Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Vyaktitva Ka Vikas
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व्यक्तित्व का विकास
काspaper
ល
ईश्वर की रचना में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है और उसमें
अपार शक्तियां भरी हुई हैं। परंतु कितने हैं
जिन्हें उन शक्तियों का ज्ञान है-वास्तव में वे
अपनी आधी शक्तियों से भी परिचितं
नहीं है । इन शक्तियों को जान और विकसित
कर वे संसार की सारी संपदा प्राप्त कर
सकते हैं, जो चाहें कार्य कर सकते हैं,
जो चाहें बन सकते हैं।
स्वेट मार्डेन की यह प्रसिद्ध पुस्तक आपको इन्हीं
शक्तियों का न केवल ज्ञान करायेगी
बल्कि उन्हें विकसित करने तथा उनकी
सहायता से मनचाही वस्तुएं प्राप्त करने के
उपाय भी बतायेगी। इस देश में आधे से अधिक
ऐसे लोग हैं जो गरीबी में रहते हुए
भी उसी में संतुष्ट हैं । वे इसी को अपना
भाग्य समझते हैं । परन्तु इच्छा करने पर
वे जो चाहें प्राप्त कर सकते हैं और
इस प्रकार न केवल अपना बल्कि
देश का भी कल्याण
कर सकते हैं।
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16
सत
का
विकास
स्वेट मार्डन
आनंद पेपरबैक्ट
स्वेट मार्डेन की रचना
'एवरीमन ए किंग' का अनुवाद
व्यक्तित्व का विकास
© विजन बुक्स प्रा. लिमिटेड
मानंद पेपरवैक्स
मदरसा रोड, कश्मीरी गट
दिल्ली-110006 से प्रकाशित
जुपिटर माफसेट प्रेस,
शाहदरा, दिल्ली, द्वारा मुद्रित
VYAKTITVA KA VIKAS (Everyman A King) by Sg
(Self Improvement)
क्रम
11
31
57
1. आशा अभिलाषा का चमत्कार
2. सफलता और प्रसन्नता के साधन
3. महत्त्वाकांक्षा के विपरीत चेष्टा तथा प्रयत्न
4. महान कार्यों में सफलता की आशा कीजिए
5. आत्म-सुझाव द्वारा आत्म-प्रोत्साहन
6. निराशावाद : एक अपराध
7. विचारों में परिवर्तन : काया पलट
85
97
103
109
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सन्तुलन, स्वास्थ्य तथा सफलता ही वास्तविकताएं हैं, असन्तुलन, रोग एवं असफलता इन्हीं के अभाव की स्थिति के नाम हैं। आशावाद के बल पर ही आप सन्तुलन, स्वास्थ्य तया सफलता को प्राप्त कर सकते हैं। आशावाद ही निर्माता है । आशावाद की स्थिति मानसिक सूर्योदय है। सूर्योदय जिस प्रकार वनस्पतियों के विकास के लिए आवश्यक है, उसी प्रकार आशावाद हर प्रकार के निर्माणात्मक कार्य की प्रगति के लिए आवश्यक है। आशावाद मानसिक सूर्योदय है, जिससे जीवन का निर्माण होता है और सौन्दर्य का विकास होता है। आशावाद से तमाम मानसिक योग्यताओं का विकास होता है, ठीक उसी तरह जैसे सूर्योदय से पेड़-पौधों का विकास होता है। निराशावाद नकारात्मक है, ऋणात्मक है। निराशावाद वह घोर नरक है जिससे मनुष्य की समस्त शक्तियां, सारी योग्यताएं पंगु हो जाती हैं और जीवन का विकास रुक जाता है जो हर बात में निराशा देखते हैं, उनका भविष्य अंधकार- मय है । जो हरसमय बुरे परिणाम का, असफलता का ही विचार फरते रहते हैं, जो जीवन के अंधकारमय पहलू पर ही दृष्टि गड़ाए रहते हैं, वे जीवन में अवांछित घटनाओं को रोकने में असमर्थ रहते है। -अपने विचारों को सीमित नहीं, असीम बनाओ, -अपनी इच्छाओं को क्षुद्र नहीं, विशाल बनाओ, -अपनी कामनाओं को तुच्छ नहीं, महान् बनाओ, -~-अपनी आकांक्षा को ऊंची बढ़ाओ और होनभावना को पास मत आने दो। उठो, जीवन को बदलकर रख दो। .
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! अरे मनुष्य ! अरे विश्व के सर्वश्रेष्ठ प्राणी! तू ईश्वरीय अंश है। संसार में तेरा जन्स कीड़ों की तरह रेंगने के लिए नहीं हुआ। तेरा जन्म गरीबी के नरक में सड़ने के लिए नहीं हुआ, बल्कि तेरा जन्म विशालतर, उच्चतर, महत्तर कार्यों के लिए हुआ है। अरे मनुष्य ! तू ईश्वर को सर्वश्रेष्ठ सन्तान है। तेरे लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं । संसार का कोई भी धन, कोई भी सौन्दर्य, कोई भी सुख तथा फोई भी यश तेरे लिए अप्राप्य नहीं। कोई भी वस्तु तेरे लिए अलभ्य नहीं । तुम राजकुमार हो, तुम्हारा सभी रत्न भण्डारों पर जन्मसिद्ध अधिकार है-पहचानो अपने अधिकार को। क्यों मोह निद्रा में पड़कर गरीब बने हुए हो ? यदि जीवन का उद्देश्य विशालतर बना लो, यदि जीवन का उद्देश्य उच्चतर बना लो, यदि जिन्दगी का मकसद इन्सान की खिदमत करना बना लो, तो इस चैलेंज से ही तुम्हारे जीवन का ढांचा बदल जाएगा। तुम्हारे अपने विचारों का घेरा ही तुम्हें गरीबी की सीमा से आगे नहीं बढ़ने देता। यह मोहनिद्रा है, तंगदिली है, मानसिक संकीर्णता है, स्वार्थ भावना है, जो तुम्हें अपने जीवन में परिवर्तन नहीं करने देती। हृदय को विशाल बनाफर ज्योंही ये बन्धन तोड़ेगी, त्योंही लक्ष्मी तुम्हारी चेरी हो जाएगी। उवासियां लेना छोड़िए, रेंगना छोड़िए, झोंकना और शिकायतें करना छोड़िए, गिड़गिड़ाना और माफियां मांगना छोड़िए । अपने गौरव को पहचानिए, दृढ़ता से, स्थिरता से सीधे खड़े हो जाइए, अपने अधिकार को पहचानिए, संसार से अपना हक मांगिए और उसे प्राप्त करके रहिए।
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आशा-अभिलाषा का चमत्कार आशा-अभिलाषा किसी वस्तु की आकृति को गीली मिट्टी में तयार करके सांचे में ढालती है, फर्म जीवन में उस वस्तु के आकार को संगमरमर जैसा साकार, ठोस और दृढ़ बनाकर प्रकट कर देता है। आप अपने शब्दों द्वारा जो प्रार्थना करते हैं, वह आपका विश्वास या मान्यता नहीं है, आपकी मान्यता तो आपकी महत्त्वा- कांक्षा ही है। संसार में कोई भी ऐसा हर्ष नहीं जिसके लिए आपकी आत्मा भूखी हो और वह आपको न मिल सके, कोई ऐसी आशा नहीं जिसे आपने वर्षों तक अपने मन में संजोया हो और वह पूरी न हुई हो परन्तु वांछित हर्ष तभी प्राप्त होगा और आशा की पूर्ति तभी होगी यदि आप पहले उसके योग्य बनें। परन्तु इच्छा करना योग्य बनने का पहला कदम है, क्योंकि इच्छा जितनी तीव्र होती जाएगी उतना ही आप अपने मनोवांछित वरदान के निकट पहुंचते जाएंगे। आप मन में जिस वस्तु की इच्छा करते हैं, वह दूर पड़ी हुई आपकी प्रतीक्षा कर रही है, वह छिपी-ढकी पड़ी है-~-चुपचाप और अदृश्य । यदि वह आपकी आत्मा के लिए, आपके जीवन तथा मस्तिल के लिए आवश्यक है, तो अपने जीवन को उसके योग्य बनाइए--फिर आप ज्यों ही उसे पुकारेंगे, वह स्वयं ही आपके पास आ जाएगी। आत्मा को जिस आशा-आकांक्षा की शिक्षा दी जाएगी, आत्मा द्वारा उसी को कार्यरूप में परिणत किया जाएगा। हमारी हादिक लालसाएं, हमारी यात्मिक आकांक्षाएं केवल कल्पना की कोरी उड़ानें ही नहीं हैं, केवल दिवास्वप्न ही नहीं हैं। वे उन वस्तुओं की भविष्यवाणियां हैं, शुभ-सगुन हैं, संवाद- दूतियां हैं, जो वस्तुएं वास्तव में यथार्थ में परिणत होने वाली हैं- • जो हमें मिलने वाली हैं। हमारी लालसाएं तथा आकांक्षाएं हमारी सामथ्र्य के संकेत- चिह्न हैं । उनसे हमारे लक्ष्य की ऊंचाई नापी जाती है, हमारी कार्य-कुशलता की सीमा-रेखा बताई जाती है। हम जिस पदार्थ को पाना चाहते हैं; सच्चाई से उसकी इच्छा करते हैं, ईमानदारी से उसके लिए प्रयत्न करते हैं, वही एक दिन ठोस यथार्थ बन जाता है। हमारे सामने जो आदर्श हैं, वे वास्तव में आनेवाली वास्त- विकताओं की ही रूप रेखाएं हैं । जिन ठोस पदार्थों की हम कामना करते हैं, ये कामनाएं उन्हीं पदार्यों की रूपरेखा की झलक हैं । एक मूर्तिकार जानता है कि उसने अपने मन में मूर्ति का जो यादशं सोच रखा है, वह केवल उसकी मिथ्या कल्पना ही नहीं है, बल्लिा जो कुछ आगे बनने वाला है, उसी का भविष्य कथन है जो कुछ संगमरमर के ठोस रूप में परिवर्तित होने वाला है, मूर्ति- कार के मन में स्थित आदर्श उसी का पूर्व-प्रतिबिम्ब है। जब हम किसी वस्तु के लिए इच्छा करना आरम्भ करते हैं, जब हम उसके लिए हृदय में तीव्र आकांक्षा को जन्म देते हैं.--तव हम उस वस्तु के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ने लगते हैं और जितनी 3 तीव्रता, जितनी शक्ति तथा जितनी निरन्तरता में हम उम मनो- - कामना के लिए बुद्धिमत्तायुक्त तथा सतर्कतापूर्ण प्रयत्न करते हैं, उतने ही हम उसे प्राप्त करने के योग्य बनते जाते हैं। हमारे कष्टों का कारण यह है कि हम जितना अधिक पदार्थों के संसर्ग में रहते हैं, उतना अपने आदर्श के संसर्ग में नहीं रहते हालांकि हम अपने आदर्श को प्राप्त करने की कामना करते हैं। उदाहरणतः,यदि हम अपने यौवन को बनाये रखना चाहते हैं तो हमें सदा अपनी मनःस्थिति यौवन की भावना से परिपूर्ण रखनी चाहिए, सौन्दर्य की भावना से भरपूर रखनी चाहिए। हमें अधिक समय सौंदर्य एवं यौवन की मनःस्थिति में रहना चाहिए। उद्देश्य में जीने, मनःस्थिति को उद्देश्य से परिपूर्ण रखने का लाभ यह होता है कि सारी शारीरिक, मानसिक तथा चारित्रिक त्रुटियां दूर हो जाती हैं । यौवन को उद्देश्य बनाकर उसी के विचारों में मग्न होकर जीने का लाभ यह होता है कि बुढ़ापे की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता। हमारे आदर्श से उसका कोई मेल नहीं, क्योंकि वह अपूर्ण है और अपने आदर्श में हम उसे घुसने तक नहीं देते । जहां हमारा यौवन का आदर्श विद्यमान है, वहां वृद्धत्व का प्रवेश ही नहीं हो सकता। हमने जो अपनी कल्पना द्वारा सौन्दर्य का आदर्श मॉडल तैयार किया है वह यौवन से भरपूर है, सौन्दर्य से परिपूर्ण है। वहां क्षोणता, विकृति एवं कुरूपता का लेशमान भी नहीं है। अतः आदर्श को मन में संजोकर जीवन जीने की कला से आश्चर्यजनक लाभ होता है, क्योंकि उस दशा में निरन्तर हमारे मनश्चक्षुओं के सम्मुख हमारी आदर्श-भूति ही विराजमान रहती है, जो पूर्णता से समन्वित होती है तथा उसी को पाने के लिए हम प्रयत्नशील रहते हैं। इससे हमारी आशा बढ़ती है, तथा अपने आदर्श को पूर्ण रूप से प्राप्त करने में हमारा विश्वास बढ़ता है, अपनी पूर्णता तथा दिव्यता पर हमारा आत्मविश्वास परिवर्तित होता है, क्योंकि हम अपने मनश्चक्षुओ द्वारा यथार्थ की झलक पाते हैं, जिसे हम स्वभा- वतः ही कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं पाना चाहते हैं और समझते 12 - हैं कि वह यथार्थ, ठोस रूप में प्राप्त होकर रहेगा। हम पदार्थों को जिस रूप या शक्ल में प्राप्त करना चाहते हैं उस रूप में सोचने से, या उसी रूप में उनकी रचना हो ऐसा दृढ़ आग्रह रखने से, जिस रूप में वे बनने चाहिएं उसी रूप में वे वनें इस पर लगातार जोर देते रहने से और साथ ही अपनी पूर्णता का दृढ़तापूर्वक दावा करते रहने से, ऐसा दृढ़ संकल्प और विश्वास करने से कि जिस अच्छी वस्तु को हम कामना करते हैं, वह हमसे दूर रह ही नहीं सकती, क्योंकि हम सम्पूर्ण श्रेष्ठता से अपने आपको अभिन्न बना चुके हैं, ऐसी मनःस्थिति में हमें अपना आदर्श और भी निखरे हुए रूप में दिखाई देने लगता है और हमारी जीवन-प्रक्रिया उसका निर्माण करके ही रहती है आप जिस पुरुष या नारी के समान बनना चाहते हैं, उसका आदर्श निरन्तर अपने सम्मुख रखिए। अपनी कार्यकुशलता, विल. क्षणता तथा सम्पूर्णन' पर निरन्तर अपने ध्यान को एकाग्र रखिए और त्रुटियों का विचार, अपूर्णता का विचार, हीनता का विचार मन से बाहर निकाल दीजिए। अपनी त्रुटियों, दुर्वलताओं तथा असफलताओं का विचार लेशमात्र भी मन में न आने दीजिए। दृढ़ता-पूर्वक अपने आदर्श की सौन्दर्य-मूर्ति अपने नयनों के समक्ष रखिए तथा उसे प्राप्त करने के लिए निरन्तर उत्साह तथा उल्लास से प्रयत्न करते रहिए, तव आप अपने मनोवांछित आदर्श उद्देश्य को प्राप्त करने में अवश्य सफल होंगे। आशा में अपार शक्ति भरी हुई है । इस विश्वास में कि हम जो कुछ चाहते हैं उसे पाकर ही रहेंगे, बड़ी भारी सामर्थ्य छिपी हुई है। हमारे स्वप्न अवश्य ही सत्य होकर रहेंगे, इस विश्वास में ही हमारी सफलता की रूप-रेखा निहित है। मन को आशा से हरा-भरा रखने से बढ़कर ऊंचा उठाने वाली अन्य कोई आदत नहीं है, इस विश्वास से बढ़कर मन को - उत्साह से भर देने वाला अन्य विचार ही नहीं है, कि हम जिस पदार्थ को चाहते हैं ठीक उसी रूप में वह हमें शीघ्र ही अवश्य मिलने वाला है । हमारे लिए जो होगा अच्छा होगा, बुरा नहीं होगा-इस प्रकार के आत्मविश्वास में अद्भुत शक्ति पाई जाती है। अपने मन में दोहराते रहिए- -हम अवश्य सफल होंगे, असफल नहीं। -हम अवश्य विजयी होंगे, पराजित नहीं। -हम अवश्य प्रसन्न रहेंगे, दुखी और उदास नहीं। इस प्रकार के आशावाद के निरन्तर जगाए रखने से बढ़कर सहायक अन्य कोई उपाय नहीं है । मन आशा-आकांक्षा से भरपूर रहे, हर बात और हर घटना से लाभ की आशा रहे, उज्ज्वल पक्ष की ओर देखने की आदत रहे; प्रकाश की ओर देखने की प्रवृत्ति रहे तो फिर मनोवांछित फल प्राप्त करने में देर नहीं लगती। अपने हृदय में संपूर्ण श्रद्धा से यह विश्वास कीजिए कि आप उस फार्य को अवश्य ही करके रहेंगे जिसके लिए आपका जन्म हुआ है। एक पल के लिए भी अपने मन में अविश्वास की एक रेखा तक न घुसने दीजिए । यदि वह आपके मन में घुसने का प्रयत्न करे, तो उसे परे धकेल दीजिए । केवल मित्रविचारों अर्थात् आशा-उमंग, उत्साह-उल्लास और कर्मठता के विचारों को ही अपने मन में स्थान दीजिए। अपने मन में केवल अपने आदर्श की सर्वगुणसंपन्न मूर्ति का ही ध्यान कीजिए। केवल उस आदर्श की प्रतिमूर्ति का निर्माण करने का प्रयत्न कीजिए जिसका आपने दृढ़ निश्चय किया हुआ है। अपने आदर्श के समान ही अपने कार्य को भी निर्दोष और त्रुटि- हीन बनाने के लिए कठिन परिश्रम कीजिए । जिस फल की प्राप्ति फा आपने संकल्प किया हुआ है उसे सम्पूर्ण (अखण्ड तथा निर्दोष) रूप में ही प्राप्त करने का प्रयत्न कीजिए। अपने मन के शन्नु विचारों (निराशा, शिथिलता, उत्साहहीनता तथा खिन्नता आदि) को दूर कर दीजिए। रद्दी कागज की तरह इन्हें फेंक दीजिए। जो विचार आपका उत्साह भंग करें, जिससे आपका मन असफलता,अनुत्तीर्णता तथा पराजय की तरफ जाए- उस हीन भाव को निकाल फेंकिए। आप क्या पाने या क्या बनने का प्रयत्न कर रहे हैं इसकी परवाह नहीं; अर्थात् आपका लक्ष्य भले ही कितना ऊंचा हो तो भी आप अपने मन में गिरावट न आने दें, निराशा को न घुसने दें। सदा मन में आशा भरे रहिए; आशावादी बनिए, आशापूर्ण बातें कीजिए, बाशा पूरी होने के उल्लास से मन को निरन्तर प्रफुल्लित रखिए। यदि आप ऐसा कर पाएंगे तो आपको अत्यन्त आश्चर्य होगा कि आपकी योग्यताओं का अद्भुत विकास हो जाएगा, आप की कुशलता तथा कार्य-शक्ति में आश्चर्यजनक वृद्धि हो जाएगी। जब मन एक बार प्रसन्न रहने के स्वभाव वाला हो जाएगा हर्प से प्रफुल्लित रहने की मादत वाला बन जाएगा, धन-समृद्धि के चित्र देखने की प्रवृत्ति वाला हो जाएगा तब उसके लिए जलना, कुढ़ना, शिथिल रहना और गरीबी के विचारों से पस्त रहना कठिन हो जाएगा-उसका ध्यान ही शत्नु-विचारों, की ओर नहीं जाएगा। यदि कहीं हम अपने बच्चों को इस प्रकार की आदत डालें, तो मानव सभ्यता में अवश्य ही क्रान्ति आ सकती है। इससे हमारे जीवन-स्तर में अपरिमित प्रगति हो सकती है। आशावाद के प्रशिक्षण को प्राप्त करके मन स्वभाव से ही ऐसा हो जाता है कि वह अपनी अधिकतम शक्ति को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। तब वह असमंजस के स्थान पर सामंजस्य तथा समन्वय को प्राप्त कर लेता है, निर्दयता की जगह दयालुता से भर- पूर हो जाता है, अशान्ति की बजाय शान्ति को प्राप्त कर लेता है, अनाड़ीपन की जगह कुशलता को पा लेता है तथा असफलता का नहीं बल्कि सफलता और विजय का मुंह देखता है। भविष्य अच्छा है-ऐसा विश्वास करने की आदत बना लेने मान से आप अच्छे पदार्थों को, धन-संपत्ति को अपनी ओर आकर्षित करने लगते हैं। आप शीघ्र ही विपुल धन के स्वामी बनने जा रहे हैं, आप सुखी और प्रसन्नचित्त बनने वाले हैं, आपका सुन्दर परिवार होगा, सुन्दर घर होगा, और आप किन्हीं ऊंचे आदर्शों के लिए जी रहे हैं और उनकी रक्षा के लिए त्याग करने को तैयार हैं-ऐसा विश्वास ही जीवन क्षेत्र में उतरते समय कार्य-व्यापार की सर्वोत्तम पूंजी है । इस प्रकार का विश्वास जिसके पास है उसे किसी प्रकार के व्यापार-व्यवसाय के लिए कभी भी पूंजी की कमी नहीं रहेगी। हम जिस वस्तु को पाने के लिए बारवार, निरन्तर प्रयत्न करते हैं-वह चाहे पहले-पहल सर्वथा असंभव ही प्रतीत होती हो, हम उसे प्राप्त करने के योग्य बनते जाते हैं। और यदि हम अपने ऊंचे जीवनोद्देश्य को, अपने आदर्श को वारंवार वाणी से प्रकट करते रहें, बार-बार उसी के बारे में कहते रहें जिसे हम अपने जीवन में एक सच्चाई के रूप में परिणत हुआ देखता चाहते हैं- उसे हम अवश्य ही एक दिन प्राप्त करके रहेंगे, चाहे वह श्रेष्ठ स्वास्थ्य हो या उत्तम चरित्र, अच्छी नौकरी या उत्कृष्ट व्यवसाय । क्योंकि वाणी द्वारा बारंबार कहने से हमें उसके बारे में वारंवार सोचने का अवसर मिलता है और इस प्रकार उसका चित्र हमारे सामने स्पष्ट होता जाता है और फिर उसी की प्राप्ति के लिए हम अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा देते हैं तो इसमें आश्चर्य क्या कि हमारे सामने वह सम्पूर्ण रूप में चरितार्थ होकर रहेगा- यन्मनसा ध्यायति, तद्वाचा वदति, यद्वाचा वदति, तत् कर्मणा करोति, यत् कर्मणा करोति, तदभिसंपद्यते। वहुत -से व्यक्ति अपनी इच्छाओं को मन्द होने देते हैं, आशाओं को बुझने देते हैं, वे इस तथ्य को समझने का प्रयत्न नहीं करते कि यदि इच्छा को निरन्तर मन में दोहराया जाए, यदि उसे वती और पुष्ट बनाने की प्रक्रिया जारी रखी जाए, तो वह व्यक्ति की सामर्थ्य को, कार्य-शक्ति को बहुत बढ़ा देती है, जिससे उसे अपना उद्देश्य प्राप्त करने में सफलता मिलती है । सिद्धि के लिए दृढ़, बल- निरन्तर आशावाद पहली शर्त है। इच्छा को निरन्तर जीवित- जागृत रखने से ही व्यक्ति में ऐसी सामर्थ्य आती है कि वह अपने सपनों को साकार कर सके। चाहे आपकी अपनी आकांक्षा कितनी ही असंभाव्य हो तथा उसकी प्राप्ति कितनी ही दूर प्रतीत होती हो, आपको अपनी आशा- आकांक्षा का आकाश कितना ही अन्धकार से घिरा प्रतीत होता हो, यदि आप उसको अपनी सर्वोत्तम शक्ति से वारंवार स्पष्ट देखने का प्रयत्न करते रहते हैं, यदि आप उसे निरन्तर अपने मन में दोहराते रहते हैं, उसके प्रति अपनी निष्ठा और विश्वास को स्थिर बनाए रहते हैं तथा उसकी प्राप्ति के लिए निरन्तर उत्साहपूर्वक प्रयत्नशील रहते हैं, तो धीरे-धीरे वह उद्देश्य ठोस रूप धारण करने लगता है। वह आपकी कल्पना के अनुरूप 'मूर्तरूप' धारण करने लगता है, और अन्ततः वह जीवन में आपकी सफलता का अंग बनकर ही रहता है। परन्तु प्रयत्न से रहित आशा वेकार है। यदि आप अपनी इच्छा या कामना को निरन्तर अपने मन में ही बनाए रहते और उसकी ओर उपेक्षा की वृत्ति रखते हैं, तो उसकी सिद्धि कभी नहीं होती। इच्छा तभी सार्थक है जब उसे प्रयत्न के दृढ़ निश्चय द्वारा परि- पुष्ट किया जाए। ऐसी इच्छा ही प्रभावी होती है । उत्साह समन्वित दृढ़ निश्चय वाली इच्छा ही व्यक्ति की रचनात्मक शक्ति को उत्पन्न करती है। इच्छा हो, बलवती कामना हो, और वह उत्साहभरे कर्तत्व से संयुक्त हो, वही मनोवांछित परिणाम- चिर आकांक्षित सफलता का कारण बनती है । अपने विचारों के उत्कर्प से हम अपनी कार्यकुशलता को बढ़ाते हैं और विचारों की हीनता से अपनी कार्यकुशलता को कम करते रहते हैं । यह प्रक्रिया निरन्तर जारी रहती है। हर समय या तो आप उत्साहभरे विचारों से अपनी कार्यकुशलता तथा कार्यशक्ति को बढ़ा रहे होते हैं या फिर घटा रहे होते हैं । अपने चरित्र द्वारा, विचारों द्वारा, भावनाओं द्वारा आप या तो अपने आदर्श-उद्देश्य के समीप जा रहे होते हैं या उससे दूर जा रहे होते हैं । यदि आप हर समय अपने आदर्श-उद्देश्य को अपने मन में सबसे ऊंचे स्थल पर रखते हैं, यदि आप उसी पर अपना ध्यान एकाग्र किए रहते हैं और उसे एक पल के लिए भी दृष्टि से ओझल नहीं होने देते, और अपने को पूर्व प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ मानते हुए अपनी कार्य सामर्थ्य पर दृढ़ विश्वास धारण किए रहते हैं । अपने को सर्वशक्तिमान ईश्वर का अंश मानकर अपने को समर्थ विपुल शक्तिमान, रचनात्मक कार्यकुशलता समविन्त व्यक्ति मानते रहते हैं, तो कोई कारण नहीं कि आपको अपने कार्य में असफलता का मुंह देखना पड़े। अपने ही हीन विचारों को दवाने की प्रक्रिया को निरन्तर जारी रखते हुए यदि आप उत्साह और उल्लास मन में भरे, अपने लक्ष्य की ओर कदम-कदम बढ़ते ही चले जाते हैं, तो आपके लिए उद्देश्य-सिद्धि कठिन नहीं रह सकती। जो करना चाहते हैं, जो बनना चाहते हैं केवल उसी पर अपना सारा ध्यान टिकाकर रखिए, उसे टालने के लिए वहाना मत सोचिए। अपने को थका-हारा, परास्त और पराजित मत समझिए । सदा यह दोहराइए- चाहे जान चली जाए, मैं हार नहीं मानूंगा। अपने को अभागा और बदकिस्मत मत समझिए। दिमाग से यह विचार निकाल दीजिए कि आपकी पराजय भी हो सकती है या भाग्य आपके विरुद्ध है । मन से इस दुर्विचार को निकाल दीजिए कि माप गरीव हैं और सदा गरीब ही रहेंगे । इन काली तस्वीरों को मन के सामने मत लाइए। ये आपकी शान्ति, प्रसन्नता और सफलता के शत्रु हैं । शत्रुओं को धराशायी किए विना आप आगे नहीं बढ़ सकते । अपने मस्तिष्क की स्लेट से निराशा और पराजय की भावनाओं को सर्वथा मिटा डालिए। वहां लिखिए- निरन्तर आशावाद पहली शर्त है। इच्छा को निरन्तर जीवित- जागृत रखने से ही व्यक्ति में ऐसी सामर्थ्य आती है कि वह अपने सपनों को साकार कर सके। चाहे आपकी अपनी आकांक्षा कितनी ही असंभाव्य हो तथा उसकी प्राप्ति कितनी ही दूर प्रतीत होती हो, आपको अपनी आशा- आकांक्षा का आकाश कितना ही अन्धकार से घिरा प्रतीत होता हो, यदि आप उसको अपनी सर्वोत्तम शक्ति से वारंवार स्पष्ट देखने का प्रयत्न करते रहते हैं, यदि आप उसे निरन्तर अपने मन में दोहराते रहते हैं, उसके प्रति अपनी निष्ठा और विश्वास को स्थिर बनाए रहते हैं तथा उसकी प्राप्ति के लिए निरन्तर उत्साहपूर्वक प्रयत्नशील रहते हैं, तो धीरे-धीरे वह उद्देश्य ठोस रूप धारण करने लगता है। वह आपकी कल्पना के अनुरूप 'मूर्तरूप' धारण करने लगता है, और अन्ततः वह जीवन में आपकी सफलता का अंग बनकर ही रहता है । परन्तु प्रयत्न से रहित आशा वेकार है। यदि आप अपनी इच्छा या कामना को निरन्तर अपने मन में ही बनाए रहते और उसकी ओर उपेक्षा की वृत्ति रखते हैं, तो उसकी सिद्धि कभी नहीं होती। - इच्छा तभी सार्थक है जब उसे प्रयत्ल के दृढ़ निश्चय द्वारा परि- पुष्ट किया जाए। ऐसी इच्छा ही प्रभावी होती है । उत्साह समन्वित दृढ़ निश्चय वाली इच्छा ही व्यक्ति की रचनात्मक शक्ति को उत्पन्न करती है। | इच्छा हो, बलवती कामना हो, और वह • उत्साहभरे कर्त त्व से संयुक्त हो, वही मनोवांछित परिणाम- चिर आकांक्षित सफलता का कारण बनती है। अपने विचारों के उत्कर्ष से हम अपनी कार्यकुशलता को बढ़ाते हैं और विचारों की हीनता से अपनी कार्यकुशलता को कम करते रहते हैं । यह प्रक्रिया निरन्तर जारी रहती है। हर समय या तो आप उत्साहभरे विचारों से अपनी कार्यकुशलता तथा कार्यशक्ति : को बढ़ा रहे होते हैं या फिर घटा रहे होते हैं। अपने चरित्र द्वारा, विचारों द्वारा, भावनाओं द्वारा आप या तो अपने आदर्श-उद्देश्य के समीप जा रहे होते हैं या उससे दूर जा रहे होते हैं । यदि आप हर समय अपने आदर्श-उद्देश्य को अपने मन में सबसे ऊंचे स्थल पर रखते हैं, यदि आप उसी पर अपना ध्यान एकाग्र किए रहते हैं और उसे एक पल के लिए भी दृष्टि से ओझल नहीं होने देते, और अपने को पूर्व प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ मानते हुए अपनी कार्य सामर्थ्य पर दृढ़ विश्वास धारण किए रहते हैं । अपने को सर्वशक्तिमान ईश्वर का अंश मानकर अपने को समर्थ विपुल शक्तिमान, रचनात्मक कार्यकुशलता समविन्त व्यक्ति मानते रहते हैं, तो कोई कारण नहीं कि आपको अपने कार्य में असफलता का मुंह देखना पड़े। अपने ही हीन विचारों को दवाने की प्रक्रिया को निरन्तर जारी रखते हुए यदि आप उत्साह और उल्लास मन में भरे, अपने लक्ष्य की ओर कदम-कदम बढ़ते ही चले जाते हैं, तो आपके लिए उद्देश्य-सिद्धि कठिन नहीं रह सकती। जो करना चाहते हैं, जो बनना चाहते हैं--केवल उसी पर अपना सारा ध्यान टिकाकर रखिए, उसे टालने के लिए वहाना मत सोचिए। अपने को थका-हारा, परास्त और पराजित मत समझिए । सदा यह दोहराइए- चाहे जान चली जाए, मैं हार नहीं मानूंगा। अपने को अभागा और बदकिस्मत मत समझिए। दिमाग से यह विचार निकाल दीजिए कि आपकी पराजय भी हो सकती है या भाग्य आपके विरुद्ध है। मन से इस दुविचार को निकाल दीजिए कि आप गरीव हैं और सदा गरीव ही रहेंगे । इन काली तस्वीरों को मन के सामने मत लाइए। ये आपकी शान्ति, प्रसन्नता और सफलता के शत्रु हैं । शत्रुओं को धराशायी किए बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते । अपने मस्तिष्क की स्लेट से निराशा और पराजय की भावनाओं को सर्वथा मिटा डालिए। वहां लिखिए- - "मैं आशावादी हूं, मैं कर्मठ हूं, मैं विजयी हूं, मैं सफलता प्राप्त करके रहूंगा।" एक क्षण के लिए भी मन में बीमारी का विचार, दुर्बलता का विचार, अकर्मण्यता का विचार, पराजय का विचार, असफलता का विचार मत आने दीजिए। ये विचार आपके मन में तब तक नहीं घुस सकते जब तक कि आप शिशिल न हों। ढीले क्यों पड़ते हैं ? यदि आप इन हीन भावों को मन में जरा-सी जगह देंगे तो ये अपनी काया खूब फैला लेंगे और आशा को बाहर धकेल देंगे। ये हीन विचार फिर आपको अपने वश में करके बेबस बना देंगे। नित्य ही अपने मन में इस प्रकार के विचारों को लाइए कि आप सर्वश्रेष्ठ प्राणी हैं, आप श्रेष्ठ मनुष्य हैं, आप ईश्वर द्वारा संसार में दिव्य और महान् कार्य करने के लिए भेजे गए हैं, आप सर्वशक्ति- मान ईश्वर के अंशावतार हैं। ईश्वर ने आपका उद्देश्य महान् बनाया है, उसे पूरा करने की योग्यता तथा सामर्थ्य दी है। उसने आपको कुछ कर दिखाने का अवसर प्रदान किया है, इस विचार से ही आपको अपूर्व आत्मविश्वास की प्राप्ति होगी, आप निरन्तर ऊंचे ही उठते जाएंगे और हर समय उत्साह में भरकर कार्य में लगे रहेंगे। - यदि किसी विशेष कार्य में आप अपने को अधिक प्रवीण, विलक्षण एवं कार्य-कुशल बनाना चाहते हैं अर्थात् यदि आप अपनी , सामर्थ्य में सुधार करना चाहते हैं, तो आप अपने कार्य के सर्वोत्तम स्वरूप की स्पष्ट कल्पना अपने सामने रखिए, कल्पना । की आंखों से अपने कार्य के आदर्श रूप का प्रत्यक्ष साक्षात्कार । कीजिए और अपनी आकांक्षा के अनुरूप अपने कार्य को आदर्श बनाने का चरम सीमा तक प्रयत्न जारी रखिए। इन ऊंचे विचारों को तब तक निरन्तर अपने मन में बनाये रखिए; जब तक आपकी B आकांक्षा मूर्त या ठोस रूप न धारण कर ले।
ऊंचे विचारों को, आदर्श-आकांक्षा को मन में निरन्तर दोहराते रहने से क्रमशः दुर्बलता, अपूर्णता तथा अशक्तता दूर होती जाती है, कार्य में त्रुटियां निरन्तर कम होने लगती हैं, इससे आप आदर्श मनुष्य बनने लगते हैं, आपका कार्य ईश्वरीय कार्य हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन उसके आदर्शों का ही अनुसरण करता है, उसीके अनुरूप व्यक्ति का चरित्र बनता है। व्यक्ति का आदर्श ही हर समय उसके जीवन पर शासन किया करता है। आदर्श एक सांचा है जिसमें मनुष्य का जीवन ढलता है । यदि आदर्श श्रेष्ठ है तो जीवन भी श्रेष्ठ होगा, यदि आदर्श सुन्दर है तो जीवन भी सुन्दर होगा। हमारी हादिक इच्छा हमारे जीवन में मूर्त प्रत्यक्ष प्रकट होकर ही रहती है । जो आदर्श हमारे मन में हर समय विराजमान रहता है, उसे हम अपने चेहरे पर प्रकट होने से रोक नहीं सकते। हम जिन विचारों, भावनाओं तथा आकांक्षाओं को पुष्ट करते, प्रवल बनाते रहते हैं उन्हीं हाथों में हमारे जीवन की बागडोर आ जाती है। अतः हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि हम निरन्तर अपने विचारों को श्रेष्ठता की ओर ले जाएं, दिव्यता की ओर ले जाएं, महानता की ओर ले जाएं। हमारे विचारों में श्रेष्ठता और उदारता आनी चाहिए, तभी हम निरन्तर उन्नति की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। दृढ़ निश्चय कीजिए, संकल्प कर लीजिए कि आप अपने मन में हीनता की भावना कभी नहीं आने देंगे, अपने कार्यों पर हीन भावनाओं का कभी प्रभाव नहीं होने देंगे, कभी मन को गिरावट की ओर नहीं जाने देंगे । दृढ़ निश्चय कीजिए कि आप जो भी काम करेंगे उस पर उत्तमता की, श्रेष्ठता की गहरी छाप होगी। आप संकल्प कीजिए कि आप जो कुछ करेंगे, जो कुछ बनाएंगे, वह उम्दा होगा, बढ़िया होगा। इस प्रकार मन को ऊंचाई पर ले जाकर, अपनी मनोवृत्ति . - - को ऊंचे आदर्शों की ओर ले जाकर, महान् वस्तुओं के निर्माण में लगाकर आप अपने मन को उदात्त बना लेते हैं, आप अपने प्रयत्न को प्रभावशाली बना सकते हैं और अपने सम्पूर्ण जीवन को ऊंचे स्तर पर ले जाने में सफल हो सकते हैं । हमारा आदर्श एक सांचा है जिसमें हमारा चरित्र, स्वरूप और आकार प्राप्त करता है। हमारे जीवन के स्वरूप का निर्माण करने में हमारे आदर्श का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। हमारे हृदय की स्वभावगत इच्छा हमारे जीवन में प्रकट होकर ही रहती है । यदि हम अपने कार्य पर, अपने चरित्न पर और अपने जीवन पर श्रेष्ठता की छाप लगी देखना चाहते हैं, तो हमें अपना आदर्श महान् बनाना होगा। आशा का सारतत्त्व या निचोड़ ही आत्मविश्वास है । विश्वास, निश्चय और निष्ठा आशा के ही विभिन्न पहलुओं के नाम हैं । आशा हमारे आदर्शों की बाहरी रूपरेखा है, कार्य उसमें विविध रंग भरता है, कार्य और प्रयत्न के बिना आशा केवल रूपरेखा या खाका है। यदि हम आशा को केवल मानसिक प्रतिबिंब ही नहीं रहने देना चाहते, बल्कि उसे एक वास्तविक तथ्य और ठोस सच्चाई का रूप देना चाहते हैं, तो हमें कर्म और प्रयत्न का पल्ला पकड़ना होगा। प्रत्येक सफल और सुन्दर रचना के पीछे विश्वास, आशा, आकांक्षा, हृदय की प्रबल इच्छा अवश्य विद्यमान रहती है । यदि वे न होतीं, तो रचना इतनी सफल और सुन्दर कभी न होती। हमारा विश्वास–हां, सफलता का विश्वास एक ऐसा चुम्बक है जो अपरिमित रचनात्मक शक्ति रूपी लोहे को अपनी ओर खींचता रहता है। विश्वास जितना प्रबल होता जाएगा, कार्य-शक्ति भी उतनी ही बलवती होती जाएगी। मकान का सपना लीजिए, विपुल धन का सपना लीजिए, प्रभावशाली व्यक्ति बनने का सपना लीजिए, उद्देश्य को पूर्ण करने वाला जीवन बनाने का सपना लीजिए, अपने समाज में महत्त्वपूर्ण व्यक्ति बनने का सपना लीजिए- अनुरुप बनने योग्य -तब उसके - कार्य-शक्ति और कर्म-सामर्थ्य स्वयमेव आपके अन्दर आ जाएगी। आपके विचार का संपूर्ण प्रवाह आपके आदर्श की ओर प्रवाहित होना चाहिए, उससे विपरीत या भिन्न दिशा में नहीं। विचारों की एकाग्रता के कारण ही मानव सभ्यता के सभी चमत्कारों को प्रकट होने का अवसर मिलता है । अच्छी वस्तुओं, अच्छी भावनाओं, अच्छी अवस्याओं के निर्माण में अपने जीवन का योगदान समझ लीजिए । मन में दृढ़ विश्वास जमा लीजिए कि आपका जीवन किसी विशाल, किसी विराट्, किसी व्यापक, किसी महत्त्वपूर्ण, किसी उप- योगी कार्य के लिए है और आप उस कार्य को तभी पूर्ण कर सकेंगे जब आप अपनी बुद्धि और प्रयत्न का संगम कर सकेंगे; जब आप अक्लमंदी से, चतुराई से, कुशलता से, सर्तकता से कोशिश कर सकेंगे। यदि आप अपने मन को निरन्तर रचनात्मक स्थिति में बनाए रख सकते हैं, यदि आप अपने आदर्श की ओर बढ़ने में निरन्तर संघर्ष करते रह सकते हैं, यदि आप अपने सपने को साकार करने के लिए लगातार काम में जुटे रह सकते हैं, तो समझ लीजिए कि आपके जीवन का लक्ष्य आपसे दूर नहीं है। मन में निरन्तर यह दृढ़ विश्वास रखिए कि आप निरन्तर उन्नति के पथ पर बढ़ते जा रहे हैं, किसी उच्चतर लक्ष्य की ओर लगातार बढ़ते जा रहे हैं, किसी उत्कृष्ट रचना या श्रेष्ठ निर्माण में सफल होते जा रहे हैं और आपके अस्तित्व का प्रत्येक परमाणु निरन्तर प्रगति की ओर अग्रसर हो रहा है। वहुत-से लोग यह समझते हैं- "सपने देखना एक खतरनाक भूल है, कल्पनाओं में उलझे रहना बेकार होता है, सपने देखने से, कल्पनाओं में डूबे रहने से जीवन अव्यावहारिक बन जाता है।" परन्तु ऊपर लिखा विचार विल्कुल गलत है। । ये सपने और ये कल्पनाएं मनुष्य के लिए उसी प्रकार पवित्र हैं, जैसे कि अन्य सद्गुण। ये उसी प्रकार वरदान हैं जैसे कि अन्य श्रेष्ठ वृत्तियां। हमें ये सपने दिव्य उद्देश्य के लिए प्रदान किए गए हैं-यदि ये न होते, तो मानवता की इतनी अद्भुत उन्नति कभी न - होती। कल्पनाओं के द्वारा हम अब तक न बनी वस्तुओं को देख सकते हैं, अभी तक न प्रकट हुए सौन्दर्य के सपने देख सकते हैं । ये सपने हमें अपने आदर्श के अनुकूल जीवन ढालने में मदद देते हैं। ये उस समय भी हममें उत्साह और जोश भरे रहते हैं, जबकि हमें कष्टदायक या अरुचिकर काम भी करने पड़ते हैं । सपने देखने की शक्ति के कारण हम गौरवपूर्ण वास्तविकताओं की झांकी देखने में समर्थ होते हैं-जो दूर होते हुए भी हमें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती रहती हैं। सपने इस बात के साक्षी हैं कि वे कार्य संभव हैं, जिन्हें संसार अव तक असंभव मानता रहा है। हवाई किले बनाना, कल्पना के महल खड़े करना, दिमागी अय्याशी नहीं है, बल्कि सभी निर्माणों का, सारी दिव्य रचनाओं का मूल रूप ही यही है। यदि सपने न होते, तो कोई सुन्दर कलात्मक रचना न होती, कोई भी गौरवपूर्ण निर्माण न होता। पहले हम अपने चित्र में महल बनाते हैं, आकांक्षा में हम उसकी विस्तृत रूप-रेखा बनाते हैं, उसके बाद ही हम हाथों से उसकी नींव रखते हैं और तब उसका निर्माण कार्य शुरू होता है। प्रत्येक वास्तविक महल, हर एक घर और मकान पहले कल्पना ही था--केवल एक सपना था। उचित प्रकार से सपने लेना सदा ही क्रियात्मक तथा रचनात्मक होता है । हर अच्छा स्वप्न- द्रष्टा अच्छा निर्माता बन सकता है। जो इच्छाओं को वास्तविक स्वरूप प्रदान करने का अथक प्रयत्न करता है, वह अपने सपने को सत्य सिद्ध करके दिखला देता है । हम जिस चीज की इच्छा करते हैं, जिसकी लालसा करते हैं, जिसकी कामना और आकांक्षा से मन को परिपूर्ण रखते हैं, जिसे पाने की आशा करते हैं उसी का हमारे मन में विश्वास होता है और उसी के लिए हम प्रयत्नशील होते हैं। यदि स्थपति ( (architect) का नक्शा न होता, तो भवन कभी सुन्दर न बन सकता । यह नक्शा. पहले उसके मन में ही पैदा हुआ था, उसके बाद ही वह कागज पर उतर सका था।
. स्थपति अपने नक्शे के पीछे भवन की पूर्णता तथा सुन्दरता को देखता है। अपनी योजना की कल्पना में वह सम्पूर्ण भवन को साकार देखता है। जीवन में हम जिस वस्तु को साकार रूप में प्रस्तुत करते हैं, उसे पहले अपने में साकार रूप में देखते हैं। यह कार्य कल्पना (imagination) द्वारा ही किया जाता है । एक भी ईट या पत्थर रखे बिना पूरा भवन स्थपति के मन में पूरी तरह साकार रहता है, उसी प्रकार हम अपनी प्रत्येक रचना को उसके सम्पूर्ण विवरण के साथ, पहले अपनी कल्पना में साकार देखते हैं और उसके बाद ही उसकी उपलब्धि के लिए कोई कदम उठाते हैं। हमारे सपने ही उत्साहपूर्ण प्रयत्नों की सर्वाधिक प्रेरक शक्ति हैं । उत्साहपूर्ण प्रयत्न ही हमारे सपनों को मूर्त (साकार) रूप प्रदान करते हैं । ठीक उसी प्रकार जैसी आर्किटेक्ट का प्लान भवन को पूर्ण बनाने की कार्य-विधि का निर्धारक होता है। यदि भवन निर्माता स्थपति नक्शे का पूरी तरह अनुसरण नहीं करते, तो भवन कभी भी कल्पना के अनुरूप नहीं बन सकता। सभी मनुष्य जो महान कार्य कर गए हैं--स्वप्नद्रष्टा ही थे। उनके प्रत्येक कार्य की सुन्दरता का अनुपात हूबहू उनकी कल्पना के विवरण से मिलता-जुलता होता है । जिस अनुपात में कल्पना अनुपात में प्रयत्न कुशलतापूर्ण होगा और उसी अनुपात में सफलता का स्वरूप सुन्दर होगा। कल्पना के विवरण पर, आदर्श की स्पष्टता पर, स्वप्न की निरन्तरता पर प्रयत्नों का स्वरूप निर्भर होता है। सुन्दर होगी, उसी यदि सपना प्रकटतः पूर्ण होता न दिखाई पड़े, तो उसका परि- त्याग नहीं कर देना चाहिए; क्योंकि कोई मनुष्य काम को पूर्ण हुआ तव तक नहीं देख सकता, जब तक वह कार्य पूर्ण न हो जाए। निरन्तर अपने आदर्श पर स्थिर रहिए । अपनी कल्पना को हाथ से न जाने दीजिए। कार्य साकार होने के प्रयत्न में क्या-क्या त्रुटि . आप से रह गयी है, इस ओर ध्यान दीजिए। उन त्रुटियों को दूर करते ही आपकी उपलब्धि साकार रूप में दृष्टिगत होने लगेगी। अपने स्वप्न को उज्ज्वल रखिए, सदा मन में जगमगाता रखिए, जीवन में रोटी कमाने के पक्ष को इतना महत्त्वपूर्ण न बनाइए कि आपको स्वप्न की उपेक्षा करनी पड़े या आपका आदर्श मध्यम पड़ता जाए । प्रतिदिन के जीवन की चर्या में ही सारा समय न खपा दीजिए। अपने कार्य की सफल उपलब्धि के लिए अधिका- धिक उत्साहपूर्ण प्रयत्न कीजिए। अपने इर्दगिर्द ऐसा वातावरण बनाइए जिससे आपको अपना आदर्श उद्देश्य प्राप्त करने के लिए निरन्तर उत्साह प्राप्त होता रहे। उन लोगों की संगति कीजिए, जिनसे आपमें उत्साह और साहस का संचार हो, ऐसी पुस्तकें पढ़िए जो आपमें लक्ष्य मार्ग पर अग्रसर होते रहने की स्फूर्ति और प्रेरणा भरें। उन व्यक्तियों से सलाह लीजिए जो आपको कर्म के लिए प्रोत्साहित करें, संवर्ष के लिए प्रेरणा देते रहें, कार्य-कुशलता के लिए उपाय बतलाते रहें। अपने आदर्श उद्देश्य को साफ रूपरेखा अपने सामने रखिए, उसके किसी भी पहलू को अस्पष्ट न रहने दीजिए। जितना महान् उद्देश्य है उतने ही परिमाण में आपका प्रयत्न भी महान् होना चाहिए-तभी आप अपने सपने को साकार रूप में क्रियान्वित कर । सकते हैं। रात को शय्या पर जाने से पूर्व कुछ समय एकान्त में बैठकर अपने सपने पर पुनः विचार कीजिए--विचार कीजिए कि आपने दिन भर में उसके लिए क्या प्रयत्न किया, क्या-क्या त्रुटियां रह गयी हैं और उन्हें किस प्रकार दूर किया जा सकता है, शान्त भाव से एकान्त में बैठकर अपनी कल्पना का सम्पूर्ण स्वप्न देखिए, उसके • समस्त विवरण के साथ । सपने या कल्पना से डरने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि सपने के बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ, नष्ट हो जाता है।' ईश्वर ने आपको कल्पना-शक्ति इसलिए नहीं दी कि आप उप- हास का पात्र बनें । उसके पीछे कोई वास्तविकता अवश्य है । कल्पना- - वस्तु के शक्ति एक दिव्य वरदान है, बल्कि वह तमाम दिव्य कर्मों तथा अभूतपूर्व वस्तुओं की झांकी है। ईश्वर ने आपको यह स्वप्न इसलिए दिया है कि आप जन-साधारण की भीड़ से अलग होकर ऊंचे उठे और इन्द्रियों की दासता से ऊंचे उठकर उस स्वप्न को साकार बनाए । कल्पना-शक्ति द्वारा आप सामान्य वस्तु को असामान्य बना सकते हैं, मामूली-से-मामूली चीज को बढ़िया और सुन्दर बना सकते हैं । कल्पना द्वारा आप कठोर परिस्थितियों को अनुकूल एवं सुखद बना सकते हैं। कल्पना वह शक्ति है जो मनुष्य को अपूर्व एवं दिव्य दर्शन कराती है, महान् वस्तु को साकार झांकी दिखलाती है, बाधाओं को दूर करके उस आदर्श को पूर्ण करने का मार्ग सुझाती है । स्वप्नों के स्वर्गीय मनोहर दर्शन हमें निराशा से दूर रहने की सामर्थ्य प्रदान करते हैं। असफलताओं में वे हमें धीरज बंधाते हैं । अनुकूल परिणाम न होने पर भी वे हमें कार्य-निरत रखते हैं । हमारे प्रयत्नों का आधार ये कल्पनाएं ही हैं । कल्पना का अर्थ मृगतृष्णा या आकाश-कुसुम की आशा करना नहीं है । कल्पना वास्तविक, उचित, कल्याणकारी, उपयोगी तथा आत्मा की उदात्तता से उद्भूत होनी चाहिए । कल्पना ऐसी होनी चाहिए जो हमें अपने जीवन को ऊंचा उठाने को निरन्तर प्रेरणा देती रहे, चाहे हमारी परिस्थितियां और वातावरण कितना ही प्रतिकूल हों, श्रेष्ठ कल्पना हमारे प्रयत्नों में शिथिलता नहीं आने देती। श्रष्ठ कल्पना हमें सदैव आदर्श कार्यस्थिति में रखती है। हमारी कार्य-कुशलता को संस्कारित करने में उसका महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। हमारी उचित इच्छा के पीछे कोई दैवी शक्ति होती है । इन्द्रियों के भोगों की लालसा के पीछे नहीं बल्कि जनकल्याणकारी, बहुजन हितकारी इच्छाओं के पीछे ही दिव्य-शक्ति विद्यमान रहती है। मात्मा से उद्भूत उदात्त इच्छा कभी भी व्यक्ति के भोग-विलास तक सीमित नहीं रहती। आदर्श उद्देश्य के लिए की गयी इच्छा के .
स्वप्न हम . पीछे ईश्वर का वरदायी हाथ होता है, जिससे व्यक्ति अपने व्यक्तित्व की पूर्ण श्रेष्ठता को अभिव्यक्ति देने में समर्थ होता है। आत्मा के ऊंचे ध्यान और चिन्तन के क्षणों में ही ऐसा श्रेष्ठ एवं दिव्य देखते हैं। उसका उद्भव क्षणिक सुख-भोग की लालसा से कदापि नहीं होता। "जब तक मनुष्य का आदर्श या सपना निर्धनता का होगा, तब तक वह निर्धन ही रहेगा।" हमारे मन की प्रवृत्ति, हमारे हृदय की इच्छा ही वह निरन्तर की जाने वाली प्रार्थना है, जिसका उत्तर प्रकृति को देना पड़ता है। प्रकृति यह मानकर प्रतिक्रिया प्रकट करती है कि हमारी जैसी इच्छा है, वैसा ही फल हम चाहते हैं। प्रकृति यह मानती है कि हम अपनी इच्छा के अनुकूल ही कदम आगे बढ़ाते हैं, और प्रकृति हमें उसी तरफ बढ़ने में सहायता पहुंचाती है। लोग इस तथ्य को बहुत ही कम समझते हैं कि उनकी इच्छाएं ही निरन्तर प्रार्थनाए हैं-- प्रकृति उन्हें सुनकर वैसा ही फल देती है। प्रकृति हमारे मस्तिष्क की प्रार्थनाओं के अनुरूप नहीं; बल्कि हमारे हृदय की प्रार्थनाओं के अनुरूप फल देती है। अव आप जैसा फल चाहते हैं, सच्चे हृदय से वैसी ही इच्छा कीजिए। यदि हम अपनी मनोवृत्ति को उदार रखते हैं, यदि हम ईमान- दारी से प्रयत्न करते हैं, यदि हम निरन्तर संघर्ष करते हैं, यदि हम अपने उद्देश्य के प्रति निरन्तर ईमानदार बने रहते हैं, तो प्रकृति हमें अवश्य ही सिद्धि प्रदान करती है-यही कुदरत का कानून है। आशा-आकांक्षा पर अपने मन को निरन्तर एकान करने में बड़ी भारी शक्ति छिपी हुई है। इस एकाग्र-चिन्तन द्वारा हम उस वस्तु को तीव्र वेग से अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं, जिसे हम पाना चाहते हैं। हमारी संपूर्ण कार्य-शक्ति इसी एकाग्रता पर आश्रित होती है। जिसकी हम आशा-आकांक्षा पल-पल करते रहते हैं, उसे हम पल-पल अपनी ओर खींचते रहते हैं। सिद्धि का यही महामन्त्र है।
हमारे हृदय की लालसाएं हमारी रचनात्मक शक्तियों में स्फूर्ति का संचार करती हैं और तभी हम उस पदार्थ को प्राप्त करने में समर्थ होते हैं जिसकी हमारे भन में तीव्र लालसा होती है। हमारी तीव्र इच्छा-शक्ति ही हमारी कार्ययोग्यता में जीवन का संचार करती है, उसी से हमारी कर्म-सामर्थ्य बढ़ती और पुष्ट होती है, और उसी शक्ति से हम मनोवांछित फल प्राप्त करने में सफल होते हैं । प्रकृति एक महान भंडारी है। उसके भंडार में संसार के सभी उत्तमोत्तम पदार्थ जमा हैं । हम जिस पदार्थ को मांगते हैं, प्रकृति वही पदार्थ हमें देती है, बशर्ते हम उसका सही मूल्य भी दें। हम पदार्थ तो मांगें और मूल्य न देना चाहें, तो यह सौदा नहीं हो सकता। हमारे विचार जड़ (मूल) के समान हैं, ये निराकार शक्ति के सागर में अपनी शाखाएं विभिन्न दिशाओं में प्रसारित करते हैं, विचार रूपी जड़ें जब सचेष्ट हो जाती हैं, जब इनमें तरंगें उठने लगती हैं, तब वे अपने अनुकूल सभी पदार्थों को अपनी ओर आषित करने लगती हैं। परिणाम यह होता है कि हमारी इच्छाएं फलवती हो जाती हैं। विधाता ने यदि पक्षी को उड़ने की शक्ति न दी होती, तो आकाश में उन्मुक्त संचरण करने की इच्छा भी पैदा न की होती। ईश्वर ने हमें यदि लालसाओं की पूर्ति की शक्ति ने दी होती तो इनकी चाह भी उत्पन्न न की होती । ईश्वर ने हमें उदात्त इच्छाएं दी, ऊंची आकांक्षाएं दीं, महान् काम करने की चाह दी, श्रेष्ट जीवन बनाने की कामना दी; इससे साफ पता चलता है कि उसने हमें इन संभाव्यताओं को प्रत्यक्ष एवं साकार प्रकट करने की शक्ति और सामर्थ्य भी अवश्य दी होगी। . वनस्पति जगत् में अंकुर, पत्ते, शाखाएं, फूल और फल अपने प्राकृतिक निर्धारित समय पर, निश्चित प्रक्रिया के अनुसार आते हैं । शीत ऋतु तब तक नहीं आती जब तक कि उससे पहले कलियं
की मुसकान पुरुषों में विकसित नहीं हो जाती, पतझड़ तब तक नहीं
आती जब तक नवदल एवं फल-फूल की तैयारी पूर्ण नहीं हो
जाती।
यदि हम किसी कार्य को समय से पूर्व ही पूर्ण हुआ देखना
चाहते हैं, तो यह हमारी भूल है, प्रकृति की नहीं। किसी ने सच
कहा है-
धीरे-धीरे रे मना,
धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय ।।
फल की आकांक्षा कीजिए, इसमें कुछ बुराई नहीं, परन्तु फल
की आकांक्षा समय से पूर्व मत कीजिए , और समय से पूर्व फल न
पाने पर अपने भाग्य को मत कोसिए।
जब पुरुष या स्त्री परिपक्व अवस्था आने से पूर्व ही फूल या फल
के लिए उतावले होने लगते हैं, तो अपनी ईश्वर-तुल्य योग्यता को
कम कर देते हैं। वे तब असीम संभावनाओं को 'असंभव' बना देते
जब पकने से पहले सेब को तोड़ने पर उसे दुःख होता है , फिर
पूर्ण होने से पहले मन की इच्छा को उखाड़ फेंकना कहां तक उचित
धीरज रखिए---आपका परिश्रम सफल होकर रहेगा, आपकी
इच्छा पूरी होकर रहेगी, आपकी आशाओं का फूल खिलकर
रहेगा, आपकी आकांक्षाओं के फल मिलकर रहेंगे ।
प्रयत्न करते जाइए, पूर्ण शक्ति, योग्यता, कुशलता और
सामर्थ्य से अपने उद्देश्य के प्रति निष्ठावान रहकर कार्य करते रहिए,
सफलता आपकी है, सफलता निश्चय ही आपको है।
2
सफलता और प्रसन्नता
के
साधन
यदि मनुष्य बीमारी, गरीबी और दुर्भाग्य के ही विचारों में डूबा
रहे, तो वह इन्हें ही प्राप्त करता है और बाद में वह इन्हीं को
अपने जीवन का अपरिहार्य अंग मानने लगता है। वह इन्हीं को
अपना मानने लगता है और अपने निकट संबन्धियों-यहां तक कि
अपने बच्चों को भी 'अपना' मानने से इनकार करने लगता है और
कहने लगता है--"ये निकट संबन्धी तथा बच्चे मेरे दुर्भाग्य की ही
देन हैं।"
गरीबी एक ऐसा नरक है, जिससे दुर्बल मन वाले लोग सबसे
अधिक भयभीत होते हैं, जबकि प्रवल चित्त वाले लोग उसे दूर
रखते हैं। गरीबी ऐसा खुले मुंह वाला नरक-दैत्य है, जो सभ्यता
को निगलने के लिए आतुर है
धन-संपत्ति का जन्म सबसे पहले मन में ही होता है । धन-संपत्ति
का प्रवाह कंजूस-मक्खीचूस, अनुदार तथा सन्देहशील व्यक्ति की
ओर कभी नहीं प्रवाहित होता।
गरीबी के विचार से संबन्ध रखने पर, मनुष्य गरीवी पैदा
करने की स्णितियों से ग्रस्त रहता है।
किसी भी व्यक्ति का यह हक नहीं कि वह सदा गिरी-पड़ी,
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- दीन-हीन दशा में पड़ा रहे । जब तक मनुष्य अपनी सहायता करने में सर्वथा असमर्थ न हो, तब तक उसे यह अधिकार कदापि नहीं है कि वह आशाभंग करने वाले, उत्साह नष्ट करने वाले,महत्त्वाकांक्षा को कुचलने वाले वातावरण में पड़ा रहे। व्यक्ति के आत्मसम्मान की यह मांग है कि मनुष्य दीन-हीन वातावरण से ऊपर उठे, धन-संपत्ति की विपुलता अपने चारों ओर निर्माण करे। गौरवशाली पद प्राप्त करने का, आर्थिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने का, अपने सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाने का प्रत्येक मनुष्य को जन्मजात अधिकार प्राप्त है। बल्कि उसका यह कर्तव्य है कि वह अपने को गौरवशाली पद पर प्रतिष्ठित करे, कार्य और आकांक्षा पूर्ति की स्वतन्त्रता प्राप्त करे, दूसरों के जीवन को ऊचा उठाने में मददगार बने, न कि समाज पर बोझ ! उसे बीमार होकर अपने संबन्धियों या इष्ट मित्रों पर बोझ बनने का कोई अधिकार नहीं है । संकट आने पर, दूसरों के आश्रित होने या दूसरों पर भार डालने का उसे कोई हक नहीं है। अपने देश में आप किसी भी धनाढ्य व्यक्ति से पूछे तो वह आपको बताएगा कि उसके सर्वाधिक प्रसन्नता से पूर्ण दिन वे थे, जिन दिनों वह गरीबी से ऊपर उठकर संपन्नता की सीढ़ियां चढ़ने का प्रयत्न कर रहा था, जब वह योग्यता एवं कार्य-कुशलता द्वारा अपने जीवन-स्तर को उन्नत बनाने के लिए कठोर परिश्रम और घोर प्रयत्न कर रहा था और जानता था कि अव अभाव और निर्धनता उसको सताने नहीं आएंगे। यही वह समय था, उसने आराम को हराम समझकर मेहनत को गले लगाया था, आलस्य को छोड़कर कर्मण्यता का पल्ला पकड़ा था। जब उसने सुस्ती छोड़कर आत्मविकास के लिए प्रयास आरम्भ कर दिया था, अपने को अधिकाधिक शिक्षित तथा सुसंस्कृत बनाते हुए उसने यह अनुभव करना शुरू कर दिया था-"अब मुझमें वह शक्ति आ गयी है कि जिन्हें मैं प्यार करता हूं, उन्हें गरीबी अव कभी सता नहीं सकेगी।" उस समय अभावों का स्थान पदार्थों का भंडार लेने लगे। जव कुंठित करने वाले वेगार-जैसे परिश्रम का स्थान कार्य-कुशलता लेने लगी। उस समय उसमें ऐसी शक्ति आने लगी कि वह अपनी स्थिति से अपने को ऊपर उठा सके, अपने आपसे आगे बढ़ सके । उसकी सामर्थ्य ने चमत्कार दिखाया और एक दिन परिश्रम का स्थान सुख-आराम ने ले लिया। अब वह अपने घर उत्तम चिन्न, श्रेष्ठ पुस्तकें, उत्कृष्ट संगीत का सामान, तथा सुखद सामग्रियां लाने में समर्थ हो गया था। उसे अनुभव हो गया कि उसके बच्चों को उस तरह का घोर एवं कठोर परिश्रम नहीं करना पड़ेगा, जैसा कि स्वयं उसे करना पड़ा था। उस समय पहले-पहल उसने अनुभव किया कि वह न केवल अपने बच्चों को बल्कि अन्य लोगों को भी रोजगार देने में समर्थ हो गया है । विकास की शक्ति का उसने अनुभव किया, उसने अपने इर्दगिर्द जो एक संकुचित घेरा बना रखा था, वह निरन्तर विस्तृत होता गया-साथ -साथ ही उसका दृष्टिकोण भी व्यापक एवं विस्तीर्ण होने लगा। इस तथ्य के साक्षीरूप सैकड़ों प्रमाण और सबूत हैं कि मनुष्य का जन्म महान् कार्यों के लिए हुआ है, विपुल धन-संपत्ति उपाजित करने के लिए हुआ है, गरीबी में विलविलाने के लिए नहीं। मनुष्य के दिव्य स्वभाव में अभाव और निर्धनता का कोई मेल नहीं है । हमारे लिए गरीवी कष्टदायी इसलिए वन गयी है कि हम इसे स्थायी (permanent) मान बैठते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि हम आत्मविश्वास से हाथ धो बैठते हैं । जो कुछ हमें मिल गया, उसे ही हम अपना 'भाग्य' मान बैठते हैं। हम अपनी आत्मा की आकांक्षा का कहना मानकर गरीवी को जड़मूल से उखाड़ने का प्रयत्न नहीं करते । हमारी दिव्य भूख क्या है -इसे जानने का हम प्रयत्न ही नहीं करते। यही कारण है कि हम दरिद्र के दरिद्र ही रह जाते हैं। विपुल धन-संपत्ति प्राप्त करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। किन्तु हाय, हम छोटी-छोटी चीजें मांगते हैं। छोटी-छोटी चीजें ।
स्वीकार कर लेते हैं । मूषक की अंजलि की भांति हमारी अंजलि भी जल्दी ही भर जाती है। हम ऐसा साहस ही नहीं करते कि अपने मन की इच्छा-आकांक्षा को उन्मुक्त रूप से व्यक्त करें और फिर उसकी पूर्ति भी करके दिखला दें। हम अपने मन को इतना विशाल ही नहीं बनाते कि उसमें हमारी आत्मा की आकांक्षा समा सके। हम अपनी मनोवृत्ति को इतनी संकीर्ण, इतनी संकुचित बना लेते हैं-आत्माभिव्यक्ति को इतना दबा या कुचल देते हैं कि हमें आत्मा की आवाज ही सुनाई देनी बन्द हो जाती है और हम प्रत्येक विषय में कंजूस, मक्खीचूस, अनुदार, संकीर्ण, तंगदिल व्यक्ति की भांति सोचने लगते हैं। जिस शक्ति ने हमें बनाया और जो हमारा पालन-पोषण करती है, वह उदारता से देती है, विपुलता से देती है, वह कंजूस नहीं है, वह सबके लिए सब कुछ देती है किसी पर वह प्रतिबन्ध नहीं लगाती। उसकी विपुलता किसी को भी वंचित नहीं रखती। वह कर्ता विधाता कंगाल नहीं है। हमारी मांगों की पूर्ति करने पर वह कंगाल हो जाने वाला नहीं है। दान करना उसका स्वभाव ही है-वह अवढर दानी है। वह पदार्थों की बाढ़ ला देता है। हमारे चित्त की आकांक्षा की पूर्ति के लिए उसने हर एक के विपुल भंडार भरकर रखे हैं। गुलाब का फूल सूर्य की धूप का एक लघु अंश नहीं मांगता, क्योंकि सूर्य का यह स्वभाव ही है प्रकाश और ताप प्रदान करना । सूर्य का स्वभाव ही है कि उसके अन्दर जो कुछ है उसे बाहर फेंकना-सवकी तरफ फेंकना। एक मोम- , बत्ती यदि दूसरी मोमबत्ती को जलाती है तो वह अपना कुछ नहीं खो देती। ठीक इसी प्रकार किसी के प्रति मिन्नता प्रकट करके, उदारता दिखलाकर हम अपनी मित्रता के अल्प अंश को भी नहीं खो देते, बल्कि दूसरों से प्यार करके हम अपने प्यार में वृद्धि ही करते हैं। जीवन का सबसे महान् ' रहस्य यही है कि हम उस दिव्य शक्ति की विद्युत् धारा से अपना संबन्ध कैसे जोड़ें? यदि मनुष्य इस दिव्य विद्युत् धारा से अपना संबन्ध जोड़ने का 'गुर' सीख जाए, तो वह अपनी कार्य-कुशलता में लाखों गुनी वृद्धि करने में समर्थ हो सकता है। कारण यह है कि तव वह उस दिव्य शक्ति के भंडार का सहयोगी तथा सहकर्ता हो जाएगा । वह न केवल उस दिव्य शक्ति भंडार से स्वयं शक्ति प्राप्त करने में समर्थ होगा, बल्कि औरों को भी शक्ति प्रदान करने में समर्थ हो सकेगा। तब वह स्वयं शक्ति का भण्डार हो जाएगा। इतनी अद्भुत शक्ति का कि जिसका उसने पहले कभी स्वप्न भी नहीं देखा होगा। जिस समय हमें यह ज्ञान हो जाता है कि सम्पूर्ण शक्ति उसी अनन्त स्रोत से आती है, और यह स्वतन्त्रता तथा उन्मुक्त रूप में हमारी ओर प्रवाहित होती है, और अनन्त स्रोतों से आने के कारण इसका प्रवाह भी अनन्त है, तब हमारे अन्तःकरण का उस अनन्त शक्ति से समन्वय स्थापित जाता है, तब हमारे भीतर का अशि- क्षित उजड्ड मन शिक्षित हो जाता है, और तब हममें से बेईमानी, स्वार्थपरता, अपवित्रता जलकर नष्ट हो जाती है । ईश्वर वह नहीं जो हमें अच्छाइयों के प्रति अंधा बना दे, बल्कि ईश्वर वह है जो हमें अच्छाइयों को देखने की दृष्टि प्रदान करे। हम पैसे को ही खुदा मानकर भूल करते हैं-इसीलिए हम जड़ के उपासक होकर बेईमानी और स्वार्थपरता, दुष्टता और अपवित्रता को गलती से आनन्द मानने लगते हैं। अन्याय के कारण जब हमारी दृष्टि धुंधली हो जाती है तव हम अपने भाई-बहनों का अनुचित लाभ प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगते हैं । जब यह धुंधलापन दूर हो जाता है, तब हम ईश्वर के समीप पहुंच जाते हैं । और तब विश्व के समस्त वांछित पदार्थों का प्रवाह स्वयं हमारी ओर प्रवाहित होने लगता है। परन्तु हमारी भूल यह है कि हम अपनी गलत करतूतों से उस विपुलता के प्रवाह को रोक देते हैं-अपने गलत विचारों द्वारा हम उस प्रवाह में बाधा डाल देते हैं।
हमारा हर एक दुष्कर्म हमारी दृष्टि पर परदा डाल देता है जिससे हम ईश्वर को अर्थात् अच्छाई को देखने में असमर्थ हो जाते हैं। हमारा हर एक गलत कदम हमें ईश्वर से दूर ले जाता है। इसके विपरीत,जब हमारी दृष्टि विशाल और उदार हो जाती है, जब कंजूस न वनकर हम विशाल-हृदय बन जाते हैं, जब हम सीमा बन्धन के बिना विचार करना सीखने लगते हैं, जब हम अपने पंगु बनाने वाले संकीर्ण विचारों से ऊपर उठ जाते हैं, तब हमें यह देखकर आश्चर्य होता है कि जिस पदार्थ को हम ढूंढ़ते-फिरते थे, वह स्वयं हमें ढूंढ़ता-फिरता है और जब हम आधा रास्ता चल- कर आगे जाएंगे, तो वह स्वयं आधा रास्ता चलकर हमें आ मिलेगा। जॉन बरोज़ ने अपनी एक कविता में यथार्थ ही कहा है- "मैं समय और भाग्य के विरुद्ध कोई शिकायत नहीं करता और देखो, जो कुछ मैं चाहता हूं, वह मुझे अपने आप आ मिलता है।" X X "मैं सो गया और जब जागा, तो क्या देखता हूं कि जिन मित्रों को मैं ढूंढ़ता-फिरता था; वे स्वयं मुझे ढूंढते-फिरते थे !" X X X "यदि मैं अकेला खड़ा हूं तो क्या हुआ, मैं आने वाले वर्षों की प्रसन्नता से प्रतीक्षा कर रहा हूं। मेरा हृदय वहीं फसल काटेगा, जहां उसने बीज बोये हैं, क्योंकि जो कुछ मेरा है वह मेरे चेहरे को अवश्य पहचान लेगा।" X X X "समय का अन्तर, स्थान की दूरी, सागर की गहराइयां और पर्वत की ऊंचाइयां मेरी वस्तु को मुझसे दूर रखने में समर्थ नहीं हो सकती।" हर समय झेंपते न रहिये कि आपके पास यह नहीं है, वह नहीं है। हर समय रोते क्यों रहते हो कि आपके पास पहनने को अच्छे कपड़े नहीं हैं, कि आपके पास वे पदार्थ नहीं हैं जो दूसरों के पास X - हैं, कि उन कामों को नहीं कर पाते जिन्हें दूसरे करते हैं या वहां नहीं जाते हैं जहां दूसरे जाते रहते हैं। नहीं भैया, इस तरह मत सोचिए, इस तरह तो आप अपने अन्धकारपूर्ण चित्र को और भी काला करते जा रहे हैं। जब तक आप इन अभाग्य के विवरणों को दोहराते रहेंगे, अपने अवांछित अनुभवों का रोना रोते रहेंगे, तब तक आपकी मनोवृत्ति उन वस्तुओं को आकर्षित नहीं कर सकेगी जिनकी आपके मन में लालसा है। आप काम तो कुछ करें और आशा किसी और वस्तु की करें, तो क्या यह भूल नहीं है ? "बोये पेड़ बबूल के आम कहां ते होय ?" भले ही मनुष्य के मन में विपुल धन-संपत्ति पाने की कितनी ही अभिलाषा हो, परन्तु वह तब तक उसे प्राप्त नहीं कर सकता, जब तक कि वह अपनी मानसिक स्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन न कर दे। जब तक व्यक्ति अपने अभाव और अभाग्य का रोना नहीं छोड़ता, तब तक उसे विपुलता तथा धन-संपत्ति के दर्शन नहीं हो सकते। -दरिद्रता का विचार छोड़िए, -असफलता का विचार छोड़िए. -पराजय की वृत्ति छोड़िए। फिर देखिए आपके दिन कैसे बदलते हैं। उठो, हिम्मत करो और गरीबी का रोना छोड़ो। पहले मन में विपुल धन-संपत्ति का विचार लाओ। मन में उनकी रचना करो, संपन्न बनने से पहले मन में संपन्नता के विचार लाना बहुत आवश्यक है । विश्वास कीजिए कि इस विशाल विश्व में दूसरों के लिए जो अच्छे पदार्थ हैं, अच्छे सुख-सुविधा के साधन हैं, अच्छे मकान हैं, यात्रा के अच्छे अवसर हैं, सुख और आराम हैं, वे आपके लिए भी हैं, परन्तु जिस समय आपके मन में यह विचार बद्धमूल हो जाता है कि वे सब पदार्थ दूसरों के लिए हैं, कि आप अभागे हैं और वे पदार्थ आपकी किस्मत में नहीं और इस तरह मन मारकर आप बैठ जाते हैं, तब आप उन्हें प्राप्त करने का अवसर खो देते हैं। अभाग्य और बदकिस्मती के ये विचार मिथ्या हैं और सबसे पहले इन्हें तिलांजलि दीजिए। इन दुर्विचारों को अपने मन से उखाड़ फैकिए। आप अपने को एक भिन्न श्रेणी से अभागों की श्रेणी में क्यों गिनते हैं ? क्यों नहीं विचारों के इस बन्धन को आप झटककर दूर कर देते ? क्यों इन गलत ख्यालों से आप चिपटे हुए हैं ? क्यों आप अपने को हीन मान बैठे हैं ? आप अपने को इसीलिए हीन मानते हैं कि आपने स्वयं को बन्धनों में लपेट रखा है। आपने स्वयं अपने ऊपर पाबन्दियां लाद रखी हैं। अपने हाथों-पैरों में ये बंधन की हथकड़ियां-बेड़ियां स्वयं डाली हुई हैं । किसने आपका रास्ता रोक रखा है ? स्वयं आपने । अपने चारों ओर आपने एक वाड़ बना रखी है और उसके बाहर जाने का आप कभी प्रयत्न ही नहीं करते ! विपुलता की ओर आप देखते ही नहीं, आपको तुच्छ और क्षुद्र वस्तुएं ही दिखाई देती हैं। विपुलता के भण्डार को क्यों आपने दृष्टि से ओझल कर रखा है ? आपने विपुलता के अथाह प्रवाह से अपने को क्यों काट रखा है ? आप विपुल धन-संपत्ति के विचार मात्र का प्रवेश अपने मस्तिष्क में क्यों नहीं होने देते? तब प्रकृति के किस सिद्धान्त के अनुसार वे पदार्थ आपको मिल सकते हैं, जिनके बारे में आपका विश्वास है कि आपको मिल ही नहीं सकते ? किस दर्शनशास्त्र के सिद्धान्त के अनुसार आप उस विशाल धन-संपदा को प्राप्त कर सकते हैं, जिसका आप कभी स्वप्न में भी विचार नहीं करते? जब आपका यही दृढ़ विश्वास है कि गरीवी ही आपके भाग्य में लिखी है; तो संपन्नता आपके पास कैसे आ सकती है? सीमितता हमारे अपने अन्दर है, विधाता में वह सीमितता नहीं है । ईश्वर तो चाहता है कि उसके बच्चे विश्व की तमाम अच्छी चीजों को प्राप्त करें, क्योंकि उसने सबको एक समान बनाया है। यदि हम उन पदार्थों को प्राप्त नहीं कर सकते, तो इसका कारण यही है कि हम अपने को सीमित, तुच्छ और हीन मान बैठे हैं । संसार में यह मान लेना सबसे बड़ा अभिशाप है कि कुछ लोग अवश्य गरीब रहेंगे। कुछ लोगों का यह दृढ़ विश्वास है कि संसार से गरीबी कभी नहीं मिट सकती; कुछ लोग अवश्य ही गरीव रहेंगे और कुछ अमीर। कुछ लोग इस विश्वास के बन्धन में जकड़े हुए हैं कि वे सदा गरीव ही रहेंगे । परन्तु ईश्वर ने मनुष्य के लिए जो जीवन-योजना बनाई है उसमें गरीबी, अभाव और भुखमरी को कोई स्थान नहीं है। इस धरती तल पर एक भी मनुष्य गरीब नहीं होना चाहिए। परन्तु कुछ चालाक लोग अधिक धन-संपत्ति समेट लेते हैं और कुछ भोले लोग इस मिथ्या विश्वास के बन्धन में जकड़े रहते हैं कि उनका जन्म गरीब बने रहने के लिए ही हुआ है। यह पृथ्वी विपुल धन-संपदा की खान है। इसमें इतने विपुल भण्डार अभी तक भरे पड़े हैं, जिन्हें अभी तक किसी ने छुआ भी नहीं। जो गरीब हैं, वे इसलिए गरीब हैं कि वे साधनों को हस्तगत करने का प्रयत्न करने की बजाय यह विचार करके थक-हार बैठे हैं कि उनका जन्म गरीब रहने के लिए ही हुआ है ! "पानी में भी मौन प्यासी मोहि देखत आवे हांसी।" संसार में सब कुछ है, आपके पास कुछ नहीं, तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि आपने इस विचार की दासता स्वीकार कर ली है कि आपका जन्म ही गरीब रहने के लिए हुआ है, क्योंकि आप अभागे हैं। अरे उठो, कड़कड़ाकर इस बन्धन की कड़ियां तोड़ - दो। - ---अपने विचारों को सीमित नहीं, असीम बनाओ, अपनी इच्छाओं को क्षुद्र नहीं, विशाल बनाओ, -अपनी कामनाओं को तुच्छ नहीं, महान् बनाओ, -अपनी आकांक्षा को ऊंची बढ़ाओ और हीनभावना को पास - मत आने दो। उठो, जीवन को बदलकर रख दो नवीन खोजी वैज्ञानिकों का मत है कि विचार ही पदार्थ हैं, विचार ही जीवन का अंग बनकर चरित्र को विशेष स्वरूप प्रदान करते हैं, और चरित्र ही हमारी आदतों पर, हमारी कर्तृत्व-शक्ति पर नियंत्रण रखता है और यदि हम अपने मन में भय के विचार को पालते-पोसते हैं, अभाव के विचारों को पनपने देते हैं, यदि हम . .निर्धनता से भयभीत हैं तो हमारे निर्धनता के भय के कारण हमारा जीवन भय के वातावरण में परिचालित होता है, हमारा चरित्र डरपोक व्यक्ति का चरित्र बन जाता है, हमारी आदतें साहसहीन व्यक्ति की आदतें हो जाती हैं, हमारे कर्म प्रभावशून्य हो जाते हैं और परिणाम यह होता है कि जैसे धागों का ताना- वाना हम बुनते हैं, वैसा ही वस्त्र हमें प्राप्त होता है। हम इसलिए नहीं पैदा हुए कि कठिनाइयों में जीवन काटते रहें, अभावों में पलते रहें, कष्टों को सहते रहें, दीन-दुखी और दरिद्र बने रहें। हमारा जन्म इसलिए नहीं हुआ कि गरीबी के दमघोंटू वातावरण में जैसे-तैसे दिन काटते रहें। हमारा जीवन इसलिए नहीं कि जीने के लिए हम हर समय रोटी-पानी की चिन्ता में ही उलझे रहें। ईश्वर ने तो हमें वे सारी शक्तियां प्रदान की हुई हैं। जिनके बल पर हम अपने जीवन को विशाल, विपुल धनसमन्वित, पूर्ण स्वतंत्र और सुन्दर बना सकें परन्तु हमी ने हार मान रखी है। हमीं कुछ रद्दोबदल करने को तैयार नहीं। भाग्य को लेकर कोसते हुए बैठे रहने में ही हमने अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली है। यदि हम पूरी तरह स्वस्थ होते, मानसिक तौर पर समन्वित होते, तो हम अपने जीवन को केवल एक घटना न मान लेते बल्कि अपनी इच्छा के अनुरूप अपने जीवन का निर्माण करने का पूरा प्रयत्न करते । परन्तु हमारे ख्याल ही गलत हैं---विचार ही दूपित हैं-सर्वोत्तम प्राणी होते हुए भी हमने अपने आपको 'वेवस' और 5 'अभागा' मान लिया और समय की चपेट सहते हुए किसी तरह है यदि हम सात र म ग -- दिन काटते रहते हैं। अपने मन के हीन विचारों को दूर कर दें, सर्वोत्तम कोटि की मानवता को अपना लें, जीवन को सुन्दर, विशाल, उदार और उदात्त बनाने का संकल्प कर लें, तो हम क्या नहीं कर सकते ? निश्चय कर लीजिए कि आप गरीबी के विचार की ओर से ही मुंह मोड़ लेंगे और ईश्वर के बनाए विपुल भण्डारों की ओर देखने का प्रयत्न करेंगे । संकल्प कर लीजिए कि आप अपने मन से कमी के विचार, गरीबी के विचार, अभाव के विचार को बाहर निकाल देंगे और उनके स्थान पर विपुलता के विचार, सम्पन्नता के विचार, तथा असीम धन-संपत्ति और पदार्थों के विचार को स्थान देंगे। दृढ़ निश्चय कर लीजिए कि आप मन में उत्साह तथा उल्लास भरकर विपुल धन-संपत्ति की आशा करेंगे । आपके लिए यही उचित है। तीव्र इच्छा में ही रचनात्मक शक्ति समाहित होती है। विपुल धन-संपत्ति प्राप्त करने की इच्छा तीव्र कीजिए, तब आप उसे अवश्य पाएंगे । इच्छा से प्रयत्न का जन्म होता है, प्रयत्न से फल को अलग नहीं किया जाता, प्रत्येक प्रयत्न का परिणाम अवश्य ही होता है। इच्छा जगाइए-दूसरे शब्दों में अपनी रचनात्मक शक्तियों को जगाइए, अपनी कर्म-सामर्थ्य को जगाइए, अर्थात् अपने सोये हुए भाग्य को जगाइए। यह सच्चाई है कि हम अपने विचारों के ही जगत् में जीवन व्यतीत करते हैं, अपने विचारों के अनुरूप ही हम अपने जीवन का निर्माण करते हैं। हमें जिस प्रकार के विचार करने की आदत पड़ जाती है, उसी के अनुरूप हमारा चरित्न बनता है, जैसा हमारा चरित्र बनता है, वैसे ही हमारे काम होते हैं, जैसे हमारे काम होते हैं, वैसा ही हमारा जीवन-स्तर होता है। ! अरे विश्व के सर्वश्रेष्ठ प्राणी! तू ईश्वरीय अंश है। संसार में तेरा जन्म कीड़ों की तरह रेंगने के लिए नहीं हुआ तेरा जन्म गरीबी के नरक में सड़ने के लिए नहीं हुआ; बल्कि तेरा जन्म विशालतर, उच्चतर, महत्तर कार्यों के लिए हुमा है। अरे मनुष्य ! तू ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ सन्तान है। तेरे लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं । संसार का कोई भी धन, कोई भी सौन्दर्य, कोई भी सुख तथा कोई भी यश तेरे लिए अप्राप्य नहीं। कोई भी वस्तु तेरे लिए अलभ्य नहीं। तुम राजकुमार हो, तुम्हारा सभी रत्न भण्डारों पर जन्मसिद्ध अधिकार है-पहचानो अपने अधिकार को। क्यों मोह निद्रा में पड़कर गरीब बने हुए हो ? यदि जीवन का उद्देश्य विशालतर बना लो, यदि जीवन का उद्देश्य उच्चतर बना लो, यदि ज़िन्दगी का मकसद इन्सान की खिदमत करना बना लो, तो इस चैलेंज से ही तुम्हारे जीवन का ढांचा बदल जाएगा। तुम्हारे अपने विचारों का घेरा ही तुम्हें गरीबी की सीमा से आगे नहीं बढ़ने देता। यह मोहनिद्रा है, तंगदिली है, मानसिक संकीर्णता है, स्वार्थ भावना है, जो तुम्हें अपने जीवन में परिवर्तन नहीं करने देती । हृदय को विशाल बनाकर ज्योंही बन्धन तोड़ेगी, त्योंही लक्ष्मी तुम्हारी चेरी हो जाएगी। उवासियां लेना छोड़िए, रेंगना छोड़िए, झींकना और शिकायतें करना छोड़िए, गिड़गिड़ाना और माफियां मांगना छोड़िए। अपने गौरव को पहचानिए, दृढ़ता से, स्थिरता से सीधे खड़े हो जाइये, अपने अधिकार को पहचानिए, संसार से अपना हक मांगिए और उसे प्राप्त करके रहिए। सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्- नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः- निर्वल व्यक्ति सत्य, शिव और सुन्दर को प्राप्त नहीं कर सकता, वह अपनी आत्मिक शक्तियों की पहचान नहीं कर सकता। अपने विश्वास की अंधता के कारण ही हम गरीबी में घिसटते रहते । हम विचारों के संकीर्ण घेरे में अपने आपको बन्द रखते हैं और भूल जाते हैं कि हमारा जन्मसिद्ध अधिकार क्या है और उसे हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं । मनुष्य की संरचना में, उसके - कोई स्तु वातावरण में असंख्य ऐसे साक्ष्य विद्यमान हैं जिनसे पता चलता है कि मनुष्य का जीवन विशालतर उद्देश्य की सिद्धि के लिए हुआ है, महत्त्वपूर्ण कार्यों को सम्पन्न करने के लिए हुआ है। उसे वढ़िया, श्रेष्ठ, उत्तम निर्माण करना है और विपुल धन-संपत्ति का स्वामी बनना है । उसे जीवन के सभी निष्पाप सुखों और निष्कलंक आनन्दों का स्वामी बनना है। फिर वह दुखी, गरीब, दीन-हीन और पतित क्यों बना हुआ र 7 T - जब मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, तो वह महान् वस्तुओं की, महत्तर कार्यों की उपलब्धि की आशा क्यों न करे ? जब वह ईश्वर का उत्तराधिकारी है, तो वह विश्व के समस्त सौन्दर्य का, विपुल धन एवं समस्त पदार्थ-समूह का स्वामी क्यों न बने ? समस्त सुन्दर एवं श्रेष्ठ पदार्थों के विशाल समूह के प्रति अपने मस्तिष्क को खुला रखने मात्र से, उनकी आशा करने और सराहना करने मात्र से, मनुष्य में उन्हें प्राप्त करने की योग्यता आने लगती है। महाराजाधिराज परमपतिा परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ सन्तान होकर भी मनुष्यों की अपार संख्या विश्व के उत्तमोत्तम पदार्थों से वंचित रहे, पदार्थों के विपुल एवं विशाल भण्डार की विद्यमानता में भी करोड़ों मनुष्य भूख से बिलबिलाएं तो प्रतीत होता है कि कहीं कोई भूल अवश्य है। वह भूल इस कारण है कि मनुष्य ने इस दशा को स्वयं बनाया है। जीवन में हमारी परिस्थितियां, हमारी आर्थिक दशा, हमारी निर्धनता या सम्पन्नता, हमारे मित्र या मिन्नों का अभाव, हमारी तालमेल या विरोध की स्थिति आदि बातें मुख्य रूप मे हमारे विचारों की ही सन्तान हैं। यदि हमारी मनोवृत्ति अभावों से भरी रही है, तो हमारा वातावरण भी उसी के अनुसार अभावों वाला र होगा। यदि हमारे विचारों में मुक्तता, उदारता, विशालता होगी, बहुलता, संपन्नता होगी और उसके साथ-साथ हम उसी के -- र - ar और र AC अनुरूप प्रयत्न एवं कठोर परिश्रम भी करते रहे होंगे, तो हम बहुलता एवं सम्पन्नता से भरपूर वातावरण के स्वामी होंगे। जीवन में हम जो कुछ पाते हैं, वह सब हमें विचारों के द्वार से ही प्राप्त होता है। यदि हमारे विचारों का दरवाजा तंग है, संकुचित है, संकीर्ण है, बदबूदार है, कंजूसी से भरा है, नीचता- पूर्ण है तो उस द्वार से हमें जो कुछ मिलेगा, उसका अनुमान सहज ही किया जा सकता है। जब हम उन लोगों को देखते हैं जो वर्षों से ही गरीबी की मार से जर्जर दशा में हैं, तो यदि भयंकर बीमारी न आयी हो, तो हम जानते हैं कि उनकी गरीबी का कारण प्राय: यह होता है कि परिवार में कोई पापी है; कोई गलत, दोषपूर्ण मानसिकवृत्ति वाला अपराधी है; कोई जुआ, शराब, चोरी, वेश्यावृत्ति आदि का दोषी है, जिसने परिवार की आर्थिक दशा को ध्वस्त करके रख दिया है और वर्षों बीतने पर भी आर्थिक दशा संभलने में नहीं आयी। संभव है, हमें उस परिवार का मुखिया ही दोपी दिखाई पड़े, जो निरन्तर अपने दुर्भाग्य को कोसता है कि उसे निरन्तर कमी और अभाव में दिन काटने पड़े हैं, हालांकि परिवार की इस हीन दशा का कारण वह स्वयं ही है। उसने गलत विचारों को अपने मन में घुसने दिया और परिणाम यह हुआ जो आज दिखाई पड़ता यदि आप अपनी वर्तमान स्थिति से असन्तुष्ट हैं, यदि आप यह अनुभव करते हैं कि आपका जीवन कठोर परिस्थितियों में वीत रहा है, या भाग्य आपके प्रति क्रूर रहा है, यदि आपको अपनी वित्तीय स्थिति के प्रति शिकायत है, तो खोजने पर आप पायेंगे कि घर-परिवार या समाज में चाहे आपकी स्थिति कैसी भी हो, वह स्थिति आपके अपने विचारों की ही वैध सन्तान है । और इसके लिए आप अपने सिवाय और किसी को भी दोप नहीं दे सकते। यदि आपके विचार शुद्ध हैं यदि आपका सोचने का तरीका सही है तो आपका जीवन भी सही ढंग का होगा, यदि आपकी विचराधारा निर्मल होगी, अर्थात् यदि आपका मन धन-संपन्नता के विचारों से, उदारता के विचारों से, दयालुता और दानशीलता के विचारों से भरपूर होगा और इसके साथ ही ठीक अपने विचारों के अनुरूप आप बढ़-चढ़कर प्रयत्न भी करते रहेंगे और आपके उद्देश्य भी वास्तविक होंगे तो परिणाम भी सर्वथा अनुकूल होंगे अर्थात् आप विपुल धन-संपत्ति के स्वामी होंगे। दूसरों के सहायक बनेंगे, खुले हाथों अच्छे कामों और अच्छे व्यक्तियों के लिए धन प्रदान करेंगे और धन, सफलता और यश के स्वामी होंगे। यदि हम समस्त अच्छाइयों तथा सारे श्रेष्ठ पदार्थों के मूल स्रोत, सर्व-शक्तिमान परमपिता परमेश्वर पर अटूट विश्वास करने लगें, तो समय आने पर इस बोये हुए बीज का महान् फल हमें अवश्य प्राप्त होगा और वह फल यह होगा कि विपुल धन का अनन्त प्रवाह हमारी ओर अबाध गति से प्रवाहित होने लगेगा, शक्ति का अनन्त प्रवाह हमारी ओर प्रवाहित होने लगेगा । जब सूर्योदय होगा, तो कमल आपसे आप खिल जाएंगे। इसी प्रकार हमारे अन्तःकरण में जब प्रभु विराजमान होगा, तो विपुल धन- सम्पत्ति के भण्डार आपसे आप भरपूर हो जाएंगे। अपनी आर्थिक दशा को सुधारने के लिए जो भी प्रयत्न सके, अवश्य कीजिए, अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा दीजिए । यदि आप अथक परिश्रम करेंगे, यदि निरन्तर प्रयत्न करेंगे, तो अवश्य ही आप परिवर्तन ला सकेंगे। वह दिव्य स्रोत ही सब प्रकार की आपूर्ति कर सकता है, उसी पर विश्वास करने से सब कुछ प्राप्त होता है। जिस प्रकार एक बच्चा अपने माता-पिता से बड़े अधिकार के साथ मनचाही वस्तु मांगता है, उसी तरह परमपिता परमात्मा से अपना अधिकार मांगिए । वह दया का भंडार है-अवश्य देगा। हमें अपनी शक्तियों के आधे भाग का भी ज्ञान नहीं है और हम अपने उचित अधिकार से आधे धन की भी इच्छा नहीं करते । यही । -- - कारण है कि धन की कमी से, पदार्थों की कमी से हम सिकुड़ते- सिमटते, घबराते-डरते हुए अपने दिन काटते रहते हैं। हम उस अनन्त धन राशि के अथाह स्रोत से महा विपुल धन- संपदा की मांग ही नहीं करते। हमें अपने अधिकारों का पूर्ण ज्ञान ही नहीं है। हम अपने को अपूर्ण मानकर अपने जीवन को भी अधूरा ही रखते हैं । उस पूर्ण भण्डार से अपना नाता क्यों नहीं जोड़ते ? हम अल्प और तुच्छ से सन्तुष्ट होकर क्यों बैठ जाते हैं ? यह ईश्वरीय इच्छा है कि मनुष्य ही विश्व के समस्त विपुल एवं अनन्त पदार्थ भण्डारों का स्वामी बने, प्रकृति के असंख्य भण्डारों का वही मालिक बने, उसके पास वे सभी वस्तुएं असंख्य, अपरिमित एवं अयाह हों जो अच्छी हैं, उपयोगी हैं, शुभ हैं। परन्तु बहुत-से मनुष्यों ने अपने विचारों द्वारा स्वयं ही अपने को गिरा रखा है, वे गिरा-पड़ा, दीन-हीन और मलिन जीवन ही व्यतीत करते रहते हैं और पता नहीं इस स्थिति को वे सहन कैसे करते हैं ! ऐसी स्थिति होने पर वे अकर्मण्य होकर कैसे बैठे रहते हैं ! श्रेष्ठ एवं उपयोगी, रमणीय एवं काम्य वस्तुओं की कमी या अभाव की स्थिति मनुष्य के लिए स्वाभाविक नहीं है। फिर इस स्थिति को आप क्यों सहन करते हैं ? आप जिस वस्तु की कामना करते हैं उससे अभिन्नता का अनु- भव कीजिए। पूरी तरह उसी के ध्यान में लीन हो जाइए। उसी पर अपने विचार पूर्णतया केन्द्रित कीजिए। उसके बारे में इस प्रकार से सोचिए कि उसे आप अपनी ओर कैसे आकर्षित कर सकते हैं। अपने मन को उत्साहपूर्वक उसी पर केन्द्रित कर दीजिए, उसे प्राप्त करने की अपनी योग्यता पर तनिक भी सन्देह न कीजिए । उसी के लिए सतत प्रयत्न कीजिए, तब आप उसे प्राप्त करने की योग्य स्थिति में अपने को पाएंगे। निर्धनता प्रायः एक मानसिक विकार या मनोरोग है । यदि आप इस रोग का शिकार हैं, तो इसका इलाज कीजिए और आपको आश्चर्य होगा कि इसका इलाज आसान है। अपने मन की . वृत्तियों में परिवर्तन लाइए, अपनी मनोदशा को सर्वथा बदल डालिए और मन से हीनता, पस्तहिम्मती , परास्तता, दरिद्रता, सुस्ती को • दूर भगा दीजिए, मन से गरीबी के चित्र को उतार फेंकिए और उसके स्थान पर संपन्नता एवं विपुलता के चिन को सुशोभित । कीजिए, विशालता, स्वतन्त्रता एवं प्रसन्नता को मन में लाइए । 1 -- सफलता, पूर्णतया वैज्ञानिक मानसिक प्रक्रिया की उपज होती है जो व्यक्ति दृढ़ विश्वास रखता है कि वह धन-सम्पन्न अवश्य होने वाला है, केवल वही-धन-संपत्ति को प्राप्त करने में सफल होता है। पूर्ण विश्वास सब प्रकार की उपलब्धियों के लिए पहली अनि- वार्य शर्त है । पूर्ण विश्वास रखने वाला व्यक्ति अपने मन में सन्देह और भय को लेशमात्र भी स्थान नहीं देता। वह अपने मन में गरीबी के विचार तक नहीं आने देता। वह दीवालिया आदमी की तरह नहीं बोलता या चलता। वह दीवालिये या भिखारी की भांति वेश नहीं धारण करता। वह तो उसी ओर मुख किए आगे बढ़ता है, जिधर उसकी प्राप्तव्य वस्तु हो । वह धन-संपत्ति को प्राप्त करने के लिए दृढ़ निश्चय से मन को हर समय परिपूर्ण रखता है। उसके विरोधी किसी विचार को भी वह अपने चित्त में नहीं घुसने देता। इस देश में आधे से अधिक ऐसे लोग हैं, जो आधी गरीवी की अवस्था में होते हुए भी उसी में सन्तुष्ट हैं। वे अपना भाग्य ही इतना समझते हैं। वे अपनी स्थिति को बदलने के लिए प्रयत्न या संघर्ष की जरूरत ही नहीं समझते हैं । वे धनी बनने के लिए कभी भी सिर-धड़ की बाजी नहीं लगाते । वे आशा ही छोड़ बैठते हैं, प्रयत्न करने की बजाय हाथ पर हाथ धर कर बैठना और भाग्य को कोसते रहना ही उनका श्रम हो जाता है। वे आर्थिक स्वतन्त्रता की आशा-अभिलाषा ही छोड़ बैठते हैं । गरीबी से त्रस्त होकर बहुत-से लोग अपने को निरन्तर गरीब । रखते हैं । वे कमी और अभाव को ही अपना भाग्य मानकर सिर झुका देते हैं और इस स्थिति के विरुद्ध विद्रोह करने का भाव ही उनके मन में नहीं उठता। दरिद्रता, कमी, अभाव और भुखमरी की दशा को अनिवार्य मानकर उस स्थिति के सामने हथियार डाल देते हैं। बहुत-से परिवारों में बच्चों के मन गरीबी के विचारों से विकृत कर दिए जाते हैं । प्रभात से रात्रिकाल तक वे गरीबी का ही रोना सुनते रहते हैं और उन्हें भी इस विलाप में अपना स्वर मिलाने की आदत पड़ जाती है । वे सुनते हैं कि घर में प्रत्येक व्यक्ति कमी, अभाव, गरीबी और भूख की ही बातें करता रहता है। वस, वे भी उसी प्रकार की बातों में अपना काल-यापन करते रहते हैं और इसी में अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। इस प्रकार के वातावरण में पले हुए बच्चे यदि उत्साहहीन, उद्यमहीन, उल्लासहीन, और गरीबी की मार से पीड़ित हों, तो आश्चर्य क्या? माता-पिता ने जो वातावरण तैयार कर दिया है, उसी में ये कीड़ों की तरह रेंगते नजर आते हैं और कोई भी उन्हें यह नहीं बतलाता कि तुम राजकुमार हो, विश्व के सर्वश्रेष्ठ प्राणी हो, ईश्वर के अंश हो । तुम अपने वातावरण को सर्वथा बदल डालने की शक्ति रखते.हो। बहुत-से लोग 'संकट या, मुसीवत के दिन' के भय से निरन्तर त्रस्त रहते हैं ।अनागन काभय उन्हें हर समय डराता रहता है और यह भय उनकी कार्य-शक्ति को क्षीण कर देता है तथा उनके उत्साह एवं उल्लास को छीन लेता है। इस प्रकार वे गलत ढंग की कल्पना द्वारा अपने जीवन के भार को और भी बढ़ाकर उसे अधिक बोझिल बना डालते हैं। चाहे आपका वातावरण कितना ही अन्धकारपूर्ण हो, चाहे आपकी परिस्थितियां कितनी ही कठोर हों, फिर भी आप निराशा को कदापि अपने मन में स्थान न दें। अपने मन में पदार्थों की कमी का विचार, अभावों का विचार कभी भी न घुसने दें। निराशा का ताना-बाना बुनेंगे, तो इनसे बुना कपड़ा भी वैसा ही होगा। - चाहे आपकी परिस्थितियां कितनी ही जकड़ने वाली क्यों न हों, कड़कड़ाकर उनके बन्धनों को तोड़कर बाहर निकल जाइए और उद्यम, श्रम, प्रयत्न, आशावाद, उत्साह और साहस के द्वारा अपने मौजूदा हालात को, अपने वर्तमान वातावरण को सर्वथा बदल डालिए। आपके अन्दर जो भी अच्छाई है, जो भी गुण है, जो भी कार्य-शक्ति और कर्म-सामर्थ्य है उसे प्रकट करके दिखलाइए । - . गरीबी के आगे सिर झुकाने वाला दर्शनशास्त्र ही असमीचीन है। यह फिलासफी ही बिल्कुल गलत है। जो दशा आपको अप्रिय है उसे तनिक भी सहन मत कीजिए। उथल-पुथल मचाकर उसे बिल्कुल बदल डालिए। जो स्थिति आपको किसी तरह के बन्धन में जकड़कर गुलाम बनाती है, उस स्थिति को सर्वथा भंग कर दीजिए। अपने सर्वोत्तम गुणों को प्रकट कीजिए और अपनी स्थिति को धन- संपत्ति से भरपूर, आनन्द और उल्लास से समन्वित, कर्म और श्रम से युक्त बनाइए। जो व्यक्ति वकील बनना चाहता है, उसे कानून के विद्यालय में--लॉ कालेज में प्रविष्ट होना होगा, अन्यथा वह असफल होगा। हम जिस चीज की आशा रखते हैं, उसे ही पाने की ओर हमारी प्रवृत्ति होती है। नदी अपने मूल स्रोत से अधिक ऊंचाई पर कभी प्रवाहित नहीं होती, इसी प्रकार यदि आपके मन में गरीबी के हीन विचार हैं, तो आपकी आर्थिक दशा उनसे ऊंची कैसे हो सकती है ? यदि आप आधी गरीवी की दशा में सन्तुष्ट हैं, तो वह कौन-सी शक्ति है, जो आपको विपुल धन-संपत्ति का स्वामी बना देगी? जो मनुष्य अपनी विजय में दृढ़ विश्वास रखता है, जिसका यकीन है कि वह विशाल धन-संपत्ति का स्वामी बनकर ही रहेगा, वह सबसे पहले अपने मन को समझाकर मना लेगा कि वह धनाढ्य व्यक्ति बनने जा रहा है, सफल होने जा रहा है, विजयी होने जा रहा है। वह अपने मन में यह कभी नहीं कहेगा- "प्रयत्न का लाभ ही क्या है ? बड़े व्यापारी-व्यवसायी सारे अवसर हथिया रहे हैं। हमारे लिए चांस कहां है, मुझे कभी विश्वास नहीं होता कि मैं अपनी वर्तमान स्थिति को बदल सकता हूं। फिर मैं क्यों न नम्रतापूर्वक अपनी वर्तमान स्थिति में ही गुजारा करता रहूं?" इस प्रकार के विचार विजयी व्यक्ति के मन में कभी नहीं आते; बल्कि वह सचेष्ट एवं सतर्क रहकर ऐसे हीन विचारों को कभी अपने मन में नहीं घुसने देता। अपना मुंह, आशा तथा विपुल धन-संपत्ति के सूर्य की ओर रखिए। उस तरफ पीठ मत कीजिए। पीठ कीजिए निराशा की ओर । प्रत्येक मनुष्य को धन-संपन्न बनने का अधिकार है। 'विपुल पदार्थों को प्राप्त करना' मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। प्रत्येक सफलता या उपलब्धि का मूल स्रोत या विकास-स्थान मन है । सफलता के बीज सर्व प्रथम मन में ही बोये जाते और अंकु- रित होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसी भी भवन का जन्म सर्वप्रथम स्थपति (architect) के मन में होता है । वह जैसी योजना बनाता है और उसके लिए जैसी रूपरेखा मन में धारण करता है, ठीक वैसा ही भवन बनकर मूर्त रूप में प्रकट होता है । इसी तरह यदि आपकी भावना धन-संपत्ति के विचारों से परिपूर्ण है तो समय पाकर वह अंकुर महावृक्ष का रूप भी धारण कर सकता है । जैसा विचार (idea) होगा, वैसा पदार्थ (material) बनकर तैयार होगा। बहुत-से लोग धन उपार्जित करना चाहते हैं; परन्तु वे अपने मन को इतना संकुचित, इतना संकीर्ण, इतना तंग रखते हैं कि विपुलता का विचार ही उसमें प्रविष्ट नहीं होने देते। ऐसे व्यक्ति क्षुद्र एवं तुच्छ प्राप्ति पर ही सन्तुष्ट होकर बैठ जाते हैं- सुपूरा स्यात् कुनदिका, सुपूरो मूपकाञ्जलिः । सुसन्तुष्टः कापुरुपः, स्वल्पकेनंव तुष्यति ॥ जो मनुष्य धन संपन्न होने की आशा करता है, वह हर समय - हर समय रह हैं । हर समय वही आपके दिमाग में छाया रहा है, अब उसकी अपने मस्तिष्क में धन बनाने के विचारों को भरे रहता है, वह हर समय धन उपार्जित करने की योजना बनाता रहता है। मानसिक रूप में वह आर्थिक ढांचा खड़ा करता रहता है। सबसे पहले मन में धन-ऐश्वर्य का स्पष्ट चिन्न अवश्य ही बनना चाहिए। बाद में उस चित्र या खाके के अनुसार भवन बनाना सरल हो जाता है । जितना विचार सूझना कठिन है, उतना ढांचा खड़ा करना कठिन नहीं है । मकान का नक्शा बनाना कठिन है-ईंट, गारा, चूना, सीमेंट लगाना अपेक्षाकृत आसान काम है। धन की कल्पना करना, उसकी आशा करना, उसकी योजना बनाना, उसका विवरण-सहित खाका बनाना, मिथ्या स्वप्न देखना कदापि नहीं, यह तो मन और मस्तिष्क की धन-संपन्न बनने की तैयारी है, यह तो मानसिक योजना है, मानसिक निर्माण है, जिसे क्रियान्वित करना अपेक्षाकृत सरल है। प्राय: जो व्यक्ति धनाढ्य बनने के सपने देखा करता है, वह उसके उपाय भी सोचने लगता है,वह अपनी कार्यकुशलता, चतुरता, कर्मठता पर विश्वास करने लगता है, बाद में जब वह सचमुच धनाढ्य बन जाता है, तब दुनिया दंग रह जाती है; परन्तु उसकी है मानसिक तैयारी को कोई नहीं जानता। र आप अपने मन में धनाढ्य बनने की कोई नयी कल्पना सोचें, विपुल धन प्राप्त करने का नया चित्र अपने मन में बनाएं, कोई पने नयी योजना बनाएं, उसके सम्पूर्ण विवरण को लिख लें और उस कि व्योरे के अनुरूप साधन-सामग्री, सहायक व्यक्तियों की एक योजना- वित बद्ध सूची बना लें । अब ईश्वर की उपासना करके सच्चे दिल से उससे याचना करके, अपनी योजना को क्रियान्वित करने में लग जाइए। कोई परिश्रम, कोई प्रयास, कोई प्रयत्न अधिक मत समलिए-आपको स्वयं आश्चर्य होगा कि आपके सव कार्य स्वयमेव बनते जाएंगे। अब तक आप शायद गरीवी के देवता की ही उपासना करते -- T की सफलता और प्रसन्नता के साधन 51 / । जगह अपने मन-मन्दिर में सर्वशक्तिमान, सबके दाता, औढरदानी परमपिता परमेश्वर को विराजमान कीजिए। भगवान का नाम लेकर दृढ़ निश्चय कीजिए कि आप अपनी योजना के अनुसार विपुल धन-संपत्ति प्राप्त करके ही रहेंगे। अपने को ईश्वर से अभिन्न समझकर उसकी सर्वशक्तिमत्ता के अंश का अनुभव अपने अन्तः- करण में कीजिए, इस बड़े 'पावर हाउस' से अपना 'कनेक्शन' जोड़ लीजिए। सब भंडारों का वही मालिक है, वही सबका दाता उससे धन-संपत्ति का विपुल भंडार पूरी श्रद्धा से, सच्चे दिल से मांगिए-फिर देखिए धन-संपदा का असीम प्रवाह आपकी ओर प्रवाहित होने लगेगा। गरीव वह नहीं जिसके पास संपत्ति न हो, बल्कि वही गरीब है जो मन का दरिद्री है। जो उठकर कहीं जाने को तैयार नहीं, किसी से मिलने को तैयार नहीं, कुछ करने की तमन्ना नहीं रखता, वही गरीब जो दरिद्रता के विचारों को सर्वथा त्याग देता है, जो दूसरों से सहानुभूति रखता है जो दूसरों की सच्चे मन से सराहना करता है जो धन-संपत्ति को निन्दा नहीं करता, जो दूसरों को धनसंपत्ति देख- फर जलता-कुढ़ता नहीं, जो किसी परिश्रम से नहीं डरता, किसी प्रयत्न से नहीं सकुचाता, किसी साहस से नहीं कतराता-वह अवश्य ही एक दिन विपुल धन-संपत्ति का स्वामी बनेगा। इसके विपरीत जो दरिद्रता से ग्रस्त है, अपने विचारों में हर समय गरीबी ही गरीवी के लक्षणों को भरे रहता है, जो अपने को गरीव मानता है और गरीबी से ऊंचे उठने की तनिक भी आशा नहीं करता, जो धनी बनने के लिए अपने को योग्य नहीं समझता, । जो हलचल नहीं करना चाहता, जो परिश्रम, प्रयत्न, साहस में संकोच करता है, जो काम-धन्धा करने से डरता रहता है, वह दरिद्र ही बना रहता है। मानसिफ दीवालियापन ही मनुष्य को दीवालिया फरता है, मानसिक गरीबो ही मनुष्य को गरीब बनाती है। . - - मानसिक उपलब्धियों की सफलता की शक्ति बहुत ही कम व्यक्ति जानते हैं । वे यह नहीं जानते कि जो कुछ रचना होती है, जो भी निर्माण होता है, वह पहले मन का एक विचार ही होता है, जो बाद में कर्म द्वारा क्रियान्वित किए जाने पर ठोस या मूर्त रूप धारण करता है। वस्तुजगत् में प्रकट होने से पूर्व प्रत्येक वस्तु विचार के रूप में उद्भूत होती है । मानसिक निर्माता का हर क्षेत्र में अधिक मूल्य है । आर्किटेक्ट की सेवा का राज-मजदूर की सेवा की अपेक्षा सदा और सर्वत्र अधिक मूल्य होता है। कोई मॉर्गन या रॉकफेलर पहले मानसिक रूप में ऐसी स्थि- तियों का निर्माण करता है, जिससे धन-संपदा का प्रवाह उसकी ओर बेरोक प्रवाहित होने लगे। संसार में जो व्यक्ति सबसे अधिक धना- ढ्य हैं या हो चुके हैं, अपने हाथों से वे बहुत कम काम करते रहे हैं। वे तो व्यावहारिक स्वप्नद्रष्टा होते हैं । कल्पना करना, सपने देखना, योजनाएं बनाना ही उनका काम होता है । सोचते-विचारते वे मानसिक आदर्श तक जा पहुंचते हैं, और अपने आदर्श की एक सुन्दर मूर्ति अपने मन में ही बना लेते हैं। यह आदर्श मूर्ति उनकी महत्त्वाकांक्षा की सजीव प्रतिमा होती है । इसके निर्माण में अपनी बुद्धि को पूरी तरह लगा देते हैं और एक दिन उनकी कल्पना साकार रूप धारण करके प्रकट हो जाती है। बड़े भवन, कार- खाने व्यापारिक संस्थान पहले बीज रूप में व्यक्ति के मन में उपजते हैं। यह बीज ही अंकुरित होता, वढ़ता, पुष्ट होता, पल्लवित-पुष्पित होता हुआ एक दिन महान् वृक्ष का साकार रूप धारण कर लेता है। जिस प्रकार नन्हे-से वीज में एक महावृक्ष कुंडली मारे बैठा है, उसी प्रकार छोटी-सी कल्पना में पर्वताकार विपुल धन-संपत्ति छिपी बैठी है। धन-संपन्न बनना हो, तो अपनी मनोवृत्ति में परिवर्तन लाइए, उसे धन-संपन्नता के विचारों से परिपूर्ण कर दीजिए । सोचने- विचारने में कंजूसी मत कीजिए, वचन में दरिद्रता न दिखाइए, आकार, इंगित, चेष्टा, भाषण, हावभाव और वेशभूषा से दरिद्रता मत , दिखाइए । अपने श्वास-प्रस्वास से आत्मविश्वास की भावना प्रकट कीजिए। जिस वस्तु को पाने के लिए आप प्रयत्नशील हैं, उसके लिए सतर्कतापूर्ण परिश्रम एवं प्रयास कीजिए; उसे प्राप्त करने के लिए पूरी तरह वातावरण तयार कीजिए। फिर आपकी उपलब्धि दूर नहीं होगी। अपने को धोखा मत दीजिए-आत्मवंचना पाप है। आप जिस काम को कर सकते हैं, उसे करते क्यों नहीं ? क्या आप भाग्य के भरोसे दीन-हीन दशा में ही पड़े रहेंगे ? क्या अपनी हालत बदलने का विचार आपके मन में आता ही नहीं ? मन से यह विचार निकाल दीजिए कि कंजूस, मक्खीचूस बन- कर आप धनाढ्य बन जाएंगे। 'अफियां लुटें और कोयलों पर मोहर' वाली कहावत चरितार्थ मत कीजिए। मन को संकीर्ण और संकुचित बनाना धन-संपन्नता का मार्ग नहीं है। विशाल, उदार एवं उदात्त विचारों को अपनाइए। अपने व्यक्तित्व को प्रभावी वनाइए। अपनी साख को मजबूत और प्रभावशाली बनाइए। जिधर हमारा ध्यान होता है, उधर ही हम जाते हैं। यदि हम गरीवी पर अपने ध्यान को एकाग्र किये रहेंगे, तो गरीन ही रह जाएंगे। समय मत गंवाइए। विपुल धन-संपत्ति के उपार्जन पर चित्त को एकाग्र कीजिए गरीबी की स्थिति को दूर करके धनाढ्य का वातावरण बनाइए। सबसे पहले हमें अपनी आन्तरिक दरिद्रता पर विजय प्राप्त करनी होगी। पहले मन की गरीबी को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। उसके बाद ही हम बाहरी दरिद्रता को दूर करके धनाढ्य बनने में समर्थ हो सकेंगे। विपुलता और संपन्नता का वास्तविक अभिप्राय है उन सभी वस्तुओं तथा सद्गुणों की प्राप्ति जो श्रेयस्कर हैं, जिनकी सभी सराहना करते हैं। जीवन में जो कुछ श्रेष्ठ है, सुन्दर है, हितकारी है, उदात्त है, प्रेरक है उसकी प्राप्ति ही संपन्नता है, धन-संपत्ति उसी का एक भाग है । वह सब कुछ सम्पन्नता है, जिससे बहुमूल्य व्यक्तित्व का निर्माण होता है । जिससे जीवन भरा-पूरा बनता है । .
- और मानवीय अनुभवों में वृद्धि होती है । मानसिक सम्पूर्णता, जीवन की सर्वांगपूर्णता, पदार्थ माना की विपुलता, असीम पूर्ति करने की सामर्थ्य,सभी सद्गुणों का समुच्चय, व्यक्तित्व की श्रेष्ठता, चरित्र की उच्चता-इसे कहते हैं सच्ची संपन्नता और यह एक ऐसी स्थिति है जिसे संकटों के तूफान भी हिला नहीं सकते।
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महत्त्वाकांक्षा के विपरीत चेष्टा तथा प्रयत्न धन-संपन्नता सबसे पहले मन में उत्पन्न होती है । यदि मन उसके विरुद्ध सक्रिय है, तो धन-संपन्न होना असंभव है । चाहना कुछ तथा करना कुछ—यह एक घातक स्थिति होती है । सव प्रकार की रचना पहले मन में उद्भूत होती है। बाद में मन के बनाये ढंग-ढांचे के आधार पर वह रचना पदार्थ तत्त्व के रूप में-मूर्त या साकार रूप में दिखाई देती है। जो व्यक्ति गरीब रहने की आशा करता है, या आधी गरीबी की स्थिति को मंजूर कर लेता है, वह कभी भी विपुल धन-संपदा का स्वामी नहीं बन सकता। यदि आप किसी वस्तु की आशा नहीं करते, तो आप उसे नहीं प्राप्त करेंगे। जब आपका एक-एक पग असफलता की ओर आगे बढ़ता जाता है, तो आप सफलता के मन्दिर तक कैसे पहुंच सकते हैं ? आपने अन्धकार की ओर मुंह किया हुआ है, निराशा से आपका चित्त भरा हुआ है, आपकी चित्तवृत्ति अकर्मण्यता से भरी हुई है, आप उल्टो दिशा की ओर बढ़ रहे हैं-फिर आपकी सारी शक्तियां बेकार हो जाएं और आपकी सारी योग्यताएं व्यर्थ सिद्ध हों तो इसमें आश्चर्य क्या?
। बहुत-से व्यक्ति जीवन की वास्तविकताओं का सही ढंग से सामना नहीं करते । वे अपने ही प्रयत्नों के अधिकांश भाग को अपनी ही चेष्टाओं द्वारा व्यर्थ कर देते हैं; क्योंकि उनकी मानसिक स्थिति में तथा उनके प्रयत्नों में परस्पर तालमेल नहीं होता। काम किसी और उद्देश्य के लिए करना और किसी अन्य उद्देश्य की सिद्धि की आशा करना नितान्त भूल है । जो ऐसा करते हैं वे गलत दृष्टिकोण के कारण मनोवांछित परिणाम को निरुत्सा- हित करते और दूर धकेलते हैं। वे अपने काम पर चित्तवृत्ति को एकाग्र करके, विजय के आत्मविश्वास को लेकर प्रयत्न करने में नहीं लगते--इसीलिए वांछित परिणाम दूर ही रहता है । दृढ़- निश्चय और आत्मविश्वास से अपनी सारी शक्तियों को उद्देश्य पर एकान किये बिना सफलता नहीं प्राप्त होती। आशा, दृढ़ निश्चय तथा आत्मविश्वास की कभी पराजय नहीं होती। धन-संपदा पाने की महत्त्वाकांक्षा रखना और सदा निर्धन रहने की आशा करना एक-दूसरे को काटने वाली चेष्टाएं हैं। आप जिस वस्तु को पाने की लालसा करते हैं, यदि उसे प्राप्त करने के लिए स्वयं अपनी योग्यता पर आपको ही विश्वास नहीं है, तो वह तो ऐसी ही बात हुई कि आप चलते तो पश्चिम की ओर हैं और पहुंचना पूर्व की ओर चाहते हैं । सफल होने का सिद्धान्त यह है कि आप जिसकी इच्छा करते हैं, उसे पाने की आशा भी करें तथा उसे पाने के लिए पर्याप्त शक्ति एवं आत्मविश्वास की भावना मन में भर लें। यदि आप अपनी ही योग्यता पर, अपनी ही कार्य सामर्थ्य पर भरोसा नहीं करते, तो आप असफलता को ही अपनी तरफ आकर्षित कर सकते हैं। जो व्यक्ति निश्चय ही सफल होना चाहता है, उसे अवश्य ही सफलता के भावों से भरा रहना चाहिए। उसे सदा ही प्रगति के विचारों से, रचनात्मक विचारों से, निर्माणात्मक विचारों से, सृजनात्मक भावों से, अन्वेषणात्मक भावों से तथा सबसे अधिक आशावाद से भरपूरक रहना चाहिए । । । - ..
आप जिस दिशा की ओर मुंह किये हैं, उधर ही आप जाएंगे। यदि आपका मुंह कभी, अभाव और भूख की ओर है, तो स्वभावतः आप उधर ही जाएंगे । इसके विपरीत यदि आप उधर से मुंह मोड़कर विपुल धन-संपत्ति की ओर मुंह कर लेंगे, उधर बढ़ना शुरू कर देंगे, अपने सारे प्रयत्नों को उसी दिशा की ओर मोड़ देंगे तो आप अवश्य ही विपुल धन-संपत्ति को प्राप्त करने में सफल हो जाएंगे। हममें बहुत-से लोग परस्पर विरोधी कार्य करने में ही लगे रहते हैं। उनकी एक चेष्टा दूसरी चेष्टा को काट देती है । जव हम अपने मन में यह विश्वास करते हैं कि हम धनी नहीं बन सकते, तो हम कैसे धनी बन सकते हैं ? जब हमारी मनोवृत्ति में ही गरीबी घर बनाकर बैठी है, तो वहां धन संपदा के आने के लिए स्थान ही कहां है ? हम जिस वस्तु को बनाने में लगे हुए हैं, वही तो बनेगी। हमारे विचारों की दरिद्रता, निराशा की भावना, सन्देह और भय की भावना, आत्मविश्वास की कमी और अकर्मण्यता ने ही हमें दरिद्र बनाया हुआ है। यदि आप धनी बनने के लिए प्रयत्नशील हैं, यदि आपने अपनी सारी योग्यता तथा कार्य-शक्ति धनाढ्य बनने के लिए लगा रखी है, तो आप दरिद्री और भिखारी का अभिनय मत कीजिए। आप अपनी मनोवृत्ति को विपुल धनाढ्य व्यक्ति जैसा बनाइए । अपना दिल खुला बनाइए । धनाढ्य व्यक्ति जैसा अभिनय कीजिए। अपनी किसी भी चेष्टा से निर्धनता को मत प्रकट कीजिए। जब तक आपने अपने इर्द-गिर्द दरिद्री जैसा वातावरण बनाया हुआ है, तव तक आपका गरीव जैसा ही प्रभाव दूसरों पर पड़ेगा, न आपकी साख जमेगी और न आप धन को अपनी ओर आकर्षित कर सकेंगे। कहावत है कि जितनी बार भेंड़ वोलती है, उतनी वार मुंह भर- कर घास खाने का अवसर गंवा देती है। जितनी बार आप अपनी - वर्तमान स्थिति की शिकायत करते हैं, उतनी बार आप डौंडी पीटते हैं कि आप गरीब हैं। यदि आप यह कहते हैं-"मैं गरीब आदमी हूं, जो काम दूसरे लोग करते हैं, वह मैं कभी नहीं कर सकूँगा, मैं कभी धनी नहीं बन सकता, मुझमें वैसी योग्यता ही नहीं जैसी दूसरे लोगों में है, मैं असफल हूं, भाग्य ही मेरे विरुद्ध है, तो समझ लीजिए कि आप अपने लिए कांटे विछा रहे हैं । तब आप निर्धनता रूपी शत्रु को परास्त करने का अवसर अपने हाथों ही खो रहे हैं । आप अपनी शान्ति तथा प्रसन्नता को नष्ट कर रहे हैं , कष्ट, बीमारी और निर्धनता को अपने पास बुला रहे हैं। विचार चुम्बक के समान होते हैं, वे अपने अनुकूल पदार्थों को आकर्षित करते हैं। यदि आपका मन निर्धनता पर ही विचार करता रहता है, तो आप निर्धनता को ही आकर्षित करते रहते हैं । यदि रोगों पर ही विचार करते रहते हैं, तो रोगों को अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं। यदि विषाद पर ही विचार करते रहते हैं तो विपाद को ही अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं। आप मन में जो चित्र बना रहे हैं, उससे विपरीत चिन्न नहीं प्रकट हो सकता- क्योंकि आपकी मनोवृत्ति जिस निर्माण के लिए प्रयत्नशील है, परिणाम उसी के अनुरूप होगा। आपकी समस्त उपलब्धियां पहले मन में जन्म ग्रहण करती हैं और बाद में बाहर प्रकट होती हैं । यदि आप हर समय व्यापार को मन्दा कहते रहते हैं, मन्दी की ही आशा करते रहते हैं, उसी के मुकाबले की तैयारी में लगे रहते हैं, सदा ही समय के विरुद्ध शिकायत करते रहते हैं, सदा ही धन्धा विगड़ने के भय से भयभीत रहते हैं, तो आप अपने व्यापार को : बढ़ाने, लाभ प्राप्त करने के लिए कुछ भी रचनात्मक काम नहीं कर सकते । निराशा की भावना को लेकर आप भले ही सफलता के लिए कितना प्रयत्न करें, आप सफल नहीं हो सकते क्योंकि निराशा और असफलता का भय आपकी कार्य-योग्यता तथा कर्म-सामर्थ्य पो को क्षीण कर देता है। |पंगु असफलता, अभाव और अनादर का वास मनुष्य की प्रबल ।
शक्तियों को भी मन्द कर देता है। इससे वांछित परिणाम प्राप्त करने वाली शक्तियों का ह्रास होता है। भय और नास व्यक्ति की कार्य-सामर्थ्य को चूस लेते हैं । फिक्र-चिन्ता से मनुष्य का प्रभाव कम हो जाता है और सफलता के लिए जो रचनात्मक चेष्टा आवश्यक है, उसके लिए मनुष्य में हिम्मत ही नहीं रहती। प्रत्येक कार्य की ओर रचनात्मक दृष्टि से देखना, उसके उज्ज्वल पक्ष की ओर देखना, उसकी ओर आशा भरी नजरों से देखना, उसकी सफलता का भरोसा करना, अपने मन को बार-बार उसकी सफलता का विश्वास दिलाते रहना, संदेह और संशय के भावों को लगातार दूर करते रहना, सर्वोत्तम परिणाम अवश्य होगा, ऐसा पक्का यकीन करना, सच्चाई और अच्छे काम की अवश्य विजय होगी ऐसा दृढ़ विश्वास रखना, अच्छे कर्ता की निशानियां हैं। ऐसे कर्ता की अवश्य विजय होती है। सन्तुलन, स्वास्थ्य तथा सफलता ही वास्तविकताएं हैं। असन्तुलन, रोग एवं असफलता इन्हीं के अभाव की स्थिति के नाम हैं। आशावाद के बल पर ही आप सन्तुलन, स्वास्थ्य तथा सफलता को प्राप्त कर सकते हैं। आशावाद ही निर्माता है। आशावाद की स्थिति मानसिक सूर्योदय है । सूर्योदय जिस प्रकार वनस्पतियों के विकास के लिए आवश्यक है, उसी प्रकार आशावाद हर प्रकार के निर्माणात्मक कार्य की प्रगति के लिए आवश्यक है । आशावाद मानसिक सूर्योदय है, जिससे जीवन का निर्माण होता है, और सौन्दर्य का विकास होता है। आशावाद से तमाम मानसिक योग्यताओं का विकास होता है, 'ठीक उसी तरह जैसे सूर्योदय से पेड़-पौधों का विकास होता है । निराशावाद नकारात्मक है, ऋणात्मक है । निराशावाद वह घोर नरक है, जिससे मनुष्य की समस्त शक्तियां, सारी योग्यताएं पंगु हो जाती हैं और जीवन का विकास रुक जाता है। जो हर बात में निराशा देखते हैं, उनका भविष्य अंधकारमय २ । है। जो हर समय बुरे परिणाम का, असफलता का ही विचार करते रहते हैं, जो जीवन के अंधकारमय पहलू पर ही दृष्टि गड़ाए रहते हैं, वे जीवन में अवांछित घटनाओं को रोकने में असमर्थ रहते हैं। किसी वस्तु को आकर्षित करने का सबसे उत्तम साधन है- उसका विचार । प्रत्येक वस्तु का प्रतिबिम्ब उसके विम्ब के अनुरूप होता है, इसी प्रकार वस्तु वैसी ही होती है, जैसा उसके बारे में " हमारा विचार होता है । दूसरे शब्दों में, हम मन में जैसे विचार रखते हैं, वैसी ही हमारी रचना होती है। यदि कोई मनुष्य प्रसन्नचित्त तथा धनाढ्य बनना चाहता है तो उसे अवश्य ही अपने मन में प्रसन्नता और धन-संपत्ति के विचार को स्थान देना चाहिए। उसे निरन्तर इन्हीं विपयों पर सोचते रहना चाहिए । उसे अपने मन में हीन भावनाएं नहीं आने देनी चाहिए । जो व्यक्ति गरीबी से त्रस्त रहता है, वह प्रायः गरीब ही रहता है। -भय छोड़ो, निर्भय बनो, -आलस्य त्यागो, परिश्रमी बनो, -खतरे से मत डरो, साहसी बनो। यदि सुख चाहते हो, तो दुःख के विचारों को त्याग दो । यदि धन को आकर्षित करना चाहते हो, तो मन की दरिद्रता छोड़ दो। जिन बातों को आप नहीं चाहते, उनसे कोई संबन्ध न रखो । वे आपकी उन्नति के मार्ग में घातक शत्रु के समान हैं । अपने मन से निराशा के विचार को निकाल दो, उसे भुला दो, उसके विरुद्ध सोचो अर्यात् मन को आशावाद से भर लो। फिर आप यह देखकर चकित रह जाएंगे कि जिन पदार्थो की आप कामना करते थे, वे आपकी तरफ दौड़े चले आ रहे हैं। -अपने काम के प्रति उचित मनोवृत्ति अपनाइए, अपने उद्देश्य के प्रति उचित मनोवृत्ति बनाइए, -अपने लक्ष्य की ओर अपनी सारी चित्तवृत्ति को - । एकाग्र कीजिए। भले ही आज आप कितने निर्धन हों, आप भविष्य में धनाढ्य बनने की आशा कर सकते हैं। यदि आपका दृढ़ विश्वास है कि आप अपनी गिरी-पड़ी, दीन-हीन अवस्था को दूर करके विपुल धन-संपत्ति के स्वामी बनेंगे, तो अपने विचारों की दरिंद्रता को त्याग दीजिए। - आप उन विचारों में विचरण कीजिए, जिनमें सौन्दर्य है, प्रसन्नता में है, हर्ष है, आनन्द है । यदि आपकी महत्त्वाकांक्षा सर्वथा स्पष्ट है- उसकी रूपरेखा आपके मन में बिलकुल साफ है, तो अपने लक्ष्य पर दृष्टि गड़ा दीजिए, और आत्मविश्वास पूर्वक अपनी संपूर्ण योग्यता उसी की प्राप्ति के लिए लगा दीजिए । तब आपकी उपलब्धि अवश्य ही महत्त्वपूर्ण होगी। - मन में - । दृढ़ विश्वास रखिए कि एक दिन हम अपने मन में सोचा हुआ काम अवश्य पूरा करेंगे, भले ही उसके लिए इस समय हमें कोई उपाय नहीं सूझ रहा, कोई मार्ग नहीं दिखाई दे रहा, फिर भी यदि हम इस विश्वास को निरन्तर अपने मन में पुष्ट करते रहेंगे, तो एक दिन अवश्य आ जाएगा, जब उसके लिए उपाय स्वयं मिल जाएंगे, मार्ग स्वयं खुल जाएगा। मन की प्रवृत्ति को निरन्तर रचनात्मक कार्यों में लगाये रखने से, अपने उद्देश्य को निरन्तर अपने मन में पुष्ट करते रहने से, उसकी सिद्धि के अवसर अवश्य ती स्वयं पास आ जाते हैं । कभी-न-कभी कहीं-न-कहीं लक्ष्य सिद्धि मार्ग सूझ ही जाता है। जो व्यक्ति अपने पर भरोसा रखता हो, जो निरन्तर अपने द्देश्य के बारे में सोचता हो और अपनी कार्य-योग्यता पर विश्वास खता हो, जो अपनी दृष्टि को निरन्तर अपने लक्ष्य पर एकाग्र किये हता हो, जो पौरुष का मदमाता हो और डटकर परिश्रम तथा घर्ष करता हो वह जीवन में सफल न हो सके, यह असंभव है। सकी सफलता तो निश्चित है। अपने मन को ऊंचा उठाइए, अपनी चित्तवृत्ति को उच्चता के . । र है त र ले जाइए, अपना दृष्टिकोण सदा निर्माणात्मक-रचनात्मक खिए । अपने पर सन्देह मत कीजिए, अपनी कार्य-शक्ति पर कभी संशय मत कीजिए, तब आप जिस काम को भी हाथ में लेंगे उत्ती में सफल और विजयी होंगे। सन्देह और संशय सबसे बड़े धोखेबाज हैं-'संशयात्म विनश्यति'-सन्देह और संशय रचनात्मक शक्ति को नष्ट कर दे हैं, महत्त्वाकांक्षा को परास्त कर देते हैं। अपने मन में निरन्तर यही दोहराते रहिए-"मुझे जिस वस्तु की आवश्यकता है, उसे मैं अवश्य हीप्राप्त करूंगा-वह मुझे मिलन ही चाहिए। उसे पाने का मुझे पूर्ण अधिकार है और मैं उसे प्राप करके रहूंगा।" मन में सफलता का विचार निरन्तर धारण किये रहने आश्चर्यजनक चुम्बकीय शक्ति है । सफलता, स्वास्थ्य तथा प्रसन्ना के विचारों से यदि आपका अन्तःकरण हर समय परिपूर्ण रहता तो संसार की कोई शक्ति आपको इनसे वंचित नहीं रख सकती। अपनी विजय में विश्वास रखिए, इसे वारंवार दोहराइए, : पर अपना सारा ध्यान केन्द्रित रखिए, उत्साहपूर्वक अपने प्रया को जारी रखिए, उल्लासपूर्ण मन से बाधाओं को दूर करते आगे बढ़ते जाइए। आप अवश्य ही अपने उद्दिष्ट स्थल पर प जाएंगे। हमने एक व्यक्ति को देखा है, जब उसके आधे जीवन केस का संपूर्ण परिणाम एक ही दुर्घटना से मटियामेट हो गया था जब उसके पास कठोर परिश्रम तथा दृढ़ आत्मविश्वास के सि कुछ भी शेष नहीं रह गया था, और बहुत बड़े परिवार क भरने की जिम्मेदारी भी उसी पर थी परन्तु फिर भी उसने नहीं मानी थी। उसने यह नहीं माना था कि वह दुवारा अपने पर नहीं खड़ा हो सकता। इस प्रकार के व्यक्ति को निरुत्स करने का किसी में साहस न था। कारण यह था कि उसने पराजय ही स्वीकार नहीं की थी। उसने अपना लक्ष्य निा .
उतर पड़ा। कया और दृढ़ निश्चयपूर्वक वह कार्य-क्षेत्र में पुनः कुछ ही वर्षों में वह दुवारा मालामाल हो गया था। आप मानव हैं--संसार के सबसे श्रेष्ठ प्राणी हैं। आपका जन्म परिस्थितियों के हाथ की कठपुतली बनने के लिए नहीं हुआ। परि- स्थितियों का दास बनने से इनकार कर दीजिए। इर्द-गिर्द के वाता- वरण का गुलाम बनने से इनकार कर दीजिए। आपका जन्म परि- स्थितियों का निर्माण करने के लिए हुआ है, वातावरण का निर्माण करने के लिए हुआ है, ईश्वर ने आपको स्वतन्त्र कर्ता बनाया है । अपना कर्तृत्व प्रकट करके संसार को दिखलाइए । विना कारण कोई कार्य नहीं होता, और पहला कारण मान- सिक कारण होता है । मन की प्रवृत्ति ही सफलता या असफलता के लिए वातावरण का निर्माण करती है। हमारे कार्यों का परिणाम ठीक वैसा ही होगा, जैसे हमारे विचार होंगे । हमारे कार्यों का परि- णाम हमारे विचार के स्वरूप से भिन्न कदापि नहीं हो सकता। हमारा स्वभाव, हमारी आदतें, हमारी प्रवृत्तियां-ये सब हमारे विचारों के अनुरूप होती हैं । इन्हीं का हमारे सारे कामों पर गहरा भाव पड़ता है । यदि हम कुछ उत्पादन करना चाहते हैं, तो हमें अवश्य ही अपने मन को रचनात्मक-निर्माणात्मक स्थिति में रखना होगा। एक असन्तुलित, चिन्ताग्रस्त, निराश, निर्धनता से त्रस्त ज्ञानसिक स्थिति-ऋणात्मक अर्थात् नकारात्मक स्थिति है। इस 'स्थति में हमारे मन में निषेधात्मक विचार-~-शत्रु-विचार ही त्पन्न होते हैं, और उनसे हमारी संपूर्ण कार्य-शक्ति तथा कर्म- ग्यता का ह्रास होता है । इससे हमारी सफलता एवं प्रसन्नता के र्ग में घोर बाधा पड़ती है। हमारी मानसिक योग्यताएं हमारी दासियां हैं। वे हमें ठीक ही वस्तुएं देती हैं जिनकी उनसे हम आशा करते हैं। यदि हम न पर विश्वास करें-यदि हम उन पर भरोसा करें, तो वे हमें र्वोत्तम पदार्थ देती हैं । यदि हम भयभीत हों तो हमारी सारी नसिक योग्यताएं भी तस्त हो जाती हैं । निषेधात्मक अर्थात् -- । - ऋणात्मक (negative) चरित्नवाले व्यक्ति घटनाओं के होने की प्रतीक्षा करते रहते हैं । जो कुछ हो जाए, जो कुछ बन जाए--उसे वे सहन कर लेते हैं । वे समझते हैं कि उनमें होने वाली घटनाओं में परिवर्तन करने की शक्ति नहीं है। इसके विपरीत रचनात्मक अथवा धनात्मक (positive) मनो- वृत्ति वाले व्यक्ति घटनाओं में रद्दो-बदल करने की सामर्थ्य रखते हैं । वे घटनाओं को अपनी इच्छा के अनुकूल मोड़ने में समर्थ होते हैं। रचनात्मक (धनात्मक) मनोवृत्ति के द्वारा ही मनुष्य महान् कार्यों को करने में समर्थ होता है। जो मनुष्य निर्माण के लिए बेचैन होता है, वह अग्रणी होता है, काम को आगे धकेलने वाला होता है, उसमें उत्साह, उल्लास और साहस होता है, जिसके बल पर वह मनोवांछित वस्तु का उत्पादन करके संसार को दिखला देता है कि उसमें कितनी शक्ति है। एक दृढ़चित्त, उत्साही, साहसी व्यक्ति ऐसी परिस्थितिय का निर्माण करता है, जिसमें परिणाम उसकी आकांक्षा है अनुरूप हों। वह बरबस परिस्थितियों को अपनी इच्छा के अनुरू ढालता है। वह जानता है कि अपने आप कुछ नहीं होता; इसलि वह अपनी कार्यकारिणी शक्तियों को पूर्ण सामर्थ्य के साथ काम लगा देता है और सब वस्तुओं को अपनी आकांक्षा के अनुय तोड़ता-मरोड़ता, रद्दो-बदल करता, सुधारता, संवारता है 3 के अनुरूप परिणाम प्राप्त करके ही चैन लेता है । बहुत-से रचनात्मक मन वाले व्यक्ति कुछ दूसरे लोगों अपने ऊपर प्रभाव होने देते हैं और उन प्रभावों से उनका अ विश्वास कम हो जाता है । दूसरे लोग सुझाव देते हैं---"आर काम को पूरा करने की योग्यता नहीं रखते, आप इस व्या व्यवसाय को नहीं जानते, आप जिस पद पर हैं, उसके अनुन योग्यता आप में नहीं है।" इससे रचनात्मक मन वाला वह व्य माम को बारम्भ करने में हिचकिचाने लगता है । उसको इन अपनी इच्छा राक्ति दुर्बल हो जाती है, जब उसकी इच्छा उतनी तीव्र नहीं रहती उसके मन में उस कार्य का महत्त्व कम हो जाता है । इस प्रकार नेता बनने के गुणों से भरपूर व्यक्ति पिछलग्गू बन जाता है । हमने जिस काम को पूर्ण करने का संकल्प किया है, उसकी सिद्धि पर हमारा अटूट विश्वास होना चाहिए, हमें उसकी सफलता की आशा करनी चाहिए, हमें उसकी सफलता के लिए अपनी सम्पूर्ण मानसिक शक्तियां नियोजित कर देनी चाहिए, हमारी मानसिक शक्तियां अनिवार्यतः उस कार्य को सम्पन्न करके रहेंगी। आशा जितनी तीव्र होगी, उत्साह उतना ही उग्र होगा। उत्साह जितना उग्र होगा, मानसिक प्रयत्न उतना ही प्रचण्ड होगा। मान- सिक प्रयत्न जितना प्रचण्ड होगा, सफलता भी उतनी ही अद्भुत होगी। दूसरे शब्दों में,हमारी सारी मानसिक शक्तियों का स्वरूप हमारी आशा तथा संकल्प के अनुरूप होता है। जिस वस्तु को हसारा हृदय चाहता है उसके स्वरूप का निर्माण हमारी आशा-आकांक्षा, हमारे विश्वास, हमारे दृढ़ संकल्प और हमारे प्रयत्न द्वारा होता है । परिणामतः वह वस्तु साकार रूप में हमें प्राप्त हो जाती है। हमारे मन में वस्तु का जो चित्र विद्यमान रहता है उसी के बैटर्न पर हमारी सारी रचनात्मक शक्तियां निर्माण करने लगती । अन्त में उस मॉडल के अनुरूप हमारी उपलब्धि होती है। जिस शुभ आशा करने का वरदान मिला हुआ है, सदि वह अपने लक्ष्य की सिद्धि के लिए दृढ़ निश्चय कर लेता है, तो सके मार्ग में चाहे कितनी ही बाधाएं आएं, अपने संकल्प के बलपर 'ह उन बाधाओं को दूर कर देता है, फिर वह अपने काम में सफल ो जाता है---वह अपने शन्न -विचारों पर विजयी होता है, इसीलिए ह सफल होता है और यदि उसे शत्रु-विचार परास्त कर देते, ह काम को बीच में ही छोड़ देता और 'असफल' कहलाता। हमारे अन्तःकरण में महान् शक्तियां छिपी हुई हैं। उन्हें हम मनुष्य को . पा - नुर है तो - स्पष्टतः समझ नहीं सकते; परन्तु हम अनुभव करते हैं कि वे शक्तियां वहां विद्यमान हैं। वे शक्तियां हमारी आज्ञाओं का पालन करती हैं, वे हमारे दृढ़ निश्चय की पूर्ति का ध्यान रखती हैं। उदाहरणतः, यदि मैं निरन्तर यह विचार करता रहूं कि मैं कुछ नहीं हूं, मैं तो तुच्छ हूं, नाचीज़ हूं मैं एक बेचारे कीट के तुल्य हूं, मैं इतना अच्छा या योग्य नहीं हूं जितने कि दूसरे लोग हैं, तो इस प्रकार निरन्तर विचार करने से यह विचार मेरे मन में बद्ध- मूल हो जाएगा, यह वहां पक्की जड़ जमा लेगा। इस विचार की स्वीकृति मेरे लिए अवश्य ही घातक होगी। यह स्वीकृति अनजाने ही मेरे अवचेतन में स्थान बना लेगी तब मेरी मानसिक योग्यता कुंठित हो जाएगी और उसका बनाया पैटर्न तुच्छ होगा। यदि मेरे विचारों में दुर्बलता, अकुशलता और असमर्थता होगी, तो मेरे जीवन का सारा ताना-बाना दुर्बल, कुशलताहीन तथा सामर्थ्य रहित होगा। तव मेरे शब्दों द्वारा भी दुर्बलता, असफलता तथा निर्धनता की। बातें व्यक्त होंगी। इसके विपरीत, यदि मैं दृढ़ता से दावा करूं कि मैं विश्व के समस्त उत्तम पदार्थों को प्राप्त करने का अधिकारी हूं, सभी श्रेष्ठ वस्तुएं प्राप्त करना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, यदि मैं घोपण कर दूं कि श्रेष्ठ व्यक्तित्व मेरा अधिकार है। और निरन्तर इस पर जोर देता रहूं कि मेरा जीवनोद्देश्य महान है, जो मेरी प्रवृत्तियों से, मेरी रुझान से प्रकट होता है, और दावा व कि शक्ति पर मेरा अधिकार है, स्वस्थ रहना मेरा हक है, वीमारी से मेरा कोई संबंध नहीं, दुर्बलता से मेरा कोई रिश्ता नहीं, असन्तुलन से मेरा कोई वास्ता नहीं-तब मैं अपने मन को इतना रचा मा- त्मक; इतना क्रियात्मक, इतना धनात्मक, इतना प्रबल बनाने में समर्थ हो सकता हूं कि मैं वस्तुओं को नष्ट करने की अपेक्षा उत्पा. दन कर सकता हूं, तोड़-फोड़ की बजाय निर्माण कर सकता हूं, मैं उस पदार्थ को उपलब्ध कर सकता हूं जिसकी मेरे मन में उत्कट मभिलापा है। । - - - रचनात्मक चिन्तन का अर्थ है-स्वास्थ्य तथा धन-सपन्नता। हमारी योग्यताएं इसीलिए हैं कि हम पदार्थों का उत्पादन करें। निषेधात्मक (ऋणात्मक) चिन्तन का अर्थ है-चिन्ता, दीनता, अस्वस्थता तथा हर प्रकार का कष्ट । रचनात्मक विचार मनुष्य का संरक्षक है, वह व्यक्ति को असन्तुलन, निर्धनता तथा रोग से बचाता है । हारे हुए लोगों की फौज में वे ही लोग हैं जिनका चिन्तन ऋणात्मक अर्थात् निषेधात्मक (negative) होता है। विजयी व्यक्तियों की सेना में वे लोग हैं, जो रचनात्मक,क्रियात्मक, निर्माणात्मक तथा धनात्मक चिन्तन करते हैं। उत्साहपूर्ण, उल्लासपूर्ण, उद्यमपूर्ण, परिश्रमपूर्ण, साहसपूर्ण, धनात्मक मानसिक प्रवृत्ति व्यक्ति की सबसे बड़ी संरक्षिका है। जब 'नहीं' कहना चाहिए, तब हम संकोच, लाज के मारे 'हां' कह देते हैं, तो यह भी ऋणात्मक या नकारात्मक चिन्तन ही है । जब हमारा निर्णय दोपपूर्ण होता है, तब हम गलत सौदे कर बैठते हैं, साहस के समय धन लगाने से चूक जाते हैं और सव प्रकार की मूर्खतापूर्ण कार्यवाहियां कर बैठते हैं । निषेधात्मक (ऋणात्मक) मन इस स्थिति में ही नहीं होता कि वह महत्त्वपूर्ण अवसर पर कोई कदम उठा सके । जिस समय हमसे भूलें होती हैं , त्रुटियां होती हैं। गलतियां होती हैं; जब साहस दिखाने के समय हम रुक जाते हैं, और रुकने योग्य समय पर अपने को रोक नहीं पाते, जब हम निरुत्साहित होते हैं, निराश होते हैं, असंतुलित होते हैं और आराम की स्थिति में पहुंचने के लिए बुरा-भला कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं, तब हमारी चित्तवृत्ति निषेधात्मक विचारों से घिरी हुई होती है । जब हम भय या चिन्ता से ग्रस्त होते हैं तब हमारा मन निषेधात्मक (ऋणात्मक) विचारों से ग्रस्त होता है; क्योंकि निषेधात्मक स्थिति में मन सदा ही कायर हो जाता है। जिस समय विधेयात्मक (रचनात्मक) विचारों में रमते हैं, और कुछ कलात्मक सृजन करने में लीन होते हैं, उस समय निषे- धात्मक विचार, उत्साहहीनता के विचार, रुग्णता एवं असंबद्धता के विचार हमारे मन में प्रवष्टि नहीं हो सकते। वे उस समय हम पर आक्रमण नहीं कर सकते। ऋणात्मक विचारों अर्थात् भय, चिन्ता, फिक्र, घृणा, ईया, जलन और तोड़फोड़ आदि बुरे विचारों का हमारे मन पर तभी आक्रमण होता है, जब हमारे मन में कोई रचनात्मक विचार नहीं होता । जिस समय निर्माणात्मक शक्ति किसी रचना में लीन होती है, उस समय किसी भी घातक ऋणात्मक विचार का हमारे मन पर आक्रमण नहीं होता। ऋणात्मक मन ही चरम निराशा का ग्रास बनता है। सामान्य स्वस्थ मन नियम और कानून के अनुसार कार्य करता dic . रचनात्मक चिन्तन का अर्थ है--स्वास्थ्य, धन-संपन्नता हमारी योग्यताएं इसलिए हैं कि हम कुछ उपयोगी तथा सुन्दर उत्पादन करते रहें। निषेधात्मक चिन्तन का अर्थ है-दरिद्रता, गरीबी, दीन-हीनता, बीमारी और हर प्रकार के कष्ट । हमारी कार्यकुशलता को मापने का पैमाना यह है कि हम काम में स्वाभाविक रूप से (आदतन) कितनी शक्ति लगाते हैं और निरन्तर लगाते हैं या नहीं। अर्थात्- निरन्तर काम की आदत+पूरी शक्ति लगाकर काम-कार्य- कुशलता। कुछ व्यक्तियों में काम करने का सहज स्वभाव इतना मन्द होता है कि कुल मिलाकर उनके काम करने के घंटों का जोड़ (सर्व- योग) बहुत कम रह जाता है । वे अपने काम में पूर्ण उत्साह के साथ निरन्तर नहीं लगे रह सकते, अत: कुल उपलब्धि बहुत ही कम होती है। हम किसी व्यक्ति से पहली बार मिलते ही उसे देखते ही तुरन्त बतला सकते हैं कि उसकी कार्य-शक्ति प्रबल है या दुर्वल अर्थात् ---- ... धनात्मक है या ऋणात्मक, क्योंकि वह जितने वाक्य बोलेगा, प्रत्येक वाक्य इस रहस्य को प्रकट कर देगा। हमारे वाक्यों की किस्म (quality) हमारी कार्य-शक्ति से अवश्य प्रभावित होती है। रचनात्मक मनुष्य जहां जाता है अपनी क्रियात्मक शक्ति के वातावरण को साथ ले जाता है। कुछ व्यक्तियों की मनोवृत्ति इतनी रचनात्मक , इतनी निर्माणात्मक, इतनी धनात्मक, इतनी सका- रात्मक होती है और वे अपने साथ इतना प्रबल वातावरण लेकर चलते हैं कि साधारण मनुष्य सहज स्वभाव से ही उनका अनुकरण करने लगता है। इस प्रकार के प्रवल व्यक्तित्व वाले चरित्रवान के लिए संसार स्वयं मार्ग बना देता है। वह जहां विद्यमान होता है आदेश देता है और लोग उसकी आज्ञा पालन किया करते हैं । उसका एक- एक शब्द गहरे आत्मविश्वास से भरा हुआ होता है। लोग इस प्रकार के चरित्र वाले व्यक्ति के प्रभाव के कारणों का विश्लेषण करने की कोशिश नहीं करते, वे तो चुपचाप तथा सहज स्वभाव से ही उसके आदेशों का पालन करने के लिए दौड़ पड़ते हैं। कुछ अपरिचित हमारे सम्मुख आते ही अपनी रचनात्मक शक्ति से हमें प्रभावित कर देते हैं । उनका प्रभाव ही रचनात्मक, निर्माणात्मक, धनात्मक एवं आक्रामक होता है। वे किसी बड़े काम को पूर्ण करने का इरादा किये होते हैं और उनके आने पर हमें यह अनुभव होने लगता है कि नेता या नायक आ गया। उनके दर्शन करते ही हम अनुभव करने लगते हैं कि यह व्यक्ति निश्चय ही जिस काम को भी हाथ में लेगा, उसी में सफल होगा, हालात को इस व्यक्ति की इच्छा के मुताबिक ढलना-बदलना पड़ेगा। इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनके चेहरे से ही दुर्वलता टपकती है, नकारात्मक मनोवृत्ति के कारण वे हम पर ऐसा प्रभाव छोड़ते हैं कि वे लापरवाह हैं, असफल हैं, अपने मार्ग पर द्रुतगति से नहीं बढ़ रहे, अपनी राह पर उन्हें रोशनी नहीं दिखाई देती। यदि आप लोगों पर यह प्रभाव डालना चाहते हैं कि आपका व्यक्तित्व प्रवल है, तो आपमें रचनात्मक विचारों की प्रबलता होनी चाहिए । आपके मन पर निर्माणात्मक-धनात्मक विचारों का शासन होना चाहिए। सब कलाओं में श्रेष्ठ कला है-जीवन को सफल तथा विजयी बनाने की कला । इस कला को ठीक ढंग से सीखकर कोई भी व्यक्ति कुशल बन सकता है। जो ग्रेजुएट सफलता की कला में प्रशिक्षित हुए बिना जीवन- क्षेत्र में उतरता है, जिसे किसी ने यह न सिखाया पढ़ाया हो कि धनात्मक मनोवृत्ति और ऋणात्मक मनोवृत्ति किसे कहते हैं और दोनों में क्या अन्तर है और दोनों के विभिन्न अंगों का क्या विवरण है, वह शीघ्र ही असफल होकर घर लौटता है। उसके संशय और सन्देह, उसके भय और नास, उसकी आत्मविश्वासहीनता तथा संशयालुता, उसकी कायरता एवं कातरता से शीघ्र ही उसके निषेधात्मक मानसिक स्वरूप का दूसरों पर भेद खुल जाता है । उसकी उत्साहहीन भावनाओं के द्वारा उसकी स्वाभाविक रचना- त्मकता दब जाती है, धनात्मक प्रवृत्ति मन्द हो जाती है । वह जहां भी काम करता है, 'संस्थान पर एक बोझ' की भांति प्रतीत होता है । एक योग्य मनुष्य होता हुआ भी वह अनजाने ही ऋणात्मक प्रवृत्ति का शिकार हो जाता है। कॉलेज या विश्वविद्यालय की शिक्षा की बजाय, प्रत्येक विद्यार्थी या युवक के लिए यह जानना अत्यन्त आवश्यक है कि मन की रचनात्मक शक्तियों को जागृत, प्रवल एवं प्रभावशाली कैसे बनाया जा सकता है, मन को कैसे धनात्मक स्थिति में रखा जा सकता । है और कैसे ऋणात्मक एवं विघातक विचारों को दूर रखा जा सकता कसे मन को अकर्मण्यता से बचाया जा सकता है। कई बार हम देखते हैं कि कालेज में अच्छे गिने गये छान जब ग्रेजुएट होकर कार्य-क्षेत्र में उतरते हैं, तो वे निपेधात्मक मनोवृत्ति से इस प्रकार आझान्त होते हैं कि रचनात्मक कार्यों में, निर्माणात्मक ।
कर्म में असफल हो जाते हैं । यदि ग्रेजुएट होने के उपरान्त छात्रों के मानसिक प्रशिक्षण के कुछ मास के कोर्स की उचित व्यवस्था की जाए, तो उनकी मानसिक शक्तियों को वलशाली बनाया जा सकता है, उनकी दुर्वलताओं, त्रुटियों और कमजोरियों को वैज्ञानिक विधियों द्वारा सुधारा जा सकता है तथा उचित ढंग से सोचना सिखलाया जा सकता है। इस प्रकार के मानसिक प्रशिक्षण के बिना कॉलेज की शिक्षा का सम्पूर्ण कोर्स प्राय: प्रभावहीन ही सिद्ध होता है । धनात्मक विचारों से व्यक्ति में रचनात्मकता और उत्पादकता का गुण आ जाता है। इस प्रकार के विचारों से व्यक्ति का निषेधात्मक रुझान समाप्त हो जाता है। यदि आप में कार्य-प्रवृत्ति होने की रुचि नहीं है, यदि किसी काम को शुरू करने को आपका मन ही नहीं चाहता, तो इस प्रकार के प्रशिक्षण द्वारा आप अल्पकाल में ही रचनात्मक प्रवृत्ति वाले हो सकते हैं। धनात्मक विचारों के प्रशिक्षण द्वारा आपकी क्रियात्मक शक्ति में अद्भुत उत्पादकता लायी जा सकती है। इस प्रशिक्षण के बाद आप जिस काम में भी लगेंगे उसी में उपयोगिता तथा सुन्दरता आ जाएगी। यहां तक कि आपके मनोरंजन तथा हास-परिहास में भी कलात्मकता आ जाएगी। ऋणात्मक या निषेधात्मक विचार मन में लाना अपने को दुर्बल करना है। 'मैं यह भी नहीं कर सकता और वह भी नहीं कर सकता'-वाली मनोवृत्ति व्यक्ति की समस्त कार्य-शक्ति को कुंठित कर देती है । यह निराशा की भावना उत्पन्न करके मनुष्य को असफलता, पराजय और पतन की ओर ले जाती है। निराशावादी मन में तथा आशावादी मन में भारी अन्तर होता है-अन्य सारी योजनाएं समान होने पर-आशावादी का कार्य समीचीन, उपयोगी और सुन्दर होगा, जबकि निराशावादी का कार्य असंगत, असंबद्ध, अनुपयुक्त एवं कुरूप होगा। विश्राम करते हुए मन में तथा ऋणात्मक मन में अन्तर होता है। विश्राम करता हुआ मन आशावादी हो सकता है, परन्तु ऋणात्मक मन काम करते हुए भी निराशावादी होता है। हमारा मन एक खड्डी के समान है, विचार धागों के समान हैं। यदि विचार निराशावाद, उत्साहहीनता तथा उल्लासरहितता के कारण गन्दे धागों के समान हैं, तो उनसे बुना हुआ कर्म रूपी कपड़ा भी भद्दा और अनुपयुक्त होगा। यदि विचाररूपी धागे सुलझे हुए होंगे, निर्मल होंगे, उत्कृष्ट कल्पनाओं के इन्द्रधनुषी रंगों में रंगे हुए होंगे, उत्साह, साहस, कर्मठता, वीरता रूपी मजबूती से युक्त होंगे तो उनके द्वारा उत्पादित पदार्थ टिकाऊ, उपयोगी तथा सुन्दर होगा। आप बारंवार-निरन्तर इस विश्वास को मन में दोहराइए कि आप ठीक वैसे ही मनुष्य हैं, जैसे आप बनने की कामना करते थे । यह विचार आपको अपार शक्ति देगा। तब आप देखेंगे कि किस प्रकार आश्चर्यजनक शीघ्रता से आपके उद्देश्य की पूर्ति होती दिखाई देती है। हम अपने जीवन का जैसा स्वरूप निर्माण करना चाहते थे, वैसा हम निर्माण कर पाये हैं, इस विचार से हमारे मन को बहुत बल प्राप्त होता है । जैसा स्वास्थ्य, जैसी पूर्णता, जैसी कार्य-शक्ति और जैसी कर्म-सामर्थ्य हम चाहते थे, वैसी हमने प्राप्त कर ली है, इस विश्वास से ही जीवन में क्रान्ति हो सकती है। जब हम अपने जीवन को आदर्श एवं निष्कलंक बनाये रखने में अपनी समर्थता का आत्मविश्वास प्राप्त कर लेते हैं, तो निःसन्देह हमारा जीवन बहुत ऊंचा उठ जाता है। हमारे जीवन पर श्रेष्ठ गुणों का शासन होना चाहिए, दुर्गुण हमारे मन पर कभी भी प्रभावी न हों, इसके लिए हमें सतत सतर्क रहना चाहिए। हमें रचनात्मकता के विरोधी विचारों को अवश्य ही मिटा देना चाहिए। जब भूमि में अच्छी खाद डाली जाती है, हवाएं अच्छी बहने लगती हैं, धूप खिलने लगती है, वर्षा ठीक हो जाती है तब पौधे के पल्लवित पुप्पित-फलयुक्त होने में कोई सन्देह नहीं रहता। पौधा - - . - सूखता-सड़ता तभी है, जब भूमि की उवरंता कम हो जाती है, वातावरण खराब हो जाता है, धूप लगनी बन्द हो जाती है और देर तक सूखा पड़ता रहता है । इसी प्रकार जब मनुष्य के मन के विचार अकर्मण्यता से भर जाते हैं, जब उद्यम कम हो जाता है, उत्साह मन्द पड़ जाता है, उल्लास मिट जाता है, साहस मर जाता है, आत्मविश्वास समाप्त हो जाता है, तब मनुष्य का व्यक्तित्व दुर्बल और प्रभावशून्य होने लगता है। सही ढंग की चित्तवृत्ति हो, तो मनुष्य पर दूसरों के गलत सुझावों का कुछ भी प्रभाव नहीं होता। लोग तो सुझाव देते ही रहते हैं और यदि आपका मन कच्चा है, तो उसे लक्ष्य भ्रष्ट होते देर नहीं लगती। यदि आप गलत सुझावों को सुनने के लिए बाधित किये जाते हों और फिर भी उन सुझावों का अपने मन पर प्रभाव न होने देने के लिए कृतसंकल्प हैं, तो दूषित वातावरण में रहते हुए भी उन घातक सुझावों से अपनी रक्षा भली-भांति कर सकते हैं। यदि आप गलत सुझावों का प्रतिकार करने के लिए, अपने संकल्प पर आरूढ़ रहने का प्रण कर लेते हैं, तो उन गलत सुझावों का आप पर दुष्प्रभाव नहीं हो सकता। इसके विपरीत यदि आप गलत सुझावों को ध्यान से सुनते हैं, बुराइयों को ग्रहण करने के लिए तैयार रहते हैं, अपने मन को चंचल वनाए रखते है, और दूसरों के कहने पर अपना उद्देश्य छोड़ने । को तैयार हो जाते हैं, तो अपने जीवन का नाश कर लेते हैं। गलत सुझावों को सुनने वाला, इस तरह के सुझावों को प्रोत्साहन देने वाल।, इन सुझावों का स्वागत करने वाला और इन्हें सुनने में मज़ा लेने वाला व्यक्ति अवश्य ही पथभ्रष्ट हो जाता है । यदि हम चाहें, तो अपने उद्देश्य को मन-ही मन वारंवार दोहराते हुए, बारंवार उस उद्देश्य की पूर्ति का प्रण करते हुए, अपने पथ पर आरूढ़ रह सकते हैं, और धीरे-धीरे उस उद्देश्य के लिए कार्य करना हमारे स्वभाव में उतर सकता है, वह हमारी । C आदत बन सकता है। तब हम अपनी जीवनधारा के प्रवाह को पूर्णतया उद्देश्य की ओर मोड़ सकते हैं और अपनी सम्पूर्ण कार्य- शक्ति को उसी की सिद्धि के लिए नियोजित कर सकते हैं । फिर हम अपनी तमाम योग्यताओं को उद्देश्य की पूर्ति के लिए केन्द्रित कर सकते हैं। कुछ समय पश्चात् हमारी कार्य-योग्यता एवं कम- सामर्थ्य की ऐसी प्रचण्ड लहर उठेगी, जो समस्त विघ्न-बाधाओं को बहा ले जाएगी और हमें उद्देश्य रूपी मन्दिर तक ले जाएगी। हमें विरोधी धाराओं की ओर से अवश्य ही सतर्क रहना चाहिए। कार्य-सिद्धि की विघातक विचार तरंगे हैं-घृणा की भावना, जलन की भावना, ईर्ष्या की भावना, निर्दयता की भावना, बदले की भावना, द्वेष की भावना-ये सारी भावनाएं ऐसी हैं जो हमारी कार्य-शक्तियों को भस्म कर देती हैं तथा हमारी उन्नति में भारी वाधा डालती हैं। जिस बात या काम के द्वारा वैमनस्य बढ़ता है उससे हमारे प्रयत्न पंगु अर्थात् प्रभावहीन हो जाते हैं। सन्तुलन से, मानसिक शान्ति से, और विचारों को स्वतन्त्रता से हमारी कार्य-कुशलता बढ़ती है। सारांश यह है कि हमारी विचारधारा रचनात्मक होनी चाहिए न कि ध्वंसात्मक । साहस की विचार-तरंग, आत्मविश्वास को विचार तरंग, दृढ़ संकल्प की विचार तरंग-~-ये हैं मन रूपी पावर हाउस की विद्युत । तरंगें, जो सफलता को समीप लाती हैं । जो व्यक्ति असफल होते हैं या पूर्ण सफल नहीं होते, वे भी यदि मन से निषेधात्मक विचार तरंगों को निकाल दें, तो वे पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकते हैं। मन से ऋणात्मक विचार रूपी कूड़े को बाहर फेंकना एक श्रेष्ठ कला है । वह कूड़ा है- 1. भय का विचार, 2.चिन्ता का विचार, 3. ईया-द्वेष का विचार, 4. निराशा का विचार, 5. संशय का विचार, 6. अकर्मण्यता का विचार, आदि । इस कूड़े को मन से बाहर फेंक दीजिए तथा इनके स्थान पर इन विचारों को मन में स्थान दीजिए- 1. उत्साह का विचार, 2. आशा का विचार, 3. उल्लास का विचार, 4. सबके प्रति दयालुता एवं स्नेह का विचार, 5. दानशीलता का विचार, 6. कर्मठता का विचार, आदि । इन विचारों के द्वारा आपका मन ऊंचा उठ जाएगा, इससे आपकी चित्तवृत्ति रचनात्मक हो जाएगी और तब आपकी प्रगति को संसार की कोई भी शक्ति नहीं रोक सकती। हमारी मनोवृत्ति का दूसरों पर भी प्रभाव पड़ता है। यदि हम आशावादी हैं, तो दूसरों में भी आशा का संचार कर सकते हैं, यदि हम आत्मविश्वासी हैं तो दूसरों को आत्मविश्वास सिखला सकते हैं, यदि हम सफल हैं, तो दूसरों को भी सफल होने की तरकीव वतला सकते हैं, और यदि हम यशस्वी हैं, तो दूसरों को भी यश प्राप्त करने का.मार्ग सुझा सकते हैं। दूसरे लोग यदि हम पर यकीन नहीं करते, यदि वे हमें दुर्बल और कायर समझते हैं, तो हमें सोचना चाहिए कि हमारे मन में निषेधात्मक विचारों ने घर बनाया हुआ है । जब तक हम इन निपे- धात्मक विचारों को मन से निकाल नहीं देते, तब तक हम किसी महत्त्वपूर्ण, आदरणीय, उत्तरदायित्वपूर्ण एवं पूजनीय पद पर प्रतिष्ठित होने के लिए आवश्यक योग्यता नहीं रखते । आत्मविश्वास, साहस, निर्भयता की भावना प्रतिबिंबित करने - - - - का अर्थ है विजयी स्वभाव । दूसरों को यदि आप वश में करना चाहते हैं, तो ऐसा ही स्वभाव बनाइए | यदि हमारा ऐसा स्वभाव प्रकट होता है, तो लोगों को हम पर विश्वास हो जाएगा कि भविष्य में हम अवश्य विजयी होंगे। लोगों को यह प्रतीत होगा कि हम 'चढ़ते सूरज' हैं और चढ़ते हुए सूरज को सब प्रणाम करते हैं । इसके विपरीत यदि हम दुर्बलता, दीनता, हीनता के भावों को प्रदर्शित करेंगे, तो लोगों का हमारी कार्य-शक्ति पर विश्वास ही नहीं जमेगा, अतः यह पराजय की प्रवृत्ति है। दूसरे शब्दों में, जितना आत्मविश्वास आवश्यक है, उतना दूसरों को अपने ऊपर भरोसा दिलाना आवश्यक है। अपने पर दूसरों का विश्वास जमाना जरूरी है। इसलिए हमें अपने आकार, चेष्टा, भापण, हावभाव से आत्मविश्वास की, सफलता की, विजय की भावना प्रकट करनी चाहिए। जो व्यक्ति विजयी की भांति जीता है, जो संसार में एक परा- क्रमी की भांति जीता है, उस पर लोगों का दृढ़ विश्वास हो जाता है कि वह अवश्य महान कार्य को पूर्ण करेगा। इसके विपरीत जो मनुष्य और चेप्टाओं से दबूपन, डरपोकपन, कातरता तथा कायरता प्रदर्शित करता है, वह प्रभावी व्यक्तित्व का स्वामी नहीं हो सकता; बल्कि उपहास का पाय अवश्य हो सकता है। जिस व्यक्ति के रोम-रोम से उज्ज्वल व्यक्तित्व की आभा झल- कती है, जिसके मुखड़े पर विजयी जैसा भाव दमकता है, जिसके । हावभाव से श्रेष्ठता एवं महत्ता की किरणें प्रसारित होती हैं, वह जो । चाहे कर सकता है और संसार से जो कार्य चाहे करवा सकता है। लोग उसके आदेश का पालन करने में गौरव का अनुभव करते हैं। इसके विपरीत--जो व्यक्ति दब्बू है, झिझकता है, पलायन । वादी है, अपने को तुच्छ, दीन, हीन तया नगण्य समझता है, जो दुईलता, अनाड़ीपन और उत्साहहीनता का प्रदर्शन करता है, वह जीवन की दौड़ में हार जाता है। अपने हावभाव , - संसार विजयो व्यक्ति का स्वागत करता है। लोग उसो मनुष्य को पसन्द करते हैं जिसके चेहरे से उत्साह, उल्लास तपा विक्रम मलक रहा हो। जिसके आने पर उत्साह और उल्लास को लहर-सो दौड़ जाए-उसे लोग सिर-आंखों पर बिठलाते हैं । अपनी शक्तियों का वारवार ध्यान करने से मनुष्य में बात्म- विश्वास की भावना उदित होती है। उसकी झलक मुनुमंडल पर आ जाती है और वह दूसरों को प्रभावित किये बिना नहीं रहती। यदि चित्तवृत्ति शक्ति और सामर्थ्य को प्रकट नहीं करती, तो संसार में आपको 'रचनात्मक स्वतन्त्र कर्ता' की कीति कदापि प्राप्त नहीं होगी। कुछ लोग विस्मित होते हैं कि दूसरे लोग उन्हें तुच्छ, क्षुद्र या नगण्य क्यों समझते हैं। इसका कारण यह है कि उनके विचारों, चेष्टाओं तथा कार्यों से ही 'विजयो' का भाव नहीं सलकता-उनकी चित्तवृत्ति पराक्रमपूर्ण, उद्दामपूर्ण, साहसपूर्ण, उल्लासपूर्ण नहीं होती। किसी भी व्यक्ति में तब तक चुम्बकीय आकर्षण-शक्ति उत्पन्न नहीं हो सकती, जब तक कि वह शक्ति को प्रतिविम्बित करने का रहस्य नहीं जान लेता। रचनात्मक चरित्र ही वह चुम्बक है, जिसकी ओर लोग अपने आप खिंचे चले आते हैं। सभी विजयी व्यक्ति पहले मन में विजय प्राप्त करते हैं, वाह्य संघों पर विजय वाद की वात है। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं कि उन्हें देखते ही हम पर यह प्रभाव पड़ता है-'यह आदमी कभी नहीं जीत सकता।' ऐसे लोग धन- समृद्धि तथा यश के लिए भाग्य के भरोसे ही पड़े रहते हैं । ये आकांक्षा की पूर्ति के लिए कभी प्रयत्नशील नहीं होते। उन्हें वेगार जैसे कम मजदूरी के कामों पर ही अपना जीवन विताना पड़ता है। वे जीवन का आरम्भ ही इस प्रकार करते हैं कि निरन्तर घोर परिश्रम में पिसना पड़े। कार्यकुशलता को प्राप्त करने के लिए यदि वे पहले प्रयत्न करते, तो उनका कर्म और जीवन भी उल्लास तथा आनन्द से परिपूर्ण होता।
उचित रूप में जिया जाने वाला जीवन सतत् विकासशील होता है। कुशलता और अधिक कुशलता, अपनी आज की कुशलता ते बोते कल की कुशलता को पीछे छोड़ जाना, यही है विकासमान जीवन का तात्पर्य । जो सतत् विकासशील है, जो निरन्तर अपनी जानकारी बढ़ाता रहता है, जो अधिक कुशलता प्राप्त करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहता है, जो अपने मानसिक क्षितिज को अविरत विस्तीर्ण करता रहता है, वह जीवन में इतनी सन्तुष्टि प्राप्त करता है, जितनी अन्य किसी बात से नहीं मिल सकती। विजयी व्यक्तित्व को प्रतिबिंबित करने की भावना से बढ़कर हितकारी भावना दूसरी है ही नहीं। निरन्तर विक्रम और विजय का यश प्राप्त करने वाला अपने अनुयायी-वर्ग पर शासन करता है। - बाल्यावस्था में ही प्रत्येक बच्चे में यह भावना कूट-कूटकर भर दी जानी चाहिए कि उसका जन्म विजय के लिए हुआ है कि उसके शरीर और मन का संगठन ही ऐसा है कि वह पराक्रमी होगा- विजयी होगा। उसे बारंबार यही पाठ पढ़ाया जाना चाहिए : तेरा जन्म हारने के लिए नहीं हुआ। यदि बच्चों को चित्तवृत्ति विजयी भावना से परिपूर्ण बना दी जाए. यदि उन्हें यह सिखला दिया जाए कि उन्हें आत्मसम्मान को सर्वोपरि समझना चाहिए, यदि उन्हें आन्तरिक शक्तियों का बोध करा दिया जाए, तो वे शायद ही किसी काम में असफल हों। बाद में उन बच्चों के जीवन में ऐसा समय आ सकता है, जब वे जहां भी जाएंगे शक्ति, उत्साह, आत्मविश्वास, विक्रम तथा विजयी भाव को प्रतिबिंबित करेंगे। बच्चों को शिक्षित करने तथा पालन-पोषण करने में यह बात सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। शारीरिक जीवन को सामंजस्यपूर्ण, समन्वित, सन्तुलित बनाने से पहले मानसिक जीवन को सामंजस्यपूर्ण, समन्वित, सन्तुलित बनाना नितान्त आवश्यक है।
आपके साथ जिन व्यक्तियों का संपर्क है, उनके साप आपके संबंध अवश्य ही स्वस्थ, मधुर एवं सुन्दर होने चाहिएं। आपको अपने भाई-बहनों के साथ अवश्य ही न्यायपूर्ण तथा तालमेल वाला संबंध कायम करना चाहिए। उसके बाद ही आप वाहर वालों के साथ स्वस्थ, मधुर एवं सुन्दर संबंध बना सकते हैं। यदि आप न्याय- प्रिय हैं, स्वस्थ हैं, प्रसन्नचित्त हैं, तो आप अपने संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के साथ स्वस्थ, मधुर एवं सुन्दर संबंध स्थापित कर सकते हैं। यदि हम अपनी चित्तवृत्ति को विजयिनी बनाना चाहते हैं, हमें अवश्य ही अपने चित्त से ईर्ष्या, द्वेष, जलन तथा प्रतिशोध (बदले) की भावना को दूर करना होगा। हमें शान्त, भद्र, सज्जन तथा उत्तरदायी बनना होगा। कार्यकुशलता तथा प्रसन्नता का दर्शनशास्त्र कहता है कि अपने जीवन को कार्यकुशल तथा परिपूर्ण बनाने के लिए उत्साह, अध्यवसाय तथा साहस की नितान्त आवश्यकता होती है। आप कुछ भी करना या कुछ भी बनना चाहें, उत्साह, अध्यवसाय एवं साहस का आश्रय आपको लेना ही पड़ेगा। जो नवयुवक जीवन क्षेत्र में अभी-अभी उतरा है और वह सफल होने को उत्सुक है, उसे यह कभी नहीं कहना चाहिए-"मैं सफल होना चाहता हूं परन्तु मुझे विश्वास नहीं कि जिस धंधे में में लग गया हूं, मैं उसके योग्य हूं। मेरे धंधे में मेरे जैसे लोगों की भीड़ लगी हुई है। इस कार्यक्षेत्र में बहुत-से लोग ऐसे हैं, जो भली- भांति अपना निर्वाह भी नहीं कर पा रहे। मुझ जैसे अनेक व्यक्ति वेकार फिरते हैं। मैं समझता हूं कि इस धंधे में लगकर मैंने भारी भूल की है। फिर भी मैं शक्ति-भर अधिक-से-अधिक अच्छा काम करूंगा । शायद मैं किसी तरह कहीं-न-कहीं पहुंच ही जाऊं।" जो नवयुवक इस प्रकार सोचता, बोलता और काम करता है, उसे अच्छा 'कर्ता' नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार का व्यक्ति धन्धा नहीं कर सकेगा, उसकी जेब खाली रहेगी और वह शीघ्र ही इस धन्धे को छोड़ जाएगा। हम क्या हैं, इससे नहीं बल्कि हम क्या कहते हैं, इससे लोग हमारे बारे में अनुमान लगाते हैं। आपके शब्दों का प्रभाव दूसरों पर बहुत गहरा होता है, इस बात को कभी न भूलिए। हमें अपनी वास्तविक योग्यताओं को ही दूसरों के सम्मुख प्रकट करना चाहिए। हम मुंह से जो चाहें कह सकते हैं; परन्तु ध्यान रहे कि जो कुछ हम मुंह से कहते हैं, उसीके द्वारा लोग हमारा मूल्यांकन करते हैं। हमारे आकार, चेप्टा तया वार्तालाप का लोगों पर जो प्रभाव पड़ता है उसीसे लोग हमें 'ऊंचा' या 'नीचा' समझते हैं। हम जैसा व्यक्तित्व प्रतिबिंबित करते हैं, वैसा ही लोगों पर हमारा प्रभाव पड़ता है। प्रभावशाली व्यक्ति वही है, जो अपने सद्गुणों को, कार्य-योग्यताओं को, कर्म-सामर्थ्य को प्रतिबिंबित करे। परन्तु बनावटी शब्दों द्वारा आप अपनी असलियत को छिपा नहीं सकते। आप अपने वास्तविक विचारों को दूसरों पर प्रकट होने से नहीं रोक सकते। चाहे आपकी वाणी कितनी मधुर हो, चाटुकारितापूर्ण हो; किन्तु आप अपने हृदय में छिपी घृणा और द्वेष-भावना को छिपा नहीं सकते। यदि आप किसीके प्रति अविचारी हैं, अन्यायी हैं, तो मीठे-मीठे शब्दों द्वारा आप उसे धोखा नहीं दे सकते। अच्छे व्यक्तित्व के लिए हृदय की स्वच्छता, विचारों की निर्मलता, चिन्तन की शुद्धता अत्यन्त आवश्यक है। उस मनुष्य की दशा पर विचार कीजिए, जो धनी बनने का प्रयास कर रहा है, परन्तु उसकी सम्पूर्ण चित्तवृत्ति और मुखाकृति यही कहती है-"धनसम्पत्ति ! मुझसे दूर रहो, मेरे पान मत आओ। मैं तुम्हें पाना तो चाहता हूं। परन्तु तुम मेरे लिए नहीं हो, तुम मेरे भाग्य में ही नहीं हो। मुझे तो जीवन-भर नम्र और दीन-हीन वनकर काम करते रहना है, यही मेरी किस्मत में लिया है। भाग्यशाली ही उन पदार्थों को प्राप्त कर सकते हैं, जिन्हें तुम - ।
प्रदान करतो हो । मैं तो ऐसी आशा कभी भी नहीं कर सकता।" बताइए, ऐसी मनोवृत्ति वाले व्यक्ति के पास क्या कभी धन- सम्पत्ति ना सकती है ? जो मन में डरा-डरा रहता है, सन्देह और संशय से भरा रहता है--वह धन-सम्पत्ति को अपने से दूर ही करता है। ठीक है कि लोग धन-सम्पत्ति को अपने से दूर नहीं करना चाहते; परन्तु वे अपनी मनोवृत्ति को ऐसी दीन-हीन बनाए रहते हैं कि धन-सम्पत्ति उनके नजदीक नहीं आती। अपने मन में वे मंगर, भय, अविश्वास और निराशा के विचारों को भरे रहते हैं और अनजाने ही धन-संपदा को दूर ही दूर कर देते हैं । बहुत-से लोग ऐसे भी होते हैं, जो जीवन में न तो बहुत सफल होते हैं और न असफल ही। वे न धनी होते हैं और न निधन हो। वे जीवन-भर नाप-तोलकर कमाते और नाप-सोलकर पूर्ण करते रहते हैं-'न सावन हरे, न भादों सूखे ।' इसका क्या कारण है ? आइये, विचार करें- इन लोगों का मन दो भागों में विभक्त होता है.आधे मन में रचनात्मक, निर्माणात्मक, धनात्मक विचार भरे रहते हैं और शेप आधे में निषेधात्मक, नकारात्मक, ऋणात्मक विचार । अतः इस प्रकार के लोग घड़ी के पेण्डुलम की भांति होते हैं। जब उनमें जरा-सा उत्साह आता है, आशा का संचार होता है, हिम्मत बंध जाती है, विश्वास जागृत होता है, तब वे कुछ उत्पादन कर लेते हैं। क्योंकि उस समय उनके मन उत्पादन शक्ति से समन्वित होते किन्तु जब उनका मन हारने लगता है, तो निरुत्साहित होने में देर नहीं करते, साहस छोड़ बैठते हैं, सन्देह और भय से वस्त होकार काम छोड़ बैठते हैं। क्योंकि इस समय उनका मन अनुत्पादक है जाता है, अत: वे कोई रचना नहीं कर पाते, किसी प्रकार उत्पादन करने में असमर्थ रहते हैं और लाभ से वंचित हो जाते हैं और पुनः कमी और अभाव की स्थिति में जा पहुंचते समय आ गया है, अपने को वदलिए। अपने मन को हर समा
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उत्पादकता की स्थिति में रखिए। अपनी मनोवृत्ति निरन्तर रचना-
त्मक विचारों से परिपूर्ण रखिए। तब आपका जीवन उन सभी
वस्तुओं तथा स्थितियों से परिपूर्ण होगा जो वांछनीय हैं, शुभ है,
सुन्दर हैं, आनन्ददायी हैं।
.. 4 महान् कार्यों में सफल होने की आशा कीजिए - आत्मविश्वासी व्यक्ति आशावादी होता है, क्योंकि वह कठिनाइयों में भी कोई-न-कोई रास्ता ढूंढ़ लेता है । संशयात्मा वाला व्यक्ति निराशावादी होता है, वह अपने सामने मौजूद रास्ते को भी नहीं देख सकता और डरता रहता है, क्योंकि वह अनिश्चय और दुविधा में ही पड़ा रहता है और अवसर को व्यर्थ खो देता है। आत्मविश्वास कार्य-योग्यताओं के सारे द्वार खोल देता है तथा व्यक्ति में श्रेष्ठ कार्य-कुशलता उत्पन्न करता है। जब हम अपने द्वारा महान् कार्यों के संपन्न होने की निरन्तर आशा करते रहते हैं, तो वह विचार हमारा स्वभाव बन जाता है, और उसकी प्रेरणा से हम अपने अन्दर छिपी हुई तमाम शक्तियों को खोज निकालते हैं तथा संसार पर उन्हें प्रकट कर देते हैं। आत्मविश्वास वह दिव्य दूत है, जिसे ईश्वर ने मनुष्य के मार्ग- दर्शन के लिए संसार में भेजा है । जब भी मनुष्य संदेह और पाप के विचारों से अन्धा हो जाता है, तब आत्मविश्वास ही उसका उद्धार करता है। उस जंगली जानवरों के पालक को क्या सफलता मिलेगी, जो
उत्पादकता की स्थिति में रखिए। अपनी मनोवृत्ति निरन्तर रचना-
त्मक विचारों से परिपूर्ण रखिए। तब आपका जीवन उन सभी
वस्तुओं तथा स्थितियों से परिपूर्ण होगा जो वांछनीय हैं, शुभ हैं.
सुन्दर हैं, आनन्ददायी हैं।
4 महान् कार्यों में सफल होने की आशा कीजिए आत्मविश्वासी व्यक्ति आशावादी होता है, क्योंकि वह कठिनाइयों में भी कोई-न-कोई रास्ता ढूंढ़ लेता है । संशयात्मा वाला व्यक्ति निराशावादी होता है, वह अपने सामने मौजूद रास्ते को भी नहीं देख सकता और डरता रहता है, क्योंकि वह अनिश्चय और दुविधा में ही पड़ा रहता है और अवसर को व्यर्थ खो देता है। आत्मविश्वास कार्य-योग्यताओं के सारे द्वार खोल देता है तथा व्यक्ति में श्रेष्ठ कार्य-कुशलता उत्पन्न करता है। जब हम अपने द्वारा महान् कार्यों के संपन्न होने की निरन्तर आशा करते रहते हैं, तो वह विचार हमारा स्वभाव बन जाता है, और उसकी प्रेरणा से हम अपने अन्दर छिपी हुई तमाम शक्तियों को खोज निकालते हैं तथा संसार पर उन्हें प्रकट कर देते हैं । आत्मविश्वास वह दिव्य दूत है, जिसे ईश्वर ने मनुष्य के मार्ग- दर्शन के लिए संसार में भेजा है । जब भी मनुष्य संदेह और पाप के विचारों से अन्धा हो जाता है, तब आत्मविश्वास ही उसका उद्धार करता है। उस जंगली जानवरों के पालक को क्या सफलता मिलेगी, जो - क्रुद्ध जंगली जानवरों के बाड़े में पहले-पहल भय, संशय तथा अनिश्चितता के विचारों को लेकर, उतरता है और मन में कहता जाता है-"मैं इन जंगली जानवरों को वश में करने का प्रयत्न करूंगा, यद्यपि मुझे विश्वास नहीं कि मैं इन्हें वश में कर सकता हूँ। अफ्रीका के भयंकर हिंस्र चीते को वश में करना, उस पर विजय प्राप्त करना अत्यन्त कठिन कार्य है। ऐसे लोग अवश्य होंगे जो इन भयंकर जीवों पर काबू पा सकते हों, परन्तु मुझे तो अपने पर सन्देह है, मैं शायद ही इन्हें वश में कर सकू।" यदि पशुपालक इस प्रकार की मनोवृत्ति को लेकर खूवार जानवरों के सामने जाता है--दुर्वलता, सन्देह और भय के विचारों से भरा हुआ वहां पहुंचता है तो संभावना यही है कि वे जानवर उसकी बोटी-बोटी नोंच डालें। केवल दुःसाहस एवं शौर्य के बल पर, केवल आत्मविश्वास तथा निश्चय के बल पर वह उन्हें परास्त करके वश में कर सकता है। उसके लिए यह आवश्यक उन हिंत्र जीवों को पहले अपनी दृष्टि से, अपनी आंखों से परास्त करे, अपनी आंखों को तीव्र दृष्टि के पीछे जो शक्ति छिपी है उसे प्रकट करे, तब वह उन्हें नम्र एवं वशवर्ती बना सकता है । तनिक- सा भय-प्रदर्शन करके वह अपने प्राणों को खतरा मोल ले सकता है । कायरता का प्रदर्शन करते ही वह जीवन गंवा बैठेगा। कि वह तथ्य यह है जब तक मनुष्य को यह दृढ़ विश्वास न हो कि वह जिस पदार्य को प्राप्त करने चला है, उसे अवश्य ही प्राप्त कर सकता है, तब तक उस पदार्थ को प्राप्त करने के लिए उस अटूट निष्ठा से काम नहीं कर सकता, जो सफलता के लिए आवश्यक होती है। जब उसे यह पक्का निश्चय हो कि वह काम कर सकता • है, काम करने में पूरी तरह समय है, काम की तुलना में यहीं अधिनः शक्ति से युक्त है, तभी अपने काम में वह पूरी सफलता प्राप्त कर सकता है। उस व्यक्ति को एक कुशल व्यापारी बनने में न जाने कितनी - देर लगेगी, जो हर समय अपनी शक्तियों पर सन्देह करता नाला है-'करूं या न करूं' की दुविधा में उलझा रहता है। पर कई अन्तःकरण में अपनी योग्यता पर ही विश्वास नहीं, तो यह माम कैसे हो सकता है? इस प्रकार की मनोवृत्ति ऐसी नहीं कि जिन पर रो बहुमूल्य कार्य किया जा सके । मन को अवश्य ही अनमोहोना चाहिए, नेता होना चाहिए, उसे आगे-आगे चलना चाहिए। रमा इन्द्रियां उसी का अनुसरण किया करती हैं । कपड़ा दुनने में उसके ताने-बाने का नमूना सोच लिया जाता है। इसी प्रकार कार्य के सफल स्वरूप का आकार-प्रकार पहले ही मनावानों द्वारा देख लिया जाता है। निर्माणाधीन वस्तु के बाद स्वरूप की परि- कल्पना सबसे पहले मन में ही की जाती है। हम सदा उसी ओर मुंह करते और आगे बढ़ते हैं, जिधर हमास विश्वास हमें ले जाता है। जिस काम को पूर्ण करने के विषय में भपनी सामर्थ्य पर हमारा दृढ़ विश्वास होता है, उसी काम को हम पूर्ण कर सकते हैं। न जाने उस नवयुवक को धन-संपदा उपाजित करने में रिलता समय लगे, जिसे जरा भी विश्वास नहीं कि वह धन उपआजितर सकता है। यदि उसके मन में यह विश्वास जम गया है--"गार केवल कुछ व्यक्ति ही धनी हो सकते हैं, अधिकांश व्यक्ति गरीरही हैं और रहेंगे, मैं भी शायद उन्हीं में से एक हूं।"--तो वह कभी भी धनी नहीं हो सकेगा। कॉलेज में जाकर जो विद्यार्थी लगातार यही सोचता रहता है-"मैं इस योग्य कहां? मैं ग्रेजुएट हो ही नहीं सकता। अधिमांग व्यक्ति कॉलेज से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। मैं भी उन्हीं में से एक हूं। कॉलेज में दाखिल हो गया हूं, यही भूल की है।" इस प्रकार के विचारों को लेकर ही यदि वह कॉलेज में जाता है, तो कोई भी मनुष्य उसकी सहायता नहीं कर सकता। कितना ही धन व्यय किया जाए, कितना ही सुअवसर आ जाए, कितने ही लोग उसकी सहायता , पडेगा। करें, परन्तु जब तक उसमें आत्मविश्वास का अभाव है, तब तक वह छ भी प्रगति नहीं कर सकता और उसका परीक्षा में उत्तीर्ण होना असंभव है। जो नवयुवक यही सोचता रहता है..-"प्रयत्न करने का क्या लाभ ? मैं कभी अफसर नहीं बन सकता।" वह सचमुन कभी अफसर के पद तक नहीं पहुंचेगा , उसे तो नीचे की नौकरी पर ही पसते रहना बहुत-से नवयुवक जोश में आकर वकील, डॉक्टर या व्यापारी बनने का निश्चय कर लेते हैं। पर यह निश्चय कच्चा होता है। इसमें दृढ़ सकल्प की स्थिरता नहीं होती । परिणाम होता है- हाय-टांय फिस ! उन्हें अवसर मिला था कि वे अपने निश्चय को दृढ़ करते, अपने निश्चय को पूर्ण करने का प्रण गारते, दृढ़ प्रतिज्ञा करते कि अपने लिए उन्होंने जो उद्देश्य चुना है उसे अवश्य पूरा करेंगे। फर इसके लिए चाहे रात-रात भर जागना पड़ता, कठोर परिश्रम रिना पड़ता, वे सब कुछ करते। अपनी प्रतिज्ञा को निरन्तर रोहराते रहते तब संभव था कि वे मफल होते। एक समय था जब वे चाहते तो अपनी दुनिया बदल सकते थे; किन्तु उन्होंने तापरवाही दिखलाई, अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझा, अपने तरदायित्व को नहीं निभाया। फिर वे सफल कैसे हो सकते थे? ऐसे भी नवयुवक हैं जो अपने धन्धे में अतिशय उत्साह से लगते है, उल्लास में भरकर वे बड़े प्रेम से कार्य में निमग्न रहते है, अपने निश्चय पर अटल रहते हैं, निरन्तर प्रयत्न करना उनका बभाव ही हो जाता है और एक दिन व उन्नति के शिखर पर जा हुंचते है। दि हम महान् नफलताओं तथा उन्हें प्राप्त करने वाले महान् गपंचनाओं का वितरण करें, तो उनमें गवरी धष्ट योग्यता मात्मविश्वास' ही दिखाई देगी। जिन व्यक्ति को अपनी कार्य योग्यताओं पर अटूट विश्वास हो जाता है जो समझने लगता है कि जिस काम को भी वह हाथ में लेगा अवश्य ही उसमें सफल होगा, चाहे बाहर वालों को यह विश्वास 'अत्यधिक' ही प्रतीत होता हो, फिर भी वह व्यक्ति अवश्य सफल होगा। बहुत-से व्यक्ति धुन के पक्के होते हैं। उन्हें अपनी कर्मठता पर गंभीर विश्वास होता है, चाहे लोग उनके इस विश्वास को मूर्खतापूर्ण ही कहें, फिर भी वे लगन के इतने पक्के होते हैं कि अपने पथ से विचलित नहीं होते और अपने अटूट आत्मविश्वास के बल पर सफल होकर दिखाते हैं। केवल आत्मविश्वास से अर्थात् अपनी शक्तियों पर भरोसा करने से ही काम पूरा नहीं होता, अपने विश्वास का दूसरों पर प्रभाव जमाना भी नितान्त आवश्यक होता है, यदि दूसरों को यह विश्वास हो जाएगा कि हमारा आत्मविश्वास अटूट है और हम अपने उद्देश्य में सफल होकर ही रहेंगे, तो वे सब प्रकार से हमारे सहायक होते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी काम में अपने को 'माहिर' या विशेषज्ञ समझने लगता है, वह आसपास के वातावरण पर शासन करने लगता है। वह प्रत्येक शब्द से आत्मविश्वास की भावना व्यक्त करता है। उसकी मुखमुद्रा से विजय की भावना टपकती है। इससे दूसरों के मन के सन्देह दूर हो जाते हैं और वे सहायता करने लग जाते हैं । प्रत्येक मनुष्य को विश्वास हो जाता है कि वह सफल और विजयी कर्ता है, जिस भी काम में लगेगा, उसे पूरा करके छोड़ेगा। संसार विजयी व्यक्ति पर विश्वास करता है। आत्मविश्वासी अपने प्रति ईमानदार होता है, और लोग भी उसके प्रति ईमानदार होते हैं। आत्मविश्वासी व्यक्ति के आकार, इंगित, चेष्टा, भाषण चाल-ढाल और हाव-भाव से गहरा विश्वास प्रकट होता है। उसकी प्रत्येक चेष्टा आत्मविश्वास की भावना को प्रतिविवित करती है और लोग उससे अत्यधिक प्रभावित होकर उसे नेता मानने लगते हैं तथा उसकी आज्ञा का पालन करने में गर्व का अनुभव करते हैं। हम उन्हीं व्यक्तियों से प्रभावित होते हैं, जो अपनी शक्ति से हमें प्रभावित करते हैं । यदि उनके अपने मन संशय या भय से भरे होते, तो उनका हम पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ सकता था। कुछ व्यक्ति अपनी उपस्थिति से ही विजय की भावनाओं का संचार कर देते है। प्रथम दर्शन में ही वे हमारा विश्वास जीत लेते हैं। वे अपनी शक्तियों को प्रतिविम्बित करते हैं, अतः हमें उनकी शक्तियों पर विश्वास हो जाता है। सब प्रकार के कार्यों में, व्यापार-व्यवसाय में हमें दूसरों पर अपना विश्वास जमाना पड़ता है-इसे साख कहते हैं और साथ से बड़ी पूंजी नहीं हो सकती। यदि दूसरे लोगों का हम पर यह विश्वास दृढ़ हो जाएगा कि हम अपनी योजनाओं को पूर्ण करके ही रहते हैं, और हम जो भी उत्पादन करते हैं वह वढ़िया होता है- उपयोगी, लाभकारी, उत्तम एवं सुन्दर होता है, हम अपने कर्म- चारियों को अच्छी व्यवस्था के कारण प्रसन्न तथा नियन्त्रित रख सकते हैं, जनता द्वारा मांगी जाने वाली सही चीज उत्पादित करके देने में समर्थ हैं, तो हम दूसरों से जितनी सहायता मांगेंगे, उतनी मिलेगी। जीवन चन्द दिनों का है । समय बहुत कम है। हर एक अपने काम के पीछे दौड़ रहा है, किसी को इतना समय नहीं है कि वह आराम से बैठकर हमारी गतिविधियों का विस्तार से विश्लेषण करे; अतः अधिकांश लोग हमारी मुखाकृति तथा हावभावों से ही हमारी कार्यकुशलता या अकुशलता, योग्यता या अयोग्यता का अनुमान करते हैं। यदि हम उन पर विश्वास का सिक्का जमाते हैं, तो वे हम पर विश्वास करते हैं । इसके विपरीत, यदि स्वयं हमें अपने पर विश्वास नहीं, हम स्वयं संदेह और संशय से ग्रस्त हैं, स्वयं ढुलमुल हैं या शिथिल हैं, तो लोगों को क्या पड़ी है कि वे हन पर विश्वास करें और हमारी सहायता करें ? एक डॉक्टर के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह हर एक रोगी को विस्तार से बतलाए कि उसने समस्त चिकित्सा प्रक्रिया का उचित रूप से पालन किया है। अच्छे डॉक्टर का चेहरा - देखते ही रोगी को उसपर विश्वास हो जाता है कि वह ठीक इलाज करेगा। जिस व्यक्ति के मुखमंडल से ही यह झलकता है कि वह सिद्धांत का पक्का है, अपने पथ से कभी विचलित नहीं हो सकता, संसार उस पर विश्वास करता है । लोग उसकी बात को सच मानते हैं और उसकी इच्छा के अनुसार काम करने लगते हैं। इस प्रकार आत्मविश्वासी को दूसरों की शक्तियां भी अनायास ही प्राप्त हो जाती हैं। आप छात्रों या नवयुवकों के किसी वर्ग की ओर ध्यान दीजिए। आप देखेंगे कि उनमें से कुछ व्यक्ति दूर से ही नायक या नेता प्रतीत होंगे ! वे दूर से ही चमक रहे होंगे और उन्हीं साथियों में से बहुत-से ऐसे होंगे कि प्रतीत होगा, वे किसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि वह आए और उन्हें आगे बढ़ाए। संसार में सब लोग अत्यन्त व्यस्त हैं। उन्हें इतनी फुर्सत नहीं कि वे आपकी योग्यता की परीक्षा करें, आपके गुणों की परख करें। यह आपका काम है कि आप अपनी योग्यता तथा गुणों से उन्हें प्रभावित करें। अपनी अयोग्यता को स्वीकार करना, दूसरों के मन में अपने प्रति सन्देह उत्पन्न करना, अपनी असफलताओं का बखान करना, अपने पर भरोसा न करना, अस्थिरचित्तता का प्रदर्शन करना- ये ऐसे दोष हैं जो व्यक्ति को असफलता की ओर ले जाते हैं। बहुत-से लोग इसीलिए असफल होते हैं कि अपने आकार-प्रकार से ही निरुत्साह, निराश और व्यथित प्रतीत होते हैं। उन्हें अपनी ही योजना पर भरोसा नहीं होता, तो दूसरे उन पर कैसे विश्वास कर सकते हैं ? यदि आप स्वयं ही अपना मूल्य घटाते रहते हैं, अपने को घटिया, दीन, हीन, मलिन समझते रहते हैं, तो निश्चय जानिए दूसरों को क्या पड़ी है कि वे आपका मूल्य बढ़ाएं या उचित मूल्यांकन करें। ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं, जो दूसरों की नजरों में स्वयं को - - - गिराता रहा हो और फिर भी उसने कोई महान् कार्य किया हो। हम अपने से जितना काम पाने की आशा करते हैं, उससे अधिक काम हम कभी नहीं कर सकते। यदि आप अपने से महान् कार्य संपन्न होने की आशा करते हैं, अपनी शक्तियों से उन कायों को पूर्ण करने की मांग करते हैं, अपनी मनोवृत्ति को उसी कार्य पर एकाग्र किये रहते हैं, तब आप अपनी इच्छा के अनुसार परिणाम प्राप्त करने में अवश्य ही सफल होंगे। यदि आपको विश्वास है कि आप विशेष व्यक्ति हैं, आप साधारण लोगों की भीड़ में नहीं हैं, भिन्न हैं, आप आम लोगों की तरह आरामपसंद या नीचे जाने वाले नहीं हैं, तो आपको अपनी दुर्बल. ताओं पर विजय प्राप्त करनी होगी। विशेष कार्य करने के लिए प्रयत्न भी विशेष ही होना चाहिए। जो लोग निरन्तर अपना अवमूल्यन करते रहते हैं, अपने को क्षीण और दुर्वल करते रहते हैं, जो अपने को कीट के समान तुच्छ और दीन-हीन मानते रहते हैं, जो अपने को धूल-कण के समान क्षुद्र समझते रहते हैं, उनमें उन्नति की आशा-आकांक्षा ही प्रतिक्षण मरती रहती है । जैसी उनकी भावना होती है, वैसी ही उनकी मुख- मुद्रा होती है। आपने अपना जो मूल्य तय कर रखा है, उससे अधिक मूल्य आपको नहीं मिल सकता। आपने अपनी योग्यता का जो अनुमान कर रखा है, उससे अधिक का अनुमान दूसरे नहीं कर सकते। आपके मन में जितना आपका प्रभाव है, उससे अधिक भाव दूसरों पर नहीं हो सकता। आपके आकार, चेष्टा, भाषण, हावभाव और कार्यों से आपका जो मूल्य प्रकट होगा, संसार उतना ही मूल्य आपको देगा। यदि आप अपने को बहुत ही साधारण समझते हैं, तो आपके चेहरे से अत्यन्त साधारण व्यक्ति जैसा ही प्रभाव प्रकट होगा। यदि आप स्वयं अपना सम्मान नहीं करते, तो ऐसा ही भाव आपकी मुख- मुद्रा से टपकेगा और लोग भी आपका सम्मान नहीं करेंगे। यदि आप .
। अपने को गरीब और दरिद्री समझते हैं, मक्खन निकला हुआ दूध या निःसार जीव समझते हैं तो आप धनी कैसे बन सकते हैं ? अपने मन में आप जिन गुणों तथा योग्यताओं का भंडार समझते हैं, आपके आकार-प्रकार से वे ही गुण प्रकट होंगे, वे ही योग्यताएं झलकेंगी। यदि आप अपने मन में गुणों, योग्यताओं, कार्य-शक्तियों का चिन्तन करेंगे, अपने को समर्थ मानेंगे, तो वे गुण, योग्यताएं तथा कार्य-शक्तियां एक दिन आपको अवश्य प्राप्त होंगी; क्योंकि आपका प्रयत्न वाद में शुरू होता है और विचार पहले उत्पन्न होता है। यदि आप चाहते हैं कि लोग आपको महान् समझें, तो आपके मुख-मंडल पर महान् मनुष्य की आभा झलकनी चाहिए। यदि आप दूसरों पर अच्छा प्रभाव जमाना चाहते हैं, तो अच्छे प्रभाव का विचार आपके मन में पहले ही विराजमान होना चाहिए। क्योंकि जैसे आपके विचार होंगे, वैसी ही आपकी मुख-कांति होगी। समस्त उपलब्धियों या सिद्धियों का मूल आधार आत्म- विश्वास है । अपने ऊपर दृढ़ विश्वास, दृढ़ निश्चय की भावना में असीम शक्ति होती है । "मैं इस काम को कर सकता हूँ" इस विश्वास से जब हम काम में लगते हैं, तो लोगों का हम पर दृढ़ 'विश्वास हो जाता है। जिसे अपने ऊपर अटूट विश्वास हो जाता है, वह बहुत-सी 'निश्चितताओं तथा दुविधाओं से छुटकारा पा लेता है। आत्म- वश्वास रक्षा-कवच है, जिसके कारण मनुष्य बहुत-सी चिन्ताओं छूट जाता है। सफलता के लिए कार्य की स्वतन्त्रता आवश्यक है। आत्मविश्वास ही ऐसी स्वतन्त्रता प्रदान करता है। आत्मविश्वास सफलता के भवन की नींव का पत्थर है। आत्मविश्वास का रिश्मा जीवन के हर एक क्षेत्र में देखा जा सकता है । आत्म- वश्वास पथ की बाधाओं को दूर करने का महामंत्र है । कठिनाइयों बड़े-बड़े पहाड़ों को हटा देने की जादूभरी शक्ति आत्मविश्वास में . .
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5 आत्म-सुझाव द्वारा आत्म-प्रोत्साहन आप अपने ऊपर विश्वास कीजिए कि आप हाथ में लिये कार्य को भली-भांति संपूर्ण कर सकते हैं । इस आत्मविश्वास को निरन्तर बढ़ाते और पुष्ट करते जाइए। जिस अनुपात में आपका आत्म- विश्वास बढ़ेगा, उसी अनुपात में आपकी सफलता का अवसर बढ़ेगा। हारता वही है जो मन में अपनी हार मान लेता है। मन में सर्वश्रेष्ठ होने का दावा कीजिए, तो आप सबके सरताज बन जाएंगे। बहुत-से व्यक्ति अपेक्षित योग्यता रखते हुए भी जीवन-भर दीन- हीन और तुच्छ ही बने रहते हैं । वे अपने ही विचारों की गिरावट के शिकार होते हैं । अपने ही सुझावों द्वारा, वे अपने को निरुत्साह करते रहते हैं। जब भी वे किसी महान् कार्य को पूर्ण करने का प्रयत्न करने लगते हैं, तभी उनका मन इस विचार से कांप उठता -'कहीं हम असफल हो गये तो क्या होगा?, बस, इस आत्म- सुझाव से उनका तन-मन शिथिल हो जाता है। उनके हाथ-पांव ढीले पड़ जाते हैं । काम करने का उत्साह ही नहीं रहता। संभावित असफलता के विचार का लेशमात्र व्यक्ति को शिथिल करने के लिए काफी है। मनुष्य की कार्य-प्रवृत्ति तथा कम-सामर्थ्य में यह
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प्रायः हम अपनी दीनावस्था का कारण अपने वाहर खोजते हैं, जबकि वह कारण हमारे भीतर होता है। हीन मनोवृत्ति ही वह कारण है, जो हमारी उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है। हम जानने का प्रयत्न ही नहीं करते कि उन्नति कैसे की जा सकती है; क्योंकि हमें विश्वास ही नहीं होता कि हम भी उन्नति कर सकते हैं । हम हर काम में पिछड़े रहते हैं, किसी भी काम में अग्रणी नहीं होते। -क्या करना चाहिए ? हमें सबसे पहले अपने विचारों को ऊंचा उठाना चाहिए। अपनी आशा-आकांक्षा को महान् बनाना चाहिए। बड़ा काम करने, ऊंचा उठने की महत्त्वाकांक्षा मन में जगानी चाहिए। फिर हमें अपनी दिव्य शक्तियों पर अटूट विश्वास होना चाहिए । ऊंची से ऊंची आकांक्षा कीजिए, अपने क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ बनने की इच्छा कीजिए, अपना उत्पादन सर्वोत्तम बनाने की तमन्ना कीजिए। आप ईश्वरीय शक्तियों का पुंज हैं, दिव्य शक्तियों का भंडार हैं, विश्व के सर्वश्रेष्ठ प्राणी हैं अतः ईश्वर के ही अंशावतार हैं, उस ईश्वर के जो सर्वशक्तिमान है-फिर आपके लिए ऊंचे-से-ऊंचा पद भी छोटा है, आप चाहें तो क्या नहीं कर सकते ? ऊंची महत्त्वाकांक्षा आपके मन में जागनी चाहिए । इसमें जादू- भरी शक्ति है। इसमें रचनात्मक सामर्थ्य है। छोटी इच्छा मत कीजिए, बड़ी इच्छा कीजिए-महान् आकांक्षा । आप देखेंगे कि आपका चरित्र भी उसी के अनुरूप ऊंचा उठता जाएगा, आपकी कार्य-शक्ति भी उसी के अनुकूल अत्यधिक परिवर्तित होतो जाएगी, आपकी सामर्थ्य बहुत बढ़ जाएगी। यदि आप स्वास्थ्य की कामना करते हैं, तो अपने मन में रोग का विचार ही न घुसने दीजिए । अपनी मनोवृत्ति स्वस्थ बनाइए । मन को प्रसन्न रखिए और उसे वेचैन न होने दीजिए। इसी प्रकार यदि आप धन-संपदा के स्वामी बनना चाहते हैं, तो मन में धन-संपदा के सिवाय अन्य विचार न घुसने दीजिए- उत्साह, प्रफुल्लता एवं साहस की भावनाओं से अपने मन को परि- पूर्ण रखिए। अपनी मनोवृत्ति धनाढ्य व्यक्तियों जैसी बनाइए, क्षुद्रता और तुच्छता के विचार मन से निकाल दीजिए, अपने आकार-प्रकार से; वेशभूषा से दरिद्रता न प्रकट कीजिए। सभी चेष्टाओं में धनियों जैसा व्यवहार कीजिए, संकुचितता एवं संकीर्णता छोड़िए, दीन-दरिद्री जैसी बातें करना छोड़ दीजिए। मन में निश्चय कर लीजिए कि आप धन-संपत्ति के स्वामी बनकर रहेंगे और अपनी कल्पना को साकार करने के लिए जो भी प्रयत्न आवश्यक होगा, उसे तन-मन-धन से आप करेंगे। यदि आप वीर और साहसी बनना चाहते हैं, तो कायरता का विचार ही मन में न घुसने दीजिए, अपनी चेष्टाओं से भय या कातरता न प्रकट कीजिए। यदि आप दब्बू हैं, झिझकने की आदत वाले हैं, लज्जालु तो अपने मन से इन विचारों को निकाल दीजिए। इनके स्थान पर तेजस्विता, अगुआपन तथा 'पहल' को अपनाइए । कार्यों में अन्तः- करण की प्रेरणा से स्वयं प्रवृत्त हो जाइए । सिर को ऊंचा रखिए, सीना तानकर चलिए। अपने व्यक्तित्व को प्रभावी बनाइए, दूसरों पर उसका अच्छा प्रभाव प्रकट कीजिए। अपने काम की उपेक्षा न कीजिए। किसी विवरण को अनिश्चित . न रहने दीजिए-लज्जा-भय-संकोच त्यागकर आगे बढ़िए । अपने मन से कहिए, "दूसरे लोग अपने-अपने काम में बहुत व्यस्त हैं। मेरी ओर देखने की उन्हें फुर्सत नहीं है । और यदि वे देखते हैं तो मैं अपने काम करने में क्यों संकोच करूं? क्यों लजाऊं? क्यों डरूं? जब मेरे विचार में मेरा कार्य श्रेष्ठ है और उसमें सफल होने का मुझे पूर्ण विश्वास है, तो मैं दूसरों को आलोचना की परवाह क्यों करूं?" यदि किसी में झिझकने, पीछे हटने, लजाने की आदत है, तो उसे यह उपाय करना चाहिए उसे मन में इस प्रकार सोनना चाहिए- "मैं इस काम को पूर्ण करने के लिए पैदा हुआ हूं। मैं इस कार्य को करने में पूर्णतया सफल होने का विश्वास रखता हूं। मेरी विजय अवश्य होगी।" जितना आत्मविश्वास आप बढ़ाएंगे, उसी के अनुपात से आपकी कार्य-कुशलता तथा कर्म-सामर्थ्य बढ़ेगी तथा उसी अनुपात में आपको सफलता मिलेगी। स्वयं अपने मन को उन्नति के सुझाव दीजिए, स्वयं अपने मन को प्रोत्साहन दीजिए, तरक्की करने के लिए प्रेरणा दीजिए, अपने काम में सुधार करने के सुझाव स्वयं अपने मन को दीजिए। स्वयं अपने मन को श्रेष्ठता के लिए, उन्नति के लिए, सफलता के लिए उत्तेजित कीजिए। जितनी बार भी आप किसी व्यक्ति से भेंट करते हैं, उतनी ही बार आप अनजाने ही उसकी तुला पर अपने को रखते हैं । वह आपकी ऊंचाई नापता है, आपके गुणावगुण को तोलता है । वह यह देखता है कि इससे पहले की भेंट की अपेक्षा इस बार आपने कुछ उन्नति की है या अवनति की है। जितनी बार आप किसी को मिलते हैं उतनी वार ही वह आप की गहराई और ऊंचाई को नापता है। वह आपके मूल्य का अनुमान करने का प्रयत्न करता है। जब आप लोगों से मिलते हैं, तो वे यह देखते हैं कि क्या आप की नजर ऊंची है ? क्या आपका सिर ऊंचा है ? क्या आपके कंधे सीधे हैं ? क्या आपकी रीढ़ की हड्डी सीधी है ? क्या आप पहले से उन्नत हुए हैं ? क्या आप अधिक सम्मान-योग्य हुए हैं ? अतः अपने मन में अपने प्रति कभी भी दीनता, हीनता, क्षुद्रता तुच्छता और गिरावट के विचार न आने दीजिए। जो मनुष्य यह जान लेता है कि वह विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, कि वह ईश्वरीय अंश है कि उसका सर्वशक्तिमान को सारी शक्तियों से सीधा संबन्ध है, कि वह संसार के पदार्थ मात्र पर शासन करने के लिए जन्मा है कि वह दिव्य है, गौरवशाली है, महान है.
दृढ़ता से बारंबार मन-ही-मन इस निश्चय और विश्वास को दोहराइए कि आपका स्थान बहुत ऊंचा है और यहां तक आपको अवश्य ही पहुंचना है, कि आपको अपनी आदर्श महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति अवश्य ही करनी है, कि आप पौरुष के मदमाते प्रतीक हैं, अपने जीवन के महान कार्य को सफलता और सुन्दरता से पूर्ण करके दिखलाएंगे। यह मानने से इनकार कीजिए कि आप किसी काम में असफल सकते हैं। दूसरा कहे तो कभी मत मानिए कि आपको पराजय हो सकती है। यदि आप निरन्तर रचनात्मक विचारों को दोहराते रहते हैं, लगातार उत्पादनात्मक तथा निर्माणात्मक भावनाओं से परि- पूर्ण रहते हैं-धन-संपन्नता की भावनाओं में विहार करते रहते हैं, अपने उद्दिष्ट पद को प्राप्त करने के लिए उस पर दृष्टि गड़ाए रहते हैं, अपनी तमाम शक्तियों को उसी के लिए केन्द्रित किए रहते हैं, तो आप उस रचना को पूर्ण करके अवश्य ही यश के भागी बनेंगे। पूर्ण कुशलता, पूर्ण सफलता, पूर्ण विजय की कामना कीजिए- अल्प से सन्तुष्ट होने की आदत छोड़ दीजिए। अधूरी सफलता से सन्तुष्ट होकर न बैठ जाइए। विचारों की धारा-प्रवाह शक्ति से ही हम अपने वातावरण तथा परिस्थितियों का निर्माण करते हैं। विचार ही वे औजार जिनसे धीरे-धीरे गढ़-गढ़कर हम पत्थर को मूर्ति का रूप देने में ' समर्थ होते हैं। अपने जीवन की आदर्श मूर्ति हम स्वयं गढ़ सकते हैं और इस कार्य में सबसे मुख्य साधन, सबसे हैं हमारे विचार। सत्य, ईमानदारी, पवित्रता, स्नेह, प्रेम, दयालुता तथा कर्तव्य- परायणता की भावनाओं को पूरी तरह अपना कर कोई भी मनुष्य अपने जीवन को सार्थक कर सकता है। जितनी बार भय की भावना आपके मन में घुसने लगे, उतनी -. महत्त्वपूर्ण उपकरण - मैं ही बार उसे बाहर ही रोक दीजिए । इसके प्रतिकार के लिए तुरन्त अपनी आशा-आकांक्षा, कल्पना-शक्ति, कार्य-शक्ति तथा अतीत की सफलताओं की स्मृतियों का ध्यान कीजिए। निर्भयता तथा आत्म- विश्वास की भावनाओं को मन में लाइए। अपनी निर्भय मूर्ति का पूर्णतया ध्यान कीजिए । मन में इस प्रकार से विचार कीजिए- "मैं कायर नहीं हूं, मैं तो पौरुष का मदमाता शूरवीर हूं। समस्त शौर्य का पुंज हूं । संसार की कोई भी शक्ति मुझे भयभीत नहीं कर सकती।" भय तो बच्चों के मन की चंचलता का नाम है। आप अपने मन को चपल या अस्थिर होने से रोकिए । भय तो मन की अस्वस्थ स्थिति का नाम है । छूत के रोग-कीटाणुओं की भांति भय के कीटा- णुओं को भी दूर ही रखिए -इन्हें अपने मन में स्थान न दीजिए। यदि आप भय को अपने मन में जरा-सा भी स्थान दे देंगे, तो अपनी कार्य-शक्ति को पंगु बना लेंगे। भाग्य या दुर्भाग्य कुछ नहीं, यह मन की मिथ्या कल्पना है। किस्मत नाम की कोई ताकत नहीं है जो एक व्यक्ति को उन्नत कर वे और दूसरे को अवनत कर दे। पिटता वही है जो भाग्य के भरोसे पड़ा रहता है। कर्मठ व्यक्ति तो आशा करता है, उसी के अनुरूप योजना बनाता है, अपने सारे साधन एकत्र करता है, अपनी संपूर्ण कार्य-शक्तियों को नियोजित करता है और अपने आदर्श के अनुकूल निर्माण करके संसार को चकित कर देता है। ।
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6
निराशावाद : एक अपराध
चिन्ता की प्रतिक्रिया करनेवाली दवा आत्मविश्वास है । जब हमें
मागं नहीं सूझता तब हम असफलता की आशंका से भयभीत होने
लगते हैं। परन्तु अपने उद्देश्य पर दृढ़ विश्वास हो, तो मार्ग आप
ही सूझ जाते हैं।
प्रसन्न रहना आसान है,
-उत्साही रहना आसान है,
-साहस करना आसान है,
--उपाय सोचना आसान है।
ऊपर लिखे आसान कामों के द्वारा ऐसा आश्चर्यजनक कार्य
सम्पन्न हो जाता है, जिसे देखकर लोग दांतों तले उंगली दबाने
लगते हैं और उस काम को अति कठिन बल्कि असंभव समझते हैं ।
जिसके मन में बेचैनी हो,वह स्पष्टतया सोचने-विचारने की
शक्ति नहीं रखता। उसका दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं होता। उसके
विचार उत्साहपूर्ण, साहसपूर्ण, तर्कपूर्ण नहीं होते । चिन्ता मस्तिष्क
को धुंधला कर देती है, सोचने की शक्ति को क्षीण कर देती है।
-स्वास्थ्य की बातें कीजिए-आप स्वस्थ रहेंगे,
-उन्नति की बातें कीजिए-आप उन्नति करेंगे,
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दुख की भावना फैलाने का किसी को भी अधिकार नहीं । दुःखबाद ही निराशावाद है। अकर्मण्यता का जन्म निराशावाद से ही होता है। मनुष्य का जन्म इसलिए हुआ है कि वह प्रसन्न रहे, हपं से प्रफुल्लित रहे, आनन्दमग्न रहे। मनहूस और मुहर्रमी सूरत लेकर अपने इष्ट-मित्रों या संबंधियों में जाने का आपको कोई हक नहीं। दुःख, निराशा जोर अकर्मण्यता फैलाने का आपको कोई अधिकार नहीं । कुछ लोगों को जब चिन्ता का दौरा पड़ता है, तो वे उसका स्वागत करते हैं । वे अपने फिक्र-चिन्ता-भय और दुःख को खोल-खोलकर बयान करने लगते हैं । वे अपने दुर्भाग्य का रोना रोने लगते हैं । वे अपने कप्टों के कारणों का, अपनी गरीवी के कारणों के प्रकट या छिपे स्वरूप का विस्तृत विवरण देने लगते हैं । उन्हें अपने जीवन को कटु बनाने वाली बातों को खुलासा वयान करने का चाव-सा होता है। उनकी उन्नति किन कारणों से नहीं हो सकी, इसका पूरा हाल सुनाने के लिए वे आतुर रहते हैं । इस प्रकार, अनजाने ही वे अपने अवचेतन मन के अन्दर शत्रु-विचारों को जड़ मजबूत करते रहते हैं और इसका उनके चरित्र पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है । इस प्रकार के चिन्ताग्रस्त, निराशावादी, रुदनशील प्राणी अपनी सारी प्रतिभा, कष्टों और दुःखों के चित्र चित्रित करने में ही व्यय करते रहते हैं। वे ऐसा प्रकट किया करते हैं कि जमे सारे संसार के कष्टों का बोझ उन्होंने ही अपने कंधों पर उठा रखा हो! इस प्रकार के व्यक्तियों की उपस्थिति में मुस्कराना कठिन हो जाता है, शान्त रहना मुश्किल हो जाता है, उन्मुक्त सांस लेना दूभर हो . जाता है। आप चाहे कितने ही उत्साही, कितने ही प्रफुल्लित, कितने ही हर्षित क्यों न हों, वे अपनी निराशाजनक, उत्साहनाशक बातचीत से आपको शिथिल करने में कसर नहीं छोड़ते। वे सन्देह, निराशा और अकर्मण्यता की बर्फ से आपका सारा उत्साह ठंडा कर देते हैं । जितनी ही बार आप उनके पास जाएंगे, आपको यही प्रतीत होगा कि सूर्य के प्रकाश से आप रोरव नरक के अन्धकार में जा पहुंचे fe ईश्वर ने यह सुन्दर भूमि बनाई और उस पर हमें हंसने- मुस्कराने, खिलने-खिलाने के लिए प्रेषित किया। उसने हमें यहां रोने, झोंकने, कुलबुलाने, विलाप करने नहीं भेजा । उसने हमें इस- लिए यहां नहीं भेजा कि हम शिकायत करते, निराशा फैलाते, हाय-हाय करते, कीड़ों की तरह रेंगते फिरें। इमर्सन ने कहा है-"प्रसन्नता से खिला, बुद्धिमत्तापूर्ण मुखड़ा सभ्यता और संस्कृति की चरम सीमा है-श्रेष्ठता का शिखर है।" इस प्रकार के शोभाशाली मुख का हम जितनी बार दर्शन करते हैं, उतनी ही बार ऐसी आभा देखते हैं। जिसकी झलक न पृथ्वी पर है न सागर में। उसके दर्शन से हमें ऐसा लगता है कि इस व्यक्ति का दिव्य शक्ति से कुछ आन्तरिक सम्बन्ध है । आभामय फिर भी शान्त, तेजस्वी फिर भी शोभाशाली, विचारशील फिर भी प्रसन्नता से उत्फुल्ल-ऐसा मुखड़ा देखकर प्रतीत होता है कि हमने 'पवित्रों से भी पवित्र' के दर्शन प्राप्त कर लिये। निराशाग्रस्त, रोने-कलपने वाला, शिकायतें करने वाला, मनहूस चेहरे वाला व्यक्ति कई वार समस्त परिवार में ही मुर्दनी और निराशा फैला देता है । वह परिवार के प्रत्येक व्यक्ति की सुख-शान्ति तथा प्रसन्नता हरण कर लेता है । अपने काल्पनिक दुःख से वह दूसरों की वास्तविक प्रसन्नता को नष्ट कर डालता है। इस प्रकार निराशावृत्त तथा विपादमय रहना क्या शक्तियों को क्षीण करना नहीं है ? क्या लाभ हो सकता है इस प्रकार की मानसिक स्थिति का? क्या लाभ है इस प्रकार मनहूसियत फैलाने - का? सर्वत्र हम ऐसे व्यक्तियों को देखते हैं, जिनकी ऊंची महत्त्वा- कांक्षाएं थीं, परन्तु वे कीड़ों की तरह रेंगते नजर आते हैं। वे छोटी- छोटी नौकरियों से ऊंचे उठने में असमर्थ रहे हैं। प्रतिदिन घोर . काम की चक्की में दिन काटने पर वे मजबूर हैं। इसका कारण है उनकी मनहूसियत, उनकी विषादमयी प्रवृत्ति, अपने दुखड़े रोते रहने की उनकी आदत। जो व्यक्ति अपने दुर्बल विचारों का दास है, वह कभी अग्रणी नेता नहीं बन सकता । वह मनुष्यों में शक्तिशाली मनुष्य की पदवी कभी नहीं पा सकता। वह कितनी ही विलक्षण वुद्धि वाला हो, कितनी ही योग्यता तथा कार्य-क्षमता से युक्त हो; परन्तु वह अपने 'मूड' का दास बनकर और पूरी तरह असमर्थ बनकर रह जाता है। इस प्रकार की मानसिक स्थिति में मनुष्य अपने हथियार डाल देता है और उसके हाथ-पांव ढीले पड़ जाते हैं उत्साहहीनता आने से व्यक्ति की निर्णय और न्याय की शक्ति घट जाती है। भय के दवाव से मनुष्य मूर्खतापूर्ण निर्णय कर लेता है। शक्ति, समझदारी, सन्तुलन, मानसिक सन्तुष्टि-इन सभी वांछनीय संपदाओं को वह खो बैठता है। प्रभावशाली कार्य करने के लिए इन गुणों की नितान्त आवश्यकता होती है। जिस समय किसी मनुष्य पर संकट आ पड़ता है या नआकस्मिक रूप में किसी बड़े काम की जिम्मेदारी आ पड़ती है, उसी समय तो उसके धैर्य की परीक्षा होती है, उसके पौरुष की परीक्षा होती है, उसकी प्रसन्नचित्तता की परीक्षा होती है, उसकी निर्णायिका शक्ति की परीक्षा होती है। किन्तु ऐसे समय वही व्यक्ति मुकाबला करने में समर्थ हो सकता है जो मन की शान्ति तथा सहज प्रसन्नता को नष्ट न होने दे। अपने को वश में कीजिए, मन को सन्तुलित बनाइए; अपनी स्थिति का धीरज से विश्लेषण कीजिए, प्रत्येक वस्तु की, प्रत्येक घटना की उचित नापतोल और जांच कीजिए तभी आप सही निर्णय कर सकते हैं; परन्तु सही निर्णय के लिए मन की साम्यपूर्ण स्थिति, प्रसन्नतापूर्ण स्थिति तथा सुविचारपूर्ण स्थिति आवश्यक है।
मनुष्य का जन्म इन्द्रियों का दास बनने के लिए, मनोभावनाओं का भृत्य.बनने के लिए नहीं हुआ है। उसका पौरुष इसी में है कि वह इनका स्वामी बने। जो इन पर शासन कर सकता है, वही अपनी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति करने में सफल हो सकता है।
विचार में परिवर्तन : कायापलट प्रत्येक कला मनुष्य की सीखी हुई योग्यता है। जो व्यक्ति जीवन में असफल होते हैं, उनमें से अधिकांश व्यक्ति यह नहीं जानते कि अपनी त्रुटियों को कैसे दूर करें तथा अपनी कार्यकुशलता को पूर्ण प्रवीणतायुक्त कैसे बनाएं। अपनी कमियों को दूर कीजिए, खामियां हटाइए, त्रुटियों को समाप्त कीजिए, गलतियों को सुधारिए और फिर अपने मन को सन्तुलित-समन्वित करके विचार तथा कार्य में सामंजस्य लाइए, ताकि आपके कार्य में आपकी पूर्ण कर्म-सामर्थ्य प्रकट हो और भविष्य में आपके हाथों जो रचना हो वह ललित तथा सुन्दर कला का आदर्श नमूना हो। आपका निर्माण उपयोगी, टिकाऊ तथा सुन्दर हो, जिसको देखते ही लोग वाह-वाह कर उठे। बहुत-से लोग बड़े नगर के किसी सुन्दर और बड़े पार्क में जमीन घेरकर अपनी झुग्गी-झोंपड़ी खड़ी कर देते हैं। सरकारी आदमियों के आने पर वे झगड़ा खड़ा कर देते हैं। वे भीड़ जमा करके अपनी गरीबी का रोना रोते हैं, दया की प्रार्थना करते हैं, अपनी असमर्थता और विवशता की दलीलें देते हैं। जब उन्हें अधिक देर वहां रहने दिया जाता है, तो वे हर प्रकार की गन्दगी फैलाते हैं। -
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हो सकतीं। जिस प्रकार घर का कूड़ा प्रतिदिन झाड़ से साफ करना पड़ता है, उसी प्रकार मन के कूड़े को भी प्रतिदिन साफ करना पड़ता है। निरन्तर नये विचार, आगे बढ़ने के विचार, प्रगति के विचार उन्नति के विचार मन में लाते रहिए तव शक्तियों को क्षीण करने की प्रक्रिया समाप्त हो जाएगी। हमारे मन तथा शरीर में निरन्तर विकास की प्रक्रिया जारी रहना स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। इसमें वाधा तव पड़ती है जब दूपित विचार हमारे मन पर आक्रमण करते हैं। परन्तु मन पर दूपित विचारों का आक्रमण तभी होता है, जब हमारे मन में शून्यता होती है; अर्थात् वहां रचनात्मक विचार अनुपस्थित होते से जब तक हम अपने मन में विकास के विचार रखते हैं, तव तक अवनति के विचार नहीं आ सकते, प्रगति के विचार हैं, तो प्रतिगति या दुर्गति के विचार नहीं आ सकते । मन को नवीन तथा तरोताजा करने के अनेक उपाय हैं और इस विषय में हम सबके भिन्न-भिन्न अनुभव हो सकते हैं । हम देखते हैं कि कई बार हमारे मन दुःख की छाया, निराशा की छाया आश्चर्यजनक रूप से लुप्त हो जाती है। दुःख के घिर आये बादल हट जाते हैं और उनके स्थान पर हर्ष और प्रसन्नता की धूप खिल जाती है। कम से कम, कुछ समय के लिए जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है। कई बार हम अनुत्साहित तथा निराश हो जाते हैं और अकस्मात् कोई शुभ समाचार आ जाता है और हमारा हृदय हर्ष से गद्गद हो जाता है अथवा कोई हंसोड़, सहृदय, खुशदिल, खुशमिजाज़ व्यक्ति आ जाता है और हमारी मनःस्थिति में पूर्णतया परिवर्तन ला देता है या कोई परमप्रिय स्नेही मित्र आकर सारा वातावरण ही बदल डालता है अथवा अचानक किसी सुन्दर स्थान अथवा देश की यात्रा का अवसर प्राप्त हो जाता है और उसके प्राकृतिक सौन्दर्य का लेप हमारे दुःखदग्ध हृदय को शीतल कर देता है, हमारे घावों को भर देता है या किसी ऐसे स्थान की यात्रा करनी पड़ जाती है । जिसकी हमारे मन में सदा से इच्छा रही है और वहां के सौन्दर्य, विशालता तथा आनन्दप्रदता के कारण हमारे विचारों में परिवर्तन आ जाता है और हम प्रसन्नता से विभोर हो जाते हैं। कुछ लोगों का यह विचार होता है कि मन बाहरी प्रभावों को ग्रहण करने में असमर्थ होता है और इसकी स्थिति में विशेष परि- वर्तन नहीं किया जा सकता और इसके हर्ष-विषाद की सीमाओं का निर्धारण वंश या भाग्य द्वारा होता है तथा हम केवल इतना ही कर सकते हैं कि इसे कुछ संस्कृति का अंश देकर चमका दें किन्तु यह धारणा गलत है। हमारे पास ऐसे असंख्य उदाहरण हैं, जिनमें व्यक्तियों की मनोवृत्ति में आमूल-चूल परिवर्तन होता देखा गया है। उनके मस्तिष्क के एक भाग में पूरी क्रान्ति होती देखी गयी है । बहुत-से लोग जो जन्म से ही दुर्वलांग थे, वे व्यायाम द्वारा पुष्टांग होते देखे गये हैं । अकर्मण्य कर्मठ होते देखे गये हैं। मनहूस शक्ल वाले प्रसन्नचित्त तथा उत्फुल्ल होते देखे गये हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सम्मुख हैं जिनमें व्यक्ति मानसिक शक्तियों से रहित थे; किन्तु प्रयत्न द्वारा उनमें भारी परिवर्तन आ गया और उनका दुर्वल व्यक्तित्व प्रबल व्यक्तित्व में परिणत हो गया। साहस का ही उदाहरण लीजिए बहुत-से अत्यन्त सफल व्यक्ति पहले इस गुण से रहित थे । खतरा था कि उनका समस्त भविष्य अन्धकारमय होगा; परन्तु माता-पिता या गुरु की शिक्षा का उनपर ऐसा प्रभाव हुआ कि उनके जीवन की धारा ही सर्वथा बदल गयी । इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य उपदेश या शिक्षा प्राप्त करके तथा निरन्तर अभ्यास से अपने विचार में क्रान्ति ला सकता है। 'उपदेष्टा या गुरु' पहले दुर्वल व्यक्ति में आत्मविश्वास की भावना जगाता है, फिर वारंवार साहस के उदाहरण देकर उसे साहस करने का सुझाव देता है, फिर वह उसे वीर पुरुषों का आदर्श सामने रखने के लिए कहता है फिर उसे वीर पुरुषों तथा जन- नायकों की जीवनियां पढ़ने का सुझाव देता है—इस प्रकार भय, कातरता तथा निषेधात्मक विचारों की जगह वह साहस और शौर्य जैसे विधेयात्मक विचारों की स्थापना करता है और व्यक्ति माता- पिता या गुरु की शिक्षा के अनुसार अभ्यास करता-करता अपने प्रवल व्यक्तित्व का निर्माण करने में सफल हो जाता है। साहस पर मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है और साहस का अभाव होने पर ही भय, कातरता मन को अपक्रान्त करती है। साहस के भाव परि- पक्व होने पर वही व्यक्ति, जो पहले कायर समझा जाता था- शौर्य एवं पराक्रम के कारनामे करके लोगों को चकित कर देता है। इससे यह प्रमाणित होता है कि मनुष्य की चित्तवृत्ति में आमूल परिवर्तन करना संभव है। जब आप भय, सन्देह, निराशा से ग्रस्त मनःस्थिति में हों, तब आप सही निर्णय नहीं कर सकते। उचित एवं ठोस निर्णय केवल उसी समय किया जा सकता है, जब मस्तिष्क सही कार्यकारी स्थिति में हो, वह निराशा, क्रोध, भय, ईर्ष्या, द्वेष, आदि के बादलों से घिर- कर अन्धकारमय न बना हुआ हो। भय तथा चिन्ताग्रस्त मनःस्थिति में कभी किसी महत्त्वपूर्ण विषय पर निर्णय नहीं करना चाहिए । जव मन निर्मल हो, सन्तुलित हो, शान्त हो, उस समय जो योजनाएं बनाई जाएं-केवल उन्हीं को क्रियान्वित करने का प्रयत्न कीजिए । भय, क्रोध आदि के आवेग होने पर मानसिक शक्तियां विखर जाती हैं। उस समय मन एकाग्र न रहने के कारण निर्णय गलत होते हैं। यदि मनुष्य सही प्रशिक्षण प्राप्त करे तथा मन को अभ्यास कराए, तो वह निराशा क्रोध, ईर्ष्या-द्वेष आदि के विकृत विचारों को कुछ ही क्षणों में अपने मन से दूर करने का सफलतापूर्ण प्रयत्न कर सकता है । वह मन के द्वारों को खोलकर अन्धकार दूर कर सकता है तथा प्रसन्नता-रूपी सूर्योदय का अनुभव करता है।
प्रसन्नता, आशा, आकांक्षा, उत्साह-इन भावनाओं के आते ही मन का अन्धकार दूर हो जाता है; अतः मनुष्य को चाहिए कि इन प्रिय भावों, इन रचनात्मक विचारों से मन को हर समय परिपूरित रखे। सभ्यता की प्रत्येक नयी आवश्यकता मानव-मस्तिष्क को नये काम करने की चुनौती देती है और जिस प्रकार जानवरों तथा मनुष्यों के शरीरों में जलवायु तया वंश-रक्षा के उद्देश्य से समय की आवश्यकताओं के अनुरूप लगातार सुधार होता चला गया है, उसी प्रकार आज के परिवर्तित संश्लिष्ट आवश्यकताओं वाले संतार की मांग के अनुरूप, मनुष्य को अपने मस्तिष्क को भी सुधारकर मुकाबले के लिए तैयार करना होगा। मस्तिष्क पर जिन कामों के बारे में सोचने का भार आ पड़ता है, उन्हीं के अनुरूप वह अपने में परिवर्तन कर लेता है, वह नये सल्स का विकास कर लेता है, दुर्बल सैल्स की मरम्मत कर लेता है तथा उन्हें आवश्यकता के मुकाबले के लिए तैयार कर लेता है। अतः यह हठवाद होगा कि 'हम नहीं बदलेंगे।' जलवायु, स्थिति तथा वंश-रक्षा की आवश्यकताओं के अनुरूप आपको बदलना होगा। प्राध्यापक एल्मर गेट्स ने कुत्तों पर मस्तिष्क विकास संबंधी कुछ परीक्षण किये थे । एक ही आयु-वर्ग तथा एक ही नस्ल के कुत्तों को लेकर उसने उनके भिन्न-भिन्न मस्तिष्क सैल्स का वैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा विकास किया । कुछ मस्तिष्क सैल्स को उसने पूरी तरह विकसित किया तथा मस्तिष्क सैल्स पूर्णतया निष्क्रिय रहने दिये, जिससे उनका विकास न हो सका । मस्तिष्क के जो सैल्स रंगों की पहचान को अनुशासित करते हैं, वे उन कुत्तों में इतने विकसित हो गये थे कि वे लाल, हरा आदि विभिन्न सात रंगों की अचूक पहचान करने लगे थे। चेप्टाओं की स्थितियों द्वारा मस्तिष्क सैल्स में परिवर्तन किया जा सकता है। उद्देश्यों की आवश्यकता के अनुरूप चेष्टाओं की स्थितियों का निर्धारण किया जा सकता है। जो मनुष्य बड़े शहर की हलचल, शोरगुल तथा त्वरा में काम करता है-उसकी मस्तिष्क शक्ति विविध रूपों में विकसित होगी । वह शीघ्र सोचेगा, तेजी से गति करेगा, संश्लिष्ट एवं विविध कार्यों में वह द्रुतगति से चेष्टा करेगा, शीघ्र आ पड़ने वाली विविधि आपात्कालीन क्रियाओं का मुकाबला करने के लिए वह तुरन्त कार्यवाही करने में अभ्यस्त हो जाता है। छोटे नगर, कस्वे में रहने वाले व्यक्ति का मस्तिष्क भिन्न प्रकार से विकसित होगा; क्योंकि उसकी आवश्यकताए इतनी विविध तथा संश्लिष्ट नहीं है और उसे तुरन्त ही बहुत-से निर्णय करने की आवश्यकता नहीं होती। मस्तिष्क अत्यन्त ग्रहणशील है । प्रत्येक धन्धा मस्तिष्क के सम्मुख भिन्न प्रकार की चुनौती उपस्थित करता है, और उसकी आवश्यकता के अनुरूप ही मस्तिष्क अपनी योग्यताओं का विकास करता है तथा विशेष किस्म के काम के लिए अपनी शक्तियों को बढ़ाता है । विभिन्न पेशों, धंधों, नौकरियों, व्यापारों और व्यवसायों के लिए विभिन्न प्रकार की विशिष्ट मानसिक तथा शारीरिक चेष्टाओं की आवश्यकता होती है और सभ्यता की यात्रा के साथ- साथ इन आवश्यकताओं में भी तीव्रगति से निरन्तर परिवर्तन होता रहता है; अतः जिस व्यक्ति का मस्तिष्क जितना अधिक ग्रहणशील, संवेदनशील, सूक्ष्म होता है, वह उतनी ही तीव्रता से अपने अंदर परिवर्तन लाने में समर्थ होता है तथा नये संघर्ष में सफलता एवं विजय प्राप्त करता है। उदाहरणतः,एक पुरोहित की आवश्यकताएं विशिष्ट होती हैं अतः उसका मस्तिष्क भी उन्हीं आवश्यकताओं के अनुरूप विक- सित होता है। वर्षों तक उसका मन निरन्तर आध्यात्मिक विषयों के चिन्तन में लीन रहता है, अतः उसके मस्तिष्क के विकास का स्वरूप एक वकील, व्यवसायी, या भवन-निर्माण विशेषज्ञ wn.
से भिन्न होगा। जिस व्यक्ति का जीवन अध्यापन या बौद्धिक हलचलों में लोन रहा है, उसके मस्तिष्क के सैल्स का विकास व्यापारी के मस्तिष्क से भिन्न होगा। अध्यापक में विचारों की उन्मुक्तता, कार्यों में शिथिलता, भौतिक पदार्थों की प्राप्ति के आग्रह का अभाव, आरामपसंदी तथा एकान्तप्रियता दिखाई देगी, जबकि व्यापारी में समझदारी, दूरदर्शिता, चतुरता, नियमबद्धता, समयबद्धता,फुर्ती और एक प्रकार की विचार सीमितता दिखाई देगी। महत्त्वाकांक्षा की उत्तेजना मस्तिष्क के विकास में परिवर्तन या सुधार लाने वाली प्रवल शक्ति है । महत्त्वाकांक्षा का निर्धारण या जीवन के उद्देश्य को तय कर लेना स्वयं अपने आपमें मस्तिष्क संबंधी बहुत महत्त्वपूर्ण घटना है। यह जहां मस्तिष्क में आगे होने वाले परिवर्तनों का कारण है, वहां अब तक हुए परिवर्तनों का परिणाम भी है। वैज्ञानिक लोग अब मस्तिष्क को विकसित करने की संभाव- नाओं पर खोज करने में निमग्न हैं । समय आयेगा, जब मस्तिष्क के विकास के रहस्यों को मानव जान लेगा और उससे मनुष्य के चरित्न के अभिवांछित विकास का कार्य सरल हो जाएगा । तव तक हमारे लिए इतना ही जान लेना पर्याप्त है कि यदि हम अपने मस्तिष्क का ऐसा विकास चाहते हैं कि हमारा व्यक्तित्व सर्वजन- प्रिय बने, तो हमें अपने मन से घृणा, जलन, ईर्ष्या, द्वेष आदि अनुदारतापूर्ण विचारों को बाहर कर देना चाहिए और उनके स्थान पर अपने मन में रचनात्मक, कियात्मक, निर्माणात्मक, धनात्मक विचारों को प्रतिस्थापित कर देना चाहिए। जीवन में नेतृत्व प्राप्त करने, शासन करने, सफलता पाने तथा विजय प्राप्त करने की यही कुंजी है।
सफलता का रहस्य
स्वेट मार्डन
मनुष्य की सफलता का रहस्य क्या है उसके विचार और
सही विचार । गलत विचारों वाला मनुष्य जीवन में कभी
सफल नहीं हो सकता। वह हमेशा ठोकर खाता रहेगा।
परन्तु सही विचार क्या हैं, उन्हें कैसे जगाया और
विकसित किया जाय, यह सब जान पाना आसान भी
और नहीं भी है।
इस विश्व-प्रसिद्ध पुस्तक की सहायता से आप भी अपने
विचारों के स्वामी बनकर अपने लिए सफलता के द्वार ,
खोल सकते हैं। निश्चय मानिए और विश्वास रखिए,
भविष्य आपका ही है, और यदि अब तक आपने पूरी और
मनचाही सफलता का अनुभव नहीं किया है तो अब भी आप
अपने मनोवल और दृढ़ संकल्प द्वारा सफलता की चोटी पर
पहुच सकते हैं।
युगपुरुष नेहरू
श्री जवाहरलाल नेहरू का जीवन-चरित्र
रस्किन बाण्ड
आधुनिक भारत के निर्माताओं में श्री जवाहरलाल नेहरू
का नाम सबसे आगे है । उन्होंने आजादी की लड़ाई
का ही नेतृत्व नहीं किया, आजादी मिलने के बाद हर क्षेत्र में
देश को आगे बढ़ाने की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया।
वे बच्चों को भी बहुत चाहते थे और उनकी उन्नति में
जबरदस्त दिलचस्पी लेते थे।
परन्तु युवा पाठकों के लिए अब तक उनकी कोई
संक्षिप्त, अच्छी और पूर्ण जीवनी उपलब्ध नहीं थी। इस
जरूरत को पूरा करने के लिए जवाहरलाल नेहरू स्मारक
निधि ने प्रसिद्ध लेखक श्री रस्किन वाण्ड से विशेष रूप से
एक जीवनी लिखवायी जो अंग्रेजी में प्रकाशित होकर देश
भर में बहुत लोकप्रिय हुई। अब स्मारक निधि ने उसी का
सरल हिन्दी अनुवाद प्रसिद्ध हिन्दी लेखक श्री राजेन्द्र अवस्थी
से करवाया है जो देश-भर के बच्चों और युवाओं के लिए
प्रस्तुत है। यह पुस्तक उन्हें न सिर्फ अपने महान् नेता के
जीवन और कार्य की सही और अधिकृत जानकारी देगी
बल्कि उन्हें देश के लिए अपना जीवन समर्पित करने की
प्रेरणा और उत्साह भी प्रदान करेगी।
सरल होमियोपैथिक इलाज
डा० युद्धवीर सिंह
'सरल होमियोपैथिक इलाज' में होमियोपैथी द्वारा प्रायः
सभी बीमारियों के इलाज का सरल और सुगम तरीका
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अपने अनुभूत और आजमाए हुए नुस्खे दिए हैं और प्रत्येक
बीमारी के लक्षण तथा उसके लिए उपयुक्त दवाओं के नाम
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