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Juna Jeevanta Chitram
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जूना जीवता चितराम
लेखक
मुरलीधर व्यास
मोहनलाल पुरोहित
प्रकाशक
राजस्थान साहित्य अकादमी (संगम)
उदयपुर
प्रकाशक
राजस्थान साहित्य अकादमी (संगम)
उदयपुर
प्रथम वार
मूल्य-३ रु. ७५ पैसे
सन् १६६०
मुद्रक
अजन्ता प्रिन्टर्स
जयपुर
थारी वस्तु भेट, थान है वल्लभ - प्रभु ।
है तो आ अळसेट, लाज ताहरै विड़द री॥
-लेखक
"
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विषय सूची पृष्ठ १ भौळी घड़ा नाखणियो or २ हुसेनौ गूजर ४ Ir ११ १४ २३ २ सुखी वारीदार ४ रमजान न्यारियो ५ सुगनी यहीभाट ६ भीखौ भठियारी ७ काबली नसीरुद्दीन ८ अलखियो १ रामली भंगी १० बिरघु सेयग ११ रुध्यो खल्ला गांठणियो १२ श्रीगोपाल श्रोमा १३ सिरदार रंगारी १४ गनी ठंठारी १५ मध्यो फेरीवाली १६ भीलियो खवास १७ हरदास दहीवाळी १६ भोलियो डाकोत १६ सीत की मालण २८ नंदी प्रोडू २१ जेसियो तंबोळी :: : : : : : : : : :: :: :: :: : ... ३६ ... ४६
ii
६८
२२ मनजी मचकांवाळी
२३ पौरायतणी-मदियैरी बहू
२४ बीजी खाती
२५ सिणगारी सैं सण
२६ बाली सामी
२७ तेजी सोनार
२८ उभौ दरजी
२६ पंखैवाळी
- ओल खाण इसी देखणे मैं श्रावै है के मिनख जूनी बातां नै मुणन-गुणन मैं मोकळी रस लैवे है। चौ, लारली बातां नै घणे उछाव-अर-उमंग सू सुणै, तोले-भोले, जाच-परखै अर हणै री नवी बातां सूमिलाण करै । भणिया- श्रण भणिया सगळे इणी मारग बै इतिहास, काण्यां-किस्सा अर लोक-साहित नै, पढ़ण-सुणन रौ चाव घण खरी-इणीज कारण सूहुवे । इणी चाव नै पूरी करण सारू, म्हां भी 'जूना जीवता जागता चितराम' लिखिया है। इणां रै पढ़ण सूमोकळी नवी चिमतकारी और हितरी-बातां आपरै जागने में आसी-अर-श्रासी-आपरै आंख्या रै अगाडी समाज रै जून बंधेज-बंधाण रौ सोवणी चितराम । इण छोटी सी पोथी सूआपने इत्ती जाणकारी तौ मिळ सी ईज- (१) श्रम री पूजा (२) आप आपरी जागा सगळां रौ माण-कारण (३) भाई चारै, मेळ अर सैयोग री भावना (४) पाप-भापरै धंधै मैं सगळे चत्तर (५) गुणां री कदर (६) त्याग, विसवास, अर भगती री भावना (७) जाति रै भेदभाव नै भूल'र सागळे धुळिया-रसिया-बसिया (5) जूनी रीत रवाज (1) भांत-भांत रा धंधा भांत-भांत रा मिनख श्रा पोथी आप लोगां रै घणी दाय श्रावणी जोयीजै, इसी म्हारी धारणा है। प्रापरी दाय-अर सरावण सूईज म्हारौ हाव बधसी। बीकानेर राखी पूनम, संवत् २०१७ मु. घ. व्यास मो. ला. पुरोहित प्रकाशकीय "जूनां जीयता चितराम" राजस्थान के लोक-जीवन के कुछ प्राचीन लेकिन ज्यलंत सहज संस्मरणात्मक रेखा चित्र हैं जिनमें राज- स्थान के समाज, संस्कृति, तथा पांचलिक जीवन के अनेक पृष्ठ मुखरित हुए हैं । अचल की धरती की धड़कन के वास्तविक बोल अंचल की भाषा में ही अपनी सफल अभिव्यक्ति प्राप्त करते हैं, प्रस्तुत रेखा- चित्र इसके प्रमाण हैं। सरल और प्रांजल भापा चित्रित राजस्थानी जीवन के यह अनेक पात्र मानव जीवन की अनेक विशिष्टताओं के प्रतीक हैं। साथ ही पुस्तक के इन चितेरे लेखकों की भी स्रजन सामर्थ्य का परिचय देते हैं। राजस्थानी भाषा में रचित श्रेष्ठ साहित्य के प्रकाशन की योजना के अंतर्गत साहित्य अकादमी के राजस्थानी विभाग ने "जूना जीवता चितराम" को प्रकाशित करने का निर्णय लिया था। प्रस्तुत पुस्तक का प्रकाशन विभाग के उसी निर्णय की क्रियान्विति है। मात्र पद्य में ही नहीं, गद्य के क्षेत्र में भी राजस्थानी साहित्य सिद्धि के नये क्षितिज छू रहा है। गद्य की अनेक विधाओं में आज नितनई श्रेष्ठ कृतियां प्रकाश में आती जा रही हैं, और उसी परम्परा में, राजस्थानी के पाठकों के लिये प्रस्तुत है यह 'जूनांजीवता चितराम'। शांतिलाल भारद्वाज 'राकेश' कार्यवाहक निदेशक राजस्थान साहित्य अकादमी (संगम) उदयपुर (राजस्थान) १ भौली घड़ा नाखणियो । , मरू भोम । करड़ी रुत । जानी-मानी वेकळूरा धोरा ! उनाळे मैं तपै तो इसौ तपै कै मत पूछी बात । इयां सू चिप'र घुवती हवा खीरा उछाले । ऊपर सूं सूरज भगवान लाय बरसाचै नीचे जमीं माता इसी तपै-इसी तपै के उभराणे वैवो तो फाला उपड़ जाये। असवाड़ा-पसवाड़ा सैन तपै । प्रांगण तपे, भीत्यां तपै, वासण तपै, विधारणा तपै अर पैरण रा गाभा । रोही में गंगा-भोळा जिनावर तपै तपत रै मारिया आकळ-पाकळ हुयोडा छैया तकै तिसां भरता तड़भडीजै । अठीन-उठीने पाणी री बगां डभका मारै । मरू-भोम मैं एक तो पाणी रौ इयां ई तोड़ी फेर उनाळे मैं तो मत पूछी बात । कृया साठीका ऊडा पाणी वळधां सू काढ़ीजै। कृ माथै इत्ती भीड़ के माथै तूं माथा टकराव अर घडां सूं घडा। पाणी ले जावणा खातर से अंतावळा । बारी मोरीजियोनी के झफाझफ पाणी ढोईजण लागोनी । पखालिया न्यारा ई राफड़ घालै । जंगी-जबर तिरिया-मिरिया भरियोडा कोठा देखते- देखतै खाली हुय जात्रै । चौ देखै हूँ पैला तो वो देखें ', तूं चाल हूँ' आयो । कदेई जोर री लूवां चाले। कदेई घम धमीजै । परसीणे रा परणाळा वैयै । मिंट-मिंद छेड़ तिस लागे । काळे ऊनाळे मैं पाणी बिना घडी एक सरै नहीं। खांधै उखण'र लाये तोई वीपरवारवाळां रै सरे नहीं । लाई काम काजियां नै तौ वेळा-बखत ई लाधे नहीं । टायर दोय-दोयर कित्ती क ढोये। जणे घड़ा नाग्वणियों पर पखालियां रै मुंडा सामो जोवणौ पड़े। पखालियां रा सुर चढियोड़ा। पैला तो बतलायां पार ई नहीं कर पर नियाजे तो बोलताई पाथरा श्रागना-बाराना पखाल मांगे । बाका फाई।
। २] [ जूनां जीवता चितराम कदेई इसी वडावडी बाजे जिको हिडक्यां २ हाथ लगायां ई रुपियाँ पखाल हाथ नहीं था। जणे घड़ा नाखणियां री बण श्रावें । खुल्ला घड़ा नखायौ तौ पाडै दिन दो टका तो अंबळी वेळा एकानी। नवी बंधी पैली तो करण ने श्रार ई को होवैनी जे हांकारी भरै तो नखरा-चखरां तूं। जूनी बंधीवाळां रै ई जोयीजी पाणी नाखदे तो बडी बात । पण पांचै श्रांगळयां एक सिरसी को होनी। कोई-कोई घडायाला भलाई हो । वान माण-मुलायजी मारै। पल्लै धरम राखे । पइसा देवता कई नै फोडी घाले नहीं-तरसावै नहीं। भोळी इसीई एक घड़ा नाखणियो हो। भोळी म्हारी गळी श्रर चौक रै घरां मैं बरसां सूं पाणी नाखतौ हो। कदैई फोड़ा को घालतो हो नी । आपरै मते ई माटा-मटक्यां अर कंडया भरो राखतौ । मिठ बोली माण-मुलायजैवाळी अर खरौ हो । बंधी मैं रुपियै रा ३२ घड़ा नाखती खुल्ला घड़ा रूण माफक पण बीजा सं थोड़ा सस्ता। भोळी भोळी अर भलो मिनख हो। भणियोड़ी भोळी आखर ई को होनी। घडी नांखती जणे पणी अथवा प्रांगण री भींत माथै कोयलै सूं एक लीख मांड देवतौ । इण तरै जित्ता घड़ा दिन भर मैं नाखती उत्ती ई लोख्यां मांड देवतौ। महीने में हैंसाब होवतौ । लोख्यां गिणीज'र ३२ रै भाव सूं दाम फळाईज जांवता । वो कदैई हंसाब मैं गोळ घालतो को होनी । कदैई ग्वोदी लोख्यां को काढ़ती होनी । भोळी खरौ हंसाबियो हो । बारै महीना में भोले नै बंधीयाळां घरां सूं एव-२फ धोती जोडी मिळतो । अर मिळती जीमण-जूठण होवती जण जीमण री नैतौ । भोर रीटंडी चेला भोळी घडा नाम्वरण सरू करती जिकै रौ १०॥-११ ताई इकधारी धैयती । पछे माळा-मिणियो फेरर पेट पूजा करतो । । ।
भोळी घड़ा नाखरिणयां
[३
दुपारै रौ आराम करती। पालो तीजै पौर -४॥ बजी घड़ी लेयर कूधै पूग
जावतौ । सिंज्या री ८-८॥ बजी ताई एकढ़ाण बैंवती ।
भोळी मैनती हौ।
बधीवाळा कदैई पइसा देवण मैं मौड़ी कर देवतो, ताई बी चींचा
को करती होनी । विना कयै ई ताजै पाणी री मटक्या-चाडा छाण देवतौ ।
बासी ठंडे पाणी री मटकी न्यारी भर'र मेल देवतौ ।
भोळी जीरणायाळी हो।
यरसां सूं घर में श्रावण-जायण सूं भोळी परायो को लखाईजती
हो नी । सगळा सं पूरी हिलमिळग्यौ हो ।
लुगायां वासण-कूसण मांजती अर सिनान-संपाडौ करती बेला गैणी
खोल'र भूल जांयती, तो भोळी, हेलो मार'र कैय देवतौ-माजी ! औ गैणी
कै रौ है, संभाळ लो।
भोळी मेळू अर हाथ रौ साची हौ ।
भोळे रो ठिंगणी खामण हो, बडी अांख्यां, गोरी सरीर, करड-काबरा
केस, छोटी मूछयां, कानटिरियोड़ा जिकां मैं मुरक्यां पैरियोड़ी, टाट पडियोड़ी,
डील ऊपर बंडी, खांधै अंगोछौ गोडा सांईनौ ऊंची-ऊंचौ धोतियौ अर उभराणे
पगां रैवतो।
श्राज बां बातां नैं मोकळा बरस हुयग्या। भोळी परलोक सिधारग्यौ,
पण बैरी भोळी उणियारी पर खराई-भलाई री छाप हिंबडै मैं हाल मंडी
पड़ी है।
. २ हुसेनी गूजर हुसेनी झांझर कै रौ ४-४|| बजी उठतौ । दिसा-फरागत सूं निमटर, गायां नै चाटौ चटायर, दूवरण लागती। दस-बारै गायां ही, सैं खरणे-वाळी अर लंबै थणां धाळी । दोय ही भूरी भैसां। दूध रा, चरा रा चरा भरीज जांवता। प, वज़ करण लागतौ । सूरज भगवान रै उदै होवण तूं पैलाई बौ नमाज पढ़लेती । पछै थोड़ी देर ताई तसबी लेयर. अल्ला-अल्ला करतौ । घर मैं लोबान खेती। दिन चढियां परचूणिया अर थोक दूध लेवणिया आय दृकता । कंदोयां रै निन रौ दूध जोयीजै, सेराबंधौ । वे ई आय धमकता । पाड़ोसी ई भेळा हुय जावता । दूध रौ भाव निकळतौ । पर्छ हुसेन रै घरवाळा कंदोयां अर थोक दूध लेवणियां रै घरै चरा भर'र दूध पूगांवता । हुसेनी गृजर हौ। हुसेनै री, घर री लुगायां ई बैगी उठती । हुसेनै नै दूवारी मैं मदत देयती । घर री बासी फूस वारी करती । गायां नै नीरती ठाण साफ करती पर फोटा थापती । काई लाराती धम्मड़-घम्मड़ पाटी पीसण । घर मैं संप हो। सगळे एक डोरे मै बंधियोडा हा । बडां-बूढां री इग्या मैं चाळरिणया हा । हुसेनी अर उण री बहू घर मै बडा हा । हुसेनी घर री मुखिया हो। घर सूं दोय कोस छेड़े एक वडी तलाव ही-घड़सीसर । जिठे रोही में, चरण लायक चुन्या पर तलाब में पाणी यती हुसेन री गायां-मस्यां ई उठे दाणी में रैयती । परयार रा दोय-तीन जणां नै उठे रैवणी पड़ती। दिनुगैरी - । हुसेनौ गूजर ] [५ बैंगो दूयोरै दूध रा भरियोडा चरा, ढांचां अपर मेल'र, गधां ऊपर ढोयर, सैर मैं वेचण सारू लावणा पड़ता । हुसेनै रै ३-४ गधा ईहा । गायां, भैंस्यां अर गधां-इण तर मोकळा जिनावर हा । हुसेनी चांपैवाली हो। हुसेनी तीन बखत री नमाज पढ़तौ। रोजा राखती। खैरात देवती। चौथाई तौ को कादती होनी पण गरीब-गुरबां री मदत करती । सभाप रौं भलो, दयावान अर चित्त रो औलीदौलौ हो। जिनावरां ने खूब सोरा राखती हो । आप अर बहू मक्कै-मदीने सरीफ री जातरा कर आया हा। हुसेनों हाजी हो। एक तो मेळू बीजौ भलो, तीजौ डंभक अर चौधौ धरमातमा होवण सं, जान-बिरादरी मैं वैरी चोखो माण-कारण ही वैरी बहू ई धेरै ओडै जोई ही । जात-बिरादरी मैं, असरचौपड़ जांवती जणे अवता सगळे हुसेनै नै तेड़ी। हुसेनी, आपरी भली अर तीखी सूझ-बूझ सं, अळंजी सुलभाय देवतौ । हुसेनी पंच हो। जिनावरां री दूधारी दिन में दोय वार होयती ही । एक भोर री बैंगी टेम अर बीजी तीजै पोररी कोई ४-४|| बजी। रात री १० बजी ताई हुसेनी गायकां री बाट जोवती । पछै वंचियो. दूध रौ मावो बणाय नाखती। मात्री चीजे दिन कंदोई अर जीमण-जूठणवाला खुसी-खुसी' ले जावता परा। कई नकद पइसा देय जांबता तो केई श्रोधार-घाट । हुसेनी श्रावणियां नै राजी करर सवदी पटाय ई लेवती । आयात काहीनी के, वी, माल डूबती आसाम्यां ने तोल देबै । वे बरस साटो नैडा लिया हा श्रर केस ताबड़े मैं धौळा को किया हा नी । मिनख री आंख पर चाल ढाल देख'र वैरा लक्खरण श्री लख लवती हो। हुसेनौ दानो-सैणी चौपारी हो। धामणां पर बाणियां रै साथै माथै दूध अर मात्रै री मोकळी खपत हवित्ती । मिंदरा मैं ई दूध जोवती । गूजर किसा बीजा को हानी, पण लोक ६] [ जूनां जीवता चितराम हुसेनै सू ईज घणा धीजता-पतीजता । बीजा, खोटौ माल ई चलाय देवता । पण हुसेनी इयां कदैई को करतो ही नी । बीजा तोल मैं ई मारण री चेल्टा करता पण हाजी वायौ कूड-कपट को वापरतो हो नी ! कदास हुसेन रै दूध सूं, काम नहीं चलती तो लोक उणरी ई मारफत बीजां गूजरां सं लयता। जिण सं वे तोल-मोल मैं ठगा नहीं। हुसेनी खातरी अरईमानवाळी हो। एक बात वोजी ई ही। कोई उणनै श्रायर लाचारी सूं कैंवतौ-हुसेना पाया ! छोरे-छोरी रौ व्यांच है, पइससड़ा खनै थोड़ा ई है, दूध-मायौ तौ थांनै देवणौ ई पड़सी । कई पइसा देय देसूं कई अोधार राखणी पड़सी। जणे बायौ धीरज-दाढस बंधायर कतौं-धारै जोईजै जित्ती दूध मावा ले जायीजे । पइसा होळे-सुस्ते देय दिये। देख भाई ! म्हारा पग मती तोडाये धरम पल्लै राखे । खरी नीवतवाले, नै काई माल री कमी है, भोळा ! हुसेनी पर उपगारी हो। पितरा मेळे, श्रोसर, वारिय, सिराध-धमछरी माथै हुसेनै रौ चोखौ माल बिकती । हुसेनी बीजां गूजरां रो दूध-भावी लेवर श्रापरी मारफत बेच देयत्तौ। सेठ-साहूकारां में वैरी श्राफी धीज-पतीज ही। इयां तो बैरौ ई, गाडी धणौ सोरों गुड़कतो यती हो । कदेई अोधार अटक जावती पर थोक घास-फूस, नीरो-चारी, गवार अर धान श्रोण लेवणों पड़ती जणे पइसा री जरूरत पड़ती इण मौकै माथै चौ सेठां-साहूकारां ने जाचतो । हुसेन री इमानदारी, मेळ अर भलाई सं, कोई ना करणी तो आधौरयो, होठ र फुरकारे सागै जोईजती जिती रकम तोल देवतौ । उण रोबोपार ई चोखा चलती हो। हुसेनी थाली साख-सोभायाळो हो । हुसेनै रौ ठिंगणी खामणी हौ, बडी-बडी आंख्या, जाडा भंवारा, रंजी री चोळी अर रेजी री जाडी धोतिया गोडो साईनो, श्रध पक्का फेस, मूधयां नाक नीचे घणी ओछी श्रर होठारे किनार तीखी, दादी च्यार- - । हुसेनी गूजर ] [७ . च्यार आंगळ री, हाथ मैं डांग, गळे में रंगदार अंगूछी, माथै पागड़ी गट्टी फैटी श्रर पगां मैं देसी जाडा जूत हा । हुसेनौ दसकत कर देवण जित्ती ई भणियोढी हो। मोकळी चौपार करती, कई खनै चौपनिये में अटकवाग लेवी । सिमरती ई वैरी पक्की ही। सगळी घात जाणे जीव ऊपर मंडी रैवती । कणेई पटली, हुमेनौ भडाक गई हसाब यताय देयती । र हसार में कई गोल पड़नी को होनी । हुसेनी हंसाधियों हो। कैवत है-अठ जोयीजे जिकोई उ जोयीजै । श्रयै नै बूढाप आय घेरियो ई। आंख्या री सोजी घणी पोली पड़गी। खाली झाखी पड़ती, प्रीती अडवी-असरचौ होवण सू खाँधी झालर हुसेनी घर सू पार निकलती। सरीर री संगती घणी अोली पड़गी । सारो दिन घर-गुवाड़ में बैठी रॅवती । मार्च माथै येठी अल्ला-अाला करती रैयती । छोरा सेवा करता। घर में हालई वैरौ कयौ होवती हो । घर-कुब पर लैण-देण सू ई घणो मोरी हो । छेकड़ अल्लारी दरगारी तेड़ी श्रायो। पछे खळखळी तगादी आयो । अवै हुसेनौजी श्रे चाल्या; च्यार जणारी चौकड़ी माथै, पापरी खसबो खिंडायर। बरस बीतग्या पण जस को वीतिनी। बैरी गुणांरी खसयो सूं हाल लोक मोयीजियोडा है । भोकै-टोकै तौ हाजी हुसेनै रौ घाटी अखरै ई नहीं- घणी अखरै। पण जोर क्या बटै जद भगवान जिलम-मरण रो जोडी- रच दियो। 1 , ३ सुखौ बारीदार सुग्दै बाये रो रंग सांवळी, श्राख्यां बड़ी, बडी मूछयां, चबडी धौली दाड़ी, धौळा-करड़ा केस, चरै माथै करडाई अर अणभी, प्रांख्या रे नीचे लंबी रेखावां, करडी चामड़ी पर गंठीजियोड़ी सरीर हाथ लक्कड-भांत पर छुरियै दाई, जाडा भंवारा, काठी गोडा साइनो धोतियौ, डील खाखडिये दाई, सिंग दाई गरज ना करतो, कुवै माथै बैठी रैयती अर सगळी बातां री निगराणी राखतौ । संघर साठा नैड़ी पण कडक इसी जिको मोटियारां ने छेड़ें बैठाये । बौ कुवै माथै रौल-राड करणियां जिकर करणियां, फालतू पाणी दोळणियां, नागाई-नकटाई करणियां नै, इसी दाफल देवता जिको वारी फाळजी गिरै छोड देवती। श्रागै सं फेर कुचमाद करण री हीमत को होवती नी। सुखी यात्री कूयै रौ वारीदार हो । कृया साठी का-घणा ऊंडा । घणखरा पोकरणां प्रामणां रा। पाणी वळधां बादीजै । वारी, भायसै री वरत मूं कृत्र में देरीजै अर पाछी चळधां सू खांचीऔ । बारी, रै मूं. माथै पुगे जणे बारो मोरग्गियो जोर सूं रागोलिया करै-आयो रे भैरियौ प्रायो। सुण'र खीली काढणियाँ, बरत री खोली काढ़े । हमें तौ वरत रीस भरियोड़ी सरपणी दाई, सरडाटै मूं कुबै पासी दौड़ें । यारो मोरणियो पग में परियोडे ग्वेटर { चरन नै कूर्य ग्यने पुगतेई दवाय लेवे । यलध बैनै उठे मुं पाछी मांचर मारण रे नाकै पुगे । ग्वीली काहणियो श्रर बारामोरणियो, दिन भर में चोया पटसा फमाय लेये। यै माथै म्यान रा डोल श्रर दोल्यां पड़ी रैयनी जिण मुं कोई पाणी पीवी पर हाथ-मंडा धोची। ।
सुखौ बारीदार ] [६ भैंस री खाल रा टुकड़ा-सळू को मैं भीजता रैवता । चिलमियां सारू एक खानी छाणा, धुखता रैवता। सुखली बात्री जूनी अर जाणीकार हो। कुबै रै पसवाडळी डावी-जीवणी कुंड्यां घड़ा भरणबाळां वास्ता भरी रॅवती। कुंड्यां रै एड़ छेड़े दोय जयर चंबडा ऊंडा कोठा तिरिया-मिरिया, पखालियां सारू भरिया रैवता। सुखलो वावी घडै अर मटकी रो कच्ची पइसौ अर पखाल री एकानी भराई लेंगती। लोग लोभ मैं आयर बेघड़िया लांवत्ता अर पिणयार मटकी माथै, दूरिणयौ-गणियो अथवा चाडौं भर'र मेलती, जण बाबी कैंवतौ क्यों धरम पल्लै राखौनी रे । खाली लोभ रै मारिया भारां मरी, कूडी तो दोवण सूरया। यायौ सगळां सूं नगदी पइसा हाथो-हाथ लेंवतो । कई री ओधार करती तो ठायै-ये री। गोळ घालणियां श्रर गिचाळ्यां ग्वावणिया री दाळ वा श्रागै गळती का हीनी। सुखलौ बाबौ डाठीक अर हंसावियो हो । गायो-डांढां सारू चयडी ऊंडी कुंड्या भरी रैवती । पंखेरुवा सारू कुंडा-ठीकरां मैं पाणी भरियौ रेवती । गरीब-गुरबां मैं बाबी मुफत मैं पाणी ले जायण देवतो। कुपै माथै कई नै न्हावण-धोवण री मनाई का हीनी । मलाई निमटर जांवती वेळा बालटी-गूणियौ भर ले जायौ । सुखलो वायो धरमातमा हौ। छोड़ होवती जण ती बायो घरे रोटी खाय प्रावती पर भीड़ होयती जण उठ ई मंगाय लेवती। कणे ई काम रै मारियां फेट खायण नै ई पुरसत का मिळती हीनी । झांझरफैरी ४-४॥ वजी कुवौ जोड़ती जिकैरो धू दुपार री १२-१ वजी १०] [ जूनां जीवता चितराम कूवी छोड़तौ । मसां सूं दो-अढाई घंटा श्राप'र बळधां नै सास खायण ने मिळती। सुखी बाबी करडी खाटणियो हो। घडा अर पखाला भराई रै हंसाब में बायो कदेई झोड़ घालती को हो नी । पण आई कोहीनी के यावै री अांख्यां मैं कोई धूड़ घाल जावै । बरस भर में सुखी बाबैरै निखरची चोखी कमाई हुय जांवती ही। जात-न्यात मैं ई उणरो बडी काण-कायदो हो। सुखै बाबै नै कूफ रे मालकां नै एक बंधी रकम २५०) ३०८) देवणी पड़ती ही । मालकां रे घरे ३०-३५ घडा पूगावणा पड़ता हा। मालकां नै छूट ही के चावै जित्ती पाणी खांधै ढोय ले जावो । कदास मालक पखाल सूं पाणी मंगांवता तो यानै खाली ढोबाई लागती। ढोवाई यै वेळा एकानौ परवाल ही। घड़ा सूं पाणी मंगांवता तौ जित्ता घड़ा, घड़ा-नाखणियौ नाखती, बदले मैं, उत्ता ई घडा बनै ढोयाई रै बदले में मुफन भरण दिया जायना । मालकां रै मिंदरा-बर्गच्या मैं पाणी मुफत देवणी पड़तौ । भिंदरां रा पूजारी तथा बगेची रा सेवग चाथै जित्ती पाणी न्हावण-निमटणियां सारू खांधे उखण'र लाय सकता हा। इण तरै रौ करारा नामो मालको अर बारीदार रे बीच में लिखियोड़ी होवती हो। पायी हुसियार पारीदार हो। श्रये कि वे मजा ? अबै तो मसीनां मूं पाणी निकले। भावी-संजोग सूं बीजली जाय परी, ती, १) ११) रुपिये पखाल विक। कई दिनां मैं लोक पुराण ढंग सूं पाणी काढणी ई भूल जामी । शनी पराये हाथ खेती है। जे कदास श्रण चीती हुय जाय तो पाणी-पाणी रोना मरां । याय में सूटियां मोटा वरम हुयग्या । पण बैग याद भूलीने पो हैनी। 1 ४ रमजान न्यारियो रमजान विचलै खामणे रौ, वडी आंख्यां, जाडा भंवारा तीखी नाक, गोरी गट्ट रंग, काळा भंवर केस, लांगद्वार धोती, सोपणे रंग री पागड़ी अर पंजाबी पगरखी पैरतौ हौ । मुल्लां रै उपदेस तूं, पछै धोती री जागा पजामा अर पागड़ी री जागा टोपी पैरण लागग्यौ हो। रमजान नमाज पढ़'र कणे ई ठंडै-ठंडे में दिनगैई तो कणै दुपारै रौ, सहूकारों रै घरां, सोनारां रै दुकानां खनली तथा बीजी ठायी ठावी जागारी धूड़, सीक्या रै झाडू सूं वार'र छाजली मैं भेळी करती । पछै बैनै फटकार में आंख्यां गडाय देवतौ । इयों करण सूं, बैन, सोने चांदी रा खेरा-घंटा, नग श्रर कदे ई काई सोनेरी जिनस लाघ जांचती। रमजान न्यारियौ हौ। लोक, नोकरी-चाकरी करण जांबता जणे रोटीवाळा पइसा निकळता । पण रमजान रै तौ पाखौ दिन धूड़ रौई काम । कैवत ई है-न्यारियै धूड़ में ई पाई । रमजान, सोनारां धरा अर चांदी-सोने री दुकानांर पागली धूड़- फूस मोल लेवती । कई सेठा-साहूकारों री हवेल्या खनली पर कई जिठे कई लाधरण री श्रासा होवती उण जागारी धूड़ भेळी कर लावती । श्राखी गळयां मैं भटकनी रैवतौ पर आपरै जचती जिकी जागा री फूस भेळी कर लायतो। इण तरै वो, आपरै घर सनै धूड़ रौ मोटो ढिग्गी भेळी कर लेंयती। पर्छ सगळे घर रा धूड रै धंधे मैं लागता । एक खाड खोदता श्रर सगळी धूड वैमै नाख देवता । फेर धैनै एक पूरसूं छाणता । पछे कई दिनां तांई धेरै उपर पाणी छड़कता रैयता । फेर नै फरकी करर वैरा लाडू बांधता ।
१२] [ जूनां जीवता चितराम सगळे लाइयां ने एक मोटे चूल ऊपर वरतण में राखता। सायत ने तिजाब रौ यो देता कान काई पीजी रसायण री किरिया सू, धूड रे लाडयां मांय सूं चांदी, सोनी, तायो श्रर पीतळ न्यारी-न्यारी काद लेयता । पणी वेळा तो, इयांरी मैनत मोकळी फटनी पर कई खाली मैनतयाळा पइसाई निफळता। लोग इचरज करता के न्यारिया धूड माय सू चांदी-सोनो कांकर काढ़ लेये है ? कैरत है-ज्यारियो मोर पांख रो सोनी उतार लेवे है। रमजान हुंदरी हो। रमजान घर प्रासृधी हो । चोखो खावती-पींप्रती परती-श्रोढ़ती। घर में मोकळा गैणा-गांठा हा । दो-दो गायां ही। पर मैं धीणो हो। रुजगार इसी ही के ३-४ महीना डट'र मैनत कर लेषण सूं बरस भर रो गुजारी निकळ जांबती। रमजान सोमो-चांदी गाळिया करती हो। भागी-टूटी सोने-चांदी री जिनसां किफायत सूं मोल लेयर थाने गाती पचै न्यारी-न्यारी डळयां वणाय'र बेच देवती । नकली, असली पर चळणसार सोने री, चैनै खरी परख ही। श्रापरै धंधे मैं, कई नै काद'र को देवता होनी रमजान चतर हो। रमजान हो हंसाळू , खुस मिजाज अर सौखीन । ईद रै दिन देखी तो. साटण रा कपड़ा खरी जरी री टोपी, कलाबूत र कामरी पगरखी। रमजान मैं, रईसी रौलटको हो। अखातीज अपर किन्ना री रुत मैं खूब धुंवा लगायती । लटाव रा लदाय भरियोडा मंजे रा भर रंग-बिरंगा बडा-बड़ा किन्ना लायती। किन्ना ढील में लड़ना । लटाई नै, खळखळ टोली छोड देवतो । किना गुड़कता-गुड़ता थकास रा' तारा बण जांवता। पेच धुळना तो इसा घुटता जिको ना तो सुळमता पर नाई कइरी किन्नौ कटती । रमजान पर मेरै घरवाळा डागळे माधै ऊभा जोर-जोर संहाका करता-किनी तोडिया मतीना भाई रे, पेय लड़ रया है, किली कटियौ नहीं है। किलो इती पेटी छोड़ती ।
रमजान न्यारियो]
शिकौ मंजौ माथै सूं ऊपर टिरतौ दीखती । किन्नां री लड़त मैं सइकडौं रुपया
पूजीज जांवता।
रमजान किन्नां रौ लड़तियौ हो।
रमजान में, एक लत खोटी ही। नितरौ आखर बावण जोवतौ ।
बिरखा रौ सवदी ई किया करती । नफी तो होक्तो कदेसीक होवती पण घाटी
तो नितरौ लागतो ईज । पाखर गतौ जद क्यों पूछौ हो रमजान री बात !
खुसी रौ पार को रैवतो होनी । खूब आपरी तारीफ करती। पीरजी नैं सीरणी
चढांप्रती।
घर रे खनकर कोई सवदेवाली बैंवतो दी सतैई रमजान, पैलड़ौ सवाल
श्री ईज पूछतौ-भाईजी क्या आखर खुलियो ?
रमजान सटोरियो हो।
गैमना पीर रै मेळे ऊपर, रमजान सगळे घरने, ऊंठगाड्यां भाई
कर र पीरजी रे दरसणा सारू ले जांचती। पछै खूब ठाठ सं रैवतो, खांबतो.
पीवती । फकीरां नै खैरात वांदतो।
रमजान धरमात्मा हो।
अबै रमजान यूढ़ी हुयग्यौ। सोजी घणी कमती पड़गी। काम-धंधी
कई बण आवै नहीं। पाखौ दिन खाट माथै बैठी हुक्की पीवै गप्पा मारै ।
सुमत सूझै तौ अल्ला-अल्ला करण लागै । छेकड़ अल्ला धैनै आपरी दरगा मैं
।
बुलाय लियो।
- सुगनों वहीभाट सुगर्न लाई सोने से जुग देखियों हो पण आज तो चैनै लोरे जुग मैं जीवणी पड़े है। दिन ई, कागावासी छाण'र, दिसा करागत सू निमटर, खंखोळी खायर, माथै परान धर'र, भुजिया-कचोळीवा री हाट जावणी पड़े है। ठे गिएर नग लेवे। पाचौ घरे पूर्ण जित १०-१०॥री टैम हुय जाये। पर्छ पेट नै भाडौं देयर, माथै, माथै गमछेरी ईदाणी बणाय'र, वैरै ऊपर लोरी परान धर'र, उमराणे पग वरसती लाय, उछळनै खीरां मैं, रेलघाट तथा मजूरां कारखानां मैं पूरें। धोती लपेटियोई गमछे ₹ पल्ले, कदेई तो सूकी भांग पर फदेई गोळी, जायते सूबांधियोड़ी रखती। ५-५ बजी र अईं गईं, सुगनौ, किठेई, बूंटी-दासिया र अखाड़े में जाय ढकती । पई लोरी परात पसबाड़े मेल'र, गोळी नै छाणर, निमटण ने जांयती । कई मजूर नगदी पइसा दे देवता तो कई हफती या महीनी चूकती जणे देवण से कैंवता । कांकरई करर आटै रौ जुगाड़ दोरी-सोरौ हुयई जांगती। सुगनों ही ठिंगणे खामणे रौ, छोटी-छोटी श्राख्या करडकाबरी दाड़ी, अधियोड़ी जटा, टीडसी दाई नाक, टिरियोडा कान, लिलाइ माथै संदूर से टोको, गुढयां बायरी चोळो, गोडा साईनो धौतियो अर हाथ में पोटौं लियां घर रीमारग लेवती। घरे पूगर थोड़ी टायर संबिलम करण लागत । इत्त ई तो, लुगाई मेडी सिरकार धीरे-धीरे कवण लागती-श्राज तो लूण बधै हैं, तेल परसूई
अप
जांवता ।
सुगनो बहोभाट ]
[ १५
खूटग्यो हो, मिरचाई आजोकीज है । पूर्वती-कई साग लाया हौ तौ दे दो,
जिको सुधार छमक दं। पर्छ बूंटी रा दागा लागोड़ी गमको संभालण लागती।
पण साग किठै पड़ियो हो ?
नसै री तार में, भारी गळं सं सुगनौ उथळी देवता-आपारै तौ दाळ
जोयीजे सागरी क्या करणौ है । दाळई सदा सुवागण है।
दाळ ई बधै है, थान काल कैयौ हौनी के चारांनांरी लेवता आया।
सुगनी कैती हूँ तो भूल आयो।
जणे वा लायण चटणी बांटण बैठ जांवती।
पछे सगळे जणा जीमण लागता जीम'जुठ'र टावर तौ
सूय
बहू वरतण मांजती, ऊंचौ पाचौ करती।
फेर घणी-बहू घरगिस्ती री बातां करता। चातां करते करते
ई, थकियोड़ा होवण सूं, दोनां नै मेरा आवण लागती पर हुय जांवता
गुडदापेच ।
सुगनै वाप-काकै रौ जमानौ देखियौ हो । पुसकरणा बामणांरी बड़ी
विरत ही, बारां वही भाट हा । बिरतरा हजारां घर हा ।
टायर रै जिलमतैई भाट री वही मैं पैरौ नांव मंडाईजतौ । भाट राजाने,
मान सं बुलांयता । प्राछो भोजन करांवता । श्रोथै सूोछा पांच रुपिया पर
बेसी श्रापरी अामना मुजव नाव लिखाई रा देवता । कोई पांचै कपड़ा पर
गणी देती।
गांव-गोठ में ई भाट राजा नै घरस में एक-दोय वार जायणी
पड़ती हो।
थियां पर हरखरै मौकै माथै श्रासूधै घरवाळी कोई-कोई, भाट
राजा नै, सोनेरा कड़ा-कंटी पैरांवती । श्राधा भोजन करांवती । यही में इण री
दाखली दराईज तो।
- १६ ] [ जूनां जोवता चितराम कोई नयी हवेली यांचती, खोळे जांपती अथवा और नामी कामी करती तो वेरी ई दाखली भाट राजारी वही मैं दरीज नौ । इण मौके उणां से चोखा मान-सनमान होवती, चोखी परारती होवती । 'उण वेळा, भाट राजा रे, किणी यातरी कमी को ही नी । चौखी आदर मान हो पर सुख-सोरप सुं गुजारी होयतो हो। किले का माईतां री बखत अर किंठ लाई सुगनै रो जमानौ । आधे सई के सूं ऊंची होषण भायो, भाटांरी वही मैं नाव मंडायाने । अबै तो मरण परणे भाट राजा पाये तो जीमजायौ घिरतयाळा मैं बी हेत-उछाप रैयौई कोयनी । नहीं जणे, लाई सुगने ने क्यों खुडिया खुधरती किरणो पड़े। विरत रा हजारा घर है घर दीठ घणा तो पांच, थोडी तो एक, भाट राजा नै नवा नांव लिखाई रा मिळणा सरु हुय जाये तो लाई सुगने से घर ऊँचौ प्रांधतै क्या देरी लागे । दाळद बात री बात मैं, धुप को जानी ? जात री पीढयां श्रर नामा-कामा रौ पूरी लेखौ-जोखोई लिखीज आये अर निकळ आ भाट राजा रैं गुजारी उपाय । पैला राज दरबार में भाट राजा राजा री बही, पीढयां अर नातें री तस्दीक सारू पेस हुया करती ही । इण सूई या लाभ पूगती हो। पण देस काळ देखता तो म्हारी श्री इतिहास अधूरौइ पड़ियों रैयती - भीखौ भठियारी भोर रो ठंडी वेळा मैं भीखौ घास-फूस अर छोड़ा बाळ'र भट्ट चेतन करतौ । पैला सरधा सं, ठाकुरजी ने हाथ जोड़तौ जिकै सं के बैरौ रुजगार चोखो चले। भीखै री बहू वेरै खनै मती रे रा चीज, गऊँ, जंवार अर चिणा लायर मेलती। भट्ट एक खानी, घर रै आगे चौकी ऊपर हो । खनैई मोकळी खुल्ली जागा ही जि?, वैरी बहू आपरी दुकान लगाया करती । चौकी माथै, घास- फूस री एक छपरी छायोड़ी हो, छायां राखण सारू । इण काम सू निपट'र, भीखें री वह टावरां नै जगांवती । टावरांरा काळाकुट उणियारा, लुक्खा केस, पासळयां दीखे, कह रै माथै रै केस इसा कतरियोड़ा जाणे भेड मंडी जियोड़ी हुयै । छोरी रा झीटा बिखरियोड़ा अर मैल- परसीण सं चिपियोड़ा। फेर गूदड़ा सांटती, टावरां नै दिसा बैठांवती, बारां हाथ-मंडा धोवती अर बासी फूस-चारी काढ़ती । टावर, हरखांवता-हरखांबता, बाप खैन जाय बैठता । चाप किरण तर- धान सेकै है, या वात, अांख्या गडायर देखता । एक-बीजे सूं आगे बैठण सारू लड़ण-झगड़ण लागता, श्रापस मैं, एक वीजैरा केस खांचता पर चूंटिया थोड़ता । कामरी येळा भीखी इयारी बदमासी सं उफतर कती-वळी वाघजाई । फेर बहू नै हेलो पाईर के तौ-लेजा धारै कुरण कयां ने। मा तड़कर कैती -आधा बळी पीटणं पड़ियां अर घांसर मांय ले जांयती । लुक्खा सोगरां रा टुकशा तोड-तोड'र एक-एक टुकड़ी सगळां ने देवती । सीराण में लायां ने श्रीईज मिळता अर इण संचे राजी हुय जायतां ।
एक पासी १८] [ जूना जोवता चितराम ठाकुरजी रे घर सं रूप बंटती येळा, भीखेरी हाथ सगळां सूनीच रेयग्या हो । वी काजळ री बीरी थर कोयल रो मासियाई हो। धू दुपार, बरसती लाय में, यो घर सूं बार निकळनी । एक मोटी श्रोडी मैं, चिणा, मती रेरा वीज, पाणी, फूल्यां, छोटे-छोटे मैले कोयळियां मैं भरर ढंग सूं जचांयती। वीज दोय तरेरा-जूणिया थर अलूणा, चिणा तीन नरैरा छोलियोड़ा, बिनायोलियोड़ा पर लूणिया-दळदिया छोलियोड़ा राखतो । कृलिया मेलती। माथै, माथै मैली-चीगटी बिदरंगी पागड़ी, डील ऊपर फाटी मेली घोळी अर पां मैं कारयां लागोड़ा जाडा जुन परियोड़ी, भीखो, 'लौ चबीणी लौ चवीणी' कैंचती, चौकार गळयां में घूमती रेती। श्रोळखियोड़ी बोली सुरण'र, घर-घर सू, लुगायां, टायर बैनै हेला पाइण लागता! आयो ई माजी, आयौ ई दादीजी, थायो भाइया कैर, बी, सगळां ने राजी राखती । कोई पइसा रा तो कोई धान रा चिणा-चीज लेतौ । यौ, सगळां नै, ठूलियां तूं मिण'र चवीणो देती। पइसा एक डब्बी मैं अर धान कोथळी मैं भेळी करती। भीखौ हँसाबियो हो। सुकरवार नै खास तौर सूं बैरी घणी उडीक रैवती । बै दिन चिणा खावणा सुभ समझीजै हैं । वै दिन तो लाई नै केट ई को खायण देवता हानी। हेलो ऊपर हेलो श्रावतौ । वै दिन चैनै दोय-तीन बार भाज'र घर सं, चबीणो लावणी पड़ती। बीजै दिनां सू, आज वैरै चौगणी बिकरी होवती । इयां तो रोटीवाळा पइसा, आडै दिम ई, वो काढ़ लवती हो । भीखै री बहू चौकी माथै बैटी चबीणो चिया करती। दोयां री मजूरी सूधाको धकतौ हो। दौये सैणा अर घर लोचू हा । । "
भीखो भठियारो]
[१६
सिंज्या पड़ियां सूं कई, क पैली भीखौ घरै पुगतौ । चिलम पीवती ।
लुगाई वैरी आटो पीसती । बौ बीजै दिन सारू सामान लेवणने चौवटै
जांयती परी। भारताय चोखी तरै जावर जिनस लेंचती।
भीखौ जाणकार वीपारी हो।
घर आंवतै रात पड जांवती । पछै वो हाथ मंडौ धोयर बिसाइ
खांबतौ । टावरां रौ लाड़ करतौ अर बानै रमावती-रोमावती'
इते ई तो बैरी बहू थाली पुरसर ले यती खता-खता सोगरा
अर लूण मिरचरी चटणी।
भीखौ संतोखी हो।
रातनै पाई-पाडोसरा भठियारा वैरी चौकी माथै प्राय जमता गप्पा
मारीजती । काण्या केयीज ती । रुजगार-धंधै रै चलचाल री बातां चलती
चिलमा चेताईज ती। औईज लायां रै जी सोरी करण रौ उपाव हो।
भीखौ मेळ अर मौजी हो
भीखी तो परलोक पूगग्यौं । पण दुपारै री वेळा कणैई-कणैई इसी
लखाई है के जाणै बौ कड़क बोली मैं, 'लौ चवीणोली चवीणो' हेला
पाई है।
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कावली नसीरुद्दीन सळांदार मेलो-मेलो घणो ढीलो जाडो अर जागा-जागा चीगटो चोळो, ए खाँधै अपर लोरो लंबी भूगळो लटकायोड़ो बीजे खांधे में एक गोथळी, माथै कुल्ली अर पेची अर पगां मे हाथ भर लंबा चरमर-चरमर करता जूत परियोड़ा 'हिंग लेलो, हिंग ललो' कैंवतो कायली मसीरुद्दीन, आपरै वेर्ट सागै जद म्हारी गळी में बडतो तो पाणंद-री लैर वै जाती। घर रे आगे धरियोई बड़े पाटै ऊपर परयार री मंडली में विराजियोड़ा पैदराजजी हरख'र हेतसूहाथ बधाय'र कैवता, 'आवो खान पादर, बैठो!' तो खां साव ई खुस हो न हकीमजी कैर पाट ऊपर बैठ जांवतो । लुगायां खांसाबरी श्रोळखयोड़ी बोली सुण'र बार यती पर एक-दो जण्यां रुखड़ी दादी नै बधाई देवण नाठती कै थारो काबली भाई' आयो है। छोरा-छंडा किलोल करता ऊतावळा ऊतावळा कैता- मीयौ मछी मारणो, कागै नै उडायणो, कागै मारी टांच ए, मीया मरग्या एक सो'र पांच ए ! गळी-गुवाड़ रा बडा-बूढा छोरा नै तड़कता अर कता-काबली बाबोजी है, मीयो मच्छी मारणो नहीं कैवणो। दाकल सुण'र छोरा चुप का होयर पाटै खने आय ऊभता । काबली बायो कई छोरै-थोरी नै दो-चार काजू, कई नै थोड़ा सा नेजा, तो कई नै दो-चार बिदाम दे'र पूछत्तो-रूखड़ी राजी हय, गोमा राजी हय, जावो सबको सलाम बोलो, मेवा दूगां! जणै छोरा ऊंतावळा-ऊतावळा एक सागैई कैता हां राजी है । अर नाठ'र आपरी दादी ने बुलायण जांवता।
काबली नसीरूद्दीन ] [२१ पछै रुखड़ी दादी कावली भाई री थाली पुरस'र लावती जिकै मैं जाडी. जाड़ी रोत्यां, गवारफळी-वाखड़ी रौ साग, घी-खांड घाल'र चूरियोडो चूरमो- अर कटोरी भरियोड़ो दूध रो होतो। चाबो कैतो लाडूला बैन, जणै रुखड़ी दादी मीठी झिड़की देर कैती-लाडू पडिया जाय है । लाडू कसू लाऊं रे डाकी ? तू तो घोषागटणो है । लाडू म्हार इयै भतीजै यगा । सांभ'र राखिया है। तो भतीजै को जल्दी लाकर बाबो जोर सूहम देवतो। जीमणारी मिठाई विकरणी आयती जद दादी एक दो रुपयां री मिठाई मोल ले'र इयां का राख मेलती। थोड़ी मिठाई टावरा सारू इयां-रै साग कावल पण भेजती। जीमजूठ'र वायो कोथली खोलतो पर बैन, वैन रै टावरां सारू कायल सूतायोड़ो मेवो पर हीग देवतो। दादी अत्रै लागती ओलभा काढणक एकदैई दो आंगळ रो पुरजो ई को मेलेनी, मोह चोर है। माफ करो थाई अब जरूर भेजूंगा, खुदा के फजल से घर पर सम खुश हयां कैर बाबी पिंड छोडायतो। पछै आयोड़ी सगळी लुगाया सू मीठो बोल'र कई न कईदेर सगळयां नै राजी कर' मुतलब री यात छेड़तो। हींग रोडच्यो खोल'र लागतो माल वेचण । काई कैती-बाला बाया! तू तो लोभी घणो, घणा दाम लेवे है । तो बाबो के तो-अच्छा मरजी श्राय दे।' काई कैती-हींग चोखी कायनी कोरो मिस्सो पाटो वलै हे। तो अचा-बच्चा दूसरा नमूना देको बाई, श्रमारा हिंग माफक दूसरा हिंग नहीं मिलेगा, हमारा हिंग बात अच्चा है. चौत सस्ता हे, केतो। बायो दानों पर सैणी योपारी ही। बायली नसीरुद्दीन कावल सूं होंगर मेया लायर अटे चोखा पइसा खड़ा करतो र अठरी जिनसां काल में बेचार दूणी चौगणो नफो करतो। कारली वायो पस्को हंसाथियो हो।
। २२] [ जूना जीवता चितराम काबळी वावो आपरो अधेलोई को छोडतो होनी चीजेरो भळाई पइसो बैमैं रजायो । पाई-पाई उघराई कर'र पछे काबळ दीसी मंडो करतो । काबली बायो पूरो लोभी हो। सवदो पटायण सारू बाबो कुड कपटई केवट लेती हो। श्रापरी माळ इलको होयतों तौई, अमारा माल बीत अच्छा हय, हम बुड्डा हय, जूट नहीं बोलता । अमारा भाव सस्ता है, कैर सबदो पटाय लेतो। काबली बायो चोखो चंद अर चरियोडो हो। काबली वा री उमर ७० रै अडेगडे ही पण तो ई चैरो लाल, बड़ी- बड़ी संख्या, जाडा भंवरा, मैंदी सूरंगियोडी दाड़ी, उफसियोडा जबाड़ा अर केस करड़काबरा हा । क्यों नहीं हो वे, ऊभ खधैि मेवा चरतो हो र चोखो खारतो हो-खाध करें उपाधा। आपां रै अठै बूढां दाई बैरो मूडो हो दाई पोलो, अांख्या रा खुट्टा बैठोड़ा, जबाड़ा चिपयोड़ा पर कबाड़ा मिळियोड़ा को हानी । बापड़े थठे रे डैणां नै चोखी खुराक अर धपटवां मेवा कठै मिळणनै पड़िया है। काबली बाबो कड़कनाळो हौ अर बत्तीसी खांडी को हुयी ही नी। काबली बाबैरो वेटो बैसूघणों चोखो'र खरो हौ। कणै कणे ई वो एकलो प्रांवतो जणे सगळे धेरै खनै मेवो अर मोफली हींग लेता कृडौ बी- ...कपटी को हो नी। वैदराजजी श्रोणनै बो 'खुदाई खिदमतगार' दळ री बाला सुणावतो जिकै रै बौ एक सभासद हो। काबली बाबो पर बैरी बैन ठाकुरजी री दरगा में पूग ग्या, पण वारी याद हालतां ई कालरी बात दाई बणियोड़ी है।
। अलखियो । एक ऊंची ऊंचौधोरी, मिण माथै वौदैलीन बार कर कोटारी डि । मांय दो पक्का थान-एफ भैरू जी रौ, वी जी हडमानजी रौ । खनै : एक झंपड़ी जिकै में अखंड जोत जगै। एक खूणै में-इकतारौ, , कांगसिया, रताळ, अर च्यार पांच चिलमा अर गांजै रौ डब्बी। बीजै मैं-खप्पर अर बडाऊ । तीजै मैं धूलो, चींपियौ, तयौ, कठौती, हांड्यां अर ठीकररी हटड़ी। वनै ई एक माळ मैं चिमनी अर तील्यांरी पेटी। चौथै मैं एक लोरी पेटी के मैं काली ऊन रा लंबा-जाडा बटियोडा डोरा, कइयां मैं घूघरा पोयोडा पर एक टोपसी मैं तेल संदूर । खनैई दो भगवां पंछिया । खूटी माथै एक अंगोली पर लंगौट लटकै। झूपडै रै आगै एक लंबी-चबडी चौकी जिकै माथै भांग घोटणारी सिल्ला लोदी अर एक पाणी री भरियोडी बालटी पर लौटी पड़ियौ । बीजे पासी दो मांचा पड़िया जिकै माथै दाटरी राल्यां पर तकिया राखियोडा । भैरूजी रै थान खनै एक गैर गंभीर दिरखत जिकैरी थैया में एक मातो काळी कुतौ जीभ काढ़ियां हांफनो बैठी। झंपडै मैं वै दो जणा : एक गुरु वीजी चेलौ । लोग इयां में (अलखिया ) के थे। चेली कुंड माय सूं पाणी खांचंर लंगोटौ अंगोली मेल'र बारै सिनान करण री सगवाड करतो। सिनान कर'र गुरु जोतबाळ सकोर में घी घालती। पर्छ सिपाई कबाज करैज्यां पांच पांडा भाग-लारै धरती पाठ करती रैयतो । चेली टिकाड सेकतो जिते गुरुजी कवाज करता रैयता । पर्छ भैरूजी हडमान जो रै भोग लगायर दो ये जीमण वैठना । थोड़ी बिसाई लेयता । चेली जित अपडै नै पाणी सू तरानतर कर देवतौ। । ।
। २४ ] [ जूना जीवता चितराम इत्तैई तो मंडली आय जुटती खडकण लागता एकतारौ'र कांगसिया । चेतती सुल्फैरी चिलमां । नसरी धुन मैं वे किणी बीजै ई लौक मैं विचरता । अलखियौ बाबी सतसंगी हो। दिन ढळियां सिला माथै रंग लागता। भांग बूटी छणती । जरदा पती लागती। मंडलीयाळा निपटण जांयता । चेली पाया गयां री टैल करती। अलखियौ बायौ अखाडची हौ। पछ लोग-लुगायां श्राय पूगती। कोई कैंवती छोरै रौ पग कुंडालिये मैं अायग्यौ दीसे हैं। भाभडाभूत ताय रैवै है। कोई निजर रौ डोरी कर देवण रौ कैंयती। कोई कैवतो म्हारी लुगाई ऊपर कैणई टूणा टामण कर दिया दीच है, अधगैली हुयगी है । दाबर हाथ लागे कोयनी। कोई कैंयौ म्हारै घर में मंगलबार नै किणी सूयां सूबींधीजियोडी संदूर चरचियोडौ पूतळी नाखग्यौ है । जदसू ई म्हारै घर मैं रूरू मैं पीड़ उठगी है। कोई कतौ-मनै डर है कै म्हारौ बैरी कठैई मनै मूठ नहीं मार देवै । बानौ सिनान कर'र लाल बम्तर धारण कर'र सगळां नै उपार बतायतौ । झाडा-फंका, डोरा गौंडा अर तावीज देंवतौ । कणैई कईनै बिच्छू सरप खाय जांबतो त। यौई ॐ आय पूगतौ । बाची झाडी दे'र जैर उतारतौ । लोग दुखी आकळ-बाफळ अवता खुसी-जुसी जांबता । अलखियो बानी परोपकारी हो । सिंज्या पडन सं थोडो पैली अलखियो बाबी पाप रे लटूरिय केसां ऊपर राख रमावती, लिलाड़ माथै संदूर री बड़ी टीकी लगायती, वृकियां माथै घूघरा पोयोडी काळी लंबी डोरो कसर बांध तो सरीर ऊपर राम्य रमावती, कंबर में घूधरा बांध तो पछै टणमण टणमण करतो भैरु मोळी लेर घर-घर मूं श्राटी मांग तो । हींगळ दाई श्राख्यां, वेढंगी माज अर घूघरां री धमक ₹ माग र 'बम-बम', 'अलग्द-अलख' री वाणी दावरां श्रर कंपळ काळज , अलखियो ] [२५ आटी पैला खप्पर मैं लेंवतो, पछै मैली-चीगटी झोळी मैं घालतो, इणतरै, बौ सैररी गळ्यां मैं घूमतौ कदास कोई आटौ नहीं घालतो अथवा जेज करतो, तो बाबी बैरै घर आगे पांच पग आगै पांच पग लारै धरतौ कवाज करती रैती। गिस्ती नै उथप'र पाटी घालणौ ई पड़ती जणं धरणी छोडती। अलखियो धाबी धरणो देवणियौ हो। घरै पूगतो जितै रात पड जांबती । पछै दिसा-फरागत सू निपट'र सिनान करतौ । फेर भैरूजी-हड़मानजी रै जोत करती अर सदा मुजब कत्राज करतौ करतौ पाठ करतौ रैवतौ । इतैई मैं चेलो दिक्कड सेक लेंक्ती । पछै भोग धर'र, दोये जीमण लागता । कारज सिद्ध होवण मूं, सरधाळ -भगत मोकळी सामगरी पृगाय देवता । फक्कड भोग धर'र आप परसाद लेंबता श्रर सगळां ने बैंच देवता । एक बार, एक भगत पांच सेर आटी घी, खांड, घर मोकळी मेवी लायौ । जोत सांरू अछूतो घी राख'र बाकी सामगरी रो भोग रांध लियो । घी खांड रौ चकाचक चूरमौ बणियौ, मांय मेवो पधराइजियो । पछै टिक्कड रा बराबर-बराबर पांच भाग करीजिया। एक गाय, एक कुतै एक पंखरूवां रौ श्रर दोय बीजा। पछे सकोरे मैं, एक बडी खीरी राख'र ऊपर सूधूप घी सींच देवतौ । फकदैणी सी जोत जाग उठतो । थोड़ी चूरमी जोतरै ऊपर मेलती । पछै भोग घर परसाद सगळांने बैंचीजतौ । इण तरै सामगरी काम में श्रावती। नगदी भेट री, भांग बूटी, सुलफौ, गांजी, जरदा पत्ती आय जांवती । अलखियो वाबी फकाड हो । अलखियै वायै नै परलोक सिधारियां मोकळा यरस हुय गया । हाल लोक बैनै भूलिया कोयनी। वैरै अस्थान रै खनकर निकळतै पाण बीत्योडी सगळी वातां याद आये बिना को वैनी पर इसी लखाइजण लागे जाणे अलखियो यावी कवाज करतो पाठ कर रखी है। -
-
है
रामलो भंगी
जागा-जागा फाटोड़ी, मैली फुच'र ढीली ढाली चोळी, माथै लीरा
लटकती दमाली पर पगां में दोय मेळ रा खांसड़ा पैरयां, रामली वापडी,
सीया री ५ यजी, सामी ठंडी हेल चलती जणे, म्हारी गळी मैं प्रांयती
थो हाथ में एक छाजली, वगल में यासारी सीक्यां रो लयो माडू
श्रर खुजै मैं, टूटोड़ी चिलमड़ी राखती।
गळी मांय सू फूस-फांडो चुगर पैला थोड़ी सेक करती । इयें खूणे सूं
वै म्वर्णे तांड, सगळी गळी, यारती । दणी तर एक रै बाद बीजी गळी झाड़ती।
बरी चिरत बडी ही।
मूघारै थकै, वैरी बहू, फाटी घाघरियो पैरयां, पूर-पूर मैलो श्रोदणी
प्रोढ़िया अर पारी-श्रागै गधी नै टोरियां प्रांयती पर आपरें धणी मैं जाजरू
झडायण मैं मदत देवती।
रामली गळी रो भंगी हो।
लोक जद सीरै मारिया सीरख मांय सू मुंडौ ई को काढ़ता हानी, तद,
लाई रामली काम में जुटती हो । हाथामूं काम करतो अर मूडै सू मीठी राग
मैं ठाकुरजी रा भजन गांवती।
रामली भगत हो।
सूरजनारायण जद ऊंचा चढ़ता अर गळी ताबडै सूं भरीज जांवती,
जणे टाचर-टीकर तायडौ लेवण नै नीसरता। सी-सी करता सगळे गांवता-
काढ़ौ सूरज बाबा तावडियो
जीबै थारी डायडियो
फेर सी पड़े थे डाढ़ी
कुप्पी सैं घी काढौ
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। रामली शंगी ] [२७ रामूडै री छोरोई ताबडै मैं एक पसवाडै उभौ रैवतो । छोरा चैने काकरा मार कैंवता-याघौ बळ भंगीडा भीटलेसी । छोरो कैंचती-मां बाप हूँ, तो घणी आधी ऊभी हूँ। जणे छौरा चिघर कैंवता साळा ! थारी छैयां पड़े हैनी ? रामली सुण'र उल्टो आपरै छोरै नै तडकतो पर बीजै खानी जायर, उभो वरण कैवती । गळी रै टायरा नै कयती-हुकम कंवर साथ रा, बरिणया राखो मादेव। रामलौ जरणावाळी हो। काम पूरो कर'र रामली घर-घर सू रोटी मांगती। ठंडी-वासी रोट्यां अर वासणे-कृसणे साग-दाळ सूं रामलैरी प्रोड़ी भरजांयनी । कई घर सू, रोटी नहीं मिलती तो रामली कई को कैंचती होनी । रामली संतोखी हो। गळी मैं स्वाड-पिणयार रौ काम पड़तो, तो रामली, मई नै-मास ताई, मैलो उटांबतौ । जिकै रै बदळ मैं चैनै रोक रुपियो, धान पर स्वाइ रा, मैला गिंदा गाभा मिळता हा । बीजी स्वाइ रौ नेग ई मिळती! उतारू मैला-फाटा कपड़ा, वे ई केई बार हाथा जोड़ी करणे सं बिरतवाळा, वैरै सामो बगाय देवता । इण तरै रामलै रै पैरण-श्रोदण री सगवड होयती ही। गळी मैं, गाय-दाढो, मिन्नी-कुत्तौ नर चिड़ी-कबूतर मर जांयती, जणे रामलैरी बडी पूछ होवती । जित्तै, मरियोड़ी जिनावर घर रै आनो सूं नहीं घीसीजती उत्तै घरवाळा खाय-पीय सकै नहीं। रामली मरियोड़े जिनावर नै, घींसती जणे जाय'र संकट मिटती। इयै रौ बैनै धान-रोटी अर पईसा मिळ जांवता। वो मरियोडै जिनावर री खाल कादर चौवटै मैं दामारी पूरी कस- बढ़ लगायर वेच देवती। रामली हुसियार चौपारी है। गळी मैं, जीमण-जूठण होवती जद रामली मचडै सामी बैठो रैयती गाय-ढांढां पर गिंडकडां नै कादती। कैंचती ट-जूठ, मनै घताइजो मां-बाप ! ।
. २८ ] [ जूना जीवता चितराम धूड अर पाणी मैं भीजियोडी ठ-जूठ, एक कडाई में बैरी खातर नाई भेळी कर राखतो। लाई सीयाळे में आधी रात ताई पास लगायां मयडै सामौ बैठी रॅवती । काम-काज निमटणे सूं कदेई तो घर-धणी वै वेळाई रीत री मिठाई पुरस देवतौ । कदेई 'दौड़जा, काल पुरससा' फैयार, बाड़ी जड़ लेंयतौ । वापड़ी 'जो हुकम' कैयार घर री मारग लेवतौ । दूजै दिन रामलो पाबड़ी कुदाळी लेयर आवतौ अर भठ्यां रा कोयला काढ़तौ । बोरयां मैं भरर लेजांवती अर बेच'र टका खड़ा कर लेंवती। रामलो घर लोचू हो। भंगीड़ा रातनै थकाण मिटावण अर जी बेलायण खातर दारू पीयर फैल करण लागता । पण चौ ही रामदेवजी री भगत ! दारू रे सामोई को जोवती होनी। मिंदर में मंडळी मैं बैठ'र मस्ती सूं इकतार ऊपर सबद गांवती अर आपरी जिनामरां जिसी जूण रै दुख नै भूल'र किणी बीजी आलोक भोमका मैं बिचरती । भंग्यारी मंडळी मैं बी, 'माराज' बजती रामलौ ज्ञानी हो। केई खोड़ीला मिनख तौ, लाई रामलै सूई माथौ लगायां विना वत्ता को हानी। वे कैंवता अठे सफाई को करीनी, उठ को करीनी । रामली 'लौ मां-बाप' क्यार सफाई करण लागतो। पण खोड़ीला खोड़ थोड़े ई छोडे है । आपड़ी उफत जावतौ। अटीने यी साफ कर'र जात्रै उठीने वे फेर जिंदगी बिखेर देवै। अपर सूं सभोग श्री देवै-काम नहीं हो तो छोडदे बिरत थारौ बार बीजी आय जासी । घणो उफतियोड़ो रामली कदेई रीसमें जबाब देय देवती किरणरी जाड़ है जिको म्हारै उपर श्राय जात्रै ! श्रावे जिक ने न्यात मैं खैणी है'क नहीं। रामली किरकैयाळी हो। - १० बिरघु सेवग बिरधुरै बधेपो को होनी । दोई जणाहा--आप पर बहू । बिरत बडी ही जिकै तूं मजै सूं काम चलती हो। बहू बिरत रै घरां मैं श्राडै दिन बडी पापड़ करांवती। हाथकाम, जिदोई, जनोठण, बिरध, मायरे मोसै रे, जान, वरी अर माईपै रै मंगळीक टांकडां मैं धेरै कामां री पोट खुल जांवती । पोकरण बिरामण मैं साथै ऊपर सामूहिक जिंदोई अर बियां हुौं । लायण बहू नै, सास खावण नैं ई वखत को मिळती हीनी, फाई फीटी हुय जांवती । तिकै ऊपर तेड़ें ऊपर तेड़ा, जिठै मोड़ी पूगै उठै ई श्रोळमौ । इण मौका ऊपर वा तेड़ा हांकारा, धान सोवणी चुगणी, मसाला पीसायणा, मणाबंध वड्या पापड़ करावणा अर मंगळीक गीत गवावएँ मैं, अंग तोड़'र मदत करती। जिकै रे वदळे धैनै चोखौ रीत रकानौ मिळती, कपड़ाई मिळता। बिरधु रैई इण मौकां ऊपर खांच-ताण रैवती । धैनै ई, तेड़ा हांकरा करना पड़ता अर विरत रै घरां मैं हरेक मौकै माथै हाजर रैबणौ पड़तौ। मंगलीक संख धुनी करणै रौ तो वैरी खास काम हो । वौ सगळां सू श्रागै आगे संख बजावती टुरतो पर्छ सगळे लारै टुरता । सामूहिक काम होवण सं, वो कपड़'र चौ कपड़े । लाई कइ नै उत्तर दे सकै नहीं । कणै ई, कायो होयर, लाचारी जताय'र, हाथा जोड़ी करें तो घर धणी री मंडी चढ़ जाये तौर बदल जाये। इत्ती खांचा-ताण, हैरानी अर कामरी मार सैंवणरै बदले में बिरधु अर वैरी बहू नैं, इण मौकां माथै, नेगचार ₹ रूप मैं जित्ती परापती होवती उत्ती सूं सारी कसर निकळ जावती। विरधु विरत रौ सेयग हो। । :
३० [ जुना जीयता नितराम महादेवजी रीमिंदर क्या तो श्रीमाली ग्राहमण क्या सिन्यासी श्रर क्या संयग पूजे। तो सिय मिदरारें पूजन री सेवां री बारी बंधियोड़ी ही। कई री यारी दिनारी श्रावती तो कई री मईनारी। विरधुरीही बारी प्रांवती । उग्ण बेलारी चढ़ापा पइसा टका नारळ, बस्तर, चापळ सोपारी श्रर महादेवजी उपर दळायोडी दूध पर घी विरधु में मिळती। विरधु पूजारी हो। विरघु नित्गेरी बिरन रे घरां में फेरी फिरण जानी। हाथ मैं एक बड़ी थाळी श्रर में मेलियोडी एक छोटी कटोरी चंनए सू भरी रेवती। 'ज ठाकुरजोरी' कर बौ, घर में पड़ती। घरवाला चनणरी टीकी लगायर, एक मुट्ठी पाटी थाली मैं घाल देवता । घरै पूगनी जणे थाळी पा सू भरीज जांबती। घिरधु फेरी फिरणियो हो। मरणै जिसे अमंगळीक मौकां ऊपर वैरै श्रर वैरी बहू रै मोकली काम- प्राज खुल जांयती। मरणया धुदै प्राणी रै लारै खीचड़ा होवण री रीत है । 'खीचड़ा' मृतक भोजन नैं कैचे है । प्रादूरी रीत तौ श्राही कै खाली बाजरी री खीचड़ी अलूणी रांधीजनौ । जिंदोई दारां नैं एक मिरियो अर वाकीरोने एक टीपरी घी मिळतौ । पछै कढ़ी पर फिलका होवण लागग्या, जिकै खाली बड़ा नैं घालता टावरां ने नहीं । जिकैसू वधते-वधते, श्रारीत थागा देयगी । अथै ती फुरवां भोजन होवण लागग्या । खीचडी तो कोई नहीं कर बदले में चावळ दाळ प्रथया खीचड़ी करै। तौ घिरधु नै, भाई-बिरादरी रै घरां में खीचडां री नैती देवण नै जावणी पड़ती । भद्दर होषणौ पड़ती। वेरी बहू, काढ़े मेले मैं, पूड़यां बटारण मैं, दाळ दळावरण मैं, आटी पीसावण मैं, धान चुगण मैं और मसाला पीसावण मैं अंग तोड'र मदत्त देवती। दोये धणी यह ॐ ई जीमता।
खारा
बिरधु सेवग]
[ ३१
बिरधु कारू हौ।
बखत बदली। सेवगां अर बिरनवाळा रा सम्बन्ध मीठे सूं
हुवग्या। सेवग कैरण लागा म्हे बामण हां, सूदर कोयनी। इतिहास पुराणा
रै पूराव सूवे आपने शाकद्वीपी ब्राह्मण सिद्ध करण लागा | बड़ी बड़ी
सभायां कीनी।
पुसकरणा बामणां. सेवगां तूं आपरै मिंदरा री पूजा छोडायली ।
इण् भहर होवणौ अर खीचड़ा जीमण बंध कर दिया। मरणै-परणे श्रावणी
बंध कर दियौ। दोनों रौ नातो टूटग्यौ। सेवगांरी जागा गोमाळी काम
करण लागा।
बिरधु ई बिरत छोड दी।
घिरधु री बिरत रे घरां मैं घरवाळा जिसी माण-काण ही। टाबर-टीकर,
वेनै काकी-बायौ केर बतळांयता अर जीकारो देवता। यौई सगळां तूं माईत
जिसी बरताव राखतौ।
विरधु अर वेरी यहूनै परलोक सिधायाने मोकळा बरस हुयग्या ।
मेळजोळ री मीठी वाता, मीठी टैम टळ भलाई जावी पण बरसां छेट
ई बैरी झीणी मीठी सिमरती मनां मैं मंडी रेवै है।
अाज ई पुराणी रीत-रिवाज री चरचा चले, जणे, बिरधु रौ सांगोपांग
चितर एकरसी अांख्या आगे फिरण लाग जा गोरो रंग, ठिंगणी खामणी,
अध बिचली आंख्या, लिलाइ माथै चनण री आड,
कानां मैं मुरक्यां
व भंवरियो, डीळ ऊपर चोळी, खांधै डुपटी, गोडां साइनी धोतियो पर पगों में
देसी पगरखी।
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रुच्ची खल्ला गांठणियों श्रांख्या काढतै वैसाख-जेठ ३ ताबई मैं, इग्यारे बजी आसरे, वयां मैं खालड़े री थेली लटकायां, खांधे ऊपर नींगलियोड़ी अर स्याळ श्रायड़ी दूणियो लियां, चोटी री भागी-टूटी पर चींध्यां लपेटियोड़ी लकड़ी सायर, खाथो-खायौ पग उठांवती, रुध्यो, म्हारे चौक मैं, पाया करती । तुक्की-मुक्की करड-कावरी दाइकली, काळी दराय उणियारी, माथे ऊपर बिदरंगी लीरा लटकती पाग लपेटियोड़ी, टाट उघाड़ी, मैलौ कुच गुंइयां वायरी चोळी पैरियोड़ी, आंख्यां नीचे छोटी-छोटी रेखावां अर कान टिरियोड़ा देखर, सैज मैं ई, इंदाजी लाग जांवतो, कै, रुध्य मोकळा सीयाळा-ऊनाळा देखियोड़ा अर ठंडी ताती सैयोड़ी है। - चौक तापई सं भरीज जांयतौ । जणे, सेठ गोमदरामजी रै पार्टी रै नीचे, मैले पाणी री कूडो खने, धूरै विषाणां ऊपर ई, अवधूत दाई, रुधौ, टांगड़ा पसार'र, थोड़ी बिसराम करती । पर्छ, सेठां रै घरसू, पाणी रौ दूणियो भराय'र, आंख्यां छांटती, पाणी पीवती पर चिलमड़ी चेतायर दम लगांवती । फेर, थेलै माय सं, बोदी खाल रा टुकड़ा, नवी खाल, सूत रो गेडी, जाडी सूई, सूची, खाल चीरण री तीखी मूठदार पाती, छोटी चौकोर भाठी अर खाल भिजोपण सारू पाळसियौ काढ़'र, ठौड़ री ठौड़ जचायतो। एक पसवाई दूणियों पर टूटोड़ी चिलमड़ी मेलती। चीकरा, सगळे, रुध्धै रौ माण-काण राखता हा । लुगायां, बैरै भागे तूं, पगरखी पैरियां को नीसरती ही नी । कदास, भूल'र अगजाण में, कोई नीसर जांयती, तो, रुघौ वती-आ तो खसमरै मायै ऊपर खल्ला ले जासी । लायण, लजसाणी होयर, मट ई, पगरखी, हाय में उठाय लॅवती।
रुघ्घौ खल्ला गांठरिणयौ ] [३३ चौकवाळा, क्या सांईना क्या छोटा, सगळे बैनै, 'रुध्यो दादी' कैयर यतळांवता हा! मरणे-परणे, जिलमणे-खूटणे ओणरी, बैन, पूरी-पूरी ठा . वती ही। . चीनण्यां अर टावरां री, फाटी पगरखी, देखती जद, टोकर कैंवतौ- खोलजा पगरखी, हर्णे गांठ देऊला, कदास पग मैं, कई खुभ जाथै जणै ! वां री पगरखी री गंठाई को लेंवतो हो नी । बड़ा-बूढ़ा, आपेई, आपरी पगरखी री गंठाई देय जांवता तो ठीक, नहीं जणे, दादी, तगादी को करती हो नी। कदेई, दादौ, बातां में लाग जांवती अर सिंज्या पड़ जांयती, ती, कई न कई घर तूं, ऊनी दाळ-रोटी श्राय जांवती। टूकै मैं, चौक मैं, वैरी, माईतां जिसी माण हो। जीमण-जूठण मैं, कारू-कमीणां नै, बौदी निवड़ियै पछे, नेग पुरसै है। पण, दादै नै तौ, माण सं बैगोई जीमाय देवता अर टायरियां बगां कई घाल देवता। सीयाळे मैं, मदरसै री छुट्टी रै दिन, ताबड़ में, छोरा, दादै खनै, बूझ बूझाकड़जी रा चुटकला अर काण्यां सुणता अर घणा राजी होंवत्ता। साईनां, दादै सूं, गिस्ती री बातां मैं, सलासूत लिया करता । एक वार, गोमदरामजी रै घरै, छोरी रौ व्याय हो। मिठाई वणावणे अर जान जीमायण सारू कोटड़ी जोयीजती ही । एक कोटड़ी, सगां री ही, पण वे, हां ना रौ खुलासा उथळी नहीं देय'र, टरकांवता हा। कदे, कैंवता- मुनीम जी मांय कोई नी, · कदै कैवतां कंची। फलाणे नै दियोड़ी है, मंगावणी पड़सी। एक दिन, गोमदरामजी, पाटे माथै बैठा, आई बात कर रया हा। इत्ते मैं, रुध्यौ बोलियो-इसाई क्या सगा-सोई जिको कोटड़ी को देवैनी । क्या कोटड़ी घसीजे है ? क्या कोटड़ी रौ कानो तोड़ लेस? क्या कोटड़ी लारै ले जावेला ? माईत ई, म्हारी-म्हारी करता, अई छोडग्या। श्राज, म्हारै सागै, कई ने भजी, देखो कोकर केंची को देनी । वात रा टका लाग है, गोमद भाई।
[ जूना जीवता चितराम
गोमद, एक जणै नै, दादै रै सागै कर दियो । दादी, ले ठाकुरजी रौ
नांवर जाय खटकियो । रामजी री कीनी अर चाबी मांगी। सागी ई टरकाऊ
उथळी मिळियो-मुनीमजी चौवटै गयोड़ा है।
'कदसीक बासी ?
'श्रा कूण जाणे ।'
'भला माणसां ! कूची री खातर क्या नित-नित गोता घाली हो ?
म्हारे फोड़ा पड़ रया है।'
'फोड़ा तो पड़ता ई होला। मुनीमजी नै आय जांवण दौ। चाबी
पूगाय देसां, थे भलाई सिधायौ ।'
'हू', अठै ई बैठी हूँ। इयै मिस, मुनीमजी रा दरसण तो हुय जावेला ।
'मरजी थारी'
'सेठसा किंठ बिराज है ?
'वे क्या करैला ?'
'मालकां ! थे, वान, म्हारै आयां री, खड़क तो पूगाय दौ।
इत्तैई, सेठ साबरी बग्घी री घंटी सुणीजी । दादै, जै रामजी री कीनी।
'सेठाई पाछी जै रामजी री कर'र पूछियौ-बोलो, कांकर श्रावणी हुयौ ?
'गोमदरामजी री बाई रो ब्यांव है । आपरी कोटड़ी री कंची
मंगाई है।'
'खुसी सूं ले जायौ । वांरीज कोटड़ी है । पण थोड़ा ठैरी, मुनीमजी ने
आय जावण दी।
'मालकां! मोकळा दिन फिरतां हुयग्या । श्राजती, आप, कांकर ई
कर'र चाची दरायई देवो तो ठीक रैवै ।'
घणा दिनां सं फिरौं हौ अर चाबी को मिली नी ?
अवै ई किरपा कराय दी तो घणी आली, मोटा सिरदारां!
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रुघ्घौ खल्ला गांठरिणयौ ] [३५ सेठ सा, फट ई, सईस नै, चाबी लावण रौ कैयौ। मिनटां मैं ई, चाबी आयगी। दादै लायर गोमदरामजी नै सांपड़ी। कदे-कदे, पोती अड़ी करतो जद, दादो बैंने, सागै टोर लावती। चौक बाळा लाड सं बैन, दुपारौ देवता। घर जाती वेळा थोड़ी मीठी-चूठी अर टाबरां रा उतारू गाभा देवता । आज बै बात न मोकळा बरस हुयग्या । दादी अर दादै रा सांईना, सगळे सरगापुर सिधार ग्या। पण, हाल ई, जद हरिजन आंदोळण री बातां छिडै, जद, रुधै दादै २ मी मेळरी चरचा चलियां बिना को रैबैनी।
- १२ श्रीगोपाल ओझा श्रीगोपाल सांठां तूं ऊपर हा पण कड़क पचासायाळां जिसी ही; सांवळी वरण, धौळा केस, फूल गुलाबिया पागड़ी लिलाड़ माथै केसर री टीकी, आख्यां बडी चस्मैं सूं दकियोड़ी, जाडा भंवारा, टिरियो? कांना मैं मुरक्या, ऊजळी चोळी, खांधै डुपटी, गढ़ मैं मुंगियां री माळा, घगल मैं टीपणौ, मी पोतांवाळी ऊजळी धोती, हाथ मैं जाडी गेडियो पर पगां मैं पंजाबी पगरखी। इयां री बिरत बडी ही अर बडौ ई ही सेठां-सहकारां मैं मान । एक तौ औस्था में वडा, फेर पद मैं, जिणझू, सगळे इयां नै पगेलागणा किया करता हो । श्रीगोपालजी ओझा हा । बिरत ₹ घरां मैं थाळी बाजतै ई, अोझा जी नै तेडी प्रांवतौ । ओमाजी श्रायर टाबर री बेळा लेंवता । भाई-बिरादरी, गळी-गुवाड़ पर मितर बधाई देवण सारू भेळा होवता; घर-धणी नै पौसायतौ तौ सगळां नै एक-एक नारळ देवती। श्रीगोपाळजी जोतसी हा। टावरां री, जिन्दोयां पड़ती, तो अोझाजी री चायना होवती मिरग- छाला, डंड, कोपीन, खडाऊ अर होमरी सामगरी, एक दिन पैला आयर ओझाजी मंडाय जायता । जिन्दोईवाळे दिन, देवतायारी भेट अर दाना सू परवार, गिस्ती आपरी सरधा सारू श्रोमाजी री सेवा करती । उण दिन ओमाजी टावर रे कान में गायत्री मितर सुणांवता | कैवता-देख वेटा, श्रयै तू जिन्दोईदार हुबग्यो है, रोजीना गायत्री रौ जप करे, सिंध्या करे, विल में मूते मती अर गाय नै चंघती नै बताये मती । - श्रीगोपालजी दीक्षा-गुरु हा ।
[ ३७ श्रीगोपाल अोझा ] बियां रैसावा मैं अोमाजी नै सांस लेवण नै ई बखत को मिळती होनी । एक रौ तेड़ी, बीजै रौ तेड़ो, तेडै ऊपर तेडौ। औमाजी फाया-फोंटा हुए जांवता । पण कमाई ई इण मौकै मोकळी होवती जिणसं कसर निकळ जांवती । हरेक घर सूं [५०] सूं कम तो क्या मिळता, वेसी भलाई मिळी । मन्ना श्रर जनोठण प्रोणरी रसोई में प्रोमाजी रै घरवाला मदत दरांवता । जिन्दोई अर गियां ऊपर कई जजमान रौ हाथ तंग होवती तो श्रोमाजी चीठी लिखाय'र अथवा अडाणगत माथै रुपिया ओधार तोल देवता वैरी काम कढ़ायर, तीजै कान ठा को पड़ण देवतानी । श्रोमाजी आडी वेळा रा मदतगार हा । परणे में श्रोमाजी री गरज रैंयती, तो मरणे में ई वां बिना काम क चलती होनी । प्राणी नै आंगण मैं पसारण सूं लेयर वारै महीना ताई श्रोमाजी री जरूरत पड़ती रैवती । इण मौके ऊपर गरड़ पुराण री भेट तथा रोटी पूरी होवणे सूं गैणा -कपड़ा रै रूप में प्रोमाजी ने चोखी परापती हुय जोवती ही। श्रोमा जी किरत करावणिया श्रर पुराण वाचक हा । परब ऊपर विरत-उपवास री कथात्री ई ओमानी बोचता था भेट- पूजापी श्रापरै घरै ले वता। कोई भागवत सुण'र तो कोई वैतरणी करर ओमाजी नै पैरावणी पैरांवता । पैरावणी में गैणा-कपड़ा अर भेट रा मपिया मोकळा मिळता । श्रोमाजी पारा कमाऊ हा। सेठां-साहूकारांरै घररी श्रोमाजी चोखी पैदा ही, मरण-परणे अपर । गऊदान ई मोकळा मिळता हा, कई नगद तो कई सरूप । श्रीमाजी ₹ घर में २-३ गायां तो सासती रैवती ईज । दुईजती जितै तौ श्रीभाजी चाटी-चारों देयता रैवता । अइएयारी खेवट वे करता को हानी । श्रोमाजी स्वार्थी हा ।
[ जूना जीवता चितराम ३८ ] श्रोमाजी रे घर में धन री मटक्यां भरी रेवती ही। गैणा-गांठाई मोकळा हा । कमाई-कजाई ई मोकळी ही। लेण-देण अर खंधी-किसती री कमाई वे मोकळी करता हा । दीपती श्रासामी सूं १००) लारै १०) अर श्रणदीपती सूं २०) काटता । गैणा-गांठा अर जागा-जमी ऊपर ई रुपिया अोधार तोलता अर रुपयो सईकड़ो व्याज लेबता । श्रोमाजी बौरा हा। श्रीमाजी उपर राम राजी हा, ती ई लोभ को छूट तो होनी । रोज कचेड़ी की फेरी देवता ईज; कई ऊपर दात्री, कई ऊपर कुड़की, तो कई रै घर री लीलामी करावण नै। अदालत रा चपरासी अर अहलकारां री भेट-पूजा करताई रैवता हा। अोभाजी भागडू हा। धन मैं धन संदोरण रै लोभ मैं वै सुख, संतोस श्रर भजन सूत्राधा आधा दौड़ता हा । बामण हा फेर अोझा, जिको कई पाठ-पूजा तो लोर. देखापै करणी ई पड़ती ही। वैसूं बैगौई पिंडी छोडायर सेठां-सहकारी घरे पूजा-पाठ करण नै जांयता परा । सेठां नै भगवान री सेवा करण री फुरसत किठे ? अोझाजी नै पोखर, सेवा रौ फळ सोरप सूं परापत कर लेंवता। श्रोमाजी रै भाग री क्या कैणी ! सेवा अर दिरय दोनू मिळ जावता । श्रोमाजी लोभी अर झंझटी हा। श्रोमाजी परलोक सिधारग्या; पइसारी पोट लाई छौड़ग्या, हिदामई लार को लीवीनी। सैंसार मैं म्यारथ रौ ई नाती है । इण वास्ते, स्वारथ सं ई, मोकै-टीक पांरी याद आई जावै है।
। .. सिरदार रंगारी एक ऊंडौ-ऊंडो गूंभारियौ । जिकै मैं एक मुसलमान परवार-रैयै । हवा अर चानणे रौ परवेस मैं नहीं-रै समान । ऊजाळे मैं सगळे बार चौक मैं मांचां ऊपर सूर्य । सियाले मैं तो यारी गुफा मैं सीरी संचार नहीं। चौमासै मैं छांट-छड़कै री वेळा मैं यां लाया मैं कोजी बीतती; घडीक गूंभारिये मैं तो घड़ीक बार । गूंभारियै मैं इसौ अमूजी जिको पंखे सूं हया लेवते-लेवते हाथ ऊतर देवण लागतो। इण परवार में से मिळायर पांच प्राणी हाः बूढौ सुलतान, बैरी लुगाई-लिछमी, वडो वेटो करीम अर वैरी बहू अर पांचवौ सिरदार । एक राख राखी ही वकरी जिकै रौ दूध बारी-बट्टै सगळां नै मिळतौ। सिरदार, दिसा-फरागत जांवती जणै बकरी नै चराय-पाय लांबतौ । दिनूगै यजू कर'र सगळे नमाज पढ़ता। फेर एक जणी पीसणे-पोषण मैं लागती पर बीजा सगळे कपड़ा रंगण में । करीम हौ पैलवान, वी अखाडै तूं मोड़ो आंवत्तौ । आंवतै ई चौई काम में जुट-जांयौ । श्रांवता-जांवता गळी-गुवाड़ रा लोग थोड़ा पग टांभता घां सू उमा- ऊभाई वातां कर'र टुर जांबता । श्री परवार मेळू अर मस्त हो। सरदार हौ बरस गिटणी अर टैणी । रंग पक्की, तुक्कल अर दाडी मुंडायोडी ! छोरां मैं छोरी र बडां मैं बडी । सगळा मैं इसी घुळियौ-मिलियौ जाणे वां साईनोईज़ सैतरी माख्यां छतै तूं चिपयोडी रैवै ज्यौं सगळे व सू चिपिया रैवता । यो सगळां नै राजी राखतौ । - ४० ] [ जूना जीवता चितराम गृभारियै खनेई पाडोसी री देलान चौकी ही। रोटी-बाटी-वायर सिरदार अर घेरी मंडळी उठे जाय जमती । वौसाळां ने भुतां, परियां, टूणे- टामण पर सैर री गां सुणावती। म्याळ-तमासां पर रमतां रा गीत है गायर मुणावती-चौमासा लापरयां । और कंठ में मिमरी घोळियोडी ही। कदैई जचती ती तास रमण लागता कदेई दिल्ल। सिरदार मीठी अर मंडळीयाज हो । कदैई ची संगळयां साग सैल करण में निकल जांयती। ये बैळा माथे ऊपर कामदार चूणियोड़ी टोपी, चूणियोड़ी चोळी, लांगदार धोती अर खाँधै ऊपर फळयां गूथियोडी गमछौ राखनी । कपडां मैं सुगंद ई लगायती । सादी तीन-च्यार वजियां परवारंवाळा सगळे काम में लाग जांवता। सै जीलगाय'र, अंग तोड'र काम करता । साढ़ी छय बजी करीम अखाडै अर सिरदार वाल मंडळी सागे वकरी चरायण-पावण टुर जांयतो। सिंज्यों ने सगळे सागै ई नमाज पढ़ता । करीम री बहू रसोई चाढ़ती अर खने येठी-बैरी सासू लिछमी सिख्या अर सायता देती। इण वेळा फेर वाल-मंडली प्राय जुटती। सै मन बैलांवता । इतै ई रसोई बण जांयती । मंडली बरखास्त होवती । मिनख पैला अर लुगायां पछै जीमती। हमैं, साइना प्राय जमता । अकास मैं अठीनै चंदणमा मुळकती, उठीनै अ किलोल करता । आधी रात तांई तरै-तरै रा खेल खेलता :- (१) कान कुचरियो भू में भरियो । (२) मियांजी-मियांजी घोड़ी घेचौगे ? कित्ता टकै ? लाख टकै । (३) अंबर घोळियो। (४) चिलम-चिलम धूताड़ियो। सिरदार खेलार अर हंसोड़ हौ। सिरदार आपरै वाप नै 'बाजी' कैंवतो भर इयां ई मंडळीवाला । वै बाजी सू, गैंडा, ताबीज, अर झाड़ा सीख लिया हा।
[४१
।
सिरदार रंगारी]
सिरदार रे खनै लोग बिच्छू, फैटोड़े, चाखरी माडी लगवावरण
श्रांवता । पांच-सात जणा तो उभाई रैयता ।
सिरदार झाड़ागर हो।
यात री बात मैं बरस बीत गया। सिरदार श्रये दुपग्गै सू चौपग्गी
हुयग्यो । पेट खुल ग्यौ । दो बेटा पर एक बेटी हुयगी । माईत बुदारी दरगा मैं
जाय पूगा । बडी भाई करीम अजमेर गयो परौ। धेरै माथै ऊपर गिस्ती रौ
भार श्राय पड़ियो। अ ने पेळा सं-घणी खाटणी पड़ती हो।
आपरे हायां सूं लोग-लुगायां पर टावरां रा कपड़ा रंगतो। लुगायां रा
श्रोदणा, धोत्या--पिरोजिया, केसरिया, कसूबल, चनणियां, मोतिया, कपरिया,
फूल गुलाविया, बलदेसाही पर धनसबाण रगती । मी हवे ती री चूनड़ी पर
बीजी भांत रा बंधेजा बांधतौ।
मिनखारा पाग-पेचा पर चीर ई इणी गा रा रंग तौ । फागण मैं
टावरां रा चोळा माथै छांटणा छांटती पर लुगायां री धोती छांटणेदार
फागणिया रंगती। मिनख इण मईने मैं पाग, डुपटा श्रर चोळा पतंगिया
रंगांयता।
सिरदार कारीगर हो।
यो सगळां मैं इयां धुळ-मिळ गयो हो जाणे दूध में भिसरी । लोक
लखाईज तोई कोयनी।
हमें वैनै रमणे-फिरणे ने टैम को लाधती नी । पण मंडळीराळारी
मिनयार अर मिन तो राखणी ई पड़ती हो।
रातने थोड़ी फुरसत लाधती । जणै संगळ्यां ₹ सागै गपां मारती ।
गुटकती अर रागोलिया करती।
तिवार-टांकडां उपर सिरदार रा टाबर लाफसी श्रोग पुरसाय ले
जांवता-।
सिरदार सगळां री तन्नू रण बैठौ हो।
।
[ जूना जीवता चितराम ४२] पानी जयानी में ई श्रठे आयग्या हा। इयां ने अठे यसियां ने प्राधी साकी हुयग्यो हो। पण ममेरे सागे-मागे, मेळ-मायन र गुणकारी इमरन में पैर विरोध रौ थिम धुलण लागग्यो। भारत री यंदवाड़ा होयर पाकिस्तान नत्रो यण ग्यौ । मीठी निजर पर मीठी भेळ खारौ हुयण लागग्यो । प्राण्यां सूं हेतरी जागा जैर यरसण लागग्यो । यर, सूग, हिंसा री भायना सूं मिनस राखस घणग्या। इयरी पैल मियां भाइयां कीयी। मसीतां श्रर घरां मैं गुपत सभावां छोयण लागी । नित नयी-नयी गप्पां उड़ती के काल रातने मुसलमान फलाणे हिन्दया रे मौले ऊपर जाय चढ़िया तो परतूं फलाणे। मूंडा जित्ताई यातां । या मैं भै छायग्यो । नवा-नया उणियारा श्रर नया नया गुल खिलण लागा। कई जागा तो माथा फूटग्या। हिंसा र पातक जैर रो असर फैलणयाळी चेमारी दाई सगळी जागा फैलग्यो । चैरां माथै हयांयां उडण लागी । एकबीजे ने सक श्रर वे विसवास री निज़र सूं जोषण लागा । सिरदार इण लैर मैं वेयग्यो । बैंई किरडे दाई रंग बदलियो । धेरै धेरै मियांमंडळी भेळी होवण लागी । बैरी मंडळीवाला रै नाक नेई अब सिरदार रे घर २ श्राजू-बाजू सकरी-सडियोडी बास श्रावण लागी । प्यारा खारा हुयग्या। सिरदार री अांख्यां सूं ई पदळियोडा रंग-ढंग लुकिया को रयानी। अवै मियांमंडली बैरै घरै भेळी नहीं होयर जंगळ मैं किणी गुपत जागा जुटण लागी। बैरै घरै लोगां तिजाब री बोतलां पडी देखी। अब बोई सागी तन्नू सिरदार परायौ बण र आंख्यां मैं रडकरण लाग ग्यौ । समंदर मैं रेवणी अर मगरमच्छ सं वैर कांकर निभै ! छैकड़ सिरदार रा पग छूट ग्या। । .
सिरदार रंगारी] [ ४३ एक दिन बौ श्रापरी आधे सइकैवाळी मीठी मेरबान बस्ती पर गूंभारियै रै मोह नै त्यागार चंपत बणग्यौ । पोलस नै बुलाय'र गूंभारियै रौ ताळौ तोडायौ गयौ। केई फूट फैलावण वाळी चीठ्यां मिळी जिण सू लोकां रो सक पक्की हुयग्यौ। धीरे-धीरे काळ चक्कर घूमियौ । आपसी मेळ-जोळ री चरचा चलण लागी। उखाडियोड़ा पाछा जमण लागा। पण म्हारौ सिरदार गयौ जिको आवडी ई गयो। बैरै गूभारियै रै श्रागै सं बैवती वेळा हालई लारली मीठी वात्यांरी याद वैर विरोध पर बिछोडे रै गैर अंधार नै चीर'र चित्त नै चटपट चेतन कर'र छाई माई हुय जावै है।
गनी ठंठारौ खाय-पीलिया , ऊना री रुत-लाय पडे तो इसी के मत पूछौ । जी चाय, अत्रै आरान ! उसी धू दुपारी बेटा, कांधे-दो बोरयां लियोडी, एक में नवा अबोद अर बीजी में भागा-टूटा अर जूना-पुराणा पीतळ, तांबे, कांसै रा बरतन भरियां, गनी ठंठारो म्हारी गळी मैं आंवती । 'पीतळ, तांये, कांसी रा नवा बरतण ले लो, जूना भागा-टूटा बदलाय लो' री आवाज सुण लुगायां जाण जाती के गली बाबी आयौ है । आप आपरी-जरूरत माफक लुगायां काई भागा-टूटा बरतण देयर बदले में नवा लेंवती तो काई उणारा दाम ले लेती। काई जूना परतणां माय सूछोंटर जोइजता बरतण सस्ती कीमत में लेती। गनीबाबौ सारीतरै रौ सवदी पटाय लेती, कई नै निरा'सर नाराज को करतौनी। गनी बामो सैणी-दानी बोपारी हो। बाये हज कीयोड़ी ही । पूरौ खुदा परस्त हो । कूड़-कपट बाटै में लूण घालै जित्तीई बरत तौ । सगळा नै खरी सला देती । गायकां नै ठग खायण री नीयत को राखतौ नी । आपरै बाजबी नर साथै गायकां रै भलाई रोई ध्यान राखतौ। घणी-वार लुगायां ने कैती, वेश्यां घर गिस्ती रो ध्यान राखौ । अण जोइजता बरतण मोल लेर अणूनी खरचौ मती करो । मिनख लाई दिनूंगै सं सिंज्या ताई खटै है, जणे पइसौं कमा है। पटसा याफार लागे कोयनी। फाई जूना परतणारे बदल नवां लेती तो गनी कती बाई ! वरतण ती हाल चोखा पडिया है-भागा टूटा कोयनी । पथे क्यों पगरखी में पग कटा? क्यों काम में आ जिसां नै श्रावी कीमत में वेचे है । तूं चाय तो इं इयां ने नयां जिसा कर लाऊं । म्हारी मैनतरा थोड़ा पइसा देणा पडेला । कई नै फैती, .
गनी ठंडारी [४५ बेटी तू कै है नी. इसा मोकळा परतण घर मैं है, फेर नया क्यों मोल लेर फालतू पइसा गमाये है । मिनख कमाई दोरी घणी कर है पर थे बिना समझियां खरच कर नाखौ । हेसाब करण में गडबड गोटाळी को करतो होनी । गळी री लुगायां ने वैरी इमानदारी ऊपर भरोसो हो । वायो नेक नीयत याळी ही। यात्रै रौ कद ठिंगणी, प्रांख्यां छोटी, रंग गऊ घरणी, छोटी धोळी. दाडी, कान टिरियोडा, मूंछा प्रागै सू श्रोधी करायोडी लारे सू लंबी; माथै ऊपर छोटी पार्टी-पुराणो फैटी, चोळी पैरियोड़ी जिके ऊपर परसीणेरा स्यांळ, गिरियां सं थोड़ी ऊंची-ऊंची सळ भरियोड़ी सूधण पगां में देसी जूती-राखतौ । ऊंवर साठ सूं ऊंची ही पण तोई कड़क चोखी ही, तांत करारी ही। सदा हंस मुख रैवतो। पकी-मैनती हो। घर गिस्ती री जरूरत रे सगळा वरतना रा उण खनै नमूना रैता : गूणियो, तपेली, थाळी, कटोरा, कटोर्यो, लोटा, टोपिया, गिलास, कटोरदान, पाळी, कुइछी वगैरें। बायो जूनां वरतणां रे बदळे नया देवता । भागा-टूटा परतण सस्ती कीमत में ले लेती। कई कई नै पइसै री मौळ रै कारण जूना धींगड, माईतां रै हाथ रा वरतण घेचर घर खर्च सारू दाम खड़ा करना होवता, तो यावी, वे वरतण आधी कीमत में ले लेंयतो । एक जाणती, म्हारै गुजारै रा पइसा पायग्या, बीजो जाणतो, म्हारे घर में नफी हुयो । दोनूरी मिळी जुळी जुगती चलती। बायो मेळू भर पक्की चौपारी हो। अत्रै गनी परमात्मारी दरगा मैं पूग ग्यो, पण हालताई गळी गुवाड़- बाळा बैरी लायकी'र नेक-नीयती नै भूला कोयनी । बैरी मीठी याद बणियोड़ी है। ~ मध्धो फेरीवाली मध्ची हो फेरीयाळी । लाई गरीब अर मैनती हो। धूदुपार री बरसती लाय में, बांधां ऊपर दो बोरयां में, काचरयां फळयां, फोफलिया, खेलरा, सांगरयां, फैर पर अमचूर भरी राखती। गळी-गुवाई में धड़ती ई रागोलिया करती- काचरयां लोजी काचरयां लो म्हारारे गायकजी थे काचरयां ई लो सांगरयां लोजी सांगरयां लो म्हारा रे गायकजी थे सांगरयां ई लौ। जिसी माल उसी ई गीत । कईनै बाबाजी कई नै काकाजी, कई नै मामाजी, कई नै भाईजी कैर, सगळा नै अपणापी देखावतो। लुगायां नै दादीजी, बडियाजी, मामाजी, बाईजी अर भौजाईजी कैर नैड़ी पड़ती। कई रै माल लेवण री थोड़ी जचती तौ मध्यो, बैनै आ कर पइसां रौ फिकर तो कीया मतीना, मौड़ा वैगा, हाथ बसू हुवै जगई दे दिया, राजी कर लेंवतौ । कैवतो इसौ सस्तो सवदी भले कोयनी । घर बैठे गिंगा आई है. दो पइसा कसरी सवदी है। मनै तो थोड़े नफैसं माल लूटावणौ है माल खलास करणौ है जणै नोरा काढूह। काई कैती-बाला मध्धा । सांगरयां बोदी पर कोरा खोखा है । कूरण पइसा मैं नाखे । जणे हस'र उथळी देवतौ-भूवाजी ! माल छांट'र लेलौ । माल सस्तो वेचूं हूं। जणै थेइ कसर काढौ हौ । हूं रुपियै री डौढ सेर बेचूं हूं। बाजार मैं डौढ़ रुपयैरी सेर दोरी मिळेला | कई इयै वातनै सोची हौ'क ?
काइ कैंवती- मध्या फेरीवाळी ] [४७ ऊपर संबछ-बारस, नागडा-पांच्या अर अासरा टांकडा पात्र है। घर मैं सांगरयां होसी तो हाती-हाती को करणी पड़े नी । देखलो साय ! हूँ तो थार फायदै अर सवीतरी वात कैयूं हूं। लैणी नहीं लैणी तो थोरै सारू है। -अमचूर तो काळी दराय है। साग रो रंग बिगड़ जाये, कूण लेबै, आधी बाळ आघड़ी है। जणै कैंवती-अमचूर नै उनै पाणी मैं छोड़र देखो तो खरी । लाल कसूबल रंग देसी। थानै काळी फूटरो क्या देखणी है। साग मैं खटाई परी चोखी लाग जासी। इत्ती सस्ती अमचूर मिळण नै किठ पड़ी है। चौवटै मैं रुपियै सेर मसां सं मिळसी। थारी खुसी, पगरखी मैं पग कटावणी हुवै तौ भलाई कटायो। म्हारौ माल तो उभोई को बैनी इयां वारी जी जमायर माल बेच देवतो। काइ अोधार राखती तो काइ नगद पइसा बटाय देवती। बात श्राही के मध्यौ पसारयां खनै सूं जूनौ-चौदौ माल पइसा मैं ले आंवतौ अर चोखा दाम खड़ा कर लेती। पसारी जाणता कूटळौ निकलियौ मध्यौ जाणतो कूटकै माय सूं रोटी निकली। दोनू रै लाभ रौ सवदी हो । बाइ बत्तीसी तो बीरौ छत्तीसौ। मध्यौ पसारयां रौ कमाऊ वेटो हो। । मधो टाबर हो जणै ई मा मरगी ही। मांमै रै घर छोटे सं बडी हुयो। मांमें मामी नै ई चै तौ मां बाप जाणिया। मध्यौ रंग-रूप.री काळी, आंख्यां कोचरी दाई, नाक तीखी, भंवारा काजळ री पतळी रेख दाइ, सरीर खाखड़ियै दाई, धोती री जागा काठे लट्ठ रो पंछियौ पैरियोडी, टाट उवाड़ी। कणे ई पगां मैं खेटर फट-फट करता तो कणे ई पगे उभराणो। माथे, माथै कळरी कतरणी फेरायोड़ी, दाड़ी स भन्या च्यार-च्यार आंगळ अांतरै, कंबर कुड़ियोडी, लिलाई माथै संपरसीणे रा टोपा पड़े।
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४८ ]
[ जूना जीवता चितरण
गमछौ बोरयां २ वार कर लपेटियोड़ी राखती । तावडी कित्ती ई
प्रांख्या कादी, खीरा उकळी, ऊपर भलाई टाट तपी अर नीचे पग बळी, पण,
श्री झाकीडो तो नेम सूगळी-गुवाइ पर चौक मौलां में फेरी फिरण मैं धू
चूकै तौ चूकती।
मघौ अवधूत हो।
गिसत्यां ने घर बैठे सस्तो माल बेचणियो, मध्धै छाडै बीजो कोई
को होनी।
मची करडी नेमी पर खरी मजूर हो।
घणी मैनत करणिय ने भूख ई घणी लागे । मध्यो, चार-पांच बाजरी
रा सोगरा, लूण-मिरचारी घटणी तूं पधराय लेंचनौ। बिरखा-पाणी हुयौड़ी
होंवतौ अर फळी, खाखड़ी, टीडसी अर लोइया घणा सस्ता मिळता तौ बियां
रौ साग वरणाय लेंवती।
लाई ऊंबर घणी अोछो लायो। ४०-४२ मैं तो परलोक ई पूगग्यौ।
मध्यै बिना कूण बडंग मारै-
काचरयां लोजी काचरयां लो
म्हारा रे गायकजी थे काचरयां ई लो
सांगरयां लौजी सांगरयां लौ, म्हारा रे गायकजी थे सांगरयांई लौ
घर बैठे सूका साग सांगरयां, फळयां, फोफळिरयां, काचरयां, जोयीजे
जण मध्धे रौ घाटो घणो अखरै।
पारे । मरदाना मध्यावा!
भीलियो खवास बुध, सुक्कर अर अदीतवार । बडा-बूढा, टाबर, सगळा कई नै अांख्या फाड़ियै उडीकै। दिनूगै री आठ साढ़ी-आठरी वेळा। दिसा-फरागत सूं सैन निपटियोड़ा । केई चौकी तो केई पाटै माथै बैठा । मजै सूं घातां करै अर - टैम टाळ। इत्तै ई मैं एक काळी दराय ठिंगणी मूरती मूडै माथै सीवळ रा बण, तुक्की-मुक्की दाड़ी, अांख्यां ऊपर घसमौ लगायोडौ जिकै री एक डांडी सावत पर बीजी री जागा डोरौ जिको एक कान रै बारकर लपेटियोड़ी, माथै, माथै चीगटी बिदरंगी पागड़ी, तौई टाट उघाड़ी, गोडा साईनी ऊंची-ऊंची धोती, बगल मैं खाल री रछाणी, फाटो मैली चोळी, खांधै मोथै मैली फाटौ गमछौ, पगां मैं खांसड़ा अर हाथ मैं लियोई गेडियै नै, खट-खट टेकती, पग ढचकांयती, भीलियौ बाबी म्हारी गळी मैं आंवतौ । भीलियो खवास हो। भीळिय, बावेरी रछाणी मैं दो-तीन देसी पाछणा नैरणी, सिल्ली, एक खाल रो टुकड़ो, देसी कतरणी, कळ री कतरणी, मूंडौ देखण रौ जूनौ धुंधळी काच अर देसी कांगसियो रैवतो। पाछणा रा नांव, टाबर नै राजी राखण सारू, भीलिथै बावै मिसरी रौ पाछणी, खांड रौ पालणौ कढ़ाय राखिया हा। डरर चाबौ पैली पोत टावरां री संवार करती। टावर बायै सू भेळा भेला होवता । माईत दामरां नै खोले में लेयर धैठता। एक तो बाबैरों पाहणी दोरौ चलतौ वीजौ हाथ धूजतौ । जागा-जागा टावरां रै माथै मैं टांचा पड़ जांवता । टायर भेळी-भेळौ हुवै । जणै माईत टावरं री हीमत बंधावण सारू बैरै मगर मैं थापी देय'र कैंचता-सूरवीर है, भीले रा सड़का तो सूरा ई ५०] [ जूना जीवता चितराम सैयै । बाबी, हसर कैंपती-रो ना बेटा! लै. देख अक्कलै मिसरी रौ पाचणी काढूं हूँ। औ सोरौ चलसी । अर देख बेटा ! तनै 'चल मेरी डमकी डमाक डम किसका झींटिया किसका तम पाळी काणी कैसं । तू तौ सैणी घणौ ईज है। लै-आले, संवार बणगी, इयां कैयर रीझायौ रैवती । इत्तै ऊपर ई कोई टाबर ताना बाजी करती जणे माईत री निजर पंचाय'र, बाबो बैरै माथै मैं एक हळकै ठोले रौ कचीई देवती अर आंख्यां काढतौ । टाबर भैरै मारियो बोलो-बोलौ हुय जांबतौ। भीलियौ बायो टावरां रौ गुरू हौ। बौ टाबरां रै माथै ऊपर लंबी चोटी पर चोटी रै नीचे दो गळियौं अर देवता रै नांवरी लटी राख'र कळरी कतरणी फेर देवतौ। पछै अागले पासी पाचणे चूलौ बणाय देवतौ जिकी खिजमत कयीजती। कोई छोरी कैंवतौ-म्हारी दादी पट्टा राखण रौं कयौ है, जणै बैनै बुचकार र कैंवतौ-ना बेटा! देढ़ावाळा बुग्या कुण रखावै, कोजा लागे । आपनि तौ खिजमत करावणी, गळी-लटी रखावणी श्रर फंदियौ गूंथावणो जोयो । टाबरां री हरजामत सू निपटर, वडा-बूढ़ा री करतौ । भीळियौ बि तेसरी हो। चारै मास, मुफत मैं, बिरतवाळां री हजामत वणवतो। औसर-नुखतै, मरण-परणे अर मंगलीक टांकडा माथै भीळियै रै घर भररा बिरतवाळां रै घरै जीमता अर मोकळी पुरसाय'र लावता। साध, आगरणी, भाई, झंडा, जिन्दोई, ब्यांव अर मरणे माथै बैरी घणी-चणी पूछ हॉवती अर चोखो नेगचारी मिळतौ। बिरतवाळा परदेस सं आंवता जणै भौळियै बाबै नै चोळी, धोती पर पाग देवता । चार महीनां मैं वीजी कपडौई देवता । भीळियै री बहू विरत रै घरां मैं लुगायां रा माथा गूंथण जायती । टांकडे-नुखते माथे प्रांठा घासण. दोन जणा मांजता । बासण लायां ने माल री माल मांजण पड़ता । घरां मैं गोळी घालनी पड़ती। , भाळियौ खवास] [५१ माथै गूंथाई १ वदळे मैं बिरतबाळा बाबै री बहू नै कई देवता-लेवता वता । इयै सू परवार मंगळींक टांकडां ऊपर घोळरा, नारळ-टका ई इयै नै मिळता। इण तरै भौळिय बाबै रै परवार रौ विरतवाळां रे घरां सू गुजारी होवती। लाई बाबै नै बिरत रै घरां रै काम सूं फुरसत ई का मिळती होनी । कणे कई रौ तेड़ी तो कणे कई रौ। वियां अर नुखतां माथै वायो घर री निगराणी राखतौ । वासण- परतण, चीज-बस्त गुमणे पांवती नही। कदै ई कोई बौदै मैं गैणौ-गांठी खोलर भूल जांवती तो बायो ठावो संभळायर दे देवतौ। भीलियौ बायौ डंभक अर खरौ मिनख हो । मौक-टोकै, परवाळा बैरी सलासूत लेवता हा। कारू-कमीण समझार बैरै सागै अोछी-हळको बौवार को करता हानी । भीलियै बाबै रौ, बिरत रै धरां मैं माईतां दाई काण-कायदो हो। अबै किठे या बात ! जमानौ ई बदळ ग्यौ। बिरत रो बंधाण दीलौ पड़ ग्यौ । अबै तो काम थोड़ी करणौ पण टका बजायर लेंबणा । बिरत रौ नाई मिळणी ई ओखी हुयरयौ है। अबै तौ कारू-कमीण कैयै है कै म्हांनै विरत पौसाथै ई कोयनी। मरणें-परणे भीळियै बाबैरी याद आयां बिना रैबै कोयनी। बेरी घाटी अखरै । छेकड़ उभोड़ा, श्राडा तो हुवैक ? समाज रौ किसी चोखो बंधाण हो । सैं आप-आप रौ काम करता अर श्रापरी जागा पूछीजता-पूजीजता । ऊंच-नीच री गिंदी भावना को होनी । ।
- हरदास दहीवाली अगूण पासी उजास होत्रण लागतो जणे सोपणी कड़क बोली मैं सुगीजती-'दही चयको-दही चक्की' । अथै ती टायर-टीकर हरदास री बोली श्रोळख'र, नाचण कूदण लागता पर बैगी लावण खातर अड़ी करण लागता। हरदास दहीबाळी हो। श्राघी गली मैं अवाज मारियोड़ी इसी जाण पड़ती जाणे,म्हारी ई गळी मैं ई मारी हो । बडा-बूढ़ा, सगळे उडीक लगायां भा. रैवता । जेज होवती जोयर उथपण लागता। पण टाबरां रै तौ जाधक ई खटावण को होवती हीनी । लागता पग पोटण, कर लेवता भरभोलियै दाई मूडौ। बाने राजीकरण सारू घरवाळा कैंवत्ता--'आयौ श्री हरदासजी बैगा आयो; मनिय नै दही देवी। इत्तैई रंग उड़ियोड़ी मैली पागडी पैरियां हजामत यधियोड़ी, खांधे ऊपर एक मैलौ-फाटी गमछौ, जिके ऊपर झायोलियो धरियोड़ी, एक हाथ मैं जाड़ी गेडियो लियां, गोडा सांईनौ मैलो पंछियौ पैरिया अर पगां मैं जाड़ा जूत धारण कियां हरदास 'आयो ई-आयोई कैवती आय धमकती। झानोलियो एक पीतल री थाली सं, दकियोड़ी रैयतो एक पासी बाट अर बीजै पासी धान रैवतौ । धान रै माय धड़ी करण सारू बडा छोटा गड्डा 3वता । वारी बारी सगळां नै दही तौल'र देवती । टावर चंगी अर थरकी लेंगता और उठे ऊमा-भाई चाट जांत्रता । फेर हाथ पसार देवता । माईत पालता, जद हरदास कैंती-बालक बादसा है, ऐ तो इयांई करसी । हरदास जरणावाळी हो। ।
। हरदास दहीवाळी ] [५३ पा गळी सूबीजी, बीजी सूं तीजी, इणी तैर घणी सारी गळियां मैं घूम'र ५-७ माओलिया वेच लेंवतौ । घरै प्रांबतो जण थाळी धान अर टकां सू' भरीज जांबती। हरदास मैनती हो। दुपारै, ग्वार फळी-खाबड़ी रे साग सूअर फोगले २ रायते मैं, बाजरी रा सोगरा भोर'र पेट पूजा करतौ । पर्छ घंटा-दोय-चंटा तप्पड़ बिछायर, लेट लगांवती। पण माछर-माख्यां टिकण को देंवतीनी । जद कदेई पंखी करतौ अर कदेई डुपटौ ओढ़ लेंवतौ । कदेई रसोई सू निमटर सिवादास री मां हायरी घालण लागती! जणे, थोड़ी ई ताळ मैं घर-घुर्र करए लागती। हरदास संतोखी हो। च्यार-पांच बजी हरदास भट्टी चेतावतौ । अगन मैं धी री छोटी नाख'र 'यंयकाळी' कैय'र भगती सूं हाथ जोड़ तौ। पछै कड़ाई चढांवतौ । धैमैं दूध भरती । मधरी अांच सूं दूध रदीजती । धीरे-धीरे दूध माथै सागीड़ी जाडी थर श्राय जांयती । हरदास कारीगर हो। हरदास रै घर मैं थोडौ-घणो दही पंचतौई । जिकै सूं तरै तरै रा साग बण जांयता । दुई मैं वेसण घोळ'र कदेई सिवदासरी मां गट्टा कदेई चीलड़ी, कदेई पतोल कर लेंगती। कदेई गळी मांय तूं मांगी छाछ मिळ जांयती तो राय अर कढ़ी प्रणाय लेंगती। कदेई रोही सूतोडर लायोडा कैर-सांगऱ्या रौ साग बण जांवती। इयां धाको धकती हो। घर मैं टावर टोळी रामजी से दीन हो। माठे-मटकै चलती, जदई गाडी गुड़क तो हो। मेरी रुत में हरदास, गांव ज्ञावती परौ । ॐ बेरा पिता पूरयो खेत हा । कच्ची टापरियो हो।
५४ ]
[ जूना जीवता चित्तराम
लुगायां-टावरां नेई, वो साग ले जांबती । सगळे खेत मैं बुधी सारू
काम करता । डीलां तूं मजूरी करता।
टाबरां ने उठे, गायां-भैंसा रो दूध पीपण नै मिळतो ।
हरी टांच रोही, हरा-हरा खेत - जियारी श्राय जांबती । बारै मईना
वायण जोगी, धान राखर बाकी वेच देवनी । चोखी रकम खड़ी हुय जांवती ।
श्रा रकम व्यांव-टांकडो मैं लागती।
हरदास घर-लोचू हो।
- - १८ भोलियो डाकोत छनीबार नै भोळियी म्हार चौक और गळी घरां मैं चक्कर काटिया करती। फैक्ती-श्राज ठाकुरजी रे तिथ वारस, यार छनीवार । फलाणे रै सरीरा सुख, स्याग-भाग अखी राखे, बेल यथै, ग्वाडी फळे, श्रर नैण गोडा निरोग राखे छनी भगवान ! कथा सूणो, तेल'र फेरी घतानो, अन्न दाता । कोई छनीचर जीरी कथा सुण'र एक टको देवतो, तो कोई बेरै मैले- काळ लोटे मे मीठी तेल घालतो । कोई पूछती-देखतो भोळिया, म्हारा घोलते नांव सू गिरे-गोचर किसाफ है. ? कोई परदेस रेयरिणयां री दिन-दसा पूछती। कोई मांदै तातै रा गिरे गोचर पूछती कै कद ताई श्राही होसी ? भोळियो श्रांगळ्यां ऊपर मीन, मेख, मिथुन, करक, सिंग गिण'र कई ने मंगळ, राहू, तो कई नै छनीछरजी री दसा वतांयती अर काळी चीजा री दान काळा तिल, काळी बकरी, काळी भैंस रौ दान करण री कैती। कई नै चोखी कमाई री, कई नै बैगोई पाचौ होषण रौ कैतौ । घिरत संई भोलिये १ परवार री गुजारी चलती हो । भोलियो डाकोत पर जोतकी हो। मरणे-परणे भोळियो हाथ में लालटैण लेयर रातरी दो तीन बजी ताई भिरत रै घरां श्रागै घूमती अर घर र मुखियै नै ऊपर लिखियै मुजय पासीस देंयती पर गरीबी सू कैवती-हां, सुणाई हुय जाथै मां-बाप ! भोळियै रा कारज श्रापई सार सौ । फेरी देवते-देवते महीनो हुयग्यौ है किरपा नाथ ! 'जणे पंचायती भेळी होवती अर भोळियै री बीनती माथै विचार होवती । न्यारी न्यारी पंचायत्यां तूं मैंने एक मुस्त २१) ३१) सायता,रा मिळता ! ।
। ५६ ] [ जूना जीवता चितराम इण तर मरणे परणे ऊपर रीत मुजय खरच करण साम यर खने एक रकम भेळी हुय जांवती । विरतथाळी होवरण सू चरी श्रापरी जान मैं घणी मान हो । भोलियो बड़ी विरतवाळी हो। भोळियी जथा नाव तथा गुणवाळी हो। घर री घाटी कदै पूरी को होवतीनी । गरीयी सूं गुजराण करती। सींदापती को होनी । भोळियो मैनती श्रर सायसवाळी हो। वेरी छोटी-छोटी कक्की यांख्या, टिरियोडा कान, करड़कायरा केस, वध्योडा नख हा, डील माधै फाटी-मैली चोळी, लिलाड माथे चंनण री भाड़ गळे मैं रुदराखरी माला, बगल में फाटी-चीगटी टीपणी, खांधे ऊपर मैली- चीगटी कोथळी, एक हाथ में मेलौकाळी लोटी, बीजे मैं बोटी री लकड़ी पर पगां मैं फरड़-फर करता खेटर हा । श्रीसर-नुखते, सराय-छमछरी-ऊपर मगळां रै जीम लैण र पछै बैन ई कई नेगरै तौर ऊपर दियो जांयती हो। मंगळीक मोकां ऊपर थैरी धारणी असुभ समझियो जांबतो हो। घर रै माय तो कोई बैनै घडन ई को देवतो होनी । कदेई कोई आपरी गरज स दान-पुन रे नियत नै मवो? र माय बडन ई देवता तोई धैरै लारै तूं पाणी रा छांटा नाखता; इण वास्तै के फेर इण खुड़पागै रा पग घर में 'नहीं पड़े । बैतूं एक तरै री छूत राखी जांयती ही। मळ-मास में भोळियै रै वण-आंयती । इये मास में सबीते मुजब एक दिन तौ सगळे बड़ा-चीलड़ा, पूडी-कचोळी, कई मीठी, पापड-खीचिया अर सलाबडा तळता ईज । चै दिन डाकौत नै सै तेल पर मौठा री दाळ दान करें। कोई तळियोडी सामगरी ई देवै । इण तरै आज ₹ दिन भोलियै नै मोकळी- दाळ अर मोकळी तेल मिळ जावतौ । वैधृत, वितीपात पार गिरण रै दिन भौलियै रै घणासारा छाया दान आय जांबता, तेल सूं भरियोडी कांसी री छिरपली मैं सोनै री टिकड़ी घाल'र उरण में आपरी छैयां देख'र दान देवता।
भोलियो डाकोत ] [५७ भोळियै र घर मैं छोटा-मोटा सात जीव हा जिकां री गुजारौ बिरत रे घरां सू चाळतो घर मैं दान में आयोड़ी एक बकरी ही जिण रौ दूध टाबरां भर बूढ़ा ने पांती सर मिल जायतौ हो । टावर धैनै रोहो में चराय-पाय लावता हा। लाई डोकरौ भोलियौ परलोक सिधार ग्यौ। बैरै प्रोसर रो खरची पंचायती मिळ ग्यौ। भोळियै री बहू अांख्यां सूं लाचार हुयगी ही तौई जीवी जित्तै पैट-पोते रौ खांधौ माळर बिरत घरां री फेरी लगांवती रयी। छेकड़ बैनै ई सौ बरस पूग ग्या । भोळियै रा वेटा-पोता नेम सं तो नही पण छिड़ियै विचड़ियै चक्कर लगाय जाथै है। भोळियै रौ नांव मिटग्यो पण याद को मिटी नी। छनीपार र दिन कणे ई इसी-लखाई जै जाणे बौ प्रांबतो ई होसी, अर कानां मैं धैरा बोल गंजण लागै-फलाणै रै सरीरां सुख, भाग-सुवाग वधै, छनीदेव रिख्या करें।
सीतको मालण
-
एकै पासी च्यार-साढ़ी च्यार रौ अमल होवती अर लुगायां सिंज्या री
रसोई चाढण री चिंता करण लागती के इतै ई मैं कई री मीठी-कड़क बोली
आंवती 'चंदलियौ, सांगरयां, कैर, क्यांरपाठी, बैंगण लौ ए।'
घर-घर तूं लुगायां धार श्राय पूछती-
'चंदळियौ क्या भाव ए'?
'देऊं तो पइसै रौ पाव हूँ। थे भेळी सेर लेवो तो एक पइसौ ओछी
दिया।
'ना बाई, तूं मौंगो देव है। चौवटै मैं दो टकां रौ सेर भर हणे ई गळी
मैं लाया है।'
'तो हूँ माथै भार-उखरिणय फिरू तो कई साब नैई फिरू' हूँ। पइसी
खण तो मनैई जोयी।'
'हां वाई । श्रा यात तो याजय है।'
'तो तोल दूंसेर भर ?'
'तोल दे।'
'ए सीतकी! सांगरयां कांकर दी?'
'दादी जी। पाठ सेर री-धणी सस्ती है, पर है ई मी ।'
'दस सेररी देखें तो एक थान री तोल दे।'
'लो दादी जी यांने तो राजी राख सू-लौ १० सेर री।'
'आगे कई कोयनी भली, आईज रेमी'।
'ठीक दादी जी'
सीतकी माळण] [५९ 'हाए, कैर कांकर दिया, सीतकी ?' 'बाई सा, छः सेर रालो, देखौ ।' 'वाली, कैर बडा घणा, मी कोयनी'। 'बड़ा टाळ'र दे दे तूं।' 'तो दे देखो दो आनो रा, भाव सात सेर रौ लगाये ।' 'लौ कनी, रात दिन रा गायक हो।' 'इण तरै सीतकी मीठी बोली तूं सगला नै पटायर मोकळी साग बेच जोवती। सीतकी माळण ही। श्रर ही मिठबोली'र चतर । सीतकी वैगी उठती। गायां नै बांटी देवती । ऊठ नै नीरती। गायां रौ दूध दूवती । फोटा थापती। बिलाणी करती। पछै सीतकी री सासू पोते नै सागै लेयरौ वंध्यावाळी २ दूध देवण जांयती । आधौ दूध वंध्यां मैं देवता, श्राधै रौ बिलाणी होवती। सीतकी री घर गिस्ती री चोखी व्यवस्था ही। सीतकी रौ धणी-नत्यू, कूबै पखाळ भरण जांबतौ, अर बंधीवाळां रै घरै नाखती । जचती तौ खुल्ली-ई-वेच देवतौ । काळे ऊनाळे मैं पाणी री मांग घणी । पखालिया मूडै मांग्या दाम लेथे । लोक-उपरा तळी पढ़ें-चौ कैवे पैला म्हारै नाखौ, तो बी कैवै म्हारै । इणगी बंधीचाळां री तक्कड़ । खांचांताणी में पखालियां री-बण आयती। चोखा पईसा तोड़ता। सीतकी खोरसै सूं निवट, न्हाय-धोबर तुळछी रै क्यार में पाणी सींचती । पर्छ रसोई चाढ़ती । धू-दुपारै रौ १२-१२। नत्थू पाछौ घरै ठुकती। थोड़ी बिसाई खांबतौ । ऊठ नै ठाण बांधती । पछै रोटी-टुकड़े भेली होती। सीतकी पछे पेट नै भाड़ी देवती। फेर वरसती काय मैं धू-दुपार जंगल में सांगरयां, कैर, खोखा, गंदिया तोहण निकळती। इतै श्रोडी फिरण री वेळा हुय जांयती। सीतकी कड़ी मैनतरण ही। . " .
६० ] [ जूना जीवता चितराम रात पडियां सीतकी धरै पूगती जित्ते सासू रसोई चढ़ाय देंयती। नत्यू गायां ने बांटी दे'र दू लेती। ॐ नै नीरती पावतो । नत्यू तो बंधीवाळा दूध पूगावण जांयती परी । सीतकी सगळां ने जीमावण-जूठावरण में लागती। पछै आप जीम'र चौको यरतण करती। दूध कढ़ायती, जमांयती। पर्छ घमड़- घमड़ पाटी पीसती। मे छांट हुयां नत्यू बाड़ी जांयतो परौ। उठे खाखड़िया, मतीरा, फल्या यांवती । जणे लायण सीतकी नै मरण नैई फुरसत का मिळती हीनी। नीरणी, दूवारी खोरसे पर रसोई पाणी सूं वैगी वैगी निवट'र सीतकी बाड़ी भातौ लेर जांयती । पाछी श्रावती बड़ी-सारी-श्रोडी काकाड़ियां, लोइयां वगैरां सूं छल लांबती। मण भर सूं ऊंची भार हुय जांयती । घर पूगर कइयां रै घरै थेपड्यां री श्रोडी भरर पूगायती। जिते चौपटे री टैम हुय जांयती । उठे थोक मैं माल वेच लेंपत्ती । सीतकी घरलोचू अर सैणी ही। टांकड़े तिवार उपर सीतकी आपरै चंधियो. घरां मैं अाखा सं झोळी भर लावती। पछै घर-घर सूं टांकडे तिवार ऊपर संधियोडी सामग्री पुरसाय लावती । सीतकी राव-बौवार अर घरोपी राखणवाळी ही। मालण्यां तौ छिडी-बिछड़ी हाळ ई केई आधै है। पण सीतकीवाळी माया सीतकी खनै ही। कठे वैरै जिसौ मेळ-मिलाप, कठे घरोपौ।
२० - नंदौं ओड बोदी पर . माथै ऊपर लीरा लटकती दमालौ, काना मैं मुरक्यां, तुक्की मुक्की दाइकली, उघाड़ी डील, गोडां सांईनी काठी धोतियौ, पगां मैं कारयां लागोडा लंबा-लया जूत, हाथ मैं डांग लिये, दिन बढ़ियां नदी, सैर री गळियां मैं कमठाणा जोवण निसरती। नंदी ओड हो। भाख फाटी नंदी रात नै उछेरियोडा गधेडा नै जोवण निसरतौ। गधेडा रोही मैं लाधै किठे ? पण नंदी तो थोड़ी ताळ मैं ई सगळां नै जोयर टोर लावतो; नंदी गधेडा रे पगां रां सैनाण जोतो-जोती जिठै बे हॉवता उठैई जाय दूकती। नंदी पागी हो। कमठाणा होवै जिठे धूड़ोड़ें रो क्या पार ! नंदी धूट रै दिगलां मैं आंख्या गडायर मन ई मन फळावट करती। पछै घर-घणी सं दोयाई रै मुकातेरी बात करती। नंदी साबियो हो। नंदी हरखांबतो के अबकले खेप कमाई री चोखी है। घर-घणी, हरखावती के सयदी सस्ती ई हुकी है। दाव-धाव मैं दोये ई एक बीजे रा कान कतरू हा । पण नंदै रौ पिरथी माता मैं लैंगियो हो-कामां जैरा लामा । दो पइसा रौ लाभ नंदे पासी ईश्वती । नंदी पतर सयदी पटापणियो हो। नंदै री यह धैगी थकी यारी रा सोगरा सेकती। जिके अपर सूण- मिरचांरी पटणी नासर सगळे जीमण लागता। पछे गधां ऊपर पाबडा, ६२] [ जूना जीवता चितराम कुदाळा, झांफ पर टावर वगां, थोडा सोगरा'र चटणी मेलर नंदी लुगायां- टाबरां समेत, कमठाण इकती। यारी जागा डेरा लगांवतो पछे सगळे काम मैं लागता । मोटियार दिगली खोद'र पूर सळूजांवता । टाबर-लुगायां धूड़ोई रा गधा भर'र सैर परकोटै सूं बार नाखण जांबता । ऊपर सूं लाय वरसै, पसबारे सूं पवन खीरा उछाळे, सरीर ऊपर परसीणै रा परणाळा वैये पण कई मजाल जिको थोड़ी फेट खायले । हां, तिस लागती जणै नींगळियोड़ चाडै मायली पाणी मोटौ लोटौ भरर ऊभाई डकळ-डकळ पी लेवता । कद सूरज मेळ बैठनोर, कद वापड़ा बिसराम लेता। जद सूरजजी बिसांईजत तद ऐई काम छोड़ता सस्तरपती संभाळता । पछे हाथ पग धोयर घर री मारग लेता। कदेई कई चौवटै सू सबदौ लावणी होवत्तौ तौ नंदी वठीनै चलौ जांबतौ । रात पड़ी नंदौ घरै पूगतो। गधा नै रोही मैं उछेरती। लुगायां रोटी पोवती अर सगळे जीमण लागता । जीम-जूठ'र मोटियार चिलमिया करता, लुगायां घम्मड़-घम्मड़ आटौ पीसती । इत्तैई मैं पाड़ोसी, आय जांवता। कदेई गप्पां लगांवता, ती, कदेई भजन गांवता। रात मोकळी ढळयां पछै बिना बिछावणे धरतीई लटा दाई गुड़क जांवता। नंदी अवधूत हो। मेह मंड्या नंदौ, खेत जांयतो। लुगायां-टावर निदाण करता। नंदी हळ चलायती बीज बांयती । इण तरै वरस भर खायण पूरतौ धान उपजायर नंदी पाछौ अवती। इत्ती मैनत-मजूरी सं कमाई करतां थकां पण, नंदी लाई करजायत ई रेवती। कमावती जिको खाय लेवता । मरण-परणे खंधीयाळां री गरज करणी पड़ती। चोटी लिखायर रुपिया लेवती श्रर सईकै लार २०) ३०) कटांवती । भली होती ती १००) रा २०) नही जणे ७०) ७५) मिळता। इये मायसं ई १) फोथळी खोलाई री अर १) कयूतरां रै दाणे रो देवों पड़ती। अठीने .
[६३
।
नंदी प्रोड ]
नंदौ मैनत-मजूरी करण मैं कसर को राखतौ हौनी बठीने खंधीवाळा
ऊपरलौ-पानौ को आवरण देवता हानी ।
नंदी बापड़ौ करजायत रैवतौ हो।
सैर री दुकाना मैं तरै-तरै री चीजां सजायोड़ी रवै। नंदे'र बिय १
टावरां रै भावै तौ कई को होनी । वे तो आपरै काम सू ईज पिरोजन राखता।
कदेई आंख उठायर सामौ जोत्रणो किसौक होवे।
नंदी साधू हौ।
नंदी भणियोड़ी 'ककोई' को होनी। हंसाब अटकल-पच्चू सू कर
लें तो हो। टावरां रे ई काळी श्राखर भैंस बराबर हौ । सैर मैं घणी
पोसवाळा-मदरसा अर कॉलेज तकातक खुलग्या हा पण इयारे भाव तो
कईन का।
नंदी ठोठ हो।
जद कोई नंदै नै टावरां नै भणायण रौ कैंवतौ तद वो उथळी देवती-
म्हारे भाग में ई विद्या लिखी कोयनी । विद्या तौ थां लोगां खातर है। म्हांनै
तो धूडरा दिगला ई दोषणा है।
कोई कैंवती-टाबर भणजासी तो सोरा रैसी, चोखो कमासी चोखो
खासी । नंदी कैंवती-म्हे तो सोगरा अर मोटै गाभां मैं ई मस्त हां। म्हाने क्यों
अकरा बोर भाये है।
नंदी संतोखी हो।
- २१ जसियौ तंबोली जेसियो जात रौ मथेरण हो । पण कैवता सागळे बैनै तंबोळी हा कारण बै पाना री दुकान खोल राखी ही। जेसियै री दुकान घणी जूनी अर नामजदार ही। धेरै हाथा मैं जायोड़ा छोरा, छोरां रा वार, दादा अर पड़दादा वणग्या उत्तै बैरी दुकान धन्नादै सू चलती ही। आज सं तीस-चाळीस वरसा पैली पानां रौ चळण निराठ थोड़ो हो। घणखरा परदेस रैवणिया लोग ई पान खाया करता हा । क्या कई रौजी दोरी होवती, खासी आंवती जिको मरेटी घताय'र दवा दाखल पान खांवती। क्या कोई सौखीन होवती जिको पान खांबतौ । लुगायां नै होठ अर जीव लाल करण सारू पान मिळ जांवता जणै वे खिलती-राजी होवती अर घड़ी-घड़ी काच मैं होठ'र जीब देखती। होठ अर जीव लाल करण सार छोरा-छंडा, लुगायां, गंदी रा पत्ता खांवता। जेसियै री दुकान पोकरणां बामणां अर बांणियारी गुवाड़ मैं ही । वाणियारी वै वेळा क्यों चात पूछो हो! आधा दीया पाया प्रांवता हा । लिखमी ऊंधी होयर पड़ती ही। जीवना ई सरग रा सुख भोगता हा । धनवानां बियां-सगाई अर हरख-उचाय रै टांकडे तथा परदेस री जोयोजती मुसाकरी कर र पाला देस मैं विते ई चौक में चमक श्राय जांयती । दिनंगे जीम-जूटर से इकता जेसियै री दुकान । चाय सं चावता पान बीड़ा। दाना पकियोड़ा कपूरी पान खांवता ती मोटियार पर सौखीन मांगता मीठा अर बंगला । जेसियो हाट मैं सगळी भांत रा पान राखतो कपूरी मीठा, यंगला, योयला, थर देसी। ।
जेसियो तंबोली [६५ जेसियरी हाट री सामली चबड़ी चौकी माथे चौपट मंडती । सगळां से चौपट रौ सौख । सै जाय जमता। बीच-बीच मैं-लाव जेसिया पान, লী रेवती। चौमजी पणती । रस बरसतौ-रंग जमतौ पौधार, दस पगड़ी पर चारकाणा रा बोल हया मैं गंजवा। सिंज्यानै कोटड्या-बोच्या सं पाछा आयर जीम-जूठर सै जमता जेसियै री हाट रे श्रागै धरियोई पाट माथै । फेर लाय पान-लाव पान लागती। इस मौके जेसियै रै मोकळी कमाई-कजाई होवती । पण चैगी ई जांयती परी भांग रै भाडे । जेसियै मैं मिरखारै सवर्दै री लोठी लत ही। धोखे रंगवाजी मैं बैरी नाव हो। थामै सामी जोयर बो फटाई वताय देवता के बिरखा घड़ी-दोय घड़ी में आय पासी। भरभोम में घिरखा रो कोड मोकळी है ईज । अठीनै चौमासो लागतो उठीने जेसिययै री हाट में 'श्रनवेशण दफ्तर' खुल जांबतो) आयोगायो, वती चालती, सयदैवाळी-अणसबर्दवाळी, बड़ी-छोटी, सगळे, जेसियै नै, मेरी बात मन चाया सवाल पूछता-(१) मे से क्या डौल है? (२) हुबसी ती घणी है (३) परवा हवा ई चल है (४) ऊगतै सूरज रै बारकर जळेरी ई हो (५) चिड्याई धूड़ मैं न्हाय है (६) भाभी ई गती है (७) तीतर पंखी यादकीई है। जेसियो वती-अवै ती बिरखा भाई ई देखो। जेसियो रात री ११-११॥ बजी हाट यांवत्ती जिते ताई बिरखारी पूछताछ चालू ई वती। जेसिय नै शिरकारी मोकळी ज्ञान होयत थकां वो हमेसा खोई मैं ई रैयती कैने ठा परमात्मा रै घर री लाई नै क्या फिटकार हो। पैने पूधर लोक ती कमावता थर यो खोबती १ घाट में वीजा जारणी बंध कर देवती। फनी-अथ सवदी करणी बंध कर देसू। मसाणियो पैराग दोग-च्यार दिनई टिकती, फेर वई घोडार वेई मैदान । सियो इंसमुख अर मिळणसार हो। सगळां मैं खपती : सावरा मैं दायर, मैं दी। चायाको मैं थी इसी बुलमिळ ग्या हो के लोक ६६ ] [ जूना जीवता चितराम लखाईजती ईही कोनी। वो गुणी अर बौश्रुत हो। घर-गिस्ती रै मामले मैं लोक वैरी सलासूत लिया करता । रंग गऊँ बरणी, प्रांख्यां बिचलै दरजे री, मुंडौ लंबी, नाक तीखौ, कान टिरियोड़ा जिकां मैं मुरक्यां पैरियोड़ी, भंवारा तीखी काजळ री रेख ज्यौं, कद लंबो, सरीर पतळो-दूवळी, उणियारौ गंभीर, अोछो-ओछौ चोलो, गोडा साइनी धोती, माथै माथै अलेटिया-गळेटिया फूल गुलाविया पागड़ी अर पगां मैं देसी पगरखी। जेसियो हाट मैं काजू-काजू जिनस सगळी राखतौ। छोरा-छापरा नै राजी करण री मोकळी चीजां ही। पान, सुपारी, मरेठी, मसालौ, जरदौ- सुरती, हींगास्टक-री गोळयां, पींपळ पाक, गुळकंद रौ खाटी, पचायोड़ी खारकां, जीरो, पीपळ, लूणिया-नींबू, पतासा, विस्कुट, चीकणी सुपारी रा किरका, पोदीणै री टिकडयां, नींबू रसरी फांक्यां, मैणबत्ती, बीडी-सिगरेट, तील्यां री पेट्या, साबण, मूगफळयां, लिफाका अर कारट। त्यौवार-टांकडां ऊपर जोयीजती जिनसां ई राखतौ हौ । दियाळी मैं, छुरछुरिया अर गोळिया पिटाका, टिकडी वाळा पिटाका, नागवाळी टिकडयां, रंग-रंग री रोसनाई री पेट्यां अर फूलझड्यां। जेसियौ चतर चौपारी हो। रात नै गळीगुवाड़ रै छोरा नै, कित्ती-भरां रा, सोने, तोळे रा अर ब्याज रा लेखा घालतौ अर मालणी बचावती। जेसियो इंसावियो हो। जेसियो सत्संगी ई हो । चौकलै रा दाना-बूढा अर भणिया गुणिया सू धेरै चोखी गुरवत रेवती । चोखी ज्ञान घरचा चलती। सासतरां री कारयां श्रर दंत कथायां ई बैनै घणी याद ही। सुलमियोड़ी पर दानी मिनख हो। जेसियो पुण्यात्मा हो। चौक रै सऊकारा रा टायर हाट मैं, कोई गैरणी-गांठी भूल जांपता अथवा कोई खुल-टूटर पड़ जायती, तो। जेसियो वारे घरवाळां ने संभळायर देय देवती।
जेसियो तंबोली] [६७ जेसियौ हाथ रौ साचौ हो। चौक रा छोरा-छंडा, छोटा-बड़ा, बहू-बेट्यां सगळे जेसियै रौ काण- कायदौ अर संकौ मानता। बराबरीवाला बैरौ अादर करता । बूढा-अडेरा सनेव राखता । जेसियो कईनै परायो को लखाईजती होनी । जेसिथै री हाट खाली पाना री हाट ई को हीनी। बा मनोरंजन- कलब, सतसंग भवन, रात्रि पाठशाळा अनवेशण दफ्तर, दुख-सुख कैरण-सुणन री सैयोगी संस्था अर भळे ना जाणै क्या-क्या ही ? पाना री दुकानां तौ चौक मैं घणी ई खुलगी पण कठै बा बात ? जेसियै नै परमात्मा री सरण मैं पूगा नै मोकळा बरस हुयग्या पण वैरी हाट खनै कर नीसरती वेळा बैरी पुण्य मूरती अांख्या आगै नाचण लाग जायै अर सुख-दुख रै भावां रै मेळ री तरंगा सूहिरदै मैं एक मीठी पीड़ लखाइजण लाग जावै।
२२ मनजी मचकांवालो मनजी लाई जिलम तौ पंजीयाळ अर पूजीजतै घर में लियौ हो पण हौ भाग पाडौ भाठौ। घर मिनखां सं भरियो-तरियो हौ : पगरख्यां ई मावती को होनी। न्यात मैं औसर-नुखता अर व्यांव-सगाई ठाठ-बाठ सं करण सू, इण परवार री चोखी साख-सोभा ही । औ सगळी मनजी रे दादै रो परताप हो। बौ ईज ऊजळी जंवारी अर धनक नांव करणियौ हो; बिय रे श्राख्यां मींचरण पछ औ परवार परवारग्यौ । कैवत ई है-एक रती बिना पाच रती। मनजी रे बाप सूधा च्यार भाई हा। च्यारे ई एक बीजै रा सिर खावणा, लखणां रा लाडा, पूरा गईवाळ । मनजी रे दादै आपरै जीव-जीवते सगळां नै न्यारा किया जणै एक-एक री पांती मैं पचास-पचास तोळा सोनौ, गैणा-गांठा, कपड़ो-लतो अर मोकळा बासण-बरतण आया हा। चांदी री थाळयां कटोरयां इण तूं पाखती। न्यारा-न्यारा पक्का घर सगळां री पांती में आया हा। नगद् नाणी, एक-एक जणै री पांती मैं पांच-पांच हजार प्रायौ हौ। पण च्यारू भाई माया-मत्तां नै देख'र फीगरग्या। घड़णी-घड़णी बारे कुण घड़तौ हौ ! जूवै रमै, दारूडा पीवै अर पड्या वे रांड्या मैं । थोडा बरसां मैं माया मारगै लागगी अर खनै बंची नवनारायण री देह । मजा जिसी ई सजा। वेमारया-सेमारपां सरीरां ने किए जा कर नाखिया अर दीखण लागा आगला घर । छेकड़ जमराज रै पारंद में जब हुयर जाय पूगा अदालत में। मनजी ओर च्यार भाई । मनजी री लाई री आंख्या पांच बरसारी ऊंबर मैं ई सीवळ मैं गई परी । भायां में मोभी पर मनजी नै छोडर वीजा ।
[६६ A । मनजी मचकांवालो] दोय साधारण घड़णी जाणै । पण चीले वाप-काकां रै ई चल-निखद्, जुयारी, दारूबाज । रोट्या रा सांसा पडण लागा। आजीवका रोजाबक डोळ नहीं। छेकड़ गांव सं पग छूटा। रुळता-भटकता पूगा बीकानेर । अठे मैनत-मजूरी री कमी नहीं । मोभी जेसी, कदेई फंदोयां री भजूरी तो कदेई ठाठे री मजूरी जावै। बीजां दोय भायां दुकान खोली । एकतो वे कई घडर न्याल करण जोगाई को हानी पर बीजी अणसैंधा होवण सूं लोग धीज-पतीज करता को हानी । पण लाई मनजी मैं कोजी बीती । श्रांख्यां री आंधौ करै तो क्या करे ? छेकड़ उपाय काढ़ियो। रात नै लोगां रै मचका देवण जाये, तेल मालस करै । घंटै रा पाना दोय लेखें । घणी रात तांई भूत दाई भटकै । चौक'र गळयां मैं ऊँचक-नीचक जागा, खाडा-खोचरा, पाखळयां कुत्ता-बिल्ला अर गाय ढांढा बैठा रैता पण मनजी तौ रागोलिया करती डांगर सायरे निधड़क निकळ जातौ । अांधै रौ राम रुखवाळौ । भगवान री दया सू मनजी री मांयली आंख्यां खुलगी ही। लोगों ने दो श्राना में दो मजा मिळण लागा-पगचंपी अर सत्संगः प्रायक बधता गया। गुजारौ चोखौ होयण लागग्यौ । मनजी री बारली आंख्यां मींचीजियोड़ी पण मांयली खुल्ली ही। मनजी मचकांवाळी हो। ऊनाळे मैं, गळी-गळी मैं लोग लुगायां धररी चौकी तथा पार्टी उपर मनजीरा भजन सुणन सारू सूती-बैठी रैती । मनजी खनै मचका तो एक-दो जणा दरांबता पण भजन सुणावण वास्ता सगळे वैनै विता-फलाणो सूर रौ पद, फलाणी कबीर री साखी सुण कोई रूपादे वाळी सबद-'मलजी हुय जायौ संत सुधारौ थारी कायारे' गावण रौ कैतौ । कोई सुखी राम रौ भजन 'हलकारा खड़ा सिरकार का क्यों नींद नसैरी सोच, कागद नै तू कठे लुको' कोई बूढापा बैरी कद हुवैला थारौ छूटबौ' गावण रौ कैती मनजी सगळां रो मन राखतौ । भनजी सतसंगी पर मैनती हो।
- ७० ] [ जूना जीवता चितराम चारे भाई भेळा रैवै । मोभी सूं छोटे भाई नै परणायण री मनजी रे जची। रोट्यां रा फोड़ा पड़े जिके तो मिट । पण भाग में सुख किठै ? कई रात री कड़ी खाटणी रा पइसा अर कई चोटी लिखायर, मनजी भाई रतनै रौ च्यांव कर दियो। मनजी खरी फरजमंद हो। रतन-नांव रौ चोर, खोटी काचरौ टुकडो निकळियो : दुकान-फुकान कुरण जावै । पाखौ दिन जू रमै । कदै कुंई कमाय लेवे तो दारूड़ा उडाये । मोभी अर मनजी ऊपर ऊंधै घटोलियै तूं मूग दले। किणी भाग फूटोडै घडणौ दियौ तौ सोनौ-चांदी वेच खायी। मनजी नै रुपिया भरणा पड़िया-'भाभी नीपती जाय कौड़ो खेल तौई जाय' । मनजी जरणावाळी हो। रतन रा रोटी कपड़े सूजतन राखते थको यो कोजी लतां री लपेट में आयर एक दिन लंबी हुयग्यौ । जींवतौ ई राखस हौ, दारू पीर बहू नै कोजी तरै मारतौ । कर्णे ई बैरौ तिरणखौ, बीटी तो कणे ई बोरियो तोड़ ले जायतौ । आप मरियो पर बैनै ई मरण जोगी करग्यौ । छेकड़ बाई मनजी नै छोड'र, छयासी सं छूटगी! मनजी उदार र उपगारी हो। फेर मनजी नै अंधी सूझी। अबकलै बिचलै बीरै नै परणावण'री जची । देखियो कदास टुकड़ा सेकण सूपिंडौ छूट जावै । पइसौ माथै कढ़ायौ कुंई घर सू भेळियौ। मनजी रौ तौ देवाळी पीटीज ग्यौ पण भाई सुगनौ भिडीज ग्यौ । बौ हौ खोटी रतन तौ औ हौ असुगनौ-पक्कौ मनहूस ऊधै घटोलियै सू मूंग दळणियौ । केई दिन भेळी रै'र न्यारो घर मांडलियो । घडणी कई घड़'र न्याल करै ? पाखौ दिन जूवै रमै अर चिलमिया चेतावै । घर मैं अन-दांते वैर । मनजी रौ नांव लेयर थानै-म्हांनै ठग लावै पर मौज उडा : लुगाई टावर आपरी करणी। मनजी सू आ देखीजी कोयनी। वौ भौजाई-टायरा नै ले पायो । दाढ़स बंधायर कयो-भौजाई रो मत । अठैई भेळा रैवी। ।
मनजी मचकांवलौ ] [७१ दोय-च्यार दिनां छेड़े पापी सुगनौ कजियो करणनै श्राय ढूको । मारण लागौ लायण लुगाई नै । मनजी समभावण लागौ जणै लुगाई नै छोडेर धेरै ऊपर हाथ उठावण लागौ; मनजी मैं ही अांधी जोर । उठायार पटकियो पर बैठग्यौ छाती माथै । जणे हाथ जोड'र कैवण लागौ अबै इयां कदे ई को करूनी । मनजी कयौ-बडौ भाई जाणर कित्ती बार गम खाई है। अबकलै म्हारी मा समान भौजाई ऊपर हाथ उठायौ तो मनै जाणे ई है। सुगनौ कपूत तो होई पण कपूर बरण'र मनजी नै फेर दुख देयग्यौ। किणी मनजी नै कयो-थारै औ जंजाळ फेर घटतौ हौ। मनजी बोळियो-से आपरै भागरौ खावै है, कुण कई नै खुंवाथै है । ठाकुरजी टावरां रै भागरी मोकळी देसी। मनजी विधेकी हो। एक बार मनजी डांगरै सायरे काम जाय रयौ हो। मारग मैं ऊभी हौ'एक मारणी गोधौ। चई मारी अर घाल सींगां मैं र आधौ उछाळियौ । हाइ खळकीजग्या अर पोताळां मैं घणी चोट लागी। बडौ भाई लाई नै एकै मैं घाल'र बडोड़ी असपताळ लेय ग्यौ । पांच मइना ताई पठैई पड़ियो रैणी पड़ियौ । दिन-रात भजन चूंचावती । भजन रै परताप सूं असपताळ रा हिरदै हीण अर फुकनीवाज सेवकां रे मन मैं दया वापरगी । वे मनजी री पूरी साळ-संभाळ राखता। एक दिन एक जणै पूछियो-मनजी भायला, काल कई आखर खुलसी रे ? मनजी कयो-मनै कंई ठा भाई ? वो बोलियो-म्हारे ती साती जचे, सुपनै मैं एक सरप देखियो हो । मनजी कयो-ठाकुरजी चा तो प्राय जाये। दूजै दिन सातो ई खुलियो । अबै तो असपताळयाळा चैनै सिद्ध कवण लागग्या । मनजी बोळियो-हू कायरौ सिद्ध है । हूं तो निद्ध है; कपूत हूं', पापी हूँ। भगवान नै भूलियोड़ी-भटकियोड़ी हूँ। म्हारो किठे छूटकी होसी ? कोई सतसंगी सुख पृषण गयो जण मनजी कयो-ठाकुरजी करी सो पोखी ई करी। नहीं जद ने याद करण री टैम ई किठे मिळती? या कैती- कैती यौ गळगळी हुयग्यो पर पांच-सात वार मंडे सं हरि-हरि जपण लागो। ।
७२] [ जूना जीवता चितराम आग बोलियो-भाईजी! एक दिन तो सुपनै मैं जमराज रा दूत लेवण नै श्राय ग्या हा। मनें क्या सुख है, पण मरणी चायौ नहीं । इत्तै मैं ठाकुरजी रा दरसण हुया-मनोहर रूप, मोर मुगट धारण नै एक हाथ मैं वंसी। ठाकुरजी मुळकिया थर कयौ-मनजी घबरा मत । म्हारो भजन करतौ । हूँ तनै अबार मरण को दूनी। मनजी भगत हो । डागदरां तो छुट्टी देय दी पण इलाज पूरी हुयो नहीं । मनजीरै कुण पट्टी-पोळी बंधारण खातर असपताळ जांबतौ थे। एक दिन इसी जची जिको कई री बतायोडी देसी दवा बजार सूं ले पायौ । बैसू तर-तार फायदो हौवौं गयौ अर कई दिना मैं पूरी तरै तूं ठीक हुयग्यो । मनजी बेमारी सूं उठियोडौ, खनै पइसौ नहीं । एक दिन चौक रे पाट भाथै बैठौ उदास हुयौड़ी माळा फेर रयौ हो । सुस्ती अर थकावट सूं आंख्या इसी धुळी जिको वठैई गुड़क कर गुड़दापेच हुयग्यौ। सुपनै मैं ठाकुरजी कयो-उठ, थारे सिरांतियै एक कागदरी पुड़ी लाधसी । तनै जोयीजै जित्ता पइसा मैं मिळ जासी। श्रांख खुली तो साचै ई सिरातियै पुड़ी पड़ी । बै मैं मोकळी रेजगी ही। मनजी भीज्योड़ी अांख्या सं भगवान नै नमस्कार करी । रेजगी गिण'र, मनजी पाखर बाय दियो । निनूगै रुपिया आय पड़िया । मनजी इस्टी हो। कई दिनां ताई मनजोरै जचियोड़ी श्राखर ऊगतो ई रयो। पिरसिधी होषण लागी । लाळ लागगी, धूपाडियो सवदी करै । रात नै लाई आधी रात तांई हाइ भांगै, दिनूगै सबदी इयरा गोडा भांगे, बायो कित गयौ न पायौ। मनजी सबदागर हो। माथे मोकळा देणा फर लिया। माया चक्कर में चढग्यो । एक जणे कयो-मनजी, श्री क्या कियो रे डफोळ ? जणं यांसू कादर माथे मैं नइडौ लियो । कैयौ-माया लाएँ परभू नै विसरग्यौ । अथै लत छूटणी पोखी हुयगी। मनजी ने थापरी करणी ऊपर पछतायी हो। । ।
- २३ पौरायतणी-मदियै री बहू आधै सईकैसू पैला री बात है। पिरजा मैं पराधीनता री भावना घणी ओछी ही। लैण-दैण, बौपार-ब? मैं असरचौ पड़ जांवतो तोई लोग कचेड़ी री पराधीनता भोगणी को चांवता नी। पंच घाल लेंवता जिके दोनों ने सळटाय देवता । कैवत है-राज रौ तेड़ी नहीं पाये जम रौ भलाई आय जावे। लोग चौवटै सू' धान-चून, तेल-लूण लावता तो डीले । कूचे सूपाणी लावता तो डीले । लुगायां श्राटी पीसती तो डीले। गळी-गुवाड़ री परबंध करता तो पांच जण मिळ'र । राज रौ मूडौ को तकता नी। मरणै-परणे पांच भाई चलायर हाजर हुय जांयता पर काम-काज सळटाय देवता । पंचांरी बात परमाण मानीजती । पंच इसा जिकै झुकते पाळणे रा सीरू नहीं-परायो हित पैला श्रापरी पर्छ देखता । पाखंड-परपंच घणौ अोछौ । माईतां री परणाळ का ऊपर चलनी पण अांख्यां खुल्ली राख'र । प्राणी पांचवान अर पुरसारथी। परायौ नरग निचोवणौ पाप जाणता ।पुड़ी-पुड़ी मिनखां नै पळोटता-परखता । संयोग अर सायता री भावना भरियोड़ी। पोथा भणता-वाचता तौ जी लगायर पूरै परिसरम सू । मोथा-थोथा को रैंवतानी, भलाई पाखर-श्राखर पूछ लेयौ । जणे पिंडत कैवांवता-पूरी पढ़ाई रै ताण । परिख्यायां री पराधीता सूपर यता। पराई भासा परायो पैरेस सू परै रैवता । पराई भासा पढ़ता ई तो मन अर माथी परायो को करतानी। ठौड़-छोड़ सगळा मानीजता-पूजीजता। घिरणा अर ऊंच-नीच री भावना घणी श्रोही। परसेवैरी कमाई नै थाछी जाणता | पाप, पाखंड पर पचेडां तूं परै रैवता । क्या-क्या गिणावां क्या-क्या बतायां ? धापरी पांच भूतां री काया पर संचियोड़ी माया रौ परबंध हाफे ई फरांवता । पोलसरे परवस नहीं। .
७४ ] [ जूना जीवता चितराम हां, तो इसी परबंध बांध राखियो हो के रात नै पौरायतिया गळी-चौका मैं पैरी देवता । पोलस री पंचायती को हीनी। पौरायतिय रे रोटी-कपड़े री परबंध गळी-गुवाड़याळा करता। इसी सुणनै मैं आई है के पर्छ पोलस पैरी देवण लागगी। तोई पोरायतिया चलता रैया । पण पोलस धमकी दीवी के पौरायतियां रे पोरै मैं, कदास, चोरी-चकोरी हुई तो पोलस जिम्मेदार नहीं वणैला । जणे श्री परबंध पराये हाथां गयो । पौरायतियां रो पौरौ यंध हुयो। पैला, रुपयै मैं, पनरै पाना, लोगां रा घर कच्चा हा। होळी-दियाळी वे दडीजता-लेसीजता अर पोतीजता । पण औई काम लुगायां खुदौखुद करती। हाफेई रोही मांय सूगुड लांबती। फोटां रौ काळ को होनी श्राज दाई घर-घर गायां ही। फोटा अर छाणियो. मुड़ सूदड़ा दरीजता-लेसीजता। पछै आयती रंगाई-पोताई री बारी । इण खातर ई परायै मसालै अर पराये हाथां री परबसता को भोगता नी। पौरायतणी धोळी लाल मिट्टी खारोटिया भरर पूगाय देवती अर घर री लुगायां हाफेई घरां री पोताई कर लेंवती। मदियै री बहू म्हारी गळी मैं धौळी-लाल मिट्टी जोईजती जित्ती पूगाय देंवती । दिसा रा हाथ धोत्रण सारू पीली मिट्टी ई लाय नाखती। मदियै री बहू पौरायतणी ही। वैरी ऊंबर साठा अई-गड़े ही किरड़कांटियौ सरीर पण तांत करारी, काळी वरण, छोटी-छोटी आंख्या, चैरै माथै सळ पड़ियोड़ा, ओछी लिलाड़, धौळा धक्क विखरियोड़ा केस, सरीर माथै बोदी कसदार अंगरखी पैरियोडी, वा फाटी काळी ओढणी श्रोढियां अर पगां मैं फाटी फीड़ी पगरखी पैरियां राखती। माथै खारोटियो धर'र, बा विरत रै घरां मैं मिट्टी पूगांवती। वैरी जागा बैरी ई काण-कायदो हो । छोटा, दादीजी, नानीजी कयता । बड़ा आदर सू' बतलांता । साईना, साईना-दाई बोल-बतळांवत्ता।
७५] [पौरायतणी-मदिय री बहू मिट्टी पूगायती जिकै दिन एक सापती रोटी मिळती । दाळ-साग हाजर होयतो तो बोई घालता। चार महीना में उतारू गाभा देवता। टांकडे-तिवार माथै रीत मुजय धान देवता । कदेई या कई सू ना तो चिड़-भिड़ती अर नाई घणी-थोड़ी फैयती। मदिये री बहू संतोखण हो। मरण-परणे मैं नेग मुजय चैने ई कई दे दिया करता। चा राजी होयर लेंबती पर थासीस देंयती यधोतरी मैं । मदियै री बहू भोळी-डाई लुगाई ही । श्राडै दिन नितरी सिंज्या नै वा गळी मैं श्रांयती पर घर आगे ऊभ'र हेली पाइती-'अडोई देवी मां-बाप ।' बैरी मीठी बोली सुणार टायरं हरखांयता, श्राधी रोटी बैनै देवण दौड़ता। टावरां ने श्राया देखर पा धणी राजी होवती । टायर येन-लौ दादीजी, लो नानीजी कैवता जणे बैरी जी सोरी हुय जांयती। मदियै री बहू सुवावरणी ही। मदिये री बहू नै मरियां जुग-जमारा हुयग्या । म्हे लोग टावर हा, जणे या आंवती ही। पण हाल तांई कुनै म्हे भूल गया होघौं इसी बात कोयनी ।
- बौंजी खाती वीजी दळती श्रीस्था री हो । रोटी खामणी, दाड़ी पर केस करड- कायरा, पक्की रंग, लिलाइ माथे रामदेवजी री रिख्या लगायोड़ी, अांख्यां छोटी-छोटी, कान टिरियोड़ा, जाडा भंवारा, पैरण ने एक बंडी, खधि माथे रेजी रो अंगोली, लट्ठ री ऊंची-ऊंची घोतियो, माथै दमालो पागड़ी-गट्टी जिकै अपर काळी ऊन रे जाई डोरे मैं पोयोड़ा रामदेवजी रा पगलिया बंधियोड़ा, पगों में खुडा-खांच देसी कारयां लागोडी पगरखी, बीजे सांधे एक जाड़ी मैली मोळी लटकायोड़ी जिकै मैं जोयोजता राब-बसोली, रंदी, करोती, बीएया, हथोड़ी पर सार। वीजी खाती हो। म्हारी गली में चीजो हफ्ते में दोय यार तो बांयती ईज । चैनै संतसंग री सौक हो । म्हाी गळी मैं पाधरौई बाजी रतनलालजी रै घरै जाय हकती। रतनलालजी री सोजी गई परी ही अर गंठियै रै कारण टुरीजती-फिरीजती को होनी । वे घर मैं ई ठावा लाधता । वीजै ने पायो जाण'र रतनलालजी घणा हरखता, पाणी री मिनधर करता। पछै दोये जणा दो बोरयां माथै आमा-सामा बैठ जांवता । ज्ञान-बैराग री चरचा छिड़ती, हौले-हौले सबद गाईजता। दोये जणा इसा मस्त पर लीन हुय जांवता जिको दीन-दुनियां री सुध ई को रैवती नी । सिंज्या पड़ी बैगीई रतनलालजी री बहू बेसण सेकर वेदवी पूड्यां तळ देवती। दोये जगणा जीम लेवता । पछ चीजों माडौणी घर रौमारग लेबतौ । वीजी रोज नेम सं रामदेवजी रा दरसण करण जांवतौ । बारी घणी मानता राखतौ । रोज पखाल करांवती, धूप खेवतौ । घणी वार जम्मी दरांवनौ । चारै ग्यारस रै दिन नारेळ वधारती, सीरणी चढ़ावती-बांटतौ।
- बोंजी खाती] [७७ दोय जणा भेळा होयता जणे वीजी भगती भीजर कैंवती-बलिहारे, वा २ परचा री क्या-क्या बात फै। फलाणे अांधळे नै वा आख्यां दीनी, फलाणे पांगळे नै पग, फलाणे कोड़ियो रौ कणक झडायो। बायो हाजरी हजूर है। बीजी भगत हो। धीजी, मांचा सालती, घट्टी री पाथी मकड़ी करती पर पीजी खोटवौं काढती । कदै ई जच जांयती ती घट्टी टांच ई देवतौ । दैनगीरी रूण उण दिन एक रुपयौ ही बीजो ई इण सं श्रोछौ को लेंगती होनी । रतनलालजी रै घर मैं ई काम पड़ती, तो ई, रुपथै संभोली को लेंवती नी । मुलायजै संजीम भलाई जांवती। म्हारी गळी गुवाड़वाळा सं वीजी घणी मीठी बोलतो, ज्ञान बघारती । प्राधै-चौथाई दिन में होवण याळे काम में यौ तो पूरी दिन लगाय देवती । जणे कवता-इत्तै से काम मैं दिन पूरौ करदियौ जणे उथळी देवती-कामनै तो टैम लागसी । म्हारै सूं नहीं पतीजी तो श्रागै सूं बीजे नै बुलाय लिया करो। अधेलोई गोली लेबण नै राजी को होंवती नी । ज्ञान-गोचर मैं, यो जित्ती सैणी हो, आपरै मुतलब मैं, उण सं ई, सवायो सैणी हो। म्हारी गळी मैं, वरसां सं प्रावती, सगळां सं सैंध-पैचाण हुयगी ही। मेळजोळ बधग्यो हो । पण क्या मजालं जिको कई रो मुलायजौ राख देवै । गळी मैं एक जणेरै बेटैरो व्याव हो। जान मैं चौ बीजे नै मेळ. मुलायजै सं जीमायण लेयग्यौ । सारै घर सं दोय नारेळ दराया । ब्यांवरै घर मैं थोड़ी-घणी खोटवौं रैवै ई। तो वै बीजै नै काम भोळाय दियौ। बीजे ती मेळ-मुलायजै नै ऊंचो मेल'र झट ई.एक रुपियौ दानगी री मांग लिया। चींजौ मुतलबियौ हौ। बीजी पर रतनलालजी आज दोये परलोक सिधार ग्या। पण कदे ई गळी मैं कई खाती नै आयो जोयर, बीजै री याद आय ई जावै। दोय छाया चित्तर, आमा-सामा बैठा ज्ञान चरचा करता, आंख्यां आगै आय जावैः एक स्वार्थी श्रर बीजो परमार्थी रौ, । , .
२५ सिणगारी सैंसण सैंस्यां री जाती पैला तो उठाऊ चूला'र अपराधी गिणी जावती ही । सायद पोलसवाळा इयांरी निगराणी राखिया करता हा । उदबुदा जीव है । क्या बोली सू क्या पैरेस तूं । इयां री रैण-सैण अर रीत-रवाज न्यारे ई ढंग रा है। मैं निरदई अर अंत लोभी हुवै है। अब्बे-खब्य में, एकल-दोकल नै झै लूट-खोस लेवै अर मार ई नाखे । दुरगुण तौ इयां री नस-नस मैं भरियोड़ा है, गुण कोई हो तो भगवान जाणे । इयां री लुगायां इयां सूं घाट कोयनी । इयां रै माथै बांधण जोग्यां ई है। तेलण सूं नहीं मोचण घाट वैरी मोगरी बैरी लाट । औ लोग आदू सं कि सं उठिया, किठे-किठै रैया, किसी इयां री बोली है, किसी जात है, किणकिण भेळ सूं बा बणी है, इण रौ पती तो जात्यां रै निकास-विकास री खोज करणियां नै ई लाग सके। आपां नै इयै खटपटै सं क्या पिरयोजन ? सैंस्यां री जात मांगणी है । घर मैं चूलौ बाळण री तौ इयां नै सौगन है। दुनिया खायण-पीवण सारू कमावै है तो भै भेळा करण सारू । खावण- पीवण रै खरचैरी चिंता-फिकर ई तो मिनखा नै गिचाय-थकाय देय अर टिकाय देवै गोड़ा। वे चिंता संपीथीजियोड़ा रैवै है । कैवत मैं ई कयौ है'क:- भूल गयी रंग-राग भूलगयी छकडी। तीन बात याद रही तेल-लूण लकड़ी। पण सैम्यानै तीना री चिंता रैवै कोयनी । जणै ई ढूंठ-रा-इंठ धणिया डोले है। किले ई जीमण जूठण हुवै तौ कागली अर सैंसी तो उठे पूर्ण है। कागलो उडायां तो उड़ जाये। जमै जिको इसा जमै के बिना कई लीया इयां ने जमराज ई उठाय ले जाये तो मलाई मादाणी ठौड़ छोड़ी।
A . सिणगारी संसण] [७६ सरम-हया, मान-अपमान, तो जुगां तूं इयां री आंख्यां पर मनां सं फरलंग हुय चुका । तो इयां खने जमा-पूजी ई मोकळी हुवै । कैवत मैं कयो है-'धन तो सँस्यां खनै घणी हुदै ।' छोरा-छंडा, टायर-टीकर, मिनख-लुगायां, तबला श्रर मैला-गिंदा कटोरा लेयर लोगां रै जीमण री वेळा सूं थोड़ा पैलाई घरां तूं उल्लर जाये । श्राखौ दिन गळी-गुवाहां मैं गोता खांवता फिरै । भलाई इयांनै फटकार दो, ललकार दी, धमकाय दो, अठै ताई लकडी उठाय लौ पण बदा तो इसा नकटा-सुरड़ा हुवै कै खिसकै ई कोयनी । कई दियां सू ईज इयां तूं पिंडौ छूटै । इसा वदमास जिको मुंजोरी न्यारी करण लाग ज्ञावै अर काढ़ण लाग जात्र गाळ । टाबरां नै ठगण सारू लकड़ी रा डेडरिया पर पूर री दड्यां राखे । तौ सैंसण सिणगारी म्हारी गळी मैं नित री फेरी देय जांवती। लंबी तडंग, काळो-कोजी उणियारी, चूंखा विखरियोड़ा, फाटा गाभा, फाटौ ओढणी, पीळा हुळक दांत, फोटै दाई नाक, बड़ी-बड़ी हया-दया बायरी आंख्या उभराणा पग, गिरियां सूं ऊंची कांसी री कड्यां पैरण नै एक हाथ मैं घोचौ अर बीजै मैं मैली-गिंदी कटोरी। फलाणे री मां, फलाणै री दादी, फलाणै री नानी-म्हारी ई सुणाई कर ए। कई घाल ए बडभागण, कैयर घर आगे अड़ी कर'र ऊभ जांवती । टावर रोळी सुण'र बार निकळता जणै बाने पूर री दडयां देखाय'र लकडी रा वाजणा डेडरिया बजायर कॅवती-रोटी ला भाइया रमतिया देसूं । सुणाई होवती कमती देखती जणै फेर वडंग मारती-ए घाल ए भाइयै री मां, थारै भाइयै री हजारी ऊंअर करै-थारौ सुवाग वधै । इण सूं ई. पार नहीं पड़ती जणे गावण-नाचण लाग जांवती। अपजोडिया सूगला गीत गांवती:- हाए, के लिछी थारी गोळ पिडियां गोळ पिडियां, 'गोळ पिंडियां हाए जोबन • झोला खाय चिमूड़ी मार फटकारौ थारै जोजन रो मार निजारी थारै नैणां रौ - । . ८०] [ जूना जीवता चितराम नाचती-गांयती जणै छोरा-छंडा भेला हुय जांवता। ताळयां वजावण लागता । कोई-कोई बडाई वार निकळ प्रांवता । नाच-गायर सागी ई सभोग देवती-ए लाए भाइयै री मां, थारौ चूडौ अखी रैवे, सुवाग बधै । ए घाल ए कोई वासी-फूसी टुकड़ी। ए दे ए बडभागण हाथ रौ ऊतर । इयां गळी मैं राफड़ घालती जण घर-घर सं रोटी-टुकड़ी मिळ जांबतौ । जणे मांगती दाळ-साग । पछै पिंड छोडती। श्रीसर-जीमणवार हॉयती जणे कनाथ रै बार ऊभी रैवती। टावरां नै रमतिया देखावती, डेडरिया बजावती। कैंयती-ऐंठ घाल मनै, रमतिया घणा देसू । जितै जीमण उठतो नहीं उत्तै बा खेळौ छोड़ती नहीं। व्यांव-सावै, मरण-परणे, या घर री खेळी छोडती ई का हीनी । घरवाळा पैसं उथप जांवता पण वा का उथपती हीनी । हमैं तो सैंसी-सैसण श्रावणा घणा श्रोछा पड़ ग्या। कोई कदेई भला ई प्राय जायौ । हां, जीमण-जूठण ऊपर तौ हाल ई कागला चूकै तौ अ चूकै। हणे कई बरसा से एक दिन सिणगारी म्हारी गळी मैं आई। धणी बूढ़ी हुयगी ही। बतायौ हूँ परदेस गयी परी ही। बडी-बूढी लुगायां बैनै देख'र हरखी, बैं सं बातां करण लागी । दुख-सुख री पूछण लागी । चलाय'र घर-घर सूबने रोटी दी, दाळ-साग घालियो । उठै ई जीमायर बैनै ठंडी पाणी पायौ । देख'र घणो इचरज हुयो अर मन में विचार उठियो के ममता ई किसीक चीज है। पछै तो फेर सिणगारी नै देखी ई कोयनी । मोकळा बरस हुयग्या । हमैं तो मरईगी दीखे है। चोखी-कोजी, सुवावरणी-अणखावणी घटनावां मनां ऊपर किसौक हळको- फीको असर छोड जाबै है जिको सिमरती मैं लंबाण तांई धूधळी-धूधळी बरिणयौ रैथै है।
२६ - बाली सामी - N वाली सामी-नित नेम सू, सिंज्या नै, म्हारी गळी मैं श्राया करतौ । लंयौ खामणी, अध बिचली अांख्या, धौळा केस, वडी मूंछा, लंबी दाड़ी, चवडौ चनण चरचियोडौ लिलाड़, जिकै ऊपर च्यार रेखायां कान टिरियोड़ा, माथै धौली पागड़ी, पैरण नै बोदौ ढीली चोळी जिकै रै ऊपर एक धोळी चदरौ ओढियोडी दोनां वंगलां मैं च्यार मोळया लटकायोड़ी, गोडां साइनी धोतियौ, पगां मैं देसी जूती पर हाथ में एक लंबी लकड़ी जिकै रै माथै लोरौ एक जाळीदार पौली, जिकै सं लटकती एक सांकळ । घर मैं वंडतो ई, बालौ, जै गोपाळजी री कैंवती। जणै घर मांय सं कणे ई गंवारी तो कणै ई बाजरी री रोटी, कणे ई आटी घाल देवता। टावर, वाले नै झूम जांवता । कैवता-वाबाजी छुट्टी दौ-बाबाजी छुट्टी दी। पैला मनै, पैला मनै, कैयर आपस में लड़ता-झगड़ता । जणे, बाली, छोरां रै हाथां सू पोले सूं लटकती सांकळ छूवाय देवतौ । सगळां नै राजी कर'र चल धरती। वाळी बाजरी रीर गवां रौ श्राटो, गयां री अर बाजरी री रोटयां, न्यारी-न्यारी झोळयां मैं घालती। बाली गोपळजी रेमिंदर रौ झोळी फिरणियो हौ। बालो पर बैरे घरवाळा गोपाळजीरै मिंदर में सेवा-चाकरी करता। बासी फूस वारी काढ़ता, पाणी भरता, मटक्यां छाणता, गायां नै चरांवता. पांवता, चाटौ देय'र दूध दूवता, तुळसीजी नै सींचता, मैतजी री रसोई करता अर चौवटै सं सवदी-सूत लाय देवता। इणरै बदले में वांनै मोळी रौ मोकळी आटो, मोकळी रोटयां नितरी मिळ जांवती । तिवार-टांकड़, जीमण-
८२]
[जूना जीवता चितराम
जूठण ऊपर गोपाळजी से कांसो पुरसीजतौ जिकै माय सं मैतजी थोड़ी जिनस
राख'र बाकी री, बाले नै देय देवता ।
आ बात को हीनी के बालो पर बैरै घरवाळा मिंदर री रोटयां ऊपर ई
जी जमाये बैठा रैवता । पसवाड़े बीजी ई मजूरी करता ।
वाली माचा बरणतो, निवार रा ढोलिया बणती, छपरा छांवत्तौ। चोखी
मजूरी कर लेंवतो, बेटा ई सेठारै अर राज मैं नोकरी करता।
बालो पर बैरी परवार पक्को मैनती हो।
बालौ मिठ बोलौ, भलौ अर मिळणसार हो । घर में ई सोरी हो।
सगळे वैसं राजी रैवता बौ, सगळां रौ मुलायजी राखतो अर भौळायौ काम
कर देवतौ।
बाले नै परलोक पूगियां नै मोकळा घरस हुयग्या। हाल ई जद
गोपाळजी री झोळीवाळी सिंज्या नै श्रावै अर टावर बैन लटूब जावै जणे
वाले री पुराणी याद आये बिना का रैवेनी।
..
२७ तेजी सोनार तेजै रौ ध्यान आंवतै ई एकबार तो काळजे मैं हूक उठण लाग जाये । जी कळमळावण लाग जाये। एक दिन लाई मल्ला-पट्टां मैं हो, खनै दो पईसा हा अर ही साख-सोमा । पण एक दिन इसौ आयो जिकी खावण नै टुकड़ा ई मिळणा दोरा हुयग्या । तीजोड़ी बूढ़ी बहू लायण वाणियां रौ खोरसौ करती, चौकी परतण करती पर दो पइसा लावती । अठीनै तेजै रै एक तो दिनांरै फेर सू घड़नौ आंवतौ ई को होनी । रुळियौ खुळियौ काम बतौ जिकोई वैसं पार को पड़तो होनी । कारण सोजी मंद पड़गी ही अर बैठकबाजी इत्ती हो का - - सकती हीनी। करमा रौ चक्कर इसौ जोर सू चलियौ जिको लाई तेजैनै चकरडंडी चढ़ाय दियो । जिकी गळी मैं वौ जवान सू बूढ़ी हुयो, वा गळी ई छूटगी। चीजी श्रण सैंधी ग्याड़ में जायर बसणौ पड़ियौ। जूनी गळी री तौ इंट-ईट भाठी-भाठी सैंधौ हौ । नवी जागा, सगळी बातां नवी। नया उणियारा नवौ यौवार । घर मैं खावण रौ कसालौ ऊपर सू सोजी मंद । भूख तो दोयां वखता लागे । पण भूवाजी सासती घर मैं ई बसै । भूख'र भूवाजी मैं माईत-टावर याळी नाती। लाई तेजी सारी तर सूं खफाखूद हुयग्यौ । जणै एक विध बैठाई । लुकर रेलघाट जावतौ परौ । उठे मजूरी करती। सिंज्या ताई पाटै-लूणवाळा पइसा कर लावती। पण सरीर अकड़ जांबतौ जाणे डांगां सूकूटियोड़ी हुदै लाई कद मजूरी करी ही दिन बदलैन मजूरी करें। अभाग कैव-हूं तनै समूळी ई गिट जाईस । कंई मजूरी कर'र आप, तौ कई बहू खोरसौ करर लावती जिकै सू चेपो चापी चलती हो।
? ६४] [जूता जीवता चितराम पण एक चात इसी हुई जिको मरियै ऊपर फेर लात लागी। एक बियाणी तेजैरी बहू नै सोनेरी जिनस चोरण रौ चोचौ लगाय दियो । पोलस आई । डोकरी नै जबते कर'र कोटवाळी लेयगी। लायण रोय-रोयर कैवै मैं चोरी करी कोयनी वापजी, पण कूण बैरी सुणै । तेजै नै ठा पड़ी । लाई रोवती-बिलखती जूनी गळी में आयो । गळीवाळा दाना-धूढ़ा कोटवाळी गया। तेजै री बहू री खातरी दीवी अर जमानत देयर छोडाय लाया। दोनू जण लाख-लाख आसीसां दीवी। पोलसबाळां गरीबणी नै इसी कूटी-इसी कूटी के अधमरी करदी। केई दिनां ताई मांचै सं उठीजियौ ई कोयनी इयै वात रौ तेजै रै हिरदै ऊपर धणी गैरो असर पड़ियौ । पण जोर क्या वटै ? बैनै मजूरी ऊपर तौ गया ई सरे, नहीं जणे टुकड़ा किठै सं मिले। दोय तो आप, एक लाई अभागी छोरौ। छेकड़ तेजै रै जंवाई-बेटी री सौक रै धणी, नै ठा पड़ी। बौ श्रायो अर छोरै'र डोकरी ने गांव लेयग्यौ । तेजौ, नौ, जित्तै खूट ग्यौ हो । इण घटना ने देख'र मन में विचार उठियौ कै कदास, सोनारां री कोई संघ बणियोड़ी होवती पर हरेक सोनार, कमाई मांय सं रुपियै लारै, पाई-पईसौ संघरै फंड में जमा करांवती होवती, ती, तेजी, कुत्तै री मौत को मरती नी । सोनारां री पंचायती तो है पण वातौ कई नै न्यात बार कर देवै, कई खनै डंड भराय लेवै अर कई रौ होकौ पाणी बंध कर देखें । इसी, जड़ री बात माथै, पंचायती रौ ध्यान ई क्यों जांवतौ हो । खैर छोडी। तेजी सोनार हो । चोखा दिन देखिया हा । मोकळी घड़यो यती हो। मोकळी पैदा ही । मिनखां मैं मिनख हो पर ही साख-सोभा, खाली ई को होनी। कैवत मैं कैवै है-'सोनार बेटी राई हांचळ काट लेवै'। पण तेजे उपर आ बान लागू का पड़ती हीनी । जूनी गळी मैं रैंयती जणै गळीयाळां तूं श्राछो-भायां जिसी चौयार राखनी । छोटी-मोटी गैण री टूटत-भागत सुधारतो तो कई सं कौडी ई को तेजी सोनार] [८५ लेंवतो नी । गळी री बाई-बेटी ने आपरी घाई-बेटी मानती। कई लुगाई रे सामनै भर निजर जोक्तौ को होनी । आपरै काम सूं काम । सगळां सं सेवा- सिलाम । सगळां री काण-कदर सगळां री मुलायजौ। तेजी पुण्यात्मा हो। दिनगै बैगी उठ'र तेजी जंगळ मैं दिसा-फरागत जांवती । पछै आयर दांतण-कुरला अर सिनान करतौ । फेर भगवान रा दोय नांव लेंपती । रामजी रे चित्तर धूप खेवती । पछै बरसाळी मैं श्रायर राछ-रूछ ठीकसर जगंबतौ- हथोड़ौ, हथोड़ी, कतियो बडी-छोटी, जंभूरी, सिंडासी, पलास, चूंथ्यां, रेती, छीणी, जिंतरी, कांटी-घाट, चांकी, मूस, पीतळ रौ दियौ, नाळ, रेती भिजोवणारी कुंडी, ऐरण, बाळकुंची, अंगेठी-अंगेठी, नवसादर, सुवागौ, तिजाब, पीसियोड़ी चूनी, सिंचा-छोटा-बड़ा। इग्यारस रै दिन कथा सुणती। रात नै माळा लेयर घणी देर ताई राम नाम जपतौ। कूड़-कपट आटै मैं लूण माफक-दासभाव परत तो सरधा सारू दान-पुन ई करती। तेजी धरमातमा अर भगत हो। तेजै री, पैलड़ी बहू इसी ही जाणे श्राभैरी बीज, सावण री तीज, चांद मांय सू चौरियोड़ी । अांख्यां मैं इत्ती सरम ही के कई सू चौ निजर ई को होवती नी । गैरणा-गांठा पैरियोड़ी साख्यात लिखमी दीखती। गुण ई लिखमी जिसा हा अर हौ नांव ई लिखमी। गळी री लुगायां सूं पूरी-पूरी हेत-मेळ राखती। दोयो री चोखी जोड़ी जची ही। जिठै लिखमी उकै दालद रौ क्या काम ? घर हंस तो हो । तेजौ, लिखमी नै, गळे रौ हार कर'र राखतौ। क्या मजाल जिको कदेई दिर-फिर ई कैय देव । अबन-छन करती। तेजी, नारी रौ खरौ मोलू-पारखू ही। इण लिखमीरे एक बेटी हुई-मोवनी । बाई मां ऊपर गई । कैवत मैं ई कैव है-मां जिसी डीकरी घड़े जिसी ठीकरी । - ८६] [ जूना जीवता चितराम मोवनी से व्यांव तेजै गाजे-बाजै सूं कियौ। गांव-गांव सू मोकळा सोनार आया । केई जान मैं, तो केई भायां मैं। गळी उंठां तूं भरीजगी । ऊंठारे नीर-चारै रौ बंदोबस्त कियो । श्रावणियां रै चिलमिया अर होकै-पाणी रौ ओपतौ जुगाड़ कियौ । गांयां सूं मिणायंद घी मंगायौ । आछा-आछा पदारथ-पकवान बणाया। पइसै नै काकरी कर दियौ । तेजी औलौदौलौ हो। गळी गुवाड्याळा नै हाथ जोड़र भेळा किया। बारौ घणौ मान- सनमान कियौ । बांई तेजै रै सगां री प्रापरै सगां दाई खातरी की। तेजे आपरी ठोड बानै ई थरप दिया। तेजै री बहू-लिखमी गळी री लुगायां नै चाय अर आदर सूं बुलाय लाई । बैरी तरफ सं बां सग्य री खातर की। तेजो घणी मेळू अर मीठो हो। पछे लिखमी सरग सिधारगी-बीजी घर मैं घाली । बाई थोड़ी जीवी। मर'र दुख-दगौ देयगी। हमें तेजी तीजी लुगाई लायौ। उपरडालै सं या घर मैं बड़ी । परणीजियोड़ी ईज सामै मवई बहै। इण रै बूढापै मैं जांयती एक छोरी हुयौ । तेजै रा कंईक आंसू पूछीजिया । पण चेमाता हंसी कैयौ- ऐ प्रांसं क्या पूंछ है हाल तनै आतूंचारी नदिया वैवावणी है। तीजी लुगाई 'गूजर' कैयावै, पण परणीजियोड़ी हुवै जिका । तेजै रौ दिन बदळियौ । लिखमी रै मरणे सूं लिखमी तौ पगे लागणा कर ई गई ही। पैदा ई पोची पड़गी अर पोची ई पड़गी निजर। बेमाता री गत वेमाताई जाणे । लाई इसै खरै भलै-भोळे, सीधे-सादे अर धरमातमा मिनख नै छेकड़, रोवाय रिबकाय'र, तरसाय-तड़फायर, परलोक भेजण रा करूड़ लेख लिखती वेळा वैरौ काळजी कांकर, भाठे दाई फाठी हुय ग्यो ? बाई जाणे। ।
तेजी सोनार] [८७ आज तेजै नै पग पसारियां दोय जुगां सूं ऊंचा हुयग्या । म्हारी गळी रे जिकै घर मैं पैली पोत चौ रैयतो हौ बोई पसर ग्यो। तेजी परलोक पूग ग्यो तो क्या हुवै ? धेरै सरीर रौ छाया चित्तर इयै लोक रै मानवियां रै मायले मना मैं तौ हाल ताई इसौ रौ इसी मंडियो पड़ियो है। बिचलो खामणी, गोरौ गट्ट सरीर तीखो नाक, बडी माथी, टाट पड़ियोड़ी, छीदा दांत, बड़ी-बड़ी आंख्यां जिकै ऊपर धौळी डांडयां रो चसमौ, जाडा भंवारा, लंबी काळी श्रोपती दाड़ी, माथै फूल गुलाबिया पागड़ी, पैरण नै कसां दार अंगरखी, ऊंची-ऊंची धोतियौ पगां मैं देसी पगरखी अर हाथ मैं छड़ी। जद गळी रा दोय दाना भेला हुवे, जूनी बातां री चरचा चलै जणे तेजै री बात अवस कर निकले । जिकै नै सुण र नयी पीड़ी श्रोतांवां रै माय तेजेरै गुणां री खुसयो पसरै श्रर.वे आपरी कल्पना रै सायरै आपरै मायले पासी मानरवै रे भोपते-सोवणे चित्तर रा धूधळा लीख-लीखाटियां खांचण - लागे।
२८ ऊमो दरजी माथै ऊपर बिदरंगी पागड़ी जिकै मैं जागा-जागा पोयोड़ी सुयां खसो- ळियोड़ी, प्रांख्यां ऊपर चांदी री डांडया रौ चसमी, लिलाइ माथै रिख्या लगायोड़ी, तीखा भंवारा, तीखी नाक, गोरौ रंग, दूवळी-पतळी सरीर, दाड़ी रा केस बिखरियोड़ा, छोटी मुंफाड, चिपियोड़ा गाल, बगलबंधी पैरियोड़ी, खांधै रेजी री गमछौ, हाथ मैं गज पर कतरणी लियो, गोडां साईनी धोती अर देसी पगरखी पैरयां ऊमी म्हारी गळी मैं श्राया करती । ची धणीसौक रतनलालजी वाबजी रै घरै ठेरिया करती। अर इयां गळी मैं सगळा रौ भौळायौ काम धंधौ करती। ऊमौ दरजी हो। ऊमै री ऊंबर पचासां सूं ऊपर ही पण वत्तीसी खंडत को हुयी हीनी। बौ छोटै टाबरां रा खलका, धूढी लुगायां री कसदार अंगरख्यो, बूढ़े मिनखां री बगलबंध्या अरचोळा सीया करती । सीयाळे मैं रुईदार अंगरखा- अंगरख्यां, रुईदार फतोयां, कानारी टोप्यां श्रर सूंथणा सीया करतौ । बौ जून ढंग रा कपड़ा सींवतो, नत्री फैसन रा कपड़ा बैनै सीवणा अवता को हानी। रतनलालजी सूं बैरै खूब छणती । खूब धुळ-मिळ'र सतसंग होपती, वीच-बीच मैं ऊमौ बनानाथजी माराज री बाण्यां रा बोल सुणावतो। बाण्यां मैं जोग अर वैराग रो विसै । इण मैं ई दोनां री रुचि ही। पण रतनलालजी भगत ई हा, भागोत ई सुणिया करता। मौई रामदेवजी रौ भगत हो । यात्यां निरगुण री आधी लागती पण आस्था सगुण मैं ई ही। जठे जम्मौ दरीज ती, बाण्यां गाईजती, वठे ऊमौ पूगती ईज । ऊमौ भगत श्रर सतसंगो हो।
। उमी दरजी] [८६ रतनलालजी रै घरै कपड़ा सीधावण रौ काम पड़ती तो उमौ रूण सू थोडी दैनगी लेंक्ती-बाई घणी कैवासुरणी करणे सूं अर रतनलाल रै जोर देयर आ बात कैणे ऊपर-'गाय घास सू भायला घालसी तो खासी कैन।' ऊमी मेळू अर मुलायजेथाळी हो। ऊमै नै गळी-गुवाड़ रा आदमी घणा चांवता हा। खासतौर सूं लुगायां तो बैतूं घणो राजी रैवती । वो टावरां नै राजी राख देवतौ । सीवाई लेवण मैं वाकी को फाड़ती होनी । दैनगी दो पइसा वीजां सू श्रोधी लेंवतौ । मौडा- धेगा पइसा देवता तौई मौड़-मपाटौ कदेई को करतौ हौनी। गळी मैं बड़ती जण लुगायां पार कर घूम जोवती । काई फाटै गाभै रै दांकी दरांवती, काई मिनखां री फाटी धोत्यां मैं डांडिया घलांवती । बौ सगळां री वेगार मुलायजै सं काढ़तौ घर पइसी ई लेवती को होनी। जमौ खरी सेवाभावी अर परमारथी हो। रुपियै-बारांना री मजूरी वण जावण सं ऊमी काम छोड देंयती पर ज्ञान री पोथ्यां कुचरण लाग जांबतौ । कणे ई च्यार सतसंग्या नै भेळा करर सतसंग छेड़ देवती कोई मातमा साधू-संग, पधारता तो कमोधू चूकै तौ बार दरसण नै चूकती। आप सं वणती पत्तर-पुसब सं सेवा करतौ। डीलै बारी सेवा करतो, मचका मुट्ठी देवती, गामा धोय देवतो, फाटी चादरां रै टांका लगाय देवती। बठे सतसंग उपदेश भर ज्ञान चरचा होवती, तो बो सगळां सतसंगी भाया नै बारै धरां तूं बुलाय लावतौ । ऊमौ मातमावां मैं घणी श्रद्धा राखतौ हौ। ऊमैं मैं ज्ञान हो, त्याग ही, सेवा ही अर-ही परोपगार री भावना। बी बस पडियां हालती कीड़ी नै ई दखल को देवती नी-वैरागरी पासी बैरी घणी रुचि ही। उमेरो सरीर कायम को रयौनी। पण वैरी सज्जनता अर गुणां री खसबू हाल ताई कायम री कायम क - - २६ - पंखैवालो पंखेवाली सं जूनै सनै सू म्हारी गळी मैं पाया करती हो। श्री कूण हो, क्यों गांवती हो, इण री एक कथा है । जिकै रौ संबंध इतिहास सूं है। कै है के एक बार यादसा औरंगजेब मन मैं इसी धारी के सगळा रजपूत राजायां नै मुसळमान यणाय दिया जाय । तो पछे बांरी पिरजा सोरी- सोरी मुसळमान बण जासी। एक खडाजंतर रचियो गयो। सगळां राजावां, अमीर-उमरानां नै, बादसा अटक नदी रे पार श्रावण रौ हुकम भेज दियो। उठे छानी-मानी इसी जडाजंत तजवीज जचाय राखी ही कै सगळां नै सागै ई मुसळमान वणाय दिया जाये। इण गुपत भेद री ठा पड़गी एक जीपणसा फकीर नै। अटक नदी र कांठ राजा लोग सुख सू बैठा गुलछर्रा उडाय रया हा । हा-हा-फी-फी हुय रयी ही ही। जीवणसा फकीर काळी कांबळ अोढ़ियोड़ी छानी-लुकती बठै आयो और सगळां नै सावचेत करर कैयौ-थे तो अठै गाफल बैठा हौ । काल थाने अटक नदी पार करनी है। थारे वै पार पूगतां ई बादसा सलामत थां सगळां ने एक सागै ई मुसळमान वणाय देसी । हूं थाने सावचेत करण नै नायौ हूँ । संभळी-संभौ अर इण आफत सूबंचण री बैगो उपाय काढ़ो। फकीर तो कैयर फर्र । सगळां रा चैरा फक्क । दुगटुग एक बीजै री मुंडो जोवे । गळे-घांटे नहीं आये । कूण पाड़ सू माथी टकराये ? कूण काळे ने धूड़ वाथै ? कूण चलाय'र मौत नै तेड़ी जाये ? फूण दिन आई मरें। कूण स्याम सूसंग्राम मांडै । - पंखेवाली ] [९१ जरी बीकानेर नरेस श्री करणसिंहजी नै इस्ट देवता री प्रेरणा हुई। बोलिया-मनै एक उपाय उखतियो है। इयां करो। बादसारी परधै नै को- पैला राजा लोग बै पार जासी ।श्रा वात वे मरियां ई को माननी । बारी सान ओली को हुय जावैनी ? वे श्रापां सू पैला बयोर हुय जासी । बाने पूगायर जद नावां पापांन लेवण नै पाठी आवै तद वांरा टुकडा उडाय दी। पाथा टुर पड़ी थापा र देस । कद नयी नया वणे अर कद वैपारवाळा, पाला श्रावै ? जित देख दाता है, फेर काई सोचसां। बात तो सगळां रै हाडो-हाड बैठगी। पण आगीवान बणै कूण ? जद श्री करणसिंहजी हांकारी भरियो । धूरी तखत अणियो। सगळे राजा मिसल-सर ऊभा । पाने चादसा थरपिया । जोर-जोर सूवारी जै बोलाई । श्रर धाने 'जय जंगळ घर बादसा, री पदवी देयर बांरी पूजन, सनमान कियो । पण जीयणसा फकीर रै उपगार रो वदळी चूकारणो हाल बाकी ई रैयग्यो । जणे सगळां मिळे'र रजवाड़ में घर-घर सू एक-एक पइसौ उपरावण रौ बैन पट्टी लिख दियो। उणी जीवण सा फकीर रैपरवारवाळा राजायां रे वखत ताई बरावर उघराई करता हा । श्रापर खनै मोरपांख रो पंखो राखण सू पखैवाळा' । कैवाया। . तो म्हारी गळी मैं फकीर अबदुल-रैमान सा आया करता । अरबी- फारसी रा वे श्राका विदवान हा । बिचलो खामणी, भारी सरीर, बडी बडी अांख्या, जाडा भंवारा, मैंदो सूरंगियोडा केस अर दाड़ी, कमेज पैरियोडी, तैमल बांधियोड़ी, माथै मलागिरी फैटी, पगां मैं पंजाबी पगरखी, एक हाथ में पंखो पर बीजे मैं छड़ी। घर सामै उभर करारी घोरदार आवाज लगांवता- हरदम चेत, लात्रौ माई एक पैसा।' गळीवाळा, बारौ घणौ श्रादर करता। दावर बानै देखण नै भेळा हुय जांबता । कई घरां तांई बारै सागै-सागै जांवता । लार सूवारी नकल कढ़ांवता ।
६२]
[ जूना जीवता चितराम
लारले दिनां मैं, साजी रै गले में खराबी हुयगी ही। बोली बैठगी।
धाघी पड़गी ही।
साजी नै कोई पइसी नहीं देंवतो तो वे दावौ करर ले सकता हो । एक
वार इसी ई वारदात सायत चूरू या रतनगढ़ में हुई ही, इसी सुणने में
आई है।
पछे इण रै बदळे मैं राज सू१००) महीनौ साजी री बंध ग्यौ हो।
मोकळा वरस इयै बात नै हुयग्या पण हाल ताई साजी ने लोग
भूलिया कोयनी।
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