Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Suhagrat Part -2

Malviya, Krishnakant · 2010/01

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वैवाहिक निवन्धावली-४
केवल पतियो के लिए
सुहागरात
(भाग २)
या
पतियों को सीख
अपने प्रेमियों के नाम
विवाह करके भी मनुष्य कैसे सुखी रह सकता है?
कृष्णकान्त मालवीय
पोस्टेज पैकिङ्ग अलग]
स०२००२
[ सजिद ५)

प्रकाशक- पं० पद्मकान्त मालवीय अभ्युदय प्रेस, प्रयाग। सर्वाधिकार रक्षित है। किसी को भी प्रकाशक की आज्ञा के बिना इस पुस्तक को छापने, अनुवाद करने या प्रकाशित करने का अधिकार नहीं है। मुद्रक- श्री० एम० एल० पाण्डेय, अभ्युदय प्रेस, प्रयाग।

विषय-सूची पृष्ठ-संख्या १ ३ ६७ १ १६ विषय तीसरे संस्करण की भूमिका हमारा निवेदन समर्पण (१) प्रियतमा को प्रसन्न रखने के उपाय (२) सन्तान-निग्रह (३) प्रेम का नशा उतर जाता है (४) पति-पत्नी के झगड़े (५) झगड़ों को अन्त करने की कला (६) तलाक (७) प्रेम में धोखा विश्वासघात है (८) प्रेम स्थायी हो नहीं सकता (६) विवाह का उद्देश्य और इन्द्रिय-निग्रह २८ ४० .. ७६ १२ १०५ ११६ . परिशिष्ट-भाग (१) रजिया की समस्या (२) समस्या का हल (३) विवाह के सात नियम (४) स्त्री, पुरुप और प्रेम (५) प्रेम और सम्पत्ति (६) प्रेम के विवाह से कर्तव्य का विवाह श्रेष्ठ है . (७) विवाह के प्राचीन क्रम... . १३० १४१ १७१ १७२ १७४ १७६ १७८ ... . .. ...

पृष्ठ-संख्या १८० १८१ १८२ .. १८६ १६६ २०० २०२ २०५ [ २ ] विपय (८) स्त्री-धन (६) विधवा विवाह (१०) विवाह-विच्छेद (११) कामवासना का दमन कैसे किया जाय (१२) विवाह के अन्तर शैय्या-विधान (१३) सुहागरात्रि-सम्बन्धी उपदेश (१४) चन्द्रकला निरूपणम् (१५) स्त्रीणा द्रावणोपायः (१६) मदनोदय (१७) स्त्री-शरीर की नाड़ियों से पुत्र तथा पुत्री (१८) सन्तान प्राप्ति के उपाय (१८) पुत्र कैसे हो ? (२०) गर्भधारणोपाय (२१) बांस की परीक्षा (२२) वाजीकरण (१३) रतिमल्लताप्राप्ति का उपाय (२४) स्त्रियों के विराग के कारण (२५) नारीवशीकरण (२६) स्वरोदय और स्वास्थ्य (२७) पतियों को आदेश (२८) दीर्घजीवी होने के उपाय २०६ २११ ... २१३ २१४ २१६ २१८ २१६ २२० ૨૨૬ ૨૭ द्वितीय संस्करण की भूमिका 'नुहागरात' या 'पतियों को सौख' का सस्करण, सन् १९३९ में ही समाप्त हो गया था। उसके बाद मैं नजरबन्द कर दिया गया और पूज्य पिता जी के स्वर्गारोहण के समय पेरोल पर छूट कर पाया तो मेरा अधिक दिनों तक जेल से बाहर रह मकना इतना अनिश्चित था कि मैंने 'अभ्युदय', अभ्युदय प्रेस, तथा अपनी समस्त प्रकाशित पुस्तकों की बिक्री इत्यादि का सारा मार सुप्रसिद्ध स्थानीय फर्म 'इडियन प्रेस प्रयाग' को सौंप दिया था। कागज की कमी और छपाई इत्यादि का समुचित प्रबंधन हो सकने के कारण मुहागरात का दूसरा सस्करण माग और उच्छा रहते हुये मी इससे पहले मैं प्रकाशित नहीं कर सका। इसका मुझे दुख है। अब मौका मिला है तो 'सुहागरात' के तीनों भागों को मैं फिर से प्रकाशित कर रहा हूँ पुस्तकें जल्दी म छपी है और यत्र-तत्र उनमें मूले रह नाना समव है किन्तु हमारा विश्वास है कि पाठक उदारतापूर्वक उन भूलों को दृष्टिगोचर कर देंगे द्वितीय सस्करण होने के बाद सुहागरान के उर्दू, गुरुमुखा, गुजराती, इत्यादि देशी भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुके है । पुस्तक की उपयोगिता का यह ज्वलन्न प्रमाण है। पुस्तक की उपयोगिता प्रान भी वैसी है जैमी आज में पहले थी इसमें मुझे सन्देह नहीं। 'सुहागरात' के द्वितीय सस्करण का मूल्य सादेतीन रुपये था। वर्तमान काल की देखते हुये उसके मूल्य में एक रुपये की वृद्धि कुछ भी नहीं है । फिर भी इस मूल्य वृद्धि के लिए हम पाठकों से क्षमा प्रार्थी हैं। इन थोड़े से शब्दों के साथ में 'सुहागरात' की यह पुस्तक पाठकों के हाथों में सप्रेम समर्पित करता हूँ। भारती भवन पद्मकान्त मालवीय २०.१.४६

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हमारा निवेदन "Joint life is by no means a bed of roses, but it is a supreme test of love". वैवाहिक-जीवन अधिकतर लिया और पुरुषों का दुखमय नहीं हुआ करता । अधिकतर पति इच्छा रखते हुए भी अपनी पत्नी को प्रसन्न नहीं रख सकते, इसी प्रकार से अधिकतर पत्नियां अपने पति को मुली नहीं रख सकती। हम लोगों में विद्या का अभाव है, शिक्षा का, जैना चाहिये, हम लोगों में प्रचार नहीं और सुखी जीवन किसको कहते हैं इसकी परिभाषा भी हम लोग नहीं जानते। बड़े कुटुम्ब का एक अङ्ग होकर रहना ही-जब कि सभी लोगों का एक ही तरह का मिज़ान नहीं, एक ही प्रकार की रुचि नहीं, एक ही आदर्श और एक ही समान ध्येय नहीं, जब कि पुष और बी-विभाग के मस्तिष्कों में जमीन आवमान का अन्तर है-सब दुःखों का एक मात्र कारण है ऐसा हम नहीं मान सकते । पैसे की कमी, सासुओं की प्रसिद्ध प्राधि- पत्य की लालसा, माता, पुत्र और वह के दृष्टिकोणों और आदर्शों में पर्क, तथा विद्या के अभाव के कारण श्री-अङ्ग की अनुदारता, संकु- चित-हृदयता और उसके पुरातन पूजा के प्रेम आदि केमाये भी संसार के समस्त दुःखों का भार हम नहीं लाद सकते। पुरुष अङ्ग अङ्गरेज़ी पढ़ हवा में उड़ने लगा है, शिक्षा ने उसे उदार बना दिया है, उसकी भावनाएँ, कामनाएँ दूसरी हैं. उनकी आकांक्षाएँ दूनरी हैं, संचार के वैवाहिक-अवस्या किती दृष्टि से भी फूलो की सेन नहीं है, यह प्रेम की सर्वोत्तम कसौटी है। 5.का.मा.

( ४ ) जीवन संग्राम ने उसे नई नई शिक्षाएँ दे दी हैं जब कि समाज का स्त्री अङ्ग हजारों कोस पीछे पड़ा हुआ है और इसीलिये पति पत्नी के जीवन मेल नहीं खाते, उनमें स्वरैक्यक्ष तथा साम्य नहीं होता और इसी कारण से वे जितने सुखी हो सकते हैं नहीं हो पाते हम इसको भी मानने को तैयार नहीं। "सबसे भले विमूढ़ जिनहिं न जाये जगत्-गति" की कहावत के अनुसार हम लोग मूढी को ही सुखी समझ लें, सो भी ठीक नहीं है। हा; यह हो सकता है कि सुख क्या है यह न जानने के कारण, उच्चादों के अभाव के कारण, कृप-मण्डक होने के कारण वे दुःख को सुख समझ लें और जो वातें हम लोगों को हृदय में शूल सी लगती हो, वे उनको राह में पड़ी हुई ककड़ियों के समान भी न दिखाई दें। साधारण विद्या और धन से हम लोग ससार के, विशेप कर, वैवाहिक जीवन के समस्त सुखों को मोल ले सकते हैं यह समझना भी ठीक न होगा, साथ ही यह समझना कि शिक्षा प्रात धनी पति पत्नी जो अकेले अपनी कोठी अलग बना कर रहते हैं, केवल इन्हीं कारणों से सुखी हो सकते हैं यह भी ठीक नहीं है भारत का जिक्र ही क्या, यूरोप और अमरीका में पति पत्नी प्रायः पढ़े लिखे होते हैं, वे माता-पिता, भाई-बन्दों से अलग भी रहते हैं, स्वराज्य के कारण उनके घरों में भारत के समान दारिद्रय भी नहीं है फिर भी वहा के वैवाहिक जीवनों के सम्बन्ध में एक विशेषज्ञ का . कहना है- चार विवाहित जोड़ों में से एक जोड़ा किसी तरह से सफल *Harmony t"Speaking broadly, I should say that only one marriage in four may be judged as even tolerably successful and a very much smaller proportion! can fairly be considered as really happy" (५) समझा जा सकता है और वास्तव मे सुखी वैवाहिक-जीवन वाले जोड़ों की सख्या तो बहुत ही कम है।" अभी कुछ ही दिन हुये प्रयाग के गोरे पत्र "पायोनीयर" ने पश्चिमीय प्रदेशों में तलाक के मुकदमो की नित्य प्रति बढ़ती हुई संख्या पर खेद प्रकट करते हुये लिखा थाक्ष- "इतनी अधिक संख्या में पुरुष-गण मे योग्यता, संकल्प और अच्छे भाव नहीं कि वे अपने वैवाहिक जीवन को सुखी बना सकें। इनमें अधिकतर जीवन के अन्य विभागों में सफलता लाभ कर लेते है। इतनी अधिक संख्या में वैवाहिक सम्बन्ध का असफल होना यह विद्ध करता है कि मानव समाज में ही कहीं पर कोई भारी गड़बड़ है।" इन सब बातों से हमारे इस मत का "विद्या, धन, या माता, पिता, बन्धु-बान्धवों से अलग रहने से ही पति और पत्नी सुखी नहीं हो सकते" समर्थन होता है स्त्री-पुरुष का वैवाहिक जीवन सफल और सुखमय हो इसके लिये हमारी समझ में आवश्यक यह है कि दोनों एक दूसरे की विशेषताओं और त्रुटियों को जाने, उनले भले प्रकार परिचित हों, दोनों एक दूसरे के सम्बन्ध में उदारता के साथ विचार कर सकें, दोनों एक दूसरे से अपना विकास प्राप्त कर सकें, दोनो अपने अपने उत्तरदायित्वो और कर्तव्यों को जानते हुए प्रत्येक मिनट उनके पालन के लिए उद्यत हों दोनों एक दूसरे के लिए हरदम अधिक से अधिक त्याग करने को तैयार हों, दोनों एक दूमरे को प्रसन्न करने की *"So many men and women lack the aptitude, capacity, good will and determination to make their marriages successful Large numbers of them are not wanting in brains for commerce, the professions and other useful and respectable duties of modern life. These marriage failures prove that there is something very wrong with humanity."

( ६ ) कीमियां को जानते हों और उनके हृदयों में एक दूसरे को प्रसन्न रखने की उत्कट वाल्छा और लालसा हो, दोनों सयमी हो, समान- शील, आचार-विचार और रुचिवाले हैं।, दोनो ही मे कुछ तो ज़रूरी ही ( mental and sexual affinity ) मस्तिष्क और रति- सम्बन्धी साम्य हो और दोनों ही प्रेम की विद्या, प्रेम के विज्ञान, प्रेम को कला और प्रेम के शास्त्र के अधिक नहीं तो कुछ ही जानकार जरूर हों। हमारी प्राचीन प्रथा यह थी कि हम को काम-शास्त्र की भी कुछ शिक्षा मिल जाती थी, ऋपि-मुनि भी इस शास्त्र का विवेचन करते थे और इसके सम्बन्ध में अन्य लिखते थे। आज यह सब कुछ नहीं है। यही नहीं, ये पुस्तके सहसा अब मिलती भी नहीं, जो मिलती भी हैं, उनम कुछ होता नहीं और अधिकतर इनमे नाम से धोखा दे धन कमाने मात्र के लिए होती हैं। इस सम्बन्ध में सरकारी रुकावटे भी हैं। हमारा निवेदन यह है कि इन पुस्तकों की कुछ वातों को छोड़ कर जिनसे प्रत्येक मनुष्य को लाभ नहीं, वाकी सव का ज्ञान एक सुखी वैवाहिक जीवन की इच्छा रखने वाले सद् गृहस्प के लिए आवश्यक हैं। हमारा निवेदन देश के विद्वानो तथा अधिकारियों से इसलिए यह है कि वे "कामशास्त्र", "रतिरहस्य", "अनारङ्ग' "नागर सर्वस्वम्" आदि मे लिखी हुई बातों के सम्बन्ध में खोज कराये और अनावश्यक्र, हानिकर तया जिन बातों को प्रकट करना वे हितकर न समझे उनको छोड़ कर एक अन्य नवविवाहित युवक और युवतियों के लिए, हम सदृश दो चार पुस्तकों को पढ़कर, लैभग्गू लिख्खाडों के हाथ से नहीं, वरन् काशी के प्रसिद्ध विद्वान श्रद्धय वावू भगवान दास जी सदृश अधिकारी, अगरेजी और प्रगाढ़ विद्वानों के हाथ से निर्माण करा दें। काम के शास्त्र और उसकी कला का ज्ञान वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने में बहुत कुछ सहायक हो सकता है, सस्कृत के ( ७ ) ऐसा हमारा विश्वास है। क्योंकि इससे काम की कला में निपुण हो वे एक दूसरे की तृप्ति में सहायक होंगे और यह तृप्ति उनके अमुखी जीवन को भी बहुत कुछ सुखमय बनाने में समर्थ हो सकेगी। "वात्स्यायन तथा अन्य कितने ही प्राचीन पाचायों ने काम- शास्त्र के ज्ञान की उपयोगिता और आवश्यकता को अपनी प्रभाव- शालिनी भाषा में जोरों से सिद्ध किया है। अभी हाल ही में इजलैण्ड के स्त्री-पुरुष सम्बन्धी ज्ञान ( Sex Psychology ) के सर्वश्रेष्ट विशेषज्ञ डा. नार्मन हेयर ने तो यहाँ तक लिख डाला है- स्त्रियों और पुरुषों को काम के विज्ञान और कला की कुछ शिक्षा जरूर देनी चाहिए। अगर इसके कारण वैवाहिक-जीवन प्रारम्भ होने के पहिले, कुमार और कुमारी की अवस्था में ही मार्ग से भ्रष्ट होने का भय हो तो चिन्ता की बात नहीं क्योंकि यह असम्भव नहीं कि आगे आने वाली सन्तान इसे भी बुरा न समझ और मान्य कर ले।" अमरीकन जज लिएडसे का कहना है- "युवकों और युवतियों को इस प्रकार की शिक्षा दे देने से बहुत से दोष समाज से श्राप से पाप ही दूर हो जायेंगे।" *For this at least will help them in having sexual adjustment and once this has been attained one thousand and one other differences in married life pale into insignificance कृ.का. मा० + Men and women should learn something of the Science and art of Love ...If this involves somo promarital experience posterity may learn to accept at”. "Education in the young in the wide subject of sex would sweep most of this evil out of existence. ...

(८) वैवाहिक जीवन और विवाह-बन्धन से बंधे हुए जीवों को सुखी बनाना ही वास्तव में कामशास्त्र का प्रयोजन भी है। कहा भी है:- "असाध्यायाः सुखं सिद्धिः सिद्धायाश्चानुरंजनम् रवायाश्च रति. सम्यक् कामशास्त्र प्रयोजनम्" [रतिरहस्य] "रिवोल्ट आव यूर्य" नाम की पुस्तक में अमरीका के जज लिएडसे ने लिखा है- ऐसी पुस्तके भी हैं जिनमें उन विषयों की चर्चा है, सभ्य समाज में जिनकी चर्चा भी पाप है। इस प्रकार की पुस्तके उप- योगी बहुत हैं । इनका पठन-पाठन आवश्यक है और इनके प्रकाशन मे रोक टोक न होनी चाहिए।" सकोच की बात है किन्तु है यह सर्वश्रेष्ठ सत्य कि आज दिन के वैवाहिक जीवनों की असफलता और दुःखों का एक प्रधान और सब से नवदत्त कारण रति-संबन्धी और रति-जनित असौख्य और असन्तोष (Sexual unhappiress) है। डा० हेयर का भी ख्याल कुछ ऐसा ही है। उन्होंने लिखा है:- -There is also a class of book that deal with subjects conventionally forbidden, but whose value to society is undeniable. They are not intended for immature minds, but there should be other methods than censorship of protecting such minds aginst them The destruction and suppression of such sources of truth for such reasons involves the payment by society of too bigh a price for the advantages that it may gain" :- (६ ) व वाहिक जीवन के अमौख्य की अधिकता अधिकतर रति- जनित असौख्य और असन्तोष का प्रतिफल मात्र है।" कामशास्त्र के विज्ञान और कला के समुचित ज्ञान से हमारी समझ मे यह उपयुक्त कारण कम से कम बहुत अंशों में दूर हो जायगा। "अनारङ्ग" मे लिखा है "रतेः सुखस्य शानाय रतिशास्त्र समभ्यसेत् ज्ञात्वा कर्माणि कुर्वीत तत्रानन्दो भवेद् ध्रुवम् अन्यथा" नचानन्दो न च सुखं दुःखस्यैवतु कारणम्" "नागर सर्वस्वम्" में तो यहा तक लिखा हुआ है:- "अगाह महेश्वरः एवं ..."नारी नान्यमिच्छति मानवम् । क्लीवोऽपि हृदयं तस्याः प्राप्नोत्येव न संशयः [तस्याः स्त्रियाः हृदयं क्लीवोऽपि पुरुषः प्रामोति, संशयो न] इति नरैर्विधिना परिसेविता परमशर्म समेत्य नितम्बिनी। तृणवर्जितजीवित निस्पृहा त्यजति याम्यपुरेऽपि न वल्लभम् ॥" dio .. ... तथा चाह महेश्वरः- "इति चिन्तित मात्रेण स्त्रीणा तृप्तिः प्रजायते । विनाऽपि 'ससर्गेण वरानने ॥ *"This frequency of unhappiness is only one manifestation of a widespread sexual unhappiness".

( १० ) उपयुक्त अन्य के प्रत्यकर्ता का दावा है कि क्लीव मनुष्य उसके आदेशानुसार आचरण कर स्त्री के हृदय का सम्राट बन सकता है और वह भी ऐसा कि यमपुरी में जाकर भी स्त्री उससे विलग न होना चाहे, यही नहीं उसका दावा यह भी है कि उसके श्रादेशानुसार पाच- रण करने से चिन्ता मात्र से विना समर्ग के ही स्त्री को पूर्ण तृप्ति प्राप्त हो सकती है। "कामशास्त्र' या तत्सम्बन्धी बातें गन्दी है, धान्यभिचार-जनक और अश्लील है, यह आर्य तया भारतीय नहीं वरन् पश्चिमीय, खोखन्नी और इन्द्रियपरायणता पर स्तम्मित-सम्यता का विचार है। बात यह है कि पश्चिमीय सभ्यता वस्तु या तथ्य वातों पर स्तम्मित नहीं है, उसमें खोखलापन और वाह्य आडम्बर बहुत है और आत्मा को नहीं बड़ को ही उसने सब कुछ समझ लिया है। आर्यसभ्यता इससे बिलकुल मिन्न है और इसीलिये दोनों के दृष्टिकोणों में इतना फ़र्क है । किसी भारतीय का नहीं वरन् एक प्रसिद्ध अगरेज लेखक का कथन है "पूर्वीय देशों में साधारणत.पुरुषों को त्रियों की शारीरिक नुष्टि के रहस्य की शिक्षा दी जाती है। हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली इन ओर से आँख फेरे हुए है और इस कारण ने गार्हस्थ्य जीवन दुःखम्य * Immoral Obscene *Moslemas"and Easterns, in general study the art and mystery of satisfying the physical woman I have noticed among barbarins the system of "making men", that is of teaching lads first arrived at puberty nice conduct of the instrumentum paratum platandıs civibus, a branch of knowledge-tree which our morden education grossly neglects, thereby entailing untold miseries upon individuals, families and generations The mock virtue, the most immodest modesty of England and of the ( ११ ) हो गया है। पूर्वीय देशो में बड़े-बड़े विद्वान और धर्म के प्रचारक भी इन विषयों पर पुस्तक लिखते हैं . ......" "सहस्सरजनीचरित्र" अलिफलैला या जो अगरेजी में "अरेबियन नाइट्स" के नाम से प्रसिद्ध है वह भी प्रायः इसी प्रकार का एक अन्य है यद्यपि जो संस्करण संसार में प्रकाशित हो रहे हैं, उनमें से इस प्रकार की सब बातें निकाल दी गयी है और इस तरह वह केवल बच्चों के मनो- रञ्जन की कथा मात्र के रूप में रह गया है। कैप्टन सर रिचर्ड एफ़ वर्टन ने असली "अरेवियन नाइट्स" के अगरेजी संस्करण* की भूमिका में लिखा है:- ""सर विलियम जोन्त ने बहुत दिन हुए लिखा था कि कोई प्राकृतिक वस्तु भी अश्लील और व्यभिचार-जनक हो सकती है यह भाव ही भारतीयों या उनके कानून बनाने वालों के हृदय में कभी नहीं उठा, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं था कि यह किसी United State iu XIX century, pronounces the subject foul and fulsome, society sickens at all details, and hence it is said abroad that the English have the finest woman in Europe and least know how to use them. Throughout the East such studies are aided by a long series of volumes, many of them written by learned physiologists, by men of social standing and by religous in high office (Vol. VIII, pp. 179-180, Terminal Essays) *कह नहीं सकते, ठीक कहां तक है, किन्तु सुनते हैं कि १५००) या १६००) में यह र स्करण मिलता है। कृ० का० मा० {"As Sir William Jones observed long ago, that anything natural can be offensively obscene never seems to have occurred to the Indians or to their legislators, singularity pervading their writings and conversation, but no proof of moral depavity. For ( १२ ) . दृष्टि से भी उनके नैतिक पतन का द्योतक है। अश्लोल श्रादि के भाव का समय और देश से घनिष्ट सम्बन्ध होता है, जो वात इङ्गलेण्ड में अश्लील हो वही संभव है मिश्र मे अश्लील न मानी जाय' इटली के प्राचीन ग्रन्थों में भी बोकेशियो का एक डी. केमरन" नाम का ग्रन्थ है। इसमे दस रात्रियों की कथाएँ हैं और इसी तरह की कयाएँ हैं किन्तु पश्चिमीय सभ्यता ने इसमें भी काट-छाट कर दी है और अव अगरेजी में इस ग्रन्थ का भी सहन-रजनी-चरित्र की भाति ही एक पवित्र सस्करण प्रकाशित होता है। हमारा ख्याल यह है कि इन पुस्तकों का देशों की सामाजिक स्थिति की आवश्यकता से सम्बन्ध था, वहा के रहन-सहन के यह अनुकूल होती थीं, इनसे समाज के सामाजिक तथा नैतिक नियमों (Social virtues) का ज्ञान होता था, साथ ही इनसे पढ़ने- वालों को कामशास्त्र सम्बन्धी साधाराण शिक्षाएँ सहज में हो मनोरक्षक रूप में मिल जाया करती थीं। किन्तु सभ्यताओं के संघर्ष से, एक के शक्तिशालिनी और दूसरी के दासी होने से, हमारी विशेषताएँ जाती रहीं, दूसरों का रङ्ग हम पर चढ गया, उनके विचार हमारे विचार हो instrance, the European novelist marries of bis hero and heroine and leaves them to consummate marriage in privacy even Tom Jones has the decency to bolt the door. But the Eastern story teller, especially, this unknown prose Shakespeare, must usher you, with a flourish, into the bridal chamber and narrate to you with infinite Eusto, everything he sees and hears Again we must remember that grossness and indecency, in fact les terpitudes, are matters of time and place, what is offensive in England is not so in Egypt, what scandalıses us now would have been a tame joke temporc Elisa" (Vo I, p. XXV in Foreword) ( १३ ) गये और इस कारण से हमारी स्थिति में जो शिक्षा हमारे अनुकूल और उपयोगी थी, हम उसे गन्दी और हानिकर समझने लगे। निकट भूतकाल से कामुकता को प्रदीप्त करनेवाले तृतीय और चतुर्य श्रेणी के लेखकों ने भी गन्दी पुस्तकों को लिख-लिख कर, इन पुस्तकों के प्रति हमारी घृणा को उचित और सार्थक बना दिया । हम लोगों को एक बात और भी ध्यान में रखनी चाहिए । निकट भूतकाल, आधुनिककाल और प्राचीनभूत में भी हमारे श्राचार्यों ने "गान्धर्व विवाह, ( Love marriage) या प्रेम के विवाह को कभी श्रेष्ठ नहीं माना वह लोग इसकी निस्सारता को जानते थे, अपने विशिष्टज्ञान और दूरदर्शिता से जो आज दिन यूरोप और अमरीका मे हो रहा है, इसको उन लोगों ने सोच लिया हो तो भी असम्भव नहीं। हमारे प्राचार्यों ने गान्धर्व विवाह की निन्दा तो नहीं की किन्तु इसे उन लोगों ने सदा "मध्यम' कहा। "सिद्धा यतो विवाहात् तनयत्यनुरागमुत्कट सुखदम् । गान्धर्वो मध्योऽपि हि सदयोगात्पूनितस्तस्मात् ॥ [कन्दर्प चूड़ामणि] यद्यपि एक प्राचार्य का मत यह था:- एके तु चित्त नयने यस्यो पुरुषस्य चानुरज्येते तस्यामृद्धिम प्राहुस्तदभावे लक्षण विफलम् ॥ अर्थात् जिस कन्या में पुरुप का मन अनुक्त हो उसी से वह विवाह करे स्वैदिक विवाह से सिद्ध स्त्री बहुत ही सुखदायक अनुराग को उत्पन्न करती है; गान्धर्व-विवाह अच्छा है पर मध्यम है, अन्य विवाह पूजित हैं। यित्यामनश्चक्षुषोनिबन्धस्तस्यामृद्विः । नेतरामाद्रियेत् । इत्येके वात्स्यायनः A man will find happiness and prosperity in such ( १४ ) किन्तु यह सर्वमान्य हुआ नहीं। माता पिता अपनी मर्जी मे अपने पुत्रों और पुत्रियो का सम्बन्ध करते थे; हा, दिन के माता-पिताओं की भांति, अखि बन्द कर, किसी स्वार्थ या बुद्धि-हिनता से वह सहसा प्रेरित नहीं होते थे। विवाह हम लोगों में एक सामाजिक ही नहीं वरन् धार्मिक बन्धन भी होता था। यह एक प्रेम सी अस्थायी वस्तु से विहीन, सब ताप, जोश और गर्म खून की वातों से दूर, उम्णता-विहीन जीवन का सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य होता था। साथ खेलने धूमने-फिरने का सवाल ही कहा, निकट भूत और आधुनिक काल में वर-वधू एक दूसरे की सूरत-सीरत से भी अनभिज्ञ होते थे। दोनों के प्रेम का प्रश्न उठता ही नहीं था क्योंकि वैवाहिक जीवन की नींव धर्म तथा कर्तव्य मानी गयी थी। बन्धन मजबूत हो और स्त्री अपने पद से सन्तुष्ट रहे इसी लिए हमारी समझ में विवाह के साथ इहलोक और परलोक का सम्बन्ध था और स्त्री को सहधर्मिणी अर्धाङ्गिनी का ऊँचा से ऊँचा, पवित्र और आदर का स्थान दिया गया था जीव स्त्री के लिए यह सव या साथ ही जड़ भान (Physical' ) स्त्री की तुष्टि के लिए काम-शास्त्र की रचना कर दी गयी थी क्योंकि हमारे प्राचार्यों से यह छिपा न था कि स्त्री संसार के समस्त अभावों को किसी न किसी तरह सहन कर सकती है और अगर कुछ उमे सह्य नहीं है तो वह है केवल रति-जनित असौख्य और असन्तोष। इससे उसे मम वेदना होती है साथ ही इससे उसके विकास में व्याघात भी पहुंचता है। भारत में ही क्यों, जापान में भी प्रेम का विवाह ( Lore marriage ) सबसे बड़ा पाप समझा जाता था। बालिका के लिए a woman who creates love in his mind and brings pleasure to his eyes at first sight He should marry such a woman only, not any other, provided she's satisfactory in other respects.

( १. ) इससे वडा कोई दूषण ही नहीं था । वालि का, माता पिता के सुख के लिए, उनके कर्ज को अदा करने के लिए वेश्यावृत्ति तक धारण कर ले यह वालिका के लिए प्रशसा की बात थी किन्तु यदि कहीं वह प्रेम का विवाह कर ले तो वह घृण्य हो जाती थी। प्रेम का, विवाह के सम्बन्ध में कहीं ज़िक्र ही नहीं था। यहां की आवश्यकताए दूसरी थीं, पश्चिम की आवश्यकताए दूसरी थी, और अपनी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति का विधान समय की सभ्यता करती थी। हमारे टीका टिप्पणी करने वालों को इसलिए सब बातो पर ध्यान देकर ही राय देनी चाहिए । यूरोप के लिए जो ठीक है वही भारत के लिए भी हो यह वीक नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे कि भारत के लिए जो ठीक है वह यूरोप के लिए भी ठीक नहीं हो सकता। इन सब बातों और विशेष कर विवाह सम्बन्धी वातो पर विचार करते समय हमको यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि पूर्वीय देशों में उनके गर्म प्रदेश होने से, साथ ही कमजोरी कामुकता और ऐयाशी की अत्यधिक वृद्धि हो जाने से बालिकाएं जल्दी अभिवृद्धि प्रास कर लेती हैं, साथ ही ग्यारह से अठारह तक की अवस्था शीघ्र ही प्रज्वलित और उत्तेजित होने वाली अक्त्या है और इस समय में युवक और युवतियों का सम्मिलन भयावह हो सकता है। हमारे देश में हमारी समझ में इसीलिए युवकों का युवतियों से मिलना, उन पर विवाह के अर्थ प्रेम प्रकट करना (Courtship and Wooing ) हानिकर समझा गया और इसीलिए हमारे देश में प्रेम के सम्बन्ध ( Love marriage) की प्रथा ही नहीं प्रचलित की गयी। पश्चिमीय प्रदेशों में, वर्वर दशा और गरीबी से त्रस्त होने के कारण, साथ ही शीत प्रधान होने के कारण वालिकाएं देर से *कामुकता की वृद्धि के कारण अमरीका से ठण्ड मुल्क में अब ११, १२, १३, १४, वर्ष की अवस्याश्रों की स्कूलों मे पढ़ती हुई कन्याए माताएं हो रही हैं। कृ० का०मा० (१६) अभिवृद्धि प्राप्त करती थीं और हैं भी, मुल्क ही ठण्ढा है, इसलिए वहा बालक और वालिकाएं अधिक अवस्था तक बिना किसी क्षति के एक दूसरे से मिल जुल सकते हैं और इसीलिए विवाह का वन्धन सर्व श्रेष्ठ वहा मस्तिष्क तथा हृदय का हुआ । वहा सामाजिक तथा मस्तिष्क सम्बन्धी साम्य (Social and mental affinity) की नींव पर विवाह इस तरह स्तम्भित हुआ, इन्हीं साम्यों की वहा फिक होती है किन्तु कदाचित् यह नींव स्थाई न हो, जैसा कि पश्चिमीय प्रदेशों में अब प्रकट भी हो रहा है, यही सोचकर हमारे प्राचार्यों ने भारतीय विवाह को धार्मिक तथा रति-सम्वन्धी साम्य ( Religious affinity, *and Sexual affinity ) और कर्तव्य के साम्य की नींव पर स्थापित किया। यूरोप और अमरीका में जो दिखाई दे रहा है उसे देखते हुए हमको यह स्वीकार करना होगा कि कम से कम हमारी दशा इस संबन्ध में उनसे अच्छी नहीं है तो स्वराव भी नहीं है। हमको यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि अव यूरोपीय विद्वान् भी ( Sexual affinity) रति-सम्बन्धी साम्य और कर्तव्य को प्रधानता देने के लिए चिल्ला रहे हैं । स्त्री अपनी ओर से अपनी बुद्धि और शक्ति के अनुसार ययाशक्ति प्रयत्न करती है, एक दासी की भांति वह पतिदेव की सेवा में रत रहती है किन्तु फिर भी उसको वह सुख नहीं मिलता जिसकी वह अधिकारिणी है और जिसके लिए वह अपना जीवन और सर्वस्व अपने पति के चरणों में अर्पण करती है। दूसरी ओर पति गृहस्थी सञ्चालन और धन सञ्चय करने में बैल सा जुता रहता है और फिर भी उसे सच्चा सुख नसीव नहीं होता। ससार की इस समय सबसे विपम समस्या यही है *इसीलिए काम शास्त्र की रचना और उसके ज्ञान का प्रयोजन भी है। कृ.का.मा.

( १७ ) पुरुप, पुरुष है, नायक है, कर्त्ता है, इसलिए उत्तरदायित्व उस पर विशेष है, वह भरसक प्रयत्न भी करता है फिर भी सौ में निन्यानवे पुरुष सफल नहीं होते क्योंकि स्त्री-प्रकृति का उनको ज्ञान नहीं इसका पता ही नहीं कि स्त्री है क्या । वह एक अोर अपने आधिपत्य में भूले हुए स्वयम् उसे जानने की कुछ कोशिश नहीं करते दूसरी ओर अत्यन्त लज्जाशीला होने के कारण, स्वयम् अपने को ही अच्छी तरह न जानने के कारण और प्रकृति के प्रबन्ध से स्त्री अधिक गम्भीर और अजय है। वह अपनी बातों के सम्बन्ध में अधिकतर चुप रहना पसन्द करती है। सदियों से अपनी कामनाओं को दवाते और छिपाते-छिपाते वह सलज्जा हो गई है और इसलिए पतिदेव को जो मालूम हो सकना चाहिए वह भी नहीं मालूम होता । पप्तिदेव अपनी धुन में दीवाने रहते हैं, अपने को सर्वज्ञ समझते हुए पग-पग पर तनिक-तनिक सी साधारण वातों में भूलें करते हैं और नतीजा यह होता है कि जीवन क्षार हो जाता है और सुख का साम्राज्य नष्ट हो जाता है। हा, अपनी मूर्खतावश हम जो चाहें समझा करें। पति अपने गृह के साम्राज्य को अधिक कएटक-विहीन और सुखी बना सके साथ ही गृहलक्ष्मी के मन्दिरों में दुःखों का दारिद्रय हो इसलिए एक विवाहिता स्त्री के अपने कुमारी-जीवन के प्रेमियों तथा मित्रों को, विवाहिता-जीवन के लिखे हुए कुछ पत्रों का संग्रह हम प्रकाशित कर रहें हैं । लेखिका स्त्री पूर्णशिक्षा प्राप्त है, पश्चिमीय शिक्षा की दीक्षा से दीक्षित है, बचपन से ही पश्चिमीय वातावरण में पली है और शिक्षापूर्ण होने के बाद पूर्ण वयस्का होने पर, अपने माता-पिता की प्रसन्नता से, अपनी रुचि के आदेशानुसार उसने विवाह किया है । पत्र उन नवयुवकों को लिखे गये हैं जो उसके मित्र थे और एक समय उसके पाणिग्रहण के लिए लालायित थे किन्तु जिनको उसने अपने योग्य नहीं समझा । पत्रों के सम्बन्ध में हम इतना और कह देना चाहते है कि वे पतिदेव की जान में लिखे गये हैं। इन पत्रों में स्त्री ने अपने में ( १८ ) प्रमियों का ध्यान उनकी विशेष त्रुटियों की ओर आकृष्ट किया है और स्त्री-हृदय की बातों को निःसङ्कोच हो कर कह दिया है। सम्भव है इन प्रोमियों में कोई हमसे श्रापसे मिलता-जुलता हो, कोई हमारा या आपका ही दूसरा शरीर हो, किती की त्रुटियां हम में श्राप में मौजूद हों। इन त्रुटियो को जान कर हम सब स्त्री-प्रकृति को समझ सकें, अपने को अपनी पत्नी को अधिक सुखी बनाने के योग्य बना सके, अपने गृहों को अधिक सुख का स्थल बना सके और अपने वैवाहिक- जीवन को अधिक सुखमय बना सके, पुस्तक का उद्देश्य यही है। वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने की जितनी बातें हो सकती है, "मनोरमा” ने, निस्सन्देह ही सूत्र रूप में, सब की ओर अपने पत्रों में इशारा कर दिया है। एक दो वातें उसने नहीं कही है, स्त्री होती हुई, पुरुषों से कुछ बातों के कहने में उसे स्वाभाविक संकोच था और इसीलिए हम इन बातों की चर्चा यहा पर कर देना जरूरी समझते हैं। सब से पहिली बात सुहागरात के सम्बन्ध की है। इस सम्बंध की सारी बातें जो पतियों को मालूम होनी चाहिए , सुखमय वैवाहिक जीवन की इच्छा रखने वाले पतियों के लिए ही, हमने अपनी "सोहागरात" प्रथम भाग नाम की पुस्तक में लिख दी है, और उनको प्रत्येक पति को जान लेना चाहिए। किन्तु उनके साथ ही साथ हम विशेष रूप से पतियों सेएक दो बात यहां पर कह देना चाहते हैं क्योंकि "सोहागरात की लेखिका “शान्ति स्त्री होती हुई, सभी वातों को कह नहीं सकती थी, साथ ही वह पुस्तक त्रियों के लिए है इसलिए आवश्यकता से अधिक वा उनमें हम भी नहीं कह सकते थे। सब से पहिली वात जो हम कहना चाहते हैं यह है कि सुहागरात की प्रथा को हम लोगों को एक दम उड़ा देना चाहिए। समय और आवश्यकता के अनुकूश ही प्रथा भी होनी चाहिए । जव विवाह वर्ष की अवस्था में होता था, वधू वड़ी होती होती दस पाच वार ससुराल में रह जाया करती थी और न किसी ख्याल से सही तो भी ( १६ ) केवल पति-भत्ता होने से पति से प्रेम नहीं तो पति में भक्ति तो वह रखने ही लगती थी। वे एक दूसरे को रोज़ घर में काम करते, उठते बैठते देखते थे। समय से एक तरह का प्रेम दोनों मे हो ही जाया करता था और तब चार पाच वर्ष एक दूसरे को जानने के बाद सुहागरात की प्रथा काम-वासना की तृप्ति के लिए नहीं, पवित्र गर्भाधा- न के लिए मन्त्र तथा पूजा द्वारा विधि के अनुसार होती थी । इसका कोई अर्थ था और इसमें तथ्य भी था । अब यह सब कुछ नहीं है। ईश्वर की कृपा से, समय की गति से, और भारत के सौभाग्य और पश्चिमीय सभ्यता के संवर्ष से अब वैवाहिक-यवस्था बढ़ती जा रही है। पढ़े लिखे कुछ घरों में विवाह अत्र पहिले की अपेक्षा कुछ अधिक पक्व अवस्था में होने लगा है। फल यह हुया है कि विवाह होते ही सुहागरात की प्रथा हो जाती है। कहने को एक और सुधार हुआ किन्तु सुधार ही के अनुकूल और अनुसार अन्य बातों मेपरिवर्तन न होने से हम खाई से खड्ढ में गिर गये हैं। पुरानी प्रया में पति पत्नी कुछ तो एक दूसरे को जान ही लेते थे, अब यह जाता रहा है और सुहागरात में दो अपरिचित व्यक्ति एक दूसरे के पास हो जाते हैं। हम नव-पतियों इतना ही कह देना चाहते हैं कि करोड़ों में विरली ही कोई एक बालिका होगी जिसे ऐसी स्थिति में सुहागरात में काम की वासना हो, या जिसे उस रात्रि में काम की वासना हो सकती है। इसलिए एक अपरिचित व्यक्ति का एक कुमारी स्त्री से, जो उसको नहीं जानती और जो शरीर के ही समान प्रात्मा से और मस्तिष्क से भी कुमारी है, बलात्कार भयावह तया हानिकर है। नव-पतियों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि कोई भी मनस्विनी स्त्री जिसमें तनिक भी अात्म सम्मान है और जो विलकुल गिरी हुई नहीं है कभी भी एक अपरिचित पुरुष को अपना शरीर समर्पण नहीं करना चाहती । उच्च श्रेणी की वेश्याएं भी कभी ऐसा नहीं होने देती किन्तु हमारे पति-गण से ( २० ) पलियों से यह व्यवहार करते हैं जो वह एक वेश्या के साथ भी नहीं कर सकते। इस सबन्ध में सम्राट नेपोलियन की कथा को नव-पतियों को सदा याद रखना चाहिए। नेपोलियन अपनी प्रियतमा जोजफाईन से विवाह कर उसे ले चला। वह उसमें इतना अनुरक था कि गाड़ी में सवार होते ही उसने उसका चुम्बन करना शुरु किया । जोजफाईन ने उसे एक वर्वर मनुष्य समझा, उसकी अवहेलना की, वह रुष्ट हो गयी और इस घटना का दोनों के जीवन पर प्रभाव बना रहा। किन्तु इसी के साथ ही साथ हम नव-पतियों से नहीं नायकों से यह भी कह देना चाहते हैं कि वे जीवन में इस प्रकार की भी- "अवघृत भावायोपा देशेकाले यथेहित निपुणैः व्यावर्त्तते नियुक्ता नेतिमत कामशास्त्राय" -भूल न करें, बड़े बड़े प्रेमियों के हृदय में अक्सर इस भूल से सदा के लिए विराग पैदा हो जाया करता है। विवाह को सुखमय बनाने के लिए और इसलिए भी कि वैवाहिक नीवन सफल हो, आवश्यकता यह है कि हम विवाह का अर्थ ठीक ठीक समझे और जाने और विशेष रूप से इस सत्य को हृदय-पटल पर अङ्कित कर लें कि विवाह दो भिन्न व्यक्तियों का एक सग निवास नहीं उस नायिका की, जिसका भाव निश्चित हो गया है और जो इसी इच्छा से स्वयम् उपस्थित हुई है, अवसर होते हुए भी यदि इच्छा की पूर्ति न की जाय तो उसे उस नायक से वैराग्य हो जायगा। किन्तु इसके साथ ही वात्स्यायन के इस उपदेश को भी हमको सदा ध्यान में रखना चाहिए- "सचिन्त्येति समागता परवधू स्यार्थिनी स्वेच्छया गच्छेत् क्यापि न सर्वदा सुमतिमानित्याह वात्स्यानः" कृ० का०मा० ( २१ ) है, विवाह और सच्चा विवाह दो शरीरों का शारीरिक विवाह भी नहीं है, अर्थात् विवाह का अर्थ इन्द्रियगत-वासनाओं का साधन नहीं है। इसके साथ ही हम को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि विवाह निरा दो आत्मायों, जीवों या मस्तिष्कों का कोरा आध्यात्मिक सम्बन्ध भी नहीं है। विवाह वास्तव में इन तीनों ही का मजमूवा, अचार या मुरब्बा है । विवाह सुखमय हो नहीं सकता, विशेपकर वर्तमान समय और युग में, यदि उसके द्वारा दो मस्तिष्कों, आत्मात्री, हृदयों और साथ ही साथ दो शरीरों का भी एक दूसरे में लय नहीं हुआ है। विना पति और पत्नी के जीवनों में ( Harmony ) स्वरैक्य हुए हजार पाधा-पुरोहित सर पटक, हज़ार वेदियो पर हम क्यों न बैठाये जायँ और करोड़ों बार ही हम क्यों न अमि को साक्षी कर एक दूसरे का हाथ पकड़ें और धर्मतः निबाह का वचन दें, सच्चा विवाह नहीं होगा, नहीं होगा, नहीं होगा। धर्म, समाज या कानून विवाह को असली विवाह का रूप दे नहीं सकते और न ये विवाह को सुखमय ही बना सकते हैं । इसे वेद-वाक्य ही समझना चाहिए कि गठ-बन्धन की गाठ अपने ही सहारे मजबूत रह सकती है ओर धर्म, समाज तथा पाधा-पुरोहित उसे मज़बूत नहीं रख सकते। विवाह को सुखमय बनाना, पति और पत्नी, विशेष रूप से, पति के ही अधीन है अन्यथा हम जो चाहें कहते रहें पत्नी सहधर्मिणी का रूप नहीं धारण कर सकती, वह ससार की नैया की वसवर की खेवैया नहीं हो सकती और वह एक उच्च श्रेणी, कोटि और कक्षा की, उच्च मञ्च पर बड़े आदर से बिठाई हुई एक पवित्र-वेश्या ही रहेगी। सुहागरात को इसलिए कामवासना की तृप्ति का आयोजन सम- झना हम सव की भारी भूल है और बहुत से अनों का कारण भी यही हो रहा है। अगर हम में बुद्धि-हो तो हमारे देश के पति-पतियों के सदृश दो अपरिचित व्यक्ति शरीर के नहीं वरन् दो आत्माओं के ( २२ ) सम्मेलन का अनुष्ठान ही सुहागरात को प्रारम्भ किया करें। सुहागरात की रात मे दो अपरिचित व्यक्तियों को एक दूसरे के प्रेम को प्राप्त करने की ही कोशिश प्रारम्भ करनी चाहिए, साथ ही एक दूसरे को जान कर हम को इस चिन्ता में लीन होना चाहिए कि किस तरह अपने जीवन की बातों में काट छांट आदि करने से दोनों के जीवन अधिक से अधिक मेल खा सकते हैं और एक हो सकते हैं। शरीरों का सम्मेलन तभी होना चाहिए जब दोनों मस्तिष्क, दोनों पारमाएँ एक हो जायँ और जब दोनों यह अनुभव करने लगे कि वे एक दूसरे के बिना रह नहीं सकते, जब दोनों एक दूमरे में तल्लीन और तद्वत् होने के लिए पागल हो जायँ दोनो यह अनुभव करने लगे कि यात्मानों का मेल जीवों का लय असम्भव है जब तक कि इस अनुष्ठान की सिद्धि के लिए शरीरों की आहुति न दे दी जाय, जव तक वे यह अनुभव न करे कि आत्माओं के निवास के लिए शरीर की जरूरत है और विना शरीर के प्रात्मा जीवित ही नहीं रह सकता, जब बरबस यह सत्य उन पर प्रकट होने लगे कि एक दूसरे के शरीर की सहायता से ही वे अपना पूर्ण विकास प्राप्त कर सकते हैं, जब "हुस्न पाईन-ये इश्क हो, इश्क आईन-ये हुस्न" और जब दोनों के शरीर लौह और चुम्बक की भांति, श्राप से आप बिना किसी बायो- जन और प्रवन्ध के, दोनों की पूर्ण सम्मति से, किन्तु विना दोनों के महाराष्ट्रों मे सुहागरात को कदाचित् "शुभरात्रि' कहते हैं, प्राचीन रूप सुहागरात' सोहागरात, का हमारी समझ में "सौभाग्य- रात्रि रहा होगा। शुभरात्रि अब अपवित्र रात्रि हो गयी है, और उस रात्रि में अब अचल सौभाग्य अर्थात् पति पर सदा के लिए अधिकार और पति की छाया स्वरूप होने का आयोजन नहीं होता है, अय होता है, पुत्रोत्पादन का प्रयत्न । पुत्र से सुहाग, सोहाग या सोभाग्य से न कभी कोई सम्बन्ध था और न हो सकता है। कृ. का०मा० म ( २३ ) मुँह से कुछ भी कहे हुए ही एक दूसरे में लय हो जाय । हम को यह जानना चाहिए कि पति पत्नी के प्रथम संसर्ग के लिए भी प्रेम, शक्ति ग बल के प्रयोग की अपेक्षा नहीं करता। हमारे इस मत से बहुत से विद्वान् सहमत न होगे, वे कहेंगे कि यात्माओं के सम्मेलन की फिक्र विवाह के पहिले होनी चाहिए, नायक और नायिका विवाह तभी करे जब प्रेम मे वह पगे हों, जब अात्माओं का लय हो चुका हो और शरीरों का लय वे चाहते हो । एक हद तक यह सर्वथा ठीक है और हम को इस मत से विरोध नहीं किन्तु इस देश यह होता भी नहीं और सहसा हो सकता भी नही। साथ ही सहज कामुकता-प्रधान-प्रेम के साथ यह हानिकर भी हो सकता है। कुछ अन्य लोग कहेंगे कि शारीरिक सम्मेलन घनिष्टता की पराकाष्ठा का परिचय देता है, घनिष्टता न भी हो तो भी इसके द्वारा दो अपरिचित अजनवी भी एक दूसरे के निकट हो जाते हैं। कुछ लोग यह भी कह वैठे गे (MIf they sexually adjust themselves nothing else matters") किन्तु इन महानुभावों की दलीलों के महत्व को उनसे अधिक मानते हुए भी हमारा निवेदन यही है कि शारीरिक सम्बन्ध बाद में ही होना चाहिए, मानव-समाज का और स्त्री-समाज का हित इसी में है। 'सच्चा प्रेम एक कुमारी के हृदय में पश्चिम में भी नहीं होता। विवाह के बाजार से एक युवक को फासना ही उसका उद्देश्य होता है और इस लिए एक दूसरे को प्रसन्न रखने की फिक्र मे दोनो ही अपना असली रूप छिपाये रहते हैं। इस तरह आत्माओ का सच्चा लय नहीं होता और कुछ ही दिनो वाद असलीयत नज़र आने पर तलाक की तैयारी होने लगती है। कृ० का० मा० "यदि रति-सम्बन्धी समता दोनों में उपस्थित हो गयी तो फिर जीवन के सहस्रो ही अन्य विभेद उनको असुखी नहीं कर सकेंगे" कृ० का० मा० ( २४ ) प्राचीन प्राचार्यों में से भी एक या दो के विरुद्ध हमारा यह प्रस्ताव है, यह हम जानते हैं। इन आचार्यों को यह भय है कि यदि सुहाग- रात को ही शरीरों का सम्मेलन न हुआ तो सम्भव है नायिका को नायक के पु सत्व में ही सन्देह हो जाय। यह सन्देह वैवाहिक-जीवन के लिए भयावह हो जायगा। "स्तम्भी भावे भर्तुः सम्मतिरिहनास्ति वाभ्रवीयानाम् । अहमेव पश्यन्ती गाढ दूयेत सा यस्मात् ॥ परिभवति पएटामिव त स्तम्भत्वंयस्यह समातनुते । तस्मादुपक्रमी स्यात् स्तम्भ नारोचयेत्तत्र॥ किन्तु यह सब जानते हुए भी हम अपने इस मत को हो कि प्रथम भेट में ही शरीरों का सम्पर्क न हो ठीक समझते हैं। कारण यह है कि यह असम्भव नहीं कि उपर्युक्त बातें उन पति और पत्नियों के लिए हो, जिनका परिचय अधिक दिनों का हो, इसके सिवाय हमारे मतभेद का प्रधान कारण यह है कि हम पुरुप-प्रकृति में परिवर्तन देखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि पुरुप, प्रेम को, वासना की तृति को अपने श्रात्मा से विलग और शरीर से ही सम्बन्ध रखने वाली वस्तु न समझे। पुरुप और स्त्री में एक सब से बड़ा अन्तर यह है कि प्रेम, जोश, कामवासना की तृप्ति या तुष्टि, पुरुष-जीवन मे एक साधारण घटना, ( accident ) या एक ( episode ) कथानक है, जिससे उसकी आत्मा से किसी किस्म का भी कोई ताल्लुक या सम्बन्ध नहीं होता। इसके विपरीत स्त्री के लिए प्रेम, कामवासना की तृप्ति, उसके जीवन का आदि, अन्त और सर्वस्त्र है और उसकी श्रात्मा से इसका घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। प्रेम करता है, और अक्सर वह समझता है कि वह प्रेम से ही पागल हो रहा है किन्तु सौ में निन्यानवे बार पुरुष केवल अपने को धोखा देता है, वह प्रेम करता नहीं या करता भी है तो केवल पुरुष, ( २५ ) अपने शरीर से, जड़ से, दूसरे शरीर को ही और उसके जड़ को ही। एक विचित्रता यह भी है कि एक पुरुष, जब वह शरीर से प्रेम करता रहता है, समझता यह है कि वह आत्मा से प्रेम कर रहा है, और इसी तरह जब कभी वह यात्मा से प्रेम करता रहता है तो समझ लेता है कि वह शरीर से ही प्रेम कर रहा है, और शरीर और जड़त्व का ही वह उपासक है। इसके विपरीत स्त्री जब वह किसी पुरुष से प्रेम करती है तो वह अपने शरीर और आत्मा, जड़ और जीव दोनों से ही प्रेम करती है। इसीलिए सुहागरात की रात में स्त्रिया, उस पुरुष को जानने, बूझने और समझने को उत्सुक होती है, जो विधि की विडम्बना से, माता पिताओं के आदेश से, पाधा-पुरोहितों की साजिश से, या जन्मपत्रों के मिल जाने से उनके पास उस समय मौजूद होता है। इसके विपरीत पुरुष में ऐसी कोई भावना नही होती। स्त्री को जानने की आवश्यकता ही उसे कोई प्रतीत नहीं होती, काम की जड़ता, उसकी वाह्य प्रखरता उसके अन्धा कर देने को सदा प्रस्तुत रहती है। यही कारण है कि पुरुष कमी कभी ऐसी स्त्रियों के प्रेम में भी पागल हो जाते हैं जिनकी प्रात्मा से उनका प्रात्मा करोड़ों कोस होता है और जिनसे वास्तव में वह प्रम कभी कर ही नहीं सकते । स्त्री से यह नहीं हो सकता, युगों से अपनी कामना और काम-वासना का दमन करते-करते वह दमन की यादी हो गयी है और इसलिए वह वर्तमान ( Immediate present ) में अन्धी और पागल हो ही नहीं सकती। पुरपत्रात्मा और शरीर को युगों से भिन्न समशता पाया है, वह समझता है कि एक को अलग रख कर, वह दूसरे मे भीन सकता है, अात्मा के विना किसी तरह के सम्बन्ध के भी इस तरह से वह शरीर की, जड़ की तृप्ति-लाभ करता है, स्त्री यह कर ही नहीं सकती। स्त्री प्रकृति के अधिक निकट है, निरक्षरा होती हुई भी, हजार गुना अधिक शिक्षित पुरुप से, स्वभाव प्रकृति और सहज बुद्धि की सहायता से वह ( २६ ) अधिक चतुर होती है, वह सृष्टि के नियमों और अनन्त सत्यों को पुरुषों की अपेक्षा अधिक समझती और बूझतो है। सच तो यह है कि एक 'विद्वान् से विद्वान् और चनुर से चतुर मनुष्य भी एक स्त्री के सामने या तो मूर्ख है, या एक बच्चा स्त्री अपने सहन ज्ञान से ही यह भले प्रकार जानती है कि *जीव और जड़ एक दूसरे के बिना सफलता नहीं लाभकर सकते और इसीलिए जब वह प्रेम करती है तो केवल शरीर या श्रात्मा से नहीं वरन शरीर और आत्मा दोनों से ही, शर्त इतनी है कि पुरुष उसे इस तरह से प्रेम करने दे। यही कारण है कि वर्तमान परिवर्तन के काल में स्त्रियां सुहागरात में सुखी नहीं होती, वे निश्चेष्ट होती है और अधिकतर के लिए सुहागरात अन्धकार, नैराश्य और असन्तोष ही की रात होती है। अभी यही होता है और अनन्त काल तक यही होता भी रहेगा जब तक पुरुष अपना तुधार नहीं करते और सुहागरात को स्त्रियों की भांति दो आत्माओं के मेल की रात न समझ कर उसे केवल दो शरीरों के मेल की रात समझते रहेंगे। हम यहाँ पर यह भी कह देना चाहते हैं कि पुरुष तथा श्री की उपयु युक्त मिन्न प्रवृत्तियों और प्रकृतियों के कारण ही अधिकतर वैवा- हिक-जीवन सफल और स्वर्गीय सुख के देने वाले नहीं होते। पुरुप कामवासना, तथा उसकी तृति को प्रात्मा और मस्तिष्क से एक बिलग वस्तु नमझता है। स्त्री की यात्मा का अपनी यात्मा में या अपनी यात्मा का उमको अात्मा मे लय वह आवश्यक नहीं समझता, सच तो यह है कि जड़ और जीव को अलग कर पुरुप ने "विवाह" को ही अर्थशून्य बना दिया है क्गकि सच्चे विवाह का उद्दश्य ही यह शिक्षा देना है कि जड़ (Body) और जीव (Spirst) अन्ततोगत्वा एक हैं और जीवन निरर्थक है यदि यह दोनी एक कर लिए नहीं जाते। ०का०मा० ( २७ ) इसका नतीजा यह होता है कि शरीर के तृप्ति-लाभ करने पर, काम- वासना की तृप्ति होने पर, या पत्नी से उसके काम को जागृत करने मे अशक हो जाने पर, उसके और उसकी पत्नी के जीवन में एक को दूसरे से बांधने वाली कोई बात नहीं रह जाती। यह सच है कि सुपति या भले मानुस पति अपने बच्चों की माता होने के कारण साथ ही अपनी गृहस्थी का सारा बोझ उठाये रहने के कारण अपनी पत्नियो को कष्ट नहीं देते, उनको वे घर की मालकिन बनाये रहते हैं, उनके सुख, खाने, पहिरने का वे अच्छा प्रवन्ध रहते हैं, उनको स्नेह और दया की दृष्टि से देखते हैं, और यह सब करते हुए समझते हैं कि वे अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। किन्तु हम इन सुपतियो और भविष्य में होने वाले ऐसे सुपतियो से कह देना चाहते हैं कि यह कर्तव्य का पालन नहीं है, और पत्नी जवान से उनसे कुछ कभी कहेगी भी नहीं किन्तु वह इन सब बातों से सन्तुष्ट रहा नहीं करती और न हो सकती है । स्त्री, शरीर के साथ ही साथ आत्मा भी चाहती है। वह कोरी देवी नहीं है या देवी होती हुई भी मानवी है और इस लिए कोरे आदर, दया कोमलता, सुख, गहनों और रुपयों से ही उसे तुष्टि नहीं होती। देवियों की भांति वह आदर चाहती जरूर है किन्तु केवल आदर और पूजा से उसे तुष्टि नहीं होती। पूजा करना वह खुद जानती है और अपने श्रेष्ठ से श्रेष्ट आराध्य देवताओं की अपेक्षा वह पति की अधिक पूजा करती है । अनुशासन-पर्व में एक स्त्री ने कहा है-"वायु अग्नि, वरुण, या दूसरे कोई भी देवता एक स्त्री को वैसे ही प्रिय नहीं होते जैसा कि "रतिपति" "प्रियतम। कावेदव्यास ने "रतिपति" शब्द का प्रयोग व्यर्थ ही नहीं किया है, यह भी हमको ध्यान में रखना चाहिए । हिन्दी के काव्यों में भी श्रेष्ठ पति के लिए सुन्दर, सरस, "सुजान' शब्द का ही प्रयोग समझदार कवियों ने किया है। कृ० का० मा० (२८) वरावर वाली, सहधर्मिणी, मनस्विनी स्त्री अपनी पूजा कभी पसन्द नहीं करती, पूजा तो दासियाँ या वेश्याएं ही पसन्द कर सकती है। दया, कोमलता आदि के प्रदर्शन से भी उसे सन्तोप नहीं होता क्योंकि यह सव विशेषताएँ उसके पास स्वय हैं और इतनी प्रचुर मात्रा में हैं कि इनकी खैरात वह दूसरों को दे सकती है। स्त्री, स्नेह चाहती है किन्तु इससे भी अधिक वह चाहती है प्रेम, जोश, (Passion) या इश्क । मदान्ध करने वाले प्रेम से विहीन स्नेह को भी एक मिनट के लिए वह सहन नहीं कर सकती, क्योंकि वह जानती है कि पति- पत्नी के जीवन के लिए एक दूसरे के बिना ये निरर्थक हैं और उसके काम के नहीं। पति और पत्नी इसीलिए स्वर्गीय वैवाहिक-जीवन तमी वहन कर सकते हैं जब जीवन पर्यन्त वे प्रेमी और प्रोमिका, नायक और नायिका, आशिक और माशूक और जीव ( Spirit ) और जड़ (Body) ही बने हैं, केवल वासनाओं की तृति के लिए नहीं चरन् जीवन के अन्य समस्त विभागों में भी। यहाँ पर एक बात हम पाठकों, देश के सुधारकों और वैवाहिक- सम्बन्ध या संस्कार में सुधार चाहने वालों से भी कह देना चाहते हैं और वह यह है कि न तो सभ्यताएँ वृक्षों के समान एक स्थान से उठा कर दूसरे स्थान पर जमाई जा सकती हैं और न हम यही कर सकते हैं कि एक सभ्यता की बातों का हम दूसरी सभ्यता में पैवन्द लगा दें। सभ्यताओं का सम्मिश्रण सभव है किन्तु उनकी कलम हम वाँध नहीं सकते । विकास और उन्नति किसी क्रम से ही हो सकती है। पश्चिम की स्थिति, आवश्यकता के अनुसार ही वहाँ की प्रथाएँ है और उन प्रथाओं के अनुकूल, उनकी ही नींव पर, वहाँ की सभ्यता और सामाजिक अभिवृद्धि का महल खड़ा हुया है। अपने अनुकूल रीति से ही। वह ऊपर भी उठाया जा रहा है। इन महलो के सतमहलों में यह सम्भव ही नहीं कि हम जाकर भारतीय या मुगलकालिक पत्थर के गुम्बज लगा दे।

( २६ ) यही नहीं कि हमारा गुम्बज ना-मौजू होगा, दमारत की खूबसूरती और उपयोगिता को नट कर देगा वरन् होगा यह कि इमारत की बनावट में फर्क हो जायगा और यह भी असम्भव नहीं कि पाठवा, दसवा, पन्द्रहवां महल हम ऊपर उठा ही न सकें, या उनके उठाने के लिये हमको बड़ी काट छांट करनी पड़े, सारी इमारत की इमारत हा रद्द हो जाय और उसके गिरही पड़ने का भय खड़ा हो जाय । इन्ही इमारतों हो के समान सभ्यताएँ भी है और इसलिये हम सब को यह सदा ध्यान में रखना चाहिये कि अगर पश्चिमीय वाती को हम चाहते हैं तो सारा क्रम हमको पश्चिमीय ही करना होगा। पश्चिमीय विचारों की नींव पर ही हमको अपनी इमारत भी बनानी होगी। विवाह को नुस्खमय बनाने के लिए विपमय कोर्टशिप, तलाक, ट्रायल मैरिज और जो जो यूरोप और अमरीका में हो रहा है, सब कुछ ध्यान में रखना होगा और करना होगा, और विना इनके काम ही नहीं चलेग। इसके साथ ही साय हमको यह भी ध्यान में रखना होगा कि पश्चिमीय ससार अभी भी स्वय निर्मित भूलभुलयो मे ही भूला हुआ है और मोन और नजात के प्य को यह निश्चित नहीं कर सका है। प्रेम के विवाह (Love marriages) को वह सफल अभी तक नहीं बना सका और जो उपाय उभरने के लिए वह करता है वही उसे एक और आफत फॅसा देता है । एक अगरेजी कवि के शब्दों में- "Where people once are in the wrong Each line they add is much too long Who fastest valkest, but walks astray Is only farthest from his way" * जब पुरुप गलत मार्ग पर होता है तो जो वात करता वही उसकी कठिनाइयों की वृद्ध करती है, जो तेज़ भागता है, साथ ही भटकता हुआ है, उत्ते उसके प्रत्येक पग उसके मंजिल से अत्यन्त दूर १० कामा० ले जाते हैं।

( ३० ) हम "कोर्टशिप" को उस रूप मे जो उसका इस समय यूरोप और अमरीका में है पसन्द नहीं करते। हमारी समझ मे यह वहा भी हानि- कर सिद्ध हो रहा है, इस मानी में नहीं कि उसके नाम पर प्रायः सतीत्व की भी हत्या हो जाती है, वरन् इसलिए क्योंकि हमारा यह विश्वास है कि "कोर्टशिप में युवक को प्रसन्न रखने और फांसने मे एक युवती को अपने मस्तिष्क और शरीर की सारी शक्तियों को खर्च करना पड़ता है और उसे हर समय चालाकी, धूर्तता, नीति-निपुणता से काम लेना पड़ता है। इसका प्रभाव उसके शरीर और मस्तिष्क पर पड़ता है और विवाह और पति का सहयोग होने तक वह प्रायः अधमरी सी हो जाती है, और उसमें प्रेम का वही जोशोखरोश नहीं रह जाता जो एक कुमारी में होना चाहिए और जो वैवाहिक जीवन को सार्थक बनाने के लिए नितान्त रूप से आवश्यक है। कुछ लोगों की राय है कि यदि स्त्रियों को भी विवाह के प्रस्ताव को स्वयम् उपस्थित करने का पुरुष के समान ही अधिकार दे दिया जाय, तो स्त्री को चालाकी, धूर्तता, नीति-निपुणता और फरेब से काम लेने की जरूरत न पड़ेगी और इस दशा में "कोर्टशिप" से उसे कोई क्षति न पहुँचेगी, किन्तु हमारा कहना यह है कि "कोर्टशिप की प्रथा के कारण युवतियाँ और युवक दोनों ही प्रेम की मादकता और सुरूर, प्रेम के खाई और खड्ड, प्रेम की आकाश-गामिनी और पाताल-गामिनी लहरों में स्नान कर चुके होते हैं, वहरे मुहब्बत की तूफी खेजियों के यपेड़ों का भी अनुभव उनको हो चुका होता है, मजा कोई वाकी रह नहीं जाता और विवाह के बाद प्रेम में उनके लिए प्रम का खाभा- विक लहलहापन, प्रेम की मादकता रही नहीं जाती । यह सब कुछ न हो तब भी हम "कोर्टशिप के इसलिए विरोधी हैं क्योंकि हम ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणियो का ही विवाह श्रेयस्कर समझते हैं, क्योंकि हम चाहते हैं कि विवाह के समय युवक और युवती दोनो ही मस्तिष्क और शरीर दोनों से ही कुमार और कुमारी ही हों और दोनों का ( ३१ ) शरीर ही नहीं मस्तिष्क भी अदूपित हो । कह नहीं सकते सम्भव है कन्या सर्वथा अदुषिता हो, मस्तिष्क से भी, कदाचित् इसी लिए "बालविवाह की प्रथा ही चला दी गई थी और अति की पराकाष्टा पर पहुंचने से ही यह अब हानिकर हो गयी हो। "सगाई जल्दी हो" की प्रथा भी कदाचित् इसीलिए जारी की गई हो कि प्रेमाङ्गुर बड़े और पर-पुरुष और "पर-दूपण' की रौक मन मे ही पैदा कर दी नाय । शरीर और मन दोनो ही पवित्र रहे शरीर और मस्तिष्क दोनों के ही परिपक्व होने पर विवाह कर दिया जाया करे ऐसा प्रबन्ध था। आर्य सिद्धान्त और सनातन-सभ्यता का श्रादेश है "यः कौमार हरः रु एवहि वरः"। कौमार शरीर का ही नहीं वरन् मस्तिष्क और मन का भी। मन में यदि किसी के प्रति ऐसा भाव उदय हो जाय तो विवाह उसी के साथ होना अनिवार्य रूप से आवश्यक था, नहीं तो स्त्री सती के पद से गिर जाती थी । यही कुमारियों के लिए अावश्यक था और यही कुमारों के लिए भी। "राम" ने "सीता" को प्रथम देखने पर कहा था-"सहज पुनीत" मोर मन छोमा... "मोहि अतिशय प्रतीत मन केरी जेहि सपनेहु पर नार न हेरी" "राम" का यह दावा था कि यदि सीता, पर नारी होती तो मेरे हृदय में उनके प्रति ऐसे भावों का उदय होना संभव न था। "सीता" जी ने स्वयंवर के समय अपने मन में, जिससे कुछ भी छिपा हो नहीं नकता और ईश्वर से, जो घट-घट व्यापक और सर्वज्ञ है, वन्दना -कीथी:- "तन मन वचन मोर प्रण सांचा। रघुपति पद सरोज मन रांचा ॥ तो भगवान सकल उरवासी। करिहहिं मोहि रघुवर के दासी ॥" - ( ३२ ) यही नहीं, जिस समय "जनक" ने निराशा में कहा "कुअरि कुँवारि रहइ का करऊँ' और राम के उठकर धनुष तोड़ने चलने पर सीता की माता सुनयना जी ने कहा, "सखि सब कौतुक देखन हारे" जिस समय राम के धनुप के निकट पहुंचने पर सीता ने कहा था:- "गणनायक वरदायक देवा। आज लगे कीन्ही तव सेवा ॥ वारवार सुन बिनती मोरी । करहु चाप गरता अति योरी।" उसी समय एक कवि रूपी चित्रकार ने सीता के हृदय का एक चित्र खींचा था, और सीता उस समय एक अपनी सखी से कह रही थीं:- "मो मन में निहचै सजनी, यह तातहु ते प्रन मेरो महा है। सुन्दर श्याम सुजान सिरोमनि, मो मन में रमि राम रहा है। रीति पतिव्रत राख चुकी, मुख भाख चुकी, अपनो दुलहा है। चाप निगोड़ो अवैजरिजाव,चढ़ौतीकहानचढ़ी तो कहा है।" पतिव्रत की रीति, के लिए मन से या मुंह से भाख देना ही काफी था। "कोर्टशिप में मन, वचन या शरीर कोई भी पवित्र रह नहीं सकता। पश्चिमीय सभ्यता की ही भांति उसकी "कोर्टशिप" की प्रथा भी पतन तथा प्रवृत्ति का मार्ग है, उत्थान, निवृत्ति और पवित्रता का नहीं। अपने देश के नवयुवकों से हम इसलिए यह भी कह देना चाहते है कि पश्चिमीय प्रथाओं में पश्चिमीय खिलौनों और वस्तुओं की भांति बाह्य तड़क-भड़क मात्र है, भीतर से उनमें कुछ नहीं है और न उनमें असली तत्व ही कुछ है। पश्चिमीय सभ्यता की हालत कुछ वैसी ही है जैसे पश्चिमीय देशों में "विज्ञान" की है। सुख के साधन लाखों ही उसने तैयार कर दिये, साथ ही बम, जहरीला गैस, पनडुब्बी नौका और सृष्टि का मिन्टों में सहार करने वाले वायुयान भी, जो सर्वथा नाश के ही साधन है।

( ३३ ) "अकबर साहब ने "दिल्ली दरबार" के सम्बन्ध में लिखा था- "महफिल उनकी, साकी उनका श्राखें अपनी, वाकी उनका" हमारी वर्तमान दशा का सर्वोत्तम चित्र यही है। जिस ओर देखो, जहाँ देखो, यहाँ तक कि मदिरों, देवालयों और भगवान की मूर्तियों के शृङ्गार में भी पश्चिमीय सभ्यता की चमक दमक पहुँच गयी है, अगर इस समय में हम कुछ अपना कह सकते हैं तो वह हमारा गार्हस्थ्य जीवन और हमारा पति-पत्नी का सम्बन्ध ही है। देश के और समाज के सुधारकों से हमारा विनीत निवेदन यही है कि ईश्वर के लिये इसे अपना ही बनाये रहना, जब तक यह अपना है, जीवन सुख और शान्ति की मृत-प्राय आशालता भी कहीं न कहीं से हरी बनी रहेगी । याद रहे, पश्चिम की ओर जाकर सूर्य भी अस्त हो जाता है। आर्य सभ्यता, अाज को अपनी इस हीन दशा में भी अगर अपनी सवत पश्चिमीय सभ्यता से कुछ कह सकती तो पश्चिमीय प्रदेशों के नायकों से वह कवि "हालो" के शब्दों में कदाचित् यही कहती- "जीस्त वेअकलों को हो जाय बसर करनी मुहाल, इतनी भी ऐ पाकलों अच्छी नहीं हुशियारियो"। इसके साथ ही वह एक दूसरे प्रसिद्ध शायर के शब्दों में यह भी कह देती- "हमने माना हो फरिश्ता शेख जी श्रादमी होना मगर दुश्वार है।" पश्चिमीय सभ्यता वासनाओं कि तृप्ति के लिए है और पश्चिमीय प्रदेशों की कितनी हीन दशा हो गयी है इसका अन्दाजा इसी से ( ३४ ) लगाया जा सकता है कि जन लिन्डसे की राय में अमरीका में हाई स्कूलों में पढ़ने वाली प्रत्येक दस लडकी में से एक और प्रत्येक सौ में दस, सुमार्ग से विचलित हो गयी है और भयावह रास्ते पर चल रही हैं। मैं यह नोरों से कह देना चाहता हूं कि इसमें अत्युक्ति तनिक भी नहीं है और वास्तव में यह कम से कम संख्या में बतला रहा हूँ। इस सख्या में भी गणना केवल उनकी ही है जिनकी उम्र इस समय १४, १५, १६ या १७ है। 'मैंने पिछले साल में सौ हराम के गमों के मामलों को अपने हाथ मे लिया, मैने इनमें से अधिकतर मे माताt/ और बच्चों का भी भार अपने ही ऊपर ले लिया। इन प्रत्येक मामलों में स्थिति छू मतर की थी और कन्याओं के सामने केवल दो मार्ग थे, तुरन्त मेरे पास आती या तुरन्त ही किमी गर्म-पात करने वाले की शरण में जाती। "कम से कम ५० फ्री सैकड़ा जो अलिगन और चुम्वन से *"One High School girl in every ten and ten in every hundred in our schools have their feet set on more or less perlous ground. Let me repeat that these are minimum figures and they include Only the ages of fourteen, fifteen, sixteen and seventeen" I bandled about a hundred cases of illegitimate pregnancy last year, taking care of most of the mothers and babies With everyone of these girls it was a touch and go whether to come to me and arrange to have the baby or to go to an abortionist f"Atleast 500/o of those who began with hugging and kissing, do not restrict themselves to that but go further than and indulge in other sex liderties, which by all the conventions are outrageously improper" "Fully 900/o of the High School boys have had sex exponence by the time they finish school" " ( ३५ ) शुरू करती है, इतने पर हो नहीं रुकती वे आगे बढ़ती है और वह सब कुछ करती हैं जो ससार और समाज के समस्त नियमों पर पदाघात करता है।" .. "हाई स्कूलों में पढ़ने वाले वालको ६० फी सैकड़ा स्कूल की शिक्षा ख़त्म करने के पहिले स्त्री का ससर्ग कर चुके होते हैं। "अपने हाथ में आई हुई लडकियों में हम लोगों ने देखा कि ३१३ मे से २६५ रजस्वला और बालिगा हो चुकी थीं ५१ और १२ वर्ष की अवस्था में। इनमें से अधिकतर ११ की अवस्था मे रजस्वला और वालिगा हो चुकी थीं। ३१३ लड़कियो को दो समूहो में विभा- जित कर देखने से ज्ञात हुआ कि २८५ उनमें से ११, १२, और १३ की उम्र में स्त्री हो चुकी थी और केवल २८ उनमें से १४, १५, और १६ की अवस्था मे स्त्री हुई थी।" "कम से कम एक शहर न्यूयार्क में इस समय मे ५०,००० 'कुमा- रियाँ ऐसे पुरुषों के साथ रह रही हैं जो उनके पति नहीं हैं।" यह सब है पश्चिमीय सभ्यता और कामुकता की वृद्धि का नतीजा। विवाह होने के पहिले की दशा यह है, विवाह के बाद क्या होता * We found that 265 of 313 girls had come to physical maturity at 11 and 12 years more of them maturing at 11 and 12 Dividing the 313 girls into two groups we found that 285 of them matured at the ages of 11, 12 and that only 28 matured ar 14, 15 and 16". There are” says Judge Lindsay "atleast 50,000 girls in New York living with men who are not their husdands ३ । ( ३६ ) है-"तलाक के मुकदमो के हालत पढ़ लीजिये। मिस मेयों मार- तीयों को निन्दा करती है किन्तु नत्य बात यह है कि इस गिरी दशा में भी भारत के युवक और युवती, कम ने कम पश्चिमीय सभ्यता के युवकों और युवतियों से सहत गुना अधिक पवित्र हैं । भारत में भी महाभारत हुआ किन्तु यहाँ ( War Babies ) युद्ध के बच्चे पैदा नहीं हुए । पश्चिमीय संसार में अब ट्रायल मैरिन, बहुविवाह आदि को प्रयाओं का प्रस्ताव किया जा रहा है किन्तु हमारा कहना यह है कि नीव गलत है, जिन सिद्धान्तों पर सन्यता अवलवित है, तिन मित्तियों के सहारे वैवाहिक-महल उठाया जाता है, वे सब हेय है, खोखली है, सुन्दर और नीव के अनुकूल होती हुई भी जहरीली है और उनसे कम चल ही नहीं सकता । सभ्यता या वैवाहिक सबन्ध को कामुकता की नीव पर स्तम्भित करना ही मूल हैं। पूर्वीय वैवाहिक सवय की नीव उष्णताऔर जो नोशविहीन ठरढा (Cold- Blooded) कर्तव्य है । प्रेगग्नि की पाच इसमें है ही नहीं। बन्धन धार्मिक है और उसकी मजबूती के लिए उमका सबन्ध इहलोक ने ही नहीं परलोक से भी पत्र दिया गया है। साथ ही सबसे बड़ा अन्तर यह है कि मस्तिष्क और हृदय का साम्य नहीं, वरन् थामिक विचारों, सामाजिक कर्तव्यों तथा रति सम्बन्धी साम्य की नींव पर यह स्तमित है । कर्तव्य त्पी बन्धन में मेम का लहलहापन न हो, मादकता न हो, यह भी असमव नहीं कि अस्थायी सुखों से वह बिलकुल विहीन हो किन्तु मादकता विहीन होने पर भी यह टिकाऊ अधिक है इसमें तनिक भी सन्देहनहीं। प्रम, जोश तथा मादकता स्थायी हो नहीं सक्नी यह भी हमको सदा ध्यान में रखना चाहिए । मस्तिष्क सम्बन्धी हमारे प्राचीन वाचाया ने गान्धर्व विवाह को धर्म-विवाह नहीं कहा इतका एक कारण यह नी कहा जाता है कि वे कहते थे कि इनमें बिबिह-विच्छेद ( Divorce ) की संभावना अत्यक्कि है । कृ. का. मा.

( ३७ ) साम्य (mental affinity ) के सामने रति-सम्बन्धी साम्य (Sezual affinity ) हेव है किन्तु इसमें तुष्टि और सन्तोप अधिक है इनमें कम से कम हमको तनिक भी सदेह नहीं। "समम् विवाहम् च मैत्री च न तु पुष्ट विपुष्टयो." का वास्तव में उद्देश्य ही यही था। प्रयाएं समय की त्यिति और आवश्यकताओं के अनुकूल ही होती हैं और पाठकों को यह सुनकर आश्चर्य होगा कि इङ्गलेण्ड के एक जबर्दस्त विद्वान ने अभी ही यह मत प्रकट किया है कि बहु-विवाह की प्रथा वहां नारी की जाय । कुमारियों की संख्या वहा अत्यधिक है, कुमार कम हैं । यहही अशरेज़ भारत की बहु-विवाह प्रथा को निन्दा करते यकते नहीं थे । इसके सिवाय जैसा कि "मनोरमा ने लिखा है, हमको यूरोप और अमरीका में जो कुछ हो रहा है, जैसी वहां की दशा है उस पर भी निगाह रखनी चाहिए । वासनाओं की तृप्ति की नीव पर स्तंभित विवाहों के नित्य प्रति बढ़ते हुए झगड़ों और तलाकों की संख्या को देखकर ट्रायल मरिन-( Trial marriages ) अर्थात् विवाह करने के पहिले, गिर्जे में जाने के पहिले, कुछ दिनों युवक और युवती एक वाय पति पत्नी की मांति रहकर यह देख लिया करें कि वे एक दूसरे से सुखी रह सकेंगे या नहीं और तब विवाह किया -का प्रत्ताव जोरो से वहाँ इन समय हो रहा है। हम उहश दो चार पुस्तकों को पढ़कर विद्वान बनने वाले का कु हमको यह नी नटा विदित होना चाहिए कि बहु-विवाह, ए पुत्य का अनेक ब्रियों से विवाह करना या द्रौपदी की भांति एक त्रा का कई पुरुषों को सम्पत्ति होकर रहना या और ही नितने प्रकार के वैवाहिक-सबन्ध देखने में आते हैं, वास्तव में त्यिति, समय की पावर- यकता और मुख्यतः पुरुष त्रियों को जन संख्या ते उनका धना सबन्ध होता है, और इनकी नींव पर ही उनका महल उठता है और हम इसी को धर्म और नामाजिक नियमों के नाम से पुकारा करते हैं। कृ.का.मा.

(३८) भी इस सबन्ध में कयन अनधिकार चेष्टा होगी, फिर भी हमारा निवेदन यही है कि यह कढ़ाई से गिर कर भट्टे मे जाने के समान होगा। पश्चिमीय मलिक रक्षा के निमित्त तथ्य तर्क और शुष्क विवेक से विचार करता हुआ नित नूतन उपाय रक्षा के सोच रहा है किन्तु रन्ना होगी नहीं क्योंकि नीव और सिद्धान्त की भित्ति ही भ्रष्ट है। हम ट्रायल मैरिजस के विरोधी इसलिए नहीं है क्योंकि हम पुरुय- प्रकृति को जानते हैं और यह जानते हैं कि जब तक उसका सुधार नहीं होता, वह • मनोन्येति नवम नवम" की पुजारिनी बनी रहेगी, वह भेवर की प्रकृति के समान है, वह फूलो पर उड़ती ही फिरेगी। हम ट्रायल मैरिजस के बिलान इस लिए भी नहीं है क्योंकि हन पुल्य है, स्वार्थी है, अन्यायी है, "हमारे लिए सब कुछ और दूसरे के लिए कुछ नहीं' कहने वाले हैं। हम ने ही पतित और दुराचारी क्यों न हों, पत्नी को हम पवित्र ही चाहते है, कुमार अक्त्या में हम कैसे ही कुछ क्यों न रहे हो । यद्यपि यह देश के सौभाग्य की बात है और इस पर हम गर्व कर सकते हैं कि पश्चिमीय देशों हमारे युवक कम से कम इस संवन्ध मे रोड़ गुना अच्छे हैं और अधिकतर हमारे युवक पवित्र ही रहते हैं ] कुमारी कोहम पवित्र और सती ही चाहते हैं और कुमारी के कौमारित्व का अपने स्वार्थ और प्रभुता से व्यर्थ ही और चर्य का महत्त्व प्रदान करते हैं । स भव है हमारे बहुत से भाई हमारे इस मत के लिए हम पर हँसे और हमको हेय भी समझ किन्तु हम कौमारित्व स्यून सतीत्व को (as such ) इची दृष्टि से और इसी लिए कि उसमें कोई विशेषता है कोई विशेष महत्त्व की बात नहीं ननी की राजधानी वलिन शहर में अत्ती हजार पुरुष और स्त्री ऐते हैं जो केवत पुरुष, या केवल स्त्रियों के क्लवो के सदस्य या सदस्या है, स्त्रियों के क्लवों में पुरुप और पुरुषों के क्लबों में स्त्रियां जा नहीं सकतीं और इन क्लबों में आपस में ही परस्पर काम-वासना की तृप्ति होती है। कृ० का० मा० ( ३६ ) समझते । हम ने छिपा नहीं कि पुरुष दूसरे की पत्नियों ओर वेश्यानों के प्रेम में अक्सर पागल होते हैं और उनके चरणों में सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं। अगर कोमारित्व में कोई विशेषता होती तो उपयुक्त बाते अनभव होती। हम यह भी जानते है कि पूर्वीय प्रदेशों के एक या दो मतदाताओं का मत यह कि विवाह के बाद पति, पत्नी को किसी दूसरे के पास “याल भाव मांक्षाय" कौमारित्व हरण के लिये भेज दिया करें और कौमारित्व - हरण हो जाने के बाद ही पत्नी का पति ने सहवान हो। इन मतदाताओं को भय यह था कि कौमारित्व-हरण के कष्ट के कारण कहीं पत्नी पति ने भय न खाजाय और कहीं ऐसा न हो कि वह पति ने फिर कभी प्रेम ही न कर सके। शारीरिक 'कौमारित्व' को वैसा महत्त्व एक दृष्टि ने 'वात्स्यायन' ने भी नहीं दिया है। कन्या समप्रयुक्तमधिकरण (Courting and wooing a manden) के अध्याय में कुमारियों को सीख देते देते यहां तक कहा गया है, अवश्य हो, यह पूर्ण रूप से विश्वास हो बहुत दिन पड़े हो गये इसलिए मतदाताग्री तथा ग्रन्थ का नाम याद नहीं है किन्तु हमने ऐसा पढ़ा तन्दर है। यह भी नभव है कि किसी भी दक्षिण मागी प्राचार्य का मत यह न हो क्योकि पार्य सभ्यता में ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारिणी, कुमार. कुमारी, अक्षत अक्षता, अदूषित युवा, अदूपिता कन्या, अपूर्व अपूर्वा का ही विवाह श्रेष्ठ माना गया है। उपयुक्त प्रथा से "कुमारी" का मन और शरीर दोनों ही दूषित हो जाता है। सुनते हैं मलाया प्रायद्वीप में प्रायः अब भी यह प्रथा प्रचलित है । बरात धूम धाम से निकलती है, विवाह होता है, अनन्तर तीन दिन पति, पत्नी के साथ रहता है, चौथे दिन पत्नी पति से अलग कर दी जाती है और फिर उसका विवाह सिवा उन पति के किसी भी दूसरे मनुष्य के साथ हो जाता है। इस प्रथा का तत्व और रहस्य हमारी समझ में नहीं आता। कृ० का०मा० - ( ४० ) जाने पर कि कुमार छोड़ कर भागेगा नहीं और उससे विवाह जीवन भर का सबन्ध हांगा:- "श्रभ्यथितापि नातिविवृता स्वयम् स्यात् । अन्यत्र । निश्चय कालात् । यदानु मन्येतानुरको मयि न व्यावर्तिप्यति इति तदैवेनम- मियुञ्जानम् बाल भाव मोक्षाय स्वरयेत् । विमुक्त कन्या भावा च विश्वास्येपु प्रकाशयेत् ॥ "कन्याभियुध्यमाना तु य मन्येताश्रय सुखम् । अनुकूल च वश्य च तस्य कुर्यात्परिग्रहम् ॥ ट्रायल मैरिज और [Premarital experience] "विगह के पहिले ही कुछ अनुभव" जिस पर पश्चिमीय ससार आज दिन बहुत जोर दे रहा है, कुछ उसी के समान किन्तु पवित्रता को लिये हुए यह उपयुक्त वातं थीं किन्तु हमारा ख्याल यह है कि हमारी सभ्यता इन सब बातो को करके देख चुकी, उसने इनको निकम्मी पाया और इनको कर छोड़ दिया। भारत में प्राचीन काल में और आज भी मलाबार, धावनकोर और उत्तरी पहाड़ी या जङ्गली प्रदेशों में क्या नहीं प्रचलित है ? स्वयवर, गान्धर्व,गक्षस, एक स्त्री के कई पति, एक पति के कई स्त्री, सब कुछ तो था और है। एक नहीं पाठ प्रकार के विवाह- सम्बन्ध होते थे, नियोग भी होता था, पति के जीवित रहत दूसरा विवाह भी होता था, किन्तु इनकी निस्सारता और [१] ब्राह्म [२] प्राजापत्य, [३] पार्ष,[४] दैव [५] गान्धर्व, [] अासुर, [७] राक्षस [८] पैशाच । प्रथम चार प्रकार के विवाह 'धर्म्य" माने गये हैं, द्वितीय चार की काम्य विवाहों में सज्ञा है। कन्या को अलकृत कर उसका दान देना, ब्राह्म विवाह कहा जाता था, यह विवाहों में सर्व श्रेष्ठ माना गया है। युवक और युन्ती मिल कर धर्म का आचरण कर, इस उद्देश्य से उनका विवाह कर टेना "प्राजापत्य विवाह कहाजाता था। वर सेदोगाव लेकर उसे कन्या दे देना "श्राप" विवाह था। एक त्वज को वेदी पर विठा .

( ४१ ) म्वरावियो को देख कर हो हमारे पूर्वजों ने, हमारी सभ्यता ने इन बातों को किया, करके जोड़ दिया, इन का बहिष्कार कर दिया और अन्त में सतीत्व, पवित्रता, धर्म और कर्तव्य कर उसे कन्या दे देना देव" विवाह कहा जाता था । इन सब उपर्युक्त विवादों में कुमारी के माता पिता की सम्मति ज़रूरी है । द्वितीय चारों प्रकार में माता पिता की सम्मति जलरी नहीं। युवक और युवती को सम्मति या प्रीति जरूरी कही जाती है किन्तु हम कह नहीं सकते कि यह ठीक कहा तक है। कम से कम पैशाच विवाह का जो रूप है वह कदाचित् कन्या की सम्मति होने पर इसी प्रकार का न होता। गान्धर्व-विवाह, प्रेम और पसन्द का विवाह था, युवक और युवती प्रेम के वशीभूत हो आप ही संबन्ध कर लेते थे । आसुर-विवाह का अर्थ कन्या के माता पिता को धन देकर कन्या ले लेना है। जबर्दस्ती कन्या को छीन ले जाना, शक्ति के वल से, राक्षस-विवाह कहलाता है और सोती हुई कन्या को चोरी से उठा ले जाना पैशाच- विवाह के नाम से प्रसिद्ध है। द्वितीय चार प्रकार के विवाह धर्म नहीं [अधh] "काम्य' विवाह कहे जाते थे। अधर्म्य क्यों समझे जाते थे, इसका एक कारण यह भी बतलाया गया है कि इनमें विवाह-विच्छेद, तलाक (Divorce) और विवाह बन्धन के टूटने की अधिक सभावना रहती थी। हमारे देश में (Love marriages) प्रेम के विवाह, गान्धर्व-विवाह इसी लिए श्रेष्ठ समझ ही नहीं गये। विवाह की नीव प्रेम [जो घटने बढ़ने और नाश होने वाला होता है] के माथे रखी ही नहीं गई। भारत में इसी लिए धर्म और कर्तव्य की नीव पर विवाह-वन्धन स्थापित किया गया था । विवाह-परिछेद (Divorce) और पति के जीवित रहते पुनर्विवाह का भी प्रायोजन था। सव के आश्चर्य जनक बात यह है कि प्राचीन भारत में विवाह-विच्छेद (Divorce ) के जो नियम थे वे प्रायः वे ही थे जो सौ वर्ष पहिले इङ्गलैंड, वेल्स स्काटलैंड ( ४२ ) की नीव पर विवाह-वन्धन को भ्यापित किया । हम भी सतीत्व और पवित्रता को इसी लिए सर्वश्रेप्ट महत्त्व प्रदान करते हैं क्योंकि हमारा विश्वास है कि वैवाहिक जीवन कमी भी मुखमय हो ही नहीं सकता जब तक कामुकता सा एकटम दमन न किया जाय और पत्नी मन और शरीर दोनों से ही सती और पति मन और शरीर दोनों से ही पवित्र, सयमी और एक पत्नी-त्रत धारण कहने वाला न हो, क्योंकि हमारा विश्वास है कि वासना की तृप्ति की नीव पर स्तम्भित सम्बन्ध न सुखकर हो सकता है और न स्थायी। किन्तु उपयुक्त बातों का अयं पाठकों कह न लगा लेना चाहिए कि पश्चिम में सब खराब ही है और हमारे यहाँ सब अच्छा ही है। पश्चिम में अनेक अच्छी बातें हैं, साथ ही भारत की कितनी ही हीन प्रथाओं का कैसा नाशकारी फल हो रहा है यह हमारा दी जानना है। इस सम्बन्ध मे तो हमारा निवेदन यही है- में प्रचलित थे। भारत के विवाह के नियम अधिकतर Germany जर्मनी के नियमों से मिलते जुलते हैं। हमारा ख्याल तो यह है कि जर्मनों ने अपने वैवाहिक नियमों का निर्माण हमारे नियमों के आधार पर ही किया है। किन्तु भारतीय तकाक की विशेषता यह थी कि प्रथमत. यह कटिन बहुत था साथ ही दुश्चरित्रता (adultry) का प्रमाण आवश्यक न था । यह हो सकता है कि बहुविवाह की प्रथा के होने से, या पुरुप की प्रभुता मे, या स्त्रियों को पवित्रता से दुश्चरित्रता का नियम ही न रखा गया हो किन्तु इसी तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि हमारे प्राचार्यों ने वही कर रखा था जिसके लिए आज पश्चिमीय प्रदेश चिल्ला रहे हैं और वह यह कि गन्दगी साबित करने की ज़ल्लत यावश्यक न समझी जाय । कृ० का० मा. कविसम्राट रवीन्द्र के शट मे सच तो यह है- “The manags system all over the world and not only in India from the earliest ages till now, is a barrier .

( ४३ ) "एक नहीं दो नहीं सौ नहीं हजार नहीं। हमारे सीने के दागों का कुछ शुमार नहीं ॥" हमारी कुप्रथाओं का सुधार और पुन स्स्कार जरूरी है, बहुत सी समयानुकूल वाते हम को जारी करनी हैं, सब से बड़ी बात यह करनी है कि पुस्तकों और अक्षरों में ही नहीं वरन् व्यवहारिक जीवन मे हम को स्त्री को आदर और पूजा का पद देना है किन्तु यह सब होते हुए भी हमारा निवेदन यही है कि जो कुछ हम करे, आँख खोल कर, उन बातों के नतीजो पर अच्छी तरह से विचार कर, साथ इस वत को साथ ध्यान में रख कर कि हमारा मार्ग पश्चिम की भाँति प्रवृत्ति का नहीं वरन् निवृत्ति का है और सच्चा और सुखदायी मार्ग यही है। हम कह नहीं सकते क्यों और कैसे किन्तु हमारा तो विश्वास है कि इस प्रवृत्ति और बासना की लिप्सा का ही यह नतीजा हुआ है कि श्राज- "यादमी को भी मुयस्सर नहीं इन्सा होना कामनाएं दो प्रकार की होती है। एक काम्य, इन्द्रियानुगत, अपवित्र और नाशकारी दूसरी पवित्र और अनन्त-जीवन की प्रदा- यिनी। एक तृष्णा से ओत-प्रोत है, काम्य है, जड़ है और यह हमको समय की गति के पहियों में जीवन मारण या जन्म और मृत्यु के रूप में बाँध देती है, दूसरी बोधमय है, यह जीवन मरण तथा जन्म और मृत्यु से हमको स्वतत्रता दिलाती है और हमारी आत्मा को अन्त- जीवन और विशिष्ट-आत्मा में विलीन कर देती है। एक अशान्ति in the way of true union between man and woman, which is possible only when "Society shall be able to offer a large field for the creative work of woman's special faculty without detracting from the creative at home". R. N TAGORE ( ४४ ) अतृप्ति, प्रवृत्ति की प्रोत्साहिका और जननी है, दूसरी तुष्टि, तृप्ति. निवृत्ति और निर्वाण की माता है। इन्हीं दो प्रकार की दो भिन्न माम- नाओं की नीब पर ही पश्चिमीय और भारतीय सभ्यता अवस्थित और अवलम्बित है। इस भिन्नता और परस्पर विरोध के कारण ही दोनों के दृष्टिकोणों में महान् अन्तर है और इसके ही कारण दोनों की प्रथाओ, श्रादशौं, उद्देश्यों और जीवन के नियमों में इतना फर्क है। इसी के कारण पश्चिमीय सभ्यता में वासनाओं को तृप्ति तथा धन-संग्रह का श्रादर और प्रायोजन है जब की भारतीय सभ्यता में सब से अधिक सन्तोप, त्याग, विद्या और चरित्र का मान था और सब से अधिक ईप्सित वस्तु थी निष्काम और शान्ति ! यहाँ केवल धन से कोई बड़ा हो ही नहीं सकता था, पश्चिमीय सभ्यता में केवल धन से सम ससार के ऊँचे से ऊँचे पद को प्राप्त कर सकते हैं। वहा रुपये की सव माया है । वहा रुपये की ही जात है हमारे यहाँ धर्म, कर्तव्य और चरित्र की नीव पर जाति का भी विभाजन था । इस धन की नीव के कारण ही अमीर गरीब का भेदभाव हुमा, गरीव पीसे जाने लगे हजारों कानूनों की नरूरत हो गयी और राष्ट्रो को दूसरे राष्ट्रों से युद्ध करना और राज्य का विस्तार करना नितान्त आवश्यकता हो गया। वैवाहिक जीवन की समस्याओं के स बन्ध में ही नहीं वरन् जीवन की प्रायः समस्त महत्वपूर्ण समस्याओं के स वन्ध मे दोनों हो सभ्यताएँ सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकी है, क्योकि सिद्धि प्राप्त करने के बाद पतन अस भव होता, कहीं न कहीं पर पहुँच कर दोनों ही सभ्यताएँ विफल हो जाती हैं, अपने हों हाथों द्वारा निर्मित "तीक गुलू" और हथकड़ियों और वेडियों में ये अपने को ही जकड लेती हैं, और एक फन्दे को छुड़ाने के फेर में और फन्दों में ये अपने को फसाती जा रही है। मुक्ति का मार्ग ढूँढ़ने में, अपने को अमर और सफल बनाने की धुन में दोनों ही पागल हो रही है यद्यपि दासी होने के कारण १८५७ के बाद से हमारे पतन-काल में आर्य सभ्यता सर्वथा हीन, निश्चेष्ट और ( ४५ ) वामसी हो गयी है। हर तरह सेहर प्रकार के अनुभव बार प्रयोग किये जा रहे हैं किन्तु निश्चित कुछ नहीं हो सका है। हमारे देश के सुधा- रकों को यह सब ध्यान मे रखना चाहिए और इन सब के साथ ही साथ हमारे इस विनीत निवेदन को भी कि सुधार अपने हाथो ही होगा, अपनी शक्तियों से ही होगा ओर होगा अपने भीतर की हो सहायता से किसी भी दूसरे की या बाहर की सहायता से नहीं। देश के सुधारकों को एक बात और भी ध्यान में रखनी होगी और यह है कि पश्चिमीय सभ्यता एक जर्मन विशेषज्ञ के मतानुसार राजसी (राजस; forceful, active, energetic) शक्ति- शालिनी, प्रत्येक क्षण आगे बढ़ने वाली, मार काट पसन्द करने वाली और सक्रिय है और हमारी सभ्यता तामसी, प्रगाढ़ निद्रा और निश्- चेष्टो की पक्ष-यातिनी, निष्क्रिय ओर स्वप्नों में लीन रहने वाली है। रज और तम की भाँति ही दोनो बिलकुल, विभिन्न पथ-गामिनी और एक दूसरे की बिलकुल विरोधिनी हैं । हमको यह भी जानना चाहिए कि रज अकेला अपनी प्रकृति और बनावट के ही कारण, केवल अपनी शक्ति और पूर्ण विकास से ही, अगर उसकी रोक थाम न की जाय, अपनी ही नहीं संसार की समस्त शक्तियों का विनाश सम्पादित कर सकता है । इसके विपरीत "तम" अकेला अपने पूर्ण विकास से निश्चेट हो संसार की समस्त शचियो को एक छोटे विन्दु (Point) का रूप दे सकता है। पश्चिमीय सभ्यता एक दम "लोकायता" या इन्द्रिो. पासन और शक्ति पर स्तंभित है। पूर्वीय सभ्यता एक दम निष्क्रिय- पात्रता (Passivity) और पूजा पाठ और अध्यात्म (Too much spiritualism) पर अवलम्बित है। एक सभ्यता का उद्देश्य है सारी पृथ्वी का साम्राज्य, दूसरी सभ्यता सारे स्वर्ग पर अधिकार चाहती है, ठीक वैसे ही जैसे वैवाहिक सम्बन्ध आर्य- सम्यता में बिलकुल शुष्क धार्मिक कर्तव्य है और पश्चिमीय Count H. Keyserling ( ४६ ) सभ्यता मे पूर्ण वासना की तृति । समस्त पृथ्वी या सारा स्वर्ग दोनों हो सिद्धान्त गलत है क्यों की या जड़ और या जीव की संज्ञा पृथ्वी तल पर हो ही नहीं सकती ठीक उसी तरह से जैसे वैवाहिक सम्बन्ध एकदम शुष्क कर्तव्य या एकदम काम्नही कर सफल नहीं हो सकता । जर्मन-विशेषज्ञ का कहना यह भी है कि राजस (पश्चिमीय) सभ्यता ससार में अपना अस्तित्व ही नहीं कायम रस सकती जब तक उसका तामसी वर्तमान पूर्वीय सभ्यता में सम्मिश्रण नहीं होता और दोनों "सत्य" के सिद्धान्त की नीव पर स्तम्भित नहीं होती। हमारा निवेदन यह है कि हम जर्मन विशेषज्ञ से इस बात मे सहमत नहीं किया सग्यता "तामसी" है। जिम सभ्यता में "गीता" और उपनिषदों का शान और सदेश मौजूद हो, वह "तामसी" हो ही नहीं सकती। अर्जन पर तामस तारी था, वह निश्चेष्ट हो गए थे, मोह के वशीमून हो गये थे, सबको अपना ही देख रहे थे इसीलिए तो भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया किन्तु इसके साथ ही साथ हम यह मानते हैं कि काल चक्र और अवनति की मार से हमारा, हमारी श्रात्मा का, और हमारे ही साथ, हमारे ही विकल्प और तक से सभ्यता का न्य भी बदल गया और ऐसी दशा में हमारे पतन काल में हममें तामम्रो प्रवृत्ति की अधिकता हो गयी, और हम प्रगाढ़ निद्रा और निश्चेष्टा के, साथ ही लोभ, मोह, चरित्र की होनता और (Too much spuritualism) अत्यधिक अध्यात्म की चिन्ता के फन्दे में फस गए। किन्तु हम फिर चेते हैं, समस्त पूर्व नागा है, और हमारी सनातन प्रार्य सग्यता जो तम नहीं रज और सत्व के सुखमय भेल और सामजस्य पर अवस्थित है और जिसकी आवश्यकता जर्मन-विशेषज्ञ बतला रहे हैं फिर हममे ही और हमसे ही विकास प्राप्त कर रही है। सभ्यता का रूप अधिक नहीं तो कुछ जरूर हम समय की प्रगति से मालूम कर सकते हैं और समय की प्रगति से विदित हो जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि १८५७ के बाद, हम अधिक तामसी हुए, हमारी सभ्यता ( ४७ ) तामसी हुई किन्तु १९०४-१६०५ में पूर्वीय प्रदेशों की स्थिति और जापान की लस पर विजय के साथ ही साथ हमारी सभ्यता ने करवट बदली । सन् १९०५ की काग्रेस ने स्वर्गवासी मि० गोखले के सभा- पतित्व में प्रथम-प्रथम हमारी राजनीति में और उसके साथ ही साथ हममें राजस" के अंकुर बोये। बायकाट का प्रस्ताव पास हुया । १६०७ की कलकत्ते की काग्रेस ने स्वर्गवासी दादा भाई नारोजी के सभापतित्व में स्वराज्य, राष्ट्रीय शिक्षा, स्वदेशी और वायकाट का प्रस्ताव पास कर यह प्रकट किया कि उसमे "रानस" का पूर्ण रूप से उदय हो गया है। डा. वीसेन्ट का "होमरूल आन्दोलन" हममें "राजस' को युवारूप में प्रकट करता है। महात्मा जी का "असह- योग" 'राजस" की पराकाष्ठा को सिद्ध करता है, किन्तु इसके साथ ही निष्क्रिय प्रतिरोध, वह भी "अहिसात्मक' खुद कष्ट सहो, मार खावो, वार मत करो, खुशी-खुशी कष्ट मेलो, अधिक से अधिक प्राकृतिक और पवित्र जीवन वहन करो" यह "राजस" में "सत्व" का सुहावना सम्मिश्रण था । असहयोग का पतन, सत्व का त्याग था, और "राजस" में ही फिर फंसना था, जो कि हिन्दू मुस्लिम झगड़ों और मार काट से प्रकट भी होता है। इस सन्सार में, साथ ही प्रकृति में स्थिरता है ही नहीं, हर तरफ हर बात में उतार चढ़ाव है, और प्रगति का रूप घड़ी के लटकन की भांति एक सीमा से दूसरी सीमा पर जाना और आना है। इस लिए यह किसी का समझना कि हमारी सभ्यता तामसी है महज़ भूल है। पश्चिम पूर्व को स्वतन्त्र न करे, पूर्व स्वयम् स्वतन्त्र हो जायगा या अपनी ही हित-रक्षा के नाम पर विवश हो पश्चिम को पूर्व को स्वतन्त्र करना होगा, नहीं तो पूर्व को बांधे रख कर वह अपनी गुलामी की जजीरों को स्वयम् अपने हाथों ही निर्मित कर लेगा। यह सब होगा, नहीं होगा, कैसे होगा, और कत्र होगा यह सब विषयान्तर है। इस समय तो हम अपने देश के समाज सुधारकों की ( ४८ ) सेवा में इतना ही निवेदन कर देना चाहदे हैं कि अपने घर में और अपने पास सब कुछ है, अन्ये होकर पश्चिम की नकल करने के फेर में पागल मत होना, वर्तमान् कालिक पश्चिमीम कोर्टशिप (Courtship), 147 #fts (Trial marriage), farve TEST ही वैवाहिक जीवन की घनिष्टता का परिचय (Pre-martial Experience) तथा अन्य इसी प्रकार की बातों के सुन्टर और भडकीले नामों से अपनी सुध-बुध को मत खो देना, इनकी हमको हमारे देश और हमारे समाज को तनिक भी आवश्यकता नहीं। वर्तमान समय में हमको किसी तरह से निराश होने की भी तनिक जरूरत नहीं। खुशी से फूल जाने और निश्चेष्ट हो वैठ जाने की भी जरूरत नहीं, किन्तु सच बात यह है १६०५ से ११२७ तक में हमने जितनी उन्नति की है, उसकी सीमा नहीं है। हम परिवर्तन और काति (Revolution) के काल में रह रहे हैं, हमको अपनी गति का पता नहीं है, किन्तु भविष्य में इन वर्षों का इतिहास लिखने वाला ऐतिहासिक हमारी उन्नति पर दङ्ग रह जायगा। हमारी सभ्यता में और हममे भीतर ही भीतर घोर मन्यन हो रहा है और हमारा विश्वास है कि इसमे हमको हमारी लक्ष्मी और हमारा अमृत दोनों ही मिल जायेंगे। हमको केवल इतना ही विश्वास होना चाहिए कि हम सब कुछ अपने ही भरोसे कर सकते हैं, प्राचान के निकट हो कर, अपनी "तामसी" निश्चेष्टता, प्रगाढ़ निद्रा का त्याग कर, ससार माया है और अध्यात्म की चिन्ता (Too much spiritualism) की प्रवृति पर अकुश लगा कर, रज और सत्व के मार्ग पर चल कर और "अभ्युदय के इस संदेश को हृदयङ्गम कर "उत्यतव्य जारतव्य योत्तव्य भूतिकर्मसु भविष्यतीत्येव मन कृत्वा सतत मव्ययः। "जागो, उठो, आगे बढ़ो और हितकर कामों में जी जान से लग जायो, इत विश्वास के साथ कि सफलता होगी और होगी।

( ४६ ) हम सुधारों के विरोधी नहीं, हम जितने व्यापक और जिन सुधारों को चाहते हैं, संकोच से, भय से और इस कारण से कि अभी हमे अपने को अधिकारी नहीं समझते, उनकी चर्चा भी नहीं करते किन्तु इसके साथ ही हमारा निवेदन यह है कि आवश्यक सुधारों को हम करते चलें, किन्तु सच्चे और व्यापक सुधार अभी हम कर नहीं सकेंगे क्योंकि हम पराधीन है, हमारा आत्मा भी हमारा नहीं और क्योकि स्वराज्य, बिना पूर्ण स्वतन्त्रता के हमारी आत्मा का पूर्ण विकास, हमारा अभ्युदय असम्भव है और जब तक यह सम्भव नहीं हम लोगों को यह अधिकार नहीं कि अधूरे और गुलामों के ज्ञान से हम महास्व- तन्त्र, सत्य संकल्प, पारदर्शी महर्षियों के ज्ञान पर हरताल फेरने की चेष्टा मे उतावले हो पड़ें। हमारा निवेदन इस लिए यही है कि हमारी सन्यया और हम इस समय दोनों ही गुलामी की नजीरों से जकड़े हुए है, दोनो ही परमुखापेक्षी हैं और इन कारणों से हमारे मस्तिष्को की गति और विकास भी परिमित हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं । स्वतन्त्र होने पर हम 'समवित' और 'विदेह-मुक्त' दोनो ही हो सकेंगे और उस समय हम अपने ही नहीं वरन् ससार के पथ-प्रदर्शक वन सकेंगे। हमारा यह मत, कम से कम, हम को स्पष्ट है कि वैवाहिक-जीवन को नुखमय बनाने के लिए, कामवासना को बहुत ही कम करना होगा, साथ ही संयम और इन्द्रिय-निग्रह को नितान्त रूप से आवश्यक बनाना होगा । हम इसी लिए शरीरों के सम्मेलन के पहिले अात्माग्री के सम्मेलन पर अधिक जोर देते हैं। हमने इसी लिए कहा है कि सुहागरात में शरीरों का सम्मेलन न हो और शरीरों का सम्मेलन तत्र ही हो, जब यह पूर्णरूप से निश्चित हो नाय कि विवाह, जीवन भर का निवाह होगा। इससे यह भी तुफल फलेगा कि काम-वासना का नियमन और नियंत्रण होगा, इन्द्रिय-निग्रह का हम को अभ्यास होगा और धीरे धीरे मानव-समान, वर्तमान काल में जो वासना की वृद्धि ( ५० ) हो गई है। और जो समार के समस्त कष्टों का एकमात्र प्रधान कारण है ], उसको कम कर सकेगा, उस पर विजय प्राप्त कर सकेगा और तब ससार दुःखी का नहीं वरन् तुखो का केन्द्र हो जायगा। इस सम्बन्ध की एक बात हम और कह देना चाहते हैं। एक जर्मन-विशेषज्ञ का कहना है कि हजार, दो हजार या दस हजार वर्षों वाट काम की वासना की तृप्ति, इसी प्रकार की, मानव-समाज में रहेगी ही नहीं। इस विशेषज का कहना है कि यह मानव-हृदय की सत्र मे नबस्त वासना है, सुखों में यह सर्वश्रेष्ठ भी है किन्तु यह सब होते हुए भी वासना की तृमि का साधन और प्रकार, इसी तरह से ही यह सष्टि का ध्येय या सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य हो नहीं सकता. क्योंकि सुष्टि का आदर्श यदि यही होता तो पुरुष और स्त्री की जननेन्द्रियों शरीर के नीचे के भाग में न होती; वाय ही शरीर के मूत्र को भी वाहर करना उनका काम न होता। जर्मन-विशेषज्ञ का कहना है कि उनके मतानुनार याचारण करने से पुरुष और स्त्री सदा सुखी और अमर-जीवन वहन कर सकते हैं। विशेषज्ञ का मत क्या है इनकी चर्चा हम नहीं करते। जब तक ससार के अधिकतर विहान उसके मत की स्वीकार न कर लें, साथ ही हम भी उसके कारल न हो जाये हम उसकी चर्चा पसन्द नहीं करते, दूसरे चर्चा कर हम व्यर्य में गालियां खाने को भी उन्तुक नहीं । जो कुछ लिख डाला है उसी के लिए कदाचित् कुछ हिन्दी के मज और संस्कृत के ऋछ विद्वान हम को दमा नहीं कर मगे । यस्तु । हम न वैज्ञानिक है, प्राणि-शान-विशारद, न प्रकृति के ही विद्वान, इस लिए नर्मन-विगेपन के मत के सम्बन्ध में हमारा कुछ भी कहना अनविकार चेष्टा होगी और इस लिए उसके समान दलीलो को न पेश करते हुए और उसके सिद्धान्त को वेदवाक्य न मानते हुए भी हम जो दलील और मत ऊपर प्रकट कर चुके हैं उनमे ही, जर्मन- * Dr. Carl Buttenstedt, ( ५१ ) विगंज के वन इन मत का समर्थन करते हैं कि मानव-समाज के भविष्य के इतिहास में काम-वासना की तृप्ति का यही प्रकार नहीं रहेगा। क्यों? न्योकि हमारा विश्वास है कि मानव-ममाज के विकास वे लिए. पुन्य और श्री को अधिक से अधिक नुखी बनाने के लिए, नाय ही त्रो को उनके जन्मजात और उपयुक्त पद पर यामीन करने के लिए यह अनिवार हनने आवश्यक है कि काम की वामना पर लगाम लगाई नाय और पुरम और श्री का सम्बन्ध इस प्रकार की बाल-वामना की तृति की नीव पर नहीं वरन् क्विी अन्य अधिक लिनीव पर नन्भित किया नाय। इस मन के रास्ते में हम को एक ही जबर्दन काटनाई दिखाई देनी है और वह यह है कि सृष्टि ने अपनी ही रक्षा के निमित्त काम-वासना की जड़ को मानव-हृदय में बड़ी मजबूती से जड़ दिया है और काम-वासना की धुरी पर ही सारा तुष्टिका चल चल रहा है। ग्राशा की रेखा हमारे लिए यह है कि प्रति नै सन्नानापत्ति का ही प्रायोजन किया था, विवाह सी प्रथा का नहीं. ऐटी दशा में काम-वासना की जड़ की मजबूती जरूरी यो। मानव-मलिक ने विवाह की प्रथा को जन्म दिया है, विवाह में सन्ता- नापत्ति का प्रागंजन है। दनलिए काम-वासना की जड़ को उतनी ही और उसी प्रकार की मजबूती की जरूरत अब नहीं रही है और इस लिए काम-वासना की तृप्ति के लिए हृदयां के सम्मेलन की आवश्यक "If we think of all that marriage represents to post of us the memory of the worlds adventure faced together in youth so heedlessly and yet so confidently, the tender comradeship, the sweet association of parenthood, how much more these count, than the bond by vihich nature, in her ingenious telcology, has contrived to secure 200 render agreeable the perpetuation of Species". 2 ( ५२ ) करहम प्रकृति के प्रवन्धकोटिकाऊ,स्वास्थ्यकर औरश्रच्छा रूपदेसकते हैं । इन सब बातों के साथ ही हम एक बात और भी पतियों से कह देना चाहते हैं । "मनोरमा" ने कई पत्रों में, कई पहलुओं से, काम- वासना को नियमित करने की बात को कहा है। सूत्र रूप से जितना आवश्यक था उसने कह दिया है फिर भी इस सम्बन्ध में हम कुछ कह देना चाहते हैं। श्रात्मा के लिए शरीर ही निवास है और जीव बिना जड़ के या जड़ विना जीव के निन्दा नहीं रह सकता। इसी एक सत्य की नीव पर सारा स सार और ब्रह्माण्ड चल रहा है किन्तु इसी के साथ ही साथ दूसरा अनन्त सत्य यह भी है कि जीव ही प्रधान है, जीव ही नायक है, का है और जीव के विना जड़ अज्ञानजीव-विहीन और जीवन-रहित है। इस लिए हमारी समझ में इन दोनों की समु- चित उपयोगिता के अनुकूल ही पुरुष और स्त्री-जीवन में इनको स्थान भी मिलना चाहिए । हमने इसी लिए दो श्रात्मा श्रों [ जीवों ], हृदयों के सम्मेलन को अधिक महत्व प्रदान किया है किन्तु यह होते हुए भी जैसा कि ऊपर हम कह चुके हैं, जड़ [शरीर ] महत्व-हीन या नगण्य नहीं है, और उसकी अवहेलना कर जीव जीवित नहीं रह सकता। जड़ के महत्व का इससे बड़े सुबूत और क्या हो सकता है कि पश्चि- मीय सभ्यता उसी की तृप्ति पर ही अवलम्बित है। हमारा निवेदन इस लिए यही है कि सृष्टि और जीव के विकास में इस लिए जड़ और इन्द्रियोपासन के महत्व को स्वीकार करते हुए भी उसे उसके उपयुक्त स्थान पर ही रखना चाहिए, और पति-पत्नी के सयोग और ससर्ग की मात्रा को वर्तमान की अपेक्षा अत्यधिक कम कर देनी चाहिए। सृष्टि का उद्देश्य, आदर्श और आदेश भी ऐसा ही है यह पशुओं और फल-फूलों को देख कर भी हम समझ सकते हैं। जीव-शास्त्र-विशारटों का मत है कि आदिकाल में पुरुष और त्रियों मे भी ऋतुविशेष* ही में * "It is not an exaggeration to say that in true marriage the sexual relationship and child-bearing ( ५३ ) काम का प्रादुर्भाव होता था। संसार और मानव-समान, साथ ही पति पत्नी की हितचिन्ता से भी कुछ ऐसा ही विधान हमारी समझ में श्रेयस्कर होगा। इस सम्बन्ध की विस्तार की बहस में न पड़ कर हम इतना ही कह कर सन्तोप करेंगे कि यह अच्छा होगा यदि पुरुष और स्त्री-समाज वसन्त तथा श्रावण मास को काम की तृप्ति के लिए एक- मात्र ऋतु समझ लें और गर्भाधान तभी किया जाय जब पति और पत्नी कामान्ध हों और अधिक से अधिक एक दूसरे में लय होने को लालायित हों। यह पति-पत्नी और साथ ही बच्चों के लिए भी अच्छा और श्रेयस्कर होगा। यह एक ग्राम प्रसिद्ध वात है कि (love children, children of passion) काम वासना के बच्चे अधिक खूबसूरत, चतुर और तेज होते हैं । इसका रहस्य इतना ही है कि यह प्रौढ कामना, और तृप्ति के बच्चे होते हैं । मनुष्य इस बात में जानवरों से भी गये बीते हैं । पशु गर्भाधान करते हैं जब वे कामना के वशीभूत होते है, जब प्रकृति उनको विवश करती है और जब वे अपने आपे से बाहर होते हैं, इसके विपरीत पुरुप बच्चे पैदा करते हैं बिना किसी ख्याल although they will always be a normal expression of marriage are incidental. They are not the object, they are the means of expressing the truth of the new life which marriage bas created". -COUNT H KERSLING + अकारण सन्तानोत्पत्ति करना, हमारा विश्वास है, संसार को नर्क का रूप देने में प्रधान कारण है । इसी कारण से अनाचार, पापाचार बढ़ा है। बृण हत्या, गर्भगत से पाप इसी के कारण होते है। श्रायुप्यहीन, अकर्मण्य, काहिल, निकम्मे बच्चे इसी की वजह से पैदा होते हैं और इसी एक कारण से मानव-समाज अत्यधिक कामुक्ता का शिकार हो गया है। कृ. का. मा.

( ५४ ) के, अकारण, आदत से रिवाज से, या यूं ही इन्द्रियों को चपलता को दमन न कर सकने के कारण या अपने क्षणिक जोश की शान्ति के नाम पर संसार के समस्त दुःखों का एक प्रधान कारण यह भी है, साथ ही पुरुष और स्त्री के पार्थक्य, उनके दिन-दिन बढ़ने वाले विमेटों और दोनों की परस्पर दूरी का भी हमारी समझ में प्रधान कारण यही है । इस प्रकार जनक बनना हमारी समझ में अनेक हटियों से मानव-समान और पुरुष और स्त्री के सम्बन्ध के लिए भयावह और नाशकारी सिद्ध हुआ है । हमारे पूर्वजों ने इसी कारण में गर्भावान के संस्कार का आयोजन किया था, जिसमे समझ चूद्ध कर, आँखें खोल, पूर्ण कामना से ही बच्चे पैदा किये जाय । हम पडित, विशेषज्ञ या बड़े विद्वान नहीं किन्तु हमारा विश्वास यह है, कि पुरुष और स्त्री युगों हुआ एक दूसरे से उसी दिन अलग और दूर हो गये जिस दिन पुरुप ने जड़ (Body) को जीव (Spirst) से अलग किया, जिस दिन उसने स्त्री को "कामवासना की तृप्ति के एक साधन" और "सुख की सामग्री का रूप दिया, और जिस दिन उनने स्त्री को एक बराबर वाली के सिंहासन से गिरा कर दासी की श्रेणी में बैठा दिया । पुरुष के ऐसा करने से ही कामवासना की तृति और प्रेम' पुरुष-जीवन में केवल एक आकस्मिक या साधारण घटना या कथानक मात्र हो गया, इसी कारण से यह कृत्य उसकी अात्मा से नहीं उसके शरीर से ही सम्बन्ध रखने लगा, और पुरुष समझने लगा कि वह प्रात्मा को शरीर से और शरीर को प्रात्मा -There have been, there are and there will be illegitimate parents but there have never been and never will he illegitimate children कृ० का०मा० * इसी कारण से विवाह सच्चा विहाह अर्थात् आत्माओं और शरीरों का न्य न रह गया और असुखकर हो गया। कृ० का. मा० ( ५५ ) से दूर रख सकता है। यही नहीं पुरुष के ऐसा करने से ही स्त्री भी परिवर्तन हुया और जैसा कि हम ऊपर लिख चुके हैं प्रेम और वासनायों की तृप्ति स्त्री-जीवन में भी शरीर और धीरे-धीरे अब अात्मा से भी विलग वस्तु होती जा रही है। शरीर, पुरुष के अधीन था, उसका वह पालन पोषण करता था, स्त्री ने कहा, यह तुम्हारा है, जैसा जब चाहो, तुम इसके साथ व्यवहार करो, और इसलिए शरीर से वह निश्चेष्ट हो गयी, वह निष्क्रिय-पात्र (Passive vessel) मात्र रह गयी, शरीर से निश्चेष्ट होने पर धीरे धीरे पुरुप की स्वार्थपरता और वर्वरता को देख स्त्री अब अपनी श्रात्मा को मी धीरे-धीरे निश्चेष्ट और विलग करती जा रही है। स्त्री समझती है और देखती है कि हर घडी, आये दिन या पुरुष की जब इच्छा हुई, स्त्री को प्रिय हो या नहीं, वह यह सब चाहता है। चाहे भी क्यों न ? पुरुप-यात्मा मे पुरुष का यह कृत्य विलग है, स्त्री ऐसा कर नहीं सकती, लिहाजा उसने यह तय किया कि शरीर की भांति ही वह आत्मा को भी तटत्य कर ले। यह सब, पुरुप, स्त्री और इनकी सन्तानों के लिए जहर साबित हो रहा है। इसलिए अगर सृष्टि को हम को जीवनमय बनाना है तो हम को स्त्री को बराबर वाली का पद देना होगा, काम की वासना पर हम को लगाम लगानी होगी, इसमें उसकी मां को भी स्थान देना होगा और ऐसा प्रयत्न और प्रबन्ध करना होगा जिसने प्रेम, काम-वासना की तृप्ति, पुरुप की आत्मा और स्त्री के शरीर से कोई विलग वस्तु न रहे, इसके साथ ही हम को ऐसा नियम बनाना होगा जिससे पिपासा को शान्ति तभी हो जब दोनों की आत्माएँ, दोनों के शरीर, चारों ही एक दूसरे में लय होने को उत्सुक और लालायित हों। हमने इसी लिए काम की तृप्ति के लिए विशेष ऋतुओं, वसन्त और वर्षा, का प्रस्ताव उपस्थित किया है। वसन्त [ फाल्गुण] में पुरुष कामान्य होते हैं प्रकृतिवशात्, वर्षा [श्रावण और भाद्र मास ] ( ५६ ) में स्त्रिया कामातुर होती हैं । अगर हमारा प्रस्ताव स्वीकार किया जाय तो कुछ ही दिनों में वर्षा का ऋतुविशेष पार ही नहीं रह जायगा और टोनी के लिए एक ही ऋतु हो जायगा। अगर गर्भाधान फाल्गुन मे हो तो श्रावण, भाद्र मन्त्री के गर्म का छठा सातवा मास होगा अर उने काम की वासना हो ही नी नहीं। फाल्गुण को पसन्द हम इन- लिए करते है कोंकि प्रयमत. यह ऋतुगल है, पुरुष का मृतु है. वह कमजोर होता है और अपनी प्रकृति का दमन नहीं कर सकता, तृत का तंत्र है, वह समुद्र है, उसमें समय ने ज्वार भाव ही श्राता है, नहीं तो वह समुद्र के समान शान्त ही रहनी है, पुरुष नट है, पां के नालों के समान वह सहज म टोलायमान हो जाता है। साय ही स्वभावत समुद्र की अपेक्षा नद कहीं अधिक चञ्चल होना है. दूसरे वसन्न में गर्भाधान होने से स्त्री प्रकृति के प्रतिबन्ध न ही वर्षा में कामातुरा नहीं हो सकेगी और उसे कोई कष्ट न होगा। इसके विपरीत यदि हम वा का गर्भाधान का समय निर्धारित करें नी एक तो पुनप कन्जोर होता है दूसरे उसके मार्ग में कोई प्राकृतिक प्रतिबन्ध हो नहीं सकता, वसन्त में वह मदान्ध होगा और अत्याचार तथा पापाचार करेगा और इसमे सब प्रयत्न निष्फल हो जायगा। इस तरह ने 'वसन्त' को ऋतुविशेष ही नहीं, एक ही ऋतु मान लेने ने, पुरुष और स्त्री, एक ही युग में फिर एक ही समान श्रेणी में आ जायेंगे, स्त्री का टासी का रूप जाता रहेगा, पुरुष और स्त्री जो, विकास की नीढ़ियों में कहीं अलग हो गये हैं फिर एक हो जायेंगे और सब मे श्रेष्ठ यात यह होगी कि बच्चे बलवान, श्राचारवान, संयमी और वीमान पैदा होकर संसार को स्वर्ग से विलग पीर दुःख का केन्द्र नहीं वरन स्वर्ग सम और स्वर्ग का ही एक दूसरा टुकड़ा बना देंगे। हमारे ही देशवासी नहीं, कुछ विद्वानो को छोड कर यूरोप और अमरीका वाले भी हमारे इस प्रस्ताव पर हॅसेंग, कहेंगे यह अव्यावहा- रिक है, मानव प्रकृति की यह अवहेलना करता है, यह व्यवस्था, ( ५७ ) आदेश और नियम समान है। हमारे युवा मित्र कहेंगे "अच्छे आये, आज तक विशेषज्ञ सताह में एक बार-दो बार पन्द्रह दिन में एक बार-दो बार, महीने में एक बार-दो बार की कैद लगाते थे, यह वर्ष में एक बार चाहते हैं क्या इन्सान हैं ? किन्तु हमारा निवेदन यह है कि वे ही नहीं हम भी उनके ही साथ हसेगे और उनकी ही बातों का समर्थन करेंगे क्योंकि उनके हो समान हम भी वर्तमान सभ्यता और वाता- वरण में ही पले हैं और इनकी कृपा से हम भी उनके ही समान कामुक और कामुकता में अधिक अभिवृद्धि प्राप्त किये हुए (Sexually more-developed) जीव है । हम सभी में काम की प्रवृत्ति इन उन्नति के युग में वर्तमान सभ्यता की कृपा से अन्य सभी वाती के समान अधिक अभिवृद्धि प्राप्त कर गयी है, किन्तु इसी के साथ ही हमारा निवेदन यह भी है कि विचार का प्रदुर्भाव और प्रचार ही संसार में सब कुछ है और किसी दशा को उपस्थित करने के लिए, किनी मी बात का अस्तित्व कायम करने के लिए पहले उस विचार का ही अस्तित्व कायम करना जरूरी है।-"मैं हूँ जैसे कि मेरे विचार है, तुम हो जैसे कि तुम्हारे विचार है किन्तु वे सब हैं जैसे कि हम सब के विचार है।" हम सब समाज के विचारों के प्रतिविम्ब स्वरूप ही हैं और इस लिए कामुकता को नियमित करने का विचार होने से ही हम सब की कामुकता श्राप से श्राप अवश्य ही धारे-धोरे कम हो सकती है। आज हमारा ऋतु विशेप का प्रस्ताव अव्यावहारिक है और जरूर है किन्तु यदि पुरुष और स्त्री को सुख से ससार में रहना है, अगर हम को निकट भविष्य में होने वाले (Sex war) स्त्रोत्व और पुतत्व के नाशकारी गृहकलह और युद्ध को रोकना है, स्त्री को उसके उपयुक्त पट पर यासीन कर, विकास की सीढ़ियों पर मानव-समाज को अपर * "I am what I think, you ara what you think but they are wabt we all think" में ( ५८ ) उठाना है और गृहस्थी को सुख और स्वर्ग का केन्द्र बनाना है तो श्रान नहीं तो पान सौ वर्ष बाद, हजार वर्ष वाद या दस हज़ार वर्ष बाद जब इस पुस्तक का कहीं नामोनिशान भी न होगा, इस पुस्तक के इस प्रस्ताव को या इसी के समान इसी के भाई किसी ऐसे ही दूसरे प्रतिबन्ध को मानव-समाज को कायम करना होगा। कामुकता की वृद्धि का फल हम देख चुके, उसका उज्वल सितारा वेश्याओं और वाराङ्गनात्रों का समूह और महाभारत है, अब कामुकता का दमन कर भी हम को देखना चाहिए, क्या होता है ? अन्त में एक बात हम और कह देना चाहते हैं। "मनोरमा ने भी लिखा है और जर्मन विशेषज्ञ की भी राय यही है कि पुरुष "राजस" और न्त्री "तामस" प्रकृति की जीव है। हमारी समझ यह विभाजन कदाचित् इस विना पर किया गया है क्योंकि पुरुष सक्रिय, सचेष्ट, शक्तिशाली, इन्द्रियपरायण और लडने वाला (active, energetic, forceful, materialistic and militant) है, इसके विपरीतन्त्री निष्क्रिय, निश्चेष्ट, अधिक धर्मभावना वाली (Passive and too much sparrual) है । इस विमानन का एक कारण यह भी हो सकता है कि पुरुष अकेला "रज" की भाति विकास प्राप्त करता हुआ अपना ही नहीं वरन दूनरों का भी विनाश सम्पादित करने में समर्थ हो मक्ता है यदि "तम" [स्त्री] से, जो अपने विकास से शक्तियों को छोटा कर एक विन्दु का रूप दे देता है, उसका सम्मेलन और सयोग न हो जाय । "तम" से ही "रज' प्रत्फुटित होता है और विकास प्राप्त करता है, जैसे पुरुष स्त्री से जन्म पाता है, साथ ही "तामम" को निष्किय, निश्चेष्ट, हीन और कर्तव्यच्युत कर, "राजस" क्मी भी अपने पूर्ण विकास को नहीं प्राप्त कर सकता, ठीक जैसे पुरुप न्त्री को गुलाम, दासी, अस्वतत्र और हीन रस कर कभी भी अपना विकाम नहीं प्राप्त कर सस्ता । पुरुष को "राजत" और स्त्री को

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( ६० ) सचय करना रहता है, जज्ब (absorb) करना रहता है, कुसुमित हो पैदा (Fructity) करना रहता है और इस लिये वह निष्क्रिय हो ही नहीं सकती । वह वास्तव में सचेष्ट (active) होती है और उसके चेतन (Mind) और शरीर (Body) के प्रत्येक रङ्ग और रेशे विद्य तगति से काम करते होते हैं। न्त्री "निष्क्रिय" (Passive) "तामस" है यह तो हमारी समझ में बिलकुल ही अनर्गल बात है। वैशेष्यात् तु तद्वादस्तद्वाद "अर्थात ( Predominant Characteristic) sale at para विशेषताएँ ही साधारण रूप से देख ली जाती हैं और इन्हीं के भरोसे लोग निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं। यह सर्वथा भ्रामक भी हो सकता है। वास्तव में हमारी समझ में पुरुप और स्त्री भिन्न नहीं हैं, वे एक ही जीव के दो भिन्न दक्षिण और वाम रूप हैं । इसी लिये स्त्री का नाम "धामा" भी पडा है । प्रकृति में जैसा कि ऊपर कहीं हम लिख चुके हैं उतार चढाव ही है। स्वरों का ही हिसाव है। पुरुप इस तरह से अारोही 'स रे ग म प ध नी' का रूप है और स्त्री अवरोही "स निध प म ग रे स" का |ख्य में तो "पुरुष" को ही निष्क्रिय, निश्चेष्ट द्रप्टामात्र और दृष्यत्वेनैव भोका भी कहा है। साख्य ने "प्रकृति" (स्त्री) को ही क्रियाशील "नर्तकी" कहा है वेदान्त में पुरुष की प्रक्रति, ब्रह्म की माया, परमात्मा की शक्ति दिखला कर दोनों की एकता का साधन किया गया है । "सर्वन देवा सुरमयतिर्य, "न स्त्री न पटो न पुमान न जन्तु."। कहा गया है, अात्मा में लिङ्ग भेद ही नहीं, पर "स एकाकी न अरमत" आत्मान द्वधा व्यभनत, पतिश्च पत्नी चाभवत" इत्यादि । अकेले क्रीड़ा नहीं हो सकती इस प्रकृतिवास्तवे च पुरुपस्याभ्यास सिद्धः कार्यतस्तत्सिद्धि. चेतनो- हेशानियमः कटकमोक्षवत् अन्ययोगेऽपि तसिद्धि सत्येनायोदाहवत् । वृहदारण्यक चतुर्थ ब्राह्मणः- "श्रात्मैवेदमप्रयासीत्पुरुष विधिः सर्व नैव रेमे तस्मादेकाकी - ( ६१ ) साथ लिये एक ही ने क्रीडा, लीला और मन बहलाव के लिए, अपने को दो कर लिया, विम्ब प्रतिविम्य । जैसे पाइने में परम समान, सहश होते हुए भी हम खुद “वाम दक्षिण" के से विरुद्ध दिखाई देते हैं। सच यह है कि "अन्योन्याच्या" से दोनों के गुण दोनो ही में हैं और स्थान, काल, अवस्था मेद ने ही वे मिन्न रूप में केवल दिखाई देते हैं । दुर्गा, काली, चन्डी रूप में समस्त पुरुप देवताओं से अधिक "रज' क्रियाप्रवणता, क्रिया-शीलता, मौजूद है (रजः कर्मणि भारत) पश्चिमीय (Physiologists) प्राणिधन के विशेषज्ञ तो सभी जीवों को (Hermaphrodite) एक ही नर और मादा उभयलिङ्गी कहते हैं। पुरुषों में स्त्री-चिन्ह स्त्रियों में पुरुष चिन्ह अव्यक्त रूप से मौजूद भी होते हैं। लाख में एक दो में यह प्रकट रूप में दिखाई भी देते हैं। सच तो यह है कि 'अर्धनारीश्वर पौराणिक रूपक ही नहीं है । यह प्राकृतिक तथ्य भी है। "काम शास्त्र" के "पुरुषावित प्रकरण" में भी स्त्री की निश्चेष्टता, निष्क्रियता (Passivity) का अपलाप ही होता है । वर्नार्ड शा ने अपने "Man Superman" "मैन सुपरमै ने" में साफ़ साफ़ यही सिद्ध किया है Fe Woman is the Persuer man the Persued स्त्री पीछा करने वाली और पुरुष मागने वाला है। अमरीका के नज लिन्डसे ने अपनी "रिवोल्ट श्राव यूथ" नाम की पुस्तक में लिखा है कि स्कूल और कालेज के युवक युवतियों का मीतरी हाल जानने ने यह प्रकट हुआ है कि युवतियां ही युवकों को मार्ग-भ्रष्ट करती हैं, युवक केवल उनके हाथ में खिलौने और शिकार मात्र हैं। युवतियां प्रेरिका हैं और वे ही प्रेरणा करती हैं। शैव सम्प्रदाय के एक अन्य में शिव-पार्वती, अर्धनारीश्वर; दोनों तम प्रधान कहे गये हैं। पुराणो मे विष्णु और सरस्वती. सत्व प्रधान, न रमते स द्वितीयमैच्छन् । स हैतावानास यया स्त्री पुमासौ सपरिष्वको स इममेवात्मान धापायतत्तमः पतिश्च पत्नी चाभवताम्" (१२) ब्रह्मा और लक्ष्मी रजः प्रधान कहे गये हैं। सच बात यह है कि तीनों ही गुण सत्व, रज तम सर्वथा अपृथक-कार्य है । ये साथ ही रहते हैं, कोई अधिक हो, कोई कम, यह बात जुदा है किन्तु तीनों एक दूसरे या तीसरे से अलग किये ही नहीं जा सकते। हम उपयुक्त इन्हीं कारणों से जर्मन विशेषज्ञ के इस मत को कि स्त्री "तामस" है सर्वथा गलत समझते हैं। केवल इतनी ही है कि पुरुष शरीर में शक्ति के वेग की गति की मात्रा नीचे से ऊपर जाती है और स्त्री में ठहराव की मात्रा अधिक है, क्योंकि उसमें शक्ति के वेग की गति ऊपर से नीचे आती है, साथ ही स्त्री मे इच्छा (Emotion ) को मात्रा अधिक है । "इच्छा शक्ति रूपा कुमारी" यह प्राचीन आचायों का कथन भी है। जर्मन विशेषज्ञ का कहना यह भी है कि ससार सुख का स्थल नहीं हो सकता और मानव-समाज तब तक सुखी नहीं हो सकता जब तक "तामस" [स्त्री ] स्वतन्त्र न हो, उसको पूर्ण विकास प्राप्त करने के लिए पूरा पूरा अवसर न मिले, जब तक तामस [स्त्री] राजस [ पुरुष ] को घसीट कर फिर उसी केन्द्र पर न ले जाय जहाँ से रज और तम का प्रादुर्भाव हुआ था और जब तक कि राजस [ पुरुष ] और तामस [स्त्री ] सत्व [ पवित्रता] के आधार पर, उसके प्रतिबिम्ब स्वरूप, अपने अपने ही नहींवरन् परस्पर के पूर्ण विकास में सहायता पहुँचाने को पूर्ण रूप से स्वतत्र न हो जायें। हम जर्मन-विशेषज्ञ की उपयुक्त वातों का पूर्णरूप से समर्थन करते हैं। मानवसमाज को सुखी और ससार को स्वर्ग का एक टुकडा बना देने के लिए हमारी समझ में यह नितन्ति रूप से आवश्यक है कि स्त्री और पुरुप दोनों अपने विकास के लिए पूर्ण स्वतन्त्र हों और दोनो का सम्बन्ध, रज, तम अर्थात् वासना की तृप्ति, निश्चेष्टता और पतिदेवता है ( Too much Spiritualism) की भावना पर स्थित न होकर रज और तम के समुचित विकास के लिए "सत्व" और मानवी-स्वत्व, पवित्रता और पूर्ण स्वतत्रता के आधार पर अवलम्बित ( ६३ ) हो । दोनों एक दूसरे को जानें, दोनों का सम्बध शरीरों के साथ ही साय श्रात्मात्रों का भी हो और दोनों कम से कम अपने दोनों के ससार में अधिकतर श्रथ में, "मैं और तुम" की सजा को भूल कर एक जान दो कालिब हो जायें-वैवाहिक सम्बध को सुखमय बनाने का हमारी समझ मे मूल मन्त्र यही है, क्योंकि हमारा विश्वास है कि जब तक पुरुप और स्त्री दोनों ही (Gross desires) निकृष्ट वासनायों से मुक्त और परिष्कृत हो अनन्त के नाभि कमल से "ब्रह्म" की भौति "सत्व" के रूप में प्रकट नहीं होते स्त्री-पुरुप का सम्बध सुखकर नहीं हो सकता और ससार सुख का स्थल नहीं होगा। प्रस्तावना क्या यह भी एक छोटी सी पुस्तिका हो गयी और इस लिए पुस्तक के सम्बंध में इतना ही कह कर हम इसे समास करते है कि पुस्तक में नाम सब कल्पित है और भापा और भाव में भी प्राव- श्यकता और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन किया गया है क्योंकि "मनोरमा" ने पत्र सब अगरेजी में लिखे थे। पुस्तक के सम्बंध में एक ही बात हम और कह देना चाहते हैं और वह यह है कि यह पुस्तक कदाचित अभी कुछ दिनों और भी ससार के सामने न आ सकती यदि हमारे स्नेही मित्र, जयपुर निवासी श्री. कुंवर शिवनाथ सिह जी ने इसके मुद्रण करा देने का भार अपने ऊपर न ले लिया होता। पुस्तक तैयार कर देना सहज था किन्तु इसका सर्वश्रेष्ठ रूप में प्रकाशन हमारे लिए कठिन था। पुस्तकें हम लिख रहे हैं, इस बात का पता चलते ही, कुंवर साहब ने अपनी सहज उदारता से, उनको मुद्रण कराने का भार अपने ऊपर लेने के सम्बध मे हम को लिखा। "अन्धा क्या चाहे दो पाखे", हम को और चाहिए ही क्या था ? हम ने सुइर्ष कृतज्ञता-पूर्वक कुंवर साहव के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया । कुँवर साहब की कृपा से ही इस तरह से यह पुस्तक प्रकाशित हो रही है, इसलिए अगर इससे देश के नव-पतियों और नव नारियोंको ( ६४ ) कुछ लाभ हो तो उसका श्रेय हमारे मित्र को ही है और उसके लिए धन्यवाद के पात्र भी वे ही हैं। अन्त में इतना ही कहना और रह गया है कि वाहिक निवन्धा- वली” का पांचों पुष्य "कामनी के पत्र" शीघ्र ही प्रकाशित होगा। 'कामिनी के पति और "कामिनी में विवाह के एक दो वर्ष वाद हो वैमनस्य हो गया था। एक घर में रहते हुए भी यह पराये हो गये ये और एक दूसरे से बोलते नहीं थे। पति जी एक दूसरी स्त्री के प्रम में पागल हो उसके दास हो गये थे। "कामिनी पर उस दूसरी स्त्री का पति जो उससे अलग हो गया था, जान देता था, वह भी कामिनी के पति को विदित हो गया था। कामिनी पवित्र थी, अपने पति से ही वह प्रेम करती थी। गर्भवती दशा में उसने सोचा कि कदाचित उसकी नृत्यु हो नाय । इस भावना से और कदाचित अपनी आत्मा की तुष्टि के लिए उसने अपने पति के नाम दस पत्र लिखे थे । ये पत्र एक दिन दैवी घटना से जिस समय कि "कामिनी' सूतिकागृह में थी, पतिदेव के हाथ लग गये। उन्होंने उनको पढ़ा, उसी समय दूसरी स्त्री से वह अलग हो गये और फिर कामिनी और उसके पति "जड़ और जीव" की भांति एक होकर सुखी हो गये। उपर्युक दस पत्रों का ही "कामिनी के पत्र में त ग्रह है। हमारा विश्वास है कि इस पुस्तक को पढ़ कर पति और पत्नी अपने वैवाहिक जीवन को साधारण रूप में सुखमय बना सकते हैं। पन-बान जसरा, ७-४-२७ कृष्णकान्त मालवीय प्रेमोपहार श्रीयत

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समर्पण चि० पद्मकान्त मालवीय "That whereby the man attains to manhood is woman. It is bis power to recognise, appreciate and appropriate her that stamps him physically man......Onno plane of being is it good that the Man element be alone, for without Love, Force can but work evil until it be spent. -"THE PERFECT WAY." बवा, संसार सुख का स्थल नहीं, यह कर्मक्षेत्र, भोग-भूमि और मानव-परीक्षा का स्थल है। फिर भी संसार में दो स्वर्गीय, सर्व-श्रेष्ट सुख हैं। पहिला मुख है ईश्वरोपसना, ब्रह्मानन्द तथा ईश्वर के प्राणियों की सेवा । सच्चे हृदय की, सच्ची, व्यापारी नहीं. सार्वजनिक सेवा में कभी कभी जो आनन्द मिल जाया करता है उसकी तुलना इस संसार के या कल्पित स्वर्ग के किसी दूसरे आनन्द से नहीं की जा सकती। हमारी समझ में मानव-समाज की सच्ची सेवा, सर्व-श्रेष्ट ईश्वरोपासना है, साथ ही ईश्वर के सानिध्य और सामीक्ष्य का सब से श्रेष्ट, और सरल साधन भी। तुमको याद होगा एक जमाने में हमने लिखा था- "वदो इंजील और कोरॉ से खुदा मिलता नहीं । उसके वन्दों ही की खिदमत सब से अच्छा काम है।" ईश्वरोपासना तथा मानव-समाज-सेवा की कोटि और उसी कक्षा का होते हुए भी, उससे कुछ ही कम आनन्ददायक ५

( ६ )
दूसरा सुख संसार में सुन्दर, सुयोग्य सहधर्मिणी का प्रेम, संयोग
और सहयोग है।
हमने उपर्युक्त दोनों अानन्दों को एक ही कक्षा और कोटि
न कहा है। प्राचीन श्राचार्यों में से भी एक ने बी के सुख
को ब्रह्मानन्द-सहोदर के नाम से पुकारा है। कोच्च अथवा
कोक ने भी कहा है:-
"तत् सौल्यं पर तत्ववेदन महानन्दोपमं..
मुसलमान कवियों ने बहुत दिन हुए यह कह कर कि "इश्क
मजाजी से ही इश्क हकीकी भी होता है। दोनों की अभिन्नता
को प्रकट कर दिया था। एक अगरेज लेखक ने भी अब
लिखा है-
परोपकारी और नानव समाज की सेवा करने वाला
मनुष्य, मनुष्य जाति ना लेही है और यह सहानुभूति, स्नेह
या प्रेम का उच्चतम रूप है।"
ससार मै नजर फेंक कर देखा। जहाँ कहीं जो देश का
आता, मानव-समाज का हितकर्ता, तुमको दिखाई देगा, उसकी
तह में एक बी और वचा के प्रेम में मग्न एक व्यक्ति के रूप
का भी तुम को दर्शन होगा।
मानव-समाज का यह अमान्य है कि पशु से ऊपर न उठ
समने के कारण प्रेम के स्वर्गीय-अानन्द का अनुभव करना
और इसे थाती की तरह, ज्ञान के साथ, जुगह कर संरक्षित
रखना उसने बहुत कम जाना है। जान स्टूअर्ट मिल ने लिखा
*"The benevolent and philanthropic personal is a
107er of mankind and this form of sympathy is krova
as the sublimation of the erotic or love instinct"

( ६६ )
है-+ "संसार में प्रेम के सिवा कोई भी तथ्य वस्तु है ही
नहीं। हेवलाक इलिस का कहना है- "संसार की तथ्य
वस्तुओं में प्रेम ही सब से अधिक तथ्य वस्तु है।" किन्तु जैसा
हमने ऊपर कहा है यह मानव-समाज का अभाग्य है कि उसने
एक सुयोग्य सहधर्मिणी, रमणी के प्रेम, सहयोग और संयोग
के सुख को बहुत कम जाना है।
फल स्वरूप, वैवाहिक-जीवन इस विज्ञान, विद्या और
कला के युग में भी, स्वर्गीय सुख का नहीं वरन संसार की
झमटा, चिन्ताओं तया नाकामियों, आनन्द तथा उत्साह-हीन
उत्तरदायित्वों और कर्तव्यों और निरन्तर हाय हाय का केन्द्र
हो रहा है।
इसके लिए अधिकतर दोषी हम ही लोग है । एक चतुर
नायक और नायिका, पति और पत्नी, अगर उनमे बुद्धि विवेक
और संयम हो संसार के समस्त अभावों के रहते हुए भी
अपने जीवन को इतना आनन्दमय और सुखी बना सकते
कि वे इसी दुःखमय संसार को स्वर्ग का एक टुकड़ा बना लें
और कवि की इस उक्ति
"टूट खाट घर टपकत टटियौ टूट
पियवा के बाह उसिसवाँ सुख के लूट"
को अक्षरशः सत्य सिद्ध कर दें
हम धनी नहीं कि तुम लोगों के लिए बॅगले वनवा देते,
जमीदारी या जायदादें खरीद देते या तुम लोगों के लिए संसार
के अभावों को दूर कर देते। हम यदि यह सब कर भी सकते
तो इससे ही तुम्हारा वैवाहिक जीवन सुखी हो जाता यह
संभव भी नहीं था। हमने इसी लिए तुम्हारे लिए यह पुस्तक
तैयार कर दी है।
t'There is nothing arel in the world but love"
f"It is the most solid of realities".

( ७० ) इस पुस्तक में सहस्रो अत्यावश्यक वातें, जिनका ज्ञान किसी भी विवाहित पुरुष या स्त्री को होना चाहिये, नहीं हैं, फिर भी इसमें वे सब बातें सूत्र रूप में किसी न किसी अंश में मौजूद हैं जिनके सहारे कोई भी पति अपने वैवाहिक जीवन को तनिक विवेक से सुखमय बना सकता है। एक वाक्य में सफल पति बनने का रहस्य वास्तव में इतना ही है कि पुरुप, पत्नी के जीवन के प्रत्येक रग और रेशे को, उसकी हत्ती के प्रत्येक तार को गुज- रित कर सके और उसमें से राग पैदा कर सके। हम आशा करते हैं कि पुस्तक मे लिखी हुई बातों को तुम ध्यान में रखोगे और अपनी शक्ति भर अपनी सहधर्मिणी के और अपने वैवाहिक जीवन को अधिक से अधिक सुखी बनाने का प्रयत्न करोगे। इन सब बातों के साथ ही साथ एक बात पर और ध्यान रखना। संसार में "भिन्न रुचिर्हि लोक: के अनुसार मानव- जीवन की सफलता की जॉच के अनेक माप और कसौटियाँ हैं। हमारी राय में उन मापों और कसौटियो मे, भारत की वर्तमान स्थिति को देखते हुए एक माप या कसौटी और जोड़ देनी चाहिए। हमारा कहना यह है कि संसार के समस्त और कठिन से कठिन, उच्च से उच्च श्रेणी के कामो को करते हुए जो स्त्री और पुरुप अपनी युवावस्था को बनाये ही नहीं, कायम रख सकें उनको ही सफल स्त्री तथा पुरुष समझना चाहिए। स्त्री के लिए वारागना (बाला+अङ्गना) शब्द के प्रयोग का अर्थ ही यही है। इसकी विवियों अनेक हैं किन्तु सब का रहस्य इतना ही है कि व्यायाम नित्य नियम से किया जाय, मस्तिष्क पवित्र विचारों से सदा परिपूर्ण रखा जाय, मास में दो चार दिन नमक न खाया जाय, साथ ही खटाई, मिर्चा, कम से कम खाया जाय । नमक न खाने या कम से कम खाने के माहात्म्य को लोग ( ७१ ) भूल गये हैं किन्तु उनको यह ध्यान में रखना चाहिए कि वात्स्या- चन, श्राश्वलायन, गोभिल सभी आचार्यों ने गर्भाधान की विधि में यह आज्ञा प्रचारित की है कि गर्भाधान की कामना रखने वाला पुरुष उस दिन नमक न खाय । बिना किसी तत्व के ऐसी थाना नहीं दी गई यह तुम समझ ही सकते हो। ऊपर से नमक खाना, खड़ा या पीसा किसी चीज़ के साथ तो बहुत ही हानिकर होता है। सब से अच्छी बात यह है कि पुरुप प्रत्येक सप्ताह में दो एक दिन ताजे फलों, दुग्ध, भीगा चना, गेहूं, गुड़- धनिया आदि खाकर ही सन्तोप किया करे। युवावस्था को अमर बनाये रखने का सर्वश्रेष्ट उपाय यह है कि मनसा, वाचा, कर्मण पुरुष पवित्र और प्रसन्न रहे । पवित्र-विचारा ही संसार की समस्त पवित्रता के जनक हैं। तुम से एक बात और कह देना चाहता हूं। "मनःशुद्धि , शरीर शुद्धिः, एकाग्र बुद्धिः, पातिव्रत, पत्नीत्रत, जानं, शौर्य संव ब्रह्मचर्ये प्रतिष्ठितम्" मनोरमा ने इस बात को अनेकों भांति ने अपने पत्रों में समझाया भी है। तुम भार्याती होना और एक पन्नी-त्रत को ही सदा धारण करना । पुरुष मदियों से अपने कुकर्मों, अपने अन्याय, युगी की प्रभुता और बी को वरावर वाली के पद से गिरा कर दास बना देने से, (Polygamous instinct) हरजाई प्रकृति का हो गया है । नाथ ही आला- इसेंधा नमक दूसरों से अच्छा है । The action is the desire condensei, the desire is the mind and the mind is the man". You must know that mind guides, mind gives life and therefore mind is above all the important thing and you cannot indulge in the vile intercourse of the mind without hurt ing your body".

( ७२ ) विहीन प्रेम करने लगने और प्रेम तथा काम-वासना की तृप्ति को जीवन की हजारों ही अन्य घटनाओं के समान ही एक साधारण घटना समम लेने के कारण पुत्प अपनी उच्च साधु प्रकृति से गिर गया है। तुम को इस लिए सचेत और सावधान रहना होगा । तुम्हारे मार्ग में अनेकों प्रलोभन उपस्थित होगे। एक मे एक सुन्दर कोमलांगियों के हाथ तुमको ऊपर उठाने के लिए सामने उपस्थित होगे, किन्तु मेरी इस बात को मदा गाद रखना कि पावेंगे यह सब तुमको ऊपर उठाने के लिए किन्तु इनमें से एक भी तुमको ऊँचा नहीं उठायेगा, ये सब तुम को नीचे ही ले जायगे धीर रसातल की ओर ही ढलेंगे। तुम यह भी सदा ध्यान में रखना कि पुत्पी ही के समान, संसार में अनेक, निस्सन्देह ही कम संख्या में, अक्सर त्रियाँ भी हरजाई प्रकृति की होती है, फर्क दोनो मे इतना ही होता है कि पुन्म अधिकतर शरीर से और त्रिग अधिकतर मस्तिष्क से व्यभिचार करती हैं किन्तु ये पुरुष और स्त्रियाँ दोनों ही असा- धारण (abnormal) होती हैं। यह भी ध्यान में रखना कि ये सब स्त्रियाँ सडकों पर ही नहीं होती। ये अक्मर समाज भी पाई जाती है, यद्यपि हमारे देश में उच्चकोटि की वेश्यात्रा के ममूह के अस्तित्व के कारण, समाज के भीतर इननी श्राव- श्यकता न थी, और इसी लिए इनकी सख्या समाज में एकदम शुन्य स्वभाव से ही शिकारी और हरजाई प्रकृति का हो गया है, और इस लिए जब तक उसकी प्रकृति का सुधार नहीं होता, यदि वेश्यत्रो के जगल से वह दूर रहा तो वह नमाज में ही शिकार खलेगा, और समान में ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वाराङ्गनाओं को उत्पन्न करेगा। ३० का.मा.

( ७३ ) कम है। रति की, काम वासना की, जीती जागती मूर्तियाँ और कलाएं दोनों ही हैं किन्तु विद्वत्ता, श्रेष्टता आदि को छोड़, दोनो मे फर्क इतना ही है कि समाज की मूर्तियाँ छिप कर, और बाजारू खुल कर सव वाते करती हैं, दूसरा अन्तर एक यह भी है कि बाजारू शरीर और जड़ की पिपासा को अधिक जागृति और शान्त करती हैं, समाज वालो आत्मा, हृदय और मस्तिष्क की तुष्टि को प्रधानता देती हैं, जिसका कारण अवसरो का अभाव भी कहा जा सकता है। तीसरा फर्क दोनों में यह है कि बाजारू रति की मूर्तियों से बच जाना संभव है, उनकी नीचता. स्वार्थ- परता, उनकी प्रकृति, उनकी जलालत, उनका समाज मे हय होना, उनका स्वयम् बाजाल होना, उनका ससग ही हय होना, अपनी मर्यादा, अपना आत्म-सम्मान, पुत्र, कलत्र, गृहस्थी, अपना उत्तरदायित्व यह सब उनसे उबरने में सहायक हो जाते हैं किन्तु समाज की मूर्तियो से बच सकना सहजसभव नहीं, इनका अधि- कार ही दूसरा होता है, दूसरे इनसे मिलन जुलने, माथ घूमने फिरने में कोई रुकावट हो भी नहीं सकता। समाज मे उन नियो का दमन और इनका संसर्ग न्याग बहुत ही जलरा है और यह ऐसी गत है जिसके लिए प्रत्येक मद्गृहन्य पुरुप ओर खा को प्रयत्न करना चाहिए, किसी वार्य में नहीं वरन् मानव-समाज और विशेष कर मत लियो क समाज और उनका जाति की रक्षा के लिए, क्योकि संसार भर नं मनी लियो का इनल बड़ा कोई शत्रु नहीं। हम इन गरीबों को दोष नहीं दंत, ये गरी भी पुत्व की हो कृपा हैं। पुरुष को काबू में रखने के लिए ही इन लोगो ने ( ७४ ) और वेश्याओं ने भी इसी विषय में अनेक जन्मों में प्रवीणता लाभ की और अब वह उसी प्रवीणता की शिकार होकर रह गई । पुरुष ने ही इनको इनके पवित्र मंच से नीचे गिराया है इसके कहने की हम जरूरत नहीं समझते, किन्तु विचित्रता यह हुई है कि पुरुप मारता खाता, इन पर विजय प्राप्त करते ही, नूतनता के पर्दे के हटते ही, या एक वार रसास्वादन करते ही तथा कभी कभी केवल विजय मात्र से ही सन्तुष्ट हो नर की नैसर्गिक नीचता को प्रकट कर इनको त्याग देता है और यह अपनी ही वासनाओ और कामनाओ की शिकार किसी तरह मरवी जीती जीवन यापन करती हैं। स्त्रियाँ प्रेम करती हैं या घृणा इस लिए पुरुप से त्यागी जाने पर केवल नर से अपना बदला चुकाने और कभी कभी अपने पेट की ज्वाला की शान्ति के लिए ये दूसरे नरो को, सत्यानाश मे मिलाने की फिक्र में चूर रहती हैं और पतङ्गों की भांति नर इनके पास इनकी बदले की प्रवृत्ति की दाहाग्नि में क्ष कामयन्ते विरज्यन्ते रजयन्ति त्यजन्ति च कर्ष यन्त्योऽपि सर्वार्थजायन्ते नैवयोपितः" Sometimes they love The next tine they hate and again become attached and then again leaye their lov- (वात्स्यायन) कुछ लोगों का कहना यह भी है कि जिस तरह से पुरुष के साथ उसके मार्ग भ्रष्ट होने पर रियायत की जाती है, समाज न उसे दण्ड देता है, न वह घृणा की दृष्टि से देखा जाता है यदि स्त्री के साथ उतनी नहीं उससे कम भी रियायत की जाय और उसकी मूले माफ कर दी जाय तो कुछ दिनों में वेश्याओं की संख्या कम हो जावगी। कृ.का. मा० ers.

( ७५ ) भन्म होने रहते हैं । यह मन समन्ना कि इनके हृदय नहीं होता, या अपनी हीन दशा पर यह विचार नहीं करती और अपने प्रति इनको ही घृणा नहीं होती । उनको छोड़कर जो इस कहावत को चरितार्य करती है कि "नीम के कीड़े को नीम ही मीठी लगती है वास्तव में जितनी घृणा ये अपने प्रति अनुभव करती है. पुन्य इनके प्रति अनुभव ही नहीं कर सकते, किन्तु ये जानती हैं कि वे घृत्य है, हेय है. समाज में इनको स्थान नहीं और इसी लिए ऊपर उठने का ये साहस नहीं करतीं। हेय समझा जाना ही ज्या कम है उपर घृश्य और निरन्कृत्य होना तो इनकी ढल्या ही कर देना है। एक रहन्य और भी तुमको बतला देते हैं। ये मत्र त्रिया, नमाज वाली और सड़क वाली भी रति की, वासना की, काम- वासना की जानी जागती कला और मूर्तियाँ होती हैं। ये अपनी सहमिणी, पन्नी और. प्रेमवल्लभा और प्रेम की एकमात्र अधिकारिणी ने कहीं अधिक आकर्षक, मनहर, लुभावने वाली प्रतीत होती हैं । कमजोरी के समय, काम के वशीभूत और कामनाओं के शिकार होने के काल में यह स्वर्गीय दिखाई देती हैं. इनके मामने पत्नी की तो संना ही ज्या संसार और समस्त बारड हेच. हेच और नगण्य प्रतीत होता है। इनको छूने का तो कहना ही क्या है. इनों पास उठने बैठने, इनकी मेवकाई करने, जहाँ पर यह हो उस भूमि पर खड़े होने और उस भूमि के वायु को श्वास द्वारा वृदय में भरने में भी स्वर्ग का ही अानन्द मिलता है। क्भी भी यह मालूम होता है कि ये ही जीवन की खान हैं और इनसे विलग होते ही प्राणवायु निकल जायगा किन्तु यह सब अपने ही मस्तिष्क की कमजोरी तथा अपने ही वृदय और मस्तिष्क का विचार होता है, यह सब अपने ही विक्रमों की माया होती है और वास्तव में एक सती गृहिणी से बढ़ कर इनके पास कुछ भी नहीं होता। ।

( ७६ ) वस्तु होना, ये रति और कामना को मूर्ति दिखाई देती हैं क्यों कि जीवन के इसी विभाग को यह विशेष रूप से जानती होती हैं और इसी में यह विशेषता प्राप्त किये हुए होती हैं। दिन रात इसी की चिन्ता और इसी की लगन इनको होती है और त्वभावत. इस तरह जीवन के इस विभाग ने यह प्रवीणता-लाभ कर लेती हैं ! इसके सिवाय इनका सबसे जबर्दस्त आकर्पण, इनका पराई न्वतंत्र होना, स्वाधीन होना और पत्नी की समान अपनी सम्पत्ति न होना होता है। इसके विपरीत एक गृहिणी अपनी दामी और मन्गत्ति होती है और इस लिए "घर की मुर्गी टके वरावर"। किन्तु यदि इस विभाग ने रति की मूर्तियों की अपेक्षा पत्नी १६, २० ही हो और २१ न हो तब भी जीवन के अनेक अन्य विभागों में पत्नी वाराङ्गनाओं ने कही बढ़ी हुई होती है। यही नहीं, यदि पत्नी. कम से कम अपने सम्बन्ध की बातों में स्वतंत्र और नालकिन मान ली जाय, यदि पत्नी भी वरावर वालो मान ली जाय, यदि उसकी अप्रसन्नता का भी उसी प्रकार भय हो, यदि उसकी प्रसन्नता की भी हमको उतनी ही फिक्र हो, यदि पति की इच्छा मात्र ही नहीं पत्नी की इच्छा और मंजूरी सहवास के लिए जरूरी मान ली जाय, यदि पत्नी को मना कर, प्रसन्न कर, उससे वर न्यल्प, रति सुख प्राप्त किया जाय तो पत्नी भी वैसी ही मुखदायिनी होगी जनी कि स्वयम् रति या रति की मूर्तियाँ। नब से बड़ा और महत्व का फर्क इन रति को मूर्तियों और गृहिणी में यह होता है कि काम-वासना की मूर्तियाँ पुरुप की कुलित प्रवृत्तियों को ही जागृत कती हैं, उसे नर्क ही की ओर ले जाती है और पुरुष भी अपन हदय के नर्क को ले इनके निकट जाते है. भन्म होते रहते हैं पार खुश रहते है । उनकी दशा होती है है कोस्त लेकिन उन ६ ममत्र हो रहे है वे देखते ही नहीं या टग्य कर भी अन्वं होते हैं क्योंकि उनकी विश्लेपण की ( ७७ ) शक्ति भस्म हो चुकी होती है। वह समझते रहते हैं कि उनमें नया जीवन आ रहा है, नई स्फूर्ति उनके शरीर मे प्रवेश कर रही है, नई ज्योति का प्रकाश हृदय में हो रहा है किन्तु वास्तव मे होता यह रहता है कि उनकी हो कामवासना और कामाग्नि के जोरो से प्रज्वलित हो उठने से, काम को दोप-शिखा उनके जीवन के तैल को जोरों से दोनो छोर से भस्म करतो रहती है और इसी के ताप को वह स्फूर्ति और इसी के प्रकाश को वह नूतन ज्योति और नवजीवन का संचार समझते रहते है । इसके विपरीत एक गृहिणो पुरुष को कुत्सित प्रवृत्तियों का नही जागृत करती, वह उसके हृदय के नर्क को प्रज्वलित नहीं करती, वह उसके पवित्र भावों को ही जगाती है और पुरुप को नर्क को ओर न ले जाकर, खुद साथ जाकर, जीवित अवस्था का तो कहना ही क्या, मरने पर भी स्वर्ग के द्वार तक पहुंचा आती है। कामुकता के काल में एक तमाशा ओर होता है। जितना अधिक वासना की दाहाग्नि जोर पकड़ती है, कामाग्नि जैसे जैसे पुरुप को भस्म करती है, पुरुप अपनी गृहिणी से उतना ही दूर भागता है, वह उसे घृणा की दृष्टि से देखता है और तनिक तनिक सी बात में वह उस पर क्रोध प्रकट करता है और कभी कभी उस पर हाथ भी चला देता है । जिस तरह से अन्धकार प्रकाश से भागता है ठीक उसी तरह से कामवासना को अग्नि में झुलसता हुआ कुत्सित कामनाओ से काला, पति पानी पत्नी से भागता है। बात यह होती है कि वह ( Abnormal state) असाधारण स्थिति और दशा में उस समय होता है। काम को दीप शिखा के प्रज्वलित होने से उसके शरीर का स्वाभाविक तेज, उसके शरीर की स्वाभाविक गर्मी, जीवन का तैल, सहज तृप्ति, भम्म होतो रहती है और इस कमी की पूर्ति के लिए उसे हर घडी अधिक और उससे भी अधिक, अग्नि, ताप और वासना

(७८ )
की तृप्ति की अमरत होती रहती है। जी बिलरल हमने
विपरीत होती है, यह शान्ति और ठंटर पहुंचाती है। पुरुन
चाहता है जलना. मिलती है उसे ठहरवा चाहता है अशान्नि-
मय शान्ति.जीवन रहित निश्चेष्टता श्री मोर मिलनी है उने
निर्मल निर्वाणग्य शान्ति और चनना और दमी लिए पन्नी
ने वह भागता है और उन पर न कोय मी श्राता है।
पुरुप न्यभाव ने ही गावर और गहा (Bully ) होता है।
अपने पापपंज के कारण पवित्रता, शान्ति और निर्मलना की
योनि अपनी गृहिणी ने वहभागता है. उनके पाप ही मंकार
बना देते हैं, किन्तु गड़ा (Bully) होने के कारण अपनी
कायरता को अपने पापा को छिपाने के लिए नं क्रोध के र
में वह अयला गृहिणी पर. प्रस्ट ऋरता है श्रीर अपना पाप
छिपाने लिए पत्नी पर मृत अपना गेट बना चाहता है, साथ
ही अपने पाणं का दोष भी अपने ऊपर न लेकर वह पनी ही
के माथ रचना चाहता है। यह भी ध्यान किक्रोच वीरता
मा नही कायरता का चिन्ह है। स्त्री पने महज नान से यह
मय ननन्ती रहती है। देवी होने के कारण कुछ दिनों वह
नमा भी करती रहती है, कुछ मह बिना ही कहती रहती है,
"श्रॉन्च न्योता, देवा श्रीर, नन्हलो' ग्रिनु कुछ दिनों बाद वह
भी पति-देव ने प्रेम न कर, उनको घृणा की दृष्टि मे न देखे ना
भी उनने दूर हो जाती है यानि की के शरीर, मस्तिष्क
और आत्मा तीनों ने ही उनकी वामनाओं का सम्बन्ध होता
है और वह या तो प्रेम कर मरती है या वृणा । "नान्यः पन्था -
विद्यत गनाय। इस तरह से पति का गाइन्थ्य जीवन मटिया-
मेट हो जाता है और जब पुरुष श्री आँच्च न्युलती है तो उने
हिन्याई देता है कि लक्ष्मी विलीन हो गयी, गृह, लक्ष्मी
लोप हो गयी, उसकी जीवन नांचा "लतापत्तादिकचैत्र वर्तते

( ७६ ) तरणो मम' के ही समान है और वह हाहाकार कर चीख पड़ता है। गृहिणी की श्रेष्ठता का एक और रहस्य बतलाये देते हैं। कामवासना की तृप्ति हो जाने पर या अशक्त हो जाने पर या वह समय आ जाने पर जब वह वासना को जागृत नहीं कर सकती एक रति की मूर्ति ( Flirt) या वाज़ारू स्त्री मे कुछ शेष नहीं रह जाता, पुरुष को शेष में कुछ मिलता भी नहीं और दोनो को एक दूसरे से बॉध रखने की कोई चीज रह नही जाती। ( Flesh cannot live on flesh) जड़, जड़ के आधार पर जीवित ही नहीं रह सकता। इसके विपरीत इस अवस्था के पहुँचने तक एक गृहिणी के पास आकर्पण और वन्धन एक नहीं सहस्रों तैयार हो जाते हैं। रति की मूर्तियो और सतियों में एक बड़ा फर्क यह भी है कि रति को मूर्तियो के सहवास से तुष्टि नहीं प्राप्त होती. अप्ति ही बनी रहती है। शराव की प्यास की भॉति, पोते जाओ, पीते जाओ, तृप्ति नहीं होती, पुरुष अशक्त हो भले ही जमीन पर गिर जाय। इसके सिवाय कितनी ही अच्छी, सुख देने वाली यह क्यो न हों, पुरुप कामान्धता और अपनी इस प्रकृति के कारण कि वह प्रस्तुत वर्नमान ( Immediate present ) मे सव भूल कर अपने को लय कर देता है, कुछ घड़ियो मोह मे पड़ा रहे किन्तु बाको अवसरो मे तनिक होश होते ही अपने हृदय, मस्तिष्क और शरीर पर भी एक विचित्र प्रकार के वोझ की भावना सदा वनी रहती है, उनका सुख भी उनका अहसान प्रतीत होता है, और अन्तर वाल वरावर का ही क्यो न हो, दो भिन्न आत्माओ व्यक्तित्वों और स्वार्थो के अस्तित्व का अन्तर सदा दिखाई देता रहता है। इसके विपरीत, पवित्र गृहिणी से तृप्ति और तुष्टि ही प्राप्त

(८)
हो सकती है. उसने एक जान दो गालिय"श भी नहन यानन्द
मिल नकता है, शर्त यही है कि वह मनी और हरी हो. दानी
नहीं, उनके नायनिकमा ही व्यवहार होता हो और उनमें
बुद्धि और विवेक हो।
त्रियों की एक और विशेषता नुमने बनन्दा देते हैं। पुर
पी से दो हज़ार नील पर बैठा हुआ मार्ग से भ्रष्ट होनी को
मातून हो जाता है । कम ? हम कह नहीं माने। वन देवी,
आदि शनि होने से या येवल उन (Institu:ion) सहज बान
में यह न जाने ? निनु पुन्य सामने सन्धिन होने ही वह
ननन्न लेना है कि दाल में कुछ काला है. इनमें नन्दह नहीं। उन
विपरीत पनी अगर मार्ग में विचलिन हो जाय दो पनि को
नहला नहीं मान्न होता था उनी नह ने नहीं मादन होता। उन
लिए पति का यह समन्ना कि पत्नी को न नादम होगा यन
मूचना है। पत्नी किमी न किनी नद जान ही जानी है, और
नव नि के जीवन से, ग्निा कुछ कहे मुने. अपने जीवन को;
ऋच्छर के पैरों की भांति वह सिकोड़ने लगती है और व
दिनों बाद उनके जीवन भी वारा के विभिन्न पथगानिनी होते
हा दोनों का वैवाहिक जीवन हार हो जाता है और निमुन्न
बन्न में भी नहीं दिखाई देता । एक मनस्विनी ली की
मी नवन पदाहोंने ही पति के जीवन से उनी तरह से
दूर
भाग जानी है जैसे वृद्धावन्या के आवही पुन्य के ननिक
शुद्धिकी प्रखरता बिदा हो जाती है।
एकवान और भी ध्यान में रखनानी विना प्रेमी जीवन
धारण ही नहीं कर सकता और इस लिए पानी को सदा अपने में
अनुरक और यरनी प्रेमिका बनाये रहने के लिए यह अनिवार्य
त्यने आवश्यक है कि पति भी सदा प्रेमी, नायक और आशिक

( १ ) ही बना रहे । याद रहे अग्नि का अस्तित्व विना धूम के हो सकता है किन्तु विना अग्नि के धुऑ हो नहीं सकता और इस लिए स्त्री का प्रेम चाहने वाले के लिए यह अनिवार्य रूप से यावश्यक है कि वह सदा अपने हृदय की पवित्र प्रेमाग्नि से अपनी पत्नी के शरीर और आत्मा को प्रदीप्त रखे। "रहीम खानखाना की स्त्री के इस आदेश "प्रेम प्रीति को विरवा चल्यौ लगाय, सींचन की सुधि लीज्यौ मुरमि न जाय !" को इस लिए कभी मत विसराना । कनियतधर्म साहित्यमुभयोरेकतरस्य वा व्यातिः (माख्य-दर्शन) "we get a hint in the first chapter of Genesis that God conceived of man and woman as originally one being, as man who held in one person all the male and female qualities, and as such was a perfect ideal of Human nature, that after-wards He divided this one Being into two persons, having simuler passions, volitions and appetites but differently conditioned by Sex, that each of these was the complement of the other and fitted to unite with one another, in order that by the mutual play of the divers, qua,ities of each on the other, the education of both might take place, and that when both through this mutual action on each other, become one, Human nature would be again, as it was at first, complete "Stopford Brooks" (Theology of the English poets )

( २ )
अन्त में तुमस इतना ही कह देते हैं-
"धर्मार्थ जीवितं यस्य
सन्तानार्थ च मथुनम् ।
अहोरात्रञ्च पुण्यार्थम ।।
तन देवाः ब्राह्मणं विदुः"
पद्मबाग, जसरा
तुम्हारा
4-१-२७
बाबू जी

प्रियतमा को प्रसन्न रखने के उपाय "जये धरित्र्या पुरमेव सारम् , पुरे गृह सन्मनि चैकदेशः। तत्रापि शय्या शयने वरा स्त्री, रतोज्वला राज्यसुखस्य सारः॥" (वराहमिहिर) मनोरमान्यास, प्रयाग ३-१२-२६१३ प्यारे प्रेम, तुम्हारा पत्र मिला । यह मालूम हुआ कि तुम्हारा विवाह होने वाला है, और शीघ्र ही तुम वैवाहिक-जीवन आरंभ करने जा रहे हो । मैंने तुम्हारे पत्र को बहुत ही धीरे धीरे फाड़ा और फिर एक मुस्कुराहट और आह के साथ उसे अग्नि में भस्म कर दिया । हँसी इसलिए आई क्योंकि मैं जानती हूं कि तुम कैसे हजरत हो और तुम्हारा शादी का इरादा मुमको एक अजीव लतीफा मालूम हुआ । आह उस पत्र के लिए थी जिसे मैं जलाना नहीं चाहती थी। मेरा यह अनुभव है कि पत्र गन्ने के रस के समान ताजे ही मजेदार होते हैं और दूसरे दिन पढ़ने में वैसे ही स्वादरहित, फीके और कडुवे प्रतीत होने लगते हैं, किन्तु यह विषयान्तर है।

२] सुहागरात अच्छा, तो तुम विवाह करने जा रहे हो। मैं समझती हूं कि मुझे तुमको हृदयगत बधाई देनी चाहिये और फिर सांसारिक प्रथा के अनुसार यह जोड़ देना चाहिये कि अपनी प्रसन्नता को प्रकट करने के लिए शब्द ढूंढ़े नहीं मिलते । मैं यह सब जरूर करती, किन्तु तुमसे और तुम्हारे पुरुप-संसार से मैं भले प्रकार परिचित हूं। मैं जानती हूं कि तुम मेरे इस प्रकार के कथन को वेद-वाक्य की तरह सत्य न समझते, साथ ही मेरी ऐसी बातों से तुम प्रसन्न भी न होते। ईमानदारी से जो कुछ मैं कह सकती हूं और मैं अव इतनी वयस्का हो चुकी हूं कि अ-ईमानदारी, छल कपट से मुझ- को कोई प्रयोजन नहीं-यही है कि मैं आशा करती हूं कि तुम अपने वैवाहिक जीवन को पूर्णरूप से सफल बनाने की पूरी कोशिश करोगे, जिस प्रकार से साधारण पति-पत्नी प्रसन्न रहते हैं उस प्रकार से प्रसन्न रहोगे और अपने दफ्तर में कड़े से कड़ा परिश्रम प्रसन्नतापूर्वक इसलिए करोगे कि तुम अपनी पत्नी के आराम के लिए आवश्यक वस्तुओं का संग्रह कर सको। अगर तुम उससे वास्तव मे प्रेम करते हो तो यह सव तुमको आनन्द- दायी होगा किन्तु यदि तुम प्रेम नहीं करते या तुम्हारा प्रेम केवल दो दिन का जोश है, तो यह सब तुम्हारे लिए आजन्म कालेपानी के समान होगा। ऐसी प्रसन्नता की बात कि उसको प्रकट करने के लिए शब्द कोप में ढूढ़े नही मिलते, तुमही समझो मेरे लिए कैसे सम्भव है। कभी कोई स्त्री इस पर प्रसन्न हुई है कि वह व्यक्ति जिससे वह प्रेम करती थी दूसरी स्त्री की सम्पत्ति हो गया, चाहे उसने स्वयं ही उससे विवाह क्यों न किया हो जिसका इशारा तुमने भी किया है।

पतियों को सीख [३ किन्तु, प्रेम ! अगर स्त्रियोचित तनिक अमिमान के लिए मुझे क्षमा करो तो मैं तुमसे यह कहना चाहती हूं कि यह तुम्हारी नई प्रियतमा मेरे ही कठिन परिश्रम के सुफलों का रसास्वादन करेगी और मैंने जो बड़े परिश्रम से वोया था उसी को काट कर अपना जीवन सुख से वहन करेगी। मैंने ही तुमको, जो तुम आज हो, कामिल, परिपूर्ण, निपुण, प्रवीण, व्यमत्युन्नपुरुप बनाया है और मैं आशा करती हूं कि तुम्हारी प्रियतमा तुम्हारे उपयुक्त होगी। प्रेम ! उस दिन की याद है जिस दिन पहिले पहल तुम मेरे पास आये थे ? एक मेरे मित्र ने, जो तुम्हारे भी मित्र थे, हमारा तुम्हारा प्रथम परिचय कराया था । तुम मेरे पास पहुंचने पर हक्का बक्का से रह गये थे। तुम बातें करना चाहते थे, किन्तु तुम बातें कर नहीं सकते थे। तुम्हारी समझ में यहा ही पाता था कि क्या कहें और किन शब्दों में कहें। जितनी देर तुम बैठे रहे, तुम्हारी निगाह जमीन पर थी या अपने मित्र की ओर । इसके वाद भी वर्षों, जब कभी तुम मेरे पास आते, तुम अधिकतर नीरव ही रहते थे, मुझको ही तुम से बातें करनी पड़ती थीं, किन्तु तुम आज और अब क्या हो ? यह किसकी कृति है ? बुरा न मानना, जिस समय प्रथम प्रथम मेरी निगाह तुम पर पड़ी थी तुम एक अनगढ़ पत्थर थे। चतुर चिनेरे शिल्पकार की भाँति मैने उसमें काट लॉट कर और उसे गढ़ कर एक सुन्दर सदा मन्द मुस्क्यान वाले, बोलते हुये मनुष्य की मूर्ति उसमें से पैदा करदी। इस परिकता को पैदा करने में क्या तुम समझते होमुमको कठिन से कठिन परिश्रम नहीं करनापड़ा था ? अब अगर तुम अपनी प्रियतमा के आने पर, द्वार जाकर खोल दिया करोगे, अगर उसके खड़े होने पर उससे खड़े होकर और टहल टहल कर ही वातें करोगे, उसके श्रमित होने पर अगर उसको कोच पर बैठा कर उसके श्रीचरणों के नीचे कुशन तकिये रस्त्रदिया ४] सुहागरात करोगे, केवल मीठी मीठी बाते कर, उसे हँसा कर उसके अम को हर लिया करोगे तो इन सब के लिए उसके धन्यवाद की पात्री मैं ही हूं, किन्तु ईश्वर के लिए उसमे यह सब कहने की विषम भूल न करना । संसार में कोई भी त्री इस बात का विश्वास नहीं करेगी कि पुरुष एक उस बी से, जो उसकी पुरानी आशना हो, शुद्ध, कलमपहीन, पवित्र मित्रता रख सकता है और तुम्हारी नई प्रियतमा जिसने, तुम्हारे वर्णन से प्रतीत होता है, अभी ही युवा- वस्था में पदार्पण किया है, और जिसमे भावुकता की मात्रा अति विशेष होगी, कभी भी इस बात को नहीं मानेगी । मुझको स्वयं इसमे बहुत कुछ सन्देह था और इसी कारण से मैंने तुमसे मिलना जुलना हमेशा बचाया । यह न भी हो तब भी तुमको जानना चाहिये कि डाह के समान सांपिन को हम त्रियां भी पुरुषों के ही समान अपने हृदय में वहन करती हैं, फर्क इतना ही है कि पुरुप इससे दंशित होने पर दानवी रूप धारण करता है, मारता काटता है, हम लोग साधारणत: मानवी रूप धारण करती हैं और केवल ईश्वर का नाम ले चुप हो सब सहन करती हैं। आज हमको इस बात की प्रसन्नता है कि हम लोगों ने अपने इस माहदे को-कि वर्ष में एक बार एक दूसरे को जरूर पत्र लिखेंगे-कायम रक्सा । मैं तो चतुर नहीं परन्तु मुमसे चतुर एक मनुष्य ने एक बार कहा था कि मित्रता को दफनाना एक मित्र को दफना देने से अधिक कप्टकर है। मैं समझा नही सकती, किन्तु वर्ष भर में एक वार पत्रों के विनमय ने हम लोगों के मृत-प्रेम में कीड़े नहीं लगने दिये । मेरी यह वात तुम्हारे सम्बन्ध में भावुकता-भय प्रतीत होगी, किन्तु मैं भावुक हूं नहीं। प्रेम ! तुम एक भयानक छैल-चिकनिये, आशिक-मिजाज, मजाकपसन्द मॅवरे की प्रकृति के मनुष्य थे और यद्यपि तुमने पतियों को सीख [५ हमसे कभी कहा नहीं किन्तु मैं यह सदा समझती थी कि तुम्हारा हृदय एक अखाड़े के समान है जिस में तुम्हारे हृद्गत-स्वतंत्रता के प्रेम और मेरे प्रति प्रेम में हर समय एक जंग जारी रहती थी और सच मानो इसी कारण से मैंने तुम्हारे साथ विवाह करने के विचार को कभी अपने समीप फटकने नहीं दिया। आशा है तुम इतना खेल कूद चुके होगे, इतनी स्वतंत्रता का उपभोग कर चुके होगे कि इन बातों की इच्छा शेप न होगी और अब तुम वास्तव में घर वसा कर स्थायी-जीवन वहन करना चाहते होगे। तुम प्रवीण नायक हो, प्रेम करने की कला में पूर्ण दक्ष हो और इस कारण से मुमको विश्वास है कि तुम्हारे वैवाहिक-काल के कलियुग का प्रथम चरण बड़े ही आनन्द और प्रमोद में कटेगा, चारों ओर तुमको सूर्य की सुनहरी किरने और वहार ही दिखाई देगी, किन्तु भूल कर इस कल्पना में पागल मत होना कि प्रेम, जोश और आनन्द सदा इसी प्रकार बना रहेगा। प्रेम ! "प्रेम" एक बड़ा ही मनोरंजक, मनमुग्ध-कर, सुहावना और लुभावना स्वप्न है, मगर अन्ततोगत्वा है यह स्वप्न ही, और अगर तुम चाहते हो कि जीवन भर प्रेम और स्नेहकी आमा और ज्योति किसी अंश में बनी रहे तो प्रारम्भ में ही तुमको सचेत होना होगा। प्रेम का लहलहापन, उसकी चकाचौध पैदा करने वाली तड़क भड़क, उसकी सर्वदिगन्त व्यापिनी सुनहरी रश्मियों का प्रकाश, उसकी मादकवा सब दिन था बहुत दिन भी रह नहीं सकती, किन्तु प्रेम फिर भी अच्छी वस्तु है और बुद्धि से काम लेने से मादकता विहिन होने पर भी उसका सुखदायी सुरूर सदा सुरक्षित रखा जा सकता है। विवाह में एक विचित्र बात यह है कि जो विना एक दूसरे को देख्ने जाने और प्रेम से मदोन्मत्त हुए विवाह करते हैं, समय से उन व्यक्तियों में भी एक तरह का प्रेम पैदा हो जाता है। इस दृष्टि सुहागरात से आधुनिक पश्चिमीय विवाह से आधुनिक भारतीय विवाह अच्छा होता है। मैंने भारतीय के साथ "आधुनिक" विशेषण का प्रयोग इसलिए किया है क्योंकि मेरा विश्वास है कि प्राचीन काल में ऐसे अनजानों का विवाह, साथ ही, ऐसी अनजान अवस्था में ही, नहीं हुआ करता था। जो हो, भारतीय प्रथा की विशेषता यह कि नव पश्चिमीय-विवाह में विवाह के बाद ही वैवाहिक- घनिष्टता से प्रेम की मादकता उतार पर होने लगती है, भारतीय- विवाह के बाद प्रेम, स्नेह या निखद्द दरजे का पशु-प्रेम ही कहो उरूज पर होता है।साथ रहने से विवाह के बाद जोप्रेम पैदा होता है उस प्रेम में निस्सन्देह ही वह अन्यापन और मादकता नहीं होती जिसके वश में मनुष्य श्रेष्ठ से श्रेष्ट, साथ ही घृणित काम कर सकता है, किन्तु इस प्रेम के द्वारा भक्ति, श्रद्धा, आदर त्याग के समान वे भाव जरूर पैदा हो जाते हैं जिनका उसादन ही सर्वश्रेष्ठ- प्रेम का ध्येय और उद्देश्य होना चाहिए। इस समय में, तुम दोनो को एक दूसरे के भावों, मनोकाम- नाओं और चित्तवृत्तियों का बहुत लिहाज रखना चाहिए। इस वात को सदा ध्यान में रखना कि प्रेम अपना पूरा खिराज वसूल कर लेता है और इन्सान को जरूरत से ज्यादानाजुक-मिजाज बना देता है साथ ही प्रेम कभी कभी निर्दय भी होता है। जहां एक ओर यह हैवहीं दूसरी ओर मानोइसी के मावजे की भांति यह भी है कि वैवाहिक जीवन में बहुत सी एक दूसरे की बाते ऑखी की ओट कर दी जाती हैं बहुत सी गलतियां साधारण रूप से जो अक्षम्य हुया करती हैं, यूं ही माफ कर दी जाया करती हैं । अस्तु । तुमको प्रियतमा को सदा प्रसन्न रखने का एक बहुत ही साधा- रण और सहन नुसखा भी बतला देती हूं। तुम सदा उस दिन और तारीख का उससे जिक्र कर सकते हो जिस दिन प्रथम प्रथम तुमने उसे देखा और तुम्हारे हृदय में उसके प्रति प्रेम प्रकट हुआ।

पतियों को सीख [७ तुम उस समय की अपने हृदय की गति का वर्णन कर उसके सौन्दर्य की प्रशंसा कर सकते हो और अपने असीम, अगाध प्रेम का उसे विश्वास दिलाते रह सकतेहो। तुम उस बात को यादरख सकते हो जो प्रथम प्रथम तुम्हारी प्रियतमाऔरतुम में हुई हो और उसकी याद उसे दिलाते रह सकते हो। जिस दिन तुम्हारी प्रियतमा ने तुम्हारे प्रेम को नीरव भाषा में स्वीकृत किया हो उस समय की अपने हृदय की स्थिति की भी बढ़ा चढ़ा कर तुम उससे सदा चर्चा कर सकते हो, तुम उसकी जन्म तिथि को याद रख सकते हो और उसके निकट होने पर उसकी चर्चा कर उसके लिए कोई भेट खरीदने में व्यस्त हो सकते हो, दूसरे चौथे बाजार से गुजरते हुए उसके लिए सदा एक न एक भेंट, जो उसे पसन्द हो, मूल्य मे वह कितने ही कम की क्यों न हो, ला सकते हो और उसे जीवन भर आये दिन इस बात का विश्वास दिलाते रह सकते हो कि तुम उसे बहुत प्रसन्न रखना चाहते हो और तुमको उसकी बहुत फिक्क रहती है। यह सव महा साधारण बातें हैं, परन्तु इन पर सदा ध्यान रखना व्यक्तियों के जीवन को प्रायः अत्यन्त निकट और सुखमय बना देता है। अव हमारी तुम्हारी प्रेम-कथा क्योकर अन्त हुई, इसकी चर्चा कर तुमको मैं प्रेम के खाई खड्डों से सचेत कर देना चाहती हूं। यह सत्य है कि प्रेम के मामलों का प्रबन्ध, उनका ऊंच नीच सोचना स्त्री का कर्तव्य है, किन्तु मैं राधा को जानती नहीं । नाम तो अच्छा है, सुना सा भी मालूम होता है, किन्तु सच तो यह है कि मैं उसे जानना चाहती भी नहीं । मैं इसलिए सारा उपदेश तुमको ही देदेना चाहती हूं। कम से कम इसकी, उसकी अपेक्षा, तुमको अधिक जरूरत होगी,क्योंकि स्त्री कभी भी पुरुष के समान प्रेम में पूर्णरूप से पागल नहीं होती, उसके मस्तिष्क मे फिर भी कुछ न कुछ विवेक शेष रह ही जाता है। एक मनुष्य अपनी ८] नुहागरात नियनमा के श्रीचरण में बिना भविष्य की तनिक भीचिन्ता क्रिये, बिना यह सोचे, एक मिनट के लिए भी, कि ननोना ज्या होगा अपना नवव मेंटक.देगा, बिना एक जण के विलन्त्र के समस्त संनार को उस पर न्योछावर कर देगा, क्योंकि समय के महत् आनन्द के मद में वह चूर होता है और उसे कुछ दिखाई नहीं दना. किन्नु हम ब्रिगं, यद्यपि हम लोग भी समय के प्रवाह में बंग से बहती रहती है, वह नहीं सकतीं । विवि के कोप से व्याव- हारिकता और सहज बुद्धि हवक्त हमको आगे देखते रहने पर वित्रश करती रहती है। इसी कारण से हम स्त्रियों को एक अंश और एक दिशा में प्रेम में वही अानन्द नहीं आता जो पुल्पों को आता है। जब कि पुनप प्रेम के घोड़ों पर सवार, बाग छोड़े हुये, सब कुछ भूला हुआआचश में उड़ने में मग्न रहता है हम स्त्रियों की निगाड़ा गई से भरी, गन्दे राजपथ पर गड़ी होती हैं वत इस मिल में कि सब ठीक है न, कोई गड़बड़ तो नहीं है। बियों को पग पग पर सोचना सनम्ना पड़ता है, पुन्यों को केवल छपने व्यवसाय में ही सोचने का काम करना पड़ता है। इन सब बातों का अर्थ यह न लगा लेना कित्रियां पुन्या की अंना प्रेम किसी अंश में कम करती हैं या यह कि प्रेम में वह मत्त नहीं होनी । इस सन्वन्य में पुल्यों और नियों में जो पार्क है वह भी वियों के अमान्य काही सूचक है। फर्क क्षेत्रल प्रेम की प्रबलता की भिन्न दिशाया और मात्रा में है। पुन, प्रेम में मन्त्र हो मर्वत्र भए में अंगण अपने को और संमार को भूल कर एक दम तल्लीन हो जाने पृया अस्तित्व के ज्ञान को भी भूल कर प्रेम के सर्वश्रेष्ठ मुख का उपभोग क्षणिक काल तक कर मनता है। सजग रहने की नारी प्रकृति के कारण बी इसल्प- नानीच सर्वश्रेष्ठ मुखको अनुमत्र नहीं कर सकती, किन्तु अपना मर्यन्व पुन्य केही समान प्रेन की बलिवेदी पर अर्पण कर और पतियों को सीख [. जीवन भर के लिए उसी प्रेम की मादकता की शिकार हो प्रेम के कारण जो कष्ट स्त्री को सहन करने पड़ते हैं वह पुरुष को कभी नहीं सहन करने पड़ते । यह बियो का अभाग्य है कि आनन्द पुरुष अधिक उठाता है, दुःख स्त्रियां अधिक भोगती हैं। साथ ही पुरुप सब कुछ अर्पण करते हुये भी कुछ अर्पण नहीं करता किन्तु स्त्री हदय पर अधिकार देते ही अपना इहलोक और परलोक दोनों ही दे देती है। अब तुम्हारी पिछली वातों की याद दिलाकर तुमको भविष्य के लिए तैयार कर देना चाहती हूँ, अगर पसन्द आये तो इनको ध्यान में रखना। प्रेम ! जब तुम मुझ से शुरू में मिलते थे, तुम नीरस, कल्प- नाविहीन और गद्यात्मक अधिक थे। तुम में कविता का नाम न था, तुम बहुत ही भोंडे और तनिक तनिक सी बातों में भूल करने वाले मनुष्य थे, और मुझको भय है कि धीरे धीरे तुमने अपनी पुरानी रविश न अख्तियार कर ली हो, इसीलिए मैं फिर दोहराती हूँ कि तुम नीरस, कल्पनाविहीन और गद्यात्मक बहुत थे। तुम तारीफ करना, स्तुत्यवाक्य कहना, बढ़ावा देना, चाटुकारिता, खुशामद करना, वाते वनाना जानते ही न थे या जानते थे तो बहुत मुश्किल से करते थे, किन्तु तुमको यह जान लेना चाहिये कि प्रशंसा, खुशामद और वढावा स्त्री के लिए वैसा ही आवश्यक है जैसे कि जीवन के लिए श्वास और अगर तुम सफल नायक बनना चाहते हो तो यह याद करलो कि प्रशंसा, बढ़ावा और खुशामद स्त्री-जीवन के सर्वश्रेष्ठ (Incentive and inspiration) प्रोत्साहक और प्रेरक है। इस समय जो कुछ राधा करेगी वह तुम्हारे लिए और तुम्हारी खुशी के लिए करेगी। वह अगर दिन मे पहिले एक वार वाल बनाती थी, कंघी करती थी तो अब दो वार करेगी, एक से एक १०] सुहागरात सुहावनी और वढ़िया वस्तुएँ तुम्हारे लिए धारण करेगी, नई रंगविरंगी सारियां पहिनेगी, यह सब तुमको प्रसन्न करने के लिए, तुमको लुभाने के लिए। जो कुछ उसमें गुण होंगे, विशेप- ताएं होंगी सत्र में वह वृद्धि करेगी, इसलिए कि तुम्हारी नजरों में उसका आदर बढ़े, तुम उसकी अधिकाधिक कद्र करो, और स्व- भावत. उसका चित्त चाहेगा कि तुम उसकी इन हरएक बातों को वरावर नोट करो, उनकी खूवियों का बखान करो, अपनी प्रसन्नता प्रकट करो और इन सब बातों के लिए उसकी, अकारण, झूठी भी प्रशंसा करो। पुराने जमाने की तरह यह समझ कर चुप रह जाने की भूल न करना कि यह तो स्वाभाविक ही है, यह तो उसका कर्तव्य ही है। दूसरी बात यह है कि अपने कपड़ो और वेप पर तुम भी सदा ध्यान रखना । यह न हो कि अचकन के बटन कभी टूटे हैं, कभी ठीक से सिले नहीं लटके हुये हैं, कभी दो ऊपर लगे हैं सत्र नीचे खुले हैं, कभी कोई लगे ही नहीं हैं। कभी कमीज कुर्ता चार दिनों मैला ही चला जा रहा है। खी अगर अपने सौन्दर्य की चिन्ता करती है, अगर तुम्हारी प्रसन्नता के लिए, उसकी वृद्धि के लिए, वह निरन्तर चेष्टा करती है और अपना शृङ्गार करती है तो इसका अर्थ यह है कि वह सौन्दर्य का मूल्य समझती है और दूसर को भी साफ सुथरा ही देखना पसन्द करती है। कपड़ों का रेशमी या कीमती होना जरूरी नहीं, कपड़ो का साफ रहना और उनको पहिनने की तमीज होना जरूरी है। इसी के साथ एक वात और भी कहे देती हूं, देखो बुरा मत मानना, स्त्री जब तुम्हारे सामने आने के पहिले दस पाच मिनट शीशे के सामने कंधी त्रुश ले खड़ी रहती है और यथाशक्ति अपने वालों को सुन्दर से सुन्दर मनहर रूप देने की चेष्टा करती है, टीका देती है तो वह दूसरे से भी कुछ आशा करती है। कम से - पतियों को सीख [११ कम नई प्रियतमा के लिए तुम भी साफ सुथरे नायक ही बना करना। वात्सायन का उपदेश है कि- " स प्रातरुत्याय कृतनियतकृत्यः गृहीतदन्तधावनः, मात्रयानुलेपनम् धूपम् सनमिति च गृहीत्वा, दत्वा सिक्थकमलचकम् च, दृष्टवा दर्श मुखम्, गृहीत मुखवासताम्बूल' कार्याण्यनुतिष्टत् ॥ नित्यं लान (ोज- स्करत्वात्पवित्रत्वाच ) द्वितीयकमुत्सादनम्, तृतीयकः फेनकः (Soap साबुन) चतुर्थकमायुष्यम्, पंचमक दशमकं वा प्रत्यायुष्यमित्यहीनम्" आदि आदि एक चतुर नायक तथा नागरिक सुवह उठकर शौचादि से निवृत हो तुवन करे, शरीर सुगन्यादि लगावे, शीशे मे अपने को देखते हुए पान खाये, फूल के हारों को धारण करे, सुगन्धमय वस्तुओं और पान को खाते हुए, फिर खाने के लिए इनको अपने पास रख कर धर्म, अर्थ और काम के साधन के लिए अपने नित्य और नैमित्तिक कर्मों में लग जाय। अपने शरीर की सफाई के लिए उसे नित्य स्नान करना चाहिए, हर दूसरे दिन उसे उबटन लगाना चाहिये, तथा मालिश कराना चाहिए, गर्म पानी से स्नान कर बदन को रगड़वाना चाहिए जिससे शरीर का मैल दूर रहे। दाढ़ी वनवाना और क्षौर कर्म कराते रहना चाहिए..... *He should get up early in the morning and having attended to the calls of nature and brushing his teeth, and by further equipping himself by anointing himself slightly with the Scent and Dhupa and adorning himself with a wreath of flowers and betel leaves. looking at himself in a glass, chewing fragrant substances and by taking more of them and also betel leaves for further use, should proceed with his daily duties in the persuit १२] सुहागरात तुमको अपनी एक सहेली की कथा सुना देना चाहती हूँ। वह एक पुरुष से बहुत प्रेम करती थी, पुरुप भी अनुरक्त था। एक सन्ध्या को किसी पार्टी या तमाशे में सब को जाना था। हमारी सहेली ने अपने प्रेमी से आदेश किया कि वहां जरूर मिलना। अभाग्यवश प्रेमी को उस दिन अत्यावश्यक काम बहुत से आगये और आफिस में उसे सर उठाने की भी फुरसत न मिली। शाम हो गई थी, किसी तरह काम खत्म कर, विलम्ब तो हो ही गया था, हाथ मुह धो वह सीधे पार्टी में पहुंचा । लौटते समय हमारी सहेली और उसके मित्र अकेले ही लौटे । रास्ते में या मकान पर पहुँच कर सखी के मित्र ने उसका चुम्बन किया और उस दिन से आज तक सखी उस मित्र से नहीं मिली। वात यह थी कि मित्र ने उस दिन क्षौर (Shave) नहीं किया था । यह सच्ची घटना है। मेरी सखी ने स्वयं ही मुझ से यह वतलाया था। मैंने बहुत समझाने बुझाने की कोशिश की थी, किन्तु उसका एक ही जवाब था और वह यह कि जब मैं इस योग्य भी नहीं कि कम से कम मेरे लिए दाढ़ी बनाने का कष्ट स्वीकार किया जाय तो मैं ऐसे मनुष्य केप्रेम से अपने को प्रसन्नता पूर्वकवंचित रख सकती हूँ। यह अत्यधिक है, बेजा है, अनुचित है यह तुम कह सकते हो और मैं of Trivargas (Dharma, Arth and Kana) He should further attend to his bodily cleanliness, by taking bath daily, every alternate day having recourse to utsadan (shampooing) of the body, he should get his body rubbed after warm bathing and use soap and other cleaning substances in order to remove dirt from the skin The shaving of the chin and trimming of the moustaches should be attended to (एक फ्रेंच टीकाकार का अनुवाद) पतियों को सीख [१३ भी इस कथन मे तुम्हारा साथ दूंगी, किन्तु इतना न हो तो कम से कम स्त्री को कुछ तो खयाल हो ही गा, यह तो तुम भी मान सकते हो । सवाल वास्तव में यह है कि तुम उससे इतना प्रेम करते हो या नहीं कि उसके लिए यह सव कष्ट उठाओ और इन समस्त वातो की फिक्र रक्खो। एक वात और कह दूं। तुम अपना सारा समय और सारी सन्ध्यायें अपने ही खेल कूद और अपने ही मित्रों में न काटना । तुम अभी से निश्चय करलो कि सप्ताह में इतनी सन्ध्यायें अपनी वीवी को दोगे। उन शामों को तुम चाहे घर पर ही वीची के साथ खेलो कूदो, या गप करो, उसे सिनेमा मे ले जाओ या जहाँ उसकी तवियत कहे उसे घुमाने लेजाओ। इससे उसकी तवियत भी बहलेगी, जीवन उसका कैदी की भाँति भारी न होगा, साथ ही तुम्हारे साथ घूमने फिरने से उसके मस्तिष्क का भी विकाश होगा। देखो यह एक साधारण सी बात है किन्तु पुरुष इसे ध्यान में कभी नहीं रखते और इससे अक्सर वैवाहिक जीवन पत्नी के लिए कष्ट-कर हो जाता है। प्रेम ! सोहागरात से लेकर कम से कम पत्नी और पति जब- तक चौपाए से अठपाए और दसपाए नहीं हो जाते वैवाहिक- जीवन की दशा वहुत ही नाजुक हुआ करती है। प्रारंभिक दशा बहुत ही उत्तेजनापूर्ण साथ ही रग रग को परेशान रखने वाली होती है और इसको सुखकर और सफल बनाने के लिए बड़ी ही बुद्धिमत्ता और नीति-निपुणता की आवश्यकता होती है। तुमको यही सिद्ध करने को नहीं रहता कि तुम बुद्धिमान् धीमान् श्रीमान या विद्वान् मनुष्य हो और कुटुम्ब का भार वहन कर सकते हो, वास्तव में तुमको यह सिद्ध करना रहता है कि धीमान् और श्रीमान् मनुष्य तो हो ही साथ ही तुम मे सव से अधिक खूबी यह है कि तुम प्रवीण नायक हो, शारीरिक बल के साथ ही १४] सुहागरात तुम में आत्मवल है, चरित्र-वल है, और तुम दृढ़ विचार पाले मनुष्य हो। भोंडे शब्दों में साफ साफ बात यह है कि प्रकृति में विवाह सी प्रथा का आयोजन और प्रवन्ध कहीं नहीं है, सच पूछा जाय तो विवाह प्रकृति के विरुद्ध है। प्रकृति ने गर्भाधान और सन्ता- नोत्पति का ही आयोजन किया था, विवाह और वैवाहिक जीवन मानवी प्रथा और मानवी मस्तिष्क का विकास है और इसलिए इसकी सफलता के लिए मानवी मस्तिष्क की विशेषताएँ अधिक मात्रा में नितान्त आवश्यक हैं। विवाह की प्रथा ने एक और विचित्रता पैदा करदी है। इसने त्रियों को अपने को स्थिति के अनुकूल बनाने का पाठ पढ़ा दिया है। स्त्रिया स्थिति के अनुकूल अपने को तुरन्त बना लेती हैं। इसी प्रकृति के कारण हम लोगों ने मनुष्य निर्मित एक पति की प्रथा के सामने सर नमा दिया, इस खूबसूरती से कि इसके विपरीत आचरण को हम पाप सम- झती हैं, किन्तु पुरुप, नियम और प्रथा के नाम पर अपनी प्रकृति पर विजय प्राप्त नहीं कर सका और इतिहास के आदिकाल से आज प्रय॑न्त कोई विरला ही पुरुष एक पत्नीधर्म के अनुकूल आचरण कर सका है। प्रेम । मैं स्त्री हूँ और युवा अवस्था में प्रवेश करने के समय से आज तक सभी प्रकार के मनुष्यों से मेरा परिचय हुआ है और इसलिए मैंने जो कुछ कहा है अपने अनुभव से सत्य ही कहा है । मुझको युवा, वृद्ध, दुबले, मोटे, विवाहित, अविवाहित, चतुर, सीधे समी तरह के मनुष्यों से भेंट करने का अवसर प्राप्त हुआ है, और तुम सच मानो इन सभी ने ही मुझसे प्रेम प्रकट करने की चेष्टा की है, इसलिए नहीं कि मैं कोई बड़ी खूबसूरत थी या मुझमें कोई विशेषता है, वरन् केवल इसलिए कि समय और अवसर अनुकूल होना चाहिए, आकर्षणशक्ति जो हरदम -- पतियों को सीख [१५ अपने विपरीत या विरुद्ध को अपनी ओर खींचती रहती है, अपनी प्रभुता दिखाने लगती है। यह नग्न सत्य है और प्रेम ! तुमको इससे सावधान रहना होगा। तुम युवा हो, सुन्दर हो, मार्ग में प्रलोभन अनेक उपस्थित होंगे। विवाह व्यक्तियों की प्रवृत्ति और प्रकृति में अन्तर नहीं पैदा कर देता, इसलिए मेरी विनीत प्रार्थना तुमसे यही है कि यदि तुम वास्तव मे सुखी होना चाहते हो और वैवाहिक जीवन को सफल बनाना चाहते हो तो समझ लो कि अगर संसार में कोई स्त्री है तो राधा ही है। तुमने शपथ भी ली है, वचन भी दिए हैं, भले आदमी हो और भले आदमी के बेटे हो, अपने वचनों की मर्यादा रक्खो और उनको सत्य ही प्रमाणित करो। राधा अच्छी है तो, खराव है तो, तुमने उसे पसन्द किया, तुमने उसका पाणिग्रहण किया है और इसलिए और कुछ नहीं तो 'वांह गहे की लाज' को सदा ध्यान मे रखना । याद रक्खो, इस संसार में अनेकों सुन्दरियो के सुन्दर हाथ तुम्हारे सामने उपस्थित होंगे, किन्तु इनमें से एक भी तुमको उन्नति के पथ पर अग्रसर नहीं कर सकेगा । प्रेम । सुखमय वैवा- हिक-जीवन एक उत्कृष्ट कला ( Art) है और इसके लिए सयम, पवित्रता, जब, परहेज़गारी, दमनशक्ति और जितेन्द्रियता की सवसे अधिक जरूरत होती है। कला एक बड़ी शक्तिशालिनी मोटर सी वस्तु है, जो बहुत भीड़-भाड़ के वीच चलाई जा रही हो । एक बच्चे की उंगली से हॉकने वाला इसे मंजिल पर या सत्यानाशी खड मे पहुंचा सकता है । कला-कुशल नायक की विशेषता यह है कि वह इसे स्वतंत्र छोड़ देने और साथ ही इसको एक दम धीरे चलाने मे दक्ष हो । सच तो यह है कि हर- जाई प्रकृति का होना विवाह कर लेने की अपेक्षा कहीं अधिक बुरा है। विवाह के पक्ष में एक ही सब से हितकर बात है और १६ ] मुहागरात वह यह कि इसके द्वारा पति पत्नी के निरन्तर एक दूमरं के साथ रहने से, कभी प्रेम प्रकट करने और उसमें पागल होने से, कभी खोजने और क्रोधित होने से, कभी प्रसन्न और असन्तुष्ट होने से पुरुप की आवश्यकता से अतिरित्त शक्ति का व्यय होता रहता है। तुम ईसामसीह के इन शब्दों को कभी मत भूलना "Yea, I say unto you, that whosoever hath looked upon a»woman to lust after her, hath committed adultry with her already in his heart." और इसलिए कर्मणा ही नहीं, वाचा और मनसा भी पवित्र रहना जरूरी है। यह पुरुप-प्रकृति के विरुद्ध होगा, जीवन में ऐसी मनहर त्रियों से तुम्हारी भेंट होगी, जिनके चरणों पर सर्वस्व न्योछावर न कर देना, तुमको पशुता दिखाई देगी, कभी कभी तुम पागल से हो जायोगे, तुम्हारा अपने ऊपर से अधिकार जाता रहेगा, तुम्हारे मस्तिष्क में विचार उठेगा कि राधा ही संसार में एक स्त्री नहीं है, उसने मुझको खरीद नहीं लिया है, हमारे तनिक इधर उधर होने से उसको क्षति नहीं पहुंचेगी, उसके सुख मे, उसकी फिक्र मे हम कोई कमी नहीं होने देंगे, किन्तु मेरा कहना यही है कि तुम इन विचारों को सदा कुचलने की कोशिश करना । मैं जानती हूं कि प्रकृति से ही पुरुप-हृदय चचल प्रकृति, शीघ्र प्रज्वलित होने वाला और भवरे की प्रकृति का है। प्रेम करने लगना और विवाह कर लेना पुरुप का सहज स्वभाव है, उसकी प्रकृति इसके लिए उसे विवश करती है, परन्तु मनुष्य को विवाह कर दृढ़ रहने और उसके धर्मयुक्त रीति से निर्वाह के लिए प्रकृति ने कोई आयोजन नहीं किया है। प्रेम ! वैवाहिक आदर्श जीवन, एक पत्नीत्रत ऐसी चीज है जिसके लिए प्रयत्न करना, जीना और मरना भी श्लाघनीय है।

पतियो को सीख [१७ यह ऐसा आदर्श जीवन है, इतना सुखमय और आनन्दप्रद है कि इसके लिए अपनी हरजाई प्रकृति का दमन और उस पर विजय प्राप्त करना देवताओ के लिये भी अनुकरणीय है। मानव आदर्शों मे यह सर्वश्रेष्ठ और सब से अधिक कष्ट साध्य है, किन्तु यह सब होते हुए भी मानव जीवन की यह सब से अधिक ईप्सित, मनोहर, मुग्धकर और ईश्वर के निकट लेजाने वाली कामना है। - प्राचीन ऋषियों का कहना है कि- "श्रायुः क्षयो विकलताऽयुपहास्यता च निन्दार्थहानि लघुता विगति. परत्र । स्यादेव • "रतेन पराङ्गनायाः" "लंकेश्वरो जनकजा हरणेन बाली तारापहारकतयाऽप्यथ कोच- काख्यः । पाञ्चालिका ग्रहणतो निधनम् जगाम तचेतसाऽपि परदारर रतिम् न काक्षेत" (अनङ्ग रङ्ग) "सचिन्त्येति समागताम् परवधूम्रत्यर्थिनीस्वेच्छया, गच्छेत क्यापि न सर्वदा सुमतिमानित्याह वात्स्यायनः" प्रेम ! यद्यपि तुमको अपनी तबीयत की शोखी, अपने छैलेपन और भवरे की प्रकृति का अभिमान है, फिर भी तुमको इस बात का खयाल रखना चाहिए कि विवाह का सम्बन्ध स्थापित करना बड़ी जिम्मेदारी की बात है और पहिली शर्त विवाह की यह है कि पति और पत्नी दोनों हर समय एक दूसरे के सामने सर झुका देने के आदी हों। याद रक्खो अगर तुम अपनी स्वतंत्रता में आवश्यक बंधन वांधने को तैया हो ओर राधा के प्रति उतनी ही भक्ति, प्रेम और श्रद्धा प्रदर्शित करने को तैयर हो जितनी कि वह तुम्हारे प्रति प्रदर्शित करती है या जितनी कि तुम उससे आशा २ १८ मुहागरात करते हो तो यह तुम्हारा वैवाहिक सम्बन्धतुम दोनों के लिए स्वर्ग- सुख का देने वाला होगा। खुश रहो और तुम लोगों का वैवाहिक जीवन संसार के समस्त सुखों का भंडार हो मेरी कामना यही है। तुम्हारी- मनोरमा सन्तान-निग्रह मनोरमा-वास प्रयाग ६-१२-१६१३ प्रेम! तुमको एक पत्र तुम्हारे वैवाहिक जीवन के सम्बन्ध में लिख चुकी हूं। इस समय बैठे बैठे फिर तुम्हारा खयाल आगया, हृदय ने कहा तुमसे कुछ वातें कीं और इसीलिए यह पत्र तुमको लिख रही हूँ । वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने के लिए अनेक बातें है, किन्तु सत्र से साधारण भूल, और जिससे साधारण से साधारण मनुष्य अपने को बचा सकता है, यह है कि वह इस बात का ध्यान नहीं रखता कि गृहस्थी रूप मशीन बिना खट पट श्रोर शारगुज के श्रानन्द से चलती रहे, उसके प्रत्येक पुरजे साफ सुथरे हो, उनमे तेल भी समय से पहुँचता रहे और वह विना प्रयास के अपना काम सुचार-रूप से करती रहे। वैवाहिक जीवन कीयह सबसे सहज और साथ ही एक महत्वपूर्ण बात है, किन्तु इसकी ओर समुचित ध्यान और इसकी सुव्यवस्था न होने से कितने ही कुटुम्ब अशान्ति और दुःख के समुद्र बन जाते हैं । सब से पहिली बात जो इस सम्बन्ध में याद रखने की है वह यह है "Cut your coat according to your cloth" जितना कपड़ा २०] सुहागरात हो उसी के अनुसार कोट की काट, स्टाइल और व्योंत भी होना चाहिए । आय अगर दो सौ की है तो खर्च दो सौ के भीतर ही होना चाहिए, साथ ही कुछ वचा भी लिया जाय जरूर, चाहे पाच ही रुपया हो, इसलिए कि गाढ़े में किसी समय काम दे । यह जरूरी है, साथ ही बहुत अच्छा भी । गृहस्थी मे क्या आवश्यक है, कितने की साधारण रूप से प्रत्येक माम जरूरत होतो है यह छिना नहीं रहता। संसार की समस्त और बड़ी से बड़ी बातो की अवहेलना कर सर्वप्रथम इन सब का प्रवन्ध हो जाना चाहिए । इन सवका रुपया, इसके पहिले कि रुपया किसी और काम के लिए लिया जाय, अलग पत्नी के हाथ में दे देना चाहिये। गृहस्थी मे समस्त आवश्यक वस्तुओं के आजाने का काम विना किसी प्रयास के मशीन की रफ्तार की भाति सदा होना चाहिये । माथ ही यह बात भी होनी चाहिये कि आवश्यक वस्तु एक पैसे की भी उधार न आवे। रुपया मौजूद है, कल दे देंगे या चेक काट कर भेज देंगे या नहीं है तो फिर चला जायगा, आगे चल कर गृहस्थी के सुखों का नाश कर देने वाला हो जाता है। एक छोटी सी बात पर और ध्यान रखना चाहिये, वह यह है कि भोजन का समय विलकुल निश्चित होना चाहिये और घड़ी की सुई के अनुसार ठीक समय पर होजाना चाहिये । इस सम्बन्ध में एक साधारण सी वात और है। अपने मित्रों या किसी को भी अगर भोजन के लिए निमत्रित किया गया है तो उसकी सूचना पहिले ही से घर की मालकिन को जरूर हो जानी चाहिये । पत्नी को विना पहिले से सूचना मिले किसी मेहमान को खिलाना, विशेष कर जब वह एक से अधिक हो, बहुत कष्टकर होता है। भोजन का प्रवन्ध स्त्री का विभाग है और इससे उसका घना सम्बन्ध रहता है। स्वभा- वत. बी अच्छा से अच्छा भोजन मेहमान को खिलाना चाहती है, अपने विभाग का सुन्दर से सुन्दर प्रबन्ध दूसरों को दिखाना पतियों को सीख [ २१ चाहती है, उसको इस बात में बहुत आनन्द आता है कि उसके घर में आये हुये लोगों को सुन्दर से सुन्दर भोजन मिले जिसमें वह मन ही मन उसके कार्यकुशल होने की प्रशंसा करें किन्तु एक दम, मिनट भर पहिले, सूचना मिलने से वह कुछ नहीं कर सकती और उस इमसे हार्दिक कष्ट होता है। दूसरे गृहस्थी की भीतरी वातों को अधिकारिणी स्त्री है, उसके सुन्दर प्रवन्ध का उत्तरदायित्व उस पर है, उसकी अच्छी या बुरी बातों के लिए नेकनामी या बदनामी उसकी होती है, इनके लिए पति को कोई दोप नहीं देता, हंसी बी की होती है इसलिए पति देवता को यह उचित नहीं कि अपनी लापरवाही, भूल और गलती से वह किसी दूसरे की बदनामी कराये । जब गृहस्थी की प्रबन्ध की बात कर रही हूं, तब एक बात और कह देना चाहती हूँ, जिस प्रकार से जितना ओढ़ना हो उतना ही पैर पसारना चाहिये, ठीक उसी तरह मे जितने बच्चों लिए हम अच्छा से अच्छा प्रवन्ध, शिक्षा, दीक्षा और आराम से रहने का प्रबंवकर सके उतने बच्चों को ही जन्मभीदेना चाहिये। एक माना, एक भी हृष्ट पुष्ट, सुन्दर, सुशील, योग्य पुत्र से माता और मुतबनी हो सकती है और जीवन में अधिक से अधिक सुख प्राम कर सकती है। एक सुयोग्य पुत्र को जन्म दे वह अपनी कीर्ति को अमर कर सकती है, किन्तु इस पांच निखिह, रोगी, आलसी, निकम्मे, निख१ पुत्रों को जन्म दे वह समस्त संसार के मुखो से, श्रेष्ठ होती हुई भी, अपने को बंचित कर सकती है। इम सम्बन्ध में मुझको अधिक कहने का अधिकार नहीं, किन्तु इतना में जरूर कह देना चाहती हूँ कि "किसी माता या पिता को, किमी ईश्वरी या मानवी नियम से यह अधिकार नहीं है कि वह अपने विलास के कारण, अपनी मूर्खता, बुद्धिहीनता या चापल्य स या अपनी प्रकृति या इन्द्रियों को वश में न रख सकने के २२ 1 सुहागरात कारण एक भी जीव को, जिसकी देख भाल, पूर्णरूप से शिक्षा और पालन का प्रबन्ध वह नहीं कर सकता, इस स्वार्थ से भरे हुए संसार में जहां वली निर्बल के माथे जीते हैं, जहां श्रेष्ठतम की विजय' का दौर दौरा है-लाये। जो माता पिता दीन या कमजोर बच्चों को पैदा करते हैं, जो रोगियों को जन्म देते हैं या जो हृष्ठ पुष्ट को पैदा करते हैं किन्तु उनकी समुचित देख रेख और शिक्षा का प्रवन्ध नहीं कर सकते, उनको अच्छा मे अच्छा सुख नहीं दे सकते, जो जीवन-संग्राम की लडाई लड़ने और उनमें विजय प्राप्त करने के लिए उनको सम्पन्न नहीं कर सकते, जो जीवन की मझधार में उनको निस्सहाय छोड़ देते हैं, वे भीपण अत्याचार करते हैं और उसी दड अधिकारी हैं जो उस मनुष्य या स्त्री को मिलना चाहिये जो एक निस्सहाय, सजीव, हंसते बोलते बच्चे को कठिन से कठिन शीत में कैलाश पर्वत की वर्फ से ढकी चट्टानों पर छोड़ देती है, जो एक मन्द मुस्क्यान वाले खेलते हुए नन्हे बच्चे को अग्निकुण्ड में फेक देती है या जो सब कुछ जानते हुए भी होश हवाम में एक बच्चे को जहर दे देती है। सन्तान-निग्रह देश, समाज और कुटुम्वों की वर्तमान स्थिति मे कुटुम्ब को सुखी रखने के लिए नितान्त आवश्यक है। यह न पाप ही है और न धर्म के विरुद्ध ही है। पतिपत्नी के सम्बन्ध में तो पाप और व्यभिचार की परिभाषा ही मेरी राय मे दूसरी होनी चाहिये । पाप होना चाहिये "विना प्रेम के मातृत्व या पितृत्व, व्यभिचार होना चाहिये "उत्तरदायित्वहीन पितृत्व या मातृत्व तथा हीन माता पिताओं का पुत्रोत्पादन" और पाप समझा जाना चाहिये "जानकर बच्चे न पैदा करना या अकारण जबरदस्ती कामेच्छा की शांति पतियों को सीख [ ૨૨ "तेते पांव पसारिये जेती लांबी सौर" की शिक्षा को इस- लिए हरएक पति-पत्नी को ध्यान में रखना चाहिये। पूर्वकाल में और आधुनिक समय में भी, जब तक पाशविक शक्ति ही सब कुछ थी, गुलामी का इस तरह का दौरदीरा न था, जब बहुतायत थी, दरिद्रता का नाम ही लोग सुना करते थे, जब आवश्यकताएं कम थी या उनकी पूर्ति सहज मे हो जाया करती थी, बड़ा कुटुम्ब बड़े भाग्य का सूचक था। थोड़ासा काम बहुत से आदमी मिलकर कर लेते थे, कोई खेतों में खाद की फिक्र रखता था, कोई मवेशियों को चराने की, कोई अन्य कामो की। इससे भी अधिक महत्व का काम यह निकलता था कि कोई पड़ोसी या गैर आक्रमण करने या लड़ने का साहस नहीं कर सकता था। बड़े कुटुम्ब की धाक रहती थी, जितना ही बड़ा, अधिक प्राणियो वाला ओर जबर्दस्त कुटुम्ब होता था उतना ही वह शक्तिशाली और सम्पन्न होता था। अव युग दूसरा है, अब केन्द्रीकरण का युग है, कल और कलाओ का युग है, अब सो मनष्यो का काम एक मनुप्य मशीन से कर लेता है । पाशविक शक्ति नहीं अब बुद्धि का युग है । इसलिए कुटुम्ब शक्तिशाली और प्रभावशाली वह होगा जिसमें बुद्धि और विवेक की बहुतायत होगी। संख्या नहीं अब शक्ति और योग्यता का साम्राज्य है । मनुप्यो की संख्या की नहीं अव मस्तिष्क की विजय है । इसलिए संख्या में अधिक पुत्री के जन्म से लाभ नहीं, वे कुटुम्ब की कीर्ति को कायम नहीं रख सकेंगे । रहने को उतना स्थान नहीं, खाने के लिए उतना सामान नहीं, आवश्यकताए जिनकी पूर्ति के लिये पैसा चाहिए, नितप्रति बढ़ती जा रही हैं, वस्तुओं का मूल्य बढ़ता जा रहा है, पैसों की खरीदने की शक्ति कम होती जा रही है, आय कम होती जा रही है, इसलिए जरूरी यह है कि बच्चे कम हो किन्तु हो धीमान्, श्रीमान्, वीर, यशस्वी, जो अकेले दस और सौ का काम कर सके, जो २४] सुहागरात अपने कुटुम्ब की उतनी ही नहीं, उससे अधिक सेवा कर सकें जितनी दश वीस पुत्र किया करते थे। मेरी राय में एक पुत्र और एक पुत्री एक माता पिता के जीवन को सुखी बनाने के लिए काफी हैं। एक छोटे भाई का और होना अच्छा हुआ करता है, यदि माता पिता सब के लालन पालन का मुन्दर प्रबन्ध कर सके, क्योकि दो या तीन वच्चे जब एक ही माता पिता के हो तो उनको उन्नति करने के लिए बहुतसी बाते आप से आप ऐसी मौजूद हो जाया करती हैं जो माता पिता के अकेले बच्चे को, उस पर कितना ही क्यो न खर्च किया जाय, नसीब नहीं हो सकती । किन्तु यह सब स्वप्न तभी देखना चाहिये जब पैसे की किसी प्रकार की कमी न हो, नहीं तो एक पुत्र काफी समझा जाना चाहिय । अस्तु। पत्र काफी बड़ा होगया और जो कुछ मुझको कहना था मैं कह भी चुकी, फिर भी एक बात और कहने के बाद ही इस पत्र को समाप्त करूंगी। अभी ही बैठे बैठे कुतूहल-वश में एक हिन्दी लेखक के सन्तान-निग्रह सम्बन्धी लेखों को पढ़ रही थी। लेख डाक्टर मेरी स्टोप्स की प्रचलित पुस्तकों के आधार पर लिखे गये हैं। जहांतक मालूम होता है लेख लिखने के पहिले लेखक महोदय ने इस विषय के बड़े बडे प्रतिष्ठित अन्यों के पढ़ने का कष्ट नहीं उठाया। उनको कदाचित् यह भी नहीं मालूम होगा कि डा. मेरी टोस शरीर और स्वाथ्य से सम्बन्ध रखने वाली डाक्टर नहीं हैं। जब लेखकको यही नहीं मालूम होगा तो फिर यह कैमे मालूम हो सकता है कि डा. मेरी स्टोप्स की पुस्तकं अच्छी होती हुई भी भूलों से खाली नहीं हैं. दो एक स्थानो पर तो उनमे भहो भूलें है, अस्तु । प्रस्तुत लेख में लेखक महोदय ने संसार भर के उपायों की हीनता दिखाकर डा० मेरी स्टोप्स के एक उपाय को सर्वश्रेष्ट बतलाया है। यह देश के अभाग्य की बात पतियों को दीख [२५ है कि लेखक महोदय को कदाचित् यह नहीं मालूम कि जो उपाय उन्होंने बताया है वह भी सर्वश्रेष्ट साथ ही हानि-विहीन नहीं है। हमारे लेखक गण देश भर के नर नारियों के विधाता है, फिर भी यह इतना आवश्यक नहीं समझते कि जिस विषय पर वे लेखनी उठाते हैं कम से कम उस सम्बन्ध में विशिष्टविद्वानों के मत से नो परिचय प्राप्त कर लिया करें । मुमको कहने का अधिकार ही न्या, और कहना चाहूं भी तो कैस और किससे कहूं, कलम उठाने का साहस भी कहें तो स्त्री हूं, लोग क्या कहेंगे, और यह भी असंभव नहीं कि कोई महानुभाव एडी बेड़ी ही सुना दें, किन्तु यदि देश के पुरुष-स्त्री सम्बन्धी विषयों के लिखनेवाले लेखकों से कहीं मेरा परिचय होता तो मैं उनसे सविनय निवेदन करती कि अपनी आंखों को बन्द कर किसी एक के पीछे उसी के सहारे भागना संकटमय हो सकता है। साथ ही यह कि ऐसे विषयों की चर्चा बड़ी जिम्मेदारी का काम है। यह भी कहती कि लेखक, वक्ता और नेता देश को बना और विगाड़ सकते हैं, इसलिए साधारण पुरुषों की अपेक्षा इन लोगों को अपने उत्तरदायित्व का अधिक लिहाज रखना चाहिये, और बिना अच्छी तरह मनन किये हुए कोई बात जवान या कलम से बाहर नहीं करनी चाहिए। मैं जानती हूं कि कम से कम मुझ से डा० मेरी स्टोप्स जरूर लायक हैं, कम में कम मुमसे अधिक अधिकार उनको इस सम्बन्ध की वातो के कहने का है, फिर भी कुछ वकने की अधिकारिणी में अपने को समझती हूँ, इसका कारण यह है कि डा. मेरी स्टोप्स की पुस्तकों के खंडन के अर्थ जो पुस्तकें प्रकाशित हुई है उनको भी मैन पढ़ा है। मैंने डा. मेरी स्टोप्स की तया उनके विरो- वियों दोनों ही की बातों को अपनी हीन बुद्धि की तराजू पर तोला है और मुझको किसी एक बात में डा० मेरी स्टोप्स और २६ ] मुहागगन किसी दूसरी में दूसरे गलत प्रतीन हुए हैं, और दोनों ही की सत्र याने सर्वथा ठीक नहीं हैं। सबसे अधिक जिस बात पर मैं जोर देती यह तो यह है कि अपने घर में भी देखो, यह असंभव नहीं कि अपने घर में ही निधि मिल जाय । इन बातों में भी अधिक जिस बात पर मैं जोर देती और जिस बात को भिना- वल्प उनसं प्राप्त करने के लिए उनके चरणों में अपना सर नमा देती वह यह है कि हमारे पथप्रदर्शक कम से कम इस बात को सदा ध्यान में रक्य कि वे अपने पाठक और पाठिकायों की कामवासना की वृद्धि तो नहीं कर रहे हैं, वे उनको अधिक कामुक तो नहीं बना रहे हैं। कामुकता की वृद्धि में ही आज मानव-समाज इतना असुखी होगया है। सुन्दर मे मुन्दरपुष्योंका चयम श्रेयस्कर है, अपनी मातृभाषा में संसार के बान को देना हमारा प्रथम कर्तव्य है, किन्तु पुष्यों के चयन के समय हमको इस पर निगाह रखनी चाहिये कि किसी मुन्दर पुष्प के पीछे तक्षक नाग तो नहीं छिपा वठा है। हमको इसपर नदा ध्यान रखना चाहिये कि अपनी भूल स, जान में या अनजान मे, क्रिसी स्वार्थ या बुद्धि-हीनता ने हम अपने भोल पाठक पार पाठिकायों को उनके पवित्र मंच से नीचे तो नहीं खींच रहे हैं, कहीं उनको गलत रास्ते पर तो नहीं लेजा- रहे हैं। मैं उनम कहती कि पाठक और पाठिकाओं तथा किमी क. नैतिक पतन करना संमार में सब में जवन्य पाप है, किन्तु ऋहू ना क्रिमसे और कैंस ? सिर में इतने बाल कहां है ? साहस कर भी नो पहिले सहन्नो ही कुवाक्यों को महन करने को शनि अपने में पैदा करलूं तब तो । अम्नु । तुमने इतना ही कहना है कि तुम बुद्धि से काम लेना और "जिन खोजा तिन पाइयाँ के ही सिद्धान्त को अधिक महत्व देना, किन्तु इतना सदा ध्यान में रखना कि मर्वश्रेष्ट उपाय ससार में समस्त मुखों के देने वाला संयम के सिवा और कुछ नही है। - पतियों को सीख [ २७ पत्र समाप्त करते समय एक वात और याद आ गई। देखो घर में पत्नी के आते ही तुम प्रभु का पार्ट न खेलने लगना, तुम सदा उसका आदर करना, उसकी इच्छा और उसकी मर्जी को ही ऊपर रखना, और विना उसकी मर्जी के कम से कम उसमे सम्बन्ध रखने वाली कोई बात न करना। वह तुम्हारी जरूर है किन्तु तुम याद रखना कि वह जड़ नहीं है उसके भी हृदय और मस्तिष्क है और यदि तुम उसे वरावर की सहचरी और अपने वैवाहिक जीवन को सुखी बनाना चाहते हो तो उसकी इच्छाओं, कामनाओं और भावनाओ का सदा। लहाज रखना तुम्हारे लिये परमावश्यक है। एक वात और याद रखना तुम उससे उसी तरह से व्यवहार करना जैसा कि तुम उसके साथ करते , अगर तुम्हारी वह पत्नी न होकर कोई कुमारी होती और विवाह के अर्थ तुम अपने प्रेम में उसे मत्त करना चाहते । वैवाहिक जीवन को आनन्दमय बनाने का रहस्य यह है कि तुम नित्यप्रति चतुर प्रेमी नायक ही बने रहो, प्रत्येक मिनट उसके हृदय पर अपने प्रेम से अधिका-धिक अधिकार प्राप्त करने की चेष्टा करते रहो, और उसको अपने प्रेम समुद्र में प्रसन्नतापूर्वक उतारते रहने का ऐसा आदी वनालो कि तनिक भी तुम से दूर होने पर वह जल- विहीन मछली को भॉति छटपटाने लगे। अन्त में तुमसे इतना ही कहना है कि अगर तुम मेरी इन वातों को सदा ध्यान में रक्खोगे तो मेरा विश्वास है कि तुम्हारा वैवाहिक जीवन कल्पवृक्ष के समान तुमको सब कुछ देने वाला हो जायगा। तुम्हारी- मनोरमा -- प्रेम का नशा उतर जाता है मनारमा-वास, प्रयाग १२-५-१६१५ निय गोरी क्या तुम बतला सकते हो कि इस समय अपनी एक पुरानी मेफ (आलमारी) से मैन क्या ढूंढ निकाला ? एक तुम्हारे प्रेम- पत्रों का बंडल । इनमें से अधिकतर प्रायः आठ दस वर्ष हुए लिखे गये थे, और मैं समझती हूं, इनको इस प्रकार जुगह कर रख छोड़ने में मैंने भूल की थी। भावुकता-वश मैंने इनको संच कर रक्खा हो यह बात नहीं है, साथ ही तुम पर अंकुश रखने की नीयत से ये रक्खे गये हो सो भी नहीं है। इनके रक्खे रह जाने का एकमात्र कारण यह है कि पत्रों को नष्ट कर देना मैं कभी भी सहन नहीं कर सकी थी विशेष कर जब कि वह तुम्हारे लिखे हुए प्रेमपत्र थे। वंडल खोलते हुए मुझे ध्यान में पाया कि वंडल इसी उन मे वधा हुआ है जो तुम्हारी हमको प्रथम भेंट थी और जिने तुम मेरे जन्पर बनाने के लिए लाये थे। मैंएक घंटे से भाग के पास बैठी हुई इस फिक्र में लगा हूं कि तुम्हारे समत्त शन्दों को भन्म कर दूं। मुमलो सुन कर आश्चर्य होगा यदि संसार में कोई ग्मी न्त्री भी हो जो एक लेही प्रेमी के प्रेमपत्र को बिना पढ़े हुए । पतियों को सीख [२६ अग्नि में भस्म कर दे। जहांतक मैं समझती हूं ऐसी हदयहीन कल्पना विहीन कदाचित् ही कोई स्त्री हो। मैंने अभी ही तुम्हारे उस पत्र को पढ़ा है जो तुम्हारा अन्तिम पत्र था और जिसके बाद तुमने मुझको लिखने का कप्ट स्वीकार नही किया । गोपी ! इस पत्र को मैं रक्खूगी, यद्यपि अन्य सब पत्र मुझ मे इनको भस्म कर देने योग्य नैतिक साहस के होते ही, राख हो जायेंगे। यह तुम्हारा पत्र मेरे पास इसलिए रहेगा,क्योकि यह मेरे इस सिद्धान्त को सत्य सिद्ध करेगा कि समय समस्त धावो का पूरक है; साधारण चोटों का ही नहीं, वरन् हृदय के नस्तरो का भी और यह कि आत्महत्या मूरों का काम है, क्योंकि आकस्मिक घटनाओ, देवीगतियों और इत्तफाक का देवता सदा कोने अतरे में खड़ा हुआ, जीवितों की सहायता के लिए प्रस्तुत रहता है, किन्तु मृतकों से वह कोई सरोकार नहीं रखता। इस अपने अन्तिम पत्र में तुमने बड़ी गम्भीरता से लिखा था कि तुम भविष्य में किसी से प्रेम करने का साहस न करोगे। तुमने लिखा था- "तुम्हें चाहा न पाया, अब किसी को और क्या चाहें ! मुहव्य क्या निमेगी फिर, भला टूटे हुए दिल से" ? तुमने अपनी प्रभावशालिनी रसिक-हृदय वाली भाषा मे बड़े मार्मिक शब्दों में लिखा था कि मैंने तुम्हारा स्त्रियों में से सदा के लिए विश्वास उठा दिया, और तुम शीघ्र से शीघ संसार से दूर चले जाओगे। क्षमा करना, किन्तु इस समय इन पंक्तियों को पढ़- कर विना मुस्कराये मैं न रह सकी, क्योंकि मुझको याद आया कि पत्र लिखने के दूसरे ही दिन तुम कालेज की टावर पर चढ़ गये थे और वहा मित्रों से इस बात पर वहस कर रहे थे कि वहा से - ३०] सुहागरात पतंग उड़ाई जाय तो कितने ऊंचे वह हवा में पहुंच सकेगी। जो तुमने लिखा था उसका यह मतलव न था, हां तंज और ताने की वात ही दूसरी है। गोपी ! कोई भी मनुष्य स्त्रियों फिर विश्वास करने लग सकता है, अगर केवल वह आत्महत्या जल्दी न कर डाले । तुमको याद है या नहीं कि तुम्हारे हमारे सम्बन्ध के टूटने के एक महीने बाद ही तुम एक दूसरी स्त्री से प्रेम करने लगे थे और उससे विवाह करने को उत्सुक थे । हमको विश्वास है कि उससे तुमको शांति मिली थी, और उससे तुम संतुष्ट भी थे, यद्यपि छुट्टी के दिनों में घर जाने पर तुमने कहा था कि तुम ईश्वर को धन्यवाद देते हो, कि उसने वजाय तुमसे तुम्हारे एक मित्र मे विवाह कर लिया। कदाचित् तुम उससे वास्तव में प्रेम नही करते थे, किन्तु तुम समझते थे कि तुम उससे प्रेम करते हो, और यह कोई अनहोनी वात भी नहीं, क्योंकि प्रेम ठीक उसी प्रकार से मस्तिष्क की वीमारी है जैसे कि वह हृदय की। तुम्हारे उसके प्रेम में फंसने से मुझको जैसा कष्ट होना चाहिए था, नहीं हुआ, क्योंकि मैंने देखा कि कम से कम मैंने तुम्हारा त्रियों में से विश्वास उठा नहीं दिया है, यह एक सुखदायनी वात थी, इसे तुम भी मानोगे । गोपी ! मैं तुम्हारे जीवन को नष्ट कर देना सहन नहीं कर सकती थी और ऐसा करने पर मैं अपने की कमी क्षमा न कर सकती । तुम ऐसे आदरणीय, स्नेहभाजन, आदर्शवादी और अपने स्वप्नों में लीन रहने वाले मनुष्य थे कि तुमकी दुःखी कर मैं सुखी नहीं हो सकती थी, किन्तु तुमसेविवाह करने पर हम दोनों को कभी सुख न मिलता । इस समय जब मैं यह सब सोचती हूं तो तुमको यतला देना चाहती हूं कि केवल तुम्हारी एक प्रकृति के कारण मैं पतियों को सीख [३१ तुमसे विवाह करने को राजी नहीं हुई। मुमको सदा यह भय रहता था कि तुम्हारी विचार-निद्रा मे कहीं मैं तुमको जगा न दूं। मेरे भोले गोरी ! त्रियां पुरुषों के समान कभी स्वप्न देखने- वाली और पूर्ण आदर्शवादिनी नहीं हुआ करती । विवाह की दूपित प्रथा, यह त्याल कि जिस घर में पली हैं उनको छोड़ना है, माता पिता के श्रीचरणों से भी विदा होना है, नूतन घर वमाना है, नये कुल को अपना कुल बनाना है, हममें भावुकता की वृद्धि न कर हमको व्यावहारिक होने की शिक्षा दिया करता है। यह न्याल सदा हम लोगों को सजग रखता है और कहता रहता है कि विवाह से हमको क्या क्या प्राशा रखनी चाहिए, क्या फल उससे फलेंगे. कौन कौन सी कठिनायों का मामना करना पड़ेगा और अन्त में होना क्या है। विवाह की प्रथा इस तरह भावुकता नही वरन व्यावहारिक जीवन के लिए हमको तैयार करती है। यद्यपि अपने हृदय में मैं तुमको अपना सना का नाथी बना लेना चाहती थी, किन्तु मैं यह देख रही थी और ममझती थी कि तुम्हारा मेरे लिए जो प्रेम है वह वैवाहिक-घनिष्टता को वहन नहीं कर सझेगा और विवाह के बाद ही काफूर हो जायगा। प्रेम की मधुमिश्रित पनियों में जब हम तुम एक साथ बैठने थे, वाते करते थे, खाते, पीत, म्बेलने थे या यमुना की सैर किया करते थे, हम लोग अपनी त्रुटियों को सहज में ही एक दूमरे में छिपा सकते थे। तुमने मुन्नको कभी क्रुद्ध, अन्यमनस्क, चिड़चिड़ी नहीं देखा, सदा हमनी हुई, खुश ही तुमने मुझको पाया। मैं तुमसे मिलती या तुम्हारे साथ घूमने जाती थी, किन्तु सदा ही जब में भरपूर बुरा at my besi होती, उस समय जब कि मैं अपनी सर्वश्रेष्ट स्थिति में होती और बुरा न मानना, तुम भी यही करते थे। एक प्रेमी खुशमिजाज, भावुक, महनशील और अपना ३२] सुहागरात सर्वस्व त्याग कर अपनी प्रियतमा को प्रसन्न रखने वाला व्यक्ति होता है, किन्तु पति-पत्नी दूसरे ही जीव होते हैं । वह सदा साथ रहते हैं, दु.ख में सुख मे, वसन्त में निदाघ मे, सुअवसरों मे कुअवसरों में, सुकाल मे और अकाल में। तात्पर्य यह कि किसी समय में इन दोनों को एक दूसरे से नजात नहीं मिलती और यह एक दूसरे की निगाहों से कुछ घड़ियों के लिए भी दूर नहीं रह सकते, दोनों मानों एक पिंजरे में कैद हो जाते हैं, जहां नियम यह है कि हरवक्त साथ रहें और एक मिनट के लिए भी कोई किमी की उपस्थिति से अपनी रक्षा न कर सके। तुम्हारे हृदय को किसी तरह से भी चोट पहुंचाने के लिए मैं नही कहती, किन्तु सोचो, तम कवि थे, चित्रकर थे, तुम कला कौशल के प्रेमी थे, तुम कल्पना के ही समुद्र में सदा स्नान करना चाहते थे। गृहस्थी के कामों में लीन-कमी तरकारी वनाते, कभी माडू बुहारू का प्रबन्ध करते, कभी अचार और मुरव्वों की फिक्र करते, आटा सानते दिखाई देने पर मैं तुम्हारी नजरों में और ही दिखाई देती। कविहृदय,संसार की इन नितान्त आवश्यक किन्तु कविता, कल्पना और कलाविहीन बातों मे मुझको संलग्न देख, मुझसे दूरभागता और तुम्हारा प्रेम-सूर्य अस्ताचलगामी हो जाता। यह भी स्मरणरहे की उस समय तुम्हारी आय कम थी, यह संभव न था कि मैं बहुत से दास दासियों को रख लेती, वह सब इन कामों को करते और मैं रंगविरंगी सारियां पहिने, तुम्हारे चित्रकार मस्तिष्क की पिपासा की शांति के लिए हंसती बोलती, मनहर चित्र के समान तुम्हारे सामने रहती, तुम्हारे मनोरंजन के लिए बोलने हसने और गाने वाली गुड़िया बनी रहती । गोपी! मेरे लिए और भी कठिनाइया थी। तुम आदर्शवादी हो तुम इसके मर्म को नहीं समझोगे, किन्तु संसार का तथ्य सत्य यही है कि आवश्यकताएं वनी ही नहीं वरन् बढ़ती रहती हैं, किन्तु प्रेम काफूर की भांति पतियों को सीख [३३ दिन दिन आयु में लीन होता रहता है। प्रेम काफूर होता रहता है किन्तु आवश्यकताएं शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की कलाओं के समान बढ़ती रहती है। पैसेकी कमी, दिन रात उसके लिए, खीचतान और उसके लिए माथापच्ची किसी भी मनुष्य के समस्त गुणों का धीरे धोरे हास कर देती है। नपये की चमकती आभा और उसके प्रनाश से चरित्र में हजारों छिद्र होते हुए छिपे भी रहते हैं। पैसे का विकाश और प्रकास दोनों ही कुछ विचित्र हैं। पैसे में बड़ी करामात है। पैसेकी कमी ऐसी तथ्य वस्तु है कि कल्पना और उससे पोपित संमार के समस्त सर्वश्रेष्ट गुणों को सहज ही में नष्ट कर देती है। संसार का सर्वश्रेष्ठ मनुष्य, यदि उसका अधिकतर समय अपनी रोटी के लिए रोज पैसा जमा करने की फिक्र में कटे, कुछ ही समय वाद निकम्मा मनुष्य हो जायगा। अब इसकी चर्चा व्यर्थ है। हमारी तुम्हारी कथा कभी की अन्त हो गई। सम्भव तो नहीं किन्तु असम्भव भी नहीं कि तुम्हारे मस्ति- प्क के किसी विसराए हुए विस्मृत कोने में भी मेरा अब निवास न हो, किन्तु में बैठे बैठे कभी कभी पुरानी बातों को सोचा करती हूं और एक प्रकार से सत्य और तथ्य बातों पर मनन किया करती है। ईश्वर ही जानता है कि मैं लखपती विवाह के इच्छुक लोगों की परवाह न कर तुमको, तुम दरिद भी होते तो, वर लेती, चक्की पीस और दूसरों का जूठन उठा तुम्हारी सेवा करते हुए अपने को सौभाग्यवती सममती, किन्तु गोपी! विवाह के लिए तुम्हारी सृष्टि ही नहीं हुई थी, तुम विवाह के उपयुक्त न थे। संसार में बहुत से मनुष्य एक एक कर अपने मायामय स्वप्नों और मुखमय-भ्रान्तियों का अन्त देख अवीर नहीं होते, वे अपने सुख-स्वप्नों को तथ्य संसार की बलवेदी पर वलिदान होते देख विचलित नहीं होते, वे धीरे धीरे क्रमश: मायामय स्वप्नों को नीरस, मायाहीन संसार की तथ्य बातों में बदलते देख अशान्त न ३ ३४ ] सुहागरात होकर धीरज धारण कर नकते हैं. और कुछ न सही तो गृहस्थी के नाम पर, बाल बच्चों के नाम पर, कल्लित सुख-स्वप्नों से विहीन वैवाहिक जीवन को वहन कर लेते है किन्तु तुम यह न कर सकते तुन्दारे लिये यह सब धुल घुल कर मरने के समान होता और मैं इन सारी तथ्य, पुकार पुकार कर अपने अस्तित्व का ज्ञान कराने वाली, वातो को आंखों की रोट नहीं कर सकती थी । विवाह की उत्सुकता, कौतुहलता, उसकी नूतनता, विवाह का जोश, विवाह के कल्पित सुख-स्वप्न, गौन की ज्योनार के साथ ही या दो चार दिन बाद में अपने अस्तित्व को खो बैठते हैं और उसका खमीयाजा ही रह जाता है। तुम आदर्शवादी हो, स्वप्ना के संसार में उड़नेवाले हो, तुम चाहे न मानो संसार का एक बड़ा जबर्दस्त सत्य यह है कि विवाह की प्रसन्नता और जोश बहुत जल्द समाप्त हो जाता है, विशेष कर बी के सम्बन्ध में। विवाह, एक प्रेमी की, जब वह पति का चाना पहिनता है- is the end of allusion and theend of romance, सुख-भ्रान्तियों का अन्त कर देता है, क्योंकि विवाह के कुछ ही दिनों बाद प्रेम का नशा उतर जाता है। हां, साधारण मनुष्यों के लिए, नो विवाह से बहुत अाशा नहीं रखते या उसकी नींव पर सुख-स्वप्नों का नहल नहीं खड़ा किये होते या जो पत्नी को विवाह के पहिले जानते ही नहीं या जो विवाह को एक 'धानिक दृष्टि से देखते हैं और उसे कर्तव्य और गृहत्यधर्म पालन का एक आवश्यक अंग समझते हैं, या जिनका Courrship प्रेमालाप प्रेमियों की भांति विवाह के बाद आरंभ होता है, विवाह के बाद भी कुछ काल तक उसके मायामय स्वप्नों को बुबुद्र के समान पैदा होते देख सकते हैं और प्रसन्न रह सकते हैं। किन्तु अफसोस तुन्हारी गणना इन पीछे की श्रेणी के मनुष्यों में नहीं हो सकती थी।

पतियों को तीख [३५ गोपी ! बार बार मैंन तुम्हारी दूसरी प्रेमिका के तुम्हारे मित्र के साथ विवाह कर लेने पर विचार किया है। मैं यह सोचा करती थी कि क्या दूमरी ने भी तुमको उतनी ही पीड़ा पहुंचाई जितनी कि मैन, मैं तुन्दारे कष्ट के समय में, तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुमको सान्त्वना देना चाहती थी, किन्तु यह सब बहुत पुरानी बातें हैं । अस्तु । अगर पिछले वर्षों में अपने हृदय की समस्त कविता को तुमने देश-निकाला नहीं दे दिया है तो मुझको भय है कि अभी तन जीवन में कई बार इसी तरह से ठोकरें खानोगे । तुम निकन्नी बियों के प्रेम में अन्य होकर उनके आदर्श-देवी होने का स्वप्न देखा करोगे, तुम उनकी सहायता कर अपने बादशी की सिद्धि का स्वप्न देखा करोगे और आंख खुलने पर विधि को कोसोन। हम विगं वास्तव में पुन्पों की भाँति इन बातोंमें बहुत कम ठोकरें खाया करती हैं, मिर्फ इसी कारण से कि हम लोग पुन्धों को, प्रकृति, स्वाभाविक नान, पशुबुद्धि, तात्कालिक नान, सहज अन्तान या इसी तरह की बातों से जान लेती हैं, किन्तु इसके विपरीत पुन्य बी को अनुभव के बाद ही जानता है। प्राकृतिक बान की अपना अनुभव का नान अधिक समय चाहता है और कष्टकर है यह तुम भी मानोगे। यही वजह है कि नियों की राय पुन्यों के सम्बन्ध में उतनी अनुदार नहीं जितनी कि पुरषों की राय त्रियों के सम्बन्ध में है। हम लोग बिना विलम्ब के एक निकम्म, दीन, छली, कपटी पुरुष को पहि- चान लेती हैं और उससे फिर कोई सरोकार नहीं रखती, किन्तु पुत्र एक निकम्मी बी को अनुभव के बाद और उससे बुरी तरह से कष्ट पहुँचाये जाने पर ही पहिचान पाता है और तब उसका सहज वाल-वृदय चीत्कार कर कहने लगता है "स्त्रियाँ चंचल होती ३६ ] सुहागरात हैं, विश्वास के योग्गनहीं होती, अस्थिर होती हैं, अव्यवस्थित-चित्ता होती हैं और सभी स्त्रियाँ एक समान हैं। प्यारे गोपी । यह मर्दी का फैसला विलकुल गलत, अन्यायपूर्ण और वेबुनियाद है। अगर स्त्रियाँ, पुरुषों की माताएं, ऐसी होती तो आज पुरुपसमाज इस योग्य न होता कि जल,अग्नि और वायु पर भी वह अपना प्रभुत्व जमा सकता । प्रत्येक स्त्री अन्य स्त्रियों से ठीक उसी तरह से भिन्न होती है जैसे कि प्रत्येक पुरुष अन्य पुरुपो से भिन्न होता है किन्तु यह होते हुए भीसमस्त त्रियों में एक समानता होती है और वह यह है कि हम में से प्रत्येक, पुरुपो के श्रेष्ठ से श्रेष्ठ स्वप्नों की आदर्श और आराध्य देवी बनने की पूर्ण क्षमता रखती है। हम में से प्रत्येक किसी भी पुरुष के कल्पनातीत सुख- स्वप्नों को चरितार्थ करने वाली हो सकती है, केवल यदि पुरुष हम में विश्वास रक्खें और अपने सुख-स्वप्नों, आदर्शों और सिद्धान्तों को कल्पना के रुपहले, चमकते हुए सूत्रो से ग्रन्थित न कर, मानव- हृदय के अस्थिर, क्षीण, क्षणभंगुर, नाजुक, फ्रानी और निर्वल तन्तुओं से ग्रन्थित करें। गोपी! यह हम लोगों का अभाग्य है, कुसूर नहीं कि हमलोग तुम्हारे सदृश पुरुष के लिए भी सांसारिक तथ्य जीवन से इन्द्र सभा की कहानियां नहीं बना सकती। पांच हीवर्ष के वैवाहिक जीवन के वाद, पत्नी का चुम्बन करते हुए भी अगर पुरुष अपने हृदय के प्रत्येक स्पन्दन को सुनता रह सकता है और गिन सकता है और अगर अन्धकार में से अपनी पत्नी की आवाज सुन उसके पेट में दर्द होने लगता है तो इस सव के लिए विधि और सृष्टि के प्रवन्धको को ही उसे दोप देना चाहिये। इश्क, मोहव्वत, प्रेम, ठंढी-गर्म-सर्द आहे, हृदय की मीठी मीठी, दुखदायी, साथ ही रसीली, रसभरी, मनमुग्धकारी, मजा देती हुई पीड़ा और इसी तरह के अन्य घातक किन्तु मजेदार कष्ट वास्तव में वे उपाय हैं जिनसे प्रकृति पतियों को सीख [३७ अपने शिकार को बलिवेदी पर लाकर उपस्थित करती है, और यह सब करने के थोड़े दिनों ही बाद, उसकी आंखों से प्रेम के जादू का पर्दा उठा उससे कह देती है-"अब देखो तुम क्या हो और तुमने क्या किया है।" गोपी ! कुछ दिनों बाद सुन्दर से सुन्दर सर्वश्रेष्ट मुखड़ा आमाहीन हो जाता है। समय ने अगर उसकी श्री को नहीं हर लिया, जो कि असंभव है, तो भी हर घड़ी के सहवास के कारण उसकी विशेषताए लोप हो जाती हैं और वह साधारण दिखाई देने लगता है। प्रियतम की सर्वश्रेष्ठ हृदय की मृदुलता और आत्मा की मधुरता को लोग स्वाभाविक और प्राकृतिक समझने लगते हैं, उसकी भी विशेषता के लिए वे अपने को बड़भागी नहीं समझते और धीरे धीरे रक्त बिम्बावरों का चुम्बन, जो एक समय मे शरीर में विद्युत का संचार करता था, जो मधु नहीं अमृत मिश्रित या, जिस पर संसार, सर्वस्त्र और भविष्य सहज ही में वार दिया जा सकता था, झोका और नीरस मालूम होने लगता है। यह प्रकृति का ही एक नियम है कि इन्द्रियां निरन्तर के रसास्वदन से अपनी स्वादन-शक्ति खो देती हैं । तुम एक सुगन्यमय फूल को सूंघ सकते हो, किन्तु सूंघते सूंघते एक समय आ जाता है, जब उसका पास रहना भी सहन नहीं कर सकते, तुम उससे ऊबसे जाते हो । साथ ही बहुत से ऐसे इत्र हैं जो दूर से दूसरों के पास रहते हुए ही मस्तिष्क पर अधिकार कर सकते और मजा दे सकते हैं। संसार का यह एक बहुत ही दुःखदायी सत्य है जिसके सामने मानव मस्तिष्क को सर झुकाना पड़ता है, और मेरा यह विश्वास है कि आज भी प्रथम प्रथम इस सत्य के सामने सर झुकाने के लिए कहने वाले व्यक्ति को तुम माफ नहीं कर सकते। मैंने इस व्यक्ति के होने के लिए इसीलिए साहस नहीं किया।

.. .. ३८ सुहागरात नुको कुछ इसी तरह की बातों का सा भय रहता था। देखो यह एक पत्र का अंश है जो एक विवाहित मनुष्य ने अपने एक अविवाहित मित्र को लिखा था और वो मेरे हाय कहीं से लग गया था- 'कमी कभी मुमतो वोर्डिङ्ग के कमरे की याद आती है जब हम भी तुम्हारे पास होते थे, जब घूमने, फिरने, सैर सपाटे में एक वहार सी थी, जब जीवन एक मादक वन्तु के समान था और अधिकाधिक हम उसने मन्न और मत्त हो सकते थे। जब प्रत्येक की एक Challenge (चुनौती) के समान थी और उसके हदय पर अपना प्रभाव जमाने की इच्छा हदय को महोन्नन कर देती थी, जब उनसे बातें करने में और मस्तिष्क को सूक्ष्म नम गति के प्रदर्शन में एक आनन्द ला आता था। अब वो तृप्ति और सन्तोष की भावना ने मालूम पड़ता है, शरीर और नलिक के तीलेपन को ही नट कर दिया है। मुझे कोई कष्ट नहीं है, मुख ही है, नेरी इच्छाओं की पूर्ति, इसले पहिले कि में उनका ख्याल भी कर हो जाती हैं। फिर भी वह सुख नहीं है। एक अजीब Dullness (वासीनता, अम्पुर्दगी, काहिली, अशक्तता) ली बा गई है और एक घड़ी की भांति जीवन की घड़ियों को मैं गिना जा रहा हूं। तुम कब आ रहे हो ? तुमसे पुराने स्वतंत्रचिन्ता विहीन दिनों की बात कर वर्तमान या भविष्य में नहीं, भूत में स्नान कर कुछ समय के लिए फिर युवा और प्रसन्न होना चहता हूँ 'नामिनी अच्छी है, सुशीला और मिष्टमापिणी.भी है, प्रत्येक मिनट उसको हमारी कित रहती है, जिन्नुहोत्त, अजीब बात है, अब उसकी गों में हमें वह मुल नहीं मिलता जो उस समत्र मिला करता था, जब वह अविवाहिता थी और हमारी बी न थी। वह तो वही है, पहिले से नहीं अविक वह हमको प्रसन्न रखने की फिक .

" पतियों को सीख [ ३६ करती रहती है, किन्तु मालूम नहीं उसकी वह मादकता, अव उसमे क्यों नहीं है । गोपी ! तुमने उपर्युक्त पत्र को सावधानी से पढ़ा ? तुम्हारे साथ विवाह कर तुम्हारे हृदय में अपनी ओर से ऐसे भावों को उदित करना मेरे लिए असह्य होता, इसीलिए तुम्हारे हजार अच्छे होते हुए भी मैंने तुमसे विवाह करना स्वीकार नहीं किया। एक फ्रांसीसी लेखक ने विवाह की चर्चा करते हुए ferent "It is a sweet society of life, full of constancy, trust and infinite number of use ful and solid services and full of mutual obligations" "यह जीवन की सरस, सुमधुर संगत है, जो स्थिरता, दृढ़-भक्ति, परस्पर विश्वास, अगणित उपयोगी तथा सार्थक सेवाओं और पारस्परिक कर्तव्यो से परिपूर्ण है।" गोपी । कहां उपर्युक्त वाते और कहां युवा अवस्था के मद मे हम लोग तारे भरी रातो और दिलवर के शोक और मोहब्बत का स्वप्न देखा करते थे, हम लोग समझा करते थे कि जीवन की इन घड़ियों का शौक, लुत्फ और हमारा जोश कभी कम ही नहीं होगा। क्या तुम अव भी नहीं समझ सकते कि हमारे तुम्हारे लिए वैवाहिक सम्बन्ध कितना असम्भव था ! मैं अब तुम से विदा लेती हूं, जैसा कि मैंने पहिले कभी तुमको छोड़ा था, और विदा लेते समय इतना ही कहना चाहती हूं कि तुम प्रसन्न और सुखी रहो और तुम्हारे स्वप्न सदा नवजीवन का सचार करनेवाले हों। तुम्हारी- मनोरमा -

पति-पत्नी के झगड़े
मनोरमा-बास,
प्रयाग
१२-१२-१६१७
"Discord 25 likely to arise in marriage
zhen partners forget that offectiones
like a fire which needs frequent replenishing
at vithers in the cold blast of indifference and
neglect."
रसिक प्यारे,
लिफाफे पर मालूम नहीं कितने क्यों बाद मेरे अक्षर देख
तुमको आश्चर्य हुआ होगा, यह भी सम्भव है कि तुमने उनको
पहिचाना भी न हो, यद्यपि इस बात को मेरा हृदय मानने को
तबार नहीं कि जब एक समय में तुम मेरी ही आंखों मे देखत
थे, मर ही कानों से मुनते थे, मैं ही तुम्हारी नयन-ज्याति और
कौमुदी थी, मैं ही तुम्हारे जीवन की त्रास थी, तब तुम मुमको
इस प्रकार भूल मत हो कि मर अक्षरों को देख कर उनको
पहिचान भी न सको। खैर, लिखने का कारण यह है कि आज
प्रियन्त्रदा और उसके बच्चों को चायपानी के लिए बुलाया था।
बच्चे बच्चों में खेलने लग गए और पुरानी सखियां, बान में उसी

पतियों को सीख [४१ कदम्ब के नीचे, जिसके नीचे कभी हम तुम बैठा करते थे और जिसके नीचे नित्य बैठ कर और तुमसे बाते कर मै तुम्हारे प्रेम मे पागल सी होगई थी, और अपनी सुधबुध खो बैठी थी, वातो मे लीन होगई। वातो वातों में प्रियम्बदा ने तुम्हारा और तुम्हारी स्त्री का जिक्र किया। उसको क्या मालूम कि किसी जमाने में हम तुम क्या थे। तुम्हारा जिक्र होने से स्वभावत. मुझको उसमे दिलचस्पी होगई, मैंने खोद खोद कर सब पूछा और जाना । प्रियम्बदा वातो में लीन थी किन्तु मेरे सामने सहसा तुम्हारा वह चित्र नाच रहा था जब तुम कभी अत्यन्त दु.खी और कष्ट मे होने पर मेरे पास आकर नीरव वैठ गये थे और मैं तुम्हारे दुःख को दूर करने के लिए संसार की बहुमूल्य से बहुमूल्य वस्तु किसी भी मनुष्य को दे सकती थी जो तुम्हारे दुःख को दूर कर तुमको सुखी और सदा सुखी बना देता।अपनी प्रशंसा नहीं करती, अब तुम पर-पुरुष हो, किन्तु प्रियम्बदा की बातें सुन मेरी दशा फिर उसी दिन की सी हो गई थी। तुम दुःखी हो, यह सुन कर हृदय-तन्तु टूटने से लगे थे, ऐसा मालूम होता था मानो कोई गृद्ध हृदय पर बैठ कर अपनी चोंचों से मेरे हृदय की रक्त-नाड़ियों को खीच रहा है। अगर उस समय तुम मेरे पास या सामने होते तो पर नारी औरसचमानो सपने मे भी पर-पुरुष की इच्छा न रखने वाली होती हुई भी मैं तुमको प्रसन्न करने की उसी तरह से उतनी ही फिक्र करती जितनी कि मैंने कभी की थी या किसी जमाने में किया करती थी। आज पत्र लिखने का कारण भी यही हुआ है। तुम्हारी स्त्री निरुपमा नाखुश हो मायके चली गई है, गोद की लड़की उसके साथ है, वच्चा तुम्हारे पास Act मैं तुम्हारी प्रकृति सेभले प्रकार परिचित हूँ, मै जानती हूं कि तुम सोच रहे होगे कि अगर किसी को यह सव मालूम होने के ४२] सुहागरात पहिलं घरती फट गई होती और तुम उसमें सना गए होते तो अच्छा थ। मैं जानती हूं कि तुमने ऐसी कोई घटना न बटे इसके लिए प्रयत्न भी भरसक किया होगा, पर. भावी प्रवल। इस समय तुम अत्यन्त दुःखी होगे, तुम्हारी श्रादर्शवादिनी भावुन्ना और कोमल प्रकृति तुन्हारं दुःख के बोम को और भी असहनीय बना रही होगी, किन्तु सुन्नको विश्वास है कि तुम कोई बात, विना समझे यूझ, जल्दी में नहीं कर डालोग। तुम त्यागी, सहनशील और दूसरो के मुग्ध के लिए मुख ने दुःख सहन करनेवाले हो, तुन्दारी प्रकृति सरल है. तुम न्वन्न में भी किसी का अप्रिय नहीं चाहते और न किसी को कष्ट ही पहुंचना चाहते हो ऐसी दशा में मेरी समझ में नहीं आता कि तुमने क्या किया, कैंस मनभेद इतना बढ़ गया और यहाँ तक नौवन कैसे पहुंच गई । तुम जब- तक सारी बातों को न बतायो में अधिक नहीं जान सन्नी । प्रिय- न्यदान जो मालूम हुआ वह एक दृष्टि से पर्गन होता हुआ भी अर्गन है, फिर भी मैं तुमको जानती हूं, तुमसे अच्छी तरह से परिचित हूँ इसलिए मैं बहुत कुछ अनुमान कर सकती हूँ और श्राज इसी अनुमान के बन्न पर. पाने पुराने नाते से, तुम्हारे दुःख में दुखी होन को, साथ ही तुम्हारा उसले उद्धार कराने को यह पत्र लिल रही हूं। ग्यारे रमिक! इसके पहिले कि मै कुछ और ऋहूं में यह कह देना चाहती है कि तुम्हारा वैवाहिक जीवन फिर उसी आनन्द के माय प्रारंभ हो सकता है, और इस तरह से कि जो हुआ है उनी कमी जीवन में छायाभी द्रष्टिगोचर न हो और वर्तमान घटना दुखदायी न होकर, प्रेम-द्धिकर हो जाय और मदा के लिए तुम लोगों के जीवन में एक हंसने और मखाल करने की वान रह जाए । इस समय की मनोवृत्त में नुमको यह असम्भव प्रतीत होगा किन्तु मानव प्रकृति का मुमाको कुछ बान है, साथ ही पतियों को सीख [४३ मैं स्त्री हूँ और तुम पुरुषों की अपेक्षा अधिक व्यवहारिक हूँ और इसलिए इन वातो के सम्बन्ध में एक स्त्री की बात अधिक विश्वसनीय होनी चाहिए। सच मानो रसिक । "वड़ा मज़ा उस मिलाप का है जो सुलह होजाय जंग होकरण क्या हमारी तुम्हारी कभी लड़ाई नहीं हुई थी, क्या जब हम तुम मिला करते थे क्या हमने या तुमने अत्यन्त दुःखी हो कभी यह नहीं सोचा कि वस अव अन्त हो गया, असम्भव है और हम दो फिर एक नहीं हो सकते, हम लोग एक दूसरे के साथ सुखी नहीं हो सकते, दोनों की प्रकृति में, दोनों के आदर्शों में और दोनो की चित्तवृत्ति और स्वभाव मे बड़ा अन्तर है। और क्या यह सब होने के बाद, दो, चार, दस दिन एक दूसरे से दूर रह कर हम दोनो फिर एक नहीं हो गए और सब भूल कर ऐसे सुखी नहीं हुए जैसे कभी कोई अप्रिय वात कभी हुई ही नहीं थी। ठीक इसी तरह से तुम और निरुपमा फिर एक हो सकते हो और जो हुआ है उस पर जिन्दगी भर कहकहे लगा सकते हो, अगर तुम मेरी बातों को मानो और विश्वास कर मेरे उपायों से काम लो। मुममें तो तुम्हारा विश्वास होना चाहिए। तुम्हारे जीवन में ऐसी घटनाएँ घटेंगी, तुम जिस पर हजार जान से निसार रहो वह भी तुमसे असतुष्ट हो सकेगी, यह मेरा पहिले से ही अनुमान था और सच मानो इस विश्वास के कारण ही मैं तुमसे जीवन भरका सम्बन्ध करने को सहमत नहीं हुई थी। मेरे नाहीं करने पर तुम बहुत दुःखी हुए थे, तुम्हारे दुःख को मैं अनुभव करती थी, मैं भी उससे दुःखी थी, किन्तु यह सब होते हुए भी मैं तुमसे विवाह कर जो आज हुआ है वह देखना नहीं चाहती थी और न आज की निरूपमा की स्थिति में अपने को रखने का मैं आयोजन ही कर सकती थी।

सुहागरात ४४] बुरा न मानना, तुम समझ सकते हो कि तुम्हारे इस दुःख में चोट पहुँचाने की मेरी इच्छा कभी नहीं हो सकती, मैंने यह लिख दिया केवल इसलिए कि तुमको दिखला सकूँ कि तुम्हारे चरित्र में कौन सी एसी बातें हैं जिनसे जो हुआ उसका होना संभव था। मैं निन्पमा को अच्छी तरह से नहीं जानती, दो चार बार, इवर घर व्याह शादियों या महिला समिति की बैठकों में उसे देखा है, किन्तु मैं उससे कमी अधिक मिली जुली नहीं, एक तो इसलिए कि वह मुझसे अधिक खूबसूरत थी, लोग ऐसा कहते थे, उसे इसका बान था और इसे वह दिखाती भी थी, दूसरे वह अपने को हरसमय लिए दिए रहती थी साथ ही उन कुछ अपने धन का भी अमिमान था। अगर उससे सखी भाव होता और मरे हस्तक्षेप या दिलचसी लेन को वह अनधिकारचेष्टा और अनुचित न ममन्ती तो मैं प्रियम्बदा से सब बातें सुनने पर तुरन्त उसके पास जाती और उसे समन्द बुझ्च कर मना लेती और तुम्हार नजर कर देती, किन्तु यह सम्भव नहीं है, दूसरे मेरा ग्ख्याल यह भी है कि ऐन म्हाड़े पति पनियों में कमी होने नहीं चाहि और हो जाये तो आपस में ही तय होने चाहि । अगर पति और पत्नी तनिक भी अक्ल रखत होवो वानं इतनी बढ़नी ही नहीं चाहि, यूँ मतमंद और कमी मनमुटाव का हो जाना मन्मव ही नहीं, स्वाभाविक है, क्योंकि जो हो, है तो दो व्यक्ति, एक तो नहीं । निरुपमा मे मेरा कमी लेह न था, इसलिए नहीं, किन्तु मेरा व्याल है कि किसी भी स्थिति में जब तक वह ऐसी न हो जाय कि वह ला इलाज हो किमी बी को भी अपने पति की शरण दोड़ कर, उसके गृह से किसी दूसरी जगह हट कर नहीं जाना चाहिए, दूसरी जगह कितनी ही अपनी क्यों न हो, विशेष कर जब पति पत्नी ही साथ रहते हाँ नन्द, जेठानी या सासका मगड़ा न हो।

। पवनें को भीख [४५ खासी लड़ाई होजाने के बाद भी "वात्स्यायन" का उपदेश यही है कि पत्नी गृह के द्वार के बाहर पैर न निकाले । "अतिक दापि नुनद्वारदेशामृगे गच्छेन्शाएक लड़ाई का सीन वात्यायन ने इस प्रकार खींचा है-नत्र नुशः कलहा नंदितमायानः शिरोन्हाणाम्वनी- दनम् प्रहगनासनाच्छयनादा महयां पतनम् माल्यग्णावमोक्षी भूमी शख्या चातन्य वचननुत्तरेग योनयन्ती विवृद्धकांचा सकचाहम्त्या- त्यनुनमन्य पदेन याही शिनि वक्षति पृष्ठे वा नद्विविरम्हन्यान् । द्वारदेशम् गन्छेत् । तत्रापविश्याकरणमिनि । अविऋद्धानि तु न द्वारदेशागं गच्छेत् । दावच्यात् । इनि दचकः । तत्र युक्तितोऽनुनी- भगना प्रवादमाकांत । प्रसन्नानि तु सकायरेख वाक्यैरेनम् तुदर्ताव प्रननरविकांतिगी नायवेन परिरन्येत् । उपर्युक्त सभी बातों से मैं सहमत नहीं मैं द्वार देश तक जाने के भी खिलाश हूं, यह प्रेम की लड़ाई का श्य है और मेरी समझ * पत्नी अत्यन्त अविव क्लह बरे. वह दुरी तरह रोवे, वालों को न्दांत डान्त, सिर चानी आदि को हायों मे धुने, पृथ्वी पर सिर पटके अपने पावन या शया से (जिस पर बैठी हुई थी ) पृथ्वी पर गिर पड़े। माता मया आदि को दूर कि दे, तथा पृथ्वी पर लौट जाय । पन्नी और भी अधिक त्रुद्ध होकर पति की बातों का उत्तर देती हुई उसके बालों को पकड़ कर, नुम्न को ऊपर उठा कर पैर से उसके बाहुयी में, छाती में और शिर में एक बार, दो बार तीन बार मारे। घर ने निकलने की धमकी देती हुई द्वार तक चलीजाय । वहा बैठ कर अानू बहाए, किन्तु अच्छे कुल की श्री बहुत कुद्ध होने पर भी द्वार में गहर कमी न नाय, न्योकि यदि वह द्वार देश से बाहर जायगी तो लोग उनको व्यनिवारिणी' कहेंगे । दत्तक प्राचार्य का भी यही मत है। पति के युतिपूर्वक मनाने पर प्रसन्न होकर कड़े शब्द कहती हुई भी पति से प्रेम करने की इच्छा से बालिजन करने को तैयार हो जाय .....

४६ ] सुहागरात में द्वार देश का अर्थ शयन के कमरे का दरवाजा ही है। घर के दरवाजे पर जाना अनर्थ होगा क्योकि यदि पति भी क्रोधित हुआ और उसने अनुनय विनय कर बुलाने की फिक्र न की तो या तो माननी का मान भङ्ग होगा जो हानिकर है या उसे अपने मान की रक्षा के निमित्त ही घर से बाहर निकलना जरूरी जान पड़ेगा। द्वार देश पर बैठ कर रोने या चीत्कार करने के भी मैं विरुद्ध हूं। साथ ही पति की इस प्रकार पूजा की जाय या लड़ाई इस तरह की हो, इसे भी मै पसन्द नहीं करती। पति का हाथ पैर चलाना या पत्नी का दोनो ही हेय और बुरा है। ससार मे कोई पति पत्नी नहीं हो सकते और न कोई दो प्राणी ही हो सकते हैं, जो निरन्तर एक दूसरे से खुश ही रहें जिनमे भूल कर भी मतभेद या क्षणिक अनबन न हो । मतभेद, कमी की छेड़छाड़ तनिक अस्थायी अनवन, प्रेम की मोर्चा लगी या गोठिल तलवार को और पैनी और तेज कर देती है, वह कभी कभी तेल की बनी चीजो की भांति, शौक को बढ़ानेवाली, मजेदार, चरपरी, सुस्वादु और हितकर होती है। घी और तेल की तरह मेल और अनवन भी है, किन्तु जो हो, हमारा अपना ख्याल यह है कि पति-पत्नी के झगड़ो मे दवने वाला या यूं कहिये कि मेल के लिर पहिले हाथ बढ़ाने वाला सदा वाजी मारता है इससे मान मर्यादा मे वट्टा नहीं लगता और वे मूर्ख हैं, चाहे पुरुप हो या स्त्री, जो यह समझते हैं कि एक दो दिन मुँह फुलाये रहने से या एक दूसरे से न बोलने से, कोई लाभ होता है या पहिले, दूसरे के अनुनय विनय करने से पहिले न बोलने वाले का मान बढ़ जाता है। मेरा अपना अनुभव यह है और मैं तुमको विश्वास दिलाती हूं कि यह विलकुल ठीक है कि मेल के लिए अग्रसर होने वाले का मान दूसरे की नजर में फौरन बढ़ जाता है और जवान से कुछ पतियों को सीख [ ४७ कहे या नही उसका हृदय कृतज्ञता के भाव से भर जाता है । स्त्री अगर चतुर हो तो उसे सदा ऐसी स्थितियो मे अग्रसर होना चाहिए, क्योंकि इससे वह प्रियतम के हृदय पर शीघ्र अच्छा अधिकार जमा लेगीका स्त्री की भूल हो तो कोई बात ही नहीं, किन्तु अगर उसकी भूल तनिक भी न हो सरासर अन्याय पति का ही हो तब भो चतुर स्त्रा को मेल का हाथ बढ़ाना चाहिए और यह जानते हुए कि ग़लती उसकी नहीं है, यही दर्शाना चाहिये मानो ग़लती उसी ने की हो और उसके लिए वह दुःखी हो । पुरुप, अगर वह पुरुप है यह देख कर कि उसकी भूल पर भी पत्नी परदा डाल रही है और स्वयम् कुसूर अपने माथे ले रही है, पत्नी की इस पर्दापोशी से मन ही मन प्रसन्न होगा और पत्नी का आदर उसके हृदय मे बढ़ जायगा । किन्तु निरुपमा से मुझे कोई मतलब नही, न मैं उसे जानना चाहती हूँ और न उसे किसी तरह को सीख ही देना चाहती हूं, जिसमे उसके समान तुमको संसार में कोई स्त्री न दिखाई दे और मेरी स्मृति भी जाती रहे। मै तुमको ही बतलाना चाहती हूँ और इसलिए एक स्त्री पर अधिकार जमाने का एक सरल गुर तुमको बतलाये देती हूँ। स्त्री का कर्तव्य क्या है यह ऊपर ही कह चुकी, किन्तु यदि पुरुप चतुर हो, और उसमे रसि- कता की तनिक भी मात्रा हो तो ऐसे अवसरो से पुरुष को सदा लाभ उठाना चाहिए । सर्वथा दोपी स्त्री हो तव भी माफी और क्षमा पुरुष को ही मांगनी चाहिए, यह स्त्री का हक है, और मेल *किन्तु मनस्विनी को आत्माभिमान का भी सदा ख्याल रखना चाहिए। आत्माभिमान और स्त्रियोचित अधिकार और सत्वी की वातों में एक मनस्विनी स्त्री को सदा अकड़ी ही रहना चाहिए। -कृ० का०मा० मैं ४८] सुहागरात के लिए पुरुप को ही अग्रसर होना चाहिए। वात्स्यायन ने तो पत्नी को प्रसन्न करने के लिए पति को ऐसा भी उपदेश दिया है- "तत्र युक्तरूपेण साना पादपतेन वा प्रसन्नमनास्तामनुनय- न्नुक्रम्य शयनमारोहयेत् "1% हम लोगों में स्त्री की हकीकत क्या है, जैसी रहन सहन है, उसमें सच पूछा जाय, कहा चाहे जो जाय, तो वह पैर की जूती के समान है, पुरुप से रूठ कर वह कर ही क्या सकती है, अपनी टिकुली और टीके तक के लिए भी तो वह पति के आश्रित होती वह क्या मान कर सकती है, कितने दिन रूठी रह सकती है, कितने घंटे न वोल कर वह अपना गुजारा कर सकती है ? पुरुप, जिसमें रसिकता हो, जो स्त्री के हृदय में सदा आदर का स्थान चाहता हो, उसे सदा ध्यान में रखना चाहिए कि स्त्री को अपनी इस हीनदशा का ध्यान कभी न होने दे, उसके मान को कभी भग न होने दे, सदा उसकी नजरों में उसका मान बनाये रहे और भूल चाहे स्त्री की हो, किन्तु माफी मांगने के लिए खुद सदा अग्रसर रहे और सदा खुद ही क्षमा मांग कर उसे माना लिया करे, बाद में, कुछ समय के बाद, उसकी भूल उसको वता देना, वातों के मिस, विना झगड़े की वातों को सामने लाये हुए यह चतुर नायक का कर्तव्य है। 2 ऐसे समय में पति पत्नी को शान्तिप्रद शब्दों से समझावे और उसके रोने यादि को बन्द कराने के लिए उसके पाव में भी पड़े और उसे प्रसन्न कर पलन पर उठालाये। प्राचीन भारत में स्त्रियों के पास निनी सम्पत्ति स्त्री-धन, वृत्ति या शुल्क स्वत्व में हुया करती थी । इस सम्पत्ति पर नियो का ही एकमात्र अधिकार होता था, ठीक उसी तरह से जैसे कि टेन-मेहर आदि पर मुस्लिम त्रियों का अधिकार होता है !

पतियों को सीख [४६ मैं तुमसे स्त्री-हृदय का राज बतलाती हूं और वह यह है कि ऐसी बातो से वह बहुत जल्द अपना अधिकार अपने ऊपर से खो बैठती है । मेरे पंडितजी यही किया करते हैं । भूल मै करती हूं, कभी कभी तो जवर्दस्ती, अन्याय मेरा होता है, किन्तु मै क्या बतलाऊ किस किस तरह से वह मना लेते हैं, यही नहीं मालूम होता कि मैं उनके टुकड़ों से जीती हूँ', उनके टुकड़ों पर पड़ी हूं, यही मालूम होता है कि मैं कोई देवी हूँ और वह प्रगाढ़ भक्ति और स्नेह से प्रेरित भक्त । या कि मैं एक नासमझ वालिका हूं' और वह एक परम स्नेही समझदार मित्र । मैं नहीं कह सकती कि इन बातों से मैं कैसी उनकी सच्ची दासी हो गई है यद्यपि कहने के लिए वह मुझको ही मालकिन बनाये हुए हैं । वात यह है कि रसिकता इस बात की अपेक्षा करती है कि प्रियतमा को अपने आश्रित होने और हीनावस्था का ज्ञान न हो, वह अपने को सदा वरावर वाली ही समझती रहे या इसका उस पर फरेव रहे, उसे यह न मालूम हो कि वह बराबर वाली नहीं है और इसलिए उसे दवना पड़ता है, चाहे कुसूर उसका हो या नहीं । तुम नाम से तो रसिक हो, पर क्या तुममें इतनी रसिकता नहीं कि सूक्ष्म में जो कुछ मैंने कहा है, रसिकहृदय से उसका विस्तार कर उसके चमत्कार और महत्व को देखो और फिर उसकी चांदनी मे अपनी निरुपमा की मूर्ति की कल्पना करो ? सच कहो कितना सुखमय जीवन हो सकता है ? पतिपत्नी की दृष्टि से ही नहीं, वालवच्चों और संसार की दृष्टि से भी ऐसे झगड़े दोनों के सिवाय तीसरे को नहीं मालूम होने चाहिए। पति-पत्नी के मगड़े की अवधि एक रात्रि होनी चाहिए या एक रात्रि और एक दिन, और वह भी उतनी ही देर के लिए जब तक कि पत्नी पति के कमरे से निकल कर दूसरों के सामने नहीं जाती। कमरे से निकलने के पहिले ही मेल हो जाना चाहिए, ४ ५० ] सुहागरात चाहे वह मेल सोने के पहिले हो या सुबह के पहिले हो, यदि कोई न सोये, तात्पर्य यह है कि पतिपत्नी में मतभेद की बात न बच्चों को मालूम होनी चाहिए, न घर वाले बड़े छोटों को और न नौकरों और नौकरानियों को अच्छी बात तो यह है कि मत- भेट होने पर या बहुत नाराजी होने पर भी सत्याग्रह किया जाय किन्तु जवान से एक भी कड़वा या बेजा शब्द न निकले और पत्नी की मर्यादा का और इसका कि वह अपनी स्त्री है, अपने बच्चों की माता है, कुटुम्ब को अधिष्ठात्री देवी और दास दासियों की मालकिन है, प्रत्येक क्षण लिहाज रखा जाय । न बोलना, अन- मना हो बैठजाना, न सोना या भोजन न करना, स्वयं कष्ट उठाना, यही दूसरे को, अगर उसमे शिक्षा, शिष्टता और भलमनसाहत है, रास्ते पर लाने के लिए काफी है। एक दिन की अपनी बात तुमको सुनाती हूं। कुछ दिनो से मैं नित्य ही पडितजी से लड़ा करती थी। वात यह थी कि वह मुझको तनिक भी समय नहीं दिया करते थे। सुबह उठे, वाहर गये, नित्य क्रिया से फारिग हो, स्नानादि कर दफ्तर में बैठ, मुअक्किलों से वातें की, दस बजा, कचहरी भागे, शाम को आये, फिर मुत्र- विकलों ने आ घेरा या दोस्त आ गये, गप-शप होने लगी, भीतर मेरे पास पहुचने तक की नौवत ही नहीं आई । रात्रि हुई, फिर मुअक्किल या दोस्त डट गये, खाने का वक्त हुआ, दोस्त हुए, थालिया बाहर उनके कमरे मे गई, अगर मुअक्किल हुए तो भीतर कमरे मे आये, मुझको भी दर्शनों का और पांच मिनट बाते करने का सौभाग्य मिला । व्यालू कर, फिर दफ्तर में चले गये, मुत्र- क्किल सर खा रहे हैं, कागजात दिमाग चाट रहे हैं या दोस्त वैठे हैं, कही लेक्चर और मिटिंग का प्रवन्ध हो रहा है और मैं अपने कमरे में बैठी बैठी सड़ रही हूं, अगर कोई महत्वपूर्ण मुकदमा दूसरे दिन जाते ही कचहरी मे हुआ तो पंडितजी मुकदमे पतियों को सीख [५१ की तैयारी में लीन ग्यारह बजे तशरीफ कमरे में लाते हैं और मैं छत की कड़ियां गिन रही हूँ या आस्मान के तारे । मुझे कालिज की परीक्षा तो देनी नहीं, न मुकदमा ही तैयार करना है कि पढ़ने ही में अधिकतर समय लग जाया करे। अब पंडितजी ग्यारह बजे जव थके मांदे आये तो फिर मुझे वतदेने की उनको ताव कहां? वह तोगुल- गुले गहे और तकिये चाहते और चाहते निद्रादेवी का आलिङ्गन । आते ही वोलते, अभी आप जग ही रही हैं, मेरा जागरण भी खल जाता, वातें करना और उस वक्तमुझको वक्त देना एकवला ही दिखाई देती। मेरी इच्छा यह होती थी कि अब चौबीस घंटे वाद मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, कुछ मुझसे भी बातें करे, मेरी दुःख दर्द कथा पूछे, मुझसे हँसे वोलें, मुझको सेवा करने का अवसर दें, मुझको भी प्रसन्न करने की चेष्टा करें, वहां इसकी फुर्सत कहां, आते ही पलङ्ग और सभाओं तथा मुकदमों के स्वप्न में लीन हो जाना । मुझको यह बहुत खलता था, मैं यह सोचा करती थी कि दुनिया की दौलत और वैभव लेकर मैं क्या करूंगी, अगर मेय पति ही मेरा पति नहीं है। दिन भर मैं उनके आराम की फिक्र करती, समय से भोजन तैयार हो जाय, चाय पानी का प्रवन्ध रहे, जरी वरावर उनको किसी बात की तकलीफ न हो, उनकी शान, आन वान में नाम को भी धक्का न लगे । उनके दोस्त आवें, उनकी खातिर का भी पूरा प्रबन्ध रहे । घर और गृहस्थी की झंझट का उनको पता भी न लगे, घर साफ सुथरा रहे, कहीं गर्द गुवारन हो, मक्खियों का नाम ही न हो, नौकरों को भी ठीक वक्त से खाना मिल जाय, सब खुश रहे, जिसमें हजार जवान से पंडितजी की चारो ओर प्रशंसा ही होती रहे और इन तमाम झमटों और कोशिशों का पुरष्कार यह कि मुझसे ही एक मिनट वातें न की जायं, मेरी खुशी का प्रवन्ध और प्रयत्न न किया जाय, मैं एक आत्मा और हृदयहीन गुड़िया जिसको प्रचुर धन, वसन ५२] सुहागरात और गहनों को केवल जरूरत है, समझ ली जाऊ । इन्ही वातो के लिए मै जब पडितनी पलङ्ग पर लेट, आखें बन्द करना चाहते मैं झगड़ा करती। धीरे धीरे यह झगडा इतना बढ़ा कि एक दो दिन उनको रात्रि भर मैने सोने ही नहीं दिया, दूसरे दिन कच- हरी में दिन खराव रहा, और मुअक्किलो के माथे गई । पडितजी के पक्ष की बातो को मैं समझती थी, मैं उनकी असमर्थता को अनुभव करती थी, मैं यह जानती थी कि हृदय मे वह मुझसे प्रेम करते हैं, संसार में मैं ही एक स्त्री उनके लिए हू, मैं जानती थी कि मेरे झगडने से उनको कष्ट बहुत होता है, मैं उसको अनुभव भी करती थी, मैं हृदय से इन सब बातों के लिए दुखी भी होती थी, किन्तु मेरे सामने प्रश्न पति और पति प्रेम का था। यही नहीं, मैं यह भी सोचती थी कि अगर इसी तरह से धीरे धीरे वह मेरी ओर से उदासीन हो गये तो मेरा जीवन, प्रियतमा का जीवन, तो नष्ट हो ही जायगा, किन्तु इसके साथ ही साथ पडितजी के चरित्र की बहुतसी खूविया लुप्त हो जायेंगी और उनके श्रात्मा के सुन्दर विकास में भी कमी झलकने लगेगी, यद्यपि मुझको यह स्वीकार करने मे लज्जा नही है कि परमार्थ को अपेक्षा अधिकतर मैं स्वार्थ से ही प्रेरित थी। मैं यह सोचा करती थी कि मुझको जीवन मे मिला क्या ? पति का मत्त करने वाला प्रेम नही, वयस्क, स्नेही, सच्चे शुभचिन्तक के दयामय स्नेह का साम्राज्य और धन, जन और गहनों का राज्य । खैर मैं इन बातो को तूल नहीं देना चाहती । सूक्ष्म मे यह कहना चाहती हूं कि मैंने त्रिया- चरित्र की शरण ली। मैंने यह करना शुरू किया कि जब वह पलङ्ग पर आकर लेटते तव भी मैं फर्श पर ही बैठी रह जाती। यह मैं बतला देना चाहती है कि हम लोग एक ही पलग पर सोते है। दुनिया के विद्वान् इसे स्वास्थ्य के लिए हानिकर कहते हैं और सर्वथा ठीक भी है, पति और पत्नी जो सदा सुखी और पतियों को सीख [ ५३ स्वस्थ रहना चाहते हों उनको सदा अलग ही सोना चाहिए, विशेपज्ञों की राय मे दो कमरे तक जरूरी है, किन्तु मैंने इसे रखा कभी नहीं रखा । खैर तो, किस्सा यह कि मैं फर्श ही पर बैठी रह जाती । लेहवश, दया के नाम पर, मनुष्य होने की हैसियत से, इनसानियत के तकाजे वे भी पलङ्ग से नीचे आजाते और मुझको मनाने और खुश करने की चेष्टा करते और इस तरह से घन्टे आध धन्टे मुझसे बातें करते, मुझको प्रसन्न करते और मेरी आत्मा की पिपासा शान्त हो जाती। फिर भी मुझको इन बातों मे पूर्ण प्रसन्नता न होती, क्योकि मै देख सकती थी कि जो कुछ वह करते थे वह प्रेम के हृदय से प्रेरित न था, वह था सब सभ्यता के नाम पर, मेरे स्त्री होने के नाम पर, अपनी शिक्षा और शिष्टता के नाम पर, एक स्नेही मनुष्य के कृपा की पात्र ललना के प्रति कर्तव्य के नाम पर, और गृह की देवी को किसी तरह का कष्ट न हो इस भावना के नाम पर । एक दो वार, मेरे प्रसन्न न होने पर, वह भी फर्श पर ही खीज कर, दुःखी होकर और थककर पड़जाते और उनकी इस वेदना को सहन न कर सकने के कारण मैं शान्त हो जाती, तकिया वगैरह लगा देती, रोने लगती, पैर दवाने लगती और फिर प्रसन्न होकर हम लोग उठकर पलङ्ग पर चले जाते। यहां पर इतना और बतला देना चाहती हूं, कि पंडितजी कभी यह सहन नहीं कर सकते कि मैं उनके पैर छूझ या दवाऊ, उनकी राय मे स्त्रियो से ऐसी सेवा लेना ठीक नहीं जब तक कि एक पुरुष भी, पति नहीं, प्रेमी की हैसियत से अपनी पत्नी के पैर दबाने को तैयार न हो। खैर, इस तरह मतभेद बढ़ता ही रहा, वह दिन मर के थके मांदे आते और सोना ही उनको सूझता, मैं उनसे बाते करना चाहती। एक रात्रि में मैं रूठी, उन्होंने मनाने की कोशिश की, वारह बज गए थे, मुकहमों के काग़ज देख कर आये थे, वहुत थके थे, मिजाज भी । .

५४ ] सुहागरात शायद कुछ बरहम था, कुछ देर उन्होंने समझाने मनाने की कोशिश की, पलङ्ग से उतर कर आये, पास बैठे, थोड़ी देर घंठे भी रहे और अन्त में मेरे किसी तरह से सन्तुष्ट न होने पर वे उस दिन फर्श पर लेटे या बैठे नहीं, खीज कर सीधे पलङ्ग पर चले गए और दो ही मिनट मे सो गये। मैं उस रात्रि में बहुत रोई, मुमको बड़ी वेदना हुई, आंसू मेरे थमते ही नहीं थे, में उनके चरणों के पास पलङ्ग के नीचे बैठ कर रोती रही, पैर भी दवाये किन्तु वह ऐसे सो गये थे कि उनकी नींद न खुली। जितने ही सुख से वह सो रहे थे, उतने ही दुःख से मैं रो रही थी। रात्रि भर मैंने इसी तरह से विताई, सुबह उनके जाने से पहिले ही मैं कमरे के बाहर हो स्नानादि की फिक्र में लग गई। रोज उठने पर हम लोग दस बीस मिनट, आधे घंटे तक कभी कभी, वातें करते थे, और कमरे के बाहर होने के पहिले पंडितजी नित्य नेम के तौर पर मुझको प्यार कर ही वाहर जाते थे। लोग इस साधारण सी वात के महत्व को नहीं जानते, किन्तु वैवाहिक- जीवन को सुखमय और चमत्कारपूर्ण बनाये रखने की यह कीमिया है। दिन प्यार और चुम्बन से प्रारंभ करना और दिन को प्यार और चुम्बन (सोने के पहिले) से समाप्त करना और एक दूसरे को सुला कर सोना । जो दस्पति इस सरल से नियम की अवहेलना नहीं करते वे सदा सुखी रहेंगे। मैं जानतीहू कितने ही दम्पतियों का जीवन विपमय हो गया केवल इस कारण से कि पति देवता सो गये और पत्नी छत की धनियां गिन रही है और उसकी आंखो में निद्रा नहीं है। पति को जो नायक हो और चतुर हो सदा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि प्रियतमा को भी नीद आगई वात में कुछ रहस्य है, मैं इसे खोल कर कह भी नहीं सकती और यह विषयान्तर भी है, इससे इसे यहीं समाप्त कर पतियों को सीख [५५ देती हूँ। हॉ, तो सर्वर ही उठ मैं कमरे से निकल स्नान ध्यान और गृह के प्रबन्ध मे लग गई, पंडितजी उठे और दिन चढ़ा देख, जल्दी जल्दी अपने गुसुलखाने में चले गये और फिर दफ्तर में मुअकिलों की सुनने लगे। पंडित जी को मेरा ख्याल न आया, उन्होंने रात्रि में मेरी फिक्र न की, सुवह उठने पर भी उन्होंने मेरी याद न की, यह भी न सोचा कि सोई या नहीं सोई, इस तरह वेसुध सोये कि इसका भी ज्ञान न रहा कि मैं पलङ्ग पर हूँ या नहीं ? इस सब से मेरा दुःख और भी बढ़ गया। दास दासियों के सामने मैं कहती और करती क्या, किन्तु मेरे आंसू थमते नहीं थे और उनको छिपाने के लिए मैं वार वार अपने कमरे से भाग जाती थी। किस्मत की मार से उस दिन यह भी हो गया कि पंडितजी के एक वकील दोस्त किसी मशविरे के लिए आगये, कचहरी उनको भी जल्दी पहुंचना था और इसका नतीजा यह हुआ कि पंडितजी ने झटपट तैयार हो खाना वाहर ही मंगा भेजा। रोज खाने के समय दो चार वातें हो जाती थीं, वह भी न हो सकी, वे कुछ रात्रि की वाते कहते, कुछ सान्त्वना मिलती, और मैं प्रसन्न हो जाती सो भी न हो सका । पंडितजी कचहरी गये और मुझ पर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा। मैं अपने को सम्हाल न सकी धड़ाम से जाकर पलङ्ग पर गिर गई, जितना रो सकती थी रोई। दासियां जो खाने के लिए बुलाने आई, मेरी दशा देख अवाक रह गई, मैंने यही कह दिया पेट में बहुत दर्द है खाना नहीं खाऊंगी। दिन भर मैं कमरे के वाहर नहीं निकली, चार बजे के समय बड़ी उत्सुकता से नीचे गई, चाय पानी का प्रबन्ध करने लगी, सोच रही थी अब आते होंगे, चरणों में सिर दे खूब रोऊंगी, क्षमा मांगूंगी किन्तु विधाता वाम था, कचहरी से गाड़ी खाली आई, पंडितजी उधर ही से अपने ५६ ] मुहागरात एक आदरास्पद वकील मित्र के यहा किसी जसरी मशविरे के लिए चले गये थे। काटो तो खून नहीं, खबर सुन मै सन्न रह गई, क्या करती। पडितजी उस दिन नव बजे रात्रि को आये, और खाना खाकर पाये। पंडितजी सहसा कभी कहीं खाना नहीं खाया करते थे, उनको कहीं खाना खाने में कष्ट होता था, कही दावत होने पर दोचार दिन उनको इसी की चिन्ता रहती थी कि यह क्या है, न जाना पड़े तो अच्छा, किन्तु आज जिस मित्र के यहां गये थे, वह बड़े थे, और पडितजी उनको आदर की दृष्टि से देखते थे। उनके कहने पर नाही कैसे करते, संकोच भी बहुत, दूसरे वह व्यलू आठ बजे करते थे, पानी पड़े या पत्थर, व्याह हो, शादी हो कुछ हो, वक्त में फर्क नहीं पड़ताथा ।वह समझे भी नहीं थे कि इतनी देर मित्र के यहा हो जायगी और इसलिए उन्होंने कुछ कहलाया भी न था। मैं इन बातों को क्या जानती थी, मैं यही सोच रही थी कि रात्रि को अवहेलना की, सुवह को याद नहीं किया, कचहरी के वक्त भोजन वाहर गया, जाते वक्त भीतर भी नहीं आये, चाय वाहर पी, और खाना भी वाहर खा आये और फिर मुकदमे के कागज हैं और वह हैं। मेरी व्यथा और भी बढ़ गई और मैंने महारालिन से कह दिया कि मै खाना नहीं खाऊंगी, तुम लोग खाना खा लो और नौकरों को भी दिलवा दो, मेरी तबियत अच्छी नहीं है, मैं सोन जाती हूँ। यह कह मैं ऊपर चली गई। दिन भर की भूखी, पैट अपनी ओर चीत्कार मचा रहा था, हृदय के दुर्द से आमू दूसरी ओर भादा की वर्षा की झड़ी लगा रहे थे, मैं फर्श पर एक किनारे पड़ गई। उत रात्रि में पठितजी जल्दी ही अपर आये, कारण यह था कि नौकरी की आंख से कुछ छिपाना कठिन ही नहीं अस- म्भव है, वे कुछ जान तो सके नहीं थे, किन्तु उनको कुछ शक पतियों को सीख [५७ होगया था। इसी कारण से पडितजी जिस समय दफ्तर से उठकर किसी काम से भीतर कमरे मे गये तो उनके नौकर ने जो बहुत पुराना नौकर भी है, उनसे कहा कि आज वहूजी की तवियत कुछ खराव है, उन्होने सुवह भी खाना नहीं खाया, चाय भी नहीं पी, और इस वक्त भी विना भोजन किये हुए ही ऊपर चली गई हैं । यह सब पंडितजी से हमको वाद मे मालूम हुआ । यह सुनते ही पंडितजी मुकदमे की फाइल को अलग रख, तुरन्त ऊपर आगये । उनको सब बाते रात की याद आगई और कमरे मे फर्श पर एक कोने मुझे पड़ा देख वे तुरन्त ही मेरे पास चले आये। उनके पास वैठते ही मेरी आंखों से सावन भादों की झड़ी लग गई और आंसुओ की धारा और भी वेग से वहने लगी। फिर तो उन्होंने बहुत अनुनय विनय की, यहां तक कि मेरे पैरों पर उन्होने अपना सर रख दिया और एक अपराधी की भांति रोने से लगे। मै क्या करती, मेरा समस्त क्रोध काफूर होगया । मुझको ही उनको शान्त करने की फिक्र हो गई। "वात्स्यायन" ने कहा ही है - "ब्रीडायुक्तापि योपिदत्यन्त द्धापि न पादपतनमतिवर्तते"* मर्द के पैर पर सर रख देने से एक अच्छी स्त्री का क्रोध, "Women, though in extreme anger would not disregard their lover falling at their feet This is common experience, says Vatsyan" 'लज्जानिमग्नहृदया यदि वा रुष्टा महापराधेन तां विक्रामति सुमुखी चरणनिपतनं क्षणं यून' लजाशीला मानवती स्त्री कितनी रुष्ट क्यों न हो, क्षणमात्र के लिए यदि नायक उसके पैरों पर अपना सर नत कर दे तो वह शान्त और प्रसन्न हो जाती है। कृ. का. मा० ५८] सुहागरात वह कैसा ही क्यों न हो, शान्त होजाता है मैं लज्जासे नत, गदगद हो उनके पैरों पर सर रख उनसे क्षमा मांगने लगी, फिर तो एक प्रेमी की भांति ही उन्होंने मनाया, खाना तो मंगा नहीं सकते थे, नौकरों को क्या ख्याल होता, मगर जो कुछ वहां सामान था, दूध, मलाई, मिठाई, उसे उन्होंने जबर्दस्ती हंसा हंसा कर मुंह में खिलाया और मैं बड़ी प्रसन्न हो गई । देखा जाय तो ज्यादती मेरी थी, न्यायोचित होते हुए भी मेरी मांग उनकी स्थिति को देखते हुए अन्यायपूर्ण थी, किन्तु उनकी बातों मे यही मालूम हुआ मानो सारा कुसूर उनका ही था और उन्होंने इस तरह से मुझे प्रसन्न किया मानो अनवन एक मिनट के लिए भी उनसे हुई ही नहीं थी। तात्पर्य यह है कि पति-पत्नी के झगड़ो और मतभेदों का शीघ्र मे शीघ्र फैसला हो जाना चाहिए, इसमे देर करना, गांठ पड़ने देना या कुदूरत बढ़ने देना ठीक नहीं हुआ करता । दूसरी बात यह भी है कि पत्नी कितनी ही अप्रसन्न क्यों न हो, गुस्से में उसने चाहे कुछ भी कहा या किया क्यों न हो, स्त्री होने के कारण वह व्यवहारिक होती है, कुछ ही समय में वह स्थिति को साफ देखने लगती है और क्रोध शांत होते ही वह मन ही मन पछताती है, किन्तु फिर वश उसका या किसी का भी कुछ नहीं रहता। हृदय से पछतावा ईश्वर की दृष्टि में किसी भी प्राणधारी को वड़े से बड़े पाप के दण्ड से मुक्त कर देता है, ऐसी दशा मे चतुर नायक का कर्तव्यं यह है कि स्त्री का रह और भी पतन न होने दे, उसे विवश होकर हाथ जोड़ क्षमा मांगने को अवसर न दे, और उसे सयम् ही मना ले । उसके पतन से, उमके यह समझने से कि वह कुछ नहीं है, पापोश है, मखमार कर पति की इच्छा के अनुसार उमे चलना ही होगा, उसके आत्मसम्मान और आत्माभिमान में कमी आती है और इसका असर दिन दिन नायक के मुख पर पड़ता है।

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पतियों को सीख
[५६
निरुपमा अपनी माँ के पास चली गई है, उसने यह भद्दी भूल
की है, किन्तु वह सदा की अभिमानिनी है और फिर अभी छोकरी
ही है। वह सुवह ही गई है, देर काफी होगई है, फिर जो
हो गया सो हो गया अब देर उचित नहीं, तुम इस पत्र को पाते
ही उसके पास जाओ और उसे सादर लिवा लाओ। जाकर
रसिक-हृदय से, एक रसिक की भाषा मे ही उससे कहो-
"कता कीजे न ताल्लुक हमसे
कुछ न सही तो अदावत ही सही"
कहो.-
"तुमको पाता है प्यार पर गुस्सा
मुझको गुस्से पै प्यार पाता है"
"घर तो तुम्हारा है, हमारा नही, गृहिणी से ही घर होता है
तुमही गृह की देवी हो, तुमसे ही और तुम्हारे लिए ही घर होता
है, पुरुप तो जंगल मे पेड़ के नीचे भी पड़ा रह सकता है। स्त्री के
लिए घर की जरूरत है और घर इसलिए उसी का है। तुम चलो
अपने घर मे रहो, वह तुम्हारा ही है, अगर हमारा उसमे रहना
तुमको कष्ठकर हो तो हमको हुक्म देना हम ही उसे छोड़कर
अन्यत्र रहेगे, किन्तु तुमतो चलकर उसमे रहो ही।"
उसको मान करने का हक है, उसका मान तुम्हारे ही भरोसे
है, और फिर तुमसे न करे तो क्या किसी गैर से वह मान
करेगी?
आचार्यों ने कहा भी है-
"स्वस्य प्रीतौ हेतुर्मान निदानम् च मानशीलानाम्"*
"कन्दर्पचूड़ामणि"
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* मानीजन जिनसे प्रसन्न होते हैं, जिन से उनको प्रेम होता है
उन से ही उनको मान भी होता है । कृ० का. मा०

६०] सुहागरात . मेरी प्रार्थना सुन और कम से कम अपने से अधिक सांला- रिक बातो मे मुझको चतुर समझ तुम विना तनिक भी सोचे हुए, जैसे बैठे हो, वैसे ही उठकर उसके पास जाओ और उसे लिवा लाओ। विश्वास रखो अगर स्त्री है, मानवी है, दानवी या राक्षसी नहीं तो वहां वह कोई झगड़ा नहीं करेगी, और हंसते हुए तुम्हारे साथ सम्मानपूर्वक चली आयेगी। रात्रि अधिक हो गई है, पंडितजी बार बार करवट बदलते पूछ रहे हैं, आज क्रिसका जन्म- पत्र तैयार हो रहा है , अब मैं सोने जाती हूं, सुबह होते ही मेरा आदमी यह पत्र तुम्हारे पास पहुंचा देगा । कल ही नहीं, परमों या नरसों दूसरा पत्र तुमको इसी सम्बन्ध में फिर लिखूगी तब तुमको बतलाऊगी कि तुम्हारे में क्या त्रुटियां हैं, जिनके कारण एसी घटनाओं का घटना सभव हुआ। बस अब नमस्कार, निरुपमा को कल खुद जाकर पहिले लिवा लाना, इसमें भूल न हो, नहीं तो फिर तुमको कभी कुछ नहीं लिखूगी। तुम्हारी- मनोरमा झगड़ों को अन्त करने की कला मनोरमा बास, प्रयाग १४-१२-१९१७ It has been said that man is the only anzmal that shows violence to the opposite sex, प्यारे रसिकलाल, मैं यह जानने को बहुत उत्सुक थी कि तुमने क्या किया, मेरी प्रार्थना और सलाह पर तुमने ध्यान दिया या नहीं, क्योकि आजकल ( Advice Gratis) मुफ्त में मिलने वाली सलाह की कोई वकत नहीं हुआ करती । तुमने मेरे पत्र का कोई जवाब नहीं दिया था फिर भी मैं पता ले रही थी और मेरे पत्र मिलने के थोड़ी देर बाद ही तुम स्वयम् जाकर आदर पूर्वक निरु- पमा को ले आये, यह सुनकर मुझको बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं तुमको तुम्हारे इस कर्तव्य-पालन पर वधाई देती है। इससे जो सुफल फलेंगे और उनका जो सुस्वाद होगा उसका आनन्द तुम्ही भोगोगे, मन ही मन कदाचित् तुम मुझको धन्यवाद भी दो, किन्तु जिसे तुमसे अधिक इस मेल से आनन्द हो और जिसके धन्यवाद की वास्तव में मैं पात्री हूँ उसको इसका पता भी न होगा कि उसके महद् आनन्द का कारण मैं हूँ। तुम भी भूल कर मेरे पत्र का जिक्र निरुपमा से न करना, उसे या किसी स्त्री ६२] গুনিয়র को भी यह जानकर, कि किसी स्त्री की सलाह से तुम उसे बुलाने गये, प्रसन्नता न होगी, यही नहीं इससे उसे कष्ट होगा और यह भी असम्भव नहीं कि वह मुझसे बुरा मानने लगे केवल इस कारण से कि उसके जाने का हाल मुझे मालूम हो गया और मेरे कहने से तुम उसे लिवा लाये । सिवाय इसके उस पर यही असर रहना कि तुम ही अपनी खुशी से, प्रेमवश उस माननी को बुलाने गये, तुम्हारे और उसके वैवाहिक जीवन के लिए श्रेयस्कर है। लोग कहते हैं कि पति पत्नी में कोई पर्दा न होना चाहिए, दोनों एक दूसरे के लिए आइने के समान होने चाहिएं, फरेव और झूठ का भूलकर भी दोनों के बीच व्यवहार नहीं होना चाहिए, किन्तु मैं तुमसे कहती हूं कि यह कोरे पंडितो और ज्ञानशून्य अव्यावहारिक लोगो की बातें हैं। मैंने तुम्हारे संबन्ध की बातें लिखने का वादा किया था, तुमने मेरी सलाह मानी और अपने वादे के अनुसार मैं यह पत्र लिखने बैठी हूँ इसलिए अन्य बातों का इसमे समावेश नहीं करना चाहती, फिर भी इतना कह देना चाहती हूं कि पतिपत्नी के लिए चाहे किसी तरह का पर्दा जरूरी न हो, किन्तु प्रेमी और प्रियतमा, नायक और नायिका के सुख- मय जीवन के लिए यह नितान्त आवश्यक है। केवल पर्दा हो नहीं, कभी कभी फरेब भी, हां, फरेब या झूठ इस तरह का नहीं होना चाहिए कि उससे किसी को ऐसा धोखा दिया जाय, जिससे तनिक भी उमे शारीरिक या मानसिक क्षति पहुंचने की संभावना हो । फरेव और झूठ धोखा देने या किसी तरह की हानि पहुंचाने के लिए नहीं, वरन् प्रेम के मेघ को और भी सवन करने के लिए ही होना चाहिए और उसी अर्थ मे, और उसी अर्थ का होना चाहिए जिस अर्थ में "अक्रवर" साहव ने कह रखा है :- "हूँ फरेवे सितमे यार का कायल अकबर, मरते मरते न खुला यह कि जफ़ा होती है।

३ पतियों को सीख [६३ फरेव की व्याख्या धोखेके बजाय जादू करली जाय तोअच्छा। खैर, अपनी बातें सुनो, उन पर गौर करो, मैं माफ साफ कन्गी, बुरा न मानना, क्योकि तुम जानते हो उद्देश्य तुम्हारी भलाई है न कि बुगई। तुमको याद है प्रथम बार तुम मुझमे कहां और कैसे मिले ये ? संभव तो नहीं कि ऐसी बातें कोई भूल सके किन्तु तुम इतने मुवमुलने लापरवाह और सदा स्वप्न देखने में लीन रहने वाले हो कि तुम्हारा भूल जाना असम्भव भी नहीं। मेरी राय तुम्हार सन्बन्ध में क्या है, इसे तुमको पहिले ही सुना देना चाहती हूँ, तुम स्वयं देख लो कि तुम क्या हो । सम्भव है जो बातें मैं कहूगी तुम्हारे दिमाग में भी कभी न आई हो, क्योंकि यह हम सब लोगों का अभाग्य है कि हम लोग भूलकर भी अपने सन्बन्ध में न्ययं विचार नहीं करते। "अपने को जानों का हम लोगों ने पाठ ही नहीं पढ़ा। हम लोग कभी अपने को उलट पुलट कर, भीतर बाहर, नहीं देखते, दूसरों के सम्बन्ध में जिस बारीकी से विचार करते हैं वैसे ही या उसी ढंग से अपने को हम कभी तराजू पर नहीं तौलते। इसके कहने की तो कोई जनरत ही नहीं कि अपने सम्बन्ध में हम सत्र की कसौटी बहुत ही उदार होती है । रसिक ! तुम एक बहुत ही सीब, बड़े अच्छे हृदय के, उदार, अच्छी भावनाओं वाले मनुष्य हो । संसार में तुम किसी का भी बुरा नहीं चाहते, यही नहीं कष्ट सहन कर भी अगर तुम किसी का भी भला कर सकते हो तो बिना विचार, पशोपेश या तान्मुल के तुम कर दोगे, तुम्हारा हृदय त्वच्छ, विकारनहित, भावनाएँ आदर्शवादनी, चरित्र निर्मल, परोपकार रत, त्यागी और विनम्र है। प्रकृति तुम्हारी सरल, " *"Know thyself" ६४] सुहागरात भावुक, एक मिनट में ही आकाश में उड़ने वाली और सर्वस्त्र न्योछावर कर देनी वाली और दूसरे मिनट में एक दम पाताल में गिर, दुःख अनुभव करने वाली है। तुम ना करना भी नहीं जानते, अप्रिय बातों को कहना पसन्द नहीं करते, इसी कारण से तुम कभी बड़े संकट में पड़ जाते हो और मित्र अकारण ही तुम को दोपी समझ लेते हैं, उनको तुम में शक होने लगता है ; केवल इसलिए कि साफ अप्रिय बातों को तुम कह नहीं दिया करते। तुममें जितनी विशेषताएँ हैं इसकी आधी भी विशेपताएँ किसी भी पुरुप को श्रेष्ठ पुरुप या नरपुगव बना सकती हैं, किन्तु यह सव होते हुए भी तुम सफल पुरुप नहीं हो सके, इसका कारण यह है कि तुम में त्रुटियाँ हैं जो तुम मे नहीं होनी चाहिए थीं। सब से पहिले तुम में चरित्र की कठोरता नहीं है जिसका किसी भी पुरुप में होना जरूरी है। कठोरता शब्द बहुत उपयुक्त नहीं है, किन्तु मेरे तात्पर्य को तुम समझ गए होगे। अगरेजी के (Strength of character) चरित्रवल की भावना रखते हुए भी यह किसी अँश मे उससे भी भिन्न है। तुम कमजोर प्रकृति के हो, मनुष्य की कठोरता के स्थान पर तुममे बियोचित कोमलता है। श्रादर्शवादी इतने हो कि तुम यह नहीं देखते कि तुम दुनिया में रह रहे हो, जहाँ स्वार्थसिद्धि, अपने उद्देश्यों का पीछा और उनकी ही सिद्धि प्रधान है। तुम स्वप्न देखने और आदर्श की पूजा में दुनिया की घुड़दौड़ मे अपने दुनिया-साज चतुर मित्रों से पीछे रह जाते हो। तुम्हारी सरल प्रकृति से वह लाभ उठाते हैं, तुम्हारे ही माथे, तुम्हारी ही प्रशसा कर, तुम्हारे अभिमान की रग को गुदगुदा और जागृत कर, तुमको सारहीन स्वप्नों में लीन कर वह आगे बढ़ जाते हैं, तुम पीछे रह जाते हो। तुम अपना सासरल सञ्चा, उदार दूसरों को भी समझते हो, दूसरे ऐसे नहीं। ऑख खुलने पर तुम देखते हो कि दूसरे ऐसे हैं, उन्होंने वेजा किया, पतियों को सीख [६५ घोखा दिया, उनको यह नहीं करना चाहिए था, वह नहीं करना चाहिए था, वह आदर्श से नीचे गिर गए और तुम समझ लेते हो कि वह छोटे मनुष्य हैं, हीन हैं, तुम बड़े हो, अच्छे हो। तुम इन विचारों से अपने को वोध दे लेते हो, अपने को बड़ा और ऊँचा समझ संतोष कर लेते हो, किन्तु दुनिया में वह आगे बढ़ जाते हैं, तुमसे बाजी मार लेते हैं और तुम कल्पना के संसार में अपने को अच्छा समझ पीछे पड़े रह जाते हो, कष्ट उठाते हो और कुछ कर भी नहीं सकते। पुरुपोचित कठोरता का अभाव और प्रकृति की कोमलता इस सब का प्रधान कारण है। जब तुम मेरे पास आया करते थे, और भी तुम्हारे अनेक मित्र हुआ करते थे, तुम्हारी सरलता, उच्च आदर्शों की पूजा और प्रकृति की निर्म- लता से वह कितना लाभ उठाया करते थे यह मैं देखा करती थी और सच मानों तुम्हारी अनेक विशेषताओं पर मुग्ध होती हुई भी तुम्हारी यह दशा मुझको खटके में डाल दिया करती थी। तुम ऐसे कोमल प्रकृति के थे कि कोई भी बढ़ संकल्प * और विचारों वाला तुम्हारा मित्र तुमको घुमा फिरा सकता था। मैंने यह भी देखा था और तुमने भी एक दो बार मुझ से कहा था कि कभी कभी यह जानते हुए भी कि दूसरे तुमको बेवकूफ बना कर अपना इष्ट सिद्ध करना चाहते हैं, तुमने उनकी सी बातें करदी, जान बूझ कर और सब कुछ समझते हुए केवल इस ख्याल मे कि तम्हारी कोई हानि नहीं, तुम कोई वेजा काम करते नहीं, किन्तु यदि एक साधारण किसी महत्वहीन वात से दूसरे का भला होता है तो होजाय । विचारपूर्वक देखो यह जो सब मैं कह रही हूं ठीक है या नहीं? इन बातों का अधिक विस्तार न कर मैं इतना ही कहना चाहती हूँ कि पुरुप के लिए यह त्रुटियाँ हानिकर *Strong will. 딫 ६६ ] सुहागरात चाहे कम हों, किन्तु एक नायक के लिए यह त्रुटियाँ विष के समान हैं। तुम से यह लिपा न होना चाहिए कि सृष्टि ने पुरुष और स्त्री को किसी उदृश्य ने निर्माण किया है। दोनों में कुछ खास विशे- पताएं हैं और दोनों में कुछ खास त्रुटियॉ हैं। एक की विशेष- ताओं से दूसरे की त्रुटियों की पूर्ति होती है, किन्तु यदि दूसरे में भी वही त्रुटियाँ हों जो पहले से मौजूद हैं, यदि दूसरे में उसी बात का अभाव हो, जिसके सहारे ही पहिले की जीवन-नाका असर हो सकती है तो दोनों का मेल या सम्मेलन ठीक न होगा, जोड़ा सुखकर न होगा और दोनों को जीवन में कठिनाइयों का सामना करना होगा। एक बात और भी बतला देती हूँ। दुनिया का यह ख्याल कि लो और पुरुष एक ही समान जीव है, सर्वथा गलत है । मेरी समन में स्त्री और पुन्य दो मिन्न प्रकार के जीव हैं, यद्यपि दोनों की बनावट सूरत और सीरत प्रायः एकसी दिखाई देती है । एक के पूर्ण विकास के लिए दूसरे का होना नितान्त आवश्यक और निहायत जरी है। विना एक के दूसरे के उद्देश्य की सिद्धि हो ही नहीं सकती, एक की पूर्ति के लिये ही दूसरे की नृष्टि हुई किन्तु फिर भी स्त्री और पुत्य वैसे ही मिन्न हैं जैसे पृथ्वी और आकाश । लियाँ त्वयं कोमल प्रकृति, सरल स्वभाव और उच्चामिला- पिणो होती हैं। वे पुरुषों में कोमलना नहीं ढूंढती । मैं स्त्री हूँ और एक स्त्री की हैसियत से और अपने वहिनों के स्वभाव, प्रकृति और आवश्यक्ताओं से पूर्ण रूप से परिचित होने के कारण, तुमको यह रहस्य बतला देना चाहती हूँ कित्रो स्वयं कोनल और कमजोर होने के कारण पुल्य में कठोरता, बढ़ता और पाशविक शक्ति चाहती है। पुरुष की इन विशेषताओं का स्त्री केहदय में अधिक आदर और मान रहता है। नी, पुत्य में, ।

पतियों को सीख [६७ नायिका, नायक में, और पत्नी, पति में हर तरफ और तरह का बल ही चाहती हैं। (१) शारीरिक वल पहले, फिर (२) मान- सिक बल, तदनन्तर (३) चरित्र बल और (४) अन्त में किन्तु अधिक अंश में वह संकल्प-वल या विचारों की दृढ़ता चाहती है । स्त्री, धन, दौलत, गहने जवाहारात, और संसार के वैभव को केवल एक हृदयहीन, कठोर पाशविक शक्ति पर न्योछावर कर देती है, एक पहाड़ की सी शक्ति के कदमों को चूमने और उन पर खेलने के लिए वह संसार के ऐश्वर्य और आदर्शवाद को लात मार सकती है । स्त्री उस पुरुष का क्या मान करे जो उसे गोद में उठा दौड़ नहीं सकता, जो उसी के समान नाजुक है, जिसके विचार, उसी के विचारों के समान, हवा से हिल जाया करते हैं, जो उसी के समान डामाडोल है, जो दुनियादार और दुनिया-साज नहीं, जो संसार मे खियो के ही समान पग पग पर धोखा और ठोकर खा सकता है, जो न अपनी रक्षा कर सकता है, न जिनमे दूसरों की रक्षा करने की क्षमता है और न है जिसमें शासन, दमन और अपने को ही काबू मे रखने की शक्ति । कवि "वायरन" स्त्री-चरीत्र से खूब ही परिचित था और उसने स्त्रियों के चरित्र को समझने की कुंजी को निम्न लिखित दो पद्यों वन्द कर दिया है:- नारी उत्पादित करती है नर के मन मे मद और प्यार, प्रारमताप से उत्पीडित वह पतितोन्मुखी प्रेम की धार। मे *(1) Strength of Body (2) Strength of mind. (3) Strength of Character (4) Strength of will.

६.] सुहागरात सदा खोजती उस मनुष्य में जिससे रखती है वह प्रेम, रक्षा करने की क्षमता श्री सुदृढ़ शक्ति सच्चा नव नेम । x x x नहीं खोजती दयाभाव वह सीधे सुन्दर सद् व्यवहार. ज्ञात उन्हें इनकी महिमा है दन का अनुभव भले प्रकार । उन्हें चाहिए सिद्ध पुरुष वह हो जो सुदृढ़ तथा निश्चल, जिसे न विचलित ग्रोधी करती जो करती उनको चचल (प० का० मा०) सच बात यह है कि समस्त विकास के बाद स्त्री अब भीप्राचीन काल की ही स्त्री है उसे आज भी उसी ( cave-man) प्राचीन पूर्व, जंगली, आदि- -पुरुप की आवश्यकता है, जो उसके लिए पहाड़ को काट कर उसमे उसके निवास के लिए मोपड़ा बना देता था, जो पेड़ों को गिरा कर, डालो को काट कर, झोपड़े को वर्पा से सुरक्षित कर देता था, जो जानवरो को मार कर उसके बच्चों की रोटियों का प्रवन्ध कर देता था, जो आसपास की जंगली जातियों के आक्रमण के समय उसकी, उसके बाल बच्चों और उसकी कुटी की रक्षा वीरता से, अपनी जान हथेली पर रख कर *"and women-things that love and move, Mined by the fever of the soul They seek to find in those they love Stern strength and promise of control. + + They ask nat kindness, gentle ways These they themselves have tried and known They ask a soul that never sways With the blind gusts that shake their own." + पतियों को सीख [६६ करता था, जिसके बाकपन ओर मदानगी को देख उसकी स्त्री की और कोई निगाह उठा कर नहीं देख सकता था और जिसकी भुजच्छाया में वह सुख से सो रहती थी और दुनिया का झमट और भय उससे दूर रहता था। आधुनिक विकास और शिक्षा का प्राभव इतना जरूर होगया है कि बी, पति या नायक में बुद्धि, विवेक, चातुर्य, रसिकता, चेतनता और संसार के समस्त सुखों को संग्रह कर देने की शक्ति चाहती है, किन्तु यह सब होते हुए भी वह स्त्री के हृदय की आदि छाप को अपने हृदय-पटल पर से अब भी नहीं मिटा सकी है और अब भी कितने ही सुन्दर आच्छादनों से सत्य क्यों न ढक दिया जाय, सच्ची वात यही है कि वह जिसको हृदय देती है, जिसे अपने बच्चों का जनक बनाना चाहती है उसमें वह शक्ति ही शक्ति हर पहलू में और हर रंग में देखना चाहती है और इसी को वह हर समय मे उसमें दृढ़ती है। स्त्री, विकास की सीढ़ियों पर तेजी से पऊर चढ़ती जा रही है, सम्भव है कुछ दिनों में वह ऐसे शिखर पर स्वयं पहुँच जाय जहां अपनी कोमलता को, अपनी कमजोरी को, वह धो वहाये, शक्ति की वह स्वयं ही खान हो जाय और निरी पाशविक-शक्ति का आदर उसके हृदय से जाता रहे, किन्तु अभी इसके लिए सैकड़ों नहीं, हजारों वर्षों की आवश्यकता है । भविष्य को कौन जाने, किन्तु अभी कम से कम सैकड़ो वर्ष तक स्त्री, पुरुप में शक्ति, शासक और प्रभु ही दूंढती रहेगी । एक चतुर नायक को इसलिए अपनी इन विशेषताओं की सदा वृद्धि करते रहना चाहिए, साथ ही समय की आवश्यकता के अनुसार इसका प्रदर्शन भी उसे करते रहना चाहिए। तनिक आंख खोल कर चारों ओर देखो, आज कल स्त्रियां क्या नहीं कर रही हैं ? किस क्षेत्र मे वह मनुष्यो से पीछे हैं ?

७०] सुहागरात पुरुषों को रोटी, कपड़ा, दफ्तर, नौकरी, धनोपार्जन आदि का बड़ा अभिमान था, अव स्त्रियां यह सब कर लेती हैं। रोटी कपड़े के लिए, पेट की ज्वाला शांत करने के लिए, गहने जवाहरात के लिए, तौक, कड़ों, कर्वनियों और वेड़ियों के लिए पुरुपों को शरण जाने की उनको न पहिले आवश्यकता थी और न अब है। अब तो उन्होंने यह भी दिखा दिया है कि इन सत्र का प्रबन्ध वह पुरुपों से अच्छा नहीं तो उनके समान ही कर सकती हैं, किन्तु फिर भी वह पुरुषों की भुजच्छाया के लिए लालायित रहती हैं, पुरुषों का आश्रय ढूंढती रहती हैं । क्यो ? केवल उसकी पूर्ति के लिए जो उनमें नहीं है। केवल पाशविक वल, पाशविक वीरता की प्रशंसक होने के कारण और केवल इस आनन्द में मुग्ध हो, पागल होने के लिए कि पहाड़ सी शक्ति वाला मनुष्य चरणो के पास बैठा हुआ विस्फारित मदमस्त नेत्रों से कह रहा है:- "देहि में पदपल्लव मुरारे और अपना सर्वस्व, अपना वर्तमान और भविष्य दे, चरणों को चूम कर ही अपने को वन्य धन्य समझने को उत्सुक है। एक स्त्री एक पुरुप पर संसार की दौलत और अपना सर्वस्व सुख से बलि- हार कर देती है,केवल इस सुख मेंमन्न होने के लिए कि मुझ अवला को फूंक से उड़ा देने में समर्थ, यह सृष्टि का सरताज मेरे सामने कातर खड़ा प्रणय-भिक्षा मांग रहा है और एक मेरी कृपा और मन्द मुस्क्यान के बदले मे त्रैलोक्य के राज को ठुकरा देने को तैयार है। एक बात और भी बतलाती हूं, संसार में अभी उस स्त्री का जन्म ही नहीं हुआ है जो पुरुप के इस प्रकार के प्रेम को देख कर, उसके मुख से सच्चे प्रेम की भाषा को सुन कर और उसके हृदय की प्रेम की ज्वाला से तप होने पर हिल न जाय और अपने सिंहासन से नीचे उतर उसके सामने हाथ जोड़ कर न खड़ी हो जाय।

पतियों को सीख [७१ मालूम नहीं, "रसिका स्त्री-हृदय के इन भावों की मधुरता, कमनीयता, गम्भीरता, अतुल-नीयता, सुन्दरता, ओतप्रोतता और मादकता को तुम समझ सकते हो या नहीं ? सच बात तो यह है कि स्त्री के चरित्र और उसके प्रेम को समझ सकना किसी बड़- भागी को ही नसीब हुआ करता है, नहीं तो सच मानो आदि शक्ति और सृष्टि के कर्ता के समान ही स्त्री भी आनन्द और अनेय है और उसके लिए भी मनुष्यों द्वारा वही कहा जाना चाहिये जो वेदान्ती ईश्वर की खोज में विह्वल हो, घबरा कर, "नेति नेति" के शब्दों में कह बैठते हैं। मैं भी कहाँ की कहाँ चली गई, क्या कह रही थी क्या कहने लगी। खैर, जो कुछ पुरुप के लिए नितान्त आवश्यक गुण मैंने ऊपर बताये हैं, तुम मे उनमें से अधिकतर गुणों का अभाव है। तुम बी को भॉति ही जल्दी सब का विश्वास कर लेते हो, बेवकूफ बनते हो, धोखा खाते हो कहो सत्य है न ? स्त्री की भॉति ही तुम अपने हृदय में बात नहीं रख सकते। तुमसे बहुत आसानी से, तनिक सहानुभूति दिखा कर या तुम्हारा मित्र बन कर तुम्हारे हृदय की सात तह के नीचे से कोई भी वात निकाल सकता है। ठीक है न ? तुममें हठ है ही नहीं या है भी तो दो चार मिनट का, दस वीस घंटे या दस वीस दिन का भी नहीं । वह मनुष्य क्या जिसमें हठ न हो, छोटेपन या बुरे तरीके का नहीं, किन्तु मनुष्योचित और मर्दानगी का? स्त्री सर्वोपरि एक नायक, जिसका अर्थ (Commander) शासक है, चाहती है। तुम स्वयं ही किसी के आश्रित, अधीन रहना पसन्द करते हो । स्त्री पर-मुखापेक्षी रहने में सुख अनुभव करती है, वह नायक की सेविका वन और नायक मे प्रभुत्व देख गद्गद् होती है, तुम स्वयं दूसरे के पीछे पीछे चलने के लिए अपनी आंखो को भी ७२] सुहागरात विछा देने को तैयार रहते हो। यह सव है या नहीं और मैंने तुम्हारे चारित्र को ठीक समझा है या नहीं ? तुम्हारी दशा तो यह है, ऐसी दशा मे तुमको तुम्हारे जीवन की सफलता के और सुख के लिए स्त्री ऐसी मिलनी चाहिए थी जो तुम्हारे अभावों की पूर्ति करती, जिसमे वे बातें, वे गुण मौजूद होते जो तुममे नहीं हैं। तुमको ऐसी स्त्री मिलनी चाहिए थी जिसमें गम्भीरता अधिक होती, जो चतुर चालाक होती, जो दृढ़ विचारों वाली होती, जिसमें स्वयं (Command) शासन और नियमन की शक्ति होती, जो, बुरा न मानना, माता, सहोदर भाई, पथप्रदर्शक, मित्र, सखी और साथ ही प्रियतमा का आवश्यकतानुसार समय पड़ने पर काम देती । दुनिया, पत्नी के महत्व को समझती ही नहीं है। माता वास्तव में पूजनीय, आद- रणीय, स्नेह और भक्ति की सर्वश्रेष्ठ पात्री है, किन्नु पत्नी इसलिए माता से भी अधिक महत्व की वस्तु है, क्योंकि पत्नी तो वह है ही, किन्तु इसके साथ ही साथ वह माता है, सखी है, मित्र है और नायिका भी है। वेदव्यास ने कह रखा है: "अात्मात्मनैव जनितः पुत्र इत्युच्यते बुधैः । तस्माद्भार्याम् नरः पश्येन्मातृवत्पुत्रमातरम् ।। निरुपमा मे यह बातें नहीं हैं। उसमें हठ और अभिमान की मात्रा अत्यधिक है । चतुर कोचवान नूतन जानवर को सँभाल पुचकार कर हांकता है। हंटर दिखाने को पास रहता है, किन्तु उसकी चोट वह देता नहीं, निरुपमा पहिले ही ऐड़ लगाने लगी। सँभालना और रास्ता दिखाना तुम्हारा काम था सो तुम थे कम- जोर प्रकृति के, तुमको स्वयं एक सहारे की जरूरत थी। तुम में (will) दृढ़ता, दृढ़ विचारों और दुनियासाजी का अभाव पतियो को सीख [७३ था । प्रकृति की तुम्हारी कोमलता को उसने कमजोरी समझा। तुम आदर्श के दीवाने, भावुक थे, तुम उसकी बातों को ही प्रधान रखना रसिकता समझते थे, उसने इसे अपना जन्मजात अधिकार समझ लिया और इस तरह से वह अपने मन की, निरंकुश और प्रभुत्व की आदी होगयी । तुम एक कोने मे रहगये और उसकी इच्छा कानून बन गयी । इस तरह से आदि से ही तुम लोगो को प्रकृति की दो प्रकार की धाराएं दो ओर बहने लगी। चाहिए यह था कि दोनों का संगम होता, एक दूसरे से मिलजुल दो धाराएं एक हो बहती, किन्तु यह हो नहीं सका । तुम मन ही मन दु.खी रहने लगे, असंतुष्ट रहने लगे और तुम्हारे सुख- स्वप्न विलीन हुए। तुम फटे फटे रहने लगे और इस तरह निरुपमा के भी सुखो में कमी आरंभ हुई। अगर दोनो मे एक भी चतुर होता तो स्थिति पर विचार कर सुधार सहज था किन्तु वह हठी, अभिमानिनी, अपने अभिमान मे चूर रही तुम इसलिए चुपरहे कि तुम देखते थे कि तुम्हारे कहने सुनने का असर ही उल्टा होता है । साथ ही तुममे यह मादा कहां कि दूसरे को अपनी मर्जी के अनुसार चला सको, और फिर तुम्हारी तो प्रकृति ही है कि दूसरों से कुछ न कहकर कष्ट सहन करते हो और चाहते हो कि तुम्हारे कष्ट को देखकर सहानुभूति से प्रेरित हो दूसरा ठीक रास्ते पर आजाय। अगर एक दूसरे से तुम लोग अपने हृदय की व्यथा का बखान करते, दोनो एक दूसरे के दृष्टिकोण को समझने की कोशिश करते तो कोई न कोई हल निकल ही आता किन्तु तुम लोगो ने इसकी फिक्र न की, अपनी धुन मे बहते रहे और इस तरह से नित्यप्रति एक दूसरे से दूर होते गये। ऐसी स्थिति में तुम्हारी प्रकृति की मधुरता और कोम- लता जाती रही, तुम्हारी सहनशीलता काफूर होगयी और शारीरिक और मानसिक कमजोरी का तुम परिचय देने लगे।

७४ ]
सुहागरात
तुम्हारा मिजाज चिड़चिड़ा होगया, वात बात में तुमको क्रोध आने
लगा। तनिक विपरीत वात होने से, तनिक मानसिक शांति का
भंग होने से तुम्हारी निगाहें चढ़ जाती। धीरे धीरे तुम्हारी
जवान पर से भी तुम्हारा इस तरह से कावू जाता रहा । सच
मानो अगर निरुपमा उन दिनों अपनी किसी सखी या सहेली को
पत्र लिखती तो एक न एक दिन उसके पत्र में निम्नलिखित
पंक्तियां जरूर होती:-
"झिड़की तो मुद्दत से मसाबात होगयी
गाली कभी न टी थी सो अब बात होगयी,
बाकी है मारखाना सो अाजकल के बीच,
सुन लोगी उसे तुम भी कि औकात होगयो"
वह भी बड़े वाप की बेटी थी, और फिर हठीली, उसे बर्दाश्त
कहां, भी वह जवाब देने लगी। स्थिति और भी बिगड़ी
और इस समय मै तुमने बहुत बड़ी गलती की, तुमने वर्वर
(Cave Man ) जंगलो आदि-पुरुप को निकृष्ट प्रकृति का
परिचय दिया । तुम्हारी भावुकता, कोमलता, सरलता, सव हवा
होगयी और तुमने एक दिन खीज कर उसपर हाथ चला दिया।
तुम्हारी कमजोरी का यह सब से बड़ा सुबूत था। आदि पुरुष
(Cave Man) के मुग्धकर श्रेठ गुणों का पारिचय ऊपर मैं
दे चुकी हूँ । उनको तो तुम प्रदर्शित नहीं कर सके, तुमने किया
वह जिससे बी के हृदय में तुरन्त ही घृणा उदय होती है।
नतीजा वही हुआ जो होना चाहिए था। धीरे धीरे उसके हृदय मे
रहा महा तुम्हारा मान और भय जाता रहा। उसकी लज्जा को
भी तुम्हारी इन करतूतों ने धीरे धीरे धो बहाया और उस दिन
तुम्हारे हाथ चलाने से ही कुलकामनी की लज्जा का त्याग कर
वह अपने मा के घर चली गई।

पतियों को सीख [७५ रसिक ! तुम मेरी वात को सदा के लिए अपने हृदय-पटल पर अंकित कर लो और अपने ही समान पुरुषों मे यह घोषित कर दो कि स्त्री के हृदय से जो अपना मान, आदर सम्मान, भय और प्रेम एकदम मिटा देना चाहता हो और जो इसके साथ ही साथ यह चाहता हो कि खी निर्लज्ज, मुंहफट, जवाब देने वाली और निडर हो जाय, उसके लिए सब से सहज नुस्खा यही है कि वह उस पर हाथ चलाने लगे, किन्तु इस प्रकृति के लोगों को मेरी इस वात को वेदवाक्य ही समझना चाहिए कि मार से स्त्री दासी भी नहीं बनी रह सकती, प्रियतमा का तो सवाल ही कहां है। हाथ चलाने के तत्व और मर्म को देख लो और स्मरणशक्ति काम देती हो तो अपनी स्थिति से मिलान कर तुलना कर लो। पहिले पहल जिस दिन तुमने निरुपमा पर हाथ चलाया होगा, वह दुःख से अवाक रह गयी होगी और धरती में मन ही मन समा जाने की बात सोचती रही होगी। उसको सबसे अधिक इसकी चिन्ता रही होगी कि कोई जाने नहीं। दूसरी बार उसके आंसू भी निकले होंगे और उसके मुंह से टुन फुन की आवाज भी निकली होगी। धीरे धीरे उसे इस बात का ज्ञान भी दुःख देने लगा होगा कि दास दासियों या कुटुम्बियों से यह छिपा नहीं रहा । तीसरी बार यह समझ कर कि मार का भी असर नहीं होता, वह कावू में नहीं आती, तुमने अधिक जोर से और अधिक मारा होगा। वेदना से, साथ ही साथ इस ख्याल से कि अब तो लोगों से यह छिपा नहीं रहा और इस आशा से कि कुटुम्बी हस्तक्षेप करें, चाहे वह घर की दासी ही क्यों न हो वह जोर से रोई और चिल्लाई होगी। तुम्हारी वातो को ज़ोर से और करकश स्वरी में उसने जवाब भी दिया होगा। भीतर ही भीतर मार की हीनता, निस्सारता और निकृष्टता सिद्ध करने के लिए उसने यह और लन्ना ७६ ] सुहागरात भी निश्चय किया होगा-चलो मारो देखें कितना मारते हो, मैं भी नहीं सुनूंगी, "तुम काटो मेरी नाक और कान मैं न छोडूं अपनी बान" । तुमने चुप कराने के लिए और भी सख्ती की होगी और उसके जवाब-स्वरूप यह इतने जोर से रोई और चिल्लाई होगी कि पड़ोसियों के घर भी गूंजने लगे होगे और इसकी चर्चा भी उनमें हुई होगी। उसके रोक का यही प्रतिबन्ध था, जिस दिन यह टूटा और उसने यह समझ लिया कि अब किसी से भी कुछ छिपा नहीं रहा, वह शेर होगयी, इस मानी मे कि उसकी लज्जा जाती रही, उसका शील जाता रहा। इसी का नतीजा यह हुआ कि लज्जा का परित्याग कर और किसी की परवाह न कर वह उस दिन चादर ओढ़ अपने मायके चली गयी। तुमसे यह सब कैसे हुआ, समझ में नहीं आता। अक्सर अपढ़, मूर्ख, अपने समय में मार खाई हुई सासुगू, स्वयं बहू से लड़ाई होने पर, उसे सताने, दंड देने और अपने काबू में करने के लिए अपने पुत्रों को शिक्षा देती हैं-"मार के आगे भूत नाचता है, मार तो देखू कैसे नहीं सीधी होती”। अक्सर अपनी माता के तानों से खीज कर उनको शांत करने के लिए पतिदेवता हाथ चला दिया करते हैं, किन्तु इन सब बातों का नतीजा एक ही हुआ करता है और वह यही कि गृहस्थी दुख और दरिद्र का केन्द्र वन जाती है। प्रियम्बदा से कुछ बातें मैंने सुनी थी, उनके सहारे और कुछ अपने अनुमान और तुम्हारे चरित्र के ज्ञान से मैंने यह सब लिख डाला है । यह सब ठीक है या गलत, इसपर तुम स्वयं विचार कर लो, किन्तु अगर इन वानों का चतुर्थाश भी ठीक हो तो तुम निरुपमा से अपने हृदय के दुखों को कहो, प्रसन्न कर, राजी कर, फुसला कर, उससे भी उसके हृदय के दुख को यातो को पूछो और बूझो, दोनों एक दूसरे की बातों पर विचार करो पतियों को सीख [७७ और तब एक दूसरे के दृष्टिकोण को हृदयंगम कर और यह संकल्प कर कि जीवन को अधिक से अधिक सुखमय वनाओगे, दोनों ही संकल्प की सिद्धि में लीन हो जाओ और हर समय एक दूसरे को समझने, प्रसन्न करने की चेष्टा में लीन रहो । कुछ ही दिनों मे तुम दोनों ही देखोगे कि तुम्हारा गृह इन्द्र का कानन हो गया, और उसकी दीवारे भी हर वक्त हंसती रहती हैं। अन्त मे अब इतना ही कहना वाकी रह गया है कि तुम्हारी सिधाई, सरलता और कोमलता का मुझको ज्ञान था, तुम्हारी कम- जोर प्रकृति से भी मैं परिचित थी, फिर भला तुमसे विवाह करने को मे कैसे राजी होती । मैं विवाह कर स्वामी चाहती थी, शासक चाहती थी, पुजारी, भक्त और सेवक नहीं। मैं चाहती थी मालिक, जिसके हुक्म मे मैं रहूँ, जो मुझको निःसन्देह ही मेरी भावनावो और कामनाओं को सदा आदर से देखते हुए, जैसी उसकी इच्छा हो घुमाये फिराये और परिचालित करे। मैं विवाह कर चाहती थी कि एक वृहद वृक्षरूपी पति जिसकी शाखारूपी भुजाओं मे लता सी लिपटी हुई मैं शोभा पाती, साथ ही जो मेरे हिलने डुलने से स्वयं न हिल जाता और जो संसार की झंझटो रूपी प्रचंडावात में स्थिर खड़ा रहता और मेरी रक्षा करता, किन्तु तुमसे समम्बन्ध कर यह सब मेरे मन की मन ही मे रह जाती, तुम से मुमको यह सव न मिलता, उलटे इन सववातो का भार मुझ गरीव अवला पर ही होता । मैं स्त्री थी, मालिक वनने में मुझको सुख न मिलता, साथ ही मेरा विकास मारा जाता, मैं अपने व्यक्तित्व की अभिवृद्धि जैसी चाहिए न कर सकती क्योंकि स्त्री-जीवन का उद्देश्य और आदर्श सेवा है और सेवा करने में ही उसे स्वर्ग-सुख मिलता है।

सुहागरात
७८]
में इन्हीं कारणों से लाचार थी, तुम्हारे वार बार आग्रह
करने पर भी मैं तुमसे विवाह करने को सम्मत नहीं हुई और मैंने
नाही कर दी। आशा है आज समस्त वातों को जान कर, तुमने
मुझको उस समय की तुम्हारी प्रार्थना को अस्वीकृत करने के लिए
माफ कर दिया होगा।
क्षमाप्रार्थिनी-
मनोरमा

वामृतलता रहा,
तलाक
मनोरमावास
प्रयाग
१४-१२-१३१७
"नामृतम् न विषम् किंचिदेकाम् मुक्त्वा नितम्बिनीम्
विरजाविषवल्लरी"
"लेकिन यह जिक्र गैर है, इसको न छेड़िये
हासिल पराई फिक्र से अपनी निवेड़िये"
मोहन,
तुन्दारा पत्र पढ़ कर आश्चर्य हुआ। मेरा यह ख्याल था और
दुनिया का भी यही ख्याल है कि वियों के पेट में बात नहीं पचती,
दुनिया भर के रहो पुतहो में और एक घर की बात को हज़ार
घरों में फैलाने में वह सिद्धहस्त होती है, किन्तु मर्द भी किसी
वानों को जान कर चुप नहीं रह सकते, यह आज तुम्हारे पत्र
ही से मैंने जाना।
"रसिक' की वीत्री अपने मायके चली गयी, परेशानी तुमको
होगयी है, और इस परेशानी में तुम यह भी भूल गये कि किसी
के घर की बातों को पर्दापोशी तुम्हारा कर्तव्य है। तुम्ही नहीं,
संसार के जितने पति हैं दूसरे की वीवियों के लिए सदा दुःखी
रहते हैं, दूसरों की बीवी बड़ी सरल, सीवी और सदा उनको कष्ट

८०] सुहागरात में दिखाई देती है। दूसरे की बीवी में सदा उनको एक सकरुण दृष्टि दिखाई देती है जिसको वह समझते हैं कि उनकी वीत्री में दूसरे नहीं देख सकते। उनकी नजरों में दूसरे की बीवी का पति सदा उसके अनुपयुक्त, हृदयहीन और पशु दिखाई देता है । दूसरे की बीवी समझदार भी बहुत दिखाई देती है, वह सहनशीलता, साहस, सन और होशियारी की जीती जागती मूर्ति दिखाई देती है और इन सब से भी अधिक खूबी उसमें यह होती है कि अपनी बीवी से वह अधिक सुंदर और मनोहारिणी प्रतीत होती है। तुमने जो कुछ लिखा है उसके सम्बन्ध में इतनी ही टीका मैं पर्याप्प समझती हूं। तुमने हमसे इस सम्बन्ध मे कुछ करने के लिए भी लिखा है, किन्तु मेरा कहना यही है कि ऐसी बातों में मैं नहीं पड़ सकती, दूसरे के घरेलू माड़ों में पड़ना एक स्त्री के लिए, विशेष कर जब कि मैं उस वीत्री को जानती ही नहीं, लाभकर के बजाय हानिकर होगा। दूसरे ऐसे मामलों में दखल किसी ऐसे व्यक्ति को देना चाहिए जिसका सम्बन्ध "रसिक" या उसकी वीवी से घनिष्ट हो। कोई पास का रिश्तेदार या मित्र ही ऐसे अवसर पर कारगर हो सकता है, मैं इस झगड़े में इसीलिए नहीं पड़ सकती। तुम्हारे पत्र की अन्य बातों के सम्बन्ध में कुछ तुमको जरूर लिखना चाहती हूं। नुमने निरूपमा के पन में अपने पत्र में अच्छी वकालत की है. किन्नु क्या में इतना पूछ सकती हूं कि जो जन्मसिद्ध अविकार तुमने निरुपमा के केवल स्त्री होने के कारण बतलाये हैं, क्या वे ही अधिकार तुम्हारी बीवी के भी हैं और क्या उनको उसे देने को तुम तैयार हो ? यह भी बतलायो कि जो दोष और त्रुटियां तुमने 'रसिक' में बतलाई हैं क्या वे ही तुम में और तुम्हारे पतियों की जाति या बिरादरी में अधिकतर मौजूद नहीं हैं ? तुम्ही नहीं,

पनियोको सीख
[८१
मंसार के समस्त पति अपनी पत्नी को बड़ी किस्मत वाली समनले
हैं, क्योंकि उनका सा पति उनको मिला।
"रिन्दे खराब हाल को नाहिद न छेड़ तू,
तुमको पराई क्या पड़ी अपनी निवेड तू।"
क्यों कहलाते हो ? तुम, पतियों की जाति ही कुछ निराली है।
संसार में बिरला ही कोई पति होगा जो जीवन में एक समय में
किसी दूसरे की बी के पास, जो अपनी बीवी नहीं है, केवल इन
लिए न गया हो कि वह ललना उसको समझे, उसके दु.ख दर्द
को झे, उसके साथ महानुभूति प्रकट करें, उसके दु.ख में
दुःखी हो और उसकी आंखों से उसकी कठिनाइयों को देख और
उस पर तरस खाय । तुमने कभी यह न सुना होगा कि एक पत्नी
कभी दूसरे के पतियों में इतनी दिलचसी लेती हो या उसने कभी
दूसरे के पति के पास जाकर उसकी सहानुभूति प्राप्त करने की
कोशिश की हो।
निरुपमा से मुझे विशेष महानुभूति नहीं । यह सम्भव है
कि त्री, श्री के प्रति अधिक निर्दय और पापाण-हृदय हुआ
करती है इसलिए मेरी ऐसी भावना हो, किन्तु ग्रह हो तब भी
मेरा ख्याल यह है कि निरूपमा का मायके जाना उसकी बड़ी
भूल थी । “धी बेटी अपने घर की भली" | "पैसा गांठ का
बाद किसकी जो पास रखे उसकी। इसके साथही
"तीर तिमूटी दसतिगे, छूटत वश न याय,
मृट जो माने बह वचन, वे नर मुटु कहाय ।"
की हमारी पुरानी कहावत है।
मैं वहत के लिए यह मान लेने को तैयार हूँ कि "रसिक"
ने कोई घोर अन्याय ही किया होगा और सर्वथा विवश होकर
ही निम्पमा मायके गई होगी, फिर भी मैं समझती हूँ कि ताली
दोनों हाथों से ही बजती है और झगड़े के लिए निरुपमा कम
६

८२] सुहागरात उत्तरदायी नहीं होगी। अस्तु, जो कुछ हो, मैं तो सिद्धान्तरूप से विवाहिता स्त्री के पति से लड़ कर अलग रहने या घर के वाहर कदम निकालने के भी विरुद्ध हूं। मै एसी दो एक स्त्रियो के नाम गिना सकती हूँ जिन्होंने पति से लड़ कर और कोई सन्बन्ध न रख, अलग रह कर, अपनी गृहस्थी और वाल वञ्चों का ऐसा सुन्दर प्रबन्ध किया जो पति की छाया मे रह कर वे दो जन्म में भी न कर सकती और जैसा सुन्दर प्रवन्ध उनके पतिदेव न कर सकते, किन्तु इन दो एक स्त्रियों की नियम के अपवादस्वरूप, असाधारण स्त्रियों में ही गणना होनी चाहिए। सभी स्त्रियां इनका अनुसरण कर सफल हो सकती हैं, ऐसा मैं मान नहीं सकती। मै स्त्री हूँ इसलिए स्त्रियों की कमियो और विशेपताओं से विशेष रूप से परिचिय हूँ। संसार पर, समाज पर, सन्तानो पर इस तरह के झगड़ो का और अलग रहने का कितना बुरा प्रभाव पड़ता है, केवल इन्ही दृष्टियों से स्त्री के पति से अलग रहने के प्रश्न को मैं नहीं देखती । मै इसी से विरोध नहीं करती, क्योंकि ऐसी स्थिति में पले हुए बच्चे बड़े होकर अपनी अवस्था मे वही कर सकते हैं जो उनके माता पिता ने किया था। मेरे सामने एक दूसरा भी दृष्टिकोण है । तुम कहोगे मैं अनुदार हूं, अपनी जाति वालियों के लिए मेरे हृदय में दुःख, दर्द, सहानु- भूति और उदारता नही, मैं उनमें विश्वास नहीं करती, मैं उनके साथ अन्याय करती हूं और हजारों वर्षों से जो पुरुप-समाज कहता आया है उसीके संस्कार से मैं प्रभावित हूं। तुम ताना दोगे कि जैसे एक पति अपनी पत्नी को भाग्यशालिनी सममता है, क्योंकि उसका सा पति उसे मिला और क्योंकि सृष्टि के आरम्भ काल से ही उसकी माता ने उसके हृदय में इस विश्वास को जड़ दिया है, ठीक उसी तरह से लाखों वर्षों के संस्कार से पतियों को सीख [५३ में भी प्रेरित हूं। जो समझो, किन्तु मेरा कहना यह है कि पत्नी को पति की शरण, छत्र-छाया और देखरेख में ही रहना चाहिए, अन्यथा राह में ठोकरें खाने और मार्ग से भ्रष्ट होने की भी सभावना है। मैं स्त्री हूँ, स्त्रियों के मान और गौरव का इसलिए तुमसे कम मुझको ख्याल नहीं है। मैं दकियानूसी ख्याल की नहीं, यह भी तुम जानते ही हो । फिर भी मैं यह समझती हूं कि देश और समाज को वर्तमान स्थिति में अभी कुछ काल तक जब तक स्त्रियों को उनकी मानवी स्वतन्त्रता, उनके अधिकार नहीं मिल जाते और आर्थिक रूप से भी वह स्वतन्त्र नहीं होजाती स्त्री को पुरुप की देख रेख, रक्षा, सहायता और सहारे की जरूरत रहेगी। मैं स्त्री को पुरुष की अपेक्षा कम धर्मरत या धर्मभीरु नहीं समझती। मेरे ख्याल मे वास्तव मे स्त्रियों में पुरुपों की अपेक्षा अधिक धर्मभावना रहती है । अज्ञान से या मदान्ध दशा में वह जो चाहे करे, किन्तु पुरुषो की भांति जानते हुए वह अधर्मपथ पर कम चलती है, किन्तु यह सब होते हुए भी स्त्री को मार्ग से विचलित कर देना कुछ अंशो मे बहुत सहज है। वह सरल प्रकृति की होती है, दुनिया की चालबाजियो मे परिचित नहीं होती, चतुर दुष्ट मनुष्यों को उसका वहका लेना आसान होता है। साथ ही स्त्री गंभीर प्रकृति और देर से उत्तेजित होने के कारण एक बार आपे से बाहरहोने पर सहसा अपने को सम्हाल नहीं सकती और प्राय: अन्धी हो जाती है और बुरा से बुरा कर्म कर बैठती है। मैं स्त्रियों के विरुद्ध, न कुछ कह सकती हूं और न कुछ लिखना ही चाहती हूं, पुरुप की अपेक्षा इन बातों के सम्बन्ध मे वे सहस्त्र गुना अधिक पूज्य और आदरणीय हैं किन्तु फिर भी यह साफ कहना चाहती हूं कि स्त्री के जीवन में प्रकृतिवशात् ऐसे अवसर उपस्थित होजाते हैं जिनमे उससे ही उसकी [४] सुहागरात रक्षा करना नितान्त आवश्यक हो जाता है। मेरे कहने का यह अर्थ नहीं कि त्रियों का विश्वास न किया जाय, वे चंचल होती हैं या कुचरित्रा होती हैं। यह कदापि नहीं। इसके विपरीत मेरा कहना यह है कि उनका पूरा विश्वास किया जाय, उनकी ओर से ऐसी भावना या सन्देह को कभी हृदय में स्थान भी न दिया जाय और उनको स्वतन्त्र रह सकने का और हर समय अपनी रक्षा करने का हर तरह से आदी बनाया जाय । हमारा यह विश्वास है कि पूर्ण रूप से निश्वास-भाजन होने के वे योग्य हैं और उनकी ओर से संसार को यही विश्वास होना चाहिए कि वह कुसन्देह से परे हैं * किन्तु एक चतुर पति का फिर भी यह परम कर्तव्य है कि अविश्वास से नहीं, सन्देह से नहीं वरन मित्र और सहायक के रूप से, प्रेम के नाते हर समय अपनी पत्री पर वह निगाह रखे, ठीक उसी तरह से जैसे कोई उस्ताद तैराक जल मे स्वच्छदता से तैरते हुए अपने शागिर्द पर, नदी के किसी कोने वह हो, दूर से ही निगाह रखता है। पति को पत्नी की वैसी ही देख रेख रखनी चाहिए, जैसे कोई माता जाड़े के दिनों में सर्वथा यह जानती हुई कि पुत्र को उसी ने सुलाया है, वह सुख से पड़ा सो रहा है, रात्रि में जब तब उठ कर उसके कम्बल को लिहाफ को, इसलिये ठीक कर दिया करती है कि उसे शीत न लग जाय । पत्नी को अविश्वास से ताकने की जरूरत नहीं, कोई भी स्त्री अगर कुछ करना चाहती है, ताकी नही जा सकती। पत्नी का पूर्ण विश्वास करना चाहिए, यही नहीं, पत्नी को यहां तक मालूम होना चाहिए कि अपनी रक्षा का भार उसी पर है किन्तु यह सब होते हुए भी प्रेम से, सहायक के नाते पत्नी को मार्ग के खाई खढ से बचाने की ओर सदा पति को निगाह रखनी चाहिए -- amw-- *(Ceaser's wife 16 above suspicion) पतियों को सीख [८५ और सतर्क रहना चाहिए । “उड़ी जात कितहूँ गुड़ी, तऊ उड़ायक हाथ"-पतन कहीं उड़कर क्यों न जाय उसकी डोर उड़ाने वाले के हाथ में रहने से वह गिरती नहीं, मार्ग से भ्रष्ट नहीं होती और उसके अधीन रहती है । पुरुष विचलित हो जाते हैं, वे दूसरो की वीवियों के पीछे ही तो भागते है, वे वीवियां किन्ही की पत्नीयां ही तो होती हैं। मैं केवल इन्हीं सिद्धान्तों की दुहाई दे निरुपमा के मायके जाने या पति से दूर रहने को पसन्द नहीं करती। तुमने लिखा है कि जब प्रकृति नहीं मिलती, जब दोनो दस दिन भी खुशी खुशी साथ नहीं रह सकते तो दोनों का अलग रहना ही अच्छा । तुमने इस बात पर शोक प्रकट किया है कि समाज में तलाक जायज नहीं, तुमने तलाक की उपयोगिता का बखान किया है। मोहन ! एक जमाने में मैं भी तलाक के लेक्चर माड़ा करती थी, उसके लामों को सहस्रमुख से वखान क्रिया करती थी, किन्तु अब मेरी राय कुछ और ही है । मैं नहीं कहती कि किसी स्थिति में भी नलाक आवश्यक या उचित नहीं, मैं तलाक की आंशिक उपयो- गिता को, विशेष स्थितियों और अवसरों में स्वीकार करती हूँ और उसका प्रतिपादन करने को भी तैयार हूँ किन्तु हर रोग का और हर प्रकार की विवेकहीनता का इलाज "तलाक" नहीं है, साथ ही तलाक की प्रथा से लाभ दस वीस को हो सकता है, हानि हजारों को । अगर पत्नी या पति नशेबाज हो, निर्दयी हो, दुराचारी हो, घर का माल असवाव जुए मे हारता हो, मार पीट करताहो, घर में कभीरहता ही न हो, गृहस्थी से कोई सम्बन्ध हीन रखता हो, या आता भी हो तो कभी अपने कर्तव्य की उसे चिन्ता ही न हो, हर तरह से वालबच्चों के जीवन के नष्ट होने की सम्भाना हो तो केवल ऐसी स्थिति में ही तलाक उपयोगी और उचित हो सकता है, निस्सन्देह ही ऐसे सुहाग से रंडापा भला, "खाना न ८६ सुहागरात कपड़ा सेत का भतरा की आवश्यकता सचमुच ही कुछ नहीं। तेल की जलेबी अस मुआ दूर से दिखाय । तेल की मिठाई, देखने में अच्छी, खाने मे धुरी, ऐसे पति के होने से पति का न होना ही अच्छा है । कम से कम, विना व्यर्थ की जलन और हाय हाय के पिसना ही पीसकर चार रोटियां तो मिलजायगी, किन्तु आदर्श भिन्न है, प्रकृति भिन्न है, स्वभाव नहीं मिलता, मैं पद्य हूं, दूसरा गद्य है, मुझको उपन्यास पसन्द है, दूसरे को नाटक पसन्द है, मुझे सिनेमा पसन्द है, दूसरा रिंक में नाच देखने या स्केट करने जाना चाहता है, मुझे स्वाराजियों की नीति पसन्द है दूसरे को प्रतियोगी सहयोगियो की ऐसी बातो के नाम पर तलाक आवश्यक नहीं । मेरा कहना यह भी है कि मै तलाक होने पर भी पति या पत्नी के दूसरे विवाह के और इस तरह दूसरे तलाक 8 की तैयारी के पक्ष में नहीं हूं। अमरीका की ओर देखो, वहां क्या हो रहा है ? कोई घर कोई कुटुम्ब सुरक्षित नहीं । अभी पति पत्नी हैं, धन्टे भर बाद गैर हैं। ज्यो ज्यों आंख खुलती जाती है विकास होता जाता है, घनिष्टता बढ़ती जाती है, भेदभाव और तलाक के उतने ही नूतन कारण पैदा होते जा रहे है। सच पूछा जाय तो तलाक की प्रथा के रायज होने मे तलाक की पाय- श्कता की अधिक से अधिक पुष्टि हुई है। इसने नित नये कारण "तलाक" प्राचीन भारत में जायज था। विशेष स्थितियों में तलाक हो सकता था, पति के जीवित रहते सब जाति की स्त्रियाँ विवाह कर सकती थीं। तलाक की शत जरूर कठिन थीं। तलाक का एक दूसरा रूप राम ने सीता का त्याग कर दिखाया जिसमें राम ने ब्रह्मचारी और सीता ने ब्रह्मचारिणी का प्रत धारण किया । पहिले प्रकार का तलाक बाट मे अपनी खराबियों के कारण जायज नहीं रह सका, ऐसी, हमारी धारणा है। कृ० का मा० पतियों को सीख [८७ तलाक के लिए पैदा कर दिये है। यूरोप और अमरीका की ओर देखो। गृहस्य और सामाजिक जीवन का मचान टूटने से पहिले चरचराता सा दिखाई दे रहा है। ऐसी सम्भावना प्रतीत होरही है कि विवाह की प्रथा ही उड़ जाने वाली है। अभी ही अमरीका के एक जज, लिन्डसे ने यह राय प्रकट की है कि ट्रायल मैरेजज (Trial marriges) हुआ करें अर्थात् विवाह के पहिले जांच के लिए, इसलिए कि पति पत्नी सुखी जीवन वहन कर सकेगे या नहीं, नायक और नायिका कुछ दिनो साथ रह कर देख लिया करें और कुछ दिनों के सहवास के बाद यदि यह मालूम हो कि दोनों एक दूसरे के साथ सुखपूर्वक रह सकेगे, तब वह गिरजे मे जाकर विवाह के बंधन से बंधा करें। जज साहब यह भूल ही गये कि यदि जांच के समय मे वह सुखी रह सके और विवाह हो जाने के दस वर्ष बाद अनवन शुरू हुई तो क्या होगा ? वह यह भूल गये कि दस दस वच्ची के पिता हो जाने के वाद पतिदेव का मन कभी कभी नव-त्रो को देख उसके प्रेम में फंस जाता है और वे उससे विवाह करने के लिए पहली बीवी से तलाक चाहते हैं। मानव-हृदय बड़ा ही चंचल है, वह वारूद की भॉति प्रज्वलित हो जाने वाला है, साथ ही वह अजीव रबड़ का सा हे, तनिक में ही उछलने कूदने लगता है और एक कवि के शब्दों में- जहा देखी नई सूरत, दिले नादा मचलता है; हम तो बस यही लगे। अगर गुण के नाम पर पति परिवर्तन किया जाना उचित है तो मेरा कहना यह है कि "आदर्श-पति" या मनुष्य, कोरी कल्पना की वस्तु है और उपन्यासो तथा नाटको ही में मिल सकता है। आदर्श-पुरुप होता नहीं, ऐसी दशा मे जैसा हो उससे ही (You have to make the best of a bad job) परस्पर सुहागरात सममाता के नाम पर काम चलाना चाहिए। अगर समझौता ही सर्वश्रेष्ठ है, तो यह तनिक विवेक और बुद्धि से साधारणल्प से अधिकतर युगलों के बीच हो सकता है, किन्तु अगर पति-परिवर्तन सांसारिक सुख के नाम पर किया जाय तो हमारा कहना यह है कि इन्यिोपासना की इति नहीं होती, क्रिमी तरह की तृप्ति अत- म्भव है, शराब की पास की मॉनि पीते जाओ, पीते जाओ वुमती नहीं । साथ ही हम लोगो को एक शायर की इस उक्ति के मर्म को भी सदा ध्यान में रखना चाहिए कि 'इस नमसरवरी का नतीजा यही मिला, दन हसरतो की मौनी का गहिल नहीं रहा।" परिवर्तन के लिए परिवर्तन की चाह होने से थोड़े ही दिनो बाद पिर परिवर्तन की आवश्यकता प्रतीत होगी। मेरी राय में पति पत्नी को वांध रखने का संसार में एक ही उपाय है और वह है परत्पर का मेल जोल या सममाना और दोनों का अपनी संतान के प्रति प्रेम और कर्तव्य, साथ ही दोनों का एक दूसरे का लिहाज और यह विश्वास कि विवाह का बंधन टूट नहीं जा सकता, "अग्निनातिकाहि विवाहाननिवर्तन्त इत्याचार्य समय अग्नि की सानी सहित किया हुत्रा विवाह बन्धन तोड़ा नहीं सकता। यह बंधन कोई भी पति-पत्नी अपने लिए तैयार कर सकते हैं और इससे बन्यकर मुखो जीवन व्यतीत कर सकते हैं, इस वन्धन के डर से मतभेद, प्रकृति-भेद और जितनं इस प्रकार के भेद हैं उसी तरह से भागते हैं जिस तरह से रस्सी की मार से भूत । *Compromise "For better for worse, for richer for poorer, in sickness and in health, till death us do part". ईला का भी यही उपदेश है। कृ. का० मा० - पतियों को सीख [८६ तुम मेरी इस बात को वेद-वाक्य ही समझना कि वैवाहिक- जीवन को सुखमय बनाये रहने का मूलमंत्र एक ही है और वह है एक दूसरे के लिये अधिक से अधिक त्याग करने की वांछा और एक दूसरे की जान देकर भी समुचित सेवा का संकल्प । ईश्वर के लिए यूरोप और अमरीका के चश्मे से ही सब बातो को न देखा करो और अगर यह करना जरूरी ही है तो कृपा कर यूरोप और अमरीका की दशा क्या है और वहां वाले अब क्या सोच रहें है, इसकी ओर भी ध्यान रखा करो। वाप बेटो की प्रकृति में अन्तर है, उनमें नहीं बनती किन्तु वह किसी तरह अपनी खुशी और नाखुशी की बातो मे काट छांट कर गुजर कर लेते हैं, माता पुत्र के दृष्टिकोण में युगों का अन्तर है, मा दकियानूसी, कलहका- रिणी है, पुत्र यूरोप और अमरीका के साथ हवा में उड़ रहा है, किन्तु फिर भी माता, और पुत्र किसी तरह बसर करते ही हैं, भाई बहिन की प्रकृति नहीं मिलती, मॉ बेटी एक दूसरे से कोसो दूर हैं, किन्तु फिर भी एक दूसरे को छोड़ नहीं देती। मित्रों से भी हम सब बातों में मिलते जुलते ही नहीं । यह सब जाने दो, नौकरी करते हो, वकालत करते हो, अधिकारियो से, जजों से नहीं बनती हर वक्त डांट खाने पर मन मसोस कर रह जाते हो और फिर भी गुजर करते ही हो । और जाने दो, इस नौकर- शाही से कौन सा सुख उठा रहे हो, अधिकारीगण, पेट-जीवी, चार पैसे के नौकर, कलक्टर, कमिश्नर, लाट सभी पग पग पर कभी तुमको तंग करते हैं तुम्हारी तनिक नहीं सुनते हैं, तुमको घृणा की दृष्टि से देखते है, तुमको खरी खोटी भी सुना देते हैं और तुमको नीचा दिखाते हैं, फिर भी दफ्तर, कोर्ट, कौंसिल, एसेम्बली और अधिकारियों के पास जाते ही हो। मेरा कहना यह है कि अगर ऐमी और इन सब स्थितियों में तुम निर्वाह कर लेते हो तो एक पत्नी के साथ पति या एक पत्नी, पति के साथ निर्वाह ६० ] सुहागरात क्यों नही कर सकती यह मेरी समझ के वाहर है सच तो यह है कि रूठे को मनाये नहीं फटे को सिलाये नहीं तो संसार में काम ही कैसे चल सकता है। वास्तव में मोहन । वात यह है कि हम सब विवाह के अर्थ और उद्देश्य को ही भूल गये हैं । हम भूल ही गये हैं कि विवाह का अर्थ प्रवृत्तियों की शांति नहीं है विवाह का अर्थ है विकास की सीढियों पर प्रत्येक मिनट ऊपर चढ़ने में अधिक से अधिक एक दूसरे को सहायता और सेवा और एक दूसरे को निवृत्ति के मार्ग के लिए अधिक उपयुक्त बनाना । आशा है मेरीइन बातो पर तुम धीरज के साथ विचार करोगे और इन्द्रियपरायणता और लोकायता के चश्मे से नहीं, जो केवल दुःख के पंक मे हम सब को फंसाने वाला है वरन मंसार को कम से कम परिश्रम में अधिक से अधिक सुख का स्थान बनाने के ध्यान के चश्मे से तुम विवाह और वैवाहिक जीवन के मसलों पर विचार करोगे और निरुपमा की फिक्र से परेशान न होकर अपनी पत्नी के उपयुक्त पति बनने की फिक्र मे अब परेशान होगे। कृपा कर इस बात को भी सदा ध्यान में रखना कि विवाह एक कर्तव्य का पालन है जिसका उद्देश्य है विकास को प्राप्त करना ओर जीवन को अधिक से अधिक स्वर्गीय जीवन के उप- युक्त बनाना । उसकी क्रिया है दूसरे के जीवन को अधिक उपयोगी बनाने के लिए कष्ट सहन और निरन्तर त्याग और सेवा। कर्तव्य पालन में अपनी खुशी, अपनी वासना, अपनी कामना का प्रश्न बहुत कम हुआ करता है। विवाह की चेदी पर बैठ अग्नि तथा अन्य देवताओं को साक्षी दे पति और पत्नी इसी कर्तव्य के पालन का वचन देते हैं और इसी का संकल्प करते हैं। तुम समझ सकते +Materialism पनियों को सीख [.१ हो कि फिर इन निर्वाह में व्यनिगत वुशी, कामनाओं और पम- न्द का नवाल नहीं उठाना चाहिए । इसी दृष्टि से देखने मे सब नर नारी अपने वैवाहिक जीवन को मुखमय बना सकते हैं और अपने जीवन के उद्देश्य की सिद्धि कर सकते हैं। संसार में मेरी मन्द बुद्धि में वैवाहिक समन्या का एकमात्र हल यही है। नुन्हारी- मनोरमा

प्रेम में धोखा विश्वासघात है
मनोरमा-वास,
प्रयाग
y-५-१६२२
"Taking a kiss in the dark has often led
to a man taking a leap in the light."
सुलभामवमनुतेऽसौ कामयेत दुर्लभाममृषामियुक्त च ।
(इति नरशीलम्--रतिरहस्यम् )
प्यारे विहारी,
आज प्रात काल चाय के टेबिल पर बैठी ही थी कि कलकत्ते
के समाचार पत्रों में तुम्हारा और तुम्हारी नई प्रियतमा का चित्र
देखा और तत्सम्बन्धी समाचार पढ़ा। टोस्ट तो मै विना कुचले
ही निगल गई और चाय प्याले में ही पडी पड़ी ठंढी हो गई।
प्राय आठ वर्ष से अपने जीवन के दर्पण मे मैंने तुम्हारी
छटा का तो कहना ही क्या, तुम्हारा प्रतिविम्ब भी नहीं देखा।
तुमको किसी तरह से कष्ट पहुचाने के लिए नहीं वरन् एक तथ्य
बात की भॉति इतना ही कह देना चाहती हूं कि तुम्हारा हमारे
जीवन-श्रोत मे नाममात्र को भी अस्तित्व शेप न था। जिस तरह
मे कुटिल ने कुश की जड मे मठा दे उसको सदा के लिए निस्तेज
कर दिया था, जिस तरह उसने नन्दराज कुज्ञ का अन्त किया था

पतियों को सीख [६३ ठीक उसी तरह से मैने तुम्हारे लिए अपने हृदय मे जो कुछ सहानुभूति और स्नेह था उसको निःशेष किया था। बुरा न मानना सदा से, मालूम नहीं क्यों, तुम्हारे लिए मेरे हृदय में एक प्रकार की माता की सी भावनाएं थी। मैंने उस समय भी तुमको याद होगा, एक बार तुम से कहा था कि एक न एक दिन अपनी भावुकता के कारण तुम विपत्ति मे जरूर पड़ोगे। आज तुम्हारे सम्बन्ध में यह पढ़ कर कि एक युवती विवाहिता लखपती स्त्री के प्रेम-पाश बंध कर उसके साथ तुम भी घर से निकल गये हो और विवाह भी तुम दोनों का होना सहज, साथ ही, सम्भव नहीं और मुकदमा भी चलने वाला है, तुम्हारी इस विपत्ति में मेरा हृदय सहानुभूति से छलकता हुआ, वरबस, प्रच- ण्ड वेग से तुम्हारी ओर भागा जा रहा है। आज मेरा सारा दिन नष्ट हो गया। सूर्य की रश्मियां खिड़- कियों के शीशो से कमरे मे चारो ओर अपना कब्जा जमाती जा रही है। मै आज बाजार जाने को थी, कल पंडितजी की वर्षगांठ है, उनके लिए कुछ प्रेजेन्ट्स लाना चाहती थी, बच्चों के लिए घोतियां लाना चाहती थी, अपने लिए भी सारियां कुछ लेनी थीं, किन्तु अब मैं कैसे जा सकती हूं, जब कि एक, जिसको मैं प्यार की दृष्टि से कभी देखा करती थी, जिसके प्रेम सलिल से कभी मेरा यह हृदय मावित हुआ था, जिसके प्रेमाग्नि से दीप्त स्नेह- मय, चंद्रानन को देखने के लिए कभी मेरा हृदय-समुद्र उमड़ा करता था, इस तरह से संकट में पड़ा हुआ है और जिस समय कि समाज मे चारो ओर उसी की चर्चा है, किन्तु हृदय रखते हुए भी कोई उसके साथ सहानुभूति प्रकट करने का साहस नहीं कर सकता और न उसको आश्वासन या सलाह देने को ही उसके पास फटकता है।

६४] मुहागरात बिहारी ! तुमको वह अन्तिम दिन याद है जिस दिन तुम्हारे नूतन रंगीले बूटेदार रूमाल को मैंने अपने आंसुओं मे तर कर दिया था, जिस दिन मैंने बहुत ही क्रोध मे तुमने कहा था कि तुमसे निवाह मुश्किल है, तुम्हारे माथ कुछ भी व्यवहार रखना नितान्त असम्भव है और तुम मेरे पास मत पाया करो। वह ल्माल अब तक मेरे पास है। मेरा पाउडर वास्स उनी मेधा हुआ है, यद्यपि मैं यह भूल ही गई थी कि यह किसका है और कैस और कब से इस प्रकार मेरे साथ रहने लगा। आज समा- चार पत्रों में तुम्हारा सुदर मुखड़ा देख यह सब बातें याद आ गई। इस समय भी तुममें हृदय बंधने वाला सौंदर्य है, और तुम्हारी नूतन प्रियनमा के सुवबुध खोकर पागल हो जाने पर मुझको तनिक भी आश्चर्य नहीं। किन्तु यह तुमने घोर पाप किया है, यह तुम्हारा ही नटखटपन है, तुम्हारी दुष्टता है और इसके लिए तुमको दंड भी मिलना चाहिए इसके कहने में मुमको तनिक भी संकोच नहीं। मैं पत्र लिख रही हूं, सम्भव है, यह सोच कर कि इस समय भी तुम्हारे साथ किसी को सहानुभूति है और मैं तुम्हारे संवन्ध में चिन्ता कर रही हूं तुमको कुछ संतोष हो और सुख मिले । मैं ईश्वर से प्रार्थना कर रही हूं किन्यायालय तुमको थोड़ा ही दण्ड देकर शांत हो जाय । यह पत्र सम्भव है एक सुदूर जंगल से आती हुई प्रतिध्वनि और आवाज की भाति तुमको प्रतीत हो, संभव है तुम यह भी सोचने लगो कि हम दोनो की प्रेम-कहानी इतनी छोटी क्यों हुई, इतनी जल्दी क्यो समाप्त होगई ? मुमको आश्चर्य न होगा यदि तुमको उस सध्या की भी याद आजाय जिस दिन मैं तुमसे नाराज थी, तुम से बोल नहीं रही थी और जबरदस्ती वुलवाने की चेष्टा में तुमने मेरा हाय दुखा दिया था। किन्तु, विहारी ! ऐसी चोटों से सुख-स्वप्नों का अन्त नहीं पतियों को सीख [६५ हुआ करता । तुमको उन कटु बातो की भी याद आती होगी जो तुम अपनी इच्छा के अनुकूल मुझको चलाने के लिए कभी कभी कहा करते थे। रूठ जाना, घर बैठ रहना, हफ्तों न आना, मेरी वरावर वाली सखी सहेलियों के यहां हाजिरी देना, डाह की अग्नि में नुलसा कर मुझको अपने अनुकूल बनाने की कोशिश और मेरी कठिनाइयों पर मुस्कुराना यह सब तुम को याद होगा। किन्तु सच मानो तुम्हारी इन हरकतों से भी मेरे भावों में अन्तर नहीं पड़ता था। बात यह कि हम लोगों में से जो जीवन की नाट्यशाला में रंगमंच पर स्वयं पात्र बने होते हैं उनको तमाशाअसली वहुत कम दिखाई देता है, वे तमाशा देखनेवाले, तमाशाई न होकर खुद तमाशा होते हैं और इस तरह कुछ देख नहीं सकते । मैं भी तुम्हारे ममान ही एक पात्र के रूप मे थी, इसीलिए मेरी आँखे देखते हुए भी कुछ नहीं देख सकती थी । तुम्हारी त्रुटियो और कमियो से वड़ी व्यया होती थी, किन्तु इनके कारण जर्रा भर कम प्रेम तुमसे मैं नहीं करती थी । तुम घुन्ने और चिड़चिड़े थे, कभी कभी तुम वड़े निर्दयी हो जाते थे, किन्तु यह सब होते हुए भी किसी समय तुम्हारी आकर्षण शक्ति कम नहीं होती थी और तुम सदा प्रेमपात्र ही दिखाई देते थे । सच जानो, मै इन सब त्रुटियो के होते हुए भी तुमको मन-मन्दिर का देवता सदा के लिए बना लेती, बड़े प्रेम भाव से तुम्हारीसदापूजाकरती, तुम्हारे ही सुख को सुख और दुःख को दुख मानती, यदि विधि की विडम्बनासे सहसा एक दिन तुम्हारा एक दूसरे व्यक्ति के प्रति निर्दयता का मुझको पता न चल जाता। यह एक आर्चयजनक सत्य है कि एक स्त्री अपने प्रेमी के हाथो, उसके द्वारा की गई कितनी ही निर्दयता को खुशी से सहन कर सकती है, किन्तु जब वह देखती है कि उसी निर्दयता का कोई दूसरा शिकार है तो उसका तड़पना देख कर स्त्री के सामने तुरन्त ही उस निर्दयता का वीभत्स नन्न स्वरूप खड़ा होजाता है, और श्रपना ६६] नुहागरात उस समय वह देखती है कि वह क्या है, और कितनी अक्षम्य है। तुम यह भी जानलो कि जिस दिन तुम ने "ललिता" की कथा मुझसे कही उसी दिन मे मेरे हृदय में तुम्हारे लिए तनिक भी प्रेम या स्नेह शेप नहीं रहा। मुझको इस समय भी तुम्हारा गर्व सहित यह कथन याद है कि वह कितना तुमसे प्रेम करती थी, तुम्हारी प्रेम-प्रतिमा के सामने उसने किस प्रकार से सर्वस्त्र अर्पण कर दिया था और फिर भी तुमने उसका कैसा त्याग किया और तुमने उसे किस तरह विसार दिया । तुम यह अनुभव ही नहीं कर रहे थे कि तुमने कैसा चोर अत्याचार किया है, और जिस समय मेरे मामने बैठे तुम यह सब बखान कर रहे थे, प्रेम का पड़ा हुआ पर्दा मेरी आंखो से उठ गया और स्वच्छ खुली हुई आंखों से प्रथम बार मैंने तुमको देखा और पहिचाना । इस नाटक मे मेरा कोई पार्ट न था' इस समय एक दर्शक के ही रूप में मैं थी, और मैंने तनिक निकट ने तुम्हारे हृदय और तुम्हारी आत्मा को देखा। मैंने देखा कि पत्थर की तरह वह सख्त है और सदा हिम से ढके हुए कैलाश की भाति वह प्रेम और उप्यताविहीन है। उस क्षण के बाद से मैंने तुम्हारे साथ उदारता का व्यवहार नहीं किया और तुमको कभी किसी बात के लिए माफ भी नहीं कर सकी। तुमको याद होगा कि दूसरे ही दिन मेरी तुम्हारी कितनी हाय हाय हुई थी, क्योंकि एक महासाधारण सी तीखी बात तुमने मुझको कह दी थी। मैं रोने लगी और हजारों कटु वाते मैंने तुमको कही थी। मैंने क्रोध में सब कुछ तुमको कहा था और यह भी कह दिया था कि मैं तुम्हारे सम्बन्ध में कैसी कैसी वीभत्स चाते अव सोचने लगी हूं। तुमने पूछा था कि खियां इतनी विवेक- विहीना क्यों हुआ करती है, तुम मुमसे वहस करना चाहते थे, किन्तु मैंने एक न सुनी और तुम क्रोधित हो जोर से दरवाजा वंद कर चले गये।

पतियों को सीख [६७ ललिता की कथा याद करो। मैं तनिक भी कटु नही होना चाहती, विशेप कर इस समय में जब कि संसार की समस्त सहानु- भूति की तुमको आवश्यकता है, किन्तु मेरे हृदय की रही सही भावुकता मुझे मजबूर कर रही है कि अपने दोनो के मृत-प्रेम के नाम पर तुम्हारे हृदय से इतनी अपील जरूर करू। प्रायः पन्द्रह वर्प का जमाना गुजरा, याद करो, हम तुर स्वर्ग- वासी मि० गोखले का व्याख्यान सुन लौटकर आये थे। ठंढ जोरों से पड़ रही थी, मैं तुम्हारे लिए चाय बनाकर लाई थी और तुम अंगीठी के पास बैठे कोयलों मे कुछ जला रहे थे और मुस्कुरा रहे थे। मैंने पूछा था यह कौनसा स्वांग हो रहा है और तुमने जवाब दिया था, जेब में ललिता के दो पत्र पड़े थे, वर्षों से इस शेरवानी को नहीं पहिना था। मैंने तुमसे पूछा था कि ललिता कौन, उसके पत्र तुम्हारी जेव मे कहां से आये, और धीरे धीरे मैंने सारी कथा तुमसे कहलवा ली थी। उसकी अवस्था १७ वर्ष की ही थी जव तुमसे उससे प्रथम भेट हुई थी। तुम कांग्रेस में स्वयसेवक बन कर गये थे, वह भी स्वयंसेविका थी। तुमने मुझसे बतलाया था कि एक रात्रि मे विषय- निर्वाचिनी समिति में उसका रूप देख कर तुम मुग्ध हो गये । तुम अपने को सम्भाल न सके । तुमने उसका परिचय प्राप्त किया,रोज़ उससे मिलने लगे, कोशिश कर छाया की भांति उसके पीछे रहने लगे और अन्त में तुमने एक दिन सुअवसर देख अपने हृदय की बात उससे कह दी। तुमने यह बतलाया था कि किस प्रकार रोरो कर, उसके चरणों पर सर रख, शपथ खा, तुमने उसको विश्वास दिलाया था और उससे विवाह का वचन प्राप्त किया था। तुमने बतलाया था किस तरह तुम कलकत्ते मे रह गये, किस तरह से उसके माता पिता से तुमने परिचय प्राप्त किया, किस तरह से तुमने ९८] सुहागरात उसके माता पिता की आज्ञा प्राप्त कर परीक्षा के अन्त होते ही जून जुलाई में विवाह करने का तुमने उसे विश्वास दिलाया। वह कलकत्ते में रह कर विवाह को कल्पना में लीन हुई, तुम परीक्षा के अर्थ कालेज में आ गये। तुम अपने दोस्तो और पुस्तकों में ललिता की सुध-बुध भूल गये । अपनी पुरानी सुसाइटी के दोस्तों में तुमको कुछ भी याद न रहा । तुमको अपने पुराने दोस्ती और पुराने शग़लों से फुरसत न थी, उधर ललिता के पत्र तुमको तुम्हारे वचनों की याद दिलाने के लिए वरावर या रहे थे। नम ईमानदारी के साथ अपना पार्ट खेलना चाहते थे, किन्तु तम लाचार थे। तुमने खुद ही कहा था कि वह कांग्रेस की, मुदूर परदेश की प्रेमकथा थी कालेज में उसका वातावरण न था। कहाँ कलकत्ता, युवावन्था का प्रथम जोश, शाम की मनोमुन्धकारी हवा, चारो ओर विजली की रोशनी और स्वच्छ- न्दता और कहाँ कालेज और परीक्षा की चक्की। कलकत्ते का मस्तिष्क ही न था, न मौदा मोल लेने वाला यह सौदाई दिमारा ही था। इसके निवाय, उसके पत्र ही ऐसे होते थे कि किसी रसिकन्हदय को वेगाना कर दे। वे इतने भहेपन से लिखे होते थे, इतनी गलतियाँ उनमे होती थी, विराम इस मही तौर से दिय होते थे कि हृदय की रसिकता सैकड़ी कोस दूर भाग जाती थी। तुम लेखक, साहित्य के प्रेमी, ऐसे पत्र तुम्हारे हृदय पर माला सा काम करते थे। तुम्हारे ऐसे रसिक कवि-हृदय के लिए गसी लड़की के साथ जीवन व्यतीत करना, जो साहित्य से हजारों कोस दूर थी, असंभव था। तुम्हारा हृदय ललिता से भागता था और इस तरह से तुमने अपने अन्तःकरण को समझा लिया। मैंने तुमसे मिन्नत की कि तुम बचे हुए टुकड़े को, जो तुम्हारे हाथ में था मुझको दिखला दो, मैंने पृथ्वी पर सर झुका तुमसे पतियों को सीख [६६ कहा कि मुनको उमना लिखना मात्र दिखला दो, संसार में महलों ही ललिवाएं हैं, मैं क्या जानूंगी कि यह कौन सी है, लम्ब देखने से भी मैं उसे भला कैसे पहिचान सकूँगी, आज क्ल कानवेन्ट की पढ़ी हुई नभी लड़कियाँ प्राय. एक ही तरह मे लिखती हैं। नुमने कागज का टुकड़ा मुमको दे दिया और विश्वास करो आज नक उन पत्र को मैं भूल नहीं सकी हूँ। वह कैसे हृदय रमे लिखा हुआ था. कैसा मार्मिक था । एक एक शब्द इस समय भी मेरे हृदय पर खिचित है । बाज तक विश्वास करी. वमा मर्मभेदी पत्र मैंने नहीं पढ़ा। उसकी सादगी, उसकी नहिना थी और साहिल की छटा का अभाव उसकी सच्चाई की दाद देता था । वहाल्मा का चीलार था। पढ़ते पढ़ते मुझे मालूम होता था कि उसके हाथ तुम्हारे आलिंगन के लिए बढ़ते आ रहे हैं। तुम उसके पत्रों का जवाब नहीं भंजन थे, तुम उसे पत्र नहीं लिखत थे, तुम्हारी चुप से वह नाहत हो रही थी, माहिए वेत्राव, बिना जल की मछली की भांति वह तड़प रही थी, उसकी तड़पन उसके प्रत्येक शब्द में ध्वनित थी। उसने लिखा था-"इसी समय मेरे हदय में यह भाव उठा था कि कदाचित् तुमने हमको विसरा दिया । इस ख्याल से ही मेरी कैसी दशा हुई। मेरा गला बैठ गया, विग्यो बंध गई. और बरबस आँसू प्रचंडवेग से चढ़ दौड़े। प्रियतम विहारी ! ऐसी भावनाओं से मुझ को बचाओ। अगर कहीं ऐसा हुआ, तो विश्वास करो, मैं जीवित नहीं रह मगी । मेरी सखियाँ सब जानती हैं, मैं उनके बीच क्या मुंह दिखाऊँगी। अन्त में उसने लिखा था कि तुमको जिस रंग की सारी पसन्द थी उसी रंग की सारियाँ और जैकट उसने कितनी ही वनाई हैं, इसलिए कि तुन्हारे सामने उनको पहिन कर वह तुम्हारे प्रेम सलिल में स्नान कर सके।

१०.] सुहागरात सोचो तो, अगर इस पत्र मे ठीक ठीक विराम नहीं दिये गये थे, अगर इसमें गला रुघने की जगह बैठ गया था, अगर इसमें ऑसू वरबस चढ़ दौड़े थे, बिग्घी बंध गई थी, तो कहाँ का आससान टूट पड़ा था ? मैं तो कहती हूं कि हजार कमियों के होते हुए भी यह पत्र गर्ने या इवालार्ड और इलोई के सर्वोत्तम प्रेम पत्र के बरावर ही रखा जा सकता है। घिग्घी बन्धने से ही तुम्हारी रसिकता को आघात पहुंचा, तुम्हारे बनावटी प्रेम को किनारा कसने का कारण मिल गया। खूब हो । अगर तुम अपने अहंभाव और अपने बड़प्पन के जोश में अन्धे न होते तो तुम देख सकते थे, कि पत्र हृदय के रक्त और प्रेमाश्रुओं से लिखा हुआ था और विरामों के स्थान हृदय के चीत्कार और आत्मा की पुकार से परिपूर्ण थे। सोचो, यह सब होने पर भी तुमने पत्र का उत्तर नहीं दिया था। मेरे चुनौती देने पर तुमने कहा था कि अपनी चुप्पी से तुम उसे समझा देना चाहते थे कि तुम्हारे भाव बदल गये हैं और तुमको उसकी तनिक भी चिन्ता नहीं है। अपनी चुप्पी से ? बिहारी । क्या इससे भी अधिक हृदय- विहीन उपाय सत्य के प्रकट करने का और हो सकता था ? मैं आज तक अपने को यह न समझा सकी, कि तुम्हारा सा खिलाड़ी, जो क्रिकेट, हाकी, फुटवाल से लेकर, ताश के खेल तक मे किसी वरह की वेईमानी और धोखा पसन्द नहीं करता, प्रेम में इस तरह से धोखा देना कैसे गवारा कर गया १ खूब समझ लो, किसी स्त्री से यह कहना कि अब तुम उससे प्रेम नहीं करते, वास्तव में उससे विश्वासघात करना और उसे धोखा देना है। तुम्हारे हृदय पर तुम्हारा काबू नहीं, तुम किसी से जबर्दस्ती प्रेम नहीं कर सकते, किन्तु तुम चुप्पी को बचा सकते हो, उसे दूर रख सकते हो, चुप्पी, भयानक चुप्पी, क्षणों को पविनों की सीख [१०१ वयों का रूप दे देती है और कितनो ही की जीवन-नौका को प्रेम समुद्र की पापाण-शिजाओं से टकरा कर नष्ट-भ्रष्ट कर देती है। हमारा तुम्हारा प्रेम, तुम कहते थे, दूसरा है । यह युवावस्था का प्रथम उफान नहीं हैं। तुम कहते थे हम तुम एक ही शहर में रहते हैं, रोज कालेज में, कालेज के बाहर, घर में मिलते हैं । एक दूसरे से भले प्रकार परिचित हैं, जवानी के जोश और भावुकता पर नहीं वरन् विवेक की नीव पर हम लोगों का प्रेम स्थित है। बिजली की तड़क भड़क, कलकत्ते की सन्ध्या की मनोमुग्यकारी हवा और नववयस की उच्छृखलता और स्वच्छ- दवा का इसमें हाय नहीं है। आँख खोल कर, सब कुछ देखते हुए, होश में, वेसुध नहीं, हम लोगों का विवाह होगा और हम लोग इसलिए सदा सुखी रहेंगे, किन्तु मेरा हृदय कुछ और ही कहा करता था। मेरा हदय किसी तरह से यह मानना ही न या कि जिस मनुष्य ने ऐसे पत्र का उत्तर न दिया हो, उसके साय सुखी जीवन व्यतीत हो सकता है। इस घटना से मेरे हृदय में सच जानो, तुम्हारे लिए तनिक भी प्रेम नहीं रह गया या । यह मत समझो कि मैं अपने हृदय की विशालता प्रकट करने के लिए यह सब कह रही हूं। "ललिता" के व्यक्तिकात सुख में मेरा कोई स्वार्य न था, उसको मैं जानती भी न थी, मैं अपने ही स्वार्यों की रक्षा से प्रेरित थी, मैं यह देख रही थी कि जो मनुष्य इतना निर्दयी एक के साय हो सकता है, वह दूसरे के साथ और मेरे प्रति भी उसी प्रकार निर्दय हो सकता है। सच मानों ललिता के प्रति तुम्हारे व्यवहार ने मेरे हदय की प्रेनाग्नि पर मनों वर्फ का काम किया और वह सदा के लिये मैं तुमको दोष नहीं देती। कितनी ही बातों में तुम आदरणीय और सर्वोचम प्रेम के पात्र थे, तुममें बड़ी आकर्षण शक्ति थी, बुझगयी।

१०२] मुहागरात तुममें गुण अनेक ये फिन्तु तुम्हारी मर्वश्रेष्ट कमी तुम्हारी स्वयम अपने को धोखा देने की शक्ति थी। तुमने अपने को धोखा दिया यह समन कर कि तुम प्रेम करते हो, किन्तु जब तुमने देखा कि वास्तव में वह प्रेम नहीं है और उसमे निकलना चाहा तो तुमने अपने मनगढन्न विचारों से अपने अन्तःकरण को समझ लिया और उसे बोध दे लिया। मुनको इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि तुन्दारे जीवन में कितनी ही ललिताएँ पानी के बुलबुलों की ममान पैदा हुई होगी और मिटी होगी और हरएक के बारे में तुमने अपने नर्क से अपने अन्तःकरण को बोध दे लिया होगा। बिहारी! तुम नहीं जानते कि संसार में मुख स्वप्नों को नष्ट करने वाली सहबों ही गलत विरामों वाले पत्र के नमान ही अन्य बातें भी हैं। किन्तु विहारी ! यह तुम्हारा ही व्वन्तिगत दोष नहीं । यह तो संसार के समस्त मर्दो की वानी है। दुनियाँ के समन्त मई अपने अभिमान में इतने चूर होते हैं और अपने को इतना बड़ा समझते हैं कि वे किसी स्त्री के साथ कैसा ही बेजा, हीन और बुरा व्यवहार क्यों न करें, उसे वह किनना ही कष्ट क्यों न पहुँ- चायें, वे समझते हैं कि उसके समस्त कष्टों का मावजा उसको उनले एक चुम्वन में मिल जाता है। यही नहीं, तुम्हारे ही नमान संनार के समस्त मदों की दशा यह है कि वह प्रथम ही प्रेम करते है और प्रथम ही लड़कर अलग भी होते हैं। बिहारी! यहमव तुम्हारा कुमूर नहीं यह हम सबका अमान्य है। और इन मंमार की विचित्रता भी है। यहाँ पवित्र पुरुण निकृष्ट वियों के प्रेम में पागल होता है। निकृष्ट विया महापवित्र मत्युत्पों के चरणों में खेलने को दीवानी होजाया करती हैं। लन्चे पुरुष यौनी रियों के अवर चुम्वन के लिए मजनू होजाते है और बानी बियाँ ताइ ने लन्वे पुरुष के वक्षःस्थल पर मुख ने पतियों को सीख [१०३ सोने के लिये लैला की भॉति लालायित होती हैं। इस संसार में यह भी याद रखो, मूरों का विवाह प्राय. ऐसी बुद्धिमती स्त्रियों से होता है जो संमार पर राज करने की क्षमता रखती हैं और चतुर झविद्वानों को ऐसी स्त्रियाँ मिलती है जिनको लिवा हाय हाय करने के कुछ प्राता ही नहीं। बिहारी । संसार विचित्रतामय है और इसकी सबसे बड़ी विचित्रता यही है कि यहाँ शेप भाग, छोर, बिलकुल विपरीत और विरुद्ध ( Extremes ) एक दूसरे मे मिलते हैं, एक समान और सहश जीव ( Affinities) करोडो मे एक दो ही मिलते हैं अपने पुराने प्रेमियों और अपनी प्रेम-कहानियों पर कभी कभी मैं विचार किया करती हूँ, कभी कभी किसी किसी के बारे मे शंका उठ जाया करती है कि उसको किस श्रेणी में रखू । तुम्हारे सन्बन्ध मे, विहारी, मैंने बहुत विचार किया है और तुम्हारे समस्त गुणों और अवगुणों को लोच कर मैंने तुम्हारे लिये ( dear bad man ) "डियर बैड मैन' की उपाधि निश्चित की है। तुम्हारे अल्हड़पन मे तुम्हारे हृदय को सुकुमारता और विचित्र मृदुलता का अच्छा समिश्रण है, और तुम्हारी निर्द- यता उसी प्रकार की है जैसी उन लड़कों की होती है जो अपने स्नेह के पाले तोते या मैने को सता कर ही खुश होते हैं। बिहारी । ऊँचे चढ़कर देखा घर घर ये ही लेखा' हम सब जैसे के तैसे हैं, कमियों के केन्द्र हैं, न अच्छे हैं, न बुरे हैं और सच पूछो तो अच्छे बुरे में चार अँगुल का ही तो फर्क है। अक्सर मंमार मे बुरे मनुष्यो का बहुत ही सुंदर हृदय देखा * "कहीं कहीं गोपाल की, गई चौकड़ी भूल, काबुल में मेवा कियो, ब्रज में कियो बबूल |" १०४ ] सुहागरात गया है, साथ ही अक्सर भले मानुसों का एक मिनट भी साथ असह्य हो जाता है। ए जोक किसको चश्मे हिकारत से देखिये, सब हम से हैं जियादा कोई हम से नहीं" तुम सहज ही में ठीक हो सकते हो अगर तनिक तुम यह सोचने लगो कि जीवन उत्तरदायित्व पूर्ण है और उसके दायित्व का वहन परमावश्यक है। एक समय में मैं यह सोचा करती थी कि तुम जीवन के उत्त- रदायित्व को अनुभव करने लगोगे । अक्सर कल्पना में मैं तुमको विस्तर पर बैठे हुये, एक अपने ही छोटे संस्करण को ईश्वर को प्रार्थना सिखाते हुये देखा करती थी। मैं चित्रित करती थी कि तुम कह रहे हो “ईश्वर मुनुवा को अच्छा वालक वना दे," तुम भी बड़ी गम्भीरता के साथ इसकी चर्चा किया करते थे, मानो पलने पर पड़े हुये चालक को अच्छे होने की जरूरत है। सृष्टि के प्रारम्भ से सब युगों में और सभी प्रदेशों में वयस्क चुरे मनुष्यों ने पवित्रामा सुन्दर वालको को ऐसी शिक्षा दी है, फिर भी आश्चर्य है कि छोटे लड़के नटखट होते गये और बड़े धीरे धीरे सुधर गये। मैं आशा करती हूँ कि तुम्हारे सम्बन्ध में भी यही सत्य चरि- । तार्थ होगा। तुम्हारी- मनोरमा

प्रेम स्थायी हो नहीं सकता
मनोरमा-बान
प्रयाग
१-१-१९२३
"It is one of noture's elementary lays that
our senses may be satisfied but not indulged
in
कामनःप्रीतिननन योषिताम् मानवधनम् ।
कन्या विनम्मान वत्ति स तानाम् प्रिया मंत् ।।
(गति रहस्यम्)
विहारी. रसिक, प्रेम, गोपी, मोहन,
न्यमावत. तुम सोचते होगे कि जब मैंन तुम लोगों की
त्रुटियों के मन्बन्ध में इतने लेञ्चर दिये हैं नो क्रम मे क्रम मैंन
या कामी प्रात्मनः प्रीतिजनन, योपिताम ब्रांगाम गगवर्धनम्
न्या विचन्मयां, कन्या भाग्यं च वनि. नाति मः तानां ऋन्याना
प्रिया भवेत् ।" (रतिरहस्यम् )

१०६ ] मुहागरात बहुत सोच समझ कर अपने पति को ढूंढा तथा पसन्द किया होगा, मेरा पति मनुष्य-विशेष होगा और उसमें एक भी त्रुटि न होगी, किन्तु तुम लोगों को यह सुनकर आश्चर्य होगा कि मेरे पंडितजी के सम्बन्ध में ऐसी कोई भी बात ठीक नहीं है वह बहुत ही साधारण मनुष्य हैं, उनमें कोई विशेषता नहीं है, साथ ही त्रुटियों और कमियों का उनको मजमुआया भंडार कहाजायतो वेजा न होगा । साधारणतया वह हृष्ट पुष्ट, मुदर, सुडोल मनुष्य हैं, भले घर के हैं और भले यादमी हैं। उनके पास स्यया अधिक नहीं, साधारण स्थिति के मनुष्य हैं और परिश्रम कर अपना जीवन निर्वाह करते हैं। जिस समय मैंने उनको प्रथम प्रथम देखा था उस समय भी उनकी यही स्थिति थी और आज भी उनकी दशा यही है। एक बात और कहदूं, मैंने उनके प्रेम मे मत्त हो विवाह नहीं किया। कम से कम वह प्रेम वसा पागल करने वाला, प्रलयकारी, विद्युत सचार करनेवाला या मोहान्य करने वाला न था जैसा कि तुम लोगों में से किसी किसी के प्रति मेरे हृदय में कभी था । इन पतिजी के लिए मेरे हृदय में शुरू शुरू में एक दूसरे ही प्रकार का प्रेम था और वह था उस प्रकार का जैसा माताओं के हृदय में अपने छोटे पेट पोछनेवाले बच्चे के लिए हो जाया करता है जब वे उसे अच्छा बनाने की चेष्टा करते करते निराश हो प्रयत्न करना छोड़कर चुप बैठ जाती हैं । पंडितजी मे तुम लोगों की अपेक्षा कोई भी विशेषता नहीं है, वरन प्रेम को शब्दो या भावी द्वारा प्रगट करने मे, प्रेम की भाषा बोलने में ये तुम लोगों का मुकाबला करना तो दूर रहा, तुम लोगों ने बहुत पिछड़े हुए है, किन्तु तुम लोगों से यह अनुभवहीन नहीं हैं। तुम लोग कालेज में पढ़ने वाले या कालेज से ताजे निकले हुए थे, किन्तु यह दुनियासाज और दुनियां देखे हुए हैं। इनकी उम्र भी तुम लोगों से अधिक है। यह न ममम लेना कि किसी तरह मे यह . पतियों को सीख [१०७ बुड्ढे हैं या इनकी उम्र ढल चली है। जैसा कि मैं ऊपर लिख चुकी हूँ यह खासे हृष्ट पुष्ट और युवा पुरुप है, प्रात स्नायी हैं और सदा ठढे पानी से स्नान करते हैं। छः साढ़े छः बजे तक स्नान धान मे छुट्टी पा यह अपने काम मे लग जाते हैं। यह भी बतलादूं कि जिस तरह से स्नान और भोजन नित्य नियम है उसी तरह से १५ मिनट कसरत का करना भी नित्य नियम ही है। संसार मे कुछ होजाय पंडितजी कसरत करने में आलस्य और नागा कभी नहीं करते। (कसरत ही की भांति यह आम और दुग्ध के भीप्रेमी हैं, कुछ हो, कहीं से अगर आम मिल सकता है तोजरूर खायंगे, पेट भर खायंगे) इससे तुम लोग यह समझ सकते हो कि दिनका प्रारम्भ सुन्दर और मेरे पति के योग्य ही होता है। इनमे किसी प्रकार की कोई गन्दी बुरी यादते है या नहीं, मैं कह नहीं सकती, किन्तु यदि हो और दिखाई देने लगे तो वह मेरे असंतोप या नैराश्य का कारण नहीं होगी, क्योंकि मैंने विवाह करने के पहिले असाधारण बातो और मुख स्वप्नों की आशा ही नहीं की थी। मैंने एक महासाधारण, जैसे संसार मे प्रायः हुना करते है मनुष्य समन कर ही इनसे विवाह किया था। मैने इतना ही देख लिया था कि यह हवा के झोको के साथ उड़ने वाले नहीं हैं, दुनियां देखे, अनुभवी, स्थिर-प्रकृति और समझदार हैं । प्रात.- स्नायी और एक निर्दिष्ट अपने ही नियम का घड़ी की सुई को भांति पालन करने वाले हैं, अपना भला बुरा समझते है, विचारों को रखते है और उनके अनुसार काम भी कर सकते हैं । मैने यह भी देख लिया था कि यह एक बहुत ही साधारण मनुष्य है, नब्बे फी सैकड़ा आदि पुरुप की ही विशेपताओ वाले हैं, किन्तु मेरे हृदय के निर्मित सांचे में पूर्णरूप से ढल जाने में इनको विरोध या आपत्ति न होगी केवल अगर मै बुद्धि और विवेक से ऐसा कर सकू । नुम लोगो को यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि:

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पवियों को सीख [ १०६ और दूमरो के शासन की शक्ति है, उसकी सब से सहज किन्तु सब से कठिन परीक्षा यही है । तात्पर्य यह कि इन बातो पर हम लोगो का प्रेम स्तम्भित नहीं है और इस तरह मे उसके जल्दी फीके पड़ने की सम्भावना हम लोगों ने दूर कर दी है। मैं यह जानती थी कि रूप और यौवन नाशवान है, बढ़ने के स्थान पर हजार मुलम्मेवाजी पर भी यह क्षीण होगा, पुरुप की कामवासना नित्य के सहवास से और उम्र के तकाजे से कम होगी, साथ ही इसकी अधिकता स्वास्थ्य के लिए हानिकर होती है, इन्ही बातों को ध्यान में रख कर हम लोगों ने इसे कम मह- त्व प्रदान किया। हम लोगों ने स्थायी प्रेम, स्नेह और मित्रता के लिए एक दूसरे की अपनी शक्ति के अनुसार सेवा करना निश्चित किया, सदा दूसरे का हर वातों मे, हर समय में लेहाज रखना निश्चित किया, यही नहीं, अपनी शक्ति भर दूसरे की आवश्यक- ताओ की पूर्ति और दूसरे को प्रसन्न रखने का हम लोगो ने संक- ल्प किया और दोनों का एक दूसरे के प्रति सिद्धान्त यही रहा, ( Unconditional surrender ) विना यूँ चरा के पूरा आत्म-समर्पण । एक बात और कह दूं, मैंने यह नहीं खा रखा कि आध घटे मे वह दर्जन वार मेरा चुम्बन करते, या घड़ी घड़ी मेरा मुख निहारा करते । इस कारण से अगर सौन्दर्य कम होने पर या समय की गति से वह मेरी ओर से इन बातों मे उदासीन होंगे तो मेरा हृदय टूटेगा नहीं और वह भग्न हो बैठने नहीं लगेगा। उनके सामने हर समय मैं गुड़िया भी नहीं बनी रहती और न रंगी चुगी हर वक्त बनी ही रहती हूं । उन्होंने मुझे साधा- रण सादी धोतियों मे घर का काम काज और प्रबन्ध करते देखा है, तरकारी वनाते और अचारों के घड़ों में पड़े हुए मेरे हाथों को भी देखा है। मैने यथाशक्ति अपने असली आत्मा और अपने रूप से उनको परिचित करा दिया है, उस रूप और उस आत्मा .

११.] सुहागरात से जिसे वह नित्य सुवह और दिन में हर समय काम काज करते देखेंगे। हर समय उनके सामने होने के पहिले मैं शीशे के सामने नहीं होलिया करती। इन बातों के सम्बन्ध में मैंने केवल सफाई और पवित्रता की ओर ही सदा ध्यान रखा है। मै सदा बहुत ही साफ कपड़े पहिनतो हूं, इसलिए नहीं कि वह उससे प्रसन्न हों, मैं पहिनती हूं इसलिए क्योकि गन्दे कपड़ों का पहिनना शारीरिक और मानसिक दोनों स्वास्थ्य के लिए हानिकर है, क्योकि कपड़ों का मैल नागवार न लगने से, आत्मा का मैला होना भी एक दिन सह सकता है और इसलिए भी क्योंकि गन्दगी मुझको स्वयम् पसन्द नहीं । "अंदर छूत नहीं बाहर कहें दूर दूर" की मैं पुजारिन नहीं । हा, सुबह स्नान करने के समय, जैसा प्रत्येक सभ्न स्त्री को चाहिए, टीका टिकुली जरूर लगाती हूं और अपने शरीर की रक्षा के लिए शृंगार जरूर करती है। इसी कारण से क्यों कि जानती हू कि टेबिल, कुर्सी-मेज वगैरह भी साफ-सुथरे और उनकी पालिश ठीक रहने से अधिक दिन तक मजबूत और अच्छे रहते हैं। हां, इस बात का जरूर लिहाज रखती हूं कि जो उनको अप्रिय हो या उनको प्रिय न हो वह काम में नहीं करती। जो उनको पसन्द न हों उन उपड़ों को मैं कभी नहीं पहनती और न उनकी इच्छा के विरुद्ध आचरण ही करती हूं। रात्रि का श्रृंगार उनकी इच्छानुकूल ही होता है, सारियां या गहने जो उनको प्रिय हैं या जिनके लिए उनका आग्रह रहता है, उन्हीं को सदा धारण करती हूँ। एक बात और कह दूं, अनेक स्त्रिां बाहर जाने के समय, व्याह शादियों में, दावतों में, मेले- तमाशे में जाने के समय सुन्दर से सुन्दर भड़कीले, चमकीले या चमक दमक वाले कपड़े और गहने पहनती हैं , अपना सर्वश्रेष्ट पतियों को सीख [ १११ शृङ्गार वह दूसरों को दिखाने के लिए करती हैं, मैंन इसके विप- रीत नियम यह रखा है कि मेरे पास और मुझमे जो सर्वश्रेष्ठ है वह सदा पंडितजी के लिए है जो करती हूं वह उन्हीं के लिए करती हूँ। जो जेवर कपड़े जिस रात्रि में मुझे पहनने होते हैं, उनको दिन में या शाम को अपने शयनागार में सुसजित कर रख देती हूं और रात में पंडितजी के कमरे में आने के पहिले उनको धारण कर लेती हूं । रात्रि में ही या सुबह तक वह उतर भी जाते हैं। खियों में मैंने एक विचित्र प्रथा नोट की है, बाहर जाते समय तो वह दो सौ चार सौ और पांच सौ की सारियां पहन कर जायंगी, किन्तु पति को, उनको उन सारियों में देखना भी नसीव नहीं हे ता। जो सारियो का देने वाला और गहनों का वनानेवाला है, वहीं उनकी छटा और सौन्दर्य को देखने से वंचित रखा जाता है। एक बात और कह दूं, स्त्रियां अपनी शोभा भड़कीली सारियों और गहनों से दबी रहने में समझती हैं, मैं इसके विपरीत इसकी ओर अधिक ध्यान रखती हूं कि सादगी और मुहावनापन किसमें है ? कौनसी चीज किससे साथ मेल खाती है ? और कम से कम वोम लाद कर अधिक से अधिक शोभा ओ में कैसे प्राप्त कर सकती हूं ? "ह जवानी खुद जवानी का सिंगार, सादा गहना है इस सिन के लिए" मैंने इसी तरह से प्रयत्न कर पंडितजी को उनके असली रूप में देखने की चेष्टा की है। एक दो बार उनके दफ्तर में ऐसे समय में चली गयी हूं जब कि वह अनुमने थे, लान्त थे, खीजे हुए थे या क्रुद्ध या चिड़चिड़े हो रहे थे । मैंने चौबीस और अड़तालीस घंटे की बढ़ी हुई दादी में भी उनको देखा है । इस कारण से तकिये पर पड़े हुए उनके गड़ते हुए वालद्वार गालों को देख मैं विचलित नहीं हूंगी।

११२] मुहागरात यह मत्र याने तुम लोगों को महा साचारा. व्यावहारिक भावुकता की हत्या काने वाली, मांसारिक और पर्गीय नहीं यग्न पृथ्वीतल की प्रतीत होगी, तुमने एक, कम से कम, मुमार यह अभियोग लगायेगा कि पटितनी में मेग विधान नहीं है मैं उनने प्रेम नहीं करती और यह कि बिना न्वर्गीय प्रेम ने प्रेरित हुए ही मैंने उनमे विवाह कर लिया है। मेरा जवाब इतना ही है कि यह किमी का मोचना निर्मल और गलन होगा। में पंडितजी का पूर्ण विचम करती हु, मेरा उनके प्रति अगाध न्नेह भी है किन्तु मैं इतनी मुर्म नहीं कि मैं मानव-हदय रुवी भ्यानमुखी का भी विश्वास का नाय ही में यह भी जानती हूं कि यह (wild) जंगली, अनियमित, अंकुश होन, पागल करने वाला, मर्यनाराक प्रेम जो प्रेमीगण एक दूसरे के प्रति अनुभव करते हैं, स्थानी हो नहीं सकता, अगर यह न्यायी हो मं भी नो यह उनकी हत्या श्रीर उनका वातमा कर देगा। हमारा नो यह विश्वास है कि प्रेम स्थायी हो नहीं नकता जब तक कि विवाह उसका ऐसा रूपान्तर न करदे कि वह प्रेम हीन प्रतीत हो। मच तो यह कि मचा और अमली विवाह तो तब ही शुरु होना है जब अन्य मत्र मानवी मंबन्ध यहां तक कि इन्द्रियो- पासना और इन्द्रियों का मंसर्ग (Sexual intimacy) मी यल हो जाता है. जब "मे" और "तुम" के शब्दों का अम्नित्व ही, कम से कम पति और पत्नी के मनार में, शेप नहीं रह जाता। मंसार के निवामियों ने एक बड़ी भूल कर रखी है। हम लोगों ने 'विवाह' और "विवाह की प्रथा" को पर्यायवाचक शब्द ममम लिया है, किन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। "विवाह का अर्थ है दो आत्माओं और उनके साथ ही उनके दो शरीरों का भी परस्पर लय, इसके विपरीत "विवाह की प्रथा" पुरुष और बी की आत्मा के नहीं, वरन, उनके पतियों को सीख [ ११३ शरीरों के और उनके सामाजिक संवन्य को-जो प्रायः नाम मात्र में ही "विवाहतहश पवित्र नाम से पुकारा जा सकता है, धर्मानुकूल बना देने का नियम और आयोजन मात्र हैं। सच्चा विवाह, संभव है, पाधा पुरोहित के और सामाजिक विवाह से उत्पन्न हो या न हो। यह भी संभव है कि कोरे प्रेम से भी सच्चा विवाह हो या न हो । पाशविक आकर्पण भी हो, प्रेम भी हो, दोनों की प्रकृति और मस्तिष्क की गति भी एक समान हो किन्तु फिर भी सच्चा "विवाह होगा नहीं, हो सकता नहीं, जब तक कि दोनों में चरित्र और नियमन की शक्ति न हो, क्योंकि इन्हीं दोनों की सहायता से जीवन में वह स्वरैक्य, सान्य और समता (Harmony) पैदा हो सकती है जिसके विना सम्मिलित जीवन (Joint life) और स्वर्गीय विवाह का स्वान एक शब्द-जाल मात्र है। एक वात और भी कह दूं, प्रेम और घृणा ( Love andhatred ) प्रायः भाई बहिन ही के समान हैं और साथ ही चलते हैं, इसलिए अगर मैं कोरे, अन्ये प्रेम से पागल हो विवाह करती भी तो मैं एक सप्ताह पंडितजी से प्रेम करती, दूसरे सप्ताह में उनसे घृणा करती और तब कदाचित् दोनों का हृदय कुछ दिनों बाद एक दूसरे से दूर भी हो जाता और यह सब सुखमन वैवाहिक जीवन के लिए विप होता। किन्तु, इस बात के साथ ही साथ तुम लोगों को इस सत्य को भी सदा ध्यान में रखना चाहिए कि अगर अपनी पत्नी से तुमको प्रेम है, और प्रेमवश ही तुमने उसे पनी बनाया है, तो इस प्रेम की सहायता से भी अदि विवेक की हत्या नहीं कर दी गई है तो वैवाहिक जीवन सुखमय हो सकता है और जीवन में जिस अनुष्ठान में लगो, उसी में तुमको सफलता भी प्राप हो सकती है।

. ११४ ] सुहागरात पश्चिमीय की अपेक्षा भारतीय विवाह-पद्धति इसीलिए अच्छी 'है । यह सत्य है कि इसमें पश्चिमीय सी मादकता प्रथम मिलन 'में नहीं, किन्तु इस की विशेषता यह है कि इसकी प्रीति दिन दिन गादी होती रहती है, स्थायी स्नेह की नीव इससे दिन दिन मज- 'घूत होती रहती है जव की पश्चिमीय विवाह मे प्रथम उफान के बाद प्रेम काफूर की तरह दिन दिन उड़ता और कम होता रहता है। पंडितजी व्यर्थ की बातें नहीं करते, उपयुक्त समय पर उप- युक्त शब्दों का ही व्यवहार करते हैं, मेरे सुख दुःख की उनको चिन्ता रहती है, मेरी भलाई और रक्षा का उनको सदा ख्याल रहता है और उसके लिए यथाशक्ति, जो सम्भव हो, करने को तैयार रहते हैं, मैं इतने से ही पूर्णरूप से सन्तुष्ट हूँ। मैंने कभी उनकी प्रेम-कथाओं को सुनना नहीं चाहा और न कभी उन्होंने भूल कर उनकी ओर इशारा ही किया। किसी के सौन्दर्य से वह मेरे आंख, कान, नाक, होठ की तुलना मेरे पास बैठे या लेटे हुए करते हो तो मैं नहीं जानती और न इन ख्याल से विचलित ही 'होती हूं, क्योंकि मुझ से छिपा नहीं कि एक डाह की इस प्रकार की प्रकृति के कारण ही स्त्री ससार की आदिशक्ति और देवी के पद से गिर कर दासी होगयी। मैंने कभी उनसे यह नहीं यूछा कि किसने उनको चतुर नायक बना दिया । मैंने शुरू में ही 'उनसे कह दिया था कि इन बातो की मुझसे कभी चर्चा न करि- येगा, साथ ही कोई भी ऐसी बात मुझसे न कहियेगा जो आज से दश वर्ष बाद आप उसी सत्यता और हृदय से मुझसे न कह सकें। पति प्राय' यह भूल किया करते हैं कि अपनी पुरानी प्रेम- कथाओं को वह अपनी प्रेमिकाओं को सुनाया करते हैं। इस तरह से अपने पूर्व जीवन को फिर वह रसास्वादन कर पान- न्दित होते हैं, साथ ही अपनी प्रशंसा और विजय की कथा में स्वभावतः उनको बड़ा आनन्द मिलता है, किन्तु वे यह भूल जाते ।

पतियों को सीख [ ११५ हैं कि जिससे वे बातें करते रहते हैं, उसकी दशा उन बातों को सुनकर क्या होती रहती है। किसी स्त्री को भी अपने प्रेमी के मुख से दूसरी खो के प्रति उसके प्रेम की कथा बड़ी दुःखदायी होती है । किसी दूसरी स्त्री की प्रशंसा भी अगर उससे पति का प्रेम झलकता हो, किसी भी पत्नी को सह्य नहीं होती । पंडितजी विशेष रूप से इन वातों का ख्याल रखते हैं। एक बात और जो हम लोगो में तर है उसे भी सुना देना चाहती हूं। हम लोग कभी एक दूसरे से कुछ छिपावेंगे नहीं ओर न कभी एक दूसर को धोखा देंगे । पडितजी अगर कभी कचहरी से उठ कर, किसो मीटिंग से या घर ही से शाम को कभी अपनी किसी पूर्व परिचिता, विवाहिता स्त्री मित्र के पास गप-शप करने चले जायगे तो इसके लिए यह जरूरी न होगा कि वह आकर यह कहें कि वे म्यूनिसिपेलिटी की मीटिग मे थे या कि किसी बुजुर्ग वकील के पास किसी मुकदमे के सम्बन्ध में सलाह ले रहे थे। हम लोगों ने यह तय कर लिया है "तुम्हें चाहूं तुम्हार चाहने वालों को भी चाहूं" यह सम्भव नहीं । मैं पंडितजी से प्रेम करती हूँ किन्तु इससे यह सम्भव नहीं कि पंडितजी के सब मित्र भी मुझको पसन्द हो । रसिक प्यारे, विवाह से व्यक्तियों का स्वभाव, उनकी रुचि, प्रकृति नहीं बदल सकती। दो जीवनों को बिलकुल एक करदेने की कोशिश वेकार है, अधिक से अधिक जो हम लोग कर सकते हैं इतना ही है कि हम लोग दोनों जीवनों को अधिक से अधिक एक दूसरे के साथ मेल खाने वाला बनादें। सदा स्वप्नों में लीन और आदर्श के पीछे सर उघारे नंगे पांव दौड़ने वाले "गोपी! तुमको यह सुनकर और भी आश्चर्य होगा कि पंडितजी ने और हमने विवाह सम्बन्धी और वैवाहिक- नीवन सम्बन्धी सभी वातो पर अच्छी तरह खूब तर्क करके ११९ ] सुहागरात विचार कर लिया है और सभी अनुपतिक वाता के सम्बन्ध में अपना अपना कर्तव्य तय कर लिया है। गहना, कपड़ा, गृहस्थी का खर्च, बच्चों का प्रबन्ध, हमारा पाकेट खर्च, नौकर चाकर, प्राय. सभी बातों के सम्बन्ध में फैसला हो चुका है और मुमको इन बातो के तय करने में तनिक भी कठिनाई प्रतीत नहीं हुई। पंडितजी इतने स्थिर-बुद्धि और दुनियादार मनुष्य हैं कि ऐसी कल्पना-विहीन, सांसारिक पृथ्वीतल की वाती के करने में इस भय ने मुझको नहीं सताया कि प्रेम तथा कल्पनापूर्ण स्वप्नी का ध्वंस हो जायगा था कि हृदय के बढ़ते हुए प्रेम-प्रवाह का श्रोत रुक जायगा। विहारी! जेबखर्च की बात सुनकर हंसते होंगे, किन्तु याद रखो समय पर खर्च न होने से कभी कभी स्त्री को बहुत कष्ट होता है। इसके साथ ही हर वक्त मनुष्य की तबियत एक सी नहीं रहती। पति पत्नी के जीवन में ऐसे भी अवसर होते हैं जब वे खिन्न होते हैं, जब पति पत्नी की अवहेलना करता है या उससे असतुष्ट होता है या पत्नी ही पति से असंतुष्ट या खिन्न होती है और पति से कुछ कहना नहीं चाहती और पैसा मॉगना तो पहाड़ सम ही दिखाई देता है। ऐसे समयों में साधारण अपनी या गृहस्थी की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये पति के सामने हाय पसारना और पैसों के लिए सर नमाना उसे बड़ा दुःखदायी होता है। अच्छा तरीका इसलिए यह है कि रुपयो पैसो की माल- किन स्त्री पहिले से ही बना दी जाय, कमाई पति की बैंक मे ही हो, किन्तु जितना घर गृहम्धी और स्त्री के लिये आवश्यक हो वह उसे मास के श्रारम्भ होते ही मिल जाया करे। वैवाहिक जीवन की साधारण किन्तु परमावश्यक बातों को इस तरह से निश्चित कर हम लोग उसके धार्मिक और कंटकमय पथ पर अग्रसर होने को पूर्णरूप से तैयार और स्वतंत्र हैं।

पतियों को सीख [११७ एक वात और भी बतला दूं, पन्डितजी बिना मेरी मर्जी के मुझको छ भी नहीं सकते, क्योंकि हम लोगो ने यह तय कर लिया है कि कामवासना की तृप्ति विना दोनों की पूर्ण कामना के प्रशंसनीय और वॉलनीय नहीं है और जीवन के इस विभाग का दफ्तर जितना वन्द रहे उतना ही अच्छा है। कामवासना की तृप्ति का सदा शरीर से ही सम्बन्ध है और शरीर ही के सामने यह उपयोगी भी है। आत्मा और शरीर, जीव और जड़ में श्रादि काल से ही युद्ध चला आ रहा है। शरीर आत्मा।के लिये जरूरी जरूर है, किन्तु इसके साथ ही आत्मा को हीन बनाने वाला भी शरीर ही होता है, इसलिये आत्मा की उन्नति और विकास चाहने वाले को अपने जड़ और शरीर को सदा अपने आधीन ही रखना चाहिए। यह हमको याद रखना चाहिये कि आत्मा के लिये शरीर नितान्त आवश्यक होता हुआ भी वस्तुतः केवल साधन मात्र है और स्वयमेव कुछ नहीं है। हम लोगों ने यह भी तय कर लिया है कि प्रेम की रही सही मादकता के क्षीण होने पर हम लोग अपने बच्चों के जीवन में फिर से नवीन रूप से जीवन वहन करेंगे। स्थायी स्नेह और सुख का मूल मन्त्र यही है । हजार वाते पति पत्नी में मतभेद की हो सकती हैं, किन्तु बच्चों की भलाई, उनके सुख की चिन्ता और प्रवन्ध में संसार की समस्त वातों को भूल कर वे एक हो सकते हैं और बच्चों को सुख में अपने समस्त दुःखो को भूल सकते हैं। हम लोगो का इसलिए संकल्प है कि जो कठिनाइयाँ हम लोगों ने अपने जीवन में अनुभव को है, अपने अनुभव से उन कठिना- इयों से अपने बच्चों को सदा बचायेंगे, अपने अनुभव से हम लोग उनके मार्ग को सदा कंटकविहीन बनाने की चेष्टा करेंगे और अपने ज्ञान से उनको संसार के लिये सब प्रकार से उपयुक्त

।
-
११८]
मुहागरात
वनाने की हम लोग चेप्टा करेंगे। उनके जीवन के बाल-काल में
हम लोग अपना वाल सुख देखेंगे, उनकी युवा अवस्था में हम
लोग युवा अवस्था का सुख उपभोग करेंगे, और इस क्रम से हर
तरह से उनको परिपक्क कर हम लोग मानव-समाज की वृद्ध और
विकास में सहायक होंगे और इस तरह से विश्वसमाज के
ऋण से हम लोग मुक्त होंगे। प्राचार्यों ने कह भी रखा है:
"कथितम् लक्षणमन्यैर्यातीद बाललालनाचणे।
पितुरिव तत्रानन्दो भवति न किम् लालनीयस्य ।।"
जैसा सुख रति में पति को प्राप्त होता है वैसा ही सुख याचे
को खिलाने में पिता को और साथ ही बच्चे को भी मिलता है।
विवाह का अर्थ और उद्देश्य मेरी समझ में इतना ही है
और मैं आशा करती हूं कि कम से कम इस बात में तुम लोग भी
मुझसे सहमत होगे। मुझको और कुछ भी कहना नहीं है और पत्र
को मैं संसार के एक बड़े जबरदस्त तत्ववेत्ता Seneca (सिनेका)
के इन शब्दों के साथ "इन्द्रियोपासना पाशविक मनोरंजन है और
सर्वथा मनुष्य के लिए हेय और अनुपयुक्त है" (It is brutal
entertainment unworthy of a man, to place
his felicity in the service of senses) खत्म
करती है।
-
तुम्हारी
मनोरमा

विवाह का उद्देश्य और इन्द्रिय-निग्रह
नात्यन्तमानुलोम्येन न चातिप्रतिलोमतः
सिद्धिम् गच्छन्ति कन्यासु तस्मान्मध्येन साधयेत्
आत्मनः प्रीतिनननं योषिताम् रागवद्ध नम्
कन्या विश्रम्मणम् वेत्ति यः स तासा प्रियो भवेत्
शूरः समुचितभाषी रति तत्रज्ञः प्रियस्य कर्ता च
प्रेक्षणकारी साहसरसिकः प्रोद्दामयौवनश्रीकः
(रतिरहत्य)
प्रिय कृष्णकान्तजी,
आप मेरे निजू पत्रों का एक संग्रह प्रकाशित करने जारहे हैं,
मुमको कोई आपत्ति नहीं, अगर इन पत्रों से कुछ भी संसार
का लाभ हो सकता है तो यह मेरे लिए गर्व और सन्तोप की
वात होगी, किन्तु यह सब होते हुए भी मेरा निवेदन यह है कि
पत्र विशेष व्यक्तियों, उनकी विशेष स्थितियों और उनकी व्यक्ति
गत वातों को ध्यान मे रख, उनकी प्रकृति को जानते हुए और
यह समझ कर कि वह एक रङ्ग में रङ्ग चुके हैं और वदल नहीं
सकते, उनको ही व्यक्तिगत रूप से लिखे गये थे। दूसरे इन पत्रों
से लाभ कहां तक उठा सकते हैं यह मैं नहीं कह सकती, यद्यपि
साधारणतया पत्रों में ऐसी अनेक वाते हैं जो किसी भी पुरुष के,
जो बी की श्रद्धा, भक्ति और प्रेम का लोलुप हो, काम की सिद्धि
हो सकती है। अगर मुमको यह मालूम होता कि साधारण जनता

१२० ] सुहागरात और संसार के सामने यह पत्र रखे जायंगे तो कदाचित् सर्वसा- धारण की भलाई केअर्थ, तथा आनेवाली सन्तानो और विशेप कर भारतीय नवयुवको के लिए अन्य उपयोगी बातें लिखती और दूसरे ही ढंग के पत्र लिखती, अव इतना अवकाश नही, साथ ही आप इन पत्रों को ही प्रकाशित करने को लालायित हैं, इसलिए मै इस पत्र के द्वारा ही अपने विचारों को और जिनको मैं वास्तव में देश, समाज और युवकों के लिए हितकर समझती हूं, इस समय प्रकट कर देना चाहती हूं। सब से पहिली वात और जिसे प्रत्येक भारतीय सन्तान को, जिसे अपना तथा समाज का सुख और समृद्धि अभीष्ट हो ध्यान मे रखनी चाहिए, यह है कि विवाह है क्या और इसका होना क्यों जरूरी हुआ। अगर हमारे भारतीय नवयुवक इसके मर्म और तत्व को समझ लें तो वास्तव में समाज रसातल में जाने से रोका जा सकता है। एक पत्र ही में, मुमको जो कुछ कहना है, मैं कह देना चाहती हूं, इसलिए मेरा कथन सब सूत्ररूप में ही होगा। विवाह के सम्बन्ध में सव को यह समझ लेना चाहिए कि यह भृष्टि के विकास के लिए है, साथ ही यह आदर्श या सर्वश्रेष्ठ भंवन्ध या प्रथा नहीं हैं । विवाह सुख को वस्तु है, इससे सुख ही उत्पन्न होता है यह विचार विलकुल गलत है इसे भी भले प्रकार हम को सब नोट कर लेना चाहिए। मानव-विकास के हित में विवाह की प्रथा को मानव-मस्तिष्क और पशु-प्रवृत्ति ने जन्म दिया, समाज की रक्षा और वृद्धि का यह साधन मात्र है, सर्वश्रेष्ठ दशा में भी यह एक समझौता (Compromise) के समान है और किसी भी दशा में यह दोपी से हीन नहीं है । सचमुच हो विवाह की प्रथा केवल समाज की धार्मिक और समाजिक वृद्धि के लिए, साथ ही समाज की रक्षा के लिए भी है। यह सब हम लोगों को कमी नहीं भूलना चाहिए । विवाह सम्बन्ध से बँध कर पति पितयों को सीख [१२१ पत्नी कम से कम खर्च और कप्ट में, साथ ही यथासम्भव सर्व- श्रेष्ट रूप में जीवनयात्रा सफल कर सकें और विकास की सीढ़ियो पर ऊपर उठ सकें विवाह का उद्देश्य इतना ही है। देश की बद- किस्मती से विवाह आज कल कम से कम खर्च वाला व्यभिचार हो गया है और इसीसे आज गृहस्य-जीवन इतना कटु, कष्टकर और कन्टकमय होगया है। अगर स्त्री का संयोग केवल आत्मायो के विकास और सन्तानोत्पत्ति के लिएमान लिया जाय और इसके सिवाय स्त्री-ससर्ग पाप समझा जाने लगे, अगर हमारी वहिने यह संकल्प करलें कि नियमित समय के सिवा वह और किसी समय में पति की वासना की तृप्ति का कारण नहीं बनेंगी और. पुरुष को वह इस बात का श्रादी वनायेंगी कि वह उनके मान- सिक और आध्यात्मिक साहचर्य में अधिक मुखी अपने को समझे तो बहुत से संसार के दुःख आप से आप कम हो जायंगे। पत्नियो को जो जीवन को अधिक से अधिक सुखी बनाना चाहती हैं, यह भी ध्यान में रखना चाहिए और अपने पतियों को यह सदा सिखाते रहना चाहिए कि शारीरिक, काम-वासना की तृमि या जड़का प्रेम, प्रेम का पर्यायवाचक शब्द न होकर प्रेम का एक निकृष्ट अङ्गमात्र है और कामवासना, प्रेम नहीं, प्रेम की छाया- मात्र है। सच तो यह है कि तीन बच्चों को जन्म देने के बाद, कामवासना का दफ्तर एक दम वन्द हो जाना चाहिए, और अगर कभी वह खुले भी तो केवल बी की इच्छा होने पर और बी की ही प्रेरणा पर । "चाणक्य" का उपदेश है- "पुत्रीवतीं धर्मकामां बन्ध्यां निन्दु नीरजस्का वा नाकामामुपेयात् पुत्रवाली, सुतवती, पवित्र जीवन वाली, बन्ध्या. जिसके मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ हो और जिसका मासिक धर्म बन्द हो गया हो, ऐसी स्त्री के साथ जब तक वह स्वयं कामना न को पुरुष भी मी संसर्ग न करे।

१२२ ] मुहागरात इसके साथ ही साथ अगर यह मान लिया जाय कि खी गृहस्थ-जीवन की नौका को अग्रसर करने के लिये बराबर की खेवैया है, भेड़ बकरी या सुख की एक सामग्री नहीं और वह इहलोक और परलोक को बनाने के लिए विशेष सहायिका है तो भी हमारी बहुत भी कठिनाइयां दूर हो जायंगी। बी का नायिका का रूप पश्चिमीय और इस्लामी भी है। भारतीय इतिहास में, भारतीय धर्मग्रन्या में बी अर्धाङ्गिणी कही गयी है। धार्मिक कृत्य उसके बिना नहीं हो सकत, यह कहा गया है, साथ ही श्री, पत्नी, कामकला की सामग्री कभी नहीं समझी गयी । आज त्रियों का मौन्दर्य देखा जाता है, नख सिख कैसा है इसकी फिक्र होती है, भारतीय प्रथा और बाद में इसकी बहुत कम गुन्जायश थी। स्त्री सर्वश्रेष्ठ वह है जो पत्नी के कर्तव्यों का उचित पालन कर सके। जो अपने और अपने पति के कुल की श्रेष्ठता और मर्यादा की वृद्धि कर सके। "तिरिया तो है शोभा घर को, जो हो लान रखावा नर की" खूबसूरती कोई वस्तु नहीं है या वस्तु विशेष नहीं है । विवाह के पहिले कन्या का रूप रंग पूछना तो दूर रहा, उसकी चर्चा भी करना कुछ समय ही पहिले बुरा समझा जाता था। लड़के का, लड़की को देखना तो स्वप्न की बात थी, लड़के के माता पिता भी अक्सर लड़की को नहीं देख पाते थे। लड़की के लिए इतना ही कामी था कि वह फलां कुल की है और यही इस बात का सर्टी- पिकेट था कि वह पत्नी के कर्तव्यों को पालन करने में समर्थ होगी। पत्नी वेश्या नहीं, नायिका बनना वह क्या जाने, इसकी उले आवश्यकता ही क्या, इसकी उससे श्राशा ही क्यों की जाय। वह पुत्रों की माता है, जननी है, गृह की देवी है, उसका गौरव यह है कि राम अगर यज्ञ करना चाहते हैं तो यन्त्र सफल नहीं हो सकता, यदि सीता मौजूद न हो, यदि कारण वश सीताकी उपस्थिति पतियों को सीख [१२ असम्भव हो तो सीता की प्रतिमा ही हो, मगर होसोने की और हो जरूर, क्योंकि धर्म इसका आग्रह करता है, क्योंकि धर्म कहता है कि विना पत्नी के मनुष्य अधूरा है और उसकी आहुति देवताश्री कोस्वीकार नहीं हो सकती। पत्नीको नायिका का रूप देना, नायिका के रूप में उसका स्वप्न देखना, पत्नी की मान मर्यादा, उसके महत्व, उसकी श्रेष्ठता और उसकी उपयोगिता को कम करना है। विवाहको इस लिए धर्म और धार्मिक बन्धनकी दृष्टि से ही देखना चाहिए और पत्नी को नायिका से श्रेष्ठतर पद देना चाहिए। समाज रसातल को जा रहा है पुरुपों की गलती से । वह इधर उधर स्वतंत्र स्त्रियों को देख पत्नी के महत्व को भूल गये हैं। वह पत्नियों में ही नायिका को भी देखना चाहते हैं, एक अंश मे, कुछ हद तक ही, यह असम्भव है, किन्तु वास्तव में यह सर्वथा असंभव है। नायिका मे जो विशेषताएं होती हैं उसका प्रधान कारण उसका अनेक पुरुपों से मिलना जुलना, संयोग और भिन्न प्रकृतियो का परिचय और अनुभव होता है। इन विशेषताओं का एक पत्नी मे जन्म विना पत्नी के धर्म की हत्या किये हुये सहज संभव नहीं, इसलिए जो पत्नी से पत्नी धर्म का पालन देखना चाहते हैं उनको वाह्य (Superficial) विशेषताओं की फिक्र न होनी चाहिए। मेरी तो समझ में नहीं आता कि लोग फानी अस्थायी वस्तुओं के पीछे पागल क्यों होते हैं। "अंधे रसिया श्राइने पर मरें" और क्या कहा जा सकता है ? सवसे पहिले सुन्दर से सुन्दर बी किसी को सुन्दर दिखाई देती है और वह उसके लिए प्राणों को न्योछावर कर सकता है, साथ ही किसी दूसरे को वह उतना ही उत्तेजित नहीं करती, दूसरे सुंदर से सुन्दर स्त्री कुछ समय के सहवास के वाद उतनी सुन्दर नहीं दिखाई देती, यह न हो तो भी सौन्दर्य ढलने की चीज़ है, बढ़ने की नहीं, ऐसी दशा में पुरुषों में अगर वुद्धि हो तो सौन्दर्य नहीं, वे पत्नियों में १२४] सुहागरात गुणों की खोज किया करे, गुण जिनको निरन्तर वृद्धि ही हो सकती है और जो अपनी महत्ता और अपनी आकर्पण-शक्ति कभी नहीं खोते । पूर्व काल में हम लोगों के पूर्वज कह गये थे-भार्या रूपवती शत्रु."--सुन्दर स्त्री शत्रु के समान है। कहने वाले मूर्ख नहीं थे। उन्होंने बड़े तत्व की बात कही थी। अगर उसके सौन्दर्य रूपी प्रकाश मे पतङ्ग की भांति हम जलने लगें और काम की तृप्ति मे लीन हुए, जो असम्भव नही, तो हमारा सर्वनाश, साथ ही विकास की सीढ़ी से नीचे गिरना भी निश्चित है। सुन्दर स्त्री ऐसी दशा में जीवन-नोका को अग्रसर करने और इहलोक और परलोक के बनाने में हमारी मददगार न होकर शत्रु का काम करती है । एक ओर यह है दूसरी ओर सौन्दर्य स्थायी नही और नित्य के सहवास से उसकी महिमा कम होती रहती है, साथ ही सोन्दर्य कमल पत्र पर पड़े हुए ओस-बूंद के समान सुहावना होते हुए भी टिकाऊ नहीं और मृग के समान भागते हुए मनुष्य-हृदय को वह सदा काबू में नहीं रख सकता । सौन्दर्य को इस काम लिए नित्य सहायक हुँदने पड़ते हैं। खूबसूरत से खूबसूरत स्त्री, सचमुच ही चन्द्रमुखी, होते हुए भी अगर वह भोडी है, उसे बातें करना नहीं आता, अगर उसमें चातुर्य और गुण नहीं, अगर वह सेवा करने मे चतुर नहीं, एक दिन से अधिक समझदार नायक पर अपना अधिकार नहीं, रख सकती। सौन्दर्य नित नूतन आकर्षण मनुष्य के लिए पैदा नहीं कर सकता, यह सम्भव ही नहीं । सेवा और गुण के सम्बन्ध मे तो "ज्यों ज्यों भीजे कामरी त्यों त्यों भारी होय" की कहावत चरितार्थ होती है। मनुष्य, जीवों में अपने को श्रेष्ठ कहता है किन्तु पशुओ में जितना व्यभिचार नही हैं उससे करोड़ गुना अधिक यह मनुष्यों में है। पशु व्यभिचार की लालसा नहीं पतियों को सीख [ ૨૨ रखते, प्रकृति से विवश होने पर वर्ष में एक दो वार उनको इमकी कामना होती है, किन्तु मनुष्यों की दशा क्या है ? हमारे पूर्वजों ने इसीलिए केवल सन्तानोत्पत्ति के अर्थ, सो भी वर्ष में एक बार, गर्भाधान के लिए स्त्री संसर्ग जायज रखा था, किन्तु अब क्या है ? जिसको हेय समझना चाहिए, जो विकास में वाधक है, उसी को आज कल महत्ता प्रदान की जा रही है। आज अप्रधान प्रधान बनाया जा रहा है, यह देश का अभाग्य नहीं तो क्या है ? इसलिए पहिले हमको यह चाहिए कि विवाह सम्बन्ध में सौंदर्य और स्त्री-समागम की बातों को अप्रधान समझे और इनके नींव पर न विवाह को स्तम्भित करे और न सुख की लालसा ही रखे। अगर पुरुष और पत्नी यह तय करलें कि उनका धर्म का बंधन है और धर्म ही के समान अपनी शक्ति भर वह उसका निर्वाह करेंगे तो बहुत से दुःखो का अन्त होजायगा । स्त्री इह- लोक और परलोक के बनाने के लिए आती है, काम की तृप्ति का वह साधन समझी या बनायी गयी, जिसकी तृप्ति संभव नहीं तो इहलोक और परलोक का बनना असंभव होजायगा। यहां पर मैं इतना और कह देना चाहती हूं कि काम की घड़ी घड़ी इच्छा, काम की प्रबलता, स्वास्थ्य और शारीरिक शक्ति की द्योतक नहीं है वरन् यह मानसिक और शारीरिक कमजोरी का सुबूत है। दिन दिन बिगड़ते हुए स्वास्थ्य, अज्ञान और वर्तमान सभ्यता की कुप्रथाओं के कारण ही आज काम की इतनी प्रखरता दिखाई देरही है। परलोक की कथा दूर की है किन्तु जवइहलोक का बनना ही असम्भव होगया तो गृह मे, गृहस्थी में या वैवाहिक जीवन में सुख कहां से प्राप्त हो सकता है ? विवाह करने की इच्छा रखने

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पतियों को सीख [ १२७ आदर और भक्ति चाहता है, अगर वह चाहता है कि स्त्री के मनोमंदिर का वह इष्टदेव हो तो उसे पूर्णरूप से राम की ही भांति ब्रह्मचर्य का भी पालन करना चाहिए । सुखमय-जीवन वहन करना भी एक कला है, संसार की समस्त कलाओं की ही भॉति इसके लिए भी एक पुरुष को उबारू, आवश्यकता से अतिरिक्त शक्ति का व्यय करना पड़ता है और इसलिए यह आवश्यक है कि आरम्भ मे अधिक से अधिक शक्ति का संचय किया जाय, ठीक उसी तरह से जैसे कि इंजन को चलाने के पहिले, व्यायलर मे भाप का संचय किया जाता है। मेरे कहने की बात नहीं है, लज्जा की बात है, स्त्रियोचित भी नहीं है, किन्तु जितना कुछ मैंने लिखा है सब वेकार और निरर्थक हो जायगा, यदि पति अब्रह्मचारी और हीन इसके कारण पति का आदर स्त्री के हृदय से कम हो जाता है, है। उसकी उसमे से श्रद्धा जाती रहती है और इससे जीवन में असन्तोप की वृद्धि होती है और हर वातो मे झगड़े की सूरत खड़ी होजाती है। वैवाहिक-जीवन इससे सव से अधिक नष्ट होता है और पति-पत्नी का जीवन क्षारमय होजाता है । जो पति, पत्नी का प्रेम चाहता हो उसे इस बात को सदा ध्यान मे रखना चाहिए। अन्तिम किन्तु महत्व मे सब से अधिक बात यह है कि जो युवक वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाना चाहते हैं उनको यह भी चाहिए कि अपने तथा स्त्री के शरीर की बनावट को अच्छी तरह से जान लें और समझ ले। किसी मित्र डाक्टरसे या अच्छी पुस्तक से इसका ज्ञान प्राप्त होसकता है । मनुष्य और स्त्री के शरीर के बड़े सुन्दर चिन्न बने बनाये मिलते हैं जिनमे प्रत्येक अङ्ग की बनावट अच्छे तरह से देखी और समझी जा सकती है और शरीर एक एक रग रेशे का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। मै कुछ और अधिक नहीं कहना चाहती और इतना ही कह कर इस पत्र को

सुहागरात
१२८]
समाप्त करती हूं कि अगर इस पत्र की याता के अनुसार ही पति-
पत्नी आचरण करें तो भी उनका वैवाहिक जीवनसंसार में जितना
मन्भव है उतना मुखमय जरूर होगा।
आपकी-
मनोरमा

परिशिष्ट-भाग

रज़िया की समस्या
मर गई, न बोली, यह क्यों, कासिम कितना कसूरवार है ?
दोप किसका है, कासिम का
या रनिया
कासिम को क्या करना चाहिये था ?
("अभ्युदय" से उद्धृत)
जो कुछ नीचे छपा है वह भी सादतअलीखां दारोगा जेल की
मेहरवानी से मिला है। कथा का कागज़ उस कोठड़ी मे, जिसमे
फांसी पाने के पहले कासिम कैद था, मिला था। कासिम आज
दूसरी दुनिया मे, जहां जाने से पहले उसने अपनी प्यारी रजिया
को भेज दिया था, है, ईश्वर दोनों की आत्माओ को शान्ति दे।
(अरशद)
कासिम ने अपने मरने के पहले जो खुद लिखा था वह
प्रकाशित किया जा रहा है, पाठक और पाठिकायें शीर्शक के
सवालो का उत्तर सोचें।
कथा का प्रारम्भ
शायद मुझे दारोगा जेल का शुक्रगुजार होना चाहिये कि
उसकी इजाजत से मैं यह चन्द शतरें तहरीर कर रहा हूं, लेकिन
मेरा दिल इस वक्त जज़बात और भावों से बिल्कुल खाली है,
मेरे दिल की इस वक्त वही हालत है जो किसी महफिल की सुबह
के वक्त होती है जब प्रातःकाल की फीकी उजियारी और निरालो

पतियों को सीख [ १३१ थकन भरी शान्ति रजनी के विलासों से उन्मत्त जागरण और सुखोपभोग को रंगहीन तथा भयानक बना देती है। मेरा हृदय एक अंधियारा मंदिर है, जिसमें जीवन नहीं, जो एक खंडहर है, जहाँ न भारती की मलक और न घन्टे की गुंजार है, केवल वीत काल की पूजा की स्मृति है, वह भी स्वप्न समान । वहाँ न पीड़ित हृदय की दर्द भरी आह है न आनन्द से उल्लसित संगीत का नाद, वहाँ केवल एक वीरान सी गंज है जिसका मेरे निकट कोई अर्थ नहीं, जो न जीवन के कोलाहल की सूचक है, न अमरता के उच्च स्वर की, वह एक हंसी है, जिसमें आह्लाद नहीं, एक रोना है, जिसमे आन्तरिक वेदना नही । कल मुझे कानून को इन्तहाई सजा दी जायगी। मैं इसके लिए तैयार हूं। हर मनुष्य इसके लिए तैयार होता है । मौत के लिए किसी तैयारी की जरूरत नही, मौत इसी से मौत है क्योंकि वह नागहानी (आकस्मिक) होती है। हर एक मौत नागहानी मौत है। मौत का वक्त मुअइयन निश्चित है और इसी तरह निश्चित किया गया है कि वेमौका अन अवसर आए। अगर हमको अपनी मौत का वक्त मालूम हो तो हमारी तमाम ज़िन्दगी इस मौत ही की तैयारी मे व्यतीत या सर्फ होजाये और जिन्दगी उसी कयाम की तरह हो जो रेल के स्टेशन पर गाड़ी के इन्तजार में किया जाता है। इन्सान की हस्ती सामयिक जरूरियात और सामयिक इन्त- जामात का एक मजमुवा या समूह है, जिसमें इश्क, प्रेम को नापायदारी, सुन्दरापा या हुश्न की वेवफाई की तरह हो, जहां तामीर निर्माण गलती हो, जहां एतमाद, भरोसा, विश्वास एक हिमाकृत हो । मुझे अपनी मौत का वक्त बता दिया गया है । इस लिए मैंने जो कुछ तामीर किया था, बनाया था उसे मुतहद्दिस कर चुका या ढाचुका हूं। मुझे इस ढाने या विगाड़ने में बहुत कम सुहागरात १३२] तकलीफ हुई है। मैंने कभी किसी इमारत की बुनियाद मजबूत नहीं रक्खी, मेरी आरजूवो को अट्टालिकायें, मेरे तववकात, मेरी आशाओं के महल, मेरे इरादों के किले सव वलन्द और शानदार थे, लेकिन मुझे ढाने के वक्त मालूम हुआ है कि सब की बुनियादें निहायत कमजोर थीं। शुरू में जब मैंने मुजरिम होने से इनकार कर दिया था तो अक्सर लोग मुझे सचा जानते थे। उनको यकीन था कि मैं अपनी "वीत्री का कातिल" नहीं हो सकता। अरशद मेरा जन्म का साथी, मेरा मित्र भी मुझे वेगुनाह निर- पराधी समझता था यद्यपि वह मुझको कितनी ही मुद्दत से जानता है। ऐसे लोग मुझ पर रहम खाते थे और मुझसे सहानुभूति (हमदर्दी) करते थे। कुछ लोग ऐसे भी थे जो मुझे झूठा सम- मते थे। इनका गुमान था कि रजिया की मौत मेरे ही हाथों हुई है। यह भी मुझपर रहम खाते थे, लेकिन मुझे हकीर (तुच्छ) तिरस्कार के योग्य समझते थे। यह दोनो ही गलती पर थे। मेरी जुर्म की स्वीकृति को दीवानगी समझने वाले सुनलें कि वास्तव मे- मैंने रजिया को कत्ल किया है। इसी दायें हाथ ने, जो इस वक्त इस कथा को लिख रहा है, रजिया की जिन्दगी के गुलको अपनी लम्बी लम्बी अंगुलियों से दबाकर जबर्दस्ती से सदा के लिये गुल कर दिया है। मेरे जुर्म के इनकार को मेरी बुजदिली (कायरता) और कमजोरी समझने वाले सुनलें कि जब मैंने अदालत में खड़े होकर विना ताम्मुल कह दिया था कि रजिया का कातिल नहीं हूं तो मेरी जवान और दिल में वही सचाई थी जिसने मुझसे बाद मे जुर्म को स्वीकार करवाया। मैं, एक नहीं, दो हूं, शायद मैं दश वीसहूं। मुझे अब अपनी जिन्दगी के आखिरी लहमों में ऐहसास, मालूम, होरहा है कि मेरी एक तनहा (अकेली) हस्ती में किस कदर कसरत, बहुतायत से मैं । पतियों को सीख [ १६३ थी। रविवाओ चाहने वाला, उस पर हजार जान कुरवान होने वाला यही इन्मान था, नो अब उसी के कन्ल की सजा में "सी पानवाज्ञा' है, यह मैं कैले मानू ? अगर मैं एक हूं तो मैं सिर्फ यही कह सकता हूं कि मुझे उनसे मुहब्बत थी । यह कितनी लगो बात है ? लेकिन नहीं, यही ठीक है, सब कुछ ठीक है, कोई बान गलत नहीं हो मकती। मैं सब कुछ हूं, मुझे नहीं मालूम क्या कहूं। शायद मैंने गलती की है। मैं एक कमजोर इन्सान हूं, सब इन्सान कमजोर होते हैं। मेरी रजिया के साथ शादी को दोसाल होगये, इसके पत्थर के हदय वाले वालिदेन, मा बाप, ने अबतक इसे मुवाफ नहीं किया है । मुझ से शादी करने के कारण अव तक वे नाराज हैं। मेरे मुहल्ले के लोग अब तक मेरी शादी को पन्यासी, गुरडापन की शादी समझते हैं, क्योंकि शादी रजिया के दुन्थियों की मर्जी के खिलाफ हुई थी। अगर हमारे मुहल्ले में मुन्दर कन्या अधिक होती तो शायद चन्द और वा- लिंदन भी इन वक्त यानी बेटियों में नाराज होते, लेकिन वे समर्मत है कि उनकी कन्याओं के बचे रहने की वजह उनकी श्रीलाद की अस्मत, पवित्रता या सतीच का प्रेम है। क्या शाय- राना ख्याल है ! यह अपनी लड़कियों की नेकखसली, सुन्दर, पारहीन चरित्र पर गर्व करते हैं । उस सिफत, उस खूबी पर नाज करते हैं जो मदों ही के विचार और कल्पना ने औरत को वटा दी है। जो मुमान बच गये हैं उनसे कह दो कि असल में वजह, उनकी लड़कियों की पाकदामनी नहीं, मेरी पाली निगाही, मेरी महत्ता थी जो उनमें से किसी को बहसियत बीवी के गवारा नहीं कर सबनी थी। यह पवित्रता के पुजारी, नीतिन, नैतिक भावों की दुहाई देने वाल समझते हैं कि मैंने रजिया को उसकी बदचलनी की बजह मे मारडाला, श्री बुदा मुझे फांनी ही पाना है तो महज एककृत के बदले क्यों?

१३४] सुहागरात में रज़िया का कातिल क्यों हूं ? रजिया को किसने मारा, शायद मैंने ? यह न कहो। तुम रजिया से जाकर पूछलो, वह कभी मेरा नाम न लेगी। वह कभी यकीन नहीं कर सकती कि मैंने उसे कत्ल किया है, उसे अच्छी तरह मालूम है कि मैं तमाम दुनिया से बढ़कर उससे मुहब्बत करता था। तुम यकीन मानो कि वह इस मुहब्बत की कद्र करती थी, महज मेरी खातिर उसने तमाम जहान के इलज़ामात अपने सर लिये, दुनियां भर की मुसीवत उसने मेरे साथ मिल कर वरदास्त की। ठीक वक्त पर मेरे लिये खाना तैयार करना और बड़े सज धज, साज सामान से मेरे विस्तर को बिछाना वहअपनेजीवन केपरम कर्तव्यों में से समझतीथी। गर्मी के दिनों मे,सारी दुपहरी वह मुझे पखा झलती रहती, रात को बड़ी देर तक मेरे इन्तजार में जागती रहती, हाय यह न कहो कि मैंने उसे मारा है। यह झूठ है तुम उससे पूछलो। ...औरत, अगर चाहे तो मी कि जिन्दगी को तबाह कर सकती है । फितरत (प्रकृति ) ने दिलों के तोड़ने के जिस कदर जितने भी ढंग हैं वे तमाम औरत को सिखा रक्खे हैं, कुदरत (प्रकृति, ने मटोंके दिल महज इसलिये बनाये है कि औरतें उनको बेपरवाही से तोड़ डाला करे, हमारी आंखें इसलिये हैं कि या हम उनको देखें या उनके लिये रोवें। औरत को खिराजे निगाह चाहिये या खेराजे अश्क, वह मर्द की निगाह से टेक्स चाहती है, चाहे वह उनको निरन्तर देखने के रूप में हो या ऑसू के । इसी दौलत से वह दिल के मुल्कों पर हुक्मरानी करती है। उसका संकल्प, जुल्म और सितम होता है, जहां बगा- चत के बगैर कोई चारा नहीं, बगावत करना ही जहांरक्षा का उपाय है। मैंने- पतियों को सीख [१३५ रज़िया से बगावत नहीं की, मैंने सिर्फ यह चाहा कि वह मुझ से मुहव्वत करे, प्रम करे। वह वर्फ थी, मैंने चाहा उसे आग बना दूं, वह ठंढी थी, मैं चाहता था हरारत हो, वह चुपचाप पानी की तरह वहती थी मैं उसे शोलों की तरह भड़काना चाहता था। मैं रात की खामोशी और सन्नाटे में कितनी ही वार घन्टों तक लगातार उसके हाथों को अपने हाथों में लिये, लम्बे लम्बे, दर्द भरे, प्रेम मे सराबोर शब्दों में उससे अपने प्रेम, अपने इश्क की कहानी कहता, उसे मनोमन्दिर की, हृदय की अधिष्ठात्री, देवी, मनोराज्य की मलिका मोअज्जमा समझ कर पुजारियों की तरह तन, मन और धन से उसकी पूजा करता । वह बुत की, तरह, पत्थर की मूर्ति की भॉति, बैठी रहा करती, मैं उससे कहता- ऐ मेरे दिल पर हुकूमत करने वाली मलिका ! मैं तेरा एक अदना,, गुलाम हूँ। तेरी खिद्मत (सेवा) करना मेरे लिए स्वर्ग में जीवन व्यतीत करना है, क्या तुम मुझ से मुहव्वत है, वह कुछ न वोलती, मैं उसकी वाहें मरोड़ता जव भी वह कुछ न बोलती, उसके चेहरे पर तकलीफ के आसार जाहिर होते, मुझे खुशी हासिल होती, पर इस पर भी वह कुछ न बोलती, तुम कहोगे शर्म की, लज्जा की वजह से- तुम क्या जानो ? तुमने सिर्फ औरतों को देखा है, तुम्हें स्त्रियों का कुछ ज्ञान, नहीं, तुम सिर्फ मर्द हो, तुम में मर्दानगी नहीं, तुम्हारी तमन्नाओं (आकाँक्षाओ) में वजरवलन्दी की कावलीयत नहीं, तुम को छोटी बातें खुश कर सकती हैं । ओ कमजर्फ इन्सानो! तुम मुझे कुछ न कहो। अकसर मैं रात मे देर से घर पहुँचता, इसने कभी इसका .

१३६ ] सुहागरात गिला या शिकायत नहीं की, जहाँ मुहव्वत होती है वहां तलव होती है, जरूरत होती है, इस बात की फिक्र होती है कि मेरा प्राणाधार मेरे पास रहे, कम वक्त देने की शिकायत होती है और इस पर अक्सर कितने ही प्रेमियों में हाय हाय होती रहती है, मगर इसने कभी यह भी न पूछा कि देर क्यों हो गई, कहां रहे ? मैं क्या जानूं कि वह मेरा इन्तजार करती थी, मैंने कई वार उससे पूछा, रजिया मेरा देर से आना तुम्हे नागवार तो नही मालम होता, तुमको यह देर अखरती तो नहीं ? उसका जवाब यही होता था कि आपकी कोई बात मुझे नागवार नहीं मालूम होती । तुमसे, तुम्हारी वीवी यो कहे तो तुमको इससे इत्मीनान, सन्तोप और शायद प्रसन्नता भी हो, शायद तुमको यह कभी खयाल भी न आए कि जिसे तुम्हारी कोई बात नापसन्द नहीं उसे शायद तुम्हारी कोई वात पसन्द भी न हो ? शायद तुम यह कभी न सोचो कि वह कौनसा मशगला है जो तुम्हारी गैरहाजरी को इसके लिए बेमानी बना देता है, वह कौन सा विचार है, कैसा मनोरंजन है, जिसमें लीन रहने के कारण तुम्हारी अनुपस्थिति, उसे वेचैन नहीं करती। तुम क्यों सोचा ? तुम स्त्रियों को जानो क्या, तुमको उनका तजुरुवा नहीं, तुममें गैरत नहीं। एक दिन मैंने उससे कहा रजिया जब तुम मेरी हो, तब फिर यह क्या कि तुम मेरी होती भी इस कदर वक्त पढ़ने और सीने, पिरोने में सर्फ करती हो, तुम मुझ से बातें करो। वह फिर भी पढ़ती रही। मैंने उसकी सब कितावें फाड़ डाली, मैंने उसके सव कपड़े जला दिए। वह रोती रही और खाना पकाती रही। उन कितावो और कपड़ों के लिए-जिनको वह मुझ से ज्यादे पसन्द करती थी, अच्छा :

मैं पतियों को सील [१३७ समझती थी-रोती रही। मेरे दिल में उस दिन एक विचार आया लेकिन उस विचार को मैंने दवा दिया और मै मुढ़ियों को बन्द करके रह गया। दो दिन उससे मैं उठा रहा, उस ने मुझे न मनाया । तुम कहोगे डरती थी, फिर तगाफुल, उदासीनता और लापरवाही किसे कहते हैं ? कल मेरी जिन्दगी का खातमा कर दिया जायगा, खुश हूँ, रजिया को मार डालने के बाद मेरा जीवित रहना फिजूल है। जिस पतंग को दीपक के जलते हुए मर जाना चाहिए वह दीपक के बुझने के बाद भी जिन्दा रह नो यह इश्क की खामी, प्रेम की हँसी है । रजिया तुम मुझको माफ कर देना, संसार की माफी की मुमतो परवाह नहीं । दुनिया में अगर मैंने किसी औरत के साथ वफा नहीं की तो इसका इलज़ाम मुझ पर नहीं लग सकता, वह इसी काबिल थीं कि एक रात के लिए बद्रे मुनीर, पूर्णचन्द्र होतीऔर वस । उनको चन्द लहमों के मनोरञ्जन से जियादह कुछ भी समझना मजाक सलीम का खून करना है, सद्विचार का गला घोटना है। उस पर भी अगर दुनिया के रहने वाले मुझे कुसूर- वार समझते हैं तो मुझे इसकी परवाह नहीं, वह मुझे कल मार डालेंगे इससे अधिक वह किसी को क्या सजा दे सकते हैं, इससे बड़ा बदला वे और क्या ले सकते हैं ? अफसोस ! अगर मुम मालूम होता कि मुझ से यूं बदला लिया जायगा तो नाकरदा गुनाहों, जिन पापों को मैंने नहीं किया उनके करने की लालसा आज हृदय में न रहती, आज उनके मजे की आकांक्षा की आग हृदय में न धधकती होती, किसी से कोई वादा न करता जिस को तोड़ते हुए मेरे दिल को जरा भी रज होता । मैं रजिया से शादी करता ? यह तुम क्या कह रहे हो ? जिसकी जवान ने मुझे कभी प्यार से नहीं बुलाया, जिसने चुप के सिवाय कभी दूसरा जवाब नहीं दिया, जिसने अपने हृदय का हाल मुझ से सदा छिपाया, . वह होते हुए १३८] सुहागरात जिसे, मेरे स्थायी प्रेम के भाव, हृदय को भस्म करने वाले शोले, कभी न भड़का सके, जिसे मेरे इश्क का प्रलयकारी भूचाल कमी न हिला सका उससे शादी करता ? यह तुम क्या कहते हो ? चौदवीं की चाँदनी में वह सफेद लिवास पहिने हुए थक कर लेटी हुई थी और मैं उसके पास बैठा हुआ अपने दिल की वेकरारी, वेचैनी को कॉपते हुए होठों से, लरजते हुए फिकरों में बयान कर रहा था। मैं कह रहा था रजिया तुमने यह मुझ पर कैसा जादू फूंक दिया है कि मेरे जिस्म मे कोई रूह है तो तुम हो, मेरी आँखों में कोई नूर है, मेरे दिल में कोई शुरूर है तो तुम हो । "मेरी जिन्दगी" "मेरी राहत" मेरी सर्वस्व अब यह नामुमकिन हो गया है कि मैं तुम्हारे बगैर इस दुनिया में कहीं भी खुशी पाऊँ। रजिया सिर्फ तुम्हारे मेरे हृदय में हजारों उमंगें उठती हैं, आरजूवों का, आकाँक्षों का एक तूफान हृदय में पैदा हो जाता है, तमन्नाओं का, ख्वाहिशों का एक कोह- राम मच जाता है, तुम्हें एक बार देख लेना, साजे हस्ती के तमाम तारों को यूं छेड़ देना है जैसे हवा का कोई लतीफ खुशगवार मॉका उन पर से गुजर गया। मेरे दिल में संगीत गूंजता है कि तू उनको सुन । क्या तू सुनती है ? वह कुछ न बोली । मैंने कहा-रजिया सुनती है ? कहने लगी-"सुनती हूँ"मैंने कहा- क्या तुम्हारे हृदय में संगीत नहीं, क्या तुम मुझे वह नहीं सुनाना चाहती ? वह कुछ न बोली, मैंने उसे कन्धों से पकड़ लिया और बहुत आजज्जी और अनुनय विनय से कहा-"रजिया ! कुछ तो कह । उसने कुछ न कहा या शायद यह कहा कि "मैं क्या कहूं। मैं उसके मुखड़े की तरफ देखता रहा, उसकी वन्द आँखों को पागलों की भाँति निहारता रहा, उसको होठों के सिकून, निश्चलता को देखता रहा, उसके चेहरे मे टपकती हुई वेपरवाही को देखता रहा । उसका तग़ाफुल, उसकी बेपरवाही, विरक्तता, 1 पतियों को सीख [ १३६ उदासीनता मुझ से बरदास्त न हो सकी। मेरे हाथ उसके गले के करीब पहुंच गए, मेरी अंगुलियों को एक जबरदस्त ख्वा- हिश ने फौलाद बना दिया, मेरा निचला होठ मेरे दातों ही से कट गया, मेरे दायें हाथ का पंजा सिकुड़ता गया उसने ऑखें खोल दी । मुझे उसकी नजरो में वहशत नजर आई, लेकिन वह मुंह से कुछ न बोली । मैं और वहशी हो गया। मेरे पंजे की गिरफ्त मजबूत होती गई, उसने कुछ कहा लेकिन उसके कहने में अलफाज न थे। मैं उसका गला भींचता गया, यहाँ तक की मेरा हाथ रुक गया, उसका और दुनिया का नाता टूट गया। मुझे चाँद तारीक, अधियाला दिखाई देने लगा। मेरी निगाह मे एक स्याह सी सुरखी फिर गई, मेरा गला खुश्क हो गया, सूख गया, मैंने एक चीख मारी और उससे लिपट गया, चिल्ला चिल्ला कर पूछता रहा कि रजिया, मेरी जान, मेरी सर्वस्व, तुम, तुम क्यों चुप हो, तुम को किसने मार डाला है ? रजिया ! मेरी प्यारी रजिया । तुम्हारा कातिल कौन है, वह कुछ न बोली। वह वेचारी मर गई, मेरे हाथों से मर गई। मैंने उसे मारा, मैं कल मर जाऊँगा । इसने मेरा दिल दुखाया । मैं इसके लिये मरता था, वह मेरी बहुत खिद्मत करती थी। ईश्वरीय कानून की गिरफ्त मजबूत है, और उनसे रिहाई कठिन है। मर्द औरत का मुतालहा, अध्ययन, करते हैं, गौर से परखते हैं इस ख्याल से कि उसकी इच्छाओं की पूर्ति सर्वोत्तम रूप से करें । वह उसकी मर्जी ढूंढते रहते हैं कि उसे पूरा करें। औरत दीवानगी का जादू करना जानती है, वह मर्दो को सहज में पागल कर सकती है, वह राहत की, सुख, शान्ति की नींद, सुलाना नहीं जानती, वह अन्धा कर देती है और अपने निकट पहुँ- चने का रास्ता नहीं बताती। रजिया ने तमाम दुनियां को नाराज किया इसलिए कि खुद खुश हो, मुझे खुश करे। मैंने उसे मार-

१४० ]
सुहागरात
डाला, क्योंकि वह मुझे खुश नहीं कर सकी । जगत एक मूर्तिमान
गोलमाल या बेकायदगी है, औरत की मोहब्बत एक अफसाना है,
कहानी है, रूह जिस्म का दूसरा नाम है, जज़बात की कोई
हकीकत नहीं,भाव निस्सार है। एक हस्ती कई हस्तियों में बनती
है, आज तुम कुछ हो कल खुदा जाने क्या होगे ?
(एक उदृ' पत्रिका से)

समस्या का हल इस कथा की पहिली ही शिक्षा यह है कि एक दूसरे को न समझ सकने के कारण ही रजिया और कासिम का अन्त होगया और संसार मे दो प्राणी, जो त्रुटियों के होते हुए भी ससार को सुखमय बना सकते थे, न रह गये। ऐसी घटनाओं का बन्द करना ही इन समस्याओ का उद्देश्य है। इसलिये पाठकों और पाठि- काओं को ऐसी समस्याओं का हल सोचना चाहिये । रजिया किस तरह कासिम के प्रेम में फंसी, यह प्रश्न इस कथा के सम्बन्ध में उठता है । स्वभावत: इस कथा के सम्बन्ध में यह भी प्रश्न उठता है किा रजिया, जो कासिम की राय में शान्ति की प्रतिमा थी, चंचलता जिसमे छू नहीं गई थी, जो बाचाल न थी वह एक गैर मनुष्य से प्रेम ही कैसे करने लगी ? किस तरह से प्रेमी एक दूसरे से मिलते, देखते, बातें या पत्रव्यवहार करते थे ? इन सव वातों के लिये कुछ चंचलता आवश्यक है, किन्तु रजिया समुद्र की भॉति गंभीर थी। रजिया या क़ासिम का सम्बन्ध कैसे हुआ क्योकर हुआ, प्रेम कैसे हुआ, यह विचारणीय वाते हैं, एक मुस्लिम गृहस्थ की कन्या से प्रेम, जो साधारणतः छोटी अवस्था से ही पर्दे में होगई होगी, साधारण वात नही । किन्तु प्रश्न जरूरी होते हुए भी निश्चितरूप से इस सम्बन्ध में कुछ कहा नहीं जा सकता । कासिम का रजिया का सम्बन्धी होना, जिससे रजिया का परदा न रहा हो और जिससे दोनों सहज में ही मिल सकते रहे हों, असंभव नहीं। फिर भी यह समस्या हल नहीं होती कि जो रजिया विवाह के दो वर्ष वाद जवान से या हाव भाव से भी कुछ प्रगट नहीं होने देती थी, उसने अपने प्रेम मे कासिम 3 खामोशी का, १४२] मुहागरात को पहले कैसे अन्धा किया या यह कि कासिम के साथ वह कैसे निकल आई ? यह साफ है कि विवाह माता पिता की मर्जी के खिलाफ हुआ था, मोहल्ले वाले खिलाफ थे, संसार खिलाफ था, इन सब बातों से यह प्रकट होता है कि रजिया प्रेम में फंस कर ही निकल आई थी। जो बाल्यावस्था में इस दर्जे तक प्रेम कर सकती थी वह दो वर्ष साथ रहने के बाद विलकुल ठंढी थी, कभी शोले की तरह भड़कती ही नहीं थी। रजिया की उम्र कम न थी, कम उम्र की लड़कियां यूं माता पिता के गृह को छोड़ा नहीं करती ? दो वर्प वाद उम्र और अधिक हुई होगी ऐसी अवस्था में एक दम इतनी चुप्पी, जो एक प्रकार से स्त्रीत्व- हीनता या अरसिकता से बाजी ले रही थी, कुछ कारण होना चाहिए । सवाल यह भी हो सकता है कि रजिया क्या सदा से ऐसी ही थी ? यदि ऐसी थी तो क्या घर छोड़ना संभव था ? यदि नहीं तो वाद में क्या हो गया ? हमारी समझ में सब कुछ इन्हीं प्रश्नों के हाल होने पर निर्भर है। यह भी प्रश्न हो सकता है कि रजिया विवाह हो जाने के कुछ दिन बाद कासिम से प्रेम भी करती थी या नहीं ? यह भी कहा जा सकता है कि पति की दासी होना एक बात है, उसका जीवनप्राण होना दूसरी । पति की सेवा में अपने को लीन कर देना एक वात है, पति की अाही होना दूसरी बात है। हमारी दूसरी कठिनाई यह भी है कि हम रजिया को अज्ञात- यौवना नहीं मान सकते, साथ ही हम उसे विस्रब्ध नवोदा, मानिनी, लज्जाभारनत, मुग्धा या मध्या भी नहीं मान सकते। यह भी हम मानने को तैयार नहीं कि रजिया सर्वोत्कृष्ट स्वकीया पतिव्रता ललना न थी। कुछ लोग कह सकते हैं कि रजिया प्रेम करती थी किन्तु उसे वह प्रकट नहीं करती थी, वह वाचाल नहीं कमसुखन, अल्पभाषिणी थी। हम इसे भी सर्वथा मानने को पतियों को सीख [१४३ तैयार नहीं, कुछ हद तक ही यह ठीक हो सकता है। रजिया कमसुखन थी किन्तु निस्सदेह वह गूंगी न थी। हम मानते हैं कि स्वभावतः बहुत से पुरुष और त्रियां कम बोलना पसन्द करती हैं, हृदय उनका प्रेम में डूबा रहता है किन्तु जुवान से हृदय के भावो को वे अदा नहीं कर सकती, अक्सर अत्यन्त प्रेम के कारण भी जवान नहीं खुलती, कवि टेनिसन के शब्दो में- "Dumb swans, not chattering pies do lovers prove" अर्थात् प्रेमी गूंगे हंस होते हैं चिड़चिड़ करने वाली चिड़िया नहीं किन्तु यह सब होते हुए भी हमारी बुद्धि मे यह नहीं आता कि अधिक प्रेम होने से या अल्पभापिषी होने से ही रजिया सदा ही चुप रहना पसन्द करती थी। कासिम ने जो कुछ लिखा है, हृदय की एक विचित्र अवस्था मे लिखा है, उसके वाक्य, यह असंभव नहीं कि तुले हुए न हों,उनमें अत्युक्तिहो, उनमे कमीहो या वे सत्य से कुछ दूर भी हों, किन्तु कासिम के इस वाक्य को हम भूल नहीं सकते "जिसकी जवानने कभी मुझे प्यार से नहीं बुलाया, जिसने चुप के सिवा कभीदूसरा जवाब दिया ही नहीं, जिसने अपने हृदय का हाल सदा हमसे छिपाया.. " दोवर्ष केजीवन मे एक बार भी रजिया सरिता नहीं बनी, समुद्र ही वनी रही, समुद्र भी ऐसा जो कभी पूर्णचन्द्र को देख कर पागल न हुआ, एक वार भी प्रेमाग्नि रजिया के हृदय के तुषार को नही पिघला सकी, वह सदा अपने दिल को अपने हाथो में लिए रही एक मिनट के लिए भी उसने कभी अपना होश नहीं खोया, यह वाते विचारणीय हैं। लज्जा या अल्पभाषिणी होने ही की वजह से यह सब हुआ, यह हम मानने को तैयार नहीं । साधारण रीति से यह कहा जा सकता है कि "माता पिता से छूटने के दुःख और लोकापवाद ने बहुत - १४४] मुहागराव अंशों में गनिया को निर्जीव बना दिया था कहने वाले यह भी नग कि मुखिया जिया दुखिया होगई थी। वह माता पिता से बिछुट्टन के दुःन ने, लोकापवाद के तीरों में दुन्नी हो नग्ना ही चाहनी थी, अपना पिंड शामिम ने छुड़ाना चाहती थी और इनी- लिए यह मर गई । "साहित्य के प्रेमी" इन्हीं शब्दों में इन्हीं बातों मो न कहकर अपने रंग में कह बैठेंगे कि दोयी है वह संसार जिनक हदय में नवं न्नहियों के लिए न्यान नहीं दोषी है वह समाज जिम हदय में पवित्र प्रेम पर पुरयमयी दृष्टि डालने के लिए शनि नहीं । यह भी कहा जायगा कि जिया मरगई न बानी व्याकि वह मन्ना ही चाहती थी उमन दुनियां को, जिसमें सबा प्रेम करना अपराय है. किसी को हदय देना पाप है, वियों के अधिकार पशुओं से भी कम है, छोड़ देना निश्चय कर लिया था और वह अपनी मृत्यु उनी व्यक्ति के हाथ मे चाहती थी जो उसके पीछे दीवाना था, उसका सर्वत्र था। वह अपने प्राणप्यारे के हाथों भरी। जिसके भाग्य में है जो गमी मृत्यु पाय ? प्रेम के प्रेमी यह भी बदन्त न्यादती यह करेंगे जिव रविण के माता पिना को बुरी तरह कोमंग और कह बैठेंगदायी है वे माता पिना जो अपनी इच्छा से कन्याओं को पशुत्रों के गले बांध देत है। और एक ऐसे श्रादमी को कन्यादान दनापाप नमनते हैं, जो इस पापमयी पृयित्री पर अपने हदय में प्रेम का वर्ग लिए फिरता है....भरी सन्मति में यदि कहीं न्याय हो तो उसे चाहिय कि रजिया की नहीं, कासिम की भी हत्या के अपराध में "जिया के मनुष्यताहीन पिता तथा बीत्वहीन माता को फांसी पर चढ़ा दे। प्रेम अन्य पुजारी यह न सोचो कि माना पिना की चलती तो जिया भी जीवित रहनी और सिम भी जिन्दा रहता । प्रेम के पुजारियों को यह सोचना चाहिये कि कया को पढ़ने के बाद भी मसिम रजिया के लिए उपयुक्त पात्र सिद्ध होता है या नहीं ? ?

पतियों को सीख [१४५ संभव है 'प्रेम के पुजारी' समझते होंगे कि शादी अगर हँसी खुशी से होती तो यह झगड़े न पड़ते । हमारा कहना यही है कि ऐसी दशा में रजिया दूसरी हो सकती थी, किन्तु कासिम यही रहता। संभव है रजिया इस दशा में सजीव होती, वह बोलती और हंसती भी किन्तु कासिम का दिमाग, उसकी प्रकृति सदा इसी प्रकार की रहती। दोनों जिन्दा रहते, संसार भी दोनों का चलता, किन्तु जैसा प्रेम के पुजारी' समझते हैं, 'आदर्श दाम्पत्य जीवन, दोनो का न होता। हम माता पिताओं का पक्ष नहीं लेते, ज्यादेतर इनमें भूल करते । अधिकतर विवाह बेजोड़ होते हैं, किन्तु मूर्खतावश । स्वार्थवश भूल करने वाले माता पिता ईश्वर की दया से कम हैं। रजिया और कासिम के सम्बन्ध में त यह भी कहा जा सकता है कि संभव है रजिया के माता पिता ने कासिम की प्रकृति को समझ लिया हो । समझ लिया हो कि यह "किताबी आशिक" है और रजिया वस्तु ही दूसरी है। कुछ हो हमारा यह विश्वास है, सभव है हम गलती पर हों, कि कासिम रजिया के लिये उपयुक्त पात्र न था । हमारी धारणा तो यह भी है कि यदि रजिया के घर वालों ने खुशी से कासिम के साथ रजिया को ब्याहा होता किसी तरह का झगड़ा भी न उठा होता स्वार्थी विलास-प्रिय नाज़ नखरों के भूखे, चचलता और हाव भाव के दिवाने, उद्धत कासिम के साथ रजिया के प्रेम के शोले भी भड़कते, वह वर्फ न होकर आग भी होती तो भी कुछ ही दिनों बाद जोश बलबलों और पहिले उफान के बाद ही, ये एक दूसरे से ऊब जाते, कुछ ही दिनों मे प्रकृति का अन्तर उनके हृदयों मे अन्तर पैदा करना शुरू कर देता, वे साथ रहते, शायद खुश भी रहते, संसार भी उनका बना रहता, किन्तु यह सब होते हुए भी दिन रात इश्क और प्रेम की लहरो में थपेड़े खाने से वह घबरा जाते और १० . १४८ ] मुहागरात वही रजिया को न प्रमन्न कर. महा। क्यों ? क्योंकि रजिया अपनी स्त्री होगई थी, अग्नी मन्यत्ति होगई थी, क्योंकि रजिया का धर्म था कि वह भामिन को नेवा कर, उसको प्रमन्न कर. क्योंकि अधिकार और यह ग्याल कि राजिया मेरी है, नया करना, प्रसन्न करना उमझा धर्म है कासिम के हदय में इस विचार को पैदा होने की जगह ही नहीं .देना था कि तू उसको प्रसन्न कर, उसको समझने की चेष्टा कर. यह वो देव कि जिसने तेरे लिए संमार के कष्ट मह वह निर्जीव क्या होगई है. किम वेदना ने उनकी हदयनन्त्री की झंकार बन्द होगई है, कौन से दुःख में यह प्रेमी दूब गई है कि उभरने का नाम ही नहीं लेनी । कासिम ने यह नहीं किया ब्योकि रजिया उसकी सम्पत्ति थी, उसकी पत्नी थी, उसरा फर्ज था कि वह स्वयं प्यार करे, हरदम हदय के प्याले में प्रेम छलकाती रहे। कामिम का कहना तो यह था "रजिया जब तुम मेरी हो. तब फिर यह क्या है कि तुम मेरे होते हुए भी इस कदर वक्त पढ़ने और सीने पिरोने में सर्फ करती हो' । मेरी हो, मुझे प्रसन्न करो। मेरे होते हुए तुम पढ़ती हो, मीती हो, मेरे सामने, मेरी उपस्थिति में तो तुमको हाय बांध कर खड़े रहना चाहिये, मेरे हाथ पैर दाबना चाहिये और मुझे प्रसन्न करने का ही प्रगल करना चाहिये । यह था कासिम | कासिम को चिन्ता थी कि कान सा मरागला है, कौनसा मनोरंजन है जो उसकी गैरहाजरी को रजिना के लिए बेमानी बना देता है। स्वयं मनोरंजन बन जाने की उसने चेष्टा नहीं की, उसने यह सोचा भी नहीं कि उसे कोई दुख हो सकता है, कोई वेदना, कोई पीड़ा हो सकती है ? बीवी का फर्ज है कि वह पति को प्रसन्न करे और स्वयं खुश रहे, अगर खुश नहीं करती तो कोई मनोरंजन जरूर है नहीं तो अपने फर्ज स वान कैसे रह सकती है ? यह शासिम का ख्याल था । कासिम पतियों को सीख [ १४६ के हृदय में साधारण मानवी सहानुभूति भी नहीं थी, वह स्वार्थ और कामातुरता का, जिसे वह प्रेम के नाम से पुकारता था, शिकार' था। वह रूप का शिकार था, वह शरीर की सुन्दरता का दीवाना था, हृदय का उसे ज्ञान न था, हृदय का वह मूल्य नहीं जानता था और हृदय की उसकी निगाह मे कोई हस्ती ही न थी, उसकी कद्र का उसको पता न था। और इस पर भी वह अपने को मर्द समझता था और उसे नारी-ज्ञान का अभिमान था। अगर रजिया अपनी सम्पत्ति न होती तो यही कासिम उसके हृदय की वेदना को, उसकी प्रकृति को समझने की कोशिश करता, यही नही अगर कासिम मजनू न होता तो भी शायद वह कुछ कर सकता था, किन्तु वहां तो हाल ही दूसरा था। मनोराज्य की मलिका मोअजमा का अदना गुलाम तो था किन्तु मनोराज्य में ही। गुलाम ने यह जानना फर्ज न समझा कि मलिका के चेहरे पर शिकन कैसी है और क्यों है ? चुप क्यों है ? गुलाम प्रेमी को इस की फिक्र हो सकती थी, मालिक को भला यह क्यो होने लगी ? कासिम यह समझता था कि रजिया का अस्तित्व उसके लिए है, रजिया उसके लिए है, किन्तु उसने एक मिनट के लिए यह न सोचा कि कासिम का भी अस्तित्व रजिया के लिए है। उसने यह न किया कि अपने को रजिया के लिए समझने लगता, अपना अस्तित्व रजिया के अस्तित्व मे लीन कर देता। क्यों करता ? वह मालिक था, रजिया दासी थी। हम अपनी ओर से इतना और इस कथा के सम्बन्ध में कह देना चाहते हैं कि नायक और नायिका के चरित्र चित्रण से समस्या सहज मे हल हो सकती है, साथ ही इस प्रसङ्ग में उपदेश भी पाठक पाठि- काओं को दिया जा सकता था। सब से पहली बात जो इस कथा के सम्बन्ध में ध्यान में आना चाहिए वह यह है कि इसी कथा को मरते समय यदि रजिया ने लिखा होता या कथा की लेखिका . १५० ] सुहागरात कोई स्त्री होती तो इस कथा का रूप क्या होता और इसी कथा से शिक्षा क्या टपकती ? हमारी समझ में चातें प्रायः कासिम की ही होती किन्तु जगह जगह पर उसमें रजिया की व्याख्या होती और उसका हृदय भी खुला हुआ होता, उसके वेदनायुक्त हृदय का चीत्कार भी कहीं कहीं पर हमे विह्वल करता, साथ ही कवि वाय- रन के शब्दों में रजिया ने यह जरूर लिखा होता- (1) I love, I love, for this love has lost State, station, mankind, my own esteem And yet cannot regret, what it hate cost So dear is still the memory of that dream. Yet if I name my guilt, it is not to boast, None can deem harshler of me, than I deem I trace this scrawl because I cannot rest I have nothing to reproach or to request (2) Man's love is of man's life a thing apart, It is woman's whole existence. Man may range, The court, camp, church, the vessel and the mart Sword, gown, gain, glory offer in exchange, Pride, fame, ambition to fill up his heart, And few there are whom these cannot estrange Men have all these resources woman but one To love again and be again undone, Or To mourn alone the love which has undone. (3) You will proceed in pleasure, and in pride, Beloved, and loving many, all is over पतियों को सीख [ १५१ For me on earth, oxcept some years to hide My shame and sorrow deep in my hearts core, These could I hear but can not cast aside The passion which still rages as before And so farowell-forgive mo-love me-No, (4) That word is idle now-but let it go I have no more to say, but linger still, And dare not set my seal upon this sheet, And yet I may as well the last fulfil My misery can scarce be more complete I had not lived till now, could sorrow kıll, Death shuns the wretch who fain the blow yould meet And I must even survive the last adiou And bear with life, to love and pray for you* कवि ने अपनी अद्वितीय सरल, सरस, प्रभावमयी भाषा में क्या कह दिया है यह कह देना तो सहज नहीं किन्तु साधारण रीति से इन पंक्तियों का अर्थ इतना ही है कि "मैं प्रेम करती हू, मैं प्रेम करती थी क्योंकि इस प्रेम ने प्रतिष्ठा, सम्पत्ति, स्थिति, मानव समाज सबसे हम को वंचित कर दिया, किन्तु फिर भी हमकोतनिक भीखेदनहीं क्योंकि उस प्रेम के स्वर्गीय स्वप्न की सुखमय स्मृति इस समय में भी हमको बहुत ही प्यारी है। मैं इन पक्तियों को घसीटे दे रही हूं क्योंकि मुझ को चैन नहीं मिल रहा है, मुझको कोई शिकायत नहीं और न मुझे कोई अपनी आकांक्षा । कवि "वायरन' की नायिका का यह पत्र है जो उसने अपने मेमी को, जो उसे त्याग कर जारहा था, लिखा था। कृ.का०मा० १५२ ] सुहागरात ही प्रकट करनी है"। पहले छन्द का अर्थ यह है, दूसरे में ललना ने बड़े ही मार्के की बात कही है और इस समस्या के हल होने पर ही मानव-समाज का भविष्य सुखदायी हो सकता है। कवि बायरन ही की नायिका नहीं, इस कथा की नायिका रजिया भी कहती है "मनुष्य के हृदय का प्रेम उसके जीवन से एक अलग ही वस्तु है, किन्तु स्त्री के हृदय का प्रेम, स्त्री का जीवन है, सर्वस्व है और उसका अस्तित्व है। वह उसके जीवन से अलग नही किया जा सकता । स्त्री का प्रेम और स्त्री का जीवन दो वस्तु नहीं है । मनुष्य के लिए संसार में अगणित क्षेत्र पड़े हुए हैं, वह प्रेम कर सकता है, साथ ही संसार के सभी विभागों में वह सिद्धि और प्रसिद्धि लाम कर सकता है, वह प्रेम न करके भी या प्रेम मे विफल होने पर भी रणक्षेत्र मे, राजनीति में, दरबार मे, व्यापार में, कीर्ति और यश कमाने मे अपने को भूल सकता है, इसी में अपना जीवन लीन कर अपने जीवन को सुखमय बना सकता है और उसके उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है। मनुष्य के लिए संसार के सब क्षेत्र खुले पड़े हैं, किन्तु स्त्री के लिए सिर्फ एक क्षेत्र है और वह है प्रेम कर दूसरों के हाथों तवाह हो जाना, फिर प्रेम करना और फिर तबाह होना । कासिम सब कुछ कहे किन्तु रजिया को इस बात का उसके पास जवाब नहीं है और न कोई। अन्य पुरुप इस बात का जवाब दे सकता है। कुसिम ने कहा था "ओ कमजर्फ इन्सानो, तुम कुछ न कहो, रजिया कासिम की अपेक्षा कितने सत्यता से इन्ही शब्दों को दोहरा सकती है । मर्दो ने अपनी मर्दानगी दिखलाने के लिए स्त्रियों को संसार के सभी क्षेत्रों से अलग कर दिया है और इसका उन्हें नाज है । कासिम अगर पकड़ा न जाता, फासी न पाता, जज उसके इन्कार को ठीक मान लेता, जैसी कि उसने कोशिश की थी तो संसार में वह बना रहता, संसार के विस्तृत मैदान में वह दौड़ लगाता, • पतियों को सीख [१५३ इतना ही नहीं वह किसी प्रेम से छलकते हुए नारी-हदयको अपनी मुठ्ठियों मे लेकर अपने स्वार्थी हृदय के तीरों से उसे फिर वेधता फिर उसे सदा के लिए विदीर्ण कर देता । इसके विपरीत अगर रनिया के किसी तरह प्राण न निकले होते, साथ ही प्राण लेने के प्रयत्न के अपराध मे कामिस को फांसी हो गयी होती तो रजिया के लिए संसार मे क्या था ? स्त्री और पुरुप मे यह भी एक भेद साफ है कि स्त्री लिख सकती है कि हम को कोई शिकायत नहीं, हमारी कोई आकांक्षा नहीं, कोई प्रार्थना नहीं किन्तु कासिम यह नही लिख सका और न कोई कासिम यह लिख ही सकता है । कासिम ने खुद ही कहा है "जिसे मेरे इश्क का प्रलयकारी भूचाल न हिला सका उससे शादी करता यह तुम क्या कहते हो ? रज़िया क्या थी? एक साधारण नहीं असाधारण बालिका जो हृदय और प्रेम का महत्व समझती थी, और उसके लिए मिट जाना जानती थी, साथ ही जो बहुत समझदार न थी और हठी थी। हम समझते है कि विवाह के समय रजिया की उम्र १६ से कम न रही होगी। रजिया को दुनिया का ज्ञान कम था। हमको यह मान लेने में तनिक भी संकोच नहीं कि सुखिया रजिया दुखिया हो गयी थी, किन्तु माता पिता से बिछुड़ने और लोकापवाद के दुख से वह इतनी दुःखी थी, इतनी निर्जीव हो गयी थी, उसका हृदय-कुसुम इतना कुम्हला गया था कि वह एक मिनिट के लिए भी कभी हरा नहीं हुआ, यह हमारी समझ में नहीं आता। दो वर्ष में कभी एक मिनिट के लिए भी अपने को, अपने दुःख को वह न भूल सकी यह एक अजीव वात है। प्रश्न हो सकता है कि क्या इस दु.ख के अलावा भी कोई, इससे भी बड़ा दुःख उसके हृदय-कुसुम को तुषार की छेनी से चीर रहा था। इसका कथा मे कोई पता नहीं।

१५४ ]
नुहागराड
अदनेवाले कहनत है कि "जिया पतिंदव की मिथ्या आशंका
पी अन्तराग्नि महब में जलती हुई प्रेम-चाला श्री संभव है
इसी ने रजिया क हदय को दन्द कर दिया हो, चिन्तुच्या में कई
में यह पता नहीं चलना चि झालिम ने रजिया पर बह
कमी प्रकट कर दिया हो कि उसका उसके चरित्र या प्रेम
में शंका हो गयी है। कोई मन्ननिहाना कह सकते हैं कि न बोलना
रडिया च त्रिगढ़ था, किन्तु ममन्त नहीं पड़ता कि एसा त्र्यों
या ? हमारी राय में यह अमन्नव नहीं कि क्रालिम को उपयुक्त
पात्र न पर, उन स्वार्थी, कानुक और केवल सौन्दर्योपासक
पकन रडिया चा नाता पिता से बिछुड़न और लोकापवाद के
तारों दुःख और भी गहरा होगग श्रीरासिन के लिए हदय
में वही प्रेम न रहा हो या ग्रेन अद्धाहीनता के रूप में परिणत
होत्या हो, किन्तु वास्तव में व्या या सोनिया ही कह सकती
है।दिया के सबन्ध में नि एक बात और हम कह देना चाहते
है और वह यह है कि जिया ही नहीं, संसार की समी ललनायें
च्या की इन शिक्षा को चलन अनरों में अपने सामने
लिव ने किपर्निव अनन्यदासी होने से ही प्रसन्न वा वश में
नहीं रहा करत, रजिया सी दुलिया रात्रि में जाग कर कालिम
वाइन्नदार छिग करती थी, गरनी की सारी दुपहरियों में वह
उन पन्या मला करती थी. ठीक वक्त से भोजन तैयार कर देना
और दिनरम बिछा देना वह अपने जीवन का पान कर्त्तव्य
मनन्नी यी चिन्तु इस कृमिन के हृदय पर क्या प्रभाव
पढ़ता था? कुछ नहीं, या बही नहीं बोमबसे पहले पड़ना
चाहिम या शासन ने न्वयं ही लिखा है इसलिए मरता
था, यह मेरी दिदमत करती थी। पत्रीकी छनन्य दासी के
सिवा कुछ और भी होना चाहिए । संसार की लियों को जो
अपना जीवन सुन्वनय बनाना चाहती हैं, जो यह चाहती हैं कि
।

पतियों को सीख [१५५ पति-देवता, वास्तव में देवता बने रहें, रजिया की इस शिक्षा को कभी न भूलना चाहिए । गोरी, सांवली, कालो, सुरूपा या कुरूपा होना देवी बात है, किन्तु एक साधारण नख सिख की स्त्री पुरुप- को पागल और पुजारी बनाये रख सकती संसार की गणि कायें, कुलटायें, पापाचारिणी स्त्रियां सुन्दरी ही नहीं हुआ करती, किन्तु पुरुप के हृदय को वे मुट्ठी मे बन्द कर लेती हैं । कुलटा कर सके और ललनायें, गृहलमिया, जो हृदय से पति से प्रेम करती हैं उसकी हृदय से सेवा करने में.तत्पर रहती हैं न कर सकें यह प्रशंसा की बात नहीं स्त्री-हृदय की अपेक्षा पुरुष-हृदय परकजा करना सहज है। पुरुष जल्दी अन्धा हो सकता है, पागल हो सकता है। इसी के साथ ही साथ रजिया की शिक्षा, और बहुमूल्य शिक्षा यह भी है कि शरीर की मुख की या वाह्य सुन्दरता एक पुरुप-हृदय को केवल अपनी ओर जोर से आकृष्ट कर सकती है, इसे निकट घसीट कर पैरों पर गिरा भी सकती है, कुछ समय तक उससे वह अपने पैर भी दबवा सकती है, किन्तु पुरुष के हृदय को सदा वश में किये रहना इसकी शक्ति से बाहर है। पास रहने पर कुछ ही दिनों बाद उसी रूप में उसी व्यक्ति के लिए साधारणतः वही आकर्पण नहीं रह जाता, ऐसी दशा में यह असंभव नहीं कि पुरुष हृदय रूपी पक्षी पैरों पर से उड़ कर कुछ मिनटों के लिए ही वनों उप- वनों और वाटिकाओं के वृक्षों पर भी बैठने की इच्छा करने लगे, साथ ही वह आकर्षण के जादू का भी शिकर हो । यदि कोई प्रयोग ऐसे समय में न किया जाय, चन्दर को अफीम का आदीन बना दिया जाय तो यह असंभव नहीं कि कुछ ही दिनों बाद वह चलता बने। हमारे देश की ललनाओं को इसलिए केवल रूप और सेवा सुश्रूपा या भोजन दे देने के भरोसे पर ही नहीं रह जाना चाहिये । वाह सुन्दरता के प्रभाव को कायम रखने के लिए और इसलिए कि कब्जा कहीं से कम न होने पावे, जवान और १५६ ] सुहागरात हृदय से काम लेना चाहिए । रूप के बाद किन्तु रूप से किसी तरह कम नहीं लिया का दूसरा अव या जादू जवान की बातचीत है। इस अन को चलाने का अगर ज्ञान हो तो ल्प होना या न होना कोई बहुत बड़े मूल्य की चीज नहीं है। पतिदेव के दुःख मुख में शरीक होकर उनके कार्य, उननी नंगहों में दिलचस्पी लेकर, तनिक बुद्धिमरी, मीठी वातों से, तनिक मान, लन्न हाव भाव से स्त्री वास्तव में अपने पति का आवश्यक अंग बन सकती है। गृह संसार यात्रा की धर्मशाला या सराय है। दिन भर के बाद दुनिया की नंम्टों से अलग होकर पतिदेव सब दुःखों को भूल जाने के लिए, आराम के लिए सराय में पहुंचते हैं। गृह में ही वे भोजन करते और आराम करते हैं। गृह की मालकिन पत्नी, सराव की देवी है। गृह पहुँचते ही एक मन्द नुसन्धान, एक सहानुभूति पूर्ण शब्द, एक मीठी अञ्ची वान, एक सामयिक साधारण काम से वह त्वामी के सकल म को, तमाम मंझटों को, दुःखों को, चिन्ताओं को मुला दे सकती है. वह उनको वही आराम पहुँचा सकती है जो सहारा या अख के रेगिस्तान की जलती हुई मभूमि की वालू में एक बटोही को, एक सुन्दर पवित्र छुहारे के दरख्तों से घिरे हुए निर्मल, स्वच्छ, मीठे पानी के सोते के पास पहुँच जाने से मिलता है। स्त्री में वृद्धि चाहिए, साथ ही चाहिए उसे पति का सहयोग | सहारा के सेवच्छ सुन्दर. वाटिका के वृक्ष और पुष्प यात्री के जीवन में नवरत का संचार कर देते हैं, उसे प्रफुल्लित और तरोताजा कर देते हैं उसी तरह से गृहवाटिका के वृक्ष और मुमन, लड़के कहू, बच्चों को साफ सुबरे रख कर, उनकी मीठी मीठी बातों से, उनके विनोद, खेल कूद, दौड़ धूप से पति देवता संसार के दूसरे दिन के युद्ध के लिए फिर हरे किये जासकते पतियों को सीख [ १५७ हैं। ऐसा हो सकता है कि थोड़ी देर के लिए पति देवता, अपनी अवस्था, अपने काम काज को और संसार को भूल जाये । पति देवता आप ही इस स्वर्गसुख को छोड़ कर भागने का नाम न लेंगे। मान, हठ, जिद्द की एक सीमा होती है। उस सीमा के पहुंचने तक ही यह लाभकर होते हैं । अफीम एक सरसों का दाना स्वरूप एक वृद्ध को सुला देती है, उसका जीवन कष्टहीन और सुखकर बना देती है, किन्तु अधिक मात्रा में यही उसका प्राण ले- लेती है। मान, हठ, आत्मसम्मान, सेवा भाव प्रेम, लज्जा, नाजो नखरा आदि से विहिन स्त्री, स्त्रीनही किन्तु इनकी मात्रा और समय निश्चित है। हर वक्त एक ही अस्त्र का व्यवहार वह चाहे लज्जा हो, मान हो, हठ हो, नाज़ नखरा हो या आत्म-सम्मान हो, व्यवहार में लानेवाली की ही एक दिन हत्या करेगा। यह ठीक नहीं कि दिन भर की काविशकोफ्त के बाद जलते भुनते पतिदेवता गृह मे आये कि अ‘गी का मुख देख दुनिया को भूल जॉय, वहां अर्धागी दूसरी सीमा पर पहुची हुई है, उसका मिजाज ही नहीं मिलता । पति देवता जान दिये दे रहे हैं, वह उनसे एकतत्वहीन शब्द कह फिर चुप हो जाती है। कोई भी पति इस दशा मे बहुत दिनो सच्चा पति नहीं बना रह सकता। रजिया के सम्बन्ध में अब हम अधिक न कहेगे। वह सती साध्वी स्त्री थी, एक अच्छे गृहस्थ की कन्याथी, जिस प्रकार अपनी माता को अपने पिताजी की सेवा करते उसने देखा था, उसी प्रकार वह सेवा करती थी। संसार का ज्ञान उसे कम था। वह शान्त स्वभाव की थी और कम बोलना पसन्द करती थी। कासिम की वातों का जवाब उसके पास यही था- दिल बुझ गया शवाब के ढलने के पेश्तर। वाकी है दिन हनोज, मगर धूप ढल गयी।

१५८] सुहागरात मृत्यु के समय की उसकी नीरवता यही घोपित करती है कि "हमने क्या चाहा था, इस दिन के लिए? 'कासिम क्या था ? हमारी समझ में एक स्वार्थी, अभिमानी, क्रोधी, मूर्ख, उद्धत और दयाहीन युवा जिसने मालूम पड़ता है उर्दू के चार चार आने के उपन्यास बहुत पढ़ रक्खे थे, जिससे जीवन के सिद्धान्त प्रायः सभी गलत थे किन्तु जो रज़िया को हृदय से पसन्द करता था और उस पर कब्जा चाहता था। (हम यह नहीं कहेंगे कि वह रजिया से प्रेम करता था)। इसे अभिमान अपने मर्द होने का था, किन्तु इसकी मर्दानगी का सबसे बड़ा सुबूत यह है कि “यह एक अवला की वाहें मरोड़ता और जब उसके चेहरे पर तकलीफ के आसार नजर आते तो इसे खुशी होती" । स्वार्थी यह इतना था कि वह रजिया को हृदय से चाहता था। क्यों ? अपने मजे के लिये, इसलिये नही कि एक मिनट भी वह यह फिक्र करता कि रजिया को कोई दुःख तो नहीं है, उसे कोई पीड़ा तो नहीं है १ कहने को यह रजिया से प्रेम करता था किन्तु उसके मां बाप से उसे छुडा कर, संसार से उसे अलग कर उसने उसी जगह एकान्त में रख दिया और उसे यह फिक्र नथी कि लोकापवाद से मृतप्राय रजिया के दिल बहलाने की जरुरत है, उसके पास अधिक से अधिक बैठकर उसे खुश रखने की जरूरत है, इस वात की जरूरत है, कि वह अपने पुराने गृह को भूलजाय, संसार को भूल जाय जिन वातों मे वह दिलचस्पी लेती है, उसी में वह भी दिलचस्पी ले, उन बातों को कासिम अपने जीवन का अंग बना ले, अपने अस्तित्व को रजिया के अस्तित्व की वह परछाही वनाले और अपने को उसमें लीन करदे। उसके विपरीत इसने उस की किताबें फाड़ डाली, उसके कपड़े जला दिये, यह देर को रात्रि में घर पहुचता और इस फिक्र में पागल होगया कि कौनसा मनो- रजन है जो उसकी गैरहाजरी को उसके लिए बेमानी बना देती है। , पतियों को सीख [ १५६ कासिम ने रजिया से कभी यह न कहा:- "अाज फहा तजि बैठी ही भूपन, ऐसे ही अंग कछू अरसीले । चोलति बोल रखाई लिए "मतिराम" सनेह सुनेते सुसीले ।। क्यों न कहो दुःख प्रान प्रिया, अँसुवानि रहे भर नैन लजीले । कौन तिन्हें दुख है जिनको; तुम से मन भावन छैल छबीले ।" इसने यह न किया कि रज़िया को पढ़ने का शौक था तो अच्छी अच्छी सुन्दर पुस्तकें लाकर उसे देता, खुद पढ़कर उनको सुनाता, रजिया से पढ़वाता, उनकी पंक्तियों से सुन्दर सुन्दर अर्थ पैदा करता और पठनपाठन में अपने को ऐसा बना लेता कि उसके विना रजिया को पढ़ने में कोई मजा ही न आता । वह उसकी बाट जोहा करती, वह उसके पास ही वैठकर पढ़ती और बिना उसकी सहायता के उसे पढ़ना न सुहाता । पढ़ने के लिए ही ऐसी पुस्तकें दी जा सकती थीं जो रजिया के सामने एक नूतन संसार उपस्थित कर देतीं, जो रज़िया के हृदय में विजली दौड़ा देती, जो मुदे को जिन्दा बना देती, जो उसमे हरारत पैदा कर देती और जो उसे शोले की तरह भड़का देतीं । उपाय एक नही सहस्त्रो थे, शर्त थी यह कि कासिम अपने को रजिया के लिए समझ लेता, किन्तु यह सव होता कैसे ? रज़िया तो विवाहिता स्त्री, प्राणप्यारी, नही दासी थी, उसके तो कर्तव्यही कर्तव्य थे, उसके हुकूक कहां, उसके अधिकार कहां १ उद्धत और क्रोधी कासिम कितना था यह उसके इसी कहने से जाहिर है "मेरे दिल में उस दिन एक ख्याल आया लेकिन उसे मैंने दवादिया और मैं मुट्ठियों को बन्द कर रह गया" । कासिम ने पुस्तके फाड़ डाली थी, कपड़े जला दिये थे, रजिया रो रही थी और खाना पका रही थी और ऐसे समय मे कासिम के हृदय मे यह विचार आया कि उसका गला दवा दे । यह विचार हृदय मे पहले ही स्थान पाचुका था, किन्तु मुट्ठी वांध उसने विचार को दवा दिया था, दूसरे अवसर पर यही विचार तनिक दृढ़ होगया और १६० ] सुहागरात वह उसे दवा न सका, रजिया मर गयी। गला दवा देने की ही जबर्दस्त ख्वाहिश ने कासिम की अंगुलियों को फोलाद बना दिया था और यही कासिम प्रेमी बनता है। कासिम को इसकी शिकायत है कि रजिया ने उसे मनाया नहीं, वह दो दिन रूठा रहा, वह वोला नही, उसने खुश करने की कोशिश नहीं की किन्तु इसी कासिम ने पुस्तकों को फाड़ने, कपड़ो को जला देने के लिये रजिया से माफी नहीं मॉगी, उसके पैरो पर गिर कर उसने यह नहीं कहा कि मैं लजित हूं, क्रोध में ऐसा होगया, यह लो, उनसे भी सुन्दर सुन्दर पुस्तकें लाया हूँ और भी अच्छे अच्छे कपडे ला दूंगा, एक मेशीन भी ला दूंगा कि और भी अच्छी तरह से सीने का काम कर सको । कासिम यह सब क्यों करता ? वह तो मर्द था, कमाता था, रजिया उसकी मोहताज थी। गुलाम का माफी मांगना, भूल के लिए पश्चाताप प्रकट करना फर्ज है, मालिक के लिये जो खाने को दे, यह नितान्त अनावश्यक है। कासिम को प्रेम का नहीं, रोटी कपड़ा देने का घमड था। उसी का जोर था। प्रेमी, आशिक कहीं यू भी किया करते हैं, उनको कभी क्या इसका भी जोर हुआ करता हैं ? वे कही गला दवा देने की भी इच्छा किया करते हैं। कासिम नासमझ था, उसको इतनी अक्ल न थी कि किसी दूसरे मुहल्ले मे किसी दूसरे शहर मे लोकापवाद के दायरे से दूर रजिया को रखता । पुस्तकों और कपड़ों के जाया हो जाने पर रजिया रोने लगी और इससे कासिम के क्रोध का पारा चढ़ गया। उसके दिल मे यह ख्याल आया कि रजिया उसकी अपेक्षा पुस्तकों और कपड़ों को अधिक प्यार करती है, इस मूर्ख को यह न समम पड़ा कि रजिया इसलिये रो रही है कि जो दिन रात के साथी थे, जिनके साथ बैठकर वह अपने दुःख के समय को काट देती थी, जिनकी सोहबत में उसे अपना संसार से, समाज पतियों को सीख [१६१ से अलग होना भूल जाता था वह साथी भी अब न रहे, अव दिन कैसे कटेगा ? वह रो रही थी इस दुःख से कि जिसने माता पिता से अलग किया, संसार से अलग किया, जिसके लिए ससार के कष्ट मैंने उठाये, जो खुद मुम को सुखी नहीं बना सकता, मेरे दु.खों को दूर नहीं कर सकता, जो मेरे हृदय-कुसुम को एक सेकन्ड केलिए प्रफुल्लित नहीं कर सकता, जिसने एक मिनिट के लिए यह समझने की कोशिश न की कि मेरा दिन कैसे कटे, जिसने स्वयं मेरे मनोरजन का कोई प्रवन्ध न किया, उसी ने श्राज उनको भी नष्ट कर दिया जो मेरी इस विपत्ति के साथी थे, सच्चे साथी थे, जो दगा नहीं कर सकते थे, जो स्वार्थी न थे और जो कम से कम मुम से प्रेम नहीं करते थे तो मेरे हृदय को चोट भी नहीं पहुंचाते थे। कासिम यह सब क्यों सोचता सम- मता, उसको तो स्त्री का महत्व ही नहीं मालूम था । वह तो सम- मता था कि स्त्री इस काबिल है कि एक रात के लिए बदमुनीर, पूर्णचन्द्र हो और वस । उसका तो विचार यह था कि स्त्रियों को चन्द लहमों के मनोरञ्जन से जियादा कुछ भी समझना सद्विचार का गला घोटना है। जिसके ये विचार हों, वह प्रेमी या आशिक हो नहीं सकता,उसकी दृष्टि में स्त्री का कोई महत्व हो नहीं सकता, वह स्त्री को अपने वरावर की समझ नहीं सकता, और जहॉ मर्द अपने से ही अधिकार और कर्तव्य स्त्री के नहीं समझता, जहॉमर्द यह नहीं समझता कि स्त्री के भी हृदय है, आत्मा है, वह भी सुख दु.ख को उसी तरह से अनुभव करती है जैसे कि मर्द, जहाँ पति वी को अपने से अधिक प्रसन्न और सुखी नहीं रखना चाहता, वहाँ सुख नहीं हो सकता, वहां वह प्रेम, जिसकी दुहाई देकर दुनिया पागल होती है, हो नहीं सकता। संसार के मनुष्यो के लिये ही नहीं पागलों के शात्र में भी तो प्रियतमा के ही सब अधिकार होते हैं, कर्तव्य का वोम तो मर्द ही के सर रहता है। ११ १४२] सुहागरात - खी-पुरुष का प्रेम यह सिर्फ कवियों की कल्पना है। प्रेमियों के ही नहीं, कवि- यो और लेखकों के मस्तिष्क की भी यह बीमारी है जिस प्रेम का वर्णन हम पुस्तको मे पढ़ा करते हैं वैसी कोई चीज संसार में होती नहीं, वैसे प्रेम का संसार में अस्तित्व ही नहीं है। प्रेम को स्थायी कहना कवियों की कल्पना मात्र है। वास्तव में जिसे हम प्रेम समझते हैं वह काम की वासना मात्र है, वह केवल प्रवृत्ति और निवृत्ति के पदार्थों का आकर्पण है। कवियों और लेखको ने प्रेम के गीत गा गाकर दुनिया को पागल और तबाह कर दिया है। उन लोगों ने अपनी कल्पना शक्ति से, लेखनी के जोर से एक ऐसी वस्तु को, जिसकी चर्चा करते भी लोग लजित होते, पवित्र बना दिया है। स्थान की कमी से इस सम्बन्ध में अधिक न लिख कर हम इतना ही कह देना चाहते हैं कि प्रेम के गीत गाने वाले यह नहीं कह सकते कि यह घटता-बढ़ता नहीं, कम से ज्यादा नहीं होता या ज्यादे से कम नहीं होता, यह भी कोई नहीं कह सकता कि आदि से अन्त तक यह एक ही सूरत में रहता है। हमारा कहना यही है कि जो चीज घटती बढ़ती है वह नाश को भी प्राप्त होती है और जो चीज़ नाश हो सकती है वह स्थायी नहीं हो सकती । किन्तु कवि अपनी कल्पना से प्रेम को अनन्त और स्थायी समझते हैं। कासिम को भी काम-वासना थी। रजिया के रूप पर यह मोहित था, यह रजिया पर कजा चाहता था, इसलिए कि खुल्लम खुल्ला, संसार, समाज और धर्म की आना से, कम से कम मूल्य देकर वह अधिक से अधिक अपनी वासना की तृप्ति करे। विवाह के नाम से वासना की तृप्ति केलिए वह एक पेटेन्ट लाइसेन्स चाहता था,विवाह का अर्थ उसके लिए इतनाहीथा,कासिम बेचारे केलिए ही क्यों सभी प्रेम के पुजारियों और विवाह का अर्थ । पतियों को सीख [ १६३ न समझने वालों केलिए विवाह का अर्थ इतना ही होता है। कासिम रूप पर मोहित हुश्रा, रूप को उसने देखा था और इस- लिए वह शरीर पर कब्जा चाहता था। इससे परे भी विवाह का अर्थ कुछ होता है इसकी उसे न फिक थी, न परवाह। वह यह नहीं जानता था, यद्यपि नारी-ज्ञान का उसे अभिमान था कि सच्चा विवाह, शरीरों का नहीं हृदयों का विवाह हुआ करता है । हृदयों का हो विवाह स्यायो सम्बन्ध और स्थायी सुख का सृजनहार होता है। इन्ही सब बातों को समझ कर हमारे पूर्वजों ने विवाह को धर्म का, कर्तव्य का वाना पहिना दिया था। विवाह जभी सुखकर हो सकता है जब वह पारस्परिक स्नेह, पारस्परिक त्याग, पारस्परिक सहयोग और पारस्परिक सेवा की नींव पर खड़ा हो । कासिम को यह विदित न था क्योंकि शायद उसकी राय में त्रियों के आत्मा या हृदय नहीं हुआ करता । कासिम का "स्त्री-सम्बन्धी ज्ञान" सभी दृष्टियों से निकम्मा था। कासिम के स्त्री और उसके प्रेम सम्बन्धी विचार यह थे कि 'औरत' अगर चाहे तो मर्दो की जिन्दगी को तबाह कर सकती। फितरत, प्रकृति ने दिलों के तोड़ने के जिस कदर जितने भी ढंग हैं वह तमाम और- तों को सिखा रक्खे हैं। प्रकृति ने मर्दो के दिल महज इसलिए बनाए हैं कि औरतें उनको वे-परवाही से तोड़ डाला करें 'औरत का संकल्प जुल्म और सितम होता है जहां बगावत के बगैर कोई चारा नहीं, बगावत करना ही जहाँ रक्षा का उपाय है। मालूम नहीं विफल-मनोरय होने पर खीज में कासिम ने यह कह डाला है या उसके ख्याल ही ऐसे थे। कासिम के न हों किन्तु संसार के कितने ही कासिमों के स्त्री-सम्बन्धी विचार ऐसे ही हैं। हम इन कासिमों से इतना ही कह देना चाहते हैं कि जिनके विचार यह हैं कि वे किस मुंह से सियों से सुख मिलने की आशा रखते १६४ ] सुहागरात हैं ? ऐसे विचार रखने वाले कभी स्त्री-सुख का उपभोग नहीं कर सकते । हम यह भी यहां पर कह देना चाहते हैं कि कासिम के यह विचार उनके लिए हितकर हो सकते हैं जो बाजारू स्त्रियों या पर स्त्रियों के साथ अपना कुछ समय काट देना चाहते हैं, गैरों के साथ व्यवहार करने मे उनको मनोरंजन समझना, एक रात्रि के लिए पूर्णचन्द्र समझ लेना और वस, हितकर हो सकता है किन्तु अपनी श्रद्धांगी के साथ नहीं, उसके साथ नहीं जिससे हम सच्चा सुख चाहते हैं और जिसको हम जीवन की संगिनी वनाना चाहते हैं। 'स्त्री और स्त्री का प्रेम' कुछ और ही वस्तु है। एक लेखक के शब्दों में स्त्री का प्रेम अद्भुत है, आरंभ मे वह इतना शुद्र है कि उसकी कोई संज्ञा नहीं, किन्तु अन्त उसका इतना विशाल है कि जिसका अन्त नहीं। यह पानी के उस छोटे बुद्दों के सोते के समान है जो वूद बूद कर पहाड़ से टपकता है किन्तु जो आगे बढ़कर एक महान नद बन जाता है । यह वह महान् नद है जो सुख के दरिया वहाता, अठिलाता, नाचता, चारों ओर आनन्द की फैलता चला जाता है जो मनुष्यों के हृदय को आनन्द से पूर्ण करने वाले सम्पत्तिशाली वेड़ों का वाहन है, जो वीरान मैदानों और जगलों को रग विरंगे सुन्दर सुमनों की वनस्थली वना देता है और जो उत्सुक किसानो के लहलाते खेतों को प्रफु- लित कर देता है। साथ ही यह स्त्री-प्रेम एक भीपण जल-प्रपात या जल-प्रवाह है जो वर्षा के तूफान मे आशा की क्यारियों को डुबोकर नष्ट कर देता है, जो विचार के वॉधों को तोड़ कर मनुष्य की पवित्रता के मन्दिरों और धर्म के देवालयों को मिट्टी में मिला देता है, जो अपने प्रचंड वेग मे गांवों, मवेशियों और गरीव किसानों के झोंपड़ों को वहाता, नाश करता चला जाता है। स्त्री क्या है, यह कौन कह सकता है, किन्तु यह सत्य प्रतीत होता वर्षा करता, पतियों को सीख [१२५ है कि सृष्टि के प्रारम्भ में, जब अन्तर्यामी ने इस संसार के क्रम का विचार किया उस समय रचनाक्रम के सांचे में उसने स्त्री-प्रेम के बीज को डाल दिया क्योंकि यह अपनी विपम और अचिन्त- नीय उत्पत्ति और वृद्धि में समानता का जन्म लेने वाला है। यह युद्ध कराता है, सन्धि कराता है और इस तरह से भी समानता स्थापित करता है। कभी यह नीचों को अकथनीय आश्चर्यजनक ऊंचाई पर पहुंचा देता है और कभी यह ऊँचों को धूल धूसरित कर देता है, उनको मिट्टी में मिला देता है । इसलिए, जब तक म्त्री, प्रकृति की विस्मय-जनक बंटी,संसार में मौजूद है पुण्य और पाप अलग अलग नहीं उदय हो सकते या उग सकते क्योंकि वह सदा प्रेम में मदमत्त, प्रेम के तीरी को लिये सामने खड़ी रहती है और हमारे भाग्य का निपटारा किया करती है। कभी यह अमृत समान मीठे जल को कटुता और जहर के प्याले में डाल देती है और कभी इच्छा के हलाहल से जीवन के स्वच्छ, पवित्र श्वास को विपमय कर देती है । बगावत व्यर्थ है । पुरुय, जिधर चाहे भागे, हर तरफ उमी का मामना है। उसकी निर्बलता, उसका प्रेम उसको कोमलता तेरी शक्ति है, उसका साहस, उसका हठ, उसकी विरक्तता, उसकी निडरना तेरे विनाश का कारण है । तू उसका है और उसी का होकर रह सकता है । स्त्री मान-भंग की भूमि है, उसमे वह चुम्बक शक्ति है, जो अनायास ही लोहे के पहाड़ों को हिला. देती है और अपनी ओर खींच लेती है। यह तेरी बांटी है, किन्तु तुझे वांव का. रखती है। उसके लर्श मे मान विदग्ध हो जाता है, कपाट खुल जाते हैं और वन्धन टूट कर गिर पड़ते हैं। वह आकाश के ममान अनन्त समुद्र के समान गम्मोर, विद्युत के समान चपल और विधि के समान अन्नात और अजेय है। स्त्री का ही दूसरा नाम अदृष्ट है। पुरुष ! इसलिए स्त्री से बचने का प्रयोग मत कर, "तू जहां भी भाग कर ।

११६] सुहागरात जायगा भावी समान वह तेरे साथ रहेगी और जो कुछ तू निर्माण करेगा वह उसी का घर होकर रहेगा। कासिक का कहना है कि औरत मर्दो को तबाह कर सकती है। किन्तु क्या औरत मर्दो को वर्ग का सुख इसी पृथ्वी पर नहीं देती और उनको ऊंचे से ऊंचे आसन पर नहीं बैठा देती । कासिक का कहना है कि दिलों' को तोड़ने के जिस कदर भी ढंग हैं प्रकृति ने औरतों को सिखा रक्खे हैं, किन्तु क्या यह कहना गलत है कि ससार में और स्वर्ग में जो भी, जितने भी सुख हैं सब की दात्री, सबका केन्द्र स्त्री है । कासिम कहता है कि 'मर्दो के दिल महज इसलिये हैं कि औरतें उनको वेदर्दी से तोड डाला करें, किन्तु क्या औरतें कासिम की अपेक्षा अधिक सत्यता से यह नहीं कह सकतीं कि वे इसलिए हैं कि मर्द उनको प्रेम में फॉसें, धोखा दें, चन्द लहमों के लिए उनको अपना खिलौना बना लें और फिर तोड़ फोड़ कर अलग करदें। औरतें इसलिए हैं कि वे सेवा करें, सर न उठावें और यों ही अपनी इह लीला समाप्त करदें । कासिम का कहना है कि 'जिया' ने सदा अपने हृदय का हाल छिपाया, किन्तु कासिम को यदि तनिक भी स्त्रियों का ज्ञान होता तो उसे यह मालूम होता कि स्त्रयों में इतना धैर्य होता है इतना संतोप होता है कि वे अपने दुःख की वात, अपनी पीड़ा की वात सदा छिपाया करती हैं, इसलिये नहीं कि छिपाने मे उनका कोई निजू स्वार्थ है वरन् इसलिए कि कष्ट सहने में ही वे अपने प्रेम का महत्व समझती हैं, अधिक से अधिक सेवा करना ही वे अपना धर्म समझती हैं और किसी तरह की भी चिन्ता या कष्ट अपने पति को वे नहीं देना चाहती। कासिम का कहना है कि स्त्रियाँ इस काविल हैं कि एक रात केलिए पूर्णचन्द्र हो और वस । उसके ख्याल में चन्द लहों के मनोरञ्जन के सिवा इनको कुछ भी समझना सद्विचारों का गला पतियों को सीख [ १६५ घोटना है। कासिम के इन्ही विचारों ने उसका नाश किया, वह रजिया को चन्द लहमो का मनोरञ्जन मात्र सममता था, वह शरीर से हो सम्बन्ध रखता था, हृदय से नहीं। स्त्रियां मनोरञ्जन मात्र नहीं हैं, वे अद्धांगी हैं, जीवन की नैया को बराबर खेवैया हैं, वे देवा हैं, दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती उनको ही भिन्न विभूतियों के नाम हैं। कासिम का कहना है कि एक हस्ती कई हस्तियो से बनती है, उसको जिन्दगो के आखिरी लहमों मे मालूम हुआ था कि उसकी तनहा हस्ती में किस कदर बहुतायत थी। अगर उसने पहले से गौर किया होता तो उसे मालूम होता कि रजिया मे ही नहीं, हर स्त्री मे दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती और काली सब एक साथ ही मौजूद होती हैं, एक हस्ती में ही बहुतायत होती है। कासिम का इतना जान ठीक है कि स्त्रियां अन्धा कर देती हैं, पागल बना देती हैं और अपने निकट पहुंचने का रास्ता नहीं बतलाती। स्त्रियों में वास्तव में यही विशेषता है, यदि वे अन्धा न कर सकें, पागल न बना सकें तो स्त्रियो के अस्तित्व के उद्देश्य की पूर्ति न हो सके और सृष्टि के विकास का काम आगे न बढ़ सके। निकट रास्ता ढूढ निकालना ही मर्द का काम है। स्त्रियां नहीं बतलाती क्योंकि उनकी लज्जा, उनका धैर्य, उनका सन्तोप, उनका सेवाभाव उनके ऐसा करने मे वाधक होता है। कासिम के सम्बन्ध मे अब अधिक कहना जरूरी नहीं फिर भी संसार के कासिमों के लिए यह कह देना ज़रूरी मालूम पड़ता है कि "पुरुष की सिर्फ आवाज स्त्रियों के हृदय पर कुछ अनूठा असर करती है । यह प्राकृतिक है, मोर की आवाज के सुनने से मोरनी की क्या दशा होती है, यह मोरनी के सिवा कौन बता सकता है, किन्तु पुरुप की आवाज़ का कुछ असर है जरूर । कासिम जिस तरह, जिस भाषा मे और जिस दिल से प्रेम की भिक्षा मांगा करता था वह किसी भी स्त्री-हृदय को साधारण रूप से हिला दे १६८] सुहागरात सकता है, उसका असर न होते देख कासिम को स्वयं विचार करना चाहिए था, उसको समझाना चाहिए था कि उसके इश्क का भूचाल रजिया को क्यों नहीं हिला देता। रजिया स्त्री थी, इसमे सन्दह करने की वजह न थी, स्त्री होते हुए भी, हृदय स्त्रीत्वहीन क्यो हो रहा था यह कासिम को सोचना चाहिए था। न समझ आने पर वजाय प्रेम मे सराबोर शब्दों को सुनाने के उसे उसके पैरो को अश्रु से धोना चाहिए था, हाथ जोड़ कर अपने किए हुए, और न किये हुए जाने और अनजाने कुसूरों के लिए माफी मांगना चाहिए था, सारा दोपी अपने को मान लेना चाहिए था। अश्रुधारा रजिया को हिला देती, गरम गरम आंसू रजिया के हृदय पर जमे हुए कीट को वहा ले जाते, रजिया का हृदय भी पिघल जाता और इस दशा मे शायद जो घटना घट गयी वह न घटती। मार डालने के बाद लिपटना निस्सार भावुकता के सिवाय कुछ न था। पति मालिक कासिम को यह वात शायद न जॅचे लेकिन प्रेमी कासिम को इसके मान लेने में कोई अड़चन न होनी चाहिए। संसार के कासिम इस बात की उपयुक्तता को न मानेंगे, उनकी समझ केलिए हम इतना ही कह देना चाहते हैं कि यदि दुर्भाग्य से साधारण सी बात में भी यदि किसी समय स्त्री को विवश होकर जबरन स्वयं अपना मान भंग करना पड़ता है तो उसका हृदय मर जाता है और पुरुप को अन्धा और पागल बनाने की उसकी शक्ति में कमी हो जाती है। अपने स्वार्थ, अपने सुख के लिए ही पुरुष को इसलिए ऊपर कही हुई बात मानना चाहिए। सिद्धान्त की वातो मे समुद्र की वीच की चट्टान की तरह अटल और अजेय प्रेम की बातो में देवी का अदना, जरखरीद गुलाम होने से ही पुरुष स्त्री का प्यारा रतिपति प्रियतम हो सकता है। कासिम के सम्बन्ध मे अब हमे इतना ही कहना है कि वह पतियों को सीख [ १६६ एक साधारण मनुष्य था, उसने विना रजिया को समझे बूझे उससे शादी की. वह उसे प्रसन्न करना चाहता था किन्तु कर न सका। अपनी बेवकूफी से वह रजिया और साथ ही अपनी मृत्यु का कारण हुआ। अनमेल विवाहो और नितान्त शारीरिक सम्बन्धी का यही अन्त हुआ करता है। रजिया ने अपना धर्म छोड़ा, माता पिता को छोड़ा, समाज को छोड़ा एक ऐसे मनुष्य के लिए जिसकीप्रकृति उसकी प्रकृति से भिन्नथी, अपनी इस नासमझी का उसने भी दण्ड पाया। वर से इस प्रकार निकलने, समाज को इस तरह से त्याग करने का दण्ड क्रूर समाज बुरी तरह से देता है, वह दयाहीन है, ममता उदारता को उसके हृदय में स्थान नहीं मिलता है। समाज ने अपनी अवहेलना का वदला लिया । खता वास्तव में उन कवियों और लखको की है जिन्होंने 'कामवासना' को प्रेम और इश्क के नाम से पवित्र कर दिया है और कसूर कासिम का सिर्फ इसलिए अधिक है कि वह मर्द था, रजिया रो अवस्था मे भी अधिक था, रजिया की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान था, उसे संसार का ज्ञान भी अधिक था और इसलिए कठिनाइयो को उसे पहले समझ लेना चाहिए था, उनको दूर करने, उनका मुका- बिला करने का भी उसे प्रवन्ध करना चाहिए था। करीब करीवसभी प्रश्नों का जवाव ऊपर की वातो मे आगया है, सिर्फ प्रश्न यही रह गया है कि 'मरगई न बोली' यह क्या? हमारा कहना यही है कि रजिया ने यह नहीं समझा था कि वह मर जायगी, कासिम मार ही डालेगा। नहीं बोली थी इसलिये क्योंकि उसकी समझ मे ही नहीं आता था कि क्या जवाब दें। निस्सार भावमय बातो का एक साधारण गृहस्थ ललना जवाव ही क्या दे सकती है ? साथ ही विरक्त होने से हठ भी था कि न बोलूंगी, मगर रज़िया यह नही समझी थी कि नतीजा यह होगा । दुनिया से वेज़ार होना, मरने के लिए सदा तैयार रहना एक बात है, मर जाना १७.] सुहागरात दूसरी । रजिया का मर जाना केवल दैव या विधि की विडम्बना के नाम से ही पुकारा जा सकता है। रजिया को उढ़ा नायिका सम- मने वाले कुछ लोग रजिया की तुलना सेक्सपियर के 'डेसी डमोना' से करेंगे । डेसीडमोना का भाग्य भी कुछ रजिया के ही समान था, डेसीडमोना भी सती थी और बोलना नहीं जानती थी, इन बातों को छोड़ कर और कोई भी तुलनात्मक बात दोनो मे नहीं है । 'डेसीडमोना' पर दुश्चरित्रा होने का अभियोग उसके पति "ओथेलो" ने लगाया था, वह सतो थो, सीधी थी, बातें करना नहीं जानती थी, चतुर भी न थी, वह पति को सन्सुष्ट न कर सकी, जब कि एक चतुर स्त्री सहज में ही कर सकती थी। रजिया की स्थिति ऐसी न थी। रजिया नहीं बोल सकी, नहीं जवाब दे मकी, क्योंकि उसका हृदय भावुक न था, क्योंकि वह बातें बनाना नहीं जानती थी और क्योंकि उस समय उसके हदय की दशा कुछ वैसी ही थी जैसी कि कथा लिखने के समय कासिम के हदय की थी। रजिया का हृदय एक अधगिरा मन्दिर था जिसमें जीवन नहीं, एक खंडहर था, जहाँ न आरती की झलक थी न घन्टे की गुंजार, उसमे केवल वीतकाल की पूजा की स्म ति थी, वह भी स्वप्न समान । रजिया सेवा का काम पूरा करती थी इसमें उसने कमी नहीं होने दी, दासी की भॉति वह काम करती रही, क्योकि कासिम की दृष्टि में वह दासी थी । कासिम ने रज़िया के हृदय की परवाह न की, उसका आदर नहीं किया, रजिया ने भी अनाहत हृदय को दूर ही रक्खा और हृदयहीन होकर ही शरीर के उपासक केलिए शरीर से ही सब कुछ करती रही। (अभ्युदय से उद्धृत) विवाह के लिये सात नियम सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए निम्न सात नियम शिकागो के जज जोसेफ सेवाथ ने लिखे हैं। आप अमरीका में कम से कम २२००० तलाक के मामलों में फैसला दे चुके हैं:- (१) अपने साथी के शरीर, मस्तिष्क और आत्मा के अनुकूल बनो। (२) ध्यान रहे कि नीरसता और सफल विवाह इन दोनों में घोर शत्रुता है। (३) समझौता वह महोषधि है जो तलाक के कीटाणुओं का विनाश करती है। (४) विवाह के पहले ही अपनी प्रेमिका अथवा प्रेमी के विवाह सम्बन्धी विचारों को मालूम कर उनको अपने प्रेममय जीवन का आधार बना लो। (५)सासों का मिलना भाग्य की बात है किन्तु उनके साथ रहना खतरनाक है और उनकी आलोचना करना घातक है। समय बीती को वेदी ही पर छोड़ आना चाहिए, फिर उसे वापस लेने कभी न जाना चाहिए। (७) विवाह-सम्बन्धी कालेज में प्रवेश के लिए कोर्टशिप प्रारम्भिक स्कूल है। प्रेम की कला की सच्ची शिक्षा तो सुहाग- रात को ही प्रारम्भ होती है और जीवन भर होती रहती है।

स्त्री, पुरुष और प्रेम स्त्री की जवान यद्यपि केवल तीन इन ही लम्बी होती है, किन्तु यदि बदमिजाज हुई तो वह अपनी जवान से ६ फीट लम्बे आदमी का संहार कर सकती है। एयनालोजिकल सोसाइटी के सामने स्त्री की पुरुप से तुलना करते हुए अपने भाषण मे डा० वर्नार्ड हालैण्डर ने उपर्युक्त कहा- वत का उल्लेख किया था। उनके भाषण से कुछ उद्धरण नीचे दिए जाते हैं- पुरुप अधिक निश्चयी, पुरुपार्थी, मत्त और स्फूर्तिवान होता है। स्त्री अधिक सहनशील, शान्त, प्रेमी और सदा एकसी रहने वाली होती है। यही कारण है कि पुरुष बढ़िया जर्राह (सर्जन) और स्त्री अच्छी धाय (नर्स) बन सकती है। पुरुष शब्दो से काम लेता है, स्त्री अपनी दृष्टि और नम्रता से काम लेती है। प्रायः सभी स्त्रियां अपने कार्यों मे बहुत उदार होती किन्तु विचारों में वे सदा उदार नहीं होती । पुरुप किसी वस्तु अथवा व्यक्ति को पसन्द अथवा नापसन्द कर सकता है; स्त्री सदा पराकाष्ठा पर रहती है। स्त्रियां वास्तविक झूठ बहुत कम बोलती हैं, क्योंकि पहले वे अपने को इस बात का विश्वास करा लेती हैं कि जो कुछ वे कहेंगी वही सत्य है । स्त्री कभी कभी अपने पापों को भी कबूल सकती है किन्तु अपनी गलतियों को वह बहुत कम स्वीकार करती है।

पतियों को सीख [ १७३ प्रेमासक्त पुरुष जल्दबाजी में रहता है । वह तीव्र भावा की प्रत्येक अवस्था को जल्दी से पार कर जाना चाहता है, मानो वह सदा केलिए इनसे छुटकारा पा जाना चाहता हो । स्त्री प्रत्येक सीढ़ी पर कुछ विश्राम लेना चाहती है। पुरुप थोड़ा किन्तु अक्सर प्रेम करता है, स्त्री बहुत ज्यादा प्रेम करती है किन्तु एक बार ही । प्रेम की वेदी पर स्त्री अपने को मिटा देती है इसके विपरीत; पुरुप कभी कभी अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए अपनी आत्मा की तरह उस स्त्री को भी ठुकरा देगा जिससे वह प्रेम करता हो। बी जव तक प्रेम करती है लगातार करती है, किन्तु पुरुष के प्रेम करने के अवसर हुआ करते हैं।

प्रेम और सम्पत्ति विवाह होते ही हम सभी रोमियों और जूलियट हो जाते हैं किन्तु प्रकृति कला से अधिक होशियार नाटक रचयिता नहीं है। विवाह के बाद वाले सुबह को ही यह हमारा साथ नहीं छोड़ देती। अतएव कभी कभी ऐसा होता है कि दूसरे दिन पर्दा उठता है और एक नया खेल आरम्भ हो जाता है सम्भवत: यह खेल 'कर्कशा स्त्री' वाला भी होता है। इङ्गलैण्ड के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ वेज्ञामिन डिजरेली के तरफ लोगों का ध्यान आकर्पित किया गया है। मि० ऐण्ड्री मौराय की विवेचना के अनुसार डिजरेली चमत्कार पूर्ण विवाह में विश्वास ही नहीं करते थे। ग्रासवीनारोड में एक विशाल मकान की मालकिन मिसेज वीएडहम लूई नामक एक अत्यन्त धनी विधवा के साथ जव डिज- रेली ने विवाह किया तब उसके शत्रुओ ने बड़े जोरों से यह कहना आरम्भ कर दिया बनाने के साधन हैं। किन्तु जैसा कि हमको उपदेश देने वाले लोग हमें आगाह क्रिया करते हैं इस तस्वीर का एक दूसरा रुख भी है। इसका सममना अत्यन्त आसान है। आजकल के विवाहों में नो मिथ्या जगमगाहट और शोरगुल रहता है उससे विवाह सूत्र में वन्यने वाले व्यक्तियों का साधारण धैर्य जाता रहता है। मैं नहीं जानता कि किसने 'प्रेमासक्त होना' इन शब्दों को ईजाद किया है। चाहे वावा आदम ने अथवा जेन जैक्कीस नौसो ने किया हो, किन्तु जिस किसी ने इन शब्दों को ईजाद किया वह अवश्य पतियों को सीख [१७५ ही अपने लोगों का बुरा चाहता था क्योकि इन शब्दो का अर्थ भ्रमोत्पादक है। कुमार कुमारी की दशा में किसी से प्रेम करना युवा व्यक्तियो केलिए एक अत्यन्त चमत्कार पूर्ण ओर उपयुक्त वात समझी जाती है। प्रेम करने से ठीक हो अथवा गलत-हम यही मतलब सम- झते हैं कि दो युवा व्यक्ति आकर्पण के नियम के अनुसार आपस में मिल रहे हैं। स्टेज और पुस्तकों में प्रेमासक्त व्यक्तियों को लेकर बड़ा खिलवाड़ किया गया है । विषय फलप्रद है और इसे लगातार उत्तेजना देते रहने को आवश्यकता है। क्योंकि परिस्थिति का निरूपण करने से पता चलेगा कि इससे बढ़ कर अन्य मजाक की चीज नहीं है। प्रेमी लोग यह ख्याल कर सकते हैं कि संसार मे वे अत्यन्त स्वार्थहीन व्यक्ति हैं। अचानक मालूम पड़ता है कि जीवन ने एक नया प्रकाश और नया अर्थ ग्रहण किया है । आपस मेदोनो प्रेमी एक दूसरे को अधिक रूपवान् देखते हैं । ऐसा ही उनको मालूम पड़ता है, किन्तु यह सच्ची परिस्थिति नहीं है । आपस में एक दूसरे को सुखी देखने की धुन में वे यह नहीं देखते कि बात वैसी ही नहीं है जैसी मालूम पड़ती है । वे तो अपने अपने सुख की तलाश में ही रहते हैं।

प्रेम के विवाह से कर्तव्य का विवाह श्रेष्ठ है। इङ्गलण्ड अभी बहुत दिनों तक प्रेम के विवाह की लीलाभूमि बना रहेगा। 'डेली मिरर' नामक समाचार पत्र में एक लेखक ने लिखा है कि हम लोग (अंग्रेज़) स्वप्नदर्शी हैं और एक फरांमीसी की तरह सच्चाई का अनुभव नहीं करते । हम लोग उसमें अधिक रुचि लेते हैं जिसे "एक सुन्दर विवाह" कहा जाता है, फूलों का गुच्छा लिए हुए वधू की महे- लियों के शर्मा जाने, वर के नखागण के ठीक समय पर गुलाब के फूल की पंखड़ियों को छिटकाने और उस गाड़ी की मनावट में जिसमें सवार होकर घर और वधू की मवारी निकलनी है हम लोग अधिक दिलचसी लेते हैं। यह मब बहुत सुन्दर है और दो युवा व्यक्तियों के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना को प्रभावमयी था कि उसने उस विधवा के धन की लालच से ही विवाह किया है। यदि डिजरेली ने धन की ही लालच से विवाह किया हो तो पाप ही क्या है। प्रेम की अमिलाया की तरह धन की इच्छा करना भी कोई बुरी बान नहीं है । 'अच्छाई' और 'धुराई तो उन वन और हनी प्रकार से प्रेम के उपयोग पर ही निर्भर है। हिजरली का उद्देश्य कुछ भी क्यों न रहा हो किन्तु इनका विवाह पूर्ण मन्तोषप्रद रहा है। डिबी और मेरी एन के व्यक्ति- गत जीवन में उङ्गलएड की एक अत्यन्त मनोरञ्जन प्रेम कहानी व्यवस्थित है। मेरी एन अपने गुणों मे पति को सदा प्रेमपाश में श्रावद्ध किए रहती थी।

पतियों को सीख [ १७७ विवाह का भविष्य क्या होने जा रहा है ? यह एक महान् प्रश्न है जिसका कोई अत्यन्त निर्मीक तत्ववेत्ता भी उत्तर देने की हिम्मत न करेगा। हमें आशा करनी चाहिये कि भविष्य के विवाहों में मिथ्या चमत्कार के भाव कम होंगे और उनमें आन्तरिक साधारण बुद्धि का ही आधिक्य रहेगा। बहुधा विवाहित लोग सुखी नहीं रहते। इसका कारण यह है कि वे बहुत अधिक की आशा करते हैं । वे समझते हैं कि विवाह से जीवन-यात्रा आसान हो जायगी, किन्तु यह सब कुछ नहीं होता । विवाह में सुख केवल एक बात पर निर्भर है और वह है विवाहित व्यक्तियों के विकास की डिग्री। यदि वे समझदार व्यक्ति होंगे, सदा सुख लेने और देने के लिये तय्यार रहेंगे और जीवन की तरफ एक तात्विक दृष्टि से काम लेने के लिये तय्यार रहेंगे तव उनके सुखी रहने की अधिक सम्भावना है। जब आपस में मतभेद हो तब उन्हें उसकी गहराई को सम- झने की चेष्टा करनी चाहिए। दूसरों के स्वभाव में परिवर्तन करने की अपेक्षा अपने स्वभाव में परिवर्तन करना अधिक अच्छा और कम कठिन है। १२ विवाह के प्राचीन क्रम सांसारिक व्यवहार विवाह होने पर ही प्रारम्भ होते हैं। कन्या को अच्छी तरह सजाकर विवाह कर देना, ब्राह्मविवाह कहलाना है । कन्या और वर से यह वचन लेकर कि वे दोनों मिल कर धर्म का आचरण करेंगे, विवाह कर देना प्राजापत्य विवाह कहा जाता है । वर से दो गाय लेकर पुत्री दे देना आप विवाह के नाम से प्रसिद्ध है। वेदी पर बैठाकर ऋत्विज को कन्या दे देने से देव विवाह होता है। गान्वर्व-विवाह, प्रेम का विवाह है, युवक और युवती प्रेम से प्रेरित हो (विना माता पिता की राय के भी) अपनी रुचि से विवाह करते हैं। कन्या के पिता को धनादि देकर पुत्री को प्राप्त करना आसु-विवाह है । वल से कन्या को छीन लाना, जैसे तन्मणी-हरण, राक्षस-विवाह कहा जाता है। सोती हुई कन्या को उठा या उठवा लेजाना पैशाच-विवाह है। पहिले चार प्रकार के विवाह धर्म कहे जाते हैं। वाकी के चार के लिए भी माता पिता की अनुमतिर आवश्यक है, क्योंकि वे दोनों ही लड़की को देकर शुल्क को लेते हैं। (१)कुछ आचार्यों ने इन चारों को "काम्य' विवाह कहा है। कुछ लोगों का कहना यह भी है कि ये धर्य नहीं माने गये क्योंकि इनमें विवाह-विच्छेद की अधिक भावना है। (२) यह समझ में नहीं आता कि अगर माता पिता सम्मत हों तो जबर्दस्ती और चोरी की जरूरत क्यों ! संभव है वल से छीन लाने या चुरा लाने के बाद विवाह के अर्य विवाह के समय में अनुमति लेना जरूरी रहा हो।

पतियों को सीख [१७६ यदि माता पिता में से कोई एक न हो, तो दूसरा और यदि दोनों ही न हों तो उस शुल्क, धन की अधिकारिणी वह स्त्री ही होगी। सव विवाहों में ही पुरुष और स्त्री की परस्पर प्रीति आवश्यक है। हमारी समझ में यह नहीं आता कि "पैशाच-विवाह के लिए परस्पर प्रीति कैसे और क्यों आवश्यक है ? अगर प्रीति हो, तो कन्या सोती न रहेगी १ वह प्रेमी के साथ भागने को स्वयं तैयार रहगी राक्षस विवाह में प्रीति हो भी सकती है नहीं भी हो सकती है। यह बात ही दूसरी है कि हम बल से छीनी कन्या के साथ विवाह को राक्षस-विवाह ही न कहें । भीष्मपितामह काशिराज की तीन कन्याओं को बल से हर लाये थे। वह राक्षस-विवाह नहीं था तो क्या था ? वर वधू मे प्रीति कर दशा में नहीं हो सकता । कृ० का० मा० सवाल ऐसी

स्त्री-धन
स्त्री-धन दो प्रकार का होता है। एक वृत्ति, दूमरा श्रावध्य ।
वृत्ति, नकद रुपयों की होती है और वह किसी महाजन के पास
जमा करदी जाती है। कहा जाता है फि रुपयोंकी संख्या दो हजार
से कम न हो यह नियम था। आवच्च-बी धन की तादाद नियमित
न थी, वह गहना, गुरिया, मकान, भूमि क्या अन्य मनकूला और
और मनकला नायदाद के रूप में होता था।
बी, पति के विदेश में होने पर, अगर वह मरण पोपण का
प्रबन्ध न कर गया हो तो गाढ़ के समय में अपने इन रुपयों को
खर्च कर सकती थी।
गान्धर्व तया आमुर-विवाह में पति के लिए व्याज सहित
बी-धन का लोटा देना आवश्यक था।
धर्म्य-विवाह लिनका हुआ है ऐसे पति पत्नी परस्पर सलाह
से दो बच्चों के पैदा हो जाने पर, स्री-धन की रकम में से खर्च
कर सकते थे। बञ्चा न पैदा होने की दशा में शुरू में तीन वर्ष
तक एक दूसरे की सलाह से पति पत्नी स्त्री-धन में से खर्च कर
सकते थे।
चहा तक मालूम पड़ता है, दो बच्चों की शतं इसलिए है,
क्योंकि बाद में विवाह-विच्छेद की सम्मावना कम हो जाती है।
कृ०का०मा०

विधवा-विवाह काम्य-विवाह में, अर्थात् गान्धर्व, आसुर-विवाह वाले पति को अगर वह खी-धन से रुपया खर्च करे तो व्याज सहित उसे वह वापस करना पड़ता था। अगर राक्षस और पैशाच-विवाह वाला पति खर्च करता था तो उसे व्याज सहित रुपया तो वापस ही करना पड़ता था, साथ ही उसे चोरी का दंड भी भोगना पड़ता था। पति के मरते ही, जो स्त्री पवित्र जीवन धारण करना चाहती थी उसे स्त्री-धन, शुल्क सब उसी समय दे दिया जाता था। किन्तु अगर वह दूसरा विवाह करना चाहती थी तो उसे स्त्री धन का मूल-धन वापस कर देना पड़ता था। किन्तु यदि कुटुम्ब की कामना से वह विवाह करना चाहती और पति के पिता या अभिभावकों की सम्मति से तो उसे रुपया नहीं लौटाना पड़ता था। पुत्रवती विधवा यदि विवाह करना चाहती थी तो उसे स्त्री- धन पर कोई अधिकार नहीं होता था। किन्तु पुत्रवती होती हुई भी बाल बचों के पालन पोषण के अर्थ ही यदि कोई विधवा दूसरा विवाह करना चाहती थी। विवाह के पहिले पुत्र के नाम से स्त्री-धन को रकम को उसे सुरक्षित रूप से जमा कर देना पड़ता था। कई पतियों द्वारा कई पुत्रों को माता को हरएक पुत्र के नाम से, उसके पिता से पाये हुए स्त्री-धन को जमा कर देना पड़ता था।* विवाहधर्म, स्त्रीधन, विधवा-विवाह, विवाह-विच्छेद यह सब "कौटिल्य अर्थशास्त्र से उद्धृत किया गया है। कृ. का. मा.

विवाह-विच्छेद।
(Divorce)
यदि पति अकारण ही एक बी के रहते दूसरा विवाह करे
तो उस प्रथम खी को उसके विवाह में पाये हुए धन दहेज आदि
को से लौटा देना पड़ता था।
एक पति एक बी के रहते दूसरी बी से विवाह करना चाहता
तो पहिली स्त्री को उसका जीवन, दहेज और साथ ही जीवन भर
के निर्वाह के लिये धन देकर वह दूसरी स्त्री या वियों से विवाह
कर सकता था।
नीच, प्रवासी, राज-द्रोही, पापी, हत्याकारी, धर्म और जाति
से पतित त्या पुंसत्व-हीन पति को पन्नी छोड़ कर दूसरा विवाह
कर सकती थी।
यदि पत्नी पतिसे द्वेष रखती हो और सात ऋतु पर्यन्त पति
से दूर रहे तो बी-धन, आभूयणादि पति को लौटा कर उसे दूसरे
विवाह की अनुमति दे दे। इसी तरह से यदि पति पत्नी से द्वेष
रखता हो और सात ऋतुओं पर्यन्त उससे दूर रहे तो नियम
यह था कि वह पत्नो को संन्यासिनी, भिनुकी खियों तथा बन्धु
वान्यवों के साथ अकेली रहने से न रोके अर्थात् उपयुक्त अवसरों
पर उसे अकेली रहने की अनुमति दे दे।
यदि पति किसी बुराई करने पर पत्नी को छोड़ना चाहे वो
उसका नीधन दहेज वगैरह उसे देकर छोड़ दे। किन्तु यदि दोष
पुरुष का हो तो बी से बीवन आभूषणादि न लिया जाय ।
घ विवाहों में विच्छेद की आना न थी । इनमें दंड का
विधान था।
थोड़े समय के लिए यदि पति वाहर गया है और बी के

पतियों को सीख [१८३ भरण पोषण का प्रवन्ध नहीं कर गया है तो पत्नी एक वर्ष तक या कुछ और दिनों तक उसकी प्रतीक्षा करे बाद में दूसरा विवाह करले, किन्तु यदि पति जीविका का प्रबन्ध कर गया है तो दो तीन वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा करे। अगर पति जीविका का प्रवन्ध न कर गया हो तो वन्धु वान्धव आठ वर्ष तक बी की रक्षा करें, इसके बाद उससे सीधन लेकर उसे पुनः विवाह कर लेने की आना दे दें। विद्योपार्जन के लिए गए हुए ब्राह्मण की सन्तानहीन पत्नी दश वर्ष तक और पुत्रवती वारह वर्ष तक पति की प्रतीक्षा करे और यदि पति राज काज से गया हो तो जीवन पर्यन्त उसकी प्रतीक्षा करे। यदि किसी समान वर्ण ब्राह्मणादि से इस समय में वच्चा पैदा हो जाय तो बी निन्द्य न समझी जाय । सम्पत्ति के नाश होने पर, तथा वन्धु वान्धवों के किसी तरह से जीविका का प्रवन्ध न करने पर स्त्री अपनी इच्छा से दूसरा विवाह कर सकती थी । धर्म्य-विवाह की पत्नी अक्षतयोनि सात ऋतुओं तक प्रतीक्षा करे । यदि पति उसकी जीविका का कोई प्रवन्ध नहीं कर गया है। यदि पति कहकर गया हो तो उसकी एक वर्ष पर्यन्त प्रतीक्षा करे, उसकी खबर न मिलने पर पांच मास और पति की खबर मिलजाने पर दश मास तक उसकी प्रतीक्षा करे। ऐसी स्थितियों में प्रत्येक स्त्री धर्माधिकारी से आना ले दूसरा विवाह कर सकती थी। यदि पति संन्यासी होगया हो, साधु हो गया हो, भाग गया हो, मर गया हो, तो उसकी पत्नी सात मास प्रतीक्षा करने के बाद पुनर्विवाह करले । पति का सगा भाई हो तो अच्छा, न हो तो उसके समान गोत्रवाले, उसी के कुटुम्ब के किसी से विवाह करले। (कौटिल्य अर्थशास्त्र) काम-वासना का दमन कैसे किया जाय? कुवासनाओं का प्रभुत्व नवयुवक समाज पर अत्यधिक है, यह निर्विवाद है। साथ ही यह भी उतना ही सत्य है कि इससे नव- युवकों का ही नहीं, देश तथा समाज का भी बड़ा अहित होरहा है। काम-वासना की कुप्रवृत्ति के फलस्वरूप मनुष्य का इतना शारीरिक हास हो जाता है कि वह फिर किसी मर्ज की दवा रह नहीं जाता इसलिए देश और समाज के हित की दृष्टि से यह श्रावश्यक है कि इस कुप्रवृत्ति का दमन किया जाय और इस पर विनय प्राप्त की जाय। नवयुवकों का हृदय वास्तव में शुद्ध होता है। साधारणतः उनकी कामना पवित्र-जीवन व्यतीत करने की होती है। मनुष्य के अन्तस्तल में एक वस्तु होती है, जो सदा इस बात का स्मरण कराया करती है कि 'तुम उत्पन्न हुए हो लिफ्सा के लिए नहीं वरन् प्रेम के लिए, अपवित्र वस्तुओं के लिए नहीं, बल्कि शुद्ध और पवित्र वस्तुओं के लिए साथ ही वह सदा आदेश करती रहती है कि अपने जीवन को उत्तम और सुन्दर बनाओ। मुझसे बहुधा नवयुवक लोग कहा करते हैं "आप जो कुछ कहते हैं, जो कुछ लिखते हैं वह अक्षरसः सत्य है और हम इस वात में श्राप से सहमत हैं कि पवित्रता जीवन का सर्वोत्तम मार्ग है; परन्तु कहना तो सरल है और उसका करना बड़ा मुश्किल है।" मैं इसे जानता हूं, पर जिस प्रकार एक नवयुवक अन्य बातों के सम्बन्ध में अपने कर्तव्य का निश्चय करता है, उसी तरह उसे स्वयं अपने जीवन और शरीर के संवन्ध मे भी निश्चय करना पदियों को सीख [१८ चाहिए । शरीर के सम्बन्ध में भी निश्चय करना ही होगा क्योंकि इसे टाला नहीं जा सकता । मेरे इस लेख का उद्देश्य उन लोगों की सहायता करना है जिन्होंने अभी अपने मार्ग का निश्चय नहीं किया है और साथ ही मुमको उन लोगों की भी मदद करनी है जिन्होंने अपने मार्ग को निर्धारित तो कर लिया है, किन्तु रास्ता गलत चुना है। मुख्य प्रश्न यही है कि मनुष्य कामवासना का निय- न्त्रण न कर उसके हाथों अपना आत्म-समर्पण कर दे अथवा अपनी वासनाओं का वह दमन करे और अपनी मानवी शक्ति को कायम रखे । अभाग्यवश कुछ लोग ऐसे भी हैं जो स्वयं तो कोई प्रयत्न नहीं करते और सारा दोष वासनाओं के ही माये मढ़ते हैं और यह भूल जाते हैं कि इस समस्या का सामना केवल उन्हें ही नहीं करना पड़ता, बल्कि प्रत्येक मनुष्य को उसका मुका- बिला करना पड़ता है। यहां पर मुझे एक नवयुवक की कथा याद आती है-युवक यद्यपि नौवजवान था, किन्तु उसकी ऑखें उसे जवाब दे रही थीं। वह डाक्टर के पास गया । डाक्टर ने उसकी परीक्षा की और कहा कि अपने आचरणों को छोड़ो नहीं तो ६ महीने वाद तुम्हारी आँखें फूट जायंगी। युवक डाक्टर की राय सुन कर घर चला आया और घर पर उसने कहा "संसार के प्रकाश! तुमको भले ही नमस्कार, पर मैं अपने पाप-कर्मों को नही छोड़ सकता" गलत निर्णय करने का यह एक बलन्त उदाहरण है। इसी प्रकार लोग मानवी शक्ति की हत्या कर बैठते हैं। अब कुछ व्यावहारिक वा भी कह देना चाहता हूं। वासना- ओं के साथ युद्ध करने में दो वस्तुओं को साथ लेकर उसका मुका- बला करना होता है। एक है शरीर और दूसरा मस्तिष्क । बुरी वासनाओं से बचने के लिए शरीर के वरावर ही मस्तिष्क पर भी ।

॥ १८६] सुहागरात काबू रखना पड़ता है । यह सदा देखा गया है कि मनुष्य के विचार ही आगे चल कर आचरण में परिणत हो जाते हैं। कामवासना के दमन के उपाय कुवासनाओं से बचने के लिए सब से पहली आवश्यक वात शरीर को साफ रखने की हे। नित्य ठडे बल से खूब स्नान करना चाहिये । ठडे जल का प्रयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से ही लाभप्रद नहीं है, वरन् यह मनुष्य के विचारों को भी पवित्र रखता है। उसमें कुविचारों के दमन की भी शक्ति है। इसके अतिरिक्त अत्यधिक खाने से भी बचना चाहिये । अधिक भोजन और साथ ही बहुत अच्छा तथा खटाई मिर्चा आदि पदार्थों के खाने से कामोहीपन होता है। खेद है कि भोजन की ओर काफी ध्यान नहीं दिया जाता । कुछ भोज्य-पदार्थ ऐसे होते हैं जो मनुष्य के स्वास्थ्य को श्रेष्ठवनाते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जिनसे स्वास्थ्य विगड़ता है । अतएव मनुष्य को ऐसे ही पदार्थ खाने चाहियें जिनसे स्वास्थ्य की वृद्धि होती हो । भोजन के लिए घी, दुग्ध, मक्खन, ताजे फल विशेषकर सन्तरे, नींबू और अधिक से अधिक हरी तरकारियाँ वहुत लाभकर हैं। बहुत से लोग नशीली चीजों का व्यवहार करते हैं और यह समझते हैं कि इससे स्वास्थ्य की वृद्धि होती है, पर यह उनकी भूल है । वास्तव में नशीली वस्तुओं से मनुष्य की वासनाएं बढ़ती हैं और संयम अपना जाता रहता है। नशे की हालत में मनुष्य में वासनाओं को दमन करने की शक्ति विल्कुल नहीं रहती । साधारण दशा में मनुष्य वासनाओं के आक्रमण का मुका- चला कर भी सकता है, किन्तु नशे की हालत में तो वह स्वयं उनके वशीभूति हो जाता है। इसलिए काम-वासनाओं के दमन के लिए नशीली चीजों का बहिष्कार अत्यावश्यक है । यह सब हम ।

। है पतियों को सीख [ १८७ अपने शरीर की ही सहायता से कर सकते हैं। अब हम इस पर विचार करते हैं कि मतिष्क की सहायता से क्या हो सकता है ? बुरी बातों के मन में आने का प्रभाव शरीर पर अवश्य पड़ता है, परन्तु इस सिद्धान्त का ख्याल न कर आजकल नवयुवक लोग अधिकतर गन्दी कथाओं और घृणित मज़ाक में ही लिप्त रहते हैं। इनको ध्यान में रखना चाहिए कि गन्दी बाते यदि कही और सुनी जायंगी तो व्यवहार में भी उनसे बचा नहीं जा सकता। इसके अतिरिक्त एक उपाय और है । जिस मनुष्य का जीवन स्वास्थ्यकर और पवित्र विचारों की ओर लगा रहता है, अर्थात् जो खेल-कूद और पवित्र दिल बहलाव की चीजों मे अधिक दिल- चस्पी रखता है, जो उसी प्रकार के विपयों पर बातचीत करता है, जो वास्तव में बातें करने योग्य हैं, और ये ही पुस्तकें पढ़ता जिन्हें पढ़ना चाहिए, तो उस मनुष्य से बुरे विचार और बुरी भावनाएं कोसों दूर रहेंगी और उसे कुवासनाओं पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत जबर्दस्त युद्ध न करना पड़ेगा। यह उपाय ऐसा है जिसे प्रत्येक मनुष्य कर सकता है और जो इसे न करे तो इसका सारा दोप किसी और पर नहीं बल्कि उसी पर होगा। अन्त में मुझे एक वात और कहनी है और वह यह कि वहुत से लोग यह कहा करते हैं कि 'अवस्था का झुकाव और प्रकृति की लहरों का वेग इतना वलशाली होता है कि वासनाओं का आक्रमण मनुष्य पर होता ही है और वह उसे अपनी ओर खींच ही ले जाता है । यह सारा दोप वासनाओं के ही माथे मँढ़ते हैं। यह हो सकता है, परन्तु हमें ऐसी बातों को उत्तेजन नहीं देना चाहिए । हमें विचार यह करना चाहिए कि जीवन युद्धों का समूह है और सब से कठिन युद्ध हमे जिससे करना है वह बुरी वासनाएं ही हैं।

१८८]
सुहागरात
इसलिए कठिनाइयों का सामना करके भी हमें बुरी वासनाओं
से बचना चाहिये । यह याद रहे कि मस्तिष्क और स्वस्थ शरीर
ईश्वर की बड़ी भारी देन है और जिसके पास ये दोनों हैं उसके
पास तो बुरी वासनाओं के दमन के लिए सर्वोचम अस्त्र आप ही
मौजूद है।
(अनुवादित)
[मूल लेखक-टो. वोपन पाठिंबटन]

विवाह के अनन्तर शय्या विधान
परिचय-विधि
तया
दूसरी तीसरी रात्रि के कर्म
(कन्दर्पचूदामरिसे)
शयनमयो कुर्यातामदारलवणमोबनावेतो ।
यत मानसौ यह किल संचरित ब्रह्मचयो च ॥
तीन दिन पहिले से ज्ञारलवण' का भोजन न कर, एकाप्रचित हो
ब्रह्मचर्य में स्थित, पति पत्नी विवाह के अनन्तर शय्या विधान'
करें।
जब तक पति पत्नी एक दूसरे के प्रेम में न फंस नायें और जब
तक दोनों यह न समझे कि बिना शारीरिक सम्मेलन के चैन नहीं तब
तक शय्याविधान या इस तरह के किसी भी आयोजन के मैं विरुद्ध हूँ।
मैंने इस विधान को फिर भी उदत करना ज़रूरी समक्षा है, उन लोगों
के लिए जो मेरी बातों से सहमत न हों, साथ ही इसलिए भी कि पति-
गण प्राचार्यों के मत से भी परिचित हो जाय।
(१) “ताता, तीता, श्रामला, तीनों घात विनाश" यह एक
पुरानी कहावत है।
कृ. का०मा०
(२) "मैं ऊपर ही कह चुका हूं कि मैं किसी भी विधान के
वरद्ध "मेरी समझ में आदत, विधान, रीति और रस्म से पुत्रोत्पा-

१६० ] सुहागरात तूर्येण सह निगदितं सप्ताहं चैव मङ्गलस्यानम् । भूपण कृति सहमुक्ती प्रेक्षा सम्बन्धि पूजा च ॥ वाद्य के साथ सात दिन तक मंगल करें और सब लोग भूपण पहन कर साथ भोजन, तमाशा नृत्य और सम्बन्धियों की पूजा भी करें। मृदुमिरुपायैरेता तस्मिन्निशि निर्जने वशीकर्तुम् । आदच्यादुद्यममिह मूकवदासीत केयाञ्चित् ॥ उसी रात्रि में नम्रता से कन्या को वश करने के लिए एकान्त स्थान में उद्योग करे और किसी आचार्य का मत है कि मूक के तुल्य रहे। स्तम्भीभावे भतु: सम्मतिरिहनास्तिवाभ्रवीयानाम् । अहमेव पश्यन्ती गाढं दूयेत सा यस्मात् ॥ पति कामवासना को चरितार्थ न करे, वाभ्रवीयाचार्य इस मत के विरुद्ध हैं, उनका कहना है कि वधू पति के तीन दिन तक इन बातों का आयोजन न करने से दुःखी होती है। परिभवति षएढामिवत स्तंभत्वं यत्यह समातनुते । तस्मादुपक्रमीस्यात् स्तमं नारोचयेत्तत्र ।। जो पुरुप तीन दिन पर्यन्त कामवासना की तृप्ति में अग्रसर नहीं होता, स्त्री उसका नपुंसक के तुल्य तिरस्कार करती है, इससे पुरुप का अग्रसर होना उचित है, अनारम्भ उचित नहीं है। दन हानिकर है। हाँ गर्भाधान के पहिले उसकी उत्कृष्ट कामना और उसके लिए पतिपत्नी का सब प्रकार से प्रसन्नता पूर्वक तैयार होना जरूर आवश्यक है कृ० का० मा० +मेरी समझ में यह आदेश सर्वथा गलत है, वात्स्यायन ने भी रस भरी, प्रेममय वात करने का आदेश किया है। हां ब्रह्मचर्य का भग नहीं होना चाहिए। कृ० का० मा. ।

पतियों को सीख
[ १६१
एवं स्याद्विश्रम्भः कन्याया न व्रतस्य भङ्गश्च ।
सति यंत्रे व्रतमंग स्वीयायामामनत्यार्याः ॥
यदि शीघ्र ही पति इन बातों की ओर रुजू होगा तो कन्या
का उसमे विश्वास बढ़ेगा, इससे व्रत भंग भी न होगा, क्योंकि
आचार्य लोग स्वकीया के साथ अग्रसर न होने को ही व्रतभङ्ग
मानते हैं।
साम्ना प्रयोजयेदय यंत्र परतस्त्रिरात्रतः प्रसभम् ।
कुसुमसमाना तासां सुकुमारोपक्रमेऽभिरुचिः ॥
प्रसभं कृतविश्वासैर्यन्त्रया दीपमानमानमारायाः ।
नियतो भवति द पोऽयत्ने पुरुषे तथा तासाम्।
उपर्युक्त आलिंगनादि कर्म के पश्चात् यह विश्वास होने पर
कि कन्या में कामदेव अभी दीपमान अर्थात् प्रज्वलित नहीं
हुआ है रति के लिए हठ करने मे निश्चय द्वेष होता है, साथ ही
} कामुकी कन्यायों को रति विषयक यत्न रहित पुरुप मे उप होता
है, इससे कन्या को इच्छा होने पर ही रतिसुख की आशा करे,
यह फलितार्थ हुआ।
युक्त्यापि यतः प्रसरं स्वयमुपलभते विशेत्तु तेनैव ।
यौवनतरलितभाव विन्द्यादस्याः प्रयत्नेन ॥
न शीघता करे, न शान्त रहे,
नायिका के भावानुकूल आचरण करे ।
कृत्या सन्नतिमस्या निज कर कमलेन पाणिकमलस्य ।
च सिद्धामेतां परिरम्मे साधयेद्वालाम् ॥
नायक स्वकीय कर कमलों से नायिका के हस्तकमलों को नम्र
करके ऐसी सिद्धि वाला को आलिंगन में समाधान करे।
सह्यत्वात परिरम्मे दद्याद्वदनेन वासताम्बूलम् ।
अप्रतिपत्तौ तत्र च सात्वनवाक्यैरिमा शपथै ॥
तत्र

१६२] मुहागरात प्रतियाचनः प्रयत्नैः चरणाम्बुजयोः सरोनरम्याल्याः। संग्राहयेदिदं खलु तामुचित मध्यकार्येऽपि ॥ कमल के सदृश सुन्दर नेत्रवाली नायिका के चरण कमल पर प्रार्थना पूर्वक गिरकर नायिका को ताम्बूल ग्रहण करावे, यह मध्यमा में भी उचित है। श्रास्यमुदास्यावसरे मृदुQवनमाचरेदसावुचितम् । बालपयेच सिद्धा चुम्बन परिरम्मयोरमयोः ॥ समुचित काल में नायक नायिका का मुख उठा कर उचित कोमल चुम्बन करे और सिद्ध नायिका को चुम्बन और आलिंगन करते हुए वार्ता करावे। श्राकर्णनाथ मस्याः परिमित वर्णामितामिधेय च । किचित्पृच्छेलामी रहित इव तस्य बोधेन ॥ कामी पुरुष नायिका के थोड़े अक्षर वाले और अधिक अर्थ वाले वचन को सुनने के लिए इसको न सममता हुआ सा कुछ प्रश्न करे। पृष्ट वा सकदमिघत्ते यदि नेयं तदा सकृञ्चरेत्पृच्छाम् । युक्त्या सात्वनया खजुनोद्वगः त्याद्ययातनाः ॥ यदि प्रश्न की गयी नायिका उत्तर देवे तो नायक एक वार साममेद से पुनः प्रश्न करै जिसमें नायिका का मन उद्विग्न न होवे। संश्लिष्टा नलिनात्यो निर्विण्णायाः शुमेक्षणारमणे । विषहन्ते पतिवचनं नैव न दोषान्स्वयं व्रवते ॥ कमल के सहश सुन्दर नेत्रवाली नायिका पति से आलिंगन किए जाने पर तत्वज्ञानादि हेतु से निर्वेद को प्राप्त होती है और * उद्धत करने में मूल और टीका मैंने वैसी ही रहने दी है। क०का०मा०

पतियों को सीख
[ १९३
पति के वचन को नहीं सहती भी उसके दोषों को स्वयं प्रकाश
नहीं करती है।
निर्विद्यमानताया प्रतिवचन साचरेच्छिरः कपैः ।
कलहेनैव विदध्यात् कं शिरसोऽपि पद्माक्षी ॥
नायिका निर्वेद को प्राप्त होने पर शिर को कंपाते हुए नायक
के वचन का उत्तर देवे और वह शिर कंपाना कुछ कलह अर्थात्
लड़ाई के साथ किया जावे।
इच्छसि मानेच्छसि वा रुचितोऽह तेऽय वानसंरचितः।
इति पृष्ट वा व्यवतिष्ठेदचिरं वश्यः स्मरासस्य ॥
निर्विएणे सति नाये यत्स्यादव्यक्तमर्थत पूर्णम् ।
प्रन याद्विहसन्ती पश्येत्तिर्यक् कदाचित्तम् ॥
पति के निर्वेद होने पर हास्य करती हुई नायिका गूढार्थ
वचन बोले और कभी कभी नायक की ओर तिरछे नेत्रों से देखें।
युक्ता तथा छुरितकैरुपरि कुच स्वर्णकुंभयोरुभयोः ।
सद्यः स्पृशेदजसं विषयीभूतः स्मरास्त्रस्य ॥
प्रियया निवार्यमाणो नैव कुर्याद्यदा परीरंभम् ।
कुरुषे ममेति कथयन् परिरम्भ कारयेदेषः ॥
आलिंगन समये स्वं करकमल नाभिदेशपर्यन्तम् ।
व्यावत्त' येत्प्रसार्य हि हरिणदृश शोभनाकार ॥
अारोप्य स्वेत्संगे कान्ता क्रमशोऽधिक ततोऽप्यधिकम् ।
सोपक्रमता कलयेदतिपत्तौ भीषये ! देवम् ॥
दशनेन क्षतमधरे स्तन पृष्ठे नखरद तयो कुर्यात् ।
कृत्या च स्वयमात्मनि सख्याः सविधे त्वया रचितम् ॥
कथयिष्यामि किमत्र व वक्षसि तासु जात हासासु ।
एव प्रतारयेत्ता बाल प्रत्यायनैश्चैव ॥

REx ]
सुहागरात
उचर रात्रिवधिक विनम्मे हस्तयोजन रचयेत् ।
सर्वागिकं च चुम्बनमासंगः स्यातरस्यैवम् ॥
.
इत्यं तस्याः कन्यामा क्रमतो विधाय दूरेगा ।
विगतोडगं रचयेत भोगान् सोपक्रमः पुरुषः ॥
इत्यं चिन्तानुगतो बालामिह सावु साधयेद्हुमिः ।
उचितोपायरेख रागस्तस्याश्च विअम्मः ॥
इस प्रकार चित्तानुगत होकर बहुत उचित उपायों से कन्या
को उत्तम प्रकार से सावन करे जिससे उसको प्रीति और विश्वास
उत्पन्न होवे।
अत्यन्तमानुल्यं प्रतिकूलत्वं तया च नात्यन्तम् ।
कन्या सिद्धौ हेतुत्वस्मान्मध्यस्थता युला ॥
अत्यन्त अनुकूलता वा अत्यन्त प्रतिकूलता ठीक नहीं है,
इससे कन्या सिद्धि में मध्यत्यता उचित है।
क्षसहसोपक्रान्तौ सा चित्ता विदुषां भयं तया पीडाम् ।
उगं च द्वेषं च प्रथयेद्योपति, शास्त्रार्थः ॥
हर से आरम्भ करने पर वह कन्या चित्त के अभिप्राय के न
जानने वाले पुल्यों से भय, पीड़ा, उद्वेग और द्वेष को प्रकाशित
करती है यह शान का आशय है।
अति साध्य समातनुते रमणो गेन दृपिता बहुधा ।
पुरुप प्राप्ता विद्विष्टा त्याद्रतात्यरतः ॥
बहुत प्रकार के रमणके उद्वेग से दूपित कन्या भय को प्राप्त
कोक ने रतिरहस्य में लिखा है:-
"सहसा वाप्युपकान्ता कन्याचित्रमविन्दता ।
मनमत्रायमसमुद्गम सदयो धमचगन्चति ।।

पतियों को सीख
[१६५
होती है और पुरुष के द्वेष से प्राप्त रति के पश्चात् आप भी
नाराज़ हो जाती है।
एक मूर्ख से बलात्कार किये जाने पर बालिका भयभीत और
त्रस्त हो जाती है और उसको वह घृणा की दृष्टि से देखने
लगती है।
सा प्रीतियोगमप्राप्य तेनोगेन दूषिता ।
पुस्पोषिणीवास्याद्विद्विष्टा वा ततोऽन्यगा |
अर्थ परिचयसंभासणीयम्
जात परिचयातूष्णी याचितमेवेन नागवल्यादि ।
अस्यान्तिके निदम्यादनीयान्दोत्तरीयेऽस्य ॥
इस प्रकार परिचय होने पर नायिका नायक के मांगे हुए पान
इत्यादि वस्तु को चुपचाप उसके समीप रख देवे अथवा उसी के
अंगोछा या रूमाल में वांध देवे ।
*Then wben she has not found a union full of love;
she, being afflicted with despondency, becomes either &
hater of man kund or; bating her own man has recourse
to other man.

सुहागरात्रि सम्बन्धी वात्स्यायन के उपदेश तस्मिन्न ताम् निशि विजने मृद्धभिरुपचारैरुपक्रमेत । इस रात्रि में पति पत्नी की अधिक से अधिक खातिर करे और उससे मीठी मीठी बातें करे। उपक्रमेत विसम्भयेच्च न तु ब्रह्मचर्यमतिवर्तेत् । पति विश्वास भाजन बनने की चेष्टा करे किन्तु अपने ब्रह्म- चर्ग व्रत का भङ्ग कदापि न करे। उपक्रममाणाश्च न प्रसस किंचिदाचरेत । कुसुमसर्माणो हि योषितः सुकुमारोपक्रमाः ।। बलपूर्वक या पाशविक शक्ति के सहारे कोई भी कार्य न करे, स्त्रियां स्वभाव से ही फूलों के समान होती हैं इसलिए बहुत ही आदर, स्नेह और नम्रता से ही उनके साथ व्यवहार करे। अगर एक अनजान पति उनके साथ पशुता से व्यवहार करेगा तो वह उससे और उसकी प्रेम की बातों से दूर भागेंगी, उनको उससे प्रीति न होगी, उस में विश्वास न होगा। नवपत्नियों के साथ इन्ही कारणों से बहुत ही स्नेह, प्रेम, नम्रता और मृदुता का व्यवहार करना चाहिये। *He should not attempt to do anything by force. For woman, are by nature like flowers and such should be approached very tenderly If they are handled roughly during the first attempt by those who are unacquainted with them, they would become averse to such amours and therefore brides should he approached with care, love and kind words

पतियों को सीख
[ १६७
अनात्मानुरागं दर्शयेत् । मनोरयाश्च पूर्व कालिकाननुवर्णयेत्।
आयत्या च तदानुकूलल्येन प्रवृत्तिं प्रतिजानीयात् ॥
एवं वित्तानुगो बालामुपायेन प्रसाधयेत्
तयास्य सानुरका च सुविधा प्रजायते ॥
उसके प्रति अपना प्रेम प्रकट करे, उसके संवन्ध की हृदगत
अपनी आकांक्षाओं का उसमे वर्णन करे, उसे यह विश्वास
दिलाए कि उस की इच्छा के विरुद्ध वह कभी भी आचरण नहीं
करेगा। उसकी कामनायो का आदर करता हुआ उसका
विश्वास-भाजन पने, तब वह उसका विश्वास और उससे प्रेम
करने लगेगी।
*Ho should reveal his love towards her, and describe
what expectation he had regarding her bofore their
marriage and should promise that he will act in future
in conformity with her wishes He should win her by
intelligently following her intention and then she will
repose confidence in him and get firmly attached to
him.

अंग्रेज़ विशेषज्ञों का मत को "So brutal are men that they very often drive their chaste and ignorant young wives from them for ever by raping them on their bridal night." पुरुप ऐसे पशु होते हैं कि प्रायः वे अपनी पवित्र, अज्ञान पलियों के साथ सुहागरात्रि में बलात्कार कर उनके हृदय सदा के लिए अपने से दूर कर देते हैं। "Moderation should be the husband's watchword on this might of all nights He should be very careful not to arouse in her a feeling of exhaustion or disgust." "He should make every night of love a tender conquest, a swift, noble comprehension If he can conquer a woman by making her heart and soul her own by taking her verginity, every times he takes her, yet making their union, a pure sacrament of love and by making her his sweet comrade." "The man should not forget, in his passion, the need for soothing words of love, of whispered outpounngs of bis heart and soul He should tell her how dear and precious she is to him, how that if he is taking from her, vergin honour, he is giving his own life into her keeping and has given her the protection of his name; how that he will always loves succour her how that although the law, the world, now gives him certain previleges (let him eschew for all time the odious word nights 1) he will claim nothing from her that she पतियों को सीख [ TEE does not concede him gladly. Let him whisper through the sheltering darkness, clasping her lovely soft form, close to his breast with tender, loving arms, if she under-stands what he asks of her. If she is a normal womon, she will whisper back that she loves him." W N. Willis ....on the contrary, the process should be a most gradual one It is only by gradudal process that the beginings of a happy married life are secured It is certain that the future married life is very much coloured by these early days of marriage and if later on times of misunderstanding or doubt come between husband and wife, she consciously or unconsciously, thinks of the early days of marriage If in these days she had any reason for resentment the doubting is apt to turn to a lasting bitterness Isabel E. Hutton, M D.

चन्द्रकलानिरूपणम्
"अगुष्ठे पद-गुल्फ-जानु-जधने, नाभौ च वक्षःस्तने,
कक्षा कठ कपोल-दन्तवसने, नेत्रालिके मूद्ध नि।
शुक्ला शुक्लविभागतो मृगहशामङ्गव नङ्गस्थिती.
सोधोगमनेन वामपदतः
पक्षद्वये लक्षयेत् ॥"
तेन रूपेण केशा कर्षणाधु च्यते
द्वगृह्णन्ति क चान ललाटनयने चुम्बन्ति दन्तच्छद,
दन्तोष्ठेन निपीडयन्ति, बहुश श्चुम्बन्ति गडस्थलीम् ।
कक्षा कठतटं लिखन्ति नखरै हन्ति गाढ स्तनौ,
मुष्ट्या वक्षसि ताडयन्ति, ददते नाभी चपेटाशनैः ॥
कुर्वन्ति स्मरमदिरे करिकरक्रीड़ा सियो जानुनी,
गुल्फागुष्ठपदानि च प्रतिमुहुनिघ्नन्ति तैरात्मनः ।
इत्येव कलयन्ति ये शशिकला मालिङ्गय मञ्जन्ति ते,
शीता शूपलपुत्रिका शशिकरस्पृष्टामिव प्रेयसीम् ।।
एकारौकारयुक्ता हरिहरजहराः पचबाणाः स्मरस्य,
ख्याता लक्ष्याण्यमीषा हृदयकुचदृशो मूर्धगुह्य क्रमेण ।
मर्मस्वेतेषु भूयो निजनयनधनुः प्रेरितेस्तैः पतद्धिः,
स्यन्दन्ते सुन्दरीणाज्वलदनलनिभर्विन्दवः कामवाराम् ॥
संक्षेपादिति नन्दिकेश्वर मतात्तत्व किमप्युद्धृत,
गोणीपुत्रक भापितोऽयमधुना सक्षिप्यते विस्तरः।
मूर्दोरः स्थलवामदक्षिणकरे वक्षोरुहोरुद्वये,
नाभी गुह्यललाटजाठरकटी पृष्ठेषु तिष्ठत्यसौ ।।

पतियों को सीख
[२०१
कन्ना श्रेगिनुजेषु च प्रतियट प्रारम्य कृतामय,
श्वेतायाः प्रति क्रमेण मटनो मूदानमारोहति ।
अनेम्वेषु मृगहियां मननिज प्रस्तावना पडिता,
मात्रायोडरा चिनयन्ति वहलज्योतिः कलिना कृतीः ।।
(रनिरहस्य)

स्त्रीणाम् द्रावणोपायः स्त्री युगों से अपनी वासनाओं को दमन करती करती दमन की आदी होगई है। वह गंभीर भी अधिक होती है, सहसा उत्तेजित नहीं होती और जव उत्तेजित नहीं होती तो तृप्ति भी नहीं लाम करती। पुरुप स्वभावतः सक्रिय होने के कारण तृप्त लाभ करता है। जिस स्त्री को तृप्ति नहीं लाभ हुआ करतो, उसका जीवन ही उसे भारी मालूम पड़ता है, वह प्रसन्न और सन्तुष्ट नहीं रहती, अक्सर हिस्टीरिया तथा अन्य इसी प्रकार के रोगों का वह शिकार रहती है। यही नहीं, तृप्ति लाभ न करने से वह पुरुष में श्रद्धा नहीं रखती, उससे प्रेम नहीं करती और इस तरह से वैवाहिक जीवन उसका असन्तोप और कलह-प्रधान हो जाता है। स्त्री को तृप्तिलाम हो, इसीलिए प्राचीन आचार्यों ने इसके लिए कितने ही विधान लिखे हैं। कामसूत्र, अनङ्गरंग, नागर-सर्वस्व, रतिरहस्य आदि अन्य इसकी शिक्षा देने ही के लिए बनाये गये । पुरुष स्त्री को सन्तुष्ट कर सके, इन ग्रन्थों की रचना का उद्देश्य ही यही है । तत्व इतना ही है कि पुरुष शीघ्र ही शान्त हो जाता है। इसलिए वह स्त्री को वाह्य उपचारों से ही कामातुरा और उत्तेजित करले और जव स्त्री भी विद्वला हो जाय तब रतिकर्म प्रारम्भ करे, जिसमें दोनों को तुष्टि बरावर से मिले । स्त्री किस तरह से कामातुर और विह्वला की जाय इसके अनेक उपाय कहे गये हैं। कहा गया है कि स्त्री के शरीर के अङ्गों में चन्द्रकला के अनुसार यत्र तत्र काम का निवास होता है, और इस तरह से उन अङ्ग से स्त्री में कामोद्दीपन किया जा सकता है। स्त्री के शरीर में कुछ नाड़ियाँ भी हैं जिनसे इसी

,
पतियो को सीख
[२०३
इष्ट की सिद्धि होती है। इसलिए हम प्राचीन आचार्यों के
चन्द्रकला संवन्धी मत को केवल यहाँ पर उद्धृत कर देते हैं।
कठे सश्लिष्य गाढ शिरसि विदधतश्चुम्बमोष्ठौ रदाने-
रापीड्याचुम्न्यगण्डौ विरचितपुलाः पृष्ठतः पार्श्वयोश्च ।
दत्वा सूक्ष्मं नखान मृदुकरजमुखैरञ्चयन्तो नितम्ब
प्राम्भारं मन्दसीताः प्रतिपदि युवती नागरा द्रावयन्ति ।
स्तनमिलनसुखातौं गण्डपाली विचुम्बन
नयनकुचयुग चाकृष्य पाश्व नखाः
अधरमबलिहन् दोर्मूल चञ्चन्नखाग्रः
कृतघन परिरम्भो द्रावयेदहि युग्मे
तृतीयाया श्लिष्यन्निविड़तममागद्य पुलकं
मुहुर्वाडोमू ले मृदुलिखित पाव कररुहै:
भुजापीड कंठे दशनवसना स्वादतरल:
स्तनो पान्तारब्धच्छुरितमबला विहलयति
चतुर्सामालिङ्गय स्फुटमलघसपीडितकुचा
दशन्तोबिम्बोष्ठ नखलिखितवामोरुफलकाः
ददन्तो दोमू लेदूरितमस कुन्नीरजहश.
शरीरे क्रीडन्ति स्मररस नदीनिरजलैः
पचम्या चिकुरानदक्षिणकरेणाकृष्य दष्ट्वाऽधर
दत्वा चूचुकयोः सखेल पुलकं चुम्बेक्तुचौ भावतः।
षष्टया गाढविगूढगात्रमधर दष्ट्वाऽय नाभीतले
प्रारब्धच्छुधुरितो लिखेतररहै रुवोस्तटी रुन्मदः॥
मृदित मदनवासो दन्तवासो लिहानः
करजकलित कठो पान्तवक्षः कपोल:
कृतघन परिरम्भः सभृतानगरको
गमयति मृदुभाव भामिनी मन्हिभानों:
अष्टम्या परिरम्य कठमसकन्नामि नखैरञ्चयन

२०४ ]
सुहागरात
देष्टोष्ठः पुलकं ददन कुचतटीं चुम्बैद्विमृद्योंचके:
नाभी मूलविलोलपाणिरधर दृष्ट्वा स्तनी पीडयन
मृद्रीयाद मदनालयं च विलिखन पार्थ नवम्या नखैः
ललाटमाचुम्न्य नखैर्लिखन्तः शिरोधरा भ्रामितवामहस्ताः
कटिस्तनेरः स्थल पृष्ठमध्ये स्मरं दशम्या प्रतिबोधयन्ति
एकादश्या करजकलित ग्रीवमालिङ्गाय गाद
पाय पाय दशनवसन किंचिदालीढलोलम्
घात घातं इदि सहसितं मन्मयागार मुद्रा
भङ्ग क्रीड़ातरलितकरा कामिनी द्रावयन्ति
द्वादश्या परिरम्य गाढमसच्चुम्बन् कपोलौ दृशो
रुन्मेश विदधीत सीकृ तिनुशोव्यादष्ट दन्तच्छदः
चुम्बनगडती मनोभवतियौ मृन्दत् ससीक कुची
कान्ता द्रावयतिद्रुते फररुहेभिन्दन्शनैः कन्धराम्
कन्दारितियौ विचुम्बितदशो दोमूल चन्चन्नखाः
कामागारनिवेशितद्विपकराः क्रीडन्ति कान्ता तनौ
दर्श पूर्णतिथौ च नर्तितनखाः स्कन्धस्थली रङ्गतोऽ
नजागार चुचूलिकाश्चितफराः कुयुः स्त्रिय विहलाम् ।।
(इति रतिरहस्ये)

मदनोदय
(नागरसर्वस्व से
पादाग्रजबोरुषु योनिनाभिकुक्षौ कुचे हस्ततले गले च
श्रोष्ठे कपोल नयने श्रुतौ च शीर्षे तथा सर्वशरीर देशे
स्थानेषु चैतेषु तिथिक्रमेण नितम्बिनीना समुदेतिकामः
वामानभागो परि शुक्लपक्षे कृष्णे च सव्यावयेत तथैव
अगुष्ठमूलात्प्रभृतिक्रमेण यावच्छिखा मूलमुपैति कामः
कृष्णे तु पक्षे चरणाप्रदेश प्रयाति नित्य शिरसस्तयैव
अंगुष्ठमूलेषुश्र,पाच जड्डायुगे, इजरावपि,ई च योनौ
नाभ्या उ, ऊ कुक्षतटे, कुचे तथा लु च कंठदेशे
लु चाधरे, ए सततं कपोले, नेत्रे च ऐ,कर्ण युगे तथा श्रो
शिखाश्रये श्री कथितौ रत सर्वाङ्गदेशे च सदैव अं अः
सर्वाङ्गदेशे मदनस्य बीज मिष्टाक्षरं सेन्दु सविन्दु शीर्षम्
वीजं शरच्चन्द्रकलावदातं सचोदयत्सूर्यनिमं प्रदीप्तम्
विभावयेत्तद्दयिता शरीरे ततो निरन्मेश विलोचनायाः
(नितान्तनि स्यन्दितनोः प्रियायाः)
विहाय बाह्यान्
विभवान् भवेयुः
मु (सु ?) खे निलीनानि षडिन्द्रियारिण
(तृप्तानि सर्वाणि भवन्ति तन्व्याः)
* तिथिक्रमेणत्यादि शुक्लप्रतिपदाया वामभागे पादाग्रे, शुक्ल
द्वितीयाया दक्षिण कणेइत्यदि प्रकारेण व्युतक्रमेणेति बोध्यम् । हरिहरस्तु
शृंगारदीपकाया शुक्लपक्षादि वैलण्यनाह" रजोदर्शनमारभ्यं श्रापंच
दशवासरम् शुक्लपक्ष इति ख्यात कृष्णपक्षस्तथोपरि" इति

सुहागरात
इति चिन्तितमात्रेण मीणा तृप्तिः प्रजायते
विनाऽपियोनिलिङ्गाम्माम् संसगेण वरानने
कोंपार्वत्रिक मस्तकेयु सचोदनीयाः करजेन नित्यम्
तृतिर्न तासा तु विपर्ययेण भवेत कदापीति वदन्ति धीराः
(नागरसर्वस्व)

स्त्री-शरीर की प्रधान नाड़ियों से पुत्र तथा पुत्री
(नागरसर्वस्व से)
सती चैवा सती संशा सुभगा दुर्मगा तया ।
पुत्री दुहित्रिणी चेति षडेता मदनाडिकाः ॥
योनिमात्रेऽपि सन्सयेता: कथिता मदनाडिकाः।
सती वामेऽवती सव्ये देवराङ्गत्वचि स्मृते।
किश्चिदम्यन्तरे चैत्र रत्न सन्यापसव्ययोः ।
दुभंगा सुमगा चैव उनाड्यौ समुदाहते ॥
सर्वतोऽभ्यन्तरे चैव पारवें स्वामुखस्य वै।
वामे पुत्रीसमाख्याता, दक्षिणेन दुहित्रिणी
सती संचोदनाचवा सतीरामा प्रकुप्यति ।
असती चोदनानारी खिद्यते च सती सदा ॥
सती संचोदनादेवसती हस्पति निर्मरम् ।
असती चोदनाचैवासती तुप्यति नित्यशः ।।
सुभगा चोदनानारी सुभगा प्रियदर्श (शिनी।
भवेत् स्निग्धाननाङ्गी च श्यामा पीनपयोघरा ॥
दुर्भगा चोदनेनापि वनिता दुभंगा भवेत् ।
रक्षा कृशा विवर्णाशी जरारोगनिपीडिता ।।
पुत्री संचोदनादेव प्रिया पुत्रवती भवेत् ।
दुहित्री चोदनेनापि दुहिता नायवे ध्रुवम् ।।
ॐ पुत्र देने वाली, कन्या उत्पन्न करने वाली।

२०८]
सुहागरात
उभयोचोदनात्सते क्रीवमेव न संशयः।
निपुण चोदयेनाही यदीच्छेद्वितमात्मनः ।।
सती कुचेऽसती कने, सुभगौष्ठेच दुर्भगा।
त्रिके तुण्डे स्थिता पुत्री, नितम्ने च दुहित्रिणी॥
एवं सचोदिता नारी नान्यमिच्छति मानवम् ।
क्रीवोऽपि हृदयं सर्व प्राप्रोत्येव न संशयः ।।

संतान-प्राप्ति के उपाय सन्तान प्राप्ति के लिए दुनियां पागल रहती है। पुरुष और स्त्री इस कामना के वशीभूत हो अच्छे और बुरे से बुरे कर्म करते हैं। अक्सर साधु, सन्त और वैद्यो से वे धोखा भी उठाते है। स्त्रियां पुत्रप्राप्ति के अर्थ लुच्चो के फेर में पड़कर अपने सती- व से भी हाथ धो बैठती हैं । हम इसीलिए यह बतला देना चाहते हैं कि सन्तान की प्राप्ति सर्वथा पति और पत्नी के अधीन है और साधु, सन्त, देवता, पीर, पैगंवर और वैद्य इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कर सकते । जिनको सन्तान न होती हो उनक पवित्रता से ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी का जीवन वहन करना बहुत जरूरी है। अगर अंगों की बनावट ठीक है और रज और वीर्य दूषित नहीं तो सन्तान होगी और होगी, चाहे संसार भर के देवी देवता और मदारी पीर और पैगंवर इसके विरोध में अपनी सारी शक्ति ही क्यों न लगा। हम वैद्य, डाक्टर या इस विषय के विद्वान् नहीं, किन्तु जो कुछ इस विषय के अध्ययन से हमारा अनुभव है उसको हम देशवासियों के लाभार्थ यहाँ पर लिख देना चाहते हैं। सन्तानार्थी के अगर सन्तान न हो तो उसे यही विश्वास रखना चाहिये कि पति पत्नियों के अङ्गों की बनावट में कोई गड़बड़ी है या उनके रज और वीर्य मे सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति नहीं है। अङ्गों की बनावट में कोई गड़बड़ी है यह सहज में ही डाक्टर या लेडी डाक्टर की सहायता से जाना जा सकता है और उनसे उसका इलाज हो सकता है। रज और वीर्य के दोष का पता लगाना बहुत ही कठिन है। विशेषकर इस वात का कि किसकी हीनता से, पति या पत्नी की, सन्तान नहीं १४ २१०] सुहागरात हो रही है। यह जान लेने का हम एक सहज उपाय बतलाये देते हैं। शयनगृह के बाहर दो गमलों को अच्छी मिट्टी भरकर रख- देना चाहिये । गमलों पर कोई ऐसा निशान बना देना चाहिये जिससे यह मालूम हो जाय कि कौन पति का है कौन पत्नी का, इन दो गमलों मे धान या यत्र छितरा देने चाहिये और रात्रि की निद्रा के वाद पति और पत्नी सुबह उठकर पहिली लघुशङ्का अपने अपने गमले में कर दिया करें। प्रायः पन्द्रह वीस दिन मे गमले में धान या यत्र के पेड़ पैदा होजाने चाहिये। जिसके गमले के पेड़ हरे भरे, लहलहाते हुए हों, उसके सम्बन्ध में समझ लेना चाहिए कि उसमें सन्तानोत्पत्ति की शक्ति है और उसमें कोई भी दोष नहीं है, जिसके गमले में पेड़ न पैदा हों, या पैदा हों तो कमजोर, पीले या छितरे वितरे हों उसके सम्बन्ध में समझना चाहिए कि उसमें कोई दोष है, उसका रज या वीर्य हीन है। यह निश्चित रूप से मालूम होजाने पर एक विद्वान् वैद्य, हकीम या डाक्टर से सहज में ही रज या वीर्य का दोष दूर कराया जा सकता है। इस बातपर विशेष ध्यान रखना चाहिए कि धान या यव दोनों गमलों में बिलकुल घरावर हों, तनिक भी कम या ज्यादे नहीं। "गर्भधारणोपायः" में गर्भधारण की अनेक विधियाँ भी लिख दी गई हैं। "नागरसर्वस्व" से हमने "सुतोदय" की अध्याय को भी उद्धृत कर दिया है।

सुतोदयं या पुत्र कैसे हों ?
सुतार्थे पद्धचिन्तानामपुत्राणां मनोमुवाम् ।
हिताय करुणासिन्धुः कथयामि सुतोदयम् ॥
रजः स्लानदिने दत्वा भिक्ष संघात भोजनम्
शतितो दक्षिणा दत्वा प्रार्थयेटरमीप्सितम् ॥
तदोष, पिवेतकान्ता तारापूजा पुर सरम् ।
कान्तया सहितो रात्रौ पुत्रार्थी विधिमुच्चरेत् ।।
समसौख्य निरन्नमेप (पः१) प्रयोगेषु यथा सुधीः ।
धैर्यवान्मोहनात्पूर्व तारापादाम्बुजं स्मरेत् ॥
यदा सूर्येण मार्गेण देह वहति मारुतः ।
सचोय नाडिका पुत्री पश्चान्मोहनमाचरेत् ॥
करवीर कुसुमैदवीमार्यतारा वरप्रदाम् ।
त्रिसन्ध्यं पूजयित्वा तु मत्र ससशतं जपेत् ॥
मंत्रस्त्वयम्-त्रों जम्भेमोहाय स्वाहा ।
पन्च शिष्या (क्षा?) परो भूत्वा मासमेकं तयाऽर्चयन् ।
वशोद्योतकरं पुत्र लमते नात्र संशयः ॥
उपित्वा लक्ष्मणामूल तन्मात्राधिष्ठितं पिवेत् ॥
सुरम्या एकवर्णायाः पयसा सबली(शवली?) कृतम् ।
तदौषधि प्रभावेन शुक्रवृद्धिः प्रनायते ।
पिण्डाच्छुक्राधिकात्पुत्रः कन्या रक्ताधिकाद्भवेत् ।
फलमूलाशनो भूत्वा पार्वती परमेश्वरी ॥
त्रिसन्न्य । पूजयित्वा तु मंत्रमेतजपेत्तदा ।
श्रो नमो भगवते महेश्वराय नमः प्रजाजननाय स्वाहा।

२१२]
मुहागरात
परदाराभिगमन मद्यमासादि भोजनम् ।
मिथ्याभिलपन हास्य मान क्रोध च वर्जयेत् ॥
तढा स्नात्वा सचैलस्तु नुधौत वटन कृती।
मत्रमेत जपेन्नित्य न निद्रा समुदाहरेत् ।
हेमतारकताम्राणि एकीकृत्य
सुसपिपा ।
दातव्य लेहनं स्त्रीणाक्षेत्रशुद्धिस्तथा भवेत् ।
शेप तु पूर्ववत्कुर्वन् कृतार्थो नियत भवत् ।
सत्पुत्रालोकनात्यन्त प्रीतिस्तिमितलोचन. ॥

गर्भधारणोपायः
ऋतु दिवसे वृतसहित पीत्वा नवनागकेसरस्य रजः
दुग्धमनुपीय रमणी रमणगता गर्भिणी भवति
मूलमपि लक्ष्मणायाः प्राज्येनाऽन्येन नासिका पीतम्
नएड्डुलजलेन पीता ददाति पुत्रं जटामासी
गोरेकवर्णभाजः पयसा वन्ध्यापि धारयेद्गर्भम
पीत्वा केकिशिखाया पुत्रञ्जीवस्य वा मूलम्
पीत्वाऽमुनव पयसा रजसिस्नाता च लक्ष्मणा मूलम,
समक्षालित शाली भक्त मुक्त्वा सुतं लभते
( रतिरहत्य)

वाम की परीक्षा Let the womansit, whilst she is fasting, on a chair or stool with an opening in the seat. Cover this opening with a napkın. Put under The chair a chafing dish in which there is a fire incense of gum, sandarach or costus or some other perfume, lıkemusk or aloes wood. The woman should close her mouth and nostrils before these things are thrown into the fire and if it be seen that the smoke of these perfumes comes out of the nostrils and mouth of the woman, she is not sterile, if no smoke is seen she is sterile. When you would know if the woman become pregnant again, take a clove of garlic, wrapit in a small piece of wool and insert it in thewoman's vagina when she पतियों को सीख [284 goes to bed The next morning if her mouth smell of garlic she will concieve again, if not, then never. - Sterility may not be in a woman And to determine in which of the two (husband or the wife) the fault lies put the urine of each in a separate vase, being careful to distinguish which is which and put a lettuce covered with green leaves into each and place the vase in the sun The next day one of the roots will be found dying. The urine of the impotent person being potent enough to kill the root.

बाजीकरणं बलीकरणाम् नागबलां, सबलामय शतावरी वानरी समं पयसा। गोक्षुरके तुरुके निशिनिपीय रतिमलतामेति ॥ मधुकस्य कर्षमेकं सहितं तुल्येन सर्पिषा मधुना । लीद गनुपीय दुग्धं निधुवनशक्ति परां धत्त ।। दशगुण दुग्धे पक शतावरी गर्भितं च घृतमश्नन् । मागधिकामधुसहित सशकरं भवति रतिमल्लः ॥ सतिलं गोक्षुरचूर्ण छागीक्षीरेण साधितं मधुना । सहपीत सप्तहान्छुमयति परदत्व मचिरेण ॥ कामुक-चूर्ण समुद्रसोख ६ मासा भोचरस ६ मारा अकरकरहा ३मासा तुख्मरेहाँ पीपल की लाख ३ मासा अजवायन खुरासानी ६मासा जायफल ३ मासा जावत्री ३ मासा लौंग ३मासा ३ मासा तुलसी की मंजरी ४ मासा अलग अलग जितनी अधिक यह पीसी जायेंगी चूर्ण उतना ही अधिक अच्छा होगा। मात्रा ३ मासा सुबह, शाम आधसेर २ तोला बड़ा गोखरू VII पतियों को सीख २१७ दुग्ध के साथ । इस चूर्ण को और भी तेज वनाने की इच्छा हो तो इसमे एक तोला वरगद का दुग्ध मिला देना चाहिये । औषधि का सेवन शीतकाल में ही होना चाहिये और इस समय दूध अधिक से अधिक पीना चाहिये। पश्चिमीय R. Ol. Phosphorat द Ol Morrhuae 5 A tea spoonful gradually increased for a dose. Phosphorized oil 1 ounce. Cod Liver oil 7 ounces. (The Phosphorized oil is Prepared by adding sim grains of phosphorus to an ounce of almond oil) Phosphorus Pills. A pill containing 3 grains of phosphorous to be taken 3 times day. Preparation Melt 600 grains of suet in a stoppered bottle capable of holding twice the quantity Add to this six grains of phosphorous and when dissolved, agitate the mixture till it is solid Divide it into 3 grain pills and cover each pill with gelatine. Each pill contains 33 grains of phosphorous किसी डाक्टर को भी यह नुस्खे सहसा मालूम नहीं होंगे। किन्तु यह अनुभूत हैं और बहुत ही लाभकर हैं फिर भी विद्वान् डाक्टरों से अनुमति लेकर ही इनका व्यवहार करना चाहिये बिना उनकी अनुमति के कदापि नहीं। कृ० का० मा० , रतिमल्लता प्राप्ति का उपाय के लिए औपधियों के विज्ञापन वहुत छपा करते हैं। अधिक- तर इन औपधियो मे मादकवस्तु, अफीम या ऐसे ही हानिकर पदार्थों का मिश्रण रहता है । वाजीकरण, स्तम्भन सभी की ओष- धियॉ मिला करती हैं युवकों को इन से सदा दूर रहना चाहिये। पैसा तो गाँठ का जाता ही है, इनसे अगर यह ठीक नहीं है तो स्वास्थ्य को भी हानि पहुँचती है । जो युवक रतिमल्लता प्राप्त करना चाहते हों, या जो कमजोर हो, और पत्नी को सन्तुष्ट करने मे असमर्थ हो उनके लिए संसार की स्त्रियों के मदन-भंजन का उपाय यह है कि वे किसी योगी से उपदेश लेकर "अश्विनीमुद्रा" को सिद्ध कर लें, कम से कम इतना अभ्यास करलें कि इच्छा होते ही वह अपनी अपान-वायु और प्राण-वायु को एक दूसरे से अलग रख सकें। यह अभ्यास कठिन नहीं है, प्राय. एक वर्ष के अच्छे अभ्यास मे यह हो सकेगा किन्तु इसकी सिद्धि होजाने पर मनुष्य "स्त्री-जित" होजाता है।

स्त्रियों के विराग के कारण
दारिद्रयाद सहिष्णुता मलिनता कापण्यकालाऽज्ञता।
पारुष्यादतिनिष्ठुरात् प्रणयिनो भूपानिषेधाटपि ॥
मिथ्यादोषविशङ्कनादतिशयोद्योगाद्वियोगात्तथा।
कार्कश्यादपुषो व्रजन्ति नियतं वैराग्यमुच्चैः स्त्रियः ॥
नैन पश्यतिनास्यनन्दति सुहृन्मित्रे प्रतीपस्थिति-
योगे सीदतिहृष्यतीव विरहे माष्ठानन चुम्विता ।।
नास्मादिच्छति मानमीय॑ति वचः प्रत्युत्तर नार्यये-
स्यादुद्विजते स्वपित्युपगता शैय्या विरक्ता सती ॥

नारी वशीकरणम् श्रामीने लालयेद्वाला तरुणी शयने तथा । उत्यिते चामिरूढ़ा तु लालनं त्रिविधं मतम् ॥ मोहनं नारमेतावाद्यावनोत्कण्ठिता प्रिया । अन्यया तत्सुखोच्छित्तिरशीतेऽकरादिय ॥ नामिहत्कंठदेशेषु दधत् श्वास च यः क्रमात् । कामोऽह भावयेत् कामी गायत्री सप्तधा नपेत् ॥ न्याजेन चुम्बनादीनामुच्छ वास पाययेत प्रियाम् । तेन सा वशमायाति न तस्यसतु स्वयं पिवेत् ।। नारीवशीकरण, कान्ता वशीकरणम्, सर्वजनवशीकरण के कित- ने ही उपाय कामसूत्र, अनङ्गरज, रतिरहस्य और नागरसर्वस्व में लिखे है, किन्तु अधिकतर उनमें गन्दे हैं या उनमें ऐसे पदार्थों का उपयोग है, जो सहसा मिलते नहीं ऐमी दशा में उनके सबन्ध में कुछ भी कह नकना कठिन है । हमने उपयुक्त अश "नागरसर्वस्व" से दे दिया है, केवल नमूने की भाति और इसलिए भी क्योंकि इसमें कुछ तथ्य भी है। अन्तिम श्लोक बहुत ही लाभप्रद है, साथ ही सरल है इसका अर्थ यह है कि नायक को चाहिये कि अपने मुख का पान खिलाने के मिस अपना उन्छाम प्रिया को पिलादे, खुट उसका उच्चास कभी न पिये। सुनते हैं प्रवीण वेश्याएं इस प्रयोग को बहुत करती हैं। गायत्री तथा--ओं नमो मनो भवाय विधमहे कन्दर्पाय धीमहि तन्न कामः प्रचोदयात् ।

पतियों को सीख
[ २२१
"कह नहीं सकते ठीक कहां तक है किन्तु केवल पाठको को
यह दिखाने के लिए कि हमारे पूर्वजों ने इन विषयों के संबन्ध
में कितनी खोज की थी, हम नारी वशीकरण सबन्धी "रति
रहस्य" से यह श्लोक उद्धत किये देते हैं:-
लजावन्ती सहदेवी पीकुमार गोरोचनीन्द्रवचूर्णम् ।
ताम्बूलेन विकीण नार्या परम वशीकरणम् ||"
-
कु.का.मा

स्वरोदय और स्वास्थ्य। सृष्टि की रचना में जो तत्व कार्य कर रहे हैं वे सर्वत्र एक से हैं। एक ही प्रकार के नियमों के आधार पर जगत् के स्रष्टा ने सृष्टि रचना की है। जड़े तथा चेतन दोनों जगत् उन्हीं नियमों तथा मूलतत्वों के विकास हैं । पृथ्वी, सूर्य तथा अन्तरिक्षस्य तारा मण्डल एवं च्यूंटी, मच्छर में एक ही स्रष्टा के कानून दिखलाई देते हैं। तभी प्राचीन ऋपि, महर्षि, संसार के अध्यन के विशाल कार्य का स्वाध्याय अपने अध्ययन के विशाल कार्य का स्वा- ध्ययन अपने अध्ययन से प्रारम्भ करते थे। अपने को पढ़ लिया तो जगत् का पाठ होगया। उनकी प्रति दिन की भाषा में जो ब्रह्माण्डे सोई पिण्डे, सरीखे वाक्य आम तौर से वोले जाते थे। स्वामी विवेकानन्द एक वार समाधि से उठे और एकदम वोल 'पड़े 'मैंने परमाणु में विश्व को देख लिया है। इसी कारण से कई पाश्चात्य दार्शनिक चेतन शरीर को ( Mherocom ) तथा विशाल जगत् को ( Macrocom) कहते हैं। सूक्ष्मरूप से प्राणि-शरीर में वह सब कुछ विद्यमान है जो स्थूल रूप में इस विशाल जगत् में दिखाई देता है। इसी विचार को दृष्टि में रखते हुए भारत के कई योगियों ने 'स्वर विद्या' का आविष्कार किया था और इस विद्या से प्रत्येक गृहस्थी परिचित होता था 'स्वरविद्या का जानना स्वास्थ्य के उन मौलिक नियमों का जानना है जिनके आधार पर परमाणु से सूर्या तक की गति होरही है। प्राचीन काल में प्रत्येक गृहस्थी अपने स्वास्थ्य को इस विद्या के सहारे ठीक रखता था।

पतियों को सीख [૨૨૨ 'स्वर' का अभिप्राय क्या है ? जिस प्रकार वाह्य सृष्टि मे सूर्य तथा चन्द्र पाये जाते हैं इसी प्रकार मनुष्य शरीर की आभ्य- न्तर रचना में भी सूर्य तथा चन्द्र हैं । दायीं नासिका के श्वास को सूर्या तथा वायीं नासिका के श्वासकोचन्द्र कहते हैं । दायेंश्वास से मनुष्य-शरीर मे गर्मी का संचार होता है, वायें से सर्दी का । दायां श्वास सूर्य का काम देता है, वायां चन्द्र का । इन दोनों को क्रमश: गंगा, यमुना एवं ईडा, पगिला भी कहा जाता है और सम्भवतः वेदों आदि में जहां नदियों का नाम आता है वह (Microcom) की दृष्टि से ही है, भौगोलिक (Geographical) दृष्टि से नहीं। 'स्वर' के नियम का अभ्यास प्रत्येक गृहस्थ को करना चाहिए । दिन को वाह्य-जगत् में सूर्य होता है, उससे गर्मी उत्पन्न होती है । इस गर्मी का प्रतिकार करने के लिए शरीर में चन्द्र का उदय होना चाहिए। इसी प्रकार रात्रि को वाह्य-जगत् में चन्द्र का उदय होता है, जिससे शीतलता उत्पन्न होती है। इस शीतलता का प्रतिकार करने के लिए शरीर में सूर्य का उदय होना चाहिए। अर्थात् दिन को वायां तथा रात्रि को दायां सांस चलना चाहिए। इससे स्वास्थ्य ठीक रहता है। यदि दिन और रात दोनों समय वायां सांस चले तो समझ लेना चाहिए कि शरीर में सर्दी से उत्पन्न होने वाले रोग शीघ्र ही उत्पन्न होंगे। जुकाम, खांसी, सिर दर्द आदि अक्सर इसी कारण हुश्रा करते हैं । इसी प्रकार यदि दिन रात दायां सांस चलने लगे तो गर्मी से उत्पन्न होने वाले रोग उत्पन्न हो जाते हैं । जिस प्रकार पाह्य-जगत् में सूर्य तथा चन्द्र के उदय होने का अपना अपना समय है उसी प्रकार शरीर में भी इन तत्वों का समय बंधा होना चाहिए । इस दृष्टि से दिन- चा को नियमित किया जाय तो स्वास्थ्यरक्षा की अनेक बातों पर स्वयं प्रकाश पड़जाता है। उदाहरणार्थ, भोजन के साथ पानी २२४] सुहागरात पिया जाय या नहीं ? इस प्रश्न पर वैद्या में परस्पर मतभेद पाया जाता है परन्तु स्वर-विद्या' जाननेवाला कह देगा कि क्योंकि भोजन दक्षिण स्वर में खाना चाहिए और पानी वाम स्वर में पीना चाहिए अत: भोजन के साथ पानी पीना हितकर नहीं हो सकता। भोजन के अनन्तर दो घण्टे के बाद स्वर बदलने पर या स्वर बदलकर पानी पी ले। इसी प्रकार पूछा जाता है कि किस करवट सोना चाहिए। जैसे अभी कहा जा चुका है, रात्रि के समय शरीर में सूर्य नाड़ी चलनी चाहिए। और क्योंकि वाई करवट लेटने से दायीं सांस-अथवा सूर्य नाड़ी-चलने लगती है अत: स्वास्थ्य की दृष्टि से रात्रि को वाई करवट ही सोना लाभप्रद है। स्वर की दृष्टि से सब कोमल कार्य वाम स्वर में तथा कठोर कार्य दक्षिण स्वर में करने चाहिएं। जो लोग इस विषय में अधिक अध्ययन करना चाहें वे संस्कृत में 'शिवस्वरोदयक्ष तथा अग्रेजी में 'Natures Finer Fovees' नामक पुस्तक पढ़ें। इस प्रकरण में एक बात का लिख देना अत्यावश्यक है। सॉस का दक्षिण वाम कर लेना सहज है। यदि दायी करवट लेटा मोनन के नाय यदि पानी न पिया जाय और जब भोजन के दो घटे बाद सदा पिया जाय, साय ही भोजन के बाद ही लघुशंका कली नाय तो क्षीणता,भालल और बुढापा सहसा पास नहीं फटकेंगे। बह भी ध्यान में रखना चाहिये कि सूर्य अर्यात् दाहिने सर के काल में ही रत-कर्म श्रेष्ठ होता है, वाम स्वर चलता हो तो इससे दूर रहें। ३० कामा० हिन्दी में "शिव-त्वरोदय श्रीर एक दूसरा अन्य "शान त्वरी- दव दोनों ही प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी स्वास्थ्य सम्बन्धी बातों पर ही ध्यान रखना अच्छा होगा। कृ.का० मा पतियों को तीख [२२५ जाय तो वायाँ सॉस चलने लगता है, यदि वायी करवट लेटा जाय तो दायां सांस चलने लगता है। परन्तु कभी कभी श्वास की गति इतनी तीव्र होती है कि कितनी देर तक भी क्यों न लेटा जाय सांस नहीं बदलता। कई लोग, जिन्हें कहीं से इस विषय में कुछ बान हो गया है, नाक में लई आदि डालकर सांस के वेग को रोकने का प्रयत्न करते हैं । यह अत्यन्त हानिकर है। ऐसा कभी न करना चाहिए । इस प्रकार रोग अपने प्रचण्ड वेग से प्रकट होता है। स्वास्थ्य बनने के स्थान में नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। साथ ही स्वर-विद्या भी वदनाम होती है। यह भी नहीं समझ लेना चाहिए कि स्वर पर ही ध्यान देने से सब कुछ हो जायगा इसपर ध्यानन देने सेजो रोग उत्पन्न हो जाते है, वेन होंगे; परन्तु स्वास्थ्य के अन्य नियमों का उल्लङ्घन करते चले जाने से मनुष्य फिर रोगो का घर हो जायगा। जहां स्वर पर ध्यान देना आवश्यक है, वहां नियमित व्यायाम, उचित तथा परिमित अहार, स्नान आदि पर ध्यान देना भी उतना ही आवश्यक है। स्वास्थ्य साधन के लिए किसी भी प्राकृतिक नियम का भग न होना चाहिए। क्योंकि स्वर के विषय मे लोगो को ज्ञान ही नहीं है इसलिए उस की चर्चा यहां कर देनी आवश्यक समझी गई । स्वर का ज्ञान एक प्राकृतिक नियम का ज्ञान है जिससे प्रत्येक सद्गृहत्य को परिचित होना चाहिए।

पतियों को
आदेश
Husbancs, Love For Wises, ETEI Coris. also loved
the church and gave hirself up for i:.
That he might sanctify and cleanse it with tte
Washirg of water by the word. Ica: he might present
it to himself and a glorious church. Dot having spot, OT
wrinkle or any such thing: bui igat should be hold
and without blenish.
So cught men to love the rires as their ow22
bodies. Ele that loveth his wife. IG-eta hirseli Fox
no man ere yet haled his own leh. but touristeta
and cherisheth it, eren as the Lord the church. fo: ve
are trembers of his lcis, o his fesh aid o his bones.
For this cause shz. a 121 Isere Eis fatte: 20
mother, ang shall be joined unto his wife and the STO
shall be one fissh.

दीर्घजीवी होने के उपाय
(१)सना प्रसन्नचित्त रहो।
(२)शुम भविप्ववादी बनो, कोई भी बात हो सदा
उसके अच्छे पहलू पर ध्यान लगायो ।
(३) सदा नाम में लगे रहो और परिश्रम करते
रहो, त्रालय में एक मिनट भी मत खोटो।
(४) मादक वस्तुओं से सदा दूर रहो, मिगरंट और
नन्बाकू का भी वहिष्कार करो।

छप गई॥ छप गई। छप गई ।। केवल विवाहिता स्त्रियों के लिए सुहागरात (प्रथम भाग) या। बहूरानी को सीख स्व. पंजाब केसरी लाला लाजपत राय लिखित भूमिका सहित [ ले० स्व० प० कृष्णकान्त मालवीय ] एक दुरंगे और १६ एकरंगे चित्रो सहित विवाहिता त्रियों के लिए शिक्षा पूर्ण पुस्तक का मूल्य केवल पॉच रुपया डाक- व्यय पृथका अभ्युदय पुस्तक भण्डार, प्रयाग। .

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Suhagrat Part -2

Author
Malviya, Krishnakant
Title
Suhagrat Part -2
File name
Suhagrat Part -2
Text
OCR done
Published
2010/01
Publisher
Nirnay Sagar Mudranalay, Bhavnagar
Language
Sanskrit
Pages
314
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Keywords
Jain Dharma
DLI number
318733
Barcode
99999990244931.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
lNRojm9c253
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