २. जातिनाम, ३. शरीरनाम, ४. शरीराङ्गोपाङ्गनाम, ५. शरीर धन्धननाम, ६ शरीरसंघात नाम, ७ संहनन नाम, ८ संस्थान नाम, 8 वर्णनाम, १० गन्ध नाम, ११ रसनाम, १२ स्पर्शनाम, १३ अगुरुलघुनाम, १४ उपघातनाम, १५ परघातनाम, १६ आनुपूर्वीनाम, १७ उछवासनाम, १८ प्रातपनाम, १६ उद्योतनाम, २० विहायोगतिनाम, २१ त्रसनाम, २२ स्थावरनाम, २३ सूक्ष्मनाम, २४ बादरनाम, २५ पर्याप्तनाम, २६ अपर्याप्तनाम, २७ साधारणशरीरनाम, २८ प्रत्येकशरीरनाम, २६ स्थिरनाम, ३० अस्थिरनाम, ३१ शुभनाम, ३२ अशुभनाम, ३३ सुभगनाम, ३४ दुर्भगनाम, ३५ सुस्वरनाम, ३६ दुःस्वरनाम, ३७ श्रादेयनाम, ६८ अनादेयनाम, ३६ यशःकीर्तिनाम, ४. अयश.कीर्तिनाम, ४१ निर्माणनाम, ४२ तीर्थकरनाम । १. जिसके उदय से आत्मा भवान्तर के प्रति सम्मुख होकर गमन को प्राप्त होता है सो गतिनाम कर्म है । यह चार प्रकार का होता है-१ नरकगति,२ तिर्यंच- गति ३ देवगति और ४ मनुष्य गति । २. उक्त गतियों मे जो अविरोधी समान धर्मों से आत्मा को एक रूप करता है सो जातिनाम कर्म है। उसके पांच भेद हैं -- एकेन्द्रियजातिनामकर्म, द्वीन्द्रियजातिनामकर्म, त्रींद्रियजातिनामकर्म, चतुरिन्द्रियजातिनामकर्म, और पचेद्रियजातिनामकर्म । ३. जिसके उदय से शरीर की रचना होती है उसे शरीर नामकर्म कहते हैं। यह भी पांच प्रकार का है - औदारिकशरीर, वैक्रियिकशरीर, आहारकशरीर, तैजसशरीर और फार्मणशरीर । ४ जिसके उदय से शरीर के अंग उपांगों का भेद प्रगट हो उसको शरीराङ्गोपाङ्ग- नामकर्म कहते हैं । मस्तक, पीठ, हृदय, बाहु, उदर, जांघ, हाथ, और पांव इनको तो अग कहते हैं और इनके ललाट नासिका अदिभागों को उपांग कहते हैं। अंगोपांग नाम कर्म तीन प्रकार का है. १ औदारिकशरीरांगोपांग, २ वैक्रियिक शरीरांगोपांग और ३ श्राहारकशरीरांगोपांग ५. जिसके उदय से शरीर नाम कर्म के से हुए आहारवर्गणा के पुद्गलस्कन्धो के प्रदेशो का मिलना हो, वह शरीरवन्धन नाम कर्म है । यह पांच प्रकार का होता है - औदारिक बन्धन नाम कर्म, वैक्रियिक बन्धन नाम कर्म, आहारकबन्धन - वश ग्रहण किये २८. ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वयः है नाम कर्म, तैजसबन्धन नाम कर्म, और कार्मणबन्धन नाम कर्म । जिसके उदय से औदारिक बन्ध हो सो औदारिक बन्धन नाम कर्म है । इसी प्रकार शेष बन्धनों का लक्षण भी लगा लेना चाहिये। ६. जिसके उदय से औदारिक आदि शरीरों का छिद्र रहित अन्योन्यप्रदेशानुप्रवेश- रूप संगठन (एकता) हो उसे शरीरसंघातनाम कर्म कहते हैं । यह भी पांचो शरीरों की अपेक्षा से औदारिकशरीरसंघात नाम कर्म आदि पांच प्रकार का ७ जिसके उदय से शरीर के अस्थिपंजर (हाड़) आदि के बन्धनों में विशेषता हो उसे संहनन नाम कर्म कहते हैं । वह छह प्रकार का है १ ववृषभनाराचसंहनन, २ वज्रनाराचसंहनन, ३ नाराचसंहनन, ४ अर्द्ध नाराचसंहनन, ५ कीलकसंहनन, और ६ असंप्राप्तामृपाटिका संहनन । नसो मे हाड़ो के बन्धने का नाम ऋषभ या वृषभ है, नाराच नाम कीलने का है और संहनन नाम हाड़ों के समूह का है । सो जिस कर्म के उदय से वृषभ (वेष्टन ), नाराच (कील) और संहनन ( अस्थिपंजर ) ये तीनों ही वज्र के समान अभेद्य हो, उसे वज्रवृषभनाराच संहनन कहते हैं। जिसके उदय से नाराच और संहनन तो वज्रमय हों और वृषभ सामान्य हो, वह बजनाराच संहनन नाम कर्म है। जिसके उदय से हाड़ तथा सन्धियों के कोले तो हो, परन्तु वे वनमय न हों और वनमय वेष्टन भी न हो, सो नाराच संहनन नाम कर्म है जिसके उदय से हाड़ो की संधियां अद्ध कीलित हो, अर्थात् कौले एक तरफ तो हों दूसरी तरफ न हों, वह अर्द्धनाराच संहनन नाम कम है जिसके उदय से हाड़ परस्पर कौलित हों, सो कीलक संहनन नाम कर्म है। जिसके उदय से हाड़ो की संथियां कोलित तो न हों, किन्तु नसों, स्नायुओ और मांस से वन्धी हों वह असंप्राप्तामृपाटिका संहनन नाम कम है। = जिसके उदय से शरीर की आकृति ( आकार ) उत्पन्न हो, उसे संस्थान नाम कर्म कहते हैं। यह छह प्रकार का है १ समचतुरस्रसंस्थान, २ न्यग्रोधपरिमंडल संस्थान, ३ मादिसंस्थान, ४ कुजकसंस्थान, ५ वामनसंस्थान, और ६ हुंडक संस्थान । जिसके उदय से ऊपर, नीचे और मध्य में समान विभाग से शरीर की प्राकृति - अष्टमोऽध्यायः [ १८ उत्पन्न हो उसे समचतुरस्र संस्थान नाम कर्म कहते है। जिसके उदय से शरीर का नाभि के नीचे का भाग वटवृक्ष के समान पतला हो और ऊपर का स्थूल व मोटा हो, वह न्यग्रोध परिमंडल सस्थान नाम कर्म है । जिसके उदय से शरीर के नीचे का भागस्थूल या मोटा हो और ऊपर का पतला हो, उसे स्वातिसस्थान नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से पीठ के भाग मे बहुत से पुद्गलो का समूह हो अर्थात् कुबड़ा शरीर हो, उसे कुब्जक संस्थान नामकर्म कहते हैं। जिसके उदय से शरीर बहुत छोटा हो वह वामन संस्थान नामकर्म है। और जिसके उदय से शरीर के अंग उपांग कहीं के कहीं, छोटे, बड़े वा संख्या मे न्यूना- धिक हो-इस तरह विषम वेडौल आकार का शरीर हो, उसे हुडक सस्थान नामकर्म कहते हैं। ६. जिसके उदय से शरीर मे वर्ण (रंग ) उत्पन्न हो, उसे वर्णनामकर्म कहते है । यह पांच प्रकार का है .-१ शुक्लवर्ण नामकर्म, २ कृष्णवर्ण नामकर्म, ३ नीलवर्ण नाम कर्म, ४. रक्तवर्ण नामकर्म, और ५ पीतवर्ण नामकर्म । १०. जिसके उदय से शरीर में गध प्रगट हो, सो गन्धनामकर्म है । यह दो प्रकार का है। एक सुगन्ध नामकर्म, दूसरा दुर्गन्ध नामकर्म । ११. जिसके उदय से देह मे रस ( स्वाद ) उत्पन्न हो उसे रसनाम कर्म कहते हैं । यह पांच प्रकार का है : १ तिक्तरस, २ कटुरस, ३. कषायरस, ४. अम्लरस और ५. मधुर रसनामकर्म । १२. जिसके उदय से शरीर मे स्पर्शगुण प्रगट होता है उसे स्पर्शनामकर्म कहते है। यह आठ प्रकार का है : १. कर्कशस्पर्श, २ मृदुस्पर्श, ३. गुरुस्पर्श, ४ लघुस्पर्श, . स्निग्ध स्पर्श, ६. रूक्षस्पर्श, ७. शीत स्पर्श और = उष्णस्पर्शनामकर्म । १३ जिसके उदय से जोवो का शरीर लोहपिंड के समान भारीपन के कारण नीचे नही पड़जाता है, और आक की रुई के समान हलकेपन से उड़ भी नहीं जाता है उसको गुरुलघु नामकर्म कहते हैं । यहां पर शरीर सहित आत्मा के सम्बन्ध मे अगुरुलघु कर्मप्रकृति मानी गई है। द्रव्यो मे जो अगुरुलघुत्व है वह उनका स्वभाविक गुण है। १४ जिसके उदय से शरीर के अवयव ऐसे होते हैं कि उनसे उसीका बंधन वा घात हो जाता हो उसे उपघात नामकर्म कहते हैं। १५. जिसके उदय से पैने सोंग, नख वो डंक इत्यादि पर को घात करने वाले - १९० । तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : अवयव होते हैं उसे परघात नामकर्म कहते हैं। १६. पूर्वायु के उच्छेद होने पर पूर्व के निर्माण नामकर्म की निवृत्ति होने पर विग्रह गति मे जिसके उदय से मरण से पूर्व के शरीर के आकार का विनाश नहीं हो उसे भानुपूर्वी नामकर्म कहते हैं । इसके चारो गतियो की अपेक्षा से चार भेद होते हैं । जिस समय मनुष्य अथवा तिर्यंच की आयु पूर्ण हो और आत्मा शरीर से प्रथक् होकर नरक भव के प्रति जाने को संमुख हो, उस समय मार्ग मे जिसके उदय से आत्मा के प्रदेश पहले शरीर के आकार के रहते हैं उसको नरकगतिप्रयोग्यानुपूर्वी नाम कर्म कहते हैं । इसी प्रकार देवगति प्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी और मनुष्य गति-प्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्म को भी समझना चाहिये । इस कर्म का उदय विग्रहगति मे ही होता है । इस कर्म का उदय फाल जघन्य एक समय, मध्यम दो समय और उत्कृष्ट तीन समय मात्र है । १७. जिसके उदय से शरीर मे उच्छ्वास उत्पन्न हो सो उच्छ्वास १८. जिसके उदय से शरीर आतापकारी होता है, वह प्रातपनामकर्म है। इस कर्म का उदय सूर्य के विमान मे जो बादर पयाप्त जीव पृथिवीकायिक मणिस्वरूप होते हैं, उनके ही होता है। अन्य के नहीं होता। १९. जिसके उदय से उद्योतरूप शरीर होता है सो उद्योतनामकर्म है । इसका वय चद्रमा भादि के विमान के पृथिवीकायिक जीवों के, तथा आगिया (पटवीजना जुगनू) आदि जीवों के होता है । २०. जिसके उदय से आकाश मे गमन हो उसे विहायोगतिनामकर्म कहते हैं । यह दो प्रकार की होती है । एक प्रशस्त विहायोगति दूसरी अप्रशस्तविहायोगति । २१. जिसके उदय से आत्मा द्वीद्रिय आदि शरीर धारण करता है सो सनामकर्म नामकर्म है। -- २२ जिसके उदय से जीव पृथिवी, अप, तेज, वायु और वनस्पतिकाय में उत्पन्न होता है सो स्थावरनामकर्म है। २३. जिसके उदय से ऐसा सूक्ष्म शरीर प्राप्त हो जो अन्य जीवों के उपकार वा पात करने में कारण न हो, पृथ्वी जल अग्नि पवन आदि से जिसका घात नही हो और अष्टमोऽध्याय: [ १६१ पहाड़ आदि मे प्रवेश करते हुए भी नहीं रुके उसे सूक्ष्मशरोर नामकर्म कहते है। २४ जिसके उदय से अन्य को रोकने योग्य वा अन्य से रुकने योग्य स्थूल शरी प्राप्त हो उसको वादर शरीर नामकर्म कहते है । २५. जिसके उदय से जीव आहारादि पर्याप्ति पूर्ण करता है उसे पर्याप्तिनामकर्म कहते हैं । यह छह प्रकार का है ~ १. आहार पर्याप्ति, २. शरीर पर्याप्ति, ३. इन्द्रि पर्याप्ति, ४ प्राणीपान पर्यामि, ५ भाषा पर्याप्ति, और ६. मनः पर्याप्ति । यहां यह प्रश्न हो सकता है कि प्राणापानपर्याप्ति नाम कर्म के उदय का जो उदर से पवन का निकालना वा प्रवेश होना फल है, वही उच्छ्वास कर्म के उदय का भी है। फिर इन दोनो मे अंतर क्या हुआ ? सो इसका उत्तर यह है कि इन दोनों मे इन्द्रिय अती- न्द्रिय का भेद है। अर्थात् पञ्चेन्द्रिय जीयो के सर्दी-गर्मी के कारण जो श्वास चलती है और जिसका शब्द सुन पड़ता है तथा मुह के पास हाथ ले जाने से जो स्पर्श से मालूम होती है वह तो उच्छ्वास नाम कर्म के उदय से होती है । और जो समस्त संसारी जीवो के होती है और जो इन्द्रिय गोचर नही होती है वह प्राणापान पर्याप्ति के उदय से होती है। एकेन्द्रिय जीवो के भाषा और मनको छोड़ कर चार; द्वीन्द्रिय, त्रींद्रिय, चतुरिन्द्रिय और असैनी पचेन्द्रिय जीवो के भाषा सहित पाच और सैनी पंचेन्द्रियो के छहों पर्याप्ति होती हैं। २६. जिसके उदय से जीव छहो पर्याप्ति में से एक को भी पूर्ण नहीं कर सके उसे अपर्याप्तिनामकर्मकहते है। २७ जिसके उदय से एक शरीर बहुत से जीवों के उपभोगने का कारण हो - उसे साधारण शरीर नामकर्म कहते हैं । जिन अनंत जीवो के श्राहार श्रादि चार पर्याप्ति, जन्म, मरण, श्वासोच्छ्वास, और उपकार एक ही काल मे होते हैं वे साधारण जीव है । जिस काल मे जिस आहार आदि पर्याप्ति, जन्म, मरण, श्वासोच्छ्वास को एक जीव ग्रहण करता है उसी काल मे उसी पर्याप्ति आदि को दूसरे भी अनन्त जीव ग्रहण करते है। ये साधारण जीव वनस्पति काय मे होते हैं। अन्य स्थावरो में नहीं होते । इनके साधारण शरीर नामकर्म का उदय रहता है। २८. जिसके उदय से एक शरीर एक आत्मा के भोगने का कारण होउसे प्रत्येकशरीर १९२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : नामकर्म कहते हैं। २६. जिसके उदय से रस आदि सात धातुएं और उपधातुएं अपने २ स्थान में स्थिरता को प्राप्त हों, दुष्कर उपवास आदि तपश्चरण से भी उपांगों में स्थिरता रहे-रोग नहीं होवे उसे स्थिर नामकर्म कहते हैं । रस, रुधिर, मांस, मेद, हाड़, मज्जा और पोर्य ये सात धातुएं हैं। पात, पित्त, कफ, शिरा स्नायु, चाम और जठराग्नि ये सात उपधातुए हैं । ३० जिसके उदय से तनिक उपवास आदि करने से तथा थोड़ी बहुत सर्दी लगने से अंगोपांग कृश होजाय, धातु अपधातुओं की स्थिरता नहीं रहे, रोग हो जावें उसे अस्थिरनामकर्म कहते हैं। ३१. जिसके उदय से शरीर के मस्तक आदि अवयव सुंदर हों-देखने में रमणीक हों, उसे शुभनामकर्म कहते हैं। ३२ जिसके उदय से शरीर के अवयव सुन्दर न हों उसे अशुभनामकर्म कहते हैं। ३३. जिसके उदय से अन्य के प्रीति उत्पन्न हो अर्थात् दूसरों के परिमाण देखते ही प्रीति रूप हो जावे सो सुभगनामकर्म है। ३४. जिसके उदय से रूप आदि गुणों से युक्त होने पर भी दूसरो के अप्रीति उत्पन्न हो, चुरा मालूम हो उसे दुर्भग नाम कर्म कहते हैं । ३५. जिसके उदय से मनोज्ञ स्वर की अर्थात् सबको प्यारे लगने वाले शब्द की प्राप्ति हो उसे सुस्वर नाम कर्म कहते हैं । ३६. जिसके उदय से अमनोज स्वर की प्राप्ति हो, उसे दुःस्वर नाम कर्म कहते हैं । ३७ जिसके जिसके उदय से प्रभा सहित शरीर हो उसे आदेय नाम कर्म कहते हैं । ३८. जिसके उदय से शरीर प्रभारहित हो उसे अनादेय नाम कर्म कहते है । ३६ जिसके उदय से पुण्यरूप गुणों की ख्याति प्रसिद्धि हो उसे यशः कीर्ति नाम फर्म कहते हैं। ४० जिसके उदय से पापरूप गुणो की ख्याति हो उसे अयशः कीर्तिनामकर्म कहते हैं। ४१ जिसके उदय से अंग उपांगों की उत्पत्ति हो उसे निर्माणनामकर्म कहते हैं। यह दो प्रकार का है:-१ स्थाननिर्माण और २ प्रमाण निर्माण । जातिनामक नामकर्म बष्टमोऽध्यायः [ १३ के उदय से जो नाक कान आदि को योग्य स्थान में निर्माण करता है, सो तो स्थान निर्माण नास कर्म है और जो उन्हे योग्य लम्बाई चौड़ाई आदिका प्रमाण लिये रचना करता है, सा प्रमाण निर्माण है। ४२ जिस प्रकृति के उदय से अचिंत्यविभूति संयुक्त तीर्थकरपने की प्राप्ति हो उसे तीर्थकरनामकर्म कहते हैं। इस प्रकार नामकर्म की बयालीस मूल प्रकृतियां हैं । किन्तु इनके अवान्तर भेदों को जोड़ने से नामकर्म की तिरानवे उत्तर प्रकृतियाँ होती है। उच्चैर्नीचैश्च । ८, १२. प्रश्न गोए णं भते! कम्मे कइविहे पण्णत्ते? गोयमा! दुविहे पएणते; तं जहा-उचागोए य नीयागोए य । प्रज्ञापना पद २३, उ०२, सु० २६३. छाया- गोत्रं भगवन् ! कर्म कतिविधं प्रज्ञप्तं? गौतम ! द्विविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-उच्चगोत्रञ्च नीचगोत्रश्च । भगवन् ! गोन कर्म कितने प्रकार का कहा गया है ? उत्तर-गोतम ! वह दो प्रकार का है-उच्चगोत्र और नीचगोत्र । दानलामभोगोपभोगवीर्याणाम् । ८, १३. अंतराए णं भंते! कम्मे कतिविधे पण्णत्ते? गोयमा! पंचविधे पण्णते, तं जहा-दाणंतराइए, लाभंतराइए, मोगंत. राइए, उवभोगंतराइए, वीरियंतराइए । प्रज्ञापना पद २३ उद्दे० २ सूत्र २९३. अन्तरायः भगवन! कर्म कतिविधः प्रज्ञप्तः१ गोतम! पञ्चविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-दानान्तरायिका, लाभान्तरायिकः, भोगान्तरा- यिकः, उपभोगान्तरायिकः, वीर्यान्तरायिकः । छाया- ३ १९६ ] तत्त्वार्थसूत्रजेनाऽऽगमसमन्वय : प्रश्न-भगवन् ! अंतराय कर्म कितने प्रकार का कहा गया है ? उत्तर-गौतम ! वह पांच प्रकार का कहा गया है:-दानान्तराय, लाभान्तराय, मोगान्तराय, उपभोगान्तराय और वीर्यान्तराय । इस प्रकार प्रकृतिबंध का वर्णन किया गया। अब स्थितिबंध का वर्णन किया जाता है- आदितस्तिमृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्साग- रोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः। ८, १४. उदहीसरिसनामाण, तीसई कोडिकोडीओ। उक्कोसिया ठिई होइ, अन्तोमुहुत्तं जहन्निया ॥ १६ ॥ आवरणिज्जाण दुण्हपि, वेयाणिज्जे तहेव य । अन्तराए य कम्मम्मि, ठिई एसा वियाहिया ॥२०॥ उत्तराध्ययन अध्ययन ३३. छाया- उदधिसदृङ्नाम्नां, त्रिंशत्कोटाकोटयः। उत्कृष्टा स्थितिर्भवति, अन्तर्मुहुर्त जघन्यका ॥ १९ ॥ आवरणोर्द्वयोरपि, वेदनीये तथैव च । अन्तराये च कर्मणि, स्थितिरेषा व्याख्याता ॥२०॥ भाषा टोका-ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय और अन्तराय कर्म की कर स्थिति तीस कोड़ाकोड़ी सागर और जघन्य स्थिति अन्तर्मुहुर्त होती है। सप्ततिमोहनीयस्य । ८, १५. उदहीसरिसनामाण, सत्तर कोडिकोडीओ। मोहणिजस्स उक्कोसा, अन्तोमुहुत्तं जहन्निया ॥ उत्तराध्ययन भ०३३, गाथा २१.

: अष्टमोऽध्याय: [ १६५ छाया- उदधिसङ्नाम्नां, सप्ततिः कोटाकोटयः। मोहनीयस्योत्कृष्टा, अन्तर्मुहुर्त जघन्यका ॥ भाषा टीका-मोहनीय कमे को उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोडाकोड़ी सागर और जघन्य स्थिति अन्तर्मुहुर्त होती है। विंशति मगोत्रयोः। ८, १६. उदहीसरिसनामाण, वीसई कोडिकोडीओ। नामगोत्ताणं उक्कोसा, अन्तोमुहुत्तं जहन्निया ।। उत्तराध्ययन अध्य०३३ गाथा ३३ छाया- उदधिसङ्नाम्नां, विंशतिः कोटाकोटयः । नामगोत्रयोरुत्कृष्टा, अन्तर्मुहुर्त जघन्यका ॥ भाषा टीका नाम और गोत्र कर्म की उत्कृष्ट स्थिति बीस कोड़ाकोड़ी सामह की है और जघन्य स्थिति अन्तर्मुहुर्त होती है । त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुषः । ८. १७ तेत्तीस सागरोवमा उक्कोसेण वियाहिया । ठिइ उ आउकम्मस्स, अन्तोमुहुत्तं जहन्निया ।। उत्तराध्ययन अ०३३, गाथा २९ त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा, उत्कर्पण व्याख्याता । स्थितिस्त्वायुः कर्मणः, अन्तर्मुहुर्त जघन्यका ।। भाषा टोका- आयु कर्म की उत्कृष्ट स्थिति तेतीस सागर की है और अन्य स्थिति अन्तर्मुहुत होती है। छाया- अपरा द्वादशमुहुर्ता वेदनीयस्य । ८,१८.

१९६ उत्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : सातावेदणिजस्य' "जहन्नेणं बारसमुहुत्ता। प्रज्ञापना पद २३, उ०२२०२६३. छाया- सातावेदनीयस्य जयन्येन द्वादशमुर्खताः । भाषा टीका साता वेदनीय की जघन्य श्रायु बारह मुहुर्त होती है। नामगोत्रयोरष्टौ । -- ८, १६. जसोकित्तिनामाएणं पुच्छा ? गोयमा! जहणणेणं अट्ठमुहुता। उच्चगोयस्स पुच्छा ? गोयमा! जहणणेणं अट्ठमुहुत्ता । प्रज्ञापना पद २३, २० २, सूत्र २६४. छाया- यशःकोर्तिनाम्नः पृच्छा ? गौतम ! जघन्येनाष्टमुहुर्ताः । उच्चगोत्रस्य पृच्छा ? गोतम ! जयन्येनाष्टमुहुर्ताः ।। भाषा टीका-हे गौतम ! यशकीर्ति नाम कर्म को जघन्य आयु आठ मुहुर्त होती है, और हे गौतम ! उच्च गोत्र कर्म को जघन्य आयु भी आठ मुहुर्त होती है। शेषाणामन्तर्मुहुर्ताः। अन्तोमुहत्तं जहन्निया। उत्तराध्ययन अ० २३, गाथा १६ से २२ तक. छाया अन्तर्मुहुर्त जघन्यका। भाषा टीका -शेष कर्मों की जघन्य श्रायु अन्तर्मुहुर्त होती है । संगति इन सभी सूत्रों के शब्द और पागम वाक्य प्राय. एकसे ही हैं। इस प्रकार स्थिति बन्ध का वर्णन किया गया। अब अनुभागवन्व का वर्णन किया जाता है विपाकोऽनुभवः। ८, २०. . ८,२१.

अष्टमोऽध्यायः [ १९७ स यथानामा ८,२२. - अणुभागफलविवागा। समवायांग, विपाकचुत वर्णन। सव्वेसिं च कन्माणं । प्रज्ञापना पद २३, उ०२. उत्तराध्ययन अ०२३, गाथा १७. छाया अनुभागफल विपाकाः। सर्वषां च कर्मणाम् । भापा टीका सब कर्मा का अनुभाग उन २ कर्मों के फल का विपाक है । अर्थात् उन मे जो फलदान शक्तिका पड़जाना और उदय मे आकर अनुभव होने लगना है सो अनुभव वा अनुभाग है। ततश्च निर्जरा। ६, २३. उदीरिया वेड्या य निजिन्ना । व्याख्या प्रज्ञप्ति शत० १, उ० १, सू० ११. छाया- उदीरिताः वेदिताश्च निजीर्णाः । भाषा टीका उस अनुभव के पश्चात् उन कर्मों की फल देकर निर्जरा हो जाती है। संगति इन सब सूत्रो के अक्षर आगमवाक्यो से प्रायः मिलते हैं अव प्रदेश बन्ध का वर्णन किया जाता है -- नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मैकक्षे- त्रावगाहस्थिताः सर्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः। सव्वेसिं चेव कम्माणं पएलग्गमणन्तर्ग। गण्ठियसत्ताईयं, अन्तो सिद्धाण आउयं ॥

१६८ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : भाषा टीका सव्वजीवाण कम्मं तु, संगहे छदिसागयं । सव्वेसु वि पएसेसु, सव्वं सव्वेण बद्धगं ॥ उत्तराध्ययन अ० ३३, गाथा १७-१८ छाया- सर्वेषां चैव, कर्मणां प्रदेशाग्रमनन्तकम् । ग्रन्धिकसत्वातीतं, अन्तरं सिद्धानामाख्यातम् ॥ १७ ॥ सर्वजीवानां कर्म तु, संग्रहे षड्दिशागतम् । सर्वैरप्यात्मप्रदेशैः, सर्व सर्वेण वद्धकम् ॥ १८ ॥ सब कर्मों के प्रदेश अनन्त है। उनकी संख्या अभव्यराशि से अधिक और सिद्धराशि से कम है। सब जीवों का एक समय का कर्म संग्रह छहों दिशाओं से होता है और आत्मा के सब प्रदेशो मे सब प्रकार से बंध जाता है। संगति -सारांश यह है कि ज्ञानावरणीय आदि सभी कर्मों की प्रकृतियो के अनंतानंत कर्म पुद्गलों के प्रदेश हैं जो आत्मा के समस्त प्रदेशो में सूक्ष्म तथा एकक्षेत्रा- घगाह रूप से स्थित हैं। सहृद्यशुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यम् । अतोऽन्यत्पापम् । ८,२६. सायावेदणिज्ज 'तिरिआउए मगुस्साउए देवाउए, सुहणामस्सणं. 'उच्चागोत्तस्स''असाया वेदणिज्ज इत्यादि। प्रज्ञापना सूत्र पद २३, उ० १. एगे पुण्णे एगे पावे। स्थानांग स्थान १, सूत्र १६ छाया सातावेदनीयः तिर्यगायुः मनुष्यायुःदेवायुः शुभनाम" ८, २५.

अष्टमोऽध्यायः [ १६९ उच्चगोत्रं असातावेदनीयः इत्यादिः एकः पुण्यः एकः पापः । भाषा टीका साता वेदनीय, तिर्यंच आयु, मनुष्यायु, देवायु, शुभनाम, उच्च गोत्र और असाता वेदनीय आदि । एक पुण्य रूप हैं और एक पाप रूप हैं। संगति - ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अंतराय यह चार घातिया कर्म कहलाते हैं। ये चारों ही अशुभ (पाप) रूप होते हैं । शेष चारो अघातिया कर्म कहलाते है। और यह पाप तथा पुण्य दोनों रूप हैं। इति श्री-जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम महाराज-संगृहीते तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वये अष्टमोऽध्यायः समाप्तः ॥८॥ * नवमोऽध्यायः भाषा टीका आस्रवनिरोधः संवरः। ६, १. निरुद्धासवे संवरो। उत्तराध्ययन अ०२६, सूत्र ११. छाया निरुद्धाश्रवः संवरः। आस्रव का रुकजाना संवर है। स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः। ६, २. तपसा निर्जरा च । एगे संवरे। समई गुत्ती धम्मो अणुपेह परीसहा चरितं च । सत्तावन्नं भेया पणतिगभेयाई संवरणे ॥ स्थानांग वृत्ति स्थान १. एवं तु संजयस्तावित पावकम्मनिरासवे । भवकोडीसंचियं कम्म, तवसा निजरिजइ। उत्तराध्ययन अ०३० गाथा ६. छाया- एकः संवरः। समितिः गुप्तिः धर्मोऽनुप्रेक्षाः परीपहाश्चरित्रश्च । सप्तपञ्चाशदभेदाः पञ्चत्रिकभेदादयः संवरे ।। एवं तु संयतस्यापि, पापकर्मनिरास्रवे । भवकोटिसंचितं कर्म, तपसा निर्जीयते ।। - नवमोऽध्याय: [ २०१ भाषा टीका उस संवर के समिति, गुन्नि, धर्म, अनुप्रक्षा, परिषहजय और चारित्र यह भेद होते हैं। जिनके क्रमशः पांच, तीन, दश, बारह, बाईस, और पांच भेदो को जोड़ने से संवर के कुल सत्तावन भेद होते हैं । पापकर्मों के नष्ट होजाने पर व्रती के करोड़ जन्मो के संचित कर्मों की भी तपसे निर्जरा होजाती है। सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिः। ९,४. गुत्ती नियत्तणे वुत्ता, असुभत्थेसु सव्वसो । उत्तराध्ययन अ०२४ गाथा २६. छाया- गुप्तयो निर्वतने उक्ताः, प्रशुभार्थेभ्यः सर्वेभ्यः । भाषा टीका- सभी अशुभ अर्थो (प्रयोजनो) से [ मन वचन काय के ] रोकने को गुप्ति कहा गया है। ईर्याभाषेषणाऽऽदाननिक्षेपोत्सर्गाः समितयः। ९,५ पंच समिईओ पण्णता, तं जहा-ईरियासमिई भासासमिई एसणासमिई आयाणभंडमत्तनिक्खेवणासमिई उच्चारपासवणखेल- सिंघाणजल्लपारिठ्ठावणियासमिई । समवायांग समवाय ५ पञ्च समितयः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा-ईर्यासमितिः भाषासमितिः एषणा- समितिः अादानभाण्डमात्रनिक्षेपणासमितिः उच्चारप्रसवपखेलसिं- घाणजलपरिष्ठापणासमितिः । भापा टीका - समिति पाच होती है --- ईर्यासमिति, भाषासमिति, एपणासमिति, श्रादानभन्डमात्र निक्षेपणसमिति (श्रादननिक्षेपणे समिति ), उच्चार * प्रस्रवण | खेल : सिधाण || जलपरिष्ठापणा $ समिति (प्रतिष्ठापणा अथवा उत्सर्ग समिति) पुरीष, भूत्र : निष्ठोवन अथवा थूक, || नाकमैल, 8 गिराना या डालना। छाया. .

२०२ ] तत्त्वार्धसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : उत्तमचमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतप- स्त्यागाहिंन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः । , दसविहे समणधम्मे पण्णत्ते, तं जहा-खंती १ मुत्ती २ अजवे ३, मदवे ४ लाघवे ५ सच्चे ६ संजमे ७ तवे ८ चियाए : बंभचेरवाले १०॥ समवायांग समवाय १०. छाया- दशविधः श्रमणधर्मः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-शान्तिः मुक्तिः आर्जव: मार्दवः लाघवः सत्यः संयमः तपः त्यागः ब्रह्मचर्यवासः । भाषा टीका -श्रमणों का दशप्रकार का धर्म कहा गया है - उत्तमशान्ति (क्षमा) मुक्ति (आकिंचन्य ), आर्जव, मार्दव, लाघव (शौच ), सत्य, संयम, तप, त्याग (दान ), और ब्रह्मचर्य से रहना। अनित्याशरणसंसारकत्वान्यत्वाशुच्यानव- संवरनिर्जरालोकबोधिदुर्लभधर्मस्वाख्यातत्त्वालु- चिन्तनमनुप्रेताः। अणिच्चारणुप्पेहा १, असरणाणुप्पेहा २, एगत्ताणुप्पेहा ३, संसाराणुप्पेहा ४। स्थानांग स्थान ४, उ०१, सु० २४७ अण्णत्ते [अणुप्पेहा ] ५-अन्ने खलु णातिसंजोगा अन्नो अहमंसि। असुइअणुप्पेहा ६ । सूत्रकृतांग श्रुतस्कंध २, अ० १, सू० १३. इमं सरीरं अणिचं, असुइं असुइसंभवं ।

नवमोऽध्यायः [ २०३ असासयावासमिणं, दुक्खकेसाण भायणं । उत्तराध्ययन अ०१६, गाथा १२. अवायाणुप्पेहा ७॥ स्थानांग स्थान ४, उ०१, सू०२४७. संवरे [अगुप्पेहा ] ८- जा उ अस्साविणी नावा, न सा पारस्त गामिणी । जा निस्साविणी नावा, सा उ पारस्स गामिणी ॥ उत्तराध्ययन अध्ययन २३, गाथा ७१. णिजरे [अणुप्पेहा ] ६। स्थानांग स्थान १, सू० १६. लोगे [अणुप्पेहा ] १०॥ स्थानांग स्थान १, सू०५ बोहिदुल्लहे [अणुप्पेहा ] ११ ॥ संबुज्झह किं न बुज्झह, संबोही खलु पेजदुल्लहा । णो हूवणमंतिराइओ, नो सुलभं पुणरावि जीवियं ॥ सूत्रकृतांग प्रथम श्रुतिस्कन्ध गाथा १. धम्मे [अणुप्पेहा ] १२- उत्तमधम्मसुई हु दुल्लहा । उत्तराध्ययन अ० १० गाथा १८. अनित्यानुप्रेक्षा, अशरणानुमेक्षा, एकत्वानुप्रेक्षा, संसारानुमेक्षा, अन्यत्वानुप्रेक्षा-अन्ये खलु ज्ञातिसंयोगाः अन्योऽहमस्मि । अशुच्यनुप्रेक्षा- इदं शरीरमनित्यं, अशुच्यशुचिसंभवं । अशाश्वतावासमिदं, दुःखक्लेशानां भाजनम् ॥ - छाया- २०४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : अपायानुप्रेक्षा, संवरानुप्रेक्षा- या त्वास्राविणी नौः, न सा पारस्य गामिनी । या निरास्राविणी नौः, सा तु पारस्य गामिनी ।। निर्जरानुप्रेक्षा, लोकानुप्रेक्षा, बोधिदुर्लभानुप्रक्षा- संयुध्यध्वं किं न बुद्धध्वं, संवोधी खलु प्रेत्य दुर्लभः । नैव उपनमंति राज्यः, नैव सुलभं पुनरपि जीवितं ॥ धर्मानुप्रक्षा- उत्तमधर्मश्रुतिः खलु दुर्लभा । भाषा टीका-१.अनित्य अनुप्रक्षा[संसार के पदार्थो जीवन काय आदि को भी नाशवान् क्षणभंगुर अनित्य समझना, ] २. अशरण अनुप्रक्षा-[सिंह के हाथ मे पड़े हुए मृग के समान इस संसार में इस जीव को शरण देकर इसकी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। ३. एकत्व अनुप्रक्षा - [यह जीव संसार में अकेला ही आया है और इसको अकेला ही जाना है। ऐसा बारंवार चितवन करना । ] ४. संसार अनुप्रेक्षा - [यह जीव इस संसार मे सदा जन्म लेकर के भ्रमण करता रहता है। यह संसार दुःखरूप है आदि संसार के स्वरूपका बारंबार चितवन करना।] ५. अन्यत्व अनुप्रक्षा जाति के सम्बन्ध भिन्न हैं और मै भिन्न हूँ । [ इस प्रकार वारंबार चिन्तवन करना।] ६. अशुचि भावना यह शरीर अनित्य, अपवित्र, अपवित्र पदार्थों से उत्पन्न हुआ, रहने का क्षणभंगुर स्थान है और दुःख तथा क्ल शो का भाजन है। [ ऐसा बारंबार चिन्तवन करना।] - 'नवमोऽध्यायः [ २०५ ७. अपाय भावना अथवा आस्रव भावना [ इस लोक मे कर्म इस प्रकार दुःख देने वाले हैं और वह इस प्रकार आत्मा मे आते हैं आदिका चितवन करना।] ८. संवर भावना जिस नाव में छिद्र होता है वह नदी के पार नहीं जा सकती । किन्तु जिस नाव में छिद्र नहीं होता वही पार लेजा सकती है। इसी प्रकार जब आत्मा में नवीन कर्मों के आने का मार्ग रुक कर संवर होता है तभी यह उत्तम मार्ग पर चलकर क्रमशः संसार रूपी समुद्र को पार करता है। ६. निर्जरा भावना-[संवर होने के पश्चात् आत्मा में बाकी रहे कर्मों को तप आदि के द्वारा नष्ट करना निर्जरा कहलाता है।] १०. लोक भावना [लोक के स्वरूप का विशेष रूप से चितवन करना।] ११. बोधि दुर्लभ भावना समझो, ज्ञान क्यो नहीं प्राप्त करते । मरण के पश्चात् फिर ज्ञान होना दुर्लभ है। इस प्रकार विचार करने के लिये रात्रियां बारंबार नहीं आतीं और यह जन्म भी बारबार नहीं प्राप्त होता। [ इस प्रकार ज्ञान की दुर्लभता का विचार करना 17 १२. धर्म भावना उत्तम धर्म का सुनना बड़ा दुर्लभ है [ इस प्रकार धर्म के स्वरूप का बारंवार चिन्तवन करना । ] संगति- इन सूत्रों और आगमवाक्य का शब्द साम्य ध्यान देने योग्य है। - मार्गाच्यवननिर्जरार्थं परिषोढव्याः परीषहाः नो विनिहन्नेजा। उत्तराध्ययन अ०२ प्रथम पाठ, सम्म सहमाणस्स' "णिज्जरा कजति । स्थानांग स्थान ५३०१ सू०४०६. छाया न विहन्येत्, सम्यक् सहन्तः निर्जरा क्रियते । भाषा टीका पीछे न हटे। भली प्रकार सहन करने वाले के निर्जरा होती है।

२०६ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : । संगति परीषह सेवन दो प्रयोजन से किया जाता है-एक, मार्ग से च्युत न होने -पीछे न हटने के लिये तथा दूसरा, निर्जरी के लिये। क्यो कि भली प्रकार सहन करने वाले के निर्जरा होती है। क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनारन्यारति- श्रीचर्यानिषद्याशय्याक्रोशवधयाचनाऽलाभरोग- तृणस्पर्शमलसत्कारपुरस्कारप्रज्ञाऽज्ञानादर्शनानि ९,९. बावीस परिसहा परमात्ता, तं जहा-दिगिंछापरीसह १, पिवासापरीसहे २, सीतपरीसह ३, उसिणपरीसह ४, दंसमस- गपरीसहे ५, अचेलपरोसहे ६, अरइपरीसहे ७, इत्थीपरीसहे ८, चरिआपरीसह ६, निसीहियापरीसहे १०, सिज्जापरीसहे ११, अकोसपरीसह १२, वहपरीसहे १३, जायणापरीसह १४, अलाभ- परीसह १५, रोगपरीसहे १६, तणफासपरीसहे १७, जल्लपरोसहे १८, सकारपुरकारपरीसहे १६. पण्णापरीसहे २०, अण्णाण परी- लहे २१, दंसणपरासहे २२ । समवायांग समवाय २२. छाया- द्वाविंशतिपरीषहाः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा-१ क्षुधापरीषहः, २ पिपासा- परीषहः, ३ शीतपरीपहः, ४ उष्णपरीषहः, ५ दंशमशकपरीषह, ६ अचेलपरोषहः, ७ अरतिपरीषहः, ८ स्त्रोपरीपहः, ९ चर्यापरिषहः, १०निषद्यापरीपहः, ११शय्यापरीपहः, १२आक्रोशपरीषहः१३वध- परीपहः,१४याचनापरीषहः, १५अलाभपरीषहः, १६रोगपरीषहः, १७ तृणस्पर्शपरोषहः, १८ जल्लपरीपहः, १९ सत्कारपुरस्कारप- रीपहः, २० प्रज्ञापरीषहः, २१ अज्ञानपरीषहः, २२ दर्शनपरीषहः ।

नवमोऽध्याय: [ ૨૦૭ . भाषा टीका परीषह बाईस कही गई हैं - १. सुधा परीषह, २ पिपासा परीषह, ३ शीत परीपह, ४ उष्ण परीपह, ५ दंशमशक परोषह, ६ अचेल परीषह, ७ अरति परीषह, - स्त्री परीपह, ह चर्या परीषह, १० निषद्या परीषह, ११ शय्या परीषह १२ आक्रोश परीपह, १३ बध परीषह, १४ याचना परीपह, १५ अलाभ परीषह. १६ रोग परीपह, १७ तृणस्पर्श परोपह, १८ जल्ल अथवा मल परीषह १६ सत्कारपुरस्कार परीषह, २० प्रज्ञा परोपह, २१ अज्ञान परीषह, और २२ दर्शन परीपह। सूक्ष्मसाम्परायछास्थवीतरागयोश्चतुर्दश । ६, १० एकादश जिने। ९, ११ ६, १२ ९,१४. बादरसाम्पराये सर्वे। ज्ञानावरणे प्रज्ञाज्ञाने। दर्शनमोहांतराययोरदर्शनालाभौ । चारित्रमोहे नारन्यारतिस्त्रीनिषद्याक्रोशया- चनासत्कारपुरस्काराः। वेदनीये शेषाः। एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिन्नैकोनविंशतः । २, १५ १६ ९, १७.

२०८ ] तस्वार्थसूत्रजैनाऽगमसमन्वय : नाणावरणिजे हां भंते ! कम्से कति परीसहा समोयरंति? गोयमा! दो परीसहा समोरयंति, तं जहा-पन्नापरीसहे नाण- परीसह य । वेयणिजे णं भंते ! कम्मे कति परीसहा समोरयंति ? गोचमा! एकारसपरीसहा समोयरंति, तं जहा- पंचेव आणुपुव्वी. चरिया सेजा वहे य रोगे य । तणफास जल्लमेव य, एकारस वेदणिजमि ॥१॥ दंसणमोहणिजे णं भंते! कम्मे कति परीसहा समोरयंति? गोयला। एगे दंसणपरीलहे समोयरइ । चरित्तमोहणिजे णं भंते! कम्मे कति परीसहा समोयरंति? गोयमा! सत्तपरीसहा समोय- रंति, तं जहा- अरती अचेल इत्थी, निसीहिया जायणा य अकोसे । सकारपुरकारे चरित्तमोहमि सत्ते ते ॥१॥ अंतराइए णं भंते! कम्मे कति परीसहा समोयरंति? गोयमा। एगे अलाभपरीसहे समोयरइ। सत्तविहबंधगस्स णं भंते! कति परीलहा पण्णता? गोयमा! बावीस परीसहा पण्णत्ता, वीसं पुण वेदेइ, जं समयं सीयपरीसह वेदेति णो तं समयं उसिणपरीसहं वेदे, जं समयं उसिणपरीसहं वेदेइ णो तं समयं सीयपरीसहं वेदेइ, जं समयं चरियापरीसहं वेदेति णो तं समयं निसीहियापरीसहं वेदेति जं समयं निसीहियापरीसहं वेदेइ णो तं समयं चरियापरीसहं वेदेइ । अठ्ठविहबंधगस्स णं भंते ! कतिपरीसहा परणता? गोयमा!

नवमोऽध्यायः [ २०६ बावीसं परीसहा इएणत्ता, तं जहा-छुहापरीसहे पिवासापरीसहे सीयप० दसप० मसगप० जाव अलाभप० एवं अविहबंधगस्स वि सत्तविहवंधगस्स वि। छविहबंधगस्स णं भंते ! सरागछउमस्थस्स कति परीसहा पण्णत्ता ? गोयमा! चोदस परीसहा पण्णत्ता ।बारस पुण वेदेइ । जं समयं सीयपरीसहं वेदेइ णो तं समयं उसिणपरीसहं वेदेइ, जं समयं उसिणपरीसहं वेदेइ नो तं समयं सीयपरीसहं वेदेइ । जं समयं चरियापरीसहं वेदेइ णो तं समयं सेज्जापरीसहं वेदेइ, जं समयं सेज्जापरीसहं वेदेति णो तं समयं चरियापरीसहं वेदेइ। एक्कविहवंधगरसणं भंते ! वीयरागछउमत्थस्स कति परीसहा पण्णत्ता ? गोयमा! एवं चेव जहेव छविहबंधगस्स णं । एगविह बंधगस्स णं भंते! सजोगिभवत्थकेवलिस्स कति परीसहा पण्णता ? गोयमा! एकारस परीसहा पण्णत्ता, नव पुण वेदेइ, सेसं जहा छव्विहबंधगस्स । अबंधगस्स णं भंते! अजोगिभवत्थकेवलिस्स कति परी- सहा पण्णत्ता ? गोयमा! एकारस्स परीसहा पण्णत्ता, नव पुण वेदेइ । जं समय सीयपरीसहं वेदेति नो तं समयं उसिणपरीसहं वेदेइ, जं समयं उसिणपरीसहं वेदेति नो तं समयं सीयपरी- सहं वेदेइ । जं समयं चरियापरीसहं वेदेइ नो तं समयं सेज्जा- परीसहं वेदेति, जं समयं सेजापरीसहं वेदेइ नो तं समयं चरियापरीसहं वेदेइ। व्याख्या प्रज्ञप्ति श०८, उ०८, सू०३४३.

२१० ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय: छाया- ज्ञानावरणीये भगवन ! कर्मणि कति परीपहाः समवतरन्ति ? गौतम ! द्वौ परीपहौ समवतरन्तः, तद्यथा-प्रज्ञापरीषहः ज्ञान- परीषहश्च । वेदनीये भगवन् ! कर्मणि कति परीषहाः समवतरन्ति ? गौतम । एकादश परोषहाः समवतरन्ति, तद्यथा- पञ्चैव आनुपूर्वी चर्या शय्या वधश्च रोगश्च । तृणस्पर्श, जल्लमेव च एकादश वेदनीये । दर्शनमोहनीये भगवन् ! कर्मणि कति परिषहाः समवतरंति ? गौतम ! एकः दर्शनपरीषहः समवतरति । चारित्रमोहनोये भगवन् ! कर्मणि कति परीषहाः समवतति ? गौतम ! सप्त परीपहाः समवतरंति, तद्यथा- अरतिः अचेलः स्त्री निषद्या याचना च आक्रोशः । सत्कारपुरस्कारः चारित्रमोहे सप्तैते ।। अन्तराये भगवन् ! कर्मणि कति परीषहाः समवतरंति ? गौतम! एकोऽलाभपरीषहः समवतरति । सप्तविधवंधकस्य भगवन् ! कति परीषहाः प्रज्ञप्ताः? गौतम! द्वाविंशतिपरीसहाः प्रज्ञप्ताः, विंशति पुनः वेदयते । यस्मिन् समये शीतपरीषहं वेदयते न तस्मिन् समये उण्यापरीषहं वेदयते, यस्मिन् समये उष्णपरीषहं वेदयते न तस्मिन् समये शीतपरीपहं वेदयते । यस्मिन् समये चर्यापरीषहं चेदयते न तस्मिन् समये निषद्यापरीषहं वेदयते, यस्मिन् समये निषद्यापरीषहं वेदयते न तस्मिन् समये चर्यापरीपहं वेदयते । अष्टविधवंधकस्य भगवन् ! कतिपरीषहाः प्रज्ञप्ताः? गौतम! दाविंशतयः परीषहाः प्रज्ञप्ताः । तद्यथा-क्षुत्परीषहः, पिपासापरीपहः शीतपरीषहः, दंशपरीपहा, मशकपरीषहः, या- नवमोऽध्याय: [ २१२ " वत् अलाभपरीपहः, एवं अष्टविधवंधकस्यापि सप्तविधवन्धक- स्यापि। षड्विधवन्धकस्य भगवन् ! सरागछमस्थस्य कति परोषहाः प्रज्ञप्ताः? गौतम ! चतुर्दश परीषहाः प्रज्ञप्ता । द्वादशं पुनः वेदयते । यस्मिन् समये शीतपरीपहं वेदयते न तस्मिन् समये उष्णपरीषहं वेदयते, यस्मिन् समये उष्णपरीषहँ वेदयते न तस्मिन् समये शीतपरीपहं वेदयते । यस्मिन् समये चर्यापरीपहं वेदयते न तस्मिन् समये शय्यापरीपहं वेदयते, यस्मिन् समये शय्या- परीपहं वेदयते न तस्मिन् समये चर्यापरीपहं वेदयते । एकविधवन्धकस्य भगवन् ! वीतरागछमस्थस्य कति परीपहाः अज्ञप्ताः? गौतम ! एवं चैव यथैव षडिवधवन्धकस्य । एकविध- बन्धकस्य भगवन् ! सयोगिभवस्थकेवलिनः कति परीपहा: अज्ञप्ताः ? गौतम! एकादशपरीपहाः प्रज्ञप्ताः नवं पुनः वेदयते शेष यथा षड्विधवन्धकस्य ! अवन्धकस्य भगवन् ! अयोगिभवस्थकेवलिनः कति परीषहाः प्रज्ञप्ताः ? गौतम ! एकादश परीषहाः प्रज्ञप्ताः, नवं पुनः वेदयते। यस्मिन् समये शीतपरीपहं वेदयते न तस्मिन् समये उष्णपरी- पहं वेदयते, यस्मिन् समये उष्णपरीसहं वेदयते न तस्मिन् समये शीतपरीपहं वेदयते । यस्मिन् समये चर्यापरीपहं वेदयते न तस्मिन समये शय्यापरीपहं वेदयते, यस्मिन् समये शय्यापरीपहं वेदयते न तािन् समये चर्यापरोपहं वेदयते । भगवन् ! कौन २ सी परीपह ज्ञानावणीय कर्म में आती हैं ? गौतम ! दो परीपह आती हैं - प्रज्ञापरीपह और ज्ञानपरीपह। भगवन् ! वेदनीय कर्म मे कौन सी परीषह ली जाती हैं। हे गौतम ! ग्यारह परीपह ली जाती हैं - पंच श्रानुपूर्वी (क्षुधा, तृषा, उत्तर - प्रश्न उत्तर २१२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमरम्मन्वय : प्रश्न उत्तर प्रश्न प्रश्न उत्तर प्रश्न - शीत, उष्ण, दशमशक ), चर्या, शय्या, वध, रोग, तृणस्पर्श और मल ( जल्द ), ये ग्यारह वेदनीय मे गिनी जाती हैं। भगवन् ! दर्शनमोहनीय कर्म में कितनी परीपह होती हैं ? गौतम ! एक दर्शनपरीषह ही गिनी जाती है । भगवन् ! चारित्रमोहनीय कर्म में कितनी परीपह होती हैं ? उत्तर - गौतम । सात परीपह होती हैं - अरति, अचेल, स्त्री, निपद्या, याचना, आक्रोश और सत्कारपुरस्कार, यह सात चारित्रमोहनीय में होती हैं। भगवन् ! अन्तराय कर्म में कितनी परीषह होती हैं गौतम ! केवल एक अलाभ परीपह होती है। भगवन् ! सात प्रकार के वन्धवालों के कितनी परीपह होती हैं ? उत्तर गौतम ! बाईसो परीषह होती हैं। किन्तु एक काल में अनुभव बीस परीषह का होता है । जिस समय मे शोतपरीषह होती है उस समय उष्णपरीपह नहीं होती। जिस समय उष्णपरीषह होती है उस समय शीतपरीषह नही होती । जिस समय चर्यापरीषह की वेदना होती है उस समय निषद्या परीषह नहीं होती । जिस समय निषद्या परीषह होती है उस समय चर्या परीषह नहीं होती। भगवन् ! आठ प्रकार के बन्ध वालो के कितनी परीषह होती हैं ? गौतम ! बाईसो परीषह ही होती हैं - क्षुधापरीषह, तृषा परीषह, शीत परीषह, दशपरीषह, और मशकपरोषह से लगा कर अलाभ परीषह तक । इसी प्रकार आठ- प्रकार के बंधवालों के तथा सात प्रकार के बन्धवालो के होती हैं। भगवन् ! छह प्रकार के बंधवाले सरागछद्मस्थ के कितनी परीषह कही उत्तर - प्रश्न गई हैं। उत्तर-गौतम ! चौदह परीषह कही गई हैं और बारह परीषहों का एक साथ अनुभव होता है। जिस समय शीत परीषह होती है उस समय उष्णपरीषह नहीं होती, जिस समय उष्णपरीषह होती है उस समय शीतपरीषह नहीं होती । जिस समय चर्या परीपह होती है उस समय शय्यापरीषह नहीं होती, जिस समय शय्या परीषह होती है उस समय चर्या परीषह नहीं होती।

चवमोऽध्यायः [ २१३ प्रश्न उत्तर - प्रश्न - उत्तर प्रश्न उत्तर भगवन् ! एक प्रकार के बंधवाले वीतरामछद्मस्थ के कितनी ,परीषह कही गई हैं! गौतम ! उतनी ही होती हैं जितनी छह प्रकार के बन्धवाले के होती हैं। भगवन् ! एक प्रकार के बन्धनाले सयोगि भवस्थ केवली के कितनी परीपह कही गई हैं ? गौतम ! ग्यारह परीषह कही गई है । किन्तु वेदना एक साथ केवल नो की ही होती है। शेष छ प्रकार के बन्ध वाले के समान होती हैं । भगवन् ! बिना बन्धवाले अयोगि भवस्थ केवलो के कितनी परीषह होती हैं? गौतम ! ग्यारह परीयह कही गई हैं। किन्तु अनुभव नौ का ही होता है। जिस समय शीतपरीषह होती है उसी समय उष्णपरीषह नहीं होती। जिस समय उष्णपरीषह होती है उस समय शीतपरीषह नही होती । जिस समय चर्यापरीषह होती है उस समय शय्या परीषह नही होती । जिस समय शय्या परीषह होती है उसी समय चर्यापरीषह नहीं होती। सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसू- मसाम्पराययथाख्यातमिति चारित्रम् । सामाइयत्थ पढम, छेदोवट्ठावणं भवे वीयं । परिहारविसुद्धीयं, सुहुम तह संपरायं च ॥ ३२॥ अकसायमहक्वायं, छउमत्थस्स जिणस्स वा। एवं चयरित्तकरं, चारित्तं होइ आहियं ॥३३॥ उत्तराध्ययन अ० २८, गाथा ३२-३३ छाया- सामायिकमत्र प्रथम, छेदोपस्थानं भवेद्वितीयम् । परिहारविशुद्धिक, सूक्ष्मं तथा सम्परायं च ॥ ३२॥ अकषायं यथाख्यातं, छद्मस्थस्य जिनस्य वा । एतच्चयरिक्तकर, चारित्रं भवत्याख्यातम् ॥ ३३॥ ९, १८. -- २१४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : - भाषण टोका-सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय, और विनाकषाय वाला यथाख्यात यह छद्मस्थ अथवा जिनके चारित्र कहे गये हैं। यह कर्मों के समूह को नष्ट करने वाले हैं। अनशनावमौदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्या- गविविक्तशय्यासनकायक्लेशा बाह्य तपः । ९, १९ बाहिरए तवे छविहे पण्णत्ते तं जहा-अणसण ऊणोयरिया भिक्खायरिया य रसपरिचाओ । कायकिलेसो पडिसलीगया वज्झो (तवो होई)॥ व्याख्याप्रज्ञप्ति शत० २५, उ० ७, सू०८०२ छाया वाह्यतपः छविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-अनशनः अवमौदर्यः भिक्षा- चर्या (वृत्तिपरिसंख्यान) च रसपरित्यागः । कायक्लेशः प्रति- संलीनता (विविक्तशय्यासनं ) बाह्य (तपः भवति)। भाषा टीका बाह्य तप छै प्रकार के कहे गये हैं:- अनशन, अवमौदर्य, भिक्षा, चर्या (वृत्तिपरिसंख्यान ), रसपरित्याग, कायक्लेश और प्रतिसंलीनता (अथवा विविक्त शय्याशन)। प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्यस्वाध्यायव्युत्सर्ग- ध्यानान्युत्तरम् । ९, २० अभितरए तवे छबिहे पण्णत्ते तंजहा-पायच्छित्तं विणओ वेयावच्चं तहेब सज्झाओ, झाण विउसग्गो । व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ०७, सू० ८०२. आभ्यन्तरतपः षड्विधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-प्रायश्चित्तं, विनयः, वैयावृत्यं, स्वाध्यायः, ध्यानं, व्युत्सर्गः । छाया- .

नवमोऽध्याय: [ २१५ 4 - भाषा टीका-श्राभ्यन्तर तप भी छै प्रकार के कहे गये हैं:- प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त्य, स्वाध्याय, ध्यान और व्युत्सर्ग । नवचतुर्दशपंचद्विभेदा यथाक्रमं प्रारध्यानात् । ६, २१. भाषा टीका उन आभ्यन्तर तपों के ध्यान से पूर्व २ क्रमशः नौ, चार, दश, पांच और दो भेद हैं। आलोचनाप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्ग- तपश्छेदपरिहारोपस्थापनाः । ६, २२. णवविधे पायच्छित्ते पण्णत्ते, तं जहा-आलोअणारिहे पडि- कम्मणारिहे तदुभयारिहे विवेगारिहे विउसग्गारिहे तवारिहेछेदा- रिहे मूलारिहे अणवठ्ठप्पारिहे। स्थानांग स्थान ९, सू०६८८. छाया- नवविधः प्रायश्चित्तः, प्रज्ञप्तः, तद्यथा-आलोचनाह, प्रतिक्रमणाह, तदुभयाईं, विवेकाह, व्युत्संगार्ह, तपसह, छेदाह, मूलाह, (परिहाराह) अनवस्थापनार्ह । भाषा टीका प्रायश्चित नौ प्रकार का कहा गया है - आलोचनायोग्य, प्रतिक्रमण योग्य, तदुभय योग्य, विवेक योग्य, व्युत्सर्ग योग्य, तप योग्य, छेद योग्य, मूल योग्य, (परिहार योग्य ) और अनवस्था अथवा उपस्थापना योग्य। संगति -- यहां तक आगम और सूत्र के शब्द प्रायः मिलते हैं। ज्ञानदर्शनचारित्रोपचाराः। ६, २३. विणए सत्तविहे पण्णत्ते, तं जहा-गाणविणए दंसणविणए - , ३१६ । तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : चरितविणए मणविणए वइविणए कायविणए लोगोवयारविणए। व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ०७, सू० उ० ७, सू० ८०२. छाया-- विनयः सप्तविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-ज्ञानविनयः दर्शनविनयः चारित्रविनयः मनोविनयः वचःविनयः कायविनयः लोकोप- चारविनयः। भाषा टीका विनय सात प्रकार का कहा गया है: मान विनय, दर्शन विनय, चरित्र विनय, मनो विनय, वचन विनय, काय विनय और लोकोपचार विनय संगति--सूत्र मे मन, वचन और काय की विनय को न लेकर सक्षेप से केवल चार भेद माने हैं। किन्तु आगम ने विस्तार की दृष्टि से सात भेद माने हैं। आचार्योपाध्यायतपस्विशैक्षग्लानगणकुल- संघसाधुमनोज्ञानाम् । ९,२४. वेयावच्चे दसविहे पण्णत्ते तं जहा-आयरियवेआवच्चे उव- झायवेआवच्चे सेहवेआवच्चे गिलाणवावच्चे तपस्सिवेआवच्चे थेरवेआवच्चे साहम्मिअवेत्रावच्चे कुलवेआवच्चे गणवेआवच्चे संघ- वेआवच्चे। व्याख्याप्रज्ञप्ति श०२५, उ०७, सु० ८०२. काया- बयानृत्यः दशविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-आचार्यवैयावृत्पः, उपाध्याय- वैयावृत्यः, शैक्षवैयावृत्यः, ग्लाणवैयावृत्यः, तपस्विवैयावृत्या, स्थविरवैयानृत्यः, साधर्मिवैयाघ्त्यः, कुलवयात्यः, गणवैयावत्यः, संघवयात्यः। भाषा टीका-वैयावृत्य दश प्रकार का कहा गया है:-आचार्य वैयावृत्य, उपाध्याय का वैयावृत्य, शैक्ष का वैयावृत्य, ग्लान का वैयावृत्य, तपस्वियों का वैयावृत्य, स्थविर नवमोऽध्यायः [ २१७ . (साधुओ ) का वैयावृत्य, साधर्मियो (मनोज्ञों ) का वैयावृत्य, कुल का वैयावृत्य, गण का वैयावृत्य, और संघ का वैयावृत्य । संगति- यहां संख्या समान होते हुये भी दो नामों में अन्तर हैं। सूत्र साधु और मनोज्ञ के स्थान पर आगम मे क्रमशः स्थविर और साधर्मि कहा गया है । जिसमे कोई विशेष भेद नहीं है। वाचनापृच्छनानुप्रेदाम्नायधर्मोपदेशाः। ६, २५ सज्झाए पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा-वायणा पडिपुच्छणा, परिअट्टणा अणुप्पेहा धम्मकहा। व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ० ७, सू० ८०२. छाया स्वध्यायः पञ्चविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-वाचना, प्रतिपृच्छना, परि- वर्तना, अनुप्रेक्षा, धर्मकथा । स्वाध्याय पांच प्रकार का कहा गया है:- वाचना, परिपृच्छना, परिवर्तना (आम्नाय ), अनुप्रक्षा और धर्मकथा (धर्मोपदेश)। बाह्याभ्यन्तरोपध्योः। ९, २६ विउसग्गे दुविहे पएणत्ते, तं जहा-दवविउसग्गे य भाव- विउसग्गे य । व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ०७, सु० ८०२. छाया- व्युत्सर्गः द्विविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-द्रव्यविसर्गश्च भावविसर्गश्च । भाषा टीका - व्युत्सर्ग दो प्रकार का कहा गया है:-द्रव्य का विसर्ग (त्याग) और भाव का विसर्ग। सगति - बाह्य परिग्रह और द्रव्य परिग्रह प्रथक् २ नही हैं । इसी प्रकार भाव परिग्रह अथवा आभ्यन्तर परिग्रह भी प्रथक् २ नही हैं। भाषा टीका २१८ ] तत्त्वार्थसूत्र जैनाऽऽगमसमन्वय : " उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यान- मान्तर्महुर्तात् । केवतियं कालं अवढियपारिणामे होजा ? गोयमा! जहन्नेणं एवं समयं उझोसेण अन्तमुहुत्तं । व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ० ६, सू० ७७०. अंतोमुहुत्तमित्तं चित्तावत्थाणमेगवत्थुम्मि । छउसस्थाणं भाणं जोगनिरोहो जिणाणं तु । स्थानांग वृत्ति० स्थान ४, उ० १, सु० २४७. छाया- कियत्कालं अवस्थितपरिणामः भवति? गौतम! जघन्येन एक समयं उत्कर्षेण अन्तर्मुहुर्त । अन्तर्मुहुर्तमानं चित्तावस्थानमेकत्र वस्तुनि । छद्मस्थानां ध्यानं योगनिरोधः जिनानान्तु ॥१॥ निश्चत (ध्यान के) परिणाम कितनी देर तक रहते हैं ? कम से कम एक समय तक और अधिक से अधिक अन्तर्मुहुर्त तक । छमस्थ और जिन के मन वचन और काय की क्रियाओं का रोकना ही ध्यान होता है। संगति यह बात स्मरण रखने की है कि क्षपक श्रेणि उत्तम संहनन वाले ही दांघते हैं। आरौिद्रधर्मशुक्लानि। चत्तारि झाणा पण्णत्ता, तं जहा-अट्टे झाणे; रोदे भाणे, धम्मे भाणे, सुक्के झाणे। व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ० ७, सु०८०३. प्रश्न उत्तर ६, २८ नवमोऽध्यायः [ २१९ ..छाया चत्वारि ध्यानानि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा-भात ध्यानं, रौद्रं ध्यान, धर्म ध्यानं, शुक्लं ध्यानम् । भापा टीका ध्यान चार प्रकार के कहे गये हैं:- आत ध्यान, रौद्र ध्यान, धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान । परे मोचहेतुः। ९, २९. धम्मसुकाइं भाणाई, झाणं तं तु बुहा वए । उत्तराध्ययन अ०३० गाथा ३५. छाया धर्मशुक्ले ध्याने, ध्यानं तत् तु बुद्धा वदेयुः । भाषा टीका - धर्म और शुक्ल ध्यान को बुद्ध कहते हैं। संगति-बुद्धिमानो ने मोक्ष का कारण होने से धर्म और शुक्ल को ही वास्तविक ध्यान माना है। आर्तममनोज्ञस्य संप्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारः। ९,३०. अट्टे झाणे चउविहे पएणत्ते, तं जहा-अमणुनसंपयोग- संपउत्ते तस्स विप्पयोग सति समन्नागए यावि भवइ । व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ०७, सू०८०३. छाया- आर्त ध्यानं चतुर्विध प्रज्ञप्त', अमनोज्ञसम्प्रयोगसम्पयुक्तो तस्य विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वागतश्चापि भवति । भाषा टीका - आर्त ध्यान चार प्रकार का कहा गया है। [उनमे से प्रथम अनिष्ट संयोग है। अनिष्ट अथवा अप्रिय व्यक्ति से संयोग होने पर उसके वियोग के लिये पारवार चिन्ता करना [ अनिष्ट संयोग बार्तध्यान है ] ।

- २२० ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : विपरीतं मनोज्ञस्य । ९, ३१. सणुन्नसंपोगसंपउत्ते तरस अविप्पनोग सति समण्णा- गते यावि भवति । व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ०७, सू०८०३. छाया- मनोज्ञसम्प्रयोगसम्प्रयुक्तो तस्य अविप्रयोगाय स्मृतिसमन्वागत- श्चापि भवति । इष्ट व्यक्ति के संयोग होने पर उसका वियोग न होने की चिन्ता करना। अथवा इष्ट व्यक्ति का वियोग होने पर उसके मिलने के लिये वारवार चिन्ता करना [इष्ट वियोग नामक आर्तध्यान है। ] वेदनायाश्च। ९, ३२ आयंकसंपयोगसंपउत्ते तरस विप्पओग सति समरणागए यावि भवति । व्याख्याप्रज्ञप्ति श०२५, उ० ७, सू० ००३. छाया- अातङ्कसम्प्रयोगसम्प्रयुक्तो तस्य विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वागत- श्चापि भवति। भाषा टीका किसी दु.ख अथवा कप्ट के पड़ने पर उसके दूर होने के लिये वारवार चिन्ता करना [ वेदना नामक प्रार्त ध्यान है ] ! निदानञ्च। ९ ३३. परिजुसितकामभोगसंपओगसंपत्ते तरय अविप्पयोग सति समण्णागते यावि भवइ। व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ०७, सू० ८०३.

नवमोऽध्यायः [ २२१ ९, ३४. , - छाया- परिजूपितकामभोगसम्प्रयोगसम्प्रयुक्तो तस्य अविप्रयोगाय स्मृति- समन्वागतश्चापि भवति । भाषा टीका- अनुभव किये अथवा भोगे हुए काम भोगों के वियोग न होने के लिये वांछा करना और उसका विचार करते रहना [निदान नामक आर्तध्यान कहलाता है] संगति इन सब सूत्रो के शब्द आगम वाक्यों से प्राय मिलते हैं। तदविरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानाम् । अट्टरुदाणि वजित्ता, झाएज्जा सुसमाहिये । उन्तराध्ययन अध्ययन ३०, गाथा ३५. छाया- आरौद्राणि वर्जयित्वा, ध्यायेत् सुसमाहितः । भाषा टीका-आर्त और रौद्र को छोड़कर उत्तम समाधि में लगा हुआ ध्यान करे। सगति उत्तम समाधि की प्राप्ति सातवें गुणस्थान से प्रारम्भ होती है। अतः यह स्वयं ही सिद्ध हो गया कि आर्त ध्यान सातव से पहिले २ अर्थात् प्रथम गुणस्थान से लगाकर छटे प्रमन्तसयत गुणस्थान तक होता है। हिंसातस्तेयविषयसंरक्षणेभ्यो रौद्रमविरत- देशविरतयोः। ६, ३५. रोदज्माणे चउविहे पण्णत्ते, तं जहा-हिंसाणुबंधी सोसा- गुबंधी तेयाणुबन्धी, सारक्खणाणुबंधी। व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ७, सू०८०३. झाणाणं च दुयं तहा जे भिक्खू वजई निच्छ । उत्तराध्ययन अ०३१, गाथा ६. छाया- रौद्रध्यानं चतुर्विधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-हिंसानुवन्धी, भूपानुवन्धी, स्तेयानुवन्धी, संरक्षणानुवन्धी ।

२२२ ] तत्त्वार्थमूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : Paranish . . ध्यानानां च द्विकं तथा, यो शिक्षुर्वर्जयति नित्यं । भाषा टीका-रौद्र ध्यान चार प्रकार का कहा गया है - अहिंसानुवन्धी अथवा हिंसानन्दी-[हिंसा करने का बार वार चितन्तवन करना ओर उसमें आनन्द मानना,] २ मृषानुबन्धी अथवा मृपोनन्दो-[झूठ बोलने का चिन्तवन करना और उसमें आनन्द मानना।] ३ स्तेयानुवन्धी अथवा चौर्यानन्दी-चोरी करने का चिन्तवन करना और उसमे आनन्द मानना।] ४ संरक्षणानुबन्ध अथवा परिग्रहानन्दी-[पिपयो को सामग्री का संरक्षण करने का चिन्तवन करना और उसमें आनन्द मानना । ] इन ध्यानो का भिनु सदा त्यागन करता है। संगति इससे प्रगट है कि यह ध्यान भिनु अथवा छटे गुण स्थान वाले के नहीं होता। अतः यह स्वयं सिद्ध होगया कि यह प्रथम गुण स्थान से लगाकर पांचवें देशविरत गुणस्थान तक होता है। आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयाय धर्म्यम् । ९,३६. धन्मे झाणे चउबिहे पएणते, तं जहा-आणाविजए, अवायविजए, विवागविजए, संठाणविजए । व्याख्याप्रजाप्ति श० २५, उ० ७, सू० ८०३. छाया- धर्मध्यानं चतुर्वियं प्राप्तं, तद्यथा-प्राज्ञाविचयः, अपायविचयः, विपाकविचयः संस्थानविचयः । भाषा टीका - धर्म ध्यान चार प्रकार का कहा गया है- आज्ञाविषय, अपाय विचय, विपाकविचय, और संस्थानविषय । संगति - उपदेशदाता के अभाव से और अपनी मंद बुद्धि से सूक्षम पदार्थों का स्वरूप अच्छी तरह समझ मे न आवे तो उस समय सर्वज्ञ की आज्ञा को प्रमाण मान कर गहन पदार्थ का अर्थ अवधारण करना आज्ञाविचय धर्म ध्यान है।

नवमोऽध्यायः [ २२३ + ९, ३७. मिथ्यादियों के कहे हुये उन्मार्ग से ये प्राणी कैसे फिरेंगे ? ये कब सन्मार्ग में आवेगे ? इस प्रकार सन्मार्ग के अपाय का अथवा आस्रव के स्वरूप का चिन्तवन करना अपाय विचय धर्मध्यान है। ज्ञानावरण आदि कर्मों का द्रव्य क्षेत्र काल भाव के अनुसार जो विपाक अर्थात फल होता है उसका चिन्तवन करना विपाक विचय धर्मध्यान है। और लोक के संस्थानो का चिन्तयन करना सो संस्थान विचय धर्मध्यान है । यह धर्मध्यान चौथे असंयत, पांचवे देशसंयत, छटे प्रमत संयत और सातवे अप्रमत्त संयत इन चार गुणस्थानो में होता है। शुक्ले चाये पूर्वविदः। सुहमसंपरायसरागचरित्तारिया य बायरसपरायसरागचत्ता- ...''उवसंतकसायवीर रायचरित्तारिया य खीएकसाय वीयरायचरित्तारिया च । प्रज्ञापना सूत्र पद १, चारित्रायविषय. छाया- सूक्ष्मसाम्परायसरागचरित्रार्याश्च चादरसाम्परायसरागचरित्रार्या- श्च । उपशान्तकपायवीतरागचरित्रार्याश्च क्षीणकपायवीतरागच- रित्रार्याश्च । भापा टीका-सूक्ष्मसाम्पराय सराग चारित्र वाले आर्य, बादरसाम्परायसरागचारित्र वाले आर्य, उपशान्त कपाय वीतराग चारित्र वाले आर्य और क्षीणकषाय धीतराग चारित्र वाले आर्य [ इनके पृथक्त्ववितर्फ और एकत्ववितर्क नामके दो शुक्ल ध्यान होते है।] परे केवलिन। रिया य, &,३८ सजोगिकेवलिखीणकषायवीयरायचरित्तारिया य अजोगि- केवलिखीणकसायवीयरायचरित्तारिया य । प्रज्ञापनासूत्र पद १ चारित्रार्यविषय, २२४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वयः ५ छाया-, सयोगिकेवलिमोणकपायवीतरागचरित्रार्याश्च : अयोगिकेवलिमी- रणकषायवीतरागचरित्राश्चि । भापा टीका-सयोगि केवलि क्षीणकषायवीतरागचारित्र वाले आयो के और अयोगिकेवलि क्षीणकषायवीतरागचारित्रवाले आर्यों के सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाति और व्युपरत क्रियानिवर्ति नाम के बाद के दो शुक्लध्यान होते हैं।] पृथक्त्वैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिव्युप- रतक्रियानिवर्तीनि । ९, ३६. सुक्के झाणे चउविहे पण्णत्ते तं जहा-पुहुत्तवितके सवि- यारी १, एगत्तवितके अवियारी २, सुहुमकिरिते अणियट्टी ३, समुच्छिन्नकिरिए अप्पडिवाती । व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ० ७, सू० ८०३. छाया- शुक्रव्यानं चतुर्विध प्रज्ञप्तं, तद्यथा-पृथक्त्ववितर्कः सविचारि १, एकत्ववितर्कः अविचारि २, मूक्ष्मक्रिया अनिवर्ति ३, समुच्छिन्न- क्रिया अप्रतिपाति । शुक्जध्यान के चार भेद होते हैं- १. पृथक्त्व वितर्क सविचारी, २. एकाववितर्क अविचारी, ३ सूक्ष्मक्रिया अनिवर्ति अथवा सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाति और १ समुच्छिन्नक्रिया अप्रतिपाती अथवा व्युपरतक्रियानिविर्ति । व्येकयोगकाययोगायोगानाम् । भापा टोका - ९,४० नुहमसंपरायतरागचरिचारिया य वायरसंपरायसरागचरि- नारिया च. 'उवसंतकसायवीतरायचरित्तारिया य खीण- कनायवीयरायचरित्तारिया च ।

नवमोऽध्यायः [ ૨૨૫ सजोगिकेवलिखीणकसायवीयरायचरित्तारिया ये अजोगि- केवलिखीणकसायवीयरायचरित्तारिया य । प्रज्ञापना सूत्र पद १ चारित्रार्यविषय । छाया- सूक्ष्मसाम्परायसरागचरित्रार्याश्च वादरसाम्परायसरागचरित्रार्या- श्च । उपशान्तकपायवीतरागचरित्रार्याश्च क्षीणकषायवीतरागच- रित्रार्याश्च। सयोगिकेवलिलीणकपायवीतरागचरित्राश्चि । अयोगिकेवलिक्षी- एकपायवीतरागचरित्राश्चि । भापा टीका सूक्ष्मसाम्पराय सरागचारित्र वाले आर्य, बादरसाम्परायसराग- चारित्र वाले आर्य, उपशान्तकपाय वीतरागचारित्र वाले आर्य, क्षीणकषाय वीतरागचारित्र वाले आर्य, सयोगिकेवलि क्षीणकपाय वीतरागचारित्र वाले आर्य, और अयोगिकेवलि क्षीणकपाय वीतरागचारित्र वाले आर्य के [यह शुक्ल ध्यान होते है। (संगति) इस कथन से प्रगट है कि पृथक्त्ववितर्क नामका प्रथम शुक्ल ध्यान मन, वचन और काय इन तीनो योगो के धारक के होता है । दूसरा एकत्ववितर्क नामका शुक्ल ध्यान तीनों में से किसी एक योगवाले के होता है। तीसरा सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाति नामका ध्यान काययोग वालो के ही होता है और चौथा व्युपरतक्रियानिविर्ति नामका ध्यान प्रयोगकेवली के ही होता है। अब प्रथम के दो ध्यानो के विशेष रूप से जानने के लिये सूत्र कहे जाते है- एकाश्रये सवितर्कविचारे पूर्वे। ९, ४१. अविचारं द्वितीयम्। ९, ४२. वितर्कः ६, ४३. विचारोऽर्थव्यञ्जनयोगसंक्रान्तिः । ६, ४४. - श्रुतम् ।

२२६ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : उप्पायठितिभंगाई पज्जयाणं जमेगदम्बंमि। लाणानयागुसरणं पुव्वगयसुयाणुसारेणं ॥१॥ सवियारमत्थवंजणजोगंतरो तयं पढमसुकं । होति पुहुत्तवियक सवियारमरागभावस्स ॥२॥ जं पुण सुनिप्पकंपं निवायसरणप्पईवमिव चित्तं । उप्पायठिइभंगाइयाणमेगंमि पज्जाए ॥३॥ अवियारसत्थवंजनाजोगंतरओ तयं बिइयसुकं । पुष्वगयसुयालंबणमेगत्तवियकमवियारं ॥४॥ स्थानांग सूत्र वृत्ति स्था० ४, उ० १, सू०२४७. छाया- उत्पादस्थितिभंगादिपर्यवानां यदेकस्मिन् द्रव्ये । नानानयैरनुसरणं पूर्वागतश्रुतानुसारेण ॥१॥ सविचारमर्थव्यञ्जनयोगान्तरतस्तत् प्रथमशुक्लम् । भवति पृथक्त्ववितर्क सविचारमरागभावस्य ॥२॥ यत्पुनः सुनिष्पकंपं निवातस्थानप्रदीपमिव चित्तं । उत्पादस्थितिभंगादीनामेकस्मिन् पर्याये ॥३॥ अविचारमर्थव्यञ्जनयोगान्तरतस्तत् द्वितीयं शुक्लम् । पूर्वगतश्रुतालम्बनमेकत्ववितर्कमविचारम् ॥ ४॥ भापा टीका जो एक द्रव्य में पूर्वगतश्रुत के अनुसार अनेक नयो के द्वारा एसाद, व्यय, ध्रौव्य आदि पर्यायों का विचार सहित अर्थ, व्यञ्जन और योग का अन्तर (पलटना अथवा संक्रान्ति ) है उसे पृथक्त्ववितर्क सविचार नामका प्रथम शुक्लध्यान कहते हैं। यह रागरहित भाववाले मुनियों के होता है ॥ १-२॥ और जो उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य आदि भंगों में से एक पर्याय में अर्थ, व्यञ्जन और गोग के अन्तर के विचार रहित निर्वातस्थान में दीपक के समान निष्कम्प रहता है वह पूर्वगतनतालम्बन रूप एकत्त्ववितर्क विचार नामका द्वितीय शुक्ल ध्यान है ॥३-४॥ इस प्रकार यात्रा और पाभ्यन्तर तपों का वर्णन किया गया। यह दोनों प्रकार के तप - '. नवमोऽध्याय: [ રર૭ नवीन कर्मों का निरोध करने के कारण होने से संवर के कारण हैं और पूर्व बंधे कर्मों के नष्ट करने के निमित्त होने से निर्जरा के भी कारण हैं। अव तपश्चरण आदि करने से जो निर्जरा होना कहा है वह समस्त सम्यग्दृष्टि जीवों के एक सी ही होती है अथवा भिन्न प्रकार की होती है यह बतलाने के लिये सूत्र कहते हैं- सम्यग्दृष्टिश्रावकविरतानन्तवियोजकदर्शन- मोहक्षपकोपशमकोपशान्तमोहलपकक्षीणमोह- जिनाः क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः । ९, ४५ कम्मविसोहिमग्गणं पडुच्च चउदस जीवट्ठाणा पण्णत्ता, तं जहा-'अविरयसम्मदिट्टी विरयाविरए पमत्तसंजए अप्पमत्तसं- जए निअट्टीबायरे अनिअट्टिबायरे सुहुमसंपराए उवसामए वा खवए वा उवसंतमोहे खीणमोहे सजोगी केवली अयोगी केवली। समवायांग समवाय १४. छाया- कर्मविशुद्धिमार्गणां प्रतीत्य चतुर्दशजोवस्थानानि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा- अविरतसम्यग्दृष्टिः विरताविरतः प्रमत्तसंयतः अप्रमत्तसंयतः नि- वृत्तिवादरः अनिवृत्तवादरः सूक्ष्मसाम्परायः उपशमकः वा क्षपका वा उपशान्तमोहः क्षीणमोहः सयोगी केवली अयोगी केवली। भाषा टीका-कर्मो की विशुद्धि के मार्ग को दृष्टि से जीव स्थान चौदह हातेहैं:- अविरतसम्यग्दृष्टि, देशव्रत के धारक श्रावक, प्रमत्तसयत वाले मुनि, अप्रमत्तसयत, निवृत्तिवादर, अनिवृत्ति बादर, सूक्ष्मसाम्पराय उपशमक अथवा क्षपक, उपशान्त मोह, क्षीण मोह, सयोगी केवली (जिन) और अयोगी केवली [ इनके क्रम से असंख्यातगुणो निर्जरा होती है।] पुलाकबकुशकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातका निर्ग्रन्थाः। ६, ४६.

२२८ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : N पंच णियंठा पन्नत्ता, तं जहा-पुलाए वउसे कुसीले णियंठे सिणाए। व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ०५, सू० ७५१. छाया पश्च निग्रन्थाः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा-पुलाकः वकुशः कुशोलः, निर्ग्रन्थः स्नातकः। भाषा टीका - निग्रन्थ पांच प्रकार के कहे गये हैं:- पुलाक, वकुश, कुशील, निग्रन्थ और स्नातक । अब इन्ही के अन्य भेद भी कहे जाते हैं:- संयमश्रुतप्रतिसेवनातीर्थलिङ्गलेश्योपपाद- स्थानविकल्पतः साध्याः। ६, १७. पडिसेवणा णाणे तित्थे लिंग-खेत्ते काल गइ संजम' लेसा। व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ० ५, सू० ७५१. छाया- परिसेवना ज्ञानं तीर्थः लिङ्गः क्षेत्रः कालः गतिः संयमः लेश्या । भाषा टीका परिसेवना (प्रतिसेवना) ज्ञान (श्रुत ), तीर्थ, लिङ्ग, क्षेत्र (स्थान), काल, गति ( उपपाद ), संयम और लेश्या [ के भेदो से भी विचार करें] संगति-आगम तथा सूत्र के शब्दों में नाम मात्र का ही अन्तर है। आगम में इन भेदों को विस्तार दृष्टि से छत्तीस प्रकार का बतलाया गया है, जिन में सूत्र के योग्य यहां छांट लिये गये हैं। इति श्री-जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम महाराज-संगृहीते तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वये # नवमोऽध्यायः समाप्तः ॥६॥ * दशमोऽध्यायः मोहनयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायचयाच केवलम् । १०, १. खीणमोहस्स णं अरहओ ततो कम्मंसा जुगवं खिज्जति, तं जहा-नाणावरणिज्जं दंसणावरणिज अंतरातियं । स्थानाग स्थान ३, उ० ४, सू० २२६. तप्पढमयाए जहाणुपुव्वीए अट्टवीसइविहं मोहणिज्ज कम्म उग्घाएइ, पञ्चविहं नाणावरणिज, नवविहं दसणावरणिनं, पंच- विहं अन्तराइयं, एए तिन्नि वि कम्मंसे जुगवं खवेइ । उत्तराध्ययन अध्ययन २९, सू० ७१. छाया- क्षीणमोहस्याहतस्ततः कर्मांशाः युगपत् क्षपयन्ति, तद्यथा-ज्ञाना- वरणीयं, दर्शनावरणीयं अंतरायिकं । तत्प्रथमतया यथानुपूर्व्या अष्टाविंशतिविधं मोहनीयं कर्मोद्घात- यति । पंचविधं ज्ञानावरणीयं, नवविधं दर्शनावरणीयं, पञ्चविध- मन्तरायिकमेतानि त्रीण्यपि कर्माणि युगपत् क्षपयति । भाषा टीका-मोहनीय कर्म को नष्ट करने वाले अर्हत के इसके पश्चात् निम्नलिखित कर्मो के अंश एक साथ नष्ट होते हैं- ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अंतराय । [अर्थात् ] सब से प्रथम पूर्व आनुपूर्वी के अनुसार अट्ठाईस प्रकार के मोहनीय कमें को नष्ट करता है। [इसके पश्चात् ] पांच प्रकार के ज्ञानावरणीय, नौ प्रकार के दर्शना वरणीय, और पांच प्रकार के अंतराय इन तीनों ही कर्मों को एक साथ नष्ट करता है। संगति और तब इसके केवलज्ञान प्रगट होता है।

२३० ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : :-:. बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमो- दो मोक्षः। १०, २. अणगारे समुच्छिन्नकिरियं अनियहि सुकज्माणं झियायमाणे वेयणिजं आउयं नाम गोत्तं च एए चत्तारि कम्मसे जुगवं खवेइ । उत्तराध्ययन अध्ययन २९, सूत्र ७२. छाया अनगारः समुच्छिन्नक्रियमनिवृत्तिशुक्लथ्यानं ध्यायन्वेदनीयमायुर्नाम गोत्रं चैतान् चतुरः कर्माशान् युगपत्क्षपयति । भाषा टीका-[ इसके पश्चात् वह ] मुनि समुच्छिन्नक्रिया अनिवृत्ति अथवा व्युपरत- क्रियानिवर्ति नाम के चतुर्थ शुक्ल ध्यान का ध्यान करते हुए वेदनीय, आयु, नाम और गोत्र इन चार कर्मों के अंशों अथवा प्रकृतियो को एक साथ नष्ट करते हैं । संगति वीतराग होने के कारण उस समय बंध के सभी कारणों का अभाव हो जाता है और प्रतिक्षण निर्जरा होते २ अंत में चारों अघातिया कर्मी को भी निजेरा हो जाती है । उस समय सम्पूर्ण कर्मों का नाश रूप मोक्ष की प्राप्ति होती है । औपशमिकादिभव्यत्वानाञ्च । १०,३ नोभवसिद्धिए नोअभवसिद्धिए । प्रज्ञापना पद १८. छाया न भवसिद्धिकः नाऽभवसिद्धिकः । भाषा टीका उस समय न भव्यत्व भाव रहता है और न अभव्यत्व भाव रहता है। .. सगति औपशमिक, क्षायोपशमिक, औदयिक तथा भव्यत्व [तथा अभव्यत्व] भावो का और पुद्गलकर्मों की समस्त प्रकृतियों का नाश हो जाने पर मोक्ष होता है । अन्यत्र केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्यः । १०,४ दशमोऽध्यायः [ २३१ केवल सम्यक्त्व, खीणमोहे (केवलसम्मत्तं) केवलणाणी, केवलदंसी सिद्ध। अनुयोगद्वारसूत्र परणामाधिकार सू० २२६ छाया- क्षीणमोहः (केवलसम्यक्त्व), केवलज्ञानी, केवलदर्शी, सिद्धः । मापा टीका.- क्षीण मोह वाले, ( केवल सम्यक्त्व वाले ), केवल ज्ञान वाले, और केवल दर्शन वाले सिद्ध होते हैं। संगति केवल ज्ञान, केवल दर्शन और केवल सिद्धत्व भावों के सिवाय अन्य भावों का मुक्त जीवों के अभाव है। अनन्त वीर्य आदि भावों का उपरोक्त भावो के साथ अविनाभाव सम्बन्ध होने से उनका अभाव न समझना चाहिये । तदनन्तरमूर्ध्वं गच्छत्यालोकान्तात् । १०,५ अणुपुव्वेणं अट्ट कम्मपगडीओ खवेत्ता गगणतलमुप्पइत्ता उप्पि लोयग्गपतिठ्ठाणा भवन्ति । ज्ञाताधर्मकथांग, अध्ययन ६, सू० ६२ छाया- अनुपूर्वेण अष्टकर्मप्रकृतयः क्षपयित्वा गगनतलमुत्पत्य उपरि लोकाग्रप्रतिष्ठानाः भवन्ति । इस प्रकार क्रम से बाठों कर्मों की प्रकृतियों को नष्ट करके आकाश में अर्ध्व गति द्वारा लोक के अग्र भाव मे स्थित होते हैं। पूर्वप्रयोगादसंगत्वाइंधच्छेदात्तथागतिपरिणामाच । १०,६ आविडकुलालचक्रवद्वयपगतलेपालाबुवदे- रण्डबीजवदग्निशिखावच्च । १०, ७. भापा टीका - + सिद्धा सम्मदिट्ठी (सिद्धाः सम्यग्दृष्टि.) प्रज्ञापना १६ सम्यक्त्त्व पद.

२३२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : PP '... . अस्थि णं भंते ! अकम्मरस गती पन्नायति ? हेता अस्थि, कहन्न भंते! अकम्मरस गती पनायति? गोयमा. निस्संगयाए निरंगणयाए गतिपरिणामेणं बंधणछेयणयाए निरंधणयाए पुव्व- पयोगेणं अकम्मस्स गती पन्नत्ता । कहन्नं भंते! निस्संगयाए नि. रंगणयाए गइपरिणामेणं बंधणछेयणयाए निरंधणयाए पुवप्प- श्रोगेणं अकम्मरस गती पन्नायति ? से जहानामए, केई पुरिसे मुकं तुंबं निच्छिड्ड निरुवहयं आणुपुव्वीए परिकम्मेमाणे २ दव्सेहि य कुसेहि य वेढेइ २ अट्ठहिं मट्ठियालेवेहिं लिंपइ २ उपहे दलयति भूतिं २ सुकं समाणं अत्थाहमतारमपोरसियंसि उदगंसि पक्लिवेज्जा, से नूणं गोयमा! से तुंबे तेसिं अट्ठण्हं मठियालेवेणं गुरुयत्ताए भारियत्ताए गुरुसंभारियत्ताए सलिलतलमतिवइत्ता अहे धरणितलपइठाणे भवइ ?, हंता भवइ, अहे णं से तुंबे अहं भट्ठियालेवेणं परिक्खएणं धरिणतलमतिवइत्ता उप्पिं सलिलतल- पइटाणे भवइ ? हंता भवइ, एवं खलु गोयमा! निस्संगयाए निरंगणयाए गइपरिणामेणं अकम्मरस गई पन्नायति । कहन्नं भंते! बंधणछेदणयाए अकम्मस्स गई पन्नत्ता? गोयमा! से जहानामए-कलसिंबलियाइ वा मुन्गसिंबलियाइ वा माससिंब- लियाइ वा सिंवलिसिंबलियाइ वा एरंडमिंजियाइ वा उरहे दिन्ना सुझा समाणी फुडित्ताणं एगंतसंतं गच्छइ, एवंखलु गोयमा!01 कहन्नं भंते ! निरंधणयाए अकस्मस गती? गोयमा! से जहा- नामए-धूमस्स इंधणविप्पमुक्करस उड्ढं वीससाए निव्वाघाएणं, , दशमोऽध्याय: [ २३३ छाया- - ? गती पवत्तति, एवं खलु गोयमा! । कहन्नं भंते! पुव्वपओगेणे अकम्मरस गती पन्नत्ता? गोयमा! से जहानामए-कंडस्स कोदंङ विप्पमुक्कस्स लक्खाभिमुही निव्वाधाएणं गती पवत्तइ, एवं खलु गोयमा! नीसंगयाए निरंगणयाए जाव पुवपओगेणं अकम्मरस गतीः पराणत्ता। व्याख्याप्रज्ञप्ति श० ७, उ० १, सू०२६५ अस्ति भदन्त ! अकर्मणः गतिः प्रज्ञायते? हन्त अस्ति । कथं नु भगवन् ! अकर्मणः गतिः प्रज्ञायते ? गौतम! निःसंगतया निरङ्ग- तया गतिपरिणामेण बन्धनछेदनतया निरिन्धनतया पूर्वप्र- योगेण अकर्मणः गतिः प्रज्ञप्ता । कथं नु भगवन् ! निःसंगतया निरङ्गतया गतिपरिणामेण बन्धनछेदनतया निरिन्धनतया पूर्व- प्रयोगेण अकर्मणः गतिः प्रज्ञायते? अथ यथानामकः कोऽपि पुरुषः शुष्कं तुम्बं निश्छिद्रं निरुपहतं आनुपूर्व्या परिक्रमन् २ दर्भश्च कुशैश्च वेष्टयति २ अष्टाभिः मृत्तिकालेपैः लिम्पति २ उष्णे ददाति भूरि भूरि शुष्कं सन् अस्थाघे (अगाधे ) अतारे अपौरुपिके उदके प्रक्षिपेत्, अथ नूनं गौतम! सस्तुम्बः अष्टानां मृत्तिकालेपानां गुरुकतया भारिकतया गुरुसंभारिकतया सलिलतलमतिपत्य अधस्तात् धरणितलप्रतिष्ठानः भवति ? हत भवति, अथ सस्तुम्बः अष्टानां मृत्तिकालेपानां परिक्षयेण धरणि- तलमतिपत्य उपरि सलिलतलप्रतिष्ठानः भवति? हंत भवति, एवं खलु गोयमा! निःसंगतया निरङ्गतया गतिपरिणामेण अकर्मणा गतिः प्रज्ञायते। कथं भगवन् ! बन्धनछेदनतया अकर्मणः गांक: प्रज्ञप्ता ? गौतम ! अथ यथानामकः-कलसिम्बलिका (धान्यविशेष- फलिका) वा मुद्गसिम्बलिका वा माषसिम्बलिका वा शाल्मलि- सिम्बलिका वा एरण्डमिञ्जिका उष्णे दत्ता शुष्का सती स्फाटता ?

२३४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : प्रश्न - एकान्तमन्तं गच्छति । एवं खलु गौतम! । कथं भगवन् ! निरिन्धनतयाऽकर्मणः गतिः? गौतम! अथ यथानायक:- धूमस्येंधनविप्रमुक्तस्य अचं विस्रसया निर्विघातेन गतिः प्रवर्तते, एवं खलु गौतम! ० । कथं नु भगवन् ! पूर्वप्रयोगेणाऽकर्मण: गतिः प्रज्ञप्ता ? गौतम ! अथ यथानामकः, काण्डस्य कोदण्डविप्र- मुक्तस्य लक्ष्याभिमुखी निर्विघातेन गतिः प्रवर्तति । एवं खलु गौतम! निःसंगतया निरागतया यावत् पूर्वप्रयोगेण अकर्मणः गतिः प्रज्ञप्ता । भाषा टीका [अब प्रश्न करते है कि जीव मुक्त होने पर ऊपर को ही क्यों जाता है सो इसके उत्तर मे सूत्रार्थ कहते हैं] - प्रश्न भगवन् ! क्या कर्म रहित जीव के गति होती है ? उत्तर - हाँ, होती है ? उनके गति किस प्रकार होती है ? उत्तर - हे गौतम । संग रहित होने से, राग (रंग) रहित होने से, स्वाभाविक ऊर्ध्व गमन स्वभाव वाला होने से, कर्म वन्ध के नष्ट हो जाने से, इंधन रहित होने से और पूर्व प्रयोग से कर्म रहित जीव के गति होती है । भगवन् ! संग रहित होने से, राग (रंग) रहित होने से, स्वाभाविक ऊर्ध्वगमन स्वभाववाला होने से, कर्म बन्ध के नष्ट हो जाने से, इंधन रहित होने से और पूर्व प्रयोग से कर्म रहित जीव के गति किस प्रकार होती है ? जिस प्रकार कोई पुरुष छिद्ररहित बिना टूटी हुई सुखी तुम्बी को क्रमसे लाता हुआ पहिले दाम और कुशाग्रो से वार २ लपेटता है । इसके पश्चात् वह उसके उपर मिट्टी के आठ लेप करता है । फिर उसको धूप मे रख कर वार वार सुखाता है । इसके पश्चात् वह उस तुम्ची को मनुष्य के डूबने योग्य अगाध गहन जल में फेंक देता है। तब हे गौतम! क्या वह तुम्बी उन आठो मिट्टी के लेपो के वोझ से अत्यन्त भारी हो जाने के कारण पानी के विल्कुल नीचे के पृथ्वीतल पर जा पड़ेगी ? अवश्य जा पड़ेगी? इसके पश्चात् क्या वह तुम्बी जल के कारण धीरे २ मिट्टी के आठों लेपों के घुल जाने से पृथ्वी तल से ऊपर उठ कर जल के ऊपर आजाती है ? निश्चय से आजाती है । उसी प्रश्न उत्तर - दशमोऽध्याय: [ २३५ प्रकार हे.गौतम.! संग रहित होने से, राग (रंग) रहित होने से और स्वाभाविक ऊर्च गमन स्वभाव होने से कर्म रहित जीव के भी गति होती है । प्रश्न-भगवन् ! बंधन के नष्ट होने से कम रहित जीव के किस प्रकार गति होती उत्तर --- हे गौतम ! जिस प्रकार कल नाम के अनाम की फली, मूंग की फली, उड़दाको फली, सेंभल की फली अथवा एरण्ड की फली को धूप में रख कर सुखाने से जब वह फूटती है तो बीज टूट २ कर एक ओर को ही जाते हैं उसी प्रकार हे गौतम ! [ कर्म] वन्धन के नष्ट होने से कर्म रहित जीव की गति होती है। भगवन् ! इधन रहित होने से कर्म रहित जीव के गति किस प्रकार होती प्रश्न प्रश्न उत्तर - हे गौतम जिस प्रकार इधन से निकला हुआ धुआं बिना किसी बाधा के हुए स्वभाव से ऊपर को ही जाता है उसी प्रकार इंधन रहित होने से कर्म रहित जीव के गति होती है। भगवन् पूर्व प्रयोग से कर्म रहित के गति किस प्रकार कही गई है ? उत्तर - हे गौतम ! जिस प्रकार धनुष से छोड़े हुए बाण की गति निर्बाध रूप से अपने लक्ष्य की ओर ही होती है, उसी प्रकार हे गौतम ! संग रहित होने से राग (रंग) रहित होने से, स्वाभाविक ऊर्ध्व गमन र भाव वाला होने से, बन्धन के नष्ट होने से, इंधन रहित होने से और पूर्व प्रयोग से कम रहित जीव के गति कही गई है। जीव का जब ऊर्ध्व गमन स्वभाव है तो फिर वह लोक के अन्त में ही जाकर क्यों ठहर जाता है ? आगे क्यो नहीं चला जाता ? इसका उत्तर सूत्र द्वारा दिया जाता है- धर्मास्तिकायाभावात् । १०,८ चउहिं ठाणेहिं जीवा य पोग्गला य णो संचातेति बहिया लोगंता गमणताते, तं जहा - गतिअभावेणं णिरुवग्गहताते लुक्खताते लोगाणुभावेणं । स्थानांग स्थान ४, उ०३, सू०३३७ ? १ २३६ ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : - छाया- चतुर्भिः स्थानः जीवाश्च पुद्गलाश्च न शक्नुवंति चहिस्ताल्लोका- न्ताद्गमनाय । तद्यथा-त्यभावेन निरुपग्रहतया (धर्मास्तिकाया- भावेन) रूक्षतया लोकानुभावेन । भाषा टीका चार कारणों से जीव और पुद्गल लोक के अन्त से वाहिर नहीं ला सकते- आगे गति का अभाव होने से, उपग्रह (धर्मास्तिकाय ) का अभाव होने से, लोक के अंत भाग के परिमाणुओ के रूक्ष होने से और अनादि काल का स्वभाव होने से । सगति आगम में जीव और पुद्गल दोनो की अपेक्षा विशेष दृष्टि से कथन किया गया है, जैसा कि आगमों मे प्रायः होता है। सूत्रों मे संक्षिप्त ही वर्णन किया जाता है। क्षेत्रकालगतिलिंगतीर्थचारित्रप्रत्येकबुद्धबो- धितज्ञानावगाहनान्तरसंख्याल्पबहुत्वतः साध्याः। १०, ६. खेत्तकालगईलिङ्गतित्थे चरित्ते । व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ०६, स०७५१. पत्तेयबुद्धसिद्धा बुद्धबोहियसिद्धा । नन्दिसूत्र केवनज्ञानाधिकार. नाणे खेत अन्तर अप्पाबहुयं । व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५, उ०६, सू०७५१. सिद्धाणोगाहणा संख्या । उत्तराध्ययन अध्ययन ३६, गाथा ५३. गया- क्षेत्रकालगतिलिङ्गतीर्थः चरित्रः । प्रत्येकवुद्धसिद्धाः बुद्धवोधितसिद्धाः । झानं क्षेत्रान्तराल्पबहुत्वं । सिद्धानामवगाहना संख्या ।

दशमोऽध्यायः
[ २३७
भाषा टोका-क्षेत्र, कोल, गति, लिङ्ग, तीथे, चारित्र, प्रत्येकबुद्धसिद्ध, बुद्धबोधित
सिद्ध, ज्ञान, क्षेत्र, अंतर, अल्पवहुत्व, अवगाहना और संख्या इन अनुयोगों से सिद्धों में
मी भेद साधने चाहिये।
संगति--सूत्र में तथा आगम में यहां शब्द साम्य देखने योग्य है।
इति श्री-जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम महाराज-संगृहीते
तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वये
* दशमोऽध्यायः समाप्तः ॥१०॥

२३८ ]
तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय :
in MardPer:-
गुरुप्पसत्थी.
नायसुओ वद्यमाणो नायसुओ महामुणी ।
लोगे तित्थयरो आसी अपच्छिमो सिवंकरो ॥१॥
सतित्थे ठविओ तेण पढमो अणुसासगो ।
सुहम्मो गणहरो नाम तेअंसी समणच्चिओ ॥२॥
तत्तो पवडिओ गच्छो सोहम्मो नाम विस्सुओ।
परंपराए तत्थासी सूरीचामरसिंघो॥३॥
तस्स संतस्स दंतस्स मोतीरामाभिहो मुणी ।
होत्थ सीसो महापन्नो गणिपयंविभूसिओ ॥४॥
तस्स पट्टे महाथेरो गणावच्छेअगो गुणी ।
गणपतिसन्निओ साहू सामण्णगुणसोहिओ ॥ ५ ॥
तस्स सीसो गुरुभत्तो सो जयरामदासओ।
गणावच्छेअगो अस्थि समो मुत्तो व्व सासणे ॥६॥
तस्स सीसो सच्चसंधो पवट्टगपयंकियो।
सालिग्गामो महाभिक्खू पावयणी धुरंधरो ॥७॥
तस्संतेवासिणा भिक्खुअप्पारामेण निम्मिओ ।
उवज्झायपयंकणं तत्तत्थरस समन्नो ॥८॥
तत्तत्थमूलसुत्तस्स
जं बीअं उपलब्भइ ।
जिणागमेसु तं सव्वं संखेवेणेत्थ दंसिअं॥ ॥
इगूणवीसानवर-विकमवासेसु निम्मिओ एस ।
दिल्लीनामयनयरे मुक्ख सत्थस्स य समन्नयो॥१०॥

परिशिष्ट नं. १. + :०: तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् । १, १४ ७ तत्र ‘नोइंदियनत्थावग्गहो' त्ति नोइन्द्रियं मनः, तच्च द्विधा द्रव्यरूपं भावरूपं च, तत्र मनःपर्याप्तिनामकर्मोदयतो यत् मनः प्रायोग्यवर्गणादलिकमादाय मनस्त्वेन परिणमितं तद्व्य- रूपं मनः, तथा चाह चूशिर्णकृत्- “मणपज्जत्तिनामकम्मोदयओ तज्जोग्गे मणोदव्वे घेत्तुं मणत्तेण परिणामिया दव्वा दव्वमणो भएण्ड । " तथा द्रव्यमनोऽवष्टम्भेन जीवस्य यो मननपरिणामः स भावमनः तथा चाह चूर्णिकार एव-"जीवो पुण मणणप- रिणामकिरियापन्नो भावमनो, किं भणियं होइ? - मणदव्वालं- बणो जीवस्स मणणवावारो भावमणो भण्णइ” तत्रेह भाव- मनसा प्रयोजनं, तद्ग्रहणे ह्यवश्यं द्रव्यमनसोऽपि ग्रहणं भवति, द्रव्यमनोऽन्तरेण भावमनसोऽसम्भवात्, भावमनो वि- नापि च द्रव्यमनो भवति, यथा भवस्थकेवलिनः, तत उच्यते- भावमनसेह प्रयोजनं, तत्र नोइन्द्रियेण-भावमनसाऽर्थावग्रहो द्रव्येन्द्रियव्यापारनिरपेक्षोघटायर्थस्वरूपपरिभावनाभिमुखः प्रथम + इस परिशिष्ठ मे वह पाठ है जो शीघ्रता के कारण मुलग्रन्थ के छपते समय उसमे न दिये जा सके थे।

२४० ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : १,२०. , मेकसामयिको रूपायकारादिविशेषचिन्ताविकलोऽनिर्देश्यसा- मान्यमात्रचिन्तात्मको बोधो नोइन्द्रियार्थावग्रहः । नन्दिसूत्र वृत्ति मतिज्ञान वर्णन. श्रुतं मतिपूर्व द्वयनेकद्वादशभेदम् । अंगबाहिरं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-आवस्सयं च आव- स्सयवइरित्तं च । से किं तं आवस्सयं? आवस्सयं छविह परमात्तं, तं जहा-सामाइयं चउवीसत्थवो वंदणयं पडिक्कमणं काउस्लग्गो पञ्चक्खाणं, सेत्तं आवस्सयं । से किं तं आवस्सयव. इरित्तं? आवस्सयवइरित्तं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-कालिअंच उकालिनं च। से किं तं उक्कालिअं? उकालिनं अणेगविहं पएणतं, तं जहा-दसवेआलियं कप्पिआकप्पिलं चुल्लकप्पसुझं महाकप्पसुझं उववाइअं रायपसेणिअं जीवाभिगमो पण्णवणा महापण्णवणा पमायप्पमायं नंदी अणुओगदाराई देविदत्थो तंदुलवेआलिअं चंदाविज्झयं सूरपण्णति पोरिसिमंडलं मंडल- पवेसो विजाचरणविणिच्छओगणिविज्जा माणविभत्ती मरणविभत्ती आयविसोही वीयरागसुनं संलेहणासुअं विहारकप्पो चरणविही आउरपञ्चक्खाणं महापञ्चक्खाणं एवमाइ, से तं उक्काल्लिनं । से किं तं कालिअं? कालिअं अणेगविहं परणतं, तं जहा-उत्तर- ज्झयणाई दसाओ कप्पो ववहारो निसीहं महानिसीहं इसि- भासिमाई जंबूदीवपन्नत्ती दीवसागरपन्नत्ती चंदपन्नत्ती खुड्डिा विमाणपविभत्ती महल्लिा विमाणपविभत्ती अंगचूलिआ वग्ग- परिशिष्ट नं० [ २४१ ----- चूलिया विवाहचूलिया अरुणोववाए वरुणोववाए गरुलोचवाए: धरणोववाए वेसमणोववाए वेलंधरोववाए देविंदोववाए उट्ठाण- सुए समुठ्ठाणसुए नागपरिआवणिआओ निरयावलिआओ कप्पि- आओ कप्पवडिसिआओ पुप्पिाओ पुप्पचूलिआओ वराहीद- साओ, एवमाइयाई चउरासीइं पइन्नगसहस्साई भगवओ अर- हो उसहसामिस्स आइतित्थयरस्स तहा संखिज्जाइं पइन्नग- सहस्साई मज्झिमगाणं जिणवराणं चोदसपइन्नगसहरसाणि भगवओ वद्धमाणसामिस्स, अहवा जस्स जत्तिमा सीसा उप्प- तिआए वेणइआए कम्मियाए पारिणामिआए चउविहाए वुद्धीए उववेा तस्स तत्तिाई पइण्णगसहस्साइं, पत्तेअबु- द्वावि तत्तिा चेव, सेत्तं कालिअं, सेत्तं आवस्सयवइरितं, से तं अणंगपविटुं। नन्दी० सूत्र ४४. सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य । १, २९. केवलदसणं केवलदंसणिस्स सव्वदव्वेसु असव्वपज्जवेसु । अनुयोगद्वार० सूत्र १४४. मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च । १, ३१ अन्नाणे णं भंते! कतिविहे पराणते ? गोयमा! तिविहे २४२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : पएणते, तं जहा-मइअन्नाणे सुयअन्नाणे विभंगन्नाणे । व्याख्याप्रज्ञप्ति श०८, उ०२, सू०३१८, संज्ञिनः समनस्काः। २, २४. ܕ ܪ , जीवा णं भंते! किं सरणी असण्णी नोसरणीनोअसरणी? गोयमा! जीवा सण्णीवि असगणीवि नोसपणीनोअसण्णीवि । नेरइयाणं पुच्छा ? गोयमा! नेरइया सरणीवि असण्णीवि नो नोसरणीनोअसण्णी, एवं असुरकुमारा जाव थणियकुमारा । पुढविकाइयाणं पुच्छा ? गोयमा! नो सरणी असण्णी, नो नो- सरणीनोअसरणी । एवं बेइंदियतेइंदियचउरिंदियावि । मणूसा जहा जीवा, पंचिंदियतिरिक्खजोणिया वाणमंतरा य जहा नेर- इया, जोतिसियवेमाणिया सगणी नो असरणी नो नोसरणीनो- असण्णी । सिद्धाणं पुच्छा? गोयमा! नो सरणी नो असरणी नोसरणीनोअसण्णी । नेरइयतिरियमणुया य वणयरगसुरा इ सराणीऽसणी य । विगलिंदिया असगणी जोतिसवेमाणिया सपणी । पराणवणाए सरणीपयं समत्तं । प्रज्ञापना, ३१ संज्ञापद, सूत्र ३१५. शेषास्त्रिवेदाः । २,५२.

परिशिष्ट नं १ [ २४३ कइविहे णं भंते ! वेए पण्णत्ते? गोयमा! तिविहे वेए पएणत्ते, तं जहा-इत्थीवेए पुरिसवेए नपुंसकवेए । नेरइया णं भंते ! किं इत्थीवेया पुरिसवेया णपुंसगवेया पण्णत्ता ? गोयमा! णो इत्थीवेया णो पुंवेए णपुंसगवेया पण्णत्ता । असुरकुमारा णं भंते ! किं इत्थीवेया पुरिसवेया नपुंगवेया ? गोयमा! इत्थीवेया पुरिसवेया णो णपुंसगवेया जाव थणियकुमारा । पुढवी आऊ तेऊ वाऊ व स्सई बितिचउरिदियसंमुच्छिमपंचिंदियतिरिक्ख- समुच्छिममणुस्सा णपुंसगवेया । गब्भवतियमणुस्सा पंचिं- दियतिरिया य तिवेया । जहा असुरकुमारा तहा वाणमंतरा जोइसियवेमाणियावि। समवायांग सूत्र १५६.

परिशिष्ट नं. २ .०: तत्त्वार्थ सूत्र भाषा (सूत्रों का अर्थ) प्रथम अध्याय मोक्षमार्ग का वर्णन- १–सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र यह तीनों मिला कर मोक्ष का मार्ग है। सम्यग्दर्शन- २-तत्त्व के (जो पदार्थ जिस रूप में विद्यमान है उसके उसो) अर्थ का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। ३–वह सम्यग्दर्शन दो प्रकार से उत्पन्न होता है- स्वभाव से और अधिगम (दूसरे के द्वारा ज्ञान दिया जाने) से । सात तत्व- ४-तत्त्व सात हैं- जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष । उनको जानने के साधन- ५-नाम, स्थापना, द्रव्य (भूत भविश्य की अपेक्षा वर्तमान में कथन करना) और भाव (वर्तमान काल की अपेक्षा कथन) से उन सम्यग्दर्शन आदि तया सात तत्वों का न्यास अर्थात् लोक व्यवहार होता है। ६-प्रमाण और नय से भी उनका मान होता है।

4 परिशिष्ट नं०२ [ २४५ ७-निर्देश, स्वामित्व, साधन (उत्पत्ति का कारण), अधिकरण ( वस्तु का आधार), स्थिति, और विधान (मेद) से भी वह जाने जाते हैं । ८-सत्, संख्या, क्षेत्र (पदार्थ का वर्तमान निवास), स्पर्शन (तीनों कालों में निवास करने का क्षेत्र), काल, अन्तर ( विरह काल ), भाव (औपशमिक आदि) और अल्पबहुत्व से भी उनका ज्ञान होता है। पांचां ज्ञान का वर्णन ९-ज्ञान पांच प्रकार का होता है- मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल । १०-वह पांच प्रकार का ज्ञान दो प्रमाण रूप है। ११-आदि के दो मति और श्रुतज्ञान परोक्ष प्रमाण हैं। १२-~-बाकी के अवधि, मनः पर्यय और केवलज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। १३--मति (वर्तमान कालवर्ती पदार्थ को अवग्रह आदि रूप जानना), स्मृति (अनुभूत पदार्थ का कालान्तर में स्मरण करना), संज्ञा (प्रत्यभिज्ञान अथवा मति और स्मृति रूप ज्ञान), चिन्ता (अविनाभाव सम्बन्ध का ज्ञान ), अभि- निबोध, (चिन्द देखकर चिन्ह वाले का निश्चय कर लेना) और इनको आदि लेकर अन्य प्रतिभा, बुद्धि आदि सव अनर्थान्तर हैं, अर्थात् मतिज्ञान ही हैं । १४-वह मतिज्ञान पांच इन्द्रिय और मन के निमित्त से होता है। १५----उसके चार भेद हैं-अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा । १६--बहु, बहुविध, क्षिप, अनिःसृत, अनुक्त, ध्रुव, अल्प, एकविध, अक्षिण, निःसृत, उक्त और अध्रुव इस प्रकार वारह प्रकार का अवग्रह आदि रूप ज्ञान होता है। १७-यह उपरोक्त भेद प्रकट रूप पदार्थ के हैं, [जो २८८ हैं। १८----अप्रकट रूप पदार्थ का केवल अवग्रह हो होता हैं, अन्य ईहा आदि नहीं होते। १९--अप्रकट रूप पदार्थ का ज्ञान नेत्र और मन से नहीं होता। [अतएव अपकट रूप पदार्थ के कुल ४८ भेद ही होते हैं, अर्थात् मतिज्ञान के कुल ३३६ भेद होते हैं।

२४६ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : , २०-श्रुतमान मतिज्ञान के निमित्त से होता है। उसके दो भेद हैं-प्रथम अंगवाह्य के अनेक भेद हैं और अंगप्रविष्ट के आचारांग आदि बारह भेद हैं। ११-[अवधिज्ञान दो प्रकार का होता है- अवमत्यय अवधि और क्षयोपशम निमित्त अवधि भवप्रत्यय अवधि देव और नारकियों के ही होता है। ११-क्षयोपशम निमित्त अवधिज्ञान मनुष्य और तिर्यंचों के होता है। वह छै प्रकार फा होता है-[अनुगामी, अननुगामी, वर्द्धमान, हीयमान, अवस्थित और धनवस्थित ] २३-मनःपर्यय ज्ञान दो प्रकार का होता है- जुमति और विपुलमति। २४-परिणामों की विशुद्धता और अप्रतीपात (केवलज्ञान होने तक चारित्र से न गिरने ) से इन दोनों में न्यूनाधिकता है । अर्थात् ऋजुमति से विपुलमति वाले के परिणाम अधिक विशुद्ध होते हैं और न विपुलमति मनःपर्यय ज्ञान वाला चारित्र से ही गिर सकता है। २५–अवधि और मनः पर्यय ज्ञान में भी विशुद्धता, क्षेत्र, स्वामी और विषय की अपेक्षा से भेद होता है। २६–मति और श्रुतज्ञान के विषयों के जानने का नियम द्रव्यों को कुछ पर्यायों में है । अर्थात् मतिज्ञान और श्रुत ज्ञान छहों द्रव्यों की सव पर्यायों को नहीं जानते, थोड़ी २ पर्यायों को ही जान सकते हैं। २७–अवधिज्ञान के विषय का नियम रूपी अर्थात् मूर्तिक पदार्थों में है। अर्थात् भवधि ज्ञान पुद्गलद्रव्य की पर्यायों को ही जानता है । २८-श्रवधिज्ञान द्वारा जाने हुए सूक्ष्म पदार्थ के अनंतवें भाग को मनःपर्यय झान जानता है। २९-फेवलज्ञान के विषय का नियम समस्त द्रव्यों की समस्त पर्यायों में है । अर्थात् केवल ज्ञान छहों द्रव्यों की समस्त पर्यायों को एक काल में जानता परिशिष्ट ०२ [ २४७ ३०- एक जीव में एक साथ विभाग किए हुए एक से लेकर चार ज्ञान तक हो सकते हैं। तीन अज्ञान -- ३१--मति, श्रुत और अवधि यह तीन ज्ञान विपर्यय भी कहलाते हैं। [ उस समय यह कुमति, कुश्रुत और कुअवधि अथवा विभंग ज्ञान कहलाते हैं। ] ३२-सन् और असद पदार्थों के मेद का ज्ञान न होने से स्वेच्छा रूप यद्वा तदा जानने के कारण उन्मत्त के समान यह मिथ्याज्ञान भी होते हैं। सात नय- ३३---नय सात होती हैं- नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवंभूत । " ...: द्वितीय अध्याय जीव के भाव १--जीव के अपने पांच भाव होते हैं- औपशमिक, क्षायिक, मिश्र अथवा क्षायोपशमिक, औदयिक और पारिणामिक। २-उनके क्रमशः दो, नौ, अठारह, इक्कीस और तीन भेद हैं अर्थात् औपशमिक भाव दो प्रकार के हैं, क्षायिक भाव नौ प्रकार के हैं, क्षायोपशमिक भाव अठारह प्रकार के हैं, औदायिक भाव इक्कीस प्रकार के हैं और पारिणामिक भाव तीन प्रकार के हैं। ३-औपशमिक सम्यक्त्व और औपशमिक चारित्र ये दो औपशमिक भाव के भेद हैं। ४-क्षायिक भाव नौ हैं- केवलज्ञान, केवलदर्शन, क्षायिक दान, क्षायिक लाभ, क्षायिफ भोग, २४८ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : क्षायिक उपभोग, क्षायिक वीर्य, क्षायिक सम्यक्त्व और क्षायिक चारित्र । ५-झायोपशामिक भाव अठारह हैं- प्रतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यय ज्ञान, कुमति, कुथुत, विभंग ज्ञान, चक्षुर्दशन, अचक्षुर्दशन, अवधिदर्शन, क्षायोपशमिक दान, क्षायोप- शमिक लाभ, क्षायोपशमिक भोग, क्षायोपशमिक उपभोग, क्षायोपशमिक वीर्य क्षायोपशमिक सम्यक्त्व, सराग चारित्र और संयमासंयम (देशव्रत)। ६-औदयिक भाव इक्कोस हैं--- मनुष्यगति, देवगति, नरक गति, तिथंच गति, क्रोध, मान, माया, लोभ कषाय, स्त्रीवेद, पुंवेद, नपुंसक वेद, मिथ्यादर्शन, अज्ञान, असंयम, प्रसिद्धत्व, कृष्ण लेश्या, नील लेश्या, कापोत लेश्या, पीत लेश्या, पद्म लेश्या और शुक्ल लेश्या । ७-पारिणामिक भाव तीन होते हैं- जीवत्व भव्यत्व और अभव्यत्व । जीव का लक्षण- -जीव का लक्षण उपयोग है। ९-वह उपयोग दो प्रकार का होता है। जिनमें से प्रथम ज्ञानोपयोग पाठ प्रकार का होता है और द्वितीय दर्शनोपयोग चार प्रकार का होता है। जीवों के भेद-- १०-जीच दो प्रकार के होते हैं- संसारी और मुक्त। ११-संसारी जीव समनस्क और अमनस्क दो प्रकार के होते हैं। १२---संसारो जीव त्रस और स्थावर दो प्रकार के होते हैं । १३-स्थावर पांच प्रकार के होते हैं- पृथिवी कायिक, अप्कायिक, तेजकायिक, वायुकायिक, और वनस्पतिकायिक । १४-दीन्द्रिय आदि जीव त्रस होते हैं। है - परिशिष्ट नं०२ [ २४९ - - इन्द्रियां १५-इन्द्रियां पांच ही होती है । १६-वह इन्द्रियां दो २ प्रकार की होती हैं- द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय । १७-निति और उपकरणों को द्रव्येन्द्रिय कहते हैं। १८-लब्धि और उपयोग भावेन्द्रिय हैं। पांचों इन्द्रिय और उनके विषय- १९-स्पर्शन ( त्वचा ), रसन (जीभ), घ्राण (नासिका ), चक्षु ( नेत्र ), और श्रोत्र (कान ) यह पांच इन्द्रियां हैं। २०-- इन पांचों इन्द्रियों के विषय क्रम से स्पर्श (हलका, भारी, रूखा, चिकना, कड़ा, नरम, ठंडा, और गरम), रस ( खट्टा, मीठा, कडुवा, कषायला और चरपरा ), गंध (सुगन्ध, दुर्गन्ध ), वर्ण ( काला, पीला, नीला, लाल और सफेद ) और शब्द हैं। २१-मन का विषय श्रुतज्ञान गोचर पदार्थ है। षटकाय जीव- २२-पृथिवी कायिक, अप्कायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक जीवों के पहिली स्पर्शन इन्द्रिय ही होती है। * नामकर्म के निमित्त से हुई इन्द्रियाकार रचना विशेष को निति कहते यह दो प्रकार की होती है-एक श्राभ्यन्तर निवृति, दूसरी बाह्य निवृति। आत्मा के प्रदेशों का इन्द्रियों के आकार रूप होना श्राभ्यन्तर निवृति है। और पुद्गल परमाणु की इन्द्रिय रूप रचना होना सो बाह्य निवृति है। + निवृति को जो सहायक हो उसे उपकरण कहते हैं। जैसे नेत्र मे सफेद भाग, पलक आदि। * ज्ञानावरण कर्म की क्षयोपशम रूप शक्ति विशेष को लब्धि कहते है। लब्धि होने पर यात्मा का विषयो के प्रति परिणमन होने से आत्मा में उत्पन्न हुए शान को उपयोग कहते है।

२५० ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : २३-लट, चिउंटी, भौंरा और मनुष्य आदि के क्रम से एक२ इन्द्रिय अधिकारहोती है। २४-मन सहित जीवों को संज्ञी कहते हैं। विग्रह गति-- २५–नया शरीर धारण करने के लिये की जाने वाली गति में कार्माण योग रहता है। २६ जीव और पुद्गलों का गमन आकाश के प्रदेशों की श्रेणि का अनुसरण करके होता है। २७-मुक्त जीव की गति वक्रता रहित (मोड़े रहित) सीधी होती है। ३८-और संसारी जीव की गति चार समय से पहिले २ विग्रहवती वा गोड़े वाली है। २९-मोड़े रहित गति एक समय मात्र ही होती है। ३०-विग्रह गति वाला जीव एक समय, दो समय अथवा तीन समय तक *अनाहारक रहता है। तीन जन्म- ३१- सम्मूर्छन, गर्भ, और उपपाद यह तीन जन्म होते हैं ३३-उन तीनों जन्मों की नौ योनियां होती हैं- सचित्त, अचित, सचित्ताचित्त, शीत, उष्ण, शीतोष्ण, संवृत, विवृत और संतृतचित । ३३-जरायुज (जरायु में लिपटे हुए उत्पन्न होने वाले), अंडन (अंडे से उत्पन्न होने वाले) और पोत (जो माता के उदर से निकलते ही चलने फिरने लगें) जीवों के गर्म जन्म होता है। ३४-चारों प्रकार के देवों और नारकी जीवों के उपपाद जन्म होता है। ३५--इनसे अविशिष्ट संसारी जीवों का सम्मृर्छन जन्म होता है। औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीर तथा छहो पर्याप्तियो के योग्य पुद्गलवर्गणा के ग्रहण को आहार कहते हैं। जीव जब तक ऐसे आहार को ग्रहण नहीं करता है, तब तक उसे अनाहारक कहते हैं।

परिशिष्ट नं०२ [ २५१ पांच शरीर- ३६--औदारिक', बैंक्रियिका, आहारक, तैजस और फार्मण। यह पांच शरीर होते हैं । ३७-अगले २ शरोर पहिले २ से सूक्ष्म २ हैं। अर्थात् औदारिक से बैंक्रियिक सूक्ष्म है, वैक्रियिक से श्राहारक सूक्ष्म है, आहारक से तैजस और तेजस से कार्मण शरीर सूक्ष्म है। ३८--किन्तु प्रदेशों+ (परमाणुओं) की अपेक्षा तैजस से पहिले पहिले के शरीर असंख्यात गुणे हैं। अर्थात् औदारिक से वैक्रियिक शरीर में असंख्यात गुणे परमाणु हैं, और वैक्रियिक आहारक शरीर में असंख्यात गुणे परमाणु हैं। ३९---शेप के दो शरीर-तैजस और कार्मण अनंत गुणे परमाणु वाले हैं। अर्थात्य श्राहारक से तैजस में अनंत गुणे परमाणु हैं, और तैजस से कार्माण शरीर में अनन्त गुणे परमाणु हैं। ४०-तेजस और कार्माण यह दोनों ही शरीर अग्रतोघात हैं। अर्थात् अन्य मूर्तिमान्न पुद्गल आदि से रुकते नहीं हैं। स्थूल अर्थात् प्रधान शरीर को औदारिक शरीर कहते हैं । + जिसमे अनेक प्रकार के स्थूल, सूक्ष्म, हलका, भारो, आदि विकार होने सभव शे उसे बैंक्रियिक शरीर कहते हैं। सूक्ष्म पदार्थ के निर्णय के लिये छटे गुणस्थान वाले मुनियो के शरीर प्रगट होने वाले शरीर को आहारक शरीर कहते हैं । $ जिससे शरीर में तेज शक्ति होती है उसे तैजस शरीर कहते है । || ज्ञानावरण आदि अष्टकर्मों के समूह को कार्माण शरीर कहते है । + आकाश के जितने प्रदेश को पुद्गल का अविभागी परमाणु घेरे उसे प्रदेश फहते है। जिस प्रकार मूर्तिक द्रव्य (पुद्गल) के छोटे बड़े पने का अदाज परमाणुओं से बतलाया जाता है, उसी प्रकार अमूर्तिक द्रव्यो (जीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल) का अंदाज प्रदेशो से लगाया जाता है। यहां सूक्ष्म होने के कारण इन शरीरों का अंदाजा भी प्रदेशो से ही लगाया गया है। यद्यपि शरीर नाम कर्म के द्वारा रचना होने से यह शरीर भी पौद्गलिक ही हैं। में २५२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : ४१-- इन दोनों शरीरों का आत्मा से अनादि काल से सम्बन्ध है [और संतान को अविवता से सादि सम्बन्ध भी है ।] ४२-ये दोनों शरीर समस्त संसारी जोवों के होते हैं । ४३--एक आत्मा में विभाजित किये हुए इन दोनों शरीरों को आदि लेकर एक साथ चार शरीर तक होते हैं। ४४-अंत का कर्माण शरीर उपभोग रहित है अर्थात् इंद्रियों द्वारा शब्द आदि विषयों के उपभोग से रहित है | ४५--गर्भ जन्म और सम्मर्छन जन्म वालों के आदि का प्रौदारिक शरीर ही होता है। ४६-उपपाद जन्म से उत्पन्न होने वालों के क्रियिक शरीर होता है । ४७-क्रियिक शरीर लब्धि अर्थात् तपो विशेष रूप ऋद्धि की प्राप्ति के निमित्त से भी होता है । ४८-तथा तैजस शरीर भी लब्धि प्रत्यय अर्थात् ऋद्धि होने से प्राप्त होता है । ४६-आहारक शरीर शुभ है अर्थात् शुभ कार्य को करता है, विशुद्ध है, व्या- घात रहित है तथा प्रमत्तसंयत मुनि के हो होता है । जीवों के वेद- ५०-नारकी और सम्मूर्छन जीव नपुंसक होते हैं । ५१-देव नपुंसक नहीं होते । अर्थात् देवों में पुरुषलिंग और स्त्रीलिंग दो ही लिंग होते है। ५२-नारकी, देव और सम्मुर्छनों के अतिरिक्त गर्भज, तिर्यञ्च, और मनुष्य तीनों वेद वाले होते हैं। परिपूर्ण आयु वाले जीव- ५३-देव, नारकी, चरमशरोर वाले, और असंख्यात वर्ष की आयु वाले भोगभूमि के जोव परिपूर्ण आयु वाले होते हैं। अर्थात् इनकी अकाल मृत्यु नहीं होती। . ~ :

है परिशिष्ट न०२ [ २५३ तृतीय अध्याय - - १-नरकों की सात भूमियां हैं:- रत्नप्रभा, शर्करामभा, वालुकाममा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तमप्रभा, और महातमप्रभा । यह सातों पृथिवी एक दूसरी के नीचे २, तीन वातवलय और आकाश के आश्रय स्थिर है। अर्थात् समरत भूमियां घनोदधि वातवलय के आधार है, धनोदधि वातवलय घनवातवलय के आधार है, धनवातवलय तनुवातवलय के श्राधार है, तनुवातवलय अाकाश के श्राधार है और आकाश स्वयं अपने ही आधार है। २-प्रथम पृथिवी में तोस लाख, दूसरी में पचीस लाख, तीसरी में पन्द्रह लाख, चौथी में दश लाख, पांचवीं में तीन लाख, छटी में पांच कम एक लाख और सातवीं में कुल पांच ही नरक अर्थात् नारकावास हैं। ३--नारकी जीव सदा ही अशुभतर लेश्या वाले, अशुभतर परिणाम वाले, अशुभतर देह के धारक, अशुभतर वेदना वाले, और अशुभतर विक्रिया वाले होते हैं । ४- वह परस्पर एक दूसरे को दुःख उत्पन्न करते रहते हैं। ५-तीसरे नरक तक उन नारकी जीवों को संक्लिष्ट परिणाम वाले असुर- कुमार देव भी दुःखी किया करते हैं । ६--प्रथम नरक की उत्कृष्ट (अधिक से अधिक) आयु एक सागर, दूसरे की तीन सागर, तीसरे की सात सागर, चौथे की दश सागर, पांचवें की सतरह सागर, छटे की बाईस सागर और सातवें नरक की उत्कृष्ट प्रायु तेतीस सागर की है। मध्य लोक का वर्णन- ७-[इस पृथ्वी पर ] जम्बूद्वीप श्रादि तथा लवण समुद्र आदि उत्तम २ नाम वाले द्वीप और समुद्र हैं।

३५४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : ८-प्रत्येक द्वीप समुद्र गोल चूड़ी के आकार, पहिले २ द्वीप तथा समुद्र को घेरे हुए और एक दूसरे से दुगुने २ विस्तार वाला है। जम्बू द्वीप- - 8--उन सब द्वीप समुद्रों के बीच में सुमेरु पर्वत को नाभि के समान धारण करने वाला, गोलाकार तथा एक लाख योजन लम्बा चौड़ा जम्बू द्वीप है। १०--इस जम्बू द्वीप में भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत, और ऐरावत यह सात क्षेत्र हैं । ११---उन सात क्षेत्रों का विभाग करने वाले, पूर्व से पश्चिम तक लंबे-हिमवान्, महाहिमवान्, निषध, नील, रुक्मी और शिखरी यह छह क्षेत्रों को धारण करने वाले अर्थात वर्षधर पर्वत हैं। १२--हिमवान पवत सुवर्णमय अर्थात् पीतवर्ण का है, महाहिमवान् सफेद चांदी के समान रंग वाला है, निषध पर्वत ताये हुए सुवर्ण के समान है, नील पर्वत वैडूर्यमय अर्थात् मोर के कंठ के समान नीले रंग का है, रुक्मी पर्वत चांदी के समान श्वेत वर्ण है और छटा शिखरी पर्वत सुवर्ण के समान पीत वर्ण का है। १३-उनके पसवाड़े नाना प्रकार के रंग तथा प्रभा वाली मणियों से चित्रित हो रहे हैं। वह ऊपर, नीचे और मध्य में एक से लम्बे चौड़े-दीवार के समान हैं। १४-उन छहों पर्वतों के ऊपर क्रम से निम्नलिखित छै हद हैं-पद्म, महापद्म, तिगिंछ, केसरि, महापुण्डरीक और पुण्डरीक । १५-इनमें से पहला पद्म सरोवर पूर्व से पश्चिम तक एक सहस्र योजन लम्बा और उत्तर से दक्षिण तक पांच सौ योजन चौड़ा है । १६-वह पद्म सरोवर दश योजन गहरा है। १७-उस पद्महद के बीच में एक योजन का लंबा चोड़ा एक कमल है। १८----इस प्रथम सरोवर और कमल से अगले २ तालाब और कमल [तीसरे तक] दुगुने है।

परिशिष्ट नं०२ [ २५५ १९----इन छहों कमलों में निम्नलिखत छै देवियां सामानिक और पारिषद् के देवों सहित निवास करती हैं- श्री, ही, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी । इनकी थायु एक २ पल्य की होती है। २०-उन सातों क्षेत्रों में क्रमशः दो २ के जोड़े से निम्नलिखित चौदह नदियां बहतो हैं-- गंगा, सिन्धु, रोहित, रोहतास्या, हरित, हरिकान्ता, सीता, सीतोदा, नारो, नरकान्ता, सुवर्णकूला, रूप्यकूला, रक्ता और रक्तोदा । २१---इन सात युगल में से पहली २ नदियां पूर्व की ओर जाती हुई पूर्व समुद्र में मिलती हैं। २२--और शेप सात नदियां पश्चिम की ओर जाती हुई पश्चिम के समुद्र में मिलती हैं। २३---गंगा सिन्धु आदि नदियां चौदह २ हज़ार नदियों के परिवार सहित हैं । अर्थात् इनकी चौदह २ हजार सहायक नदियां हैं। २४--भरत क्षेत्र का उत्तर दक्षिण विस्तार पांच सौ छब्बीस सही छै वटा उन्नीस (५२६६) योजन है। २५-भरतक्षेत्र से आगे विदेह क्षेत्र तक पर्वत और क्षेत्र दुगुने २ विस्तार वाले हैं। २६-विदेह क्षेत्र से उत्तर के तीन पर्वत और तीन क्षेत्र विदेह क्षेत्र से दक्षिण के पर्वतों और क्षेत्रों के बराबर विस्तार वाले हैं। २७--इनमें से भरत और ऐरावत क्षेत्र में उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के छै २ कालों में [ प्राणियों के आयु, काय, भोग, उपभोग, सम्पदा, वीर्य, और बुद्धि आदि ] बढ़ते और घटते रहते हैं। २८-उन भरत और ऐरावत के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों की पांच पृथिवी ज्यों की त्यों नित्य हैं। अर्थात् उनमें कालचक्र की हानि और वृद्धि नहीं होती।

२५६ ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : २९--हैमवत क्षेत्र के मनुष्यों की आयु एक पल्य, हरिवर्प वालों की दो पल्य और देवकुरु वालों को तीन पल्य होती है । ३०-इन दक्षिण के क्षेत्रों के समान ही उत्तर के क्षेत्रों की रचना और आयु है। ३१-विदेह क्षेत्रों में संख्यात वर्ष की आयु वाले मनुष्य होते हैं । ३१--भरत क्षेत्र जम्बूद्वीप का एक सौ नव्वेवां (१९०) भाग है । अढाई द्वीप का वर्णन- ३३-धातकीखंड नाम के दूसरे द्वीप में भरत आदि क्षेत्र दो २ हैं। ३४-पुष्करद्वीप के आधे भाग में भी भरत आदि क्षेत्र दो २ हैं । ३५-अनुष्य मानुषोनर पर्वत से पहिले २ ही रहते हैं । ३६-मनुष्यों के दो भेद हैं—आर्य और म्लेच्छ । ३७-देवकुरु तथा उत्तरकुरु को छोड़कर पांच भरत, पांच ऐरावत और पांच विदेह इस प्रकार पन्द्रह कर्मभूमियां हैं । ३८ अनुष्यों की उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य और जघन्य अन्तर्मुहुर्त है । ३६-तिर्यञ्चों की भी उत्कृष्ट आयु तीन पल्य और जघन्य अन्तर्मुहुर्त होती है। १०. चतुर्थ अध्याय चार प्रकार के देव- १-देवों के चार समूह हैं-(भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक)। २-भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्कों में कृष्ण, नील, कापोत और पीत ये चार लेश्या होती हैं। ३-धवनवासियों के दश भेद, व्यन्तरों के आठ, ज्योतिष्कों के पांच और कल्पोपपन्नों के बारह भेद होते हैं । + देखो अध्याय ४ सूत्र १७ परिशिष्ट नं०२ [ २५७ देवों के इन्द्र भादि दश भेद- ४-इन मंदों में से भी प्रत्येक के निम्नलिखित दश २ भेद होते हैं- इन्द्र, सामानिक, त्रायस्त्रिंश, पारिपत, प्रात्मरक्ष, लोकपाल, अनीक, मकी- र्णक, भाभियोग्य, और किल्विपिक । ५-व्यन्तर और ज्योनिकों में प्रायस्त्रिंश और लोकपाल नहीं होते । ६-भवनवासी और व्यन्तरों के प्रत्येक भेद में दो दो इन्द्र होते हैं । देवों का काम सेवन-- ७....भवनवामो, व्यंनर, ज्योतिष्क, सौधर्म स्वर्ग और ईशान स्वर्ग के देव [ मनुष्यों के समान] शरीर से काम सेवन करते हैं। -ऊपर के म्वों के देव केवल स्पर्श करने, रूप देखने, शब्द सुनने और मन से ही काम सेवन का रस ले लेते हैं । -स्वों (कल्पी) के परे के देव काम सेवन रहित है। देवों के अवान्तर भेद-- १०--भवनवासियों के दश भेद हैं- असुरकुमार, नागकुमार, विद्युतकुमार, सुपर्णकुमार, अग्निकुमार, पातकुमार, स्तनितकुमार, उदधिकुमार, द्वीपकुमार और दिकुमार । ११--व्यंतरों के आठ भेद है- किन्नर, किम्पुरुष, महोरग, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, भूत और पिशाच । १२ -ज्योतिष्कों के पांच भेद हैं-- सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र और प्रकीर्णकतारे । १३-यह सब ज्योतिष्कदेव मनुष्य लोक अर्थात् अढ़ाईद्वीप और दो समुद्रों में सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा देते हुए निरंतर गमन करते रहते हैं। १४----उन के द्वारा समय का विभाग किया जाता है । १५--मनुष्य लोक से वाहिर के ज्योतिष्कदेव निश्चित अर्थात् गति रहित हैं । १६-इनके ऊपर विमानों में रहने वाले देव वैमानिक कहलाते हैं।

१५८ ] तस्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : - १७-वैमानिकों के दो भेद होते हैं- कल्पोपपन्न और कल्पातीत । स्वर्ग और उनके ऊपर की रचना- १८-यह सब निम्नलिखित क्रम से ऊपर २ हैं । १९-सौधर्म, ईशान, सानत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्म ब्रह्मोत्तर, लांतव कापिष्ट, शुक्र महा- शुक्र, सतार सहस्रार, आनत प्राणत और श्रारण अच्युत में कल्पोपप- पन्न देव रहते हैं । और नवनवेयक के नौ पटल, नौ अनुदिश के एक पटल तथा विजय, वैजयंत, जयन्त, अपराजित और सर्वार्थसिद्धि नाम के पांच अनुत्तर विमानों के एक पटल में कल्पातीत देव रहते हैं । ( यह सब अहमिन्द्र कहलाते हैं। ) २०- ऊपर २ के वैमानिकों की आयु, प्रभाव, सुख, धुति, लेश्या की विशुद्धता, इन्द्रिय विषय और अवधि बान का विषय अधिक २ हैं। २१-- किन्तु गमन, शरीर की उच्चता, परिग्रह और अभियान ऊपर २ के देवों का कम २ है। २२- सौधर्म ईशान में पीत लेश्या; सानत्कुमार माहेन्द्र में पीत पम दोनों; ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लानव और कापिष्ठ में पद्म लेश्या; शुक्र, महाशुक्र, सतार और सहस्रार में पद्म शुक्ल दोनों तथा आनत आदि शेष विमानों में शुक्ल लेश्या है । परन्तु अनुदिश और अनुत्तर विमानों में परम शुक्ल लेश्या होती है। २३-अवैयकों से पहिले के सोलह स्वर्ग कल्प कहलाते हैं। लौकान्तिक देव-- २४–पांचवें स्वर्ग ब्रह्मलोक के अंत में रहने वाले लोकान्तिक देव कहलाते हैं । २५–इनके आठ भेद होते हैं- सारस्वत, श्रादित्य, वन्दित, अरुण, गर्दतोय, तुषित, अव्यायाध, और अरिष्ट । २६-विजय प्रादि चार विमानों के देव दो जन्म लेकर भोक्ष जाते हैं ।

परिशिष्ट नं २ [ २५९ तिर्यञ्च जीव- २७...देव, नारकी और मनुष्यों के अतिरिक्त शेप सब जीव तिर्यञ्च हैं । देवों की आयु-- २८-असुरकुमारों की आयु एक सागर, नागकुमारों की तीन पल्य, सुपर्णकुमारों को अढाई पल्य, द्वीपकमारों की दो पल्य और शेष छह कुमारों की उत्कृष्ट श्रायु डेढ़ डेढ पल्य की है। २६-सौधर्म और ईशान स्वर्ग के देवों की उत्कृष्ट आयु दो सागर से कुछ अधिक है। ३०-सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग के देवों की उत्कृष्ट अत्यु सात सागर से कुछ अधिक है। ३१-ब्रह्म ब्रह्मोत्तर के देवों की प्रायु दश सागर से कुछ अधिक, लान्तव और कापिष्ठ में चौदह सागर से कुछ अधिक, शुक्र और महाशुक्र में सोलह सागर से कुछ अधिक, सतार और सहस्रार में अठारह सागर से कुछ अधिक, अानत और प्राणत में बीस सागर की, तथा प्रारण और अच्युत स्वर्ग में बाईस सागर को उत्कृष्ट आयु है । ३२-पारण और अच्युत युगल से ऊपर नव ग्रैदेयकों, नव मनुदिशों, विजयादिक चार विमानों और सर्वार्थसिद्धि विमान में एक २ सागर आयु अधिक है। अर्थात् प्रथम अधेयक में तेईस सागर, नवम वेयक में इकत्तीस सागर, नव अनुदिशों में बत्तीस सागर और पांचो अनुत्तर विमानों में तेंतीस सागर उत्कृष्ट आयु है। ३३- मौधर्म ईशान स्वर्ग की जघन्य आयु एक पल्य से कुछ अधिक है । ३४- पहिले २ युगल की उत्कृष्ट प्रायु अगले अगले युगलों में जघन्य है । ३५-नारको जीवों की जघन्य आयु भी इसी प्रकार दूसरे तीसरे आदि नरकों में पूर्व २ को उत्कृष्ट आगे २ जघन्य है । ३६-प्रथम नरक की जघन्य आयु दश सहस्र वर्ष है । " २६० ] तत्त्वार्थमृत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : ३७– भवन वासियों की जवन्य प्रायु भी दश हजार वर्ष है । ३८- व्यन्तरों की जघन्य आयु भी दश हजार वर्ष है। ३९- व्यन्तरों की उत्कृष्ट आयु एक पल्य से कुछ अधिक है। ४०- ज्योतिषकों की उत्कृष्ट आयु भी एक पल्य से कुछ अधिक है। ४१- ज्योतिषकों की जघन्य आयु पल्य का आठवां भाग है। ४२- सभी लौकान्तिक देवों की उत्कृष्ट और जघन्य श्रायु प्राट सागर है । पंचम अध्याय छै द्रव्य- १-धर्म, अधर्म, आकाश और काल अजीवकाय अर्थात् अचेतन और बहुमदेशी पदार्थ है। २–उक्त चारों पदार्थ द्रव्य है । ३–जीव भी द्रव्य हैं। ४- यह सब द्रव्य [ इसी अध्याय के ३६ वें सूत्र के काल द्रव्य सहित] नित्य अर्थात् कभी न नष्ट होने वाले, अवस्थित अर्थात् संख्या में न घटने बढ़ने वाले और अरूपी हैं । ५-किन्तु इनमें से केवल पुद्गल द्रव्य रूपी हैं । ६-धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, और आकाश द्रव्य एक २ ही हैं । ७-यह तीनों ही द्रव्य निष्क्रिय भी है । द्रव्यों के प्रदेश- ८-धर्म, अधर्म और एक जीव द्रव्य के प्रदेश असंख्यात २ हैं । ६-आकाश के अनन्त प्रदेश हैं [किन्तु लोकाकाश के असंख्यात प्रदेश हैं | १०-पुद्गलों के प्रदेश [स्कन्धों के अनुसार संख्यात, असंख्यात और अनंत हैं । ११-पुद्गल परमाणु के एक प्रदेश मात्रना होने से प्रदेश नहीं कहे गये हैं ।

परिशिष्ट न०२ [ २६१ - द्रव्यों का अवगाह- १२.---इन सब द्रव्यों का अवगाह (स्थिति ) लोकाकाश में है। १३-धर्म और अधर्म द्रव्य सम्पूर्ण लोकाकाश में हैं। १४-पुद्गलों का अवगाह लोक के एक प्रदेश आदि में है । १५-जीवों का अवगाह लोक के असंख्यातवें भाग आदि में है । जीव के छोटे बड़े शरीर को ग्रहण करने का दृष्टान्त- १६-जीव के प्रदेश संकोच और विस्तार से दीपक के समान [छोटे बड़े सभी शरीरों में व्याप्त रहते हैं।] द्रव्यों का उपकार- १७-धर्म द्रव्य का उपकार जीवों और पुद्गलों को गमन में सहायता देना तथा अधर्म द्रव्य का उपकार स्थिति में सहायता देना है । १८-सब द्रव्यों को जगह देना आकाश द्रव्य का उपकार है । १६-शरीर, वचन, मन और श्वासोच्छवास आदि बनना पुद्गलों का उपकार है। २०-सुख, दुःख, जीना और मरना यह उपकार भी पुद्गलों के ही हैं । २१-जीवों का परस्पर उपकार २२-वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व काल द्रव्य के उपकार हैं। पुद्गल द्रव्य का वर्णन-.. २३-स्पर्श, रस, गन्ध और वर्ण वाले पुद्गल होते हैं । २४-शब्द, बंध, सूक्ष्मता, स्थूलता, संस्थान, भेद, तम, छाया, आतप (धूप) और उद्योत सहित भी पुद्गल होते हैं । [सारांश यह है कि यह भी पुद्गल की ही पर्यायें होती हैं । ] २५-पुद्गलों के दो भेद होते हैं- अणु और स्कन्ध । २६-पुदगलों के स्कन्ध भेद ( टूटने ) और संघात ( जुड़ने ) से उत्पन्न होने हैं। . है -- २६२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : २७-किन्तु अणु भेद से ही होता है, संघात से नहीं होता । २८ नेत्र इन्द्रिय से दिखाई देने वाला स्कन्ध भेद और संघान दोनों से ही होता है। - द्रव्य का लक्षा- २९-द्रव्य का लक्षण सत् है । ३०-उत्पाद ( उत्पत्ति ), व्यय ( विनाश ), और ध्रौव्य ( स्थिर मौजूदगो ) सहित को सत् कहते हैं ३१ -जो तद्भाव रूप से अव्यय अर्थात् तोनों काल में विनाश रहित रहित हो उसे नित्य कहते हैं। ३२--मुख्य करने वाली अर्पित और गौण करने वाली अनर्पित से वस्तु की सिद्ध होती है। स्कन्धों के बन्ध का वर्णन-- ३३-परमाणुओं के स्कन्धों का बन्ध स्निग्धता अथवा विकनाई और माता अर्थात् रूखेपन से होता है। ३४- जपन्यगुण* सहित परमाणु में बंध नहीं होता । ३५-गुण की समानता होने पर सहगों का वन्ध नहीं होता । ३६-किंतु दो अधिक गुण वालों का ही वन्ध होता है । ३७-और वन्ध अवस्था में अधिक गुण सहित पुद्गल अल्प गुण सहित को परिणमाते हैं । अर्थात् अल्पगुण के धारक स्कन्ध अधिक गुण के स्कन्ध रूप हो जाते हैं। द्रव्य का दूसरा लक्षण ३८-गुण और पर्याय वाला द्रव्य होता है । *जिस परमाणु में स्निग्धता अथवा रूक्षता का एक अविभागी प्रतिच्छेद रह जावे वह जघन्य गुण वाला है।

परिशिष्ट नं. २ [ २६३ काल द्रव्य- ३६--काल भी द्रव्य है । ४०. वह काल द्रव्य अनन्त समय पाला है । गुण का लक्षण- ४१–जो द्रव्य के नित्य आश्रित हो अर्थात् विना द्रव्य के आश्रय के न रह सकें तथा स्वयं अन्य गुणों से रहित हों वह गुण हैं । पर्याय का लक्षण- ४२-द्रव्यों के जिस रूप में वह हैं उसी रूप में होने को परिणाम या पर्याय कहते हैं। 04 षष्ठ अध्याय आस्त्रव का वर्णन- १--काय, वचन और मन की क्रिया को योग कहते हैं। २--वह योग ही कर्मों के आगमन का द्वार रूप आत्रव हैं। ----शुभ परिणामों से उत्पन्न हुआ योग पुण्य प्रकृतियों के आलव का कारण है तथा अशुभ परिणामों से उत्पन्न हुआ योग पापरूप कर्ममा- तियों के आस्रव का कारण है। ४--कपाय सहित जीवों के होने वाला सांपरायिक आलव तथा कपायरहित जीवों के होने वाला ईर्यापथ आस्रव होता है । साम्परायिक आत्रव के भेद- ५-प्रथम साम्परायिक आसव के निम्नलिखित भेद हैं- पांच इन्द्रिय, चार कपाय, पांच अवत, और पचीस क्रिया । ६-उस पासूव में भी तीव्रभाव, मन्दभाव, ज्ञातभाव, अक्षानभाव, भधिकरण और वीर्य की विशेषता से न्यूनाधिकता होती है ।

२६४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : मानव के अधिकरा- ७–पासूव का अधिकरण (आधार) जीव और अजीव दोनों हैं। जीवाधिकरण के १०८ भेद- ८-आदि के जीवाधिकरण के निम्न भेद हैं:-- संरम्भ, समारम्भ और प्रारम्भ । फिर उनको मन, वचन और काय योग से करना (कृत), कराना (कारित) अथवा करते हुए को भला मानना (अनुमोदना)। फिर उसमें क्रोध, मान, माया अथवा लोभ करना । इस प्रकार तीन, तीन, तीन और चार को परस्पर गुणा देने से एक सौ आठ भेद होते हैं। भजीवाधिकरणk-निवर्तनाधिकरण, निक्षेपाधिकरण, संयोगाधिकरण और निसर्गाधिकरण यह चार अजीवाधिकरण के भेद हैं । भाठों कर्मों के स्त्रव के कारण- १०-ज्ञान तथा दर्शन के विषय में प्रदोष, निन्हव, मात्सर्य, अंतराय, आसा- दन और उपघात करने से ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय कमों का श्रासूव होता है। ११--स्वयं दुःख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध, और परिदेवन करने, दूसरे को कराने अथवा दोनों को एक साथ उत्पन्न करने से असाता वेदनोय कर्म का आसूव होता है। १२-प्राणियों और व्रतियों में दया, दान, सरागसंयम आदि योग, क्षमा और शौच आदि भावों से साता वेदनीय कर्म का आसव होता है । १३-केवलज्ञानी, शास्त्र, मुनियों के संघ, अहिंसामय धर्म, और देवों का अवर्णवाद करने से दर्शनमोहनीय कर्म का आसव होता है । १४–कपायों के उदय से तीन परिणाम होने से चारित्र मोहनीय कर्म का आसव होता है। . - .

परिशिष्ट नं०२ [ २६५ १५--बहुत प्रारम्भ करने और बहुत परिग्रह रखने से नरक श्रायु कर्म का आसव होता है। १६--कुटिल स्वभाव रखने से तिर्यंच आयु कर्म का आसूव होता है १७--थोड़ा आरम्भ करने और थोड़ा परिग्रह रखने से मनुष्य आयु का आसूच होता है। १८--स्वाभाविक कोमलता से भी मनुष्य आयु का पासूव होता है । १९-सातों शील तथा अहिंसा आदि पांचों व्रतों का पालन न करने से चारों गतियों का आस्व होता है। २०-सरागसंयम, संयमासंयम ( देशव्रत ) अकाम निर्जरा और बालतप से देव आयु कर्म का पासूव होता है । २१-सम्यग्दर्शन भी देव आयु का कारण है । २२-- मन, वचन और काय के योगों की कुटिलता और अन्यथा प्रवृत्ति से अशुभ नाम कर्म का पासव होता है २३-इसके विपरीत मन, वचन और काय को सरलता और विसंवाद न करने से शुभ नाम कर्म का आसव होता हैं । २४---१ दर्शन विशुद्धि, २ विनयसम्पन्नता ३ शीलों और व्रतों का अतिचार रहित पालन करना, ४ निरन्तर ज्ञान के अभ्यास में रहना, ५ संसार के दुखों से भयभीत होना ६ शक्ति अनुसार दान करना, ७ शक्ति अनुसार तप करना ८ मुनियों की सेवा करना, ६ रोगी मुनियों की परिचर्या करना, १०अद्भक्ति ११ आचार्य भक्ति, १२ बहुश्रुत भक्ति, १३ प्रवचन भक्ति, १४ सामायिक स्तवन, वंदना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायोत्सर्ग इन छह आवश्यकीय कियाओं में कमी न करना, १५ जैनधर्म का प्रचार करने रूप मार्ग- प्रभावना और १६ सहधर्मी जन से अत्यन्त प्रेम मानना-यह सोलह भावनाएं तीर्थंकर प्रकृति के आसूव का कारण हैं । २५–पर की निन्दा करने, अपनी प्रशंसा करने, पर के विद्यमान गुणों को २६६ ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : छिपाने और अपने अविद्यमान गुणों को प्रगट करने से नीच गोत्र कर्म का पासव होता है। २६---इसके विपरीत अपनी निंदा करने, पर की प्रशंसा करने, अपने विद्यमान गुणों को छिपाने पर के गुणों को प्रकाशित करने और अपने से गुणाधिक के सामने विनय रूप से रहने तथा गुणों में बड़ा होते हुए भी मद न करने ( अनुत्सेक ) से उच्चगोत्र कर्म का आसव होता है। २७-दूसरे के दान, भोग आदि में विघ्न करने से अन्तराय कर्म का शास्रब होता है। सप्तम अध्याय पांच व्रत- १-हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह से ज्ञान पूर्वक विरक्त होना व्रत है। २–उक्त पांचों पापों का एक देश त्याग करना अणुव्रत कहलाता है । और पूर्ण त्याग करना महाव्रत है । ३-उन व्रतों को स्थिर करने के लिये प्रत्येक व्रत की पांच २ भावनाएं हैं । ४--वचनगुप्ति, मनो गुप्ति, ईर्यासमिति, श्रादाननिक्षेपण समिति और आलो- कितपान भोजन यह पांच अहिंसावत की भावनाएं हैं। ५- कोष का त्याग, लोभ का त्याग, भय का त्याग, हास्य का त्याग और शास्त्र के अनुसार निर्दोष वचन बोलना यह पांच सत्यव्रत की भाव- नाएं हैं। ६-खाली घर में रहना, किपी के छोड़े हुए स्थान में रहना, अन्य को रोकना नहीं, शास्त्रविहित आहार की विधि को शुद्ध रखना और सहधर्मी भाइयों से विसंवाद नहीं करना यह पांच अचौर्यव्रत की भावनाएं हैं । ७-स्त्रियों में प्रीति उत्पन्न करने वाली कथाओं का त्याग, स्त्रियों के मनो- - , परिशिष्ट नं०२ [ २६७ हर अंगों को देखने का त्याग, पूर्वकाल में भोगे हुए भोगों को स्मरण करने का त्याग, पौष्टिक तथा प्रिय रसों का त्याग और अपने शरीर को श्रृंगार युक्त करने अथवा सजाने का त्याग यह पांच ब्रह्मचर्य व्रत की भावनाएं हैं। ८-पांचों इन्द्रियों के स्पर्श रस आदि इष्ट अथवा अनिष्ट रूप पांचों विषयों में राग द्वेष का त्याग करना परिग्रह त्याग व्रत की पांच भावनाएं हैं। ९----हिंसा आदि पांचों पापों में इस लोक में दण्ड मिलने तथा परलोक में पाप वन्ध होने का चिन्तवन करे। १०-अथवा यह चिन्तवन करे कि यह पांचों पाप दुःख रूप ही हैं । ११ –सर्व साधारण जीवों में मैत्री भावना, गुणाधिकों में प्रमोद भावना, दुःखियों में कारुण्य भावना और अविनयी अथवा मिथ्यादृष्टियों में माध्यस्थ भावना रखे । १२-अथवा संवेग और वैराग्यो के लिये जगत् और काय के स्वभाव का भी पारम्बार चिन्तवन करे । पांचों पापों के लक्षण- १३-प्रमाद के योग से द्रव्य अथवा भाव प्राणों का वियोग करना हिंसा है। १४-असत् वचन कहना अनृत अथवा असत्य है। १५-विना दी हुई वस्तु को ले लेना चोरी है । १६-मैथुन करना अब्रह्म अर्थात् कुशील है । १७-[ चेतन अचेतन रूप परिग्रह में ] ममत्वरूप परिणाम ही परिग्रह है। १८- जो शल्य रहित है वही व्रती है। * संसार के दु.ख से डरना, + ससार से विरक्त होना, पांच इन्द्रिय, मन बल, बचन बल कायबल, श्रायु और श्वासोच्छ्वास यह दश प्राण हैं, आत्मा के ज्ञान दर्शन आदि स्वभावों को भाव प्राणं कहते हैं।

२६८ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : , १९-[ व्रतो जीव दो प्रकार के होते हैं ], अगारी ( गृहस्थी ) और गृहत्यागी साधु । अणुव्रती श्रावक २०-अणुव्रतों का पालन करने वाले को अगारी कहते हैं । २१-दिग्विरति, देशविरति, अनर्थदंडविरति [ इन तीन गुण बूतों ] सामायिक, प्रोषधोपवास, उपभोगपरिभोग परिमाण और अतिथिसंविभाग बूत [ इन चार शिक्षावतों का ] भी अगारी पालन करे । २२-और मृत्यु के समय होने वाली सल्लेखना का पालन करे । व्रतों और शीनों के अतिचार २३-शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, अन्यदृष्टिप्रशंसा और अन्यदृष्टिसंस्तव यह पांच सम्यग्दर्शन के प्रतीचार हैं। २४-पांचों व्रत और सात शीलों के भी कम से पांच २ अतीचार हैं । २५-बंध, वध, छेद, अत्यन्त बोझ लादना, और अन्न पानी न देना यह पांच अहिंसाणुवत के अतीचार हैं । २६-झूठा उपदेश देना, किसी की गुप्त वात को प्रगट कर देना, झूठे स्टाम्प आदि लिखना, किसी को धरोहर को अपना लेना, और किसी की चेष्टा आदि से उसके मन की बात को जानकर प्रगट कर देना यह पांच सत्यागुक्त के प्रतीचार हैं। २७-चोरी करने का उपाय वताना, चोरी की वस्तु को लेना, राज्य (देश) के विरुद्ध चलना, नाप और तोल के वाट आदि को कमती वड़ती रखना, और असलो माल में खोटा माल मिला कर बेचना (प्रतिरूपक व्यवहार ) यह पांच अचौर्याणुवत के अतीचार हैं। २८-दूसरे का विवाह करना या कराना, परिगृहीतेत्वरिकागमन, अपरिगृहीतेत्व- रिकागमन, अनंगक्रीडा, और कामतीवाभिनिवेश* यह पांच ब्रह्मचर्याणुव्रत के अतीचार हैं। इनका लक्षण इसी प्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वय के पृ० १७० पर देखो , परिशिष्ट नं २ [ २६६ , " " २९-क्षेत्रवास्तु, हिरण्यसुवर्ण, धनधान्य, दासीदास और कुष्य इन पांचों के परिमाण को उल्लंघन करना परिग्रह परिमाणवत के पांच प्रतीचार हैं। ३०-ऊर्ध्वातिक्रम, अधोऽतिक्रम, तिर्यगतिक्रम, क्षेत्रवृध्दि और स्मृत्यंतराधान यह पांच दिग्बत के अतिचार हैं। ३१-श्रानयन, प्रेष्यप्रयोग, शब्दानुपात, रूपानुपात और पुद्गलक्षेप यह पांच देशत्रत के अतिचार हैं। ३२- कन्दर्प, कौत्कुच्य, मौखर्य, असमोक्ष्याधिकरण, और उपभोगपरिभोगानर्थक्य यह पांच अनर्थदंडवत के अतिचार हैं। ३३-तीन प्रकार के योग दुःप्रणिधान, अनादर और स्मृत्यनुपस्थान यह पांच सामायिकवत के अतिचार हैं। ३४-अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जितोत्सर्ग, अप्रत्यवेक्षित अममार्जितादान, अपत्यवेक्षित अप्रमार्जित संस्तरोपक्रमण, अनादर और स्मृत्यनुपस्थान यह पांच प्रोषधोप वास व्रत के अतिचार हैं। ३५---सचित्त, सचित्त सम्बन्ध, सचित्तसम्मिश्र, अभिषव और दुःपक ऐसे पांच प्रकार के पदार्थों का आहार करना उपभोग परिभोग परिमाणवत के पांच अतिचार हैं। ३६-सचित्तनिक्षेप, सचित्तपिधान, परव्यपदेश, मात्सर्य और कालातिक्रम यह पांच अतिथि संविभाग व्रत के अतिचार हैं। ३७-जीविताशंसा, मरणाशंसा, मित्रानुराग, सुखानुबंध और निदान यह पांच सल्लेखनामरण के अतिचार है। दान का वर्णनां ३८- [अपने और पराये] उपकार के लिये अपने [पदार्थ ] का त्याग करना दान है। सिमणोवासए णं भंते! तहारूवं समणं वा जाव पडिला- भेमाणे किं चयति? गोयमा ! जीवियं चयति दुच्चयं चयति , २७० ] तत्त्वार्थसूत्रजनाऽऽगमसमन्वय : ३९–विधिविशेष, द्रव्यविशेष, दातारविशेष और पात्रविशेष के कारण उस दान में भी विशेषता होती है। अष्टम अध्याय बंध के कारण- १-मिध्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कपाय और योग यह पांच बन्ध के कारण हैं। बंध का स्वरूप- २-जीव कपाय सहित होने से कमों के योग्य पुद्गलों को ग्रहण करता है वह बंध है। बंध के भेद- २–प्रकृति वन्ध, स्थिति बन्ध, अनुभाग बन्ध और प्रदेश बन्ध यह चार उस न्ध की विधियां (भेद) हैं। प्रकृति बंध-आठों कर्मों की प्रकृतियां- ४-श्रादि का प्रकृति बन्ध, ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय इस तरह आठ प्रकार का है । [इनमें से शानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय यह चार घाति कर्म हैं और शेष चार अघाति कर्म हैं । ५-उन कमों के क्रम से प च, नौ, दो अट्ठाईस, चार, वयालीस, दो और पांच मेद हैं। दुक्करं करेति दुल्लह लहइ बोहिं बुज्झइ तओ पच्छा सिझति जाव अंतं करोति। व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक ७ उ०१ सूत्र २६४ इस सूत्र के आगमपाठों में इस पाठ को भी मिला लेना चाहिये। . " - .

परिशिष्ट न०२ [ २७१ -- ६-मति ज्ञानावरण, श्रुत ज्ञानावरण, अवधि ज्ञानावरण, मनःपर्यय ज्ञानावरण, और केवल ज्ञानावरण यह पांच भेद ज्ञानावरण कर्म के हैं। ७-चक्षुर्दर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण अवधि दर्शनावरण, केवल दर्शनावरण, निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलाप्रचला, और स्त्यानद्धि यह नौ प्रकृति दर्शनावरण कर्म की हैं। ८--सातावेदनीय और असातावेदनीय यह दो प्रकृति वेदनीय कर्म की है। ----मोहनीय कर्म के दो भेद हैं, दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय इनमें से दर्शन मोहनीय के तीन भेद होते हैं- सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व । चारित्रमोहनीय के दो भेद होते हैं- कपाय वेदनीय और नोकपाय वेदनीय । अकपाय वेदनीय अर्थात् नोकपाय वेदनोय के नौ भेद हैं- हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुपयेद, और नपुंसकवेद । कपाय वेदनीय के सोलह भेद होते हैं। अनन्तानुबन्धी क्रोध मान माया लोभ, अप्रत्याख्यान क्रोध मान माया लोभ, प्रत्याख्यान क्रोध, मान माया लोभ और संज्वलन क्रोध मान माया और लोभ, [यह मोहनीय कर्म की अहाईस प्रकृतियां हैं । १०-नारकायु, तैर्यगायु, मानुपायु और देवायु यह चार आयु कर्म की प्रकृतियां हैं। ११---गति, जाति, शरीर, अंगोपांग, निर्माण, बन्धन, संगत, संस्थान, संहनन, स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, आनुपूवीं, अगुरुलघु, उप ', परघात, पातप, उद्योत, उच्छ्वास, विहायोगति, प्रत्येक शरीर, साधारण शरीर, त्रस, स्थावर, सुभग, दुर्भग, सुस्वर, दुःस्वर, शुभ, अशुभ, सूक्ष्म, बादर, पर्याप्ति, अपर्याप्ति, स्थिर, अस्थिर, आदेय, अनादेय, यशकीर्ति, अयश कीर्ति और का - .

२७२ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : Asion- तीर्थकरत्व यह बयालीस नाम कर्म को सूल प्रकृतियां हैं। १२--उच्च गोत्र और नीच गोत्र यह दो गोत्र कर्म की प्रतियां हैं। १३-दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य का विघ्न करना रूप पांच प्रकृतियां अन्तराय कर्म की हैं। स्थिति बन्ध- १४---ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अंतरायकर्म की उतकृष्ट स्थिति तोस कोडाकोड़ी सागर की है १५-लोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर को है। १६-लाम और गोत्र कर्म की उतकृष्ट स्थिति बीस कोडाकोड़ी सागर की है १७-श्रायु कर्म की उतकृष्ट स्थिति तेंतीस सागर को है। १८–वेदनीय कर्म की जघन्य स्थिति बारह मुहुर्त की है। Ke--नाम और गोत्र कर्म की जघन्य स्थिति आठ मुहुर्त की है। ३०-शेष ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय, और आयु कर्मों को जघन्य स्थिति अन्तर्मुहुर्त है। अनुभाग वन्ध- २१-कर्मो का जी विपाक में है सो अनुभव अथवा अनुभाग है। २२-वह अनुभाग बंध कर्म की प्रकृतियों के नामानुसार होता है। २३--अनुभव के पश्चात् उन कमों की निर्जरा हो जाती है। प्रदेश बन्ध--- २४-शानावरण आदि कर्मों की प्रकृतियों के नामानुसार कारणभूत समस्त भावों अथवा सब समयों में मन वचन काय की क्रिया रूप योगों को नाम कर्म की उत्तर प्रकृतियां ९३ हैं, जिनका वर्णन इस ग्रन्थ में पृष्ठ १८७ से १६१ तक किया गया है। बद्ध कर्मों में फलदान शक्ति पड़कर उनके उदय मे माने पर अनुभव होने को विपाक कहते हैं।

परिशिष्ट नं २ [ ૨૭૨ विशेषता से भात्मा के समस्त प्रदेशों में एक क्षेत्रावगाह रूप से स्थित जो सूक्ष्म अनंतानंत कर्मपुद्गलों के प्रदेश हैं उनको प्रदेश बंध कहते हैं। पुण्य तथा पाप प्रकृतियां- २५.-सातावेदनीय, शुभ आयु, शुम नाम और शुभ गोत्र यह पुण्य रूप प्रकृतियां हैं। २६-इन प्रकृतियों से वाकी बची हुई कर्मप्रकृतियां पाप रूप अशुभ हैं । -- नवम अध्याय संवर का लक्षण-- १-आस्रव के रोकने को संवर कहते हैं। संवर के कारण- २-वह संवर तीन गुप्तियों पांच समितियों, दश धर्म के पालन करने, बारह अनुप्रेताओं के चितवन, बाईस परीपहों के जीतने और पांच प्रकार के चारित्र के पालने से होता है। निर्जरा के कारण- ३-बारह प्रकार के तप करने से निर्जरा और संपर दोनों होते हैं। सीन गुप्तियां-- भले प्रकार मन, वचन, और काय की यथेष्ठ प्रवृत्ति को रोकना सो गुप्ति हैं। पांच समितियां-- ५--ईया, भाषा, एषणा, आदान निक्षेप और उत्सर्ग यह पांच समितियां हैं। - दश धर्म- ६-उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम प्राजर्व, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, २७४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : ' उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग (दान), उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य यह दश प्रकार के धर्म हैं। बारह भावनाएं ७-अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ और धर्मस्वाख्यातत्व इनका बारवार चिन्तवन करना सो अनुप्रेक्षा हैं। बाईस परीषय जय- ८-रत्नत्रय रूप मार्ग से च्युत न होने और कमों को निर्जरा के लिये परीसह सहनी चाहिये। ९-१ क्षुधा, २ तृपा, ३ शोत, ४ उष्ण, ५ देशमशक, ६ नाग्न्य, ७ अरति, ८ स्त्रो, ९ चर्या, १० निपघा, ११ शय्या, १२ आक्रोश, १३ वध, १४ याचना, १५ अलाभ, १६ रोग, १७ तृणस्पर्श, १८ मल, १६ स- कारपुरुस्कार, २० प्रज्ञा, २१ अज्ञान और अदर्शन यह वाईस परीपह हैं। १०-सूक्ष्म सांपराय नामक दशवें गुणस्थान वालों के तथा छद्मस्थवीतराग अर्थात् उपशांत कषाय नामक ग्यारहवें और क्षीणकपाय नामक वारहवें गुणस्थान वालों के चौदह परीषह होती हैं । ११-तेरहवें गुणस्थानवर्ती जिन अर्थात् केवलो भगवान के ग्यारह परीपह होती हैं। १२-स्थूल कषाय वाले अर्थात् छटे, सातवें, आठवें और नौवें गुणस्थान वालों के सब परीपर होती हैं। १३- प्रज्ञा और अज्ञान परीपह ज्ञानावरण कर्म के उदय होने पर होती हैं । १४-प्रदर्शन परीपह दर्शनमोह के उदय से और अलाभ परीपह अन्तराय कर्म के उदय से होती है । १५-नाग्न्य, भरति, स्त्रो, निपद्या, आक्रोश, याचना और सत्कारपुरुस्कार यह सात परीपद चारित्रमोहनीय कर्म के उदय से होतो हैं । १६--शेप [क्षुधा, तृपा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शव्या, बध, रोग, - परिशिष्ट न०२ [ ૨૭u . तणस्पर्श और मल यह ग्यारह परोपह] वेदनीय कर्म के उदय से होती हैं। १७--एक हो जीव में एक को आदि लेकर एक साथ उन्नीस परोपह तक विभाग करनी चाहिये । पांच प्रकार का चारित्र- १८-सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसारपराय और यथाख्याता यह पांच प्रकार का चारित्र है । बारह प्रकार के तपों का वर्णन- १६-अनशन, अवमौर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्त शय्यासन और कायक्लेश यह छह प्रकार के वाह्य तप हैं । २०--प्रायश्चित, विनय, वैयाहत्त्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान यह छह अभ्यन्तर तप हैं। २१--प्रायश्चित के नो, विनय के चार, वैयाश्य के दश, रवाध्याय के पांच और व्युत्सर्ग के दो भेद हैं। २२-आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तपः, छेद, परिहार और उपस्थापना यह प्रायश्चित के नौ भेद हैं। २३--ज्ञानविनय, दशनविनय, चारित्रविनय और उपचार विनय यह चार विनय के भेद हैं। २४-श्राचार्य, उपाध्याय, तपरखो, शैक्ष, ग्लान, गण, कुल, संघ, साधु और मनोज्ञ इन दश प्रकार के साधुओं की सेवा टहल करना सो दश प्रकार का वैयाच्य है। २५-वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश यह स्वाध्याय के पांच भेद हैं। २६- बाह्य उपधि और अभ्यन्तर आदि का त्याग करना सो दो प्रकार का व्युत्सर्ग तप है। " २७६ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय : T ध्यान का वर्णन--- २७–उत्तम संहनन वाले का अन्तर्मुहुर्त पर्यन्त एकाग्रचिन्तानिरोध करना ध्यान है। २८- अार्तध्यान, रौद्रध्यान, धम्यध्यान, और शुक्लध्यान यह चार प्रकार के ध्यान हैं। २९-धर्म्यध्यान और शुक्लध्यान मोक्ष के कारण हैं । चार प्रकार के आर्तध्यान- ३०-अप्रिय पदार्थ का संयोग होने पर उसके दूर करने के लिये बारंबार चिन्तवन करना सो [ अनिष्टसंयोगज नाम का प्रथम ] आर्तध्यान है। ३१-प्रिय पदार्थ का वियोग होने पर उसको प्राप्ति के लिये वारंवार चिन्तवन करना [ सो इष्टवियोगज नामका द्वितीय आध्यान है । ३२--वेदना का बारंबार चिन्तवन करना [ सो वेदना जनित तीसरा मार्च ध्यान है।] ३३-और आगामी विषय भोगादिक का निदान करना सो निदान नामका चौथा आत्तध्यान है। ३४- वह आर्तध्यान मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, अविरत, देविरत और छटें प्रमत्तसंयत गुणस्थान वालों के होता है । चार प्रकार के रौद्रध्यान- ३५- हिंसा, अनृत, चोरी, और विषयों की रक्षा से रौद्रध्यान चार प्रकार का होता है । यह प्रथम पांच गुणस्थान वालों के होता है। धर्म्यध्यान के चार भेद- ३६- श्राज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकषिचय और संस्थान विचय यह चार प्रकार का धम्यध्यान है। चार प्रकार के शुक्ल ध्यान का वर्णन- ३७-प्रादि के दो शुक्ल ध्यान श्रुतकेवली के होते हैं, श्रुत केवली के धर्म्य- . -- - परिशिष्ट नं०२ [ २७७ ध्यान भी होते हैं। ३८–बाद के दो शुक्ल ध्यान सयोगकेवली और अयोगकेवली के ही होते हैं। ३९ -पृथक्त्ववितर्क एक त्ववितक, सूक्ष्मक्रियापतिपाति और व्युपरतक्रियानिवर्ति यह चार शुक्लध्यान के भेद हैं। ४०-पृथक्त्ववितर्फ तीनों योगों के धारक के, एकत्ववितर्फ तीनों में से किसी एक योग वाले के, तीसरा सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति काययोग वालों के और व्युपरत क्रियानिवरि अयोगी केवली के ही होता है। ४१-पहिले के दो ध्यान श्रुतकेवली के आश्रय होते हैं और वितर्क तथा विचार सहित होते हैं। ४२-दूसरा शुक्लध्यान विचार रहित है। ४३-श्रुतज्ञान को वितर्क कहते हैं। ४४–अर्थ, व्यञ्जन और योगों के पलटने को विचार कहते हैं । निर्जरा का परिमाण- ४५-सम्यग्दृष्टि, श्रावक, मुनी, अनंतानुवंधी का विसंयोजन करने वाला, दर्शनमोह को नष्ट करने वाला, चारित्रमोह को उपशम करने वाला, उपशांत मोह वाला, सपश्रेणी चढ़ता हुआ, क्षीणमोही और जिनेन्द्र भगवान इन सब के क्रममे असंख्यात गुणी निर्जरा होती है। मुनियों के भेद- ४६-पुलाक, बकुश, कुशील, निग्रंथ और स्नातक यह पांच प्रकार के निग्रंथ साधु है। १७–संयम, श्रुतं, प्रतिसेवना, तीथे, लिंग, लेश्या, उपपाद और स्थान इन पाठ प्रकार से उन मुनियों के और भी भेद होते हैं।

२७८ ] तत्त्वार्थसूत्रजेनाऽऽगमसमन्वय : , दशम अध्याय. केवल ज्ञान का उत्पत्ति क्रम- १–मोहनीय कर्म के क्षय होने के पश्चात् [अन्तर्मुहुर्त पर्यन्त क्षोणकपाय नाम का बारहवां गुणा स्थान पाकर फिर एक साथ ज्ञानावरण, दर्शना- वरण और अन्तराय कर्मों का क्षय होने से केवल ज्ञान हाना है। मोक्ष प्राप्ति क्रम २--बंध के कारणों के अभाव और निर्जरा से समस्त कमों का अत्यन्त अभाव हो जाना सो मोक्ष है। ३--मुक्त जीव के औपशमिक आदि भावों और पारिणामिक भावों में से भव्यत्व भाव का भी प्रभाव हो जाता है । ४---केवल सत्यस्व, केवल ज्ञान, केवल दर्शन, और केवल सिद्धत्व इन चार भावों के सिवाय अन्य भावों का मुक्त जीव के अभाव है। ५-समस्त कमों के नष्ट हो जाने के पश्चात् मुक्त जीव लोक के अन्त भाग तक ऊपर को जाता है। ऊर्ध्वगमन का कारण- ६-७-कुम्हार के द्वारा घुमाये हुये चाक के समान पूर्व प्रयोग से, दूर हुई मिट्टी के लेप बालो तुम्बी के समान असंग होने से, एरंड के वीज के समान वध के नष्ट होने से और अग्नि शिखा के समान अपना निमी- स्वभाव होने से मुक्त जोव ऊपर को गमन करता है । अलोक में न जाने कारण - ८. अलोकाकाश में धर्मास्तिकाय का अभाव होने से गमन नहीं होता है सिद्धों के भेद- ९-क्षेत्र, काल, गति, लिंग, तीर्थ, चारित्र, प्रत्येक बुद्ध बोधित, ज्ञान, अव- गाइना, अन्तर, संख्या और अल्पबहुत्व इन बारह अनुयोगों से सिद्धों में भी भेद साधने चाहिये ।

परिशिष्ट नं०३ दिगम्बर और श्वेताम्बराम्नाय के सूत्र पाठों का भेद प्रदर्शक कोष्टक। प्रथमोध्याय श्वेताम्बरोम्नायी सूत्रपाठः X X X . . सुत्रा दिगम्बराम्नायी सूत्रपाठः सूत्राङ्क १५ अवग्रहहावायधारणा. १५ अवग्रहहापायधारणा- २१ द्विविधोऽवधि. २१ भवप्रत्ययोवधिदेवनारकाणाम् २२ भवप्रत्ययो नारकदेवानाम् २२. क्षयोपशमनिमित्त षड्विकल्पः शेषाणाम् २३ यथोक्तनिमित्तः.. २३ ऋजुविपुलमती मनःपर्यय. * पर्यायः २५ विशुद्धक्षेक्षस्वामिविषयेभ्योऽवधिमन, पर्याययोः २८ तदनन्तभागे मा.पर्ययस्य २8 पर्यायस्य ३३ नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दसम- भिरूढेवम्भूता नयाः ३४ सूत्रशब्दा नयाः ३५ आद्यशब्दौ द्वित्रिभेदौ पर्यययोः २६ . X X x द्वितीयोऽध्याय. ५ ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुरित्रि- दर्शनदानादिलब्धयः पञ्चभेदा. सम्यक्त्वचारित्रसयमासंयमाञ्च ७ जीवभव्याभव्यत्वानि च ७ भव्यत्वादीनि च के सूत्रो मे सर्व मनः पर्यय के बदले मनःपर्याय पाठ है । भाष्य २८२ 1 तत्त्वार्थसुत्रजैनागमसमन्वय . AA X সুগাজু दिगम्बराम्नायी सूत्रपाठ स्पुत्राङ्क श्वेताम्बराम्नायी मृत्रपाठ २६ द्वयो यो पूर्वा. पूर्वगा X X २२ शेणस्त्वपरगाः X X २३ चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृत्ता गङ्गासिन्ध्नादयो नमः २४ भरतः षड्विंशतिपञ्चयोजनशतविस्तारः षट् चैकौनविंशतिभागा योजनस्य २५ तद्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षाबिदेवान्ताः x २६ उत्तरा दक्षिणतुल्या २७ भरतैरावतयोवृद्धिहासौ पट्समयाभ्यामुत्स- पिण्यवसर्पिणीभ्याम् २८ ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिता २९ एकद्वित्रिपल्यापमस्थितयो हैसवतक हारिवषेकदैवकुरुबका X x X x Y X X ३० तथोत्तरा. y x Xx x ५ ॥ У xxx x x .. ३१ विदेहेषु सङ्खयेयकालाः ३२ भरतस्य विष्कम्मो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभाग. ३८ नृस्थिती परावरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहुर्ते १७ परापरे ३९ तिर्यग्योनिजानाञ्च १८ तिर्यग्योनीनाञ्च चतुर्थोऽध्यायः २ आदितस्त्रिषु पीतान्तलेश्याः ३ तृतीयः पीतलेश्यः ७ पीतान्तलेश्याः = शेषाः स्पर्शरूपशब्दमन. प्रवीचाराः ..प्रवीचाद्वयोराद्ध यो १२ ज्योतिष्काः सूर्याचन्द्रमसौ १३ सूर्याश्चन्द्रमसो . प्रकीर्ण- ग्रहनक्षत्राप्रकीर्णकतारकञ्च १९ सौधर्मशानसानत्कुमारमाहेन्द्रब्रह्म २० सौधर्मशानसानत्कुमारमाहेन्द्रब्रह्म- ब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्टशुक्रमहा- लोकलान्तकमहाशुक्रसहस्रारे शुक्रशतारसहस्रारेष्वानतप्राण- X X है तारकाव परिशिष्ट नं०३ [ २८३ श्वेताम्बराम्नायी सूत्रपाठः .. २ X X y X x x सूचाङ्क दिगम्बराम्नायी सूत्रपाठ सूनाङ्क तयोगरणाच्युतयोर्नवसु वैयकंपु विजयवैजयन्तजयन्तापराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च • सर्वार्थसिद्धच -२ पातपद्मशुक्जलेश्या द्वित्रिशेपेषु २३ लेश्या हि विशेषेषु २४ ब्रह्मलोकालया लोकान्तिका लोकान्तिका २५ सारस्वतादित्यवम्बरुणगर्दतोयतु २६ पिताव्याबाधारिष्टाश्च व्यावाधमरुतः (अरिष्टाश्च),४ २८ स्थितिरसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां २९ स्थिति मागरोपमत्रिपल्योपमार्द्धहोनमिता ३० भवनेसु दक्षिणार्धाधिपतीनां पल्योपम- मध्यर्धम् ३१ शेषाणां पादोने ३२ असुरेन्द्रयोः सागरोपसमधिकं च २६ सौधर्म शानया सागरोपमेऽधिके ३३ सौधमादिषु यथाक्रमम् ३४ सागरोपमे ३५ अधिके च ३० सानत्कुमारमाहेन्द्रयो सप्त ३६ सप्त सानत्कुमारे ३१ त्रिमप्तनवकादशत्रयादशपञ्चदशभि ३७ विशेषत्रिसप्तदशैकादशत्रयोदशपञ्च- दशभिरधिकानि च ३३ अपरा पल्योपमधिकम ३९ अपरा पल्योपममधिकं च ४० सागरोपमे ४१ अधिके च ३६ परा पल्योपमधिकम् परा पल्योपमम् ४० ज्योनिष्काणांच ४८ ज्योतिष्माणामधिकम ४६ ग्रहाणमेकम् ५० नक्षत्राणामर्द्धम् ५१ तारकाणां चतुर्भाग रविकानि तु २८४ ] तत्त्वार्थसूत्रजैनाऽऽगमसमन्वय सूनाक श्वेताम्बरोम्नायी सूत्रपाठः सूनाइ दिगम्बरान्नायी सूत्रपाठः ४१ तदष्टभागोऽपरा ५२ जघन्या त्वष्टभाग. ५. चतुर्भाग. शेषाणाम् x ४२ लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि X Y सवेषाम् X x X X पञ्चमोऽध्याय २ द्रव्याणि २ द्रव्यारिण जीवाश्च ३ जीवाश्च ८ अप्सङ्घयेया. प्रदेशा धर्माधमैकजीवानाम असङ्घया. प्रदेशा धर्माधर्मयोः ८ जीवस्य च १६ प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् १६ विसर्गाभ्यां २६ भेदसङ्घातेभ्य उत्पद्यन्ते २६ संघातभेदेभ्य उत्पद्यन्ते २६ सद्व्यलक्षणम् ३७ बन्धेऽधिको पारिणामिको च ३६ बन्धे समाधिको पारिणामिको ३९ कालश्च ३८ कालश्चेत्येके ४२ अनादिगदिमांश्च ४३ रूपिष्वादिमान् ४४ योगापयोगी जीवेषु षष्ठोऽध्याय ३ शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य ३ शुभः पुण्यस्य ४ अशुभपापस्य ५ इन्द्रियकपायाव्रतक्रियाः पञ्चचतुः ६ अव्रतकषायेन्द्रियक्रिया पञ्चपञ्चविंशतिसंख्या पूर्वस्य भेदा. ६ तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्य भाववीर्याधिकरण विशेपेभ्यस्तद्विशेषः विशेषे- १७ अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य १८ अल्पारम्भपरिग्रहत्वं स्वभावमार्दवं x x x X - च मानुषस्य - परिशिष्ट न०३ [ २८५ सूत्राङ्क श्वेताम्बराम्नायी सूत्रपाठ X X X X २१ विपरीतं शुभस्य A सूत्राक दिगम्बराम्नायी सूत्रपाठः १८ स्वभावमार्दवं च २१ सम्यक्त्वं च २३ तद्विपरीतं शुभस्य २४ दशनविशुद्धविनयसम्पन्नता शील- अतेवनतिचाराऽमीतगाज्ञानापयोग- संवेगो शक्तितस्त्यागतपसा साधु- समाधियानत्यकरणमहदाचार्य- बहुतप्रवचनभक्तिरावश्यका- परिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचन- वत्सलत्वमितितीर्थकरत्वस्य . .. ऽभीक्षण सङ्घसाधुसमाधिवय बृत्यकरण ... तीर्थकत्वस्य सप्तमोऽध्यायः x x X X ४ वाङ्मनागुप्तोर्यादाननिक्षेपणसमित्या- लोकितपानभोजनानि पञ्च ५ क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्य- नुवोचिभाषण च पञ्च शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधा- करणभैयशुद्धिसधाविसंवादाः x पञ्च X X ७ स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहराङ्गानिरी- क्षणपूर्वरतानुस्मरणवृष्येष्टरसस्वशरीर- सस्कारत्यागाः पञ्च ८ मनोज्ञामनाक्षेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्ज- X X नानि पञ्च । हिंसादिविहामुत्रापायावद्यदर्शनम ४ हिंसादिष्यहामुत्र चापायावद्यदर्शनम् १२ जगत्कायस्वभाषौ वासंवेगवैराग्यार्थम् ७ जगत्कायस्वभावौ च संवेगवैराग्यार्थम् २८६ । नत्त्वार्यसूत्रजैनागमसमन्वय : सूबाई दिास्वगन्नायी सूत्रपाठः सूत्राड श्वेताम्बराम्नायी सूत्रपाठः २८ परिविवाहबरणत्वरिकापरिगृहीता २३ परविवाहकरणेत्वरपरिगृहोता परिगृहोतागमनानङ्गक्रोडानामतीबा- भिनिवेशाः ३२. कन्दर्पकोत्कुच्यमौख-समीक्ष्याधि- २७ कन्दर्पकोकुच्य करणापभोगपरिभागानर्थक्यानि रणापभोगाधिकत्वानि ३४ अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादान- २६ संस्तागे संस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्युनुप- नुपस्थापनानि स्थानानि १७ जीवितसरणाशंसासिगानुराग- निदानकारणानि सुखानुवंवनिदानानि । अष्टमोऽध्यायः ... पुद्गलानादत्त २ सकवायत्वाज्जीव. कर्मणो योग्या- न्पुद्गलानादत्ते स बन्धः X ३ सवन्धः ४ श्राद्यो नानदर्शनावरणवेदनीयमोह- मोहनीयायुप्कनाम नीयायुर्नामगोत्रान्तरायाः ६ मतिश्रुतावाधिमन पर्ययक्वलानाम् ७ मत्यादीनाम् ७ चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रा- निद्रानिद्रामचलाप्रचलाप्रचला- म्त्यानगृद्धयश्च स्त्यानगृद्धिवेदनीयानिच दर्शनचारित्रमोहनीयाकपायाकपाय- १० मोहनीयकषायनोकषाय वेटनीयान्यास्त्रिद्विनवपोडशभेदाः द्विषोडशनव मन्यन्त्वमिथ्यात्वतदुभयान्याऽकपाय तदुभयानि कषायनोकषायावनन्तानु- कपायो हान्यरत्यरतिशोकमयजुगुप्सा वन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानावरणसव- म्त्रीपुनपुंसकवेदो अनन्तानुबन्ध्यप्रत्या लनविकल्पाश्चैकश. कांधमानमाया- ..

परिशिष्ट नं०३ २८७ ] श्वेताम्बरास्नायी सूत्रपाठ - सुत्रांक दिगम्बराम्नायी सुत्रपाठः सूत्रांक ख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनविकल्पाश्चै. लोभाः हास्यरत्यरतिशोकमयजुगुप्सास्त्री- कश क्रोधमानसायालाभाः पुन्नपुंसकवेदाः १३ दान लामभागापभागवीर्याणाम १४ दानादीनाम् १६ विंशति मगात्रयो. १७ नामगोत्रयोविशतिः १७ त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुषः १८ युप्कस्य १६ शेषाणामन्नर्मुहुर्ता मुहम २४ नामप्रत्यया. सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्म-२५ कक्षेत्रावगाहस्थिता सर्वात्मप्रदेशेष्वन क्षेत्रावगाहस्थिवा. न्तानन्तप्रदेशाः २५ सद्वद्यशुभायुनर्नामगोत्राणि पुण्यम् २६ सद्यसम्यकत्व हास्यरतिपुरुपवेदशुमायु २६ अतोऽन्यत्पापम् लवमोऽध्यायः X X . ६ उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसयम ६ उत्तमः क्षमा तपस्त्यागाकिञ्चन्यब्रह्मचर्याणि धर्म २७ एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिन्न कान्न- १७ पिंशने. विशति १८ सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहार १६ छेदोपस्थाप्य विशुद्धिसूक्ष्मसाम्पराययथाख्यात- यथाख्यातानि चारित्रम् मिति चारित्रम् २२ आलोचनप्रतिक्रमणतदुभयविवेक- व्युसनंतपश्छेदपरिहारोपस्थापनाः स्थापनानि २७ उत्तमसहननरय काग्रचिन्तानिराधो निगधा ध्यानम ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् X २८ श्रामुहात ३० श्राममनोजस्य साम्प्रयोगेत पार्तमगनोज्ञानां ૨૨ X ..

२८८ ] तत्त्वार्थसूत्र जैनाऽऽगमसमन्वय. fi.. सूत्रांक दिगम्बरास्नायी सूत्रपाठः सूत्रांक . श्वेताम्बराम्नायी सूत्रपाठः X x ३ द्विप्रयोगायस्मृतिसमन्वाहार. है. विपरातं मनोजस्य ३३ विपरीतमनाज्ञानाम् ३६ श्राज्ञापायविपाकसंस्थानविच्याय धर्म्यम् धर्ममप्रमत्तसंयतस्य ३८ उपशान्तीणकषाययोश्व २७ शुक्ले चाद्य पूर्वविदः ३६ शुक्ले चाद्य' ६० ज्येकयागकाययोगायोगानाम ४२ तब्येककाययोगायोगानाम ४१ एकाश्रय सवितर्कविचारे पूर्व ४३ सवितके पूर्व दशमोऽध्यायः बन्ध हेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्न २ बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां फीवप्रमोक्षो मोक्ष. ३ कृस्नकर्मक्षयो माक्ष. ३ औपशमिकादिभव्यत्वानां च ४ औपशमकादिभव्यत्वाभावाश्चान्या केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्य. अन्यत्र केवलसम्यक्वत्ज्ञानदर्शन सिद्धत्वेभ्यः ६ पूर्वप्रयोगादसंगत्वाद्वन्धच्छेदा- तथागतिपरिणामाञ्च परिणाञ्च तद्गतिः ७ श्राविद्धकुलालचक्रवद्व्यपगतलेपालावु- वदेरण्डवीजवदग्निशिखावश्च ८ धर्मास्तिकायाभावात् x x X x X X X X

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Tatvarthsutra Jainagam Samanvai Bhashatika Sahit

Author
Muni, Atmaramji Maharaj
Title
Tatvarthsutra Jainagam Samanvai Bhashatika Sahit
File name
Tatvarthsutra Jainagam Samanvai Bhashatika Sahit
Text
OCR done
Citation
1934
Published
2010/06
Publisher
Delhi, Lala Shadiram Gokulchand Johrey Chandni Chok
Language
Sanskrit
Pages
312
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
327624
Barcode
99999990003210.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
l36nkJZXoEd
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