Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Van Avam Vanya Jeev Sanrakshan Kyu Aur Kaise
Front matter
।।श्री गुरू जोरपरापन प्राक्कथन UJ पनो की सुरक्षा में जानवरो के प्रति दया-भाव अनादि काल से ही सारी भारतीय संस्कृति की उदात परम्परा रही । कालांनार में श्री गुरू जम्भेश्वर भगवान ने इसे आगे बढ़ाते हुए प्रगल पूर्वक इनकी रक्षा की हग प्रेरणा दी। वर्तमान में प्रकृति के निया की अवहेलना के दुष्परिणाम हमारे शागर्न है। हमारे लिए जीवनोपयोगी एया. पानी. जमीन और वनस्पति प्रदुषण गुना होगे से विश्व की अधिकाश आवादी भुकम्प, भाट य अकाल आदि विभीषिकाएं झेलन हेतु विवश हैं। जानवरों के प्रति हिसा य मासाहार की प्रवृत्ति बढन से सहज शाना चभाव के मनुष्य मे दया, करूणा. सहनशीलता व विनम्रता आदि मानवीय सदगुणों का लोप हो रहा हैं। इस प्रकार पर्यावरण प्रदुषण से ऊपजे विकट हालात के कारण आज हमारा जीवन विविः संकटो से घिर आया है। इनसे छुटकारा पाने हेतु हमे प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने क सिलसिला बन्द करना होगा। मौजूदा हरे पेड़ों व वन्य प्राणियो की सुरक्षा के ठोर उपाय तलाशने होगे। इनके विनाश के कारण जो क्षति हुई हैं. उसकी भरपायी हेतु वृक्षो व वन्य प्राणियों के उरित सरक्षण के साथ साथ इनकी वृद्धि के उपाय भी करने होगे। इस धारणा को गति देने हेतु समाज के रहनुमाओं और बुद्धिजीवियो को रागठित होकर सुनियोजित प्रयास कर अनुकूल वातावरण तैयार करना होगा। तभी हम इस क्षेत्र मे अभिष्ट सफलता हासिल कर पायेगे। इस विचार को बढावा देने हेतु लेखक ने अच्छा प्रयास किया है। एसे सद्प्रयासो के अधिक से अधिक प्रचार प्रसार की जरूरत हैं। ताकि आम आदमी वृक्ष एव जगली जानवरो की उपयोगिता को भली भॉति समझकर इनकी सुरक्षा के प्रति सचेत हो सके। इसके अलावा इनकी सुरक्षार्थ कानूनी पहलुओ की सटीक जानकारी देकर लेखक ने आम जन को जागरूक करने का सफल प्रयास किया हैं। इसकी काफी समय से जरूरत महसुस की जा रही थी। क्योकि पूर्व में कानूनी जानकारी के अभाव में कई लोग अज्ञान वश कानून की पेचीदगियों में उलझ जाते थे अत इस पुस्तक से वन अपराधो को रोकने हेतु विविध पहलुओ की जानकारी मिल सकेगी। 15.' को मिलेगा। विश्व कल्याण की भावना से संचालित ऐसे सद् प्रयासो को मैं आशा करता हु कि पुरतक में वर्णित तमाम जानकारियो का लाभ अधिक , अधिक बढावा मिलना चाहिए। यही आज के समय की प्रमुख मॉग हैं। । (स्वामी रामानन्द आचार्य)
वन एवं
'वन्यजीव
संरक्षण क्यो?
और कैसे?
लेखक
राम किशन डेलू
महासचिव अखिल भारतीय जीव रक्षा
विश्नोई सभा,
बीकानेर
राम किशन डेलू
मूल्य . 20/- रूपये मात्र
टकण
:- लिम्बा कम्प्यूटर्स, खाजूवाला, मो. 9414903805
मुद्रक :- मनीष प्रिन्टर्स एण्ड स्टेशनर्स
आवरण, सज्जा व्यापारियों का मौहल्ला, बीकानेर 2522957
अनुक्रमणिका - - 5 8 12 13 16 17 20 23 23 25 27 29 32 33 34 36 1. पर्यावरण घेतना के अग्रदूत - गुरू जम्भेश्वर भगवान 2. अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई समा 3. अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई सभा के उद्देश्य 4. अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई समा के नियम 5. क्यों जरूरी है वन सुरक्षा ? 6. वृक्षों की उपयोगिता एवं वृक्षारोपण 7. रेगिस्तान में वन विनाश की भयावहता 8. अवैध पेड कटाई रूकवाने हेतु सुझाव 9. वृक्षो की रक्षार्थ विश्नोई समाज की अग्रणी भूमिका 10. बहुपयोगी खेजडी-प्रकृति का अनमोल उपहार 11. उजड़ती हरियाली-उदासीन वन विभाग 12. पी. के. डी. नहर वन भूमि पर अवैध काश्त प्रकरण 13. खेजडली शहीदों की स्मृति में खाजूवाला में वृक्षारोपण 14. वन अधिनियम में बदलाव की आवश्यकता 15. क्यों आवश्यक है वन्य जीव संरक्षण ? 16. धर्म शास्त्रों में वन एवं वन्य जीव सुरक्षा की महिमा 17. महापुरुषों की नजर में अहिंसा 18. वन्य जीव सुरक्षा कानून का विकास-एक नजर में 19. अवैध शिकार की परिभाषा 20. शिकार के बाद बरती जाने वाली सावधानियाँ 21. वन्य जीव सुरक्षा कानून मे तलाशी गिरफ्तारी बरामदगी 22. वन्य जीव शिकार गतिविधियाँ 23. चिंकारा हरिणो के अस्तित्व पर संकट के बादल 24. वन्य जीव शिकार अपराध पर नियत सजा 25.' बन्दूक से शिकार करने पर 26.' जीप या किसी वाहन से शिकार करने पर 27.' चिड़ियाघर के किसी प्राणी को तंग करने पर 28. हरिण पालना दण्डनीय अपराध 29. वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1991 की विशेषताएं 30. शिकार प्रकरणों मे गवाह के बयानों की उपयोगिता 31. शंका समाधान-प्रश्नोत्तर 32. इसलिए कानूनी सजा से बच रहे है वन्य जीव शिकारी 33. अवैध शिकार की रोकथाम हेतु आवश्यक सुझाव 39 40 42 42 45 47 51 53 54 54 54 55 56 58 60 62 65 66 68 69 70 70 71 73 75 76 - 77 79 81 82. 34 कानून द्वारा संरक्षित वन्य पशु-पक्षी 35 हरिणो की रक्षार्थ अमर शहीद बलिदानी 36. विश्नोई महिलाओं के हरिण प्रेम की अनूठी मिशाल 37. जब मोहम्मद साहब हरिण के जामिन बने 38. हरिणी के प्रति बादशाह की सहृदयता 39 सौन्दर्य प्रसाधनों पर टिका क्रूरता का संसार 40. राजस्थान मे गौ वध प्रतिषेध कानून 41. गौ वंशीय पशु के अस्थायी प्रवर्जन के लिए परमिट 42 राजस्थान में पशु बलि कानूनी अपराध 43 बीमार एवं घायल पशु पक्षी की सेवा-हमारा धर्म 44 आक्सीटोक्सीन ईजेक्शन के दुष्परिणाम 45 पशु निर्दयता (निवारण) अधिनियम 1960 46. जमीन पर बिखरा पोलीथीन कितना घातक ? 47. यज्ञ का विधान क्यों ? 48. अ मा.जीव रक्षा विश्नोई समा बीकानेर के बढ़ते कदम 49 लूणकरणसर जीव रक्षा विश्नोई सभा की गतिविधियाँ 50 बीकानेर शहर इकाई की गतिविधियाँ जीव रक्षा विश्नोई सभा खाजूवाला परिचय 52. पीपुल फॉर एनीमल्स बीकानेर परिचय 53. मनुष्य के अनुकूल नही है-मांसाहार पद्य-भाग 54. हरिणो की व्यथा 55 धरती करे पुकार 56. पेड़ लगाओ जोत जलाओ 57. खेजडली महाबलिदान 58. खेजडली के शहीदो की अमरवाणी 59. प्रकृति सगीत 60. मत पेड़ काट इन्सान 85 86 87 69 51. 87 112 113 114 - 115 116 । । । । । । । 11. 118 119 1. :120 अनमोल है पेड़-पौधे. और पशु-पक्षी, इन्हे बचाईये पुस्तक-परिचय प्रस्तुत पुस्तक के प्रकाशन का प्रमुख उद्देश्य आम-जन में वन एवं वन्य जीवों के प्रति सुरक्षा के भाव पैदा करना है। वन एवं वन्य जीवो के विनाश की बनती हुई अंधी दौड़ को कैसे रोका जाय? हरे पेड़ों और जगली जानवरो की वृद्धि के क्या उपाय हो? पर्यावरण प्रदुषण के आसन्न खतरो को कैसे टाला जाय? आदि ऐसे कई ज्वलन्त प्रश्न है, जो प्रायः हमारे मनो मस्तिष्क मे तैरते रहते है। समय रहते अगर इनका समाधान सम्भव नही हुआ. तो हमारा अस्तित्व तक खतरे में पड़ सकता है। ऐसे में सृष्टि के सबसे बुद्धिमान प्राणी मनुष्य पर ये जिम्मेवारी आयद होती है, कि वह अपनी भूलो के कारण उपजे इस गम्भीर संकट से निजात पाने हेतु गहराई से सोच विचार कर उचित उपाय करे जिससे जगलो की सुरक्षा सुनिश्चित हो तथा जगली जानवरो के विनाश का सिलसिला थम जाय। इसके लिए हमें रोजाना जगह-जगह घटित होने वाले वन अपराधो की तह मे जाना होगा। आम तौर पर घटित होने वाले इन अपराधों में अपराध को अंजाम देते समय कानून की पकड़ से बच निकलने हेतु वन अपराधी अनेक प्रकार की चालाकिया करते हैं, हमे सावचेत होकर उनकी हर संदिग्ध गतिविधि पर पैनी नजर रखकर उनके द्वारा की गई कारगुजारियो को उजागर करना होगा तथा वन अपराध प्रवृति को समझ कर चौकस निगाह के द्वारा अपराध से सम्बधित तमाम जानकारियां हासिल करनी होगी। तभी हम वन अपराधियों को कानूनी सजा की परिधी मे ला सकते हैं, अन्यथा नहीं। आज वन्य जीवो के शिकार व हरे पेड़ो की कटाई के कारण बिगड़े पर्यावरणीय हालात विश्व मे चिन्ता का कारण बने हुए हैं। जन जागरूकता के अभाव में अपराधी कानून की पकड मे नही आ रहे हैं और कानून की उचित जानकारी के अभाव में अपराधियों तक पहुचकर उन्हें कानून के हवाले करवाना सहज आसान नहीं होने के कारण वन्य प्राणियों के अन्धाधुन्ध शिकार से सृष्टि की अनेक बहुपयोगी पशु-पक्षियो की प्रजातियां नष्ट हो गई. और कई दुर्लभ वन्य जीव प्रजातियाँ अपने अस्तित्व की अतिम घडिया गिन रही है। अर्थात नष्ट होने के कगार पर हैं। इस र अहिंसा के देश मे हिसा का ताडव मचा हुआ है। यूँ तो रोजाना छुपे तौर पर शिकारियों द्वारा मारे जाने वाले जानवरो की सख्या बहुत ज्यादा है, लेकिन शिकारियो को पकडवाने में कम लोगों द्वारा रूचि लेने के कारण कुल घटित घटनाओं में से मात्र 5 प्रतिशत वारदातें ही सामने आ रही है। इस स्थिति का सर्वाधिक निराशाजनक और दुखद पहलु यह है कि पकड में आने के बावजूद दिली लघर व्यवस्था और न्याय प्रक्रिया में व्याप्त भ्रष्टाचार का लाभ उगकर अधिकांश दोषी शिकारी अदालतो से धड़ा-धड़ बरी हो रहे है। ऐसे अराजक माहौल मे यह सबसे बड़ी चुनौती है कि कानून के डर से बेखौप इन दुस्साहसी शिकारियो मे कानून का भय केसे पैदा किया जाय? ताकि वे हताश होकर वन अपराध से किनारा करलें।
संसार के प्रत्येक जीव में प्रभू की महान सत्ता का वास है अतः कष्ट न दे। 2 वेसे तो वन एव वन्य जीवों की सुरक्षा हेतु कानून द्वारा कुछ नियम कायदे बने हुए हैं (जिनकी चर्चा हम इसी पुस्तक मे करेगे) इस सम्बन्ध में बने वन्य जीव संरक्षण अधिनियम मे शिकार मे दोषी पाये जाने पर कठोर दण्ड का प्रावधान है। लेकिन मौजूदा व्यवस्था की विसगतियों के कारण दोपी शिकारी को सजा दिलयाना सहज आसान नहीं रह गया है। क्योंकि वर्तमान में शिकारियो को दण्डित करवाने वालो से बचाने वाले अधिक हावी है, अत इस विषम स्थिति को बदलने के लिए हमे विचार करना होगा कि इस बिगड़े माहोल को कैसे पटरी पर लाया जाय ? मौजूदा वन्य जीवों व हरे पेडो को करो बचाया जाये ? वन्य जीवो की सुरक्षा प्रति खतरा बने शिकारियो एव वन माफियाओ को पकड़वाने हेतु क्या उपाय किये जाये? इन्हे दण्डित केसे करवाया जाय ? वन अपराधो को रोकने हेतु हमारी क्या भूमिका हो? वन एव वन्य जीव कैसे सुरक्षित रह सकते हैं ? आदि प्रश्नो के समाधान का प्रयास पुस्तक में किया गया हैं। इसके अलावा पालतु पशुओ के प्रति बरती जाने वाली कुरता को रोकने व गौ वध निषेध कानून तथा पोलीथीन के दुष्प्रभावो की जानकारी भी शामिल हैं। दुष्ट शिकारियो द्वारा निरतर किये जा रहे वन्य पशु-पक्षियों के अवैध शिकार और वन माफियाओ द्वारा की जा रही पेडो की बर्बादी को इनकी सुरक्षार्थ जिम्मेवार अधिकारी देखकर भी अनदेखा कर रहे है, सुनकर अनसुना कर रहे हैं, इनकी सुरक्षा हेतु किये जा रहे मौजुदा सरकारी प्रयासो मे गम्भीरता नहीं झलकती। समुचित दूरदर्शिता के अभाव में सतही तौर पर किये जा रहे थोथे उपाय इस समस्या के समाधान की दिशा में नहीं जाते। उदाहरणार्थ वन एव वन्य जीवों की सुरक्षा हेतु नियुक्त वन कर्मियो के पास हथियार बन्द क्रूर शिकारियों एव सगठित वन माफियाओ को खदेडने हेतु आवश्यक जीप. हथियार एव सचार के साधन उपलब्ध नही होने के कारण जंगल और जीव भगवान भरोसे छोड दिये गये है। इस प्रकार बेहद कमजोर निगरानी तत्र जगल के मौजुदा पेडो की रक्षा करने में अपने आप को असहाय पाता है। राजस्थान की आबोहवा में कम पानी मे फलने-फुलने वाले बहुपयोगी मरूभूमि के कल्पवृक्ष खेजड़ी, को कहने को तो राज्य वृक्ष का दर्जा प्राप्त है। लेकिन उन्हें काटकर ऊट-गाडो पर ढोने की सरकारी छूट के कारण इसे भारी मात्रा मे काट-2 कर आग की भट्टियो मे झौंका जा रहा है। रोजाना खेजडियों के कटे पडो से लदे गाडो की शहरो की और बढती लम्बी कतारे इनकी बर्बादी का स्वत बयान करती हैं। एसे निराशाजनक माहौल में जब दूर-2 तक आशा की किरण दिखाई नही देती, एसे मे पर्यावरण सरक्षण की सोच रखने वाले तमाम लोगो को एकजूट होकर आसन्न समस्या से छुटकारा पाने के लिए अ भा जीव रक्षा विश्नोई सभा एव पीपुल फॉर एनीमल्स जैसे पर्यावरण संरक्षण के हिमायती सगठनो से जुड कर सामूहिक रूप से सक्रिय भूमिका निभानी चाहिये। ताकि इस क्षेत्र मे आ रही मौजूदा एवं सम्भावित चुनौतियो का दृढता पूर्वक सामना किया जा सके। एस करना धार्मिक दृष्टि से तो उचित है ही साथ ही यह हमारा नैतिक दायित्व 3 भय व शत्रुता मिटाती है तो अहिंसा का मार्ग अपनाना होगा भी है। मात्र-जन घर्चा और भाषणों से समाधान सम्भव नहीं है इस हेतु हमे जमीनी सच्चाई को मानते हुए व्यवहारिक धरातल पर उतरकर गेस कार्य योजना को अमली जामा पहनाना होगा। लेकिन ऐसा तभी सम्भव हो पायेगा. जब आम आदमी को इस विषय में विस्तृत जानकारी होगी इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर पुस्तक का प्रकाशन किया गया है। हमारे जीवन जीने के लिए सबसे पहले स्वच्छ प्राण वायु (आक्सीजन) का होना अति आवश्यक है और प्रकृति द्वारा यह स्वाभाविक प्रक्रिया तय है कि हमारे द्वारा श्वांस लेकर वापस छोड़ी गई दुषित कार्बनडाई ऑक्साईड पेड़-पौधे पी लेते है और इसके बदले में हमें शुद्ध ऑक्सीजन देकर हमारे जीवन को बनाये रखते है, लेकिन धरती पर हो रही हरे पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई बढते मशीनीकरण के फलस्वरूप आक्सीजन की मात्रा घटने तथा जहरीली गैस की मात्रा के बढने से हमारा अस्तित्व संकट में है। मानवीकृत भूलों से रुष्ट प्रकृति अपना रोद्र रूप दिखा रही है धरती का तापमान सामान्य से अधिक बढ रहा है प्रकृति का स्वाभाविक धक गड़बड़ा गया है। जिससे हिमनदो की बर्फ पिघल रही है. अकाल, बाढ, अतिवृष्टि, अनावृष्टि भूकम्प से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है तथा पेड़ों की कमी से राजस्थान जैसे प्रदेश में रेगिस्तान का प्रसार हो रहा है. वनस्पतियो में कीटनाशकों एवं रासायनिक खाद के उपयोग के कारण भूमि का उपजाऊपन नष्ट होकर भूमि में पैदा होने वाले खाद्य पदार्थ जहरीले हो गये हैं। वातावरण में जहरीली गैसें मिल जाने से जन स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। ऐसे में हमारा यह नैतिक कर्तव्य बनता है, कि हम मौजुदा वन एव वन्य प्राणियो की सुरक्षा हेतु अनुकूल प्रयास कर पर्यावरण सरक्षण में अपना योगदान दे। इस पुस्तक के प्रकाशन मे सर्वाधिक सहयोगी रहे राजस्थान पथ परिवहन निगम में सेवारत उन परिचालक महानुभावो का मैं हृदय से आभारी हूं जिन्होने पर्यावरण सरक्षण हेतु प्रकाशित इस पुस्तक की तमाम लागत राशि को स्वयं वहन कर समाज के सामने एक नायाब उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनका यह त्याग वन एवं वन्य जीवो के प्रति आम जन मे सुरक्षा के भाव पैदा कर समाज मे जन चेतना जागृत करने में कारगर साबित होगा। इसके अलावा पुस्तक के प्रकाशन मे विश्नोई समाज के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ कृष्णलाल विश्नोई का रचनात्मक सहयोग मिला एवं समाज के वयोवृद्ध अधिवक्ता श्री पाबुराम बेनीवाल (बीकानेर) ने पुस्तक में संदर्भित कानूनी पहलूओ की जानकारी दी। वरिष्ठ पशुचिकित्सक डॉ. हनुमानराम सिरवी (वर्तमान खाजूवाला) जिन्होने सदैव घायल एव विमार पशु पक्षियों की चिकित्सा सेवा में रूचि लेकर अपना अमूल्य सहयोग प्रदान किया तथा पोलिथीन व ऑक्सीटोक्सीन इंजेक्शन के दुष्प्रभावों के बारे में अवगत करवाया। अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई समा प्रधान श्री हनुमान विश्नोई, मंत्री श्री हेतराम विश्नोई जिन्होने सभा की राष्ट्रीय स्तर की गतिविधियों की जानकारी में सहयोग प्रदान किया। बीकानेर सभा के जिलाध्यक्ष श्री बीरबलराम धारणियां, उपाध्यक्ष श्री शिवराज जाखड़, बीकानेर तहसील प्रभारी श्री मोखराम धारणियां, श्री लक्ष्मण खीचड़, श्री रामधन माल 4 जहां दया व धर्म नही, वहां निश्चय ही उल्टे कर्म होगें-गुरूजाम्भोजी (खाजूवाला) सेवानिवृत प्रशासनिक अधिकारी श्री ओमप्रकाश गोदारा, पूर्व विकास अधिकारी श्री मोहनलाल लोहमरोड़, विश्नोई धर्मशाला बीकानेर के अध्यक्ष श्री लेखराम धायल, श्री श्यामसुन्दर गोदारा, एडवोकेट श्री कृष्णलाल बेनीवाल, एडवोकेट श्री कृष्णकुमार दुकिया, एडवोकेट श्री बद्रीराम सिवर (खाजूवाला), एडवोकेट रामसिंह सिहाग, सभा अध्यक्ष श्री धुकलराम भादू (लूणकरणसर) आदि का आत्मिक सहयोग मिला। परम श्रद्धेय स्वामी रामानन्द जी आचार्य, स्वामी भागीरथदास जी शास्त्री, स्वामी कृष्णानन्दजी आचार्य, स्वामी गौवर्धनदासजी आचार्य, समराथल धाम के महन्त स्वामी रामाकृष्णजी व स्वामी छगनप्रकाशजी, वयोवृद्ध सत पुज्यस्वामी कनीरामजी महाराज की अनुकम्पा से मुझे पुस्तक लिखने की प्रेरणा मिली। इस पुस्तक की प्रकाशित एक हजार प्रतिया सुधि पाठको को लागत मुल्य पर उपलब्ध करवायी जा रही है। प्रथम सस्करण की प्रतियां विकते ही उसी विक्री राशि से पुन उतनी ही पुस्तकों का फिर से प्रकाशन करवाया जायेगा। इस प्रकार आपके सहयोग से यह क्रम अनवरत चलता रहेगा। पुस्तक के प्रकाशन मे अगर कोई त्रुटि रह गयी है तो सुविज्ञ पाठको के सुझाव सादर आमत्रित है ऐसी त्रुटि को अगले प्रकाशन मे सुधारा जायेगा। उपरोक्त वर्णित महानुभावो के अलावा जिन लोगो ने पुस्तक के प्रकाशन मे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सहयोग दिया है मैं उनका तहेदिल से आभारी हू। रामकिशन डेलू खाजूवाला 5 अरे निर्दयी! निरपराध मूक पशुओं की हत्या क्यों करते हो ? पर्यावरण-चेतना के अग्रदूत-गुरू जम्भेश्वर भगवान विश्नोई सम्प्रदाय के प्रर्वतक श्री गुरू जम्भेश्वर महाराज का प्रादुर्भाव विक्रम सक्त 1508 को मिती भादवा बदी अष्टमी के दिन नागौर जिले में ग्राम पीपासर के ग्रामपति श्री लौहटजी पंवार के घर माता हसादेवी की कोख से हुआ। उनका तेजोमय स्वरूप अलौकिक आभा युक्त था ! अपनी सकल्प सिद्धी से जो वे चाहते वही हो जाता था, वे पूर्ण निराहारी तथा भूख, प्यास, निद्रा, आलस्य, हर्ष, शोक, काम, क्रोध आदि से रहित थे। उनकी पलके नही झपकती थी तथा पेट व पीठ की बजाय चारों और से देखने पर उनका मुख मण्डल ही दिखाई देता था तथा उनकी देह की छाया नही पडती थी। उनके इस तेजोमय दिव्य स्वरूप एव उनके द्वारा बताये जा रहे चमत्कारों से प्रभावित माता पिता ने उनके बचपन के दुलार का नाम अचभा रखा। बाद में उन्हे जाम्भा कहकर पुकारे लगे। जन्म से सात वर्ष तक वे मौन रहे, 27 वर्ष तक गाये चरायी. 51 वर्ष तक मोक्षदायिनी वाणी कही। जिनमें से उनके कुछ शब्द उनके शिष्य नाथोजी को कठस्थ हो गये थे, उन्हे कालातर में लिपिबद्ध किया गया, जिन्हे शब्द वाणी कहा जाता हैं। विश्नोई समाज के हर घर मे इन 120 शब्दो का लयबद्ध ढग से सस्वर श्रद्धा पूर्वक पाठ किया जाता हैं। मरू भाषा में रचित इन शब्दों में मानवीय जीवन मूल्यों एव नैतिक आदर्शों का अत्यत सजीदगी से वर्णन किया गया है, तथा धर्म के गूढ प्रश्नों का इसमें सहज और सरल भाषा मे उल्लेख हैं। उन्होने किसी भी विद्यालय में शिक्षा ग्रहण नहीं की। स्वयं उन्ही के द्वारा उच्चरित शब्दो मे उल्लेख हैं। "म्हे सरे न बैठा सीख न पूछी निरत सूरत सब जाणी"। अपने माता-पिता के देहावसान के उपरान्त सारी पैतृक सम्पति गरीबों को दान कर वे समराथल नामक एक ऊंचे टीब्बे पर आ विराजे. और वहा प्रकृति को ही उन्होने अपना स्थायी घर मान लिया उन्ही के शब्दों में- "हरी ककहडी मडप मेड़ी, जहाँ हमारा वासा' यहां पर आकर उन्होने अपने तपोबल एव सकल्प से प्रकृति के गूढ रहस्यों का गहराई से विश्लेषण किया। विक्रम संवत 1542 में राजस्थान में भीषण अकाल पडा। अकाल की मार से दुखी लोग अपने घरों को सुना छोडकर मालवा की और पलायन करने लगे. तो गुरू महाराज ने उन्हे घर छोडकर जाने से रोका और अपने स्वयं के प्रयास से उनके लिए अन्न एवं चारे की व्यवस्था की। इससे लोग उनके भक्त बन गये। गुरू जम्भेश्वर महाराज ने उन्हें बताया कि इस मरू क्षेत्र मे अधिकतर अकाल के हालात का कारण यह है कि यहा हरे पेड कम है इसी कारण यहा वर्षा कम होती है अत आप लोग ज्यादा से ज्यादा वृक्ष लगाओं। पेड वर्षा के बादलों को अपनी और आकर्षित करते है। दुसरा उपाय यह बताया कि शुद्ध घी से यज्ञ करने से भी वर्षा के आसार बन जाते हैं और पर्यावरण शुद्ध होता है। ।
वर्तमान में व्याप्त हिंसा का बड़ा कारण मांसाहार प्रवृति हैं। 6 इस प्रकार पर्यावरण की शुद्धि हेतु यश एव वृक्ष सुरक्षा को उन्होने सुकाल के लिर आवश्यक माना। उन्होने मनुष्य को जीवन जीने की उत्कृष्ठ युक्ति पूर्ण 29 धर्म नियमों का प्रतिपादन कर घोषणा की कि "इन धर्म नियमों का पालन करने वाला भविष्य में विश्नोई कहलायेगा"। "इन नियमों का पालन करने वाले जब तक जीयेगें सुख पूर्वक जियेगें तथा मृत्यु के बाद मोक्ष के अधिकारी होगें"। इसे उन्होने - "जीयां ने जुगति मुआ ने मुगति" नान दिया। विक्रम संवत 1542 को उन्होने समराथल धोरे पर विराजमान होकर विश्नोई पथ की नींव रखते हुए इस धर्म को अपनाने वाले हजारों अनुयाईओं को पवित्र यज्ञ की साक्षी में पाहत पिलाकर दीक्षित किया जिन्हे आज विश्नोई जाति के नाम से जाना जाता है। उनके द्वारा बनाये गये 29 धर्म नियमों में 15वें व 17वें धर्म नियम में उल्लेखित- जीव दया पालणी. रूंख लीलो नही घावे" का ही प्रभाव था जिसके कारण आज तक खेजड़ी वृक्ष एव हरिण आदि वन्य जीवों की सुरक्षार्थ सैकड़ों नर-नारियों ने अपने प्राणों का बलिदान देकर भी इनकी रक्षा की। इतिहास साक्षी है कि विक्रम संवत 1648 में तिलवासनी (जोधपुर) में हरी खेजड़ियों की रक्षा हेतु मोटोजी नैण व तेजूदेवी और नैतूदेवी तथा विक्रम सवत 1661 को इसी जिले के ग्राम रामासड़ी की कर्मा व गौरा नामक दो नवयौवनाओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। विक्रम संवत 1710 में ग्राम पोलावास (जोधपुर) के नवयुवक बुच्चोजी ऐचरा ने भी खेजड़ीयों की रक्षा हेतु अपने प्राण होम दिये। विक्रम संवम 1787 में गुरू महाराज के आदर्शो से प्ररित विश्नोई समाज के 363 नर नारियों ने हरी खेजड़ियों की रक्षार्थ आत्म बलिदान देकर सम्पूर्ण विश्व को वृक्षो की सुरक्षा की ऐसी प्रेरणा दी जो युगों युगों तक हमारी राह को आलोकित करती रहेगी। जिनमें 69 महिलाऐ व 294 पुरूष थे। इसी प्रकार हरिणों की रक्षार्थ आज तक सैकड़ो लोगो ने बलिदान दिये और वन्य जीवो की सुरक्षार्थ बलिदान देने का सिलसिला आज भी जारी हैं। गुरू जम्भेश्वर भगवान ने अनेक राजाओं व महाराजाओं को ज्ञानोपदेश दिया जिनमें दिल्ली के तत्कालीन राजा सिकन्दर लौदी, जोधपुर के राव सातल, बीकानेर के राव लुणकरण, बीदासर के राव बीदा. कर्नाटक के शेख सदु, नागौर के मोहम्मदखां जैसलमेर के राव जैतसी व झाली राणी आदि प्रमुख हैं। उनका विचार था कि मात्र उत्तम हुन मे जन्म लेने से व्यक्ति बड़ा नहीं हो सकता- "उत्तम कुली का उत्तम न होयवा। कारण किरिया साल"।। (शब्दवाणी) धर्म के नाम पर पाखंड कर धर्म की गलत व्याख्या करने वालों को फटकारते हुए कहा "बामण थाते वेदे भुला, काजी कलम गुमाई। जोग बिहुणा जोगी भूला मुडिया अकल न काई ।। (शब्दवाणी) वृक्षारोपण को अधिकाधिक बढावा देने हेतु उन्होने स्थान-स्थान पर घूम-घूम कर लोगों को ज्यादा से ज्यादा पेड लगाने हेतु प्रेरित किया। - 7 दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान - रामचरित मानस उन्होने अपने हाथों से लाखों पेड़ लगाये। उनके इस अभियान के दौरान लगाये गए पेड़ों में ग्राम रोटू जिला नागौर जिसमें एक ही दिन में लगाए गये 3 हजार से अधिक खेजड़ी के पेड़ आज भी विद्यमान हैं। गुरू महाराज के वरदान के कारण उन पेडों पर रहने = वाले पक्षी वहाँ के खेतों में नुकसान नहीं करते और उस क्षेत्र में कभी अकाल नहीं पड़ता। वृक्षारोपण के अलावा उन्होने पेयजल हेतु जन सहयोग से अनेक स्थानों पर घूम-2 कर तालाब, कुण्ड आदि बनवाये जिनमें समराथल व जाम्भोलाव को पवित्र तीर्थ माना जाता है। हरे पेड काटने वालों को वे टोकते हुए कहते-अरे भाई अपने परम हितेषी पेड़ों को क्यो काट रहे हो? "कायं काटी वनरायो" (शब्दवाणी) इसी प्रकार निरीह जानवरों को मारने वालों को डाँटते और कहते:- "रे रे पिडस पिंडू, निरधन जीव क्यू खण्डू (शब्दवाणी 38) जीव हिसा करने वाले पाखडी जोगियो को फटकारते। "जटा बधारो जीव सघारो, आयसा ये पाखण्ड तो जोग न होई" (शब्दवाणी 43) हिसा भाव का विरोध करते हुए अक्सर वे ऐसा करने वालों से पूछते- आप स्वयं मरना नही चाहते, फिर दूसरो को मारने क्यो दोड़ते हो ? "यू क्यू भलो ज आपन मरिये, अवरा मारण धाईये"। (शब्दवाणी 20) एसे लोग जिनका जन्म तो अच्छे कुल में हुआ है, लेकिन उनके कर्म चण्डाल जैसे थे और वे जानवरों को मार कर खाते. उन अभागों की मृत्यु के बाद होने वाली अधोगति का उन्होने शब्दवाणी में बड़े मार्मिक ढग से वर्णन किया है जो इस प्रकार है- जाका जनम नही पर करम चण्डालूं। और कू जिभै कर आप कू पौखणा।। जिहिं की रूह लै दी जेसी दौरे घुप अन्धारो। तानवे तानबा, छान छानवा। कूक वै पुकारवा जाकी कोई न करवा सारू । (शब्दवाणी 112) इसी प्रकार समराथल धोरे पर उनके उपदेश सुनने पहुंचे मुसलमानों को धर्मोपदेश करते हुए वे कहते-हे भाई! किसकी आज्ञा से तुम गाय, बैल व बकरी आदि परोपकारी पशुओं को मारकर खाते हो ? स्वयं खुदा आपके हिँसायुक्त कर्मों का हिसाब मांगते हुए जब आपसे पुगेंगे कि इन निर्दोष जानवरो को क्यो मारा ? तो क्या जबाब दोगे? क्या इनकी मृत्यु के दौरान इन्हे होने वाली मर्मान्तक पीडा का तुम्हे अहसास है? अगर इनको मारकर खाना जायज है तो स्वयं करीम (ईश्वर) ने गायें क्यों चराई? फिर तुम अपने शरीर को पुष्ट करने हेतु इनका दुध, दही, घी क्यो खाते हो? गाय माता के समान अमृत मय दुध देकर हमारे शरीर का पोषण करती है उसका दुध अगीकार करने योग्य होता है ऐसे परोपकारी पशु पर छुरी चलाने वाले पढ सुनकर भी खाली रह गये। उनकी दृष्टि में जो व्यक्ति रहम (दया) का भाव रखता है वही वास्तव मे रहमान नाम रखने योग्य है। वे हिसा करने वालों को प्रेम से समझाते कि आप लोग जानवरों के प्रति जोर जबर्दस्ती करने वाली करद (छुरी) का त्याग करोगे तभी विश्व कल्याण की कामना ---- - 8 तुलसी दया न छोड़िये जर लग घट में प्राण - रामचरित मानस से तुम्हारे द्वारा परे जाने वाले कलमे को खुदा सुन पायेमें अन्यथा नही- "जोर जरय करद जै छाडो, तो कलमा नाम खुदाई (शब्दवाणी 106) अगर जानवरों पर इस प्रकार जोर-जुल्म करोगे तो अत समय के बाद इस' से कलकित जीवात्मा को अपार कष्ट उठाने पडेगें। जीवा ऊपर जोर करीज, अंतकाल होयसी भारूं। (शब्दयाणी 9) जीव रक्षा को वे धर्म का अभिन्न अग समझते थे उनका स्पष्ट अभिमत था कि उस दया व सवेदना नही है वहा निश्चय ही उल्टे कर्म होगे। कर्म फल का मजाक उड़ाने दान नास्तिकों की और मुखातिब होकर समझाते-"आप लोग ससार में आने से पूर्व किये ग सदकर्म के वादे को भूल गये हो"- "भरमी वादी वादे भूला, काय न पाली जीव दयो' (शब्दवाणी 44) वृक्षो की कमी के फलस्वरूप निरतर पड़ने वाले अकाल से निपटने हेतु उना द्वारा दर्शायी गई युक्ति के अनुसार वन एवं वन्य जीवों को बढावा देकर उनकी और पर्यावरण शुद्धि के लिए घर-घर में यज्ञ का विधान मात्र विश्नोई समाज ही नहीं बल्कि भौतिक चकाचौंध मे भटकी सम्पूर्ण मानवता को युगों युगों तक राह दिखाता रहेगा। अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई सगा -परिचय वैसे तो विश्नोई समाज का हर व्यक्ति शुरू से ही वन्य जीवो की सुरक्षार्थ सजग प्रहरी की भूमिका निभाता आया है। लेकिन शिकारियो की बढती हुई उच्च राजनैतिक पहुच तथा इस क्षेत्र मे आ रही बडी धुनौतियो से निपटने हेतु समाज में एक ऐसी सगठित शीर्ष नेतृत्व करने वाली सस्था की जरूरत महसूस की गई जो इस क्षेत्र में सक्रिय भूमिका का निर्वहन कर सके। और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु प्रथम प्रयास मे मेहराणा (पजाव) मे चौ रामजीलाल विश्नोई की अध्यक्षता में सन् 1966 मे "शिकार निरोधक कमेटी" का गठन हुआ जिसमे चौ सतकुमार जी राहड को प्रचार मन्त्री बनाया गया। इसके बाद दिनाक 15 1 1975 को इस सस्था का नाम बदलकर अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई सभा कर दिया गया। निस्वार्थ भाव से कार्य करने वाले श्री सतकुमार जी राहड़ निवासी दुतरावाली को इस सभा का प्रधान बनाया गया। सभा के सदस्य बनने की पहली शर्त शाकाहारी होना रखी गयी तथा इसकी वार्षिक एवं आजीवन सदस्यता शुल्क प्रारम्भ में क्रमश 100. 1000 रूपये रखा गया तथा कालांतर मे पजाब के अलावा हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, उडीसा, बिहार, आदि अन्य प्रातो मे भी इसके सदस्य बनाए गए। 31 सालो के लबे सफर मे सभा द्वारा किए गए कार्यो की फेहरिस्त काफी लबी है। अत. पाठको की सुविधार्थ कुछ विशेष चुनिदा घटनाओ को इस पुस्तक में सम्मिलित किया गया है। जो इस प्रकार हैं.- सन् 1975 मे पजाब सरकार ने श्री सतकुमार राहड को मानद वन्य जीव प्रतिपालक नियुक्त किया जिससे उन्हे शिकारियों को पकडकर उनके खिलाफ कोर्ट में चालान करने के अधिकार निरजीव आगे सरजीव मारे, डूब गया बिन पानी - संत विल्हौजी. 9 मिल गए। 24 नवम्बर 1975 को निमन्त्रण मिलने पर उन्होने दिल्ली में आयोजित विश्वधर्म सम्मेलन में भाग लेकर गुरू जम्भेश्वर जी के नियमों व पर्यावरण संरक्षण के संबंध में अपना ध्याख्यान प्रस्तुत किया। उनके भाषण की विश्व भर से पधारे प्रतिनिधियो ने भूरी-2 प्रशसा की और सचार माध्यमों ने इसे विश्व भर में प्रसारित किया। इसी वर्ष सभा के कार्यों के मद्देनजर पजाब सरकार ने पजाब के 16 विश्नोई वाहुल्य गाँवों में वर्ल्ड लाईफ सेन्चुरी बनाकर वहाँ के वन्य जीवों को संरक्षित घोषित कर दिया। दिनाक 1711.77 को गांव लोहावट (जोधपुर) में हरिण शिकारियों से संघर्ष में श्री बीरबलराम खीचड के शहीद होने पर श्री संतकुमार राहड़ ने शहादत स्थल पर शहीद की मूर्ति लगवाई तथा शहीद की पुण्य समृति में लोहावट में शहीदी मेला शुरू करवाया जो प्रतिवर्ष 17 दिसंबर को लगता है तथा शहीद के आश्रितों को 1200 रूपये नकद व एक सिलाई मशीन मदद स्वरूप प्रदान की गई। दिनाक 84.78 को हरियाणा के भूत्तनकलां मे श्री केहरसिह जाट हरिणों के शिकारियों से मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गए। प्रधानजी ने वहां पहुचकर शहीद के परिजनो को सात्वना दी तथा 1100 रूपये मदद स्वरूप दिए. वहा के सरपंच श्री मोमनराम की प्रधानगी में वहां की सभा का प्रभार सौंपा गया। इसके बाद उन्होने विश्नोई समाज के अत्यंत गौरवशाली खेजडली के खडाणे पर ध्यान केन्द्रित कर, हरे पेड़ों की की रक्षार्थ आत्म बलिदान देने वाले 363 शहीदों की शहादत को चीर-स्थायी बनाने के लिए उन शहीदो के गावों में जाकर उनके वंशजो से तथा बिश्नोई समाज के भाटों से सम्पर्क स्थापित कर 50 गावों के 69 स्त्री एव 294 पुरूषों के नाम पिता के नाम, गोत्र आदि का सम्पूर्ण विवरण सूचिबद्ध किया। वहां के स्थानीय लोगों की मदद से चौ गंगाराम विश्नोई की अध्यक्षता में एक मेला संचालन कमेटी बनाकर शहीदी मेला प्रारम्म किया। स्व. श्री रामसिह विश्नोई आदि समाज के लोगों ने उनका भरपूर सहयोग किया. शहीदों की पावन समृति मे शहीद-स्थल पर शहीदी स्मारक बनाया गया। दिनाक 12.12.78 को विश्व के इस प्रथम पर्यावरण मेले का शुभारभ अद्वितीय घटना थी। दिनाक 27.1278 को सऊदी अरब का शहजादा प्रिस बदर भारत सरकार से अनुमती लेकर जैसलमेर जिले के रामगढ गांव में गोडावण के शिकार हेतु शाही लवाजमें के साथ आया। स्थानीय समाज के विरोध के बावजूद जब वह नही माना, तो सभा ने दखल कर विदेश मत्रालय से सम्पर्क स्थापित कर प्रिस बदर को शिकार करने से रुकवाया। सन् 1981 मे कुछ इर्ष्यालु लोगों की नुक्ताचीनी से व्यथित श्री सतकुमार राहड़ ने अपने पद से इस्तिफा दे दिया। अत सालभर तक सभा का काम बाधित होने पर समाज के द्वारा उन्हे पुन दिनाक 13882 को सर्व सम्मति से आजीवन प्रधान चुन लिया गया। इसके बाद उन्होने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिनाक 24882 को वे राज्य सरकार (पांव) द्वारा वन्य जीव : . .
जीवां. उपर जोर करि, अन्त काल होयरी मारूं - गुरूजाम्भोजी. 10 रालाहकार बोर्ड के सदस्य पुन लिये गए। दिनांक 11.5.83 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में स्थित ग्राम मंगलपुर जौरा के श्री हरिनारायण वाजपेयी ने नील गायों के शिकार पर पाबंदी की मांग पर कानपुर जिला प्रशासन को पूर्व अल्टीमेटम देकर आत्मदाह कर लिया। सूचना मिलते ही प्रधानजी घनास्थल पर पहुंचे यहाँ नीलगायों के शिकार पर प्रतिबंध लगवाया तया शहीद की प्रतिमा का अनावरण किया। सन् 1984 में उड़ीसा सरकार के निमंत्रण पर वे उड़ीसा गए। वहां पर मांसाहारी लोगों द्वारा सरशित काले हरिणों के आवास क्षेत्र का दौरा कर वहां के लोगों की हरिणों के प्रति प्रेम-गाव की प्रशंसा कर उनका मनोबल बढाया। दिनांक 15.187 को समा की और से जोधपुर में राष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. एस. एम. मोहनोत को 10000 रूपये नकदी व प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। दिनांक 18.292 को भारत सरकार के प्रधानमंत्री श्री पी.वी. नरसिम्हाराव ने उनको जीव रक्षा के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यों के फलस्वरूप इदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित किया। इस पुरस्कार की प्राप्त राशि एक लाख रूपये उन्होंने अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई सभा को समर्पित कर अतुलनीय त्याग का परिचय दिया। दिनाक 9-12--27 को पर्यावरण संरक्षण की यह महान विभूति अपना नश्वर शरीर छोडकर अन्नत में विलीन हो गई। श्री सतकुमार राहड के देहावसान के बाद श्री हनुमान विश्नोई समा के प्रधान बने। श्री संतकुमार के साथ पूर्व में काफी लंबे समय तक साथ रहने पर उन्हे सभा की कार्य प्रणाली का अनुभव था। वे 1980 से पंजाब राज्य के वन्य जीव सुरक्षा सलाहकार बोर्ड में प्रतिनिधी भी है इनके कार्यकाल में निम्न कार्य सपादित किए गये.- दिनांक 25.1297 को समा के सदस्य श्री हनुमानदास सीगड निवासी मौजगढ (हरियाणा) को शिकारियों द्वारा ट्रेक्टर से कुचलकर घायल करने पर समा ने दोषियों के विरूद्ध जानलेवा हमले की कानूनी कार्यवाही करवाई तथा समा के जाबाज कार्यकर्ता को सम्मानित किया। दिनांक 26298 को ग्राम मिठडिया (राजस्थान) में शिकारियों की गोली से घायल लोगों की सहायता के लिए वे घटनास्थल पर पहुंचे और पुलिस थाने में केश दर्ज करवाया। दिनाक 20898 को घडसाना (श्रीगंगानगर) में शिकारियों द्वारा 24 हरिणों के शिकार करने पर दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करवाई। दिनाक 2.1098 को सर्वाधिक चर्चित शिकार प्रकरण जिसमें जोधपुर जिले के कांकाणी क्षेत्र में फिल्मी सितारे सलमानखान, आदि के द्वारा किये गये काले हरिणा के शिकार के विरोध में वन अधिकारियों से मिलकर राजस्थान हाईकोर्ट में मुकदमा दायर करवाया गया।
| गली में फेंका पोलीथीन गाय की मौत का पैगामा दिनांक 23750 को कंदूखेड (पंजाब) में वन्य प्राणियों की रक्षा हेतु लोगों को प्ररित करने के उद्देश्य से एक बहुत बड़ा सम्मेलन आयोजित किया गया। दिनांक 6699 को ग्राम गीलावाला (हनुमानगढ) में शिकार होने पर शिकारियों के विरुद्ध मुकदमा दायर किया गया। दिनांक 7.1099 को गांव सांवतसर जिला चुरू राजस्थान में घटित 40 हरिणों के शिकार के विरोध व रोप स्वरूप दिनांक 14.1199 को महात्मा गांधी की समाधी राजघाट नई दिल्ली में प्रधानजी की अगुवाई में धरना देकर आक्रोश प्रकट किया व समाज के लोगों ने रैली निकाली। दिनांक 89.2000 को ग्राम विराई (जोधपुर) के श्री गंगाराम ईसरवाल के शहीद होने पर उनकी धर्मपत्नी श्रीमती किशनीदेवी को 51 हजार रूपये नकदी देकर सभा द्वारा खेजड़ली मेले में सम्मानित किया गया। दिनांक 209.99 को ग्राम चातरा मांजरा (नागौर) राजस्थान पुलिस में सेवारत जांबाज सिपाही श्री सुखराम जाट के शिकार प्रकरण में शहीद होने पर शहीद के गांव जाकर शहीद को श्रद्धांजली दी गई. तथा 5100 रूपये नकद मदद स्वरूप शहीद के आश्रितों को दिये गए। दिनांक 9.122000 को अबोहर में एक बहुत बड़ा समारोह आयोजित कर समा के संस्थापक व पूर्व प्रधान स्व. श्री संतकुमार विश्नोई की आदमकद प्रतिमा का अनावरण, समारोह की मुख्य अतिथि श्रीमती मेनका गांधी भारत सरकार प्रतिनिधि से करवाया गया। सन 2001 में हनुमान विश्नोई प्रधान अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई समा को अवैतनिक मानद वन्य जीव प्रतिपालक नियुक्त किया गया। दिनांक 17.12200 को शहीद श्री बीरबलराम की पुण्य तिथि पर ग्राम माप तहसील फलौदी जिला जोधपुर की विरांगना श्रीमती गोमती देवी, जिसने अदम्य साहस का परिचय देकर अकेली ने शिकारियों का मुकाबला कर मारा गया हरिण छीन लिया था, उसकी वीरता पर उसे 1100रू. नकद व शाल ओढाकर लोहावट में सम्मानित किया। दिनांक 2232003 को नागौर (राजस्थान) में आयोजित जीव रक्षा सम्मेलन में समा द्वारा ग्राम मिंयासर जिला बीकानेर में हरिण रथार्थ शहीद छैलुसिंह राजपूत की विधवा को 51000 रूपये की राशि देकर सम्मानित किया गया। दिनांक 2832005 को (चैत्र वदी तीज विक्रम संवत 1661) को खेजड़ियों की रक्षार्य नागौर जिले के गांव पौलावास में शहीद बुच्चों पी ऐचरा की पुण्य समृति में उनकी पावन समाधी स्थल पर शहीदी मेला शुरू किया गया जो प्रति वर्ष चेत्र बदी 3 को लगता है। दिनांक 2-9-2006 को खेजड़ली शहीद मेले के अवसर पर हाल ही में हरिण रखार्थशहीद स्व. श्री गंगाराम ज्याणीकी धर्मपलि को 5 हजार रूपये नकद देकर सम्मानित किया गया। इसके अलावा प्रति वर्ष जीव रक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को समा 12 |संकल्प करो कि पोलीथीन जलाकर नष्ट करेगें। द्वारा सम्मानित किया जाता है। जीय रक्षा विश्नोई सभा के प्रधानजी ने इस प्रकार समय-समय पर देश के किसी भी कोने में शिकार की वारदात की सूचना मिलने पर घटना स्थल पर जाकर यथा सम्भव कार्यवाही की। अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई समा के उद्देश्य 1 2. 4. 5 अपने सदस्यों को प्राणी मात्र से प्रेम करना सिखाना। थलचर, जलचर, नभचर तथा वनचर की रक्षा करना। उनकी चिकित्सा का प्रबन्ध करना। 3 ससार के पशु पक्षी मनुष्य मात्र की सेवा करते है, इसलिए लोगों को शाकाहारी बनाने का प्रयत्न करना। गाय हमारे को दुध देकर मा के समान पोषण करती है। गौ वध पर प्रतिबन्ध हेतु प्रयत्न करना एव उत्पीड़न रोकना। शिकार प्रभावित क्षेत्रों मे वन्य जीवों के शिकार की वारदातो पर अकुश लगवाना. एव मासाहार सेवन के दुष्परिणामों का प्रचार करना। 6. पर्यावरण सरक्षण हेतु वन एव वन्य जीवो की रक्षार्थ परिचर्चा शिविर आयोजित करना, कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण हेतु विचार गोष्ठियों का आयोजन करना. वन्य जीवो की सुरक्षा से सम्बधित राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओ का आयोजन, व क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों का सम्मान करना। पर्यावरण सतुलन एवं वन्य जीवों की सुरक्षा के महत्व से सम्बधित साहित्य प्रकाशित करना। फिल्मों तथा प्रदर्शनियों के आयोजन द्वारा इसके महत्व का प्रचार प्रसार करना। 8. वन्य जीवों एवं हरे वृक्षो की रक्षार्थ बलिदान हुए अमर शहीदों की पावन पुण्य तिथि पर शहीदी मेलों आदि का आयोजन करना। श्री जम्भेश्वर भगवान के बताये आर्दश नियम “जीव दया पालणी रूख लीलो नहीं घावै" को जन-जन तक फैलाकर हरे वृक्षों एवं जीव मात्र की सुरक्षा के प्रति जन जागृति के भाव उत्पन्न करना। 7 9 13 पेड़ लगाना और पनपाना हमारा पुनीत कर्तव्य है। अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई सभा के नियमः- 1. समा के साथ "विश्नोई" शब्द जीवों के प्रति इस समाज के बलिदान की क्षमता को देखते हुए रखा गया है। अत: यह संस्था विश्नोई धर्म के आदर्शों की हिमायती हैं। 2 विश्व के किसी भी देश व प्रान्त के भाई बहिन जो शाकाहारी है सभा के सदस्य बन सकते 3 जाति धर्म, वर्ग, रग, लिंग आदि के आधार पर किसी को सदस्य बनने से नहीं रोका जायेगा। 4. ग्राम सभा का सदस्यता शुल्क 100 रू. होगा एव ग्राम सभा के प्राथमिक सदस्य की अवधि । तीन वर्ष होगी। 5. आजीवन सदस्य सभा को 2100 रूपये एकबार में जो एक सौ रूपये प्रति वर्ष दान देगा व जिला. प्रान्तीय एवं राष्ट्रीय सभा का सदस्य होगा और चुनावो में भाग ले सकेगा, उसे मतदान का अधिकार होगा। कोई भी वयस्क आजीवन सदस्य उसे जिला प्रान्त या राष्ट्रीय कार्यकारिणी सभा का एक वर्ष का अनुभव प्राप्त हो वह राष्ट्रीय सभा मे प्रधान पद का उम्मीदवार हो सकता हैं। 6. हर आजीवन सदस्य और प्राथमिक सदस्य को एक प्रार्थना पत्र भरकर ग्राम या नगर जीव रक्षा विश्नोई सभा को देना होगा जिला सभा बनने पर सारे प्रार्थना पत्र जिला सभा के पास भेज दिये जायेगें। 7. अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई सभा की समस्त समाओं का वित्तीय वर्ष इस्वी सन के जनवरी से दिसम्बर तक माना जायेगा। 8. दान या चन्दा केवल शाकाहारियों से लिया जायेगा। 9. जहां केवल जीव रक्षा विश्नोई सभा लिखा होगा उसका अर्थ केवल अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई सभा होगा, परन्तु ग्राम नगर जिला व प्रान्त लिखना आवश्यक हैं। 10 हर शाकाहारी ग्राम में या बहुसंख्यक शाकाहारी ग्राम में जहा के बहिन-भाई चाहेगें जीय रक्षा विश्नोई समा बनाई जायेगी। जिसके चार पदाधिकारी - प्रधान, उपप्रधान, मंत्री तथा कोषाध्यक्ष होगें, और सात प्रबन्धक सदस्य कुल इण्यारह सदस्यों की एक अंतरिम समिति नियुक्ति की जायेगी अथवा चुनी जायेगी। 11. आम सभा का कोरम 1/10 होगा कार्यकारिणी की बैठक का कोरम 14 होगा पहली बार बुलाई गई बैठक का कोरम पुरा न होने पर दुसरी बार बैठक बुलाई जायेगी। फिर भी कोरम पुरा न हो तो जो भी कार्यवाही की जायेगी वह वैधानिक तौर पर मन्जूर होगी फिर कोई ऐतराज मान्य न होगा। 12. ग्राम सभा से राष्ट्रीय सभा तक का चुनाव तीन वर्षों के पश्चात हुआ करेगा एवं वोट परोक्ष अथवा अपरोक्ष एवं डाक द्वारा भी लिया जा सकता हैं। 13. महामंत्री के पास कार्यवाही का रजिस्टर पत्र व्यवहार पैड डाक रजिस्टर एवं फाईल - 14 पेड़ लगाना पुण्य महान गाते संत वैद कुरान। आय-व्यय की केश बुक चन्दा तया दान की रसीद, सम्पति का रजिस्टर, खर्च की रसीदे और जरूरत पड़ने पर और भी रजिस्टर या फाईल आवयकतानुसार रखी जा सकती है। महामंत्री अपने कार्य को सम्भालने के लिए आवश्यकतानुसार वैतनिक कार्यालय मंत्री एवं अर कर्मचारियों की नियुक्ति प्रधान की स्वीकृति से कर सकता है। प्रधान अपने पास बैंक की पास बुक रखेगें तथा आय व्यय का हिसाब पड़ताल करेगें आवश्यकता समझने पर अन्य समस् कागजात का भी निरीक्षण करेगें। 14. बैंक में खाता अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई सभा के नाम से खोला जायेगा बैंक खात से रूपये निकालने का अधिकार प्रधान, महामन्त्री, मन्त्री व कोषाध्यक्षा में से प्रधान के हस्ता अनिवार्य होगें एवं बाकी तीनपदाधिकारियों में से किसी एक के हस्ताक्षर होना अनिवार्य होगा 15. ग्राम जीव रक्षा विश्नोई सभा अपनी आय का 60 प्रतिशत अपने पास रखेगी 40 प्रतिशत जिला सभा को देगी. इसी प्रकार जिता समा कुल आय का 60 प्रतिशत अपने पास रखक 40 प्रतिशत प्रान्त की समा को देगी, इसी प्रकार प्रान्त 60 प्रतिशत अपने पास रखकर 40 प्रतिशत राष्ट्रीय देश की समा को देगी। सिवाय बीकानेर जिला कार्यकारिणी क) 16. ग्राम समा का मंत्री अपने पास संस्था (माग) के एकसौ रूपये जिले का मंत्री दो सौ पचास रूपये प्रान्त का मंत्री पाँचसौ रूपये तथा राष्ट्रीय महामंत्री एक हजार रूपये रख सकेगा। प्रा' समा का कोषाध्यक्ष अपने पास समा के दोसौ रूपये. जिले का कोषाध्यक्ष पाँच सौ रूपये. प्रान्त का कोषाध्यक्ष एक हजार रूपये राष्ट्रीय समा का कोषाध्यक्ष दो हजार सौ रूपये रख सक है। जिला समा का प्रधान अपने पास समा के पांच सौ रूपये प्रान्त का प्रधान एक हजार रूपये राष्ट्रीय प्रधान दो हजार रूपये रख सकेगे। ग्राम समा. जिला समा. प्रान्त समा तथा देश की समा शेष रकम किसी चैक या डाक खाते मे रखेगी। 16. ग्राम समा हर प्रकार के सांड की उचित रक्षा करने का प्रयल करेगी। सांड अयवा साँडे की देख भाल के लिए वेतन पर सेवक भी रखा जा सकता है। 17. अविश्वास का प्रस्ताव कार्यकारीणी के सदस्यो मे 2/3 मतों से स्वीकार हो जाने पर पदाधिकारी को अपना पद छोड़ना होगा एवं कार्यकारिणी उसके पदाधिकारी के स्थान पर शेष अवधि के लिए पदाधिकारी नियुक्त कर सकती है। 18. राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गन फैपल नात्र आजीवन सदस्यों में से ही होगा। राष्ट्रीय प्रधान का चुनाव वैद्य मतदाताओं द्वारा होगा। प्रधान अपनी कार्यकारिणी को स्वयं मनोनीत करेगा, राष्ट्रीय प्रधान अपनी कार्यकारिणी के किसी भी पदाधिकारी को कार्य ठिक न करने पर अथवा विश्वास न होने पर पद से वंचित करके कार्यकारिणी के ही अन्य सदस्यों में से दुसरे पदा कारी मनोनीत कर सकता है एवं अपने से निम्न स्तरीय संस्थाओं को भंग कर सकता है और उनके स्थान पर तदर्थ समिति (एडहॉक कमेटी) को मनोनीत कर सकता है। 19. प्रधान या महामंत्री थोड़े समय (जितने समय में सबको सूचना मिल सके) का नोटिस देकर बैठक दुला सकते हैं।
15 मानव तेरी यह मनमानी प्रदुषण की करूण कहानी। 20. वह सदस्य नहीं रहेगा:- (क) जो प्रार्थना पत्र देकर नाम कटवा ले। (ख) वंगवास हो जाने पर (ग) पागल हो जाने पर (घ) ग्राम या जिला छोड़ने पर (ड) कार्यकारिणी की और से बहिष्कृत होने पर (च) लगातार पांच बैठकों में उपस्थित न होने पर (3) सभा के उद्देश्यों, नियमों, पास होने वाले प्रस्तावों का उल्लंघन करने पर। 21. आय व्यय का हिसाव हर वर्ष छपवाकर वितरण किया जायेगा। 22. हिसाब देखने का हर सदस्य को अधिकार होगा। 23. जीव रक्षा विश्नोई समा किसी भी राजनैतिक संस्था से सम्बन्ध नही रखेगी। 24. समा उद्देश्यों तथा नियमों में परिर्वतन राष्ट्रीय समा की कार्यकारिणी 2/3 बहुमत से कर सकती हैं। 25. समा बुद्धिजीवियों तथा विद्वानों को संरक्षक भी बना सकती हैं। 26. समा हर प्रकार के सलाहकार भी मनोनीत कर सकती हैं। 27. समा का काम हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपी में होगा। आवश्यकता पड़ने पर दुसरी भाषाओं में भी किया जा सकता है। 28. ग्राम समा के चार पदाधिकारियों के अतिरिक्त प्रत्येक 25 सदस्यों पर एक प्रतिनिह पी जिला को भेजा जायेगा। जिला कार्यकारिणी मे सभा के 11 से 21 तक पदाधिकारी और सदस्य होगें। जिला पदाधिकारी प्रांत समा का निर्माण करेगें। प्रान्त की कार्यकारिणी के सदस्य 21 से 31 तक होगें (जिनमें पदाधिकारी शामिल है) प्रान्तों के पदाधिकारी स्पष्ट मतदान से राष्ट्रीय सभा का निर्माण करगें। जिसकी कार्यकारिणी के पदाधिकारियों सहित 21 से 51 तक सदस्य होगें। 25 सदस्यों पर एक प्रतिनिधी वाला फॉर्मुला जिला व प्रान्तीय सभा पर भी लागु होगा। 29. राष्ट्रीय समा के प्रधान के लिए चुनाव हेतु वोटर केवल वे ही आजीवन सदस्य होगें जिन्होने चुनाव तिथि घोषित किये जाने की तारीख तक कम से कम एक वर्ष पहले सभा की एक सौ रूपये प्रति वर्ष की सदस्यता अथवा दौहजार एक सौ रूपये की आजीवन सदस्यता ग्रहण की हुई हैं. एवं पुराने आजीवन सदस्य का भी 365 पहले दिन तक का कोई बकाया न हो, और जिसकी आयु चुनाव घोषणा तिथि तक 21 वर्ष की हों एवं प्रान्तीय समाओं के पदा किारी भी राष्ट्रीय सभा में वोट देने के अधिकारी होगें। 30. चन्दे के लिए रसीद बुकें जिला स्तर पर छपाई जावेगी। 31. जिला स्तर से उपर की समाओं की 6 महिने में एक बैठक होनी आवश्यक हैं ग्राम और जिला स्तर की सभा से जितनी चाहे बैठक बुला सकते हैं। 32. आजीवन सदस्यता शुल्क की कोपियां छपवाने, वितरण करने व सदस्यता शुल्क लेने इत्यादि का अधिकार केवल मात्र राष्ट्रीय कार्यकारिणी को ही होगा।
16 | प्रदुषण की काली छांया जीएन भर दुःख का साया। वों परूरी पर सुरक्षा ? आप कल्पना करे कि हमारे द्वारा सी गई कॉनलाई ऑक्साईट गैस को पीने पेड़-पौधे पर्याप्त मात्रा में मौजूद न हो तो क्या होगा ? राय स्वाभाविक तौर पर कॉर्बनड. ऑक्साईटस का अवशोषण नहीं होने से, उसकी मात्रा वायुमण्डल में अत्यधिक बढ जावे और ऐसा होना हमारे जीवन के लिए अत्यंत यसरनाक साबित होगा। वर्तमान में हरे पेड़ की अन्धाधुन्ध कटाई होने और वृक्षारोपण को उचित गाया नहीं मिलने के कारण स्थिी दिनों-दिन विगती जा रही है। यही कारण है कि विश्व भर के मौसम वैज्ञानिक पेड़ों है। कमी से वितित है। आदर्श स्थिति में पृथ्वी के क्षेत्रफल के हिसाब से एक तिहाई यानी 11 प्रतिशत क्षेत्र में हरे पेड़ों (वनों) का होना जरूरी है। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश में कुछ 22 प्रतिशत क्षेत्र में ही यन मौजूद है. जर कि राजस्थान की स्थिति तो और भी अधिक नाजुक और दयनीय है। राजस्थान में 33 प्रतिशत की बजाय मात्र 10 प्रतिशत भू-भाग में ही वन हैं। यही कारण है कि यहा प्राय. अकाल का स्थायी साया रहता हैं। वर्षों से अकाल की विभीषिका झेलते आ रहे इस मरू प्रदेश में आर्थिक दृष्टि से पिछड़ने का यह सबसे बड़ा मूल कारण पेड़ों की कमी से यर्षा का नहीं होना ही है। राज्य की 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी के कृषि और पशुपालन पर निर्भरता के बावजूद सरकार द्वारा इस समस्या की विकरालता से लगातार मुंह मोड़ना हैरत में डालने वाली बात हैं विकास के लम्बे चौडे । दावे और वादे करने वाले राज नेतागण अकाल के इस मुलभूत कारण पर गंभीर होकर कमी प्रयास नहीं करते। इस विषय पर मात्र भाषण देकर औपचारिकता तो निभाते है, लेकिन जब वन विकास पर ठोस नीति बनाकर ईमानदारी से लागू करने की बात आती है, तो टाल दिया जाता हैं। जब तक वन विनाश को रोकने और वन विकास को बढावा देने वाली स्पष्ट ठोस नीति नही बनेगी और उसके क्रियान्वन हेतु ईमानदार प्रयास नही होगें, तब तक वन विकास का नारा लगातार छलावा ही साबित होता रहेगा। वर्तमान में केन्द्र सरकार द्वारा "जो रोजगार गारन्टी योजना" प्रारम्भ की गई है। राजस्थान जैसे सुखे प्रदेश में इस योजना के तहत अधिकाधिक वृक्षारोपण एव वन विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाये तो प्रदेश को हरा भरा बनाने में काफी मदद मिल सकती हैं। जगत् के जीतने भी जीव है उनमें मनुष्य सबसे बुद्धिमान प्राणी हैं, इस नाते धरती को प्रदुषण मुक्त रखने की जिम्मेवारी भी उसी की हैं। लेकिन खेद का विषय है कि वह अपनी इस अहम जिम्मेवारी को निभाने मे पूर्णतया विफल साबित हुआ हैं। भौतिक विकास की अंधी दौड मे प्रकृति के नियमो की अवहेलना के चलते धरती, आकाश, हया, पानी एवं अतरिक्ष प्रदुषित हो गये। इनके दुष्परिणाम स्वरूप प्रकृति द्वारा सहज सचालित स्वाभाविक मौसमी तत्र गडबड़ा गया हैं. और इस प्रकार पर्यावरण प्रदुषण से उपजे विकट हालात के कारण क्रुद्ध । 17 जंगली जीव करे पुकार, हमें बचाने की दरकार। प्रकृति अकाल, अतिवृष्टि, बाढ-वभूकम्प आदि देवी प्रकोपों के द्वारा अपना कहर बरपाकर हमें अपनी गलतियों की सजा दे रही हैं। मानयीकृत इस गमीर चूक के कारण धरती के तमाम जीव धारियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। इस प्रकार पर्यावरण प्रदुषण विश्व की सर्वाधिक आसन्न समस्या बन गई है। सृष्टि के रचनाकार ईश्वर ने मनुष्य सहित अन्य प्राणियों के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए प्राण वायु (ऑक्सीजन गैस) की रचनाकर हमारे प्राणो को जीवित रखने का आधार खडा किया। इसी प्रकार पेड पौधों को मनुष्य आदि जीव धारियों के जीवन का आधार बनाया। लेकिन दोनों के श्वास लेने व छोड़ने की क्रिया में अन्तर रखा है, वो यह है कि पेड़ पौधे हमारी तरह श्वास तो लेते है परन्तु वे ऑक्सीजन की बजाय हमारे द्वारा छोडी गई दुषित गैस कार्बनडाई ऑक्साईज पीते हैं, और उसे अपनी श्वसन क्रिया के द्वारा ऑक्सीजन के रूप में बदलकर वापिस उगलते (छोड़ते) है। पेड़ पौधो द्वारा छोड़ी गई यह ऑक्सीजन ही हमारे प्राणों का आधार है। हमारे द्वारा श्वास लेने की क्रिया से ऑक्सीजन हमारे शरीर में प्रवेश कर फेफड़ों में से गुजर कर युन के साथ बहती हुई कार्यनडाई ऑक्साईड के रूप में दुषित अवस्था मे हमारे शरीर से बाहर निकलती है । तो उसे पेड पौधे सहज ही पी लेते हैं । इस प्रकार पेड़-पौधों और मनुष्य आदि जीव धारियों की आपसी निर्भर श्वसन प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है, और अनादिकाल से चली आ रही हैं । इसी पर हमारा जीवन टीका आ सामान्यतः हमारे वायु मण्डल में 21 प्रतिशत ऑक्सीजन, 78 प्रतिशत नाईट्रोजन तथा 1 प्रतिशत कार्वनडाई आक्साईड सहित अन्य गैसें होती हैं । जिसमें कार्बनडाई आक्साईड गैस की मात्रा मात्र 003 प्रतिशत ही हैं । उचित मात्रा में पेड़ पौधो के नही होने तथा चढते औद्योगिकरण के कारण कार्बनडाई आक्साईड की मात्रा बढने की सम्भावना बढती जा रही हैं. तथा ऑक्सीजन की मात्रा घट रही है। मनुष्य आदि अन्य जीवधारियों के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए ऐसी स्थितिया उचित नही कही जा सकती । अत: पर्यावरण संतुलन हेतु धरती के हर भू-भाग पर 33 प्रतिशत हरे पेड़ों की मौजूदगी आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता हैं. एव इसकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए । वृक्षों की उपयोगीता एवं वृक्षारोपण ससार में वृक्ष से ज्यादा उपकारी और कोई नही है। क्योकि हमारे जीवन का हर पल वृक्षो की दया पर आश्रित हैं । वृक्ष का फलना-फुलना मात्र औरो की भलाई के लिए निहित है । वैसे अगर वृक्षों के लाभो को ठीक से गिना जाये तो इसका हम ठीक तरह से मूल्यांकन ही नही कर पायेगें । क्योकि इनके फायदें अनगिनत और अनन्त हैं । लेकिन सबसे बड़ा फायदा यह है कि पेड़ हमें ऑक्सीजन देकर जिन्दा रखते हैं, और बदले में लेते है हमारे द्वारा छोडी गई दुषित कार्बनडाई आक्साइडे गैस। आप कल्पना करें अगर पेड इस दुषित गैस को पीने से इन्कार कर दें, तब क्या होगा ? इसकी कल्पना मात्र से ही हम सिहर उठेगें, क्योकिएसी अवस्था में हमारी मृत्यु , 18 1 डगर-डगर पर पेड़ लगाओ जीवन में खुशीयां ले आओ। निश्चित है । वृक्ष हमें फल फूल छाया एवं औषधियां तो देते ही है इसके साथ-साथ सर्दी गर्मी, और वायु के दाय को रातुलित करने का काम भी करते है कड़ाके की ठण्ड में शील लहर को रोकने की बहुत बड़ी जिम्मेवारी वृक्ष निभाते हैं, वृक्षो के अभाव में हमारी फसलों का अत्यधिक अमूल्य दाना शीतलहर (पाला) खा जाती है या फिर कडी धुप में बीज अकुरित होने की अवधि से पहले ही सूखकर नष्ट हो जाते हैं अत फसल की बढवार हेतु वृक्ष की सघनता अनिवार्य हैं । खेजड़ी के पेड़ को तो हर खेत में अनिवार्य रूप से लगाया जाना चाहिए। क्योकि खेजड़ी की पतियां उतम खाद तैयार करती हैं। और भूमि के उपजाऊपन को बढाती हैं अत वृक्ष विश्व की सर्वाधिक किमती धरोहर है। ऐसे महान परोपकारी वृक्षों की मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी के द्वारा अपने सर्वनाश की किमत पर लगातार की जा रही उपेक्षा सचमुच विस्मयकारी हैं। वर्तमान मे बिजली, पानी, रोजगार विषयक आदि न जाने कितने तरह के आन्दोलन हो रहे हैं, लेकिन हमारी आर्थिक उन्नति में बाधक मूल समस्या अगर कोई है तो वह है राजस्थान जैसे मरू प्रदेश में पेड़ों की कमी और हरे पेडो की कटाई। जिसपर कोई ध्यान नही दे रहा हैं । समय की पुकार है कि अब आम आदमी को सचेत होकर वन विनाश के खिलाफ मुँह खोलना होगा । अगर समय रहते इस गंभीर आसन्न समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब हम श्वास लेने के लिए भी तरस जायेगे। अत आज इस विकराल समस्या से विश्व को उबारना प्रत्येक व्यक्ति का धर्म है, अत इस आपद् धर्म को निभाने के लिए हमे अभी से कमर कसनी होगी । इसके लिए हर गाँव में जीव रक्षा सभा एव पीपुल फॉर एनीमल्स जैसे सगठन खडे किये जाये | जो हरे पेड काटने वालों को ऐसा करने से रोके और वृक्षारोपण और पोषण के पुनित कार्य को बढावा देने हेतु उपाय करे तथा संगठित होकर खेत-2 में खेजड़ी, नीम, पीपल, बट जैसे उपयोगी पेड लगाये जाये। एसे कार्यो की समीक्षा के लिए प्रति वर्ष वर्षाऋतु में वन-महोत्सव आयोजित कर ऐसे कार्यक्रमों को आगे बढाया जाय! वृक्षारोपण करने के लिए आम आदमी मे वृक्षो के महत्त्व के प्रति जनचेतना का भाव जगाना आवश्यक है । इस समझ को विकसित करने हेतु प्रारम्भिक स्तर पर सर्व प्रथम इसकी शुरूआत प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर से करनी होगी | घर मे हर बच्चे के जन्म के शुभ अवसर पर एक खेजडी का पेड लगाया जाये। विवाह होने पर वर वधू अपने भावी सुखी जीवन की मगल कामना हेतु, सुखद गृहस्थ जीवन के लिए अपने हाथों से पेड लगाकर अपनी वर्ष गांठ के इस यादगार पल को ताउम्र अपने हृदय में सजोकर पेड़ की देखभाल करें । इसके अलावा अपने प्रिय स्वजन के वियोग (स्वंगवास) होने पर उनकी आत्मा की शान्ति की कामना से दिवंगत आत्मा की पुण्य स्मृति में पेड लगाया जाये । प्रति वर्ष खेजड़ली शहीदी दिवस भादवा सुदी दसमी अथवा अन्य किसी महापुरूष से सम्बधित किसी विशेष तीज त्यौहार पर वृक्षारोपण किया जा सकता हैं । इस प्रकार अपने आत्मीय जनों के सुखद भविष्य की कामना एव पुण्य स्मृति में लगाये गये पेडों में परिवार के सभी लोगों का भावनात्मक लगाव पैदा होने से इनकी उचित देखभाल भी बेहतर ढंग से सभव हो सकती - खेजड़ल्यां खेतां री शान, जान गया है सकल जहांन। 19 है। घर के बड़े बुजुर्गों को चाहिए कि वे किस्से कहानियों के माध्यम से छोटे-छोटे बच्चों में वृक्षों के प्रति लगाव का भाव जागृत कर हरे पेड़ों का बीजारोपण करें । वृक्षो की सुरक्षा हेतु प्राण देने वाले पुण्यात्मा (शहीदों) की गाथाएं सुनाकर याल मन में हरे पेड़ों के प्रति अपनत्व के भाव जगाये जायें। गुरूजनो का भी कर्तव्य बनता है कि वे अपने--2 स्तर पर पाठशालाओं में अपने शिष्यों को हरे पेड़ो के महत्व को समझाकर उनकी सुरक्षा की घुट्टी पिलाये। प्रत्येक सरकारी एवं गैर सरकारी विभाग के अधिकारी अगर चाहें तो अपने अपने कार्यालय परिसर को हरा भरा बनाने हेतु बेहतर भूमिका निभा सकते हैं । पौधों को लगाना यद्यपि एक आसान कार्य हैं, परन्तु उनको पनपाना व सुरक्षा करना एक चुनौति पूर्ण कार्य हैं. जो आमजन की सहभागिता के बिना सम्भव नही है। अत. इस हेतु सुनियोजित ढंग से कार्य योजना बनाकर लग्न से कार्य किया जाये तो इस क्षेत्र में निश्चित रूप से एक नयी वृक्ष क्राति का सुत्रपात हो सकता है । अत. इस हेतु हमें आज से ही अपने मन में यह धारणा बना लेनी चाहिए कि "वृक्ष ही मानव मन को सुखी बनाकर उसे दृढ आर्थिक आधार दे सकता है" । बिश्नोई समाज एक धर्म प्राण समाज है। समाज द्वारा विश्नोई रत्न माननीय भजनलालजी की अगुवाई में आज तक समाज के धर्म स्थलों पर जो विकास के निर्माण कार्य किये गये हैं वो वाकई काबिले तारीफ हैं । परन्तु अब स्थिति की नजाकतता के मद्देनजर हमें अपने उन सभी धर्म स्थलों को वृक्षारोपण कर हरा भरा बनाने के पुनित कार्य में जुट जाना चाहिए. ताकि समाज इससे प्रेरणा लेकर इस पावन परम्परा को आगे बढाता रहे । यही धर्म का असली मकसद है, और इस मकसद को पूरा करने के लिए अब उमाज के प्रत्येक व्यक्ति को सक्रिय होकर जुटना होगा । आज के समय में हरे पेड़ों की सुरक्षा उतनी मुश्किल नही रही जितनी 300 वर्ष पहले थी । तब राजाज्ञा ही कानून और सजा होती थी । ऐसे विकट समय में भी हमारे पूर्वजों ने वन एवं वन्य जीवों की सुरक्षा मे कोई आंच नहीं आने दी। बल्कि अपने प्राणों पर खेल कर भी उनकी रक्षा की थी ।इस सम्बंध में खेजडली के खडाणे के उस प्रसंग का उदाहरण देना चाहुगा जब सत्ता मद में चूर जोधपुर राजा के मंत्री गिरधरदास भडारी ने खेजड़ी के हरे पेडों को जबरन कटवाना चाहा तो विरागना अमृतादेवी ने राज कारिंदें से कृल्हाडी छिनली और सिंहनी की तरह दहाड कर बोली-"तु अगर राजा का मंत्री है तो मैं एक विश्नोई की पुत्री हूं और गुरू जाम्भोजी को साक्षी मानकर प्रण करती हूं कि चाहे मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दो लेकिन पेड का एक पत्ता तक नही काटने दूगी । उसने सपरिवार खेजड़ी से चिपक कर अपने प्राण होमकर भी इस वचन को निभाया लेकिन खेजडी नहीं काटने दी । आगे क्या हुआ लिखने की जरूरत नही पूरा संसार जानता हैं कि अमृतादेवी विश्नोई द्वारा हरे पेड़ों की रक्षा हेतु धर्म की बलिवेदी पर स्वयं को होमकर जलायी गई जोत में उसके पति और पुत्रियों सहित 362 स्त्री, पुरूषों ने अपनी जान कुर्बान कर प्राणों की आहुति दी । लेकिन अपने धर्म पर आंच नही आने दी। आज उनके वशज 20 किसो. दया बिन धर्म, जाप विन. किसो जमारो - संत विल्हौजी हम उनकी शिक्षा को अपने जीवन में उतारने में कहां तक सफल है ? यह बात हमें अपने आप से पुछनी चाहिए। रेगिस्तान में वन विनाश की भयावहता । राजस्थान के अधिकतर जिले वर्षा के पानी पर निर्भर है । पूरे देश में सबसे कम वर्षा बीकानेर, जैसलमेर, चुरू, जोधपुर, बाड़मेर आदि क्षेत्रों में होने के कारण यहा कम पानी में विकसित होने वाले खेजड़ी,नीम,बबूल के अलावा दुसरे पेड़ कम पनपते हैं अत. इस शुक्र क्षेत्र में हरियाली के नाम पर अधिकतर खेजड़ी के पेड़ है । जमीन की गहराई से पानी लेकर बढने की क्षमता के कारण इस मरूस्थलीय क्षेत्र में खेजड़ी वरदान स्वरूप हैं । राज्य में हो पेड़ों की कमी के कारण अधिकतर अकाल का साया रहता है कभी कभार थोड़ी बहुत वर्षा होने के बावजूद यहा की रेतीली भूमि में पानी जमीन में गहरा चला जाता है । लेकिन इसके बावजूद खेजड़ी के पेड़ो की बढवार में कोई फर्क नहीं पड़ता। जमीन में गहराई से पानी सोखने की क्षमता रखने वाली खेजडी के पेड़ की जड़े ऐसे विकट हालात में भी इसे हरा भरा बनाये रखती हैं । लेकिन अफसोस इस बात का है कि रेगिस्तान के इस कल्पवृक्ष खेजडी के महत्व को दर किनार कर अब इसे नासमझी मे बेरहमी से भारी मात्रा में काटा जा रहा है । अगर फसल की दृष्टि से देखा जाये तो दुसरे वृक्षों की तुलना में खेजडी का पेड सर्वाधिक उपयोगी और उपजाऊ हैं । क्योकि खेजड़ी ही मात्र एक ऐसा पेड है जिसके नीचे बोई गई हर तरह की फसलें अन्य भूमि की तुलना में अधिक मात्रा मे पैदा होकर बढती है । यही कारण था कि हमारे समझदार पूर्वज अपने खेतो में अधिकाधिक खेजड़ी के पेड़ लगाने और पनपाने में रूचि लेते थे तथा उनकी सुरक्षा के प्रति सदैव सचेत रहते थे। जिसके परिणामस्वरूप फसल उत्पादन में भी उन्हे इसका प्रत्यक्ष फायदा मिलता था। खेजड़ी के पेड को तुलसी के समान पवित्र और देवतुल्य मानकर पूजा की जाती थी। उन्हें काटना बड़ा भारी पाप माना जाता था । इनकी सुरक्षा हेतु सचेत बिश्नोई समाज का वृक्ष प्रेम जग जाहिर है । लेकिन बड़े खेद का विषय है कि खेजडी आदि हरे पेड़ों के प्रति लोगों में अब दो लगाम व भावना नहीं रही जैसी आज से 300 वर्ष पहले थी । अब तो खेजडी काटने वाला किसान अपने ही पाव पर कुल्हाड़ी मारता सा प्रतीत हो रहा हैं। उसे ऐसा करने से अब कोई भी समझाने अथवा रोकने टोकने वाला नहीं है। खेजड़ी आदि हरे पेड़ों की सुरक्षा में आम जन की रूचि घट जाने के कारण वोटपरस्त राज नेताओं ने वन सुरक्षा कानून में ढील देकर एक तरह से इन्हे काटने की छूट दे दी है। जिसके परिणाम स्वरूप वृक्षों की हरियाली को रौंदकर खेतों के उपजाऊपन के मूल आधार खेजड़ियों को विनाश की किमत पर भी जानबूझकर नष्ट किया जा रहा हैं, दूरगामी लाम को तिलांजली देकर क्षणिक लाभ को महत्व दिया जा रहा हैं। ऐसा लगता हैं मानो - हरा वृक्ष नही काटणा, यह सबका मन्तव्य जम्भसार 21 कुएं में मांग पड़ गई हैं. इस सम्बंध में कोई कुछ भी सुनने और समझने को तेयार नही हैं । सबसे ज्यादा असरने वाली बात तो यह है कि खेजड़ियों के पेड़ों की सुरक्षार्थ प्राण गवाने वाले सैकड़ों बलिदानियों की सतति की रगों में दौड़ने याला खून भी ठण्डा पड़ चूका है। अब पेड़ों की रक्षार्थ जान लड़ाना तो दूर कोई इनके विनाश की और आंख उठाकर भी नहीं देखता. यह कटु सत्य है। खेजड़ियों के अलावा हमें इस क्षेत्र में मौजूद फोग, खींप, सिणिया फैर, घास और विविध औषधीय वनस्पतियों की सुरक्षा पर भी विचार करना होगा । क्योंकि मानवीय दखल के कारण उपरोक्त वनस्पतियों का दायरा चिताजनक ढंग से सिमटता जा रहा हैं। उनमें कई मरूस्थलीय औषधियों की प्रजातियों तो विलुप्त हो गई है । कई प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर है। सैवण, भुरट व घास के मैदान सिमट जाने से जहां एक तरफ पशुओं के लिए घास. चारे और चारागाह की गभीर समस्या उठ खड़ी हुई हैं। वहीं दूसरी ओर वनस्पति रहित यातू रेत आंधियों से उड़-उड़ कर सिचित नहरी क्षेत्र को घरानी भूमि में तब्दील कर रही हैं. और भूमि को बजर बना रही है । आँधियों से चलायमान घूल सड़कों व रेल पटरियों पर परार कर जनजीवन में परेशानी का सबब बनती जा रही हैं। जहां तक हरे पेड़ों की कटाई का प्रश्न है अकाल के हालात में खेजड़ी आदि हरे पेड़ों की कटाई ज्यादा हो रही है । खेजड़ी की लकड़ी ईमारती फर्नीचर की बजाय मात्र जलावन के काम में आती है । इसकी विशेष उपयोगिता नही होने के बावजूद इन्हे काटने वाले लोगों ने खेजड़ी कटाई को रोजमर्रा का धधा बना लिया है और ऐसा करने वाले पेशेवर लोग मौजूदा कानून की खामियों का नाजायज फायदा उठाकर खेजड़ी आदि वृक्षो को काट-काटकर ईट भट्टों जिप्सम व धुना पकाने तथा माये की भट्टियों में पहुचा रहे हैं। ऐसे स्थानों पर जगह-जगह इन काटे गये पेड़ों के ढेर के ढेर देखे जा सकते हैं । खेजड़ियों के कटे पेड़ों के तनों से लदे ऊंट गाड़ो की लम्बी-लम्बी कतारें रात्रि को एवं सुबह के समय शहरों की तरफ जाती हुई कभी भी देखी जा सकती हैं। इन पर लदे पेड़ों के तने देखकर सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि रोजाना दिन भर में कितनी खेजड़ियों की बलि चढती होगी । नहरी क्षेत्रों में सिचाई सुविधा से किसानों एव वन विभाग द्वारा 20-25 वर्ष पूर्व लगाये गये हरे पेड़ों की बर्बादी का किस्सा तो और भी ज्यादा खौफनाक हैं । वर्षों पूर्व नहरो व उप नहरों के किनारे लगाये गये अधिकाश लाखों हरे पेड़ वन विभाग द्वारा राजस्व अर्जित करने के लालच में काट डाले गये । जब कि सरकार का यह कदम उचित नही है । विशेषकर बीकानेर जिले के रेतीले क्षेत्र में जहा से नहरें गुजरती है वहां पर नहरों के अलावा आस-पास बहुत कम संख्या में हरे पेड़ मौजूद है। इस कारण इस क्षेत्र में अन्य क्षेत्रों की तुलना में वर्षा सबसे कम होती हैं । और बीकानेर से लेकर जैसलमेर तक नहर के अतिम छोर तक नहर के ईर्द गिर्द अधिकाश क्षेत्रों में रेतीले टिब्बे हैं । अतः इस क्षेत्र में नहरों के किनारे खड़े हरे पेड़ों को काटना बर्बादी को निमत्रण देने के समान हैं | क्योकि पेड़ों कमी से वर्षा तो कम m 7 न . पेड़ नही होगें, तो प्राण वायु का शुद्धिकरण कोन करेगा ? होगी ही साथ ही आंधियों से उड़ने वाली रेत नहरों एवं खालो में गिरने से नहरों के रखरखा व सिचाई व्यवस्था में भारी व्यवधान पैदा होगा। अतः राजस्थान सरकार को रैतीले । में पेड़ों की सरकारी कटाई के फैसले पर पुनर्विचार कर इस पर रोक लगानी चाहिए। वन एवं राजस्व भूमि में शेष हरे पेड़ों की हिफाजत की पुख्ता व्यवस्था नहीं है के कारण बीकानेर, श्रीगगानगर, हनुमानगढ, जैसलमेर आदि नहरी क्षेत्रों में वन माफिया ने सम्बधित प्रष्ट अफसरों से मिलीभक्त कर हरियाली को समेट कर चाँदी कुटने का ६८ बड़े पैमाने पर शुरू कर रखा है ऐसे लोगों ने नहरी क्षेत्र के गावों और मण्डियों में संचालित पचासों लकड़ी चिराई के आरे वार्षिक ठेके पर ले रखे है और उन आरों पर प्रति आरा रोजान लगमग 40 क्वि लकड़ी चिराई की जाती हैं जिनमें जलाऊ लकडी के अलावा शीशम आदि वृक्षों की बेशकीमती ईमारती लकड़ी के पेड़ भी शामिल हैं। हर आरे वाले के पास एक ट्रेक्टर ट्रोला व 10-15 मजदूर होते हैं जो हरे पेड़ों को काटकर आरे पर लाकर चिराई के काम को अंजाम देते हैं चीरी गई लकड़ियों के पाटियों आदि को तिरपालों से ढके बंद ट्रकों में रातो रात पार कर दिया जाता हैं। इन लोगों की उपरोक्त गतिविधियां पुलिस एवं वन विभाग से छुपी हुई नही है। सम्बंधित अधिकारियों से इन वन माफियाओं की मासिक चौथ बदी तय होती है। अत इन्हे रोका नही जा रहा हैं । वन माफियाओं की इन नापाक गतिविधियों को रोकने हेतु जीव रक्षा विश्नोई सभा प्रयासरत हैं लेकिन सभा द्वारा निःस्वार्थ भाव से किये गये प्रयासो को सम्बधित जबाब देह अधिकारी इस लिए तवज्जों नहीं देते. क्योकि ऐसा करने से भ्रष्ट अधिकारियों की नियमित आमदनी में बाधा आती हैं । हरे पेड़ों की कटाई की समा द्वारा बार-बार उच्च स्तर पर की गई शिकायतों की जांच के आदेश इन्ही अधिकारियों के पास आते हैं और अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के बचाव में आवश्यक खाना पूर्ति कर अक्सर रिपोर्ट भेज दी जाती हैं। इसमें सर्वाधिक गौरतलब तथ्य यह है कि खुद शिकायत कर्ता को यह पता ही नही चलता कि कब जाच हुई और कब रिपोर्ट भेजी गई । इस प्रकार पेड कटाई को प्रोत्साहन देने वाले अष्टकर्मियों को बचा लिया जाता हैं । जिसके परिणाम स्वरूप अवैध पेड़ काटने वाले वन माफियाओं की कारगुजारियों को उजागर नही किया जा सकता । कई बार शिकायतकर्ता द्वारा अधिक दबाव देने पर वन विभाग द्वारा थोड़ी बहुत जुर्माने की रसीद काटी जाती हैं । लकिन रसीद उस वन माफिया के नाम से नही काटी जाती है जो इस प्रकार लम्बे समय से सुनियोजित ढग से वार्षिक ठेके पर लेकर लकड़ी का आरा चला रहा हैं, और पेड भी कटवा कर दुलाई कर रहा हैं । ऐसा व्यक्ति जुर्माने के पैसे भी चुकाता है लेकिन सम्बधित वनकर्मी उसे बचाने हेतु स्वयं उसकी बजाय अन्य किसी व्यक्ति के नाम से जुर्माने की रसीद काटते हैं । वन कर्मियों की इसी चालाकी के कारण सभा अथवा अन्य कोई शिकायतकर्ता चाहकर भी वन माफियाओं के खिलाफ अपराध साबित नही कर पाता है और इस प्रकार अवैध कटान अबाध जारी हैं। अतः आवश्यक है कि हरे पेड़ों की कटाई को रोकने हेतु सम्बंधित अधिकारियों की - 1. 2. 5 को बनाये रखने हेतुजप अनुगूंज पाँच सदी गुजरने के बाद भी पशु पक्षियों की सेवा व सुरक्षा, सबसे बड़ा पुण्य । 23 जबाब देही निश्चित होनी चाहिए, तथा राज्य सरकार को इस प्रकार बड़े पैमाने पर हरे पेड़ों की कटाई करने वालों एवं उन्हे सह देने वाले प्रष्ट कर्मियों को चिन्हित कर उन्हे कानून के दायरे में लिया जाना चाहिए। ताकि हरे पेड़ों की कटाई की गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लग सके। अवैध पेड़ कटाई रूकवाने हेतु सुझाव:- हरी खेजडियो की ऊंट गाडों पर हो रही दुलाई की छुट समाप्त कर तुरन्त रोक लगायी जाये। अवैध कटे जब्त पेड़ का जुर्माना न्युनतम पेड की किमत का कम से कम दस गुणा निर्धारित हो। 3. अवैध पेड़ कटाई को प्रोत्साहन दे रहे वन कर्मी की तुरन्त सेवा निवृति हो। हरे पेड़ों की कटाई को प्रोत्साहन दे रहे पेशेवर लकडी चीराई आरों के लाइसेंस रद्द हो। जिप्सम व मावे की भट्टियों पर मौजूद खेजडी की लकडियो को अभियान चलाकर जब्त किया जाए। जिप्सम की भट्टियों में जिप्सम पकाने हेतु पेड़ों की बजाय बिजली से पकाने की शर्त का बैकों द्वारा दिए जाने वाले ऋण मे प्रावधान हो। खेतों मे खडे पाँच फिट से ऊंचे खेजडी के पेड़ों की वर्ष में एक बार गिरदावरी की व्यवस्था शुरू की जाय। वन विभाग के क्षेत्रिय वन अधिकारियो को जीप, हथियार एवं मोबाईल, की सुविधा सभी रेंजो में उपलब्ध हो। वन विभाग के सुस्त उडन दस्ते को वन एवं वन्य जीवो की निगरानी हेतु सक्रिय किया जाये। तथा स्वयं सेवी संस्थाओ के समर्पित लोगो को इससे जोडा जाये। खेजडी कटाई को पूर्ण प्रतिबधित घोषित किया जाये। 11 वन अपराधों की शिकायतों पर त्वरित कार्यवाही हेतु जिला मुख्यालय पर फेक्स व फोन सुविधाओं सहित कंट्रोलरूम बनाया जाये जो ऐसी शिकायते मिलते ही तुरन्त कार्यवाही को अजाम दे सके। वृक्षों की रक्षार्थ विश्नोई समाज की अग्रणी भूमिका गुरू जम्भेवर भगवान द्वारा बनाये गये 29 धर्म नियमों में सोहलवां व सतरहवां नियम “जीव दया पालणी, सँख लीलों नही घावे" धर्म नियम जीवो की रक्षा एवं वृक्षों के संरक्षण के सम्बंध में है। मात्र मनुष्य ही नहीं अपितु धरती के समस्त प्राणी जगत के अस्तित्व 6 7. 8 9 10 24 | वन प्राणी. धरणी श्रृंगार, रोको इन पर अत्याचार । राजस्थान ही नहीं बल्कि आज पूरे विश्व में सुनाई दे रही है। मानव सहित समस्त प्राप्ती जा कल्याणार्थ श्री गुरु महाराज के गये इस महामंत्र की शंप ध्वनि आज हमें द सोचने को याध्य कर रही है कि अब यन एवं वन्य प्राणियों के महत्व को ज्यादा समय ट झुग्लाया नहीं जा सकता । गुरू महाराज ने मरुभूमि में निरंतर पढ़ने वाले अकाल के स्थर रागाधान हेतु अधिकाधिक वृक्षारोपण कर उनकी सुरक्षा करने की मानय मात्र को प्रेरणाद उनके द्वारा दिये गये इसी महामत्र का प्रभाव रहा कि गरुमूमि के कल्पवृक्ष कहे जाने दा रोजड़ी के वृक्षों एवं यन्य जीवों पर जय जय राकट आया उनके अनुयायी सैकड़ों नर-नारि ने वृक्षों एवं वन्य जीवों की सुरक्षार्थ अपने प्राणों का बलिदान देकर भी उनके उपदेश साकार किया। इतिहास साक्षी है कि विक्रम रावत 1848 में ग्राम तिलवारानी (जोधपुर) में? खेजडियों की रक्षा हेतु श्री मोटोजी खोखर य नेतुदेवी, और खीवणीदेवी ने अपने प्राण न्यौछ किये। विक्रम रावत् 1661 में ग्राम रामाराडी (जोधपुर) की करमा और गौरां नामक दो यौवनाओ ने जेठ वदी 2 को खेजड़ी के वृक्षों की रक्षा हेतु अपने प्राणों का बलिदान दिर विक्रम संवत् 1710 में ग्राम पोलावास (नागौर) के श्री पुच्चोजी ऐचरा ने भी खेजड़ीयों की र हेतु अपने प्राण होग दिये। जिनकी याद में प्रति वर्ष जेठ वदी 11 को अखिल भारतीय रक्षा विश्नोई सभा द्वारा मेला लगाया जाता है। यहां पर उनकी लोक देवता के रूप में पृ होती है। खेजडियों की रक्षार्थ विश्नोई समाज को सबसे बड़ी चुनौती विक्रम संवत् 1787 तब मिली जब जोधपुर जिले के खेजडली ग्राम में तत्कालीन जोधपुर नरेश अभययिह काम गिरधरदास भण्डारी अपने दल बल सहित खेजडली ग्राम मे खडे खेजड़ी के वृक्ष काटने। आ गया। वहा विश्नोई समाज के लोगों के प्रतिरोध के बावजूद उसने भारी तादाद में खेजडी जबर्दस्ती काटने की दिढोरा पीटकर घोषणा कर दी इसकी जोधपुर जिले में मौजुद विश्न समाज के 84 गांवों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई और सभी गावों के लोग हरे वृक्षों की कटाई रोव हेतु आ डटे। समाज के बड़े बुजुर्गो ने राज कारिंदो को समझाने की बहुतेरी कोशिश लेकिन गिरधरदास भण्डारी नही माना और जय भण्डारी ने वृक्षो के बदले दाम (रूपये) दे को कहा तो उन लोगों ने अपनी मजबूरी बयान कि-"दाग लगे जे दाम दो, पंथ मां पूर होय. सिर सौंपां रूँखां सटे म्हे टुकडो दा ना कोय" अर्थात अगर हम पेडो के बदले में रूप देते हैं तो हमारे धर्म मे दाग लग जायेगा और हम अपने धर्म पालन में पौने समझे जायेगे उनका कहना था कि हम अपने धर्म में सवाये ही रहना चाहते हैं। तब क्रोधित भण्डारी ने तमाम खेजडी के पेड़ों को काटने का आदेश दे दिया लेकि इसके बावजूद धर्म की आस्था से सचालित पर्यावरण प्रेमी पिछे नहीं हटे। उन्होने संसार व एक नया नारा दिया-"सिर साटे लँख रहे तो भी सस्तो जाण" और अपने आराध्य गुर जम्भेश्वर भगवान का जय घोष करते हुए वे लोग खेजडियो को बाहो मे लेकर चिपक गये राज सत्ता मे मद सैनिको ने खेजडियो के पेडो से चिपके नर-नारियो पर कुल्हाडे चला वेत खेजड़ी लहर लेवे जीवन में खुशियां भर देवे । 25 रू कर दिये लेकिन धर्म से संचालित वे आस्थावान जरा भी विचलित नहीं हुऐ। मरते दम क उन्होने खेजड़ीयों को अपनी बाहों में थामे रखा और 50 ग्रामो के 363 नर-नारियों ने रा प्रकार खेजड़ी के वृक्षों की रक्षार्थ अपने प्राणों का आत्म बलिदान कर दिया। जिराकी शाल विश्व में अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। इस महा बलिदान को खेजड़ली के खडाणे के नाम | जाना जाता है उन हुतात्माओं की पावन स्मृति में अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई समा रा प्रति वर्ष भादवा सुदी 10 को विश्व प्रसिद्ध पर्यावरण मेला भरता है, जिसमें विश्नोई समाज अलावा राज्य वनमंत्री प्रति वर्ष भाग लेते है। हां पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रयासरत देश के कोने-2 से लोग पहुंच कर भाग लेते है। इस कार बिश्नोई समाज का खेजड़ी जैसे बहुपयोगी हरे वृक्षों की सुरक्षार्थ गौरवशाली इतिहास हा है। बहुपयोगी खेजड़ी-प्रकृति का अनमोल उपहार राजस्थान के अधिकांश जिलों में पाया जाने वाला वृट खेजडी प्रकृति प्रदत अमूल्य पहार हैं। कम पानी में पनपने वाले इस वृक्ष को वैदिक भाषा मे शमी' कहते हैं। पौराणिक नाख्यानों में इस वृक्ष का बहुत अधिक महत्व बताया गया है। सदैव हरा भरा रहने वाला यह सदाबहार वृक्ष मरूस्थल के लोगों के लिए वरदान से कम नही है। इस पेड के फायदों को गेना जाये तो लम्ची चौड़ी फेहरिश्त बन जायेगी। अत हम प्रमुख लाभो की ही चर्चा करेगें। अन्य पेड़ों की तरह इस पेड़ की जड़े आडी तिरछी व जमीन पर नही आती है बल्कि सीधी जमीन की गहराई तक जाकर पानी सोखती है। अत जिन खेतों मे खेजडी के वृक्ष मौजूद है उनमें लगी फसलों की सिचाई हेतु लगा पानी खेजडी वृक्ष नही लेता. यही कारण है मात्र खेजड़ी के पेड़ के नीचे अन्य स्थान की तुलना में फसल अच्छी पनपती हैं। इसका कारण यह भी है कि खेजड़ियों से निरतर गिरने वाले पते फसलों के लिए उत्तम खाद से कम नहीं हैं। यही प्रमुख कारण है कि जानकार अनुभवी किसान खेजडी के पेड़ों को नही काटते। वर्ष में एक बार इन बड़े पेड़ों के ऊपरी हिस्सों की पतली टहनियों की छगाई से प्राप्त लुग (पत्तिया) पशुओं के लिए उत्तम पौष्टिक आहार हैं। जिन लोगो के पास पशु नही हैं, वे लोग इनकी पत्तियों को ऊंचे दामों में बेचकर आर्थिक लाभ कमा सकते हैं। जिस किसान के खेत में खेजड़ी के पेड मौजूद है, उस घर मे जलाउ ईंधन की समस्या स्वत. हल हो जाती है क्योकिं वर्ष में एक बार शीत ऋतू में छगाई से प्राप्त पतली टहनिया वर्ष भर ईंधन का काम देती है। खेजड़ी से प्राप्त सांगरी पौष्टिक हरी सब्जी तो है ही साथ ही ऊबाल कर सुखाने के बाद, कभी खराब न होने वाली सुस्वादु सब्जी बन जाती है। इसका महत्व किसी से छुपा हुआ नहीं हैं। सागरी की सब्जी व अचार के स्वाद का ही प्रभाव हैं, कि अब वह राज्य व देश की सीमाओं को लापकर विदेशो तक पहुँच गयी है।
| खेत-खेत खेजड़ ऊपजाओ गाडा भर उपज ले जावो । 26 हमारे देश मे प्राचीन समय से ही खेजड़ी के वृक्ष के धार्मिक महत्व व इन्ही लान के मद्देनजर हमारे सैकड़ों पुर्वजों ने जब भी इन पर सकट आया। इनकी रक्षा हेतु अपने प्रा न्यौछावर कर दिये। लेकिन मरूस्थल के रमणीक बाग खेजड़ियों पर आँच नहीं आने दी जोधपुर जिले के ग्राम खेजड़ली का विश्व प्रसिद्ध विश्नोई समाज का खडाणा जग जाहि है। ग्राम रामासड़ी की विश्नोई यालाएं करमा, गौरा पोलावास के बुच्चो जी बिश्नोई ग्रा तिलवासनी के मोटोजी व नेतु एवं खिवणी विश्नोई आदि ने खेजडियों की रक्षार्थ अपने प्राण का उत्सर्ग कर खेजडी के महत्व को रेखाकित किया। खेजडी के वृक्ष को प्रकृति ने यह विशेषता प्रदान की है कि अकाल के हालात में इनके पेर की पत्तिया सुखकर निस्तेज होने की वजाय और ज्यादा हरी होकर दमकने लगती है। जबटि अन्य पेडो में ऐसी विलक्षण विशेषता नही पायी जाती। कई सुगनी लोग वर्षा ऋतु में खेजर की सुरगी पत्तियो को देखकर अकाल का पूर्वानुमान करते देखे गये हैं। खेजडियो की रक्षार्थ शहीदो का बुलन्द नारा-"सिर साटे सँख रहे तो भी सस्त जाण" आज भी हमे प्रेरणा देता है कि हर किमत पर खेजडियो की रक्षा करों। हिन्दू समान मे खेजडी. पीपल, वटवृक्ष को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। खेजडी को तुलसी भी कहा हैं। वैशाख के महीने मे प्रचण्ड गर्मी के समय खेजडी पीपल, आदि वृक्षों मे पानी देकर सींच के धार्मिक महत्व के कारण हमारी माताए व बहने महिने भर इनमे पानी देकर पूजा अर्चन करती है। हमारे जीवन के अधिकाश सस्कारो में खेजडी के लूग का महत्व हैं। अधिकार ग्रामीण किसान लोग लोक देवी-देवताओ के प्रतीक के रूप में खेजडी की पूजा करते हैं शायद इसी लिए "गाँव-गाँव गोगो खेजडी" का मुहावरा प्रचलन मे आया। गुरू जम्भेश्वरजी ने स्वयं अपने हाथो से खेजडी के लाखो वृक्ष लगाकर जिर वृक्षारोपण आन्दोलन का सुत्र-पात किया था, जिसे अब और आगे बढाने की जरूरत है लेकिन अफसोस का विषय है कि इतने अमूल्य और धार्मिक महत्व वाले खेजडी के पेड़ों के नादानी वश बेरहमी से काटा जा रहा हैं। वैसे खेजडी की लकड़ी इतनी ज्यादा किमती र्भ नहीं होती काटी गयी खेजडी जलावन के अलावा कहीं काम नही आती। अत इन्हे काटने वाले नादान लोग अपने पावों पर कुल्हाडी मार रहें हैं। इन्हे रोका जाना आज के समय की प्रमुख माँग है। खेजडी काटने वाले लोगों को समझा बुझाकर, धार्मिक मान्यताओ एवं परम्पराओं का वास्ता देकर अथवा कानून के भय से रोकने के प्रयास मानव समाज के बुद्धीजीवियों और राज नेताओं को करने चाहिए। अन्यथा इस क्षेत्र में मरूस्थल के प्रसार को रोक पाना किसी भी प्रयास से सभव नही हो पायेगा।
27 . मिट्टी पानी और बयार, जीवन जीने के आधार सुन्दरलाल बहुगुणा उजही हरियाली और उदासीन बन-विगाग राजस्थान जैसे सुखाग्रस्त क्षेत्र में हरे रशों की मौजूदगी अत्यत महत्वपूर्ण है। दक्षिणी व पूर्वी जिलों की बजाय प्राय पश्चिमी क्षेत्र जोधपुर नागौर बीकानेर, जैसलमेर आदि जिलों में अन्य जिलो की तुलना में हरे दक्ष कम मात्रा में है। इस क्षेत्र में हरे पेरें की कमी के कारण बरसात प्राय कम ही होती है। इन क्षेत्रों में अधिकाधिक धारोपण कर हरे पेड़ों की संख्या को बताया देने की जरूरत है, लेकिन अफसोरा (ग) का विषय है कि अकाल के हालात में इस क्षेत्र में उल्टे पृक्षों की बेरहमी से कटाई हो रही है।नारी क्षेत्र में वन विभाग एवं किसानों द्वारा विकसित किये गये लाखो हरे पट्टे की बर्बादी का मंजर किसी से छुपा हुआ नही है। एक तरफ राजस्व अर्जित करने के लोग में राज्य सरकार नहरों के किनारे खड़े ताखों हरे पेड़ों को सिरे से कटवा रही है तथा दुसरी तरफ वन एव राजस्व भूमि पर अवैध पेड़ काटने वाले पन माफिया बड़े पैमाने पर सक्रिय हो गये हैं। उनके कुल्हाड़े व आरे हरे पेड़ों पर चल रहे है. जीव रक्षा विश्नोई सभा ने गाजूवाला छतरगट. लूणकरणसर आदि क्षेत्रों में ऐसे लोगों द्वारा काटे गये हरे पेड़ों को कई बार पकडयाया लेकिन ऐसे लोगों के खिलाफ वन अधिकारी ठोस कानूनी कार्यवाही की बजाय मात्र औपचारिकता निभाते पाये गये। हरे पेडों को रोजाना कटवाने वाले मुख्य अपराधियों की लगाम थामने की बजाय, उनके नौकरों के नाम से महिने में एकाधयार थोटी बहस जुर्माने की रसीद काटकर वन्यकर्मी अपनी मासिक स्थायी आमदनी का रास्ता खुला रखते है और इस प्रकार रोजाना भारी मात्रा में अवैध पेड़ काटने वाले राम्यधित वन कर्मियों को सुविधा शुल्क घुफाकर सदैव निश्चित बने रहते हैं। रोतों के अलावा वन माफियाओं ने नारों के किनारे वन व सरकारी भूमि से भी पेड़ काट ले जाने का दुस्साहस जुटा लिया है। समा ने ऐसी कई वारदाते घटित होने पर आवाज उठायी। लेकिन इसे कोई सुनने वाला नही इस सम्बन्ध में मैं एक उदहारण प्रस्तुत करना चाहगा। दिनांक 21.1104 को 61 हैड (खाजूवाला) के पास के जे डी नहर के किनारे खडे 5हरे खेजड़े वन माफिया ने काट डाले। सूचना मिलने पर नहरी सीमा मे कटे पेड़ों के फोटो खींचे और सम्बधित वनकर्मी रणधीरसिह को समा ने उक्त कटे पेड़ जब्त करवाये। लेकिन उक्त प्रष्ट वनकर्मचारी ने भेंट पूजा लेकर रातों रात उन काटे गये खेजड़ों को बिना कानूनी कार्यवाही किये उठवा दिया। इसकी शिकायत सभा द्वारा श्रीमान रेंजर साहब से लेकर राज्य सरकार तक की गई लेकिन आज तक इस सम्बंध में उक्त कर्मचारी के खिलाफ कोई कार्यवाही नही की गई। इसी प्रकार वन विमाग के छतरगढ रेंज क्षेत्र में पेशेवर आरा मशीन सचालकों द्वारा भारी पैमाने पर अवैध रूप से हरे पेड़ों की कटाई हुई। वहा के समा प्रतिनिधी श्री रामचन्द्र खीचड़ के अथक प्रयासों के बावजूद वहाँ पर वन माफियाओं द्वारा किये जा रहे हरे पेड़ों का कत्लेआम अभी तक नही रूका है। राजस्म भूमि के अलावा अब तो नहरो के किनारे एवं वन घर-घर हवा. रचाना होगा, पर्यावरण बचाना होगा- स्वामी दयानन्दवी | 23 विभाग की सरकारी भूमि में वर्षों पूर्व लगाये गये सरकारी पेड़ों पर भी वन माफियाओं कुदृष्टि पड़ चूकी है। खाजूवाला उपखण्ड क्षेत्र में जिपराम की बहुतायत होने के कारण क्षेत्र में विगत 10 वर्षों से जगह-जगह अनेक जिप्सम पकाने की बड़ी-2 भट्टिया लगी है और जब से यह भष्टिया शुरू हुई है तब से इस क्षेत्र में मौजूद हरे पेड़ों एवं फोग की शर्मा की शामत आ गयी है। इन भट्टियों में दिखावे के तौर पर बिजली के कनेक्शन ले र जबकि जिप्सम की पूरी की पूरी पकाई अवैध कटे पेड़ों से हो रही है। रोजाना सैकड़ों क्वि खेजडी आदि हरे पेड़ों की लकडिया कट-2 कर इन भष्टियों की आग में झोकी जा रही एक-एक भट्टियों के पीछे छिपाकर रखे, काटे गये पेड़ों की सैकड़ों क्विटल लकड़ी के ढेर लग पड़े है। यह गौर करने योग्य है कि आखिर इतनी बड़ी तादाद में पेड़ कहाँ से कटकर आ रहे है ? इस वायत पूछने पर मट्टियों के मालिकों का रटार जवाय होता है-"हमें तो लोग ला कर बेचते हैं। जबकि सच्चाई कुछ और ही बयान के हैं वो यह है कि आम तौर पर किसान लोग खेतों में खड़े पेड़ काटने की सम्बधित तहसील से वैद्य इजाजत नही लेते और न ही किसान लोग स्वय इतने पेड़ काटते है। होता यह अपने खेत में खड़े पेड़ों को अक्सर लोग पेशेवर वन माफियाओं को बेच देते है और खर के बाद वनमाफिया लोग अपने सधे हुए मजदुरों की मदद से उन पेड़ों को काट कर कि लकड़ियों को आरा मशीनों तक पहुंचा देते है तथा शेष बची खेजड़ी आदि की लकडियो भट्टियों में पहुचा देते हैं। जिप्सम की भट्टियों की कारगुजारियों का सभा ने नजदीक से अz किया तो चौंकाने वाले तथ्य उभरकर सामने आये। 29 जूलाई 2006 को सभा को सूचना मिली कि पूगल ब्राच नहर की 80 आ से 112 आरडी तक नहर के किनारे भारी तादाद में अवैध रूप से हरे पेड़ कटे हे।त घटना स्थल पूगल ब्राच नहर की 97 आरडी के पास राजस्थान पत्रिका सवाददाता को है गया तो मौके पर वन विभाग की नर्सरी में चार औरतें हरे पेड़ काटती दिखी। तब सम्ब क्षेत्रिय वन अधिकारी श्रीमान् अहमद कादरी को मौके पर बुलाकर वन क्षेत्र में भारी: में अवैध रूप से कटे हरे पेडी के अवशेष (यूँठ) दिखाये और पेड़ काटने वाली महिलाओं घरों से लगभग दो ट्रोली ताजे कटे पेड़ो के तने कुल्हाड़िया. आरियाँ आदि बरामद करवा स्थिति की गंभीरता के मद्देनजर जब उन्हे सही आकलन हेतु कटे पेड़ों की करने का निवेदन किया तो वह साफ इन्कार हो गये तथा अपने क्षेत्र में घटित इस अपराध पर पर्दा डालने के लिए उन्होने बिना गिनती किये कागज पर 286 पेड लिख लि तब रामचन्द्र खीचड़, रामनिवास सहारण सहीराम कालीराणा, श्यामसुन्दर गोदारा आदि र के कार्यकर्ताओं के सहयोग से मैंने लगातार दो दिन तक उक्त अवैध कटान क्षेत्र में एक पेड़ की आर डी. वाईज (नहर की दूरी) कटे पेड़ो की सही गिनती की गई तो चौंकाने व तथ्य उभरकर सामने आये। पूगल ब्रांच नहर की 80 आर.डी. से 112 आर डी तक नहर दोनों किनारे पर 2447 वह इसी नहर के 97 हैड से निकलने वाली उप नहर बी.एल.डी. ना 29 मन वृक्षों से आती हरियाली, जन-जन में लाती. खुशहाली । की 1 से 10 आर.डी. तक 866 पेड़ इस प्रकार कुल 3313 पेड अवैध कटे पाये जाने के बावजूद वन विभाग के सम्बधित उच्चाधिकारियों का रवैया इन पैड़ो की बर्बादी हेतु जिम्मेवार वन कर्मियों के खिलाफ कार्यवाही करने की बजाय उन्हे बचाने का रहा अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई सभा के अध्यक्ष श्रीमान बीरबल विश्नोई एव उपाध्यक्ष श्री शिवराज जाखड़ द्वारा बीकानेर वन मुख्यालय पर इस गंभीर प्रकरण पर भ्रष्ट वनकर्मियो के खिलाफ कार्यवाही हेतु * दबाव बनाने पर उक्त नहर के सुरक्षा गार्ड रामजीलाल व चौकीदार गंगाराम को निलवित किया गया। लेकिन कर्मचारी संगठन के दबाव में आकर उच्च वन अधिकारियों ने तीसरे दिन उन्हे पुन बहाल कर दिया। अब यह विचारणीय प्रश्न है कि सरकार के ऐसे पौने प्रयासों से भला ये पेड कैसे - सुरक्षित रह पायेगें ? पूगल बाच नहर के अवैध पेड़ कटान क्षेत्र के ईर्द गिर्द लगी हुई जिप्सम पकाने की भट्टिया बन्द नहीं की गई तो ये तब तक सुलगती रहेगी जब तक इनके चारो और । की पूरी हरियाली इनकी भेंट न चढ जायेगी। काश! इस क्षेत्र के बुद्धिजीवी लोग आसन्न - स्थिति की गंभीरता को समझ पाते। इन भट्टियों के बारे में पूछे जाने पर वहा के किसान श्री रामनिवास सारण कहते है कि सरकार इन भट्टियो के द्वारा इस क्षेत्र में कथित विकास का । दावा करती है विकास हो या न हो लेकिन इन भट्टियों से हरियाली उजड़ने पर हम सब किसानों की बर्बादी होना तो तय है। उनके हृदय से कहे इन शब्दों की पीडा इस धारणा को रेखाकित करती है कि पेड कट जाने पर उक्त रेतीले क्षेत्र में नहरों में मिट्टी भर जाने से सिचाई सुविधा बाधित होगी तथा वृक्ष विहीन धरती पर वर्षा सदा के लिए मुह मोड़ लेगी और आधियों से उडी रेत सिचित क्षेत्र को रेत के धोरों में तब्दील कर देगी। पूगल ब्रांच नहर तो मात्र एक उदाहरण हैं। अन्य नहरों के किनारे इससे भी बडे अवैध कटाई के घफले उजागर हो सकते है। सभा इसके लिए - भविष्य में प्रयास करेगी। अब समय आ गया है कि सरकार को इस क्षेत्र मे कम मात्रा में मौजूद हरे वृक्षों की कटाई पर पूर्ण पाबंदी लगाकर वृक्षारोपण को अधिक से अधिक बढावा देना चाहिए - ताकि इस क्षेत्र के लोग खुशहाल हो सके। पी के डी नहर क्षेत्र में वन भूमि पर अवैध काश्त प्रकरण खाजूवाला उपखण्ड क्षेत्र में 1978 में हरे पेड़ों की कमी के मद्देनजर राज्य सरकार के आदेश से उपनिवेशन विभाग ने 1978 में सैकड़ों मुरब्वे भूमि वन विभाग को वन विकास हेतु आवटित की। 1994 में राजस्थान राज पत्र (गजट) में उक्त भूमि वाकायदा दर्ज हो गयी और वन विभाग ने उक्त भूमि का कब्जा ले लिया। इस भूमि पर वन विभाग ने लाखों रूपये खर्च कर वृक्षारोपण किया तथा चारागाह विकसित कर भूमि के चारों और तारबदी की लेकिन वन विभाग की सही देख रेख के अभाव में उक्त तारबदी गायब हो गई।
30 गांव-गांव अभियान चलाओं, डगर-डगर पर वृदा लगाओ । इसके बाद 1973 में जब पी के सी नहर बनी तो अधिकाश असिचित भूमि सिचित हो गई तथा सिंचाई विभाग ने उका भूमि में वन विकास हेतु पानी की बारी (सिचाई सुविधा उपलय करया दी। इस पेशकिमती वन भूमि में नहर का पानी लगता देखकर भूमाफियाओं की गिन दृष्टि इस पर पड़ी तो उन्होने वन अधिकारियों से ससठ गांठ कर संगठित रूप से इस वन विभाग की भूगि में खड़े पेड़ों को काटना शुरू कर दिया तथा सुनियोजित तरीके से वन भूमि में अवैध काश्त शुरू कर दी। सभा ने हरे पेड़ों की अवैध कटाई के विरुद्ध आवाज उठायी तव वन कर्मियों द्वारा इन्हे टोका गया। लेकिन सभी चालाक भूमाफिया एक सेवानिवृत उपनिवेशन आवंटन अधिकारी द्वारा जारी पिछली तारीकों के फर्जी पढे ले आये। समा ने बड़े पैमाने पर उक्त वन भूमि में अवैध पेड़ कटने की वारदात को गभीरता से लिया और पूरे प्रकरण की विस्तृत जानकारी प्राप्त की तो मालूम हुआ की लगभग 127 मुरव्या वन भूमि में वन माफियाओं ने अनाधिकृत रूप से हरे पेड़ काटकर कब्जा काश्त शुरू कर दी है। विरोध की भनक लगते ही कब्जाधारी लोगों ने उक्त भूमि के फर्जी पट्टे बनवा लिये उक्त पहे बनवाने में उपरोक्त सेवानिवृत अधिकारी के निकट के रिश्तेदार का नाम सुना गया। इन फर्जी पट्टों में ऐसे लोगों के नाम आवटन दिखाया गया है जिन्होने 20 वर्ष पहले राजस्व भूमि आवटन हेतु उपनिवेशन विभाग में आवेदन कर रखा था। इस प्रकार हर किसी कब्जाधारी के पास ऐसा एक गिदड़ परवाना (फर्जी पट्टा) हैं। जिसके बल पर उन्होने उक्त वन भूमि पर बेखट खेती शुरू कर दी। लेकिन इस दौरान उन्हे लगातार सिंचाई सुविधा वन विभाग के नाम से ही मिलती रही क्योंकि उक्त भूमि आज भी वन विभाग की है। इसके बावजूद सिंचाई विभाग ने इस व्यापक धान्धली के विरूद्ध आज तक मुंह नही खोला और लगातार साल दर साल वन भूमि में अवैध काश्त हो रही है। राजस्व विभाग के सम्बधित पटवारी जिनके पास इस भूमि के आकडे मौजूद रहते है। सब कुछ देख सुनकर लगातार अनजान बने रहे। उक्त वन भूमि की सुरक्षा सेवारत वन पाल हरिकिशन खटीक और.अमीलाल यादव ने वन भूमि पर इस प्रकार लगातार अवैध पेड कटते एवं काश्त होते देखते भी अपने कर्तव्य का पालन नही किया। अत वन भूमि में मौजूद तमाम हरे पेड़ों को कब्जाधारियों ने काट-काटकर बेच डाला और वन विभाग बडे पैमाने पर हुए इस वन विनाश के उक्त कृत्य को मूक दर्शक बन कर देखता रहा। इस प्रकार लगभग 3000 बीघा से अधिक वन भूमि में लगे हजारो हरे पेड़ो और चरागाह का सफाया हो गया। राजस्व विभाग द्वारा वन भूमि में काबिज लोगों के नाम से नियम विरुद्ध बराबर गिरदावरी की जा रही है। जबकि जमीन का मालिक वन विभाग हैं। शिकायत होने पर वन विभाग ने वन भूमि से कब्जे हटाने चाहे, तो उक्त कब्जाधारी उपखण्ड अधिकारी खाजूवाला एवं राजस्व अपील अधिकारी बीकानेर से फर्जी पट्टों के आधार पर स्टे ऑर्डर ले आये अब वन विभाग चाह कर भी अतिक्रमियों को बेदखल नही कर पा रहा था। सभा ने इस धान्धली की उच्च स्तर पर शिकायत की तो उपखण्ड अधिकारी महोदय ने थोक में जारी किये गये .
31 | मत लो वृक्षों की तुम जान, धरती होगी रेगिस्तान । स्टे ऑर्डर रद्द कर दिये। उक्त फर्जी पहों में मुरब्बे के बीधा न हिन्दी लिपी में तथा मुरब्बा नं अग्रेजी में अलग-अलग लिखायी से लिखा देखकर इनके फर्जी होने का साफ संदेह होता है।इसके अलावा कई पट्टे तो ऐसे बनाये हुए कि मुरख्या तो एक है लेकिन उसके पट्टे दो व्यक्तियो के नाम से बनाये है उदाहरण के लिए लालुसिह पुत्र डूंगरसिह चक 21 पी.के.डी के नाम से एक फर्जी पट्टा मुनं. 181/48 में 25 बीघा भूमि आवटित बतायी हैं। इसी न. का मुरब्बा भवरलाल पुत्र मालाराम के नाम से 23 बीघा का पट्टा बना हुआ है। इसी भवरलाल पुत्र मालाराम के नाम से मुन 181/56 में 25 बीघा का पट्टा बना हुआ है जबकि इसी मुरब्बे की 13 बीघा भूमि का पट्टा लालूसिह पुत्र भूगरसिह के नाम से बना हुआ है। चक •23 पी के डी में अख्तर पुत्र सतार मोहम्मद के नाम से मुनं 163/25 जिसे 1988 में आवटित दर्शाया गया है जबकि अभी अख्तर की उम्र मात्र 20-21 वर्ष है। यही स्थिति युनस पुत्र गुलाम मुस्तफा के पास मौजूद पट्टे की हैं। दर्शाये गये आवटन के समय यह दोनों दुध मुंहे बच्चे थे। अत जाहिर है कि नाबालिगों को भी आवटन बता दिया गया। उक्त क्षेत्र के काश्तकार लाधुराम कासणियां ने सभा कार्यकर्ताओं के समक्ष आशका व्यक्त की कि जब सरकारी भूमि पर ऊँची पहुंच वाले लोग इस तरह नाजायज कब्जा कर सकते है तो फिर गरीबों का तो भगवान ही मालिक है। जीव रक्षा विश्नोई सभा द्वारा इस प्रकरण को उठाने पर उक्त वन अपराधियों मे से कई कब्जाधारियो के खिलाफ वन विभाग ने मई 2005 में मुकदमें दर्ज किये। लेकिन इच्छा शक्ति के अभाव में उक्त मुकदमे मात्र औपचारिकता ही साबित हुए। खाजूवाला के तहसीलदार ने अतिक्रमियों की कुर्क की गई लाखों रूपयों की फसलें कब्जाधारियों से साठ गाठ कर उन्हें वापिस सुपुर्द कर दी मात्र कुछ लोगों के नाम से मामूली तवान लगाकर उन्हे छोड दिया। इस प्रकार प्रशासन द्वारा उचित कार्यवाही नही होने से उपरोक्त भूमि पर कब्जाधारियों ने पुनः काश्त शुरू कर दी। जो आज भी बेधडक जारी है। कानन में प्रावधान है कि किसी भी वन भूमि को केन्द्र सरकार की अनुमति के बगैर गैरवानिकी कार्यों के लिए डी फोरेस्ट नही करवाया जा सकता, लेकिन तत्कालीन उपखण्ड अधिकारी ने चक 20 पी के डी. के मुरब्बा नं. 4, 10, 11, 12, 13 तथा 21 पी.के.डी. के मु ने 2 व 3 को गैर कानूनी ढंग से डी फोरेस्ट करके नियम विरुद्ध आवंटित कर दिये। इसी वन भूमि में जारी स्टे ऑर्डरों मे सम्बधित अधिकारी द्वारा तहसीलदार से पत्रावली मांगने का उल्लेख है। लेकिन सही पत्रावली उपलब्ध क्यों नहीं करवायी गई ? उक्त वन भूमि की सुरक्षार्थ तैनात वन कर्मी इस प्रकार वन विनाश को देखकर चुप क्यों रहे? लगातार वन भूमि में अवैध काश्त क्यों होने दी जा रही है ? एवं सिचाई विभाग वन विकास के नाम से आवटित पानी से कब्जाधारियो की फसल क्यों पका रहा हैं ? तत्कालीन उपखण्ड अधिकारी अरूणप्रकाश शर्मा खाजूवाला एवं राजस्व अपील अधिकारी बीकानेर रिकार्ड देखे बिना आँख मूंदकर वन भूमि के कब्जाधारियों को भूमि के मालिक वन विभाग को सुने बगैर घडा घड स्टे 32 एक वृक्ष सौ. पुर समान, वृक्ष बिना नही कल्याण । जारी क्यों करते रहे। इन्हें रोका क्यों नही गया ? उपरोक्त ज्वलत सवालों के जबाब अब भी अनुत्तरित है। याजूयाला के अलाया यज्जू क्षेत्र में भी इसी प्रकार वन भूमि में अवैध को हुए। लेकिन इस क्षेत्र के पर्यावरण को चौपट करने की इन नापाक हरकतों को गभीरता से नही लिया जा रहा है। जिसके कारण यन भूमि पर कब्जा करने की प्रवृति दिनों दिन बदली ही जा रही है। सरकार ने अगर ऐसी गतिविधियों पर दृढता से रोक नही लगाई तो समुद्र वन क्षेत्र को उजड़ने से कोई नहीं बचा सकता। खेजड़ली के शहीदों की स्मृति में खाजूवाला में वृक्षारोपण खेजड़ी के हरे वृक्षों की रक्षार्थ अपने प्राणों का बलिदान देने वाले 363 अमर शहीदों से प्रेरणा पाकर, उनकी पावन स्मृति को तरोताजा रखने हेतु खाजूवाला उपखण्ड के बिश्नोई समाज ने एकजुट होकर एक ऐसा नायाब उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो हर किसी के लिए अनुकरणीय साबित हो सकता है। खाजूवाला मे स्थित श्री गुरूजम्भेश्वर मन्दिर एव धर्मशाला चैरिटेबल ट्रस्ट परिसर मे पावन तीर्थ खेजडली शहीदी स्थल से लाये गये उन पवित्र वीजों से पनपे खेजडी दे श्रखलाबद्ध सुन्दर पेडो के उद्यान को देखकर उन महान आत्माओ के त्याग पूर्ण बलिदा की याद बरयस ताजा हो आती हैं। जिन्होने 300 वर्ष पूर्व उन खेजडियों से लिपटकर उन बचाने हेतु अपने प्राण होम दिये थे। आज भी उनके विश्व प्रसिद्ध बलिदान की गाथा को अप में सजाये खड़े वे पेड वहा के कण कण के ईतिहास को अपने आप में समेटे मौजूदा पेड की सुरक्षा हेतु हमे निरतर प्रेरणा देते नजर आते हैं। उनसे प्रेरणा लेकर सर्व प्रथम शहीदी स्थल के पेडो से लाये वीजो को वृक्षारोपण से 6 माह पूर्व थेलियो मे खेजडी के पौधे उगाकर तैयार किये गये और उसके बाद जीव रक्ष विश्नोई सभा व ट्रस्ट के सयुक्त प्रयास से आगामी कार्य योजना तैयार की गई। जिसवं अनुसार खाजूवाला क्षेत्र की 32 पचायतो में जन सम्पर्क कर उक्त पेड लगाने हेतु 36: बिश्नोई समाज के लोगो को सूचिबद्ध किया गया। तदन्तर भादवा सुदी दसमी सवत् 206: (शहीद दिवस) पर एक विशाल सामूहिक वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया जिस 363 स्त्री पुरूषो ने एकजुट होकर अपने अपने नाम से कुल 363 खेजडी के पौधे लगाये उन पौधो की सुरक्षा, सिचाई व पोषण का जिम्मा ट्रस्ट को सौपा गया और प्रति पौधे पर खर्च होने वाली कुल 150 रूपये सेवा शुल्क राशि प्रति पौधा लगाने वालों ने जमा करवायी । पौधे लगाने वालो के नाम पते अकित लौहे की पट्टिकाएं पौधे के पास लगाने वाले की पहचान के तौर पर लगायी गई तथा भूमि पर 10-10 फुट के अन्तराल से एक ही सीध में 4 लाईनों में सामान्नतर ढग से 3-3 फुट के गहरे गड्ढे खुदवाकर पौधे लगवाये गये। वृक्षारोपण स्थल को "अमर शहीद अमृतादेवी विश्नोई शमी उद्यान" नाम दिया गया। इसका शुभारम्भ पुज्य स्वामी भागीरथदास जी शास्त्री व श्रीमान् विरेन्द्र बैनीवाल विधायक द्वारा किया गया।
- जन-जन को बतलाना है, जंगली जीव बचाना 33 यह तो एक छोटी सी शुरूआत है आज ऐसे प्रयासों को और आगे बढ़ाने की जरूरत हैं। ऐसा करना मात्र पर्यावरण संरक्षण ही नहीं अपितु हमारे आर्थिक हितो के लिए भी जरूरी है ऐसे प्रयास मुक्ति धाम मुकाम समराथल जाम्भोलाव आदि तीर्थ स्थलो पर समाज द्वारा एकजूट होकर किये जा सकते हैं। वन अधिनियम में बदलाव की आवश्यकता हमारे देश में सबसे कम वर्षा राजस्थान के बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर, चुरू आदि क्षेत्रों में होती है एवं राज्य के अधिकांश भागों में खेजड़ी, नीम, बबूल, बैर आदि कम वर्षा में पलने वाले पेड़ हैं। इनमें बहुउपयोगी खेजड़ी तो प्रकृति प्रदत वरदान हैं। प्रशासन एवं वन विभाग कानूनी विसगतियो के चलते इनके कटान को रोक पाने में असफल साबित हो रहे खेजड़ी के पेड़ो की सर्वाधिक कटाई राजस्व भूमि में हो रही हैं। रोजाना हजारों पेडों को काटा जा रहा है। लेकिन इनकी सुरक्षा हेतु सम्बधित तहसीलदारों के पास समय नहीं हैं। पटवारी अपने हलकों में कटते पेड़ो को देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं। सरकार की दुलमुल नीति के अलावा मौजूदा लचीले कानूनो के चलते सम्बधित जबाबदेह अधिकारी कानूनी खामी और संसाधनों की कमी बताकर अपनी जिम्मेवारी से बच रहे हैं। आम जनता और सामाजिक सरथाओं द्वारा खेजडी आदि वृक्षों के अवैध कटान करने पालों के खिलाफ लगातार बढती शिकायतो पर कार्यवाही तो दूर की बात सुना तक नही जा रहा। जिसके परिणाम स्वरूप छिटपुट कटाई की जगह वन माफियाओं ने हरे पेड काटकर बेघने का घधा जगह जगह चला रखा हैं। ऐसे लोगो का धधा पाक सीमावर्ति नहरी क्षेत्रों में अत्यधिक बढ गया है। बज्जू, दन्तौर, रावला. खाजूवाला, छतरगढ, लूणकरणसर व गगानगर जिले के क्षेत्र में ऐसे लोगो का धधा दिनों दिन फल फुल रहा हैं, जिसके परिणाम स्वरूप इन क्षेत्रों में हरे पेड़ों की संख्या दिनो दिन चिता जनक ढग से सिमटती जा रही हैं। मौजूदा कानून में पेड़ों की निगरानी और कटाई की रोकथाम हेतु पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था नहीं हैं। क्षेत्र में भौगोलिक स्तर पर मौजूदा कानून मे वन एव सरकारी भूमि के पेडो की सुरक्षा का जिम्मा वन विभाग का है। इसके अलावा पुलिस को भी ऐसे वन अपराधो पर कार्यवाही का अधिकार है। राजस्व भूमि में बिना अनुमति के अवैध हरे पेड़ों की कटाई से सुरक्षा का जिम्मा राजस्व तहसीलदार का हैं। लेकिन राजस्व कर्मचारी ऐसी शिकायतो के बावजूद राजस्व भूमि में हरे पेड़ों की कटाई को रोकने में रूचि नहीं लेते। यही कारण है कि वर्तमान में सर्वाधिक पेडो की कटाई की वारदाते राजस्व भूमि में हो रही हैं और इस कटाई को रोकना दिनो दिन मुश्किल होता जा रहा है। मौजूदा कानून में प्रावधान है कि कोई भी किसान सम्बधित तहसीलदार से वैद्य अनुमति प्राप्तकर अपने खेत में से पेड काट सकता है बशर्ते व काटे गये सख्या ये पाच गुना पेड लगाये। लेकिन आम दुसरी खामी यह है कि काटे गये पेड़ों को ऊंट गाडो पर टोने की राज्य सरकार द्वारा सुरी ऊँट गाड़ों का प्रयोग शुरू कर दिया है। जिन्हें पुलिस एवं वन विभाग कानूनी लाचारी के कारण पकड़ नही पा रहे हैं। अगर समय रहते उपरोक्त विसंगति पूर्ण कानून एवं व्यवस्था में उचित परिर्वतन नही किया गया तो निकट भविष्य में शेष बचे खुचे हरे पेड़ भी आग की भट्टियों में समा जायेगें तथा क्षेत्र से वर्षा हमेशा के लिए मुह मोड लेगी। जिसकी क्षेत्र के लोगों उपरोक्त लचीले कानूनों में मात्र भापण देने एवं लिखने से काम नही चलेगा आम आदमी को सचेत होकर ऐसे तुगलकी कानूनो और माहौल को बदलने हेतु जन आन्दोलन सृष्टि के प्रत्येक जीव को जीवन जीने का हक है, सभी प्राणियों को अपना जीवन प्यारा है। मारे जाने पर हर जीव को अपार कष्ट और पीडा का आभास होता। विशेषज्ञों ने सिद्ध किया है कि कई जानवरों में मनुष्य की तरह जाति समुदाय, समाज सम्बधी एकता और पारिवारीक प्रेम व अपनत्व प्रत्यक्ष रूप से देखा जाता हैं. इसलिए अपनो के मारे जाने व बिछोह मनुष्य अपनी स्वय की बढ़ती आबादी को नजर अंदाज कर जानवरों की संख्या सीमित करने हेतु उन्हें मारकर खाना जायज ठहरा रहा है। लेकिन मनुष्य की यह सोच एकदम उल्टी है। क्योकि ऐसा करने पर जानवरो की संख्या जरूरत से ज्यादा बढ़ेगी और तब प्रकृति के नियमो के साथ खिलवाड होगा, उदाहारण के लिए शेर चीता, आदि मांसाहारी जानवर कम होगें तो शाकाहारी पशुओं की सख्या बर्दगी और एसी अवस्था में वे स्वाभाविक तौर पर फसलों को नुक्शान पहुचायेगें, और अगर शिकार आदि कारणो से शाकाहारी वन्य पशु कम होगें तो मांसाहारी पशु गाँव ढाणियो एव खेतों में पालतु पशुओ को अपना निवाला जगह-जगह पर पेड़ लगाओ, धरती को भी स्वर्ग बनाओं । तौर पर यह देखा जाता है कि तहसीलदार से मंजूरी लेने की किसान फालतू का इस रामझते है। अत कम ही लोग मजूरी की प्रक्रिया को अपनाते है मजूरी की बजाय इस के लोग अपने खेतों में खड़े हरे पेड़ों को यन माफियाओं को बेच देते है और खरीददार यन माफिया लोगों ने कानूनी यामी का फायदा उठाकर धन कमाने उद्देश्य से दो की हरयाली का जोर शोर से चालू कर रखा है। मौजूदा राजस्य नियमों में जुर्माने की राशि बहुत कम है। 50 वर्ष पूर्व यने नियमों के बाद महगाई हजार गुणा बढ गयी हैं। लेकिन कुन की राशि वही अधिकतम 50 रुपये की काटने वालों के लिए चुकानी पुरि नहीं है। शीशम व रोहिला का पेड काटने वालों के लिए 50 रू का जुर्माना कोई मायना नही रखता है। यही कारण है कि लोगों की कटाई सकने में रूचि नही ते छुट मिली हुई हैं, जिसके परिणाम स्वरूप पेड़ काटने वालों ने कटे पेड़ों की दुलाई के लिए को बड़ी भारी किमत चुकानी पडेगी। करना पडेगा तभी कुछ सुधार हो सकता अन्यथा नहीं। क्या आवश्यक है वन्य जीव संरक्षण ? का मानसिक राताप भी उन्हे मनुष्य की तरह ही होता हैं।
35 | पुराने वन बचाओ नये वन लगाओं। बनायेगे. और मनुष्यो के लिए भी खतरा बनेगे। इसी प्रकार कीट पतगो को खाने वाले पक्षी खत्म होगें तो अनेक प्रकार के हानिकारक कीड़े कीटाणु बढ जायेगें जो फसलों को नष्ट कर देगें। इस प्रकार प्रकृति का सतुलन बनाये रखने के लिए सृष्टि के समस्त जीव जंतुओं की स्वाभाविक भूमिका प्रकृति द्वारा तय है। कोई भी जानवर अनुपयोगी नही है। यहा तक की जहरीले सर्प आदि जानवर चूहे खाकर फसलो की रक्षा करते है, और वायुमण्डल में भौजुद जहरीली गैसों को पीकर प्राणवायु के शुद्धिकरण में प्रत्यक्ष भूमिका निभाते है। यही कारण कि वे किसानों द्वारा पूजे जाते हैं। इस प्रकार धरती के तमाम जीव जंतु, पशु पक्षी, प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप में मनुष्य की सेवा के लिए परमात्मा ने बनाये। लेकिन खेद का विषय है कि मनुष्य अपने अज्ञानवश इन्हे अपने अधीन मानकर क्रुरता पूर्वक नष्ट करने पर तुला हुआ हैं। मांस. खाल. लोम. सींग, दाँत आदि के लोभ में अथवा शौकिया (मनोरजन के लिए) वन्य प्राणियों को निर्दयता पूर्वक मारा जा रहा है। इसके अलावा देव पूजा के नाम पर पाखण्ड रचकर निर्दोष पशुओ की बलि चढाना, चिकित्सकीय परीक्षणों में जानवरों की हत्या करना, तथा जीवित जानवरों को मर्मान्तक पीड़ा देकर उनसे कथित कातिवर्धक वस्तुएं (सौन्दर्य प्रसाद नि हेतु) प्राप्त करना भी शामिल है। वन्य प्राणियों के अन्धाधुन्ध शिकार की प्रवृति के कारण विगत तीन सौ सालो में 36 किस्म के स्तनपायी व 94 किस्म के पक्षियों की प्रजातियों का नामोनिशान मिट गया, और अब 236 स्तनधारी एव 287 पक्षियों की प्रजातियें अपने अस्तित्व की अंतिम घडिया गिन रही हैं। जीव वैज्ञानिकों का कहना है कि यही स्थिति अबाध चलती रही तो वनो की तीव्र कटाई के फलस्वरूप अगले 20 वर्षों में 50 प्रतिशत वन्य जीवों की व वनस्पतियो की प्रजातियां नष्ट हो जायेगी, और इनको सरक्षण नही दिया गया तो पर्यावरण चक्र पर अत्यत घातक प्रभाव पड़ेगा। आज से 40 वर्ष पहले खेतों में हरिणो व गिदड़ो की डार की डार घुमती रहती थी। लेकिन अब मात्र विश्नोई बहुल क्षेत्रों में अथवा चिड़ियाघरो में ही देखने को मिलते हैं। ट्रेक्टर आदि मशीनीकृत यत्रों की बुवाई मे भूमिगत सांप, केंचुए आदि की अनेक प्रजातियाँ नष्ट हो गई। डाइक्लोफेनिक सोडियम नामक जहर के दवा के रूप में उपयोग से नभचर गिद्ध, कौओं आदि की अनेक प्रजातियां लुप्त हो गई, जो हमारे मृत जानवरो की देह को खाकर पर्यावरण संतुलन का काम निःशुल्क करते थे। वनों के साथ-साथ वन्य प्राणियो का अस्तित्व भी जरूरी है क्योकि वन एवं वन्य प्राणी एक दुसरे पर आश्रित हैं वनो के विकास में वन्य पशु पक्षियों का महत्वपूर्ण योगदान है। वन्य प्राणियों के वन सहज प्राकृतिक आवास स्थल है। लेकिन जैसे-2 वनो का आकार सिमट रहा है वैसे-2 वनों पर निर्भर वन विकास की महत्वपूर्ण कड़ी माने जाने वाले वन्य पशु पक्षियों की जान पर बन आई हैं। उनके लिए अब अपने आपको शत्रु जानवरों एवं शिकारियों की नजर से बचा पाना मुश्किल हो गया हैं।
अनुमव करने वाली जान होती है। श्रीमद भागवत गीता में स्वय भगवान श्री कृष्ण अर्जुन कि अगर इन पशुओं को मारा नही जाये तो इनकी सख्या बढ जायेगी। लेकिन वास्तव यह सोच सही नही है वन्य प्राणियों की आवश्यक सख्या. संतुलन को कायम रखने हेतु प्रद की व्यवस्था ही कारगर है। इसमें मनुष्य का किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप इसलिए उचित नहीं है, क्योकि एसा होने पर उस जानवर की उपयोगिता का लाम प्राप्त नहीं किया में वृक्षों को अत्यत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है। हमारे तीज त्यौहारों पर दर्शक हमारी प्राचीन भारतीय परम्परा में वृक्षों को देव तुल्य स्थान प्राप्त था। धर्म शास्त्र पुजा का विधान कर प्रकृति के सरक्षण और पर्यावरण नियमों का परम्परागत विकास किय गया। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए गुरू जम्भेश्वर महाराज ने पर्यावरण संरक्षण हे -"जीव दया पालणी रूंख लीलो नहीं धावे" नामक धर्म नियम अपनाने पर विशेष बल दिया मनु स्मृति में वृक्षो की योनि पूर्व जन्म के कर्मों के फलस्वरूप मानी गई है। उसमें वृक्षों के कठोपनिषद मे जिज्ञासु ऋषि पुत्र नचिकेता को स्वयं यमराज कहते हैं कि मनु की जीवात्मा को अपने पूर्व कर्मफल स्वरूप मृत्यु के बाद भी शरीर धारण करना पड़ता। उनमें जिनके पाप-पुण्य समान होते हैं, वे मनुष्य का और जिनके पुण्य कम तथा पाप अधि होते हैं, वे पशु पक्षी का शरीर धारण करके उत्पन्न होते हैं, और कितने ही जिनके पा अत्यधिक होते हैं. रथावर भादको प्रात हो कर वृक्ष, लता, तृण आदि जड शरीर में उत्प होते हैं। इस प्रकार पशु पक्षियों एवं वृक्षों में भी हमारी ही तरह सुख दुख, कष्ट का अनुर स्थाणुमन्ये अनुसयन्ति यथाकर्म यथा श्रुतम्।।(कठोपनिषद-1) वैज्ञानिक प्रयोग के द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया था, कि पेड-पौधों में भी सुख-दुख कालान्तर में महान वैज्ञानिक सर चगदीश चन्द्र वसु ने तो इससे भी आगे बढद वृक्षारोपण का यही पगार होगा स्वस्थ सुखी इन्सान । जैसा कि हम जानते है कि यनों के पेड़ पौधे परागाह की घास व अनेक और को उगाने के लिए कोई हल जोतने नहीं जाता. यनों में पेड़ पौधों की अभिवृद्धि प्रकृति दून स्वचालित प्रक्रिया के तहत स्वत होती रहती है। प्रकृति की इस लीला में यन्य जीयों का महत्वपूर्ण योगदान होता है वन्य पशु खूरों एव शरीर के बालों आदि से चिपक कर घास, फुल फल आदि के बीज इधर-उधर फैल रहते है। कई पशु पक्षियों द्वारा खाये जाने याले फलों के बीज, फूल य बीठ आदि के इस धरती पर एक जगह से दुसरी जगह भीजों के विखराव की प्रक्रिया निरतर चलती रहती है। छोटे-छोटे कीट पतगें फूलों के परागकणों को एक पौधे से दुसरे पौधे तक पहुंचाकर भी पौधे एव उराको फलों की अभिवृद्धि में प्रत्यक्ष सहायक बनते हैं। कई लोगों का तर्क होता सकता। धर्म शास्त्रों में वन एवं वन्य जीव सुरक्षा की महिमा भी अन्य जीवित प्रणियो की भाति सुख दुख का अनुभव करने वाला माना गया। करने वाली जीवात्मा विद्यमान साबित होती हैं। योनिमन्ये प्रपद्यन्तें शरीरत्वाय देहिन ।
सब प्राणियों को अपना बंधु समझना चाहिए - चरक सहिंता 37 उपदेश देते हुए कहते हैं कि वृक्षों में मैं पीपल का पेड़ हूँ। -"अश्वत्थमेंनं सुविरूढ मूल." पीपल का पेड़ दुसरे अन्य पेड़ों की तुलना में 100 गुना ज्यादा ऑक्सीजन छोड़ता हैं। पीपल के इसी महत्व के कारण इसे ऑक्सीजन का टेंक कहा गया हैं। वैसाख के महिने मे अत्यधिक गर्मी के कारण हरे पेड़ों में जब सिंचाई की आवश्यकता होती हैं तो पौराणिक मान्यताओं के कारण हमारी माताओं एवं बहिनों के द्वारा पीपल एवं खेजडी के वृक्षो में पूरे महिने पानी डालकर पुजा की जाती हैं। इस प्रकार श्रद्धा एवं विश्वास से परिपूर्ण धार्मिक मान्यताओ से सिचित पीपल, खेजड़ी.. क्ट,नीम, आदि पेड़ों की अभिवृद्धि होती रहती हैं। रामचरित मानस के अरण्यकांड में वन के सुरम्य पेड पौधों और पशु पक्षियों की सुन्दर क्रिडाओं का वर्णन अत्यंत मनमोहक ढंग से किया गया हैं। भगवान श्री राम जब वैदेही (सीता) की खोज मे वन मे विचरण करते हुए प्रकृति के सुन्दर स्वरूप का सजीव वर्णन करते हुए अपने भाई लक्षमण से कह रहे है चौ विटप विशाल लता अरूझानी। विविध वितान दिए जनुतानी।। कदली ताल वर धुजा पताका। देखि न मोह धीर मन जांका।। (1) विविध भाँति फूल तरू नाना। जनु बानैत बने बहु बाना। कहुँ-कहुँ सुंदर विटप सुहाए। जनु भट विलग-2 होई छाए।। (2) कुँजत पिक मानहुँ गजमाते। ढेक महोक ऊँट बिसराते।। मोर चकोर कीर वर बाजी। पारावत मराल सब ताजी।। (3) तितिर लावक पदचर जूथा। वरनि न जाइ मनोज बरूथा।। स्थ गिरी सिला दुदुंभी झरना। चातक बदी गुन गन वरना।। (4) मधुकर मुखर भेरी सहनाई। त्रिविध बयारी वसीठी आई।। चतुरगिनी सेन सँग लिन्हे। विचरत सबहि चुनौती दीन्हे || (5) मत्स्य पुराण में वृक्षारोपण को महान पुण्य कारक मानते हुए कहा गया है- दस कूप समा वापी, दस वापी समा हृद.। दस हृद सम पुत्रों, दस पुत्र समा दम ।। वृहस्पति स्मृति मे कहा गया है कि जो मनुष्य-"में सबका आत्मा हु" यह जानकर अडज, स्वेदज, उद्भिज्ज व जरायुज इन चार प्रकार के प्राणियों को दुख नहीं देता, उस जीवात्मा को शरीर से अलग होने पर भी अर्थात (मरने पर) कभी भय नही रहता.-- योन हिस्या दहं ह्यात्मा भुतयामं चतुर्विधम। तस्य देहा द्वियुक्तस्य भयं नास्ति कदाचन।। 3411 (वृहस्पति स्मृति) इसी स्मृति मे और भी कहा है :-"दान द्वारा धन सफल होता हैं" जीव की रक्षा से आयु की वृद्धि होती हैं, जो मनुष्य हिंसा नही करता वह एश्वर्य और आरोग्य रूप अहिंसा के फल को भोगता हैं- धन फलमि दानेन, जीवित जीव रक्षणात। रूपमारोग्यमैश्वर्य, हिसा फल मश्नुते।। 71 वृहस्पति स्मृति।।
चरक सहिता इसके अलावा मनुष्य शरीर का मुल्याकन करते हुए कहा गया है कि उसी मनुष्य का जीवन सार्थक है जो बहुतों का जीवन मूल है. और जो केवल अपना पेट भरने में ही लगे रहते है अत्रि स्मृति में लिखा है कि दुख की अवस्था में जो प्राणी की रक्षा करता है, उसकी उपरोक्त श्लोक में यजुर्वेद में राजा को इंगित कर हिदायत दी गई है कि। राजन आप कई प्रकार की दृष्टि से देखने वाले हैं अत सुख की प्राप्ति के लिए एवं अपने वृद्धि हेतु द्विपद प्राणी मनुष्य तथा पवित्रकार जंगली गवादि पशुओ को मत मारो, उस पर क्रातिकारी सत जैनमुनी श्री तरूणसागर जी महाराज की दृष्टि में हिन्दू वही। जो हिसा न होने दें। अक्सर कहा करते है कि जिस धर्म शास्त्र में अहिंसा की प्रतिक हो, उसे सिर पर रखकर पूजना चाहिए और जो धर्म शास्त्र हिसा को, धर्म बताना हो त चूल्हें में जला देना चाहिए। उपरोक्त विवरण के शास्त्रोक्त उदाहरणों का मोटे तौर पर सार अर्थात दुसरो पर उपकार करना पुण्य, तथा दुसरों को दुःख पहुचाना पाप की श्रेणी में आता। प्रतिदिन सब प्राणियों को मंगल कामना करें - दक्षा स्मृति में लेख है कि सुख की अभिलाषा करने पाला अपने की समान दुर जीवधारियों को भी देखे । क्योकि जैसा सुख-दुख स्वयं को होता है वैसा ही अनुभव दुः. को होता है.- यथैवात्मा परस्त पद दृष्टय्य. सुखमियता । सुख दुखानि तुल्यानि. यथात्मनि तथा परे ।। 21 दक्ष स्मृति ।। और भी कहा है कि जो सुख दुख दुसरे के लिए किया जाता है, वह सब कालान्तर में अफ आत्मा में ही आकर कर्ता को प्राप्त होते है... सुख वा यदि था दुख, यत्किंचित्कृपते परे । यस्कृत तु पुनः पश्चात्सर्वमात्मनि रखेत 1122 दक्ष स्मृति ।। वे जीते हुए ही मृतक के समान हैं। स जीवति य एवं को बहुभिरचोय जीत्यते । जीवं तो मृतका रत्वन्ये पुरुषा रयोदर भरा ।। 36 दक्ष स्मृति ।। दान के तीन फल (धर्म, अर्थ व काम) प्राप्त होता है.- आतुरे प्राणदाता च त्रीणी दान फलानि च (अत्रि स्मृति) शातातप स्मृति में अध्याय 5 में उल्लेख है कि पशु की हिसा करने वाला घोर द्वारा मारा जाता है- इय मा हिंसी दिपाद पशु सहस्त्राक्षो मेघाय चीयमानः । मयुं पशु मेघमग्रे जुषस्य तेन चिन्यानस्तन्दोनिषाद ।। यजुर्वेद/13/471 की सेवा करके उससे लाम उठाते हुए शरीर को निरन्तर स्थिर बनाओं । यही है कि किसी भी प्राणी को दुख देना अधर्म, और सुख पहुचाना धर्म है। चार वेद छ शास्त्र में, बात लिखी है दोय । दुख दीने दुख होत है, सुख दीनै सुख होय ।। महर्षि वेद व्यास ने इसकी पुष्टि इस प्रकार की.- परोपकारस्य पुण्याय. पापाय पर पीड़नम ।
विदुर नीति || गुणीजन प्राणियों के संहार की अनदेखी नही करते - कहा भी है.- जन्मापि दातु न बल ही यत्र। विनाशने तत्र न कोऽपि तर्क.। यत्रापि कुत्रापि यदर्थ मेवम। हिसा पशुनां परिवर्जनीया।। अर्थात् जब किसी को उत्पन्न करने मे हम असमर्थ है, तो किसी को मारने का हमें क्या अधिकार है? अत. जहां कहीं भी पशु हिसा होती हो, उसका विरोध करना चाहिए। महापुरुषों की नजर में अहिंसा 1 भगवान महावीर स्वामी :- अपनी जान सबको प्यारी है अत समस्त प्रणियों के प्रति कल्याण भावना ही सच्चा धर्म हैं। 2. भगवान बुद्ध :- ज्ञानी होने का सार यही है, कि वह किसी भी प्राणी की हिसा न करे। अहिसामूलक समता ही धर्म है। मृत्यु भय से भयभीत जीवों की रक्षा करना ही अभयदान हैं। मास म्लेच्छो का भोजन हैं 3 ईसा मसीह - मनुष्यों तुम रक्त वहाना छोड दो. मुँह मे मास मत डालों । प्रभु बड़ा दयालु है. उसकी आज्ञा है कि मनुष्य पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाले अन्न व फलो से जीवन निर्वाह करे। बाइबिल (33-61--1) 4 मोहम्मद साहब.- (सुरी हज-जिकर हज) अल्लाह खून और गोश्त को पसद नही करता। लईयना लल्लाह लुहू मूहा वला दिमा ओहा वला कि अयना लुहत तकवा. अल्लाह ताला को तुम्हारी कुर्बानियों के गोश्त और खून से कोई वास्ता नहीं, केवल विश्वास की जरूरत हैं। 5. सन्त कबीरजी-इन झटका उन बिसमिल कीना. दया दोहां से भागी। कहत कबीर सुनो भाई साधो, आग दोवा घर लागी। ६. सत पीपाजी :- जीव मार जीमण करे, खातां करे बखाण। पीपा परतख देखले, थाली मांय मसाण।। 7. गोस्वामी तुलसीदासजी- दया धर्म का मूल, पाप मूल अभिमान। तुलसी दया न छोडिये, जब लग घट में प्राण ।। 8 जार्ज बर्नार्डशा- मनुष्यों! जानवरो को भी जीने का हक दो। उन्हे खाकर पेट को कब्रिस्तान मत बनाओं।। 9 स्वामी दयानन्दसरस्वती- वेदो मे मांस खाने का कही उल्लेख नही हैं। 10. गुरू जम्भेश्वर भगवान-जाडी हिरण संहार, देख सिर दिजिये। बरजत मारे जीव, तहां मर जाईये।। 11. बादशाह अकबर-दीन ए इलाही मत में मांसाहार व जीव हत्या का स्पष्ट रूप से निषेध माना जायेगा। 12. सुफीवाद - सूफी सन्त भी मासाहार के विरूद्ध थे। 13. गुरू नानकदेव :- मेरे शिथ्यो तुम मास भक्षण एव जीव हिसा मत करना।
अनुसूची को संशोधित कर अन्य बहुत से पशु पक्षियों को उसमे शामिल किया गया, एक नजर में जीव जतुओ को नही मारा जायेगाः तोते, मैना, अरूणा, कलहस, नन्दीमुख,सारस, दिनाक जिसका नाम-'वन्य पक्षी सुरक्षा अधिनियम नं. 10 रखा गया। लेकिन यह कानुन नगरपालिव आदि कुछ विशेष क्षेत्रों तक ही सीमित था, इसके अलावा इस कानून में मात्र प्रजनन र मे ही पक्षियो को बेचने पास रखने मे निषेध किया गया था, किन्तु उनको मारना मना था। अत यह कानून लगभग बेअसर साबित हुआ और पशु पक्षियो की प्रजातियों के वि अत अग्रेज सरकार ने वर्ष 1912 में वन्य पक्षी एव पशु संरक्षण अधिनियम पारित किया जिसमे राज्य सरकारो को राज पत्र में अधिसूचना के द्वारा यह अधिकार। गया कि वे अपने क्षेत्र में पूरे वर्ष तक वन्य पक्षी तथा पशु के लिए शिकार बद अवधि कर सकती है, ऐसे किसी अन्य पक्षी तथा पशु को पकड़ना, मारना, बेचना अथवा खर कानून के विरुद्ध होगा तथा इस अधिनियम के उल्लघन पर 50 से 100 रूपये तक जु इस अधिनियम मे मात्र चौसिगे, गर्थे, गवल, भैंस, हरिण, चिकारा, बकरिया, खर एव घडियाल आदि बड़े जानवरों को इस कानून की परिधि में नही लेने से इनके शिका अधिनियम न 27 के द्वारा इस कानून में ससोधन कर 1912 के मुख्य अधिनियम में धार और जोड़ी गई जिसमें यह व्यवस्था थी कि प्रान्तीय सरकारें अधिसूचना के द्वारा किसी को वन्य पशु पक्षियों के लिए अभयारण्य घोषित कर सकती हैं, जिसमें मौजूद किसी भी पशु पसी को मारने की मनाही होगी और इसमें 50 रूपये जुर्माने का प्रावधान रखा गया और सब प्राणियों के साथ अपने जेसा बर्ताव करें - महाभारत वन्य जीव सुरक्षा कानून का विकास वन्य जीव कानूनों की नीतियों का इतिहास बहुत पुराना है। वैसे तो प्राय . धर्मो में इनके संरक्षण की बात कही गई हैं। लेकिन सबसे पहले इस सबन्ध में लिखित काट ई पू. तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने बनाया अपने शासन काल के अंतिम दिन उन्होने लिखा- "अपने राज्यभिषेक के 26 साल बाद मैं घोषणा करता हूं कि निम्नलिहि वाली मछलिया, गैंडे. . ... ....और सभी चौपाऐ जानवर उपयोगी तथा खाने लायक है. वनों को नहीं जलाया जाएगा-"आदि कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वन्य जीवो हत्या करने व हानि पहुंचाये जाने पर राजा की और से कठोर दण्ड के प्रावधान का च हैं। बिश्नोई सप्रदाय के प्रणेता गुरू जम्भेश्वर महाराज के बाद बिश्नोई समाज की दर रियासत काल में राजाओं एव जागीरदारों द्वारा वन्य जीवों के शिकार पर पाबंदी वन्य जीवों के प्रति सुरक्षा भावना के अनुरूप बीकानेर, जोधपुर, नागौर आदि अनेक जिल समय-समय पर लिखित परवाने एव ताम्रपत्र जारी किये जाते रहे। सर्वप्रथम भारत में सहिताबद्ध लिखित कानून सन् 1887 में अंग्रेजो ने बना का खतरा नही टल पाया। तथा एक माह तक के करावास की सजा का प्रावधान रखा गया। मैल, गडे भेड़ तथा 16 पक्षियों की प्रजातियां शामिल हाथी, शेर, बाघ, तेन्दूप, रोकथाम नही हो पाई थी। अत सन् 1935 मे वन्य पक्षी एवं पशु सुरक्षा लेकिन्त 41 - बेजुबान प्राणियों की आवाज बनें पीपुल फॉर एनीमल्स अभयारण्य के अलावा कही पर भी शिकार की मनाही नही थी। इसी वर्ष बने गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट की धारा 100 में सभी प्रान्तों को वन्य जीव कानून अपने-अपने स्तर पर बनाने की छुट दे दी गई। अत सभी राज्यों में इस सम्बन्ध में अलग-अलग कानून बन गये। यह कानून भी कारगर साबित नही हुआ, इस सम्बन्ध में अखिल भारतीय स्तर पर कोई विशेष प्रयास नहीं किये गये। इसके बाद देश आजाद होने के काफी समय बाद ससद ने 9 सितम्बर 1972 को यन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम स. 53 पारित किया, वैसे यह कानून पूर्ववर्ती कानूनो से सशक्त था। लेकिन इसमें भी कुछ खामियों रह गई इस अधिनियम की धारा 9 में लाईसेंस धारक को शिकार करने की अनुमति का प्रावधान था, तथा इसके अलावा अधिनियम की धारा 44 मे लाईसेरा प्राप्त करने पर रारक्षित जीव जन्तुओं के व्यापार पर छुट थी। इसके बाद 1976 में वन्य जीवों को कुछ सम्मानजनक स्थान मिला सरकार ने स्वय देश के वन्य जीवों की सुरक्षा, सुधार और बचाव की सवेधानिक जिम्मेवारी सभाली और वन्य जीयों की सुरक्षा के लिए राज्य सूचि-2 में उल्लेखित प्रविष्टि सख्या-20 को समवर्ती सूचि-3 में अतरित किया गया जिससे ससद और राज्य विधान मण्डल दोनों को वन्य पशु पक्षियो की सुरक्षा हेतु कानून पारित करने का अधिकार मिल गया। दुसरा महत्वपूर्ण कार्य यह हुआ कि 20 जुलाई 1976 को वन्य प्राणीजात और वनस्पतियो की संकटापन्न प्रजातियों के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार सम्बन्धी कनवेन्शन जिसे 'साईटस' कहते हैं की अनुसमर्थन के दस्तावेजजमा करवाये और 18 अक्टुबर 1976 देश इसका एक पक्षकार बन गया। सन् 1982 में वन्य प्राणी सरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 11 और 12 मे सशोधन करके वैज्ञानिक प्रबध अथवा सकटापन्न प्रजातियों के वैकल्पिक उपयुक्त वासस्थल मे रखने के लिए वन्य जीवों को पकड़ने और स्थानान्तरण के लिए लाईसेंस लेना जरूरी कर दिया गया तथा धारा 44 मे भी सशोधन किया गया। वर्ष 1986 में 1986 के सशोधन अधिनियम सख्या 28 के द्वारा सविधान के अनुच्छेद 253 के तहत वन्य प्राणियो और वनस्पतियों की सकटापन्न प्रजातियो के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार (साईटस) के उपबंधो को लागू करने के लिए वन्य जीव सरक्षण अधिनियम 1972 मे एक नया अध्याय 5 क जोडकर अनुसूचित जीव जन्तुओं से व्युत्पन्न ट्राफियों, जीव, जन्तु-वस्तुओं आदि के व्यापार पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया गया कि अब कोई भी व्यक्ति चाहे उसके पास लाईसेंस हो या न हो इन अनुसूचित जीव जन्तुओं उनके किसी अगो, मास, खाल, हड्डियो, दातो अथवा उनकी ट्राफियों, बदी पशुओ आदि का कारोबार नही कर सकता था। सन् 1991 के संशोधित अधिनियम सख्या 44 में एक नया अध्याय ३ क जोड़ा गया। जिसमें सकटापन्न पौधो के संकलन एवं वाणिज्यक दोहन पर प्रतिबंध लगाने के उपबधो का प्रावधान किया गया। इसी अधिनियम में अनुसूचि 6 जोड़ी गयी जिसमें सकटापन्न पौधों की विविध प्रजातियो को सूचिबध किया गया। इस प्रकार वन्य पशु पक्षियो के अलावा पौधे भी सरक्षित श्रेणी में आ गये इस प्रकार से तुरन्त बाहर निकालकर उसे राहत पहुचाये और इस बात का ख्याल रखा जाये कि चोटि छिनने का प्रयास करना चाहिए तथा शिकार में प्रयुक्त जीप, ऊँट आदि को भी घटनास्थ से वन्य प्राणियो का शिकार करना वन्य जीव सरक्षण अधिनियम 1972 का उल्लघन माना जाता है तथा ऐसा करना इस अधिनियम की धारा 51 के तहत दण्डनीय अपराध है और इन 1 वन्य पशु पक्षी के शिकार की घटना घटित होने पर मारा गया जानवर व उसके अगों 2. शिकार कर भाग रहे शिकारी को बिना चोट पहचाये पकड़ने का प्रयास करे अथवा अन 3 जानवर अगर घायल अवस्था में है तो प्राथमिक उपचार कर अथवा डॉक्टरी इलाज 5. घटनास्थल पर विद्यमान जानवर का शव, बिखरा खून. खूनआलुदा मिट्टी. शिकारी शिकार में प्रयुक्त वाहन के पद चिन्ह, मांस.खाल, हथियार, आदि साक्ष्य जो मौके पर उपल हो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो ताकि इनकी बरामदगी से घटना की पुष्टि हो सके। 6 मारा गया जानबर लेकर भाग रहे शिकारी से यथा सभव जानवर बन्दूक, आदि अस्त्र शर घटना स्थल से न उठाने दे। लोगो की मदद से ऐसा करे। लाईसेंस धारी के जिसे Sub Sectuon 5 मे लाईसेस जारी किया गया हो) उपरोक्त विधियों वरिष्ठ विधि सलाहकार श्री पाबूराम विश्नोई के अनुसार कानून द्वारा सरक्षित फिर 4 जानवर अगर शिकारी के कुडके अथवा किसी फासे या फदे में फसा हुआ हो तो सावधान जीव दया नित राख, पाप नही कीजिये - संत विल्होजी सन् 1887 मे कुछ चुनिन्दा पक्षियों के संरक्षण से शुरू हुई प्रक्रिया उत्तरोतर आगे बढी, अनेक सशोधनों की प्रक्रियाओं से गुजरती हुई 107 साल बाद सन् 1991 में अपना अभिट स्थान प्राप्त कर वन एवं वन्य जीवों की सर्वाधिक उपेक्षित प्रजातियों को कानूनन अभिष्ट सुझा मिल पाई। लेकिन यह प्रक्रिया अभी रूकी नहीं हैं अब भी कुछ संकट ग्रस्त वन्य जीव प्रजातिय सुरक्षा के इन्तजार में हैं। अवैध शिकार की परिभाषा वन्य जीव सरक्षण अधिनियम कानून की अनुसूचि 1, 2, 3 एवं 4 में वर्णित सरति किसी भी वन्य प्राणी को बन्दूक, कुडका, तलवार, फासा, जाल, धनुष बाण, फदा, चाकू, पूर्व गुलेल से एव विष देकर मारना, पायल करना तथा ऐसा करने का प्रयास करना अवैध शिकत की परिधी मे आता है। अर्थात उपरोक्त साधनों से चारो अनुसूचियों के सरक्षित जगली पर पक्षियों को चोट पहुचाना, जान से मारने की चेष्टा करना अवैध शिकार माना जायेगा। सिकन अपराध की सजा कम से कम 6 माह से लेकर अधिकतम वर्ष तक हो सकती है। शिकार के बाद बरती जाने वाली सावधानियां भी वन्य पशु पक्षी के शिकार की घटना घटित होने पर निम्न सावधानियां बरती जानी चाहिए, उसका जीवन बचाने का प्रयास करे। n जानवर भाग न पाये तथा उसे कुत्ते आदि अन्य हिसक पशु भार न दे।
जांडी हिरण संहार देख, सिर दीजिये. संत विल्होजी 43 पर रोकना चाहिए ऐसा संभव न हो तो वाहन के नम्बर नोट कर लेने चाहिए तथा उनके भागने की दिशा की पूरी जानकारी रखनी चाहिए। 7. पकड़े गये शिकारी से किसी प्रकार का समझौता लाई (दण्ड) जुर्माना आदि न करके दोषी को कानूनन दण्ड दिलवाने हेतु दृढता पूर्वक कायम रहे। क्योंकि निरपराध जीवो की हत्या असम्य अपराध हैं। 8 सक्षम अधिकारी के घटनास्थल पर पहुंचने से पूर्व मृतक अथवा घायल जानवर के शरीर के अंगो व अन्य साक्ष्यों को घटनास्थल पर पड़ा रहने दें। उनके साथ किसी प्रकार की छेड़खानी न हो। घटना के तुरन्त बाद फोन पर नजदीकी पुलिस अथवा वन चौकी में सम्बधित वारदात की सूचना देकर अधिकारी को घटनास्थल पर बुला लेना चाहिए। अधिकारी द्वारा आनाकानी अथवा पहुचने में विलम्ब की अवस्था में जीव रक्षा समा अथवा पीपुल फॉर एनीमल्स से सम्पर्क करना चाहिए. इनके फोन नम्बर हमेशा पास रखे। 10. अगर शिकारी को मौके पर पकड़ा जाना सम्भव न हो तो वह जहां भी जाकर छिपे, अधिकारी के पहुचने तक उस पर पूरी नजर रखी जानी चाहिए। 11. पुलिस अथवा वन विभाग को दर्ज करवायी जाने वाली प्रथम सूचना रिपोर्ट में घटना का सिलसिलेवार सम्पूर्ण विवरण शिकारी का पूरा नाम, स्थान, समय, शिकार अपराध करने की प्रक्रिया सहित महत्वपूर्ण साक्ष्यों आदि की जानकारी एफ.आईआर. मे सम्बंधित अधिकारी को लिखित में देनी चाहिए। 12. अगर संम्भव हो सके तो मारे गये अथवा घायल जानवर एवं उसके अंगों व अन्य साक्ष्यों, शिकार में प्रयुक्त वाहन. ऊँट, हथियार एवं घटनास्थल का रंगीन फोटो लिया जाये। उक्त फोटो मय निगेटिव अदालत में केश जाने के बाद गवाही के दौरान मजिस्ट्रेट को सबूत के तौर पेश किया जाना चाहिए। 13 शिकारी को पकड़ने अथवा पकड़वाने में किसी प्रकार की झिझक महसूस न हो लेकिन उसके घर में प्रवेश नहीं किया जाये क्योंकि उसके घर की तलाशी करने का अधिकार पुलिस अथवा वन अधिकारी को ही है। 14 जाँच अधिकारी और अदालत को वारदात की सच्चाई अवगत करवाने हेतु खुलकर गवाही दें, क्योंकि गवाह के बयानों की शिकारी को दण्डित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका है। 15. अगर कोई व्यक्ति मौके, बेमौके छिपकर चारों अनुसूचियों मे सरक्षित किसी भी पशु पक्षी के शिकार करने के उद्देश्य से कुड़का, जाल, फासा, फदा, आदि लगाकर अथवा बन्दूक तलवार आदि से मारने अथवा पकड़ने का प्रयास करता है तो उसके खिलाफ भी कानूनी कार्यवाही सभव है। 18. शिकार की घटना घटित होने पर उपरोक्त सावचेती रखकर कोई भी व्यक्ति चाहे व किसी भी जाति या धर्म का क्यों न हो शिकार अपराधी के विरुद्ध पुलिस अथवा वन विभाग में स्वयं 1 जाच अधिकारी के घटनास्थल पर पहुंचते ही सबसे पहले अपराधी को पकडवाने है उसकी मौजुदगी के सम्भावित स्थान से शिकारी को अविलम्ब पकड़वाने की कोशिश कराई होने पर अथवा पुलिस के आने की भनक लगते ही अक्सर शिकारी फरार हो जाते हैं। 2 अगर शिकारी ने जानवर के मास, खाल. हड्डियां, सिर आदि सबूत मिटाने की निकार 4. शिकार के प्रयास में घायल वन्य जीव का डॉटरी मुआयना एवं ईलाज करवाया जा 5 शिकार वारदात मे मारे गये वन्य जीव के डाक्टर द्वारा किये जाने वाले पोस्टमाटर्म 8 घटनास्थल पर जांच अधिकारी द्वारा बनाये गये उन तमाम कागजों में जैसे- मौकाना बरामदगी फर्द, पंचनामा आदि कागजातों पर लिखे तमाम विवरण को पढ सुन एव समझा 7 मारे गये जानवर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट की एक कोपी सम्बंधित पशुचिकिता नियमानुसार 30 रूपये फीस जमा करवाकर ली जा सकती है। ताकि बाद में रिपोर्ट में 8 अधिकारी को मौके पर घटना का पूरा वृतांत सविस्तार बताया जाना चाहिए ताकि 9 बरामद साक्ष्यों मास.खाल. खून, खुर. हथियार आदि को सील बद करने के दौरान र ऊपर सील के साथ लगायी जाने वाली कागज की चिट पर हस्ताक्षर करने चाहिए 10. जाच के दौरान उपरोक्त एक मौका नक्शा की गवाही में जाच अधिकारी नाजायज से मुल्जिम पक्ष के किसी व्यक्ति को गवाह न बनाये तथा मुलजिम के परिजनों एक्स से मिली भक्त कर उनसे साठ गाठ न कर पाये. इसका ध्यान रखा जाना चाहिए। 11.किसी भी शिकार प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी गवाह है अत घटना से सम्बंधित दें और सही सही तथ्य अधिकारी को बताये ताकि अपराधी को दण्डित किया जाता जानकारी रखने वाले प्रत्यक्षादशी गवाह जाच अधिकारी के समक्ष खुलकर निर्भीकता सेगा बरजत मारे जीव, तहां मर जाइये - संत विल्होजी म पक्षकार बनकर लिखित एवं मौखिक शिकायत कर दोषी को पकड़वा सकता है। 17. सम्बधित विभाग में शिकार प्रकरण की एफआईआर दर्ज होने के बाद उसकी एक अवश्य प्राप्त करें। जांच अधिकारी एफ.आई.आर. की कोपी शिकायत कर्ता को देने के कानूनन बाध्य है। घटना की जाँच के दौरान बरती जाने सावचेती:- कहीं छिपा दिये है। तो उन्हे दृढने मे अधिकारी का सहयोग करना चाहिए। 3. अगर शिकारी घटनास्थल से कहीं और हो गया है, अथवा छुप गया है, तो उत्तर चिन्हों के आधार पर अधिकारी को मददकर तलाशने के प्रयास किये जाने चाहिए। दौरान सभा कार्यकर्ताओ की मौजुदगी आवश्यक है। ही हस्ताक्षर करने चाहिए, सादे कागजों पर नहीं। शिकार प्रकरण में माकूल कार्यवाही की जा सके। चाहिए। फेर नही किया जा सके। कागजों पर नहीं।
| हिंसा पशुता है, अहिंसा मनुष्यता । 45 12 ऐसा करते समय अपने मन में सदैव ये ख्याल रखे कि आप एक प्रकृति के घौर शत्रु को उसके किये की सजा दिलाने जा रहे है। ऐसा करना आपका धार्मिक एवं नैतिक दायित्व भी हैं। 13. मुकदमा अदालत में जाने के बाद अदालत की सूचना मिलने पर निश्चित तारीख पर गवाह अपने सही सही बयान कोर्ट में दे। अपने पूर्व ययान न बदले। 14 आर्थिक प्रलोमन अथवा किसी के बहकावे में आकर अदालत में झुठ बोलकर अपराधी को सजा से बचाना उचित नहीं हैं। वन्य जीव सुरक्षा कानून में तलाशी, गिरफ्तारी व बरामदगी वन्य जीव सरक्षण अधिनियम की धारा 50 मे निर्देश है कि मुख्य वन्य जीव सरक्षक । प्राधिकृत अधिकारी या यह यन अथवा पुलिस अधिकारी जो उपनिरीक्षक की श्रेणी से कम का न हो और जिसके पास यह विश्वास करने का युक्ति युक्त आधार है कि किसी व्यक्ति ने इस अधिनियम (वन्य जीय सरक्षण अधिनियम) के विरूद्ध कोई अपराध किया है। तो वह- (क) ऐसे व्यक्ति से अपने नियत्रण में या कब्जे के किसी बन्दी वन्य जीव जीव जन्तु के अंग, मांस. ट्राफी. (खाल, खुर,सींग) आदि को निरीक्षण के लिए पेश करने की अपेक्षा कर सकेगा। (ख) किसी यान की तलाशी लेने या जाच करने के लिए उसे रोक सकेगा या किसी ऐसे व्यक्ति के अभियोग में के किसी परिसर, भूमि, यान में प्रेवश कर सकेगा और उसकी तलाशी कर सकेगा। (ग) किसी व्यक्ति के कब्जे में के बन्दी प्राणी, वन्य प्राणी, वन्य प्राणी के कोई अग, मास, जिनके बायत इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है, किसी ऐसे अपराध को किए जाने के लिए प्रयुक्त किसी फासे, औजार, वाहन, और आयुध को जब्त कर सकता है, और जब तक कि उसका यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसा व्यक्ति हाजिर होगा और किसी ऐसे आरोप का उत्तर देगा, जो उसके विरूद्ध लगाया जाए, वह उसे बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकेगा, और उसके विरूद्ध कार्यवाही कर सकेगा। नियम 50 की धारा (1) में निर्दिष्ट किसी भी अधिकारी के लिए यह कानून सम्मत होगा कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को जिसे वह कोई ऐसा कार्य करते देखता है।नियम 50 कि धारा (3 क) वन्य जीव सरक्षक व वन्य जीव संरक्षण सहायक निदेशक के अधिकारी के अधीनस्थ अधिकारी ने यदि उप धारा (1) के खण्ड (ग) के किसी बन्दी प्राणी या वन्य प्राणी को अपने कब्जे में लिया है तो उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने से पूर्व अभिरक्षा में दे सकेगा। जिसके कारण अभिग्रहण किया गया है। (घ) पूर्वक शक्ति अधीन निरूद्ध किया गया (पकडा गया) कोई व्यक्ति या जब्त कि गई वस्तुएं विधि के अनुसार कार्यवाही किये जाने के लिए तुरंत मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जायी जायेगी (ड) कोई व्यक्ति जो बिना युक्ति युक्त हेतुक के कोई ऐसी चीज पेश करने में असफल रहता जम्ममहिमा || अधिनियम के अधीन अपराध के निवारण या पता लगाने या अपराधी को पकड़ने में ज्या के लिए कहे तब आरोपी व्यक्ति का कर्तव्य होगा कि वह ऐसी सहायता करे अर्थात आर * कोई भी व्यक्ति मुख्य वन्य जीव वार्डन या प्राधिकृत अधिकारी से अनुमति लिये बगैर दर जीव उत्पादों जैसे मांस, खाल, हड्डी, सीग, लोम आदि को लाने ले जाने पर प्रतिरवित हो। * चारों अनुसूचियों के किसी भी जीव जन्तु के शरीर के किसी भाग को क्षतिग्रस्त करताना वन्य पक्षीयों के अण्डो को नुकसान पहुंचाना तथा ऐसे पक्षियों व सरीसृपों के घौसलों * ऐसे आयुध गोला बारूद धनुष बाण, विस्फोटक, कुडका, काटें चाकु,जाल, विष, कदंप *किसी भी अनुसूचित वन्य पशु पक्षी को बन्दी बनाना व उसका मांस, घरों, या होटल पकाना भी अपराध की श्रेणी में आता है। अत ऐसी अवस्था मे ऐसा करने वालों को पक्षमा * स्वय अपने अथवा किसी अन्य व्यक्ति की प्रतिरक्षा में किसी वन्य जीव जन्तु को सदभावना * आदमखोर व जानलेवा हमला करने वाले हिसक जानवर द्वारा आक्रमण की स्थिति उक्त जन्तुओं को सदभाव पूर्वक घायल करना अथवा मारना अपराध नहीं होता लेकिन पाप भतिकर प्राणियां, देख अंधारि राति- है जिसे इस धारा के अधीन पेश करने के लिए अपेक्षित है। इस अधिनियम के अधीन अर का दोषी होगा। धारा 50 की उप धारा (7) में कहा गया है कि जब कभी सक्षम अधिकारी इस उससे मारे गये जानवर के शय, अगमा औजार बरामद करने के लिए सहायता को को इन्हे बरामद करवाना जरूरी होगा। कानून में अन्य प्रावधान इस प्रकार है.- कोई भी व्यापारी इनका व्यापार नही कर सकेगा। * पक्षीयों के विदेश निर्यात पर पूर्ण प्रतिबन्ध है। अनुसूची 1, 2, 3 4 4 के जीव जन्तुओं को बन्दी अवस्था में नहीं रखा जा सकेगा त उन्हे पकड़कर कही लाया ले जाया नही जा सकेगा। करना या नुकसान पहुंचाना अथवा काट कर लेना। गडबडाना क्षतिग्रस्त करना कानूनन प्रतिबंधित हैं। आदि उपकरण जिनसे वन्य जीव को मारा गया हो अथवा वन्य जीव को धोखे से पकड़ा। हो अथवा वन्य जीव के किसी अग को क्षतिग्रस्त किया गया हो को सबूत के तौर पर बरा करना कानून सम्मत है। जाना न्याय सगत हैं।। पूर्वक पकडकर धन अधिकरियों को सुपुर्द करना गलत नहीं है। मारागया उक्त पशु सरकारी सम्पति होगा। * उपरोक्त नियम जम्मू कश्मीर को छोड़कर पूरे भारत में लागू है।
47 जीवदया.लित पालणी, सदाचार यह जाण जम्भसार वन्य जीव शिकार गतिविधियां राजस्थान के बीकानेर व जोधपुर संभाग में वन्य जीव सबसे अधिक असुरक्षित हैं। यहां सर्वाधिक चिकारा हरिणों का शिकार हो रहा हैं। जब से जीव रक्षा विश्नोई समा ने शिकारियों के खिलाफ धरपकड़ करवाने का अभियान छेड़ा है, तब से शिकारियों ने अपने बचाव के कई तरीके अपना लिये हैं। विश्नोई समाज की चौकस निगाहों से बचने के लिए अब बन्दूकों की बजाय कई अन्य तरीकों से वन्य जीवों को मारा जा रहा हैं। उनमें कुडका, लौहे का शिकजा) फासीनुमा तार का फदा, जाल आदि प्रमुख है। शिकारी प्रवृति के लोग ये जानते है कि हरिण कहीं भी विचरण करे, लेकिन रात को उसके बैठने की (विश्राम स्थल) सुराळी एक ही जगह निश्चित होती हैं, जहा वह बैठना पसंद करता है. और हरिण की यही आदत उसकी मौत का कारण बनती हैं। खुराळी में हरिण की जाने की डगर में शिकारी लोग जगह जगह लोहे के कुडके लगा देते हैं। लौहे की पत्तियों के गोलाकार पूरे घेरे के रूप में निर्मित कुड़के में कपडा सिला होता है. कुड़के को खोलते समय इस धेरे के ऊपर सिकजेनुमा अन्य दो पत्तिया फैलकर बाहरी घेरे के बराबर हो जाती है। इसे खुला रखने के लिए एक कुटा लगा होता है, जो कपड़े पर हरिण के पैर पड़ते ही (हलचल से) कुड़के में लगी फैली पत्तिया शिकुड़कर हरिण का पैर मजयुती से कस लेती हैं। कुड़के के एक सिरे पर लोहे की साफळ बंधी होती है जिसके दुसरे सिरे में एक लकडी की गिल्ली लगी होती है उस को गहरा गड्डा खोदकर दबा दिया जाता हैं। ताकि कुड़के मे फंसा हरिण कुड़का लेकर भाग न सके। शिकारी की इस करतूत से अनजान अपनी डगर से गुजर रहा हरिण का पैर इस प्रकार धोखे से कुडके में फस जाता हैं। कुडके की पकड़ से आजाद होने के लिए हरिण अपनी पूरी ताकत लगाकर प्रयास करता है। जकड के भयंकर दर्द से छटपटाते हुए उन्मत की तरह कुड़के के चारों और चक्करधिन्नी की तरह चक्कर काटता व गिरता पड़ता, कराहता एव रोता रहता हैं। लेकिन उसके करूण क्रिन्दन को सुनने वाला यहा कोई नहीं होता लहुलुहान अवस्था मे चेतनाशुन्य होकर दर्द से बिलबिलाते हरिण को थोडी सी आहट मिलते ही दूर छिपा शिकारी आकर (फसे हुए हरिण को) वेर्ददी से लाठियों से मारकर निकाल कर ले जाता हैं। कई बार शिकारी के पहुचने मे देर होने पर मांसाहारी जगली जानवर उसे जिन्दा नोच-नोच कर खा जाते है। हरिण की ऐसी दयनीय दुर्दशाग्रस्त रक्तरजित घोर दुखदायी मौत मनुष्य की अकल्पनीय क्रूरता को प्रकट करती हैं। लोहे के कुडके से हरिण का शिकार जब से शिकारियों ने कुड़कों से हरिणो का शिकार करना शुरू किया है तब से चालाक शिकारी अक्सर कानून की पकड़ बच रहे है। चोरी छुपे कुडके से शिकार करने वाले शिकारियों को कानून की पकड मे लाना जरूरी हैं। ऐसी वारदातो मे हरिण की चिल्लाहट की आहट से कई बार शिकारी पकडे भी जाते हैं, लेकिन कुल घटित ऐसी वारदातो में मात्र बावजूद मात्र कुडके और कटे पजे तथा परिस्थिति जन्य साक्ष्य के आधार पर अपराधी शिकारी समस्त जीव किसी न किसी रूप में मनुष्य के सेवक हैं । 5 प्रतिशत मागते ही पकड़ में आपायोंकि ज्यादातर शिकारी निर्जन ऐसे स्म ही कुरुको लगाते हैं, जहां से फसे हुए जानवर की आवाज कोई सुन न पाये। अढ इमा होना भी जरूरी है। इसकी जरूरत पर अधिकार लोग ऐसी बातों पर ध्यान नहीं है। कुछ मामलों ऐसा देखने में mes में फसा हरिण पजा तुझाकर भाग अध ऐसी अवस्था में कुछका लगाने वाले अपराधी तक कसे पाया जाये ? इस सम्बध में अपने निजी अनुभव पर आधरित पटना प्रस्तुत करना चाहुंगा। जो इस प्रकार है- दिनाक 15 3 2000 को चफ 15 केएलडी (आनन्दगद) निवासी श्री सत्यानन्द हेतु चौकस निगरानी की जरूरत है। इस सम्बंध में पूर्ण जानकारी का आवश्यक प्र! सभा को सूचित किया कि वह खरूला पोस्ट के पास गाये चरा रहा था तो एक चिकायह जिसके एक पाव में कुउका लगा हुआ लंगड़ाता हुआ वहां से गुजरा। थोड़ी दूर असेल रोहरिण आया था. एक व्यक्ति हरिण का पीछा करता मालूम हुआ जिसे उसने पहचान लिया श्री सतपाल ने हरिण को पकडकर उसके पाव के जकड़े कड़के को निकालने का प्रयास किन तो इसी दौरान पजा तुडाकर हरिण भाग गया। श्री राहू से पूरी घटना सुनकर लेखक स्पति पूगल थाना प्रभारी को लेकर सतपाल राहू की ढाणी गया। वहा पर 15-20 अन्य पर 1-"मुझे इस शिकार प्रकरण में नाहक झुठा फसाया रहा है तो उसे मैने सम्झाया गया कि पूरे मामले की तहकीकात (जाँच) कर ही कार्य होगी किसी को झठा फंसाना हमारा ध्येय नही हैं। श्री सतपाल सह हमे घटना स्थल पर गये और हाथ से इशारा कर कुडका घिसटते हरिण के पद चिन्ह और उन पद चिन्हीं पीछे-पीछे एक व्यक्ति के चप्पलो के खोज बताते हुए कहा कि यह पैर इसी शिक आदुराम नायक के है जो अब आपके सामने अपने आप को बेगुनाह साबित करने के झुठा नाटक कर रहा हैं। इसको कुडका लगे हरिण का पीछा करते हुए मन स्वय अपनी अ से देखा हैं। आदुराम नायक के पैरो मे उसी समय वही चप्पल पहनी हुई थी, जो हरिय पीछा करने के दौरान थी। उस चप्पल मे लगे चमड़े के दो पैबन्द ही सतपाल के दावे सही ठहराने हेतु पर्याप्त थे, लेकिन फिर भी हमने घटना की पूरी तह मे जाने की ठान ली।। भेउसी शिकारी आदुराम के खेत की सीव के पास एक लकड़ी के देर तक जाकर पद विहीं लगभग एक किलोमीटर चलने तक उसी व्यक्ति के पैर हरिण का पीछा करते दिखे। अन्न | रूक गये। लकडिया हटाई गयी तो उनके नीचे कुडका लगाते समय भूमि में खोदा मा गड्ढा निकल आया। वहीं पर हरिण के बिखरे बाल एव खुन आलुदा मिट्टी सच्चाई का बचाना जब थाना अधिकारी ने अपने तेवर दिखाये तो घिघियाते हुए शिकारी आदरान नायक ने अपना अपराध कबूल कर लिया और पूरा अपराध घटनाक्रम हबह जबानी बयान कर सब कुछ सच-सच उगल दिया। इस प्रकार शिकार प्रभावित हरिण के भाग जाने के। मौजूद मिले, उनमे से एक ने कहा- कर रहे थे। अब शक की कोई गुंजाईश नही थी। पकडा गया।
1 . रोग करो हिंसा अहिंसा में बदल जायेगी - योग गुरू स्वामी रामदेवजी | 49 सल रखवाली के बहाने वन्य जीवों का विनाश जीव रक्षा विश्नोइ सभा की सक्रियता और समाज की चोकस निगाहो से बचने के लए वन्य जीव शिकारी कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते है। वर्तमान में पर्यावरण प्रेमियों की छेड़ी गई मुहिम से बचने के लिए शिकारियों द्वारा फसल रक्षा का अब झुठा बहाना बनाकर जोकानेर, श्रीगगानगर, आदि जिलों के सीमावृति नहरी क्षेत्र मे मौजूद जंगली जानवरो पर कहर बरपाया जा रहा है। वहा पर चालाक पेशेवर बन वावरी शिकारी क्षेत्र के किसानों को कसलो की सुरक्षा के लिए जरूरी बताकर जंगली जानवरों के सफाये हेतु भ्रमित कर मना नेते है। और फसलों की सुरक्षा की आड मे वन्य जीवो का शिकार करते है। वास्तविकता यह है कि हरिण आदि जानवरो द्वारा बडे पौधों के ऊपरी भागं घर लेने पर फसल की बढोतरी मे कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता एव छोटे पौधों के समूल उखडने पर कृिति उक्त फसल की क्षति पूर्ति किसी न किसी रूप में स्वत पूरी कर देती है। लेकिन इस असलियत से बेखबर कई भ्रमित किसान बाहर से ऐसे आदतन शिकारियों को बुलाकर अपने खेतों के आस पास मौजूद हरिण, नील गाय, खरगोश आदि जगली जानवरों को मरवा इसके लिए एक चक (निश्चित क्षेत्र लगभग 2000 बीघा सिचित भूमि) के काश्तकार मापस में मिलकर वन्य जीवो को मरवाने के एवज में सामूहिक तौर पर प्रति मुरव्वा गेहूं व गिदी एकत्रित कर शिकारियो को देते है और जंगली जानवरों को मरवाने के दौरान शिकारी का हर तरह से सहयोग करते है। जगली जानवरो के सफाये से पूर्व चतुर शिकारी उस क्षेत्र के सभी किसानो से उहमति-पत्र लिखवाकर हस्ताक्षर करवा लेते है। ताकि किसी सम्भावित विरोध अथवा कानूनी मडचन खड़ी होने की स्थिति मे उक्त सहमति पत्र का भय दिखाकर उन लोगो को अपने क्ष मे सहायता के लिए आगे खडे होने को मजबूर कर शिकारी अपना बचाव कर सके। इस किार कुटिल शिकारी खेतों की फसलो की सुरक्षा के नाम पर किसानो को मुर्ख बनाकर एक रिफ मोटी रकम ऐठ रहे है तथा दुसरी तरफ उन्ही के संरक्षण में मारे गये जानवरों के मास. बाल बेच कर दोहरा लाभ कमा रहे हैं। इस प्रकार निरीह वन्य प्राणियो के अवैध शिकार की घटनाए दिनों दिन चिताजनक ढंग से बढ़ती ही जा रही है। जीव रक्षा विश्नोई समा के अथक ग्यासों के बावजूद अधिकारियों की अनदेखी के कारण ऐसी वारदातो को रोक पाना मुश्किल होता जा रहा हैं। जानवरों को मरवाने वाले लोगो के पक्ष मे राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण इस प्रकार ठेके पर जगली जीव मारने वाले शिकारियों के विरूद्ध सही कानूनी कार्यवाही करने से पुलिस बच रही हैं। अत पुलिस के डर से बेखौफ शिकारियों द्वारा वन्य जीवों का कत्लेआम जारी है। ऐसे शिकार प्रभावित क्षेत्रों के आस पास आधे से ज्यादा भू-भाग वन क्षेत्र हैं अत शेकारी अपने सधे हुए ऊँट एव शिकारी कुतो की मदद से हरिण आदि जंगली जानवरो का श्री कृष्णलाल सुथार, खियाराम सहारण आदि पूगल पुलिस को लेकर घटनास्थल पर पहुई जम्ममार को पकड़वाने हेतु सूने वन क्षेत्र में उनका पि करना साक्षात मौत से टकराने के पर है। अत आम आदमी ऐसा कर पाने में अपने आपको असमर्थ पाता है। लेकिन अपवाद तौर पर आज भी ऐसे वन्य जीव प्रेमी मौजूद है जो शिकारियों का पीछाकर उन्हे भाव पर . पीछा करते हुए उन्हें खदेड़ कर निर्जन वन क्षेत्र. में ले जाकर गोली से मारकर लिया। है। उस वन क्षेत्र की सुरक्षा हेतु तैनात निहत्थे वन प्रहरी प्राण भय से बन्दूकधारी रिका की इन बेजा हरकतों को देखकर भी अनदेखा कर देते है। जानवरों को मार रहे रिला जानवर छोडकर भागने तक मजबूर कर देते हैं। ऐसी ही एक घटना 24 जनवरी 2018 | खाजूवाला के वक 1 के.वाई.एम में तब घटी जब इसी प्रकार ठेके पर लाये गये हन। शिकारियों ने दो नील गायों का ऊँट से पीछाकर बन्दूक से मार डाला। घटना के प्रकार पास की ढाणियों के निवासी श्री रायसाहब सह व श्री खैरूराम डारा ने शिकारी द्वारा, पुलिस को ले जाकर शिकारियों द्वारा मारी गई नीलगायें, पद चिन्ह और शिकारियों को ठहर का स्थान दिखाया। इसी दौरान हरिणों का पीछा कर रहे ऊंट पर सवार शिकारियों सहायक उप निरीक्षक आदूराम को साथ लेकर जीप से पिछा किया गया तथा पिछा कर के दौरान शिकारी ऊँट छोड़कर भागने में सफल रहे। उनके द्वारा पिछे छुटा ऊँट पुति थाने ले आयी। इस प्रकरण में राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण पुलिस ने दोषी शिकारियों पकड़ना तो दूर कागजों मे ऊँट की जब्ती तक नहीं दर्शायी। दिन के प्रकाश में 4 बजे धात घटना को अंधेरी रात मे घटना तथा नील गायो को कुतों से मारना दिखाकर दर्ज मुकद न 10/3 में एफ आर. लगाकर दोषी शिकारियो को बचा लिया गया। इसकी उच्च स्तर 7 पी.के.डी. ने शिकारी का पीछा किया। उन्हें अपने नजदीक आता देखकर श्योपतराम पर निशाना साधकर अपनी टोपीदार बदूक से फायर कर दिया लेकिन श्योपर हेतु शिकारी से निहत्थे ही भिड गये। काफी देर तक गुत्थमगुत्था होकर संघर्ष करने के इससे तिलमिलाकर क्रुध शिकारी ने अपनी पेंट की जेब से चाकू निकालकर दो पर ताबड़तोड़ वार कर जान लेवा हमला कर दिया। चाकूके वार से अपने आपको के प्रयास में श्योपत पूरी तरह से लहुलूहान हो गये लेकिन उस जाबाज ने शिकारीसे सब करना नहीं छोड़ा और अततः शिकारी को जमीन पर पटककर उसके पहने तमाम कर फाड़कर छीन लिये। शिकारी भाग खड़ा हुआ। सूचना मिलने पर लेखक व श्री रामचनमा हरी वणी विश्नोई राखे, कारण नांव मुखां नही भाखे । गई नील गाय नहीं उठाने दी। इसकी सूचना मिलने पर लेखक ने शिकायत की गई लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। हमी वा भी के लोगों द्वारा वहां के जा जानवरों ।' चलाकर से साहसी श्योपत ने शिकारी की बन्दूक छीन ली। छ फुर्ती से जमीन पर गिर कर चार बाय एवं अन्य साहस का परिचय देते हुए बंदूक ने व न मारो रिधी रह है, जो मेरी अज्ञा में वह है - गुरूजम्भेश्वरजी]] 51 कूओं से गंभीर रूप से घायल श्री श्योपतराम को खाजूवाला लाकर इलाज करवाया गया। । शिकारी के विरूद्ध जानलेवा हमले का मुकदमा 49/6 पूगल थाना मे दर्ज हुआ। समा ने इस घटना को गंभीरता से लेकर विश्नोई धर्मशाला खाजूवाला मे एक पात बैठक बुलायी तथा बैठक में मौजूद सभी लोगों ने खाजूवाला के श्रीमान उपखण्ड धेकारी व श्रीमान् पुलिस उप अधीक्षक से मिलकर घटना के प्रति रोष प्रकट कर फरार कारी को अविलम्ब गिरफ्तार करने की मांग रखी और समाज के दवाब के कारण अगले दिन शिकारी को गिरफ्तार कर लिया गया। इस घटना में पुलिस द्वारा सभा कार्यकर्ताओ मौजूदगी में सम्बधित लोगों से पूछताछ करने पर यह पुष्टि हो गयी थी कि शिकारी को जदेवसिह व केशुराम चक में मौजूद वन्य जीवों को मरवाने हेतु लूणखां गांव से लेकर आये । केशुराम की ढाणी पर उक्त शिकारी द्वारा जानवर मरवाने के एवज मे सामूहिक रूप से कठी की हुई 15 कट्टे गेहूं व भागते वक्त शिकारी परिवार द्वारा छोड़ा गया घरेलू सामान रूपये और गहने पुलिस को पडे मिले। जिन्हे जब्त करने के बावजूद पुलिस ने बाद में कारी के सहयोगियो को बचाने के लिए जानबूझकर सम्बधित मुकदमे में उल्लेख नही या। । इस प्रकार वन्य जीवों को मरवाने हेतु ठेके पर लाने वाले सह अभियुक्त ऊँची पहुँच कारण अपराध की सजा से बच गये। अगर ऐसे लोगों पर कानूनी कार्यवाही सभव हो पाती.. भविष्य में इस प्रकार की संभावित घटनाओं पर अकुश लगता। लेकिन ऐसा हो नही पाया। चिंकारा हरिणों के अस्तित्व पर संकट के बादल एक समय ऐसा भी था, जब राज्य के सभी जिलो में स्वच्छन्द अठखेलिया करते रेण हर कही दिखाई दे जाते. लोगों का इनके प्रति स्वाभाविक स्नेह-भाव होने के कारण रेणों के झुंड के झुड निर्भय होकर विचरण करते नजर आ जाते। खेतो और वन क्षेत्र मे हा भी नजर जाती, वहाँ कुलाँचे भरते सुन्दर मृगों का नयनाभिराम चित्ताकर्षक दृश्य आंखो सामने आ जाता। प्रकृति की गोद में उछल कूद क्रीड़ा करते सुन्दर मृग भला किसे नहीं हाते? वर्ष की पहली बरसात पर किसान लोग जब खेत मे हल लेकर हलोतिया (बुवाई [ शुभारम्भ) करने जाते तो सर्व प्रथम श्रद्धापूर्वक भगवान को हाथ जोड़कर ध्यान मुद्रा मे स्वर से कामना करते, कि-हे प्रभु। आप हम से पहले पशु पक्षियों व बहिन सुहासनियों के जन की व्यवस्था करना। इससे हम सहज ही अनुमान लगा सकते है कि अनपढ और गँवार मझे जाने वाले किसानों के मन में मूक प्राणियों के प्रति कितनी अधिक संवेदना थी? आज आधुनिकों की अपेक्षा उनके संस्कारी मन में दया का भाव कितना प्रबल था। यही कारण । कि तब वन्य पशु पक्षी निर्भय होकर खुले विचरण करते थे। परन्तु जैसे-जैसे समय बदला लोगों की मानसिकता भी बदली.. उनके सोच में हले की अपेक्षा बड़ा परिर्वतन आया। परमार्थ की जगह स्वार्थ ने ले ली, और लोगों की हो पाता। कई बार तो एक ही दिन में शिकारी लोग भारी तादाद में हरिणों को मार देते हैं। खा रहे हैं। लेकिन उनकी यह सोच राही नहीं थी। क्योंकि हरिणों द्वारा खायी जातक फसलों की भरपाई प्रकृति किसी न किसी रूप में स्वत कर देती है। इसी सौद के किसान हरिणों की सुरक्षा के प्रति लापरवाह हो गये और शिकारियों के दरात से हरिया राकट के बादल गयराने लगे और जहा राहा इनके शिकार की वारदाते घटित हनेल इस प्रकार किसानों द्वारा सरचित समझा जाने वाला निरीह वन्य प्राणी कस्तो घिर गया और इन मूक प्रणियों का कत्लेआम शुरू हो गया तथा इनकी सख्या दिनानि चिता जनक ढंग से कम होती गई। किसी सरकार ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। बिर परिणाम स्वरूप उपेक्षापूर्ण माहौल मे अब हरिणों की संख्या मात्र विश्नोई दाइल्य क्षेत्र हा ही सिमट कर रह गयी हैं। विश्नोईयों के अलावा अपवाद के तौर पर सिद्ध एव राजपूत करने से कतराते थे। लेकिन अब अफसोस इस बात का है कि विश्नोई बाहृत्य क्षेत्रों में हरिणों की मौत बनकर उभरे शिकारी उनका पीछा नहीं छोड़ रहे है, और यहा भी अपना बरपा रहे हैं। यहा भी दुस्साहसी शिकारियों ने हरिणों को मारने का साहस जुटा। जिनसे शेष बचे खुचे हरिणों के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए पर्यावरण प्रेमी सघर्ष रहे हैं। लोगों के प्रबल विरोध के बाजूद हथियार बन्द र शिकारी ऊँटों पर सवार है आते है, और निरपराध भोले भाले हरिणों का मार कर ले जाते हैं। चिकारा हरिणों का मंहगे होटलो में जाता है, इनकी खाल ऊंचे दामों पर अन्तराष्ट्रीय बाजारों में बिकती इसी लालच मे इन्हे मारा जा रहा हैं। आम तौर पर इनका शिकार पेशेवर बनबावरी कर रहें है। ऊँट गाडों पर घरेलू सामान लदे शिकारी कुतों के साथ सपरिवार वन विचरण करने वाले इन घूमन्तु लोगों ने वन्य जीवो को मार कर उनकी मास. खालको का धन्धा बना रखा है। यह लोग हरिण आदि वन्य जीवों के शिकार के लिए अक्सर टो: इनको ऐसा करने से रोकना साक्षात मौत से टकराने के बराबर है। लेकिन जिसकी कीमत उन्हे अपनी जान देकर चुकानी पडती है। बीकानेर, जोधपुर व नागौर में विगत पचास वर्षों में दो दर्जन से अधिक लोग हरिण शिकारियो से मठभेड में शही प्रतिवर्ष मात्र बीकानेर जिले में लगभग 25 हरिण शिकार की वारदातें साम रही है जबकि चोरी छुपे हो रही इससे 20 गुनी ज्यादा वारदातो का तो खुलासा ही नहीं। इस प्रकार सामुहिक रूप से बडी संख्या में मारे गये चिंकारा हरिणो को समा कार्यकर्ताओं श जठे एक नहीं लीलो गंठ, वळे पड़े नहीं मेहरी छाँट । मानसिकता बदल जाने से भोला भाला हरिण असुरक्षित हो गया तथा दुष्ट शिकारियों के पर यक दृष्टि पद गई। यदली सोग के लोगों को अब लगने लगा.... जाति के लोग भी इनकी सुरक्षा के प्रति सजग है। बन्दूक और कुड़कों के अलावा शिकारी कुतों की भी मद्द लेते हैं। बावजूद धन्य है वे आस्था से संचालित पर्यावरणवीर जो इनसे निहत्थे ही भिड जा चूके है। जिनमें अधिकाश विश्नोई समाज के लोग हैं। कुछ वर्ष पहले शिकारी विश्नोई याहुल्य क्षेत्रों में हरिणों के शिकार के लिए दीन दुःखियों की सहायता करनी चाहिए - चरक सहिंता 53 कई बार पुलिस को बरामद करवाया है जिनमें सावतसर मे 40 हरिण, घड़साना मे 25 हरिण राणासर की रोही में 7 हरिण चक विजयसिंहपुरा की रोही मे 7 हरिण लूणकरणसर क्षेत्र ... 5 हरिण बरामद करवाये गये। इस प्रकार एक साथ इन बेजुबान वन्य प्राणियों के सहार की घटनाएं दिल दहलाने वाली हैं। शिकारियों से निस्वार्थ भाव से सघर्ष के दौरान मारे जाने गले कानून के सहयोगी को शहीद का दर्जा नहीं मिलता, बल्कि ऐसी घटनाओ में शहीद होने की घटना को सरकार आम दुर्घटना जैसी सामान्य घटना के रूप मे लेती हैं तो दुखद आश्र्चय होता है। अगर मौजूदा हरिण शिकारी गतिविधियो पर समय रहते सख्ताई से रोक नही लग पाई, तो वह दिन दूर नही जय चिकारा हरिण किताबो के पन्नों तक ही सिमट कर रह जायेगें। अत आवश्यकता है इनकी रोकथाम हेतु ईमानदार प्रयासों की। वन्य जीव शिकार अपराध पर नियत सजा वन्य प्राणी सरक्षण अधिनियम की धारा 51 के अन्तर्गत इस अपराध पर दी जाने * वाली सजाओं को मोटे तौर पर दो भागों में बाटा जा सकता है जो इस प्रकार है- 1. यदि कोई व्यक्ति अधिनियम के किसी भी ऐसे प्रावधान (अध्याय 5 क और धारा 38 ञ को +ोडकर) अथवा उसके अन्तर्गत बने किसी नियम या आदेश का उल्लंघन करता हैं तो उसे -- इस कानून के अपराध का दोषी माना जायेगा। दोष सिद्ध होने पर उसे अधिकतम 3 वर्ष तक - की कैद या 25 हजार रूपये जुर्माना हो सकता है अथवा दोनों ही सजाओं से दण्डित होगा। अध्याय 5 की धारा 39 (1) क में पाचवी अनुसूची के पीडक जन्तु सामान्य कौवा, मुषक, चूहा, गादूर आदि आते हैं तथा इसी धारा 39 मे उल्लेखित उपधारा 11 मे उल्लेख - है कि अगर यह जानने का पर्याप्त आधार मौजूद हो कि अपराधी को अपनी आत्मरक्षा के लिए - बाघ, शेर आदि आक्रामक जानवर के प्रति ऐसा अपराध मजबूरी वश करना पडा हो तो उसे इस कानून में सुरक्षा मिल सकती है। अधिनियम के अध्याय 4 की धारा 29 में प्रावधान है कि किसी विशेष परिस्थिति में राज्य सरकार की अनुमति से लाईसेस धारक द्वारा किसी अभयारण्य में वन्य जीव को मारना कानूनी अपराध की श्रेणी मे नही आयेगा। 2. दुसरी श्रेणी में कम से कम एक वर्ष की कारावास की सजा, किन्तु जिसे 6 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता हैं, तथा कम से कम 5000 रूपये जुर्माना भी किया जा सकता हैं। इस तरह का दण्ड उन मामलों में दिया जायेगा जहां अपराध अनुसूचि 1 या अनुसूचि भाग 2 में विनिर्दिष्ट वन्य जीवों के सम्बंध में हो अथवा किसी अभयारण्य या राष्ट्रीय उद्यान के सम्बध मे हो। अनुसूची 1 या 2 के भाग 2 में विनिर्दिष्ट किसी वन्य जीव जन्तु या उन जीवो के मांस, या जीव जन्तु के अग मौजूद हैं अथवा यदि अपराध किसी अभयारण्य या राष्ट्रीय उपवन में शिकार सम्बंधित या उसकी सीमाओं में परिर्वत करने से सम्बधित हो तो ऐसा अपराध ऐसे कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष से कम नही होगी किन्तु जिसका विस्तार 6 वर्षों तक परन्तु यह और कि इस उपधारा में वर्णित प्रकृति के किसी द्वितीय या परवाना सक्षम अधिकारी द्वारा वन्य जीव के शिकार में प्रयुक्त बंदूक अादि हथियार पर किया जाता है, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम कानून की धारा 51 की उपधारा () में कहा गया है कि अदालत में दोष सिद्ध होने पर बदूक आदि हथियार का लाइसेंस रद कर दिया जायेगा तथा वह शिकारी दोष सिद्धि से 5 वर्ष तक दुवारा उस हथियार का लाइसेंस नही बना सकता। उल्लेखनीय है कि बन्दूक से शिकार करने का प्रयास भी अपराध है। शिकार अपराध में बिना लाईसेंस की बन्दूक से वन्य प्राणी का शिकार करने पर लाईससी बन्दूक से शिकार की अवस्था में भा. द. की भारा 27 शस्त्र अधिनियम उपरोक्त दोनो ही अवस्था मे वन्य जीव का शिकार होने पर शस्त्र अधिनियम उलंघन का मामला बनता है एवं इस अपराध की सजा अधिकतम 3 वर्ष होगी। इसके अलावा जीप अथवा किसी अन्य यान्त्रिक वाहन पर सवार होकर उससे वन्य जीव का पीछा कर शिकार करने पर उस वाहन को अथवा ऊँट आदि पशु को सक्षम अधिकारी द्वारा जन किया जा सकता है। शिकारी के उस अपराध का दोष साबित हो जाने पर वह मोटर अथवा वाहन अधिनियम की धारा 51 की उपधारा 2 के तहत राज्य सरकार की सम्पति (सम्पत) वन्य जीव सरक्षण अधिनियम की धारा 51 की (ख) में लिखा है कि जो कोई व्यक्ति धारा (38 ) के उपबंध जिसमें उल्लेख है कि अगर कोई चिडिया घर के किसी प्राणी को तंग करें, सताये व नुक्सान पहुचाये, खिलाये या शौर कर प्राणियों को उतेजित करे या विड़िया घर की भूमि को गदा करेगा तो उसे 6 माह तक जेल की सजा हो सकती हैं। तथा 2000 रूपये जुर्माना अथवा दोनों ही सजा हो सकती हैं। दूसरी बार यही अपराध करने पर कोउ मारे तो मार न देवां, जम्मगुरू कहि दई सो सेवा - बम्पसार हो सकता है और जुर्माना भी 5000 से कम नही होगा। अपराध की दशा में कारावा ASEA संकेगी तथा 2 दई से कम नहीं है। जुर्माने की राशि 10 हजार से कम नहीं होगी। बन्दूक से शिकार करने पर के अन्तर्गत कानूनी कार्यवाही होगी। हरिण शिकार के अपराध की सजा अलग से होगी। जीप या किसी वाहन से शिकार करने पर हो जायेगी। चिड़ियाघर के किसी प्राणी को तंग करने पर भारतीय दण्ड सहिता को GITTARIA के तहत कार्यवाही होती है। 1 वर्ष की सजा 5000 रूपये जुर्माना हो सकता हैं।
- । M . -हसो दया बिन धर्म शान बिन किसी चतुराई - संत विल्होजी 55 हरिण पालना दण्डनीय अपराध बहुत कम लोग जानते है कि हरिण आदि जगली जानवरों को घर में पालना गनूनी जुर्म हैं। लेकिन कानूनी जानकारी के अभाव में आम तौर पर लोग शौकिया हरिण विकों को अपने घरों में पाल लेते हैं। जबकि ऐसा करना जंगली जानवर की सहज रामाविक जीवनचर्या के विरूद्ध अनाधिकृत प्रयास तो है ही साथ ही कानूनी अपराध की श्रेणी भी आता है। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1995 के तहत ऐसा अपराध सावित होने पर + माह की सजा का प्रावधान है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कई मांसाहारी लोग हरिण, खरगोश, न्दर, तोता, मैना आदि वन्य जीवों को पालने का यहाना लेकर घर में ले आते हैं और मौका कर उन्हें मारकर खा जाते हैं। इस प्रकार छुपे तौर पर जंगली जानवर मारने वाले मारे गये जानवर के शेष अंगों को अपराध की सजा से बचने हेतु कहीं छिपा देते हैं, और उनकी इस करतुत की किसी को मनक तक नहीं लगती कि "पाले गये जानयर को कर मारकर गायब कर दिया? ऐसी रोकायतें जीव रक्षा विश्नोई सभा को कई बार मिलती है लेकिन ऐसी स्थिति में खास दिक्कत यह है कि मारे गये जानवर के अंगों की बरामदगी आदि साक्ष्यों के अभाव में अपराधी के विरूद्ध कानूनी कार्यवाही संभव नहीं हो पाती। ऐसे सदिग्ध व्यक्ति के घर जीवित हरिण आदि वन्य जानवर मौजूद होने की अवस्था में कोई भी व्यक्ति ऐसे अपराधी के खिलाफ निकटतम पुलिस चौकी अथवा वन कार्यालय में मुकदमा दर्ज करवाकर घर में बन्दी बनाया गया जंगली जानवर बरामद करवा सकता है। इसी प्रकार ऊंट गाडो पर वन क्षेत्र में घुमने वाले पेशेवर बनबावरी आदि शिकारियों के विरूद्ध भी (जगली जानवर मौजूद पाये जाने पर) कानूनी कार्यवाही की जा सकती हैं। प्रस्तुत लेख में लेखक का उपरोक्त जानकारी देने का अभिप्राय यह कि “कोई भी व्यक्ति शौकिया तौर पर हरिण आदि वन्य प्राणी को पालकर उनकी सहज स्वतंत्रता को नाहक छिनने का प्रयास न करें"। प्रत्येक वन्य जीव स्वच्छंद और खुले वातावरण में रहने का आदी होता हैं, तथा वहीं सुरक्षित रहता है। जंगली पशु पक्षियों की सुरक्षा रहन सहन तथा शारीरिक विकास व पोषण हेतु जगल अनुकूल परिस्थितिया प्रदान करता है। जगली झाड़ियों के झुरमुट. घास के मैदान एव पेड पौधे वन्य प्राणियों की सुरक्षा एवं भोजन के प्रमुख आधार हैं तथा वनों में मौजूद विविध जड़ी बुटियों उन्हे हर दम स्वस्थ और तरोताजा बनाये रखती है। जगल मे उन्मुक्त भाव से स्वच्छद विचरण एव धमाचौकड़ी करते हरिण खरगोश आदि जगली जानवरों को देखना किसे अच्छा नहीं लगता? और यही उछल कूद जगली जानवरों की जीवनचर्या का एक अहम हिस्सा हैं। लेकिन दुर्भाग्य का विषय है कि अब उनकी स्वतत्रता में सेंध लग चुकी है। क्योंकि हरिण आदि जानवरों को घरों में पालने की प्रवृति चिताजनक ढंग से दिनों दिन बढती ही जा रही है। अक्सर लोग झाडी की ओट में अपनी माँ के इन्तजार में बैठे सुन्दर मृग छोने को अज्ञान वश उठाकर घर ले आते हैं। वे यह नही सोचते कि अपने कलेजे के टुकडे को चरक संहिता -~~-dar में कमे ज्यदा दिन . अन्दाजा हम सहज ही लगा सकते हैं। बच्चे को अपनी मां की ममता की छाह से अगस्त से उपचार करना गलत नही है। अतः ऐसी अवस्था के शिकार वन्य प्राणी को ईलाज के दो सुरक्षित स्थान पर रख कर स्वस्थ होने तक मानवीय आधार पर रखा जा सकता है। ऐसे हालात मे पीडित प्राणी को अपने हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता। जी. बिश्नोई सभा के समक्ष ऐसे बेसहारा विषम हालात के शिकार वन्य पशु पक्षी प्राय आd हैं और सभा के निष्ठावान कार्यकर्ता सेवा भाव से ऐसे जानवरों की चिकित्सा में मदद का है। पीपुल फॉर एनीमल्स संगठन भी इस क्षेत्र में सक्रिय है। मौजूदा समय में ऐसे असहाय वन्य प्राणियों की सरकारी स्तर पर चिकित्सा की पुख्ता व्यवस्था नहीं है। इन सुरक्षा हेतु तैनात वन अधिकारी ऐसे जानवरो के ईलाज एव देखभाल में विशेष रूविन्द लेते। कई बार दवाईयो का बजट नही होने का बहाना बनाकर टाल दिया जाता है।37/ ऐसे समय मे सरकार को इस सम्बध मे स्पष्ट नीति बनाकर ऐसे निराश्रित बेबस वन्य प्राणी की चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करवानी चाहिए। अन्यथा इन्हे काल के गाल में जाने से बात वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1991 की मुख्य विशेषताए वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम (1972) में सन् 1991 मे इस प्रकार से सशोधन किता। गया था, कि जिससे उसमे मौजूद कई कमिया दूर हो गयी। अधिनियम में अब तक का सबसे बड़ा और दूरगामी सशोधन था। इस सशोधन की कुछ मुख्य विशेषताए निम्नलिक्षित है। 1इस अधिनियम मै वन्य जीवो को अधिक सुरक्षा प्रदान करने की व्यवस्था है। नियमों 2 पहली बार गैर सरकारी व्यक्ति इस अधिनियम के उल्लघन के मामले को सीधे न्यायालय मे ले जा सकते है। ऐसा प्रावधान किया गया है। इससे पूर्व गैर सरकारी व्यक्ति कानून उल्लघन के मामले का पता लगने पर मामले की सूचना केवल सम्बधित कर्मचारी को है। दे सकते थे। सशोधित अधिनियम की धारा 55 (ग) मे प्रावधान है कि "कोई व्यक्ति जिसन। दथित अपराध के बारे में केन्द्र/राज्य सरकार या प्राधिकृत अधिकारी को शिकायत करने के अपने इरादे की सूचना निर्धारित विधि में कम से कम 60 दिनो का नोटिस दिया हो। किसी प्राणी को भयभीत नहीं करना चाहिये - खुराळी में न पाकर उस बच्चे के वियोग में कातर मा हरिणी कितनी दुःखी होती होती. अधर्म नही तो और क्या है? अपवाद के तौर पर कई वाहन की चपेट मे आकर घायल, में असहाय हरिण आदि जगली जानवर का तुरन्त ईलाज करवाना जhu "; ऐसी विकट स्थिति में सदभावना पूर्वक बीमार एवं घायल जंगली जीव का नि मुश्किल कार्य है। उल्लघन करने की सजा बढ़ा दी गई है। - 1 । है इम का बदलता मिजाज, रूष्ट प्रकृति का कोप है। 57 इस अधिनियम के विरूद्ध अपराध का प्रमाण हो, वह व्यक्ति अथवा गैर सरकारी सगठन, रचित राज्य के मुख्य वन्य जीव यार्डन या केन्द्र सरकार को इस आशय का नोटिस दे ता हैं और यदि 60 दिनों के अन्दर कोई कार्यवाही नहीं की जाती है तो सक्षम न्यायालय मला दायर किया जा सकता है। अधिनियम की धारा 9 के अनुसार अनुसूचि 1. 2. 3 और 4 मे निर्दिष्ट सभी वन्य जीवों शेकार करना निषिद्ध है। इनमें से किसी प्रजाति के शिकार करने और उन्हे जाल में ने हेतु लाईसेस जारी नही होगे तथा पहले के जारी किये हुए लाईसेस रद होगें। इन शों के कियान्यन को सुनिश्चित करने के लिए जन जागरूकता और सतर्कता बरतने की निनियम लागु होने से पूर्व व्यापारियो के पास मौजूदा लाईसेसशुदा वन्य जीवो से बनी ओं की जाँच की जानी है, और प्रत्येक वस्तु पर पहचान मोहर लगायी जानी है. क्योकि व्यापारी इस आड में नया माल प्राप्त करने और बेचेने के लिए पुराने स्टॉक का नाजायज माल करते है। ष्ट्रिीय उद्यान्नों के समान वन्य जीव अभयारण्यों में हरे पेड़ों की वाणिज्यक कटाई एव जीवों के दोहन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। न्य जीव अभयारण्य के 10 किमी. की सीमा में रहने वाले व्यक्तियों को राज्य के मुख्य जीव वार्डन की सहमति के बिना नये आग्नेयास्त्र के लाईसेंस जारी नहीं किये जायेगें। ग्यातित हाथी दाँत और नक्काशी याली वस्तुओं के व्यापार पर 2 अप्रैल 1992 से प्रतिबंध दिया गया है। न्य जीवो के चोरी छिपे शिकार करने वालो और इस अधिनियम के उल्लघनकर्ता धियो के लिए एक-एक महत्वपूर्ण निवारक उपाय शुरू किया गया है। इसके बाद घि मे प्रयुक्त वाहनों जीप, ट्रक, पोतो हथियारों आदि को अधिनियम के उपबन्धो के नार जस्त कर दिया जायेगा, और यह सरकारी सम्पति हो जायेगी। ख्य वन्य जीव वार्डनों या दुसरे प्राधिकृत अधिकारियों से अनुमति लेकर लिये गये मामलों छोडकर अथवा पीडक जन्तुओ को छोड़कर वन्य जीवों या वन्य जीव उत्पादों को लाने माने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। अब पक्षियों के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया हैं। सशोधित अधिनियम में बार पौध प्रजातियों की सुरक्षा की भी व्यवस्था है। लहो या चीरी हुई ईमारती लकड़ी र्यात पर भी प्रतिवध लगा दिया गया है। वन्य जीवो, वन्य जीव उत्पादों एवं उनसे बने सामान का अवैध व्यापार जो काफी फैला है. सरकार द्वारा सापों की खालों के व्यापार पर प्रतिबंध लगाने से पहले भारत से नित प्रतिवर्ष 2.5 मिलीयन था तथा कस्तुरी मृग से प्राप्त कस्तुरी को सोने से तीगुने के मूल्य में बेचा जाता है, अन्य जैसे नेवले के बालो को ब्रुश बनाने के लिए इग्लैंड ले जाने, सूप बनाने के लिए बतासी (स्विफ्लेटस) नामक पक्षी का अति दोहन तक शामिल " स्टडबुक्स रखेगा, बदी वन्य जीव प्रजनन करने की व्यवस्था करायेगा, और वनों में सकटान वन्य जीव शिकार प्रकरणों मे दोषी शिकारी को सजा दिलवाने में गवाह की भूमिका होती हैं। प्रारम्भ में वन अथवा पुलिस जाँच अधिकारी द्वारा घटना से सम्बंधित गई ली जाती हैं इसके बाद केस अदालत मे जाने पर मजिस्ट्रेट के समक्ष गवाही होती है। तौर पर वन्य प्राणियों के शिकार अपराध की वारदातें खेतो व वन क्षेत्र में होने के कारन घटा के प्रत्यक्षदर्शी अधिकतर अशिक्षित ग्रामीण पृष्ठ भूमि के लोग ही होते हैं जिन्हे अक्सर का की जानकारी नहीं होती। अत कई बार वन्य जीव के शिकार की घटना घटित होने पर लेकिन स्वय मुखर होकर इस लिए गवाही देने आगे नही आते क्योंकि उन अनजाना भय बना रहता है कि कहीं वे गवाही देकर किसी कानूनी लफडे में फसन जबकि वास्तव में ऐसा कुछ नही हैं। देश का कोई भी नागरिक चाहे व किसी भी जाति धर्म को मानने वाला क्यों न हो वह बिना किसी हिचकिचाहट के जंगली पशु पक्षियों का शिकार करने वाले अपराधी के विरूद्ध नजदीकी थाने अथवा वन विभाग चौकी में अपनी तरफ से। प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार सदैव ध्यान में रखना चाहिए कि ऐसा करके वह है। उसे ऐसा करने से किसी को भी रोकने या टोकने का अधिकार नहीं हैं। मुकदमा दर्ज सहज जीव दया धर्म और कर्तव्य का पालन कर, नि.स्वार्थ भाव से कानून की मदद कर रही करवाने वाले व्यक्ति के अलावा अन्य लोग जिन्होने शिकारी को जानवर मारते हुए देखा हो बारे में कोई जानकारी रखते हो, अथवा जिन्होने शिकारी को जानवर का पीछा करते, बन्दूक अथवा बुलाने पर घटनास्थल पर गये हो, शिकारी द्वारा मारे या घायल किये वन्य जीव के शिकारी को ललकार कर भागते हुए का पिछा किया हो या जानवर मारकर ले जाते देखा आकास. वायु तेज जल धरणी, तामें सकल सृष्टि ही करणी- शब्दवारी है। इसके अलाया गैठे के सीग, हाथी दौत, सकटापन्न पक्षियों के समुर (माता की हदिया रीछ का पित तथा ऐसे औषधिय पौधों की भी एक लम्बी सूची हैं. 1734 किया जा रहा है। उनमें बहत से पौधे अतिदोहन के कारण संकटापन्न हो गये है। भारतीय चिड़िया घरों की स्थिति सुधारने का काम करेगा, नमूनों का आदान प्रजातियों का आशान्चित सवर्धन करायेगा आदि। शिकार प्रकरणों में गवाह के बयानों की उपयोगिता शिकारी के विरूद्ध कानूनी कार्यवाही तो करना चाहते है। लिखित या जुबानी मुकदमा दर्ज करवा सकता हैं। चलाते या जानवर को फसाने हेतु कुडका, या फदा, जाल लगाते देखा अथवा इसी दौरान हो, ऐसे लोग प्रत्यक्षदर्शी गवाह की श्रेणी में आते है।
59 तु को मारने वाला, चोर द्वारा मारा जाता है शातातप स्मृति इसके अलावा पुलिस अथवा वन अधिकारी के अन्वेषण के दौरान घटनास्थल पर तूद वे मौजीज लोग जिनके सामने अधिकारी ने मारे गये जानवर या उसके मास. खाल. . हड्डी आदि को जिनकी मौजूदगी में मौके पर कागजों में बरामदगी लिखी हो घटना ल का मौका नक्शा फर्द बरामदगी आदि कागजात तैयार किये हो उस समय वहां मौजूद रेत भी गवाह की श्रेणी में आता है। वह गवाह इस बात का साक्षी है कि उसके सामने स ने परामदगी की ओर उपरोक्त कागजात तैयार किये। मोटे तौर पर शिकार से इंधित इन तमाम तथ्यों की जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति गवाह कहलाता है। वन्य प्राणियों के शिकार की घटना घटित होने पर घटना से सम्बधित साक्षी लोगो निष्क्रियता के कारण कई बार वन्य जीव शिकारी अपराध करके भी कानूनी सजा से बच ते हैं। ऐसे अपराधों में प्रत्यक्षदर्शी की गवाही जरूरी होती है लेकिन कई बार जीव रक्षा 1 के समक्ष ऐसी स्थितियां आई जब शिकारी के आतक से या अज्ञानवश घटना के साक्षी ही देने से हिचकिचाने लगे तब उन्हे वस्तु स्थिति से अवगत करवा कर हर सम्भव यिता का आश्वासन दिया गया तो वे सहर्ष गवाही देने को तैयार हो गये। कुछ घटनाओं में वास्तविक गवाह के निष्क्रिय होने की अवस्था में शिकारी पक्ष व अधिकारी से साठ गांठ कर शिकायतकर्ता की आँखो में धुल झोक कर झूठे बनावटी यह गढ लेते हैं. जो कोर्ट में अपराधी के अनुकुल गवाही दे देते हैं। इस प्रकार झुठे गवाह बयान के आधार पर शिकारी अपराध करके भी अदालत से छुट जाता हैं। अत इन वन राध प्रकरणों में इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए की जाँच अधिकारी ने अपराधी पक्ष कल्पित झूठे गवाह तो नही बना लिये हैं। दुरारी बात ध्यान में रखने की यह है कि मौजूदा नून में यह प्रावधान है कि पुलिस द्वारा लिखे गये गवाहो के बयानो मे सम्बधित गवाहों के ताक्षर नहीं होते। अत. कई बार मुल्जिम से कथित प्रभावित जाम अधिकारी मुल्जिम के पक्ष अपनी मनमर्जी से मन चाही गवाही लिख लेते है इस प्रकार कल्पित गवाहो के आधार अपराधी कोर्ट में बरी हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में सरकार को चाहिए कि पुलिस को पाबन्द किया जावे की पुलिस रा धारा 161 आर.पी.सी. के अन्तर्गत लिये गये गवाहान के बयान को उन्हे पढाये जाने के गद ही चालान किया जाये। अन्यथा गवाह के पुन तितम्बा बयान लिये जावें। गवाहो की रक प्रमुख परेशानी यह है कि सरकार द्वारा नियुक्त अधिकाश सरकारी वकील वन अपराध प्रकरणों में रूचि लेकर सम्बधित मुकदमें में सही पैरवी नहीं करते। जबकि उनका यह दायित्व होता है कि वे गवाह को सही सही गवाही देने की प्रकिया समझाये लेकिन प्राय ऐसा नहीं होता। बचाव पक्ष की जीरह के दौरान सरकारी वकील प्राय चुप रहते हैं। बचाव पक्ष के वकील गवाह से उटपटा सवाल कर वो विचलित करने का प्रयास करते देखे गये इसके बावजूद सरकारी वकील उसका उचित प्रतिवाद नही करते, और तो और अधिकतर केसों में गवाही बचाव पक्ष के वकील द्वारा पूछे गये सवालों पर भी आधारित होती जीवों को अभय देने वाला कभी भयभीत नहीं होता - वृहस्पति स्पति है और गवाह उसी के अनुरूप उतार देता ही अन्य आवश्यक जानकारी बाबत गदाह का प्राप्त नहीं कर पाती और यन अपराधी को इस मौजूदा प्रचलित प्रक्रिया का मिलता है। यही कारण कि अधिकांश शिकारी शिकार करके भी कोर्टी से बरी हो रही न्याय व्यवस्था की मौजूदा इन विसंगतियों पर पर्यावरण प्रेमी समाज को गई है। --- sayारियों नही पूछता। अत शिकारी के अपराध को साबित करने हेतु आवश्यक अहम दया पूर्वक विचार कर तुरन्त निर्णय लेने की जरूरत है। अब अपराधी शिकारियों को करवाने के लिए अदालतों में विचाराधीन मुकदमों में निजी तौर पर वकील नियुक्त करना की पैरवी करना आवश्यक हो गया है। अत इस सम्बंध में गम्भीर प्रयास की जरूरत है। प्रश्न 1 शिकारी ने हरिण आदि वन्य जीवों को फासने हेतु जानवर के आवास स्थल पर गुजरने की जगह कुडका फदा जाल या शिकजा लगा रखा है, लेकिन उसमें जानवर उत्तर-हां उसके खिलाफ शिकार करने के प्रयास का मामला बनता है। अत उसके दिन वन्य जीव सरक्षण अधिनियम की धारा 9/51 के तहत मुकदमा दर्ज हो सकता है। प्रश्न 2-शिकारी ने किसी वन्य जीव को मार लिया है, और सबूत मिटाने की नियत से गया जानवर लेकर भाग गया है। घटना स्थल पर उसके पेरों के निशान व खून। प्रश्न 3-शिकारी कुत्तों को उकसाकर किसी वन्य जीव को मरवाना शिकारी की श्रेणी में 31 प्रश्न 4-शिकार करके पिछा होने पर भागते शिकारी के पीछे छुटेजुते, चप्पल,चदर आदि। प्रश्न 5- अगर ये आशका हो कि पुलिस के घटनास्थल पर पहुंचने में विलम्ब देर होने की अवस्था में शिकारी सबूत को छिपा देगा तो ऐसे सबूत को घटना स्थल से उठा ले जाकर शंका समाधान-प्रश्नोत्तर फसा है, तो क्या उसके खिलाफ केश दर्ज हो सकता है? शिकार का उपकरण बरामद हो। हुआ है. तो क्या उसके खिलाफ केश दर्ज हो सकता है? उत्तर-- हाँ! उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज हो सकता है। है या नहीं? उत्तर- हाँ सामान सबूत की श्रेणी में आते है या नहीं? उत्तर-जूते, चप्पल, चद्दर आदि शिकार करने के सबूत नहीं होते। अन्य सुरक्षित स्थान पर रखा जा सकता है अथवा नहीं? शि प्रश्न 12. शिकारी स्वयं द्वारा मारा गया जानवर लेकर भाग रहा है. कानून की मदद करने 61 दारू मांस तमाखू माइा जीवण में नित भरे विकारा। उत्तर- नहीं। क्योकि ऐसा करने से घटना की सत्यता को सारित नहीं किया जा सकता। अत ऐसी अवस्था में घटना स्थल से घटना के राज्यों से छेड़छाड़ न कर दूर से उसकी निगरानी की जा सकती है। प्रश्न - विना लाईसेन्स की बन्दूक से वन्य प्राणी का शिकार करने पर शस्त्र अधिनियम की कौनसी धारा लागू होगी और उसकी सजा क्या है? उत्तर-बिना लाईसन्स को बन्दूक से शिकार करने पर शस्त्र अधिनियम की धारा 3/25 आर्म एक्ट का मुकदमा दर्ज होगा तथा अपराध साबित होने पर इसकी अधिकतम सजा तीन साल की होगी। बन्दूक की जाति होना जरूरी है। प्रश्न :-- लाईसेन्सी बन्दूक से शिकार करने पर शस्त्र अधिनियम की कौनसी धारा लागू होगी? उत्तर- लाईसेन्सी बन्दूक से शिकार करने पर शस्त्र अधिनियम की 7 आर्मा एक्ट के तहत সুশা বর্ষ } प्रश्न :- ऊंट गाड़ों पर सदिग्ध रूप से वन क्षेत्र में घूमने वाले पेशेवर शिकारी वन बारियों की शक के आधार पर तलाशी ली जा सकती है या नहीं? उत्तर- ऐसे लोगों की पुलिरा अथवा यन-विभाग के अधिकृत सक्षम अधिकारी द्वारा तलाशी ली जा सकती है। प्रश्न- शिकार की घटना होने पर मोके पर पुलिस एव वन विभाग का किस स्तर का अधिकारी तलाशी व जाँच कार्यवाही में सक्षम है? STT- शिकार की वारदात में पुलिस उपनिरीक्षक अथवा उसके समकक्ष वन अधिकारी कार्यवाही करने में सक्षम है। प्रश्न 10- अगर सम्बन्धित अधिकारी वन अपराध की जाँच में शिकारी पक्ष से साठ-गाठ कर से नाजायज फायदा पहुचाने हेतु जान बुझ कर अनियमितता बरते तो क्या उसके विरूद्ध न्यायालय में वाद दायर किया जा सकता है? उत्तर - अगर जॉच अधिकारी जानबुझकर अन्वेषणाधीन प्रकरण में शिकारी के पक्ष में निभा का उल्लंघन कर अनियमितता बरते तो उसके खिलाफ सम कोर्ट में भारतीय दण्ड सहिता की धारा 166, 167 के तहत वाद दायर किया जा सकता है। प्रश्न ११. शिकारी द्वारा बदले की भावना से शिकायतकर्ता अथवा गवाह को प्रताड़ित करने, धमकान या आर्थिक नुकसान किये जाने पर क्या उसके विरूद्ध कानूनी कार्यवाही की जा उत्तर- एसी अवस्था में अदालत में यदि मुल्जिम के खिलाफ मुकदमा चल रहा है और अभियुक्त जमानत पर रिहा भारतीय दण्ड प्रक्रिया की धारा 107 2 116 के तहत कार्यवाही कर उसकी जमानत निरस्त करवायी जा सकती हैं। सकती है?
प्रश्न 5- अगर ये आशका हो कि पुलिस के घटनास्थल पर पहुंचने में विलम्ब (दर) होने की | जीवों को अभय देने वाला, कभी भयभीत नहीं होता - वृहस्पति स्मृति 60 है और गवाह उसी के अनुरूप उतर देता हैं। अन्य आवश्यक जानकारी बाबत गवाह को कोई नहीं पूछता। अत शिकारी के अपराध को साबित करने हेतु आवश्यक अहम तथ्य अदालत प्राप्त नहीं कर पाती और वन अपराधी को इस मौजूदा प्रचलित प्रक्रिया का सीधा फायदा मिलता हैं। यही कारण कि अधिकाश शिकारी शिकार करके भी कोर्टो से बरी हो रहे हैं। न्याय व्यवस्था की मौजूदा इन विसंगतियो पर पर्यावरण प्रेमी समाज को गम्भीरता पूर्वक विचार कर तुरन्त निर्णय लेने की जरूरत हैं। अब अपराधी शिकारियों को दण्डित करवाने के लिए अदालतों में विचाराधीन मुकदमों में निजी तौर पर वकील नियुक्त कर मुकदमों की पैरवी करना आवश्यक हो गया हैं। अत इस सम्बध में गम्भीर प्रयास की जरूरत हैं। शंका समाधान-प्रश्नोत्तर प्रश्न 1 शिकारी ने हरिण आदि वन्य जीवो को फासने हेतु जानवर के आवास स्थल अथवा गुजरने की जगह कुडका फंदा जाल या शिकजा लगा रखा है, लेकिन उसमे जानवर नहीं फसा है, तो क्या उसके खिलाफ केश दर्ज हो सकता है? उत्तर- हां उसके खिलाफ शिकार करने के प्रयास का मामला बनता है। अत उसके विरूद्ध वन्य जीव सरक्षण अधिनियम की धारा 9/51 के तहत मुकदमा दर्ज हो सकता है। बशर्ते शिकार का उपकरण बरामद हो। प्रश्न 2- शिकारी ने किसी वन्य जीव को मार लिया है, और सबूत मिटाने की नियत से मारा गया जानवर लेकर भाग गया है। घटना स्थल पर उसके पेरी के निशान व खून बिखरा हुआ है, तो क्या उसके खिलाफ केश दर्ज हो सकता है? उत्तर- हाँ। उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज हो सकता है। प्रश्न 3- शिकारी कुत्तों को उकसाकर किसी वन्य जीव को मरवाना शिकारी की श्रेणी में आता है या नहीं? उत्तर- हाँ प्रश्न 4-शिकार करके पिछा होने पर भागते शिकारी के पीछे छुटे जुतें, चप्पल,चद्दर आदि सामान सबूत की श्रेणी में आते है या नहीं? उत्तर-जूते, चप्पल, चद्दर आदि शिकार करने के सबूत नहीं होते। अवस्था में शिकारी सबूत को छिपा देगा तो ऐसे सबूत को घटना स्थल से उठा ले जाकर अन्य सुरक्षित स्थान पर रखा जा सकता है अथवा नहीं? एड. पाबूराम बिश्नोई 61 दारू मांस तमाल माड़ा, जीवण में नित भरे विकारा । उत्तर- नहीं। क्योकि ऐसा करने से घटना की सत्यता को सावित नहीं किया जा सकता। अत. ऐसी अवस्था में घटना स्थल से घटना के साक्ष्यों से छेडणड न कर दूर से उसकी निगरानी की जा सकती है। प्रश्न :- विना लाईसेन्स की बन्दूक से पन्य प्राणी का शिकार करने पर शस्त्र अधिनियम की कौनसी धारा लागू होगी? और उसकी सजा क्या है? उत्तर-बिना लाईसन्स की सन्दूक से शिकार करने पर शस्त्र अधिनियम की धारा 3/25 आर्स एक्ट का मुकदमा दर्ज होगा राया अपराध सापित होने पर इसकी अधिकतम सजा तीन साल की होगी। बन्दूक की जति होना जरूरी है। प्रश्न- लाईसेन्सी बन्दूक से शिकार करने पर शस्त्र अधिनियम की कौनसी धारा लागू होगी? उत्तर- लाईसेन्सी बन्दूक से शिकार करने पर शस्त्र अधिनियम की 27 आर्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज होगा। प्रश्न 8-ऊँट गादों पर सदिग्ध रूप से पन क्षेत्र में घूमने वाले पेशेवर शिकारी वन बावरियों की शक के आधार पर तलाशी ली जा सकती है या नहीं? उत्तर- ऐसे लोगों की पुलिस अधया यन-विभाग के अधिकृत सक्षम अधिकारी द्वारा तलाशी ली जा सकती है। प्रश्न - शिकार की घटना होने पर मोके पर पुलिस एवं वन विभाग का किस स्तर का अधिकारी सलाशी जाँच कार्यवाही में सक्षम है? उतर- शिकार की वारदात में पुलिस उपनिरीक्षक अथवा उसके समकक्ष वन अधिकारी कार्यवाही करने में सक्षम है। प्रश्न 10- अगर सम्बन्धित अधिकारी वन अपराध की जाँच में शिकारी पक्ष से साठ-गाठ कर उसे नाजायज फायदा पहुंचाने हेतु जान बुझ कर अनियमितता यरते तो क्या उसके विरूद्ध न्यायालय में वाद दायर किया जा सकता है? उत्तर - अगर जाँच अधिकारी जानयुझकर अन्वेषणाधीन प्रकरण में शिकारी के पक्ष में नियमों का उल्लघन कर अनियमितता बरते तो उसके खिलाफ रक्षम कोर्ट में भारतीय दंण्ड सहिता की धारा 166, 167 के तहत पाद दायर किया जा सकता हैं। प्रश्न 11. शिकारी द्वारा बदले की भावना से शिकायतकर्ता अथवा गवाह को प्रताड़ित करने, धमकाने या आर्थिक नुकसान किये जाने पर क्या उसके विरूद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है? उत्तर- एसी अवस्था में अदालत में यदि मुल्जिम के खिलाफ मुकदमा चल रहा है और अभियुक्त जमानत पर रिहा हो तो भारतीय दण्ड प्रक्रिया की धारा 107 व 116 के तहत कार्यवाही कर उसकी जमानत निरस्त करवाशी जा सकती हैं। प्रश्न 12 शिकारी स्वयं द्वारा मारा गया जानदर लेकर भाग रहा हैं, कानून की मदद करने के उद्देश्य से उससे जानवर बनने के दौरान अगर पीछा करने वाले पर शिकारी आक्रामक . जिस व्यक्ति में दया भाव है, वही धार्मिक हैं - दक्ष स्मृति 62 होकर जान लेवा हमला करदे और आपसी साहस पूर्ण मुकाबले के दौरान शिकारी के घोट लग जाये, तो क्या कानून मदद करने वाले को बचा सकता है? उत्तर- हाँ. भादस की धारा 97 एवं 100 के तहत ऐसी अवस्था में प्रतिरक्षा का अधिकार उत्पन्न हो जाता हैं। प्रश्न 13 राज्य सरकार द्वारा नियुक्त अवैतनिक वन्य जीव प्रतिपालक को यन अपराधों की रोक थाम हेतु क्या शक्तिया प्राप्त हैं ? उत्तर- वन्य जीव सरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 4 की उप धारा () के तहत नियुक्त अवैतनिक वन्य जीव प्रतिपालक सरकारी लोक सेवक माना जायेगा, तथा अधिनियम में निर्देश है कि धारा 47 (ख) के तहत लाईसेन्सों के रिकार्ड का निरीक्षण कर सकता है तथा धारा 55 के तहत उसे वन एव वन्य जीव अपराध में प्रवेश, तलाशी बरामदगी और अवरोधन की शक्ति प्राप्त हैं तथा वह न्यायालय मे अपराधी के विरूद्ध उपयुक्त जाच कर शिकायत दर्ज कराने के लिए प्राधिकृत है। वह मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के अधीन कार्य करेगा। प्रश्न 14 किसी वन्य पक्षी या पशु को मारने के इरादे से किसी शिकारी ने जहर से सनें दाने भूमि पर विखर दिये है और चुगकर जानवर मारे जाते है तो उक्त कृत्य वन्य जीव शिकार की श्रेणी में आता है या नहीं? उत्तर-मारने के सबूत मौजूद हो तो उक्त कृत्य अपराध की श्रेणी में आता है। प्रश्न 15 रात को हरिण की दर्दनाक चिल्लाहट सुनाई दी। सम्भावना शिकार घटित होने की है तो क्या करना चाहिए? उत्तर- ऐसी अवस्था में तत्काल पुलिस को सूचित कर सम्भावित स्थान पर तलाशी लिरायी जानी चाहिए। तलाशी के दौरान वहा पर वन्य जीव के शिकार की घटना घटित होने के उपयुक्त साक्ष्य एव औजार बरामद होने की स्थिति में आरोपी के विरूद्ध मुकदमा दर्ज हो सकता हैं। प्रश्न 16 राजस्व भूमि में बिना वैद्य इजाजत के खेजड़ी आदि हरे पेड काटने वालो के खिलाफ कानूनी कार्यवाही हेतु तहसीलदार अथवा अन्य कोई सक्षम अधिकारी बाध्य है या नहीं? उत्तर- राजस्व भूमि तहसीलदार के अधिकार क्षेत्र में आती है अत ऐसी अवस्था में सम्बधित तहसीलदार को लिखित सूचना दी जानी चाहिए। राजस्व भूमि में अवैध पेड़ कटाई पर भा द.सं की धारा 379 वह वन अधिनियम के तहत कार्यवाही हो सकती हैं। ऐसे पेड़ काटकर ले जाने वालों के पास टी पी. नहीं हो तो धारा 42 एव 52 के तहत कार्यवाही सभव है। इस लिए कानूनी सजा से बच रहे है वन्य जीव शिकारी। हमारे देश मे लगातार सिकुड़ते वन क्षेत्र के कारण कृषि क्षेत्र तो बढा परन्तु वन्य प्राणियों के लिए अनुकूल प्राकृतिक आवास सिमटते गये। इससे उनकी प्रकृति प्रदत सहज सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया हैं। मरूभुमि में साल दर साल अकाल के हालात में चारे पानी की तलाश में भटकते हरिण, खरगोश, नील गाय आदि जंगली जानवर मजबूरन - गवाहों के हस्ताक्षर बयान पर नहीं होते कानून प्रदत इस सुविधा का खुलकर दुरूपयोग किया जीवों की रक्षा करने वाले की आयु बढती है वृहस्पति स्मृति किसानों के खेतों की और पलायन करने को विवश हैं। जंगली झाड़ियों में अपने आपको छुपाकर जान बचाने वाले ये वन्य जीव ऐसे विकट हालात में सहज ही शिकारीयों के हाथों मारे जा रहे हैं। एक हरिण के मास एवं खाल की किमत वर्तमान में लगभग 5 हजार रूपये होने के कारण शिकारियों द्वारा सर्वाधिक हरिणों का शिकार किया जा रहा हैं। इस स्थिति का एक निराशाजनक पहलू यह भी है कि इन घटनाओं मे साक्षी आम किसान वर्ग शिकारियों की इन करतुतों को जानकर भी अपने क्षुद्र स्वार्थ के वशीभूत अनजान बना रहता है। वन्य जीवों से फसल सुरक्षा के अलावा हथियार बद कर शिकारियों का खोफ तथा उनके संभावित बदले की भावना से नुकसान की आशका के चलते लोग कानून का सहयोग कर दोषी शिकारियों को पकड़वाने से कतराते हैं। यही कारण है कि घटित शिकार वारदातों में से मात्र 5 प्रतिशत मामले ही उजागर हो पाते हैं। जिन्हे विश्नोई समाज मुस्तगीस बनकर सम्बधित थानो में केश दर्ज करवाता है। यह सर्व विदित तथ्य है कि विश्नोई सामाज अपनी धार्मिक भावना के कारण हरिण शिकार की कोई भी झूठी शिकायत नहीं करवाता। लेकिन इसके बावजूद पुलिस का मौजूदा रवैया शिकारियो को दण्डित करवाने मे कारगर साबित नहीं हो रहा हैं। क्योंकि शिकार अपराधों मे प्राय पुलिस ईमानदारी बरतने के बजाय उल्टे दोपी पक्ष से अधिकाधिक रिश्वत ऐठने को ही अपना अभिष्ठ ध्येय मानकर चलती हैं। अत. अक्सर शिकारी अपराधी धडल्ले से शिकार करके भी अदालतों से धडाधड छुटते देखे जा रहे हैं। ऐसे अनेक शिकार प्रकरणो मे शिकारियों के विरूद्ध वर्षों के सघर्ष के दौरान मैनें अपने अनुभव से ऐसा महसूस किया हैं। अपवाद के तौर पर कुछ ईमानदार अधिकारियों के अलावा उच्चाधिकारियों से लेकर निचले स्तर तक पुलिस कर्मी भ्रष्टाचार में स्त हैं। पुलिस थानों में आने वाली शिकार की शिकायतो पर प्राय सीधे तौर पर प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाती। ऐसी सूचना पर शीघ्र रिपोर्ट दर्ज कर निष्पक्ष तथ्यान्वेषण की बजाय पुलिस पहले जाँच का झुठा नाटक कर रिश्वत ऐठने हेतु शिकारी के पक्ष में एसी प्रकिया अपनाती है कि शिकायतकर्ता को भनक तक नहीं लगती और अपराधी के पक्ष मे वास्तविक तथ्यों में हेर फेर कर पूरे प्रकरण को सदेह की परिधि में लाकर अपराधी को नाजायज लाभ पहुचाने के लिए शिकायतकर्ता की सही सूचना को जानबूझकर नजर अदाज किया जाता हैं। अपराध घटित हो जाने का पता लग जाने के बावजूद बरामदगी एवं पूछताछ की दिशा शिकारियों के बचाव के एवज में ली गई रिश्वत पर ही निर्भर करती हैं। अत. सर्व प्रथम घटना स्थल पर शिकारी अथवा उनके नजदीक सयधी को अलग से ले जाकर गोपनीय पूछताछ के बहाने रिश्वत की राशि तय कर ली जाती हैं और यहीं से शुरू होता है.- "शिकारी को केश को शिकारी के पक्ष में करने के लिए पुलिस ऐसे-ऐसे झूठे गवाह तक गढ लेती है जिसकी शिकायत को भनक तक नही लगती। कानून में ऐसा प्रावधान है कि रिश्वत लेकर बचाने का सिलसिला।
मे प्रस्तुत करने | जहां अगनिहोत्र हो, वहां निवास करें- गौतम स्मृति | BA जाता है। पुलिस जिस तरह से घटना को दर्शाना चाहती है। उसी के अनुरूप मनचाहे बयान लिख लेती है। गवाहों को मात्र नाम-पता पूण जाता है। केश दर्ज करवाने के बाद फरार मुल्जिमों की गिरफ्तारी एव शेष हथियार आदि साक्ष्यों की बरामदगी के सम्बंध में शिकायत कर्ता द्वारा पूछने पर रटा रटाया गोलमाल जवाव मिलता है कि कार्यवाही कर रहे हैं। इस प्रकार अपनी सुविधानुसार प्रष्ट तरीके से मुल्जिम को कय बुलाकर गुप-चुप ढंग से कोर्ट में पेश कर दिया जाता है ? "इसका शिकायत कर्ता को तब पता चलता है जब शिकारी जमानत करवाकर उसे धमकाने लगता है। इस प्रकार पुलिस द्वारा कूटरचित जाँच की तथाकथित विरोधाभाषी जाँच फाईल सहित चालान कोर्ट में पेश हो जाता है। इतना ही नहीं कोर्ट में प्रस्तूत केशों में गवाही हेतु तलब किये गए कई गवाहों को सबधित पुलिस द्वारा उक्त केश को कमजोर करने हेतु जान बूझ कर सुचित नहीं किया जाता। जिससे या तो गवाह के गिरफ्तारी के वारट निकल जाते हैं अथया कोर्ट गवाह को गैर हाजिर मान लेती है। इस प्रकार पुलिस की भ्रष्ट कारगुजारियों का लाभ अन्तत. शिकारी को मिलता है। जिन केशों को पुलिस अपनी जाँच मे झुठा करार देती हैं। उनकी एफ आर. कोर्ट । एव कोर्ट द्वारा मजुर होने की इतिला अपनी करतुतों को छिपाने हेतु जान बुझकर पुलिस द्वारा परिवादी पक्ष को नही दी जाती है। अत परिवादी कोर्ट द्वारा प्रदत समय सीमा की अवधि मे पुलिस की झुठी जॉच कार्यवाही के विरोध में अपना पक्ष प्रस्तुत नही कर पाता और पुलिस के काले कारनामों पर अन्तत. पर्दा ही पड़ा रहता है। इस प्रकार पुलिस की भृष्टता और निष्क्रियता का लाभ अतत दोषी को मिलता है। प्रस्तुत लेख मे बीकानेर सभाग पुलिस की उपरोक्त कारगुजारीयो का उल्लेख मैने सुनी सुनाई बातो नही किया हैं। बल्कि उपरोक्त घटनाओं का मे स्वय प्रत्यक्ष साक्षी हुँ। बीकानेर जिले के खाजूवाला उपखण्ड में घटित प्राय तमाम शिकार की वारदातो पर जीव रक्षा विश्नोई समा खाजूवाला के दखल से सम्बधित पुलिस थानो मे दर्ज शिकार अपराध के पचासो केशो में मेने (सभा अध्यक्ष रामकिशन डेलू) नजदीक से देखा है। आज भी एसे शिकार के केशो में हमें शिकारियो के साथ-साथ भृष्ट पुलिस से भी सघर्ष करना पड़ रहा है। पुलिस की उपरोक्त कारगुजारियो के कारण ही विश्नोई समाज जब तब पुलिस को कोसता रहता है। लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के चलते सुधार की गुजाईश दूर दूर तक नजर नहीं आती। शिकार प्रकरणो मे पुलिस रिश्वत के लिए नियम कायदों की किस प्रकार धज्जिया उडा रही हैं। इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण मैं पाठकों को देना चाहुँगा जो इस प्रकार हैं- दिनांक 7-4-2002 को चक 1 एच डब्ल्यू एम (खाजूवाला) क्षेत्र में जगुराम बावरी व उसके पुत्र हरखाराम तथा महेन्द्रसिह सिख के द्वारा बन्दूक से हरिण मारने पर खाजूवाला थाने में दर्ज मुकदमे में पुलिस ने शिकारी पक्ष से सांठ-गाठ के बाद न तो बन्दुक बरामद की तथा न ही सही गवाही लिखी। मुल्जिमो को कानूनी सजा से बचाने के लिए कोर्ट में प्रस्तुत घालान मे खाजूवाला पुलिस द्वारा उक्त केश में बरामद हरिण को कुत्तों के द्वारा मारना दिखा आधार पर - - 65 | जो व्यक्ति प्रतिदिन हवन करता है, वह धन्य है- दक्ष स्मृति दिया गया। इतना ही नहीं नामजद शिकारी हरखाराम को बचाव पक्ष का गवाह तक बना डाला। जबकि मैने स्वयं पुलिस को घटना स्थल पर ले जा कर बन्दूक की गोली से मरे हरिण को बरामद करवाकर पोस्टमार्टम के दौरान हरिण के रंगीन फोटो भी खीचें थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हरिण के गोली से मरने का स्पष्ट उल्लेख है। जांच अधिकारी के उक्त भ्रष्ट रवैये की शिकायत सभा द्वारा प्रशासन से लेकर राज्य सरकार तक की गई थी। लेकिन निष्पक्ष जाँच नही हुई। स्पष्ट है कि अब उक्त केश में अपराधियों का बरी होना तय है। मौजूदा कानूनी प्रावधान के अनुसार प्रशासन अथवा सरकार की अनुमति के बिना ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकती। इसके अलावा कुछ अन्य कानूनी विसंगतियां भी इसके लिए जुम्मेवार है, मसलन शिकार प्रकरणो में गवाह के बयान बचाव पक्ष के वकील के प्रश्नों पर आधारित होना, सरकारी वकील द्वारा शिकायतकर्ता को सबधित केश के सबंध मे कानूनी जानकारी नहीं देना, तथा लम्बित प्रकरणो मे वाहों से बार-बार कोटों का चक्कर कटवाना, शपथ पत्र पर दिये गए गवाह के बयान मान्य नहीं होना, कोर्ट में प्रीजार्च ऐवीडेंस का प्रावधान आदि कानूनी विसंगतियों का लाभ अन्तत. शिकारी को मिलता है। अक्सर ये देखा जाता है कि शिकार की घटना के समय समाज जितना मुखर होता है, उतनी सक्रियता बाद मे दिखाई नहीं देती। कोर्ट में केश जाने के बाद शिकार अपराधो की पैरवी के लिए समाज को और अधिक सक्रियता दिखानी होगी। अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा एवं समाज के बुद्धिजीवियों से मेरा विनम्र आग्रह है, कि राजस्थान, हरियाणा, पजाब आदि राज्यों में दर्ज मुकदमों की पैरवी हेतु सामाजिक स्तर पर अधिवक्ता नियुक्त किये जाएं तथा इसका खर्चा समाज वहन करे ताकि भविष्य में वन्य जीवों के हत्यारो को उनके किये की अधिकतम कानूनी सजा मिल सके। अवैध शिकार की रोकथाम हेतु आवश्यक सुझाव 1 शिकार प्रकरणों में मौजूदा पुलिस गवाही की प्रक्रिया मे भा. द सहिता की धारा मे संशोधन कर वन अपराध प्रकरणों में गवाह के हस्ताक्षर का प्रावधान किया जाये ताकि जॉच अधिकारी तथ्यो में हेर फेर न कर पाए। 2. वन अपराधों की रोकथाम हेतु आवकारी थानों की तरह अलग से वन पुलिस का गठन हो। 3 वन्य जीव शिकार प्रकरणो को केश ऑफिसर स्कीम के दायरे में लाकर जाँच करवाई जाए। 4 हथियार बन्द शिकारियों के आंतक से गवाह कोर्ट में आकर समुचित गवाही नहीं दे पाता अत शपथ पत्र पर दी गई गवाही मान्य हो। 5 शिकार अपराधों से जुड़े लोगों को जारी किए गए हथियार लाईसेन्स रद्द किए जाए। जाँच का अधिकार पुलिस उप अधीक्षक से नीचे के श्रेणी के अधिकारी को न हो। 7. शिकार अपराधो के प्रकरणों की जाँच शाकाहारी अधिकारी से करवाई जाए। 8 इस क्षेत्र में निस्वार्थ भाव से सहयोगरत पजीकृत स्वयंसेवी संस्था पदाधिकारियों को आत्म रक्षा हेतु हथियार लाईसेन्स देने की व्यवस्था हो।
मरू लोमडी, टोप लगुर. सुनहरा लगूर, नील गिरी लगूर, पात बंन्दर, शिया बन्दर, मछियारी 66 भेड़िया, तिब्बति गजेल, तिब्बति जगली गधा, तिब्बति लोमडी, तिब्बति ऐन्टीलोप या चिरन, जीना उसी. का सार्थक है, जो बहुतों का जीवन मूल है- दक्ष स्मृति 9 वन्य जीव शिकार प्रकारणों को रोशन ट्रायल घोषित किया जाए। 10 कोर्ट में वन्य जीव अपराधों में दो बार गवाही लेने (प्रीचार्ज एवीडेन्स) की बजाय एक ही बार गवाही की व्यवस्था हो। 11 सूचना के अधिकार के तहत सम्बन्धित केश के कोर्ट में चालान तक पुलिस द्वारा की गई कार्यवाही से परिवादी को अवगत करवाना अनिवार्य घोषित किया जाए। 12 फसल रक्षा के बहाने आदतन शिकारियों को लाकर यन्यजीयों को मरवाने की बढती प्रवृति पर अकुश लगाने के लिए इन्हें लाने वालो को सह अभियुक्त बनाया जाए। 13 सम्बन्धित केश में मुल्जिमों से साठ गाठ कर बरामदगी एवं अन्य तथ्यों में हेरफेर करने वाले एव इन प्रकरणों में कोताही बरतने वाले अधिकारी के विरूद्ध कोर्ट में समुचित कार्यवाही हो। 14 ऊँट गाडो पर शिकार की टोह में घुमने वाले पेशेवर शिकारियों को चिन्हित कर उनके विरुद्ध अभियान चलाकर उनके हथियार जब्द कर उन्हें पाबन्द किया जाए। 15 शिकारियो के खिलाफ प्रभावी कार्यवाही के लिए वन विभाग को माकूल हथियार वाहन एव सचार के साधन उपलब्ध करवाये जाये। 16 सबधित केश मे गवाहो को सरक्षण तथा आने जाने का किराया दिलवाया जाये। 17 शिकार प्रभावित वन्य पशु के पोस्टमार्टम की प्रति शिकायतकर्ता को देने हेतु संबधित पशु चिकित्सक को पाबद किया जाये। 18 वन्य प्राणियो की मौजूदगी वाले क्षेत्र को सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाये। 19 सचार माध्यमो य शिक्षा पाठ्यक्रम मे वन्य जीवों के महत्व का प्रचार हो। 20 वन्य जीव शिकार विषयक सूचनाओं के लिए जिलास्तर पर हेल्पलाईन शुरू की जाये कानून द्वारा संरक्षित वन्य पशु पक्षी वन्य जीव सरक्षण अधिनियम 1972 जो राजस्थान में दिनाक 19 1973 को लागु हुआ इस कानून के अध्याय 3 की धारा 9 के अन्तर्गत उललेख है कि कोई भी व्यक्ति इस कानून मे सरक्षित अनुसूचि 1. अनुसूचि 2 अनुसूचि 3 एव अनुसूचि 4 में वर्णित जगली पर पक्षियो का शिकार नहीं करेगा। (सिवाय लाईसेंस धारी के) इन चारो अनुसूचियो में वर्णित सरक्षित निम्नलिखित सरक्षित किसी वन्य पशु पक्षी का कोई व्यक्ति अगर शिकार करेगा तो वह वन्य जीव सरक्षण अधिनियम (कानून) के उल्लंघन का दोषी होगा और कानून के उत्तधन पर इस कानून की धारा 51 के अन्तर्गत 6 माह से 5 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। अनुसूचि-1 (स्तनपायी वन्य पशु) कृष्णमृग, काला हरिण, चिकारा हरिण, भूअंगी हरिण, भारतीय गजेल हरिण, चौसिगा हरिण, कृष्णसार हरिण, मुषक हरिण, कस्तुरी मृग, दलदली हरिण, हाथी, भालु, गेंडा, हिमालयी लाल भालु, शेर, चीता, मेघी तेदुआ, बाघ, नीलगिरी शेर, हिम तेंदुआ, व्याघ. (पथर 67 (हमिचिनस औरिटस) फाइव स्ट्रिप्ड पाम स्किवरल (फनम्बुलुस पेन्नन्टी) धरती के वन प्राणी भंगार,रोको इन पर अत्याचार । बिल्ली, सुनहरी बिल्ली. हिमालयी दिल्ली. चिता बिल्ली. सगम मेरी विल्ली, फैलास बिल्ली, भूरी चितली बिल्ली, शरमिदी विल्ली. वन विडाल (रोही मिनडा) अंडमानी, जगली सूअर, जगली भैसा, जंगली याक, घोरखर गधा, बडी गिलहरी, खरगोश, (लोमशश) भालु शूकर, हुलाक, लाल पण्डा. छोटा भारतीय कछुआ, चीनी पैंगोलिन, विज्जु, उदबिलाव, स्लोक बियर, (मालु) सील, कैकड़ा खौर मैकाक. मलय या सब भालु, सरौ स्नवफिन डाल्फिन, उरियल या शापो, मारयोर, ओविस एमान साप्यान, हगल रक गौर या भारतीय बाइसन. गागेय डाल्फिन, इयूगोंगा, मरू चिल्ली, कैराकल, केटेसियन प्रजाति. विटुरोग, भाराल. अनुसूचि-1 (जल स्थलचर एवं सरी सृप वर्ग के जीव) मगरमच्छ (सभी प्रकार के). घडियाल, अजगर, लिजर्ड या वार्ड ओवल : अनुसूचि- (पक्षी) ऐसी उप नस्लो और नस्लों से भिन्न जो अन्य अनुसूचियो में वर्णित है। याज, सारस काली गर्दन वाला, महान भारतीय सारग, महान भारतीय धनेर. पहाड़ी बटेर, नार काडमी धनेर. निको यारी कबुतर. पीकॉक. फीजेट. (पोलीप्लीक्ट्रोन वाइकाल कारटम) मयूर. (पायो किस्टेट्स)गुलावी सिर वाला बतख, साईयेरियन सफेद सारस, (ग्रसत्यूकोजैरनस), तिब्बती हिम मुर्गा (टट्रोजैलस टिवेटनस) श्वेतोरा समुद्री उकाब. (हलिएटस ल्यूसोगास्टर) श्वेत पख वन बतख (करिनास्फूआलाटा) हावास बस्टार्ड, श्वेतकर्ण फिजट, श्वेत स्पून विल। अनुसूचि-2 असमिया बन्दर, टोपी वाला बन्दर, सुअर पूछ बन्दर, रेसुस बन्दर, ठदार पूछवाला बन्दर, सामान्य लंगूर, वगाल सेही. हिमालयी अकीटीट सेही, हिमालीय नट, या सलामन्दर, जगली कुत्ता या ढोल. (क्युअन अल्पाइनस) चमेलियन, स्पिनी टेल्ड, लिजर्ड या साडा. (यूरोमास्टिक्स हार्डनिकी) मुश्क बिलाव, (मालाबार मुश्क बिलाव को छोडकर विवेरासईडा की सभी प्रजातिया, जगली बिल्ली, फेसिस क्वौस) उदविलाय. सामान्य लोमडी, उड़न गिलहरी, बड़ी गिलहरी, हिमालयी काला भातु, सियार, गन्ध माजरी, लाल लोमडी, रीध, स्पर्महवेल, ६ गमन या मूषक सर्प, श्वानमुख सर्प, भारतीय कोबरा, किंग कोबरा, रसल्स वाइपर, ओली देसियस, कीलपैक, स्नेक. वारनस स्पेसीज, (पीत मॉनीटर छिपकली को छोडकर) चैकरेड कील बैक स्नेक, कथियान्याल, मारेन्स, मार्मोटस, नील गाय, चीतल, लकड़बग्घा (हायना), सांभर, जंगली सुअर (ससस्क्रोफा), शूकर हरिण, खरगोश (कलंक धरा, सामान्य भारतीय, मरूहिमालयी शश) भारतीय सेही (हिस्ट्रिक्स इडिका). नेवले (जीपस हर्पस्टस), गन्धमाजार (वर्मला, पर गुस्ना, मस्टेला पुटोरियस), काटा चूहा, अनुसूचि-3 (स्तनपायी) गोरल. भोंकू हरिण या मन्टजैक अनुसूचि-4 (स्तनपायी) 68 जाल, खेजड़ी और कंकेडो, बड़ पीपल रूंखां नही छेड़ो पक्षी बुलबुल, सारस, बतख, बगुला, राजहस, नीलकण्ठ, मैना, मुनिया, उल्लू, तीतर, बटेर, टिटिहरी, तेलीयर, गिद्ध, क्या, कठफोड़वा, फुदकी, अवलक, नौरग, हवासील, पराकीट, कबुतर (कोलम्बिडी), ल्यूरॉक कबूतर, (कोलम्बोलिविया)के सिवाय, चचरी, कोयला, (कुकुलिडी). जल कौवा, टिकरी, कलग्यी बतख, हरेवा, सारग हुकना, सारग बटेर, पथा. भूरे सिर वाला सामुद्रिक, नील, करेल, बसन्त गौरी, बब्लर, अवोसेट, अवादवत, कगुलिन्दें बानकर, फास्ता. मरकती, ड्रागोज. नीलयी, तूती. चाफिन्च सहित, हंसावर, फुलचूही, मकरवीमार, गोल्डपिच, ग्रीव्स. यक. बुज्जा, आइरस या भुवींगी. जल मोर, जंगल मुरगा, किलकिला, चण्डूल. लोटीकीटस, शिकारी मुटरी, सहित मुटरी, मन्निकिन्स, मेगोपोडस, सहेली. छपका, पीलक, कस्तुरामार, फेजेण्ट, प्लोवर्स, जलमुर्गी, (जलकुक्कुटी) मरूतीतर, चाहा, स्परफाउल, रवरबानक, चमरघेघ, पनलवा, शकरखोरा, चैती, बाम्कार. गगारा, ट्रोगोन, वाक्स बिल्स, श्वेताक्ष, इसके अलावा 12 प्रजातियो के सर्प, अनुसूचि-2 भाग दो से भिन्न सूचिबद्ध इस प्रकार है- एम्बली केहालिडी. एमिलिडी, बोइडी, कोलाइडी, डासी पेपटिडी, इलापिडी. (कोबरा, क्रेट और कोरल सर्प) ग्लौकोनिडी, हाइड्रोपिडी. (ताजे जल और समुन्द्री सर्प) इलिसिडी, लेप्टोटीफ्लोपिडी, युरोपेल्टीडी, वायपरिडी. जेनोपेल्टिडी, ताजेजल के मेढक, (राणाप्रजाति) श्रीकील्डटर्टल, कछुए, पिण्डजटोड, मूस, तितलिया और पतगे। हरिणों की रक्षार्थ अमर शहीद बलिदानी हरे वृक्षों की तरह विश्नोई समाज के लोग प्रकृति के वन्य जीवों की सुरक्षा में सदैव अग्रणी रहे हैं। जिस प्रकार देश की सीमा पर शत्रु पक्ष के आक्रमण की स्थिति मे सैना का जवान गोलियों के सामने सीना तान कर डटा रहता है। उसी प्रकार विश्नोई समाज के लोग अपनी धार्मिक आस्थावश हरिण आदि वन्य जीवों पर संकट आने पर निस्वार्थ भाव से हथियार बद क्रूर शिकारी को वन्य जीवों के शिकार करने से रोकने का प्रयास करते है, जिसकी किमत उन्हे अपनी जान देकर चुकानी पडती हैं। इस प्रकार वन्य जीवों की रक्षार्थ अपनी जान कुरबान करने वालो के कतिपय उदाहरण प्रस्तुत है. 1. श्री चुनाराम पुत्र श्री हरदानराम गोदारा उम्र 22 वर्ष नि रोहिचाकला जि. जोधपुर दिनाक 19.5 39 को हरिण शिकार प्रकरण में शहीद हुए। 2. श्री धुकलराम माल सन् 1947 में ग्राम रोटू जि. नागौर मे मगरासर ठाकर को हरिण के शिकार से रोकने के प्रयास में शहीद हो गये। 3. श्री चिमनाराम पुत्र श्री गोरखाराम माँझू उम्र 35 वर्ष निवासी वारासण त गुडामालानी, जि बाड़मेर हरिण शिकारियों से जॅझते हुए दि 12447 को शहीद हुए। 4 श्री प्रतापाराम पुत्र श्री गोरखाराम माँझू उम्र 29 वर्ष निवासी बारासण त गुड़ामालानी जि बाड़मेर हरिण शिकारियों से मुठभेड़ में दि. 12.447 को शहीद।
हवनीय दव्यों से हवन करो, सर्वत्र शुद्धता होगी.. सामवेद 69 5. श्री अर्जुनराम पुत्र श्री प्रभुराम पंवार,उम्र 36 वर्ष निवासी भगतासनी जि. जोधपुर दि.3. 250 को हरिण शिकारियों से मुठभेड मे शहीद हुए। 6 श्री बीरबलराम पुत्र श्री बिडदाराम खीचड़ उम्र 30 वर्ष निवासी लोहावट त फलौदी जि जोधपुर दि. 17.12.77 को शिकारियो को हरिण मारने से रोकने के प्रयास में शहीद हुए। 7. श्री निहालचन्द पुत्र श्री हनुमान धारणिया उम्र 35 वर्ष निवासी सांवतसर त. डूंगरगढ जि बीकानेर, भागते शिकारियो का पिछा करने के दौरान दि 31096 को शहीद हुए। ४ श्री भीयाराम पुत्र श्री लालाराम गोदारा उम्र 25 वर्ष निवासी बनाड़ जिला जोधपुर दि 15563 को हरिण शिकारियों से मुठभेड में शहीद । 9 श्री गगाराम पुत्र श्री फुसाराम ईशरवाल उम्र 35 वर्ष नि. चैराई त. ओसिया जि जोधपुर हरिणो के शिकार प्रकरण में दिनांक 8 9.2000 को शहीद हुए। 10. श्री गगाराम ज्याणी नि नान्दडा कला जि. जोधपुर हरिण शिकार प्रकरण मे दि 264 06 को शहीद हुए। 11. श्री हजारीराम पुत्र श्री भागीरथ मौझू उम्र 68 वर्ष नि. मेहराणा जि. फिरोजपुर (पजाब) को हरिण शिकारियों द्वारा बदले की भावना से शहीद हुए। उपराक्त विश्नोई समाज के अलावा अन्य समाज के लोगो ने भी वन्य प्राणियों की सुरक्षा हेतु बलिदान दिये। जो इस प्रकार है. 1. श्री नारायणराम पुत्र श्री पुरखाराम जाट निवासी भीमडा त बायतु, जि बाडमेर, दिनाक 4.799 को हरिण की रक्षार्थ शहीद हुए। 2 श्री सुखाराम पुत्र श्री कोजाराम जाट उम्र 30 वर्ष निवासी चातरामाजरा जि नागौर दिनाक 30599 को हरिण शिकारियों का पिछा करने के दौरान शहीद हुए। 3 श्री छेलुसिह पुत्र श्री चैनसिह राजपुत उम्र 25 वर्ष निवासी मैयासर त. नोखा, जि. बीकानेर दि. 29 103 को हरिण शिकारियो का पिछा करने के दौरान शहीद हुए। 4 श्री हरिसिह पुत्र श्री राधाकिशन राजपूरोहित उम्र 30 वर्ष नि झाबरा त. पोकरण, जि. जैसलमेर दि 28 404 को हरिणों की रक्षार्थ शहीद हुए। 5 श्री केहरसिंह जाट निवासी भूतनकला (हरियाणा) शिकारियो से सघर्ष के दौरान दि. 8478 को शहीद हुए। 6. श्री हरिनारायण वाजपेयी निवासी मंगलपुर जोरा त कानपुर (उ प्रेदश) ने नीलगायों के शिकार के प्रतिबंध की माग पर 1583 को आत्मदाह कर बलिदान दिया। विश्नोई महिलाओं के हरिण प्रेम की अनुठी मिशाल वन एव वन्य जीव सुरक्षा के क्षेत्र में पुरूषो के साथ-साथ विश्नोई महिलाओं में भी वन्य जीवों की सुरक्षा की भावना शुरू से ही रही हैं इस समाज की ममतामयी माताओं ने अनाथ एवं बेसहारा हरिण शावको को अपने आचल का दुध पिला-2 कर उनका पोषण किया। ऐसी अनूठी मिशाल अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।
70 (ढोंग से नही ढंग से जीओं - मुनी तरूणसागर जी महाराज इनमे ग्राम नाठोड़ी (हरियाणा) की श्रीमती रामीदेवी ग्राम खारा जि. जोधपुर की श्रीमती शारदादेवी.. रामपुरा नारायण (पजाय) की श्रीमती विजयलक्ष्मी सहू पनि विजयपाल सह एव ग्राम जाजीवाल जि जोधपुर की श्रीमती पुनीदेवी आदि सहदया माताओं ने उत्कृष्ट सवेदना का परिचय देते हुए अपनी मा रो बिछुड़े लावारिस एव अनाथ हरिण शावकों को अपने लाडलों की तरह स्वय का दुध पिला-पिलाकर अपने स्नेह से पाला पोषा। जब मोहम्मद साहब हरिण के जामिन बने एक वार अरव देश के सुने जगलों मे से गुजरते हुए मौहम्मद साहब ने एक बहेलिए द्वारा विछाये गये जाल में एक हरिणी को फसे हुए देखा। तो उन्हे हरिणी पर रहम आ गया एव उन्होने शिकारी को कहा कि इसे छोड़ दो- पर शिकारी उसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ। दोनो की बाते बहेलिए की जाल में फसी मादा हरिणी सुन रही थी। मोहम्मद साहब की कृपा से हरिणी ने मनुष्य की भाषा में बहेलिए से कातर स्वर में कहा कि-"मैं पिछे एक नवजात बच्चे को छोडकर आई हूँ, उसे दुध पिलाकर तथा दुलारकर वापिस आ जाऊगी"। पर बहेलिया नही माना तब-"मोहम्मद साहब बहेलिए के जाल में फंसी हरिणी के जामिन बने" तो बहेलिए ने हरिणी को जाल के पाश से मुक्त कर दिया। और मोहम्मद साहब के प्रति कृतज्ञ हरिणी कुलाचे भरती हुई अपने बच्चे के पास चली गई। रास्ते में सोच रही थी कि मेरे जामिन अल्लाह के रसूल हैं अगर देरी हो गई तो न जाने बहेलिया उनके साथ क्या सलूक करेगा। अत शीघ्र ही अपने बच्चे के पास जाकर उसे दुलार से दुध पिलाकर वापिस आ गई उसे वापिस लौटता देखकर बहेलिए का हृदय परिवर्तन हो गया। वह मोहम्मद साहब के कदमों में गिर गया तथा अपने पाप-कर्म पर पश्चाताप करते हुए उनसे माफी मांगने लगा। मोहम्मद साहब ने उसे उपदेश दिया कि हरिण आदि जगल के तमाम जीव ईश्वर । मनुष्य की सेवा के लिए बनाये हैं. इन्हे कत्ल कर देना गुनाह हैं। तब बहेलिए ने नतमस्तक होकर प्रण लिया कि वह भविष्य में कभी भी जानवरों का शिकार नही करेगा। मोहम्मद साहब ने बहेलिए को दुआऐ दी और हरिणी उछलती-कुदती अपने बच्चे के पास पहुंच गई। हरिणी के प्रति बादशाह की सहृदयता एक दिन बादशाह सुबुक्तगीन शिकार के लिए गया। उसे शिकार का शोक था। बहुत तलाश करने पर भी उसे मारने के लिए कोई जानवर नही मिला। उसकी आखे जगल में चारों और शिकार की तलाश में लगी हुई थी। थोड़ी ही देर बाद उसने देखा कि एक हरिणी अपने बच्चे के साथ बेखट के निर्भय होकर चर रही हैं। काफी देर तक वह अपलक हरिणी और उसके बच्चे को निहारता रहा, और उसकी हिसा दया में बदल गई और उसने सोचा "मारने से यह अच्छा होगा कि हरिणी के सुन्दर बच्चे को पकड़ लिया जाये। वह उतरा धीरे-धीरे उनके समीप गया और दाँव ताककर बच्चे को पकड़ लिया। वह बेहद प्रसन्न था और बच्चे के पांव बाध कर घोड़े पर आगे काठी पर रख लिया और अपनी 1 सीस सौंपां अर नही कम्पो, मरण हूं मत को डरो- खेजड़ली बलिदानी 71 राजधानी की और चल पड़ा। बेचारी हरिणी मे आखिर माँ का भावुक हृदय था. अपनी सतान के लिए विहदल थीं। अपने प्राण की परवाह न कर वह भी उसके पीछे-पीछे हो ली अपने प्यारे बच्चे के वियोग मे हिरणी के नैनो मे झर-झर आँसू बह रहे थे। सुदुक्तगीन आखिर मनुष्य ही तो था। हिरणी की कातर अवस्था देखकर उसे दया आ गयी। उसने घोड़ा रोका, और बच्चे की टांगे खोलकर उसे छोड़ दिया बच्चा छलांग लगाकर माँ के पास आ गया। हिरणी को मानो संसार मिल गया वह बच्चे को प्यार-दुलार से चाटने लगी, वह बहुत खुश हुई, और उछलती-कुदती अपने प्यारे बच्चे के साथ वन में लौट गई। पर लौटते समय जब तक सुयुक्तगीन आँखों से औझल नही हुआ तब तक वह उसकी और कृतज्ञता और प्रेम से निहारती रही। यह था “उसके सद्व्यवहार का प्रताप"। उस दिन रात को सुबुक्तगीन ने एक स्वप्न देखा, स्वप्न में पैगम्बर मोहम्मद साहब ने उससे कहा- "सुबुक्तगीन! आज तुमने जो सद्व्यवहार एक वन्य पशु से किया हैं"। अल्लाहताला इससे बहुत प्रसन्न हुए हैं। "तुम जीवन में बहुत उन्नति करोगे" तबसे सुबुक्तगीन ने शिकार करना छोड दिया। सच है सव्यवहार (दया) चाहे मनुष्य के प्रति किया जाय अथवा पशु पक्षी के साथ वह कभी व्यर्थ नही जाता। सदा फलदायक होता हैं। सौन्दर्य प्रसाधनों पर टिका क्रूरता का संसार पृथ्वी का स्वामी केवल मनुष्य ही नहीं हैं। सब जीव जन्तुओं को धरती पर जीने का अधिकार हैं। अगर हम किसी जीव की रक्षा नहीं कर सकते तो उसे मारने का हमें क्या अधिकार हैं? * "दाढी बनाने के बाद आफ्टर सेब"लगाने के शौकीन यह नहीं जानते कि इस लोशन की परिक्षा के लिए न जाने कितने गिनिपिगो (जानवरों) की खाल उधेड़ी गई होगी। * सेन्ट बनाने के लिए "विज्जु" नामक जानवर को बुरी तरह से पीटा जाता है। वह व्यग्र होता है तो उसके शरीर से पदार्थ निकलता है जिससे सुगन्ध नचोडी जाती हैं इस दौरान उसकी ग्रन्थियों को चाकू से खरोंचा जाता हैं। * बन्दरों व खरगोशों पर वैज्ञानिक प्रयोगों की निर्दयता पूर्ण गाथा सुनकर रोंगटे खडे हो जाते है। 3 स्त्रियों के सौन्दर्य प्रसाधनों मे किस प्रकार जीयो का दुरूपयोग होता है। आईये देखें :- * लिपस्टिक लगे जिन होठों से मुस्कराकर युवतियां इतराती हैं वह लिपस्टिक की लाली न होकर किसी न किसी मासूम जानवर का रक्त होता है, जो उनके मुख पर मुस्कराता है। * महिलाएं जिस फेस पाउडर का इस्तेमाल कर सुन्दर दिखना चाहती हैं वह "स्लेण्ड लोरिस" नामक बन्दर की प्यारी-प्यारी आंखों व दिल को घिसकर बनाया जाता हैं। * प्रसाधन सामग्री को जुटाने हेतु रोज अनेक कछुओं को मारा जाता हैं। उनके शरीर से निकाला गया तेल प्रसाधन सामग्री में इस्तेमाल होता है।
72 * होय होतब कोल गुरू के, सिर सुंपो साको करो- खेजड़ली बलिदानी * टेल्कम पावडर एव लिपिस्टिक के प्रयोग नन्हे बन्दरों पर करके उन्हे मौत के घाट उतार दिया जाता हैं। 1984 में 5 करोड़ थे अब मात्र 40 लाख ही रह गये है। * गधविलाव को मार मारकर उसकी थैली से सुगन्ध निकालते है जिरा सुगध को स्त्रिया घाव से लगाती हैं। गधविलाव कुछ सप्ताह में दम तोड़ देता है। करतुरी के लिए हरिण की नाभी चीरी जाती है। शैम्पू के निर्माण के लिए खरगोश का सिर पिंजड़ें मे फसाकर उसकी आंखें चिमटियों द्वारा फोड दी जाती है। जिससे भयानक पीड़ा सहते हुए खरगोश मर जाता है और फुटी हुई आखों के सत से शैम्पू बनाया जाता हैं। साप छिपकली एव घडियाल को पकड़कर उनकी रीढ की हडियो को तोडकर जीवित अवस्था में उनकी खाल खींच ली जाती है और उन्हे तड़फ तडफ के मरने के लिए फैंक दिया जाता हैं। उनकी खाल से लेदर की विभिन्न वस्तुएं बनायी जाती हैं। * रेशम की साडी या रेशम के वस्त्र निर्माण हेतु हजारों लाखों रेशम के कीट जन्म से पूर्व ही खोलते पानी मे उबाल दिये जाते हैं एक साडी के निर्माण में 50 हजार कीटों की बलि दी जाती हैं। नरम कपडे के लेडिज हेड पेग बनाने के लिए जीवित पशुओ के बछडो (गाय, भैंस. कुत्ते) आदि चौपायों को मारकर अथवा उनके भ्रूण के पेट चीरकर जीवन बनने से पुर्व जीवित पशुओं को मारकर उनका क्रूम चमडा निकाला जाता है इनसे पर्स, जैकिट, चैल्ट, जूते आदि का निर्माण किया जाता है। * मोती उत्पादन हेतु ओयस्टेट नामक जीव के शरीर को बेरहमी से चीरा लगा कर अप्राकृतिक मोती निर्मित कराते है और मोती निकालकर उसे मार देते हैं। फर के वस्त्र आदि के लिए गर्भवती भेड को लगातार पीटा जाता है जिससे समय से पूर्व मेमना पैदा हो जाता हैं फिर भेड के सामने ही उस मेमने की खाल खींच ली जाती हैं जिससे मुलायम फर की प्राप्ति हो सके। * हाथी दाँत की सौन्दर्य सामग्री के लिए अनेको हाथियो को गैर कानूनी तरीको से प्रति वर्ष मारा जाता हैं। पशु बालो द्वारा निर्मित ब्रश आदि के लिए पशु को कसकर पकड़ा जाता हैं फिर उसके बाल बेरहमी से नोच लिये जाते हैं। बाघ को उसकी बेशकिमती खाल, चर्बी, मांस व हड़ियों के अतिरिक्त कामोत्तेजक औषधियों के निर्माण के लिए मारा जाता हैं। उपरोक्त जीव क्रूरता मे शामिल स्त्री क्या करूणामयी होने का दावा कर सकती है ? चाँदी का वर्क हिन्दू समाज में चांदी का वर्क अपना महत्व रखता चादी के वर्क में लिपटा हुआ पान खिलाया जाता हैं। मदिर में प्रसाद पर चॉदी का वर्क लगाया जाता है सुपारी उद्योग में भी चाँदी के वर्क का उपयोग होता है। ताजी मिठाई भी चादी के * * शादी के समय दुल्हे को | पानी पियो छातकर, वाणी बोलो जानकर । 73 यर्क में सजी लुभावनी लगती हैं। क्या आप जानते है कि चाँदी का वर्क कैसे बनाया जाता हैं ? बैल या भैंस की हत्या कर उनकी ताजी गर्भ आतों में चाँदी की चादर को रखकर उसे हथोडों से तब तक पीटा जाता है जब तक चांदी के वर्क का रूप न लेले। इस शाकाहारी वर्क में रक्त एव आतों के मास का अच्छा खासा अंश आ जाता है। शाकाहार में मांसाहार 1. शक्कर- सफेदी हेतु हड्डियों का चारकोल के रूप में उपयोग होता हैं। 2 सेन्ट-जीवों के उत्तको एव जीव रसायन से निर्मित। 3 सेव- इसकी चमक हेतु शिलेक नामक जीय का उपयोग किया जाता है। 4 विस्कुट-जीवों की वसा तथा अण्डे की सफेदी से निर्मित। 5. चोकलेट-अण्डे के लेसीथीन से युक्त। 6 केक-अण्डे का उपयोग। 7. जेमजेली- हड्डियों के जेलेटीन का उपयोग। 8 मिठाई-जेलेटीन का उपयोग। 9. टूथ पेस्ट - जन्तु वसा व हड्डियों का उपयोग। "किसी की जान गई, किसी की अदा ठहरी" राजस्थान में गौ वध प्रतिषेध कानून प्राचीन भारत में गौधन को अत्यन्त सम्मान जनक स्थान प्राप्त था गाय को मारना या पीटना उचित नही माना जाता था। गौ वध करने वाले को हेय दृष्टि से देखा जाता था। गौ वध करने वाला व्यक्ति जब तक उस पाप का प्रायश्चित नही कर लेता तब तक उसे जाति बहिष्कृत की तरह व्यवहार किया जाता था। लेकिन जैसे जैसे समय बदला, लोगों की सोच में भी बदलाव आया, और बिना दुध देने वाले गौ वश को लोग घर बाहर निकाल कर अपने हाल पर छोड़ने लगे। इस प्रकार आर्थिक रूप से अनुपयुक्त समझे जाने वाले गाय, बैल, बछडे आदि गौ वश कसाईयों के हत्थे चढकर कत्लखानो में पहुंचकर कटने लगे। रही सही कमी मशीनीकरण ने पूरी कर दी। ट्रेक्टर आदि कृषि यन्त्रों से बुवाई का दायरा बढ जाने के कारण तथा परिवहन मे मोटरो के प्रचलन उपयोगी बैलो को नकार दिया गया, और वे मौत के मुह में जाने लगे। अनुपयोगी बण्डों के उचित पालन पोषण नही होने से गावों में उन्नत सांडों का भी टोटा पड़ने लगा हैं। इस प्रकार की विकट परिस्थितियों के कारण हमारे देश में प्रतिदिन हजारों की सख्या में गौधन काल के गाल में जा रहा है। अत इनकी सुरक्षा हेतु कठोर कानून की जरूरत महसूस की गई और इस सम्बंध मे राजस्थान सरकार द्वारा “राजस्थान गौवंशीय पशु (वध मांस आदि अखाद्य पदार्थों को मत खाओं - गुरूजम्भेश्वर भगवान 74 का प्रतिषेध और अस्थायी प्रवर्जन) अधिनियम 1995" नामक कानून दिनांक 24 8 95 को राज्य में लागू हुआ इस अधिनियम में गाय, बछडा, बछिया साड व बैल को गौवशीय पशु माना गया। इस अधिनियम में कारित अपराध को विभिन्न तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है। जो इस प्रकार है- किसी भी ढग या रीति से मारना। किसी भी प्रयोजन या उद्देश्य के लिए मारना। आशय पूर्वक मारना। 1 2 3 उदाहरण के लिए मुसलमान लोग ईद पर भी इनका वध नही कर सकेगे। चराई. कृषि कार्य, डेयरी उद्योगें हेतु ले जाने, पशु मेले में भाग लेने के लिए अधिकृत सक्षम अधिकारी को निर्धारित प्रकिया में आवेदन कर समुचित लिखित अनुमति प्राप्त करेगा। विना अनुमति के गौवशीय पशु को अन्यत्र ले जाना कानून का उल्लघन माना जायेगा। इस अधिनियम के अधीन किसी भी अपराध के किये जाने के उद्देश्य को अग्रसर किसी भी ट्रक आदि वाहन से पशु ले जाया जाये तो ले जाने वाला दुष्प्रेरणा का दोषी माना जायेगा। अपराध साबित होने पर उसे 6 माह से 5 वर्ष तक की सजा तथा 5000 रूपये तक जुर्माना हो सकता हैं। सम्बधित पशु के प्रवर्जन की लिखित अनुमति लेने से पूर्व सम्बधित पशु चिकित्सक से स्वास्थ्य जाँच करवाकर सक्षम अधिकारी जिला कलेक्टर अथवा उपखण्ड अधिकारी उस पशु को एक निश्चित कालावधि को चराई के लिए अन्यत्र ले जाने हेतु अनुमति देगा। लेकिन मजुरी की अवधि की तारीख अगले अगस्त माह से पूर्व यदि कोई व्यक्ति ऐसे गौवशीय पशु के परमिट मे उल्लेखित कालावधि के भीतर यदि वापिस नही लाता है, तो यह समझा जायेगा कि उसने कानून की उप धारा 1 का उल्लंघन किया है। अपराध पर कानूनी सजा इस अधिनियम की धारा 8, 9 व 10 में जुर्माना व दण्ड के बारे मे प्रावधान इस प्रकार है- इस अधिनियम की धारा 3 के अनुसार किसी भी विधि, प्रथा, रूढी के द्वारा अगर कोई व्यक्ति गौ वंश (गाय, बैल, बछडा, बछडी व साड) का वध करता है या दुष्प्रेरणा करता है तो अधिनियम की धारा के अनुसार इस अपराध की सजा न्युनतम एक वर्ष से दस वर्ष तक का कारावास व दस हजार रूपये जुर्माना की सजा का प्रावधान है। इस अधिनियम की धारा 4 के अनुसार तत्समय प्रतकी भी अन्य विधि में । अन्तर्विष्ट किसी बात के होने पर भी कोई भी व्यक्ति गौ मास या किसी रूप में गौ मांस उत्पादों का कब्जा बेचने व बेचने के लिए परिवहन नहीं कर सकता। इसी अधिनियम की धारा 5 में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति गौवंशीय पशु को स्वय या अपने किसी एजेन्ट या नौकर के जरीये मारने के प्रयोजन से यह जानते हुए भी कि उसकी 1. 2 - 4 प्राकृतिक सौन्दर्य से श्रेष्ठ नही है, बनावटी सुन्दरता । 75 वध किया जा सकता है। राज्य के भीतर या बाहर किसी भी स्थान पर पशु को न तो निर्यात कर सकता है और न ही करवा सकता। अगर कोई अधिनियम की उपरोक्त धारा 4 व 5 का उल्लंघन करता हैं तो वह अधिनियम की धारा 8 के अनुसार 6 माह से 5 वर्ष तक का कठोर कारावास तथा 5000 रू के जुर्माने से दण्डित होगा। 3. किसी गौवंशीय पशु को शारीरिक पीड़ा, रोग या अंग शैथिल्य करने या ऐसी दुष्प्रेरणा करने पर अधिनियम की धारा 9 के अनुसार 3 वर्ष तक की अधिकतम कठोर कारावास एव 3000 रू के जुर्माने से दण्डित होगा। किसी गौवंशीय पशु को साशय गंभीर क्षति पहुचाने एव इस हेतु किसी को दुष्प्रेरित करने पर इस अधिनियम की धारा 10 के अनुसार 1 वर्ष से 7 वर्ष तक कठोर कारावास व 7000 रू. जुर्माना हो सकता हैं। इसके अलावा राजस्थान उच्च न्यायालय ने यह अभीनिर्धारित किया है कि यदि किसी गौ वश पर प्रहार कर गभीर क्षति कारित की जाती हैं, जो प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त हो तो उसे “वध" का दोषी माना जायेगा। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति गौ वश पर लाठी से प्रहार करता है चाहे उसका उद्देश्य उस गाय को मारने का नही रहा हो तो उसे "गंभीर क्षति" कारित करने का दोषी ही माना जायेगा। गौ वंशीय पशु के अस्थायी प्रवर्जन के लिए परमिट इस अधिनियम की धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन राज्य में अकाल अथवा अभाव ग्रस्त क्षेत्रों से गौ वंशीय पशुओं को अन्यत्र राज्य में चराई के लिए कृषि या डेयरी उद्योगों के प्रयोजनार्थ राज्य से बाहर, अथवा पशु मेले में राज्य से बाहर ले जाने की अवस्था मे पशुओं को ले जाने वाले व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि वहः- 1. सक्षम अधिकारी को निर्धारित प्रपत्र में आवेदन करना होगा। 2 सक्षम प्राधिकारी उस प्रस्तावित आवेदन के मिलने पर प्रवर्जन हेतु आवश्यक परिस्थितियों का उचित मूल्याकन कर सम्बधित क्षेत्र के पशु चिकित्सक को उस पशु के स्वास्थ्य परीक्षण एवं पशुओ के शरीर पर स्थायी पहचान चिन्ह से आश्वस्त होगा। 3. पशु चिकित्सा अधिकारी प्ररूप-4 में प्रमाण-पत्र जारी करेगा और गौ वशीय पशु के स्थायी पहचान चिन्ह लगायेगा। 4. इस प्रक्रिया का समाधान होने के पश्चात सक्षम अधिकारी उपर्युक्त प्रयोजनों के लिए परमिट जारी कर सकेगा। 5 अस्थायी प्रवर्जन से गौ धन के लौटने पर आवेदन सक्षम प्राधिकारी को अपने द्वारा वापिस लाये गये पशुओ के बारे में लिखित सूचना निर्धारित प्रपत्र के द्वारा देगा। 6. चराई एव पशु मेले में भाग लेने के बाद वापिस लाये गये पशुओं की संख्या के बारे में 76 गाय के समान परोपकारी व पवित्र पशु विश्व में कहीं नही है । फेरफार यदि कोई होतो उसके सबूत के साथ सक्षम अधिकारी को स्पष्टीकरण देना होगा। 7 यदि कोई चराई के लिए ले जाये गये पशु को परमिट में विनिर्दिष्ट (अकित्त) कालावधि के भीतर-2 वापिस नहीं लाता है तो वह अधिनियम के उपबंधों के अधीन दण्डनीय होगा। 8 इन्हे अन्यत्र ले जाने वाला परिवाहक गौवशीय पशुओं की लदाई के पूर्व यह सत्यापित करेगा कि इन पशुषों के लिए अधिनियम की धारा 5 के अधीन विधि मान्य विशेष परमिट जारी किया जा चुका हैं। ऐसा न होने पर अधिनियम की धारा 8 के अधीन दण्डनीय होगा। इस अधिनियम के विरूद्ध अपराध कारित करने पर वाहन से पूलिस द्वारा जन्त किये गये गौवंश को पशु कल्याण मे लगी किसी स्वेच्छिक सस्था को अथवा गौ शाला को अतिम निपटारा होने तक दिया जा सकता हैं। जहां गौ शाला नही हो वहा अन्य कोई व्यक्ति उन्हे रखना चाहे तो उन्हे भी सुपुर्द किया जा सकता है लेकिन ऐसे पशुओं के मालिक मिल जाते है तो उनसे पशुओं के रखरखाव का खर्चा वसूल कर उन्हें लौटाया जा सकता हैं। राजस्थान में पशु बलि कानूनी अपराध जिस तरह हमारे सामाजिक जीवन में कई प्रकार के अधविश्वास एव कुरीतियाँ प्रवेश कर गई है. उसी क्रम मे देवी देवताओ के पूजा के विधान के नाम पर पाखण्डी पुजारियों ने पूजा । के असली स्वरूप को बिगाड रखा है, जिसमें सबसे अधिक अखरे वाली बात है-"देवी देवताओं की मूर्तियों के आगे निरपराध जानवरों की बलि चढाना"। पशु बलि की इस हिसक कुप्रथा के बारे मे लोगो की यह बेतुकी सोच है कि-"देवी के आगे बकरे की बलि चढाने से देवी खुश होगी। जबकि यह सोच सरासर गलत हैं। पुरातन हिन्दू धर्म ग्रन्थों में कहीं भी पशु बलि की आज्ञा नहीं हैं। कुछ निहित स्वार्थी मांसाहारी लोगो ने कभी ऐसी घिनोनी कुप्रथा शुरू कर दी और लोग अज्ञान वश इसका अधानुकरण करते गये। न जाने इस गलत सोच के कारण आज तक कितने निरीह जानवरों को अपनी जान गवानी पड़ी। जबकि वास्तव मे देवी ऐसे पाप पूर्ण कृत्य से खुश होने की बजाय कुपित होती है। क्योकि देवी सम्पुर्ण चराचर जगत की माता हैं। एक सामान्य माता भी अपनी सतान का पूरा नहीं चाहती फिर वह तो जगन्माता हैं। वो भला अपनी लाडली सतान निरपराध जानवर की हिंसा कैसे सहन कर सकती हैं ? अतः प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि अधविश्वास पर आधारित इस पाप पुर्ण कृत्य के कारित होने पर उसे प्रयत्न पूर्वक रोकने का प्रयास करें। अन्यथा ऐसा करने वाले पाखण्डी को कानून के सुपुर्द करावे। महान सत विल्होजी महाराज पशु बलि पर कटाक्ष करते हुए कहते है - भरम उपाय पाहण गुरू थरपे, साध सेवा नहीं जाणी। निरजीव आगे सरजीव मारे, डूब गया बिन पाणी।। इस कुप्रथा की रोक थाम हेतु राजस्थान सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के आधार पर 24 अप्रेल 1975 को राजस्थान पशु और पक्षी बलि (प्रतिषेध) अधिनियम 1975 लागू किया | पोलीथीन की सुविधा धरती की दुविधा । 77 गया। जिसकी धारा 3 में उल्लेख है कि कोई भी व्यक्ति मन्दिर अथवा सार्वजनिक एव धार्मिक पूजा स्थल परिसर में न तो पशु अथवा पक्षियों की बलि देगा और न बलि देने में सहायता करेगा तथा अधिनियम की धारा 4 में कहा गया है कि- (क) न तो बलि का आयोजन करेगा. न ऐसे आयोजन का प्रस्ताव करेगा। (ख) न तो बलि देगा. और न बलि देने में प्रस्ताव करेगा. अथवा (ग) न तो चलि में सहायता करेगा. न भाग लेगा, न ऐसी सहायता अथवा सेवा का प्रस्ताव करेगा। पशु बलि होने की पुर्व सूचना पर संभावित पशु बलि को रोकने के लिए निषेधात्मक कार्यवाही भी की जा सकती हैं। इस सम्बन्ध में कार्यपालक मजिस्ट्रेट को परिवाद प्रस्तुत करने पर मजिस्ट्रेट के आदेश का उल्लंघन कर बलि देने पर अपराधी को एक वर्ष तक के सजा एव 1000 रू. का जुर्माना या दोनों ही सजाओं से दण्डित किया जा सकता हैं। अपराध की सजा जो काई इस अधिनियम की धारा 3 के उपबंधो का उल्लघन करेगा अथवा उल्लंघन में सहायता या दुष्प्रेरणा करेगा तो दोष सिद्धि पर ऐसी अवधि के कारावास से जो 6 माह तक हो सकेगी। अथवा ऐसे जुर्माने से 500 रूपये तक का हो सकेगा। अथवा दोनों से दण्डित किया जा सकेगा। 2. जो कोई धारा 4 अथवा 5 के उपबंधों का उल्लंघन करेगा अथवा उल्लघन मे सहायता या दुष्प्रेरणा करेगा। तो उसे दोष सिद्धि पर ऐसी अवधि के कारावास से जो 3 माह तक की हो सकेगी अथवा जुर्माने से जो 300 रूपये तक हो सकेगा अथवा दोनों से दण्डित किया जा सकता हैं। बिमार एवं घायल पशु पक्षी की सेवा हमारा-धर्म पशु दो प्रकार के होते हैं - एक पालतु तथा दुसरा वन्य पशु। मनुष्य की स्वाभाविक मनोवृति है कि जिन पशुओं से उसे दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति व आर्थिक लाभ मिलता है, उनका बिमार पड़ जाने पर यथा साध्य ईलाज करवाता है, लेकिन यह प्रवृति तब तक ही कायम रहती है जब तक पशु उसके काम आता रहे। उदाहरण के लिए किसी दुर्घटना में अगर पशु अपग होकर चलने फिरने में लाचार हो जाये या बुढा हो जाता है तो उस पशु को अपने हाल पर छोड़ दिया जाता हैं। यह प्रवृति नैतिक रूप से उचित नहीं हैं। स्वार्थ वश की गई सेवा, सेवा नही होकर मात्र अपना उल्लू सीधा करना है। निःस्वार्थ सेवा वही है जो किसी पशु की असहाय अवस्था में की जाये। एक बार सत दादुदयाल रात्रि मे कही जा रहे थे तो उन्हें एक जगह थोडे-थोड़े अन्तराल से "राम.. .....राम..........राम" के नाम की आवाजे क्रमबद्ध सुनायी दी। संत दादु | एक बेल को मारना मनुष्य के कत्ल के समान है 78 इसाइयाह 66/3| जी ने अनुमान लगाया कि शायद ऐसा कोई मका होगा जो एकान्त में बैठकर तल्लीनता से प्रमु नाग का जाप कर रहा है। वे जिज्ञासावश उस आवाज की दिशा में उसके समीप गये तो उन्हाने देखा, कि एक किसान अपने बैल के द्वारा रेहट चला रहा था जैसे ही वह रहट के पात्रों का पानी खाली करता तो रेल का पूछ मरोड़कर "राम" शब्द का उच्चारण करता उरो देखकर सत की पूर्व धारणा एकाएक बदल गई और उन्होने कहा- "दादु दुनिया यावळी, कहे चाम को राम। पूछ गरोडे बैल को काटे आपगो काम।। यही स्थिति हमारी हो गई है कहने का तात्पर्य यह है कि मात्र स्वार्थ वश की गई सेवा का उतना महत्व नहीं होता जितना कि निस्वार्थ भाव से होता है। पशु पालकों द्वारा अपना मतलब हल होने के बाद पशु धन को प्राय असहाय अवस्था में छोड़े निढाल पड़े हुए किसी पशु को देखकर सहदय पुरूप के दिल में दया भाव का स्वामाविक संचार होता है। वास्तव में धर्म का मूल तत्व दया ही है। कहने का तात्पर्य यह है कि मात्र स्वार्थ वश की गई सेवा का उतना महत्व नहीं होता जितना कि निस्वार्थ भाव से होता है। अत ऐसी दयनीय हालात में घायल. बीमार. पडे हुए येवरा मूक प्राणियों की सेवा य चिकित्सा करना हमारा ६ म ही नही कर्तव्य भी है। क्योंकि इस प्रकार बेहाल पशु अपनी पीड़ा का इजहार हमारे सामने नहीं कर सकते। अत. ऐसी स्थिति मे उनके हाव भाव से ही हमें ये जान लेना चाहिए कि उन्हे हमारी मदद की जरूरत है। इस सम्बंध में अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई सभा व पीपुल फॉर एनीमल्स, विश्नोई टाईगर फॉर्स जैसी स्वयसेवी संस्थाओं के सैकड़ो समर्पित कार्यकर्ता ऐसे दीनहीन जरूरत मद पशुओ की पीड़ा को बाटने का प्रयास करते हैं। अधिक से अधिक लोगों को ऐसी संस्थाओं से जुड़कर अपना अमूल्य योगदान करना चाहिए। पिछले वर्ष दैनिक भास्कर अखबार मे एक खवर प्रकाशित हुई जिसका शीर्षक था “ऊट बना दूठ" खबर को पढकर मालूम हुआ कि जालवाली गाव के पास सड़क के किनारे एक दुर्घटना ग्रस्त ऊट महिने भर से पैर टुटा निढाल पड़ा अपनी बेवसी के आसू बहा रहा हैं। इस खबर को पढकर पीपुल फॉर एनीमल्स बीकानेर के उपाध्यक्ष शिवराज जाखड़ बीमार पशु प्रमारी मोखराम धारणियां श्री लक्ष्मण खीचड़ भवरलाल सहारण चम्पालाल कालीराणा आदि कार्यकर्ताओं ने ट्रेक्टर ट्रोली से ऊट का बीकानेर वेटनरी कॉलेज में ईलाज करवाकर उसे राहत पहुचायी। इसी प्रकार इन सस्थाओ के कार्यकर्ता बीकानेर, नोखा, श्रीकोलायत. खाजूवाला, लूणकरणसर आदि क्षेत्रों में इसी प्रकार के हालात के शिकार मूक पशु पक्षियों की चिकित्सा सेवा में जुटे हुए हैं। इसी प्रकार शिकारियों अथवा कुतों द्वारा घायल एव बीमार हरिण आदि वन्य जीव तथा अकाल की मार से पीड़ित गौधन जिन्हे तत्कालीक ईलाज और चारे की जरूरत है तथा उन्हे इन्तजार है कि कोई ऐसा दयालु आये और उसकी पीडा को हर ले। इस प्रकार बेहद कष्ट पूर्ण हालात मे बेबस मूक प्राणियों की सेवा से जो आत्म सतुष्टि मिलती हैं उसका शब्दों में बयान नही किया जा सकता। कई नवयुवकों में तो इस सम्बध पशुओं की दुर्वलता के साथ साथ राष्ट्र भी दुर्बल होता है - डॉ. हैरल्ड|| 79 में गजब का सहानुभूति भाव देखा गया है। आज से दो वर्ष पूर्व साजूवाला से 15 किमी. दूर ढाणी का एक नव युवक कुत्तों द्वारा बुरी तरह घायल किये एक नील गाय के बच्चे को लेकर खाजूवाला जीव रक्षा सभा कार्यालय पहुंचा तो उसे देखकर में दंग रह गया, कि वन्य पशु को कंधे पर लाद कर लाने से उसके कपड़े रक्त से सने हुए थे। लेकिन उस नवयुवक रामनिवास राहारण ने इसकी परवाह न कर उक्त वन्य पशु को ईलाज हेतु खाजूवाला पहुंचाया। कई दिन ईलाज के बाद उसे जंगल में छोड दिया गया। बचाने वाले को दुआ देती हुई वह नीलगाय जंगल में भाग गयी। आपकी नजर मे ऐसा कोई बेसहारा घायल अथवा तड़पता हुआ पशु अश्रुपूर्ण नेत्रों से सहायता की अपेक्षा से आप को निहारता नजर आये तो तुरन्त उसकी सेवा में जुट जायें। पीड़ित की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं ऑक्सीटोक्सीन ईजेक्सन के दुष्परिणाम मात्र हावी आज हम ऐसे असंतुलित भौतिक विकास की दहलीज पर आ खड़े हैं, जहा हमारी नैतिकता डगमगाने लगी है। सकारात्मक सोच की जगह स्वार्थपरता ने लेली हैं। अपने स्वार्थ को साधने के लिए क्रूरता पूर्वक व्यवहार बढने से मात्र लाभ की बाते सोची जाने लगी है. येन-केन प्रकारेण लाभ हासिल करने की प्रवृति ने बेजुबान जानवरो को भी नहीं बक्सा है अधिक उत्पादन की महत्वाकांक्षा ने मनुष्य को इस कदर अंधा बना दिया है कि वह प्रकृति के कायदे कानून तोड़ कर भी पशुओं का दोहन करने को आमादा हैं। देश में पशुओं के दुध दुहने के लिए ऑक्सीटोक्सीन नामक इंजेक्शन का प्रयोग बहुत ज्यादा बढ़ गया हैं। पशु पालक इसे सामान्य भाषा मे पशु पावसने वाले टीके के नाम से जानते हैं। वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. हनुमानाराम सीरवी खाजूवाला के अनुसार इस इजेक्शन का प्रयोग दुध दुहने के लिए करना बिल्कुल गलत हैं। क्योंकि इसे लगाने पर पशु के थनों में दुध तो उतर आता है लेकिन यह दुध पीने वाले के लिए अत्यन्त हानि कारक हैं। लगातार इसके प्रयोग से पशु का दुध धीरे धीरे समाप्त हो जाता है। इस हारमोन का दुध में उत्सर्जन होने के कारण मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता हैं। पशु औषधि वैज्ञानिकों द्वारा किये गये विभिन्न अनुसधानों के परिणामों के आधार पर ऑक्सीटोक्सीन से होने वाले कुप्रभावों के बारे में जो तथ्य सामने आये हैं। वे निम्नानुसार हैं:- 1. इसके नियमित प्रयोग से दुधारू पशुओं की दुग्ध स्त्रावी ग्रथियां प्रभावित होती हैं। उनकी कोशिकाएं नष्ट होकर दुध उत्पादन में कमी होने लगती हैं एवं अततः पशु दुध देना बंद कर देता हैं। 2. इसके लगातार प्रयोग से हारमोनल सतुलन बिगड़ जाता है जिससे पशु का शरीर क्रिया तंत्र एवं उसके पाचन अवशोषण तत्र व चयापचयी क्रियाओं पर अत्यंत घातक प्रभाव पड़ता भय और वैर से मुस्ति पानी है तो अहिंसा अपनाओं - भगवान महावीर 180 हैं और इस टीके को अधिक मात्रा में देने पर दुध में सोडियम की मात्रा घट जाती है जिससे पशु के शरीर मे खनिज असंतुलन बढ जाता है। 3 इसके लगातार प्रयोग से ओवेरियन (गर्भाशय) के संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है तथा अडाशय में गाठ बन जाने से अंडाशय काम नही करता। 4 हारमोनल असतुलन से पशु के मासिक स्त्राव में गड़बड़ी होने से पशु समय पर ताव में नहीं आता। कभी कभी तो पशु का ताव में आना ही बंद हो जाता हैं। 5 ग्याभन पशुओ में इसके प्रयोग से गर्भपात या अधुरा बच्चा पैदा होने की सभावनाएं अत्यत बढ जाती हैं।अधुरा बच्चा होने से पशु की समय पर जेर नही गिरती तथा अन्य समस्याए जैसे बच्चेदानी मे सुजन आना, ग्याभिन नही होना तथा ताव में आने पर भी ग्याभिन नही होने जैसी बिमारिया उत्पन्न हो जाती हैं। 6. जिन पशुओ में इस टीके का प्रयोग किया जाता है उनके दुध मे ऑक्सीटोसिन हारमोन मिलने से नर पशु मे परिपक्वता देरी से व मादा पशु में जल्दी आ जाती हैं ये दोनो ही परिस्थितिया सही नहीं हैं। 7 इस टीके के प्रयोग से निकाले जाने वाले दुध में उक्त पशु के रक्त, अस्थि व मज्जा, के घटक भी आ जाते हैं। 8 आक्सीटोसिन से प्रभावित पशु का दुध लेने वाले मनुष्यो में खासकर बच्चों में मस्तिष्क सम्बधी विकार, असामयिक बुद्धि तथा हारमोनल असंतुलन पैदा हो जाता हैं। इस दुध के सेवन से स्त्रीयों के मासिक धर्म में गड़बड़ी हो जाती हैं। गर्भपात होने के सभावना बढ़ जाती हैं। इसके अलावा स्त्रियो में स्तन कैंसर तथा पुरुषों में नपुसकता होने मे इस हारमोन का महत्वपूर्ण स्थान हैं। अत आक्सीटोक्सीन इजेक्शन पशु धन के विकास, स्वास्थ्य के लिए भारी रूकावट हैं। इसके प्रचलन को किसी भी हालत में रोकना होगा। जीव जन्तु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 की उप धारा 12 के तहत दुधारू पशुओं का दुध उतारने या बढाने के ऐसे किसी भी प्रयास को अपराध माना जायेगा और दोषी व्यक्ति को दण्डित किया जायेगा। उक्त अधिनियम मे यह दर्शाया गया हैं कि यदि कोई व्यक्ति दुधारू पशु पर फुका या डुमदेव नामक किया एव दुग्ध स्त्रवण को बढाने के लिए कोई अन्य ऐसी किया जिसमे के अन्तर्गत किसी पदार्थ का उपयोग करेगा जो उस पशु के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं या अपने कब्जे अथवा अपने नियत्रण के अधीन किसी पशु पर ऐसा करता है तो वह अपराधी होगा लिप्त पाये जाने पर उसे 1000 रू तक जुर्माना या दो वर्ष कारावास अथवा दोनों दण्ड दिये जा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार द्वारा इस टीके (ओषधि) की अवैध बिक्री एव दुरूपयोग करने वाले औषधि विक्रेताओं पर प्रतिबंध लगाया जा चुका हैं। इस टीके का कुप्रभाव पशुओं के स्वास्थ्य के साथ साथ मनुष्यों की सेहत से जुड़ा है अत हम सभी की यह कर्तव्य बनता है। कि इस दिशा मे जन जागरण अभियान चलाकर इसके दुष्प्रभावों का प्रचार कर हर गाव, ढाणी, और दुर दराज में बैठे पशु पालकों को अवगत करवाया जाये। - 81 जो अपने प्रतिकूल जान पड़े, उसे दुसरे के प्रति न करें - विदुर नीति पशु निर्दयता (निवारण) अधिनियम 1960 बहुत कम लोग जानते है कि देश के कानून में गूक पशुओं के प्रति बरती जाने वाली निर्दयता पूर्ण व्यवहार पर कानून मे सजा का प्रावधान है और कोई भी व्यक्ति किसी पशु के प्रति क्रूरता पूर्ण व्यवहार नहीं कर सकता। पशु की क्षमता से अधिक उससे काम नही ले सकता, चाहे वो उस पशु का मालिक भी क्यों न हो। अपने पालतु पशु को कानून द्वारा मिले तमाम अधिकारों की रक्षा करना उसका दायित्व हैं। पशु निर्दयता (निवारण) अधिनियम (केन्द्रिय अधिनियम) 1960 के अध्याय 3 की धारा 11 में उल्लेख है कि (क) किसी पशु को पीटता है, ठोकरे मारता है, अधिक सवारी करता है. अधिक जोतता है. अधिक भार लादता है, यातनाएं देता है अथवा अन्य इस प्रकार का किसी पशु के साथ व्यवहार करता है जिसके कारण वह पशु अनावश्यक पीड़ा एवं कष्ट भुगतता हैं। (ख) किसी पशु से ऐसा कार्य या परिश्रम कराता है, जिसे वह रोग. दुर्बलता, घाव, सूजन एवं अन्य कारण से करने के अयोग्य हैं, अथवा मालिक होने के कारण किसी पशु से इस प्रकार कार्य लेने हेतु अनुमति देता हैं. अथवा- (ग) स्वेच्छा से तथा अनुचित रूप से किसी पालतु अथवा बं दी पशु मे ऐसी कोई औषधि अथवा पदार्थ प्रवेश कराये जाने का कारण बनता है या कारण बनने का प्रयत्न करता है, अथवा- (घ) किसी पशु को किसी गाड़ी अथवा अन्य वस्तु के भीतर या ऊपर इस रीति से ऐसी स्थिति ले जाता हैं अथवा हस्तांतरित करता हैं जिससे वह अनावश्यक पीडा एवं कष्ट का विषय बनता हैं, अथवा- (ड) किसी पशु को ऐसे पिजड़े अथवा अन्य रहने के स्थान में रखता है या बंदी बनाता हैं जिसकी लम्बाई, चौड़ाई व ऊचाई उस पशु की हरकत के लिए अपर्याप्त हो व उसे उचित अवसर प्रदान न करता हो, अथवा- (घ) किसी पशु को अनुचित रूप से लम्बे समय तक जंजीर अथवा अनुचित तंग रस्सी या भारी सख्त रस्सी से बाधे रखता है, अथवा- (छ) मालिक होने के नाते वह उपेक्षा करता है अथवा उपेक्षा का युक्ति पूर्वक निमित बनता है व किसी आभ्यासित रूप से किसी कुते को जंजीर से बाघे रखता है या सकुचित नजर बदी मे रखता है, अथवा- (ज) किसी बदी पशु का मालिक होने के नाते उसे भोजन, पानी, आश्रय प्रदान करने में असफल रहता है, अथवा- (झ) किसी उचित कारण बगैर किसी पशु को ऐसी परिस्थितियों में त्याग कर जिसमें उसे भूखें निराहार रहकर अथवा पानी के अभाव में रहकर पीड़ा उठानी पड़े; अथवा- (ञ) इच्छा पूर्वक ऐसे पशु को जिसका वह मालिक हो किसी सड़क पर खुला चले जाने देता 82 बलि. हेतु निरपराध पशु की हत्या पूजा नहीं, पाप है। है जबकि पशु छूत के अथवा राक्रामक (हिड़काय) जैसे रोग से पीड़ित हो या किसी उचित कारण बिना रोगी अथवा अपंग पशु को जिराका वह मालिक है किसी सड़क पर मर जाने देता है. अथवा- (ट) किसी ऐसे पशु को बेचने का प्रस्ताव करता है या उचित कारण बगेर अपने कब्जे में रखता है जो अग, भग किये जाने, भूखा प्यासा रखे जाने अधिक संख्याओं में रखे जाने, अथवा अन्य दुर्व्यवहार के कारण पीड़ा भोग रहा हो. अथवा- (ठ) अनावश्यक निर्दय रीति से जरूरी नहीं होने पर भी किसी पशु को अंग भंग अथवा दय करता है, अथवा- (ड) किसी पशु को इस प्रकार नजर बद करता है अथया उसका निमित बनता हैं वह ताकि वह किसी अन्य पशु के शिकार की वस्तु न बन सके: अथवा- (द) अपने व्यवसाय के प्रयोजनार्थ, पशु की लडाई अथवा किसी पशु को ललचाने के अभिप्राय से किसी स्थान को. रागठित करता है. रखता है, प्रयोग करता है, अथवा व्यवस्था करने का कार्य करता है तथा इस प्रकार के प्रयोग हेतु किसी स्थान के लिए आज्ञा देता है या प्रस्ताव करता है अथवा किसी प्रयोजन के लिए रखे गये किसी स्थान में किसी अन्य व्यक्ति के प्रदेश हेतु धन प्राप्त करता हैं . अथवा- (ण) किसी निशाने बाजी की स्पर्धा में वृद्धि करता है या भाग लेता है जहा पशुओं को इस प्रकार की निशाने बाजी के प्रयोजनों हेतु मुक्त किया जाता हो। उपरोक्त पशु निर्दयता निवारण अधिनियम 1960 के अध्याय 3 की धारा 11 के के से लेकर ण तक उपबंधों के अधीन अपराध कारित करने पर अधिकतम 3 माह की सजा और 100 रूपये जुर्माने की सजा का प्रावधान हैं तथा इन अपराधों के घटित होने पर उपनिरीक्षक के पद का अधिकारी तलाशी व बरामदगी कर सकता है। जमीन पर बिखरा पोलीथीन कितना घातक ? आज पोलीथीन की थैलियां पेकिंग सामग्री के तौर पर हमारे दैनिक जीवन का एक अहम हिस्सा बनकर रह गयी हैं। सस्ता व सुलभ होने के कारण खान पान से लेकर देनिक उपभोग की सभी वस्तुओ में पोलीथीन का प्रचलन बहुत ज्यादा बढ गया हैं। इससे मनुष्य के सामने पर्यावरण प्रदुषण की विकट समस्या उठ खडी हुई है। इसके फालतु कचरे के निस्तारण की समुचित व्यवस्था नही होने के कारण प्लास्टिक का कचरा हमारे लिए जी का जजाल बन गया हैं। जब से गुटखों व चॉकलेटों का प्रचलन बढा है तब से पोलीथीन के कचरे में भारी इजाफा हुआ हैं। विगत 30 वर्षों में सब्जी व अन्य खाद्य पदार्थों में पोलीथीन के प्रचलन से इनकी थैलियों के छोटे बडे टुकड़े यत्र तत्र बिखर कर जगह जगह गन्दगी फैला रहे हैं। जन चेतना के अभाव में इनके भंयकर दुष्परिणामों की तरफ किसी का भी ध्यान नही जाता । पोलीथीन मनुष्य द्वारा निर्मित वह कृत्रिम पदार्थ हैं, जो कभी भी नष्ट नही होता. जबकि कागज, जूट, गत्ते आदि से बनी पेकिग सामग्री एक निश्चित समयावधि अमृत मय 83 देश धर्म का नाता है, गाय हमारी माता है में नष्ट होकर रेत में तब्दील हो जाती हैं। परन्तु पोलीथीन के टुकड़े छोटे-छोटे हो जाने के शवजूद जमीन से संयोग पाकर भी नष्ट नहीं होते और व सालों साल धरती में पर पड़ा रहता है। पोलीथीन नष्ट नही होने की प्रकृति के कारण अब पर्यावरण प्रदुषण का खतरा बनकर उभरा हैं। सहज ही हल्का होने के कारण पोलीथीन थोडी सी हवा के झोंके से दूर-दूर तक बिखर कर गावों और शहरों के अलावा दूर दराज के खेतों में भी पहुंच गया है वहां बोयी जानी वाली फसलों के अंकुरण में बाधा बनता जा रहा है। जहां जहा कृषि भूमि में पोलीथीन के टुकडे मौजूद हैं हल की नोक से कट फटने के बावजूद पोलीथीन के टुकड़ों के नीचे गिरे बीज को उगाया नहीं जा सकता- भूमि पर गर पड़ा हुआ है. पोलीथीन का छोटा पाना। उगा नही जा सकता दाना, बोने वाला है अनजाना।। पोलीथीन खाने से गौ धन संकट में फालतु समझकर फेंके जाने वाले पोलीथीन से सबसे बडा अनर्थ यह हो रहा है कि गलियों में गिरे पोलीथीन आदि के टुकड़ों को खाकर रोजाना भारी मात्रा में अपने दुध से हमारा पोषण करने वाली गौ माता मौत के मुंह में जा रही हैं। अक्सर लोग अपनी गायों को दुहने के बाद घर से बाहर निकाल देते हैं। गलियों मे इधर उधर मुंह मारता पशु पलास्टिक की थैलियां खा जाता है। जिससे मात्र राजस्थान में प्रति वर्ष हजारों की सख्या में गौ धन पेमौत मर रहा है। जिसके जिम्मेवार और कोई नहीं हम स्वयं है। भारतीय संस्कृति में गाय को सम्मान जनक माता का दर्जा प्राप्त है। लेकिन हमारी अपनी लापरवाही से रोजाना बड़ी संख्या में गौ धन का दुखद अन्त सचमुच दिल दहलाने वाली घटना है। परन्तु कटु सत्य है। भूमि पर फैकें टुकड़ों को अपनी गौ माता चर जाती है। प्राण त्यागती तड़फ-तडफ कर हमको तनिक दया ना आती। मरती गऊए करे पुकार! सुणले धर्म हीण मौत बिना हमको मत मार नहीं मिलेगी दुधांधार। पोलिथीन खा कर मरने वाली गायों के शरीर के सब अंग समय आने पर रेत बन जाते हैं लेकिन उसके पेट में मौजूद पोलिथीन. गुटखों के पाऊच, सिन्थेटिक कपड़ों के टुकडो आदि की गठरीनुमा कृत्रिम पदार्थ गाय का पूरा शरीर नष्ट होने के बावजूद देखे जा सकते हैं जो बाद में पुन. धरती पर बिखर कर पूर्ववत नुक्सान पहुंचाने लगते हैं। इस प्रकार पोलिथीन खाकर बीमार गायों के मरने का सिलसिला नहीं रूका तो एक दिन ऐसा आएगा जब हम गौ रस (घी, दूध, दही) के लिए तरस जाएंगे। खाजूवाला के पशु चिकित्सक डॉ. हनुमानाराम सीरवी के अनुसार पशु के द्वारा खाया गया पोलीथीन किसी भी तरह से पच नहीं पाता और आतों में फंसकर लगातार इक्कठा होता जाता हैं और अधिक संख्या में इक्कठा होने पर गठरीनुमा बनकर पशु की भोजन नली ।
भगवान श्रीकृष्ण // 4 प्रकृति हमें जीवन जीने का आधार देती है - को अवरूद्ध कर देता है जिससे पशु के आफरा आ जाता है तथा पेट में गांठ बनने से आत में रूकावट जैसे लक्षण प्रकट होते है। जिससे पेट में दर्द का होना, बार-बार दस्त लगना. गैस बनना शुरू हो जाता है, जब आफरा आता है तो पेट दोल की तरह बजता हैं कमी कभी जुगाली करने पर आफरा उतर जाता हैं। पशु सुस्त रहता है। पशु के दोनों पैरों के बीच सूजन आना. इस बीमारी का मुख्य लक्षण हैं। उपचारः- प्लास्टिक खाने से बीमार पशु का किसी भी दवा से ईलाज नही हो सकता मात्र पेट का ऑपरेशन कर पशु की जान बचायी जा सकती है। लेकिन जीवित पशु के पेट से पोलीथीन निकालने के लिए समनटौमी ऑपरेशन की सुविधा जिला स्तर के अलावा अन्यत्र दुर दराज मे कही भी सुलभ नहीं हैं तथा साधन हीन पशु पालकों द्वारा शहर लाकर महगे खर्च से ऑपरेशन करवाना उनके चुते से बाहर हैं। अत. ऐसी हालात के शिकार पशु की मौत । को टाला नहीं जा सकता है। हवा के झोंके से चलाय मान पोलीथीन उड़कर जहा भी जाता हैं वहां अपना विनाशक दुष्प्रभाव अवश्य छोड़ता है। कृषि भूमि के अलावा गावों व शहरों में गन्दे पानी की : निकासी की नालिया पोलीथीन की थैलियां फसने से बाधित हो रही हैं। इनमें गिर कर इक्कठा । हुआ पोलीथीन पानी के प्रवाह को रोक देता हैं, जिससे पानी दुषित होकर सड़ांध मारने लगता हैं। बडे महानगरों में तो सिवरलाईने तक इनसे जाम हो जाती हैं। बदबुदार गन्दे पानी से अनेक प्रकार की घातक बिमारियां पनपती है। इस प्रकार अपने दुष्प्रभावों के कारण पोलीथीन आम जन की परेशानी का कारण बना हुआ हैं। इस समस्या से निजात पाने हेतु आज पूरा विश्व चितित हैं। राजस्थान सरकार ने पुन. धक्रित पोलीथीन की पतली थैलियो पर कानूनन रोक लगा रखी हैं। लेकिन कानून को तब तक क्रियान्वित नही किया जा सकता जब तक आम आदमी इनके नुकसान को समझकर इनकी रोक थाम की स्वयं पहल नही करेगा। पोलीथीन के दुष्प्रभावों की रोकथाम हेतु निम्न उपाय अपेक्षित हैं.- 1 हमेशा सब्जी एवं खाद्य पदार्थ पोलीथीन की बजाय अन्य थैले में लाने की आदत डालें। 2. घर में आई पोलीथीन, नायलोन के चिथडो को फैकने की बजाय सुरक्षित इक्कठाकर जला दें। 3. सार्वजनिक तौरपर इनके सम्भावित खतरों के प्रति आमजन को आगाह कर जनचेतना के भाव जागृत किये जाये। 4. धार्मिक और सामाजिक एव सरकारी आयोजनों मे भोजन व नाश्ते में प्रयोग किये जारहे यूज एण्ड थो प्लास्टिक पात्रों पर सख्ताई से पाबदी लगे। 5 सभी धर्माचार्य एवं राजनेतागण आमजन को इस सम्बध मे प्रेरित करें। 6. मौजूदा पोलीथीन के कचरों के ढेरों को इक्कठा कर जलाने का गली गली में अभियान चलाया जाये। 7. ग्राम पंचायत नगर पालिका व नगर परिषद में अपशिष्ट प्लास्टिक को नष्ट करने हेतु प्रति वर्ष बजट में प्रावधान हो।
85 लाचार जीवों के प्रति क्रूरता बरतने वाला सबसे बड़ा कायर है । 8. सचार माध्यमों से पोलीथीन की हानियों का निरंतर प्रचार प्रसार हो। 9 मेलों अथवा धार्मिक महत्व स्थलों पर पोलीथीन फेंकने की प्रवृति पर रोक लगे। 10. पोलीथीन बनाने वाली फैक्ट्रीयों पर प्रतिबंध लगाने की पुरजोर मांग हो। यज्ञ का विधान क्यों? हिन्दू धर्म शास्त्रों में यज्ञ का बहुत महत्व हैं। हमारे मन में यह प्रश्न उठना स्वामाविक है कि आखिर यज्ञ का विधान क्यों किया गया ? मनुस्मृति में यज्ञ के उद्देश्यो को बेहतर तरीके से समझाया गया है। उसमें उल्लेख है कि यज्ञ से मनुष्य की आत्मा शुद्ध होकर उसके चीर सेवित कुसंस्कार नष्ट हो जाते हैं. मनुष्य के मनोविकार घटते हैं। ब्रह्मतेज मे वृद्धि होती हैं, अच्छे विचारों का उदय होकर भगवान की प्राप्ति सुगम हो जाती हैं। यज्ञ के द्वारा अनेक कामनाओं की पूर्ति होती है जिनमें मुख्य लाभ आत्म कल्याण हैं। इस प्रकार यज्ञ से निश्चित रूप से शान्ति दायक शुभ सदगति होती हैं। धर्म शास्त्रों में उललेख है- अग्नौत्रास्ताहुतिः सम्यगादित्य मुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वष्टेरन ततः प्रजा।। अर्थात अग्नि मे डाली हुई आहूति सुर्य की किरणों में उपस्थित होती है उनके संसर्ग से अन्तरिक्ष में इस प्रकार का अनुकूल वातावरण बन जाता है जिससे बादलों का संग्रह होने लगता है और वे समय पाकर धरती पर बरसते है। उस वर्ष से अन्न, औषधि, वनस्पति, लता, फूल-फल आदि विविध वनस्पतियां मानव व प्राणी मात्र हेतु उत्पन्न होते हैं। कवि भीम पाण्डिया के शब्दों में- हवण लोक परलोक सुधारे सुखदाई संपै संसार, परियावरण हुवै घण निरमल सुध-बुध ही जीवणरौ सार। गाय के शुद्ध घी एवं धूप गुगल आदि सुगन्धित पदार्थों से विधि विधान पूर्वक किये जाने वाले यज्ञ से वायु मण्डल शुद्ध होता है. तथा वायुमण्डल में मौजूद प्रदुषित विषेली गैसों का दुष्प्रभाव नष्ट होता है। जिसका धरती के सभी जीव धारियों को प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। अब तो भौतिक विज्ञान द्वारा यह सिद्ध किया जा चुका है, कि यज्ञ से वायुमण्डल में हवन सामग्री के धूएं के जो अणु फैलते हैं उनमें निगेटिव चार्ज के विद्युत आवेश प्रवेश कर जाते हैं। ये अणु वायुमण्डल में मौजूद नमी को खींच लेते हैं, और इस प्रकार धीरे-धीरे इनके आस-पास बादल के खण्ड बन जाते हैं। ये बादल यज्ञीय धुम्र अणुओं से ओत-प्रोत रहते हैं। इनका विषैला अंश नष्ट हो जाता है। ऐसी दृष्टि में केवल मनुष्य ही नहीं सारे प्राणी मात्र वनस्पति और मिट्टी में भी सात्विक भावों का संचार हो जाता है। मुण्डकोपनिषद में कहा गया है जो व्यक्ति शास्त्र विधि से नित्य प्रति यज्ञ में आहुति देता है उसे मरण काल में अपने साथ लेकर ये आहुतिया सूर्य की किरणें बनकर वहां पहुंचा 86 गाय कहूँ या तुझको को माय - कवि मैथिली शरण गुप्त देती है, जहा देवताओं के स्वामी इन्द्र निवास करते हैं। तात्पर्य यह कि अग्निहोत्र स्वर्ग के सुखों की प्राप्ति का अमोघ उपाय है। गुरू जम्भेश्वर भगवान ने अपने शब्द में कहा- जा दिन तेरे होम न जप न तप न क्रिया, जाण के भागी कपिला गाई। अर्थात हे मनुष्य। जिस दिन तेरे घर मे यज्ञ, जप, तप आदि धार्मिक क्रियाएं नहीं हो तो तूं समझना की तेरी बुद्धि रूपी कपिला गाय भाग गई अर्थात तेरा जीवन निष्फल है। कात्यायन स्मृति में उल्लेख है कि जो मनुष्य कर्म में स्थित हो कर एक दिन भी पवित्र हो कर अग्नि की सेवा करता है वह उस समय से एक सौ दिन तक स्वर्ग के सुख भोगता है। गीता जी के तीसरे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण स्वयं अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते है- अन्नाद्भवन्ति भूतानि पुर्जन्यादन्न सम्भव । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ. कर्म समुद्भवः ।।4 || श्री मद्भागवतगीता ।। अर्थात सम्पूर्ण प्राणी अन्न से पोषित होते हैं और वर्षा से अन्न पैदा होता हैं, यज्ञ से वर्षा होती हैं। कर्मों से यज्ञ उत्पन्न होता है कर्म वेद से उत्पन्न होता है तथा वेद परमात्मा से प्रकट होते हैं। परमात्मा सर्वत्र यज्ञ मे विद्यमान हैं। अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्नोई समा के बढ़ते कदम वन एव वन्य जीवों के संरक्षण मे बीकानेर जिले के विश्नोई समाज की उल्लेखनीय भूमिका रही है। वैसे तो समाज का हर युवा इनके सरक्षण के प्रति सजग है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी है जो वन एवं वन्य जीवों की सुरक्षार्थ निरन्तर सक्रिय रहते हैं। शिकार अपराधियों के विरूद्ध इनके द्वारा छेडी गई मुहिम लगातार जारी है। जय भी कोई वन अपराध घटित होता है तो वे लोग दोषी शिकारियों को कानूनन पकडवाने हेतु सक्रिय हो जाते हैं और घटित वारदात की पूरी तहकीकात कर दोषी लोगों को कानून की परिधि में लाने हेतु प्राण-प्रण से जुट जाते हैं और तब तक नहीं रूकते जब तक अपराधी शिकारी सप्रमाण पुलिस की गिरफ्त में न आ जाय। इस प्रकार निःस्वार्थ व समर्पित भाव से वन्य जीवों की सुरक्षा हेतु जिले सभी तहसीलों में कार्यकर्ता सक्रिय है। तहसील स्तर पर शिकारियों के विरूद्ध सचालित अभियान में जिला स्तर पर कार्यकारिणी नहीं होने से कुछ कठिनाईयां आ रही थी। सम्बधित पुलिस थाना से लेकर मुन्सिफ कोर्ट तक ही कार्यवाही सम्भव हो पा रही थी सेशन कोर्ट में केश जाते ही शिकारियों की जमानत हो जाती थी। जिला प्रशासनिक स्तर पर सुनवायी नही होती थी। पुर्व जिलाध्यक्ष स्व श्री शकरलाल सिवर के निधन के बाद जिलाध्यक्ष पद भी रिक्त हो गया। तब विश्नोई समाज के गणमान्य लोगों और बुद्धिजीवियों ने दिनांक 12206 को विश्नोई धर्मशाला बीकानेर में एक निटिग बुलायी। तथा अ. मा. जीव रक्षा विश्नोई.समा की जिता कार्यकारिणी का गठन किया। जिसमें सर्वसम्मति से (सेवानिवृत पुलिस उप अधीक्षक) श्री 87 पोलीथीन भगाओ, गाय बचाओ। बीरबलराम धारणियां को अध्यक्ष. श्री शिवराज जाखड़ को उपाध्यक्ष श्री डॉ. कृष्णलाल विश्नोई को कोषाध्यक्ष, रामकिशन डेलू को महासचिव नियुक्त किया गया। इसके अलावा तहसील स्तर पर बीकानेर अध्यक्ष श्री मोखराम धारणियां, लूणकरणसर अध्यक्ष श्री धुकलराम भादू, नोखा अध्यक्ष श्री महीराम दिलाईया, श्रीकोलायत अध्यक्ष श्री ईमीलाल नैण, खाजूवाला अध्यक्ष रामकिशन डेलू को चुना गया। इसके अलावा पचायत स्तर पर भी सभा की ईकाइयां गठित करने का निर्णय लिया गया। जिसके अनुरूप जिलाध्यक्ष श्री धारणियां ने जन्माष्टमी के दिन खाजूवाला पहुंचकर वहां की 16 पचायतों के प्रभारियों की नियुक्ति की गई। जिनमे खाजूवाला पंचायत के प्रभारी रामकिशन डेलू, 2 केएलडी के श्री बद्रीराम खदाय, 2 कालुबाला श्री इन्द्रजीत पंवार, 22 केवाईडी श्री लाजपत थोरी, 14 बीडी श्री रामकुमार पूनियां, सांभरदा श्री हरचन्द माल, 8 कैवाईडी श्री पृथ्वीराज धारणियां, 34 केवाइडी श्री सतपाल भादू, गुल्लुवाली श्री मनीराम सिंवर, 3 पावली श्री सुदेशकुमार रोहज, सियासर चौगान श्री ओमप्रकाश गोदारा, 17 केवाईडी श्री फरसाराम बोला. कुण्डल श्री हनुमान खीचड को नियुक्त किया गया। नव नियुक्त सभा अध्यक्ष श्री बीरबलराम धारणियां को वन एवं वन्य जीवों की सुरक्षा हेतु अनेक प्रकार के प्रयास करने होगें। इस क्षेत्र में आने वाली संम्भावित चुनोतियों से निपटने हेतु जिले के सभी पर्यावरण प्रेमियो को एक जुट होकर इन्हे सहयोग प्रदान करना होगा। जिलाध्यक्ष ने भविष्य की चुनौतियो से पार पाने के लिए कई योजनाएं बनायी है जिन्हे सभी लोगों की सहमति से ही क्रियान्वित किया जा सकता है। सभा की भावी योजनाएं इस प्रकार हैं:- 1. वन एवं वन्य जीयो की सुरक्षा के लिए हर समाज के लोगों को जोड़ा जायेगा। 2. सदस्यता अभियान गाव-गाव में चलाकर अधिकाधिक लोगों को इस मिशन में शामिल किया जायेगा। 3. अदालतों में विचाराधीन तमाम शिकार प्रकरणों की फाईले निकलवाकर विद्वान वकीलों द्वारा उचित समीक्षा करायी जायेगी। 4. वर्ष में एकबार जिला स्तर पर जीवरक्षा सम्मेलन आयोजन किया जायेगा। 5. कोर्ट में लम्बित शिकार केशों की पैरवी हेतु वकील नियुक्त किये जायेगें। प्रतिवर्ष इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले अधितम 11 लोगों को सम्मानित किया जायेगा। 6 वर्ष में एक बार आय व्यय लेखा जोखा प्रस्तुत किया जायेगा। 7. उपरोक्त गतिविधियों के संचालन हेतु आवश्यक फड राशि एकत्रित की जायेगी। लूणकरणसर जीव रक्षा विश्नोई सभा की गतिविधियां खाजूवाला की तरह लूणकरणसर समा की ईकाई भी वन एवं वन्य जीवों की सुरक्षार्थ प्रयत्नशील हैं। इस इकाई के अध्यक्ष श्री धुकलराम भादू, सचिव एडवोकेट रामसिह सिहाग, काकडवाला के भूतपूर्व सरपच श्री कालुराम जयाणी, पीपुल फॉर एनीमल्स के प्रभारी श्री | यदि हम गौओं की रक्षा करेगें तो गौएँ हमारी रक्षा करेगी - पं.मालवीय / 88 बनवारीलाल कडवासरा, एडवोकेट हसराज गोदारा, श्री रामस्वरूप पूनियां, प्रेम गोदारी, श्री ओमप्रकाश. श्री मनीराम नाई. श्री सतपाल गोदारा, आदि कार्यकर्ता इस हेतु प्रयासरत हैं। इसके अलावा अवैध पेड़ कटाई को रोकने तथा बेसहारा घायल एवं बिमार पशु पक्षियों के ईलाज में सभा कार्यकर्ताओं ने कई पशु पक्षियों को बीकानेर ले जाकर उनका निस्वार्थ भाव से ईलाज करवाया। उनके द्वारा सेवा भाव से किये जा रहे उक्त प्रयास प्रशसनीय है इसके अलावा इस क्षेत्र मे वन्य जीवों के शिकार से सम्बंधित घटित घटनाएं इस प्रकार हैं:- दिनाक 15 1204 को कालु गाँव की रोही मे 5 हरिणो का शिकार होने पर ग्राम वासियों के सहयोग से लूणकरणसर थाना प्रभारी श्री भूपेन्द्रसिंह, हवलदार श्री मनीराम विश्नोई, राजेश, रतनलाल व मनीराम ने लगभग 10 किमी तक शिकारियो का पीछाकर मारे गये 5 हरिणो की खाल व वन्दुक बरामद की तथा मन्साराम, करणाराम नामक शिकारियो को नामजद किया। इस आशय का मुकदमा 316/4 वजरगलाल ब्राम्हण नि कालू ने दर्ज 1 करवाया। 2 3 4 दिनाक 4305 को भिखनेरा की रोही में लाधू, शंकर यावरी, बशीरखाँ व राँझेखा द्वारा मिलकर चिकारा हरिण मारने पर राजेन्द्रसिह राजपूत की तरफ से शिकारियों के खिलाफ लूणकरणसर थाने में मुकदमा सं 09/5 दर्ज करवाया गया। दिनांक 10 405 को ढाणी भोपालाराम क्षेत्र मे पृथ्वी व नोपा बावरी द्वारा बन्दूक से दो हरिण व तीतर का शिकार करने पर श्री रामेश्वरलाल ब्राम्हण व श्री सहीराम जाट ने उनका साहस पूर्ण पीछाकर पृथ्वी बावरी को पकड लिया, तथा शिकार में प्रयुक्त ऊँट गाडा, बन्दूक व छूरी और मृत हरिण बरामद करवाया। श्री धुंकलराम भादू ने इस आशय का मुकदमा स 59/05 दर्ज करवाया। दिनाक 13 405 को ढाणी भोपालाराम क्षेत्र में मगननाथ व आणदनाथ द्वारा 1 खरगोश व झाऊ चूहे का शिकार करने पर जीवणराम ब्राम्हण व बालुराम ने लूणकरणसर थाने में मुदकदमा सं. 63/5 दर्ज करवाकर मारे गये जानवर बरामद करवाये। दिनाक 136 05 को रावासर की रोही मे हरिणो के शिकार की सूचना मिलने पर थाना प्रभारी श्री राजेन्द्र भादू, हवलदार श्री मनीराम गिला एवं ग्रामीणो ने तुरन्त मौक पर जाकर शिकारियों का पीछा किया। घटनास्थल पर दो मारे गये हरिण एक ऊँटनी मिली व बन्दूक जब्त की गई। दिनाक 28.1005 को हरचन्द नाथ व सवाईनाथ द्वारा एक लोमडी का शिकार करने पर श्री ओमप्रकाश ब्राम्हण नि. बामनवाली ने इस अपराध का मुकदमा स 23/5 लूणकरणसर थाने में दर्ज करवाया एव लोमडी बरामद करवाकर शिकारी को पकडवाया। उपरोक्त शिकार प्रकरणों में शिकारियों की धरपकड एव बरामदगी में लूणकरणसर पुलिस की सकारात्मक भूमिका रही। इतना ही नहीं लूणकरणसर पुलिस ने स्वय अपने प्रयास से गौ वंश तस्करों को कानून के शिकजे में कैद किया। 5 6 - यन्त्र मन में चेतलता जगाता है .Civs सामवेद दिनाक 23206 को थाना लूणकरणसर के हयतदार श्री मनीराम विश्नोई ने अर्जनसर चौराहे पर एक ट्रक पका। जिसमें 2 बड़े पेल बेहद कष्ट पुर्ण हालात मैं तुरा तुस कर भरे हुए थे। उन्हें युघट खाने में कटने हेतु ले जारहे गौ तस्कर अमीर खा व औशक अती निवासी सतला (उप्र) को गरमगार, कर बना पशुओं को महाजन गौशाला के सुपुर्द किया गया तथा दोषियों के खिलाफ राजस्थान गोपीय अधिनियम के तहत मुकदमा न 12/06 दर्ज किया। 2 दिनांक 137.06 को दुलमेरा के पास एक मिनी ट्रक में भर कर इसी प्रकार यातना पुर्ण हालात ले जा रहे दस बण्डो को गौ तस्कर शमशेर पवशी निवासी श्री गगानगर को लुगकरणसर थाने के हवलदार श्री मनीराम विश्नोई ने पकडकर उनके खिलाफ मुकदमा नं 145/00 दर्ज करवाया और बछडों को बजरग गौशाला लुणकरणसर के सुपुर्द करवाया गया। कार्यवाही में मेनपाल कुम्हार य काशी राम करया ने भी सहयोग दिया। बीकानेर शहर इकाई की गतिविधियां बीकानेर शहर एव देहात क्षेत्र में घटित होने वाली दुर्घटनाओं में पायल पशु व पक्षी जिनका कोई भणी पोरी नहीं होता। ऐसे लाचार और दयनीय हालात के शिकार जानवर इलाज हेतु प्राय बीकानेर आते रहते है। इसके अलावा शिकार प्रभावित क्षेत्रों से आनेवाले चोटिल हरिण, खरगोश, नीलगाय व मोर आदि वन्य जीवों के इलाज और रख रखाव हेतु बीकानेर तहसील के अध्यक्ष श्री मोखराम धारणियां के सफल नेतृत्व में उनकी टीम के सहयोगी युवा एडवोकेट श्री सुनील पुनिया देसलसर, एडवोकेट श्री लक्ष्मण खिचड मन्याला, एडवोकेट हेतराम खिचड जै. मगरा, ऐडवोकेट घनश्याम खिचड़ बन्धाला.ऐस्वोकेट मनीराम सिगड़ रासीसर, एडयोकेट राजकुमार पूनियां देसलसर, सभा के उपाध्यक्ष श्री जसवंत सिगड़ व श्री शिवलाल सिगड़ रासीसर, श्री भवरलाल सारण भोजासर, श्री चम्पालाल कालीराणा सतरण, श्री मनीराम गोदारा जेगळा, श्री रामगोपाल खीचड़ जे. मगरा, श्री जयप्रकाश भाम्भू खारा, श्री जयप्रकाश पूनियां जेगळा. श्री अवण तरड जसरासर, श्री हनुमान देहरू सलूडियां, श्री बाबूलाल धारणियां, सावतसर, श्री रामकिशन पूनियां देसलसर. श्री बाबूलाल माम्भू खारा, श्री रामकृष्ण तरड़ जसरासर. श्री सुनील माम्भू खारा, श्री गोकलराम खीचड ज.मगरा, समा सचिव श्री गोपीराम पूनियां जेगळा, प्रचार मत्री श्री घनश्याम खदाव जेगळा. एडवोकेट श्री हसराज डेलू बीकानेर, श्री शुभकरण डेलू काकड़ा, श्री रामरतन डेलू काकड़ा. श्री हनुमान सेन बीकानेर, श्री रमेश गोदारा जेगळा. श्री किसन पूनियां जेगळा, पशु क्रूरता निवारण समिति बीकानेर के सचिव श्री मांगीलाल भादू जेगळा, श्री बाबूलाल लेधा कुचोर, श्री हनुमान बेनीवाल धक विजयसिहपुरा श्री राधाकिशन सीचड़ मोडायत, श्री पवन सारस्वत मालासर, श्री जगदीश धारण देशनोक, श्री प्रभूगर स्वामी व यशपाल शर्मा बीकानेर ! उपरोक्त युवाओं की सगठितम निस्वार्थ भाव से बेसहारा घायल एवं विमार पशु 90 हवन को कर हेत्, दुवध सब दूर भगाओ - संत विल्होजी पक्षियो के ईलाज एवं उनके प्रति क्रूरता को रोकने हेतु एव जीव रक्षा समा की अन्य गतिविधियों में विशेष तौर पर सक्रिय रहती है। समा इस प्रकार दीन हीन पशु पक्षियों की चिकित्सा एव सेवा हेतु ऐसे अधिक से अधिक युवाओं को जोड़ना चाहती हैं। अत किसी भी जाति अथवा धर्म को मानने वाले शाकाहारी लोग इस टीम के साथ जुड़ सकते हैं। इसके अलावा विश्नोई धर्मशाला बीकानेर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री लेखराम धायल एव प्रवध कार्यकारिणी के तमाम सदस्य जीव रक्षा विश्नोई सभा के सहयोग हेतु सदैव तत्पर रहते है। सभा का मुख्यालय भी विश्नोई धर्मशाला परिसर में ही स्थित हैं। सभा की नोखा की इकाई के श्री महिराम दिलोइया व अखिल भारतीय विश्नोई महा सभा के कार्यकर्ता एव अखिल भारतीय जम्भेश्वर सेवक दल के सदस्य नोखा क्षेत्र में अवैध शिकार की रोकथाम हेतु विशेषतया प्रयत्नशील है। इसी तरह रज्जू के श्री महीराम बेनीवाल व कोलायत तहसील क्षेत्र में सभा अध्यक्ष श्री ईमीलाल नैण एडयोकेट हसराज डेलू व अर्जुनराम बैनीवाल नि चक विजयसिहपुरा, श्री हरीराम धायल ठेकेदार आदि कार्यकर्ता इस क्षेत्र में प्रयासरत हैं। जीव रक्षा विश्नोई समा खाजूवाला परिचय नहरी विकास के साथ साथ जेंसे-2 खाजूवाला उपखण्ड मे कृषि क्षेत्र बढा वहाँ पर मौजूद हरिण आदि वन्य प्राणियो पर सकट के बादल मडराने शुरू हो गये। पूर्व में कभी कभार होने वाली शिकार की घटनाओं में चिता जनक ढग से वृद्धि होने लगी। ऐसी विषम परिस्थिति मे वन्य जीवो के शिकार की घटनाओं की रोकथात हेतु सन् 1989 मे “जीव रक्षा विश्नोई सभा खाजूवाला" का गठन किया गया। इस संगठन के अध्यक्ष श्री रामकिशन डेलू बने। वन एव वन्य जीवो के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं की सभा के उद्देश्यों के प्रति निष्ठा भाव से प्रभावित होकर सगठन से लोग लगातार जुडते गये और सगठन भरपुर उत्साह से इस क्षेत्र में काम करता गया। इस प्रकार विगत 17 वर्षो मे सभा ने क्षेत्र में घटित हुई तमाम शिकार की घटनाओ में दोषी (शिकारियों) के विरूद्ध सक्रिय होकर अहम भूमिका निभाई। सभा ने अपने प्रयासो से वन्य जीव शिकारियो के खिलाफ लगभग 100 से अधिक मुकदमें सबधित थानो मे दर्ज करवाकर शिकारियो की करतूतो को येनकाव किया। उन दर्ज होने वाले सभी मुकदमो मे दोपीयो के खिलाफ घटनास्थल पर पहुंचकर पुलिस जाँघ व अपराधियों की गिरफ्तारी मे सभा अध्यक्ष ने सक्रिय सहयोग किया तथा घायल वन्य प्राणियो को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई। इस लम्बे सघर्ष पुर्ण अभियान के दौरान, सभा कार्यकर्ताओ ने निडरता पूर्वक शिकारियो से जॅझते हुए जिस दृढ अटुट निष्ठा एव त्याग का परिचय दिया उसकी मिशाल अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। वैसे तो पूगल, खाजूवाला, छतरगढ व दन्तौर आदि क्षेत्रों मे इस पुस्तक के लेखक एव सभा अध्यक्ष रामकिशन डेलू के सफल नेतृत्व में सभा कार्यकर्ताओ द्वारा वन्य प्राणियों के शिकारियों के विरूद्ध किये गये सघर्ष की दास्ता इतनी (निःस्वार्थ भाव से की गई सेवा ही सच्ची सेवा है। 91 विस्तृत है कि उन सस्मरणों को शब्दों मे पिरोना सहज नहीं है अत. पूर्व में घटित घटनाओ को सक्षिप्त में पाठकों की जानकारी हेतु इस पुस्तक में प्रस्तुत किया जा रहा हैं। जो इस प्रकार हैं:- 1 2. 3 4 5 दिनांक 2687 को चक 4 के.जे.डी. में ट्रेक्टर पर सवार होकर यन्दूक से हरिण का शिकार करने वाले केसरा, नन्दराम, काशी व नत्थू बावरी को पुलिस थाना खाजूवाला को पकड़वाकर उनसे मारा गया हरिण व बन्दूक बरामद करवाई। दिनाक 16 1088 को चक 24 के.जे.डी. मे हाकमखा व देवीलाल जाट द्वारा बन्दूक से हरिण का शिकार करने पर खाजूवाला पुलिस को मौके पर लेजाकर कारतूस की डार व मारे गये हरिण की खून आलुदा मिटटी जप्त करवाई। दिनांक 16.1091 को चक 12 बी.एलडी. मे कुडके से हरिण का शिकार करने वाले दोषी देवाराम व महिराम बावरी और कासम खा मुस्लमान के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाकर मारा गया हरिण पूगल पुलिस को बरामद करवाया। दिनांक 11292 को चक 10 डी.के डी. मे हरिणों को मारने वाले मोहम्मद लवाणा व उसके भाई के खिलाफ मुकदमा छतरगढ थाने में मुकदमा दर्ज करवाकर मौका मुआयना करवाया। घटनास्थल पर से खून आलुदा मिल्टी व शिकारियों की जीप के टायरो के निशान दिखाये। दिनाक 31,1092 को बोडसिह निवासी चक 2 के.जे.डी. द्वारा हरिण का शिकार करने पर मौके पर से खाजूवाला पुलिस को लेजाकर मारा गया हरिण बरामद करवाया। दिनाक 17.92 को चक 3 के.जे.डी. में हरिण को मारने वाले राजसिंह. निर्मलसिंह, जगबीरसिह को मौके पर खाजूवाला पुलिस लेजाकर मय हरिण व शिकार मे प्रयुक्त ट्रेक्टर न. आर आर क्यू 6563 जब्त करवाया। दिनाक 18.293 को चक 4 ए.डी एम. में लोहे के शिकजे में फांसकर हरिण मारने वाले दातार सिह, रणजीतसिंह निवासी 2 एडीएम को खाजूवाला पुलिस के सुपुर्द करवाकर मारा गया हरिण बरामद करवाया। दिनाक 8893 को चक 31 के.जे.डी. के निवासी सोहनसिह, नायबसिह, भोजा, मोहन नायक व पूनम मेघवाल द्वारा मिलकर हरिण का शिकार करने पर खाजूवाला पुलिस को घटनास्थल पर लेजाकर हरिण की खाल बरामद करवाई। दिनाक 9993 को चक 4 बी.आर.डब्ल्यूएम. में बन्दूक से हरिण का शिकार करने पर फूसाराम जाट, कालू, बलवीर व पालाराम के खिलाफ खाजूवाला थाने में कार्यवाही कर मृत हरिण बरामद करवाया। दिनाक 26.2.94 को चक 18 के.जे.डी. में हरिण मारने वाले नानक व गजन बावरी 6 7. 9 10.
92 11 12 करवाया। 13. 14 जीव धारियों को सताने वाले के दुःख, वैर और संताप नही मिटते । के विरूद्ध खाजूवाला थाने में केस दर्ज करवाकर ए.एस आई बूटासिह को घटनास्थल पर मौका मुआयना करवाया व मौके पर खून आलुदा मिटटी जब्त करवाई। दिनांक 23894 को चक 2 एन.जी.एम. की रोही में ऊंट गाड़े पर वन्य प्राणियों के शिकार की टोह में विचरण कर रहे पेशेवर शिकारी लिछमण, सुरजा, ईश्वर, चेतन, धन्ना व शिली को मौके पर पूगल पुलिस को लेजाकर पकड़वाया व उनके द्वारा मारे गये 11 साडे, एक हरिण, 4 गोफाट (पाटा गोह) बारह कुड़के व ऊंट गाड़ा जब्त करवाया। दिनाक 3 12 94 को चक 1 जी डब्ल्यू एम में कुडके में फसाकर हरिण मारने वाले सोहन बावरी को खाजूवाला पुलिस से पकड़वाकर मारा गया हरिण बरामद दिनाक 25895 को चक 2 डी.के.डी मे बदूक से हरिण मारने वाले शम्मू खां, भादे खां, सूरे खां व आदराम मेघवाल निवासी 3 डीकेडी के खिलाफ छतरगढ थाने में अभियोग दर्ज करवाकर घटनास्थल का मुआयना करवाया। दिनाक 5 10 95 को चक 2 जी.डब्ल्यूएम में बोदूराम बावरी, सोहन बावरी व हजारी द्वारा हरिण मार-काटकर लेकर भागते हुए बोदूराम बावरी से हरिण का मास के टुकड़े छीनकर खाजूवाला पुलिस थाने में बरामद करवाये। एवं मांस काटने की धुरी भी जब्त करवाई। दिनाक 18 1.96 को चक 2 बी आर.डब्ल्यू एम मे बलवीर बावरी, बोदूराम बावरी व हजारी द्वारा कुडके मे जकडे तडफते हुए हरिण को मौके पर खाजूवाला पुलिस लेजाकर बरामद करवाया। दिनांक 20.2.96 को चक 13 के.जे.डी. स्थित अपने खेत में लगाये हुए कुडके को उखाडकर भागे हरिण का पीछा कर मारने वाले नन्दलाल व छगन ओड को खाजूवाला पुलिस को घटनास्थल पर लेजाकर पकडवाया। दिनाक 3596 को माधोडिग्गी क्षेत्र में कुडके मे फंसाकर हरिण मारने वाले जोगाराम व मोटाराम के खिलाफ केस दर्ज करवाकर घटनास्थल से खाजूवाला पुलिस को मारा गया हरिण वरामद करवाया। दिनांक 5.3 97 को सिसाडा पोस्ट वाच टावर के पास बी एस एफ के जवानों एवं कालूसिह द्वारा जीप में सवार होकर रात्रि को बदूक से हरिण का शिकार करने पर खाजूवाला पुलिस को घटनास्थल पर लेजाकर सरसो के पौधो में जगह-जगह बिखरा खून जीप के टायरों के निशान व जवानो के पद चिन्ह दिखाये। दिनाक 29 497 को चक 2 के एल डी में कुडके में फसाकर हरिण मारने वाले कर्मसिंह बावरी को हरिण के मृताग सहित पूगल पुलिस के ए.एसआई मल्लूराम 15 16. 17. 18. 19.
93 20. 22 23. 24 मूक पशुओं के प्रति हो रही क्रूरता को रोकें - श्रीमती मेनका को मौके पर लेजाकर गिरफ्तार करवाया तथा हरिण के मृतांग व कुड़का जब्त करवाया। दिनांक 29 497 को चक 1 एडी.एम. में जीप संख्या यूटीएक्स 6253 से पीछा कर हरिण मारने वाले रामलाल ओड. को पूगल थाने के सी आई शायरसिह के सुपुर्द कर मारा गया हरिण बरामद करवाया। 21. दिनांक 26 597 को चक 2 एमडब्ल्यू एम. के वावरी शिकारी के काश्तशुदा खेत में पूगल पुलिस को लेजाकर शिकारी द्वारा भूमि में गाड़ा हुआ हरिण का पकाया हुआ मांस बरामद करवाया। दिनाक 3797 को चक 2 बी एल.डी. मे शंकर मेघवाल द्वारा बंदूक से मारे गये हरिण के मृतांग काटी हुई अवस्था में पूगल थाना प्रभारी शायर सिंह को घटनास्थल पर लेजाकर बरामद करवाये व शिकारी शंकर को गिरफ्तार करवाया। दिनांक 31897 को के.जे.डी. नहर के पास रावला रोड़ पर किसी अज्ञात शिकारी द्वारा बोरी में यद दो हरिणों के शव चलती गाड़ी से फैकी अवस्था में खाजूवाला पुलिस को लेजाकर बरामद करवाया व इस आशय का केस दर्ज करवाया। दिनांक 5 1.98 को पाक सीमावर्ती सिसाड़ा पोस्ट क्षेत्र में पेशेवर शिकारी सुल्तान नायक व उसके आठ अन्य सहयोगियो द्वारा जगली सुअर को घेरकर भालो से मारने पर खाजूवाला पुलिस को लेजाकर मारा गया सुअर व शिकारियो का फोर्ड ट्रेक्टर जब्त करवाया। दिनाक 16.2.98 को चक 4 एस डब्ल्यूएम. में श्रवण बावरी द्वारा कुडके में फसाकर मारा गया हरिण मौके पर पूगल पुलिस को लेजाकर बरामद करवाया। 26. दिनांक 3898 को चक 2 एस एस एम. मे पेशेवर शिकारी देसराज, भगवाना, लाला, मंगला व छिन्दा बावरियों द्वारा बन्दूक से हरिण मारने पर मौके पर खाजूवाला पुलिस लेजाकर शिकार में प्रयुक्त ट्रेक्टर जब्त करवाया। व मृत हरिण का भूमि पर गिरी खून आलुदा मिटटी जब्त करवाई। दिनांक 248.98 को चक 5 केएल डी. में हरिण का शिकार करने वाले सुगना बावरी व उसके सहयोगी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की। दिनाक 18 1098 को श्री जम्भेश्वर भगवान मदिर खाजूवाला परिसर में श्रद्धालुओं द्वारा बिखेरे चुग्गे को चुगते कबुतरो को गुलेल से मारने वाले शिकारी विजेन्द्र व पप्पू साटिया के खिलाफ खाजूवाला थाना में केस दर्ज करवाकर शिकारियो को कबूतर सहित पकडवाया। दिनाक 12.12 98 को चक 4 के जे.डी. में कुडकों मे फासकर हरिण मारने वाले पेशेवर शिकारी पालसिह बावरी को भागते हुए पुलिस थाना खाजूवाला से पकड़वाकर मारे गये हरिण के मृतांग, तख्ता, छुरी आदि जब्त करवाये। 25 27. 28. 29 94 30 31 32 33 | वन्य जीवों की सुरक्षा-मानव मात्र का कर्तव्य -जीव रक्षा विश्नोई सभा दिनाक 25 12 98 को पाक सीमावर्ती पवनी पोस्ट क्षेत्र में नोखा ठाकुर कुशाल सिंह द्वारा स्थानीय किसानों के विरोध के बावजूद जबरदस्ती वन्य जीवों को शिकार करने पर वहा जाकर स्थिति की तहकीकात कर जिला प्रशासन को लिखित शिकायत की गई। दिनाक 27 199 को नोखा ठाकुर के पुत्र व चौथिये (काश्तकार) पप्पू व अमीर ने शिकार करने का तरीका बदलते हुए खेतों मे कुड़के लगाये एक कुडके में फसा एक हरिण मरने पर खाजूवाला पुलिस को मौके पर लेजाकर वहां मौजूद पप्पू व अमीर बावरी को पकडवाकर हरिण बरामद करवाया। पुलिस थाना प्रभारी पृथ्वीसिह द्वारा दोषी का नाजायज पक्ष लेने पर विरोधस्वरूप जन आन्दोलन के तहत हजारों वन्य जीव प्रेमियों को इकटठा कर खाजूवाला मण्डी में 31 जनवरी को उग्र प्रदर्शन कर थाने का घेराव करने के बाद नोखा ठाकुर की शिकारी गतिविधियां बद हो पाई। दिनाक 31199 को 14 के जे.डी. बी में किसी अज्ञात शिकारी की गोली से मृत पाये गये हरिण की शिकायत पर खाजूवाला पुलिस को मौके पर लेजाकर जांच के दौरान मृत हरिण बरामद करवाया। दिनाक 126 98 को कश्मीरा सिह सिख निवासी पजावा (पजाब) द्वारा हरिण मारने पर मौके पर मारा गया हरिण देशनोक पुलिस से बरामद करवाकर सभा अध्यक्ष के भाई रामनिवास डेलू द्वारा पकड़वाया गया व कानूनी कार्यवाही की गई। दिनाक 2299 को गोविन्दराम व हरजीराम बावरी द्वारा चक 6 एम एम (पूगल) मे बदूक से हरिण मारने पर पूगल पुलिस को मौके पर लेजाकर मारे गये हरिण के मृताग बरामद करवाये गये। दिनाक 6 399 को शौकिया शिकारी दीदार सिह मजहबी, जगजीत सिह व अग्रेज सिह जटसिख और मेजरसिह रायसिख द्वारा चक 3 बी वाई एम. की रोही में जीपो से हरिणो का पीछा कर बदूको से मारने पर खाजूवाला पुलिस को मौके पर लेजाकर उक्त शिकारियो को गिरफ्तार करवाकर शिकार में प्रयुक्त जीप व ट्रेक्टर जब्त करवाये। सबूत मिटाने हेतु खेतो में जगह जगह गाडकर छिपाये हुए हरिणों के मृतावशेष समा कार्यकर्ताओं की मदद से दूढ ढूढकर खाजूवाला पुलिस अधिकारी सवाईसिह को जब्त करवाये। दिनाक 6.3.99 को वन्य जीव शिकारियो द्वारा पकडकर बांधा हुआ एक बदर चक 3 बी.वाई एम. मे खाजूवाला पुलिस को बरामद करवाया। दिनांक 8299 को चक 3 एमडब्ल्यू.एम. मे महावीर नाई व विजयसिह राजपूत द्वारा योजना बनाकर खेत की बाड में शिकजेनुमा तार मे फसाकर हरिण मारने पर पूगल पुलिस को मौके पर लेजाकर मारा गया हरिण बरामद करवाया। दिनाक 1399 को भारत पाक सीमावर्ती क्षेत्र खाला पोस्ट पर तैनात भारतीय 34 35 36 37 3a 39 40 यज्ञ सकारात्मक ऊर्जाको प्रवल बनाता है - 95 सीमा सुरक्षा बल के चार जवानों द्वारा सरकारी जीप से पीछा कर अपनी सर्विस राईफलों द्वारा तीन हरिणों का शिकार करने पर पूगल थाने में केस दर्ज करवाया एवं पुलिस को मौके पर लेजाकर यारदात की पुष्टि करवाई। दिनांक 19499 को कुण्डल गांव से बाहर डेरा डाले 6-7 घुमतु जोगी जाति के लोगों द्वारा भाले से हरिण मारने पर मौके पर शिकारियों से मुठभेड़ में घायल हुए हनुमान गोदारा की शिकायत पर खाजूवाला पुलिस लेजाकर दोषियों को गिरफ्तार करवाया। दिनांक 15699 को चक 27 बी.डी के कश्मीर, मलकीत बावरी ने खरगोश का शिकार किया समा कार्यकर्ता राजेश गोदारा द्वारा पीछाकर कर खरगोश सहित पकड़ने पर गांव वालो ने उससे शिकारी को छुड़वा दिया और शिकारी ने उल्टे राजेश के विरुद्ध प्रताड़ना का झूठा केस कर दिया तब सभा ने दखल कर शिकारी के विरूद्ध शिकार का मुकदमा नं 106/99 दर्ज करवाया। 41. दिनांक 21.999 को चक 37 के वाईडी. के छेलू व कश्मीर यावरी द्वारा दो हरिणों का शिकार करने पर घटनास्थल पर खाजूवाला पुलिस लेजाकर खोजबीन के उपरात शिकारियों के खेत में दो अलग-अलग खडडों में मारकर छुपाये दो हरिणों व तीन लोहे की छुरिया बरामद करवाई। दिनाक 101299 को चक 5 जे.एम. मे गुलाम नबीखा व गायड़ खा आदि द्वारा ट्रेक्टर से रात को पीछा कर बदूक से हरिणों का शिकार की वारदात पर शिकारियों का पीछा कर मारे गये हरिणों को छीनने में प्रयासरत सुरजाराम डेलू का शिकारियों ने अपहरण कर प्रताड़ित करने के बाद उसके खिलाफ मनगढत झूठा केस दर्ज करवाने का प्रयास करने बज्जू थाना पहुचने पर असलियत को उजागर कर तत्कालीन पुलिस अधीक्षक बीकानेर से दखल करवाकर शिकारियों के विरूद्ध शिकार, अपराध व मारपीट प्रकरण बज्जू थाने में पंजीबद्ध करवाया। दिनाक 92.2000 को चक 8 एस टी एम में कालु व भानी बावरी द्वारा खेतों की रखवाली के बहाने बदूक से हरिण मारने पर छतरगढ पुलिस को लेजाकर मौके पर मारा गया हरिण बरामद करवाया। दिनाक 15 3.2000 को आदूराम नायक निवासी 19 के एल डी द्वारा अपने खेत की सींव में कुड़के मे फासकर एक हरिण मारने पर पूगल पुलिस को घटनास्थल पर लेजाकर शिकारी आदूराम को पकडवाया कुडके मे फसे हरिण की टाग कटकर अलग हुई अवस्था में जब्त करवाई। दिनाक 1442000 को चक 14 डी के डी में हरिण मारने वाले देवीलालं व दलीप बावरी, हनुमान मेघवाल आदि के खिलाफ केस दर्ज करवाकर मारे गये हरिण के मृताग खाजूवाला पुलिस से बरामद करवाये। व मांस काटने की छुरी तथा तख्ता 42 43 44 45 46 47 48 49 उभा धर्म जाण नहीं देस्याँ, जीयां जस मूवां गति लेस्याँ -खेजड़ली वीर | 96 भी जब्त करवाया। दिनाक 117.2000 को चक 29 के.वाई डी मे बलवीर व कृपाल बावरी द्वारा जहरीला दाना डालकर बड़े पैमाने पर मारी गई कमेडियों के अपराध में स्थानीय ग्रामीणो के सहयोग से बलवीर को खाजूवाला थाने में पकडवाया। मौके पर मारी गई चार कमेडिया जब्त करवाई। दिनाक 137.2000 को पुलिस की पूर्व कार्यवाही से बेखबर फरार शिकारी कृपाल बावरी ने हल्के विष से युक्त गेहू के जहरीले दाने पुन खेतों में बिखेर दिये मौके पर खाजूवाला पुलिस को लेजाकर दूसरी बार मारी गई 25 कमेडिया व दो कौए बरामद करवाये। (जब्त मृत पक्षियो के फोटो राजस्थान पत्रिका के 1472000 अक में प्रकाशित) दिनाक 1492000 को चक 18 के जे.डी में मोहन फकीर न कालू भोपा द्वारा गर्दन मरोड़ कर हरिण शावक का वध करने पर खाजूवाला पुलिस के थानेदार श्री हरजिन्द्र सिह व रामेश्वर विश्नोई को साथ लेकर शिकारियो को पकड़वाया और उनके कब्जे से मारा गया हरिण बरामद कराया। मुकदमा न.-219 दिनाक 5.101 को गाव करणीसर भाटियान के भीखसिह राजपूत द्वारा पालने के बहाने हरिण को घर लेजाकर मार देने की सूचना मिलते ही पूगल पुलिस के द्वारा शिकारी के घर मारे गये हरिण के टुकडे बरामद करवाकर शिकारी को पकडवाया। मुकदमा न 07 दिनाक 11.1.01 को चक 15 बी.एल डी. मे खेत की बाड के फदे मे हरिण फास कर शिकार करने वाले कालू नाई. सुल्तान मेघवाल आदि के विरूद्ध कानूनी कार्यवाही कर खून आलूदा मिटटी हरिण के बाल, लोहे के तार का शिकजा बरामद करवाये। मुकदमा नं. 16 दिनाक 27.10.1 को चक 4 डी डब्ल्यूडी मे पालसिह द्वारा लगाये कुडके मे तड़फते हरिण को कालूराम खीचड द्वारा अपनी दुकान मे रख कर इलाज के दौरान मौत हो गई। उसके बाद दुकान में रात को ताले में बंद हरिण को पालसिह शिकारी पक्ष के लोग दुकान तोडकर सबुत मिटाने की नियत से ले गये सूचना मिलने पर पूगल पुलिस से खोजबीन के बाद खिलीया बावरी की दाणी से मारा गया हरिण बरामद करवाया। मुकदमा न. 2 दिनांक 4301 को चक 6 बी एल.डी. के सफी खां, करीम खां व हीरा बावरी द्वारा बदूक से हरिण मारने पर, पूगल पुलिस को मौके पर लेजाकर सफी खां की ढाणी मे काट कर पकाई मादा हरिणी, उसका नवजात मृत बच्चा पिछवाड़े में फंकी अवस्था में तथा छुरी व लकडी का तख्ता भी बरामद करवाये। मौके पर मौजूद शफी खां को पकडवाया। मुकदमा नं. 42 50 51. 52 53 54. 55 शाकाहार और अहिंसा, एक दुसरे के पूरक है। 97 दिनांक 4301 को उसी दिन उपरोक्त केस के मौके मुआयने के दौरान ही बंदूक चलने की आवाज की दिशा मे पुलिस द्वारा जाने से इंकार करने पर सभा कार्यकर्ताओं के सहयोग से ऊंट गाड़े पर भागते तीन जनों को घेरा देकर काफी मशक्कत के बाद उनसे टोपीदार बदूक छीनकर उन्हें 2 किमी दूर शफी खा की ढाणी लाकर वहां पर मौजूद पूगल पुलिस के हवाले किया। मुकदमा नं. 43 दिनाक 24 3.01 को क्षेत्रीय वन अधिकारी दंतौर को लिखित शिकायत करवाकर 11 जनवरी को 15 बी एल.डी. में हरिण के शिकारी सुल्तान मेघवाल की ढाणी की तलाशी लेकर वहां से मारे गये हरिण के सींग, कुडका और दोषी द्वारा 50 किलोग्राम कटीला तार (वन विभाग की नर्सरी से चुराकर छुपाया हुआ) वनपाल हनुमान गोदारा, बख्तावर सिह व बहादुर यूनीयां द्वारा बरामद किया गया तब दोषी सुल्तान की मां ने बरामदगी करने वाली पूरी टीम पर मारपीट व छुआछुत का झूठा केस दायर कर दिया जो बाद में पुलिस जाच में झूठा साबित हुआ । वन विभाग में दर्ज मुकदमा नं. 95/9 दिनाक 15 501 को चक 29 के.वाईडी (बी) में गुरदेव बावरी निवासी 365 हैड द्वारा खरगोश मारने पर शिकारी को सभा कार्यकताओ की मदद से खाजूवाला थाने में मारे गये खरगोश सहित लेजाकर पेश किया। मुकदमा नं 75 दिनाक 31.5 01 को चक 5 जे एम (जगासर) में ट्रेक्टर से रात को पीछा कर हरिण का लाईट की रोशनी में शिकार करने वाले शिकारी सुरेन्द्र व कालू को उडनदस्ता बीकानेर को मौके पर लेजाकर पकड़वाया। मारे गये हरिण की एक टांग कटी अवस्था मे व हरिण काटने का लकड़ी का तख्ता खून से सना बरामद करवाया। मुकदमा धारा 9/51 व 39 के तहत वन विभाग में दर्ज करवाया। दिनाक 20 501 को बलवीर बावरी के लड़कों व जॅवाई द्वारा चक 11 डी.डब्ल्यू डी. में जाल बिछाकर खरगोशो का शिकार करने पर घटनास्थल पर पूगल पुलिस को लेजाकर मारा गया खरगोश व उसे छीनने के प्रयास मे छुटी शिकारी की चद्दर आदि बरामद करवाये ढाणी की तलाशी के दौरान सभी शिकारी फरार पाये गये। मुकदमा न 89 दिनाक 23701 को चक 9 पी.के.डी में लालेखों व रज्जाकखाँ निवासी 11 के.वाई. डी. द्वारा ट्रेक्टर से हरिण का पीछा कर बदूक से शिकार करने पर शिकार में प्रयुक्त ट्रेक्टर सहित मारा गया हरिण बरामद करवाया। मुकदमा नं. 146 दिनांक 22.1201 को पेशेवर शिकारी फतूराम बावरी निवासी सतराना (अनूपगठ) द्वारा सपलिक खाजूवाला क्षेत्र में आकर वन्य जीवों का शिकार कर सतराना जाने वाली बस में रवाना होने की सूचना मिलने पर रावला थाना प्रभारी श्री बाबूलाल बिश्नोई को फोन पर सूचित कर शिकारी को नाकाबदी कर रावला में बस से उतार 56. 57. 58. 59.
60 61 62 63 64 जाम्भोजी को होकम म्हात्रे, रूंख न काटन देवा थाने -तिलवासनी साका 98 कर गिरफ्तार करवाया। मारे गये चिंकारा हरिण अलावा चार जीवित सांडे रावला पुलिस द्वारा शिकारी की तलाशी के दौरान कटटों में से जब्त किये गये। दिनाक 3302 को गिदाराम व पतराम नायक निवासी 14 बी.एल डी द्वारा हरिण का शिकार करने पर पूगल थाने में मुकदमा नं. 19/02 दर्ज करवाया। दिनांक 8302 को पोला, नरसी केसरा मेघवाल और चेलासिंह राजपूत द्वारा मिलकर लोहे की तार के फंदे मे फंसाकर हरिण का शिकार करने पर दोषियो की ढाणी से मारा गया हरिण पूगल पुलिस को बरामद करवाया। मुकदमा न 2 दिनाक 7402 को धक 26 के जे डी. में बंदूक से एक हरिण को मारने वाले जगूराम बावरी को उसकी ढाणी खाजूवाला पुलिस ले जाकर पकडवाया एवं घटनास्थल से शिकारी द्वारा मारा गया हरिण बरामद करवाया। मुकदमा नं 31 दिनाक 22602 को चक 15 के एल.डी मे छोटू नायक व रामूराम द्वारा बदूक से हरिण मारने पर पूगल पुलिस को मौके पर लेजाकर शिकारी छोटू की ढाणी की तलाशी के दौरान सिल्वर की तपेली में पकता हुआ हरिण का मास बरामद करवाया। मुकदमा न 70 दिनाक 68 02 को धक 1 पावली के कृष्ण व दर्शन यावरी द्वारा हरिण का शिकार करने पर क्षेत्रीय वन अधिकारी को मौके पर जाकर शिकारी द्वारा हरिण की ड्रेसिग के बाद खेत के टिब्बो में दो जगह खडडो में दफनाए गये हरिण के शेष अवशेष बरामद करवाये। मुकदमा वन विभाग नं 44 दिनाक 17.1202 को चक 14 बी डी. में गुरमुख व रामूराम द्वारा हरिण का शिकार करने पर खाजूवाला थाने के सी आई रामेश्वर लाल सहारण को मौके पर लेजाकर आकडे के पेड मे छुपाया हुआ अभागे हरिण का सिर कटी अवस्था मे बरामद करवाया । घर की तलाशी के दौरान शिकारी गुरमुख लोहे के बडे सदूक में छुपा दिनाक 10103 को वन क्षेत्र मे कुडके लगाकर उनमें फसने वाले हरिणों को मारने वाले शकर व बलवीर बावरी और गुरमीत मजहबी निवासी 1 के जे डी को कई दिनों की रात्रि गश्त के बाद आखिर दबोच लिया गया और उसी दिन रात को खाजूवाला पुलिस के सुपुर्द कर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया शिकारियों की निशान देही पर सहायक निरीक्षक चम्पाराम ने घटनास्थल पर दो अलग-अलग स्थानो पर जमीन खोदकर लगाये गये कुड़के बरामद किये। मुकदमा न दिनांक 11103 को टोकला (कोलायत) में जलदाय विभाग कर्मियों द्वारा तीन हरिणों का शिकार कर पाईपों पर लटकाने की सूचना पर जिला कलेक्टर बीकानेर को शिकारियों के खिलाफ घटना से सबधित कार्यवाही हेतु लिखकर फैक्स किया दिनाक 26.103 को सिसाडा पोस्ट क्षेत्र के किसानों द्वारा देके पर बावरी शिकारी 65 पाया गया। 66 1 67. गया। 58.
69 71. वन बचाओ वर्ष लाओ, पेड़ लगाओ पुण्य कमाओ । रखकर 30-40 वन्य जीवों को मरवाने की शिकायत पर खाजूवाला थाने में सहायक उप निरीक्षक आदूराम को घटनास्थल पर लेजाकर शिकार कर रहे दो यावरियों का पीछा किया गया। इस दौरान शिकारियों से छूटा ऊंट पुलिस ने जब्त किया मौके पर से शिकारियों द्वारा मारी दो नील गायें भी पुलिस को बरामद करवाई। मुकदमा नं. 10 दिनांक 22.00 को धक 15 के.एल डी. में खेत की बाड़ में पतले तार के फदे में फंसाकर लाठियों से हरिण का शिकार करने वाले गुरप्रीत व सुखासिंह को पूगल पुलिस से मौके पर गिरफ्तार करपाकर घटनास्थल पर मारा गया हरिण बरामद करवाया। 70. दिनांक 1230 को कालू खां निवासी 8 डी.एल. पक्खू खां निवासी 7 डीएल द्वारा घक 7 डी.एल. में बंदूक से हरिण मारने पर शिकारियों के विरूद्ध छतरगढ थाने में कानूनी कार्यवाही करवाई गई। मुकदमा नं. 21 दिनांक 6600 को घक 12 सी.के डी. में राजे खां व कृष्ण वापरी निवासी 9 डी. के.डी. द्वारा कुडके से फांसकर हरिण का शिकार करने पर छतरगढ पुलिस को घटनास्थल पर लेजाकर मारा गया हरिण बरामद करवाया पदोपियों को गिरफ्तार करवाया। मुकदमा नं. 26 दिनाक 17.903 को धक 5 केजे डी. के गुरचरणसिह पंजाबी द्वारा (पक्षियों रो फसल रक्षा के लालच में) खेत में गेहू के जहरीले दाने बिखेर दिये गये। उन दानों को धुगने वाले सैकड़ों कमैड़ियों, कबूतरों आदि पक्षियों ने उड़ते हुए दम तोड़ दिया इस आशय की शिकायत मिलने पर पन्य जीव उड़न दस्ता बीकानेर की टीम को बुलाकर घटनास्थल पर लेजाकर तहकीकात करने पर घटना सही घटित होनी पाई गई दोषी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया और सजा के तौर पर दोषी से 21 हजार रूपया जुर्माना अपराधी से रसीद संख्या 1857/7 के मार्फत नगद वसूल करवाया गया। दिनांक 12.1.04को सूचनानुसार चक 9 डी के डी. के बच्यूखाँ आदि किसानों द्वारा फसल रक्षा के बहाने वन्य प्राणियों को मारने हेतु हथियार बंद पेशेवर बावरियों को दुलाने पर छतरगढ पुलिस को लेकर घटनास्थल पर गये लेकिन पुलिस आने की पूर्व सूचना मिलने पर शिकारी पुलिस के जाने से पहले कहीं छुप गये। वहां के लोगों को भविष्य में पावन्द करवाया। दिनाक 6604 को धक 2 के.एच.एम. में चंदूराम नायक द्वारा द्वारा पप्पूसिह के खेत खरगोश का शिकार करने पर खाजूवाला पुलिस को घटनास्थल पर लेजाकर वारदात घटित होने की पुष्टि करवाई। पुलिस ने शिकारी चन्दूराम नायक को धारा 151 में 24 घण्टे हवालात में बद रखकर छोड़ दिया। शिकार केस दर्ज नहीं किया। 72. 73. 74.
100 75 76. 77 अहिंसा के देश में हिंसा क्यों ? दिनांक 28 604 को चक 1 के.जे.डी. में एक खरगोश व तीन पाटा गोह को मारने वाले शिकारी सुरजाराम व चनणाराम बावरी को मय शिकार खाजूवाला पुलिस के सुपुर्द करवाया गया। मुकदमा नं. 125 दिनांक 11103 को चक 6 के.डब्ल्यू.एम में खलीलखाँ, हाजी शरीफ आदि ने जीप से हरिण का पीछा कर बंदूक से हरिण मार दिया। तब प्रत्यक्षदर्शी सभा कार्यकर्ता श्री गौरीशंकर विश्नोई निवासी 8 के.डब्ल्यू.एम ने पूगल थाना में इस आशय का मुकदमा नं.5/3 वन अधिनियम, 27 आर्स एक्ट के तहत शिकारियों के खिलाफ दर्ज करवाया। दिनाक 7804 को बाबूनाथ ने रावला रोड़ चक 6 पी.एच एम की रोही में एक चिकारा हरिण को शिकारी कुतों की मदद से घेरकर लाठियो से मार डाला, और मारा गया हरिण डेरे पर ले जाकर छुपा दिया। सभाध्यक्ष द्वारा इस आशय का मुकदमा संख्या 154/4 खाजूवाला थाने में दर्ज करवाकर मौके पर पुलिस को लेजाकर बावूनाथ के डेरे पर से उसकी निशानदेही पर पानी की मटकियों के नीचे खड्डा खोदकर दफनाई अवस्था में मारा गया हरिण बरामद करवाया गया। इस प्रकरण में खाजूवाला पुलिस जांच अधिकारी द्वारा शिकारी से मिलकर परिवादी द्वारा लिखित प्रथम सूचना रिर्पोट मे अपराध घटित होने की लाईनें जान बूझकर हटाने पर खाजूवाला न्यायालय को वकील के माध्यम से अवगत करवाया तथा दोषी अधिकारी के खिलाफ पुलिस अधीक्षक को शिकायत प्रेषित की। दिनाक 21105 को श्री नारायणराम पुत्र श्री मामराज विश्नोई निवासी चक 19 एस बी.एस ने टेलीफोन पर बताया कि वहां कौशलाराम, ताराचन्द, भंवरलाल जाट ने खोड में कुडका लगाकर एक हरिण को फासकर शिकार किया है लेकिन सम्बन्धित थाना सुथारवाला मे मौजूद ए.एसआई नेचलाराम मेघवाल न तो रिपोर्ट दर्ज कर रहे हैं, न मौके पर जा रहे हैं। तब मैंने जैसलमेर के पुलिस अधीक्षक महोदय को फोन नं 252234 पर फोन कर वस्तु स्थिति से अवगत करवाकर कानूनी कार्यवाही की प्रार्थना की। फलतः सम्बन्धित पुलिस ने मौके पर पहुचकर मारा गया हरिण बरामद कर केस दर्ज कर लिया। दिनाक 27505 को 3 पावली पचायत के सरपच श्री जगदीश सहारण ने टेलीफोन से सूचना दी कि दलीप सिंह कागड़िया के खेत में उसी के काश्तकार गुरुदेव बावरी ने कुडके मे हरिण फसाकर गर्दन मरोडकर मार डाला है। इस आशय की मुकदमा खाजूवाला थाना में दर्ज करवाकर मारा गया हरिण बरामद करवाया। दिनांक 2905 को अखाराम नायक चक 37 के.जे डी. ने अपने खेत की बाड़ लौहे के तारों के फंदे लगाकर एक हरिण का शिकार कर लिया। रात को 11 बजे मनीराम डेलू द्वारा इसकी सूचना मिलने पर खाजूवाला पुलिस को मौके पर 78 79 में B0.
81. 82. 83 84 लीलो रूंख नही घावों, अनि घावें द्यो प्राण - खेजड़ली बलिदानी 101 लेजाकर मारा गया हरिण बरामद करवाया। मुकदमा नं दिनाक 12.1.06 को चक 2 के.वाई.सी. के करतार यावरी आदि द्वारा कुड़का लगाकर पिकार का प्रयास करने एवं अवैध रूप से नहर के पानी मे मछलियां पकड़ने पर सभा कार्यकर्ता मुकेश कुमार की शिकायत पर खाजूवाला थाने में मुकदमा नं. 03/6 दर्ज करवाकर कुड़का आदि बरामद करयाये। दिनांक 20.106 को कमाल खां के खेत में शिकारी ने कुड़का लगाकर पिकार किया। हनुमान भादू निवासी 11 टी डब्ल्यू एम. की सूचना पर कट्रोल रूम को सूचित कर बज्जू पुलिस अधिकारी देवानन्द के द्वारा मारा गया हरिण व कुडका बरामद करवाया। दिनाक 24.206 को करनैलसिंह रायसिख निवासी 6 पीएचएम ने खेत की सीव में तार के फंदे में फंसाकर हरिण का शिकार किया। रामरतन खीचड़ से इसकी सूचना मिलने पर खाजूवाला पुलिस को मौके पर ले जाकर कर तार के फंदे. खूनआतुदा मिट्टी, कुल्हाड़ा. मृत हरिण का मांस तथा शराब की भट्टियां भी पकड़वायी। मु. नं. 29/06 दिनाक 19-3-06 को चक 6 डी.के.डी. (छतरगढ) के किसानों द्वारा यहा हरिण, नीलगाय आदि वन्य जीवों को मरवाने हेतु आपस में चन्दा कर बिठाये गए पैशेवर बावरी जाती के व्यक्ति को मौके पर जाकर स्वयं टिब्बे पर बैठे देखकर इसकी शिकायत श्रीमान हेमन्त पुरोहित आई जी साहब को लिखित मे की। उनके दखल से शिकारी को भगाया जा सका। दिनाक 8-5-06 को शिकारी प्रदीप नायक निवासी शेखसर (झुंझनू) ट्रक खलासी के द्वारा खाजूवाला के पास वन क्षेत्र में एक कबुतर मारने पर खाजूवाला पुलिस को बुलाकर उसे पकड़वाया। चाकु से छिले कबूतर को देखकर खाजूवाला सी आई. श्रीमान शायरसिंह राठौड ने अपनी मजबूरी बतायी कि कबूतर संरक्षित प्राणी नहीं है अत. मामला दर्ज नहीं हुआ। दिनांक 3-6-06 को चक 3 पी बी. में रमेश बावरी द्वारा बन्दूक हरिण मारने की सूचना सुखराम कालीराणा निवासी 3 पी बी. ने दी, उन्हें शिकारी का पिछा करने को कहा गया तथा पुगल पुलिस को लेकर घटनास्थल दिखाया। फरार शिकारी को दुसरे दिन पकड़वाया। मुकदमा न. 55/06 दिनांक 25.5 06 को चक 7 पी के डी. में वन्य जीवो के सफाये हेतु वहां के लोगों द्वारा लाये गये पेशेवर सुभाष बावरी ने हरिणों का पिछाकर हरिण की टाग में गोली मारी इसका विरोध करने पर शिकारी ने सभा कार्यकर्ता श्योपत भाट पर चाकू जान लेवा हमला कर घायल कर दिया। सूचना मिलने पर मुगल पुलिस को घटनास्थल पर ले जाकर फरार शिकारी की बन्दूक, गोलियां, खूनआलुदा मिटटी, व वन्य जीवों को मरवाने हेतु शिकारी द्वारा इक्कठी की हुई 15 कट्टे गेहु नगदी 85. 86 87.
88 89 सिर साँटे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण - खेजड़ली बलिदानी 102 आदि जब्त करवायी। दिनांक 9-7-06 को चक 5 पी.बी. में शिकारी ने एक खरगोश का पिछा कर कुल्हाड़ी से शिकार किया। सूचना मिलने पर पुलिस को घटना स्थल पर ले जाकर मारा गया खरगोश य खून से सनी कुल्हाड़ी बरामद करवाई। दिनाक 1-9-06 को आधी रात को 2 के एलडी. पंचायत प्रभारी श्री बद्रीराम खदाव ने मोबाईल पर सूचना दी कि चक 35 के.जे डी. (ए) में स्थिति मनफूल बावरी के खेत में हरिण के कराहने की आवाज आई है. तब खाजूवाला पुलिस को सूचना दी। पुलिस तत्काल मौके पर गई। शिकारी के खेत से एक कुडका बरामद किया तथा शिकारी को गिरफ्तार किया। गौ हत्या, गौ वंश तथा पशु उत्पीड़न से संबंधित 2 दिनाक 5292 को चक 2 पीबी, के पास छतरगढ रोड पर अवारा गायों को छोड़ने आये लोग किसानों के ललकारने पर गायों को चलते ट्रेक्टर से सडक पर फेंक गये, जिससे एक गाय के पैर की हड्डी टूट गई व दो-तीन गाये चोट लगने पर घायल हो गई। उनका इलाज करवाया व दोषी ओमप्रकाश, कुलवीर, हंसराज व सुरेन्द्र निवासी जीयांवाली को इस कृत्य के लिये फटकारा दोषियो ने अपना गुनाह कबूल कर स्वेच्छा से प्रायश्चित स्वरूप 2100 रूपये खाजूवाला गौशाला मे रसीद कटवाई। दिनाक 9995 को चक 5 के.जे डी. के सुनील व बाल मुकुन्द धानक द्वारा बछडे को घेर कर लाठियो से पीट-पीट कर मारने पर दोषियों के खिलाफ खाजूवाला थाने मे 2 आर पी सी. एक्ट के तहत केस दर्ज करवा कर मारा गया बछड़ा वरामद करवाया। मुकदमा नं 95 दिनाक 191295 को मदनलाल रेगर निवासी 20 वी डी द्वारा बेल का बेरहमी से लाठियों से पीट-पीट कर मार देने की ग्रामीणो की शिकायत पर सभा द्वारा मदनलाल से सम्पर्क किया तो दोषी ने अपनी गलती मानकर स्वेच्छा से प्रायश्चित स्वरूप श्री कृष्ण गौशाला खाजूवाला में 1100 रूपये की रसीद कटयाई। दिनांक 4.7 97 को चक 35 के.जे.डी. के राजूराम व छोगाराम नायक द्वारा अपनी टोपीदार बन्दूक से हरिणो पर फायर करने की शिकायत पर घटनास्थल पर जाकर देखा कि कृष्ण ज्याणी द्वारा पीछा करने पर शिकारी राजूराम सीसे की गोलियाँ, बारूद और जूते छोड़कर भाग गया। लेकिन पूगल पुलिस ने इन वस्तुओं को पर्याप्त सबूत नहीं मानकर केस दर्ज करने से इंकार कर दिया। अतः टोपीदार बदूक जब्त करवाने हेतु 3 4 5. 6. 7 वृक्षारोपण पुण्य महान, जान गया है सकल जहान । 103 लिखित कार्यवाही की गई। दिनाक 10398 को के जे.डी नहर के किनारे रोजाना पक्षियो का शिकार करने वाले अवतार सिंह मजहबी सिख की लाईसेसी बन्दूक जिला कलेक्टर महोदय को पत्र लिखकर जब्त करवाई गई। दिनाक 201.2000 को चक 17 के वाई डी आबादी के केवलसिंह उसके पिता द्वारा गाव के सांड की निर्दयता से पिटाई कर गांव से बाहर खदेड़ने पर सांड को छुडाने गये चन्दूराम विश्नोई के साथ दोषियो द्वारा लाठियों से मारपीट करने पर दोषियो के खिलाफ जिला पुलिस स्तर पर कार्यवाही कर पिटाई के शिकार चन्दूराम की मदद की गई। दिनांक 8.5 2000 को पुलिस थाना खाजूवाला में उपखण्ड अधिकारी के मार्फत लिखित आदेश करवाकर खाजूवाला मण्डी के सुअर मालिक ढगलाराम, राजू, चन्दू, नरसी, मखण, हरि नायक, बिहारी, कश्मीर, मामराज खटीक के विरूद्ध मण्डी मे पालित सुअरों को अवारा छोड देने पर धारा 139 आई.पी.सी के तहत इस्तगासा दर्ज करवाया गया जिसमे अकाल की मार से निढाल पड़ी बेवस जीवित गायो को नोच-2 कर खाने पर मरी गायो का उल्लेख था लेकिन समय पर कार्यवाही नही होने पर मण्डी मे जन जागृति पैदा कर स्थानीय प्रशासन को उन सुअरो को बेदखल करने पर मजबूर कर दिया गया। इसी का परिणाम हैकि आज मण्डी पूर्णत सुअर मुक्त है। दिनाक 29 6 2000 को दुर्गा माता मदिर के पास खाजूवाला में शराब पीकर नशे में धुत ट्रक सं. आर.जे 13/जी 5694 के चालक द्वारा ट्रक को खुले मे बैठी हुई एक गाय पर चढाकर मार दिया गया। ट्रक लेकर भाग जाने पर खाजूवाला पुलिस से नाकाबन्दी करवाकर चक 40 केजे डी के पास पकडवाया गया। अपराधी के विरूद्ध धारा 429, 279 के तहत केस दर्ज करवाकर पकडवाया गया। मुकदमा न 128 दिनांक 27.7 2000 को मगलराम व उसके लडकों द्वारा बछड़ी को पीट-पीट कर मारने पर पशु निर्दयता निवारण अधिनियम एवं गौवंश वध की धाराओ के तहत खाजूवाला पुलिस थाना में केस दर्ज करवाया गया। मुकदमा न. 183 287.2001 को चक 4 के.जे.डी. में पल्लुसिह मजहबी के खिलाफ अवारा गाय को लगातार 7-8 दिन तक भूखी प्यासी बाँध कर रखने व लाठी से पैर तोडने पर खाजूवाला थाने मे पशु अत्याचार निवारण के तहत केस दर्ज करवाया। 8 9. 10.
104 11. 12 13 14 हरे पेड़ की शीतल छाया, देख-देख कर मन हरसाया। दिनाक 482001 को चक 38 के.जे डी. नहर के पास नर्सरी के वनकर्मी सुरज्ञान, रमेश, कृष्णनाथ व गगाराम द्वारा कई सूनी गायो को बाडे में जवरदस्ती भूखी प्यासी बद रखने पर गौ उत्पीड़न कानून के तहत खाजूवाला थाने में केस दर्ज करवाया। दिनाक 22.8 2002 को चक 18 के.जे.डी के मोमनराम पुत्र श्योलाल जाट द्वारा विगत 8-9 दिनो से भूखी प्यासी गाय बांधे रखने की सूचना मिलने पर उक्त दोपी का गाय नहीं खोलने पर केस दर्ज करवाने की चेतावनी देने पर मोमनराम गाय छोडने पर सहमत हो गया। दिनाक 6 1 2002 को चक 9 के.एल डी. के नब्यूखाँ, सम्मूखाँ, शमीरखाँ, मुमताज ने मिलकर एक जीवित बछड़े को मार काट कर खा लेने के बाद ड्रेसिग के बाद शेष मृतागो को कच्चे खाले के बीचो बीच खड्डा खोदकर दफना दिया और उपर पानी चला दिया। सूचना मिलते ही पूगल एव खाजूवाला चिकित्सको के बोर्ड से पोस्टमार्टम करवाया गया। दिनाक 27 52002 को सेना द्वारा खेतो मे बिछाई गई यारूदी सुरगो की तारवदी (चक 20 के वाई डी मदरेश गोदारा के खेत में) अन्दर अवारा गाये घुस गई तब खाजूवाला स्थित सेना के अस्थाई मुख्यालय के प्रभारी अधिकारी से लिखित अनुरोध कर सेना की मदद से उक्त गायो के प्राणो की रक्षा की गई। दिनाक 1732003 को धक 19 के.जेडी के मोमनराम द्वारा गांव के सांड को कई दिनो तक भूखा प्यासा यांधकर मारने पर ग्रामीणो की शिकायत पर धारा 8,9,10 राज गौ वशीय अधिनियम के तहत खाजूवाला थाना मे केस दर्ज करवाकर कानूनी कार्यवाही करवाई गई। मुकदमा न. दिनाक 126 2003 को खाजूवाला मण्डी के बेल गाडा चालक रामूराम पुत्र रामचन्द्र लुहार द्वारा अपने मरियल बैल के गाडे पर दोपहर की तपती धूप मे 17 क्वि भार लादकर हाकने पर बेदम बेल निढाल होकर गिर पडा तब गाडे का जुआडा बेल के सीगो पर गिरने से सीगो की पोलरी (खोल) उखड गया। बेल के ईलाज के बाद मण्डी वासियो के आग्रह पर केस दर्ज नहीं किया गया। गाडा चालक ने स्वेच्छा से प्रायश्चित स्वरूप 111 रूपये की रसीद गौशाला मे कटवाई व भविष्य में ज्यादा वजन नहीं लादने का वचन दिया। दिनाक 28.1 2004 को चक 12 के वाईडी से पाच भेड बकरियां चुराकर मीणा मार्केट स्थित मखणसिह कसाई की मांस की दुकान मे बेचने पर 15 16 17.
18. 19. 20 | पेड़ लगाओ जोत जलाओ, धरती पे स्वर्ग ले आओ जाम्भो जी|| 105 चोरी के जानवरों को ऐसे चोरों से खरीदकर दो जानवर तुरन्त फुरत काटकर बेच देने वाले लोगों की मास की दुकानें हटवाने हेतु जिला कलेक्टर को पत्र लिखा गया। दिनाक 61.2004 को मीणा मार्केक के मांस विक्रेता नत्थू खां, युसुफ खां, फमण ओड, माला, सुरजा, सुखराम, महावीर खटीक, हरदेवसिह व अवतार सिह मजहबी द्वारा स्वास्थ्य नियमो की लगातार अनदेखी कर सरेआम जानवरों को निर्दयता पूर्वक मारने पर उनके खिलाफ खाजूवाला उपखण्ड अधिकारी के समक्ष सी.आर पी.सी 133 के तहत सभा की तरफ से इस्तगासा दायर किया गया। दिनांक 27.894 को चक 43 3D मे BSF के जवानो द्वारा श्री रामनारायण भादू के खेत में तीतरों का अवैध शिकार बन्दूक द्वारा करने पर विरोध करने पर उनके बड़े अधिकारी द्वारा खाजूवाला मंदिर मे आकर समाज के समक्ष अधीनस्थ जवानों की करतूत पर माफी मांगने पर समाज के आग्रह पर केस दर्ज नही किया गया। दिनांक 15 5 2002 को खाजूवाला मे हरिजन बस्ती के खुले बडे कुण्ड में गिरे बडे साड को उपखण्ड अधिकारी महोदय के मार्फत सेना के जवानो की मदद लेकर रस्सीयों से बाहर निकलवाया। दिनाक 127.04 को घूरण यादव निवासी खाजूवाला ने लिखित शिकायत की कि यहां के विहारी मजदूर यहां से बैलो को खरीदकर एक ट्रक में 12 बडे बैलो को बेहद कष्टपूर्ण हालात में ढूंसकर बिहार ले जा रहे हैं। वहां ये बैल कसाईयो को बेचे जायेंगें। तब प्रयास कर विहार जा रहे उक्त ट्रक को रास्ते में पूगल से वापिस मंगवाकर खाली करवाया गया। दिनाक 24704 को रामबच्चन सिंह जिला मत्री कुशीनगर विश्व हिन्दु परिषद में फोन पर बताया कि उक्त ट्रक को आज हमने पकडकर थाना कोतवाली हाटा में खड़ा करवाया है तथा गौ-तस्करी के विरूद्ध धारा 3,5,8 गौ-वशी अधिनियम व पशु क्रूरता अधिनियम के तहत मुकदमा नं. 427/4 दर्ज करवाया है। उल्लेखनीय है कि इस ट्रक को खाजूवाला उपखण्ड अधिकारी ने नियम विरूद्ध अनुमति प्रदान की थी। इस आशय का फैक्स कुशीनगर से परिषद के कार्यकर्ताओ से प्राप्त हुआ। दिनांक 11.904 को मिनी ट्रक संख्या आर जे-19 3972 के ड्राईवर राजकुमार पुत्र मक्खनसिह ओड खाजूवाला ने पुरानी मण्डी चौराहे पर बैठी एक बछड़ी का पैर लापरवाही से ट्रक से कुचलने पर ट्रक को 21. 22. 23
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32 33 34. | मृत्यु के समय कर्म फल ही साथ जाते है विदुर नीति 107 स्थान में एक वर्ष का एक बछड़ा जिसे कुत्तों ने घेरकर बुरी तरह नोच खाया है। लहु लुहान अवस्था मे बेसुध पड़ा है। घटनास्थल पर पशु चिकित्सक को लेजाकर कुत्तों द्वारा काटे गये घावो मे टाके लगवाये तथा स्वस्थ होने तक उसका ईलाज करवाया। दिनांक 9405 को सूचना मिली कि नई मण्डी में एक बूढा सांड बीमार व असहाय अवस्था में पड़ा तड़फ रहा है। तो उसके पास चिकित्सक को ले जाकर टीके लगवाये गये। काफी प्रयास के बावजूद भी उसे बचाया नहीं जा सका । अतः उसकी ससम्मान अन्त्येष्टि कर दी गई। रामप्रताप भादू पवन गिला, सुभाष धारणिया, राजू पुरोहित ने भी इसमें सहयोग किया। दिनांक 11.7.06 को तरसेमसिह सिख 22 केयाईडी की सूचना पर खाजूवाला से बाहर हड्डी रोहडी पर बैठे एक तीन वर्षिय बछडे को ट्रेक्टर ट्रोली से गौ शाला मे लेजाकर पशु चिकित्सक से उपचार करयाया। इस पर टुटे बछडे को असहाय अवस्था मे कुते नोच रहे थे। दिनांक 26106 को सीमा सुरक्षा बल के खरोला पोस्ट अधिकारी श्रीमान हरदेस विश्नोई द्वारा खाजूवाला लाये (कुडके से घायल) हरिण को बीकानेर भिजवाकर उपचार करवाया गया। दिनाक 10806 को सडक दुर्घटना में घायल हरिण को लेकर श्री सुखराम कालिराणा आये। जिसका उपचार करवाया गया। मारने के इरादे से बंधक बनाकर रखे हरिणो को मुक्त करवाया। दिनांक 22.699 को चक 5 एम डब्ल्यू एम. के मलकीत व बलवन्त बावरी एवं गुलजारी बावरी निवासी 4 एमडब्ल्यू एम. के घर बन्धक बनाकर रखे दो हरिणों को क्षेत्रीय वन अधिकारी दन्तौर को मौके पर ले जाकर सुपुर्द करवाया एवं दोषियो को मौके पर पकड़वाया। दिनांक 5.10 2000 को सूचना मिलने पर जगुराम पुत्र बग्गुराम ओड निवासी लालबास हरियाणा हाल गाव सजरयाला (खाजूवाला) के घर पर मारकर खाने हेतु कई दिनो से बंधक बनाकर रखे चिंकारा हरिण को सजरवाला जाकर मुक्त करवाया गया। ग्रामीणो के आग्रह पर दोषी के विरूद्ध केस दर्ज नहीं करवाया गया। दिनाक 5904 को किशोरसिंह पुत्र श्री उम्मेदसिंह राजपूत निवासी 27 के.वाई डी. जो एक थैले में एक जीवित हरिण शावक को लिये जा रहा था। सभा कार्यकर्ता भवर सिहाग की सूचना पर उसका पीछा कर उसके द्वारा अपहृत हरिण के बच्चे को जंगल मे दूर ले जाकर छोड़ा गया। दिनांक 10205 को छत्तरगढ प्रतिनिधि श्री रामचन्द्र विश्नोई ने सूचना 35. 1. 2. 3 4.
. 108 गुरम करने की सामग पैदा करें- साम वेद दी बिमारीराम भाट निवासी रगो पर 2 हरिण जलाल यां 'गिरागी के पर में हरिण पाला हुआ या यागाला में टा. चिल्लो के पर एक हरिण यो होने की गूपमा पर इन पारों हरिणों की रिहाई हेतु श्रीमान उप गन सराक घारग को लिया गया। दिनाक 31305 को दिनेश पुन यनयारी शिरलोई गिगासी 23 के पाई डी ने सूपना भी कि पपू सिह पुत्र जोगेन्द्र सिंह गजापी निवासी 25 को याई सी द्वारा मारकर खाने की नियत से एक सरगोश को पका गया है। सब जरा को अपाता रोएसयाकर उसे जगत में दूर ले जाकर स्वतत्र गेट दिया गया। 5 - . मानवीय राहायतार्थ राहयोग दिनाक 15 10 2001 को याजूपाला में घिराट-2 कर पलने पाले गुगे भिखारी को राजीय शक्ति के पास रोडवेज की बस द्वारा पैर कुपले जाने पर खाजूपाला थाने के किसी पुलिसकर्मी ने बरा ड्राईपर से अपनी जेव ग फर छोड़ दिया। पुलिस थाने के पारा गम्भीर मायल अवस्था में कराहत भिखारी. को शाग को पुलिरां पाले हारपीटल के पास पटक गये। तब सारी स्थिति जानकर खाजूपाला पुलिस की ग्रदयहीनता की शिकायत पोकालेर कन्ट्रोल का में फोन पर की गई तब पुलिस हरकत में आई और पर लिया को गिलास पारा 219.3d4 के तहत केरा दर्ज कर पसं . ios को जरा किया गया। लेकिन अत्यधिक रक्त. "स्त्राव के कारण काफी प्रयत्न से ईलाज के बावजूद भिखारी को बचाया "मला जा सका और भिसारी पल बसा। . हिमांक 31720pp को कृषस गे.यिकलाग और अभाव पररा पपूराम पुत्र मानारोग तयंका मियासी 32 के.वाई डी पर आमिरा भूख से बेहास 6 सदस्यीय परिवार को कियाई.डी पायत की अपमित रधि में लेने विकलांग पैशन एवं राहत के तौर पर स्थानीय प्रशासन से निशुल्क अनाज हेतु लिखित निवेदन किया गया। दिनाक:312-2002 को गरीब और भूमिहीन, असहाय सुशिला बेवा हजारीराम, मेघाल निवासी सिसाड़ा को निशुल्क अनाज एवं विधवा पेंशन शुरू करवाने हेतु उपखण्ड अधिकारी खाजूपाला से अनुरोध किया गयां दिनांक 19.122003 को चक 2 एम.टी.एम मे हिस्से पर काश्त करने वाले हड़मान विश्नोई की ढाणी मे आग से सम्पूर्ण घरेलु सामान अनाज, 5 अफीम, शराब, बीड़ी सिगरेट, करते जीवन मटियामेट। 109 नगदी, कपड़े आदि जलकर नष्ट हो जाने पर प्रशासन द्वारा पूर्व में स्वीकृत इदिरा आवास का गेहूं अभावग्रस्त परिवार को राजस्व तहसीलदार से दिलवाया। दिनाक 23.12.2003 को गोमदराम पुत्र सुखाराम सासी की घास-फूस की छत मे आग लगने से जले घरेलु सामान के कारण पीडित पक्ष को सतिपूर्ति में आपदा राहत के 1800 रूपये स्वीकृत करवाये। अवैद्य पेड़ कटाई प्रकरणों पर सभा की कार्यवाही का विवरण बीकानेर जिले के खाजूवाला क्षेत्र मे कई लोगों ने हरे पेड़ो को अवैध रूप से काटकर लकड़ी चिराई के आरो व जिप्सम पकाने की भट्टियो मे पहुँचाकर बेचने का धंधा बना रखा हैं। ऐसे लोगो को निरुत्साहित कर हरे पेडो को बचाने हेतु जीव रक्षा विश्नोई सभा खाजूवाला विगत 10 वर्षों से प्रयासरत हैं। सभा अध्यक्ष द्वारा समय समय पर उठाये गये निम्नाकित विविध प्रकरणो मे वन विभाग ने वन माफियाओ से हजारो रूपये जुर्माना वसूला एव अभियोग दर्ज किये। जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है.- दिनाक 127.95 को मेहराराम जाट द्वारा 8 के.वाई डी नहर की 24 आर डी. पर 700 पेड़ो की कटाई पर मुकदमा दर्ज करवाया। दिनांक 22198 को चक 10 के एल डी (वी) नहर के किनारे अवैध रूप से काटे गये पेड़ो पर कार्यवाही। दिनांक 202.98 को के.वाई.डी नहर की 62 आर डी पर अज्ञात लोगो द्वारा अवैध रूप से 70-80 हरे पेड़ों की कटाई पर कार्यवाही। दिनाक 2442002 को चक 12 डी डी मे रूपाराम मेघवाल द्वारा 11 बडे खेजेड़ों की कटाई पर कार्यवाही। दिनांक 4 2 2003 को चक 4 के.के.एम मे रामूराम द्वारा 25 खेजड़ीयो की कटाई पर कार्यवाही। दिनाक 26 52003 को पूगल ब्रांच नहर की आरडी 38 से 70 के बीच 200 हरे पेड़ों की अवैध कटाई पर कार्यवाही। दिनाक 1.7.2003 को अग्रेजसिंह निवासी धक 2 के.डब्ल्यू एम द्वारा 3 खेजड़ों की अवैध कटाई पर कार्यवाही। दिनाक 6 12 2003 को चक 19 के.वाई.डी. बी के लिछमण बावरी आदि द्वारा खेजड़े की कटाई पर कार्यवाही। दिनांक 13.1.04 को चक 2 पी बी के बशीरखाँ मिरासी द्वारा पाँच खेजड़ो की कटाई पर कार्यवाही। 1 2: . 5 6 7. 9. 10.
11. 12. 13 14 15. 16. 17 18. विकलांग, कुरूप, वृद्ध, गरीब व मुर्ख का उपहास न करें - मनुस्मृति | 110 दिनाक 11.3 2004 को खाजूवाला में सड़क के किनारे दो हरे पेड़ों की कटाई पर कार्यवाही। दिनाक 94.2004 को केवाई.एम माईनर के किनारे 40 कीकर के बडे पेड़ो की कटाई पर कार्यवाही। दिनांक 217.2004 को चक 13 डी.के.डी. मे .काटे गये हरे वृक्षो की ट्रेक्टर-ट्राली जब्त करवायी। दिनांक 14804 को डडी क्षेत्र मे वनकर्मी ओमप्रकाश की मिलीभगत से हो रही पेड कटाई का खुलासा। दिनाक 1.904 को श्रीमान जिला कलेक्टर श्रीगगानगर को रावला क्षेत्रों मे अवैध पेड कटाई रोकथाम हेतु लिखित अनुरोध । दिनांक 29 904 को चक 4,5,6,7 व 8 एम एम. के लोगों की पेड़ कटाई की शिकायत पर कार्यवाही। दिनाक 7 1004 को खाजूवाला मण्डी मे हरे पेड़ों की कटाई मे लिप्त दो आरा मशिनो पर कार्यवाही। दिनांक 9 10.04 को पूगल ब्राच की आर डी. 60 से 62 तक नहर के किनारे खड़े हरे वृक्षों की कटाई का खुलासा। दिनांक 11.1004 की रात्रि को वन कर्मियो की टीम के साथ गश्त कर एक ट्रोली कटे पेड़ एवं अन्य 11 ट्रोली अन्य पेड काट कर लाने का खुलासा। दिनांक 21 11.04 को केजे.डी. नहर की 3 आर डी. के किनारे कटे 5 खेजडे वनविभाग को जब्त करवाये। दिनाक 22.1104 को पेड़ कटाई रूकवाने हेतु प्रतिनिधी मण्डल खाजूवाला उपखण्ड अधिकारी से मिला। दिनांक 28 11.04 की रात को वन अधिकारियों के साथ जाकर 29 वाई डी. मे रात को नाका लगाकर एक ट्रोली हरे पेड़ जब्त करवाये। दिनांक 21204 को चक 14 के.एल डी. (बी) नहर के किनारे 50 आर. डी. से 72 आर डी तक पेड कटाई का सिलसिला रुकवाया। दिनांक 4 1204 को चक 22. 35 के.वाई डी व 2 ए डी एम में पेड़ कटाई की तहसीलदार खाजूवाला को सूचना दी। दिनांक 8.1204 को पूगल ब्रांच नहर के किनारे पर डंडी में रोजाना पेड़ काटकर मावा भट्टी चलाने वाले कृष्ण यादव को लकड़ी सहित पकड़वाया। दिनांक 15.1204 को 2 पी बी मे खेजड़ो की कटाई की शिकायत। दिनाक 29 12.04 को 7 पी.एच एम के पास यन भूमि में आंधी से गिरे पेड़ों की चोरी के बारे में विभाग को आगाह किया। 19 20 21. 22 23 24. 25. 26. 27.
29. 30. 31 33. 34 35 36 37. दुःखी प्राणी की रक्षा से धर्म अर्थ व काम की प्राप्ति होती है अविस्मृति 111 28. दिनाक 4.305 को पूगल वाच नहर की 60 आर.डी. पर मोबाईल आरे से पेड़ कटने की सूचना देकर रात्रि गश्त की मांग की। दिनांक 10-4-2005 को 6 वी डी. में आरा सचालक द्वारा खड़े 70 पेड़ों का सौदाकर की जा रही कटाई रूकवायी। दिनाक 36.05 को खोयेवाला माईनर पर वन क्षेत्र में हुए पेडो की कटाई की सूचना दी। दिनांक 15805 को पूगल ब्रांच नहर की उपनहर बी एलडी की 106 आरडी. से 109 आरडी तक वहां के वेलदार द्वारा नहर के किनारे अवैध पेड कटवाने की शिकायत। 32 दिनांक 19805 को चक 5 डी के डी. मे हरे पेड़ों की कटाई की सूचना दी। दिनांक 9806 को 6 एमडी डब्ल्यूएम (डण्डी) मे खेजडियां कटने की शिकायत। दिनाक 10806 को चक 8 वी डी. मे 2 खेजड़े व 1 वैर कटने की सूचना । दिनांक 23805 को चक 7 एसएसएम (सी) में 6 हरे खेजडे कटे पकडवाये। दिनांक 19.1205 को चक 3 बीएलडी. में खेजड़े काटने वाले को रूकवाया। दिनाक 4106 को चक 1 बी.वाई एम् मे 8 कटी खेजडीया पकड़वायी। दिनांक 18106 को बीकानेर जिला कलेक्टर को पत्र देकर पीकेडी नहर के चक 10. 11, 17, 18, 20, 21, 22 व 23 पी केडी एवं 3 पीकेएम की 120 मुरब्बा वन भूमि में भू माफियाओं द्वारा वन उजाडकर अवैध कब्जे का खुलासा । दिनांक 5306 को वन विभाग के गश्ती दल के साथ जीरो आर.डी. रोड पर लखुवाली पुली के पास दो ट्रोली हरी कटी लकडियां जब्त करवायी। 40. दिनाक 18306 को चक 2 5 एमडब्ल्यूएम मे हरे पेड कटने की शिकायत। दिनाक 7.406 को चक 1 पी.बी में बड़े पैमाने पर हो रही हरे पेड़ों की कटाई रुकवायी। दिनांक 10506 को चक 1 एडी.एम में खेजडे कटने की शिकायत। दिनांक 12406 को अवैध पैड कटाई के विरोध में छतरगढ समा प्रभारी श्री रामचन्द्र खीचड द्वारा डीएफओ. कार्यालय के समक्ष एक दिवसीय सांकेतिक धरना। दिनांक 21806 को चक 13 केएलडी के ग्रामीणो की सूचना पर वन विभाग की आरक्षित भूमि मे पेड कटाई को रूकवाया। दिनाक 22806 को 25 केवाईडी में सरकारी भूमि पर 7 पेड कटने की सूचना । दिनाक 4906 को चक 3 कालुवाला मे खेजडे काट रहे वन माफियाओं का ट्रेक्टर व आरियाँ सीज करवायी। उपरोक्त तमाम अवैध पेड कटाई के प्रकरणों में छतरगढ क्षेत्र में घटित वारदातों मे छतरगढ सभा प्रभारी श्री रामचन्द्र खीचड़ का उल्लेखनीय योगदान रहा। 38 39 41 42 43 44 45. 46.
112 भ्रूण हत्या (गर्भपात) महापाप है, इससे बचो पाराशर स्मृति पीपुल फॉर एनीमल्स बीकानेर परिचय -- 1 2 3 4 पर्यावरण सरक्षण में राष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय कार्य करने वाली श्रीमती मेनका गाधी राष्ट्रीय अध्यक्षा पीपुल फॉर एनीमल्स नई दिल्ली के निर्देश पर प्रदेश प्रभारी श्री बाबुलाल जाजु ने 11 जनवरी 05 को कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर में जिले की कार्यकारिणी गठित की जो इस प्रकार हैं- सरक्षक श्री भवरलाल कोठारी सयोजक श्री डॉ एके. गहलोत जिला प्रभारी श्री रामकिशन डेलू उपाध्यक्ष श्री शिवराज जाखड 5 सचिव श्री सुनिकुमार बाठिया 6 सगठन मत्री श्री लक्ष्मण खीचड 7. प्रचार मंत्री श्री जसवत सिगड़ कोषाध्यक्ष श्री पुनमचन्द माल विद्यालय प्रभारी श्री जयकिशन गहलोत 10 बिमार पशु प्रभारी श्री मोखराम धारणियां 11 नोखा प्रभारी श्री राजाराम धारणिया 12 देशनोक प्रभारी श्री गोविन्दराम सोनी 13 श्री कोलायत श्री ईमीलाल नैण 14 सांवतसर श्री हरीराम धारणियां 15 छतरगढ़ श्री पवन कश्यप 16 खाजूवाला श्री रणजीत मजोका 17 काकड़ा श्री रामेश्वरलाल डेलू 18 लूणकरणसर श्री बनवारीलाल कडवासरा 8 9 113 जल सीमित है, इसका प्रयोग सोच समझ कर करना होगा । मनुष्य के अनुकूल नही है मासांहार सृष्टि के रचनाकार ईश्वर ने मनुष्य शरीर रचना के साथ साथ उसके लिए उचित पोषण हेतु अन्न, दाले, फल, सब्जिया इत्यिादि सुस्वादु भोज्य पदार्थों की भी व्यवस्था की। यहा तक की बीमार शरीर के ईलाज हेतु विविध संजीवनी जडी बुटियो को उत्पन्न किया। हमारी सुविधार्थ फसलों की बुवाई परिवहन एवं दुध, दही, घी आदि के लिए बहुउपयोगी पालतु पशुओ की रचना की, इसके अलावा मनुष्य की सेवा के लिए पशु पक्षी, कीट, पतग, वनस्पति आदि से युक्त विहंगम सुन्दर संसार का निर्माण किया ताकि वे अपने अपने स्तर पर सेवा कर मनुष्य को सदैव लाभ पहुंचाते रहे और अपनी सहज क्रियाओ से धरती को प्रदुषण मुक्त बनाते रहें। लेकिन खेद का विषय है आज मनुष्य ईश्वरीय कृत प्रकृति की इस सुव्यवस्था को तहस-नहस कर मनमानी करने लगा है। पशु पक्षियों से समुचित लाभ उठाने के बजाय इन्हे नृशसता पूर्वक मार-मार कर खाया जा रहा हैं। भारत मे मासाहार की बढती गम्भीर प्रवृति का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आजादी के समय जहा देश में मात्र 300 बुचड़खाने थे परन्तु आज बढकर 35 हजार हो गये हैं। जिनमे प्रति वर्ष करोडो निर्दोष पशु पक्षियों को बेरहमी से काटा जा रहा हैं। मनुष्य स्वाभाववत् शाकाहारी प्राणी हैं। मास खाना उसकी सहज प्रवृति नही हैं। हमारे शरीर की आकृति मासाहार के कतई अनुकूल नहीं हैं। क्योकि मासाहारी प्राणियो के शरीर की रचना एवं खाने पीने का ढग अलग तरह से होता हैं। किसी भी जानवर को मारे बिना मास प्राप्त नही हो सकता। अत. ऐसा करने से हिसा की भावना बढती है एव धर्म के संस्कार लुप्त हो जाते हैं। विश्नोई समाज में मासाहार का नाम लेना भी बुरा माना जाता हैं। इतना ही नहीं विश्नोई समाज ने लगभग 500 वर्षों से मासाहार के विरुद्ध एक मुहिम सी छेड रखी हैं। यही भावना उन्हे वन्य प्राणियों के विनाश को रोकने हेतु प्रेरित करती हैं।
| यज्ञ इहलोक और परलोक दोनों को सुधारकर सुखी जीवन बनाता है
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हरिणों की व्यथा
मारी गई मति मानव की. यह देख मेरा मन हारा।
पीछे पड़े जान के गाहक, वन वन भटके
बेचारा।।
केसा सुन्दर रूप बनाया, केसी कर्ता की माया।
उसका सृष्टा बडा सयाना, सबके मनको भाया।।
लेकिन कुछ मानव अनजान, उजाड रहे धरती की शान।
इनको बुद्धि दो भगवान, नहीं समझते अपनी आन।।
इनकी करतूतों को सुनकर, हृदय तड़फता दिल रोता है।
जीवन दाता ईश प्रभु, इस जग में ऐसा क्यो होता है ?
जैसी करनी वैसी भरनी, यह तो एक सच्चाई है।
फिर भी जान नहीं पाये, जीवों पर आफत क्यो आई है ?
वन जीवो की दारूण व्यथा रह-रह मन को छूजाती है।
फिर भी इन हृदयहिनों को, जरा शर्म नही आती है।।
धरती के वन प्राणी सारे, सहमे बैठे है बेचारे।
हिसा की काली छाया के, आगे दौड़-दौड़ कर हारे।।
कान खोलकर सुनो पापियों, भारी मोल चुकाना होगा।
तब जेसे को तेसा होगा. सिर धुन-धुन पछताना होगा।
अन्तर्मन में झाक शिकारी तूं पत्थर की शिला न बन।
दुःख देगा तो दु.ख पायेगा, इतना अधिक अनाडी न बन।।
बहुत हुआ अब जगो साथियो! अब तो ऐसा नही चलेगा।
कलि काल की इस बेला में अपना धर्म निभाना होगा।
115 सब्जी के छिलके व बुंठन पोलीथीन में डालकर सड़क पर न फेंके । घरती करे पुकार मानव जब दानव बण जाये, जीवां पर छुरी चलवावे। मरतो जीव घणो दुःख पावे. पिजर कुके अर कुरलावे ।। दया भावना धार पीड़ा जानले हिंयों पीडा तूं भर जावे, पीडा धरती ने धुजावे। काम्प्यां अणगिण नर मर जावे, देख-देख हियो भर आवे।। धरती करे पुकार मनवा मान ले छोडयो बाण फेर नही आवे. मुरख मन में क्यों इतरावे। मारयोडी माटी क्यूँ खावे. इणा धरम करम मिट जावे।। भीतर छोड विकार, मनड़ो थामले अणबोला ने क्यूँ संतावे, वे दुःख किणरे सामी गाये। माटी देख-देख ललचावे, जनम अकारथ थारो जावे।। मरतो करे पुकार जुल्मी मान ले अपणी दुरगत आप करावे, माणस जनम फेर नही आये। धरम शास्तर आ बतलावे, तेरो जनम अकारथ जावे।। गियो जमारो हार, भोळा मान ले समझ बिना मुरख पछतासी, तेरो धरम रेत रळ जासी। इण विध निरो पाप कमासी. निहचै तुं नरका मे जासी।। अपणो जनम सुधार, करम गत मान ले मारयो है तो मरणो पडसी, किया करम काटयां ही सरसी। छाती पीट-पीट पछतासी, कोई दवा काम ना आसी।। हो मरणे तैयार, मूरख मान ले काट चौरासी नर तन पायो, मूढ पणे में फेर रूळायो। मार-मार जीवां ने खायो, मूल धरम न तें बिसरायो।। पापी छोड शिकार अब तो मान ले बिना दया धरम नी पूरो, ओ कुकरम घणो है बूरो। दया करो दीनो पर शूरों, धरम-ध्यान हो ज्यासी पुरो।। मन में सोच-विचार, कारण जान ले मानव जब दानव. e
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हिंसा टले ज्यों टालिये
संत उदोजी
पेड़ लगाओ जोत जलाओ
पेड लगाओ जोत जलाओ जाम्भोजी रा शब्द उचारो।
दया धर्म को मन मे धारो, मरते देखो जीव उबारो।।
जीवन में जुगति भर जासी, सृष्टि रा प्राणी सुख पासी।
प्रदुषण री अवखी वाधा, पूर्व में जानी अविनाशी।।
पीपासर मे अवतरित गुरू, समराथल जब किया पयाना।
दीन दुःखी को गले लगाओं. यही धर्म का मूल खजाना।।
अंतर्मुख हो जोत जलाई, सब शिष्यन के मन में भाई।
मरू भूमि की दुविधा देखी, काल करूर बडे दुःख दाई।।
साल बयाळो काळ भयंकर, विचलित होय उठे जम्भेश्वर।
किया निवारण होगी पीडा, भूखे प्यासे कांपे तन धर।।
तर-तर तपती लुआं चाले, अंगारा ज्यूँ सूरज बाळे।
काया कांपे हिंवडो हाले, तपती रेत ऑख ने बाळे।।
काळ कोप रे कारण होवे, धरती रा प्राणी दुखीयारी।
किण विध आरा दुःखडा मेटु, जम्भेश्वर आ बात विचारी।।
जीवन में जुगति · जिवो पाखण्ड से मुंह मोडों भाई।
सांसो की कीमत को जाणो, घर घर पेड़ लगाओ भाई।।
हरिया सँख कदे ना काटो, हरियाली ने जाणों प्राण।
खेत-खेत में शमी उगाओ, फल देसी थाने भगवान।।
रोटू धाम जब हुआ पयाना, चमत्कार को सबने माना।
खेजड़ियों को दिल से जोडो औरो को ये पाठ पढाना।।
हरियल टांस सँखडा छाया, रोटू वासी सब हरसाया।
पेडा री महिमा रे कारण, तन मन धन री बढगी माया।।
जीव न मारो, नेकी गहो - जम्भसार दर्शन 117 खेजड़ली महाबलिदान जम्भेश्वर की पावन वाणी, पढ सुण भगतो ने पहिचानी। जीवन मोड़ चले उस पथ पर, रच दिनी इक करूण कहानी।। खेजड़ली पेडां री नगरी, जोधाणे राजा ने अखरी। काटण भेजी सेना सगळी, करी तियारी पूरी जबरी। गाँव चौवठे गिरधर आया, राजा रा फरमान सुनाया। सुन कर राजा का परवाना, विश्नोईयां अतिशय दुःख छाया।। गाँव-गाँव में फिरी दुहाई, भेळा हुया सैण अर भाई। पेड़ों पर विपति पण आयो, जोधाणे रो राव कसाई।। खेजड़ल्याँ रा म्हे रखवाळा, म्हारो धरम खेजड़ी पाळां। प्राण जिते काया में नाचे, पण राखण म्हे मर खप ज्यांला।। लीली खेजडियां मन भाती, सब री काया ने सरसाती। जुल्मी जुल्म करो ना घाति, थारों हियों फटे ना छाती।। खेत राज रो गाँव राज रो गाँव राज रो, काटयां तूं के जावे थारो। राजाज्ञा ने सिर पर धारो, अपने अपने प्राण उबारो।। जे पण राखो तो डंड देकर, अपणे अपणे घर को जायो। खेजडल्याँ लकडां रे खातिर, विस्था क्यूँ थे प्राण गुमाओ।। दाग लगे जे दाम दां पंथ मां पूणा हुय ज्यासां । नहीं झुकणदां धर्म धजाने, खेजडल्याँ हित मर ज्यासो।। समझाकर सब हारग्या, गरभी अडयो गुमान। भंडारी तन कर कहयो काटो शमी तमाम । खट खट खट खट चले कुल्हाड़यों पेडां स्यूँ चिमटे कट ज्यावे । जाम्भोजी रो नेम निभावण, हंसता-हंसता प्राण गुमावे।। दही बिलोणो छोड ईमरती, खेजडले रे जा लिपटाई।। माँ रे पाछे बेटियां आई, मोह ममता भी रोक न पाई।। काया री चिंता तजी साख पडयां लिपटया नर-नारी। पेडां खातिर शीश कटाया धन्य धन्य बे नर अवतारी।। दोहा- सतरासो सतियासिये, मंगलवार महाना पेड़ तणा सिर सौंपग्या जग मे करग्या नाम।। हुया 363 अमर बलिदान।
जीव संगी कोई नही भाई, करम किये अपने संग जाई जम्मसार दर्शन// 118 खेजड़ली के शहीदों की अगर वाणी सिर कटा रहे है आज खेजड़ो के लिए, जहां को सदा याद आयेगें हमें। चल दिये अपनो को छोड़ अपने हाल पर, दूनियां वाले हमें ना मूला पायेगें।। मरने कटने के डर से हटेगें नहीं, सब मिल करके साका करेगें यहीं। आज तन तो नही पर धर्म खास है, ये जताने को आज मरने आये है हम।। धर्म हेत जीवन जीने का पैगाम है, खेत के खेजड़े हमारी आन-बान हैं। उनतीस नियमों में यह खास नेम है, वन बचाने को आज मरने आये है हम।। खुद के स्वार्थ पे लड़ते अर मरते कई, धर्म की धार भेंट चढ़ जायेगें हम। खेजों के काज आज जान कुर्वान कर, मर जाने को आज मिलके आये है हम ।। खेत की खेजड़ी को कभी काटना नही, जान पर खेल कर पेड़ राखना सही। धर्म हेत आज जान अपनी कुर्वा नकर, धर्म को साकार कर जायेगें हम। जिरा खेत में खेजडी की बढी तादाद है, उस खेत के धणी को धन्यवाद हैं।। खुशहाल उस धरती की खासियात है, यह बताने को आज मरने आये है हम। हरियाली के बिना वर्षा आती नहीं, पादलों को कभी भी लुभाती नहीं।। कुदरत की कहानी का एक राज है, यह सिखाने को आज मरने आये है हम। पेड जीवन की नैया के पतवार है, पेड़ रक्षा करो धर्म उपकार है।। बिन पेड श्वांस लेना ही दुश्वार है, समझाने को आज मरने आये है हम। पेड सासों की धडकन के आधार है, पेड़ जीवन के जीने की दरकार है।। पेड धरती के सुन्दर श्रृंगार है. पेड़ बचाने को आज मरने आये है हम। धर्म के लिए जिओ धर्म पर मर मिटो, धर्म की आण से के ना हटो।। उनतीस नियमों का ये आगाज है, दरशाने को आज मरने आये है हम। हम शहीदों की याद में तुम रोना नही, दिल को मजबुत कर होश खोना नही।। जनम एक ही नहीं इस धरा धाम पर बार-बार जनम ले लोट आयेगे हम बार-बार
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जाल खेजड़ी और कंकेड़ों, बड़ पीपल रूंखां नही छेड़ो।
प्रकृति संगीत
रे साधो भाई खेजड़ला वर देला..
जाम्भोजी रा शब्द बखाणे।
जीवन में जुगति भर जाणे
कोई एहडा करम करेला
रे साधो भाइ खेजडला वर देला
काल कुसम्मो दूर भगाावे।
बरखा रा बादल बरसावे।
खेत खळा भर दैला
रे साधो भाई, खेजडला वर देला
खड़ी खेजडीयां लेरा ले रे
जीवन सुख संगीत बिखेरे
गीत सुनो अलबेला
रे साधो भाई, खेजडला वर देला
खेजडियां रा बाग लगाओं
उसर खेत धान पनपाओ
हरिया खेत मुळकेला
यथा समय हवन-यज्ञ करते रहना चाहिए -
चरक सहिंता
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मत पेड़ काट इन्सान
कर कुदरत रो सनमान रे, मत पेड काट इन्सान रे।
ऐ धरती रो सब विष पीवे, संसारी पेडा तूं जीवे।
राखे जीव जगत रो ध्यान रे, मत पेड काट इन्सान रे।।
प्राण बाव पेडा तूं आवे, आं बिन सांस कदे ना आवे।
सृष्टि रो गुण पहचान रे, मत पेड काट इन्सान रे।।
बादलिया पेडांसू आवे, तिरसी धरती ने तिरपावे।
तूं समझ बडो ओ ज्ञान रे, मत पेड काट इन्सान रे।।
आभो इन्दर घण गरणावे, बादलिया भी उड उड जावे।
बिन पेडा रो नुकसान रे, मत पेड काट इन्सान रे।।
परमारथ खातर ऐ जीवे, धुएँ, धुंआसे ने ए पीवे।
ऐ जीवधारया री जान रे, मत पेड काट इन्सान रे।।
"सुरज तपने की तैयारी, छाया मे दौडे ससारी।
- मिलज्ये दुनियाँ ने आराम रे, मत पेड़ काट इन्सान रे।।
फल फुलॉरी शोभा न्यारी, आपर निर्भर सब नर-नारी।
राखे जन्म मरण रो ध्यान रे, मत पेड़ काट इन्सान रे।।
धरती मे सब तूं उपकारी, पेडा री महिमा है भारी।
थारो भलो करे भगवान रे, मत पेड काट इन्सान रे।।
कट गये पेड भूल भई भारी, विपदावॉ बढगई जनता री।
डेलू समझावे कर ध्यान रे, मत पेड काट इन्सान रे।।
।। इति।।
राजस्थान राज्य पथ परिवहन के कर्मचारीगण जिन्होने प्रस्तुत पुस्तक की लागत राशि वहन कर एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। मनीराम भादू शिवकरण डेलू 9414649047 रामपाल गिला 9414363812 ओमप्रकाश गोदारा 9414689928 9413105378 रामकिशोर डेलू 9413144688 रामरतन डेलू 01520-250353 चन्दुराम डेलू 9413143883 किशनलाल धारणिया 9414429334 मनीराम डेलू .01531-250351 रामधन भादू 01531-220517 भवरलाल बागुडा 9413105248 रविशंकर बैनीवाल 9414414712 रामप्रताप पूनियाँ गणेशाराम गोदारा 9414967929 9414138315 जगदीश गोदारा 9414648816 रामेश्वर डेलू 9928229649