Adarsh Library, Jaipur

Utradhikar Jarasindh

2011/01

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UTTRADHIKAR ( NOVEL ) BY JARASANDH
आवरण : इम्पैक्ट, इलाहावाद
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अनुवादक : छेदीलाल गुप्त
मुल्य : अठारह रुपये
© लेखक
प्रथम संस्करण : १९७६
गिरीश टण्डन द्वारा साहित्य भवन (प्रा०) लिमिटेड, ६३ के० पी० कक्कड़ रोड,
इलाहावाद के लिये प्रकाशित तथा अलंकार मुद्रणालय, जवाहर स्क्वायर,
इलाहावाद द्वारा मुद्रित ।
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यह उपन्यास 'उत्तराधिकार' उपन्यास विद्या मे एक नया सफल प्रयोग है । जरासध जी स्वय भी इस कथा के गढने मे अपनी पूर्व परिचित राह छोड कर नई राह पर चलते नजर आते हैं। इस उपन्यास मे उन्होने एक नई मान्यता स्थापित की है-इतिहास अपने को दुहाता ही नही है, कभी-कभी इतिहास प्रतिशोध भी लेता है। शरणार्थियो की समस्या को लेकर और जमीदारी प्रथा के टूटने की प्रक्रिया से जोड़ कर आप ने एक नई बात पैदा की है। यह उपन्यास सर्वथा नई भूमि पर, नई शैली मे, नई समस्या लेकर, नई सवेदना के साथ लिखा गया है जो अपश्य ही पाठको को प्रिय लगेगा, इसी विश्वास के साथ हम यह कृति प्रकाशित कर रहे है । -प्रकाशक

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. उत्तराधिकार

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F-1162 ॥ १ बायें हाय से रेलिंग पकड़कर आहिस्ते-आहिस्ते बहूरानी कार चढ रही थी। अभी थोड़ी देर पहले सीढी की पटरियां धोई गई थी। पानी अच्छी तरह पौधा नही गया या । खूब सफाई के बाद भी यहां यहां कुछ-कुछ मैन जमी रह गयी थी । उस पर निगाह पड़ी कि भौहें सिकुड़ गयी। अमिनीत उनके पीछे चल रहा था। बहूरानी उसकी और मुसातिब होकर बोली, “लाला, जरा समल कर चढ़ना । कही पैरन विठ्ठल जायें ... सब के सब कैसे हो गये हैं । जांगरचोर!" सोढी पर पैर पड़ते ही अभिजीत का मन मनमना सा हो गया। बहूरानी के कहने पर उसकी अनमनस्कता टूटी । यो ही मुस्कुरा कर वह बोला, "हूँ-ऊ, अच्छा।" सीढ़ी पर मोड लेो ही सामने से चामियों का गुच्या निए दौड़ता हुआ हलघर आता दिखाई पड़ा । यह उन्हें देखकर दीवाल से सट कर खड़ा हो गया। बहूरानी बोली, "दरवाजे और खिडकियां, सब की सब खोल दी गयी है न ?" "कहां, ताला ही नहीं खुलता।" "क्यों ? धामी नहीं मिली क्या ?" "मिली, मगर टस मस नहीं होती । मोरचा लग गया होगा।" "यह तो कोई खराबी नही है ।" वहूरानी उदास होकर बोली । सीडी के घुमाव पर की चौड़ी पटरी पर सड़ी होकर सुली खिड़की से कई मिनट बाहर ताकती रही। फिर आवाज में सहजता लाती हुई वोली, "वैसे क्या होगा !" "बिना ताला तोड कोई चारा नहीं । किसी मिस्त्री को पकड़ कर लाना होगा।" "उहं, वह क्या यही मिल जायेगा! उतनी दूर बाजार जाना होगा । तब तक तो "वाजार क्यो ! यही बगल में ही है।" 'यही!" "हाँ, रिफ्युजी-बस्ती में, वहां है क्या नही !" ...

१० उत्तराधिकार 'नहीं, नहीं" बहूरानी के चेहरे पर शंका घिर आयी। वह बोली, "मुनीम जी को पता चल जायेगा तो कुरुक्षेत्र मच जायेगा।" "उन्हें पता चलेगा तव न ! चुपचापं खिड़की से बुला लायेंगे। दो हथौड़े में ती ताला टूट जायेगा।" कहते हुए हलधर पुर्ती से नीचे उतर गया। उसकी आँखों और होंठों के कोने में एक ऐसी हँसी चिपकी थी, जैसे बड़ों से छिपाकर कुछ करने जैसा काम किये जाने पर छोटे हंस दिया करते हैं। अभिजीत भाँप गया। कुछ तुनुक कर बोला, "लगता है उनका यहाँ आना मना है ! । 3 "विल्कुल ! उनकी छाया भी पाप है। मगर उनका भी क्या दोष ! पर हैं सव के सव बेतुके । न कुछ पूछ, न ताछ, अचानक टिड्डियों की तरह झुंड के मुंड आ बसे । अरे, बगीचे के मालिक-मुख्तार से पूछ तो लिया होता! माना उस समय मुसीवत में फंसे थे, बाद को पूछ लेने में ही क्या हर्ज था ? रातो-रात खूटी-खम्भा गाड़कर मौज से जम गये । मानो यह उनके सात पुरखों की जमीन हो । 'छोड़ो, यह महाभारत तो धीरे-धीरे सुनोगे ही। मुनीम जी ही सव कहेंगे।" और वे वहीं से लौटने का इरादा कर के वोली, "तो अभी अव ऊपर जा कर क्या होगा ! कमरा खुले, झाड़-बुहारू हो ले, तो आ जायेंगे।" सीढ़ी के छोर पर मेंहगनी की लकड़ी का वजा-सा फाटक था। उसके किवाड़ के काले रोगन वाले पल्ले में कभी चेहरा देखा जा सकता था । अव तो वह चमक उड़ गयी है। फाटक के पार लम्बा-चौड़ा छज्जा है। छज्जे के एक तरफ कतार से कमरे, सब के सब बन्द । हर के दरवाजे पर अढ़ाई-अढ़ाई सेर के मोरचे लगे ताले भूल हैं । दूसरी ओर चौड़ी छत, जिसके तीन तरफ की रेलिंग वारीक नक्काशीदार है पर वह जगह-जगह से टूट चुकी है और बदरंग हो गयी है। छज्जे पर भी सफाई हुई थी लेकिन पूरी छत पर धूल, खर-खरके, चिड़ियां-चुनमुन की पांखे विखरी थीं, जिसके नीचे काई जमी थी। अव चारो तरफ देखने के बाद अभिजीत ने कहा, "लगता है बहुत दिनों से यहाँ कोई आया ही नहीं।" बहूरानी ने तुरंत कोई उत्तर नहीं दिया। छत की ओर दृष्टि गड़ाए चुप खड़ी रहीं। और जब कहा तो कुछ ऐसी कुम्हलाई आवाज में, कि लगा दूर जैसे बहुत दूर से आवाज आ रही हो। कहनी नहीं, स्वगत-उक्ति हो, "उधर तुम गये, इधर महल का द्वार बन्द हुआ, सो तब से घरवाले ने एक दिन को भी इधर मुंह नहीं किया। वे कमी फमार आ जाते थे, युद खड़े होकर नौकरों से झाड़-बुहार कराते थे। यह भी कई वर्प तक ही। इसके बाद वे भी चल बसे । वस, तभी से जो सव वन्द हुआ तो वन्द ही पड़ा । संझौती जलाने भी कोई नहीं आता।" - उत्तराधिकार ... कुछ पल सुप्पी और फिर फैली हुई दूरियों की ओर हाय उठा कर बोली, "इस सडक से गाडी जब गुजर रही थी, उस समय अपने कमरे को सिडको पर मैं खड़ी थी। सुले दरवाजे से सव दीख रहा था, तुम इस बगल सिर लटकाये बैठे थे और उनका बांया हाय तुम्हारे कन्धे पर पड़ा था। यह पया कल की बात है ! अरे अट्ठारह-उन्नीस वर्ष बीते । क्यो इतना ही न !" बहूरानी अपने देवर का मुंह निहारने लगी। सुदूर अतीत की यादों की गहरी छाया से मलिन उनकी आंखे बोझिल-सी लगी। अमिजीत कुछ नहीं बोला। धीरे-धीरे छत पर बढ़ गया । बहूरानी व्याकुल हो उठी, "नही, उधर न जामो, बहुत बिछलन है।" अभिजीत यह सुन पाया हो, ऐसा लगा नहीं। खोया सा और भी आगे बढ़ रेलिंग के निकट जा पहुँचा । बहूरानी ने पुर्ती से उसका पीछा किया । उसे सतर्क करते हुए कहा, "लाला उधर न जाओ, पुरानी लकडी है, किस जमाने की 1" अमिजीत एक कदम पीछे हट आया । बहूरानी कुछ क्षण सामने ताकती रही। बोली, "देस तो रहे हो न? वाग तो वाग, पूरा मैदान दखल कर बैठे हैं। नाम रखा गया है 'जवर-दखल कॉलोनी' यानी जो जबरदस्ती दखल किया गया हो । यह तो इससे ही सिद्ध है । मुनीम जी का ख्याल था किये लोग कुछ स्थिर हो लें तो कोई रास्ता निकले पर उसका तो कोई लक्षण ही नजर नहीं आता।" यमिजीत चुपचाप बस्ती की ओर देखता रहा। वेडे के किनारे-किनारे फैली थी फूलों की बगिया । दस बीघे तक । अधिकारियो के जमाने में सब हरा-भरा था। गिरते दिनो से उनका ध्यान शायद इस ओर नही रहा और जब वे रहे ही नहीं तो फूली की जगह जगली पौधो ने ले लिया या यो कहा जाय कि वाग को ढकेल कर जगल ने अपना अधिकार जमा लिया। चारो तरफ का घेरा जो यहां-वहां से महरा गया है, वही 'जवर-दखल' करने वालो के लिए यह भी एक सुविधा ही है। सिर्फ बाग ही नही, चार सौ बीघे पर उन्होंने अपना कब्जा कर लिया है। भादो को गगा जब किनारे तक भर आती तो फैली-पसरी धूसर धरती के विस्तार पर गेरुआ छटा अभिजीत की आंखो मे तैरती रहती थी। कमी वह इसो छत पर खडे होकर मुग्ध-मन यह सब देखा करता था। उस दिन के उस अपरूप रूप को याद पाते ही उसके मन मे टीस हुई। हरी-हरी लोमल घास से ढंकी धरती की देह मे जैसे घिनौने घाव के चकत्ते बन गये हैं । इधर-उधर, यहां-वहां मिट्टी के तेल के कनस्तर से बने, खपरैल से छाये घर, ताड के पत्तो का बेडा, फटे टाट का घेरा, मूडो का देर, गिट्टियो की ढाल, कीचड ! इसी मे ढेर सारे नगे-अधनगे लोग गिलबिला रहे है ! यह क्या इसान है-भगवान को श्रेष्ठ रचना !

१२ उत्तराधिकार अभिजीत की आँखें वस्ती की ओर से हट गयीं। इतना दीन-हीन, दुर्दशाग्नस्त, महा रूप उससे देखा न गया। इतने दिनों वह जहाँ था, वह भी यही देश था-भारत- वर्प । गरीवी वहाँ भी थी, पर वहीं से इसकी कोई तुलना ही नहीं हो सकती। "पीछे से ठोंक-ठाक की आवाज आयी । वहूरानी ने कहा, "लगता है मिस्त्री आ गया । दिन भी चढ़ आया है । इधर का काम होने दो, हम लोग नीचे चलें, कम से कम तुम कुछ मुंह के डाल तो लो ! लोग आने लगेंगे तो मौका नहीं मिलेगा।" पहला कमरा बहुत बड़ा है, एक विराट हाल। उसके सामने उन लोगों के पहुँचते ही मिन्त्री ने अपने हाथ की हथौड़ी जमीन पर रख दी । फिर दोनों हाथ जोड़ कर भुक गया और नमस्कार किया। वहूरानी ने पूछा, "तुम यहीं, इसी बस्ती में रहते हो ?" "हाँ रानी मां, रह क्या रहे हैं किसी तरह साँस ले रहे हैं।" हलधर ने पूछा, "तुम्हारा घर किस सड़क पर है ?" "अरे यही क्या तो'''लड़कों ने सड़क का कुछ नाम रखा तो है, पर ठीक से मालूम नहीं।" "यहां की सड़कों का नाम भी है ?" बहूरानी ने अचम्भे में डूबकर पूछा । हलधर ने बताया, “बहूजी, यह जो कटी-फटी सड़कें दीख रही हैं न, उनके हर नुक्कड़ पर तख्ती लटकी है। उन तख्ती पर कोलतार पोत कर खड़िया से नाम लिखा गया है। किसी का नाम देगप्राण शसमल रोड है और किसी का नेता जी सुभाप - एवन्यू।" "अच्छा !" वहूरानी को हँसी आ गयी । मिस्त्री झेप गया । अघा कर वोला, "यह सब काम लड़कों का है।' हलवर की खबरों की झोली में कुछ और भी मजेदार खबरें थीं, जिसे वह मौका पाकर रखे विना रह न सका, "तो उधर जो नयी सड़क बन रही है, उसका नाम होगा शंभूचरण राजपथ । यह वे ही आपस में वतिया रहे थे।" इस नाम के कोई नेता या प्रसिद्ध व्यक्ति हुए हैं, यह अभिजीत नहीं जानता था। इसलिए उसने पूछा, "वह कौन है ?" "वही", बहरानी ने अर्थपूर्ण दृष्टि से देवर की ओर देख कर कहा, "उसी के इशारे पर तो यहाँ के लोग उठने-बैठते है।.."छोड़ो, ताला टूटते ही फौरन कमरा साफ करवा टालो । समय नहीं है।" यह माना हलधर को दे जैसे ही वे चलने को मुड़ीं कि मिस्त्री ने टोका, "ई मालिक ही हैं न, जिनके आने की चर्चा थी!" "हां जी, अपने छोटे मालिक ।" "परनाम, परनाम मालिक !" A उत्तराधिकार फिर अमिजीत के सामने वह नत हुआ। योला; "हम तो देखते ही समझ गये "रानी मां, आज यहाँ गाना-बजाना होगा !" "हाँ, कलकत्ते से हमारे उस्ताद था रहे हैं । उन्ही की बैटको होगी।" "तो हम लोग भी सुनेगे ।" मिस्त्री ने घिधियाकर कहा । बहूरानी फुछ कहे कि हलधर बोल पड़ा, "ह, हुआ सब चौपट ! तुम का समझोगे ई सब।" मिस्त्री ने जरा दुवर कर विरोध किया, "माहे ? गाना का हम लोग सुनने नहीं हैं-मुदा मनोहर चत्रवती या कवि-गान गुना है-हरेक बरस, दशहरे मे लगातार तीन-तीन दिन । अपने जमीदार के नाट्य-मन्दिर में मोतीराम का जापा, रास के समय टप्पा, मुदा क्या नहीं सुना ? कितना बडा-वडा दल आता था ढाका से।" "अरे यह तुम्हारा यह कवि-गान और टप्पा-धप्पा थोडे ही है यह हलधर का वाक्य बमी पूरा हुआ नही था कि अमिजीत का गंभीर स्वर गूंजा, "ठीक है, तुम लोगो में जो सुनना चाहे वह ना जायें।" बहूरानी कई कदम आगे बढ़ गयी थी। अमिजीत की बात की भनक पाने ही ठमक कर खड़ी हो गयी और देवर का मुंह ताक्ने लगी। - " २ पत्रा के अनुसार अट्टारह-उनीस वर्ष, मगर अपनी दौड मे समय चक्कर साने को नापने का कोई यंत्र होता तो यह सिद्ध हो जाता कि जो कुछ हुआ है वह बेहिसाब है । इन कई बरसो की छोटी सी सीमा में पूरी एक शताब्दी सिमट आपो है । इतिहास के इतने लम्बे अध्याय में एक और अपार विध्वस और दूसरी ओर पुननिर्माण का अथाह आयोजन टिपा रहा है। एक ओर है पुरखो की परम्परा का विलोप, दूसरी ओर है बनते हुए नये जीवन का सूत्रपात । दोनों के बीच न जाने कितना चढ़ाव-उतार, बनाने- बिगाडने की प्रक्रिया होती रही है। जिसके परिणामस्वरूप अविरल आंसू बहा है। हाहाकार हुआ है। सभ्यता और मानवता की लांछनाएं मिली हैं। जैसे एक संकरी गंवई नदी की छाती चीरता हुआ कोई महासमुद्र लहरें उछालता हुआ आगे बढ़ गया है। यही सब कुछ स्वरूपकांदी के बंद्योपाध्याय घराने के इस ऐतिहासिक विशाल कमरे में खडे, उसके वर्तमान वशधर अमिजीत के मन को कुरेद रहा था। कुछ देर बाद - उत्तराधिकार १४ ही यहाँ संगीत की महफिल जमेगी। जिसकी लगभग सभी व्यवस्था पूरी हो चुकी है । पूरे कमरे में दरी बिछ चुकी है। उस पर एक तरफ कुछ जगह छोड़ कर जाजिम और तकिये सज गये हैं। वहाँ खास लोग बैठेगें। और वहाँ कुछ ऊंची गद्दी लगायी गयी है, जिस पर बैठेगें उस्ताद, उनके संगतिया। सभी में से गंध का एक विचित्र भभका निकल रहा है । हलधर ने सगी खिड़कियाँ खोल दी हैं । अगुरु का धूना देने में वह उलझा है । छत से भूल रहे हैं चकचमाते हुए झाड़-फानूंस । मगर उनके एक सौ आठो कंदील पहले की भांति आज रोशन नहीं हैं, उनके बदले पेट्रोमेक्स टाँगे गये हैं कई, जो गिनती में जगह को विस्तार के हिसाब से कम हैं। ऐसी धुंधली रोशनी में दीखने वाली बदरंग दीवालों पर भयंकरता ने अपना प्रभाव जमा लिया है। कहीं-कहीं जो बड़े-बड़े मूल्यवान तैलचित्र टंगे हैं वे अधिकतर इस घराने के पुरखों के हैं। उनके, जो इतिहास के गर्त में समा गये हैं। अभिजीत घूम-घूम कर उन चित्रों को देख रहा है । उन पर जमी गर्द की सफाई ठीक से नहीं हुई है। चित्रों में पीछे की पंक्ति में जो लोग खड़े या बैठे हैं, उनमें से किसी की शवल पर गौरव का गरूर है, तो किसी के चेहरे पर दया से उपजी प्रसन्नता का भाव । ये दौलत और जिन्दगी के साथ आँख-मिचौनी का खेल खेलते रहे हैं । जहाँ देने को हाथ बढ़ाया, वहाँ सब उजड़ गया, जहाँ से लिया वहाँ कुछ छोड़ा ही नहीं। एक हाथ से पोपण तथा दूसरे से शोपण । बायें अवरोध, दायें अनुरोध । यहीं उनकी जिन्दगी का अर्थ रहा है। उनके लिए जिन्दगी का कोई मोल नहीं था, न अपनी, न दूसरों की । जरूरत के मुताबिक दोनों ही एक जैसे हेय । लेने में जिस तरह नहीं हिचके, देने में भी उसी तरह कुंठित नहीं हुए। नारी उनके लिए सिर्फ भोग्या थी, शराव के कई प्रकारों में एक ऊंचे स्तर के मनोरंजन की वस्तु । उसके मूल्यांकन का उनके पास एक ही निकप था-तन की भूख मिटाना । इसलिए जिरा नारी को दिन के धुंधलके में वरणयोग्य मान उन्होंने सम्मानित किया उसे रात की रंगीनी में वेश्या मान कर अपमानित भी किया। उन्होंने आधी रात में जिस के तलवे सहलाये रात के अन्तिम प्रहर में उसे लात मारा। अभिजीत ने यहाँ से आँखें हटा कर अपने अन्दर झांका-इसी अतीत का वह वर्तमान है। मगर खानदान का कोई चिह्न उसमें नहीं उभरा । वह उनके खून का मात्र परिचय है, विचार और आदर्श नहीं । जिन्दगी जीने का जो ढंग उनका था, उससे उसका पोई ताल-मेल नहीं । वह एकदम आज का है, कुल-कलंक। उसे तैंतीस की अपनी उम्र में इसके लिए, कितना क्या चुकाना पड़ा है, और कितना क्या चुकाना पड़ेगा। हॉल में उपर दीवाल पर एक छाया उमरी । वहूरानी आ रही हैं । बंद्योपा ध्याय घराने की बड़ी विधवा बहू जो चालीस की चौहद्दी पार कर रही हैं। रंग गोरा । " - उत्तराधिकार - । तन भारी होने के बावजूद भी बीती जवानी के चिह्न आज की मौजूद हैं । अभिजीत ने स्मृति से बोभिल पलकें उमार कर मामी को ओर देसा। बहूरानी गौर से चारो ओर देखती हुई चली आ रही थी। वे शान्तिपुरी थान की उजली साडी पहने थी जिसमे नीचे या आंचल मे यही मी गोटे को इतनी-सी किनारी भी नहीं थी । अमिजीत को अपनी दुमा याद आयी। वे तीज-त्यौहारी मे या ऐसे अवसरा पर चौडी किनारो पो मडाले आंचल वाली साडी पहना परती थी। और महफिल मे चिक की ओट मे आ बैठती थी। उस समय वे पचारा की थी । और बहूरानी का पहिनावा उन दिना क्या था ? सलमा-सितारे वाली वेशरीमती साडी स मास्ती देह तथा हीरे-मोती-टके दुपट्टे मे से झांकता विहंसना मुरडा । अमिजीत यादो मे हम गया। महामाया ने अभिजीत को वहां देया तो अचरज मे डूब गयी। बोली, "लो, तुम यहाँ हो और मैं घर भर ढूंढ भरी। अभी-अभी हलधर को गगा किनारे देसने पो भेगा। बचपन मे तुम वही जाकर बैठते थे। याद है ? गगा भी आज वैसी नही रही, जैसा तुम देख गये थे। घट गयी है बहुत । वैशाख-जेठ म तो घुटने भर भी पानी नहीं रहता । कहीं-कहीं तो सूख भी जाती है। बरसात मे जरूर पहले जैसी उपन-उपन उठती है । उस समय लगता है, चलो पुरानी गगा लौटी तो सही ।" इन सारी बातो से अभिजीत के पल्ले कुछ भी नही पडा। पडा भी हो तो मन मे उतरा नहीं । उस समय वह हॉल ये एक ओर दृष्टि गडाये सडा था। दृष्टि वहीं स्थिर किये वह बोला, "वह रात तुम्हे याद हे भाभो " "कौन सी रात लाला तुम्हारे लौट आने पर याद रखने लायक रात तो एक हो है, दूसरी नहीं।" '"यह भी तुम ठीक कहती हो। फिर भी मेरे लिए उसका जोड नही है । क्या नाम था उस वाईजी का?" महामाया यह समझ गयी थी कि अमिजीत विस रात की चर्चा कर रहा है। कुछ रुक पर गहरी सांस लेकर उन्होंने कहा, "मालम नही, कोई घाई-वाई रही होगी।" वह बाई जी जहाँ सोयी थी, उस जगह का ध्यान अभिजीत को आज भी है । वह ठीक से सोयो नही थी । देह लुढ़वाये पड़ी थी। ऊपर झूलते हुए जाड-फानूसो म पई तो एकदम वुझ नुदे थे, वाको कइयो म पई गिनती की कदीलें जल रही थी, और मन्द रोशना मै भी उसके साडो-गहने झकमका रहे थे। और उसका मुंह | उस दिन अमिजीत को पहली बार यह महसूस हुआ था कि साये मे आदमी की शक्ल कितनी बद- शक्ल होती है । वह भद्दा मुंह इस क्षण भी आंखा के सामो उमर आया । उधर से मुंह मोडकर वह बहूरानी की आर मुखातिब हुआ । एक झेप-मरी मुस्कान उसके चेहर पर छा गयीं। एक ऐसी सलज्ज मुस्कान जैसी उम्र बढ़ने पर बच- १६ उत्तराधिकार पन के किसी अटपटे व्यवहार की याद करके मुस्काई जाती है। वह बोला, "माज सोचता हूं वह वचपना था।" "बच्चे और कर भी क्या सकते हैं। बड़ों को उसी भाव से देखना न चाहिए । अपने बड़े मालिक भी अगर उस दिन ऐसा ही समझते तो-" "नहीं समझने का कारण था। उस समय यह समझा भी नहीं जा सकता था। पर वाद को उन्हें महसूस हुआ होगा। ऐसे घराने के एक पन्द्रह वर्ष के लड़के का इतने कडे अनुशासन की सीमा तोड कर उस गहरी रात में ऐसा दुस्साहस कर बैठने में उसकी यंत्रणा क्या हो सकती है, कोई सोचता भी कैसे ! हो सकता है सोचा भी हो, पर उसने जो किया वह भी विक्कार के सिवा और क्या हो सकता था, इसलिए ऐसे को कठोर दंड दिया ही जाना चाहिए।" "मगर वह दण्ड, तुम्हें क्या पता, अकेले तुम्हें ही भोगना नहीं पड़ा लाला !" ''पता है, तुम सभी को भोगना पड़ा है, खास कर माँ को !" "हम लोगों को छोड़ो। माँ के बारे में भी मैं नहीं सोचती। कौन जाने विधाता ने कप्ट भोगने और बोझ होने के लिये ही संसार में उन्हें भेजा था। इसके लिये उनका हृदय भी वैसा ही था । लेकिन लाला, जिन्होंने दण्ड दिया वे स्वयं उस भोग के सब से बड़े भागीदार हुए । यह खवर तुम तक शायद नहीं पहुंची है। मैं कह यही रही थी। उस रात के बाद इस महल में दीया नहीं जला !""छोड़ो, आज के दिन यह सब कहना-सुनना ठीक नहीं ! जामो कपड़े बदल लो, तैयार हो जाओ।" अभिजीत ने अपने को देखा और कहा, "क्यों, यह कपड़े तो ठीक ही हैं ।" "अरे वाह ! मिल की धोती और गंजी पहन कर महफिल में बैठोगे ? नहीं नही ! तुम्हें क्या पहनना है, मैंने सहेज दिया है । आओ, अब मेरा यहाँ खड़ा रहना उचित नहीं है । लोग-बाग आने लगे हैं।" "तुम चलो, में आया ।" महामाया घवराती-सी चली गयी। उधर देखते हुए अभिजीत फिर भतीत में इव गया। वहरानी से माँ की कोई तुलना नहीं हो सकती, फिर भी बाज, इस क्षण वे हो सहसा यादों में उभर आयी। उस दिन की वह रात-जब पीछे से उसने देखी थी एक सपाट, अचल देह, माज मट्टारह वर्प के व्यवधान में भी जिसकी टीस ज्यों की त्यों बनी हुई है। उस समय रात कितनी बीती होगी, शायद दो-अढाई बजा होगा। अमिजीत कोई सपना देखते हुए अचानक चौक कर सोये से जग गया था। बगल वाली पलंग उत्तराधिकार पर माँ सोती थी। पलक खुली तो उसने देखा कि पलंग खाली है-मा यहाँ गयो ? मन वैसा तो कर उठा। वह अक्षा कर उठ बेटा । दूसरे ही धरा उसे अपने आप से ही लज्जा हुई । मला वह कहां जा सकती हैं ! बरामदे में उधर जो नहानघर है, उधर ही गयी होगी, आ जायगी अमी। अमि लेट गया पर दृष्टि दरवाजे पर टंगी रही । दस मिनट'' पन्द्रह मिनट। वह उद्विग्न हो उठा । अपने पलंग से उतर, मिडे विचाड़ सोल वरामदे मे आ गया । रात अंधेरी यो। दूर बाहरी महल मे जो चौमुंहा दिया जल रहा था, उसके अलावा पही कोई रोशनी नहीं थी । धुले-उजले याकाश पर तारे झिलमिला रहे थे, उसी धुंपली मिलमिलाहट मे उसने देखा कि एग्जे के एक कोने में हाथ के सहारे रेलिंग पर भुकी मां पडी हैं । सिर से मांचल सरक कर कन्धे पर अटक गया है । दूर से बरा इतना ही दीसा । उनके खडे होने की इस भगिमा मे जैसे बीते बहुत से दिनो में इक्ट्ठी होने वाली उदासी गहराई थी। अमिजीत था तो पन्द्रह बरस का ही। मां से उसका सम्पर्क काया की छाया जैसा हो या। मां का हर चरण जाना-पहचाना था। मां को इतना उदास, असहाय आज के पहले उसने कभी नहीं देखा था । सहसा उसके मन मे हुआ-मां अकेली है, बहुत अली ! कुछ क्षण वह वही सहा रहा, फिर धीरे-धीरे मां के पास जा पहुंचा। उनसे सटते ही वे चौंक कर उसकी ओर मुही। अभि ने तव देखा-उनकी अखेिं डबडबाई हुई हैं । अचरज से पूछा, "क्या हुआ मां ?" सुलोचना ने झट मांचल से आंखें पोछ ली। अभि के कन्धे पर हाय सहलाते हुए पहा, "इतनी रात को तू जग क्यो गया ? चल सो, सो जा।" अभि कुछ बोला नही । सुलोचना उसकी बांह पकड फर ले गयो और बिछावन पर सुला दिया । सिर सहलाती हुई बोली, "तेरी नीद टूटी कैसे ? कोई सपना देखा ? सो जा ! रात जगने से तबीयत खराब हो जायेगी बेटे | पानी पियेगा...?" "नही ।" अमि खामोश लेटा रहा । मुंदी आँखो मे मां की धुंध मे डूबी-आंसूमरी आँखें तैरने लगी। इस मांसू के उद्गम से वह परिचित नहीं था। अपने बचपन मे जितना और जो वह सोच समझ सका था, उससे ही उसका मन टीस और गुस्से से भर उठा । अमि यह जानता था कि उसके पिता आज तीन दिनो से इस महल मे एक पल के लिये भी नहीं आये। वह देखता रहा है कि मां उनके पसन्द की रसोई स्वय उनके लिये बनाती रही हैं। रोज ही भोजन के कमरे मे उनके लिये आसन बिछा कर बैठी रही हैं। पिताजी जय भोजन करते थे तो मां वही बैठी पखा झलती थी, पर इधर पंखा जैसे का तैसा पड़ा रहा है। उस आसन पर कोई आसीन नहीं हुआ, वह पंखा मला नहीं गया। दोपहर ढले महरी आयो और सब उठा कर ले गयी। इसके उत्तराधिकार १८ वाद भोजन करके पिताजी जिस पलंग पर आराम करते थे, माँ नियम से उसकी चादर वदल उसकी सिलवटों को ठीक करती रही हैं । गड़गड़े का पानी बदल कर रोज नियत स्थान पर उनका खास नौकर दिवाकर रखता रहा है । माँ उसके नैचे को बार-बार सहेजती-संभालती रही हैं ताकि उनके हाथ बढ़ाते ही उन्हें सरलता से मिल सके । इन तीन दिनों तक मुंह पोंछने के लिये तौलिया मी तिपाई पर रखा गया है पर जिसके लिये इतना सब कुछ किया गया वही अनुपस्थित रहे । वे क्यों नहीं आये इस विषय में न किसी ने उसे खोल कर बताया और न उसने जानने की कोशिश की। यह उसका अनुमान है कि इसमें उसके खानदान की हीनता छिपी है। इधर कई रातों से हॉल-घर में महफिल जमी है। लखनऊ से बाई जी आयी हैं। खास-महल में उन्हें ठहराया गया है। जहाँ छोटे बच्चों के जाने की सस्त मुमानियत है। वहाँ के क्रिया-कलाप के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी नहीं होने पर भी नौकर-चाकरों की पुसफुस, इशारेबाजी, रात को देर तक पीने-पिलाने की सरगर्मी, नायव-गुमाश्तों की दौड़-धूप और हद पार कर आने वाले कहकहे से एक पन्द्रह वर्प की उम्र के लड़के का यह अन्दाज लगाना कि इन सभी से वंश के कत्ताधर्ता की कई दिनों की अनुपस्थिति का कुछ न कुछ लगाव अवश्य है, यह सोचना अस्वाभाविक भी नहीं है। ऐसे परिवेश में अभिजीत जन्मा और इतना बड़ा हो गया। किन्तु दूसरे सभी इसे ही इस खानदान का स्वाभाविक और अटूट अंग मान बैठे थे, पर अमि के लिये यह सम्भव नहीं था । छुटपन से ही बंद्योपाध्याय परिवार का छोटा वंशधर जैसे कुछ अलग तरह का ही रहा । वह वंश की परम्परा में ठीक ढल नहीं सका। ऐसी धारणा बहुतों की है, कइयों ने तो दवे स्वर में कहा भी है। पर इससे अधिक किसी ने सिर भी नहीं खपाया । किसी ने भी इस बात पर गौर नहीं किया कि जैसे-जैसे आंखें खुलती गयी है वैसे-वैसे इन सब के विरुद्ध एक दवा विक्षोभ और मन की ओट में पलने वाली घृणा की संकोच उसके कच्चे मन को लहू-लुहान करती रही है। जब वह कुछ और बड़ा हुआ, तब से वह अन्दर ही अन्दर यह महसूस करने लगा कि ऐसे ऐशो- इशरत में उसके पिता जो लिप्त हैं, वह केवल लज्जा की ही बात नहीं है बल्कि उसमें निहित है मां के प्रति उपेला "असम्मान ! और माँ ऐसी हैं कि इस बारे में कभी कुछ सोचती भी नहीं। इधर इन तीन दिनों से अमि मां के हर वात-व्यवहार पर निगाह रखने लगा है और भीतर ही भीतर विस्मित भी होता रहा है। मां सहज माव से चलती-फिरती रही है, काम-काज करती रही हैं, नौकर-नौकरानियों को 'यह करो-वह करो' का आदेश देती रही हैं। किसी भी काम में जरा भी पार्क नहीं पड़ा, जरा भी शिथिलता नहीं आई। जैसे किसी प्रकार के क्षोम, कचोट और लज्जा-बोध करने जैसा कुछ हुमा ही नहीं। ३ उत्तराधिकार अचानक अरमय नीद टूटने पर जब धूमिल रोशनी में मां के सोष मरे मुखडे पर उसको दृष्टि गयी तब उसे कोई विशेष विस्मय नहीं हुआ। सो पर से जैसे किसी ने एक पदो हटा दिया । उसे सहसा ऐसा लगा कि इतने बडे परिवार को दिन मर के ढेरो काम-काज की धुरी पर जिने वह चककर साने देसता रहा है, वह उसकी मां की याधिक देह है और सुनसान छाने पर रेलिंग के सहारे रात के समाटे में जो पडी थी, जिसकी आंखें आसुओ मे डबडबाई थी, वही उसकी माँ है । और मां का वास्तविक रूप भी यही है--बलक, पलह से प्रस्त, लज्जा और व्यथा मे व्याकुल ! युछ देर पहले मां उसको बगल से हट गयी थीं। शायद उन्होंने सोचा हो, अभि सो गया है या एक भोर से इतनी रात तक काम की यान में चूर होने की वजह से बैठे रहना उन्हें अच्छा नहीं लगा हो। इसलिये उसकी ओर पीठ फेर कर सो गयी थी। तासे में जलने दीये की मद्धिम रोशनी मे उनको मिडी-सिमटी देह नजर आ रही थी । दोनो पांव घुटने से जुड़े थे। पहने से वे दुबली लग रही थी। ऐमा लग रहा था जैसे कोई छोटी-सी लडकी सोयो हो । अमिजीत का मन रो उठा। एम इतने बड़े परिवार की सम्पन्न मालकिन, इतनी धन-सम्पत्ति, इतना वृतित्व-प्रभुन्च, सब कुछ होते हुए भी मां कितनी गरीव है, कितनी दीन-हीन । मां को अन्धेरे मे आंसू बहाना पडता है, वयो"आखिर पयो ? और मन मे विद्रोह की निनगारियां चटखने लगी थी। किसी एक व्यक्ति के विरुद्ध नहीं । परिवार के हर कुछ के विरुद्ध विशेष कर खास-महल के हॉल-धर मे जो कुछ हो रहा है-बहायापी बहशीपन ", उसके विरुद्ध प्रत्यक्ष न होते हुए भी कोई भी घृणा के भाव से वरी नहीं है। अभि के मन मे सुलगती आग धीरे-धीरे आंसो मे लपटें लेने लगी थी। विधा- वन से वह फौरन उठ खड़ा हुआ-इसका समाधान चाहिए करना होगा। क्या? कैसे ? वह क्या कर सकता है ? यह सोच ही नहीं सका । जवान मन मे दृढता की कमी नहीं होती। मां के ऊपर एक नजर डाली-वे सोयी हैं। धीरे से दरवाजा खोलकर वह चुपचाप निकल पडा। अन्दर महल के पार बीच का महन है और इसके भी वाद है खास महल । कही भी हलचल नहीं, सब कुछ सोया-सा खामोश । जब कि अभी-अभी कुछ देर पहले इस विशाल महल को घेरे था गति-नरग और शब्द-गुन्जार । एक ओर काम-अकाम में उलझे लोगों को बतकही, दौड-धूप, तो दूसरी ओर, उधर किसी सुकण्ठी के सुरीले स्वर, तबले मौर सारगी की ठुनक, पुंघरू की गूंज की समा । रह-रह कर गूंज उठता या गंवारू 'वाह-वाह' । इन सब के ऊपर जैसे किसी ने मुर्दा सनाटे की चादर डाल दी थी।

उत्तराधिकार २० लम्बे दर-दालान की दूरियां तय कर हॉल-घर की सीढ़ी के सामने ममिजीत सहसा रुका । उसके दोनों पैर काँप रहे थे। उस जैसे नावालिग के लिये यहाँ आने की मनाही थी। जितने दिन महपिल होती, उतने दिन वह यहाँ या नहीं सकता था। दूसरे ही क्षरण वह बाधाओं का बन्धन जर्दस्ती तोड़ तेजी से उपर चढ़ गया। निषेध की सीमा तोड़ने की गरज से वह बढ़ गया आगे । इतनी सुनसान रात में । दरवाजा खुला था। पूरे हॉल-घर में जाजिम विछी थी, उन पर यहाँ-वहाँ सिलवटें पड़ी थीं। बड़े-बड़े तकिये इधर-उधर पड़े थे । कितनी ही खाली बोतलें लुढ़की पड़ी थीं। अभिजीत धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था । हॉल-घर पार कर उधर के कमरों में से कोई एक कमरा उसका लक्ष्य था, लेकिन कौन-सा, यह वह खुद नहीं जानता था। आगे बढ़ा कि उसे रुकना पड़ा। वहाँ किनारे पर मखमली लाल कार्पेट से ढंके मोटे गद्दे की थोड़ी ऊँची जगह के पास उसे घेर कर तवले, हरमोनियम, सारंगी जहां-तहाँ जैसे-तैसे पड़े थे। इसी के वीच टूटी-फूटी हुई, धदाम से गिर गयी-सी एक पड़ी थी नारी-देह विखरी-सी। उसके सिर के ऊपर छत से भूलते झाड़-फानूस की टिमटिमाती रोशनी में उसके चेहरे का एक हिस्सा नजर आ रहा था । होंठ दोनों बहुत कुछ ग्युले-से थे । अमिजीत जरा और पास गया-क्या यह वही है ? नहीं ! उसने सुन रखा था, उसके टिकने के लिये कहीं अलग व्यवस्था थी, इधर ही कहीं। तो यह यहाँ क्यों पड़ी है ? अलावे इसके नौकरों की कानाफूसी से उसे यह पता चला था कि वह लाखों में एक है-बहुत ज्युवमूरत । ग्युबसूरती क्या इसे ही कहते हैं ? साड़ी और गहने से यह सन्देह नहीं रहा कि यह वही नहीं है । जहाँ-तहाँ अधजली मोमवत्तियों की टिमटिमाती रोशनी की झिलमिलाहट उसकी देह पर पड़ रही थी। वेशकीमती साड़ी और बहुमूल्य गहने पहन कर इस निपिद्ध महल में भला उसके सिवा और कौन हो सकता है ? गयी अमिजीत जानता था, ये लोग शराब पीती है। सम्भवतः ज्यादा चढ़ा हो और नशे में यहां से अपने कमरे तक जा नही सकी, यहीं लुढ़क गयी। यकायक वह हिली-टुली । नीद मे ही बुदबुदाती हुई उसने पैरों को सीधा किया और चित पड़ी रही । अव अभिजीत ने उसके संग-प्रत्यंग, सब कुछ देखा। उसके मन पाहा--विकृत, ऐसा विकृत चेहरा उसने आज के पहले कमी नहीं देखा । सोयी भी ऐसे है-बेढंगी । यह कोई भूतनी है । दादी की कहानी वाली भूतनी, जो रात के पहले पहर में स्पसी युवती का नकली रूप धारण करती है और जैसे-जैसे रात ढलती जाती है, वैसे-वैसे उसका असली रूप प्रकट होता जाता है । उसे घूरते रहने पर अमिजीत का युवा मन करणा से पिघल उठा। जितने ने --

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उत्तराधिकार २२ वेटे को पहचान नहीं पाये। उसकी ओर जव बढ़े तो सहसा रुक गये। आश्चर्य के साथ बोले, "अभि तुम ? इतनी रात को यहाँ ?" अभिजीत को जैसे काठ मार गया हो। सहसा गुस्से में उवल कर सुरजीत बोले, "वता, यहाँ आया क्यों तू ?" अमि कुछ कहना चाह कर भी कुछ बोल न सका। होंठ थर-थर काँप कर रह गये। इसके बाद आँसुओं में भीगे कई शब्द उसके मुंह से निकले, "आप माँ को इतना दुःख क्यों देते हैं ? आप एक मिनट के लिये भी अन्दर उनके पास क्यों नहीं आये ?" यह कहते हुए उसकी आँखों में आँसू भरभरा आये। दोनों हथेलियों में उसने अपना मुंह छिपा लिया । फिर वहाँ से लौट आया । बाई जी का मुजरा पांच दिनों के लिये तय था । अभी दो दिन और बाकी थे। सवेरा हुआ तो मालिक की बैठक में खजांची की बुलाहट हुई। उनका खास नौकर दिवाकर उन्हें खबर देने आया। खजांची को पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ-कल आधी-रात बीते तक महफिल जमी थी। कम से कम सवेरे आठ बजे तक खास-महल के कौवे भी भला कैसे जग सकते थे ! मालिक के जगने की बात तो और भी देर से उठती है। ऐसा ही वह वर्षो से देखते आ रहे हैं। आज तक कभी भी इसमें कोई गड़- बड़ी नहीं हुई। दिवाकर हुक्म तामील करके चला गया। कुछ देर बाद फिर वुलाहट हुई तो खजांची भागे आये । देखा, तकिये से उठगे मालिक गड़गड़ा पी रहे हैं। जैसे इसी समय रोज वे यही करते हों। उनके चेहरे के भाव से या आँखों से भी कुछ प्रकट नहीं हुआ। सामने हाजिर होते ही उन्होंने शान्त मगर भारी आवाज में कहा; "वाई जी का हिसाब नक्की कर दीजिये ।" खजांची कुछ समझ नही पाया, इसी भाव से वह खड़ा रहा । सुरजीत गड़गड़े का नेचा हाथ में लेकर बोले; "सुना नहीं ?" "जी, पांच दिन पूरा हो ले तो एक संग हिसाव हो जायेगा।" बड़ी मुश्किलों से सिर युजलाते हुए खजांची ने कहा । "वह आज ही चली जायेगी।" "आज ?''तो हिसाव तीन दिनों का किया जाये ?" "नहीं, कोल के अनुसार पूरा।" खजांची 'जो हुक्म' कह कर चले गये। इस संबंध में जिसे जो और आदेश देना था मुरजीत ने दिया । सभी ने विना कुछ कहे गर्दन हिला-हिला कर मंजूर कर लिया और जिसे जो करना था वह उसमें लग गया। सवाल-सवाल ही बना रहा मन में उत्तराधिकार या आँखो मे । किसकी हिम्मत पी जो कुछ पूधे। रिसरी रिस गलती से यह सब हुआ यह मो सभी के मन में छिपा रहा । यह खबर अभिजीत को नौरी भी पानापूमी ने जारी मिली। उगे पुगी होनी चाहिए । यही तो वह पाहता था । इमोरियन यह बाधीरायो वहाँ गया, पानहीं दिन को भी जाना सफ्ट की बुलावा भेजना पा । गुनी में यदी रिमी गार पा की कल्पना मे उसका दिल दहल उठा । सिफ यही नहीं, परिवार में सनी इरा पाये त्रस्त हो उठे। पढने वैटा तो मन नहीं लगा। पिना उत्तर-पतट पर सिमरी पर जा सड़ा हुआ। उस महल से होती हुई जो सडर स्टेशन मी सरप पली गयी है, उसरा गुप हिस्सा यहाँ से नजर माा है। सहमा उसने देसा-एर बाद एर, सान तगारिया चली जा रही हैं । यबशा-वासा, गठरी-मोटरी संमासे जो मोग उस पर बेटे है उनमे से दो-एक को वह पहबानना है। बाई जी चली जा रही थी। वेलगारियां 'धर-प' करती हुई मयर गति में यह रही थी | अमिजाविधीमी शलासों को थामे सुप सहा रहा । इस छोटी उप में भी उगये मन ने महा-पnि नही हुआ। इसमें कोई शुभ दिपा है, जिसका अन्त यही नही हो MPur उसका प्रारम हो । क्या-क्यो, यह वह नहीं जानता, घोच भी नहीं गएगा। कुछ मिनट बाद दरवाजे पर होने से दस्तक हुई । दायाने takath नौकरानी पुचियामा सडी दी। सा मुंह अपार से बादाम गा गया At I ults. जीत उसकी गोद में ही इनना बड़ा हुआ है । उगपी मानो ग गा-ग मी स्नेह टपरता रहा है। यमी उस दम पर अभिजीमा मन भिगुर ना। पुगिया! ने बढे दर्दीले महजे में पहा, "छोटे भइया, तुम्हें माजीग युनाया।" "यहाँ हैं वे ?" "अपने कमरे में।" इतना पह कर वह चली गयो । अभिजीत यो शया हुई- -~ग यत तो उसे कभी नहीं बुलाती । उनका अपने पमरे म भी होना आश्चर्य ही है । रोग ही दोपहर तक वह रोसोई में रहा करती हैं। सुलोचना अपने कमरे की त्योढ़ी पर ही मिली। यमि की आसे उनकी मासो से मिली, पलकें मारी लगी । आँखो में ललाई छायी थी 1 मा उममी मारमा रो जुही पी, इसलिये उसे यह समझते देर नहीं लगी कि मां को इसी बीच जा. मयानप तूपान का सामना करना पडा है। माँ ने लहरे पो देखते हो मूर रात को नहीं गये थे? पिसने पहा था तुम्हें यहाँ जान को अभि सुपचाप सुनता रहा । वह समझ गया । af 4 कहा, "उतनी १ उत्तराधिकार नहीं था। मां को क्या कहा गया होगा, कितना कहा गया होगा, विना इसका ख्याल किये उसने जो कुछ किया उससे उन्हें ही सब से पहले दंड भोगना पड़ा। अचानक सुलोचना उसे छाती से लगा उसके सिर पर गाल टिका कर विफर पड़ी, "बिना तेरे कैसे जिऊंगी रे !" अभिजीत चौकन्ना हुआ, माँ ने ऐसा क्यों कहा ? बगल के कमरे से पिता जी के रह-रह कर खाँसने की आवाज आ रही थी। अमि को यह पता नहीं था कि आज वे भी इस समय अपने कमरे में ही होंगे। यह अचरज की ही नहीं, दुश्चिंता की भी बात थी। हर रोज वे कव के सदर में जा बैठते थे । जव से उसे ज्ञान हुआ तब से वह ऐसा ही देखता आया था । एक दिन के लिये भी इसमें कोई फर्क पड़ा हो ऐसा उसकी जानकारी में नहीं है । बाहर मां के कमरे के सामने से ही जाया जा सकता था। भारी पैरों की चट्टी की आवाज धीरे-धीरे करीव आ रही थी। सुलोचना फौरन अमि को अपने से अलग कर आँचल से आँसू पोंछने में लग गयी थीं । सुरजीत जाते-जाते ही विना किसी और देखे यह कहते हुए चले गये, “एक घंटे बाद ही रवाना होना है।" जब तक चट्टी की आवाज दूर जाकर गुम न हो गयी, तब तक ममि चुप, वुत बना खा रहा । इसके बाद भी कुछ बोला नहीं। सिर्फ टुकुर-टुकुर मां की ओर ताकता रहा । अभी जो यहाँ आतंक छा गया था, वह मिट गया था। हमेशा की तरह वहां सन्नाटा घिर आया । अभ्यास से बन गया संयम के बाँध में अगर कहीं दरार बनती नजर आती है तो वह क्षणिक ही होती है। वह किसी की निगाह की पकड़ में नहीं आती । अन्तराल में जो भूचाल मचा था उसके सिर्फ एक झोंके का साक्षी वह रह जाता है । वाहर उसका कोई प्रभाव नजर नहीं आता और न ही वात-चीत में ही उस आवेग का पता चलता है। अभि के माथे पर जो बाल विखर आये थे उन्हें प्यार से ठीक करते हुए सहज भाव से सुलोचना बोली, "तुझे काशी जाना होगा । अपनी दादीजी के पास । वहीं तेरी पढ़ाई होगी । वहाँ तू रह सकेगा?" मगि का मन तड़प उठा। उम्र कच्ची है फिर भी वह समझ गया-उसे माँ से दूर हटाया जा रहा है । यही उसे दंड मिला है । अकेले उसे ही नहीं, उसके संग माँ को गी। उसके लिये मां जितनी मां है उनके लिये वह उससे कहीं अधिक है, यह जैसे वह जानता है, वैसे दंड देने वाला भी अनजान नहीं है। परन्तु इस समय उसे अपनी बात ही वही लगने लगी। जब से वह जनमा तब से आज तक वह मां से अलग कमी नहीं आ। नौबीस घंटे के लिये भी अलग रहा हो ऐसा उसे ख्याल नहीं । साथ ही इतनी बधी दुनिया में नाहीं नी मन उसका नहीं लगा । इस लगाव ने ही उसे माँ के इतने निगट ला दिया था । उरावे मन की गांठ धीरे-धीरे और भी मजबूत हो गयी थी।

उत्तराधिकार २५ कोई लडका जब बड़ा होता है, तब मां की गोद के दायरे से उसे हटना पड़ता है। चारोतरफ को लालसाओ के वह वश में होने लगता है। बहुत सारे बन्धन उसे कसने लगते हैं। मां से दिनो-दिन उसकी दूरियां बढती जाती हैं। यही ससार का नियम है। बच्चे बडे होते हैं, उनके मन मे पख उग आते हैं। ऐसे में मां की गोद छोटी-सी नोड लगती है। उसमे यह समाया नहीं रह सकता । जैसे परिवार मै अमिजीत पैदा हुआ यहां यह चक्कर और भी अधिक चनिल है। यहां पुरुषों की जिन्दगी बाहर ही बाहर की होती है । बच्चे जल्दी ही सयाने हो जाते हैं । अन्दर महल से तहप कर वे भी बाहर या जाते हैं। दूसरे सभी का भी यही हाल हुआ है। अमि उनसे अलग थोडे ही है । फिर भी उसके मामले में हवा का रुख उल्टा हो नजर आया। अमि, इस सानदान का जो तौर-तरीका रहा है, उससे कदम मिला कर नहीं चल पाया । इसीलिये कही वह अनुकूलता न पा मां के आँचल में सिमटा रहा । और अब उसे मां को छोड कर दूर, बहुत दूर जाना होगा। पता नहीं कब तक के लिये ? उसका मन मसोस उठा। सुलोचना अब तक अमि की आंखो मे निहारती रही थी। जो भाषा उन आंखों मे रूप ले रही थी, उसका हर आखर उनके मन पर अकित होता जा रहा था। चेहरे पर इस दर्द का थाभास तक नहीं था। जैसे कुछ हुआ ही नहीं, इस तरह वे हंस कर बोली, "इतना भया सोचने लगा रे ! क्या कोई जीवन भर मां के पास रहा है ? सयाना हुमा । बाहर जाकर पडे-लिखेगा नहीं तो आदमी कैसे बनेगा?" अभिजीत कह सकता था, मां अभी भी गांव की पहाई दो बरस बाकी है। आज ही फाशी जाकर पढने का सवाल क्यो उठा ? पर उसने कुछ कहा नहीं। मां क्या यह जानती नही ! यह सिर्फ उनकी सहज मुस्कुराहट को गौर से देखता रहा। वे अपने अन्तर में जिस बेरसी का कांटा बहुत जतन से छिपाये थी, वही यह अपनी दृष्टि टिकाये था। उसने देखा, मां का वही असहाय रूप, जिसे कल रात अधेरे छज्जे के एक कोने में देख कर वह पागल हो उठा था । वह आज की इस मुस्कराहट मे और भी अधिक साफ नजरमाया। यह सब कुछ सोच लेने के बाद उसका अपना दुःख वीना मालूम पड़ने लगा। मां के इस अपमान और ग्लानि ने ही उसके मन के विक्षोम और क्रोध को साहस सौंपा था। वह भी सहज भाव से हंसते हुए बोला, "मां, तुम जरा भी न सोचो, मैं दादी जी के पास बडे मजे में रहूँगा।" यह कह कर फौरन वह अपने कमरे मे चला यया और उसने दरवाजा जोर से बन्द कर लिया। भी और बेटे के मन का यह हृदय-विदारक छल दोनो के मन मे ही रह गया। घटे भर बाद विचले महल की व्योढी पर खडी सुलोचना, जब पुत्र को विदा दे रही थी, उस समय भी उनके होठो पर वही मुस्कराहट झलक रही थी। अमि भी मुंह को हस्ती २६ उत्तराधिकार हुई हूक जी-जान से छिपाने के प्रयत्न में अपने निचलें होंठ दाँतों से काटने लगा था। बग्धी के दरवाजे तक पहुंच, पायदान पर पैर रखते ही वह फूट पड़ा था। उसके भइया इन्द्रजीत ने उसे बाँहों में भर लिया था। बग्धी में उसे बगल में लेकर वे बैठे रहे । वे ही उसे काशी पहुँचा आये। काशी में कई वार उसकी मुलाकात भइया से हुई थी। एक बार पिता जी भी मिले थे। वे दादी से मिलने गये थे। दादी अपने पुत्र के सामने ही गंगा-लाभ कर चुकी थीं। पर माँ से उसकी भेंट कमी नहीं हुई। उसके जाने के बाद वह छह वरस तक जीवित रहीं। जव तक विस्तर नहीं पकड़ लिया तब तक वे घर के सभी काम करती-करवाती रही। कही भी कोई कमी आने नहीं दी। छोटे लड़के अमि का जिक्र भी उन्होंने कभी किसी से नहीं किया। न घर-परिवार के लोगों ने ही कभी उनके मुंह से कुछ सुना । पत्र आने में जब देर होती तो महामाया अपने पति से तार दिलवा देती । उत्तर में हाल-चाल मिल जाता था। उसे वह सासुजी को स्वयं बता देती थी और वे चुपचाप सुन भर लेती थीं। कभी कोई इच्छा भी व्यक्त नहीं की। . ,जब वे वहुत बीमार पड़ीं, तो इन्द्रजीत ने एक रोज उनसे कहा, "अभि को तार देकर बुला लें जब से वह गया है एक दिन के लिये भी नहीं आया ।" सुलोचना ने फौरन कहा था, "नहीं, नहीं । उसकी पढ़ाई में बाधा पहुँचेगी।". ::" मां को इन्द्रजीत पहचानता था । फिर उसने कभी कुछ नहीं कहा । कुछ क्षरण वाद सुलोचना ने ग्बुद ही कहा था, 'मेरी बीमारी का हाल उसे मत - लिखता।" :.., मौत सिरहाने खड़ी है, यह.वात सभी के छिपाये भी उनसे छिपी नहीं थी। ऐसी दशा में भी उन्होंने एक-एक का ख्याल रखा था। नौकर-नौकरानियों तक को बुला-बुला कर उनके घर-परिवार, बाल-बच्चे सभी के बारे में पूछ-ताछ की, आदेश-निर्देश देती रहीं । यदि किसी की सुध न ली तो वह था अमि । कई दिनों बाद वहरानी उनको पास बैंठी उनकी पीठ सहला रही थीं। कुछ करना वाकी नहीं था, सिर्फ आखिरी घड़ी की इन्तजारी थी। उस क्षरण भी होश थी। रह- रह कर पल-पान को वे वेगुध हो जाती और फिर फौरन पलके उभार कर देखने भी लगती थी। उनकी निगाह अचानक पतोहू के चेहरे पर पड़ी और वे बोल उठी थीं, "अरे, तू रो रही है 'तेरी आंलो में आंसू बहू, मुझे और कष्ट न दे रे...! सब के सामने मैं जा रही है, ब? भाग्य ! वस सिर्फ "।" इसके आगे वे बोल न सकीं। 4 उत्तराधिकार वहूरानी उनके पैरो से चिपक गयी 1 सिसकियां लेती हुई बोली, "मां, आप कह भर दीजिये, लाला को तार दिलवा दूं।" उत्तर में सुलोचना की आंखो के कोने से आँसू के दो कतरे लुढक कर चू गये। इशारे से बहू को बुला कर बाहो मे लेकर उन्हों ने रुक-रुक कहा, "मरा अमि इस पर मे आये, यह इच्छा नहीं है वहूरानी !" महामाया कुछ बोल न पायो, केवल उन्हे तरती रहीं। सुलोचना पुन : बोली, "मेरे जाने के बाद उसे बुला लेना । और मेरी तरफ से यह कहना, कहना कि "पर कोई भी मां अपने बेटे से यह कमी नही कहती बडी मुश्किल तो यह है ।" महामाया सांस रोके इस अपेक्षा मे थी कि सास क्या कहना चाहती हैं, कि तमी वाहर से वैद्यजी के गाने को आट मिली। साथ ही पुचि यामा ने दरवाजे से गरदन निकाल कर हट जाने का माखो से इशारा किया । बहूरानी के हटे बिना वैद्य जी कमरे मे आते भी तो वैसे ! महामाया चटपट पिछवाडे के दरवाजे से बाहर निकल गयी । वैद्य जी आये। रोगिणी को देखते ही उनकै ललाट पर शिकन पड़ी। इन्द्रजीत उनके पीछे आकर खड़ा हो गया था। वैद्यजी ने मुड कर उसकी थोर देखा, फिर पलग के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गये और विद्यावन पर पडे कुम्हलाये तथा सुस्त हाय उठा कर उंगलियां नाडी पर रखी ही थी कि वे चौंक उठे। गहरी सांस लेकर इन्द्रजीत से बोले, "सुरजीत बाबू को बुलाइये ।" कोई उन्हें बुलाने दौडा गया। इन्द्रजीत आगे बढ कर मां को एक टक देखने लगा। वगल के कमरे मे उढके पल्ले की ओट में वेचैन-सी बहूरानी खड़ी रही। एक प्राचीन जमीदार के घराने की जवान पतोहू का बाहर के लोगो के सामन होना, ओछी बात थी ! परिचित, घरेलू वैद्यजी के सामने भी वह नहीं हो सकती। पर वैद्यजी के उतरे कठ की आवाज सुनते ही उसका होश उड गया। वह दौडी आयी और मां जैसी सामु से लिपट गयी । वे बहूरानी के लिये मां से भी बढ़ कर थी। तब वह सिर्फ बारह- तेरह की नवेली थी, तब एक गरीब घराने से अपने रूप-गुरण के कारण ही इतने बड़े और ऐसे प्रतिष्ठित परिवार में आ गयी थी। इसके बाद वह मैके कमी नही गयी। धीरे-धीरे अपनी मां की शक्ल उसके मन से उतर गयी थी और जो उस पर छा गयी थी जो वह भी आज सदा के लिये चली गयी। यह अजाना ही रह गया कि बिटिया को रिक्तता की पूरक पतोहू से वह अमि- जीत के लिये कौन-सी ऐसी गोपनीय वात रहना चाहती थी विन्तु कह नही पायीं। आज से छह-सात वरस पहने दिखावे का हंसी हंस कर जिस बेटे को विद्याथा, था, २८. उत्तराधिकार अन्तिम घड़ी में भी उसे देखना क्यों नहीं चाहा, यह क्या उनका हार न मानने वाला हठ था या कुछ और ! जो कुछ भी हो पर वह एक निर्मम रहस्य-आवरण में ही ढंका रह गया। । सुरजीत वावू सदर महल वाले कमरे में ही नित्य के नियम के अनुसार उपस्थित थे। पत्नी की ड्योढ़ी पर जब वे पहुँचे, उस समय वैद्यजी अन्दर से बाहर निकल रहे थे। इस परिवार में वे एक लंबे अरसे से जुड़े थे, सिर्फ वैद्य ही नहीं थे, दुःख-सुख, आफत- विपत के हिस्सेदार भी थे । पलक उभार कर पल भर के लिये उन्होंने सुरजीत बाबू की ओर देखा फिर आँखें नीचे गड़ा ली थीं। कमरे में लोग मर गये थे। अपने-पराये, शरणागत, दास-दासियाँ समी जुट गये थे । एक सुर में रूलाई उमड़-घुमड़ रही थी। सभी सिसक रहे थे। फूट कर रोने का जैसे किसी में साहस ही नहीं था । देखते ही देखते जिन्होंने आँखें मूंद लीं। जिस प्रकार वे चुपचाप मुंह मोड़ गयीं, उसी प्रकार उन्हें चुपचाप विदाई भी देनी होगी। चिल्ला कर, सिर पीट कर उनकी चिर-निद्रा भंग करना उचित नहीं होगा। ड्योंढ़ी के बाहर जो लोग खड़े थे, उनने अगल-बगल हट कर राह बना दी। सुरजीत धीरे-धीरे आगे बढ़ गये थे। धर्मपत्नी की सेज के पास जाकर कई क्षरण खड़े रहे । उपस्थिति की आँखें वचा कर एक गहरी साँस ली थी फिर सिर झुका कर बाहर निकल गये थे। जब नदी का कोई किनारा ढहने लगता है, तब आते-जाते लोगों को मुट्ठी भर मिट्टी ही गिरती नजर आती है, लेकिन यह पता उन्हें नहीं होता कि इस ढाही का आरंभ दरअसल बहुत दिनों पहले हो चुका है, क्षय भीतर ही भीतर होता रहा है । स्वरूपकांदी के बंद्योपाध्याय परिवार में भी यह क्रम भीतर ही भीतर जारी था । एक धर्म-परायणा नारी अपनी त्याग-निष्ठा, सेवा-परायणता और संयम के सुदृढ़ बांध से उसे संभाले रही । वही चली गयी । अब ढाही नंगे रूप में प्रकट हुई। पहली वलि खानदान के बड़े लड़के की चढ़ी-इन्द्रजीत की। भाग्य का कुछ ऐसा चला चला कि पिता ने स्वयं उसे नाश के मुंह में धकेल दिया । दक्सिन गं मुन्दरवन के वादा नामक इलाके में इनकी जमींदारी थी बाखर- गंग । छोटे-छोटे कई साधारण गांव का मालिकाना था। प्रजाओं की गिनती भी किसी बड़ी जमींदारी की अपेक्षा बहुत कम थी। किन्तु वे थे बड़े खूखार । किसी के दबाव को मानना उनके स्वभाव के विपरीत था। बल्कि यह सव वहाँ की मिट्टी में ही नहीं था।

उत्तराधिकार २६ आ खुलते ही सामने उपनाती गगा दीसती और बगल में हाहाकार करता जगल । दोनो में कोई भी मिन नहीं। दोनो ओर मोत या आतम । जल में घडियाल, थल पर वाघ । नहाते वक्त पर एक पैर शरीर से अलग हो जायेगा, कोई ठीक नहीं। लक्टी चुन्ने गये कि हुँडार का ग्रास बनना पडगा और ऊपर से आँधी-नूपान, कब मा जाए, कोई जानता न था। यहां जो भी आया कुछ मोर ही गया। रोद प्रकृति मे जिनका जन्म हो और जन्म से ही जिन्ह खोने वी वाध्यता हो, उनका म्यभाव भी वैसा ही होगा, निष्ठुर, कटोर, जिद्दी । पर वादा के प्राकृतिक परिवेश का दूसरा रूप भी है । एप मगलमय स्प। यह केवल तोडता ही नही, बनाता भी है । जैसे लेता है, वैसे ही देता भी है । सेना में हरी- परी फसल, नदी-नहरो मे विचरतो मछलियां, वाग-बगीचो मे सुपारी-नारियल पा आबार । यह सब तो है, मगर व वह लेगा, यब यह देगा, यह यही जाने । यहां के लोग भी ऐसे ही हैं । थुश हुए तो सब लुटा दिया, नाराज हुए तो राब चूटने में भी हिचक नही। जमीदार से इनका वास्ता बडा बीहड था। टूटने-चुडने का प्रम जिन्दगी भर चलता रहता। इस वक्त खुशामद मे मुवे तो उस वक्त छोध मे तने हुए। आज जो लाठी पैरो के नीचे है, क्ल यही सिर पर टूट सकती है । सवेरे माफी मांगने मे मशगूल, शाम पो जान लेने के मुस्तैद । स्वरूपकांदी के प्रत्येक गुमास्ते इस विलक्षणता से परिचित थे और यहां को जमीदारी में अमला-अमीन के चुनाव मे हमेशा इसका ख्याल रखा जाता था। जमीदारी छोटी है और साधारण भी । पर नायव के ओहदे पर जो पाते थे वे दूसरी जगहो की तुलना में अधिक अनुभवी, वुशल और चतुर होते । बलाये इसके भी मगडे होते ही रहते, दगा-फसाद, पून-हत्या कई फौजदारी केस चलते ही रहते । सुलोचना जिस दिन से गयी, उसी दिन से मालिक अपने को धीरे-धीरे सब ओर से समटने लगे थे। रोज एक बार गद्दी मे जा बैठते । मगर पहले की तरह भूल- चूक मे हाथ नहीं डालते। कोई जटिल समस्या आयी तो कुछ कह-बता दिया। कभी- कभार खास नायव को बुला कर कहते कि इन्द्र से पूछ लो। मेरा अब क्या ? उसे हो तो अब सब कुछ देखना-समझना है । इन्द्रजीत भी कुछ-कुछ काम देखने लगा था। उसको गद्दी अलग थी। उन के लिहाज से और वश-परपरा के अनुसार कई मित्र भी जुट गये थे । स्वभाव मे दम्म, यानी वशगत वैभव और मर्यादा का गुमान। और सिर बिला वजह हठी और उग्र। अगल-बगल के लिए उतना सजग नहीं । समय बड़ी तेजी से बदलता जा रहा था । आज जमीदार पहले की तरह प्रजा के मां-बाप नही रहे। समय के अनुसार चलना होगा-- इस यथार्थ-ज्ञान का समाव इन्द्रजीत मे खूब था ।

उत्तराधिकार ३० सुरजीत यह महसूस करते और सोच में डूबे रहते । यह हुआ कैसे ! उनके दो पुत्र हैं। एक में उनका स्वभाव ही नहीं और दूसरा वह सीमा पार कर गया है। एक उनके बारे में एकदम अचेत और दूसरा बेहिसाब सचेत । दोनों में कोई भी स्वभाविक नहीं। दुनिया में अस्वाभाविक होने पर प्रायश्चित करना पड़ता है। अपने वातावरण को अपने अनुसार नहीं बनाने या खुद को उसमें नहीं ढालने से प्रकृति उसे माफ नहीं करती। इसलिए एक को पहले ही हटना पड़ा। हटाया खुद ही । पर वे तो थे निमित्त-मात्र । यही उसके लिए प्रकृति के द्वारा दिया गया दंड था । और दूसरे को भी अपने अति का फल भोगना पड़ेगा ही। वह भोग सामने ही है, सुरजीत को इसका अन्दाज नहीं था । होता तो वे सतर्क रहते, उसे मिटाने की कोशिश करते । वाखरगंज की जमींदारी से समाचार आया कि तीन गांवों के खेतिहरों ने खजाना देना बन्द कर दिया है। उनके पीछे है वही मेहरबक्स, उन्हीं के आधीन एक छोटा जोतदार । वह जितान धूर्त है उतना ही लापरवाह । कभी लुक-छिप कर जमींदार के विरोध में आग लगाता था, अब खुलकर सामने आ डटा है । नायव जी ने उसे बुला कर समझौते का प्रयत्न किया था । पर वह कुछ मानने को तैयार ही नहीं हुआ। जो नौकर नायव जी का पत्र लेकर आया था, उससे उस व्यक्ति के बारे में एक मौखिक रिपोर्ट भी मिली । गद्दी में बैठकर वहुत से लोगों के सामने वह कह गया था. "आप से कुछ कहना-सुनना नहीं है नायव जी। आप हैं किस खेत की मूली । समझौता तो मालिक से होगा। उन्हें बुलाइये- यह कह कर बिना नायव के उत्तर की अपेक्षा किये दल-बल सहित वह चला गया था। चिट्ठीरसेन जब जमींदार के सामने अपनी आंखों देखा वर्णन का वयान कर रहा था, तब वहां इन्द्रजीत उपस्थित था । वह चुप नहीं रह सका । वह ऐंठ कर बोला, "और तुम्हारे नायब साहब ने क्या किया ?" "जी वे करते भी क्या ?" "मूर्ख !" दाँत पीसते हुए दवे गले से वे हुँकार उठे। स्वगत कथन होते हुए भी, मुना सभी ने। सुरजीत तकिये का सहारा लेकर गड़गड़ा पी रहे थे । नेचा होंठो से हटा कर उससे बोले, "अच्छा, तुम अभी जामो।" वह चला गया। सुरजीत ने नायव के पत्र को पुत्र की ओर बढ़ा दिया । इन्द्र- जीत ने सरसरी निगाह से पत्र पढ़ कर ताव के साथ कहा, "मैंने पहले ही कहा था, ऐसे कमजोर नायब से वाखरगंज का काम नहीं चल सकता । केले का भुरता और मात साकर जमींदारी नहीं चलाई जाती । वहाँ एफ पठे की जरूरत है।"

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उत्तराधिकार ३० । मुरजीत यह महसूस करते और सोच में डूबे रहते । यह हुया कैसे ! उनके दो पुत्र हैं। एक में उनका स्वभाव ही नहीं और दूसरा वह सीमा पार कर गया है। एक उनके बारे में एकदम अचेत और दूसरा बहिसाव सचेत । दोनों में कोई भी स्वभाविक नहीं। दुनिया में अस्वाभाविक होने पर प्रायश्चित करना पड़ता है। अपने वातावरण को अपने अनुसार नहीं बनाने या ग्बुद को उसमें नहीं ढालने से प्रकृति उसे माफ नहीं करती। इसलिए एक को पहले ही हटना पड़ा। हटाया ग्युद ही । पर वे तो थे निमित्त-मात्र । यही उसके लिए प्रकृति के द्वारा दिया गया दंड था । और दूसरे को भी अपने पति का फल भोगना पड़ेगा ही। वह भोग सामने ही है, मुरजीत को इसका अन्दाज नहीं था । होता तो वे सतर्क रहते, उसे मिटाने की कोणिश करते । वायरगंज की जमींदारी से समाचार बाया कि तीन गांवों के वेतिहरों ने खजाना देना बन्द कर दिया है। उनके पीछे है वही मेहरबक्स, उन्हीं के माधीन एक छोटा जोतदार । वह जितान धूर्त है उतना ही लापरवाह । कमी लुक-छिप कर जमींदार के विरोध में आग लगाता था, अब खुलकर सामने या डटा है । नायव जी ने उसे बुला कर समझौते का प्रयत्न किया था । पर वह कुछ मानने को तैयार ही नहीं हुआ। जो नौकर नायव जी का पत्र लेकर माया था, उससे उस व्यक्ति के बारे में एक मौयिक रिपोर्ट भी मिली । गद्दी में बैठकर बहुत से लोगों के सामने वह कह गया था- "बाप से कुछ कहना-मुनना नहीं है नायब जी। आप हैं किस खेत की मूली । समझौता तो मालिक से होगा। उन्हें बुलाइये-' यह कह कर बिना नायब को उत्तर की अपेक्षा किये दल-बल सहित वह चला गया था। चिट्ठीरसेन जब जमींदार के सामने अपनी आँखों देखा वर्णन का बयान कर रहा था, तब वहां इन्द्रजीत उपस्थित था । वह नुप नहीं रह सका । वह ऐंठ कर बोला, "मोर तुम्हारे नायव साहब ने क्या किया ?" "जी वे करने मी यया ?" "मूर्स !" दांत पीसने हुए दवे गले से वे हुँकार उठे । स्वगत कयन होते हुए गी, मुना सभी ने। गुरजीत तकिये का सहारा लेकर गड़गड़ा पी रहे थे । नेचा होंठो से हटा कर उगी बोने, “अच्छा, तुम अनी जायो।" यह चला गया । गुरजीत ने नायव के पत्र को पुन की मोर बढ़ा दिया । इन्द्र- जीज ने सरगरी निगाह से पत्र पढ़ फर ताव के साथ कहा, "मैंने पहले ही कहा था, रोगे कमजोर नायव से बासगंज का काम नहीं चल सकता । पोले का मुरता और भात पाकर जमीदारी नहीं चलाई जाती। वहाँ एक पट्टे की जरूरत है।" ।

उत्तराधिकार इन्द्रजीत की सबर उसे नही दी गयी। महामाया की इच्छा थी कि सपर भेज दे। पर समय नहीं हो सका । क्या फायदा । वह जानती थी, भायेगा नहीं । और आ- पर ही क्या परेगा ? चिता-मस्म देखे गिना क्या बिगडना है ! दूर है, दूर हो रहे । इसके बाद जिस दिन मालिक ने भी मुंह मोड लिया उम दिन भी महामाया ने सुद खबर नहीं भेजी। सदर नायन को यह कहा गया था कि मौत भी सबर के साय उसे यह कहा जाये कि बड़े भाई के अमाव में पिता या पाद, उसे ही रहता है। और अब से वही सारी सम्पत्ति का उत्तराधिकारी भी है। वह बिना हिचक आये तथा अपना सब संमाले । उत्तर में अभिजीत ने पहला दिया था, "बाद का काम-वाज वह अपनी औ- मात के मुताबिक यहीं पर लेगा, मां के वक्त जैसे पर लिया था। सम्पति की मालकिन बनी रहे बहूरानो । वह जिस हाल में है, उसी से रहार दूर रहना चाहता है । इसी प्रकार दिन कट रहे थे। इसके बाद देश आजाद हुआ और साथ ही पैदा हुई जटिल समस्याएं । दिना दिन जटिलताएं और भी जटिल होने लगी। धीरे-धीरे जो समस्या थी वह जमीदारी ही सत्ता के हाथ में चली गयी। पहरानी ने सोच लिया-चलो झमेला मिटा । इससे बाद लगा कि समस्या मिटी नहीं, सिर्फ उसने नया रूप ले लिया है। ऐसा म्प जिससे रह तया उनके धर्मचारी बिल्कुल अनभिज्ञ हैं। महामाया बडी चिता में पड़ गयी। सदर नायव को अमिजीत के पास भेजा। उन्हें एक पत्र लिखकर दिया। वह पत्र सिर्फ सपत्ति के बारे में होता तो अमिजीत उत्तर लिखबर भेज देता पर उसमे कुछ और भी लिखा था, जिमको वह अपेक्षा नही कर सपा । पत्र भी अन्तिम पक्तियो यो मिजीत ने पई वार बढा, जैसे यह कोई दूसरी बहूरानी हो । जिस मुहागिन को उखने पहली बार देखा था एक समारोह की शाम में । उस समय वह पी ही क्तिनी बडी। इसके बाद वे दोनो अगल-बगल सयाने माई बहन के समान । बहूरानी उसे लोगो के सामने 'देवर जी' कहती और अकेले मे अभि कह कर पुकारती थी । अपने छोटे देवर को भी अपना नाम लेकर पुपारना सिसा दिया था, "क्या भाभी-मामी करते रहते हो । हमे अच्छा नहीं लगता।" "अरे वाह, तुम तो बडी हो।" यानी उसे जो बताया गया था उसे ही उसने दुहरा दिया । बहरानी ने उसे चुटकी में फुर्र पर दिया, “धत्त, बड़ी यायो में वही।" "तो क्या कह कर बुलायें " "क्या मेरा कोई नाम नहीं है ? तुम्ह सिर्फ मापा कहने म क्या दिक्कत है। मरी ससियां तो यही नाम लेकर पुकारती थी।" यहाँ उसकी सखियां नहीं है । साया वे नाग पर कोई अगर है ता अमि ही है। पर मह बहुत शर्मोला है। नाम लेकर वह किसी तरह भी नहीं पुकार सक्ता । तर तय हुआ कि वह 'मायादी' कहा करे । ।

उत्तराधिकार ३२ शिवदास राय बूढ़े हो चुके थे। जब वे सदर- नायव थे, तभी मालिक के इस पुत्र के बारे में सुना था। वे वोले, "इतनी जल्दी क्या ? अभी तो आप माये हैं। आराम करिये। दोपहर के वाद बुलवा लेगे । यों उसे बुलाना नहीं पड़ेगा। खबर मिलते ही वह खुद आ जायेगा।" "उसकी मेहरवानी की ताक में मैं बैठा रहना नहीं चाहता।" व्यंग्य के लहजे में इन्द्रजीत ने कहा, "वह मेरा आका नहीं है, यही उसे अहसास कराना है ।" शिवदास गंभीर हो गये । बोले, "वह कोई मामूली जन नहीं है। जोतदार है।" "मालूम है । बरस में पांच सौ का खजाना देता है।" "फिर भी उसका कुछ सम्मान है।" "सम्मान !" इन्द्रजीत हंसा । फिर गंभीर होकर वोला, "इसलिए तो आपने उसे सिर पर चढ़ा लिया है।" इतने पर भी शिवदास ने पकड़वा कर नहीं बुलाया। पर मेहरवक्स के आते ही अपने नायव की वह 'भूल' या 'कमजोरी' इन्द्रजीत ने सुधार दी। मामूली जन के वैठने के लिये पतली लेकिन लंबी पटरी जो पड़ी थी उस पर ही उसे बैठने को कहा गया । वह वहां नहीं बैठा। जमींदार के सवालों का जो उसने जवाब दिया वह भी उदंडता के भरा था । इन्द्रजीत ने अचानक हुक्म दिया, "पीठ पर इसकी बाँहें बाँधो।" नायव और गुमास्ते घवरा उठे । पर मालिक के सम्मान की रक्षा के लिये किसी का मुंह नहीं खुला। वहां के मुसलमान प्यादे हुक्म तामिल करने में ना-तुकुर करने लगे । तव इन्द्रजीत ने देशवाली दरवानों को इशारा किया। वे आगे बढ़ आये और उसके दोनों हाथ पीठ पर ले जाकर अंगौछे से बांध दिया गया। उसने चूं तक नहीं की। सिर्फ जमींदार के वेटे को एक नजर देख भर लिया। इस नजर की जिन्हें पहचान थी वे अन्दर ही अन्दर सिहर उठे । ऐसी नजर सिर्फ विषधर सर्प की होती है । उसी रात कचहरी में आग लगी। इन्द्रजीत दौड़कर बाहर आया तो अन्धेरे उड़ता हुआ एक नेजा आया और उसे बेघ गया। यह एक अजव हथियार था ! सुपारी के पंड़ के पतले फट्टे को एक ओर तराश कर धारदार बनाया गया था। बहुत तीखा असर वाला हथियार । मालूम पड़ा कि देह इधर-उधर से कट-फट गयी । में मां के मरने की खबर अभिजीत को समय पर ही भेजी गयी थी। इन्द्रजीत ने पन के साथ आदमी भी भेजा था। लेकिन वह नहीं आया। किसलिए आये ? श्राद्ध की बहार देखने ! जरा भी इन्चा नहीं हुई। मां का अन्तिम कर्म, जो उसे करना चाहिए पा, काशी में ही ब्राह्मण बुला कर कर लिया। इसके बाद इधर की कोई खोज सबर ही नहीं ली।

उत्तराधिकार रहे थे कि कहां डेरा डालें। तभी उन्हें याद आयी--यहां दशाश्वमेघ घाट के करीब ही तो स्वरूपकांदी के जमीदार का मकान है। बहुत वर्ष पहले कभी सुरजीन के साय आये भी थे । यही उन्होंने पनादाई को सुना भी था। वह मान खाली पड़ा रहता था । मालिक कभी-कभार आते, वही ठहरते। इसके बाद उनकी माता जी और बहन काशीवास के लिये आयी । वे सभी एक-एक कर चली गयी। अब यहां स्थायी रूप से उन्ही का छोटा लडका अमिजीत रहने लगा था। अभिजीत की याद उस्ताद जी को आयो । उनकी महफिल मे ही उसे देखा या । एक खास दिन की बात आज भी उन्हे याद है। उसी समय उसका जनेऊ हुमा था। महफिल मे वह उतरे हुए बाल वाले सिर पर जरी की टोपी पहने सभी के साथ बैठा था । प्यारा-सा कुमार । उसके शात चेहरे पर बुद्धि की हल्की-सी थामा थी। आखें दोनो स्वप्निल । रह-रहकर बरवस उसकी ओर दृष्टि चली गयी थी। सहसा उन्होंने देखा, घुटने पर लयपूर्वक वह लडका ताल दे रहा है । 'सम' और 'अन्तरा' मे उसको गरदन का हिलना तथा हाय हिलाने की खास-खास मंगिमा देख कर वे अचम्भे मे पड गये थे । वह यह नही भांप सका कि उस्ताद जी की निगाह उस पर पड गयी है। वह मगन होकर मुन रहा था। उन दिनो की महफिल मे सगीत के ज्ञाता, लय तथा ताल के समझदार लोगो की कमी नहीं थी। उनके बीच कोई भी गायक गाकर आनन्दित ही होते । उस्तादजी वो भी यह सुख मिला था। मगर उस महफिल मे उन्हे सबसे अधिक सन्तोप हुआ था उस बालक को सुनते देख कर । उसकी हरी-डरी आँखो की दिपी-छिपी भगिमा से औरो की प्रशसा फीकी पड गयी थी। उस समय मौका नहीं मिला था। उस्तादजी ने मन ही मन तय कर लिया था कि दुवारा जब आना होगा, तव सुरजीत से कहेगे कि लडके मे गुण है, उसके लिये कोई व्यवस्था होनी चाहिए । पर यह कहने का सुअवसर मिला कहाँ ! कलकत्ते मे ही किसी से उन्हें पता चला था कि लडके को काशी भेज दिया गया है। इस बीच उन्हे भी महफिल के लिये बुलाया नही गया, और सुरजीत बाबू भी स्वर्ग सिधार गये । बधोपाध्याय परिवार से उनका नाता ही टूट-सा गया। अगर वे काशी नही आते तो फिर से यह सब सोचा ही नहीं जा सकता था। मगर तांगे पर बैठ कर उस्तादजी सोचने लगे, जो लडका अमिजीत उस दिन मुग्ध-मन उनका गाना सुन रहा था, उसकी मति-गति आज कैसी होगी, कौन जाने ? हो सकता है उन्हें पहचाने भी नहीं, सो अचानक पुराने सम्बन्ध का जिक्र कर वहां ठहरने मे उन्हे हिचक हुई। क्यो नहीं कही और ठहरा जाये | विचार की गति जिधर भी हो लेकिन तांगा तो उसी पुरानी राह पर बढ़ता जा रहा था। शायद कमी की वह दृष्टि जो भीड से .

३४ उत्तराधिकार , अभि यही कह कर पुकारता लेकिन अगल-बगल कोई न होता तब । कम दिन नहीं, कई वर्षों तक । हंसी-ठट्ठा, छेड़खानियाँ, वेमतलव का रूठना- मनाना । वर्षा की मेघ घिरी दोपहरी में जब सब लोग सो जाते, तव दालान में दोनों का भींगना । सवसे छिपकर चील-कोठरी में जा बैटना और लाल मिर्च तथा धनिया की पत्ती के साथ ढेरों वेर चट कर जाना । कितना मजेदार लगता ! वे दिन, फिर एक दिन पटाक्षेप हो गया । इसे भी कितने वर्ष वीते ! पत्र रख कर अमिजीत ने पैड खींच लिया । कुछ देर सोचता रहा-क्या लिखें। मन में वातों की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। पर कलम की नोंक से निकली सिर्फ एक पंक्ति तुम्हारा पत्र मिला । तीन चार दिनों में ही पहुंच रहा हूँ। । ३ उस्ताद जी अपने नियत आसन पर आ बैठे। वही पुराना आसन । माटा-सा कश्मीरी गलीचा, पीठ के नीचे वही मखमल में लिपटा तकिया। लेकिन उसका गाढ़ा रंग फीका हो गया है । वड़ा-सा हॉल, उसमें वरती गयी वस्तुओं पर भी महाकाल के कठोर पंजे की छाया पड़ गयी है। चारो तरफ एक वार बूढ़े उस्ताद जी ने आँखें फेर लीं। इसी कमरे में बहुत वार आये और गा चुके हैं । पिछली बार जब आये थे तो बिल्कुल सामने ही महफिल के मालिक बासीन थे । उनके अगल-बगल, कायदे के अनुसार जगह छोड़कर जो लोग वैठे थे उनमें से बहुत से जाने-पहचाने चेहरों पर नजर पड़ी। मालिक के मित्र, आत्मीय, कुछ कृपापात्र । प्रायः सभी समझदार श्रोता थे । वे जिला व शहर कलकत्ते से चुन-चुन फर बुलाये जाते थे। आज वे परिचित चेहरे अनुपस्थित थे। आज का दृश्य बिल्कुल भिन्न था । वंद्योपाध्याय परिवार के वर्तमान वंशधर, वंग का एकमात्र जीवित पुरुष उपस्थित था। पर वह पिता के विशिष्ट आसन पर नहीं बैठा था। वह आसन विद्याया ही नहीं गया था। जन-साधारण जाजिम यहां से वहाँ तक बिछी थी, उसी पर एक. किनारे वह भी बैठा था । अगल- वगल के लोगों से अलगाव का बिना ख्याल किये। जैसे प्रधान नहीं, कोई मामूली योता है। फिर उसी के लिये ही आज का यह आयोजन आयोजित था । इसका मो एक छोटा-सा इतिहास है। कई वर्ष पहले उस्ताद जी तीर्थयात्रा को गये थे। पाशो पहुँच कर वे सोत्र उत्तराधिकार रहे थे कि वहां डेरा डालें। तभी उन्हे याद आयो---यहां दशाश्वमेघ घाट के करीब ही तो स्वरूपांदी के जमीदार का मकान है। बहुत वर्ष पहले कमी सुरजीत के साय आये भी थे। यही उन्होंने पन्नावाई को सुना भी था। वह ममान खाली पड़ा रहता था । मालिक कभी-कभार आते, वहीं ठहरते। इसके बाद उनकी माता जी और बहन काशीवास के लिये आयी। वे सभी एक-एक कर चली गयी। अब यहां स्थायी रूप से उन्ही का छोटा लडका अभिजीत रहने लगा था। अभिजीत की याद उस्ताद जी को आयी। उनकी महफिल मे ही उसे देखा था । एक खास दिन की बात आज भी उन्हें याद है। उसी समय उसका जनेऊ हुआ था। महफिल मे वह उतरे हुए वाल वाले सिर पर जरी थी टोपी पहने सभी के साथ बैठा था । प्यारा-सा कुमार । उसके शात चेहरे पर बुद्धि की हल्की-सी आमा थी। आंखें दोनो स्वप्निल । रह-रहकर बरवस उसकी ओर दृष्टि चली गयी थी। सहसा उन्होंने देखा, घुटने पर लयपूर्वक वह लडका ताल दे रहा है । 'सम' और 'अन्तरा' में उसको गरदन का हिलना तथा हाय हिलाने की सास-खास भगिमा देख कर वे अचम्भे में पड़ गये थे। वह यह नही भांप सका कि उस्ताद जी की निगाह उस पर पड गयी है। वह मगन होकर सुन रहा था । उन दिनो वी महफिल मे सगीत के ज्ञाता, लय तथा ताल के समझदार लोगो की कमी नही थी। उनके बीच कोई भी गायक गाकर आनन्दित ही होते । उस्तादजी को भी यह सुख मिला था। मगर उस महफिल मे उन्ह सबसे अधिक सन्तोप हुआ था उस बालक को सुनते देख कर। उसकी हरी-डरी आंखो की छिपी-छिपी भगिमा से औरो की प्रशसा फीकी पड गयी थी। उस समय मौका नहीं मिला था । उस्तादजी ने मन ही मन तय कर लिया था कि दुवारा जब माना होगा, तब सुरजीत से कहेगे कि लड़ये मे गुण है, उसके लिये कोई व्यवस्था होनी चाहिए । पर यह कहने का सुअवसर मिला कहाँ ! कलकत्ते में ही किसी से उन्हें पता चला था कि लडके को काशी भेज दिया गया है। इस बीच उन्हे भी महफिल के लिये बुलाया नही गया, और सुरजीत बाबू भी स्वर्ग सिधार गये । बधोपाध्याय परिवार से उनका नाता ही टूट सा गया । अगर वे काशी नही आते तो फिर से यह सब सोचा ही नहीं जा सकता था । मगर तांगे पर बैठ कर उस्तादजी सोचने लगे, जो लडका अभिजीत उस दिन मुग्ध-मन उनका गाना सुन रहा था, उसकी मति-गति आज कैसी होगी, कौन जाने ? हो सकता है उन्हे पहचाने भी नहीं, सो अचानक पुराने सम्बन्ध का जिक्र कर वहां ठहरने मे उन्हे हिचक हुई। क्यो नही कही और ठहरा जाये | विचार की गति जिघर भी हो लेकिन तांगा तो उसी पुरानी राह पर बढता जा रहा था । शायद कभी की वह दृष्टि जो भीड से -- ३६ उत्तराधिकार अलग उस पर गड़ी थी, वही उनके अजाने में अपनी ओर उन्हें खींचे लिये जा रही थी। मकान ढूंढने में बहुत परेशानी भी नहीं हुई। पर अभिजीत वहाँ नहीं था। जो लोग वहाँ थे, उनसे पता चला कि कई रोज पहले वह हरिद्वार चले गये हैं । वहाँ कई दिन बिता कर और भी भागे जाने का उनका इरादा है; प.हाँ-कहाँ जायेगे वही जानें। दो-एक वर्ष के अन्तर में हिमालय प्रमण करने का उनका नियम-सा है। कव तक लौटेंगे, यह बता नहीं गये । कभी बता कर जाते भी नहीं । उस्ताद जी लोटे जा रहे थे । पर पुराने गुमास्ता उन्हें पहचानते थे, यहीं इसी मकान में देखा था। मालिक उन्हें बहुत भादर-सम्मान देते थे, यह वे जानते थे । उन्होंने इसका जिक्र करते हुए ठहरने का आग्रह किया । उस्ताद जी का ना नहीं कर सके । दूसरे दिन उस्ताद जी गङ्गा-स्नान को जा रहे थे । बगल में ही अभिजीत का कमरा था, जिसका दरवाजा मुला था, सफाई हो रही थी। भीतर निगाह दौड़ाते ही उन्हें दीवाल से लटकता तानपूरा नजर आया। पूछने पर पता चला कि वह मालिक का है । जव यहाँ वे रहते हैं, तब उसका रियाज करते रहते हैं। मन अधा उठा । इस लड़के के लिये क.मी जो उन्होंने सोचा था, वह व्यर्थ नहीं गया। व्यर्थ हो ही नहीं सकता । यह विद्या कमी विलप्त नहीं होती, सोयी रह सकती है। और फिर कब कैसे वह जाग जायेगी यह भी कोई नहीं कह सकता। यह प्रसंग यहीं समाप्त हो जाता, पर हुमा नहीं । वहुत दिनों बाद उन्हें स्वरूप- कांदी के बंद्योपाध्याय परिवार के सदर-नायव का लिखा एक पत्र मिला । उन्होंने लिखा था- उनके नये मालिक काशी से अपनी जमींदारी में लौट आए हैं। इसी उपलक्ष में एक महफिल का आयोजन किया गया है। बहूरानी की प्रवल इच्छा है कि पहले की तरह ही एक शाम उस्ताद जी अपने पुराने आसन पर आसीन होकर हम लोगों को मुख पहुँचायें। उस्ताद जी अस्वीकार की मुद्रा में थे। उम्र काफी हो चुकी थी। गाना-बजाना भी लगभग टूट-सा चुका था। अचानक उन्हें याद आया कि नया मालिक तो वही लड़का होगा। बस वे राजी हो गये। उस्ताद जी अपने प्रोताओं की ओर ही बार-बार देख रहे थे । अमिजीत के अगल-बगल जो लोग बैठे थे, अपरिचित होते हुए भी यह अनुमान वे लगा सके कि उनमें लोग गांव के वागिन्दा है, योर अधिकतर लोग शहर के निमंत्रित लोग हैं । प्रतिष्ठित- सम्मानित लोग। मंगीत की महफिल के रीति-रिवाज के जानकार लोग। मगर उनमें लिसने से हैं जो संगीत के जानकार है, यह कहना मुश्किल है। फिर भी ये महफिल की सजावट के लायक तो है ही।

उत्तराधिकार 1 चढाव यहाँ भी प्रमुख पोता ही हैं। थोडा हटकर, जाजिम पर बहुत दूर तक जो लोग जमे बैठे हैं वे मामूली लोग हैं, और जो गिनती मे मम नहीं हैं। चेहरे पर और पहिरा मे हीनता-दीनता की छाप स्पष्ट है । शास्त्रीय संगीत की महफिल में ऐसे "निचले तबके के लोग कम ही नजर आत हैं। ये कौन हैं, यहां आपे कैसे, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सका । वुलापे गये हैं या बिना बुलाय आये है ? उस्ताद जी यह सोच भी नहीं पाये । यद्योपाध्याय परिवार के इन हॉल में ऐसे लोग परपरा के अनुसार सप नहीं पाते । पुरानी सारगी उस्ताद जी लेने वाय थे । और उनका तबनची अचानक बीमार पड़ गया था सो वह आ नहीं सका। उसकी जगह दूसरे को पकड लाये थे । वह उतना पक्का नही था । इसलिए उनके मन में थोडी वेचैनी थी। महफिल से उपस्थित श्रोताओ को देसकर उनका मन मोर मी उदास हो गया। पर इसे वे दिपाये रहे । अमिजीत से उन्होंने हंसकर पूछा, "क्या सुनोगे ?" "आपकी जो मर्जी " विनय पूर्वफ मेंपते हुए उसने उत्तर दिया । उस्ताद जी ने ईमन अलापा । उम्र हुई, रियान का अमाव । स्वर उतार मे वह गति नही रही । मगर दाठ वही है। अलाप लेते ही पता दल गया । जब वे गा रहे थे तो उनकी आंसें अभिजीत से मिलती रही थी। धीरे-धीरे वह मस्त हो उठे । यह किसी से दिपा नहीं रहा । यही गये या सब से वडा पुरष्कार है, यह सगीत समी के लिए नहीं होता। किसी को अच्छा लगे या न लगे पर एक पो तो लगा यही कलाकार का सबसे बडा सतोप है । उस एक के आगे अपने वो न्यौछावर कर देना उनका स्वमाव होता है। उस्ताद जी ऐसे ही कलाकार थे। कितने ही उनके महफिल मे आये । यह उनकी समस्या कभी नहीं रही। गिनती उनके लिए महत्व की पभी नही रही । एक हजार अर्थहीनो में यदि एक ही अर्थपूर्ण हो ता वे अपनी कला को सार्थक मानन वालो मसे थे। बहुत वर्ष पहले जव उस्ताद जी यहां आते थे, उस समय होने वाली दो-एक महरिनी की याद अमिजीत को भी है। उन्ही दिना की यार बस तथा संगीत का जितना भी ज्ञान उसन अर्जित किया है उससे वह यह समय रहा था कि ऐसे गवैये को एसी महफिल मे खीव लाना ठोक नही हुआ। पर उसके लिए उनके योग्य आयोजन करना समय नहीं था। इसलिए पहले तो वह महामाया ये प्रस्तान पर राजी नहीं हुआ था लेकिन बहरानी तो आज भी उसी पुरान वद्योपाध्याय परिवार के वीर दिनो मे सांग ले रही थी । लव अर्से बाद वश-परपरा के हादार को वापस पार, उसके द्वारा पुरान इतिहास का यथासमर पुनर्स द्वार करना ही उनकी मसा रही हो, यही सोचकर अमितीत न विरोध किया था। किन किन वा निमन्त्रण भेजा जाय, इसका मार भी उत्तराधिकार कुछ ऐसे लोग . बहूरानी के ऊपर ही था। उन्होंने सदर के नायव से राय-मशविरा करके ही सूची तैयार की थी। जिला और महकमे के कुछ ऊंचे अफसर तथा कई वे-सरकारी प्रमुखों के का नाम इसमें दर्ज होना स्वभाविक ही था। स्थानीय सभ्य समाज भी आमंत्रित थे, जो इस परिवार के पुराने संरक्षक थे। यानी दोनों ने मिलकर मालिक की परंपरा का जितना संभव हो सका कुछ उठा नहीं रखा । वगल की वह जवर-दखल कॉलोनी उनकी कल्पना में भी जगह नहीं पा सकी। 'शास्त्रीय संगीत' ऊंचे लोगों के लिए है। वे भला यह सव क्या समझेगे ? माना किसी को समझ हो भी, तो उसे यहाँ इस हॉल में बैठाया नहीं जा सकता। ताला खोलते समय आये आधे पागल मिस्त्री का घिधियाना-हम लोग जरा सुनेंगे-सुनकर वहेरानी मन ही मन अचंभे में डूब गयी थीं । और अभिजीत ने जब आने की छूट दे दी तो पहले इस पर वे कुछ विस्मित हुई जहर पर वाद में इसे कोई महत्व नहीं दिया। उनका ख्याल था कि एक मूर्ख को अभिजीत ने टालने की गरज से यह छूट दी है । उन्हें यह पता नहीं था कि सचमुच वे दल के दल आ जुटेंगे और घर के मालिक उन्हें आदर-सत्कार से ला बैठायेगे। नायब चुपचाप सब कुछ देखने के लिए वाध्य थे। मगर उनका मुंह लटक नाया था। बहूरानी भी भीतर ही भीतर नाराज हो उठी थीं। फिर उन्होंने यह सोचकर अपने को संतोष दिया कि हो सकता है वर्षों यहाँ नहीं रहने के कारण वह यहाँ की परिस्थिति से अनजान हो । धीरे-धीरे जब समझ जायेगा तो सब ठीक हो जाएगा। परिस्थिति समझे या न समझे, इस परिवार का लड़का होकर भी अभिजीत ने इतना अवघ्य समझ लिया था कि पिछले दिनों ये लोग किसी तरह भी यहां नहीं पहुँच सकते थे । जहाँ अधिकार की बात है वह इस वर्ग के लोगों के लिए नहीं उठती । शास्त्रीय संगीत के महफिल में जहाँ कोई उस्ताद गा रहे हों वहाँ पहली पंक्ति में बैठने के अधिकारी जो विपय के ज्ञाता है, उसका मरम समझ सकें और कि रस में डूब सके। यह ज्ञान या अनुभूति किसी सास वर्ग या जाति की निजी सम्पत्ति नहीं होती। पढ़े-लिखे, अपढ़, मानो-अजानी तो सभी वर्गों में होते हैं। पढ़ाई-लिखाई, पद-मर्यादा; धन-सम्पत्ति के नावार पर जिन्हें प्रथम स्थान दिया जाता है, उनमें भी ऐसे हो सकते हैं। उसी प्रकार यह सब सीखने का अवसर जिन्हें नहीं मिला, जो अवांछित अतिथि के रूप में दूर पर मोड़ से बैठे हैं उनमें भी मिल सकते हैं। पर अभिजीत की चिन्ता यह थी कि उस्ताद जी को कहीं बुरा न लगे। अपर से हो सकता है ये कुछ न बोलें, पर मन ही मन कुछ सोच न लें । वे जहां, जैसे समाज में किया करते है, यहां इनकी पैठ नहीं होती। इनके बीच बैठने के वे अभ्यस्त नहीं भी हो सकते हैं। ये पुराने जमाने ने आदमी ठहरे। जिन्दगी भर यही करते रहे। विद्या दायिनी मस्ती की देन यो है-एक वीणा और दूसरी पुस्तक । वे दूसरे अवदान के . १ ।

पूरे तारा पर से उँगनिया हासी । सरगिया अपनी छधी रोग पर तबसची पी और उत्तराधिकार वितरण में जरा मी कमी नहीं करते । कोइ भेद नही रसते । उनके ख्याल से धनी- गरोग सभी समान रूप से यह अजित कर सकते हैं. बिना किसी दाधा-दिन । पर पहने के लिए इंसा की मुठी नियमानुसार बन्द रहती है। विरले ही उस विदा में पारगत हो सकत है। इहीं लिए जरूरी है सामाजिक हाना । जीवन में जिन्हें जूमना नहीं पड़ता, जो आसानी से अपनी जिन्दगी जीते हैं, वे ही वाग देवी के यांये हाय का दान पाने का अपना हाय वढा सकते हैं। यानी इस विद्या में पारगत होने का अभि- कार एक बडे लोगो को ही है । उस्ताद जी जैसे गुणी व्यक्ति ऐसा के द्वारा ही लालित- पालित होते हैं । एसा म जो प्रतिमा है, यह धनवानो की वृपा के बिना विकसित नहीं हो सकती, हा सकता है कि अवसर न मितन पर सदा विलुप्त ही रह जाये। जिनकी गिरती साधारण में है, वे ऐसा को कुछ नहीं दे पाते। ऐसो को जो कुछ मिला है सिर्फ स्वीकृत और पुरप्कार ही नहीं बल्कि जिन्दगी जीन का साधन धनवानी से ही मिलता यानी उप्नाद जी अगर अभिजीत के साय कुछ पक्षपात करें और उसी मसा से इन लोगो को क्षित दृष्टि से देखें, तो उन्हें दोषी ठहराया जा सकता। मासन पर आसीन होने के बाद ही वस्ती के लोगो पर जब उनकी नजर गयी यो और उममे जा भलका था वह अभिजीत से दिपा नहीं रहा। मगर वे भाव टिके नंही रह, यह देखकर उसे पुच सनोप हुआ । वह समझ गया कि ये भी ऐसे ही कला- कार हैं जो अपनी ना मे एक बार दूर तो फिर अपने अगल-बगल मा स्याल इन्ह नहीं रहता। तपतची ये पाररा उस्ताद जी वीच-बीच मे मुंझला उठने थे। वह जब भी बताल हाता कि प रयकर उसे ताल वतान लगते । यानी उसकी तरफ मुपर सिर भक भोर पर बोल का उच्चारण परने लगते थे । बहुतों की समझ के मान लेन मि यह भी गान का ही कोई टुक्डा है। अभिजीत उस-उसड जाता था। पर करे क्या, उसरी समझ मे यह नही आ रहा था । यहाँ दूसरा कोई अच्छा तबलची भी नहीं मिल सकता था। अभिजीत ने एक और बात पर गौर किया, यिनिया का ध्यान उस ओर गया होगा। हो सकता है कि उस्ताद जी का आँख भी भांप गयो हाँ। तबले की सगत मे जब भी कभी काई श्रुटि होती, यस्ती के लोगों में बैठा एक व्यक्ति बहाल हो उठता था। सभी मुंझलावर, कभी निराश होकर बुरी तरह सिर घुनन लगता था। उसकी मासो और चेटर पर व्यन मावा सोसा लगता था कि उसका दिन चोट उठा हो , बीच- यीच म, दव म्वर म है, ईश्य' भी वह कर उठता था। इस वार तानची से कोई एसी भूल हुई कि उस्ताद जी सहसा रुक गय । सान यह परे पा, यहां दे उत्तराधिकार , होंठ विचका कर पूरने लगा। उस आदमी ने एक अजव स्थिति पैदा कर दी। टूटी प्रत्यंचा से छिटके तीर की तरह छिटक कर हाथ उठा कर जोर से कह उठा; "उठ जामो, हट जामो...!" हॉल में जैसे अचानक एक वम्-विस्फोट हुआ हो । सभी की चकित माँखें उसकी मोर टंग गयीं। वह लेकिन तत्क्षरण गुम हो गया जैसे धरती फट जाये और वह उसमें समा जाये । वह यह क्या कर बैठा ! कुछ पल के लिए सचमुच वह ज्ञान खो बैठा था। महफिल में सन्नाटा छा गया था। गाने की ओर लोगों का मन-ध्यान कम था । श्वर-उधर कुछ लोग फुसुर-फुसुर वतिया रहे थे। वे सब के सब अचानक शान्त हो गये । जैसे साँस रोके इस प्रतीक्षा में बैठे थे. -अव क्या होगा? किसी के कुछ कहने के पहले ही सदर के नायब सामने आये । सम्मानित अथि- तियों की अभ्यर्थना, महफिल की मर्यादा और संचालन का जिम्मा उन्हीं पर था । इस- लिए वे ड्योढ़ी पर खड़े थे। वहां से वे धीरे-धीरे चल कर वस्ती के लोग जहाँ वैठे थे, वहाँ आ गये। चुटकी के इशारे से उस आदमी को बुलाया, "ओ माई, इधर-इधर - आना।" वह घबराहट में उठ रहा था कि बगल में बैठा एक नौजवान उसे रोक कर खुद खड़ा हो गया । हाय जोड़ कर उस्ताद जी से उसने कहा, "हम उसकी ओर से आप से माफी मांगते हैं। आप समझ गये होंगे कि वह काहे गरमा गया। वह एक बढ़िया तबलची है।" नायब नौजवान से खुश नहीं थे। खुश रहने की बात भी नहीं थी। यह शंभू था, बस्ती का नेता । यही सब ग्युराफात की जड़ भी था, यह वे अच्छी तरह जानते थे। यहाँ इस तरह माफी मांगना उसकी नेतागिरी ही थी । वे उसमें इस काम को बर्दाश्त नहीं कर सके । रूखाई के साथ बोले, "तुम्हें किसने टाँग अड़ाने को कहा जी !" "जी, हमने आप से तो कुछ कहा नहीं ।" बिना किसी और देखे ही शंभू ने फौरन उत्तर दिया । 'आपसे' शब्द के ऊपर कुछ इस प्रकार जोर दिया गया था कि सिर्फ उपेक्षा नायव की ही नहीं की गयी थी बल्कि मंसा औरों की भी उपेक्षा करने की थी । यानी गाव कुछ इस प्रकार व्यक्त हुआ कि 'आप कौन हैं साहब ? हम तो उस्ताद जी में बात कर रहे हैं।' यह कहना पर्याप्त है कि बंद्योपाध्याय खानदान के सदर नायव यह सुनने के अन्यस्य नहीं थे। सास कर आज के इस आयोजन के नियोजक वे मोर बहूरानी ही श्री और प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने ही सभी को न्यौता दिया था, सिर्फ इन लोगों को कर। उनमें से ही एक के द्वारा जो कुछ हुआ, वह बुरा हुआ। इसे गले के नीचे भारला जितना मुश्किल या यगे ही कुछ ऐसा किया भी नहीं जा सकता था जिससे कि गाफिल में और गबही मने। फिर भी थे कुछ कमाई के साथ कहने जा रहे थे कि उत्तराधिकार उन्होंने देखा, नये मालिक उठ खडे हुए हैं और वे इधर ही बढे आ रहे हैं। अतः वे कहते-कहते रुक गये। अमिजीत के वहाँ पहुँचने के पहले ही पीछे से उस्ताद जी की आवाज आई, "उसे यहां बुला लीजिये।" उसे यानी शम्भू को। मगर वह अभिजीत की ओर देख रहा था। जैसे कुछ और करने के लिए वह अन्दर ही अन्दर तैयार हो रहा हो। उस्ताद जी की बात उसे सुनाई नही पडी । उस ओर उसका ध्यान खीचा बगल के एक लडके ने, “तुम्हें कहा जा रहा है शभू माई !" "हमका?" "कम्न?" लडके ने उस्ताद जी और उंगली दिखाया। शभू उठ खड़ा हुआ। फिर मुक कर दोनो हाथ फेला मीड मे रास्ता बनाता हुआ जैसे ही चम्पत होने वाला था कि फिर उस्ताद जी ने कहा, "उसे मेरे पास भेजिए न।" "जाओ न नवीन का।" उस आदमी को अया कर देखते हुए शभू ने कहा। "हम ?" "हाँ, तुमको बुला रहे हैं न उस्ताद जी।' नवीन इतने पर भी अक-धक था। भेपा-झपा सा इधर-उधर देखता हुआ यो चला जैसे अब वह किसी भयानक सकट में पड़ने ही वाला है । अभिजीत अपनी जगह लौट गया था। उसी के सामने के गुजरना था, वहाँ नदीन ने एक कर, प्रायः धरती पर मुफ कर नमन किया। इसके बाद आगे बढ़ कर उस्ताद जी के सामने भी जमिनस्त होकर द्विविधाग्रस्त-सा हाय जोड कर खड़ा हुआ। "उन्होंने मुस्कराते हुए बाये तबले की ओर इशारा करके कहा, "हो जाये एक हाध?" नवीन ने कुछ कहा नही सिर्फ उसकी जीम बाहर निकल आयी और उस पर दांत गडा कर वारबार गर्दन हिलाने लगा। "क्यो, हर्ज क्या है ?', "आपसे झूठ कुछ नही कहेगे । कभी-कभी जरामन बजाते हैं तो " मगर आप के साथ ! अरे बाप रे!" "ठीक है, आओ बैठो, जो होगा देखा जायेगा।" नवीन ने पल भर मे क्या सोचा पता नही, मगर उसने गमीरतापूर्वक उस्ताद जी का चरण स्पर्श किया फिर पैरो पर गिर गया। उन्होंने उसे पकड कर उठाते हुए कहा, "ठीक हैं, ठीक है।"

उत्तराधिकार तबलची पहले ही एक किनारे सरक गया था। नवीन ने सबसे पहले उसकी ओर मुखानिव हो माफी मांगते हुए कहा, "मझ्या, कुछ ख्याल न करना।" वह तललची संभवतः इसके लिए तैयार नहीं था। घबराहट में कुछ बुदबुदाया पर ज्या कहा लिली की समझ में नहीं आया। तबलची की जगह बैठते ही नवीन ने दोनों तवले को कई बार हाथों से छू-ट्ट कर प्रणाम किया फिर बाँखें मूंद कर उनने अपने इष्टदेवता को प्रणाम किया । जत्र उमने आँग्वे खोली तो उसके चेहरे पर कुछ देर पहले वाली कुंठा का भाव गायब था। उसकी जगह आत्मवल की चमक व्याप्त थी। पहले कई दफा हयोड़ी ठोंकने की बारी थी। यह शेष होते ही जत्र मन्यन्त कि हायो का पहला हाय तबले पर पड़ा और उनमें से एक परित्रित झंकार निकाली, उस्ताद जी बघावे से उसे देखने लगे। उस दृष्टि को प्रसाद मान कर नवीन ने सिर नुकाकर संगीकार किया। उधर मारंगी के तार पर भी छड़ी पड़ी। एक वाजे का दूसरे ने साथ दिया । दजाने गलों में भी इशारे में नमनि का सम्मापा हुआ। आपस में सहयोग की स्वीकृति-जिसका अर्थ था, हम सहयोगी हैं, हम दोनों का जो काम है, उसे ही कहा जाता है 'संगत' । मतलब 'नगति' या मेल में ही निहित है हमारा सम्पर्क । जिनके दोनों ओर हम बैठे है, जो हमारे मव्य-विन्दु है, उन्ही का अनुसरण अपने-अपने पय पर हम करेंगे । प्रतिद्वंदी नहीं, सहयोगी है । इतने बड़े उस्ताद के खास संरगिया से भी नवीन को मय था। पर उसकी दृष्टि में उसे जो भाग्यासन की झलक मिली; उनसे उसे बल मिला । अपने आप पर भी विश्वास जमा । उस्ताद जी ने नजन अलापा। मीरा का भजन । जिस मापा में मीरा की रचना दी, उस भाषा का गान यहां के लोगों को नहीं था। उसका व्याकरण वे नही जानते थे । परन्तु नंगीत का व्याकरण अलग होता है, उसकी अपनी भाषा होती है, जिंग समझने के लिये बुद्धि या शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती ! आवश्यक होता निर्म नीला मन, जायद हर गानीमा नहीं होता। गाना मात्र ही संगीत या 'भूमि नहीं होना ! मगर मान का मजन अवश्य उसी लर का गाना है। उसके पदों का परिचय हो या नहीं लेकिन उसका भाव प्रोता अनायास ग्रहण कर सकेगें अगर उसे अन्नर में नदी उग ने उतार दिया जाये। यह काम गायकों का है। गायक देना नहीं है। र उमा वाहन है। फिर क्या हर गाय के लिये यह सम्भव है ? गली में कल में नाका जादू होता है ? बह विगंप मंत्र क्या सर्व विध साधित है ? दगा ही अगर होता नो दुनिया में 'प्रतिमा' का कोई अस्तित्व ही नहीं होना । A उत्तराधिकार , सभी सब नही कर पाते । कोई-कोई एक विशेष क्षमता लेकर जनमते हैं। कोई उत्स उसका जब नहीं मिलता तय कहा जाता है-देवी शक्ति है। हा सकता है, यही हो । न भी हो । यही घष्टि का रहस्य है, जिसरा आवरण आज मी उन्मोचित नहीं हुआ। कौन जाने कमी होगा भी या नहीं। प्रतिमा ईश्वर प्रदान होते हुए भी उसके प्रस्फुटन या जिम्मेदार मनुष्य ही है । ईश्वर जो कुछ देते हैं, वह है माय बीज या बहुत हुआ तो अकुर, उसे पत्र-पुप्प ने रूप में सुशोभित करने का काम मनुष्य का है। सिर्फ विधाता ने ही तो इस विश्व की सष्टि नहीं की, उसकी पर्त दर पर्त मे मनुष्य वे कार्य-चिह्न अक्ति हैं। उस्ताद जी में सम्मवत. इन दोनो का वास्तविक मेल था। ईश्वर प्रदत्त मठ से युक्त थी उनको जीवन व्यापी साधना । बहुत दिनो पश्चात् आज इस सांझ मे जैसे उन्होंने सब नि शेष कर दिया। जिसके आ', कौन है उनके श्रोता, यह सब भूलकर । यदि भूलते नहीं तो यह सम्भव भी नहीं होता। अह रुकावट डालता, मर्यादा-बोध पन्धे पर सवार हो जाता । पर पो उनके सामने बैठे हैं, उनमें से बहुत से लोग उनके इतने महत्त दान के योग्य पान नही है, इसे वे बिल्कुल ही भूल गये थे। गाने में तन्मय थे । इससे भी बड़ी बात यह थी कि अपने सुर मार में उन्होंने सिर्फ शिक्षा और साधना का उपयोग ही नहीं किया था बल्कि उसमे उन्होन अपना हृदय उडेल दिया था । गाने के साय एकान्त हो गये थे। हो सकता है, इस विशेष गाने की भाषा, स्वर, अन्तनिहित आवेदन सहायक सिद्ध हुए हो। मोरा जब अपने गिरधर गापाल को गाना सुनाती थी, उस समय वह यह भूल जाती थी कि वह राजरानी है, यह भूल जाती अपना अभिजात्य, गौरव, मर्यादा । एक अति साधारण रमणी के रूप में अपने पत्थर के श्रोता के सम्मुख समर्पित हो जाती थी, वैसे ही उस्ताद जी मी इस क्षरण अपने जीवन भर को अजित को हुई विद्या, यश, मान-सम्मान, स्वातत्र्यबोध, सब कुछ भूल कर एक साधारण गायक की तरह अपने को शिक्षा-दीक्षा हीन अनाडी श्रोताओं मे विपीन कर चुके थे। उसका परिणाम हाथो-हाय मिला । जिनने अव तर उन्ह यलग भर रखा था, झिझक और कुछ मय के अलावा और कुछ नहीं दिया था, वे जैसे अव्यक्त आपण से और निकट आ गये । जिन आँखो में एक गूंगी निर्विकार उदासीनता के अलावा और कुछ नही था, वहां दीखा उत्सुकता वा प्रकाश | उसमे प्रस्फुटित हुआ पाने का आनन्द । श्रोताओ का लगा कि व कुछ पा रहे हैं, कही कुछ जाग रहा है। यह आदमी जो गा रहा है वह सिर्फ उस्ताद नहीं हैं, उनमे अपने आत्मीय का दर्शन हो रहा है । वे हमारे जाने-पहचाने हैं, बहुत पास के कोई । गाना जब खत्म हुआ तब महफिल की समां ही बदली हुई थी। गवैये के साथ ४४ उत्तराधिकार । श्रोता एकात्म हो चुके थे, सूक्ष्म सूत्र जुड़ चुका था । सभी उल्लसित-उत्तेजित थे। कोई- कोई मुग्ध, किसी की दृष्टि भावभीनी थी। वह मिस्त्री जो ताला तोड़ने आया था, और जिसने महफिल में आने की इजा- जत चाही थी, वह तो बीच-बीच में तड़प-तड़प उठा था । वह अब अपने को रोक नहीं पाया। दौड़कर उसने उस्ताद जी के पैरों पर सिर पटक दिया। इसके बाद गरदन उठा, हाथ फैला कर कह उठा, "चरण धूल दीजिये प्रभु ! देश छोड़ने के बाद ऐसा कभी नहीं सुना था भगवान् !" यह कहते हुए उसकी कोटर में धंसी दोनों आँखों में आँसू डवडवा आये । लगा उसे अचानक अपने देश की याद हो आयी। बहुत दिन हुए जिसे छोड़ आया है और शायद अब कभी वहाँ जा न पाये । ऐसी ही किसी मधुर-करुण अनुभूति का स्पर्श उसे छूने लगा। उस्ताद जी ने रोका। कितने लोग उनके चरण रज लेते रहते हैं। उन जैसे प्रसिद्ध कुशल, गुणी व्यक्ति का प्राप्य सम्मान यही तो हैं । इसी दृष्टि से इसे देखते भी हैं। अभ्यास के वशीभूत होकर मन को उद्वेलित करने जैसा उन्हें इसमें कुछ नहीं मिलता । लेकिन इस मूर्ख, दरिद्र गवार आदमी की • सरल उमंग और आत्मीय स्पर्श से उन्हें एक ऐसा सुख मिला, जो समझदार श्रोताओं की फर्जी वाहवाही में नहीं मिलता । मिस्त्री के कन्धे पर हाथ रख कर हंसते हुए वे बोले, "तुम लोगों को अच्छा लगा।" "ई भी कोई कहे की बात है ?" अव उस्ताद जी अपने अचानक मिले तबलची की ओर मुड़े । स्नेह से पूछा, "तुम्हारा नाम क्या है ?" "जी..."जी-नवीनदास ।" "हाथ बहुत मीठा है । अच्छा बजाते हो।" "काहे नहीं !'' मिस्त्री ने गर्व के साथ कहा, हलवाई का पूत है न । चीनी का रस वोटते-घोंटते हाथ भी मिठाई हो गया है ।"..."यह कहकर अपने मजाक से वह आप ही खिलखिला कर हंस उठा । बस्ती के लोगों ने भी इस हंसी में साथ दिया । खास कर जवान और लड़कों के दल ने । सभ्य श्रोताओं के होंठों पर भी हलकी हंसी झलनी । सामने की जगह खाली होने लगी थी। मेहमान यहाँ-वहाँ से एक-दो उठ-उठ कर जाने लगे थे। कोई दूर से और कोई पास आकर त्रुशी-खुशी विदा ले रहे थे। कोई-कोई दो कदम आगे बढ़कर उस्ताद जी को धन्यवाद दे-देकर कृतज्ञता ज्ञापन कर रहे थे।

उत्तराधिकार ४५ बस्नी वालो को मोड अमी भी लगी थी। वे गाना सुनने आये थे । अन्त तक सुनेंगें। बीच मे ही उठकर चले जाने में जो विभिष्ट होने की गांठ होती है, वह उनमें नहीं है । या शायद हो-(जो लोग नितात साधारण होते हैं वे ही आखिर तक ऐसे में डटे रहते हैं)-पर विशिष्ट बनने की लालसा ऐसो मे नहीं होती। असाधारण हैं ऐसा सोचकर वे यहां आये मी नहीं। यानी वैठे रहे । कार्यक्रम के बीच में बातचीत करना कोई बुराई नहीं है । दये सर मे वह मी चल रहा था, और हॉल में उस और गप्पे हो रही थी । सहसा एक जवान छोकरा उठ खा हुआ । उसके हाथ के इशारे से गप्पे रुकते ही उस्ताद जी के अभिप्राय से उसने कहा, "अव एक चलताक हो गुरुजी!" सामने की पक्ति मे कई वूड-पुरनिया बैठे थे । इस महफिल के पुराने श्रोता, उस्ताद जी के सास मक्त और रूचे स्तर के संगीत के समझदार लोग । वे चौक उठे। अभिजोत को भी कम अचरज नहीं हुआ । ठीक उसको बगल में जो बैठे थे उन्होंने उसके कानो मे झंभलाकर धीरे से कहा, "देख लीजिये इनकी बेहूदगी।" अमिजीत के कुछ कहने के पूर्व ही उन ओर बैठे एक सज्जन ने फडी आवाज मे धमकाते हुए कहा, “तुम लोगो ने क्या समझ रखा है ? किससे क्या कह रहे हो, कुछ पता है ?" - जवान छोकरा कुच हतप्रम हुआ, पर बोला, "काहे, का ॐ चलताऊ नही जानते?" "नहीं भाई।" उस्ताद जी ने धीर-गम्गीर भान स्वर में उत्तर दिया, "हम पुराने जमाने के लोग हैं । वह सब सीख कहाँ सके ? अच्छा हो आधुनिक या पलताळ तुम लोगो में से कोई गाये।" इतना कह कर वे धीरे-धीरे उठ खडे हुए और बगल के दरवाजे की ओर बढे। सामने जो लोग वैठे थे, वे भी उठ खरे हुए। अभिजीत ने भी उस्ताद जी का अनुसरण किया । साथ ही वाढ के बहाव की तरह हड्बडा कर बस्ती के लोग टूट पडे और देखते ही देखते सामने की खाली हुई जगह दखल कर बैठे। बहरानी महफिल में नहीं आयी थी। आने का मन नही था, यह बात नहीं, बहुत दिनो के बाद उस्ताद जो गाने आय थे, खास कर उन्ही के अनुरोध भाग्रह पर । लेकिन वह बैठनी कहाँ ? पहले जब भी महफिल होती थी तो महिलाओं के लिये गवैये की दाहिनी ओर जो जगह थी वहां चिक का पर्दा पड जाता था। सिर्फ परिवार की महिलाएं या स्वजन-आत्मीय ही नहीं, बाहर को आमत्रित स्त्रियां भी होती और गांव की दिन बुलाए जो त्रियां आ जाती उनके लिये भी स्थान यहां होता । पुरुषो के लिये जो व्यवस्था थी, उनके बीच भी वैसा ही नियम था यानी भिन्न-भिन स्तर को महिलाओ के लिये विमिन पांनियां बैठी थी। याग की महफिल मे चिक नहीं पड़ी थी । नायब जी ने कहा था जरूर, खास उत्तराधिकार ४६ । कर बहरानी को दृष्टि में रखकर ही, लेकिन महामाया ने यह 'हंगामा' गरने नहीं दिया। 'गीतर ही भीतर उनका यह ख्याल रहा हो कि भव चिफ का जमाना लद गया । यहाँ तो वे अकेली रह गयीं है। आयोजन भी उतना विशाल नहीं है। अपनों फो बुलाया नहीं गया। गाँव की औरतों के लिये भी इरा परिवार की हँसी-खुशी में अब उतनी दिलचस्पी नहीं रही। आमन्त्रित सरकारी अफरारों को संग उनकी पलियाँ, बहिन कुछ थायेगी। ये पुरुषों में ही बैठेंगी। बहुत हुआ तो बिना किसी पायरे के थोडा फासला होगा । ये इस जमाने की महिलाएं हैं। दरवाजे-खिड़कियों की राजावट सिवा परदे का व्यवहार जानती नहीं। चिक की योट में लुका-छिपा रहना उनके आत्मसम्मान की टेरा पहुँचाना है । गहामाया ने अवश्य नायव से यह सब कुछ नहीं पाहा । अपनी असुविधा ही उन्हें बता दी थी , "गहिलायों को अलग बैठाने में देख-रेख कौन करेगा ? मैं तो हर समय घर ही उलझी रहेगी।" इधर का मतलब बहुत गुन्छ था-सारा मेहमानों के नापत का इन्तजाम करना, उस्ताद जी के गंग आये कई लोगों को भोजन की व्यवस्था, राव तो उन्हें ही करना था। मन ही मन सोचे बैठी थीं, यह सब ठीक-ठाक करके यदि मौका मिला तो हॉल के यगल गमरे में जा बेटेंगी। बीच वाले दरवाजे के पास ही तो उस्ताद जी का आरान था। दरवाजा जरा फाँक कर लेने पर ही उस्ताद जी को देखा जा सकता है, गाना गुना जा राकता है। श्रोताओं की निगाह वहाँ पहुँच भी नहीं सकती। अचानका महामाया ने किसी से गुना फि उस्ताद जी उठ गये हैं। उन्हें अचरज हुआ । इतनी जल्दी ! इस घर में बहुत महफिल होते उन्होंने देखा है। चिन्ता में पड़ गयीं । पाहीं उस्ताद जी नी तबीयत तो अचानक खराव नहीं हो गयी ! बूढ़े हो गये हैं, पारीर भी पैसा नहीं रहा। अन्दर महल से फौरन बाहर आयीं । विचले-महल की ड्योढ़ी पर नायब मिले । उनका बेदा गम्भीर था । उन्हें देखते ही ये समझ गयीं, जहर गढ़बड़ी हुई है। क्या आहै...यह जानने गो ठहर गयी । पता नहीं पया गुनने को मिले । नायव ने अजीव दृष्टि से गहामाया गी और देखा। इसके बाद दाहिने हाथ मी हथेली उलट कर उन्होंने धोरण स्वर में पाहा, "हो गया।" जरा हराने की कोशिश गी। गीगी गिती विपदा में ही यादगी हंगता है। "गया हुआ नायव जी ?" गुन्छ मीर पास आकर बहरानी ने उरते-डरते पूछा । "वही जो गोता था। एक दिन मैंने माहा थान, ये जितना जो मुछ ले सुपे है, उगे तो वाला नहीं होने वाले हैं। उनका असली मकराद है हमारी इज्जत पर मना करना । गम्यता मी छानी पर नी, दश लेगा, एक दिन जबरदगल पा टा पहराने लगेगा। यही हुआ । इसी हाल में उसकी गुल्मात हो गयी। दुःस गी बात 1 उत्तराधिकार तो यह है कि हमलोगो ने ही इसका अवसर इन्हे दिया । इन्दे बुला लाये--आ वैल मार।" "मैं कुछ समभी नहीं !" वहूरानी की बातो मे व्याकुलता यी । नायव जी ने उस ओर ध्यान नहीं दिया। वे उस वक्त स्वय बडबडा रहे थे, "मत्र बिला जायेगा। यह पता है और यह भो पता है कि उसके पहले हम भी बिला जायेगे । और अपनी आँखों के आगे ही ।" वास्य अपरा रहा । अमिजीत वहां आ गया था । उसे देसम नायव सुप हो गये और वहां से जाने के लिये पैर बटाया ही था कि अमिजीत ने उन्हें रोक पर रहा, "का, मैं आपको ही दंढ रहा था। बाहर से जो लोग आये हैं, कोई चले न जायें । मैं तो समी को पहचानता भी नहीं ।" "ठीक है । मैं देखता हूँ।" नायब चले गये। अमिजीत बहूरानी की ओर मुडकर बोला, "तुम्हारा इधर सब ठीक है न ? मतलब नाश्ता-भोजन ।" महमाया ने इस सवाल का उत्तर न देकर बीच मे ही एक और सवाल किया, "यहाँ क्या कुछ गडबडी हुई है लाला?" "गडबडी? नही तो " "इतनी जल्दी महफिल उठ गयी ?" "महापित उठी नही, उस्तादजी उठ गये। अब तुम्हारी इस बस्ती ने लोग आपस मे गा-बजा रहे हैं।" "वस्ती ये लोग ?" बहूरानी ये ललाट पर माडी-टेढी रेखाएं उमर मायी, "शायद इसी लिये उस्तादजी उठ गये?" "नही, वे अपनी मर्जी से ही उठे। उनके बारे मे जैसा हम समझते हैं, वे वैसे नही हैं । फहाँ मुडना होता है, वे जानते हैं। खैर, मैं चला, तुम्हारे गेस्ट यो संभालू । इन्तजाम होने ही खबर मिजवा देना।' "सब हुआ ही है। देर नहीं है।' अचानक जैसे जबरन समी चिन्ताएं उतार फेक अपने कर्तव्य की ओर महामाया लौट आयी, 'प्लेटे सजाई जा रही हैं। अब पाय बनाने को कहती हूँ?" तेजी से अन्दर महल में जाते हुए वे ठमक कर खडी हुई। हाल से शोर का एक झोका आया। उधर मुंह मोड कर वे दई क्षण तकती रही। इसके बाद तेजी से भाग वढ गयी। उनकी मांखो मे ओ अभलाहट थी अमिजीत से वह छिपी नहीं रही। बाहर महल मे जाते हुए उसके होठो पर हंसी की पतली सी रेस उभर आयी। इस हाल मे माने वाला शोर इस महल के लिये कोई नयी बात नहीं थी । बहुत बरस पहले भी मुना उत्तराधिकार १. जाता रहा है। इससे भी अधिक उदंड तथा पागल पन से वह भरा होता था। फिर भी उसे ये सहते थे, मान लेते थे। माज सह नहीं पाते । बहुत बुरा लग रहा था । उस समय जो शोर मचाते थे और आज जो शोर मचा रहे हैं उनमें दूरियां की थीं। एमीलिये मन को बुरा लग रहा था। इन कई वर्षों में समय बड़ी तेजी से आगे बढ़ा है। बहूरानी और नायबजी ही उसके साथ कदम नहीं मिला सके हैं। ४ अगिजीत को जब काणी भेजा गया था, उस समय तक गांव के स्कूल में अभी दो वर्ष की पढ़ाई बाकी थी । हेड मास्टर उसे पढ़ाते नहीं थे । फिर भी वह बंद्योपाध्याय परिवार का लटका है यह यह जानते थे । स्कूल और स्कूल के बाहर भी उससे वे संपर्क रयते थे । कारण, उसके वात व्यवहार से ऐसा लगता ही नहीं था कि वह जमींदार पराने फा सका है। उस परिवार से पहले जी आते रहे हैं, उनमें यह भावना साफ प्रकट होती थी। दुर्गा मोहन बाबू बहुत दिनों से इस स्कूल से जुड़े हैं। अपनी जवानी में एसिस्टेंट टीचर हो कर आये थे, धीरे-धीरे चढ़े-बढ़े। इसके लिये उन्होंने किसी का परवाजा कमी नहीं खटखटाया । अमि के लिये दुर्गा मोहन बाबू के मन में एक स्नेहपूर्ण म व्यक्त याकर्पण था। इसके साथ एक और चीज जुड़ी थी, जिसे काहा जाता है संवेदना । इस शान्त, नाजुक, गोले बच्चे की बायों में झांकने पर उन्हें रादा ऐसा लगा है कि इसके मन में कोई दुःख है, जिसे ये उगने होकार महमूग करते थे। कारगा से नो वे अनजान थे। पर यह जान से थे कि अमि जिस घराने का लगा है, जिस वातावरण में पला है उसमें यह अपने को पपा नहीं पा रहा है । बंद्योपायाध्य परिवार के विशाल महल में वह नितांत अकेला है। उसके बाहर भी जो छोटी-सी दुनिया है, उसमें भी वह अपने फो खपा नहीं पाता । दोनों बीच में एम महल पी ऊंची दीवाल खड़ी है। बाधा उसकी अपनी मोर से जितनी प्रबल है, उससे नाही अधिक बाहर का बन्धन है। यह किसका लड़का है, उगे मूलना चाह पर भी, गांव उसे भूलने नहीं देता। निग दिन यह गुना कि अनि यहाँ से जा रहा है, अब से वह अपनी काणी- निमागिनी दादी के यहां रह गार पड़ेगा, गंगी ही उसकी इच्छा है (प्रचार ऐसा ही दिया गया था ), दुर्गा मोदन एक ओर जहां उसकी अनुपस्थिति को हृदय से अनुमय वे उत्तराधिकार 1 , कर रहे थे, वही उन्हे खुशी भी हुई । अपने घर में ही पराये होकर रहने से कही अच्छा है परदेश मे जीवन बिताना । अपनो से अलग होने मे जो एक टीस है, सास कर इननो कच्ची उग्न के लडके के लिये, उससे कहीं अधिक सुख है-मुत्तिः । यहाँ रहने पर उसका मन गमले के पौधे की भांति दिन-दिन सूखता जाता, अब वह खुली आबोहवा पाकर सरसम्म बना रहेगा। अभिजीत की मास्टर साह्य से भेंट कभी कभार ही होती थी। बातें भी जो कुछ होती बहुत मामूली। फिर भी फिन्ही अज्ञात कारणो से वह उन्हे अपने से ही लगते थेस्वल्पकांदी जिस दिन उसे छोडना पड़ा, उसके बाद से जीवन भर वह इस भागी- रथी के तट पर त्याग आये जीवन भो भूलने का ही पल करता रहा । पर भूल न सका । शायद भूल ही जाता यदि तीन-तीन लोगो का अदृश्य आमर्पण का माला-जाला उसके मन के चारो ओर पिरान होता। उसमे जो सबसे ज्यादा प्रबल था, बहुत पहले ही वह टूट चुका है । दूसरे के सिंचाव की उपेक्षा नहीं कर पाया तभी तो उसे इतने दिनों बाद मी लौट कर आना पडा है। भोर तीसरे के प्रति मन ही मन अब तक यह सदेह शील रहा है । पता नहीं लौटने पर क्या से क्या पाये ? मनोबल हा होने पर भी संसार की माटी किसी को सदा पकडे नहीं रहती। लौटने पर उसने सुना, उसकी लाशका निर्मूल है। दुर्गा मोहन बाबू अभी भी हैं। सिर्फ 'हे' ही नहीं । वे बाज भी मन से हरे और तन से भरे हैं। लवे काम के दिन उन्होंने जिस माटी में बिताया है, रिटायर होने पर भी समवतः उसकी माया से वे भुक्त नहीं हो पाये थे। स्कूल से कुछ दूर गंगा के उतार पर यानी तराई जहाँ से शुरू हुई है, वही एक घर बना लिया है । उनके मिलने-जुलने वाले बहुत नहीं है, इसकी जरूरत भी उन्हे नही थी। पत्लो बहुत दिन हुए परलोक सिधार गयो । लडके कोई कलकत्ते में कोई बही, अपनी गृहस्थी में लगे हैं। एक लड़की है, संतान हीना विधवा । वही बाप के साथ रहती है। यानी बूढा बेसहाय बाप उसी की शरण में पड़ा है। दुर्गा मोहन ऐसा ही सोचते और लोगो से कहते भी यही थे । उनका विश्वास है कि भगवान किसी को एकदम से वचित नहीं करते । महफिल मे वे आ नही सके थे । सगीत से दिलचस्पी जरूर है। मगर एक री मे बहुत देर तक बैठ कर सुनने का शरीर नही रहा अब । बीच मे उठना उनके मता- नुसार गवैये का अपमान करना है। इसलिये वहाँ नहीं जाना ही तै कर लिया था, जिसकी खबर उन्होंने एक पत्र लिखकर अभिजीत को दे दी थी। इसके पहले ही अमि- जीत उनसे मिल आया था। महफिल के कुछ रोग बाद एक दिन वह सबेरे-सवेरे जा पहुंचा था । दुर्गा बाबू कालेज में साहित्य के विद्यार्थी थे, स्कूल में भी वे अग्रेजी ही पहाते थे, मगर अवकाश वे दिन अब वे दर्शनशास्त्र के पठन-पाठन में बिता रहे थे। आज-कल वे 'साख्य' पढ़ उत्तराधिकार रहे थे। इससे उन्हें बहुत आनन्द मिल रहा हो, ऐसी बात नहीं थी। अभिजीत को देख फर मन ही मन प्रसन्न हो उठे । पुस्तक बन्द कर के मुस्कुराते हुए बोले, "आओ, अमि" अभि की इच्छा हो रही थी कि मास्टर साहब के पैर छू कर प्रणाम करे, पर वे ब्राह्मण नहीं थे तो कैसे एक ब्राह्मण-पुत्र से पैर छुआते । नमस्कार बहुत मामूली शिष्टाचार लगता है । इसलिये चुप चाप उनके वैम्पचेयर की बगल में जा बैठा। दोनों पक्षों के कुशल होम के बाद उसने कहा, “बहुत आराम से था, मास्टर साहब । बहूरानी का अनुरोध अम्वीकार नहीं सका सो आना पड़ा। सोचा, चलो अब तो जमींदारी का कोई झमेला नही रहा, कुछ रोज आराम से विता लूंगा।" दुर्गा मोहन बोले, "जमींदारी चली गयी तो उसका झमेला मी खत्म हो गया, यह कैसे मान लिया ?" "देख यही रहा हूँ। झमेला और भी बढ़ गया है । देखिए न, एक नयी समस्या में मैं पड़ गया।" यह कह कर उसने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ कागज निकाला। दुर्गा मोहन ने कहा, "क्या है यह ?" "आप इसे ग्बुद पढ़ देखिये न, और आप बताइये, इस मामले में क्या किया जाये ?" "मुझे बताना होगा ?" हाथ बढ़ा कर कागज लेकर खोलते हुए दुर्गा मोहन ने कहा, "मैं तो जीवन भर कैसे इम्तिहान पास किया जा सकता है यही समझता-समभाता रहा । अव तो उससे भी मुक्त कर दिया गया हूँ। यों अब उसकी जरूरत भी नहीं रही।" "यह भी तो एक इम्तिहान ही है मास्टर साहब, स्कूल-कालेज के इम्तिहान से कहीं ज्यादा जटिल ।" . 'यो तो हम सभी जिन्दगी भर इम्तिहान ही देते रहते हैं। उसका क्या समय- गया असमय, न कोई नोटिस । और विषय भी पहले से जाना नहीं जा सकता। मगर इस इम्तिहान में बैठना ही पड़ता है । पेट में दर्द है, मैं नहीं बैलूंगा, यह नहीं चलेगा।" दुर्गा मोहन गाहो रहे और हाथ का कागज पढ़ते रहे। यह सबर-नायब का पत्र था, जो अभिजीत को लिखा गया था। लेकिन उस अभिजीत को नहीं जो उनका स्नेहभाजन या । इस परिवार से वर्षों से जुड़े होने के नाते जिसे ये 'तुम' कह कर पुकारते थे। यह पत्र उन्होंने उस अभिजीत को लिखा, जो भाज उनका मालिक है.--अन्नदाता । जमीदार-वंश का एकलौता उत्तराधिकारी। बातें भी उसमें इगी ने अनुसार लिखी हुई थीं। "महामान्य, रागम्मान इम दीन की बिननी है कि बहुत लंबे अर्मे से मैं आपकी गद्दी में रादर

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उत्तराधिकार १२ "यह सब जिम्मेदारी लेने को मैं नहीं आया था मास्टर साहब । इसके लिये मैं तैयार भी नहीं है। अगर ऐसा ही होता तो जिस दिन पिता जी की मौत की खबर मिली और जब कि भझ्या उनके पहले ही चल बसे, उसी समय आ जाता। मैं माया, सिर्फ बहरानी की वजह से । उनका पत्र पढ़ कर मन में आया, जरा देख आऊँ । सिर्फ कुछ दिनों के लिये चला आया। "मगर उनका भी तो न्याल रखना होगा। इतने बड़े महल में वे एकदम अकेली हैं। वे ही भला किसलिये ऐसे मामले में पड़े ? एक सन्तान भी यदि होती, तो भी एक बात थी।" अभिजीत सुप रहा। इसके भागे कुछ पाहने को भी नहीं था। उसने ग्बुद गी इस पर मोचा-विचारा है, ग्वास कर यहाँ आने पर, जब उसने अपनी आँखों से देखा कि गागी कितनी अकेली हैं, कितनी शून्य, तो दंग रह गया वह । बसे, किस भरोसे वहरानी जी रही हैं। जिन औरतों का मन कुछ है ही नहीं, सिर्फ चाभी वाले खिलौने की तरह चलती रहती हैं, जो दुनिया में एक मशीन की तरह सुबह से शाम तक जैसे एना यामरे में चलती-फिरती रहती हैं, उनकी बात अलग है । मगर महामाया उन औरतों में तहीं है । उसका मन है, उसमें अनुभूति है, तीन-नेज । सब कुछ उसे छूता है। वे सोचना जानती है, अपनी आँखों से जो देखा है और जो देख रही हैं, उसके बारे में ये सजग हैं। इसके अलावा भी जो इतने वर्ष, इतनी उलट-पलट शोक-ताप- गंताप में भी ग्यटी रही है, टूटी नहीं, भागी नहीं, इसके रूप में उनके चरित्र की दृढ़ता हो तो है । असाधारण मनोवल मोर सर्वोपरि है उनका कर्तव्य-बोध । अमिजीत को यामीण देखकर दुर्गा मोहन ने उसकी चिन्ता गाँप ली और उसी पर बल दिया । बोले, "वे तो परिवार की बहह हैं, उन भी हुई, आधी उम्र पार कर नुकी अब तो, उन्हें ही काशी चला जाना चाहिए था । पर वे गयी नहीं । सिर्फ कर्तव्य- बोध ने उन्हें रोक रखा है । जिस परिवार की ये पतोहू दें, उसकी जिम्मेदारियां इनकार नहीं सकती, इसीलिये पक्षी हैं । पर इसकी भी तो कोई सीमा होनी चाहिए।" अगिजीत ने इस प्रसंग को और मागे बढ़ने नहीं दिया। पत्र की ओर इशारा को बोला, "इस विषय में क्या किया जाये ?" दुर्गा मोहन पुग्ने कागज पर एक बार और दृष्टि डाल कर बोले, "मेरा ख्याल है, योयर जब जाना चाहते हैं तब उन्हें रोकना ठीक नहीं होगा । इस पत्र में एक बात गुगे बड़ी अच्छी लगी-उनकी सच्चाई, जिसे गाहा जा सकता है--मिनसियरिटी ऑफ परपज । मन में कुल बाहर कुछ, इसकी जगह सब कुछ माफ कह कर फुरसत चाहते हैं। मह बहुत ही नियनी है। कोई और होता तो असली कारण ने हट कर पाहता, "उन्न दल गया है। स्वास्थ बीमा नहीं रहता, अव जाना चाहता है। पर उसने ऐसा नहीं था। उन्हें जो अगुविधा है, उसे गोलकर कह दिया है। इसके बाद उन्हें रोका ६ . - उत्तराधिकार मो नहीं जा सकना । रोकने पर रुको भी नहीं।" अभिजीत ने कहा, "वे अगर यही कहते कि वे जिस युग के आदमी हैं, वह युग अब नहीं रहा । जिस धारणा से वे एक समय से जमीदारी चलाते रहे उरा धारणा को बदलना होगा, जो उनो लिये कठिन है, वो मेरे लिये भी उन्हें छोडना सहज होता। लेकिन उन्होंने ठीक ऐसा नही रहा । उनकी बातो से यह पता चलता है कि मुझसे उन्हें कोई शिकायत है। यही बात मुझे पटक रही है। इतने पुराने एका विश्वस्त, योग्य कर्मचारी अन्त मे मन में कुछ खोट लेकर जायें-'" बात पूरी न होने पर भी दुर्गा मोहन को समझने में कोई असुविधा नहीं हुई। बोले, "इस पक्ति पर मैन भी गौर किया है। जहां यह लिखा है-~-अपने किसी विश्वासी योग्य व्यक्ति को भार सौंप कर आप भी निश्चिन्त हो सकते हैं। इसे शिकायत न कह कर गर्व कह सकते हो। यह तो रहेगा ही। जिनके लिये सारा जीवन सपता-मरता रहा, उनमे अगर अण्डर-स्टैंडिंग की कमी हो, मत या विचारों में मेल न रहे, तो कुछ मन को लगता ही है । इचे इतना महत्व न दो। अगर उन्हें बुलाकर कहो, आपके ऊपर मुझे ततिकनी अीरमास नहीं है, इसका कोई कारण भी नहीं है, उनके मन में जो सताप है वह साथ ही साय पिरत जायेगा। उन्हे मैं जानता हूँ, तुमसे अधिक दिनो से देखता आ रहा है। जीवन मे बहुत इधर-उधर दिया है, रेविन मन का सरल है।" इतना पुराना, योग्य एवं परिश्रमी कर्मचारी दुःखी होकर जाये और कारण वह हो, मह सोच कर अभिजीत को परेशानी कम न थी। मास्टर साहब को बातो से उसे कुछ राहत तो मिली । इानी देर से इस मामले को लेकर अन्दर ही अन्दर जो कांटा तुम रहा था, उससे तनिक मुक्ति मिली। यश्वर सरकार युद ही चले जा रहे है, यह ठीक ही है। वो यह अप्रिय काम अभिजीत को ही करना पड़ता । इस लिये वह अपना मन भी बना रहा था। सदर नायर के रूप में उनकी योग्यता पर कोई उंगली नही उठा रास्ता था । वद्योपा- ध्याय परिवार उनसे जो सविस, पो अकय सेवा-यूपुसा और परिश्रम लेता रहा है, इसकी भी कोई तुलना नही हो सकती। फिर भी उनके जाने की जरूरत आ पड़ी थी। काम करने वालो के लिय एव निर्दिष्ट समय होता ही है, जिससे अधिक उसे घसीटना उचित नहीं होता। लाहे जितनी बडी प्रतिमा क्यो न हो, उसके विकास तथा पूर्णता की सीमा होती है, जहाँ उसे झकना ही पड़ता है । आदमी जैसे अमर होकर नहीं जनमता, वैसे ही उसकी शक्ति और क्षमता भी अपरिमीम नहीं होती। निर्धारित लाइन पार करते ही उसका मूल्य गिर जाता है। एसे में भी अगर यह अपनी जगह से हटता नही, गद्दी से निपका रहता है, तो वन ही उसे धक्के मारकर हटा देता है। इतिहास की भाषा मे तब वह पहलाता है--अनारों, सामजस्यहीन । सदर नायर यशेश्वर सरकार भी, इसी प्रकार, अपना समय गुजार चुके थे।

५४ उत्तराधिकार । उन्हें छोड़कर जाना पड़ रहा है यह उनका कोई दोष नहीं था। अयोग्यता भी नहीं। जाना होगा, यह रामय की मांग थी, समय की स्वाभाविक गति का अलंध्य दायरा । वे जिस परम्परा के धारक और वाहक थे, उसका ह्रास हो चुका है। उसे देश की सरकार ने अपने हाथों ले लिया। जमींदारी चली गयी है, उसके साथ उसका प्रताप भी चला गया है पर आंच अभी बाकी है । वह इनके मन में जमी है। उसमें शरणार्थियों ने आग में घी का काम किया ! जमींदारी जाने के बाद भी जिस जमीन पर इनका अखण्ड और एक छत्र अधिकार था, उसो पर जोर-जबरदस्ती आ वैठे। पहले जैसा होता तो इस जोर-जुलुम का जबाव लाठी से दे दिया जाता, लेकिन इन लोगों को पता है कि अव लाठी का जोर नहीं रहा। तभी इतनी हिम्मत हुई। यह जैसे टूटे मनोवल वाले बंद्योपाध्यायों के खिलाफ एक उद्धत चैलेंज हो-ताकत हो तो आओ। हाँ जबरदस्ती है । 'जबर दखल' का अर्थ तो यही है । तुममें ताकत हो तो हमे वेदखल करो। सदर नायब इस वस्ती के मामले को इसी दृष्टि से देखते रहे हैं, दूसरे रूप में देखने की दृष्टि उनकी नहीं थी। इसका एक दूसरा पहलू भी हो सकता है, यह वह सोच भी नहीं सकते थे । कोन हैं ये ? क्यों ये टिड्डियों की तरह माये और उनकी जमीन पर था गये ? कोन हैं वह जिन्होंने इन्हें ऐसे जुल्म और अनधिकार की राह पर धकेल दिया ? इन सारे सवालों की वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे। यह सवाल उठाये तो ये फिल काहकर टाल देगें। मगर अभिजीत को मालूम है, यहां आते ही वह सोच चुका है। इन सवालों को अब टाला नहीं जा सकता । कानून अवश्य उसके नायव और मुनीम के पीछे आ खदा होगा। कानून का मतलब घटना से होता है। क्या हुआ ? मामला क्या है ? हाट आर पी फतटस् ऑफ दी केस ? वस इतना ही तो सवाल है । जवाव भी बहुत सहज है। बाहर के कुछ लोग आये और इतने बीघे जमीन पर जबरदस्ती दखल जमा बैठे । "निराकी जमीन हे ?", "हम लोगों की", आगे बढ़कर सदर नायव कहेंगे, "यह है उसका परिमाण !" यह कह वे दाखिल करेंगे लोहे के सन्दूक में सहेज कर रखे फटे- पुराने कागज । हो सकता है मुगल बादशाह या ईस्टइंडिया कम्पनी का फरमान । उससे पता चलेगा श्री श्रीयुत अगुरु बन्योपाध्याय महोदय के निवास-आवास के अन्तर्गत यह जमीन थी, उनको वंशपर पीढ़ी दर पीढ़ी इसे भोगते रहे हैं। जिसका वर्तमान हकदार है श्री अगिजीत बन्योपान्याय । वे ही दखलदार हैं । बग बौर कुछ की जरूरत ही नहीं। सत्वाधिकार और दखल-इन दो शब्दों के आधार पर अदालत अपनी राय दे देगी-उजाड़ दो लोगों को, दे मार ट्रेसपासर्स । पर-बार गिग दो-दै नार मन अथराइजङ् रुपवरम् । इसके बाद गालिकों की तरफ से होगी कार्यवाही दी। वह अगर ठीक तरह से गगह पर कारखा दुई नो पुतिन आकर कोर्ट का हुाम तामील कारेगी। किसवी - उत्तराधिकार पुलिस ? गवर्नमेंट की। कोन गवर्नमेंट ? जिसने इन अमागी को उनके पुरखों के सत्वाधिकार और दखल से उजाड कर मा धकेला है यहां । वहाँ कोई कानून नहीं था, पहा है कानून का सामाग्य । परिणाम दोनो जगह एक । लाठी के बल पर अधिकार पर कुछ फर्क है । वहां की लाटी सिर्फ भगा कर ही शान्त नहीं हुई । गाय-वैलो की तरह मारते-मारने खदेड दिया बहुत दूर । सिर्फ मार ? इसके साथ ही जो बुध, इनके साय हुला यह गाय-बैलो के साथ भी नही होता । म हाथ से पैदा मदनिगी से और औरतो का सो गया शील सर्वस्व । जिनकी जान गयी वह तो गयो। जो जान लेकर विसी तरह भाग पाये, वे सो आये सम्पत्ति, मान मर्यादा, अपने-आत्मीय-स्वजन और इनसे भी अधिक कीमती-मनुष्य होकर मनुप्य के ऊपर से विश्वास । इस बस्ती के लोगो की शक्ल पर वह घिनौना किन्तु जीवित इतिहास लिखा है। दिना उसके इन लोगो को सोचा भी नही आ समता । सवाल सिर्फ कानून काही नहीं हैं । वेवल मार अधिकार और अनधिकार के वैधे-बंधाये फारमूले में फिट करके इनका विचार नहीं हो सकता। मास्टर साहब के पास माने के पहले अमिजीत बैठा-बैठा यही सोच रहा था, आदमी पातून यो मान कर ही चले, जैसे यह बात सही है, येसे ही कातून मनुष्य के लिये धने यह भी उतना ही सही है । आदमी की विचारधारा, जिन्दगी की रो मे रीति- नोति, सामाजिक अवस्था जैसे-जैसे बदलती हैं, कानून को भी मोड़-तोडकर उसके साप मेल मिला लेना पड़ता है। पुराने जमाने के कानून से नये जमाने की समस्याओं को हल करना या सम्भव यह तो हुई सरकार की बात । आदमी के जीवन में जब कोई नया सवाल उठना है, उसके लिय भी यही बात लागू होती है। हमारा मन पुराना है, पुराने चश्मे से उसका मूल्याकन नही कर सपाना । उसे समझने के लिये उसके अन्तनिहित रूप को उपलब्धि करने जैसा नया मन चाहिये । मगर यह मेरे पास नहीं है तो किसी ऐसे की शरण में जाना होगा, जिसके पास यह है । इस बस्ती के मामले में किसी एक ऐसे का अभाव अभिजीत को महसूस हो रहा था। इसे अब उसने मास्टर साहब के सामने रखा, "माना कि नायव मका को छोड दिया, मगर इसके बाद?" दुर्गा मोहन जी बोले, "नये नायव को रखने की सोच रहे हो ? इसकी क्या वैसी कोई जरूरत है ? बाज जमीदारी का जो थोडा बहुत काम है वह तो गुमास्ती से ही चल जायेगा।" "मैं जमीदारी ये बारे में नहीं सोच रहा हूँ। सार रहा हूँ शम्भूचरण एण्ड कम्पनी के बारे में।" दुर्गा मोहन जी से । शभूचरण के बारे में वे पहले से ही सब कुछ जानते थे। वे बहने ही वाले थे कि यह काग विमी और से होने वाला है क्या ? फौरन उन्हें याद 7 उत्तराधिकार ५६ आया, कुछ क्षण पहले ही अभिजीत ने कहा था, कुछ दिनों के लिए ही आना हुआ है। इसलिए वे रुक गये। सहसा अमिजीत ने कलाई में बंधी घड़ी देखकर उठते हुए कहा; "ठीक है, यह वात फिर कमी होगी । आज चलूं, आपके नहाने-खाने का समय हो गया है।" घर लौटते की राह मैदान से तिरछा काटकर आने की थी। उधर से न आकर अभिजीत ने घूम कर जाने वाली सड़क पकड़ी । गंगा के किनारे-किनारे । कुछ दूर आने पर उसके घर की सरहद शुरू हुई, नदी तक वह फैली है। पूरी तरह आज बस्ती की दखल में है। खास-महल के दोमहले से यह देख चुका है। यह हिस्सा वह अच्छी तरह नहीं देख सका था। पंक्तिवध्द टीन के छप्पर और झोपड़ियाँ देख कर मूली हुई पीड़ा ताजी हो उठी। अजव भद्दा और अव्यवस्था का सम्राज्य । 'प्लान' कुछ होता है, इसका कोई ख्याल नहीं, रुचि का तनिक भी ध्यान नहीं। कहीं अन्त नहीं । किसी- किसी झोपड़ी के सामने हिस्से में चीरे हुए वाँस या फट्टे का घेरा। उसके बीच दो- चार छोटे-छोटे केले का पेड़ सीधे में सिर उठाये खड़े-अड़े हैं। कहीं-कहीं लता-गुल्म इच्छा के अनुसार फैले हैं । और वैरोक-टोक खिल उठे हैं ढेर सारे फूल । रूखी, कठोर अनिवार्यता के दायरे में थोड़ी बहुत अअनिवार्यता की दखल । वे स्वयं नहीं आये। इन लोगों ने ही कहीं से लाकर लगाया है। ये ऊपर से जितने भी रूखे-सूखे हों, लगता है अन्तर अभी भी विल्कुल सूखा नहीं है । धीरे-घरे सूख जायेगा, सूखने भी लगा है। हाल फिलहाल के विगत अतीत का नृ:शंस इतिहास और मौजूदा वर्तमान के कठिन दिनचर्या की निर्मम मार ने जिस पथ पर इन्हें धकेल दिया है, उसमें हो सकता है, सौन्दर्य, मधु-रस बूंद भर भी ढूंढें न मिले । जो चाल चल कर ये एक सुन्दर, सुखद, स्वस्थ्य मानव समाज के रूप में बढ़ सकते थे, इस तरह रहने पर वे ही कुत्सित, नीचत्व, उछ खल 'जनता' में वदल कर जायेग । उस भयानक सड़ांध से इतने सारे लोगों को बचाने का क्या कोई उपाय नहीं है ! यह चिन्ता कई दिनों से अभिजीत को वेचैन किये थी, और इस क्षरण गंगा के पिनारे-किनारे धीरे-धीरे यही सारी बातें मन ही मन वह सोचता-विचारता चला जा रहा था। एक भंड नंगे-अधनंगे लड़के-लड़कियाँ उछलते-कूदते अभिजीत के सामने से नदी की ओर जा रहे थे, शायद नहाने के इरादे से। सहसा उसने देखा, आपस में उनमे से कोई मार-पोट करने लगे हैं, कोई बात नहीं पर इसका ढंग कुछ और ही था। अलावे इस सात, घंसे, धक्का-बुक्की के साथ-साथ जो गंदी-भद्दी गालियां वक रहे थे वे, उसे सुन कर कानों में अंगुली ढूंस लेनी पड़ी । जव कि जरा भी गौर करने पर यह भन्दाज आनानो से लम जायेगा कि जिन्न, निम्नवर्ग' या चालू भाषा में 'नीच' कहा जाता ये उस मिट्टी के नहीं थे । नाम पूछने पर कुछ ऊँच वर्ग की उपाधियाँ भी मिलेगी।

उत्तराधिकार और भी एक चीज अभिजीत की आँखो मे खूब खटकी । झुड मे जैसे कुछ बडे लडके थे, वैसे ही कई लडकियां भी यो जिन्हे छोटी कहना उचित नहीं होगा । समी गदा फाक पहने थी, किसी-किसी का प्राय फटा भी था। उनकी ठीक-ठीक उम्र का पता उसे नहीं चला । मगर यह पता है, जिस देश से ये वहां थाई हैं, वहां इस उम्र की कोई लडकी बिना अपना या पडोसी के सग-साथ इस तरह लडको के झुड के साथ नहाने नही जाती। वैसे इस इलाके में रहने वाली भी नही जाती । यह ठीक है कि पश्चिम की तुलना मे पूर्व की लडकियां कुछ अधिक फ्री होती हैं, घूमने-फिरने में आजाद और लाप- रवाह । मगर यह और वात है। उनम शर्म-हया का अभाव नहीं होता। कुछ बडी होते ही, लडका से आवरू बचाने के लिए वे बहुत कुछ मान कर चलती है। यह सिर्फ उसका ख्याल नहीं है, उसने देखा है। काशी मे उसने इस पर गौर किया है। काशी तो समस्त मारत पा सगम है । समी इलाके के, हर तरह के आदमी को वहां करीव से देखा जा सकता है । खास कर तव जव कमी 'योग' लगता है, विविध भेष भूपाधारी, विविध भाषा-मापी, विभिन उम्रो की नर-नारी, गली-कूचो मे, मठ-मन्दिरो मे, पाट की सिडियो पर दो दिनो के लिए घर बसा लेते हैं, उनकी खुनी हुई जिन्दगी सहज मे ही परड मे आ जाती है । वहां उसने आन्ध्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात और पजाब के साय-ही-साथ पूर्वी वगाल को भी खोट-पोट कर देखा है, प्रभावित हुआ है, उसमे से दो चार परिवारो मे घुला-मिला भी है । यह सब उसका अजाना नहीं है। लडकियां किसी से यम लजवती नही, यह भी उसने गौर किया है । आज इन लडकिया को देखकर उसे लगा, उनमे भी टूटन शुरू हो चुकी है। इनके मां-बाप, रिश्तेदार इस सम्बन्ध मे सिर नही खपाने । वह सव वाने मानो यहाँ फिजूल हैं। लडके-लडकियां, खासकर जो बडी हो चुकी हैं, उनका भविष्य, लज्जा, चान-चलन, पहिनने-ओढने पर नजर रखने की अब जरूरत नहीं रही। यही मनोमाव बन गया है । वे जहां आ पहुंचे हैं, यही उनकी जड है । आंधी या वाढ के थपेडे से जिस नाव पा लगर टूट चुका है, उसे जैसे किसी और देखने का अवकाश नहीं होता, सिर्फ ध्यान रहता है-किस प्रकार प्राण बचे, वैसे ही ये हैं आज । समाज के बन्धन से टूट चुकने के बाद उससे इनका कोई सपर्क नहीं रहा । उसके नियम-कानून मान कर चलने की भी कोई जरूरत नहीं रह गयी। आज सिर्फ एक ही चिन्ता है-कैसे जिन्दा रहे । एक और बात पर अमिजीत ने गौर किया, बडी तकलीफ के साथ । सडको की मार-पीट को बडी लडकियां भी हंस-हंस कर देख रही थी। उनकी बुरी-से-पुरी गालियो का भी कोई असर उन पर नहीं था । उन गालियो को नगे अर्थों का भी जैरा वे मन-ही- उत्तराधिकार मन उपभोग कर रही थीं। मान लिया न भी कर रही हों, क्योंकि हो सकता है उन्होंने शर्म-हया का वोध खो दिया हो । उनमें किसी-किसी के तन-बदन पर जवानी के लक्षण भी उमरे थे, पर मांखों में संकोच, होंठों पर लाज की छुअन नजर नहीं आयी । इससे बड़ा खालीपन आदमी की जिन्दगी में और क्या हो सकता है ? किस राह के राही हो गये हैं ये ? क्या इन्हें अब भी लौटाया नहीं जा सकता ? मगर कैसे ? महामाया अपने घर के काम-काज में उलझी रहीं । अभिजीत के आते ही शिका- यत के स्वर में बोली, "कहाँ गये थे, अयं ? कितनी देर हुई, कुछ ख्याल है ?" "देर कहाँ हुई ! यमी बारह बज कर वीस मिनट ही हुए हैं । वहाँ था तो--" "रहने दो, वहाँ क्या करते थे क्या नहीं, मैं देखने थोड़े ही जाती थी। यहाँ जो इतनी देर से खाओंगे और खराई हो गयी तो?" अभिजीत बनावटी गंभीरता के स्वर में बोला, "आजादी बड़ी कीमती है, मेरी समझ में अव आया।" महामाया चौके की ओर जा रही थीं। मुड़ कर खड़ी हो, ओठों में हँसी छिपा कर बोली, "मगर मैं तो तुम्हारी आजादी में दखल नहीं देती। जो मन में आये करो। सिर्फ-" "यह 'सिर्फ' ही यह अहसास कराता है कि आजादी और बहूरानी के राज में कितना फर्क है।" महामाया प्रसन्न हुई । हंसी रोके न रुकी। बोली, "बहूरानी का राज अब है के दिन ? असली रानी जब आकर सिंहासन पर आसीन होगी, तब देखूगी आजादी के लिए कितना अफसोस होता है ।" अभिजीत कुछ कहने जा रहा था कि बहूरानी ने रोक कर कहा, "वस-बस, जल्दी नहा लो । मैं खाना लाने को कहती हैं।" खाने गया तो अमिजीत अवाक् । घर ठीक है। घर वही है, जहाँ उसके पिता जी वैठकर भोजन किया करते थे-~~~कई वर्ष पहले, मां पंखा लेकर बैठती उनके वायें बड़े से पोड़े के सामने रखी होती शोननीय चांदी की थाल, उसके तीन तरफ सजी होती छोटी-बड़ी कटोरियां । बहूरानी ने इस बार जब वह आया तो वहीं खिलाने का इन्त- जाम किया था । बहुत कुछ उसी पुराने ढंग से, सिर्फ उसमें कमी थी तो पहले के राज- सी ठाठ में, वह भी कुछ-कुछ । माज का तरीका कुछ और ही था। पीड़ा, वजनदार थाली, गिलास, कटोरे सब नदारत । उसमी जगह थी उजले सफेद टेवुल फ्लाय से ढंकी खाने की मेज । वर्तन जरूर ।

उत्तराधिकार कसि के थे, आकार में कुछ छोटे हल्के और बिना नक्काशी के । झकझकाहट ऐसी जैसे मुंह दीखे। महाराज के पीछे-पीछे बहूरानी के कमरे मे आते ही अमि नै उनकी ओर पलकें उठा कर देखा । आंखो में अचंभे मे इबा सवाल । उन्होंने कहा, "देखो, ठीक है या नहीं ? यह मेरी बुद्धि नहीं है, मैं तो इस मामले में बिल्कुल अनाड़ी ठहरी । पर किशन को यह सब अच्छा लगा है।" किशन अमि का बनारसी नौकर है। मालिक के संग-साप सभी जगहें जाता- माता रहता है। यहां मी माया था। अमि ने कहा, "यह सब करने को किसने कहा ?" "कहेगा कौन ? इसके साथ चीनी मिट्टी के बर्तन होते तो खूब फबता, किशन ने वहा भी था। पर मेरा ही मन हिचक गया और फिर अपनी नौकरानियों का हाथ जो ऐसा है कि दो ही दिनों में सब शेप ! इसलिये यही ठीक है। इसमे तो कोई दिक्कत नहीं है न?" "नहीं, दिक्कत क्या है ? इतने दिनो से जिस तरह खाता रहा हूँ, उसी में क्या दिक्कत थी ? पर कुछ मुश्किल जरूर होगी।" "कोई मुश्किल नहीं होगी, बैठो तो तुम।" पौढे या आसन पर पैर मोड कर, झुक कर खाने की आदत बहुत दिनो से टूट गयी थी। यही आदत अब ालने में अमिजीत को कुछ परेशानी महसूस हो रही थी, लेकिन उसने यह किसी को जानने नहीं दिया फिर भी बहूरानी भाप गयी थी। इसलिये उन्होंने सदा की रीति बदल कर ऐसा इन्तजाम किया था। उससे कुछ पूधा भी नही, यहाँ तक कि जानने तक नहीं दिया। इन्तजाम सब रातो-रात कर उसे अचम्भे में सास दिया। साते समय देवर को हिचक थी। बहूरानी ताड गयी थी, मगर उसका मूल कारण मात्र आदत नहीं थी, यह वे समझ नहीं सकी । उसका मतलव भोर भी गहरा था। खाने के मामले में आज याडम्बर जैसा प्रदर्शन था, मही उसके मन को लगा था। भासन और वर्तनों के आधार प्रकार, वजन और बहुलता, साने की चीजो की अधिकता, और इससे भी अधिक इसमे जो एक खास मानसिकता जुडी थी, उससे वह अपने मन का तारतम्य जोड नही पा रहा था । बहूरानी से यह साफ लफ्जो मे कहना उचित भी नहीं लगता। उनके लिये ये सब कुछ इस परिवार की मर्यादा का अग था । उसको बुनियाद मे पैग उस मरम की तह में वे पहुंच जायेगी, यह सोचा भी नहीं जा सकता था। मगर अमि को तो वे जानती है, इन कई दिगो मे उसे बहुत ही करीब से देखने का मौका मिला है। हो सकता है, इसी से उनकी यह धारणा बनी हो कि इससे वह खुश UT मन्त्र उत्तराधिकार ६. यह सब सोच कर ही अभिजीत बहुत अचम्भे में डूब गया तथा इस क्षण बहूरानी के प्रति श्रद्धाविनत हो गया। साथ ही दुर्गा मोहन बाबू के घर से निकल कर इस सड़क पर धीरे-धीरे वह जो कुछ सोचता-विचारता रहा था, उसके बारे में भी उसे बहुत कुछ भरोसा हुआ । इस बस्ती को लेकर जो उलझने हैं, उसे इस परिवार की पतोहू की नजर से ही महामाया नहीं देखें, अमि का मन पढ़ने की भी कोशिश वे करें, उसके किसी काम में वे अढंगा न लगायें, चाहे वह उनके मन मुताबिक हो या नहीं, पर वे चुप रहें । इतना ही वह चाहता है और वह निश्चिन्त भी है। लेकिन इतना ही तो बस नहीं है । सिर्फ चुप रहने या अनिच्छा से कुछ मान लेने से ही तो काम नहीं चलेगा । बहूरानी की मंजूरी भी जरूरी है । यह मात्र उसकी भावना नहीं, आवश्यकता है। इस बारे में अभी तक उसे भरोसा नहीं मिल रहा था, उसे कुछ विश्वास हुया । ऊपर से देखने पर यह मामला बस इतना ही है कि पीढ़ा की जगह टेबिल-कुर्सी । पर बहुत बार बहुत तुच्छ वस्तुओं में भी कुछ महत्व का संकेत छिपा रहता है। भोजन कराने की पद्धति में परिवर्तन होने पर भी इस क्षरण बहूरानी का जो नित्य-कर्म था वह पहले जैसा ही था । फर्क बस इतना ही है कि पहले इस अवसर पर बैठ कर सब किया जाता था, अब बगल में खड़ा रहना पड़ा । वे अपना काम शुरू करने वाली थीं कि ममि बोल उठा, "ओह, रहने भी दो।" "क्या ?" "यह पंखा ।" "क्यों ?" "अंग्रेजी में इसे कहा जाता है ऐनाक्रॉनिज्म । मतलब जिस काल का जो नहीं उसे उस काल में घसीटना । यह इतिहास की दृष्टि में भयानक दोप है ।" "मंगर ये मक्खियां माने तव न ? ये तो इतिहास का कर्ज खाये नहीं हैं।" "तो एक काम करो। मेरे जैसा ही एक ऊंचा आसन और मंगा लो।" "कोई जरूरत नहीं । तुम खाओ । मुझे कोई तकलीफ नहीं है।" "तुम्हें नहीं है, मुझे तो है। एक तो यह मेरे मन के खिलाफ है कि कोई मौज से खाये और कोई उसे पंखा झलने का फप्ट करे, यह मुझे बड़ा बुरा लगता और फिर इस तरह एटेशन होकर पढ़ा रहना ।" "अच्छा नई, मैं बैठी जाती है......" महामाया ने नोकर को बुला कर कुर्सी मंगवा ली । उस पर बैठते हुए बोलीं, . "यह मामूली-सी बात भी तुम्हें बुरी लगती है ! उसकी वजह है, तुम असल में गलत जगह बैठ गये हो।" अभिजीत कुछ समझ नहीं सका, इसलिये महामाया की मोर नजर उठाते ही उन्होंने बात आगे बढ़ा दी, "इसमें हम लोगों को कोई तकलीफ नहीं होती, तुम यह उत्तराधिकार नही जानते न..!" फिर पल भर रुक कर उन्होंने जैसे अपने आप से ही कहा, "तुम्हारा कोई दोष नही है । जानने का अवसर हम लोगो ने दिया ही कहाँ ?" महामाया के लहजे मे उदासी थी। चेहरा फोका पड़ गया था। वे इसके मागे बुध न कह कर धीरे-धीरे पंसा भलती रही, अमि मी चुपचाप खाता रहा । बहूरानी के अलिम वाक्य मे जो इशारा था, वह उससे छिपा न रहा । कई मिनट बीतने के बाद अमि ने ही बात छेडी, शायद वातावरण को कुछ सहज बनाने के ख्याल से, "तुम्हे देख कर मुझे एक कहानी याद हो आयी मामी ।" "कहानी ! जरा मैं भी सुनें ।" महामाया हंसती हुई सहज भाव से बोली। "छोडो अमी, फिर कमी । कहानी मुनाऊँगा तो तुम्हें भोजन का वक्त भी नहीं मिलेगा।" "नहीं, कहो।" "विद्यासागर के दोस्त थे हेरिसन साहब । सिर्फ दोस्त ही नही, भक्त कही। मेदिनीपुर जब वे कलक्टर होकर गये, तो साहब के मन में आया कि वे विद्यासागर की माताजी के दर्शन करें। जिस माता का ऐसा पुत्र है, पता नहीं वह कैसी होगी । लो समालो। उस जमाने की ब्राह्मण कुल की रमणी साहब-मूचे के आगे कैसे होती ! एक तो म्लेच्छ और ऊपर से विदेशी। यानी करेला उस पर नीम चढा । फिर जिला मजिस्ट्रेट साहब को कैसे टाला जाये । यही चिन्ता थी। कि भगवती देवी कह वैठी 'उसे बुला लो। इतना बडा साहब है तो क्या हुआ, आखिर वह अपने ईश्वर का दोस्त ही है न । और जब अपने मन से ही आना चाहता है, तो मना करने से अपने ईश्वर का हो मान तो घटेगा।' "फिर क्या था । हेरिसन विद्यासागर के घर पधारे । कभी जिसने गांव के बाहर पैर नही रखा, बेटे के हजार कहने पर भी, ऐसी एक ब्राह्मण कुल को स्त्री, कायदे से पर्दानशीन, वे एकदम उन्मुक्न भाव से अग्रेज मजिस्ट्रेट के सामने आ खडी हुई । जैसे किसी अपने जन की अगवानी करने घर की मालकिन आयी हो । ईश्वर से ही सुन रखा था कि साहब कुर्सी पर बैठते हैं । कुर्सी की व्यवस्था पहले से कर ली गयी थी। उस पर उन्हें बैठा कर खुद भी एक कुर्सी पर बैठ गयी और ठेठ मेदनीपुर की बोली मे बातें करने लगी। इधर-उधर की बातो के वाद वे उस पक्के विलायती सिविलियन से वोलो, 'तुम्हे खा-पी कर जाना होगा । मैंने तुम्हारे लिय स्वय खाना बनाया है।' "साहब ठक् बैठे देखते रहे। "उसी कुसी के सामने टेवुल लगायी गयी । साहब को उन्होंने क्या-क्या खिलाया यह तो विद्यासागर की जीवनी मे वही लिखा नही है । पर खाना विलायती तो होगा ही नहीं, होगा भात-दाल, तरकारी और मछली का रसा! हो सकता है, वे मेदनीपुर को थीं, रसे की जगह पोस्ते की भुजिया जरूर रही होगी । उनके जीवनी लेखक यह लिखना उत्तरा नहीं भूले कि अपने बेटे के दोस्त की बगल में पंखा झलती हुई वे यह कहती रही-'यह खामो, यह चख लो, इसे भी मुंह में डालो........।' "उन्होंने जो बातें की थी हेरिसन अपने मामूली दंगला के ज्ञान से, कितना क्या समझ पाये होंगे यह बताना मुश्किल है। मगर एक बात बिना संदेह, उनके मन में उठी होगी कि विना ऐसी मां के इतना महान पुत्र जन्म नहीं ले सकता।" महामाया तन्मय होकर सुन रही थीं । उनका पंखा झलना रुक गया था। कुछ कहते-कहते इसका ध्यान आया तो झट वे पंखा झलने लगीं। शायद वे यह पूछना चाहती थीं कि अभिजीत को यह कहानी क्यों याद आयी। महामाया संकोच में पड़ गयीं और इसलिये कहते-कहते रुक गयीं। उनका देवर गंभीर स्वभाव का है, यह इन कई दिनों में वे समझ चुकी थीं। आज इस मामूली घटना से उन्हें क्या मिला, यह तो वे ही जानें । कहानी की स्थिति का जो मेल आज की परिस्थिति से है, वह ऊपरी है । अगर अभिजीत उन्हें घसीट कर भगवती देवी से मिलान करेगा तो महामाया शर्म में डूब जायेगी। इसलिये उसे इस प्रसंग से हटाने के लिये उन्होंने वात खेड़ी, "कहानी सुनाने में तुम ने कुछ खाया नहीं लाला ।" अभिजीत का ध्यान उनकी इस बात की ओर नहीं गया। गया भी हो तो वह अपने विचार में डूबा रहा । बोला, "संसार में ऊपर उठना कितना मुश्किल है, खास कर वैसों के लिये, जो संस्कार में जिन्दगी भर चिपके रहते । खैर छोड़ो। तुमसे कुछ जरूरी बातें करनी है भाभी । अभी नहीं, शाम को । तुम्हें वक्त मिलेगा न ?" "मैं इतना क्या करती हूँ जो वक्त नहीं मिलेगा ?.."जरा रुको, मात ठंडा हो गया, एक मुट्ठी गरम-गरम लाती हूँ।" महाराज को वे बुलाने जा रही थीं कि अभिजीत ने रोका, “नहीं, नहीं, यही काफी गरम है । और नहीं चाहिए।" कहते हुए बचा हुआ खाना जल्दी-जल्दी खाने में वह लग गया। ५ उनसे अभिजीत क्या बात करना चाहता है, इसका कुछ-कुछ अन्दाज बहूरानी को है । पर 'तुमसे कुछ जरूरी बातें करनी है भाभी' इसके द्वारा मन का जो विशेष रूम उद्घाटित हुआ, यह बिल्कुल भिन्न था। इस गरणार्थी समस्या से अभिजीत के मन में एक गहरी वेचैनी थी, । जब से वह यहाँ माया है तब से उन्हीं के बारे में सोचता रहता है, यह वे जानती थीं। वेचनी उन्हें भी कम न यो, पर वह दुसरे प्रकार की थी। यह जो इतने सारे लोग बिना कुछ कहे, मुने, उत्तराधिकार । अचानक उडकर आये और जुडकर बैठ गये, उनके घर से सटी ही नहीं, उसी मे-- इतनी जमीन बिना किसी हिवक के जबर्दस्ती दखल कर बैठे, यही उनको बेचैनी थी। सदर नायब पहले तो गुस्सा हुए थे, बाद को सिर ठोक कर हाथ पर हाथ रख कर बैठ गये थे। जमीदारी पर सरकार ने कब्जा कर लिया है। लाठी-सोटा, पाइक-बरन्दाज भी बरखास्त हो गये । रह गये सिर्फ ये-बिना हथियार के हरगोविन्द । कई दिन सर- कारी दफ्तरो का चक्कर काटा। थाना गये, जिला मजिस्ट्रेटे से मिले । कैसे इस जमीन का उद्धार हो ? किसी से कोई भरोसा नहीं मिला। शरणाथियो से भिडने के लिये कोई राजी नहीं । हार कर बहूरानी से मालिक को पत्र लिखवाया। सदा परदेस मे रहने पर भी वे ही तो सम्पत्ति के एकमात्र उत्तराधिकारी हैं । वही आये। वह जब आया, देखा, तो शरणार्थियो को लेकर उसका मन भी वेचैन हो उठा। मगर उसको बेचैनी कुछ और थी। बहूरानी को इसका आभास था। सुप लगाये रही। सदर नायब भी समझ गये मगर वे चुप नहीं रहे, इस्तीफा दाखिल कर दिया । खोल कर सब सामने रख दिया। मालिक से जब मूल विषय मे ही मत-विरोध है, तो रहा कैसे जा सकता है ? इतने दिनो के अनुभवी, शुभेच्छु प्रधान कर्मचारी को छोडने की इच्छा अभिजीत की नहीं थी। पहले उसे कोई उपाय नहीं सूझा फिर उसने सोचा, सिर्फ अपना ही सोचा तो काम नहीं आता नायब के पक्ष से भी सोचना जरूरी है । जब अन्तिम रूप से वह समझ गया कि अब उन्हें रोका नही जा सकता, और मास्टर दुर्गा मोहन जी ने भी यही कहा, तव बहूरानी के ऊपर ही सब छोड दिया गया । पर उनके मन की बात अव्यक्त रहते हुए भी अभिजीत के लिये अस्पष्ट नही थी । ये नायब ही थे। बद्योपाध्याय परिवार के अन्तिम स्तम्म । यहां का सब कुछ इन्ही के कन्धे पर था । और यदि यह कन्धा ही हट जाये तो फिर रह क्या जायेगा ? पिर भी बहूरानी चुप रही । और अपने दो, यह सोचकर सन्तोष दिया कि नायब की तरह वे भी उस प्राचीन युग की आखिरी निशानी है, परन्तु कुछ फर्क है । नायव जा सकते हैं, वे नही जा सकती। वे इस घर की हड्डी-पसली से जुडी हैं, वहाँ से हट कैसे सकती हैं ? और भी, वे तो इस घर की पतोहू ठहरी । घर के लोगो का मन रख, ताल मे ताल मिला कर चलना उनका काम है । इत्ती-सी जब थी, तब यहाँ आयी । तब से अब तक यही सीखा है और सीख की परीक्षा भी दे चुकी है। कमी फेल नहीं हुई । जब वे अकेली हो गयी, सिर पर किसी का हाथ न रहा, फिर उसी पुराने ताल से ताल मिनाती रही। सदर नायब जब भी उनसे कुछ पूछने-ताछने आये हैं, तब सिर्फ एक ही बात वह कहती रही हैं, "मैं भला क्या वहूँ नायब जी । मालिको के समय से जो जैसा करते आ रहे हैं वही करिये।"

उत्तराधिकार ६४ इसी तरह इतने वर्ष बीते। अभिजीत जब आया तब उसे देखकर, दो-चार बातें करने के वाद, उसके हाव- भाव से महामाया को लगा कि पुरखों का जमाना अब लद गया। जितने दिन बीतते गये, उतनी ही उनकी धारणा मजबूत होती गयी। वे समझ गयों कि अब राग बद- लना होगा । इस नये मालिक की लय कुछ और ही है। उन्हें भी अपना स्वर मिलाना होगा। बहूरानी ने वही राह पकड़ी। इसके लिए कोई खास असुविधा नहीं हुई। इसके लिए विधाता की इन पर कृपा होती है। नये से, अनभ्यस्त और अपरिचित से तालमेल बैठा लेने की एक विचित्र क्षमता अपनी इस नारी नामक सृष्टि को उसने खास तौर पर प्रदान की है। नारी सब कुछ कर सकती है। वह थोड़े प्रयास से ही हर अवस्था में अपने को ढाल लेती है। अपनी इच्छा, अनिच्छा, ख्याल-खुशी, अभ्यास-आदर्श सब कुछ को कांट-छांट कर नये क्रम में फिट कर सकती हैं। पुरुष यह इतनी आसानी से नहीं कर पाता, यह नहीं-वह नहीं की स्थिति में पड़े रह कर अपने को फ्रेम में फिट नहीं कर पाता । उठते-बैठने उनके मन में हिचक होती रहती है । महायाया को एक और सुविधा थी। अभिजीत उसे तब मिला जब वह यहाँ दुल्हन के रूप में आयी थी । यह एक सुविधा थी । उस दिन की वह दस ग्यारह की लड़की एक मामूली परिवार से सिर्फ रूप के नाते इतने बड़े बंद्योपाध्याय के घर की बहू बन कर बायी, और जब उसने अपने चारो तरफ किसी को नहीं पाया, तब उसे मिला यह झैपू, मुंहचौर देवर, यह अमि - फैले हुए दरिया में स्नेह से घिरा छोटा-सा टापू । अभि के लिए भी उस समय अपने पुरखों के विशाल वैभव में माँ के सिवा और कोई नीड़ नहीं थी। पर माँ की निकटता भी सहज नहीं थी। पूरे परिवार का बोझ उन पर ही था । इसलिए उसकी जिन्दगी बहुत खाली-खाली थी। उसी खाली को बहूरानी ने भरा था । फिर चला, देखा-देखी, मिलने-जुलने में बाधाओं का क्रम । सब कुछ दवा रहा। दोनों के एक दूसरे के सामने आ खड़े होते ही स्वर्ण सुयोग मिल गया। उस दिन शाम को महामाया काम-काज से फुर्सत पाकर जब आयी तव अभिजीत इन गरणार्थियों की चर्चा छेड़ बैंग। इनसे जो-जो समस्याएं उठी हैं, उन्हें हर पहलू से उनके सामने रखने की कोगिश उसने की। इन लोगों से उसे जितनी भी सहानुभूति क्यों न हो, उनके इस 'जबर-दखल' करतूत से बहुत क्षुब्ध । सिर्फ भीड़ के जोर पर और गुनीव्रतों की बहा देकर दूसरों की जगह में बनधिकार घुसना अक्लमंदों का काम नहीं है। कोई भी समाज-व्यवस्था इसे मंजूर नहीं करेगी। देश के मौजूदा कानून की नजर में भी भयानक अपराध है। वही अपराध अचानक एक भयंकर रूप में उभर बाया था। इसीलिए सरकार कुछ उलझन में पड़ गयी थी और वह क्या करे यह सोच नहीं पा रहा था। मगर यह समस्या तो उसी की पैदा की हुई है, उसकी ही गलत + - उत्तराधिकार ६५ । नीतियों का ही यह फल है। फिर भी कोई भी सरकार के आगे मुबै तो वैसे । भुकने पर राष्ट्र की बुनियाद हिल उठेगी। सरकार की मदद से ही इन्हे ठीक किया जा सकता है। समय तो कुछ लगेगा ही उपर से पानी की तरह से धन भी बहेगा। साथ ही कुछ जाने मी जायेगी । सब समय था । ऐसी हालत में पहले से मालिको की वार्रवाई ही ठीक थी । फिर भी एक बात पर विचार परला जरूरी है । उसी बात पर जिसे वह अभी कई घटे पहले दुर्गा मोहन बाबू के घर से लौटते समय सोचता आ रहा था, । रास्ते मे जो कुछ जैसा उसने देखा था उससे उसका मन बचोट रहा था । यह सब उसने बहू- रानी से कहा, इसी सिलसिले में और भी कहा । यहा कि-~-जिस जिन्दगी से ये टूट सुके हैं, यह कहना ठीक नहीं होगा, बलि' यह कहा जाये कि मनुष्यस्पी हिंसक जानवरो ने इन्हें जिस जिन्दगी से तोड दिया, वह वही जा पहुंचे। "जानती हो भाभी ! अभी उस दिन तक ये थे । बडे भोले और शान्त । खेती- वारी, कारवार, नौकरी-चापरी करते रहे। इनके बाल-बच्चे वितनी मुसीबते उठाकर नहर-नाले पार कर पढ़ने जाते रह, दूर-दूर स्कूलो में । वहां से लौट कर खाली समय मे मां-बाप के हर काम मे वे हाथ बंटाते रहे । ये जितने वैवस थे उतने ही शान्त और वैसे ही आदर्श के पक्के बहुएं विना किसी झिझक के पोखर पर नहाती थी । कमर पर गगरा लेकर दूर से सूबनल से पानी लाती थी। सभी मर्द दिन भर की मशक्कत के वाद ढोल-भजीरा लेकर किसी पडोसी की दालान में इकट्ठे हो गाते थे। झगडा-झझट मार-पीट, कोर्ट-कचहरी इस गांव-उस गाँव में ठनाठनी नहीं थी, ऐसी बात भी नहीं। कुछ-न-कुछ बरस मर लगा ही रहता था । यहाँ-वहाँ कुछ-कुछ गुडे-बदमाश होते ही थे। मगर इनसे इनके बंधे-बंधाये सामाजी जीवन मे कोई फर्क नही था। समाज बन्धन का जो बंधा-बंधाया था वही अटूट था। ऐसे लोगो के मन्तर और बाहर मे जैसा परिवर्तन हुआ है कि क्या कहा जाये। आदमी इतना नीचे उतर जाएगा यह सोचा भी नहीं जा सकता।" यह कहते हुए अभिजीत ने ऐसा भाव प्रकट किया जैसे घिनौना रूप प्रत्यक्ष देख रहा हो। यहूरानी ने महसूस किया कि अमि के चेहरे पर दुख का झीना पर्दा गिर आया हो। दूसरे ही क्षण वह फिर अपने पुराने प्रसग पर लोट आया, बोला, "मैं, जानती हो मामी, उन्हे उसी जिन्दगी में लोटा ले जाना चाहता हूँ। जैसे भी समय हो।" महामाया के सोचने का ढग यह कभी नहीं रहा, जब कि इन बेहूदे लोगो के प्रति उनका प्यारा-दुलारा देवर सदा से ही ऐसा कृपालु बना हुआ है। बात-चीत मे इसका आभास उन्हे मिलता रहा है। शुरू मे उन्हे इसस कुछ अँभलाहट हुई थी । वह भी यह सोचकर अभिजीत ने इनका असली रूप अभी नही देखा है । गरीबी की वजह से फिजूल इन्हे यह विश्वास हो गया कि सिर्फ दया या सहानुभूति ही नहीं, इसकी जड नही और गहराई मे है।

उत्तराधिकार अभि ने कहा, "यह फाम बहुत जटिल है। असली बात तो यह है कि इसके लिए कोन वढ़े ?" "और कौन ?" बिना हिचक महामाया ने उत्तर दिया, "तुम, तुम बढ़ो, यों मागे-पीछे लोगों की कमी नहीं रहेंगी। अभिजीत को याद आया कि दुर्गा मोहन ने भी यही कहा था। कोई भी यही कहेगा । अभि ने धीरे-धीरे कहा, "उहूँ, मुझसे नहीं होगा।" "क्यों ? क्या फिर भागने की मर्जी है ? लाला अव भाग नहीं सकोगे। इस वार पैरों में वेड़ी डाल कर ही दम लूंगी मैं ।" यह कह कर वहूरानी होठों के भीतर मुस्कराई। उन्होंने फौरन महसूस किया कि इस मजाक का देवर पर कोई असर नहीं पड़ा । जैसे उसने सुना ही नहीं। जिस प्रकार उदासीन होकर अभि ने यह कहा था--मुझसे नहीं होगा-उसी प्रकार उसने कहा, "देखो न, जैसे हैं नायव कक्का । उनकी तरह के काम के लोग कहाँ मिलेगें ? मगर इस मामले में वे भी कुछ नहीं कर सके। तभी तो वे खुद ही हटना चाहते हैं। मैं भी सोचता हूँ । अव रोकने में लाभ भी क्या है।" 'उनकी बात और है । जीवन भर सब कुछ वे जिस दृष्टि से देखते आये हैं, इस उन्त्र में उनमें परिवर्तन संभव नहीं है। और सबसे बड़ी वाधा तो यह है कि शरणार्थी लोगों ने उन्हें बहुत सताया है । उनका अपमान किया है, वह यह भूल जायें-?" "जानता हूँ भाभी, उनकी परेशानी में खूब समझता हूँ। उन्हें मैं दोष नहीं देता । मेरे सामने भी तो दिक्कतें हैं जो उनकी उस परेशानी से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।" बहूरानी अमि की उस दिक्कत का अन्दाज नहीं लगा सकती थीं। इसलिए उसको ताकती रहीं। अमिजीत बोला, "ठीक-ठीक यह तुम्हें समझाना मुश्किल है। हो सकता है तुम्हें सब कुछ सपना लगे। फिर भी सुनो--यह कोई रहस्य नहीं है। इसे मैं पग-पग पर अनुभव करता हूँ। "जो कुछ मैंने तुमसे कहा उसे सही रूप देना मेरे बूते फा नहीं है। काम करने की दृष्टि से नहीं, भावना के कारण । मतलव इन लोगों से मुझे जितनी भी हमदर्दी क्यों न हो, इनमें उतर कर, इनके दुःख-दर्दो, आचार-विचारों में घुल-मिल नहीं सकता, कभी नहीं । बड़चन है मेरे परिवार की विरासत, इससे चिपका मन-मन की एक खास बनावट । तुम अगर अंग्रेजी जानती तो इसे स्पष्ट करने के लिए कहता ‘फेम ऑफ माइन्ड' । जिससे दूर भागते हुए भी खून में जिसे मैं ढोता चल रहा हूँ। अपने पिता की वह दृष्टि, मेरी इन दोनों मांखों में समाई हैं। इसे मुला फैले सकता हूँ! लोग कहते हैं, मेरे गले की नावाज भी उन जैसी ही है। मेरा मन उनका मन नहीं है। हो सकता है। फर्क अगर कुछ हो सकता है तो मन के विकास में । उसका हा तो एक ही है। यही तो मेरा जन्मगत उत्तराधिकार है। धन-सम्पत्ति । - उत्तराधिकार नहीं, यह तो ठुकरायी जा सकती है । यह उत्तराधिकार मेरे खून, हाड-मांस मेवा-मज्जा सब मे समाया हुआ है । जो इस काम मे अडचन है--मेरी अपनी अन्तरात्मा।" अपनी सरल सहज बातो को दौड मे यहां पहुंच कर अमिजीत ने सास ली यहूरानी एक्दम सन्नाटे मे आ गयी। अभि ने जिस अडचन की बात कही, उसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकती । उसके मन की बहुत-सी बातो को जानते हुए भी मन का यह कोना उनको आँखो से योझल था। उसकी बातो को उन्होंने मान लिया हो सो बात भी नही, मगर वे विरोध भी नहीं कर सकी। वे अतीत की दूरियो मे खो गयी । कितने सारे दिनो की कितनी सारी बातें मन में कोपन लगी। इस बद्योपाध्याय-परिवार की जो परपरा रही है और जिसे अमि एक खास मन मानता है, शुरू से ही तो वह इसका विरोधी रहा हैं, जिसका 'भोग' भी उसे भोगना पड़ा है । एक रावे अर्से तक दूर-दूर रहा है । गुद को अलग हटाये रहा है। फिर भी वह मन आज इतना बडा होवर प्रकट हुआ। अमिजीत न कहा, "मुश्किल क्या है जानती हो ? मुश्किल है यह तुम्हारा शभू चरण और उसके सगी-साथी । बस्ती के बारे मे आज कुछ भी किया गया तो वे सब से आगे मा खडे होगें। इन लोगो की अपनी भाषा है, अपनी व्याकरण है। दरअसल वह उनका नहीं है, इस पार आकर उन्होंने राजनीतिवालो से यह सब सीखा है । वह कदापि कर्ण-प्रिय नहीं है---'यह हमे चाहिए-यह मिल जाये तो अच्छा हो'-ऐसे सहज भाव से न कह कर, वे कहगे-'यह है हमारी सोलह सूत्री मांग।" और यह कहने का उनका ढग इतना बेहूदा होगा कि क्या कहा जाये । हम कहगे-'आप से कुछ बाते करनी थीं ।' उनकी मापा होगी--'आप के सामने यह प्रस्ताव रखा गया ।' अपने नायब कक्का की भौहे सुनते ही ललाट पर चढ जायेगी। और मेरे पिता या दादा होते तो उनके तलवे का खून सर पर चढ जाता । और मेरा, लेकिन मुझे कही कुछ नही लगता । शान्त और सहज भाव से सब कुछ सुन लेता हूँ, मगर उनकी बातें उनकी बद मिजाजी, मसगत मांगो की फेहरिश्त कब मेरी नशो मे जो खून बह रहा है उसे खोला नही दे यह कौन जानता है ? इसलिये अपने ऊपर ही मुझे भरोसा नही है । मेरा विश्वास है कि किसी काम को उठाने के पहले जिस त्याग की जरूरत है, उसे लोग क्रोध कहते हैं और जो ग्रहणयोग्य है उसे कहा जाता है निरपेक्षता । जिस सम्पत्ति पर उन लोगो ने जबरदस्ती अपना कब्जा किया है, वह मेरी है, उससे मुझे मोह है। कभी न कभी यह अहसास मुझे होगा ही। और जब भी होगा तब मेरी दोनो बांहे शिथिल हो जायेगी । मैं उनकी भलाई चाहता हूँ मामी। मगर चाहने और करने मे बडा फर्क होता है। यह काम मुझ से नही हो सकता । मैं करना भी चाहता हूँ लेकिन पीछे रह कर।" "तो आगे कौन रहे?" "ऐसा कोई, जो इन लागो की रग-रग पहचानता हो जिस दवहर मे वे यहाँ - उत्तराधिकार । अभि ने कहा, "यह फाम बहुत जटिल है। असली बात तो यह है कि इसके लिए कौन बढ़े ?" "और कौन ?" विना हिचक महामाया ने उत्तर दिया, "तुम, तुम बढ़ो, यों मागे-पीछे लोगों की कमी नहीं रहेंगी। अभिजीत को याद आया कि दुर्गा मोहन ने भी यही कहा था। कोई भी यही कहेगा । अभि ने धीरे-धीरे कहा, "उहूं, मुझसे नहीं होगा।" "क्यों ? क्या फिर भागने की मर्जी है ? लाला अव भाग नहीं सकोगे । इस वार पैरों में वेडी डाल कर ही दम लूंगी मैं ।" यह कह कर वहूरानी होठों के भीतर मुस्कराई। उन्होंने फौरन महसूस किया कि इस मजाक का देवर पर कोई असर नहीं पड़ा । जैसे उसने सुना ही नहीं। जिस प्रकार उदासीन होकर अमि ने यह कहा था-मुझसे नहीं होगा--उसी प्रकार उसने कहा, "देखो न, जैसे हैं नायव कक्का । उनकी तरह के काम के लोग कहाँ मिलेगें ? मगर इस मामले में वे भी कुछ नहीं कर सके । तभी तो वे खुद ही हटना चाहते हैं। मैं भी सोचता हूँ। अव रोकने में लाभ भी क्या है।" 'उनकी बात और है । जीवन भर सब कुछ वे जिस दृष्टि से देखते आये हैं, इस उम्र में उनमें परिवर्तन संभव नहीं है । और सबसे बड़ी बाधा तो यह है कि शरणार्थी लोगों ने उन्हें बहुत सताया है । उनका अपमान किया है, वह यह भूल जायें-?" "जानता हूँ भाभी, उनकी परेशानी में खूब समझता हूँ। उन्हें मैं दोष नहीं देता। मेरे सामने भी तो दिक्कतें हैं जो उनकी उस परेशानी से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।" वहूरानी अभि की उस दिक्कत का अन्दाज नहीं लगा सकती थीं। इसलिए उसको ताकती रहीं । अभिजीत बोला, "ठीक-ठीक यह तुम्हें समझाना मुश्किल है । हो सकता है तुम्हें सब कुछ सपना लगे। फिर भी सुनो-यह कोई रहस्य नहीं है। इसे मैं पग-पग पर अनुभव करता हूँ। "जो कुछ मैंने तुमसे कहा उसे सही रूप देना मेरे बूते का नहीं है । काम करने की दृष्टि से नहीं, भावना के कारण । मतलव इन लोगों से मुझे जितनी भी हमदर्दी क्यों न हो, इनमें उतर कर, इनके दुःख-दर्दो, आचार-विचारों में घुल-मिल नहीं सकता, कभी नहीं । अड़चन है मेरे परिवार की विरासत, इससे चिपका मन-मन की एक खास बनावट । तुम अगर अंग्रेजी जानतीं तो इसे स्पष्ट करने के लिए फहता 'फेम ऑफ माइन्ड' । जिससे दूर भागते हुए भी खून में जिसे मैं ढोता चल रहा है। अपने पिता की वह दृष्टि, मेरी इन दोनों मांखों में समाई हैं। इसे मुठला कैसे सकता हूँ ! लोग कहते हैं, मेरे गले को यावाज भी उन जैसी ही है। मेरा मन उनका मन नहीं है । हो सकता है। फर्क अगर कुछ हो सकता है तो मन के विकास में । उसका स्प तो एक ही है। यही तो मेरा जन्मगत उत्तराधिकार है । धन-सम्पत्ति उत्तराधिकार नहीं, यह तो ठुकरायी जा सकती है । यह उत्तराधिकार मेरे सून, हार-मांस वा-मज्जा सब मे समाया हुआ है । जो इस काम में सडचन है-मेरी अपनी अन्तरात्मा।" अपनी सरल-सहज बातो की दौड मे यहां पहुंच कर अभिजीत ने सास ली बहूरानी एकदम सन्नाटे मे आ गयी। यमि ने जिस अड्चन की बात पही, उसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकती । उसके मन की बहुत-सी बातो यो जानते हुए भी मन का यह कोना उनकी आंखों से ओमल था । उसकी बातो को उन्होंने मान लिया हो सो बात भी नही, मगर वे विरोध भी नही कर सकी । दे यतीत की दूरियों में सो गयी। वितने सारे दिनो की कितनी सारी बातें मन में कोधने लगी। इन दद्योपाध्याय-परिवार की जो परपरा रही है और जिसे अभि एक सात मन मानता है, शुरू से ही तो वह इसका विरोधी रहा हैं, जिसका 'मोग' भी उसे भोगना पड़ा है । एक लवे असें तक दूर-दूर रहा है । सुद को अलग हटाये रहा है । फिर भी वह मन आज इतना बडा होवर प्रकट हुआ। अभिजीत ने कहा, "मुश्किल क्या है जानती हो? मुश्किल है यह तुम्हारा शभू घरण और उसके सगी-सायो । वस्ती के बारे मे आज कुछ भी किया गया तो ये सब से आगे आ खडे होगे । इन लोगो को अपनी भाषा है, अपनी व्याकरण है। दरअसल वह उनका नहीं है, इस पार आकर उन्होंने राजनीतिवालो से यह सब सीखा है । वह कदापि कर्ण-प्रिय नहीं है-'यह हमे चाहिए-~~यह मिल जाये तो अच्छा हो'-ऐसे सहज माव से न कह कर, वे कहगे-'यह है हमारी सोनह मूत्री मांग ।" और यह पहले का उनका ढग इतना बेहूदा होगा कि क्या कहा जाये । हम कहगे-'आप से कुछ बातें करती थी।" उनको मापा होगी-'आप के सामने यह प्रस्ताव रखा गया ।' अपने नायव फक्का को मोहे सुनते ही ललाट पर चढ जायेगी। और मेरे पिता या दादा होते तो उनरे तलवे का खून सर पर चढ जाता । और मेरा, लेकिन मुझे कही कुछ नही लगता | शान्त और सहज माव से सब कुछ सुन लेता हूँ, मगर उनकी वातें उनकी बद मिजाजी, असगत मांगो की फेहरिस्त कब मेरी नशो में जो खून बह रहा है उसे सौला नही दे यह कौन जानता है ? इसलिये अपने ऊपर हो मुझे भरोसा नही है । मेरा विश्वास है कि किसी काम को उठाने के पहले जिस त्याग की जरूरत है, उसे लोग क्रोध कहते हैं और जो ग्रहणयोग्य है उसे कहा जाता है-निरपेक्षता । जिस सम्पत्ति पर उन लोगो ने जवरदस्ती अपना कब्जा किया है, वह मेरी है, उससे मुझे मोह है। कभी न कभी यह अहसास मुझे होगा ही। और जब भी होगा तब मेरी दोनो वाहें शिथिल हो जायेगी । मैं उनकी भलाई पाहता हूँ मामी। मगर चाहने और करने मे बडा फर्क होता है। यह काम मुझ से नहीं हो सकता । मैं वरना भी चाहता हूँ लेकिन पीछे रह कर।" "तो आगे कौन रहे ?" "ऐसा कोई, जो इन लागो की रग-रग पहचानता हो, जिस ववडर मे वे यहाँ उत्तराधिकार महमूस कर सके।" । 17 गिरे हैं, उसे कम-से-कम उसने भी कुछ भेला हो। जो फेर-बदल इनकी जिन्दगी में उसे पूरे मन से "कहां पाओगे ऐसे को ?" "पाना होगा । एक उपाय है । तुम्हें बताऊं। इसके पहले मास्टर साहब से इस बारे में बातें कर लेनी ठीक होगी। कितना बजा है अभी ?" "बहुत । अभी तुम बाहर नहीं जा सकते । कल चले जाना ।" रात अधिक नहीं हुई थी फिर भी अभिजीत ने बहूरानी की बात मान ली। सवेरे उसने उन्हें बड़ा कष्ट पहुंचाया था, इसलिये अब और कष्ट देना नहीं चाहता। महामाया रसोई की ओर जा रही थीं। अमिजीत ने टोक कर कहा, "अरे हां, यह तो मैं भूल ही गया । नायव कक्का के लिये कुछ पेंशन की व्यवस्था हो तो कैसा रहे ?" "पेंशन ?" "हां, यानी स्टेट से कुछ माहवार देना ! यह ठीक है कि यहाँ आज तक किसी को नहीं दिया गया । फिर भी इनकी बात अलग है।" महामाया का चेहरा खुशी में खिल उठा । बोली, "वड़ा अच्छा हो, उन्हें जरत भी है । लड़का एक भी नहीं है, लड़कियां कई हैं । और कुछ बीघा जमीन, वस ! इससे होगा भी क्या !" "वे कहीं इन्कार तो नहीं करेंगे ? तुम उन्हें समझा कर कहना। यह तो दया को भीख नहीं है । यह उनका अधिकार है। उन्होंने जो दिया है, सारा जीवन, उसका साधारण-सा प्रतिकार !' "जरूर कहूंगी।" बाग्रहपूर्वक महामाया बोलीं। ६ काशी में जिस उस्ताद से अभिजीत संगीत सीखता था, उन्होंने कहा था, दीक्षा लेते हैं, वे जसे नित्य-कर्म करते हैं, रोज सवेरे या शाम को, कम-से-कम एक वार देव-अनुष्ठान में बैठ कर, वरामदे में या किसी शान्त कोने में, अपने इप्ट-देव की जय करते हैं, यह भी तुम्हारा वैसा ही नित्य-कर्म होना चाहिए । काम जितना भी हो, एक चार तानपूरा लेकर जन्दर बैठोगे । इससे सिर्फ गला ही नहीं खुलेगा, बल्फि तुम्हारा मन बहुत से मंझटों ने हट कर कुछ पल के लिये एकान भी होगा । इसीलिये संगीत को सापना कहा गया है। यह भी एक तरह का व्यायाम है, तुम लोग जिसे एक्स्नसाइज उत्तराधिकार Re कहा करते हो, सिर्फ गले का नहीं, उससे ज्यादा मन का । वहां, जितने दिनो रहा, वह इस आदेश का पालन वरावर करता रहा । यहाँ वह कर नहीं पाता । उस्ताद जो के कहे अनुसार यहाँ मन एकान होने के बजाय और भी मटका रहता है। और युक्ति का उपाय जो उन्होंने बताया था उसका पालन वह यहाँ कर ही नहीं पा रहा है । अमि जिस दिन यहां आया था, उसके दूसरे ही दिन भोर में उसके कमरे से तानपूरा की स्वर लहरी आयो तो वहूरानी को बड़ी खुशी हुई थी। गाना-बजाना तो इस खानदान का पुश्तैनी रिवाज है। बीच के बहुत सारे बरसो मे उसकी यह धारा सूख-सी गयी थी। उसमे अब फिर क्षीण धारा नजर आयो। इसे कायम रखना होगा, ऐसा प्रयत्न करना होगा जिससे इसका विकास हो । मन ही मन यह सोच कर ही उन्होंने नायब जी से कह कर महफिल का आयोजन रखाया था। बुलाये गये पुराने उस्ताद, इस परिवार से जिनका इतने दिनो का घनिष्ट सपर्क रहा, जिनसे बहुन यार, बहुत से लोगो को सुख मिला है। उन दिनो की महफिल की महत्ता को लोटाना होगा तकि वही वातावरण लौट सके, यही उनका उद्देश्य था । इसके बाद जो कुछ महफिल मे हुआ वह ठीक नही हुआ । तभी से महामाया ने गाने-बजाने के बारे मे फिर कोई उत्साह नहीं दिखाया। कभी कुछ कहते हुए अमिजीत ने कहा था, "गाने-बजाने की एक लौकिक्ता होती है, जिस की उपेक्षा नहीं की जा सकती । यह कुछ ही, रसग्राहियो में सिमटा रहे, यह असमव है, और अवाछनीय भी। मामूली आदमी को भी उसका हिस्सा देना होगा।" महामाया ने इसका विरोध किया था, "मामूली आदमियों के लिये मामूली चीजें है । यह ऊंचे दर्जे की राग-रागिनी वे क्या समझे ? यह सब उन्हे बुला-बुला कर सुनाने का मतलब है-उल्लू को मोती चुगाना ।" इस यात मे कुछ तल्खी थी, और इसकी ही आशा मी थो। बहूरानी जिस सानदान की बहू हैं और कि छुटपन से जिस विचार मे पली-पुसी, यह स्वर उसी खान- दान का था, सिर्फ उनका अपना नहीं । अमिजीत ने इस बात को आगे नहीं बढ़ाया। हो सकता है, उसने सोचा हो कि उनका यह कला निराधार नहीं है । यह तो मानना ही होगा, सब कुछ सव के लिय नही हाता । पर यह भी क्या कर मान लिया जाय, मानव समाज का एक बड़ा हिस्सा एक महत् वस्तु से वचित रह जाये ? ऊजे दर्जे का संगीत, नीचे दर्जे मे उतर आये, यह कोई नहीं चाहता, लक्नि ऐसा कुछ क्या नहीं किया जा सकता, जिससे कि नीचे दर्जे के लोग भी उसका उपभोग कर सके ? अगर ऐसा नहीं किया गया तो धीरे-धीरे वह विलुप्त हो जायेगा । कुछ थोडेस लोग उसे अपनी यांहो पर ऊंचा उठाये नहीं रख सकते, अगर कुछ और लोगो को बांहे न मिल । समय भी बदल गया है । यह युग बाहा को वाह दने का है ।

-- उनके तर्क से बिल्कुल ही दुसरे प्रकार की एक छोटी-सी घटना अभिजीत को पायी। अमिजीत उस समय छोटा-सा था। घर में कोई बड़ा समारोह मनाया जा रहा दबी की व्रत-प्रतिष्ठा या ऐसा ही कुछ । बहुत से लोग निमंत्रित थे, विभिन्न तरह ग । ब्राह्मण, केचे वर्ग के लोग तो थे ही, उनके साथ जो नीचे तपके के लोग थे, मा कम नहीं थे। जमींदार के घर होने वाले सभी काम-काजों में वे बुलाये जाते थे। बार भी वे निमंत्रित थे । बहुत बड़ा समारोह था । अमि अपनी लड़कपन की उत्सुक ग्यों में सब कुछ बूम-घूम कर देख रहा था । अचानक उसकी नजर दही लाने वाले ऋगियों पर पड़ी । वह एक दृश्य था । वहगी कन्वे पर लिये हुए कतार से लोग चले आ रंब थे, हगी के दोनों तरफ परातों में दही की मटकी सजी थी। एक साथ सब हिल पुल रहे थे और वहगिये मी उसी की लय में नाचते हुए आ रहे थे । नौकरों में एक नीकर दही और मिठाइयों की देख-रेख के लिये मुकर्रर था । उसके माथ था---राजन घोप, बंद्योपाध्याय परिवार का बंधा ग्वाला। दही के जुगाड़ फा गार उस पर ही था । वही चुन-चुन कर मटकियों को दो भागों में बांट रहा था। अभि ने पूछा, "दो भागों में क्यों वाँट कर रख रहे हो "दही एक नम्बर, दो नम्बर का है, दो किस्म का है।" उस नौकर ने उत्तर दिया। । "दो किस्म का क्यों ?" "छोटे-बड़े सभी को क्या एक ही किस्म की चीज दी जा सकती है, छोटे वावू ? इधर, ये हैं बढ़िया किरग का दही । यह ब्राह्मणों और ऊंचे लोगों के लिये है, और यह है फालतू लोगों के लिये ।" "ठीक नहीं है !" "गयों ?" अव राजेन घोष ने कहा, "मगर हां, उसके मुकाबिले का नहीं है तिहर किसान ही न खायेगें !" दही गी गांति गाने में भी श्रेणी-भेद है। 'छोटे-बड़े' सभी के लिये एक नहीं। इसे इसी प्रकार महामाया को सुनाये या नहीं, अभिजीत यही सोच रहा अन्त में यह सोच पर उसने सुनाया ही नहीं कि जो मजा उसे इसमें मिल रहा रागाता है धे न पा सकें। दोनों की दृष्टि अलग-अलग हैं । उनके दिल को कहीं - लगे। -- बहुत दिनों के बाद उस दिन जाने क्या सोच कर भोर में ही 6 भेट गगा। गहामाया उससे पहले ही जग जाती हैं। लेकिन उस उत्तराधिकार ७१ नही, नीद टूट जाने पर भी वे पड़ी रही। पिछली रात अमि ने जो कुछ कहा था उससे अभि के मन की एक नयी दिशा का उद्घाटन उनके सामने हुआ था । बहुत देर तक वे बातें उनके मन को उद्वेलित किये थी। कब उन्ह नीद या गयी थी यह उन्हें भी नहीं मालूम । सबेरे जब नीद टूटी तो उन्ही बातो मे वे उलझ गयी। शरणार्थियो के बारे में अभिजीत कुछ सोचता-विचारता रहा है, वह इतने दिनो बाद स्पष्ट हुआ । उसके पिता या दादा जीदिन होते तो उन्ह भी यह चिन्ता होतो लेकिन उसका रूप दूसरा हाता । वे सोचने-वैसे इन्ह ग्रस्त किया जाय । बहूरानी यही सोच सकती थी। इतना ही वह सहज रूप से सोच सकती थी। इसके आगे का सोचना उनके लिये दुबोध या। अभिजीत का मन है, कर्तव्य-गान है, उमगे हैं, तो इनके लिये दर्द भी कैसे न हो । फिर भी कुछ करना चाह कर भी करना नही चाहता । उसने जिस रूकावट की चर्चा की थी वहीं उनके लिये एक आश्चर्य था। कुछ शकाएं मी होती हैं । कोन जाने यह उसका यहां से भागने का एक बहाना हो । तानपूरा और अपने नौकर को सग लेकर फिर कहीं काशी जा न बैठे, जिस दिन झोक चटी कि उसी दिन कही निकल न जाये । जा भी सक्ता है । य कामकाज ही तो राह रोके खडे हैं। किसी दूसरे के कन्धे पर इन्ह सवार कराने के बाद बस छुद्री । जब आया था तब उसने कहा था-सिर्फ तुम्हारे लिये ही चला आया मामी । तुम्हारा आदेश क्या ठुकरा सकता है वहरानी ने जो पत्र लिखा था, उसमे उनकी कोई चचा न रहने पर भी अमिजीत यह जानता था और यहां आने पर और भी जान गया है कि इस वस्ती की समस्याओं की वजह से ही उन्होंने हमे यहां बुलाया है । उसका कोई रास्ता निकलते ही वह चलता 7 बनेगा। असल मे क्या महामाया ने उसे सिर्फ इसीलिये बुलाया था ? और वह भी क्या इसीलिये चला आया? अलाप कानों में पड़ते ही विचार-क्रम टूट गया ! महामाया फौरन उठ बैठीं। और दिनों के बजाय माज बहुत देर हो गयी थी। दरवाजा खोल कर बाहर आ खही हुई। इसके पहले भी उन्ह लगा था चोर आज और भी प्रमाणित हो गया कि अमिजीत को अपने पिता का सधा हुआ गला मिला है । वह स्वय हो कल ऐसा कह भी रहा था। महामाया बहुत देर तक खडी खडी सुनती रहीं। उन्हें याद आया कि बरसो पहले ससुरजी भी इसी कमरे म बैठ कर ऐसे ही अलाप करते थे । पक्के रागों पर उनका मच्या दखल था । वे कभी-कभी इसके बारे में चर्चा भी किया करते थे । सासुजी की मौत उनका कठ स्वर मुनाई नहीं पग । गाना ही नहीं, बात-चीत भी बहुत कम बाद से उत्तराधिकार ७२ ही करते थे। खडाऊँ की आवाज से यह अन्दाज लगाना पड़ता था-कत्र वह आ रहे हैं, कब कहां जा रहे हैं। इन्हीं गुन्धियों में उलझते-उलझने पता नहीं कैसे वहूरानी ने मन-ही-मन यह संकर किया कि अभिजीत जाना चाहेगा, तो मी उसे जाने नहीं दिया जायेगा । और यह वे ही कर सकती हैं। वह जिसे जो काम सौंपना चाहता है सोपे । मगर उसे भी रहना होगा यहीं। दिन चढ़ते ही अभिजीत माया, बोला, "मैं बाहर हो आऊँ भामी ! मास्टर साहब के पास जाना है।" महामाया जानती थीं, । कल रात ही वह जाना चाहता था, उसने ही रोक दिया था। कहा, ''देर मत करना ।" दुर्गा मोहन जी से आज से पहले जितनी चर्चा हो चुकी थी, वह कुछ और आगे बढ़ी। अपने आगे जो रूकावट, जो असमर्थता ममिजीत अन्दर-ही-अन्दर महसूस कर रहा था, बहूरानी से जो कुछ उसने कहा था, वही वैसे ही जरा भाव-मापा बदल कर मास्टर जी के आगे मी उसने रखा । दुर्गा मोहन जी कल यह सोच नहीं सके थे, माज जब मुना तब अचरज में डूब गये। अभिजीत को वे जानते हैं । उसकी मानसिकता से मी वे परिचित हैं । कोई और होता तो क्या करता यह सवाल अलग है । अभि के लिये यही स्वाभाविक है। संस्कार के आगे तक की दाल नहीं गलती । यानी इस पर तर्क करना व्यर्थ है । ऐसी दशा में उसे मान कर ही आगे बढ़ा जा सकता था। जिम्मा कोई भी ले। सबसे पहले जरूरी है-विचार पूर्ण एक योजना । और जिसके लिये शुरू से ही उसमें उनका हाथ होना । अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह चाहे जितना सही, उदार और कल्याणप्रद क्यों न हो, उसके पीछे जितनी भी शुभेच्छा हो, उस पर शुरु से ही वे मंदेही रहेंगे और हर ओर से रुकावटें आयेंगी। इसके बाद एक दिन सब छिन्न-भिन्न होता नजर आयेगा । धन और श्रम दोनों ही बेकार हो जायेगा । इस विषय में दुर्गा मोहन जी का अनुभव अभिजीत से कहीं अधिक है । वे एक के बाद एक सरकारी प्रयत्नों की फेल होते देख चुके है। उसका प्रमुख कारण था, सब कुछ ऊपर से इन पर लाद दिया जाना । लोगों ने उनसे हाथ नहीं मिलाया, सिर्फ छिद्रान्वे- पण करते रहे और उन केनों ने बंडल के बंडल नोट निकलते गये थे। "सरकार यह नुकसान सह सकती है ।" दुर्गा मोहन अभिजीत को कई उदाहरण देकर समझा रहे थे, "क्योंकि सरकारी रकम, यानी जिसे हम लोग गर्वनमेंट रिसोर्स पहा करते हैं, उसका कोई अन्त नहीं है, जो कुछ जायेगा, वह तुम्हारी निकाल कर पूरा कर लिया जायेगा । लेकिन तुम्हारा मला कितना क्या रिसोर्स है ? हमारी जेवों से उत्तराधिकार मतलब तुम जो कहते हो, वही मैं भी कहता हूं। शुरू से ही उनके उस नेता को क्या नाम है उसका ?" अमिजीत ने मुस्करा कर कहा, "शभूचरण ।" "हां, इस शंभूचरण को साथ रखना होगा । उसे छोड कर कुछ किया नहीं जा "इसके पहले अपनी बोर का मी एक शंभूचरण चाहिए।" "पही तो सकट है।" दुर्गा मोहन ने गर्दन हिला कर नहा, "तुम जैसा आदमी ढूंढ रहे हो, वैसा चटपट मिल सकेगा, ऐसा लगता नहीं।" "आप का दायरा तो कोई छोटा नही है । उसमे अगर कोई-" "एक आदमी के विषय मे मैं सोच रहा था । लडका बहुत सहृदय है । इसी इलाके मे उसका घर है। उनकी समस्याएं वह समझ सकता है, और उसे सहानुभूति- पूर्वक निमा भो सकता है।" "हम भी ऐसे को ही ढूंढ रहे हैं। आप उन्हें मिलने के लिये पर लिख दीजिये। कहाँ रहते हैं वे ?" "अभी तो कलकत्ते में ही है ?" "तब तो दो-चार दिनो मे ही मा सकते हैं।" "क्यो नही ! पर मैं कुछ और ही सोच रहा था अभी ! अमी तुमने कहा न, हमें मी एक शभूवरण चाहिए, यह बहुत सच है, जवकि तुमने वह सोच कर नहीं कहा और शम्भूचरण मी ओक उस स्तर का आदमी नही है । उनको मुसीवत पर ही तुम्हारी नजर जाती रही है । तुम्हारे लिये यह स्वाभाविक भी है । पर हमलोग जो इन लोगों को बहुत दिनो से देखते आ रहे हैं, वे जानते हैं, उनके बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिनके लिये दुःख-मुसीबत एक तरह से फायदा उठाने का जरिया है। जिसके बल पर वे ऐसा कोई दुष्कर्म नही जो न करते हो । ऊपर से वे बहुत अच्छे हैं, जैसे कुछ जानते ही नहीं, पर भीतर से एक नम्बर के कमोने है, ठग, जुआचोर, फरेबी । मतलब अपने आदमो का भला होना ही पर्याप्त नहीं, उसे चालाक-चतुर भी होना होगा, जिससे उनके सग ताल-मेल बैठा सके । इसलिए मेरा कहना था, कि जब तुम काम दे रहे हो तो ठोक-बजा कर उपयुक्त का चुनाव करने में क्यो को ?" "आपकी बात समझ मे आयी। पर जितना सम्मव हो काम उतना ही चुपचाप हो। और फिर यह कोई ऐसा काम तो है नही कि जिसके लिये शुरू मे ही ढोल पीटी जाये- "मैं भी यही सोचता हूँ। बिना ढोल पीटे क्या किया जा सकता है, इस पर सोचना होगा । क्यो नही हम लोग और भी विचार करे, तुम भी ढूंढो । जरूरत होगी तो अखबारो में विज्ञापन भी दिया जायेगा । वमा ख्याल है ?"

"आप जैसा सोचिये ।" इतना कह कर कलाई पर बंधी घड़ी देखते हुए ला, "आज आज्ञा दीजिये । वहूरानी का जल्दी लौटने का आदेश है।" दुर्गा मोहन ने हंसते हुए सिर हिलाया, "मुझे वे पहचानी जो हैं । एक तो मास्टर ऊपर से बूढ़ा, जो वातों के सिवा और कर क्या सकता है। ऐसे आदमो हज में छुटकारा नहीं मिलता। इसलिये उन्होंने पहले से ही सावधान कर दिया।" "मगर उनका ख्याल कुछ और ही है।" "क्या ?" "मैं माकर आपके आराम में दखल पहुंचाता हूँ, मैं आपके नियमित नियमों में राधा पहुंचाता हूँ और ऊल-जलूल कामों के लिये विवश करता हूँ।" "अच्छा ऐसा ? उन्हें मेरा नमस्कार कहना और कहना तीस वर्षों तक एक क्रम में नियमों का जुआ ढोते-ढोते दोनों कंधों में घट्टा पड़ गया है । नियम की मामूली अवहेलना से कुछ आता-जाता नहीं । वल्कि यह अच्छा ही लगता है । मगर-" गर्दन मुका कर दरवाजे से अन्दर की ओर चकित होकर देखते हुए बोले, "जैसे गाजियन के अण्डर में मैं हूँ कि बस चलना-फिरना, उठना-बैठना सब घड़ी की सुई के अनुसार-" आवाज दबी होने पर भी यह बात जिसके लिये कही गयी थी वहां तक पहुंच गयी। साथ ही ओट से तीखी आवाज आयी, "कौन कहता है तुम्हें कि घड़ी के साथ चलो ? जो मन चाहे वह करो।" दूसरे ही क्षण आवाज और निकट से आयी । जिसका स्वर बिल्कुल बदर हुमा था, "वाबू जी !" "क्या है वेटी।" "अनि भइया से कह दो कि कल दोपहर को यहीं भोजन करें।" "कल क्या है ?" "है क्या ? यों ही।" "मगर विना वहूरानी को बताये-' "यह चिन्ता आप न कीजिए । मैं उनसे ठीक कर लूंगी।" "फिर बात क्या है । समि, तुम स्नान कव करते हो ?" "सवेरे ही । काशी से ही मेरी यह आदत है।" "तो दस बजे के पहले ही चले आना।" अन्दर से कहा गया, "लेकिन इतने सवेरे मेरी रसोई नहीं तैयार होगी।" "बरे मई, रसोई तुम जब इन्चा हो तब बनाओ । तुम क्या समझती हे लोग येकाम के है ? बहुत काम है हम लोगों के पास, क्यों अमि?" । ।

उत्तराधिकार । अभि सिर्फ मुस्कराया । इस बार अन्दर से कोई उत्तर नही आया फिर भी इन दोनो को यह समझने में जरा दिक्कत नहीं हुई कि कमरे के अन्दर भी एक हल्की हसी तैर रही है। जिसका अभिप्राय साफ है कि 'तुम लोग कितने काम के हो यह किसी से छिपा नहीं है।' अभि उठ खड़ा हुआ । इसी समय बाहर से अपरिचित गले की आवाज आयो, "मास्टर साहब घर मे है ?" "कौन ?" दुर्गा मोहन जी ने पूछा । "जी मैं हूँ, शम्भूचरण सरकार, शरणार्थी यस्तो से या रहा हूँ।" दुर्गा मोहन जी दरवाजे पर आ खडे हुए, "माइये।" नमस्कार करते हुए शम्भूचरण ने आजिजी से कहा, "आपको कष्ट दने चला आया ।" "अरे नहीं-नही कष्ट की क्या बात है।" अन्दर आते ही अभिजीत के सामने पडते ही शम्मूचरण क्षण भर के लिये हतप्रम हो गया। फिर हंसते हुए उसे भी उसने नमस्कार किया। अमिजीत ने नमस्कार का उत्तर देते हुए कहा, "अच्चे हैं न !" "जी हाँ!" उधर की दीवाल से सटी दो कुसियां पडी थी। उधर ही सकेत कर दुर्गा मोहन "वैठिये।" शम्मू कुछ घबराते हुए बोला, 'आप लोग बाते कर रहे थे, तो मैं फिर कभी-" दुर्गा मोहन बीच में ही बोल उठे, "वैठिये आप ! हमलोग यो ही बैठे बातें कर रहे थे।" अभिजीत ने कहा, "मैं तो जा रहा था, जा रहा हूँ।" इतना कह कर वह बाहर निकल गया । दुर्गा मोहन उसे बगीचा के गेट तक छोड कर लौट आये बोले, "तो बताइये शम्भू बाबू क्या हाल है।" "बताता हूँ, इसके पहले आप से एक विनती है मास्टर जी ?" "कहिये ।" "यह वावू हटाना होगा आपको । अव वह हमलोगो को शोभा नहीं देता।" ने कहा, "क्यो ?" "हम क्या है, कहां आ खडे हुए हैं, वैसे हैं, कुछ भी तो बाप से छिपा नही "यह ठीक है, कि हम आपलोगो को और आपकी हालत भी जानते हैं । अगर यही बावू नहीं कहलाने का कारण है, तो हम आप से सहमत नहीं हो सकते ।", पूचरण ने तर्क रखा, "वाबू हम कहते किसे हैं ? जो भद्र हैं । हमलोग कपड़े-लत्ते, काम-काज में कहीं से भी 'भद्र' हैं क्या ?" यानी आप कहना चाहते हैं कि इंसान जब संकट में पड़ जाता हैं, तब वह । रह जाता । लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता । मेरे पास भद्र-अभद्र की कसौटी रही है जिस पर आपने जो कुछ गिनाया उसमें से एक भी नहीं कसा जा । यह बिल्कुल अन्तर की चीज है । मैं उसे ही भद्र समझता हूँ जिसका मन आचरण भद्र है । वह क्या पहनता है, वह कैसे खाता है, कैसा दीखता है—यह बकवास है।" शम्भूचरण के चेहरे पर विविधापूर्ण हंसी कांप गयी । वोला, "आप कुछ ख्याल करें। यह सब आपकी किताबी बातें हैं। दरअसल आदमी को बाहर से ही देख कर च-नीच मानते हैं । इस देश में जव से आया हूँ तब से खास तौर से यह मानने लगा हूं।" "क्यों मानने लगे ?" "यहां के लोगों का जो व्यवहार देखा उससे ।" "वे क्या आपलोगों से कोई बुरा सलूक करते हैं ?" "ठीक ऐसा कुछ नहीं कहा जा सकता पर ये इस आरोपित संकट को जिस निगाह से देखते हैं, उससे तो कुछ छिपा नहीं है-साफ है।" दुर्गा मोहन जी ने उत्तर फौरन नहीं दिया । कुछ क्षण आंखें जमीन से गड़ाये रहे । फिर गर्दन उठा कर बोले, "आपकी बातें मैं पूरी तौर पर मानने को तैयार नहीं है शम्भू बाबू । सीमा के उस पार से एकाएक इतने सारे लोगों के एक संग आने पर यहां के लोग खुशी नहीं हुए, यह ठीक है । परन्तु इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि आपलोग जो यहां आये या आने के लिये विवश हो गये, उनको यहां के लोग महसूस नहीं करते, या उनसे कोई सहानुभूति नहीं रखते, ऐसा सोचा नहीं जा सकता। नाराज हैं, यह ठीक है पर आप लोगों से नहीं । जिस कारण से, जिनकी गलती से या वेअक्ली से इतना भयानक उलट-पलट हुआ, उनसे । और वे तो पकड़ में आते ही नई न ! इसलिये सब कुछ आप लोगों पर जा पड़ा । इसे धृणा या ईयां नहीं कहा सकता।" -- इन बातों का कोई असर जम्भूचरण के मन पर पड़ा, ऐसा लगा नहीं। सीधा कहा, "यह सब आपके या आपके जैसे दो चार लोगों के मन की बात हो है पर औरों का त्याल कुछ और ही है । वे सोचते है, से और कब यह पाप ताकत होती तो अब तक टाल भी देते । मन का कर नहीं पाते, इसलिये गुरू पर दिन उनका बढ़ता जा रहा है।"

उत्तराधिकार ७७ "यह आप अपने गुस्से की बात कह रहे हैं, शम्भू बाबू, धीरगम्भीर स्वर मे दुर्गा मोहन जी ने कहा, "अगर सही नजरिये से इस मामले को गहराई में उतर कर देखे तो आप अपनी गलती महसूस करेंगे । मान लीजिये, आप एक खाते-पोते लोग हैं। दस लोगों को रोटी खिला कर खाने वाले जो आमदनी है उससे किसी तरह काम चलता है। बिना कोई खबर दिये अचानक एक दिन छ -सात हित-नात आ गये। आपके घर में जो कुछ है चावल, दाल, तेल, नमक सब दो दिनो में खत्म हो गया, घर में उठने बैठने, सान-विधाने की परेशानी नजर आयी। परिवार में जो सहजता थी वह अब नहीं रही। आपको मालूम हुआ आने वाला दो-चार दिनी के लिये नही आया । कोई चारा नहीं था इसलिये आप के घर मा धमके । मान लीजिये उनका वाद में घर-दरवाजा सर कुछ बह गया है, या आंधी मे महरा गया है । सब कुछ जानते हुए भी आप या घर के लोग परेशानियां छिपा नहीं पा रहे हैं । आप लोगो के वात- व्यवहार से सब प्रकट हो जाता है। हित-नात सोचते हैं आप पर वे बोझ हैं, आप बहुत स्वार्थी हैं । मगर यह बात नहीं है । वे आपके परिवार से अच्छा व्यवहार नहीं पा रहे हैं, जिसकी तह में हैं अर्थ-नीति का सिद्धान्त-आवश्यकता के अनुसार साधन का अमात्र । जो है उसमे पूरा नही पडना । यह समस्या तो कोई आज की नहीं है, सदा की है। सिर्फ इसी देश की नहीं, सारी दुनिया की है। हर देश और युग मे आदमी का आदमी से विरोध के मूल मे यही बात निहित है।" दुर्गा मोहन जी के चुप होते ही शम्भूचरण ने कहा, "मगर हम लोग तो इनके सहारे या इनकी थाली में हिस्सा नहीं बंटाने आये । हम अपने पैरों पर खड़ा होना चाहते हैं, कोशिश भी कम नहीं की।" "बिल्कुल ठीक," साथ ही साथ मास्टर जी ने कहा, "सबसे पहले उन्हें यह महमूस कराना होगा, यह विश्वास देना होगा उन्हे जो यहां के वाशिन्दे हैं, कि आप लोग बाहर के नहीं है। जैसा कि आपने अभी थोडी देर पहले ही कहा कि यहां आने के बाद यह और भी अधिक माप समझ रहे है, यह अहम् त्यागना होगा । यह कोई अलग देश नहीं है । यह देश जिस प्रकार हमारा है, उसी प्रकार आपका भी है। हमेशा से रहा है, आज भी है । जरूरत है इसके लिये मन बनाना, इसके बाद आप देखेंगे कि कोई समस्या ही नहीं रह जाती। शम्भू चुप बैठा रहा । मास्टर जी की अन्तिम बातें उसके मन को छू सकी हैं, ऐमा लगा । कुछ क्षण बाद जब उसने चुप्पी तोडी तो पहले जैसी तर्क की आवाज में तल्सी नहीं यो। धीरे-धीरे यहा, "इसी कोशिश में हम लगे हैं मास्टर जी। बूढे सभी उस पार जो कुछ छोड़ बाये हैं उसी का सपना देख रहे है । उन्हे बदलने मे समय लगेगा । अपनी धरती का मोह वडा विचित्र होता है । और मैं तो अपनी उम्र के और अपने से छोटो को यह समझाने मे लगा हूँ कि माई 'शरणार्थी' शब्द तुम लोग मूल 1 उत्तराधिकार ७८ - जाओ। लोग कहें, कहने दो, हम नहीं मानेगे । हम रिफ्यूजी हैं, हम शरणार्थी है, हम भाऊ-लाऊ हैं--ऐसे ही हमें कितना क्या कहा जाता है। इस कहने में जो अपमान निहित है । सव को भूलो । लेकिन आप जरूर यह समझ रहे होंगे कि यह एकतरफा मामला नहीं है । यह मान लें कि अपनी जर-जमीन से निकाले हुए होते हुए भी देश से निकाले नहीं गये, यह माटी भी हमारी ही माटी है, यहाँ हमारा भी जोर है, अधिकार है। आप लोग भी अगर यह नहीं मान लें, हाथ बढ़ा कर न कहें-आओ तुम लोग, तो सिर्फ मन बना कर भी हम क्या करें ? इधर से बिना भरोसा मिले मन बने भी कैसे ? और ऐसा भरोसा क्या हम लोगों को मिला है मास्टर जी ? आप ही कहिए।" दुर्गा मोहन जी मन ही मन कुछ सोचते रहे । अगर भरोसा नहीं मिला तो इसके लिये शम्भूचरण भी कम जिम्मेदार नहीं है। उन्होंने इसे प्रकट नहीं किया । ऐसी गहन परिस्थिति में कटु सत्य कहने से गलतफहमियों के बढ़ने की सम्भावना होती है । तर्क का समय यह नहीं है । ऐसी बातें सिर्फ सुनने की होती है विरोध करने की नहीं। इसके अलावा शम्भूचरण की वातों में जो अभियोग है उसे यों ही टाला भी नहीं जा सकता । विदेशियों के द्वारा सीमा निर्धारण की गलत रेखाओं के उस पार से उत्पीडित इन अभागों को इस पार के लोगों ने अपनत्व नहीं दिया, इस कटु सत्य को कोन स्वीकारेगा ? मन ही मन यदि स्वीकार भी लिया हो, हो सकता है वह प्रकट न हुआ हो । इसकी कोई वजह तो होगी ही। कुछ देर पहले शम्भू को दुर्गा मोहन जी ने यही समझाने का प्रयत्न तो किया था। उनके कथन में सत्यता जितनी भी हो मगर इस समय उसे उपलब्ध करने की मानसिकता की आशा व्वर्थ है । यह सोच कर वे चुप-चाप बैठे रहे। शम्भू पल भर रुक कर बोला, “बंधोपाध्याय परिवार की ही बात लीजिए, हम लोग उनकी गोदी में भांपने तक नहीं जाते, उनका कुछ विगाड़ा तक नहीं, कहीं ठोर नहीं मिला, तभी इस भसाद मैदान में आ बसे । हमें उजाड़ने का नामव जी ने क्या- पया उपाय नहीं दिया ? सब कुछ तो आप जानते ही हैं, अपनी आँखों देखते रहे हैं।" "नायव को दोष देना उचित नहीं होगा।" दुर्गा मोहन ने धीमे से कहा, "मालिक के स्वायों की रक्षा करना उनका कर्तव्य है, इसके लिये उन्हें हर माह वेतन दिया जाता है। उनके स्वार्थ में धक्का लगते देख जो उन्हें करना चाहिए, वही उन्होंने किया।" "शिल तरीका क्या यही था ? जरा नोचा भी नहीं कि हम लोग कितनी बुरी हालत में से है । मागो, अभी भागो, यहां से निकलो।"

उत्तराधिकार दुर्गा मोहन इस प्रसंग में भरसक उतरता नहीं चाहते थे । बोले, "खैर आप लोग तो बैठे ही हैं, मागे नहीं । अपना घर-द्वार बना लिया, अब उस गडे मुर्दे को उखाडने से क्या फायदा?" शम्भू ने बिना किसी हिचक के मंजूर किया, “सो आप ठीक कहते है। और यह बाते कारने आपके पास हम आये भी नहीं। बातो में ही बात निकल गयी।" क्षण भर रक कर वह पुनः पोला, "जिस काम के लिये आये हैं, वह इससे अलग है । अलग कहूं भी कैसे ? हमारे सामने तो एक ही सवाल है--किसी तरह जोना । सिर पर उप्पर, तन तर कपडा, पेट मे रोटी। इसी की कोई व्यवस्था कैसे हो? इसमें अगर आप कुछ मदद कर सकें तो." वावय अधूरा छोड कर शम्भूचरण मास्टर जी का मुंह ताकता रहा । वे मो पलके उमार कर आश्चर्य से बोले, "मैं ?" "हाँ मास्टर जी । इसीलिये मैं आपके पास आया हूँ। कोई अपनी इच्छा से नहीं, हम लोगो की कमेटी ने मुझे भेजा है।" दुर्गा मोहन की आंखो मे आश्चर्य के साथ ही सदेह भी झलका । इस शरणार्थी वस्ती के नेता की क्या मंसा है । ये लोग तो आज इस गांव मे नही आये। इतने दिनों बाद एकाएक हमारी मदद की जरूरत इन्हे क्यो पडी ! यह सब ठीक-ठीक उनकी समझ मे नही आया । बोले, "हम आप के लिये क्या कर सकते हैं ?" शभू बिना रुके बोला, “हो सकता है आज के पहले आप कोशिश करते भी तो सफलता शायद मिलती नहीं, लेकिन अब निश्चित है । जिनकी मुट्ठी मे हम लोगो का भविष्य है, वे यापकी कोई भी बात टाल नही सरते । आज इसका और भी विश्वास हो गया।" "आप का मतलब अमिजीत से है ?" दुर्गा मोहन कुछ कहने जा रहे थे कि अन्दर से पुकार हुई~"बाबू जी !" इस पुतार मे निहित अर्थ उनका जाना हुआ है । टेबुल पर एक टाइमपीस घडी थी। उसकी ओर देख कर फौरन उन्होने कहा, "आपा, अभी आया बेदी !" ७ सवेरे-सवेरे हवाखोरी करने की आदत दुर्गा मोहन जी की जवानी की लत है। जब स्तूरा जाते थे तब बहुत तडवे सो कर उठ जाते थे और पडोस के लोगो के जगने उत्तराधिकार । के पहले ही घूम कर लौट आते थे। स्कूल की तैयारी के पहले बहुत सारा काम पड़ा रहता था। उनमें प्रमुख था लड़कों के होम टास्क की कापियां जांचनी। उनके जमाने में मास्टर जी ही अपने आवश्यक कामों में इसे भी एक मानते थे। बाद में विद्यार्थी और मास्टर दोनों को ही इस काम से मुक्ति मिल गयी थी। आज भी टास्क लडके करते हैं मगर पॉलिटिकल टास्क । यह उन्हें मिलता है राजनीतिक नेताओं से । वे ही इस युग के शिक्षक हैं। छात्र-छात्राएं अपने पाड़ा के अड्डे पर इसे तैयार करते हैं और नेताओं की जरूरत के अनुसार वे परीक्षा देते हैं, नारे लगा कर, वम चला कर, जलूस सजा कर, मनूभेट में होने वाली जन-सभाओं में या कभी-कभी पुलिस से ईट-युद्ध करके। वे कोरे मास्टर होते हैं जो पॉलिटिक्स का पाठ नहीं लेते, इस परिदृश्य के मूक सर्शक मात्र । होमटास्क और परीक्षा की कापियां जांचने के अलावे भी दुर्गा मोहन जी को बहुत सारा काम करना पड़ता था । तरह-तरह के लोग उनसे मिलने आते । केवल पढ़ाई-लिखाई या स्कूल के काम से ही नहीं, इस दायरे से भी अलग दायरे की इनके सुझाव-विचार या प्रवचन की जरूरत होती थी। गांवों में मास्टर सब से अधिक निर्भर- शील और तटस्थ व्यक्ति होता है; इसी निगाह से वे देखे जाते थे । अपढ़ और कम पढ़े- लिखे लोगों के मन में भी उन पर श्रद्धा होती थी और जिस तरह हेड मास्टर अपने अड़ोस-पड़ोस में अधिक विद्वान होते हैं, इसलिये उन्हें भी वे श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। उस समय भी राजनीति थी, सामाजिक दल-बल था । मगर हेडमास्टर इन सभी से पर समझे जाते थे। इसलिये सभी दलों की आस्था इन पर थी और सभी दलों के ऊपर उनका प्रभाव भी समान रूप से था । साधारणतः जरा कड़े स्वभाव के वे होते थे । स्कूल के डिस्प्लीन की रक्षा के लिये सर्तक रहते थे । कभी-कभी यह सतर्कता सीमा पार कर जाती थी। फिर भी जनता जनार्दन का सर्मथन उन्हें मिलता था। दुर्गा मोड़न अपने प्रारंभिक जीवन में श्रद्धा और समर्थन पा चुके थे। जब वे अपने माटर जीवन के दूसरे मव्याय में पहुंचे तो देखा कि व्यक्तिगत रूप में कोई परिवर्तन नहीं होने पर हेडमास्टर नामक व्यक्ति अपने पद से हटा दिये जाते हैं । व्यक्ति स्वाधीनता फे नाम से एक नयी स्थिति का आयात हुआ है। जिसके बाहर-भीतर बहुत पोल हैं। उसके प्रभाव से 'शिक्षा' की जो प्रमुखता थी वह 'राजनीति' के अधिकार में चली गयी है। तभी तो शिक्षा को संकल्पित लोग राजनीति के खिलाड़ियों के मंत्र पर भीड़ लगाने लगे है। दुर्गा मोहन के जमाने की बात अब नहीं रही। इस हालात को उन्हें ज्यादा दिनों तक गेलना नहीं पड़ा। जल्दी ही विदा होने का समय आ गया बना वे मुद हर जाते । कारण कुछ और नहीं था । अन्तिम दिनों में उन्हें ह बहुत कचोटता रहा कि 'व्यक्ति स्वतन्त्रता' का सबसे अधिक प्रभाव लड़कों - १ उत्तराधिकार ८१ - के अनुशासन-बोध पर पहा । शिक्षा की बुनियाद हिल उठी है और विदेशा अफसर साही से जूझते हुए सर आशुतोप जैसे मनोपी ने जो फ्रेम बनाया या, स्वदेशी स्वेच्छा की रक्षा मे हो सकता है एक दिन वह भो टूट जाये। स्सूल छोडने के बाद से उन्हे ऐसा ही लग रहा था। वे हर तरफ से अपने को समेटने के प्रयत्न मे लगे रहते, यहां तक कि कुछ दिनो तक अखबार भी पहना छोड दिया । मगर एक पढा लिखा आदमी बाँखे बन्द कर सकता है पर मन के झरोखे बन्द नही कर सकता ! चेप्टा करने पर भी नहीं । उस झरोखे से जो जितना टुक आता था, उसी से वे अस्थिर रहा करते थे। दिल दुखता रहता था । उससे बचने के लिये ही वे साहित्य और दर्शन में लिप्त रहा करते थे । इस युग के साहित्य मे नहीं, उसमे भी तो लक्ष्यहीनता व्याप्त है-उन्नीसवी शताब्दी एव उसके पूर्व के क्लासिक, जिसका आग्रह सर्वकालिक होता है, जो हर युग का है-शेक्सपीयर, डिकेंस, टाल्सटाय वकिम- चन्द्र, रवीन्द्रनाथ, रोमारोल्या-उसमे ही वे खोये रहने की चेष्टा करते रहते । विन्तु वचना मुशिकल या । युग अपना प्रभाव पैसे छोड़ सकता है ? वह तो पल-छिन हुँकारता रहता है-'ऐसे युग मे जब जन्मे हो तो कर्ज तो चुकाना ही होगा।' समय सापेक्षता से कौन बच पाया है । दुर्गा मोहन भी अपने आप को बचा नहीं पाये, जितना भी वे क्कासिक और दर्शन मे मुंह क्यो न छिपाये । हो सकता है वह बच भी जाते यदि शुरू में भयानक भूल न कर बैठते तो, यानी इस बगला देश मे नही जनमते । जहाँ के एक वगाली कवि ने एक दिन उन्मुक्त कठ से गाया था-'सार्थक जनम है मेरा लेकर जनम इस देश ।' थे क्या कमी सपने मे मी सोच सके थे कि उनकी यह भावना उसी देश मे शितना हास्यास्पद हो उठेगी। इस सगीत की रचना उहोने जिस परमतत्व को उपलब्ध कर की थी, वही स्वाधीनता जब मिली तब उसके देश के लोगो ने डर कर उसकी ओर देखा तो असलियत का पता चला कि वह कुछ नहीं है, है विदेशियो द्वारा चाकू और लालफीता जो उनकी छाती मे चुम रहे हैं । उस समय भी वे सोच नही सके कि कितना खून बहेगा उस घाव से । कुछ दिन बीतने पर इसका पता चला । यह अनुभव हुमा कि अब यह खून पोछे भी नहीं पुंछ सकता। जहां यह चाकू धंसाया गया था, उसके कुछ ही दूर पर इस पार दुर्गा मोहन का जन्म हुआ था। उनका कार्य क्षेत्र और आखरी जीवन का ठौर भी अधिक दूर नहीं रहा । इसलिये इस क्षत-विक्षत स्वाधीनता के वीभत्स रूप को भी उनकी आँखो ने प्रत्यक्ष देखा । भटकाव-मटकाव भी कैसे कहा जाये ? षडयन्त्रपूर्ण राजनीति के एक ही घक्के मे बगाली कही जाने काली एक जाति रातो-रात भिखारियो मे बदल गयी । ऐसा और इतना निर्मम उदाहरण दुनिया के इतिहास मे कही देखने को नहीं मिलता । भिखारी वह होता है, जिसका कुछ नहीं होता--जो अन्नहीन, वस्त्रहीन, गृहहीन होता है।

उत्तराधिकार लोग बढ़ने से भीड़ बढ़ी है, मगर यह तो वरावर से ही है। यह अपना राष्ट्रीय अभ्यास है, संस्कार भी कह सकते हो । सिर्फ इस बंगला देश में ही नहीं, सम्पूर्ण भारत में ऐसा ही है।" "यह ठीक है। पच्छिम में इससे भी ज्यादा है।" अभि ने उसमें अपने को जोड़ा; "यहां तो, हम ऊंची जाति के लोग ऐसी खुली जगह में आकर वैठने में कुछ हेठी समझते हैं। वहाँ तो ऊंच-नीच सब समान है। सभी की गति 'मैदान' में है । यहाँ तक कि महिलाएं भी लाचार है । जब कि वे शमिली कम नहीं होतीं। इस खास समय को छोड़ कर आदरू के बारे में वे उदासीन नहीं होती। दरअसल हमारे चरित्र में एक सेल्फ कंट्राडिक्शन जो है। हम गाय को देवी के रूप में पूजते हैं, गोदान हमारा एक बड़ा कर्म है, 'धर्म-साद' जितना भी अत्याचार क्यों न करे लेकिन गाय को छुआ कि वस । जब कि गऊ की ऐसी अवहेलना दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं होती। इसी प्रकार गंगा हमारी माँ के समान है, जिसमें एक डुबकी लगाने से हमारे लिए स्वर्ग का दरवाजा बुन जाता है, और हम हर रोज सवेरे उस पर चढ़ा आते है अपनी देह का रिजेक्शन, यानी सब से गंदा दुर्गधित चोला । सोचने पर इससे भयानक कुछ नहीं लगता।" उस दिन अभिजीत कुछ पहले ही आ पहुँचा । उसके हाथ में कागजातों का एक पुलिन्दा था। चेहरे पर उलझन का भाव । उस समय दुर्गा मोहन जी हवाखोरी से लौट कर हल्का नाश्ता करने के बाद लॉन की देख-भाल में लगे थे । अभि की ओर देखते हुए मन्द मुस्कान के साथ बोले, "आओ।" कागजात से वे ररिचित थे। कल सारी दोपहर उसे मनोयोगपूर्वक देखते रहे थे। कुछ देर अमि भी बैठा था। दोनों मिल कर इसी विषय पर बातें करते रहे। इसके बाद वह चला गया था। उसे कलकत्ता जाना था। दुर्गा मोहन ने शाम को सारे कागजात उसके घर भिजवा दिये थे। - . अभिजीत पुलिन्दा खोल, मेज पर रख एक टाइप किया फुल-स्केप कागज निकालते हुए बोला, "जी, एक बात पर आपने गौर नहीं किया।" "किस पर?" कागज के ऊपर दुर्गा मोहन मुक गये । ममि ने उँगली रख कर दस्तखत की ओर उनका व्यान खींचा । फिर बोला, "यह ठीक है कि नाम से फौरन पकड़ना मुश्किल है।" मोर वह हंस पड़ा। दुर्गा मोहन भी हंसते हुए बोले, "सिर्फ नाम ही क्यों, क्वालिफिकेशन और दूसरे पार्टीलर जैसे लिखा गया है, उससे महज में पपाड़ पाना कठिन है । समझ में बात तब आयी जब टेस्टीमोनियल पर गौर किया।" "सुनाव मायद पहले ही कर लिया था ?"

उत्तराधिकार "नहीं, सब पढ़ कर ही किया । अपने को कौन का कहना है ? इस पर ध्यान देन से कही काम चलता है ? देवना यह होगा कि दूसरे क्या कहते हैं।" यमिजीत अवाक् उनकी ओर देखता रहा । दुर्गा मोहन ने यह देख कर कहा, "क्यो, क्या तुम्हारे विचार से इससे भी वेटर कोई और है ?" "मही," अपिजोत ने फौरन उत्तर दिया, "हमें जो चाहिए, जैसे भादमी की जरूरत है, इस दृष्टि से तो यही वेस्ट वडिडेट हैं, पर।" पर के बाद वह रुक गया। दुर्गा मोहन ने पूछा, "पर, पर मैंने विचार नहीं किया, सो बात नहीं । कुछ दिवफते है । अपनी ओर से भी और हो सकता है, उसकी ओर से भी। मगर सिर्फ इस वजह से दरसास्त को रिजेक्ट नहीं किया जा सकता । शुरू में ही हम लोग एक गलती कर बैठे । विनापन में यह उल्लेख कर देना चाहिए था कि महिलाएं अर्जी न दें- वुमेन आर अनमूटेवुल जैसा किसी-किसी सरकारी विज्ञापन में होता है । जब यह चूक हो ही गयी तो उसे वाद नही किया जा सकता, यह अनुचित होगा।" अमिजीत ने कुछ नहीं कहा । मन-ही-मन मान बैठा कि यह 'अनुचित' शब्द जिस प्रकार कहा गया है, उसके आगे कुछ कहना बाकी नही रह गया । मास्टर जी को वह जानता है। मामूली बातो में भी उनसे वह न्यायपूर्ण सुझाव पाता रहा है । जो कुछ उन्होंने ने किया है वह जितना भी वास्तविक हो, काम में उससे जितनी भी उलझनें पैदा क्यो न हो लेकिन वे उससे टस-से-मस होने वाले नहीं हैं । यह यही पकडे रहेगे-~~-यह अनुचित होगा। जमीदारी उन्मूलन के बाद जो जटिलताएं सामने उमरी, उनसे मुकाबिला करने से कहीं अधिक अहमियत है रिफ्यूजियों के द्वारा जबरदस्ती दखल करने की समस्या को सहज भाव से मिटाने के लिये एक ऐसे मैनेजर की जो इस समस्या को एक तरफ तो कडाई से तथा दूसरे पक्ष से सहानुभूति पूर्वक हल कर सके, इसके लिये पहले अभि ने मास्टर जी से ही अनुरोध किया था कि वे अपने जाने हुओ मे से किसी को इस काम में लण दें। ऐसा कोई उनकी जानकारी में नही था, यह बात नही । पर इस तनह किसी को रोजी देगा उन्होंने उचित नहीं समभा, क्योंकि उसस भी योग्य बहुत से लोग हो सकते। इसलिये यह तय किया गया था कि इसके लिये अखबारो मे विज्ञापन दिया जाये। विज्ञापन में इसका साफ-साफ जिक्र कर दिया गया था कि नौकरी के उम्मीदवार को शरणार्थियों के चरित्र, उनके आचार-व्यवहार, उनकी खास तरह की मानसिकता एवं इलाके से मलोमांति परिचित होना जरूरी है। साथ ही उम्र, शिक्षा, पारिवारिक परि- चय, जमीदारी के विषय मे जान (यदि कुछ हो) और इससे सबंधित कुछ जानकारी देने का भी निर्देश था। इसी के साथ प्रशसा-पत्रो की नाल भो मांगी गयी थी। यह बना ही काफी होगा कि जियो का ढेर लग गया था । अमिजीत के हाथ में जो पुलिन्दा था, वह उसी का छोटा सा हिस्सा था । बहुत सारे तो पहली नौज में .

उत्तराधिकार ही खारिज हो चुके थे। यह काम अभि ने स्वयं कर डाला था, मास्टर जी पर इसका बोझ नहीं डाला । अन्तिम चुनाव का जिम्मा उन पर ही था। उन्होंने सब दृष्टियों से जिसे योग्यतम मान कर चिह्नित किया था, उसके नाम पर पहले गौर नहीं किया जा सका, देखने की जरूरत भी नहीं थी। ऐसी स्थिति में नाम महत्व नहीं रखता । वाद को उस पर उनकी निगाह गयी थी । वह नाम था निहार चटर्जी । इस नाम से यह अनुमान वे लगा नहीं सके थे कि यह किसी लड़की का नाम है । वाद को जब प्रशंसा-पत्र पड़ने लगे तब वे 'शी' देख कर चौंके थे। इसके बाद सारी अजियों को फिर एक वार उलट गये और तुलना करते हुए विचार करने लगे। पर निहार चटर्जी ही अन्त में हर तरह से योग्य मालूम पड़ीं। उन्होंने उसी के पक्ष में अपनी राय दे दी। अभिजीत उनके तर्क से अवाक हो गया, लेकिन उसका मन इस पर जमा नहीं, यह दुर्गा मोहन जी भांप गये थे। उन्होंने जो किया वह क्या अपनी मर्जी से ? उनका तो काम था सबसे अधिक नम्बर जो पाने लायक है उसे वही देता। सारी जिन्दगी तो वे यही करते आये हैं, आज भी उन्होंने यही किया। विश्वविद्यालयों की कापियां जांचते वक्त तो छात्राओं और छात्रों में उनके लिये कोई भेद नहीं रहा । अभिजीत अभी भी सिर झुकाये बैठा था । दुर्गा मोहन ने एक बार फिर उसकी ओर देखा । उसके मनोभाव को पढ़ने का प्रयत्न उन्होंने किया । उचित-अनुचित के सवाल पर वह गौर नहीं कर सका है, वात यह नहीं। फिर भी इस चुनाव पर उसका मन टिक नहीं रहा है। वह एक अलग पहलू है। गुण ही सिर्फ योग्यता की कोसीटी नहीं होती, देखना यह पड़ेगा कि इस विशेष काम में यह लड़की कितनी उपयोगी सिद्ध होगी। वह सिर्फ लड़की ही नहीं है, उम्र में जवान मी, है । हो सकता है, विज्ञापन की भाषा से काम की गहराई का अन्दाज वह न लगा सकी हो । संभव भी नहीं है। इस बारे में और भी जानकारी प्राप्त कर उसे ही निर्णय लेना होगा कि क्या वह इस काम में सफल हो सकती है ? "एक बात हो सकती है।" अचानक मास्टर जी की आवाज कानों में कौंचते ही अभिजीत ने चौंक कर उनकी ओर देखा । दुर्गा मोहन जी ने कहा, "उस लड़की को बुलवा भेजें । इंटरव्यू में जैसा होगा कुछ कर लिया जायेगा।" यह भी अभिजीत को कुछ जचा नहीं, फिर भी जहां जिस वात के लिये वह बिल्कुल निराश हो चुका था उसकी कुछ माशा बंधी। बोला, "आप अपने यहां ही बुलायें।" "नहीं, नहीं, मेरे यहाँ क्यों ? नौकरी तुम दोगे, वह तुम्हारी मैनेजर होगी। तुम्हारे दफ्तर में आये।" "मगर इंटरव्यू तोलेगे आप।" "मैं तुम्हारे साथ रहूंगा, एडवाइजर के रूप में । मीर-1" । ।

उत्तराधिकार ८७ - कई पल चुप रह कर पुनः बोले, "बहूरानी को भी अपने बोर्ड में रखना होगा।" अभिजीत सोचे बैठा था कि इस खबर से बहूरानी को चौंका देगा । मगर बहू- रानी ने जो कहा उससे वह स्वय अवाक रह गया, "मैनेजर जिसे चुना गया है, वह एक लडकी है ।" यह सुनते ही बहूरानी ने झट से कहा, "अच्छा ही तो है, चलो मुझे कम से कम एक सगिनी तो मिली । इतने बडे मकान में अकेले कितना मैं घुटती हूँ!" "लेकिन तुम्हारा सग निभाने के लिये तो वह रखी नहीं जा रही है ।" मन्द मुस्कान के साथ अभिजीत बोला, "वह आ रही हैं काम करने, बाहर से ही उसका वास्ता होगा । तुम उसे पा से सकती हो?" "डरो नहीं, मैं वाधा नहीं बनूंगी।" देवर की ओर तिरछी निगाह से देखते हुए वहरानी ने 'वाधा' पर जोर दिया, “वह मालिक का दायरा है, यह मुझे पता है । उसमे हिस्सा मैं बटानेवाली नहीं है। लेकिन काम में विराम भी तो है, उसी अवसर का लाभ उठा लेगे। इसमे तो तुम्हे कोई उन नही है न?" अभिजीत ने महसूस किया कि विला वजह वह गडबडी मे बुरी तरह फंस गया और कि चर्चा अगर आगे वढी तो चिकोटी काटने वाली मामी से पार पाना कठिन है । इसलिये हँसता रहा । बहूरानी ने कहा, "कब से वह आ रही है ?" "आयेगी ही, ऐसा कुछ तय नहीं हैं । सिर्फ अर्जी दे दिया और नौकरी मिल गयो ? इसके बाद की रस्म है इन्टरव्यू ।" “यह मला क्या होता है ?" "भेटे-मुलाकात, पूछ-ताछ, यानी कितना क्या वह कर सकती है, या कर नही सकती है इसकी जांच-पडताल । इसके लिये वह बुलायी गयी है-परसो दस बजे । तुम वैयार रहना।" "मैं ?" महामाया जैसे आसमान से गिरी। "हाँ, तुम्हे भी हम लोगो के साथ रहना होगा । इन्टरव्यू बोर्ड के तीन सदस्य हैं-हेडमास्टर जी, तुम और मैं।" "अजब बात है । मैं वहाँ क्या कहेंगी?" "समी को मिल जुल कर, देख-सुन कर तय करना पडेगा न ?" "मैं भला क्या देखूगी ? मनेजर-वनेजर के बारे मे मैं जानती भी क्या हूं ?" इसके बाद आवाज दाब, होठों के मोनर हंसी छिपा कर बोली, "लडकी देखने जैसा कुछ होता तो मैं रहती भी।" बहूरानी अव मास्टर जी के सामने होने लगी थी। वे आये तो उन्हे राजी ८६ उत्तराधिकार ही खारिज हो चुके थे। यह काम अभि ने स्वयं कर डाला था, मास्टर जी पर इसका वोझ नहीं डाला । अन्तिम चुनाव का जिम्मा उन पर ही था। उन्होंने सब दृष्टियों से जिसे योग्यतम मान कर चिह्नित किया था, उसके नाम पर पहले गौर नहीं किया जा सका, देखने की जरूरत भी नहीं थी । ऐसी स्थिति में नाम महत्व नहीं रखता । वाद को उस पर उनकी निगाह गयी थी । वह नाम था निहार चटर्जी । इस नाम से यह अनुमान वे लगा नहीं सके थे कि यह किसी लड़की का नाम है। बाद को जब प्रशंसा-पत्र पढ़ने लगे तब वे 'शी' देख कर चौंके थे। इसके बाद सारी मजियों को फिर एक वार उलट गये और तुलना करते हुए विचार करने लगे। पर निहार चटर्जी ही अन्त में हर तरह से योग्य मालूम पड़ी। उन्होंने उसी के पक्ष में अपनी राय दे दी। अभिजीत उनके तर्क से अवाक हो गया, लेकिन उसका मन इस पर जमा नहीं, यह दुर्गा मोहन जी भांप गये थे। उन्होंने जो किया वह क्या अपनी मर्जी से ? उनका तो काम था सबसे अधिक नम्बर जो पाने लायक है उसे वहीं देना । सारी जिन्दगी तो वे यही करते आये हैं, आज भी उन्होंने यही किया। विश्वविद्यालयों की कापियां जांचते वक्त तो छात्राओं और छात्रों में उनके लिये कोई भेद नहीं रहा । अभिजीत अभी भी सिर झुकाये बैठा था। दुर्गा मोहन ने एक बार फिर उसकी ओर देखा। उसके मनोभाव को पढ़ने का प्रयत्न उन्होंने किया । उचित-अनुचित के सवाल पर वह गौर नहीं कर सका है, वात यह नहीं। फिर भी इस चुनाव पर उसका मन टिक नहीं रहा है। वह एक अलग पहलू है। गुण ही सिर्फ योग्यता की कोसीटी नहीं होती, देखना यह पड़ेगा कि इस विशेष काम में यह लड़की कितनी उपयोगी सिद्ध होगी। वह सिर्फ लड़की ही नहीं है, उम्र में जवान भी, है । हो सकता है, विज्ञापन की भापा से काम की गहराई का अन्दाज वह न लगा सकी हो। संभव भी नहीं है। इस बारे में और भी जानकारी प्राप्त कर उसे ही निर्णय लेना होगा कि क्या वह इस काम में सफल हो सकती है ? "एक बात हो सकती है।" अचानक मास्टर जी की आवाज कानों में कौंधते ही अभिजीत ने चौंक कर उनकी ओर देखा । दुर्गा मोहन जी ने कहा, "उस लड़की को बुलवा भेजें । इंटरव्यू में जैसा होगा कुछ कर लिया जायेगा।" यह भी अभिजीत को कुछ जंचा नहीं, फिर भी जहाँ जिस बात के लिये वह बिल्कुल निराश हो चुका था उसकी कुछ आशा बंधी। बोला, "आप अपने यहां ही बुलायें।" "नहीं, नहीं, मेरे यहाँ क्यों ? नौकरी वह तुम्हारी मैनेजर होगी। तुम्हारे दफ्तर में आये।" "मगर इंटरव्यू तोलगे आप।" "मैं तुम्हारे साथ रहूंगा, एडवाइजर के रूप में । और-।" तुम दोगे,

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उत्तराधिकार - । करने की एक वार और कोशिश की, "तुम रहो तो ठीक ही है बहूरानी । खास कर इसलिए कि वह एक लड़की है और अभी उम्र भी कम है । और फिर तुम्हारे विना कुछ हो भी तो नहीं सकता । बंधोपाध्याय परिवार के भले-बुरे से तो तुम जुड़ी हो । इसलिये ऐसे एक जरूरी काम के लिये तुम्हारा मत आवश्यक है।" महामाया बोली, "यह लड़की तो हमारी जैसी पुराने जमाने की नहीं होगी मास्टर जी, जो मर्दो के सामने लाजवन्ती बनी बैठी रहेगी। आज कल की पढ़ी-लिखी लड़की हैं, और वह नौकरी करने आ रही है। मेरा रहना कोई मतलब नहीं रखता मौर रही बात मत की ? आप और लाला मिल कर जो तै करेंगे, उस पर मैं मला वोल भी क्या सकती हैं।" दुर्गा मोहन जी ने कुछ कहा नहीं ! चलने के लिये उठ खड़े होते हुए बोले, "एक लड़की को हम लोग जो काम सौंप रहे हैं. अगर उसके लिये वह उपयुक्त हुई और उसकी तरफ से कोई आपत्ति नहीं हुई तो तुम्हें कोई आपत्ति नहीं होगी न ?" "नहीं-नहीं आपत्ति क्यों होगी ? आज कल लड़कियाँ तो हर तरह का काम कर रही हैं-ऐसा मैंने सुना है।" दुर्गा मोहन जी चले जा रहे थे, बहूरानी दो कदम आगे बढ़ कर बोली, "वह लड़की कुंवारी है या विवाहिता ?" मास्टर जी जाते हुए रुक गये । बहूरानी की ओर मुखावित होकर बोले, "शायद कुंवारी ! अर्जी में ऐसा कुछ लिखा नहीं है पर इसके साथ जो प्रशंसा-पत्र नत्यी है, उसमें नाम के आगे 'कुंवारी' शब्द का उल्लेख है, जबकि ये सव काफी दिनों पहले के हैं । "यह सवाल क्यों उठा बहूरानी ?" "और कुछ नहीं, मैं उनके रहने की बात सोच रही थी। विवाहिता होगी तो वह अलग कमरा चाहेगी और अगर कुंवारी हुई और साथ कोई न आया तो यहीं रह सकती है। बीच वाले मकान में तीन-चार कमरे खाली भी हैं।" "यह सब तो तुम जैसा चाहोगी वैसा ही होगा। पहले उसे 'काम'तो मिले, इसके बाद 'धाम' । इतना कह कर मुस्कराते हुए दुर्गा मोहन जी आगे बढ़ गये। इन्टरव्यू का समय निर्धारित था, दस बजे । इसके कई मिनट पहले दिखा, विशाल रादर दरवाजे के अन्दर एक लड़की घुसी। दुर्गा मोहन जी दफ्तर वाले कमरे के पीछे के एक कमरे में बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे। खिड़की से उन्होंने इस लड़की को देखा । छरहरी-सी, कुछ लम्बी, हो सकती है इसीलिये कुछ अधिक दुवली नजर आती हो वर्ना दोहरे गढ़न की कही जा सकती है । रंग साफ नहीं, पर काला भी नहीं। मुछ-गुछ श्याम वर्ण की जैसी बंगला देश की अधिकतर लड़कियां होती है। घोड़ा और निस्ट आने पर शक्ल की बनावट कुछ साफ हुई । ग्लवमूरत कहने में रुकावट भी कुल मिलाकर सुखी काहने में किसी को हिचक नहीं । अंग्रेजी में जिसे हैंडसम कहा - उत्तराधिकार ८६ जाता है । नाक, मांख, ललाट और ढोढ़ी पर को चमक पर सबसे पहले नजर पड़ती है। चेहरे की तरह पहिरावे में भी कोई चाक-चिक्य नही । आकाशी रग के किनारे वाली मामूली तांत की साडी, ब्लाउज मी उसी रग का । हाथ मे एक सादा-सीधा-सा वैग और छोटी बेंट वाला औरताना छाता । गेट पार कर दफ्तर की खुली चौहद्दी मे पहुंच एक बार इधर-उधर ताक कर देखा । पहले के दिनो मे वहां दो-चार पाइक-बरफन्दाज मुकर्रर होते। पुराने रीति- रिवाज के अनुसार दुर्गा मोहन जी ने भी ऐसा ही कुछ सोच रखा था, पर उस लडकी को आगे बढ कर दफ्तर तक पहुंचाते नहीं देख कर कुछ अनमने से हो गये । ऐसे मे ही हलधर सामने बढ आया । शायद अमिजीत ने कह रखा हो । वह कुछ पूछ कर उसे पहचान गया । जमीदारी अमल मे गाव तकिये के सहारे गडगडे का नेचा हाय मे लेकर वे आर्थी-प्रार्थी, अतिर्ता गतो से भेट करते थे, आज ऐसी व्यवस्था नहीं थी। बगल के छोटे कमरे में बैठकर अमिजीत काम करता है । चीजो के नाम पर एक आफिस मेज और कई कुसियों । वही हलधर ने इन्टरव्यू देने आयी लडकी को ला वैगया । साथ ही दुर्गा मोहन भी उस कमरे मे आये और उनके पीछ-पीछे अमिजीत मी ला गया। निहार उठ खडी हुई। ये ही उसके परीक्षार्थी हैं और नियुक्ति करने वाले अधिकारी भी, यह सहज ही उसकी समझ मे आ गया । उसने विनम्रतापूर्वक दोनो को नमस्कार किया। अभिजीत ने उसे आते नही देखा था। उसके साथ कोई आया होगा, यह सोचकर अभिजीत हलधर से कहने ही वाला था उन्हे बैठाये कि निहार बोल उठी कि वह अकेली आयी है । अमिजीत ने फिर कुछ नही कहा । दुर्गा मोहन बोले, "आने में कोई दिक्कत तो नही हुई न ।" गर्दन हिलाकर निहार ने बताया, नही । फिर दुर्गा मोहन जी ने कई सवाल किये । कलकत्ते मे कहां रहती हो ? मकान अपना है या किराये का ? कहाँ की रहने वाली हो, पूर्व बगाल के किस जिले को ? कितने दिन हुए इस पार आये ? परिवार मे कौन-कौन हैं ? वगैरह-वगैरह । निहार ने एक-एक का उत्तर दिया । अन्तिम सवाल के उत्तर मे यह स्पष्ट हुआ कि यहाँ अपनो के नाम पर हैं सिर्फ माई और बहिन । "और देश मे " दुर्गा मोहन ने पूछा । "वहाँ कोई नही ।" "माता-पिता?" निहार चट से उत्तर नहीं दे पायी । उसके शान्ताभीर चेहरे पर धीरे-धीरे उदासी उतर आयो उसके दांतो से होठ काटने से अनुमान लगा लिया गया कि वह अपने को । " उत्तराधिकार १० कंहीं रोक रही है । कई पल बीते, तब कहीं वह सहज हुई और बोली, "वे नहीं रहे।" माता-पिता का जिक्र छिड़ते ही इस लड़की की शक्ल पर भावों का जो परि- वंर्तन हुआ और फिर अपने को सहज बनाने की उसने जो चेष्टा की इससे दुर्गा मोहन और अभिजीत से कुछ छिपा नहीं रहा । वे समझ गये कि 'वे नहीं रहे' इस छोटे से उत्तर में कोई भयानक दर्द छिपा है । इसलिये इस विषय की कोई चर्चा करने का यह अवसर नहीं हो सकता । दोनों ही पक्षों में मन ही मन समझौता हो गया । हेडमास्टर ने अभिजीत की ओर एक बार देखकर उसकी चुप्पी को सहमति मान कर वात आगे वढ़ाई । यह बात इस बात की एक छोटी-सी भूमिका थी कि विज्ञापन में 'मैनेजर' शब्द का उल्लेख होते हुए भी काम ठीक 'मैनेजरी' नहीं है । जमींदारी जव नहीं रही, उसकी मैनेजरी का भी अब कोई मतलब नहीं होता फिर भी मैनेजमेंट जैसा कुछ तो है ही, जो बहुत कुछ इस विलुप्त जमींदारी से जुड़ा है। सरकार ने जमींदारों का अधिकार ले लिया है मगर उनके लेन-देन की पूरी-पूरी जिम्मेदारी नहीं ली है। एक कीमत ते अवश्य किया है, लेकिन वह सिर्फ कागजों पर ही । वे रुपये कव इनके हाथ लगेगें, इस वारे में कुछ ते नहीं है । इसके लिये लिखा-पढ़ी, कोशिश पैरवी करते रहना होगा। कितने दिनों और परिणाम कव क्या निकलेगा, यह कहना कठिन है। "इसके अलावा," कहते हुए दुर्गा मोहन ने अभिजीत की ओर देखा, "इस वारे मैं और जो कुछ कहना है, वह तुम कह सकते हो अभि ! मैं मास्टर ठहरा, जमींदारी की समझ मुझमें कहाँ हो सकती है।" "मुझे भी कितनी समझ है, आप अच्छी तरह जानते हैं।" "फिर भी जब से आये हो, तव से कुछ देख-रेख तो कर ही रहे हो।" "उसी का तो नतीजा यह है कि सब गड़बड़ाता जा रहा है। मगर एक बात समझ में आ गयी है।" "क्या, बताओ तो ?" "यही कि यह मेरे वश का नहीं है ।" दुर्गा मोहन हंस पड़े । निहार के होंठो पर भी हँसी की पतली सी रेखा उभरी। दुर्गा मोहन ने उसकी ओर देखकर कहा, “यानी यह सब आप को समझ लेना होगा।" "और जो कुछ करना है-" अमिजीत ने आगे जोड़ा; "वह मी करना होगा । पुराने अनुभवी कई लोग हैं। उनसे सहयोग आपको मिलेगा। इस बारे में आप को भी अनुभव होगा ही, ऐसा आपने लिखा मी है ।" "अनुभव यानी?" निहार ने अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहा, "मेरे भाई की छोटी-सी जमींदारी थी । उसका बहुत बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में चला गया, इधर भी कुछ है, मतलब अभी यह सरकार की देख-रेख में है। वे सरकारी नौकरी में बाहर ही "ens उत्तराधिकार ६१ - दिन बिताते रहे हैं। अब बूढे हो चुके हैं, इसलिए जो कुछ करना पड़ता है मुझे ही, इसी से जो कुछ सीख सकी हूं।" दुर्गा मोहन ने कहा; " इनकी हालत भी कुछ ऐसी ही है । जो कुछ था उस पार चला गया, मतलब जो कुछ था सब डूब गया। समस्या इस पार यानी इधर की है। ऊपर से एक नई आफत आ गयी जबर-दखल । आते हुए आपने देखा ही होगा।" "उस कालोनी की वात आप कर रहे हैं न ?" निहार ने पूछा। "हां, वह सभी इनकी जमीन है।" अमिजीत ने कहा, "इसी विषय में कुछ करना ही मेरा अभिप्राय है । विज्ञापन मे भी यह लिखा था । आपने देखा ही होगा।" निहार ने गर्दन हिलाकर स्वीकारा, उसने देखा है। पल भर की चुप्पो के बाद अमिजीत ने कहा, "इन लोगों से एक तरह के सम- झोने की जरूरत है, जिसके लिए हमलोग जमीदारी मनोमाव से कुछ करना नही चाहते हैं, उनकी मांगो को जितना भी हो सके सहानुभूति के साथ निवटाना चाहते हैं । यह भी ठीक है कि दूसरे पक्ष के स्वार्थों का भी ख्याल रखना ही पड़ेगा। इन दोनो के बीच सामजस्य वैसे वैठाया जाये, यही उपाय निकालना है और इसके लिये ही आपका सहयोग जरूरी है। निहार को कुछ कहना नही था । सिर मुकाये चुप बैठी रही। इससे यह सिद्ध हुआ कि अमिजीत की बात उसने अच्छी तरह समझ ली है। समी चुप थे । इस चुप्पी को अभिजीत ने ही तोडा, " हमारा यह सौमाग्य है कि हमारे परम पूज्यनीय गुरु-" उसकी दृष्टि दुर्गा मोहन की ओर गयी साथ ही वह बोले, “भूतपूर्व और जोडो ।" "स्कूल कमेटी के लिये आप भूतपूर्व हो सकते हैं, मेरे या और किसी के लिए नही ।" अभिजीत ने फौरन उत्तर दिया और पूर्व प्रसग मे लौट गया, "इनका मूल्यवान सुझाव मिलता रहेगा। इनके अतिरिक्त, हमारी मामी-" यह सुनते ही निहार ने पलकें उभार कर देखा । देखने मे चकित-भाव था । उसकी ओर देखते हुए दुर्गा मोहन बोले, "बनर्जी परिवार की लक्ष्मी-स्वरूपा । आप से बाज ही भेट होगी । लीजिए शायद बुलावा आ गया-क्यो रे ?" हलधर हाय जोडे विनय भाव से दरवाजे पर आ खडा हुआ था। मास्टर जी के सवाल पर निहार की ओर इशारा करते हुये कहा, "बहनजी मिल कर जाये ऐसा कहा है बहूरानी ने, और आप भी चले मत जाइयेगा।" दुर्गा मोहन हंसते हुये बोले; "देखिये मला, अभी से हो बहनजी हो गयी । अब मुझे भी आप-आप करना जंचता नही ।"

हार ने संकोच के साथ कहा; 'तो ठीक है उसे यहीं खत्म कर दिया जाये । अव अन्दर चली जाओ । अनि पूछना है क्या ?" अभिजीत ने गर्दन हिलाकर कहा; "जी नहीं।" वहूरानी से मैनेजर के पद पर निहाल चटर्जी की नियुक्ति यानी फाइनल सेलेक्शन के पहले नों पक्षों की सुविधा के लिये एक इंटरव्यू जरुरी है, जब यह निश्चय किया गया दुर्गा हन ने उसी वक्त अभिजीत से कहा था, वहूरानी को भी अपने बोर्ड में रखना होगा। मह वात बहुत अहम नहीं होते हुये भी बहुत सोच-विचार कर कही गयी थी। पहली बात जो सहज में गौर करने की है और जैसा कि उन्होंने भी कहा था कि अर्जी देने वाली एक महिला है। कोई पुरुष होता तो इन्टरव्यू में उनके होने का सवाल ही नहीं उठता था। लेकिन एक लड़की को हर तरह से समझने के लिए सिर्फ पुरुप की नजर ही पर्याप्त नहीं है; कुछ कमी रह जाती और जव कि यह सुविधा है तो क्यों न उसका फायदा उठाया जाय । अलावा इसके मैनेजर जव कि एक लड़की हो तव अन्दर महल से उसका संप होगा ही। फिर वह शुरू से ही क्यों न रहे। ऊपरी तौर से यह सव होते हुए भी दुर्गा मोहन के प्रस्ताव के पीछे एक कारण था, इस परिवार के विगत कई वर्षों के इतिहास में जो कारण समाधान पाने को छटपटाता रहा है । हेडमास्टर का इस परिवार से प्रत्यक्ष रूप में संपर्क नहीं था । अभिजीत के लौट माने के पहले कभी उनको बुलाया नहीं गया था और न वे खुद आये थे । फिर भी इस ऊंची चहार दीवारी से घिरी विशाल अट्टालिका से उनका सूक्ष्म और अव्यक्त संपर्क बना रहा । उस ओर के उत्यान-पतन पर, दूर रहते हुए भी विना गो किये वे रह नहीं सकते थे । वहूरानी जैसी पढ़ी-लिखी लेकिन बुद्धिमती और शील-स्वभ वाली महिला के जीवन-क्रम पर उनकी नजर बराबर रही है । अपने बघू जीवन के प्र अंक में महामाया बंद्योपाध्याय परिवार की बहुत लाड़ली बहूरानी रही। घर की म प्रतिप्ठा की शोमा-श्री के सिवा उसकी और कोई भूमिका नहीं रही। जिस दि परिवार से सास ने मुंह मोड़ लिया उस क्षण से ही आत्मीय, सगे-संबंधी-नौकर- नौकरानियों से भरे-पूरे परिवार के प्रति कर्तव्य का निर्वाह उसके कन्धे पर आ गया वक्त उन ही क्या थी ! मगर परिवार की सभी परंपराएं और कर्तव्य वे पून मायीं । हो सकता है उन कम होने से ही उनका 'बहूरानी' नाम आज भी " में बदल नहीं पाया । यही कारण है कि वे आज सिर्फ मालकिन ही नहीं है, स उत्तराधिकार माहर-भीतर सब उन्हे देखना पड़ता है । बनर्जी परिवार की रीति-नीति यह नहीं थी। परनी का करतब घर की सीमा तक ही सीमित, दफ्तर की दीवाल के बाहर पैर रखना अपराध-घर के बाहर आना जिस प्रकार अनीति थी, उसी प्रकार वहां के किसी काम में हस्तक्षेप करना मो महान् अपराध था । महामाया के समय तक इस नियम में कोई व्यति-क्रम उत्पन नही हुआ। जमीदारी के विषय मे वे न कुछ बोल सकती थी न कर सकती थीं । यहाँ तक कि जिस दिन पति ने मालिक की इच्छा के विरुद्ध बाखरगज के विद्रोही प्रजा को मुट्ठी मे करने के लिये वे नाव मे बैठे, उस दिन महामाया का मन किसी आगत सवट की सभावना से बार-बार बिलखा पा । मगर कब कहूँ-कैसे कहूँ, इसी द्विविधा मे वह यह कह नहीं सको-~'तुम न जाना ।' यह कहना भी अपराध होता । अन्त तक वह चुप ही रही। इन्द्रजीत फिर नही लौटा । वैधव्य को शून्यता के भोग से महामाया किसी एकात मे जाना चाह कर भी जा नही पायो । ससुर उस समय जीवित थे । घर से उन्हें चिपका रहना पडा । अपर से कुछ और बोझ उस पर आ पड़ा, जो मालिक के जीते जी नहीं माया या । बनर्जी परिवार की सदा की रीति कायम नहीं रह सकी । बहूरानी के जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। पत्नी की मौत के बाद से सुरजीत ने अपने अभ्यस्त जीवन-श्रम से अपने को बहुत कुिछ समेटा । रोज दफ्तर मे जा कर बैठते बस इतना ही । पर जब तक वे वहां रहते सर्फ गडगडा गुडगुदाते रहते, बातचीत सास किसी से नहीं करते, जरूरी काम-काज के लिये अगर कोई कुछ पूछने-ताछने आता तो बगल के कमरे की ओर इशारा कर देते। बगल के कमरे मे बडा लडका इन्द्रजित बैठाता था। इसके बाद वह भी जब उनके सामने ही मुंह मोड गया, तब से दफ्तर से मालिक का जितना जैसा सबध था वह भी नहीं रहा । पत्नी के कमरे की बगल मे उनका जो सोने का कमरा था, वहां से हट कर वे बिचले मकान के एक छोटे से कमरे में आ गये थे। वहां से वे कमी-फमार ही निकलने । एकदम जरूरी काम के बिना सदर नायब भी उनसे नही मिल पाते । वाते मी जो कुछ होती वह हो-ना मे । दो-चार बातो के बाद ही वे उदासीन हो जाते--"जो अच्छा समझो, करो । मुझे परेशन मत फिया करो।" ऐसी जब स्थिति आती तब यज्ञेश्वर को बहूरानी की शरण लेनी पड़ती, "तुम्हे जरा मालिक के पास जाना होगा बहू बहूरानी टाल नहीं पाती। बनर्जी परिवार की भलाई के लिये उन्हें सीमा का अतिक्रमण करना ही पड़ता। रई वर्षों मे ससुर भी सिधार गये । एकमात्र जीवित वशघर अमिजीत अपने बाप-दादे को धन-सम्पत्ति पर अधिकार जमाता तब महामाया क्या करती यह कहना कठिन है । हो सकता है काशी के मकान में अपनी सारी जिन्दगी बिता देती--इस - " ।

उत्तराधिकार परिवार की विधवाएँ जो आज तक करती आयी हैं। पर उनके जीवन की धारा मुड़ गयी दूसरी ओर ! अनिच्छा पूर्वक और अनजाने में ही धीरे-धीरे जमींदारी जटिल-जाल में फंसती गयी । उस जाल ने जव ऐसा रूप धारण किया जिसकी गांठें खोलनी उनके लिये मुश्किल हो गयी तव लाचार होकर अभिजीत को बुलवाया, वर्ना वे कभी खुद नहीं बुलातीं । जैसे, जिस उम्र में इस परिवार के छोटे लड़के को उसकी मां की गोद से छीन कर दूर किया गया था, इसे सास की तरह वे भी भूल नहीं सकीं। एक-एक कर जव सभी चले गये, इस विशालपुरी की उदासी उसकी अपनी उदासी बन गयी, तब बहूरानी निरंतर यही सोचती रहीं-काश वह लौट आता ! पर लिखने की सोच कर भी लिखा नहीं जव कि यह मांग वनर्जी परिवार के लिये जितनी जरूरी थी उतनी उनके अपने लिये उससे कम नहीं थी। फिर भी वीते इतने वर्षों में वे चुप रहीं। एक ऐसा अवसर आया जब अभि को उन्हें आने के लिये लिखना ही पड़ा, जिसमें जो ध्वनि थी उसकी उपेक्षा अभिजीत भी नहीं कर सका । अगर यह वात न होती तो वह कदापि अपनी उजड़ी जमींदारी की लाश फूंकने यहां न आता। दुर्गा मोहन यह समझ चुके थे। अपने इस छात्र को वे बचपन में ही पढ़ चुके थे । यह उनकी धारणा थी कि सिर्फ जमींदार वंश की भावना उसके खून में नहीं है। फिर बहुत दिनों बाद जब मेंट हुई तब पहली मुलाकात में ही उन्होंने मान लिया, मन वैसा ही माज भी है--सम्पत्ति से विमुख, निलिप्त । बल्कि इतने अरसे तक उसने जो जिन्दगी जी है, उसके प्रभाव और परिवेश ने वनर्जी परिवार के उत्तराधिकारी होने योग्य उसे नहीं रखा है । अंग्रेजी में जिसे कहा जा सकता है मिसफिट । वह मिसफिट है। उसकी आंखों में झांकने पर, उसकी बातों में डूबने से यह सहज में समझा जा सकता उसके भीतर कोई त्यागी-वैरागी वसा है। यहां आने पर उसे कुछ द्विविधा में पड़ना पड़ा है, वह द्विविधा या बन्धन बनर्जी परिवार का नहीं है, उसके पैतृक अट्टालिका के छज्जे, बरामदे और आंगन में जो मीठी-कड़वी यादें चिपकी हैं, उसका भी नहीं है, यह बन्धन एक ओर जहां अचानक उड़कर आये और जुट कर बैठे शरणार्थी नाम के अजब जीव का है, वहीं दूसरी ओर हैं वहूरानी का । लेकिन ये भी उन्हें सदा बांध कर रख नहीं सकेगें। उसके अन्दर वसा वैरागी कब जाग उठेगा शायद उसे खुद भी नहीं मालूम । मगर भीतर ही भीतर उसकी प्रक्रिया चल रही है । यह वात नहीं थी तो इसमें जोर की जरूरत क्यों पड़ी ? इस विषय में वह एड़ी-चोटी का पसीना एक कर रहा है इसका मतलब क्या है क्या उसका यह सोचना नहीं कि वह कैसे यहाँ से नाजाद हो। परन्तु अभिजीत के अनजान होने पर भी दुर्गा मोहन जानते हैं कि सिर्फ एक मैनेजर के ला बैठाने से ही समस्या का समाधान नहीं हो सकता । इस परिवार का अपना एक आदर्श है; उससे बिना जुड़े, वाहर का कोई भी, बाहर का ही रह जायेगा। **.. है उत्तराधिकार बहुत कोशिशो के बवजूद भी वह अमिजीत के सोचे-विचारे को पूरा नहीं कर सकेगा। बनर्जी परिवार को भी उसके पीछे रहना ही होगा । आधार होगा तमो न सुधार होगा। वहूरानी को छोड कर मला कौन है इस विस्तार मे ? इसलिये दुर्गा मोहन ने उसे शुरू से ही बांध रखना चाहा पा ताकि अपने बनारसी सेवक-सहचर को लेकर अमि किसी दिन निकल मागे तो यहां कोई रितता पैदा न हो। हेडमास्टर के प्रस्ताव का अभिजीत ने पूरे मन से अनुमोदन किया था पहना उचित नहीं होगा। वह भी तो यही चाहता था । बहूरानी जैसे वनर्जी परिवार को समालती आ रही हैं, संभालें । वह तो आया है सिर्फ कुछ दिनों के निये, उन्होंने बुलाया, वह आ गया बस, अपने मन की यह वात एक दिन दुर्गा मोहन जी को वह बता चुका है। बल्कि उन्होंने ही कहा था कि-"उनका होकर भी तो सोचना होगा । विधवा वैवारी, जिसकी गोद भी नहीं मरी, वे भला क्यो जिन्दगी भर इस झमट मे किस लिये उलझी रहे ?" इसका कोई जवाब नहीं है । इसलिये अभिजीत को उस दिन चुप रह जाना पड़ा पा । आज उन्ही मास्टर जी का जब स्वर मिन मिला तो मन ही मन अचरज मे डूबे बिना नहीं रह सका, मगर समी शकाओ को अप्रत्याशित खुशियो ने ढंक दिया। 'महिला मैनेजर' के बारे मे महामाया का मनोमाव अनुकूल होगा इसमें अभिजीत को सदेह था, अचरज भी । महामाया ने बोर्ड मे रहना मंजूर नहीं किया । मास्टर साहब के अनुरोध के बावजूद भी। अमिजीत के उत्साह मे कुछ कमी आयी । उसने सोच लिया, इस काम मे बहूरानी का मन नहीं है सिर्फ वे देवर की इच्छा रख रही हैं। दुर्गा मोहन ने उसके उत्तरे चेहरे को देख कर समझ लिया । वोले, "कुछ सोचो नही । विधाता हमारे दाये है । अभी हारने पर भी अन्त मे जीत हमारी ही होगी।" फिर अमिजीत मी आंखो मे झांक कर बोले, "तुम्हे पता है ? 'उत्सुकता' का माव अपने सप्टिकर्ता ने योडा-बहुत हर किसी के मन मे दिया है । मतलब हम लोगो उनके लिये अधिक । सास कर अपने सबध मे बेरोक-टोक । एक स्त्री दूसरी स्त्री के सबध में तटस्थ रहेगी इसमे सोचने की क्या बात है । जव कि हम कैंडिडेट की पढाई- लिसाई काम-काज या घर के बारे मे जानकारी प्राप्त करेंगे, वहां वे उसके मन के भीतर बैठ जायेगी, इसका प्रमाण तो अमी ही मिल गया। सुना नही ? वह कुंवारी है या विवाहिता, कहाँ रहेगी-आदि मे अभी से ही सिर खपाने लगी हैं।" : को कम, हलधर जब निहार को बुलाकर मकान के भीतर ले गया, तब दुर्गा मोहन ने उत्तराधिकार यानी-" ममि भोर की देश पर अर्थपूर्ण हसी हराते हुए कहा, "देख लिया न ?" "नापते लिये।" "मोहो, यह नाश्ता ही तो राव गुछ होता है। इरा संबंध में पूरब-पश्चिम में कोई सारा पस नहीं है । यूरप अमेरिका में फूटनीतिक बातों के लिये लंच या डिनर टेबुल ही उपयुक्त स्थान है। आफिरा मतलब दपतर नहीं । इसी प्रकार अपने यहाँ है नाश्ता या गोजन । पवाये बिना रराना-ररा का भानन्द नहीं मिलता। खास कर नये मेहमानों के साथ । बहरानी यह जानती हैं। हग लोग पुराने होते हुए गी 'इतर जम' ठहरे, यह पहरो न पाहत बड़ी-सी थाली लिये हुए हलधर का प्रवेश हुआ। दुर्गा गोहन जी की इच्छा थी कि एक बार वे बहरानी से मिल लें। इसी बहाने ये उनका गनोगाव जान लें । पर उधर नाश्ता करते-कराते सांझ हो जायेगी इसलिये वे गले गये । छागि मो रागमा गये फि रांगव हो तो बहूरानी से वात घेट कर अन्दाज लगाये । यानी जरा कोक बजा ले । अगि भी पाम उत्सुना नहीं था । मगर अपनी तरफ से बात देने की नौबत नहीं आयी । राभि ने वाद घूम-फिर मर बहरानी उराके कमरे में गायीं और उन्होंने राबरो पहले यही पूछा, "कसी लगी ?" "यही तो में पूछने पाला था ।" बहरानी पल गर. पी सागोणी के बाद, औरो अपने आप से ही बोली, "लएकी मली है।" "लगी तो गली है, लेकिन मैनेजर गैसी होगी, यह सोच कर बतायो ।' "यह सब मेरे सोगने की बात नहीं है । मैंने सिर्फ लदगी को देखा।" "भरा ? तो इतनी देर तक तुम लोग पगा बातें करती रहीं ?" "बहुत सारी । यह तुम नहीं रागन रागोगे।" पाहिने हाथ की उंगलियां निराशापूर्वक पला फर अगिजीत उदारा स्वर में बोला, "तो फायदा गया था ! मैंने सोचा था तुम गुछ मदद फरोगी।" धहुरानी जरा मागे वन अमि की पीठ पर हाथ रख कर योली, "फरूगी मदद, जरूर गारगी । गेरी जहां जरूरत होगी यहाँ मैं खुद आगे माऊँगी । बताओ तुम्हें २.सी लगी ?" "हमलोगों गो तो गुल मिला कर अच्छी ही लगी।" "बरा, फिर गया है !" शार अब नही लगता । मगर दपार पाले कमरे में गिसी प्रकार मा रद्दोबदल उत्तराधिकार भी नहीं हुआ। एक तरफ है वही गद्दी, उस पर बडे-बडे गावाक्ये, गाढ़े लाल मखमल के कपर झीने मलमल का मोढाव । पहले रोज बदला जाता था, अब तीन-चार दिनों के बाद । पर झाड-पोछ रोज ही होती है । सांझ-सवेरे बत्ती जलती, धूप दिखाया जाता। मालिक का वह चांदी का गडगडा जस का तस रखा है, जहाँ का तहाँ । रोज पिसाई- मजाई से चकाचक । इसके लिये बहूरानी का आदेश है । खुद यहां वे नही आती, लेकिन हलघर से प्रायः पूछती रहती हैं--"सदर महल मे गया था ?" "यही तो, अभी ही सब साफ-वाफ करके भाया ।" सदर महल अब दफ्तर-कमरे को ही कहा जाता है । और तो सभी कमरे बन्द पडे हैं । सिर्फ फोने वाले धमरे में कई कर्मचारी बैठते हैं । इस बीच एक कमरा और खुल गया है, छोटे वावू के लिये, आधुनिक ढग से मेज कुसियो से सजा, जिसकी सफाई किशन करता है । हलघर पर अपर के सभी काम का जिम्मा है पर बहूरानी के खास हुक्म से उसे दफ्तर की ओर भी ध्यान रखना पडता । जैसे यही बनर्जी परिवार का प्रतीक है । यही उसका पुरातन रूप आज भी कायम है। जिसे कायम रखना ही होगा- बहूरानी के आदेश का अतनिहित अर्थ शायद यही है । उसके ठीक बगल वाले कमरे मे, जहाँ इन्द्रजीत बैठते थे, उसमे ताला जो बन्द हुमा सो बन्द ही है । बनर्जी परिवार के इतिहास में उसका भो महत्व कम नहीं है । मालिक के जीवित रहते हुए जमीदार के प्रशासन मे बहुत कुछ दखल उनकी इच्छा- अनिच्छा से वहां चला गया था। जिसका उपयोग भी मानिक की अपेक्षा नही रखता पा । पुराने जमाने के सभी यह जानते हैं । हलधर भी अजाना नहीं है । इन्द्रजीत जब जीवित थे, वह इस कमरे में आया है, बहुत कुछ देखा भी है । वह भी तो दफ्तर का ही कमरा है। बडे बाबू वहाँ बैठते थे, फिर भी कभी उसे खोला नही जाता, न झाडा- बुहारा जाता है । बहूरानो मी इस सबंध मे कुछ नहीं कहती । यह सब कुछ कमी-कमार उसे बडा अजब-सा लगता है। एक दिन उसके मन मे जाने क्या आया । बहूरानी से इस कमरे को धामी मांगने गया, बोला, "बडे बाबू के कमरे की चाभी भी दीजिये । बहुत दिनो से सफाई नहीं हुई है।" बहूरानी कही जा रही थी, ठमक गयी । उनके पूरे मुखडे पर जाने भयो शोक- सतप्त घाया पिर मायी । कई क्षरणोतक घिरी रही। फिर जाते हुए सहज स्वर में बोली, "ठीक है, बाद को कमी कर लेना । घामी कहो रखी हैं, ढूंढनी पडेगी।" हलधर ने समझा, कारण कुछ भी हो, बहुरानी टाल गयो । चाभी ढूंढना कोई समस्या नही हो सकती। हो भी तो उसका समाधान फौरन हो सकता था । सिर्फ वे .

१८ उत्तराधिकार हुक्म दे देती, फिर तो ढूंढना उसका काम था। उसके लिये बहूरानी को परेशान होना नहीं पड़ता। कारण वही है, जिसके लिये बहूरानी वड़े बाबू का कमरा खोलना नहीं चाहती, हलघर की छोटी बुद्धि से वह जानने की बात नहीं है । मगर इससे बड़ी मुद्धि वाले भी इस कारण से कभी अवगत नहीं हो सकेंगे। दूसरों की कौन कहे, वहूरानी खुद भी क्या अपने मन की बात जानती हैं ? यह क्या उनकी जिद है या शिकायत ? पति से मिले अवज्ञा-मिश्रित स्नेह को उन्होंने संवल मान कर अपनी पूरी तरुणाई इस विशाल अट्टालिका के मूने अन्तःपुर की शोभा बनी रहीं, उससे इसका क्या संबंध है ? या यह जवर्दस्ती बुलावा भेज कर बुलाई गयी अकाल मृत्यु की निर्मम स्मृति की निर्ममता को भूलने का व्यर्थ प्रयत्न है ? जो चोट वह दे गया है, उसे छिपाने की व्यर्थ चेष्टा ? और हो सकता है, यह एक तरह का विरोध भी हो। पति के इस दफ्तर वाले कमरे को बहूरानी स्वीकृति देना नहीं चाहतीं । उसमें जुड़ी है, उदडंता, उच्छृखलता, दम्म, पिता के प्रति उपेक्षा, उनकी आकांक्षा के विरुद्ध विद्रोह । वह सब अनाचार छिपा रहे, इस बन्द कमरे के अंधेरे में, मिट जाये अवहेलना, अस्वीकार और विस्मृति का अन्तराल । फिर कभी भी हलधर ने इस कमरे की चाभी उनसे नहीं मांगी, और न ही वहूरानी को ही उसे ढूंढ़ने की फुरसत मिली। और लंबे दिनों बाद यह स्थिति आयी कि हलघर को इसके लिये बहूरानी के पास जाना पड़ा। वह जरा घबराता हुआ बोला, "वहूजी, बड़े वाबू के दफ्तर वाले कमरे की चाभी कहां है ?" "क्यों ?" "छोटे वावू मांग रहे हैं।" इस 'क्यों' को ही बहूरानी दोहराने वाली थीं कि उनके मन में जाने क्या आया कि वे रुक गयीं । हलधर से ही यह पता चला कि नये मैनेजर का दफ्तर वहीं होगा। मेज-कुर्सियां और वहुत-सी चीजें आ गयीं हैं । गद्दी सनाने का हुक्म छोटे वावू ने दे दिया है। बहूरानी के मुखड़े पर आज कोई परिवर्तन नजर नहीं आया और नहीं उन्होंने कोई सवाल ही किया । चुपचाप उठी, अपने कमरे में गयीं और हलवर को चामी धमा दी। इसी सिलसिले में हलधर ने एक नयी वात बौर बतायी। वह यह कि उस कमरे में नहाने का भी कमरा वनेगा, एटेच वाय रूम, ऐसा ही कुछ किशन कह रहा था। छोटे बाबू ने काशी में जैसा वनवाया है । उसका सामन भी जल्दी ही याजायेगा। पहरानी ने यह सब सुना या नहीं, यह पता नहीं । वे वरामदे में रेलिंग पर हाय उत्तराधिकार EE घरे चुपचाप खडी रही । खास महल या कुछ हिस्सा वहां से नजर आता है । उघर ही वे देखती रही । हलधर चला गया । बहूरानी को भी बहुत काम था, नौकरानियां उनकी प्रतीक्षा मे होगी, यह जानते हुए भी वे हिली नहीं । आंखो मे क्यो तो उदासी घिर आयी थी । एक गहरी सांस उहोने ली, हो सकता है, अनजाने ही । फौरन ही वे सजग हो उठी । बहुत दूर-दूर से जो स्मृतियां टुकडे-टुकडे हो कर इकट्टी हो रही थी, उन्हें दूर हटा कर तपाक से नीचे उतर गयी। ऊपरी तौर पर बात कुछ वैसी नहीं लगी। एक कमरे मे कुछ अदल-बदल, नयी चीजो का रखना फिर भी उनके भीतर कही कोई खलबली मच गयी । इस मामूली परिवर्तन के भीतर सदा के लिये खो गया एक कोई, मिट गयी बहुत दिनो को ढेर सारी स्मृतियां । मैनेजर कहाँ बैठे, इस विषय मे कल ही तो अमितीन से वातें हुई हैं । बहूरानी का कहना था, बीच की कोठी के किसी एक कमरे मे । उन्हाने महा था, तो कमी-कभार में भी उसके दफ्तर मे साय-सग बैठ कर अड्डा जमा सकूँगी या वह जब फुर्सत मे होगी तब उसे भी हम अपने चौके-चूल्हे के दफ्तर मे घसीट लाऊंगी। अमिजीत को चिन्तित देख कर उन्होंने आगे कहा, "कोई दिक्कत है क्या ?" "मेरी तरफ से कुछ नहीं। मैनेजर अगर तुम्हारे अडर मे रखू तब तो मेरा पौवारा ही है । मगर-" मुस्कुरा कर बहूरानी के मुखडे पर नजर गडाकर वोला, "तुम्हारा यह शभूचरण एन्ड कम्पनी जब डेपुटेशन लेकर मायेगा या जुलूस -" "माफ करो भई, मैं बाज आयी ऐसे अड्डे से । तुम उसे अपने खास महल मे ही कही ले जाकर बैठाओ।" कही से बहूरानी का अभिप्राय इस कमरे से नही था, उस कमरे का अपना एक इतिहास है, अभिजीत ने यह भी नहीं सोचा । उघर नये मैनेजर की नियुक्ति की खबर डाल से पात-पात मे और रग मे रगोन होकर समयानुसार कॉलोनी में फेल ही नही गयी बल्कि चर्चा का विषय बन गयी । उसमे, स्वमावत व्यग का पुट अधिक था । कर्ज, सहायता मादि के लिये सरकारी दफ्तर मे कॉलोनी के लोगो का आना-जाना लगा ही रहता था। वहाँ पक्तिवद्ध कुर्सियो- भेजो मे से किसी एक पर महिला को बैठे देख कर पहले वे लोग चौक उठे थे । अव वे पोकते नहीं । पहले पहल आंखे-फार-फाड कर देखते कि मर्दो मे घिरी एक युवती सिर मुलाये फाउटन पेन से क्या सब लिख रही है मोटी-मोटी बहियो के पनो पर, मनोयोग पूर्वक । नजर ममी भी इधर-उपर उनी नही । सहकर्मी आपस मे हंसी-मजाक करते, १०० उत्तराधिकार चाय पीते, सिगरेट खोंचते और यह अकेली लड़की बिल्कुल गुमसुम । सिर्फ काम और काम। यह सव अव उन लोगों को आकर्षित नहीं करता। वे एक नजर डाल कर आगे बढ़ जाते हैं । पहले इस पर आपस में खूब फन्तियाँ कसी जाती थी । जवान लड़के इस काम करने वाली लड़की को हिरोइन मान कर मन ही मन रोमांटिक उपन्यास का मजा लेते थे । अव यह कोई 'वात' नहीं रही । अगर किसी ने आकर खवर दी कि खाद्य विभाग में दो लड़कियां और मा गयी हैं, तो कोई उत्साह नहीं दिखाता। यह भी कोई वात नहीं रही अव । लेकिन यहां की बात और है । प्राचीन काल के जमींदार; जिनके परिवार की नारी आज भी लोगों के सामने नहीं होती उन्हीं के दफ्तर में काम करने को रखी गयी है एक लड़की, वह भी बुढ़िया नहीं, युवती । निहार जिस दिन इंटरव्यू देने आयी थी, उसी दिन किसी-किसी की निगाह उस पर पड़ी थी। यह एक अचरज की बात थी- कान में मक्खी घुस जाये और फड़फड़ाये नहीं ! 'कौन है यह लड़की ?' यह सवाल मर्द- औरत, बूढ़े-बच्चे समी के शोध का विषय बन गया था-दाल में कुछ काला है ! वात कुछ है, वह वात क्या हो सकती है, इस बारे में मतभेद था । नौजवानों ने स्वाभाविक तौर पर यह सोच लिया था कि नये मालिक और नये मैनेजर में जरूर कुछ मामला है, जो नया नहीं है और वह भी सिर्फ नौकरी का माजरा ही नहीं है । बड़े और बूढ़ों में बातें होती; "इसमें कोई भेद जरूर है । यह 'छोटे बाबू' बाहर से जैसा भला दीखता है, वह अन्दर से वैसा नहीं है । कुछ भी कहो, आखिर है तो वह जमींदार का ही लड़का !- एक लड़की को मैनेजर बना कर हो सकता है कोई मतलब गांठना चाहते हों और नहीं तो क्या जो फट्टर नायब से नहीं सधा, वह"मतलव शुरू से ही सर्तक रहने की जरूरत है।" ye । शम्भूचरण के मन में यह शंका नहीं उत्पन्न हुई, यह बात नहीं । मगर जब दो बुजुर्गों ने उसे इस ओर इशारा किया तो उसने हंस कर टाल जाना चाहा- "माप लोग तो हर बात में संदेह करते हैं। उनकी इच्छा जिसे मैनेजर वनायें। इससे हमारा क्या ?" "नहीं बेटे", गर्दन डुलाते हुए बूढ़ों में से एक ने अपना मत गंभीरता से व्यक्त किया, "मेहरारू की जात फा विसुवास नहीं । वह सब कर सकती है । जमींदार युद जो नहीं कर सकता-जरा लाज हैं न इस मेहरारू से करा लेगा । उसकी आंख में शील जो नहीं है।" मन्भू ने ऐसी किसी संभावना पर ध्यान नहीं दिया। दूसरी बातें छेड़कर इस प्रसंग को हल्पा बना दिया, "मुनिये, यह चर्चा बड़की मां तक न पहुंचे । योंही-" उत्तराधिकार "काहे ? पहुँचे भी तो क्या होगा? बडकी-मो मेरा का कर लेंगी। जर-जमीन लुटा माये तो क्या अपने परिवार को वश में करन की ताकत मी हम खो बैठे ?" इसमें वह चतुर है यह उसके साथी ने भी मजूर किया । कहा, “यह तो तुम्हारे जाती दुश्मन भी कह सकते हैं । कॉलोनी के सभी लोग यह जानते हैं, मानते हैं। क्यो शमू?" "यह सब छोडो। घर-परिवार को जलन समी को है । इससे क्या मतलब ? यह मैनेजर छोकरिया के आने से हम लोगो का क्या केसा हाल होगा यह भी सोचो। तुम जाओगे वहां क्या?" "कहाँ ?" "उसी छोकरी के पास ।" "किसलिये ? हम लोगो को जो करना होगा, यह सीधा मालिक से करेगे । वहाँ एक बार जाया जा सकता है।" बूढे इससे सहमत हुए। इतने दिनो से ये बनर्जी परिवार की परती जमीन में घर बनाकर रह रहे हैं । पर कानूनन उनका कोई अधिकार नहीं है। वे जबर्दस्ती दखलदार हैं । यह ये भी जानते हैं और मालिक पक्ष भी बराबर यही महसूस करता रहा है। इनके विरुद्ध अनधिकार दखल का मामला दायर हो चुका है । इन लोगो ने अपने पक्ष मे समर्थन पाने की चेष्टा नही की । शावद कचहरी के आदेश पर ही पुलिस इन्हें उजाडने के लिए मायी। लोगो में सरगर्मी आयो । पर गडबडी नही मची । मचने नही दी नेताओ ने । खासफर शभू- चरण ने । पुलिस को साफ-साफ कह दिया गया-वे नही हटेगे, नही उठगे। घर-द्वार तोड-उजाड दो, चीजे नाश कर दो, फिर भी वे यह जगह नहीं छोडेगे। पुलिस आगे नही बढी । लौट गयी। शायद यही सरकारी नीति रहा हो, जब कि बल-प्रयोग की घटना उस दिन कम नहीं घटी। यहां जो मालिक पक्ष के लोग हैं वे भी दगा-हगामा नही चाहते । नायब चाहते थे कानून की सहायता से अनधिकार दखल के विरुद्ध अपना अधिकार लेना। जमीन का उद्धार करना । बहूरानी की भी मशा यही थी। इसके बाद से फिर इन्हें उठाने या हटाने की कोशिश नहीं हुई। ये मौज से रह रहे हैं । इसका मतलब यह भी नहीं है कि मालिक पक्ष ने इस दखल को मान लिया है । लेकिन कोई अघटन नही घटा, मगर कोई सद्भाव भी नहीं बढा। दोनो तरफ गुस्सा जमा होता रहा है, जमती रही दुर्घटनाएं, अविश्वास भीतर ही भीतर शीत-युद्ध जारी है। कालोनी के बाशिन्दे इस विषय मे निश्चित है कि उनके हटने की कोई गुजायश नही है, जबरदस्ती दखल होने पर भी स्थायी दखल है। पर इससे ये खुश नही थे। वे चाहते थे अधिकार । जो जमीन उनके कब्जे मे आ गयी है, उस पर वे मलिकाना अधिकार उत्तराधिकार चाहते हैं । यहां हम रह रहे हैं, कोई हमें हटायेगा नहीं, यही पर्याप्त नहीं है, जब तक हमारा हक मन्जूर नहीं होता, न निश्चित होंगे, न हो सकते हैं । विपद मुक्त रहकर भी इसलिये कालोनी का आज मन चिन्तामुक्त नहीं है। छोटे-बड़े सभी किसी एक सम- झौते के लिए इच्छुक हैं । वह ढुलमुल हालत और कितने दिन चलेगी? कॉलोनी में मास्टर साहब नाम के बूढ़े व्यक्ति को वहां के निवासी जानते नहीं थे ऐसी बात नहीं । मगर उनके बारे में वे उतनी दिलचस्पी नहीं रखते थे। वस शम्भू से उनकी मामूली सी जान पहचान थी। जमींदार परिवार से उनका कोई संपर्क है, इतना वे नहीं जानते थे । यों ऐसा संपर्क था भी नहीं। यह तो अभिजीत के आने से ही हुआ। मास्टर के घर अभिजीत का आना-जाना उनकी आँख-ओट नहीं था । सड़क तो गंगा किनारे से ही निकली थी और वहीं अभागे कालोनी के लोगों का जमाव होता। शंभूचरण ने भी देखा था पर इसे इतना महत्व नहीं दिया। अमि कभी उन्हीं के स्कूल में पड़ा भी था, और जब यहाँ आया तो अपने पुराने गुरु से मिलना-जुलना व्यावहारिक सौजन्यता के सिवा और क्या हो सकता है। दूसरों के विषय में खोज खबर रखना, गाँव जवार का सदा से उत्कट अभिप्राय रहा है और कालोनी के लोगों का और भी अधिक । कर्तव्य के नाम पर यहां कुछ नहीं होगा । जव कि अवसर खूब है । अड़ोस-पड़ोस के चूल्हे के अतिरिक्त यहां और कौन सी चिन्ता है। अतः दुर्गामोहन तथा अमिजीत का सम्पर्क सिर्फ गुरू-शिष्य का ही नहीं है, कुछ और भी है, इस सच्चाई को समझने में लोगों को देर नहीं लगी । ऊपर से गंभूचरण का यह सन्देह धीरे-धीरे दृढ़ होता गया कि अब जमींदार पक्ष की पॉलिसी निर्धारण का असली स्थान है रिटायर्ड हेडमास्टर का वैठका । इस विषय में स्थिर मत होकर ही उसने पिछले दिनों हेडमास्टर की शरण ली थी। उन्होंने भी उसे टाला नहीं था, अपने भरसक उसे सहायता का आश्वासन दिया और साथ ही उन्होंने शंभूचरण को सलाह भी दी थी, "अभि से मिल कर साफ-साफ वातें करिये।" उनके बीच जब वह चर्चा चल रही थी कि उनसे मिलने कौन-कौन जायेगा, पया मांगे होगी, फैसे प्रश्न को उपस्थित किया जायेगा--तनी इस नये मैनेजर की खबर फैली थी। कॉलोनी में एक नयी सजगता आ गयी । असली उद्देश्य से भटक कर उनका ध्यान उस बोर केन्द्रित हो गया था। शम्भूनगण ने अफवाहों को दब जाने के लिये कुछ वक्त गुजरने दिया और फिर यह तय किया कि पहले वह अभिजीत से अकेले ही मिलेगा। अभिजीत अपने माफिस में ही था। बाहर से आवाज आई कि फोरन कहा, "आपये, बन्दर आ जाय।" ।

उत्तराधिकार शम्भू ने भीतर प्रवेश करते ही देखा, मेज की बगल मे एक युवती बैठी है । अभिजीत मुस्कराता हुआ बोला, "आप लोगो का परिचय करा दें। ये हैं अपने निहार चटर्जी, अपने स्टेट की मैनेजर । और ये हैं, श्री शम्भूचरण--" अमिजीत के अचानक रुकते ही शम्भू ने कहा, "सरकार।" अभिजीत जरा झेपा, वोला, "उस दिन आपके नाम के साथ जो जुड़ा है वह सुना तो जरुर या लेकिन हठात् याद नही आया । अभी-अभी आपकी ही चर्चा चल रही थी।" अन्तिम बातें निहार के अभिप्राय से कही गयी थी। परिचय होने के साथ-साथ निहार ने मुस्कराकर शभूचरण को नमस्कार किया। शभूचरण अचानक इस सम्मान से उभत्रुम मे पड़ा रहकर जैसे-तैसे दोनो हाथ जोडकर मस्तक तक ले गया। भीतर ही भीतर वह घबराया सा लगा। वह अभिजीत से मिलने आया था यो मैनेजर से मिलने की भी लालसा यो । इधर कई दिनो से पूरी कालोनी मे इनकी गरमा-गरम चर्चा थी। पर अवानक भेंट होगी और कि एक भली लडकी उसे इस तरह नमस्कार करेगी, इसकी आशा उसे नहीं थी। जान-पहचान तो होनी ही थी और उनकी गरज से ही, यह तो वह जानता ही था, पर इस तरह सामना होगा इसके लिए उधका मन तैयार नही था। वह तो निहार के बारे में सोंचे धैठा था कि वह लडकी होगी मालिक की चापलूसी मे तल्लीन, कॉलोनी के लोगो के प्रति उपक्षा का भाव रखने वाली । रिलीफ दफ्तर और दूसरी जगहो मे जैसा वह देखता आया है। एक तरह का आरोपित दुराव का व्यवहार । मर्द कर्मचारी तो मुंह बिगाड कर बात भी कर लेते, कमी सहानुभूति भी दरसाते । सही बातो मे ही सरकारी सीमा का उल्लघन कर लेते, मगर औरतें, वाप रे बाप । अपने चेहरे पर आरोपित गमीरता लपेटे गुमसुम बैठी रहती बातें वे भी करती मगर सरकारी इच और बटसरे से नाप जोख कर । निहार लेकिन मिन्न नजर आयी, मुलाकात मो जरा सी देर के लिए। फिर भी इस जवान लड़की का साफ-सहज मन छिपा नही रहा । हाव-भाव मे, मुस्कराहट मे, नमस्ते करन के ढङ्ग मे,विनम्र भाव का प्रमाव शभू के मन पर पडे बिना नही रहा। कुछ अपनत्व का भाव भी उसे मिला । वह जैसे मेहमान हो, मित्र हो । और जब कि देखा जाय तो कालोनी और यहां के लोग दुश्मन बदतर थे। वह जब भी सदर नायब से मिलने आया है, वे इसे हीन दृष्टि से देखते रहे हैं । उनका चेहरा तमतमा उठता। गरज कर 'निकल जाओ' तो कहते नही थे। पर दोनो आंखे आग उगलने लगती। वह भी तनकर सा रहता । दोनो तरफ का सपर्क साफ और सीधा था। इसलिये शभू अपनी ओर से कमी द्विविधा और सकोच म नही पड़ता। आज मगर शभूचरण एक अप्रत्याशित स्थिति में पड़ गया और यह सुनकर तो वह चारो खाने चित्त हो गया । "अभी-अभी आपकी ही चर्चा हो रही थी।" पता उत्तराधिकार १०४ नहीं अभिजीत वाबू ने क्या कहा होगा । चाहे जो कहा होगा पर उसके मन पर कैसा प्रमाव पड़ा होगा। इनकी आपसी वात-चीत में उसका रहना उचित है या अनुचित, जब तक शंभू यह तय करे कि अमिजीत बोला, "खड़े क्यों हैं ? वैठिये न ।" उनकी मेज के दाहिनी ओर निहार बैठी थी। उन्होंने बायीं ओर की खाली कुर्सी की ओर मैनेजर के सामने इशारा किया । शंभू ने सोचा, बोला, "मैं कभी और आ जाजाऊंगा।" मगर घबराहट में वह अपने विचार को शब्द नहीं दे सका । भैप से भरा आगे बढ़ा और कुर्सी खींचकर बैठ गया। वैठने को तो वह बैठ गया, मगर उसके मन की ग्लानि बनी ही रही । आज के पहले इस कमरे में वह आया जो नहीं था। अभिजीत से मिलने अकेले भी वह पहली बार ही आया था । नायव या और अमलों से वह जब-तब मिलता। जो कचहरी है उस कमरे में उन लोगों ने कभी भी उसे या उसके साथियों को वैठने को कहा हो उसे याद नहीं । वहाँ बैठने के लिये पड़ी रहती थी दरी और उसके सामने दीवाल से सटी फई कुर्सियां । शंभू को बिना कहे ही जवरदस्ती बैठना पड़ता था। यह मानकर कि यह सरकार के चाकरों को सोहाता नहीं, उन्होंने इसके लिये कभी कुछ कहा नहीं। आज नायव या गुमास्ते बीच में नहीं थे । खुद इस स्टेट के मालिक ने अपनी वगल की कुर्सी की ओर इशारा कर आग्रह से कहा, 'वैठिये', इतना परिवर्तन ! वह कुछ सोच नहीं पाया । बैठने के वाद मन की गांठ कुछ ढीली जरूर हुई। चुप्पी अभि- जीत ने ही तोड़ी, "सुनाइये क्या हाल है।" "हम लोगों का हाल और क्या हो सकता है भला ! आप से मिलने चला माया।" "अच्छा ही किया। अपनी इस कॉलोनी के विषय में ही हम लोग वातें कर रहे थे । आप मौके से आ गये । अच्छा यह बता दूं कि इसके बाद आप लोगों को जो भी कहना-गुनना हो, करना-घरना हो, उसके लिये मेरी जरूरत नहीं । सब कुछ इन्हें ही समने-समझायें।" पलकों के इशारे से उन्होंने निहार को संबोधित किया। उनके इशारे पर शंभू ने भी निहार को ओर देखा। निहार विना पलक उठाये ओठों में ही मुस्कराई । यों लगा, इसका कोई मतलब नहीं है, सिर्फ मालिक की मर्जी है । सभी मालिक अपने कर्म- पारियों को इसी प्रकार सम्मान देते हैं। इसका मतलब यह कदापि नहीं कि उन्होंने अपना सारा हक उसे दे दिया हो। अमिजीत ने कहा, "ये लेकिन आपने इलाके की ही हैं ? वातों से पता नहीं उत्तराधिकार पत्तता मगर आप लोगों के संग ये गांव-जवार को बोली में ही बोलेंगी। क्यो मिस पटर्जी ? आपका गांव वहाँ या?" हंसकर निहार से पूछा । उत्तर मे निहार के मोठो पर हंसी नहीं निखरी। निहार ने बनावटी हंसी हंसकर कहा, "नोआखाली।" "आपका पर भी क्या वही था?" अब अभिजीत शभू की ओर मुडे । "जी नही, मेरा देश था फरीदपुर । मगर नोआखाली के कुछ लोग अपने साथ हैं।" यह सुनने ही निहार चौंक उठी, पलकें उमरी और फौरन नम गयी। दोनों में से किसी ने नही देखा । अभिजीत ने कहा, " खैर, मैं यो उपर का कुछ नहीं जानता, उघर का ही धयो, इधर के विषय मे भी मेरी जानकारी बहुत कम है । बचपन से ही बाहर रहना पड़ा । मिस चटर्जी को पद्मा नदी के इस ओर उस पार को यानी बगला देश की पूरी जानकारी है । यह दोनो के लिये अच्छा है।" निहार और शभू दोनो चुप । अभिजीत कई पल उत्तर की प्रतिक्षा में बैठे रहे फिर शभू से बोले, "तो आप बोग बाते शुरु करिये। यहां भी अपनी बातें आप कर सकते है । अब मैं चलूंगा, या मिस चटर्जी अच्छा हो आप इन्हें अपने कमरे में ही--" बीच में ही शन बोला, "आज छोहिये, फिर किसी दिन मा जाउंगा।" और वह उठ खडा हुआ तया नमस्कार करने के लिये दोनो हाथ उठाते हुए बाहर निकल गया। बाहर आया तो उसे महसूस हुआ कि एक कठिन परीक्षा से मुक्ति मिती । एक लडको से अकेले मे वातें करने का साहस अमी उसे नही है । अपने आपको सतोप देने के लिये उसने सोचा-यह कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि इसके लिये वह पहले से वैयार होकर नही आया था। आज तो सिर्फ उसे जानना था, नयी स्थितियो के बारे मे। इधर की ह्या क्या है ? परन्तु अभिजीत यदि अकेला होता तो बिना कुछ यात किये 'माज छोडिये' कहार वह चला न आता। यह वात मन में उठी कि उसे फौरन दवा दिया, लेकिन वह वात खटकती रही। उसके लिये यह एक तरह से हार यी। उस लड़की न यह जरूर सोच लिया होगा कि यह भगोडा है, हो सकता है कि वह मन ही मन हंस भी रही होगी। सब पर चलने एप यह तन कर खड़ा हो गया, जैसे निहार उसके सामने खड़ी हो । कमजोरी, कमजोरी काम नहीं चलेगा। यह वराबर याद रखना पडेगा कि मैं उनका दुश्मन हूँ और उसकी एकमात्र भूमिका हाती है लडाई के लिये अपने को प्रस्तुत रखना । इतने सारे लोगो की जिन्दगी का सवाल है। जिनका पहला काम है इस कॉलोनी पर कब्जा करना । किसी लड़की को मैंनेजर बनाना इसमे मालिक की चाल भी हो सकती है। होगी ही। कॉलोनी के कुछ लोगो की धारणा ऐसी ही है-- इसे मी बदलनी होगी।

उत्तराधिकार इस क्षण शंभू का मन शंकालु हो उठा । अभिजीत सब कुछ इस मैनेजर के ऊपर छोड़कर खुद अलग क्यों हटना चाहता है ? शायद उसने सोचा हो कि एक लड़की के यागे हम लोगों की दाल नहीं गलेगी। मधुर मुस्कान और मीठी बातों से वे अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेंगे। यह हम नहीं होने देंगे। अभिजीत वावू की यह बात भी शंभू को जंची नहीं । यही कहना कि यह मैनेजर पूर्व वंग की है यानी अपने देश की है और तव इनकी सहानुभूति मिलेगी ही। इस देश. में यहाँ अपना सब कुछ खोकर शरणार्थी होकर आने के वाद से शंभू ने कुछ और ही अनुभव किया है । कितना पापड़ वेलना पड़ा, कितने और कैसे लोगों का दरवाजा खट- खटाना नहीं पड़ा। उनमें से सबसे अधिक निराश किया था उन्होंने ही जो उसके देश के कमी थे, उस पार वेहाल, मतलव तूफान के उठने के पहले ही जिन्हें सीमा पार करने का अवसर मिला था । उनका वहाँ जो कुछ था, विक गया या इस पार के लोगों से अदल-बदल लिया गया था और जो घर-द्वार रोजी-रोजगार वाले वन वैठे थे उन्हें फायदा न सही नुकसान भी क्या हुआ ? इस दर्जे में आते हैं सरकारी अफसर । उनसे पूछा गया था, "कहाँ का इरादा है।" 'पी' या 'आई' ? पाकिस्तान या इन्डिया ? हिन्दू अफसरों ने लिखा था 'आई', और इसी तरह मुसलमानों ने लिखा था 'पी' । दोनों दलों का सितारा चमक उठा। 'आई' वाले जब यहाँ आये तो देखा कि एक बड़ा दल 'पी' वाले यहाँ से जा चुके हैं । और चले गये हैं अंग्रेज, पेंशन की मोटी रकम लेकर बहुत से ओहदे और कुसियां खाली पड़ी हैं । यही तो उन्हें चाहिये । और चटपट प्रमोशन, पदोन्नति, जो नीचे लटके थे और ऊपर चढ़ आये । ऐसे सभी जो रिटायर्ड होने वाले थे वे भी ऊपर और ऊपर उछल भाये। ठीक यही हाल है उस पार के सरकारी ओहदे दारों का । बटवारे से लाखों लाख बेघर-वार के लोगों को जन्म मिला है, ऐसा कहने वाले दीया के तले का अंधेरा ही देखने वाले हैं । वे यह नहीं जानते कि दीया के ऊपर उजाला होता है, जिसमें चमकते हैं ये, ये बंटवारे के सूत्रधार, यानी दोनों देशों की राजनीती के बड़े-बड़े खिलाड़ी और वे जिन्हें कहा जाता है ब्यूरोक्र । इस दल को नेतामों ने कभी अच्छी निगाह से नहीं देखा । फिर भी दरारों में घुस कर ऐसे लोग भी जम गये । शम्भूचरण की भांति जो लोग मिट्टी की भूठी ममता में या समय से अवसर न मिलने की वजह से, अपनी माटी का मोह नहीं त्याग सके और अपने इस मूल के कारण सहसा विना पंख के पंछी की तरह भटकते हुए लदखा कर जगह-जगह आ गिरे वे स्वभावतः बाशा लगाये बैठे रहे कि उनसे आगे जो आयें, वे सभी किस्मतवर लोग जो यहां सहेज संभाल कर बैठे हैं, वे देश के लोगों को कम से कम नजर उठा कर देखेंगे ही। मगर कुछ दिनों भटकने के 4 ।

उत्तराधिकार १०७ बाद यह पता चला कि उनकी दशा रेल के यात्रियो जैसा है-क्तिी तह पहले घुस कर डबा दखल कर तो या घसा देकर डन्त्र में घुस आओ, फिर कोई बात नहीं । गमा की तरफ से कॉलोनी में धुतने के मुहाने पर सपरेल छाया, चटाई से घिरा एक छोटा-सा घर है । उस घर में एक तरफ सारी का टेबुल, एक कुर्मी, सालटेन और दूसरी तीनो तरफ की दीवात से सटी बंचें पड़ी हैं । यह सब कुछ यहां के मिस्त्रियों के हायों का बनाया हुआ है । यह है कालोनी का पचायन घर । भूचरण ही प्राय: रोत यहां वैग मिलता है। टेवुल डायर में उसने कागज-पत्र रखे रहते हैं। कभी-कभी यहाँ मिटिंग होती है । वह भी तब, जब वही दुनाये । इसके अलावा पाडा के लडकी का यही सास यहा है, खास कर बद गन्मूचरए यहां नहीं होता। जमीदार की चहरी से शानू ने लौट कर देखा कि वेंच मरी है । वूडो को सस्था ही अधिक है । इनमें कई छोकरे भी हैं । छोकरो का एक बडा दल बाहर भी मंडरा रहा है । हमेशा से जब ये आपस में वात-विचार करते हैं तो लगता है ये भगड रहे हैं । इनकी नावाज स्वनावतः ही सप्तम पर चढ़ी हुई होती है, जैसे बिना जोर से दोले ये अपनी बात यह नहीं सक्ने । विपय जैसा भी क्यों न हो, वहस इस तरह करेंगे बैठे गले का कमीटशन कर रहे हो। बाज भी बातें कुछ इसी तरह हो रही थी, मगर झगडे के दायरे में नहीं पहुंची यो । शन के आते ही सनी चुप हो गये । उसकी बोर उन्नु दृष्टि से देखने लगे। नुप्पी वोडे हैं बडङ्क ददा । वे बोले, "को मई, नट हुई ?" शन ने गर्दन हिला कर बताया, "हाँ ।" "क्या स्थाल है ? कुछ कहा मुना-।" "जो कुछ होना है मैनेजर के जरिये । वह वही थी।" "जायेगी क्हा-।' उनके पोपले मुंह से फटे देल्न से मै हवा निकलती है, मक से, वैसे ही हंसो ति स निकनी, और चेहरे पर भी विदप का नाव मलका । कोई बोन उठा," दखने में देती है ?" पूछने वाले के ही नहीं दबि बोरी की शान पर यह सबाल शमू को मलका मानो उनके शि और समस्या से अधिक महत्वपूर्ण यह ही है । शमू ने कोई जवाद नहीं दिया। चारो तरफ जाने दोडा कर बोला, "वद वीदार की इच्छा है तो हमलोगों को मैनेजर से ही वास्ना रखने में उय का है, वह उनसे कब मिना जाये आज हम यह तय कर लें। मांगों के बारे में तो एक तरह से हम लोगों ने तय कर ही लिया है । उसको फेहरिस्त भी वनो हुई है। वही उनके रख सामने मर देगे।" आज यहां पचायत के सभी सदस्य इकट्टे ये ! शमू के कहने पर जब रिवी ने कहा, किसी के कुछ कहने की प्रतीक्षा करके तव वह पुनः वोला, "अव यह - प लोग ही करें कि मांगों को लेकर उनसे कौन या कौन-कौन मिले।" इसके पहले नायव के जमाने में जब भी 'दरवार' की नौबत आयी है, सभी एक हो शंभू को प्रतिनिधि मान लेते थे, सभी एक साथ कह उठते-मइया तुम्हीं संभालो, रे बस का नहीं है । आज लेकिन नजारा कुछ और ही था । सभी एक-दूसरे का मुंह हारने लगे। उनमें से एक ने हँस कर वनमाली से पूछा, "क्यों भई, जाओ-" वनमाली अनिच्छा से बोला, "जब सभी की यही मर्जी है ! और जव शंभू भी वाहते हैं, तो उन क्या है।" एक और का सिर हिला । घर के बाहर छोकरे आपस में सिर फुटौवल कर रहे थे। उनमें से एक आगे बढ़ कर वोला,"रामू भइया, हम लोगों को भी कुछ कहना है ।" "कहो।" "अपने क्लव के कुछ मेम्बर भी डेपुटेशन में शामिल किये जायें।" "क्लव, पर क्लब तो हम लोगों की निजी संस्था है। उससे जमींदार का क्या लेना-देना ?" "है कैसे नहीं; खेलकूद, पुस्तकालय, सांस्कृतिक कार्यक्रम सब की नजर बचा कर एक क्षीण हँसी शंभू के होंठों पर व्याप गयी। - निहार को काम संभाले लगभग एक माह हो गया । इस वीच वहूरानी से की मुलाकात सिर्फ एक बार ही हुई। हलधर से उन्होंने बुलवाया था । निहार ने ज चाहा था कि कब मिले ? इस बारे में हलधर को कोई आदेश नहीं था। पर वह नौकरों में अलग अपनी हस्ती मानता रहा है इस परिवार का पुराना और नोकर जो ठहरा। इसी गर्व में उसका इतनी मामूली सी बात के लिये अन् दौड़ कर जाना, कोई मानी नही रखता । उसने आवाज में वजन भर कर अप ही कह दिया, "यहां का काम खतम करके चली जाइयेगा।" इतना कहने के अपनी काफी अक्ल खटानी पड़ी थी, यानी यह सुद ही सोच लेना पड़ा था। ठहरी, कोई ऐरू गेरू तो नहीं जो बुलाइट हुई और दौड़ पड़े । निहार ऐसा कोई काम नहीं कर रही थी। वह जाने को तो उ सकती थी, पर गयी एक घंटे वाद, जब घर लौट रही थी, तब एक नौकरा उत्तराधिकार १०६ । वहां तैनात थी। उसे वह बहूरानी की बैठक मे पहुँचा गयो । इसके थोड़ी देर बाद ही बहूरानो वहाँ मायीं । बोली, "तुम तो मिलती ही नही । काम बहुत रहता है पया ?" निहार हंस कर बोली, "नही काम तो ऐसा कुछ विशेष नहीं रहता।" "तो फिर।" इस सवाल का जवाब हंसी मे छिप गया। 'तुम' पर बहूरानी पहली मुलाकात मे ही उतर आयी थी, साफ-साफ कह दिया था-'सुन लो मई, आप-चाप मुझसे नहीं होगा।' निहार इससे खुश हुई थी। उसने कहा था, "जरूरत क्या है।" बस इतने ही हेल मेल के लिए जितना बहूरानी ने सोच रखा था। निहार लेकिन उतना भी आगे बढ़ने में हिचक रही थी, क्यो कि वह कुछ बचा कर चलना चाहती थी। फर्क तो रहेगा ही, नयी जो है । यो वे उसे जिस दृष्टि से भी देखे, मगर उसका दर्जा तो एक कर्मचारी का ही है । दोनो के सबधो मे दूरी का होना अनिवार्य था । यह सोचना ही गलत होगा कि इतनी जल्दी आत्मीयता होगी । बहूरानी की ओर से भी यह प्रयत्न नहीं हुआ था। पर वे माने बैठी थी कि वह कुछ आगे बढे गी, हजार हो, एक लडकी हो ठहरी । यह सोच कर ही उन्होंने उसे अपने पास बुलाया, निहार को, मैनेजर को नहीं । असल में एक सभ्रात कुल की लडकी को 'नौकर' के रूप मे देखने की भावना बहूरानी की आज भी नहीं है, यो उनके विषय मे सोचने को कुछ भी सोचा जा सकता है। और जो कुछ भी सोचा जा सकता है और जो कुछ प्रत्यक्ष है, वही सत्य नहीं है। दृष्टि का साक्ष्य मन कभी नही मी मानता है। बहूरानी दोषी नहीं हैं । वे थी अति प्राचीन सस्कारो के सरक्षक जमीदार घराने की विधवा पतोहू । आधुनिक सामाज मे सांस लेती एक कामकाजी लडको को मात्र नौकर मान लेना उनके मन मे खटका भी हो पर ऐसो को पारिवारिक माने बिना काम नही चलता । स्कूल कालेज में पढ़ाने वाली शिक्षिकाओ और इसमे फर्क है । मगर शिक्षिकाएं छात्राओ के लिए अलका बहन, वरुणा बहन होती हैं, मगर स्कूलो मे शिक्षक भाई नही 'सर' हो जाते हैं। इसी तरह कालेज मे नामो को सक्षिप्त करने के चक्कर मे जिसमे से आत्मीयता ही खो जाती है । हेडमिस्ट्रेस को 'बड़ी बहनजी' कहने को ही रोति है। वे भी सभवत, खुश होती हैं लेकिन हेडमास्टर को 'बडे भाई साहब' कहने से रिश्ते में कितनी गडबडी पैदा हो जायेगी। किसी महिला छात्रावास की सर- क्षिका ओट मे छात्राओ से जितनी भी हंसी मजाक करे भगर प्रत्यक्ष मे वह 'मौसीजी' ही होती हैं । इस ओहदे पर अगर पुरुष हो और वे जितना भी छात्रो को स्नेह दे उनके प्रति उदार हो, पर 'मौसाजी' नही कहला सकते । इधर-उधर की कुछ बातो के बाद निहार से बहूरानी ने जब उसके भाई-भावज , ११० उत्तराधिकार पूछने पर पहले दिन ही जो स्थिति उत्पन्न हुई थी, उससे उनके विषय में कुछ और पूछ ने की इच्छा होते हुए भी उन्हों ने नहीं पूछा । इस छोटी उम्र में ही मां-बाप दोनों को लड़की खो बैठी !- इससे महामाया का कोमल मन स्वभावतः उसके प्रति अनजाने ही द्रवित था । और इस प्रसंग को जव निहार टाल जाती है तो फिर जानने को है ही क्या! बहूरानी ने भी सोचा कि निश्चय ही उन दोनों के मृत्यु-प्रसंग में से किसी एक की भी स्मृति असह्य हो सकती है । जिस वजह से उसे वह भूली रहना चाहती हो, इसलिये आज उनकी चर्चा उन्होंने नहीं की। एक खास बात के लिये उन्होंने बुलाया था। जब निहार की नियुक्ति का निर्णय नहीं हुआ था, तभी वहूरानी सोच चुकी थीं कि उसके रहने की व्यवस्था उन्हें करनी होगी । यह एक लड़की जो हैं । यही वात सव से पहले उनके मन में उठी कि कलकत्ते से रोज अकेले इतनी दूर जाने-आने में कितना मुश्किल हैं और यहां कहीं आस-पास जगह पाना संभव नहीं और फिर जवकि उनका अपना ही इतना बड़ा मकान खाली पड़ा है जगह की कमी नहीं । खास महल में असुविधा हो सकती है, वीच वाले मकान में तीन कमरा दे दिया जाये तो मजे में वह रह सकती है । रसोई आदि की व्यवस्था भी हो सकती है । नौकर-नौकरानी अपने साथ ले आये तो ठीक वर्ना वे ही जुगाड़ कर देंगी। इच्या हो, संगव हो तो उसके अपने लोग भी यहां साथ रह सकते हैं, कुछ दिनों के लिये या हमेशा भी। केवल निहार की सुविधाओं को ही बहूरानी ने नहीं सोचा, इस में उनका अपना सुख-स्वार्थ भी निहित है। इस विराट-जनहीन मकान में अकेले रहना एक दिन-दो दिन नहीं वरसों-बरस, कभी-कभी असहय हो उठता । मन थकान और ऊब से टूट-टूट जाता । इस परिवेश में ही वे जनमती या बचपन से बड़ी होती तो यह सन्नाटा इतना न काटता बल्कि स्वभाव में सहज ही हो जाता । दर असल शुरू से इस सन्नाटे से उनका परिचय नहीं हुआ। वे जिस दिन इस बनर्जी परिवार में आयीं थीं उस दिन चारो तरफ गुलजार था । विवश, बेचारी । हर तरफ भीड़, तरह-तरह के लोगों का जमाव । जाने-अनजाने, आत्मीय-आश्रित, दास-दासियां, पाइक-बरकन्दज, चाकर-अमलदार । कितना शोर-गुल फाम-धाम, मानन्द-उत्सव, मौज-मस्ती। कितना त्याग, दुःख, पाप, अनाचार--सव - कुछ था। - कई वरसों में ही यह सव कुछ विला-सा गया ! पतन की शुरूआत होती है- मभिजीत को जिस दिन यहां से हटाया गया काशी । इसके बाद से ही तो, परिवार, घर- द्वार सब कुछ जैसे बैजान होने लगा। हाल (महफ़िल) जहां संगीत समारोह, जश्न और जलसे होते ही रहते थे, दरवाजे पर, अगल-बगल के कमरों में ताला लग गया । नीचे के कचहरी-घर में भी 'उसे बुलाओ, उसे पकड़ कर लाओ', 'यह क्यों नहीं हुआ', कहा-सुनी, दौड़-धूप, सभी कुछ धीरे-धीरे थम हो गया । बीच वाले महल के भीतर हर प्रकार की उत्तराधिकार , एक गहरी उदासी-घर बनाती गयी। नौकर-नौकरानियो का तू तू-मैं मैं, इतने बडे जमी- दार घराने की जो शोमा थी वह भी खत्म हो गयी। इसके बाद मौत का सिलसिला शुरू हुआ । एक-एक कर कुछ ही दिनो में सब चले गये--मालिक, मालिकन, परिवार का बडा लडका । तव इतने लोग-जन बेकार लगने लगे । दो-दो चार-चार कर बहुतो की छंटाई शुरू हुई । इतनो विशाल अट्टालिका को सन्नाटे ने ग्रस लिया। हर ओर सन्नाटे की भयावह गूंज गूंजने लगी। बहूरानी इसी मे सांस लेती रही और इस असमव को विचारती रही-यह क्या हुआ ! वे दिन कहाँ गये। शुरू-शुरू मे तो सब कुछ एक भारी चट्टान-सा लगता रहा । जो करता, 'कही माग जायें, जिधर जगह मिले उधर ही ।' मगर कोई चारा नहीं था । सब के छोड़ कर चले जाने, मर-विला जाने के बाद जो जिन्दा रहा उसका वन्धन बहुत भयानक होता है । सास कर जब कोई और नही, अकेली वे ही है, चारो तरफ से यह वधन उसे नहीं तो और किसे जकडे था। अभिजीत जो अब भाया तो बहूरानी ने राहत की सांस ली। सोचा, इतने दिनी का अकेलापन अब दूर हुआ । अमि केवल उसका देवर ही नही, मन का मनबसिया मी है । जिस दिन वे प्रथम लाल-बहूटी बन कर यहाँ आयो, गरीब किसान के घर का दायरा लांघ कर इस हरे-मरे जमीदार घराने की विराट अट्टालिका मे, उस दिन उन्हे ऐसा लगा जैसे उनकी दिशाएं मरमा गयो हैं, वे खो गयी हैं । उस समय जिसके मिलने पर मन में ढांढस बंधा था--चलो जान बची, कोई किनारा तो है, वह यह अभिजीत ही था ! इस घराने का छोटा लडका, मगर शर्मीला और सहज । वह भी यहाँ बे-आसरा था। माँ के सिवा वह और कही टिक नही पाता था । माँ भी उसे कितना मिलती थी-सहमा-सहमा वह बचपन के दिन काटता रहा। बहूरानी हो एक ऐसी मिली, जिसने उसे यह अहसास कराया कि उसका कोई है इसके बाद बहुत दिन बीत गये । गगा की धारा बहुत नीचे उतर गयी । सूख गयी । आज का अमिजीत, वह अभिजीत नहीं रहा, कोई और हो गया। यह ठीक है कि बहूरानी के बुलावे पर ही वह आया है, उनके प्रति सहानुभूति, सहृदयता का भाव आज भी नहीं मिटा है, इसमे भी सदेह नही, फिर भी दो दिनो बाद ही बहूरानी को लगने लगा कि इसे पकड़ना, बांधना कठिन है । आने को तो आ गया, पर लौट जाने के लिये कमर कस कर । यहां के किसो-कुछ के साथ उसका मन आज भी नहीं जमा है। अपनी जिम्मेदारी के बारे मे सजग रहते हुए वह इस ताक मे भी है कि कब मौका मिले, अपने बोझ किसी के कन्धे पर डाल कर फुर्र हो जाय । वह मैनेजर लडकी आखिर रखी क्यों गयी ? जिस दिन से वह काम मे लगी है, उसी दिन से अभि उसे समझाने-सहेजने मे जुटा हुआ है । बहूरानी उसे पाती है सिर्फ भोजन के वक्त । इसका अलाहना कमी बहुरानी ने नहीं दिया, मन ही मन मसोसती रही । अपने देवर को वे पहचानती तो है उत्तराधिकार ११२ पर कहीं कोई गलत अर्थ तो नहीं लगाता--कहीं नौकर-नौकरानियाँ, अमलदार--कुछ उलटा-सीधा सोच तो नहीं रहे है । सोचते भी हों, कौन जाने, पर उन्हें विश्वास हैं कि मैनेजर को सिखाने-पढ़ाने के सिवा इसका और कोई अर्थ नहीं हो सकता। जिस दिन यह काम पूरा हुआ कि बस, उस दिन काशी के लिये रवाना। इतना सब कुछ होते हुए भी बहूरानी के मन में सहज-संदेह फुकारता रहा । अभी उसके सामने जो लड़की बैठी है, उसे वे गौर से, गहराई में उतर-उतर कर देख रही थीं। पहली मुलाकात में ही अच्छी लगी थी। क्यों ? यह वे नहीं जानतीं । 'कोई' किसी को अच्छा या बुरा लगता है इसके लिये वह 'कोई' जिम्मेदार नहीं होता, इसका जिम्मेदार है अपना मन, जो-जैसा होता है वही लगता है । इस अच्चाई-बुराई की बुनावट अपनी-अपनी कुशलता पर निर्भर है । अपनी भावना के रंगों से कोई किसी को रंग लेता हैं। वहूरानी भी इस क्षण उस लड़की को मैनेजर के रूप में नहीं, बल्कि अपनी चाह के रूप में देख रही थीं। उनकी इस 'चाह' का रंग ही उसके चेहरे पर छिटका था। उसका चुपचाप आँखें धरती में गजाये बैठना ही बहूरानी की चाह को चार चांद लगा रहा था। आज जो कुछ कहने के लिये उसे बुलाया था, उसके आते ही इरादा बदल गया। पहले देवर से पूछू, वे क्या कहते हैं। पर कहने को वे कह बैठी-'अरे हां, निहार, तुम एम काम क्यों नहीं करती ? ....."अच्छा छोड़ो.......।" निहार ने गर्दन उठायी मगर कुछ बोली नहीं, उसकी आँखों ने यह पूछा, "क्या छोड़ो।" बहूरानी ने कहा, "मैंने सुना है कि तुम्हें आने-जाने में बहुत तकलीफ होती है । घर से ट्राम पर सियालदाह, इसके वाद रेल और यहाँ स्टेशन पर उतर कर रिक्शा और इसी तरह लौटती भी हो । वाप रे बाप, कितना समय लगता होगा और कितनी तकलीफ होती होगी। धूप है, वर्षा है, ठंड है-" कहते-कहते रुकीं । शायद इसलिये कि निहार क्या कहती है जरा सुनं, पर वह तो तुप ही वैठी रही । तव बहूरानी भूमिका से हटकर सीधे भूल प्रस्ताव पर आ गयीं, "यहीं रहा करो।" निहार बोली, "कोशिश तो बहुत कर चुकी, फहीं घर मिलता ही नहीं।" "कहीं घर लेने की जरूरत क्या है ?" निहार ने पलकें उभार फर जिस प्रकार देखा उससे लगा कि वह बहूरानी के कहने का तात्पर्य समझ नहीं पायी । बहूरानी ने पुनः कहा, "इस मकान में ही रहो, मेरे पान।" उन्होंने अपनी मंसा जाहिर की, "मेरे संग रहो । बलग क्यों रहोगी ? इतना बड़ा मकान खाली पड़ा है । जिधर जितना कमरा चाहोगी मिल जायेगा । कुछ अदल-बदल भी करने का मन हो तो वह भी हो जायेगा।" ।

उत्तराधिकार निहार नै चट से कोई उत्तर नहीं दिया । उसे अच्छी तरह याद है कि नौकरी के विज्ञापन में रहने की व्यवस्था का कोई उल्लेख नही था और नियुक्ति पत्र में भी इसका कोई जिक्र नहीं है । यह बहूरानी को ही भावना है । इससे नौकरी में अड़चन मा सकती है । मेरा राजी होना गलत हो सकता है। इस दृष्टि से बहूरानी ने शायद न सोचा हो । एक बार मन मे माया कि अपनी दिक्कतें उन्हें बता दे लेकिन वहूरानी से आँखें मिलते ही कहा न गया । क्योकि उनको आंसों में अपनत्व का एक गहरा भाग्रह था। इन्कार करना उनके मन को दुःख पहुंचाना था । और मान भी ले तो कैसे? 'हा' और 'ना' के मध्य एक अन्तराल होता है, उसे इसी अन्तराल का आश्रम लेना होगा यानी मौन रहना होगा । मौन हर जगह स्वीकृति का लक्षण ही है, संभवतः नही, कमी-कभी यह अनिच्छा का भी द्योतक होता है । बहूरानी का जो जी हो समझे ! यह भी हो सकता है कि इच्छा है मगर फौरन हामी कैसे मरे-कुछ सोचने का समय तो चाहिए ही और ऐसा भी वे सोच सकती है कि इच्छा नहीं है मगर सामने कहे तो कैसे, पर आखिर कब तक वह इस द्विविधा में उन्हे रख सकेगी ! उत्तर तो कुछ न कुछ देना ही होगा। इस संकट से निहार को हलधर ने उवारा । उसे न तो किसी ने बुलाया और नही किसी को इसकी जरूरत थी, फिर भी नाश्ते की तश्तरियां (जो नौकरानी दे गयी थी) और गिलास ले जाने के बहाने या हाजिर हुआ और सामान उठाते-रखते हुए उसने कहा, "छोटे बाबू बापको ढूंढ रहे थे।" निहार ने जानना चाहा, "मिलने को कहा है क्या ?" "नही, कही, बाहर से आये, सोधा आपके आफिस में गये फिर फोरल निकल गये।" और जो कुछ उसने कहा वह अनुमान के आधार पर ही इतनी बुद्धि का परिचय वह बराबर देता रहता है । हलघर बनर्जी घराने का वह साधारण नौकर नही, हुक्म तामिल करने से ऊपर भी कुछ भूमिका उसकी है । अवसर पाते ही वह उसका उपयोग किये बिना रहता नहीं। बहूरानी ने कहा, "किधर गया, देखा तुमने ?" "अपने आफिस की तरफ जाते दीखे।" "इस समय आफिस में क्या काम हो सकता है ? वह नाश्ता कब करेगा मला ? जा उसे बुला ला ।" हलघर जाते हुए दरवाजे के पास से ही बोला, "वे तो यही आ रहे हैं।" अभिजीत ड्योढ़ी पर पहुँच कर, निहार को वहां देख ठमक गया। बहूरानी ने कहा, "क्यों, आ जाओ।" "हूं, फिर आ जाऊंगा।"

११४ उत्तराधिकार "आखिर क्यों ? आओ, तुम्हारे लिये नाश्ता मंगवाती हूं।' "नहीं, सिर्फ चाय ।" यह कहते हुए अमिजीत अन्दर आकर एक कुर्सी खींच कर वेठ गया। "अरे वाह, सिर्फ चाय ! कव के दो कौर खाकर निकले हो।" "वह अभी भी पेट में जस का तस पड़ा है । तुम्हारे बंगाल का नाश्ते का रिवाज अपने गले नहीं उतरता।" "यह कह कर छूट नहीं सकते । उसे गले उतारना ही होगा ! अच्छा तुम लोग बातें करो, मैं अभी आयी।" वहूरानी के जाते ही अभिजीत ने निहार से कहा, "कालोनी की कोई खबर मिली? कब वे लोग आपसे मिलने आ रहे हैं ?" "नहीं।' "दो एक दिन और देख लिया जाये । इसके बाद उनकी प्रतीक्षा न कर हम लोग अपने प्लान के अनुसार खुद आगे बढ़ें। पहले जमीन का सर्वे कराना जरूरी है । यह काम पुराने सर्वेयर से ही हो सकता है । कल पता लगाइये, पता तो अपने पास कहीं लिखा जरूर होगा । लेकिन बहुत दिनों से उसे बुलाया नहीं गया है।" "किसे ?" कमरे में आते हुए महामाया ने कहा । "अपना वही, सर्वेयर।" "यहां भी तुम दफ्तर खोल वैठे ? नहीं मई, यह नहीं चलेगा ! तुम्हारे दपतर फा दायरा इस खास महल की ड्योढ़ी के बाहर ही रहे । क्यों निहार ?" निहार सिर्फ हंसी । अभिजीत पता नहीं कुछ कहना चाह रहा था कि बहूरानी की खास नोकरानी मंगला आती दिखी। उसके हाथ में एक तश्तरी थी, उसे तिपाई पर रख कर जब अमिमीत के सामने उसने सरकाया तो वह चौंका, “यह क्या ! मेरे लिये इतना सारा।" "कितना क्या है, खा लो !" निहार की ओर एक नजर डाल कर तथा ओंठों में मुस्कराती हुई वहूरानी ने कहा, "तुम्हारी मैनेजर इस मामले में तुमसे कम नहीं है। दोनों ही-सिर्फ चाय ?" "मैंने सिर्फ चाय नहीं कहा था।" निहार बोली, "मुझे पता है, कहने से कोई असर नहीं।" वहूरानी ने फौरन उत्तर दिया, "हां, कहा तो नहीं, पर किया अपने मन का हो न !" "मैं ठीक इनके उल्टा हूँ । कहने के बावजूद करके दिखाता हूं-" अभिजीत साने लगा तो निहार ने अपनी कलाई में बंधी छोटी-सी घड़ी देख कर बहरानी से कहा, "मैं अव चलं ।"

उत्तराधिकार "हूँ, तुम्हे तो ट्रेन पकडनी है । पुर्सत मिलते ही आ जाया करो । मरे बुलाने के लिये रुकी मत रहा करो।" निहार ने गर्दन हिलाकर स्वीकार कर लिया। उसके जूते की खटखटाहट खत्म होते ही अमि बोला, "कॉलोनी में इस मैनेजर को लेकर हगामा मचा हुआ है।" बहूरानी को वहां की सबरी के लिये कोई उत्सुकता नही । बोली, "उनकी कौन चलायै, कुछ न कुछ तो लगा ही रहता है।" "पर यह बहुत मजेदार मामला है।" "हां, उनका लीडर यानी शम्भूचरण उस रोज मांग लेकर मेरे पास माया था। मैनेजर से परिचय कराया था और कहा था, "अब से जो कुछ कहना-सुनना हो सब इनसे ही कहा करना । यानी मैनेजर से, सब कुछ का फैसला भी यही करेगी । वह चला गया । तब से ही हगामा मचा हुआ है । अच्छा हुआ, शम्भू अकेला नही अब डेपुटेशन लेकर आयेगा।" "यह क्या होता है ?" "चुने गये कुछ लोगो का दल ।" "अच्छा । दल-बल के साथ हो-होल्ला मचाने पर यह लडकी मला संभालेगी कैसे?" "छोटा-सा दल पांच-सात लोगों का, इसके लिये वोट लिया जा रहा है, दल बन रहा है । वेधारा शम्भू मुश्किल में पड़ गया है । छोडो, वे आये न आये । हमें तो अपना काम करना ही है। इसे अब यो ही छोडा नहीं जा सकता। कुछ करना ही होगा। मैंने सोचा है । यही तुम्हे बताने आया था ?" "तुम बताना चाहते हो, मैं सुन लूंगी, पर मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि तुम जो करोगे उसमे मुझे कुछ कहना नही पडेगा । जब तक तुम नही थे तब तक नायब जी मुझे 'इसमे उसमे' जोडते रहे । मैं उन्हें टाल भी नहीं सकती थी। वे भी क्या करते, किसके पास जाते ? जिस दिन से तुम आये, मेरी छुट्टी हुई।" "छुट्टी मजूर होगी तब न ? सोच लेने से ही तो छुट्टी मिल नही जाती। अच्छा छोडो, अब मेरा प्लान सुनो।" अभिजीत क्षण भर के लिये रुका । यहां आने के कई रोज बाद ही, जिस दिन पहली बार बहूरानी के साथ दूसरे मजिल के हाल के सामने विछलन वाली खुली छत पर खडे रहकर गगा की ओर देखते हुए वह सिहर उठा था, वह दिन उसे याद है। फैले हुए मैदान मे सपरैल वाले, टीन और फटे टाट से घिरे 'कॉलोनी' के घिधौने घरो में उसे जो पीडा पहुँचाई थी, आज भी सहज नहीं हो पाई है। एक नजर मे वह था ऊपरी तौर पर देखा गया एव दृश्य । इसके बाद उसके भीतर का रूप जब उसने देखा - - उत्तराधिकार - था तब उसके मन में सिर्फ यही एक वात वार-बार उठती रही-अब और नहीं । रात को लेटे-लेटे बच्चों की तरह वह सोचता रहा, ऐसा क्या नहीं हो सकता कि यह नरक रातो-रात स्वर्ग में बदल जाये । कभी सदर नायव यज्ञश्वर सरकार ने मी, हो सकता है, यही कल्पना की हो। अपने लटत, पाइक-वरकन्दाज न सही पुलिस तो है, उसकी मदद से इन दखलदारों को बेदखल करने की सोची हो । घरों को तोड़-फोड़कर बचा हुमा कूड़ा अपने लोगों से ही साफ करा लिया जायेगा । अभिजीत की तुलना इनसे कुछ भिन्न है। संकट बरकरार और 'सिर छिपाने' के बहाने जो आफत जमा हो गयी है, उसका सफाया, यानी सांप भी मर जाय लाठी भी न टूटे । अभिजीत का यह मनोभाव बहूरानी जानती न हों ऐसी बात नहीं थी। वे जानती थी कि जवर-दखल के जवर हिस्से को उन्हें स्वीकार करना ही पड़ेगा। कमी- कमी वे जानने को यह भी जानती हैं कि बंगाल के बाहर सरकार ने इन्हें वसाने का यहां-वहाँ इन्तजाम किया है। साथ ही इन्हें रूपये, रेल-किराया भी दिया जाता है। सरकार के लोग सर-सामान के साथ आते हैं और खुद लारियों में लादकर ले जाते हैं, अपने साथ और उन जगहों में पहुंचा आते हैं। इससे उन्हें कुछ सन्तोप हुआ था। लेकिन जब उन्होंने सुना, 'ये' देश छोड़ कर कहीं जाना नहीं चाहते । किसी कॉलोनी में कुछ लोगों को भेजा गया था लेकिन कुछ दिनों में ही वे गोल बांध कर लौट आये। लोट तो आये, मगर जो जगह वह छोड़ कर गये थे वह उन्हें नहीं मिली, तो वे रेलवे स्टेशन, गोदामों, मैदानों जहाँ भी खाली जगह मिली वहां फिर से खूटी-खम्मा गाड़, चट घेर कर जम गये। यह देख कर कोई कहीं से हिलना नहीं चाहता। शंभुचरण एंड पार्टी भी यहाँ से टस-मस नहीं होगी--बुरे से बुरा हाल क्यों न हों-ये यहीं जमे रहेंगे। बहूरानी यह भी जानती हैं कि अभिजीत इस सरकार के सहयोग से इनकी व्यवस्था करने के प्रयत्न में सचेष्ट नहीं है । जहाँ वे यह भी जानती हैं वहीं इसका भी पता है उन्हें कि अभि इन लोगों के लिए बहुत परेशान भी है। ये लोग अच्छी जिन्दगी जियें, वह यही चाहता है। केवल वह सोचता ही नहीं, ऐसी किसी योजना को बनाने में लगा भी है। मगर वह योजना क्या और कैसी है, उसका काम कैसे होगा, इस बारे में वे कुछ न जानती हैं, न जानना चाहती हैं । अभिजीत बोला, "यह जो जमीन वे दखल किये बैठे हैं, किसी तरह भी कानून से वे नहीं पा सकते, यह जैसे सच है वैसे ही वह हमें वापस मिल जायेगी यह सोचना भी व्यर्थ है।" "यह तो मैं भी जानती है। कुछ दिनों पहले तक यह लालसा में पालती रही, भाज भी मिटी नहीं है।" "वह हमें वट्टे खाते लिख देना होगा। इसका मतलब यह भी नहीं है कि उन - " उत्तराधिकार लोगो के नाम लिखी जा चुकी है या लिखी जा सकती है। पंचायत के नाम, या कोई ट्रस्ट-फस्ट वन-बना लिया जाये । वे भी शायद इससे अधिक कुछ चाहते नही मगर-- बहूरानी चुप बैठी रही । अमिजीत मिनट भर वाद उनकी ओर देखता हुआ मुम्फराकर बोला, "तुमसे कहने में कोई हिचक नही है । मैं खुद निश्चय नहीं कर पा रहा हूँ--त्रया करूं क्या नही ? इन लोगो के लिये हम सोच कर भी क्या करें? अपने हाय मे कुछ करने का है भी तो नही, किया भी क्या जाये ?" बहूरानी के सामने मी यही सवाल है पर वे चुप रही । अमिजीत बोला, "इतने लोगो को नरक मे छोड कर उनकी ओर से मुंह फेर कर बैठा भी नही जाता । यह सही है कि उनकी इस दशा के भागीदार हम नही हैं । हमारी कोई जिम्मेदारी नही है । जिम्मेदार अगर है तो स्टेट । उसकी मशीनरी, जिसे गर्वनमेट कहा जाता है, वही पगु या अर्कमण्य है, लेकिन यह मान कर भी सभी हाय बाँधे बैठे रहें, यह बात भी कुछ जंचती नही । और अपने घर के सामने यह नरक देखा भी नही जाता।" बहूरानी को जैसे मजा आ रहा हो-वात तो यही अटकी है। कुछ अशो मे ठीक भी है । बेमतलब अजगर की तरह पड़ी यह बिना छप्पर-छावनी की बस्ती उसकी आंखो के सामने उसकी सुरचि सम्पन्नता को सुई चुमोती रहती है। किन्तु उसके मन को चौबीसो घटे जो व्याकुल बनाये है वह घरहीन घेरा नही, उसका असुन्दर तन- मन नहीं, बल्कि उनके अन्तर में जीने की जो लालसा की ललक है उसका कीचड में लिपटा रहना । पिछले दिनो किसी बात के प्रसग मे उसने कहा था, "आदमी इस तरह रह सकता है, यह मेरी धारणा के विपरीत है, पर आज उस विपरीत को अपनी आँखो से देख रहा हूँ।" बहूरानी ने कहा, "तुमने क्या तय किया है ?" "मैं सोचता हूँ, इस बस्ती को आदमी के रहने लायक दूं। बनायेंगे वे ही जो भोगेगे, हम तो मात्र सहयोग देंगे। रहे तो खपरैल ही, दीवाल इंट वो और फर्श पक्की हो जाये और बेड से घिरी थोडी-सी जमीन आगे-पीछे हो, जिससे एक परिवार मामूली जिन्दगी सफाई से जी सके । यानी कुछ छोटे-छोटे काटेज के जैसा । देखने लायक, सांस लेने लायक ।" बहूरानी ने महसूस किया था कि उस क्षण जैसे खपरैल से छाये, बाग-बगीचे से घिरे मनमावन कांटेज का स्वप्न अभिजीत की आंखो मे साकार हो उठा हो । ऐमा कुछ कहना उन्ह भाया नही जिससे कि उसका यह सपना टूट जाय । लेकिन अमि- जीत के लिये यह सिर्फ सपना ही नहीं है, उसे साकार करने के लिये वह कटिबद्ध भी है । अभिजीत ने भागे जो कुछ कहा उससे स्पष्ट हुआ कि- ११८ उत्तराधिकार दिन कहा था, वे "मैं कह रहा था, कुछ असंभव करने की इच्छा नहीं है। जो हर किसी के लिये अनिवार्य है, ऐसा कुछ करना मैं चाहता हूँ और यह पूरी स्कीम इतनी बड़ी है कि हाँ तुम जिसे कहती हो शंभूचरण एंड पार्टी वह छोटी नहीं है उनके लिये जगह ही पूरी नहीं पड़ेगी। यों परती जमीन पड़ी तो है, सवाल है रूपये का ? इतने रूपये कहां से आयें ?" सवाल के निकट पहुँचकर फिर कुछ देर सिर झुकाये अमिजीत सोचता रहा। इसके बाद सिर उठा कर बोला, "मुझे काशी भेज दिया गया, इस बात पर तुमने एक "यह दंड जिनने दिया, खुद इससे भयानक दंड भोगते रहे। यह शायद तुम नहीं जानते ।' यह नहीं जानते हुए भी कुछ-कुछ इसका आभास मुझे है । एक घटना से लगा था कि वे बहुत परेशान रहे और किसी एक काम के माध्यम से उन्होंने अपनी परेशानी मिटानी चाही थी, यह तुम लोग शायद कोई नहीं जान सके, न भइया न तुम । शायद माँ से भी वह छिपा रहा जब कि मां की एक सही की जरूरत उन्हें पड़ी थी। सही माँ ने तो विना कुछ जाने ही कर दिया था। पिताजी ने कहा, उनके लिए यही बहुत था।" "यह मैं जानती हूँ पर अवसर की ताक में तुम्हें बता नहीं पायो अब तक, सिवा इसके और कोई वजह नहीं है।" "काशी जाने के लगभग दो वर्षों बाद । रजिस्ट्री से एक पाकेट मेरे नाम माया खोला, देखा, मेरे नाम वेंक का एक पास-बुक है। उसे खोला, देखा उस पर मेरा नाम लिखा है और दूसरे पन्ने पर मोटी रकम का अंक चढ़ा है। साथ ही एक पत्र भी था; पिताजी का लिखा । यही पहला और अन्तिम पत्र था जो एक पुत्र को अपने पिता से मिला--मेरे चिरंजीव । इसके बाद लिखा था इस पास-बुक के बारे में । उन्होंने लिखा कि उनके पिता अपनी पतोहू यानी मेरी माँ को एक मकान वसीयत कर गए मां की सहमति से वह मकान वेचकर उसकी रकम बैंक में जमा कर दी गयी है मेरे नाम उसमें किसी का कोई हक नहीं । जब मैं अठारह का हो जाऊंगा तो उसे चाहे जैसे खर्च करूं। "मन में पाया कि वापस कर दूं। नही चाहिए ये रूपये । इसके बाद पत्र फिर पढा । पास-बुक खोला, उस पर हाथ सहलाया। मुझे लगा, नहीं यह सिर्फ रूपये नहीं, इस छोटी सी पुस्तिका में और भी कुछ है। मानो एक ऐसा स्पर्श, जिसे अग्राह नहीं किया जा सकता और रूपये तो मां के हैं, उन्हें उनके सुसर ने दिया था। वे मां को बहुत स्नेह करते थे, वे ही ऐसा कहा करती थीं। "सहेज कर उसे आलमारी में रख दिया। आज भी वैसी ही रखी है । सोचता कि उसे अव काम में ला" ये ।

उत्तराधिकार ११२ १० पुराने सर्वेयर शीतल दत मिले । ये कमी वद्योपाध्याय घराने के मासिक वेतन मोगी अमीन थे । जगह जमीन की नाप जोख मे माहिर । छोट-मोटे घरो का प्लान भी बना लेते जब कि बोवरसियर नहीं हैं और न ही इन्जिनीयरिंग स्कूल का कभी मुंह देखा। सुरजित कहा करते थे कि अपने शीतल इशिनीयरो को जेब में रखते हैं । उनकी मौत के बाद इस स्टेट मे कुछ रोज रहे। इसके बाद हटा दिये गये । तब से फिर कही स्थायी नौकरी में नहीं हैं। ठोके पर काम करते रहे, आज कल उसे भी छोड़ दिया। बूढे गये यादवपुर इलाके मे कुछ सस्ते मे जमीन खरीदी और एक वर्ष पहले एक छोटा-सा मकान भी बना लिया है। लोगो का कहना है कि वद्योपाध्याय घराने की जब चलती बनती थी, उसी बहती गगा मे शीतल ने हाथ धोया यानी बहुत कुछ अपना बनाया। यह समवतः भूठ नही हैं । पुराने जमाने मे जमीदार के दफ्तर में जो लोग काम करते थे उनमे छोटे-बडे सबो का वेतन बहुत कम होता । कोई उस पर निर्मर भी नहीं रहता। एक नायब, पूरे दफ्तर के जो मालिक होते, वे महीने म तनख्वाह पाते कुल वीस-पच्चीस रुपये या इससे भी कम, भगर वे अपने घर मे होली-दीवाली खूब ठाठ से मनाते थे। इनके यहाँ एक व्याह, अन्नप्रासन और जनेक मे जो खर्च होता था वह नायव जी के सारे जीवन की कमाई से भी पूरा नहीं पड सक्ता था। तनख्वाह दरअसल एक रिवाज थी, नौकरी से लगे रहने को मान्यता । आमदनी कपरी होती थी खूब, जिसमें कोई रुकावट नहीं यो । वह सहज, स्वाभाविक रूप मे ही होती, बहुत बार तो प्रत्यक्ष रूप मे भो । मगर दिखाने के लिए पर्दे की ओट मे । जमीदार इसे नियम मानते थे । उनके हिस्से मे तो कोई हाय हाल नही पाता। प्रमा का योम ये बढात रह्ने । उनका ही पेट मार कर अपना बनात रहते । यह ऊपरी कमाई कमी-कमी निचोड कर निकाली न जातो यो। स्रोत की मोटी घार जमीदार की भार बहती और पतली उनके सेवक के पेट-पोखर, या परिवार-गहर मे जा कर गिरती । शीतल दत्त ने अमिजोत का बचपन मे देखा था। दरवाजे से घुसते या निकलते एक शर्मीला-शान्त ऐसा लडका जैसा साधारणत जमीदारो के होते नहीं । कभी-कभार उस प्यार से निक्ट बुलाकर यो हो कुछ पूछ ताछ करने पर उसके उत्तर से मन अपा गया था। इसके बाद इतने वर्षों बाद अब मुलाकात हुई । 'आप' कह या 'तुम', उलझे १२० उत्तराधिकार रह कर मुंह से 'तुम' ही निकला । आज का हाल चाल लेते हुए पुराने जमाने की बात भी छेद बैठे, अफसोस भी जाहिर किया। अमिजीत इसी बीच अपने काम की बात छेड़ वैठा ! उसकी इच्छा थी, इनसे सिर्फ जरीप करवाले । जमीन कितनी है, यह पता चल जाये तो वह अन्दाज लगा सकेगा कि कितने कोटेज वन सकते हैं और एक में कितना खर्च वैठेगा, जिसका हिसाव निहार से वनवा लिया जायेगा । सर्वेयर की रिपोर्ट मिलते ही कुल खर्चे का पता चल जायेगा। उसकी जमा रकम से काम हो जायगा या नहीं, अगर नहीं तो कैसे कहां से फाट-छाँट की जा सकती है, यह भी विचारा जा सकता है । सो पूछा "आखिर जमीन है कितनी ?" शीतल बाबू पूछ बैठे; "वहां क्या करने का इरादा है ?" अमिजीत झंझला उठा । सर्वेयर का यह पूछना बेकार है, मगर अमीन है तो उसकी यह उत्सुकता हो सकती है, यह मान लिया जा सकता है । खास कर यहां के मामले में । उनसे संपर्क बहुत पुराना जो है। इसलिये....इससे आपको क्या मतलब ? -~-जैसे प्रश्न करने में हिचक हुई । झुंझलाहट छिपा कर अभिजीत ने अपनी योजना हल्को- फुल्के ढंग से बतायी । शीतल बाबू सब सुनकर दुःखी मन से बोले, "एकदम, पत्थर में दूब उगाने का ख्याल है । ये लोग तुम्हारे इतने बड़े दान को कानी कौड़ी के मोल भी नहीं मानेगें, तुम्हारा नाम भी जवान पर नहीं लायेंगे।" "जी, दान में नहीं कर रहा हूँ और न मुझे नाम की ही परवाह है।" अमि- जीत यह पहना चाह कर भी कह नहीं सका । इसलिये नहीं कि यह गर्वोक्ति होगी बल्कि भंस के आगे बीन बजाना होगा । न ये समझेगे, न इन्हें समझाया ही जा सकता है । शीतल बाबू श्रोता को चुप पाकर जरा ऊंची आवाज में बोले, "और फिर तुम्हारा ये काटेज बन्दर के गले में घंटी की उक्ति चरितार्थ करेंगे। ये कमी ऐसे न रहे हैं, और न रह सकेंगे ? दुनिया भर का गोवर इकट्ठा करके दीवालों पर गोइठा पायेंगे । तुम सामने बगिया बनाओगे, ये वहाँ कूड़ाखाना बना डालेगे । चबूतरे पर बैठ कर उनके चंगू-गंगू पेशाब करेंगे, टट्टी करेंगे पांच-पांच, सात-सात बकरियां पालेगे । ऐसों के लिए तुम घर बनाने की सोचते हो । नुम भी गजब के हो । सब सिमट कर एक संग एक ही कमरे में घुसे रहेंगे । एक महीना भी नहीं बीतेगा कि आज जैसे नाक पर कपड़ा रखना पड़ता है उस समय भी रखना पड़ेगा।" अगिजीत चुप था, लेकिन अन्दर ही अन्दर नाखूण भी। जिसे शीतल बाबू ने गांप भी लिया तो गला दान गर बोले, "तुम्हारे पास हृदय है, सो हो पयों नहीं ? कितने बड़े वंश के लड़के हो। तुम्हारे बाप-दाद भी कितना चया दान-त्याग कर गये है। उन लोगों ने मन्दिर की प्रतिष्ठा की, तालाब-पोसर गुदवाये तुम भी ऐसा ही कुछ करो, मतलब स्कूल खुलवाओ। अस्पताल बनवायो, सभी का कल्याण हो । सिर्फ , उत्तराधिकार १२४ उनके पीछे इतना रुपया बहाने से फायदा ? जमीदारी गवर्नमेंट ने ले ली। रुपये तो दिए नहीं यभो । समझ-बूझ कर जो करना है करो मेरा तो और कुछ कहना नही है।" अभिजीत चौक कर वोला, "नहीं, यह क्या बात हुई ! आप को जो कुछ मिला 'है वह आपको मेहनत का ही मिला है । छोडिये, यह काम आप कब करेंगे।" शीतल बाबू ठक रह गये । वे अपने पुराने मालिक के नये उत्तराधिकारी का मुंह ताकने लगे। फिर वोले, "करने को तो कल से ही शुरू कर सकता हूँ।" "तो ठीक है, आपको उसके मद मे कुछ रुपये दे दिये जायें, आज कहे देता हूँ।" इतना कह कर अमिजीत उठ खडा हुआ। - एक लम्बे अर्से वाद आज जद सुवह अमिजीत सो कर उठा पर रियाज करने बैठा । इतने दिनो इच्छा होती ही नहीं थी। हो कैसे ! इसके लिये मन मे जो धीरज और शान्ति चाहिए वह हो तब न जिस काम मे लगा मन उसी मे उलझा रहता है । रोज के कामो की बात और है । उसकी एक सीमा होती है, किसी दूसरे काम मे दिक्कत नहीं आती। लेकिन यह काम ही कुछ और है । इसमे उत्कठा, अनिश्चयता, क्या पता क्या हो, ऐसी एक भावना जुडी रहती है । रात को भी जो पीछा नहीं छोडती । अधिक रात तक जिस की चिन्ता खाती रहती है । सेवेरे-सवेरे सो कर उठना तो उसकी पुरानी आदत है, अमिजीत के आज-कल वह भी नहीं हो पाता। तानपुरा रख कर अपने कमरे की चौडी खुली छत पर वह कुछ क्षण टहलता रहा । वहाँ से गगा दिखाई पड़ती है । वहाँ सूखी वाल से ढेको एक गहरी खन्दक है । उसकी तलहटी मे जो एक पतली-सी जल-रेखा किसी तरह बची रह कर 'नदी' के रूप मे बह रही है, उस पर ओखे जाती ही नही क्योंकि वह बीच मे अवस्थित है, 'कॉलोनी', एक नरक, जानवरो की जिन्दगी का एक नमूना-'जानवर' क्यो कि वह सजीव है । प्रति मुहूर्त वह मद्दी आवाज में अपने होने की घोपणा करता रहता है-~-'मैं हूँ।' तुम हो मगर इसान की अमिरुचि को नोचने-खसोटने का अधिकार तुम्हे नही है । अभी कुछ दिनों पहले तक उस ओर देखने को उसकी इच्छा नहीं होती थी। ऊब, टोस और अपराध-वृतियो की एक केसी मिली जुली अनुभूति से वह भीतर ही भीतर व्याकुल हो उठता था आज यह भाव उसे मटका नही सका। वहां वह आंखें गडाये रहा और देखता रहा कि वदरग मिट्टी के तेल के पीपे से, फटे चिये बोरे से घिरा तया टूटे खपरैल से छाया यह स्तूप धीरे-धीरे विलीन होता जा रहा है और उसकी जगह उमर रही है साफ सुथरी, सजी-सलाई एक वस्ती । 'कॉलोनी' नही । इस शब्द को उन लोगो ने क्यो अपनाया यह अमिजीत की समझ मे आज तक नही ।आया वे तो इसी देश के वासी हैं, 'उपनिवेश' तो विदेशी बनाते हैं। लगता है इन्हे जबरदस्ती विदेशी उत्तराधिकार १२२, बनाया गया । 'कॉलोनी' यानी मन के विरुद्ध कुछ मान लेना। 'कालोनी' मिटा कर इसे उनका अपना घर बनाना होगा । पूर्व पाकिस्तान के न होंगे-बंगाली, इस पार के रहने वालों की तरह ही, उनसे अलग नहीं । सीमा की लकीर खींच कर और उसके ईद-गिर्द खूटी खम्मा गाड़ कर धरती का हिसाव किया जा सकता है मगर एक देश या एक जाति को दो टुकड़ों में वाँटा नहीं जा सकता। सुबह का नाश्ता अभिजीत अपने कमरे में ही करता है, सो वह कर चुका । मंगला चाय का प्याला और तश्तरी उठा कर ले गयी। दफ्तर जाने के पहले यों ही एक मासिक के पन्ने अभिजीत उलटने लगा कि तभी कालोनी की ओर शोर सुनाई पड़ा। यह कोई नई बात नहीं थी । लड़ाई हंगामा वहाँ के लिए भजन-कीर्तन है। बात-बात में पति-पत्नी को पीटते हुए भट्टी गालियाँ बके, घर से निकल जाने की धमकी दे, औरतें भी चूकती नहीं । हमला सिर्फ गालियों तक ही नहीं, लात-जूते, लाठी-सोंटे, गुत्थम-गुत्थी तक होना रोज का काम है । मां-बेटी, वाप-बेटे, भाई-बहनों में बतकही होती, उसकी शब्दावली सभ्यता के कोने में ढूंढ़े नहीं मिलेगी। पड़ोसी बड़े मजे में, विना कानों में ऊंगलियां डाले इसके मजा लेते रहते हैं। आत जो श्रोता होते कव वे ही रण-क्षेत्र के योद्धा नहीं होंगे, ऐसा कोई कह नहीं सकता । अपनों से पराये के वीच, वहां से घरों के आँगन में भाग लहकती रहती। अभिजीत शुरू में इससे परेशान हो जाता । हलघर या किशन को बुला कर कहता कि जा देख आ, क्या हो रहा है उधर, लेकिन अब यह सब उसे व्यग्र नहीं करता। रोज के खाते में आ गया है यह सब । मगर आज का मामला कुछ और था। अभी वह यह सब सोच ही रहा था कि जरा पता लगाये कि हलवर दौड़ा हुआ माया । वोला, "छोटे बाबू, शीतल वाबू को धक्के देकर मारपीट कर लोगों ने भगा दिया ।" "क्या, वे कहां हैं ?" "माफिस में।" अभिजीत फौरन वहां से दफ्तर में आया। उसके पहुंचते ही शीतल दत्त फट पड़े; "मइया, मैंने कहा था न, ये पनाले के कीड़े पनाले में ही जिन्दा रह सकते हैं। गंगा के निर्मल जल में ऐंठ कर मर जायेगें। तुम चले ही ऐसों का कल्याण करने !" वे और कुछ कहने जा रहे थे। अभिजीत ने वीच में ही रोक कर जानना चाहा, "हुमा क्या ?" जवाब में जो कुछ उससे पता चला वह यह कि मार-पीट, दंगा-फसाद जैसा कुछ नही हुमा, मगर कालोनी में घुसने नहीं दिया गया । नाप-जोख में रुकावट डाली गयीं और शीतल बाबू ने जव मालिक की दुहाई देकर अपने लोगों के साथ धुतने की चेप्टा फी तो कई छोकरे भागे वड़ आये, उनका जंतर-बंतर छीन लिया, उनमें से एक ने - - उत्तराधिकार . मजाक उडाते हुए कहा--'मआपके मालिक में अगर दम है तो वे ही क्यो नहीं मागे आते ! आप हैं कौन हैं-~-न तीन में न तेरह में ....' अमिजीत अचरज में डूब गया । एक तो, जरीप दो रोक्ने का कारण उसको समझ में नही माया । शंभूचरण से इस विषय मे बाते पहले ही हो सुपी भी । उसने कोई आपत्ति नहीं की थी, दूसरी बात यह कि उनके पक्ष से यह व्यवहार पहली बार हुआ, व्यक्तिगत रूप से इतने दिनो उन्ह उनसे अच्या व्यवहार ही मिलता रहा। कई मिनट में कुछ सोच कर फिर शीतल बाबू की तरफ देखते हुए कहा, "चलिये, देखे, माजरा क्या है ?" शीतल बाबू ने कहा, "तुम खुद न जाओ । छोकरों को मनि-गति ठीक नहीं परतीत हुई । यच्छा होगा कि किसी और को भेन कर मेरा फीता-चीता मंगा दो। मैं अब उधर पैर रखन वाला नही ।" अमि रुका नही । तन पर बनियाइन और पैरो में चप्पल पहने ही वह निकल पड़ा । दफार में जो-जो लोग थे लघर, किशन, दो कमकर~~वे भी उन्ही के साथ चल पडे । कॉलोनी के मुहाने पर कोई नही मिला । कुछ आगे था उनका पचायत-घर । वहाँ, उसके अन्दर और बाहर बहुत से लोग इकट्ठ थे। कोई भाषण देने की मुद्रा में ऊंची आवाज में कुछ कह रहे थे । अमिजीत को देखते ही बाहर इकट्ठे लोगों ने रास्ता बना दिया। अभि ने चारो तरफ देख कर जानना चाहा कि शभू कहाँ है ? एक सग कई बोल उठे "वह वह अन्दर है।" मन्दर जो लाग थ उनम से अनको की नजर इधर उठी । एक दवी सी हलचल का सभाटा सार्य-सायं करने लगा। मापगा दे रह थ एक अधेड सज्जन उनके भगस- बगल तीन चार नोजवान बैठे थे साफ मुयरे कपडो मे, चेहरे से अपरिचित सगे। कॉलोनी एक लड़के ने उठ कर मापण देने वाले के कान में कुछ कहा। ये दरवाजे की तरफ वद आये । अमिजीत के सामने खड़े होकर बाले, "नाप शायद यहाँ के सरकार है ?" इस सरकार में व्यग का भाव छिपा था। अभिजोत के उत्तर दने के पहले ही अन्दर से आवाज आयो, “यही हैं अपन अभिजीत बाबू।" अभि ने दवा यह वही मित्री था, हाल का ताला ताडने के लिए हलधर जिसे बुलाकर ले गया था। सीत-समा मे प्रवेश पाने के लिए जिसने कहा था, हम हूँ सुनेगे जरा।' अमिजीत ने जिस सादर अनुमति दी थी। वक्ता और उसके आस-पास के नौजवानों ने बुरी नजर से अमिजीन को दखा। कॉलोनी दो-तीन छोकरे मापस म एक दूसर का धमकाने लगे, 'तुम सुप भी रहो ।' कोई फिर कुछ नहीं बोला । अभिजीत वक्ता महादय का सबोधन कर बाला, "आप का ता कमी देखा नहीं । आप क्या यही रहते है मतलव इसी कालोनी में ?" - १२२. उत्तराधिकार बनाया गया । 'कॉलोनी' यानी मन के विरुद्ध कुछ मान लेना । 'कालोनी' मिटा कर इसे उनका अपना घर बनाना होगा। पूर्व पाकिस्तान के न होंगे-बंगाली, इस पार के रहने वालों की तरह ही, उनसे अलग नहीं । सीमा की लकीर खींच कर चोर उसके ईद-गिर्द खूटी खम्भा गाढ़ कर धरती का हिसाव किया जा सकता है मगर एक देश या एक जाति को दो टुकड़ों में बाँटा नहीं जा सकता। सुबह का नाश्ता अभिजीत अपने कमरे में ही करता है, सो वह कर चुका । मंगला चाय का प्याला और तश्तरी उठा कर ले गयी। दफ्तर जाने के पहले यों ही एक मासिक के पन्ने अमिजीत उलटने लगा कि तभी कालोनी की ओर शोर सुनाई पड़ा। यह कोई नई बात नहीं थी । ललाई हंगामा वहाँ के लिए मजन-वीर्तन है। बात-बात में पति-पत्नी को पीटते हुए मही गालियाँ बयो, घर से निकल जाने की धमकी दे, औरतें भी चुकती नहीं । हमला सिर्फ गालियों तक ही नहीं, लात-जूते, लाठी-सोंटे, गुत्थम-गुत्थी तक होना रोज का काम है । मां-बेटी, बाप-बेटे, भाई-बहनों में बतकही होती, उसकी शब्दावली सभ्यता के कोने में हूंढ़े नहीं मिलेगी। पड़ोसी बड़े गजे में, बिना कानों में ऊंगलियां डाले इसके मजा लेते रहते हैं। आत जो श्रोता होते कब वे ही रण-क्षेत्र के योद्धा नहीं होंगे, ऐसा कोई कह नहीं सकता। अपनों से पराये के बीच, वहां से घरों के आँगन में आग लहकती रहती। अगिजीत गुरू में इससे परेशान हो जाता । हलधर या किशन को बुला कर पाहता कि जा देख आ, क्या हो रहा है उधर, लेकिन अब यह सब उसे व्यग्र नहीं करता। रोज के खाते में भा गया है यह सब । मगर आज का मामला कुछ और था। अभी वह यह सब सोच ही रहा था कि जरा पता लगाय कि हलधर दौड़ा हुआ माया । बोला, "छोटे बाबू, गीतल बाबू को धक्के देकर मारपीट कर लोगों ने भगा दिया ।" "पया, वे कहां है ?" "धाफिम में।" अभिजीत फौरन वहाँ से दातर में आया। उसके पहुँचते ही शीतल दत्त फट पड़े; "गइया, मैंने कहा था न, ये पनाले के कीड़े पनाले में ही जिन्दा रह सकते है। गंगा के निर्मल जल में एंठ कर मर जायेगें । तुम चले ही ऐसों का कल्याण करने !" वे और कुछ कहने जा रहे थे। अभिजीत ने बीच में ही रोक कर जानना चाहा, "हुआ गया ?" जवाब में जो कुछ उससे पता चला वह यह कि मार-पीट, दंगा-फसाद जैसा कुछ नहीं हुआ, मगर कालोनी में घुराने नहीं दिया गया । नाप-जोख में रकावट डाली गयी और शीतल बाबू ने जब मालिक की दुहाई देकर अपने लोगों के साथ घुसने की चेष्टा पी तो कई छोपरे आगे बढ़ आये, उनका जंतर-बतर छीन लिया, उनमें से एक ने - । उत्तराधिकार मजाक उडाते हुए कहा-'आपके मालिक में अगर दम है तो वे ही क्यों नहीं आगे आते ! आप हैं कौन हैं-न तीन में न तेरह मे !......' अभिजीत अचरज में डूब गया। एक तो, जरीप को रोकने का कारण उसको समझ में नही आया । शंभूचरण से इस विषय मे बाते पहले ही हो चुकी थीं। उसने कोई आपत्ति नहीं की थी, दूसरी बात यह कि उनके पक्ष से यह व्यवहार पहली बार हुआ, व्यक्तिगत रूप से इतने दिनो उन्हे उनसे अच्छा व्यवहार ही मिलता रहा। कई मिनट मे कुछ सोच कर फिर शीतल वायू की तरफ देखते हुए कहा, "चलिये, देखे, माजरा क्या है ?" शीतल वावू ने कहा, "तुम खुद न जाओ । छोकरो की मति-गति ठीक नहीं परतीत हुई । अच्छा होगा कि किसी और को भेज कर मेरा फीता-चीता मंगा दो। मैं अव उधर पैर रखने वाला नही ।" अमि रुका नही । तन पर बनियाइन और पैरो मे चप्पल पहने ही वह निकल पडा । दफ्तर मे जो-जो लोग थे-हलघर, किशन, दो कमकर-वे भी उन्ही के साथ चल पड़े। कॉलोनी के मुहाने पर कोई नही मिला । कुछ आगे था उनका पचायत-घर । वहाँ, उसके अन्दर और बाहर बहुत से लोग इकट्ठये । कोई मापण देने को मुद्रा में ऊँची आवाज मे कुछ कह रहे थे । अभिजीत को देखते ही वाहर इकट्ठे लोगो ने रास्ता बना दिया। अभि ने चारों तरफ देख कर जानना चाहा कि शमू कहाँ है ? एक सग कई बोल उठे "वह ..वह अन्दर है।" अन्दर जो लोग थे उनमे से अनेको की नजर इधर उठी । एक दबी सी हलचल का सनाटा सार्य-सामं करने लगा 1 मापण दे रहे थे एक अधेड सज्जन उनके अगल- बगल तीन चार नौजवान वैठे थे साफ-सुयरे कपडो मे, चेहरे से अपरिचित लगे। कॉलोनी के एक लड़के ने उठ कर भाषण देने वाले के कान मे कुछ कहा । वे दरवाजे की तरफ बढ आये । अमिजीत के सामने खड़े होकर बोले, "आप शायद यहां के सरकार है ?" इस सरकार में व्यग का भाव छिपा था। अभिजीत के उत्तर देने के पहले ही अन्दर से आवाज आयो, "यही हैं अपने अमिजीत बाबू ।" अभि ने देखा यह वही मिस्री था, हाल का ताला तोडने के लिए हलधर जिसे वुलाकर ले गया था । सीत-समा मे प्रवेश पाने के लिए जिसने कहा था, 'हम हूँ सुनेंगे जरा ।' अमिजीत ने जिसे सादर अनुमति दी थी। वक्ता और उसके आस-पास के नौजवानो ने बुरी नजर से अमिजीत को देखा। कॉलोनी के दो-तीन छोकरे मापस में एक दूसरे को धमकाने लगे, 'तुम चुप भी रहो।' कोई फिर कुछ नही वोला । अमिजीत वक्ता महोदय को सवोधन कर बोला, "आप को तो कभी देखा नहीं । आप क्या यही रहते हैं, मतलव इसी कालोनी में ?" . * १२४ उत्तराधिकार । "मैं कहां रहता हूँ, यह आप न भी जाने ती कोई फर्क नहीं पड़ता। इसके पहले मैं जानना चाहता हूँ, आप जमीन की नाप-जोख किस लिये करवा रहे हैं ? इन्हें यहां से हटाने का अगर ख्याल है तो-।" उनके वाक्य पूरा करने के पहले ही कोने से शंभूचरण की आवाज आयी, "नहीं, ऐसा कोई ख्याल उनका नहीं है । इनका जो कुछ ख्याल है, वह अपने हक में है।' "अपने हक में ?" ऐंठ कर भापणकतर्ता ने कहा, "आप से कहने को यही कहा गया होगा, मगर मैं कहूं कि वह सिर्फ आपके हक में होगा । आप उनसे मिल कर कॉलोनी का सत्यानाश करने में लगे हैं। आप मालिक के दलाल हैं।" स्वर विरोध और समर्थन में टकराने लगे और एक हलचल-सी मच गयी । वह सज्जन गला फाड़ कर बड़बड़ाने लगे । अभिजीत ने हाथ उठाकर उन सभी को शान्त रहने का इशारा किया । और स्वरों की टकराहट के शान्त होते ही जो सज्जन भाषण दे थे उनसे कहा, "देखिये हम आपको नहीं पहचानते । इनकी ओर से आप को बातें करने का क्या हक है, यह मेरी समझ में नहीं आता।" कॉलोनी के दो-तीन लड़के एक संग बोल उठे, "ये हम लोगों के नेता हैं।" "होंगे।" अमिजीत ने कहा, "मगर ये यहां के वाशिन्दा नहीं हैं।" "न सही।" विगड़ कर नेता जी बोले, "अपने इन रिफ्यूजी भाई-बहनों के अधिकारों की रक्षा का भार हमने उठाया है । ऐसी कॉलोनियों में जमींदार के बढ़ते अत्याचार को रोकना ही हमारा काम है। इनके अभाव-अभियोग बहुत हैं, जिन पर विचार करना जरूरी है।" और फिर धीमी आवाज में वोले, "आप से झगड़ा-झंझट करना हमारा मकसद नहीं है । मिल बैठ कर बात करना हम चाहते हैं।" अभिजीत कुछ पल चुप रह कर शान्त स्वर में बोला, "मेरा भी ऐसा ही ख्याल है । ये जब हमारी जगह में आकर रहने लगे, और इतने दिनों से रह रहे हैं, तो इनकी जो समस्याएं हैं, उसे हम और ये मिल कर ही मिटा लें । किसी बाहरी की जरूरत ही नहीं है।" इतना कह कर दूसरे पक्ष को विरोध करने का मौका न देते हुए अभिजीत अपने घर की ओर लोट पड़ा। + ११ फॉलोनी से कुछ दूर हट कर गंगा हठात दाहिने मुड़ गयी है। वायीं तरफ ऊंचों पाट है। दिन-दोपहर में बहुत-सी गायें चरती हैं । चरवाहे लड़के धपा चौकड़ी मचातें ते है-गुल्ली डंडा और कबड्डी खेलते रहते हैं । सांझ के बाद वहां व्याप जाता है मोश सन्नाटा । आस-पास कोई घर-द्वार नहीं है । किसी को बिना प्रयोजन आने की रत नहीं पड़ती। वही, एक छोटे से टीले पर शंभूचरण गमगीन बैठा या। भासमान पर चाँद नही था पर तारे बहुत थे । उनके क्षीण प्रकाश में नीचे की ली-सी धारा धूमिल नजर आ रही थी । शंभू अपने दोनों हाथों को घुटनों से जोड़ उसी पर ठुड्डी टिका कर कुछ सोच रहा था। शंभूचरण दर्शन नही बघारता न कविता लिखता है, न पढता है । प्राकृतिक प अवलोकन या अध्यात्म चिन्तन में उसकी रुचि नहीं है । वह सोच रहा था कॉलोनी बातें--'देश' त्याग कर आने के बाद से उसका ध्यान-ज्ञान और उसकी अपनी स्याएं सब कुछ कॉलोनी ही है । खास कर उस दिन की घटना, पंचायत के आफिस जो घटी । वह दलाल है, यह उसके दिल को मसोस रहा था। समर्थन में कोई दम था, विरोधियों का स्वर कही अधिक तीखा और पुरजोर था । और ये ही पिछले में 'शभू भइया' कहते अधाते नहीं थे। वह 'दलाल' है ! शंभू को हंसी आ गयी । इस हंसी मे पीडा की झलक पी.। ना कहने वाला उसका कौन है ? क्या है ? तीन माई है वह, मां और एक बहुन । परिवार । पर्याप्त जमीन-जायदात, पोखर-बगीचा, सब कुछ था। दोनों बडे भाई -खलिहान का काम देखते थे । शंभू को उन्होने स्कूल में पढ़ने को बैठाया था। शंभू पढना-लिखना सीख कर रजिस्ट्री दफ्तर में दलील लिखने का काम करने लगा था। एक बहाना था, असली मकसद था गांव में कहां क्या अभाव है, अगल-बगल उसकी । जरूरत है-इसके लिये दौड़-धूप करना । किसके ऊपर जमीदार ने बकाया खजाने लिये दावा दायर किया है, या कुडकी का हुकुम किसके नाम लाया गया है । इसकी |ना मर मिलनी काफी थी फिर तो जैसे-तैसे दो कोर मुंह में डाल कर बीस मील र की दौड़-धूप में लगना उसका काम था। इसके बाद वकील, मुख्तार-मुहरिर पेश- र, गवाह-सबूत, दलील-दस्तावेज की आफत-विपद मिटाने से लेकर, कैसे-क्या हो लिये बुद्धि खटाना । तीन-चार दिनो के बाद अधमरा होकर जब घर लौटता तब घर लोगों की बक-भक- -तुम्हे क्या, घर का खाकर गांव का बोझ लिये फिरते रहो। तुम्हारे कौन हैं जो बिना खाये-पिये वहां पड़े रहे, इससे क्या फायदा ? दो पैसे की तो कमाई नही इस काम में। शभू मुस्कराता रहता-कमाई तो घेले की नहीं । घर में दो आयें, यह दूर की बात, उल्टे घर की कमाई के सारे पैसे निकल जाते गांव की स्वयं काई में । फिर भी यह उसका नशा था । ऐसा कुछ काम फिर आ गया तो शंभूचरण दाबाद । भाई उबिया कर कहते-करे जो मर्जी । वे अपने ऐसे बिगड़े भाई को र से पाल रहे थे। मां इस कोशिश में लगी रहती कि कैसे उसे बाँधा जाये । चूड़ियाँ काने वाली की खोजबीन भी चल रही थी गुपचुप । - - १२६ उत्तराधिकार - - ऐसे में ही तूफान आया । सब तहस-नहस हो गया-धन-मन, माशा-आकांक्षा, एक जाति का संपूर्ण भविष्य । लात खाते-खाते शंभूचरण आ पहुँचा उस पार से इस पार । यानी पूरब से पंश्चिम, पहा से गंगा । वच गयी थी अपना कहने वालो में सिर्फ माँ। दोनों भाई लटेतों की लाठी से मारे गये, उनके बाल-बच्चे कहाँ कैसे खो गये । बहुओं का कोई अता-पता नहीं । वह्न को छीन कर ले गये उस पाड़ा के छोकरे । शंभू यदि घर में मौजूद होता तो उसकी भी गति भाइयों की ही होती। उस समय वह कहीं दूर गया हुमा था । जब दूसरे दिन लौटा तो देखा, मां बैठी छाती कूट रही है । पास-पड़ोस के गांव-जवार में जो लोग बच गये थे, वे आये । उसे घेर कर बैठे- एक झुंड में भिन्न-विभिन्न उम्र के औरत-मर्द, बच्चे-कच्चे। उन्हीं की तरह वह भी है निःसहाय, भटका हुमा। कभी मामूली संकटों में जिनका साथ देता रहा है, उन्हें ऐसे भयानक संकट में कहाँ छोड़े और कैसे ? सभी को साथ लेकर शंभू निकल पड़ा-जो होना है पहले हमारा होगा फिर तुम लोगों का, और हम क्या कर सकते हैं, इस समय । में माते-आते कितने ही और मा जुटे । जिन्हें वह न जानता था, न पहचानता था। जिन्हें कभी देखा तक नहीं, वे भी अपने होने का दम भरते हुए सामने आ खड़े हुए। संकट यादमी को एक बनाता है । वन के रिश्ते से भी इसका खिंचाव अधिक होता है। इस पार पहुंच कर भी शंभू एक भीड़ में उलझ गया । क्या जरूरत थी ? मां का हाथ थामे कहीं भी सिर छिपाने की जगह वह पा जाता और दो प्रारणी के लिये मोटा खाने, मोटा पहनने की व्यवस्था यासानी से कर लेता । किस बूते पर वह एक हुजूम को ठो रहा है ? आदत से लाचार जो है । इसके बाद के कई वर्षों का इतिहास बड़ा निर्मम है-यहुत कठोर । एक तरफ इतने लोगों के खाने-पहनने और सिर छिपाने की चिन्ता दूसरी तरफ जमीन पर टिके रहने के लिये संघर्प । खास नायव और उनके पीछे पुलिस का जोर । बहुत बाधा-विन्नी में भी इतनी बड़ी कॉलोनी बस गयी, इसके पीछे है शंभूचरण सरकार की एकनिष्ठ, अथक प्रयत्न, परिश्रम, धीर-युद्धि, संगठन की कुशलता । यह भी पतियाने जोग है कि कॉलोनी के लोग उसके कहे की कहते थे और किये की करते थे। मगर ऐसा नहीं होता तो अकेला वह कैसे क्या कर लेता! मत-मतांतर का सिर नहीं उठा, यह बात नहीं। लेकिन वह अन्त तक नुकता ही-'शंभू की जब यही इच्छा है तो ठोफ है', 'शंभू मइया जब कह रहे हैं तो और कहना क्या है ।' पूरी कालोनी का मन ऐसा ही था । अभिजीत के आने के पहले तक कॉलोनी का अहम सवाल था, टिके रहने का सवाल । संख्या के अलावे समी तरफ से वे कमजोर थे, शंगू यह अच्छी तरह जानता उत्तराधिकार । था। उसकी नीति थी, सहयोग की शभू यह अच्छी तरह जानता था । उसको नीति थी, समझौते को नोति । सख्या के बल पर लडाई मामूली बात थी। यह विवाद न उठा हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता । मगर वह शमू ही था, जो उसे दबाए रहा । उसका निश्चित मत था कि इससे तत्काल कुछ लाम होने के बावजूद अन्त मे नुक्सान ही होगा। यह तो विरोधी के हाथो हथियार पडाना है । इसलिये उसकी 'पालिसी' रही बात-चीत, मिल-जुल कर, एक-एक कर, अपनी मांग मनवाते जाना, जिससे हिलता-डुलता खूटी- खम्मा जम सके, जिस जमीन पर पैर लडखडा रहे हैं, वह जम जायें। अभिजीत के आने के बाद से पथ कुछ सुगम हुआ । इसका आमास शंभू को मिला था वह जानता थाकि इस आदमी की नसो मे जिस तरह जमीदार का खून है, उसी तरह यह हृदयहीन नहीं है एक हृदय है, जिस पर वश की छाया नही पड़ी है । यही कालोनी के लिये गनीमत है। शमू दुर्गा मोहन से मिला । इस भूतपूर्व शिष्य के उपर उनका प्रभाव प्रबल है यह सहज-सत्य था। उनसे मरोसा पाने के बाद सीधे 'मालिक' से सजोग उसने बैठाया ! देखा, एक जगह पर वे एक हैं । उसकी तरह वे भी शरणारियो के कल्याण के इच्छुक हैं, कालोनी मो आदमी के रहने लायक बनाना चाहते है । दोनो की दृष्टि मे जो फर्क था वह एक के लिये जो मुख्य है, दूसरे के लिये गौण है । लेकिन यह सवाल उठाने पर इसी मे सारा समय बीत जाना, और कोई काम ही आगे नहीं बढता । इससे अच्छा है वे जिस राह चलें, अपने से उसे मान ले-शभू का विचार यही रहा । इतने दिनो तक जमीदार से उसका विरोध था, अब हो गया सहयोग । ऐसे ही मौके पर मैनेजर की नियुक्ति हुई । यो यह ऐसी कोई खास बात नहीं यो । उसका दफ्तर है,तरह-तरह का झझट-झमेला है, तो एक मैनेजर होना ही चाहिए। पर यहां जो आई वह एक पुरुप मैनेजर नहीं, एक 'लडकी' है, यानी यह एक आश्चर्य- जनक ज्वलन्त 'घटना' है। जब जमीदार भऔर उनके कार्यकर्ताओ से हो जो कुछ समझना-समभाना होता था इसका मार शभू के ऊपर था तो वह अकेले ही आता-जाता था। इसे लेकर किसी का सिर नही दुखता था। अब पूरी कॉलोनी आगे आ गयी है। सिर्फ जवानो की महली ही नही, बुजुर्ग भी रस ले-लेकर बात-बात मे चर्चा करने लगे हैं । अनैले एक छोकरी के सग-साथ बैठकर शभू भी नि सकोच बाते नहीं कर पाता था। उसी ने प्रस्ताव रखा कि कालोनी के मामले में एक प्रतिनिधि-मडल की नियुक्ति हो तो वैसा रहे ? सभी ने इस बात को जैसे लोक लिया। कई दिनो तक प्रतिनिधियो के चुनाव की बैठक हुई। पहले जो सूची बनी वह इतनी लम्बी थी कि मैनेजर के कमरे की कौन कहे ऊपर का हाल भी छोटा पडता ! काट-छांट करने पर झमेला उठ खडा होता । कोन रहे और किसका नाम काटा जाय, इसे लेकर मयानक बहस चली । सर्वसमाये उत्तराधिकार .१२८ कोई सूची वन तो पायो नहीं, उल्टे भीतर ही भीतर जो पेंच, गुट-परस्ती, कहा-सुनी चल रही थी वह मुखर हो उठी । एक दल का दूसरे दल का मुंह देखना पाप । उघर आफिस से बार-बार बुलावा आता । अभिजीत तरह-तरह की स्कीमों में उलझा था। ताकि इनमें से किसी एक को अन्तिम रूप दिया जा सके और उसे लेकर इन लोगों से खुल कर वात हों। जो कुछ होगा वह मैनेजर के ही मार्फत । कई दिनों तक प्रतीक्षा करने के बाद शंभू को अकेले ही जाना पड़ा, सिर्फ एक ही दिन नहीं, दो-चार दिनों का अन्तर दे-देकर कई बार । उस समय अभिजीत अपने काटेज-स्कीम में लगा था । शंभू की उसे हर कदम पर जरूरत थी। कॉलोनी के बड़े-बूढ़े-~दोनों तपके को दिलचस्प चर्चा का मौका मिल गया । पहले दबी-दवी, शंभू के परोक्ष में, फिर प्रकट रूप में, फिर तो विलकुल मुंह पर- 'कहाँ दौड़े जा रहे हो शंभू भाई ? शायद वहाँ ? अच्छा है ।', 'कैसा कट रहा है सुना है, खूब मजे में जम गये हो। कुछ मिलने मिलाने को है या-' 'मिलने' का अर्थ गंभीर था। शंभू इस कान से सुनता और उस कान से निकाल देता। इन बातों को कोई खास महत्व नहीं देता। पर धीरे-धीरे वह समझ गया, कहीं कोई ऐसा चक्र चल रहा है जिसे नजर-अन्दाज नहीं किया जा सकता। छोकरों का एक गुट कुछ दिनों उसके प्रतिकूल था। इस कहा-सुनी से उसे प्रश्रय मिल रहा था। कुछ बड़े बुजुर्गों में भी इसका असरपड़ रहा था। कॉलोनी के नौजवानों में असंतोष बढ़ रहा था, इससे शंभू अनजान नहीं था। इसका प्रमाण भी प्रत्यक्ष नजर आ रहा था। सव कुछ अनायास पता चल रहा था। इससे बचना चाह कर भी वह बच नहीं सकता था। आग लगी है तो आँच उसे सहनी ही पड़ेगी। इसके लिए उसे कोई गम भी नहीं। लेकिन पछतावा जरूर है । ये सभी जब आये तव इनके दो मुट्ठी अन्न के लिए वह कभी पीछे नहीं हटा, दूसरे की जमीन पर अथक परिश्रम, स्टेशन से इस गांव-उस गांव वोझा ढोना, शाक-सब्जी, गली-गली सिर पर लेकर वेचना, सड़कों पर दुकान लगा कर बैठना, शहर में दो-चार घरों में नौकरी करना जो अक्षम और कमजोर थे, उनमें से कुछ भीख मांगने लगे थे । बूढों के लिए यही सब से सहज उपार्जन था । इन सब बातों से वह अवगत है। उस समय जो बच्चे थे, बाज जवान हो चुके हैं। वे ऐसे काम करने में हेही समझते हैं । इनमें से कुछ तो पढ़ने-लिखने भी लगे हैं। चारो तरफ का रंग-ढंग देख फर नांवे सुली हैं, वे दूसरे तरह का धन्धा चाहते हैं । मिहनत से डरते नहीं, मगर खेत मजूर, फुली, फेरीवाला या घरेलू नौकर होना इन्हें पसन्द नहीं। मिल-फैक्टरियों का करता पोतना मंजूर है । मगर नाम के साथ फोटर, टर्नर, मेकनिक, इलेक्ट्रिशियन या - उत्तराधिकार .१२६ ऐसी ही कुछ पदवी जुडी हो। कुछ ने ऐसा काम घूम-फिर कर जुगाड भी कर लिया, लेकिन बहुत से बेकार भी हैं। यह परिवर्तन औरतो मे भी आया। लडकी या जवान-जहान अपनी नानी- दादी की तरह घर-घर चौका-वासन नही करेगी, किसी को रसोई नहीं बनायेंगी। उपले नहीं पायेंगी, लडके नही खिलायेंगी। तो करेंगी क्या मई, नर्स बनेंगी, सिलाई- बुनाई, फैक्टरियो मे महिला विभाग मे, दफ्तरो मे, दुकानो मे नौकरी करेगी। किसी सम्पनी की प्रतिनिधि बन कर घर-घर मे स्नो, पावडर, मजन और अचार-वचार लेकर बेचना भी मजूर है । खटने से मुंह चुराना पाप है, मगर इस खटने मे 'मान सम्मान' होना चाहिए। कौन मिटाये नौकरी की यह भूख ? कहां है काम कालोनी के जव उजडने की स्थिति है तर यहां के लडके-लडकियों को यह कौन समझाये । वे व्यग्र हो उठे थे। व्यग्रता को कोख से जनम लेती है उच्छृन्खलता और उजड्डपन । ये मां-बाप, चाचा- भाई को मानते नहीं । कुछ कहा गया कि झिडक दिया। कभी इन नौजवानो पर शमू का प्रमाव था खूब, वह अब घटने लगा है। शमू का भरोसा अभिजीत है । उसके हृदय है वह इनके लिए बहुत कुछ करले को इच्छा रखता है। लेकिन इसके लिए चाहिए समय, ववसर । रातोरात सभी सम- स्याओ का समाधान सभव कैसे है । यही अपने लोगो को समझाना-युभाना मुश्किल हो उठा जमीदार से उसके रफ्त-जफ्त को भी बहुतो ने सदेह की दृष्टि से देखा । कौन जाने भीतर ही भीतर यह शमू क्या गुलगुला पका रहा है । प्रकृति को रिक्तता असह्य है। कालोनी की जिन्दगी से शभू जैसे हटता जा रहा था, वैसे ही दूसरे लोग खाली जगह मे भरते जा रहे थे। वाहरी तत्व देखने-सुनने मे मिन्न, पहनने-ओढने मे सभ्य, वावू तपके के लोग । शुरु मे ऐसो को ये लोग अपने आगे फटक्ने नहीं देते थे पर वे लोग लगे रहे, आते-जाते रहे । दो-दो चार-चार का गुट बना कर । पाठ पढाने लगे। हमारा कोई स्वार्थ है, आप को भलाई के लिए ही हम थाते हैं । इतने दिनो तो जमीदार और सरकार का मुंह देखते रहे । क्या किया उन लोगों ने ? अब हमारी बाते सुनिए, हमारी पार्टी का फार्म भरिए, आइये, एक होकर मैदान मे कूद पडे 1 देखिये हम क्या से ध्या कर देते हैं । भविष्य के सपने मांखो मे सजे। सब से बड़ी जरूरत है--काम । काम, काम क्या वडी बात है ! ऊधमी लडको के लिए इतना लासा बहुत था। छोटे-माटे नेता का भी आगमन होता कमी-कभी। उनके लिये पचायत घर में मीटिंग होती । कहते, 'कौन कहता है आप उपेक्षित हैं, शरणार्थी हैं ? आप देश की सम्पदा है । आप लोगो के कल्याण मे ही देश का कल्याण छिपा है । यह सकल्प लेकर हम आय हैं।

१३० उत्तराधिकार सभी खबरें शंभू को नहीं मिलतीं । कुछ उड़ती खबरें वह पा जाता। ऐसे कल्याणकारियों पर उसे भरोसा नहीं था । आज से भी भयानक दुर्दिन में वह इनसे भी बड़े-बड़े नेताओं का दरवाजा खटखटा चुका है। किसी ने आँखें खोल कर देखा तक नहीं, फटकार दिया; 'हम क्या करें । ओकलैंड हाउस जाइये । आप की पूरी जिम्मेदारी गवर्नमेंट के ऊपर है।' किसी-किसी ने ऐसा भी कहा-"आये क्यों अपना देश छोड़- फर?" आज शरणार्थियों के लिये जिनकी छाती फटती है, उनका भी जरूर इसमें कोई स्वार्थ है । छोकरों को भी वह यह समझाने का जतन करता रहा है कि समझ-बूझ कर फूंक-फूंक कर कदम उठाओ । इसका फल उल्टा ही हुआ । उस पर वे ही संदेह करने लगे और अन्त में उसे सुनना पड़ा-वह जमींदार का दलाल है। पास ही कहीं झुंड के झुंड सियार बोल पड़े । बहुत रात हो गयी है । नव चलना चाहिए। मगर उठने की हिम्मत नहीं हो रही है। उसी कालोनी में लौट कर जाना होगा, जहां वह आज उपेक्षित है । जव कि वहाँ के लिए, वहाँ के सभी लोगों के लिए उसने कुछ उठा नहीं रखा। मां अब तक जगी ही बैठी है, हो सकता है वह घर-बाहर एक कर चुकी हो । वह कह कर नहीं आया था कि देर से लौटेगा, अब ढेर सारी वफनी सुननी होगी। मां वपना सब खोकर उसे कैसे खो दे! गंभू ने लौटते हुये सोचा, माँ को लेकर कहीं चला जाये । अंडमन या दंडकारण्य फिर एक नयी जिन्दगी शुरु हो, नये लोगों के संग । यही ठीक होगा। जिनका विश्वास उस पर से उठ गया है, जिनकी आँखों में माज- "कोन है वहाँ ?" शंभू चौंका । कुछ लोग सामने से चले आ रहे थे। नजदीक आये तो उसने देखा कालोनी के तीन छोकरे थे। हर एक के हाथ में सोंटा। एक ही स्वर में बोल उठे, “ शंभू भइया !" फिर एक ने कहा, "इतनी रात को कहाँ गये थे, हम लोग बूंढ़ते रहे, यहाँ-वहाँ ।" गंभू का मन पलटा, इन्हें छोड़ कर कहीं जाया जाय भी तो कैसे ? उसे यहीं रहना होगा । यहीं ! १२ दुर्गा मोहन जी नहीं हैं। अपने बड़े लड़के से मिलने रानीगंज गए हैं। इधर स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था। यों कोई खास बीमारी नहीं थी, अन्दर से हिम्मत उत्तराधिकार गुम हो गयी थी। बेटी से कुछ बताया नहीं, लेकिन वह समझ गयी थी और वह घबरा गयी थी । दुर्गा मोहन जी ने समझाया-बुझाया कि उन्हे कुछ ऐसा नहीं हुआ है । अजर-पजर भड रहा है। उम्र की एक अवधि होती है न? उसे धोखा कैसे दिया जा / सकता है। यह तर्क व्यर्थ हो गया । लडके आए। बडे लडके का घर कलकत्ते में है, वहाँ वे जाने को तैयार नहीं हुए । किसी काम के सिलसिले मे जब गये थे तब श्याम बाजार की अली-गली पार करते हुए सांस फूलने लगी थी। 'मझले' को टाल नही सके । रानी- गज खुली जगह है, दूर पर पहाड, प्राकृतिक छटा, हवा-पानी भी माफिक है। जाना पडा। मास्टरजी की अनुपस्थिति अमिजीत को बुरी तरह खल रही थी। कालोनी के भामते में उसकी योजना मे वह शुरु से हैं। वह स्वय उनसे खुल कर राय लेता रहा है। उन्होंने उसे उत्साहित किया था । किसी-किसी बात मे मतान्तर होने के बावजूद भी अमिजीत उनकी हर बात मानता रहा है । अपने लिए व्ह बहुत साफ है--विद्या-बुद्धि भगवान ने कुछ दी है, पर व्यावहारिक ज्ञान के मामले में उसकी दौड कितनी है वह, यह जानता है । और कुछ करने के लिए यह अनियार्य है। साथ ही मानव चरित्र का शान और अनुभव भो, इस दृष्टि से उसका ज्ञान और अनुभव बहुत सीमित है। इसके लिए मास्टर साहब पर निर्भर करना उचित था। वे जीवन वे लवे दिनो तक यादमी को आदमी ही तो बनाते रहे हैं । दुनिया में बहुत कुछ देसा-सुना व गुना है। दुर्गा मोहन ने भी जब कि रिटायर्ड होने के बाद निष्पह हो चुके थे, फिर अपने इस परम स्नेही हृदयवान छात्र के बुलावे को अस्वीकारा नहीं। इसे पहले जब देखा था तब वह एकदम बच्चा था। बहुत वर्षों बाद जब फिर देखा तब उन्होंने महसूस किया कि दुनियादारी के मामले मे वह आज भी बच्चा ही है। जन्मा जमीदार के घर लेकिन बात-विचार जमीदारी वाला नहीं है और न ही वह इसे पा सका । मन का गदन ही कुछ और है । हृदय है, आदमी को दु ख-दर्द मे देखकर दुखी होता है । जितना हो सकता है उसे दूर करने की सोचता है, पर उपाय ढूंढते हुए असहाय हो उठता है । बहुरानी का पत्र पा कर जब वह यहाँ आया, बेमन से ही आया। कुछ दिन बीते कि वह अपने पुराने जीवन में पहुंच गया। यहां की जो बड़ी समस्या है, यह जबर दखल कॉलोनी, उसके हल के विषय में वह सोचता ता रहा पर अपने को आगे लाने मे हिचकता रहा । लोगो से जितना जैसा करा लिया जाये। मैनेजर रखने का उद्देश्य भी यही था। इसके बाद दुर्गा मोहन जी ने गौर किया था। इन शरणार्थियों ने उसकी चिन्ता को परिधि मे बहुत जगह घेर लिया है। इनके लिए कुछ करना चाहिए, ऐसी हालत में इतने सारे लोगो को छोडा भी नहीं जा सकता-उसके मन मे मह माव, धीरे जड जमा देठा, जिसे वह खुद भी समझ नहीं सका, पर दुर्गा मोहन जी के

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उत्तराधिकार गढा भी नहीं जा सकता। किसी खटके अटके मे गगा-स्नान के पात्री जैसे किसी धर्म- शाले में जा टिकते हैं, यह भी बहुत कुछ वैसा ही होगा । वर्ना वह मी करके देख लिया जाता । पर ऐसा करना समव नहीं भी हो सकता है, इसके पीछे एक बड़ा कारण है। अमिजीत ने कारण उस वक्त नहीं बताया था। लेकिन दुर्गा मोहन जी ने अनु- मान लगा लिया था, इसलिए बिना कुछ पूछ बैठे रहे । अमिजीत कुछ क्षण नुप रह कर धीरे-धीरे वोला,"यह मकान मेरे लिये कोई महत्व न रखता हो किन्तु बहुरानी की दृष्टि में इसका एक अलग ही नक्शा है । पहले मैं यह नहीं जानता था, बाद में पता लगा कि इस सूने मकान के कमरे, दर-दरवाजे, सहन-सीढी, यहां तक कि दर-दिवाल समी उनसे वा करती हैं और वे सव से बाते करती हैं । एक दिन की बात है, आप को सुनाता हूँ। शाम को घूम-फिर कर मैं लौटा तो देखा कि एक अन्धेरे कमरे से छाया की तरह वे निकली । मुझे उन्होंने देखा नहीं और वे एक दूसरे कमरे में जा घुसी। इस तरह पूरे मकान मे चक्कर काटती रही फिर धीरे-धीरे सोदियो से नीचे उतर गयी।" दुर्गा मोहन कुछ देर स्तब्ध बैठे रहे । फिर वील, "मुझे मालूम है । हलधर ने बताया था। कभी-कभी वे इसी तरह चक्कर काटती रहती हैं । इस मकान से वे सारी जिन्दगी चिपकी रही हैं --हार हुई एकजिस्टेंन्स को, उनको नहीं । वे तो उसी मे जीवित हैं।" सभी की दृष्टि तो समान नहीं होती। सभी समस्याओ को सभी अपनी तरह से देखते हैं । एक के लिये जो सही है, दूसरे के लिये गलत, अर्थहीन । लोग जो भी सोचे, अभिजीत अपने विचार से इस निश्चित निर्णय पर पहुंच चुका था कि उसको कॉलोनी में रहने वाले लोगों की पहली जरूरत है, सन्य ढग से रहने के लिए घर । यही कभी सबसे भयानक कमी है। हो सकता है, उसकी इस धारणा के पीछे उसको खास मानसिकता हो, जिसकी बुनियाद सहज, उन्मुक्त और सभ्रात जीवन यापन रही हो यो वह ऊपरी तपके का आदमी ठहरा । रोटी-कपडे की कमी से कमी वास्ता नही पहा । उसके कमी की यत्रणा वह बुद्धि से, हृदय से अनुमव करता रहा, जीवन मे नही । भूख को उसकी अनुभूति में अनुभव का हाहाकार नहीं है । कारण जो मो रहा हो, ये भूखे हैं, गगे हैं, इसे महत्व न देकर उसने इनके उठने-बैठने को गैरत मिटाने को ही पहले सोचा। इस बारे मे वहूरानी से पहली बार जो बात हुई थी,उन्होंने अपनी तरफ से कुछ नहीं कहा था मोर जब उन्हे लगा कि इस दिशा मे उसका मन बहुत आगे बढ चुका है, तो फिर इस पर कुछ सोचने-विवारने का जतन नहीं किया, जरूरत भी नहीं महसूस की । उठे जो अच्छा लगे, करे इस घराने के मालिक-पुस्तार हमेशा स्यालो मे ही खोये रहे हैं, यह भी तो उन्ही का वशधर है । तो यह भी उसी राह चले । वे तीज त्योहार, जातरा महफिल मे रुपये पानी की तरह बहाते रहे, यह शरणार्थियों के पीछे - किसी एक में वह लगा रहे यही खुशी की बात है । जो खुले आकाश में म पा, अब मायद बंध सके । अभिजीत ने जब उनसे जानना चाहा–'तुम्हारा ख्याल क्या है ?' बहूरानी ने क तो है, करो।' बस इतना ही कहा था । हो सकता है उन्होंने मन ही मन सोचा -यह वस्ती उनकी आंखों से हटे, अच्छा ही है । अभिजीत ने जिसे 'कांटेज' का नाम या है, बनेगें उस तरफ । खास महल के दूसरे मंजिल की खुली छत पर खड़े हो कर गा का दर्शन किया जा सकेगा। यहां से वहाँ तक टूटे महराये छप्पर और ढेर सारे गन्दे लोग दृष्टिपथ छेक कर खड़े नहीं रहेगें। शरणार्थियों के लड़ाई-झगड़े, गाली-गलोज से कानों को राहत मिलेगी। बहूरानी से जो कुछ उसने कहा था, वह सब निहार को बताने की उसकी इच्छा थी पर आगे चल कर इस बारे में ऐसी कोई उत्सुकता उसमें नहीं रही । ऐसी बातों के लिये एक अन्तरंग वातावरण होना चाहिए । निहार और उसके बीच यह अन्तरंगता पैदा नहीं हो सकी थी। दोनों में किसी ने भी इसके लिये चेष्टा नहीं की । सहानुभूति और सौजन्य में कोई कमी न थी, फिर भी संबंध एक तरह से 'आफिसियल'-सा ही होकर रह गया । अमि ने यह मान लिया कि वह अपने पद का अनावश्यक फायदा उठा रहा है । 'मालिक' होने की दिक्कतें बहुत हैं । खास कर जव नीकर लड़की हो और जवान लड़की। और उस ओर से भी विनय के अलावा और कुछ न मिलता हो । जो कहा गया सिर झुका कर मंजूर । कुछ ऐसी वातें, काम के सिलसिले की, जिसे किये विना नहीं चलता, इससे अधिक वह कभी वोलती ही नहीं । अभिजीत भी कम नहीं है । मैनेजर और मालिक का जैसा सम्बन्ध होता है, उससे रत्ती भर भी इधर-उधर नहीं होता। निहार के लिये उसका यह मालिक शुरू से ही जटिल बना हुआ है । वात-चीत में, व्यवहार में, यों जितना सरल है उतता ही शालीन, वनावटीपन जरा भी नहीं। फिर भी कुछ ऐसा उसमें होता है जो अपने बीच की दूरियां दोनों को ही महमूस फरा देती है । आये भी कम दिन नहीं हुए, रोज न सही, प्रायः ही मेंट, मुलाकात, बातें होती ही। कभी उसके कमरे में, कभी उनके कमरे में, बिना बुलाये कभी वह खुद चले आते हैं बैठते हैं वे उसकी छोटी मेज की दूसरी मोर । कभी-कभी कुछ दिखाने या पन पर दस्तख कराने की गरज से उसे उनसे बहुत करीव होकर खड़ा भी होना पड़ता है। मगर उन्होंने कभी भीतर-भीतर भी अनुभव किया हो इसका आमास ही नहीं मिला । उस उन्न की एक लड़की के लिये अनुग्रह तो दूर की बात, तनिक उत्नुकता भी उनमें नहीं ऐसे इंसान से जिनता हो सके उतनी दूर अपने को रखने के सिवा निह लिये चारा ही क्या था? इसके लिये अगर उसके मन में अहम की पतली सी रेखा जाये तो इसमें भी अचरज की कोई बात नही । किसी पुरुष से इतनी तटस्थताओं - उत्तराधिकार सीनता की आशा मला कोई लडकी कैसे करे ? हृदय चीणा के तारो के झकार से न सही आंखो की पुतलिपो पर खिंची सूक्ष्म-रेखा के द्वारा आरोप करना क्यो नही चाहेगी? इस कोशिश में अगर वह सफल न भी हो सकी पर मालिक को सहानुभूति जीत चुकी थी, जिसे कहा जा सकता है एक तरह का स्नेह, वह पा रही थी। विधाता ने अजव ढंग से इनका मन-मिजाज गढा था पर अन्ततः जहाँ ला खडा किया वहां वह खप नहीं पाए । ये इस जमाने के इसान नहीं हैं। यहां की समस्याओ को समझ ही नही पाते । कदम-कदम पर असहाय हो उठने हैं । यह सोच कर निहार जितना हो सकता था उतना अपने मालिक को समालती-सहेजती थी। पई बार तो उनका सोचा-विचारा इतना ऊटपटांग होता, कुछ ऐसा करने को कहते, जिसका कोई मतव नहीं होता, बल्कि अपना नुकसान होने की समावना उसमे निहित होती । वाज वक्त तो काम करने वाले झंझला उठते । निहार उन्हे समझाती बूझाती, 'जब उनकी मर्जी यही है तो जितना जो हो सके उतना हम लोगो को करना ही चाहिए।' यह कहते हुए उसे हैसी भी आती- ये धेचारे उसे पहवानते ही नहीं । उनके लाभ-हानि को ही ये बडा बना कर देखने के अभ्यासी हैं, उसके भीतर का आदमी कितना बड़ा है, यह वे देख ही नहीं पाते। अपनी 'कांटेज-स्कीम' को जब अभिजीत ने उसके हवाले किया तव निहार उसे मन से मजूर नहीं कर सकी । उसने सर्वेयर शीतल वाबू की तरह खुल कर विरोध नहीं विया । लेकिन इसके लिये इतना आगे बढने मे कोई तुक उसे नजर नहीं आया । इससे विस्थापितो की असली समस्याओ का निराकरण कितना हो सकेगा? शभूचरण से बातें कर वह जो समझ सकी थी वह यही कि वे खुद इतता नहीं सोचते। जिसे जमीन पर वे दखल जमा कर बैठे हैं, उसका अधिकार मिल जाये, बस वे सुश । जवकि उनकी मांगो का कोई अन्त नहीं हो सकता, मगर सब पूरी भी नहीं हो सकती, इसे भी वे अच्छी तरह समझते हैं। इसके अलावे जबर्दस्ती उपकार करने को लोग साधारणत सदेह की नजर से भी देखते हैं । खास कर ये लोग । मार खा-खा कर, वहाँ से यहाँ, यहाँ से वहाँ बसते- उजडते रहने पर उनका स्वभाव सदेही हो गया है । उन्ह जव यह कहा जायेगा कि तुम लोगो के लिये बहुत अच्छा पर वनवाया जा रहा है-तब वे आपस मे एक दूसरे का मुंह देखने लगेगें-आखिर बात क्या है ? दया मे पिघल उठे हैं, ये यह तो अनहोनी बात है। कांटेज बनाने के पहले तो उनकी कुछ झोपड़ियां तोडनी ही होगी और इसी समय कुछ गडबडो मचेगी। वे लोग अपने हाथो बनाय-वसाये घरो को कुछ दिनो के लिये भी छोड फर हटना नही चाहेगे जब स्कीम मे इसकी भी व्यवस्था है । उसका उपयोग कितना काम में आयेगा, यह कहना मुश्किल है । यह स्कीम शमूचरण की सलाह से बनी है, उसने समर्थन एव सहयोग का वायदा किया था। पर अव तो शमू का कालोनी में इतना प्रभाव भी नहीं रहा। वहाँ उसके विरोध मे एक गुट तैयार हो गया है । इसको खवर शायद यमिजीत को न हो पर ?

३६ शीतल बाबू नहार यह अच्छी तरह जानती है। निहार ने स्कीम में हाथ लगाने के पहले मालिक से सलाह-मशविरा करने का निश्चय किया था। सोचा था को जिस दिन मिलने का पत्र लिखने का आदेश आया, उसी दिन वह बात छेड़ेगी पर यह संभव नहीं हुआ। हो सकता है इसका कारण उसके मन में दवा अहंकार हो- उन्होंने जव खुद कुछ नहीं कहा, तो मुझे क्या गरज ? या ऐसा भी हो सकता है - यही जब वे चाहते है और इतना आगे काम वढ़ा चुके हैं, तो अव रोकने पर उनके मन को चोट लग सकती है। इसलिए उनकी इच्छा ही पूरी हो, कर्त्तव्य भी यही है। और उस दिन की वारदात ! निहार आयी तो कर्मचारियों ने उसे बताया, कुछ बढ़ा-चढ़ा कर ही । फिर भी इतना तो समझ में आया ही कि जिनके लिए वे वेचैन हैं, वे स्वयं अवरोध बने हुए हैं । हो सकता है इसके जड़ में बाहरी प्रभाव भी हो, न भी हो, पर आशंका तो इसकी है ही। निहार को आशंका तो धी। उनी समय यदि वह सावधान कर देती तो हो सकता है वे जरा इस पर ठहर कर विचार करते । जिस चोट से उन्हें बचाने की गरज से वह उनके पास नहीं गयी, उससे कहीं गहरी चोट में वे पड़ गये। किसी के बिना कहे ही निहार यह अनुभव कर रही थी कि श्रीमान बहुत शहता हो गए हैं । ठीक भी है । मगर वे रुक जायेगे ऐसा नहीं लगता । मन जितना भी कोमल क्यों न हो, एक दृढ़ता भी उसमें है, जिसका आभास मिलता रहता है। तभी तो उस दिन इतने लोगों के विरोध के बावजूद भी डटे रहे। हटे नहीं। उनके नेता को सामने ही तन कर कह माये, 'ये मेरी जमीन में आ बसे हैं । इनकी जो समस्याएं है उन्हें हम और ये मिल कर मिटा लेगे । बाहर के किसी के बीच में पड़ने की जरूरत नहीं । यह सव निहार ने अपने कानों नहीं सुना। वहां वह उपस्थित नहीं थी, समय तक दफ्तर पहुँची ही नही थी । जव आयो तो लोगों से सुना। यहाँ के मला कर्मचारी; प्यादे-कमकर सभी ने वडे गर्व से उसे सुनाया। कहा, 'इतने दिनों मालिक को मुंह से लोगों ने जमीदार के बोल सुने । रोयाव देखा अपनी मांखों । ही तो होना चाहिए।' यह जमींदार का गर्व था या कुछ और निहार नहीं जानती। इस घ स्टेट के मालिकों का बखान वह मुन चुकी है। अमिजीत की नसों में उनकी फा दम्न न होने पर भी उनकी अमिजात्य का भाव पड़ा रह गया हो। जनजाने फा प्रभाव उस दिन प्रकट हुआ हो-'ये मेरी जमीन में मा वसे। इनकी जो उन्हें हम और ये मिल कर मिटा लगे । बाहर के किसी की जरूरत नहीं। प्रतिपालन की भावना काही जाए तो भी इसमें निहित है एक 'मैं'।

उतराधिकार निहित जो भी हो, अमिजीत का यह रुख निहार को माया था । उसमे पौरुप का गर्व है, यह भीतर ही भीतर मान कर बिना प्रशसा किए वह रह नहीं सकी। इस घटना के बाद कई दिनो तक मालिक से मुलाकात नहीं हो सकी। उन्होंने भी उसे नहीं बुलाया । निहार को भी ऐसा कोई काम नहीं पड़ा, जिसे लेकर वह उनके पास जाती। उस दिन वह जान-बूझकर ही दफ्तर देर से आई। कुछ मिनट बाद हलधर आया और बोला, " छोटे बाबू जानना चाहते हैं कि आप क्या अभी उनसे मिल सकती है ?" "वे कहां हैं ?" "अपने आफिस मे।" "चलो, आती हूँ।" दरवाजे पर वडा-सा पर्दा भूल रहा था । निहार पर्दे के बाहर आ सडी हुई। जब कि वह भा रही है,यह खबर पहले ही भेज चुकी थी फिर भी मौतर जाने मे उसे कुछ हिचक हुई । इसी क्षण हवा के झोके से पर्दा हटते ही नजर आया, सेक्रेटेरियट टेबुल के पीछे रखी अभिजीत की कुर्सी खाली पड़ी है। अभी-अभी तो लघर ने कहा था कि छोटे बाबू कमरे मे हैं, वे इसी बीच चले कहाँ गये । वह खडी-खडी सोच रही थी, कि वह लौट जाये या रहे कि तभी अन्दर से आवाज आयी, "आ जाइये।" निहार के अन्दर आते ही कोने की आराम वुर्सी पर से अभिजीत उठ खडा हुमा । अपनी कुर्सी की ओर जाते हुये उसने कहा, "वैठिये।" आज के पहले इस कमरे मे आरामकुर्सी निहार ने नही देखी थी । इधर कई दिनो से वह यहां आयी भी नहीं थी, इसी बीच यह लाई गयी होगी। हो सकता है, पहले से ही पडी हो । कमी-कमी काम के बीच मे आराम करने की इच्छा किसकी नही होती- चलो जरा टांगें सीधी कर ले या बदन ढीली कर ले । इसीलिए यह आराम कुर्सी लाई गयी हो। यह तो सहज मे ही सोचा जा सकता है। निहार को इस क्षरण लगा कि वर्तमान मानसिकता से इसका भी कोई लगाव है। कभी भी अभिजीत ने किसी वजह से मैनेजर को बुलवाया है तो काम की यात शुरु करने से पहले उसका कुशल-क्षेम पूछना नहीं भूला है। कभी-कभी यह भी जानना चाहा है-उसे कोई दिक्कत तो नही है या कैसा महमूस कर रही है ..। पर आज यह सब कुछ नही, आते ही पूछा, “उस दिन जो कुछ हुआ उसके विपय में कुछ आपने सुना या नही ?" कत्र क्या हुआ, क्या नहीं इसका बिना जिक्र किए इस ऊटपटांग प्रश्न का उनर मी निहार ने दिया, "सुना ।" यह तो वही जाननी थी कि इधर कई दिना मे जो कुछ हुआ है वही उसे चैन लेने नही दे रहा हैं । फार्म-६ ।

। ३८ - - निहार सामने की कुर्सी पर बैठी थी। अभिजीत मेज पर जरा भुक कर उसकी ओर देखते हुए बोला, "अच्छा आप बता सकती हैं ये हैं कौन ?" निहार ने गर्दन हिला कर कहा, "नहीं, मैं किसी को नहीं जानती, मगर इतना पता है कि ये किसी राजनैतिक दल के लोग हैं।" "यह तो मैं भी समझता हूँ, जब कि यहाँ की राजनीति से मैं बिल्कुल अनभिज्ञ हूँ । लेकिन इतने दिनों तक ये कभी नजर नहीं आये।" "जरूरत नहीं थी, नहीं आये।" "यह भी कोई बात हुई ! इनकी तो बहुत जरूरत होती है।" "सब से उन्हें क्या लेना-देना, उन्हें तो अपनी जरूरतों से मतलब होता है।" अभिजीत के आगे निहार की यह बात स्पष्ट न हुई, इसका पता अभिजीत की मोखों से चला। इसलिए उसने अपने कथन को और अधिक स्पष्ट किया, "दिन तो बहुत हो गये, अब इनका नाम वोटर लिस्ट में लिखवाने का अवसर जो आ गया । चुनाव भी सामने ही है । इतने वोट अगर मुट्ठी में हो जाये तो फिर क्या !" "तो यह बात है ? ठीक है, लोग जिसे चाहें वोट दें। हमें कुछ आपत्ति नहीं मगर वे मेरे कामों में रुकावट क्यों डाल रहे हैं ? इन असहाय लोगों को मेरे विरुद्ध क्यों खड़ा होने की भूमिका रच रहे हैं।' निहार ने फौरन कोई उत्तर नहीं दिया। वह समझ गयी कि ये यहाँ की ही राजनीति नहीं राजनीति ही नहीं समझते। ये यह भी नहीं जानते कि राजनीति का धर्म है असंतोप पैदा करना, लोगों को आतंकित तया विक्षुब्ध बना कर अपना मतल साधना । अंग्रेजी में जिसे कहा जाता है Fishing in troubled water, यही क्षमता दखल करने और विस्तार नीति को फैलाने का सरल तरीका । वह सब अगर वह कहती तो अभि को लगता कि वह भाषण दे रही है । लिए वह चुप रहो और अभि उत्तर में कुछ सुनने के लिए उसका मुंह देखता रहा तो कहना ही पड़ेगा। कहना न पड़े इसके लिए वह साफ बोली, "मैं कुछ न. सकती। पर लगता है वोट पाने के लिए जो कुछ करना होता है, वे वही कर रहे सीधे-साधे लोगों को समझा रहे हैं कि जमीदार तो तुम लोगों के लिए कभी कुछ नहीं, जो करता है अपने स्वार्थ के वाभूत होकर। हमलोग तुम्हारे कल्याए आए है। इस जमीन पर तुम लोगों को दखल दिला कर रहेंगे। जो वेका धंधे में लगायेगे, आदमी की तरह जीने के सभी उपाय करना हमारा आदमी जब विपत्ति में पड़ा होता है तब ऐसे आश्वासन पर सहज में ही लेता है। यह मान बैठता है कि - 'हाँ यही अपने हैं।' अभिजीत गंभीरता से सुन रहा था । निहार के रुकते ही धीरे-धीरे ठीक कहती हैं। किसी को यह सिद्ध करना हो कि वह तुम्हारा मित्र है उत्तराधिकार उसे यह समझाना होगा कि और जो है सब आपके दुश्मन हैं। और फिर 'जमीदार' संज्ञा के साथ एक ऐसी परम्परा जुडी है कि वह 'दुश्मन' के सिवा और कुछ हो ही नहीं सकता । खैर, आप के ये राजनीतिक नेता कालोनी मे आयें, जायें, मगर अब तो वे मुझ तक पहुंचने लगे हैं।" "आप के पास ?" निहार आश्चर्यचकित होकर बोली। "उस रोज के सज्जन मेरे पास आए थे, अधिक रात को । बैठते ही शुरु किया- 'उन्हे क्या आप बच्चा समझते है । क्या वे अपनी भलाई-बुराई नहीं समझते ? आपकी यह घर बनवाने की स्कीम सिर्फ धोखा है, इस कायदे से आप लोगो को हटाने के मत- लब मे हैं, यह वे समझ चुके हैं । उनका ख्याल है जोर-जुल्म से जब आप उनका कुछ विगाड नही सके तव यह तरीका अपनाया है आपने। अपनी ऐसी स्वीमो से बाज आइये।" "मैंने कहा, 'अगर नही आया तो ?' उनमे जो कम उम्र के थे वे गरज उठे- 'तो आपको अट्टालिका पर भी उनका दखल करा कर दम लेंगे।' "मैंने हँस कर कहा, 'बस यही न ? इसके लिए आप लोग भूठ-मूठ तकलीफ क्यों उठाये ? अगर ऐसा लगेगा तो मैं खुद उन्हे बुला कर अट्टालिका मे वसा दूंगा।" निहार को मजा आया, वह तपाक से बोली, "तब उन लोगो ने क्या कहा ?" "एकाएक गुम हो गये । फिर जो कुछ कहा वह सुन कर मैं चकराया। स्वर एक दग नरम हो गया। उनमे से वे जो कुछ उम्रदराज थे और बात-चीत मे कम हिस्सा ले रहे थे, अब विगडी बनाते हुए बोले, 'नही, यह सब आपको कुछ करना न होगा अभि- जीत बाबू । अपने पूर्वजो के इतने बडे-बडे मकानात आप इन अमागो को सौंप दे यह क्या बात हुई । एक वार घुस गए तो आप क्या समझते हैं फिर कमी निकलेंगे ? कभी नहीं । ऊपर से दो दिनो मे जो हाल कर देगे कि आप सोच भी नहीं पाते । कुछ दिन ठहरिए न । इस जमीन से भी वे हटाये जायं, इसकी व्यवस्था तो हम खुद कर देंगे। और अगर, मान लीजिए, ये न भी हटे तो कम से कम आप को जमीन का मुआवजा सरकार से हम पाई-पाई दिलवा देंगे । आप सिर्फ अपनी यह स्कीम रद्द कर दीजिए।" और वे रुके और अपने साथी की ओर देख कर बोले, "क्या नाम है उसका ? "उत्तर मिला-शभूचरण ।" "वे फिर मेरी ओर मुखातिब हुए, 'हां, सुन लीजिए, इस शभूचरण को जरा मो तरजीह मत दीजियेगा । आपने उसे पहचाना नहीं है। इन शरणार्थियो को आप जितना सीधा समझते हैं, दरअसल वे ऐसे नहीं है । खासकर यह शभू । भले आदमियो का मुखौटा लगाए फिरता है, पर अन्दर ही अन्दर बड़ा भारी बदमाश है । उसका विश्वास करना सांप को दूध पिलाना है ।" निहार मुस्कराई; "शभू बाबू की वजह से ही उनकी दाल जो गल नहीं पाती।"

Utradhikar Jarasindh

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Utradhikar Jarasindh
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Utradhikar Jarasindh
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Published
2011/01
Publisher
Elhabad, Printing Press Elhabad
Language
Sanskrit
Pages
146
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Chemistry
DLI number
546770
Barcode
4990010025269.00
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