Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Sarthi Se Maharati

Shastri,sant Gokul Chandra · 2011/04

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हिंदी भूपण परीक्षा की सहायक पुस्तकें वीर-कविता की कुंजी (ले०--धीशंभुदयाल सक्सेना, साहित्यरत ) इसमें वीर कविता के सर पद्यों के अर्थ यड़ी सरल भाषा में दिए गए है। कठिन शब्दों के अर्थ और प्रसंगवश पाने वाली सत्र कहानियां भी दी गई है । इस कुंजी की सहायता से विद्यार्थी स्वयं इस पुस्तक को पढ़ सकते हैं । श्री शंभुदयाल सक्सेना और हिन्दी भवन का नाम इसकी शुद्धता और सर्वोत्तमता का सबसे बड़ा प्रमाणा है । भू२) हिन्दी-काव्य-विवेचना की प्रश्नोत्तरी [सं-हरिश्चन्द्र शास्त्री, हिन्दी प्रभाकर ] इसमें हिन्दी काव्य-विवेचना का संक्षेप प्रश्न और उत्तर के रूप में दिया गया है और पुस्तक में आई हुई सब कविताओं के अर्थ भी दिए गए हैं। सरल-इन-लेखन (ले०-श्री केशवप्रसाद शुल्क विशारद ) इसमें घरेलू पत्र, व्यावहारिक पत्र, निमन्त्रण-पत्र और अजी आदि लिखने का ढंग बड़ी सरल भाषा में समझाया गया है । पत्र लिखना सीखने के लिए सर्वोत्तम पुस्तक । हिन्दी-भूपण के प्रत्येक विद्यार्थी के पास यह पुस्तक जरूर होनी चाहिए। भू०) मात्र । भारतवर्ष के इतिहास की प्रश्नोत्तरी (दूसरा भाग) [ले. -ला. सोमदत्त सूद, अध्यापक कन्या-महाविद्यालय, जालंधर ] इस पुस्तक में प्रो० वेदव्यास और प्रो० गुलशनराय के भारत- वर्ष के इतिहास के श्राधार पर वास्कोडिगामा के भारत-प्रवेश से लेकर श्राज तक का भारतवर्ष का इतिहास प्रश्न और उत्तर के रुप में दिया गया है । मूल्य ) हिंदी भूपण परीक्षा की सहायक पुस्तकें व्याकरण-प्रदीप [सं-प्रो. राय एम. ए.] यह हिन्दी का परला व्याकरगा जिममें ध्याभरगा विपर का विवेचन पर्याप्त विस्तार और शास्त्रीय ढंग से रिज्या गया है, जिममें हिन्दी-भाषा-विज्ञान पर भी संक्षिप्त विनार प्रगट किये गये और राजस्थानी, अवधी तथा प्रजभाषा में ध्यासगा पर भी प्रकाश डाला गया है। यही इसकी मय बड़ी विशेषताएँ है, और यही विद्यार्थियों की सबसे बड़ी मांग है जिन्हें प्राचीन काव्य- माहित्य का भी अध्ययन करना होता है। इसकी इसी विशेषता को देखकर पंजार यूनिवर्सिटी ने इम हिन्दी भूपगा में नियत किया है। मूल्य १) अलंकार प्रवेशिका की प्रश्नोत्तरी (ले-मा-दुर्गादास गुत, साहिरप विशारद, हिन्दी-प्रभार) इसमें अलंकार प्रवेशिका का संप प्रश्न और उत्तर के रूप में दिया गया है। मूल्य 1-1 मान । व्याकरण की प्रश्नोत्तरी है.-श्री भीमप्रताप शास्त्री, पी. ५. भौर कपिराज रामलाल अप्रवाल संपादक-श्री धर्मचन्द्र विशारद इस पुस्तक में हिन्दी का सारा व्याकरण बहुत श्रासान भाषा में प्रभ और उत्तर के रूप में समझाया गया है । विद्वान संपादक ने इसे हर तरह से विद्यार्थियों के लिए उपयोगी बना दिया है। पुस्तक लेते समय संपादक का नाग अवश्य देख लें । मूल्य 1-) सारथी से महारथी की कुंजी [ले-लारामकृष्ण शाखी, हिन्दी प्रमार] इसमें 'सारथी से महारथी' के सर गीतों और कठिन शब्दों के अर्थ देकर नाटक फे अंकों की कथा का संक्षेप सरल भाषा में दिया गया है।

सारथी से महारथी ( मौलिक नाटक) नौसहिया जैन जय। वीकार। लेखक- सन्त गोकुलचन्द्र शास्त्री, पी. ए. द्वितीय संस्करण) २००० मूल्य ११) अमिल्द १)सजिल्द मकाशक- चन्द्रगुप्त विद्यालंकार माहित्य भवन, ५१, मुभा रोड, साहार। . ला. देवराज एम. ए नीली बार प्रेस, रामनगर, लाहौर ।

} माद्रीपुत्र
नाटक के पात्र
पुरुष पात्र
युधिष्ठिर
भीम कुन्तीपुत्र
अर्जुन
पांच पांडव (भाई)
नकुल
सहदेव
अभिमन्यु-अर्जुनपुत्र
घटोत्कच-भीमपुत्र
धृष्टद्युम्न-दुपदपुत्र ( द्रौपदी का भाई )
श्रीकृष्ण-यादवेश (अर्जुन का सारथी)
धृतराष्ट्र--हस्तिनापुर-नरेश (दुर्योधन आदि का पिता)
दुर्योधन-धृतराष्ट्र का बड़ा पुत्र
कर्ण-राधापुत्र ( वास्तव में कुन्तीपुत्र)
शकुनि-दुर्योधन आदि का मामा
दुःशासन-दुर्योधन का भाई
विकर्ण-दुर्योधन का भाई
भीम-कौरव-पांडवों का पितामह
दोण-भरद्वाज का पुत्र, कौरव-पांडवों का अस्त्रविद्या शिक्षक
शल्य-मदराम (फर्ण का सारथी)
विदुर-धृतराष्ट्र का छोटा भाई

रुपाचार्य-द्रोणाचार्य का साला; कौरव-पांडवों का शिक्षक
अश्वत्थामा--द्रोणाचार्य का पुत्र
सैनिक
दर्शक
प्राह्मण
जरासन्ध
जयद्रथ
प्रौपदी स्वयंवर में उपस्थित राजगण
शिशुपाल
अधिरथ -सून ( कर्ण का पोषक पिता)
स्त्रीपान
गांधारी-धृतराष्ट्र की स्त्री (दुर्योधन आदि की माता)
कुन्ती-पांडु की स्त्री (कर्ण, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन की माता)
द्वौपदी-अर्जुन की स्वयंवर-विजिता घी
पद्मावती-कर्ण की स्त्री
राधा-कर्ण की पोषिका माता

दो चार शब्द मुझे हिन्दी-संस्कृत बोर्ड का सदस्य होने की हैसीयत से कई नए और पुराने लेखकों के भिन्न भिन्न विषयों पर नाटक- ग्रन्थों के पढ़ने का अवसर मिलता रहा है । कहावत है- खरबूजा खरबूजे को देख कर रंग बदलता है । अतः मुझमें भी इस क्षेत्र में कूदने का शौक उठा । उसका परिणामस्वरूप यह नाटक सहृदय पाठकों के सामने प्रस्तुत है । यह मेरा प्रथम प्रयास है, इसमें कोई शक नहीं--पर मैंने इसे परिश्रम से लिखा है जैसे कि प्रथम कृति को हरेक लेखक लिखता है । यह अच्छा है या बुरा है इस का निर्णय पाठक और समालोचक करेंगे। कर्ण को ही अपनी कृति का नायक मैंने क्यों बनाया -इसका विशेष कारण है। भारतीयसत्ता की नाव प्राज फल ऐसे समुद्र में यह रही है जो विक्षुब्ध है, जिसमें रहने पाले अनेक ग्राह उसे टक्कर से चकनाचूर करने को उद्यत है । उस नाय को सुरक्षित पार लेजाने का भार उन नपयुवकों पर है जो उत्साही, धैर्यावलंयी और प्रति- कूल परिस्थितियों में भी घबराने पाले न हो। ऐसे नवयुधको के सामने अनुकरणार्थ ऐसे महापुरुषों के जीवन चाहिये जिन में ये गुण विद्यमान हों । मुझे भारत के प्राचीन और अर्था- चीन इतिहास में एक कर्ण ही पेसा मिला है जिसका जीवन नवयुवकों के जीवन को ऐसे सांचे में दाल सकता है।

कर्ण का जीपन संघर्ष का जीवन था । उत्पन्न होते
हो माता ने पानी में यहा दिया। देयात् मृत्यु से तो बच गया,
पर हाथ किस के लगा ?-एफ सूत के। उन दिनों शुद्धों का
समाज में जो स्थान था यह फिसी से छिपा नहीं। किसी और
के हाथ लग जाता तो शायद उसे अपनी स्वामाधिक शकियों
के प्रदर्शन का अनुकूल अवसर मिल जाता, पर शुद्र को कौन
पूछता था!
सूतपुत्र होने के कारण ही द्रोणाचार्य ने उसे उच्चकोटि
की अस्त्र विधा देने से इनकार कर दिया, परशुराम जी ने
पढ़ाई हुई विद्या यापस लेली, द्रौपदी-स्वयंघरमें मारा हुआ मैदान
उसके हाथ से निकल गया. फिर भी वह हताश नहीं हुआ।भाग्य
फा-दुर्भाग्य का मुकाबला डट कर करता रहा । परिणाम यह
हुआ कि दुर्योधन के माधिपत्य में उसे अपनी अन्तर्लीन
शक्तियों के प्रदर्शन का अवसर तो मिला, पर यहुत थोड़ा।
कारण यह था कि उसे एक ऐसे व्यक्तिका यलम्पन लेना पड़ा,
जोईया, मद, लोभ और मोहके अथाह सागरमें यह रहा था।
कर्ण को भी अपने उन्नायक का अनुसरण करना पड़ा। इसलिए
चीफण, भीष्म, द्रोण, विदुर और दूसरे गण्य-मान्य नेता उस
घिराद्ध हो गये, यात यात में उसे उन लोगों को खरी-खोटी
गते सुननी पड़ती थीं। फिर भी उसने जीपट को नहीं छोड़ा।
स का ध्येय था अर्जुनवध-और उस की पूर्ति में यह एफ
दम भी लक्षित मार्ग से इधर उधर नहीं हुआ। उसके जो
रिख ये, ये भी उस को चीरता, दानवीरता और स्वाभि-

AASHA
मानता के कायल थे। श्रीकृष्ण और शल्य ने र
प्रशंसा की है। माता कुन्ती के शब्दों में-
“वह शूर था. वीर था, उत्साही था, दानी
का पछा था। सारथी के घर पल कर-उसका पुत्र
में महारथी का पद पाना उसी का काम या
(पांडवों ) जैसे वीरों का उसे मुकाबला करना ट
उसे भाग्य से भी लड़ना पड़ता था " .
भारत के हतभाग्य युवकवर्ग कायम
होना चाहिये क्यों कि “ उसकी अपना
पराकाष्टा है । कर्ण मरा नहीं जीवित है.
रहेगा । उसका जीवन वीरों का आदर
वीरता के इतिहास में सदा सुवर्णाक्षण

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पहला अंक
पहला दृश्य
(समय-सायंकाल, स्थान-नदीतट पर एक रम्य बन, एक स्त्री और
उसका पति दोनों बैठे हैं)
अधिरय-फैसा सुहावना समय है !
राधा-और फैसी शीतल बयार चल रही है !
अधिरथ-इन हरे-भरे वृक्ष और लताओं को देख-देख नयन
श्रान्त ही नहीं होते।
राधा-और उन पर उछलते-फुदकते पक्षियों के कलरव को सुन
फर कान तृप्त ही नहीं होते।
अधिरथ-इस फलनादिनी नदी को भी देखो । फैसी इठलाती और
मदमाती चाल से सागर की ओर चल रही है !
राधा-यही चाल नवोढा वधू की होती है, जब उसे पतिदेव के
प्रथम दर्शन की लालसा रहती है।
अधिरथ -जरा नभो-गण्डल को भी तो देखो कैसी काली घटा
छाई हुई है !
राधा-यही काली घटा नाथ. समम्त Aam -

अधिरय-इममें यया मना । जय या वांगन का प्रयास पहातो
है तो उसे पान कर समस्त प्रति उन्मत्त होकर नापने
लगती है।
राधा-ममम्त मनम्पति में नपा सीमन प्रा माता है, यह नाइलहाने
लग जाती है।
धधिरय-सृष्टिक कण-कण में नव जीवन का संचार होने लगता
है। लता-श श्रादिमें नई महानि का भाती है-
1-और ये मानन्द से नाचने लगते हैं। अपने फल-फूलों को
देख-देस मानो आनन्दसे झूमने लगते हैं। प्रायो
नाथ, हम भी प्रकृति देवीफ. टमास और मानन्द की
धारा में अपने आप को यहा।
अधिरथ-( मनमनाAT र) राधे, कैमा अच्छा होता यदि
हम भी इन फलते-फूलते वृक्षों में उल्लास और भानन्द
का रसास्यादन करते! पर...
राधा--पर क्या ? कहते-पाहत रुक क्यों गये स्वामी ?
अधिरय--पर जब कभी ऐसे समय में मेरे हृदय में विनोद
और श्राहाद की रेखा का उदय होने को
ही होता है सो उसी समय एक अलक्षित
वेदना हृदय में उठती है। उसी के योग
2-असह्य घोझ के नीचे दपकर सारा का सारी
विनोद और पाल्हाद चूर्ण हो जाता है । क्या
फभी इन फले-फूले वृक्षों की तरह भाग्यवान

होंगे ? क्या हमारे जीवन-वृक्ष की सूखी डालियों के
साथ भी ईश्वर कभी ऐसे सुन्दर फल..............
राधा-(प्रेम से ) अवश्य लगायेंगे नाथ । ऐसी साधारगासी
वांत के लिए दिल को छोटा न करना चाहिए प्रागाधन ।
ईश्वर के अक्षय भएडार में किसी वस्तु की कमी नहीं।
किसी न किसी दिन वे हम कंगालों की भी करुण-पुकार
सुनकर हमारी फैलाई हुई झोली भरेंगे।
गाना
हरि, मत और अधिक तरसाओ।
हम चातक तुम घनश्याम हो, करुणाजल बरसाओ हरि मत।
आँखें प्यासी उस दरसन को, अब तो झलक दिखाओपहरे मत ।
सूना सय घरयार तनय बिन, सुत-आनन दरसाभो ॥हरि मत।
(किसी नवजात शिशु के रोने की आवाज़ आती है।)
अधिरथ-(कान लगाकर) सुनती हो-किसी बालक के रोने
की आवाज़ पा रही है।
(गाना मेड़कर, कान लगाती है।)
राधा-मालूम तो यही होता है और आवाज़ भी नदी में से श्रा.
रही है। चल.कर देखें तो?
अधिरथ हां, चलो देखें। (दोनों चलते हैं।"
--

(Atha team thaर)
या-(१) देखिये, या मौत मामने
यह रही?
re--कोई पिटारी मा रहा है।
(MR WAR CATRaat Ke we
amerient)
-~(Teri) रे ! पिटरंग एक नमार गिरा है।
अधिरय-(पान में रेगर) गो. नौ किमी ने एक लकी
का मासा दे रहा है की सदस्य र गाय । ऐमा
पर व्यहम करते हुए भी उस मन की फोमन
মাখনাঙা বা বাবা যায় না। কাপুর
होता है उमेरमा स्याश्या, मत्यु नहीं।
(or my को २३)
सपा-(स) देसी मधुर मुगश्यान !
अधिरथमा कमलसा मिला हुआ गुस
रापा-ईश्वर ने हमारी करणपुकार सुन ली है।
अधिरध-और हमें सुन्दर घटा दे दिया है।
राधा-इससे मेरी गोद हरी हो गई है।
अधिरथ मेरे घर में माला हो गया है।
राधा--यह फोई पड़ी पापागाइदया जननी होगी जिसने ऐसे
लाल को त्याग कर अपनी गोदी सूनी कर ली है।
तोहरी हो गई है।

( ५ )
राधा-संसार की गति ही ऐसी है प्राणवल्लभ । एक सूना होता है
और दूसरा भरपूर होता है ; कोई उजड़ता है, कोई बसता
है। सूर्य अपने पीछे अन्धकार छोड़ कर आगे उजाला
करता है। समझ में नहीं पाता, ऐसे चान्दुसे सुन्दर
वालक को त्यागने का कारण क्या होगा।
अधिरथ-राधे, वह वेचारी कोई विपद को मारी होगी। भाता
का मोह तुम जानती ही हो ! उसने विवश होकर
ऐसा किया होगा । बेचारी अब भी पाठ-आठ
आंसू रो रही होगी।
(नालक रोने लगता है)
राधा-(गोदी में झुलाती हुई मुंह को चूम कर ) न रो मेरे लाल !
देखो, रोओगे तो मैं न बोलूंगी।
अधिरथ-(सी के साथ ) लो, तुम' तो सचमुच इस की मां
वन पैठी हो।
राधा-मां नहीं हूँ तो और कौन हूँ। क्या मां के सिर पर कोई
सींग होते हैं । घी का हृदय वड़ा विशाल होता है स्वामी ।
वह जिसे वहां एक बार स्थान दे देती है, फिर उसे
वहां से अलग नहीं होने देती । फिर स्नेहबंधन !
यह तो एक विचित्र बंधन है ! कई बार दो अपरिचित
व्यक्तियों को भी यह ऐसे. दृढ़ पाशों से बांध देता है कि
संसार की कोई शक्ति भी उन पाशों को तोड़ नहीं सकती।
--

गाना
राधा-दी में मम दिनसी मुनाली है।
प्रसारिम गुन मुपापितोकिममहाकदिनीविकाitiरने.
अधिरय-जीर्ण-शीर्ण अति देह को मुतमी माटी की है॥हीने
दोना-अंधारमय हम जीवन में चन्द्रमोरना की है। हरने
शुग जुग जियो मानोने पेटा. प्रभु मे विनय यही ने.
(दोनों गांव-गात, आनन्द स प - मन, भारत का लिये
निकल मति है)।
दूसरा दृश्य
(समय-मभ्याह, स्थान-एक सुला मैदान, कई घालक खेल रहे हैं)
एक लड़का हम लोग प्रतीक्षा करते करते यान्त होगये, पर फर्ग
अभी तक नहीं पाया।
दूसरा लड़का-याता कैसे पिता फै साथ कहीं रथ हाँक रहा होगा।
(मा, हिला विकास गरले.)
सीसरा लड़का-अरे ! रथ कहाँ हाँक रहा होगा कपड़ा घुन रहा
होगा-जुलाहे का पोता जो बहरा! (फिर सब इंसते है)
पहला लड़का-सुना है यह नदी में डूब रहा था, अधिस्य ने
इसे बचाया है।

दूसरा लड़का और पुत्र की तरह पाल-पोस कर इतना बड़ा
किया है।
तीसरा लड़का--किसी बड़े भाग्यवान का लड़का मालूम होता है।
दुसरा लड़का होगा, पर अब तो सारथी का बेटा है।
चौथा लड़का--तुम लोगों को ऐसी बातें करते लज्जा नहीं आती ?
कर्ण की उपस्थिति में तो तुम्हारे देवता न मालूम कहां
कूच कर जाते हैं, मुँह में जवां नहीं रहती, भीगी बिल्लीसे
बन जाते हो।
पहला लड़का-बातें तो तूने पते की कहीं। कर्ण की उपस्थिति में
उसकी यात तक काटने का किसी को साहस नहीं होता।
सही बात तो यह है कि उसके अलौकिक और तेजस्वी
मुख की ओर हम नजर उठाकर देख भी नहीं सकते ।
दूसरा लड़का-देख भी क्योंकर सकें ! उसके सुवर्णमय कुंडल और
कवच पर जिस समय सूर्य की ज्योति प्रतिविम्बित
होती है तो उसका सारा शरीर ही सुवर्णमय दीखने
लगता है । अनेकों सूर्यों का प्रकाश मानो एकत्र
हो जाता है।
चौथा लड़का-मेरे पिता जी कहते हैं कि वह मनुष्य नहीं देवता है,
शायद किसी शाप के कारण स्वर्ग छोड़ कर
भुमण्डल पर पाया है।
का-यह बात भी ठीक हो सकती है।
".

(८)
सुवर्णमय कुण्डल और कवच सहित उत्पन्न हुआ
न देखा है और न सुना है।
(सहमा एक अन्य गुगर भाकर लड़कों को मारने दौरता है।
सरहाके भागने लगते है। एक तीर सामने से भाकर
मुभर के माथे पर लगता है। वह पिलाता-चिल्लाता
भाग जाता है। इसने में कर्ण भाता है।)
कर्ण-(धनुष पर तौर पदाये ) भाइयो, भागो नहीं । सुअर तो
भाग गया, तुम क्यों भाग रहे हो ?
सब ( इकडे होकर )-कर्ण भैया, तुमने देर क्यों कर दी ?
चौथा लड़का-(दूसरे और तीसेर लड़कों की ओर इशारा करके ) ।
ये
कह रहे थे कि-
(ये दोनों लड़के हाथ जोड़ने के इशारे से उसे मना करते हैं)
कर्ण-बताश्रो, बताओ क्या कह रहे थे ?
चौथा लड़का-कह रहे थे कि......कि......कर्ण माता पिताकी
सेवा में लीन होकर हमें भूल गया होगा।
कर्ण-मेरे भाग्य में कहां कि मैं माता-पिता की यथेष्ट सेवा कर
सकू ! फिर भी जितनी वन पड़ती है, उसे करना अपना
अहोभाग्य मानता हूँ। मेरी तुच्छ सेवा से प्रसन्न होकर जब
वे मुझे आशीर्वाद प्रदान करते हैं तो चित्त में ऐसा भान
होता है कि मानो मुझे त्रिलोकी का साम्राज्य मिल गया है।
पर इस समय मुझे उनकी सेवा का सौभाग्य नहीं मिल

• . तीसरा लड़का-तुम और क्या कर रहे थे ? कर्ण-मैं अस्त्रविद्या का अभ्यास कर रहा था। दूसरा लड़का-क्या अकाने ही ? कर्ण-हां, अकेने ही। क्या अकरने अभ्यास नहीं किया जासकता? जैमा मनो-यांग एकान्त में अकेले अभ्यास करने से हो मकता है वैसा अन्यत्र नहीं । चौथा लड़का-तुम ने अस्त्रविद्या की दीक्षा किससे ली है ? फर्ण-अभी तक तो किमी से नहीं ली। दूसरा लड़का-तो बिना गुरुदीक्षा के तुम ने इतना कुछ सीख लिया है ? पहला लड़का-तब तो कमाल है ! दूसरा लड़का-मिलकुल कमाल है कर्ण-कमाल-बमाल फुछ नहीं । साधना से किया काम सदा फल- प्रद होता है। चौथा लड़का-कर्ण भैया, एक बात मैं अवश्य कहूँगा । मनुष्य स्वयं चाहे किसी भी विद्या में कितना ही प्रवीण क्यों न हो जाय, किन्तु उस विद्या के वास्तविक मर्म का ज्ञान गुरुदीक्षा के बिना कभी नहीं प्राप्त होता है। कर्ण-यह तो मैं भी मानता हूँ, पर मुझे दीक्षा देगा कौन ? चौथा लड़का- - फौन नहीं देगा! आप श्राचार्य द्रोणजी के पास क्यों नहीं जाते ? वे तुम्हें अवश्य अस्त्रविद्या सिखाएंगे। द्रोण कौन हैं और कहां रहते हैं ?

चौथा लड़का-श्या प्राचार्य को भी नहीं जानते १ प्राचार्य द्रोगाजी महर्षि भरद्वाजभी के सुपुत्र है, धान फल भीष्मजी की देख-रेख में कौरव और पांडव फुमारों को श्रखशिक्षा दे रहे हैं। उन जैसा अशाप्रयता संसारभरमें कोई नहीं है। आप जैसे सुपात्र शिप्य को पाफर ये प्रसन्न होंगे। कः-माई, तुम ने यह यान बताकर मुझ पर पड़ा उपकार किया : है । मैं श्राजीवन तुम्हारा आभारी रहूँगा। अब मैं वहीं जाने का उपाय करना हूँ। ( मबसे) भाइयो, मुझे पत्र विदा दो। सय कर्ण भैया, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो । पर हमें भूलना नहीं। फर्ग-क्या बाल्यसखा भी कभी भूल सकते हैं ? (बात करते करते सा माने हैं) तीसरा दृश्य (स्थान-अधिरथ का घर, एक कमरे में करणं आग के साथ नीचे- ऊपर टहल रहा है।) कर्ण(अपने आप, आवेग से } सूतपुत्र--सूतपुत्र--सूतपुत्र ! जहां जाता हूँ कान में यही शब्द प्रतिध्वनित होते हैं-सूतपुत्र- सूतपुत्र । नदी फी लहरों से, वायुमंडल से, घर की दीवारों तक से भी यही आवाज़ आती है। ब्द पीछा नहीं छोड़ता।

( ११ )
(कुछ सोचकर ) अपमान जनक क्यों ? 'गुणा: सर्वत्र पूज्यन्ते
पितृवंशी निरर्थक ।
सूनपुत्र हूँ तो क्या! मैं किस बात में किसीसे होन
हूँ ! क्या मुझ में ब्राह्मणों जैसा मस्तिष्क नहीं, क्षत्रियों
जैसी बलिष्ठ भुजायें नहीं और उन भुजाओं में शस्त्र थामने की
शक्ति नहीं ? (चिन्तानिमग्न होकर) फिर भी मैं जहां जाता हूँ
मुझे सूतपुत्र और शूद्र कह कर चिढ़ाया जाता है।
इससे मेरे नाक में दम आ गया है । लुटेरों की तरह जान
छिपाये भागा फिरता हूँ।
तीन चार दिन की बात है-खेलते-खेलते समवयस्क
साथियों से कुछ अनबन होगई। वे थे चार और में अफेला,
चारों को खून पीटा। इतने में एक ब्राह्मण देवता वहां श्रा
निकले और मुझे यह कह कर लगे धमकाने कि शूद्र
होकर तुम्हारी क्या मजाल कि इन उच्चवंशीय बालकों
का सामना करे! उस के ये वचन न थे, पैने तीर थे।
मेरे दिल में चुभ गये। अपनासा मुंह लेकर मैं घर में
आगया।
कल की ही एक और घटना है। मैं आचार्य द्रोण से
अलविद्या सीख रहा था । द्रोण जी की अर्जुन पर विशेष
कृपा रहती है । उन्होंने उसे ब्रह्मास्त्र का प्रयोग और
संहार सिखाया है। मैंने भी उनसे वही अस्त्र मुझे सिखाने
को विनय किया। जो उत्तर प्राचार्य ने दिया वह अब भी
हजारों विच्छुओं की तो in_winnar
-

है। उन्होंने कहा-ग्राह्मण और क्षत्रिय के सिवा इस अस्त्र
का और कोई अधिकारी नहीं।' उन के विचार में शूद्रों
का ईश्वरीय सृष्टि में अस्तित्व ही नहीं। माना कि शूद्रों
का स्थान ममाज में बहुत नीचा है, सामाजिक शरीर के
वे पाँव माने जाते हैं, पर शरीर का अङ्ग तो हैं। पाँव
ही सही। क्या पाँव निष्क्रिय हैं। कभी नहीं, पाँव न हो तो
समूचा शरीर ही निकम्मा है । ( और भी भाग से ) यह
सूतपुत्र कर्ण समाज में शूद्रों को अधिकार प्राम करा कर ही
दम लेगा। क्षत्रियपन का गर्व करने वाले अर्जुन से नाकों
चने चबवायेगा। जिस अर्जुन के लिये श्राचार्य ने मेरा इतना
अपमान किया है, उसका क्य ही मेरे जीवन का ध्येय
होगा। (कुछ ठहर कर ) पर कहें क्या ! कोई साधन
भी तोपास नहीं । शस्त्रविद्या के ठेकेदार भी तो ब्राह्मण और
क्षत्रिय ही हैं । वे मुझे अप्लशिक्षा क्यों कर देंगे।
(फिर आवेश से ) -सूतपुत्र............
(एक भोर से अधिरथ आता है और छिप कर कर्ण की
बातें सुनता है।)
कुलहीनता का भारी पत्थर मेरे गले से ऐसे ज़ोर से यांधा
हुआ है कि संसारसागर में मुझे यह नीचे की ओर ही
लिये जा रहा है, ऊपर उठने ही नहीं देता। विधाता
यदि मुझे सूतकुलजन्म के माथ अनुभवशक्ति प्रदान न
फरता तो मुझे जरा भी कष्ट न होता। अपने कुल के दूसरे

( १३ )
गोगों के साथ में भी ऐसे जघन्य अपमानों को सहिष्णुता
। सहता और उनकी परवाह न करता।
-( अपने आप ) हा देव ! मैं ही कर्ण के कष्टों का कारण
हूँ। यदि मैं इसे नदी से निकाल कर अपने घर न
लाता तो शायद किसी कुलीन व्यक्ति के हाथ में श्राकर
यह भी फुलीन माना जाता और सूतपुत्र होने के
अपमानसे मुक्ति पाता । शुभ संकल्प से किये परोपकार
का भी कभी कभी कैसा बुरा परिणाम होता है-इसका
उदाहरण मुझे अाज मिला है तो क्या मैं इसे वास्तविक
परिस्थिति का परिचय देकर इसके मानसिक बोझ को
हलका कर दूं ? ( सोच कर) नहीं, ऐसा करने से
घोर अनिष्ट होने की आशंका है। इस में न इसका
लाम है और न हमारा ! यह हमें छोड़ कर दर-दर
भटकता फिरेगा और इसके स्नेहपाश में बंधे हुए हम
इसके वियोग को न सह सकेंगे। ( पास जाकर और सिर
पर हाथ रख कर ) कर्ण, क्या सोच रहे हों बेटा ? आज
तुम्हारा चेहरा सूर्य के प्रचंड ताप से म्लान कमल की
तरह क्यों मुरझाया हुआ है ?
॥ जोर का और भारसरों में आंसू भर कर) पिताजी, क्या शूद्रों
1. में कोई स्थान नहीं ? क्या वे मनुष्यसमाज
ा होने का भी अधिकार की ...

? ( १४ ) इन्हें क्यों टुकराया जाता है ? पिता जी, कहिए, मनुष्य- समाज की दृष्टि में ये क्यों इतने गिरे हुए माने जाते हैं ? अधिरथ-येटा, वास्तव में हम लोगों का मनुष्यसमाज में कोई स्थान नहीं । हमारी सत्ता ही नहीं मानी जाती । हमारे साथ पशुओं से भी घृणिततर बर्ताव होता है । पर किया क्या जाय ? यह दुर्गति सहनी ही पड़ती है । मैं न सहूँगा पिताजी । अपनी तपश्चर्या और भुजबल के प्रताप से अपने पुल का नाम समुज्जल कर अपनी जाति को ऊंचा करूंगा। बताइये पिताजी. है कोई ऐसा व्यक्ति जो शूद्रोंको अस्त्रविद्या दे सके ? यदि है तो वह चाहे संसार के किसी दूरतम कोने में भी छिपा हो, मैं उसके चरणों की रज माथे पर चढ़ाऊंगा और श्राजीवन उसका किंकर रह कर उससे धनुर्विद्या सीलूँगा । अधिरथ---पर ऐसा है कौन जो हम लोगों के साथ कुछ सहानुभूति रखता हो ? मुझे तो ऐसा कोई नहीं दीखता। हाँ, जमदमिपुत्र परशुराम जी अस्त्रविद्या के पारंगत हैं। इस विद्या में कोई भी उनके जोड़ का नहीं। वे क्षत्रियों फे परम शत्रु हैं, इस से उन्हें अस्त्रविद्या नहीं देते, पर शूद्रों को भी नहीं देते-ग्रामण हैं-कट्टर ग्राह्मण हैं। ब्राह्मणों को ही अस्त्रशिता देते हैं। प्राचार्य द्रोण जी फ भी वे ही गुरु हैं।

. . ( १५ ) फर्ण-श्राचार्य द्रोण के भी वही गुरु हैं ! तो मैं उन्हीं से ही अस्त्रविधा सीखंगा-जैसे भी हो, अवश्य सीतूंगा; और श्राचार्य द्रोण और उन प्रिय चेले अर्जुन का मानमर्दन करूंगा। अधिरथ- 1-पर यह होगा कैसे ? कर्ण-जैसे भी हो. यह करना होगा । (आवेश से) प्रणाम पिता जी । ( प्रणाम करके प्रस्थान) अधिरथ-कर्ण मेरे लिए एक पहेली है । इस में अवश्य कोई देव- अंश है । ये जन्मजात सौवर्ण कुण्डल और कवच किसी मनुप्य के कभी हुए हैं ? (आकाश की ओर देखकर) ईश्वर, मेरे कर्ण के तुम ही रक्षक हो । (प्रस्थान) चौथा दृश्य (स्थान-एफ बन, कर्ण एक वृक्ष के सहारे खड़ा है । उसकी वैषभूपा ब्राह्मणों की सी है, हाथ में धनुप और कंधे पर तूणीर है।) कर्ण-( अपने आप ) अभ्यास करते करते मैं श्रान्त हो गया हूँ। गुरुजी ने जितने प्रकार की अवविधा सिखाई थी उसके अभ्यास में अब कोई न्यूनता नहीं रही। (यंग्य से) श्राचार्य ने मुझे ब्रह्मास्त्र नहीं दिया तो क्या? वही ब्रह्मास्त्र मैंने गुरु 'सले लिया है। प्राचार्य ने भी तो इन्हींसे.

था। अय अर्जुन मुझ से किस बात में अधिक है ! जय
उमका और मेरा सामना होगा नो पता लग जायगा उसे
आटे-दाल का भाव; तब देगा किस करवट ऊँट बैठता
है ! ब्रह्मास्त्र उसके पास भी है और मेरे पास भी । रही
यह बान कि उससे लाम कौन उठायेगा इसका निर्णय
समय करेगा। (मामने देखकर ) सामने लताओं के फरमुद्र
में कौन जीत्र है ! ऐसा जान पड़ता है कि कोई वनपशु खेत
का ध्वंस कर रहा है। इसका संहार करना चाहिए । वनपशु
के संहार के साथ ही शब्दवेधी पाण की परीक्षा भी हो
जायगी । ( धनुष पर सौर चढाकर छोड़ता है। तार
लगने से एक गाय के रंभाने की मायाज आती है।)
(चकित होकर ) यह तो गाय की आवाज़ है । कहीं मैंने
धेनुश्य तो नहीं किया ! (भागकर उधर जाता है । गाय को
मरी पड़ी देख कर ) मैंने कैसा अनर्थ कर डाला! अज्ञान से
जगन्माता पयस्विनी धेनुका वध कर डाला है। मैं कैसा
अभागी हूँ ! दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ता। ओ करता
हूँ शुभ संकल्प से करता हूँ, पर होता है बिलकुल विपरीत !
(कुछ चिन्तित होता है)।
(ससा एक माह्मण भाता है)
प्राझण-(जोर से ) कपिला, परी कपिला! कहां चली गई री!
(भपने आप ) श्राज कहीं दूर निकल गई मालूम होती
।

( १७ )
है। पहले तो मेरे एक ही बार चुलाने पर रंभाने लग
जाती थी और प्रेम से उछलती फूदती मेरे पास आती थी-
(महमा कर्ण उस के पाम भाता है।)
कर्ण-( अपराधीसा; हाथ जोड़ कर ) पर अब आपके अनन्त काल
नक पुलाते रहते भी न रंभायेगी और न आपके पास
श्रायेगी।
प्राह्मण-कारण?
[---उस को हत्या हो गई है।
ब्राह्मण-(भ्याकुल होकर ) किस के द्वारा?
कर्ण-मुझ अधर्मी और पापी के द्वारा ।
'प्राह्मण-मेरी यतधेनु की हत्या करने वाले अधर्मी, पापी,
नारको, तूं ब्राह्मण नहीं चांडाल है। ब्राह्मण के पवि
नाम को कलङ्कित करने वाला वास्तव में दानव है।
कर्ण-(हाथ जोड़कर) क्षमा कीजिये महात्मन, मैं ब्राह्मण नहीं हूँ।
प्राझण-यदि ब्राह्मण नहीं है तो तू कौन है ? कपटयेप में ब्राह्मण
जाति को घोर पाप से लांछित करने वाला तूं कौन है ?
फर्ण-मैं सूतपुत्र हूँ।
प्राह्मण-सूतपुत्र है ? तो इस कपटवेप से प्राह्मण के पवित्र नाम
फो कलुषित क्यों कर रहा है ?
फर्ण यह न पूलिये महात्मन् , इस बात को कुछ काल तक गुप्त
-

( १८ )
श्रामग-गुप्त रहने दूं ? क्यों ? (कुछ ठर कर) नहीं बताता अच्छा,
नयना, मैं स्वयं योगदृष्टि से इस का पता लगा लेता हूँ।
(भास मंद कर और ध्यानावस्थित होकर, फिर कुछ समय बाद
भासें खोल कर ) लग गया पता । छल-कपट जैसे धृणित
व्यवहार से तू परशुराम जी से अनविद्या सीख रहा है।
छिः छिः ! ऐसे कुकार्य से अस्त्रविद्या जैसी पवित्र विद्या को
प्राप्त करने की चेष्टामात्र करना भी अति जघन्य कर्म है।
कर्ण-महात्मन्, क्षमा करें। मैं इतना पापी नहीं जितना आप मुझे
समझ रहे हैं। मैंने वेपपरिवर्तन एक ध्येय की पूर्ति के
लिये किया है।
प्राह्मण-मुझे सब बात का पता लग गया है राधेय । जिर
उद्देश्य से तू यह सब कुछ कर रहा है उस में तुर्भ
कभी सफलता न होगी। जिस को नीचा दिसा
के लिये तूने यह वेष धारण किया है, और जिस ।
तू सदा लाग-डाँट रखता है उसी से युद्ध करते समय ते
रथ का पहिया पृथ्वी में फंस जायगा और वह तेर
बध कर देगा । गौ माता को हत्या के कारण गौ (पृषी
ही तेरे वध का निमित्त होगी।
कर्ण-(हाथ जोड़कर) ऐसा शाप न दीजिए महात्मन् । इस
तो मुझे मार ही डालिये । मैं सब प्रकार के अपमा
सहने को प्रस्तुत हूँ, पर अर्जुन से परास्त होने का अपमा
।

-
(१६)
नसह सगा। इस शाप से मुझे मुक्ति दीजिए। और
कोई भी दण्ड दीजिए, पर यह यन्त्रणा मुझ से न सही
जायगी।
माझगा-फर्ण, ऐसे घोर पाप का दण्ड भी ऐसा ही घोर होना
चाहिये । यह शाप अक्षरशः सत्य होगा। मेरे वचन
मिथ्या न होंगे । ( जाता है।)
फर्ण-(निराश होकर) दुर्भाग्य ने यहां भी मेरा पीछा नहीं
छोड़ा। (कुछ ठहर कर ) यद्यपि मेरे भाग्य में विफलता ही
लिखी है तो भी मैं कमर कसकर उस का साम्मुख्य
फरंगा। ऐसी परिस्थितियों में कर्ण व्याकुल होने का
नहीं । बाधायें कायरों के लिए होती हैं, वीर नर तो उन से
और भी उत्तेजित होकर कर्मपथ पर अग्रसर होते हैं ।
(प्रस्थान)
पांचवाँ दृश्य
(स्थान-परशुराम जी का आश्रम)
फर्ग-(शोक-मरतसा) इतने दिनों की घोर तपस्या को एक ही
शाप ने विफल कर डाला है। जब विधाता ही मेरे वाम है
तो मैं और किसी से क्या कहूँ ! ( कुछ सोच कर ) श्राज
प्रात: से न जाने चित्त बेचैनसा क्यों हो रहा है ! उस में
वचारतरंगें उठती और विलीन हो रही हैं। न.
केस भावी घटना की सूचक है (...
S

(२०) कुछ भी हो जाय, कर्ण उनका सामना करेगा। बाधाओं के पहाड़को भी गुरुजी यताये हुए एक ही शस्त्र के प्रहार से छिन्न-भिन्न कर देगा। कर्ण के दिल में लोहे को दृढ़ता है और शरीर में इस्पात की क्षमता है। उसका क्रोध अशनिपात के समान है जहां गिरेगा उसे अस्त- ध्वस्त कर देगा। एक अर्जुन क्या, सौ अर्जुन भी उसके सामने टिकने का सहास न कर सकेंगे। (नेपथ्य से--कर्ण ! कर्ण !! ओ वेदा कर्ण !!!) (मन कर) यह तो गुरु जी को श्रावाज है । ( ऊँचे स्वर मे) आया गुरु जी ! ( उठ कर जाना चाहता है)। (परशुराम जी का प्रवेश, कर्ण विनीत भाव से हाथ मौज कर उन्हें प्रणाम करता है)। परशुराम-बेटा, आज मैं बहुत प्रान्त हो गया हूँ। एक तो कई दिनों का उपवास, उस पर यह लंबी यात्रा! आखिर अवस्था भी तो ढल रही है। अब शरीर से अधिक कष्ट नहीं सहा' जाता। हाड मांस का ही तो बना है, इस्पात का तो नहीं। कर्या-आप मेरी गोद में सिर रखकर जरा विश्राम कीजिये, मैं अभी मुट्ठी-चंपी से श्राप की मब थकावट भगा देता हूँ। परशुराम-मेरा जी भी यही चाहना है कि थोड़ी देर मुस्तालूं । (कर्ण की गोद में सिर रस कर लेट जाते है)। फर्ण-(कुन समय तक उनके सिर को दापने के वाद) सो गये। कितने प्रान्त थे : लेटते ही गाढ निद्रा में चले गये।

( कर्ण की टांग में कुछ पाना होने लगती है )
अहह ! दाई टाँग में बड़ी पीड़ा हो रही है। ऐसा
मालूम होता है जैसे सैकड़ों बिच्छू काट रहे हैं । (टांग
को एक भयंकर मांसाहारी कीड़ा काटता नज़र आता है।)
क्या यही कीट काट रहा है ? ऐसा भयंकर मांसाहारी
कीट मैंने अाज तक नहीं देखा । ऐसा प्रतीत होता है
कि शरीर का सारा लोहू पीकर ही रहेगा। अरे ! पीड़ा
तो बढ़ ही रही है । पर किया क्या जाय. न मैं इसे मार
सकता हूँ और न झ्गा ही सकता हूँ । जरा भी हिला
कि गुरु जी की निद्रा का भंग हुश्रा ।
परशुराम-( अक्रमात् आंखें खोलकर) अरे ! ये पानी यहां कैसे
श्रागया ? सारा शरीर इससे तर होगया है।
कर्ण-यह पानी नहीं गुरुजी ।
परशुराम तो क्या है ?
कर्ण-यह लोहू है।
परशुराम-लोहू ! (सहसा ठकर ) लोहू कहां से आगया ?
कर्ण-मेरे शरीर से।
परशुराम -तरे शरीर से ! सो कैसे ?
कर्ण-गुरुजी, जय श्राप मेरी गोद में सिर धर कर सोगये तो एक
भयङ्कर मांसाहारी कीट ने मेरी जंघा का मांस काट खाया,
उसी घाव से यह रुधिर निकल रहा है।
-तुमने उसे हटाया क्यों नहीं ?
जरा भी हिलता तो आपकी नोंद टूट जाती।

( २२ ) परशुराम-( अपने आप ) इतनी सहिष्णुता! फिर ब्राह्मण में ! विधाता ने ब्राह्मणों का हृदय कोमलतम स्नायुतन्तुओं से बनाया है, उसमें ऐसी कठोर यातना सहन करने की शक्ति हो ही नहीं सकती (कोप के आवेश में, कर्ण से) तू ब्राह्मण नहीं है-ब्राह्मण हो ही नहीं सकता। अग्नि अपनी दाहशक्ति चाहे छोड़ दे, पर प्राह्मण कभी अपनी स्वाभाविक मृदुता को नहीं छोड़ सकता । प्रामाण और कठोरता ! नहीं नहीं, कदापि नहीं-तू माझया नहीं हो सकता । मुझ से धोखा हुआ है । (क्रोध से अखि लाल करके ) सच बता नराधम, तू कौन है ? सच बता नहीं तो अभी शाप भस्म कर देता हूँ कर्ण-(हाथ जोड़ कर ) क्षमा करें, भगवन् । मुझ से बड़ा अपराध हुश्रा है। मैंने पापको धोखा दिया है । इस पाप का प्रायश्चित करने को मैं तैयार हूँ। मैं ब्राह्मण नहीं, मैं सून- परशुराम--सूनपुत्र!, फर्ण-हां गुरुदेव, मैं सूतपुत्र हूँ। मेरे पिता का नाम अधिरय और माता का नाम राधा है। मैं प्राचार्य द्रोण जी का शिन्य हूँ। सूतपुत्र होने के कारगा मुझे ये ब्रह्मास्त्र नहीं देना चाहते थे, अर्जुन को ही देना चाहते थे। उनके इस पक्षपात- युक्त व्यवहार और अपमान से मेरे हृदय पर बहुत गहरी चोट लगी। तत्काल मैंने निश्चय किया कि कहीं से भी प्रसाद प्रास फरंगा और अर्जुन को समना करंगा। मैंने फिर सोचा, श्राप भी मुझ सूनपुत्र को प्रशिक्षा न देंगे । इससे मैंने । असत्य-भापणसा घोर अपराध किया है । मेरी यह विव- शता देखकर मुझे क्षमा दान दें। (उनके चरणों पर गिरता है ।) परशुराम-(क्रोध से ) नीच, तेरे इस घृणित अपराध को मैं कभी क्षमा नहीं करूंगा। तू सूतपुत्र होकर पांडु-कुल- शिरोमणि अर्जुन का मुकाबला करना चाहता है ! निस्सन्देह, मैं तुझे कभी अपना शिष्य स्वीकार न करता यदि मुझे तेरी वास्तविक गति का पता लग जाता। कर्ण-(गिरा हुआ ही) क्षमा गुरुदेव ! परशुराम-मैंने पहले ही कह दिया है कर्ण, कि यह अपराध मैं क्षमा नहीं करूंगा, पर तुझे कोई बहुत कड़ा दण्ड भी नहीं देना चाहता, जो कुछ मैंने तुझे दिया है वही लौटा लेता हूँ । इसलिये यह शाप- कर्ण-(भूमि से उठकर और हाथ मोद कर ) क्षमा गुरुदेव, आमा- परशुराम-कभी नहीं । इस लिये तुझे यह शाप देता हूँ कि जिस समय तू अर्जुन के साथ युद्ध करेगा उस समय मेरी दी हुई समस्त शास्त्र-विद्या तुझे भूल जायगी। पर मेरा शिष्य रहने से रण-भूमि में दूसरा कोई भी तेरे सामने न टिक सकेगा। तेरा नाम संसार में अमर अमरता क्या करूं! मैं अमरता नहीं चाहता। मैं चाहता ही वात-अर्जुन को नीचा दिखाना, - ( २४ ) परशुरामकर्ण, अर्जुन के सखा कृष्णा है। यतः कृष्णस्ततो जयः। (स्थान) कर्ण-( आकादा की और) अर्जुन, मुकाबला तेरा और मेरा नहीं हो रहा है, हमारे भाग्यों का हो रहा है। मैं स्वीकार करत हूँ-तेरा भाग्य मेरे भाग्य से प्रयल है। अहां जाता हूँ दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ता। फिर भी कर्ण ने कभी उत्साह छोड़ना नहीं सीखा । तेरा और मेरा सामनः रगा-स्थल में अवश्य होगा-परिणाम कुछ भी हो। रहे हो छठा दृश्य स्थान-एक बाज़ार, समय मध्याह, लोग सड़क पर चल फिर रहे हैं। एक मनुष्य-( सामने से माते दूसरे मनुष्य को) कहीं आ भाई देवदत्त ? देवदत्त-उधर ही तो, जिधर सब लोग जा रहे हैं। क्या तुम नहीं चलोगे? तु-भाई, जाने को जी तो चाहता है, पर क्या करूं धर फे फामों ने नाक में दम कर रक्खा है, उन से छुट्टी ही नही पाने पाता। देवदत्त --अरे मित्र ! घर के कामों से तो तभी छुट्टी मिलेगी अब यमराज का निमन्त्रण आयेगा। यज्ञदत्त--तब तो छूटेंगे हो, किसी पर अहसान थोड़े करेंगे। यज्ञदत्त- , ( २५ ) (मामने मे धर्मदेव और शान्तिदव आते है।) धर्मदेव-(देवदत्तके कंधे पर हाथ रख कर) देवदत्त भैया, चलोगे न ? देवदत्त-चनूंगा क्यों न ! मुझे यज्ञदत्त जैसे काम-काज थोड़े ही हैं। जब जी चाहता हे काम करता हूँ, जब जी चाहता है उसे छोड़ देता हूँ। धर्मदेव -क्या यज्ञदत्त न जायेगा ? ( यशदत्त की ओर) अरे भाई, संसार के काम तो होते ही रहते हैं, पर ऐसा अवसर तुम्हारे-मेरे जीवनकाल में फिर आने का नहीं । शान्तिदेव-इस में क्या सन्देह है। मैंने सुना है कि राजकुमार बहादुरी के ऐसे ऐसे करतब दिखाते हैं कि देखने वाले दंग रह जाते हैं। धर्मदेव--जो बातें सुनी भी नहीं वे देखने को मिलेंगी। सुना है अर्जुन कुमार ने धनुर्विद्या में अति-प्रवीणता प्राप्त कर ली है। एक तीर चलाता है तो अंधकार हो जाता है। शान्तिदेव--और उसी दम जब एक और छोड़ता है तो न जाने अन्धकार कहां रफूचकर हो जाता है-सर्वत्र प्रकाश हो जाता है। देवदत्त- ---इस से भी बढ़ कर चकित करने वाली एक और या सुनो है । जब चाहे वह तीर छोड़ फर मेंह बरस सकना है। शान्तिदेव-अजी यही नहीं, उस के तोर श्राग बरसा सकते है सांप छोड़ सकते हैं, निद्रा ला सकते हैं, और न मा क्या क्या कर सकते हैं।

(२६) यादत्त-तो क्या ये सब करतय भान ही दिखाये जायेंगे? देवदत्त 1-पान न दिखाये जायेंगे तो कय दिसाये जायेंगे ! पान हो तो बुमारों को परीक्षा का दिन है। यादत्त परीक्षा लेंगे कौन ? धर्मदेव-श्रोणाचार्य जी के सिया और कौन ले सकता है! अर्जुन की परीक्षा लेने में और किस की समता है ! गुरु गुड़ तो चेला शफार-यह कहावत यहां चरितार्य हो सकती है। यादत्त-वहां और क्या क्या होगा? शान्तिदेव-तरह-तरह के खेल दिखाये जायेंगे, गदा युद्ध होंगे, अस्नचातुरी दिखाई जायेगी। देवदत्त-दा-युद्ध किन में होगा? शान्तिदेव कुमार भीमसेन और दुर्योधन में । देवदत्त-दुर्योधन भीम का क्या मुकाबला करेगा ! एक ही प्रहार से घना मुंह के बल गिरेगा। धर्मदेव-ऐसा मत कहो । गदा चलाने में दुर्योधन भी किसी से कम नहीं। संसार में यदि कोई भीम का साम्मुरण्य कर सकता है तो दुर्योधन ही कर सकता है। (बाजों को भावाड़ आता है।) देवदत्त-हम लोग यहीं खड़े विवाद कर रहे हैं और उधर खेल श्रारम्भ होने को है। -मालूम तो ऐसा ही होता है। बानों की आवाज़ शायद रंगभूमि से ही प्रारही है। देवदत्त-तो अब चलना चाहिए । ! धर्मदेव-

सव-हां हां, चलें बहुत भीड़ जुट गई तो फिर खड़े होने को
भी स्थान न मिलेगा।
यज्ञदत्त-तुम लोग चलो, मैं भी घर से होकर पाता हूँ।
धर्मदेव-फिर वही बात!
देवदत्त-अरे जाने दो इस सड़ियल आदमी को । रात-दिन
फाम धंद में ही फंसा रहता है।
धर्मदेव-फंसा रहा करे, हमें क्या ! हम तो न कुछ लेकर आये हैं
और न कुछ लेकर आयेंगे। जो दिन प्रानन्द से कट
जायें वे ही अच्छे ।
(देवदत्त, शान्तिदेव और धर्मदेव जाते है )
यज्ञदत्त 1-इन लोगों को बुद्धि पर बलिहारी ! पर खाने को एक
दाना भी नहीं, और चले हैं खेल-तमाशा देखने । मेरे
घर में घृद्ध माता-पिता हैं, स्त्री है, बाल बच्चे हैं।
उनका पालन-पोषण करना मेरा प्रथम धर्म है। खेल
तो होते ही रहते हैं। ( जाता है)

( २८ )
सातवाँ दृश्य
(स्थान-गभूमिका बड़ा भारी मैदान, उसके एक कोनमें सभामंडर,
सभामंडप में उच्च सिंहासन के आसपास यैठने के प्रासन,
पीछे कुछ ऊँचाई पर राजघराने की स्त्रियों के लिये
प्रेक्षागार, रंगभूमिमें दर्शकों का भारी जमाव ।)
(सब से पहले आचार्य द्रोग, अपेन पुत्र अश्वत्थामा जी के साथ .
प्रवेश करते है।)
एक दर्शक-(पास खड़े दर्शक से) भाई, ये कौन हैं ?
दूसरा दर्शक- इन्हें भी नहीं पहचानते ? ये 'हो, तो प्राचार्य
द्रोण हैं । इनके साथ दूसरे व्यक्ति इन्हीं के सुपुत्र
अश्वत्थामा जी हैं।
तीसरा दर्शक इतने वृद्ध हैं, तो भी इनका मुखमंडल सूर्य के
समान दमक रहा है। चाल से मत्त मातंग को
भी मात कर रहे हैं । मस्तक पर तिलक, मुख
पर श्वेत और लम्बी रमश्रु, गज के भुजदंड के
समान आजानु-लम्बी भुजायें और उन
पहने हुए भुजत्राण, हाथ में धनुप और कंधे पर
शरों से भरा तूगीर-इनकी शोभा को द्विगुणित
कर रहे हैं । ...
चौथा दर्शक-इन्हें देख कर इस समय ऐसे मान हो रहा है
जैसे ब्राह्म और क्षात्र तेजों ने मिलकर एक अपूर्व
ज्योति उत्पन्न कर दी है। राजस और सात्विन
गुणों का विचित्र सम्मिश्रण हुअा है !
.
पर

। । ( २६ ) ( आचार्य एक ऊँचे मंच पर खड़े होते हैं।) कुछ दर्शक-अरे भाइयो, कुछ सुनने भी दोगे ? आचार्य कुछ कहने लगे हैं। प्राचार्य द्रोगा-पुरवासियो, आज का दिन आप लोगों के लिये अत्यन्त शुभ दिन है। आज के दिन राजकुमार, आपके भावी शासक अपनी अस्त्र-शिक्षा समाप्त कर आपके सामने उस में परीक्षा देंगे। राज- कुमारों की शिक्षा मेरे अधिकार में हुई है। इसका मुझे गर्व है । जैसी शिक्षा उन्होंने ग्रहण की है वह उन के वंश के अनुरूप है। उसी में उनकी आज परीक्षा होगी। आप लोग सावधानता से उनके करतबों को शान्तिपूर्वक देखें। सब लोग-श्राचार्य द्रोण की जय ! राजकुमारों को जय ! पालकियों में बैठी हुई राजकुलाङ्गनाएँ आती है। उन्हें प्रेक्षागार के पास खड़ा किया जाता है। सब स्त्रियाँ पाल- कियों से निकल कर प्रेक्षागार में जा बैठता है। गांधारी-( आंखों पर पट्टी बांधे हुए) बहन कुन्ती, बहुन लंबी प्रतीक्षा के बाद आज का दिन आया है। आज हमारे स्तनन्धय बनों ने युवावस्था में पांव घरा है। सिंह- शावकों से वनराज केसरी बने हैं। आज यह देखना होगा कि इन्हों ने शत्रुदल को दलन करने और आतों के रक्षण की कितनी क्षमता प्राप्त की है। वर्षों के प्रतीक्षा के बाद क्षत्रियों के भाग्य में यह दिवस देखने को मिलता

।
चुभता रहना है, उसे पर पार निकालने का यज्ञ किया मी
पर ज्यों ज्यों यम किया त्या त्यों पद और भी
धेसता गया ।
पुन्ती---यह कौन सी ऐसी यात है यही दीदी ?
गांधारी-पही यह अस्त्रशिक्षा भाई भाई में इंन्या और यमनस्य के
योज योने वाली न हो। मैं कई दिनोंसे देख रही हूँ कि
फौरवों और पांडवोंमें भ्रातृभाव के भाव विलीन होते जा रहे
हैं। मेरा येटा (मो सास मेकर) मेरा येटा दुर्योक्न तुम्हारे
सब येटों से, विशेषतः अर्जुनते डाह करना रहता है ! उस
फी देखा-देखी उसके दूसरे भाईयों में भी वैसे ही कुसंस्कार
जागृत हो रहे है । मैं ईश्वर से सदा यही प्रार्थना करती
रहती हूँ कि ये मेरे येटो-~-कौरव और पांडवों को सुमार्ग
पर लाएँ। भाई-भाई फा ईर्ष्यानल सारे पुल को भस्म
फर देना है यहन।
पुन्ती-ऐसा विचार मन में न लायो घड़ी दीदी । कुमार अभी
धाज्ञक , घड़े होने पर सम्भल जायेंगे। घर के दो घरतन
भी आपस में टकरा जाते हैं, फिर ये तो मनुष्य हैं। महा-
राज की देख-रेख में सम्भल जायेंगे।
गांधारी-खेदतो यह है कि इसका बहुत सा उत्तरदायित्व भी इन्हीं पर
है । इनके कान सुनते हैं पर आंखें"नहीं देखतीं। देखने
और सुनने में बहुत बड़ा अन्तर है । बचपन से दुर्योधनका
स्वभाव बहुत कुटिल रहा है । बातों बातों में ऐसा मकड़ी
का सा जाल फैलाता है कि ये उस में फंस जाते हैं
और दुर्योधन की वात को टाल ही नहीं सकते।
..

( ३२ ) फुन्ती-मैं एक बात कहती हूँ-बुरा न मानना । भाई शकुनि का व्यवहार भी मुझे देर से खटक रहा है । वे सदा दुर्योधन फे ईर्ष्यानल को भड़काते रहते हैं-बातों बातों में उस में मानों घी डालते रहते हैं। गांधारी-इस में कोई संदेह नहीं। मैं भी यही बात देर से देख रही हूँ। एक दो बार भाई को समझाया भी है, पर वह ऐसी घेसिर-पैर की बातें करता है कि कुछ समझ में नहीं पाता । अब तो ईश्वर ही कुरुवंश का रक्षक है ! फुन्ती-बड़ी दीदी, अब इन यातों को रहने दो। यह समय विपादका नहीं, हर्ष का है । लो, राज्य के मन्त्रिगण, विदुर जी तथा दुसरे राजवंशी लोग पा रहे हैं। (रानमन्त्री, श्री व्यास जी, विदुरजी, भीष्मपितामह, कृपाचार्य और दूसरे राजवंशी लोग आकर अपने अपने आसनों पर बैठ जाते है। दर्शकों में कोलाहल होने लगता है।) कुछ दर्शक-हटो हटो, रास्ता छोड़ो। कुछ और दर्शक-अरे अंधे हो ! देखते नहीं किन की सवारी श्रा रही है ? कुछ दर्शक- कि तुम लोग क्यों गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला रहे हो ! हम सब कुछ देख रहे हैं। महाराज ही तो प्रारहे हैं।

( का मिाही भाते हैं। उन के पाउ र दो आता है। उस पर
महारान राष्ट्र सोने के दौर में मेरे, बनके पछि सबर्ग
पत्र का पामे कि मनुष्य बेटा है, दूसरा उन पर
चमर मुस्टा रहा है। उनके माते ही नरमिप
बत्रने लगा। चारों भोर शोर
मचने लगता )
सब लोग-(एक रपर से ) फुस्युलावतंस महाराज धृतराष्ट्र फी
जय! (इछ समय तक 'जय' 'जय' के मारे सुनाई देते हैं)
धृतराष्ट्र--(विदुर से) विदुर जी, आचार्य में विनय फीजिए कि
परीक्षा-कार्य प्रारम्भ करें।
विदुर-बहुत अच्छा । (ोप से ) प्राचार्य, महाराज की प्रज्ञा
है कि कुमारों को बुला कर कार्यक्रम शुरू हो ।
द्रोण-बहुत अच्छा-
(भाचार्य वाजेवालों को संकेत करते है । बाने बजने लगते है।
पहले युधिष्ठिर, भीम, भर्जुन, नकुल और सहदेव पांचों
पांडव भौर फिर दुर्योधन और उसके सर भाई
रंगभूमि में भाते हैं । सब कुमारों की ऊंगलियों
पर अंगुलित्र हैं। उनकी कमरों में रस.
जटित सुवर्ण के पट्टे बंधे है। उनकी ..
पीठों पर तरकस और हाथों
• में धनुष है।)
एक दर्शक-मनुप्यकुमार है कि देवपुत्र हैं !

दूसरा दर्शक-कुमार युधिष्टिर का भाल कैसा चमक रहा है ! वहां पर साफ लिखा मालूम होता है कि यही हमारे महाराज होंगे । इन में सम्राट बनने के सब लक्षण दिखाई देते हैं। तीसरा दर्शक-तब न बनेंगे जब दुर्योधन यनने देंगे ! चौथा दर्शक- दुर्योधन की क्या मजाल कि बाधा डाले ! भीम और अर्जुन के रहते दुर्योधन की दाल न गलेगी। पांचवां दर्शक-अरे मित्र, ज़रा भीम की ओर भी देखो। कैसी मत्त मातंग की सी चाल है ! छठा दर्शक-अजी रहने दो मत्तमातंगी चाल । देखो वनराज कसरी दुर्योधन श्रा रहा है। सातवां दर्शक-अर्जुन को तो तुम लोगों ने देखा ही नहीं । धनुष तो उसी के हाथ में सोहता है, मानों उस पर उसी का स्वत्व है। एक और दर्शक-अरे भाइयो, छोड़ो इस वाद-विवाद को। तुम्हारे मत्तमातंग और यनराजफेसरी, धनुष और गदा अभी तुम्हारे सामने श्रा जायेंगी। व्यर्थ झगड़ा क्यों करते हो? एक दर्शक-क्यों न झगड़ा करें-हम सब लोग पुण्यात्मा पांडय- कुमारों की जय चाहते हैं । धर्म उनकी ओर है यतो धर्मस्तो जयः। दार कहने से दुर्योधन और उसके भाइयों घनता बिगड़ता है ! अभी मैदान में पानी . - दूसरा

पानी होगा और दूध का दूध ! सों के साथ पांचों
का क्या मुकायला!
(ोनो दलों के लोग भाप में माने समय
आकर उन्हें शान कर है।)
द्रोणाचार्य---(दर्शकों के प्रति ) सर कुमार श्राप गामने परीक्षा
दन को उपस्थित हैं। आपलोग ध्यान से उनके
करतय देखें।
(लांगों में फिर शोर होने लगता है।)
एक दर्शक-श्रो ये लाल दुपट्टे वाले, भाई, सनिक यैठ जाओ, जरा
हमें भी युद्ध देखने दो।
वह दर्शक देखने को इतने उत्सुक थे तो पहले क्यों नहीं था
गये ? में सूर्योदय से पहले यही खड़ा हूँ। मैं
न वेगा।
(दूसरी ओर फिर शोर)
कुछ दर्शक-यैठ जाइये, येठ जाइये, भागे खड़े हुए लोग यदि
बैठ जाये तो सब लोग आराम से देख सकेंगे।
( रक्षापुरुष आकर लोगों को शान्त करते है और सर हुए दर्शकों को
बैठाते है।)
द्रोणाचार्य--पहले कुमार युधिष्ठिर आपके सामने भाला चलाने
चातुरी दिखायेंगे।
( अश्वारूद युधिष्ठिर मैदान में आते हैं और घोड़ा दौड़ा कर भूमि में
गड़ी हुई एक कोली को भाले की नोक से
उपाल ले जाते है।)

( ३५ )
सब लोग-(एक स्वर से) वाह वाह ! कैसे भाला अपने निशाने
'पर ठीक पैठा!
एक दर्शक-इसी को कहते हैं भाला चलाना!
दूसरा,, -प्राचार्य के मिखाये हैं भाई ।
तीसरा ,,-अभी आगे देखना और क्या क्या होता है ।
(युधिष्ठिर तलवार से ऊपर से गिरती हुई नारंगी के अपर में
हो दो टुकड़े कर देते हैं।)
(जनता में करतलध्वनि, युधिष्ठिर का प्रस्थान । )
(एक ओर से भीम और दूसरी ओर से दुर्योधन गदा लिये आते
है और गदायुर करते हैं।)
भीम ---(ललकार कर) दुर्योधन, हम दोनों में से किसको गदा चलाना
अच्छा थाता हैइसका निर्णय थान हो जायगा।
'दुर्योधन-हां, अवश्य होजायगा और सदा के लिए हो जायगा ।
अभी एक ही प्रहार से तुम्हारा काम तमाम किये
देता हूँ।
भीम-श्रीज तुम्हारे ही हृदयरक्त से तुम्हारा ईनिल शान्त
करता हूं।
(दोनों जोर से प्रहार करते है-प्रहारों से उनके कंचुकों से
भाग की चिनगारियां निकलती है। एक एक प्रहार
पर लोग वाह वाह' के नारे लगाते हैं
भौर करतल ध्यान करते है।)
एक दर्शक-ऐसा मालूम होता है कि दो माता भिड़ रहे हैं।
दूसरा,अरे मातंग क्या, मुझे तो दो पहाड़ टकराते दिखाई

तीसरा दर्शफ-दोनों को चिनगारियों के समान जलती मारों को
दंग कर दरसा लग रहा है। ये परीक्षा दे रहे हैं या
रावत् युद्ध कर रहे हैं?
(माम के प्रभार करने पर भीम के पक्षपाशंक र वार की
पनि करते है और दुयोपन . प्रहार करने पर उसके
पक्षपाती गे ही नारे लगान है)
चौथा दर्शक-अरे भाई, और यातों को छोड़ो। विधाता ने इन
दोनों का एक ही जोड़ा बनाया है। कोई किसी से
फम नहीं दीखता।
पांचवां दर्शक-मैंने कहा न था कि भीम का मुकाबला दुर्योधन ही
कर सकता है ?
(भाम और दुर्योधन दोनों आवरा के माथ एक दूसरे की जान लेने पर
उतर आते है)
द्रोणाचार्य-(उच्च स्वर से ) अरे भीम वेटा, अरे कुमार दुर्योधन,
युद्ध मत करो, फेवल गदामहारों से पातुरी दिखायो ।
यह परीक्षा काल है, युद्धकाल नहीं ।
(फिर भी दोनों नहीं रुकने)
धृतराष्ट्र--(विदुर से) विदुर जी, लोगों में इतना शोर क्यों हो रहा
है ? कृपया हरेक बात मुझे बनाते जाओ।
विदुर-महाराज, भीम और दुर्योधन गदायुद्ध में चातुरी दिखा
गान्धारी-(कुन्ती से) बहन, इस समय लोगों में अपूर्व जोश क्यों

( ३७ )
हो रहा है ? आँखों पर पट्टी रहने के कारण मैं स्वयं नहीं
देख सकती, तनिक यहां का हाल मुझे भी सुनाती जाओ।
पुन्ती-बड़ी दीदी, अाज का दृश्य देखने योग्य है, इसका ठीक
ठीक वर्णन जिह्वा से नहीं हो सकता । पर मैं कैसे कहूँ
कि श्राप आँख की पट्टी खोलदें! पति के नयनविहीन होने
पर अपनी आंखों पर भी सदा के लिये पट्टी बांधकर श्राप
ने नारीत्व को बहुत ऊँचा पद दे दिया है। पतिव्रताधर्म
को पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया है । बहन, सब घटनाओं
का वर्णन अवश्य करती जाऊंगी। इस समय भीम और
दुर्योधन गदायुद्ध कर रहे हैं।
धृतराष्ट्र-(विदुर से ) विदुर जी, प्राचार्य से कहिये कि इनका युद्ध
बंद करदें. मैं दोनों की प्रकृति को जानता हूँ । गदा-
चातुरी दिखाते-दिखाते वे वास्तविक युद्ध करने
लग जायेंगे।
(विदुर जी आचार्य को संकेत करते हैं ।)
द्रोणाचार्य-( कृपाचार्य से ) कृप ! आप ही जाकर इनका युद्ध बंद
करदें। फेवल कहने से यह न मानेंगे।
(कृपाचार्य जाकर उनके बीच में खड़े हो जाने है और युद्ध
बंद कर देते है । भीम आर दुर्योधन क्रोध से एक दूसरे की
ओर दखते हैं।
दुर्योधन-फिर सही।
भीम-वह 'फिर' भी शीघ्र भाजायेगा।
(भीम के पक्षपाती 'भीमसेन की जय' और दुर्योधन के
य' के नारे लगाते हैं
दाजे बजना बंद करते है)

प्राचार्य-(समभूमि में में गोर) दर्शकगण, भर पाहु-
মা অন দ্বাধন। ঘাথ । fiৰ ব্যৰ
देव पर पकिन हो जायेंगे। मुमार अर्जुन पर मुझं
ग है । पा. मुझे -भागा सभी पद पर प्यारा है।
(अर्जुन का रे दर पर ghne काम, 44: गतिमा
पर गान gfer, म त भरा तरकम भोर
साप में अनुर)
(मो माने पर दर्शक करतारपान पर है। राम और
नरामरे बनते है। लोग इट उठ र सुनको मोरे
और 'इमार भर्नुन की जय' नारे लगाने ।)
धृतराष्ट्र-(विदुर से) विदुर जी, पर्शक-मंडली में श्राफाश को
भी विदीर्ण करने याला, कोलाहल क्यों हो रहा है ? ऐसा
प्रतीत होता है मानों अगाधता समुद्र उमड़ उठा है।
विदुर~~ रामन, पुन्तीपुत्र, पाएनन्दन अर्जुन ने रंगभूमि में
प्रवेश किया है।
धृतराष्ट्र-गहामना विदुर जी, युधिष्टिर, भीम, अर्जुन मनुष्य नहीं
देवपुत्र हैं, फुन्तीरूपी यज्ञकार से मानों तीन
अमियां उत्पन्न हुई हैं।
(शकुनि का प्रया)
शफुनि-महाराज, इन अमियों में घृत की अहुतियां डालते
जायोगे तो वे और प्रचंड होकर फौरववन को
भस्म कर देंगी।

( ३६ )
शकुनि-मेरे कहने का यह श्राशय है महाराज, कि पांडवों का
भरण-पोषण करना सांपों को दूध पिलाना है।
गान्धारी--(कुन्ती से ) यह कैसा कोलाहल है बहन ?
फुन्ती-आप का सेवक अर्जुन रंगभूमि में आया है।
गान्धारी धन्य हो वहन, जिस की कोख ने अर्जुन जैसे
वीरात्मा को जन्म दिया है । पर एक बात मैं कहती हूँ,
क्रोध न करना । न मालूम अर्जुन का नाम सुनते ही मेरी
नाड़ी-नाड़ी में क्यों रक्तसंचार हो जाता है । लोहू उबल
उठता है । ऐसा भान होता है कि वह मेरा वैरी है-
जन्म-जन्मांतरों का वैरी है, मेरे वंश का ध्वंसक है।
कुन्ती-छोड़ो यह बातें बड़ी दीदी । शायद इन बालकों के परस्पर
लड़ाई-झगड़ों को सुन सुन कर आपके ऐसे विचार होगये
हैं। जैसे मैं आपकी दासी हूँ पैसे मेरे पुत्र भी श्राप के
(अर्जुन धनुष पर तीर चदा कर उसे छोड़ता है। आकाश से
अनि बरसने लगती है, लोग भय से भागने लगते हैं)
कुछ लोग अरे बचानो बचायो! यह अग्नि हमें अभी भस्म कर
देगी।
कुछ और लोग-(भागते भागते ) अब प्रलय में कुछ देर नहीं । यह
अनि समस्त संसार को भस्म कर देगी।
पहला दर्शक-(रोता हुआ) यदि मेरे वस्त्र जल गये तो पहनूंगा क्या?
१! तुझे वस्त्रों की पड़ी है। वनोंकी
रहेगी। वस्त्रों के साथ तुम्हारा शरीर,
दूसरा
ग

प्राचार्य-(उच्य स्वर में) अर्जुन बेटा, आमेय याण का संहार करो। लोग घबरा रहे हैं। ( अजुन एक दूसरा बाण छोड़ता है। आकाश में जलवा होने लगती है। सब लोग प्रसन्न होते हैं) एक मनुष्य-(दूसरे में) लो भाई, देवराज इन्द्र ने हमें बचा लिया, नहीं तो मृत्युकुण्ड के किनारे ही खड़े थे । दूसरा मनुष्य---तुम भी निरे मूर्खराज हो ! तुम्हें अब भी नहीं पता लगा? ये कुमार अर्जुन की धनुर्विद्या के करतब थे। तीसरा मनुष्य-यह भी कोई खेल है ! यदि हम जल जाते तो ? ( अजुन एक और तार छे, इता है, सर्वत्र अधकार छा जाता है।) कुछ दर्शक-माज तो पता ही नहीं लगा और संध्या हो गई है ! र-मन एकत्र लगा हो तो समय की गति तीव्र हो जाती है। अभी चलना ठीक होगा, पाठ कोस फा मार्ग रातोरात तय करना होगा। ( अर्जुन एक और तीर चलाता है, पहले से भी अधिक प्रकाश हो जाता है) दर्शक-(आपस में बात की बात में अंधकार छू-मंतर हो गया है। दोपहर तो कत्रको ढल चुकी है, पर प्रतीत ऐसा होता है कि सूर्य अपने पूर्ण यौवन पर है। एक मनुष्य-भैया, न तत्र संध्या थी और न अब दोपहर है । समय वही है जो पहले था ! यह अन्धेरा और उजाला भी धनुर्विद्या के प्रताप से हैं। और- प

( ४१ )
जुन नीरों को छोड़कर कभी लोगों को सुलाता है फिर जगाता
है, कमी मर्ष निकालता है पश्चात् मर्पभक्षी पक्षी
उत्पन्न कर उनका संहार करता है। प्रत्येक
घटना के बाद 'बार अर्जुन की जय'
'पांदुनन्दन अर्जुन को अयं 'धनुधर
अर्जुन की जय' के नारों से
आकाश गूंज उठता है)
(कुछ रक्षापुरुष रंगभूमि में एक गाय लाते हैं। उसके दोनों सांगा
पर दो नारंगियां दांधते है, फिर गाय को चक्कर में दौड़ाते है ।
अर्जुन तार लेकर सड़ा होता है । दर्शकों में शोर
मचमा है।)
कुछ लोग-अर्जुन, अर्जुन, ऐसा न करो। तीर गाय को लग
गया तो इस बेचारी के प्राण निकल जायेंगे।
कुछ और लोग ---और तुम्हें गोहत्या का पाप लगेगा।
पुछ लोग -हम ऐसा न करने देंगे । जाने दे देंगे पर गोहत्या न
।
होने देंगे।
घुछ और लोग-गौ हमारी माता है-माता से भी पूज्यतर है ।
जीते जी हम इसकी हत्या न होने देंगे।
द्रोणाचार्य-(उच्च स्वर में ) दर्शकगण, क्या आप लोग समझते हैं
कि अर्जुन गोवध करने को उद्यत हुआ है ? तुम्हारा यह
भ्रम है । जिस वंश ने अर्जुन को जन्म दिया है-उसके
पुस्खाओं ने गौ की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर
....फर दिये हैं। अर्जुन उन्हीं का वंशधर है। श्राप
।
-

धाचार्य-(TER या म) अर्जुन येटा, श्राप धाया का संहार फरो। लोग घबरा रहे हैं। ( अजुन एक दूसरा सामना है। माकाशमे जलवा होने लगता है। गर लोग प्रसन्न होते हैं) एक मनुष्य-(दूमर में) लो भाई, देवराज इन्द्र ने हमें यचा लिया, नहीं तो मृत्युयुएड के किनारे ही खड़े थे। दूसरा मनुष्य--तुम भी निरे मूर्यराज हो ! तुम्हें अय भी नहीं पता लगा? ये कुमार अर्जुन को धनुर्विद्या के फरत थे। कुछ दर्शक- फुट और- तीसरा मनुष्य-यह भी कोई खेल है ! यदि हम जल जाते तो ? (अर्जुन एक और तार है.पना है, संयंत्र अपवार या जाता है।) -आज तो पता ही नहीं लगा और संध्या हो गई है ! र~-मन एकत्र लगा हो तो समय को गति तीन हो जाती है। अभी चलना ठीक होगा, पाठ कोस का मार्ग रातोरात तय करना होगा। ( अजुन एक भोर तार चलाता है, पहले से भी अधिक प्रकाश हो जाता है) दर्शक--(भआपस में) यात की बात में अंधकार छू-मंतर हो गया है। दोपहर तो कयको ढल चुकी है, पर प्रतीत ऐसा होता है, कि सूर्य अपने पूर्ण यौवन पर है। एक मनुष्य-भैया, न ता संध्या थी और न अब दोपहर है । समय वही है जो पहले था ! यह अन्धेरा और उजाला भी धनुर्विद्या के प्रताप से हैं।

दे सकते हो । यह विद्या न अर्जुन की संपत्ति है और ,
न किसी और की, विद्या अभ्यासी की होती है।
(कर्ण एक एक करके वे सब काम कर दिखाता है, जो अर्जुन ने किये
थे । लोगों में बहुत जोश पैदा हो जाता है। उसके प्रत्येक काम पर
सरतलध्वनि करते हैं
दुर्योधन:-( उठकर और आदेश से ) जीते रहो कर्ण, प्राज तुम ने
निराशासमुद्र में डूबते हुए मुझे हाथ दे कर
निकाला है । ( उस के पास जाकर ) कर्ण, आज तुम मेरे
अभिन्नहृदय मित्र हो । मैं अपने आप ही जिस अग्नि में
जल रहा था --तू ने आज उसे शान्त किया है। हम
दोनों का ध्येय एक है-अर्जुनविध्वंस । दो होते
हुए भी हम अाज से एक हुए ।
फर्ण-(दुयोधन के धन्ये पर हाथ रखकर ) कुरकुमार, आपने मुझ पर
जो विश्वास किया है, वह आजन्म मेरे पास धरोहर
रहेगा। कर्ण प्राण दे देगा, पर विश्वासघात न करेगा।
(दुर्योधन कर्ण के हाथ पकड़ कर उसे गले लगाता है)
( अर्जुन से ) अर्जुन, तुम्हारी कीर्ति मुझे यहां लाई है।
मैं तुम्हारे साथ द्वन्द्वयुद्ध, करवालयुद्ध या पाण-युद्ध
के लिये लाया हूँ । इन में से जैसा युद्ध चाहो स्वीकार
फरलो, मैं तैयार हूँ।
अर्जुन-कर्ण, जो लोग बिना बुलाये पाते हैं और इस प्रकार की
गर्वभरी बातें करते हैं ये कुत्सित लोग होते हैं।
पूर्ण-अर्जुन, यह रंगभूमि और भाज का उत्सव सर्वसाधारण
के लिए है। इस पर किसी एक व्यक्ति का स्वत्व नहीं है।

. मान्न होकर पान की गर गरी देगे। दगांदी धार मात्र हो पुद्ध लोग-(३१ मा ) यो गोर र ! भाचार्य पं. दरों पर भी नही? (ARYAatti in है। दून tri | Rinkal rait) लोग-धन्य हो अर्जुन, पन्य हो या योग्ता की पराकाहा है। ( सन Reatोगो , रो, को म' की भाभी को माता का गाम में माना है | Ts के हाथ में भगुन, कमर में कार कानों जाना यंदत और है।) फॉन है ? (मित रोसर) मनुष्य है या पर्वनराज मुमेर चला आ रहा है। एक दर्शक-इसके मुग्पी कान्नि अप्रितम मुवर्ण के समान है। दूसरा ,इम में यज्ञ इतना है कि पलने से धरती कांप रही है। तीसरा यह कौन है? युद्ध लोग-परे भाई, मुनो । यह कुछ कह रहा है। फर्ण-(द्रोणाचार्य और नागार्य को प्रणाम फर ) अर्जुन, तूने याण चलाने के जो करतब यहां दिसाये है मैं उन सब को दिखाउँगा 1-उन से भी अधिक 'चमत्कारी फरतम दिखा कर तेरे गर्व को चूर्ण फलंगा। द्रोण-कर्ण, तुम भी अपनी अखचालनचातुरी को पा दुख लोग-

वंश में उत्पन्न हुअा है । इसका युद्ध उसी से होगा
जो इसी की तरह ही उमवंशज हो। इसलिए तुम भी
अपने माता पिता का नाम बताओ।
(कृपाचार्य का वचन सुनते ही कर्ण के मुस का वर्ण उड़ जाता है,
उसके हाथ से तलवार गिरने लगती है।)
दुर्योधन-(आगे मद कर) अश्वत्थामा, सभे योद्धा प्रतिपक्षी के कुल की
परवाह नहीं करते । उन्हें मृत्यु का कभी भय नहीं होता।
अर्जुन यदि सना और वीर क्षत्रिय है तो उसे कर्ण से
युद्ध करने में हिचकिचाना न चाहिए ।
कृपाचार्य-कर्ण. को अपने माता पिता का नाम और जाति
बताने में संकोच क्यों है ? वह अवश्य किसी नीच
जाति का होगा । मैं अर्जुन को नीचकुलोत्पन्न से
युद्ध न करने दूंगा।
दुर्योधन-यदि अर्जुन को किसी राजा से ही युद्ध करना अभिप्रेत
है तो मैं अभी कर्ण को अङ्गदेश का राज्य
(एक मुकुट मंगवा कर कर्ण के सिर पर रखता है और माथे पर
तिलक लगाता है। चारों ओर से 'अंगराज कर्ण
की जय' के नारे होते हैं।)
(सहसा अधिरथ का प्रवेश । वह बहुत घबराया हुआ है।
उसका शरीर पसीने से तर है । भागता भागता कर्ण
के पास जाता है। कर्ण उसके चरण
छुता है।)
।

।
पीर रूप को माना और हर मनर
RRER का र कार नही है।
दुवंशे फो नरहन माप को थानों का क्या प्रया!
पाणी में कार दो। यदि भुमाकों में पग हो नी नलवार
भानों और रंग-भूमि । उनी।
अन- यदि तुम्हें अपनी भान भारभूत है. नी उस भाव में,
में अभी नलमार . एक ही हाय में गुमें यम-गहन
भनाई।
फर्ग-(पार कर ) में तैयार रहा है।
(शागार . )
लोग-यहां शोर फैमा?
कुछ लोग- उपर से भाग दुर.) गुन्ती माता यहोश होगई थी,
पर प्रय अच्छी हैं।
एक पुरुर-थाखिर मी ही तो हैं । खियों का हृदय ऐसे फठोर
श्रापातों केय को नहीं मान कर सकता । उन्हें घर
क्यों नहीं हो गए ?
दुमरा पुरुर-तू भी कैसी येतुकी हॉक रहा है ! माता कुन्ती
शूर-पत्नी और शूर-माता है । इनका जन्म वोर
वंश में हुआ है। ऐसे सरय उन्हें कैसे भयभीत कर
सकते हैं! कुछ धीमारी-सिमारी होगी जिससे हृदय
शिथिल होगया होगा।
कृपाचार्य-( उन दोनों के कोच में भाकर, कर्ण से) वीरवर, तुम धन्य
हो जो ऐसी वीरता की बातें कर रहे हो। पर तुम
जानते हो गर्न, -
.

(४५)
में उत्पन्न हुआ है । इसका युद्ध उसी से होगा
जो इसी की तरह ही उच्चवंशज हो। इसलिए तुम भी
अपने माता पिता का नाम बतायो ।
(कृपाचार्य का वचन सुनते ही कर्ण के मुख का वर्ण उड़ जाता है,
उसके हाथ से तलवार गिरने लगता है।)
दुर्योधन-(आगे बढ़ कर) अश्वत्थामा, सच्चे योद्धा प्रतिपक्षी के कुल की
परवाह नहीं करते । उन्हें मृत्यु का कभी भय नहीं होता ।
अर्जुन यदि सचा और वीर क्षत्रिय है तो उसे कर्ण से
युद्ध करने में हिचकिचाना न चाहिए ।
पाचार्य-कर्ण : को अपने माता पिता का नाम और जाति
बताने में संकोच क्यों है ? वह अवश्य किसी नीच
जाति का होगा । मैं अर्जुन को नीचकुलोत्पन्न से
युद्ध न करने दूंगा।
दुर्योधन-यदि अर्जुन को किसी राजा से ही युद्ध करना अभिप्रेत
है तो मैं अभी कर्ण को अङ्गदेश का राज्य देता हूँ।
। (एक मुकुट मंगवा कर कर्ण के सिर पर रखता है और माथे पर
तिलक लगाता है | चारों ओर से 'अंगराज कर्ण
की जय' के नारे होते हैं।)
(सहसा अधिरथ का प्रवेश । वह बहुत घबराया हुआ है ।
उसका शरीर पसीने से तर है । भागता भागता कर्ण
के पास जाता है । कर्ण उसके चरण
।
छूता है।)

पौर पप हो र मामा और हर मन
लपकार 22 सपा में की रहने है।
दुषी को मारोप की भाषा का पया प्रयोगन !
पागों से उत्तर दी। यदि भुमा
यन होनो नलग्न
पामों और रंग-भूमि में ।
अन- यदि तुम्हें अपनी गाग माभून है. नो मई में,
मैं भी नलार थे. एक हो दाय में तुम्हें यम-मदन"
में है।
का-(SIT कर ) में तैयार मड़ा।
(त्रिषागार में)
लोग-यहां शोर कैगा है?
कुछ लोग- भार पुर) पुन्नी मागा यहोश होगई थी,
पर अथ अच्छी है।
एक पुरुष-आसिर सोही सोहै। मियों का हृदय ऐसे कठोर
प्राधानों के सश्य को नहीं मान कर सकता । उन्हें घर
क्यों नहीं हो गए?
दूमरा पुरुर-तू भी फैमी येतुफी हांक रहा है ! माता कुन्ती
शूर-पत्नी और शूर-माता हैं। इनका जन्म योर
वंश में हुआ है। ऐसे दृश्य उन्हें कैसे भयभीत फर
सकते हैं ! कुछ बीमारी-सिमारी होगी जिससे हृदय
शिथिल होगया होगा।
कृपाचार्य-( उन सेना के बीच में आकर, कर्ण से) वीरवर, तुम धन्य
हो जो ऐसी वीरता की बातें कर रहे हो। पर तुम
जानते हो अर्जुन क्षत्रियवंशी है. कुरुकुल जैसे उच्च
.

.
( ४५ )
वंश में उत्पन्न हुआ है । इसका युद्ध उसी से होगा
जो इसी की तरह ही उनवंशज हो। इसलिए तुम भी
अपने माता पिता का नाम बताओ।
(कृपाचार्य का वचन सुनते ही कर्ण के मुख का वर्ण उड़ जाता है,
उसके हाथ से तलवार गिरने लगता है।)
दुर्योधन-(आगे बढ़ कर) अश्वत्थामा, सचे योद्धा प्रतिपक्षी के कुल की
परवाह नहीं करते । उन्हें मृत्यु का कभी भय नहीं होता।
अर्जुन यदि सच्चा और वीर क्षत्रिय है तो उसे कर्ण से
युद्ध करने में हिचकिचाना न चाहिए ।
कृपाचार्य-कर्ण. को अपने माता पिता का नाम और जाति
?
बताने में संकोच क्यों है ? वह अवश्य किसी नीच
जाति का होगा । मैं अर्जुन को नीचकुलोत्पन्न से
युद्ध न करने दूंगा।
दुर्योधन--यदि अर्जुन को किसी राजा से ही युद्ध करना अभिप्रेत
है तो मैं अभी कर्ण को श्रङ्गदेश का राज्य देता हूँ।
(एक मुकुट मंगवा कर कर्ण के सिर पर रखता है और माथे पर
तिलक लगाता है । चारों ओर से 'अंगराज कर्ण
की जय' के नारे होते है।)
(महसा अधिरथ का प्रवेश । वह बहुत घबराया हुआ है ।
उसका शरीर पसीने से तर है। भागता भागता कर्ण
के पाम जा.
.

। - अधिरथ-घटा, नुन यहां हो ? मैंने तो इस पर का कोना-कोना धान डाला है, गर तुझे कही न पाया तो भागता यहां पाया हूं। अब जी में जी पाया है। तुम्हारी माता फो न जाने क्या दशा हो रही होगी। धेचारी के प्राण निकल रहे होंगे। चलो येटा, घर चलें। एक दर्शक-अरे! यह तो सारथी अधिरथ है। दूसरा-~~यही तो। इस की स्त्री का नाम राधा है। तीसरा-तय तो यह कर्ण सूतपुत्र है। चौया-कर्ण सुनपुत्र- पांचवां--कणे सारधीपुत्र... छठा- -~कर्या सुनपुन-- (कुछ ही देर में कर्ण के सूतपुत्र होने का समाचार रंगभूमि में सर्वत्र फैल जाता है और सब के मुख से दो स्वर मैं-~~वर्ण सूतपुत्र, फर्ण भूमपुत्र- यह आवाजें निकलती है।) भीम-(व्यग की हंसी हंसता हुआ) श्राखिर भांडा फूट ही गया ! ( कर्ण से) सूतपुत्र, तुम अर्जुन के हाथ से मरने के भी योग्य नहीं हो। तुम्हारा फुलोचित काम है रथ हांकना, घोड़ों की रासें पकड़ना । 'उसी काम को फरो। जैसे फुत्ता यज्ञवि का श्रास्वादन नहीं कर सकता वैसे ही तुम अङ्गराज्य का उपभोग करने के योग्य हो । फर्ण-भीम, लोकाचार से डर रहा हूँ, नहीं तो अभी इस तलवार से तेरी गरदन उडा देता।

भीम-और में तेरा इबलिय बब नहीं करता कि शूद्र को छूने से
प्रायश्चित्त करना पड़ेगा।
दुर्योधन -भीम. तुम्हारे मुख में ऐसे कायरों के से वचन नहीं शोभा
देते, इन बातों से तुम भाई की जान बचाना चाहते हो।
क्षत्रियों में सदा बल का ही आदर होता चला
पाया है । शूरों और नदियों के उद्गम स्थान को कोई
नहीं पूछता । दानवकुल को नष्ट करने वाले वन का
जन्म दधीचि की हड्डियों से हुआ था । कुमार कार्तिकेय
के माता-पिता का कोई पता नहीं । उसे कोई अग्नि
का, कोई कृत्तिका का और कोई गंगा का पुत्र
बताते हैं । विश्वामित्र जन्म के क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणों
में उत्तम माने जाते हैं और महर्षि पद पर पहुंच गये हैं।
फर्ण की ओर तनिक देखो । ऐसा तेजस्वी मुखमंडल,
जन्मजात सुवर्ण के कुण्डल और कवच कभी किसी
नीच जाति के जाये के हो सकते हैं ! शृगाली शृगाल
को ही उत्पन्न करेगी और सिंही सिंड्को । सिंह शृगाली
का आत्मज नहीं हो सकता । कर्ण किसी वंश का भी
हो, मेरा हार्दिक मित्र है । हम दोनों एक हैं-अभिन्न हैं।
अङ्गराज्य क्या, समस्त भूमंडल का राज्य भी इसके
चरणों में अर्पण कर सकता हूँ।
(धिन को पात मुनकर दर्शकों में कोलाइल होने लगता है)
in तो पते की कही है । (गुणानन्ति पन्तूनां
वलो क्सचित् ) श्रादर गुणों का होता है,

( ५० )
मेरे पसीने की जगह लोहू बहाने को उचत रहते हैं।
सय फे सय गुरुमेवारत, धर्मात्मा और मत्यवादी हैं।
उन से बुराई कर ? नहीं नहीं, ऐसा नहीं होगा-कदापि
न होगा। ऐमा विचार मन में लाना ही कुंभीपाक नरक
में गिरना है । ( फिर कुछ सान कर ) देखा जाय तो वे एक
तरह से मेरे शत्रु है। मेरे पुत्रों के शत्रु हुए तो मेरे ही
हुए । मेरे पुत्रों के मुख से रोटी का कोर छीनने वाले.
क्या मेरे शत्रु नहीं ? मेरे श्रात्मनों को यपौती-उनके
न्यायमंगत राज्याधिकार से वंचित करने वाले क्या मेरे
शत्रु नहीं हैं ? क्षणिक ने सत्य कहा था-नीतिज्ञ शत्रु
पहले विश्वास का जाल फैलाता है, फिर मकड़े के आलमें
फंसी हुई मक्खी की तरह विश्वस्त का वध करता है।
अब समझा । इसी लिए वे मुझ से इतना प्रेम करते हैं,
सेवाभाव दिखाते हैं। शायद उनके ये भाव भी कृष्ण की
सिखाई नीति का फल हैं। (कुछ ठहर कर) बात किसी
ठिकाने नहीं ठहरती। मन में भ्रम हो रहा है । एक
तर्क की नींव पर विचारभवन खड़ा करता हूं कि
तत्काल दूसरा तर्फ उसे गिरा कर धरातलशायो कर देना
है। (चिन्तित हो कर ) ठीक बात तो यह है कि उन्होंने मेरे
साथ कभी फूटनीति का प्रयोग नहीं किया । शत्रु अपना
शत्रुभाव चाहे कितना छिपाता रहे, पर कभी न कभी वह
ज़ाहिर हो ही जाता है-भांडा फूट जाता है। पर ऐसा
अब तक कभी नहीं हुआ। दूसरे, नीतिकुशल भाई विदुर,
भीष्म, आचार्य और सब लोग पांडवों को
.
.

उन्हीं की प्रशंसा करते हैं। आखिर उन में कोई गुणा
है-तमी न ! (कुछ ठहर कर ) क्या करूं मन की
विचारधारायें प्रतिकूल दिशाओं में यह रही हैं । कुछ
निर्णय नहीं कर पाता । वे शत्रु नहीं हो सकते ( विचार
कर )। पर मित्र भी नहीं हो सकते।
(दुर्योधन, कर्ण और शकुनि का प्रवेश ।)
दुर्योधन-प्रणाम पिता जी।
फर्ण-महाराज प्रणाम ।
शकुनि-प्रणाम, जीजा जी।
धृतराष्ट्र-कौन ? दुर्योधन ! तुम्हारे साथ और कौन हैं ?
दुर्योधन –अंगराज फर्ण और मामा शकुनि ।
धृतराष्ट्र-अच्छा, अच्छा-तुम्हारे ही साथी हैं। तुम सब लोग
सुखी रहो।
दुर्योधन-(कर्ण से, फानों में ) तुम कहो ।
फर्ण-(हाथ के इशारे से शकुनि से ) तुम कहो ।
शकुनि-(धीरे से) दुर्योधन कहे, वही तो हमें यहां लाया है।
धृतराष्ट्र क्या बात है बेटा ? चुप क्यों हो ? कहो जो कहना
चाहते हो।
दुर्योयन-पिता जी, हम लोग श्राप से एक घात कहने आये हैं।
हमें आज कल पुरवासियों की ओर से कुछ मंगल
की आशंका है।
धृतराष्ट्र-पुरवासियों से अमंगल फी आशंका ? नहीं बेटा, तुम्हें भ्रम
आ होगा।

दुर्योधन-यात यह है पिता जी, कि वे लोग ज्येष्ठ पांडव-कुमार युधिष्ठिर को राज्यपद देना चाहते हैं। भीष्म और घाचा विदुर भी उन्हीं का पक्ष ले रहे हैं । धृतराष्ट्र-ठीक नो है । राज्य उन्हीं का है और उन्हीं को मिलना चाहिये। दुर्योधन-ऐसा कभी न होगा । यदि यह हुश्रा पिता जी, तो हमारे साथ घोर अनर्थ होगा। कुरुवंश में सब से बड़े होने से राज्य के अधिकारी श्राप थे । पर श्राप चक्षुहीन होने कारण राज काज न चला सकते थे, इसलिये चाचा पांडु राजा बने । पर इससे राज्य उनका हो नहीं गया। ये तो फेवल आपके प्रतिनिधिरूप से राज-काज चलाते रहे। राज्य के अधिकारी रामा के पुत्र होते हैं न कि प्रतिनिधि फ पुत्र । यदि इस समय राज्यपद पांडवों को मिल गया तो उनके बाद उनके वंशज ही राज्याधिकारी रहेंगे। हमारे पुत्र-पौत्र राजवंश से भ्रष्टहीन हो जायेंगे बल्किरोटी के टुकड़े टुकड़े के लिये उन्हें पांडवों के मुख की ओर देखना पड़ेगा। इससे कोई ऐसा प्रयन्ध कीजिये जिससे यह कष्ट मिटे। धृतराष्ट्र---बेटा, तुम्हारी इस बात में कुछ सत्यता हो सकती है, पर किया क्या जाय ! न्याय और धर्म की दृष्टि से राज्य पांडवों का है । दूसरे, मेरे स्वर्गीय भाई पांडु वड़े धर्मात्मा थे। वे मुझे पितृवत् समझते थे । मेरी आज्ञा की अव- हेलना कभी नहीं करते थे। युधिष्ठिर उन्हीं का पुत्र है ।

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गायेंगे, यदि न मानो हमारा विगार हो । माने है। धृतराष्ट्र-- लोगों ने मुझे पड़े श्रममंजस में डाल दिया है। मालूम नहीं इममा परियाम क्या होगा। शनि-होगा फ्या! मोहोना पाहिये यही होगा। पुरे काम का परिणाम कही या भी हुआ? पयूल के योग से कमी आमा है? दुर्योधन-मामा, तुम्ही ने सलाह दी न थी कि पांडवों को यारणावत मेमा जाय? शकुनि-हां, मेरी तो अय भी यही मम्मति है। मेरे विचार में मो जितना जल्दी हो सफे भेजा माय । धृतराष्ट्र-तो तुम उन्हें पारगावन भेजना पाहत हो ? फर्ग-विचार तो यही हे महाराज | धृतराष्ट्र--पर उन्हें सहमत फैसे किया माय ? शकुनि- (-इस की चिन्ता श्राप न करें। इसका प्रयन्ध हम ने कर लिया है। हमारे गुमचरों धारणाबन को अत्यन्त । ग्मणीय स्थान यता यता कर उनका मन उसे देखने को लालायित कर दिया है। हमें आशा है कि ये स्वयं आप से वहां जाने की आज्ञा मांगेंगे। (पांचों पांडवों का प्रवेश । एक एक करके धृतराष्ट्र छूते गोर प्रणाम करते है।) -आओ घंटा, बैठो। (बैटने के लिए स्थानों की ओर संवैत करते है । सब बैठते हैं।) के चरण धृतराष्ट्र- । राज्यलोभ से प्रेरित होकर अपने भाइयों के प्राण मत लो। इन कुमित्रों के संग में तुम्हारी बुद्धि फितनी भ्रष्ट होगई है-जरा सोचो तो ! दुर्योधन -माता जी, श्राप ऐसी अधीर क्यों हो रही हैं ? यदि पांडव दो चार दिनों के लिए पारगावन चले गए तो क्या अनर्थ हो जायगा ? फिर, जो भी कुछ हो रहा है, पिता जी की सम्मति से हो रहा है। गांधारी-तुम्हारे पिता अांखों के अन्धे तो हैं ही, पर पुत्रमोह- वश बुद्धि के अन्धे भी हो रहे हैं । तुम्हारी और तुम्हारे इन पथ-भ्रष्ट साथियों की कुमन्त्रणा से उन्होंने कर्तव्याकर्तव्य के विचार को तिलांजलि दे दी है। तुम लोगों की ऊँगुलियों के इशारों पर नाच रहे हैं। कर्ण-माताजी, हमारे महाराज-अपने स्वामी के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करना श्राप को क्या उचित है ? गांधारी-स्त्री पति का आधा अङ्ग है । एक प्राधे श्रङ्ग को पथ- भ्रष्ट होते देखकर दूसरे श्राधे श्रङ्ग का उसे सुपथ पर लाना धर्म है । पति और पत्नी गृहस्थजीवन- रूपी रथ के दो पहिये हैं। एक के टूटने पर दुसरा निफम्मा हो जाता है। समूचा रथ ही निष्क्रिय हो . जाता है। फर्ण-पति-पत्नी-सम्बन्ध को श्राप से बढ़ कर संसार भर में दुसरा कौन जान सकता है देवी ! पर हम और महाराज जो भी फुछ कर रहे हैं, आपकी सन्तान के हित से कर रहे हैं । यह प्रश्न युधिष्ठर और दुर्योधन के राज्य- लेने देने

धनगटदुर्योधन गुम लोगन जाने मुझे शिस मन्ध-कूप गिराग हो ?
गडनि -मन्नान पे लिए अन्य का क्या नरक में भी गिग्ना
स्वीकार करना पड़ता है।
(पारानि 4 min 1).
फर्ग-भया, शाप ने पुरोपन को नो पक्षा कर रहा है न ?
दुर्योधन-विज्ञान पथा। रुपये में पड़ी शशि है, यह असंभर
फार्य को भी संभर कर देता है। पर अगराज, कहीं
फर्ग-मेरी ओर से निशंक रहिये । अभी तक आपने फर्ग को
नहीं पायाना। यह शरीर प्रापफ उपकारों के घोक फे नीचे
इनना दया हुआ है कि जन्मान्तर में भी उसे न तार सरेगा।
कर्ण को गरदन जो विपत्ति पर विपत्ति आने पर भी कभी
नहीं झुकी और न झांगो-सदा श्राप भागे झुकी रहेगी!
जय फभी इस व्यक्ति की ओर से आपको संदेद पे अहर:
मात्र का भी भान हो उसी समय इसका सिर धड़ से अलग
फर देना । मुग्य से 'श्राहे तक न निकलेगी।
दुर्योधन-मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। मैंने अपनी जीयननैया
की पनवार तुम्हारे हाथों में दी है। मुझे तनिक भी
संदेह नहीं कि तुम इसे इन भयंकर घ्यालों और ग्राहों से
वचा कर पार ले जायोगे।
(साठी किती दुई गांधारी का सहसा प्रवेश)
गांधारी -पार नहीं ले जायेंगे, मझधार में डुबो देंगे। बेटा, इन
स्वार्थी लोगों से यहक कर अपना जीवन नष्ट मत करो।
।

। , ( ५७ ) राज्यलोभ से प्रेरित होकर अपने भाइयों के प्राण मत लो । इन कुमित्रों के संग में तुम्हारी बुद्धि कितनी भ्रष्ट होगई है-ज़रा सोचो तो! दुर्योधन [-माता जी, आप ऐसी अधीर क्यों हो रही हैं ? यदि पांडव दो चार दिनों के लिए वारगावन चले गए तो क्या अनर्थ हो जायगा ? फिर, जो भी कुछ हो रहा है, पिता जी की सम्मति से हो रहा है। गांधारी-तुम्हारे पिता आंखों के अन्धे तो हैं ही, पर पुत्रमोह- वश बुद्धि के अन्धे भी हो रहे हैं । तुम्हारी और तुम्हारे इन पथ भ्रष्ट साथियों की सुमन्त्रणा से उन्होंने कर्तव्याकर्तव्य के विचार को तिलांजलि दे दी है। तुम लोगों की ऊँगुलियों के इशारों पर नाच रहे हैं। कर्ण-माताजी, हमारे महाराज-अपने स्वामी के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करना आप को क्या उचित है ? गांधारी स्त्री पति का आधा अङ्ग है । एक आधे श्रङ्ग को पथ- दूसरे श्राधे अङ्ग का उसे सुपथ पर लाना धर्म है । पति और पत्नी गृहस्थजीवन- रूपी रथ के दो पहिये हैं । एक के टूटने पर दूसरा निफम्मा हो जाता है। समूचा रथ ही निष्क्रिय हो जाता है। कर्ण-पति-पत्नी-सम्बन्ध को श्राप से घढ़ कर संसार भर में दुसरा कौन जान सकता है देवी ! पर हम और, जो भी कुछ सन्तान के रहे हैं। यह और दुर्योधन फे राज्य भ्रष्ट होते देख .

का नहीं है, इस पर श्राप के पौत्र, प्रपौत्र और उन के
भावी सन्तानों का भविष्य निर्भर है। क्या आप यह
चाहती है कि पांडवकुल के लोग राजा कहलायें और
फुरुकुल के लोग -श्राप के वंशज रोटी के टुकड़े टुकड़े के
लिए क्लिविलाते दर दर के भिखारी बने फिरें ?
गान्धारी-में
यह बातें कुछ नहीं समझती। मैं तो कंवल न्याय
चाहती हूँ। ईश्वर ने जिसे जिस का अधिकारी बनाया
है उसी का उस पर सत्व होना चाहिये । यदि ईश्वर
को राजसत्ता कुरुवंशजों के हाथ में देनी अभिप्रेत होती तो
मेरे पति को अन्धा ही क्यों बनाते ? बेटा, भवितव्यता
के मार्ग में बाधायें खड़ी कर अपने आप को चकना-
चूर मत करो । पांडव धर्मात्मा, न्यायकारी और
प्रजाप्रिय हैं। राज्य उन्हीं की बपौती है और उन्हीं
को मिलना चाहिए ! स्वयं योगिराज कृष्णा, त्यागमूर्ति
भीष्म, शस्त्रविद्या के पारंगत आचार्य द्रोण, मेरे देवर
नीतिनिपुण विदुर-ये सब लोग पांडवों का पक्ष ही
न्यायसंगत मानते हैं। बेटा दुर्योधन. इस दुराग्रह को
छोड़ कर साधु मार्ग का अवलंबन फरो और हटत्रत
भीष्म जी के जीवन से शिक्षा लो, जिन्होंने पावों पर
लोटते हुए भी राज्य को लतिया कर हमारे वंश का नाम
संसार में उज्ज्वल कर दिया है।
दुर्योधन --माता जी, श्राप तो इतना कुछ कह गई जो हम समझ
ही नहीं सके । पांडवों के वारणावत जाने पर प्राप

। (५६) फर्ण-वे लोग अपनी इच्छा से यहां जा रहे हैं। उन्होंने स्वयं महाराज से वहां जाने की अभ्यर्थना की है। गांधारी-कर्ण, मैं तुम लोगों की इन फुवालों को खूब जानती हूँ । मेरी आंखें नहीं हैं पर कान तो हैं । तुम जानो, मैं ने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया है, मेरी बात मानने या न मानने को तुम स्वतन्त्र हो । ( जाता है।) फर्ण-दुर्योधन भैया, मुझे तो माता जी की बातों में कुछ सार मालूम होता है । क्या राज्य लेने का कोई और उपाय नहीं है ? दुर्योधन -श्रस पहले ही प्रवाह में वह गये ? अभी तो ध्येय फी सफलता के लिए भयंकर तूफानों का सामना करना होगा । यदि अब भी चाहो.... .तो तुम्हारा साथ छोड़ दू ? यह कभी न होगा दुर्योधन । में और तुम अभिन्नहृदय है। हमारा भविष्य एक है, आदर्श एक है। जिधर चलोगे आंखें मूंद कर तुम्हारा अनुसरण करूंगा, तुम्हारे साथ कुम्भीपाक में भी रहना पसन्द करूंगा। दुर्योधन-तुम से यही श्राशा है । (दोनो जाते हैं ।) दूसरा दृश्य (स्थान-एकचमा नगरी में एक ब्राह्मण का गृह । उस में पांचों भाई और माता कुन्ती बामणों के वेश में !) अर्जुन-श्राज तो हम लोगों का एक तरह से पुनर्जन्म हुश्रा है। सहदेव-इस में क्या सन्देह है ! यह तो किन्हीं पूर्वसञ्चित शुभ- -

कमो का फल साझिये गो साल यहां तक पर
गये है।
नकुल---हमारे इन येशों को पफर कोई नहीं कह साता कि हन ।
मन्म और फर्म से ग्राम नहीं ।
फुन्ती-(सकर ) तुम लोग पाप में यदुन निपुग हो।
भीम-यदि विदुर चाचा म्लेच्छभाषा में पादाको वास्तविक यान
न मुझा देते तो हम लोगों का यचमा फटिन ही नहीं
विलयुम्ल असंभव था।
युधिष्टिर-चाचा जी हम लोगों पर यहुन उपकार कर रहे हैं।
अर्जुन-उपकारों का भी कोई ठिकाना है ! पहले दुर्योधन के
पड्यन्त्र की सूचना दी फिर अपने ही एक विश्वस्त
कर्मचारी द्वारा उस पर से निकालने फ लिए घर से ले
कर वन तक एक सुरंग खुदवा दी, पुनः गंगा पार कराने
का प्रयन्य किया।
युधिष्ठिर-यही नहीं, जब कभी अवसर पाते हैं, हमारा पक्ष लेकर
दुर्योधन, कर्ण और शकुनि--यहां तक कि महा•
राज तक को भी खरी-खरी सुनने रहते हैं।
अर्जुन-हमारे लिए वे इतने कष्ट सहते हैं, समुद्र में रह कर मानो
प्राहों से वैर रखते हैं।
सहदेव-तभी तो दुर्योधन और कर्ण उन रो सदा तने रहते हैं,
कभी कभी उनका अपमान करने पर भी उतर पाते हैं।
नकुल-पर अपनी अनुपस्थिति में हमें कोई कष्ट न हो, इसलिए
ये इतना अपमान सहकर भी

युधिष्टिर-वे प्रकृति से ही माधु हैं। अच्छा, उस दुष्ट पुरोचन का
क्या हुश्रा-कुछ सुना ?
भीम-गुना क्या आंखों से देखा । श्राग के प्रचण्ड होते ही उस
की झांस खुली और वह भागने की चेष्टा करने लगा।
पर भागता कहां से, मैंने सब द्वार तो पहले ही बन्द कर
दिये थे। तब यह वहीं गिर गया। जब मैं सुरंग में घुसा
तो उसके ये शब्द मेरे कानों में पड़े--दूसरों के लिये
कुत्रां खोदने वाला स्वयं उस में गिरता है।
युधिष्ठिर-मृत्यु का कराल रूप जव मनुष्य के समक्ष उपस्थित
होता है तो उसका मलिन से मलिन चित्त भी ऊपर से
सुत्सित प्रवृत्तियों का प्रावरण हट जाने पर आइने की
तरह निर्मल हो जाता है । पापी, अधर्मी और अत्या-
चारी पुरुषों को ईश्वर की याद तब आती है जब अन्तिम
श्वास उनके कण्ठ में होते हैं।
अर्जुन-एक बात अवश्य माननी पड़ेगी । अपनी कला में वह
अतिकुशल था।
भीम-निस्सन्देह, उसने घी, लाख, चौं, सन, घास, बांस आदि
जलने वाले पदार्थों को मिला कर ऐसी कारीगरी से घर
बनाया था कि यदि हमें पहले ही पता न लग जाता तो
हम अवश्य धोखे में आ जाते ।
कुन्नी-येटा युधिष्ठिर. रणावत से हम कितनी दूर हैं ?
युधिष्ठिर - वहां से हम बहुत दूर निकल आये हैं माता । खटके
की बात नहीं।
प्रणय में इतनी दूर निकल पाने का श्रेय ----
S
.

.
।'
दादा की है। हम मय लोग और विशेषत: माता जो
पहन चलने में यफ फर यूर हो गई थी। यदि भीन
भैया हमें कन्धे पर उठा कर अपनी नाफारूपी भुजाओं
द्वारा मुदूर-ब्यापी ममुद्रमास मार्ग के पार न पहुंचाते,
नो यहां सक थाना कठिन होना।
पुन्नी-अय पुछ समय के लिये नो उन दुष्टों से पीछा छूटेगा
कभी एक पड़ी भी यहां रहने पैन नहीं पाया । मुझे तो
मदा यही प्रतीत होता था कि तुम लोग ज्यालामुखी के
शिखर पर हो । पर उन दुष्टों को हमारी मृत्यु का विश्वास
होगा भी?
(कुछ सानो का रेश, पर उनका भाशिष्य करते.)
युधिष्टिर-पाप लोग कौन है भाई!
एक प्राझण-हम प्रादाय हैं। आप कौन लोग है ?
युधिष्ठिर-हम भी ग्राहगा हैं। श्राप किधर से पा रहे हैं और
फहां जाने का विचार है?
प्रामण-हम यारणावत से आ रहे हैं और पांचाल देश को जा
रहे हैं। चले तो हम सीधे पांचाल. देश को जाते, पर
मार्ग में एक ऐसी घटना हुई है जिससे मन बहुत भारी
हो गया है । विचार है कि दो चार दिन यहां टिकने से
वह शान्न हो जायगा, फिर धागे को पल पड़ेंगे।
युधिष्ठिर-कौनसी ऐसी घटना हुई है जिससे आप को इतना
फष्ट हुअा है ?
ग्राह्मण-क्या कहूं भाई ! जिह्वाद्वारा घताना तो टर
ग्टन
PITMET

मन में विचार आते ही हृदय कांप जाता है, समूचा
शरीर यराने लगता है, यांखें पथरा जाती हैं।
युधिष्ठिर-ऐसी कौनसी घटना घटी है ?
प्राह्मण-क्या यताऊँ भाई ! अनर्थ हो गया है,
भीम-युछ बतायो भी।
ब्राह्मण-पांचों पांडवकुमार माता कुन्ती सहित जल गये हैं।
युधिष्ठिर र तब तो अनर्थ हो गया है । क्या यह बात सत्य है ?
प्रादाण-इसकी सत्यता में कुछ सन्देह नहीं । जले हुए गृह से
पांच मनुष्य और एक स्त्री की हड्डियां मिली हैं
अर्जुन-(एक और होकर भोम से ) वहां पर ये हड्डियां कैसे आई ?
भीम-( कुछ सोचकर ) मेरे विचार में तो वह नाविक स्त्री, जो
पूर्व रात्रि में हमारे पाश्रम में आई थी, जल गई है,
उसके साथ पांच पुत्र भी थे।
अर्जुन–बेचारी की हमारे लिये बलि होगई है। यदि हमें उसके
वहां होने का पता होता तो उसे भी बचा लेते।
भीम-भवितव्यता!
युधिष्ठिर-( माह्मणों से )इस घटना को सुनकर बड़ा खेद हुआ है।
ब्राह्मण-तुमने ही नहीं, जिसने भी यह बात सुनी है बड़ा शोक
किया है । दुर्योधन और उसके भाइयों के अत्याचारों
को हम लोग इस श्राशा से सहन करते रहे कि थोड़े
में धर्मराज युधिष्ठिर सिंहासनासीन
में होंगे और हमारे सब कष्ट मिट जायेंगे, घोर अन्धकार
के बाद प्रकाश का विस्तार होगा।
पर पानी फिर गया है।
ही समय
--
4

पुन्नी-(भन में मेटा, इस पन्धकारमय विनिमार
में हस्ती हुई भी मुममाया फी शाला क.मामने जब
गुम लोगों के कीरि-माशोक की मा परि मलनी,
६, नो मुझं विपत्तियां भूल जाती है. पारसंगर
स्थान में मानोराय-मानन्दमागर में नमग्न हो जाती
हैं। संमार में राज्य, ऐश्वर्य, मोग-गिलात की पुध मसा
नहीं, ससा है पंचन शुद्ध, स्वच्छ कति की-जिम की
फीनि दे पद सदा अमर है।
अर्जुन-म
-गाना भी, यह तुम्हारे पवित्र दूध और उस-शिशांओं
.
पुन्नी-सुम लोगों के ऐसे उच्च विचार है तभी तो तुम इतने
घड़े हो।
युधिष्ठिर--(मामणी ) दुर्योधन को भी इस घटना का पता लगा
है कि नहीं?
एक प्राक्षण-पता क्यों नहीं लगा ! उस दुष्ट का हो तो यह
पड्यन्त्र या । पुरोचन से लाख का घर बना कर
उसमें उन पवित्र आत्माओं को जलवा दिया है।
उस दुष्ट पुरोचन को भी अपने पाप का फल मिल
गया है-अपनी लगाई आग में श्राप ही जल मरा है।
इसी तरह दुष्ट दुर्योधन को भी अपने कुकृत्यों का फल
मिलेगा, अवश्य मिलेगा-ईश्वर का न्याय अटल है।
दूसरा ब्राह्मण--उसे फल अय ही मिल रहा है-सब लोग उसे धिकार
रहे हैं। अपयश एक तरह की जीवन्मृत्यु है भैया,
कीर्तिर्यस्य स जीवति ।

तीसरा ब्राह्मणः-मैंने सुना है कि फर्ण नाम का कोई सूनपुत्र है, उसने धनुर्विद्या में बहुत विख्यानि पाई है। अस्त्र- परीक्षा के दिन यह अर्जुन से भी मुकाबला करने को उद्यत हो गया था । शठ कहीं का! सूतपुत्र होकर पांडुपुत्र के साथ मुकाबला! अच्छाफिया अर्जुन ने, मुकायलेसे इनकार कर दिया । अय तो परदा ढंका रहा भाई, पर यदि कहीं अर्जुन हार जाना तो? (अर्जुन और भीम एक दूसरे को और देखते हैं)--उसी दुष्ट कर्ण से दुर्योधन ने बड़ी मित्रता गांठ रक्खी है। उसी के परों पर घच्चा उड़ता फिरता है । पर अब तो सर्वनाश हो गया है ! युधिष्ठिर-हम लोगों को भी इस घटना का बड़ा शोक हुआ है भाई, पर किया क्या जाय-भवितव्यता प्रवल है ! श्राप कह न रहे थे कि आप पांचाल देश को जा रहे हैं ? ब्राह्मण-हां, वहीं जा रहे हैं । यहां पड़े पड़े श्राप क्या कर रहे हैं ? आप लोग भी हमारे संग चलें। भीम-पांचाल में है क्या जो हमें भी साथ घसीटते हो ? प्राह्मण-भैया, तुम्हारा स्वभाव तो बड़ा तेज़ है । ब्राह्मण का स्वभाव शान्त और शीत होना चाहिये । यह राजसी प्रकृति क्षत्रियों को सोहती है, हमें नहीं । भीम-( युधिष्ठिर से इशारा पाकर ) क्षमा करें देवता । वास्तव में ही मेरा स्वभाव कुछ तीखासा है। 31 पाल में कोई उत्र ब्राह्मण-ऐसा वैसा उत्सव नहीं, बड़ा भारी उत्सव है । महाराज दुपद की कन्या द्रौपदी का स्वयंवर है। यहाँ पर देश- देशान्तरों के राजे-महाराने एकत्र होंगे । नरह तरह के कौतुक होंगे, कई यज्ञ होंगे, जिन्हें सम्पादन करने के लिए दूर दूर के ऋषि, महर्षियों को निमन्त्रण दिये गये हैं। भीम-महाराज, आप लोग भी तो निमन्त्रित ही होंगे, हम अनि- मन्त्रित कैसे जायें? ब्राह्मण-हमें कौन निमन्त्रण देता है ! आज कल निमन्त्रण उन्हें मिलता है जिन की काँख में सिफारिशों का पुलिन्दा हो, या जिन के आगे पीछे लंबी लंबी पूछे--उपाधियां लगी हों। हम दरिद्र ब्राह्मणों को कौन पूछता है - हम तो इस अशा जा रहे हैं कि उत्सव की रौनक भी देखें और कुछ प्राप्ति भी हो आय--एक पंथ दो काज । भीम-(मुस्करा कर) यदि कुछ प्राप्ति की आशा हो तो हम भी चलें? ब्राह्मण-राजा के द्वार पर जा कर खाली हाथ थोड़े ही आयेंगे। युधिष्ठिर-तब तो हम भी तैयार हैं। ब्राह्मण-फिर देरी किस बान की! चलो, अभी चलो। सब पांडव-चलो, चलो। (सब नेयार हो कर चलने । . '

तीसरा दृश्य
(स्थान-पांचाल देश-एक बहुत बड़ा मंडप, उसके दाई ओर सुन्दर
भवन,
उसमें देश-देशान्तरों के राजे-महाराजे कीमती वस्त्र और
भूषणों से सजे बैठे हैं । बाई ओर स्त्रियों के बैठने का भवन है।
उसमें राजमहल की स्त्रियां बैठी हैं। मंडप के
थीच में बहुत ऊँचाई पर एक चक्राकार यन्त्र
घूम रहा है । उसके ऊपर एक मछली टंगी
है। सामने की ओर हज़ारों दर्शक खड़े
हैं। उनमें अपने संगी बामणों के
साथ ब्राह्मणवेषधारी पांडव
खड़े हैं ।)
भीम-( अर्जुन से ) भैया, इस मंडप की शोभा अपूर्व है । इसे
अमूल्य पदार्थो से अलंकृत करने में कोई त्रुटि नहीं रहने दी
गई है। चारों ओर की दीवारों पर टँगे हुए बहुमूल्य रेशमी
घरोफे ऊपर मणि मुक्ताओं की झालरें कसी शोभा दे रही हैं ?
अर्जुन-भूमि पर चंदन और गुलाब जल के छिड़काव से और
अगुरु को सुगन्ध से सारा मंडप महक रहा है।
नकुल-महाराजाओं के बैठने के मंचों पर कैसे सुन्दर आसन
बिछे हैं !
--महाराज की अपनी चौकी पर सोने और चांदी का काम
फैसो कारीगरी से किया हुआ है !
एक कर कई राजे आकर अपने अपने
दुर्योधन और वार्ण भाते हैं।
.

भीम--(भजुन मे ) मैया, पापात्मा दुर्योधन और नराधम कर्ण भी पा रहे हैं। देखिये जरा दुर्योधन की ग्रीवा की ऐंठन और गर्वपूर्ण गति ! अर्जुन-शायद हमें मृत जान कर इतफै अभिमान और गर्व की मात्रा बहुत बढ़ गई है। भीम-और इसे देखते ही मुझ में भी क्रोध की मात्रा बढ़ गई है । यदि तुम लोगों का भय न हो तो यहीं इसकी ऐंठी हुई गर्दन को ऐसे तोड़ दूं जैसे मत्त मातंग कदलीस्तम्भ को तोड़ देता है। युधिष्टिर--(अर्जुन में ) देखते हो सामने उच्च मंच पर कौन बैठे अर्जुन-(ध्यान से देखकर ) मेरे तृषित नेत्र-चकोर जिस मेघश्याम को कब से खोज रहे थे, उसी के अब दर्शन हुए हैं। (दोनों हाथ जोड़कर ),वासुदेव, स्निग्ध और विनीत हृदय से .प्रणाम करता हूं। (युधिष्ठिरसे) उनके पास बलदेव भैया भी हैं। श्रीकृष्ण-(बलदेव से ) बलदेव भैया, सामने की पंक्ति में जो पास-" पास प्राह्मणवेष मे पांच व्यक्ति बैठे हैं उन्हें पहचाना है वे कौन हैं? वलदेव-(ध्यानपूर्वक देखकर ) पहचाना है, खुब पहचाना है। श्राग यदि राख के नीचे भी हो तो भी उसका प्रकाश नहीं छिपता। युधिष्ठिर का विशाल भाल, भीमकासुगठित शरीर, अर्जुन के आजानुलम्बी भुजद्वय और नकुल और सहदेव की, सुन्दर प्राकृति कभी भूल सकती हैं! - ..

( ६६ )
(दपत- का पुत्र धृष्टयम्न कुछ कहने को उठता है । सर्वत्र सन्नाटा
छा जाता है।)
धृष्टद्युम्नं-पूज्य नरेशो और भद्रजनों,
जो मैं आपके सम्मुख कहने को खड़ा हुआ हूँ
आप उसे ध्यान से सुनें। इस मण्डप के मध्य में यह
धनुप खखा है और उस के पास पांच बाया भी धरे
हैं। ऊपर अधर में एक चक्र चल रहा है और उस के
ऊपर एक मछली टंगी है। आप में से जो भी व्यक्ति इस
धनुषं पर तीर चढ़ाकर चक्र के रंध्र में से मछली की
'आँख बंधेगा उसी के गले में मेरी यहन द्रौपदी वरमाला
पहनायेगी।
(द्रौपदी को साथ लेकर धृष्टद्युम्न वहां जाता है जहां अन्यान्य राजे-महाराजे
मैई। धृष्टयन हाथ में एक सुंदर पुष्पमाला है ।)
धृष्टद्युम्न-(प्रौपदी के साथ चलता चलता) बहन, हस्तिनापुराधीश
धृतराष्ट्र के ज्येष्ठ कुमार, दुर्योधन अपने भाईयों के साथ
सामने बैठे हैं । उनकी दाई ओर महाधनुर्धर अङ्गराज
कर्ण हैं। गांधारराज सुबल के पुत्र शकुनि और
-विराट के पुत्र शंख और उत्तर भी यहां विराजमान
हैं। महाराज समुद्रसेन के सुपुत्र चन्द्रसेन, महापराक्रमी
भगदत्त, मद्रराज शल्य, महाप्रतापी : पुरुवंशी दृढ़धन्ता
और राजा उशीनर के पुत्र शिवी आदि अनेक नरेशों
ने हमारे निमन्त्रण को स्वीकार कर हमारा उत्साह
बढ़ाया है ।, वासुदेव कृष्ण .
..
और हलघर
१

: . (७०) असंख्य यादवगण के साथ यहां पधारे हैं। सिन्धुराज जयद्रय, पराक्रमी शिशुपाल, जरासन्ध और दूसरे जग- न्मान्य नृपतिगणों ने इस उत्सव में सम्मिलित हो कर हमें कृतार्थ किया है। बहन, इनमें से जो कोई भी मछली.की आँख को घेधे उसी के गले में यह वर माला डाल देना। (बाने बजने लगते है) ( सब से पहले जरासंध उठता है।), जरासन्ध-(ऊच्च रवर से ) श्राप लोगों के सामने मैं पहले ही याण से इस लक्ष्य को बेध कर पांचाली का पाणि- प्रहण करता हूँ। (एक पक कर पांचों तार चलाता है। किसी तीर से भी सक्ष्यवेध नहीं होता।) सब लोग-आइये जाइये। -अपनासा मुंह लेकर जाइये। दूसरा-आये थे एक ही तीर से लक्ष्य वेधने को! जयद्रथ-(भपने पास बैठे एक रामा से ) जरासन्ध का पल मन्द हो । गया है । इसकी भुजाओं में अब वह पराक्रम नहीं रहा, नहीं तो यह लक्ष्य भी न वेध सकता! मैं इसे वेध कर द्रौपदी को प्राप्त करता हूँ। (ो गर्व के साथ भाकर धनुष उठाना है।) लो उड़ गया लक्ष्य ( का कर तीर छोड़ता है ।) तार छूटते ही उसके भरके से मुंह के बल भूमि पर गिर पड़ता है. एक दर्शक . .

( ७१ )
मुकुट सिर से उड़ कर दूर जा गिरता है । दर्शक और सब राजे हमन
लगते है।)
एक दर्शक-लक्ष्य तो नहीं उड़ा, पर मुकुट साफ उड़ गया है ।
दूसरा-उड़ तो गया, चाहे कुछ हो! ( मब ठठाकर हंसने हैं ।
जयद्रथ लज्जित हो कर अपने स्थान पर जा बैठना है।)
शिशुपाल-श्राखिर जयद्रथ भी तो बूढ़ा हो गया है । इसे यहां
आना ही न चाहिये था। जो वस्तु जिसके भाग्य में
होती है, वह उसे ही प्राप्त होती है । कृष्णा मेरी ही
अधीगिनी होगी।
एकराजा -पहले लक्ष्य तो वेध लो, पीछे कृष्णा को अर्धाङ्गिनी
बनाने का नाम लेना।
शिशुपाल-लक्ष्य-वेधन करना भी कोई बड़ी बात है !
(बड़े गर्व के साथ आकर धनुष उठाता है । उस पर तीर रसने
को जोर लगाता है, पर तीर चढ़ता ही नहीं।)
शिशुपाल-(धनुष को भूमि पर रख कर ) धनुप में कुछ दोप है।
पहले इसे ठीक करना चाहिए।'
एक दर्शक-अङ्गर खट्टे हैं।
दूसरा-जितने अकड़ कर पाये थे, उतने लज्जित हो कर जा
स
तीसरा दर्शक-बड़ों की कही हुई कहावतों में बड़ी सचाई है-
'अहंकार, का सिर नीचा' कहावत इस पर कैसी
ठीक लागू होती है !
है और धनुष पर सौर चढ़ा देता है।)

" एफ दर्शक-पही है सूतपुत्र कर्ण ? दुसरा-हां, यही सूतपुत्र- (दर्शकों में से सापुत्र-पुत्र----को ६ वा माती है।) द्रौपदी-(ऊँचे स्वर से ) मैं सूतपुत्र को न बरंगी । (यद मुन कर कर्म के बाहर का रंग उ जाता है और धनुष को पृथ्वी पर सर कर लौट जाता है।), एक रामा-इसे कहते हैं-खाली हाथ आये और खाली हाथ गये। दूसरा-सूतपुत्र हो कर इसे द्रौपदी को व्याहने का साहम ही न. फरना चाहिये था । तीसरा-दुर्योधन ने प्रदेश का राज्य दे दिया तो क्या जाति भी बदल दी? घौथा राजा-क्या कोई जाति बदल सकता है. काकः काकः वका बका। राजा द्रुपद--( आमन पर खड़ा हो कर) ऐसे ऐसे जगद्-विख्यात राजा-महाराजाओं ने लक्ष्य वैधने का प्रयास किया पर किसी से कुछ न बन पड़ा । मुझे भाज ऐसा मालूम हो रहा है कि यह क्षत्रिय जननी भारत- यसुन्धरा क्षत्रियवंश से हीन हो गई है। यहां पर कोई सच्चा क्षत्रिय नहीं रहा । यदि आज धनुर्धर- श्रेष्ठ सव्यसाची अर्जुन होते तो इस निरशा का मुख न देखना पड़ता। .

अर्जुन-(भीम से ) भैया, क्षत्रियकुल का यह अपमान हम से नहीं सहा जाता। आप जाकर लक्ष्यवेध फरें। भीम-दुपद ने नाम तुम्हारा लिया है भैया, अव द्रौपदी तुम्हारी हो चुकी । यदि तुम क्षत्रिय हो तो लक्ष्य बेध कर द्रौपदी का पाणिग्रहण करो। ( अर्जुन मोकृष्ण की ओर देखता है । कृष्ण उसे साक्ष्य धने को इशारा करते हैं । अर्जुन उन्हें सिर नवा कर प्रणाम करता है।) अर्जुन-(ऊंचे रवर से ) क्षत्रियों में चाहे प्रोजस् न रहा हो । पर ब्राह्मणों में ब्रह्मवर्चस् अभी तक वैसे ही देदीप्यमान है। जो काम क्षत्रिय-भुजा नहीं कर सकी वह ब्राह्मण- भुजा करके दिखा देगी। (आगे बढ़ कर धनुष उठा लेता है) ( अर्जुन को देखकर भाक्षणमंडली में जोश उत्पन्न होता है। लोग अपने मृगचर्म और कमण्डलुओं को उछाल उछाल कर हर्षनाद करते हैं 1) एक ब्राह्मण-(मर्जुन को) धन्य हो बेटा ! तुमने प्राह्मणफुल का मस्तक संसार में ऊँचा कर दिया है। दुसरा प्राह्मण-यदि इस छोकरे ने यह काम कर दिया तो क्षत्रियों के मुख पर कारिख पुत जायगी। तीसरा ब्राह्मण-फरेगा क्यों न, अवश्य करेगा। देखते नहीं हो इसकी आजानु लंबमान भुजाएँ, वृहद् वक्षः-स्थल, विशाल भाल और उस पर से टपकता हुआ तेज:पुञ्ज ।

( ७४ )
चौथा ब्राह्मण-इसे देख कर मुझे ब्राह्मणशावतंस साक्षात्
जामदग्नेय परशुराम जी का स्मरण श्राता है।
इसको गजशुएड के समान भुजायें, भरे और उभरे
हुए कंधे यह बता रहे हैं कि इसे अस्त्रविद्या का
बहुत अभ्यास है।
कुछ ब्राह्मण-जो काम जरासघ. जयद्रथ, शल्य और शिशुपाल
श्रादि अस्त्रविद्यापारंगत न कर सके, उसे यह कल
का छोकरा ब्राह्मगा क्या करेगा!
और प्राह्मण-यही बात है, प्राह्मणों का अपमान और हँसी करावेगा।
एक वृद्ध प्राह्मण-भाइयो ! हम लोगों की श्राजीविका
क्षत्रियों पर ही निर्भर है । यह छोकरा अपनी
चंचलता और धृष्टता के कारण इन राजाओं
को हमारा शत्रु पना देगा।
कुछ ब्राह्मण-इसे वापिस बुला लेना चाहिए।
एक ब्राह्मगा-अरे तुम लोग इन क्षत्रियों से क्यों दवे फिरते हो?
अजीविका देने वाला ईश्वर है। हमें इस प्राहाण का
उत्साह बढ़ाना चाहिए।
(ब्राह्मण लोग 'धन्य हो वेग', 'ध दो लक्ष्य', 'माझणवंश का नाम
उज्ज्वल कर दो' इत्यादि नाद करते है । अर्जुन धनुष पर तीर चढ़ाकर
पहले तौर से ही लक्ष्य वेध देता है । ग्रामणों के हर्ष का पारावार नहीं
रखता । अंगोछा, कमण्डलु, मालायें और जो कुछ भी किसी के पास है उसे
आकाश में उछाल उजाल कर हर्षनाद करते है। द्रौपदी अर्जुन के गले
में वरमाला' मारती है । नरसिंघे बजने लगते हैं। फूलों की वर्षा
पोन लगती है।

( ७५ ) एक प्राहाया-(अर्जुन के पास जाकर और अपनी सफेद दाही हाथ में लेकर) बेटा, तूने आज इस सफेद दाड़ी की लाज रख ली है। ( अर्जुन उसे प्रणाम करता है और द्रौपदी को लेकर चलता है। मद माहाणा और उसके चारों भाई उसके पछि चलते है।) शिशुपाल-आज अनर्थ हो गया है ! एक प्राहाणशृगाल क्षत्रिय- शार्दूलों के मुखों से शिकार छीन कर ले जा रहा है और हम लोग निःस्तेज होकर देख रहे हैं ! जयद्रथ-इस क्षत्रियकुलाङ्गार दुपद ने हमारा अपमान किया है। जरासंघ--इसी समय दुपद और द्रौपदी दोनों को मार देना चाहिए। कर्ण-द्रौपदी ने मुझे सूतपुत्र कह फर अपमानित किया है, इस अपमान का बदला मैं अवश्य लेकर रहूँगा। सय राजे-मारो मारो-ये जीवित न रहने पायें । (सम राने अर्जुन को मारने दौड़ते है । भीम एक वृक्ष उखाइ कर उससे बहुतों को मार देता है और कुछ भाग जाते है।) सब प्राहाण-(अपने अपने कमण्डलु और मृगछाला उछालते हुए) डरना नहीं ब्राह्मणकुमार, हम सब तुम्हारे साथ हैं। हम लोग तुम्हारे पक्ष में होकर शत्रुओं से लड़ेंगे। अर्जुन-आप लोग दूर ही खड़े होकर कौतुक देखते रहें। भीम- इमारे पास श्राप न पायें, कहीं गेहूँ फे साथ धुन भी न पिस जाय। (कर्ण अर्जुन के सामने आता है ।।

,
कर्ण-अरे घालणाधम, जो यशांश देवताओं का था उसे कुत्ते
की तरह का कर तू कहां ले जा रहा है ? अब दिखा
चही भुजयल जिस से तूने लक्ष्यय किया था।
(अर्जुन पर तीर छोड़ता है।)
शल्य-(मीम से ) नीच ब्राह्मण, हम लोगों के ही दान से भैंसे की
शकल बना कर हमें ही मारने को उद्यत हुआ है ?
(भैम पर सड़गप्रहार करता है। माम उसे पक्ष की शासा पर
लेना है । राणा दूर जाता है।)
भीम -यह ले उस दान का प्रतिफल । ( एक बड़ा वृक्षशासा उमेक मिर
पर मारता है । वह अचेत होकर गिर पड़ता है।)
फर्ण-आज ब्रह्मांड के सिर और पैरों में युद्ध हो रहा है । अभी
निर्णय हो जायगा कि यली कौन है-सिर या पैर ?
अर्जुन-अरे शूद्रापसद, यही धाण यह निर्णय कर देगा ( यह का
कर भाग चलाता है। कग बेहोश हो जाता है।)
फर्ण--(होश में आकर) द्विजश्रेष्ठ, तुम्हारे अथक बाहुबल और
शस्त्रचातुरी को देख कर मुझे बड़ा हर्प हुआ है। मैं
ब्राह्मणासत्ता के आगे सिर झुकाता हूँ ! आज मुझे ज्ञात
हुआ कि माझणवंश में एक नहीं कई परशुराम हैं।
अर्जुन-कर्ण, तूने बहुत अच्छा किया जो हार मान ली, नहीं तो
क्षत्रियों के रक्तपात से आज बसुन्धरा रक्त हो जाती ।
(यह कह कर उसने पास खड़े हुए रथ में द्रौपदी और चारों भार यों
को बिठा लिया । फिर रथ भगा कर चला गया ।)

चौथा दृश्य
(स्थान-धृतराष्ट्र का महल, धृतराष्ट्र एकान्त में बैठा है।)
धृतराष्ट्र --न जाने मेरी आत्मा मुझे क्यों धिक्कारती रहती है।
उठते-बैठते, सोते-जागते अन्तरात्मा से सदा यही आवाज़
श्राती है--धृतराष्ट्र ! तुझे विकार तू अतिनिष्ठुर,
पापात्मा और कृतन है मेरी समझ में मैंने ऐसा कोई
भयकर पाप नहीं किया है, सिवा......पर उसमें मेरा क्या
अपराध है । मैंने तो उन्हें फेवल कुछ समय तक दुर्योधन
से दूर करने के लिये वारणावत में भेजा था । वहां यदि
जल कर उनकी मृत्यु हो गई तो इस में मेरा क्या दोष !
(व्याकुल होकर) फिर वही अाराज ! हां, इस में
मेरा भी अपराध है । यह जान कर भी कि दुर्योधन
पांडवों से सदा लाग-डाँट रखता है-मैंने दुर्योधन के
कहने से उन्हें वहां मेजा ही क्यों ! पुनमोह में फंस
कर मैंने यह कुकर्म किया है। सन्तान का मोहबन्धन
है ही ऐसा । (कुछ सोच कर ) दुर्योधन को पांचाल देश
में गये बहुत समय हो गया है। अब तक उसका कोई
समाचार नहीं पाया।
(विदुर का प्रवेश)
विदुर-प्रणाम महाराज!
धृतराष्ट्र-श्राओ विदुर, येठो।
आज एक बड़ी खुशी का समाचार सुनाने .

-
नराष्ट्र--(गणे ) दुर्योधन में परंपर में रिमा पार होगी ?
उस से मुझे यही प्राशा यो।
विदुर-यह पान नही भैया! शुभ समाचार यह है कि पांथों
पांडवयुमार मीदिन ।
धृतराष्ट्र-(भा मे हर्ष मापदुमा ) क्या ये मोति? विदुर,
या ममाचार पाम्तव में प्रतिहमर है। उनको मृत्यु
में मेरे माई पांडफे वंश का जोर हो गया है-इस भात
का शोक मेरे हृदय को मा पुन की तरह काटना रहता
था। अब मुझे शान्ति मिली है। परन्तु तुमने अभी तक
स्वयंवर का युद्ध समाचार नाही मुनाया।
विदुर -अत्यन्त हर्प के फारगा मैं प्राधा समापार ही मुना पागा
हूँ। द्रौपदी के स्वयंवर में जय किसी प्रिय से लक्ष्ययन
नहो सका, तो.........
धृतराष्ट्र-नो मेरे दुर्योधन ने.........
विदुर-दुर्योधन ने नदी, माझगा पेपपारी अर्जुन ने लक्ष्य येध कर
द्रौपदी का पाणिप्रहग्य कर लिया है । (पृतराष्ट्र के बारे
का रंग र जाता है)
(संभल कर)
धृतराष्ट्र-अर्जुन
लक्ष्य येध किया है ? एक ही बात है-दुर्योधन ने
किया या अर्जुन ने किया। मुझे अर्जुन भी दुर्योधन की
तरह प्यारा है।
(पाचन और कर्म का प्रवेश)
दुर्योधन-(खाई से ) पिता जी, मैं श्राप से एक पान. फहना
पाहता हूँ।

धृतराष्ट्र-तुम दोनों नीति-युशल हो, जो बतागदी अलंगा। .. कणे-महाराज, हम श्राप से अब यह विनय ने श्राय कि (७६) विदुर-मुझे जाने की प्राज्ञा दीजिये, महाराज । शायद दुर्योधन एकान्त में बात करना चाहता है। ( जाता है।) धृतराष्ट्र-पांचाल से कब आये बेटा ? यह सुन कर मेरे मन को ठेस लगी है कि द्रोपदी ने तुम्हें-- दुर्योधन-मुझे नहीं वरा--यही कहने को थे न पिता जी ? इससे तो आपको बड़ी खुशी हुई होगी-और चाचा से ही यह खुशी का समाचार मिला होगा धृतराष्ट्र-दुर्योधन, तू शायद यह समझना कहने पर चलता हूँ । यह समझना तेरा भ्रम है। मैं जानता हूँ कि यह पांडवों का पक्षपाती है। मैं उसके आगे उनके गुणों का यखान इसलिए किया करता हूँ कि वह मेरे मन के वास्तविक मावों को मार न सके। दुर्योधन- --चाचा ने यह भी बता दिया होगा कि पांचों भाई और. उनकी माता अभी जीवित है। धृतराष्ट्र-यही बताने को तो वह श्राया था। कि मैं विदुर के इस नई परिस्थिति में हमें क्या करना चाहिए? दुर्योधन-जिस उपाय से इन पांडवों से इनारा पीछा छूटेज पर विचार करने को हम आप धृतराष्ट्र---उपाय तुम्ही बनाओ!

(८०) दुर्योधन-दुपद याम्दी और प्रतापी गmदा अर्जुन में ये नया मान्य हो गया है। यह पान पुरा हुआ है। मे पहले कि उनमें पनिटलाय में कोई ऐया पाय करना चाहिये जिसमें दुपा और अर्जुन में मनमुटाय हो जाय और सुपर में अपने यहां से निमाल। . फर्ण-सुपद मा युद्धिमान और नीतित गमा यह कभी न फरेगा। पांडयोंसे पराक्रमी रामारों के माध मान्य जुड़ गाने मे मो याद करने नहीं ममाता दोगा। यह मपाय . टोक नदी, कोई और बनायो। दुर्योधन-दसरा उपाय यह है कि पांचों भाइयों में किसी न किसी बात पर परम्पर गगहा उत्पन्न किया जाय जिससे थे अलग- अलग हो जायें। आपस की फूट से प्रत्येक को मार देना अनि सुगम होगा। फर्ग-दुर्योधन, तुम नहीं जानते कि उनके शरीर पांच है पर उनमें हृदय एक है, प्रागा एक है। ये एक हाय की पांच उँगलियां हैं। उनमें फूट डालना असम्भव है। दुर्योधन--यह भी एक उपाय हो सकता है कि भीम को विप देकर मार दिया जाय । भीम को खाने पीने की पड़ी लालसा रहती है, अतः उसे भोजन में विप देना आसान होगा। भीम की मृत्यु से पांडव सहायहीन और निर्यल हो जायेंगे। तब उन्हें मारना सहल होगा । फर्ण-दुर्योधन, तुम इस प्रकार के तुच्छ उपायों का प्रयोग फभी से फर रहे हो, पर पांडयों का mm- बांका नहीं कर

( ८१ )
सके। इसलिए अधम और भीरु जनों के उपायों को छोड़
फर शूर क्षत्रियों के उपायों का अवलम्बन करो । तुम
क्षत्रिय हो, वीर क्षत्रियों के वंशज हो । कुत्सित चालों से
अपने उज्ज्यल वंश को कलकिन न करो। मेरे विचार में
तो एक ही उपाय है जिससे काम निकल सकता है ।
वह यह है कि जड़ जमने से पहले ही पांडवों को दवा लेना
चाहिए । इस समय दुपदपक्ष के लोग हमसे निर्वन हैं।
वे युद्ध के लिए तैयार नहीं हैं। दूसरे, यादवपति कृष्ण में
पांडवों से दूर हैं। तीसरे, किसी और भूपति से अर्भ
पांडवों की मित्रता नहीं हुई है । अनः इस समय उन्हें परास
फरना सहल होगा।
धृतराष्ट्र-घेटा, जो कुछ अङ्गराज फर्ण कह रहा है, वही मु
समय और नीति के अनुकूल जान पड़ता है । मे
इच्छा है कि भीष्म और द्रोण से भी सलाह कर ले
चाहिए, क्योंकि उनकी सहायता के बिना हम कुछ न
कर सकते।
(भीष्म और द्रोण का प्रवेश)
लो घे दोनों भी श्रा गये हैं ! (दोनों से ) अभी छ
का जिकर हो रहा था कि आप थागये।
भीष्म-बहुत अच्छ हुआ कि हम ठीक उसी समय पहुंचे हैं
हमारी आवश्यकता है।
-(भीष्म से ) आपने पांडवों के जीवित होने का
समाचार तो सुन ही लिया होगा ? अब कोई ऐसा
.

निप्रित करना है जिससे माई-माई भगा
भीम-मृतराष्ट्र, मेरे विचार में पांडों के माय सदा गगहा करना
चित नहीं। मेरे लिए तुम और तुम्हारे भाई पांडु दोनों
समान मलिए उनके और तुम्हारे पुत्रों को में एकसा
प्यार करता है। पर इस पितहीन है. उनकारागुम्हारा
धर्म है और मेरा मी । दिपना यह है कि इन में मगड़े
का कारण क्या है। मेरे विचार में हो कौरव और पांडवों
में विवाद का मूलकारमा राज्य है। इसे बांट कर पापा
कोषले लें और आधा पांडयायापि राज्य कान्याया-
गुल अधिकार पाइयों का है तो भी पांढव धर्मात्मा है-
ये इस निर्णय में मीन-मेर न करेंगे।
द्रोण-जो सुध भीष्म जी ने कहा है में भी उस का अनुमोदन
करता हूँ। इस में सत्र की भलाई है। ऐसा करने से आपका
यश फैलेगा। साथ ही धापकी शक्ति के साथ यदि
पांडवों की शक्ति भी मिल गई तो संसार की कोई शक्ति
भी आपके सामने कि न सकेगी।
कर्ण--में श्राप के कथन का अनुमोदन नहीं कर सकता । पांडवों
से हमारा समझौता कभी न हो सकेगा। एक दिन उन से
मुठभेड़ होगी हो । यदि ऐसा है तो अय ही बह, क्यों. न
हो जाय जय कि उनका पक्ष निर्बल है। प्राचार्य को
शायद अपने प्रियतम शिष्य
युद्ध करने में संकोच
होता है।

-- द्रोण-मिध्यभिमान की ऐसी बातें तभी तक होंगी बेटा, जब तक देवसम पांडवों का साक्षात् नहीं हुआ । इस भूमंडल पर अब तक ऐसा कोई उत्पन्न नहीं हुआ जो अर्जुन फे पैने तीरों के सामने क्षण भर भी टिक सके। फर्ण युद्ध छिड़ने दो आचार्य, फिर देखना कर्ण का पराक्रम । पांचों भाइयों को मैं अकेला ही यमसदन भेजने की क्षमता रखता हूँ। भीष्म-( व्यंग्य से ) तभी उन्हें यमसदन भेज कर द्रौपदी को छीन लाये हो। धृतराष्ट्र-येटा दुर्योधन और कर्ण, शन्तनुपुत्र भीष्म और धनु - विद्याचार्य द्रोण के वचन राजनीति और धर्मफे अनुकूल हैं। मेरी भी यही सम्मनि है कि पांडवों को प्राधा राज्य देकर इस कलह को मिटाना चाहिए । (श्रीकृष्ण का प्रवेश । उन्हें देख सब लोग उठ खड़े होते है से संकेत पाकर विदुर उन्हें उच्च आसन पर देठाते है।) धृतराष्ट्र यादवेश, आपने बड़ी कृपा इस रजसे पवित्र किया है। क्या आशा है ? कृष्णा-महाराज धृतराष्ट्र, मैं पांचालनरेश दुपद और उनके सहा- यफ दूसरे नृपगण का सन्देश लेकर उपस्थित हुश्रा हूँ। उन्होंने आप से सविनय प्रार्थना की है कि पांडव-कुमार अय पातक नहीं रहे। उन्हें भी अय स्वयुलोचित मान- कदा रखने के लिए राज्य के कुछ माग और धतराष्ट्र फो चरण- -- * है । इस लिए पिछली वातों को भूलकर आप उन्हें पुत्रवत् समझ कर उनका पालन करें। धृतराष्ट्र-वासुदेव, श्राप ठीक समय पर सन्देश लेकर आये हैं। अब इसी बात पर विचार हो रहा था । भीष्म और द्रोग्य जी की सम्मति के अनुसार हम इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि पांडवों को श्राधा राज्य दिया जावे । मेरे विचार में खांडवप्रस्थ का प्रान्त उनके लिए उत्तम होगा। कृष्ण-मुझे विश्वास है कि आपके निर्णय को पांडव : सहर्ष स्वीकार करेंगे दुर्योधन-वे स्वीकार क्यों न करेंगे ! अकिञ्चन भिखारियों को राज्य मिल जाय और वे स्वीकार न करें! फर्ण- इसमें क्या संदेह है ! उनका न घर था और न घाट, दर- दर ठोकरें ग्या रहे थे। अब राजा बन जायेंगे। कृष्णा-कर्ण, मिटते हुए फलह को मिटाना ही उत्तम है। तुम जैसे चाटुकारों ने ही दुर्योधन का दिमाग विगाड़ रक्खा है। पोडव महाशूर हैं, वे अपने अधिकार को याहुबल से...... वर्ण-रहने दो पेशव, महशूरता उनकी तय मानी जाती जय . चाक्तियों के स्थान में बाहुबल के प्रयोग से यह राज्य लेते। कृष्णा--तुम लोगों को उनके याहुबल का ज्ञान द्रौपदी-स्वयंवर में क्या नहीं हो चुका? दुर्योधन-यासुदेव, जाकर उन्हें कह दो कि मैं उन्हें मुई की नोक- भर भूमि भी देने का नहीं। ।

कृष्ण-महाराज धृतराष्ट्र, अब किसकी बात को ठीक समझू-
आपकी या दुर्योधन की ?
धृतराष्ट्र-दुर्योधन, मैं कलह मिटा रहा हूँ और तुम बढ़ा रहे हो।
द्वारिकाधीश. जो मैंने कहा है वही होगा । पांडवों को
कह दीजिये कि खांडवप्रस्थ पर अपना अधिकार
कर लें।
श्रीकृष्ण-तथास्तु । (चलने को खड़े होते है । सब लोग खड़े हो जाते हैं।)
( पटाक्षेप)
पांचवाँ दृश्य
(स्थान- --पांडवों का समाभवन, दुर्योधन, कर्ण और शकुनि
घूम घूम कर उसकी शोभा देख रहे हैं।)
दुर्योधन-ऐसा अपूर्व सभाभवन पहले कभी देखने को नहीं मिला ।
यहाँ पर शिल्पियों की विद्या की अन्तिम सीमा है।
-इन्द्र और कुवेर श्रादि देवताओं के सभाभवन भी इसके
सामने नहीं टिक सकते।
शकुनि-सभाभवन क्या है खासा लंबा-चौड़ा अखाड़ा है। एक
एक हजार हाथ तो इसकी परिधि है ।
कर्ण-सोने के पेड़ों में अमूल्य मणिमुक्ताओं के फल लगे हुए हैं।
दुर्योधन-और उनके परस्पर प्रतिविम्बित होने से जो प्रकाश
फैल रहा है उसके सामने सैकड़ों सूर्यों का प्रकाश भी

शामि-गोलको गो, या इगनोगी मानो माग से पते कर रही है। पर्ण-पार पत्र की माने याने सम्भ मे गोलाकार पने ! उन पर in-गफ लम पमे सलहे ! (EO HD मना) दुर्योधन-दम सरोवर की शोभा कैसी अपूर्व ! इसमें दिन । दुए शतदल फमज्ञ माने पं. बने हैं। फर्गा-और उन फमली के पत्तों को भी देश में ययमगि फपने। शनि-सरोवर में तैरनी हुई मलिगों के पदों की गणना नहीं हो सकती । उम मदली का पर्या (माली की भोर शारा करक) पण गा में पदल रहा है। (दो गरम पदारे, उसका मापा दीवार मे रहता है, पहा सो इमर लोग रस पहले है।) फर्ग-ध्यान से चलो भैया। यह कमरे का दार नहीं बिलौर को धनी हुई दीवार है। शनि-भवन की कसा तो हमने अच्छी सरह देखती है। प्राओ इधर चलें। . दुर्योधन- (इस भागे जाने हैं) -इधर कहां लोटे मामा ? इधर तो पानी ही पानी ३, थागे चलने से कपड़े भीग जायेंगे।

। ( ८७ ) ", (पोसी और भंगरखे को संभाल कर आगे बढ़ता है। सामने खड़े कुछ नौकर हम पड़ते है।) दुर्योधन--(लत्रित होकर) मैंने समझा था यह जल का सरोवर है । कर्ण-यह सरोवर नहीं- 1-स्वच्च स्फटिक का फर्श है। शकुनि श्रागे इस ओर न जाना चाहिये । कहीं और लज्जित न होना पड़े। दुर्योधन-चलिए, दाई ओर चलें। (थोड़ा आगे चल कर पानी के तालाब में गिर पड़ता है । उसके को भीग जाते है। सामने खड़ा भीम हंसता है । शकुनि, दुर्योधन की भुजा पका कर उसे निकालता है) (युधिष्ठिर नये कपड़े लेकर भोग आते है ) युधिष्टिर-भैया, कहीं चोट तो नहीं लगी ? लो ये वस्त्र पहन लो । दुर्योधन-(वस्त्र लेकर ) नहीं नहीं, कोई चोट नहीं आई । पानी तो मैंने देख लिया था पर संभलते-संभलते पांव फिसल ही गया। युधिष्ठिर-अच्छा हुआ कोई चोट नहीं आई । आप और सैर करें। ( जाते है) दुर्योधन-अब आगे न जाना चाहिए। शकुनि--यहीं से लौट चलना चाहिए । यहाँ अधिक ठहरना अप- मानजनक है। दुर्योधन, 1-अपमान का ज़िकर न करो मामा । यहां की चप्पा- चप्पा भूमि सहस्रों मुखों से मेरा अपमान कर रही है। मैं ही ऐसा निर्लज्ज हूँ कि जो अब तक जीवित हूँ।

( one MA hts RTE एक प-in, ग पर ARE Pा है है मगर गोदी के भाई TERI AR ran पद में हर्ष AR FAIR l को Staffrar होने की LITER HIT मोने * A Rar कोरवों को मार मोर मुटान में प्रानि करने को पर है. MEन पार गरे मनो गया, समापन गरिन गापा भी मुग्दारा पल भी यांची गरता। पोंभर-तुम दोनों में अभिनय मित्र हो । इसलिए नारे सामने अपने मागम भागना अनुचित मदीपनगम भोर मामा, म सग प्यां और अपमान को भाग में में इतना मल रहा है कि मेरे रोम- रोग से मदों अभियान निस्ल ही है। उनसे मेरे अा-प्रया मल रहे हैं। मुम्ही इस कोरान्त कर मकने हो। फर्ग-भैया, निराश होने की कोई बात नहीं। इतने शूर होकर भी तुम भीर और पलाहीन पुमागे जैसी यात कर रहे हो? में पयत एक दो उपाय मानता हूँ---युट, युद्ध, युद्ध रणभूमि हो चीरता को मननी और पिता है। इसकी गोद में पले

(2)
और सोये हुए वीरों की यशःपताका अनन्तकाल तक
नमोमण्डल में फहराती ,रहती है । सचे क्षत्रियों की
यही सच्ची माता है । इसे छोड़फर किसी और की
शरण लेना भीरता है, महापाप है। दुर्योधन, यह
संसार नश्वर है इसकी अनेकानेफ विभूतियां भी
क्षणस्थायिनी हैं इसलिए काम वे करने चाहिए, जिनसे
इस शरीर के मिट जाने पर भी नाम न मिटे ।
शकुनि भैया, मैं अङ्गराज से सहमत नहीं । इस समय पांडवों के
भाग्याकाश के सब नक्षत्र चमक रहे हैं। वे सब उनके
अनुकूल हैं। इससे युद्ध में हम उन्हें हरा नहीं सकते।
मैंने एक और उपाय सोचा है।
दुर्योधन-( उत्सुकता से ) क्या ?
शकुनि--महाराज युधिष्ठिर को धूत खेलने का महाव्यसन है ।
पर चे उसमें बिलकुल अनाड़ी हैं। यदि किसी तरह तुम
उन्हें मेरे साथ पासा खेलने को तैयार कर दो तो आपके
पौं-बारह हैं। दाँव लगायो तुम और पांसा फेदूंगा मैं।
पांसा फेंकते समय मेरे हाथ में ऐसी सिद्धि होती है कि
आन की शान में उलट-पलट हो जाता है। इसके द्वारा
युधिष्ठिर का समस्त राज्य में आपको दिला सकता हूँ।
दुर्योधन ----यह उपाय तो बहुत अच्छा है-मैंस मरे और लाठी न
टूटे। फर्ण मैया, तुम्हारी क्या राय है ?
फर्ण-मैं तो इसे महाअधम कार्य समझता हूँ । इससे मैं सहमत
न हूंगा।
शनि-अधम कार्य क्यों ? जिस तरह तलाश घलाना जिलों

का धर्म है इमी तरह घाक्रिया भी तो उन्हों का कार्य है।
फिर, यदि गुड़ खिला कर शन्नु मारा जाय तो विष
क्यों दिया जाय?
दुर्योधन-कर्ण, मामा का उपाय में ठीक समझता हूं । तुम्हें यदि
इस में कुछ आपत्ति भी हो तो भी इसे मेरे कहने पर मान
जायो । क्या तुमने नहीं कहा था कि यदि मैं तुम्हें कुम्भी-
पाक में भी गिराऊँगा तो तुम मीन-मेप न करोगे?
फर्ण-दुर्योधन, तुम्हारे इस वचन ने मुझे अवाक कर दिया है।
मैं दातक्रिया को कुम्भीपाक में गिरना समझता हूँ, पर
तुम्हारे लिए मुझे वह भी स्वीकार है।
दुर्योधन-इसके लिए मैं तुम्हारा श्राजीवन किंकर होकर रहूंगा।
शकुनि-झली यात । न कोई किंकर, न कोई स्वामी, तुम दोनों
परस्पराधीन हो, एक रथ में जुते
दो घोड़े हो।
कर्ण-शकुनि ने वात पते की कही है।
दुर्योधन-और उपमा भी ठीक दी है।
(तीनो बातें करते करते जाते है )

(११)
छठा दृश्य
(स्थान-धृतराष्ट्र का सभाभवन, धृतराष्ट्र सिंहासन पर बैठे हैं।
उनके पास विदुर, भीम, द्रोणाचार्य और दूसरे मन्त्री बैठे हैं ।
सभा के मध्य में एक चौकी पर चौसर की बिसात पिछी
हुई है, पास ही गोटियां और पाँसे घरे है।
उसके एक ओर युधिष्ठिर और दूसरी ओर
शकुनि, कर्ण और दुःशासन
आदि बैठे हैं।)
शकुनि महाराज, अब खेल शुरु होना चाहिये । सव उपस्थित
जनता उसके लिए उत्सुक बैठी है।
युधिष्ठिर-शकुनिजी, जुआ बहुत ही निन्दित कर्म है । बसे-वसाये
घरों को उजाड़ कर यह श्मशान बना देता है। इस से
घी के जलते दीपक श्रान की श्रान में बुझ जाते हैं
और प्रकाश के स्थान में अन्धकार हो जाता है।
भाई, तुम्हें क्या मालूम नहीं कि संसार में
अफेला नहीं रहता ? मद्य, चोरी आदि अनेक व्यसन
इसके सहचर हैं । द्यूत जहां जाता है सत्यानास को
अपने साथ ले जाता है।
विदुर-घंटा युधिष्ठिर, जब द्यूतकर्म को तुम इतना बुरा मानते
हो तो फिर इसे छोड़ते क्यों नहीं ?
युधिष्ठिर (चाचा जी, मैं प्रणबद्ध हूँ। किसी की ललकार
को. में अस्वीकार नहीं कर सकता, फल चाहे
।
धूत कभी
1
पछ हो।

है
विदुर--(राए में) महागा, इस कार्य को रोकना आपका
फन है। नहीं तो मनास हो गया!
भीष्म-राणा या राजारिश के लोग नियमित काम को करते है,
प्रशासन में प्रापरी भाग है। यह मान भाई भाई
को हार-जोन का नहीं है तराष्ट्र, या जगला के मामने
उच्च या नीच प्रादर्श रचने का प्रश्न है, रागर्म नहीं है
कि इसे इसी समय रोका जाय।
धृतराष्ट्र -पेटा दुर्योधन, नीतिनिपुण विदुर और तुम्हारे दादा,
भीम जो जो कुछ कर रहे हैं मैं उन से सहमत है।
इस पल को अभी पन्द कर दो।
दुर्योधन-पिता जी, यह कैसे हो सकता है ! पार की अनुशा से
हो तो इतना अयोपन हुआ है। इतनी तैयारी करने फे
बाद में एकदम बंद कर देना मेरे लिये लानामद
होगा। यदि भाई युधिष्ठिर जी चाहें तो एक दो दाँव
लगा कर इसे बन्द कर सकते हैं।
धृतराष्ट्र हो, ठीक कहते हो येटा, खेल एक दम से बन्द हो
सकता!लो घेटा
विदुर-आज श्राप कुरवंश फे सर्वनाश का योम वो रहे हैं
महाराज!
शकुनि सर्वनाश तो होगा ही, पर किसका होगा यह भवितभ्यता के
अधीन है। भवितव्यता के मार्ग में यात्रा करना महापाप है।
भीष्म--(द्रोण से ) यह अच्छा नहीं हो रहा है, श्राचार्य । धृतराष्ट्र
दुर्योधन के हाथ में कटपुतली हो रहे हैं, जैसा वह नचाता
है वैसे नाचते जाते है।
३

( ३ )
द्रोण-मुझे तो कुरुवंश का भविष्य अन्धकारमय दीखता है।
युधिष्ठिर-तो खेलना पड़ेगा ?
फर्ण-हानि क्या है ? दो चार हाथ खेल कर छोड़ दीजिये।
युधिष्ठिर-एक बार शुरू हो जाने पर धून से पल्ला छुड़ाना असंभव
है। जीतने वाला और जीतने की आशा से और हारने
वाला हारे हुए धन को लौटा लेने को प्राशा से इसे
घोच में नहीं छोड़ता । इसमें जीत भी हार है । इसका
स्वाद मधुर विष की तरह है ! यदि आप लोग मुझे इस
पापकर्म में धकेलना चाहते हैं तो श्रापकी इच्छा ! मैं
इनकार नहीं कर सकता । मेरे साथ चौसर कौन
सेलेगा?
दुर्योधन-दौव मैं लगाऊंगा और पांसा मामा शकुनि फेंकेंगे।
युधिष्ठर---पासा फेंके एक और दांव लगाये दूसरा, यह नई बात है।
भीम-इस दाल में कुछ काला काला है भैया, इनके जाल में
न फंसना।
(चारो पांडव विचारमग्न हो जाते हैं)
ष्ठिर और शकुनि सेलते हैं। सब दांव जीनता
जाता है और युधिष्ठिर हारता । अन्त मे युधिष्ठिर मरे
भाइयों और अपने आप को हार जाता है।)
दुर्योधन आपके पास और क्या है जिसे दांव पर लगायेंगे ?
शकुनि इनके पास द्रौपदी जो है, उसे क्यों नहीं लगाते ?
विदुर-धिकार है दुष्ट, तेरी बुद्धि को। तू मामा के रूप में दुर्योधन
का शत्रु है जो इसे सर्वनाश की ओर ले जा रहा है।

के (६४) दुर्योधन-भैया, मामा ठीक कह रहे हैं । शायद कृष्णा- भाग्य से ही आप अपनी हारी हुई सम्पत्ति लौटा सकें! भीष्म--(शोक से मिर नाच कर ) अनर्थ, घोर अनर्थ ! ऐसे दुर्वचन कहते इसकी जिह्वा घे. मो टुकड़े क्यों नहीं हुए ! युधिष्ठिर-मैं द्रौपदी को दांव पर लगाता हूँ। शकुनि-(पासे फेंक कर ) लो यह दाँव भी मैं जीत गया हूँ। (मुशी से उछलता है।) दुर्योधन-श्रव द्रौपदी हमारी है । कर्ण-(खुशी से अपने आप से ) द्रौपदी ने भरी सभा में मेरा अपमान किया था । कहती थी मैं सूनपुत्र को न वरूंगी । श्राज. उस अपमान के प्रतिशोध का समय है। दुर्योधन- (अपने आप ) मेरी विपत्ति का कारण यही द्रौपदी है। यदि यह अर्जुन को न धरती तो उसके पिता दुपद की सहायता से पांडवों का जो पक्ष इतना प्रबल हो गया है कभी न होता । न पांडव राजसूय यज्ञ करते और न वह सभाभवन यनता, और न मेरा वहां अपमान होता। जब मैं पानी में गिरा था तो भीम ने मेरा उपहास किया था। भीम का बदला द्रौपदी से, द्रोपदी का बदला भीम से और उस अपमान का बदला सब पांडवों से लूंगा । ( रपष्ट ) अब ये मेरे दास हैं (ज़ोर से हंसता है) (अपने सारथा प्रतिकामी से ) प्रतिकामी, तू इसी समय जाकर द्रौपदी को इस राजसभा में हाज़िर कर ? (प्रतिकामी सड़ा होजाता है, चलता नही )खड़ा क्यों है ? इनसे डरता है- इन दासों - से डरता है, अरे मूर्ख-

( ५ )
कर्ण-अरे मूर्ख, दासता की गृहला में बंधे हुए भीम के हाथों में
गदा उठाने की, अर्जुन से हाथों में गांडीय पकड़ने की
और युधिष्ठिर और उसके दूसरे भाइयों के हाथों में किसी
शस्त्र के थामने की शक्ति नहीं है । अब ये महाराज दुर्यो-
धन के प्रणबद्ध दास हैं। और द्रौपदी .
शकुनि-जब ये लोग दास हुए तब उसके दासी होने में क्या
फसर रह गई है !
दुर्योधन--( हंसता हुआ ) ठीक कहा मामा । ( प्रतिकामी को ) मूर्ख,
यहीं खड़ा है ? गया क्यों नहीं ? शीत्र जा । (प्रतिकामी
जाता है ) द्रौपदी !-द्रौपदी मेरी दासी ! (ठठाकर
हंसता है।)
(प्रतिकामी लौट आता है)
दुर्योधन-अरे ! तू खाली हाथ लौट आया है ?
प्रतिकामी-महाराज, वे नहीं आतीं।
दुर्योधन-तो उसे वल से पकड़ लाता ।
प्रतिकामी -उस सती को स्पर्श करने का मुझ में साहस न था।
दुर्योधन-तो चूड़ियां पहन ले ! दुर्योधन का सारथी इतना भीरु !
दर हो यहाँ से । (वह हट जाता है ।)
दुर्योधन-(दु:शासन से ) भाई, बिना तुम्हारे यह काम किसी और
से होने का नहीं । तुम्हीं जाओ, और जिस अवस्था में
वह हो उसी में पकड़ लाओ।
भीम-( युधिष्ठिर से ) भाई साहित्र, देख रहे हो क्या हो रहा है ?
इस समय हमारा क्या कर्तव्य है ?
युधिष्ठिर-भीम, यह समय शान्ति और धैर्य का है। हमारी
"

। . (६६) जिह्वानों पर ताले लगे हैं और हाथ-पांव शृखला से जकड़े हुए हैं ! कुछ बोल नहीं सकते, कुछ कर नहीं सकते, ईश्वर रक्षा करेंगे। (दुःशामन द्रौपदी को बालों से पकड़े हुए सभा में ला पटकातर है।) द्रौपदी-(भालनाद करी हुई चारों ओर देखकर ।) इस सभा में भीष्म से योद्धा, विदुर से नीतिज्ञ, प्राचार्य से महारथी बैठे हैं। उनसे मैं पूछती हूं कि क्या यह सब कुछ उनकी सम्मति से हो रहा है ? (कोई उत्तर नहीं देखा ) क्या सब के मुँहों पर ताले पड़े हुए हैं। गदा की डींग मारने वाले भीम, कहां है वह गदा ? क्या गांडीवधारी अर्जुन का गांडीव हाथ से नहीं उठता ? ( भीम क्रोध से गदा उठाने लगता है।) अर्जुन-भाई, यह समय धैर्य का है। भीमयों क्यों नहीं कहते कि धैर्य के साथ अपमान सहने का है ? अर्जुन-जिन पांडव-शार्दूलों की ओर ये कौरव-शृगाल नज़र भर फर देखने का भी साइस न कर सकते थे आज उन्हीं की मूलों के बाल नोच रहे हैं, और वे ऐसे जंजीरों से बंधे हैं कि जरा भी हिल-जुल नहीं सकते। नकुल-भैया, यह समय हमारी परीक्षा का है। द्रौपदी -क्या मैं यह पूछ सकती हूं कि मुझे यहां क्यों लाया गया है? दुर्योधन- र यह तो तुझे सो धार कहा जा चुका है कि युधिष्ठिर ने तुझे मेरे पास जुए में हारा है । अब तू मेरी दासी है और मेरी आज्ञा से यहां लाई गई है। watcom- ---

( ६ )
द्रौपदी-महाराज ने पहले अपने आपको हारा था या मुझे ?
दुर्योधन-पहले अपने भाइयों को हारा फिर अपने श्रापको
हारा और फिर तुझे।
द्रौपदी -अब मैं आप लोगों से यह पूछती हूँ कि अपने
आपको हार जाने के पश्चात् महाराज युधिष्ठिर को
न्याय-मर्यादा के अनुसार यह अधिकार था कि वे मुझे
दाँव में लगाते ? (सब चुप रहते हैं, कोई उत्तर नहीं देता)
सब मौन हैं, सब की निहाओं पर जैसे ताले लगे हैं।
न्याय के उच्चासन पर यासीन महाराज, श्राप काधर्म तोन्याय
करना है । पुत्रवधू के नाते न सही, एक प्रजा के नाते तो
मेरा अधिकार है कि मैं श्रापसे न्याय की भिक्षा मांगू।
नीतिवेत्ता चाचा जी, श्रापकी नीति इस समय क्या
कहती है ? क्या वह पुस्तकों के पन्ने काले करने के लिये ही
है ? द्रोणाचार्य और कृपाचार्य जी, आप तो ब्राह्मण हैं।
पताइये आपके शास्त्र इस विषय में क्या कहते हैं ? सब
फे सब चुप हैं ! क्या मैं यह समझू कि इस समा में
मुझे न्याय मिलने की कोई पाशा नहीं ?
विकर्ण-इस सभा में बड़े बड़े राजे, महाराजे, नीतिवेत्ता और
शास्त्रों के धुरन्धर पंडित वैठे हैं। क्या भाभी के
प्रश्न का कोई उत्तर न देगा! ( कुछ ठहरकर ) कोई उत्तर
दे या न दे, पर जो कुछ मुझे उचित मालूम पड़ता है
में वह कहता हूँ । शास्त्रकारों ने जुआ खेलना, शिकार
खेलना और मदिरापान श्रादि फई प्रकार के व्यसन
चताये हैं । इन में बालक्त मनुष्य धर्माधर्म का विचार नहीं

"
कर माता! इसलिए महागा युधिटिश मे जुए में हारी
दुई द्रौपदी यास्ता में हारी दुई नहीं है।
कर्ण-विका, अपने छोटे मुंह से इतनी बड़ी बातें क्यों कर रहे
हो ? लकड़ी से उत्पन्न होकर उसी की गला देने वाली
प्राग के समान तुम स्यालयातक हो। तुम अपने आपको
महापंटिन समझते हो ? जिस प्रभ का उत्तर अनेक रामे
महारागे, परिडत और विद्वान् नहीं दे सके, तुम उसका
उत्तर दे रहे हो ?
दुर्योधन-युधिष्टिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव, अब तुम
रामपुत्र नहीं रहे, मेरे दास हो । अत: रामपुत्रों के यस्त्र
और आभूषण उतार दो। (सर पाटन बरन-भूषण उतार
देते ) दुःशासन, इसी समय द्रौपदी के भी वस्त्र और
भूपण उतार लो।
(इसमन द्रौपदी के वस्त्र उतारने भगताहै।)
द्रौपदी-( अत्यन्त करुणस्वर से रोती हुई) हे कृप्या, हे करुणागार,
है दीनबन्धो ! इस अचला की रक्षा करो। नारी-धर्म के
रक्षक तुम ही हो। इस समय कौरव मुझे अपमानित
करने पर तुले हुए हैं, द्वारिकाधीश, मेरी लना तुम्हारे
ही हाथ में है।
गाना
लमा मौरी राखो श्यामहरी,
विपदहारी भक्कन रखवारे भक्तिन विपद परी । सजा मोरी।।
दुशासन मतिअंध दुष्ट ने तीच केश परी।

(६६)
लाय सभा के मध्य वसन हरने को कुमति करी । लजा मोरी ॥
धर्मपुर, देवेशतनय भौ' पवनतनुज सगरी
जीवट हार म्लानमुख बैठे, उनसे कछु न सरी । लज्जा मोरी०॥
भीष्म, द्रोण, विदुर, नयवेत्ता सघ ने मौन धरी ।
हठी दुष्ट दुर्योधन से उनकी अय कछु न धरी । लजा मोरी ॥
तुम ही मात-पिता बांधव मम, दारण परी तुमरी।
जन हरि शरण लई हरि, तव तो स्यार से काहि डरी । लजा मोरी
(दु:शासन द्रौपदी के वस्त्र उतारते उतारते श्रान्त हो जाता है,
पर एक के उारने पर नीचे से दूसरा निकल आता है।
अन्त में वह थक कर रह जाता है।)
द्रौपदी-(क्रोध के आवेश में ) अधम, नीच, इन अपवित्र हाथों
सती के मिन फेशों को तूने खींचा है उन्हीं खुले केशों
पेणी मैं तेरे ही हृदय-रक्त से सींचकर बांधूंगी । इस !
के पूरे होने नक ये खुले ही रहेंगे।
भीम-( गदा उठाकर ) सव सभासदों के सम्मुख में यह प्रण करत
कि यदि मैं इस गदासे दुर्योधन की जंघाओं को चूर्ण न
दूं, दुःशासन का हृदय चीर कर उसका रक्त पान न
और उससे द्रौपदी के फेशों को न सोंचू तो ईश्वर
शुपति न दें। मेरी यह प्रतिरक्षा प्रस्ता है ।।
दुर्योधन-रहने दो इन गीदड़भभकियों को; भविष्य में जो होगा
जायगा । इस समय तो तुम मेरे दास हो।
विदुर-महाराज, अब हमसे अधिक कष्ट नहीं सहा जाता । मह

क्या तेरे मुमदएट में अर्जुन से कम थन है? पया अजुन के हाथों में घर पकड़ने और उन्हें पलाने की शक्ति मुझ में अधिक है ? पाई थपित हो भी, पर शगुको यलयान् मगम पर हदय में फापरता का भार भी लाना, पया कर्ण के लिए सामना नहीं ? यसरीरमार है तो फिर इसलिए फोति को क्यों कललित किया जाय ! मुझे शात कि मैं भाग्यहीन हैं। नहीं तो गुरु परशुराम जी से पढ़ी हुई अस्त्र- विद्या निष्फत क्यों होती ? द्रौपदी के स्वयंवर में मारा हुश्रा मैदान दाय से क्यों निकल माता ? पर मनुन्यता इसीमें है कि भाग्य से भी संपाम किया जाय । अनुकूल परिस्थितियों में को हरेक सफलता प्राप्त कर सकता है, किन्तु सगा धीर याद है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सफलता प्राप्त करे । उस संघर्प में यदि मृत्यु भी हो आय तो पद भी अमरता है। यहीं एक मेरा लक्ष्य है। मैं फेल अर्जुन को ही नीचा दिवाना चाहता हूँ, और किसी से न कुछ लेना है, न देना है। (आयेश से ) अर्जुन! अर्जुन!! (सहसा पमावती का प्रदेश) पावती-नाय! अर्जुन, अर्जुन, क्या कह रहे थे! क्या अर्जुन पागये हैं? फर्ण-क्या तुम ने मेरो पातें सुनी है ? पद्मावती-और तो कोई बात नहीं सुनी फेवल इतना सुना है कि आप अर्जुन को बुला रहे थे। फर्ण-(चिन्तानिमग्न होकर ) क्या करूँ ! अर्जुन से पीधा ही नहीं .१ उठते-बैठने, सोते-भागते मेरी आंखों के सामने

..
।
( १०३ )
वही खड़ा नज़र आता है । सोता हूँ तो भी उसका स्वप्न
देखता हूँ।
पद्मावती-प्राणाधार, अर्जुन इस समय न मालूम कहां बनों में
भटकता फिरता होगा ! अब तो उसका विचार छोड़िये।
जब वह लौट आयगा तो देखा जायगा। श्रापने तो
अपना जीवन ही.......
कर्ण-निस्सन्देह नष्ट कर दिया है। अपना ही नहीं, तुम्हारा
जीवन भी नष्ट कर दिया है । मैं अनुभव करता हूँ कि मैं
तुम्हारा पति होने के योग्य नहीं हूँ। पर मेरा इस में
क्या दोष!
पद्मावती-प्राणवलम, आप तो बात को खींच कर फहीं से कहीं
ले गये। यह मेरा सौभाग्य है जो आपकी चरणसेविका
पनी हूँ। एक वीरक्षत्राणी को वीर पति प्राप्त
करने के सिवा संसार में और क्या प्राप्य है !
कर्ण-प्रिये, में देख रहा हूँ कि जब कभी मैं निराशालहरी में बहने
लगता हूँ, उसी समय तुम अपने स्नेह और श्रद्धारूपी
दोनों हाथों को फैलाकर मेरी रक्षा करती हो । इस समय
भी तुम्हारे इन वचनों ने मेरे चित्त पर से एक बहुत भारी
योझ उठा दिया है। मेरे इस भाग्यहीन जीवनाकाश में
फेबल एक तुम ही सौभाग्य की एक प्रकाशमान रेखा हो प्रिये ।
इसी के भरोसे मैं शत्रुत्रों से टक्कर लूंगा।
पद्मावती-धन्य हो नाथ, आपकी अर्धाङ्गिनी आप वीरता-
मार्ग में कभी फाँटा नयनेगी।
दुर्योधन और शनि भोत है । पावत अपनी

फर्ण-आइये महाराज, आइये शकुनि जी, आपने बड़ी कृपा को जो दर्शन दिए। दुर्योधन- -श्राप से फुल परामर्श करना था, इसलिये श्रा गये हैं। शनि- ---काम्यक वनसे जो समाचार प्रतिदिन पा रहे हैं, वे आपने सुने हैं ? कर्ण-हररोज वे ही तो सुनता रहता हूँ । सुना है अर्जुन ने महा- देव, इन्द्र और दूसरे दिपालों से अनेकानेक शस्त्र प्राम कर लिये हैं दुर्योधन-और भीम के विषय में भी कुछ सुना है ? फर्ण--मेरे मस्तिष्क में अर्जुन के सिवा और किसी के लिए स्थान नहीं। दुर्योधन-तुम्हारे लिए तो केवल अर्जुन की ही सत्ता है, पर हमारे लिए एक एक पांडव यमतुल्य हैं। हम ने सुना है- भीम ने कुवेर-मर के रक्षक कई राक्षसों को मार भी दिया था तो भी कुवेर उस पर रुष्ट नहीं हुए। आपने जटासुर राक्षस का नाम सुना होगा। उसे भी भीम ने मार दिया है। इसके अतिरिक्त उसने ऐसे ऐसे शूरता के कार्य किये हैं कि जिनसे उसकी कीर्ति दिदिगन्तों में फैल गई है। शकुनि महाराज, इसका कोई विचार न करें। राजसत्ता आपके हाथ में है, ये लोग केवल याहुबल लेकर क्या करेंगे। उन्हें तो अपनी आजीविका के लिए ही बहुत कष्ट उठाने पड़ते होंगे, हम लोगों की ओर ध्यान का उन्हें समय

हो कहां मिलसा होगा! महाराज, श्राप चिन्ता न करें। पांडय
आपसे राज्य लौटा नहीं सकते। उनक यनवास फे चारह वर्ष
चाहे बीतने को है, परन्तु तेरहवें वर्ष उन्होंने गुप्तवास करना
है । यदि गुमवास में हमें उनका पता लग गया तो उन्हें
फिर पूर्ववन् उन्हीं शतों पर वनवास और गुप्तवास करना
पड़ेगा। इसी चक्र में उनकी सारी यायु समान हो जायगी।
दुर्योधन-मामा, श्रापकी कल्पना तभी सफल हो सकती है जब
हमें उनके गुप्तवास का पता लग जाय ।
शकुनि-श्राप असे प्रतापी राजा के लिये यह भी कोई कठिन
कार्य है ? अापके दून देश देशान्तरों में धूम-फिर रहे हैं।
उनके लिये पांडवों का पता लगाना फठिन न होगा।
दुर्योधन-इस कल्पना की नीव चाहे खोखली है मामा, तो
भी इसी पर अवलंबित होकर श्रागे का कार्यक्रम निर्धा-
रित होना चाहिये । और पारा भी तो नहीं 1 ( कर्ण से)
एक यात में और कहने को श्राया था अंगराज।
कर्ण-क्या?
दुर्योधन-वह यह कि श्राप दिग्विजय की यात्रा करें । आपके
दिग्विजयी होने से हमारा पक्ष प्रति प्रथल हो जायगा।
फर्ण-मैलो जाने को उद्यत हूँ और चिरकाल से मेरी इच्छा भी यही
रही है, परन्तु श्राप लोगों की रक्षा का भार--(रुक जाता है)
दुर्योधन-मैं तुम्हारा अभिप्राय समझ गया फर्ण । इसमें कोई
संदेह नहीं कि तुम हमारे रक्षक हो, पर इस समय रक्षा
का भार किसी को सौंपने की आवश्यकता नहीं। पांडवों
प्रभाव में और किसकी शक्ति है कि हमसे टकरते ?

पास जो और प्राचार्य पदियों थे. पपासी होने
कारमा जरा शिथित रहते हैं परन्तु रिमी बाहरी शह
का मुकारला ये पूरे पल से करेंगे।
शनि--दिग्विजय में आपको जरा भी कष्ट न होगा । अधिकार
नरेश तो आपका नाम ही सुनकर सन डाल देंगे।
कर्गा-~यदि आप लोगों की यही आशा है तो मुझे स्वीकृत है।'
दुर्योधन इसके लिये शोध नैयारी करनी पड़ेगी।
[तर चलें?
शनि-हो, चलो।
(तोनों जाते है।)
दूसरा दृश्य
4
(स्थान-काम्यक वन । युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव
और द्रौपदी बैठे हैं।)
अर्जुन-सुना है कि फर्ण दिग्विजय की यात्रा कर रहा है।
युधिष्ठिर-सुना तो यही है । पांचाल देश से श्राये हुए कुछ
मनुष्यों के द्वारा यह पता लगा है कि उसने पहले
महाराज दुपद पर चढ़ाई की थी
द्रौपदी-उर
1-~~उस दुष्ट ने पिता जीपर चढ़ाई की ?. श्राप लोगों की
अनुपस्थिति में पिता जी की क्या दशा हुई होगी?
युधिष्ठिर-~महाराज ने कर्ण की अधीनता मान कर उसे कर देना
स्वीकार कर लिया है।

( १०७ )
द्रौपदी-यह घोर अनर्थ हुआ है।
भीम-भाई साहिब, हमारे इन कष्टों के कारण श्राप हैं । यदि
आप दुर्योधन और कर्ण श्रादियों को गन्धर्वराज चित्रसेन
से न छुड़वाते तो वे इस समय यमपुरी की सैर करते होते।
( अपने आप, ऊँचे स्वर से) आये थे राज्य का आडंबर
दिखा कर हमें जलाने ! वचों को मुँह की खानी पड़ी।
युधिष्टिर-उस समय परिस्थिति ही कुछ और थी भीम । घर में चाहे
फोई लड़ें झगड़ें, पर बाहरी शत्रु का मुकाबला सब
को मिल कर करना चाहिए-यह नीति है। इसी का हम
ने अनुसरण किया था।
भीम-महाराज के हृदय में नीति. दया और धर्म के भावों ने
मानो डेरा डाला हुआ है। अत्याचारी के अत्याचारों
को क्षमा कर देना इन की दया है, और यही इन का
धर्म है।
५
अर्जुन-दादा, महाराज के विषय में ऐसे वाक्य न कहने चाहिएँ।
द्रौपदी-अर्जुन, क्या अब ही भूल गये उन आततायियों के
अत्याचारों को ? देख रहे हो इन खुले केशों को ? जब तक
ये खुले हैं तब तक तुम्हें में इन्हें न भूलने दूंगी।
युधिष्टिर-कृष्णे, हम लोगों को सब कुछ स्मरण है, उन अत्या-
चारों का बदला लेने के लिए केवल अनुकूल अवसर
की प्रतीक्षा है।
अर्जुन-जिकर हो रहा था कर्ण की दिग्विजययात्रा का, कुछ
और पता भी लगा है। .
-

(१०)
मामा की धार प्रामा पाइयों पं. पक्षपाती होने
ER राशिक्षित रहने है परन्तु किमी पाइरी राय
का मुकारला ये पूरे पल से भरेंगे।
शनि-विधिजय में प्रापको जरा भी फट न होगा । अधिकांश
नरेश तो आपका नाम ही सुनकर शानदाल देंगे।
कर्ण-यदि आप लोगों को यही पाता है तो मुझे स्थान है।
दुर्योधन-इम लिये शीर तैयारी करनी पड़ेगी।
-तय चलें।
सयुनि-हो, चलो।
(सोनों जाते है।)
दूसरा दृश्य
(स्थानकाम्यक पन । युधिष्टिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव
और द्रौपदी बैठे हैं।"
अर्जुन-सुना है कि फर्ण दिग्विजय की यात्रा कर रहा है।
युधिष्ठिर-सुना तो यही है। पांचाल देश से आये हुए कुछ
मनुष्यों के द्वारा यह पता लगा है कि उसने पहले
मदाराम द्रुपद पर चढ़ाई की थी।
द्रौपदी ----उस दुष्ट ने पिता जीपर चढ़ाई की ? आप लोगों की
अनुपस्थिति में पिता जी की क्या दशा हुई होगी ?
युधिष्ठिर-महाराज ने कर्ण की अधीनता मान कर उसे कर देना
स्वीकार कर लिया है।
HervatinA

( १०७ )
द्रौपदी-यह घोर अनर्थ हुआ है।
भीम-भाई साहिय, हमारे इन कष्टों के कारण श्राप हैं। यदि
आप दुर्योधन और कर्ण श्रादियों को गन्धर्वराज चित्रसेन
से न छुड़वाते तो वे इस समय यमपुरी की सैर करते होते ।
(अपने आप, ऊँचे स्वर से) पाये थे राज्य का प्राडंवर
दिखा कर हमें जलाने ! वचों को मुँह की खानी पड़ी।
युधिष्टिर--उस समय परिस्थिति ही कुछ और थी भीम । घर में चाहे
कोई लड़ें भगड़ें, पर बाहरी शत्रु का मुकाबला सब
को मिल कर करना चाहिए-यह नीति है । इसी का हम
ने अनुसरण किया था।
भीम-महाराज के हृदय में नीति. दया और धर्म के भावों ने
मानो डेरा डाला हुआ है। अत्याचारी के अत्याचारों
को क्षमा कर देना इन की दया है, और यही इन का
-
अर्जुन-दादा, महाराज के विषय में ऐसे वाक्य न कहने चाहिएँ।
द्रौपदी-थर्जुन, क्या श्रव ही भूल गये उन अाततायियों के
अत्याचारों को ? देख रहे हो इन खुले केशों को ? जब तक
ये खुले हैं तब तक तुम्हें में इन्हें न भूलने दूंगी।
युधिष्ठिर-कृष्णे, हम लोगों को सब कुछ स्मरण है, उन अत्या-
चारों का बदला लेने के लिए पवल अनुकूल अवसर
की प्रतीक्षा है।
अर्जुन-तिकर हो रहा था कर्ण की दिग्विजययात्रा का, कुछ
भी लगा है ?

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( १०६ )
उसमें अस्त्र-शस्त्रोंको अग्नि में कौरवों की प्राहु-
तियां डाल डाल कर अन्त में दुर्योधन की पूर्णाहुति देंगे।
युधिष्ठिर---अज्ञातवास के सम्बन्ध में भी इसी समय निश्चय कर
लेना चाहिये कि वह समय कहां बिताया जाय । तुम
लोग सब देशों और उन के राजाओं को जानते हो।
उनमें से तुम्हें कौन देश पसन्द है ?
अर्जुन-महाराज, मेरे विचार में तो विराट नगर में ही रहना
उत्तम होगा। वहां के राजा बड़े धर्मात्मा और न्यायप्रिय
हैं। उन्हीं की सेवा में हमारा एक वर्ष बड़े आनन्द से
कट सकेगा।
भीम-मैं इसके सहमत हूँ।
नकुल, सहदेव-हमारी भी यही राय है।
युधिष्ठिर-तो निश्चय हुआ ?
सब-हां, पका निश्चय हुआ।
युधिष्टिर-अब इस स्थान को छोड़ देना चाहिए। यदि कौरवों को
हमारा पता लग गया तो वे दुष्ट हमें तंग करेंगे।
भीम-ठीक है । इस लिए अभी चलना उचित है।
(सब चलते है।)
।

तीसरा दृश्य (स्थान-दुॉपन की रामा। दुर्योधन सिंहासन पर है। उसके पास पास भीष्म, द्रोण, विदुर, कर्ण और दूसरे गरेश और सभासद । एक सभासद-पान हम लोग सब सभासदों की ओर से महाराज दुर्योधन को राजसूय यज्ञ की सफलता पर बधाई दने हैं । महाराज, आप का यज्ञ युधिष्ठिर फे या से कही यढ़ चढ़ कर हुआ है। दूमरा सभासद-महाराज, यह वह यज्ञ है जिसे सम्पादन कर ययाति, नदुप, मान्धाता और भरत समान नरेश आज भी स्वर्गसुख भोग रहे हैं। परन्तु उनमें से एक भी इसे उस सनिपूर्णता से नहीं कर सका जिससे श्रापने किया है। शनि--जिस महाराज दुर्योधन की राजसभा को कर्ण से महारथी, भीष्म जैसे वीराप्रणी, आचार्यसे शास्त्रशत्रवेत्ता प्रामया । और विदुर जी जैसे राजनीतिज्ञ सुशोभित करते हों, उसके यज्ञ की संपूर्ति में किसी को कुछ सन्देह हो सकता है ? कर्या-राजन, हम सब को बड़ी प्रसन्नता हुई है कि आप का यज्ञ निर्विघ्न समान हुआ है । महासमर में विजय पाकर जय श्राप फिर ऐसा यज्ञ करेंगे तव हम आपका और भी अधिक अभिनन्दन और सत्कार करेंगे।' . दुर्योधन-अंगराज, श्राप लोगों की सहायता हुई तो मुझे उसमें भी पूर्ण सफलता प्राप्त होगी। । --- Re-

( १११ )
कर्ण-महाराज, अाज में फिर वह प्रतिज्ञा दोहराता हूँ कि जब तक
मैं अर्जुन का संहार न कर लूंगा तब तक दूसरे से अपने
पैर नहीं धुलवाऊंगा और किसी याचक को विमुख न
लौटाऊंगा, उसे शरीर तक देने में संकोच न करूंगा।
सब सभासद--अंगराज कर्ण की जय !
विदुर-हररोज़ प्रतिज्ञा ही करते रहियेगा।
भीष्म-जो वादल गरजते हैं वे बरसते नहीं।
कर्ण-पितामह, मैं देर से देख रहा हूँ कि बात बात पर श्राप
लोग मेरी निन्दा करते रहते हैं । मालूम होता है मेरी
उन्नति आप को पसन्द नहीं ।
भीष्म-कर्ण, तुम लोगों की चाटूक्तियों ने दुर्योधन को श्रासमान पर
चढ़ा रक्खा है। इसका परिणाम यह होगा कि वह जितना
ऊंचा चढ़ा है उतना ही नीचतम गर्त में गिरेगा, क्योंकि तुम
लोगों से बनाया हुआ यह प्रासाद तुम्हारी ही चाटूक्तियों
की निस्सार नींव पर खड़ा है।
शकुनि--दादा, हम लोग तो उसे कीर्ति और यश का मार्ग दिखा
रहे हैं।
भीष्म--नहीं, अन्ध-कूप में गिरा रहे हो। शकुनि, मामा होकर भी
तुम उस से न मालूम किस वैर का बदला ले रहे हो।
उसको प्रवृत्ति सदा कुमार्ग की ओर ही बढ़ा रहे हो।
कर्य -दादा, यह सोचना आपकी भूल है।
भीष्म-मेरी भूल है कर्ण ! कान रखते भी तुम लोग बहरे हो।
श्रांखें रहते भी तुम लोग श्रन्धे हो। पर मेरे कान भी हैं और
आंखें भी । मैं सब कुछ सुन रहा हूँ, देख रहा हूँ। शुरू से ही

( १२१ )
परीक्षा का कोई ऐमा यिस्ट समय आया तो उसमेंस उचार्य
हो कर उन लोगों को यता दूंगा कि कर्ण का दान-प्रण
यस्तुनः सया है।
(दौगारिक का प्रया)
दौवारिक-महाराज, द्वार पर सड़ा एफ मनुष्य प्रवेश पाहता है।
फर्ण- यह कौन है?
दोवारिक -- महाराज, येषभूषा से तो बामगा मालूम होता है ।
कर्ण-उन्हें भीतर ले श्रायो।
(दौवारिक प्राण को ले भाता)
फर्ण-( उठकर ) मानगा देवता, प्रणाम ।
पाहाण-चिरायु हो, अंगराज ।
कर्ण---देवता, फहिये किस लिए आगमन हुआ है ? यह समय
दान का नहीं है-मेरे दान का समय है-सूर्योदय,
जब मैं सूर्य देव को अर्घ्य देता हूँ । तो भी आप मेरे द्वार पर
कुछ श्राशा लिए पाए हैं, अनः निराश न लौटेंगे।
प्राह्मण-श्रृंगराज, मैं कुछ लेने को नहीं आया हूँ-देने को
आया हूँ।
फर्ण-कर्य के पास प्राह्मणों के दिये आशीर्वाद और ईश्वर से दी
हुई और बाहुबल से सञ्चित धनराशि की कोई कमी नहीं ।
श्राप और क्या देने आये हैं देवता ?
प्राह्मण-चेतावनी ।
कर्ण-चेतानी ! चेतावनी केसी ?
ब्राह्मण-सर्वनाश से बचने की
कर्ण-तुम भूलते हो ब्राह्मण

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( ११६ )
का रूप धार कर तुम से फुण्डल और कवच का दान लेने
का उस से वचन दिया है।
कर्ण - तो क्या इन्द्र ब्राह्मणवेश में आकर मुझ से कुएइल और
कवच मांगेगा?
ब्राह्मण-हाँ।
कर्ण-ग्राह्मण देवता, वह दान मुझे देना ही पड़ेगा । कर्ण
का प्रण है कि उस के द्वार से कोई भिक्षुक खाली हाथ
न आयेगा । यही तो मेरी परीक्षा समय है। विप्रवर, यही
समय है भीष्म, द्रोण और विदुर को बताने का कि मेरा
प्रण ढोंग नहीं है।
ब्राह्मण--फिर तुम अर्जुन को कैसे मारोगे?
कर्ण -इन दो भुजाओं और उन में पकड़े हुए धनुष से ।
ब्राह्मण-भूल रहे हो कर्ण।
कर्ण -यह चाहे भूल हो-पर इस भूल से ही अक्षय कीर्ति के
मार्ग को जाऊंगा ( कीर्तिर्यस्य स जीवति)
ब्राह्मण-तुम मेरी बात नहीं मानोंगे ?
कर्ण-कभी नहीं।
ब्राह्मण-यदि तुम्हारी यही धारणा है, तो एक और यात मानो ।
कर्ण-वह क्या ?
ब्राह्मण-कुण्डल और कवच लेने के पश्चात् इन्द्र तुम से अवश्य
प्रसन्न होंगे। ये वर मांगने को कहेंगे-उस समय तुम
उन की एक पुरुष-घातिनी शक्ति मांग लेना और उसको
अर्जुन के वध में काम लाना।
कर्ण-यह मुझे स्वीकार है। पर ग्राह्मण देवता, श्राप हैं कौन--मुझे
.

। आप से यह पूछना तो भूल ही गया। जिस संसार में मेरा कोई नहीं उस में मेरे सच्चे हितकर तुम कौन हो ? माह्मण-यह यताने की बावश्यकता नहीं। (सहसा अन्तर्शन होजाता है) (पभारती का प्रदेश) पद्मावती-नाथ, यह कौन था ? कर्ण-तुमने उसकी यातें सुनी हैं ? पद्मावती-कुछ मुनी हैं और कुछ नहीं । कर्ण-सुनी कौन कौन सी है ? पद्मावती-यह सुना है कि वह कह रहा था कि आप पर एक विपत्ति पा रही है। फर्ण-विपत्तियां तो आने के लिए ही होती हैं, पर जो उनका मुकाबला दृढ़ता और धैर्य से करता है उसके लिए ये विपत्तियां नहीं रहती। पद्मावती- तो क्या आप ब्राह्मण-वेषधारी इन्द्र को कवच और कुण्डल दे देंगे? कर्ण-तो क्या तुम ने इन्द्र का नाम भी सुन लिया है ? पद्मावती-इस समय तो अच्छी तरह नहीं सुना, परन्तु इसका मुझे पहले ही ज्ञान था। कर्ण-सो कैसे ? पद्मावती-एक दो दिन की यात है- मैं सोई पड़ी थी। समय लग- भग आधी रात होगा । सहसा मेरे कमरे में प्रकाश हुआ और एक दिव्यरूप पुरुष मुझे सम्बोधन कर कहने लगा- भद्रे ! मैं तुझे एक चेतावनी देने आया हूँ । मैंने हाथ जोड़ कर पूछा-चेतावनी केसी देवता ? उसने कहा- अर्जुनसमा इन्द्र तुम्हारे पनि से जन्म-गात मुरडल और कयच फा दान मांगेंगा। यदि वे उन्हें दे देंगे तब ही उनकी मृत्यु अर्जुन फे दायों से हो सकेगी-अन्यथा व अगेय है। फर्ण-तुमने उनका नाम पदा? पद्मावनी-मैं नाम पूछनी ही रह गई कि वे अन्नान हो गये। इनने में देव मन्दिर की शंख ध्वनि से मेरी आँख खुल गई फर्ग-मेरे साथ भी यही घटना हुई है। मैं उस ब्राह्मण का नाम पूछना रह गया कि वह अन्तान होगया। प्रिये! तुम नै नाज से पहले तो इस घटना का ज़िकर किसीसे नहीं किया ? पद्मावती-कई यार थान कहने को जिह्वा पर आई, पर और कामों में लग जाने से उसे कह न पाई । दूसरे, स्वप्न की बात पर मुझे विश्वास भी नहीं था, अतः उधर बहुत ध्यान नहीं दिया। फर्ण- -सत्य कहती हो प्रिये ! आखिर स्वप्न की बात थी, उस पर विश्वास क्यों कर हो सके ! पद्मावती--परन्तु अब तो स्वप्न की बात नहीं रही, प्राणेश्वर ! श्राज की घटना का उस स्वप्न की घटना से जब मिलान करती हूँ तो भय के मारे मेरा शरीर थर्राने' लगता है । प्राणवल्लभ, वास्तविक भिनुक के निराश लौटने से प्रतिज्ञाभङ्ग का दोष हो सकता है किन्तु कपटी और धोखेबाज़ याचक की इच्छा को पर्या -

( ११६ )
पाप है। इसलिए जब आपके पास वह ब्राह्मण आये तो उसे
खरी-खरी सुना देना । अपना सा मुँह लेकर लौट जायगा।
कर्ण-तुम कैसी विचित्र बातें करती हो प्रिये ! तुम कर्ण की
पत्री हो, क्या तुम्हें ऐसे वचन शोभा देते हैं ? मेरा यह
पुण है कि जो हाथ मेरे सामने पसारा जाय वह कभी
खाली न जाय, वह हाय चाहे इन्द्र का हो, चाहे किसी
मिचुक का हो।
पद्मावती -नाथ ! आपके वचन तो ठीक हैं, पर मेरा मन उन्हें
नहीं मानता।
कर्ण-सत्याग्रह से मनाओ, मान जायगा।
( सत्यसेन का प्रवेश)
सत्यसेन -माता जी, मृगया के लिए जा रहा हूँ । मेरा धनुप और
तूणीर कहाँ हैं ?
पद्मावती-चलो बेटा, देती हूँ। (पुत्र को साथ लेकर जाती है)
कर्ण-विचित्र समस्या है। इन्द्र को नहीं नहीं, ब्राह्मण को-
यदि लौटा देता हूँ तो प्रण-भङ्ग होता है और यदि कुण्डल
और कवच दे देता हूँ तो अपने पैरों पर आप ही
कुठारप्रहार करता हूँ। मेरे लिए, मेरे क्या, सब शूर पुरुषों के
लिए ऐसी समस्या को हल करने का एक ही उपाय है.
पाण जायँ पर वचन न.जाई।

।
पुरद्वान और कपन विधमान है सपनाम पर किसी
सम्धका अमर नदी ही गाना। पर घंटी, गुम उन्हें
पर क्यों नही देनी किन्द्रको मानने से इनकार .
गार में?
पानीपन का गुफी, पर ये नहीं माने । फरत में कदापि
भयभंगन महंगा, इससे चाहे मेराशगेर ही गला भाय ।
गांधारी-तो इममें मैं क्या कर सकती है?
पचायती t--माता भी, आप उन्हें समझा मरती है। ये आपकी
यात कमी न रमलेंगे।
गांधारी-पेटी, उससे यदुन समीप तुम हो या मैं ? तुम पनी हो
और मैं बस्तुनः कुछ नहीं ! फिर, का महाठी है। जिस
पान पर सह अड़ यैठना है उसे कभी नहीं छोड़ना । तुम
जाननी हो इन सब मामलों का मूल है राम्य । तुम कर्ण
को क्यों नही समझाती फि दुर्योधन को समझा बुझा
फर पांडवों को गुजारे के लिये--कंवा गुशारे के लिये
ही राज्य का युद्ध भाग दिलवाई? फिर सब ममेले स्वयं
मिट जायेंगे।
पद्मावती --माता जी, कई बार प्रार्थना की, हाय जोड़े, पांव पड़ी
और स्त्रियों के अमोघ अस्त्र-अभुधारां को भी काम
में लाई, पर वे टस से मस नहीं होते। उनके दिमाग में
दो प्रणा ही समा रहे है-देही दो प्रया -अर्जुन के क्य
का प्रण और दान का प्रया।
गांधारी-तब तो विधाता का ही पाश्रय है।

( १२३ )
पद्मावनी-श्राप महाराज दुर्योधन के द्वारा उन्हें सुमार्ग पर क्यों
नहीं लाती?
गांधारी-दुर्योधन स्वयं उसी दलदल में फंसा हुआ है । वास्तव में
कर्ण और दुर्योधन एक ही शरीर के दो अंग हैं । उनके
स्वभाव, हृदय, वचन और कर्म सब एक हैं। मैं तो उस
दिन को कोसती रहती हूँ बेटी, जिस दिन फर्ण की
दुर्योधन से घनिष्ठता हुई थी। अब तो सिवा ईश्वर के
और कोई सहारा नहीं।
पद्मावती-मुझे भी यही भान हो रहा है। अब मुझे जाने की
आज्ञा दीजिये।
गांधारी हां, जाओ। तुम्हारा सौभाग्य अटल रहे बेटी।
पद्मावती-सती का यह आशीर्वाद ही मेरे बुझते हुए जीवनप्रदीप
में स्नेहप्रदान करता रहेगा। ( जाती है)
पटाक्षेप
छठा दृश्य
(स्थान-नदी का तट, कर्ण सूर्याभिमुख होकर बैठा है। पास
कुछ दूरी पर कोशाध्यक्ष वैठा है।)
फर्ण-मेरे जीवन का क्षण क्षण वाद-विवाद और लड़ाई-मगड़े
आदि में व्यतीन हो रहा है । ईप्या, विषाद,
प, मत्सर श्रादि चारों ओर से मुझे घेरे रहते हैं।
ही थोड़ा समय है जिस में मुझे परमानन्द

( १२४ )
मिलता है । ये मेरे जीवन के उत्कृष्टतम भाग हैं। भिनुक को
भिक्षा देकर मेरा मन बल्लियों उछलता है। जिस
दिन किसी भिक्षुक को कुछ देने का अवसर नहीं मिलता,
वह सारा दिन उदामीनता और अनुत्साहता में कटता है।
(एक भिक्षुक आता है।)
भिनुक-दानवीर कर्ण की जय ।
कर्ण-आइये महाराज, श्रापने बड़ी कृपा की। कहिये क्या
आज्ञा है ?
भिक्षुक-अंगराज, में एक अकिश्चिन ब्राह्मण हूँ। घर में एक वृद्धा
माता, गृहिणी और पोडशी कन्या के सिवा और कोई
नहीं । कन्या विवाहयोग्य होगई है, पर पास एक कौड़ी
भी नहीं कि उसका विवाह कर सकू।
कर्ण-( कोशाध्यक्ष से ) कोशाध्यक्ष जी, यह ब्राह्मण देवता जो
कुछ मांगे दे दीजिये।
कोशाध्यक्ष-(प्रााण से) चलिये महाराज ! (प्राक्षण को साथ
केकर जाता है।)
कर्ण -आज का दिन साली तो न गया।
(कुछ यात्रियों का प्रवेश)
सब यात्री-दानवीर कर्ण की जय
कर्ण-आइये महाराज! आप लोग कहां से श्रा रहे हैं १ .
एक यानी-महाराम हम लोग पांचाल देश से बारहे हैं। हमारी
इच्छा भारतभर के तीर्थस्थानों की यात्रा की है। किन्तु

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.
( १२६ )
द्वार से निराश होकर न कोई लौटा है और न ागे को
लौटेगा। ऐसे समय जब मैं सूर्याभिमुख होकर दान देने
को बैठता हूँ नो उस समय यदि कोई मेरा शरीर. भी मांगे
तो उसे भी देने में संकोच नहीं करता) -
प्राह्मण-धन्य हो अंगराज ! शिवि, दधीचि और हरिश्चन्द्र समान
आप-जैसे प्रया-पालक नरेश भारत में इने गिने. ही
हैं।
कर्ण-उन महापुरुषों के साथ मेरी तुलना कहां ! कहां उत्तमांग का
भूषण मुकुट और कहां पाँव का जूता! ।
महाराज, श्राप श्राज्ञा क्यों नहीं, करते ? उसके पालन'
करने को मैं अत्यन्त उत्सुक हूं।
ग्राह्मण-महाराज, यदि श्राप दान देना ही चाहते हैं, तो अपने
फुण्डल और कवच दीजिये।
कर्ण-(कुछ चित्रित होकर ) ब्राह्मण देवता, कुण्डल' और कवच
मांग कर आपने मुझे विषम समस्या में डाल दिया है।
संसार की और सब वस्तुएँ मैं देने को उद्यत हूँ, पर फुण्डल
.
और कवच--
.
प्राह्मण न दीजिए यदि श्राप देना नहीं चाहते।
फर्या--
--चया आप रुष्ट हो गये हैं ? मुझे श्राप का रोप अभीष्ट
नहीं। किसी प्राह्मण को रोषित कर निराश लौटाने से सात
पीड़ियां नरक-गामिनी होती हैं, परन्तु यदि वह ब्राह्मण स्वयं
देवराज इन्द्र हो तब तो अधोगति का कोई ठिकाना नहीं।'
ब्राह्मणा-क्या मुझे पहचान लिया,,अंगराज ? शायद श्रापको
भगवान सूर्य ने सचेत कर दिया।
.

( १२७ )
फण-वे भगवान सूर्य थे जिन्होंने ग्राह्मणवेष में मुझे साक्षात्
और मेरी स्त्री को स्वप्न में दर्शन दिये थे ?
ब्राह्मण-अवश्य ।
कर्ण-सुरेश, मैं कुण्डल और कवच तो उतार देता हूँ, पर उनके
काटने से मैं कुरूप हो जाऊँगा, साथ ही शरीर में घाव
'हो जायेंगे।
इन्द्र-मैं तुझे वर देता हूँ कि इनके काटने से न तुम कुरूप होओगे
और न तुम्हारे शरीर पर घाव होंगे।
फर्ण-आपकी महती कृपा । ( कुंडल और कवच काट कर देता है ।
इन्द्र उन्हें लेकर चलने को उपत होता है।) देवराज, मैंने
तो आप को कुण्डल और कवच दे दिये, पर आप भी
र मुझे एक वस्तु प्रदान करेंगे ?
इन्द्र-मांगो क्या मांगते हो?
फर्ण-मुझे अपनी अमोघशक्ति दीजिये।
इन्द्र-कर्ण, तुमने शक्ति मांगकर मुझे बड़े संकट में डाल दिया है।
फर्ण-उतने अधिक संकट में नहीं जितने में फुण्डल और कवच
मांगकर आपने मुझे डाला था।
इन्द्र-कर्ण, मैंने समझ लिया है कि जिस की रक्षा के लिए मैंने
कुण्डल और कवच लिये हैं उसी के. वध के लिए तुम
यह शक्ति मांग रहे हो। पर तुम्हें यह स्मरण रहे कि
अर्जुन के रक्षक स्वयं भगवान कृष्ण हैं। जिस फे
रक्षक कृष्ण हों उसे मारने वाला संसार में न कोई हुआ
है और न होगा।
कर्ण-भगवान् अर्जुन की रक्षा किया करें
-

भय नहीं । सचा शूर यही होता है देवराज, जो अत्यन्त
विषम परिस्थितियों में भी हतोत्साह नहीं होता।
इन्द्र-कर्ण, मैं तुम्हारी युद्ध-वीरता और दानवीरता से अत्यन्त
प्रसन्न होकर अपनी अमोघशक्ति प्रदान करता है । पर
एक पात है। यद्यपि यह शक्ति मेरे हाथ से छूटने पर
सैकड़ों शत्रुओं को मार कर मेरे हाथ में श्रा जाती है
तथापि तुम्हारे हाथ से छूटी हुई यह केवल एक ही शत्रु के
मारफर मेरे पास लौट आयेगी।
फर्ण-मुझे. यह स्वीकार है । संसार में मेरा फेवल एक ही
शनु है.। (इन्द्र शक्ति देकर अन्तद्धान रो जाता है।)
फर्ण-(अपने आप) कुएडलों से मेरे मुख की शोभा थी, फवच
से शरीर की शोभा थी । उनसे मेरा शरीर
अभेद्य था । ये दोनों चले गये । अब उनका क्या शोक !
जो चले गये उनका ध्या शोक ! वे तो गये, पर उनके
स्थान में जो वस्तु मैंने पाई है, उसकी मुझे आवश्यकता
थो-अत्यन्त आवश्यकता थी। कुण्डलों और कवच से मेरे
शरीर की रक्षा तो हो सकती, पर मेरे पास अर्जुन
को मारने का कोई साधन न था । अर्जुनके वध का साधन
यह शक्ति मुझे अब मिली है । कुण्डल-कवच के आने
की मुझे कोई चिन्ता नहीं, पर अर्जुनवध के लिए
क्षमता प्राप्त करने का मुझे असीम हर्ष हुआ है। (चिन्तित
होकर ) पर......देवराज कहते थे- अर्जुन के रक्षक स्वयं
भगवान् कृष्ण हैं । (भावेश से ) कृष्ण हैं तो हुआ करें---
समय पर देखा जायगा। (जाता है।)

( १२६ )
सातवां दृश्य
(स्थान-धृतराष्ट्र की सभा । धृतराष्ट्र और उसके आसपास
भीष्म, द्रोण, विदुर, दुर्योधन, कर्ण, शकुनि आदि
और कुछ और सभासद बैठे हैं।)
विदुर-महाराज, पांडवकुमारों ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार
बारह यरसों के वनवास और एक वरस के अज्ञातवाम की
अवधि पूरी करदी है । अब वे श्राने वाले होंगे। उन्हें कोई न
कोई ठिकाना देने का विचार अव ही कर लेना चाहिए ।
कर्ण-वे जल्दी ठिकाने लगाये जायेंगे मन्त्री जी, आप ज़रा
चिन्ता न करें।
भीष्म-कर्ण, बढ़ चढ़ कर ऐसी बातें करना अच्छा नहीं । तुम
लोग उन्हें ठिकाने लगाओगे या ये तुम्हें लगायेंगे यह
तो समय श्राने पर मालूम होगा। यह समय संयमपूर्वक
विचार कर विदुर जी की समस्या को हल करने का है,
ऐसी वाचालता का नहीं।
प्रोग-युद्धक्षेत्र से भागने और वाचालता में अंगराज कर्ण की
समता कोई नहीं कर सकता।
शकुनि-प्राचार्य, यशस्वी कर्ण को ऐसे असत्य वचन कह कर
क्यों उत्तेजना देते हैं ?
द्रोण--शकुनि, वह घटना इतनी जल्दी भूल गये जब तुम्हारे
यशस्वी कर्ण विरादेश में अर्जुन के तीक्ष्ण तीरों से
घायल होकर युद्धभूमि छोड़ भाग गये थे?
दुर्योधन---युद्धानल में शरीर की निष्फल आहुति देना घुद्धिमानों
भा

. का काम नहीं। समय देखकर कार्य सम्पादन करना हो नौनिहता है। विदुर-मैंने जो समस्या बारक सामने रखी थी, उस पर अभी तक विचार नहीं हुआ। दुर्योधन- उस पर विचार करने की आवश्यकता ही नहीं । पांडव अज्ञातवास के समय की अवधि समाप्त होने से पूर्व ही प्रकट हो गये हैं, इसलिए उन्हें प्रण के अनुसार पुनः पूर्ववत वनवास और अज्ञातवास करना पड़ेगा। भीष्म-दुर्योधन, तुम भूल रहे हो । पांडवों के अज्ञातवास ‘का समय उनके प्रकट होने से बहुत पहले समात हो चुका था। काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन, पक्ष, मास, प्रह, नक्षत्र, ऋतु और वर्ष-ये सब कालचक (वर्ष) के छोटे और बड़े अंश हैं। इनके अनुसार समय के पढ़ने घटने और नक्षत्र- मण्डलकी गति के कुछ व्यतिक्रम से हर पांचवें वर्ष दो मास अधिमास ( मलमास ) के बढ़ते हैं। उन्हीं मलमासों को जोड़कर श्रान तेरह वर्ष पूरे होकर पांच मास और छ: दिन अधिक हो गये हैं । अतः पांडवों की प्रतिज्ञा पूरी होने में कोई सन्देह नहीं। (दौवारिक का प्रवेश) दीवारिक-महाराज, वासुदेव श्रीकृष्ण श्रारहे हैं। धृतराष्ट्र-(विरमय से ) यशोदानन्दन पा रहे हैं भीम-शव पा रहे हैं ? द्रोण-गोपाल कृष्ण श्रारहे हैं?

( १३१ )
विदुर-हम लोगों के सौभाग्य जो पर बैठे ही वासुदेव के
दर्शन होंगे!
फर्ण-(दुर्योधन के कान में ) पांडवों का दूत बन कर आया होगा।
दुर्योधन-(कर्ण के कान में ) इसका और काम ही क्या है !
(कृष्ण जी का प्रवेश, सब सभासद खड़े हो जाते हैं और
प्रणाम करते है।)
धृतराष्ट्र यादवेश, आप के चरणपात से हमारा भवन
पवित्र हो गया है । कहिये श्राप और आपके बन्धु
और मेरे भतीजे पांडव सकुशल है न ?
श्रीकृष्ण-श्राप की कृपा से हम सब लोग सकुशल हैं। गांगेय
भीष्म, श्राचार्य द्रोण, महामना विदुर जी, आप लोग तो
अच्छे हैं
भीष्म-गोपाल, जिनके सिर पर श्रापका करुणाहस्त हो ये
अच्छे क्यों न होंगे!
श्रीकृष्ण-महाराज धृतराष्ट्र, मुझे एक आवश्यफ कार्य के लिये
आपके पास आना पड़ा है। आप के भतीजे पांडुकुमार
वनवास और अज्ञातवास की अवधि समाप्त कर विराट
राजा के यहां ठहरे हुए हैं । वहां वे आपके न्याय की
प्रतीक्षा कर रहे हैं।
कर्ण-न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं, या युद्ध के सामान और सेना
जुटा रहे हैं?
श्रीकृष्ण-दोनों काम कर रहे हैं । न्याय न होगा तो युद्ध अनिवार्य
है। न्याय की दृष्टि से तो ये समूचे राज्य के अधि-
कारी हैं, परन्तु रार मिटाने फे हेतु वे राज्य का वही

भाग मांगते हैं जिससे उन्हें कपट-यून में हरा कर
यशित किया गया था।
शकुनि-कपट-इन फैमा ! महाराज को पांमा खेलने को लन
थी, इसलिए हम से साधारण सा निमन्त्रण पाते ही वे
यहां आ धमके। न पांसों पर किसी का अधिकार है
और न भाग्य पर, ये दोनों उन विपरीन थे। हमारा
क्या दोष!
श्रीकृष्ण-मैं गुज़री हुई बातों के मामले में नहीं पड़ना चाहता
राजन् ! कौरवों और.पांडवों को चाहिये कि गुजरी बातों
को भूल कर श्रम से शुद्ध हृदय से भाई भाई का सा
आचरगा करें।
कर्ण
-कृष्ण जी, आप तो कहते थे कि अयेला अर्जुन ही समस्त
कौरवदल के संहार की क्षमता रखता है, फिर हम लोगों
की शरण की क्या थावश्यकता?
श्रीकृष्ण--यह सब फुछ मैं तुम लोगों के हो हित के लिये कर रहा
हूँ कर्ण ! दुर्योधन, तुम क्यों चुप बैठे हो ? तुम्हारे ही
'हो' या 'नहीं' पर असंख्य जीवों के जीवन अवलम्बित
हैं। तुम चाहो तो असंख्य नारियों को वैधव्य से और
लाखों वचों को अनाथ हो जाने से बचा सकते हो।
दुर्योधन-यदि न चाहूँ तो?
श्रीकृष्ण-यदि न चाहो तो ऐसा कराल युद्ध होगा, जिसमें प्रवाहित
रुधिर-सरिता की बाढ़ में सारा कुरुवंश. वह जायगा।
यही समय है निर्णय करने का कि तुम्हारा नाम संसार
RAM

( १३३ )
के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा हो या उसके पन्ने
तुम्हारी कलुषित करतूतों से काले हुए हों।
दुर्योधन-कृष्णा, हमारे ही अतिथि हो कर हमारा ही अपमान
करना क्या उचित है ?
शकुनि-इसे कहते हैं गोद में बैठकर डाढ़ी के बाल नोचना।
श्रीकृष्ण-महाराज, श्राप अपने कुमार्गगामी पुत्र को संयम में
नहीं रख सकते क्या ?
धृतराष्ट्र-वासुदेव, यदि मेरा इस पर कुछ भी अधिकार होता तो
मामला यहां तक पहुँचता ही क्यों ! श्य तक सिमट
न जाता ?
श्रीकृष्ण-राजन् , अब यत्न करो इसे समेटने का।
कर्ण -जब दोनों पक्षों में से एक पक्ष मिट जायगा तो मामला
आप ही श्राप सिमट जायगा।
भीष्म-कुरुवंशरूपी वृक्ष की जड़ों को कर्ण और शकुनिरूपी
मूसे ऐसे फाट रहे हैं कि एक दिन उसे धराशायी करके
ही दम लेंगे।
द्रोण-महाराज, आप एक राजा हैं दूसरे दुर्योधन के पिता हैं।
श्राप साम, दाम, भेद और दण्ड में से किसी भी उपाय से
इसे सुमार्ग पर ला सकते हैं।
धृतराष्ट्र-प्राचार्य, आप दुर्योधन को जानते ही हैं। वह मेरे कहने
में नहीं है । उसकी सुमति या कुमति जो कुछ कहेगी,
वहीं वह करेगा।
शकुनि-सौ की एक कही । जब पिता यूढ़ा हो जाता है तो घर में
बड़े पुत्र की ही चलती है।
विदुर-तब तो सर्वनाश अनिवार्य है।

( १३४ )
धृतराष्ट्र
-भवितव्यता के श्रागे सिर झुकाना ही पड़ता है।
श्रीकृष्णा-क्या खाली हाथ ही मुझे जाना पड़ेगा?
( कर्ण दुपाँधन को संकेत करता है ।)
दुर्योधन न तुम्हें जाने की आवश्यकता है और न तुम्हारे हाथ
ही खाली रहेंगे पेशव।
(पाश लेकर कृष्ण को बांधने को उठता है।)
श्रीकृष्णा- यह बात ! संसार को मुक्त करने वाले मुझे तू क्या
वांधेगा मूर्ख !
(झट से सभागवन से निकल जाते है।)
भीष्म-दुष्ट ने श्रीकृष्ण को सादर विदा करने का भी हमें अवसर
न दिया। दुर्योधन, जिन कुमित्रों के इशारों पर तुम नाच
रहे हो, विपत्ति के समय ये ही तुम्हारा साथ न देंगे।
कर्ण-दादा, मैं देख रहा हूँ कि श्राप मुझ पर सदा से वक्रदृष्टि रखते
रहे हैं। आपके फठोर वचन सुन-सुनकर मैं तंग आ गया हूँ।
भीष्म-कर्ण, सत्य और हितकर वचन सदा कठोर लगा करते हैं।
फर्ण-तो श्राप चाहते हैं कि मैं यहां आना जाना और युद्ध
करना छोड़ दूं!
भीष्म-छोड़ दोगे तो कौन सा अनर्थ हो जायगा !
फर्य-तो आज से मैं अत्र छोड़ देता हूँ। (अपना भनुष हाय से
भूमि पर रखता है।) पितामह, अब आप मुझे न युद्ध में
और न सभा में देखेंगे । अब श्रापकी मृत्यु हो जायगी
तब मैं शस्त्र उठाऊंगा।
भीम-फर्ण शायद यह समझता है कि यदि वह न लड़ेगा तो
हमारा काम ही न चलेगा। इसलिए मैं यह प्रतिज्ञा करता
हूँ कि मैं अकेला ही प्रतिदिन हजारों योद्धाओं का
वध क्रिया करूंग। (पाप)

चौथा अंक
पहला दृश्य
(स्थान-पांडवों का भवन, युधिष्ठिर, उनके भाई और
द्रोपदी बातें कर रहे हैं।)
युधिष्ठिर-जब से गोपाल गये हैं मेरे मन को चैन नहीं। क्या युद्ध...
भीष्म-भाई साहब, युद्ध के भय से व्याकुल हो रहे हैं।
युधिष्टिर-भीम, मैं अपने लिए नहीं व्याकुल हो रहा । व्याकुल
हो रहा हूँ उन असंख्य नारियों के लिए जिन्हें पति-
मृत्यु से वैधव्य-यन्त्रणा भोगनी पड़ेगी, पुत्रमृत्यु से
निरपत्यता का कष्ट उठाना पड़ेगा और घर-गृहस्थी
चलाने वालों के न रहने से असाहाया होकर रोटी के
टुकड़े टुकड़े के लिए पराधीन होना पड़ेगा। मैं व्याकुल
हो रहा हूँ उन अनाय वो-दुधमुंहे वक्षों के लिए
जिनके आर्तनाद से श्राफाश गूंज उठेगा।
द्रौपदी-महाराज, श्राप दूसरों के दुःखों का तो ऐसा भयंकर चित्र
खींच रहे हैं, पर भूल गया है मेरे बालों का पापी दु:शा-
खींचा जाना । अब भी जब बीमत्स...

+v ८ ( १३८ ) अर्जुन-ताजी दोनों हाथों से पिटनी है दादा । एक पक्ष के पूर्गा प्रथन करने पर भी यदि दूसरा पक्ष तना ही रहे तो असफलता के सिवा और परिणाम ही क्या हो सकता है ? भीम- दुर्योधन की ईन्याग्नि में मत्सर और विद्वेग की आहुतियां दं देकर कर्ण और शकुनि उसे प्रचण्ड करते रहते हैं, शान्त होने ही नहीं देते। युधिष्टिर-तो फिर गले पड़ा ढोल यजाना ही पड़ेगा ? (श्रीकृष्ण का प्रवेश, सब उर खड़े होते हैं।) श्रीकृष्ण-हो, बजाना ही पड़ेगा, और ऐसे जोर से बजाना पड़ेगा कि उसकी दिदिगन्तव्यापिनी कराल ध्वनि अनन्त काल तक संसार में गूंजती रहेगी। (माकृष्ण के बैठने पर सब बैठ जाते है।) अर्जुन हमारी नैया के तो श्राप ही पतवार है सखे । श्रीकृष्णा-अर्जुन तो सारा बोझ मुम पर ही डाल कर आप अलग खड़ा रहना चाहता है। अर्जुन- R-अलग खड़ा नहीं रहना चाहता, श्राप के समीपतम होना चाहता हूँ, श्राप के हृदय में स्थान पाना चाहता हूँ। श्रीकृष्ण-वह स्थान तो तुम्हें युगों से मिल चुका है । अब बातों का अवकाश नहीं, युद्ध की तैयारी करनी चाहिये । अर्जुन--ठीक-ठीक पता है कि हमारी और उनकी ओर कितनी- कितनी सेना और कौन-कौन क्षत्रिय होंगे ? श्रीकृष्ण-सब पता है । हमारी ओर सात अक्षौहिणी और कौरवों की ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेनायें . होंगी। इसके सिवाय उनकी ओर भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा, ( १३६ ) कृपाचार्य, कर्ण, शल्य, श्रादि चुने चुने वीर होंगे। और तुम्हारी ओर- अर्जुन-देवाधिदेव स्वयं नारायण । श्रीकृष्ण-मैं तो दुर्योधन से अपनी नारायणी सेना देते समय यह प्रण कर चुका हूँ कि मैं युद्ध में शस्त्र न उठाऊंगा। श्रव मेरे लिये और काम ही क्या रह गया है ! अर्जुन-मैं अपनी देह को आपके सुपुर्द कर दूंगा । उस की रक्षा फा भार आप के ऊपर होगा। श्रीकृष्ण-मैं इस का आशय नहीं समझा। अर्जुन-यासुदेव, जानकर भी मुझे बना रहे हो ? मैं चाहता हूँ कि युद्धक्षेत्र में आप सदा मेरे अंग-संग रहें। श्रीकृष्ण-अब तुम्हारा इशारा समझ गया हूँ। मैं तुम्हारा सारथी बनने को तैयार हूँ युधिष्ठिर-सब तो हमारा बेड़ा पार है । (पटाक्षेप) तीमरा दृश्य (स्थान-नदीतट, समय-प्रातः, कर्ण सूर्याभिमुख होकर ध्यानमग्न बैठा है।) ( कुन्ती का प्रवेश ) कुन्ती-यही है, वहीं है मेरे हृदय का टुकड़ा। कैसी सुन्दर मूर्ति और सूर्यवत् देदीप्यमान मुखद्युति ! (ध्यान से देखकर ) समय ध्यानमग्न है, इसलिए पुद देर तक यहीं होगा। (कुछ सोच कर ) बड़ी कठिनासमस्या है,

.
किस मुख से मैं इस से किये गा दुर्व्यहार का वर्णन कर
सरूंगी। ( उसेक सामने की राह हो जाती है।)
कर्ण-(आँख खुलने पर) देवी, श्राप कौन हैं और यहां क्यों
खड़ी हैं ?
कुन्नी-कर्ण, तुम्हारे सामने तुम्हारी माना खड़ी है।
कर्ण-मेरी माता ! मेरी माता तो गया है।
कुन्ती-घटा, तुम राधेय नहीं, फौन्तेय हो।
-श्राप का नाम युन्ती है क्या ?
कुन्ती-हां, मेरा नाम कुन्ती है और में ही कुन्नी युधिष्ठिर,
उनके भाई अर्जुन और भीमसेन की जननी हूँ।
कर्ण-होंगी, पर मैं कैसे मानूं कि आप मेरी भी माता हैं ? मुझे
तो अधिरथ ने नदी में बहता पाया था।
कुन्ती-तुम्हारा कथन सत्य है बेटा। मैंने ही तुम्हें नदी में बहा
दिया था।
कर्ण-देवी, श्राप मेरी माता नहीं हो सकती । श्राप से तो सम्बन्य.
विच्छेद उसी समय हो गया था जिस समय श्रापने हृदय
पर पत्थर रख कर मुझे नदी में दुबो दिया था। उसके
बाद राधा ने मुझे पुनर्जन्म देकर अपनी गोद की शरण
दी। वही मेरी माता है।
कुन्ती-बेटा, तुम क्षत्रियकुल में उत्पन्न हो, सूतपुत्र नहीं हो ।
पांडवों के भाई हो-धर्मराज युधिष्ठिर, गाण्डीवधारी
अर्जुन और गदाधारी भीम तुम्हारे भाई हैं, तुम उनके
बड़े भाई हो।
कर्ण-देवी, सूनपुत्र होने का मुझे बड़ा गर्व है। इसी नाम .

से मैंने इतनी विख्याति पाई है । इतने काल तक तो आप को मेरा स्मरण हुश्रा नहीं, अब यह सम्बन्ध जताने का क्या कोई विशेष कारण है ? कुन्ती-घंटा, मेरे हृदय में दूसरे पुत्रों की तरह तुम्हारे लिए भी स्नेह का यही उच्चासन रहा है । कई बार तुम्हें मिलने को जी भी चाहा परन्तु साहस और अवसर दोनों ने साथ नहीं दिया। अब अनपरीक्षा के समय तुम में और अर्जुन में युद्ध होने लगा था तो तुम लोगों के अनिष्ट की आशङ्का से ममतावश मेरा हृदय बैठ गया और मैं मूर्षित हो गई थी। वही ममय-युद्ध का समय अब अधिक भयङ्कर रूप में आने को है । इस युद्ध के भयङ्कर परिणाम का विचार कर, अब मुझसे न रहा गया-मुझे पाना ही पड़ा। (कांपते हुए स्वर में ) कर्गा, भाइयों-भाइयों के इस युद्ध को रोको, तुम रोक सकते हो कर्ण- [---कुछ भी हो, यह युद्ध मुझसे रुकने का नहीं और न मैं इसे रोकना चाहता हूँ । युद्ध होगा और उसमें मैं अपने शरीर तक की बलि देकर महाराज दुर्योधन के उपकारों का बदला चुकाऊंगा। कुन्ती-ऐसा न कहो बेटा, दुर्योक्न पापी है, अत्याचारी है। उसका साथ छोड़ कर अपने भाइयों का पक्ष ग्रहण करो। तुम उनके बड़े भाई हो और वे तुम्हें बड़े मान कर तुम्हारी प्राज्ञा में रहेंगे। कर्ण-यह कभी न होगा, चाहे कुछ भी हो । दुर्योधन मेरा स्वामी है जब मैं केवल सूनपुत्र था तो मुझे अंगराज बनाकर ( १४२ ) महारथी का पद दिया । यदि मैं उसका पन छोड़ कर उसके .. शत्रुओं से जा मिलूं तो मेरे जैसा कृतन कौन होगा! कुन्ती-क्या माता की बात न मानोगे कर्ण ? कर्ण-(आवेश से ) माता के नाम को कलुषित न करो देवी। माता प्रेम और वात्सल्य की सजीव मूर्ति होती है। उसका जीवन निष्काम वलिदान का समुज्ज्वल आदर्श है। संसार में माता के सिवा कौन दूसरी स्त्री अपने शरीर का रक्त, मजा और मांस देकर सन्तान को पुष्ट करती है ? में मातृशक्ति का पूरा भक्त हूँ, उसके चरणों पर मेरा सिर सदा मुका रहेगा। पर आप मेरी माता नहीं-मेरी माता राधा है। उसी के चरणों की रज मेरे माथे का तिलक रहेगी। फुन्ती-तो क्या तुम अपने भाइयों से लड़ोगे-अपने हाथ से अपने भाइयों का वध करोगे ? बेटा, ऐसा न करो। अपने भाइयों के ही लोहू से अपने हाथ न रंगो । स्लकुल- घात जघन्यतम पाप है। -देवी, श्रापक श्रामह पर मैं अर्जुन को छोड़ कर किसी और पांडव को जान से न मारूंगा। पर अर्जुन के साथ, मैं मरने मारने का युद्ध करूंगा । यह मेरा प्रण है। मेरे या अर्जुन के मरने पर भी आपके पांच ही पुत्र बने रहेंगे, इस लिए हम दोनों के युद्ध का श्राप को कुछ भय . न होना चाहिए। यदि अर्जुन ने मुझे मार डाला तो मुझे अक्षय- म्वा मिलेगा और यदि मैंने अर्जन को मार दिया तो .

( १४३ )
कुन्ती-बेटा, मुझे खेद है मैं तुम्हारे विचार को न बदल
सकी। तो भी इतना लाभ तो हुआ कि तुमसे अर्जुन के
सिरा दूसरे भाइयों को न मारने का प्रण ले चली हूँ।
इस प्रण को भूल न जाना । ( जाती है।)
कर्ण-अच्छा होता यदि माता कुन्ती से इस समय भेंट न होती !
इससे मेरी जीवनसरिता की आनन्दमय लहरी में भयंकर
तूफान उठ पड़ा है। संभव है श्रय मेरी तलवार भ्रातृस्नेह
के कारण अर्जुन पर भी इतने ज़ोर से न चल सके।
जिन्हें में अपने जानी शत्रु जान रहा हूँ वे ही मेरे भाई
निकले । कैसी विधि-विडम्बना है !
(पटाक्षेप)
।
चौथा दृश्य
(स्थान--समरभूमि, दोनों पक्षों की सेनायें व्यूह रच कर
अपने अपने पक्षों में सड़ी हैं । युद्ध के बाजे और
नरसिंघे बज रहे हैं । योद्धा लोग युद्धभूषा
से सजे हुए युद्ध के लिए तैयार खड़े हैं)
(रथ में बैठे अर्जुन का प्रवेश । अर्जुन के रथ को श्रीकृष्ण
हाँक रहे हैं 1)
अर्जुन-वासुदेव, मेरा रथ दोनों सेनाओं के मध्य में हाँक ले
चलिये। वहां से मैं देखना चाहता हूँ कि शत्रुपक्ष में से
और कौन युद्ध के लिए आये हैं।
श्रीकृष्ण-बहुत अच्छा । ( अर्जुन के रथ को समरभूमि के मध्य में
लाकर खड़ा कर देते है।)

। ( १४४ ) भर्जुन-गोपाल, जैसे हमारी सेना का संचालन धृष्टद्युम्न कर रहे है, उसी तरह कौरवसना का अधिपत्य किसे सौपागया है? श्रीकृष्य--अर्जुन, वह दंग्यो मामने ऊंची ध्वना से युक्त रथ में बैठे हुए पालपद्मवारी, तुम्हारे दादा भीष्म जो कौरव- सेना का संचालन कर रहे हैं। उन्हें जीतना सन्यसाची जरा टेढ़ी खीर है। अर्जुन-(ध्यान से देख कर ) वासुदेव, मुझे तो शत्रुपक्ष में भी काका, याचा, मामा. ताऊ, पितामह, गुरु, श्राचार्य सब अपने ही सम्बन्ध बाले दिखाई देते हैं। क्या इनके साथ युद्ध करना होगा? श्रीकृष्ण-इनके साथ नहीं तो और किसके साथ लड़ोगे ? अर्जुन-मुझ से यह नहीं होगा मित्र । मेरे हाथ चाहे कट जाये पर इनसे मैं अपने ही सम्बन्धियों पर शस्त्र , चलाऊंगा। (शस्त्र हाथ से है. देता है।) श्रीकृष्णा-ठीक युद्ध के समय ही तुम्हारे मन में ऐसी भीरता क संचार कैसे हो गया अर्जुन ? शत्रु देखेंगे तो हंसेंगे। तुम वीरवर पांडु के श्रात्मज हो, तुम्हारे इस अक्षत्रियोचित फर्म से उनका उज्ज्वल बंश सदा के लिये कलंकिन हो आयगा, स्वर्ग में उनकी आत्मा को फष्ट होगा। अर्जुन-~-मेरे घस की बात थोड़े ही है ! मैं क्या करूं ? इन्हें देखते ही मेरा हृदय कांप उठा है, हाथ पैर सुन्न हो गए हैं, शरीर में रोमांच हो पाया है, हाथों में गांडीव उठाने की शक्ति नहीं रही । सारी दिशायें मुझे कुलालचक्र को तरह घूमनी दीख रही हैं।

( १४५ ) श्रीकृष्ण-इन बातों को पहले ही सोच-विचार लेना था। ऐसे गाड़े समय में इन की ओर ध्यान देना ही भीरता है । तुमने कभी यह भी विचार किया है कि इनकी मृत्यु के बाद राज्य तुम लोगों के ही हाथ पायगा। अर्जुन-कृष्ण, मुझे न विजय चाहिए और न राज्यभोग । जिनके लिए हमें राज्यसुख के भोग की इच्छा है यदि वे सम्बन्धी ही न रहे तो राज्य हमारे किस काम का! श्राप ही कदिए मधुसूदन, जिन की कृपा से मुझे शस्त्रशिक्षा मिली है, उन पूज्य आचार्य पर मैं कैसे वाण छोड़ सकूँगा ? जिन पितामह ने मुझे गोद में खिला कर इतना बड़ा किया है, उन पर यह हाथ कैसे उठेगा ! उनका वध करते मुझे लज्जा न पायगी? श्रीकृष्ण-अर्जुन, शोकप्रस्त होने से तुम्हारा मन इस समय अपने वश में नहीं रहा, नहीं तो ऐसी बातें कभी न करने । जिन सम्बन्धियों के. विषय में तुम इतना शोक कर रहे हो उनसे तुम्हारा नित्य सम्बन्ध नहीं है । पता है वे लोग पूर्व जन्म में कौन थे और आगे क्या होंगे ? इन लोगों के हज़ारों, लाखों जन्म हो चुके हैं और हजारों लाखों और होंगे, इसी तरह तुम्हारा और मेरा जन्म- चक्र भी न जाने कब से चला आ रहा है और कब तक चलता रहेगा। अर्जुन-वासुदेव, तो फिर मृत्यु से भय क्यों होता है ? श्रीकृष्ण-गुडाकेश, इसका कारण अज्ञान है। देखा जाय तो मृत्य फेवल दशा का परिवर्तन ( १४६ ) बचपन, जथानी और बुढ़ापा शरीर को तीन अवस्यायें हैं, उसी तरह जन्मान्तर चौथी अवस्था है। सच पूछो तो जन्म बदलना धर्म है जैसे पुराने कपड़े उतार कर नये पहनना । शरीर क्षणिक है और श्रात्मा शाश्वत । जीवात्मा न स्वयं मरता है और मारा जाता है। इसे शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, पानी भिगो नहीं सकता और हवा सुखा नहीं सकती। अर्जुन-घनश्याम, यदि किसी को मारने से उसके जीवात्मा का कुछ बनता बिगड़ता नहीं, तो फिर उसका वध किया ही क्यों जाय? श्रीकृष्ण हम लोग संसाररूपी नाट्य मंच पर अभिनय करने वाले पात्र हैं। जैसे नाट्य मंच पर प्रत्येक पात्र को अपना अपना अभिनय करना पड़ता है, उसी तरह संसार की मोहमाया के जाल में फंस कर हमें भी मत्र काम करने पड़ते हैं। जो कोई अपना कार्य अच्छी तरह से कर लेता है लोग उसकी स्तुति करते हैं। तुम क्षत्रिय हो अर्जुन, युद्ध क्षत्रियों का धर्म है। यदि तुम युद्ध से विमुख होकर भाग जाओगे, तो लोग तुम्हें भीर और कायर कहेंगे। इससे तुम्हारा ही नहीं तुरहारे वंश का भी अपयश होगा। अर्जुन-क्षत्रियधर्म मैं अच्छी तरह जानता हूँ। पर यह क्या निश्चित है कि हम ही जीतेंगे ? यदि हार गये तो यह मार-काट किस काम की? श्रीपा--मनुष्य का कर्तव्य कार्य करना है। उसका फल ईश्वर- ।

( १४७ )
धीन है। निष्काम कर्म करने से इष्ट फल न भी मिले तो
भी चित्त की शान्ति तो बनी रहती है । इस लिए अर्जुन,
शत्रुओं की विजय पराजय का विचार छोड़कर
अपना कर्तव्य करते जाओ ! यह ज्ञान कि मैंने
कर्तव्यपालन किया है चित्त को शान्ति और सन्तोप
प्रदान करता है।
अर्जुन-वासुदेव, आपके इस अमूल्य उपदेश ने मेरे ज्ञानचक्षु
खोल दिये हैं। अब मेरी बुद्धि ठिकाने लगी है । कहिये
क्या प्राज्ञा है ?
श्रीकृष्णा-तुम क्षत्रिय हो अर्जुन, अपने धर्म का पालन करते
हुए शत्रुदल का विध्वंस करो।
( अर्जुन अपना धनंजय शंख बजाता है । युद्ध शुरू हो जाता है।
अर्जुन का पहला तीर भीष्म के चरणों पर गिरता है।)
भीष्म-( तीर को उठाते ही।) धन्य हो अर्जुन, युद्ध के समय भी
तूने फुलमर्यादा को नहीं छोड़ा, पहले तीर के द्वारा अपने
पितामह के चरणों पर प्रणाम किया है । तुम्हारे तीर को
ही तुम्हारा प्रतिनिधि मान कर मैं उसे हृदय से लगाता
हूँ। (तीर को हृदय से लगाते है । फिर शंखनाद कर पांडवों
की सेना पर तीर छोड़ते हैं । युद्ध छिड़ जाने से दोनों ओर
कोलाहल होने लगता है।)
अर्जुन-सखे कृष्ण, इस युद्ध का मूल कारण कर्ण है, इस लिए
सब से पहले मेरा रथ उसी मदान्ध के पास ले चलो
पहले मैं बीज को ही नष्ट करना चाहता
यद्धरूपी विपक्ष फलना-फलना ही न

( १४८ )
श्रीकृमण-कुन्तीपुत्र, तुम्हें मालूम नहीं कि कर्ण का यह प्रग्य
है कि पितामह के जोते मैं अस्त्र प्रहण न करूंगा ?
इसलिए कर्ण से यदि युद्ध को लालसा है तो पहले
पितामह का अन्त करो।
अर्जुन-(व्यंग्य से) कर्ण का यह प्रण उस की भीरता का परिचय
देता है । फैमा अच्छा बहाना निकाला युद्ध से भागने का !
श्रीकृष्ण-अर्जुन, कर्ण में चाहे कई और दोष हों, पर उस में
भीरता लेशमात्र भी नहीं । उस के समान शूर योद्धा
संसार भर में दो चार भी शायद ही हों । जीवन-संप्राम
में प्रतिकूल परिस्थितियों और पहाड़ सी वाधाओं का
सामना करते करते वह कभी हताश नहीं हुआ । उस के
स्थान में कभी कोई और होता तो निराश होकर न
जाने क्या कर बैठता! उसके शरीर और मन में इतनी
दृढ़ता है कि वे दोनों इस्पात के बने मालूम होते हैं। .
भीष्म के बाद श्राचार्य को छोड़ कर मैं कर्ण को ही.
सर्वोत्तम वीर समझता हूँ। वह उपहास के योग्य नहीं,
श्रादर के योग्य है । जब उसके साथ युद्ध होगा-
अर्जुन-तब तो आनन्द आ जायगा । वहादुर शत्रु के साथ युद्ध
करने से जितना आनन्द मुझे पाता है, वैसा स्वर्गसुख
से भी नहीं आता।
(श्रीकृष्ण मर्जुन के रथ को आगे बढ़ा ले जाते हैं)
(.पटाक्षेप)

( १४४ )
पांचयाँ दृश्य
(स्थान-दुर्योधन का डेरा । यहाँ पर दुर्योधन, प्राण, दुःशासन,
शकुनि, शल्य, जयद्रथ, अश्वत्थामा, कृपाचार्य आदि योदा
दुर्योधन-दादा जी दस दिन शत्रुश्रों का संहार कर वीरगति पा
गये हैं। अब उनके अभाव में हमें बहुत कष्ट हो रहे हैं।
शत्रुपक्ष के दस हजार सैनिकों को प्रतिदिन मार कर
वै दम लेते थे । जब तक वै सेनापति रहे हमें किसी
का भय नहीं था। शत्रुओं के चेहरों का रंग सदा उड़ा
रहता था। पर अब.........
शकुनि -अब चिन्ता न करें महाराज । यद्यपि भीष्म जी की मृत्यु
से हम सब को बड़ा खेद हुआ है तो भी कर्ण से वीर
योद्धा अब भी हमारे पक्ष में विद्यमान हैं।
दुःशासन-मामा ठीक कह रहे हैं ---कर्ण को बुलवाइये ।
कृपाचार्य-कर्ण की वोरता में किसे सन्देह हो सकता है ! महारथियों
में वे अप्रगण्य हैं।
दुर्योधन-तुम लोग सत्य कहते हो । इस समय हमारी डूबती हुई
नाव को कर्णसमान प्रवीण और शूर फर्णधीर की
आवश्यकता है। परशुराम जी का शिष्य होने के कारण
कर्ण अर्जुन से धनुर्विद्या में बहुत बढ़ा चढ़ा है ।
सब लोग-(एक स्वर से ) तो उन्हें बुलवाइये।
(दुर्योधन एक बारपाल को कर्ण को लाने के लिए भेजता है।)
अश्वत्थामा-एक बात सोचने की है। पिछले दस दिनों के युद्ध
अनुपस्थित रहने से कर्ण को द्रम याट

( १५० )
अनुभव ही नहीं है। इसलिए उसी पर एफदम सारा
चोम रख देना उचित न होगा।
शकुनि-उसका युद्ध में भाग न लेना तो उल्टे हमारे लाभ की बात
है। युद्ध में भाग न लेने से वह बिल्कुल ताज़ा है, उसका
बल ज़रा भी क्षीण नहीं हुना।
(कर्ण आता है । सब उसका आदर करते है।)
दुर्योधन-अंगराज, श्राइये । हम लोग तुम्हारी प्रतीक्षा में हैं।
फर्ग-(पेट फर ) मुझे दादा की मृत्यु का बड़ा शोक है महाराज।
अब मुझे मो श्राज्ञा हो मैं करने को तैयार हूँ।
दुर्योधन-पितामह के मरने के बाद, सर्वप्रथम इस उपस्थित समस्या
को हल करना होगा कि दादा जो सेनापति का पद छोड़
गये हैं, वह किसे दिया जाय !
कर्ण-राजन्, दादा की मृत्यु के याद श्राचार्य के सिवा मुझे,
ऐसा वीर दिखाई नहीं देता जो सेनापति बनने के योग्य तक
हो । आचार्य हम सब के गुरु हैं, उनको यह पद देने से कोई
स्पर्धा नहीं करेगा।
दुर्योधन-तुमने मेरे मन की बात की है अंगराज। (द्रोण से) प्राचार्य,
पितामह के बाद दादा की धरोहर--ग्रह पद-मैं आपके
सुपुर्द करता हूँ। मुझे जरा भी संशय नहीं कि आप इस
धरोहर की जी-जान से रक्षा न करेंगे।
(सब एक स्वर से- आचार्य द्रोण की जय !)
द्रोग--जो पद महात्मा भीष्म के चिरस्मरणीय नाम से पवित्र हो
चुका है, मैं अपने आपको उसके योग्य नहीं समझता।

12
( १५१ )
फिर भी क्योंकि आप लोगों ने मुझे उसके योग्य समझ कर
इसे दिया है अतः अपने प्राण न्योछावर कर भी मैं इसे
फलंकित न करूंगा 1 मेरा पराक्रम, बाहुबल, धनुर्विद्या
और सब कुछ इसी पद को रक्षा में समर्पित हैं ।
( दुर्योधन ने तिलक में द्रोण का आभिषेक किया । रण के बाजे
बजने लगे।)
-(एक रबर से--सेनापति द्रोण को जय !)
(पटाक्षेप)
छठा दृश्य
(स्थान--समराङ्गण, एकान्त)
(दो सैनिक भागते हुए आते है और हॉफते-हाँफते खड़े हो जाते है।)
वेश्वर-सोमेश्वर भैया, आज तो जान बड़ी कठिनता से बची।
रमेश्वर (-जान बची तो लाखों पाये। लड़ाई भाइयों भाइयों की,
और सत्यानास हो रहा है हम जैसे बेचारों का।
वेश्वर-भैया, एक बात कहता हूँ--आज युद्ध का आनन्द श्रा
गया । ऐसा युद्ध कभी पहले न देखा था ।
गोमेश्वर--तुझे अानन्द आया होगा, पर मेरी तो जान भय के मारे
निकल रही थी। उधर अर्जुन का तीर धनुष से निकलता
था, इधर मेरे प्राण शरीर से निकलने लगते थे।
विश्वर-कहीं निकल तो नहीं गये
सोमेश्वर-वस निकलने को ही थे कि मैंने हृदय पर हाथ रखकर
उन्हें जोर से पकड़ लिया, निकलने न दिया ।
देवेश्वर-(ईस कर 1) अच्छा हुआ निकले नहीं । एक याद

लड़ते तो अर्जुन भी अच्छे हैं-पर जैसा युद्ध आज हमारे
सेनापति प्राचार्य ने किया है, वैसा अब तक किसी ने नही .
किया । दिल चाहता था कि भाग कर उनके हाथ
चूम लूं।
सोमेश्वर-नाये क्यों नहीं ? जाते तो मजा आ जाता ! तुम चूमने
ही न पाते कि यह मुंड ( उसके सिर पर राप पर कर)
रुपड से अलग हो जाता।
देवेश्वर-~प्राचार्य के वाण चलते ही शत्रुओं के दल के दल परा:
शायी हो जाने थे और जो बचते थे वे आंधी के आगे
पाल नौका की तरह भाग जाते थे।
सोमेश्वर-भाई. हमारे पक्ष में एक से एक बढ़ कर शूर है । कर्ण
क्या किसी से कम है ? आज उसकी अजुन से मुठभेड़
हो गई । उस समय अंगराज ने पैने तीर छोड़-छोड़
फर अर्जुन के होश उड़ा दिये थे और यदि कृष्णा की
उसको सहायता न मिलती तो वह बचने न पाता । असे
नदी का प्रवाह पहाड़ की चट्टान से टकरा कर दो
धाराओं में बँट जाता है, उसी तरह कर्ण के बाणों से
पांडवों की सेना के दो भाग हो गये थे। यीच में महारथी
फर्य उचशृङ्ग पर्वत की तरह खड़ा रहा। कर्ण क्या
है मानो-
(ो और सिपाही आते है।)
चन्द्रभानु-~भीरता की सजीव मूर्ति है !
सोमेश्वर- यह क्या कह रहे हो चन्द्रभानु ! मैं तो कहने वाला था
कि वीरता की सजीव मनि है. और वस्तुतः यह है भी।

विश्वेश्वर-रहने भी दो--(व्यंग्य मे ) वोरता को सजीव मूनि !
घमा एक नन्हें से चालक से मुंह की खाकर भागा।
चन्द्रभानु-मुँह की खाते हो, पांच सिर पर रख लिये और भाग
गया।
विश्वेश्वर -बालक क्या था यम था!
चन्द्रमानु-अब तक पुत्र से पाला पड़ा है, जब पिता से पड़ेगा
तो आटे-दाल का भाव याद आ जायगा।
सोमेश्वर-क्या बात है भैया, फुल हमें भी बतायो ।
विश्वेश्वर-( सोमेश्वर की बात का स्याल न कर ) यह सिंदशावक था
और ये सब के सब शृगाल थे-शृगाल ।
चन्द्रभानु-किन्तु खेद है कि इस सत्यानासी युद्ध की विकराल
गाल के नीचे वह भी अन्त में चला गया।
देवेश्वर-कुछ हमें भी बताओगे कि अपना ही राग अलापते
जाओगे?
विश्वेश्वर-भाई, मरना इसी का नाम है, ईश्वर मौत दे तो ऐसी।
चन्द्रभानु-एक रणभूमि, दुसरे ऐसी वीरता ! एक ने दूसरी को
श्राश्रय दिया।
सोमेश्वर- हम लोग इन पहेलियों को नहीं धूम सकते ।
चन्द्रभानु-यह पहेली नहीं, सची घटना है-श्रांखों से देखी,
इन्ही ( आँखों की ओर इशारा कर ) आँखों से देखी।
देवेश्वर-क्या देखा है?
चन्द्रभानु--यह तो तुम मुन हो चुके होगे कि प्राचार्य ने आज
चाल्यूह रचा है।
सुना
।
।
ha

चन्द्रभानु उसकी रक्षा के लिए चुने धुने मदारयी और प्रतिरमी लगाये गये थे और उमसी द्वारा का कार्य जयद्रय के मुपुर्द हुआ था। घर और उनके पुत्र सुभद्राकुमार अभिमन्यु के सिया उसके अंदर कोई नहीं घुस सस्ता था। सोमेश्वर-अर्जुन को तो मैंने कहीं और युद्ध करते देखा है। पन्द्रभानु- यद्द भी इन लोगों की पाल थी । उन्हें संशतकगगा कहीं दूर स्थल में युद्ध फे लिए ले गये थे। पीछे रह गया था अभिमन्यु । यह शेर शायशा जरा भी नहीं पत्रराया और न्यूह में जाने को तैयार होगया। उसके साथ भीम श्रादि कई और वीर भी थे, पर उन सब को जयद्रय ने द्वार पर ही रोक लिया। फेवल अभिमन्यु ही अंदर घुसने पाया। विश्वेश्वर-भीतर फौरव दल के चुने चुने नायक एकत्रित थे, फिर भी वीर अभिमन्यु नहीं धयराया । वह था केवल एक और शत्रु थे अनेक । पर उस अफेले ने ही उन सब के दांत सट्टे कर दिये। जिधर मुँह घुमाता मैदान साफ हो पाता । दुर्योधनकुमार लक्ष्मण, फर्ण- कुमार और दूसरे वीरों को पान की आन में यमपुर मेज दिया। सोमेश्वर -धन्य हो कुमार! फिर क्या हुश्रा भैया ? चन्द्रभानु---फिर हुमा क्या? बहुत देर तक युद्ध होता रहा । जो भी उसके सामने श्राया टिक न सका। दुर्योधन, दुःशासन और कर्ण से महारथी शार्दूल के सामने से शगालों की तरह दुम दबाकर भाग गये ?

सोमेश्वर-(विस्मय से ) इसके पश्चात् ? चन्द्रभानु-इसके पश्चात् ऐसी घटना हुई जिस का वर्णन करते छाती फरती है। हमारे नायकों ने ऐसा जघन्य कार्य किया जिस का ज़िकर करते लम्जा से मुख नीचे करना पड़ता है। द्रोण और कर्ण थादि छः महा- रथियों ने मिल कर उस अकेले बालक को मार दिया। देवेश्वर और सोमेश्वर---छि: ऐसा घृणित व्यापार ! चन्द्रभानु-भैया देवेश्वर, मुझे तो इस अधर्मयुद्ध से घृणा हो गई है। देवेश्वर-तुम्हारा कहना ठीक है । ऐसे युद्ध में भाग लेना महा- पाप है। चन्द्रभानु–पाप तो है ही। सोमेश्वर-तो चलना चाहिए । कहीं किसी ने देख लिया तो फिर धधकती आग में झोंक दिये जायेंगे। (मर जाते है।) सातवां दृश्य (स्थान-समरभूमि, कर्ण और उसके पास दुर्योधन खड़ा है। दोनों के रथ पास पास ही खड़े हैं।) दुर्योधन-यदि ऐसा न करोगे तो सारी सेना का अभी अन्त हुआ चाहता है। पर्ण-महाराज, मुझे तनिक विचार करने दो। दुर्योधन-विचार करने का समय फहां. कर्ण ! इधर तुम विचार- ( २५६) मन्त रहोगे, माराम हमारे गय बोरों का संहार कर देगा। को तुम कहते हो कि उम अमोर शनि का पटोत्कच हो पर प्रयोग किया जाय? दुर्योधन और किस दिन के लिये उसे रस मोड़ियेगा ! हम सय लोग और प्राचार्य, अश्वत्यामा, भूरिभा श्रादि वीर योद्धा पूरा यत्न फर सुफ है पर वह किमी से दाना हो नहीं । लायुध को उस के सामने मना । उसे भी उसने क्षण में मार दिया। फर्गा--महाराम, श्रापको पता है कि यह शक्ति मैंने फयच फे घदले इन्द्र से अर्जुन को मारने के लिये ली थी। इस शक्ति का ही यह प्रताप है कि अर्जुन को मेरे सामने पाने का साहस नहीं होता। यदि यह साधन भी मेरे हाय से चला गया तो फिर अर्जुन को कोई नहीं मार सकेगा। वह भयंकर सांप- दुर्योधन-सांप का जय मुकाबला होगा तो देखा जायगा, अब तो इस सपोले से हमारा पीछा छुड़ाओ । जिस तरह हम सब लोगों ने मिल कर अभिमन्यु को मार दिया था, उसी तरह ,अर्जुन को भी मार देंगे। पर इस घटोत्कच को आसुरी माया का मुकाबला हम नहीं कर सकते । मेघ की तरह गर्मन करता हुआ यह निधर जाता है उधर ही लाशों के ढेर जमा हो जाते हैं। (एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में गदा लिए हुए घटोत्कच आता है।)

- घटोत्कच-(दुर्योधन और कर्ण से ) पुरवंश के निर्लज्ज कुपुत्रो, तुम्हारे अनुयायी सैनिकों का मैं संहार कर रहा हूँ लोग यहां पर छिपे बैठे हो । परन्तु तुम्हारा छिपना निष्फल है। तुम्हारा काल यहां भी श्रा गया है। (दुर्योधन से ) मेरे पिता को विप देने वाले नीच, पहले मैं तुझे ही नरफ में भेजता हूँ। ( उस पर त्रिशूल चलता है । दुर्योधन भाग जाता है और शूल से उसके रस के घोडे कट जाने है।) बच गया कायर, आततायी सदा कायर होते हैं। ( कर्ण से ) राधापुत्र, तू नहीं भाग सफेगा । ले तू भी ले । (कर्ण पर गदा- प्रहार करता है । कर्ण तोर छोड़ कर गदा को काट देता है।) दुर्योधन-(फिर आकर ) कर्ण, यही समय है शक्ति चलाने का। शीव करो, यह भाग गया तो और भी उपद्रव करेगा। कर्ण-यह शक्ति तुझे जीता न छोड़ेगी । (शक्ति चलाता है । शक्ति घटोत्कच का शरीर काट कर इन्द्र के पास चली जाती है।) दुर्योधन-इसके मरने पर देह में प्राण पाये हैं। थोड़ी ही देर और यदि यह जीवित रहता तो हम में से एक को भी जीवित न छोड़ता। दुष्ट मरते मरते भी अपनी पर्वत- समान देह के नीचे सैकड़ों सैनिकों को ले मरा । आखिर भीम का ही तो पुत्र था ! (कर्ण के पास आकर ) मित्र, किस सोच में पड़े हो ? : फर्ण-अमोघ शक्ति के हाथ से निकल जाने से अब अर्जुन के वध की श्राशा मिट गई है। अर्जुन मुझसे बलवान नहीं परन्तु कृष्ण की सहायता का अभेद्य कंचुक जो उसने

14
पाहन रस्सा है उसके सामने मुझसे कुछ नहीं यन पड़ेगा।
दुर्योधन-यह पला मो टली, भविष्य का विचार भविष्य में करेंगे।
..
आठवां दृश्य
(स्थान--
-सुयोधन का भरन, समय-नागि)
दुयोधन--( निनामग्न ) श्राचार्य भी चल दसे । दादा के बाद
प्राचार्य के भरोसे पाशात्रों का गगनचुम्बी प्रासाद खड़ा
किया था, यह भी धराशायी हो गया। अय पीछे कौन
रहा है जिसे श्राशाओं का फेन्द्र बनाया जाय ! फेवल एक
फर्ग ही रहा है, पर जब भीष्म चले गये, प्राचार्य पुछ न
फर मो तो यह क्या कर सऊंगा! यदि उसके पास
श्रमोप शक्ति यच रही होती, तय भी इतनी चिन्ता
न होती । इधर हमारी यह दशा है, उधर पांडवों के
भाग्यसूर्य का मध्याह्न है । एक अर्जुन हो प्रतिदिन
हजारों सैनिकों का अन्त फरके दम लेता है।
फल अश्वत्थामा सन्धि करने का उपदेश दे रहे थे,
परन्तु इस समय सन्धि करना व्यर्थ है-बिडम्बना है।
जिसके लिए हजारों लाखों चोरों ने अपने जीवन न्योछावर
कर दिये, उसका उचित स्थान उन्हीं के पास है।
(आवेश से ) युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुला, सहदेव इन
सब को भी वहीं भेज कर रहूँगा, सन्धि होगी तो वहीं
होगी-उसकी शर्त भी वहीं दादा, और श्राचार्य की
सम्मति से तय होंगी। (सोचकर ) पर पीछे रहा कौन

( २५६ )
है जिसके भरोसे लई ! ( उत्तेजित होकर ) है क्यों
नहीं, कर्ण है, शल्य है, प्राचार्यपुत्र अश्वत्थामा है।
यद्यपि फर्ण के पास पुएडल, कवच और शक्ति नहीं
रही तो भी वह किसी बात में अर्जुन से कम नहीं है ।
उसका पराक्रम किसी से कम नहीं-तभी तो दादा
और प्राचार्य उससे डाह करते थे। साथ ही, वह मेरा
पूर्ण विश्वासपात्र है । दादा का अर्जुन से पौरस्नेह था,
आचार्य का उससे शिष्यस्नेह था, पर कर्ण उसका जानी
शत्रु है । इसलिए उसे मारने में कोई कसर न छोड़ेगा !
(ऊँचे स्वर से) कोई है ? ( द्वारपाल आता है।)
द्वारपाल-भाडा महाराज ?
दुर्योधन -अगराज कर्ण को चुला
लाओ
द्वारपाल-जो आज्ञा (जाता है)।
दुर्योधन-मेरा विश्वास उत्तरोत्तर बढ़ रहा है कि जो कार्य
दादा और आचार्य से नहीं हो सका उसका संपादन
कर्ण अवश्य करेगा।
(कर्ण का प्रवेश)
कर्ण--(प्रणाम करके) महाराज, आधी रात के समय आपने
स्मरण किया है-
-क्या कोई विशेष कारगा है ?
दुर्योधन-सखे, प्राचार्य की मृत्यु से चित्त प्रशान्त हो रहा था, नींद
नहीं पा रही थी, इसलिए तुम्हें फष्ट दिया कि दोनों मिल
कर श्रागामी कार्यक्रम का ही निर्णय कर लें।
कर्ण-पांडवों के वध के सिवा और हमारा कार्य ही क्या
दुर्योधन-कर्ण, अव मेरे अवलंब केवल तुम ही हो।
.

फर्गा-प्रापशी श्रमों का पालन करना मेरे जीवन कामुरु
हेश्य रहा।
दुर्योधन-यह तो मुझे पता है मित्र । तुम मेरे यांतरिक मित्र हो
जि.स नौका फे पर तुम दूसरों को पना र
पं.अय स्वयं मन कर उसे किनारे लगाये।
फर्ग-महाराज की असीम कृपा है जो मुझे इस महान पद
योग्य सममत है। मैं श्रापक विशस का पार पनने
या फांगा। श्रय मुमै विदा होने की अनुमा दीजि
इस सम्बन्ध में मुझे यहुन सा कार्य करना होगा।
दुर्योधन- तुम मा मकते हो । रात भर जागरण के कारया मु
भी तंद्रासी भा रही है। श्रय निश्चिन्त हो कर एक
प्राय पड़ी श्राराम फरलू।(फर्ण प्रणाम करके माता
(पराशेष)
--

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२१
पुद सरस में नहीं आता ! सेनापति कणे, सुम्दों को
उपाय बनायो।
कर्ण-महाराष, अर्जुन का मारतानि नही, यदि अर्जुन का सस
मारथी मेरे पास भी हो। अनस्ययं हुनना पली नहीं
जितना यश प. पल से यती है।
दुर्योधन-सनापनि, हमारे प मैं जो योटा यप रहे हैं, उन
में से यदि कोई तुम्हारे सारथ्य के योग्य हो तो
उसे अभी तुम्हारे साथ किये देता है।
कर्ण महाराज, यदि शल्य मैरे सारथ्य का काम संभालें तो मुझे
हा की कोई चिन्ता न होगी।
दुर्योधन-इस का प्रपन्य करना मुझ पर छोड़ो।
कर्गा-तो मुझे आने की अनुज्ञा दीजिए, मैंने कल के लिए अर्भ
बहुत तैयारी करनी है।
दुर्योधन- हां, आइये।
(कर्ण जाता है। दुर्योधन बारपास को शस्य को बुलाने
को भेजता है)
दुर्योधन-(शकुनि से ) मामा, शल्य कर्ण का सारथी मनन
मानेगा कि नहीं?
शकुनि हम सब लोग इस समय कर्ण के अधीन है, इसलिए
महारान शल्य को सेनापति का वचन टालना न चाहिए ।
( शल्य का प्रवेश)
शल्य-(प्रणाम कर महाराज ने इस समय मुझे किस लिए
स्मरण किया है?
दयोधन महाराज शल्य, प्रतिक्ष्ण युद्ध की समस्या बहुत विकट
1

-
होती जा रही है। वचने का कोई उपाय नहीं सूझता।
अब केवल एक ही उपाय रह गया है जिससे रक्षा की
सम्भावना है और वह आप पर निर्भर है।
शल्य-वह क्या है कुरुराज ?
दुर्योधन-कल कर्ण का अर्जुन से भयङ्कर युद्ध होगा।
शल्य-होना ही चाहिये। कहां तक हम इस यन्त्रणा को सहन
फरते रहेंगे!
दुर्योधन-इस यन्त्रया से मुक्ति का एक ही उपाय है । वह यह है
कि जब कर्ण का युद्ध अर्जुन से हो तो आप उसके
सारथी बनें!
शल्य-यह नहीं होगा। कर्ण किस बात में मुझसे श्रेष्ठ है कि मैं
उसका रथ हाँ?
दुर्योधन महाराज, बुद्धिमान पुरुष सदा दूरदर्शिता से काम लेते
हैं । इस समय हम सब एक ही नाव में हैं । यदि वह
हूयेगी तो हम सब डूबेंगे । दूसरे, सारथी बनने में हर्ज
क्या है ? क्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कम हैं जो उसके
सारथी बने हैं। इसमें आपकी हेठी नहीं कर्या की
हेठी है, जो आपकी शरण चाहता है ।
शल्य-( अपने आप ) मैंने युधिष्ठिर जी से भी तो प्रण किया था
कि जय कर्ण और अर्जुन का युद्ध होगा तो कर्ण का सारथी
यन कर उसका बल कम करूंगा। यह भी तो पूरा करना
होगा! ( स्पष्ट ) महाराज, श्रापफे कहने से मैं कर्ण का
:सारथी बनना इस शर्त पर स्वीकार करता हूँ कि रथ हांकते
समय मैं कर्ण से जो कुछ भी कहूँ उसे वह सुनना पड़ेगा।

शल्य- दुर्योधन-यह शर्त में कर्ण की ओर से स्वीकार करता हूँ। शल्य-तो मैं भी श्रापकी श्राक्षा स्वीकार करता हूँ। अब मुझे विदा दीजिए। दुर्योधन-हाँ, आप जा सकते हैं । तो बात पकी हुई न ? . -क्षत्रियों के मुख से निकली वात सदा पकी ही होती है । : .. (जाता है।) दुर्योधन-यह चिन्ता भी मिटी । शल्य का कर्ण से मिलना सोने पर सोहागा हो जायगा । इन दोनों की सम्मिलित शक्ति अर्जुन और कृष्ण की शक्ति से किसी तरह कम न होगी। फिर कृष्ण निरा सारथी ही है, उसने शस्त्र न उठाने का प्रण किया हुआ है और शल्य समय पर युद्ध भी फर सकता है । शल्य और कर्ण एक से एक मिल कर ग्यारह हैं और अर्जुन एक का.एक । अब हमारी विजय निश्चित है। (दासी का आश्रय लिये गांधारी का प्रवेश ।) गांधारी–विलकुल अनिश्चित है दुर्योधन, बल्कि आकाशकुसुम की तरह असम्भव है ! दुर्योधन-श्राप कैसे आई माता ? राजमाता युद्धभूमि में ? गांधारी-बेटी, एक बार फिर देखने आई हूँ कि माता के स्नेह, आज्ञा और अनुनय-विनय में कुछ भी असर रह गया है कि नहीं । दुर्योधन, मातृस्नेह के सामने 'कठोर से फठोर हृदय भी पिघल जाते हैं, मातृ श्राज्ञा के श्रागे वीरा- तिवीरों को भी गरदने झुक जाती हैं और मातृविनय को बोट में गतिशत ----- " मातृशक्तियों की परीक्षा के लिए मैं फिर आई हूँ ! दुर्योधन-श्रापका ध्येय क्या है ? कहिये माता, मेरे पास अधिक समय नहीं है। गांधारी-बेटा, मेरे सौ पुत्रों में से लगभग नब्बे पुत्रों को रण- चण्डी को तृप्त करने के लिये तूने अग्निकुण्ड में स्वाहा कर दिया है, पर चंडी अभी तक तृप्त नहीं हुई, उसने अब तक तुम्हें विजय का वरदान नहीं दिया । अब तो उस कठोरहदया की पूजा छोड़ो, रणचंड़ी की जगह कमलवासिनी लक्ष्मी की पूजा करो। दुर्योधन-तो आप मुझे युद्ध बन्द करने को कहने आई हैं ? यह न होगा माता। इसके सिवा दुर्योधन 'श्राप की सब प्राज्ञायें मानने को प्रस्तुत है। गांधारी-यटा, सौ. पालकों की जननी हो कर भी मैं अपुत्रा हो जाऊँगी और उधर कुन्ती के तीनों के तीनों पुत्र जीवित रहेंगे। क्या तुम्हें यह सह्य है ! अब तो कहना मानो पुत्र, मुझे राज्य नहीं चाहिये, ऐश्वर्य नहीं चाहिए, सुखभोग नहीं चाहिए -चाहिये फेवल तुम लोगों के दो चार 'बचे हुए हृदय के टुकड़ों के मुख देखना । दुर्योधन-माता, मैंने इस बात पर कई बार विचार किया है और इसी निर्णय पर पहुँचा हूँ कि इस समय युद्ध बन्द करना भीरुता होगी। युद्ध का परिणाम मैं जानता हूँ। मूर्ख नहीं, सय फुछ जानता हूँ। समस्या इस समय यह है कि सामने उत्तुङ्गशिखर पर्वत है और पीछे पाताल- स्पर्शिनी साड़ी है । न आगे जा सकता हूँ और न

।
.
.
( १६८ )
पीछे ! मेरे कहने पर दादा, आचार्य और असंख्य
वीरों ने हँसते हँसते अपनी जानों को रणचंडी फे
यज्ञ में बलिदान कर दिया है। इसी रण के कारण
हजारों घरों के दीपक बुझ गये हैं, हज़ारों वंश
निर्मूल हो गये हैं । अव मेरा स्थान यहां नहीं है--
उन्हीं वीरात्माओं के पास है। यदि इस समय
युद्ध बन्द कर देता हूँ तो स्वर्ग से वीरों की
आत्मायें और संसार में तड़पते हुए पितृविहीन पुत्रों
और पतिविहीन विधवाओं के आर्तनाद मेरे जीवन
को सदा के लिए कष्टमय बना देंगे । वे लोग
मुझे धिक्कारेंगे और कहेंगे-नराधम, कायर, दुर्योधन
अपने सुख और ऐश्वर्य की लालसा से हमें धधकते
अग्निकुण्ड में झोंक कर खुद गुलछरें उड़ा रहा है ।
क्या आप अपने वीर पुत्र पर होती हुई धिकारों की
इस बौछार को सह सकोगी ? क्या आप यह चाहती हो
कि आप का स्तनन्धय प्रात्मज कुरुवंश को कलंकित
फरने का कारण बने ? माता, माता-बताओ, बनाओ
कि वीर क्षत्रियाणी, वीरजाया, धीर स्त्री होकर श्राप
का भी कोई फर्तव्य है कि नहीं ?
गांधारी-(दुर्योधन के सिर पर हाथ रख कर ) शान्त बेटा, शान्त !
मैं सब कुछ जानती हूँ-क्षनियधर्म भी जानती हूँ।
पर क्या करूं!.पुत्रस्नेह ने मन की सय भावनाओं
फो दवा रक्खा है।. मैं आंखों की अन्धी तो हूँ ही,
पुत्रस्नेह ने मेरी श्रान्तरिक
.
A

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. ( १७० ) भीम-(अपने तीर से दुःशासन के तीर को मध्य में हो काट कर) तुम्हारा यह तीर यहां तक पहुँचने ही न पायेगा। अब मेरी गदा के प्रहार को सहन कर । (गदा को जोर में दुःशासन के मिर पर प्रहार करता है । दुःशासन प्रहार से मूधित हो कर गिर पड़ता है।) भीम-(उछल कर उसकी ओर जाता हुआ ) इस समय सब को सुना फर मैं कहता हूँ कि मैं अभी इस पापी का अंन्त करूंगा। किसी की भुजा में शक्ति हो तो इसे बचा ले। सिंह की दाड़ों में आये हुए हरिण की तरह इस दुःशासन को जो छुड़ाने का यन्न करेगा, इस से पहले वही यमलोक को जायेगा। (कूद कर उम की छाती पर चढ़ जाता है । करार उसकी छाती पर रखकर) अरे नराधम. जिस समय मेरे मुख पर प्रण का ताला लगा था, उस समय 'वैल, बैल' कह कर मुझे चिढ़ाता था । उन शब्दों को कहने वाली इस निहा को अभी खींच देता हूँ। जिन हाथों से तू ने द्रौपदी के पवित्र फेश खींचे थे, उन्हें अभी तोड़ देता हूँ। ( तलवार से उसके दोनों हाथ काट देता है।) दुःशासन-भीम, इतना कष्ट देकर वध करने से क्या लाभ ! एक दम ही मेरा अंत क्यों नहीं कर देता ? भीम-दुःशासन, शारीरिक कष्ट हृदय के कष्ट से बहुत कम दुःख- दायी होता है। तुम लोगों के वाग्बाणों से छिद-छिद कर हमारे हृदय छलनी हो चुके हैं। क्या वह कम कष्ट. है जिसे हम वर्षों से भोग रहे हैं ! विपत्ति के समय कोई सहायक नहीं होता। बिल के कयों पर बढ़ कर तुम हम

( १७१ )
लोगों का अपमान करते रहे वे ही तुम्हारे महाराज
दुर्योधन और सेनापति कर्ण अब कहां हैं ?
( उस के हृदय में कटार शुभेड़ना है । दुःशासन के हृदय से
जोर से रुधिर निकलता है।)
भीम-( रक्त को पीता हुआ ) माता के दूध में, द्राक्षासव में, अमृत
में भी ऐसा स्वाद नहीं जैसा दु-शासन के रक्त में मुझे
मिल रहा है । मेरो दो प्रतिज्ञाओं में से एक तो दुःशासन के
रक्त से पूरी होगई है, दूसरी अब दुर्योधन की जांघ तोड़ कर
पूरी होगी। (कुछ सोच कर ) मेरी प्रतिज्ञा तो पूरी हो
घुकी, पर द्रौपदी को अभी शेष है। उसे भी इस दुष्ट का
चुल्लूभर रक्त अपने बालों को सींच कर घेणी बांधने को
चाहिये । (चुल्लू में दुःशासन का लोहू भर कर ले जाता है।)
( पराक्षेप)
-
चौथा दृश्य
(स्थान-कर्ण का महल, कर्ण रण के लिए तैयार हो रहा है,
शरीर पर करच पहनता हुअा ऊपर नीचे जा पा रहा है।
फर्ग-( अपने आप ) बस इसी दिन-श्राज के ही दिन निर्णय
हो जायगा। मैं निर्णय करके ही छोड़ गा कि भारत में
चलवानों में उत्तम मैं हूँ या अर्जुन । हम दोनों में से
भूमंडल पर एक ही के लिए स्थान है-एक म्यान में
दो तलवारें नहीं समा सकती। अर्जुन की विमय हो या
मेरी-इसकी कोई चिन्ता नहीं । पर अर्जुन से एक बार
लोहे के चने चयवाऊँगा । उसे पता लगेगा कि फिसी

( १७२ )
से पाला पड़ा था। जिस समय मेरे दोर्दण्ड के बल से
छूटे हुए तीर उसकी छाती में फंसेंगे तो उसे छठी का दूध
याद था जायेगा । क्या हुआ यदि उसके सहायक कृष्णा
है, शल्य भी किसी बात में किसी से कम नहीं । पर गुरु
परशुराम जी ने तो कहा था कि विजय अर्जुन......1(आवेश
में ) हो, अर्जुन की ही हो, मैं विजय नहीं चाहता, चाहता हूँ
फेवल अपने यश की ध्वजा को ऊँचा फहराना चाहता हूँ
श्राने वाली सन्तानों के मुख से कहलवाना कि सूनपुत्र होकर
भी कर्ण ने पौडुवंश-शिरोमणि सव्यसाचो से लोहा लिया
था। आज मेरे मन की अभिलापा'
(सहसा पद्मावती का प्रवेश)
पद्मावती-कैसी अभिलाषा प्राणेश्वर ?
कर्णवही अभिलापा-यही अभिलापा प्रिये, जो वर्षों से मेरे मन
में अपूर्ण ही पड़ी रही है और जो इस समय लम्बी और
कठिन तपस्या
बाद पूर्ण होने वाली है।
पद्मावती-किसी और प्रदेश का राज्य मिल गया है क्या?
कर्ण-त्रिलोकी-राज्य भी उसके सामने तुच्छ है।
पद्मावती-ऐसी कौनसी वस्तु है नाथ ?
फर्ण-अपने पराक्रम को दिखाने का अवसर । वर्षों से साधना
फर रहा था कि किसी तरह अर्जुन से साम्मुख्य हो । आज
वह सफलता मिलने को है।
पद्मावती-अर्जुन से साम्मुख्य ! जिसके दृष्टिपात से ही घोरों के
हृदय थर्रा जाते हैं, उस अर्जुन का साम्मुख्य ! जिसके
गांडीव के टंकार से योद्धाओं के हाथों से अस्त्र गिर
जाते हैं, उस अर्जुन का साम्मुन्य ! जिस देवदत्त फे
TTA

( १७३)
नाद के श्रागे सिंहगर्जन भी तुच्छ है, उस
अर्जुन का साम्मुख्य ! जिसके रक्षक स्वयं भगवान्
श्रीकृष्णा हैं, उस अर्जुन का सा मुख्य ! क्या कह रहे हो
प्रायन ! श्रापका यह वचन सुनते ही मेरी होश
ठिकाने नहीं रही!
कर्ण-कर्ण की सर्मिणी होकर तुम्हारे मुख से ऐसे वचन ! जिस
प्रकार कर्ण वीरता में अपने आपको लाखों में एक मानता
है, उसी तरह उसकी अर्धाङ्गिनी को भी वीर नारी-कुल में
अनुपम होना चाहिए।
पद्मावती-पर अर्जुन से युद्ध करना शेर के मुँह में हाय
डालना है।
फर्ण-कर्ण का वह हाथ है जिस में शेर के मुख की दंष्ट्रा
तोड़ने की क्षमता है।
पद्मावती-अपने प्राणेश के बल पर मुझे गर्व है, पर क्या अर्जुन
से लोहा लेने के विना काम न चलेगा ?
फर्ण-उससे एक न एक दिन लोहा लेना ही पड़ेगा। तो फिर
क्यों न शोय ही लिया जाय । जब तक अर्जुन और कर्ण
दोनों जीवित हैं तब तक युद्ध की समाप्ति न होगी।
पद्मावती-मैं अबला क्या जानूं इन बातों को प्राणधन ?
कर्ण---तुम अबला नहीं हो। तुम में बलिष्ठ पिता का रक्त है, तुम
बलिष्ठ पति की स्त्री हो, तुम बलिष्ठ पुत्रों की जननी हो-
तुम अबला नहीं हो सकती। अबला कहाने वाली नारियों
ने संसार में वे काम किये हैं जिन्हें बलिष्ठ से बलिष्ठ
मनुष्य सम्पादन करने का साहस होलहों कर सकते ।

( १७४ )
स्त्रियों की सहनशोलना जगत्प्रसिद्ध है, तुम्हारे लिये भी
उसके प्रदर्शन का समय आ गया है प्रिये ! मन छोटा न
फरो। तुम कर्ण-पत्री हो।
पद्मावती-प्राणाधार, श्राप के वचनों से मेरे हृदय में वीररस का
सागर ठाठे मारने लगा है। जी चाहता है कि आपके
शरीर का कंचुक बन कर अपना जीवन सफल बनाऊँ।
(जाकर एक पुष्पमाला लाती है और कर्ण के कंठ में
पहनाती है।)
इष्टदेव, जो मन पहले अनिष्ट शङ्का से विक्षुब्ध हो रहा
था वहीं श्रापके गले में यह माला पहना कर श्रापको,
रणभूमि के लिए विदा करने को उत्सुक हो रहा है ।
i-अब तुम कर्णमाया हो। प्रिये, शायद यह हमारी अन्तिम
मेंट हो!
पद्मावती मेरे वीर स्वामी, शरीर का सम्बन्ध चाहे टूट जाय,
पर हमारी थात्माओं के सम्बन्ध को कोई शक्ति नहीं
तोड़ सकती। नाथ, मुझे आपकी वीर मृत्यु
और
वीर विजय दोनों पर गर्व होगा। श्राप ने ही तो कहा
था कि मैं वीरपुत्री, वीरजाया और वीरप्रसू हूँ।
फर्ण-ईश्वर, मुझे शक्ति प्रदान करें कि मैं तुम्हारे इन उमविचारों
के अनुरूप बन सकूँ।
(पद्मावती की और देखता देसता चला जाता है।)
पद्मावती-चले गये, शायद मदा के लिये चले गये ! जिस अर्जुन
के सामने भीष्म, द्रोण, श्रादि न टिक म उस फै
सामने । यह मैं क्या सोच रही हूँ। उनके विषय

में अनिष्ट भावना ! नहीं, नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।
- एक अर्जुन तो क्या हज़ार अर्जुन भी मेरे वीर स्वामी
का मुकाबला नहीं कर सकते । पर अर्जुन के
सहायक ..."( सोच कर ) होने दो, एक क्या
सौ कृष्णों को भी उसे सहायता क्यों न मिले, किंतु मेरे
स्वामी की तुलना-शूरता में, दानिता में, धीरता में
कोई नहीं कर सकता।
ईश्वर मेरा सौभाग्य अटल".
(एक भिक्षुक का प्रवेश)
भिक्षुक नहीं रह सकता।
पद्मावती-भिक्षुक, तूने क्या कह डाला-मेरे धैर्य के बांध को
तोड़ दिया है । ( अपने आप ) इस भिक्षुक का वचन कहीं
अष्टोक्ति न हो।
भिनुक-कर्ण के द्वार पर श्राकर मैं भूखा नहीं रह सकता।
(पद्मावती बहुत मा भोजन लाकर भिक्षुक को देती है।)
पद्यावती--भिक्षुक, मेरे पति को दीर्घायु के लिए ईश्वर से
मार्थना करते रहना।
(भिक्षुक जाता है।)
गाना
भवलों के रसदार हो।
करणानिधान जगदीमा विमो, अयला के रखवारे हो।
मैया मंझधार परी, अप दिसेन पारावार.
ले पतवार रया-काणा की उसे लगा दो पार

माग गुमही miti
भर कीर गुनी मुरम.मि र निधार
মা , খ ২৫ বিশ্ব মা ,
हप-मगिरनिगाहो।
भरमा
+kada.ma.
भविपीRE जर रमे
मुष
मंहार
HARI रहममेरिया मग उदार
दुम मम मौसमरहो।
भाली......
( गागा
पांचवां ण
स्थान पाममि, कर का रस पाता है। उसमें कर और उसम्म
सारमी शल्य बैठे हैं।"
फर्गा-सारथी, रथ को यहीं खड़ा करो। जिस समय अर्जुन अपने
शिविर से निकलेगा तो यहीं रोक फर उससे युद्ध फलंगा ।
शल्य-कर्ण, अर्जुन से युद्ध करने का साहस न परो । म जान
पड़ता है कि तुम्हारा अन्न निकट है। श्राम तक कभी
गाल ने भी सिंह का वध किया है ?
का--शल्य, मालूम होता है तुम शत्रु से मिले हुए हो, नहीं तो
1

( १७७ )
मुझे कर्तव्यभ्रष्ट करने के लिए ऐसे वचन न कहते ! मणियों
के पारखी को ही मणि को परख होती है-मेरे बल का
ज्ञान अर्जुन को है, तुम्हें नहीं।
राल्य-अर्जुन को श्राने दो राधेय । जिस समय अर्जुन के गाँडोव
से छूटे हुए वागा तुम्हारे रक्त के पिपासु हो कर तुम्हारे
पीछे दौड़ेंगे और तुम्हें अपनी देह छिपाने को कोई स्थान
न मिरनेगा, उस ममय तुम पछताओगे।
(रथ पर चढ़े हुए कृष्णसहित अर्जुन का आना)
लो तुम्हारा काल सामने ही पा रहा
कर्ण-अर्जुन को देख कर मेरा हृदय वासों उछलने लगा है।
मुझे विजय-पराजय की कोई चिन्ता नहीं । चिन्ता है केवल
अर्जुन के साथ लोहा लेने की । (जोर से ) अर्जुन, मैं
कभी फा यहां खड़ा तुम्हारी बाट जोह रहा हूँ।
अर्जुन-सूतपुत्र, मैं भी तुम्हें कभी का खोज रहा हूँ।
(अपना रथ उसके पास लेजाता है)
शल्य--सहों में रहना हुअा गीदड़ अपने आपको नच तक सिंह
समझता रहता है जब तक सिंह का मामना नहीं होता।
नरशृगाल, तुम अर्जुन के गर्जन को सुनते ही दुम दया
कर भाग जाओगे।
अर्जुन-(ऊँचे रवर से ) अर्जुन के हाथ से कर्ण को बचानेवाला
संसार में कोई नहीं । जिस पापो के पापभार से चंसु-
धरा दयी पड़ी है, उस कर्ण को मार फर में उसका वोम
दलका करूंगा।
फर्ण-अर्जुन, यह शस्त्रों का युद्ध है, बातों का नहीं।

अर्जुन-पने e rilो मन ETE X में
(iiit ke * मरि परेको
करन-अर्जुन, मुम्हारे जिन गायों ने शहा और आगा
महायोग को भी परत किया था, दो सान बर्ग
प्राग ऐम निषा होग में जांधी का ग मानव
सामने ।
अर्जुन --राधेय, गुन्हें गानूम होना पानिए कि अर्जुन का नूगीर
पदाव्य है।
मर्ग-भूगीर अक्षम्य होगा, पर न तो अन्य नहीं ।
(गार मा में नाग को हैं)
मेरे नाग मुम्हें इसी पणा मार देंगे।
अर्जुन-तुम्हारे नागों को मेरे गरड़ या प्रायेंगे।
(ममा att उगी धग भागों को मार है।)
कर्ण-यद अल निष्फल हुआ तो क्या, श्रय शमसे न पचने
पाओगे। ( भागार पलाता
है, निश से नारों और अग है।
भाग दिकाई देती है।
अर्जुन-मेरा यह अन इस अपि को ही नहीं बलिक तेरे प्लदय
की अग्नि को भी अभी शान्त किये देता है । ( सारणास्त्र
चलावा निम से वरूप जल से सारी भाग जातो है।)
शल्य-सारथीपुत्र, प्राज प्रहदशा तुम्हारे विपरीत है । अर्जुन के
हाय से आज तुम नहीं बच सकतं ।
4

( १७६ )
कर्ण-शल्य, तुम्हारी बातों से मैं उत्साहहीन होने का नहीं।
क्षत्रियधर्म निष्काम युद्ध है, जय-पराजय ईश्वराधीन है ।
(लगातार इतने तीर छोड़ता है कि अर्जुन दिखाई नहीं देता )
--अर्जुन, कर्ण का बल बढ़ रहा है । इसे इसी समय मारने
में कुशल है।
अर्जुन -यह बाण कभी निष्फल न होगा (बाण चलाता है जिससे
कर्ण का मुकुट कट जाता है।)
शल्य-कर्ण महाराज, मुकुट का फटना महा अपशकुन है। तीर
की नोक ज़रा और नीचे होती तो श्राप की गरदन अब तक
साफ उड़ गई होती । खैर, अव नहीं तो फिर सही । अर्जुन
की दृष्टि आप की गरदन पर पड़ गई है, अब इसकी
कुशल नहीं।
कर्ण-शल्य, तुम्हारा काम घोड़ों की रास पकड़ना है, उसी
कर्तव्य का पालन करो।
शल्य-मैंने तो आज रासें पकड़ी हैं, पर तुम्हारे पुरुखा कब से
इन्हें पकड़ते आये हैं।
( अर्जुन का एक और बाण कर्ण का करच तोड़ देता है।)
अव बाण को हृदये में घुसने में कोई रुकावट नहीं रही।
देखना यह है कि पहले सिर कटता है कि हृदय ।
कर्ण-शल्य, मुझे पता न था कि तुम मेरे आस्तीन में सांप हो।
(अर्जुन का एक और नाण उसके रथ की ध्वजा को कार देता है।
कर्ण शल्य को रथ घुमाने को कहता है पा रथ चल नहीं सकता)
शल्य-घोड़े इतना बल लगा रहे हैं, पर रथ घूमने नहीं पाता।
कर्ण-देखिये तो कारगा क्या है ?

जय () स्यायामां पक भूमि में गया है। कम Kitare it ) RAP कामा ! मातम होता है माणु का मग मिट गया है। (५) मन, देशयोग से मेरे का पहिया पानी में | ग. जागा इसे निकालने का समर मुझ नी । समिधर्म यह ঞ্চি নির্য যাদু মঙ্গার বন্য পাৰি। श्री राधय, भाग मुझ तुम्हारे मुख से 'धर्म' शब्द निध- मना मन कर यहा विस्मय मा यमं पर पाने में लिये मुम अर्जुन को कह रहे हो तुम्हारा धर्म पर पाया में द्रोपदी व माप अत्यार होते देख कर तुम मर जिम समय पृट पास पना कर शनि को महाराम युधिष्ठिर से पूत बलने की अनुमति दी थी उस समय तुम्हारा धर्म कहां था ? ल से पांडवों को लाभगृह में गलाने का पड्यन्त्र रचते समय तुम्हारा धर्म कहा था ? जय श्यले कुमार अभिमन्यु का और महारथियों के साथ मिल घर पर किया था, उस समय पर्म कहा था, ? अब तप धर्म का विचार नहीं किया नोय धर्म का पल्ला पकड़ कर विपत्ति फे दल दल से क्यों निकलना चाहते हो ? सारथीपुत्र, इस समय धर्म धर्म चिलाना तुम्हारी कायरता है, अपनी देह को यचाने का एकमात्र यहाना है। (कर्ण सत्र से सिर लाने करना है।) कर्ण-कृष्ण, तुम अर्जुन के विचारशून्य पक्षपाती हो, इसलिये ( १८१ ) भगवान परशुराम से दिये हुए इस अस्त्र से अर्जुन के साथ तुम्हारा भी क्ध करता हूँ। (परशुराम का दिया अस्त्र निकालकर चलाना चाहता है, पर उभे चलाने की रीति को भूल जाता है।) गुरुवर ने भी बड़े आड़े समय में साथ छोड़ा है ! उनका शाप सत्य हो रहा है। कृष्णा-अर्जुन, यही समय है कर्ण को मारने का। अर्जुन-(एक अस्त्र निकाल कर) यदि मेरे किये तप का कुछ फल है, यदि मेरी गुरुभक्ति और वृद्धसेवा निष्काम रही हैं, यदि मैं योगिराज कृष्ण का अनन्यचित्त भक्त हूं, तो मेरा यह बाण कर्ण का तन फोड़ कर पार हो जाये। (बाण छोड़ता है। बाण कर्ण के हृदय को गौर कर पार हो जाता है। कर्ण गिर पड़ता है। पांडवपक्ष में 'अर्जुन की जय', 'गांडीवधारी कुन्ता- पुत्र की जय' के नारे लगाते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन का रथ पांडव- शिविर की और और शन्य कर्ण का साली रथ कौरवशिविर की ओर ले जाता है।) शल्य-( रथ में जाता हुआ, अपने आप) कर्ण के वध का बहुत पुछ उत्तरदायित्व मुझ पर है। मैंने जो प्रण युधिष्ठिर जी से किया था उसका पालन मेरा कर्तव्य था। श्रय में प्रणमुक्त हूँ। संभव है युद्धसंचालन का भार अब मुझ पर हो आपड़े । और पीछे रहा ही फौन है ! यदि कर्ण का पद मुझे सौंपा गया तो इस युद्धानल में अपनी देह की आहुति देकर स्वर्गस्थित कर्ण को तृप्त करूंगा, उसके वध करवाने में पाप वा प्रायश्चित्त करूंगा। कर्ण वीर था, लाखों में एवं गा। निधन बिभिगों से गहने भी कर कभी नारा नहोला । माने पाया रे ग पर भीग, पर्जुन- ममान गयीर योदाममा टपर लेने को उपर रहता था। भीष्म उमर विन्द , आवायं उम को मदा कोमने रहने , रागमन्त्री बिदुर को उसे लाट रहती थी, नो मी या लक्षित मार्ग में कमी नही विचलित हुमा। उसका एक दो समय, एक ही समस्या, एक ही ध्येय था--अर्जुनारीरिक गम्ध्यिों पर उम . का पूर्ण अधिकार मा पर मोदेवी शनि उप विरुद्ध थी, उगपर मास मा किसने विभय पाईजो यद विभय पाता! इमलिये में अपने ध्येय में सलमान मिली। मैं तो মণবা কি ? পাপা মা পা ধা বাচ্চা है। गणं मरा नहीं, जीवित है-संसार में सदा जीवित रहेगा। उसका भीका पोरों का आदर्श होगा और उसका नाम धीरता के इतिहास में सदा मुवणांपरों में लिखा रहेगा। (जाता है) (रोमीx Vा भार भरिक पा मवेर) राधा-कहां है मेरा लाल? फर्या-(मीन परया में) माता, मैं यहां पड़ा हूँ । (TNI भागती ot उसके पास जाती है । उसका सिर अपनी गोद में लहर) यंटा, तुम्हारी यह दशा! रेशमी पिझोने पर सोने वाले महाराज कर्ण की यह दशा !! दिग्विजयी अंगराज की यइ दशा!!! फर्ग-माना, यह समय हर्प का है, ग्वेद का नहीं । वीर पुरण को यही शय्या शोभा देती है। मैं धन्य हूँ माता, कि मुझे अन्त ।

(२-३ )
समय में भी तुम्हारे चरणरज को माथे पर चढ़ाने का
सौभाग्य मिला है ( उठने का यत्न करता है।)
राधा-(अत्यन्त स्नेह से विहल होकर ) मेरे बेटा ! मेरे लाल !! (उमके
गले से लिपट जाती है।)
(सहसा कुन्ती का प्रवेश)
फुन्ती-(रोती हुई) कर्ण ! येटा कर्ण !! कहां हो ? मैं कुन्ती, तुम्हारी
माता तुम्हें खोज रही हूँ।
फर्ण-(धीमे स्वर में ) माता, मैं यहां हूँ।
(कुन्ता भागसी जाता है और कर्ण का सिर राधा को गोद से लंकर
अपनी गांद में कर लेता है । कर्ण दोनों हाथों से उसे प्रणाम करता
है और आंखें सदा के लिए बन्द कर लेता है। कुन्ता रोनी है।)
राधा-तुम कौन हो बहन ?
कुन्ती-मैं तुम्हारी बहन हूँ । कर्ण की माता हूँ।
राधा-कर्ण को माता ! (दीर्घ श्वास लेकर ) मुझे कर्ण की मृत्यु
फा इतना शोक न होता यदि मैं शेष आयु इस भाव को
हृदय में लिये बिता सकती कि मैं ही उसकी माता हूँ।
पर अब तो तुम ने कर्ण और मेरे मध्य में एक बड़ी दीवार
खड़ी कर दी है।
धुन्ती-बिलकुल नहीं राधा, तुम ही कर्ण की माता हो । मैं उस
की जननी थी, माता नहीं; तुम जननी नहीं, पर माता हो।
तुम्हारा पद मुझ से कहीं ऊँचा है।
राधा-जो भारी बोझ तुम ने मेरे हृदय पर रखा था यन, उसे
तुमने स्वयं उठा लिया है। अब मैं कर्ण की स्निग्ध
को हृदय में छिपाये शेष जीवन भी शान

मांगी। पर मारा नाम पूरना ना भून होगा?
पुन्नी--नाम मागरमा जोगी?
अभिय-गी भारी भी पासी था और मतभी पहनी ही रहा ।
पर भी नहीं मा गादिया, श्रीमान भी। (ग)
पतो, छप गलें।
राधा-पलने पं. मिया और गारा हो गया है।
(Risit)
(iii भा)
पुन्नी-मन नहीं मानता, इममा मंग मोड़ने को भी नाही
चाहना । ( मासिर गोर ) पटा, मैंने तुम्हारे
साथ यड़ा अन्याय-पोर अन्याय घिया है। इसका मुझे
अस्यन्न पशाताप हो रहा है । जो पहना है-दमी
मुन्दर मुग्य को गोद में लिए रोष प्रा यही पिता ।
(कण के मुत्र की मार देर कर ) कमी मुन्दर मुमम्यान ! मेरे
लाल ! मेरे धीर पटा!! (रोती है।)
(फ और में कृष्ण, पाठe, भीम, अर्जुन और महादेव
आन है और वो ही आते हैं।)
युधिष्ठिर-नफूल को खोजतं इतना समय हो गया है पर अब तक
यह नहीं मिला। कहीं कोई......
श्रीगा-अनिष्ट को कोई शंका न करो युधिष्ठिर , ! यह अभी
धाता ही होगा।

नकुल?
युधिष्ठिर-शकुनि को मार आये ? शाबास बेटा। इस युदानल
अर्जुन-मैंने सुना है कि वह द्वैपायन हद में छिपा बैठा है ।
श्रीकृया--जब भीष्म, द्रोण और कर्ण से न रहे तो वह बेचारा
कहां बचेगा! फिर भीम-का प्रगा कहीं अपूर्ण रह
युधिष्ठिर-द्रौपदी को अभिलाग अक्षरश: पूरी हो रही है।
फुरुकुल-भवन, के सारे स्तंम एक एक कर गिरग
है। तीन दो टूट ही गये है, फेवल एक ही शेष रहा
अर्जुन-मुझे विजय की दुको शो है ही,
पर जितनी उसे
(१८५)
सहदेव-मैंने सुना है कि वह अत्रों से सुसज्जित होकर शकुनि को
खोज रहा था।
(सहसा नकुल का प्रवेश )
नकुल-( अपने आप ) उम पापी को खोज कर अाखिर मार ही
डाला। सारे अनर्थ की जड़ वही था।
कृष्ण-( नकुल को देग्य कर ) किसे खोज कर मार डाला
नकुल-( उन सब को देख कर और हाथ जोड़ कर ) इमी पापी,
अंधी शकुनि का अन्त कर पाया हूँ ।
में पूर्ण पाहुति दुम्हारे हाथ से पड़ी है।
भीम-अभी पूर्ण पाहुति कहाँ ! पूर्ण पाहुति तो मैं दुर्योधन की
डालूंगा। जब तक वह जीवित है, युद्ध समाप्त नहीं हो
सकता है !
उस दुष्ट का...
सकता।
है, वह भी अब निरा गिरा।

Ratiny ja, पण ऐ. मिपा न कहो। पुषितिर-- * a fime) मात, माा पर्न ( 47 ) आरकी गोद में कार जंगपांरपान से शोर मचा मिर पाया की गला की ...... गुन्गी - गुग्दारी मद का भी गोर का अधिकारी है। गुधिष्ठिर का माराय? कुन्ती मेरा घटा था, गुग गरका प्रम मा। मुंग-माता ! गुली--गिय को कोई पात नही भेटा, भो मैं पादरही बिज- पुल सत्य है। युधिष्टिर-माना, सुगने दम यहा अन्याय किया है जो श्रय मक यह भेद दिपाया है। अर्जुन-यदि यह पता होता की कर्ण इमारा अपज है, तो इम रागपष्ट को, जिस के लिए इतनी मार-काट हुई है-उभी के चरणों में अर्पण कर हम उस के सदा किंफर यन कर रहते । युधिष्ठिर-या कर्ण को भी इसका पता था ? कुन्ती -~~पता हो गया था, पर यहुन र फे यार, जय उसके लिए फौरवपक्ष छोड़ना असंभव हो गया था । थेटा, प्रांसों पर शत्रुभाव के कुत्सित प्रावरण होने के कारण तुमने बास्तविक

( १८७ )
कर्ण को नहीं जाना । वह शूर था, उत्साही था,
दानी था, और अपने प्रणा का पका था। सारथी के घर
पल कर-उसी का पुत्र कहला कर कौरवदल में महारथी
का पद पाना उसी का काम था । जहां एक ओर तुम
जैसे वीरों का उसे मुकाबला करना पड़ता था, दूसरी
ओर उसे भाग्य के साथ भी लड़ना पड़ता था। पर आज
तक भाग्य के सामने कौन टिक सका है जो वह टिकता!
युधिष्टिर-इस विजय के कारण जो हर्प और उल्लास हमें हो रहा
था, वह एक दम लुप्त हो गया है।
अर्जुन-मेरी अन्तरात्मा मुझे अब ऐसे भाई की हत्या के लिए
धिकारने लगी है। हमारी विजय भी पराजय है।
श्रीकृष्ण-धर्मराज, विपाद छोड़ो । जो होना था हुआ है। भवि-
तन्यता प्रबल है-उस के आगे सब को झुकना
पड़ता है।
युधिष्ठिर-सत्य है जनार्दन, भवितव्यता के आगे सब को झुकना
पड़ता है। हम भी सब उसके आगे झुकते हैं।
(पटाक्षेप)

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यह हिन्दी का पहला व्याकरण है जिसमें व्याकरण विषयः का विवेचन पर्याप्त विस्तार और शास्त्रीय ढंग से लिया गया है, जिसमें हिन्दी-भाषा-विज्ञान पर भी संक्षिप्त विचार प्रकट किये गये हैं और राजस्थानी, अवधी तथा प्रजभाषा फेव्यामरण पर भी यही विद्यार्थियों की सबसे बड़ी मांग है जिन्हें प्राचीन काव्य- हिंदी भूषण पराक्षा का सहायक एस्तकें व्याकरण-प्रदीप --प्रो. रामदेव एम. ए.]. [ले. - साहित्य का भी अध्ययन करना होता है । इसकी इसी विशेषता को देखकर पंजाय यूनिवर्सिटी ने इसे हिन्दी Nan किया है । मूल्य १) . हिदीं भूपण परीक्षा की सहायक पुस्तकें हिन्दी माहित्य से इतिहास की प्रश्नोत्तरी EHI m ] : TEAX में दिली मानिsm zऔर ना में, कप में REATा है। परीक्षा में पूरे भने पाटे मार मी मू1) श्राज की दुनिया की प्रश्नाची [--TEAn] इस yिा. पर में पूर्व गाने पाने मान... मयंशी मी मारिन और Trek जोकोक्तियों और मुहारे List सादा ऐ२. ५., म. मी. एस., टी. हि.] हमने मोतियों और गुमाशों के अर्थ तथा उनको अपने पायों में जिम मरद प्रयोग रिया मा है. यह मम मनी भांति निग्माया गया है। पाले, मीमरे और एटे पत्र . लिए अत्यावश्यक पुम्सका मू. मात्र। हिन्दी-भूषगा-निबन्धमाता (Aधा शुरयास अपना साहित्यरय, सेठिया काले, कामेर) इम पुम्नक में हिन्दी-भूषगा परीस में पिणे १०-११ यों में पाप हुए लगभग ४५ पिरयों पर विस्तृत नियन्ध और लगभग इतने ही साफ ( outhues) दिये गए हैं। भाषा शुद्ध और सरल है। पृष्ठ मरन्या ३५० से भी अधिक और मूल्य पवन १) नियन्ध फे पत्र में दी सर से अधिक विद्यार्थी फेल होते हैं इसलिए इसकी एक प्रति अवश्य खरीदिए। हिन्दी-भूपरण-प्रश्न-पत्र उत्तर सहित (संपारा-श्री रामप्रसाद मिश्र विशारद) हिन्दी भूपग परीक्षा फे. पिद्रले सालों के प्रभ-पत्र उत्तर सहिन दिये गये हैं। प्रत्येक विद्यार्थी को इसकी एक प्रति अवश्य लेनी चाहिये । मूल्य १-)

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Sarthi Se Maharati

Author
Shastri,sant Gokul Chandra
Title
Sarthi Se Maharati
File name
Sarthi Se Maharati
Text
OCR done
Citation
1940
Published
2011/04
Publisher
Lahore,nili Baar Press
Language
Sanskrit
Pages
196
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
552321
Barcode
4990010033063.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
l8bHCaRfUs6
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