Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Nirash

Dr.tej Bahadur · 2011/04

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मनोहर सीरोज़ न०४
निराश
(उपन्यास)
डा. तेजबहादुर
मूल्य चारह नाना

प्रकाशक-~-पितोन्द्रमोहन मित्र,
माया कार्यालय,
Cpyright reserved with the pathshes
मुक-कोरेन्दगार,
माया मेस,

निराश श्रीमती कोकिला देवी जिस कमरे में अकेली बैठी थी, यह कमरा किसी समय रामनगर की सबसे सुन्दर राजकुमारी के रहने का था, और भाग थपनी भग्नावाया में भी सुन्दर लगता था। कमरे में पाठ दीवारें थी, और प्रत्येक दीवार में एक खिड़की थी. जिन पर की मनमत्री पर्दे लटकते थे। धृत की कारीगरी धुंधली हो गई थी। गोधूलि की पेक्षा थी। थोड़ा अंधेरा हो गया था। कोकिला देवी ने बठ कर एक खिड़की खोज दी। स्वच्छ, सुगन्धित वायु का एक झोका माया, और उनके बालों से रेतने लगा। कश्मीर को सुन्दर घटा दृष्टिगोचर होने लगी। कोकिला देवी एक दी साँस लेकर कहने लगी-'यदि मैं मर जाती, तो कितना अच्छा होता ! यह जीवन तो मृत्यु से भी सरार है ! ईश्वर, इस जीवन का अन्त हो जाना...!' "पर लोग प्राशा ही के सहारे जीते हैं। मेरी मी एक प्राशा है-मेरी छोटी बच्ची ! पद, मर्यादा, मान, प्रतिष्ठा, धन, धान्य, पनि, मिन सब सो गये, और मेरे लिये मेरी बया को छोड़ कर कुछ भी न बामैने कहानियाँ सुनो है कि एक बनको द्वारा फिर प्रानदान की जरा वापस मिल गई। सम्भव है कि इसीलिये मेरी बची छोड़ दी गई.... पदी ने पाठ बजाये। तब उन्होंने घड़ी की ओर देखा, और फिर कहने लगी वयक्ष आठ ही बने हैं। थाइ, मेरे लिये तो प्रत्येक घण्टा एक युग के समान है। इसी समय दरवाजे पर एक थपकी पड़ी। "अन्दर मानायो!" और की नौकरानी ने एक थाली लेकर प्रवेश किया। "श्रीमती जी, नाराज तो न होंगी। सुबह से आपने कुष्ट नहीं खाया है। मैं साना ले पाई है। प्रार्थना करती हूँ, भोजन कर लीजिये !"और यह लालटेन जवा कर पजा गई।

३ निराश समय का विचित्र चक्र है। पुक समय जिसकी सेवा को को दास-दासी बहते थे, भान असकी केवल एक दासी साविम थी। कोकिला देयी खागे बैठ गई । वाजटेन की रोशनी पूरी तौर से उन पर पड़ रही थी। स्पष्ट प्रतीत हो सा था कि ये किसी उस घंश की, सम्भवतः राज-धराने की, है । र म्या, वेरा सुनौज, सुन्दर पर कुछ झुर्रियाँ पड़ी हुई । पाल अम्पे पर कुछ अस्स- यस्त, असि चमकदार, कटीली पर कुछ पीड़ा लिपे । हाम-पैर गोरे । अंगुलियों में केवल एक अंगूठी, यह भी मामूली । भोजन करके उन्होंने एक किताय उठाई, चौर पदने लगी। पर पढ़ने में मन नहीं लगा। फिर सोचने लगी-'प्रार मुझे जारित रहना है, तो इस सरह से नहीं रह सकती। और मुझे जीवित थवश्य रहना है अपनी पञ्ची के लिये। नहीं तो पिर कौन उसकी देख-माल करेगा? चारों तरफ निस्तम्घता थी। खिड़की खुली हुई थी, और साँप सोय करती उंदी वायु उस से पा रही थी। और इस तरह जय घे भायों के बीच बहती चली जाती थी, सहसा एक गाड़ी की सदनदाहट सुनाई दी। वे पीक दरवाजा धीरे से खुला । "श्रीमतीजी, राजा राजेन्द्र प्रताप सिंहजी पाये राजेन्द्र प्रताप सिंहनी? नाम तो पहचाना हुया नहीं है। इस समय रात में क्यों पाये हैं ? " दो, इस समय नहीं मिल सकती। मुरह पायें।" नौकरानी बोली-"श्रीमती जी, घे अकेले नहीं । उनके साथ एक छोटी खडकी मी है।" "मोह! तू ने पहिले क्यों नहीं बताया ? जा, जल्दी युला ला!" दासी चली गई । कोकिला देवी ठकर धैठ गई। यदि कोई और होता, तो सस्नुकता से शीशे के सामने जाकर अपने कपड़ों को ठीक करती। पर उन्होंने इस पर भी ध्यान नहीं दिया। सोचने लगी-"राजेन्द्र प्रताप सिंह ! स्मरण होता है कि यह नाम कहीं सुना अवश्य है-पर टीक से याद नहीं आता।' कि दरवाज़े से पापा आई-"क्या मैं अन्दर मा सकता हूँ?"

निराश जी..." कोकिला देवी ने नज़र उठाई। देखा, एक खूबसूरत गवयुवक सामने खड़ा "क्षा-दा, पधारिये !" "पाप तो मुझे जानती न होगी ?" "कुछ याद नहीं पाता।" "ठीक है। मैं श्राप से कभी नहीं मिला हूँ, पर मेरे चाचा जी रणवीर सिंह "हा-हा, हमाल या गया। उन को तो हम लोग घच्छी तरह जानते है। इस कुपी पर बैठिये !" राजेन्द्र प्रताप कुर्मी पर बैठ गये; लड़की को गोदी में विटा लिया, और कहने लगे-"श्रीमतीजी, मुझे मार के बारे में सुन कर बड़ा दुःख हुआ!" "फिर भी हम लोग अन्त तक स्वामिमक्त रहे-~-इसी का सन्तोष" "तो श्राप कुछ भी नहीं पचा पाई." "कुछ भी नहीं। हमारी जागीर छीन ली गई । हमारा पद दिन गया, नाम मिट गया" "श्रय मी भार का नाम इतिहास में रहेगा।" "हो सकता है।" "धापने अपने दोस्तों से मदद क्यों नहीं मानी ?" "मिसा मांगने से तो भूखों मर गाना अच्छा है । जिसने दूसरों को सहायता थी, वह दूसरों से सहायता मांगे! जब तक मेरे पति के पास पन था, जागीर धी राजदरबार में मान था, तब तक सैकड़ों दोस्त थे। आज कोई सुध लेने याला नहीं है। हम लोगों के पास कुछ धन जवाहरात वेव कर हो गया था । यह स्थान अशा था, और किराया कम लगता था। इसी को ले लिया। यही पर मेरे पति की मृत्यु हुई-यों में, दुख में, और निर्वासित अवस्था में।" कोकिला देवी का गला भर पाया। प्राशी से प्रासू टपकने लगे, और ये योष में ही धुर दो गई। घोड़ी देर बाद पोली-"टनको मरे दो वर्ष हो गये । श्रय मेरी लड़की सीन वर्ष की है। धन-धान्य सब खतम हो गया, और प्रा कोई उपाय नही रह गया । मैंने लड़कियों को पढ़ाने का निश्चय किया है।" "इससे मना कितमी प्राथ होती होगी?" "मेरे निर्वाह के लिये काफी मिल जाता है।" "मुझे पिछले हफ्ते में मालूम हुआ था।" कोकिला देवो चुप रही।

६ निराश . थोनी देर तक निस्तब्धता रही। राजेन्द्र प्रताप ने एक दशा अपनी लड़की की तरफ देखा, फिर कोकिला देवी की तरक, और फिर कहना शुरू किया- "श्रीमतीनी, मैं पाप से एक गुप्त बात कहना चाहता हूँ, और मात मेरी इस लड़की के बारे में है।" "श्रापकी लड़की ! तोश्रापको शादी हो गई है?" “जी! पर पहिले यह वायदा कीजिये कि किसी से इसके बारे में नहीं कहि- येगा । मुनि, यह तो श्राप जानती ही है कि मेरे चाचाजी की यही जागीर थी। मेरा बालन-पालन उन्होंने ही किया। उनके कोई लड़का न था। चे की कोई कमी न थी। मैं जो चाहता सीता, जैसे चाहता धन लुटाता--कोई शैक-टोक न थी। मेरे चाचाजी ने मुझे पूरी स्वतसा दे रखी यो । दुर्भाग्य कहिये था सौभाग्य, मैं किसी से प्रेम करने लगा। पर वह गरीब थी। एक मास्टर की पुत्री थी। अवसर पाने पर अपने इस प्रेम के बारे में मैंने चाचानी से प्रगट किया । और..... "सुन कर ये बहुत नाराज हो गये यही हुश्रा न " "जी हो। उन्होंने सास-साफ कह दिया कि अगर मैं उस बड़की से शादी करूँगा तो वे मुझे अपना उत्तराधिकारी न बनायेंगे। मैं एक विचित्र दुविधा में पड़ गया। न तो मैं उसका दिल ही ताद सकता था, और न जागीर का नाम हो । मेरी कायरता कहिये या जो कुछ, अाखिर मैंने चुपचाप उसके साथ विवाह कर लिया, और कश्मीर चला गया । वायु परिवर्तन के बहाने एक साल तक उसके साध रहा । इसी बीच में यह लड़की पैदा हुई । पाचाजो कही शक न कर बैठे इससे मुझे लौटना पड़ा। धीमतीजी, दोष मेरा है, और मैं उसकी सजा भी भुगतने को तैयार हूँ । गलती मेरी थी । प्रथम तो मुझे उससे रिपे तौर से शादी न करनी थी, और जब शादी कर ही ली थी, तो उसे एक लम्मे असे तक अली नहीं छोड़ना था। काश्मीर से पाये मुझे खगमा चार साल हो गये, पर मैं वापस न जा सका। इधर चाचाजी धीमार हो गये, और फिर उन्होंने मुझे जागीर छोड़ पर जाने की माशा ही न दो। उनके देहान्त के बाद भी मैं परावर जागीर के कार्य में व्यस्त रहा। मेरा इरादा श्रय मृणालिनी और इस बच्ची को और यह बान सब के आगे स्वीकार कर लेने को था कि मृणालिनी मेरी पनी है। पर जब मैं काश्मीर उस गाँव में पहुँचा जहाँ वह रहती थी, तो मैंने उसे मृत्युशैया पर पाया। वह विरह में सूप कर कोटा गई थी। मैं लाख प्रयत करने पर भी इसे म सा सका, और मेरे पहुँधने के तीसरे दिन ही घर इस ओवन से मुक्त हो गई। राजेन्द्र रुक गये। गक्षा भर भाया था। रंधे स्वर खाने वा था, निराय ७ में थोले-"मेरी यह यच्ची रानी मेरे लिये पच गई । मुझे कितना दुख हुआ, कितना सोम हुया, कितनी पीड़ा हुई-~यह सब क्यनीय है । मैंने अपने इन्हीं हाथों से उसे जला दिया, और इस प्रकार मेरी इस प्रेम-कहानी का अन्त हो गया! अब अपनी शादी के बारे में कहने से फायदा ही क्या ? यदि मृणालिनी होती, तो बात दूसरी ही होता; पर पर यदि मैं कहूँगा तो लोग उस स्वर्गीय प्रात्मा के प्रति जाने क्या-क्या भाव प्रकट करेंगे । इसलिये मैंने इस गुप्त-भेद को गुप्त रखना उचित समझा हूँ। अब इस बच्ची का प्रश्न है। इसके लालन-पालन का प्रश्न है। इसी से इसको श्राप के पास लाया हूँ। यह अयोध पालिका है। इसे मोरानी' कहती पो । सम्मवतः थापको लड़की के परायर ही होगी। मेरी हार्दिक इच्छा है कि अब आप ही इसका लालन-पालन करें।" कोकिला देवी चुप रहीं। राजेन्द्र ने फिर कहा-"मैं श्रापका यामारो रहूँगा! यह तो आप जानती है कि जागीर को उत्तराधिकारिणी यह नहीं हो सकती, फिर भी इसके खर्च के लिये पर्याप्त धन जमा है। धन की कमी नहीं रहेगी, पर एक मुश्किल है। उसे आप चाहें तो हल कर सकती हैं। आप यह जानती है कि मेरी शादी गुप्त है। क्या श्राप इसे अपनी लड़की पतला कर लालन-पालन नहीं कर सकेंगी?" कोकिला ने कहा--"यह तो उचित न होगा।" "उचित-अनुचित मेरे ऊपर छोड़ दीजिये । पाप इसका लालन-पालन कीजिये अपनी पुत्री की तरह । संसार को दिखाने के लिये यह श्राप की खदकी रहेगी। जम तक यह सोलह वर्ष की न हो जायगो, तब तक में तीन सौ या महीना आपको धीर तीन सौ इसके लिये देता रहूंगा।" कोरिजा देवो चुप रहीं। सोचने नीजीन सौ रुपया महीना उसके लिये तथा इसकी पुत्री के लिये जरूरत से भी ज्यादा । उनका दारिद दूर हो जायगा। फिर इनकार करने में नाम ही क्या ? कोई दूसरा हो स्वीकार कर राजेन्द्र ने कहा-"पर आप को यह प्रतिज्ञा करनी होगी कि मेरी अनुमति के बिना भाप कमी उससे यह न कहेंगो कि मेरी पुत्री नहीं है, तू राजेन्द्र प्रताप की पुनो है। यह अभी छोटी बच्ची है । इसको अरनो मा को या मेरो याद कुछ भी नहीं है, और जो थोड़ी-बहुत है मी-वह मी भूल जायेगी। आपकी पुत्री भी छोटी है-उसे मी अधिक कुछ याद न रहेगा । अपर पाप ने दोनों को एक तरह पाजा, तो दोनों ही बड़ी होकर अपने को सगी बहिन ही समझेगी । कृपया कहिये, स्वीकार हैन ! खेगा।

निराश कुछ पण कोकिला देवी के हृदय में संघर्ष होता रहा। कमी धाम सम्मान बीतता, कभी लोम । सन्त में लोभ ने विजय पाई । "मुझे स्वीकार है"धीरे से कह दिया। "धन्यवाद ! आप ने मेरे हृदय से-एक बोझ उतार दिया। एक बात और साफ कर देना उचित होगा। संसार की सभी पस्तुथों की तरह मनुष्य क स्वभाव भी परिवर्तनशील है। सम्भव है कि भागे चल कर मेरा दिमा अदख जाय, इससे मैं लिखा-पदी भी कर देना चाहता हूँ। मेरी यह कहान केवल तीन मनुष्यों के बीच रहेगी-पाप, में तथा मेरा वकील । मैंने उसे या भार सौंप दिया है कि वह बैंक से रुपया निकाल कर प्रति महीने आप के पास भेजता रहे। वसीयस के अनुसार मैं ने उसके नाम रपया बैंक में जमा कर दिया है। हमारी और पापकी श्राज की मातें मी उसमें जिस दी जायेगी अगले सप्ताह में इस कागज़ की तीन प्रतियाँ थापके पास भा जायगी। श्राप उन पर इस्तार कर के एक अपने पास एस बीजियेगा, तया दो वापस कर दीजियेगा । मैं पाप पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाना चाहता-जही चाहे जाइये, जैसे चाहें रुपये को खर्च कीजिये । पर एक शतं अवरप रहेगी कि साल में चार पार पाप पत्रों द्वारा मुझे उसकी अवस्था अवश्य सूचित करत रहियेगा। सापको कोई खास पात लिपने की कारूरत नहीं-केवल यही कि "यह मैं कर दूँगी," कोकिला देवी ने उत्तर दिया। फिर म मालूम पधा दिन में प्याल माया कि बोली-"क्या आप को इसके बिन्दुहने का दुःख नहीं होगा। "होगा तो, पर नाचानी है! आप से छिपाने से क्या प्रायदा? देखिये- यह बहुत समय है कि मैं दूसरी शादी करूँ। संसार की नजरों में तो में चमी अविवाहित हो हूँ ! एक अति सुन्दर तथा दयालु खएकी है। उस ने भेट हृदय पर अधिकार भी कर लिया है। और मैं नहीं चाहता कि मेरी यह कहा उसके कानों में पड़े। "मैं समझ गई" "भीमसीजी, में अपने साथ कोई सामान आदि नहीं खाया है, ये स्वीमिरी पचास रुपये, इसके लिये कपड़े बनवा दीजियेगा चौर यह ६.०) रपया पहि मास का खर्चा कोकिला देवी ने हाय पदाया | नोटों का स्पर्श होते ही हाय काप घटा पोखी-"इसकी रसीद..." "वकील को भेज दीजियेगा । अरमा, अय आशा दीजिये।"

निराश है "क्या श्रमी घले जाइयेगा?" "हा, मुझे शीघ्र से शीघ्र रियासत में पहुँच जाना है।" और राजेन्द्र प्रताप सिंह उठ खड़े हुये। गोदी में रानी को चिपटा लिया। इस को देने के लिये कोकिला देवी की तरफ हाथ पढ़ाया, पर रुक गये। उन्होंने रानी का धुम्मन लिया, और जमीन पर खड़ा कर दिया। कोकिला देवी ने मट उसे अंक में उठा लिया। "शाप इस के साथ..." राजेन्द्र प्रताप का गला रुघ थाया। नेत्र गीले हो गये। "निश्चिन्त रहिये, मैं इसे अपनी पुग्नी की ही तरह पालूँगी !" "धन्यवाद! आप ने मुझे प्राजन्म अपना ऋणी पना लिया !" और अपना अन्तिम स्नेह चुम्बन रानी के कपोलों तथा मस्तक पर अंकित करके राजेन्द्र प्रताप चले गये। कोकिला देवी स्तब्ध-सी पैठी रहीं। यदि गोद में रानी तथा हाथ में नोट न होते, तो कदाचित् इस घटना को वे स्वप्न ही सममर्ती । एक समय था कि राजेन्द्र प्रताप के लिये स्त्रियाँ पागल रहा करती थी। हंसमुख, सुन्दर, पलिष्ठ तथा प्रान्त में सब से बड़ा रईस, एक राज्य का उत्तराधि. कारी ! चाचा राजा श्रीराचीर सिंहजी ने विवाह नहीं किया था, राजेन्द्र को गोद ले लिया था। पड़े-बड़े लोगों की यही इच्छा थी कि उनकी पुत्री के. पति राजेन्द्र प्रताप ही हों! पर न मालूम क्यों, वे शादी करने पर राजी नहीं होते थे। चाचाजी मी उन की शादी के बारे में अस्सुक थे । मादिर एक दिवस उन्होंने इसके बारे में जिन छेड़ ही तो दिया । बोले-"बेटा, मैं तो अविवाहित ही रहा, परन्तु तुम को तो शादी कर लेनी चाहिये।" राजेन्द्र चुप रहे। "चुप न रहो । संघोष त्याग कर सान साफ कह दो। मैं तुमको इजाजत देता हूँ।" "चाचाजी, मुगको विवाह करने से इनकार नहीं है । "क्यों उत्तमपुर की राजकुमारी उर्मिना" निराश "वा सहा मदक की शौकीन है, शन-पररा है !" "चौर मार पन्द्रमान की युधी, चन्द्रावती !" "मरी भरीसी, पीली !" "कुमारी इन्दिरा" "या तो पहुभ हो है।" "तो फिर तुम कैसी लरकी चाहते हो। समझ में नहीं माराम नही जानते कि बिया क्या पसन्द की जाती है इसलिये किये विपरीत गुग्यों को समिश्रण रहती है। यदि स्त्रियो हर तरह पूर्ण हो, दोष से रहित हो, सो फिर शायद मनुष्य का जीवन दूभर हो जाय।" "चापका कदमा चित है। पर मेरी या इछा है कि मेरी जीवन-सगिनी ऐसी न हो मुझे बाद में पतागा परे। मैं काफी सोच-विचार र पछी साह परख कर, शादी करना चाहता हूँ।" "अया, ऐसा ही करी। मगर कुम, मान, प्रतिष्ठा का पश्य ध्यान "यापकी पाशा न रागा।" "देखो, मुझे धन की थाह नहीं। जपं मेरी भामदनी का साया भी नहीं है। यह समधन जमा होता जा रहा फेवल म्हारे लिये। इसमें मुझे यह जरूरी नहीं कि तुम्हारी शादी में दहा मि । पर हा, मैं इतना जरूर चाहता हूँ कि खानदान ऊँचा हो।" “हमा में ध्यान रखूगा।" "बेटा, मैं यूमा हो चला । मैं चाहता हूँ कि इन नामों के मुंदने के पहले ही मुम्हागी शादी देस।" राजेन्द्र ने सिर मुका लिया और उस दिन फिर विवाह को यात प्रतम हो गई। इसके बाद, अचानक एक दिन फिर चाचा-भतीजे में बात-चीत शुरू हो गई । उसी रात राजेन्द्र घूम घाम का बौटे थे। "दा, में अब सीर्थ यात्रा को जाना पहना हूँ। सम्भव है, साब-: महीना माद जो । मेरे पीछे तुम्ही मेरे प्रतिनिधि होंगे। किसी बात में कमी म करना । पर मुझे सब लिखते रहना। मुझे खुशी होगी। पर सब से की सुशी होगी यह पद कर कि नुमने अपनी जीवन-सगिनी का चुनाय कर लिया है"- याचा ने कहा। राजेन्द्र ने फिर कोई उसर न दिया।

निराश "और देखो, राजेन्द्र, तुम इस बीष में यहीं रहना। स्कूल की इमारत या गई है, पर मास्टर नहीं है। तुम इस बारे में पान देना । मा, योग्य मास्टर रसना । धन की परवाह मत करना । समझे ?" और दूसरे दिन प्रातःकाल ही वे तीर्थ यात्रा को चल दिये । पर चलते. चलते एक बात कह गये-"मने सुना है कि पास की जमीदारी मनोहरपुर के जागीरदार ने खरीद की है। उनका यहीं पर रहने का इरादा भी है। कुलीन घंश के है। उनकी पुत्री मनोरमा अति सुन्दर, शिष्ट क्या प्रतिभा- धान है" राजेन्द्र ने सिर झुका लिया। और उनके जाने के बाद यह कार्य में जुट गया। स्कूल का प्रबन्ध करना सर्वप्रथम तथा आवश्यक था । उसने अध्यापक के लिये विज्ञापन दिया। उत्तर में सैकड़ों प्रार्थना-पर पाये । एक को सुन खिया । पानी प्रार्थना-पों को रही की टोकरी में डाल दिया। मास्टर जयन्ती प्रसाद को स्वीकृति भेज दी गई कि 'पापको नियुक्ति ५० २० मासिक पर की जाती है। रहने के लिये स्थान भी मिलेगा।' पही असने चाचाजी को मी लिन भेजा। उत्तर माया--जिर दिन स्कूल शुले उस दिन जसा हो। और इधर नियति ने अपना खेल प्रारम्भ कर दिया। नौ जुलाई भा गई । राजेन्द्र को यह मालूम था कि मास्टर जयन्ती प्रसाद श्रा गये है। जरसे और दावत का प्रबन्ध हो रहा था। राजेन्द्र प्रातः काल पाँच यजे उठे, और सात याते-बजते घोड़े पर सवार हो चल दिये । बाल-वि चाकाश के एक कोने से माँक रहा मा । वायु सुगन्धि से परिपूर्ण थी। प्रकृति को शोभा को निहारते हुये राजेन्द्र ले जा रहे थे। थोड़ी देर बाद ये स्कूल के निकट भा पहुँचे । स्कूज शहर के एक कोने में था । इमारत बालीशान थी। स्कूल के चारों तरफ सुगन्धित पुष्यों की क्यारियाँ थीं। पर वे स्कूल के सामने न रुक सोधे उस छोटे से मकान की तरफ बढ़े जो वारा के एक किनारे पर था ।वह मकान भी नया था। दरवाजे पर ही एक नौकर मिला, जिसने बताया कि माला साइव स्कूल में हैं। राजेन्द्र को बैठक में बिठा कर वह उन्हें सुपर करने गया। राजेन्द्र निराय ने देखा कि कम सार-सुथरा है, समो वस्तुयें होने से सही है। एक किनारे पर एक यक्ष्मारी पुरकों से भरी पड़ी थी। जिल्दों पर सपे हुये पुराने के माम पदकर उन्हें मास्टर साहय की योग्यता का विश्वास हो गया। भोपी की प्रतीकेशार मो शय मास्टर माहर नही माये, तो बाहर निकल गये । पेला, पी, चमेली, गुलाब पुन रहे थे। पेशा उपर घूमने लगे कि अचानक ठिटक रहे। कानों में किसी की रस घोलती सी घायापी कोई गा रहा था। पराधिस हो गाना सुनने लगे। एक अनार के पेड़ का सहारा लेकर सरे थे। पत्तों की सदसदाहट से यह प्रमोव हुमा कि कोई पा रहा है। एकाएक गाना गया, और राजेन्द्र ने देखा, सामने एक शाजिका सही है। पयसपही १६-१७ साख । उसके बाल असे हुये थे, और श्वेत सादी सपा से ही म्लाउन पहिने थी। सुन्दर, अति सुन्दर ! गुलाबी कपोल, तीर की सरह सुमने पाले नयन! "एमा कीजियेगा! मैं जयन्ती प्रसादजी से मिलने गाया था ।" "ये स्कूल की तरफ गये हैं।चार का शुम नाम " "मेरा नाम सन्द प्रा है।" "प ही राजेन्द्र प्रताप सिंह " पालिका मे कुन चकित होकर पड़ा। शिएकाएक कुछ लक्षित होकर योनी-"मा कीजियेगा। मैं अभी जाकर पिता- जी को दुबा खाती हैं।" फिर थोड़ी देर बाद नोट छाई। पाकर योगी-पिताजी स्कूल में नहीं है। शहर गये हैं। पाते ही होंगे। आप उनके थाने तक किये न !" "मी, यदि आपको कोई भसुविधा न हो।" "गुझे कोई असुविधा न होगी में वो अभी पाप ही के मारे में सोच रही थी। "मेरे बारे में क्या सोच रही थी ?" "यही की आप कैसे होगे--अधेड़ या बूढ़े।" "और ऐसा न पाकर गुरद विस्मय हुमा होगा।" इसका उत्तर न देकर यह योजी-"मैं आपको धन्यवाद देना चाहती थी, क्योंकि पाप ही की दया के कारण हम लोग यहाँ शाशके हैं।" "इसमें मेरी दया कहाँ पाई। महतो थापके पितानी योग्यता के कारण निराश "फिर भी थापको धन्यवाद देना में अपना कर्तव्य समझती हूँ।" इतने ही में किसी के पद-शब्द सुनाई पड़े। "पिताजी पा रहे हैं। वे प्राप से मिल कर बहुत खुश होंगे।" और मास्टर साहब ने भाते हो कहा-"वटी, मृणालिनो, कुछ जल-पान का प्रबन्ध तो करो!" और अतिथि को लेकर वे घर की ओर चल दिये। इन नये मास्टर से मिल कर राजेन्द्र प्रताप को अत्यन्त प्रसराता हुई। मास्टर साहब किसी उच्च वंश के न थे, न किसी उच्च समा के सदस्य थे, ये विद्वान थे। जय राजेन्द्र चलने लगा, तो उन्हें पिता-पुत्री घोड़े तक पहुँचाने गये। "मुझे आशा है, मास्टर साहब, बाज शाम का जलसा सफल रहेगा। उसमें कई राजकुमारियाँ भी आयेंगी।" "तब तो उसमें मेरा सम्मिलित होना उचित न होगा!" मृणालिनी बोली। "क्या तुम्हें हर बगता है " "मैं कभी भी किसी राजकुमारी से मिली नहीं।" "नहीं, हरने की कोई बात नहीं !" राजेन्द्र ने हँसते हुये कहा, और चल दिये । रास्ता तो वही था जिस पर होकर ये आये थे, पर यह मार्ग थप नया. सा प्रतीत होने लगा । जाते समय तो प्रकृति की शोभा निरखते गये थे, पर लौटते समय उनकी आँखों में यती थी एक सुन्दर मूर्ति, और कानों में गूंज रही थीं वही सुरीली तान ! हृदय ज़ोर से धड़क रहा था, रगें तेजी से फड़क रही थी, शरीर रोमांचित हो पाया था। यह सम क्यों ? इसका कारण चे स्वयं ही नहीं बता सकते थे। चोखों ने कितनी ही सुन्दर स्त्रियों देखी थी, पर ऐसी सादगी नहीं, पवित्रता नही, निर्दो. पिता नही। शायद अनजाने में ही मदन देव ने हृदय को सुमन-दार से धित कर दिया। "काश, इन राजकुमारियों में भी इतनी सादगी होती!" सुबह को तो शाम का जल्सा अपने ऊपर एक भार सा लग रहा था, पर अथ इतनी व्यग्रता थी कि यार-बार घड़ी निकाल कर समय देख रहे थे। माली को बुला कर एक गुलदस्ता बनाने की यात्रा दी। इस गुबदस्ते को घे क्या HिE गे, पर ही नियमही कर पापे । में एक पाय मालिया। जमा में एक राम रपान या पायान-पान पर थी थी। मादीशी।पोटे मोटे व Finford नियमों को तार पा रहे थे। समारो-मिला, तो दिदि-गी शिक्षियों की मानि FRE रही थी। पानी पानी रग की माने थी, धीर कानों में far मेमे पाईयागनिया चारमानोरीai के काम कोणी पदने भी, चौर मोहेगा सा भी सहन हुये पो। गले में एक बहुरुप हा या दरा भी पदापी-सी सनी हुई थी। मार राजेन्द्र भागमन में वैसे राय में खान पैदा कर दी। सभी शसस सिंघमाई होने के अभियान का ममुगिन इसरिया। पासनी गायकी बारा में जिती होत में पानी शिपा। एक झुंज में माघी दिपो दुई गपालिनी गीधी। समय नेपाकर पूषा-"यहाँ यात्रीहो?" "मुझे हर जगता!" "टर किम मनकापुर पासोमही मायेगी!" "ये इतमा सुन्दर , गाँजी १..." "तुम्हें करने की गई भावयना नहीं। जो, गुम्हारा परिचय कर महिला से करा, मी काली साड़ी पहने थैठी हैं। पे यमगर को राम- बड़ी माता के दिल मैं सीमामाकी में पा कर लिया। शससे ये मुम मिल कर पास करने wilmकुमार रात उन्ही को कुमार पामे सड़े हो गये। "अगर हम लोग राममार की चाहती है, शर्मिला नेहा- "वो पहले उस बिभीनोखहकी से मेल मियारयायें!" पर शीघ्र ही उन्हें अपनी भारती मातम पर गई। 19६ घिनौनी की उतनी मुशील, विपक्ष तथा समीकी निकला किन सब को मुक्त से उसी प्रशसा करनी पड़ी, मानना पहा कि यह गुली में धारा है। माल" इस घटना का अन्स या हो सना था।

निराश राजेन्द्र प्रताप, बीस वर्ष का नवयुवक, कुलीन घंश की कही जाने वाली सड़क-भड़क वाली कुमारियों की तरफ से कुछ सिंघा हुश्रा, प्रेम और सुख का भूखा... मृणालिनी, गरविकसित कली की तरह, पवित्र, निषि, लजीजी ..फिर भी प्रथम परिचय होने पर राजेन्द्र ने यह नहीं सोचा था । कहाँ वह...एक रईस, उच्च यंश का राजकुमार और कहाँ मृणालिनी ! एक मामूली परी स्कूल-मास्टर की लड़की ! और क्या सम्बन्ध इन दोनों में हो सकता था ? केवल यही कि एक मालिक तो दुपरी नौकर की लड़की, एक दयावान और, दूसरी दया की पात्री ! तो भी कोई दिन ऐसा न खाता या भयकि राजेन्द्र को घोड़ा मास्टर साहय के दरवाजे पर जाकर न बँधना हो। पर राजेन्द्र के हृदय में कोई पाप न था। यों तो वह भी इसी संसार का एक प्राणी था, हाड़-मांस का एक पुतला था, फिर भी इसका हृदय निर्मन या! बात यह थी कि उसका जी संमार की दिखावटी बातों से-मीम और पाउडरों से पुते हुये चेहरों से-इतना ऊब गया था कि उसे इस 'सादगी की मूति' के साथ रहने में एक अजीय भानन्द थाता था। धौर वह अनजाने में कुछ कुछ झुकने लगा था-मृणालिनी की तरफ आकर्षित होने लगा था। और मृणालिनी ! एक राय की बेटी ! उसे तो प्रथम ही था। ऐसे उत्तम स्थान में रहने का अवसर मिला था, प्रथम ही बार ऐसे ऐसे भोजनों का स्वाद मिला था, प्रथम ही धार सोने और चाँदी की तश्तरियों में चाना खाया था, प्रथम ही धार एक नवयुवक से घुल-मिल कर बातें करने का अवसर मिला था। वह अपने को स्वर्गलोक में समा रही थी। उसके साथ घड़ी हुश्रा भी जो स्वाभाविक था। उसने राजेन्द्र को अपना हृदय समर्पण कर दिया, अपना संसार पना जिया, अपना देवता मान लिया, अपना श्रादि और अंत समझ लिया... न मालूम कब तक यही होता रहता, अगर स्वरूपनगर की राजमाता इसमें न पड़ जाती । धेधारी दयाल, प्रकृति की खी थी, और मृणालिनी से स्नेह करने लगी थी। उन्होंने राजेन्द्र के बारे में सुना, और यह सोचा कि राजेन्द्र को अवश्य सचेत करना चाहिये । घे मौके की तलाश में थी कि एक दिन मौका मिल ही गया। योली-“राजेन्द्र में सुग्हें अपने बेटे की तरह मानती हूँ!". "राजमाता ! इसमें भी कोई सन्देह है।"

मिरा "अगर मैं तुममे म मा सोनोगे।" "कही मासे पेट माराम हुमा करता" "बारा रामप्रिय..." "केगी मोमियो रोगी मेरी मनाई ही दिये, इमड़ा मुझे पूर्ण विश्वास" "तुम्हारे नये मायरा की पाको बहुत भोली-भाली चौर पर है।" राद पुरा "मुझे मालूम हुमा हिम रोज ही जाया करते हो" "मो. भापमे अफ हो मुना है।" "क्यों माते हो।" राजेन्द्र सोचने लगा। यह क्यों जाता है, इस पर मो उसने स्वयं भी कमी विधार गहों दिया था। मोमा-"शमाता, मैं क्यों माया पर तो मैंने कभी नहीं मोचा था।" "फिर मी!" "मुझे चाहा गा "मुम्हें केवल चपने भानग के लिये किसी के नाम पर कलंक बगामा कषित है" "मैंने तो कळक नही लगाया !" "जाग यूझ कर नहीं लगाया, ठीक है, पर राम दूसरे लोगों की जवान तो नहीं रोक सकरी । बेटा, भाम-नस का वातावरण ही ऐसा है । ती मी युवक सपा युवती का अधिक मिखन राजना, पारे गाय निर्दोष तथा निक लंका, चाहे ये निकटतम सम्बन्धी दी क्यों न हो, ससार नहीं दे सकता। यह तो उन दोनों को अपने ही ष्टिकोण से देखेगा।" "पर दूसरे बोगों को क्या पड़ी है..." "यह तो तुम रोक नहीं सकते। इससे उत्सम तो यही है कि उनको भवसर हीम दिया जाय | ससार की नारों में एक युवक आया युवती का मिलना क्या अर्थ रखता है, जानते हो।" "मी नहीं।" "एक तो यह किया युवक उस युदनी से प्रेम करता है तया उसे पक्षी बनाना चाहता है, और दूसरा यह कि यह दुष्ट है, कामी है, और उराको भ्रष्ट करना पाहता है, उसका सतोप्य सूट कर, चरित्र पर कलंक लगा कर चोद देना चाहता है । मैं जानती हूँ कि तुम्हारी इन दोनों में कोई भी या नही है।

-~- थीसठियाल नगलय निराश बीकानेर । " तुम उससे विशद कर नहीं सकते और मुझे पूर्ण विश्वास है कि सुम्हारा इरादा उसे भ्रष्ट करने का भी नहीं है।" राजेन्द्र चुप रहा। यह एक शब्द भी न बोल सका। "परन्तु यह स्वाभाविक है कि अगर तुम उससे ज्यादा मिले-जुले, तो वह तुम्हारी तरफ थाकषित हो जायगी। और तब? इससे तो यही अच्छा है कि तुम उसके यहाँ जाना छोड़ दो, उससे मिलना एम्दम बन्द कर दो।" "मैं नहीं समझता कि मैं आप को किन शब्दों में धन्यवाद हूँ। मैं अन्धा था, आप ने मेरी धोखे खोल दी, राजमाता!" "यही हसर पाने की मुझे तुम से घाशा मी थी। राजेन्द्र, यह सुन्दर, भोली-भाली नव-विकसित कच्ची के समान है..." "नहीं, मही, ऐसा न कहिये, राजमाता, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैंने जो कहा है वही करूँगा भी।" और राजेन्द्र फिर चला भाषा। सारे दिन यह व्यन रहा, चिन्तित रहा। मोह, अगर मृणालिनी इन बातों को सुनेगी, तो क्या कहेंगी? - राजमाता ने जो कहा था वह ठीक ही निकला। उसके दोस्तों ने उसे पधाइयाँ दी, और इस बात को गुप्त रखने पर शाशी। जब उसने अनभिज्ञता प्रगट की तो उस पर ये हसे, और जब वह नाराज हुआ तो उसे चिढ़ाया। पर षेधारी मृणालिनी को कुछ भी पता न था। वह फूलों और चिड़ियों के यीच में डूबी अपनी नई दुनिया में व्यस्त थी। 'मृणालिनी को इस बारे में प्रागाह कर देना चाहिये'-राजेन्द्र ने सोचा। पर यह कार्य किस पर सौंपा जाय ! क्या यह स्वयं जा कर कहे, मगर... इसी चिन्ता में वह पड़ा रहा। उस मध्या को भी वह उसी उधेड-थुन में पड़ा बारा में घूम रहा था। अचानक सामने से मृणालिनी माती दिखाई पड़ी। उसने चाहा कि यह मृणालिनी के सम्मुख न पड़े, पर पूर्व इसके कि यह हिपे मृणालिनी ने उसे देख दिया। "आप को देख कर पड़ी घुशी हुई, राजकुमार, मैं तो समझती थी कि भाप कहीं चले गये हैं।" नि०-२ “ऐसा क्यों सामा!" "इसी से किडीन दिन बीत गये, और भाप दिखाई ही दिये। तोग नसे मापही मिले" राजेन्द्र क्या है, समझ में नहीं मारामागुणालिनी एक उसकी देख रही थी। "मरा कार्य में अधिक्षयरत रहा।" "तो भार भागे कमी भी हतना स्यरत न रहा कीनिये । मुझे पान ने पर प्रधानही धगता" राजेन्द्र केमे उससे मददरों सा साफ करें। वैसे इस भोली भाजी खिका को समझा। "पार मे तो या जीवन मेरे लिये स्वर्ग बना दिया, रामकुमार!" "पायो- wrot-- " -- इस संसार में वियोग ना निरचय है।" "मैं माप का मतलब नहीं सममी, पह पहेली सी क्यों पुझा रहे है।" "मुणालिनी, में तुम से एक दो बात कहना चाहता है, समव है कि वह हे भली म खगे। मितु उसके लिये दोषी में ही हूँ, मैं ने मुम्हारे साथ धिम्याय किपा" "आपने मेरे साथ अन्याय किया" "कैसे तुम्हें समझाऊँ। मेरे तुम्हारे यहाँ प्रामे पर बनी मे टी टिप्पणी "किसने टन राजकुमारियों ने" "सपने" "पर ये कहते क्या है?" "वे कहते पा है, यह कह कर में अपनी जपान पम्मी नहीं काना दा, गहन्हें ही दुख पहुँचाना जाता हूँ। पर मुग्णालिनी, मेरे इस प्रकार पसुम से मिलने, में मेशही दोष है। मेरी कोई पुरी नियत नहीं थी। हारी सुन्दरता, तुम्हारा मोजा भाजा, सभाष, तुम्हारी सादगी गे मुझे हलिया था। पर मैं कितना स्यार्थी या कि मैं ने तुम्हारा जरा सा भी प्रयास किया। जरा सा भी नहीं सोचा कि मनुष्य मेरे इस स्वार्थ के कारण हैं दो लगायो । एमा करो, मुझे दुःख है। मैंने ही गलती की है। मैं ही ।

निरा उसे सुधारूंगा । योगों को रामाने शीघ्र ही बन्द हो जायेंगी अपये देखेंगे कि हम लोग अब जरा भी नहीं मिरते-एक-दूसरे की सूरव तक नहीं देखते... घरे ! यह क्या गृणालिनी।" मृणालिनी सिर पकड़ कर बैठी थो । उसका चेहरा पोला पड़ गया था। राजेन्द्र एकदम दर से गये। उन्होंने उसको पकद लिया, और बोले-"भृणा- बिनी, मृणालिनी, पाखें खोलो!" किसी युपती श्री को इस प्रकार अपने अंक में रखने का यह प्रभम दी अवसर था। सारे पदन में सिहरन दौड़ गई, हृद्य तेजी से धड़कने लगा, रंगें तेजी से फड़कने लगी । वह अपने को न रोक सके। दवा हुधा प्रेम उभर आया । उसको कस कर चिपटा लिया, और योले--"मणालिनी, मृणालिनी!" मृणालिनी की पलके कुछ हिली, हॉट कुछ कपि । राजेन्द्र ने सन्तोष की साँस ली। मृणालिनी ने भाखें खोबों, तो अपने को राजेन्द्र के थाहुपाश में पाकर, शरमा कर खड़ी हो गई । धीमे स्वर में कहा--"आप ने क्या कहा था! याद माया यही कि हम लोग अथ न मिजे-एक दूसरे की सात मी न देखें। अशी भात है, यही होगा।" और यह फूट-फूट कर रोने लगी। राजेन्द्र का हृदय इवित हो गया। यह संसार में पहिले मनुष्य न थे, जिन्हें स्त्री के प्राों ने हरा दिया हो। स्त्री के प्रासू सर्वदा से पुरुष पर विजेता होते पाये हैं और होते रहेंगे। "भृणालिनी ! मैं तुम्हें नहीं छोदेगा । दुनिया वाले जो चाहें तो कहैं। अवरोधो मत" "गलती मेरी ही थी, सुम्हारा दोष नहीं था। सब मेरा दुर्भाग्य है । मैंने यह नहीं सोचा था कि मैं एक गरीय को खड़की है, और तुम एक रामकुमार। मैं ने यौना हो कर चाँद को पाने की कोशिश की थी, उचित ही फा मुझे मिला" "नहीं, नहीं, मृणालिनी, यह बात नहीं है।" "नहीं, में अब तुम्हारी बात नहीं सुनगी । तुम जानो। मैं तुम्हें रोक भी नहीं सकती। मेरा तुम पर क्या अधिकार ?" "अधिकार क्यों नहीं, सब कुछ है।" "राजकुमार, आप जाइये, और मुझे मेरे भाग्य पर छोड़ दीजिये !"-- मृणालिनी रो कर बोली। 1 मिराश "क्यों " ८ चौदनी पिटक रही थी। उसमें मृणालिनी अति सुन्दर, सापात स्वर्ग की देवी-सी, लग रही थी। राजेन्द्र ने दुयो हो घर कहा-"गृणाजिनी, दुनिया ओ चाहे सो कहे, पर मैं तुम्हें नहीं घोर सकता।" यह भी कोई काने की बात है ? मैं तुम से प्रेम करता हूँ।" "स!" "चन्द्रदेव साती है, यह प्रकाश, यह पृथ्वी, यह माना-सय साया है। मैं तुमसे प्रेम करता हूँ और शीघ्र ही विवाह करूँगा।" "मुम्म"--कुछ अाश्चर्य से मृणालिनी ने पूछ।। "क्या तुम्हें मेरा विश्वास नहीं" "शोह" मृणालिनी का स्वर कॉप गया। "मेरे जीवन की साध पूरी हो गई, रानी" राजेन्द्र ने कहा । इस समय तो यह अपने चाचाजी की बात भूल गया था। "अय सुम घर लामो । रात ज्यादा हो गई । चलो, उन्हें घर पहुँचा हूं।" दोनों चल दिये । दोनों ही अति प्रसन्न थे। दोनों ही के सुशी के मारे पैर जमीन पर म पड़ते थे। "खो तुम्हारा घर भा गया । अय बिदा हो। पर एक वादा करो। अमी इस बात को गुप्त रखोगीन" "क्यों ?"---सकित स्वर से मृणालिनी ने पूछा। "उस समय तक जब तक मैं चाचाजी की स्वीकृति न पाल।" "क्या घे नाराज हो जायेंगे।" "वे क्या करेंगे, यह तो नहीं पताया जा सकता, पर यह मिश्चय समझ जो कि कोई भी तुम को मुमसे अलग नहीं कर सकता।" 'यह कार्य उचित था या अनुचित' यह प्रश्न बार-बार राजेन्द्र के हृदय में उठ रहा था। ससका हृदय खुशी से धड़क रहा था, चाहता था कि जोर से पुकारे-'मृणालिनी, मेरी मृणालिनी! पर न मालूम क्यों कोई अज्ञात शक्ति धार-बार उसके कानों में कर रही थी-'तुम ने उचित नहीं किया। 'नहीं, नहीं, मैं ने उचित ही किया वह उस अज्ञात शक्ति को उत्तर देता- 'मैं इसमे प्रेम करता था। मैं ने श्राज एक अति सुन्दर घी को अपना लिया है। मैं हो ऐसी ही जीवन-सगिमी की तलाश में या अब मेरी मनोकामना पूरी निराश पर वह अज्ञात शक्ति शायद इस उत्तर से सन्तुष्ट न होती और कहती- 'यह उचित कार्य न था। सोने के पहिले असने अपने चाचा को खत लिखा । वह चाहता था कि धाचा को यह लिखे कि 'मैंने एक लड़की देखी है । सुन्दर, भोको-माजी, निदोष, गरीय, पर उथ वंश की नहीं । उससे मैं प्रेम करता हूँ और पा मुझसे। क्या मैं उससे शादी कर ' पर वह अपने चाचा की प्रकृति को जानता पा, अतः उसने यो लिखा---'भाप मेरी शादी के लिये उत्सुक हैं, यह मुझे मालूम है। मान लीजिये कि कोई सुन्दर लड़की केवल अच्च घराने को छोड़ कर और सब बातों में मेरे लिये उपयुक्त हो-मुझको मिल जाये, तो श्राप उसके साथ विवाह करने की स्वीकृति दे देंगे।' यह पत्र लिख लेने के बाद उसे कुछ सन्तोष हुमा । सम्भव है कि चाचा जी स्वीकृति दे ६, क्योंकि मैं उनसे अपनी जीवन-संगिनी को विशेषतामों के पारे में कह चुका हूँ। यह सोने ही जा रहा था कि नौकर ने पाकर एक प्रत दिया। यह खत मनोहरपुर के जागीरदार साहब का था, जिसमें उनसे प्रार्थना की गई थी कि वह भगल्ले दिन दोपहर को उन्हीं के यहाँ भोजन करें। प्रातःकाल होते ही वह स्कूल की तरफ चला। दरवाजे पर घोड़ा चौधते समय उसे लोगों के कहने का ध्यान हो माया, जो उसका घोदा बघा देख कर तरह-तरह के विचार दौड़ाया करते थे। एक दिन असलियत मालूम हो हो खायेगी---उसने सोचा। भास्टर साहब सूज जाने की तैयारी में थे। "राजकुमार, दास-से क्यों प्रतीत होते हो" "मैं तो उदास नहीं है।" मास्टर बोले-"तुम्हारा चेहरा कुछ मुर्मापा हुआ-सा है । कदाचित् राव ज्यादा जगे हो। एक प्याला चाय पियो।" और उन्होंने अन्दर बैठी हुई मृणालिनी को धाय बनाने की आज्ञा दी। फिर बोले-"पमा कौजियेगा राज. कुमार, मेरा तो स्कूल का समय हो गया, पर मा। चाय पीकर गाइयेगा।" "धन्यवाद ! में मार से कुछ बातें करना चाहता हूँ, पर ममी नहीं, जब अवकाश हो।" "जय आप की इच्छा हो।" और मास्टर साहब स्कूल चल दिये। राजेन्द्र ने अन्दर घुसते ही मृणालिनी को देखा- मेज के सहारे सरी हुई थी। मेज पर नाश्ते का सामान रखा हुआ था। हस कर बोली-"मैं सो जानती थी कि तुम अवश्य भामोगे।" .

निराश "तो मना कर दीजिये, न भाया करूंगा।" "देखो, ऐसी बातें न कहा करो।बो, कुछ खालो" राजेन्द्र ने खाते खाते कहा-"ऐसा स्वादिष्ट भोजन तो किसी राजा को भी शायद ही मिलता हो।" "पर मेरे राजा को तो मिलता है। सच पताइये, आपको पसन्द माया ?" 'यह सब मैंने ही पनाया है। आपकी रुचि के अनुसार भोजन बनाना में शीघ्र ही सीख जाऊँगी।" राजेन्द्र सपा । इसकी मी होकर, इतने बड़े राज्य की स्वामिनी होका पिर खाना बनाने की क्या जरूरत पड़ेगी ? पर पद एकाएक गम्भीर हो गया, हसी एक गई । सम्म कि यह राज्य की स्वामिनी न बन पाये, और वह स्चय ही एक मामूखी यादमी बन जाये ! "धार समीर क्यों हो गये" "एक बात पताको मृणालिनी । चार में शारीम हो जाऊँ, राज्य से वचित कर दिया जाऊँ, तो क्या तुम मुझे प्यार करोगी?" "प्रेम में यह सवन्तर नहीं टाल सकता राजेन्द्र मलिक मैं तो तुमको और भी अधिक प्यार करने खग माऊँगी। सच पूछो, तो मुझे राजमहल मे हर खगता है।" fast को मौकरानियों तक इतनी सरक भएक की पोशाक पहनती है, जो मुझे स्वस में भी पास नहीं हुई। "पगली की को!" पर राजेन्द्र को यह देख कर निराशा हुई कि इसे भी पहों की इतनी सियिकी निराशा छिप न सको, हरे पर पड़ हो हो बाई । गृणालिनी ने भी देख लिया। पूछने बगी--"क्यों, क्या बात या नाराज हो गये" राजेन्द्र ने बहाना बनाना चाहा, पर मृणालिनी ने यही कहा-"मुझे क्षमा कर दो। मुझमें शुधियाँ हैं, कमी है। धीरे धीरे श्रुटियाँ दूर हो जायेंगा, कमी पूरी हो जायेगी । मैं तुम्हें नाराज़ नहीं करूंगी। मैं तुम्हारी नाराजी की अपेक्षा भर साना बेहतर समझती हूँ।" "मृणालिनी, तुम सो पागलों की सी बातें करती हो, मैं क्यों नाराज होने लगा !" मोड़ी देर दोनों चुप रहे । फिर राजेन्द्र ने कहा-"अला, मन विदा दो।"

निराश "कहा" "इतनी जल्दी ! अभी श्राप को पाये देर ही कितनी हुई !" "मुझे दूर जाना है।" "मनोहरपुर के जागीरदार के यहाँ । वहाँ दावत है।" मृणालिनी चुप रही। "यदि तुम कहो, तो न जाऊँ।" "नहीं, नहीं, जाइये । मैंने सुना है कि उनकी पुत्री मनोरमा अति "पर तुम्हें कोई भय नहीं होना चाहिये मृणालिनी ! मेरी इच्छा स्वयं ही लाने की नहीं है, विवश हो कर जाना पद रहा है, केवल शिष्टाचार के लिये। जिस हृदय पर मृणालिनी जैसी देवी विराजमान है, उस पर कोई भी अधिकार नहीं जमा सकता । जिन नयनों में तुम्हारी मोहनी सूरत यसी है, उनमें कोई अन्य नहीं पा सकता। विश्वास रखो, मृणालिनी, एक मनोरमा क्या सौ मनी रमायें तुम्हारी बरावरी नहीं कर सकती। मैं सुम से प्रेम करता हूँ-पोरं किसी से भी नहीं।" उसके इन शब्दों को सुन कर मृणालिनी धानन्द से नाच उठी, तथा नियति भी मुस्करा पदी !... .कुछ ही घंटों के पश्चात् वह जागीरदार साहय के यह! पहुँच गया। जागीरदार साहब ने उसका दिल खोल कर स्वागत किया। और भी मितने मेहमान थे, ये भी उससे मिल कर प्रसर हुये । बागीरदारिनी मे सो उसकी आय-मगत में कोई कसर ही ग रखी। प्राबिर तो यह एक बड़े राज्यका राधिकारी था, और अविवाहित था। किस माता-पिता की इच्छा अपनी पुत्री अछी जगह ब्याह देने की नहीं होती। जागीरदार सथा उनकोसी भी तो किसी कन्या के पिता-माता थे। घभी भोजन में कुछ देर थी । लोग मापस में बात चीत कर रहे थे। राजेन्द्र मी राधित दो दो मौनी अकसरों की बातें सुन रहा था । एकाएक मय खोग द्वार की तरफ देखने लगे। राजेन्द्र में भी चकित हो कर देखा-दरवाजे पर एक मनोहारिणो मूर्ति दी थी। पदी मनोरमा है!ौजी अफसर कुपपुसाया। निन्द ने अपने जीवन में प्रथम दी बार मनोरमा को देखा था। बम्पो, मुन्दर, कान्तिमयो, प्रतिमा-युक! कमरारे मपम, सुगैल, बायो प्रीया, मागिन जैसो खहर खाती देणी, माकर्षक मोड, रक-शित पोज और मोहनी मुमकान ! ..

२४ राजेन्द्र में बहुत सी दरिया देसी घी, पर ऐमो भय तथा अनुगमन वह जैसे MRANE में गया हो। और रसके कामों में एक घोषातो सो ए भाषा पहा-"ममस्ते !" ता समका यान इय, Anो से िमी छोक में उतर पापा । देखा, बागीशनी ममोरमा साप सकी है, और मनोरमा नमस्ते कर रहा है। मलित हो गया, सई दोहा नमसो की। मनोरमा पाकर मामा के साय उमीनगर में बैठ गई और सचारों तरफ १% जमाघ-सा लग गया। राजेन्द्र अपनी जगह पर पेटा रहा। इसमें कोई मराय नहीं कि वाममोरमा पर मोहित हो गया पाया कोई अन्य बा STRETी या होमी, परभी एक पुरुष था । और ऐसे घिरखे ही पुरुषोंगे, जिन्होंने सुन्दरता की मोहिनो शEि मागे सिर कुकाया । विश्वामित्र-जैसे मुनि भी मरमादित हो गये थे, तो राजेन्द्र की क्या गिनती थी। ' कितना भाग्यवान होगा, जिसके साप पायिार करना स्वीकार कर लेगी !' उसने सोचा और उसे पो होने छगी हम मनुषभाय पर 'अगर में स्मसन्न होता, परि मृणालिनी को वचन न दिया होता!...पर यह ग्य है। मनोरमा गुमको महणही न करेगी। कहा था और कहा मैं पाकाय- पासा का पता है। उसे फिर याद नहीं किया समय में बीता ! भोजन में पपा पार्भ थे।शायदयान में या-उस पर ममोरमा की सुन्दरताका मा पा गया मा। मा स्थापी महा रहता। धीरे-धीरे कम होता है, और अन्त में सतर जाता है। और यदि दिमाग पर कोई घमा सणे, सो और भी नही ठतर माता है, पाहे वह नशा किसी भी प्रकार का हो। राजेन्द्र को भी धकाधगा, चाचा का प्रत पद पर । ससने अब बीपी पार पत्र पा:- 'प्यारे भेटे, मुझे सानुब होता है कि तुम ऐसे सवाल पूछ कर केशव स्याही भीर काम हो यद करते हो या कुछ सोपवे भी हो। और, जब तुम मे सवाब पूछा है, तो उसर देना मेरा भी फ्री है। कीचड़ और दूध कमी नहीं मिल सकते, और यदि मिज भी जाये, तो दूध दूध न होकर कीपर ही हो जाता है। कीपर को चाहिये कि कीचड़ में मिले चौर दूध को दूध में । तुम स्वयही समझदार हो। इतना हसर यथेष्ट होगा।.... हो, यह समझदार है, और यह समझ भी गया। यह दोनों यस्तु साय- साथ नहीं पा सकता-या तो मृणालिनी को ही पाबे या राज्य ही को। पर ।

निराश २५ वह किसको पुने ? उसमें कोई और गुण भी तो नहीं था जीविका-उपा- जग के लिये प्रारम्भ हो से जिपको वह अपनी सम्पत्ति सममता आया है, उससे हाय धो बैठे और उस निर्दोष भोली-भाली बालिका को धोखा दे ? एक तरफ कुओं दूसरी तरफ खाई ! यह इसी उधेड़-बुन में था कि चाचाजी का दूसरा खत भी पा गया । लिखा था- 'मेरे बेटे, इसनी जल्दी दूसरा लत पा कर तुम्हें ताजुभ तो जरूर होगा, पर मैं तुम्हें सावधान कर देना अपना कत्तंव्य समझता हूँ। विद्वान् मनुष्य प्रागा-पीछा सोच कर कोई काम करता है। 'विना विचारे जो करे सो पीछे पछताय', जो काम करना खूप सोच विचार कर करना, जदयाशी न करना ! प्रेम के पीछे ४तापला हो जाना बुद्धिमानों को शोभा नहीं देता । जिम सुम नवयुवक प्रेम कहते हो वह सधा प्रेम नहीं-वह तो केवल एफ नशा है, जो धीरे-धीरे कम हो कर उतर जाता है । मेरा विश्वास करो। सय स्त्रिया एक-सी होती हैं। शादी के कुछ ही महीने पार तुम यह भूल जानोगे कि तुम्हारी पसी वही स्त्री है, जिसके प्रेम में तुम मर जाने को तैयार थे था जिससे तुम घृणा करते थे। जहाँ तक मैंने देखा तथा सुना है, मैं ने तो यही सत्य पाया कि बेवकूफ ४ससे शादी करते हैं, जिससे कि चे प्रेम करते हों; और बुद्धिमान् उसको प्रेम करते हैं, जिससे कि घे शादी करें। सुम शादी करना चाहते हो, तो फिर किसी ऐसी स्त्री में क्यों न करो, जो उच्च घराने की हो, जो समाज में उन्हें भागे पढ़ा सके। जिसके साथ शादी करके तुम्हें नीघाम देखना पदे, अपने सहयोगियों में मुंह न छिपाना पड़े। यह केवल मेरो सलाद है। इसको आज्ञा मत समझना । तुम अपने मन के अनुसार कार्य करने के लिये स्वतन्त्र हो। पर एक बात कहे बिना मेरा जो नहीं मानता । सुम यह जानते हो कि मैं तुम् कितना स्नेह करता हूँ। तुम्हारा स्थान महेन्द्र को देने में मुझे पीड़ा होगी, क्योंकि मैं उसे नहीं चाहता। तुम मुझे पीड़ा पहुँचानोगे, ऐसी भाशा सो मही है।...' इस पत्र को पद का राजेन्द्र की द्विविधा और भी बढ़ गई। यह बेचारा परे- शान हो गया। मृणालिनी राप! अजीब हालत थी उसकी ।। मृणालिनी के पास होता, तो यह सब भूल जाता। अगर कुछ केवन इतना ही कि संसार में सर्वश्रेष्ठ है, सपा वह न निराश - है। और जब विलग होता, तो सारी याद बोट घाती, संशय होने लगता कि कही उसका स्वस केवल सतहीन रह जाय! हेक्सा कुछ सप्ताह पूर्व वह प्रसन्न था, बेपरवाह या, मात्र था, चहकता पिरता था और शव उदास तथा व्यापुल! या प्रेम का यही फल हुमा करता है। उस दिन राजेन्द्र ने सोचा-'हम बातों का सम्बन्ध मृणालिनी से भी है, अत उसकी भी राय लेनी चाहिये। और यही विचार करता हुआ था सेजी से मास्टर साहप के घर की तरफ पैदल ही पढ़ा जा रहा था कि गृणालिनी ने सप्तको पुकारा । यह करने के किनारे फूल चुन रही थी। हम कर बोली-"मैं पार की विना माशा फूल तोर रही हूँ।" "जो स्वय मुझे ही घाशा दे सकती है, उसे माशा को क्या प्रापरपकता ! इन पर सो तुम्हारा भी अधिकार है।" राजेन्द्र ने उत्तर दिया । एकाएक उसे बुछ ध्यान आया, बोला-रानी, मैं तुम से कुछ बातें करना चाहता हूँ "क्या कोई सास पात है " "क्या मुझसे फिर कोई अपराध हो गया है।" "नहीं, नहीं, रानी ! सुम से कोई अपराध नहीं हुमा ।" भुया चेहरा फिर खिल उठा। चिड़ियाँ चहक रही थी, पुष्प खिल रहे थे, बसन्त का साम्राज्य था। "देखो राजेन्द, ये पुप कितने मुन्दर लग रहे हैं। चिड़िया चहक रही हैं।जानते हो क्या गा रही है-प्रेम के गीत, झरना भी कल कल शब्द द्वारा प्रेमी के सराने अलाप रहा है " जादू अपना कार्य शीघ्रता से कर रहा था। उदासी, निराशा, सराय, दुख भागे जा रहे थे। मृणालिनी का सम्पर्क ही ऐसा था। राजन्द्र ने जमीन पर एक किताब पढ़ी देखी । वह उसे उठाने को मुका, पर मृणालिनी ने उसे उठा लिया। "नहीं, नहीं, इस किताब को न देखिये ।" और उसने उस किताब के मुख- पृष्ठ पर अपना हाथ रख दिया । "नहीं, नहीं, में किताब नही देगा । किसने छोटे और सुन्दर हाय है। और उसने उस हाथ को अपने हाथों में दवा लिया। हाथ हट ना मुख पृष्ठ पर लिखा नाम भी उसने पर लिया 'सम्याचार के नियम" निराश और यह हँस पड़ा। हंसता ही गया, यह सोच कर कि मृणालिनी सम्प पनने के लिये किताओं की सहायता ले रही है। यह हंसता ही गया । फिर एकाएक रुक गया। चाचाजी के पत्र का स्मरण हो पाया। "मृणालिनी, ये कितायें पीछे पद लेना, और इनको तुम व्यर्थ ही पड़ "मैं यो केवल तुम्हें प्रसन्न करना चाहती हूँ। तुम्हारे योग्य बनना चाहती "अप भी हो । विश्वास रखो। सियों, विशेषतया सुन्दरी स्त्रियाँ, स्वमाव- तया मन तथा कृपालु होती हैं । पर इस समय मैं तुम से एक आवश्यक यात करने पाया था। सम्हारी सलाह लेने आया था, अपने जीवन के बारे में...। मैंने तुम से कहा था कि मैं चाचाजी को लिखूगा, इनका उत्तर भा गया मृणालिनी चुप रही। "चायाजी गर्वीले पुरुष हैं, उनको प्रेम में विश्वास नहीं।" मृणालिनी चुप रही। "और न शादी में । उनके विचार विचित्र है, पर इन सब बातों से कोई खास फायदा नहीं, सारांश यह है कि उन्हें हम लोगों की शादी पसन्द नहीं।" मृणालिनी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। यह एक पत्ते की तरह कापने लगी। उसने बोलना चाहा, पर योल न सकी। "देसी भयभीत न होओ, मृणालिनी, धैर्य धारण करो!" पर मृणालिनी में से कुछ नहीं सुना। सिर नत कर लिया, और खिों से टप-टप मासू टपकने लगे। राजेन्द्र को मृणालिनी कभी भी इतनी मुन्दर नहीं लगी थी जितनी इस समय जल-भरे नयन, काँपते गोठ, विमन ग्रीवा, उदास मुखड़ा-समी उसकी सुन्दरता को मानो द्विगुणित कर रहे थे। "रोयो नहीं ।" राजेन्द्र ने उसके बासू पोछते हुये कहा-"तुम ने पूरी बात सुनी ही कहाँ । कोई भी सुम को मुझपे विलग नहीं कर सकता-मेरे धापाजी भी नहीं। सच मृणालिनी, चाचाजी अलग नहीं कर सकते। हाँ, मुझे राज्याधिकार से वंचित अवश्य कर सकते हैं, और उस समय मेरी दशा क्या होगी १ मैं स्वयं ही नहीं कह सकता, किस तरह से जीविका चलेगी।" स्त्रियों में एक लाख विशेषता होती है, वे अपने पति या प्रेमी का दुःख M धारा भी "सोहिर मुझे मेरे भाग्प पर छोड़ दो," मृणालिनी ने शो कर करा! "यह भसम्मय है।" मृणालिनी बार पाप कर बोली-"मसम्म है। तुम मुझे प्रेम करते हो, मैं मुभी हूँ। में जीवन भर तुम्हारी अनीसा में काट दूंगी।" "लेकिन गुणालिनी, म मालूम कितना समय लग जाप!" "मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं। हम लोग कभी को मिलेंगे।" "हो सकता है कि वर्षों प्रतीक्षा करनी पड़े।" "मुझे भय नहीं है।" और इस प्रकार उस शुबहा का, जो इतना मीरस लग रहापा, अना हुना। राजा रणवीर सिंह जी अपनी सफलता पर मानदित हो उठे। राजेन्द्रका दिमारा सही रास्ते पर पा गया। उन्होंने सोचा एक प्रेम में पागल पनि कितनी भासानी से रास्ते पर लाया जा सकता है ! जब मैं वापस बोदूंगा, सो मुझे पूर्ण विश्वास है कि किसी न किसी ग्रामीय सुन्दरी के धारय होने की कहानी अवश्य सुनाई देगी। और यो दिन शान्ति रही भी। पर राजेन्द्र को शान्ति नहीं थी। उसे विपी मुजाकातें पसन्द न थी। फिर भी यह इसे क्योंकर परिवर्तित करे, यही सोधने में लगा रहता था। जैसे जैसे दिवस, सप्ताह बीतते, उसे यह लगने लगा कि उसने एक फूली का कार्य किया है, पर अब विवशता थी। उसने वचन दे दिया था, और यह वचन मा नहीं करना चाहता था 1... जिस दिन उसने सोचा था कि मास्टर साहब से सब बातें कह दूंगा, असी सायकाल मास्टर साहब की दृश्य-गति बन्द हो जाने के कारण अचानक मृत्यु हो गई।... और जब मास्टर साहब की मृत्यु के बाद राजेन्द्र मृणालिनी से मिला, तो यह अति दुखित थी, पीली पड़ गई थी । पाखें रोते-रोते सूज गई थी। राजेन्द्र में सान्त्वना देते हुये कहा-'मृणालिनी, दुखी न होयो, मैं हूँ, में सुम्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होने दूंगा।" गृणालिनी रो कर बोली-"तुम भी बिछुनायोगे।"

निराश "क्यों में बिछुड़ जाऊँगा? अब तो मैं तुम्हारी और भी ज्यादा परवाह "खोग मुझसे कह रहे थे कि मुझे यह मकान छोड़ना पड़ेगा, क्योंकि कोई दूसरे मास्टर इसमें रहेंगे। "तुम फिर कहाँ जानोगी " "जहाँ परमात्मा ले जाये।" "क्या तुम्हारे कोई भी नहीं है ?" "नहीं, तुम को छोड़ कर कोई भी नहीं है । और अब तुम को भी छोदना पड़ेगा। कोई कहता है कि किसी अनाथालय में चली जाप्रो । कोई कहता है खड़कियों को पढ़ाया करो। कोई कहता है फिल्म कम्पनी में चली जाभी, और एक ने कहा 'मुझसे शादी कर लो'" मृणालिनी रोने लगी। "निराश न होमो, मृणालिनी, यदि तुम राय दो, तो हम लोग शादी कर लें।" "शादी! पर तुम्हारा सर्वनाश हो जायेगा राजेन्द्र ! नहीं, यह नहीं हो सकता। मैं तो मार्ग को धूल हूँ, धुल में मिल जाऊँगी । पानी का एक घुबयुला हूँ, न किसी ने थाना देखा, न जाने की पर्वाह करेगा; पर तुम तो हीरा हो..." "देखो प्रिये, मैं तुम्हें अकेला नहीं देख सकता । तुम्हारी सहायता करना मेरा धर्म है। अगर ऐसा हो कि हम लोगों की शादी गुप्त रहे..." मृणालिनी ने कुछ नहीं कहा । “यही ठीक रहेगा। इससे मेरा उत्तरदायित्व बढ़ जायगा । हम लोग कहीं पाहर घस कर रहेंगे। विश्वास रखो, एक दिन यही शादी गुप्त न रह कर प्रगट हो जायेगी, और उस समय में गर्व के साथ मुम्हें राज्य में वापम खाऊँगा। अच्छा तो सुम जाओ, और यह प्रगट करो कि तुम अपने किसी सम्बन्धी की शरण में जा रही हो।" और दोनों विलग हो गये। 'काके की सी...सूर्य निकलने से पहिले ही चल देना...पाचा कोवळ विखना कि स्वास्थ्य सुधार के खिये भ्रमण को जा रहा है...रेल का सफर... लाहौर में मार्यसमाज में विवाह...एक माह से दूसरी जगह रेन की यात्रा....

निराश और अंत में काश्मीर के अन्दर एक छोटा-सा गाँव'...यह सब अब राजेन्द्र सोचा करना, सो स्वम ही-सा प्रतीत होता था। उस गाँव में एक छोटा-सा घर, उममें दो प्रायी-पति चौर पनी । एक मुखी गृह नन्दन कानन के समान होता है। एक सुखी परिवार स्वर्ग के सहश! परन्तु ज्यों-ज्यों समय बीतता गया राजेन्द्र की धारणा बदखती गई। मृणालिनी में मोह लेने की शक्ति अवश्य थी, पर मोह को स्थिर करने की नहीं । राजेन्द्र के हृदय में विधार उठने लगे कीचड़ और दूध ! मृणालिनी में यदि यही कमी होती कि वह एक उच घराने की नहीं है-एक गरीब लड़की है, तो कदाचित राजेन्द्र इसको राज जाता, पर कठिनाई पह यो कि व्यवहार में, प्राचार-विचारों में यह राजेन्द्र के योग्य न साबित हो सकी। और राजेन्द्र को यह अनुभव होने लगा कि उसने एक बेवकूकी का कार्य किया है। पर मृणालिनी पर वह प्रकट नहीं होने देना चाहता था। उसने विचारा-'मैं उसके सुख में बाधा नहीं पहुँचाऊँगा, चाहे मुझे दुखी रहना पड़े। वह नहीं जानेगी कि मैं अभी से उस बंधन से ऊब गया हूँ, जो जीवन-पर्यन्त भट्ट पालवी मेरी है। मैं ही स्वयं उसको सहूँगा।'... और वह मृणालिनी के साथ लगभग एक सान रहा, पर कभी स्वम में भी अपने विचार मृणालिनी पर प्रकट होने का अवसर न दिया। अचानक एक दिन राजेन्द्र को चाचा का पत्र मिला। पन छोटा-सा था। उसके प्रत्येक शब्द से चाचाजी का व्यक्तित्व झलक रहा था। उन्होंने खिपा था- 'क्या मैं यह जानने का अधिकारी हैं कि क्यों तुम एक साल से बाहर रह रहे हो। यदि तुम्हें उचित लगे, तो वताना, अन्यथा नहीं। यौवन का एक अपना गुप्त रहस्य हुया करता है । मैं बूढ़ा उसे नहीं जानना चाहता। यौवन की एक अपनी राह होती है, मैं उसमें विन नहीं डालना चाहता, पर जहाँ तक मेरा विश्वास है कि एक सुन्दर स्त्री की कटीनी घाखों के कार के मागे मनुष्य अपने को भूल जाता है । र, यह सम तो तुम्हारी मी पर है। पर एक बात मैं कह देना अपना कसंध्य समझता हूँ। तुम अभी नवयुवक हो, नुम को संमार में नाम पैदा करना है, इतिहास में स्थान बनाना है। अवसर चमूत्य है। राज्य-परिपद का चुनाव होने जा रहा है, यह अवसर हाथ से खोने पर पछतानोगे।...

निराश मुझे भागा है कि इस सप्ताह के अन्त तक तुम यहाँ अवश्य था जानोगे।...' वह पत्र पद ही रहा था कि मृणालिनी मा कर उसके गले से लिपट गई। और हँस कर पूछा-"किसका पन है।" "चापाशी का।" हँस कर पूछा-"क्या लिखा है" राजेन्द्र ने पन पर कर सुनाया। सुन का मृणालिनी बोली-"तब तुम जानो, अवश्य जाम्रो। अब में तुम्हें नहीं रोकेंगी।" "मृणालिनी, तुम कह सो रही हो कि जामो, पर यह भी सोचा है कि वहाँ पहुँच कर फिर मेरा शीघ्र धापस लौटना नहीं हो पायेगा।" "म हो, मुझे इसका ख़्याल नहीं है। एक पक्षी को अपने पति के मार्ग में वाधक नहीं बनना चाहिये । मैं तुम्हें कुछ भी नहीं दे सकती हूँ, मैं कुछ सहा- यता नहीं कर सकी हैं, पर इतना अवश्य कर सकती हूँ। तुम जानो जरूर जामो, संसार में अपना नाम अमर करो, इतिहास में अपना नाम स्वर्गारों में लिवानो । सम्भव है कि बाद में तुम्हारे चाचाजी मुझे पमा कर दें।" "यह तो यह कभी भी न करेंगे, और मैं उनसे कहूँगा भी कैसे " "तो भी मैं तुम्हारे उसति के मार्ग में काँटा न पनूंगी। मैं तुम्हारी पनी हूँ और कौन ऐसी पनी होगी, जो यह न था कि उसके पति का नाम अमर हो जाये, यह इससदार, सर्वश्रेष्ठ पुरुष बने।" "फिर तुम यहाँ अकेले रह लोगी" "हा, अकेली रह लूंगी। "कोई चिन्ता नहीं, में सर्वदा मुम्हारा विश्वास करूंगी। कमी भी मेरे हृदय में सन्देह न होगा, सदा तुम्हारी ही मंगल-कामना मनाती रहूँगी, और जब मुझे यह मालूम होगा कि मेरे राजेन्द्र का नाम देश के कोने-कोने में व्यास हो रहा है, तो गर्व से फूली नसमाऊँगी।" और सप्ताह का अन्त भी न होने पाया था कि राजेन्द्र घर पहुँच गया । + चाचाजी पर नहीं मिले वे किसी यावश्यक कार्य से चले गये थे। राजेन्द्र अपने काम में जुट गया। दिन-रात उसने एक कर दिया, पर तो भी सफलता होती न दिखाई पड़ी।

विरा इपर शादी की स्मृति मिड-सी पड़ने लगी। पर यह नियमित समय पर अपने जेप-प्रय से पचा का रुपया भेता रहता था, पदाका रूपी सया पुस्तकों के पास भी । गेषता कि गृणानिमी पुश बहेगी, और सोधेगी कि मेरे पति को वश मेरा यारहता है। ...एक दिन पश-मोदा राजेन्द्र पा कर चारपाई पर थेट रहा। मेधारा परेशान इसने ही में पाचागी टपके कमरे में सो गये। वह उठा। "चाचाजी, में इतनी मेहनत करता है, पर सफलता के रिक्ष तक भी दिमाई नही परते।" "ठीक है। मेहनत तो करते प्रबरय हो, पर राजनीति में केवल मेहनत ही काशी नही होती । म यह सोभानते ही हो कि मनोहापुर के जागीरदार समापतिरत्र के लिये कोशिश कर रहे हैं। तुम उनसे माकर मिली। उनके लिये कोशिश करो, और उनसे अपने क्षिये होशिश कामे को हो । उनकी पुत्री मनोरमा कोशीको कि यह भी हुम्हारी सहायता करे।". पापाजी के प्रादेशानुसार राजेन्द्र दूरे दिन भागीरदार साहब के पास गया। जागीरदार तथा उनकी पनी दोनों ही उसको देख कर प्रलय हुये और भय उसने अपनी हत्या प्रकट की, सो सह तैयार हो गये। राजेन्द्र जैसे नवयुवक को अपनाने के लिये शासुक थे ही, क्योंकि मी इदा उसको जामाता के स्वरूप में देखने की थी। अगर राजेन्द्र कोई अन्य गुस्ता कार्य के लिये कहता, तो मी ये शायद तैयार हो जाते, यह निश्चय था। नौटते समय पड गया.म. के बारे में सोच रहा था। उसका सुन्दर मिनीत चेहरा, मोहिनी आँखें, मधुर मुस्कान, सप उसकी मारों में घूम रहे थे। एकाएक दमका घोरा मिचका और उसका ध्यान किसी कुते के भौंकने ने भंग किया। उसने घोड़े को संभालते हुये चौंक कर देखा, बताई के पास एक मे-हाऊन्ह और लता कुन के अन्दर से मलक रही थी किप्ती की साली। कुत्ता फिर माँका और यह साड़ी वाली कुंज से बाहर निकल कर पाई। राजेन्द्र ने पहचान लिया, मनोरमा यो । यह क्रौरन घोड़े पर से न पड़ा, और मनोरमा की सरळ पदा। मनोरमा के मुख पर एक प्रसन्नता की बाहर दौड़ गई, पर राजेन्द्र म देख पाश। "मोद, राजकुमार ! बाप कब आये?" उसने कहा-"शान्त हो, राईगर, तुई दोस्त और दुरमन की पहिचान होनी चाहिये ।" और उसने अपने निराश बोधन । सुन्दर कोमल हाथों से प्रेहाऊन्ट को सहलाना प्रारम्म कर दिया। "मैं इसके व्यवहार के लिये पमा प्रार्थी हूँ।" "कदाचित् यही इसका, मेरे स्वागत करने का ढंग हो।" राजेन्द्र ने कहा- "मैं पाप ही के यहाँ से पा रहा हूँ, क्या मेरी एक प्रार्थनास्वीकार कीजियेगा" "प्रार्थना नहीं, भाज्ञा कहिये," मनोरमा ने राजेन्द्र की तरफ देखते हुये कहा-"यहाँ धाकर पैठिये।" पर शीघ्र ही उसने लजा कर खेिं नीची कर ली। यदि राजेन्द्र कुछ अधिक अनुभवी होता, कुछ अधिक समझदार होता, तो कदाचित् उन नयनों की भाषा को समझ लेता, और समझ लेता कि क्यों एकाएक लजित हो गयन नीचे हो गये, क्यों धोठों पर एक कंपनी-सी दीद गई, क्यों ये नाजुक हाथ एकाएक फुत्ते को सहलाने लगे। पर वह धनुभवी न था, समझदार न था, और दूसरे उसको स्वम में भी पाशा न थी कि ममोरमा के हृदय में उसके लिये कोई स्थान होगा। राजेन्द्र ने अपनी सम्पूर्ण महत्वाकांक्षायें मनोरमा के समय खोल कर रख दी। यह बोलता हो गया, यह प्रतीत होता था कि उसके शब्दों का भंडार समाप्त हो नहीं होगा। अन्त में उसने कहा-"प्राप ही यताहये, क्या मेरी ये अमितापायें, महत्वाकांक्षायें, अनुचित हैं ?" "कदापि नहीं ! बलिक में तो यह कहूँगी कि यह पुरुप, जिसमें महरया- फांबायें न हों, पुरुष कहलाने योग्य नहीं।" "तो फिर प्राप...?" "महर्ष, रामकुमार ! मैं पाप की सहायता करूंगी और जिस समय माप की सफलता का समाचार सुनूँगी, उस समय जितना इपं मुझे होगा, कदाचित् किसी को भी नहीं।" पर राजेन्द्र इन शब्दों के असली तय की न समझ सका । "राजकुमार, कल प्राप भोजन मेरे यहाँ ही कीजियेगा," मनोरमा ने कहा। और फिर वह विदा मांग का पक्ष दी। राजेन्द्र यहीं सदा रहा, उसने उस साड़ी की तरफ, इस कुत्ते की तरफ सय तक देसा जप तक ये नजरों से मोमजन हो गये। फिर भी वह सड़ा रहा कुछ बेहोश-सा कुछ नशे में-सा । मरे, मैं इस तरह से क्यों पड़ा है। और फिर उसके लिये क्या, उसके तो एक पसी है, सुन्दर, सुशील! और यह घोड़े पर सवार हो धन दिया, पर यह विचार बार-बार उसके हृदय में उटते नि०-३ .

निगरा Tr, मरमा मेरो दो जनो नमो गुम्दा, सनी ! धनों के सहा मैं सर होने का स्पोर हॉकी सपी मुन का मापे, और माtarai-RITA र हा दे कोशिश म मनमा से भी पर इनस KarietixT ER इसने रापERRER AIEEEK में मिशar rti की। TAmrifडाहीही निश्चित की जाये। REET मोर-" में बम प्रायोरा देने के बारे में भी सुबह मापन होगा और शाम साय SharmaITTETो मम्मम्मी पर आयेंगे, तो पर जा करने में ही एको, एक न एक दिन राजन मा और मेरे पाने का माम मर हो जायेगा।" 1 रार को सपासा भास हुई। भारदार सादर की सरता सौ निरव होमो भाग्यपरिकासदार मग गया। परिषद में प्रवेश PRET मेगा माशापान प्रान्त के राजाओं की, मोबड़े भाग थी, ९० प्रतिनिधि राय-परिषद यो। रामेन्द्र की समता पर सभी प्रसन्न धे। चोर अप रणवीर सिजी arranर सहा मनोरमा को धन्यवाद देने गये, तो उनकी वेज और कुशल निगारों में बद राउ सारखी, मिसे राजेन्द्र की निगहें न देख पाई थी कि मनोरमाराची धार पूर्ण रूप से धार्पित । मनोरमा की जीत अवश्य गोहाने मोगा--'मेरा इस समय बाध में पहना उदित न होगा । राजेन्द्र मोरमारे शीत नही पायेगा और फिर इस घरमा का अन्त सो निश्चय ही है, दोनों का साजेन्द्र को मी सुखी भी सयापा और साथ ही एक पुत्री का सम्म र कर गभागा-भागा धारमीर गया। सूशालिनी उसकी सजसा पर भी न समाई। पीपली के धीच अन्तर या गश था, और वह धीरे धीरे पावादा गरा सेहरे पर दासी के बाद माये रहते । उसका कारमीर जाना निराश सुन्दर कोमल हाथों से प्रे-हाउर को सहलाना प्रारम्भ कर दिया। "मैं इस व्यवहार के लिये धमा-प्रार्थी हूँ।" "कदाचित् यही इसका, मेरे स्वागत करने का दंग हो।" राजेन्द्र ने कहा- "मैं श्राप ही के यहाँ से था रहा हूँ, क्या मेरी एक प्रार्थनास्वीकार कोजियेगा। "प्रार्थना नहीं, भाना कहिये," मनोरमा ने राजेन्द्र की तरफ देखते हैं फहा-"यहाँ पा कर बैठिये।" पर शीन ही उसने बना करोखें नीची का बीं। यदि राजेन्द्र कुछ अधिक अनुभवी होता, कुछ अधिक समझदार होता, कदाचित् उन नयों की भाषा को समझ लेता और समझ देता किक एकाएक लशित हो गपन नीचे हो गये, क्यों बोठों पर एक कपकपी-सीई गई, क्यों थे नाजुक हाय एकाएक फुत्ते को सहलाने लगे। पर पद अनुमपी न था, समझधार न था, और दूपरे उमको स्वम में : प्रासान थी कि मनोरमा के हदय में उसके लिये कोई स्थान होगा। राजेन्द्र ने अपनी सम्पूर्ण महत्वाकांक्षायें मनोरमा के समय खोल कर र दी । वह बोलता ही गया, यह प्रतीत होता था कि उसके शब्दों का भंड समास ही नहीं होगा । अन्त उसने कहा--"आप ही बताइये, क्या मेरी अमिलापाय, महत्वाकांक्षायें, अनुचित है ?" "कदापि नहीं ! बल्कि में तो यह कहूँगी कि यह पुरुप, जिसमें महरः कांधायें न हों, पुरुष कहलाने योग्य नहीं ।" "तो फिर आप..." "सह, राजकुमार ! में पाप की सहायता करूंगी और जिस समय माप ! सफलता का समाचार सुनेंगी, उस समय जितना हर्ष मुझे होगा, कदाचि किसी को भी नहीं।' पर राजेन्द्र हा शब्दों के असती तरण को न समझ सका । "रामकुमार, कल अाप भोजन मेरे यहाँ दी कीजियेगा," मनोरमा ने कहा और फिर वह विदा मांग कर चल दी। राजेन्द्र वहीं खड़ा रहा, उसने उस सादी की सा, इस कुत्ते की तर तब तक देखा जा सक पे नज़र्रा से योमन नहो गये। फिर भी बह खा रहा कुछ बेहोश-सा कुछ नशे में सा। अरे, मैं इस तरह से क्यों सहा और फिर उसके लिये क्या, उसके तो एक पसी है, सुन्दर, सुशील! और व घोड़े पर सवार हो धज दिया, पर यह विचार बार-बार बसके हृदय में उठ १५ निराश रहे-हारा, मनोमा मेरी हो जाती ! मी गुम्पा, सनी RI. ही मुशोख इतनी कमी पत महास में होने जा ! रणधीर सिंह जी भी सारा पाने गुन र राहुये, चोर अपमा सम्मान की-RA मा मुम्हारे शिये कोशिश करेंगे, सो समारो बीत निश्चित क्या तुम मनोरगा में भी मिले ?" पर सनसे गमेन्द्र को घबराहट दिखी म रही, जिस समय उसने अतापालिlaana ममोरमा से मिळा, चीर बातचीत की। उसमाधीर मिकीही निश्चितता कर सोये सोते समय उन्होंगे पौधा-"प में मामी मेम के बारे में नही पुगता है, पायर सय परम होगा। राजेन्द्र मास होगा और जागीरदार साप शो अपरप ही। और आप जागीदार सहए मेरे सायची यन आरोगे, तो फिर धे अपने जामाता को भागे पाने में मही पूगे, एक न एक दिन रागेन्म भी समापति होगा, और मेरे पाने का नाम अमर हो जायेगा।" राजेन्द्र को सफलता प्राप्त हुई। बागीरदार साक्ष्य की सफलता को निश्चय दी-सी पी राजेन्द्र राज्य परिषदका सदरप पन गया। राप परिषद में भयेश माप्त कर कोना माधारय हाय न था। प्रान्त के राजानी की, यो सड़े जागीरदारों की, एक प्रतिनिधि राज्य-परिपर थी। राजेन्द्र की सफलता पा सभी मत थे। और जय रणवीर सिहजी जागीरदार साहय तथा मनोरमा को धन्यवाद देने गये, सोहनी तेज और पुरान निगाहों ने वह पात मार ली, जिसे राजेन्द्र की निगाह न देख पाई थी कि मनोरमा राजेन्द्र की ओर पूर्ण रूप से घामर्पित है। 'मनोरमा की बोत अपरम होगी' उन्होंने सोग-'मेरा इस समय बीच में पदना उचित न होगा। राजेन्द्र मनोरमा से भीत नहीं पायेगा और फिर इस घटना का मत सो निश्चय ही है, दोनों का विवाह राजेन्द्र को भी सुशी थी अपनी सफलता पर धौर साथ ही एक पुत्री का जन्म सुन कर । वह भागा-भागा काश्मीर गया। मृणालिनी उसकी सफलता पर फूली न समाई। पर अय पति पती के पीध अन्तर बढ़ गया था, और यह धीरे धीरे बढ़ता ही गया । राजेन्द्र के सेहरे पर दासी के बादल छापे रहते । उसका काश्मीर माना निराश धीरे-धीरे कम होता गया । यद्यपि वह नहीं चाहता था कि मृणालिनी इस अन्तर को जान ले, पर वह जान हो गई.--किसी तरह इस गुप्त भेद का आभास पा ही गई। समझ गई कि वह पति के मार्ग में काँटे के समान है। पर उसने अपना सन्देह राजेन्द्र पर नहीं प्रगट हाने दिया, धन्दर ही अन्दर घुलती रही, जलती रही, रोती रही। अन्त में जो कुछ होना था यही हुधा । वह बीमार पड़ गई। उसकी बीमारी का समाधार पा कर राजेन्द्र को दुख हुना । उसका हृदय ही उसे विधारने लगा। कायरता उसी की थी, प्रथम उसे विवाह ही नहीं करना चाहिये था । और जम विवाह कर लिया था, तो उसे इस तरह से थनग नहीं छोड़ना चाहिये था । उसने चाहा कि वह काश्मीर जाये, पर जा न सका । घोई से गिर जाने से उसके चाचा श्री रणवीर सिंहमा की मृत्यु हो गई । धंधारे अपनी बहू का मुंह तक भी न देख पाये, धानसा खगी रही। अन्त समय में मी वह राजेन्द्र को मनोरमा से विवाह कर लेने पर जोर देते रहे। दाह-कर्म के बाद राज्य के प्रयन्ध से पन्द्रह दिन हो मिली, तो यह सीधे काश्मीर भागा। यह पका इरादा करके गया था कि मृणालिनी को श्रम सर्व साधारण के सामने अपनी पत्नी स्वीकार कर लेगा । पर विधना का विधान विचित्र है। उसके पहुँचने के तीसरे दिन अपनी तीन साल की पुत्री रानी को छोड़ कर अपने पति की गोद में मृणाजिनी ने दम तोड़ दिया। राजेन्द्र के हृदय को धक्का पहुँचा । पर वह कर ही क्या सकता था? रियासम में उपे शीघ्र ही पहुँचना जरूरी था। अतः यह पुत्रों का प्रबन्ध करके शीघ्र ही वापस लौट धापा । मृणालिनी की मृत्यु का उस पर छाकी असर हुधा । वैसे सो राज्य-परिपद में यह काफी दिलचस्पी लेना था, यहाँ सफ कि इसकी अंतरंग कमेटी का भी सदस्य बना लिया गया, पर हृदय में उसके उत्साह नहीं था । उसका दिल टूट गया था। राय-परिषद के उपसमापति का चुनाव हुआ, और राजेन्द्र सर्वसम्मति से उपसभापति चुन बिया गया। एक मनुष्य के लिये, जो एक साल से परिषद का सदस्य बना हो, इतनी जल्दी इस पद पर पहुँच जाना असाधारण था । मनोरमा या समाचार सुन कर हर्ष-विभोर गई । बधाई देने के लिये राजेन्द्र के घर माई, पर राजेन्द्र को थाना की तैयारी करते देख कर उसे निगाव भारत परम्प को देखकर तो मीमी याद में पता पधार विnिt, गोमा in Ame दिपाई, या सम ही स्वारी in-कामना की। गनेश पा गया माम्प सुधार दिप पा साप, सो मरिमा कोरिने धिम। यसका, गोमारा मनमाने मे विश्री, पदमी रस पी। 'पदियभारमा मेरो होस... विचार पायी होशीनी मी-समोसार परिवार CREE विजाना कि मनोरमा राहतो.गी मारिया R, और पाना मी गो in tी र पासा, सनी Ramr जिलगी किमने थपाई .... जय बर पारम वोटर, हो उसने गोमा It में aretail गुना किमबखोगों में सो विवाद की मा प्रकट की। गौर- दार सपा उमदी पी तो कायों के प्रस्ताव पर समन भी होग, परमोरमा महमत न हुई। मरने साकार कर दिया। TH. मित्र ने उससे कहा-"मगोरमा चार रिमी से प्रेम करी" "हो सकता है।"-उसने दरार दिया। और विश्व में सोचने लगा कि या भाग्यपान व्यक्ति कौन होना। टाके एक सुसरे मित्र ने कहा- नहीं मालूम, थीमार है। मनोरमा के बीमार होने का समाचार पाकर सरने को रोकना ममोरमा को देखने को इस्लामपत हो उठी। उसको दशते ही मनोरमा के मोठों पर एक पीय मुस्कान दी गई। टसने वेदने की इमा मकर की। राजेन्द्र ने गिरा दिया। पीठ को सहारा देने के लिये राजेन्द्र ने तकिये को टापा 'सकी ग्राम धोखा तो महीं दे रही हैं। उसने एक बार औरों याद की, और फिर बोधी। नहीं, घोझा नहीं है। या बदस्यम-क में तो नही है। मनोरमा या निराश ३७ मनोरमा से उसकी यह अवस्था दिपी न रही। उसने उस चित्र कोठा लिया, और जरा-सी हंसी ला कर योली-"यह तस्वीर श्राप की ही है। मैं चोरी से ले आई थी।" और राजेन्द्र ने उसी मुख से सुना कि प्रथम भेट में ही मनोरमा के हृदय पर उसने अधिकार कर लिया था । श्रोह ! कितना नासमम या राजेन्द्र ! मनोरमा शोघ्न ही स्वस्थ हो गई। मंगल-वाद्य यजे। जागीरदार तथा उनकी पत्नी की अभिलाषायें पूर्ण हो गई, और मनोरमा को तो मनोवांछित फाज मिल गया । राजेन्द्र भी खुश था। नये राजा तथा रानी का स्वागत प्रजा ने दिल खोल कर किया। राज्य-परिषद के सदस्यों ने बधाइयाँ दी। और राजेन्द्र का घर 'स्वर्ग' हो गया। यह पिछली बातें भूल गया-घे पीते दिन याद न रहे, और इसी तरह सुख- धन में कई वर्ष बीत गये। लोगों का यह विचार है कि विवाह के बाद, शीघ्र ही नहीं तो अधिक से अधिक तीन वर्ष के भीतर यदि विवाह का फल प्राप्त न हो, तो दायटरों, वैद्यों, हकीमों की राय लेनी चाहिये। दो-तीन वर्ष की कौन कहे, यहाँ तो साठ वर्ष बीत गये। मनोरमा चिन्तित थी, राजेन्द्र चिन्तित था और सभी इट-मित्र चिन्तित थे । सरह-तरह की सलाह देते थे। स्वयं जागीरदार साहय ने यह कहा कि--"बेटा, खानदान का नाम घलाने के लिये पुत्र का होना आवश्यक है । तुम दूसरी शादी कर लो।" मनुष्य कितना नादान तथा कितना स्वार्थी होता है ? यदि सन्तान न हुई तो स्त्री का दोप! पर राजेन्द्र इस पर सहमत नहुमा चिन्ता मे तीयता धारण करनी शुरू कर दी। और निराशा भी बढ़ती हो गई। ऐसा नियम है कि अधिक सुख में या अधिक दुःख में मिय-जनों का स्मरण हो ही पाता है। राजेन्द्र को भी स्मरण हो आया मृणालिनी का, जिसके बारे में उसने एक भी शब्द मनोरमा या किसी से भी नहीं कहा था। और जब गृणालिनी का स्मरण हो पाया, सो पाद भा गई मृणालिनी की पुत्री-अपनी पुग्नी-नानी ! यह व्यथित हो गया। 'क्या इसी का फल तो भगवान् मुझे नहीं दे रहे हैं? ओह, मैं भी कितना नीच हुँ कि जिस दिन से उसे कोकिला देवी के पास छोड़ा, एक बार भी देखने नहीं गया। क्रोध आने लगा स्वयं पर ही। यह अपराध अचम्प, निराश । है ! इसका सुधार करना चाहिये । और यह धागे न सोच सका। दोनों हाथों से सिर थाम कर पेठ गया। प्रय दिन-रात पह इमी चिन्ता में रहने लगा। यही पीड़ा उसे मताने लगी। यही व्यथा से व्यषित करने लगी। उसको ऐसा लगने लगा कि जैसे कोई इसके हृदय पर इयादे को चोट मार रहा हो, और कह रहा हो-'तुम नीच हो । कायर हो ! तुम्हारा यह अपराध अक्षम्य है। शीघ्र ही इसका मुधार करो।' पर सुधार कैसे किया जाय ? रानी को ले धाया जाय। मनोरमा से सब बातें कह दी जाय। यह फिर क्या समझेगी ! उसके कोमल हृदय को ठेम तो न पहुँचेगी ! मैं उसकी निगाहों में पलित सो नहीं हो जाऊँगा ? चिन्ता चिता से भी भयानक होती है। चिता मुर्दे को जजाती है, चिन्ता जीवित को। राजेन्द्र दिन पर दिन सूखने लगा, स्वास्थ्य गिरने लगा। मनोरमा से उसकी यह दशा न देखी गई। वह पूछ ही बैठो-"नाय ! यह आप की दशा कैसी हो रही है ? क्या दुख है माप को?" "क्या करोगी जान कर " "क्यों, क्या में श्राप की अर्धाङ्गिनी नहीं हूँ १ श्राप के सुख दुख की साधिनी नहीं है" "हो, पर फिर भी..." "रुक क्यों गये १ कहते चलिये, क्या मुझ पर विश्वास नहीं " "तुम पर तो विश्वास है, पा दर है कि कहीं मेरा विश्वास न उठ जाये।" "एक पत्नी का पति पर विश्वास नहीं उठ सकता, चाहे पति कैसा ही या महो" "यदि पापी हो तो?" "पापी हो, पूनी हो, पतित हो, कोदी हो, अन्धा हो, पर है तो पति, थोर पति ही पत्नी का परमेश्वर है। पति ही के सहारे पनी इस ससार से पार होती है। विवाह बन्धन कोई कच्चे धागे को गोद नहीं है।" "मनो, पर मेरी एक पाप-कया है।" "मुनाइये, स्वामी, शीध्र यताइये, जिससे कि मैं भी श्राप का भार घंटा सकें।" "सुम देवी हो मनोरमा!" और उसने कथा सुनानी प्रारम्भ कर दी। जय यह अन्त पर आया, तो मनोरमा रो दी। "बेचारी सदकी माँ का स्नेह ही न जान पाई। थाप ने यही मूल की नाय! पहले ही से मुझे सब . - निराश चतखा देना था। यह मा के प्रेम का मूल्य तो समझ लेती ! श्रव भी समय है, शीघ्र जाइये, नहीं, हम दोनों बजेंगे और उसे लायेंगे।" पाह रे, भारतीय मारी! धन्य है तुम्हारे पसि-प्रेम को, धन्य है तुम्हारे हृदय की विशालता को! पर मनोरमा की साध मन की मन में ही रह गई । इम्फालुएंजा ने दोनों पर आक्रमण किया । राजेन्द्र तो जीत गया, पर मनोरमा हार गई ।... और जय राजेन्द्र मनोरमा को भस्म को नदी में प्रवाह करके लौटा, तो यह पूर्व का राजेन्द्र न रह गया था। काश्मीर में एक रमणीक उपत्यका में दो पालायें घूम रही थी। दोनों ही कवियों की कल्पना को साकार मूर्तियाँ थीं-चंचल, प्रल्हड़, सुन्दर ! दोनों में समानता थी। वपस भी बगमग बरावर ही था। पर एक विभिनता मो थी- एक स्वभाव की विनीत थी, नन्न यो, दयाल थी; और दूसरी स्वभाव की कुछ हठी, कुछ कठोर तया गर्शनी थी। "यार! यदि मैं एक राजकुमारी होती, तो कितनी सुखी होती!" उस गऊली माला ने कुछ उच्च वाणी में कहा । लोग उसे कमला कहते थे। "तुम भूल रही हा वहिन !" मधुर वाणी वाली ने कहा-"सुख के साधन हमारे अन्दर हैं, बाहर नहीं।" "श्रोह ! विमला, यह अपने ही उपयुक्त पात तुमने कही," कमला ने मजाक के तौर पर कहा-"तुम तो गुण को सान हो, जीती-जागती भनाइयों की प्रतिमा हो" "तुम भी बन सकती हो कमजा, पर तुम तो ध्यान ही नहीं देती, जरा- जरा-सी बात पर तूल पाँध देती हो।" कमला को जैसे यह विषय प्रिय नहीं लगा। वह एक गाना गुनगुनाने लगी। विमला ने टोक दिया-"इस गाने को न गायो, माँ इसको नहीं पसन्द - करती" "पर मैं सो पसन्द करती हूँ । मौ पसन्द नहीं करती, इससे उनके सामने नहीं गाती । इस ..माँ यहाँ.पर नीलो में बनी निराश घा इसी उपत्यका में मील के किनारे पर था। उसी की तरफ देखती हुई विमला बोली-"हम बोगों का घर शिवमा सुन्दर !" "होगा ! मुझे तो घर सया जेल एक समान लगता है। मुझे तो यहाँ घर के बाहर ही घरमा खगता है। "जेल देखा नही है हमी यह पाव है। एक बार ोल देत लो, सो अन्तर मालूम पर भायेगा।" कमला ने कोई उधर ने दिया। केवल 'दा' कह दी, और एक सिरालीको पकाने के फिराक में लगी रही। फिर योलो-"विमला, म इसनी भनी दो, किहर जगह सन्तुष्ट रहती हो । परमात्मा को धन्यवाद है कि मैं तुम्हासी तरह - विमला नोखी। कमला ने कहा-"क्यों ? सुप वोही विमला? चारसय में नो में पदसी है, ठीक है। मेरा भी इस प्रकार के घर में नहीं धगता। मैं चाहती है नई नई, तरह-तरह की सामियों, प्रेशन के सामान, नाटक, और सिनेमा। यदि ममि मैत्रीपन सकती" "क्या रहें गो का स्याश नहीं है कमजा?" "है, पर जीवन भर तो नहीं रह सकता । विमबा, क्या तुम कभी भी नहीं सोचा करती हो, प्रेम, प्रेमी और विवाह के बारे में ! उस जीवन के बारे में जो इस जीयन से भिन्न है। एक जना की थाहर नग्न तथा सुशील चेहरे पर दौड़ गयी। "ये बातें सौपने को होनी है, यह देखो, ढाकियात्रा रहा है।" कमला प्रत ने दौड़ गई । केवल एक ही प्रत था । कमजा को असे ले कर निराशा हुई। हाकिया बौट गया। "विमला, मैं तो समझती थी कि कोई निमन्त्रण पन होगा, पर यह निकला एक मामूली लिफाफा, सयुक्त प्रान्त से..." "सयुक्त प्रान्त से मुझे नहीं मालूम था कि मा के कोई रिश्तेदार पहा भी "न मुझे हो। पर अगर यहाँ को जल पामु की तरह ही वहाँ के मनुष्य भी है, तो मेरा दूर से नमस्कार है । आयो, मा को सत दे यायें ।" दोनों बालायें दवे पैरों घर में घुसी। किसी को न पा कर उसी सरह झील की तरफ पाले दालान की और बड़ी । इनकी माँ मशीन पर सिलाई करने में व्यस्त थी, इतनी प्यरत थी कि इनका आना म जान सकी।

निराश ४" विमला ने पीछे से श्रा कर चुपचाप माँ की आँखें बन्द कर बी। "छोड़ कमला, मुझे अच्छा नहीं लगता ।" "मैं तो यहाँ खड़ी हूँ, मुझ पर क्यों नाराज होती हो?" "मेरी अच्छी बेटी विमला..." और विमला ने बाखं खोल दी। समय के साथ-साथ कोकिला देवी में भी परिवर्तन हो गया था। चेहरा अब भी सुन्दर था, पर झुर्रियों बढ़ गई थी। बाल लम्बे थे, पर श्राधे से अधिक श्येत हो गये थे। याखें चमकदार थीं, पर अधिक पीड़ा लिये हुये। "मा, सुम्हारे लिये सय से आनन्ददायक क्या हो सकता है ?" कमला ने पूछा। एक श्राह कोकिला देवी के मुंह से निकल गई-"मेरी मृत्यु !" "नहीं मा, ऐसा न कहो,' विमला रूमासी हो कर बोली। "यह एक खत है, संयुक्त प्रान्त से श्राया है," कमला पोली-"क्यों माँ, क्या वहाँ कोई अपना है ?" कोकिला देवी ने कुछ उत्तर न दिया। केवल नत ले लिया । लेते समय हाथ कोप उदा । पर उन्होंने उसे तभी खोला जब दोनों लड़कियाँ चली गई। कोकिला देवी उठ कर खड़ी हो गई। उन्हें दोनों चालायें झील के किनारे पानी में पैर लटकाये लहरों में खेलती दिखाई दी। वह एफटक हो कर उन्हें देखने लगी। उन्हें दोनों से प्रेम था। एक से इसलिये किया उन्ही की पुत्री थी, घोर दूसरी से इमलिये कि उसे पाता था । वह सही खड़ी कुछ सोचती रहीं। 'नही. में ने जो कुछ विधारा है बही ठीक है,' अगे आप से बोली। यह लगा जैसे किमी अज्ञात शक्ति ने उन्हें कुछ चेतावनी दी, क्योंकि एकाएक कुछ पीकी पड़ी, और कॉप गई। और फिर कुछ सोचने लगी। मील के किनारे से थाती हुई कमला की हसी ने उनकी विधार-धारा तोड़ दी। उन्हें स्मरण हो पाया कि यह सत अष भी उन्हीं के हाथ में है। उन्होंने धावाज दी--"कमला, विमला, यहाँ थानो" अावाज देने के बाद यह फिर बैठ गई तथा कुछ उदास, कुछ :-- "मा, जो कुछ कहना है की प्राइस को जानती थी, न बनो । मैं जो सम्म हम सप से है, और इस तौर पर %3- निराश "गुझे सुशी है कि मेरे सम्बन्ध की कोई पान तो भाई," समका ने पुष रसुक हो कर कहा। पर माँ के चेहरे को गम्भीरता से इसे कुछ सदमा. सुम लोगों से एक भेद लिपा रखा था, इसपिये कि यता देने से हम लोगों के मानन्द में याधा पहतो, और दूसरे इमलिये हि यता देने से तुम से एक को . खैर ऐसे पहुत... कारण है कि ने उस भेद को गुप्त सपना हो उत्तम समझा । उस भेद का सम्बन्ध से है कमला । मैंने तुम दोनों को अपनी लड़कियों की तरह पाहा, पर वास्तविकता तो यह है कि मेरे दो नहीं, परिक एक ही पुत्री थी। कमला, तुम मेरी भेटी नहीं हो !" "तुम्हारी बेटी में नहीं हूँ ! नही मा, ऐसा न हो !" "कैसे म कहूँ, मेटी ! यह सच है कि मैं ने तुम्हें पाजा, पर तुम मेरी पुत्री महीं हो। तुम राना राजेन्द्र प्रताप को पुनी हो । जब तुम सोन वर्ष की थीं, सब यह मुझे सौंप गये थे।" "रामा राजेन्द्र प्रताप की पुनी? मुझपे मजाक कर रही हो, माँ ?" "महीं, फमना, सच कह रही हूँ. यद्यपि यह सच कहने में मुझे कितनी पीला हो रही है, यह में दी जानती हूँ । सुमी, तुम्हारे पिता ने एक शादी की थी, जिसे उन्होंने गुप्त ही रखना प्रत्या समझा ।" "क्यों" "इसलिये कि शादी भरावरी की नहीं थी। तुम्हारी माँ एक मास्टर की पुत्री थी।" मे कुछ कहना चाहा, पर कोकिला देवी ने रोक दिया, और सारी कहानी उसे सुना दी। "मेरे पिता की गलती थी। उन्हें शादी गुप्त नहीं रखनी चाहिये थी।" "कमला, यह कहना मुम्हें शोमा नहीं देता।" "मैं जो उचित समझती हूँ, अवश्य कहूँगी । सरे, विमला ! रो क्यों रही हो?" "मा, सुम ने यह क्यों बताया" विमला ने रोते रोते कहा--"कि कमला मेरी बहिन नहीं है। यह पक्षी जायेगी, तो फिर मैं अकेली कैसे रहूँगी?" "पगली कहीं की !" माँ ने प्यार की मिकी दी-" ने पूरा हाल सुना ही कहाँ ? सुनो कमला, यह जो सत पाया है सम्हीं का है। न्होंने तुम्हे तो शुबाया ही है, पर यह सोच कर कि तुम्हें कहीं मेरा वियोग अधिक न बने, कमला निराश ४३ . मुझे भी घुसाया है। और वह यह भी जानते हैं कि मेरे एक पुत्री है, इसलिये उसे भी बुलाया है। हम लोग साथ-साथ रहेंगे, समझी विमना!" "सच माँ !' विमला ने आँसू पोछते हुये और मुस्कराने की चेष्टा करते हुये कहा--"तब तो कमला मुझसे अलग नहीं होगी।" "तो मैं राजा राजेन्द्र प्रताप की पुनी हूँ?" कमला ने कुछ रुकते सकते कहा । उसका गर्वानापन थपनी घटा दिखाने को उत्सुक हो रहा था। "माँ, मैं मुम्हें मा ही कहा करूँगी । माँ, मेरे हाथों को देखो, कितने छोटे, कोमल तथा सुडौल हूँ। तुम तो हमेशा यही कहा करती थीं कि ये सच वंथ की निशानी "क्षा हाँ, प्यारी बेटी ! मैं तुम्हें कमला कह कर पुकारा करती हूँ। मैं ने यह नाम इसलिये रखा, क्योंकि यह नाम मुझे प्रिय था, मेरी एक अत्यन्त प्रिय सपी का था, पर तुम्हारा असली नाम 'रानी है।" मोजन का समय हो गया था। पर कमला आज ज्यादा न खा सकी। यह इतनी प्रसन्न थी कि प्रससता ही से उसका पेट भर गया था। राजा राजेन्द्र प्रताप का नाम लोग बड़े ही ग्रादर तथा गौरव के साथ लिया करते थे। अत्यन्त धनी थे। उनकी पुत्री होना कोई कम गौरव की पात न थी। जिस दिन राजेन्द्र ने कोकिला देवी को पत्र लिखा उसी दिन अपने एक अनन्य मित्र को मी। और मिन के पत्र के उत्तर-स्वरूप, उनका पुन कोमलसिंह तीसरे ही दिन श्रा गया, क्योंकि राजेन्द्र ने उसी को भेजने के लिये लिखा था। उसके बुलाने के कारण भी थे, जो कारण उन्होंने व्यक्त किया था, वह तो साधारण ही था, पर जो उनके हृदय में था यह था कोमलसिंह से रानी का विवाह ! उनका कोमल- सिंह पर स्नेह भी अधिक था । कोमलसिंह होनहार था, स्वरूपवान था, प्रतिमा- शाली था। राजेन्द्र के खानदान में अब कोई भी न था। उन्हें कोमलसिंह से पद कर राज्य का अधिकारी कोई भी टिगोचर न हुा । कोमलसिंह का यह प्रथमही यह मनोरमा के सामने भी माता-जाता था। एक यक्ति बन गया था। Lो धुला कर सारा राजमहल सजाने की प्राज्ञा दी। समान जबर फैल गई । स्वमाव से परिचित रामा की सब उतावले हो उठे। प्रकार से निराश चौर अन्त में उनके भाने का दिन शाही पहुंचा। राजेन्द्र सपने कमरे में बैठे हुये विचारों में निमम थे। उनके सामने गृयालिनी था मनोरमा दोनों में ही चित्र टंगे हुये थे। ये टस समय रानी हास्यान कर रहे पे-'वह कैसी होगी। क्या पद मृणालिनी-पी ही मुन्दर, मुशील, मधुर-मापिशी होगी।' अचानक कोमलसिंह ने भाकर विधार प्रवाह में बाधा डाल दी। "पाया. ली, वे लोग आ गये। गाडी फाटक के भीतर या गई।" राजेन्द्र गुपचाप उठकर चल दिये। पापा कोमसिंह पान्होंने तीन स्त्रियों को गाड़ी से उत्तरसे देखा। न हदय में घनेक भार उठने लगे। हृदय में एक भयानक समाम होने लगालीना निकर पाई।सीनों में नमस्ते को । राजेन्द्र ऐसे सड़े थे, जैसे प्रस्तर मूर्ति हो । "श्रीमान् । पर धाप की बेटी है रानी! जिसे पाप ने मुझे सौंश मा और जिसका नाम मैं ने कमला रए दिया है,"--कोरिखा देवी ने कहा । राजेन्द्र ने का अमला को हएप से जगा लिया, और बोले-"NAI काना, पेटी! मैं पापी है।" पुत्री पिता को पा कर हर्ष फे चार यहा रही थी पिता पुत्री को पाकर घासू बहा रहे थे।.... कोकिला देयो पिता और पुत्री का मिलन देख रही थी। लभोली विमला एक सरह चुपचाप सनी थी। और कोमलसिंह की निगाहें किसी के प्रेहरे पर जमी हुई थी। "चाचा जी, मुझे कोकिला देवी एक पहेली सी लग रही हैं," कोमलसिंह थोडा । रामा राजेन्द्र प्रताप सिंह और कोमलसिंह थारा में रहन रहे थे। "क्यों ? सुग्डारी यह धारया क्यों हुई। मुझे तो उनमें कोई यात मी नहीं नगर माती घेधारी दुख की मारी हैं। उच घश की हैं। किसी समय काकी धनवान थी, पर दुर्भाग्यवश शाना सब खो पैठौं ।" "सब नहीं, एक त मच गया, उनकी पुत्री !" राजेन्द्र एक षण के लिये विचलित हो गये, पर तुरन्त ही संभल कर पोले-"हा, तुम ठीक कह रहे हो। विमला एक सुन्दर, मुशोल खाकी है। - निराश ४५ उसकी वाणी में तथा उसके व्यवहार में एक खास आकर्षण है। वह वास्तव में रन है। पर तुम ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया । तुम्हें क्यों कोकिला देवी पहली-सी लगती है " "इसका पत्ता तो स्वयं मुझे ही नहीं मालूम, लेकिन मुझे वह इतनी उदास, इतनी एकान्त प्रिय लगती हैं कि जैसे वह कोई रहस्य छिपाये हुये "तुम अाजकल कोई तिलिस्मी या जासूसी उपन्यास तो नहीं पढ़ रहे हो ?" राजेन्द्र ने हँस कर कहा-"वह कोई रहस्य नहीं छिपाये हुये हैं।" "हो सकता है। वह उच्च घंशीय, मुन्दर, मिलनसार, मिष्ठ-मापिणी, च्यवहार-कुशत है, पर मुझे यह लगता है, जैसे हर समय वह किसी विचार में हबी रहती हो । जय मैं एकाएक कुछ कह बैठता हूँ, तो यह ऐसे चौंक पड़ती है, जैसे डर सी गई हो । धनके हृदय पर कोई बोझ सा लगता है।" राजेन्द्र ने हँसते हुये कहा-"तुम्हारा सोचना सही है। उन्हें हर समय अपने गत जीवन का ध्यान बना रहता है, पर वह रहस्यमयी नहीं है।" "वह कय तक यहाँ ठहरेंगी" यदि कोई चतुर मनुष्य होता, तो अवश्य ताड़ लेता कि कोमलसिंह पह प्रश्न पसले समय कुछ लजित-सा हो गया था, उसकी पाणी में कुछ कम्पन था। मैं उन्हें ठहरने के लिये राजी कर सक, पर हमला रानी के विवाह तक तो अवश्य ही।" "कमलारानी का विवाह ! मुझे तो सन्देह होता है कि यह विवाह के लिये शीन तैयार न होंगी।" यो " राजेन्द्र ने उरमुक हो कर पूछा। "वह चासानी से प्रसन्न होने वाली लड़की नहीं । अन्य सभी पसूरत खड़कियों की तरह...' "क्या तुम उसे सूबसूरत समझते हो?" 'अवश्य ।" इस उत्तर से गजेन्द्र मन ही मन सुरा हुये। "और नों में कोई तुलना नहीं कर उत दे, और कहे कि इन दोनों में जो में प्राधा-प्राधा बाद ।" या मूर था, यह तो उसी का महीं। . पर गिराय "stat, ए बाल बतानो, मम, रखा Tanी ही गुमसे समामा " | शरामी गार पौदारको माग!" "गुगल, गुर ! मुशीन, भय, मादी पारा मा रात्री TH माहीमा ममेमो बाम समी | कोलम रठी, गinar 'पंगा ही सो विमाप मायामी कामा।" होnainा वार रसिद से था। राजेन्द्र मन में पाया और प्ररग पर, परबगर । समय भुरा रहमा हो कि राममा उमड़ी हाकि इस्या पीक कोमसिंहकानिकी पुत्री मे हो शाम । पर उन्होंने मी चपनी हमा प्राटग करना या समायदि वासे, तो शादी कर दोनों में कोई भी उसकी MI का पलपन गर माता था। परब चाहते कि दोनों में प मेगदी साय सप पर अपनी पुरा प्रद करें। और प्रेम हो जायगा, दमाई पूर्ण विश्वास पान विकार में किसी नवयुपर का, प्राम का कोमलसिंह- नक किमो युवना के म में पदना, प्रास कर महारानी-मी पुश्तो मे, समय नहीं था। पर इनमा शपश्य मानते थे कि समय लगेगा। इसी से जब उन्होंने देखा कि दोनों पाली समय साप-साप म्पल करते ६,तो शन्हें कमी ही भसासा हुई। कमबरामी ने पुरसवारी सापाने का निश्चय किया, और सो भी कोमजासिंह से हो पढ़ाने का निश्चय किया और ‘पद भी कोमलसिंहसेती। राजेन्द्रप्रताप यह मव देशसे सो पुश दोसे, पर कहते कुछ नही। "तुम्हारे पिताजी कितने या हैं !" विमला ने एक दिन कममा से कहा--"मैं तुम्हारे धन से नहीं करती, न मुम्हारे भाग्य से, पर ऐसे पिता पाने पर जरूर ईपी करती हैं।" "पर मैं तो तुमसे, इतनी अधीमा पाने पर, ईशश नहीं करती !" "यदि म चाहो, तो मैं गा के मेम में हिस्सा दे सकती है, पर मैं तुम्हारे पिता को महत पाहता हूँ। यदि वह मेरे पिता होते, तो भान्म पूजा करती !" "शौक से ग्रध मी वा सकती हो । में राम मागी।" इसो सरह और भी विषयों पर इन दोनों में पातें होती थी। और लगभग सभी मनुष्यों के बारे में, परन्तु कोमन के बारे में कभी चर्चा नहीं चली। केवल निराश एक बार विमला ने पुछा--"क्या कोमलसिंह सुम्हारे पिता के रिश्तेदार है?" "नहीं, उनके दोस्त के पुत्र हैं।" "पड़े अच्छे मनुष्य हैं।" पस, फिर कोई बात नहीं हुई । क्योंकि कमला के चेहरे का भाव विमला ने देख लिया था। तीनों के लिये कमरे सुव्यस्थित किये गये थे। पर एक कमरा खास तौर पर सजाया गया था। क्योंकि अपनी बेटी के लिये कुछ विशेषता होनी ही चाहिये थी। यद्यपि इन तीनों के कमरे घराघर-बराबर थे, फिर भी कमलारानी का कमरा और दोनों कमरों से मिल था । उसमें बहुमूल्य कालीन बिछे थे । एक सोका सेट रखा था। एक किनारे रेडियो भी था। कमलारानी अपने इस कमरे को देख कर बड़ी मसत थी। उसकी वर्षों की साथ पूरी हो गई थी। वह जो तएक-भड़क पसन्द करती थी, वह यहाँ मिल गयी। अचानक एक दिन कोकिला देवी ने जाने का विचार किया। इस पर राजेन्द्र ने प्रार्थना की कि कमलारानी के विवाह तक यदि वह यही रहें, तो अति उत्तम होगा। प्रार्थना ही नहीं की बल्कि धाग्रह भी किया। कोकिला देषी इस भाग्रह के आगे परास्त हो गई । राजेन्द्र ने एक यात का और अनु- रोध किया कि विमला भोर कमला दोनों बहिनों के समान हो रही, अतः श्रम भी बहिनों के ही समान रहें । कोकिला देवी इस बात की प्राज्ञा दे दें कि वह विमला को भी अपनी बेटी की ही तरह मागें। कोकिला देवी को इस पर स्वीकृति देनी पड़ी। उसी दिन राजेन्द्र ने कमलारानी को अपने कमरे में बुलाया। श्राज यह प्रथम ही दिन था जब कि पिता ने पुत्री को बात करने के लिये बुलाया था। इसके पहिले उन्हें कुछ शर्म-सी पाती थी उस लड़की से पात करने में, जिसके साथ उन्होंने इतना अन्याय किया था। बोले-"कमलारानी, जानती हो तुम्हें क्यों पुखाया है ?" "नहीं, पिता जी।" "तुम तुरा तो हो "बहुत खुश ।" "हाँ बेटी, यही में भी चाहता हूँ। तुम्हारे खर्च के लिये मैं ने काक्रो, .

४८ मिराश रुपया रख दिया है। जैसे जी चाहे प्रर्य करना। पर हो, जिमूख प्रापी मन करना । मेरो इरमा केवल पुग्द .रा देखने की है।" "पिता जी, मैं बहुत खुश है। और यहाँ रहना भी चाहिये, क्योंकि वास्तव. में इसी जगह पर तो मेरा अधिकार है।" "क्या तुम कोकिला देवी के पास सुरा नहीं थी।" "का थी, पहा को में कोई शिकायत नहीं करती हूँ। उनका बरताव मेरे साथ भरमाथा, पर वों का जीवन नीरस था" बात करते करते कुम इसका चेहरा ऐसा हो जाता था कि राजेन्द्र को अरदा नहीं समता था। "देखो, येदी, अपर, गहने, चौरमी वीज जो सुहें पसन्द हो, सब प्रीद लो, दाम सब का मैं दूंगा । इसका तुम्हारे मासिकप से कोई सम्बन्ध नहीं। मैं चाहता हूँ कि तुम अर से-भाले कपड़े पदिनो, गहने पहनो । तुम चाहो तो इन बातों में कोकिला देवी की राय सकती "उनकी राय ठीक न होगी । हो, बीस साक्ष पहिले जर हो सकती थी। वह दिया खूसट प्रामकल के सेशन के बारे में क्या जाने " मुग कर राजेन्द्र अवाक रह गये। या सोजो टीक सममना करना । हो, एक पास खूप याद आई, में* तो उसे भूल ही गया था। विमला भी यहीं रहेगी। जैप्पी चीज म अपने लिये खरीदना पैपी ही उसके लिये भी।" कमला की नाक-मयें सिकुद गई। पण भर चुप रह कर भोजी- "पिता जी, और कुछ कहना है, सो शीघ्र कालिये, मुझे पुसवारी सीखनी है।" राजेन्द्र ने केवल सिर हिला कर प्रकट कर दिया कि और कोई बात नहीं कहनी है।बह चली गई। 'यह तो मृणालिनी से जरा भी नहीं मितवी । न मालूम इस मैं बह गई तथा हर कहाँ से भा गया! मृणालिनी का हृदय तो बयाही विशाल था। इसका इतना सकीर्य कैसे हो गया? मुझ में भी तो ये बात नहीं है। बाली में भी कुछ कठोरपन है। यही सोचते सोचते यह खिड़की के पास खड़े रहे। सन्होंने कमलारानी को उस जागदार, सदमाश घोड़े पर पढ़ते देखा, जिसकी उसने सीधे-सादे घोड़े को अपेक्षा पसन्द च्यिा था। धास्तव में उनकी पुत्री सत्य उन्हीं के लिये एक पदेली बन रही थी। राजेन्द्र ने बड़े गौर से कमबा को बढ़ाने में मदद करते कोमल को देखा। बातें कर रहे थे, पर प्रेमियों की भांति नहीं।

निराश ३१ घह खड़े-सहे यही देख रहे थे कि दरवाजे पर किसी ने एक हल्की-सी थपकी दी। "धन्दर श्रा जाओ!" और उन्होंने पाश्चर्य से देखा-दरवाजे पर विमला खड़ी है-बनाई-सी सिकुड़ी-सी, आँखें नीचे किये। विमजा लगाती हुई बोली-"मैं इस तरह था गई, पमा कौजिये । माँ ने मुझे सप बताया है। आप कितने उदार हैं ! पार को धन्यवाद देने के लिये मैं उत्सुक हो उठी, इसीलिये आई है।" किसनी मधुर थी उसकी वाणी ! राजेन्द्र के कानों में अमृत घोलने लगी, और जब वह चली गई, तब भी उसकी बातें उनके कानों में गूनती रहीं। ऐसा मुझे सोचना सोन चाहिये, पर क्या करूँ मैं ऐसा सोचने के लिये थाप्य हो गया हूँ, कितना अच्छा होता यदि कमलारानी इस खपकी के समान होती! विमला कितनी सीधी-सादी, सुन्दर, भोली-भाली है। इसका हृदय कितना कोमल तथा विशाल है ऐसी स्त्रियों सुख देने के लिये पैदा होती हैं। ऐसी ही स्त्रियाँ पास्तव में लक्ष्मी स्वरूपा होती हैं। जिसको विमनप ऐसी पुत्री मिले यह धन्य है, और जिसको विमना ऐसी पत्नी मिले, उसका जीवन ही सफल है। यदि कमलारानी भी इसकी तरह हो जाय, तो मेरे माग्य खुल जाय। पर मुझे तो सराय होता है कि कमला के पास हृदय कहलाने वाली कोई वस्तु है मी या नहीं। वह तो एकदम हृदयहीन-सी लगती है। माछा मैं इसकी जाँच करूँगा। और जाँच करने के लिये उन्होंने कमलारानी को अपने साथ-साथ घुस- पारी करने को कहा। वह तैयार हो गई। दोनों साथ साप चल दिये। रास्ते में यह बोले--"कमलारानी ! जानती हो मैं तुम्हें हालेपल रहा है ? उस बगह पर, जो तुम्हारे लिये प्रति पावन तीर्थ स्थान स्वरूप है।" "मेरे लिये तो कोई भी पावन तथा तीर्थ स्थान नहीं हो सकता। मुझे तो सीर्य स्थानों में कोई भी विश्वास नहीं।" और वह हम दी। उसकी हंसी चौर उपके कहने का ढंग दोनों ही राजेन्द्र को अधिक अप्रिय दंगे। नि J निराश "किसी और के लिये महो पर तुम्हारे लिये तो यह स्थान पवित्र होना भावश्यक है । तुम उस जगह चल रही हो, महा तुम्हारी माँ हा करती थी।" राजेन्द्र को निराशा हुई। वह कममारानी में जो भाय देखना चाहते थे, न देख पाये। रास्ते भर फिर यह पन भोग्ने । निरन्तर उनके हदय में पही प्रश्न उटता रहा कि क्या ER हदय है। और उधर कमजारानी भी रास्ते भर सोधनी रही-'म गाने पिताजी मुझे यहाँ क्यों ले जा रहे हैं, घे मुझसे क्या चाहते हैं।' दरवाने पर धोदा बाँधने पस्य सपेन्द्र की धान्य गीली हो गई है याद मा गई स्वरूप नगर की राजधानीकी यात। "क्या मेरी माँ वास्तव में इसी मकान में रहती थी ?" कमला की यादी में कुछ घृणा-सी थी। "यह वो पहुत छोगा मकाा है। इसमें वह कैसे रहती रही होगी? इस गली जगह को तो मैं तीर्थयान नहीं मान सकती।" राजेन्द्र को बहुत निराशा हुई । यह कैमी लड़की है, जो अपनी माँ की जगह को तीर्थ स्थान मानने से इन्कार करती है। द निश्चय कर लिया कि अब इससे वह कभी भी इस प्रकार की बातें न करेंगे। सो भी मन में जाने क्या माया, पूछ बैठे---'बेटी, क्या तुम्हें अपनी माँ के पारे में जानने की कोई इरशा मही" "नहीं, पिताजी ! प्रथम तो मुझे उनकी याद भी नहीं, और फिर यह एक दुस मरी कहानी है, यह जितनी आदी मुखा दी जाय, उतना ही अदा" क्या वास्तव में यह एकदम हृदयहीन है ? सोचा, और उसे साथ ले वह बगीचे में गये, जहाँ गुलाब लहलहा रहे थे। कमजा को दिखा कर बोले- "येटी, इन गुलावों को देवती हो, जिनने सुन्दर है। इनको मुम्हारी माने और मैंने क्षगाया था ! क्या तुम्हें पसन्द हैं ?" "मुझे ये पपन्द हैं, पर इनमें कोई विशेषता तो मुझे मार नहीं पाती।" राजेन्द्र से न रहा गया। का उटे-"कमला, तुम में तो अपनी मौके समान एक भी गुण नहीं है। कोई भावना क्या तुम्हारे हृदय में है ही नहीं?" "अभी तो नहीं है, और फिर इन जरा जरा सी बातों के लिये विशाल भी नहीं!" अंधारे राजेन्द्र को घड़ी निराशा हुई । सुपचाप दोनों लौट पड़े।

निराश ५ 'क्या इसके हश्य है ?"-उनके हृदय में विचार उठा, और उत्तर मिला- 'नहीं!'.और कमला के भी हृदय में विचार उठा, पिताजी का साथ देने के लिये विमला ही उपयुक्त रहेगी। इनके विचारों से तो उसी के विचार मिलते है। मेरे लिये तो कोमल सिंह ही उपयुक्त हैं। इसीलिये जब फिर राजेन्द्र ने कमला से अपने साथ चलने को कहा, तो उसने अनिच्छा प्रगट की-बहाना कर दिया । पर राजेन्द्र बास्तविक कारण समझ गये थे। अपनी पुत्री के प्रा जाने से राजेन्द्र खुश थे। सारा वातावरण ही पदका गया था। स्वयं उनकी दिनचर्या में भी परिवर्तन हो गया था। उनकी पुत्री उनको भी अच्छी लगी थी। उस पर उनको गर्व मी था। यह सुशिपित राथा तेज थी, याद्य-पटु भी थी। किसी का चरित्र-चित्रण करने में तो अति कुशल यो । थोड़े से शब्दों में अधिक प्रगट कर देती थी। उसका मजाक निदोष रहता, हाँ कभी-कभी कद् था, घरपरा तथा कुछ सन्तानी हो जाता। इतना सम होते हुये भी हृदय में राजेन्द्र को सन्तोष न था। उनके विचारों के अनुसार उनकी पुत्री में एक मड़ी भारी कमी थी-स्नेह की, ममता की, प्रेम की! फिर भी इस विचार को उन्होंने अपने हृदय में ही रखा। कमला तथा विमला दोनों के लिये तरह-तरह के उपहार देते रहे --एनकी एक-एक मांग को पूरा करते रहे। पर एक में कमी करते रहे। कमला नाच, गाने, तमाशे की शौकीन थी। इसी में राजेन्द्र ने कुछ कमी को, और यदि कोई ऐसा जलसा किया भी तो अधिकतर स्खयाँ ही आमन्त्रित की। उनके इस कार्य का मतलब बहुत से लोग समझ गये ये कि क्यों राजेन्द्र अभी नवयुवकों को नहीं बुलाते हैं। पर कोकिला देवी से समझ न पाई और जब समझी भी तो घड़ी देर में। राजेन्द्र अभी तक पता न पा सके थे कि कोमल कमला रानी से प्रेम करता ६ या महीं। पर इसका उन्हें विश्वास पाया कि कमला करने लगी है।ौर जय कमला प्रेम करने लग गई है, तो कोमन को भी करना होगा, क्योंकि कमला का प्रेम कोई मामूली प्रेम न होगा। यह भाग के समान होगा, और उस भाग के सामने कोमल नहीं ठहर पायेगा। .

५२ निराश पास्तव में कमला कोमक्ष से मेम करने लग गई थी। पर उनका प्रेम निमल प्रेम नहीं था। यह तो कोमल से उसके बाद गुणों के कारण प्रेम करने लग गई थी, आन्तरिक गुणों के कारण नहीं। लेकिन उसने अपना प्रेम व्यक्त नही किया गिर्याजी थी। इसके गर्व ने यह स्वीकार नहीं किया। जब कोमल ने ही प्रेम व्यक्त नहीं किया, तो बह क्या करे ? वह हठी थी, इसलिये यह मानने को संवार न थी कि कोमल उसके भागे कभी न मुशायद किसी के चरित्र का अनुमान लगाने में कुशल थी। पर कोमल के मनोभावों को जानने में पह सफल न हुई। कोमल उसके लिये पहेजी सायना रहा । वह इस पहेली को सुलझाने में लगी रही। एक दिन खुद ऐसा ही असर पा गया, जर कोमल ने कहा-"कमलारानी, सुना है, तुम यहुन पच्छा गाती हो, एक गाना सुनाप्रोन प्राम!" "कैसा गीत तुम पसन्द करते हो। वीर-रस का जिसको सुन कर खून फड़क उठे, या प्रेम रस का, या करुण-रस का, जिसको सुन कर तुम्हारा हृदय द्रवित हो जाय।" "मुझे तो तुम्हारी इस अन्तिम बात पर संशय होता है।" "ऐसा क्यों?". जरा गम्भोर होकर फमजा ने पूछा। कोमल उत्तर में ईस दिया । "इस उत्तर से मैं सन्तुष्ट नहीं हूँ। आप को बताना ही पड़ेगा।" "किसी के दिल पर सर करने का गुण आपके स्वाभाव से परे है। किसी के हृदय को द्रवित करने के लिये एक दिन हृदय ही चाहिये।" "सो श्राप के कहने का तात्पर्य यह है कि मेरा हृदय द्रवित नहीं हो सकता?" कोमल सिंह की समझ में न पाया कि क्या उत्तर दे। उसी समय कमरे में घिमला था गई । कोमल को वैसे अनायास ही सहायता मिल गई हो। योला---"विमला, मैं एक अजीब मुसीबत में पड़ गया हूँ। मैं ने कमला से अपना एक विचार प्रगट किया, उस पर यह नराम हो गई। तुम मेरी सहायता विमला ने दोनों की बातें मुन कर निर्णय दिया-"कमला बहिन का हृदय द्रविन हो सकता है, पर किसी साधारण घाट पर नहीं।" होमरा सिंह के विषय में निर्यच हुना या, असा उसने कमजा से समा माँगी ।कमा प्रसव हो गई। छोसल पोला--"यतो गायो!" कमजा पियानो पर बैठ गई। कोमल सिंह अपजक इरि से देखने लगा।

निराश गया। हापी-दाँत के परदों पर पड़ती हुई कोमम, पतली अंगुलियों को, सुन्दर चेहरे को और धनुष साना भौहों को । उसके हृदय में अनेक विचार आये, पर उनमें से प्रेम का एक भी नहीं था। श्रय कमला ने गाना शुरू किया। उसने एक के बाद दूसरा ऐसा करुण-रस से ओत-प्रोत गीत गाया कि कोमल को पाखें सजल हो उठी। उसने प्रेम के गीत गाये, उस अमर, अमिठ, अनादि प्रेम के गीत गाये कि कोमल का हृदय मचल गया, और वह इस लोक को छोड़ कर स्वाम-लोक में विचरने वग "मैं एक बार फिर घमा माँगता हूँ कमलारानी ! माप के गीत अहि सुन्दर तथा हृदयमाही थे, " गाना समाप्त होने पर कोमल ने कहा। "धाप को पसन्द धाये?" "बहुत ज्यादा।" "मेरा सौभाग्य है।"-ौर कमलारानी मुस्करा पड़ी। इस समय यह अति सुन्दर प्रतीत हो रही थी । गालों की लालिमा पढ़ गई थी, अखि भी सजल थी । और सर्वोपरि थी उसकी मुस्कान जो अति थाकर्षक यो। कोमलसिंह के नयन इस पर स्थिर हो गये। अचानक उसके नयन विमला के नयनों से जा टकराये, उनमें कोई उलहना न था, पर या कुछ पाश्चर्य तथा पीड़ा ! कोमलसिंह के नेत्र नीचे की ओर झुक गये। यदि इसका कारण कमला को मालूम पड़ जाता, तो अवश्य ही वह अपने नम्र प्रतिरोधी की हत्या करने तक में न चूकती। पर वह न जान पाई थी। वह अपने ही विचारों में निमन थी-'मैने कोमल को खुश कर दिया है। मैं ने देखी है उसकी आँखों में एक विचित्र ज्योति ! क्या मैं उनसे नहीं जीत सकूँगी ?' राजा राजेन्द्र प्रतापसिंह पुराने विचारों के न थे, और न घह याधुनिक सभ्यता के विरोधी ही थे। अतः उन्होंने सभी ऐसी यातें कमलारानी को सिखजाई, जो थाधुनिक काल में होती है। घुड़सवारी का सो उन्होंने विरोध किया ही नहीं था। इसके अतिरिक्त संगीत तथा नृत्य-विधा मी इसको सिखलाई और यह केयज भारतीय ही नहीं, परन् पाश्चात्य भी। विमला तो फमला की बहिन के समान समझी जाती थी, अतः उसने भी सप सीखा। फिर एक दिन उन्होंने एक बड़े अक्षसे तथा भोज का आयोजन किया।

निराश अवसर हो ऐसा था। मनोहापुर के जागीरदार तया उनकी पो पा रहे थे। और प्रान्त के गवर्नर भी मय पधार रहे थे। इससे Tाम अमर क्या हो सकता था ? तुरन्त ही विचार कार्य रूप में परिपत होने लगा ! TRमहछ सजाया जाने लगा। मित्रो नया सहयोगियों को निमन्त्रया भेज दिये गये। गवर्नर साहब विदेशीय थे। चत पारधारय नृत्य का भी प्रबन्ध हारे लगा। महल का सब से यहा कमरा ही इसके लिये अपयुक्त समझा गया। समी शोग यही सरका से उस दिन का इन्तजार करने लगे-कमा सास तौर पर मरत में केवल एक दिन याकी रह गया। उस दिन कोमलसिंह ने विमजा से कहा-"विमला नुम प्रथम मृग्य तो मुझे ही दिखामोगी" पाश्चात्य मृत्य भारतीय नृत्य से और विभिल होता है। अधिकतर नृत्य जोसे में किया जाता है, सया कई जोर साथ साथ नृत्य करते हैं। एक सक्षसे म सात या पाठ नृत्य होते हैं, तथा प्रत्येक के बीच में कुछ माराम करने के जिये अवकाश विमला चुप रही। बमा गई । कपोल कुछ अधिक साल हो गये। मौत नीचे कर ली। "विमला, वैसे तो मुझे यह नृत्य अधिक पसन्द नहीं, पर पदि तुम स्वीकार करो तो विमला कुछ सुना चाहती थी। पर मुँह मे कोई शब्द न कह सकी। केवल उसके नेत्र कुछ ऊस उठे । कोमल ने भी धागे कुछ नहीं कहा। उसने विमला के मेनों में स्वीकृति दी थी। उसी दिन सध्या को, जय कोमल कमशारानी के साथ था, राजेन्द्र भागये। "कोमल, मैं तुम्हारी ही खोज में था। इस नृश्य समारोह का पारम्भ तुम्ही को करना होगा, और यह भी कमलारानी के साथ।" "यह क्यों पितानी ?"-कमबारानी ने पूछा। "मेरी प्यारी पची, शिष्टाचार के नाते यही उचित होता है। इसमें अपनी दूरधा से काम नहीं होता। तुम मेरी पुत्री हो, थान के समारोह को रानी। सम्हारा तो प्रथम नृत्य में रहना आवश्यक है, और तुम्हारे साय के लिये कोमल का।" कोमलसिंह ने रुकते रुते कहा- पर मैं तो किसी दूसरे से वादा कर कमलारानी कुछ उदास हो गई। राजेन्द्र कुछ नाराज से हो गये। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि ससार जान जाये कि ये दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हैं। " निराश बोले-"कोमल, मैं तुम को मजदूर नहीं करता। पर यह मेरी इछा है। क्या तुम मेरी इच्छा पूरी करोगे ? मेरा यह अनुरोध है । क्या मेरे अनुरोध को शल दोगे। तुम से मुझको ऐसी भाशा तो नहीं है।" कोमल निरुत्तर हो गया। स्वीकृति दे दी। राजेन्द्र प्रसर हो कर चल दिये। पर कमला ने मुंह फेर लिया। कोमल योला-"कमलारानी, सुम नाराज हो गई !" "तुम्हारी बला से!" कोमल ने कमला की आँखों में घासू देखे । यह हृदय का भी कोमल था। वे घासू न देखे गये। "मुझे क्षमा कर दो कमला रानी !" और उसने पास में लगे एक फूल को तोड़ लिया-"लो, इसे ग्रहण करो!" "उसी को जा कर दो, जिससे प्रथम नृत्य का वादा कर लिया था।" कोमल चकित रह गया। कमलरानी की इस ईपो का तो कोई कारण न था। ये दोनों मित्र अवश्य थे, पर प्रेमी नहीं । कमी भी कोमल ने अपना प्रेम कमला पर व्यक्त नहीं किया था। फिर क्यों यह ईप कर रही है। कुछ रुक कर बोली-"क्या तुम यास्तव में समा चाहते हो" "धमा कर सकती हैं, पर एक शर्त पर । इस युवती का नाम पता दो।" अतिथियों में कई युवतियाँ भी थीं, इसी से कमला को नाम जानने की मिशासा थी। "नाम जान कर क्या करोगी " कमला के जी में पाया कि कह दे-'इसजिये कि मैं उससे घृणा करने जगूं।' पर उसने केवल यही कहा-"केवल उसुकतावश पूछ लिया।" कोमल की शुमान पर नाम था, और कहने ही जा रहा था, पर रुक गया। योषा--"मा करो, कमला, ऐसा करना सजनता के विरुद्ध होगा।" कमला को यह सुनने की प्राशा न थी। वह नाराज हो गई । चल दी। कोमा में कई भावा दी, पर वह रुकी नहीं, न मुड़ कर ही देखा । सीधी वा कर कमरे में लेट गई । उसके पिता समझदार थे । समझ ही गये कि किससे उनकी घेटी खड़ कर पाई है। उन्होंने कुछ नहीं कहा--न कमला से, न कोमल से। केवल उन्होंने धीरे से कुछ गन्द कहे-इसने धीरे से कि उनके अतिरिक्त और कोई न सुन सहे, वे सायद ये थे-'प्रेमियों में लड़ाई प्रेम की पुनरावृत्ति के ही लिये हुया करती है। . - निशा कमयाम से प्रेम करती थी। और प्रयाग सब प्रकार से भी दिया साथी पदिमा सीमा ने यह परम पदि कोम के मुंह से मा ने वही करने की रिशको मावि मनाने और समे काम से माराज होकर नही किया। इससे तोष में गिरायगी। सपा कोमल ने भी सीधा-'कमा इस गृह की या मना है, की पुत्री Inामी गुझे गिमा पाते हैं। उनकी पुत्री को मार मैगे URRही किया। दोगों के विमान में बी पग भी, पत संबह होने में a | कोम का पत्र पहिले से अधिक मन मामा इनमे HRA होगा। कोमन का दिया मा पुन थाली में लगा लियामा पारा में निहस गई । चाँदमी दिरही थी, पर उसमें गहाने लगी। "कममा येरी, भाग सो बड़ा मसस हो"-चानक कोपिला दे, धाकर कहा। कमलाकगई। "बेठी, में कई दिनों से सम से कुछ कहने के लिये समय रही थी, ऐसा अवसर मिलता ही नहीं था । पहिले सोहम लोग घन्टा पात किया करो थे, पर यहााकर तो एक पण भी नहीं मिलता।" "मैं यहाशाकर बहुत प्रसन्न है।" "मुझे यह सुन काप-बमा, यह तोम मानती हो कि मैं तुम को अपनी बेटी की सरह पाया और अब भी अपनी ही पेरी समस्त हूँ, इसीनिये एम से कुछ पात करना चाहती हूँ।" "कोई मापण सोम होगी ?"-कमला ने कुछ इस कर पूछा। "नहीं, बेटी ! एक बार मताभोगी सच सच बताना, क्या तुम कोमक्षक चाहतीहो?" कमना लमा गई, पिर पीली पड़ी, और फिर पदे ही धीरे से कहा- . "मेरी बची, जब में दूसरों के हृदयों के विचार मान जाती हैं, तो तुम्हारा क्यों न जान सकेंगी। फिर भी मैं मे पुष्टि के लिये तुम से पूछ लिया । मैं व एक सबा देती हैं, एक चेतावनी देती हैं, इससे प्रेम मत करना।" कमला य अपने को रोक सकी। ससके गर्व और एट मे शोर किया,

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निराश जबसे की रानि धा ही गयो । राजेन्द्र ने राजकमल को स्वर्ग बनाने में कोई कसर न रखी थी। एक तर मधुर पार पा रहे थे। स्थान-स्मान से सगीत भी पुखाये गये थे। ये तो समी स्त्रियों, अवस्था का धान घोष कर सितलियाँ मन कर फुदक रही धों, पर इस स्वर्ग को शनी सो बास्तर में कमलारानी हो यो । स काम को गोबी साड़ी और धैसा ही प्रनाउ । बासी में फूल, दो नागिन सी ल, दोनों कन्धों पर अठखेलियाँ करती भी। कानों में झिजमिजाते हुये ईयरिंग। दोनों भवों के तनिक ऊपर में एक लाख टीका । गो में माता की भेंट, एक जहाजमाता हुअा हाराहाय में एक फूलों का गुस्सा । उँगलियों में लकदक करती हुई गृटिया । पैरों में ऊँची एड़ी की सैन्न-समोस पर शोभायमान हो रहे थे। वह इस रात्रि में जितनी सुन्दर लग रही थी, येती कमी भी नहीं खगी थी। यह पास जितनी प्रबाश्री, उतनी कदाचित् पहले कभी न हुई थी और इसका कारण भी था-कोमल का थाधरय उसके प्रति प्रति कोमल हो गया था। वह येवारी टस कोमलता को मेम समम बैठी थी। कमला सुन्दरी थी, इसमें कोई सन्देह नहीं था, और अपनी सुन्दरता के से अनभिज्ञ भी था। वह धनी थी, और धन का उसे मद भी था। यह न ती थी, पर वह यह सब प्रेम के धागे तुच्छ समझ बैठी थी, इसमें भी कोई सन्देह न था। यह यही कममा यी, जो प्रेम और प्रेमियों पर हँसा करती थी। जो धन के भागे समार की अन्य वस्तुम्रो को हेय समझती थी. उसी कमला के श्रम ये थे विचार कि मैं कोमज से प्रेम करती हूँ। उसको भी मुझसे प्रेम करना पड़ेगा। मेरे प्रेम की विजय अवश्य होगी। मेरा प्रेम कोई साधारण प्रेम नहीं है, पानी की तरह निर्मल नहीं है, माग के समान है। भाग के सामने कोई रहर सस्ता है ? यदि किमीने बीच में बाधा डालने का साहस किया, तो भस्म हो जायगा, चाहे वह कोई ही क्यों न हो !... नृत्य के समारोह का समय मा पहुँचा था। प्रथम नृत्य के लिये कोमन कमखा के पास गया। कमला बोली-"कोमल सुम इन फूलों को पहचानते हो?" पहचानता तो हूँ, पर है कि कहाँ झगड़े की याद न दिलाये।" "नहीं, यह तो मुझे फिर कभी भी झगड़ा न करने की शिक्षा देगे।" इन दोनों की जोड़ी को देख कर सभी यह कह रहे थे कि कैपी अनुपम घोड़ी है !

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निराय "मुझे क्या मालूम ।"कोकिता देवी ने इस ढंग से उत्तर दिया, जैसे बिमला से उनका कोई भी सम्बन्ध नहीं है। "उसके लिये परेशान क्यों हो रहे हो?" कमला ने कहा-"यह भी दिछ यहला रही होगी।" पान्तु कोमा को विश्वास नहीं हुथा। क्योंकि लय उसने विमला से कहा था कि राजेन्द्र इस बात पर जोर दे रहे हैं हि प्रथम त्य के साथ रहे, तो वह उदास हो गई थी, और यह उदामी कोमल से छिपी न रह सकी थी। बेचारा कोमल विवश था । वह इस उदासी को दूर करने के लिये सब कुछ करने के लिये तैयार था, क्योंकि वह विमला से प्रेम करने लगा था। उसके प्रेम में डूब गया था। वह सब कुछ, यहाँ तक कि अपने प्राय तक, उसके प्रेम के लिये उत्सर्ग करने को तैयार था। प्रथम प्रेम पवित्र, सजिल की भाँति निर्मज होता है। कोमल का यह प्रथम प्रेम था, और उसकी समझ में अन्तिम भी। और शायद यही कारण था कि कमलापानी-जैती सुन्दरता की मूर्ति के सम्मुर होते हुये भी उसने विमला के लिये पूना था, और थम भी उसकी तलाश में दिदीदा रहा था। कमला का अब पाँचवा नृप उसके साथ था, इसलिये घर चली गई, पर यह वहीं खड़ा अपने कार्य में रत रहा। अन्त में उसे सफलता गि मनोहरपुर की -----.: लग रही थी के अतिरिक ।। ५% जागारदारनी भी थी। उनका भी यही ज्याद था कि विमक्षा कमना से भी अधिक सुन्दर लग रही है। एक हल्की, वसन्ती रंग की सादी और वैसा ही जाउज । कानों में सादे ईयरिंग सथा गले में केवल एक बाट । काले-काले केशों में सफेद पुष थे। हाथ में भी सफ़ेद पुरुषों का गुच्छ। । भोला भाला मुखङ्गा, नम्रता की मूर्ति ! कोमल उसी सरफ प्रसर हुआ, पर बीच में राजेन्द्र ने उसे रोक लिया, तथा कुछ मेहमानों के बारे में बात करने झगे । जव उनसे पीछा छूटर, तो फिर घा उसी र पदा, पाहतो जागीरदारनी अकेली थी। दूसरे नृप के लिये बाध बजने प्रारम्भ हो गये थे, और इस नुस्य के लिये विमला ने उससे वायदा भी कर लिया था। विमला कहाँ चली गई। वह तमाश करने लगा। अगर कोमल को विमला के मनोभावों का पता चल माता, सो उसे प्रापर्य . १ .

...निराश . जाता, Iand , . । म होता। अगर विमला के हृदय में उठती हुई नई पीड़ा का अनुभव हो तो मी शाध्यय न होता। दिमन्ना ने कोमल और कमला के बारे में लोगों को राय सुनी थी। उसने यह मो मुना था कि इन दोनों को कितनी अनुपम जोड़ी रहेगी। पर न मालूम पा, प शद उसके हृदय में तीर की तरह चुभे थे। वह स्वयं से पूछती, यो कि ये सब्द सुन कर क्यों उसे पीड़ा हो रही है। पर उसे पोसा हो रही थी, और वह मी असा ! इसी से वह उस जलसे से भाग पाई । नृत्य-घर के समीप ही एक छोटा-सा तहखाना था। उसमें एक रेम जल रहा था; हरुका प्रकाश हो रहा था। विमला ने उसे ही उपयुक्त मनमा, चौर वही भाग पाई, और एक कुर्सी पर बैठ गई। लोग कहते है कि एकान्त स्थान में रोने से पीदा का भार हल्का पड़ खाना है। उसने जूने की घरघराहट सुनी, और कोमल को पाते देखा, तो सिर नीचे सबिमा। "पिमला, तुम पक्षी पर्यो पाई !"---कोमल ने पाते हो पूछा। "मैं ले रहना चाहती थी, "सुम क्यों उदास हो १.अरे, तुम रो रही हो ! क्या कारण है " लेप'के, के मशारा में गर्म प्रामुओं से भीगा हुया यह मुन्दर घेहरा और भी सुन्दर हिममा पार पौध कर योखी-"कार या सुन कर क्या कीजियेगा!" ."इमलिये कि...विमला...इसलिये कि...में तुम से प्रेम करता हूँ। मैं सच मिमा ! जिस समय से मैं ने तुम्हें देखा उसी संण से तुन्द ,प्रेम भने हा गया है, और मरते समय तक प्रेम करता रहूँगा!" निममा धुप हो गई। "हम मासा द्रो नही हो गई। मो पष्टता को दमा करना, क्या तुम मेरा मेम TANTRA करोगी का दोहो...कहो हो, चोलो, यदि नहीं होगी, वो मेरे समान दुशी तुम्हे कोई भी न दिखाई देगा। कहो हो।" मरेपी में निका, दिस एक प्रेमी ही सुन संकता या मोड में किमुना मुर, दिमना, मरो हदयसरी विमारानी, मैं इस मा समाज की रात, मुझे जीवन मर याद रहेगी । यह चय मेरे भी मापदा मुखमप पख है!", और पापा मे मिश काहाप पंच लिया। बिमलाप शेयर की यादोनों के लिये नदीम मनमा धापनप सेमी से . पग रहा था। . .

निराश "मुझे क्या मालूम।"-कोकिला देवी ने इस घग से उत्तर दिया, विमला से उनका कोई भी सम्पन्ध नहीं है। "जसके लिये परेशान क्यों हो रहे हो"कमला ने कहा--"वह भी दिन पहला रदी होगी। पान्तु कोमल को विश्वास नहीं था । पयोंकि अब असने विमबा मे कहा था कि राजेन्द्र इमपात पर जोर दे रहे है विप्रथम नृप में यह कमला के साथ रहे, तो यह उदास हो गई थी, और यह उदासी कोमल से छिपी न रह सकी थी। धारा कोमल विषय था। वह उस उदासी को दूर करने के जिये सब कुछ करने के लिये तैयार था, क्योंकि यह विमदा से प्रेम करने लगा था। पर उसके प्रेम में डूब गया था। वह सब कुछ, यहाँ तक कि अपने प्राण तक, उसके प्रेम के लिये उत्सर्ग करने को तैयार था। प्रथम प्रेम पवित्र, सलिल की भाति निर्मल होता है। कोमल का यह प्रथम प्रेम था, और उसकी समझ में चन्तिम भी। और शायद यही कारण था कि कमनारानी जैसी सुन्दरता की मूर्ति के सम्मुख होते हुये भी टलने विमला के लिये पूछा था, और अब भी उसीकी तलाश में टि दौड़ा रहा था। कमला का शव पाचवा नृत्य उसके साथ था, इसलिये यह चली गई, पर घा वहीं सहा अपने कार्य में रत रहा। अन्त में उसे सालता मिल हो गई। मनोहरपुर की जागीरदारनी के पास विमला सही दिखाई दी। कितनी सुन्दर लग रहीधी बह! कम-से-कम कोमल को तो पह लग ही रही थी। पर कोमल के अतिरिक्त और भी कई दर्शक थे, जिनमें एक जागीरदारिनी भी थी। टनका भी यही सवाल था कि विमला कमला से भी अधिक सुन्दर लग रही है। एक हस्की, बसन्ती रंग की साड़ी और धैया ही साउन । कानों में साद ईयरिंग सया गले में केवल एक हाट । काले काले केशों में सफ़ेद पुष थे। हाय में भी सफेद पुरों का गुस्सा मोला भाला मुसदा, भम्रता की मूर्ति ! कोमल उसी तरफ अग्रसर हुआ, हा बीच में राजेन्द्र ने उसे रोक लिया, तथा कुछ मेहमानों के बारे में बात करने लगे। जब उनसे पीछा छूटा, तो फिर यह उसी तरफ बढ़ा, पर महतो जागीरदारनी अकेली थी। दूसरे नृत्य के लिये पाच वमने प्रारम्भ हो गये थे, और हम नृत्य के लिये विमला ने उससे वायदा भी कर दिया था। विमला की चली गई। यह तलाश करने देगा। अगर कोमन को विमला के मनोमावों का पता चल जाता, सो उसे पात्रय निरा . पदि इस समय कोई आपकी मुद्रा देखता, यो अवश्य कहता कि यह जो कुछ कर रही है यह पूरी मी करेगी। अकमे को हुये तीन सप्ताइ हो गये थे, पर अभी तक विमता की भेंट गुत ही रही। इस बीच में कई दके कोमन ने उसे प्रगट करने की इग्मा ही, विमला से पाहा मांगी, पर मायेक समय विमला ने असहमति जाहिर की। "कोमल, गप तक यह भेद गुप्त रहे नमी तक अच्छा है। न मालूम बयों मेरा हृदय यही कह रहा है कि जब तक हमारा प्रेम गुप्त है, तभी सक सुरक्षित है।" "ऐमा विचार करने का कारण ! "कारण नहीं बता सकती, पर यह विचार इस समय मेरे हृदय में रहता है-दिन-रात सोते-जागते, उरते-बैठने, बस एक यही विचार मेरे हृदय को भषे दाजता है।" "इस विचार को छोदी किसी को क्या, घो इसमें बाधा हाले । चाली और 'सुम्हारी मो हम दोनों को इतना प्यार करते हैं कि हमारे मुख में बाधा जना पसन्द न करेंगे।" पर विमजान मानती थी। वह अपनी इट पर अड़ी ही रही, उसके हृदय . से वह विधार दूर नहीं होता था, और वह हमी भाव उदास रहा करती थी। और इसी कारण से उन दोनों का प्रेम गुप्त हो रहा और इसी कारण से कदाचित कमला को सोचने का अवसर मिला कि क्यों कोमल इतना फरा- घरा- माना हैक्यों उसकी मुन्दरता का अमर उस पर नहीं होता है .. उसने वो अपनी सम्म में कोई कमर उरा नहीं सनी थी । वह तो हर समय रीका विणीच सांच कर प्रदर्शित करती थी। हर समय उसीके साथ पुमने जाने की जिद किया करती थी। ऐसे-ऐसे प्रेम से सराबोर गाने सुनाती पी, जिम मुन कर पर भी पसीज उदे।। "कोगन !" एक दिन पह ही अशी, मेव कि ये दोनों एक पेड़ के नीचे देठे में 1 चोपडा का समय या, धूप मुहारनी का रही थी, एक दूसरे पैर . मोरादेन्द्र और विमला भी थे, और कोकिला देवी एक तर दूर परी एक विवाद पद रही थी। कोमल, तुम्हरी अावाज यही मुरोली. और सबसुम प्रेम के गीत गाठे हो, तो यह लगता है कि तुम किसी से प्रेमकान समेत '- काम पुष "तुम पिता की घोसे प्रेम पर हो नि एक रहे थे। धमनियों में की मेमपामा सा. लाहीधी। रावेर एनमो से मिच गये।... "पा कोमर, क्या हमारा मकरमा सिन" "परिपा Mantr हो महान अणित है। तुमने पर मोपाया।" "राम मंगे, देसोगे तो माजोगा हा विचार Amar कमखाकी..." "दोनोगोंहो..." Maratी को भी शायद मही इजा है।" मा रामेको पाया Matt, Trt को प्रेमी सपा महासका है, और पति को भी तो मेरा तो नही है और न शायद मया है। चौर पर मैं उसने प्रेम भी नहीं करता, प्रेम गित...! दी गाकर धानी को सर सात मुमाता हूँ। "मी मही, कोमल, रुप दिम रहर आयो," TARAI मे सार से साइते हुये कहा। "जैसी बहाया।" 'मेरी समझ में नहीं पाता कि पों पर मेरी परवाह नहीं करता क्यों पर मुझे नहीं चाहता। पर याद पाहगाहपरवाह करेगाना मे सोला- से माना पड़ेगा। यदि धाग के सामने कोई काट डाले, तो भाग क्या करती है ? मला देती है, भाम का देसी, विनाश कर देती है। वही में भी करेगी। जो कोई मेरे और कोम के बीच में पायेगा, उसका विनाश कर दूंगी, उसके टुको-टुकदे पर टालगी, जैसे में इसके करती हूँ। और उसने हाय से फूज नोच-नोच कर फेंक दिया। उसका चेहरा इस समय समतमा उठा था। "विनाश फ्राने में, अपने मार्ग की रावटों को दूर करने में मुझे समिक भी दया नही होगी। मैं अपने एप को कठोर पनार्गी पथर का कर लगी, पर रुकावट को बड़ से उखाड़ फेंगी' at Patna art at . .

निराश राज्य-परिषद का अधिवेशन होने पाजा था । इस अवसर पर सभी सदस्य अपने इष्टमित्रों और बन्धु-धान्धत्री-सहित तथा आमन्दित राजा, रायमाहय, जागीरदार, ताल्लुकेदार अादि पधारा करते थे। राजा राजेन्द्र ही इस अधिवेशन के सभापति मनोनीत हुये थे। उन्होंने सोचा कि इस अवसर पर धमला, विमला और कोकिला देवी समी साथ चले। कोकिला देवी ने कुछ यहाने भी पनाये, चाहा कि वह और विमला न जाये, पर राजेन्द्र के आगे कुछ न घनी, और उन दोनों को भी जाना पड़ा! कोमल कुछ समय पहिले ही चला गया था। उसको कुछ घर पर काम था। और राजेन्द्र ने यही उससे कह दिया था कि वह भी अपने पिता के साथ वहीं पहुँच जाय, सथा दोनों उनके ही अतिथि यन कर रहें । राजेन्द जानते थे कि इस अधिवेशन पर सभी प्रकार के मनुष्य होंगे-बूढ़े, गवयुवक, पालक और यह इस कारण से चाहते थे कि कमला और कोमन अधिकतर साथ-साथ रहे। इन दोनों लड़कियों ने तो यहाँ हलचल-सी मचा दी। जिसको देखो वही उनको सुन्दरता का गीत गाता था। नवयुवक रामा, राजकुमार, जागीरदार, सभी एक तरफ से इन दोनों के प्रेम प्राप्त करने के लिये होड़ लगाने लगे। धीरे-धीरे और सब तो निरुत्साह हो गये, पर स्वरूप नगर के राजकुमार ने पाशा न हारी । वह अपनी धुन में लगा रहा। यह कमक्षा के प्रेम में पागल हो गया था। स्वरूप नगर का राजकुमार उत्तम स्वरूपवान् , धनवान, समृदिशाजी था। फिर भी जाने क्यों राजा राजेन्द्र प्रताप उससे कुछ उदासीन थे, यही लोगों को चकित करने वाली यात थी। स्वयं उत्तम को भी इसी बात पर धाश्चर्य था कि क्यों राजा राजेन्द्र प्रताप उससे इतने खिंचे खिचे-से रहते हैं। सभ्याचार के नाते उसकी प्राधमगत करते हैं, पर व्यवहार में कुछ शुष्कता रहती है। और इस पास को देख कर और भी पाश्चर्य था कि कमला भी अपने पिता की तरह खिंची रहती थी। उत्तम और कोमा एक दूसरे के दोस्त थे। कोमला अधिकतर कमला के साथ रहता, पर उत्तम को कोमल के किसी भी कार्य से यह पता लगा कि कोमश कमला से प्रेम करता है। फिर क्यों कमला उसकी तरफ से उदासीन है? उसके साथ धूमने चली जाती, बातें करती है, पर मेमन-सी। परन्तु जय कभी कोमल साय होता है, तो असम से सुन कर पाते कर लेती है, हस भी लेती, पर नत्र कमी अकेली होती है, व्यवहार सर्वया भिन्न होता है।

"तुम बीकन पर्यन्त थानन्दित रहो, फमता बहिन तुम जैसी सुन्दर तथा . निराश "नग्न हो, पराठी, मुशीत हो, उस विधारवाजी हो, इय विशाल हो, भारमा की पवित्र स्वार्थी न हो। मेरे प्रेम का उसी मात्रा में प्रत्युसर २-सारांश यह कि यह देवी हो।" बमा गुमको कोई ऐसी मिल गई है।" सा सुनने के लिये यह म्यप्र हो उठी। पर कोमन में कोई दिया। उनको यो विमजा पा जामी थी। "क्या गुमको कोई मिल गई है?" कम ने मश्न दोहराया। "हो"दोसा, सरित पर मिला। कमला थाडी देर चुप रही, फिर योगी- उसका नाम तो मुझे न पूना चाहिये।" "त, किसी दिन मालूम हो जायगा।" कमला के ध्यान में विमक्षा न घाई यो । उसने सोचा यह मुझे प्रेम करता है, मुम्मो स धोने हैं। किसी न किसी दिन यह स्वयं प्रेम व्यक्त करेगा। और उसका चेहरा मिल | THE Etम ने कमा के सिने चेहरे को देखा और सोचा कितनी गलती पर मुनकर कि मैं मे किसी से प्रेम करना शुरू कर दिया है, कमला तिनी सुश हुई है ! और इसी तरह एक दूसरे के मा को गलत समझते रहे, और इसी तरह प्रत्येक छोटी से छोटी घटना गलतहमी को पढ़ाती गई। कोमल उठ कर राजेन्द्र के पास धज्ञा गया । कला को अकेली देख विमला उसके पास चली बाई । विमला ने कमलाको प्रति प्रसय देता। "कमला,या । तुम बहुत सुश दिसाई पदारही हो!" ", पगली ! मैं ने अभी एक ऐसी ही यात मुनी है मुझे जीवन भर धानन्ददायक होगी।" - कोई प्रम-मय मिना होईया कमक्षा का सन्देश दिया है ? यही होगा। पर पयों कोम ने उससे कुछ नहीं कहा ? तब ! क्या इसे सच्च पारमाय दुख उठाने के लिये नहीं बनाई गई "और तुम विमला?" " मैं खूबसूरत, और न उच्च ।"

निराश स्वीकार न किया और अपने नम्र, विनीत, लजीले स्वमाव से उनको प्रभावित कर दिया। कोकिला देवी ने भी विमला को समझाया, क्योंकि वह भी विमला की इच्छा के विरुद्ध उसकी शादी नहीं करना चाहती थीं। उन्होंने उसे अपने भरसक समझाया, पर विमला अपने निश्चय से न हिगी । कोकिला देवी ने इस श्रस्त्रीकृति का कारण नहीं पूछा, क्योंकि वह जानती थी कि विमला कोमल से प्रेम करती है, और यह भी जानती थीं कि इस प्रेम का फल अनिष्टकारी होगा ।... अधिवेशन समाप्त हो गया । सब लोग अपने अपने घर चलने को तैयार हो गये। मनोहरपुर के जागीरदार हठ पकह गये कि सब लोग उनके यहाँ चलें, और राजेन्द्र का आग्रह था कि सय लोग उनके यहाँ चलें । अन्त में सुलह इस बात पर हो गई कि सब लोग पहले तो जागीरदार साहब के यहाँ चलें, और फिर दो-तीन दिन यहाँ ठहर कर तब सय लोग राजेन्द्र के यहाँ चलेंगे। परन्तु कोमल ने मनोहरपुर जाने से विवशता प्रगट की। उसके पिताजी पहले ही चल दिये थे, श्रतः उसने आवश्यक कार्य का बहाना यना दिया। विमला से उसने साफ-साफ कह दिया था यदि वह साथ चलेगा, तो अपने गुप्त रहस्य को प्रगद किये बिना उसे चैन न पायेगा । विमला ने उससे कुछ दिन और ठहर जाने की प्रार्थना की, और कहा कि जब यह उनके यहाँ आयेगा तमी इस पर विचार करेंगे। राजेन्द्र को कोमल के साथ न चलने पर श्राश्चर्य हुश्रा । अभी तक उन्होंने उसके साथ कमला को शादी के बारे में थाशा नहीं छोड़ी थी। कोमल उत्तम को अपने साथ ले गया था। उत्तम को स्वयं तो कोमल के साथ जाना थुरा खगा, पर किसी अन्य को नहीं। पर वह कोमन से मना भी नहीं कर सकता था, क्योंकि यह उसका अंतरंग मित्र था। उत्तम को यही सन्तोष था कि तीन-चार दिन याद पुनः कमला के दर्शन होगें। मनोहरपुर में इन लोगों के लिये आमोद-प्रमोद के प्रर्याप्त साधन थे। पर कमला को कुछ भी अच्छा न लगा। उसे कोमल का न होना खल रहा था। कमला के लिये कोमज ही सब कुछ था। कोमन के साथ थानन्द, श्रामोद-प्रमोद सभी थे । जय कोमल ही नहीं तो ये भी नहीं। वह यह चाहती थी कि जितनी अल्दी हो, अपने घर पहुँच जाय, क्योंकि कोमल मे घही पाने का वादा किया था। .

गृत्यु'. ससम तो भी निराशन दुधा, हाय महारा, पर धरनी धुन में लगा रहा, चौर भन्न में एक दिन भय कमला इसके माप मने गई, सो उसने परमा उदय धीर पर ब दिया, परन्तु भारवर्य किकमजा पर कोई भी आसान rमा, उमने स्यका नगर की रानी थाने से साफ कर दिया। उत्तम हतीसाह गया, पर मारा तो भी न हारी। मन में कहा- कदाचित तुम मुझे अपने योग्य नहीं समझतो, मजा, पर भाशा महीनो अपने को सम्हारे योग्य यनाने की चेष्टा करूंगा। या तो सफलता मिलेगा या कमना के मन में कई बार अाया कि कह दे कि तुम्हारी घेष्टा सपा निरर्थक होगी, क्योंकि यह किसी दूसरे से प्रेम करती है। पर इसने यह कहा नहीं । कद्दे भी कम कि दसका प्रेम अभी तक वाहत नहीं हुआ था। और उधर स्वीवित पाने के लिये कमला ने पेष्टाये की। उत्तम से कोमा को उपस्थिति में हस हस र यात करके कोगन के मन में ईद के माय पैस करना पापा सम पर तो कोई भी पसर म मा । छटा सुश होता था। जय कभी देखता कि डसम और कमला किमी कमरे में जान-यूम कर म जाता। मशा सोचतो-'कोमन कदाचित् पाहता है कि मैं इसम से प्रेम करने बा । नहीं, यह नहीं हो सकता । कदाचिन् यह मेरी परीक्षा ले रहा है।' पर कोमल के भावों को लक्ष्य कर कमला धारपर्यही भारचर्य होता था। और भी एक आश्चर्य की बात थी-कामना अपने प्रतिद्वन्दी को सोम निकालने में सर्वदा चौरमा रही थी, पर शोज नही पाती थी। एफ से पद कर एक सुन्दरियों का जमाव था, पर कोमल को किसी को भी तक प्राकर्पित होने नहीं देवा । विमला उसकी मविद्वन्दी हो सकती है-इसका इसे स्वस में मी धनुमानमा 'वह केवल मेरी परीक्षा कर रहा है, और कोई बात नहीं। यही सोच लेती। यही उसके विचारों का फल निकलता। जो प्रेमी लोग कमला की तरफ से निहसाह हो गये थे ये सम विमला की तरफ मुके। विमला भी कमला से कम न निकली। एक को छोड़ कर सभी मैदान छोड़ गये, वह था मनोहरपुर के जागीरदार का सबसे छोटा पुत्र-मनोरमा का सबसे छोटा माई-बाजेन्द्र का सबसे छोटा साला । नाम था उसका मनोहर । राजेन्द्र को भी विमला के लिये मनोहर से शद कर कोई दूसरा पति नहीं दिखाई दिया। उन्होंने विमला से इस विषय पर बात चीत को, पर विमला ने निराच निस्य की घरह थक कर कमला एक धारामकुर्सी पर लेटी थी। और विमला को एक तरफ पातें करते देसा। 'परमारमा करे, से प्रेम करने लग जाये,-उसने सोचा। पर वास्तव में उन बारों हो रही थी यदि वह सुन पाती ! उत्तम विमला से अपनी छह रहा था। कोमल से तो प्रार्थना कर ही पुसा था। अब विमला कर रहा था। जा ने दूसरी तरफ देखा-कुछ लोग चैमिन्टन खेल रहे थे। कोमल । पा, पर उनकी निगाहें इसी तरफ थीं। नों की निगाहें मिनी । यह उठ कर पाया, और बोला-"कमला, मैं एक बात कहना चाहता हूँ।" 'कहिये" "यहाँ नहीं, बागीचे में चलो। यह बात ऐसी नहीं है, जिसे कोई और कमजा चुप बैठी रही। कोमल ने कहा-"अरला थगर नहीं चलना चाहती तो न सही, मैं फिर दूंगा।" "नहीं, नहीं, चलो!"-हंस कर बोली। वह मन-ही-मन प्रसत हो रही थी । एकान्त स्थान प्रेम की बातें करने के लिये ही उपयुक्त समझा जाता है। बगीचे में पहुँच कर दोनों एक जगह बैठ गये । कोमल ने कहना शुरू किया-"कमला, हम लोगों ने किराना समय साथ-साथ बिताया है हम लोगों के हृदय में एक-दूसरे के लिये स्थान है।" "मैं तुम्हें सुनी देखना चाहता हूँ। इसलिये, चाहता हूँ कि तुम मेरी यात मान लो। इसको मजाक मत समझना। कमला, तुम और लड़कियों से भिन्न हो, अधिक सुन्दर हो । यदि भाज्ञा हो तो कहूँ?" "कहो!" कमला ने सचिप्त-सा उत्तर दिया, पर दिक्ष पुकार-पुकार कर कह रहा था--'शीघ्र कहो-'कमला, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ !' "तुम शादी के योग्य हो गई। मैं तुम से इसी विषय पर कुछ कहना चाहता हूँ । उत्तम तुम से इतना प्रेम करता है, तुम क्यों उस सीन हो उसे भ्रम हुआ कि कमला का घेहरा सफ़ेद पड़ गया है, पर यह केवल भ्रम ६८ । निश्चय के अनुसार सब लोग मनोहरपुर से राजेन्द्र के यहाँ पहुँच गये। पर कमला घर पहुंध कर भी ,पुश न थी। कोमल के बिना उसे दिन युग के समान मालूम पड़ रहे थे। यह मार में, एकान्त में, एकाकी बैठी हुई कोई गीत गुनगुना रही थी कि उसकी बदलीनता में डाकिये ने पाकर बाधा पहुँचाई। अनमनी-सी हो कर कमला ने पर ले लिया। और बिना देरी एक तरफ रख दिया । पर फिर वह पन कहाँ से आया है, किसका है, यह जानने का बोम संवायन कर सकी। लिफाफे को उजद कर देखा । अरे, कोमल ने भेजा है ! पिताजी के लिये कुछ-न-कुछ सुखद समाचार अवश्य होगा। और यह भागी भागी गई, पिता को पत्र देने के लिये । और अब पिता ने पत्र पढ़ा, तो उनका चेहरा खिल सटा । उनके खिले हुये चेहरे को देख कर समी खुश हो गये । और जब उन्होंने यह बताया कि कोमल याज बाउ बजे रात्रि की गाड़ी से सपाम के साथ श्रा जायगा, तो कमेखा के हर्ष का पराचार न रहा। वह सोचने बगी-'कोमल इतनी जल्दी क्यों भा रहा है, उसीके लिये ! विरह में ही प्रेम का स्वाद मालूम होता है। बिछुड़ कर ही मिलन का आनन्द पाता है। पर यह उत्तम फिर पा रहा है। क्या ही अच्छा हो यदि विमला उसके गले मद जाय, कम से कम मेरा तो पीछा छूटे। विधारो में कमला इतनी मम थी कि उसने यह नहीं देख पाया कि विमजा का चेहरा पीला पड़ता जा रहा था। मम के गुप्त भेद के खुलने का समय निकट अाता जा रहा था। इसीसे बिमला मय के मारे पीलीपदी जा रही थी। धीरे-धीरे सध्या या पहुंची। श्राज कमला ने अपने को .पूर सनाया था। माली को खास तौर पर Trm hd लाल दूसरा 'मन ने N '। . . . .. . . माली बेचारे को लाल गुलाव लाने पड़े। और कमला ने उन्हें पाली में सभाया, हाथ में भी एक गुरा ले लिया। पर जब कोमलसिह थाया, तो उसने उन बाल गुजाओं की तरफ ध्यान तक न दिया । यह अस झगडे को भूल चुका था। कोमन को भाये दो दिन हो गये थे। ये दो दिन बड़ी अच्छी तरह से कदे थे। सामोद-प्रमोद के सभी साधन थे। कभी घुड़सवारी होती, तो कभी टेनिस खेली जाती । कभी नृत्य होता, तो कभी संगीत समाज शुद्धता ।

निराश बेचारे थाधाजी भी उठ कर अपने कमरे की तरफ चल दिये। और जब कमरे के दरवाजे अन्दर से लगा लिये गये, तप उन्होंने पूछा-"दा, क्या कहना चाहते हो" पर कोमल का साहस न पड़ा । वह चुपचाप हाथी-दाँत के बने हुये एक कलम से रोलने लगा। उसको गुलियों कॉप रही थीं। "येटा, शर्माप्रो नहीं, साफ-साफ कह दो। तुम जानते हो कि मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करने के लिये तैयार हूँ।" "चाचाजी ! मैं आप की अनुमति पाहता हूँ, पिताजी ने दे दी..." राजेन्द्र हंस दिये, और हम कर बोले-"समझ गया। तुम शादी करना घाइते हो, तुम्हारी और कमला की बड़ी ही सच्ची जोड़ी रहेगी" "कमला नहीं, चाचाजी, विमला!" राजेन्द्र पर जैसे अकस्मात् पनपात हुआ। पर यह तुरन्त ही संभल गये और पूछा-"क्या यह भी... क्या तुम्हारी यह हार्दिक इच्छा है" "जी, चाचाजी!" "बेटा, सो मैं भी तुम्हे अनुमति देता हूँ। मैं तुम्हारे मार्ग में बाधक नहीं बनना चाहता। हाँ, यह बात सच है कि मेरी बाशानों पर तुपार-पात हो गया, मेरी हार्दिक इच्छा तुम को अपना भावी राज्याधिकारी बनाने की थी । तुम को और कमला को एक सूत्र में बाँधने की थी, पर मेरी भाशा फलीभूत न हो सकी।" राजेन्द्र की निराशा को देख कर कोमल कुछ उदास हो गया । "उदास न हो कोमल ! मैं तुम से नाराज नहीं है। विमला जैसी लड़की के लिये तुम उपयुक्त भी हो । मेरे हृदय में विमला के लिये कमला केकी घरा. बर स्थान है । उसको सुखी देख कर मेरे हृदय को शान्ति मिलेगी। तुमने कोकिला देवी से भी अनुमति ले ली जामो बेटे, उनकी भी अनुमति ले लो।" कोमल चल तो दिया, पर कुछ उदास वित होकर । वह राजेन्द्र से इतना स्नेह करता था कि उससे उनकी प्रान्तरिक व्यथा न देखी गई। पर वह विवश था, कारण कि उसके रोम-रोम में विमला ही समाई हुई थी। उसकी बातों को सुन कर कमला और राजेन्द्र को तो दुःस्य तथा निराशा ही हुई थी, पर कोकिला देवी के व्यवहार ने उसे चकित कर दिया, जय कोमल ने उनसे बताया कि यह विमला को प्यार करता है। और उनसे विमला के साथ विवाह करने की अनुमति मांगी, तो उन्होंने अनुमति तो दे दी पर वह रोपड़ी, सिसकियाँ भरने लगी, और सिसकियों मरती-माती बोली-कोमन निराश हो ममम का मने अधिक ध्यान नदिया, और रहता गया--"म एक पोप पुर। निगाद में दम उथम पर मिनाकछिन है I रिप मिमि दावे के साथ समाf सो कोई तुम्हारे लिये वयगुण मही हो माना । यदप हो म का!" "गुम गुममे या कारदे हो! मग गुमको मारने की समारोहदोम!" " में, पाकि गुझे हमारे गुग का शान, मदारी भलाईको "शाह कोगा, गुझको तुमसे प्यो मायाम योग सिको...मैं..." शादी से अधिक साई माधों मे, उधारे, गे समके मपनों में पर कर दिया । और जो-करिया सरे am सवित हो गया--- हो गया। कममा उससे प्रेम करती है, सबसे बर में भी जानन भा। 'विषम समस्या धो! कमला रे . . असा ददय इस भरकी के लिये वाद हो गया था, और वागीमको दर्ग सोधी, पाकममा ने इस पर कोई सर नहीं दिया। केवल इतमा होगा- "मापजागर।" कोमस उपास होना पाया। चन्द्रमा और तारों ने चित्र-विचित्र एय देसे होंगे, पर HIM ART देखा होगा--ौर म देखा होगा ऐमा चेहरा, दुस से भरा हुघा, म देखा होगा पेसा गर्य, कोष, पा, निसटत अम, दुल सोम, गिराशा की साधी जो उस क्षपकी केहदय में रही थी। कोमख भी इस माह कमन्ना को दुख पहुँचाने पर उधास था। यह सोच रहा पा~यदि कमला उससे में म करने लगी थी, तो इसमें इसका क्या दीप सुझको अपने और घिमना मेम को मात गुप्त नहीं रखनी थी। यदि कमजा को यह मालूम पद जाता, तो मह कदापि यह मूर्खता न मी | अप भी समय है। पिताजी मे तो अनुमति दे दी है, पर पापाशी को भी अनुमति लेने के लिये कह दिया था। उनकी भी अनुमति से, जितनी शीघ्रता हो उतना ही अरमा । धौर पर सीधा रामेन्द्र के पास गया। श्राते ही भोला--"चाचागी, मुझे आप से कुछ कहना है । मही, पाँ नहीं, एकान्त में" निराश ७३ "माँ की यही राय है।" इस समय का दृश्य ऐसा था कि यदि कोई चित्रकार देखता, तो प्रफुल्लित हो आता, एक चित्र तैयार कर देवा । वह दो सुन्दरी लड़कियाँ बनाता-एक कोमल, लीली प्रेम की मूर्ति, पर कुछ भयभीत । दूसरी-गर्वीली, पर कुछ उदास तथा कुछ भयानक मुद्रा । और उस चित्र का शीर्षक देताम और प्रतिहिंसा की देवियाँ। "माँ की राय को छोड़ो, मुझे वतामो, क्या तुम उनसे प्रेम करती हो " पापी कुछ कठोर थी। विमला सहम गई, श्रास नीचे कर ली। "मुझसे संकोच करने की कोई जरूरत नहीं, बताती क्यों नहीं १ सय पताना, क्या तुम वास्तव में कोमल से प्रेम करती हो?" उसर के लिये शब्दों की कोई आवश्यकता न थी, कोमल का नाम सुनते ही श्राखों में एक ज्योति था जाना, थोंठों पर मुस्कान का दौड़ जाना, गालों पर लालिमा का चालाना, ही पर्याप्त उत्तर था, पर फिर भी विमला ने उत्तर दिया--"हाँ, माणों से भी अधिक।" "तुम-जैसी लड़की में इतना प्रेम ?" "क्यों बहिन, मैं तुम्हें जो इतना प्रेम करती हूँ।" "उस प्रेम में और इसमें महान् अन्तर है। एक बात बतायो, विमला, मान लो, तुम्हें कोई कोमल से भी अधिक धनी, स्वरूपयान, शिक्षित घर दिलाने का वायदा को, तब भी क्या तुम कोमल को ही पसन्द करोगी?" विमला को यह वाणी अति कोमल प्रतीत हुई, पर वह यह न देख पाई कि कमला की आँखों से अग्नि निकल रही है। "मैं रानी बनना भी पसन्द न करूंगी।" "तुम कोमल के प्रेम में इतनी दिवानी हो, पर क्या वह भी इसना प्रेम भरता है। यदि उसे कोई रानी मिल जाय, तो यह न चूकेगा। यह तुम्हारे। जैसा भावुक नहीं है" विमला ने अपनी दोनों बाद कमला के गले में डाल दी--"तुम मुझे चिहाना चाहती हो, चिदा तो, महिन ! मुझे सुरा नहीं लगता, बिल्कुल ही नहीं, क्योंकि मैं जानती हैं कि ये केवल तुम्हारी दिखावटी बातें हैं। हृदय से तुम यहुत खुश हो, ययोंकि तुम मुझे बहुत धादती हो । तुम्हारी इन पनावटी बातों में में नहीं माने की, अगर मैं ही अपनी यहिन का स्वभाव नहीं पहिचानेगी, सो और कौन पहिचानेगा जानती हूँ इस गऊने, हठी, क्रोधी, शरीर के मीतर कितना कोमन हुनय है!"

निराध तुम मे भारी भूल की, जो कमला को छोड़ कर विमला से प्रेम किया, और इसका परिणाम गुझे अच्छा नहीं दिखाई देता यदि हम कमजा से विवाह करसे, सो मुझे अधिक सुख होता।" पौर मला, पालिवन्या का ध्यान है! - उम कोमल का सर्वोत्तम मित्र था, अतः प्रातःकाल होते ही सर्वप्रथम यह भानन्ददायक समाचार कोमल ने उसे ही मुमाया । इसमें एक कारण भी था, और यह काम भी कोमल का पूरा हो गया । यह स्वयं कमला से यह कहना नहीं चाहता था, पर पह भी चाहता था कि कमला को समाचार मालूम पड़ जाय, यह काम उत्तम ने कर दिया। कमला सफेद गुलामों के बाग में सही हुई, एक फूल को हाथ में ले कर रोक्ष रही थी। और जब इससे अत्तम ने बताया कि कोमज और विमला का विवाह अक्टूबर में होने जा रहा है, तो वह स्तब्ध रह गई। अपने दोनों हाथों को इस तरह जोर से दाय लिया कि गुजाय का कोटा उसके कोमल हाथों में चुम गया, कुछ भी पीड़ा न हुई । सारा संसार उसको घूमता-सा नजर या रहा था। इस समय मृत्यु हो उसको सुरुवाई लग रही थी। पर या दशा अधिक देर तक न रही। शीघ्र ही उसने अपने को समान लिया. बोली- उत्तम थायू , अगर यह पात है, तो मुझे बधू को अवश्य बधाई देना चाहिये । दिमला मेरी बहिन के समान है।" और वह मिला को बधाई देने के लिये चल दी। उत्तम की श्राशाय मग की मन ही में रह गई । उसने सोचा था कि इस समय फिर अपना प्रेम व्यक्त करूंगा, कमक्षा से प्रार्थना करुगा, पर कमला ने उसे अचसर ही न दिया। विमला अपने कमरे में बैठी मविष्य की कल्पना में तीन थी कि कमला ने श्रा कर कल्पना लोक से उसे इस लोक में ला दिया। "सच बतायो, विमला ! क्या तुम कोमल से विवाह कर रही हो?"

निराश ७५ "पर पात पदी विचित्र है, मुझे नितंब तो न समझोगे !" "तुम भी कैसी बातें करती हो, कमला ! मैं तुम्हें निलंज समझेगा, क्या इतने दिनो तक साथ रह कर भी हम एक-दूसरे को समग नहीं सके, जो ऐसा कहती हो!" "तुम कहते हो कि प्रथम पण ही से तुम ने विमला को प्रेम करना शुरू कर दिया था-अगर मान लो कि विमला न पाती, सो क्या मुझे यह अधिकार मिल सकता था ? "बड़ा घमीब सवाल है।" "मैं ने तो पहिले ही कह दिया था।" मुझे यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि विमला के बाद मेरे हृदय में तुम्हारा ही स्याल है। कमला, तुम में कोई कमी नहीं है। यदि विमला को मैं ने न देसा होar, at अवश्य तुम से ही शादी करता।" जीवन अय कमला के लिये नीरस हो गया । आन्तरिक कमला चौर भारी कमला के बीच प्रति पण के संघर्ष ने जीवन को नरक के समान यना दिया । होभित, निराश, पीड़ा-मरे हृदय को वास्तविक भावनाओं को अन्दर ही रख कर ऊपर से प्रसन्न चित्त दिखाई देना-उसके लिये एक यातना हो गई। दूसरों का तो धोखा देने में सफल हो गई । पर स्वयं अपने आप को धोखा न दे सकी । अन्दर आग लगे, और बाहर उसको प्रकट न होने दे, हृदय विदीयं हो जाये, और बाहर उसका आभास तक न लगने दे-इसमें कितनी अशान्ति, कितनी पोहा, कितनी यत्रणा होती है, यह केवल वही जान सकता है, जिस पर ऐसी बीती हो! राजा राजेन्द्र प्रताप को तो कमला के व्यवहार से विश्वास हो ही गया था कि वह इस विवाह से प्रसन्न है, अतः उन्होंने सरल स्वमाव से कमला को युजा भेजा। "कमला बेदी, मेरी इच्छा विमला की शादी यहीं से करने की है।" "जैसी थापकी इच्छा।" "ौर में कोमल को एक उपहार भी देना चाहता हूँ। वह बेचारा सम- मता है कि मैं उससे नाराज हूँ।" "पिताजी ऐसा क्यों समझते हैं यह " ७४ मि एक पाको कमलाप में होता REA प्रारा, पामरे ही पास हो गया-कमीम मने जिये। मकानो माथुर गुमने मरने को विमता के धागिन से पुराते हुये कहा-"म ज्ञानगी होभासे में कोगी रहती है। पदा पार, कोमल को भी बधाई दे भाऊ, में गुना ६ जिबीमहीलाने पाने ।" और पा गोदारा गई-"ge यात और बनायो, विमला ! शादी कम की सप रे!" "माँ बापाट्या में है।" 'माक्षर सकतो का समय है।--गाने पोषा-'इतने ममम में मो ममार को आपरार हो सकती है पर सम्मा दुर्घटना बीमारी दुए यु ! समार ही परिवर्तनशीप में पदमतार-बार नहीं तो का समय है, कोमज...विमा...गमी में परियांग हो सकता है! हीरों में निमत या प्रश्ने कार में पाक मेट दी। एकाएक उसे ध्यान पाया कोमा मेयधाई देने वापर पर उससे मिलने का साहस वैसे करेगी ! मही, मही, पर मिलेगी, जो इस बात का ध्यान रखेगी कि कोमज्ञ को उसके प्रान्तरिक विचारों का पता लग जाय, पाप की पेपना नया गिरा का पता गजाया पर निराशा किरातको सक भास सप सास! यदी मोचकर उसमे मरने पर लीक किये, केशों को संपा। हम सर यम-ठन कर यह आने को तेपार हो धो कि कोमय ही उसके कमरे में भा गया। यह भरने घर जा रहा था, सोपे पिता ने भाया था। सममा योनी--"सोमब, मैं गुम्दारे ही पास मारहो मी, भाई देने । पर तुम हो पड़े घाजा, इतने दिन तक पताया भी मही!" Hararat की कोई यात नदी । मैं तो समझता था तुम समझ गई "प्रेम में दिमी का घश नहीं पता, यह अपने पापा को जाता है। मृणा की भी यही विशेषता है।' गूद तत्व की बातें मैं नहीं समझी" "जर प्रेम करने लगोगी, सो स्थर्य समम आभोगी।" कमला पुष देर चुप रहो फिर धोनी-"एक बात बताओगे, कोमल?" "प्रवश्य।' "यायदा शे" "अयश्य बताऊँगा।"

निराश ७५ "पर यात यदी विधिय है, मुझे मिली तो न समझोगे!" "तुम भी कैसी बातें करती हो, कमला ! मैं तुम्हें निलंग समभूगा, क्या इतने दिनो तक साथ रह कर भी हम एक-दूसरे को समझ नहीं सके, जो ऐसा कहती हो!" "तुम कहते हो कि प्रथम पण ही से तुम ने विमला को प्रेम करना शुरू कर दिया था-~-अगर मान लो कि विमला न पाती, तो क्या मुझे यह अधिकार मिल सकता था" "पदा आजीय मवाल है।" "मैं ने तो पदिले ही कह दिया था।" मुझे यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि विमना के बाद मेरे हृदय में तुम्हारा ही स्थान है। कमला, तुम में कोई कमी नहीं है। यदि विमला को मैं ने न देखा होता, तो अवश्य तुम से ही शादी करता।" - जीवन भय कमला के लिये मौरस हो गया। श्रान्तरिक कमला और पाहरी कमला के बीच प्रति पण के संघर्ष ने जीवन को नरक के समान पना दिया। सोभित, निराश, पीड़ा-गरे हृदय को वास्तविक भावनाओं को अन्दर ही रख कर ऊपर से प्रसन्न चित्त दिखाई देना-उसके लिये एक यातना हो गई। दूसरों का तो धोखा देने में सफल हो गई। पर स्वयं अपने प्राप को धोखान दे सकी। अन्दर भाग लगे, और बाहर उसको प्रकट न होने दे, हृदय विदीर्ण हो जाये, और बाहर उसका सामाप्त तक न लगने दे-इसमें कितनीधशान्ति, कितनी पीड़ा, कितनी यत्रग्या होती है, यह केवल वही मान सकता है, जिस पर ऐसी पीती हो! राजा राजेन्द्र प्रताप को तो कमला के व्यवहार से विश्वास हो ही गया था कि वह इस विवाह से प्रसन है, अतः उन्होंने सरल स्वभाव से कमला को खुला भेना। "कमला बेटी, मेरी इच्छा विमला की शादी यहीं से करने की है।" "जैसी श्रापकी इच्छा।" "और में कोमल को एक उपहार भी देना चाहता हूँ। वह पेचारा सम• शाराज हूँ।" समझते हैं यह " निराश और जब राजेन्द्र ने कमला से सारा कारण का मुनापा, सो कमला ने केवल हनना ही कहा-"अगर मार मुझसे पहिले दी पर लेते, तो कमी के कान येते कि भाप के विधार पूर्ण नहीं होने के। "मच्या, माया," सने हुये उन्होंने कहा-"मैं मानता हूँ कि ऐसा सोधने में मेरी ही गलती थी । पर उपहार के पारे में तुम ने नहीं बताया कि विमला को या उपहार दिया जाय " कमजा और उसके पिता में फिर इस विषय पर काफी वार्तालाप हुआ, पर राजेन्द्र को जरा भी कमक्षा के हृदय के सूफान- बवडा हा पसा न लग पाया । लेकिन कमला केहदय में अब यही विचार जोर कर रहा था कि मैं प राक इसको सहन कर सपूंगी ! मैं कैसे इसको सहन की इसी बीच में विमला भी था गई। पाते ही योनी--"कमक्षा, में वन्हें ही दे रही थी। चलो, मेरे साथ, जरा साड़ियों पसन्द कर दो।" "चलने को धनती हूँ, पर मेरी पसन्द सुम्हारे पसन्द आयेगी ?" "चलो भी, हम से न यतो " और दोनों जैसे ही कमरे में घुसी, उनकी रष्टि कोकिला पर पड़ी, जो साड़ियों, जम्परों, कामों के ढेर से अलगी हुई थीं। इनकी शाहट पाकर उन्होंने सिर उठाया, धौर कमला को देख कर, पर्वदा की भाँति उनका चेहरा शिल उठा-"तुम मा गई कमला रानी ! बड़ा ही परमा हुमा। मेरी सो जान कमला जल्दी-जली सपनी राय दे कर चल दी। विमला ने उसके पले जाने पर ज्यादा महत्व नहीं दिया । कोकिला को कुम थाभास हुमा, पर फिर भी उगको कमला के हृदय में उठती हुई घाँधी का पूर्ण मात्रा में प्राभास नही हो पाया था। पर फगना को इस समय इस घोधी का घेग समावना असा हो गया। मन में बोली-'इस समय यदि में यहाँ रही, तो अवश्य मर आऊंगी और वह बाहर निकल गई, घाग़-यगीचे, माइ-खाइ स को पार करती झरने के किनारे जा पहुँची । कोई भी मनुष्य श्रोस-पास नहीं था, परन्तु एक चिहिया शीघ्र ही टूटे दिल की हृदय विदारक पुकार से चौंक उठी। गौर वायु भी उस दुःखी भारमा के अन्दन को सहन न कर, ढोल उठा। 'मुझसे सहन नहीं होगा, अव अधिक नहीं सह सकती, नहीं, नही...नहीं सह साती ! और वह हरी हरी घास में मुख दिपा कर फूट-फूट कर रोने लगी।

निराश फिर अचानक ही उसने अपने दोनों हाथ प्रार्थना-स्वरूप ऊपर की तरफ पठाये, और कहा-'नहीं, नहीं, यह नहीं ! मैं ऐसा नहीं कर सकती, इतनी पापिन नहीं बन सकती!' पर हरी घास अपना संदेशा कहनी हो गई। या विधार उसके हृदय में हर होता ही गया, क्योंकि रोना बन्द हो गया था। यदि उसकी जगह पर कोई दूसरी सदशी होती, तो अपने माता-पिता या सखी से अवश्य सब सच बात कह देतो, और किसी दूसरी जगह दिल यहलाने के लिये चली जाती, पर कमला का ग तथा हट कर यह स्वीकार कर सकता था कि वह दूसरों से कहे-~-'जिसे मैं प्रेम करती हूँ, यह मेरी तनिक भी परवाह नहीं करता। दूसरे से विवाह करने जा रहा है ! उसने दुनिया को अपनी कम जोरी यताने की अपेक्षा दुःस तथा पीडा सहना पसन्द किया। कई बार उसके हृदय में प्रारम-हत्या के भी विचार उठे। 'यदि में मर जाऊँ, तो?'-उसने हृदय से प्रश्न किया। 'तो क्या ? थोड़े दिन लोग याद करेंगे, फिर भूल जायेंगे । तुम्हारे पिता विमला को चाहते हैं । तुम्हारे बाद उनका समस्त धन, राज्य कोमन और विमला को मिल जायगा,'-हदय ने उत्तर दिया। 'नहीं, नहीं, ऐसा करना उचित न होगा, फिर इन दोनों को सुखी देख कर मुझे नरक तक में चैन नहीं पायेगा,'–उसने कहा। याच्या यह यात्म-हत्या नहीं करेगी, फिर? इस "फिर' के उत्तर में उसके हृदय में विमला के प्रति घृणा उस्पटा हो गई । यदि वह न होती, तो कमला की दुनिया ही बदल गई होती । कोमल ने स्वयं ही स्वीकार कर लिया है कि यदि मिला न होती, तो वह अप्सीसे प्रेम करता, उसीसे विवाह करता। विमला, वास्तव में घृणा के योग्य है, और मैं उससे घृणा करती हूँ । यह...यहाँ बाई ही क्यों ? उसे तो मर जाना चाहिये। और ऐसे ही विचार उसके हृदय में बारम्बार उठने लगे। और ज्यों-ज्यों दिन बीतने लगे, उसकी घृणा वरती गई, और यह विचार होता गया। कमला अपनी पृणा को औरों के सामने तो छिपा रखने में समर्थ हो जाता, पर जय कभी विमला से अरे में बात करती, तो ये भाव अपने थाप उसके चेहरे पर व्यक्त हो जाते । विमला येचारी इन भाषों को देखती, तो सोचती कि कदाचित् उससे कोई अपराध हो गया है, जिससे कमला बहिन नाराज है। इससे घर एक दिन जब कि कमला अपने कमरे में अकेली बैठी थी, उसके पास पहुंच गई । और নিয়ায় ली-"कमला बहिन, मुझसे अनजाने में यदि कोई अपराध हो गया हो, तो मा कर दो। तुम मुझसे नाराज़ क्यों हो" "तुम से यह किसने कहा।" कमला की पाणी कठोर थी। "कहा किसी ने भी नहीं, पर शुम नारा ही सी बगी हो । समा का न बहिन" और टपटप करके प्रभु यह घने, फिर घर बन गई उन सुनों की, जिसमें परपर राक को भी पिघलाने की शक्ति थी। पर कममा का दय पत्थर से भी कठोर हो गया था। विमला रो रो कर पोखी-"हमला, लोग हमेशा यहिन की सरह रही है। तुम इसनी निर्दय पहिले तो न थी, ब कैसे हो गई। याद है, जप में गिर पड़ी थी तो तुम ने अपनी साली फाई . : यह बिमक्षा के चेहरे पर पीदा के भार देख फा, मन में खुश हो रही थी, ऊपर से बोली-“ऐसे व्यर्थ के विचार तुम्हारे लिये इस समय उचित । विमना ! झुटपन की पात धौर थी, फिर भी हम दोनों के विचारों में तर रहता ही था।" विमला ने कुछ उत्तर न दिया, और यह देख कर कि कमला को उसकी स्थिति पसन्द नहीं है, यह पुर पाप सिर नीचा किये घली भाई । पीछे मुड़ न देखा, और उसका पीछे मुड़कर न देखना अच्छा ही हुमा, क्योंकि यदि कमला की घृणा, प्रतिहिंसा या क्रोध से गरीटि देख पाती, तो अवश्य ही र भी अधिक दुखी होती। कोमल अपने कमरे में बैठा हुआ हिसाब लगा रहा था। यात तीसरी तस्यर हो गई, केवल सत्ताइस दिन इस महीने में और पन्दुइ दिन अक्टूबर कुल ४२ दिन अब उसके तथा स्वर्ग के मध्य में रह गये हैं। बोह ! कितना छा हो, यदि ४२ दिन १२ पर्यों में परिवर्तित हो जाय ! "बाबूजी, माप का रजत है," पोस्टमैन ने या कर कहा। कोमल ने खत हाकिये से ले लिया। खोल कर पढ़ा, और पढ़ते ही चेहरे चिन्ता छा गई। पिता से कुछ पहाना बना, वह बिस्ता बाँध कर पहिलो ही बड़ी से चल दिया ।...

निराश यहाँ दरवाजे पर ही राजेन्द्र मिल गये। घोले-"अच्छा हुधा जो तुम था गये कोमल ! अाज विमला की तबियत कुछ ठीक नहीं है। कल तो ज़्यादा खराब हो गई थी। वह घबरा जल्दी जाती है, अथ कोई फिक्र की बात नहीं है।" तय उनकी शाज्ञा ले कर कोमल विमला को देखने उसके कमरे में गया। कमरे के एक किनारे चारपाई पर विमला लेटी हुई थी। खिड़की से धूप की रोशनी उस पर पड़ रही थी। उसी सूर्य के प्रकाश में कोमल ने देखा कि कितना परिवर्तन हो गया है। चेहरा इतना पीला पड़ गया था कि कोमल स्तब्ध रह गया। विमला ने उसे देखा । और दूसरे ही क्षण यह चारपाई के समीप था । "विमला, तुम इतनी बीमार रही, और मुझे खबर तक नहीं !" "मैं तुम्हारी व्यर्थ की परेशानी नहीं बढ़ाना चाहती थी, और अब तो अच्छी है।" "विमला, अचानक कैसे तुम इतनी बीमार पड़ गई ?" "बीमारी का कोई कारण नहीं, हृदयेश्वर, सिर्फ भय के कारण।" "मय किसका?" "न मालूम क्यों हृदय में आशंकायें उठा करती है, भय लगता है कि मैं तुम्हें..." "पगली हो तुम विमला, तुम से मैं ने कितनी बार समझाया है कि ऐसी निमूल शाशंकाओं को ध्यान ही में मत लाया करो ! कय से बीमार हो " '"करीय एकहना हुश्रा । एक दिन शाम को अचानक जाड़ा-सा लगा, फिर शाख जलने-सी खगी, गला सूखने लगा, पर भय तो अच्छी हूँ।" पर कोमल ने महसूस किया, विमला का यदन अय-भी गर्म था, हाथ तप रहे थे, पीठ जल रहे थे। "इलाज किसका हो रहा है ?" "किसी का भी नहीं । म ने इसकी जरूरत ही नहीं समझी बाप भी परसों ही बाहर से खौटे हैं।" "किसी दाटर को दिखाना आवश्यक है। मैं जाना और मनी र वर्मा को लाता हूँ। विमला ने मना भी किया, पर यह न माना, sittart के भीतर की हायर यर्मा को रोगिणी के पास ला कर सदा कर दिया। डाक्टर धर्मा पयाति प्राप्त, अनुमयी तथा श रामर मिल भी . ।

निराश - - विमला के रोग ने उन्हें घर में डाल दिया । कोकिला देवी पास में सही भी। उनसे उन्होंने पूछना पार कर दिया--"क्या आप के प्रान्दान मे किसी को टी० बी० हुई थी ?" "नहीं, मेरी याद में तो किसी को नहीं हुई थी।" दादर ने कुछ देर विचार किया, फिर पूछा-"रोगियी को कुछ सदमा तो नहीं पहुँचा है, कोई ऐसी बात तो नहीं हुई है, जिससे इसे दुःख हुआ हो?" "कोई भी नहीं। शीघ्र ही इसकी शादी होने घानी है।" "शादी इसकी मार्ग के तिला तो नहीं हो रही है ?" साक्टर धर्मा पुष पाश्चर्य में पड़ गये। बाहर मी पर शोमल से योले "लपण तो थी ही के से हैं। पर यमो कोई प्रास बीमारी नहीं पड़ी। एक टा सा टानिक, और चाराम देना कानी होगा। घराने की कोई बात नही शीघ्र ही हो जायगो।" "धन्यवाद, हास्टर साहब ! सच यात तो यह है कि इसके लिये में बहुत हर गया था। म मालूम क्यों इसके दिमाग में यह विचार जम गया है कि यह बचेगी नहीं। "साज्य है ! ऐसा विचार क्यों और, पार घबराये नहीं । किसी को शाप भेज दें, मैं दवा दे दूंगा।" टाक्टर साहय चले गये। कोमल उनको पहुँचा कर वापस आया, वो उसको कमला दिखाई दी। "कोमल बायू ! भाप कब धाये "-प्रति प्रसा हो कर उसने पूछा। "धाज ही याया। चाचाजी ने विमला की बीमारी का हाल लिया था। बेचारी कामी बीमार।" कमला के चेहरे पर एक धीमी-सी घृणा को रेखा दी गई। "पाप को चाचाजी ने व्यर्थ में परेशान किया। विमला इतनी धीमार तो "पर कमबा, वह बदल कितनी गई, कितनी कमजोर हो गई है." "प्रमियों की आँखों में कुछ-न-कुछ विचित्रता अवश्य रहती है, क्या थभी डाक्टर भाये थे?" "हा, वह पूछ रहे थे कि विमजा के वंशज में किसी को दी तो नहीं हुई थी।" "मुझको क्या पता, और फिर यदि हो भी तो कोई बतायेगा क्यों ?" - निराश । "कमला, तुम विमला का पूरा ध्यान रखोगी।" "यह भी कोई कहने की बात है, कोमन, यह तो मेरा फ्रज है!"... डाक्टर को दवा था गई । दवा ने असर दिखाया, विमला की दशा में परिवर्तन हुधा। परन्तु उसी रात कोमल को एक और धाश्चर्य हुमा । उसको नींद नहीं पा रही थी । यह धारपाई पर लेटा करवटें बदल रहा था । रात केसे कटे । यही प्रश्न था। उसने सोचा कि कुछ पढ़े ही, पर किताव जो रास्ते में पढ़ता आया था, यह तो उसी कमरे में थी, जिसमें और किताबें रखी हुई थीं। सोचा-चलो, उसी को ला कर पढ़े। और यह किताय लेने पल दिया। कमरे में रोशनी जलती देख कर उसे अाश्चर्य हुा । उसे आशंका हुई कि कहीं चोर न हो, और वह दये पैरों आगे पढ़ा। कमरे के दरवाजे से छान बगा कर सुनने लगा। कमरे में सन्नाटा था । नहीं, चोर नहीं हो सकता। कदाचित् कोई लैम्प भूल मे जलता छोद गया है। फिर भी सावधानी से उसने धार से दरवाजा खोला। घड़ी ने उन-टन करके दो प्रजाये । मेज पर भुका हुथा कोई पढ़ रहा था। कोमल के पैरों की आहट पाकर सिर उठाया । कोमल धकित रह गया । यह कमला थी! "थरे कमला, तुम यहाँ इस समय क्या कर रही हो?" कमला का चेहरा सफेद हो गया । जो किताव यह पद रहो यी ४से छिपा "नींद नहीं पा रही थी, इससे सोधा कुछ पद ही लें।" "कौन-सी किताब है" "एक किताव है," उसने उस किताय को और भी छिपाते हुये कहा- "ऐसी ही एक किताब है, पर कोमल वायू, किसी से कहियेगा नहीं।" लाइयरी में सभी प्रकार की पुस्तकें थीं । कोमल ने सोचा कि कोई उपन्यास होगा।"नहीं कहूँगा, विश्वास करो।" पर उसे यह ताउजुप अवश्य हो रहा था कि कमला इतनी घबराई हुई-सी क्यों है ? शायद मेम का उपन्यास है, या कोक-शास्त्र है, तभी तो यह उसे दिखाने में घबरा रही है। और जब कमला चली गई, तो वह मुस्कराया। परन्तु यदि वह उस पुस्तक का नाम पढ़ लेता तो थवश्य हान मुस्कराता। कोमल जा कर अपने कमरे में लेट गया, और पुस्तक पढ्ने बगा। नि० लिया।

निराश धार बने उमको भ्रममा कि कोई दीवाहर बज रहा है। पर उसने केवल इसे अपना प्रमही मममा । मात काम कोमल, ममता तथा राजेन्द्र नाय पा रहे थे कि कोहिला देवी घबराई र पी भाकर चीनी-विमला की हाजम एम सराय हो गई है।" गाद भी पाये । उनको विमला से यहा स्नेह था। "क्या बात' माना या अधिक है, गया जा रहा है, फलेने पर अमन है, मूर्या भाया पाता है।" कोसश चाय का वैसे हा छोड़ कर दाटर को बुलाने प्याजा दोहा। डाकर यो मा विमला को अवस्था देख कर पपरा गरे। कोमल को पकान्त में ले जाकर योले-"क्या पाप हो के साथ इनकी शादी होने वाली 41 में एक मास कारण से यह पूछ रहा हूँ।" 'रागिणा की अवस्था ज्यादा सराय है, और ऐसी कि मैं किसी चौर भी ढाक्टर की राय सेना जरूरी समझता हूँ।" कोमल के चेहरे का रग९ गया। "तो डाकार साइव " "जीवा और मरण तो परमात्मा के हाथ में है, पर इस समय अवस्था खतरनाक है । इसासे में यह चाहता है कि भाप सार द्वारा लाटर कौराक्ष किशोर को बुलवा लें। मुझे तो इस केस ने आश्चर्य में डाल दिया है। प्रय तक ऐसा केस में ने देखा ही नहीं।" कोमल चुप रहा। हार ने कहना जारी रखा-"अगर थाप का जगह में होता, तो तार भजने में देरी न करता।" और कोमल चला गया सार देने । तार घर लगभग तीन माल दूर था। जय कोमल तार घर पर पहुँचा, वो वह धौर घोड़ा दोनों ही पसाने स ताथे। विमजा की अवस्था ने राजेन्द्र को बहुत अधिक चिन्तित कर दिया। घर धेचन हो गये । कोकिला देवी माध्यम हो गई थी।

मिराश दूसरे दिन प्रातःकास मौ पने दास्टर कौशज किशोर पा गये । सार धर्मा स्टेशन पर उनको लेने गये। रास्ते हा में हार कौशल किशोर ने उनसे रोगिता की भवस्या के बारे में पूमापामा उत्तर दार वर्मा ने दिया उससे उन्हें वास्नय में बाधयं दृमा । साधर वर्मा ने कहा-"रोगियों की अवस्था प्राप स्वयं ही देख कर अनुमान कर लेंगे । पर मेरी एक प्रार्थना है, माप उसकी परीक्षा करते समय मेरी राय मन सामियेगा, स्वयं अपना गियर्याय भागियेगा। फिर बाद में हम घोर पाप-अपना-अपना निर्णय मिना लेंगे।" टास्टर कौशल किशोर ने टाटर वर्मा की प्रार्थना को स्वीकृत कर लिया और वह पाते ही सीधे रोगिणी को देयने गये । प्रश्न पर प्रश्न उन्होंने पूऐ, और उत्तर पर उत्तर मिझे और उनका घेरा गामार हो गया। परीक्षा समाप्त कर वह उस कमरे में गये, जो उनके लिये राजेन्द्र ने माजी करया राया था। दार वर्मा का भी कमरा पास ही में था। वह भी बाहर कौशल किशोर के कमरे में पहुँच गये। "डाक्टर धर्मा ! जरा दरवाजा बन्द कर दीजिये, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि हम दोनों की यातें कोई घऔर मुने।" साक्टर वर्मा ने उठ कर दरवाजा घन कर दिया। "डाक्टर धर्मा, मैं ने रोगिणी की परीक्षा की...' "ऐसे नहीं साक्टर किशोर, हम लोग अपना-अपना निर्णय एक कागा पर लिख लें, फिर मिलान करें।" दोनों ने दो कागजों पर अपने अपने निर्णय लिख लिये, तथा एक दूसरे से कागज बदल लिये । दोनों कागजों पर एक ही से शब्द थे--'रोगिणी की ऐसी श्रयस्था जहर को न्यून माया दी जाने के कारण हुई है। दोनों डाक्टरों ने इसे पदा। दोनों की मुद्रा गम्भीर हो गई। "यह सो भयंकर पात है। किसने ऐसा किया किसी घटनावश तो जहर रोगियों के पेट में पहुँचा नहीं, किसी ने जान-यूझ कर दिया है, कौन हो सकता है डाक्टर पमो ?" "मैं इन्हीं विचारों में पड़ा हुधा हूँ। मैं पिछले कई धपी से इस परियार का पारिधारिक साक्टर है, और मुझे तो रोगियो सर्प-प्रिय दिखाई दी है, ढाक्टर किशोर": " - ८४ निराश "कोई नौकर आदि ! क्योंकि एक केस ऐसा ही में देख चुका है, जिसमें नौकर ने मालिक को जहर दिया था।" "यहाँ तो यह भी सन्देह निर्मूल है। प्रत्येक नौकर विमला से स्नेह करता है।" "फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं कि इसको जहर दिया गया है। और थह काम भी किसी ऐसे का है, जो इस जहर को माया से भिन्न है, क्योंकि उसने जहा ऐसी न्यून मात्रा में दिया है कि यह खद्दकी बीमार सो अधिक हो जाय, पर तत्काल मृत्युन हो।" "यह स्वस्थ हो सकती है या नहीं?" "दोनों थाते सम्म , डाटर वर्मा। इस मात्रा की एक या दो खुराक हानि नहीं पहुँचावेगी, लेकिन इसी मात्रा की चार पुरा मृत्यु को निश्चित कर देगी, न जिस तरह हो हमें उसका पता लगाना है। इस शहर को और भी अधिक रोगिणी के शरीर में पहुंचने से रोकना है। इसमें कानो सतर्कता की धावश्यकता है। हम दोनों का सन्देश किसी पर भी प्रगट नहीं होना चाहिये, यदि हो गया, तो फिर अपराधी सतर्क हो जायेगा।" "में था के प्रस्ताव से सहमत हूँ।" "क्यों डाक्टर यर्मा, श्राप तो यहाँ के पारिवारिक चिकित्सक है। इस परिवार में किसको अपना साथी बनाना चाहिये १ बिना किसी को बनाये काम नहीं चलेगा।" "राजा राजेन्द्र प्रताप रोगिणी के कोई सम्बन्धी भी नहीं है, अतः उनको इस रहस्य से मिज्ञ करना घेकार है। रोगियी की माँ, बहमदी जल्दी हर जाने चोली खो, फिर मुझे भय है कि वह इसे गुप्त मी रख सकेंगी या नहीं। राजेन्द्र की पुत्री कमजारानी के बारे में भी मेरी यही राय है। बाकी बचते है केवल कोमल । यही उपयुक्त भी होंगे, क्योंकि यही रोगियी मावी- पति हैं।" "यार का कहना ठीक है। यही व्यक्ति हम लोगों के लिये उपयुक्त रहेगा। डाक्टर बर्मा, क्या श्राप उनको तुना लाने का कष्ट करेंगे ?" कुछ क्षण उपरान्त जन कोमल डाक्टर वर्मा के साय उस कमरे में घुसा, और जब हास्टर कौशल किशोर का गम्भीर चेहरा देखा, तो वह सहम गया । और जब दार वर्मा ने दरवाजा बन्द कर ताला लगा दिया, तो वह धरित हो गया। और जब डाक्टर कौशल किशोर ने कहा--"कोमन पावू, प्रतिज्ञा निराश ८५ क्या कीजिये कि जो कुछ हम लोग कहेंगे, ससे श्राप किसोले न कहेंगे।" तर तो उसके पाश्चर्य का पारावार न रहा। बास्टर वर्मा ने कहा -"देखिये, कोमल बाबू, पात ऐसी ही है, जिसे गुप्त ही रखने में हम लोग सफल हो सकते हैं। और हमारी सफलता या अस. फलता पर ही विमजा का जीवन और मरण निर्भर है।" कोमल से स्वीकृति पाने पर डाक्टर किशोर योले-"कोमल पावू, श्राप बता सकेंगे कि विमला का शा कौन है ?" "विमला का शत्रु ! कोई भी नहीं है डाक्टर साहब!" "उसकी मृत्यु से किसका लाम हो सकता है ?" "लाभ किसीका नहीं, परन् हानि ही होगी। मेरा सर्वस्व छिन जायगा। कमलारानी की बहन छिन जायेगी, कोकिला देवी की पुत्री छिन जायेगी। पर ऐसे सवाल आप क्यों पूछ रहे हैं डाक्टर साहय " "शान्त रहिये, अभी पता लग जायेगा । यस, एक सवाल और । क्या रोगिणी थपने जीवन से सुखी थी?" "महुत-बहुत ! चौर इस विवाद से हो और मी।" "हा है। आप यह जानना चाहते हैं कि क्यों में यह प्रश्न पूछ रहा था। बात यह थी कि में यह जानना चाहता था कि कहीं हम लोगों ने निष्कर्ष पर पहुँचने में ग़लती तो नहीं की। हम लोग इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि विमला देवी को जहर दिया जा रहा है। इतनी कम मात्रा में कि जान धीरे-धीरे निकले।" कोमल स्तब्ध रह गया-"विमला को जहर दिया जा रहा है। नहीं, नहीं, ऐमा नहीं हो सकता!" "यह सच है । मैं शपथ खा कर कहता हूँ कि यह सम है।" "क्या यह सम्मव नहीं हो सकता कि धाप लोगों ने निष्कर्ष पर पहुँचने में गलती की हो" "पाखती मनुष्य से हुधा करती है, और हम लोग भी मनुष्य हैं । पर इसमें गलती नहीं हुई।" डाक्टर वर्मा ने कहा-"मुझे अपने पर पूर्ण विश्वास नहीं हुआ था इसीमे तुम से डाक्टर साहब को बुलाने को कहा था, और इनकी भी यही राय है।" "कोमल बाबू, अधिक चिन्ता की कोई यात नहीं। परमात्मा को कम से श्रमी विमला की दशा काबू के बाहर नहीं हुई है। पर हम को तो उसे पदना निराश "कोई नौकर पादि। क्योंकि एक ऐस ऐसा हो में देख सुधार, निमम मौकर ने मालिक को बाहर दिया था।" "यहाँ तो यह भी सन्देश लिख है। प्रत्येक मर बिममा से स्नेह करता है।" "फिर भी इसमें कोई मन्देद नहीं कि इसको हर दिया गया है। और या काम भी किसी ऐसे का है, जो इस नहर की मात्रा में मिल पोंकि उसने जहर पी म्यून मात्रा में दिहिया सहकी बीमार मोसधि हो आय, पर सकाल मृत्यु न हो।" "परस्परप हो सकती है या नहीं?" "दोनों या सम्भय , दाटर पो म माया को एक या दो पुरा हानि नहीं पहुँचायेगी, लेकिन इसी मात्रा को चार ,मुराके यु को निश्चित कर देगा, न सिमरा हो में उसका पता लगाना है। हम दर को चौर भी अधिक रोगिणी के शरीर में पहुंचने से रोना है। इसमें काही सतता की भावश्यकता है। हम दोनों का सन्देश किसी पर भी प्राट नहीं होना चाहिये, यदि हो गया, तो पिर अपराधी सतर्क हो जायेगा।" "मैं पाप के प्रस्ताव से महमत हूँ।" "वों साक्टर धर्मा, श्राप तो यहाँ के पारिवारिक चिकित्सक है। इस परिवार में किसको अपना साथी बनाना चाहिये । बिना किसी को पनाये काम नहीं चलेगा।" "राजा राजेन्द्र प्रताप रोगिणी के कोई सम्बन्धी भी नहीं है, प्रत बसको इस रहस्य से मिल करना बेकार है। रोगिणी की मा, पदवी अन्दी दराने थाली स्त्री है, फिर मुझे भय है कि यह इसे गुम भी रख सकेंगी या नहीं। राजेन्द की पुत्री कमलारानी के बारे में भी मेरी थी राय है। बाकी पचते केवल कोमल । यही उपयुक्त भी होंगे, क्योंकि यही रोगियों के यात्री- पति हैं।" "श्राप का बना ठीक है। यही व्यक्ति हम लोगों के लिये उपयुक्त रहेगा। डापटर वर्मा, क्या श्रार उनको धुला खाने का कष्ट करेंगे " पुछ सय उपरान्त जय कोमन दाटर वर्मा के साथ उस कमरे में घुसा, और जब डाक्टर कौराल शिमोर का गरमीर चेहरा देखा, तो यह महम गया । और जय दायर वर्मा ने दरवाजा बन्द कर ताला लगा दिया, तो वह चक्ति हो गया। और जप दाक्टर कौशल किशोर ने कहा-"कोमल दायू, प्रतिज्ञा निराश ८५ कीजिये कि जो-कुछ हम लोग कहेंगे, उसे श्राप किसीसे न कहेंगे।" तब तो उसके श्राश्चर्य का पारावार न रहा। साक्टर वर्मा ने कहा -"देखिये, कोमल पावू, बात ऐसी ही है, जिसे गुप्त ही रखने में हम लोग सफल हो सकते हैं। और हमारी सफलता या अस- फलता पर ही विमला का जीवन और मरण निर्भर है।" कोमल से स्वीकृति पाने पर डाक्टर किशोर योले-“कोमल धावू , क्या आप बता सकेंगे कि विमला का शग्नु कौन है?" "विमला का शत्रु ! कोई भी नहीं है दास्टर साहब !" "उसकी मृत्यु से किसका लाभ हो सकता है ?" "लाम किसीका नहीं, परन् हानि ही होगी। मेरा सर्वस्व छिन जायगा। कमलारानी की बहन छिन जायेगी, कोकिला देवी की पुनी छिन जायेगी । पर ऐसे सवाल पाप क्यों पूछ रहे हैं डाक्टर साहब ?" "शान्त रहिये, अभी पता लग जायेगा । यस, एक सवाल और । क्या रोगियी अपने जीवन से सुखी थी ?" "बहुत-बहुत ! और इस विवाह से तो और भी।" "ठीक है। आप यह जानना चाहते हैं कि क्यों में यह प्रश्न पूछ रहा था। बात यह थी कि मैं यह जानना चाहता था कि कहीं हम लोगों ने निष्कर्ष पर पहुँचने में गलती तो नहीं की हम लोग इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि विमला देवी को जहर दिया जा रहा है। इतनी कम मात्रा में कि जान धीरे-धीरे निकले।" कोमल स्तब्ध रह गया-"विमला को जहर दिया जा रहा है ! नहीं, नहीं, ऐसा नहीं हो सकता!" "यह सच है । मैं शपथ खा कर कहता हूँ कि यह सम है।" "क्या यह सम्मव नहीं हो सकता कि आप लोगों ने निष्कर्ष पर पहुँचने में गलती की हो" "गाखती मनुष्य हुआ करती है, और हम लोग भी मनुष्य हैं । पर इसमें गलती नहीं हुई।" वाक्टर वर्मा ने कहा-"मुझे अपने पर पूर्ण विश्वास नहीं हुआ था इससि सुम से डाक्टर साहब को बुलाने को कहा था, और इनकी भी यही राय है।" अधिक चिन्ता की कोई पात नहीं। परमात्मा को हरा से अभी विमला की दशा काबू के बाहर नहीं हुई है। पर हम को वो उसे पदना "कोमल बा, वाकागर। निराश है, जो जहर रहा है। और इसी में श्राप की सहायता की यावश्यकता है। पर एक बात का ध्यान रसियेगा, कानो-कान दिभोको हमारे सन्देह का पता न लगे, क्योंकि यदि पत्ता लग गया, तो वह जहर देना सन्द कर देगा-विमजा अच्छी हो जायेगी। पर कर सक? यदि फिर यह व्यक्ति ऐसा करे, तो ?" कोमल के मस्तिष्क में डाक्टर की बातें जमती जा रही थी। एक गलती कर सकता है, पर दो नहीं । "मैं पूरी सहायता फरूंगा," उसने कहा। "तो सब से प्रथम हमको विमना के लिये व्यवस्था करनी पड़ेगी। क्या याप कोई पुसा व्यक्ति मता सकते हैं, जो रोगिणी के पास रह सके, दवा दे, पथ्य द । मैं कोई नौकर या नर्स नहीं चाहता।" "दो ही हो सस्ते हैं-एक विमला की मा, दूसरी उसकी बहिन ।" "A ही ठीक रहेगी। यह अवस्था में भी बड़ी हैं। पर ध्यान रहे उनसे भी यह इस्य गुप्त रखा जाय । सियों को मैं श्रद्धा तथा भादर की दृष्टि से देखता हूँ, पर किसी यात को गुप्त रखने के लिये मुझे उन पर तनिक भी विश्वास नहीं । मैं उनको यह विश्वास दिला दूंगा कि रोगिणी की खबरदारी रखना यति धावश्यक है। पथ्य भी जो साक्टर वर्मा समय समय पर प्रतायें, यही दिया जाय । और एक बात का ध्यान रखा जाय कि रोगियो को धाराम की यन्त आवश्यकता, श्रतः हम दोनों डाक्टरों तथा उसकी मौके अतिरिम कोई भी कमरे में न जाय । श्राप का काम कोमन यायू, उस जहर देने वाले का पता लगाना है।" 'मैं दिन-रात चौकसी करूंगा, डाक्टर साहब, जब तक उसे पकान लूँगा, चैन न लूंगा।" कार्य-क्रम के अनुसार वाक्टर वर्मा रोगिणी के पास चले गये। दो घंटे बाद ढाकार किशोर को जाना था, और उसके दो घन्टे बाद कोकिला देवी को। कोगन की अवस्था इस समय विचित्र थी। उसके मस्तिष्क में नाना प्रकार के विचार उठ रहे थे-'कौम विमला के प्राणों का गाहक है ! यही प्रश्न भार बार उसके हृदय में उठ रहा था। कौन हो सकता है कोई नहीं हो सकता। सभी तो मिला से स्नेह करते हैं, सभी दास दासी उरा पर प्राण न्योहायर करने को तैयार रहते हैं। यदि कोई उसके प्राणों का गाहक होगा, तो क्यों है और वह इस प्रश्न का समुचित उत्तर न सोज पाता था। डाक्टरों की निराश राय है, कोई अवश्य विमला को जहर दे रहा है। एक बार यदि वह उसे पा जाय, केवल एक यार....' 'उत्तेजित मस्तिष्क को ठंडा करने के दो ही उपाय हैं, एकान्त स्थान तथा धूम्रपान । कोमल ने भी यही किया। एक सिगरेट जला कर याा में निकल गया । वह एकान्त स्थान चाहता था, पर नियति को उसको अकेले रहने देना स्वीकार नया। कमलारानी ने उसे अपने कमरे की खिड़की से देख लिया था और वह कोमल के पास चला दी । चलते समय कमला ने एक पुस्तक भी ले ली, क्योंकि वह यह दिखाना चाहती थी कि वह उसीसे मिलने आई है। कमला के हृदय में कोमल के प्रति प्रेम पद रहा था, पर साथ-ही-साय ग भी । प्रेम के कारण तो वह मिलने चली, गर्व के कारण पुस्तक ले ली, और जब कोमल को देखा, तो चेहरे पर आश्चर्य के चिह्न प्रकट कर लिये। सोली-"मैं तो समझती थी कि श्राप तकिये में मुँह छिपाये सो रहे दोंगे!" कोमल को कमला की न तो वाणी ही भाई, न उसकी मुस्कान ही। वह बोला--"कमला विमजा की अवस्था चिन्ताजनक है।" "इन दायटरों ने तुम्हें हरा दिया है व्यर्थ में । मुझे तो साक्टरों पर निक भी विश्वास नहीं । एक होता तो खैर, पर यहाँ तो दो-दो हैं ! कोमल, मेरा सो विश्वास यह है कि यदि विमजा को प्रकृति के भरोसे छोड़ दिया जाता, तो वह अवश्य अच्छी हो जाती।" "कमला, विमला मृत्यु के मुस में है!" "नहीं, मुझे विश्वास नहीं कि विमला मृत्यु के मुख में है । और यदि यह मर गई, तो वास्तव में यह अत्यन्त हृदय विदारक घटना होगी। पर मनुष्य का इसमें क्या चारा-हानि-लाम, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ !" "यह सभी जानते हैं, पर सभी के हृदय में पीड़ा होती है।" "पर कुछ सान्त्वना भी तो अवश्य होती है।" कोमल चुप रहा। कमला ने फिर कहा-"यदि मैं मर जाऊँ, तो कितना अच्छा हो !" "विमला इतनी अच्छी है, और मैं इतनी सराय ! विमला यहाँ भी देवी है, और वहाँ भी स्वर्ग में देवी ही रहेगी, पर मुझे तो नर्क मैं सड़ना होगा!" "क्यों?"

८. निराश - कैमी ग्य की बात करती हो । विमला के लिये तो शो कहा ठीक है, पर तुम ने अपने लिये जो कहा, वह लत है।" "मैं ठीक ही कह रही हूँ।मा को कभी भी विमला को झिकना तक मी नही पदा, और गुझे मार तक सानी पड़ी।" कोमल को भायें सजल हो पाई। "कमला, तुम किसी ऐसे को जानती हो, जो विमला से पृणा करताको "विमला से पृणा!" कमला ने शान्त माय से उत्तर दिया-"कोई क्यों करेगा?" हो तो में भी सस्य सोचता हूँ, पर समम नहीं पाता हूँ।" और फिर अचानक उसके ज्यान में धाया कि वह गुप्त रहस्य को प्रकट करने के कितने निकट पहुँच गया है, अतः उसने यात वदश दी--में यही सोच रहा था कि ससार में पदि कोई ऐसा है, जिसे सप चाहते है, तो वह विमला है। "मेरा भी यही विचार है। मैं उसको यचपन से जानती हूँ। कमी भी उसने अपनी शुमान से अपशब्द नहीं निकाला। क्रोध करना तो यह जानती ही नहीं, पर तुम ने ऐसा अजीव सवाल पर्यों पूछा?" "मैं उसके बारे में विचार कर रहा था।" कोमल में बहका यहकामा उत्तर दिया-"अप वह पाई, तो इतनी स्वस्य तथा सुन्दर थी। किसीको स्वम में भी विचार न था कि वह इतनी जल्दी मर जायगी ! उसकी दशा में कितना परिवर्तन हो गया है ! मेरी सारी प्रसनता विमक्षा में केन्द्रित है। कमहा! तुम मेरी दशा का अनुभव भी नहीं कर सकोगी । जय तुम भी किसी से प्रेम करने अगोगी सब समझोगी यह दु.ख जो मुझे इस समय एक तण के लिये कमला की प्रा उस पर केन्द्रित हो गई। यदि उस ष्टि को कोमज देखता, तो पता चन जाता कि कमला किती को प्रेम करती है या नहीं। पर वह तो एकटक विमला के कमरे की खिड़की की तरफ देख रहा था। विमला का ध्यान भाते ही उसके सजल नयनों से अश्रुधार बह निकली। कमला ने उसके कधे पर हाथ रख दिया--"कोमल, इसने कायर न बनो, इतने उदास न होयो, मुझसे तुम्हारा दुख नहीं देखा जाता !" कोमल इतना दुखी था कि इस कोमल वाणी ने उसके हृदय में स्थान कर लिया।

निराश "कमला मुझमे विमला का वियोग न सहा आयगा। यदि वह मर गई, वो क्या होगा ?" कमला के हृदय में प्रेम तथा घृणा में संघर्ष हो रहा था। उस संघर्ष के कुछ चिह चेहरे पर भी दृष्टिगोचर हुये । पर केवल कुछ क्षणों के लिये । "तो क्या तुम्हें विमला इतनी प्यारी है" “हा, यदि यह मर गई, तो संसार मेरे लिये एक मरुभूमि के समान हो जायेगा । चाह, कमला ! विमला की मृत्यु का विचार पाते हो मैं कातर हो जाता हूँ, पागल सा हो जाता हूँ।" उसकी समझ में नहीं पाया कि क्यों कमला एकाएक माने को तैयार हो गई, और फिर क्यों रुक गई। "कोमल, मान लो कि यह हो जाय, जो होना न चाहिये, तब भी तुम्हें इतना निराश, इतना कातर म होना चाहिये । यह संसार है, याद में कदाचित सुम्हें कोई ऐसी मिल जाय, जो तुम्हें विमला से भी ज्यादा प्रेम करने लगे और सुम उसको।" "नहीं, नहीं, कमला, यह सम्भव नहीं । संसार भर की सुन्दरता, गुण, सादगी, मेरे लिये दूसरी विमला नहीं बना सकती ! और मुझे आये कितनी देर हो गई ! मुझे चलना चाहिये, पमा करना कमला!" कोमल चला गया कमला को अकेली छोड़ कर । उसके जाते ही कमना अपने को न संभाल सकी । घास पर गिर कर फूट-फूट कर रोने लगी-"बाद, मेरा प्रेम, घायल, व्यथित, तिरस्कृत प्रेम ! वह कमी भी मुमसे प्रेम नहीं करेगा, और एक मैं हूँ कि उसके लिये अपना जीवन तक उत्सर्ग करने को तैयार हूँ ! शाह, कोमल ! तुम कितने कठोर हो, कितने निर्दय हो !"...रोते-रोते हिचकियों बंध गई। फिर हिचकियाँ बन्द हो गई और दूसरे भाव हृदय में उठने लगे। अमावस्या की रात्रि थी । आकाश में बादल छाये हुये थे। घोर अन्धकार था। सारे राजमहल में समादा था। यदि सघाटे को तोड़ती थी, तो केवल घन्टे- घन्टे भर याद घड़ी। सभी सो रहे थे, चारों तरफ निस्तब्धता का राज्य था। कोमल अपनी धारपाई पर पड़ा घन्टे की नावाज पर धावाज गिन रहा था- भ्यारह, बारह, एक, दो ! उसकी आँखों से नींद उड़ गई थी। उसका हृदय तो निराश विमला के पास था, सारे विचार उसी पर केन्द्रित थे। विमला मुख में है, यही विचार से उद्विग्न क्येि था। उसे भ्रम हुथा कि कोई दये पैरों बड़ी सावधानी से या रहा है। पर उसने उसवल अपना मम ममम कर टाल दिया। एकाएक उसके मस्तिष्क में बिजली सी कौंधी-जहर देने वाला कहीं न हो" और वह अपने भ्रम को मिलने के लिये चारपाई से रठा । अपात सावधानी से दरवाजा खोला, और बाहर बरामदे में भाया । और उसे दूर पर बरामदे पर बिने हुये पर्श के ऊपर कोई छाया-मूति जाती-सी दिखाई पड़ी। यह भा चुपचाप उसके पीछे लग गया। छाया मूर्ति दबे पैरोजीने से नीचे उतरी और विमला के कमरे की तरफ चली । कोमल ने भी उसीका अनुसरण किया । विमला के कमरे के दरवाजे पर भार वह मूत्ति रुक गई । कोमल भी एक गया । उसका उत्तेजित हृश्य और भी तेजी से धड़कने लगा। बड़ी ही सावधानी स, धीरे से दरवाजा खुना, और वह छाया-मूर्ति अन्दर प्रविष्ट हुई। दरवाजा खुला रह गया था । कोमल भी था कर चुपचाप पर्दे की श्रा में छिप गया, जिससे वह उस मूति पर नजर रख सके। बिमला चारपाई पर पदी सो रह थी। एक किनारे एक छोटी सी भे पर दवाई की शीशी तथा पथ्य की वस्तुयें रखी थी, तया उसी पर एक शीशे का लेप भी धुंधला सा प्रकाश दे रहा था। कोकिला देवी की चारपाई माली थी। कमरे के यात्री भाग में अंधेरा था, यह सब कोमल ने एक ही दृष्टि में देख लिया। उस मूर्ति ने एक बार इधर उधर देखा, फिर विमधा के समीप गई, फिर इधर उधर देखा, नया मुक कर विमला के कपोलों पर एक हल्का-सा चुम्बन शकित कर दिया। विमला बेचारी देहोशी को नींद सो रही थी, उसे क्या पता कि कोई अपना प्रेम प्रदर्शित कर रहा है कि यह मूर्ति एकटक उसको तर देसती रही, और फिर उस मेज़ की हरक बदी, जिस पर की दवा की शीशीरखो यो । लैम्प का धुंधला-सा प्रकाश उस पर पड़ा । कोमल ने देखा कि सिर से पैर तक ढका हुधा है, केवल दो छेदों मे दो पाखें चमक रही है। उस मूर्ति ने दवा का शीशी उठा बी, और अपने कपड़ों में से एक छोटी सी शीशी निकाली। कोमल ने स्पष्ट देखा कि उसने दवा वाली शीशी का कार्क घोला, तथा उम छोटी शीशी का भी । शीशी फिर रस दी गई। दौटी शोशी भी यन्द काली गई । एक सण यह मूत्ति खड़ी सोचती रही, फिर विमला की सर पड़ी। पण तक उसे निहारती रही, पर मेज को सरफ बढ़ी, धौर इस बार उस निराश ११ छोटी शीशी में से उसने बूंद-बूंद कर के कुछ दया शीशी में डालना शुरू किया। दवा की शीशी को हिला कर उसने मेज पर रख दिया, और वह छोटी शीशी हाथ में ही रही। एकाएक शेर की तरह तदप कर कोमल फूदा । अंधेरे में उसके पैरों से किमीको ठोकर भी लगी, पर उसने उसकी परवाह न करके उस मूर्ति का यह हाथ एक हाथ से जा पकडा, जिसमें शीशी थी और दूसरे हाथ से उसका गला 1 हडबड़ा कर मूर्ति पीछे हटी । मेज को कुछ धक्का बगा। लैम्प जमीन पर गिर कर चकनाचूर हो गया। कमरे में अंधेरा छा गया। कोमल के पैरों से जिसे ठोकर लगी थी, पर कोकिला देवी थीं। येचारी विमला की धारपाई के पास बैठी बैठी थक कर निद्रा के वशीभूत हो जमीन पर लुढ़क गई थी । जमीन पर अँधेरा था ही, उसीसे कोमल उन्हें न देख सका था । ठोकर से तो वह घबरा कर जग ही गई थी, पर लेम्प के गिरने से और भी घयराइट द गई । 'हो न हो चोर है, क्योंकि सोते समय में किवा बन्द नहीं कर पाई थी। अवश्य कोई चोर घुसा होगा, इस कमरे को खुला पाकर इसी में घुस आया'-इतने विचार बिजली की भाँति एक साथ उनके मस्तिष्क दौड़ गये, और वह उसी घबराहट में चिल्जा उड़ी-"धोर-चोर !" विमला के अगल-अगज दाटर कौशल किशोर तथा राजा राजेन्द्र के कमरे थे। सौभाग्यवश दोनों ही जग रहे थे, और दोनों के ही विचारों में विमनायी। कोकिला देवी की अावाज दोनों ही ने सुनी, और दोनों शीघ्रता से कमरे में घुस पाये । दोनों ही के टार्च की रोशनी कमरे में पड़ने लगी। "चाचाजी, चोर नहीं है," कोमल उत्तेजित स्पर में योला । राजेन्द्र की दार्च की रोशनी उस पर पड़ी, फिर उस मूर्ति पर, जिसके मुँह पर से थावरण ६४ गया था। "कौन, कमला ! यहाँ क्यों ? कोमल क्या बात है-" राजेन्द्र ने पूछा। कोमल ने उनको कुछ भी उत्तर न दिया । "डाक्टर साहय, इसके हाथ से इस काशी को ले लीजिये, और बतलाइये कि क्या है।" दायटर किशोर ने शीशी ले ली। "यताइये द्वाटर साहब, क्या है" श्रीराश ने दस शहर का नाम लिया। यज्ञान से अज्ञान पुरस भी उसने को जानता है कि यह प्राणघातक है। "पर इस सब के क्या माने हैं कोमल ! तुम यहाँ क्यों हो कमला ! सुम निराश क्या कर रही हो। कोमज तुम ने क्यों कमबा का हाय इस तरह से पर रखा है" विमला इस शोर-गुल से अरमान जग पड़ी। उसके कोमल, बीमार तथा कमजोर दिमाग में कुछ भी समझ में न पाया। कोशिला देवी मचानक ही मूर्षित हो कर गिर पद। "श्रीमान ," दाटर रिशोर प्रोले- "यदि मेरा अनुमान सत्य है, तो पाप कृपया अपने कमरे में चले वाहये । यहाँ रोगियों पर प्रभाव अच्छा न पड़ेगा। मैं यहाँ धोमती जी की देख-भाल करता हूँ।" राजा राजेन्द्र प्रताप अपने कमरे को बल दिये। उनके पीछे-पीछे कोमन कमला का हाथ पकडे पक्षा गया । कमरे में पहुँच कर राजेन्द्र ने सैम की पत्तो तेर की। कोमलने क्रममा का हाथ सोद दिया। कोमल मोना-"माप कारण जानने के लिये अन्न थे। मुनिये, कारण केवल यह है कि कमला संसार भर की सियों से पतित है, कपटी है, दुष्टा " "लामोश कोमल ! तुम को मैं येटे की तरह मानता हूँ, पर इसका अर्थ यह नहीं कि तुम मेरी ही पुत्री के प्रति ऐसे शब्द व्ययहार में खाचो ! मैं तुम्हें घेतावनी देता हूँ कि अगर एक भी ऐसा शब्द मुंह से निकला तो..." "मेरी मृत्यु भी इसका अपराध कम नहीं कर सकती ! धैर्य धारण कीजिये चाचाजी ! मैं ने श्राप से पहिले कुछ भी नहीं बताया था, क्योंकि उस समय इस भेद को गुप्त रहने में ही भलाई थी। क्या आपको मालूम है कि विमता को क्या थीमारी है ? किस बीमारी से यह पीड़ित है ? क्यों पद धुली जा रहा "नहीं, पर विमला की बीमारी का इपसे क्या सम्पन्ध ?" "सम्बन्ध है । उसको धीरे-धीरे जहर दिया जा रहा है, और यह जहर देने वाली है, यह !" "तुम झूठ बोलते हो, क्या तुम शपथपूर्वक यह कहते हो?" "जी । हास्टर धर्मा को सन्देह हुमा, पर उन्हें विश्वास न हुदा कि धिमक्षा को जहर दिया जा रहा है। इससे उन्होंने डाक्स किशोर को बुलवाया। उनकी भी यही सम्मति हुई। दोनों असमजस में पदे कि कौन जहर दे रहा है, और क्यों ? इसीलिये थे यहाँ व्हरे। इसीलिये उन्होंने मेरी सहायता ली । मेरा दिमाग चकरा गया कि यह काम मैं कैसे कर सकेगा। पर ईश्वर ने मेरी मदद मिराश को । आज दूसरी बार में ने किसी के दो पैरों चलने की थाइट पाई । एक रात और भी ऐसा हुआ, पर मैं ने अपना भ्रम समझ कर टाल दिया था। मैं बड़ी सावधानी से कमरे के बाहर पाया । एक मूर्ति को अति सावधानी से दने पैरों नीचे उतरते देखा । मैं ने अनुसरण किया। यह पाया-मूर्ति विमला के कमरे में प्रविष्ट हुई । मैं पर्दे की आड़ में छिप गया। मैं ने देखा मुर्ति ने विमला के कपोली का चुम्बन किया, फिर यह मेज़ की तरफ बढ़ी। लैम्प के प्रकाश में देखा कि मूर्ति सिर से पैर तक की है, केवल देखने के लिये दो छिद्र है । मूर्ति ने दया की शीशी खोली और एक छोटी-सी शीशो अपने कपड़ों से निकाली। पर उसने फिर शीशी रख दी, और विमला की तरफ बढ़ी, फिर मेन की तरफ लौटी, जैसे कुछ विचार कर रही हो। माद में उसने उस छोटी- सी शीशी से दया की शीशी में कुछ बूदें टपकाई । में ने दौड़ कर उसे पकड़ा। अंधेरे में जमीन पर कोकिला देवी लेटी थीं, मेरी ठोकर उनके लगी, और वह जग गई । उस मूर्ति का मेज में घमा लगा। लेप गिर कर चूर हो गया। अन्धकार हो गया । कोकिला देवी चिलाई। श्राप भाये । श्राप की टार्च की रोशनी उस मूर्ति पर पड़ी। श्राप ने पाश्चर्य से कहा-'कौन ? कमला, यहाँ ?' उस शीशी में क्या था यह तो बाप ने डाक्टर किशोर के मुंह से सुन हो लिया होगा।" "मुझे विश्वास नहीं होता," राजेन्द्र ने कहा। वाणी उत्तेजित भयरय थी, पर शाँखों में शोध की झलक मिट चली थी-"कोमल, तुम पागल तो नहीं हो गये हो?" "मैं पागल हो सकता हूँ, पर डाक्टर कौशल किशोर तो नहीं।" राजेन्द्र की दशा दयनीय हो गई थी। "कोमल, तुम मुझ पर दया करो। यह मेरी अकेली बच्ची है । कह दो, यह सय मूल है। कमला रानी, तुम्ही पोलो, यतायो, क्या यह सच है? बोलो, कमला, बोलो, यह क्यों किया? तुम्ही यताप्रो कोमल ।" कमला कुछ न बोली। "चाचाजी, सत्य का मुँह श्राप कहाँ तक बन्द करेंगे। मुझे भी यह असत्य ही लगता, यदि मैं ने स्वयं न देखा होता । पर ऐसा इसने किया क्यों ? यह मेरी भी समझ में नहीं पाता । यह और विमला बहिनों की तरह रहीं, कभी भी विमला ने इसको हानि नहीं पहुँचाई । फिर ऐसा क्यों किया, यह, मैं नहीं यता सकता चाचाजी, केवल यह जानता हूँ कि इसने ऐसा किया।" पिसी के पैरों की अाहट हुई। कोमल ने देवा-हरी-सी सहमी गई सी कोकिला पीधा रही हैं। चेहरे का रंग सफेद हो गया २४ निराश कोमल से पूछा--"कोमल बाबू ' यह क्या मामला है ? विमला मूर्षित गई है। कमला ने क्या दिया ?" उनकी प्राशन भी कॉप रही थी। कोई उत्तर न पा का वह कमला की ताक मुही-"येटी, पतानो, तुम ने क्या किया है।" थोर जर वह चुप रही तो राजेन्द्र से बोली- 'श्रीमान्, श्वाप हो यताइये, मेरी कमला ने क्या किया है ?" कमल को कोकिला देवी के व्यवहार पर प्राश्चर्य हो रहा था कि कमला के लिये वह इतनी ध्यप्र क्यों है? "मैं कत इतना ही बता सस्ता हूँ कि कोमल ने कमला पर विमला को जहर देने का दोषारोपण किया है । श्राप ही बताइये कोपिला देवी, क्या यह सब हो सकता है क्या कमला-जैसी देवी ऐसा नीच तथा जघन्य कर्म कर सकती है और उसको भी तो देखो, चुपचाव बैठो है, पोलती तक नहीं, जैसे गूगी हो गई है !" "कमला ने विमला को जहर दिया! नही, यह सम्भव नहीं,..." कोकिला देवी कहते कहते रुक गई। उनके मस्तिष्क में चल-चित्र की मोति पिछली कुछ घटनायें फिर गई। उन्हें स्मरण हो पाया कि एक दिन रात में जप उनकी प्रॉस खुल गई थी: वो उन्होंने कमला को खड़े देता था। उसके हाथ में दवा की शीशी थी। और जब उन्होंने कमला से इस समय भाने का कारण पूछा था, तो उसने उत्तर दिया था कि नींद नहीं पा रही थी, तबियत घरा रही थी, इसी से विमना को देखने चली आई। "कमना-योजती क्यों नहीं ?" राजेन्द्र ने कुछ प्रोधित हो कर पूछा--- "क्या वास्तव में तुम ने ऐसा जघन्य कार्य किया है। क्या तुम ने विमला की दया मिलाया है" कमला अब तक बैठी कुछ सोच रही थी। यह प्रतीत हुभा कि उसने अपने विचार स्थिा कर लिये, क्योंकि यह बोली-"में अस्सीकार कर देती, किन्तु इससे लाभ क्या ? दाटर किशोर, दवा की शीशी, यह छोटी शोशी- सभी मेरे विरुद्ध सासी है।" राजेन्द्र इस भबके को न समाज सके । कातर हो कर कुरसी पर बैठ गये। कमशा कहती गई-"मुझे प्रसन्नता है कि विमला यस जायेगी, पर मुझे उसके जीवित रहने का दुख भा है। मैं उससे प्रेम करती थी और घृणा भी।" "कमला, क्या तुम वास्तव में स्त्री हो ?" राजेन्द्र ने कहा-"या एक स्थ- सूरत पिशाचिनी - পিায় - सुना नहीं। "जो चाप समझे। दोनों का मम्मिश्रण...." "यह सुम कह रही हो या ये वास्तव में सुम्हारे शब्द है ? नहीं, नहीं, हारे अन्तःकरण के शब्द नहीं है, यद्यपि में यह जानता हूँ कि तुम हृदय "यदि हृदय-हीन होती, तो फिनना या होना ! पर कटिनाई नो यही है कि मुझमें हृदय है, पर हाँ धन्यों से मि" कोकिला देवी ने बड़े निीत, स्वर में कहा--"येही कमजा, ऐसा न करो। यह मुन कर मेरा हृदय फरा जा रहा है।" "कमला, क्या यह यतामोगी कि तुम ने ऐसा अपराध क्यों किया?" कोमल ने एडा। "नहीं, क्यों बताऊँ? तुम इसे अपराध कहते हो, तो कहो।" कोकिला देवी रूंधे स्वर में बोल उठी-"मैं जानती हूँ।" पर किसीने "इस बहाने से काम नहीं चल सकता," कोमल ने जरा कठोर हो कर कहा-"तुम नीच हो, कपटी हो, पूनी हो। तुम मुस्कराती रही और वह पीड़ा सहती रही। तुम अपने इन अधरों से उसके कपोलों का, अधरों का चुम्बन करती रही, और अपने इन हाथों से उसके प्याले में जहर मिलाती रहीं। क्यों, दोस्तो यह छल क्यों " "मुझे खुशी है कि विमला वध गई, पर यदि भवसर मिले, तो मैं फिर ऐसा ही करूँगा।" "मोह, हृदय हीन ! पापाय पिशाचिनी!" कमलारानी तन कर खदी हो गई । श्राखें जल 8ठी ! “यह कह रहे हो तुम ? मेरा तिरस्कार कर रहे हो तुम ! मुझे मिड़क रहे हो तुम ? मेरा अपराध संसार पर प्रगट करने को तुले हुये हो तुम? सुम, जिसके लिये मैं में यह सब किया, जिसके लिये हृदय में चुपचाप अनेकों पीड़ायें सही, सन्ताप सह, जिसे पाने के लिये मैं सूनी पनी ! सुम जानना चाहते हो कि मैंने विमला को क्यों जहर दिया ? मैं ने पहिले ही कहा था कि मेरा प्रेम मावुक प्रेम नहीं रहेगा जल की मरह शान्त न रहेगा, अग्नि के समान प्रचड होगा । मुझे भय कोई बना नहीं है, मैं कहती हूँ कि मैं तुम से प्रेम करती थी। तुम से जो मेरे प्रेम को सर्वदा टुकराता आया, सुमसे, जिसने मुझे अपराधी प्रमाणित में ने सुम को वह प्रेम देना चाहा, जिसका अनुमान अस्वीकार कर लेते तो मेरी यह दशा न हुई . A नुम स्वप्न में मी सकते।

निश
गधी होती, पर RERN-ममन हो गये, यासी
यार हो गई मुजी पी थी...यदि मेमर
Ranar...
भीम ने मुझे दोषी प्रमाणित या...मे...निमको में मात्र
समतों पी... गुमने..." शाप या nिETREET नेगी।
wimm पदाधित हो गया।
"!मो समम , म rring रही हो। पापाजी,
कोकिला देयो धौर विमला पमा पर गे । म अ मी सुधी पम सनी हो।
विमला अब गई, मुझे भी इन चाहिय।"
परासार...मा.. गुमा...शिमा और कोम...ावों के बारपूस
गये, हितकिया पर हो गई। हाय में प्रतिदिमा और गुला के भार प्रब
हो गये। "मही, मही, मैं परमही करती, माही erant मुसी
जीवन नही पिताना चाहती । यदि मीच सोमीप ही बना पसरप करat
"कमला, तुम मेरे हृदय को दे रही हो!" राजेन्द्र मे कातर होकर
"बिधे हुये हश्य से और क्या शन्द्र निकलेंगे" में देवी की दो पर
पिशाचिनी की या और अधिक पन गई।"
मोकिला देवी ने कुछ गम्भीर होकर कहा-"कमा, रमा म्पर्य की बाने
पा रही हो ! मेरे सामने दम ऐसा नहीं कर सकती । धुटने टेको, परमRY
से एमा मागो।"
कमना में गर्व तयाणा मिश्रित स्वर में कहा-" को मौष में बोलने
का क्या अधिकार?"
"पेनहरे अधिकार है ? पूरा अधिकार है।"
"देखो कोकिला देवी ! तुम ने मुझे पाला पोमा, हमके माने या नहीं कि
तुम मुम पर हुकम चासो | तुम यहा आई-अपने साथ अपनी पुत्री को.----
व पुत्री को देखने में भोली भाली पर मेरे भाग का कोटा बन गई, मेरे प्रेम
के रास्ते में रोड़ा अटका दिया माई । तुम ने उसकी सहायता की और अब
मुझे शिक्षा देने चली हो।"
"मैं ने तुम को प्रपती पुश्री की तरह पाला?"
"ET-यो को पुत्री बनने से तो मैं मर जाना उत्तम समझती हूँ।"

निराश कोकिला देवी निरुत्तर हो गई। कमला को पदि उनके हृदय का पता चल जाता, तो कदाचित् ऐसा न कहती! राजेन्द्र के धैर्य का बाँध टूट गया- "परमारमा, यदि मैं यह सब देखने और सुनने के लिये जीवित न रहता, तो कितना अच्छा होता ! प्रोह ! पेसी सन्तान से तो निःसन्तान रहता, तो अच्छा होता! कोकिला देवी, मैं ने तो धाप को एक भोली-भाली, सरल, निर्दोष पालिका सौंपी थी, पर प्राप ने मुझे क्या लौटाया--एक हृदय-हीन सुन्दर पिशाचिनी ! मैं ने श्राप को एक घरची दी- आप ने मुझे खूनी लौराया !" "कमला!' कोमल ने श्रान्तं स्वर में कहा--"कमला, तुम देख रही हो कि चाचाजी को कितना दुःख है, कितनी पीड़ा है ! गर्व को छोड़ो पश्चात्ताप करो, हठ को छोड़ो, नम्रता ग्रहण करो, अय भी कुछ नहीं बिगहा है । चाचाजी से समा माँग लो" "मुझसे ऐसा कहते हो, क्या उस पिता के लिये कहते हो, जिसने अपनी पुत्री की खयर तक न ली, वतायो, ऐ धर्मामानों !" राजेन्द्र के मुँह से एक पोदा-भरी दयी-सी चीख निकल गई । कोकिला ने धागे वद कर कमला का मुंह पन्द कर दिया । श्रीमान् , मुझे कुछ कहना है। पर पहले आप मुझे क्षमा प्रदान कर दें। मैं घुटनों पड़ कर, सिर मुका कर क्षमा की याचना करती हूँ। मुझे मा कर दिजिये !" और यह गर्वीली महिला कोकिला देवी, जिन्होंने सर्वदा अपना मस्तक ऊँचा रखा, . हो गई। नतमस्तक कोमल चकित या, राजेन्द्र चकित थे, कमला मी चकित थी। पर कोकिला देवी उसी तरह नतमस्तक रहीं । राजेन्द्र ने ऐसा न करने को भी कहा, पर फिर भी वह न उटी-"पहिले श्राप कह दिजिये कि क्षमा कर दिया। दोष अक्षम्य है, फिर भी मैं धमा की भीख मांगती हूँ।" राजेन्द्र ने उन्हें सास्वना दी, जमा करने का वचन दिया, तब वह उठी कुरसी पर बैठी नहीं-खड़े-ही-खड़े कहना प्रारम्भ किया-"श्रीमान्, वास्तविक अपराधिनी में हूँ । पाप ने मेरा विश्वास किया, मैं ने आप को धोखा दिया । मेरी कृतनता का फल मुझे मिल गया। श्रीमान्, वर्षो पहिले श्राप दुःख तथा उदासी-भरे मेरे पास आये थे। मुझ पर पूर्ण विश्वास करके मुझे नि०-७ ६८ निराश - अपनी पुत्री सौप गये। इस योग्य न थी, फिर भी मैं ने उसका बाबन- पालन किया, ठीक अपनी पुत्री की ताह । श्राप से मिलने के पूर्व में गरीबी का शिकार हो चुकी थी। घोह, मुझे कितना कंदुधा लगा था यह दिन ! पाप ने कितनी उदारता से धन दिया! और हम लोग पूर्ववत् मुख से रहने लगे। यह आशा थी कि थाप अपनी पुत्री को बुलायेंगे नहीं, और पाप की पुनी मेरे पास रहेगा। पर आप का पन थापकी पुत्री को बुलाने के लिये थाया । मुझ पर पनपात हुभा । श्राप ने मुझे भी साथ माथ बुलाया था । श्राप का अर्थ था कि में इस घर को भी अपने घर के समान समर्मू, पर मेरे हृदय में तरह तरह के विचार भाये-जैसे श्राप फिर दूसरी शादी कर लें, फिर .? मैं बालच में फैस गई । मैं ने दोनों लपकियों को साथ-साथ खेलते देखा, हृदय में विचार पाया...क्यों न पाप की पुत्री श्राप को दे दूं?" राजेन्द्र प्रताप ताज्जुब से भर गये । कोमल अति विकट घा गया। कमला ने अपनी गर्षाली तथा पृणा मिश्रित दृष्टि उनकी तरफ धुमा दी, पर यह बोलती गई.-"क्यों यह विचार हृदय में उठा ! कदाचित् बताना कठिन हो, पर यह विचार हृदय में अवश्य उठा । हृदय ने कहा कि यदि राजा साहब फिर से शादी कर लें, या उनको दया दृष्टि तुम से फिर जाय, तो तुम उसकी पुत्री से कह सकोगी-'तुम मेरी पुत्री हो, और फिर यह मुझे पुनः गरीबी के कष्ट से बचा देगी। यह मेरा अपराध था। पर गरीबी के भय ने मुझे मजबूर कर दिया । यह मेरा मूर्खतापूर्ण विचार था । पर उस समय इसके अतिरिक्त कोई उपाय भी न सूझा । श्रीमान् , भाप का घश दागी नहीं हुमा-दुआ मेरा । कमला श्राप की पुत्री नहीं-मेरों है । श्राप को सरल हृदया भोली- भासी पुत्री तो विमलारानी है !" "पर श्राप को इस कार में लाभ क्या हुआ ?"-कोमल ने पूछा। "कुछ भी नहीं । मैं सोचती हूँ कि गरीयो के भय ने मुझे पागल कर दिया था। मैंने सोचा था इस तरह फिर मुझे किसी वस्तु की कमी न रहेगी, फिर से दाने-दाने को न तरसना पदेगा । मैं इस प्रलोभन में क्यों भाई, स्त्रय ही अब नहीं कह सकती । सम्भव था कि मैं आप से यह भी न कहती, पर नहीं, यह मेरे हृदय पर एक भार के समान था ! कहती अवश्य, पर इस समय श्राप ने मेरी शिक्षा दीपा पर थारोप लगाया। श्रीमान् , पाप का दुख देख कर इसी समय मुझे हदय का बोम्म हलका कर देना पड़ा। इसका मुझे स्वास में भी मामास न था कि मेरी कोख से ऐसा कुल-कल हनी पैदा होगी!"

নিয় "श्रीमतीजी, श्राप ने कह तो दिया, पर कहना आसान है, विश्वास देलाना कठिन," कमला ने कहा । "बेवकूफ खड़की ! क्या यदि यह साय न होता, तो मैं कहने का साहस कर सकतो थी ! एक बार तो पाप कर चुकी, उसके लिये मेरी प्रारमा अब तक धिक्कारती है, क्या फिर करतो? तु सवून चाहनी है ? बुलाऊँ अपनी बूदी दासी को ? चुनाऊँ उस डाक्टर को, जिसने तेरी औध के फोड़े को चीरा था? समझ गई । अब नहीं घुलाना पड़ेगा, सुझे स्वयं विश्वास हो गया। में ही तेरी इत-मागिनीमा हूँ। श्राह ! तुम जैसी को माँ बनने में कितनी पीड़ा हो रही है।" "कोकिला देवी, क्या यह सच है ?"-कोमल ने पूछा। "हाँ, सच है कोमल, तुम्हें क्या अब भी विश्वास नहीं होता! दोनों में कितना अन्तर है, विमला ने कभी भी मुझे जरा-सा भी कष्ट नहीं दिया। यह हमेशा कोमल, विनीत, प्राज्ञाकारिणी, नम्र, सत्यवादी रही। एक मिनट को भी मुझे पीछा नहीं पहुँचाई । उसे अपनी पुत्रो बनाये रहने में कितना सुख या ! चार कमला, सदा गर्वीली, हठी, जो काम में मना करूँ, उसीको करने बाजी रही। प्रतिक्षण क्लेश पहुँचाती रही । ऐसी लड़की को कोई क्यों व्यर्थ में अपनी पुत्री बनातेगा।" "कोमल बाबू, अब तो चाप को और भी अधिक प्रसन्न होना चाहिये!" कमला ने ताने के ढग पर कहा-"आप उस लड़की से, जिसे आप प्रेम करते है, विवाद तो कर ही रहे हैं, साथ-साथ राजा राजेन्द्र प्रताप की पुत्री से भो, प्रेम और धन का संयोग ! में किसकी बेटी हूँ, इसकी अधिक मुझे चिन्ता नहीं, मेरा तो भविष्य अंधकारमय है ही।" "श्रीमान्, श्राप अपने मुंह से एक शब्द भी नहीं बोले । क्या प्रम मो मुझे घमा नहीं किया ! में सर्वदा अपने इस कृत्य पर पश्चातार करती रही, अन्दर-ही-अन्दर जलती रही । मेरो प्रात्मा को शान्ति नहीं मिलती थी।" राजेन्द्र धुप रहे। "श्रीमान् ! मैं दुष्टा हूँ, पापिनी हूँ । पर क्या प्रार मुझे धमा नहीं करेंगे ? में प्रलोभन में पड़ गई थी। दूसरे, मुझे कमजा पर अत्यधिक प्रेम था। सोधा था कि इसका जीवन बन जायगा।" राजेन्द्र फिर भी बुर रहे । कुश विचार में पड़ गये । चेहरे की रंगत प्रति पण बदलने लगी।

निरास "धीमान में पाचन पसार कर दया की ग माँगती हूँ। मय तक माप पमा नहीं कर देंगे, गुमे शान्ति नहीं मिलेगी। यदि मर माऊँगी, यो मी पारमा को शान्ति न मिझेगी ." कोकिला देखी लिए प्रोन सही, गाईभ गया, चामुमो की धारा निकली। राजेन्द्र रूप से निको पाशार सपा पाम सामि से मरे हम शनों मे प्रभावित होगये। बोले--कोकिला देवी, में सहृदय से एमा करता हूँ। परमात्मा को धन्ययार यि रहस्य रचित समय पर शुख गया। परिदम होने मीप पर पूर्व का पवदार नहीं रह मातातिमी म रियास दिलाता है कि मेरे मुंह मे उखाना या एका मी ग निकलेगा। भाप मे सरीयामय से ऐसा किया था, निरचय मानिये, मैं इसका भी पूरा प्रबन्ध कर दूंगा।" और पिरकमदा के निकट गये। "कमखा, मैं तुम से भी एक रन मही कहूँगा । पर मेरी प्राधा तुम भविष्य में मनी प्रकार जीसन विताना!" इस गऊली कादशी पर कुछ भी प्रभार नहीं पहा । उसकी गुमा में लेरा- मान भी कमी न पाई। "मार ने कभी मुझे हपय से प्रेम नहीं किया, सदा विमलादीको चाहते रहे।" "फिर भी मैंने तुम्हारा पूरा ध्यान रखा। मुझे तुम से नि अपरय हुई थी, क्योंकि पुम को हदय हीन पाया था।" "यहीन ! और मैं ने हडप के ही कारण अपने को पार कर साक्षा!" और फिर उसने सम की तरफ देखते हुये अपने इसी स्वर में कहा- "पुयय-यात विमला, जीती। पाप-अर्यात में, हारी। पर एक प्रश्न पती हूँ, मैं ने अपना दोप स्वीकार कर लिया। मैं ने विमखा को जहर दे देना चाहा, इस पाशा से कि उसकी मृत्यु के बाद मै कोमल को पा जाऊँगी। पर मेरी यह भाशा निमून साबित हुई । अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि आप लोग क्या करेंगे ? मेरा भविष्य अंधकारमय हो गया है सदा के लिये । यदि भाप जेल भेजेंगे, तो सहर्ष जाऊँगी, भ्यायालय में अपना अपराध स्वीकार कर लूंगी।" "तुम ने मेरी पुत्री को जहर दे कर मारना चाहा था, पर मैं ने तुम को अपनी पुत्री की ही तरह समझा। मैं तुम को रामा करता हूँ," राजेन्द्र ने कहा- - निराश कहा। "तुम अानाद हो । यदि तुम्हें पश्चात्ताप हुआ, और तुम सुमार्ग पर चली, तो मुझे प्रसन्नता होगी।" "तुम विमला की यहिन के समान थी," कोमल ने कहा-"श्रतः मैं भी समा करता हूँ।" "यदि तुम मुझे अपना प्रेम देते, तो कितना अच्छा होता ! माँ, तुम भी योलो," कमला ने कहा--"तुम ने भी तो मुझे अपराधी सहराया है।" "मैं तुम्हें भगवान् पर छोड़ती हूँ !" फोपते स्वर में कोकिला देवी ने "भगवान् ! इस नाम की कोई वस्तु है भी, जो तुम ने मुझको उन पर छोड़ दिया!" कमला ने कहा-"मेरे लिये तो भगवान भी मर गये हैं। मैं पली जाऊँगी, जहाँ आप कोई भी न देख सकें । मैं पर पात्ताप कर सकती हूँ, पर करूंगी नहीं । श्रय धाप में से कोई भी मेरे बारे में कुछ भी न सुभेगा।" "कमला इतनी निराश न होनो । इतने पाप में न जाओ, परमात्मा से क्षमा माँग लो!" राजेन्द्र ने कहा-"तुम को मैं ने अपनी पुत्री की तरह रखा है। भय भी मेरे हृदय में तुम्हारे लिये स्थान है। पश्चात्ताप कर बो टो! परमारमा से शमा मांग लो ! अपनी दुःखी माँ को और न दुसानो ! यद्यपि तुम बिमला से नहीं मिल सकोगी तथा यहाँ भी नहीं रह सकोगी, फिर भी मैं वादा करता हूँ कि मैं तुम्हारे लिये पर्याप्त साधन कर दूंगा-मकान, धन, जमींदारी । तुम्हारा यह कृत्य मी किसी पर प्रगट नहीं होने दूंगा। हम लोग डाक्टर किशोर से इसको भूल जाने की प्रार्थना करेंगे । मान जात्रो, कमजा! इतनी कठोर न पनो" "आप की दया के लिये धन्यवाद । यह सब मेरी तरफ से विमना को उपहार दे दीजियेगा । मैं जो चाहती हूँ वह नहीं मिला, न मिल सकने की याशा है। अतः पश्चात्ताप करने से क्या नाम ! मेरे हृदय में प्रतिहिंसा का भूत जग गया है, उसे भगाना कठिन है," कमला ने कहा । और पूर्व इसके कि कोई उसे रोक सके वह कमरे से तीर की तरह निकल गई। डाटर कौशल किशोर को सम दातें सुन कर अधिक धाश्चर्य नहीं था। यह साक्टर तो थे ही, साथ ही साथ मनोवैज्ञानिक भी थे। "राजा साहय, मुझे यह सुन कर अधिक प्राश्चर्य नहीं हुआ। जिस समय मैं ने उसे टेसी निराश समय मैं ने यह समम लिया था कि यह जो कईगी इसे पूरा करके ही दम लेगी। यदि माप यह वहसे कि उसने सबसे कटिन गया साहसपूर्ण कार्य किया है, तो मुझे धारचर्य न होता, महो मुन कर शा। पर दुन्य है। उसने यह मार्ग पुना । अव धार है या विचाराने पड़ा। राजेन्द्र पोले--"मेरा इरादा कौशिक्षा देवी को पुछ मासिक बाँध दै, और उनसे काश्मीर खोर जाने को कप बशी प्रम भी मुधर सकती "मुझे सन्देश है । जय इस प्रति ही खो दिगढ़ जाती है, सो भवज एक प्रतिशत उसके मुधरने की माशा होती है।" "पदि यह सुधर जाये, सो मुझे सुख मिलेगा। में धारवर में उससे स्मेह करने लगा था। पर डाक्टर साहय, मुझे भी यही पार है कि यह सिर पहिले हो मेरे हृदय में क्यों उठा | सदा में यही सोचा करता था कि विमला मेरी स्त्री से कितनी मिलनी-शुजती है-रग में दसनी नहीं, पर गुणों में। इसके लिये दोषो स्वयं में हूँ।" "क्यों श्रीमान् !" "इसलिये कि मैं ने इसने सानो सक उसकी खोज प्रयर म ली। कभी भी देखने नही गया।" "इन मासों को छोड़िये।" "दाटर साहय, एक प्रार्थना है। इसको गुप्त रखियेगाहर पाली घटनाको।" "मैं बाप की मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकता और विमला के बारे "मैं उसके साथ पूर्ण न्याय करूँगा, उससे कोकिला देवी के कपट का हाल तो यसाना ही पड़ेगा, पर मैं नाम न पताऊंगा। मैं इसको समाचार-पत्रों में निकलवा दूंगा। यदनामी, बीटाकशी, जो होगी, सहो जायगी। कुछ दिनों पाद सद मामला शान्त पड़ जायेगा । पर यिमशा से क्या यमी बनाना उचित होगा क्या अब भी यह प्रतरे में है" "नही, खतरे में नहीं है । खतरे का कारण ही न रहा, फिर खतरा कैसे रहेगा! हो, पूर्ण स्वस्थ होने में कुछ समय लगेगा। फिर भी देख-भाल की आवश्यकता पड़ेगी। आप विमला से केवल थोड़ा सा भाग बताइये । और यह भी श्रमी नहीं, बाद में । यह तो उससे बताया ही जायगा कि वह भाप की पुत्री है, पर यदि आप के स्थान पर मैं होता, तो मैं कभी भी यह न कहता कि निराश उस स्त्री ने, जिसको वह यहिन मानती थी, उसी ने उसको जहर देने की कोशिश की । श्रीमान् यदि थाप मेरी राय मानें, तो उसको कमी भी यह न जानने दें।" "बापटर साहय, भाप की सलाह के लिये धन्यवाद ! मैं इसी सम्मति पर कार्य करूंगा। आज से श्राप मुझे अपना दोस्त समझे।" ये बातें राजेन्द्र प्रतापसिंह तथा ढाटर कौशल किशोर प्रातःकाल हुई । डाक्टर वर्मा को कुछ भी नहीं बताया गया। डाक्टर कौशल किशोर तथा ताफ्टर वर्मा दोनों जाने की तैयारी करने लगे। जाने के पूर्घ डाक्टर किशोर एक बार फिर विमला के कमरे में गये । उसे देख कर बोले-"अय तो तुम्हारी सघीयत अच्छी है?" "er," मुस्कराने की चेष्टा करते हुये विमला ने उत्तर दिया। "अब भी तुम्हारा भय मौजूद है ?" "नहीं, कदाचित् इसलिये कि मैं अय अच्छी हूँ।" "अब मेरी तो जरूरत रही नहीं, श्रम विदा दो।" और फिर दायर किशोर चले गये। उन दोनों को फाटक तक राजेन्द्र रवयं पहुँचाने गये । लौटते समय उन्होंने कमला के पास जाने का निश्चय किया उससे जाने की तैयारी करने को कहने के लिये, क्योंकि अब उन्हें विमला तथा कमला का एक ही स्थान में रहमा स्वीकार न था। पर कमरे में कहीं भी कमला न दिखाई पड़ी। मेज़ पर एक छोटा-सा कागज लिखा रखा था। राजेन्द्र ने पदा--"मुझे खोजने की चेष्टा न कीजियेगा, क्योंकि ध्यर्थ होगा। यदि मैं प्रेम में सफल होती, तो सुखी रह सकती थी, पर वह सम्भय नहीं । पुरुप अधिक निराशा में, पीड़ा में मदिरा पीना प्रारम्भ कर देते हैं, मैं भी कुछ करूंगी। मेरा अन्तिम प्रणाम स्वीकार कीजिये !.... राजेन्द्र की घाखों में घासू श्रा गये । कमला के प्रति क्रोध था, पर उनका हृदय द्रवित हो गया उस लड़की के लिये, जिसने जान-यूम कर कुमार्ग पर चलना स्वीकार किया है। कोकिला देवी यहाँ से जाना नहीं चाहती थी, और राजेन्द्र उनको रखना नहीं चाहते थे, पर अन्त में कोकिला देवी के यहुत हठ करने पर उन्होंने यष्ट स्वीकार कर लिया कि जय तक विमला पूर्ण रूप से स्वस्थ न हो जाय, यह रहें तथा माद में वह यदा-कदा विमला को देखने या सकती है। ।

r लिया उपी दिन राजा साहय ने सर दाम दासियों को बुलाकर कर दिया कि एक भारी भूल हो गई थी। उनकी पुरी भक्षा मही, पास्तव में मिमा रानी है। गेन्द्र ने कमला की बोज करवाई, पर म य । शचि और उसके चार में पता लगे, हगो विचार में कमो का यान मे निरीण काने लगे, चौर उन्हें देख कर यन्त भाश्ययं मा सिमी बानुर-कीमतो मादियों, यहुमूल्य धाभूषण, मणि माणिक माद, समी ची कराने में की हैं। एक मा चीज़ कमज्ञानही से गई। पर कुछ दिनों के बाद पता घमा कि एक पोत बहो गई है। इस सय पदमून्य परतों में उसे एकधीत पसन्द पाई थी, और उसे बहमन मे अधिक बहुमूल्य समझ कर ले गई । और वा परत थी--कोमल का एक छोटा चित्र, उमपुर का विन, जिसमे उसने प्रेम किया और जिसने उसे टुकराया। केव उमी की सरीर ले गई। इस घटना के कुछ दिनों बाद, एक दिन यिममा बोजो-"माँ, कममा यहिन मेरे पास नहीं पाती। मैं सनी चार मुम से न चुकी है।" कोकिला देवी सिरहाने के बाद में लेख मब रही थी, यह कुछ न बोली। "मा, वह मुझसे मरा सो नहीं है। मैंने तो ऐसा कोई अपराध नहीं किया।" को कला देशी सुप रहीं, अपना काम करती रहीं। "माँ, मैं निरन्तर स्वप्न में उसे देखा करती हूँ कि यह मुझसे कह रही है-'मुझे अत्यन्त दुख है, पर किस बात का, यही मुझे भारपर्य होता।" 'मेरी बरची, अब तुम कैसी हो" "मर को अच्छी हो चशी हूँ मौ" "जब तुम योमार थी, तो कमला काश्मीर चली गई । वहाँ यह कुछ समय तक रहेगी।" "माँ ! बह जाते समय मुझसे मिलने तक भी न धाई ।" “ी हायटरों ने मना कर दिया था। सुम इतनी यीमार जी थी।"

निराश १०५ न "जब मैं इतनी बीमार थी, तो वह मुझे छोड़ कर क्यों चली गई। मैं तो कभी भी न जाती।" कोकिला देवी क्या उत्तर देती । घुप रहीं। "और मा, अय इसे मालूम हो गया है कि मैं अच्छी हो रही हूँ ?" "हाँ, अवश्य !" "माँ, मैं तो इस योग्य हो गई हूँ कि उसे पत्र लिख सकूँ।" माँ बोली । केवल मन में सोचने लगीं-'कुछ दिनों बाद अपने श्राप ही सारी घटना इसे मालूम हो जायगी। अभी नहीं, अभी इस योग्य नहीं हुई है। इमी तरह और कई दिन बीते । एक दिन वह पा हो गया जब उसगे चारपाई छोड़ दी, और वह पहिली बार कमरे से बाहर निकली। प्रातःकाल का समय था । मूर्य देवता उदय हो रहे थे। विमला फार वाले कमरे में एक कुर्सी पर बैठी प्रकृति की शोभा निरख रही थी। इसी समय राजा राजेन्द्र प्रताप ने कमरे में प्रवेश किया। उनको देखते हो विमला खड़ी हो गई। "चाचाजी, मैं आप को देख कर कितनी खुश हुई, नहीं बता सकती, श्राप मुझ पर कितने क्ष्यालु रहे, इसके लिये कैसे धन्यवाद दूँ!" उसको फिर कुर्सी पर बिठाते हुये राजेन्द्र योले-"बेटी ! मैं ने तो केवल अपना कर्तव्य पूरा किया। इसमें दया कैसी ? श्राज तुम्हें, यह देत कर मुझे कितना पानन्द था रहा है ! विमला ! मैं तुम से एक यारा कहना चाह "कहिये चाचाजी, कहिये, क्या कोई खुश-खयरी है ?" रहा हूँ।" "अवश्य ही कमला के बारे में होगी !" "नहीं, तुम्हारे बारे में ।" और राजेन्द्र ने सारी कथा कह दी । फेवल कमला के अपराध के बारे में कुछ नहीं कहा । विमला को विश्वास नहीं हुआ। विमता बोली-"मैं ने तो कभी भी माँ को झूट बोलते नहीं सुना। मां ने यह कपट किया, यह सम्भव नहीं । पिताजी, ('श्रोह ! यह शब्द अपने श्राप हृदय से उठा था) क्या आप को मालूम है, में कभी-कभी सोचा करती थी कि जैसे मैं ने श्राप को कहीं देखा था। एक धुंधली सी स्मृधि भी हृदय में धाती थी कि जैसे मैं कहीं फूलों से लदी हुई एक गुदिया लिये श्राप के साथ-साय कहीं गई मो।" "तो नम ने यह कमी भी मुझसे कहा क्यों नहीं ?"

निराश "मुझे भय था Or मा म हो जा । गुम मे नही, मुझे परमेयप विनियमनामे में रam करता था।" "तिमा मात्रा पति हम गुरु ता देना, मेरी मार्ग की पर कोहिनादेशी नयी तीन उमरिया ऐशियही समय में" "मा गम्नी मी ! गुमै विवाय पामें टी को htin भी सपादा मेम कमा पर ही माती बाबमत्रा को पर बाती भी, गाम रमको सुधों पर जिये ऐरिया हो। उनक) हीमोमग होगा विमा एक भया जगद व शापपी" "ही मेरा भी है पर इस पर उसको परासार यो अभिया, यामें दमडा सीमार में सभी मे पाप होना-कमी में धम, शिमीको ज्यादा । पर जो भरने पार को स्वीहार पर थे, रग पर परपाकर , उसके दोर की मात्रा कम होगी।" “श्राप कितने भाई पिसानी !" "मेरी " सिसी का मिलन समा! "पिताशी, कमक्षा पहिल को तो अधिक दुरः मही! मेरी हरमा रिचार अपने घर की अधिकारयों उसी को बनाये रती कंचन धार के बने मे सन्तुप रहूँगी।" "यामेरामा पेटी! धिकारी को दोनोअधिकार मिलेगा" "घड्या तो पार उसको कापी धन दे दीजियेगा। भाप भी तो उसमे किराना स्नेह रमते थे। मेरी सा परमदिन ही बार भायेगी उसे बसाने के लिये मी दोरही है कि इस पटना से मेरे म्यवहार में अप भी बतर म पदेगा। इसे यह भी विश्वास दिखाना चाहती है कि मैं अब भी उसकी पहिले वाली ही बहिन हूँ।" किाना विशाल है इसका हय राजेन्द्र में मोबा-डी अपनी मा की तरा और पद बोले- टो, विमला रानी ! १६ अप नहीं पायh कमी नही पहचर्य ही पळी गई।" *भराम हो गई होगी इसीसे।" राजेन्द्र ने पुष भी नहीं कहा-मागे भी पित कमी नहीं कहेंगे। और विमला सयंदा मम ही में रही, और किमाने उसके प्रम को दूर नहीं किया।

निराश १०७ तरसधाया। समाचार-पत्रों में यह समाचार भिजवा ही दिया गया था। इसे पढ़ कर लोगों में एक तहलका मच गया । ऐसी घटनायें उपन्यासों में तो अवश्य पढ़ी थी, पर वास्तविक जीवन में न देखी, न सुनी थी। इसी बीच में कोकिला देवी चली गई । कितने ही सम्वाददाता राजेन्द्र के पास आये । उनसे मिलने पर राजेन्द्र ने सब से यही कह दिया कि दोनों महिलायें यहाँ नहीं है, चली गई। इस समाचार को पढ़ने वालों में स्वरूपनगर का सजकुमार उत्तम भी था। यह भी भागा हुआ पाया । उसकी विक्षिप्त अवस्या को देख कर राजेन्द्र को "पद कहाँ गई? मैं उसे सो गा, और जब तक उसके चरणों में अपना नाम, राज्य तथा प्रेम न अर्पण कर दूंगा, मुझे चैन न मिलेगा।" "उत्तम ! यह कहाँ गई मुझे भी नहीं मालूम । यह मैं तुम्ही से पतला रहा हूँ, और किसी से भी नहीं कहा कि वह अपनी हरछा हो से विना मुझे बताये चली गई, और तब से मुझे कोई भी समाधार नहीं मिला।" "यह इतनी गीली तया हठी थी हो । जब उसने अपनी मा के कपट का हाल सुना होगा, तो फिर उसके गरीले हृदय ने यहाँ रहना स्वीकार न किया होगा।" राजेन्द्र ने उसकी इस धारणा को काटना उचित न समझा। "धीमान् ! प्रेम अमर है, मैं उसे खोगा, उसे अवश्य पाऊँगा।"... उत्तम ने काफी समय, काफी धन कमला की खोज में व्यय किया, पर घ्यर्थ ! अन्त में निराश हो गया । उसका विवाह याद में हो गया, पर उसने एक ऐसी ही सड़की पसन्द की, जिसकी प्राकृति कमला से बहुत मिलती थी। किन्तु यह अपनी पत्नी को प्रेम अपित न कर सका, जो उसने कमला को किया था। कोकिला देवी चली गई थी। उनके गमन के समय का श्य अत्यन्त ही हृदय विदारक था। उनका तथा विमला दोनों ही का पुरा हाल मा ! यह कुछ दिन तो कारमौर में रही । पर कमला की याद ने उन्हें बेचैन कर रखा था। उन्होंने इसकी खोज में दिननात एक कर दिया-एक स्थान से दूसरे स्थान, फिर दूसरे से तीसरे । इसी तरह से घूमना शुरू कर दिया। पर कममा न मिली--न मिली। कोकिजा देवी की निराशा दिन-प्रति-दिन बढ़ती गई। थन्त में उनका जर्जरित हृदय अधिक निराशा को न संभाल सका, और वह कदाचित कमला ही को खोजने उस लोक को चली गई।...

मिराश विमशा की शादी का दिन प्रा पहुँचा । राजेन्द्र को हरदा भी कि विवाह ही धूम-धाम से हो, परविमला को इदा या नहीं थी। राजेन्द्र में भी अपनी पुनी हो का मन रखा। विमलारानी धौर होमक्ष का विराह हो गया। विवाह के पश्चात् जर पिमना और कोमन मिले, ही विमला के चेहरे पर कुछ विवाद को पापा देख कर कोमल ने पूछा- "ऐसे मानन्द के अवसर पर व विशद को हाया क्या" "कमला की याद सता रही है, यह पेचारी कहाँ होगी ?" "क्यों रानी!या में काफी नहीं हूँ" "है, भाप मेरे मर्वस्व है। फिर भी स्वामी वह मे यहिन थी !" एक से दो हुयेयो में एक हुरे जोवन गर न बिरने के लिये ! भय भी कलकत्ता मी विशाल नगरी में उस रमणी की चर्चा होती है, जो बिजली की सरह सम्य समान में प्रविष्ट हुई, बिजली की ही तरह पुरुषों के हृदयों में घुमी, विमती ही ही तरह उनके हृदयों को दग्ध किया और फिर बिजली हो की तरह विलीन हो गई। यह सुन्दर थी, अति सुन्दर ! उसकी एक मुस्कान पाने के लिये पुरुष तड़प उठे। उसकी कृपा पाने के लिये अपना सर्वस्व अपंग का दिया ।...पर यह तो एक हृदय-हीन जादूगरनी थी। इससे प्रेम करो से तो किसी पापाण- प्रतिमा से प्रेम करना पड़ा था ! उसकी मुस्कान विषमरी-होती थी। उसके नयन तार को ताहने थे। दया तो वह जानती ही न थी। एक शेरनी से दया की प्राशा की जा सकती है, पर उससे नहीं! हदय के साथ खेलना, उसे लुमाना, तहाना फिर तोद देना उसका खिलवार था। एक के बाद दूसरा, दूसरे के वाद सोसारा, निराश तीसरे के बाद चौथा...पर उसे सन्तोष न होता था, और पुरुष भी उसको अपनाने के लिये लालायित हो उटते; पर व्यर्थ ! यह कौन है ? क्या नाम है ? कहाँ से आई । किस जाति की है ?--कोई नही जान पाया । सब केवल यही जान पाये कि यह एक कुबीन महिना है, दुःखों की मारी पर दया-हीन, निर्दय, कठोर !... "जितनी भी स्त्रियों में ने देखी हैं तुम उनमें सबसे सुन्दर तथा सबसे कठोर हो!" एक बार एक राजकुमार ने उससे कहा था। "मैं वही हूँ, जो संसार ने मुझे पनाया।"--संक्षिस-सा उत्तर मिला। एक पार लोगों ने उसे एक धनी युवक को दिखाया, जो उसके प्रेम में पागल हो कर दर-दर ठोकर खाता फिरता था। यह मुस्करा दी। फिर जब लोगों ने बताया कि उसने प्रारम-हत्या कर ली, तो हंस दी, और पोली- "बेवकूफ या ...यह सुन्दरी धन से रहना तो जानती ही न थी । शान्ति उसके पास पटकती न थी। कुछ लोग तो कहते थे कि वह सोती तक नहीं थी। वह सयंदा किसी समाचार को सुनने के लिये उरसुक रहतो, पर जैसे न सुन पाती थी। कभी भी किसी मन्दिर, मसजिद, गिरजा आदि में न जाती । सर्वदा वह पुरुषों का हृदय तोड़ने में बिप्त रहती। कभी भी सन्तुष्ट न होती तथा, उसका हृदय पुकारता ही रहता-और-और !! एक दला एक धनी सेठ ने उसे एक हीरा भेंट किया, और पूछा--"श्राप किस घस्तु सन्तुष्ट हो सकती हैं" "किसी से भी नहीं। मुझे कोई वस्तु श्रानन्द नहीं दे सकती, और पीड़ाही!" कभी भी यह पिघली नहीं। कभी भी उसकी कठोर मुद्रा में श्रन्तर आया।पर एक रानि इसमें परिवर्तन हुा-महान् परिवर्तन ! वही उस जीवन की अन्तिम रात्रि थी। जीवन-दीप का तेल लगमग समाप्त हो गया या दिशाश देत नो बनी न हो यो। म रात्रि पर frei,रो-रो मा कर रोई । अनी मी मौसानी से बने एसपी int, शो पर मुचित ली थी। और कोर १८ मार fera इसे प.पन से पिराधी--'मार, कोमा ! कोम! मैं मुमती पी गुम मे मकरमा हार का लिया होगा!-मे में। मी दामी कोही यो। "रोमा, पगी." कममा में सांप रा मैं --"अप भोग में रिटीम मरावी एक सय देना- सरस सोन देगा, और बार- "निराश" जीपन-दीर टिमटिमा काम गपा! EAR

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निहाश कोमल सिंह कान में घुसे । चारों तरफ दीवारों पर जिाहदरतर, तलवार, पन्दूर, जगली जानवरों की साझें टंगी यौ। यह चुपचाप उन्हें देखते "हार, चापका सामान-लाइये।" और राममिद ने कापते हाथों से, जो अन्यन्त हर्ष में करण कोप रहे थे, यह धमा ले लिया ! उस धूल से भरे धने को उसने उसी सावधानी से हटाया, जैसे कोई सोने की अमूल्य पस्तु को उठाता है। पर धरले की रस्मी गुल ही गयो, धौर गैल-मारक यादि वस्तुएँ विसर पड़ी । जादी-जल्दी उनको उटाता हुआ बोला- हुजूर, नहाने का सामान ठीक करता हूँ। अगर पहले से मालूम होता कि धाप माने या है सो... " "अब मो सारी बातें गुप्त है ?" "अमदाता ! रियासत में केवल एक ही दो ऐसे हैं, जो यह जानते हैं कि श्राप फौग में...' कोमलसिंह ग्यम हो गठे--"पाना..." "नहीं पायदाता, ये यह नहीं जानते।" कोममिह ने सन्तोप की सांस ली। "हा, यही चाहिये । क्या यहाँ काम ठीक चल रहा है" "कोई नई खबर !" "मेघसिंह पैदल सेना में मरती हो गया।" "ठीक किया, और ." "और.." कैसे रामसिह कहे कि सुल्तानसिंह उसका इग्लौता बेटा नहीं रहा-कोमपि का सबसे प्यारा मौर... "और अन्नदाता, मुस्तानसिंह..." "कहो, रामसिंह, कहो, र क्यों गये ? क्या हुआ सुल्तानसिंह को?" "समा, अनदाना "बोलो, रामसिंह, सुल्तानसिंह .." "मुल्तानसिह कर्क की लड़ाई में मारा गया।" रामसिंह की बासू भरी बाँखें नीची थीं। “उसको 'इण्डियन आर्डर आफ मेरिट मिला है।" "शाबाश!" कोमल सिंह की आँखें चमक सटी, पर साथ ही साथ कुछ झूद भी उप-टप कर गिर पड़ी-"यह एक अच्छा नौकर या, और उससे भी कलंक अच्छा सिपाही!"--गला कुछ भारो हो चला था- रामसिंह, तुम मेरे पिता के समय के हो मुझे गोद खिलाया है। समझ लो कि श्राज से सुल्तानसिंह जिन्दा है, और कोमलसिंह मर..." "अन्नदाता! अन्नदाता ! ऐसे अशुभ वचन ? हम लोगों को भार पर अमिमान है" कोमलसिंह के ओंठों पर एक हल्की मुस्कान दौड़ गई। उन्होंने अपने दोनों हाथ फैला दिये, चौर देखने लगे-नाखून टूटे हुये, जोड़ों पर घाव के मिशान, हथेली सस्त तथा छालो से परिपूरित, कुछ सूखे, कुछ हरे, और हाथ एक मजदूर "और मुझको सुल्तानसिह पर अभिमान है ! रामसिंद, एक बड़ा सुखदा- यक समाचार है, पर रसना गुप्त...फौज में उन्न भर की कैद हट रही है, और ढाक्टरी भी कदी नहीं होगी। ऐसे शुभ समाचार तो वर्षों से नहीं सुने हैं।" कोमन सिंह का चेहरा कुछ सोच कर खिल उठा। "अन्नदाता, कपड़े उतारिये नहाने का पानी तो गर्म हो गया होगा ।" "अच्छा, देखो, रामसिंह ! इस वर्दी को सात कर लेना खूप...पिछली दफा की तरह।" "यह कमीज़ सो ज्यादा फट गई है, पर सिजवा देना, और मह पैपट, महुत अच्छा तो नहीं है, फिर भी..." "जी, अन्नदाता" "अच्छा मैं नहाने जाता हूँ। तुम खाने का इन्तजाम करो!" नहा कर कोमलसिंह भोजन के कमरे में गये। उसमें सलधारें, मन्दूके, जिरहमतर श्रादि दीवारों पर सजे थे । एक किनारे पर नाव खेने के बाद भी टंगे थे, और उनके बीच में एक शील्ड ओ यूनीवर्सिटी में नौका-दौड़ में प्रथम भाने पर कोमलसिंह को पुरस्कार स्वरूप मिजा या । कोमलसिंह कुरसी पर बैठ गये । सामने ही एक तस्वीर टंगी थी--एक असाधारण सुन्दरी युवती की- कुशलपुर की वर्तमान रानी की सोबह वर्ष पूर्व की तस्वीर । कोमलसिंह उसकी और एक-टक देखने लगे। देखते-देखते किसी ध्यान में मग्न हो गये। भोजन परोस दिया गया, पर उन्हें कुछ भी खघर नही। "अन्नदाता-मोजा..."

निराश होमसिंह हाल में गुमे । चारों पर यारों पर निर, मारे, ब, जम जारी की साय गो पौ। यह पुराचार गरें देरने "दुपूर, सार मामान-माइये।" भार रामसिंह ने कहा, at प्रपन्त हर्ष के बाद रहे थे, पहना से रिपा| उस पू से मरे भले को हमने उसी मायधानी से उठापा, कोई मोने को पाप यानु फो टराना , पर धरी की मी तुदी यो, गे माफ सादि या गिर पड़ी। मादी जी उनको उहाला दुमा धोका-कार, नहाने का सामाम ठीक करता है। पर पहधे मे मालूम हो किधाराने पाले " . "भव मी मारी पात!" "अनदाता ! रियासत में यक्ष एक ही दो ऐसे हैं, जो पहनते है कि पाप पोज में कोमलसिंह प्यम हो बडे-पातु..." "नही मादसा, यह महाँ जानरो।" कोमसिंहने मन्तोप घी सास की! "हा, पही चाहिये । क्या यही काम ठीक चल रहा" . "कोई नई पर।" "मेघसिद पैदल सेना में परती हो गया।" "ठीक किया, और " "और " कैसे रामसिंह कहे कि मुस्तानसिंह उसका इकलौता मेरा नहीं सह-कोमतिका सबसे पारा नौकर "और अन्नदाता, मुस्तानमिद." "कहो, रामसिंह, कहा, रक क्यों गये क्या हुमा मुल्तानसिंह को ?" “पमा, शदाता" "बोलो, रामसिंह, सुस्तानसिंह ," "मुहमानसिह हार की घड़ाई में मारा गया। रामसिंह की घासू मरी बाद मीची थी । “उसको 'इरियन पार माफ मेरिट' मिला है।" "शावा" कोमतसिंह की भावं धमकी, पर साथ ही साथ कुछ बूंद भी टप-टप कर गिर पड़ीं-"वह एक घरमा नौकर था, और उससे भी कलंक अच्छा सिपाही!"-गला कुछ मारो हो चला था-"रामसिंह, तुम मेरे पिता के समय के हो, मुझे गोद खिलाया है। समझ लो कि श्राज से सुल्तानसिंह जिन्दा है, और कोमलसिंह मर..." "असदाता! अन्नदाता ! ऐसे अशुम वचन ? हम लोगों को भार पर अमिमान है !" कोमल सिंह के अोठों पर एक हल्की मुस्कान दौड़ गई। उन्होंने अपने दोनों हाय फैजा दिये, और देखने लगे-नाखून टूटे हुये, जोषों पर घाव के निशान, हथेली सन्त तथा छालों से परिहित, कुछ सूखे, कुछ हरे, और हाथ एक मजदूर के-से थे। "और मुझको सुल्तानसिंह पर अभिमान है ! रामसिंह, एक बड़ा मुखदा- यक समाचार है, पर रखना गुप्त...फौज में उन भर की कैद हट रही है, और दारी भी कड़ी नहीं होगी। ऐसे शुम समाचार सो वर्षों से नहीं सुने हैं।" कोमलसिंह का चेहरा कुछ सोच कर खिल उठा। "अन्नदाता, कपड़े उतारिये नहाने का पानी तो गर्म हो गया होगा।" "अच्छा, देखो, समसिंह ! इस वर्दी को साफ कर लेना खूप...पिछली दफा की तरह।" "जी" "यह कमीज तो ज्यादा फट गई है, पर सिलया देना, और यह पैपट, बहुत अच्छा तो नहीं है, फिर भी...' "जो, अन्नदाता!" "अच्छा मैं नहाने जाता हूँ। तुम खाने का इन्तजाम करो!" नहा कर कोमलसिंह भोजन के कमरे में गये । उसमें तलवारे, थन्दुक, जिरहवस्तर आदि दीवारों पर सजे थे। एक किनारे पर नाव खेने के बाद भी गे थे, और उनके बीच में एक शील्ड जो यूनीवसिटी में नौका-दौड़ में प्रथम भाने पर कोमलसिंह को पुरस्कार स्वरूप मिला था। कोमलसिंह कुरसी पर पैठ गये । सामने ही एक तस्वीर टंगी थी--एक असाधारण सुन्दरी युवती को- कुशलपुर की यसमाग रानी को सोलह वर्ष पूर्व की तस्वीर । कोमलसिंह उसकी और एक-टक देखने खगे। देसते-देखते किसी ध्यान में मग्न हो गये। भोजन परोस दिया गया, पर उन्हें कुछ भी सयर नहीं। "अन्नदाता-भोजन..." * +4

१४
"titi, मेघा, मादीहर!"
"अन्नदाता!"
“यो गया है। मोह! मोसन मा गया।"चोर पो जाने पर एक-दो
मास माने, ािो...तार को मात देलते, कम सोनी, फिर एकको
ग्राम धिमीशा भोजन समातमा।
भप भी पा पान मान दोरेशान रहापा, पर दोनों
दयाय दिया।
मुबह होते ही होंने रामसिंह को एशमी छाने का दुमपा,
क्योंकि उनकी पय की मोटर परकार के कौमी कार्य के लिये दो गई थी।
निय समाया हो पायतामा, गेरामा, माता चौर उसमें कर स
अलि फगामा कर निकले, राममिका हो गया।
कोमलमिह उसके भाव .मान हम दिये। राममिह स से अधिक
विराम-पान पोजे-"हमे भी जान लो। मैं एक मीनी मिनने
जा रहा है, जो मुझे देख कर पुरान होगी।"
मी पड़ दी। गमग ग्यारह बने इन्होंने बस एक फाटक पर
बार घरी यमाई । एक मौकर बाहर निकला।
"पया रानी साहिया पर में"
"मापकीन"
कोमसिंह ने प्रश्ने नाम या एका दिया। मौकर धनको पारी कमरे
में बैठा कर, इसला करने गया । कोमयसिंह उस मुमशित कमरे की सुन्दरता
देखने लगे। अगर के कमरे में हंसी के फापारे छूट रहे थे, जो एकाएक बटन
हो गये, और एक खो ने दरवाजे पर का परदा हा का कमरे में पदार्पया
किया।
धदम्रो खमी भी, मुन्दर थी, घोग हिरन को सी, याज काले, घोटी
नागिन जैसी।
यह अवसर इन दोनों के मिलने का प्रथम नहीं था।
कोमलसिंह ने उठ कर रानी की अभ्यर्थना की-"मुझे खेद है कि तुम्हारे
भानन्द में बाधा पहुँचाई । मैंने सोचा मा टेलीफोन पर बात कर , पर केस
.

कलंक
"
कान हो तृप्त हो सकते थे, प्रा नहीं । इसीमे सोचा कि...और जो पात में
करना चाहता था वह...
थे हिरन कोसी अलि प्रश्न-सूचक रष्टि से ताक रही थी।
"क्या मैं एकान्त में श्राप से कुछ पातें कर सकता हूँ-जेन्द्र के यारे
पहले तो यही मालूम हुआ कि आँखों ही द्वारा नकारात्मक उत्तर मिलेगा:
पर पलकें गिरी, फिर उठी--माँख के भाव विलीन हो गये । रानी साहिय'
कुरसी पर बैठ गई।
"मैं उसे देखना चाहता हूँ।"
.?"
"हृदय की ज्वाला को अब दवाने में असमर्थ हूँ, इसीलिये तुम से पहले
थाज्ञा लेने आया हूँ।"
"वह इलाहाबाद यूनीवर्सिटी में है।"
"किस कसा में ? हाँ, आय तो वह बड़ा हो गया होगा । श्रम तो यह यू.
टी०सी० में..."
“नहीं, राजेन्द्र अभी इन कामों के लिये छोटा है।"
"
"और इसका झुकाव संगीत की ओर अधिक है।"
“संगीत"
"हा पायलिन!"
जो कुछ हो, मैं उससे मिलना चाहता हूँ।"
"वहीं यूनीवर्सिटी में "
"नहीं, कुअलपुर में !"
"अच्छा, कोशिश करूँगी । श्रब को जब वह छुट्टी में आयेगा..."
"मैं उसपे इसी शनिवार तक मिल लेना चाहता हूँ।"
"इसी शनिवार तक "
तक। चाहे कुछ घंटों के लिये ही सही,
लिये ही पुको छीनने की कोशिश नहीं करूंगा।
.

मियारा
"
-
करता है या इसे देशमा जसा हूँ। यदि मसी, यो में से पर
भीम परामिम पिता"
"मी, नही, पह " विचलित , पर साग लिया, पो
गई, किर-"ry"
"रानी, भय मी एम मिनी गुम्दर हो ।
"att . कदाचिा भार को यह महामाराम कि मुझे मामले में..."
"जानता, सामा
"तो सो सर पर बात ममता कि चार की म्यार
की। इन yिa ani मोबाइम लोगों को पूराळमें..."
"इसमें उपचार को या माश्या १ महशो मा Fire
श"
"मुझे मालूम होता रहता था कि anal-का, चीन,
अमरीका..."
"हा, मैं ने काफी सफर किया, और भी मामा, भगर पर जाई निस
Stat in
"पर या पाप...?" रानी चुप हो गई। मरन RT RET किया, पर
कोमसिह समझ गये।
"पह भी पाने की भाषायता है ।" घोर पाप परखने के लिये कहा----
"यदि न हो, वो मुम्हे यता दी कि राजेन्द्र देखने में वैमा है।"
"टीक तुहारी ही तरह । पन्तर व इतमा है कि उसकी चाय पीर
बाल मेरे जैसे है..."
"एक अन्तर और है कि वह अलपुर के परा में पहला है, जिसे सगीत
रानी ने राजा को सरफ देखा।
"हम लोग सर्वदा से सिपाहीर है।"
"क्या कुशलपुर के सबसे पहले राजा विगुल के शौकीन नहीं थेचोर
स्वय तुम क्या थीन मजा कर स्याली फौज को परे महीये"
"वह फौजी सगीत था...पायशिन नहीं।"

कलंक
"पर वह यमाने में निपुण है।"
"रानी, उसे संगीत की तरफ ज्याक्ष मत झुकने देना।"
"क्यों ? कुशलपुर के वंशवालों ने फौज में बड़ा नाम..." उसने अपने
आप को रोक लिया, लेकिन तीर छूट चुका था। कोमलसिंह तिलमिजा उठे--
रानी योली-"मुझे समा कर दो!"
कोमलसिंह धुप रहे । दोनों ही चुप रहे।
शनिवार या गया-
x
धान कोमलसिंह अकेले बैठे भोजन नहीं कर रहे थे। उनके साथ उनका
राजेन्द्र भी था। वैसे तो कोमलसिंह ऊपर शान्त थे; पर अन्दर से उनका
हृदय अपने पुत्र को पन्द्रह वर्ष याद देख कर उमड़ रहा था। यह एकटक उसकी
तरफ देख रहे थे । सोच रहे थे कि बात करूँ, पर क्या बात की जाय ?
"तुम्हें रास्ते में तो कोई तकलीफ नहीं हुई ?"
"जी नहीं!"
फिर घही समस्या
"तुम महल देख चुके ?"
"जो, मैं ने करीब-करीब सब कमरे देख ढाले । ये पूर्वजों की तस्वीरें, ये
पन्दूकें, तलवारें श्रादि मुझे बहुत अच्छी लगी।"
"तुम्हारी भी तस्वीर लगेगी।"
प्रब क्या बात की जाय!
"तुम इलाहाबाद यूनीवर्सिटी में हो?"
"मी, पिताजी!"
"अच्छी जगह है । मैं भी वहीं का पढ़ा हूँ। कौन-से खेज का शौक है !
फुटबाल, क्रिकेट, नौका-सेना--यह डाइ देखते हो; यह मुझे नौका-दौड़ में
सर्व प्रथम धाने पर पुरस्कार मिला था।"
"श्रमी में में यह तय नहीं किया है, और मुझे जो कुछ समय मिलता है,
मंगीत में चला जाता है ।"

निराश
.
करता हूँ, मैं केवल उसे देखना चाहता हूँ । यदि तुम कहो, तो मैं उसे यह
भी म यताऊँ कि मैं उसका पिता हूँ।"
"नहीं, नहीं, यह " रानी कुछ विचलित हुई, पर साध लिया, घुप हो
गई, फिर---"अच्छा ।"
"रानी, अत्र भी तुम कितनी सुन्दर हो "
"वस...कदाचित श्राप को यह नहीं मालूम कि मुझे भाप से मिलने में..."
"जानता हूँ, यह लाचारी..."
"तो इसी अवसर पर मैं यह उचित रूममती हूँ कि चार को धन्यवाद
भी दे दूँ। इन पिछले वर्षों म जो पाप हम लोगों की कुशलता में..."
"इसमें धन्यवाद की क्या आवश्यकता है ? यह तो मेरा कर्तव्य
था।"
"मुझे मालूम होता रहता था कि श्राप कहाँ हैंअफ्रीका, चीन,
धमरीका...'
"हा, मैं ने काफी सफर किया, और भी करता, अगर यह लड़ाई न दिद
जाती।"
"पर क्या प्राप...?" रानी चुप हो गई । प्रश्न पूरा नहीं किया, पर
कोमलसिह समझ गये।
"यह भी पूछने की धावश्यकता है।" और यात बदलने के लिये कहा-
"यदि हर्ज न हो, तो मुझे बता दो कि राजेन्द्र देखने में कैसा है"
"ठीक तुम्हारी ही तरह । अन्तर फेवल इतना है कि उसकी आस चौर
खाम मेरे जैसे है..."
'एक अन्तर और है कि यह कुञ्जनपुर के वश में पहला है, जिसे सगीत
से रचि है।"
रानी ने राजा की तरफ देखा।
"हम लोग सर्वदा से सिपाही रहे हैं।"
"क्या कुशलपुर के सब से पहले राजा विगुल के शौकीन नहीं थे और
स्वय तुम क्या पीन बना कर रयाली फौज को परेद नहीं कराते थे
"EE फौजी सगीत था...वायलिन नहीं।"

“पा वापराने में मिम।"
"रागी, समान की श मासको दा"
- "पी ! र के. पावानों ने फोन में था माम..." मी
प्रारको बिमा, किन नी ! गुका थाकोमar तिमि
मां पोजी-"गुम्ने पमा कर दो !"
कोजामिद रई। दोनों ही गुप रहे।
शनिवार माया-
x
x
घाममा भने यो मोसन मही कर रहे थे। इसके साप उमा.
रामेल भी पापे तो कोमसिंह कार शान थे, पापदर से सनका
दस भरने पुत्र को पाद वर्ष बाद देश कर उमद रहा था। यह एक ARE
सरफ देख रहे थे। मोप रहे थे कि यात करूं, पर या बात की जाए।
" गाने में तो कोई सहजीफ मी दुई"
पिरही समस्या
"तुम मच "
"जो, मैं ने करीब-करीब सब कमरे देश था । ये पूर्वजों की तस्योरें, ये
बन्दूके, सलवार धादि मुझे पहुन घदी लगी।
"मुम्हासी भीमम्वीर लगेगी।"
प्रवक्या बात की जाय।
"तुम इलाहाबाद यूनीवसिंदी में हो?"
“मी, पिनाशी!"
"अच्छी जगह है । मैं भी यहीं का पहा हूँ। कौन-से रोज काजीक है !
फुटबाल, किट, नौका-सेना यह दाद देखते हो; यह मुझे नौका-दौड़ में
मधमपम पाने पर पुरस्कार मिला था।"
"चमी मने
संगीत में
तय नहीं किया है, और मुझे प्रो-कुछ समय

निशश
कोमARE PREPइसमें रती मा पिसार
होगा farसे ऐसा सारा नए ? र भोपयों
नदी का तो
और डोमनि रोग में ratr दुपा, मथ महिने -
"Cral को सी सीर।" घोंगो मापको गा, कमानी
पान में थे। बोकी देर बार हाने प्रथम सर मारा।
"स्पा पथ भी यहा 'यून प्रतिनिगर?"
"पर भी तो गुमा ua"पूसरा सोरजोदा गया !
"भीमा या महो । गोंगी यांर मग और शुभवार को
होगी, और ही दिनों मुझे बाहिम कोने जा रहा है।"
कोमपदकाय उप ITपुर के पंधकारापान!
सखार के परखे यानिम पाने का धनुषाधाम पर Eि!
पर ये भाष कोमसिंह मेम्यक महाधिन मोजम समासका धेने पर
सनाक-"लो, ३५ शिकार कर पायें !" और दोनों ही पदे.
क्षने के लिये गये।
जय कोमलसिंह पपने कामे पाने को कमरे में गये, तो उनके मुख से
...
रामसिह को प्रावात दी बह भी चाक्षी कमी, हाफ पैट, पालिस किया हुमा
पूट पहने पर दाते प्रादर भाया।
"हम सब के गया माने हैं, रामसिंह!"
"जी, पमा, मन्नदाता ! मैंने सोचा कि पर साइप के पाने की सुखी
"थेवकूफ कहीं का! आमो, सादी पोशाक खामो
"जो, अन्नदाता
कोमलसिंह का एन रगों में तेजी से दौड़ रहा यादय की धाकन या
गई थी। उन्होंने कापते हुये हाथों से बर्श उठाई । साने को उठा का सिर में
बाधने लगे। की कार २६ गई धारपाई पर उसे फेंक, शीशे के सामने सरे
।

कलंक हो पान काइने बगे। एकाएक कुछ एयान या गया, मेपर घंटी बजा दी। सरता-दरता रामसिंह पाया। "देखो, कुंवर साहब से कह दो कि कपड़े पहन कर यहाँ पाये। मैं यही उनका इन्तज़ार करूंगा।" X x X के मलसिंह ने दरवाजे का परदा गिरा दिया । और दस मिनट के अन्दर ही अन्दर सिर से पैर तक राजपूत राईफल्स के कैप्टेग की पदी से सुसजिरा हो गये । यह पर्दी, जिसको सन्होंने पिछले पन्द्रह वर्षों से नहीं पहनी थी। कोमल सिंह ने अपना प्रतिविम्य शीशे में देखा। मुंह से एक विषाद-भरी सिसको निकली और उन्हें याद मा गई यह रात ! मोह ! कितनी भयावनी वह रात थी- राजपून राईफल्स की दो कम्पनियों को सरहद पर जाने का हुपम मिला गानों ने कुछ ऊधम मचाया था। कमाएर कोमल सिह का दोस्त महाबीर हो कर जा रहा था । वास्तव में जाना तो मेजर कृष्णकुमार को चाहिये था, पर किसी कारणवश वह रुक गये थे। कृष्णाकुमार का रुकना-कोमल सिह का यह सन्देछ, जो लगातार पिछले पाठ महीनों से उनके हृदय और प्रारमा को ग्ध कर रहा था, पुष्ट हो गया। मेजर कृष्णकुमार सुन्दर, हसमुख, नौजधान, बहादुर, अचूक निशानेबाज, प्रसिद्ध शिकारी-समी सरह के शिकार खेलने का शौकीन-शेर, पीते, हिरन, खरगोश, स्त्रिया...। पाते ही उसने निशाना बनाया कोमलसिंह की स्त्री को! रानी उस समय लगभग अठारह-बीस वर्ष की थी, असाधारण सुन्दरी! कोमलसिंह को बड़ी विकट परिस्थिति का सामना करना पड़ा। प्रकट तो कुछ कहा ही नहीं जा सकता था; न कुछ कहा और कहे भी किससे ? अपनी स्त्री से अपने अफ़सर से ! फौजी कानून का नियन्त्रण कितना कठोर होता है ! पर सन्देह की चिनगारी अन्दर ही अन्दर सुलगती रही, और जब श्राग असहनीय हो गई, कोमल सिंह ने मदिरा की शरण ली। उस रात, कोमलसिह ने मदिरा खूय पी। और जाने से इनकार कर दिया। पाठ महीने तो वह जलता पाया, और अय-मेजर और उसकी स्त्री अकेले" निभास जगदस्ती उनको ले जाया गया, मगर या गझे स्टेशन पर ही चोरी से उतर गये । खोटे, और बिना कुछ भागा-पीधा सोधे मेगा के बंगले में घुस गये। वहाँ उन्हें अपना सन्देश वास्तविकमा में परिणत होता दिखाई दिया, क्योंकि पहाँ गम उत्सुक, एप ग्यप्र, कुछ चिन्तित, कुछ विजिस-सी अपनी सो को पाया। यह प्रथम ही अवसर या कि कोगनसिंह ने धरने पर पा सुश कर दोपारोपण किया। उनके शब्द वाण की तरह पने थे। मेर ने क्रोधित हो शब्दों का टसर दिया तलसर । कोमसिह यार तो थया गये, पर कुछ घोटला गई श्रॉल के पास । चोख १२ सो गई, पर सम्पूर्णतया नहीं। धयके में गिर पड़े। गिरे-ही-गिरे कोमलसिंह ने उसर दिया पिरतीज की दो गोक्षियों से । मेमर माहब कटे पूर की नाह निर्माय हो गिर पदे। पिर. रि कोर्ट मार्शच । इनके पिले महरापूर्ण कार्य, विकृत मस्तिष्क आदि अन्य बातों का जूरी ने स्थान किया। पद से तो प्युन किये हो गये, पर प्राण दराड से पच गये-मिली इन्हें सात वर्ष की सप्त कैद ! इनके और राना के बीच में पड़ गई गैस की मोटी दीवाल और हाय में । यह धरने एक साल के पुत्र को लेकर पितृ-गृह बौड़ गई। थार को कोमलसिंह को विश्वास हो गया कि उनका सन्देह निमूब था। मेजरसाहब के अदबी ने बताया कि रानो साहिया ने कभी भी मेजर साहय को मध्याहन नहीं दिया। अलटा मिद देती थी। उस रात यह मेगर मादय से याशाखेने गई यी चपने पति के साथ जाने के लिए पर अब होता ही क्या? कोमसिंह के हृदय में एक टीस उठी-उन्होंने क्या क्या नहीं खोया- पद, मर्यादा, खो, पुत्र...? और बदले में पाया क्या । x "क्या अन्दर चा सकता हूँ?" 'हो, हो" परदा धीरे धीरे घटा । "चोद पिसाजी !"-राजेन्द्र के स्वर में प्रदा थी, श्रादर था, गर्ध था। कोमलसिंह के हृदय पर प्रायात लगा। उन्होंने तो यह कपड़े राजेन्द्र के हृदय में फौज के लिये धाव पैदा करने के लिए पहिने थे, पर वह तो सच समझ रहा है। "जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, सो इसी रेजीमेण्ट में भरती होऊँगा।" 1 कलंक 'जब मैं बड़ा हो जाऊँगा ! कुअलपुर राज्य-वंश का कलंक-कलंक ! कलंक तो स्वयं उन्होंने-कोमलसिंह ने लगा दिया, तो क्या इससे सच बातें कह दी जाय ! हो, यही ठीक है।' "अभी तुम इस रेजीमेण्ट में भातो मत होना, किसी और में हो जाना ।' इण्डियन एयर फोर्स में चले जाना, पर इसमें नहीं..." "तुम्हें यह तो मालूम ही होगा कि मेरा इसी रेजीमेण्ट में कोर्ट-मार्शल हुआ था। मैं इसमें कैप्टन था। यह धब्बा आसानी से धुलनेवाला नहीं; फिर भी पाशा करता है कि कुछ महीनों में में इस कलंक को धो डालने में समर्थ m। हम लोगों के लिए राजपूत राईकरम में भरती न होना शर्म की बात पर जय तक..." इसके आगे वह न बोल सके, गला भर श्राया । चुपचाप कपड़े परख कर चल दिये। ' राजेन्द्र भी धुप हो रहा, पर उसके दिल में यह बात चुभ गई। उसने मन-ही-मन प्रतिज्ञा कर ली इस कलंक को धोने की। x x । दूसर दिन सुबह सात बजे कोमलसिंह दवे पैरों राजेन्द्र के कमरे में गये। - यह सो रहा था। पढ़ी सावधानी से उसके ललाट का चुम्बन के निकता पाये । बाग़ में रामसिंह उनकी ढोली-ढाली धर्दी, थैला प्रादि लिये सदा था। ' कपड़े बदल स्टेशन पर पाये । सोच रहे थे-'जब वह जागेगा मैं मीलों दूर हूँगा, और रामसिंह उससे कहेगा यहुत जरूरी काम से गये हैं।' 'लड़ाई के दिनों में सिपाहियों की तो मुसीवत रहती है, पर कुलियों की भी कम नहीं रहतो, घरम् ज्यादा ही। आगे बढ़ कर खाई खोदना, ज़मीन घरायर करना, सफाई करना सब काम कुलियों को करने पड़ते हैं । कुलियों में तो सब ही तरह के भादमी खप जाते हैं, केवल पदन तगड़ा होना चाहिये। कोमलसिंह भी खप गये । डाक्टरी रिपोर्ट के अनुमार उगको दाहिनी आँख कुछ खराब यो । दृष्टि कमजोर थी। इसी कारण यह सिपाहियों में माती न हो पाये थे। इनकी कार्य-पटुता, इनके शाज्ञा-पालन, इनको तरसता से सभी इनसे सुश थे। पर यह ज्यादा किसी से मिलते-जुलते नहीं थे। लेबर पटालियन के जमादार पद पर इनकी जाति हुई चौर यह एक हवाई अड्डे पर भेज दिये गये। यह खुश थे। पदोगति हुई इसलिये नहीं, बल्कि इसलिए कि मन रसा नि था किपीन कामको वासी है, चौर उप की मेरी है, या art भादी नही गाभारा पारिकोज में सिपाही व मादुरी राहार्य कर सकेंगे और कि. पर हमी शा में प्रारी, पर उनरी सी मार पानी पिया | सन फोर में भागी होकर पवारने या ETEIN NEne का भारत और शाम डिसीम हो गई करू धोनी परीक्षा में पंच कर दिपे गये। हामेm-"anl गे मनुष्यों की भारयाजो सानो देश र उनका साया है। पानी पापमोरी ए ex मा गुग हो, यदि तुम भी मर शेषशासनही रायोग, मामानी रिभोपोगे।" भारदम कोममिद कोटे शहर भाग और निरा के कार पर पा गये। मेन में महिपा--"हरो, यहाँ सामो।" कोमलसिंह ने जौट कर धीमी साम हिपा और परे हो गये। पर मेयर धमीदेवादिन पाखे यहाँ कर पाया था। "में शुगेकही देता है।" को दुमकी के रेशीमेएट में है।" "नहीं, मम पहले ही देगा। मेर साइव को पावें चमक उठी। उन्हें याद मा गई, पन्द्रमोशप सीवाने । बन्दोंने पहिचान जिया अपने भूगर्व सहयोगी को मनाया सम्मो सास महापार की स्मरण शक्ति घोसादे गाय! दोनों राजपूत राईपरस में प्न थे। भाग्य का सेज-एक हो गया मेमर, दूसरा... पुखी । मेमर साइप के गुमे युष निकालने हो पाता था कि उनकी मौत कोमसिंह से जा टकराई। कोमलसिंह की शानों ने कुछ मूक प्रार्थना की, मेमर की चौखों ने रजत दे दी। "घरमा म मा सकते हो। मैंने पहिधारने में रानी की।" कोमलसिह तम्यू में से बाहर निकले । साली पर्व का आय उनके सामने बीमरस रूप धारण कर साहो गया। य तक तो पाशा थी, पर! परमारमा ! परमारमा !! अगर कलकम शुज सका सो..पद, मर्यादाउनी घी, अनकापुर-सब ही उनके लिये गाने ! फिर भी पर देर कलंक १२२ . जब तक साँसा, तब तक अाशा अब भी आशा अपना सुनहला स्वम दिखा रही थी- शायद हो जाय-कुछ...कोई दुर्घटना...हवाई हमला... ऐसा हो कुध, जिसमें यह कुछ धीरता दिखा सों, पर कुछ न हुआ। हवाई जहा दिनात आते और जाते, रहते और उत्तरते...पर कुछ न हुआ। एक रात जय कोमलसिंह की कम्पनी बुध काम कर रही थी, उन्हें कुछ र पर कुछ उड़ाके जाते हुये दिखाई पड़े । सब-के-सब नवयुवक थे । सय ही पोशाक में नय-शिख सक मुसजित थे । सभी प्रसन्न थे, खुश हो कर आपस में इसी मजाक करते हुये अपने-अपने यायुयानों में बैठ गये। अरे ! यह क्या सम्भव हो सकता है। क्या यह सच है ? क्या जो यह थावाज़ उसने सुनी, क्या...? जय कम्पनी काम समाप्त करके लौटी तो कोमलसिंह चुपके से मेजर साहय के खेमे में घुस गये । मेजर साहय कपड़े उतार फर सोने जा हो रहे थे कि उनको देख कर खुशी से फूल गये, लिपट गये उनसे । कुछ देर तक इधर-उधर की बात होती रहीं। "उस दिन तो श्रापने मामले को खूय साधा, नहीं तो गजय हो गया होता।" "पहले तो मुझे यदा ताज्जुब हुमा-और अगर तुम्हारी आँखे न बोलतों 'लो...." "ET, यह तो बताइये कि कुछ नये उड़ाके श्राये हुये हैं।" "हा, वैसे तो सभी साहसी हैं, पर इनमें एक बड़ा दिलेर है। है तो उन्न में सबसे छोटा, पर बहादुरी में सबसे पह-चढ़ कर है। वैसे तो नाम राजेन्द्रसिंह है, मगर हम लोगों ने 'दिलेरसिंह' रख छोड़ा है।" कुछ देर तक बात होने के बाद कोमलसिंह ने बिदा मांगी। मेजर सादव भी घड़ी देख कर बोले-"हाँ, जाओ, अब सो जायो।" पर कोमलसिंह सोने नहीं गये । चुपचाप मैदान की तरफ लौट गये । एक गदे में दिप गये । दिसम्बर का महीना था। कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। देखते ही देखते पा गये प्रकाश में बादल । टप-टप बूदें गिरने लगी मूसलाधार वर्षा होने लगी, पर केवल कमीज़ और लर्सी ही पहने कोमलसिंह बैठे रहे जब तक कि यह उड़ाके वापस नहीं लौट आये।। इसी तरह रोज रात को, नियमों का उल्लघन करके, भूख-प्यास की परवाह .

"समझा पिताजी,...और मां से न कहियेगा कि मैं को में हो गया हूँ। उन्हें नहीं मालूम है।" कोमलसिंह मन ही मन हंस दिये । घेधारा क्या जाने कि उनमें और राजेन्द्र की माँ के बीच में...और यह सोच कर फिर मन ही मन रो पड़े; पर कहा केवल इतना ही-"मुझे तुम पर अभिमान है, राजू ! तुम्हारे पुरखा मी स्वर्ग से गर्व भरी दृष्टि से सुम्द निहार रहे हैं।" मेजर साहब ने कुछ इशारा किया। “पिताजी, ममय हो गया । एक घटे याद लौट कर घाऊँगा। तब बातें हाँगी । आशीर्वाद दिजिये पिताजी, मैं अपने कार्य में सफल होऊ!" और राजेन्द्र घुटनों पर बैठ गया। उसके मुंह पर तेज था, घाँखों में एक ज्योति थी, धीर मन में एक सकल्प... "जा राज्..." इसके आगे कोमलसिंह कुछ न कह सके । गला भर पाया। केवल उसके शीश पर हाथ रख दिया। ठीक एक घटे के बाद एक घायुयान उतरा। दो जगह धक्के साने के बाद रुक गया, पर चालक न उतरा । लोग दौड़ पड़े, कोमलसिंह भी दौड़े। चालक घेहोश हो गया था, सिर से खून बह रहा था। कई जगह गोली लगी थी। उसका साथी मरा पड़ा था । अति सावधानी से उतारा गया । उतारते समय कुछ होश धाया। वहवड़ाने लगा-"दस नमन जहाज...घेर लिया...खूब बाहे...राजेन्द्र मे घार गिरा दिये...और आ गये...घेर लिया...राजेन्द्र को धेर लिया टंकी में भाग लग गई...थाग...राजेन्द्र ने हवाई जहाज का मुंह नीचे कर दिया...यम छोड़ दिये.. सब एक साथ . भयानक धडाका...फेक्टरी ...पुल...चिथड़े-चिपडे.. राजेन्द्र भी... और वह एक दफा जोर से कॉप कर चुप हो गया। सिर लटक गया । कोमनसिह विदिप्त-से हो गये । उसको निर्जीव लाश को झकझोरने लगे, "हा, राजेन्द्र.. भागे कहो...भागे कहो।" फिर जमीन पर गिर पड़े-"नहीं, ...नहीं परमारमा ऐसे नही...ऐसे नहीं..."

कलंक १२७ - फर्मल साहब नाराज हुये-"यह लेवर यटालियन का प्रादमी क्या कर रहा है-हटाश्री इसे ।" मेजर महावीर सिंह ने कुछ सोचा, फिर भागे बढ़ कर थोड़े से शब्दों में कुल कहानी कह दी। बेहोशी की हालत में कोमलसिंह अस्पताल ले जाये गये । उनकी बिहोशी को ही हालत में कर्नल साहब तार द्वारा हिस्पैच' भेगा । उत्तर भी पा गया ...जिसके फल-स्वरूप-- जय कोमलसिंह होश में थाये, तो खड़े हो गये । सामने ही एक शीशा था, उसमें अपना प्रतिबिम्ब देखा-"है, यह राजपूत राईफल्स की घर्दी कहाँ से आयी-किमने पहिनाई...उतारो इसको..." और कमर से पेटी खोलने लगे। "यह न कीजिये, मेजर कोमलसिंह !" फनंन साहब अन्दर घुसे । उनके पीछे और भी अफसर थे। कोमलसिंह-"क्या ये लोग मेरा मजाक उड़ा रहे हैं। मैं तो कुली खेपर पटालियन..." "मेजर कोमलसिंह, श्राप की बेहोशी में तार-द्वरा सारी कहानी हेड क्वार्टर्स भेज दी गई, जिसके फलस्वरूप भाप को 'डिसटिंग्विश्ड सर्विस आदर' तया राजेन्द्र के लिये विक्टोरिया कास...आप को मेजर यना कर, सम्मानित कर, अवकाश दिया जाता है।" कोमलसिंह घर लौटे । स्टेशन पर फीम ने सलामी दी । फौज ही की एक मोटर पर वह रियासत को रवाना हो गये, और वह जय पहुंचे, सो चिराग़ जन चुके थे। किले के फाटक पर राज्य-चिव जगमगा रहा था। रामसिंह में लगाया पा...नहीं, नहीं...राजेन्द्र ने लगाया था। रोशनी हो रही थी। सारा किला जगमगा रहा था । "बुझा दो इन रोशनियों को...किसने कहा था -नहीं-नहीं मव बुझानो, जलने दो," और मन-ही-मन युदबुदाये-'राजेन्द्र ने जलवाई है। मुझे बुभवाने का क्या अस्तियार !!

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Nirash

Author
Dr.tej Bahadur
Title
Nirash
File name
Nirash
Text
OCR done
Citation
1935
Published
2011/04
Publisher
Allahbad Maya Press
Language
Sanskrit
Pages
138
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
552316
Barcode
4990010033059.00
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C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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