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कृयोद्दीश
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३२
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॥ श्रीः॥
इन्द्रजिद्विरचितः
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नियोड्डीशः।
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पं० लालमनशर्मकृतभापाटीकासमेतः
तथा
पं० बलदेवप्रसाद मिश्रसंशोधितः ।
स चायं
श्रीकृष्णदासात्मज-गडाविष्णोः
अध्यक्ष " लक्ष्मीवेंकटेश्वर” मुद्रणागारे
मेनेजर प०शिवदुलारे वाजपेयी इत्यनेन स्वाम्यर्थ
मुद्रयित्वा प्रकाशितः।
संवत् १९८०, शकाव्दाः १८४५०
कल्याण-सुंबई.
सस्य ग्रंथस्य सर्वेऽधिकारा यंत्राधिकारिणा
स्वायत्तीकृताः।
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1
ॐ नमो गणेशाय ।
क्रियोड्डीशः।
आपाटीकासमेतः।
आनन्दशिखरारूढं पार्वत्या सह शंकरम् ।
पप्रच्छ गिरिजा कान्ता पुनर्नत्वा वृषध्वजम् ॥१॥
आनन्दशिखरके ऊपर विराजमान श्रीपार्वतीसे शोभित
श्रीशंकरजी महाराजको नमस्कार कर श्रीमहारानी पार्वतीजी
पूछने लगीं ॥ १॥
पार्वत्युवाच-भगवन्सर्वदेवेश सर्वज्ञानपथ प्रभो ।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि नियोडशं विलो वद ॥२॥
श्रीपार्वतीजी कहनेलगी हे भगवन ! हे सर्वदेवंशः ! हे सर्व
ज्ञानमय ! हे प्रभो ! इस समय क्रियगड्डीश सुननेकी मेरी अति
इच्छा है कृपा कर वर्णन कीजिये ॥२॥
ईश्वर उवाच-शृणु देवि प्रवक्ष्यामि उड्डीशं तत्रभु-
तमम् । गोपितच्वं प्रयत्न मन स्वप्नाणवल्लभ॥३॥
मियोझीश
श्रीशिवजी पहनेलगे, हे देवि ! श्रवण करो तन्त्रोंमें उत्तम
उड्डीश तन्त्रको बाहता हूं, हे प्राणवल्लभे ! यह तन्त्रोत्तम
उड्डाश तन्त्र सर्वथा गोपनीय है ॥ ३ ॥
शांत्यादि पद वाणि तेषां लक्षणं च ।
स्वदेवतादिकालादि ज्ञात्वा कमाणि साधयेत् ।
शीतांशसाल लक्षाण व्योमवायुहविझुंजः॥४॥ एतेषा
वाजयोगेन ग्रथनातिक्रमण का साधयेत् ।
लं संयं।
शांति आदि पद कर्म और उनका लक्षण कहाजाता है।
निजंदवता, दिक्, कालादिकको जानकर कर्म साधन करे ।
चन्द्र, जल, पृथ्वी, व्योम. वायु, अग्नि ॥ ४ ॥ इन छाके
धांजयांगस ग्रथनादिक्रमपूर्वक कर्म साधन करे। ठं, वे, लं, हे,
य, वं, यह छः एन छहों देवताओंके वीज हैं।
तत्तवता-रतिवाणी रमा ज्येष्ठा मातङ्गी कुलका-
मिनो । दुर्गा चैव भद्रकाली कमोदी ताः प्रपूज-
येत् ॥६॥ वसन्तायतकालनियमः।
रति, वाणी, रमा, ज्यहा, मातंगी, कुलकामिनी, दुर्ग,
समालो पुन दलालाका को खादिन पूषन करे ॥ ५ ॥
१९" मापाटीकासमेतः। पसन्त आदि ऋतु कालनियममें ग्रहण किये हैं। इति क्रियोड्डीशे महातन्त्रराजे देवीश्वरसंवादे प्रथमः पटलः॥१॥ अथ सर्वरोगमुक्तिकवचम् । श्रीदेव्युवाच-देवदेव महादव सुरासुरनमस्कृत । इदानीं श्रोतुमिच्छामि रोगमुक्तः कथं प्रभो ॥१॥ श्रीपार्वतीजी कहनेलगीं। हे देवदेव ! हे महादेव ! हे सुरा- सुरनमस्कृत ! हे प्रभो ! इस समय मेरी यह इच्छा है कि, रोग- मुक्तिका उपाय आपके मुखारविन्दसे सुनूं अर्थात् साधक लोग किस प्रकार रोगमुक्त होते हैं ॥ १ ॥ नास्ति नाता च जगतां त्वां विना परमेश्वर । वरादिवारण शीघ्र कृपया पश्या वद ॥ २ ॥ हे परमेश्वर ! आपके विना त्रिलोकरक्षक अन्य नहीं हैं अतः हे प्रभो ! कृपापूर्वक ज्वरादि रोगोंकी निवृत्तिका उपाय वर्णन कीजिये ॥२॥ ईश्वर उवाच-कणयानि तव स्नेहात्कवचं पारणं महत् ॥ श्रीशिवजी कहने लगे हे प्रिये ! तुम्हारे स्नेहसे मैं मरादि रोगनाशक कवचको कहता हूँ।
क्रियोड्डीशः। ॐ नमो भगवति वनशृंखले हनतु भक्षतु खादतु अहो रक्तं पिब पिन नरवक्षास्थिरतपटे अल्माङ्गिमम्मलि- तशरेरि वज्रायुधे वज्रपाकारनिचित पूर्वीन्दिशं सुञ्चतु दक्षिणां दिशं मुञ्चतु पश्चिमां दिशं मुञ्चतु उत्तरा दिशं मुञ्चनु नागार्थ धनग्रहपति बन्धतु नागपी बन्धतु यक्षराक्षसपिशाचान् बन्धत प्रेतभूतगन्धर्वा दयो ये केचिद् उपन्यास्तेभ्यो रक्षतु ऊर्य रक्षतु अधो रक्षतु श्येनिकांपञ्चतु ज्वल महाबले एहोहि तु मोटि मोटि सटायलि पत्राशिवज्रप्राकारे ऐं फट् ह्रीं ह्रीं श्रीं फट इंफु – फालवग्रहेभ्यः सर्वव्या- विभ्यः सर्वदुष्टो पद्धवेभ्यः ह्रीं अशेषेभ्योमा रक्षतु || इतीदं कवचं देवि सुरासुरसुलभम् । ग्रहज्वरादिभूतेषु सर्वकर्मल योजयेत् ॥ १ ॥ हे देवि ! देवताओंकोभी बड़ी कठिनतासे प्राप्त होनेलायक इस
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मापाटीकासमेतः।
कवचके पाठ करनेसे सर्व प्रकारके ज्वरादिक सहसा दूर होजाते
हैं अतः सर्वकर्मोमें इस कवचका प्रयोग करे ॥१॥
न देयं यस्य कस्यापि कवचं मन्सुखाच्युतम् ।
तहत्ते सिदिहानिः स्याद्योगिनीनां भवेत्पशुः ॥२॥
मेरे मुखारविन्दसे निलित यह कवचराज हरएकको न देने
चाहिये क्योंकि हरएकको देनेसे सिद्धिहानि होतीहै और दाता-
को योगिनियोंका पशु होना पड़ता है ॥ २ ॥
दद्याच्छन्ताय वीराय सत्कुलीनाय योगिने
सदाचाररता ये च निर्जिताशेष एव हि ॥३॥
यह कवचराज शांतप्रकृति, वीर, सत्कुलीन, योगी, सदाचार-
रत, जितेन्द्रियको ही प्रदान करना चाहिये अन्यको नहीं ॥३॥
ऐकाहिको चाहिकश्च व्याहिकश्चातुराहिकः ।
सर्वे ज्वरा विनश्यन्ति कवचं धारयेद्यदि ॥ ४ ॥
इस कवचराजके धारण करनेसे प्रतिदिन आनेवाला ज्वर,
दूसरे दिन आनेवाला ज्वर, तिजारी ज्वर, चौथे दिन आनेवाला
एवं सर्व प्रकारके ज्वर सहसा दूर होजाते हैं ॥ ४ ॥
(८) नियोडीशः। स्त्रिया वामनरे धाम घुसा च दक्षिणे करें। अवश्यमेव सिद्धिः स्यात्सत्यं सत्यं वरानने ॥ ५ ॥ यह सवचराज स्त्रियोंको वायें और पुरुपोंको दक्षिण हस्तमें धारण करना चाहिये, हे वरानने ! अवश्य इस कवचके धारण करनेसे साधकवर्गको सिद्धिलाभ होगा ॥ ५ ॥ इति क्रियोड़ीशमहातन्त्रराजे देवीश्वरसंवादे द्वितीयः पटलः॥२ ।। अथ सर्वरोगविनाशाय पार्थिव शिवलिंगपूजनप्रकरणम् । अतः परं महानि पूजनं पार्थिव शिवम् । विशेषतः सर्वरोगे त्र्यम्बकल्प प्रपूजनम् ॥ १ ॥ अव सर्व रोगोंकी शांतिके लिये पार्थिव शिवलिंगके पूजनका प्रकरण कहाजाता है हे महेशानि ! पार्थिव [ मृत्तिकाके बनाये हुए ] शिवपूजनका प्रकार कहाजाता है । विशेषतासे समस्त रोगोंके उत्पन्न होतेही त्र्यम्बक शिवजी महाराजका पूजन करना योग्य है ॥१॥ यत्कृत्वा सर्वतः शान्तिर्भवेदेवि न संशयः । ततः प्रयोगं सर्वेषां वश्यादीनां च कारयेत् ॥ २ ॥ हे देवि ! जिस पार्थिव विधान करनेमें सर्व प्रकारले रोगोंकी मापाटीकासमेतः। शांति होती है, इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं तत्पश्चात् सम- स्त वश्यादिकोंका प्रयोग करावे ॥२॥ विधानं तत्र वक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने । हे कमलानने ! मैं पार्थिवपूजनके विधानका वर्णन करताहूँ श्रवण करो। शिवपूजाविधानम्। मृदा लिङ्गं विनिर्माण शत्ततोलकमालया। तत्रा- नीय सृतं मुण्ड स्थापयित्वा ममार्चनम् ॥१॥ पूर्वमग्निं च संस्थाप्य यज्ञस्थानं चतुर्विधम् । उत्तरे दक्षिणे वापि पूर्व च पश्चिने तथा ॥ २॥ सर्वका- मेधु होतव्यमन्यथा निष्फलं भवेत् । घटं संस्थाप्य मम पूजा यथाशक्ति कुर्यात् । ततो वह्निस्थाप- नम् । मुण्डस्थापनम् । नरमहिषमारिमुण्डत्रयम् । अथवा नसुण्डत्रयम् । एकसुण्डं वा तदुपरि मां संपूज्य गन्धोदकैः स्नापयित्वा वितस्तिमितघरा- तुले पोथयित्श तस्यापार वेवी कल्पयेत् । तत्रैव (१०) कियोद्धाश! भूतनाथादीच चतुर्दिक्षु सुधयेत् । पूर्व ॐ सूत- नाथाय नमः इति पाचादिभिः पूजयित्वा बलि दद्यात् । एवं दक्षिणे इमशानाधिपाय । पश्चिम कालभैरवाय । उत्तरे व ईशानाय । वेदीमध्ये हौं प्रेतबीजं बिलिख्य तत्रैव आरती पूजयेत् । १०० (सौ)तोले मृत्तिकाके शिवलिंगको बनाकर और मृतक पुरुपके कपालमें स्थापन कर अगाडी कहेहुए विधानके अनुसार पूजन करे ॥१॥ पूर्व अग्निको स्थापन कर चारों दिशा- ओंमें हवन करे क्योंकि यह चारों दिशा यज्ञस्थान कहाती हैं । सर्व प्रकारकी कामनाओंमें पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर, अवश्य इन चारों दिशाओंमें हवन करे इन दिशाओंमें हवनके न करनेसे समस्त कियाहुआ कर्म निष्फल होजाते हैं, प्रथम घट स्थापन कर यथाशक्ति मेरा पूजन करना चाहिये तत्पश्चात् अग्नि स्थापन करे । पुनः मुंड स्थापन करे । नर, महिष, मार्जार इन तीनोंके . मुण्डको स्थापन करे । अथवा तीनों नरमुंडही स्थापन करने चाहिये यदि किसी कारणसे ३ नर मुंड प्राप्त न होसकें तो एक नरमुण्ड अवश्यही स्थापन करे और उस मुंडके ऊपर श्रीपा भाषाटोकासमेतः । थिव शिवजी महाराजका पूजन कर गन्धोदक आदिसे स्नान करावे (पुनः) वितस्तिमात्र पृथिवीको खोदकर उक्त पार्थिव- प्रतिमाको उक्तस्थानमें गाडकर वहीं वेदी निर्माण करे और भूतनाथादिकोंका चारों दिशाओंमें यथावत् पूजन करे । ॐ भूत. नाथाय नमः इस नाममंत्रसे पाद्यादि प्रदान कर पूर्वदिशामें पूजन करे, बलिदान करे ॐ नमः श्मशानाधिपाय इस नाममंत्रसे उक्तविधानपूर्वक दक्षिण दिशामें पूजन कर बलिप्रदान करे । कालभैरवाय नमः इस नाममन्त्रसे पश्चिममें बलिप्रदान करे। ईशानाय इस नाममंत्रसे उत्तर दिशामें बलिप्रदान करे । वेदीके मध्यमें हौं इस प्रेतबीजको लिखकर वहींपर सरस्वतीका पूजन करे। पुष्पांजलिः। रे वीर शव देवेश मुण्डरूप जगत्पते । दयां कुरु महाभाग सिद्धिदो अब मजणे ।। इति शुष्पाञ्जलि. त्रयं दत्त्वा आग्नेय्यां ही नमः नेत्रत्या ह्रीं चण्डिकायै नमः। वायव्यां ह्रीं भद्रकाल्यै नमः। ईशाने ह्रीं दयामय्यै नमः । श्मशानयासिनो ये ये देव । देवाश्च भैरवाः । दयां कुर्वन्तु ते सर्वे सिद्धिदाश्च १२) क्रियोड्डीशः। भवन्तु मे । अनेन प्रणवायन पुष्पाञ्जलिवयं क्षिपेत् । ततः स्थानं तु संस्पृश्य वश्यो भव वदे- दिति । रे वीर शव ! रे देवेश ! मुंडरूप ! जगत्पते महाभाग ! दया कर और मेरे इस जपविधानमें सिद्धि दे, इस प्रकार तीन पुष्पां- जलि प्रदान कर इन वीजमंत्रोका उच्चारण कर । आग्नेय्यां ह्रीं नमः। नैर्ऋत्यां ही चंडिकायै नमः । वायाव्यां ही भद्रकाल्ये नमः। ईशाने ह्रीं दयामय्यै नमः । जो २ श्मशानवासी देव अथवा अदेव भैरव हैं वह समस्त मेरे ऊपर कृपा कर सिद्धि प्रदान करे । इस प्रणवादिसे तीन पुष्पांजलिको छोडे तत्पश्चात् स्थानको स्पर्शकर फहै “वश्या भव” अर्थात् मेरे वशमें हो। तदनन्तरं स्नान तब लिङ्गं संस्थाप्प परवरि । स्नानं तु पञ्चगव्येन दधिदुग्धादिकं तथा ।। अथ- वा परमेशानि शार्करामधुना युतम् । पंचामृतस्ततः स्नान काश्येत्परमेश्वरि ॥ ईशानाय प्रथमं स्नान बामदेवाय द्वितीयकम् । तृतीदेख्योजाताय चतुर्थे च
-०
भोपाटीकासमेतः। (१६)
पिनाकधूक । पंचमं देवदेवेशं पूजयेत्पार्थिव
शिवम् । अधुना मूलमंत्रेण शरिया शायनिक
परम् । ततो जीवन्यासं कृत्वान्यासादिकं ततः परम् ।।"
हे परमेश्वरि ! तत्पश्चात् लिंगको स्थापन कर स्नान करावे ।
दधि दुग्ध मादि पंचगव्यसे स्नान करावे । हे परमेशानि
अथवा मधुमिश्रित शर्कराहीसे स्नान करावे, हे परमेश्वरि
तत्पश्चात् पञ्चामृतसे स्नान करावे, ईशानाय' इस मन्त्रसे प्रथम
स्नान करावे, 'वामदेवाय' इस मन्त्रसे दूसरा स्नान करावै 'सद्यो
जाताय' इस मन्त्रसे तीसरा स्नान करावे, 'पिनाकधृ' इस
मन्त्रसे चौथा स्नान करावे, 'देवदेवेश इस मन्त्रसे पांचवां स्नान
करावे, पार्थिव श्रीशिवजीका पूजन करे । अब मूलमन्त्र अथवा
गायत्रीमन्त्रको उच्चारण कर शर्करासे स्नान करावे, तत्पश्चात
जीवन्यास कर न्यासादिक करे ।
ध्यानं शृणु महादेवि स्नेहेन कथितं मया ।
दत्ताभ्यां कलशदयामृतरसैराप्लावयन्तं शिरोधाभ्यां
तौ दधतं मृगाशवलये द्वाभ्यां वहन्तं परम् । अंके
(१४) क्रियोड्डीशः। न्यस्तकरदयामृतवट केलासकान्तं शिवं स्वच्छा- सोजगतं नवेंदु सुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे ॥ पुनत्विा तु संपूज्य अंगन्यासं ततः परम् । हे देवि! तुम्हारे स्नेहसे बद्ध मैं अब ध्यान कहता हूँ, श्रवण करो। दोनों हाथोंसे दो अमृतके कलशोंमेसे अमृतरसको अपने शिरपर छिडकते हुए, और दोनों हाथोंमें अमृतव लशको धारण करते हुए, दोनों हस्तकमलके मणिबन्ध मृगाक्षवलयको धारण करतेहुए अंक.(गोदी ) में रक्खाहै अमृत कलश जिनके नवीन चन्द्र है मुकुटमें जिनके ऐसे कैलासकान्त श्रीशिवजी महारा- जको भजते हैं । फिर ध्यान और पूजन कर अंगन्यास करे । अंगन्यासः-ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं हृदयाय नमः । ध्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पुष्टिवर्द्धनं शिरसे स्वाहा। भगोंदेवस्य धीमहि शिखायै वाटू । उर्वारुकमिव बन्ध- नात् व्यवचाय हुं । धियो यो नः प्रचोदयात् नेत्रत्रयाय भाषाटीकासमेतः। (१५) वौषट् । मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् अस्वायफ्ट्र एवं करन्यासः। इसी प्रकार करन्यास भी करे। ततः षोडशोपचारेः पूजा ।" जचापराजिता कृष्ण- बिल्वपत्रं च पिप्परम् । अपामार्ग करवाई प्रत्येक जुहुयाच्छिये । अष्टाधिकशतेनैव पूजयेत् । हे शिवे ! जवा, अपराजिता, कृष्ण, विल्वपत्र, पीपल, अपामार्ग ( चिरचिटा), कनेर प्रत्येक से १०८ हवन करें। अतः परं महेशानि मधु देयं विशेषतः । गुडाई करतेनैव सुरास्तु ब्राह्मणस्य तु ॥ नारिकेलोदकं चैव कास्ये तु क्षत्रिस्य च । कांस्यस्थं माक्षिका वैश्यस्य । शूद्रस्य ताम्रपाने तु मधुयुक्त निवेदयेत् । अथवा सार्षपं तैलमाज्येन होमवेद्विजः । जुहुया- सर्वकर्माणि कथितानि महेश्वरि ।
(१६) क्रियोडीशः।
हे महेशानि ! इसके पश्चात् मधु देना चाहिये । शुड और
अदरखके रसमें मिश्रित सुरा ब्राह्मणको दे। नारियलका जल
कांस्यपात्रमें क्षत्रीको दे। कांसीके पात्रमें सहत वैश्यको दे, शूद्रको
तविक पात्रमें मधु देवे, अथवा ब्राह्मण सरसोंका तेल और घृतसे
समस्त कौमें हवन करे है महेश्वरि ! यह अति गोपनीय विषय
सुम्हारी मौतिके वश होकर मैंने तुमसे कहाहै ।
मन्त्र-मंत्रं शृणु महादेवि कथितं तवश्रद्धया।
हे महादेवि ! मंत्रको सुनो में तुम्हारी श्रद्धासे कहता हूं।
ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि
पुष्टिवर्द्धनं भगोदेवस्य धीमहि उर्वारुकमिव बंधनाद
धियो यो नः प्रचोदयात् मृत्योर्मक्षीयमामृतात् ।
पुरश्चरणके साथ इस मंत्रको १००००८ जपै उपरोक्त
विधान सब को है।
स्थानभेदक-शून्यागारे नदीतीरे पर्वते वाचतु-
प्पथे। बिल्वसूले इमशाने वा निर्जने च प्रपूजयेत् ।
अणिमायशक्ति च ॥ वन्ध्या वा मृतवत्सा वा बनो
माषीकासमेतः। (१७) वा राजशष्टके । सर्वशान्तिकर देवि पूजनं त्र्यम्बके शिव । अत एव कथितं मे च सत्यं सत्यं वरानने। शून्यस्थान, नदीके किनारे, पर्वत, चौराहे, बेलके वृक्षकी जडमें, श्मशान या एकांतमें अणिमादि आठ शक्तियोंकी पूजा करे । वंध्या मृतवत्साका इस पूजनके करनेसे दोष निवारण होतोह, राजभय शत्रुभय दूर होताहै । हे शिवे ! हे देवि ! शिवका यह पूजन सब भांतिकी शांतिको करनेवाला है । हे वरानने मैंने यह सत्य कहाहै। इति क्रियोड्डीशे महातन्त्रराजे देवीश्वरसंवादे तृतीयः पटलः॥३॥ अथ सर्वव्याधिमोचनम् । शृणु वक्ष्यामि चागि सर्वव्याधिविमोचनम् । एकादश पूजयेद्द्वान्दशाशं गुग्गुलैघृतैः ॥ चत्वार कुख्याः संस्थाप्याः पंचपल्लवसंयुताः ॥ उक्तमंत्रण रौप्यादलपामध्ये लिंगं पूजयेत् । प्रतिवासरं सात- लिंग पूजयेत् लक्षं जप्त्वा ॥ पलाशसमिधा हामसू (१८) क्रियोड्डीशः। सत्तमंत्रण तत्कमात् ॥ अत्र पीठे यजमानलभिपेक्ष- येत् । दक्षिणां दद्यादोहेमतिलांजलीन ब्राह्मणेभ्यः किञ्चिद्देया आचार्याय दद्यात् ॥ हे श्रेष्ट अंगवाली ! अव सव व्याधियोंसे छूटनेका उपाय कहताहँ दशांश गूगल और घीसे ११ सद्रोंकी पूजा करनी चाहिये । पञ्चपल्लवयुक्त पांच घट स्थापन करे । उपरोक्त मंत्रसे. चांदी के अष्ट दलवाले पद्ममें लिंगको पूजै । एक लक्ष जप करके पलाशकी समिधाद्वारा उक्त मंत्रसे क्रमानुसार होम करे । फिर यजमानका अभिषेक करे । गौ, पृथ्वी, हेम (सुपर्ण) तिलांजलि दक्षिणा दे । कुछ ब्राह्मणको देकर वाकी आचा- यको दे दे। इति क्रियोड्डीशे महातंत्रराजे देवीश्वरसंवादे चतुर्थः पटलः ॥४॥ अथ क्रियोपदेशः । वशीकरणादिकर्माणि चारतिथिनक्षत्रमण्डलवि- शेपे कर्तव्यानि । स्फाटिशी माला सर्वसिद्धिदा। मणिसंख्या । पंचविंशतिभिर्मोरं पुष्टौ तु सप्तविंश- तिः । त्रिंशद्भिर्धनसिंधिस्तु पंचाशनमन्त्रसिद्धये ।। अष्टोत्तरशतैः सर्वसिद्धिः।
भाषाटीकसमेतः। (१९)
व क्रियोपदेश कहाजाता है । वशीकरण आदि कर्म वार,
तिथि, नक्षत्र और मण्डलविशेषमें करना चाहिये, स्फटिककी
मालासे जप करने पर सर्वसिद्धि प्राप्त होती है । दोनांकी गिनती
२५ दानेकी मालासे जप करने पर मोक्षसुख प्राप्त होता है पौष्टिक
कर्ममें २७ दानोंकी माला होनी चाहिये । धनसिद्धिमें तीस
दानोंकी माला होनी चाहिये । मन्त्रसिद्धिमें ५० दानोंकी माला
लेनी चाहिये । १०८ दानोंकी माला सर्वसिद्धिमें लेनी चाहिये।
शिक्यन्त्रसमायुक्तमौषधं सफलम्भवेत् । मूलिको
पाटनच्छेदनादिविधिः पूर्वतन्त्रे कथितः । बन्ध्या-
दिदोषनिवारणम् । स्त्रीणां बाधकमोचनम । रक्तमा-
यादिचतुर्विधवाधकदोषनिवारणम् । तत्र यन्त्रम् ।
त्रिकोणमथपट्कोणं नवकोणं मण्डलाकृति । यन्त्रा-
ज्येतानि संलिख्य वाहयन्मन्त्रपूर्वकम् । तंत्रपूजनात्
औषधादिभक्षणादोषशान्तिः।
(२०) क्रियोड्डीशः। शिवमन्त्रक जपपूर्वक यदि औषधि उत्पादन कीजाय तो सफल हो । मूलिका ( जड ) के उखाडनेकी विधि पूर्वतन्त्रमें कहचुके हैं । वन्ध्यादि दोप निवारणके अर्थ और स्त्रियोंकी बाधा मोचनेके अर्थ इस मूलिकाका प्रयोग करे माद्रि आदि चार प्रका- रके दोपोंका यथार्थ निवारण होता है । अब यन्त्र कहाजाता है मण्डलाकृति, त्रिकोण, पट्कोण अथवा नवकोण मन्त्रसहित यन्त्र लिखकर पूजन करे और औषधी भक्षण करे तो सर्व मकारके रोग शात होयें । इति क्रियोडीशे महातन्त्रराजे देवीश्वरसंवादे पञ्चमः पटलः ॥५॥ अथ मृतवत्सादिशांतिकवचम् । मृतवत्सामृतगर्भापुत्रहीनानां शान्तिः कवचधार. गात् । कवचं प्रथमम् । ॐ नमो नरसिंहाय नमो महाविपन्नाशाय दिव्यरूपाय नरसिंहाय नमः । स्थौं खौं क्षौ रामाय नमः । रा रामाय नमः । ॐ ह्रीं श्री फणं हुं हां फेत्कारशब्देन सर्वबालकस्य सर्वश्योपद्र- बनाशाय इमां विद्यां पठति धारयति यदि तदा । नरसिंहो रक्षति सदा हुं फट् स्वाहा ।
भाषाटीकासमेतः। (२६)
अव मृतवत्सादि शान्तिकवच कहाजाता है । जिन स्त्रियोंके
गर्भ हा पुत्रादिक मरजाते हैं उन्हें मृतवत्सा कहते हैं उन्हींका
शांतिविधान कहाजाता है । उनको ही इस कवचके धारण
करनेसे शांतिलाभ हो सकताहै।
प्रकारांतरण, द्वितीयकवचम् ।
अव प्रकारान्तरसे दूसरा कवच कहाजाता है ।
ॐ नमोनरसिंहाय हिरण्यकशिपोक्षःस्थलविदा-
रणाय त्रिभुवनव्यापकाय भूतप्रेतपिशाचडाकिनीकु-
छनाशाय स्तम्भोद्भवाय समस्तदोपान् हरहर विष
विष पचपच मथमथ हलहन फट हुँ फटू काठः एहि
रुद्रो ज्ञापयति स्वाहा ।
ॐ क्षों नमो भगवते नरसिंहाय ज्वालामालिने
दीतदंणय आग्ननेवाय सर्वरक्षोनाय सर्वभूतविनाशाय
सर्वज्वरविनाशाय दहदह पचपच रक्षरक्ष हुँ फद्र
स्वाहा।
(३३) क्रियोड्डीशः। गोरोचनया भूले विलिख्य वर्णस्था गुटिका स्त्रिया वामकरे पुरुषेण दक्षिणे करे धार्या कदापि न दोषः ।। इस कवचराजको भोजपत्रके ऊपर लिखकर सोनेके तावी- जमें बंद कर स्त्रियां बायें और पुरुष दक्षिणभुजदण्डमें धारण करें किसी अवस्था में भी यह अपवित्र न होगा। इति क्रियोड्डीशे महातन्त्रराजे देवीश्वरसंवादे षष्ठः पटलः॥६॥ श्रीदेव्युवाच-श्रुतं कवचचरितमपूर्व देवांछि- तम् । इदानीं श्रोतुमिच्छामि यन्त्र कथय में प्रभो। श्रीदेवीजी कहने लगी। हे देव ! मनोवांछितदायक अपूर्व कवच चरित सुना, हे प्रभो ! अब मेरी यन्त्र सुननेकी इच्छा है कृपा कर कहिये। (यन्त्रम् ) ईश्वर उवाच-भावादीन्न कार तु पावें शीर्ष तथा पुनः । भावात्मकं तेन भवेत षट्कोणं यन्त्रमुत्तमम् । माया बीजं ह्रीं गर्भए ।
मापाटीकासमेतः। २३ पट्कोण यन्त्र लिखकर ही वीजको मध्यमें लिखे, शेष सुगम है। स्त्रिया वामहस्ते धारणाइन्ध्या पुत्रवती भवेत् । वालाया बालकस्यापि कण्ठे सन्धार्य सुखी भवेत् । भूर्जे गोरोचनया विलिख्य स्वर्णस्थं धारयेत् । पोड- शीचक्रस्य गोरोचनया भूर्जे विलिख्य धारणात् स्त्रीणां सौभाग्यवृद्धिः । चतुकाणचक्रं संलिख्य ह्रीं गर्भ बाहौ धारणात् नारी जीवत्पुत्रिका अथवा चतु- कोणे प्रणवादि क्षं पुनः । मीनचक्रं संलिख्य धार- णात् वन्ध्या जीवत्पुत्रिका भवति । इस यंत्रराजको भोजपत्रके ऊपर लिखकर यदि स्त्री अपने वायें हाथमें वांधे तो वन्ध्याके भी पुत्र पैदा हो गोरोचनसे भोजपत्रके ऊपर लिखकर सोनेके तावीजमें. बन्द कर वाला अथवा वालकके कण्ठमं यदि यह यन्त्रराज पहनाया जाय तो सुख प्राप्त हो । पोडशीचक्रको गोरोचनसे भोजपत्रके ऊपर लिखकर धारण करनेसे स्त्रियोंको सौभाग्य प्राप्ति होती है। चतुष्कोण चक्रके मध्यमें ही वीज लिखकर वाहुमं धारण करनेसे स्त्री जीवत्प्पत्रिका होती है मीन चक्रके चारों कोनम - (२४). क्रियोड्डीशः। प्रणवादि क्ष वीज लिखकर धारण करे तो बन्ध्या स्त्रीभी सन्तानसुखको प्राप्त हो। अतः परम् अष्टदलकणिकामध्ये माया । ततः परं दलमध्ये हे हे मायावीजे पुनः पुनः । इतः परं नव- दलं मायाबीजं विलिख्य बाहौ धारणात् मृतवत्सा जीवत्वत्सा ॥ गोरोचनाकुंकुमेन संलिख्य रक्तपत्रेण संवेष्टय गुटिकां पञ्चामृतः पंचगव्यैः स्नापयित्वा । प्रणयेन तु संमन्त्र्य स्नापयद्न्धद्रव्यकैः । प्राणान् प्रतिष्ठाप्य देवतारूपां गुटिका सम्पूज्य धारयेत् । तत्पश्चात् अष्टदल कर्णिकामध्यम मायावीज लिख और दल- मध्यमें दो दो मायावीज लिख । एवं नवदलमें मायावीज लिख. कर और रक्त सूत्रसे लपेटकर गुटिकाको पंचामृत तथा पंच. गव्यसे सान कराकर प्रणवसे अभिमंत्रित कर पुनः गन्धद्र- व्योंस ज्ञान करावे । प्राणप्रतिष्ठा करके देवतारूप गुटिकाका पूजन कर धारण करे। शिवल्नालम्-घृतेन मञ्जना वापि स्नापयेदश्य- मापाटीकासमेतः (१५) फाणि । दुग्धादिना तथा देवि शान्ती नृत्युआयेऽपि च ॥ आकर्षणे तु मधुना भस्मना क्रूरकर्माण । . अव शिवस्नान कहाजाता है । वश्यकर्ममें घृत और मधुसे स्नान करावे, शांति तथा मृत्युञ्जयजप कर्ममें दुग्धादिकसे स्नान करावे, आकर्षण कर्ममें मधुसे स्नान करावे, क्रूर कर्ममें अस्मसे स्नान करावे। अस्य परिमाणम्-शततोलंकमानेन द्रव्यमेतत्त्र- कीर्तितम् । तन्मानं सम्बिदाचूर्ण नेवेद्यं च सुरेश्वरि ।। बिल्वपत्र तथा पुष्पं दद्यादृष्टोत्तरं शतम् । शांतिकादो द्रोणपुष्पं बर्देश चाभिचारक ॥ स्तम्भने मोहने चैव धतूरं कनकावयम् । विद्वेषोचाटने देवि विजयाप्र- पराजिता ॥ चतुर्दश्यां समारभ्य यावदन्या चतुर्दशी। एक क्रमशो लिंगं पूजयनक्तिभावतः । अष्टाधिक- सहनं तु जपं कुर्यादिनोदिने ॥ सप्ताह सात-लिङ्गानि
(२६) क्रियोडीशः।
पंचाहे वाथ पञ्चकम् । चण्डोग्रेण विधानेन जपपूजा-
दिकं स्मृतम् ॥ वटुकेन तु मंत्रेण मंजुघोपेण वा
प्रिये । त्रयम्बकेण देवेशि शान्तिके जपपूजनम् ॥
तत्तत्कल्पविधानेन जपं पूजां समाचेत् । जातिध्वंसे
कुलोच्छेदे ज्यादौ रोगसंकटे ॥ महाभये समुत्पन्ने
सर्वाभिचारसम्भवे । यत्नेन पूजयेद्देवि लिङ्गमष्टोत्तर
शतम् । अतिरुद्रप्रयोगादौ रुद्राध्यायेन वा पुनः ॥
नीलकण्ठेन वा देवि स्तवेन तोपयेच्छिवम् ।
हे देवोश ! अब रनान द्रव्यके तोलेका परिमाण कहाजाता
है, सौ तोले परिमाण स्नानद्रव्य होना चाहिये । तत्परिमाणही
नैवेद्य होना योग्य है। विल्वपत्र और पुष्प १०८ होना
चाहिये । शान्ति आदिमें द्रोणपुष्प, अभिचार प्रयोगमें वर्वरा
पुष्प, स्तम्भन और मोहन फर्ममें धतरेके पुष्प, विद्वेष और
उचाटन कर्ममें विजया तथा अपराजिताके पुष्प होने योग्य
हैं । एक पक्षकी चतुर्दशीमें प्रयोग आरम्भ करे और
दूसरे पक्षकी चतुर्दशीमें प्रयोग समाप्त करे । क्रमानुसार
भक्तिपूर्वक एक २ लिंगका पूजन करे प्रतिदिन अष्टोत्तर
भाषाटीकासमेत। (२७) शत जप करे । सप्ताहमें सात और पञ्चाहमें पांच लिङ्गक पूजन करे । चण्डोग्र विधानपूर्वक जप पूजन करना चाहिये । हे प्रिये ! शुद्ध और साफ २ उच्चारणं फियहुए वटुक मन्त्र अथवा व्यम्बक मंत्रसे शांति कर्ममें जप और पूजन करे । तत्तत् कल्पानुसार पूजा जप करना योग्य है । जातिध्वंस, कुलोच्छेद, महाज्वर, संकट, महाभयकी प्राप्ति, सर्व प्रकारके अभिचार आदि प्रयोगामें यत्नपूर्वक अष्टोत्तर शत १०८ लिंग- का पूजन करे । हे देवि ! रुद्राध्याय, अथवा नीलकण्ठस्तवसे स्तुतिकर श्रीशिवजी महाराजको प्रसन्न करे । स्तव-सर्वज्ञज्ञानविज्ञानप्रदानकमहात्मने । नमस्ते देवदेवेश सर्वभूतहिते रत । अनन्तकांतिसम्पन्न अनन्तासनसस्थित । अनन्त शान्तिसम्भोग पर- मेश नमोस्तु ते । परापरतरातीत उत्पत्तिस्थिति- झारक । सर्वार्थसाधनोपाय विश्वेश्वर नमोऽस्तु ते । सर्वार्थनिर्मलाभोग सर्वव्याधिविनाशन । योगियोगी लहायोगी योगश्विर नमोऽस्तु ते। कुन्ना लिंग- (३८) क्रियोसीशः। तिष्ठाश्च ध्यात्वा देवं सदाशिवम् । पूजायित्वा विधा- लेन स्तवपाठसुदीरयेत् । लिंगस्तवं महापुण्यं यः शृणोति सदा नरः। नोत्पद्यते च संसारे स्थान प्राप्नोति शाश्वतम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शृणुयाच सुसंस्तवम् । पापकर्ता कलेर्मुक्तः प्राप्नोति परम पदम् । अव स्तव कहाजाताहै । हे सर्वज्ञ ! हे सर्व देवेश ! हे सर्व मृतहितेरत ! ज्ञान विज्ञान देनेवाले आपको नस्मकार है। अनन्तकान्तिसम्पन्न ! हे अनन्तासनसंस्थित ! अनन्तकांति- सम्भोग ! परमेश्वर ! आपको नमस्कार है । है परापर ! परातीत ! हे उत्पत्तिास्थितिकारक ! हे सर्वार्थ साधनके उपाय ! विश्वेश्वर आपको नमस्कार है । हे सर्वार्थ निर्मलाभोग ! हं सर्वव्याधिविनाशन ! योगियोंके योगी, महायोगी ! योगीश्वर आपको नमस्कार है । लिंगकी प्रतिष्टा और सदाशिवका ध्यान कर विधानपूर्वक पूजन कर इस स्तवका पाठ करे । यह लिंग- स्तव महापुण्यदायक है जो नर एकाग्रचित्त हो इस स्तवका पाठ करते हैं फिर उनको इस संमारके' दुःख नहीं भोगने पडते, किन्तु शाश्वत शिवलोकको प्राप्त होते हैं । इस कारण प्रयत्न पूर्वक इस मनोहर स्तवराजका पास करना गौर शवण करना भापाटीकासमेतः। (२९) अत्यावश्यक है क्योंकि महापापी मनुष्यभी इस संसारके दुःखों को तृणवत् त्यागकर परम पदको प्राप्त होजाताहै । इति क्रियोड्डीशे महातंत्रराजे देवीश्वरसंवादे सप्तमः पटलः ॥७॥ अथ रुद्रकवचम् । भैरव उवाच-वक्ष्यामि देवि कवचं मंगलं प्राण- रक्षकम् । अहोरात्र महादेवरक्षार्थ देवमाण्डितम् ॥ अस्य श्रीमहादेवकवचस्य वामदेवऋषिः पक्ति. छन्दः सौः बीजं रुद्रो देवता सवीर्थसाधने विनि- योगः। भैरवजी कहनेलगे कि हे देवि ! मंगलरूप प्राणरक्षक रुद्रक वचको कहता हूँ। यह कवच रात्रि दिन रक्षा करनेमें समर्थ है । यह श्रीमहादेवजीकी रक्षाके लिये देववृन्दसे मण्डित है इस कवचका वामदेव ऋपि, पंक्ति छंद, सौः वीज, रुद्र देवता है । रुद्रो मागंप्रतः पातु पृष्ठतः पातु शंकरः ॥ कपर्दी दक्षिणे पातु वामपार्था तथा हरः ॥ १ ॥ शिवः शिरलिप पातु ललाटे नीललोहितः ॥ ने में यम्बका पाहु बाहुगुम पड़ेश्वरः ॥२॥सणे ।
क्रियोड्डीशः। च महादेव ईश्वरश्च तथोदरे ॥ नाभौ कुक्षौ कटि- स्थाने पादौ पातु महेश्वरः ॥ ३ ॥ सर्व रक्षतु भूतेशः सर्वगात्राणि ले हरः ॥ पाश शूलञ्च दिव्यास्त्रं खड्गं वज्र तथैव च ॥ ४ ॥ नमस्कोम भूतेश रक्ष मां जगदीश्वर ॥ पापेभ्यो नरकेभ्यश्च त्राहि मां भक्तवत्सल ॥ ५ ॥ जन्ममृत्युजराच्याधेि- कामक्रोधादपि प्रभो ॥ लोभमोहान्महादेव रक्ष मां विशेश्वर ॥ ६॥ त्वं गतिस्त्वं मतिश्चैव त्वं शूमि. मवं परायणः ॥ कायेन मनसा वाचा त्वथि भक्ति- इंढास्तु मे ॥ ७॥ मेरे अग्रभागमें रुद्रदेव मेरी रक्षा करें, मेरे पृष्ठभागमें शंकर देव मेरी रक्षा करें, कपर्दी देव मेरे दक्षिण भागमें मेरी रक्षा करें, मेरे वामभागमें हर देव मेरी रक्षा करें, शिवजी महाराज मेरे शिरकी रक्षा करें, नीललोहित मरेललाटकी रक्षा करें, त्र्यम्बक नेत्रकी रक्षा करें, महेश्वर दोनों बाहुकी रक्षा करें, मेरे हृदयकी महादेव रक्षा करें ईश्वर उदरकी रक्षाकरे नाभि, कृक्षि, कटि ( कमर ) हाथ पैरली मापाटीकासमेतः । महेश्वर रक्षा करें,सर्वथा भूतेश मेरी रक्षा करें, हरदेव समस्त गात्रकी रक्षा करें, हे भूतेश! पाश, शूल, दिव्यास्त्र, खङ्ग, वज्र, आदिकी रक्षाकरो, मैं आपको नमस्कार करताहूं, हे भक्तवत्सल ! पाप और नरकसे सदा मेरी रक्षा करो, हे प्रभो ! जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, काम, क्रोधसे भी मेरी रक्षा करो हे त्रिदशेश्वर ! लोभ मोहसे भी रक्षा करो, हे भगवन् ! आपही गति हैं आपही मति हैं, अपही भूमि हैं और आपही हमारे मुख्य आश्रय हैं । हे प्रभो ! मन, वचन, कायकरके मेरी भक्ति आपमें दृढ हो॥१-१७॥ फलश्रुतिः-इत्येतद्रुद्रकवचं पाठनात्पापनाश- नम् । महादेवप्रसादेन औरवेल व कीर्तितम् ॥ न तस्य पापं देहेषु न भयं तस्य विद्यते । प्राप्नोति सुखमारोग्यं पुत्रमायुःप्रवर्द्धनम् ॥ पुत्रार्थी लभते पुत्रान्धनार्थी धनमाप्नुयात् । विद्यार्थी लभते विद्या मोक्षार्थी मोक्षमेव च ॥ व्याधितो मुच्यते रोगाबद्ध मुच्येत बन्धनात् । ब्रह्महत्यादि पापं च पठनादेव नश्यति ।
(३१) क्रियोडीशः।
अब कवचपाठका फल कहाजाता है इस रुद्रकवचके पाठ
करनेसे पाप नष्ट होते हैं। श्रीमहादेवजीकी प्रसन्नताके लिये यह
कवच श्रीभैरवजीने कहाहै । इसके पाठ करनेवालांका शरीर
पापांसे स्वच्छ होजाता है जैसे कि मैलके कर जानेसे सुवर्ण
स्वच्छ होताता है, इसके पाट करनेवालोंको कहीं किसी प्रकारका
मय नहीं होता सुख और बारोग्यताको प्राप्त होता है, पुत्रार्थी
पुत्रको प्राप्त होताहै, धनार्थी धनको प्राप्त होताहै, विद्यार्थी
विद्याको प्राप्त होता है, मोक्षार्थी मोक्षको प्राप्त होता है. रोगी
रोगसे छूट जाता है, वन्धनग्रसित वन्धनसे छूटजाता है, विशेष
क्या इस कवचके पाठ करनेसे ब्रह्महत्यादिक पापभी नष्ट
होजाते हैं।
अथासनम् ।
एक सिद्धासन प्रोतं द्वितीयं कमलासनम् ।
व्यामाजिने सर्वसिदिनिसिद्धि गाजिने । वस्त्रासन
रोगहरं वेत्रनं प्रीतिवर्द्धनम् । कौशेयं पुष्टिदं प्रोक्तं
कम्बलं सर्वसिद्धिदम् ॥ शुक्लं वा यदि वा कृष्णं
विशेषाहताकम्वलम् । मेपासनं तु वक्ष्यार्थसाकष्टो
भाषाटीकासमेत! (३३) ध्यानधर्म च । शांती लगाजिनं शरुतं मोक्षार्थ व्याघ्रचर्म च । गोचर्म स्तम्भने देवि वाजं चोच्चाटने तथा। (विशेषे इवानवाई च) मारणे माहिषं चर्म काँद्दिष्टं समाचरेत् । सर्वसामार्थदं देवि पवस्वासन तथा । कुशानं करबलं वा लवकर्मसु पूजितम् ।। दुःखदारिद्यनाशंतु काटपाषाणजालम् । अब आसनविधान कहाजाता है। पूजनकर्ममें एक सिद्धासन अथवा दूसरा कमलासन प्रशंसनीय है । व्याघ्रचर्मके आसनपर जप करनेसे सर्वसिद्धि प्राप्त होती है । मृगचर्मपर पूजन करनेसे ज्ञानप्राप्ति होती है । वस्त्रासनपर पूजन करनेसे रोग दूर होता है । वेत्रके आसनपर जप करनेसे प्रीतिकी वृद्धि होती है । कुशके आसनपर जप करनेसे पुष्टि प्राप्त होती है । कम्वलके बासनपर जप करनेसे सर्वसिद्धि प्राप्त होती है । शुक्ल अथवा कृष्ण इन दोनों प्रकारके कम्बलोंसे रक्त कम्बल श्रेष्ठ है । वश्यकर्ममें मेष । आसन, आकर्पण कर्ममें व्याघ्रचर्मका आसन, स्तम्भनमें गोच- मका आसन, उच्चाटनमें अश्वचर्मका आसन, विद्वेपणमें श्वान- चर्मका आसन, मारणकर्ममें महिपीके चर्मका आसन ग्रहग (३४) कियोड्डीशः । करे । हे देवी ! रेशमीन वस्त्रका आसन सर्व कामनाओंका देने वाला है। कुशासन अथवा कम्बलासन सर्व कामे पूजनीय है। काठ तथा पापाणका आसन दुःख और दारिद्रयनाशक है । अथ होमघटादिस्थापनम् । नित्यं नैमित्तिक कार्य स्थण्डिले पा समाचरेत् । हस्तमात्रेण तत्कुर्यालालक्षाभिः सुशोभनम् । तोय- पूर्णान्घटान्पंच स्थापयेत्परमेश्वरि । एकेन मन्त्रयु- रसेन स्थापिता स्युः सपल्लवः । अशक्तों व महादेवि एकलेन च वाससा । कदाचिदपि चकेन सर्वान्ना- च्छादयेच्छिवे । अनाच्छादिततोवानि स्थापयित्वा बजत्यधः। अव होमघटादिकका स्थापन कहाजाताहै । हे परमेश्वरि ! नित्य तथा नैमित्तिक कर्म समाप्तकर पुनः हस्तमात्र वालुकासे सुशोभित स्थंडिल निर्माण कर उसके ऊपर जलसे भरे पांच घद धापित करे, एक मथवा दो मंगोसे अभिमंत्रित कर उक्त पांच - मापाटीकासमेतः । (३५) फलशांके मध्य में पंचपलय प्रवेश करे, हे महादेवि ! यदि पृथक कलशके आच्छादनार्थ वनकी शक्ति न हो तो एकही वस्त्रसे पांचों कलशाको लपेन्दे क्योंकि स्थापित जलको आच्छादन न करनसे स्थापनकती अधोगतिको प्राप्त होताहै । ततः स्यां स्थी इति श्रीमिति मन्त्रेण घटं स्थिरी. कृत्य । क्लीं इति घटप्रोक्षणम् ॥ कामिति घटाभि- मन्त्रणम् । ह्रीं इत्यारोपणम् । ह्रीं जलेन पूरणम् । ततः कृताञ्जलिः पठेत् । त नन्तर स्थां स्थी इन बीजमन्त्रोंसे और श्री इस मन्त्रसे घटको स्थिर कर लीं इस बीजमन्त्र से घटको प्रोक्षण करै । क्रां इस बीजमंत्रस घटको अभिमंत्रित कर ही इस वीजमंत्रसे घटको स्थापन करे । पुनः ही मंघसे जलसे पूर्ण फरेफिर अंज- लि बांधकर मायनामंत्र पहे। गंगाद्याः सरितः सर्वाः समुदाय सरासि च । सर्वे समुद्राः सरितः सरीसि जलदा नदाः॥ हृदाः प्रस- वणाः पुण्याः स्वर्गपातालभूगताः । सर्वतीर्थानि पुण्यानि घटे कुर्वन्तु सन्निधिम् ॥
(३६) कियोडीशः। तलः श्रीमिति पल्लयम्, हुमिति फलम्, रमिति सिन्दूर, वमिति पुष्पस् मूलेन, दूर्वाम्, ओ ओ ओं इत्यभ्युक्षणम् ॐ फटू स्वाहा इति कुन ताडनम् । शान्त्यर्थ नापयेत्कुम्भम् । पुण्याहे वाचयित्वा कर्म कुर्यात् दिग्बन्धनादि गणेशग्रहदिक्पालादीन्प्रतिकुण्डे पूजयेत् । स्थण्डिले पूजयेल्लिङ्गं सर्वापत्तिविनाशनम् । कुम्भे चापि पूज- येत् । ततः अग्निमानीय संस्कृत्य होमं कुर्यात् । हे घट! गंगा आदि नदियां, चारों समुद्र, तालाव, शेप समु. द्र क्षीरसागर आदि, सरिताय, छोटी छोटी नदी, नाले, पो ता. लाव झरने, स्वर्ग, पाताल और मर्त्यलोकके समस्त वावडी आ- दिजलस्थान, समस्त काशी आदि पुण्यक्षेत्र तुम्हारेमें आकर वास करे। पुनः श्री वीजसे पञ्चपल्लब स्थापन करे । हूं इस वीजमंत्रसे घटके भीतर फलस्थापन करे । इस बीजमंत्रसे घटके उपर सिन्दूर चढावे । बं बीजमंत्र उच्चारण कर पुष्प चढावे । मूलगन्त्रसे दूर्वा भापाटीकासमेतः। (३७) चढावे । ॐ ॐ ॐ इन तीन प्रणवाको उच्चारण कर अभ्यु- क्षण करे । * फट् इस वीजमंत्रको पढकर कुशासे घटको ता- डन करे। शान्तिके लिये कुम्भको स्नान करावे । पुण्याहवा- चन कर दिग्बन्धनादि कर्म करे । गणेश, ग्रह, दिक्पालादि. कॉकी प्रीतिक अर्थ कुंडम पूजन करे स्थंडिलमें लिंगका पूजन करनेसे सर्व प्रकारको आपत्तियां दूर रहती है। कुंभमें भी पूजन करना चाहिये फिर अग्निको ताम्रपान द्वारा लाकर संस्कार कर हवन करे। महाविपत्ती जुहुयात् जवा कृष्णपराजिताम् । द्रोणं वा करवीरं वा मनोऽभीष्टफलं लभेत् ॥ कर- वीरः श्वेतरक्तः रक्तचन्दनमिश्रितः । द्रोणेच केत- कीपुप्पैः होमो रोग विमोचयेत् ॥ चम्पकैः श्वेत- पद्मश्च कोकनदं च वन्धुकम् । विल्मपत्रं कुरुवक मुनिपुष्पं च केसरम् ॥ हुत्वा यदि महादेवि अश्यं पुत्रवान्भवेत् । रक्तोत्पलं विल्वपत्रं काञ्चनं रक्तव- कम् ॥ शान्तिमंत्रत्रिकं चापि शतसंख्याक्रमेण तु! जुह्वयात्तु महेशानि सर्वसिद्धिर्भवेत्तदा ।
(३८) क्रियोड्डीशः। महाविपत्तिमें जवाकुसुम, तथा विष्णुक्रान्ताके पुष्पसे हवन करे । मनवांछितकी प्राप्तिके लिये द्रोणपुष्प, तथा बनेरके पुष्पोंसे हवन करे । वा श्वेत, अथवा रक्तचन्दनमिन कनेरके पुष्पोंसे हवन करे, रोग शान्तिके अर्थ द्रोणपुष्प अथवा केत- कीके पुष्पोंसे हवन करे । पुत्रप्राप्तिके अर्थ चंपाके पुष्प, श्वेत पद्म, कोकनद, कन्दूरीके पुष्प; बिल्वपत्र, कुरुवक, अगस्तवृ- क्षके पुष्प केशरसे हवन करे । सर्व सिद्धिके अर्थ रक्तकमल, विल्वपत्र धनूरेके पुष्पोंसे हवन करे । परन्तु एकही शांतिमंत्रसे अष्टोत्तर शत १०८ वार हवन करना चाहिये। इति क्रियोड्डीशे महातंत्रराजे देवीश्वरसंवादे नवमः पटलः॥ ९॥ अथ शाक्ताभिपेकः । शाक्ताभिक्षेको बन्ध्यामृतवत्सारोगिणीनां शान्ति- फरः । धनकीायुखिलौभाग्यजननः साशा- पूर्णी मन्त्रदोषनिवारणोऽभिचारहरो ग्रहदोषनाशनः सर्वसिद्धिप्रदोऽभिषेकः ॥ अब शाक्ताभिषेक कहाजातीहै । यह शाक्ताभिषेक वंध्या, मृतवत्सा रोगिणी स्त्रियोंको शांतिप्रदान करनेवाला है । धन, कीर्ति, आयुवृद्धि करनेवाला है । सम्पूर्ण आशा पूर्ण करने- वाला है । मन्त्रदोष निवारक है। अभिचार और ग्रहदोष दूर कर सर्व सिद्धि प्रदान करता है।
मापाटीकासमेतः। (३९) अथ नयनरञ्जनम् । दीपं कृत्वा ताम्रपाने कजलं पातयेदथ । गा. घृतेन चालोडय चक्षुपी अथ रजयेत् । पूर्व च यादृशं दृष्टं तादृशं च प्रपश्यति । दीपक जलाकर ताम्रके पात्रमें फजल पाडे, फिर उसी फजलको घृतम मथकर नेत्रोंको आंजे, जैसा कि पूर्वमें देखा था वैसा ही देख सकता है। प्रकारान्तरे-रक्तचन्दनसंयोगान्मधुना सह रोदुको कियएमजनञ्च तिमिरं हन्ति सुन्दर । यंजनका द्वितीय प्रकार रक्तचन्दन और शहतको मिला- कर धूपमें सुखाले पुनः नेत्रोंमें आंजे तो रतौंधी दूर हो । अथान्या-पुनर्नवाघृतं वद्यश्चक्षुल्तेजः कर भवेत् । पुनर्नवा सिद्धकिया हुआ घृत शीघ्र नेत्रकान्ति बढानेवाला है। अब ज्वरहरणम् । अपामार्गस्य मूलं व कन्य- (४०). क्रियाडीशः। कासूत्रवन्धने । स्वात्यां तथा वैष्णवे व ज्वरं हन्ति सुदारुणम् । ज्वरहरण चिकित्सा कहीजाती है । अपामार्गकी जडको कुमारी कन्याके हाथसे कते सूत्रमें बांधकर स्वाती अथवा विष्णु नक्षत्रमें यदि शिरोभागमें धारण करे तो सहसा ज्वर दूर हो । अथ सर्वज्वरनिवारणम् । रक्तवाच्या मूलमर्क- चारे कदलीसूत्रैः शय्यायां दापयेत् सर्वज्वरं तापज्वर हरेत् । अव सर्वज्वर शान्ति प्रकार कहाजाता है। लाल वाडीकी जडको मंगलवारके दिन फेलेके सूत्र में लपेटकर यदि शय्याके एकदेश (पायेमें ) बधैि तो तापज्वर आदि सर्व प्रकारके ज्वर शांत हों। अथोदररोगप्रशासनस्-नागेश्वरमूलं मधुना सह पानादुदररोगशांतिः। उदररोग शान्ति कही जाती है। नागेश्वरकी जडको सहतमें मिलाकर पान करनेसे उदररोगशांत होता है। अथ तृष्णानाश:-रक्तचन्दन धाषित्वा तोलक जलसंमिश्र वामहस्ते गृहीत्वा सम मापाटीकासमेतः। (४१) होत्तरशतं संज्याय पिवेत् । सप्ताहात्तस्य तृष्णा- नाशो भविष्यति। अव तृष्णानाशप्रकार कहाजाताहै । रक्तचंदनको पानीगें घिस कर और एक तोला मात्र पानी मिलाकर बांये हाथमे लेकर १०८ वार बगाडी कहे मंत्रका जप कर अभिमन्त्रित कर पान करे एक सप्ताहके बीच तृष्णाशांति होगी। मन्त्रस्तु-शब्दवीजदयं भद्रे नाशयद्वितयं वदेत् । तृष्णेति पदमुच्चार्य ततः स्वाहा मनुर्मतः । अनेन मनुना देवि तृष्णानाशो भविष्यति । हे भद्रे ! अव मंत्रोद्धार कहाजाता है। दो शब्दवीज दोषार नाशयपद, तृष्णापद स्वाहापद इनको जोड देनेसे मंत्रोद्धार होता है, हे देवि ! इस मन्त्रसे पान करनेसे तृष्णानाश होती है । अथ सर्वापच्छान्तिकर महास्वस्त्ययनम् । अथ वक्ष्ये महेशानि महावस्त्ययनं शृणु । सर्व- सिद्धिकरं पुण्यं सर्वपापविनाशनम् ॥ सर्वोपद्रवज्ञापन सर्वारिष्टविनाशनम् । . मलाव्याधिप्रशमनमपस्मार- १४२) क्रियोडीशः। विनाशनम् ॥ योगिनीवृत्तवेतालाः प्रेतकूष्माण्डप- वणाः । तत्र स्थाने न तिष्ठन्ति डाकिन्याद्या विशे- पतः। हे महेशानि ! अव सम्पूर्ण आपत्ति दूरकर शान्तिप्रदान करने वाला स्वस्त्ययन कहा जाताहै । हे देवि ! शान्तिप्रद महास्वस्त्य- यन श्रवणकरो (सुनो) इस स्वस्त्ययनके पाठ करनेही मात्रसे सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। यह परम पवित्र और सम्पूर्ण पापनाश करनेवाला है । यह सम्पूर्ण उपद्रव और सम्पूर्ण अरिष्ट विनाशक है इसके उच्चारण करनेसे महाव्याधि और अपरमार (मृगी) दूर रहते हैं । योगिनी, भूत, वेताल, प्रेत, कूष्माण्ड, पन्नगादि कदापि उस स्थान नहीं वास करते जिस स्थान निरन्तर इस महास्वस्त्ययनवा पाठ होता रहता है। कृत्यामध्यर्चयेहेवि यथाविधिपुरःसरस् । पोड- शारं लिखेत्पमं योनियुग्मं सविन्दुकम् ॥ तन्मध्येऽ- दुलं लिख्य यकारादीन्यसेत्मामात्ह । तन्मध्ये चैव पदोणं लिखेन्मूलमनुस्मन् ॥ चन्द्रविम्बं लिखे- मध्ये असाध्ये पार्थिव शिवम् । तस्य सध्हे न्यसेतू माषाटीकासमेतः। (४३) कुंभे गले लन्दामभूपितम् । तस्य मध्ये न्यसेत् कृत्या सर्वलक्षणसंयुताम् । पूजयेञ्च यथान्यासं पायसन्तु निवेदयेत् ॥ परितोष्य घटे न्यस्य असितांगा- दिवान् । गन्धपुष्पादिनाभ्यर्च्य तदाहो क्षेत्रपालकान् । लोकपालं यजेदेवि तदये होम- माचरेत् । जुहुयादाज्यापामार्गेण रक्षतां भिद- मर्पणौ ॥ दूर्वाग्रखदिराश्वत्थं प्रत्येकन्तु शता- दिकम् । कुण्डे वा स्थण्डिले वापि होमकर्म समा- चरेत् । तस्य दक्षिणपाचे तु लक्ष्मी ध्यायेद्यथाविधि। कुण्डमध्ये न्यसेदेवी दक्षिणे च श्रियं स्मरेत् ॥ वाम- पार्थ स्मरेदेवी हल्लेखा परमेश्वरीम् । तस्यैव वाम- पार्श्वे तु पूजयेदशनायकम् ॥ अयुतं सूलमंत्रञ्च जपे- मृत्युविनाशनम् । अयुतं धणहत्यायां जपेत परि- माणं विद्धःमहाव्याधिप्रशमनं तावजप्त्वाभिषेकतः।
(४४) क्रियोडीशः। एवं यः कुरुते मर्त्यः पुण्यां गतिमवाप्नुयात् ॥ तस्या- वश्यं न विद्येत व्याधिभ्योऽपि अयन्नहि । हे देवि ! यथाविधान कृत्या देवीका पूजनकरे । पोडश दल कमल लिख सविन्दु योनियुग्म लिखे । उस यानियुग्मके मध्यमें अष्टदल कमल लख क्रमानुसार यकारादिक लिख उसके मध्यमें पट्कोण यन्त्र लिख मन्त्रका ध्यान करे । मध्यमें चन्द्रवीम्ब लिखे अशक्तिमें पार्थिव शिव लिंगही, स्थापन करदे ॥ उसके मध्यमें कुम्भ स्थापन कर कंठदेशमें पुष्पमालासे विभूपित करे। कलशके उपर कृत्या देवीको स्थापन करे जो कि सर्वलक्षणयुक्त है । यथान्यास पूजन कर पायस प्रदान करे । घटके ऊपर न्यासकर असितांग (उज्ज्वल वण ) भरवका ध्यान कर । गन्ध- पुष्पादि प्रदानकर वाद्य प्रदेश क्षेत्रपालका पूजन करे । अग्र भागमें लोकपालों का पूजन कर हवन करे । उसक दक्षिण भागमें यथाविधान लक्ष्मीजका ध्यान करे । कुण्डके मध्यमें देवीजीको स्थापन कर दक्षिणभागमें श्रीका ध्यान करे । हृदयमें स्थित देवीजीका वांम,भागमें ध्यान करे । उसीके वामभागमें, दशना- यकोंका पूजन करे । मृत्यु विनाशक मूल १०००० जप' करे । भ्रूणहत्या दोपकी निवृत्तिके अथ भी १०००० ही जप करे । महाव्याधिकी शांतिके अथ १०००० जप कर अभिषेक .
भाषाटीकासमेतः। (४५) करे । इस प्रकार करनेसे उत्तम गति प्राप्त होतीहै । जप करनेवालेको व्याधियोंसे भय नहीं होता। इति श्रीक्रियोडीशे महातंत्रराजे देवीश्वरसंवादे दशमःपटलः ॥१॥ अथ कुमार्यावशनम् । श्रीईश्वर उवाच-अथ वक्ष्यामि संक्षेपात् कुमा- योवेशनं शृणु । सुगुप्ते विजने देशे गोमयेनोपलेपिते॥ आचार्यः प्रयतो भूत्वा सुस्नातो विजितेन्द्रियः । नवकुम्मान समादाय शुद्धकुम्भेन पूरयेत् ॥ नवं शरावमानीय कपिलाघृतपूरितम् । कुब्योपरि समा- रोप्य दीप प्रज्यालयेत्ततः॥ शताष्टमन्त्रजापेन कुमारा वा कुमारिकाः । अतीतानागतञ्चैव वर्तमानं यद्भ- वेत् ॥ शुभाशुभानि सर्वाणि पश्यन्ति नात्र संशयः । सम्यग्ध्यात्वा गणेशानं गले यामे जपेनिशि ॥ शुभा- शुभानि कर्माणि कथयन्ति न संशयः। कन्यकार्थी (४६) नियोड्डीशः।- शुचिर्भूत्वा मन्त्रराजं गणेशितः ॥ जप्त्या दशसह- स्त्राणि भारताश्वभावजः । पुपर्दशाशवनात लां कन्यां लभते ध्रुवम् । श्रीशिवजी कहने लगे। हे देवि ! अव संक्षेपसे कुमारी आवे. शन कहाजाता है सुनो। सुगुप्त (अच्छे प्रकार रक्षा कियाहुआ) एकान्त स्थानको गोबरसे लीपकर आचार्य। उक्त नियमानुसार स्नान को और जितेन्द्रिय रहै । पुनः नवीन कुंभको शुद्ध जलसे पूर्ण कर स्थापन करे और उसी घटके उपर नई सराईमें कपिला गौके घृतसे दीपकको प्रज्वलित कर स्थापन कर १०८ वार मन्त्रका जप करे । यदि जपके समय कुमार अथवा कुमारी दोनोंमेंसे एक अथवा दोनोंही स्वयं पूजा स्थानमें पाकर उप- स्थित हों तो यथाविधान उनका पूजन करे। पूजनके करनेसे और उनके प्रसादसे बीतेहुये अथवा आनेवाले और वर्तमान शुभाशुम समस्तही स्वयं दृष्टि पडेंगे इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है। तत्पश्चात् भले प्रकार गणेशजीका ध्यान कर एक महर रात्रि वीते जप कर्ममें रत हो, इस विधानके करनेसे देवता मसन्नही स्वयं सन्मुख आकर समस्त शुभ अशुभ जैसा होना है कहेगा परन्तु देवताके रूपको देखकर डरना मत देवता
हैं
मापाटीकासमेतः । (४७)
मारता नहीं है। कन्यार्थी पुरुपको योग्य है कि पवित्र हो
गणेश मन्त्र जपै, मन्त्र जपने के पश्चात् सूर्यमुखीके पुष्पोंसें
दशांश हवन करे तो अवश्य उस कन्याको प्राप्त होय ।
अथ काम्यकर्माणि ।
वक्ष्यामि झाम्यशर्माणि साधकानां हिताय वै ।
शास्त्रोक्तेनैव मन्त्रेण संक्षेपानतु विस्तरात् ।।
अब साधक लोगोंके हितार्थ काम्य कर्म कहेजाते
शास्त्रोक्त मंत्रहीसे संक्षेपपूर्वक कर्म करे विस्तारपूर्वक नहीं।
अथ दिव्यज्ञानादिलाभः ।
स्वहृत्पद्मे गणेशानं कुन्देन्दुधवलप्रभम् ।
शुजालंकारसम्पन्न भावयेद्यो निरन्तरम् ॥
आरती तस्य वनाजे शास्त्रज्ञा वहुसुन्दरी ।
नित्यं प्रकाशते सत्यं दिव्यज्ञानप्रदायिनी।
अव दिव्य ज्ञानादि लाभ प्रकार कहाजाता है । जो मनुष्य
निरंतर निज हृदयकमलमें बुन्देन्दु धवल कांतिवाले और श्वेत
आभूपणांसे सुशोभित श्रीगणेशजी महाराजला ध्यान करते हैं
उन मनुष्योंकी रसना (जीम) के ऊपर मनोहर रूप धारण
करनेवाली और अनेक शास्त्रों के ज्ञानसे प्रकाशवाली सरस्वतीजो
वास करती हैं।
(४८) क्रियोडीशः। अथ वशीकरणम् । न विनश्येद् गणेशानं सिन्दूरसदृशप्रभम् । पाशांकुशधरं ध्यात्वा योजपेन्मंत्रिसत्तमः ।। अनंगवशसम्पन्ना तमभ्येति वरांगना । अथ वशीकरणम् । सिन्दूरके समान है कांति जिनकी ऐसे पाश और अंकुशधारण करनेवाले गणेशजी महाराजका जो साधकलोग ध्यानकर पूजन करते हैं और मंत्रका जप करते हैं ऐसे साधकोंके समीप अवश्य काममोहित सुन्दरी अंगना स्वयं सेवार्थ आती है। प्रकारान्तर-पाशांकुशायरानीति हिमकुन्देन्दु- मल्लिमस् । दिग्वस्त्र चन्द्रवर्णासं स्पारमाणिक्य- मण्डलम् ॥ यः स्मरेत्तस्य चशगा झवश्यापि वरांगना। प्रकरांतर कहाजाता है । पाश, अंकुश, वर, अभय धारण करनेवाले, कुन्दके फूलके सदृश कांतिवाल, चन्द्रके तुल्य कांति- वाले, स्वरन् मणियोंके मण्डलसे सुशोभित ऐसे दिगम्बर सदा- शिवका ध्यान करने में जो नहीं प्राप्त हो सकती है अवश्य ऐसी मनोहारिणी प्रिया स्वयं भा अपने को प्रदान करे । अर्थात् चयन होग।
भाषाटीकासमेतः। (४९) अथ सुखस्तम्भनम्-विवादेषु गणेशानं ज्वल. ग्रिसमप्रभम् । प्रतिवाद्विमुखे ध्यायन्प्रजपेन्म- नसा मनुम् । तन्मुखं स्तंभयेदाशु वादी दीनोऽपि नान्यथा। अथ मुखस्तम्भन कहाजाता है । जलती हुई अग्निके तुल्य कांतिवाले गणेशजीका ध्यान कर यदि विवादविषयमें वादीके सम्मुख मंत्रराजका जप करे तो अवश्य वादीके मुखका स्तम्भन हो और वादी दीनवत् व्यवहार करे अथ सर्वरोगहरणम् । अंगुष्ठमानं हृत्पद्मे शुद्ध- स्फटिकसन्निभम् । चिन्तयित्वा गणेशानं चिदंबर- सुधारसम् । अभिषिच्य सुरश्रेष्ठं सततं धरणीतले । सर्वरोगविनिर्मुक्तचिरकालं सजीवति । अव सर्वरोग हरण प्रकार कहाजाता है । शुद्धस्फटिकके तुल्य उज्ज्वल, चेतना स्वरूप, अमृत रसपूर्ण, अंगुष्ठमात्र देहधारी श्रीगणेशजीका जो मनुष्य निज हृदयकमलमें ध्यान कर निरन्तर पृथिवीतलमें अभिषेक करते हैं वह लोग सर्व प्रकारके रोगोंसे मुक्ति भि करते हैं । और चिरकालंतक जीवनसुख भोगते हैं।
(५०) क्रियोडीशः। अथ विपहरणम् । शुक्रवर्ण गणेशानं दशाबाई मदोत्कटम् । शुक्लांबरधरं सौम्यं चिच्छशांकामृत- प्लुतम् ॥ भावयेद्धृदयाम्भोजे नित्यं निर्मलमानसः । मंत्री गरुडवत् सद्यस्त्रिविधं हरते रिपम् ॥ अव त्रिविध विपहरण प्रकार कहाजाता है । शुक्लपर्ण, दश- भुज, मदोत्कट, शुक्लवस्त्र धारण करनेवाले, सौम्य, चन्द्र अमृ- तसे प्लुत ऐसे गणेशजीको जो मंत्रीलोग शुद्धचित्तसे निज हृदयकमलमें ध्यान करते हैं वह मंत्री लोग तीन प्रकारका विष- हरण करनेमें गरुडवत् समर्थ होते हैं । अथ नानाविधकार्याणि-धनार्थी मधुना नित्यं वशार्थी पायसे नेत् । घृतेन लक्षणीसंप्राप्त्य हुनेत् शर्करया तथा ॥ आयुपे चार्थसंपत्तौ दना च जुहुया- तथा । अनेन चान्नसंपत्त्ये द्रव्याप्य तिलतण्डुलैः ।। लवगैरप्यनावृष्टये वृष्टिनामस्तु बिल्वकः । सोभा- ग्यार्थी तथा लाजैः कुसुमैश्चापि सोदनैः ।।
भापाटीकासमेतः। (५१) अब नानाविध कार्य विधान कहाजाता है । धनार्थी सहतसे हवन करे, वक्ष्यार्थी पायस ( खीर ) से हवन करे, लक्ष्मीप्राप्तिके अर्थ धृत शर्करासे हवन करे, आयु अथवा अर्थसम्पत्ति के लिये दधिसे हवन करे, अन्न प्राप्तिके लिये अन्नसे हवन करे, द्रव्य प्राप्तिके लिये तिल और तण्डुलसे हवन करे, अनावृष्टिके अर्थ लवणसे हवन करे, वृष्टिकामनाके अर्थ वेलसे हवन करे, सौभा- ग्यवृद्धि के लिये लाना होम करे अथवा ओदन (भात ) मिश्रित फूलोंसे हवन करे। अथ विविधवशीकरणानि-वृशिने जुहुयात पझे राजानं वशमानयेत् । अश्वत्थोदुंबरप्लान्यग्रोधस- मिधो हुनेत् ॥ विप्रक्षत्रियविदशूद्राः सद्यो वश्या अवन्ति । अव विविधवशीकरण प्रकार कहाजाताहै । वश्य कर्ममें कम- लदलसे हवन कर इस प्रकार हवन करनेसे राजाभी वश्य होसत्ता है । अश्वत्थ, उदुम्बर, पिलखन, न्यग्रोधकी समिधाओंसे हवन फरनेसे ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, शूद्र सबही वश होसक्त हैं। अथ स्त्रीवशीकरणम्-स्त्रीणां प्रतिकृतिं कृत्वा पिष्टेन प्रतिवासरम् । साज्याहुत्तित्रयन्तस्य वशमा- यान्ति नान्यथा । वै ॥ (५२) क्रियोड्डीशः। अब स्त्री वशीकरण प्रयोग महाजाता है । प्रतिदिन पिष्ट (पिट्टी) से स्त्रीके आकारकी प्रतिमा बनाये और तीन भाज्य (घृत) की आहुति प्रदान करे तो अवश्य वशमं होय । प्रकारान्तरम् । मन्त्रराज जपित्वा तु यथाविधि महोदरम् । दशांशेजुहुयान्मन्त्री राजिकालवणेन च ॥ तद्भस्म वामहस्तेन गृहीत्वा ताडयेत् स्त्रियम् । समागच्छति सा नारी मदनानलविह्वला। अव प्रकारांतर कहाजाता है । मन्त्री यथाविधान श्रीमहाराज : गणेशजीके महामंत्रराजका जप कर राई और निमकसे दशांश हवन करे । तत्पश्चात हवनकी भस्मको वाम हस्तम लेकर साध्य स्त्रीके ऊपर प्रक्षेप करे, इस प्रयोग करनेसे अवश्य साध्य स्त्री कामदेवसे विह्वल होकर साधकके समीप आवेगी। अथ रिपुस्तम्भनम्-तच प्रजपदेनं पीतपुष्पैश्च मन्त्रवित् । स्तम्भयेद्रिपुसैन्यं च सामात्यबलवाह- नम् । प्रतिवादी भवेन्मूको मन्त्रस्यास्य प्रभावतः।
भापाटीकासमेतः। (५३) स्तम्भयेत् पश्चद्रव्याणि नान कार्या विचारणा । अब रिपुस्तम्भन प्रयोग कहाजाता है । पूर्व प्रकारानुसार मन्त्रराजका जप कर पीत पुप्पीस हवन करे । इस प्रयोगके कर- नेसे मंत्री सहित मनुके बल (फौज ) का स्तंभन होता है । इस मन्त्रराजके प्रतापले वादीका मुख बन्द होजाता है अर्थात जिहासे कहनेको समर्थ नहीं होसकता । इसमें किसी प्रकारका मन्देह नहीं कि इस प्रयोगके करनेसे पञ्चद्रव्यांका स्तम्भन होजाता है। अथ शत्रूच्चाटनम्-विभीतिकसमिद्भिस्तु नियत जुहुयात्तथा । सम्यगुच्चाटयेच्छन् स्वस्थानानु विशेपतः ॥ मेरुमण्डलतुल्यो वा स देवो- द्विनमानसः । ग्रामयुद्धे पुरे वापि इमं स्तुत्वा तु होमयेत् । उच्चाव्यत्ति वेगेन मानुपेषु च का कथा। अब शत्रुच्चाटन प्रयोग कहाजाता है । शत्रु उच्चाटन प्रयोगमें वहे डेकी समिधासे हवन कर तो अवश्य शत्रुका उच्चाटन हो, विशेप क्या एकवारको मेरु पर्वतके तुल्य स्थिरचित्त पुरुपकाभी कियोड्डीशः। उचाटन होसकता है, ग्रामयुद्ध अथवा पुरयुद्ध में मन्त्रराजका जप कर दशांश हवनकरे । इस प्रयोग करनेसे जड पदार्थका भी उच्चाटन होसकता है मनुष्योंका तो कहनाही क्या है । अथ मारणम्-मानुपास्थि समानीय समय- मांगुलीमितम् । मृतकौरन्तु संवेष्टय सहला- धाभिमन्त्रितम् ॥ कुलिकोट्यवेलायां हासनारे खने- छवि । सप्तादान्मरणं तस्य भविष्यति न संशय ॥ अब मारण प्रयोग कहाजाता है । आठ अंगुल प्रमाण मनु. प्यकी अस्थिके कीलेको मृतक पुरुषके शिरके बालोंसे लपेटकर एक हजार आठ बार (१००८ ) मन्त्रसे अभिमंत्रितकर कुलिक योगके उदयमें शत्रुके द्वारपर पृथिवी खोदकर दाबदे तो अब. श्य शत्रु व्यक्तिका एक सप्ताहके मध्य में मरण होय । अथ गणेशयन्त्र-मनः परं बत्रराज शृणु क्षेवि भणशितुः । सुसम्झे भूतले शुहे. गजायैः सुप. रिकले ॥ कामक्रोधविनिर्मुक्त पूर्ववन्यासयुतः । ।
मापाटीकासमेतः। (५५) संपूज्य देवदेवेशं गणेशं शंकरात्मजम् ॥ सूने शोमे तस्योपरि यन्त्रराजं समुद्धरेत् । कस्तूरी- रोचनायन्त्रकाश्मीर बन्दनं रसम् ॥ गोशचन्द्रससंयु- तमातंगमदमिश्रितः । सर्वैश्च सुसमैरोमः प्राणमापूर्य संलिखेत् ॥ लेखन्या हेमशूच्या वा जातिकाप्टेन दूर्वया । पत्रिंशत्कोणमष्टारं बादशारं ततः परम् ॥ कदर्गादीनि गायत्र्या वर्णा- न्यपि लिखेदहिः । महाभूमण्डलं कुर्याद्जाप्टक- विभूषितम् ॥ तद्वाा वारुण कूर्ममण्डलञ्च नतं शुभम् । काणचायां लिखेन्मन्त्री हक्षा प्रणववे- टिती॥ अंगानि चाप्टकोणेषु लक्ष्मीमनुदलं लिखेत् । द्वादशारे लिखेच्छाति विना नपुंसकस्वरम् ॥ स्वरपत्रं कलापत्रे ततश्चाष्टदलाम्बुजे । कादिमन्ताक्षरञ्चापि सर्व पूर्वादितो लिखेत् ॥ पुनः पार्थककोणेपु वादि सान्तं समालिखेत् । एतन्मंत्रं समाख्यातं न देयं (५६) कियोडीशः। यस्य कल्याचित् ॥ अणिमाद्यष्टमन्त्रेण चाटबाहु प्रपूजयेत् । बव गणेश यन्त्र कहाजाता है । हे देवि ! अव श्रीगणे- शजी महाराजके यन्त्रको सुनो । गजादिकोंसे अच्छी तरह परि- प्कृत, शुद्ध समान भाग पृथिवी तलमें, काम क्रोधको छोडकर पूर्ववत् न्यासकरके देवदेवेश गणेशजीका पूजन करके, कैसे ग णेशजीका शिवजीके पुत्र ऐसे, भूर्जपत्र अथवा रेशमीन वस्त्रके ऊपर कस्तूरी, गोरोचन, केशर, रक्तचंदन, मातंग ( हाथीका ) मद इत्यादि सुगंधित द्रव्योंको एकत्र कर गणेशजीका यन्त्र खींचे लेखनी स्वर्ण, चांदी अथवा जातिकाष्ठ वा दूर्वा हो, यन्त्रराज ३६ कोण, अष्ट अरा निर्मित तथा द्वादश अरा निर्मित हो, उसके वहिर्भागमें गायत्रीके कवर्गादिकोंको बहिर्भागमें लिखे, फिर गजाष्टकसे सुशोभित महाभूमंडलको सुशोभित कर भूपित करै । महा भूमंडलके वहिर्भागमें नत वरुण देवके कूर्म- मण्डलको लिखे । साधकको योग्य है कि कमलदलकी कार्ण काओंमें हकार क्षकार इन दो वणीको लिखे, अष्टकोणमें अंग और लक्ष्मी मन्त्र दलोंमें लिखे, द्वादशार कमलमें शक्तिवीज लिखे नपुंसक स्वरके विना, कलापत्रमें स्वरपत्र लिखै । "पुनः" अष्टदल मध्यमें ककार आदि क्षकारांत वर्णोको क्रमानुसार लिखे फिर पार्श्वके कोणोंमें वकार आदि सकारांत वर्गों को लिदै । यह इसप्रकार वर्णन कियाहुआ यन्त्रराज साध- .
भाषाटोकासमेतः। (५७) कके विना अन्यको देना उचित नहीं है । अणिमादि आठ मंत्रोंसे अष्टवाहुका पूजन करे । अंअणिमायै नमः स्वाहा । लं लक्ष्म्यै नमः । व्यं व्याप्त्यै। पं प्राकाम्यायै । मं महिमायै । ई ईशित्वायै । ६ वशित्वाय । कं कामावशायित्वाये नमः स्वाहा। यह अणिमादि अष्ट मंत्र हैं। एवं संपूज्य विधिवन्मन्त्री मुनिगणान्यजेत् । भोजयित्वा विधानेन नानामिष्टफलादिभिः ।। दिव्य- गन्धयुतः पुष्पैदिव्यगन्धप्रलेपनः । मूषिकं पूज- यामाल नानामिष्टफलादिभिः ॥ ॐ समृषिकाय गणाधिपवाहनाय धर्मराजाय स्वाहा । इत्यननव मन्त्रेण मूषिकं पूजयेत्ततः । एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् । मन्त्री इस प्रकार पूजनकर मुनियोंका पूजन करे और नाना- प्रकारके मिष्टान्न तथा फलादि द्वारा ब्राह्मणोंको भोजन करावे ।
(५८) क्रियोडीशः। घुनः दिव्य गंध, पुष्प और दिव्य प्रकारके प्रलेपनादिको गणेशजीके वाहन मूषकराजका पूजन कर मिष्टान्न और फला. दिकोंसे तृप्त करै । यह मंत्र है । “ॐ समूषिकाय गणाधिपवा- हनाय धर्मराजाय स्वाहा” इसही मंत्रसे मूपिकराजका पूजन- करे । यह मूपिक गायत्री मंत्र है। एकदंताय विद्महे वक्रतुं- डाय धीमहि तन्नो दंतिः प्रचोदयात् । इति क्रियोड्डीशे महातंत्रराजे शिवगौरीसंवादे एकादशः पटलः ।। अथ वशीकरणम्-पलाईवणेन रजतेन वा साध्यस्य प्रतिमा कृत्वा सायहरतं गरी कृत्वा बहि-. तालहरिनाचूर्णकं पलादै तत्र निशिष्य रक्तासने तत्रोपविश्य चतुर्दिक्षु पत्ताका निवेश्य तिलपूर्णपट- मधः कृत्वा संस्थाप्य प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा पूर्वास्यः प्रवालमालया दशसाहस्रजन प्रयोगाहों भवेत् । अब वशीकरण प्रयोग कहाजाता है । प्रथम पलाई ( आधापल) स्वर्ण अथवा चांदीकी साध्य ( जिसके ऊपर प्रयोग कियाजाय) उसकी प्रतिमा वनाचे । पुनः १ हाथ महरा पृथिवीमें गड्ढा खोदे उसमें महीन पिसाहुआ हलदी और हरतालका चर्ण विछावे । साधक रक्त बासनके ऊपर बैठकर मापाटीकासमेतः। (५९) चारों दिशाओमें ध्वजा (झंडी) स्थापन र तिलपूर्ण घटकी प्राणप्रतिष्ठाकर स्थापन करे और प्रवाल ( मूंगा ) मालासे सुशोभित करे । पुनः साधक पूर्वाभिमुख दशहजार जपकरे तब प्रयोगके योग्य हो। अथ मन्त्रम्-प्रणवं पूर्वमुच्चार्य मायावीजं द्विती. यकम् । कात्वं त्वलासिनीयुक्तं वामकर्णेन्दुभूपि- तम् । ततो मत्पदं चूयाचामुण्डे तदनन्तरम् । साध्यनाम ततो न्यस्य वशमानय तत्परम् । वाद्विजायावधिर्मन्नं जपेदशसहस्रकम् । अथा 'न्यत् । चालुण्डे मोहय मोहय अमुकं वश- मानय स्वाहा । प्रातः स्नात्वा हविष्याशी जितेन्द्रियः शुचिर्भूता प्रातःकालमारभ्य सध्य. न्दिनावधिजपसमाप्तेर्दशांशादिकामेण होमादीश्च कार - येत् । जातीपुप्पोमेन वशयेन्नात्र संशयः । कामतुल्यश्च नारीणां रिपूर्णा शमनोपमः । यावज्जी- वनपर्यन्तं स्मरणं च प्रजायते । प्रथम प्रणयका उच्चारण करे । द्वितीय वार मायावीजका !
(६०) क्रियोड्डीशः। तीसरी बार 'कात्वं त्वलाकिनी' युक्त वाम कर्ण और इन्दुभूपित मत्तपदका उच्चारण करे । तत्पश्चात् चामुण्डे इस पदको मिश्रित कर साध्य व्यक्तिके नामकी भी योजना कर और वशमानय स्वाहा यह अन्तमें मिलादे । इस प्रकार दश हजार मंत्र जपे। दृमरा प्रकार । चामुंडे मोहय मोहय अमुकं वशमानय स्वाहा । अथवा इस मंत्रका जापकरे प्रातःकाल स्नान कर, हविष्यान्नका भोजन करनेवाली जितेन्द्रिय साधक व्यक्ति शुद्धता और . पवि- त्रतापूर्वक प्रातःकालसे लेकर मध्याह्नतक जापकर जापक्रमानु- सार दशांश हवनादि करे । जातिपुष्पोंसे हवन करनेसे अवश्य साध्य व्यक्ति वश्य हो जायगी । और कामदेवके तुल्य मनो. हर स्त्रियोंको प्यारी यमके समान असह्य शत्रुवर्गको जीवन पर्यंत साधक व्यक्ति प्रतीत होगी। अन्यच्च । श्वेतापराजितामूलं पेषयनोचनायु- तम् । शतेन मन्त्रितं कृत्वा तिलकं कारयेत्ततः। वशयेन्नात्र संदेहः। सफेद अपराजिताकी जडको पीसकर और गोरोचन मिला- कर सौ बार मंत्रसे अभिमंत्रित कर निज मस्तकके उपर तिलक करे तिलककी ओर देखने मात्रहीसे साध्यव्यक्ति अवश्य “वश्य होगी।
भापाटीकासमेतः। (६१) अथ राजवशीकरणम् । रक्तपुष्पेण चामुण्डा- पूना। ध्यानम् । दंष्ट्राकोटिविशंकटा सुवदना सान्द्रा कृकारे स्थिता खट्वांगासिनिगूढदाक्षिणकरा वामेन पाशांकुशा ॥ श्यामा पिंगलमूर्द्धजा भय- करी शार्दूलचर्मावृता चामुण्डा शववाहिनी जपविधी ध्येया सदा साधकः । जप्त्वा किंशुकः सुमेहत्या फलप्राप्तिः। आद्यन्ते महती पूजा । पञ्च दिनप्रयोगेण राजानं वशमानयेत् । अब राजवशीकरण प्रयोग कहाजाताहै । रक्तपुष्पांसे चामुंडा. का पूजन करे । यह ध्यान है दंष्ट्राकोटिसे विशंकट, मनोहर मुखसे सुशोभित, दक्षिण हस्तमें तरवार धारण करनेवाली वाम. हस्तमें पाश और अंकुश लिये, श्यामवर्णवाली पिंगल वर्णवाले केशांसे विभूपित शिरोभाग जिसका शत्रु वर्गको भय देनेवाली शार्दूल चमसे आच्छादित शरीरवाली, शववाहिनी चामुण्डाका , ध्यान करते हैं और इसी प्रकार जप कर्ममें सदा साधकोंको चामुण्डाका यान वरना चाहिये । टेसके फलोंसे कियाहुमा आवाहन फल प्रदान करनेमें समर्थ होता है । आदि अन्तमें .
(६२)
क्रियोड्डीशः।
वृहत् पूजा करनी चाहिये । पांच दिनके प्रयोगसे राजा वश्य
होता है।
प्रकारान्तरेण वशीकरण-मृगशीर्ष तु संग्राहा
सुरक्तकरवीरकर । नांगलं कीलकं तत
सप्तवाराभिमन्वितम् । यस्य नाम्मा खनेद्भूमो स
वश्यो भवति ध्रुवम् । मन्त्रम् । ॐ हुँ
स्वाहा । तत्ततस्थाने यथासंख्यपयुक्त त्वयुक्तं
Ditch
जपेत् ।
अव प्रकारान्तरसे वशीकरण प्रयोग कहाजाता है । मृग.
शिर नक्षत्रमें रक्त करवीरके काष्ठको लेकर उसमेंसे नौ अंगुल
प्रमाण एक कील बनाकर सातबार मंत्रसे अभिमंत्रित कर साध्य
व्यक्तिका नाम उच्चारण कर पृथिवीमें खोदकर दाब दे अवश्य
साध्य व्यक्ति वश्य होगा। यह मंत्र है। ओं हुं हुं स्वाहा ।
जिस प्रयोगमें जितना जप कहागया है उतनाही होना चाहिये।
जहां कुछभी नहीं कहा है वहां है दश हजार जाप करे।
इति क्रियोड्डीशे महातंत्रराजे गौरीधरसंवादे द्वादशःपटला !!
मापाटीकासमेतः । (६३)
अथ विपणम्-गृहीत्या शलसीकण्टं निखने-
द्भविदारतः । कालहो जायते नित्यं शत्रोहे न .
संशयः । मन्त्रः। ॐ नमोनारायणाय अमुलायु.
क्षेन सह विवेपं कुरुरु स्वाहा ।
अब विद्वेषण प्रयोग कहाजाता है । साहीके कांटेको अगाडी
कहे हुए मंत्रसे अभिमंत्रित कर भूमिमें गाडदे अवश्य द्वेष भाव
प्रकट होकर शत्रुओंमें कलह हो । यह मंत्र है । ओं नमो नारा
यणाय अमुकामुकेन सह विदेपं कुरु कुरु स्वाहा ।
अथान्यत्-परस्परं रिपार मित्रेण सह
निश्चितम् । महिपाश्चपुरीपाभ्यां
महिपाश्चपुरीपाभ्यां गोमूत्रेण
समालिखेत् । पयो म तयोः शीघ्र विद्वेषश्व
परस्परम् ॥
विवेपका दूसरा प्रकार कहाजाताहै । महिप, अश्व इन
दोनोंके पुरीपको गोमूत्रसे मिश्रित कर जिनका परस्परमें भारी
मेलबाले मित्रोंका नाम लिखे तो बहुत शीघ्र उन बहुत दिनोंके
मिलनेवालोंका अवश्य आपसमें विद्वेष भाव होजावे ।
(६६) कियोड्डीशः। आकाशके तुल्य नीलवर्णवाली, महाचण्डा, सुर और असु- रोको विमर्दन करनेवाली, तीन नेत्रवाली, महाशब्द करनेवाली सर्व आभूषणांसे भूपित, कपाल और कतका हाथमें लिये चन्द्र सूर्यके ऊपर स्थित शर समूह धारण करनवाली प्रेत तथा मैर- वसे वेष्टित, पितृकाननमें वास करनेवाली, समस्त सिद्धियां देने. वाली, ऐसी कालिका देवीकी तृप्तिके अर्थ विविध पुष्प, छाग- वालि इत्यादिसे हवन करे और भक्तियुक्त चित्तसे महेशानीका पूजन करे । पुनः हवनकी भस्मको मन्त्रसे अभिमंत्रितकर छला. हमें धारण करे अवश्य शत्रुका विद्वेषभाव उत्पन्न हो । बन्त्र-ओं द्रीं विदेषिणि असुकामुकयोः परस्पर- योर्विदेषणं कुरकुरु स्वाहा। 'यही विद्वेषण मन्त्र हैं। अथोच्चाटनम् । सौरारयोदिने ग्राह्यं नास्थि चतुंगुलद। निशावसाने लिख्य प्रधान- भवन क्षिपेत् ॥ सप्ताहाऽभ्यन्तरे शत्रोराशु
भापाटीकासमेतः । (६७)
चोच्चाटनम्भवेत् ॥ ढूं अमुकस्योच्चाटनं कुरुशुरु
स्वाहा । हूं असुक हनहन रवाहा।
शनि वा मंगलवारको चार अंगुल प्रमाण मनुष्यके अस्थिके
ऊपर मन्त्र लिखकर रात्रिके अन्तमें शत्रुने स्थानमें मध्यप्में फेंक
दे तो अवश्य एक सप्ताहके बीच शत्रुका उच्चाटन हो। दूं असु-
कस्योच्चाटनं कुरु कुरु स्वाहा । दूं अमुकं हनहन स्वाहा । यह
मंत्र है।
अथ स्तम्भनम्-असुरूस्य सनः तस्मयस्तम्भय
टुं फट् ।
यह स्तम्भन मन्त्र है।
अथ शांतिः-शांतिः सर्वाभिचारस्य पञ्चमध्यन
जायते । काम्यप्रयोगे सर्वत्र नियमोऽयुतसंख्यकः ।।
होमसंख्या १०००० ॥
अब अभिचार प्रयोगोंकी शान्ति कही जाती है। समस्त
अंभिचार प्रयोगोंकी शान्ति पञ्चगव्यसे होती है । समस्त
कास्य प्रयोगोंमें दश हजार जपकरे ऐसा नियम है।
अथ मारणम् महावत्याप्रयोगः-अतःपर पहे.
शानि मारणं शृणु पार्वति । येन विज्ञातमात्रण
(१८ कियोद्धाशः। सुसाध्यं भुवनत्रये ॥ हजाया महायोगिन्यतोगौरी पदं वदेत् । सुवनभयंकरीति पदं वर्मास्त्रमुच्चरेन्मनुस्।। अथवा प्रथम न्यासमथातो ब्रह्मण पदम् । यदीर्घ- युक्तबीजेन चोगमन्त्रेण योजना॥ हृदयं च ततोऽ. नेन धर्माण शिरः कमात् । शिखाकवचनेत्रास्त्र- वन्यासकाः स्मृतः ॥ अंगिराश्च ऋपिदेवि गाय- त्रीच्छन्न ईरितम् । सिंहवका च भूतानां भयंकार ततः परम् ।। महासत्या देवता च इत्युक्त्वा न्यास- माचरेत् । अब मारण प्रयोग कहाजाता है । यह महाकृत्यांका प्रयोग है। हे पार्वति ! अव मारण प्रयोग कहाजाता है सुनो । इस प्रयोगके यथार्थ करनेसे सिद्धि प्राप्त होती है । इसके' अगाडी न्यास कम है बुद्धिमान् जन स्वयं जानलेंगे। सिंहवक्रा, भूतानां मयंकार, महाकृष्या, देवता इन नामोंको उच्चारणकर न्यास करे । इसका नापि अंगिरा और छन्द गायत्री है।
भाषाटीकासमेतः। (६९) अथ ध्यानम्-सिंहाननां कृष्णमुखी लम्ब- गावपयोधराम् । दंष्ट्राकरालवदनां त्रिनेत्रां सर्व भोज्ज्वलाम् ॥ष्णकांचीसमायुक्तां विधूमाग्नि समप्रमाम् । त्रिशूलचकमुशलखद्धांगलरपंक जाम ॥ लेलिहानमहजिह्वां विद्युत्पुञ्ज सुभीपणाम् । ध्यात्वा कृत्यां विधानेन पूजयेन्मन्त्रवित्तमः ॥ ध्यात्वा कृत्यामचयेद्वे रक्तैः पुप्पैश्च वश्यक्के ॥ कृष्णेारणकृत्येषु मांसरक्तासः स्तुताम् । अव ध्यान कहाजाता है । सिंहके मुखके तुल्य मुखवाली कृष्णमुखी, स्थूल कुचवाली, वृहत् दंष्ट्राओंसे भयङ्कर मुखवाली, त्रिनेत्रा अर्थात् तीन नेत्रवाली, उज्ज्वल वर्णवाली, कृष्णकाञ्ची ( तागडी ) से सुशोभित, प्रज्वलित अग्निके तुल्य कान्तिवाली, त्रिशूल, चक्र, मुशल पनको चारों हस्तमें धारण करनेवाली, जिहासे होटाको चाटती हुई विद्युत्, (विजली ) पुञ्जके तुल्य भयंकर शब्दवाली ऐसी कृत्या देवांका यथाविधान ध्यानकर पृजन को परन्तु वश्य कर्ममें रक्त पुष्पोंसे पूजन करना योग्यहै। मारण प्रयोगमें कृष्णपुष्प, मांस तथा रक्तासबसे स्तुतिकर -- पूजन करे।
(७०) कियोडीशः। त्याञ्च मदन कुमारच्छादिनी तथा। भीपणां श्रीमती चैव प्रतिष्ठाञ्च लतः परम् ॥ विद्यामभ्यर्चयेदष्टपनेषुति (क्रमशः ) सुलो- चनाम् । पूर्व तु शांकरी नाम शुक्लवी वरा- न्विताम् ॥ द्विभुजां सौम्यवदनां पाशांकुश- धरां शिवाम् । दक्षिणे मीपिका नाम लम्ब- जिह्वां सुधामुखीम् ॥ कृष्णवणी रक्तमुखी रक्तमालानुलेपनाम् । चतुर्भुजा सिंहनादां महाघोपा कपालिनीम् ॥ खनापरता शिरो- माला सर्वाभरणभूषिताम् ॥ पथिमे वारुणी नाम वर्णवणी सन्मुखीम् । सुरुमालिका शुभदंष्ट्रामभयदां सदा । उत्तरे सीमिका नाम चतुर्हस्तां भयंकरीम् । मदना, कुमार्यश्वच्छादिनी, भीपणा, श्रीमती ऐसी कृत्या देवीकी प्रतिष्ठाकर भष्टदल कमलमें सुलोचना विद्यारूप श्रीकृत्या देवीका पूजन करे । पूर्वदिशाम शांकरी, शुलवर्णा, वरान्धिता, भाषाटाकासमेतः। (७१, विभुजा, सौम्यवदना, पाशाङ्कुशधरा, शिवा इन नामोंसे पूजन करे दक्षिणभागमें भीपिका, लम्बजिहा, सुधामुखी, कृष्णवर्णा, रक्तमुखी रक्तमालानुलेपना, चतुर्भुजा सिंहनादा, महाघोपा, कपा. लिनी, खड्गहस्ता, शिरोमाला, सर्वाभरणभूपिता इन नामोंसे पूज नकर पश्चिम मागम वारुणी, स्वर्णवर्णा, हसन्मुखी, सुरुद्रमालिका, शुभ्र दंष्ट्रा, अभयदा इन नामोंसे पूजन करे । उत्तर भागमें भीमिका चतुर्भुजा, भयङ्करी इन नामोंमे पूजन करे । पूजयित्वा जपेन्सन्नं नित्यमष्टोत्तरं शतम् । अवाप्य विनियोगस्तु कर्तव्यो मंत्रिणा सदा ॥ कालं विदित्वा प्रतिमां मधूच्छिष्टेल कारयेत् । मादशांगुलकं शत्रो खलोमसमन्वितम् ॥ हृदो नामशेषञ्च फटकारच सममके । अस्य प्राणान् प्रतिष्ठाप्य मरिचलेपयेत्ततः ॥ मृत- ब्राह्मणचाण्डालकेशाम्यां पादयोः बहा करे करमये तोरणे वाप्यधोमुखम् ॥ तस्यायो मेखलायुक्तं त्रिकोणं तत्र कुण्डकम् ।। तत्र शारं विधायानि परिस्तीर्ण शरैस्तुणैः ॥
(७२) क्रियोड्डीशः। विभीतकं पीधाय कल्पवेद्यस्य मारणम् । जुहुयानिम्बतलाक्तः काकोलूकस्य पुच्छकैः ॥ दारयेनं झोपयैनं मारयेत्याभिधाय च । अष्टोत्तरशतेनैव मनुना विधिना ततः ॥ होमान्ते विधिवत् कृत्वा बाह्ये अग्नेश्च सन्निधौ । यो मे द्वेष्टि जनः कश्चिदूरस्थो पान्तिकाप च ॥ पिन कृत्येऽसुकं तस्य हुमित्युक्त्वा लिवेद- येत ॥ संरक्ष्याग्निं विधानेन नवरात्रं समा- चरेत् ॥ हुनेद्यायत्ताबदल्य भवेदेव रिपो- तिः। अर्कक्षीरे च मरिचं पिष्ट्वा सिद्धार्थ- मेव च ॥ जले संलोड्य मंत्रेण रिपुं ध्यात्वा निरुद्धक् । कृष्णाम्बरोत्तरीयायपादेनाकल्य तद्रिपुम् । वज्रशूलमिति ध्यात्वा तस्योपरि तु निक्षिपेत् । नवरात्रात परे शर्मियते नान संशयः ।
. भापाटीकासमेतः । (७३) कृत्या देवीका पूजन कर नित्यप्रति अष्टोत्तर शतमंत्र जपे । मंत्रीको सदा विनियोग करना चाहिये । पुरश्चरणके कालको जान कर मोमसे प्रतिमा बनावै परन्तु शत्रुकी प्रतिमा१२अगुंल प्रमाण हो और उसके नख लोमभी अवश्य हों "प्रतिमा विषय में नख लोम कृत्रिम होते हैं" प्रतिमाके हृदयमें शत्रका नाम और मर्मस्थानमें फटकार लिखे । शत्रु प्रतिमाकी प्राणप्रतिष्ठा करके मिरचीको पीसकर सर्वांग लेपकरे, पुन: मृतक ब्राह्मण तथा मृतक चाण्डालके केशांसे प्रतिमाके हाथ पांव बांधकर अधोमुख तारणमें लटकादे बौर उसी प्रतिमाके नीचे मेखलायुक्त त्रिकोण कुण्ड स्थापन अर्थात् निर्माण करे उस कुण्डमें अनि स्थापनकर तृण और शरसे अग्निको आच्छा- दिन करे । बहेडेकी माला पहनकर काक, उल्लू इन दोनोंकी पूंछको निम्बपत्र ( नीमके पत्ते ) और कडुआ तेल मिला हव- नकरे, हवनके समय दारय, शोपय, मारय इन तीन शब्दोंका उच्चारण करताजाय । विधानपूर्वक १०८ वार मंत्र द्वारा हवन करे, पुनः अग्निके निकट हो कहे हे कृत्ये । दूर देशमें रहने वाला अथवा समीप रहनेवाला जोभी कोई मेरा शत्रु हो उसका रक्त पानकर ऐसा कह मंत्रके अन्तम हुँ वीज मिश्रितकर आहुति प्रदान करे । विधानपूर्वक अग्निकी रक्षा कर नवरात्रितक अथवा जबतक शत्रुका मरण न हो तबतक नियमपूर्वक हवन करता रहे । आकके दूध मिचोंको पीसकर और मन्त्रोचारणपूर्वक
(७४) . क्रियोड्डीशः।
जल मिलाकर नेत्र मूंदकर शत्रुका ध्यान कर काले वस्त्रोंसे वेष्टित
उस शत्रु प्रतिमाको चरणके अंगूठेसे स्पर्शकर और वज्र शूलका
ध्यानकर उक्त मरिच जलको शत्रु प्रतिमाके शरीरके उपर
छिडकदे तो नवरात्रिके पश्चात् अवश्य शत्रुका मरण होगा इसमें
किसी प्रकारका संदेह नहीं है ।
अथ बटुकभैरवप्रयोगः-अतः परं महेशानि
शृणुष्व कर्मसिद्धिदम् । बटुकं विषलाडाख्यं-
पूजयेत् पदसु कर्मसु ॥ ( आचम्य स्वास्ति
वाचनसूक्तं पठित्वा ) अभ्यर्च्य च शिरःपको
श्रीगुरुं करुणामयम् ।
अव बटुकभैरवका प्रयोग कहाजाता है । हे सहेशानि ।
कर्ममें सिद्धि देनेवाले बटुकभैरवका प्रयोग सुनो । विमल है
अङ्ग जिनका ऐसे श्रीवटुकभैरवजीका पूजन छहो कर्मोमें करै ।
आचमनकर स्वस्तिवाचन सूक्तको पढकर निज शिरपझमें करु-
णामय श्रीगुरुजीका पूजन करे ।
संकल्प-शोत्याधयुकगोत्रान्तनालनहावि-
लिटोपशमनपूर्वकारोग्याशुद्धिकामो गणेज्ञादि-
पूजापूर्वकबद्धकपार्मिषशिवपूजनमहं करिष्ये ।
भापाटीकासमेतः। (७५) गुरु पूजनके पश्चात् यह संकल्प करना योग्य है। शान्तिादो-रचि पूजयेदादी क्षेत्रपा ततः पुनः । स च पूजयेदेवि ध्यानं शृणु महामते । शांतिकादिमें प्रथम रतिका पूजन करे तत्पश्चात् क्षेत्रपालका । हे दवि ! रुद्रकामी पूजन करे में अब ध्यानकोभी कहता हूँ मुनो। प्रणयाचं . ध्यानम्-शुलहरतं महारोन्नं सर्व- विघ्नानिपूदनम् । पूर्णचन्नसमाभासं रुद्र कृप- सवाहनम् ॥ एवं ध्यात्वा महाकाली पूजये इन्द्रदेवतम् ॥ प्रणवायं रुद्राय नमः इति । भक्तियोगतः शततोलकपरिमितलिंगमानीय लॉल्यपात्रे लिंग संस्थाप्य । सामान्या- यं ततः हत्या भूतमुहिं महेश्वरि । प्राणाया- ममंशन्यासं पीठन्यासं तमाचरेत् । प्रणव आदिमें कहकर ध्यान । विगल है हायमें जिनके, महागेद्र स्वरूप, समस्त विन्न नाश करनेवाले, पूर्ण चन्द्रमण्डलके तुल्य कांतिवाले, वृषभवाहन श्रीरुद्र (शिव ) जीका ध्यान करते हैं । इस प्रकार रुद्रजीका ध्यान करके रुद्र देवका भीमहा- - (७६) फियोड्डीशः। कालीका पूजन करे । प्रणवाद्य श्रीरुद्रजीको नमस्कार है भत्तिपूर्वक सौ १०० तोले प्रमाण शिवलिंगको लाकर काँशीके पात्रमं स्थापनकर तदनंतर सामान्य अर्घप्रदानकर भूतशुद्धि, प्राणायाम, अंगन्यास, पीटन्यास करे । ततः ऋष्यादिन्यालः। ततो देहन्यासः । यथा मुनि ॐ भैरवाय नमः । एवं ललाटे भीम- दर्शनाय नमः । नेत्रयोः सूताश्रयाय नमः । मुखे तीक्ष्णदर्शनाय नमः । कर्णयोः क्षेत्र- पाय नमः । हदि क्षेत्रपालाय नमः । नालि- देशे क्षेत्राख्याय नमः । कटयां सर्वाधनाश नाय नमः । उौंस्थिनेवाय नमः । जंघयोः रक्त- पाणिकाय नमः । पादयोः देवदेवेशाय । सर्वाग बटुकाय । तदनंतर । प्रष्यादि न्यास करे। तत्पश्चात् देवन्यास करें। जैसे मूनि भैरवाय नमः इस मंत्र से सस्तक स्पर्श करै । एवं ललाटादि, सर्वांगका स्पर्श करे । ललाटे भीमदर्शनाय नमः । नेत्रयोः भृताश्रयाय नमः । मुखे तीक्ष्णदर्शनाय नमः । कर्णयोः क्षेत्रपाय नमः।
मापोटीकासमेतः। (७७)
हदि क्षेत्रपालाय नमः । नाभिदेश क्षेत्रात्याय नमः । फेटयां
सविनाशनाय नमः ऊचाः त्रिनेत्राय नमः । जंघयोः रक्तपा-
णिकाय नमः । पादयोः देवदेवेशाय नमः । सर्वांगे वटुकाय
नमः । इस प्रकार अंगन्यास करें।
अथ करांगन्यासः । ॐ ह्रीं वाँ अंगुष्ठाभ्यां नमः
इत्यादि । ॐ ह्राँचौं हदयाय नम इत्यादि ततो
मूलेन व्यापकं कृत्वा ध्यायेत् । ॐ बन्दे बालमि-
त्यादि संपूज्य । द्वाविंशदक्षर चैवं जपेद्रुद्रसहलकम् ।
अभिप तर्पणञ्च यथाविधि समाचरेत् । एपा
शातिर्महाशांतिः कथिता तव श्रद्धया।
अब कांगन्यास कहाजाना है। ॐ हीं यां संगुष्ठाभ्यां
नमः इस मंत्र दोनों हाथोंके अंगूठोका स्पर्श को हां यां
हृदयाय नमः । इस मंत्र से हृदयका स्पर्श करे । फिर मृलसे
व्यापक कर ध्यान को । व बालमित्यादि हम ध्यान
मंत्रो ध्यानकरे । पृजनकर २२ घर के मंत्रका ११ हजार
जप करें । यथाविधान अभिषेक और नर्पण। दी।
यह महाशांति तुम्हारी श्रद्धासे वर्णन करी गई है।
(७८) क्रियोडीशः। अथ वशीकरण-पूर्ववत संकल्प्य । राजसध्या- नेन ॐ अवारकादि ध्यात्वा । अब वशीकरण प्रयोग कहाजाता है। पूर्ववत् संकल्प करके उह्यद्भास्करादि इस राजस ध्यानसे ध्यान करै । अथ स्तम्सनम्-अतः परं महादवि पूजनं दूर- कर्मणि । पूर्ववत् संकल्प्य । विद्वेषणोच्चाटनादिषु च रकमसु ध्यानम्-यथा ध्यायनीलाद्रिकान्तामि- स्यादि ध्यात्वा संपूज्याशिवसदस्यसंख्याकभुक्तं शेने अनुकं वशमानय स्वाहा इति. मन्त्रजपकर्माह वरिष्य। अव स्तम्भन प्रयोग कहाजाता है । हे महादेवि ! अरकर्ममें पूजन विधान कहाजाता है। पूर्ववत् संकल्प करके कर्म आरंभ करे । विदेषण उच्चाटन आदि क्रूर कर्मोंमें ध्यान यथा ध्यायेन्नी- लाद्रिकान्तम्० इस श्लोकद्वारा ध्यान करे । यानकर पूजन- फरे । जप संख्या ॥ ११००० ॥ यन्त्रे पूजाक्रमः-पुनात्वा यन्त्रे पुष्प निध व भाषाहनादिक अर्थात् । यथा । तत्र भापाटीकासमंतः। (७९) क्रमः । मूलादि सबोजातमन्त्रेणावाहनम् । पथा सूलं ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमः । भवेऽभवेऽनातिभवेभजस्व मां भवोद्भवाय वै नमः। पिनाकधुगिहागच्छ इहागच्छ । पुनर्मूलमुच्चार्य ॐ वामदेवाय नमः एवं ज्येष्ठाय रुद्राय कालाय हल- विकरणाय वलाय बलविकरणाय बलप्रमथनाय सर्वभूतदमनाय नमो नमः । उन्मनाय नमः इह तिष्ट इह तिष्ठ मूलं इह सन्निधेहि अव यन्त्रमें पूजन विधान कहाजाता है । फिर ध्यान कर यन्त्रमें पुष्प स्थापन कर आवहनादि करे । जैसे मूलादि सद्यो- जातं मंत्रसे आवाहन करे आवाहन मन्त्र यथा। ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमः । भवेऽभवनातिभवेभजस्व मां भवोद्भवाय वै नमः पिनाकधृग् इहागच्छ इहागच्छ पिर मूलका उच्चारण कर इन नाममन्त्रों द्वारा जाहन करे। ॐ वामदेवाय नमः । ॐ ज्येष्टाय नमः । ॐ रुद्राय नमः । ॐ कालाय नमः । चल- (26) कियोडीशः। विकरणाय नमः । ॐ बलाय नमः । ॐ बल- विकरणाय नमः । ॐ बलप्रमथनाय नमः । ॐ सर्वभूतदमनाय नमोनमः । ॐ उन्भलाय नमः । इह तिष्ठ इह तिष्ठ मूलं इह सन्निधेहि । इस प्रकार आवाहन कर पूजन करे। अघोरण सन्निरोधनम् । पुनर्मूलं ॐ अघो- रेयोऽथ घोरेया घोरघोरतरेयः ।। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमोऽस्तुते सदरूपेभ्यः । इह सन्निरुद्धस्व । घोर मंत्रसे सन्निरोधन करे । यही उपरोक्त घोर मन्त्र है । तत्पुरुषेण योनिमुद्राप्रदर्शनम् । पुनर्मूलम् । ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् । इति योनिमुद्रा प्रदर्शयेत् । तत्पुरुषेण इस मंत्रसे मुद्रा दिखावे । फिर मूल मंत्रका जप करे ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचो यात इस शिवगायत्री मंत्र से मना दिखाने ।
भापाटीकासमेतः। (८१) ईशानेन वन्दनामिति । पुनर्मूलम् । ओं ईशा- नः सर्वविद्यानमीश्वरः सर्वभूतानां ब्राह्मणोऽ- धिपतिब्रह्माधिपतिर्ब्रह्माशिवोमेऽस्तु सदाशिव ॐ । शिवं बन्दयामि नमः । ततः प्राण- प्रतिष्टा । आँ द्री को हंसः बटुकायनमः पशु पतेः शूलपाणेः प्राणाः इह प्राणाः जीव इन स्थितः । सन्द्रियाणि । चक्षुः श्रोत्रघ्राण- प्राणाः इहागत्य सुखं चिरं तिष्टन्तु स्वाहा । -हुँ इत्यवगुण्ठ्य । पमिति धेनुमुद्रयामृतीकृत्य छोटिकाभिर्दिग्बंधनं कृत्वा पडंगानि संपूज्य देवं पूजयेत् । "ईशान" इस मन्त्री बन्दना करे । फिर मूलजः । ॐ ईशानः गर्वविद्यानामीधरः सर्वभूतानां व्रमाधिपतिर्ब्रह्मा शिवोऽ स्तु सदाशिवः ॐ गिवं वंदयामि नमः । इन मन्त्रों में शिवजीसी नंदना करें । फिर प्राणप्रतिष्ठा करे । भां द्रीं को हंगः बटुकाय नमः। पशुपनेः शूलपाणः प्राणाः इद प्राणाः । जीव द स्थितः। संबद्रियाणि चक्षा श्रीवत्राणमाणाः रहागत्य सुखं चिरं तिछन् कियोडीशः । स्वाहा इन मन्त्रीद्वारा उक्त प्रतिमामें प्राणप्रतिष्ठा करे । हुँ इस वीजका अवगुंठन कर 'वम्' इस वीजहारा धेनुमुन्द्रा दिखावे और अमृतीकरण करे छोटिका ( ताली) द्वारा दिग्बन्धन और पडंग पूजनकर देवदेव श्रीशिवजीका पूजन करे । मूलमुच्चार्य एतत् पाद्यम् । ॐ महादेवाय सोम- सूर्तये बटुकात्मने पशुपतये शिवाय नमः । एवं क्रमेणाचिमनयिादिकं दद्यात् । स्नाने तु विशेपः । यथा । अचेत्यादि अमुकरयाऽ- कोपांशुलनिवृत्तिपूर्वकाहारियोपशमनारोग्यायु- वृद्धिकामनया शततोलकपरिमितदुग्धेन बंदुका- सकपशुपतेलिङ्गं नापयामि । ॐ सयोजातं प्रपद्यामि इत्यादिना स्नापयेत् । ततो जलेन स्नापयित्वा । मूलम् । एप गन्धः । ॐ महा- देवाय सोमसूर्तये नमः पुरे तु अछेत्यादि उक्तवत् कामनया बटुकात्मकपशुपतये शिवा याष्टोत्तरशतन्द्रोणपुष्पाण्यहं संप्रहहे । मूल सांपाटीकासमेतः। (८३) सुचार्य ॐ महादेवाय लोमसूर्तये नमः । इति .-मंत्रण एकाम् एक कृत्या दद्यात् । एवं बिल्वपत्रम् । मधुपर्क धूपदीपे तु गन्धयत् । नैवेद्यम् । अत्या- दिस्नानीयवत् कामनया एतत् सोपकरणशततोल- क्षपरिमितातपतण्डुलनेवेचं बटुकात्मकपशुपतये शिवाय तुभ्यमह संपददे ॐ महादेवाय सोमसूर्तये नमः । शततोलकपरिमितसंविदा चूर्ण पानीयं तांबूलं व पूर्ववत् संकल्प्य दद्यात् । इति । मूल मंत्र उच्चारण करै । ॐ महादेवाय सोममूर्तये वटुकात्मने पशुपतये शिवाय नमः । इस मन्त्रसे शिवजीको पाद्यप्रदान करै । इसी प्रकार अर्घ आचमन आदि प्रदान करे । परन्तु स्नानमें कुछ विशेषता है । यथा । प्रथम संकल्पकरे । संकल्प यह है। अद्येत्यादि अमुलस्याशेषाऽशुभनिवृत्तिपूर्वकाहारिष्टोपशमनाइयो- ग्यायुर्वृद्धिकामनया शततोलकपरिमितदुग्धेन वटुकात्मकपशुप- पतेलिङ्गं स्नापयामि । ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि इत्यादिना लाप- येत् । इस मंत्रसे शिवको स्नान करावे फिर जलसे स्नान करावे और मूल मंत्रका जप करे । महा देवाय सोममूर्तये नमः । इस -- (८४) क्रियोड्डीशः। मंत्रसे गन्ध मदान करे पुष्पभी संकल्पपूर्वक चढाने योग्य हैं। यह सकल्प है। अयेत्यादि अमुकस्याशेपाऽशुभनिवृत्तिपूर्वक ग्रहारिष्टोपशमनारोग्यायुर्वृद्धिकामनया बटुकात्मकपशुपतये शिवायाष्टोत्तरशतद्रोणपुष्पाण्यहं सम्प्रददे । तत्पश्चात् मूलमंत्र उच्चारण करॐमहादेवाय सोममूर्तये नमः इस मंत्रसे एक २ पुष्प शिव प्रतिमाके ऊपर चढावे । इसी प्रकार बिल्वपत्रभी चढाना मधुपर्क धूप, दीप, गन्धके तुल्य चढाना संकल्पपूर्वक नैवेद्यमी अर्पण करै यह संकल्प है । अद्येत्यादि अमुकस्याऽशेषाऽशुभनि- वृत्तिपूर्वकग्रहाऽरिष्टोपशमनाऽऽरोग्यायुर्वृद्धिकामनया एतत् सोप- करणशततोलकपारमितातपतण्डुलनैवेद्य, बटुकात्मकपशुपतये शिवाय तुभ्यमहं संप्रददे । इस प्रकार नैवेद्य प्रदानकर तांबूल पूगीफल आदि भी संकल्प द्वारा अर्पण करे । संकल्प पूर्ववत् जानना। वशीकरणसन्त्रे । मूलसुच्चार्य ओं भवाय जलभू- तये बटुकालाने शिवाय नमः । एवं क्रमेण पूजयेत् । एवमचिमनीयं दधात् । इनाने तु अत्यादि- अनुकरम्यासुलवशीकरणाचे शततोलकपरिमित. तेन मधुना वा बटुकात्मकपाशुपतशिवलिंछी रूनाप- माषाटीकासमेतः । (८५) यामि । मूलसुच्चार्य । एप गन्धः ॐ भवाय जलमूर्तये पुष्पे तु अद्येत्यादि अमुकल्यामुशवशीकरणार्थम् अष्टोत्तरशतद्रोणपुष्पं बटुकात्मने पशुपतिशिवायाऽ हे सम्प्रददे । सूलसुच्चार्य एतत् द्रोणपुष्पं ॐ भवाय जलमूर्तये नमः इति प्रत्येकम् । एवं बिल्वपत्रम् । धूपदीपे तु ॐ अवाय जलमूर्तये नमः नैवेद्यं तु अद्येत्यादि अमुकस्थामुकवशीकरणार्थशततोलक- परिमितसोपकरणनैवेद्यं ॐ बटुकात्मकपशुपतिशि- वायाऽहं सम्प्रददे मूलमुच्चार्य एतत् सोपकरणशत- तोलकपरिमितनैवेद्यं सम्बिदाचूर्णञ्च ॐ भवाय जलमूर्तये नमः । ततः पानार्थोदकम् आचमनीयं ताम्बूलं च दद्यात् । अब वशीकरण मन्त्रका विधान कहाजाता है मृल मंत्रका उच्चारण करे । ॐ भवाय जलमूर्तये बटुकात्मने शिवाय नमः इस क्रमानुसार पूजन करे । इसही क्रमानुसार अर्ष, आचमन - (८६) क्रियोडीशः। आदि प्रदान करे । स्नानविपयों संकल्प करे । यह संकल्प है । अद्यत्यादि अमुझस्याऽमुझवशीकरणाथै शततोलकपरिमितवृतेन मधुना वा बलात्मकपशुपतिशिवलिंग स्नापयामि । मूलमंत्री उच्चारण कर ॐ भवाय जलमूर्तये नमः इस मंत्रसे गंध प्रदान करे । पुष्प संकल्प द्वारा प्रदान करे । संवाल्प यह है अद्ये त्यादि अमुकस्यामुकवशीकरणार्थम् अष्टोत्तरशतद्रोणपुष्पं बटु कात्मने पशुपतिशिवायाऽहं सम्प्रददै । मूलमंत्र उच्चारण कर ॐ, भवाय जलमूर्तये नमः इस मन्त्रसे पृथक् पृथक् द्रोण(दोहना) पुष्प चढाये इसी प्रकार विल्वपत्र भी चढावे । ॐ भवाय जलमृ. तये नमः । इस मंत्रसे धूप दीप प्रदान करे । नैवेद्य संकल्पपूर्वक प्रदान करे । संकल्प यह है अछेत्यादि अमुकस्यामुभवशीकरणाथ शततोल्कपरिमितसोपकरणनैवेद्यं ॐ बटुकात्मकपशुपतिशिवाय संप्रददे । मूल मंत्रको उच्चारण कर ॐ भवाय जलमूर्तये नमः इस गंत्रद्वारा नैवेद्य जल ताम्बूल पूगीफल, आदि प्रदान करे । ततः अष्टावरणं पूजयेत् । ततोटमूर्ति पूजयेत् । ततो मूलन पुष्पाञ्जलिजयं दत्त्वा संकल्प्य शिवसाह-. नसंख्याक तन्मन्नं जपेत् । शान्तिकादी झूरकर्म- ण्यपि । ततो गुलादिना जपं समाप्प स्तोत्रादिक पठेत । :
भापाटीकासमेतः। (८७) तदनन्तर अष्टावरण पूजन करे । फिर अष्टमृतिका पूजन करे। पुनः मूलमंत्रले तीन पुष्पाञ्जलि प्रदानकर ११ हजार रिख मंत्रका जप करे । शांतिकादि कर कर्ममें भी तदनन्तर गुहादिसे मंत्र जपको समाप्त कर स्तोत्रादिका पाठ करे । ततो वलिदानम्-यथा मूलमुच्चार्य वटुकभैर- याय एप वलिनमः । मेरवपरिवारगणः सह मस शवन् सरुधिरं पिव पिव इवं बलिं गृह गृह स्वाहा । ॐ शत्रुपक्षस्य रुधिरं पिशितं च दिने दिने । भक्षय स्वगणैः साई सारमेयसमन्वितम् ॥ ततो विहित द्रव्यः अष्टोत्तरशतं सायं वा होमयेत् । अव बलिदान प्रकार कहाजाताहै .। मूल मंत्रको उचारण कर बटुकभैरवाय एप वलिनमः । इस मंत्रसे बलिप्रदान करे । भैरवपरिवारगणैः सह मय शगुन् नमधिरं पिन पिव. इमं बलि गृह गृह स्वाहा । बलिप्रदान के समय इस मंत्रका उच्चारण 'करे । ॐ शत्रुपक्षरय रुधिरं पिशितं च दिने दिने । भक्षयस्य. गुणैः साद्ध सारमेयसमन्वितम् । यह समरन मंत्र बलिप्रदानके संगय उच्चारण करने तत्पश्चात् पीछे सहये कर्मानुसार द्रव्यास १०८ अथवा १००० याहुति प्रदान कर हरन करे ।
(८८) क्रियोड्डीशः। वशीकरणे तु घृताक्तराजिकाभिरष्टोत्तरराहस्त्र- होमः । शान्त्यर्थ दूर्वादिकम् । क्रूरकर्मणि बिल्वप- त्रम् । लच्चाटने तु ॐ ह्रीं श्रीं हुं शिवाय स्वाहा । हति विशेषः । दक्षिणां वटुकात्मकपशुपतये शिवाय तुभ्यमहं सम्प्रददे । इवेतसर्पपं लवणमिति । वशीकरण प्रयोगमें घृत मिश्रित राईसे १००८ चार हवन करे शांति के लिये दूर्वादिकसे हवन करे । क्रूर कर्ममें विल्वपत्रसे बन करे । उच्चाटन प्रयोगमें ॐ ह्रीं श्रीं हुं शिवाय स्वाहा मंत्रमें इतनी विशेपता है संकल्प द्वारा दक्षिणा प्रदान करे श्वेत सरसों अथवा लवणसे हवन करे । इति क्रियोडीशे महातंत्रराजे उमामहेश्वरसंवादे त्रयोदशः पटलः ॥ १३ ॥ अथ पढ़कर्मणां कवचं शत्रुमर्दनम् । श्रीदेव्युवाच । श्रुतं वटुकमाहात्म्यं पूर्णविस्मय यकारकम् । इदानी श्रोतुमिच्छामि कवचं वै पटुको मणाम भापाटीकसमेतः। (८९) अयश विनाशकारक षट्कर्म कवच कहाजाता है। श्रीदे वीजी कहने लगी । हे भगवन् ! आपके प्रसादसे महाविस्मय- चारक वटुकमाहात्म्य श्रवण किया अब मेरी पटकर्म कवच श्रवण करनेकी इच्छा है कृपापूर्वक वर्णन कीजिये । श्रीईश्वर उवाच । शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यन्मां लं परिपृच्छसि । श्रवणात् पठनादापि शत्रुनाशाय तत्क्षणात् । शिवजी कहनेलगे । हे देवि ! श्रवण करो तुम्हारी प्रीतिक अर्थ में पट्कर्म क्वच वर्णन करताई इस कवचके पाट करनेस शत्रुका नाश होता है। श्रीदेव्युवाच । त्रिलोक्यमोहनार्थतु कवचं में प्रकाशय । त्रैलोक्यशत्रुसंहतुं नाशितुं यत्सम भवेत् ॥ एवमुक्तो महादेवः कुलो भूत्वा जगत्पतिः । देवी प्रबोधयामास वाक्येनामृतवार्पिणा । देवीजी कहने लगी । भगवन् तीनों लोकोंके मोहनार्थ मेरे प्रति भवचका वर्णन करो । जिस फवचके पाटमात्रहीसे तीनों (९०) क्रियोड्डीशः। लोकोंके शत्रुओंका समुदाय मात्र नाश हो । इस प्रकार श्रीशि- वजी महाराज देवीजीकी वाणी श्रवणकर महाक्रोध हो देवी- जीसे कहने लगे। श्रीमहादेव उवाच। परानिष्टे महादेवि कुतस्ते जायते मत्तिः । हे महादेवि ! पराये अनिष्टको जो चिंतन करती हो न जाने ऐसी विपरीत बुद्धि तुमको कहाँसे उत्पन्नहुई है । श्रीदेव्युवाच । जिघांसन्तं जिघांसीयान्न तेन बहाहा भवेत् । ये यथा मां प्रपद्यन्ते श्रुतिरस्ति पुरा- तनी । यदि ते वर्तते देव दया हि कथ्यतां मयि शत्रूणां प्राणनाशार्थसुचाटनवाहितौ । तेषां हि बद्ध- नाशार्थ सर्वदा प्रयता नराः। श्रीदेवीजी कहने लगी । भगवन् यह पुरानी श्रुति है कि मारनेवालेको अवश्य मारे उसके मारनेसे ब्रह्महत्या दोष नहीं लगता । हे देव ! यदि आपकी कृपा मेरे ऊपर है तो दया कर शत्रुके प्राणनाश करनेवाले उच्चाटन तथा वश्य आदि प्रयोगांको कहिये क्योंकि सर्वकालमें मनुष्य निज शत्रुके नाशके लिये यत्न किय ही करते हैं।
भाषाकासमेतः । (९१) ईश्वर उवाच । शृणु देवि यहाभागे झालाग्नि- प्राणवल्लभे । यस्थ धारणमात्रेण शवगा नाशनं भवेत् ॥ धृत्वा तु पादमूलेन स्पृष्ट्या दाख इवाकरोत । हारणागतमावन्तु नाशितुं नेव शक्यते ॥ शृणु देवि महाभागे सावधा- नावधारय । शत्रूणां प्राणनाशार्थ अपितः काल एवतः। श्रीशिवजी कहनेलो। हे कालनिप्राणवल्लभे ! महादेवि श्रवण करो कि जिस करचराजके धारण करनेमात्रही से शत्रु नाश होताहै । इस कवचराजको पादमूलमें धारण कर शत्रुका स्पर्श करे तो शत्रु दासकी नाई आज्ञा पालन करने में प्रवृत्तहो फिर क्या जरूरत है उसके प्राण नाश करनेकी क्योंकि शरणा. गतके प्राणनाश करनेमें प्रायश्चित्त है । हे देवि ! हे महाभागे ! सावधान हो श्रवण करो कि यह कवचराज शत्रुके प्राण नाश करनेमें कुपित कालके तुल्य है। दशवका दाधुजा दशपादाजनाममा । कोटि सूर्यप्रभा काली मा हान् विनाशय । नाश- यित्वा क्षणं देवि अन्य विनाशय । की
(९२)
क्रियोड्डीशः।
की की लग्राम विकालदंष्ट्र परपक्षं मोहय
मोहय पच पच मथपथ दह दह हन हन माश्य
मारय ये मां हिंहितुसुधना योगिनीचस्तान
वारय वारय छिन्धि छिन्धि भिन्धि भिन्धि करा-
लिनि गृह्णगृह्ण ओं क्रींक्रीं क्रींकी स्फूरस्फूर पूरपूर
पूनपून चूल्सचूल्य धधक धमधासारय मारण
सर्वजगदशामानय ओं नमः स्वाहा ।
यह भद्रकालीका कवच कहाजाता है । दशमुखवाली, दशा,
पाद. दशभुजा, अञ्जनपर्वतके तुल्य कृष्णवर्णवाली, करोडों
सूर्यकान्तिसे शोभित, महाकाली क्षणमात्रमें मेरे भूत भविष्य
वर्तमान शत्रुओंका नाश करे । यह कवचहै क्रीं क्रीं क्रीं उग्रप्रभे .
विकट दंष्ट्रे परपक्षं मोहयमोहय,पचपच, मथमथ, दहदह, हनहन,
मारयमारय, ये मां हिंसितुमुद्यता योगिनीचस्तान् वारय वारय
छिन्धिछिन्धि, भिन्धिभिन्धि, करालिनि गृह्णगृह्ण, ओं क्रीं क्रीं
क्री की स्फूरस्फूर, पूरपूर. पूनपून चूल्वचूल्य, धकधक, धया
गारयमारय, सर्वजगदशमानय ओं नमः स्वाहा ।
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भाषाटीकासमेत (९३) इति ते कवचं देवि भद्रकाल्याः प्रचोदितम् । भूजे विलिखितञ्चैतत् स्वर्णस्थं धारयेद्यदि । शिखायां दक्षिणे वाही कण्ठे वा धारयद्यदि । त्रैलोक्षं मोहयेत् क्रोधात् त्रैलोक्यं चूर्णयेत् क्षणात् ॥ पुत्रवान्धनवान्धीमान नानाविद्या- निधिर्भवेत् । ब्रह्मास्त्रादीनि शास्त्राणि तनावस्प- र्शनात्ततः ॥ शरवो नाशमायान्ति रजतेन प्रधारितम् । मासमात्रेण शत्रणां महाविपद ; कारणम् ॥ ययं शठं स्मरन्यर्त्यः कवचं पठति ध्रुवस् । तंतं नाशयते सचल्तथ्यं ते तवदा- म्यहम् । धारणे सजते शत्रुः कण्ठशोपं सदा भवेत् । हत्करूपो जायते तावद्यावत्तस्य कृपा न चेत् ॥ हे देवि ! इस प्रकार श्रीभद्रकालीजीका कवच तुम्हारे प्रति 'वर्णन किया यदि इस कवचराजको गोरोचन आदि द्रव्योंसे भोजपत्रके ऊपर लिखकर सुवर्णके तावीजमं वन्दकर शिखा, ३ (९४) क्रियोड्डीशः। दक्षिण बाहु, अथवा कण्ठमें धारण करे तो क्रोधपूर्वक तीन । लोकोंको मोहितकर तत्क्षणस्वाधीन करनेमें समर्थ हो, और पुत्रार्थी पुत्रको प्राप्त होय, धनार्थी धनको, विद्यार्थी नाना प्रकारकी विद्याओंको प्राप्त हो इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है । यदि इस यंत्रराजको उक्त विधानानुसार लिखकर चांदीके ताबीज बन्दकर उक्त स्थानोंमें धारणकरे तो अवश्य धारण । करनेवालेके शरीरके स्पर्श मात्रहोसे ब्रह्मादि अस्त्र शस्त्र शत्रुका नाश करनेमें समर्थ होय । इस प्रयोगके अनुष्ठान करनेसे एक मासके भीतर २ शत्रुओंको महा विपत्ति प्राप्त होजाती है। प्रयोगकर्ता जिस व्यक्तिका चिन्तवन कर इस प्रयोगका आरम्भ करेगा, अवश्य उस व्यक्तिका नाश होगा। शत्रुका ध्यानकर यदि यह कवचराज निज कण्ठदेशमें धारण कियाजाय तो. शनुका कण्ठ सूखने लगे गौर शरीर कांपने लगे, जबतक भद्र- कालीकी कृपा न हो कोपाही करै ।। इति कवचम् ॥ अथ रिपुनाशरुवचम् । ईश्वर उवाच ॥ त्रिकालं गोपि देवि कलि- काले प्रकाशितम् । न वक्तव्यं न इष्टव्यं तव रग्नेदात् प्रकाश्यते ॥ काली दिगम्बरी देवि जगन्मोहन मारिणी । तच्छृणुष्व महादेवि त्रैलो- क्यमोहनन्त्विम् ।
मापाटीकासमेतः । (९५) श्रीशिवजी कहनेलगे । हे देवि ! यह व वचरान सत्ययुगादि तीनों कालोंमें गुप्त रहा परन्तु अब इस कराल कालिकालके सम- यमें यह कवचराज प्रकाशित हुआ है इसमें तुम्हारा प्रेमही कारण है अन्यथा यह देवताओंको भी अलभ्य कवचरराज प्रका शके योग्य न था, "अच्छा" अव तुम यह कवचराज न तो किसीको देना और न किसीको दिखाना । हे प्रिये ! जगत्को मोह करनेवाली काली दिगम्बराक प्रयोगको वर्णन करता हूं सुनो । हे महादेवि ! यह महाप्रयोग तीनों लोकांको मोहित करनेवाला है। अस्य महाकालमेरवऋपिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्मशानशालिका देवता सर्वमोहने विनियोगः । ऐंत्री का स्वाहा विवादे पातु मां सदा । क्की दक्षिणकालिकादेवतायै सभामध्ये जयप्रदा ॥ की मी श्यामागिन्ये शो मार मारय । ह्रीं क्रीं क्रीं क्लीं त्रैलोक्यं वशमानय । ह्रीं श्रीं की मां रक्ष रक्ष विवादे राजगोचरे द्वाविंशत्यक्षरी ब्रह्म सर्वत्र रक्ष (१६) जियोडीशः। मां सदा ॥ बापचे वर्जितं यत्र तत्र मां पातु का लिका । सर्वत्र रक्ष मां देवि श्यामा तूरच रू- पिणी ॥ एतेषां परमं मोह भवद्भाग्ने प्रकाशि- तम् । सदा यस्तु पठेद्वापि त्रैलोक्यं वहामानयेत्॥ इदं वापचमज्ञात्वा पूजयेहोररूपिणीम् । सर्वदा स यहाव्याधिपीडितो नात्र संशयः ॥ अल्पायुः स श्वेतोगी कथितं तव नारद । धारणं कब- स्यात्य सूर्जपत्रे विशेषतः । स यन्त्र कवचं धृत्वा इच्छासिद्धिः प्रजायते । शुक्लाष्टरुयां लिखेनमंत्री धारयेत् स्वर्णपत्रके ॥ कवचस्याल्य माहात्म्य नाहं वक्तुं महात्मने । शिखायां धारयेद्योगी फलार्थी दक्षिण भुजे ॥ इदं कल्पद्रुमं देवि तव स्नेहात प्रकाश्यते । गोपनीयं प्रयत्नान पठनीय । महामुने।
भापाटीकासमेतः। (९७) इस कवचका महाकालभैरव ऋषि, अनुष्टुप् छंद, श्मशान कालिका देवता है । और सर्व मोहनार्थ यह विनियोग है । की बूं का स्वाहा विवादे पातु मां सदा । क्लीं दक्षिणकालिका- देवतायै सभामध्ये जयप्रदा । क्रीं क्रीं श्यामांगिन्यै शत्रु मारय- मारय ह्रीं क्रीं क्लीं त्रैलोक्यं वशमानय ह्रीं श्रीं क्रीं मां रक्षरक्ष विवादे राजगोचरे. द्वाविंशत्यक्षी ब्रह्म सर्वत्र रक्ष मां सदा ( यह क्वच मन्त्र है इनकी भाषाकी कोई ऐसी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती अतः नहीं लिखी ) रक्षा रहित स्थानमें कालिका देवी मेरी रक्षा करें उग्र स्वरूपिणी श्यामा सदा सर्व स्थानमें मेरी रक्षा करें। यह परम मोहन कवच है । हे प्रिये ! तुम्हारे भा. यार्थ प्रकाशित किया गया है । जो मनुष्य सदा इस कव- चका पाठ करते हैं तीनों लोक उनके वशमें हैं विना इस कव. चके जाने जो मनुष्य घोररूपिणी कालिकाका पूजन करेंगे अवश्य सर्वदा वह मनुष्य महाव्याधियोंसे पीडित रहेंगे । वह मनुष्य अल्पायु और सदा रोगी रहेंगे । हे नारद ! यह बात सत्य जानों । विशेषकर भोजपत्रके ऊपर लिखकर इस यन्त्रको धारण करे । यत्नपूर्वक इस कवचके धारण करनेसे इच्छासिद्धि होती है । शुक्लपक्षकी अष्टमीको भोजपत्रके ऊपर लिख कर धारण करे स्वर्णपत्रमें बंद करके हे महात्मन् ! इस कवचके माहात्म्यको वर्णन करनेक लिये में समर्थ नहीं हूँ । योगी शिः (९८) क्रियोड्डीशः। खामें धारण करे, फलार्थी दक्षिण भुजामें धारण करे हे देवि ! यह कल्पद्रुम तुम्हारे स्नेहसे प्रकाशित किया है । परन्तु सर्वथा यह कल्पद्रुम गुप्त रखने योग्य है । श्रीविष्णुरुवाच-इत्येवं कवचं नित्यं महालक्षिण प्रपठ्यताम् । अवश्यं वशमायाति त्रैलोक्यं सचराचरम् । शिवेन कथितं पूर्व नारदे कल- हास्पदे । तत्पाठान्नारदेनापि मोहितं सचराचरम् । श्रीविष्णुभगवान् कहने लगे हे महालक्ष्मि ! इस प्रकार यह शत्रुमर्दन कवच पढना योग्य है अवश्य तीनों लोक वशमें आजाते हैं । शत्रुर्वर्गसे विह्वल नारदजीके प्रति श्रीशिवजी महा- राजने यह कवचराज वर्णन किया था इसके पाठ करनेसे नार- दजीने भी सचर तथा अचर जीवमात्रको मोहित करालिया। इति कवच समाप्त ॥ इति श्रीक्रियोड्डीशे महातंत्रराजे देवीश्वरसंवादे चतुर्दशः पटलः१४ अथ सर्वरक्षाकरं कवचम् । श्रीदेव्युवाच-भगवन्देवदेवेश सर्वाऽऽनायन- पूजित । सर्व में कथितं देव कवचं न प्रका- माषाटीकासमेतः। (९९) शितम् ॥ प्रासादाख्यस्य मंत्रस्य कवचं मे प्रकाशय । सर्वरक्षाकरं देव यदि स्नेहोऽस्ति सम्प्रति। श्रीदेवीजी कहनेलगीं । हे भगवन् ! हे देवदेवेश ! हे सर्वा- म्नायपूजित ! देव ! सब कुछ आपने मेरे सन्सुख वर्णन किया परन्तु कवचका वर्णन नहीं किया सो अव कृपापूर्वक प्रासा- दारव्य मंत्रका कवच वर्णन कीजिये जो कि सर्व रक्षाओंका करनेवला है। श्रीभगवानुवाच-प्रासादमन्त्रकवचस्य वामदेव- ऋषिः । पंक्तिश्छन्दः । सदाशिवो देवता । साध- काभीष्टसिद्धये विनियोगः प्रकीर्तितः। शिरो से सर्वदा पातु प्रासादाख्यः सदाशिवः । षडशरस्व- रूपो मे वदनं च महेश्वरः ॥ पंचाक्षरात्मा भग- वान् भुजो मे परिरक्षतु । मृत्युञ्जयस्त्रिबीजात्मा आयू रक्षतु मे सदा ॥ वटमूलसमासीनो दक्षि- णामूर्तिरव्ययः । सदा मा सर्वतः पातु पत्रिंशद (१००) क्रियोड्डीशः। र्णरूपधृक् ॥ द्वाविंशात्मको रुद्रः कुशो मे परिरक्षतु । त्रिवर्णात्मा नीलकण्ठः कण्ठं रक्षतु सर्वदा ॥ चिन्तामणिजिरूपे सर्वनारीश्वरो हरः। सदा रक्षतु से गुह्यं सर्वसम्पत्प्रदायकः ॥ एका- क्षरस्वरूपात्मा कूटरूपी महेश्वरः । मातैडमै- वो नित्यं पादौ मे परिरक्षतु ॥ ओमित्याख्यो महाबीजस्वरूपस्त्रिपुरान्तकः । सदा मां रण- भूमौ तु रक्षतु विदशाधिपः ॥ ऊर्द्धमूर्धानमी. शानो मम रक्षतु सर्वदा । दक्षिणस्यां तत्पुरुषो अव्यान्मे गिरिनायकः ॥ अघोराख्यो महादेवः पूर्वस्यां परिरक्षतु । वामदेवः पश्चिमस्यां सदा मे परिरक्षतु ॥ उत्तरस्यां सदा पातु सद्योजात- स्वरूपधृक् ॥ श्रीविष्णुभगवान् कहने लगे । प्रासादमंत्र कवचका वामदेव. ऋउपि पंक्तिश्छंद, सदाशिव देवता है साधकबभीष्टसिद्धिके पर्थ विनियोग है । प्रासादास्य सदाशिव मेरे शिरोभागकी रक्षा मापाटीकासमेतः। करें, पडक्षर स्वरूप महेश्वर. मेरे मुखकी रक्षा करें । पंचाक्षरा- त्मा भगवान् शिव मेरी दोनों भुजाओंकी रक्षा करें । त्रिवी- जात्मा मृत्युंजय सदा मेरी आयुकी रक्षा करें । वटवृक्षकी मूलमें स्थित अव्यय दाक्षिणामूर्ति, पत्रिंशत् ( ३६ ) अर्ण- रूप धारण करनेवाले सदाशिव सर्वदा समस्त स्थानोंमें मेरी रक्षा करें । द्वाविंशवर्णात्मक रुद्रदेव मेरी दोनों कुक्षियोंकी रक्षा करें । त्रिवर्णात्मक नीलकंठ मेरे कंठकी रक्षा करें । चिंतामाणि, सर्व नाडियाम बीजरूप ईश्वर हर सदा मेरे गुह्य देशकी रक्षा करें । सर्वसस्पत्मदाता एकाक्षर स्वरूपात्मा, कुटरूपी महेश्वर, मार्तड, भैरव, नित्य मेरे पादकी रक्षा कर ॐ इस माख्या (नाम) को धारण करनेवाले, महाबीजस्वरूप त्रिपुरांतक, त्रिदशाधिप, सदा संग्रामभृमिमें मेरी रक्षा करें। ईशान अर्ध्व भागमें मेरी रक्षा करें। गिरिनायक तत्पुरुष दक्षिण दिशामें मेरी रक्षा करें। अघोराख्य महादेव पूर्वदिशामें मेरी रक्षा करें। वामदेव पश्चिम दिशामें मेरी रक्षा करें । सद्योजात स्वरूपधृक् उत्तर दिशाम मेरी रक्षा करें । इत्थं रक्षाकरं देवि कवचं देवदुर्लभम् । प्रात:- काले पठेद्यस्तु सोऽभीष्टफलमाप्नुयात् ॥ पूजा- काले पठेद्यस्तु साधको दक्षिणे भुजे । देवा (१०२) ) क्रियोडीशः। मनुष्या गन्धर्चा वश्यास्तस्य न संशयः । कवचं यस्तु शिरसि धारयेद्यदि मानवः ॥ करस्था- स्तस्य देवेशि अणिमाद्यप्टसिद्धयः । स्वर्णपने त्विमा विद्यां शुक्लपट्टेन वेष्टिताम् ॥ राजतोदरसं- विष्टां कृत्वा च धारयेत्सुधीः । संप्राप्य महती लक्ष्मीपत्रं च शिवरूपधृक् । यसले कस्मै न दातव्यं न प्रकाइयं कदाचन ॥ शिष्याय भक्ति युक्ताय साधकाय प्रकाशयेत् । अन्यथा सिद्धि हानिः स्यात सत्यमेतन्मनोरमे ॥ तव स्नेहान्म. हादवि कथितं कवचं शुभम् । न देयं कस्य चिनद्धे यदीच्छेदात्मनो हितम् ॥ योऽर्चयेद्न्ध- घुप्पायेः कवचं सन्मुखोदितम् । तेनानिता महादेवि सर्व देवा न संशयः ॥ हे देवि ! इसप्रकार देवताओंको दुर्लभ इस कवचराजका जो मनुष्य प्रातःकालके समय पाट करते हैं उनको वांछासिद्धि प्राप्त मापाटीकासमेतः । (१०६) होती है । जो साधक लोग पूजन समय इस कवचराजको दक्षिण भुजामें रख पाठ करते है उनके वक्ष्य (बाधीन ) देव, मनुष्य, न्धर्व रहते हैं, इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है । जो मनुष्य कवचको शिरमें धारण करते हैं, हे देवि उन साधकोंके हाथमें ही अणिमादि षष्टसिद्धियां वास करती है । इस फवचको स्वर्णफ पत्र (तावीज ) में वंदकर श्वेत पटवस्त्रसे वेष्टित करे । अथवा चांदीके तावीजमं बंद कर सफेद रेशमक सूत्रसं पंकर भुजा या कंठदेशमें धारण करें तो महालक्ष्मीकी प्राप्ति हो और अंतकालमें शिवरूप होके कैलासमें वास करें परन्तु स्त्रीको वाम भुजा और पुरुपको दक्षिण भुजामं यह यंत्र राज धारण करना योग्य है। साधकके विना अन्य किसी धूर्त पुरुपको यह यंत्रराज न देना और न प्रकाश करना भक्तियुक्त शिष्यफे निकट प्रकाश करना अन्यथा व्यवहार करनेसे सिद्धि हानि होती है, हे महादेवि । यह कवच तुम्हारे स्नेहसे कहागया है, हे भद्रे ! अपने शुभकी इच्छा करनेवाला साधक यह कवचराज जिस किसीको न दे। हे महादेवि ! जो साधक मेरे मुखसे निकले इस क्यचराजका गंध पुष्पादिसे पूजन करते हैं मानों उन्होंने समस्त देवताका पूजन कर लिया इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं। इति क्रियोडीशे महातन्त्रराज देवीश्वरसंवादे पंचदशः पटल।१५।
(१०४) कियोडीशः। यथ व्यम्बकमृत्युञ्जयमन्त्रा। श्रीदेव्युवाच-इदानीं श्रोतुमिच्छामि पूर्वमुक्तं च ध्यम्बकम् । प्रभेदे कथितं देव शान्ति मृतसंजी- बनीम् ॥ श्रीदेवीजी कहनेलगी। हे देव ! अब व्यंवक प्रयोगके श्रवण कानकी इच्छा है। ईश्वर उवाच । शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यन्सां त्वं परिपृच्छसि ।। मातॄणां तिसृणामम्व गर्भजातो यतो हरः ॥ अतस्व्यम्बक इत्युक्तं मम नाम मदेश्वरि । वशिष्ठोऽस्य ऋषिः प्रोक्तश्छन्दोऽनुष्टु- बुदाहृतः । देवताऽस्य समुदिष्टस्यम्बकापार्वती- पतिः। विभक्तमन्त्रवणश्च पडंगानां च धल्प- नाम् ॥ ततश्च वह्निवीजेन समन्ताज्जलधारया प्राचीरं चिन्तनं कुर्यात्ततः संकल्पमाचरेत् ॥ पुनः संकल्पं देवेशि भूतशुद्धयादिकं च यत् । ततः पश्चात् करन्यासं कुर्याच मम सुन्दरि ।
भापाटीकासमेतः। (१०५) श्रीशिवजी कहनेलगे । देदेवि ! सुनो,जो तुम मुझसे बूझती हो, में हर तीन मात्रिकाओंके गर्भसे उत्पन्न हूँ । हे महेश्वरि ! । इसी कारण मेरा नाम व्यम्बक है । इसका वसिष्ठ ऋपि, छंद . अनुष्टुप् है पार्वतीपति सदाशिव इसके देवता है, विभक्त मंत्र- वासे पडंगकल्पना करनी । फिर वद्विवीजसे जलधारा प्रक्षेप करे । प्राचीर चिन्तवन कर संकल्प करे । तत्पश्चात् भूतशुद्धि करन्यास करे। त्र्यम्बकं अंगुष्ठाभ्यां नमः । यजामहे तर्जनीभ्यां. स्वाहा । सुगंधिं पुष्टिवर्धनं मध्यमाभ्यां वपट् । उर्वारुकमिव बन्धनादनामिकाभ्यां हुस् । मृत्योर्मुक्षीय कनिष्ठाभ्यां वोपट् । मामृतात् कर- तलपृष्टाभ्यां फट् । एवं हृदादिषु । अब न्यास करें जाते हैं । त्र्यम्बकं अंगुष्ठाभ्यां नमः । दोनों हार्थोके अंगूठोको दोनों हाथोंकी तर्जनी अंगुलियांसे स्पर्श करे। यजामहे तर्जनीभ्यां स्वाहा । इस मंत्रसे दोनों हाथोंकी तर्जनी- अंगुलियोंको दोनों हाथोंके अंगुठीसे स्पर्श करे । एवं पांचों अंगुलियोंके और करतलपृष्ठको उक्त मन्त्रों द्वारा स्पर्श करता. जाय इसी प्रकार हदयादिन्यास करे।
(१०६) क्रियोडीशः। ततो द्वात्रिंशन्मन्त्रवर्णान्न्यसेत् । पूर्वपश्चिमया- म्योत्तरेषु वपु ४ । उरोगलो स्ये ३ । धुन- नामिहत्पृष्टकुक्षि । लिंगपायूरुमूलान्ते। जानुयुग्णे २ । गुल्फयोयुग्मे २ । स्तनयोः२। पाश्र्वयोः २ पादयोः २ । पाण्योः २ नासि कयोः२।शी १ । मन्त्रवर्णान्न्यसेत्क्रमात पुनस्ततः पादाकादशस्थानेषु न्यसेत् । शिरो युगल शिपु १ के १ गण्डयुगे १ भुजयोः ३ हृदये १ जठरे १ पुनः गुह्यो रु १ जानु १ पादेपु १ न्यासमेवं समाचरेत् । नत्पश्चात ३२ वोद्वारा न्यास करे । पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर मुखमें ४ । वक्षस्थल, गलमदेश, अर्ध्वमुखमें न्यास करें। फिर नाभि, हृदय, पीठ, कुक्षियोंमें न्यास करे ४ । पुंसचित गुदप्रदेश, जंघामूलांतम न्यास करे ६ । दोनों जानुओंम न्या० २। दोनों गुल्फीमें न्या०२ दोनों स्तनोंमें न्यास करे २ । दोनों पाधाम न्या० २ । दोनों चरणों में न्या०२ । दोनों हाथोंम न्यास करे।
भापाटीकासमेतः। (१०७)
दोनों नासिकाके छिद्रोंमें न्या० २ । शिरमें न्यास १। फिर
पादादि ११ स्थानाम न्यास करे । शिर दोना भी, दोनों नेत्र,
मुख, दोनों कनपटी, दोनों भुजा, हृदय, उदर, इन स्थानोंमें
न्यास करे । फिर गुह्य, उरु, जानु, पादमें न्यास करे !
तत उक्तध्यानेन ध्यात्वा मानसोपचारैः संपूज्य
विशेपाध्यै संस्थाप्य शेवोक्तपूजावाहनादिकं
पञ्चपुष्पाञ्जलीन्दत्त्वा वरुणं पूजयेत् । त्र्यम्बकं
हृदयाय नमः । इत्यादि पडङ्गानि पूजयेत् ।
ततोऽप्यपत्रेषु ॐ अर्काय नमः । एवमिन्दवे वसु-
घायै जलाय वह्नये चायवे व्याने यजमानाय
तद्वाो पूर्वादितः ॐ रामाय नमः । ॐ राकार्य
नमः । ॐ प्रभाय नमः । ॐ ज्योत्स्नाय नमः ।
ॐ पूर्णायै नमः । ॐ उपसे नमः। ॐ पूपाय
नमः। ॐ स्वधाय नमः । ॐ विश्वायै नमः। ॐ
विद्यायै नमः । ॐ सितायै नमः। ॐ कृत्यै नमः।
ॐ श्रद्धायै नमः । ॐ साराय नमः । ॐ सन्ध्याय
(१०८) क्रियोझीशः।
नमः । ॐ दिवाय नमः । ॐ निशाय नमः ।
तद्वाहो ॐ आर्याय नमः । ॐ आये नमः ।
ॐ प्रज्ञाय नमः । ॐ मेघाय नमः । ॐ कान्त्य
नमः । ॐ शान्त्यै नमः। ॐ पुष्टयै नमः । ॐ
बुद्धये नमः । ॐ धृत्यै नमः । ॐ मत्यै नमः ।
ततो धूपादिविसर्जनान्तं कर्म समापयेत् ।
तत्पश्चात् उक्त ध्यानसे ध्यानकर मानसिक पूजनकर, विशेष
अर्घ्य स्थापन कर, शैवोक्त पूजन तथा आवाहनादि करके पंच
पुष्पांजलि प्रदानकर वरण पृजन करे । भ्यम्बकं हृदयाय नमः
इत्यादि पडंग पूजन करे । फिर अष्टदल कमलके मध्यमें इन
नाम मन्त्रीद्वारा पूजन करे । अर्काय नमः । इन्दवे नमः । सु.
धाय नमः । जलाय नमः । बद्रये नमः । वायवे नमः । व्योम्ने
नमः । यजमानाय नमः । कमलदलके वाहिर भागमें पूर्वादि
क्रमानुसार पूजन करे । आंगमाय नमः । ओ राकायै नमः।
मां प्रभाय नमः । ज्योत्स्नायै नमः । बो पूर्णाय नमः।
या उपसे नमः । ओं पूपायै नमः । ओ स्वधायै नमः। ओं
विश्वायै नमः। ऑविद्यायै नमः ।ओं सितायै नमः । ओं
.
भापाटीकासमेतः । (१०९) कृत्यै नमः । ओं श्रद्धायै नमः। ओं सारायै नमः । ओं संध्यायै नमः । मों दिवायै नमः । ओं निशाय नमः । वहिर्भागमें ॐ आर्यायै नमः । ओं आद्रीय नमः । ओं प्रज्ञायै नमः । ॐ .मेधायै नमः। ओं कान्त्यै नमः । ओं शांत्यै नमः । ओं पुष्टय नमः । ओं बुद्धयै नमः । ओं धृत्यै नमः। ओं, मत्यै नमः। तदनन्तर धूप आदि विसर्जनान्त कर्म समाप्त करें प्रयोगस्तु शनश्चरे कुजे वा अश्वत्थमूलं स्पृष्ट्वा सहस्र जपेत् । पुरश्चरणविधानेन सबै कुर्यान्महे- श्वरि । साक्षान्मृत्योविमुच्येत किमन्याः क्षुद्रिकाः क्रियाः। प्रत्यहं जुहुयान्मन्त्री चतुःस्थण्डिलविधा- नतः । द्विसहस्रं दूर्वावटजवाभिः करवीरकः । विल्वपत्रं पलाशञ्च तथा कृष्णापराजिता ।क्ट वृक्षस्य समिधं जुहुयादयुतावधि ॥ धनधान्यस- मृद्धिः स्यात्सत्यं सत्यं महेश्वरि । इसका प्रयोग शनिवार अथवा मंगलके दिन करे और अश्वत्थ (पीपल) वृक्षको स्पर्शकर एक हजार मंत्र जप करे । हे महेश्वरि पुरश्चरणविधानसे-समस्त प्रयोग करे।इस प्रयोग करनेसे साक्षात् (११०) क्रियाशिः। मृत्युसे मुक्ति प्राम होती है तो अन्य क्षुद्र क्रियाओंका तो कह - नाही क्या है । मन्त्रीको योग्य है कि प्रतिदिन चतुःस्थंडिल विधानपूर्वक हवन कर । दो हजार दुवक नाल, जवा, कनग्के पुप्प, बिल्वपत्र, टाककी समिधा, कृष्ण अपराजिता, वटवृक्षकी समिधा इन मव वस्तुओंमें दशहजार हवन करे तो अवश्य धन धान्यकी वृद्धि हो । हे देवि ! यह वात सत्य जानों । मृतसञ्जीविनी विद्या। अतः परं देवि शृणु मृतसंजीविनी तथा । आदी प्रासादवीज तदनु मृतिहरं तारकं व्याहृति व प्राचार्य त्र्यम्बकं यो जपति च सततं संपुटं चानुलोमम् । उपचकमिति मृत्युंजयमंत्रस्य जपान् सर्वसिद्धिर्भवति । एतन्मंत्र जपेदाशु व्याधिमुक्तो संवंध्रुवम् । अब मृतसंजीवनी विद्या कहीजाती है हे देवि ! तुम श्रवण कंगे। प्रथम प्रामाद बीजका उच्चारण करें नत्पश्चात् मृतिहर बीज- फा नारक तथा व्यारतिको उचारण कर जो साधक लोग निर. न्तर संपुट तथा अनुलोम त्र्यम्बक मंत्रका जाप करते हैं उनको : मापाटीकासमेतः। (१११) मृत्युंजय त्र्यम्बक मंत्रके प्रसादसे ससिद्धि प्राप्त होती है । इस मंत्रके जापसे शीघ्रव्याधि दूर होती है । ध्यानं शृणु महादेवि । स्वच्छे स्वच्छारविन्द स्थितमुभयकरे संस्थिती पूर्णकुंभौ पाण्यो- हैलाक्षमाले निजकरकमले द्रौ घटौ नित्य- पूर्णों द्वाभ्यां तौ च सवन्तो शिरसि शशि- कला चामृतैः प्लावयन्ती देहं देवो दधाने विदिशतु विशदा कल्पजाला श्रियं नः॥ एवं ध्यात्वा यंबकाय महारुद्राय नमः ॥ महा- घोरं यदि तदा पूजयेत्परमेश्वरम् । ततः सुर- सुन्दरीत्यादियोगिनीसाधनम् । ततो भूति- नीसाधनम् । हे महादेवि! अव ध्यान सुनो । दो हाथों में स्वच्छ कमलदलके भारण करनेवाले दो हाथोंमें पूर्णकुम्भ धारण करनेवाले, दो हाथों में हेलाथै अक्षमाला धारण करनेवाले, दो हाथों में पूर्ण और सावी घट धारण करनेवाले शिरोभागमें अमृतसाविणी शशि- दला धारण करनेवाले, ऐसे देवदेव श्रीसदाशिव कल्पकल्पांततक
(११२) क्रियोडीशः।
हम लोंगोंको उत्तम लक्ष्मीप्रदान करे । इस प्रकार ध्यान करे
व्यम्वक और महारुद्रका यदि महाघोर मंत्रका जप करे तो
परमेश्वर सदाशिवका ध्यान करे । तत्पश्चात् सुरसुन्दरी आदि
योगिनी साधन करे प्रथम भूतिनांसाधन ।
अथ भूतिनीसाधन।
श्रीदेव्युवाच । योगिनीसाधनं ज्ञातं भूतिनीसा-
धनोत्तमम् । तद्वदस्व महादेव कृपास्ति यदि
मां प्रति।
श्रीदेवीजी कहनेलगों । हे देव ! योगिनीसाधन तोजाना अव
यदि आपकी पूर्ण कृपा हो तो भूतिनीसाधनको भी सुनाइये ।
श्रीईश्वर उवाच । आद्या विभूपिणी देवी
परा कुण्डलधारिणी । हारिणी सिंहिनी चैव
हसिनी च ततो नटी। कामेश्वरी तथा प्रोक्ता
रतिदेवी ततः प्रिया । इत्यष्टौ नायिकाः प्रोक्ताः
साधकानां सुखावहाः।
श्रीशिवजी कहनेलगे। हे प्रिये ! आठ नायिका साधकवर्ग:
को सुख देनेवाली है उनके पृथक् २ नाम सुनो । आधा विभृ.
पिणी १, परा कुण्डलधारिणी २, हारिणी ३ 1, सिंहिनी
.
मापारीकासमेतः। (११३)
४। हसिनी५ । नटी ६, कामेश्वरी ७ ।, प्रिया रतिदेवी ८
यह आठ नायिका साधकोंके सुखार्थ कही है।
अथ आद्याविभूषिणीसाधनम् ।
यथा मंत्रं महेशानि आद्या विभूपिणी तथा।
मंत्रः ।हूं फट् फट् ह्रीं भूतिनी हूँ हूँ हूँ। क्रोधा-
बृदयं मायाँते भूतिनी च त्रिकूर्चतः ।
अथवा शृणु देवेशि ॐ ह्रीं ह्रीं फट् फटू
विभूषिणी हूं हूँ। तार लज्जाद्वयात्रदयं विभूषि-
णीकोधदयम् ।
हे देवि ! यथामंत्र आद्याविभूपिणीका साधन करना योग्य
है। यह मंत्र है। हूँ फट् फटू ही भृतिनी हूँ हूँ हूँ। क्रोधाखदय,
मायान्तमें भूतिनी वीज, त्रिकूर्च मिश्रित करे। हे देवोश ! और
भी सुनो ॐ ह्रीं ह्रीं फट् फट् विभूपिणी हूँ हूँ हूँ । तार, लजा-
दयास्त्रयविभूपिणी क्रोधद्धयमिश्रित करे।
अथ ध्यानम् ।
दक्षे कर्तरिको परेऽसिलतिका हस्तान्जके
बिभ्रती ह्यसुगस्तनशोभिवक्षसि चलेहोरा-
- दिभिः शोभिता । दन्तान्तर्गतमांसशोणितवसा-
(११४) क्रियोडीशः। सिक्तास्ति यस्यास्तनूः कालश्यागलवर्णिकाम्र- गभुजगेर्वेष्टिता रक्षतु । अब ध्यान कहाजाता है । एक हाथमें कर्तरी और दूसरे हाथम तलवार धारण करनेवाली ऊंचे कुम्भ तुल्य स्तनवाली, हृदयमें आभूषण धारण करनेवाली. दांतोंके अप्रभागसे दुष्टोंके मांस शोणितको तथा च को चावकर पीनसे जिसका देह भीग गया है और कालके तुल्य श्यामवर्णवाली, रसालवृक्षके आश्रित व्यालवर्गसे सुशोभित पृष्ठदेशवाली ऐसी पर्वतवासिनी देवी रक्षा करे। स्थानं वृक्षतले तत्र यामिन्यां दिवसत्रयम् । जपेदयसहस्त्रं तु ध्यायेदेकायमानसः। जपान्ते च महापूजा पुनधूपं निवेदयेत् । चन्दनोदकाम- श्रेण दत्त्वाध्य तुप्यति ध्रुवम् । माता वा अयिनी सार्या दृष्टा सवति कामिता । करामलकता कृत्वा माता सूत्वा जगत्रयम् । शताप्टपरिवारस्य ददात्यंजनसूपणम् । अगिनी महाभागा सह- खायोजनादपि।
मापाटीकासमेतः। (११५॥ ददाति स्त्रियमानीय दिव्यं रसं रसायनम् । भार्या चत्पृष्टमारोप्य स्वर्ग प्रयाति नित्यशः । दीनाराणां सहस्त्रन्तु रसं चैव रसायनम् । सर्वाशा पूरयत्येव सदा देवी विभूषिणी । तीन रात्रितक अश्वत्थ वृक्षके नीचे वासकर आठ हजार मंत्र जये और एकाग्रंमनसे ध्यान करे जपान्तमें महापूजा करे और फिर धूप प्रदान करे । चन्दनामिश्रित अर्धप्रदान करनेसे देवता विशेष प्रसन्न होती है। कामनार्थ माता, भागिनी, भार्या इस प्रकार इन स्वरूपोंका ध्यानकर पूजन करे तो देवता अत्यन्त प्रसन्न हो अभीष्ट प्रदान करे । मातारूप देवता प्रसन्न हो दिव्य दृष्टि होती है । भागनीरूप देवता प्रसन्न हो सहस्रयोजन ४००० (कोस) दूरमें स्थित दिव्यरस और रसायन तथा स्त्रीको क्षणभरमें ला सामने उपस्थित करदेती है । भार्यारूप देवता रस, रसायन, तथा असफियोंको अपनी पृष्ठमें लादकर कुवेरके भण्डारसे लाकर सामने उपस्थित करदेती है । विशेष क्या स्त्रीरूपसे ध्यान करी हुई आद्या विभूपिणी देवी स्त्रीके तुल्य समस्त आशा पूर्ण कर नेमे समर्थ होती है। अथ पराकुण्डलिनीसाधनम् । एराकुण्डलिनीध्यानं शृणु देवि महेश्वरि । क्षण 'कुण्डलधारिणी शशिमुखी लीलावती सस्मित (११६) क्रियोडीश। शौलश्रोणिविलम्बिकाञ्चिवितताव्यामुग्धलोकत्रया। युक्ताहारमरीचिकान्तिविलसत्प्रोगकुम्भस्तनी पायात्कुण्डलधारिणी निजगतामानन्दसन्दोहभूः। हे देवि पराकुण्डलधारिणीका ध्यान सुनो । कानों में कुण्ड- लॉसे सुशोभित, चन्द्रमाके तुल्य मुखवाली, लीलावती, मन्द मन्द मुसकान करनेवाली, पर्वतरूप श्रोणितटमें विततकांची धारण करनेवाली, तीनों लोकोको मुग्ध करनेवाली, मोतियोंके हारकी कान्तिसे विभूषित, उन्नत कुम्भके तुल्य स्तनांवाली, तीनों लोकोंको आनन्द देनेवाली पृथिवीस्वरूपा कुण्डलधारिणी योगिनी हमारी रक्षा करै । श्मशाने पूजयदेतामयुतं जपमाचरेत् । आ- पाति तत्क्षणादेवी ततः कुण्डलधारिणी । साध- केनापि रक्ताय देयं तुष्टा वदत्यपि । किं कर्तव्यं मया वत्स मातरुक्त्वति साधकः । पञ्चाशतञ्च दीनारान्देहि त्रैलोक्यदापिनि । यह प्रयोग श्मशानमें करने योग्य है, और १०००० जप करै । तत्क्षणमं प्रसन्न हुई कुण्डलधारिणी देवी साधकके सम्मुख भाषाटीकासमेतः । (११७) मा उपस्थित होती है । प्रसन्नचित्त साक्षक रक्त अर्थ प्रदानकरे तो देवता प्रसन्न हो कहै कि हे वत्स ! अब मुझको क्या कर्तव्य है, आज्ञादे, तव साधक कह हे मातः ! तुम त्रैलोक्यदाता हो, अतः पचाश असफी मुझको भी दो । अथ सिन्दूरहारिणीसाधनम् । अतः परन्तु चागि सिन्दूरहारिणीमनुः ॥ क्रोधद्रयेन्दुसंयुक्तः सिन्दूरहारिणीपदम् । कूर्चबी- जत्रयं चास्त्रं सम्प्रोक्तं विविधं तथा । अव सिन्दूरहारिणी योगिनीका साधनप्रकार कहाजाताहै । हे चार्वगि ! सिन्दुरहारिणी योगिनीका मन्त्र श्रवण करो । इन्दु संयुक्त क्रोधद्वय कूर्चवीजत्रय अस्त्र इनको मिश्रितकर हारिणी योगिनीका मन्त्रोद्धार होता है । ध्यानम् । सिन्दूराकृतिहारिणी चलदलव्या- लोल शाखास्वरा सोत्कण्ठीकृतगात्रयट्रिशुभगा- शुभ्रांशुचन्द्रस्मिता । अन्तः सन्ततदंतकांतिम- मलिना त्रैलोक्पशोभाकरी पायादुन्नतबाहुयुग्म- लतिका सिन्दूरहारिण्यसो।
(११८) क्रियोडीशः। सिन्दूरके तुल्य आकृतिवाली, शत्रुवर्गको हरणकरनेवाली सकम्पस्वाग, उत्कण्टायुक्त देहसे शोभित, उज्ज्वलहास्यपूर्ण मलिनदन्तकान्ति, तीनों लोकोंकी शोभा करनेवाली, दीवाहु- युक्त सिन्दुरहारिणी योगिनी हमारी रक्षा करे । शुन्ये देवालये गत्वा निर्जने निशि साधकः । तत्वसंख्यदिनं यावज्जपस्तत्व-( २९ ) सह- स्कः ॥ तदन्ते महती पूजा वस्त्रालंकारशूपणः। कुर्यात्साधकपर्यस्तु भार्या भवति शामिता ॥ वरं वस्य शीघ्रं त्वं प्रोक्ता सिन्दूरहारिणी । रक्षति द्वादशदिनं देवी सिन्दूरहारिणी। साधक २५ दिनतक निर्जन देवस्थानमं रात्रिके समय २५ हजार जप कर तदनन्तर महापूजा कर वस्त्र और भूपणादिसे देवताको अलंकृत करे तो कामिता भार्या होय; और उसी समय सिन्दूरहारिणी सम्मुख आकर कहैगी हे साधक ! वर मांग और द्वादश (१२) दिनतक देवी सिन्दुरहारिणी रक्षा करनेमें समर्थ होगी। अथ सिंहिनीसाधनम् । अतः परं देवि शृणु सिंहिन्याश्च महामनुस् ।
मापाटीकासमेतः। (११९) मायादयं क्रोधद्वयं मिहिनीति पदन्ततः ॥ पुनः कोषं तदन्ते च सिंहिनी च महामनुः ॥ ह्रीं ह्रीं फट् फट् सिंहिनी हूं हूं फट । शैलाये निर्जने वापिसिदिन्याः पूजनं तथा। अव सिंहिनी साधन कहाजाता है । हे देवि । सिंहिनीके महामन्त्रको मुनो । दो मायावीज (ह्रीं ह्रीं) दो क्रोधवीज ( फट् फट सिंहिनी पद फिर क्रोधवीज ( है हैं फट)के मिश्रित करनेसे सिीहनीका मन्त्र होता है, यथा "ह्रीं ह्रीं फट फट सिंहिनी हूँ हूँ फह" । सिहिनी देवीका पूजन पर्वत अथवा निर्जन स्थानमें करे। ध्यानम्-शेलायक्रमदुर्गमन्तु अटवीदुर्गास्तु देत्याइते केशायस्थसमस्तविष्णुचरणं प्रभ्रष्टसं- सिंहिनी । यावन्तोवलदण्डवारणवलात प्रक्षु क- सिद्धांगना शपं पातु समस्तमन्तककुलच्याकल्प- मानाकला। यह सिंहिनी योगिनीका ध्यानमंत्र है । यह ध्यानमंत्र पूजन समय उच्चारण करना योग्य है।
(१२०) कियोझीशः। गत्वेकलिंग यामिन्यां प्रजपेदयुक्तं मनुम् । ततो हृष्टातिवरदा सिहिनी चेति पूजिता ॥ किं करोमि वदत्येव सार्या शवति झारिता । दिनावसाने यामिन्यां सिहिन्यायाति राति च । वस्त्रयुग्मं रस- मयं साधकाय दिन दिने। शिवमंदिर गति समय जाकर १०००० मंत्र जप करें । इस प्रकार मंत्र जप और पृजन घग्नेम वग्दा मिहिनी देवी भनिन्नहोगाधक कोंगी कि माधक ! आजाकर अव मेग क्या कर्तव्य । मिहिनी देवी विनायसान ( मायंफाल ) में माधको सम्मुग्य स्थिन हो माधकको वस्त्रयुग्म और समय पदार्थ प्रतिदिन प्रदान करेंगी। ईमिनीसाधनम् । अतः परं शृणु चावगि हंसिनीसाधनकमम् । ॐ हूं हूं हूं फद हंसिनी । प्रणवञ्च विघार्चालाई सिनी कथितो मनुः । अब गिनीसाधन प्रकार कहाजाना है । हे चांगि! होगनी योगिनीके माधन प्रकारको सुनो। है है हूँ फह हसिनी । यह हसिनीके साधन प्रकारका मंत्र है।
भाषाटीकसमेतः। (१२१) ध्यानम्-शुभा शुभ्रसरोजतुल्यनयना सायुग्म- वाणान्विता शुशृपाकुलमुधसाध्यवनिता संसेविता सादरम् । किचित्तिर्यगपांगलोलवलितव्यामुग्ध- मेरानना दिव्या काञ्चनरत्नहारलालता श्रीह- सिनी पातु नः । श्वेनवर्ण, श्वतकमलदलके तुल्य नेत्रवाली, युग्म ( दो ) शरसे व्याप्त, सेवाम तत्पर, मूह माध्य वधूगणसे आदरपूर्वक सेवित कुछ एक अपाङ्ग भागको तिरछा तिग्छाकर मधुर हास्य करनेवाली मनोहर सुवर्णकी माला धारण करनेवाली देवी हसिनी हमाग रक्षाकरे । वज्रपाणिहं गत्या प्रतिमा शोमनां लिखेत् । अवधानेन संपूज्य जपेदयुतसंख्यकम् ॥ याव- दर्द्धनिशा देवि ! हंसिन्यायाति निश्चितम् । चंद- नार्थप्रदानेन हष्टा भवति हासिनी ॥ कि मया ते प्रतिव्यं शीघ्रं तद्वद साधक । वस्त्रालंकारमो- ज्यानि दिव्याथ संप्रयच्छति । अवशेपव्ययामा- चान्न ददाति प्रकृयति । .
(१२२) नियोष्टींशः।
हस्तमं वज्रको लेकर गृहमं प्रवेश करे और शोभापमान हसि.
नीकी प्रतिमाको लिखे । सावधान होकर १००००१ दशहजार
मंत्रका जप करना योग्य है । हे देवि ! अर्द्धरात्रिके समय हसिनी
देवी साधकके सम्मुख आकर स्वयं उपस्थित होगी उस समय
साधकको योग्य है कि चन्दनादि पूजाद्रव्यद्वारा देवीका पूजन
आनन्दपूर्वक करे यही देवताको प्रसन्न करनेका महोपाय है । इस
विधान अनन्तर देवी साधकस कहंगी फि हे साधक ! इस समय
मुखको क्या करना चाहिये आज्ञा कर ऐसा कह साधकको वस्त्र
अलंकार, भोज्य आदि पदार्थ देती है तव साधकको योग्य है कि
उक्त लब्ध पदाथाको अपने व्यबसे अधिक अपने पास न रक्खे
किन्तु दीन दुखियोंको दान करदे अन्यथा देवी क्रोध करती है ।
अथ नटीसाधनम् ।
इतः परं महामाये शृणु मे नटीसाधनम् । “ॐ
हूँ हूँ फट फट नटी हूँ हूँ हूँ" | तारं कूर्चक्रो-
धास्त्रदयतो नटीति पदमुरेत् । कूर्चत्रयन्तु
मन्त्रोऽयं कथितो नर्तकीमनुः ।
हे महामाये ! अव नटी योगिनीका साधन सुनो। प्रथम नटी
मन्त्र कहाजाताहे वीजोदारानुसार ॐ हूँ हूँ फट फटू नदी हूँ हूँ हूँ।
भाषाटीकासमेतः। (१२३) ध्यानम्-फुल्लेन्दीवरसुन्दरोदरमुखी प्रोत्तुङ्गकुम्भ- स्तनी मृगयुगगनयना सानन्दाहादस्मिता क्षीरा- म्भोनिधिसम्मवा विलसिता मानुपौरिविनाशिनी वीणासंगीतशालिनी मणिमयकुण्डले कण धार- णतत्परा व्याहारलाकचातुरी। अब ध्यान कहाजाताहै । प्रफुलितकमलदलके सदृश मुख तथा उदग्वाली उच्च कलशके तुल्य स्तनवाली, मीनके तुल्य चंचल दो नेत्रोंको धारण करनेवाली, आन्दपूर्वक मंद २ हास्य करनेवाली, क्षीरसागरसे उत्पन्न हुई, भक्तोंके शत्रुओंको नाश करनेवाली, वीणायुक्त मनोहर गान करनेवाली, मणि जटित कुण्डलको कानमें धारण करनेवाली, मनोहरवाणी बोलनेवाली नटी योगिनीका हम ध्यान करते हैं। नीचपाशं गर्म गत्या सप्ताहजपपूजने ।नटी सुसिद्धा भवति धूपं दद्यान्मुहुर्मुहुः॥ चन्दनेनाध्य देयन्तु नेवेद्यञ्च मनोहरम् । सदा कामभोगदाची भार्या भवति नर्तकी ॥सुवर्णफलमेकन्तु व्ययं त्यक्त्वा- जुगच्छति । दिने दिने नदी देवी स्थायिनी भवति ध्रुवम्!
(१२४) फ्रियोडीशः। नीच स्थानमें एक समाह इस प्रयोगको करे और मंत्रज- पभी करें । वारम्बार धूपके देनेसे देवी प्रसन्न होती है और तत्क्षण सिद्धि प्राप्त होती है । चन्दनमिश्रित अर्घ प्रदान कर मनोहर नैवेद्य प्रदान करे तो नर्तकी सर्वदा स्त्रीवत् प्रसन्न.हो काम भोग प्रदान करेंगी। और प्रतिदिन नटी देवी साधकके खर्चके लिये एक सुवर्ण फल प्रदान कर स्थिर रहेगी। अथ चेटीसाधनम् । अतः परं महादेवि चेट्या आकर्षणं शृणु । मन्त्रो यथा-तारं कूर्चद्रयान्ते च अस्त्रयुग्म ततः परम् । चेटी क्रोधद्यञ्चोक्तं चेटीमन्त्रोत्त. मोत्तमः। अव चेटीसाधन प्रकार कहाजाताहै । हे देवि । चेटी योगिनीके आकर्पण प्रयोगको श्रवण करो। यह चेटीयोगिनीका मन्त्र है । ॐ हूँ हूँ हूँ फट फटू चेटी हूँ हूँ ध्यानम्-देव्येपाऽमृतमापिणी शशिसुखी अष्टोत्तरीयाघरा विभाणा कलशं सरोजम- मलं स्वर्ण च सीमंतके । श्रीखण्डादिविलपनाग- मापाटीकासमेतः। (१२५) लवपुः सौरभ्यसंभाविता किञ्चिद्धर्मसमाहिता पि- करवा पायात्मभाचोटिा अमृतभाषिणी, चन्द्रमुखी, उत्तरीयको धारण करनेवाली, मनोहर अधरोष्टवाली, कमलदलवत् सुन्दर कलश धारण करने वाली, सीमन्तभागमें सुवर्ण धारणकरनेवाली, चन्दनादि विलेपसे सुगंधित शरीरवाली, कोकिलाके तुल्य मनोहर कण्ठवाली चेटी योगिनी हमारी अथदा तुम्हारी रक्षा करे । सत्रापि भीपणस्थाने नामोच्चारणमात्रतः। ध्रुवं चेटी समागत्य चेटीकर्म करोत्यपि ॥ अ- थवा स्वगृहद्वारे त्र्यहं रात्रौ जपं चरेत् । आगत्य नियतं देवी चेटीकर्म करोति च । भीषण स्थान में नाममात्रके उच्चारण करनेसे निश्चय चेटी दवी आकर कर्म करनेमें समर्थ होता है अथवा निज गृहके द्वार पर तीन दिन और तीन रात्रितक मंत्र जापकरे तो चेटी देवी स्वयं आकर दासीवत् कर्म करनेमें समर्थ होय । अथ कामेश्वरीसाधनम् । कामेश्वरीप्रयोगः । तारं कूच स्त्रयुग्मं कामेश्वरी भूतिनी ततः । परं डेन्तं शोधत्रयं कामेश्वर्याः मनुः स्मृतः।
(१२६) नियोडीशः।
अब कामेभरीसाधन कदाजाता है । यह कामेश्वरीकामंत्रोद्धार
है । मन्त्र गया। कामेवगे है फट् फद कामेभर्ग भृतिन्य हैं
हैं।
ध्यानम्-ॐ तालस्कन्धसमागता मधुरता
कामन्तु पुष्पान्चिता गायत्री मधुराधरा स्मित.
मुखी वीणायुता गायती। रक्ताम्भोजविलोचना
मधुमयुक्ता समन्तादियं पुष्यत्पुप्प्यधनुर्धरामधु-
मुखी कामश्वरी भूतिनी॥
नालमृक्षम निराम कन्नबाली, मधुपानमें आमक्त बहुन फूल
युक्त भक्तकी रक्षा करनेवाली, सुन्दर होठीबाली हेरामुखी, वीणा
यजाकर गानेवाली, लाल. कमलके समान नवाली, गधुगानसे
मत्त फलहा फलीका धनुप धारण करनेवाली कामभग हगारी
रक्षा करे।
तत्र स्थानं समागत्य कृत्वा मांसस्य
भक्षणम् । मांसादिना वलिं दत्त्वा सहस्र
जपमाचरेत् ॥ मनुमकै सहस्रन्तु जपित्या
सिद्धिमाप्नुयात् । जपानिशीथमायाति रतनाध्य
भाषाटीकासमेतः। (१२७)
निवेदयेत् । कामेश्वरी भवेत्तुष्टा आर्या भवति
कामिता । साशां पूरयत्येव राज्यं यच्छति
निश्चितम् ।
उस स्थानपर जाय मांसका भक्षण कर तथा मांस आदिसे
वलिदान कर एक हजार जप करै । इस प्रकार बारह हजार जप
करनेसे अवश्य सिद्धि होती है, जप करते २ रात्रिमें रक्तका अर्घ
देना । ऐसा करनेसे कामेश्वरी देवी सन्तुष्ट होजाती है और मन.
मानी स्त्री होती है संपूर्ण आशायें पूर्णकर राज्यतक देदेती है।
अथ कुमारीसाधनम् । हूं हूं फट् फट् देव्य हूं हूं
हूं। क्रोधदयास्त्रयुग्मं च देवीति पदमुद्धरेत् ।
डेन्तं शोधत्रयं गुप्तं कुमारीमन्त्रमुत्तमम् ।
कुमारीसाधन कहते हैं । 'हूँ हूँ फट् फट् देव्यै हूँ हूँ हूँ' यह
मंत्र जानना । इस मंत्रका उद्धार दिखाते हैं । यथा-क्रोधदय
(हूँहूँ ) तथा-अस्त्रगुग्म ( फट् पाट् ) और 'देव्यै' ऐसा पद,
पुनः क्रोधत्रय (हूँ हूँ हूँ ) इतने अक्षर जिसमें हों वही कुमारी
देवीका मंत्र है।
ध्यानम्-दिव्यकार्मुकदमाभा कुमारी दिव्यरू-
पिणी । सीलंकारसंयुक्ता भार्या भवति साधिता।
(१९८) कियाडीशः। दिव्य धनुपको धारण किये, सोनेकीसी बांतिवाली, सम्पूर्ण अलंकारोंसे शोभित, दिव्य रूपवाली कुमारी देवि पूर्वोक्त जपादि करनेसे भार्या होजाती है। रात्रौ देवगृहं गत्वा तत्र शय्यां प्रकल्पयेत् । सित्तवस्त्रं चंदनं च ज्योतिः पुष्पं प्रदापयेत् ॥ धूपं तु गुग्गुलं दत्त्वाष्टसहस्र जपेन्यतुम् । जपान्ते नित्यमायाति चुम्वनालिंगनादिलिः ॥ कामित्ता जायते भार्या सत्यं देवी कुमारिका दिदात्यष्टौ घदीनारान्दिध्ववस्त्रयुगं तथा ॥ कालिकं भोजन दिव्यं परिवारस्य दास्यति । अन्याश्रमगृहाव्य- सानीयाशु प्रयच्छति ॥ नित्यं सहस्र जप्त्वा तु सा बागाति कुमारिका । सत्यं सत्यं पुनः सत्यं शृणु मे प्राणवल्लो ॥ रात्रिक समय देवमंदिरमें जाकर वहां शय्याकी रचना करे । सफेद चन्दन तथा सफेद वस्त्र और चमेली के फूल चढावे । गूंग- लक्षी धूप दे आठ हजार मंत्र जपै इसमकार मंत्र जपनेके पश्चात 1 मापाटीकासमेतः। (१२९) चुंबन आलिंगन मादिको देती हुई कुमारी देवी अवश्य पाती है चौर आकर आठ अशरफियोको देती है तथा दिव्य वस्त्र, दिव्य भोजन देती है । हे प्राणप्यारी ! में सत्यही तुझसे कहताहूँ कि जो पुरुप प्रति दिन एक हजार जप पूर्वोक्त मन्त्रया करता है उसके पास देवी कुमारी जाती है तथा दूसरोंका भी धन लाक उस साधकको देजाती है। मुहुर्मुहुर्जपेन्सन्नं शोधस्य मंत्रमुत्तमम् । शोधा- धिपं व्योमवकं वज्रपाणि सुरान्तकम् । एतन्म- त्रमयिनाय यो जत्तिद्वितक्षया । तस्य स्या- निष्फलं वर्म अन्ते नरकमाप्नुयात् । मालिकल्प. तरोदल्ली मृत्तिनी सिद्धिरुच्यते। उत्तम शोधयंत्रको वारम्वार जपे । जो साधक लोग विना प्रयोगविधि जाने मन्त्रजप करते हैं । कदापि उनको सिद्धि प्राप्त नहीं होती किन्तु अन्तम नरकगामी होते हैं। अथ साधनक्रमः-अतः शृणु परं देवि सुन्द- सीसिद्धिसाधनम् । सुन्दर्यादिप्रभेदेन प्रत्येक पू. जयेच्छिवे ॥ प्रातरुत्थाय सुस्नातो नित्यकर्म समाचरेत् । ततःप्रासादमारुहा पूजास्थानं सु- (१३०) क्रियोडीशः। शोभनम् ॥ बिल्यसूले श्मशाने वा प्रान्तरे च चतुप्पथे । तत्रस्थः साधयेद्योगी योगिन्यादि च भूतिनीम् । हे सुन्दरि ! अव सुन्दरीके सिद्धिसाधन क्रमको सुनो। हे शिवे सुंदरी यादि भेदानुसार प्रत्येकका पूजन करे । साधक प्रातःकाल शय्यासे उठकर स्नानादि समाप्तकर नित्य कर्म करे । तत्पश्चात् गृहमें आकर पूजास्थानमें स्थित हो विल्वमूल अथवा श्मशानमें या चौराहेमें योगिनी आदि भूतिनीता साधन करे । अजिनासनगः शुद्धस्तिलकं सूनि कारयेत् । ततो विधिवदाचम्य सूर्याध्य प्रदेत्ततः ॥ स्व- स्तिवाचनिकं कृत्वा शान्तिपाठं पुनः पुनः ॥ गणेशं बटुकाञ्चैव पूजयेद्यन्त्रकोपरि ॥ ततश्चोद- मुखो भूत्वा संकल्पं तत्र कारयेत् । गणेशं नोधमेवं पूजयेत्परमेश्वरि ॥ मूलमंत्रण प्राणा- यामं पडंगन्यासमाचरेत् । पूर्ववच्च पुनात्वा मानसः पूजयेत्ततः ॥ कृत्वाध्य स्थापनं तत्र पसमधदलं लिखेत् । तन्मध्ये च विनिय चन्द-
.
भाषाटीकासमेतः। (१३१)
नेन विलेपनम् । लजाबी लिखेत्तत्र पुना-
त्वा प्रपूजयेत् । निशाणं पूजयंहीरं दिवायां
पूजयेत्पशम् ॥ मूलमन्त्रं म्हादेवि प्रासं व्याप्य
जपेत सुधीः । अदराने ततः पूजां बलिं कृत्वा
विधानतः ॥ निर्भयः संजपेन्मंत्र हद्वतं च निव
दयेत् ।
मृगचर्मके ऊपर स्थित होकर निज मस्तकमें तिलक करे। पुनः
आचमन करे । स्वस्तिवाचनपूर्वक सूर्य भगवान्को अर्घ प्रदान
करे। यन्त्रके ऊपर गणेशजी तथा बटुकजीका पूजन करे । फिर
उत्तरमुख हो संकल्प करे । हे परमश्चरि ! गणेश तथा क्रोध
भैग्वजांका पूजन करे । मूलमंत्रसे प्राणायाम तथा षडंगन्यास
करे फिर उक्तरूपसे ध्यानकर मानसिक पूजन करे । अर्घ स्थापन
कर अष्टदल कमल लिखे और उस अष्टदलके मध्यमें चन्दनसे
लेप करे । उक्त दलके मध्यमें लज्जाबीज लिखकर श्रीभगवती.
का ध्यानकर पूजन करे । रात्रि समय वीरका और दिनके समय
पशुका पूजन करे । हे महादेवि ! साधकको योग्य है कि एक
मासपर्यंत मूलमंत्रका जप करे । अर्द्ध रात्रिके समय पूजनकर
पालिमदान दे मौर निर्भय हो मंजका जप को।
जियाड्डीशः।
अथ यक्षसाधनम् ।
पत्तः परं महादेवि पक्षसाधनसुत्तमम् ।
अव यक्षसाधन कहाजाता है । हे महादेवि ! यक्षसाधान प्रकार
सुनो । प्रथम वीस (२०) प्रकारके यक्षोंके नाम कहजाते हैं ।
भीमवक्र १ महावक्र २ सिंहवन ३ हयानन ४ गईभास्य५
महावर ६ वहुवक ७ गजानन ८ विभ्रम ९ बाहुक १०वार ११
सुग्रीव १२ रंजक १३ पिशाचास्य १४ जृम्भक १५ वामक १६
अर्थद १७ जयद १८ मणिभद्र १९ मनोहर २० ।, यह २०
यक्ष साधकको सिद्धि देनेवाले हैं ।
अथ यक्षमन्त्रः-गगनो ग्रहणश्चैव युक्तचन्द्रा-
दशेखरः । एकाक्षरमहामन्त्रो साधकर्जप्यते
यदि । संख्ययाटसहलाम्य सर्वसिद्धिप्रदायकः ।
इस एकाक्षर यक्षमंत्रका ८००० हजार जप करे तो साध.
फको सर्वसिद्धि प्राप्त होय।
श्रीदेव्युवाच । भीमवकादियक्षाणां महामन्त्राः
श्रुता मया ॥ चंद्र खर तछ्यान्न संक्षेपेण वृद
प्रभार
मापाटीकासमेतः। (१३३) श्रीदेवीजी पहनेलगी । हे चन्द्रशेखर ! भीमवनादि २० यक्षों के महामंत्रको कहो । श्रीशिवजी कहते हैं, हे प्रिये ! नाम मंत्र श्रवण करो। यथा-हो भीमवनाय स्वाहा १ हो हो महावकाय स्वाहा २ व हो सिंहवाय स्वाहा ३ ही लं कर्माणि साधय हयाननाय स्वाहा ४ ही कुरु कर्माणि साधय साधय गर्द्धभा- स्याय स्वाहा ५ हो महावीराय स्वाहा ६ हो कुरुकुरु वहुवाय स्वाहा ७ है। महावलिने गजाननाय स्वाहा ८ ही विभ्रमाय स्वाहा ९ हो ही वाहुकाय स्वाहा १० हो ऐ वागय स्वाहा ११ हैं। सुग्रीवाय स्वाहा १२ हो रचकाय स्वाहा १३ ही सर्वकमाणि साधय पिशाचाय स्वाहा १४ हों ज़ुभकाय स्वाहा १५ हौं लं वामकाय स्वाहा १६ हों अर्थदाय स्वाहा १७ हौं जयप्रदाय स्वाहा १८ ही माणभद्राय स्वाहा १९ हो मनोहराय स्वाहा २० हे महादेवि ! इसके पश्चात् ध्यान सुनो। अथ यक्षाणां ध्यानानि । भीमवकध्यानम् । प्रत्यालीपदं कृष्णं खर्व- कर्बुरसूर्धजम् । द्विभुजं दक्षिणे कर्वी वामे खपर- धारिणम् । व्याघ्रचर्माम्बरधरं त्रिनेत्रं भीपणा- जनम्।
कियोडीशः। अब यक्षा ध्यान कोजाते हैं। प्रथम भीमवरका ध्यान कहाजाता है । कृष्ण वर्ण, छेटे शरीरवाला, कर्वर केश दो भुज दक्षिण हायम की ( कैंची) और वाम हाथमें खप्पर धारण करनगला, वक चर्मको धारण करनेवाला, त्रिनेत्र ऐसे भीष- णाननका ध्यान करते हैं। पहावक्रध्यानम् ! ध्यायेवं महावक्रमशिवण त्रिनेत्रकम् । द्विभुज दक्षिणे खडं खेटकं वामह- स्तके | कृष्णकेशन्तु कुटिलं विकृतास्यं भया- नकम् । साधलाय प्रयच्छन्तमययं वरदेव च। महावका ध्यान कहाजाता है । अग्निके तुल्य वर्णवाले त्रि. नेत्र द्विभुज अर्थात् दो भुजावाले, दक्षिण हस्तमें खड्ग और वाम हस्तम खेटको धारण करनेवाले, कृष्णवेश और कुटिल, फैले मुखवाले भयानक, साधकले अर्थ अभय और वर देनेवाले महा- चक्र देवका हम साधक लोग ध्यान करते हैं। सिंहवक्रध्यानम् । ध्यायेदेवं सिंहवकं जटासार- समन्वितम् । विकृतास्यं द्विजिह्यं च चतुर्ने द्विकर्णकम् । द्विभुजं च गदापाणिं वामे चाs- अयसनम् ।
भाषाटीकासमेतः। ६ १३५)
सिंहवकका ध्यान कहाजाता है । जटाओंके भारसे सम
न्यित टेढे मुखवाले, दो जिहावाले, हाथमें गदाधारण करने
वाले, वाम हाथसे अभय प्रदान करनेवाले ऐसे सिंहवक्रजीका
हम ध्यान करते है।
अथ हयाननध्यानम् । श्वेतो हयाननः खों
द्विभुजोऽतिभयानकः । दक्षे डमरुकं धत्ते वामे
चैव त्रिशुलवाम् ।
अव हयानन यक्षका ध्यान कहाजाता है । श्वेतवर्ण, छोटे
शरीरवाला, भयङ्कर स्वरूप, दक्षिण हाथमें डमरू और वाम
हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाला हयानन यक्ष हमारी रक्षाकरे ।
महावीरध्यानम् । ध्यायेदे महावीरं द्विकर्णन्तु
त्रिनेत्रकम् । द्विभुज हास्यवदनं बराऽभयवि-
धारकम् ।
अव महावीरका ध्यान कहाजाता है । दो कर्णवाले, तीन नेत्र
पाले, दो भुज और हास्य करनेवाले, दोनों हार्योंमें वर और
अभय धारण करनेवाले ऐसे महावीरका ध्यान करते हैं, और
यक्षाफे ध्यान डामरतन्प्रमं विस्तारसे कहेगये हैं।
इति क्रियोड्डीशे महातंत्रराजे गौरीश्वरसंवादे
पोडशः पटलः ॥ १६ ॥
कियोडीशः।
अथ मृत्युञ्जयविधानम् ।
देव्युवाच-प्राणनाथ कृपासिन्धो बृदि शास्त्रवि-
शारद । मृत्युञ्जयस्य पूजायाः किं फलं कि
विधानकर।
अव मृत्युञ्जय विधान कहाजाता है । हे प्राणनाथ ! हे
कृपानिधो ! हे शास्त्रविशारद ! मृत्युञ्जय शिवपूजाका क्या
विधान और क्या फल है कृपा कर कहो।
श्रीशिव स्वाच । बन्नाह सलो नौरि त्यथि
लेहात प्रकाशितम् । मृत्युंजयविधान दु न
वक्तव्यं वहिर्मुखे । सुखे तु देवि वक्तव्यं यत्नतः
प्राणवल्लभे । मृत्युंजयो महादेवः साक्षान्मृत्युहरुः
परः । विधानं तस्य संक्षेपाहतच्यं शृणु सुन्दरि ।
देवेशि रोगशान्त्यर्थ तस्य पूजाविधिर्षया ॥
मृत्युंजयं समापूज्य लिंगं त्रिभुवनेश्वरम् । रोगा-
तो शुच्यते रोगाखो चुच्येत बन्धनात । यस्तु.
भाषाटीकासमेतः। संपूजयेद्भक्त्या लिंग मृत्युंजयाभिधम् । यमोऽ- पि प्रणमेद्वत्त्या किं करिष्यति पामरः ॥ शिवजी कहने लगे । हे गौरि ! इस प्रयोगको प्रकाश कर- नेकी मेरी इच्छा नहीं है तथापि तुम्हारे स्नेहवश प्रकाश करता हूं। यह प्रयोग धर्मविमुख पुरुपके संमुख न कहना । हे प्राण- वल्लभे ! श्रद्धावान् पुरुपके निकट यह प्रयोग प्रकाश करना योग्य है । साक्षात् मृत्युञ्जय श्रीशिवजी मृत्युके हरनेवाले हैं । हे सुन्दार ! अब में उनका विधान संक्षेपसे कहता हूं सुनो। हे देवोश ! रोगशांतिके अर्थ शिवलिंगका पूजन करे तो रोगी रोगसे छूटे । वंदी बंधनसे छुटे । जो लोग शिवलिंगका पूजन करते हैं यमराजभी आकर उनको भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं अन्य पामर मनुष्योंकी कौन कथा । तल्य पूजाविधिं वक्ष्ये शृणु मत्प्राणवल्लभे । जातिभेदर्मृत्तिकान्तु गृहीत्वाऽशीतितोलकाम् ॥ निर्माय पार्थिव लिंगं कात्याधारे निवेशयेत् । पोशाणिकेन गंण कुर्याच पठनं बुधः । स्वाप- येत् पञ्चगव्येन प्रत्येस्याएशोलकाम् । स्वस्थ- मन्त्रैश्च प्रत्येकद्रव्येण नापयेत् सुधीः ॥ रोग- शिमोडीशः। शयेच्छया विज्ञानामगोनादिपूर्वकम् । उपविश्या- सने विग्रो धृत्वा धोतं च वाससम् ॥ रुद्राक्ष- मालां कण्ठे चै धृत्वा भस्मत्रिपुंड्रकम् । उप- चाराः पोडा तु देया सक्त्या प्रयत्नतः । सुवर्णस्यासनं देयं तथैवाभरणानि च । वस्त्रयुग्म प्रदद्यात्तु परिधेयं यथा भवेत् ॥ दं प्राणवल्लभे ! पूजनविधान कहता हूं सुमो । जातिभेदसे ८८ तोले मृत्तिका लेकर शिवलिंग बनाये और उस लिंगको कासीके पात्र में स्थापन कर पौराणिक मंत्रोदारा पूजन करे पंचगव्य से स्नान करावे निज निज मन्त्रम कहे द्रव्यसे पृथक् २ मान करावं । रोगनाशफी इच्छासे नाम और गोत्रको उच्चारण कर सान करावे । विप्र घासनपर बैठकर भोर धौत वस्त्र पह- नकर कण्टम नद्राक्षकी माला पहनकर भस्मका निपुंडू लगाकर भक्तिपूर्वक पोडशोपचागसे पूजन करके सुवर्णनिर्मित वासन प्रदान करे और आभूषण,नथा वस्त्रादिक भी प्रदान करे । शिवयन्नं यथा-पदकोणमण्डलं कृत्वा तदन्ते साध्यनामकम् । प्रसादधीज हां संलिख्य ततः पदपोणेषु प्रणवसहितपंचाक्षरवर्णाद पलंगमं-
भोपाटोकासमेतः।
त्रांश्च विलिख्य तदहिः पञ्चदलानि विरच्या
तहलेषु ॐ ईशानाय नमः । ॐ तत्पुरुपाय
नमः । ॐ अघोराय नमः । ॐ सद्योजाताय
नमः ॐ वामदेवाय नमः । इति पंच मंत्रान
प्रागादिकमेण लिखेत् । तदहिरपदलानि रच.
यित्वा तदलेषु मातृकावर्णाव लिखेत् । तदहि-
वृत्तं त्र्यम्बकेण वेष्टयेत् । एतद्यन्नं जपहोमा-
दिना संपूज्य धारयेत् । आयुरारोग्यश्वर्यादि-
सिद्धिर्भवति ।
अव शिवयंत्र कहाजाता है। प्रथम पट्कोण यंत्रको लिख.
कर उसके मध्य में साध्य व्यक्तिका नाम लिखे और प्रसाद
वीजोंको लिखकर पट्कोणाम प्रणवसहित पंचाक्षरमंत्रके वा
( अक्षरों ) को लिखे तथा पडङ्गमंत्रोंको भी लिखे । उसके
बहिर्भागमें पंचदल निर्माण कर उसके दलाम ॐ ईशानाय
नमः । ॐ तत्पुरुषाय नमः । ॐ अघोराय नमः । ॐ सद्यो-
जाताय नमः । ॐ वामदेवाय नमः । इन पांच मंत्राको मागादि
क्रमसे लिखे । उस यंत्रके वहिर्भागमें अष्टदल निर्माण कर
(१४००
क्रियोडीशः।
दलोमं मातृकायोंके वोको लिखे। अदलने बहिर्भागको
व्यम्बक मंत्रसे वेष्टित करे । इस यंत्रको जप होम आदिसे पूजन
कर धारण करे तो आयु आरोग्य ऐश्वर्य आदिकी सिद्धि होय।
अथ मृत्युंजयमंत्रः-अथवा शृणु देवेशि यंत्रं
सर्वसुसिद्धिदम् । मध्ये साध्याक्षराव्यं ध्रुवमभि-
विलिखेन्मध्यमं दिग्दलेषु कोणेष्वन्तं मनोस्तत्
शितिभुवनमथो दिक्ष चन्द्र सिदिक्षु । ढान्तं
यन्नं तदुक्तं सपालसवहरं वेडभूतापमृत्युव्या-
धिव्यामोहदुःखप्रशमनमुदितं श्रीपद कीर्ति-
दायि॥
मृत्युञ्जय यंत्रका चित्र अन्य तंत्राम वर्तमान है बुद्धिमान
जन उन ग्रन्थांको देखकर अपनी तृप्ति करसकते हैं । ग्रन्थ
विस्तारके भयसे यहां चित्र नहीं बनायागया है। विना चित्र
दिखाये विशेष व्याख्यासे कुछ काग साधारण पुरुषांका नहीं
निकल सकता है इस यंत्रका सांगोपांग पूजन करनेसे श्रीप्राप्ति
होती है।
मधुपर्क कांस्यपात्रे दद्यादोजनयुग्मकम् ।
विल्वपत्रसहस्त्रन्तु हाननं विनिवेदयेत् ॥ एवं
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मापाटीकासमेतः । (१४१॥ संपूज्य लिंगकं दिसह मर्नु जपेत् । समि- निस्तु गुडूच्यास्तु तत्र होम समाचरेत् १दक्षिणा वालणे देवि सुवर्ण वस्त्रकं तथा। तद वा त वा यथाविभवमानतः। अंगहीनान कर्तव्या पूजा बाफलदा यतः । एकालिंग समाराध्य फालं स्यादन्यके युगे ॥ तत्फलं लभते देवि कली संख्या चतुर्गुणा । आम्रपाने तु संस्थाप्य जल- चाशीतितोलशम् ॥ तज्जलेनेव देवेशि कुशैः सम्माय रोगिणम् । क्षिपेद्दीपशिखायां च मन्त्र- भुच्चार्य मानकम् ॥ एवं विधिविधानेन पूजये. मम लिंगकम् । यादृग्यासू भवेद्रोगो नाश- मेति भयोदितम् । सांगन पूजयित्वा तु लभते वाहितं फलम् ॥ अंगव्यतिक्रमेणैव वृथा भवति वासना । रोगी मधुच्यत सद्यो भोगायोज्झिता- कंचुकः । यदि सपने भक्तित्तदा भुक्की भवे.
(१४२) मियोडीशः। ध्रुवम् । अन्यथा यदि देवेशि सबै भवति निष्फलम् । अव मधुपर्क कहाजाता है। काँसी के पात्र में युग्म भोजन प्रदान करे छिद्ररहित १००० विल्वपत्र प्रदान करे । इस प्रकार लिंगका पूजन कर दो हजार मंत्र जप करे । गिलोयकी जडकी समिधाओंसे हवन करे । हे देवि ! सुवर्ण, तथा वस्त्र ब्राह्मणोंको देवे और शुभ दक्षिणा भी देवे शक्ति के अनुसार आधा अथवा आधेका आधा जितना होसके भक्तिपूर्वक प्रदान करे । अंगहीन कर्म न करना चाहिय क्योंकि प्रयोग निष्फल होजाता है। एक लिंगका पूजन करनेसे अन्य युगोंमें भी फल होता है । हे देवि ! कलियुगौ यदि तंत्रशास्त्र में कहे विधानसे चौगुना जपादि करे तो फल प्राप्त होता है । आमके पात्रमें ८० तोले जल भर कर रोगीको कुशाओस मार्जन करे । इस विधिक अनुसार शिवलिंगका पूजन करे तो जिस किसी प्रकारका भी रोगीको रोग होगा वह शीघ्रही नाशको माम होजायगा। सांगोपाङ्ग पूजनके कानेसे वांछित फलकी प्रामि होतीहै । अंगहीन प्रयोगके करनेसे समस्त वासना वृथा होजाती है । इस प्रयोगके करनेसे रोगी इस प्रकार रोगसे मुक्त होजाता है जैसे कि कैचलीसे मर्प मुक्त होजाता है । जिन पुम्पाकी सियवाक्यम. भक्ति और विश्वास है वोही सहसा रोग भाषाटीकासमेतः। (१४३) से लूट सकते हैं । हे देवोश ! जिन पुरुषोंका मेरे ऊपर पूर्णता से विश्वास नहीं है उनकी समस्त क्रिया निष्फल होजाती हैं। अथ मंत्रपूजाविधानम् । अतः परं देवि शृणु यंत्रपूजाविधानकम् । अव मंत्रपूजाका विधान कहाजाता है । हे देवि ! अब इसके पश्चात् यंत्रपूजनके विधानको सुनो। कृतनित्यक्रियो देवि स्वस्तिवाचनपूर्वकम् । संकल्पं च ततः कुर्याद्रिधिवाक्यानुसारतः ॥ अग्रेत्यादि अमुझगोत्रः श्रीपूर्वकदेवशर्मा यंत्रा. विष्टितदेवतायाः पूजार्थममुकयंत्रसंस्कारमहंक- रिष्ये । इति संकल्प्य महादेवि गुरोरचनमाच. रेत् । पञ्चगव्यं ततः कृत्वा शिवमंत्रेण मंत्रि- तम् । तत्र चनं क्षिपेन्मंत्री प्रणवेन समाकुलम् । तदुद्धृत्य ततश्चक्र स्थापयेत्स्वर्णपात्रके ॥ पञ्चामृतेन दुग्धेन करतूरीकुंकुमेन च । पयो दधिधृतोदशर्कराधरेनुक्रमात् ।। तोयधूपान्तरः (१४४) क्रियोडीशः। कुर्यात पंचायतमनुत्तमम् । अधाषिः कलशै- देवीमष्टाभिर्वारिपूरितः ॥ पायजलसम्पन्न का- यत् रूनानमुत्तमम् । स्नान सम्मान ता देवी स्थापयेत् स्वर्णपीठके॥ स्वस्तिवाचनपूर्वक नित्यक्रियाको करे फिर विधिवाक्यके अनु- सार संकल्प करे । अयेत्यादि यही संकल्प है । पुनः गुरुपूजा फरे तत्पश्चात् पंचगव्यको निर्माण कर शिवमंत्रसे अभिमंत्रित करे । फिर प्रणयुक्त चक्र निर्माण करे उस चक्रको स्वर्णके पात्रमें स्थापन करे । पञ्चामृत, दुग्ध, कस्तूरी, कुंकुम, पय, दाधि, घृत, सहत, शर्करा इत्यादिसे क्रमानुसार यंत्रराजको स्नान कगये । और धूप दीप आदि प्रदान करे । आठ प्रकारके जलोंसे पूरित आठ कलशोंमें सर्वोषधि आदि सुगंधित पदार्थ स्थापन करे और उसी जलसे स्नान करे और उसी देवाको सुवर्णके सिंहासनमें स्थापन करे। गायत्री यथा-यंत्रराजाय विद्महे महामंत्राय शीमहि तन्नो यन्त्रः प्रचोदयात् । स्पृष्ट्वा यंत्र सामेण गावच्या बाधिन्नयेत । अष्टोत्तर- मापाटीकासमेतः । (१४५) शतं देवि देवताभावसिद्धये ॥ आत्मशुद्धिं ततः कृत्वा पडेगर्देवतां यजेत् । तनापाहा महादेखि जीवन्यासञ्चारयेत् । उक्त गायत्रीमंत्रको उच्चारण कर यंत्रको कुशाग्रभागसे स्पर्श कर अभिमंत्रित करे । हे देवि ! देवताभावकी सिद्धिले गर्थ१० वार मंत्र जपकरे पुनः आत्मशुद्धि कर पडंगहारा देवताका पूजन करे। हे महादेवि ! यंत्रमं देवताका मावाहन कर जीय. न्यास करे। प्राणशतिष्टा-अस्य प्राणप्रतिष्ठामन्त्रस्य ब्रह्मा- विष्णुमहेश्वरा अपयः। ऋग्यजुःसामानि च्छ- न्दांसि । चतन्यं देवता । प्राणप्रतिष्ठायां विनि- योगः। उपचारः षोडशभिर्महामुद्रादिलिस्तथा। फलताम्बूलनेवेद्यः शिवं तत्र समर्चयेत् ॥ पट्ट- सुवादिकं दद्यासालंकारमेव च । अगुरुं चाग- रं घण्टा यथायोग्यं महेश्वरि ॥ सर्वमेतत्प्रयत्नेन दद्यादात्महिते रतः । ततो जपेल्सहरमन्तु सकले- (१४६) त्रियोडीशः। प्सितसिद्धये ॥ जपसमापनं कुर्यादष्टांगेन नग- स्कृतम् । अष्टोत्तरशतं हुत्वा सम्पाताज्यं विनि- क्षिपेत् ॥ होमकर्मण्यशक्तश्चेद्विगुणं जपमाच- रेत् । गुरवे दाक्षिणां दद्यात्ततो देवी विसर्जयेत् । अव प्राणप्रतिष्ठा कही जाती है। प्रथम विनियोग समाप्त कर षोडश उपचार और महामुद्रादि द्वारा पूजन करे । फल ताम्बूल नैवेद्य मादि शिवजीको समर्पण करे। रेशमीन वस्त्र, तथा अन्य प्रकारके वस्त्र आभूपणाधिसे शिवजीको प्रसन्नकर पूजन करे और यात्मकामनाके अर्थ मगुरु चामर, घंटा, यथा- शक्ति प्रदान करे । फिर सहस्रवार मूल मंत्रका जप करे। जप समाप्त कर अष्टांग नमस्कार करे १०८ वार हवन करके धारा- वांध अमिमं घृत प्रदान करे । यदि हवन करनेकी शक्ति न हो तो दुगुना मंत्र जप करे । और गुरुको दक्षिणा देकर देवताका विसर्जन करे। अस्प प्रयोगः । कृतनित्यक्रियः स्वस्ति- वाचनपूर्वकं संकल्पं कुर्यात् । अयेत्यादि अमुकगोत्रः श्रीअमुकदेवशर्मा अमुकदेवता पूजार्थममुकयन्त्रसंस्कारमहं करिष्ये । ततः भाषाटीकासमेतः। (१४७) पञ्चगव्यमानीय दौं इति मन्त्रेणाष्टोत्तरशतमषि- मन्त्र्य प्रणवेन यंत्र तत्र क्षिपेत् । तत उत्थाप्य स्नापयेच्छीतलजलचन्दनगन्धकस्तूरीकुंकुमः । स्नापयित्वा पञ्चगव्यमानीय हौं इति मन्त्रेणाष्टो- त्तरशतमभिमन्त्र्य प्रणवेन शोधयित्वा स्नाप- येत् । तत्र नमः। प्रथमं शीरेण स्नापयित्वा धूपं दद्यात् । एवं दना घृतेन मधुना शर्करया च। ततोऽष्टाभिः कलश स्नापयेत् । कुंकुमगो- रोचनया चन्दनमिश्रितैस्तोयः स्नापयेत् । सर्वत्र स्नानं मूलमन्त्रेण तत्तो यन्त्रहत्तोल्य कुशाग्रेण तत्स्पृष्ट्वा गायत्र्यष्टोत्तरशताभिमंत्रितं कृत्वा प्राण- प्रतिष्ठां कुर्यात् । अस्य प्राणप्रतिष्ठामंत्रस्य ब्रह्मा- विष्णुमहेश्वरा ऋषयो ऋग्यजुः सामानि च्छन्दांसि चेतन्य देवता प्राणप्रतिष्ठायां विनियोगः । तद्य- था-आँ ह्रीं को यं बलं वं शं यं संहाँ हसः ॥
(१४८) क्रियोडीशः। अमुकदेवतायाः प्राणा इह प्राणाः । जीव इह स्थितः । संन्द्रियाणि वामन इत्यादि प्राणान् प्रतिष्ठाप्य तत्र भकातिदेवतामावाहा पोडशोपचारः पंचोपचार पूजयेत् । तत्र पसूत्रादिकं दत्ता अष्टोत्तरशांत सहस्र वा जपित्वा शक्तम्शेलि दद्यात् । ततोऽप्टोत्तरशतं होमं कुर्यात् । होमा आये दिगुणो जपः कार्यः । ततो दक्षिणां दत्त्वा छिद्रावधारणं कुर्यात् । अब इसका प्रयोग कहाजाता है। नित्य क्रियाको समाप्त कर स्वस्तिवाचनपूर्वक संकल्प करे । अयेत्यादि यह संकल्प है फिर पंचगव्यको लाकर ही इस मंत्र से १०८ वारः अभिमंत्रित कर प्रणवसे यन्त्रको उसमें निक्षेप करे । फिर उस यंत्रको उठा फर शीतल जल, चन्दन, गन्ध, कस्तुरी कुंकुमसे स्नान करावे । फिर ही इस मंत्रको उच्चारण कर प्रणवसे शोधन कर स्नान करावे । यह काम है । प्रथम दूधसे स्नान कराकर धूप प्रदान करे इसी प्रकार दही, घृत, सहत, शर्करासे स्नान करा अष्ट कल- शसे स्नान करावे । कुंकुम, गोरोचन, चन्दन मिश्रित करावे ।
मापाटोकासमेतः । (१४९ सब जगह मूलमन्त्रसे स्नान करावे । फिर यंत्रको उठाकर कुशाके अग्रभागसे छूकर गायत्री मंत्रसे अभिमंत्रित कर प्राण प्रतिष्ठा करे । और उक्त विनियोग प्रदान करे आँ ह्रीं को ये व ल व श य स हो हंसः अमुक देवतायाः प्राणा इह प्राणा जीव इह स्थितः इत्यादि उच्चारणसर देवताका आवाहनकर पंचोप चार तथा पोडशोपचार पूजन करे और रेशमीन वस्त्र आदि देकर १०८ वार अथवा १००० मंत्र जप करे यदि शक्ति हो तो वलिदान भी करदे । फिर १०८ वार हवन करे । होमामा- वमें द्विगुणं जप करे । तदनन्तर दक्षिणा देकर छिद्रावधारण करे। इति श्रीक्रियोड्डीशे महातन्त्रराजे देवीश्वरसंवादे सप्तदशः पटलः ॥ १७ ॥ अथ शिवयंत्रम् । तत्रादौ पट्कोणमण्डलं कृत्वा तदन्ते साध्ये नाम युक्त प्रसादबीजं विलिख्य पदकोणेषु प्रणयसहि- तपञ्चाक्षरवर्णान विलिख्य विचरेषु पडंगमंचात् तदहिः पंचदलानि विरच्या तहलेषु * वामदेवाय । १५०) क्रियोडीशः। नमः । ॐ ईशानाय नमः । ॐ तत्पुरुषाय नमः। ॐ अघोराय नमः । ॐ सद्योजाताय नमः इति पंच मंत्रान् प्रागादिक्रमेण लिखेत् । तदहिरष्टद- लानि रचयित्वा तदलेषु मातृकावर्णान लिखेत् । तदहिवृत्तं यम्बकेन वेष्टयेत् । तद्यन्ने जपदो- मादिः कार्यः। अब शिव गंत्र कहाजाताहै-प्रथम पट्कोण मण्डल निर्माण करे और उस मण्डलके बीच साध्य व्यक्तिके नामको लिखे और प्रसाद वीजको भी लिखे । छओं कोणा में प्रणवसहित पञ्चाक्षर मंत्रके वर्णीको लिखे । विवरों में पडंग मंत्रोंको लिखे यंत्रके वहिर्भागमं पंचदल बनावे । दलाम नाममन्त्रोंको लिखे यह नाममंत्र है । ॐ वामदेवाय नमः । ॐ ईशानाय नमः । ॐ तत्पुरुषाय नमः । अघोराय नमः । ॐ सद्योजाताय नमः । इस प्रकार इन पांच मंत्रांको प्रांगादि क्रमसे लिखे । पुनः यंत्रके वहिभाग अष्टदल निर्माण करे । दलाम मातृकाओंके वर्णीको लिखे । दलाक वहिर्भागको व्यम्बक मंत्रसे वेष्टित करे और यंत्र जप होमादिक करे।
भापाटीकासमेतः । (१५१) अथ मृत्युञ्जययन्त्रम्-मध्ये साध्याक्षराव्यं ध्रुव- मभिविलिखेन्मध्यमं दिग्बलेषु कोणेष्वन्तं मन स्तक्षितिभुवनमथो दिक्षु चन्द्रं विदिक्षु । ढान्तं यन्त्रं तदुक्तं सकलभयहरं क्ष्वेडभूतापमृत्युच्या धिव्यामोहदुःखप्रशमनमुदितं श्रीप्रदं कीर्तिदायि । इसका अर्थ पिछाडी काहचुक हैं। अथ रोगशान्त्यर्थ-व्यम्बकमातसंजी- विनीविधानम् । स्वच्छं स्वच्छारविन्दस्थितमुभयकरे संस्थितो पूर्णकुम्भी द्वाभ्यामेणाक्षमाले निजकरकमले दो घटो नित्यपूर्णी । द्वाभ्यां द्वौ च स्रवन्तौ शिरसि शशिकलां चामृतैः प्लावयन्तं देहं देवो दधानं विदिशतु विशद कल्पनाले श्रियं वः ॥
(१५२) क्रियोड्डीशः। इसका भी भाषार्थ हम पिछाडी लिख चुके हैं अतः पिष्टपेषण न्याबसे क्या काम ? आदा प्रासादबीजं तदनु सृतिहरं तारकं व्याह- तिञ्च प्रोच्चार्य त्र्यम्बकं यो जपति च सततं संपुटं चानुलोमम् । गायत्र्याः पूर्वपादं तदनु च शिवदं त्र्यम्बकस्यादिनं तत्मोचार्य ध्यानपूर्वं जपति हि मननोऽत्वेति मृत्यु ध्रुवं सः॥ प्रासादबीज को मृतिहरं यक्षरं मृत्युञ्जयमंत्र ॐ जूं सः । तार कम् । ॐ व्याहतपः भूर्भुवः स्वः । तेन हौं ३० जूं सः । ॐ भूर्भुवः स्वः तत्तरूयम्बकमंत्रः पूर्वमं त्रेणानुलोमाण संपुटितः । अल्य जपात सर्व सिदिसवति पुनः 8 मायच्याः प्रथमपाद श्यामकल्या प्रथमपादमित्यादि च ध्यानं पूर्ववतम् ।
मापानीकासमेतः। ११५३) प्रथम प्रासादबीज तत्पश्चात् मृत्युहर तारक तथा व्याहतिका उच्चारण कर जो मनुष्य निरन्तर संपुट तथा अनुलोम त्र्यम्बक मंत्रका जप करते हैं उनको सर्वसिद्धि प्राप्त होती हैं । हो यह प्रासादवीज है । मृत्युहर तीन अक्षरका ओं जूं सः यही व्यंवक मंत्र है । ओं को तारक कहते हैं । भूर्भुवः स्वः इनको व्याहति कहते हैं। हैं। ओं जूं सः ओं भूर्भुवः स्वः । इस अनुलोम क्रमा- नुसार संपुटितकर जप करे सिद्धि प्राप्त होगी। फिर गायत्री मंत्रका प्रथम पाद और त्र्यम्बक मंत्रके प्रथमपादको सम्पुटित- कर जप करे ध्यान प्रथम कह चुके हैं। इति क्रियोड्डीशे महातंत्रराजे देवीश्वरसंवादेऽष्टादशःपटलः॥१८ अथ मृत्युञ्जयकवचम् । श्रीदेव्युवाच-भगवन् देवदेवेश देवताभिः प्रधू- जित । सर्व से कथितं देव अवचन प्रकाशि- तम् ॥ मृत्युरक्षाकरं देव सर्वाशुभविनाशनम् । कथयस्वाद्य मे नाथ यदि स्नेहोऽस्ति मा प्रति। अव मृत्युञ्जय कवच कहाजाता है । श्रीदेवीजी कहती हैं। हे देवदेवेश ! हे देवताओंसे प्रपूजित ! भगवन् ! आपने मुझसे सप कुछ कहा परन्तु मृत्युहर, सर्व रक्षाकर, अशुभनाशक कवच (१५४) क्रियोडीशः। नहीं कहा कृपाकर कहिये । हे भगवन् ! यदि मेरे ऊपर आपका परम स्नेह है तो॥ ईश्वर उवाच--अस्य मृत्युञ्जयमन्त्रस्य वामदेव पिर्गायत्रीच्छन्दा मृत्युञ्जयो देवता साधका- भीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । शिरो मे सर्वदा पातु मृत्युञ्जयसदाशिवः । सत्यक्षरस्वरूपो में बदनं च महेश्वरः । पञ्चाक्षात्मा भगवान सुनो में परिरक्षतु । मृत्युञ्जयस्निवीजात्मा ह्याय रक्षतु मे सदा ॥ विलवृक्षसमासीनो दक्षिणामूर्तिर- व्ययः । सदा मे सर्वतः पातु पदाशिवर्णरूप- वृक् ।। द्वाविंशत्यक्ष रुद्रः कुक्षी मे परिरक्षतु । विवर्णात्मा नीलकण्ठः कण्टं रक्षतु सर्वदा ॥ चिन्तामणिवीजपूरे ह्यर्द्धनारीश्वरो हरः । सदा रक्षतु मे गुलं सर्वसम्पत्प्रदायकः ॥ स त्र्यक्षरस्व- रूपात्मा कूटरूपी महेश्वरीमार्तण्डभैरवो नित्य पादौ मे परिरक्षतु ॥ ॐ जूं सः महावीणस्वरूः- भाषाटोकासमेत (१५५) पत्रिपुरान्तकः । ऊहमूद्धनि चेशानो मम रक्षतु सर्वदा । दक्षिणस्यां महादेवो रक्षेन्मे गिरिना- यकः । अघोराख्यो महादेवः पूर्वस्यां परिरक्षतु ।। वामदेवः पश्चिमस्यां सदा मे परिरक्षतु || उत्तर- स्यां सा पातु सद्योजातस्वरूपधृक् ॥ इत्थं रक्षाकरं देवि कवचं देवदुर्लभम् । प्रातमध्याह्न- काले तु यः पठेच्छिासन्निधौ ॥ सोऽभीष्टफल- माप्नोति कवचस्य प्रसादतः । कवचं धारयेद्यस्तु साधको दक्षिणे भुजे ॥ सर्वसिद्धिकरं पुण्यं सवी- रिष्टविनाशनम् । योगिनीभतवेतालाः प्रेतकल्मा- ण्डपन्नगाः ॥ न तस्य हिंसां कुर्वन्ति पुत्रवत्पा- लयन्ति ते । पठित्वाभ्यर्चयेहेवि यथाविधि पुरः सरम् ॥ लक्षश्च मूलमंत्रस्य पुरश्चरणमुच्यते । तद्धारणे महादेवि मृत्युरोगविनाशनम् । एवं यः कुसते मर्त्यः पूण्यां गतिमयानुयात् । इति जार (१५६) क्रियोडीशः। महादेवि तस्य पके स्थितं सदा ॥ कवचस्य प्रसादेन मृत्युमुलो भवेन्नरः । अन्यथा सिद्धि- हानिः स्यात्सत्यमेतन्मनोरमे ॥ तब स्नेहान्म- हादेवि कथितं वावचं शुभम् । न देयं कास्य- चिद्रे यदीच्छेदात्मनो हितम् ॥ श्रीशिवजी कहनेलगे । इस मृत्युंजय मंत्रका वामदेव ऋपि गायत्री छंद मृत्युंजय देवता है गौर साधनोंके मनोरथ सिद्धि के अर्थ विनियोग रहा है । मृत्युंजय सदाशिव मेरे शिरकी रक्षा करें । तीन अक्षरस्वरूप महेश्वर मेरे मुखकी रक्षा करें । पंचव- णात्मक भगवान् सदाशिव मेरी दोनों भुजाओंकी रक्षा करें। मृत्युंजय मेरी आयुकी रक्षा करें । विल्ववृक्षके नीचे वासकर नेवाले अव्यय सदाशिव, दक्षिणामूर्ति पत्रिंशत् ( ३६ ) वर्ण रूप, धारण करनेवाले सर्व स्थानों में मेरी रक्षा करें द्वाविंशति रूपात्मक रुद्र मेरी कुक्षिकी रक्षा करें । त्रिवर्णात्मक नीलकण्ठ मेरे कण्ठकी रक्षा करें । बीजपूरमें चिन्तामणिके तुल्य अर्द्धना रीश्वर भावान् सदाशिव मेरे गुह्यभागकी रक्षा करें । त्रिवर्णा (मक, कूटरूप, महेश्वर, मार्तड भैरव नित्य पेरे पांवकी रक्षा मापातीक्षासमेत (१५७ ) करें । ओं जूं सः इन वीजोंके रूपको धारण करनेवाले त्रिपुरा- न्तक मेरे अर्ध्वमाग अर्थात् मस्तककी रक्षा करें । गिरिनायक महादेव दक्षिण दिशामें मेरी रक्षा करें । अघोराख्य महादेव पूर्वदिशामें मेरी रक्षा करें । वामदेव पश्चिम दिशामें मेरी रक्षा करें । सद्योजातस्वरूप धारण करनेवाले उत्तरदिशाम मेरी रक्षा करें। हे देवि ! इस प्रकार देवताओंको भी दुर्लभ ऐसे रक्षाकर कवचका प्रातःकाल भार सायंकाल जो मनुष्य शिव मंदिरमें पाठ करते हैं उनको इस कवचके प्रसादसे वांछित फल प्राप्त होता है । जो साधफ इस परम पवित्र कवचको दक्षिण मुजामें धारण करते हैं उनको सम्पूर्ण सम्पत्तियां प्राप्त होती हैं और समस्त रोग उनके नाश होजाते हैं। और योगिनी, भूत, वेताल आदि पदापि उसकी हिंसा नहीं करते किन्तु पुत्रः वत् पालन करते हैं । हे देवि ! यथाविधान, इस कवचका पाठ करके शिवपूजन करे लक्ष अर्थात् एक लाख मूलमंत्रके जप कर नेसे एक पुरश्चरण होता है । हे देवि ! इस पुरश्चरणके करनेसे मृत्यु और रोगका नाश होता है । इस प्रकार करनेस पुण्र गति प्राप्त होती है । हे देवि ! इस कवचके ज्ञाता मृत्युसे निर्भय रहते है । न करनेसे सिद्धिकी हानि होती है । हे महादेवि ! तुम्हारे स्नेहरो शुभ कपचराज चाहा है । हे भद्रे ! अपनी फागना पूर्ण (१५८) क्रियोहीशः। होनेकी इच्छा करनेवाला अन्यको यह कवच न दे । मृत्युंजय कवच समाप्त । पूर्वमें पृजन विधान कहआये हैं। इति क्रियोडीशे महातंत्रगजे देवीश्वरसंवादे एकोनविंशतितमः पटलः ॥१९॥ अथ यन्त्रप्रकरणम् । वन्ध्यायन्त्रम्-अतः परं देवि शृणु यन्त्रधारणमु. त्तमम् । यन्त्रधारणमात्रेण सर्वाभीष्टफलं लभेत ।। जन्मवन्ध्या च या नारी शुभपुत्रवती भवेत् । तदा गोरोचन'चेन लिखेद्यन्त्रमनुत्तमम् ।। वृत्तद्वयं समालिख्य पद्ममष्टदळं लिखेत । प्रतिपद्मे लिखे- न्यायावी भूपुरकं ततः ।। भूर्जपत्रे लिखेद्यन्त्र धारयेत्तु महेश्वरि । कुक्षौ धृत्वा महायन्त्रं शुभपु- अवती भवेत् ॥ प्रयोगान्तरमन्यत्र प्राणसङ्क स्तो नहि । दक्षिणां गुरखे दत्त्वा गृह्णीयाद्यन्त्रम्- त्तमम् ॥ अब यन्त्रप्रकरण पहाजाता है । प्रयम बन्ध्यायन । हे देवि ! यन्त्रधारणविधानको सुनो । यन्त्रके धारणमात्रहीसे मगंस्य गोलिन फार प्राप्त होगात । जनगगन्ध्या सी शुभ पुगको भापाटीकासमंतः। (१५९) प्राप्त होजाती है । गोरोचनादि सुगन्धित पदार्थासे उत्तम यन्त्रको लिखे । दो वृत्त निर्माण कर अष्टदल कमल लिखे । प्रतिपन्नमें 7. मायावीज और भृपुर लिखे । हे महेश्वरि ! भोजपत्रके उपर लिवकर इस यंत्रको धारण करे तो इसके प्रसादस बंध्या सी भी पुत्रवती हो । इस प्रयोगकी समाप्तिमं गुरुजीको दक्षिणा देवे । वृत्तं चतुर्दलं पद्म भूपुरेण समन्वितम् । वृत्तमध्ये लिखेदवि साधकारख्या विशेषतः ॥ पुत्रवतीपदं पश्चात् भवत्विति पदं ततः । प्रणवः पुटिता लज्जा त्रिधा पत्रेप्नु संलिखेत् ॥ पूर्ववत्पूजयेदेखि धारयेदक्षिणे भुजे | सत्यं सत्यं हि देवेशि वन्ध्या पुत्रवती भवेत् ॥ दुर्भगा चद्भवेन्नारी सुभगा मासतो भवत् । वृत्तचतुर्दलपद्म भूपुरयुक्त निर्माण करे । हे देवि ! वृत्तके मध्यमं साधकके नामस्तो लिखे और पुत्रवती इस पदको लिखके भवतु इस पदको लिखे ( उदाहरण ) रमा पुत्रवती भवतु इस उदाहरणके अनुसार लिखे फिर प्रणवपुटित लज्जावीज तीन प्रकार पत्रोंम लिखें । हे देवि ! पूर्ववत् पूजन करे । और दक्षिण भुजामें धारण करे । हे देवि ! यह सत्य बात है कि इसके
(१६०) क्रियोडीशः।
धारण करनेसे वंध्या पुत्रवती होती है । दुर्भगा स्त्री एक मासके
भीतर सौभाग्यवती होजाती है।
अथ रक्षायन्त्रम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि महारक्षाकरं परं ।
धारणादानवपतिर्महारक्षाकरो भवेत् ॥ पञ्चदलं
लिखेदेवि ग्लोबीजेनैव लाञ्छितम् । पञ्चक
सर्वमध्ये लिखित्वा धारयेदि ।। न तस्य पुत्र
भीतिः स्यात्तत्र रक्षाको हरः । गोरोचनाउंछ
माभ्यां सजे संलिख्य धारयेत् ॥ तत्र पूजा महा
देवि गणपस्य समाचरेत् । पूजितं पारितञ्चैव
सोपवनाशनम् ॥ वृत्तमष्टदलं पनं पुनः पना
संलिखेत् । गोरोचनाभिः सलिण्य धारयेत्परसे-
श्वरि। उक्तरूपेण लिंगल्य पूजां कृत्वा महेश्वरि ।
धारयेद्यो भवेत्तस्य झपमृत्युविनाशनम् ॥
अव महारक्षाकर यन्त्र कहाजाता है जिसके धारण करनेसे
दैत्येश्वर भी रक्षा करनेवाला हो जाता है । हे देवि ! पंचदल
कमल लिखकर ग्लोवीजसे मंकित करे । और सर्वदलोंके मध्यमें
भापाटीकासमेतः । (१६१) गम्बीज लिखकर पूजन कर धारण करे तो पुनमय कदापि न हो किन्तु शिवजी महाराज स्वयं आकर रक्षा करेंगे। भोजपत्रके उपर गोरोचन और कुंकुमसे लिखकर धारण करे और गण:- तिका पूजन कर यंत्र धारण करे तो समस्त उपद्रव नाश हो और पुत्रकी प्राप्ति हो । वृत्त अष्टदल कमलके प्रतिदलमें ला वीज लिखे । हे परमेश्वरि गोरोचनादि सुगंधित पदायासे लिख धारण करनेसे पुत्रप्राप्ति होती है ! हे महेश्वरि ! उक्त. विधानके अनुसार यंत्रका पूजन करे । हे देवि ! पूजन और यन्त्रके धारण करने से अपमृत्यु दोष दूर होता है । अथ पुत्रजननयन्त्रम् । बिन्दुवृत्तं समालिख्य लिखेदष्टदलं ततः । प्रति- पत्रेषु यंवीजं लिखेदथ पृथक्पृथक् ॥ पूर्ववत्पूज- जयदेवि धारणान्मृत्युनाशनम् । काकवन्ध्याज- नस्थापि बहुपुत्रकरं परम् ।। पदकोणं विलिखेवृत्तं ततश्चाटलं लिखेत् । पटकोणेषु च पट् दीर्घान् विलिखेत्परमेश्वरि ॥ ऐं ह्रीं ॐ ऐं ह्रीं फट् स्वाहा लिखेदष्टदले ततः । सर्वमध्ये लिखेदेवि ततः ६ (१६२) क्रियोडीशः। शृणु महेश्वरि ॥ प्रणवस्तु ततो माया साधकाख्य तु ङन्तकम् । सुपुत्रञ्च समालिख्य उत्पात्य पद- न्ततः ॥ विधाय चैवं विधिवद्धारयेद्यन्त्रमुत्तमम् । धारणात्सर्वसंपत्तियोदेवि न संशयः ॥ पूजन पूर्वमुक्तम् । देवी कालीमंत्रण पूजयेत् । यव पुत्र उत्पन्न करनेवाला यंत्र कहाजाता है । बिन्दुवृत्तको लिखकर अष्टदल कमल लिखे, और उक्त कमलदलके प्रतिदलमें पृथक् २ यंवीजको लिखे । हे देवि ! पूर्ववत् पूजनकर धारण करे तो मृत्युसे भय न हो । काकवंध्या स्त्री भी बहुपुत्र लाभ करे पट्कोण वृत्त लिखकर पुनः अष्टदल लिखे और छहों कोणोंमें बीजमंत्र लिखे । “ऐं ह्रीं ॐ ऐं ह्रीं फट् स्वाहा” इनको अष्ट- दलमें लिखे । यंत्रके मध्यम प्रणव, मायावीज, साधकका नाम सुपुत्र, उत्पादय इन पदोंकी योजना कर सविभाक्तिक लिखे । विधिपूर्वक इस उत्तम यंत्रको धारण करे । हे देवि ! यंत्र धारण करनेसे समस्त सम्पत्ति प्राप्ति होता है, इसमें किसी प्रकारका सदह नहीं है । इसका पूजनविधान पिछाड़ी कह आये हैं। बीजामा पूजन कासगी बस करें।
भापारीकासमेतः। (१६३) अथ वशीकरण । वशीकरणयन्त्रन्तु शृणु मत्प्राणवल्लभे । यस्य भारणमात्रेण वशी कुर्यात् पुनः प्रिये ॥ चतुर्वृत्तं समालिख्य लिखेदष्टदलं ततः । ॐ शमुखं व- घयेति प्रतिपद्मदलं लिखेत् ॥ यस्य नामाभि- संलिख्य बाहौ सन्धारयच्छिरे । पूर्ववत्पूजयद्देवी जपेल्लक्षं विधानतः ॥ चामुण्डोक्तविधानेन पूज- येदेवि साधकः । हुत्वा चैव विधानेन स वशी भवति ध्रुवम् । हे मत्याणवल्लमे ! अव वशीकरण यन्त्र सुनो कि जिमकं धारण करने मात्र ही वशीकरण होसक्ता है। चतुर्वृत्त लिखकर अष्टदल लिखे । "आं शत्रुमुख बन्धय" प्रनिदलमें लिखे । साध्य व्यक्तिके नामको लिखकर वाहुगे धारण को और पूर्ववत् पूजन को । चामुंडाके विधानको देखकर पूजन करे और विधानपूर्वक हवन करे। अथ वन्धमुक्तियन्त्रम् । प्रथमन्तु.लिखेवृत्तं तदहिस्तु स्वरोल्लिखेत् ।व- हिर्बभूवयं लिख्य चतुर्दिक्ष च ही लिखेव ।।
(१६४) क्रियोड्डीशः। वृत्तयुग्माष्टपत्रञ्च लिखगोरोचनादिना । ग्रीवायां कंठदेश वा शिखायां वापि धारणात् । बन्धमु- तिर्मवेत्तस्य नवमे दिवसे तथा। पूर्वोक्तविधिना- लक्षं दुर्गामंत्र जपेदुधः । अव वन्दीमांचन यन्त्र कहाजाता है।" वृत्सलिखे और उस वृत्तके बहिर्भागमं स्वरोंको लिखे । वहिर्भागमें दो बुभू लिखे और चारों दिशाम ही लिखे दो वृत्त लिखकर गोरोचनादि कसे अष्टदल लिखे । ग्रीवा (गर्दन ) कण्ठ, शिखामं धारण करे तो नैवं दिन वन्धनसे मुक्ति हो । पूजन प्रकार पूर्व कह- दिया है एक लाख दुर्गामन्त्र जपे । अथ डाकिन्यादिभयविनाशनयन्त्रं जीववत्सायन्त्रं च । वृत्तयुग्मं लिखेत्तत्र महाबीजचतुष्टयम् । चतुष्को णद्वयं वाह्ये लिखित्वा धारयद्यदि ॥ नाशयत्क्ष- णमात्रेण डाकिन्यादिभवं भयम् । मृतवत्सा यदि भवेन्नारी दुःखपरायणा ॥ धारयेत् परमं यंत्रं जीववत्सा ततो भवेत् । अव डाकिनी आदि भयनाशक तथा जीववत्सायन्त्र कहाजा. ता है। दो वृत्त लिखकर चारों कोनाम चार महावीन लिखे और भापाटीकासमेतः। (१६५) पूजन कर धारण करे तो डाकिनी आदि भय नाश हो । अथ- वा जिस स्त्रीका पुत्र उत्पन्न होकर मरजाता हो और सर्वथा सन्तानसे दुःखित हो यदि वह स्त्री इस यन्त्रराजको सांगोपांग धारण करे तो उसकी संतान जिये और सुख भोगे । दीर्घरेखाद्वयं दत्त्वा तदात्रेऽष्टदलं लिखेत् । ॐ ह्रीं देवदत्त ह्रीं रेखामध्ये लिखेच्छिवे ।। रेखागान दुले ॐ हूँ रेखाद्यन्तदले च ॐ (लिखेत) । गोरोचनाकंकुसेन तथैवालक्तकेन वा ॥ यस्य नाम तु संलिख्य स्थापयेत्परमेश्वरि । पंचामृतेषु देवेशि जीवक्त्ता भवेद्धि सा ॥ तत्सुतस्याकाल- मृत्युनन्यिथा जायते प्रिये । उक्तरूपे तथा पूजा लक्षमन्त्र जपोच्छवे ॥ १०॥ दो दीर्घ रेखा लिखकर उनमें अष्टदल कमल लिखे और उक्त रेखाओंके मध्यमें आं ह्रीं देवदत्त ह्रीं आं इस मंत्रको लिखे । रेखाके गात्रदलमें आं हूँ रेखाके अन्तदला ओं इन वीजोंको लिखे । हे परमेश्वरि ! गोरोचन, कुंकुम लाख इनसे साध्य व्य- - (१६६) कियोडीशः। ति के नामको लिखे और पंचामृतमं स्नान करावे हे देवोश ! स्त्री अवश्य जीववत्मा हो हे शिवे ! इस यन्त्रको धारण करनेवाली स्त्रीका पुत्र कदापि अकाल मृत्युको न प्राप्त होगा । परन्तु उक्त विधिक अनुसार पूजन करे और एक लाख मन्त्र जप करे । इति क्रियोडीशे महातंत्रराजे देवीश्वरसंवादे विंशतितमः पटलः समाप्तः ॥ २० ॥ अथ विजयानुपानम् । दुग्धयोगेन विजया महातेजस्करी स्मृता ।क्षुद्रो- धवलकारित्याचक्षुदौपापहारिणी ॥ जलयोगेन साहन्ति हाजीर्णादिगदान्क्षणात् । घृतेन मेधाज- ननी वाग्देवीवशकारिणी ॥ कफदोपानशेषांस्तु मधुना लह नाशयेत् । सैन्धवेन युता साहि जठ- राग्निं विवर्द्धयेत् ॥ सितया लवणेनापि युडेन सह सेविता। अम्लपित्तं तथा शूलं विनाशयति तत्क्षणात् ॥
मापाटीकसमेत। (१६) बलपुष्टिप्रदा मोक्ता मधुर स्वरकारिणी ॥ कल्प ज्ञानदा चेत् सर्वसिद्धिप्रदायिनी । अव विजया अनुपानका विधान हाजाता है । यदि विजया ( भंग ) दूधके साथ पी जाय तो तेजका उदय हो नेत्र आदिका दोष दूर हो । कोई कहते हैं कि विजयाके पान करनेसे चक्ष आदि दोष उत्पन्न होजाते हैं । यदि विजयाको येवल जलमं पीसकर और पानीमें छानकर पिये तो अजीर्ण रोग दूर होजाता है। घृतके योगसे विजयाका सेवन करना वाणीती चतुराई देता है। सहतके योगसे विजयाका सेवन करना समस्त कफ दोपीको नाश करता है। संधेनमक योगसे विजयाका सेवन करना जठराग्निको प्रज्वलित करताह लवण अथवा शर्कग वा गुडके योगसे विजयाका सेवन करना शूल और अम्लपित्तको नाश करता है । विजयाके सेवन करने में बल, पुष्टि प्राप्त होती है और ज्ञान भी प्राप्त होता है । विजया समस्त सिद्धियोंकी देने वाली परमासद्धि है। इति क्रियोड्डीशे महातंत्रराजे शिवगौरीसंवादे एकविंशतितमः पटलः ॥ २१ ॥ A
(१६८) क्रियोड्डीशः।
अथ मंगलचण्डीप्रयोगः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्वपूज्ने देवि मंगलचंडिके हूँ हूँ
फट् स्वाहा । इत्येकविशाक्षरो मनुः । ध्यान
यथा-देवी षोडशवर्षीयां शश्वत्सस्थिस्यौवनाम्।
सर्वरूपगुणाढ्यां च कोमलांगी मनोहराम् ।
श्वेतचम्पकवीमा चन्द्रकोटिसमप्रभाम् । वह्नि-
शुद्धा कराला च रत्नभूपणभूषिताम् ॥ बि-
भ्रती काबरीमार मल्लिकामाल्यभूषितम् ॥
बिम्बोष्टी सुदती शुद्धां श्वेतपद्मनिभाननाम् ।
ईपद्धास्यासन्नास्या सुनीलोत्पललोचनाम् ॥
जगदाचीञ्च दात्री च सर्वेभ्यः सर्वसम्पदाम् ।
संसारसागरे घोरे पोतरूपां वरां भजे ॥
इति श्रीमदिन्द्रजिद्विरचित्तः नियो-
ड्डीशः समाप्तः।
१ गलिकामाल्यभूषितामिति पाठांतरम् ।
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मापाटीकाममेतः। ( १६९) अब मंगलचंडीप्रयोग कहाजाता है । ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्व पूज्ये देवि मंगलवांडके हं हूं फट् स्वाहा । यह २१ अक्षरका मंगलचंडीका मंत्र है । नव ध्यान कहाजाता है । १६ वर्षकी अवस्थावाली, निरंतर युवावस्था पूर्ण, समस्त गुण तथा रूपसे सुशोभित, कोमल अंगवाली, मनको हरनेवाली, श्वेत चम्पाके तुल्य कांतिवाली, चन्द्रकिरणके तुल्य उज्ज्वल, अग्निके तुल्य शुद्ध कराल ( भयंकर ) स्वरूप धारण करनेवाली, रत्नोंके भूप- णांसे भूपित, श्वेतवस्त्र धारण करनेवाली चमेलीके फूलोंसे जटित कवरी (चोटी) को धारण करनेवाली, कन्दूरीके तुल्य रक्त ओष्ठवाली, श्रेष्ठदांतवाली, श्वेत अर्थात् पवित्र, कमलकी कांतिको धारणकरनेवाली मंद मुसकान करनेवाली, नीलकमलद- लके तुल्य नेत्रोंवाली, जगत्को धारण करनेवाली, समस्त सम्पत्ति देनेवाली, इस दुप्पारसंसारमें नौकाके तुल्य पार लगानेवाली जगज्जननी देवीजीका हम साधक लोक ध्यान करते हैं। इति श्रीवैद्यरामनारायणशास्त्रिकृतभापानुवादसमेत क्रियोडीशतंत्रं समाप्तम् । पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, खेमराज श्रीकृष्णदास, सक्षमीवेंकटेश्वर "स्टीम प्रेस, "श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम् प्रेस, कल्याण-मुंबई. खेतवाडी-तुंबई. ॥
.... कय्यपुस्तकानि ( मन्त्रशस्त्रि-ग्रन्थाः ) की. रु. आ. अनुष्ठानप्रकाश-पं० चतुर्थीलालकृत-नैमित्तिक ममें परमोपयोगी है इसमें-अवड मकडचक्र, दीक्षा- पुरश्चरण, सूर्यचन्द्रादि ग्रहों में पुरश्चरण तथा संकल्पादि संग्रही तहैं और अनेक प्रकारके देवी देवताओंके अनुष्ठान प्रकाश किये हैं ६-० आश्चर्ययोगरत्नमालातन्त्र आसुरीकल्प-भाषाटीकासमेत । तन्त्रशास्त्रोंके पुस्त- कोंमें यह भी एक है वृहत् इन्द्रजाल-(संस्कृत और भाषा) मन्त्र, तन्त्र, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, प्रयोग और वैद्यक तथा - समस्तका-के सिद्धकरनेवाले १३८ यन्त्रोंसमेत संग्राद्यहै. २-0 इन्द्रजाल-बडा-मथुराका छपा उच्छिष्टगणपतिपञ्चांग १-० उड्डीशतन्त्र-रावणविरचित मूल तथा मुरादावादानि- ' वासीश्यामसुन्दरलाल त्रिपाठीकृत भाषादीकासहित ०-६ .... .
.... मन्त्रशास्त्र-ग्रन्थाः । (१७१) नाम. की. रु. बा. कार्तवीर्यार्जुनोपासनाध्याय-यह ग्रन्थ कार्तवीर्योपा- सकांको तथा सभी लोगोंको अवश्य लेना चाहिये २-० कामरत्नतन्त्र-महाराष्ट्र ( मराठी ) भाषासहित-इसमें मोहन, वशीकरण इत्यादिके अलावां वैद्यककेमी वाजीकरणादिक उत्तम प्रयोग है । मराठी जानने- वालोंको बहुत उपयोगी है १-० गायत्रीपुरश्चरण गायत्रीपञ्चांग-इसमें-गायत्रीचक्र, कल्पपद्धति, उप- निषद्, गायत्रीतच्य, गायत्रीकवच, गायत्री स्तव- राज, गायत्रीपंजरस्तोत्र, गायत्रीसहस्रनाम और गायत्रीपटलादि संग्रहह गुप्तसाधनतन्त्र-पं० वलदेवप्रसादमिश्रकृत मापाटी- कासहित इसमें अनेक प्रकारके योगानुकूल पट्- कर्म और गर्भ इत्यादिका औपधिप्रयोग है ०-६ गोपालपंचांग-इसमें-(पटल, पद्धति, सहस्रनाम, कवच, स्तवराज ) यह पांचों अंग है ०-१० गौतमतन्त्र-महर्षि गौतमप्रणीत । यह वैष्णवोंको परमोप. योगी तथा श्रीगोपालोपासकोको परमश्रेयस्कर है १०-८ .... .... ....
नाम .... .... (१७२) कय्यपुस्तकानि- की. स. आ. गंधोत्तमानिर्णयतंत्र-इसमें मद्यका विवेचन है चतुर्विशतिगायत्री-श्रीमद्विद्यावारिधि पं० ज्वालाप्रसा- दजी मिश्रकृत-भापाटीकासहित दसात्रेयतन्त्र-मापाटीकासमेत । यह औषधिप्रयोग इत्यादि २४ पटलाम वर्णित है दुर्गासप्तशती-इसम- प्रतिश्लोक, बीजमन्त्र, प्रयोगविधि देवीकवच, अर्गला, कीलक, नवार्णविधि, गत्रिसूक्त, सप्तशतीन्यास, दुर्गापाठ, उत्तरन्यास, देवीमुक्त, नवा र्णवसन्निवेदन, प्राधानिकरहस्य, पैकृतिरहस्य मूर्ति- रहस्य समेत ८ पक्तिकी मोटा अक्षर रेशमी जिल्द १.-१२ " तथा रफ कागज रेशमी गुटका १-४ दुर्गासप्तशती--संपूर्ण घटनाओंके मृर्तिमान चित्रांसहित वडा अक्षर चित्रभी देखने योग्य है .... दुर्गासप्तशती-मोटा अक्षर उपरोक्त विपयानुसार खुलीसाँची १..४ दुर्गासप्तशनी-३२ पेजी रेशमी गुटका " तथा खुलापत्रा दुर्गासप्तशनी- ६४ पेजी रेशमी गुटका छोटा अक्षर दर्गासप्तशती--छोटा तावीज गुटका गुटका ग्लेज .... .... ..." ..." ....
नाम. .... .... पन्त्रशास्त्र-ग्रन्थाः। (१७३) की. रु. आ. दुर्गासप्तशती-शानन्तनबीटीकासमेत ०-१२ दुर्गासप्तशती-नागोजीभट्टकृत टीकासमेत दुर्गासप्तशती-सातटीकासमेत । इसम--दुर्गाप्रदीप, गुप्त- वती, चतुर्धरी, शान्तनवी, नागोजीभट्टी, जगच्चन्द्रिका दशोद्धारादि सप्तटीकासमेत है दुर्गासप्तशती भापाटीकासहित पं० रामेश्वरभट्टजी अनुवादित ग्लेज कागज १-०४ दुर्गासप्तशती- पद्यात्मकभापा-अनन्यकविकृत दुर्गापासनाकल्पद्रुम--पं० हरिकृष्ण व्यंकटरामसंगृहीत । जिसमें-दुर्गाजीका ६० प्रकरण कईएक शास्त्रसे उद्धृत कर अन्तमं दुर्गापाठभी रक्खा गया है । दुर्गाजीके उपासक को अवश्य संग्रहोपयोगी है.... ५-० धन्वन्तरितन्त्रशिक्षा-भाषाटीकासहित । देवादिदेव महा- देवप्रणीत । इस ग्रन्थमं तन्त्रके विपय बहुत अच्छे हैं, तान्त्रिकोंके अवश्य लेने योग्यहै १-८ नवरात्राचापद्धति--नवरात्र में घटस्थापनादि नित्यपूजा- पद्धति प्रत्यंगिरापचांग-इसमें-पटलपद्धति, कवच, तथा सहस्र नाम स्तोत्रका संग्रह प्रत्यक्ष फलदायक है ०-१४ पुरश्चरणदीपिका-पुरश्चरणकर्मम अति उपयोगी है ....०-३ ....
. (१७४) भय्यपुस्तकानि-- की. रु.भा. वटुकभैरवोपासनाध्याय-(वृहज्योतिपणवान्तर्गत ) जिसमें संपूर्ण भैरवोंकी उपासनाका मन्त्रोद्धार, पुर- श्चरणकवच, पुजासहस्रनामस्तवादिका संग्रह है १-८ महालक्ष्मीपूजापद्धति-भापाटीकासहित महायक्षिणीसाधन-पं०ज्वालाप्रसादमिश्रकृत भापाटीका समेत । इराम-अनेक प्रकारकी यक्षिणी साधनादि- विधि समस्त ( २२५) विपर्य है ०-१२ मन्त्रमहार्णव-मन्त्रशास्त्रका महान् ग्रन्थ संपूर्ण छपके तैयार है। ऐसा ग्रन्थ आजतक अन्यत्र कहीं भी नहीं छपा । इस बृहद्ग्रन्थका दाम भी थोडा रक्खाहै २०-० महानिर्वाणतन्त्र-मापाटीकासमेत । इसमें-तान्त्रिक उपा- सना, मूलमन्त्र, कर्मकाण्डादि आध्यात्मिकतत्त्वादि विपर्यह मन्त्रमहोदधि-सटीक (९८ ) यन्त्रीसमेत । इसमें-गणेश मन्त्र, कालिकामन्त्र, तारामन्त्र, ब्रह्मोपसितत.ग, छिन्न- मस्ता, यक्षिणी, वाराही, धूमावती, कर्ण पिशाचिना, स्वप्तेश्वरी, वाला, त्रिपुरसुन्दरि, अन्नपूर्णेश्वरी, मंगल. पूर्वकभीविद्या, श्रीवियाका परिवार, हलगन्मन्न, विष्ण ..." 4 ४-० ।'
मन्नशान-नन्याः। (२७५) की. रु. भा. मन्त्र, रोगदारिखनाशकरगिन्त्र, महामृत्युंजयमन्त्र, अभीष्टसिद्धिदकार्तवीर्यार्जुनमन्त्र, कालगत्रि-मन्त्राविधि, टमन्त्र, सर्वदेवाको यन्त्र, नित्यपूजा, नित्यार्चनविधि, पवित्रपूजनान, मन्त्रशुद्धि और शान्त्यादि पदकर्म इत्यादिमन्त्रीका उद्धागादि उत्तमप्रकारसे वर्णितहै.... ५-० मन्त्रमुक्तावली-( मन्त्रसंग्रह ) वैष्णव शैव-शाक्तोंको सर्वोपयोगी है। माहेश्वरीतन्त्र-मापारीकानमेन । इसम-सारण, मोहन, वशीकरण, उचाटनादि विधि भलीप्रकार वर्णितहै ....०-४ मंत्तन्त्र-तन्त्रोंपर प्रायः लोग यह दोप लगातेहैं कि, वह वाममन प्रधान होनेसे वैदिक लोगोंके अनुष्ठानके योग्य नहीं किन्तु इस सर्वश्रेष्ट "मेकतन्त्र" में अनेक वैदिक- प्रयोग ऐसे उत्तम है कि, उक्त दोष कभी नहीं लग- मक्ते । इसमें-अनेक अपूर्व २ अनुष्ठानहें जो वैदिक नथा तान्त्रिक सभीके उपयोगी है । अवश्य लीजिये, तन छपाह सोगिनीतात्र-५० कन्हैयालालमिश्रकृत भापाटीकासहित हम समापनीती उपासनागन्ना, पुराण तणा
नामा
८
( १७६) -कंव्यपुस्तकानि ।
की. रु. अ
अनुष्ठानविधि इत्यादि भलीभाँति वर्णित है
योगमालातन्त्र-पं० वलदेवप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकासमेत।
इसमें-अनेकप्रकारके योगानुकल पट्टकर्म और 'ग'
इत्यादिका औपधिप्रयोग है ।
गधाकृष्णपञ्चाङ्ग-इसमें-श्रीराधिका और श्रीकृष्णजीव
युगलरूप पटल, पद्धति, कवच, सहस्रनामस्तो
भक्तिमय उपासना योग्यहै । इमका रेशमी गुटका है।
रुद्राक्षधारणविधि-शिवभक्तोंको अवश्य लेना चाहिये....
वर्णवीजप्रकाश-इसमें अकारादि क्रमसे शब्द लिखके उन
वीजवर्ण लिखे हुए हैं और उनकी स्पष्टताके हि
अमुक २ वाके अमुक अमुक वीके' एकत्र योग
यह वीज वर्ण बना हुआहै, यहभी लिखागया है, य
ग्रन्थ मन्त्रोद्धार करने के लिये बहुतही उपकारक है
और आजतक ऐसा कोई दृमरा ग्रन्थ नहीं छप
सुन्दर रेशमी जिल्द बधाह
१-
पुस्तके मिल का ठिकाना-
गंगाविष्ण श्रीकृष्णदास,
" लक्ष्मीवकटेश्वर " छापाखान
कल्याण-मुंबई
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