Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Ujjawal Pravachan

2011/03

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उज्ज्वल-प्रवचन
महासती उज्ज्वर कुमारीनी के राष्ट्रीय महापुरुषों के
सम्बध में किए गए प्रवचन
रनमार जैन, रत्नेश
धमगाश्री, मारिसरन

बोरा नर-माला -१
जून १.५० प्रथम सत्करग ३०००
मूल्य दस आने
मताधिकार प्रकारकाधीन
प्रकागक
मूलचन्द्र रहनाते
सहायक मन्त्री
मुद्रक
नारायादास जाजू,
मुम्मघा
श्रीकृष्ण प्रिवर्स वधा।
भारत जै। मामा, वा!

प्रकाशक की ओर से : महारता उ जलकुमारीजी के राष्ट्रीय प्रवचनों का यह मग्रह पाटको ये हाथों में देत हुए सजना होती है। पाठक देनेगे कि इन प्रवचनों में अनुचित माम्प्रदापिकता और धार्मिक सहिष्णुता को साध्वानी किंचित् भी स्थान दिया है। हमारे देश में निम विशाल मानस मावना ओर धर्म समय और कम शील नैतिकता का आवश्यकता उसके दशन हा प्रश्चनों में हो सकते हैं। सामित ममान और साम्प्रदा यिक वेशभूषा में ग्कर मा उ यमागजा ने अपना आन्तरिक उदार दृष्टि का परिचय दिया। भारस रेन महामण्डर केरल बसाम्प्रदायिक ही नीं, बल्कि एक सोदयी सस्था है, जो मर धर्मा और सब मतों के प्रति आदर भाव रखती है। जहाँ की अहिंसा और सचाह रशन होते हैं वहाँ महामाल अपनत्य दखता है । इमा दृषिोण की पूर्ति हायक स्वरू: ये प्रपचा प्रकाशित किये जा रहे हैं। महासताजी के धार्मिक प्रवचनों का एक मग्रह अयत्र प्रकाशित हो चुका है। उसके मद महामण्डल के अयक्ष श्री यकाजा की मुलाकात सो पर चर्चा में उरकुमारीनी के सामने बात रखा गद थी कि कोह सर्वनामयोगी सरह हो तो महामन्दर को उसे प्रकाशित करने में प्रसन्नता होगी। माइ रामकुमारती से पत्र व्यार हुआ और उन्होंने यह समद भेज देने की कृपा का 1 यह 6 'बोस प्रय माग की ओर से प्रकाशित हो रहा है। इस पुस्तक की बि से जो आय होगा उसमे ऐसी ही कार पुस्तक प्रकाशित की जा सकती।

२
पुस्तक की छह साद आदि में निन मित्रों का समयोग मिल
है उन्हें नहीं भुलाया जा सकता। भाद भी० जमनालालजी ने पम सयो
धन तथा विषय को समझाने के लिए उस गोषक दने आदि में काफी भम
किया है । वे इतने निकट है कि उनका आभार मानने में भी सकोच होता
है
। शुद्ध तथा शाम मुद्रण में प्राण प्रस का जो सहयोग मिला है, उसके
लिए हम अपन आभारी हैं।
आशा पाठक इस पुस्तक को जानाएगे और हमारे उत्साह के
बनायेंगे ताकि इसके दूसरे सप्रद मा प्रकाशित किए ज सकें।
निलक चौक
-मूलच द बढजाते
वर्धा, २२ जून'५

आभार यह पुस्तक 'वोरा प्रथ-माल' की आर में प्रकाशित हो रहा है। इंदौर का श्री रोग परिवार मृत्ति में धार्मिक मामाल और जैन जगत' मालिक के प्रति शुरू से ही उमक विचार अनुकूल और उदार रो हैं। ययापिने स्वास्वामी समाज और मम्प्रदाय क है तथापि उनकेल में सच मम्प्रदायों के प्रति सद्भावना और सौजन्य है। बोरा परिवार के प्रमुम्ब श्री सूरजमल जी बोरा (पम मूरनमल इस्तीमल बोग कपडे क ध्यापारी, नुकोजापर कलाग मार, इदोर) की प्रवृत्ति मदा ही धार्मिक कार्यों की ओर विशेष रहा है। आज यापि रे वृद्धावस्था के कारण अग्रस्त हैं और किसा टरह की इ-31 प्रक्ट करन में असम र है, तथापि अपने पिताजी का भावना का बयार कर श्री पुवराजजी ने साहित्य प्रकाशन को उपयुक्त समझ कर महामण्डल की जोर से 'बोरा प्रयमाला' गुरु करने का इच्छा व्यक्त की। महामवल उनके इस विचार का आदर और आभनादन करता है। यह प्रम नता की बात है कि मा. पूरजमलजा के दोनों पुत्र श्री. हस्तीमलजी और श्री. पुनराजजी यापार करत हुम धार्मिक रुचि रखते और यथाशक्ति धर्म तया सेवा कार्य में प्रवृत्त रहते हैं। हमारी अभिलाषा है कि जिस सद्भावना में यह प्रथ माला गुरू हुइ है उसमें में अच्छी अच्छी माजोपयोगी पुस्तके प्रकाशित हो और बोर, परिवार को समाधान से कि उनकी सद्भावना मायक हो रहा है और उनके दान का सदुपयोग हो रहा - ܕܝ सम्पादकीय महामती श्री उ जलकुमाराजा जैन समाज को एक विदुषी मावा और आदश विचारिका है। उनके प्रवचनों की मानव हृदय पर जो छप परती है, वह पटन और मुनने वार्ग में बुरी हुइ बात नहीं है। गत वर्ष 'उडवल वाणी के नाम से मताजा के प्रवनने का सब प्रथम मस्करण प्रकाशित हुभा था, आर इस वा का प्रवनन क नाम में उनका यह एक और नवान प्रकाशन हो रहा है। उन वाणी में धार्मिक प्रवन नों का मकलन या । परतु इस माह में उनके रामाय प्रवचनों का अधिकता है, जो कि कि-ही म्वास मौकों पर मायबानिक ममारभों में किये गये हैं, जैमा कि अप अनुभव करेंगे। इन प्रवचनों में कहीं भी साम्प्रदायिकता की नजर नहीं जागा महात्मा बुद् विवेकानर, टेगार, तिलक और गांधा जेभे महापुरुषों पर एक जेन मावा का अपन वेश में रह कर कहना कुछ भामान नहीं है। लक्नि यह पाने वाले कष्ट नान सगे कि इस दिशा कभी मतीची का शान कितना गहन है। और द किस इद तक अपनी चत को कइन में समय हैं। साम्प्राविक धनों में बध हुए गेने पर भी उनका मानम बढा मुलझा हुआ है। पिर प्रतिराइन की उनका शैली बड़ी आली है। श्री. रिषभदामबी राका, अध्या भारत जैन महामइल, वधा का यदि प्रेम पूरा आग्रह न होता तो सभव है यह पुस्तक अमी पाठकों के हार्यों में न पहुँन पाता | अत यहाँ मैं उनका आभार मा7 कर, अगर पाठकों ने इन प्राचों को पटने का ना रखा तो मैं अपना श्रम मुफल ममगा। 'जैन प्रकार कार्यालय -रलकुमार जैन रत्नेश पायधुनी, वम्बई ३ , ।

अनुक्रम
,
,
१
भगवान महावीर म्दामी
३
२०
०८
७
मानता प्रमा युर और बापू
नगर गाधीजी
म्यामा किन
निल्क प्रदान
बिपरिसीद्रागार
मामा गाधीना
मामा कामदार
यात्रा और गाय
मदामा गाधा और जिला
.
.
८३

१ भगवान् महावीर स्वामी पवित्र दश निहार भाज गे दाई हजार रूप पहले म. महावीर इस भारत भूमि पर जमे थे। उनका जन्म बिहार में हुआ था। जमे बिहार में और बिहार में ही सर्व प्रथम उन्हान धर्म प्रचार मी रिया । इहाँ ममकालीन म. बुद्ध भी एक महान् धर्म प्रचारक थे। उहाँने भी बिहार में ही विचरण किया था। आज क जमाने के महान् सन्त पुरुष महात्मा गाधीजी ने भी अपने सत्याग्रह की गुरुलात बिहार से ही की थी। इन तानों महापुरुषों के कार्यों की शुरूआत बिहार से होने के कारण ही विहार एक पात्र दश कहा जाता है। वों की दशा म. महावीर के पिता गजा सिद्धार्थ थे और मामा पा राजा चेटक। चेटक का कामैन गण गजमों पर काफी प्रभार था। भगवान् ने ३० वर्ष की अवस्था में घर छोडा और साधु दाग प्राण की। उस समय माझा त्रियय और शूदों की दशा पटुत सरार थी । ब्राक्षण लोलुपी हो गय थे क्षत्रिय युद्ध प्रिय और विकासा बन गये थे, और वय स्वार्थी। झूटों की तो दगा हा विनित्र थी। वे तो पशुओं से भी बदतर माझे जान | एम स्थिति को सुसान के लिय मावान् ने मुनि-दीशा से और दुनिया को इस नगा 1 मुक्त करने का उपाय सका। इसके लि उन मद साह १५ त म तपस्या का और उसके गद जो उपाय ममा उभा उप करने हुए उ होन दिवा, अपरिग्रह और an २ उक्ल प्रवचन तीन 'द'–कार और 'अ -कार पुराणों में एक कथा आती है। एक बार देव, दानव और मानवों ने मिलकर ब्रह्माजी को खुश करने के लिये तपश्चर्या की । ब्रह्माजी समा घिस्थ थे। कई दिनों बाद जब उ होने अपने ने खोल तो सामन देवों को खडा पाया उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने 'द' हान्द का उच्चारण किया और समाधिग्य हो गये । देवों ने समझा हम विलासी है, भोगी है, अत ब्रह्माजी ने में 'द' से इन्द्रिय दमन करने का उपदश दिया है । इसके बाद दानव आये। उनका दखकर भी ब्रह्माजी ने 'द' कहा और अपने नेत्र बद कर लिये । दानव पर ये अत उ होने समझा, हमें ब्रह्माजी 'द' से दया का उपदेश दिया है। अव में जब मानव आये तो उनको भी ब्रम्हाजी ने दही कहा जऔर पुन समाधिस्थ हो गये। मनुष्यों ने सोचा हम कृपण है अत ब्रह्माजी ने हमें '६' से दान का उपदेश दिया है। इस कथा में जैसे ब्रह्माजी ने तान 'द' कह कर सबको शान्ति का मार्ग बताया वैसे से भ० महावीर ने मी अगान्त दुनिया को शान्ति का मार्ग बताते हुए तान '' मुनाये, जिनका अथ है अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकात । मत्य लोक को स्वम बनाना हो और शास्वत शाति प्राप्त करना हो तो यह इन तीनों सिद्धा तों से प्राप्त की जा सकती है। प्रज्ञा और अहिंसा का समन्वय दूसरे प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य मे 'प्रशा' की विशिष्टता है। अपने ज्ञान में उत्तरोत्तर वद्धि करना प्रज्ञा है। मानव अपने ज्ञान में वृद्धि कर सकता है, दूसरे माणा नहीं कर सकते । ५०० वर पहले की तरह हा अब भी साथी झुड बनाकर रहते हैं, पक्षी भी ५०० वर्ष पहल की तरह अब मी अपना घर बनाते हैं और उनमें रहते हैं। उनमें कोई परिवर्तन होता हो या हुभा से ऐसा नहीं लगता। परतु मनुष्य की यह यात भगवान महावीर स्वामी ३ नहीं है। उसकी प्रज्ञा का निरन्तर विकास होता रहता है। लेकिन यह याद रखने का बात है कि यदि इस प्रज्ञा में अस्यिा का साप न रहा तो यह तारक के बदले नाग हो जाती है। आज विज्ञान ने तरक्की की है और उमने अशुनम भी खोज निकाला, पानु अहिमा को साय न रखने से यह तारक के बदले नाशक बन गया है । यूरोप की गोरी जातियों ने क्या किया है। अपनी प्रशा के बल पर उहोंने दूसरे देश को सूर लूटा खसोग और उनका शोषण कर अपनी स्वाथ पूात ही तो की है । भग्रेनों न भारत के साथ यही तो किया है। इस तरह उनका प्रशा तो बढी, पर उमक साय अहिसा न बढा इमलिये परिणाम मी खराब ही हुआ । प्रज्ञा के माघ साथ अहिंसा का ना मी शिवार्य है। इसीलिये भगवान ने साटे पारह वर्ष नाद तर अपमा मौन छोडा तब अपप्रथम उहोंने यही कहा 'मा दणो'--किसी कोन मारो।' अगर तुम क्मिा को मारोगे तो तुम्हें भी मरना पड़ेगा अगर तुम किसी को छेदोग तो मुम्हें भी छेदाना होगा भार अगर तुम मी को भेदोगे तो याद रखो तुम भी भेदाना पडेगा । म बुद्ध ने भी यही कहा है नहि वेरेन येराणि सम्मतीध पदाचन । मेरेन च सम्मन्ति एम धम्मो सनतनो । का कभी भी अत नहीं आ सस्ता | इस युग के महान म त पुरुष और मारत के राष्ट्र पिता ने भी यही कहा है कि 'तुम्हें मारने को आने वाले को यदि तुम मारोगे तो उसका हितैषी तुर मारने का दौनेगा, इससे तुम्हाय मरण मी मुनिश्चित है। इम तरह जब तुमको मरना ही है तब " मरने से तो अच्छा है कि तुम शिमारे ही मरने को तैयार रहो।'

४ उज्वल प्रवचन इस तरह जो स देश भगवान् ने २ .. वा पहले मुगाया था, यही हमें गांधीजी ने भी मुनाया । सच्चा सुख अहिंसा में है प्राणी मात्र सम्व चाहता है, दुख कोहनदी चाहता। स-सा आपत्ति आते ही मनुष्य भगवान् को याद करने लगता है। इसका अथ यही है कि हम दुम्ब नहीं चाहते ! लेकिन जिसे हम चाहते हैं वह मुस धाणिक नहीं होना चाहिये। दूसरों के दुख से मिलवारा सुम्द भी हमें नहीं चाहिये । क्योंकि ऐमा सुम्न भी सुस्त नहीं है। सर सयको दुप देकर मुम्ब प्राप्त करें तो परिणाम में कोई सुखी नही हो सकेगा। इससे तो सत्र माना दुग्य हा यहागे। हम एक को दुखी कर सुख चाहते हैं तो दूसरा मैं दुखी कर मुम्ब प्राप्त करता है, अत दुख हो बढता है, सुम्ब नही । अत इस था यत सुम्न का सच्चा माग भगवान् ने साडेचारह वर्षों तक जगलों में रह कर और अनाय देना में भ्रमण कर खोजा और उदै जो उगय मिला उसका आदेश दते हुए इहोने कक्ष- 'ममा सुन अगर यही है तो यह अहिंसा में है, सब स प्रेम करने में है। इसका मूल सून बनात हुए उौं। कहा-'जोआ और जान दो।' एक तरफ यह बात भगवान् ने हमारे गामने रखी और दूसरी तरफ जीबो जवस्य विनम्' की बात भी सुनाई दा। यानी एक जीव दूमर जाव आगर क गिना जोहा नहीं सता । यदि अहिमा ही सम्चा मार्ग है ता एक का जीवन दूमी के जावन का प्राचार बनता है इसमें आसा में रहती है। यह प्रन लोगों क दलों में उपना स्वाभाविक ही है। इमी प्रश्न को एक जि लवक ने अपनी भाषा में Leism is Killing-जाना मारना है---कहा है । इस प्रके उत्तर में हमारे तत्त्वचिन्तकों ने कहा है कि 'जना या मारना' यह एक सत्य हकाकत .

भगवान् महावीर स्वामी मात्र है पर यह मानव का धर्म नहीं है। मानर का धर्म तो यही है कि वह कम से कम हिमा करके जधिक से अधिक अहिंसा का ही पालन करें। दमी को अग्रेजी में भी कहा गया है कि Killing the least is lenvin, the best -कम-से कम हिंसा करते अहिंसा का अधिका धिक पालन यरना हो जावन का सर्वोत्तम सार है। यही बात भगवान ने भी अपने साढे बारह वर्ष के लम्बे मौन को खोलने समय कही थी- 'मा हो मा हो' जिसको वेदों में भी 'मा हिंस्यात् स भूतानि काकर समझाया गया है। सयम मनुष्य के हृदय में शुभ और अशुभ दोनों तरह की भावनाएँ नाता है। उसके दिल के एक कोने में प्रेम, वात्सल्य, धमा, सन्तोष और सहृदयता रहती है और दूसरे कोने में काम, क्रोध, अहकार, और लोम बन्य न्यासनाएँ रहती है। जब तक इन घासनाओं पर संयम नहीं किया जाता तर तक अहिंसा का पालन नहीं किया जा सकता । आज विश्व के महान् युद्धों के मूल में लोमतो! लोभ पर सयम नहीं है इससे युद्ध होते हैं और मनुष्य मनुष्य को मारते हैं। इसलिये भगवन् ने अहिमा का उपदेश देते हुए कहा कि अगर तुम्हें अहिंसा को अपने गोपन में उतारना है तो संयम और तप का पाला करो। आप और संयम अहिंसा के दो पॉव है जिनके बिना अहिंसा चल नहीं सकती। सयम का अर्थ केवल भगवा या सफेद वन पहन लना ही नहीं, पर अपनी वासनाओं का दमन करना है। अहिंसा के आराधक को अपनी यासनामों का दमन करना ही होगा। अहिंसा का दूमर पाँव है प । उपवास या मन करना मात्र ही सपना ६ उवल-प्रवचन ध्यापारी है, पर अपने स्वाध की बलि देना मी तर है। कल्पना कीजिये एक है, जो यहा नातिमान् है और सादगी से रहता है। व्यापार में अनाति करना उसे नहीं सुहाता । उसने किसा दूसरे व्यापारी से एक चीज का सौदा किया । सौदा करते ही उस चीज के दाम पाँच गुने बढ गये। अप दी। वला अगर सौदेके भाव में वह नीज दे तो उसका घर निरस्ती ही विषड जाय, बाल-बच्चे भूखों मरने लग जायें और बेचारे या दीयाला ही निकल जाय । तर नीतिमान् यापारी सोचना है कि एसा स्थिति में मेरा क्या कर्तव्य है । इमकी स्थिति सो मालामाल हो जाने जैसी है, पर अषकी अतरमा बोलती है- अगर मैं ऐसा करूँगा तो उसके पाल-पन्चे दुम्बी, अनाथ और कंगाल हो जायगे 1 बन पह उस यापारी के पास गया और बोला "मैं भाई, आना सौदा रद करता हूँ।" यही मायना अहिमा है। अपने लोम पर विजय पाना सयम है और स्वार्थ का त्याग करना ता। जर तक हममें इस प्रकार या सयम और तर हो तर तक हमारी अहिंसा अपूर्ण ही रहेगी, यह पूर्ण नहीं कही जा सकेगी। भगवान् के हमी अहिमा तत्व को हमारे गष्ट पिता गांधीजी ने भीअपनाया था। उ होंने अपनाया नहीं, अपने जीवन में ताने-बाने की तरह उन कर भी रिवा दिया था। यापू की अहिंसा भी व्यापक मी कुछ लोग कहते हैं कि महात्माना या अहिमा ता मान्य तक ही सीमित था। लेकिन ऐसा समझना ठीक नहीं है। पो ऐमा कहते ६ वे सभी गाधानी को पूरा समझे नहीं है । गाधीजी के जीवन में ऐसे कई प्रसग मिलत हैं, जिनसे सध प्रतात होता है कि उनकी यनिगत आहिंसा मानव तक ही सामित नहीं थी बल्कि इमसे मी आगे और बहुत भाग सक्ष्म जीवों तक यो, जैसा कि हम उनके दो एक जीवन प्रसगों से भीमानि। जान सकेंगे।

भगवान् महावीर स्वामी महात्माजी न यरवदा जेल में थे तर काका साहस भी उनके माय थे। सरदार यमभाई पटेल भी उमी जेल में थे, पर अलग कमरे में थे। एक दिन सरदार ने अपने तेल सुपरिटेण्डेण्ट के साथ एक चिट्ठी लिवकर महात्मानी के पास भेजी। उसमें गिया था 'मेरे पास पूणियाँ नहीं रही हैं, भेजियेगा ।' महात्माना के पास मी पूणियों नहीं थी अत उहोंने काश साव मे कहा-'मेरे पास पूणियां नहीं बचा है तुम अपनी पृणियाँ मरदार को दे दो।' कामा साहन ने कहा-'मुझे पूणियाँ बनाना नहीं आता, ब मेरी पृणियाँ समाप्त हो जायगीत में कहा से लाऊँगा ! मेरे पास इतनी पूमिया नहीं है कि मैं मरदार को दे स ।' महात्माजी ने कहा 'तुम पिका मन करो, मैं तुम्ह पूगियाँ बनाना सिवा दूंगा, लेकिन तुम अभी अपनी पूणियाँ सरदार का दे दो। ये पूर्णियाँ मंगा रहे हैं।' काका साहब ने अपनी पूणियाँ मरदार के पास मिनया दी और लगे पूणियाँ पनाने । परणात के दिन ये अत धनुमा कर पीनने में बरार काम नहीं दे रहा था। महात्मानी ने कहा-धनुआ की सात पर जरा नीम के पत्त रगहोगे तो यह यरामर फाम दगा। सामने ही नीम का पेड या। काका साइर उठे और झट दम-वीस पत्त ताद कर ले जाये। लेकिन महात्माजाने जर इतने पत्ते देपे तो काका सा से कहा 'तुम्हे ता दो पत्तों की ही जरूरत यो पिर इतने सारे पत्ते को ताद लाये' इतो पने तोड कर तो तुमने उस नीम हा अपराध किया है।" एक दूसरा प्रसग और सुनिये । काका साहब ने महात्माजी को बूचा मना कर नाम का एक दातुन दिया । गाधीजी ने दातुन किया और फिर * दातुन देते हुए काका से कहा--"दम दातुन का क्या तोड कर रख रो और कल फिर मुझ यही दातुन दना ।" काया साहको पदा--"आप ऐसा क्यों करते हैं। नाम ये पह तो यहाँ बहुत हैं।"

६ उजवन्द-प्रवचन है, पर अपने स्वार्थ की बलि देना भी तप है। कल्पना काजिये एक यापारी है, जा रहा नीतिमान् है और सादगी से रहता है । "यापार में अनाति काना उसे नहीं सुहाता । उसने किसा दूसरे न्यापारी से एक चीज का सौदा किया। सौदा करते ही उस चीज के दाम पाँच गुने यढ गये । नप देने चला अगर सौदेके भाव में वह चीज दे तो उसका घर गिरस्ती ही विगह जाय, बाल-बच्चे भूखों मरने लग नायँ और बेचारे का दीवाला ही निकल जाय । तर नीतिमान् यापारी सोचना है कि एसी स्थिति में मेरा क्या कर्तव्य है। इसकी स्थिति तो मालोमाल हो जाने नैसी है, पर असकी अन्तमा बोलता है- अगर मैं ऐसा करूँगा तो उसके बाल पच्चे दुखी, अनाथ और कमाल हो जायगे। अत यह उस यापारी के पास गया और बोला ' म भाई, अपना सौदा रद्द करता हूँ।" यही मावना जहिमा है । अपने लोम पर विजय पाना सयम है और साथ का याग करता है। तक हममें इस प्रकार का सयम और तर न हो तब तक हमारी अहिंसा अपूर्ण ही रहेगी यह पूर्ण नहीं कही जा सकेगी। भगवान् के इमी अहिंसा तत्व को हमारे राष्ट्रपिता गांधीनी ने भी अपनाया था । - होंने अपनाया की नहीं, अपने जावन में ताने-बाने की तरह सुन कर भा दिखा दिया था। पापू की अहिंसा भी व्यापक थी कुछ रोग कहते हैं कि महात्मानी का हिंसा ता मान्यता हा मामित था। लेकिन ऐसा समझना ठाक नहीं है। जो ऐसा कहते ह वे अभी गांधीमी को पूरा समझे नहीं है। गाधीजी के जीवन में ऐसे कई प्रसग मिलता है, जिनसे सपा प्रतीत होता है कि उनकी व्यक्तिगत अहिंसा मानव तक हा सामित नहीं थी बल्कि इससे मी आगे और बहुत आगे सक्ष्म जावों क थी, जैसा कि हम उनके दो एक जीवन प्रसगों से मत्रीभानि, जान सञ्ग।

भगवान् महावार स्वामी ने कहा की आज्ञा का पार कर ।' युवक ने पूछा 'इश्वर आशा क्या है।" स ने कहा "तू अपने पडौसी के साथ हमदर्दी का व्यवहार कर र मे प्रेम कर ।' युवक 'यह तो मैं करना ही हूँ।' तब ईसा न कहा: 'तू अपना सारा धन गरीओं में याट दे।" यह सुन कर यह युवक चला गया। मा धनवानों को यह बात कैस अच्छा लग सकता है। उस युवक को मा अन्छी न लगी । तर ईशु अपने नियों को उपदेश देते हुए कहा-~~'सूई की नोंक में से ऊर का निकल जाना आसान है, पर पायानों का स्वर्ग में जाना आठान नहीं है। भगवान् न मी यही कहा है जातक मानव परिमहा रहता है तब तक वह धर्म का पालन नहीं कर सकता। पतमान् युद्धों के मूल में यही परिग्रह वृत्ति है। इसलिये भ. महावीर ने अहिंसा के साथ अपरिग्रह का सदेश दिया था। यहाँ यह भी समझ लेना सम्पी है कि सम्पत्ति जैसे परिप्रह है ऐसे ही साम्प्रदायिकता भी एक भयकर परिप्रद है । परिग्रह से जसे कइ अनर्थ हुए है वैसे ही साम्प्रदायि कता ने भी मयार अनर्थ किये है। हमारे देश में कौमी साम्प्रदायिकता ने स्था नहीं किया ! उसने हमारे राथपिता को भी हमसे छीन लिया। समझ लेना चाहिये कि मतामह भी ऐसा ही पाप है। इसी के साथ साथ एक और नया परिग्रह गष्ट्रीयता का पैदा हो गया है। यह मुघरे दुए रोगों का है। यह भी हमारा आदर्श नहीं होना चाहिये। हमारा आदर्श तो विखापुत्व रोना चाहिये। Nationalism नहीं Univers alism होना चाहिये । यही बात भगवान ने अपने अपरिग्रह नामक दूमो सिद्धा त में कही है। अनेकान्त तासरी पात जो उनि कही, वह है अनेका त । दुनिया निसे स्वादाद के रूप में भी जाती है। हर मनुष्य की अप अपनी विशिष्ट ८ उबल परचन महात्माजी ने कहा -"जब तक यह दातुन चले तर ता उसमरा उपयोग न करना उठ पेड का अपराध करना है।" इससे यह भलीभांति जाना जा सकता कि महात्माजी की यक्तिगत अहिंसा मानव मर्यादित ही नहीं, वह सूक्ष्म जीवों तक भी याम थी। गीता और अहिंसा एक बार गांधीजी से मिलना हुआ था तब पूछा था कि गाता में तो श्रीकृष्ण ने युद्ध का विधान किया है तप रि अहिंमा क्यों कही गह है ! इसका उत्तर देते हुए गांधीजी न कहा था-"गीता के अन्त में तो अहिंसा का ही विधान किया गया है। हिंसा जो सिदि मिलती है वह ऊपरी होती है-दबावरी हाती है। सभी सिद्धि तो अहिंसा से ही प्राप्त की जा सकती है।" आज से पचीस सौ वर्ष पूर्व तो यात भगवान् कही थी वह आज भी उतनी ही उपयोगा है, यह साफ जाहिर है। परिग्रह पाप का मूल है दूसरी बात उन्होंने अपरिग्रह की कही । अहिंसा या सत्य तो पया यवाची शद हैं एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। परिग्रह रिसा से ही बढना है। उसके मूल में अहिंमा नहीं होती। कई मनुष्य यह कहते हैं कि हम पाय और प्रामाणिकता से पैसा इकहा करते है, इसमें बुरा क्या करते है। लेकिन वे यह नहीं जानते ह कि भगवान ने साफ कहा कि परिया-मद रखना ही पाप है। फिर चाहे वा याय से किया गया हो या नीति से किया गया हो। परिग्रह में सिवा पाप के और कुछ होता दी नही। स्यों के पाप का मूल ही परिग्रह है। परिमही धार्मिक नहीं होता। चाईवित्र में एक उदाहरण है। म. ईशु के पास एक धनवान युवा भाया और बोला : 'मुझे कल्याण का मार्ग पताइये ।। ईशने कहा: 'तू ईश्व बुद्धदेव जयाती का अब है आन या नियादशमी का १५ युद्धदेव का जन्म दिवम है। दुनिण में घनेको मनुस्य जम बने और मरते हैं, पर हम सभा का नयतियों नहीं मनाते । जयतियाँ उही की मनाई जाता है, निनका प्याति से हमारे हदयों में भी प्रमाग उसान होता है। जयती मनाने का अर्थ उन महापुगों की दा हुइ पूजी का वप के त में हिसार करना गमतानि का मान मिलना। महान धम प्रातक चुत भगवान बुद्ध एक महान् धर्म प्रपतक थे। उनके धर्म का प्रसार र देशों में भा हुआ । आज मा लाखो यर्मा, लाइ, जापानी तथा चीनी बौद्ध धर्म के अनुयायी है। धर्म भनुष्य के जीवन का एक उत्तम जग है, इमलिये धर्म प्रवर्तक तया धर्म प्रचारक माना समाज को उत्तमोत्तम और सर्व सेवा करता है। बुद्ध को माननाने की साच्या अधिक है, लेमिन बुद्ध के इस विजय में या धमर प्रवर्तन में नहीं भी चलाकार की गध नही। स्लम तथा इमाइ धम के नाम पर बून की नदियाँ हाइपर बौद्ध के नाम पर रक्त का एक चूदमा नहीं गिरा है। पारमिताओं की साधना - न अपने पूर्व जन्मों में उद्ध-पद के योग्य बनाने वाली दान, प्रग, वाय, साति, सत्य, अधिष्ठान, मैना और उपशा इन " उ वर प्रवचन लिहाती है। भ• युद्ध में मध्यम माग को शि है। भाकरा पाय में अद्वैतवाद की दौर म. महावीर में अनेकान्त की दृष्टि थी । इसका अर्थ यह है कि एक ही सत्य को समझने के अन्य अलग कर इण्डिोण हाते हैं। एक यात का एक पुणदी पुरुष अपनी तरह जानता है और उसी को आण पुरुष दूमरे रूप में दसता है। दोनों सत्य देखते हैं पर अलग अग देवन है। इसका समझने के लिय मगवान ने अनात काट जनता का दी, निममा सक्षिम अथ 'ही' 'मी' है। याना अVAT ही आग्रह न रखत हुए दूसरे को माता को भी स्वाकार करना है। जिसको आज की परिभाषा में सवधर्म समभाव कह सकते हैं। अनेक धी को अपने में मिला लेना अनेकान्त है और इमा का नाम महात्माजी ने सर्वधर्म सममा सा है। अनेका त याना भनेक धर्म । किया भी धर्म का माडन करना अप हो धर्म का पहन करने जैसा है, अत अनकातामा विमा धमका बहन नहं कर सकता आकात पाप या खडन कर माता है, सत्य का नहीं। फिर चाहे २० पूण हा या अपूण पर उम मय का पटन न ररना ही अनकात है । और यही सर्वधर्म समभाव भा है। इस प्रकार भ• महावारी आइसा, जपान और अनेकान का क्रमग अग त अभ्यम और विचार विम ता को दूर करने के लिये जो अमर मदेश दिया है उसे यदि काई आज भी अपने जावा में तारे तो मानव समुदायका पसाण सरा है। महावार जयती १९४९ U [चार नयती पर दसगज मोरारजा हाईपल, अधरा में दिया गया प्रवचन] बुददेर R पुथल मच रही थी । दिन में खाना-पीना छुट गया और रात में नींद नहीं आती थी। इस तरह किनने ही दिन गत सक या मनोमपम चलता महाभिनिष्पमण एक बार राजा शुद्धोदन अपने साथ कुमार सिद्धार्थ को लेकर बसन्त की चोभा देखो गये । राजा बाहिंग शोभा देख रहे थे, पर सिदार्थ कुमार का चिन्तनशील मानस कुछ और ही देखने में लीन था। पास ही खेत में एक किसान अपने बलों पर सरासर चाबुक मारते हुए हल चला रहा था। बैग को चुपच प अपने सामा की मार सह कर भी काम करा परता था। यह देखकर कुमार को बडा दुख हुआ । कुछ दूर आगे, जय होने जग सागकी से देखा कि एक छिपकली भाटिया को पीन बीन कर खा रही है। इतन में एक साँप चिलने से निकला और वह उस छिपकली को दगते दबते म्वा गया। परतु साप की भी कजा आगद थी। कपर म एक नील नजर उस साँप को देखा तो वह झपट कर उसे उपर उठा ल गई। इतने में एकतिकारी ने अपन तार का मिलगाया और ताण पर चील कार से नीचे आ गिरी। यह सब इस तरह हुआ कि किसी साधारण मनुष्य के समझ में भी नहीं आ सकता, लेकिन कुमार न नविन कलह काटु स्वस हनने से ही म भाति समझ लिया। उनके से तत्क्षण उद्गार निकल पडे कि- अरे रे। जगत् ऐमा विचित्र है ? पलवानों का निलो रात पर मौन मजा करना क्या यही सारे भ्यवहार का सर है। इस दूसरे सग मे कुमार मिदा का मन दुनिया के स्वा व्यवहार से सपया उगसीन हो गया । अत में एक दिन उनका यह कि मध्यरात्रि में व अपने नवजात निशु राहुल और देवी यशोधरा को निद्राधीन छोडकर महाभिनिष्क्रमण कर गये । स्थिति यहा नक पहुँच १२ 3:17पषचन -- दस पारमिताओं को मिद कर भाज स २५०० वा पूर्य कपिलवस्तु ने राम शुद्धोदन की महारानी मायामशा की कोम में जन्म लिया था और उनका माम सिदामार रा गया था। युद्ध पुरुष का दशन यौवनावश्या प्राम होने पर कुमार सिवाय का स्वाद BS Rar और गुणरती राजा या यशोधरा के साथ दा दिया गया। एक बार कुमार सिद्धार्थ साउद्यान में जाहेथे । यहाँ उसने ए* १८ पुरुषको देवा निसकी कमर गुडी हुई थी, मिरपर सोद पाल आ गये थे, मदम दाँत नहीं थे, देखने तथा सुनो की शक्ति शाण हो गई थी और साथ-पाव कॉप रहे थे। ऐसे वृद्ध पुरुष को देमार उपचार भाया कि एक दिन मैं भी ऐसी स्थिति में आजाऊँगा इसलिये अमीम उR लिप साधार हो जाना चाहिए। रागी और मृत का दशन घुछ दिनों बाद उड़ोंने एक यामार मनुष्य को देगा, नो रोगी भवन पीच से क्या था । उसे देख कर उ विचार भाया कि मेरा शरीर भी याधिया का घर है, एक न एक दिन भेग भी यही हाल होगा ! अत में जब उ हो। एक मृत देह को देना तो सोचा: नमा है, मन मेरा भी एक दिन इसी तरह अन होगा ऐमा विच स्ते विचार उनका हृदय ग्लानि से भी भाया और सबके प्रति उदासीन हो गए उद्यान में न छोडकर वे पुन राजमहल में सैट आये । परनाममा में भी उचैन नहीं भाया । समाल का रंग भी उनके गम्य भार पीका कर दिया था। रा, रोग और मृत्यु उनका ननरों के सामने चित्र पा की तरह घम रहे थे। और इनके लिये उसके हृदय में भारी उथल बुद्धदेर भ. बुद्ध ने फिर से माप समान को एक करने के लिये जम जातिवाद का शेिष किया और गुण तथा चारि य का महत्व बताते हुए उसने न जच्चा वसलो होती न जचा होति वभ्मणो। कम्मण यसलो होति, कम्मणो होनि सम्भणो । वाति से कोई प्राह्मण या गद गद होता, कम से ही ब्राह्मण या द्र होता है। जातिवाद का रोग जातिवाद का यह रोग मानव समाज को नारों पी से लगा हुआ है, जो कि आन भी दूर नहीं हुआ है। बिहार में 'मह' और दु' नाम की जाति म जो अग्ने मिया -मरे को मनुष्य ही नहीं मानतीं । वह आक्षणों से भी अधिक छुआन का खयाल रखती है । वह कुत्ते का छुआ स्खा सकती है, पर वहाण के हाय का पानी नहीं पा सकती । एकवार विहार में जब दुष्काल पा था, तर उस जानि के कुछ रोग भी एक रात भोजनालय में मोना करने आया करते थे। एक दिन जर भोजन कर रहे थे, तब एक खिस्सी पोटोमापर उनका फोटू लेने के लिये वहाँ ना पहुँचा । उसो वहाँ जैसे ही पैर रखः वैस ही वे लोग अपना मोजन छोष्ट कर भाग गये। यह जातिवाद का ऊँच नाच का रोग है, जिसके लिये 7. महावीर और बुद्ध की शिक्षा हा राम बाण औषधि है। पा-या के विरोध में युद्ध का साहस उस समय 47 यश में धम माना जाता था। निर्दोष पशुओं की या में पलि दी जाती थी । इमसे दूसरी तरफ पशुओं की कमी पडने से खेती में जो नुकमान होता था उसका परिणाम भी मानव-ममाज को ही भोगना पडता था। इस पशु या का विरोध करना और इसके लिये अड्डा प्रवचन Hemand मस की उपध मत्य की साध लिये उन्होंने भाई की और का ४६ फर मय का प्राति की। पुत IELउमेर चार अर सार का मार्ग का उसका । या RRRRH मानर जीयाको दो मुग परता। गोपनापग पपन फामारभोग की सामनि, म धन पर मासFTS का अधिकांश भाग नाम में PETHERE तुमको प्रार करता है। जन या त्या है। भगवान युद्ध र माने में कामोरी की भकि on किती परिमन ताम जी ( TATE का सबा कर देश का 7 dant R THE Flats करते हैं। यह २१ भमर के मानपानमा धान दोनों अपनी से मुन कर 1 मगममा का पारा और था। चार आय सत्य भगवान बुद्धचिार मन्या - प्रकार (.) मात्र शासक और दुमका। (२) Tण सका है। (३) तृष्णा के TIश से तुम का ना -10 है। श्री (४) राग देप और जाभाव दूर होने मे निवाग की मातिती है। बुध की प्रति म महावीर और म० युद्ध दोनों समान महापुरुषों और ध- प्रचार का आग-हार मा दोनों का एक दीया। दोनों गगनुमा त्याग का अमर भारत के एक कोन से दूसरे को तक पहुँन गया था भ० धुर ने अनेक सामाजिक गुरुपयों का सामना किया था करनी के जाति मेदो अवह माना समाप के टुकरे टुकने कर दिये बुद्धदेव उसने म. युद्ध के अहिंसा के अहिंसा के उपदेश को ग्रहण कर रिया। कहने का तात्पर्य इतना ही है कि ऐसे अनेकों प्रसों में भी म. बुद्ध ने अपनी जिदगी को जोखिम में डाल र अहिंमा का प्रचार दिया था। रेसे वैर दूर नहीं होता वैर-वृत्ति देष या शत्रुता भी सूम हिंसा हा है। देश से द्वेप की वृद्धि होती है और ये से ही बढता है। वर-वृति से हम सामने वाले को वैर वृत्ति को दवा नहीं सकते। उमका अ त तो और वृत्ति से ही किया जा सकता है। अद्वेप से ही द्वेष को जीता जा माता है। और जहिंसा से ही हिंसा का नाश किया जा सकता है। बुद्ध ने भी अपनी पाणी में कहा है नहि पेरेन वेराणि, ममतीधि कदाचन । अपरेण च ममती स धम्मो सनन्तनो। भगवान बुद्ध इस संदेश के उपदेशन बनने से पहले उपासक बने थे। यह निद्धात विर बुद्धि का योग नहीं है कि जावन के अनुभर का सार है। एक कवि की कल्पना एक अग्रेज फघि उनका एक मुदा प्रमग अपनी कविता में चिनिन करते हुए कहता है---एफ पार भगवान बुद्ध जगल में चले जा रहे थे। इतने में सामने से एक मयार गक्षम माया और बुद्ध की मजा करते हुए बोला--"ऐ शाति के उपदेशक । और प्रेम की बातें करने वाल। मैं अमी तु मार डालता हूँ और फिर देखता हूँ कि तेरा प्रेम और शाति का आदर झरना तब भी वह सकता है क्या ?" यह कहकर उसने अपनी तलवार उठाई और युद्ध के सामने र दी। भ० बुद्ध उज्वल प्रवचन जमाये हुए हता का विरोध करना कोई फम साइस का काम में नहीं था। लेकिन जिन्दगी जोखम में डाल कर भी भ• युद्ध ने यश होने वाली घोर हिंसा के विरुद्ध अपना नारा बुल द किया और अहिंसा का सन्देश सारे जगत को मुनाया। राजा सिम्बिसार को उमके यहाँ होने वाले यज्ञ की यात कहने के लिये भ० बुद्ध कई मील लम्बा रास्ता काट कर भी वहाँ पहुचे । यश की तैयारी हो रही थी। ऋत्विज हाथ में चमकता हुआ दुरा लेकर खडा या । बाह्मण मघोच्चार कर रहे थे। पास ही में एक निदोष पशु मेला परपर काँप रहा था। महाराज लिम्बसार दोनों हाथ जोडे आसन पर मेटे हुए थे। मच्चार के स्वर जैसे असे बढ़ने लगते है वैसे वैसे ऋविज का हाथ भी छुरा लेकर उपर उठने लगता है और उधर सामने खडे हुए मूक पशु के कठ से अन्तिम चीम्ब भी निकल पडती है। इतने में ही वा भगवान बुद्ध आ पहुँचे और उस मूक पशु को अपनी आइ में लेकर सिंहनाद करते बोले टहरो पुराहित, ठहो। इस तेजधी गजनि को देख कर सब स ध हो जाते हैं । ऋत्विन के हाथ कांपने लगते हैं औ छुग नीचे गिर पहता है। राजा गप में आप कहता है "आहुति के येक्तिने अथक भय नों द्वारा ज्योतिषियों ने यह शुभ घडा बताई थी, पर उसमें तूने च्यवधान साल कर जो मयकर आराध किया है, क्या उसका तुझे भान 1 इम अपराध की सजा क्या हो सकती है, इसकी तो तुझे खबर बुद्ध ने शाति से जवाब दिया- "हाँ राजन ! यह मैं जानता हूँ। इतने जावों की रक्षा के खानिर यदि मु अपना सिर मी दना पड़े तो इसकी तैयारी कर के ही में यहाँ आया हूँ।" म० युद्ध का इस स्वार्पण की भावना का प्रमार राना विम्यसार क हृदय पर पट विना न रहा बुद्धदेय - शुद्ध आनाविका, ६ सयर यापार मानी शुद्ध पुरुषार्थ, ७ सम्या स्मृति- शुद्ध स्मृति और ८ सम्यक् समाधि यानी चित्त की शुद्ध एकाग्रता नामक आय अधोग का भाग बताया है। ये आर्य अभंग आर्य पुरुष के आट भाज हम अपने जाप को आर्य कारलाने का गौरव सो अनुभर करते हैं, पर आर्यत्व के गुणों में से कितने गुण हममें १, क्या इसका मी विचार ६म करते है १ च तो यह है कि आज हमारा नायन इन आठ गुणों से बिल्कुल पिरीत दिशा में यह रहा है। हमारे जीवन में तो मम्यक् पि ३, न सम्यक् वार और न सम्या आजीविका ही। ये सब भी सम्यक हो जाय तो दुनिया से आधे अनयों का अत हो सकता है। सच्चा आर्य कहलाने के लिये इन आर्य अथांगों को अपने जीवन में ताने बाने की तरह बुन लेने की जरूरत है। जब हम का पालन कर चार आर्य-सत्य का अनुकरण करने लगेंग तमी म १० बुद्ध की जयती को B रसग। निया दशमा [चैत य योगाश्रम, घाटकोपर द्वारा आयोजित सभा में दिया गया प्रवचन] १८ उघल प्रवचन शाति और प्रेम भरे में कहा-'प्यारे मित्र! मैं वो अभी भी आगे नु चाहता हूँ, मुझे तुम पर द्वेष नी, प्रेमा उसन्न होता है चलकर वह अप्रेज कवि कहता है कि यह नम्न वाणी सुन कर का भयकर राक्षस एक कबूतर के रूप में परिवर्तित हो जाता है और बुध के चरणों में लोट जाता है। कहने का साराश इतना प्रेम से भयकर राम-वृत्ति को भी कबूतर का तरह नम्र बनाया जा सकता है। युद्ध अशाति के कारण है इस युग में गन २५ वर्षों में हा दो वि वयुदो चुके है। दुनिया ने बहे विषम का सहन किये हैं। नतिक जावन पर युदातर जो बुरा परिणाम हुआ है, उसे हम सभी जानते हैं। यूरोप के लोग गत दोनों युद्धों का स्मरण करते ही थरथर कापने लगते है। ये युद्ध और तो गये हैं, फिर माघे आज तीसरे सियुद्ध को न्योता दे रहे। एसा प्रतीत होता है। इस विषम परिस्थिति को मिटाने का अगर कोद मर है तो यह केरल म० युद्ध का दिया हुआ प्रेम मत्र ही है । इसा से सारी दुनिया में अमन चैन और सुम गान्ति स्थारित की जा सकती है। भ. बुद्ध के जाज के जन्म दिवस को अगर सपल करना हो तो उसका एक ही उपाय है, और यह यह कि प्रेम और मैत्री भावना का बीजारोपण काजिये उनकी पुष्टि और वृद्धि कीजिये और अपने जीवन में उतार लीजिय। आर्य-अष्टांग आर हमारा जीरा भ० बुद्ध ने चार आर्य-सन्य को सिद्ध करने के लिये १ सभ्यग्दृष्टि यानी सच्चा शन, २ सभ्यग सकल्प याना शुद्ध विचार, ३ सम्यक वाक- यानी सन्य भास सम्यग् कर्म-शुध्द कर्म, . सम्यक आजीव हिसास मानवता प्रेमी बुद्ध और आप सत्यनों का आत्मोल्प म. महावार तथा वुद के जमाने में जन्यजी का स्थिति बही खराब थी। वेदों के अध्ययन तथा धर्म पालन का उह अधिकार है। नहीं था। मैन और बौद्ध धर्म ने जातिगत भेद भावा का अस्वीकार किया था जिममे ये दोनों धर्म अत्यनों के रिये आशावाद रूप बन गये थे। ने उच्च जाति के अ यार्यों स बचने के लिये पडी उमग से इन धर्मों को स्वीकार करते थे। न. महावीर के श्रमण-मर में प्राह्मणों के जुल्मों से पीडिन और उनमे निरस्त दो हरितन भाई चित्त और सभूति तथा जानिन हरिकेशी और भेतारनजादि आमानी से प्रविष्ट हो ा मोत्कर्ष माध सके थे। इसी तरह थेर गाथा में भ. बुद्ध के अक हरिजन शिष्य येरमुनीत का भी उदाहरण जाता है। पर मुनीत एर' नीच जाति में उसर हुआ था। मान लगाने लगाते जब एक दिन उसने भिभुओं के पाथ युद्ध को देखा तो अपना झाइ टोकरा फेंक कर उसने उन्हें प्रणाम किया और अपने को भी भिक्षु-मध में दीजित कर लेने की प्रार्थना की। धुर ने भी उसकी भक्ति भाषा को देख कर दीक्षित कर लिया था। बापू का हरिजनोद्धार आन के अत्यनों की स्थिति देख कर युग पुरुर गाधीना का हदसभा काप उटा था, निनके उद्धार के लिये उहोंने मगीरथ प्रयत्न किया और युन्हें 'हरिजन' नाम से सबोषित किया । पूजनीया कस्तूरबा से लेकर अनेक मित्र कुटुचयों का और अय सनातनियों का विरोध कान पर भी उन अपने आश्रम में हरिजन पालकों को रखा और उनका योपण करने वाला की तरह किया। इतना ही नहीं, सभी तरह के भेद मा सकर स्वान पान लग्नादि सबों को भी चाल किया। वे बहुधा इरिजनों के में ही निवास करते थे। इश्वर के दार सबके लिये खुले होने चाहिये।

+ में मानवता प्रेमी बुद्ध और वापू युद्ध और गांधी जयतियों का संगम आज विजयादशमी का दिन म० युद्ध का ज म दिवस है । साथ माय हमारा सारा देश गांधी जयतो के निमित्त गाधी सप्ताह भी मना रहा है। गाधी-सप्ताह कल २ अक्टूबर को पूर्ण शेगा, इसलिये आज बुद्ध और बार दोनों के जन्म दिवसौ का संगम होनाने में यह पर्व महान् बन गया है । अहिंसा की जरूरत दोनों ही महापुरुष अहिंसा के पैगम्बर थे। म युध्द के जमाने हिंसा का धार्मिक क्षेत्र में साम्रा य या और अय गाधी युग मेरा नीतिक और आर्थिक पत्र में हिंसा का तांडव नृत्य हो रहा है। म० बुध ने शान्ति कर धार्मिक क्षेत्र की हिंसा और पगु यज्ञादि की प्रथाओं क दूर कर पुन अहिंसा का साम्रा य स्थापित किया था। पाने भी राम नासिक क्षत्र में सिा का सामना अहिंसा से किया और अन्त में वित प्राप्त कर दुनिया को दिखा दिया कि हिंसा को भी अहिंमा से परा किया जा सकता है। विद असी दुनिया के पांचवे दिस्से का प्रजा के उन्होंने एक धूट भी रक्त बहाये बिना गुलामा से मुक्त करा दिया । आ- दुनिया का सब से आधेक आवश्यकता इमी अहिंसा की है। युद्ध मे ह हुए जगत को शाति तो प्रभु महावीर, युद्ध और बापू की अहिंसा से मिल सकगी। म. मुन तथा महात्मा गांधी इन दोनों महापुरुषों के जीवन तर उपदेश में जो साम्यता पाह जाती है ३६ आज हम दोनों की पुण्यति पर देखने का प्रयत्न करेंगे।

मानवता प्रेमी बुद्ध और बापू धामिर समय भगवान बुद्ध के घम का नाधार पविरता, त्याग और मदाचार है। पचार(अधिा सत्य, अस्तेय, अपचय और मादक पाया का त्याग) म धर्म का उही प्रचार किया था। गांधाजी की विचारधारा का मूल मा सत्य, अहिंसा, ब्रहाचय मादक द्रध्या का त्याग और अस्तेय रहा था, जो कि म. बुद्ध के पचगील धम का ही आधुनिक स्वरूप है। सन्मारनाद्वारा प्रतिसार आज से २५०० थप पूर्व भगवान बुद्ध कर गये ६ कि घृणा करने मग दूर नहीं होती। व६ प्रीति करन से ही मिरता है। इस प्रकार हमको आनद पूरक नीना चाहिय और हम से ना घृणा करते हैं उनसे भी हमें घृणा नहीं करनी चाहिय । उनके बीच में रहत हुए भी हमें घृणा विलीन रहना चाहिये । लाला पर उदारता स और अमुल्य पर मत्य में विजय प्राप्त करनी चाहिये ! महात्मानी भा प्रेम से दूर को, अहिंसा में हिमा को जीतन के लिए ते ही रहते थे । उ होने केवट कसा ही हा था, जीरन मर अमिक साया मा लगे थी। उदोंने कहीं भी भेनिाना या गोगवार जेट यातना या गती प्रकार के साम7 अपना हाय भी उँचा नहीं दिया था। नाम्प्रदायिक और दाशनिक पादों के बीच बद्ध भ० युद्ध के समय में मत मतातर और पथ मप्रदायों के अनझगडे थे। दागानिक वाद विवादों का पार नहीं था आरमवाद, अनारमाद, नित्यत्व, अनि यत्व देत अदन, इधर कतृत्व, निरी वरवाद, मुश्कितत्व जनादित्य आदि दाशनिक प्रनों के वितहाबाद में प्रेम मैत्रा रूपी शुद्ध धम का भरना गुरुक हो गया था। म बुद्ध ने इन सब वादों को छाह कर प्रेम, मैत्रा, अहिंसा और सत्स घम के पालन का सदश मुनाया। उन्होंने कहा- - २२ उचल प्ररचन इसका उहोंने आदोलन किया और जावन में यह सिद्ध भी कर दिखाया। इस प्रकार इन दोनों महापुरुषों ने हारजन उदार का कार्य एक समITI किया था। सेवा-शील बद और नापू बुद्ध का सेना भाव और उसके लिये उनका उपदेश हम इस एक प्रमा से ही जान सकते हैं। विनय पिटक में इसका उल्लेग आता है कि एक मितु को पर की पामारी था और वह मल मूत्र मे भरा हुआ पर रहता था । सयोग स एक दिन भ• बुद मिनु आनद के साथ विहार करते दुए वहाँ आये। उहोंने उससे पूछा- "आयुष्मन् ! तुझे केसा मालूम होता है ?" भिशु ने कहा- "मुझे पेट का रोग है।" बुद्ध ने पूडा "तुम्हारी कोई गा करन याला मा है या नहीं?" उसने कहा--- " मिथुओं के लिये भार रूप हूँ इसलिये मेरी सेवा कौन करना चाहेगा।" भ. जुद ने आनद से कह पर पानी मगाया और फिर उसे दोनों ने साप कर एक सच्छ पिठौने पर मुलाया। इस प्रसग को लक्ष्य में रख कर भ० बुद्ध ने अपने भिक्षुओं मे कहा- "भिभुआ। तुम पहले अपने रोग मिथुओं की सेवा क्यों नहीं करते हैं जिनको मेरा सेवा करनी हो, वे पह रोगी का सेवा करें। उनकी सेवा ही मेरी सेवा है। इस प्रकार उहाँ सेवा का जाद उपस्थित किया था । गांधीजी की सेवा भावना तो मुविदित है सेवामाम में ये शुष्ट राम परचुरे शास्त्री की सपा स्लप अपन हाथों से किया करते थे। खुजला याच रागों के दो जब उनके पास आते थे तो वे स्वय अपने हाथों से उन । मलहमरी किया करते थे । कयों को अपने हाथों से एनिमा भा देत ये इस तरह दोनों हो महापुरुषों न अपन दिन में मेवा का एक आदश उपस्थित किया था। -- मानवता प्रेमा बुद्ध और बापू महात्माजी ने भी अपन आश्रम व ग्यारह प्रतों में साम्प्रदायिक कल्हों में निरर्थक र होती हुई अपनी शक्ति को बनाने के लिये सवधम मनार का समावेश किया था । वे भी कहते रहते थे कि किसी मो धर्म की निंदा किये बगैर उसम रही दुइ ज अइयाँ सप ना करनी चाहिये । इस दिशा में भी दोनों के रिकोणों में ममानना थी। धर्म का उपदेश कर भ० जुद्ध यह मानते थे कि तक मनुष्य का जनादि का प्राय मिक आवश्यकता पूरी न हो तर ता नीति, धर्म या आध्यात्मिकता चाहे जितना ऊँचा उपदेश क्यों न हो, उसके गले नहीं उतारा जा सकता । मनुष्य के पेट का खड्डा जब तक नहीं भरता तब तक वह स्थिर चित्त होकर चुर मुननेवालाना है। इसलिये पहले अन चाहिये और पिर शान, ऐसा उनका मानना था। जैसा कि उनके इस एक प्रसग से स्पष्ट हो जायगा। एक बार भ• बुद्ध आल्वी गाव में एक दरिद्र, परतु म मनुष्य की योग्यता देख कर यहाँ आये। बुद्ध आये, यह सुनकर उस दरिद्र मनुष्य को भी धर्म के दो चोल सुनने की इच्छा हुई। परन्तु दुर्भाग्य से उसा दिन उसका एकल रही भाग गया था। अत उमने बैर को दूर कर ही धर्मोपदेश मुनने का तय किया । ल मिल गया पर पहर का समय से चुरा था। खाया-पीया कुछ नहीं था मत भून भी जोर की सा गइ थी। पिर भी यह घा नहीं गया और दर्शन के लिए के पास आया । बुद्ध ने उसकी क्षुषा वेदना को समझा और परले उसके खाने की यवस्था की, अब उसकी भाव मिटी और मन एकाग्र हुआ स्व युद्ध ने उसे चार आय सत्य का उपदेश दिया। इससे उसकी शान लि3 उठी और वह भी बौद्ध भिक्षु बन कर सपर्मे शामिल हो गया !

२४ उवल प्रवचन सृष्टि श्वर से बनाई हो या अनादि हो, मोक्ष का स्वरूप ऐमा हो या वैसा परन्तु जर तुम तृष्णा को छोडोगे तभी दुख से मुक्त होओगे। अहिंसा सत्यादि का पालन क्रोगे तो सिद्ध हो पाओगे-बोधि प्राप्त कर लोगे। राग दूपादि का नाश करोगे ता चाहे किस स्वरूप का मोक्ष हो, पर यह नुम्हें अवश्य मिलेगा। लेकिन यदि तुम मोक्ष का स्वरूप ही तय करने में रह जाओगे और रागद्वेप से राहत 1 बनोगे तो यह निश्चय समझना कि तुम्हारा मोक्ष ही होगा। तृष्णा का त्याग और गग द्वैप पर विजय करने में ही तुम्हारा भविष्य उज्वल है । ' इस प्रकार भ० बुद्ध ने सब बादी से दूर रह कर मत मतान्तरों के सर रगहों का अन किया था। विवार से कार्य श्रेष्ठ है एक बार भ. बुद्ध के अन्लेवासा निग्य आयुष्यमा आनद ने भ. बुद्ध से पूछा कि "भगवन् । इश्वर है या नहीं है तो कैसा है । सृष्टि इश्वर ने बनाई है या अनादि है ! इन चर्चास्पद प्रश्नों पर आप प्रकाश क्यों नहीं मारते तव भ. बुद्ध ने कहा- 'आनद किसा पुरुष को तीर लग जाय और कोई बंध उसकी चिकित्सा करने जाय तो उस समय वद वै। उसका तरि निकाल कर मलहम पट्टी करने के बदले और उसके बहते हु तून को बद करने के बदले यदि वह इसकी जाँच करे कि तीर किसने मारा। किमने आया। किस दिशा से आया! मारनेवाला बारा था या गोरा तो तुम उसे मूर्ख, कहोगे या बुद्धिमान ! ऐमा जाच करने के माय तो उस समय उसका सून बद कर मल्हम पत्री वरना दा सयानापन है। इसी तर हे आयुमा आनद । हवा, सृष्टि मोक्षादि को कोरा चर्चा करने मे तो मनुष्य का तृष्णा तरीकाल कर उसे दुख मुन होने का माग बनाना सभेत धर्म है।

मानवता प्रेमा युद्ध और बापू
२५
महात्मानी ने भी अपरा मात्रम के ग्यारह प्रतों में साम्प्रदायिक
कलहों में निरथक यर होता हुई अपनी शार्च को बनाने के लिये सवधर्म
सममाय का समावेश किया था। वे भी कहते रहते थे कि किसी मो धर्म
की निंदा किये बगैर उसमरी हुइ अच्छाइयाँ सइयं प्रण करनी
चाहिये । इस दिशा में भा दोनों के शिकाणों में समानता थी।
धर्म ग उपदेश कर?
भ. बुद्ध यद मानत थे कि जब तक मनुष्य की अनादि का प्राथ
मिक आवश्यकता पूरी न हो तब तक नीति, पम या आध्यात्मिकता चाहे
जितना ऊँचा उपदेश क्यों न हो, उसके गले नहीं उतारा जा सकता।
मनुष्य के पेट का खड्डा जब तक नहीं भरता तब तक यह स्थिर चित्त होकर
उप मुननेवाला नहीं है। इसलिये पहले अन चाहिये और रिशान
ऐसा उनका मानना था। जैसा कि उनके इस एक प्रसग से हर
हो जायगा।
एक बार भ. बुद्ध आल्वी गाव में एक दरिद्र, परनु नत्र भर
का योग्यता देख कर वहां आये । बुद आये, यह नुनकर -
दरिद्र मनुष्य को भी धर्म के दो गोल सुनने की
हमद
दुभाग्य से उसा दिन उसका एक बैल कहीं भाग गया या
चल को दूर कर ही धर्मोपदेश मुनने का तय क्यिा । टटिसन
दुपहर का समय शे चुका था। खाया-पीया कुछ नहीं कर
और की हग गई थी। पिर मी यह घर नहीं गया
बुद्ध
के पास आया । बुद्ध ने उसकी सुधा वेदना भने
उसके खाने की व्यवस्था की, जय उसकी भुम्व
मिस
तब बुद्ध ने उसे चार आय सत्य का उपदेश करे -
शिलिउ उठी और वह भी बौद्ध मिनु स्नान

२६ उ बलप्रवचन भूय महान् रोग है मिपुओं में इस प्रमा की उप चचा सुनकर बुद्ध ने कहा-'भि ओ यह मुहम जपने बैल को बोलने के लिये सगल में मारा मारा पिरा है, और वा मे साधा मरे पाम आया है। ऐसी दशा में में इसे उपदेश दूगा तो यह इसे रचेगा नहीं। ऐमा समझ कर ही मैंने इसे भोजन कराया है। भूम्व राग के ममान दूमय कोर रोग इस दुनिया में नहीं है। दूसरे रोगों को तो चिकित्मा द्वारा दूर किया जा सकता है पर भूव का ता रोनगेज उठकर विकिरमा करना परती है। इसलिय भूव एक महान् रोग है। 'जिघच्छा परमा रोगा' और बुभुश्चित न प्रतिमानि किंचित् ' आदि जा भूत्र वाक्य कहे गय है व बिलकुल यथार्थ हा है। महात्मा ने भी जस हि द में करोडों मनुष्यों को भूख प्यासे और वस्परदिन देखा पर उसने भा यह समझ लिया कि भूव का रोग बिना नैतिक उत्थान या घाम मावनाओं का नागति रोना अगस्य है। इसको दूर किये बिना दूमरा काइ मा उद्धार का मार्ग उनके गले नहीं उतर सकता इसलिये उ होन मा करोड़ों मनुष्यों का अन मिले ऐसे उपाय खोजे । गृह उद्योग और चरस्व का प्रचार किया । और इन सब दुखों का मूल कारण राजकीय पराधीनता से दूर करन में अपना जारन समपण किया। चान में गाधीपाका स्थान इस तरह कर एक बातों में घुद्ध और सपू में समानता दृष्टि गोचर हाती है । इमाल्ये चाना लोग बापू का आवित बुद्ध या महाबोधिसत्य मानते हैं। धमारती (चाति निक्ता) क चीनी प्रा यारक तानयुन शान ने एक गार गाघा जपती के प्रसग पर कहा था कि दिवासा गांधी जी को दूर पिए मानवता प्रेमी बुद्ध और यापू । महात्मा समझाते हैं, और पश्चिम के लोग उनको हिदी मत या योगी कहते हैं, पर चानी रोग तो उनको जीवित बुद्ध या महाबोधिसत्य के रूप में समझते हैं। गाधाजी के प्रति चीन में कहा गहरा मान और प्रेम है। हिद में तो गाधाजी के पक्ष या विपक्ष में टीका भी सुना जाती है, पर तु. चान में तो उनके प्रति यल मान और प्रेम ही है। और यह मान नौर प्रम ऐमा है जो सर्वथा शुद्ध और निर्मल है।" युद्ध और यापू को दस पुण्यतिथि पर उनके उपदेश तथा भवन प्रसनों का याद कर उनका अनुसरण करने का हर एक को प्रयास करना नारिये । इसा में उनकी सफलता भी है। आन बसिसार पाशविक सत्ता में पसता चला जा रहा है, तब यदि विश्व को कोई बार मुक्ता हे तो ये हैं बुद्ध और बापू के अहिंसा प्रम, शान्ति तथा मलिदान के अमर सस । इनके द्वारा दुनिया का प्राण हो सकता है। [चैत य योगाश्रम, बन का तरफ से आयोनित सभा में दिया गया प्ररचन] ४ पुण्य लोक गाधीजी गुण्य कति बापू केवल निर्म पुण्य हा निना कान रहा है, एम महात्मा गा पीजी के विषय में आन में कुछ कहेंगी। नीना में यती सम, कृष्ण या बुद्ध गु या मोहम्मद रिसा भा महापुरुष की जयती उनके जीवन-काल में मनाई गई हो, एमा इतिहास से ज्ञात नहीं शेता। परनु महात्माजा का जयता तो इनम मौदगी में केवल एक दिन तक ही नहीं, एक एक सप्ताह तक मनाई जाता रहा है। और वहा सिलसिला मार मा चल रहा है। निस्सन्देह यह बात ऐमा है कि जो सदन ही दिल म विस्मय उत्पन्न कर देती है। भला, ऐमी उ में क्या बिपना था। चादों के बीच गाधीजी पितृ भक्त राम और माता के रचयिता कृष्ण ये माने स सवया मित जमा के महामाजी एक विरले कर्मयोगा और युग पुरुष । गम ने तो रावणादिक राठों का और कृष्ण ने क्सादिर दुष्टों का नाश कर धर्म सस्थापना की थी, पान्नु गाधीजी ने तो प्राय प्रत्येक माप के मानस में उत्पन्न हुए सक्दो कमों को-साम्रायवाद, पूनावाद, जातिवाद, यवाद, जवाद और इस तरह इम्पीरियलिम्म, इ-स्ट्रीयलि म, नेपाल म और बोलोदिम आदि आदि जो कि माव हदय पर आधिपत्य कर बैठ थे और जो मार जगह सून । नदिया वारदे थे उनको दक्ष करने में ही-ठाके Kalanो विमुक्त करने में ही जानी सारी शाक्त वर्ष की थी।

पुर-लोक गायीजी चरसे का नाद राम ने सीताजी को रावण से छुडाया और कृष्ण ने द्रोपरी कारता का-गाल रक्षण के लिये चौर बजाया। पर तु गांधीजी तो कोटाहिट माताओं की लाज रन और भूग मिगने का सा उठा कर दिद से साढे सात मात्र गावों में पिर मे एस बार चरसे कागद नगाया और नमी में अपनी जिदगी का अघिन माग गुजारा था। यम के हाथ में धनुष बाण थे आर या पे पास या सुदर्शन चक्र, जिसका उपयोग ये चय ही कर सकते थे | पर गांधीनी का धर्म प्रवर्तन चा चरसा, तो ऐमा अनोग्या चा था कि निमका उपयोग आबालवृद्ध सरकाई ढक कर सकते -कर रहे हैं। कृष्ण के चन की तरह यह सहारक नहीं, करोड़ों का जन्नदाता-मर्जक मिद हुआ है। इसके. चलाने से रचून की धारा नहीं करती, गार के अचल में से निकरनेवाले निमर दूध का तरह ही दम चक में में भी जीवन रक्षक शुद्ध श्वेत सून के तार निलले है। हममें स देह नहीं कि हिन्द की करोड़ों जनता को रोमा अहिम शम्न र कर मामानी ने मरणो मुप प्रना में मेर और नर प्राणों का सचार किया था। कृष्ण और गाधी कृष्ण ने तो केवल मुदामा को ही गरीषी म मुन किया था, पर नु इस युग के माहन -गाधीनी न तो कोरि-कोटि जना से दरद्रनारायण का पद देर उसकी सपा और सुश्रूषा करने में ही अपना मस्त अर्पण कर दिया था । कृष्ण बेल हो सल में माखन चोर बने थे। परन्तु गाधी जी दो गो देश यासियों को सत्य कम में निर्भयता सिम्बो के लिये खुले आम नमकन्नोर बने थे। एक की तो बाल लीला ही थी, पर मो में था मत्य और म नय पद प्रतिष्ठा का उच्च उरमाद उ घ7 प्ररचन सतयुग का माहा चशी का रहा रमिया था, जो अपना वया की जाने से गाय का दूध पीते हुए बजगे को जोर हाथ में रसो लेकर दूध पिलाती दुर गोर ललनाओं को पालामा तारा । पर इस युग के मोहन न ता 'यग सहिया' नव जीवन' और 'हरिजन' द्वारा दुनिया भर के मानवों पर अपनी अजय मोदिनी डालकर अमान्य र नारियों को मानव हित के लिये साल कर दिया। उन्होंने साम्रा दियों के सिंहासन पा दिये थे, यवाद के पाये हिला दिये थे और गुलामी के अधन ढाले कर पंक दिये थे। बापू क पाण्डर महाभारत के युद्ध में के साथी धमात्मा पावणे, ना अतुल पराक्रम होने पर भी धर्मपराया है। गाधीजी के सत्याग्रह सप्राम के साथी भी धर्मराज की तरह सरहदा गादी, धर्मगात्र धुर घर जमुल कलाम जानाद साज यमूर्ति राजेन्द्रप्रसाद, भाम की नर मादार परेल और अर्जुन की भाति ५ नेहरू रहे हैं, जिनके पास कई अहिणी सत्याग्रही शात सैनिकों का कतारें लगी रहती थी। ये मानक मेरमा ना करने के लिये नहीं, पर सर-I के तौर पर य, सदार राने के लिये ही, पर रग करने के लिये थे। युद्ध को उत्तेजित करने वाले की, पर शात करने वाले थे। वही आज इस नूतन युग क सर्जक-लगामी बने क- युग नहीं, पर युग कृष्ण सतयुग में न मेरे और गाधीजी 'कलयुग में । लकिन कश्युर को सत्य युग बनाने का भगारथ काम उहीने उठाया। कल यानी यः और कलयुग याना यत्र का युग। इस विनाशकारी यत्रयुग ने जा लाखो दलने, पासने और युनो वाला मी जाजापिका जीन ली है औ पुण्य लेक गांधामी अजा का भक्षण किया है। प्रजा के सत्व का गापण कर उसके नर को नष्ट कर दिया है। इस कलयुग ने ही मानव-जाति को सत्य हान बना दिया, ऐसा मान से समझने लग गये हैं। कलयुग को 'कर युग' बााने पर ही सत्य-युग का ज म होता है। कल यानी यत्र की जगह 'कर यानी दस्तोद्योग का सानrय स्थापित करना सत्य युग को प्रस्थापित करने का राज मार्ग है। गृहोद्योग से विश्व-शाति महात्मानी ने जब स्वरा प के साथ साथ गृहोद्योग की बात कहनी शुरू की तब कश्यों को आश्चर्य हुआ कि 'यह तो दुनिया को बैलगाडी के युग की तरफ ले जाने की याते हैं। परतु जार यी दुनिया अपनी आँखों के सामने यरवाद और विज्ञान का परिणाम विक युद्ध और आत्म विनाश के रूप में दख रही है। भर महात्माजी की विचार धारा के पाठे रहे हुए इस सय का आभाम दुनिया को भी होने लगा है कि विश्व गाति का सच्चा उपाय और अहिंसा इस्वोद्योग को प्रधानपद देने वाली समाज-व्यवस्था और अर्थ व्यवस्था में ही समाई हुई है । चरसे में निभयता गांधीजी के धर्म च चखें का चमत्कार तो देखिये, जिसको रशिया या अमेरिकन बम स्पर्श तक नहीं कर सकते। यसवादी मिल-मालिकों के हृदय जहाँ गत दिन बम्पार्टमेंट के भय से घडते रहते हैं, वो चली चलाने पाल को न कोई चिता रहती है और न किस तरह का भय दी। उहै तो यह विनास होता है कि दो-चार रुपये कीमत वाले चलें पर कौन ऐमा मूर्ख होगा जो हजारों की कीमत वाला अम पंकने का पचार करेगा ! इस प्रकार चरखे को आधुनिक युद्ध और अनेक तरह के शस्त्रास्त्री के सामने अभेव कवच अथवा ताबीज बनाकर महात्माजी ने यत्र-युग को परास्त कर दिया।

३२ उार प्रवचन आज रिचय का अस्न हिंसा राम ने हिंसक शस्त्रों द्वारा रावण से युद्ध किया और कृष्ण ने शस्त्र- धारण न करते हुए मी सारथी बनकर युद्ध का मार्गदर्शक और प्रेरक बनना स्वीकार किया था । भगान् महावार तो सिक शस्त्रों को छुआ तक नहीं था और न किसी हिंसक प्रवृति के मार्ग दर्शक या प्रेरक ही बने ये । परित रहोंने तो 'मा हणा मा हणो' का गमीर स्वर ही गुजित किए था । यहा तक कि जर उनके परम भक्त चहा राजा ने भी हिंसक वृत्ति स्वीकार की तर उससभा उहोंने प्रतिकार श किया । इस तरह युग में गाधाजी ने भी गजकाय और अय ममी क्षत्रों में अहिंसा को आगे बढाया और कहा कि 'हिंसक शरमों से कभी विमय होनेवाली नहीं है । अहिमा ही विजय का एक मात्र अमोध गस्त है।' लढाई करने वाले देशों का भी व जन्त ता यही स देश मुनाते रहे थे । महात्माजी के दम सन्देग की भले हा आज सत्ता बने साम्रायवादा कद्र न करें, पर तु जत में तो मेरा विश्वास है कि इमा राजमार्ग की शरण लिये बिना दुनिया रा भला नहीं हो सकेगा। दाने जपन धियों को उपदेश देते हुए गिरिप्रवचन में कहा है कि 'कोई तुम्झरे एक गार पर तमाचा मारे तो तुम दूसरा गाल मा उसरे जागे कर दो। महामाने तो अपन सत्याग्रही सैनिकों को इससे भी आगे बट कर यह कहा कि कोई नुमपर राठी उठाये तो नुम उसके सामने अपना मिर कर दो। और उसको सार में दम लिया हो तो तुम जान मुह से उसका जहर चूम लो।' मौजदगी में अनुयायी यह सच है कि ऐसा अहिंसा का अनक विधि दानो गाधीजी को टुभा या उसमें टाल्ल्ाय के लखों का मा अमर था। उन्होंने अमे- मद में मत

पुश्यलेक गावाजी
३३
३
रिकन लेखक पारो में भी मविनय कानून भग का पट साम्बा था लेकिन
लाय और पारी दोनों हो नवनि मे प्रान सम्पको पूरी तरह
अमल में नाम थे जबकि महात्माजा का चिन्तन और वर्तन
संयुक्त बन गया था। मामाजी ने श्रीदमा को विचार वच्चार, आचार
और प्रचार में इस तरह मगाम कर दिया था कि समस्त समार कोने-
कोने के विच सन् मनुष्य इनके प्रति आकर्षित हो गये थे। यह एक
ऐतिहासिक सत्य है कि गामीजी की मौनदगी में ही उनके अनुमयियों की
जितनी अधिक माया हुइ थी उननी अधिन मख्या किमी भी युग के महा
पुरुष की मौजूदगी में उसरे अनु गीथयों या ना हर।
प्रवर्तक
घापू
रवी द्रनाथ टैगोर भारत को विभूति और पिर कार ये 12 श्रीन
शपियों को ओक प्रतिमूर्ति थे। उसने मी कहा था कि 'मरे ही में
आने समर का महाकवि होऊ पातु महात्माती तो अपने युग के बद से
इ युग प्रति है।' इस प्रकार पूवी लकी सा दह गारा माना-
मयमे बलिया| दुना के जिम को में मान नक गम, ण,
बुद्ध या इयूका नाम नहीं लिया गया उस कोने में भी महाका
नाम आज बडे प्रेम में लिया जा रहा है।
जो कर पुण्य ही जिनकी कार्ति रहा ऐमे महा माजी जान
सोश का आज मन पा7ी जिम पथ के पथैक बन र होने
हमें मुक ना सिवाया उमा पथ पर समस्त ममार चलकर मुन म, IT
मेरा भावना है।
[गांधा जयती के अवसर दिया गया प्रवचन]
-

.५.
स्वामी विवेकानद
भारत महापुरुषों की सान।
भामरे नग्ने सामी विधारद नाम मे कौन अपरिचित
होगाएक धम पनारक और समाज सुधारक माप थे। उसके
मुवा असे ऋषि-मुनियों की विमल-वाणी मरिता-सात की तरह
नहिन होती थी। - दा भारत महापुरुषों की स.21
समय समय पर यह एक के बाद एक मा पुरुष होत आयेवार
कुशा सवार राम और बुद्ध, शारानार्य और समानुम जैनन्य मामु
और तु दाम करी, नाना और गुरु गोवि ददि से बनन
भारत ने दुनिया को दिये हैं। इन साद रामकृष्ण परमहम स्वामी
सम्तय और स्व विवान जमाना आता है और फिर गाधी-युग
की शुरूमा त हारा है, जिसमें कि हम अभी जी रहे हैं।
अमेरिका में स्वामीजी.
भाज जिम महापुरुष का जगती हम मना से वे एक माधु पुष
थे। उन्होंन गप और अमेर में
आर्म की घाई
भी Frame .८९३ में जब मेरा के विमो का विश्व
धर्म पE Wordpirirament of Religious er थी, ना
Etमा विका-६ दिमम + तिHि ARE A आयत हुए।
विश्व के UAN मे मन धर्मों क मन्न भिन्न विद्वान् प्रातिनिधिगण ani
भायखमीजा की जय के विषय में बोलन को कराया
क्षा प्राम मे मा को मशक सा हुई कि मैं या न धुरंधर

स्वामी विवेकानंद । - वदनों के मम और यामी देशी भाषा में अग्ने विपके विहान को से समझ मगा । लेकिन फिर भी हम्मद रखे हुए और बोले- "Sisters and Brothers of America-अमेरिकाले दिनो और माश्यो!" तनाबले तालियों की गगगडाहट से गई। सौ- कि उमदे में ऐसा कहने का रिवाज नहीं है। वा तोहिनी और भाइयों के बदले Indies and gentlemen (रेडीज एटमेन) कहा जाता है। अत समजा द्वारा बहनो और माह का पवित्र सोमन मुन उघडा सुings . इम देखार स्वामानी का उत्साहाना यद गया और तो उसने घोत. एमा प्रभावशाली प्रवनन किया जिस न अमरिका के विदम् बलिक BC दुनिया के विद्वान् आनति हो गये। देश में उनक प्रभाव का यह पहला और यानकिर तो उसने लम्बे समय तक यूरोप और अमेरिका पर धर्म का नारा और उसकी कीति पर स्या बताया। उनका भजी भाषा पर सा अधिकार पारि भगा और अमेरिकी मामने ति होना पड़ता था। माज मी उनी वनस्वी मा उन प्रयोग सुरक्षित है। उनकभापण: इन कई बाद भी उनो भाण पढो ममय बिल्कुल नवीन से रगत हैं। उनमे मा भने प्रेरणा भरी हुई कि पढने वाले की सुत- वेतन न उठा मोरे ए के जग देने एव को गतिमान याने मारा उन भाषणों में माना होती है। अद्भुत स्मरगशक्तिः उनकी मात्र-शक्ति भी दिम थी। 'एण्ट मायाम्पीडिया ऑफ निट ब वे पद रहे थे, तर उनमक ने उनसे पछ घल प्रवचन - स्वामीजी आप इतना बडा प्रथ तो पर रहे हैं, पर क्या पूग याद र जायगा ! जाने कहा की यह पुस्तक और पूछ कर देख लो।' मक में ने एक विषय पूछा और स्वामाजी ने अपरा मा ही जैसा कि पुस्तक लिका हुआ या जबानी का सुनाया । केवल एक बार पढ़ने से हो माग याद रह जाय ऐमी गया स्मरम गति देख कर मर के आश्चर्य का पार न रहा । उसने पूछा एसी स्मरण शक्ति कैसे प्राप्त की जा सकती है। स्वामीजी ने कहा- अखड ब्रह्मचर्य से उनके ब्रह्मचर्य के तेज से बो अरे मनुष्य भी चकित हो जाने थे। रमेरिका की स्त्रिया तो उनके पीछे पागल हो पिरा करता थी। 'सिस्टर निवेदिता' तो उन वामा रो ६ आकर्षित हो सवा करन के निमित्त मारत में आकर बस ई थी। स्वामीती गुरु सन् १८५७ में जब भारत में विद्रोह हुभा था तब कर एक विद्रोहियों ने कर के मय मे साधु थे। भारत कर लिया था और इबर उघर फिी लग गये थे। पुलिस उनको पकडने के लिये कई बार सच्चे साधुओं को भागिर तार करती थी और नाक व रान भी करती थी। एकबार एक सचा साधु जा कि १४ नामे मो धारण किय हुए साख जीवन व्यतात कर रहा था, पुगिम द्वारा पकड लिया गया । पुलिस ने उसे खूब पूस्त छ की, पर मानहान का वजह 37 हुउ जवाब नहीं दिया । तब पलम न मम यिा कि यह तो कोई कद्र ही छायावा बन कर रेठ ।या और अय बचने के सातिर मौन धन पर दोग कर रहा है। पुलिस ने अपनी तलव र निकाला और उR Eाता में मौक दा । कि क्या था मत के उन अन्तिम क्षणों में पर अपने चौदह साठ के मौन के अन्त में भा उम माधु के मुखानि मे "तत्वमा ये दो शब्द निकल । अर्थात् सन उसे पुलिस का यही कहा कि तुम

स्वामी विवेकानद
का उग परमात्मा के साप हो अन मे लिये तो पूया। इस अद्भुत
पान का मेरू और उदा चरित माधु पुरुष ही स्वामा विरेक नद का भाद
पुष था। जिसन ऐम महान् आदी की सारी अपने मन में की दो
उसका नारन बिना पाया रहा होगा, म सध में छ कहो की
आवयकता नहीं रहती।
मारता पाप है
कमजोग और भीरा स उ बसन्त घृणा थी और थ६ रनक
राणों से सट र होता है। निलता और मीरता कोही व सब पापों
अमूठ समझने थे। उहोंने कहा है- Strength ts life weak
nas is death, fear 15 ron of sin
यस्तुत निमा और
पोरपन को लेकर ही सब पाप उत्पन झाते है। गति और पता
मात करा हा माना जाध्यामिक पथ पर अग्रसर होना है।
दरिद्र नारायण की से
दन्द्रनाम शन्द का प्रयाग मप्रथम स्वामी विवेकानत ने दी
किया या। मानम्-गामही प्रभु पूजा का समाया होता है ऐसी हद
अदा में से काम शब्द का मादु या वे कहते थे कि-
Jam rriy to unde 40 1 hundred thousind rebirthis
htrin up a sinle nin-OF मनुष्य के उद्धार के लिये याद
जो हमारे 7म भी लेने पढ़े नप भी मैं या नहीं। गरीयों के
'प्रति सहानुभुने रखता यता मानव का मव प्रथम धर्म है। ऐगा उमा
वेदना ही नहीं, समझना भी था। देर मठ के बगीच में नद मजदूर
आम पााने ये एक दिन स्वामा के पास जान बैठ गये और
नम् बात करने गेवर असे पोसतम्मार पर गादर

उद-प्रवचन
कितने हैं । काम पर तिने या मार्ग मिलता है। गुजारा से
चलता है। लोघर मा ११ पत्यान
भादमिका में परस्पर
जन मा है। भादि वे ही है
थे कि इसने में एक मयामी ने भार का स्वागनी का
के एक धनादय धीम अप मिसन अाय। गतु स्वामको न
इस बात पर ध्यान नही देखा और आनी बात लूनी। देर
इतजार करने पर भी गारी पाधू को स्वभीनी न नहा हो
सके।
विउ वाम लोग जान पा सका को
गरीयों की बात सुनन में प्रो. उदै उनले का मार्ग दान कराने
में बटा आम ताप का अनुभव हेता था।
यम का मूल्य
एक बार स्वामी जी को कलात मे नदी पार कोलोना
में बैठने का मौका आया था। उस समय उनका एशि
पाले से किया तय करने लगा। माना mantar in और
यह चार आन देने का कहा था
सनम तसभी 24
मोल उठे किमार। इनके माय हा भवता जाता। यह
के ना मांगता है तो हमें खुशा से आठ आना देना चाहिए।
सच्चा धर्म
एक और प्रसा! एक गर तिवादी पत्र अधिति और
'दा की नाय' नामक सुधामह माग प्रथला श्रायुन मागम
गोग देउाकर अपन दामका लहर स्वार जादा प्राय ।
खामाजी का अब यह मालम हुआ कि इन में म ए गम जानी है नो
उनस उनो। सर्वप्रथम पजाब के काल का हाल पूछ,
और उसक

स्वामी विरानंद
लिये किये गये भा तक के प्रयनों से मुहमके बाद उसने उनसे
शिक्षा प्रचार और समाज-सुधार सबधी तिचीत की।
स्वामीनी मे दा है। ममय उम पनायी सपने पड़े
सैदपूर्वक कहा- 'स्वामी 1, पैदल यो जानकारी के लिये हम
यो मापी सेवा में आय थे, पर दु-ग से गने तो माण
विषयों पर बातचीत की। आज का हमारा यह पिनो व्य
चल गया है। स्वामीजान सभा का उत्तर दिय भाई मेरे
देश का एक कुत्ता मा भूगा मत है तब तक उसक) मा जोर
उनकी पूरी मार ममाल ना मेरा धर्म है । इस मिस मग सा al
है या झूठा है। दाप्रय हुए गैनो गृह. या मु र प
गये। लेन देवरार महाय हाय का गहग अमर हुए
गिना नहीं था। उनके हृदय में तो देशानिमान की भावना और
गरा जम गई।
सेवा में ही मुक्ति है
यूरोप और अमेरिका में हिम का प्रचार 1 77 earch
विवेकानद स्वशटे तक उन या निश्चय कि गोठा के
साधु भों को कवर मठों में नहीं 18 बाना चाहय बाल मित्र मिल
स्थानों पर पाभ्रम र स्वामी रामकृशा महम क उदार मिटान्नों का
प्रचार करना चाहिय। भी उदय उपनामी जनद को मन
पास पुल या और उन्हें पाक में उपश दन के लिये जन को कह ।
म्वामा विजानदजी एकालपेपी और
नियण पुषा । TRA
नजाल में परना अच्छा न , प्रत उन यसको उहते
साम जी में दाका जाकर क्या उपदेश देसी
इछ जानता नही
हुए कहा

उन्धरान कुरा नहीं जानता स्वामी विद ? ने कहा 'तुम्६ वहा जा • हूँ। यहा उन्देश देता है। क्या यही तो ससे हा उपदश है। उपनिषद में भी कहा किजो यह कहता 'नमो जाना नह', उनी । उसको गना है।' पर विवाद से इसमे " मनोष नहीं हुआ। उन्होंगे तो अन्तम 4 माप कह दिया कि- 'स्वामाजा, अमा कुछ समय तक मुझ मुलगे र साधना करी दीजिहाना सुनती स्वामी को गण आगया और उहोंने जय तेज कर कहा- परि तुम अधिकार बात किये बिना ही मुक्ति में जा चाहो तो नरक निसाग | यदि तुग्दै राचमुच मुनि पद प्रत करना हो तो दूसरों को वा-सुश्रूषा करो। यही सबसे मग्न साधन है। फिर नरा शा त दार उदान कहा हम करा बेटा, और तन मन धन से मेवा को प्यार , इ. मन भूलो यहा मुख्य चल है । फल की आशा न रखते हुए और दूगर्ग को मा करते हुए यदि तुम भी पाना पडे कई घर नहीं! स्वार्थ सिद्धि के पीभूत हो मिले हुए स्वर्ग-सुख से भी ऐमानक सुदरत है।' स्वामी विरमान- नेकपाद स्वामीजी की आज्ञा का पालन किया और उपदेश देन आरम कर दिया । इस प्रकार उन्हें ने जन सेवा में सेवा मानी थी और सत्य भमा AT | Fई २ र जर उन्हें गा३ युटुम्यों में से किसी के बीमा हैन की खया मिलती तब व अपने भक्त डाक्टरों को उनकी मुक्त चिक्रिमा कान का कह दिया करते थे। नैतिक हिम्मत उ में नैतिक भिमत भगर की पी। जन सेवा का काय कर हुए सयार धर्म न भायधन ही किया | साना, जब ये पनी ऐ

स्वामी चिकानट
४१
छोकदा अपने ही शियों द्वारा सुनते थे तर ये यही करते थे कि दुनिया चाह
का कद, पर इमरी अपना कार्य करते जाना चाहिये। एक बार जब वे
जमेरिका में थे तय क शिष्य ने यहाँ से लिया कि लोग मानकर
हमार टॉकी। नदी, हमारा मी प्रत्यक्ष का 7 लगे। इसका
उत्ता दे हुए स्वा जी ने लिखा था--'हमारी लाम निंदा विशालकाय
हाथ के लिये चींटी के जैसा है।
समीती की भविष्यवाणी
आर स ५० वप पूर यामी सिकान टमर पर गडी का
पाश्चात्य-सस्कृतिक विपरम जो भविष्यवाणी की थी यह न
कुर पर पती हा रही है। उन कहा था-
The whole of we tern civiliz ition will Crumblr
to preces in the rest fifty yeurs if there is no spiri
turl foundation अथात् परिची सरति यदि अपनी नी में
नाध्यामिकता का पाया नहीं डागीता .. म उगा रहे टुक्दे
साबाग । नही यात उ हान दूसरी जग' भी इस प्रकार कही है----
Europe the centre of the mines on of mate
rial energy, will crumblt in to dust with a fifty
Tears of she is not mindful to charge lier position,
to shift her ground and male spirituality the basis
cf her life
जो उपरे मामार्गसिक युद्धा व मजनारा को दिपा पन्ते य
जी उपन्य स्वामी ५० साल पृर सारी दुपिया यो गुना चुइ ५।
It is hopeless and perfectly usele to attempt to
-overn mankind with the st ord मानव ममाम पर तलवार
पर माम्राय नमाजग प्रयास सना निष्ण और निराशा बनकर

४२ उसल प्रवचन व सुग्ध समिर और दुख रूप है। प्रत्यक एनिमुन बामना अपन माय साथ दुख को भी रेकर आती है, यह बात बत्रात हुए स्वामीडी करते हैं- Every ounce of pleasure brings its prundt Pain यानी एक अश मात्र मुग्योपभोग भी एक पोट दुख को लाना है। बाथनी या वरती आज का नुप बनी बड़ी रान कगा तो बानना है, पर आचरण मैं उमा भी नहीं उता । मन भर कहने से कन भर याचर- करना आध है। समीजी न भी कहा है- An ounce of practice is worth than twent thousind tons of his fall बीम हजार टन उपग टने के बल एक बम आचरण मैं ल अधि भर है। इस तरह उ होंने अपन विविध उपदी द्वारा बनता मत्य मार्ग स्वाया था। कर्मशील सन्यास का आदर्श कामी विकाना र तेजवी और प्रभावशाला सन्यासी असे अपने मा कार द्वारा घम को भा राजस्वी माया था । प्रत्यक सन्यामी किमी न किमा करित की प्रवृत्ति म गा रहता' समीकमी को भी काम रिना रहन नहीं लय। उहोन ' मारा' नामा एक पत्र में गुरु किया या बो धाव भी चालू है जि आरिमअत तक मा काय सयामाही किया करते थ। स्वामी वि ना दी इम जगता पर यहि म उन शिपय बामनौपयागी प्रम रमण र उ7 अपन बीवन में उतारन का प्रयल करग तो हमारा जय मा साया हो सकेगा। [पार योगम, पाकापर फ तत्वावधान में मनाई गई विवेकानद जस्ता प्रसग पर दिया गया प्रचा।] उन

:
तिलक प्रद्धाजलि
वे जीवित है।
भाज अगस्त की पारी साय है और यलिम्फ भालिका
विमरे । उनका अवमान हुए २९ वय हो गय है, फिर भी उनका
बम निशन ही दिलादना है। श्रद्धांजलि का अगदे श्राद्ध
लियम और श्राद्ध का मत है श्रद्धा द्वारा भूतकाल को जीवित ग्राने
पाभपूर उपाय | माय का 17 हुए इतना अन्न हो गया पर
हम भी उनमे प्रग्गा प्रान करत पूति सता और अवड मना
माको भा अगामार करत है। इस प्रकार हम उभर सा पर मी
अपन जति पात।
मरापुरुष जब तक अपा रार मे चोपित मत तब तक व अपने
प्राणों क२ परीवित रत। न जा व मल मातो तबरे
उन अनायो पर जीत रहत हैं। पिर उके अनुशाषितों में
बिना प्राण ता उतना ही न जीरन मी होता है। सामा'
बना में मोनी 7 सचार मिया है वह तक जीवित रहना
तबना ये मी अमर ने रोंगे।
सरोग-माय
गेमार की दगमक्ति, निता और वृद्धावस्या में भी काम करन
का उ आदि गुण आज क नश्युको क सीन निगम क लिए बो
ही अनुकराया है। उनक इन गुण मटी उनकी प्रसिद्धि र दुम्मा : एक
को स दूसरे को तक पेस गह थी। एव पार, सक

.77 प्रवचा
मालपर साधुन में ५ और कामार का भ्रमण कर रह थे, नन
अनपद मामांग किमान न उनस पूछा "स्वामीजी, आप किधर से पधार
रहपाकासाहब ने "बच म ।" किमाा न पृछा, "अम्बई
क्या त्या के पास है। उस मेंचार का भूगोल शान यर्ग तक सीमित
या। स क्या मारम कि बम्बर का है। उमने र आग भाहर
'वामानी जापका गात्र क्या है।" म्वामी जा 7 उत्तर
मागटिपन ब्राह्म। इतना सुनत ही वह बोल उटा
“लिक
महारान कागे, क्या आपको कुछ पता है '' बम्ब- खाऊ के पास
गोगा एमा बिमका भौगोरिक नागा वह भी तना तो मारता हा या
कितिपय महारात महागाध्यन ब्राह्मण - कादश के पातर सरकार में
रह रहे है और सरकार ने -* ल में बात रखा है।
लोकमान्य की छाप
एक बार रिल्ला में भारत म। माण्टग्यू साहब आप छुए 4 । उहोन
लोकमाय को मिशन के यि युगया। 71 गस मिला रिल्ल *
तब उनक मान में म निकालाकी सरकार ने मना
लेकिन जनताको भनि सत्ता जोर स वाद नहीं ॥ मग । जुमा
निकान पर भी दिल्ली तया घासपास के गोवे हमारी लोग उनक
दाक यि
गि पर आव पड गय य। गायों के आदमी
'म नमय पापम में बात कर २६ कि 'आब पूना का राजा जान
वाला है। सतार उभा त हरता है। फन्ने का मत" पल
दनना ही है के दम प्रकार र दूर तक जनपर लोगां पर भी कमाय
की उप पट्टी तुद थी।
शारीरक स्वास्थ्य के हित
रोकमान्य नियमान का कि यति मन का मुद बनाना हा
जोर मकर-शक्ति गाना हाना गरीर को मुन्त बाना पाहिय । प्राक्षण
कर दी।

तिलक श्रदानाले वाति में जन्म रने से उनरा मिराह नाल्यावस्था में ही कर लिया गया था। इनकी पत्नी का सारथ्य समस अधिक अच्छा था जिमस कभी कभी उनके नित्र स्नी रिस्मी भी किया करो थे। रोकमा या ऐमा स्वमार या कि एकसार जिम काम के ठिय दृट सकप कर लेने ध कि उम पूरा कि विना नहा धोगत य । उनका जब अपने गरीर का सुपर बनान का पुन मगर हर तर पूरी तरह मे इस काम में जुट गरे । एमक लिये हो। अपन कान का अभ्याम मी छोड़ दिया ओ पूरा एक रार अपने शरीर का मजबूत बनाने में ही लगा दिया । उम व उदोंने किसी भी दिन कोर किताब ठार Tef पी और सुबह शाम हर ममा पाराम का ही शिक्षा लेल रह । ममे उनका गरीर गीग और निगगरा गया था। वृद्धावस्था में मावे बिम हिम्मत क साथ काम कर सके थे रह २३ गरारनधारथ्य का गयान शिक्षा का ही प्रताप था। निके, सीम आदिगों में उनसरी विशष श्रद्धा नहीं थो । टसी व्यायाम सही शरी' मादा बनता है, एमा ही ये मात थे। इसके लिय होन अपन घर में ही अपने पुत्रों के ग्येि सब सविधाएँ पर गम्बी गायक विषय में माय कोनी अधिक जाभिमचि थी कि में सभी जर अपने घर पर लिगम थे तर उममें पा यो यो व्यायाम करने की सूचना किया करते थप्रनिटिन उद्यो किन ।। बैई करते हैं, यह मी पृछ। फरत थे। आम युनिवति की डिमा पा7 बाल हमेशा यमनार और बीमार पगेनाले भाइ यहिना को इम उगारण म शिक्षा ग्रहण परनी चाहिये । उह यह समझ लेना पादिय नि मात्र ज्ञान के विमित होन स ही काम नही चलेगा, शरीर स्वास्थ्य भी मुरद होना जरूरी है। वृद्धि र गो पर मा शगर के समास्य 01 कोइ पाय सिद्ध नहोंगे सम्या । अत गरार स्वास्थ्य भी पग्मा • पक है। यूगर के दशों में स्वस्थ वारों को इनाम दिये जाते और डाक अपरोग्य की परी ा से नाता दे माराम भी "गा प्रथा का प्रचार होना चाहिय ।

श्वसनसन श्री लोकमार के जीवन प्रसगों में बहुत कुछ जाना समझा जा सया है। उनमें से कुछ-एक प्रसग यहाँ कह जात है। दुास में धीरज । इ. सन् १९०२३ में पना में यहुत बागेस ग देला हुआ या। उस समय में मान्य शहर म बाहर एक और महत । लेकिन यहाँ भी गरे उनका पीछा नी जग और अनमें उनके ज्यष्ट पुत्र शिवाय को, जो कि बहा बुद्धशाली युवा था और पग्युमन काल में पढता था, उसका शिकार होना ही पड़ा। उ सप्ताह में लोकमा य क चचरे माद और एक माना भी लाके शिकार हो गये। इस प्रकार एक के बार एक मुसीन आती.६, परfies महाराज ने अपना धन वाया और शाा मे मन मान किया एमे समय में विश्वनाथ कतकर म उनक एक मित्र मान्यना टने क लिय उनके पाम गय। उस समय तिलक महाराज ने कहा- भर भाइ ! गाँव की ली मैं नम हर एक घरवाल को उममें छाना डालना पड़ता है, मही हममें भी हुओं है। इस प्रसग में दुका नुनिअमन ' बो स्थिशा लक्षण है उनक जीवन में सत दिवार पडा है। 'सु-पुनित स्पृ.' यह सक्षम हम उनक जीवन में एक दूमर दृटान जान सकंग । निस्पृह तिलक तिलक महाराज के एक स्नेही मित्र ने भात ही बात में एक बार उनसे पू-बलवत्स! जब स्वराय हो जायगा तब तुम अप। राम में कोना पमर रोग ! प्रधान मत्री या परनाम मत्री . मका उत्तर देते हुए उौन कहा 'नहीं - माई ! स्वराज्य सा परतो मैं अपो स्वामी कार में गणित का अध्यापक बनकर बैट जाऊँगा। मुश राज पाट चख चस नहीं चाहिय।

विला अदाजाने हरिजनोद्धार तिलक के समय में महाराष्ट्र ब्राझगों में छुआछूत का भयंकर मत सा हुआ था। वे हरिजनों की छाया तक अपन उपर नहीं गिरन दते थे। एस समय में उनके हाथ की चाय पीना और उनक घरों में बैठना क्या कम भाइस का काम माना जा सकता है। अहमनगर के हरिजनों ने श्रेषमान्य को पाय पानी का आमनग मेजा तो उन्होने बिना किसी सकोर * उसे स्वीकार कर लिया। उनका चाय पानी पी लेने पर उतेन वहां के परिजनों को सोधित कर कहा 'भाइरो! ब्राह्मगों न तुम्हें नीच गिराया है, एसा समझकर तुम उनके प्रति देष मत करना । प धीर धीर पानी भरल अवश्य सुधारेंगे । हरिजनों को अस्पश्य मानना चाहिय, एमा शास्त्रों में कहीं भी उल्लेख नहीं है। उनकी सादगी और पवित्रता उनका मन पवित्र और जीवन सारा था । पवित्रता और सादगी में सा एसे पस है जिनसे मानव ऊपर उठ सकता है। आजकल मानन काम को कम करते है और उसका विंटोरा अधिक पीरन है। निगे:मान्य एसे नहीं थे। वे बह सीघ और सच पुरुष थे। अम्बइ में बन रनिक पा 'गम्मत' शुरू हुआ, तब आदिम की सजावट क लिो मातागम पत ने मारा कि इमक लिये इतने बल और इतनी बुर्मिी की माय ता रहगी। हम पर लोकमान्य न कहा "जब हमने कमरी' और मर टा' शुरू किया था हमार पास तो एसा कोई साइची टाठबाट नहीं था। यतमान पर से दमको एक पाद भी नहीं मिलती थी। हम तो अपना बिस्तर गोल कर अपन मामने रस टेने थे और पिते पत य । इनना होन पर भी हमारा लिम्बना मट नहीं हुआ था। सारगी और हाकि छाम का काम होता वह बाडमरस कभी नहीं हो मक्ता ! वे मरी एक एक RA से प्रजा में नवजीवन का संचार कर देते थे। वरपर उनके रहे।

४८ "रल परचम । घबराती थी। मे दमय हो गया था कि कहीं लाक्मापके शर- बार हमारा साम्रा छिन भिन न हो जाय । उनये दार गोली की तरह अपने ला का वधन थ। सरकार कह चार रनके प्रयोग से ही भयभीत होकर उ जलों में कर दिया था। स्मरण-शक्ति वाम्यावस्या सही उनकी म्मरण गति बा तर थी। जयापक अन्य रनसे अधूग रातों को नोरयुक में उतार लेने को कहते थे त्व ग्नस कहा करते थे कि नोक में क्यों टना' मीचा दिमाग में ही करों न उतारले. अल्पतम वेतन न्यू इगलिश पल र गुरू हुइ, तर लाकमार कवर तीस रुपया मासिक वतन हो । तर एक साथी ने उनसे कहा 'क्या मर जान पर दम अपनी दाद क्रिरारा जिने पैम भी बचा नहीं पायेंगे " लोकमाय ने उत्तर दिया, 'इमकी मित्र तो हमार बले समान का अधिक होनी चाया मान टन क लिए नहीं किन्नु गगी दूर कग लिए वनारा मुद्रा शरीर नापजादगा।' हमारा कर्तव्य म प्रकार उमा नानाविध जीरन प्रमगो म जनता सद सीख सकता है। मिमी मी मगपुरुष का जन्म रियम थाद रिक्स मनान का गलल्य यी दान है कि जनता उमो जीवन की किताओं का स्मरण कर अपन जीतम उ उतारन की कोशिश कर। हमें मी आजनि श्रद्धांजलि रियम को मच्च अथों में मनाना है तापलबमा म ही नहीं, 3 के सारणा का स्मरा पर उनगे अपन जीवन में उ । का प्राम करना चाहिय, जिनमें उनकी साथक्ता ममायी हुई है। [निक अजिलि दिवस पर रिया गया प्रचा , عليه विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर h कवि का कार्य और क्षेत्र आज तवी अगरत रवीद्र श्रद्धाजलि दिवस है। वे भारत नहीं, समस्त विश्व के महान् कवि थे। कवि यानी रा-देवनेवाला । को मात साधारण मनुष्यों को बहुत पढने, सुनने, विचारने और अनुमान करने पर भी समझ में नहीं आती वह कवियों द्वारा सहज ही देखी जा सकती है। इसस हटा यानी देखने वाले कहे जाते हैं। साधारण मनुष्यको दृष्टि वर्तमान काल तक ही सीमित होती है, जब कि निर्मल बुद्धि वाले कवियों की नजर अनागत-मयिष्यतक पहुंच जाती है। एक मुहावरा है-'जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुंचे कवि । 'यानी सूर्य दुनिया के समस्त अधकार का नाश करनेवाला है, परतु जिस अधकार को दूर करने में वह मा असमय रहता है, उसे पवि दूर कर देता है। स्य तो स्थूल पृषी पट पर ही अपना प्रकाश फैलाता है, परतु कवि सूक्ष्म हृदय पर भी अपना प्रकाश पेलाता है । यह मानव हृदय के कोने कोने में पहुंच कर अशानांधकार को दूर करता है। सूर्य की शक्ति तो मर्यादित है, निससे अह अपने मर्यादित क्षेत्र का ही अधकार दूर कर सकता है। ममा जब कि स्य मारत में प्राग पैला रहा है तब वह अमेरिका के बधकार को दूर नहीं कर सकता। पर तु कवि की शक्ति सूर्य की तरह सामित नहीं है । वह एक ही साथ सारी दुनिया के अधकार को दूर कर सकता है। वह अपने साथ दूसरे को भी दिय-टि दे सकता है। ।

उ वल प्रवचन अनका स्वदेशाभिमान कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के हृदय में स्वदेशाभिमान तथा स्वदेशा भाषा का प्रेम उजुले मारा करता था। अमेरिका तथा आस्ट्रेलिया की सरकार ने जब अपने देश में हिंदुओं (हद निवासियों) को नागरिक हक पाने से वचित रखने का कायदा वनामा, तर कविवर ने जब तक यह कायदा रद्द न हो जाय तब तक इन देशों में नहीं जाने की प्रतिज्ञा धारण की थी। नमेरिका का आमत्रण मा उ हैं मिला, पर वे वहां नहीं गये। असहयोग आदोलन क समय ब्रिटिश गवर्नमेंट का दिया हुआ 'नाइट हु' का खिताब उहोंने लाई चेम्सफई को वापिस लौटा दिया या। विश्व के साहित्य निर्माण में उनका महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। उनकी लेखना किसा भी विषय से अदूती नहीं थी। चरित्र, कथा, कहानी, नाटक, प्रहसन, प्रयाप्त वर्णन, आत्मजीवन, गीत, काव्यादि सभी विषयों में इनकी लेखनी रमी हुी थी। यही वजह थी कि उहे इन सभी विषयों क लेपन में पूर्ण मफ्लना भी मिली। यह विशाल साहित्य उहोने मव प्रयम अपना मातृभाषा में ही लिया। बाद में उ होन स्वय कुछ प्रयो का अंग्रेजी अनुवाद भी किया। लेकिन आज तो विविध माषाओं में भी उनके अनुवाद मुलभ हो गये है। गीतांजलि कवीद्र ने अपनी कल्पना शक्ति म समल ममार में भारत की दिगन कीर्ति पर स्वग कर चाया है । गीतामलि जैमी छोटी-सी पुस्तक लिव कर उन्होंन सारी दुनिया को चक्ति कर दिया । इस पुस्तक पर उन्हें सवा लाख रुपयों का नोबल पुरस्कार भी दिया गया था, जिसे स्वीकार कर उन्होंन नोबल प्राइज के गौरव में ही अभिवृद्धि की थी। गीताजलि की कविताएँ, इतनी अधिक लोकप्रिय हैं कि पॉमी पर लका हुआ कैदी भी

विश्वकवि वादनाथ टैगोर
इन कविनाओं को गाते ममय मृयु को भून बाता है। कुछ दर के लिये
तोपमा लगता है कि मृत्यु भी मानो उम कविता को मुनने के लिए कुछ
क्षय र गह हो।
कवी रवीद्र सचमुच कवियों में सिरताज थे। विश्व भारती उनका
कि मनीय स्मारक है। महर्षि मनु की थ६ वागी---
अश्मद मनस्य सकामागबमन ।
म्हस चरित्र चिरन् पृपियों भर मानवा ।
उौन विश्व भारती द्वारा मत्य कर रिसाह है।
आत्मोपासना लग
गार या मानन 4 कि आज की दुनिया के तमाम अनयों का
मूल मकुचित राष्ट्रपामा दी है। उन्होन अमरिका में कहा भी या कि
रा, प्रबा, धम, नेगनेलि म, अथवा राष्ट्र उपासना, यह आधुनिक जातियों
में एक नया रोग पेग हुआ है। इसमें सबनाय समाया हुआ
राष्ट्रों के बीच में प्रेम की मुलह कराना ही आय सस्कृति का या उस प्रतिनिधि
हमारे कवीद्र का सदा था। मनुष्य की निगत या सामाजिक सोंगी परम
उनि ही आप सस्कृति का ध्यय है। वातम्योपामक कृति कहता है कि
'आमा को छाटी मत करा और दुखों से घबराओ नहीं। उन्हें सइन करो
और बढ बनो। आत्मा अमर है और परिस्थिति धग जीदी है। सहनशक्ति
द्वारा भी परिस्थिति पर काबू किया जा सकता है। आरमदेव की उपासना
छोकर अहकार
के
या राजासना क पीछ मत पड़ा। आमा को ही पकड
गे, क्योंकि वही शिव है, मगठहै और परम सुटर है । इसलिये उसी
का उपासना कर
उसका अतिम
टैगोर न सबम आखिरी व प्राइमीम इन मिशन-पश्चिमी.....
सकृति का याग लिया था । उम लेन्द्र के अन्त में-

५२ उप्रवचन अपग पर तन मद्रामि पति। सन सपनान भवति समूएस रिनापति । यह लोक दिया गया था । गुवराती भाषाने से कार मार ने र शुधनाने पर था इसका पवार सन्देर में था शव है। णमर मनुष्य को एमा स्गता कि असम का मारग से, असन्य शेरने से हमको भव मिला है और भुना है। इसके विपरीत पम का आचरण करन याला दुभी भोर दरिद होता है। और नीति मे. माग पर घरने से परि दुख होता तो फिर मन को क्योर पकर रखना चाहिये ! ख एसा मबार पैदा हो गटातर हमारी पम भावना की नार गमगान रगती है। इस रिपर माना कोर करन की रसासन इस गेम में मरी है। इसमें कहा गया कि अपन से मनुष्य धुद्धि प्राप्त करता है, मुख-वैभर प्राप्त करता है और सम युगल जाता है, परन्तु अन्त में उसका समूल नाता है। तापिरमा पर पनि हो जाता है कि मात्र धर्म में ही स्थायी मुशाति माम की था सकती है। समभाव दे सर्जक टेगोर कविय, इससे हम यो मान नहीं देत हैं। पर सपा रहात है कि साक्षरा विपरीता भवनि रापसा । स स Tr को उरटने पर 'राक्षसा' नहाता है सही विषम टिवाट और अप मनिया साक्षर तथा कविमी रावृत्ति क होत हैं। यह पृत्तिहमार करिमें लदा-मात्र भी नहीं थी। उन्होने बो कुछ भी कहा और खिा, PITH ग्खे बिना समभार पूर्वक ही कहा और लिखा । गाँधीबी सममात्र के पैगम्म थे तो रखी द्रनाम समभाव क रुजक करिये। कवीद की निष्पा वृत्ति और सम दृष्टि को शेयर की जनता उनको मान दती है। उहोंने भोयर- विश्वकचि रखा द्रनाथ टैगोर भाइज' प्राप्त किया, इससे वे महान् थे, यह बात भी नहीं है। उनकी तरह आज तक का साहित्यकारों को 'नोबल प्राइज' मिला है, पर उनमें हमार कवि जैसी विशालता भाग्य मे ही दिखाई देती है । इयाद किसीन' गे मी साहित्य लेग्वन पर नोबल प्राइन मिला था, परन्तु उनकी मनोवृत्ति तो बहुत सकुचित थी। उदाहरण के तौर पर देखिय उनक ये शम्द West t» West and east 1s east and the twin can never mat My heart is narrow therefore it can not make room for any country other then my own दूसरी तरस रैगोर को मनोवृत्ति देखते समय तो ऐसा लगता है कि ग्नक हृदय में प्रम की मुरसरी बहती थी। उनका भी एक अश देखिय My heart has spread its ails to the idle Winds for the Shadowy is land of any where इम कवि-सम्राट की कल्पना शक्ति बडी अद्भुत थी । उ होने अपने पना के सागर में गहरी दुबकियाँ मार पर अनेको अमूल्य रन और मेनी खाने हैं, जी अपन काय में पिराकर दुनिया के समक्ष रखा है। इतना जरूर है कि ये अमूल्य बबाहरात उदोन खुले नहीं छोड है, पर मान रक्कन वाली (टिबिया) में बद किय हैं। चाना भी डिबिया क भीतर ही है। लिबिया खोलने की योग्यता जिममें न से उमको व मोती नहीं मिल मक्ने । मुज पुरुष ही उनको प्राप्त कर सकते हैं। उनका पूरा परिचरनो उनका साहित्य दी मकता है। फिर भी उनका यहा यांग-मा परिचय कराया जाता है। सतत्रता का सगीत 'एवइ' नामक उनकी अमजा पुनक में उ होन छोटे छोरे वाक्यों द्वारा अयाक्ति अरकार में मनुष्य को बग सुटर उपाय लिया है । उसका एक वाक्य है उ बल-प्रवचन The water fall eings I find my song when I fird my freedom ऊपर से गिरता हुआ पानी का प्राह गाता है कि 'जब मैं खतत्र हुआ तभी अपना सगात भी प्राप्त कर सका। इस अयोक्ति से कपि यह बताता है कि पाना जब तक अधा रहता है, तब तक उसमें से सगात नहीं निकलना। उमा नरह मात्मा भी जब तक बधन मुक्त नहीं बनता तब तक उसमें से भी मधुर संगीत का प्रादुभाव नहीं होता। विकारों से मुक्त होने पर ही आमा संगीत के माधुय का अनुभव कर सकता है। दूसर एक वाक्य में वे कहन ह How far are you from me of rust I am hidden in your heart o flower फुल पर स पूछता है कि 'ह पर तू मुझ म कितना दूर है।' फल" अवाम देता है कि 'मैं तेरे हाय में छुपा हुआ है।' इस वाक्य से वे यह कहना चाहते हैं कि कम के पीउ उसका पल तो रहा हुआ ही है अा सलम करते समय उसके पर की जाया रख बिना अनासक्त भाव से करते जाना चाहिय । सत्ता और प्रम क बीच का अन्तर बताते हुए कवि कहता है-- सत्ता और प्रेम Power said to the world you are mine the world hept at prisioner on her throre love said to the world I am thine world gave it the freedom of her house सत्ता में विश्व से कहा कि 'तू मरा है।' विन्ध ने सत्ता का यह प्रभुव स्वीकार कर लिया। परतु जब प्रेम 7 सत्ता को कैद र विन से कहा गि 'मैं तेरा हू' तो विश्व ने उसकी नन वाणी स खुश होकर अपने सम्पूर्ण साम्राय में उसको स्वात य दे दिया ।' सत्ता और प्रेम की शक्ति में यही अन्तर है। सत्ता स प्रना का शरीर अधीन किया जा सकता है, पर उसके दृश्य को तो प्रेम से ही बीता ना सकता है। नौकर पर सा जमाने बायग विश्वकवि रवा द्रनाथ टैगोर तो यह हमारे सिरपर मपार हो जायगा और अधिक विगहेगा। पर तु उसी को मम से रखा गयगा तो वह इमारे पार पडगा और दुगुना काम मी गा| किन आज का दार तो यह है कि मानव मात्र में सत्ता चलाने की पति निमाम हो गई है। राजा प्रजा पर, सेट नौकर पर पिता, पुत्र पर, गुरु शिष्य पर, और सास बहू पर, यो हर एक टिल में सत्ता की लालसा बढ गह है। लेकिन उनको यह अच्छी तरह समझ रना चाहिये कि दूसरों को सत्ता स नहीं, पर प्रम से ही बीा जा सकता। नम्र तथा लघु बनन का लाभ ननात हुए कवीद्र कहत हैं Tiny Gross Jour Eteps are small but you pou.ess the earth under your tread घास नसी भुर वस्नु भी अपनी नम्रता तथा पुना स महान् पृथ्वी को अपने पैरों तरे रखती है। दूसरों को अपना बनान की तथा गुरुजनों के कृपा भाजन वाने पी नम्रता ही एक चानी है। जन सेवा ही ईश्वर प्राप्ति गीताजलि की ११ वी कविता में करि इश्वर प्राप्ति का सच्चा माग चतान हुए कहता है-'मानय सवा ही हर प्राप्ति का सथा साधन है।' यह पचिना रश्चियन प्रजा को बढी प्यारा रगता है। क्वीद्र को सबसे पहला श्रद्धामलि अपना इस कविता मदी रशियन प्रजा द्वारा मिला थी। इस कविता में ३ कल्पना करते हैं कि-एक भन पर की प्राप्ति के लिय मादर में जाता है और उसक सत्र द्वार ब र इन्वर का माप जपने लगता है। माला परता है स्तोत्र गाता है और इश्वर टगन की आशा रखता ह । उसको सबोधित दर कवि कहता है- Leave this chanting and singing and telling of beads ! whom do t thout worship in this lonely dark corner pf - अवनप्रवमन a temple with doors all shut open thim eyes and ses thy God is not before thee 1 He: there where the tiller is tilling the hard ground and where the path maker 19 breaking stones आखें मूर कर मर जपन बाल म कहत है-आम्दै लान और प्रख, तेग परमात्मा या नहीं है। तरा परमा मा तो वहा है, जहा किसान अपमा कार भूमि पर हल जान रहा है और मजदूर एयर पोर रहा है। तुझ या उस परमात्मा क न करन हो ता - उम किमान और मजदूर के पास जा। उनकी सरा करेगा ना इश्वर प्रामि जरूर होगी। अट गोधरिग में भी एमा ही एक नरोत्तम मत्त का प्रमग नाया गया है । राज मरक राजा स बार कहता है कि-महाराज, नरोत्तम भस अपन इस सोन करावाल मरिमझी कभी नहीं आता । वह मात्र के बाहर एक झाड के नीच देकर ही भगवान् के भजन गाता है। परन्तु यहाँ हरदम आमियों का मलामा लगा रहता है और सैकडों पर नारी उमके पास आत जात रहत हैं। किन हमार इस मरिमें तो काम नहीं आता इम ममाचार में कुपित है। राजा नरातम भक्त के पास गया और शेला 'एमा मुटर मन्म और कीमती मरि छोडकर आप भगवान् का मजन करन क लिय यहा मिट्टो पर क्या बेट है। नरातम भक्त न शानि स उत्तर दते हुए कहा-Beacause God is not there in your temple क्योंकि परमात्मा तुम्हार मरि में नहीं है।' राजा यह सुनकर स्तधा गया और बालग-'महाराज, यह क्या कहत हो । मर मन्दिर मैं इश्वर नही है ।। क्या आप नहीं जानन कि मैंन कितने खच स यह मरि बनवाया है और कितनी भय प्रन्टिा करवाद थी। दो करोड मोन की मोहरोंन २ मरि बनवाया गया है।

विश्वकवि रवी द्रनाथ रेगोर -- मत ने कहा 'गजन ! यह सब में बानता है। परन्तु जिम समय नुम भरना यह मरि बना रहे थे, उस समय इबारों मनुष्यों के घर बार अनि त्रि में पानी में बह गय थ, और व सब मटर की आगा रख कर तुम्हार पास आए थे। परन्तु तुमन उस समय उनकी सहायता नहीं की। तब सजर न कहा था-'अर, यह पामर प्रागी, जो अपने भाइयों के लिये झोपड भी नहीं बनवा सकता, वह मरे लये मतिर क्या बनवा सकेगा। उसी समय से इश्वर न अपना आसन उम मरि मे स उग कर इस पेट के नीच रख लिया है। इसलिये में यही बेरपर भगवान का भजन करता हूँ। मदिर में जो मूर्ति है वह भगवार की नहीं, तुम्हारे अभिमान की पुतली है । 'इतना मुनते ही राजा का नस Tम में आग फैल गह और व. बाला---'भक्त | तुम मेरा देश जोहर चल जाओ। मैं तुम्हें आज च निकाला दता हूँ ।' मत्त ने प्रसनता पूर्वक जवार लिया Banish me where Jou have banished my Goa 'जामे मर परमात्मा को न ने सीमा बाहर किया है यक्ष स न मुझ भी खुशी म बाहर कर। इस कविता से गार यह कहत है कि जो मनुष्य मानव मया नहीं कर सकता वह इश्वर की सबा करने का अधिकारी नहीं हो सकता। उनक विशाल साहित्य सागर क य यो स जलयित हैं, जिनक र म मन किनित् मात्र ही आपको बताया है। उनका सारा सादिन्य ही अध्ययन और अगाम रन जसा है। उनके इस भाद-दिवम के अधमर पर यदि हम उनके साहित्य का तनिक भी परिशालन कर आमा को उन्नति पय पर असमर करेंग तो हमारा या हुए बिना नहीं रहेगा। बम्बई ७८४४ } [*गार अदांजलि दिवस पर प्रिया गया प्रवचन ] महात्मा गाधीजी बापू का प्रेरक जीवन 1 गया, जितना गत दो हजार वषों में किसी के लिय इतना लिया और कहा न पूर गांधीजीक सम्बध में। दिन के अनेकानेक मानवों न उनक सम्म ध में लिया और कहा है। उनस नया कुछ मुझ आज छ कहना नहीं रहा। मुझ जो कहना ह यह सब पुराना और अनेक धार कहा जा चुका ह । फिर भी यह हममें प्राणों का सचार करने वाला -नव चतन और नव जावन टने वाला है। सूरज रोज उत्य और अस होता है लेकिन वही सूरज प्रति दिन भी उगता है। इस तरह वही पुगना सूरज रोज रोज उटित होकर जैम नव चेतन और नव जीवन र नाता है उसी तरह मापुम्पों का जीवन भी नव जीवन टेनेवाला होता है । गाधाजी का धम कद मनुष्य यह समझत है कि गाधानी राजनीतिक पुरुष थ। और ऐम भाद मुझसे पृछत हैं कि राजनीतिक पुरुषों क बार में क्या आप जैस माधु सन्त भी बोल सक्त है । मरा उनस कहना है कि गाघीजी स्थूल दृष्टि स भल ही गजनीतिक पुरुप समझ जात हों पर सूक्ष्म दृष्टि स वे एक धार्मिक पुरुष थे । उनके अपन ही दो म कहू तो ! wear the garb of a pohtucian but am at heart a religious man -अयात् में राजनीति का चोला पहनता हूँ पर हृदय स तो धार्मिक वृत्ति का है। उनक सभी काय विधक मुन होत थ । धम में टनका अट्टा श्रद्धा थी। हिंसा में उनका विश्वास महात्मा गापानी नहीं था। घ यह खुले तौर पर कहा करत थे कि हिंसा या अधम से किया गया काय कभी सफल नहीं होता। यत्तिगत क्षेत्र हो या सामायिक, अया पारमार्थिक किसी भी क्षत्र में हिंसा का आश्रय नहीं लना चाहिये। दौ, अयाय का प्रतिकार अवय करना चाहिये । प्रतिकार करन का मी तराका हमें गाधीजी ने अमिक बताया । उहोंने कहाः "प्रतिरार भी धम स हो सकता है । अधम, असत्य, हिंसा आदि में सच्चा नहीं होता, जिममे उनक रा किये गये काम स्थायी नहीं रह सकते । सत्य दी बलवान् है और यहा स्थिर भी है। प्रम और मैत्री ही स्थिर रह स्वती ६ । साहरण क प में 'अ', 'ब' को निरस्कृत करे और '' '५' का तो दोनों में बैरवी ही वृद्धि होगी। पर यदि दोनों में स पक्ष में मैत्री या प्रम भाव होग ता दूमर का वैरभाव भी कमजोर पद्ध जारगा। वेरा के सामन बैर रम्बने से तो पैर का अधिक बलवान बनाता है | अबेरी समक्ष भी देर न रख कर प्रम और मैत्री माव धारण करना चाहिय । गांधीजी न हमें यही सिवाया है। उनका प्राश स्थायी है वे हमारे बीन से चले नहीं गये हैं। यह सच है कि उनका पच महाभून का स्थूल शरार विलीन हो गया है, परन्तु उनका स्म ८६ नष्ट नहीं हुभा है। आकाश में चमकन वाल तारों में स ना किरण निकलती है यह हजार वर्षों बार भी रिग्वाह दता है और अस्त हुए तारों की अतिम किरण भी सैकहो या बार खिाद पड़ती है। ठीक इसी प्रकार गम महापुरप के ६ में से निकली हुई अहिंसा और सत्य की किरण भी हजारों वर्षों तक ज्योतिमान् रह सक्गी और दुनिया को मालाक्ति करती रहगी। । समभार के पैगम्बर समभाव उनका मम्निष्प था। वण, जाति, सम्प्रदाय या दध कोई भी उनके पाय में बाधा नहीं होते य। उनके मत में ब्राह्मश और उबलप्रवचन -- हारमन, अमीर और गरीब, काम और गोरा, गिति और अशिशिन मर ममान थे। सनमुन माधोजी समभार के माप मानवता के प्रचारक मानयता उनका हृदय था। उनकी प्रत्यक प्राति म मानवता तान बान की तरह गुयी हुइ यी । रत ऑम् और पमीकी नलियो म उ हिंसा ही दृगोचर होती थी, जिनकी तरफ उन माग भी लाप खींचा था। जीवन निकाह लिप तन तोर परिश्रम करनाले श्रम बीवियों का अपन जुमी गुगमा मालिकों द्वारा चूमा बा| और उनके खजना का नाम पीना, बापू म नसावा गया। उनका हाय पिपल उठा और पल-स्वरूप वे आजान सभामा बन गय । बम गिरधरलाल की मूर्ति पर कोड पहने और उमरे चिर दोबत बागमारा की पार पर, उमी नरहरिद्रारायण की यथा भी बापू के हय पर अस्ति हा जाता थी। मापू मानवता क गरज थ। अपन पाम आनवाली को व मानता क रंग म रग ते थे। एक बार ये उहामा क प्रवास पर भीनय पटरूज क साय गय य । शन पर गाहा के इन्तजार में बैठ ही था कि वह एक वृद हरिजन आया । वह अपन मुह म तिनका लकर बापू के पैरों में गिर पर। आपू न हसत हमत उमम भेट मागी। परिजन के पास एक पैमा था। उसन वहा अपना अब स निकाम और गापू का न के लिए अपना हाय बताया। बापू ने कहा- मैं कुछ विशप में चाहता हूँ।' हरिजन बहुत खुश हुआ। उम लगा कि मर पाम कुछ विशष चीज है, जिसे गाधीजी चाहत है। बापू न कहा- मुझ ये तीन बचन क ता मइ कि किमा भी लिन किमा क मामन मुह में तिनका नहीं ना। क्योंकि गोबर सभी मनुष्यों को स्वमान होता है जिम हर मनु'य को मुरामत रखना चाहिय। दूमरा शराब न पीना और तीमरा माम न खाना ।' हरिजन न बापू की तीनो बाने मजूर कर ली और इस तरह महामा गांधीजी दो चार मिनिट में ससम सही बापू ने उस पर मानवता का रंग चदा दिया | सचमुच उनका एसा चमत्कार था। सत्य और अहिंसा की मूर्ति सत्य और अहिंसा तो उनके श्वासा वाम य । असत्य और हिंसा के वातावरण से उनको अपार दुख होता था। आजादा मन्ने से पूर्व और र में भी हिंसा का नग्न ताडव हुभा या उमस उस अमझ पीडा हुद या-उनकी आमा रो पडा थी। उस भयकर हिंसा कांड के बीच भी सपू अहिंसा के टीपसम्म बने और प्रेम का निमल प्रकाश देते रहे । उनकी बामा, पर स्थिर अवाज वैर का बदला प्रेम से काआ, बराबर गूडनी ही सा अहिंसा के प्रति उनका तिल भर मी भदा कम नही हुई। सवा और सत्याग्रह वे आदर्श मवा और सत्याग्रह दानो उनक पैर थे। उनकी सारी प्रवृत्तियाँ सेवा-मय ही थी। हमारे पूर्वको ने-मगवान् महावार और बुद्धन-जो मत्र दिया था उस हम भूल गये थे। बामू फिर स उसकी चार टिगह। व करते थकि बो रोगी की-दुखी की सेवा करता है वह प्रभु का सवा करता है। भगवान महावीर स भी एक बार यह प्रश्न किया गया था सना करन से क्या सभ होता है। इसका उत्तर देते हुए भगवान ने कहा था --'सेवा करा स अन्न करण शुद्ध होता है। तीर्थकर जैसा योग्यता मात करने का राक्षमाग मा मा ही है। बापू के नारन में यह सवा अनक तरह स मिली जुला रिवाइ देती थी। सेरामाम में वे अपन हायो मही रागियों की सवा करत थे। एक्चार खुजली का रोगी-एक किसान आया और उसन सपूम अपनी बीमारी का इलाज पूछा । बापू ने सोचा कि यह गराब मनुष्य अपन लिय सापन सामग्री कहां से रावेगा ! उ होने अपने स्यि भरे हुए, टब ने पानी से ठमे स्नान कराया और फिर अपने

उल प्रवचन
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अभय और
अपना निर्दिष्ट
हाथों स उमक शरार पर मलहम लगा दी। म प्रकार मया और मयामह
उनक चरण अन हुए थे।
अभय और सयम
मयम उनका भुजाय थीं।
एक तरफ मारा
दुनिया का अभिप्राय । और दुमरी तरा
सय हो तो सारी दुनिया की अगणना करप भी वे अपन निणयानुमार
ही पलते थे। उनकी निमयता यहाँ तक विकसित हो चुका थी कि वे
किसी भी यत्ति या सत्ता म भयभात नहीं होत य और न कभी होन
दूसरों को भयभीत करन की इच्छा से की थी। गिरित, अशिजिन,
आचाल वृद्ध, साचारा दुराचारा मत्र कोइ उनक पाम बिना किसा शिक्षक
के आ जा सकते थे।
तीर्थ-स्वरूप बापू
पवित्रता और विवेक उनक नत्र य । कविवर टेगार ने कहा है कि
* य 1 को मनुष्य का रूप धारण करन को इच्छा युद, और वह गाधाजी क
रूप में अवतरित हुआ।' मरि वा मस्जि- में जाने पर जैस पवित्र
विचार भाते है वैसे पवित्र रिचार गाधीजी कतिकर रहन पर आते ५)
मानों व पय ही तीच स्वरूप या
समाज सुधारक नापू
प्रजारित की अनको प्रवृत्तियाँ उनकी रोमापना थी। भाश्यता
निवारण और स्त्री उद्धार य दो उनक महान सामाजिक काय थ । मनुष्य
के हृदय में हुए झूठे जजाल, अनुचित रीति रिवाज आदि निकालने का
होंने भरमक प्रयान दिया था। मनुष्य मनुष्य क माध में वो उच्च और
नीच कुल को लेकर पशुता का यार करता था उनका उम्न मान
VI

महामा गांधीजी कराया और अप्रन्यो कलिये भी अनेको मटिग के द्वार खुलवा दिये। उहोंन कहा कि 'मनुष्य अपने कार्य और विचारों में ही ऊँच नीन दो सकता है, जाम स नहीं।' स्वामा न्याना मरस्वती ने भी यही माग प्रहा किया था । भगवान् महावीर ने भी यी सब मुनाया था और आचरण में भी उतारा था। उसने अपने अमग सघक अदर प्रत्येक मानव को बिना किसी भे भाव के साधु बनाया था। महामा युद्ध न भी इमी मागे को प्रहण किया था। उदोन भी अपनों को अपना साधु बनाया था। आज दाइ.बार वर बाद गाधीजी ने भी मानव का मानर कम्प में बीवित रहना सिस्थाया । श्री को सभी अब ममझते थ, पान्तु गाधीजी ने उम निभय बनाया और नी एक शति है, यह गिद्ध कर बनाया । पाशविक बन भले ही पुरुष में अधिक हो, पर नैतिक बल में श्री पुरुष में भी र कर है। श्री जागति का बीज अनिका का में बोया गया था। जिम समय गाधीजी आमिका में थे उस समय ए भाइ यहाँ से अपनी पनी को रेकर आमिका गय। इस पर आफ्रिका की सरकार ने एतराज किया कि तुमको यहाँ रन का अधिकार है, तुम्हारी पनी का ही। इस पर केस चमया गया और अन्त म कौर ने पैसा दिया कि खिम्ती धम के अनुसार जिनके विवाह को में दज नहीं कराये गये होंग ऐम विवाह गैर-कानुनी माने जायगे । गाधीनी में यह मुना तो विचार किया कि अगर इस तरह विवा गैर कानूनी मान जायेंग तो बालक भी गैर कानूनी माने जायगे। इस तरह तो हिंदुओं की सारी मम्पत्ति भरकार के हाथ में चली बायगी । और इस प्रकार विवाहित स्त्री का कोह अविकार नहीं हो न उसका बा अपमान है। 1 छोलन हुए अपू ने रमोद करती हुइ रा से कहा-'जनरल रमपम कहता है कि त् मेग औरत नहीं है, पाशवान है। अब तू क्या करगी ? बा को उस समय अपनी न उल प्रक्चन शक्ति का मान नहीं था । - होने कहा-'इम तो औरतें हैं, इमा क्या हो सकता है।" बापूना-जमना। पा-ममे बाना कैसे होगा! बापू-पों नहीं ! राम वन में गय य तो सीता भी उनरे साथ गई थी। मैं जल में बाउंगा तान क्यों नहीं ना मरेगी।" रा ने कहा-'टीक है, पर मैं खागी पया!' बापू- फल खाना, न मिलता उपवास करना, और कदाचित त् बर में मर भी भावगीता में भाचीवन तेरी बगदारूप में पूजा करत रहूँगा।' मी जागति का बीज न सब प्रथम अप्राका में आया गया था। भाषा और बापू बापू ने मानव को मानवता, कायर को साहस अन्यजने को आत्मा और गुलाम को गौरव रिया था। कोह भी क्षेत्र उनसे अपूता नहीं मा था। शिक्षण क लिये उ होन गुरूभात मी चार किया था और नये नये माग बताय थे। गुजरात विद्यापाट की स्थापना में उनका अमूल्य सहयोग रहा या अप्रालिदने और बोलने में भी बड़े सिद्धहस्त में जिस पर सुनकर अमज मी बहुत खुश होत या फिर भी राष्टभाषा दिन- माना क ही हिमायना रहे य । उनमें यह अमौर शाति थी कि वे अपने सकरप बर से सार वातावरण में परिवतन कर देते थे। उन्होंने खाटीका प्रचा करना शुरू किया तो हजारों यो पुरुष खादी पहनने लग ग्य! हमे जरा और रशमा कपों को पहनने वाला नया मी खादी पहनने गौरव मानने लगी। घर घर घरखा चन्न लगा और हाथ में तर रखना मी एक रिवाद हो गया। - महामा गाचीजी प्राकृतिक चिकित्सा इसके सिवा गांधीजी न प्राकृतिर स्पायर्या को खोजकर आहार और आराम्य शास्त्र में भी आग नवीन परिपतन करने की सूचनाए की भाषा को सरल, समृद्ध और भाचार वृद् सब समझ म इसका हर आग्रह रम्पत हुए एक शर-कास भी रहान तैयार कराया। हम महापापी न बनें सगात के तावे बने गोवीन थे। प्रभु मत्तिक भननों को मुत मुनत व तस्लान हो जाते थे। इस तरह गाधाजी के जीवन से हम बहुत कुछ बान को मिलता है। गोडसे ने ता उनके स्थूर टह का ही घान किया है, पर तु जब हम अहिंसा सन्य, अभय, विवेक, सवा और सत्याग्रह का पात करत हैं तब हम उन सूझम दद का घात करन वाल पहापापा अनत हैं । स्यूट दे तो मिल वाहा है, उस रिका कर रखने की किमी कामी शनि नहीं है। जीवन-मरण गाधामी न जम में मृत्यु पपन्न अपनी सारी जीवन पद्धति दुनिया के समक्ष पश की है। जी केमे और मृयु आरे तो उसका मी हॅसते सो आरिंगन कम किया जाय, यह हमें गाधीजी न सिखाया ह। जीरन की अनिम सास तक मी टोने सपा धम स अपना मुँ- माला था। अमर शहीद पाए मान थे एक महान ही बन गये है। हा निम्न को नके 'अनुयारियों ने ही मृग पर चारा था। सात्र ान के सामने जन सन्य और बापत में से एक को कायम रमन दा मवा- आया तब उमने सत्य ५ लिए जा जापन की 477 ना दा उचित समझा। र थ उजल प्रवचन कालान लोगों ने उम भी बदर कर मार डाला। श्राकृष्ण को भा अपने कुटुम्बा के तीर से मौत के घाट उतरना पड़ा था । स्वामा दयाना सरम्वता अपने हा सोइय द्वारा जहर टन पर मार गये य । मरते समय जब रमोइय न उनक समक्ष अपने पाप को प्रकट किया तो स्वामी दयानर सरस्वती न अपन पास के सभी रुपये देन हुए उस पर अपार दया प्रक्ट की थी और उमसे भाग कर अपना जान बचान को कहा था। बुर का उनका साला सटा मारन को उयत रहा करता था। म. महावार पर उन्हीं के शिष्य गौशालक न तजालेल्या पेंट कर उौ मारन की चया का था। पार मवत्र मापुरुषां का मरण इमी तरह होता है। महात्माजी को भी उही महापुरुषों की पत्ति में खड़ा होना था। नितान वे मी अपन ही देग मा क हाथों में मयु प्राप्त कर उन्हीं अमर गहीदों की पत्ति में जा चापू की महान् भेट टन वाले । बापू न मान पता का महाविमान दुनिया को भेंट किया है। मनुष्य जब पृथ्वी पर गाना होता है तब उसक ल्य नदा, समुद्र, पहाट आनि को गधना कठिन हो जाता है। क्योंकि ये सभी पृथ्वी के टुकडे टुकड कर । परन्तु जब वह विमान म उन्ता हो, तब ये नदा, नाल, पगर, ममुर आदि उमको छुने तक नहीं हैं। उमा तरह प्रेम और मानवता के महाविमान में बैटन वाल मानव यात्री को भी राष्ट्र प्रमा, सम्प्रदाय का जाति क भ नहीं दृत हैं । इन सबस दूर रह कर वह मरलता मे अपना जीवन व्यतीत कर सकता । बापू न अपना सन्म केवट मागी म ही नहीं, बलि अपन जीरन और आचरण मे मी सजाव कर बताया था। चगाल म एक कहावत है-'आमार जीवन इ आमार बाना' यह बापू क लिये चिकुर सत्य मिद्ध दर है।

६७
महात्मा गाधाजी
उनकी इच्छा
उनका अन्तिम इच्छा थी !क भारत एक आश देश बन कर
वासना ग्रस्त और दुख से सन्तप्त बन हुए विश्व को मानवता, मैत्री और
धमका पार पटारें। उनकी इस इच्छानुसार अगर हम चलेंगे तो उसी में
माधी जयती की सपरता है।
चम्बद
२१०४८
[जैन युक सघ, बम्बइ के तत्वावधान में
गाधी जयती के उपलक्ष्य में श्रीमहावीर जैन विद्या-
श्य में दिया गया प्रश्चन]

महा मानव का महाप्रयाण चाप पर गोली प्रश्न आन सारा समार गोत मागर में इस हुआ है। ससार आना बुछ एमा अनुभव कर रहा है कि अनटम्बा अनमुना भाम्प नाज आ गया हो। हर रोज हजारों मनुष्य मरते ई, किन्तु हमें विचार तक नहीं होता कि कौन कहा मरता है। और रिसको अन्त्यहि क्रिया कहाँ होती है। रवित आज एक यत्ति चापू- के चल जाने पर जो अपार दुख हो रहा है, वह क्यों हो रहा है। इसका क्या कारण है । उन पर गोली चली' यह समाचार मुनकर मानो हमार गरीर पर गाली चली हो, एसा असह्य दुख उना वियोग से हमें क्यों अनुभव का रहा है? यह प्राय है जिसका उत्तर हमें यहाँ खोज लेना है। जीवन-यम्तूरी एक बार बरार में कोह धनवान् यत्ति एक विशाल मकान बना रहा पा। उस समय कस्तूरी चचो गला एक नेपाली सा आ पहुँचा। उस धनवान् पत्ति न उससे करतूरी का मार पूछ। नेपा ने तिरस्कार भरा उनर देते हुए कहा-'तुम दणि क दरिद्र मनुष्य कस्तुरी क्या खरी पूना जाने पर भी गायद ही मार विष सगा। यह तुन पर उस धनिक यत्ति का बना रोष हुआ और उसने उमा समय पारी म कहा- तेर पास जितनी परखरी है पर इमी ममय यहा तौर पर रखने और अपन अपय र ल । म भी इस चोम मिया टता हूँ ताकि तर भारत में जाकर तू यह कदमक कि दक्षिण क गंग तो कस्तूरी की दीपाल वनात है।" सचमुच उस पति 7 मारी कस्तूरी। सक्त महामानव का महाप्रयाण ६ खरा- कर चूने म मिरवा दी और उमम अपन मकान की दीवारें बनवाई। कहत , आज मी उम मकान की दीवारों में मस्ती की मुगधि आती है। टीक इसी तरह मामाजी के जीवन-आगों की सेवा म भी वस्तुग डाली थी। उसकी मुपास के जीवन पयन्त तो सबन सदन की ही, परतु उनके अवमान क बाद भी हजारो वर्षों तक उनकी या सुवास महफ्ती रहेगी। विनानका एक नियम है कि हमारा वष पूर्व निकल हुए तार की किरण को आज भी हम देख सक्ने है, भान के टर हुए तार की अन्तिम किरण हजारों यों बाद भी टली बा सकती है। यह सच है कि महात्माजी का नीवा तारा आर टूट गया है, पर उसकी रिण का "कानो हमजारों की ता भी मिलता रहेगा। निष्पप यह माजी का जीवन आगा की मुराम और प्रम का प्रा लता था, पर भाज उम जीवा प्रदीप के बुझ जार स समम्न ममार में अपरा छा गया है और व शो-मागर में निमग्न हो गया है। महा-मानर बाप महामाजी कोइ साधारण मनुष्य नहीं थ | घ महामानव-अर गुमप य | अभय, अदप और अवर य महापुरुष कती क्षण हैं। इनको इम महामाजी क जीवा में भली माति टम सक्त है। अमय बनना आचामिना की नींव है। इसक विधा कोइ भी सद्गुण टिक नही मुक्ता। अभय मुन्य क बिना किसी भी सद्गुण का मूल्य नहीं होता और मा सद्गुण होत व निभयता की पारिश में ही पुष्प बन कर बिलते हैं। याय पीटा, परोपकार, साथत्याग, आम्रपान प्रतिकार करन की हिम्मत और मौका आन पर आम-अलिगा ता करने की तैयारी, ये सभी निमरता भारा हा हृदय में रतरते हैं-विश्न ई-रते हैं। निमयता रहित सभी उज्वल प्रवचन प्रवृत्तियॉ निक्ल होती है। गीता में भी जहाँ देवी सम्पत्ति का घन किया गया है, यहाँ निभयता को ही सप प्रथम स्थान लिया गया है। आमुरा सम्पत्ति को परास्त करने के लिये जर मी सम्पत्ति अपनी पूर रचना करती है, तब सनापति का पद अभय को ही प्राम होता है । स्यामा पिकानद न भी कई बार अपन भाषण में कहा है कि fear is so-- भय पाप है। इतना ही नहीं, भप सब पापों का मर भी है। इस प्रकार अनेक गुणों का जनक अभय महापुरष का प्रथम लक्षण है। वह दो प्रकार का है-एक तरफ तो मनुष्य किमी पति या जररम्त मत्ता स भी मयभीत न हो, और दूसरी तरफ उमस भी कोइ यक्ति मयभीत न हो। एसा टोतरपा गुड जाचरण होन पर ही जमय' की मिदिमानी जा मकती है। मृत्युजय बापू महामाजी क जीत में अभय इसा रूप में प्रतिष्ठित था। अमेरिका में विश्व करि रवीद्रनाथ टैगार में जब एक पत्रकार न महा माजी की विधपता पूठी, नर उ होन उत्तर देते हुए कहा था कि महात्माजी में तीन गेिषताएँ है। अमय, सत्य और हिसाब की सराह उनके पास इतना अधिक है कि नेपाइ पाइ का भी लगा रखते है । जिम कामक लिये जो रकम प्रात हुइ होगी उमी काम में वे उमका उपयोग परते हैं । मुझ याद है कि एक बार सौजन्य मान स्वामी आनट न प्रसगा बातचीत में कहा था कि महामाजी को एक भाइ न लोकमान्य तिलक का सुदर जीवन परित्र लिम्बने पाले को ये हजार म्पये इनाम टने के लिय न्येि ये, परन्तु योग्य लेवा नहीं मिलने पर यह रकम आज भी उमी तरह अलग सबी है । उमका किसी दूसर काम में उहोंने उपयोग नहीं किया । यह उनकी हिसार की सफाई का एक छोटा सा उपाहरण है जिस पर से उनकी प्रामाणिकता का पूरा पूरा अनाज लगाया जा सकता है। उनका महा मानरका महाप्रयाण ७१ सत्य की उपासना को तो सब दोद जानते हैं। सत्य एक तरफ हो और सारा दुनिया एक तरफ हो तो भी ये सारा दुनिया को छोडर अकेने सत्य के निक अदिग खड़े रहते थे । बापू की निभयता का परिचय देते गद्रनाथ ने कहा था कि मैं तो विश्व-कवि कहा जाता है फिर भी मेर मामने काइ मनुष्य गरी निकाय र आव तो मैं डर के मारे बालक का तरह भागना शुरू कर दूगा, किन गाधी जी के समय यदि कोइ छरा स्वर आवे तो उसका हमने हुए यात ही नहीं करेंगे पति मुके सामने नावर सद्ध हो जायगे । य* है उनकी निभयता । उनको किमा यत्ति या आपत्ति का भय नहीं था और न मृत्यु का ही भय था। वे मत्युजय नम कोह मयभीत हो, एसा उनका आचरण नहीं था। मबका एक समान प्यार थे । एक छो में बालक म लेकर रक मिपारी, मूग्न, पडित या दुराचारी सब उनसे भियना पूरक मिल माने थे। इस प्रकार ग्मय रूप में गाधीजी अभय को धारण किये हुए थ। थे। अद्वेषी बापू महापुरुष का दूसरा पण है अद्वप । अहिमा और प्रम का पहला रूप अदप अवर ही बापू की जीरन सिद्धि का मजीर आश था । गत कुछ महीनों म ता अद्वेष अहिंमा और और ही उन उपटेगा का मुख्य अंग नन गय ५। उन अपनी सारी जिल्गी स्टार में ही गुजारी। रहने के लिये ही उनका जन्म हुआ था एसा भी अगर कहा जाय ता अनुचित नहीं है। पिर भी उदोन किसा के साथ वैर नही गया। जिसके माथ वे हरते ये उसका भी हित ही चाहते थे ! वे एक तरफ तो ग की दानवता के सामने माद रहते थे, पर दूमरी तरफ उमकी मानवता के साथ भाइ चारा मी "घत थे। सारी चिन्गा त गइ रहते हुए भी उनके मन में कोई दुमन नहीं था यही धान उनकी अत्यमिद्धि को सिद्ध कर देती है -- ।

७२ उप्रचन निमल हदय बापू हुआ गाधीजी अपन विरोधियों का भी माद पहुंचाग करते थे। रक्षिण अफ्रीका में जब वे रहते थे तब उनके विरोधियों का एक शिघ महल जनरल म्मम मे मिलने गया था । लकिन उनमें म किमी भी यक्ति में इतनी दक्षता या भाषा जान नहीं था कि अपना आत को कह कर जनरल स्मसको प्रभावित कर सके। अंत में उड़ान इसक रिय महामाजी स ही प्राथना की । अपने बार में अपन ही शन को पिरोधी बाते करना कोन चोदेगा। लेकिन महात्माजी ने उन आग्रह का कायम रखते हुए उनकी प्राथना स्वीकार की और उह पूरा पग मनुष्ट भी किया। इस प्रकार व द्वप और चैर को पूरा तरह नए कर चुक य | वण जानि, सम्यगय या दा तक ही नहीं, मानर मात्र पर उनका प्रम था। उनको टेग्वन दी एमा भास हो लगता या मागों प्रम ही गाधीजी क रूप में अवतरित हा। उसके अग प्रत्यग स प्रम का दो झरना झरता रहता था। उनकी वाणा का अपण करना प्रेमामृत का पान करा की तरह लगता था । उदोन अपनी निदगी में जो जो महान् कार पिय उमक मूल में मानव पमही रिवाद पता है । अब नब ने मान के प्रति क्सिी का दूप पा र उत्ति को देखते थे तब तब उनका हृदय बना दुपित हो उठा था, जिसकी शाति के लिप उ उपवास की शरण लमो परती थी। सन् १८३० में जब व यरवडा जेल में थे, उस समय वा क जलर मिस्र किवन बापू स गुजराती पटन के लिय आया करत य । बापू उहे बालपोथी पटान थे। लकिन जब व एक दिन नहीं आय तो बापू न दूमर गिन उनकी खबर का कल्य काका साहब को उनके पाम भजा। भोजन कर लने पर काबा साहब । गाधीजी मनकि मि पिन कल एक आरमी को पासी दने के काम में कर गय य अत परन नहीं आ सके य । बस, पासा देश का नाम मुनत ही गाधीजी तो अन्याय की गय । उनका पहरा ल गया । उ हान - महरा माना का महाप्रयाण ७ ३ - कहा-काका, ग्वाया हुआ अनाज अभी पर स वादित निकल बारगा। उम मनुष्य का पामी का चित्र सामने पडा हो जाने से गांघाजी इतन अम्वस्थ हो गय कि उसम काका माइन भी घबरा गय। एक मनुष्य की इत्या म भी जब वे इतन दुम्बित हुए ता सैकडों मनुष्यों के खून स उनकी अत्मा कितनी दुक्ति होती रक्षा होगी। इस बात का महल ही अदान लगाया जा सकता है। हत्या ही नहीं, पर मानव हार में र२ हुए दूप भार, बैर भार भी उनको शय की तरह चुमन थ । मानव हाय में प्रम की निमल-योति जगाने के लिये मग तपर रगत थ और उनका यह हर विश्वाम था कि ममल मानर समाज म यह योनि जगाई ग सक्नी है। प्रचलित दीप स्तम्भ और और अहिंसा के प्रतीक बाप, अवह प्रापलिन लीप-तम्भ की तरद य | आखिरी कुछ महाने तो उनक मयार परिस्थितियों में गुजर-मानो प्रल्यकाल हा, किन ऐम ममय म मी व अपने आग को ध्यय को दूरस्थ की तरह पकह रहे थ। और उनकी धीमी पर मुहर आनाज मत्य तथा पुरुषाथ का मन कराती हुइ लाग को बराबर ऊपर मे नुनाहर रखी थी। चारों तरफ दीपक बुझ रहे थ, पर यह उल दीपस्तम अग्वद्ध रूप में चल रहा था और आमपाम + हिमा नया देप तिमिर में अपनी प्रकाश किरण फेंक था। म जीती बागती प्रामवान आ मा को न तो कोई अनवस्था घर सकी और न कोई नाही उमको विकृत कर सकी थी। ता. २७१४८ के प्राथना प्रचन क य शब्द इमी की साली द रह है। वे कहते हैं-'वर-वृत्ति की छुपी इच्छा भी मत रखो।' दरगाह को कोमी पानो स जो नुमान पहुँचा उसक लिय गांधीजीन दुख यन किया था। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में भी ऐसा ही हुआ था, हिना कोर टीक नाव नहीं ने । - ७४ उ बल प्रवचन एमी वैर वृत्ति को अटका न सकें, क्या इम हद ना हमारा पतन हो चुका है। बुराद की बुरा स तुलना उचित नहीं कहा जा सकता। अनासक्ति के उपासक महापुम्प का तामरालमा अपर है। बापू निमी भी प्रसग में पेट नहीं करत थे। व बह विक प्रमग म मी खुग रात थे। मन् १९४४ मैं व जिन्ना स मुलाकात करन लिय बबन पाय थ। उस समय हमारा भी मिलना बापू म होता था। उस समय मुलाकात के निप्पल होने पर भी वार क च र पर लगमान भी खर नजर नहीं आता था ।मानों कुछ हुआ ही न हो, यो पूर्ण प्रम न चित्त स व बाते किपा परत थएस तो अनको प्रसगों से उनका जीवन भरा हुआ था फिर भार भी अप्रस न नहीं रह थे । अनामक्ति का ये उपासक थे और इमाम उन्हें सफलता या बसरलता पातक न कर सकी थी। सच्चा स्मारक इम प्रकार अभय, अप और अग्बा गुणों द्वारा गाधीजी महानत क पमिक बन य । आज उनक इ गुणों की मुगास चारों तर पैल रई । और यह सुबास ही रोहों पक्तियों के नेत्रों में म अश्रु धारा बहा रह है । उनका परित जीरन उनक पाम जानेवालों में भी पवित्रता मरता था कह वपा पूर बम्बद के गऊन हॉल में एक विशाल ममा के समक्ष भाषा दत हुए अप्रोका स सैरकर गोवर न ग था-'गाधीजा क मानि में रहन पर मुदर मदिर या मस्जिद में खड हो एसे भय रिचार आत उन उम्च जीवन को अपन सामन रख कर उनक पथ पर हम सब चले यही उनका सचा स्मारक २ - १८ घारकोपर की पाक मभा में महात्माजी को दी गई अनि यत्र-युग और गृहोद्योग यत्रों से हास आज का युग यत्र युग क नाम स प्रसिद्ध है। इस आखिरी शतादी मत्रों ने जो शाघ्रगामी प्रगति की है, वैसी पहले कभी नहीं हुई थी। इम प्रगति का सर्वोच्च शिखर अणुबम' है, लकिन इस प्रगतिगामी युग कममा यर क्षणिक मुग्न टन क मिया अय सब प्रकार से हानि प्र ही सिद्ध हुए हैं। यों का प्रबलना म माना जाति यत्रात् बननी जा रही है। यह मान हितादिन का विचार भी नहीं कर सकना । यनों मे आर्थिक, गारीरिक, बौद्धिक, नैतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक यो सवतोमुग्वा हास हा होता है। यन्त्र और चरसा प्रिया क समक्ष प्रतिक्यिा गेना स्वाभाविक है। रापण सामन गम, दानव के सामन दव, कम क समक्ष कृष्ण, हिमा के सम असा और पाप के मामने पुर जैम पैा शेत मे ही या प्राबल्य के मामन गाधीविचार पैदा हुआ । गाधीजी ने यनों क सामन चग्य की--गू यिोग की प्रतिष्ठा की। यत्रों में होने वारे मतानुग्वी हास का रोग द्वारा गेका जा मक्ता आशका गलत है कह लोगों का ग्वाल है कि यत्र बाटु य क इम जमार में गहोयोग क्या कर सकेगा। दुनिया की बहा बा मिरों ६ मामन अगर योर से मनुप चरचे चलान लग जाय तो उमम क्या होन वाला है। लेकिन एसा सोचना टीक नहीं है। यारा यह न तो एमाहै कि अमावस की कारी उजरलाचन । प्रतीता गत म किसा का बाहिर निकलो का काम पड और पर उR ममा " यह कि विश्व क गहनतम अधकार को मग पर रैम दूर कर सकगार मा मश कर जैम उसका अबर म भरका मुग्नापूर है, वैसे ही कर का प्रश्न मी अजाननापूर्ण है। सबाट क इम भी ममर में गृह उद्योग जैमी छोटी सी प्रवृत्ति भी अधर म दीपा की तरह है। टीम में दीपक जला हैस याय स आ दीपक अमानकर मार का धकार र करे, य' आगा हम सनी चाहिय । यत्र उद्योग से बेकारी बरती है वामि टिम यत्र उयोग और गृह योग वामित करने क यन रोग महारभा या महान म है I गराग अल्पारभी है । उरण तौर पर हम पर कोही- -मिल का कपड़ा और ग्वा।। मिल + पर में एकदिर म पद्रिय तर f-सा है। नप को मुगम और चमकान बान कि म पर पशुओं की चरबारगाद जाना है । इसक सिवा मिक कारण घर में चरखा चयन बाल और नाथ स कपना बुान वाल बहुन म वकार ही जान है । " उद्योग म गमग १.. मनुष्य जितना काम करो है उतना मिल म एर आमी कर रहा है। इसम .. आरभी मकार बन जाा है। और उनकी मानाविका का सहारा न जाता है । वृत्ति छर हो जाता है, बिमक हिन्दू शास्त्रा में यध जेमा पाप बताया गया है। यत्र भूत ह पत्र भूत क समान है। जैम का विमान भूतकी साधना के और पिर भून कहे कि मुझ काम ही तो मैं तुम्हें या जागा, म यर को भी वामनदारिया जाय तामाटिक कोहीयाजाना। यानी तर य खना नक्ति मन की बात हो जाता है। जैम म यो म अकि । ।

स्त्र युग और गोयोग
।
नाना
है
गन रिया जाना है मे ग्यास मीना जाता है। उ पारन माय
विगम का मकान पेश हो जाता है। इसमें लिये युद्ध का नौवनमा
1 अपना मार मब देश में बचा जा सके लिये ये युरहान है।
बागों पर कब्जा करना, इमेरे लिय युद्ध तक की तैयारा रखना, इस तरह
यत्र चोर युद्ध की मार परम्पर नुटी दुर है। -मम यत्र या यत्र की
स्तु का योग करने वाला हर एक मनुप युद्ध की महा मानव हिंसा का
भागातार बनता है।
मनोयोग में
तरता
प्राचान समय में रामन बाटणा- अपना शौक क ग्वानिर छोर
छा- बालक + सयकार कर कुटों में रग्या करत य और अपने सामन
जीक्ति मनुष्यो क पटो और गरार पर रार लगा कर जला दिवा करत थे
एगे मनु यो का मगर कहन - | परतु ना मनुष्य आज चम और
पानलला लिय ही मिट उत्र और सिक चमर की वस्तुएँ उपयोग में
लान ६ उनमें क्या ऐसा ता का अग नहीं है । ना० १४" के
'हरिजा नयु' म श्री विगोरला मारूगा ने लिखा था कि नरम चमद
दयि गमाती गाना का कल किया जाना है और फिर उसक गम के
उर का चमडा कार सकी वस्तुएँ बनाइ जाना है। गम
मुनापा बहुत मिलना है। एमी वस्तुएँ काम में लाना कितनी बोर
मिा और ऋता है। अ-सा प्रमियों की तादनका सा नक नहीं
करना चानिये । आ सक चमट की गु- उयोग की वस्तुओं का उपयोग
में दबा धामयों का मान्ध चिद है।
मात्र समान में माथिक स्थिति विपाना के चार पर पहुँच
गर है। एको मम करने क यि गोयाग ही एक मात्र पार है । यत्रो
द्वशनल पानी की तरह एक नगद सेनी धाराम नथ घन बहाना

७८ उजवल प्रवना जाता जबकि गायोग द्वारा शरमर मरमर बरमान की तर, मारममाग पोषण होना है। आज धन का विमानन करन क यि अनेक बार प्रचलि हुए है, परतु यथाथ में धन का योग्य वितरण करन पाय यति कोइ मरवा और सरम माग है तो वह महामाना द्वारा बताया गया गहा योग ही है। या द्वारा मुडी र मानर गति अनत ह और गहों भूगों मरत है, जब कि गोयाग द्वारा करोग मनुष्यों को मुहा भर अनाज पहुँचाग जाता है। इमारिय महा मान भराव का अनाना की उपमा दी थी मिली में काम करन बाल मजरा क र अनि श्रम म दुरल हा जात हैं। कइया को क्षय और दमा जैस संग ही जार है। घर में कर काम करन वाल स्त्री पुरुषों को जब मिल में जाकर काम करना पढत है तब नैतिक पतन की भी गुरुआन दोन लग जाता है। अमेरिका जमे गा में ज । यत्र हा का तरह पल रन हैं प ा क एक अनुभा श्री कुमारपाज कहत हैं कि अमरिका का बहुत मी प्रायमग स्वला में विवाधिया कपार प्राथमिक शिण भी ग्रहण नहीं कर सका है। मका कारण बनात उ होन लिखा है कि यत्रों की अधिकता म नाद भी जद बन जाती है. इम प्रकार शारीरिक, नैतिक और बौद्धिक सम भी यत्र हानिकर हामिद यत्र अशाति फैलाते है यों ने मुग्न सामग्रा में तो बहुन पति की है, पर हर कीम शाति को दूर रिया है। मनुष्य घर में दो या बाहर, पर इतनी अधि खग्या होती है कि मनुष्य अपन अन्न को नहीं मुन माता । बाद निकले कि मोटर सायल का पर, रेल की भकभक, विमान । परवर और मिलले की घर घर आवाज गुरु रता है। और घर में अ । - यत्र युग और गृहोद्योग ता पाव की सरसर टाइप राईर की किल्क क्लिक प्राइमम भी सू मू और रोहयो की सरवर चालू हो रहती है। एमा अशान्त वातावरण मनुष्य के शान तन्तुओ को निबल बना देता है। चित्तवृत्ति एकान नहीं दो मकती। एमी स्थिति में शाति काँम प्राप्त हो ! गृह उदाग ही इस अगान्ति से बना सकता है। दोनों में अतर गोपांग घर को मुग्वा बनाना है और याद्योग इम मुग्व का परवान करता है । गृहोद्योग से चरित्र निमर बनना है, और मिले में यह धूल में मिल जाता है । गृहोदाग स सगीन का मुम्बर निकलता है और मिळtस ककशक्टु पनि होती है। गहायोग पनी की तरह अपन घर में ही पोषण करनेवाला और मिल वया की तरह अपन यहा बुला कर उसको चूस लता है और फिर दुनकार देता है। गोयाग का काम परत समय मन हिलारें मारता है और मिली म काम करत समय मन चतर खाता है। गायोग दवी है और मिल पनना राथमी है। गायोग में लगाया गया पैसा धी-ध में परिवर्तित हो जाता है और मिल में लगाया हुआ पैसा तयार बदूक और बम के रूप में परिग्न हो जाता है । मिलों पारम्बानो और उनमें काम करने वाले को सा बम से भय बना रता है, और परम्वा या गृह उद्योग हममे निमय बना रहता है। मकर के समय म जबकि मका राम र जाना है तब नरवा या गृ उद्योग हा मुत्रका सदायक बाता है। आपको याद होगा कि गत युद्ध में जब कि अणुरम में जापान का नाश हुआ था और समल कल कारखाने नष्ट हो गरे य, तब वहा की मां-बगियों की स्ना चरम् न ही रम्मी था।

८० उल प्रवचन यत्रोद्योग अनार्य है हम गहोद्योग को आय धधा कह सक्त है और यत्रोद्योग को अनाय । हमारे गुरुटर इस सबंध में खूब बारीकी से विचारते हैं। ये कहते ३ जिला परिमाण में यत्र या यत्र की बना हुई वस्तुओं श उपयोग गातार उसने ही परिमाण में मनुष्य अनाय बनता जाता है। एक भाई न जब उसे अपना मोटर खरीन का बात कही तो उ होने कहा कि 'इम महारभी साधा से मोर की तीव्र गति की तरह ही मनुष्य अनायता क ५दे में पता चला जाता है। उन दगनाथ यदि कोई भा- ऐम साधनों में बेट र आता है तायर भी उनको प्रिय नहीं लगना । इस तरह वे यत्रायोग का अनायता की तरफ ल जाने बाग माधन समझते हैं। विवेक जाप्रति निक चिना धम TEमक्ता | पली बात तो यह है कि मनुष्य को अपनी आवश्यक्तार कम करनी चाहिय । परतुजा आरक्ताएँ जीवन के रियजनियार है उनका प्रण करते समय भी शिक्षक को जाग्रत रख कर ग्नरे पीछ अप या महारम तो नहीं आता है इसका विचार कराचाहिय। यदि किसी दयाधर्मा को को यह कह कि इस कीडा को मारोंग तो मै तुझे पाँच लाय म्पया दूंगा, तो क्या वह व्याधर्मी यह काम परगा। नही, वह यह माम हरगिज नहीं करगा और पाँच लाउ रुपया छोट रगा। पर तु रही ग्यापना यदि मौज मोर क लिए या समा मिलने की दृष्टि स गृहोद्योग की -स्तुओं का त्याग कर पर की वस्तुएँ पोग में लाता हागा ना वह दयाधर्मी किमहरनक दयारान दमका आप सयदी विचार कर लीजियगा। उपयास मारि तप करन बाला और धार्मिक क्रियाएँ करने वाला पुम्प यनि तु कुछ महगी है या दपन में अछी नहीं है, "सके लिए ही गृहोद्योग को तेना नहीं द तो य, उमा लिपस्तिना विचारणीप सवाल हो पाता है ?

यत्र-युग और गृहोद्योग ८१ कुछ विचारणीय प्रश्न गाय में मार खाना शुरू हो तो आप सब उमका कितना विरोध करेंग परन्तु यदि गांव में मिल शुरू होती है तो क्या आप उसके विप बुड करग ' जमे कसाई के लिये समाज में स्थान या प्रतिय नहीं है, वैस ही उद्योगपति भी प्रतिष्ठा के अधिकारी कैसे मान जा सकते हैं ! खुले आम बाजार में यदि कोइ मुसल्मान गोवध कर तो सारे बाजार म हटताल हो जायगी, परन्तु जब उसी बाजार में नया कारखाना खुल्ता हो तो उस समय किमी का पर भी विचार को नहीं आता ! मुझे बडा विस्मय होता है कि अब तक इन्सान इस सन्य को क्यो नहीं समझ पाया है ! हम निश्चय करें आज के गाधी जयती पवित्र दिवस पर और गृहोद्योग प्रगान के इस रपाटन व समय हम सको यह निणय कर लना चाहिय कि जहा तक गोयाग की मल्पहिंसक वस्तुएँ मिलती हो यहा ता दूमरी कोइ यत्र निर्मित वस्तुएँ न खरीदेंगे। यह कल्युग है | कल यानी मशीन या यत्र का युग । परन्तु गद उद्योग इस क्ल्युग को मतयुग यानी गाधीयुग म परिवर्तित कर सकगा। गृहोद्याग तप है गृहउद्योग की अल्पारंभी वस्तुओं को प्राप्त करने मे यति थोही कठिनाइ उठानी पर और फिरना भी पड तो उस समय यह समझना चाहिये कि यह तो धम यात्रा है। अधिक महगी पडती हो तो यह समझ लेना चाहिय कि बटी हुइ कीमत हम अपो टेग वासियों को गगन दे रे है। महोयोग की वस्तु

८२
उबल प्रवचन
यनि कोमल न हो तो यह समझ लेना चाहिये कि कोमलता का त्याग मा तप
ही। मारा य कि चाह जिम तरह भा अहिंसा प्रमियों को नोयोग
का महारभी वस्तुओं का त्याग अपश्य करना चाहिय ।
घारकापर
[महो योग प्रगान क ममा
दिया गया प्रवचन]

-
आँखों से अबुधाग यहचली तब उनो प्रतिसाक मार
समयमा उछ भी नही हुआ था। इमाशणया जिना
और महात्मानी के जापन में आकाश पातारागया। एक
गामा आकाश का जीव था तो दूसरा पागलपक ने अपने तुर
स्वाथ खातिर चालाख करोट मानों का भाग लिया,
म करो मानों के लिय अपना मका या-अरनीति
या अनर दोनों के मामालिये।
के अपमान से लोगों को कद दुम्ब नहाए।
मानव का जावा आणि तुरनो मनाई
भले ही सगी जोग या महावार
इन मौत।
महात्मा गांधी और जिन्ना
पाप और जिना में अतर
मानन की जिन्दगी नगिक होता है पर उम्दा सून सावन हजारों
वर्षों तर नावित रहता है। गम और गवण हजारों वर्षों पूर्व हुए थे और
उनका स्कूल जीवन न हो गया, लेकिन आज मा उनका सूम रावन
मिला है। गम के जापन का मधुरता और राम जावन की
कटुता
आत भी दुनिया में ली हुई है । इमी तर म भार कम की याद
मा अभी तक बना हुई है। यह बात हमारे २१ 17 ए और
का विभाजन रोपाल जिना का देहावरान बताश है। दोनों ने अपना
पल देह छोड दिया है लेकिन ममझना यह है कि अव १० महात्मानी का
विशेग समाचार सुनकर पा पर दूत्य मानव मी पिकाएर , लोगों का
महापुरपों की मैत्री भारना
है । तरि हम मर कर भा था ,
तो दुसरे
म

८४ उ. घलप्रपचन - जाय कि जो वर्षों तक इस पृथ्वी पर जाना पुगध पैगता रह! महापु - रुषों के जीवन-काल को हजारों वर्ष यतीत हो गये हैं, फिर भी उनकी सुवास ताना रना हुइ है। ऐमा उनमें क्या था? क्या इम मी वैमा नहीं पर मरते १ महापुरुषों के जावन में मंत्री भावना भरी रहनी है। करुणा और मंत्री के मनोहर फूल उनके हत्य में खिले हुए होते हैं गाधाजी के नायन में भी ऐमी हा उत्तम भावना मरी घी, निममे अज मा उनका जीवन हमें अत्यत प्रिय लग रहा है। चापू मी मैत्रीभापना मैत्री-मावना जैन धर्म का मूल है। पाकाय मेरेर पन्द्रिय प्राणियों तक यह भावना रहता है। 'मिमी मे स च मृण्मु मे यही साचिन ोता है। महात्माजाकावन में यही भावना थी। जिममे लगने ये उसमे भीर भाव नही रमत थे। उनके पावन का अभिका का एक असग है सब ना उनके कह दुमन भी हो गये थे, जो इनसे विहे थे। एक बार लेग, जो कि गाधीजी के दुश्मन , जनरल स्मटम से उनके विलाप कुछ कहना चाहते थे। लेकिन क्या कहे निमम कि जनरल स्मटम पर उप प्रभाव पड सके यह उनमें से किमी को माना सूझ रहा था। अत में वे मर गांधीजी के पास गय तो उन उ जो कहना चाहिये जिससे कि स्मटम पर कुछ प्रभाव पड सके, बताया और बढे प्रेम से विदा क्यिा । मला, मैत्रा मावना का इससे मुदर उदाहरण और कौनसा हो मकता है। अपने नत्र को भी एमा सलाह देना क्या मैत्री भावना नहीं है? जिन्ना का जीवन दूसरा तर अगर आप जिना के पावन को देखेंगे तो वहा आपको यह भावना नहीं दिखाई देगी, और ता क्या वे अपने भाद के प्रति भी महात्मा गाधा और जिला अम नहीं रखते थे। उनका सगा भाइ बम्बद की गोकुलदास तेमाल (जाग) हॉस्पिटल में मर गया, पर उसका खबर तक जिन्ना ने नहीं न । भला जिम मानर में अपन मार के प्रति भी अनुराग न हो उसके हृदय में क्या कभी मैत्री मावना मम हो सकता है। उमे तो जपने नु स्वाय की मैत्री यो जिसके लिये व वाया और अत में उमी के पास मर गया । आन उसका एमा ही अपवित्र पावन शेष रह गया है। उसके ज रन से आज हमें यही शिक्षा लेनी है कि हम भी यही उमसी मह अपना विषला जावन यहाँ नहीं बिना जाय, पर तु मानक दिन के लिये योजवर हो जाय। जैसा कि महात्माजी ने अपने नावन से हमें पता दिया। मैत्री का अथ गावाजा नीवन में मैत्री भावना कर कूट कर भरा था। मेवा का मतलय यहा है कि दूमरे के प्रति भी अपने जमी भायना रम्वना । जैसे माना अपन लिये मुम्व चाहता है वैसे हा वह दूसरे के प्रति भी मुग्व की कामना करे यहा मैत्रा भावना का अथ है। यह भावना महापुरुषों के सावन में भरा रहती है। अमार मापना महापुरुषों के बावन में दूसरा जा रस होती है वह है प्रमोद भावना । टमरे गुणी मनुष्यों के गुणों को देख कर प्रसन्न होना प्रमाद मार है। सन्' ४४ में जब मुझ गाधीजी मे मिलने का मौका मिला था, तब प्रसगवा निता को बान भी चल पडा थी। महात्माजी ने जिना के विषय में कहा, महा उसमें कह भवगुण हैं, वहाँ उसमें कई भद्गुण मा हैं। ऐसी भावना हा प्रमोद भावना है। महात्माजी में यह था, पर विना में या मारना कहा थी। दोनों के जावन की

८६
उपर प्रवचन
-
तुरना यदि कोइ करना चाहे तो यह इन ना तरिक मद्गुणों को लेकर ही
का जा सकता है। मानर में 11 मैत्रा मारना आना या
मानव को ही नहीं, पशुओं को भा अपन या में करता है। TIL
महावार के समयमरण में पारा जार सिंह भी माघ मारो । मया
भारना कामी परमौर स्थिति का ? एमा मेगा भारना महापु
रश नीयन में सता है जो युग तक मुगध सता रहता है। मह मानी
के नया में इसकी मुरास 4 पर निनावे जीरन में यह नगी 14
मान समान का गनु था। यह अपना दुधन न घर कर गया
निसको दुध भेकडो वो ता पानावण को पति करता रहा।
अत में 17 आज य निचय करना चाहिये। हम हमाग गौचन
दुर्गाधा नहीं, मुसासित बना और इसका प्रयत्न करें। अगर हम इन
शुभ मानानी को भरने जावन में स्थान देकर विमिन राना मास
सूम जया ओनिय तो गुम होगा ा, र दुनिया के सिपमा
हितकारी होगा। युगों तक उममे जो मुसि निक नेगी पद सारी दुनिया
के पारों को धोती रहेगा। ऐसे गुम जायन मा 7 दर और
परलोक को मुधार मकेंगे।
६
[जिन्न! क भसान पर गि
गया एक प्रश्न ]

"
हमारे गालोपयोगी श्रेष्ठ प्रकाशन
'प्यारे राजा बेटा' पर लोकमत
दोनों पुस्तकें अपत सरल भाषा में एक बालक के मानम व
हृदय का उन्नत करने के लिए प्यारे राजा रे सम्बोधन के माथ
एक पिता के प्यार से लिम्वी गई है, इस कारण यह पुस्तक मी पालकों
के रिए ही नहीं, मम धर्मों व दसों के महापुरुषों में दिलचस्पी रखने वाले
पाठकों के लिए भी पटनीय बन गद है।" -लोकमत (दैनिक) नागपुर
नरश्रेठाल्या या अमोल चरित्र कथाच्या वाचनाने मुलाचा
दृष्टिकोन व्यापक होइल च परतु त्याहि पेशा या मप्रति पी धम
समय सम्वण्याची मायना जाग्रत टेविली गेली आहे त्याने उत्कृ मार्ग
दर्शन होण्या सारन्ये आहे | हिदी वागणा-या प्रत्येक मुलाने है दाही
HAT कदा न, अनेक वाचावे इतके ते आकर्षक व चटकदार
जाहेत ।'
-लोकसत्ता (मगटी दैनिक) कम्बई
" मिडिलस्त्रों में यह पु तक पाठ्यक्रम में रावी लाने योग्य है।'
-प्रमाद (मामिक) अकोला
"मुचि पूण बाल-साहित्य के यथष्ट उत्पादन में प्रस्तुत पत्राकार
चहान वस्तुन माग प्रदर्शन कर रही है।"
~~-सम्मेलन पत्रिका (द्वैमासिक) प्रयाग
They are such as to catch the immediate attention
of children ard impress on them tho e noble qualities
which go in the making of a great man History geogt
aphs and ethics are all fused into an absorbing narrative
and the result is as interesting as it is elevating Hindi
hnouing children are sure to welcome those two books
very warmly"
-Bharat Jyoti (Sunday Edition)

"इसमें सन्देह नहीं कि ये पुलके रोचक भी है और प्रेरणादायक भी। सम्पूर्ण सीणताओं से उपर उठाने के लिए पाद आदि सन्तोष जनक है और मूल्य भी अनुचित या बटाकर नहीं रखा गया है।" -प्रताप (दैनिक) कानपुर "न्या (गोणी) साप्या हिन्दी मध्ये सागितल्या असल्याने हिदी भाषा आणि पुराण व इतिहास याचा सुदर प लहान मुलाच्या मर समली शाळातून गवण्यालायक हे दानहि भाग आहेत " -सकाळ (रविवार) पूना "इसमें सदेह नहीं कि हमारे महापुरुष हमारे जीवन से दूर जा पड़े हैं। लागों में उनके अस्तित्व पर भा अविश्वास सा पैदा हो गया है। ऐसे वातावरण में पालकों पर प्रस्तुत पुस्तकों का बहुत ही अच्छा प्रभाव पडेगा। भावना को वृद्धिस बालकों की नैतिकता भी प्रभावित होगा। क्यानक आश प्रधान है। पुस्तकें सर्वपा निदोष है।" प्रदीप (दैनिक) पटना Pyare Raja Bet Ilection of buc opbre l aketch of nifty great men of all creeds nd national pa Threepubt canonm mkould prove popular tb boys and grha of sender age They are written R simple languag Sorn parables ocluded here empha # moral v tvey a note esting to oner - Times of India Mr Ranka wlting from bebind prigon b rs ho poured bis beart into every liu tbe tester audit 12 a that affect on than the appeal of buttori allet The cho c# 18 wide enough and 10tfen ded to give the boys 1 beral education Pa epts who wish to present their ch ldren w to useful liternture o birthday will find these booka ba dy --The HITAVADA NAGPUR लेखक सम्पादक रिपभदास राका जमनालाल जैन, साहित्य रत्न आकर्षक मुख पृष्ठ । पृष्ठ सख्या पहले भाग की ८९, दूसरे भाग को ६ । पुस्तक कई स्थानों पर पाठ्यक्रम में रखी गई है। अनेक विद्वानों तया नेताओं द्वारा प्रशसित । दूसरा मस्करण भा हायोंहाय बिक रहा है। मूल्य प्रत्येक भाग का दस आने। भारत जैन महामण्डल, वर्धा

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Ujjawal Pravachan

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Title
Ujjawal Pravachan
File name
Ujjawal Pravachan
Text
OCR done
Citation
1950
Published
2011/03
Publisher
Vardha,bharat Jain Mahamandal
Language
Sanskrit
Pages
102
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
551878
Barcode
4990010032574.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
lDgVkjLr5se
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Ujjawal Pravachan