Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shakti Sangam Tantra (sundari Khand)
Front matter
दशमः पटलः-प्रज्ञात-दुनिमित्तम् (धनोदयः, पञ्च-केतुः, शान्ति-विधिः) एकादशः पटलः-महाकाल-मन्त्र-विधिः (धूम्र-केतु-निर्णयः, दिन-होरा-चक्र, साम्राज्य-मेधा- दीक्षा-फलं, कालिका-सिद्धि-लक्षणं, जीव-फोड़ा-निर्णयं, रुद्राक्ष-महिमा, पीठ-क्रम, यन्त्र-स्थापनं, पुरश्चर्या-क्रम, भूत-निग्रहः, कुल्लुकादि-निर्णयः, महाकाल-पूजा-विधिः) द्वादशः पटलः-१ कालो-नित्या १०८ त्रयोदशः पटलः-२ कपालिनी, ३ कुल्ला नित्या-विधिः ११३ चतुर्दशः पटलः-४ कुरुकुल्ला ५ विरोधिनी नित्या- विधिः ૧૧૭ पञ्चदशः पटलः-६ विप्रचित्ता, ७ उग्रा, ८ उग्रप्रभा नित्या-विधिः १२३ चोडशः पटलः-६ दीप्ता, १० नीला नित्या-विधिः १२६ सप्तवशः पटलः-११ धना, १२ बलाका, १३ मात्रा, १४ मुद्रा नित्या-विधिः अष्टादशः पटलः-१५ मिता नित्या-विधिः १४१ एकोनविंशति-तमः पटलः-तिरस्करणिका, स्वप्न- वाराहिका, कृष्ण-मातङ्गी प्रयोग-विधिः १४६ विशति-तमः पटलः-सम्पत्-सरस्वती, मृत्युञ्जय- रुद्र, पथिषद् रुद्र प्रयोग-विधिः १५२ एक-विशति-तमः पटलः :-आद्र-पटेश्वरी, वार्ता-यक्षी, कर्ण-पिशुन, किरात-बाराहो, काल-वादिनी, धूमावती प्रयोग-विधिः १५६ १३५ , " परिचय तन्म-साहित्य मे 'शक्ति सङ्गम तन्न' का अपना विशेष स्थान है। यह चार खण्डो में उपलब्ध है-१ काली-खण्ड, २ तारा-खण्ड, ३ सुन्दरी-खण्ड और ४ छिनमस्ता-खण्ड । इनमे से तोसरे खण्ड को 'कौल-कल्पतरु' पण्डित देवीदत्त शुक्ल के निर्देशानुसार सम्पादित कर प्रस्तुत रूप में प्रकाशित किया जा रहा है । इस सस्करण की विशे- पता यह है कि इसमे मूल संस्कृत पाठ को आधुनिक ढंग से सम्पादित किया गया है । प्राय सभी समास शब्दो को 'हाइफन' (-) द्वारा कर दिया गया है, जिससे पढने और समझने मे पाठको को विशेष सुविधा होगी। मूल तन्म-साहित्य के अध्ययन से यह सरलता से ज्ञात हो जाता है कि तत्व से उच्च कोटि के दार्शनिक विचारो और वैज्ञानिक साधना-पद्धति का ज्ञान प्राप्त होता है । इससे तन्त्र और तन्त्रोक्त उपासना के सम्बन्ध में जो भ्रम लोगों मे है, वह दूर हो जाता है। शक्ति-सङ्गम तन्त्र के प्रस्तुत 'सुन्दरी-खण्ड' के नाम से पाठको को यह नही सोचना चाहिए कि इसमे केवल सुन्दरी अर्थात् भगवती पोडशो की उपासना के सम्बन्ध मे ही प्रकाश डाला गया है । वास्तव मे इसमे तन्त्र के जिज्ञासुग्रा को जानने योग्य विविध प्रकार की वातो का वर्णन किया गया है और यही तथ्य सभी तन्त्रो के सम्बन्ध मे पाया जाता है । यह तथ्य प्रस्तुत खण्ड मे विवेचित विपयो के सक्षिप्त परिचय से स्पष्ट हो जाता है । सुन्दरी-खण्ड मे कुल इक्कीस पटल है, जिनमे तान्त्रिक साधना सम्बन्धी विविध विषयो का विवेचन है । यथा- प्रथम पटल इस पटल का शोषक है 'श्रीचक्न योगादि कथन' । 'श्री चक्र' भगवती पोडशी के पूजा-यन्त्र को कहते है। इसी का दूसरा प्रसिद्ध नाम है-~'श्री-यन्त्र।' अत इस पटल मे थी-यन्त्र के 'योग' अर्थात् साधनाम्यास के सम्बन्ध में आवश्यक वातें बताई गई है । इस सम्बन्ध मे सर्व प्रथम यह बताया गया है कि पोडशी की उपासना मे पहले भगवती वाला के मन्त्र की दीक्षा लेना आवश्यक है क्योकि श्रीवाला. (१) मन्त्र के जप से मुख की शुद्धि होती है। तव पञ्चदशी अर्थात् भगवती ललिता (श्री विद्या) के मन्न-जप का अधिकार प्राप्त होकर भगवती पोडशी की उपासना करने की योग्यता मिलती है। इसी तारतम्य मे दीक्षा-क्रम का निरूपण और न्यासादि का विवरण देते हुए श्रीयन्त्र के स्वरूप का वर्णन किया गया है। प्रसङ्गवश गुरु-परम्परा एव सम्प्रदाय-भेद का भी परिचय दिया गया है। द्वितीय पटल इस पटल का शीर्पक है-'उदयाक्षर-निरूपण' । 'उदयाक्षर'-पद से तात्पर्य यह है कि मन के प्रत्येक अक्षर मे विलक्षण शक्ति निहित है । उस शक्ति का उदय विधिवत् साधना द्वारा ही सम्भव है । ऐसी साधना को हृदयङ्गम कराने के लिए इस पटल के प्रारम्भ में यह वताया गया हैं कि किस देवता की उपासना करने से कौन सा फल प्राप्त होता है। फिर दीक्षा-परम्परा एव गोड, काश्मीरादि सम्प्रदायो का महत्व प्रतिपादित करते हुए उत्कीलन, शापोद्धार, दीपिनी आदि की आवश्यकता बताई है कि इनसे मन्त्र मे सजीवता आती है । अन्त मे ध्यान के तीन प्रकार बताते हुए श्री-चक्रादि पूजा-यन्त्रो मे किस प्रकार भावना-पूर्वक पूजनादि करना चाहिए, इसे स्पष्ट किया गया है । गुरु, देवता और मन्त्र के ऐक्य-भावना द्वारा ही मन्त्राक्षरो मे पूर्ण जाग्नति का उदय होता है । तृतीय पटल 'प्राणायाम-जप ' शीर्षक से इस पटल का विषय स्पष्ट ही है. किन्तु पाँच प्रकार के प्राणायामो और प्राणायाम-पूर्वक जप का विवेचन अन्त भै हो मिलता है । प्रारम्भ मे केरल, काश्मीर, गौडादि क्रम के अनुसार ध्यान, सङ्कल्प आदि के सम्बन्ध मे उपासक की भावना किस प्रकार की होनी चाहिए, इसे स्पष्ट किया गया है। फिर पाँच प्रकार को नित्याआ-१ तिथि-नित्या, २ दिन-नित्या, ३ युग-नित्या, ४ काल-नित्या और ५ पर्याय-नित्या का वर्णन कर शुक्ल व कृष्ण- पक्ष के क्रम से इनके अर्चन का निर्देश किया गया है। इसी सन्दर्भ मे नाम-पारायण, मन्त्र-पारायणादि का विवेचन कर स्वप्न-मन्त्र के तीन भेद स्पष्ट किए गए हैं और यह बताया है कि स्वप्न मे प्राप्त मन्त्र का ऋषि, छन्द आदि यदि न बताया गया हो तो उसका नपि शिव, छन्द गायत्री, देवता चिद्-रूपा मानना चाहिए । कोलक आदि ऐसे मन्त्र मे नही होते । यह द्रविड मत के अनुसार है । काश्मीर-मत के अनुसार (२) स्वप्न-मन्त्र के ऋपि ब्रह्मा, छन्द गायत्री, शक्ति स्वर और कीलक अव्यक्त माने गए हैं । गौड़-धाम के अनुसार स्वप्न-लब्ध मन्त्र सिद्ध होता है । अतः न उसके ऋपि, छन्द आदि माने जाते है और न उसकी पूजा के कोई नियम । केवल जप मात्र से ही उसकी सिद्धि होती है, ऐसा सिद्धान्त है। ऋणी, घनी और सिद्ध मन्त्रों का विवेचन करते हुए तीनों क्रमों के अनुसार पुरश्चर्या के अगों को बताया गया है । मन्त्र के जात- सूतक और मृत-सूतक इन दो दोपों के निवारण को विधि बताते हुये होम, तर्पण, अभिषेक आदि के सम्बन्ध में प्रकाश डाला गया है। तदनन्तर पडाम्नाय को प्रस्तार-गरगना देकर मेर-प्रस्तार, कैलास प्रस्तार और रल-गर्भ इन तीन प्रस्तारों को विशेषता बताते हुए गुरु, देवता, मन्त्र और स्वात्मा इन चारो को ऐक्य-भावना का महत्व प्रतिपादित किया गया है । फिर श्रीप्रासाद-परा और श्रीपरा-प्रासाद मन्त्रो का पारायण-क्रम देकर यह बताया है कि पूर्णाभिषेक-दीक्षा होने पर नाम-पारायण, मन्त्र-पारायण और नाड़ी-पारायण आदि के करने का अधिकार मिलता है । मेधा-दीक्षा से सम्पन्न साधक ही चक्र- पारायण कर सकता है। चतुर्य पटल 'यन्त्र प्रस्तार-निर्णय' शीर्षक के अन्तर्गत इस पटल में श्रीयन्त्र में निहित चार शिव-चक्रों और पांच शक्ति-चक्रों का जो सामरस्य है, उसे स्पष्ट किया गया है । पिन्दु से मन्वन तक शक्ति-चक्र और उसके वाद द्वार तक शिव-चक्र बताया गया है । यही शुद्ध चक्र है और भू, कैलाश तथा मेरु इन तीन प्रस्तारो के भेद से यह तीन प्रकार का है । भू-प्रस्तार के दो भेद हैं—पाताल और ऊध्वं । कैलाश-प्रस्तार भी दो प्रकार का है-अर्ध-कलाश और पूर्ण-कैलाश । इसी प्रकार मेरु-प्रस्तार के भी दो भेद हैं । इन छहो में से प्रत्येक के मृप्टि, स्थिति, संहार-क्रम से तीन-तीन भेद होने से कुल १८ रूप होते हैं। मेरु- प्रस्तार में नित्या का, कैलाश-प्रस्तार में मातृका का और भू-प्रस्तार में वाग्देवता का तादात्म्य बताया गया है । यह श्रीयन्त्र भगवतो पोडशी के सम्बन्ध में वर्णित है। भगवती ललिता के सम्बन्ध में बहुत से प्रस्तार कादि-हादि मत एवं कामराज-लोपादि भेद से बताए गए हैं। इन सब प्रस्तारो के ज्ञान से श्रीविद्योपासक देवेन्द्र के समान होता है और सर्व-सम्भोग-साम्राज्य-लक्ष्मी की उस पर कृपा होती है ।
मे देवता को, कण्ठ मे मन्त्र को और सहस्रार में गुरु को प्रतिष्ठित करे । सहस्रार म गुरु पक्ति की, अगो की भ्र-स्थान मे और कण्ठ-रल मेघा-दीक्षा से सम्पन्न साधक हो यन्त्र-प्रस्तार का निर्णय कर सकता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इस पटल के ३६ श्लोक तक का वर्णन 'यन्त्र-प्रस्तार-स्तव' नाम से प्रसिद्ध है। इस स्तव के पाठ करने से साधक को सभी सिद्धियां मिलती हैं। इसे 'पन्त्र-पारायण-स्तव' भी कहते हैं । इस स्तोत्र को फल-श्रुति ५० वें श्लोक तक दी है। काली, तारा, सुन्दरी और छिन्नमस्ता इन चारो मे कोई भेद नहीं है । अत काली में भी यन्त्र-पारायण करे। ऐसा निर्देश कर तत्व- न्यास की विधि बताई है। पूरो से नाभि तक प्रात्म-तत्त्व, नाभि से हृदय तक विद्या-तत्व और हृदम से विन्दु तक शिव-तत्त्व कहा गया है। सारे मन्त्र का उच्चारण कर सर्वाङ्ग में न्यास करे, यह सवन्तत्व है । आत्म-तत्व में १५ तत्त्व हैं, विद्या-तत्व मे २५ तत्व हैं और शिव- तत्त्व मे ३६ तत्त्व हैं । सर्व-तत्त्व में ५० तत्त्व हैं। अन्त मे बताया है कि तत्त्व-ज्ञानी शक्ति पात कर सकता है। 'स्नात-भेद- निम' शीर्षक के अन्तर्गत इस पटल मे बताया है कि सभी क्रियाओ मे स्नान मुख्य है । प्रात , मध्याह्न और साय तथा जब भी मन में ग्लानि हो, स्नान करना चाहिए । स्नान ५ प्रकार के है-१ वारण, २ नाभस, ३ भस्मज, ४ संजस और ५ दैवत । वारुण स्नान के दो भेद हैं-वैदिक और तान्त्रिक । नाभस स्नान १८ प्रकार का है । भस्मन स्नान ५ प्रकार का है। तेजस-स्नान मे गुरु-तेज, मन्त्र-तेज और देव तेज के ऐक्य की भावना कर तीनो चैतन्य रो युक्त अपने स्वरुप करे । यही तजस स्नान है। दैवत स्नान में मूलाधार से सहार तक देवता को व्याप्त अनुभव करे । इडा को गङ्गा, सुषुम्ना को यमुना और पिङ्गला को सरस्वती ध्यान कर देह में प्रयाग तीर्थ की भावना तक सभी आदरण-देवताओ की भावना करै । यही देवत स्नान है । प्रात , मध्याह्न, साय और अर्धरानि-इन चार कालो मे सन्ध्या- पन्दन कर गायत्री का जप करे। प्रातःकाल पष्टि-परायण, मध्याह्न मे नाम-परायण, रात्रि में मन्त्र-पारायण और निशा-काल मे तूर्य- सन्ध्या करे। पञ्चम पटस कल्पना करे अर्थात् हृदय काली मे ४, तारा-छिन्ना में ३ सन्ध्याओं का विधान है किन्तु इनमें कोई भिन्नता नहीं है। पष्ठ पटल इस पटल का शीर्षक है 'दीपेशादि-विनिर्णय' । पद्मासन से बैठकर साधक अपने मूनि में दीपनाथ का पूजन करे । आठ दिशाओं में आठ वर्ग अद्धित कर उनमें दो-दो स्वर लिखे । इससे महा-नादाक्षर का उद्भव होता है । ईशान कोण में दीपनाथ की पूजा निम्न मन्त्र से करे- ॐ श्रीकण्ठादि-नन्दनाथातिरिक्त पद-वाय रक्त-दादेश-शक्त्या- युक्ताय अस्मिन् क्षेत्र इमां पूजां गृहं गृह्ण स्वाहा । वें श्लोक में उल्लिखित मन्त्र के जप से उर्वशी का भी वशी- करण होता है । इस मन्त्र का उद्घाटन एक प्राप्य पाण्डुलिपि में निम्न प्रकार किया गया है- ॐ उच्छिष्ट-चामुण्डे जम्भय जम्भय मोहय मोहय अमुकं मे वश- मानय स्वाहा । माला का सूत्र पुराना होने पर उसे पुनः नवीन सूत्र में वनवा लेना चाहिए। छः मास से अधिक पुराने सूत्र को माला नहीं रखनी चाहिये । माला यदि स्वयं टूट जाय तो प्रायश्चित करके पुनः उसे गुहा कर प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिये । पुरश्चर्या के जप या होम करते समय यदि माला हाथ से गिर पडे, तो १०० वार जप द्वारा प्रायश्चित्त करके पुनः पुरश्चरण प्रारम्भ करना चाहिए। नारिकेल- जल की पायस से अयुत होम करने से त्रैलोक्य वशीभूत होता है और तिल-तण्डुल के होम से प्रीति उत्पन्न होती है । तिल और तण्डुल की मात्रा का निर्णय कर बताया है कि सोलह लों का स्थापन कर पर-देवता की पूजा कर रात्रि में होम करे । बाद तर्पण करे। मे,केरल.बासीर और पैर करके परमुगार पुस्तकालय पर प्रकाश डाला गया है। सप्तम पटन म्यम' शीर्षक के अन्तर्गत इस पटल में भारत के दिए गये हैं, जिनसे १७ वी शताब्दी के पूर्व की त होती है । ये प्रदेश निम्न प्रकार थे- ५) 6 मेधा-दीक्षा से सम्पन्न साधक हो यन्त्र-प्रस्तार का निर्णय कर सकता है यहां यह उल्लेखनीय है कि इस पटल के ३६ श्लोक तक का वर्णन 'यन्त्र-प्रस्तार-स्तव' नाम से प्रसिद्ध है। इस स्तव के पाठ करने से साधक को सभी सिद्धियां मिलती हैं। इसे 'यन्त्र-पारायण-स्तव' भी कहते है । इस स्तोत्र की फल-श्रुति ५० वें श्लोक तक दी है। काली, तारा, सुन्दरी और छिन्नमस्ता इन चारो में कोई भेद नही है । अत काली मे भी यन्त्र-पारायण करे । ऐसा निर्देश पर तत्त्व- न्यास की विधि बताई है। पृरो से नाभि तक आत्म-तत्व, नाभि से हृदय तक विद्या-तत्त्व और हृदय से विन्दु तक शिव-तत्व कहा गया है । सारे मन्त्र का उच्चारण कर सर्वाङ्ग मे न्यास करे, यह सव-तत्त्व है। पात्म-तत्व मे १५ तत्त्व हैं, विद्या-तत्य मे २५ तत्व हैं और शिव- तत्व मे ३६ तत्त्व हैं । सर्व-तत्त्व मे ५० तत्त्व हैं । अन्त में बताया है कि तत्त्व-ज्ञानी शक्ति-पात कर सकता है। पञ्चम पटत 'स्नान-भेद-निर्णय' शोपंक के अन्तर्गत इस पटल मे बताया है कि सभी क्रियाओ मे स्नान मुख्य है । प्रात , मध्याह्न और साय तथा जव भो मन मे ग्लानि हो, स्नान करना चाहिए । स्नान ५ प्रकार के है-१ वारुण, २ नाभस, ३ भस्मज, ४ संजस और ५ दैवत । वारुण स्नान के दो भेद है-वैदिक और तान्त्रिक । नाभस स्नान १८ प्रकार का है । भस्मज स्नान ५ प्रकार का है । तेजस-स्नान मे गुरु तेज, मन्त्र-तेज और देव-तेज के ऐक्य की भावना कर तीनो चैतन्य से युक्त अपने स्वरूप की कल्पना करे अर्थात् हृदय मे देवता को, कण्ठ मे मन्त्र को और सहस्रार मे गुरु को प्रतिष्ठित करे । यही तैजस स्नान है। दैवत स्नान मे मूलाधार से सहस्रार तक देवता को व्याप्त अनुभव करे । इडा को गङ्गा, सुपुम्ना को यमुना और पिङ्गला को सरस्वती ध्यान कर देह मे प्रयाग तीर्थ की भावना करे । सहस्रार मे गुरु पक्ति की, अगो की भ्रू-स्थान मे और कण्ठ-मल तक सभी आवरण-देवताओ की भावना करे। यही दैवत स्नान है । प्रात, मध्याह्न, साय और अर्धरानि-इन चार कालो मे सन्ध्या- वन्दन कर गायत्री का जप करे। प्रात काल पष्टि-परायण, मध्याह्न में नाम परायण, रात्रि मे मन्त्र-पारायण और निशा-काल मे तूर्य- सन्ध्या करे।
- काली में ४, तारा-छिन्ना में ३ सन्ध्याओं का विधान है किन्तु इनमें कोई भिन्नता नहीं है। पष्ठ पटल इस पटल का शीर्षक है 'दीपेशादि-विनिर्णय' । पद्मासन से बैठकर साधक अपने मूनि में दीपनाथ का पूजन करे । पाठ दिशाओं में आठ वर्ग अङ्कित कर उनमें दो-दो स्वर लिखे । इससे महा-नादाक्षर का उद्भव होता है । ईशान कोण में दीपनाथ की पूजा निम्न मन्त्र से करे- ॐ श्रीकण्ठादि-नन्दनाथातिरिक्त-पद-वाय रक्त-द्वादश-शक्त्याघ- युक्ताय अस्मिन् क्षेत्र इमां पूजां गृह गृह स्वाहा । ८वें श्लोक में उल्लिखित मन्त्र के जप से उर्वशी का भी वंशी- करण होता है । इस मन्य का उद्घाटन एक प्राप्य पाण्डुलिपि में निम्न प्रकार किया गया है- ॐ उच्छिष्ट-चामुण्डे जम्भय जम्भय मोहय मोहय अमुकं मे वश- मानय स्वाहा। माला का सूत्र पुराना होने पर उसे पुनः नवीन सूत्र में वनवा लेना चाहिए। छः मास से अधिक पुराने सूत्र की माला नहीं रखनी चाहिये । माला यदि स्वयं टूट जाय तो प्रायश्चित्त करके पुनः उसे गुहा कर प्राण-प्रतिष्ठा करनी चाहिये । पुरश्चर्या के जप या होम करते समय यदि माला हाथ से गिर पडे, तो १०० बार जप द्वारा प्रायश्चित्त करके पुनः पुरश्चरण प्रारम्भ करना चाहिए । नारिकेल- जल को पायस से अयुत होम करने से त्रैलोक्य वशीभूत होता है और तिल-तण्डुल के होम से प्रीति उत्पन्न होती है । तिल और तण्डुल की मात्रा का निर्णय कर बताया है कि सोलह पात्रो का स्थापन कर पर-देवता की पूजा कर रात्रि में होम करे । उसके बाद तर्पण करे। अन्त मे केरल, काश्मीर और गौड़ क्रम के अनुसार पूजन-काल व दिक्-निर्णय पर प्रकाश डाला गया है । सप्तम पटन 'देश-व्यवस्था-नियम' शीर्षक के अन्तर्गत इस पटल में भारत के ५६ प्रदेशों के नाम दिए गये हैं, जिनसे १७ वी शताब्दी के पूर्व की देश को स्थिति ज्ञात होती है । ये प्रदेश निम्न प्रकार थे- - मेघान्दीक्षा से सम्पन्न साधक हो यन्त्र-प्रस्तार का निर्णय कर सकता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस पटल के ३६ श्लोक तक का वर्णन 'यन्त्र-प्रस्तार-स्तव' नाम से प्रसिद्ध है। इस स्तव के पाठ करने से साधक को सभी सिद्धियां मिलती हैं। इसे 'यन्त्र-पारायण-स्तव' भी कहते हैं । इस स्तोत्र की फल-श्रुति ५० वें श्लोक तक दी है। काली, तारा, सुन्दरी और छिन्नमस्ता इन चारों में कोई भेद नही है । अतः काली मे भी यन्त्र-पारायण करे। ऐसा निर्देश कर तत्त्व- न्यास की विधि बताई है। पैरों से नाभि तक प्रात्म-तत्त्व, नाभि से हृदय तक विद्या-तत्त्व और हृदय से विन्दु तक शिव-तत्व कहा गया है। सारे मन्त्र का उच्चारण कर सर्वाङ्ग में न्यास करे, यह सवन्तत्व है । प्रात्म-तत्व में १५ तत्त्व हैं, विद्या-तत्व में २५ तत्व हैं और शिव- तत्त्व 'मे ३६ तत्व है । सर्व-तत्त्व में ५० तत्त्व है। अन्त में बताया है कि तत्त्व-ज्ञानी शक्ति-पात कर सकता है। पञ्चम पटल 'स्तान-भेद-निर्णय' शोपंक के अन्तर्गत इस पटल में बताया है कि सभी क्रियाओं में स्नान मुख्य है । प्रातः, मध्याह्न और सायं तथा जव भी मन में ग्लानि हो, स्नान करना चाहिए । स्नान ५ प्रकार के है-- वारुण, २ नाभस, ३ भस्मज, ४ संजस और ५ दैवत । वारण स्नान के दो भेद है-चैदिक और तान्त्रिक । ताभस स्नान १८ प्रकार का है । भस्मज स्नान ५ प्रकार का है। तंजस-स्नान में गुरु-तेज, मन्त्र-तेज और देव-तेज के ऐक्य की भावना कर तीनो पैतन्य से युक्त अपने स्वरूप को कल्पना करे अर्थात् हृदय में देवता को, कण्ठ में मन्त्र को और सहस्रार में गुरु को प्रतिष्ठित करे । यही तैजस स्नान है। दैवत स्नान में मूलाधार से सहस्रार तक देवता को व्याप्त अनुभव करे । इडा को गङ्गा, सुपुम्ना को यमुना और पिङ्गला को सरस्वती ध्यान कर देह मे प्रयाग तीर्थ की भावना करे । सहस्रार में गुरु पक्ति की, अंगो की भू-स्थान में और कण्ठ-मल तक सभी आवरण-देवताओ की भावना करे । यही दैवत स्नान है । प्रातः, मध्याह्न, सायं और अर्धरात्रि-इन चार कालो में सन्ध्या- वन्दन कर गायत्री का जप करे। प्रातःकाल पप्टि-परामरण, मध्याह्न में नाम-परायण, रात्रि में मन्त्र-पारायण और निशा-काल मे तूर्य- सन्ध्या करे। (४) " - काली में ४, तारा-छिन्ना में ३ सन्ध्यामओ का विधान है किन्तु इनमें कोई भिन्नता नही है। पष्ठ पटल इस पटल का शीपंक है 'दीपेशादि-विनिर्णय' । पद्मासन से बैठकर साधक अपने मूनि में दीपनाथ का पूजन करे । आठ दिशाओं में आठ वर्ग अङ्कित कर उनमें दो-दो स्वर लिखे । इससे महा-नादाक्षर का उद्भव होता है । ईशान कोण में दीपनाथ की पूजा निम्न मन्त्र से करे- ॐ श्रीकण्ठादि-नन्दनाथातिरिक्त-पद-वर्णाय रक्त-द्वादश-शक्त्यार्घ- युक्ताय अस्मिन् क्षेत्र इमां पूजां गृह गृह स्वाहा । ८ वें श्लोक में उल्लिखित मन्त्र के जप से उर्वशी का भी वशी- करण होता है । इस मन्त्र का उद्घाटन एक प्राप्य पाण्डुलिपि में निम्न प्रकार किया गया है- ॐ उच्छिष्ट-चामुण्डे जम्भय जम्भय मोहय मोहय अमुकं मे वश- मानय स्वाहा । माला का सूत्र पुराना होने पर उसे पुनः नवीन सूत्र में वनवा लेना चाहिए। छः मास से अधिक पुराने सूत्र की माला नही रखनी चाहिये । माला यदि स्वयं टूट जाय तो प्रायश्चित्त करके पुनः उसे गुहा कर प्राण-प्रतिष्ठा करनी चाहिये । पुरश्चर्या के जप या होम करते समय यदि माला हाथ से गिर पडे, तो १०० बार जप द्वारा प्रायश्चित्त करके पुनः पुरश्चरण प्रारम्भ करना चाहिए। नारिकेल- जल की पायस से अयुत होम करने से लोक्य वशीभूत होता है और तिल-तण्डुल के होम से प्रीति उत्पन्न होती है। तिल और तण्डुल की मात्रा का निर्णय कर बताया है कि सोलह पात्रो का स्थापन कर पर-देवता की पूजा कर रात्रि में होम करे । उसके बाद तर्पण करे। अन्त में केरल, काश्मीर और गौड़ क्रम के अनुसार पूजन-काल व दिक्-निर्णय पर प्रकाश डाला गया है। सप्तम पटन 'देश-व्यवस्था-नियम' शीर्षक के अन्तर्गत इस पटल में भारत के ५६ प्रदेशों के नाम दिए गये हैं, जिनसे १७ वी शताब्दी के पूर्व की देश की स्थिति ज्ञात होती है । ये प्रदेश निम्न प्रकार थे- - १ अङ्ग, २ वङ्ग, ३ कलिङ्ग, ४ कालिन्द, ५ केरल, ६ हस-केरल, ७ सर्वेश-केरल, ८ काश्मीर, काम-रूप, १० महाराष्ट्र, ११ आन्ध्र, १२ सौराष्ट्र, १३ तेलङ्ग, १४ मलयाल, १५ कर्णाट, १६ अवन्ती, १७ श्री विदर्भ, १८ मरु, १६ आभीर, २० मालव, २१ कोल, २२ पाञ्चाल, २३ काम्बोज, २४ वैराड्, २५ पाण्डय, २६ विदेह, २७ वाह्लीक, २८ किरात, २६ वक्तान, ३० खुरासान, ३१ ऐराक, ३२ भोटान्त, ३३. चीन, ३४ महा-चीन, ३५ नेपाल, ३६ शिलहट्ट, ३७ गोड, ३८ महा-कोशल, ३६ मगध, ४० कीकट, ४१ उत्कल, ४२ श्री कुन्तल, ४३ हूण, ४४ कोकण, ४५ कैकय, ४६ शौरसेन, ४७ बुरु, ४८ सिंहल, ४६ पुलिन्द, ५० कच्छ, ५१ मत्स्य, ५२ मद्र, ५३ सौवीर, ५४ लाट, ५५ वर्वर, ५६ सौन्धक । इन ५६ देशो की भौगोलिक सीमानो का भी उल्लेख किया गया है, जिससे देश को परिवर्तनशील व्यवस्था का रोचक ज्ञान प्राप्त होता है। इस पटल के प्रारम्भ मे भगवती तारा और काली के ध्यान के सम्बन्ध मे रहस्योद्घाटन किया गया है । अष्टम पटल 'पञ्च-अस्थ-कथन' शीर्षक के अन्तर्गत इस पटल मे प्राचीन भारत के पांच खण्डो का वर्णन किया गया है । ये खण्ड हैं-१ इन्द्र-प्रस्थ, २ यम-प्रस्थ, ३ वरुण-प्रस्थ, ४ कूर्म-प्रस्थ और ५ देव-प्रस्थ । इन्द्र से पूर्व दिशा का आशय है । अत. भारत के प्रथम पूर्वी खण्ड के उत्तर मे हस्तिनापुर, दक्षिण मे गदावर्त, पूर्व मे मथुरा व गोकुल, कोण-देश मे वृन्दावन और पश्चिम मे द्वारिका स्थित है। यह अश्व- पति का देश है । इस प्रस्थ के मध्य मे कालिका-मुख-गोचर वाराही- क्षेत्र है। यम से दक्षिण दिशा का वोध है । अत भारत के दक्षिणी खण्ड के पश्चिम मे सोमेश्वर, पूर्व मे सप्त-शृङ्गो, उत्तर मे मायापुर और दक्षिण मे व्यङ्कटेश स्थित है । यह नरपति का देश है । इस प्रस्थ के मध्य मे कमला-मुख-गोचर शङ्कावर्त माया-क्षेत्र है। वरुप से पश्चिम दिशा का तात्पर्य है । अत भारत के पश्चिमी वण्ड के पश्चिम मे मक्केश्वर, उत्तर मे हिंगुला और दक्षिण मे लोक्य विजया स्थित है । इस प्रस्थ के मध्य मे शीतला-मुख-गोचर राजावर्त- क्षेत्र है।
कूर्म से मध्य स्थान का प्राशय है । अतः भारत के मध्यवर्ती खण्ड के दक्षिण मे गोकर्ण, पूर्व में कामाख्या, उत्तर में मानसेश और पश्चिम में शारदा स्थित है। इस प्रस्थ के मध्य में वज्रेशी-मुख-गोचर त्रिगुणा- वर्त-क्षेत्र है। देव से उत्तर दिशा का बोध है । अतः भारत के उत्तरी खण्ड के दक्षिण मे श्रीरङ्ग, पश्चिम में गायत्री, पूर्व में जगन्नाथ और उत्तर में अमरकण्टक स्थित है। इस प्रस्थ के मध्य में ललिता-मुख-गोचर मोहनावर्त काञ्ची-पुर कामाख्या-क्षेत्र है। इन पञ्च-प्रस्थों के ईश्वर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव है, जो काली-तारा-परायण हैं। नवम पटल 'लता-साधन' शीर्षक के अन्तर्गत इस पटल में तन्त्रोक्त रहस्य- मयी शक्ति-पूजा का वर्णन किया गया है। दशम पटल 'अज्ञात-दुनिमित्तं' शीर्षक के अन्तर्गत इस पटल में आकाश में दिखाई देनेवाले घम्रादि केतुओं से भावी सङ्कटों का अनुमान कर उनके शान्त्यर्थ श्रीविद्या-मण्डप की प्रतिष्ठा करने का निर्देश किया गया है। एकादश पटल महाकाल के मन्त्र की विधि वताई गई है। विधि बताने के पूर्व पिछले पटल के तारतम्य में केतुओं के विविध भेदों तथा अन्य अमङ्गल-सूचक चिह्नों का परिचय और उनके द्वारा सूचित भावी सङ्कटों का वर्णन किया गया है। तदनन्तर साम्राज्यमेधा-दीक्षा के फल का उल्लेख कर देत्य- गुरु शुक्राचार्य को महिमा वताकर धनेश कुबेर, वह्नि और इन्द्र का इस पटल में महत्व दर्शाया है। इसके बाद गौड़, केरल और कश्मीर के क्रम-भेद से जीव- न्यास के पांच प्रकारों का वर्णन कर रुद्राक्ष धारण का फल बताया है कि रुद्राक्ष से विभूपित साधक रुद्र के समान होता है। रुद्राक्षमण्डप में दक्षिणामूर्ति और प्रानन्द-भैरव मतानुसार श्रीचक्र के विविध रूपों का विचार कर पीठ-क्रम को जानकर श्री यन्त्र में शक्ति का पूजन करने से साधक सर्व-सिद्धियों का स्वामी होता है।
यन्न चैतन्य मूर्ति स्वरूप है और पीठ को पात्र कहा है। प्रत यन्त्र के नीचे पीठ का पूजन करे। पीठ के ऊपर यन्त्र को स्थापित कर उसके मध्य मे शुभ योग और शुभ दिन महा-पर्व मे पूजन करे। चन्द्र-सूर्य-ग्रहण काल मे यन्त्र की स्थापना करे । पविनारोपण और अधिवासन कर्म को जानकर विधिवत् समस्त कर्म करे। किसी कर्म का लोप न करे अन्यथा महा-पाप होता है। प्रथम प्रहर में अधिवासन और तृतीय प्रहर मे पविजारोपण करे। पुरश्चर्या भी तीन प्रकार की है-केरल मे दशाङ्गा, कश्मीर अष्टाङ्गा और गौड़-माग मे पञ्चाङ्गा । साम्राज्य-मण्डल-क्रम को जानकर जप से पुटित पूजा और पूजा से पुटित जप इस प्रकार साधना करे। मन्त्र को पूजा-युक्त ही जपना चाहिए, केवल मन्त्र-जप नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार जप-युक्ता ही पूजा करनी चाहिए, केवल पूजा नहीं होती। इसके बाद भूत-प्रेतादि ग्रहो की शान्ति करने का उपाय वताकर कुल्लुका, सेतु, महासेतु, निर्वाण आदि का महत्व स्पप्ट किया है। विद्या-सम्बन्धी दोषो को खा जाती है, इससे 'कुल्लुका' कही जाती है । विद्या की सिद्धि-रूपी सागर को जिसकी सहायता से पार करते हैं, उसे 'सेतु' कहते है और महा-विद्या की प्राप्ति का मार्ग-दर्शक होने से 'महा-सेतु' की प्रसिद्धि है। 'निर्वाण' देवता के चैतन्य को प्रकट करता है और परब्रह्मात्मक है। काली की कुल्लुका पञ्चाक्षरी है-क्री हूं स्त्री ही फट् । ताग की कुल्लुका यक्षरी है और नीला तथा छिनमस्ता की कुल्लुका अष्टाक्षरी है-वज्र-वैरोचनीये फट् । भैरवी की कुल्लुका है-हैस्त्र । श्रीमत्-त्रिपुरसुन्दरी की कुल्लुका द्वादशाक्षरी है-ऐ क्ली ही निपुरे भगवति स्वाहा । अन्य देवतानो की कुल्लुका त्र्यक्षरी है-ॐ स्नी फट् । छिन्नमस्ता के द्वार-देवता अघोर और विरूपाक्ष कुल्लुकादि के ऋषि कहे गये है। छन्द, वीज और शक्ति अपने अपने देवता के अनुसार होते है । पुरश्चर्या ग्रादि अपने मूलमन्त्र के समान की जाती है। महा कुण्डलिनी का मन्त्र है-ॐ जू स काल-मूर्ति काल- प्रबोधिनि कालातीते काल-दायिनि कपाल-पान-धारिणि अमरि कुण्डलिनि ज स. वञ्च वञ्च सोह स्वाहा । ८ मूलाधार में कुण्डली देवी का और उसके नीचे कामराज का ध्यान करें। वहीं 'स्पर्श-सुन्दरी' कही जाती है। वह महा-काम-कला- रूपा है और उसके मूनि में 'काकिनी' स्थित है। अव महाकाल की विशेषता बताकर त्रिलोक की रक्षा करने- वाले उनके पोडशाक्षर-मन्त्र को बताया है-हूँ हूँ महा-काल ! प्रसीद प्रसीद ह्रीं ह्रीं स्वाहा । भगवती काली के सभी रूपों के शिव यही महाकाल है । उक्त मन्त्र का विनियोग है--ॐ अस्य महाकाल-मन्त्रस्य कालिका ऋषिः, विराट् छन्दः, सर्व-रूपी निरञ्जनः महाकाल: देवता, हूँ बीजं, ही शक्तिः, स्वाहा कीलकं, देवता-प्रीत्यर्थे विनियोगः । इसके वाद निर्देश किया है कि माया-वीज (ही) से पडङ्ग-न्यास कर ध्यान करे। यथा-कोटि-कालानलाभासं" 'प्रसन्न-वदनं शिवम् । तदनन्तर पञ्च-त्रिकोणात्मक पूजा-यन्त्र में, योनि में अथवा कामिनी के हृदय, मस्तक या स्तन-मण्डल में महाकाल के पञ्चावरण-देवताओं का पूजन करे। पूजन के वाद मन्त्र का एक लाख जप, जप का दशांश हवन स्वयम्भू-वीज या कारण से सिक्त करवीर-पुष्पों द्वारा करे। नित्य, नैमित्तिक या काम्प सभी कर्म भगवती काली की पूजा-विधि के समान ही करना चाहिए। अव काली की अन्तर्धान-करी विद्या की साधना-विधि यह बताई है कि ध्यानोक्त मूर्ति का ध्यानकर मूलाधार में गणपति, लिङ्ग में गणप-वल्लभा, नाभि में वटुकनाथ, हृदय वटुक-वल्लभा, कण्ठ में उड्यान पीठ, 5 में प्रदीप्त-मङ्गला, ललाट में करवीर, अलक मे क्षेत्र- पाल, मूनि मे कालिका एवं व्योमेश्वर्यम्बा, ललाट मे खेचरी, 5-मध्य में दिक्-चरी, हृदय में गोचरी, नाभि में भू-चरी, लिङ्ग में खग-मूर्तिका, मूल-पत्र में विचित्रा, ललाट में सूर्य, दक्ष-नेत्र में चन्द्र, वाम-नेत्र में अग्नि, कण्ठ में कालिका, हृदय में दास-योनि, नाभि में दास-सिद्ध (दीप्ति-सिद्धि) का पूजन कर मूनि, ललाट, कण्ठ, हृदय, नाभि, लिङ्ग, मूलाधार और सर्वाङ्ग में क्रमशः अष्ट-माताओं और अप्ट-भैरवो की पूजा करे। अप्ट-माताएं हैं-१ ब्राह्मी, २ माहेश्वरी, ३ कौमारी, ४ वैष्णवी, ५ वाराही, ६ ऐन्द्री, ७ चामुण्डा, ८ महालक्ष्मी। (4) - ।
अष्ट-भैरव हैं-१ मन्यान-भैरव, २ पट्-चक्र-भैरव, ३ फटकार- भैरव, ४ विभक्ष (विम्भक्ष) भैरव, ५ वीरेश-भैरव, ६ श्रीमन्तेश्वर (श्रीमन्त-त्रिपुर) भैरव, ७ हम-गर्भ (सर्ग) भैरव, '८ चण्डिकेश्वर-भैरव । उक्त सभी देवताओ के नाम मे चतुर्थी विभक्ति लगाकर पूजा करे। यथा-'ॐ गणपतये नम , ॐ गणप-वल्लभाय नमः' इत्यादि। फिर मूल-मन्त्र का यथा-शक्ति जप कर निम्न मन्त्र से क्षेत्रपाल को वलि प्रदान करे-ॐक्षे क्षेत्रपाल इम वलि गृह्ण गृह्ण स्वाहा । द्वादश पटल पर-काय-प्रवेश की साधना एव पट्-चत्रो मे वर्गों के ध्यान की विधि बताकर यह स्पष्ट किया है कि मूलाधार मे उक्त भावना के अभ्यास से मन्त्र-सिद्धि मिलती है और विद्या शक्ति-मती होती है। नाभि-चक्र में विद्या-ज्ञान के लिए ध्यान करे, जिसमे छ' मास के भीतर साधक को देह का ज्ञान होता है । हृदय-कमल मे भावना का अभ्यास करने से साधक निकालज्ञ होता है और कण्ठ मे भावनाभ्यास से देह-सिद्धि मिलती है। अव काली की नित्याओ को बताते हैं । यथा-१ काली, २ कपा- लिनी, ३ कुल्ला, ४ कुरुकुल्ला, ५ विरोधिनी, ६ विप्रचित्ता, ७ उग्रा, ८ उग्रप्रभा, ६ दीप्ता, १० नीला, ११ घना, १२ वलाका, १३ मामा, १४ मुद्रा और १५ मिता-यही कानी का नित्या-मण्डल है। प्रथम 'काली'-नित्या का मन्त्र १६ अक्षर का है-ॐ ह्री कालि कालि महा-कालि कोमारि मह्यं देहि स्वाहा । इसका विनियोग है-ॐ काली-नित्या-मन्त्रस्य परशुराम ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, कालिका देवता, ह्रीं वीज, क्री शक्ति , स्वाहा कीलक, कालिका-भीगनाद्यर्थे विनियोगः। माया-वीज (ह्री) से पडङ्ग-न्यास कर ध्यान करे । यथा-श्याम- वर्णा प्रेत-भूमिपु । इस प्रकार ध्यान कर त्रिकोण-युग्म, वृत्त, अष्ट-दल और भूपुरा- त्मक पूजा यन्त्र के विन्दु में काली का पूजन कर विधिवत् प्रावरण- देवताओ का पूजन करे । नैवेद्य अर्पित कर नीराजन कर एक लक्ष मन्त्र-जप करे। दशाश हवन पायस अथवा करवीर से करे तो सभी सिद्धियां प्राप्त होती हैं। त्रयोदश पटल द्वितीय 'कपालिनी'-नित्या का मन्त्र २६ अक्षर का है-ॐ ह्रीं (१०) - क्रो कपालिनि महा-कपाल-प्रिय-मानसे कपाल-सिद्धि मे देहि हूँ फट् स्वाहा। विनियोग-ॐ कपालिनी-नित्या-मन्त्रस्य भैरव ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, कपालिनी देवता, क्री वीजं, स्वाहा शक्तिः, हूँ फट् कीलक, कपालिनी-सिद्धये विनियोगः । पट्-दीर्घ वीज अर्थात् 'क्रां, क्री, , मैं, क्रो, क्र:' से पडङ्ग-न्यास कर ध्यान करे-ध्यायेदजन-पुजाभां......गीत-हास्य-परायणाम् । त्रिकोण-त्रय, वृत्त, अष्ट-दल और भूपुरात्मक पूजा-यन्त्र के प्रथम, द्वितीय त्रिकोण में क्रमशः महाकाली महालक्ष्मी-महासरस्वती और रति-प्रीति-कान्ति का पूजन कर तृतीय त्रिकोण में इच्छा-ज्ञान-क्रिया का पूजन करे । मध्य में कपालिनी का पूजन कर अष्ट-दल में मातृ- काओं की पूजा कर अष्ट-भैरवों, दिक्-पालों और उनके अस्त्रों का पूजन करे । ? कुलाचार का पालन करते हुए पञ्चोपचारों से पूजन कर साधक एक लक्ष मन्त्र-जप करे । हयारि-कुसुम अथवा मांस और मधु से इष्ट- सिद्धि के लिए हवन करे। पुरश्चरण के विना कपालिनी कैसे सिद्ध हो सकती है ? अतः मुण्डासन पर बैठकर सदा देवता का ध्यान करे । महा-माला, महा- पात्र, महा-यन्त्रासनादि की विधिवद् व्यवस्था करे । तव साधक सफल होता है। 'मोहनाञ्जन' प्राप्त करने की विधि बताकर तृतीय 'कुल्ला'-नित्या के विषय में बताया है कि इस नित्या के तीन नाम है-२ कालिका, २ कुल्लुका, ३ कुल्ला । कुल की पूज्य होने से 'कुल्ला' या 'कुल्लुका' कहते है । इसका मन्त्र ७ अक्षर का है--ॐ क्री कुल्लायै नमः । विनियोग-ॐ कुल्ला-नित्या-मन्त्रस्य भैरव ऋषिः, गायत्री छन्दः, कुल्ला-काली देवता, कालिका वीजं, कुल्ला शक्तिः, कीलकं, सर्वार्थ-साधने विनियोगः । कालिका-विषयक पूजन-यन्त्र में पूजा करे । कुमारी-पूजन से देवी कुल्ला निश्चय ही सिद्ध होती हैं । दो लक्ष मन्त्र का जप करे । ध्यान है-कदाचिदभ्र-सदृशां.. कुलाम्बां परिचिन्तयेत् । जप का दशांश करवीर और जपा-पुष्पों से हवन करे। उसके दशांश से गन्ध-जल से तर्पण तथा मार्जन करे । अन्त में ब्राह्मण- भोजन कराकर कुमारी-पूजन करे, तो सब विद्याओं का ज्ञान देनेवाली 'कुल्ला'-विद्या प्रसन्न होती है। (११) .........
स्वाहा । नैमित्तिक और काम्य फमों मे त्रिकोण-द्वय, वृत, अप्ट-दल और चतुर्दार-युक्त-भूपुरात्मक पूजा-यन्त्र के मध्य मे काली-बीज-युक्त वीज का न्यास करे । दूसरे त्रिकोण मे धृति, पुष्टि, मेघा, तुप्टि, प्रज्ञा और जया की पूजा करे । दलो मे अष्ट-मातृकानो और भैरवो का पूजन कर लोकपालो और शस्यो को पूजा करे । अथवा कालिका के समान ही सारा पूजन करे। दोनो नवरात्रो मे, चन्द्र-सूर्य-ग्रहण मे, सक्रान्ति मे उत्तम कामना को सिद्धि के लिए यन्म मे 'कुल्लुका' का अर्चन करें । चतुर्दश पटल चतुर्थ नित्या गुरुकुल्ला' का मन्त्र २७ अक्षर का है--क्री * कुरुकुल्ले की ह्रीं मम सर्व-जन-वशमानय क्री घुरबुल्ले ही स्वाहा । इस नित्या का हृन्मनु ६ अक्षर का है-ॐ हूं कुरकुरले ह्रीं इस हृन्मनु के विना 'कुरुतुल्ला' की सिद्धि नहीं होती। विनियोग-ॐ कुरुकुल्ला-नित्या-मन्नस्य कालभैरव प्रपिा, वृहती छन्दः, कुरुकुल्ला देवता, क्री वोज, ही शक्तिः, स्वाहा कीलकं, सर्वार्थ- सिद्ध पर्थे विनियोगः। पड्-दीर्घ काली-वीज (क्री) से पडङ्ग-न्यास कर ध्यान करे। यथा-शवोपरि समोसीनो कुरुकुल्ला महोदयाम् । एक लक्ष मन्य-जप कर नि-मधुरान्वित विल्व-पनो व विल्व-पुष्पो से होम करे । उसके दशाश से तर्पण, तर्पण के दशाश से मार्जन और उसके दर्शाश से विप्र-भोजन कराए। तव मन्त्र सिद्ध होता है । त्रिकोण-त्रय, वृत्त, अष्टदल और भूपुर-द्वयात्मक पूजा-यन्त्र के विन्दु मे काली-बीज लिखकर शक्ति-त्रय का क्रमश तीन त्रिकोणो मे पूजन करे । शक्ति-त्रय है-१ काली-तारा-छिन्नमस्ता, २ वालाम्बा- बगला-रमा और ३ उग्नगर्भा-उग्रवीजा-उग्रवीर्या । अष्टदल मे ब्राह्मी आदि अप्ट-मातृकाप्रो और अष्ट-भैरवो का पूजन करे । भूपुर मे लोकपालो तथा उनके अस्त्री की पूजा करे। शव, श्मशान या अरण्य विपिन मे 'कुरुकुल्ला' की पूजा करने से साधक को सव सिद्धियां मिलती हैं। जो भी वह चाहता है, उसे प्राप्त होता है। सभी ब्राह्मणो और सुवासिनियो की पूजा करे, तो पूर्ण सफलता मिलती है। (१२) .. .. तण्डुल (चावल) से जय और गोधूम (गेहूँ) से धन प्राप्ति होती है। माप (उड़द) से शत्रु नाश और मुद्ग (मूंग) से मोक्ष होता है। तिल-तण्डल के होम से देवता की महा-प्रीति मिलती है। राजी- लवण, सर्पप-लवण या सपि (घृत)-लवण के होम से कामिनी वशीभूत होती है । हरिद्रा से दरिद्रता नष्ट होती है। पञ्चमी नित्या 'विरोधिनी' का मन्त्र ३३ अक्षर का है--ॐ क्री ह्री क्लीं हूँ विरोधिनी शत्रूनुच्चाटय विरोधय विरोधय शत्रु-क्षय- करी हूँ कट् स्वाहा। विनियोग-ॐ विरोधिनी-नित्या-मन्त्रस्य भैरव ऋषिः, गायत्री छन्दः, विरोधिनी देवता, की वोज, ह्री शक्तिः, क्ली कोलकं, अभीष्ट- सिद्धयर्थे विनियोगः । काली-वीज को पड्-दोध कर दोनों पडङ्ग-न्यास करे । ध्यान- घ्यायेदजन-गिरि-निभां - शत्रूणा नाश-कारिणीम् । त्रिकोण-त्रय, वृत्त, अष्ट-दल, चतुर्दार-युक्त एक भूपुरात्मक यन्त्र की फणिका में विरोधिनी का पूजन कर तीनो त्रिकोणो में क्रमशः १ धूम्राचि-ऊष्मा-ज्वालिनी, २ ज्वलिनी-विस्फुलिङ्गिनी-सुश्री और ३ सुरूपा-कपिला-हव्यवहा का पूजन कर अष्ट-दलों में अष्ट-भैरवी सहित अष्ट-भैरवों की पूजा करे । भूपुर मे लोकपालो की और उसके वाहर उनके अस्त्रों का पूजन करे। तव नीराजन कर मन्त्र का एक लक्ष जप करे। उसका दशांश विधिवत् हवन करे । विभीतक के होम से शत्रु-नाश, धत्तूर-कुसुमों के होम से शत्रुओं का विद्वेपण, काकोलूका के मास-होम से मारण होता है इत्यादि। पश्चदश पटल वैप्रचित्त का नाश करने एवं अति दुष्टो के वध के लिए उद्यत होने से छठी नित्या 'विप्रचित्ता' नाम से प्रसिद्ध है। उसका मन्त्र ३७ अक्षर का है--ॐ श्रीं क्लीं चामुण्डे विप्रचित्ते दुष्ट-घातिनि शत्रून् नाशय एतद् दिनावधि प्रिये सिद्धि मे देहि हूँ फट् स्वाहा । विनियोग-ॐ अस्य विप्रचित्ता-नित्या-मन्त्रस्य ईश्वर ऋषिः, जगतो छन्दः, विप्रचित्ता देवता, चामुण्डा बीजं, श्री शक्तिः, क्ली कीलकं, अभीष्ट-सिद्धयर्थे विनियोगः । पड्-दीर्घ काम-वोज से पडङ्गन्यास कर ध्यान करे। यथा- सिंहोपरि समारूढां...... साधकानामभीतिदाम् । (१३) एक लक्ष मन्त्र-जप कर दशाश कुमुदों से हवन, उसके दशाश अप्ट-गन्ध-जल से तर्पण, उसके दशाश से मार्जन, उसके दशाश से अभिषेक और उसके दशाश ब्राह्मणो को भोजन कराये । त्रिकोण-वृत्त-पटकोण-वृत्त-अष्टदल-वृत्त और भूपुरात्मक यन्त्र के मध्य विन्दु मे विप्रचित्ता का पूजन कर निकोण मे त्रिगुणा का अर्चन करे । पट्कोण मे पडङ्गो का, दलो मे अष्ट मातृकाओ एव भैरवो का, भूपुर मे लोकपालो का और उसके बाहर शस्त्रो की अर्चा कर नीरा- जन करे । जप-फल को देवी को समर्पित कर साधक हवन करे । हवन की विविध मामग्रियो का फल निर्देश कर अगली नित्या की विधि वताई है। सातवो नित्या 'उग्रा' का मन्त्र ७ अक्षर का है-ॐ स्त्री हूँ ह्रीं ॐ विनियोग-ॐ अस्य उग्रा-नित्या-मन्त्रस्य भैरव ऋपि , वृहती छन्द , उग्रा देवता, हूँ वीज, फट् शक्ति , स्त्री कोलक, सर्वाभीष्ट- सिद्धयर्थे विनियोग । पड्-दीर्घ माया-धीज से पडङ्ग-न्यास कर ध्यान करे । यथा-ततो ध्यायेत् परामुग्रा वरदान-परायणाम् । दो लक्ष मन्त्र-जप कर उसके दशाश कमलो को घृत-युक्त कर उनसे हवन करे। फिर सविधि दशाश तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण- भोजन कराए। । त्रिकोण वृत्त-अष्टदल-वृत्त-भूपुरात्मक यन्त्र के मध्य मे कूर्च-वीज (हूँ) लिम्मे । निकोण मे तारा-नोला-एकजटा का अर्चन कर अष्ट-दलो मे उग्रा-धाराप्टक, वरोचनाष्टक, पद्मान्तको की अर्चा कर विधिवत् लोकपालो और उनके अस्मो का अर्चन करे । तव नीराजन कर देवी को जप समर्पित कर शवासन पर सदा जप करे। आठवी नित्या 'उग्रप्रभा' का मन्त्र पच्चीस अक्षर का है-ॐ ह्र हूं उग्रप्रभे देवि कालि महादेवि स्वरूप दर्शय हू फट् स्वाहा । विनियोग-ॐ अस्य उग्रप्रभा-नित्या-मन्त्रस्य महाकाल ऋपि , त्रिष्टुप् छन्द , उम्रप्रभा देवता, हूँ बोज, ॐ शक्ति , फट् कीलय, कालिया दर्शनाद्यर्थे विनियोग । पड्-दीर्घ वीज से पटङ्ग न्यास कर ध्यान करे। यथा T--ध्याये- दुग्रप्रमा काल-यश्वनीम् । - एक लक्ष मन्त्र-जप कर दो त्रिकोण-अष्टदल और दो भूपुरात्मक यन्त्र के मध्य विन्दु में उग्रप्रभा का अर्चन कर पहले त्रिकोण में काली- तारा-रोचनो को और दूसरे त्रिकोण तारा-एकजटा-नीला को अर्चा करे । दलो मे अष्ट-मातृकाओं का और दलान में अष्ट-भैरवों का अर्चन कर भूपुर में लोकपालो को और उसके बाहर उनके प्रस्त्रों की अर्चा करे। जप का दशांश मैरेय-युक्त वज्र-पुष्पों मे हवन करे। दुग्ध या मधु से दशाश तर्पण कर दधि, इक्षु-रस या पोठ-तोय से दशांश मार्जन करे । दशाश ब्राह्मणों को भोजन कराकर कुमारी-पूजन कर शक्ति- पूजा करे। ..... उग्रप्रभा की उपासना से साधक सव सिद्धियो को प्राप्त कर काली-रूप हो जाता है। षोडश पटल नवमो नित्या 'दीप्ता' का मन्त्र १६ अक्षर का है-ॐ क्रीं ह्रीं हूँ दीप्ताय सव-मन्त्र-फलदाय हूँ फट् स्वाहा। विनियोग--ॐ अस्य दीप्ता-नित्या-मन्त्रस्य महादेव ऋपिः, उष्णिक छन्दः, दीप्ता-नित्या देवता, क्रो वीजं, ह्रीं शक्तिः, स्वाहा कीलकं, अभीष्ट- सिद्धयर्थे विनियोगः । पड्-दीर्घ काली-वीज (क्री') से पडङ्ग-न्यास कर ध्यान करे । यथा-ध्यायेद् दीप्तां... श्मशानालय-वासिनीम् । एक लक्ष मन्त्र-जप कर दशाश करवीर-पुष्प से हवन करे । कदली के हवन से सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। दशांश गन्धाष्टक-जल से मार्जन और उसके दशांश ब्राह्मणो व कुमारियों को भोजन कराए। ब्राह्म मुहूर्त में उठकर गुरुदेव का स्मरण करते हुए सहस्रार में गुरु का ध्यान कर मूलाधार से अपनी जिह्वा तक व्याप्त परा मूल-विद्या की भावना करे । दीप-रूपा सरस्वती को मूल-वीज-स्वरूपिणी ध्यान करे । सम्पूर्ण मातृका का उच्चारण कर मूल-विद्या का उच्चारण कर पुनः मातृका का उच्चारण कर फिर मूल-विद्या का उच्चारण करे। इस प्रकार तीन वार जल को अभिमन्त्रित करे । फिर मूल-विद्या को अपनी जिह्वा मे दीप-रूपिणी, तेजो-रूपा, सायुधा ध्यान कर उक्त जल का पान करे। इससे साधक त्रिकालज्ञ होता है । न्यास, ध्यान, पाठादि के विना ही चतुर्विध पाण्डित्य उसमें आ जाता है। (१५) ।
जाती-पुष्प के होम से काव्य-शक्ति, कुन्द-पुष्प से सर्व-शास्त्रो का ज्ञान, दूर्वा से शान्ति, गुडूची से मृत्यु-निवारण, मुरा से मोहन, जम्वा से स्तम्भन, आन से वशीकरण, अम्बुज से महोन्नति, करीप से उच्चा- टन, कवंटी-फल से विद्वेपण, नौल-पुप्प से मारण और मरिच के होम से आकर्षण होता है। दसवी नित्या 'नीला' का मन्त्र २१ अक्षर का ह्रीं ह्रीं हसवलमरी नील-पताके हु फट् स्वाहा । विनियोग-ॐ अस्य नीला-नित्या-मन्त्रस्य भैरव अपिः, वृहती छन्द , महा-नील-पताकिका देवता, क्री वीज, हूँ शक्तिः, हूं फट् कोलक, अभीष्ट-मिद्धयर्थे विनियोग । पड़-दीर्घ कानी-वीज से पडङ्ग-न्यास कर ध्यान करे । यथा-अथ ध्यायेन्महा-नीला .नीलाम्भोज-वन-प्रभाम् । हविष्याशी और जितेन्द्रिय होकर कुलाचार के क्रम से तीन लक्षा मन्त्र-जप करे । परिष्कृत भूमि पर त्रिकोण-कुण्ड में हवन करे । दुग्ध या सुरा से दशाश तर्पण कर रक्त-जल से तर्पण करे। फिर ग्राह्मणो और सुवासिनी-कुमारी-शक्ति इन तीनो को भोजन कराये। पुरश्चरण करने से ही मन्त्र सर्वार्थ-दायक होता है। पूजा-यन्त्र के मध्य-विन्दु में कूचं-वीज (हूँ) लिखकर उसके ऊपर त्रिकोण-वत्त-पट्योग-वृत्त-अष्टदल-वृत्त-चतुर्दार-युक्त भूपुर बनाये । चारो द्वारो पर बटुकादि द्वार-देवताओं का, उसके वाहर उनके अस्त्रो का, मष्ट-दलो मे भैरवो का, केसरो मे अष्ट-मातृकानों का, वृत्त मे अष्ट-मिद्धिया रा, पट्-कोण मे पडङ्गो का और त्रिकोण मे कालरात्रि- महारामि-मोहरात्रि इन तीन देवताओ का अर्चन कर मध्य में नीला को आराधना करे । तव नैवेद्य अपित कर नीराजन करे। फिर स्तुति फर, नमस्कार-पूर्वक विसर्जन करे । 'की हूँ स्त्री हो अमुकी यक्षिणी क्री हूँ स्त्री हूँ फट् स्वाहा'- इस मात्र से ६३ यक्षिणियो का पूजन करे। इसी प्रकार हूँ प्री है प्री सर्व पक्षा हुं फट् स्वाहा'-इस मन्त्र से यक्षो का मन करे । सप्तदश पटल प्पारएनी निरया 'पना' का मन्त्र १४ अधार का है-ॐ पली पनामये पनापने ही पट् । (१६) विभ्रती क्रमात्। विनियोग -ॐ अस्य घना-नित्या-मन्नस्य घोर भरव ऋषिः, विराट् छन्दः, धना-नित्या देवता को वीज, ह्रीं शक्ति , हु फट् कोलक, कालिका-प्रीतये विनियोगः । पड्-दीर्घ 'क्री' वीज से पडङ्ग-न्यास कर ध्यान करे । यथा-धना- नित्या एक लक्ष मन्त्र-जप कर दशाश घृताक्त कमल-पुष्पों से हवन करे। दशाश तर्पण गन्ध और दुग्ध आदि से कर, शीतल जल से दशाश मार्जन रे । दशाश ब्राह्मण-भोजन कराए। पट-कोण-वृत्त-अष्टदल-भूपुरात्मक यन्त्र के पट्-कोणो मे पडङ्गो का पूजन कर अष्ट-दल मे अष्ट-मातृकाओ और भैरवो की अर्चा कर भूपुर मे लोक-पालो को तथा उसके वाहर उनके अस्त्रो को पूजा करे । तव यथा-शक्ति जप कर नीराजन करे । अन्त मे स्तुति-पूर्वक नमन कर विसर्जन करे । वारहवी नित्या 'वलाका' का मन्त्र है-ॐ क्रों हूँ ह्रीं बलाका- कालि अत्यद्भुत-पराक्रमे अभोष्ट-सिद्धि मे देहि हु फट् स्वाहा । विनियोग--ॐ अस्य वलाका-निन्या-मन्त्रस्य भैरव ऋपि, बलाका-नित्या देवता, क्रों वोज, हूँ शक्ति, ह्रीं कीलक, कालिका. प्रोतये विनियोग : कोलक (ह्रीं) से पडङ्गन्यास कर ध्यान करे । यथा-अञ्जनान्त- सदृशी ते करोम्यहम्। एक लक्ष मन्त्र-जप कर दशाश विल्व-पत्रो को घृत मे भिगो कर हवन करे । दशाश दर्पण, दशाश मार्जन कर उसका दशाश ब्राह्मण-भोजन कराए । जो कर्म न कर सके, उसके स्थान मे विप्र- भोजन कराने से उस कर्म की पूर्ति हो जाती है। सेरहवी-नित्या माना' का महा-मन्त्र है--ॐ को ही हूँ अँ आँ हैं लक्ष ॐ क्रीही हूँ अं आँ है लँ ॐ क्रीं ह्रीं हूँ। अन्य मन्त्र है-ॐ क्री ही हू महा-मात्रे सिद्धि मे देहि सत्वर हूं फट् स्वाहा । दूसरा मन्त्र है-ॐ को हू ह्रो शिवे मात्रे ॐ क्रीं हू हो हू फट् स्वाहा। इस प्रकार नाम के आदि मे वीजो के याग से या सम्पुट करने से नित्याओ के अनेक प्रकार के मन्त्र होते हैं । विनियोग-ॐ अस्य मात्रा-मित्मा मन्त्रस्य भैरव ऋपिः, उष्णिक छन्दः, मात्रा-नित्या देवी देवता, क्री वीज, हूँ शक्ति, ह्री कीलक, (१७) ..
- कालिका (महेप्टायें) विनियोगः । पड्-दीर्घ माया (ह्रीं) से पडङ्ग-न्यास कर ध्यान करे। यथा- चतुर्भुजां त्रिनयना "श्रोमात्रा महा-धोर-निनादिनीम् । एक लक्ष मन्त्र जप कर विल्व अथवा केले के फलो, अंगूरो या वीर से दशाश हवन करे। तर्पण, माजन, ब्राह्मण-भोजन यल-पूर्वक करे। जो कर्म न हो सके, उसके स्थान मे दुगना जप करे। चौदहवी नित्या 'मुद्रा' श्रीविद्या-क्रम मे 'मुद्रिणी' नाम की दण्डिनी है । महा-विद्यानों आदि के मन को द्रवित करने से इसे- 'मुद्रा' कहा है । इसका मन्त्र है-ॐ को ही हूंप्री फ्रें मुद्राम्बा मुद्रा-सिद्धि मे देहि भो जगन्मुद्रा-स्वरूपिणी हूं फट् स्वाहा । विनियोग–अम्य मुद्रा-नित्या-मन्त्रस्य महादेव ऋषिः, गायत्री छन्दः, मुद्रा-नित्या महादेवी देवता, क्री वीजं, ह्री शक्तिः, हूं कीलकं, कालिकायें विनियोगः। पड्-दीघं 'क्री' से पडङ्ग-न्यास कर ध्यान करे। यथा -अञ्जनाद्रि- निभा 'ब्रूहीति वादिनीम्। त्रिकोण-वृत्त-पट्-कोण-वृत्त-अष्टदल-भूपुरात्मक यन्त्र के चार द्वारो पर गणेश, योगिनी, क्षेम-पाल मौर वटुक का पूजन कर भूपुर में लोक- पालो व उनके अस्त्रों की पूजा क्रमशः करे । अप्ट-दलो मे मातृकाओ को अर्चा कर केसरो में अप्ट-भरवो की पूजा करे । अष्ट-दलो के अग्र भाग मे अप्ट-सिद्धियो की अर्चा कर पद-कोणो मे पडङ्गो का पूजन करे । पट्-कोणो में क्रमश: १ राज्यदा, २ भोगदा, ३ मोक्षदा, ४ जयदा, ५ अभयदा और ६ सिद्धिदा की पूजा कर त्रिकोण मे १ इच्छा, २ ज्ञान और ३ क्रिया को अर्चा करे। मध्य में सभी उपचारों से मुद्रा की पूजा कर नीराजन करे । नीराजन के बाद प्राणायाम कर दो लक्ष मन्त्र-जप कर श्वेत करवीर-पुष्पों से दशांश हवन, उसका दशांश तर्पण, दशाश मार्जन कर उसका दशाश प्राह्मण-भोजन कराए। इस प्रकार मन्त्र सिद्ध करनेवाला साधक ही मन्त्र के प्रयोग करने का अधिकारी होता है। अष्टादशपटल पन्द्रहवीं नित्या 'मिता' का मन्त्र २७ अक्षर का है-ॐ क्रोह हो ऐं मिने-परिमिा-पराक्रमाय ॐ का है ह्रीं ऐं गोहं हं फट् स्वाहा । विनियोग-* प्रस्य मिता-नित्या-मन्त्रस्य महाफाल ऋपिः, (१८) त्रिष्टुप् छन्द , मिता-नित्या देवता, फ्री वीज, हू शक्ति , ही कोलव, कालिकार्थे विनियोग । पड्-दीर्घ 'ह्रीं" से पडङ्ग-न्यास कर ध्यान परे । यथा- घ्यायेन्नीलाद्रि-सङ्काशा • दीन-नाथा विभावयेत् । तीन लक्ष मंन्त्र जप कर किंशुक या ज्योतिष्मती के फूलो से हवन करे। मन्त्र-सिद्धि हेतु लाल करवीर से हवन करे । खदिर की सस्कृत अग्नि मे त्रिकोण-कुण्ड मे हवन करे । ताम्बूल के पत्तो से होम करने से कालिका प्रसन्न होती है। नागवल्ली के हवन से नागिनी और वज- पुप्पो के हवन से डाकिनी सिद्ध होती है। धूस्तुर के हवन से शत्रु नाश होता है और कुन्द-होम से कवित्व-शक्ति प्राप्त होती है । जाती-पृष्प से विजय, तिल-पुष्पो से बल और उन्नति, पुनाग से पुरुपार्थ, केतकी से सुन्दर स्त्री, आसुरी से शत्रु-नाश, चन्दन से विजय, अगुरु से राजकीय पद, रक्त चन्दन से सभी का मोहन, गिरि-कर्णी से कन्या, सेवन्ती से शिव-स्वरूपता, गुडूची से शत्रु-नाश, मरीच से आकर्षण, पूगी-फलो से सौभाग्य, जाति- फलो से धन, चम्पक से स्तम्भन और' जम्बु के हवन से दुख-नाश- इस प्रकार विविध प्रकार के होम से अपनी कामना की पूर्ति करे । होम का दशाश तर्पण पीठ-जल, गन्धोदक या केसर-जल से करे। तपंग का दशाश मार्जन और उसका दशाश ब्राह्मणो, शक्तियो और कुमारियो का पूजन-भोजन सम्पन्न करे । इससे सभी सिद्धियां मिलती हैं। त्रिकोण-नित्तय, वृत्त, पट्-कोण, वृत्त, अष्ट-दल और चतुर्दार-युक्त भूपुरात्मक पूजा-यन्त्र बनाए तथा उसके मध्य मे विन्दु अङ्कित करे। पहले विकोण मे १ काली, २ करालिनी, ३ धोरा की, दूसरे निकोण मे १ वामा, २ ज्येष्ठा, ३ रौद्री की, तीसरे त्रिकोण मे १ इच्छा, २ ज्ञान, ३ क्रिया की पूजा कर वृत्त मे १ वार्ताली, २ लपु. वाराही, ३ स्वप्न-वाराही और ४ तिरस्करिणी की पूजा करे । षट्- कोणो मे पडङ्गो को और वृत्त मे अप्ट-सिद्धियो की पूजा करे । अष्ट- दलो मे मातृकाओ की पूजा करे । उनके अन्त भाग मे भैरवो की पूजा कर भूपुर मे लोकपालो को और उसके बाहर उनके अस्त्रो की पूजा करे। इस प्रकार आराधना करने से मन्त्र की सिद्धि प्राप्त होती है। अथवा सभी नित्याओं के लिए सामान्य ध्यान करे । यथा- (18) अजनाद्रि-निभाः गर्बा गुष्ठ-माला-विभूषणाः । दक्ष-हस्तं देवी-खड्ग वाम-हस्ते च तर्जनीम् । धारयन्त्य: शुभाः काल्या वरदाभय-सत्-कराः ।। अर्थात् सभी नित्या देवियाँ कृष्ण-वर्णा है, मुण्ड-माला गले मे धारण किये है । दाएँ हाथ मे देवी-खड़ग, वाएं हाथ मे तर्जनी-मुद्रा है और शेप दो हाथो मे वर और अभय मुद्राएं हैं। इस प्रकार ध्यान कर नाम-मन्त्र से जपादि करे। एकोनविंशति पटल श्री देवी ने कहा कि 'हे देवेश ! महा-मोहन करनेवाली तिर- स्कणिका विद्या को बताइए।' श्री शिव ने कहा कि 'श्री विद्या और वाला की अङ्ग-भूता और महा-मोहन करनेवाली विद्या यह है-ऐं क्री ह्री श्री तिरस्करणि सकल- जन वाग्वादिनि सकल-पशु-जन-मनो-चक्षुः-थोम जिह्वा घ्राण तिर- स्करणं कुरु कुरु ठः ठ स्वाहा। दूसरा मन्त्र-भेद यह है-ऐ ह्री श्री क्ली भगवति स्वाहा । ३-माहेश्वरि सर्व-पशु-जन-चक्षुस्तिरस्करण कुरु कुरु स्वाहा। ४-लोक्य-मोहिनि महा-माये सर्व-जन-मनश्चक्षुस्तिरस्कृतिं कुरु कुरु स्वाहा । ५-ऐं ह्री श्री हसौः ॐ नमो भगवति श्रीमाहेश्वरि सर्व-जन- मनश्चक्षुस्तिरस्करणं कुरु कुरु स्वाहा । ये पांचो मन्त्र क्रमशः पांचो मकारो के रक्षक है। पञ्च मकारो की रक्षा के लिए इन पांचो मन्नो का उच्चारण करे। समष्टि की रक्षा के लिए छठे मन्त्र का उच्चारण करे-ह्री क्ली नमो भगवति माहेश्वरि सर्व-जन-मनश्चक्षु. तिरस्करण कुरु कुरु स्वाहा। इस मन्त्र का विनियोग है-ॐ अस्य तिरस्करिणका-मन्त्रस्य शक्ति ऋषिः, गायत्री छन्दः, सव-पशु-जन-मनश्चक्षुरादि-तिरस्कृतः देवता, क्ली वीज, ह्री शक्तिः, क्री कीलक, तिरस्कृतो विनियोगः । पडङ्ग-न्यास अङ्गन्यास ऐं ह्री श्री क्ली अगुष्ठाभ्या नमः हृदयाय नमः पनी भगवति तर्जनीभ्या नमः माहेश्वरि मध्यमाम्या नमः सर्वा तिरस्करणो अनामिकाम्या नमः कवचाय हु पुरु कुरु मेव-प्रयाय वापट् एह्रोक्नोलो साहा रतल-मारपृष्ठाम्या नमः अस्त्राय फट (२०) . कर-न्यास शिरसे स्वाहा शिखायै वपट कनिष्ठाभ्या नम.
फिर वर्ण-न्यास कर सम्पूर्ण मन्त्र से व्यापक न्यास करे। तव ध्यान करे । यथा-मुक्त-केशी" पशु-तर्जन-मुद्रिकाम् । उक्त तिरस्करणिका-मन्त्र को भोज-पत्र पर कुकुम आदि से लिख- कर कुम्भ के आगे स्थापित करे। मन्त्र का एक लक्ष जप कर मधु और घृत से सिक्त विल्व-पत्रो से दशाश हवन करे। हवन का दशाश तर्पण और उसका दशाश मार्जन कर उसका दशाश ब्राह्मण-भोजन कराये । इस प्रकार मन्त्र को सिद्ध करनेवाले साधक को तिरस्करण- क्रिया करनी चाहिए । यह क्रिया सभी उद्देश्यो को पूर्ण करती है और पशुनो को शिथिल करती है । स्वप्न-वाराही विद्या तीन प्रकार की है-१ पञ्चदशी, २ अप्टा- दशाक्षरा और ३ चतुविशति-तत्त्वा । इनमे से १८ अक्षरो वाला मन्न सर्व-श्रेष्ठ है । यथा-ऐं ह्री नमः वाराही अघोरा स्वप्ने ठः ठः ठठ. स्वाहा। इसका विनियोग है-अस्य स्वप्न-वाराही-मन्त्रस्य ईश्वर ऋपिः, अनुष्टुप् छन्दः, स्वप्नेशी देवता, ऐं वीजं, ही ठः ठः ठः ठः स्वाहा शक्तिः, भविष्यादि-प्रदर्शने विनियोगः। पडङ्ग-न्यास-ऐं हृदयाय नमः, ही नमो वाराही शिरसे स्वाहा, अघोरे शिखायै वषट्, स्वप्नेशो कवचाय हु, ठः ठः ठः ठः नेन-त्रयाय वोपट, स्वाहा अस्नाय फट् । इन्ही छ मन्त्रो का न्यास कटि, कण्ठ, गण्ड, कर्ण, नेन और मूर्घा मे कर ध्यान करे । यथा- -नीलान्जन गण-विराजिताम् । पन्द्रह अक्षर वाला मन्त्र है-तारे नमो भगवतिवाराहि ठ ठः ठः ठः । इसका विनियोग है-अस्य स्वप्न-वाराही-मन्त्रस्य अक्षोभ्य भैरव ऋपिः, शवार छन्द', स्वप्न-वाराही-देवता (शेप पूर्वोक्त मन्त्र-वत्) २४ अक्षर वाला मन्त्र -ही हू वार्तालि वार्तालि वाराहि वाराहि स्वप्नेश्वरि स्वप्नेश्वरि ऐंय। विनियोग--अस्य स्वप्न-वाराही-मन्त्रस्य जनार्दन ऋषि., सस्कृति स्वप्न-वाराही देवता (शेष प्रथम मन्न-वत्) कृष्ण-मातङ्गी को मन्त्र-ॐ नमा भगवति कृष्ण-मातङ्गिनि शिरो-वल्कल-धारिणि सर्व-जनमहङ्करि ह्रा ह्री ह.ह ही ह्रः अमुक मे वश्याकृष्टि कुरु स्वाहा । विनियोग-अस्य कृष्ण-मातङ्गी-मन्त्रस्य कृष्ण ऋषिः, विराट छन्दः, ॐ वोज, ह्री शक्तिः, स्वाहा कोलकं, लोक्य-वश्यार्थ विनियोगः। (२१) . . छन्द, , अञ्जनाद्रि-निभाः पर्वा सुस-माला-विभूपणाः । दक्ष-हस्ते देवी-खड्ग वाम-हस्ते च तर्जनीम् । धारयन्त्यः शुभाः काल्या वरदाभय-सत्-कराः ॥ अर्थात् सभी नित्या देवियाँ कृष्ण-वर्णा हैं, मुण्ड-माला गले मे धारण किये हैं । दाएँ हाथ मे देवी-खड़ग, वाएं हाथ मे तजनी-मुद्रा है और शेष दो हाथो मे वर और अभय मुद्राएं है । इस प्रकार ध्यान कर नाम-मन्त्र से जपादि करे। एकोनविंशति पटल श्री देवी ने कहा कि 'हे देवेश ! महा-मोहन करनेवाली तिर- स्कररिएका विद्या को वताइए।' श्री शिव ने कहा कि 'श्री विद्या और वाला की अङ्ग-भूता और महा-मोहन करनेवाली विद्या यह है-ऐं क्री ह्री श्री तिरस्करणि सकल- जनं वाग्वादिनि सकल-पशु-जन-मनो-चक्षुः-श्रोत्र जिह्वा प्राण तिर- स्करण कुरु कुरु ठः ठः स्वाहा। दूसरा मन्त्र-भेद यह है-ऐ ह्री श्री क्ली भगवति स्वाहा । ३-माहेश्वरि सर्व-पशु-जन-चक्षुस्तिरस्करण कुरु कुरु स्वाहा । ४-त्रलोक्य-मोहिनि महा-माय सर्व-जन-मनश्चक्षुस्तिरस्कृतिं कुरु कुरु स्वाहा। ५-ऐ ह्री श्री हसौः ॐ नमो भगवति श्रोमाहेश्वरि सर्व-जन- मनश्चक्षुस्तिरस्करणं कुरु कुरु स्वाहा । ये पांचो मन्त्र क्रमशः पांचो मकारो के रक्षक है। पञ्च मकारो की रक्षा के लिए इन पांचो मन्त्रो का उच्चारण करे । समष्टि की रक्षा के लिए छठे मन्त्र का उच्चारण करे-ह्री क्ली नमो भगवति माहेश्वरि सर्व-जन-मनश्चक्षुः तिरस्करण कुरु कुरु स्वाहा । इस मन्त्र का विनियोग है-ॐ अस्य तिरस्करिणका-मन्त्रस्य शक्तिः ऋषिः, गायत्री छन्दः, सव-पशु-जन-मनश्चक्षुरादि-तिरस्कृत. देवता, क्ली वीज, ह्री शक्तिः, की कीलक, तिरस्कृती विनियोगः । पडङ्ग-न्यास कर-न्यास अङ्ग-न्यास एं ह्री श्री क्ली अगुष्ठाभ्या नमः हृदयाय नमः क्ली भगवति तर्जनीभ्या नमः माहेश्वरि मध्यमाभ्यानमः सर्वा तिरस्करणो अनामिकाभ्या नमः कुरु कुरु कनिष्ठाभ्या नमः एह्रोक्नोक्नो स्वाहा करतलकरपृष्ठाम्या नमः अस्त्राय फट (२०) शिरसे स्वाहा शिखायै वपद कवचाय हु नेत्र-त्रयाय वापट फिर वर्ण-न्यास कर सम्पूर्ण मन्त्र से व्यापक न्यास करे। तव ध्यान करे । यथा-मुक्त-केशी" पशु-तजन-मुद्रिकाम् । उक्त तिरस्करणिका-मन्त्र को भोज-पत्न पर कुकुम प्रादि से लिख- कर कुम्भ के आगे स्थापित करे। गन्न का एक लक्ष जप कर मधु और घृत से सिक्त विल्व-पत्रो से दशाश हवन करे। हवन का दशाश तर्पण और उसका दशाश मार्जन कर उसका दशाश ब्राह्मरण-भोजन कराये । इस प्रकार मन्त्र को सिद्ध करनेवाले साधक को तिरस्करण- क्रिया करनी चाहिए। यह क्रिया सभी उद्देश्यो को पूर्ण करती है और पशुओ को शिथिल करती है । स्वप्न-वाराही विद्या तीन प्रकार की है-१ पञ्चदशो, २ अष्टा- दशाक्षरा प्ररि ३ चतुविशति-तत्त्वा । इनमें से १८ अक्षरो वाला मन्न सर्व-श्रेष्ठ है । यथा-ऐं ह्री नम. वाराही अघोरा स्वप्ने ठः ठः ठ ठ. स्वाहा। इसका विनियोग है-अस्य स्वप्न-वाराही-मन्त्रस्य ईश्वर ऋपिः, अनुष्टुप् छन्दः, स्वप्नेशी देवता, ऐं वीजं, ह्री ठः ठः ठ. ठः स्वाहा शक्तिः, भविष्यादि-प्रदर्शने विनियोगः । पडङ्ग-न्यास-ऐं हृदयाय नमः, ही नमो वागही शिरसे स्वाहा, अघोरे शिखायै वषट्, स्वप्नेशी कवचाय हु, ठः ठः ठः ठः नेत्र-प्रयाय वौपट, स्वाहा अस्त्राय फट । इन्ही छः मन्तो का न्यास कटि, कण्ठ, गण्ड, कर्ण, नेत्र और मूर्घा में कर ध्यान करे। यथा -नीलान्जन गण-विराजिताम् । पन्द्रह अक्षर वाला मन्त्र है--तारे नमो भगवतिवाराहि ठः ठः ठः ठः। इसका विनियोग है-अस्य स्वप्न-वाराही-मन्त्रस्य अक्षोभ्य भैरव ऋपिः, शक्वरि छन्दः, स्वप्न-वाराही देवता (शेष पूर्वोक्त मन्त्र-वत्) २४ अक्षर वाला मन्त्र-ही हू वार्तालि वार्तालि वाराहि वाराहि स्वप्नेश्वरि स्वप्नश्वरि ऐंय । विनियोग--अस्प स्वप्न-वाराही-मन्त्रस्य जनार्दन ऋषिः, सस्कृति छन्दः, स्वप्न-धाराही देवता (शेप प्रथम मन्न-वत्) कृष्ण-मातङ्गी का मन्त्र-ॐ नमा भगवति कृष्ण-मातङ्गिनि शिरो-वल्कल-धारिणि सर्व-जनमहङ्करि हा ही ह्रह हो ह्रः अमुक मे वश्याकृष्टि कुरु स्वाहा । विनियोग-अस्य कृष्ण-मातङ्गी-मन्नस्य कृष्ण ऋपिः, विराट् छन्द , ॐ वीज, ह्री शक्तिः, स्वाहा कोलक, लोक्य-वश्यार्थ विनियोगः। (२१) 'ह्रीं' बीज से पडङ्ग-न्यास कर ध्यान करे । यथा--- -बीणा- वादन संसाधिका । इस प्रकार ध्यान कर उच्छिष्ट हाथ से एक लक्ष जप करे और उच्छिष्ट हाथ से ही वलि प्रदान करे । इस प्रकार जप करनेवाले को सिद्धि प्राप्त होती है। विशति-तम पटल सम्पन्-सरस्वती का मन्त्र है-क्ली ऐं सौः सौः ऐं क्ली। यह पडक्षरी विद्या सर्व-मन्त्रो मे श्रेष्ठ है। दीनो, दरिद्रो और जिनका अधिकार छिन गयो है, उन सबको महा-सम्पत्ति की देनेवाली है। विनियोग है-ॐ अस्य सम्पत्-सरस्वती-मन्त्रस्य कृष्णः ऋपिः, गायत्री छन्दः, सम्पत्-सरस्वती देवी देवता, ऐ वीज, क्ली शक्ति, हसौः कीलक, सम्पत्त्यर्थे विनियोगः । छठे अक्षर से पडङ्ग न्यास कर, नौ वार व्यापक न्यास-पूर्वक ध्यान करे। यथा-अनेक-कोटि सम्पत-सरस्वतीम् । त्रिकोण-पट्कोण-वृत्त-अप्टदल-भूपुरात्मक यन्त्र वना कर त्रिकोण मे सम्पत्-सरस्वती देवी की पूजा करे । दलो मे भैरवो के सहित मातृ कामो की, भूपुर में लोकपालो की और उसके बाहर उनके अस्त्रो की पूजा करे। इस प्रकार प्रावरण-पूजन कर मन्त्र का जप तीन लाख करे । पलाश-पुप्पो से दशाश हवन करे। पुरश्चरण करनेवाला ही प्रयोग का अधिकारी होता है । एक लक्ष जप कर पायस से दशाश हवन करने से साधक पृथ्वी पर राजा होता है । छः हजार नित्य जप कर कमल-पुष्पो से दशाश हवन करे, तो एक वर्ष के भीतर अचल लक्ष्मी प्राप्त होती है। प्रति- दिन एक हजार जप कर शालि-ताण्डुल से हवन करे, तो पृथ्वी का स्वामित्व मिलता है । विल्व के मूल में बैठकर नित्य १० हजार जप करे, तो साधक १५ दिन के भीतर सभी प्रकार का ऐश्वर्य प्राप्त करता है । जो विल्व के मूल मे विल्व की समिधा से १०८ वार हवन करता है, उसके घर मे तीन मास के भीतर महान् ऐश्वर्य आ जाता है । अन्न को स्पर्श कर यदि दरा वार जप करे और तव उसे खाए, तो उसके घर में अन्न की वृद्धि होतो है और वह अक्षय होती है। नदी के किनारे एकाग्र मन से मन्त्र का जप पवित्र होकर करे और गाय के घी से दशांश हवन करे, तो तीनों लोक वश में होते है । नित्य चार हजार पाहुतियां घी से दे, तो एक मास के भीतर अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। (२२) मृत्युञ्जय मन्त्र दस अक्षर का है---ॐ जूं स मा पालय स जूं ॐ। निनयोग-अस्य मृत्युञ्जय मन्त्रस्य वामदेव ऋषि , पक्ति छन्द , मृत्युञ्जयो महा-रुद्र देवता, ॐ पोज, जं शक्ति , काल-मृत्यु-विनाशार्थे विनियोग । मन्नाक्षरा से न्यास कर ध्यान करे । यथा--अच्छ-स्वच्छार- विन्द जालश्चिर न । पोठ पर पट्कोण अष्टदल-वृत्त अङ्कित कर पट्कोण के मध्य मे मृत्युञ्जय शिव का पूजन क पट्-कोण म सत्यादि पांच मन्नो से सदाशिव का पूजा करे। फिर आयुया सहित लोक-पालो का पूजन करे । एक लक्ष जप से पुरश्चरण करे । तिलो से दशाश होम करे । नदनन्तर तान लक्ष जन करने से काल-मृत्यु का निश्चय हो नाश होता है । पर्वत के आगे १२ लक्ष जप करने में साधा शतजीवो होता है, इसमे मन्देह नही । मृ यु निवारण क लिए दूर्वा से अयुत हाम व रे । पथिपद् रुद्र मन्त्र-ॐ नम रुद्राय पथिपद स्वस्ति मा रक्ष पालय । म मन्नते माग के सङ्कटा स रक्षा हाती है। इसका विनियाग है-प्रस्य पथिपद-रुद्र-विद्या-मन्त्रस्य वामदेव नपि , पक्ति (गायनी वा) छन्द, पथिपद्-रुद्र देवता, ॐ वोज, नम शक्ति , मार्गे सकल-भाति-निवारणार्थे विनियोग । • पडङ्गन्यास कर ध्यान करे । यथा-शुद्ध स्फटिक देव सदाशिवम् । पटकोण-अदल-भूगृहात्मक यन्न म प्रावरण-पूजन कर चार लक्ष जप पूर्वक तिल से दशाश हवन करने से मन्त्र सिद्ध हाता है। सिद्ध मन्त्र का १०८ वार जप करने स मार्ग म चारा का भय नही रहता, इनने हो जप से भूख-प्यासे पथिक का शून्य स्थान में भी भोजन और जल प्राप्त होता है। एक-विशति-तम पटत इस पटल मे शन-निगह के लिए प्रसिद्ध पाद-पटेश्वरी विद्या के मन्त्र, विनियोग, ध्यान, पुरश्चरण पार प्रयोग ग्रादि का विवरण साङ्केतिक रूप म दिया गया है- मन्त्र-ॐ नमो भगवति आर्द्र-पटेश्वरि हरि-नील-कालि आर्द्र- जिह्व चण्ड-लाहिनि रुद्राणि कपालिनि ज्वाला-मुखि सप्त-जिह्व सहस्र-नयने एहि अमुक ते पशु ददामि, अमुष्य जीव निकृन्त माहित जीवापहारिणि हू फट् भूर्भय स्व फट् स्वाहा रुधिर पिव मार-वादिनि मम शनु छेदय छेदय पिय पित्र शोशित हू फट् स्वाहा । (२३) - विनियोग |--ॐ अस्य आई-पटेश्वरो-विद्या-मन्त्रस्य दुर्वासा ऋषिः, गायत्री छन्दः, आई-पटेश्वरी भद्रकालो देवता, निकृन्त वीज, स्वाहा शक्तिः, शत्रु-निग्रह-कामा विनियोगः । पडङ्ग-न्यास--'हां, ह्री, हू, है, ह्रीं, ह्रः' से करे । ध्यान-शितोन-तर-दष्ट्रिका भद्र-काली चिरम् । मरु-भूमि श्मशान मे १० हजार मन्त्र का जप करे। स्नान कर गीले कपडे पहन कर शनु के प्रति प्रयोग करे । केवल जप मात्र से एक मास के भीतर शत्रु का निग्रह होता है । कृष्णाष्टमी से लेकर कृष्ण चतुर्दशी तक शत्रु-नाम से युक्त मन्त्र का जप करे तो शत्रु का नाश होता है । कृष्ण प्रतिपदा से दशमी तक मन्त्र का उच्चारण कर हाथ की अञ्जलि मे जल लेकर शत्रु के देश मे उस जल को फेके, तो शत्रु-समूह का विनाश होता है, इसमे सन्देह नही । शनु के नाम का उच्चारण कर १०८ वार मन्त्र का जप करने से उसका नाश होता है, यह निश्वय है इसके बाद वार्ता-यक्षी, पिशुन और वाराही मन्त्री की प्रयोग- विधि बताकर घूमावती-मन्त्र का विधान बताया गया है। इस सर्व विषय को गुरु-मुख से समझना हा कल्याणकारी है । उपसहार इस प्रकार शक्ति-सङ्गम तन्त्र के इक्कोस पटलो का परिचय हिन्दी भाषा मे सक्षेप मे इस उद्देश्य से दिया गया है कि पाठक वन्धु तन्त्र- साहित्य को विविधता को हृदयङ्गम कर गम्भीरता-पूर्वक उसके अध्ययन को आवश्यकता को समझे। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि यद्यपि यह 'सुन्दरी-खण्ड' है. किन्तु इसमे भावतो काली को नित्यायो का विशद विवरण दिया गया है क्योकि इन नित्याओ का तादात्म्य श्रीविद्या को सर्व-सक्षोभिणी, सर्व-विद्राविणी आदि देवताओ से है। विशेष रहस्य गुरुदेव से समझना चाहिए। इसी प्रकार इस तन्न मे उल्लिसित मन्त्रादि के जो प्रयोग मरल जान पड़ें, उन्हे भी गुरुदेव के निर्देश के विना कभी न करें क्योकि तन्त्रोक्त विधान सर्वथा विज्ञान- सम्मत है और त्रुटि होने पर हानि भी हो सकती है। हमे विश्वास है कि प्रस्तुत हिन्दी-साराश से जिज्ञासुप्रो को तन्त्र के साईतिक रूप को समझने में सहायता मिलेगी और तन्त्राचार्य महानुभाव रहस्योद्घाटन के प्रति सजग और सचेष्ट होगे। . (२४) प्रथमः पटलः श्री चक्र-योगादि-कथानम् श्रोदेव्युवाच- देव-देव ! महा-देव ! भक्तानुग्रह-कारक अनाद्यन्त ! पराकाश! तमोडे निर्गुणं विभुम् ।। १ यत्-प्रसादान्मया नाथ ! ज्ञातमागम-शासनम् । कालान्तरे समायाते पुनः पृष्टं मया विभो ॥ २ पूराभिषेक-दोक्षा तु कथं भेदत्यमागता। श्रीशिव उवाच- आदौ बाला महा-देवि ! सर्वाद्या परिकोर्तिता ॥३ यां बिना पश्चदश्यां वै नाधिकारः कथतन । अक्षरे फूट-त्रितयं कलि-योग्य-पर प्रिये ॥४ अन्योच्चारादधर्मत्वाद् भ्रष्टत्वान्न हि सिध्यति । बालया मुख-शुद्धित्वं ततो विद्याधिकारिता ॥ ५ विद्याधिकार सम्पन्ने पोडश्यामधिकारिता । घोडश्याधिकृतायां तु सर्वत्राप्यधिकारिता ॥६ पञ्चदश्यां ततो न्यासः पञ्चदश्या विधी शिवे । दशधा मातृकां न्यस्य विद्या-न्यासं तथैव लघु-पोढां महा-पोढां पोढां बाह्यान्तरे तथा । चक्र-न्यासं पुनः कृत्वा शक्ति-न्यासं समाचरेत् ॥ ८ शक्ति-न्यास-परी मन्त्री देव-रूपो न संशयः । ततः पराधिकारी स्यात् तन्न्यासात् तदनन्तरम् ॥६ परा-प्रासादिके न्यासे अधिकारस्तदुत्तरम् । प्रासाद-परया चाथ ततश्चरण-दीक्षणम् ।। १० निर्वाण-चरणाद्यां वै ततः शाम्भव एव तु । निर्वाण-चरणाख्यं वै शाम्भयोत्तरमीरितम् ॥ ११
वालायामधिकारी चेद बालोक्तान् विन्यसेद् बुधः ।
पञ्चदश्यधिकारी चेत पञ्चदश्यधिक चरेत् ॥ १२
विद्या-न्यासोत्तरं देवि ! उत्कीलनमथाचरेत् ।
दोपिनी-न्यसनं कृत्वा ततः कुल्लुका-चिन्तनम् ॥ १३
पोडशो-दीक्षा-युक्तश्चेत् महा-पोढादिकं चरेत् ।
परा-दीक्षरण-युक्तश्चेत् षडाधारादिकान् न्यसेत् ॥ १४
परा-प्रासाद-युक्तश्चेत् तत्तल्यासान् समाचरेत् ।
प्रासाद-परा-युक्तश्चेत् तानेव विन्यसेद् बुधः ॥ १५
चतुश्चरण-दीक्षा तु
परा-प्रासाद-गोचरा ।
उभयोर्नहि भेदोऽस्ति किञ्चिद् भेदोऽस्ति पार्वति ।। १६
ततः शाम्भव-दीक्षा स्यात् पूजा श्रीचक्र-गोचरा ।
सर्वेषां पूजनं कार्यं न्यसनं वा विधीयते ॥ १७
प्रथम न्यसनं प्रोक्तं ततः पूजा प्रकीर्तिता ।
श्रीचक्रे पूजनं कार्य सर्वेषां प्रिय-वादिनि ॥ १८
पडाम्नाय-स्थले देवि ! षट्-शाम्भवमथार्चयेत् ।
पण्णां स्थान विधायाथ सम्वत॑शमथार्चयेत् ॥१६
सर्वेषां पूजनं कृत्वा चाथ वै कलशं तथा ।
पूजयेद् यत्नतो देवि ! सर्व-सिद्धिमभीप्सुभिः ॥ २०
सर्व-दीक्षा-समायुक्तः सर्व-न्यासान् समाचरेत् ।
पोडशी तु विना देवि ! नान्यत्र ाधिकारिता ॥ २१
परा-प्रासाद-दीक्षाद्याः षोडश्युत्तरगाः क्रियाः ।
तत्तत्-तन्त्रोक्त-विधिना तत्तद्-दोक्षादिभिर्युतः ॥ २२
तत्तत् कर्म प्रकुर्वीत नान्यथा शाङ्करं वचः।
या चरण-दीक्षा सम्प्रोक्ता परा सैव प्रकीर्तिता ॥ २३
श्रीविद्या तु विहायाथ नाधिकारत्वमिष्यते ।
श्रीविद्यायां तु सम्पूर्णः सर्व-मार्गी भवेत् प्रिये ॥ २४
२]
श्रीचक्र-लेखनं कृत्वा त्रिकोणं विन्दु-मध्यगम् ।
ततो वृत्तं समालित्य चतुर्दलमनन्तरम् ॥ २५
चतुः-पञ्चारमालिख्य चतुरस्रात्मकं ततः।
पट-त्रिंशत्-तत्व-रूपं तु विग्रहं विलिखेत् ततः ॥ २६
एवं तु विग्रहं भाव्यं भावनैव तु लेखनम् ।
प्रासाद-पूर्वा तु परा प्रोक्ता श्रीतत्व-विग्रहा ॥ २७
श्रीमहा-पोडशी विद्या मन्त्र-विग्रह-रूपिणी ।
वृत्तस्य परितो देवि ! पारम्पर्य-कर्म यजेत् ॥ २८
परा-प्रासाद-विद्यायाः क्रमः प्रोक्तो महेश्वरि !
मुश्यं कर्म प्रवक्ष्यामि शृणु यत्नेन साम्प्रतम् ॥ २६
विन्दूपरि विभाव्याथ ततो ह्यष्ट-दलं शुभम् ।
पट-त्रिशद्-दल-संख्या कमलं तु ततो लिखेत् ।। ३०
अष्ट-त्रिशद् दलं चैव तद्-बहिबिलिखेच्छिवे !
कमलं भुवनाप्यं तु तद्-बहिविलिखेच्छिवे ॥ ३१
पञ्चाशद्-दल-संख्याकं चन्द्र-संख्या-समन्वितम् ।
एवं विलिख्य विधि-वत् तत्र ध्यायेत् परामम्बिकां ॥३२
एवं पूर्व विभाव्याऽय पत्रिंशत्-तत्व-विग्रहाम् ।
परा-प्रासाद-विद्यां तु प-त्रिंशत्-तत्व-विग्रहाम् ॥ ३३
शाम्भवे लेखनं यन्नं तत्र वै भावना मता ।
बाह्यतः पूजनं कृत्वा ततो ध्यात्वा पराम्बिकां ॥ ३४
अधिकारे समापन्ने परा-पूजादिके विधौ ।
पट्-शाम्भवे महेशानि ! ह्यधिकारस्ततो भवेत् ॥ ३५
पट-शाम्भवो महेशानि ! सर्वोत्तर इतीरितः।
षोडश्युत्तरगा दोक्षा कार्या वा त्वियमेव वा ॥ ३६
एवं दीक्षादिभिर्युक्तः किं जप्यं परमेश्वरि !
भक्तिर्यस्य यत्र भवेत् तेन जप्यं तदेव तु ॥ ३७
[३
सम्प्रदायानुसारेण भक्ति-योग-वशेन तु । पोडशी शक्ति-दीक्षा स्याद् द्वितीयमुच्यते शृणु ॥ ३८ परा-प्रासाद-विद्या तु शिव-शक्ति-मयी परा। अर्द्ध-नारीश्वरः प्रोक्तः सर्व-तन्त्रेषु गोपितः ॥ ३६ इत्येतदुक्तं देवेशि ! किमन्यत् श्रोतुमिच्छसि ? श्रीशिव उवाच- किं जप्यमिति शङ्का ते या जाता परमेश्वरि ॥ ४० सैवोच्यते महेशानि ! शृणु यत्नेन साम्प्रतम् । श्रीचक्र सर्व-देवानां निवेशनमुदीरितम् ॥ ४१ महा-श्रीचक्र-राज्ञीयं महा-थोषोडशो परा । परा-प्रासाद-विद्या तु महा-श्रीचक्र-नायिका ॥ ४२ ऊर्धाम्नायादि-दीक्षा तु परा-प्रासाद-गोचरा । परा-प्रासाद-विद्यायाः श्रीचक्रे चिनिवेशनम् ।। ४३ षट्-शाम्भवेश-विद्यायाः श्रोचके विनिवेशनम् । विन्दु-चके महेशानि ! पूजनं शृणु सादरम् ॥ ४४ बिन्दु-चके तु नैर्ऋत्यां मानसं पूजयेच्छिवे ! विन्दु-वायव्यतो देवि ! नात्र सम्पूजयेच्छिवे ॥ ४५ विन्दु-चक्रस्य पूर्वे वै मारुतं पूजयेत् प्रिये ! विन्दु-चक्रस्य चाग्नेण्यां तैजसं पूजयेच्छिवे ॥ ४६ विन्दु-चक्रस्य वारुण्यामाप्यं शाम्भवमर्चयेत् । विन्दु-चक्रस्य चैशान्यां पार्थिव पूजयेत् ततः ॥ ४७ स-रश्मिकान् समभ्यर्थ्य यथोक्तेन तु वर्त्मना । पट-त्रिशच्चक्रगे देहे न्यसनं कारयेत् प्रिये ।। ४८ इत्येत् कथितं देवि ! ह्यथवा नव-मण्डले । नवात्मकं मण्डलं वै मुख्यमेव प्रकीतितम् ॥ ४६ नव-चकात्मकं देवि ! महा-सम्वर्तकेश्वरम् । पूजयेद् यत्नतो देवि ! प्रोक्तं संक्षेपतः प्रिये ॥ ५० प्रातःकृत्यादि स-ध्यान-पूजनादि-क्रियादिकम् । श्रीमत्-पञ्चक-तन्त्रेषु विस्तरेण प्रकाशितम् ॥ ५१ पट-शाम्भवाख्यं यन्त्रं तु नवात्मकामतोरितम् । तस्मिन् यन्ने मुख्य-पूजा कथिता परमेश्वरि ॥ ५२ पञ्च-प्रेतास्तु श्रीचक्रे षट्-प्रेताः शाम्भवे मताः । सप्त-प्रेता गुह्यकाल्यां कथ्यन्ते शृणु साम्प्रतम् ॥५३ हिरण्य-गर्भ इत्याख्यः शाम्भवे परिकीर्तितः । इन्द्र-भैरव-नामानी गुह्यकाल्यामितीरिती ॥ ५४ सङ्घटनाख्घा मुद्रा वै त्रिविधा परिकीर्तिता। कर-द्वयं तु संयोज्य ह्यधो चक्त्रं सुलक्षणम् नखे नखान सुसंयोज्य पञ्चांगुल्यो ह्यधो भवेत् । करावित्थं सुसंयोज्य मुद्रा सङ्घटनाभिधा ।। ५६ पूर्व मुद्रां सुसंयोज्य कनिष्ठे विरलीकृते । सङ्घनाख्या मुद्रा तु द्वितीया परिकोतिता ॥ ५७ अत्रापि पक्ष-द्वितयं कनिष्ठे भिन्न-योजिते । तृतीया जायते मुद्रा चतुर्थी सर्वतोत्तमा ॥ ५८ अंगुष्ठानामिया-मध्ये योन्याकारेण योजयेत् । कृत्या कर-दयस्यैवं धोवस्त्रं सुशोभनम् ॥ ५६ तर्जन्यां तर्जनी योज्या कनिष्ठायां कनिष्ठिका । तर्जनी द्वे कनिष्ठे द्वे चानतोवं नियोजयेत् ।। ६० सङ्घट्टनाख्या मुद्रेयं जपान्ते सर्व-सिद्धिदा। चतुश्चरण-विद्यायां पट-शाम्भव-विधावपि ॥६१ मुख्या प्रोक्ता महा-देवि ! दर्शयेत् यत्नतः शिवे ! इत्येतद् गदितं देवि ! किमन्यन् श्रोतुमिच्छसि ॥ ६२ श्री शिव उवाच- अथातः सम्प्रवक्ष्यामि पारम्पर्य-क्रम शिवे ! पूर्ण-दोक्षा-परत्वेन विविच्य कथयामि ते ॥ ६३ [५ - साक्षात् पर-शिवेनादौ शङ्करस्तु प्रबोधितः । चतुभिः सह शिष्यस्तु शङ्करोऽवतरिष्यति ॥ ६४ शिवेन वोधिता देवी देव्या सर्वे प्रबोधिताः । ब्रह्म-विष्णु-शिवाश्चैव ईश्वरेण प्रवोधिताः ॥ ६५ शिव-पारम्पर्य-गतो गुरुः शिव-परम्परा देवी-परम्परा देवि ! फाल्युपदेश-वमना ।। ६६ प्रनापि शक्ति-बाहुल्यं मत-संख्या न विद्यते । अथानन्द-भैरवात्तु देवी-मत-परम्परा पूर्वोक्त-त्रितयं देवि ! काम-राजे तु भिन्नतः । आनन्द द-भैरव-मते पञ्चाशीति-मत-क्रमः शिव-पारम्पर्य-दीक्षा दक्षिणामूर्तितः प्रिये ! सर्वत्र पारम्पर्यत्वं त्वथ मध्यां शृणु प्रिये ॥६६ दिव्याधौध-त्रयोद्युक्ताः शैये गारणप-चोदिताः । अनापि मत-बाहुल्यं मया वक्तुं न शक्यते ॥७० तन्त्रे च दिव्य-सिद्धौधौ मानवौघस्तृतीयकः । सुन्दर्या श्रीमहा-काल्यां तारायां कालिफा-मनौ ॥ ७१ पञ्चदश्यां लोपिकायां मन्वस्तिक-मन्त्रके। परायां शैव-युक्तायामाद्यन्त-व्युत्क्रमादिके ॥७२ पट-शाम्भवे महेशानि ! औध-त्रयमुदीरितम् । सर्वमौध-त्रयं प्रोक्त किमितः श्रोतुमिच्छसि ॥ ७३ औधात् परम्परा प्रोक्ता दिव्य-सिद्धात्मका प्रिये ! शिवादीघाः समुद्भूतास्त्वोध-पूजा-परम्परा ॥७४ दक्ष-मूर्त्या गाणपिकं तथैव बटुकादिकम् । अयानन्द-भैरवादि तत् सर्वमौध-मध्यगम् ॥७५ प्रवभूवुः सम्प्रदायः ह्यते च परिकीर्तिताः । प्रानन्द- द-भैरवे देवि ! कोटि-भेदाः प्रकीर्तिताः ॥ ७६ ॥८० आनन्द-भैरवाद्या व हाये चान्तर्गताः प्रिये ! मार्ग-प्रवर्तकत्वात्तु मुख्यत्वं परिकीतितम् ।। ७७ तस्माद् ऋपित्वतां प्राप्ता विरूपाक्षादयः प्रिये ! सरस्वती लेखनी तु गणेशो लेखको मतः ॥ ७८ मतं पर-शिवस्येदं वक्ता देवो महेश्वरः। पृथ्वी पन्त्री महादेवि! नाथाः शास्त्रस्य बन्धकाः ॥ ७६ ब्रह्मास्त्रायाः शास्त्रपाल शरभाद्यास्तु रक्षकाः । पौधाः प्रवर्तका लोके ते पूज्या सर्वथैव पारम्पर्यात् क्रम-गता भिन्न-भिन्नाः प्रकीर्तिताः । दिव्या देवान्तिके नित्यं सिद्धा भूमाविहावपि ॥ ८१ मानवौधा मनुष्येषु मनुष्येषु औघ-त्रयमुदीरितम् । शिवात् स्व-गुरु-पर्यन्तं ज्ञानं पूजामनुतमाम् ॥ ८२ देवीतः स्व-स्व-गुर्वन्तं ज्ञानं पूजा परा मता। अथानन्द-भैरवाख्यं स्व-गुर्वन्त-गतं प्रिये ॥८३ इयमेका महा-देवि ! दक्षिणामूर्ति-सम्मता। शृणु यत्नेन देवेशि ! तत्त्वं स्व-गुर्वन्तं प्रिये ॥ ८४ पूजा प्रोक्ता तूत्तमा तु त्वौघात् गुर्वन्तकं शृणु । औघात् गुर्वन्तकं देवि ! ज्ञानं पूजा प्रकीर्तिता ॥८५ मुख्यं ज्ञानमिदं प्रोक्तं कलौ कुनापि तिष्ठति । देवि ! पूर्व-चतुष्कं तु वेता-सत्य-युगे मतम् ॥ ८६ सर्वाभावे महेशानि ! परमेष्ठ्यन्तकं मतम् । चतुष्क त्वथवा ज्ञेयं नान्यथा सिद्धि-रोध-कृत् ॥ ८७ स्व गुरु-पर्यन्तमुपदेश- परम्परा । तथा देवेशि ! सर्वत्र भैरवाद्यं प्रकीर्तितम् ॥ ८९ दक्षिणामूति-पादे तु स्व-गुर्वन्तं प्रपूजयेत् । एक-विंशत्तमं ज्ञानं गुर्वाख्यं क्रियतां लघु ॥ ८६ देव्याः
बहु।
यदा
गुरु-बाहुल्य-भेदास्तु त्वानन्द-भैरवे
एतज्-ज्ञानं विना देवि ! पाप-भागी भवेन्नरः ।। ६०
स्त्रीणां दीक्षा कथं देया तत्र स्त्रीत्वं कथं भवेत् ।
देवी-परम्परोद्दिष्टस्तूपदेशो भवेत् ॥ ६१
तदा स्वकीयां सन्दीक्ष्य पुण्य-भागो नरो भवेत् ।
संन्यासीनां तु दीक्षा तु दक्षिणामूर्ति-सम्मते ॥६२
शिवे चानन्द-देवेषु सर्वत्र दीक्षणं चरेत् ।
शैवे शिवान्तकं नाम वैष्णवे तु तदन्तकम् ॥ ६३
शाक्ते तु शक्ति-गुरवस्तन भेदा भवन्ति हि ।
सौरे सौरं गाणपत्ये बौद्ध धर्मान्तिकं भवेत् ॥६४
एवं पाशुपतायेषु तत्र
दीक्षोक्त-नाम तु।
कार्य तु यत्नती देवि ! इत्येवं कालिकाऽब्रवीत् ॥५
अथवा दक्षिणामूति पूजयित्वा महेश्वरि !
तत्सकाशात् प्रदेया स्यात् स्त्रीणां दीक्षा तु सा मत॥६६
यदि स्त्रीणां बाधिका तु कर्मणः स्यात् तदा मयं ।
पुत्र-द्वारा पोषणीयः पुत्रो नास्ति यदा शिवे ।। ६७
पूर्व कार्या साक्षरे व ततः सन्दीक्षयेत्तु ताम् ।
अथान्यत् सम्प्रवक्ष्याभि पूर्वोक्तं तच्छृणु प्रिये ॥ ६८
कलौ युगे तु सम्प्राप्ते करिष्यन्ति न केचन ।
उप-विद्यां समासाद्य जपिष्यन्ति नराधमाः ॥६६
न ते सिद्धि प्राप्नुवन्ति ते सर्वे दुःख-भागिनः ।
तेषां निन्दा कलौ देवि ! भविष्यति न संशयः ॥ १००
काली तारा छिन्नमस्ता सुन्दरी बगलामुखी ।
मातङ्गी भुवना लक्ष्मोधूम्रा त्रिपुर-भैरवी ॥ १०१
एता एव महा-विद्या सिद्ध-विद्या युगान्तरात् ।
विद्यात्वं तु महा-देवि ! तत्तद्-युग-बशेन तु ॥ १०२
1
प्रिये ॥१०७
गुरु-सन्तति-हीनत्वादुप-विद्या प्रयोजनात् ।
दुराचाराग्निन्दनाच्च न ते वै सिद्धि-भागिनः॥ १०३
काली तारा छिन्नमस्ता सुन्दरी त्वेक-रूपिणी ।
अन्याऽपि च महा-देवि ! एक-रूपा न संशयः ॥ १०४
उप-विद्यादिकं चैव
चैव दश-विद्यामुपाचरेत् ।
सर्वस्व-हरणं कृत्वा योगिन्यो भक्षयन्ति तम् ॥ १०५
अथान्यत् सम्प्रवक्ष्यामि मत-भेदादि-वर्णनम् ।
काली तारां महा-विद्यां दीपिनों कुल-सुन्दरोम् ॥ १०६
सर्व-कालं जपेद् विद्वान् यदि सिद्धिमभीप्सति ।
पाशुपत-त्रिशूल्याद्या वीर-कौलादयः
अत्रैवान्तर्भविष्यन्ति महा-विद्या-विधौ शिवे !
वीर-शेवा वीर-पूर्व-वैष्णवा ये प्रकीर्तिताः ।। १०८
अत्रैवान्तर्मविष्यन्ति काली-तारादिके मनौ ।
चार्वाकादि-प्रभेदास्तु चीन-भेदा अमी स्मृताः ॥ १०६
चार्वाका आर्हता बौद्धा चीन-जैनादयः शिवे !
शाक्य-सिंहादि देवेशि ! देवी-पुत्रादिकाः प्रिये ॥ ११०
अत्रैवान्तर्भविष्यन्ति महा-तारा-मनौ शिवे !
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि पूर्ण-दीक्षा-विवेचनम् ॥ १११
पूर्णाभिषेक-दोक्षायां भेदा वै वहवो मताः ।
परा-प्रासाद-विद्या प्रासाद-परयाऽथवा ॥ ११२
विन्दु-युक्तो भवेच्छेवे स! काम-कलात्मिका ।
प्रासाद-पर-रूपायां विन्दु-सर्गात्मकं तथा ॥ ११३
परा दीक्षा तथान्या वै तत्त्वादि-विन्दु-सर्गतः ।
अथ पट्-शाम्भवी दीक्षा बहुधा परिकीर्तिता ॥ ११४
गर्भ-शाम्भवकं चापि केरल-शाम्भवं च वा।
फेरले बहवो भेदास्तांश्चात्र कथ्यतेऽधुना ।। ११५
[.
च
बहु।
यदा
गुरु-बाहुल्य-भेदास्तु त्वानन्द-भैरवे
एतज्-जानं विना देवि ! पाप-भागी भवेन्नरः ॥६०
स्त्रीणां दीक्षा कथं देया तत्र स्त्रीत्वं कथं भवेत् ।
देवी-परम्परोद्दिष्टस्तूपदेशी भवेत् ।। ६१
तदा स्वकीयां सन्दीक्ष्य पुण्य-भागी नरो भवेत् ।
संन्यासीनां तु दीक्षा तु दक्षिणामूर्ति-सम्मते ।। ६२
शिवे चानन्द-देवेषु सर्वत्र दीक्षणं चरेत् ।
शैवे शिवान्तकं नाम वैष्णवे तु तदन्तकम् ॥६३
शाक्ते तु शक्ति-गुरवस्तव भेदा भवन्ति हि।
सौरे सौरं गाणपत्ये बौद्ध धर्मान्तिकं भवेत् ॥६४
एवं पाशुपताधेषु तत्र
दीक्षोक्त-नाम तु
कार्य तु यत्नतो देवि ! इत्येवं कालिकाऽब्रवीत् ॥ ६५
अथवा दक्षिणामूति पूजयित्वा महेश्वरि !
तत्सकाशात् प्रदेया स्यात् स्त्रीणां दीक्षा तु सा मता1८६
यदि स्त्रीणां बाधिका तु कर्मणः स्यात् तदा मथं ।
पुत्र-द्वारा पोषणीयः पुत्रो नास्ति यदा शिवे ॥६७
पूर्व कार्या साक्षरे वै ततः सन्दीक्षयेत्तु ताम् ।
अथान्यत् सम्प्रवक्ष्यामि पूर्वोपतं तच्छृणु प्रिये ॥ ६८
कलौ युगे तु सम्प्राप्ते करिष्यन्ति न केचन ।
उप-विद्यां समासाद्य जपिष्यन्ति मराधमा: ।। ६६
न ते सिद्धि प्राप्नुवन्ति ते सर्वे दुःख-भागिनः ।
तेषां निन्दा कलौ देवि ! भविष्यति न संशयः ।। १००
काली तारा छिन्नमस्ता सुन्दरी बगलामुखी।
मातङ्गी भुवना लक्ष्मी॰म्रा त्रिपुर-भैरवी ॥ १०१
एता एव महा-विद्या सिद्ध-विद्या युगान्तरात्
विद्यात्वं तु महा-देवि! तत्तद्-युग-वशेन तु ॥ १०२
प्रिये ॥१०७
गुरु-सन्तति-हीनत्वादुप-विद्या प्रयोजनात् ।
दुराचारान्निन्दनाच्च न ते वै सिद्धि-भागिनः॥ १०३
काली तारा छिन्नमस्ता सुन्दरी त्वेक-रूपिणी ।
अन्याऽपि च महा-देवि ! एक-रूपा न संशयः ॥ १०४
उप-विद्यादिकं चैव दश-विद्यामुपाचरेत् ।
सर्वस्व-हरणं कृत्वा योगिन्यो भक्षयन्ति तम् ॥ १०५
अथान्यत् सम्प्रवक्ष्यामि मत-भेदादि-वर्णनम् ।
काली तारां महा-विद्यां दीपिनों कुल-सुन्दरीम् ॥ १०६
सर्व-कालं जपेद् विद्वान् यदि सिद्धिमभीप्सति ।
पाशुपत-त्रिशूल्याद्या वीर-कौलादयः
अत्रैवान्तर्भविष्यन्ति महा-विद्या-विधी शिवे !
वीर-शवा वीर-पूर्व-वैष्णवा ये प्रकीर्तिताः ॥ १०८
अत्रैवान्तर्मविष्यन्ति काली-तारादिके मनो।
चार्वाकादि-प्रभेदास्तु चीन-भेदा अमी स्मृताः ॥ १०६
चार्वाका आहेता बौद्धा चीन-जैनादयः शिवे !
शाक्य-सिंहादि देवेशि ! देवी-पुत्रादिकाः प्रिये ॥ ११०
अत्रैवान्तर्भविष्यन्ति महा-तारा-मनौ शिवे !
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि
पूर्ण-दीक्षा-विवेचनम् ॥ १११
पूर्णाभिपेक-दीक्षायां भेदा वै बहवो मताः ।
परा-प्रासाद-विद्या
प्रासाद-परयाऽथवा ॥ ११२
विन्दु-युक्तो भवेच्छवे सर्गी काम-कलात्मिका ।
प्रासाद-पर-रूपायां विन्दु-सर्गात्मकं तथा ॥ ११३
परा दीक्षा तथान्या वै तत्त्वादि-विन्दु-सर्गतः ।
अथ पट्-शाम्भवी दीक्षा बहुधा परिकीर्तिता ॥ ११४
गर्भ-शाम्भवकं चापि केरल-शाम्भवं च वा।
केरले बहवो भेदास्तांश्चात्र कथ्यतेऽधुना ।। ११५
पडन्वयः
वापि चतुरन्वयमेव वा।
त्रितयं वापि देवेशि ! ह्यभावे एकमेव वा ॥ ११६
शिव-रश्मिः शक्ति-रश्मिः शिवशक्त्यात्मका यदा।
त्रिपुरा दश-पश्चाख्य-मालोक्ता रश्मयः परा ॥ ११७
किं वा पडन्वयाख्येषु प्रोक्ता वै रश्मयः पराः ।
किं वा चरण-दीक्षा स्याच्चतुचरण-रूपिणी ।। ११८
रक्त-शुक्ल-मिश्र-रूपं निर्वाणं तु तुरीयकम् ।
चरण-त्रय-दोक्षा स्यानिर्वाणं सर्वतोत्तमम् ॥ ११६
निरिणात्तु परं देवि ! नास्ति ज्ञानं तु मामके ।
पोडश्यां पूर्ण-दीक्षा तु सम्प्रदाय-परो चरेत् ।। १२०
सम्प्रदायानुसारेण ततन्मन्त्रेषु पश्यताम् ।
पडन्वयस्तु देवेशि ! गुह्यकाल्यामपि स्मृतः ॥ १२१
पूर्णाभिषेक-दीक्षा तु काल्यां च परिकीसिता ।
एवं सर्वासु विद्यासु पूर्ण-दीक्षा प्रकीर्तिता ॥ १२२
श्रीसुन्दयाँ तथा फाल्यां मुख्या तु परिकोर्तिता।
सम्प्रदायानुसारेण तत्तदर्चनमाचरेत् ॥ १२३
पञ्चदश्यामपि शिवे पूर्ण-दीक्षा प्रकीर्तिता ।
मन्वगस्त लोपिकायां नाम-दानं तु भिन्नतः ॥ १२४
सम्प्रदायानुसारेण नाम देयं महेश्वरि !
श्रीमद्-दक्षिण-काल्यां तु काली-गुरूक्त-वर्त्मना ॥१२५
तारायामपि देवेशि ! तारा-गुरूक्त-वमना ।
यथा काली तथा तारा या तारा संव कालिका ॥ १२६
इत्युक्तत्वान्महेशानि ! तारायामपि दोक्षणम् ।
गुह्य-काल्यां महा-देवि! षड्-रश्मि-क्रमतः शिवे ॥ १२७
दश पञ्च मालिकाऽत्र गदिता प्रिय-वादिनि !
तद्-रश्मि-क्रम-योगेन नाम-पूजादिकं मतम् ॥ १२८
१०]
पद-शाम्भव-क्रमेणव
अस्यां तु
नाम देयं महेश्वरि !
महा-काम-कला काली राज-राजेश्वरी मता ॥ १२६
दीक्षा सम्प्रोक्ता पूर्ण-दीक्षा शुभा शिवे !
एतद्-गुरूक्त-मार्गरंग
मानवौध-क्रमेण तु ॥ १३०
गुरु-भक्तस्य शिष्यस्य आज्ञा-नाम प्रदापयेत् ।
या सा काम-कला काली योग-पट्टेश्वरी मता ॥ १३१
योग-दीक्षेति सा प्रोता महा-निर्वाग-रूपिरयो ।
हंस-काल्यामपि तथा प्राज्ञा-नाम प्रदापयेत् ।। १३२
या सा काम-कला काली योग-पट्टेश्वरी मता।
परा-प्रासाद-रूपा स्यात् महा-काम-कला परा ।। १३३
चरण-दीक्षा हंस-काल्यां चतुश्चरण-रूपिणो।
हंस-दीक्षात् परं नास्ति दीक्षा पूर्णाभिषेकिका ॥ १३४
अथ हंस-क्रमेणव आज्ञा-नाम प्रदापयेत् ।
अनापि देव-देवेशि! शिव-देवी-परम्परा ॥ १३५
भैरवास्यादि-नाथस्य देवते कथिते शिवे !
सर्वेपां तु महा-देवि ! औघ-परम्परा मता ॥ १३६
औघ-परम्परा-ज्ञानात् पौधे मुख्यत्वमेव तत् ।
शिवाद्या देव-देवेशि ! विरूपाक्ष-परम्परा ॥ १३७
प्रादि-नाथाद् गुरु-ज्ञानं स्व-गुर्वन्तं महेश्वरि !
आदी सर्वत्र देवेशि ! मन्त्रद. प्रथमो गुरुः ॥ १३८
परम्परादिका देवि ! महेशा एव नान्यथा ।
आनन्दनाथ-संज्ञान्ता गुरवः परिकीर्तिताः ॥ १३६
स्त्रियोऽपि गुरु-रूपाश्च अम्बान्ताः परिकोर्तिताः ।
आदौ श्रीस्व-गुरु पूज्य शिवान्तं पूजयेच्छिवे ॥ १४०
एवं देवि ! दोक्षणादौ पूर्ववत् परिकीर्तितम् ।
आनन्द-भैरवायेषु ह्य वमेव प्रकीर्तितम् ॥१४१
[११
प्रिये ॥ १४३ स्व-गुर्वादि समारभ्य दिव्यान्तं पूजयेच्छिवे ! अथ काली-दीक्षणादौ आज्ञा-नाम प्रदापयेत् ।। १४२ प्रकारान्तरतो देवि ! गद्यते शृणु साम्प्रतम् । प्रलादानन्दमारभ्य वोधानन्दान्तिकं एतद् गुरूक्त-मार्गेण चाज्ञा-नाम प्रदापयेत् । तारायामपि सम्प्रोक्तः संक्षेपेरण मया तव ॥ १४४ श्रीशिव उवाच- अथान्यत् सम्प्रवक्ष्यामि सम्प्रदाय-स्वरूपकम् । आदौ हि वैदिकः प्रोक्तस्ततो हि वैष्णवः परः ॥ १४५ ततो गाणपतं प्रोक्तं ततः सौरं प्रकीर्तितम् । सौराच्छेष्ठं शव-शास्त्रं शवाच्छाक्तं महेश्वरि ।। १४६ शाक्ताद् वामं महेशानि ! श्रेष्ठेति परिकीर्तितम् । वामात्तु दक्षिणः श्रेष्ठो दक्षिणाद् वीर एव तु ॥१४७ अथ वीराच्चावधूत कौल-पूर्व प्रकीर्तितः । अवधूताद् दिव्य-मार्गो दिव्याच्छे प्ठो न विद्यते ।। १४८ शैवे चान्तर्भविष्यन्ति श्रीमत्-पाशुपतादयः । पाञ्चरात्रादयो देवि ! वैष्णवे सम्भवन्ति हि ॥ १४६ शाक्ते चान्तर्भविष्यन्ति पाषण्ड-चोन-सम्मताः । कापालिके रुद्र-भेदाः कौले चाष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ १५० वोरे पञ्च-मतं देवि ! चोने शत-द्वयं मतम् । बौद्धानां शत-भेदाः स्युः सप्त पाशुपते मताः ।। १५१ दिव्ये भेद-द्वयं देवि ! पशवस्त्रिविधा मताः । अवधूते सप्त-भेदाः सम्प्रदाय-क्रमेण तु ॥ १५२ प्रानन्दः प्रथमः प्रोक्तो द्वितीयो नाथ एव तु । मुख्यस्त्वानन्दनाथः स्यात् प्रकाशस्तदनन्तरम् ॥ १५३ स्वरूपस्तु ततः प्रोक्तश्चैतन्यस्तु तदुत्तरम् । आराध्याचार्यकश्चैव विद्याधिक्यात् प्रकीर्तितः ॥ १५४ १२] वाचकः। षट्-शाम्भवादि-शास्त्रज्ञस्त्वाराध्यः परिकीर्तितः । 'गु'-शब्दस्त्वन्धकारत्वाद् 'ह'-शब्दस्तस्य बोधकः ॥१५५ द्वाभ्यां गुरुश्च सम्प्रोक्तः : स एव हि प्रकाशकः । नाथः सिद्धचादिभियुक्तस्त्वानन्दः शम्भु-शक्तिवान् ॥१५६ मानन्द-नाथ-शब्दस्तु पर-शवस्य महा-वीरस्तु यः प्रोक्तः स माहेश्वर इतीरितः॥ १५७ वीरस्तूद्धत-वत् प्रायः फलौ तिष्ठति कुत्रचित् । विलास-सम्प्रदायस्तु तद्-भेदः केरलो मतः ।। १५८ तद् भेदो द्रविडः प्रोक्त आचार्यत्व-प्रदायकः । स्वाराज्ये नियतः प्रोक्तश्चैतन्याख्यः स एव तु ॥ १५६ द्रविडेऽन्तर्भविष्यन्ति स्वामि-सम्प्रदाय-वाचकाः। गौडः : स्वरूप इत्युक्तस्त्वानन्दाख्यः स एव तु ॥ १६० केरलो बहवो भेदास्तानहं वच्मि संशृणु। भव-सिद्धो हराख्यस्तु सिद्धाख्यः परिकीर्तितः ॥ १६१ देश-पर्याय-भेदेन कल-हट्ट चतुष्टयम् मन्त्र-पर्याय-भेदेन विधि-सिद्धिस्ततः क्रमः ।। १६२ काल-पर्याय-भेदेन सिद्धानन्द-मत-क्रमः कल-हट्टो गो-मुखश्च विज्ञानी तदनन्तरम् ॥ १६३ द्रविड-राजो महेशानि ! उत्पादाख्यस्ततः परम् । काल-पर्याय-भेदेन सम्प्रदाय-क्रमो मतः ॥१६४ पूर्व-केरलमादौ स्यात् द्वितीयं तूत्तरं भवेत् । अत्रापि नाम-बाहुल्यं सम्प्रदायानुसारतः ॥ १६५ दिव्यः सिद्धस्ततः सत्यश्चैतन्यश्चित् -घनः परम् । सर्वज्ञास्यो ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र-संज्ञा-धरः शिये ॥ १६६ आदि-संज्ञा ततो देवि ! योजनीया सरस्वती। आदी दिव्यादयः शब्दास्ततो देवी सरस्वती ॥ १६७ [१३ श्रादौ कमास्तु विज्ञेयाः सम्प्रदायस्तदुत्तरम् । ततो नामादिकं ज्ञात्वा चाज्ञा-पदं महेश्वरि ॥ १६८ अथ द्रविड-भेदात् हि शृणु वक्ष्ये यथा-क्रमम् । अद्वैतापः पूर्ण-नाश्चिदम्बाख्यस्तृतोषकः ॥ १६६ अद्वैताख्यः सम्प्रदायस्त्ववधूत-मतेऽपि च। सरस्वत्यन्तगो वापि चानन्दान्तोऽपि वा प्रिये ॥ १७० नाथान्तो वा महेशानि ! त्रितयं त्रितयं त्रिषु । ईशाख्यस्तु महेशानि ! केरलान्तर्गतो भवेत् ॥ १७१ माहेश्वरः स भवति विश्व-रूपाभिधः प्रिये ! एतेऽपि केरले देवि ! ह्यन्तभूता भवन्ति वै ॥ १७२ एवं ज्ञानेन सम्पन्नः कुण्डली-ज्ञान-पूर्वकम् । पूजनं तु प्रकर्तव्यं नान्यथा सिध्यति ध्रुवम् ॥ १७३ एतदज्ञानतो देवि ! न विद्या सिद्धिमाप्नुयात् । विद्या-सिद्धिमभीप्सुर्वै ज्ञान-पूर्व समाचरेत् ॥ १७४ अज्ञानात् यत् कृतं देवि! तत् सर्व निष्फलं भवेत् । इति संक्षेपतः प्रोक्तमवश्यं क्रियतां प्रिये ॥ १७५ बलिदान-विधौ देवि ! पात्रासादन-कर्मणि । विनियोग-विधौ सर्व स्पष्टं भवति नान्यथा ॥ १७६ श्रीशिव उवाच- अथ कि पृच्छसि शिवे ! काश्मीरं ब्रूहि सत्वरम् । सर्व-दिव्यस्तु यः प्रोक्तः स काश्मीरेति कोतितः ॥ १७७ भाव-नाथः क्रिया-नाथो ज्ञान-नाथस्तथैव च। चित्परः चेतनेशश्च सिद्ध-नाथाय एव च ।। १७८ ऋद्धि-नाथस्ततश्चैव इत्पष्टौ कोर्तिता मया । पूजनादौ महेशानि ! पानासादन-कर्मणि ॥ १७६ १४]
भेद एष महेशानि ! सर्वमेकं प्रकीर्तितम् ।
गौडाख्य-मार्गो देवेशि ! तथा काश्मीर-सम्मतम् ॥ १८०
केरलेऽन्तर्गतं देवि ! नान्यथा शाङ्करं वचः ।
क्वचित् कदाचित् भेदो वै सम्प्रदायात् प्रकीर्तितः॥१८१
बिजटक-जटा चोभे त्रिशूली विन्दु-भूषितः ।
चतुर्भेदा महेशानि ! शैवेऽत्रान्तर्गता भवेत् ॥ १८२
शैवे चान्तर्गता देवि ! श्रीमत-पाशुपतादयः ।
तेषां तु सप्त-भेदा वै तानहं वच्मि संशृणु ॥ १८३
श्रादौ शिखी ततो मुण्डी जटी चव तृतीयकः ।
द्वि-दण्डी त्वेक-दण्डी च त्रि-दण्डी च ततः स्मृतः ।।१८४
वीर-शैवः सप्तमस्तु सप्त-पाशुपताः स्मृताः ।
वैष्णवे त्वष्ट-भेदाः स्युस्त्यादौ वैखानसः स्मृतः ॥ १८५
श्रीराधा-वल्लभो देवि ! गोकुलेशस्तृतीयकः ।
वृन्दाव्यस्तु चतुर्थः स्यात् पाञ्चरात्रस्तु पञ्चमम् ॥१८६
वोर-वैष्णव-नामास्यस्तदन्यः परिकीर्तितः ।
रामानन्दी हरि-व्यासी निस्वार्फश्चाष्टमः स्मृतः ॥१८७
स्मार्ता भागवता देवि ! एते मार्ग-प्रवर्तकाः ।
शाक्त चान्तर्गता देवि! चीनाः कापालिकाः शिवे ॥१८८
बौद्धाजनास्ततो देवि ! दिव्याः कौलास्तथा शिवे !
वीरः पशुस्ततः प्रोक्तस्तेषां लक्षरणमुच्यते ॥ १८६
चीनानां द्वि-शतं भेदास्ताराच्छिन्ना-विधौ स तु ।
ताराधीशः पराधीराः क्षेमाख्यः प्रेम-तारकः ॥ १६०
परापन्नस्तथा जीव-दया-परः ।
चिरजीवी सिद्ध-नामा संक्षेपानावकीर्तितः ॥ १६१
कापालिके पश्च-भेदास्तानहो चूमहे शिवे !
इन्द्र-जाली देव-जाली रुद्र-जाली तृतीयकः ।। १६२
सागराख्घः
विद्या-जाली तुर्य-संख्यः पञ्चमः सिद्धि-जालिकः। पञ्च-कापालिकाः प्रोक्ता बौद्धान् संशृणु यत्नतः ॥ १६३ केशच्छेदी वृक्ष अदो मद्याशो कल्मषस्तया । इच्छा-भेदी पञ्चमस्तु एवं बहु-विधा मताः ॥ १६४ जैने भेद-द्वयं देवि ! कथ्यते यत्नतः शृणु पार्श्वनाथः कला-नाथः पद्मा-भोगवती-रतः ॥ १६५ आदि-दिव्यस्तूप-दिव्यो दिव्य-भेद-द्वयं शिवे ! पशवस्त्रिविधा देवि ! ज्ञाताज्ञात-विनिन्दकाः ।। १६६ पञ्चधा वोर इत्युक्तस्तद्-भेद शृणु पार्वति ! श्रीचक्र-वीरो देवेशि ! ऊर्मिलाख्यो द्वितीयकः ॥ १६७ चूडा-चक्रं तृतीयं स्यात् पुष्प-वक्रं चतुर्थकम् । जोव-चक्रं पञ्चमं स्यात् पञ्च-भेदाः प्रकीर्तिताः॥ १६८ भाव-योगो जीव-चक्ने पुष्प-चक्ने क्रियाभिधः । श्री-चक्रे ज्ञान-योगस्तु लय-योगस्तु ऊर्मिले ॥१६६ चूडा-चक्रे राज-योगो किमन्यच्छोतुमिच्छसि ? श्री देव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि पूर्वोक्तं चाति-गुप्तकम् ॥ २०० श्रीशिव उवाच- फोटात् ब्रह्माण्ड-पर्यन्तं सर्व-शक्ति-मयं जगत् । शक्ति-सम्पूजनाद् देवि ! ब्रह्माण्डं पूजितं भवेत् ॥ २०१ शक्त्या शिवस्य वै देहे भुवनानि चतुर्दश । लोक-त्रयं कला-स्थाने देव-लोकादिकं शिवे ॥ २०२ पर्वता धातवो वापो समुद्राः सरितस्तथा । ब्रह्माण्ड-गोलो यच्च यत् किञ्चिज्जगती-तले ॥२०३ तत् समस्तं शक्ति देहे स्फुटं तिष्ठति पार्वति ! ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च शक्ति-देह-समुद्भवाः ॥ २०४ १६) वल्लभा । द्वितीयः पटलः उदयाक्षर-निरूपणम् श्रीदेव्युवाच- पूर्वोक्तं वद देवेश ! यद्यहं तव श्रीशिव उवाच- धन-कामे गणपतिमारोग्ये च दिवाकरम् ॥ १ तारा-पति च श्री-कामे मुक्ति कामे जनार्दनम् । नारायण सर्व-कामे श्री-कामे पुरुपोत्तमम् ॥ २' मन्त्री मन्त्र-प्रसिद्धय श्री विद्यार्थो कालिकां यजेत् । मातङ्गी धन-कामस्तु वाराहीं सर्व-कामया ॥३ भुवनेशी राज्य-कामः तथा नील-सरस्वतीम् । तथा त्रिपुरामेवं च कूट कूट-विभाविनीम् ॥ ४ सर्व-कामं कलियुगे कृते च पुरुषोत्तमम् । द्वापरे शिव-भेदं च त्रेतायां वामनं हरिम् ।। ५ अथ कलियुगे शस्ता या वालेति निगद्यते । नेतायां ललिता शस्ता द्वापरे पञ्च-कूटगा ॥६ पट-कूटा च कलौ शस्ता सर्व-तन्त्रेषु गोपिता। सर्व-कामं कलि-युने सुन्दरी परमेश्वरि ॥७ वगला सर्व-सिद्धयर्थ स्तम्भनार्थ विशेषतः । धूमावती मारणार्थे शरभो निग्रहे मतः प्रत्यङ्गिरा अग्न्यस्त्रादि-निग्रहार्थ प्रकीर्तिता । श्रीशिव उवाच- अन्यत्तेऽहं प्रवक्ष्यामि यद्यज्जानामि देवते ॥६ [१७ फा०-२ भूति-कामस्तु सततं पूजयेत् त्रिपुरां कलौ । फालिकां च महामायां वारपी-कामस्तु चार्चयेत् ।। १० भुवनेशों तथा तारां स्वर्ग-कामस्तु चार्चयेत् । ब्रह्म-वर्चस-कामश्च ब्रह्माणं परिपूजयेत् ॥११ आरोग्य-कामोऽथ रवि धन-कामो हुताशनम् । कमलां सिद्धि-कामस्तु विद्या-कामः सरस्वतीम् ।। १२ कलौ नील-पताकां च तथा नील-सरस्वतीम् । वाक्-सिद्धिर्जायते शीघ्र काम-सिद्धिर्न संशयः ॥ १३ कर्मणां सिद्धि-कामस्तु पूजयेद् वै विनायकं । भोग-कामस्तु शशिनं बल-कामः समोरणम् ।। १४ विमुक्त्यै सर्व-संसारात् प्रत्यनेनार्चयेच्छिवम् । ध्यान-योग तथा मोक्षं यदीच्छेद् ज्ञानमव्ययम् ॥ १५ सोऽर्चयेच्च विरूपाक्षं सर्व-सत्व-मयं हरम् । छिन्नमस्तां राज-पूर्वां मातङ्गी काम-कालिकाम् ॥ १६ श्मशान-कालिकां देवि ! सर्व-सिद्धि-प्रदां यजेत् । अश्वारूढां कुक्कुटी च तथा भोगवती शिवे ।। १७ नित्यक्लिन्नां च भेरुण्डां स्त्री वश्यार्थ यजेत् प्रिये ! सर्वाकर्षण-कामस्तु कालिककाक्षरी यजेत् ॥ १८ तथा मधुमती विद्यां सर्वोकृष्टौ यजेत् प्रिये । परा-प्रासाद-विद्यां च तथा पट्-शाम्भवेश्वरोम् ॥ १६ सर्व-काम-प्रसिद्धयर्थं यजेद्यत्नेन सुन्दरोम् । धनदा ऋद्धि-कामेन सिद्धि-कामेन कामिनी ॥ २० भैरवी रूप-कामेन हयग्रीवस्तु वाक्-प्रदः । श्रीशिव उवाच- दीक्षा-परम्परामाह येन देवी-मयो भवेत् ॥२१ गौड-काश्मीर-द्रविडे कौले वामे च दक्षिणे । सर्वत्र योजनीया हि यथा-मार्गरण सुन्दरी ॥ २२ १८)
:
अधिकार-वशाद् देवि ! कलौ पाप-समन्विते ।
कलौ युगे च सम्प्राप्ते सर्वे भ्रष्टा भवन्ति हि ॥ २३
परम्परा-विनाशस्तु भविष्यति न संशयः ।
गुरु-क्षोम विमुख्यं च नातः सिद्धिः प्रवर्तते ।। २४
अज्ञाम-वशतो देवि !भ्रमन्ति हि इतस्ततः ।
मार्ग-भ्रष्टास्तथा जाता शाखा-रण्डा यथा मताः ।। २५
कोटि-संख्य-युगैर्वापि न ते वै सिद्धि-भागिनः ।
दीक्षा-परम्परां वक्ष्ये श्रीविद्यायां महेश्वरि ॥२६
कालिकायामपि तथा गौड-काश्मीर-भेदतः ।
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि श्रीविद्या-भेद-दीक्षणम् ॥२७
लब्धाधिकारिभिर्देवि ! बालोपास्या महेश्वरि !
पूर्णाधिकारिभिर्देवि ! काम-सम्पूजिता परा ॥ २८
तदुत्तरं षोडशी स्यात् परा विद्या तदुत्तरम् ।
परा-प्रासाद-विद्या स्यात् प्रासाद-पर-रूपिणीम् ॥ २६
सम्प्रदायानुसारेण दीक्षणं कारयेत् प्रिये !
पट्-शाम्भवं ततः प्रोक्तं सम्प्रदायानुसारतः ॥ ३०
चरण-दीक्षा ततः प्रोक्ता त्वितो दीक्षा न विद्यते ।
निर्वाण-दीक्षा देवेशि ! सर्वतश्चोत्तमा मता ॥३१
निर्वाण-दीक्षा-परतो नान्य-दीक्षा तु विद्यते ।
निर्वाण-दीक्षया युक्तः परं ब्रह्म न संशयः ॥ ३२
चरण-त्रय-दीक्षा तु क्वचित् कार्या महेश्वरि !
बाला-मन्त्रादिका मन्त्रा विद्या-मन्नव कोतिता ॥ ३३
या सा पञ्चदशी देवी षोडशी संव कीर्तिता ।
पोढा-न्यासादिकं चैव अष्टादश-सहस्रकम् ॥ ३४
न्यासा यत्नेन कर्तव्या नाम-पारायणं तथा ।
परा-प्रासाद-विद्यायां सर्वमेव प्रकीर्तितम् ॥ ३५
[१६
कास-नित्यादिक चव युग-पर्याय-नित्यकाः ।
मन्त्र-पारायणं कर्म नाडी-पारायणं तथा ।। ३६
पोडशी-विद्यया युक्तस्त्वधिकारी हि सर्वतः ।
पडन्वय-क्रमे दीक्षा न्यास-पूजादिकं शिवे
भिन्नमेव पुरा प्रोक्तं विशेषः कथ्यते पुनः ।
चतुश्चरण-दीक्षायां भिन्न न्यासादिकं मतम् ॥ ३८
परा-प्रासाद-विधायां विशेषः कुत्रचित् प्रिये !
सर्वेषां पूजनं देवि ! श्रीचक्रे परिकीतितम् ॥ ३६
अधिकारानुसारेण योजनीयं महेश्वरि !
सर्व-दीक्षादिभिर्युक्तो महादेवो न संशयः ।। ४०
उत्तरोत्तरमेतद्धि श्रेष्ठं विद्धि महेश्वरि !
एतज्-ज्ञान-वशाद्देवि ! साक्षाद् ब्रह्म-मयो भवेत् ॥ ४१
आदावेकाक्षरी प्रोक्ता वाला-वत् परिकीर्तिता ।
सिद्धकाली पञ्चदशो विद्या-वत् परिकीर्तिता ॥ ४२
अथ वै दक्षिणा-काली पोडशी सैव कीर्तिता।
ततः कामकला काली परा-प्रासाद-वन्मता ॥४३
चरण-दीक्षा यथा प्रोक्ता तथैव हंस-कालिका ।
ततस्तु गुह्यका-काली पट्-शाम्भव-परेश्वरि ॥४४
पद-शाम्भवे गुह्यकाल्यां भिन्न एव प्रकीर्तितः ।
अन्नापि काल-नित्यादि ज्ञानं प्रोक्तं मया तव ॥ ४५
मन्त्र-पारायणं देवि ! नाम-पारायणं तथा ।
नाडी-पारायणं चैव युग-नित्यादिकं शिवे ॥ ४६
काल-नित्यादिकं चैव दिन-नित्यादिकं तथा ।
सर्व विस्तरतो देवि ! मया पूर्व निवेदितम् ॥ ४७
फाल्यां तु युग-नित्यादि काल-नित्यानुसारतः।
विशत्-साहस्रफ चाष्ट-शती पद-विशदोरिता ॥ ४६
२०]
काल-नित्या-विधानादि साधनं कथ्यते पुनः। इत्येत् कथितं देवि ! संक्षेपेण मया तव ॥४६ एतद-विधानयाल्लोके सिद्धि-रूपो न संशयः । पूर्णाभिपेक-दोक्षायां नाम-पारायणं चरेत् ॥ ५० शैवे शैवान्तगं नाम वैष्णवे तु तदन्तगम् । सौर-गाणप-बौद्धादौ तत्तच्छास्त्रोक्त नामतः ॥५१ शाक्त शक्त्यन्तगं नाम शाक्त बाहुल्यमीरितम् । श्रीमच्छाम्भव-दीक्षादौ शाम्भवो ह्यत्र सम्मतः ॥ ५२ तद्-रश्मिगं च वा नाम गुरु-मध्य-स्थितं च वा। ऋतु-वैविध्यगं वापि यथाम्नाय-क्रमेण तु ॥ ५३ शिव-शक्ति-युग्म-भेदान् माला-मन्त्रस्थमेव तु । पोडश्यां पञ्चदश्यां च लोपामन्वगस्तिके शिवे ॥ ५४ एतद्-गुरु-प्रोक्त नाम देयं यत्नेन दीक्षणे । परा-प्रासाद-मध्ये तु प्रासाद-परयाऽथ वा ।। ५५ शिव-शक्त्यन्तगं नाम शैव-शक्त्यन्तगं च वा । निर्वाणाद्यन्तगं नाम चरणे तद्-गुरु-स्थितम् ॥५६ मेधायां तद्-गुरुस्थं च प्रोक्तमेतन्महेश्वरि ! अथान्यत् सम्प्रवक्ष्यामि सारात्-सार-तरं परम् ॥ ५७ श्रीदेव्युवाच- शापोद्धारोत्कीलने तु तत्र भेदः कियान् भवेत् । तन्मे वद महादेव ! यद्यहं तव श्रीशिव उवाच- उत्कीलनं बन्धनं स्यात् शापस्तेजो-निरोधकः । कोलने तु महादेवि ! न गतागतमोरितम् ॥५८ गतागतं महादेवि ! शापोद्वारे तु वर्तते । भक्तानुग्रह काम्यत्वाद्देवी-साधक-सन्निधौ [२१ वल्लभा ।। ५८ ॥६०
अय
गत्वा दत्तो वरो देवि ! स मृघा जात एव हि ।
मन्त्र-चैतन्य-रोधत्वान्मृपा जातो महेश्वरि ।। ६१
शापो निगदितस्तथोत्कीलनमुच्यते ।
भक्तानुग्रह-काम्यत्वाद् दातव्यो हि बरः शिवे ॥६२
बन्धनस्य यदा मुक्तिस्तदैव तु गतागतम् ।
शक्तिस्तु वर्तते देव्या वरदाने महेश्वरि ॥६३
यथा ऊर्ज-तरे वत्से धेनु-प्रोतिस्तु वर्तते ।
बन्धनस्य यदा मुक्ति स्तन-पान तदैव हि ॥ ६४
काली तारा तथा छिन्ना तेजः-पुज-निभा मता ।
त्रयाणा तेजः-संरोधं को हि कर्तुं क्षमो भवेत् ।। ६५
तस्माच्छापादिकं नास्ति कालिकाया महेश्वरि
कालिका तारिणी विद्या उत्कीलन-विमोचनी ॥ ६६
दाम-सन्त्रोटन कृत्वा धेनुर्याति यथा सुतम् ।
भक्तानुग्रह काम्यत्वात् तथेयं कालिका परा ॥ ६७
तारा छिन्ना स्तम्भनेशी सर्व-बन्ध-विमोचनी ।
शापे तु प्रस्रवो नास्ति कोलने प्रस्रवोऽस्ति हि ॥ ६८
कालिकाया महादेवि ! सर्वदा प्रलवोऽस्ति हि ।
शापोद्धार-निरुक्तिस्तु शृणु यत्नेन साम्प्रतम् ॥ ६६
वत्सो निकट-वर्ती स्याद् धेनुनिकट-वतिनी ।
दुग्धाभावान्महादेवि ! नेकट्ये किं फलं भवेत् ।। ७०
कालान्तरे समायाते पुनर्दुग्ध यथा भवेत् ।
शाप-निर्मोचनादेव
पुनस्तेजः
वत्स-बन्धन-मुक्तित्वात् फल सिद्धं हि वर्तते ।
उत्कीलने वन्धनं हि फल-सिद्धि-प्रदा प्रिये ॥ ७२
तस्मादुत्कोलन भिन्नं शापो भिन्नः प्रकीर्तितः ।
अक्षर-व्यत्ययो देवि । उत्कीलन-विधौ स्मृत ॥ ७३
प्रवर्तते ॥७१
२२]
मन्त्रश्चतन्य-रूपत्वात् चैतन्य-व्यत्ययो न च । चैतन्य-व्यत्ययं त्यक्त्वा पाप-भागो नरो भवेत् ॥ ७४ तत्पापस्य निवृत्यर्थ प्राणायामः प्रकीर्तितः। देहावयव-रूपत्वं ह्यक्षरे वर्तते शिवे ॥ ७५ अक्षर-व्यत्ययाद् देवि ! होनाङ्गत्वं प्रजायते । शाप-होने महादेवि ! सर्वाङ्ग सिद्ध मेव हि ॥ ७६ वत्स-बन्धनकं कर्म पुनः सिद्धं यथा भवेत् । तथोत्कीलनकं कर्म पुनः सिद्धं महेश्वरि ॥ ७७ शाप-दाने महादेवि ! चैतन्याभाव एव हि । विद्यमाना यथा गौः दुग्धं नास्ति महेश्वरि ।। ७८ शाप-दाने महेशानि ! चैतन्यं नास्ति शाम्भवि ! उत्कीलने महादेवि ! चैतन्यं सिद्धमेव हि ॥ ७६ इति भेदेन गदितो किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ? श्रीदेव्युवाच-- दीप-रेखादिकं कर्म पूर्व यत् सूचितं त्वया ॥८० किमपराद्धं मया देव ! न तन्मह्यं प्रकटीकृतम् श्रीशिव उवाच- दीप-रेखादिकं ज्ञानं सारत-सार-तरं मतम् ॥ ८१ दीपिन्यन्योक्ति-सिद्धयर्थ दीप-रेखा प्रकोतिता । आरम्य भानोरुदयात् षष्टिविघटिकान्तरम् ॥ ८२ सृष्टि-संहार-योगेन दीप-रेखा-विधिर्मता विन्दुमारभ्य होरान्तं दीपिनी समुदेति हि ॥ ८३ सर्व-मन्त्राणि देवेशि ! दोपिनो समुदेति हि । घटि-क्रमेण देवेशि ! तत्र मन्त्रोदयो भवेत् ॥ ८४ मन्त्र-माने त्विदं प्रोक्तं मया संकेतकं शिवे ! एकाक्षरं समारम्य सहस्रान्तं महेश्वरि ॥ ८५ [२३ अक्षरे चोदयं देवि ! घटिका-क्रम-योगतः । तत्राक्षरं सदोदेति तज्ज्ञानात् फलमाप्नुयात् ॥८६ हंस-चारो महादेवि ! यथा चलति सर्वदा । अजपा सैव गदिता सङ्कल्पात्तु फल-प्रदा ॥८७ युगाधारम्भ-दिवसं ज्ञात्वा चाहर्गणं शिवे ! मन्त्राक्षरोदयं देवि ! विद्धि यत्र सुनिश्चितम् ॥ ८८ एकैक-घटिका-योगाद् विन्दु-रेखोदयाक्षरम् । होरान्तं यत्नतो देवि ! ज्ञातव्यं शुभमिच्छता ॥८६ द्वारमारभ्य विन्द्वन्तं पुनरेकोदयाक्षरम् । एवं व्याप्तेन देवेशि ! विरा-रूपत्वतां व्रजेत् ॥६० व्यापकत्वं विना देवि ! न विराड्-रूपता मता । विश्व-रूपत्व-भावो हि विरा-रूपे प्रकीर्तितः ॥ ६१ दीप-रेखां विना देवि ! न हि वै दीपिनो मता। दीप-रेखा-मध्य-भागे दीपिनी समुदेति हि ॥६२ तत्रैव दोपिनी पूज्य तवैव चोदयाक्षरम् । उदयाक्षर-योगेन सजीवं मन्त्रमेव हि ॥६३ विनोदयाक्षरं देवि ! मन्त्रं निःशप्त न हि । मन्त्र-शाप-निवृत्यर्थ उदयाक्षर-चिन्तनम् ॥६४ मन्त्रोदयाक्षरं देवि ! तथा रेखोदयो भवेत् । उदयाक्षर-योगेन कि न सिद्धयति भू-तले ॥ ६५ मन्त्रोदयं यथा देवि ! तथा रेखोदयो भवेत् । रेखोदयो मन्त्र-मात्रे स्यादुदयोऽपि हि वर्तते ॥ ६६ इति प्रोक्तं मया देवि ! किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ? श्रीदेव्युवाच- पूर्व संसूचितं नाथ ! यन्त्र-ध्यानं त्वया प्रभो ॥६७ कयं ध्येयं किं विशिष्टं कि ध्येयाध्येयमेव हि । वृत्तं भित्ति-स्वरूपं वा मेखला-वत्-स्वरूपकम् ॥ ६८ २४] किंवा रेखा-मयं ध्येयं किं वा मेरु-स्वरूपकम् । विश्व-रूपं स्मरेद् वापि तत्सर्व मयि कथ्यताम् ॥4 श्रीशिव उवाच- ध्यानं तु त्रिविधं प्रोक्तं यन्त्र-मात्रे महेश्वरि ! आदौ विराट-स्वरूपं स्याद् विश्व-चक्षुः-स्वरूपिणं ॥१०० यन्त्रं सम्भावयेद् देवि ! सर्वत्र कथितं त्विदम् । श्रीचक्रादी महादेवि ! विराज-रूपे तु साम्यता ।। १०१ द्वितीयं तु कथं ध्येयं तन्ने वद महेश्वरि ! तेजः-पुञ्ज-निभा रेखा सर्व-चैतन्य-स्वरूपिणी ॥ १०२ सर्व दर्पण-बद-भाव्यं स्व-प्रकाश-स्वरूपिणम् । चैतन्यं भावयेत सर्व विन्द्वादि-भूपुरान्तकम् ॥ १०३ मूले तेजः-प्रकाशेन नाभिन्नं भावयेत् प्रिये ! तृतीयं शृणु देवेशि ! मेरु-रूपं सनातनम् ॥ १०४ उत्तरोत्तर-बीज च बिन्द्वारभ्य विभावयेत् । बिन्द्वधो भावयेद् देवि ! चकैकोत्तरतः शिवे ॥ १०५ नवोत्तर-क्रमेणैव भावयेद् वा महेश्वरि ! काली-विद्या-विधौ देवि ! नव-रत्न-स्वरूपिणी ।। १०६ रेखाः सम्भावयेद् देवि ! मेरु-प्रस्तारवच्च वा । श्रीचक्रं बीज-संयुक्तं निःशप्तं परमेश्वरि ॥१०७ बीज-हीनं तु यच्चनं तच्चकं सिद्धिदं न च । सृष्टि-चनं भवेदादौ स्थिति-चक्रं द्वितीयकम् ॥ १०८ लय-चक्र तृतीय स्यात् त्रिधा चक्रे निवेदितम् । बीज-संलेखनं देवि ! त्रिविधं गदितं मया ॥१०६ बीजं बिना तु निर्जीवं शव-वत्-परिकीर्तितम् । वीज-युक्तं भवेद्यन्नं निःशप्तं सिद्धि-दायकम् ।। ११० बोजाभावे मातृकार्यान् संलिखेद विन्दु-भूषितान् । यन्त्र-मध्ये तु संलिख्य तद्यन्त्रं पूजयेच्छिवे ॥१११ [२५
दलाकार तु यद्यन्नं तद्यन्त्र सिद्धि-दायकम् ।
दलाकारं कलौ पूज्यं नान्यथा सिद्धिदं शिवे ।। ११२
मन्त्र-चैतन्यक देवि ! यन्त्र-चैतन्यकं तथा ।
गुरु-चैतन्यक देवि ! स्वस्मिस्त्रितय-भावना ॥ ११३
न तत्र ध्यान रूपादि तेजः-पुञ्ज-विभावना ।
स-प्रपञ्चे तु निःसारे दुराचार व्रते शिवे ।। ११४
भावनैव तु सम्प्रोक्ता भावना सिद्धिदा मता ।
भावना यदि सिद्धा न तदेत तु कथ भवेत् ।। ११५
भावना प्रेरण देवि | देवेन क्रियते शिवे !
प्रत्ययं शृणु देवेशि । यत सर्वैः क्रियते सदा ॥ ११६
कुण्डली भिन्नरूपा स्यात् तल्लिङ्गं भिन्नरूपिणम् ।
स्वयम्भु-लिङ्गमित्युक्तं स्वतः सिद्धं महेश्वरि ॥ ११७
मूल-विद्या-मयी देवि ! कुण्डली शक्ति-रूपिणी ।
कुण्डली सर्प-रूपा स्याद् देवता भिन्न-रूपिणी ॥ ११९
शिवस्याभिन्न-रूपत्वात् विधा रूपं प्रकीर्तितम् ।
मूलाधारं तु कुण्डल्याः स्थान प्रोक्त महेश्वरि ॥ ११६
श्रीदेवतायाः स्थान तु हृदयं परिकीर्तितम् ।
शिव-स्थानं महेशानि ! सहस्रार प्रकीर्तितम् ॥ १२०
स्थान-भेदान्नाम-भेदाट रुप-भेदान महेश्वरि !
कथमेक्यं महादेवि ! तस्मात्तु भावना मता ॥ १२१
स्थान-भेदे रूप-भेदे नाम-भेदे न वै मम
तात्पर्य विद्यते देवि ! कि तु चैतन्य-भावना ॥ १२२
गुरु-मुख्याः क्रियाः सर्वा निर्वाणं गुरु-रूपकम् ।
निर्वाणं परमं ब्रह्म निर्वाणं तु गुरोः पदम् ॥ १२३
गुरुः शक्तिर्गुरुविद्या गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुब्रह्मा गुरविष्णुर्गुरुविराट् स्वरूपवान् ॥ १२४
२६]
गुरुमन्त्री हि चैतन्यं कि बहु ब्रह्म केवलम् ।
चैतन्यमेव तात्पर्य ध्यानं तु भावनैव हि ॥ १२५
केन दृष्टं ध्यान-रूपं भावना-मान-गोचरम् ।
दृढ-भावनया युक्ते प्रत्यक्षं दर्शनं भवेत् ॥ १२६
चैतन्यं सर्वदा भाव्यं गुरौ देवि ! न संशयः।
गुरुं विना न विद्याप्तिनं च मन्ताप्तिरेव च ॥ १२७
गुरु-स्थानं श्रेष्ठ-भूत गुरौ सर्वस्य भावना ।
गुरु-देवत-मन्त्राणामैक्य सम्भावयन् धिया ॥ १२८
मन्त्रार्थ हृदि निश्चत्य गुरु-रूपं परामृशन् ।
सर्व गुरौ विलीनं वै ज्ञात्वा तु प्रजपेत् प्रिये ॥ १२६
स्वाभिन्नत्वेन सम्भाव्य त्रितयं नितयं त्रिषु ।
सर्व-चक्षुः सर्व-मुखं सर्वस्यैव स्वरूपिणम् ॥ १३०
गुरुमेव विजानीयाद् ! गुरुं ध्यायन जपं चरेत् ।
मया पूर्व निगदितं भाव-त्रितयकं शिवे ॥ १३१
पशु-चोर-दिव्य-भावाद् दिव्ये किं वा निरूपितम् ।
तेजः-पुजं विभाव्याऽथ सर्वमेक-स्वरूपकम् ॥ १३२
चैतन्यं च विभाव्याऽथ महा-तेजः स्मरेच्छिवे !
गुरु-कृपा भवेद् देवि ! देव-रूपो गुरुः स्मृतः ॥ १३३
गुरु-रूपो भवेदात्मा आत्मा-रूपो मनुर्भवेत् ।
मन्त्र-रूपं तु सकलं विभाव्य मूर्ति-कल्पना ॥ १३४
ध्यानोक्तां देवतां ध्यात्वा सर्व संसाधयेत् क्षरणात् ।
एवं भावनया देवि ! ताद्रूप्यत्वं प्रजायते ॥ १३५
ताद्रूप्ये तु समापन्ने पर-शक्तित्वतां ब्रजेत् ।
पर-शक्ति-स्वरूपोऽहमिति सम्भाव्यमव्ययम् ॥१३६
चैतन्य मूति सश्चिन्त्य किं न सिद्धयति भू-तले ।
त्रयाणामेकगं तेजस्तन मूर्ति-प्रकल्पना ॥१३७
[२७
ध्यानोक्त-देवतां ध्यात्वा स्व-स्वरूपां विभावयेत् ।
त्रितयं त्रिपु सम्भाव्य तवेष्ट-मूर्ति-कल्पना ॥ १३८
मनः स्थैर्य यथा देवि ! तथा कार्य महेश्वरि !
तस्याः सम-रसं देवि ! तेजः-पुञ्ज-निभं स्मरेत् ॥ १३६
अर्धनारीश्वरमपि मन्त्र चैतन्य-विग्रहम् ।
न देहे मन्त्र-वर्णान् स्वे व्याप्तान वै भावयेत् सुधीः॥ १४०
वन-माला-समां भाव्य तेजः-पुज-निभां शिवे !
इति संक्षेपतः प्रोक्तं यथा कुण्डलो-रूपकम् ॥ १४१
कुण्डलो-त्रितये देवि ! यथा सम्भाव्यते शिवे !
तथाऽत्र भावना प्रोक्ता किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥ १४२
२८]
तृतीयः पटलः प्राणायाम-जपः श्रीदेव्युवाच- देवाधि-देव सर्वज्ञ सव-शास्त्र प्रवर्तक ! मन्त्रोदयादिकं ज्ञानं दीप-रेखादिकं प्रिये ।। १ भावनान्तं च कथितं पूर्वोक्तं न प्रकाशितम् । श्रीशिव उवाच- तदेव कथ्यतेदानी शृणु यलेन साम्प्रतम् ॥२ केरलारय-मतं चैकं काश्मीरं तु द्वितीयकम् । गौड-संज्ञं तृतीयं स्यान्मतं तु भावना-विधौ ॥ ३ आदौ तु केरलं देवि ! शुद्धं सर्वेषु सम्मतम् । गुरु-दैवत-मन्त्राणामैक्यं सम्भावयन् धिया ॥ ४ चैतन्यं तु त्रयाणां च तेजः-पुजं विभावयेत् । उपदेष्टा गुरुदेवि ! मन्ने चैतन्य-वोधनम् ॥ ५ चैतन्यस्य स्वरूपं वै गुरु-रूपं विभावयेत् । नव-रत्न-प्रभा देवि ! यथा चैकत्र योज्यते ॥६ ज्वलन्मेरु-सम-प्रभाम् । एकन्न योजनाद् देवि ! कोटि-सूर्य-सम-प्रभाम ॥७ तत्-प्रभायां महा-देवि ! गुरं शम्भु-स्वरूपिणम् । वराभय-करं शान्तं द्वि-नेत्रं द्वि-भुजं गुरुम् ॥८ तत्-तेजसा घिलीचं हि जगत्-स्थावर-जङ्गमम् । केरलाप्ये सम्प्रदाये एवं सम्भावयेद् गुरुम् ॥६ गुरु-मुख्याः क्रियाः सर्वास्तस्मात् सर्वोत्तमो गुयः । काश्मीराख्यं शृणु प्राज्ञे ! येन तन्मयतां व्रजेत् ॥ १० [२६ एकत्र योज मन्त्र-देव-गुरूणां हि त्वैक्य सम्भावयन् धिया । तेजः-पुज-निभं सर्व ाक्षरस्य स्वरूपकम् ॥११ तेजः-पुजाक्षराणि च सर्व चैकन भावयेत् । सर्व लोनं ह्यक्षरे - चैतन्य-त्रितयं शिवे ॥ १२ सर्व चैतन्यजं तेजः कोटि-सूर्य-सम-प्रभाम् । तेजः-पुजाक्षराण्येव रत्न-कूट-समूह-वत् ॥ १३ सम्भाव्य प्रजपेन्मन्त्रमिष्ट-सिद्धि-प्रदायकम् । काश्मीराख्य-क्रमः प्रोक्तो गौड-कम-मतः शृणु ॥ १४ देवता-गुरु-मन्त्राणामैक्यं सम्भावयन् धिया । सर्व तेजोमयं भाव्यं जगत्-स्थावर-जङ्गमम् ॥ १५ व्रयाणां देवि ! चैतन्यं तेजः-पुञ्ज-निभं शिवे ! तेजः-कूटमभूदेक मेरु-पर्वत-सन्निभम् ॥ १६ तत्-तेजसि महा-देवीं सायुधां परिचिन्तयेत् । ध्यानोक्त-विधिना ध्यात्वा सर्व-रूपां विभावयेत् ॥ १७ एवं भावयतस्तस्य देवता वरदा भवेत् । इयं वै भावना प्रोक्ता किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥ १८ श्रीदेव्युवाच- सम्प्रदाय-त्रयेणव सङ्कल्पो यस्तु सूचितः। स च वै कथ्यतां देव ! यद्यहं तव वल्लभा ॥ १६ श्रोशिव उवाच- केरलाख्ये सम्प्रदाये सङ्कल्पं शृणु सादरम् । प्रीत्यर्थ देवतायास्तु सङ्कल्पः परिकीर्तितः ॥ २० देवताया यदा प्रीतिर्जाता तत्क्षणमेव प्रसन्नता भवेदादौ ततः प्रीतिः प्रवर्तते ॥ २१ प्रीतिर्जाता यदा देवि ! प्रसन्नत्वे न संशयः । प्रीत्यर्थे विनियोगस्तु मुख्योऽयं परिकीर्तितः ॥ २२ काश्मीराख्ये क्रमे देवि ! विनियोग शृणु प्रिये ! प्रत्यक्ष-दर्शनार्थ हि देवताया महेश्वरि ॥ २३ गौड-क्रमे महेशानि ! सर्व-सिद्धयर्थमेव तु । देवताया यदा प्रोतिस्तदा सर्व प्रवर्तते ।। २४ प्रत्यक्ष-दर्शनं देवि ! प्रीतौ लीनं हि वर्तते । तथा वाक्यादि-संसिद्धिः प्रीती लीना हि वर्तते ॥ २५ तस्मात् प्रोतिर्मुख्य-भूता प्रीत्यर्य विनियोगता। इति प्रोक्तं महा-देवि ! किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥ २६ श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि नित्या पञ्च-विधा कथम् । श्रीशिव उवाच- शृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि काल-नित्यासु निर्णयम् ॥ २७ तिथि-नित्या भवेदादौ दिन-नित्या तदुत्तरम् युग-नित्या ततः प्रोक्ता काल-नित्या मता ततः ॥ २८ ततः पर्याय-नित्या स्यादेवं पञ्च-विधा मता। शुक्ल-कृष्ण-क्रमेणव द्विधा नित्यार्चनं मतम् ॥ २६ आदी कामेश्वरी शुक्ले चित्राधा कृष्ण पक्षके । तिथि-नित्यां समभ्यर्च्य द्वाभ्यामाद्यां ततः प्रये ॥ ३० पुनराद्यन्तमाचर्य दक्षिणामूर्ति-सम्मतम् । आनन्द-भैरव-मते प्रथमे दिन-नित्यकाम् ॥ ३१ शुक्ल-कृष्ण-क्रमेणैव तदन्ते सकलां यजेत् । तिथि-नित्या तु कथिता दिन नित्या-पुरःसरम् ॥ ३२ शुक्ल-कृष्ण-क्रमेणैव तदन्ते सकलां यजेत् । युग-नित्या तु कथिता काल-नित्या च पूर्व-वत् ॥ ३३ पर्याय-नित्या देवेशि! काल-नित्या-पुरःसरम् । कथ्यते शृणु देवेशि ! सावधान-मनाः शृणु ॥ ३४ (३१ ॥ ३७ शून्य-सगौ समुद्धृत्य ततः काम-कला वदेत् । हस. सोऽह समुद्धृत्य पर्यायः कथ्यते शृणु ॥ ३५ अकारादि-क्षकारान्त उ-अ-इ-पल्लवान्वितः। परस्परान्वितैर्देवि । द्वि-त्रि-क्रम-गतः शुभैः ॥ ३६ स्वरादिभिरथोपात्तैस्तथ तैश्च स्वरान्वितैः । परस्पर पल्लवितैर्नाम-परायणाभिधा पर्याय-नित्या कथिता काल-नित्यान्विता शुभा । पर्याय-स्व-जनिर्देवि । काल-नित्या-प्रकाशतः ॥३८ तत्तत् पारायण नाम कीर्तित देव-दुर्लभम् । कालिकाया महेशानि ! नित्या-पर्याय नामतः ॥ ३६ काली-पर्याय-नित्या वै सक्षेपेण प्रकाशिता । विशत्-साहस्रक भाग शत-पट-त्रिंशदोरिता ॥ ४० प्रत्य केचिदिच्छन्ति नागे सप्तशतीति च । अक्षरोदयक यत्तेऽनेकमेव प्रकीर्तितम् ॥४१ पष्टि-पारायणं नाम पूर्वमेव प्रकीर्तितम् । नाम-पारायण भिन्नं मन्त्र-पारायण तथा ॥४२ मन्त्र-पारायणं भिन्नमेव प्रकीर्तितम् । अक्षरोदयः पष्टितमस्त्वेक प्रकीर्तितः ।। ४३ काली-पारायणं नाम कीर्तित तव सुव्रते ! सुन्दर्या भिन्नमेवोक्त तच्छ णु व महेश्वरि ॥ ४४ आ-ई-पल्लव-संयुक्तः परस्पर-युतः शिवे ! द्वि-नि-क्रमाक्षरः काः क्षान्त-वर्ण-यतः शिवे ॥ ४५ स्वरादिभिरथ क्षान्तस्तैश्च तैः सस्वर शिवे ! नामानि मिपुरे ! ते हि गणितः सम्भवन्ति हि ॥ ४६ विशत-साहस्रकं साष्ट-शत पनिशदेव हि । गुह्याति-गुह्यं कथितं यन्न कुत्र प्रकाशितम् ॥ ४७ ३२] :
प्रकारः प्रथमो वा हि प्राकारः प्रथमोऽथ वा।
अकारः प्रथमो देवि ! ह्याकारस्तदनन्तरम् ॥४८
विरा-रूपं तु प्रथमं ततः सावयवा मता ।
विरा-रूपं कालिकास्यं सुन्दरं सुन्दरो-मुखम् ॥ ४६
तस्मादकारो मुख्यो हि स तु कालो-विधौ मतः।
कादि-वर्णः कालिकायां हादिः श्रोसुन्दरो-मते ॥ ५०
वर्ण-स्वरूपे तद्-रूपं न मदीयं तु विद्यते ।
कादिविराट् शून्य-रूपः ककारः परिकीर्तितः ॥ ५१
हादिहकारः श्रीविद्या चित्कला काम-सुन्दरी।
महा-काम-कला विद्या हकारे तु विराजते ॥ १२
विराट्-स्वरूपं सुन्दर्या विद्या-मात्रे प्रकोतितम् ।
तथापि काल्यां देवेशि ! मुख्यत्वेन व्यवस्थितम् ।। ५३
नाम-पारायणे देवि ! तत्-स्वरूपं प्रदृश्यते ।
अकारो विन्दु-संयुक्तो प्रकारः सर्ग-संयुतः ॥ ५४
अं-अश्चेत्यक्षर-द्वन्द्वमनुत्तर-स्वरूपकम्
अनुत्तरा द्वि-पञ्चाशद्-विद्याख्या परिकीर्तिता ।। ५५
एवं काम-कला विद्या मत-भेदेन दशिता ।
ईकारः केवलो देवि ! महा-काम-कला मता ॥ ५६
अत एव काम-राजे ककारत्वे तु मुख्यता ।
लोपायां तु हकारो हि त्वाकारत्वेन कीर्तितः ॥ ५७
कृत्वा हराद्धं देवेशि ! यो ध्यायेत् जगदम्बिकाम् ।
मन्त्र-द्वयेन पुटितं सर्वाभिन्नत्व-भावना
नाम-पारायणं प्रोक्तं काली-विद्या-विधौ शिवे!
अतएव तु सम्प्रोक्तं चित्-त्वरूपं महेश्वरि ॥ ५६
अकारः प्रथमो देवि! ह्याकारस्तु द्वितीयकः।
आकारो व्यापकत्वेन सर्व-व्यापक ईरितः ॥६०
फा०-३
[३३
. हकारार्ध-कला देवि ! ईकारः परिकीर्तितः । एवं मिलित्वा देवेशि ! महा-राजेश्वरी परा।। ६१ महा-राजेश्वरी विद्या पल्लवः परमो मतः । श्रीविद्यायां महेशानि । प्रोक्तं संक्षेपतः शिवे ।। ६२ विराऊत्तरेश्वरी विद्या कालिकायां प्रकीर्तिता। अकारस्तु ककारेऽपि हकारेऽपि प्रकीर्तितः ॥ ६३ प्रकारोच्चारणं देवि ! न कादी हादि-सम्मतम् । उभयोर्यत्र चेत् कूटं कूटार्थे परिकीर्तितम् ॥ ६४ कटोच्चारणकं कर्म कलौ कस्य भविष्यति । तस्मादुच्चारणार्थ हि ह्यकारः परिकीर्तितः ॥ ६५ ककारस्त्वादि-वों हि हकारश्चरमो मतः । अवार्थे प्रत्ययो देवि ! वर्णोद्वारे भविष्यति ॥६६ कहेत्येवं महा-मन्त्रो यस्य चाचि प्रवर्तते । स धन्यः स च विज्ञानी स हि वै देव-पूजितः॥ ६७ प्रणामं कुर्यात्तं दृष्ट्वा ज्ञानात् फलमवाप्नुयात् । अज्ञानात् फलनाशः स्यात किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥ ६८ श्रीदेव्युवाच- पष्ठी-जप-प्रकारोऽपि नाम-पारायणं तथा । मन्त्र-पारायणं देवि ! ाक्षरोदयकं तथा ॥ ६६ दीप-रेखादि-विज्ञानं मन्त्राणस्योदयं कस्याधिकारी देवेश ! केन कार्य स को भवेत् ॥ ७० तन्मे वद महादेव ! यद्यहं तव वल्लभा । श्रीशिव उवाच- पूर्णाभिषेको शुद्धान्तो गुरु-भक्तो दृढ-व्रतः ॥७१ अनित्य-कर्म-सन्त्यागी नित्यानुष्ठान-तत्परः । पारम्पर्य-क्रमासक्तः षट्-शाम्भवान्तमेव हि ॥७२ तथा।
सन्ध्या-चतुष्टये देवि ! ह्यधिकारो हि यस्य । आचार्यत्वे महा-देवि ! अधिकारो हि यस्य वै ॥७३ भविष्य-ज्ञान-त्रैकाल्य-ज्ञान-विज्ञान-दर्शने वाला पञ्चदशी कादि पोढा विद्या परा ततः॥ ७४ परा-प्रासाद-निर्वाणी पडन्वय-क्रमस्ततः एवं परम्परा-युक्त नाम-संज्ञादि-संयुते ॥ ७५ तस्याधिकारी देवेशि ! नाम-पारायणादिके । पष्ठी-जपं समारभ्य नाम-मन्त्रान्तिके शिवे ॥७६ एवं पारायणं कर्म यः करोति महेश्वरि ! सच कि मानुषो देवि ! स साक्षाच्छिव एव हि ॥ ७७ पष्ठी-पारायणं नाम नाम-पारायणं तथा । मन्त्र-पारायणं ज्ञानं दीप-रेखादिकं तथा ॥७८ नाम-दानादि-संकेतो नापस्य कर्मणः फलम् । येन कोटि-युगं देवि ! सुन्दरी सम्यगचिता ॥७६ अष्टादश-सहस्रं हि न्यासान् येन स्व-देहके । पुरश्चर्यादि-संयुक्तंन्यस्ता देवेश-वन्दिता तेनेदं लभ्यते देवि ! हथवा नहि लभ्यते । एतत् तत्त्वं महेशानि ! किश्चिज्जानामि यत्नतः ॥८१ पूर्ण-वेत्ता महा-देवि ! स साक्षात् कालिकाम्बिका। सैव वै सुन्दरी-रूपा तारुण्यामृत-विग्रहा ॥८२ जानाति सुन्दरी देवि ! सा त्वमेव महेश्वरि ! सर्व गोपसि प्राज्ञे ! मम भाग्यं महत्तरम् ॥ ८३ श्रीदेव्युवाच- धन्योऽसि शिव विश्वेश सर्व-पार-प्रदर्शक ! शक्तौ शिवं विना शम्भो ! सामरस्यं न दृश्यते ॥ ८४ श्रीशिव उवाच- भेदो नास्ति महा-देवि ! यथा बीजांकुरो भवेत् । संवाहं पु-स्वरूपेण स्त्री-रूपेणाहमेव हि ॥ ८५ [३५ ॥८० आवाभ्यां न हि भेदोऽस्ति भेदस्त्वज्ञान-सम्भवः । उपदिष्टोऽस्मि देवेशि ! ह्यनुत्तर-गुणार्णवे ॥८६ त्वत्-प्रसादादिदं सर्व न वै विस्मृतमेव हि । इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ८७ श्रीदेव्युवाव- पूर्व संसूचितं नाथ ! स्वप्न-मन्त्र-विवेचनम् । न मां कथितं नाथ ! मम वा योग्यता न हि ॥८८ सर्व मे कथ्यतां देव ! यद्यहं तव वल्लभा । श्रीशिव उवाच- एतावत् काल-पर्यन्तं न कुत्रापि प्रकाशितम् ॥ ८६ तव प्रोत्या महेशानि ! कथ्यते शृणु साम्प्रतम् । पञ्चाशद् वै महा-पद्मा ह्यागम-ग्रन्या ईरिताः ॥६० तन्त्र-मन्त्रा महा-देवि ! सर्वेषु च प्रतिष्ठिताः । त्रिशन्निखर्व-पड्-वृन्द-नवत्यर्बुद-कोटयः ॥६१ मन्त्राः प्रोक्ता महेशानि ! ह्यागमं कुत्र कि स्थितम् तत् शृण त्वं महेशानि ! यद्यहं तव वल्लभः ॥ ६२ महतू-पञ्चाशत्-पद्मे तु षट्-विशति भुवि स्थितम् । चतुर्दश स्थितं स्वर्गे दश पाताल-गोचरम् ॥६३ एवं क्रमेण देवेशि ! ह्यागमः कथितो मया । स्वप्न-मन्त्रा महा-देवि त्रिधा वै परिनिष्ठिताः॥६४ पाताले तु विराट-चक्रं स्वर्गे ताण्डव-चक्नकम् । स्वर्ग चक्र-द्वयं देवि ! त्रिपुरारयं द्वितीयकम् ।। ६५ आदी विराट् ततो देवि ! शिव-ताण्डयमेव च । तृतीयं त्रिपुराप्यं तु स्वप्न-मन्त्रास्त्रिधा स्थिताः ॥६६ तवैव तु हृदन्ता ये ते विराट-चक्र-गोचराः । अस्त्रान्तास्तु महेशानि ! शिव-ताण्डव-गोचराः ॥ ६७ ३६] । त्रिपुरा-चक्र-मध्यस्था वह्नि-जायान्तिका मताः। एते मन्त्राः त्वौत्सुक्येन भुवि स्वप्नेन गोचराः ॥६८ स्वप्न-मार्गेण देवेशि ! उपदिष्टाः शिवेन तु । तेषां तु लक्षणं देवि ! शृणु यत्नेन साम्प्रतम् ॥ पाताल-चक्र-मन्त्राणां लक्षणं शृणु साम्प्रतम् । अञ्जनं गुटिका गुप्तिश्चाज्ञा-सिद्धिस्तथैव च ॥१०० शिव-ताण्डव-चक्रस्य लक्षणं शृणु साम्प्रतम् । खड्ग-वेताल-सिद्धिश्च पर-काय-प्रवेशनम् ॥१०१ चराचर- र-गतित्वं च ाणिमाद्यष्टकं तथा। त्रिपुरा-चक्र-मन्त्राणां लक्षणं शृणु पार्वति ॥ १०२ मनोरथस्य चाक्लेशस्त्रिपुरा-चक्र-मण्डले । पष्टि-सिद्धीश्वरो भूत्वा भुवि स्वर्गे च भू-तले ॥ १०३ विशङ्करस्या ये मन्त्रास्ते च कुत्र प्रतिष्ठिता। अर्ध-नारोश-चक्र तु ते च तिष्ठन्ति पार्वति ॥ १०४ विधा शङ्करतां यातास्ते वै पर-शिवस्य च । मण्डले संस्थिता देवि ! सुन्दरीव तु लक्षणम् ॥ १०५ परा-प्रासाद-मन्त्रो हि प्रासाद-परयाऽथवा । यथा द्वि-धात्वमापन्नस्तत्रापि च महेश्वरि ।।१०६ आद्यं यत्तु भवेद् देवि ! तदाद्य-शङ्करो मतः । स शङ्करः परा-वत् स्यात् किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥१०७ श्रीदेव्युवाच- स्वप्न-लब्धे महा-देवि ! ऋपिच्छन्दादिकं कथम् । ऋषिच्छन्दादिकं यन्न स्वप्ने प्रोक्तं महेश्वर ॥१०८ तथा पीठादिकं ध्यानं यन्न प्रोक्तं महेश्वर ! यत्र नोक्तं महा-देव ! तत्र किं च कथं भवेत् ॥ १०६ श्रीशिव उवाच---- ऋषिः शिव इति प्रोक्तो गायत्रीच्छन्द ईरितम् । चिद्-रूपा देवता देवि ! कोलकाद्यं न विद्यते ॥ ११० .[३७ --
द्रविडाख्यं मतं प्रोक्तं कश्मीरं शृणु यत्नतः ।
ऋपिच्छन्दानुक्ते तु ऋषिब्रह्मा महेश्वरि ॥ १११
गायत्रीच्छन्द आदिष्टं को विजानाति पार्वति !
स्वराः शक्तय इत्युक्तास्त्वव्यक्तं कीलकं मतम् ॥ ११२
पोठं तु मातृका-पीठं ध्यानादि मातृकोक्त-वत् ।
गौड-क्रमे महेशानि ! सिद्ध-मन्त्रतया शिवे ॥ ११३
न ऋषिच्छन्दसी देवि ! न पूजा-नियमः शिवे !
जप-मात्रेण सिद्धिः स्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥ ११४
न चक्र-शोधनादीनि सिद्ध-मन्ने महेश्वरि !
सिद्ध-मन्त्रे विकल्पश्चेत् सिद्धत्वं तस्य गच्छति ॥ ११५
न ऋणं न धनं वापि जप-मात्रेण सिद्धिदः ।
पुरश्चर्यादिकं देवि ! पूर्ववत् परिकीर्तितम् ॥ ११६
न पडङ्ग महेशानि ! चैतन्येशी तु देवता।
प्राण-प्रतिष्ठा-ध्यानं तु ध्यान-मात्रं प्रकीर्तितम् ॥ ११७
तेजः-पुझं मन्त्र-वर्ण-ध्यानं सर्वार्थ-सिद्धिदम् ।
मून-मन्त्र-पडावृत्या पडङ्ग न्यासमाचरेत् ॥११८
पदं यत्र भवेद् देवि ! तेन वा न्यसनं चरेत् ।
यन्त्र प्रोक्तं पडङ्गाधं तत्र वै तत् समाचरेत् ॥ ११६
पोठेऽनुक्ते शक्ति पीठं ध्यानेऽनुक्ते तु मातृका ।
पुरश्चर्याद्यनुक्ते तु दिक्-सहस्र जपेत् प्रिये ॥ १२०
द्वा-विशाक्षर-पर्यन्तं दिक्-सहलं प्रकीर्तितम् ।
तदुत्तरं महा-देधि!
गजान्तक-सहस्रकम् ।। १२१
स्वप्न-लब्धे स्त्रिया दत्ते ह्यन्तरं तु कियद् भवेत् ।
संस्कारे साम्यता देवि ! घट-संस्कार-मात्रके ।। १२२
सिद्धारि-चक्र देवेशि ! नाम-मानं तु शोधयेत् ।
प्राण-चक्र विचिन्त्याय रुद्र-चक्राणि संन्यसेत् ॥ १२३
३८]
ऋण-धनाख्य-चक्रं हि सर्वत्र कोतितं मया । ऋण-चकं विहायाय दशावुद-मितं जपेत् ॥ १२४ न तस्य सिद्धिदेवेशि ! देवता-शापमाप्नुयात् । स्वस्य नास्ति ऋणित्वं हि देवे दोषो हि दीयते ॥ १२५ दोषो न दद्याद् देवेषु चोत्तमण जपेत् सदा । ऋणिमन्त्रं समाश्रित्य यो मन्त्रान् विविधान् जपेत् ॥१२६ इह सिद्धीश्वरो भूत्वा परे शिव-समो भवेत् । मन्त्रे संशोध्यमाने तु ऋणं हि दृश्यते प्रिये ॥ १२७ श्रीदेव्युवाच- सिद्धिः स्वानुभवादेव तत्र कि वर्तते प्रभो ? श्रीशिव उवाच- पूर्व संसाधितो मन्त्रः स ऋणीत्यभिधीयते ॥ १२८ तद्-युग-स्थान-नाना तु स ऋणी परिनिष्ठितः । तत्प्रभावान्महेशानि ! स मन्त्रः सिद्धि-दायकः ॥ १२६ स्वप्न-मध्ये तु सम्प्राप्तश्चमत्कारो न विद्यते शोध्यमाने महा-चक्न न ऋणी दृश्यते स्फुटम् ॥ १३० स मन्त्रस्तु धनी देवि ! शिष्येभ्यश्चोपदेशयेत् । श्रीदेव्युवाच- पूर्व प्रोक्तं त्वया देव ! स्वप्न-लब्धादयः प्रभो ॥ १३१ स्वप्नलब्धा स्त्रिया दत्ता माला-मन्त्रादिकाः प्रिय! सिद्ध-मन्त्रा इति प्रोक्तास्त्वन्यथा प्रतिपादितम् ॥ १३२ तत्र मे संशयो जातस्तन्मे वद महेश्वर ! श्रीशिव उवाच- सत्यमेतन्महेशानि ! सिद्धत्वं वर्तते स्फुटम् ।। १३३ यत्नास्ति प्रत्ययो देवि ! स सिद्धः परिकीर्तितः। प्रत्ययो नास्ति देवेशि ! स धनी परिकीर्तितः ।। १३४ [३६ -
सिद्धत्वं प्रत्यये देवि ! न सर्वे सिद्धतां गताः ।
पूर्व-संस्कार-वशतस्त्वन्ये मन्त्राः प्रकीर्तिताः ॥ १३५
पारम्पर्येण सम्प्राप्ताः संस्कार-वशतः शिवे !
तस्माद् ऋण-धनं शोध्य मन्त्री जप्यः शुभेच्छुना ॥१३६
पूर्व-नाना ऋणित्वं हि तथैव विद्यमानता ।
ईदृशस्तु महेशानि ! महा-भाग्येन लभ्यते ॥ १३७
संस्कारेण तु सम्प्राप्तस्त्वधुना ऋणतां गतः ।
सोऽपि वै तादृशो देवि ! न धनी तादृशो मतः ।। १३८
चक्र-पञ्चक-मध्ये तु ह्येतद् योज्यं महेश्वरि !
इति संक्षेमतः प्रोक्तं साधनान्तं प्रकीर्तितम् ॥ १३६
पुंस्त्रोनपुंसका देवि फट-स्वाहा हृत् क्रमात् स्मृताः
इति संक्षेषतः प्रोक्तं साधनं कथ्यते शृणु ॥ १४०
अस्त्रमध्ये त्वस्त्रमन्त्राः वह्निकान्तान्तिकाः स्त्रियां
नमोऽन्ताः शिव-मन्त्रेषु ह्यन्तर्भूता इतीरिताः ॥ १४१
केचिद् द्वि-मातृकोक्तं हि ध्यानमिच्छन्ति पार्वति !
केचित् नश्यन्तु काश्मीरा द्विधा भेदः प्रकीर्तितः ॥१४२
पञ्चायतन-योगेन मन्त्रार्थेन महेश्वरि !
पल्लवेनाथ देवेशि ! ह्यन्तर्भूता भवन्ति हि ॥ १४३
भुवि स्थितास्तु ये मन्त्राः पल्लवैः सङ्गता यदि ।
ते हि स्वप्नेषु सम्प्राप्तास्तेषां कुत्र प्रयोजना ॥ १४४
केचित्तु कवचे प्रोक्ताः केचित् स्तोत्रे प्रकीर्तिताः ।
प्रधान-वत्तु
ते सर्वे सञ्जप्याः परमेश्वरि ।। १४५
प्रधानोक्तं तु यत् कर्म तत्तत् सर्वत्र कीर्तितम् ।
तत्रोदाहरणं देवि ! नील-सारस्वते स्मर ॥ १४६
गुरूपदिण्टा देवेशि ! पुरश्चर्या प्रकोतिता ।
तत्र मार्ग-क्रमो देवि ! कथितः पूर्व-वत् प्रिये ॥ १४७
... केरले तु पुरश्चर्या दशाङ्गा परिकीर्तिता। अष्टाङ्गा तु पुरश्चर्या काश्मोरे कथिता मया ॥ १४८ पञ्चाङ्गा तु पुरश्चर्या गौड-मार्ग प्रकीर्तिता । स्वप्न-लब्धे महेशानि ! अङ्गे पुरस्क्रिया मता ॥ १४६ जपो होमो ब्राह्मणानां भोजनं त्रितयं मतम् । स्वप्न-लब्धे पुरश्चर्या दोष-द्वय-निवारणम् ॥ १५० जात-सूतकमादौ स्यात् तदन्ते मृत-सूतकम् । सूतक-द्वय-संयुक्तः स मन्त्रो नैव सिद्धयति ॥ १५१ श्रीदेव्युवाच- जात-सूतक-दोपस्य वारणं केन वा भवेत् ? श्रीशिव उवाच- 'लिखेदष्ट-दलं शुभम् ॥ १५२ तन्मध्ये कलशं स्थाप्य तत्र वै वट-पत्रकम् । वट-पन्ने कुंकुमेन लिखित्वा मन्त्रमेव तु ।। १५३ कलशं पुरतः स्थाप्य गुरोः प्राणान् निवेशयेत् । गुरोः सकाशाद् ग्रहणं जात-सूतक-वारणम् ॥ १५४ श्रीदेव्युवाच- मृत-सूतक-दोपो हि कीदृशः परमेश्वर श्रीशिव उवाच- बिना पुरस्क्रियां देवि ! मन्त्रो मृत इतीरितः ॥ १५५ जीव-हीनो यथा देहः सर्व-कर्ममु न क्षमः । पुरश्चरण-हीनो हि तथा मन्त्रः प्रकीर्तितः १५६ तस्मात् कुर्यात् पुरश्चर्या मृत-दोष-प्रशान्तये। यो मन्त्रश्चेतना-युक्तः स मन्त्रः सिद्धि-दायकः ॥ १५७ चैतन्यं तु पुरश्चर्या चैतन्य गुरुरेव च । यन्त्र-चैतन्यकं देवि ! मन्त्र-चैतन्यक तथा ॥ १५८ [४१ ?
गुरु-चैतन्यकं चैव चैतन्य-त्रितयं मतम् । चैतन्य-त्रय-हीनो यः स मन्त्रः सिद्धिदो न हि ।। १५६ स्वप्न लब्धो धनी चेत् स्यात् तदा कि वा विधीयतां मन्त्रानुसारतो देवि ! पुरश्चर्या समाचरेत् ॥ १६० ततच्चक्रानुसारेण होम-कर्म समाचरेत् । अनुक्त-होम-द्रव्ये तु तिलोमः प्रकीर्तिताः ॥ १६१ घृतेन कथितो देवि ! यवेनापि तथैव हि । फेवलं घृत-होमेन वरदाः सर्व-शक्तय ॥१६२ एवं पुरस्क्रियां कृत्वा सिद्धत्वं प्रविचार्य च । मण्डलान्तं परीक्ष्याऽथ ह्यथवा त्वयनान्तकम् ॥ १६३ वत्सरान्तं चावलोक्य सहस्त्रं प्रत्यहं जपेत् । चमत्कारो न जायेत तदा शिष्यो वदेद् गुरुम् ।। १६४ ऋणादिकं विचार्याऽथ शिष्याय प्रवदेच्छिवे ! अन्यथा विकलो भूयाच्छिष्य-पापं गुरौ भवेत् ॥ १६५ स्यागं न कुर्याद देवेशि ! मन्त्र-त्यागे दरिद्रता । इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ १६६ श्रीदेव्युवाच- भू-लोकस्थो महा-मन्त्रः स्वप्न-मध्ये समागतः । तब कि वा प्रकर्तव्यं कि तत्र मण्डलं भवेत् ।। १६७ श्रीशिव उवाच- पूर्व संसाधितो मन्त्री दत्तः केनाप्यसाधितः । स ऋणी वा धनी वाऽपि विचार्य साधयेत् प्रिये ॥ १६८ तत्तत्-कल्पोक्त-रीत्या तु पुरश्चरणमाचरेत् । पारम्पर्य-विहीनत्वात् पूर्व-संसाधनात् प्रिये ॥१६६ स्वप्न-द्वारा तु सम्प्राप्तस्तं मन्त्रं साधयेत् प्रिये ! श्रीदेव्युवाच- अरि-मन्त्रः स्वप्न-मध्ये प्राप्तश्चेत् कि विधीयतां ॥ १७० ४२]
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पल्लवं योजयेद् वापि त्याज्यो वा यत्नतः शिवे !
पल्लवैः संयुतो यो हि मन्त्रान्तरमुपागतः ॥ १७१
मूल-प्रकृति-वद् देवि ! सर्व प्रोक्तं मया तव ।
अस्त्र-प्रकरणाद् देवि ! शस्त्र-मध्ये प्रयोजना ॥ १७२
मन्त्र-प्रकरणाद् देवि ! मन्त्र-मध्ये नियोजयेत् ।
मूल-प्रस्तार-मार्गेण दर्शनादि-क्रमेण तु ॥ १७३
पडाम्नाय-क्रमेणव प्रस्तार-द्वारतः शिवे !
मन्त्र-माने तथा विद्या-मात्रे प्रस्तार-साधना ॥ १७४
पूर्वमेव मया प्रोक्ता संख्यां शृणु महेश्वरि !
मन्त्र-विद्यादि-भेदस्तु आन्नाय-दर्शनादिकः ॥ १७५
पारे परार्ध-संख्याता मन्त्रा जाता महेश्वरि !
कलो प्रस्तार-हीनत्वादडा एव प्रकीर्तिताः ।। १७६
प्रस्तार-रूपं यज्ज्ञानं गुह्याद् गुह्यतरं शिवे !
आदिनाथो विजानाति नाहं जानामि पार्वति ॥ १७७
श्रीमहा-सुन्दरी विद्या काली कामकला तु सा ।
प्रादिनाथ-परशिवी वीजांकुर-समानको ॥ १७८
तथा कामकला कालो श्रीमहा-सुन्दरी प्रिये !
सर्व संक्षेपतः प्रोक्तं रहस्यं शृणु पार्वति ॥ १७६
स्त्री-लब्धे देव-देवेशि ! श्रीमद्-देवी-परम्परा ।
स्वप्न-लब्धे महा-देवि ! दक्ष-मूर्ति-परम्परा ॥ १८०
पूजयेद् दक्षिणामूर्ति गुरुत्वेन महेश्वरि !
चतुष्कं पूजयेवावी किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ।।११
पडाम्नायस्य मन्त्राणां प्रस्तार-गरगना शिवे ।
पडाम्नायस्य प्रस्तारास्त्रिंशद्-वृन्द-निखर्वकाः ॥ १८२
पञ्चावंदेति मन्त्राः स्युः पूर्वाम्नाये महेश्वरि !
दक्षान्नाये महेशानि ! नवत्यर्बुद-कोटिकम् ॥ १८३
पञ्च-खर्वेण संयुक्ता मन्त्राः प्रोक्ता महेश्वरि ! आम्नाये पश्चिमे देवि ! त्रिंशदर्बुद-पद्म काः ।। १८४ मन्त्राः प्रोक्ता महेशानि !चोत्तरं शृणु सादरम् । पञ्चाशद वै महा-पद्म पडर्बुद-त्रि-वृन्दकम् ॥१८५ ऊर्ध्वान्नाये महा-देवि प्रस्तार-गणनां शृणु । अष्टाव॒दं कोटि-वृन्दं पञ्च-शङ्कति कीर्तिताः ।। १८६ पातालान्नाय-गणनां शृणु यत्नेन साम्प्रतम् । कोट्यव॒दं निव-नवति वृन्दं पभेन संयुताः ॥ १८७ मन्त्राः पाताल-प्रस्तार-मध्यस्थाः परमेश्वरि ! पडामायस्य प्रस्ताराः प्रोक्ता यत्नेन शाकरि ॥ १८८ न प्रकाश्या यत्र कुत्र गणना-मात्र-गोचराः । गणितं यो हि जानाति शिव-सिद्धान्तगं शिवे ॥ १८६ अष्टाविंशति-सिद्धान्ते यस्य ज्ञानं भवेत् प्रिये ! श्रीसिद्धान्त-मते देवि ! प्रस्तार-ज्ञानमेव हि ॥ १६० प्रस्तारज्ञो महेशानि ! कलौ दुर्लभ एव हि । गणना कथिता देवि ! प्रकारः कथ्यते शृणु ॥ १६१ एतत्-प्रस्तार-विज्ञानी शिव-रूपो न संशयः । प्रस्तारज्ञस्य मुखतो यद्यन्नियति तत् प्रिये ॥ १६२ शिव-वाक्य-समं तत्तत् किमुत फल-कत्यनम् । इति संक्षेपतः प्रोक्तं प्रस्तारः कथ्यते परः ॥ १६३ श्रीदेव्युवाच- संसूचितं तु यत् पूर्व कथ्यतामपि साम्प्रतम् । मन्त्र वृत्तं महा-देव ! कथं ध्यायेद्धि तद् वद ॥ १६४ होम-तर्पण-कार्याणि कथं कार्याणि तद् वद । श्रीशिव उवाच- दल-मूलं तु यद् वृत्तं तदाधारस्थमीरितम् ॥ १६५
दलोपरिस्थं वृत्तं हि शृणु त्वं प्रारण-वल्लभे !
चन्द्र-सूर्याग्निभ-भयं
व्यत्ययेन प्रकीर्तितम् ॥ १६६
एते प्रसिद्धा देवेशि ! न हि चन्द्राः प्रकीर्तिताः ।
देव्याः कोटयर्बुद-कला सदोदेति हि यत्र वै॥ १६७
स चन्द्रः स च सूर्यश्च सोऽग्निर्मुख्य इतीरितः।
षडन्वये महेशानि ! ते च प्रोक्ता मया तव ॥ १६८
त्रि-रूपं वृत्त-त्रितयं तेजो-रूपं महेश्वरि !
विराट-स्वरूपं यत् प्रोक्तं तदेव परिनिष्ठितम् ।। १६८
अन्यत्र स्मरणीयं हि स-वृत्ति-ध्यान-कर्मणि ।
तेजः-पुञ्ज-निभां देवि ! परिखां संस्मरेत् सदा ॥२००
उत्तरोत्तरतो देवि ! सगुण-ध्यान-कर्मणि ।
उत्तरोत्तरतोच्चत्वे चिन्त्यमाने महेश्वरि ॥२०१
साम्मुख्यं चैव सर्वेषां वर्तते प्रिय-वादिनि !
यथोच्च-नीच-स्थानेषु सर्वा आवृत्तियो मताः ॥ २०२
इति कारणतो मुख्यो मेरु-प्रस्तार ईरितः ।
कैलासाख्यस्तथा देवि! प्रस्तारः परिकीतितः ॥ २०३
रत्नगर्भाख्य-प्रस्तारस्तृतीयः परिकीर्तितः ।
आध-प्रस्तारे देवेशि ! सर्वेषां दर्शनं समम् ॥ २०४
कैलासाख्ये महेशानि ! केपाश्चिदन्तरायिताः।
रत्न-गर्भाख्य-प्रस्तारे मुख्या मताः प्रकीर्तिताः॥२०५
आवृत्तयस्तु देवेशि ! त्रिधा भेदत्वमागताः।
नोचेत् विधात्वं किमर्थं विश्व-रूपत्वमेव तु ॥ २०६
सर्वत्र कौतितं पूर्व सत्यमेव महेश्वरि !
अधिकार-वशाद् देवि! तत्तत्-स्थान-समाश्रयः ॥२०७
होम-कर्म शृणु प्राज्ञे ! पूर्व प्रश्नोत्तरं तव ।
होमे स्वाहां प्रयुञ्जीत हुन्मन्त्रः परिकीर्तितः ।। २०८
[४५
तथाभिषेके देवेशि ! हृन्मन्त्रः परिकीतितः। होमेऽग्नि-जाया या प्रोक्ता सा होमे परिनिष्ठिता ॥ २०६ मन्त्र-मध्ये यदा वह्नि-जाया वर्तते प्रभो ! मन्त्रान्ते चैव हृन्मन्त्रास्तथा वह्नि-प्रिया विभो ॥ २१० मन्त्रेणैव तु निर्वाही द्वितीया कि प्रयोज्यताम् । मन्त्रान्ते या वह्नि जाया सा तु मन्त्र-स्वरूपिणी ॥ २११ होमाङ्गत्वे द्वितीया तु कीर्तिता वै मया तव । तथैव तर्पणे विद्धि हन्मन्त्रस्तु द्वितीयकः ॥ २१२ एवं न कुरुते यस्तु स होनायुर्भवेच्छिवे । होम-कर्म तु कार्य स्यान्मन्त्रे सिद्धे फलं भवेत् ॥ २१३ सैवाग्नि-जाया चेद-होमे गृह्यते प्राण-वल्लभे ! स्वस्य प्रभुत्वमायाति मन्त्राः क्लिन्ना भवेत् प्रिये ॥२१४ क्लिन्न-दोष-निवृत्यर्थ होमे स्वाहा मयेरिता । स्वानन्दोप-निवृत्यर्थ हृन्मन्त्रस्तर्पणे मतः ॥ २१५ मन्त्र-क्षोभे महेशानि ! हुं-फडादि तु वर्तते । तथापि पल्लवत्वेन पुनर्देयं महेश्वरि ॥२१६ हृन्मन्त्रेण पुटीकारे क्रियमाणे महेश्वरि ! मन्त्र-क्षोम-निवृत्तिस्तु सर्वथा जायते शिवे ॥ २१७ मन्त्र-मध्ये नतिर्देवि ! वर्तते यद्यपि प्रिये ! तथापि सम्पुटत्वेन पुनर्देया महेश्वरि ॥ २१८ हृदयादि षडस्त्राणां पुरश्चर्योच्यते शृणु। इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥ २१६ श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि रहस्यं भावना-क्रमे । श्रीशिव उवाच- स्वाहान्तः सर्व कार्याथं फडन्तः क्रूर-कर्मणि ॥ २२० नमोऽन्तो मारणादौ तु मन्त्र-जातेः फलं स्मृतम् । शक्ती स्त्रीपु च मन्त्रेषु रुद्राक्षं वर्जयेच्छिवे ॥ २२१ ४६]
अय वक्ष्यामि देवेशि! चतुर्णामक्य-भावनाम् ।
गुरु-दैवत-मन्त्राणां स्वाभिन्नत्वेन भावना
॥ २२२
गुरु-तजः-स्वरूपं हि कूटमेकं विभावयेत् ।
देव-चैतन्य-कूटं हि तेजो-रूपं विभावयेत् ॥ २२३
मन्त्राक्षराणां चंतन्यं
ज्वलत्-पर्वत-सन्निभम् ।
स्वात्म-चैतन्य-फूटं हि तथैव मेरु-तुल्यकम् ॥ २२४
एकीभूतं चतुस्तेजो ब्रह्माण्ड-व्यापकं शिवे !
कोटि-कालानल-प्रख्यं यम-सूर्य-सम-प्रभम् ॥ २२५
चन्द्रार्बुद-समं देवि ! विरा-रूपं विभावयेत् ।
तेजः-पुजं विभाव्याथ तत्र मूति प्रकल्पयेत् ॥ २२६
तनेष्ट-देवतां रम्या कोटि-कन्दर्प-सन्निभाम् ।
ध्यानोक्तां तां तु सन्ध्यात्वा जपं कुर्यात् समाहितः ।। २२७
अथवा सकलं ध्यायेत् तेजः-पुज्ज-निभं शिवे !
एकीभूतं च तत्-तेजः सदा ध्यायेन्महेश्वरि ॥ २२८
अथान्तर्मातृकां वक्ष्ये पारम्पर्य-क्रमागताम् ।
पड्-दलानां स्वरूपं तु पूर्वमेव प्रकीर्तितम् ॥ २२६
वर्णोच्चारादिकं सर्व प्रोक्तं तुभ्यं मया शिवे !
न्यसनस्य क्रम देवि ! विलास-सम्प्रदायके ।। २३०
कथ्यते शृणु देवेशि ! रहस्याति-रहस्यकम् ।
ब्रह्माण्डात् कोट-पर्यन्नं शिव-शक्ति-मयं ध्रुवम् ॥ २३१
शिव-शक्ति-मये मार्ग परा-प्रासाद-गोचरे ।
श्रीप्रासाद-परापि स्याद् विन्दु-सर्गान्वितापि सा ॥ २३२
हंस-शक्ति-मनु-युतं विन्दु-नादान्वितं शिवे !
श्रीप्रासाद-परा-मन्त्रः कीर्तितः परमेश्वरि ॥ २३३
हाधमादौ समुद्धृत्य मध्येऽणं विन्दु-संयुतम् ।
( साद्यमन्ते
समुच्चार्य न्यसनीयं क्रमेण तु ॥ २३४
[४७
प्रत्यर्ण विन्यसेद् देवि ! योगं बाह्यमुपाचरेत् ।
साद्यं हाचं साथ-हाचे वर्णादौ तु समुच्चरेत् ॥ २३५
ततो वर्ण समुच्चार्य न्यसनीयं महेश्वरि !
हायेन केवलेनैव सम्पुटोकृत्य मन्त्र-वित् ॥ २३६
सायेन केवलेनैव सम्पुटीकृत्य मन्त्र-वित् !
साद्य-योगं ततो वर्ण न्यसेद् देवि ! यथा-क्रमात ॥ २३७
हाद्य-योगं ततो वर्ण न्यसेद् देवि ! यथा-क्रमात् ।
श्री-बोज तु समुद्धृत्य श्रीप्रासाद-परा ततः ॥ २३८
पुनः श्रीबीजमुद्धृत्य ततोऽणं तु समुच्चरेत् ।
अनेन सम्पुटीकृत्य न्यसेत् तत्तत्-स्थले शिवे ॥ २३६
श्री स्त्री ततःश्री वै वर्ण ततः श्री तु समुद्धरेत् ।
पुनः श्री-बीजमुद्धृत्य हसौं श्री तु समुच्चरेत् ॥ २४०
एवं सम्पुट-योगेन न्यसनीयं महेश्वरि !
श्री-बीज-पुटितं हाचं ततो वणं समुच्चरेत् ॥ २४१
आदी बीजं ततो वर्ण न्यसेद् तत्तत-स्थले प्रिये !
श्री-बीजं तु ततः साधं पुनः श्री-बीजमुच्चरेत् ।। २४२
अनेन सम्पुटोकृत्य न्यसेद् यत्नेन शाम्भवि !
श्री-बीज-पुटितं साद्यं ततो वर्ण समुच्चरेत् ॥ २४३
अनेन क्रम-योगेन सुन्दरी सुप्रसीदति ।
सायं श्री-बोज-पुटितं ततो वर्ण महेश्वरि ॥ २४४
हाद्यं थो-बीज-पुटितं वर्णान्ते तु समुच्चरेत् ।
एवं विन्यस्य यत्नेन साक्षात् सिद्धीश्वरो भवेत् ।। २४५
श्रीवोज-पुटितं हायं साधं श्री।पुटितं तथा ।
ततो वर्ण महेशानि ! पूर्व-वीजानि चोच्चरेत् ।। २४६
एव हि सम्पुटीकृत्य सद्योग समुपाचरेत् ।
साद्यं श्री-बीज-पुटित हायं श्री-बीज-पुटितं ततः ॥ २४७
ततो वर्ण पुनर्बीजं न्यसेत् साधक-सत्तमः।
योगं कृत्वाऽथवा देवि ! न्यसनीयं महेश्वरि ।। २४८
श्री-बीज-पुटितं हाचं साधं च तत्पुटीकृतम् ।
वणं तत्पुटितं कृत्वा योगं च समुपाचरेत् ॥ २४६
साद्यं श्री-धोज-पुटितं हाद्यं च तत्पुटीकृतम् ।
एतैस्तु पुटितं वर्ण योगं च समुपाचरेत् ॥ २५०
हायं श्री-पुटितं देवि ! साद्यं श्री-पुटितं तथा ।
पुनर्हाद्यं श्री-पुटितं ततो वर्ण समुच्चरेत् ।। २५१
एतस्तु सम्पुटीकृत्य पुनर्योगं समाचरेत् ।
साधं श्री-पुटितं देवि! हाचं श्री-पुटितं तया ॥ २५२
पुनः साद्यं श्री-पुटितं ततो वर्ण तु पूर्व-वत् ।
हाधं श्री-पुटितं देवि ! साद्यं श्री-योग-युक्तकम् ॥ २५३
पुनर्हायं श्री-पुटितं वर्ण तैस्तु पुटीकृतम् ।
आदी योगं च वा कृत्वा ततः साद्यं तु हाद्य-वत् ॥ २५४
हाद्यं श्री-पुटितं देवि ! साद्यं श्री-पुटितं तथा।
पुनर्हाद्य श्री-पुटितं हसोऽन्तस्तु पुटीकृतम् ॥ २५५
योगं कृत्वाथवा देवि ! हसौ श्री-पुटितं च वा।
एतैस्तु पुटितं वर्ण हसौं श्री-पुटितं च वा ॥ २५६
श्री-हसौमिति मध्ये वा हसौ श्री-मिति वा शिवे !
हाद्यं श्री-पुटितं देवि ! साद्यं श्री-पुटितं तथा ॥ २५७
पुनर्हाद्य श्री-पुटितं हसौऽन्तस्तु पुटीकृतम् ।
योगं कृत्वायवा देवि ! स्हौं श्री-पुटितं च वा ॥ २५८
एतैस्तु पुटितं वर्ण योग वा पूर्ववच्छिवे !
साद्यं श्री-पुटितं देवि ! हायं श्री-पुटितं तथा ।। २५६
पुनः साद्यं श्री-पुटितं स्हौऽन्तैस्तु पुटीकृतम् ।
एतस्तु पुटितं वर्ण स्हौं श्री-पुटितं च वा ॥ २६०
श्री हौमिति वा मध्ये स्हौं श्री मिति वा प्रिये !
विन्दु-सर्गान्वितं कृत्वा न्यसनीयं महेश्वरि ॥ २६१
[४६
फा०-४
हाध-साध-क्रमेणव
हाधं साधं महेशानि ! श्री-युतं पुटितं च वा ।
पूर्वोक्तः पुटितं ह्यतत् युक्त वा परमेश्वरि ।। २६२
उत्तरोत्तर-योगेन पुटितं संयुतं च वा।
पारायण-क्रम विदुः ॥ २६३
पारायण-क्रमाः सर्वाः प्रोक्ताः पूर्व मया शिवे !
अयं क्रमो महेशानि ! देवानामपि दुर्लभः ॥ २६४
नाख्येयो यत्र कुत्रापि त्वन्यथा शापमाप्नुयात् ।
अनन्त-पादुकाख्योऽयं क्रमः प्रोक्तो मया शिवे ॥ २६५
अन्य-पारायण वि ! सूक्ष्म-कालेन जायते ।
एवं पट्-चक्र-भेदेषु पारायणमुदीरितम् ॥२६६
मेधा-दीक्षा यस्य भवेत् तस्यात्रवाधिकारिता ।
मेधा-दीक्षा विना देवि ! चक्र-पारायणं चरेत् ॥ २६७
स च मृत्युमवाप्नुयात् रोरवं नरकं व्रजेत् ।
पर-काय-प्रवेशादि यस्य हस्ते विराजते ॥ २६८
तस्य मेधा-दीक्षणं हि गदितं तु मया शिवे !
मया पूर्व महेशानि ! षड्-वारं तु कृतं च वै ॥ २६६
अहं किश्चित्तु जानामि तवाग्रे तु प्रकाशितम् ।
पूर्ण जानाति देवेशि ! सुन्दरी पर देवता ॥ २७०
नान्यो जानाति देवेशि ! संक्षेपाद् गदितं मया !
पूर्णाभिषेक-युक्तो हि नाम-पारायणं तथा ॥ २७१
मन्त्र-पारायणं देवि ! नाडी-पारायणादिकम् ।
मेधा-दीक्षा-समायुक्तश्चक्र-पारायणं चरेत् ॥ २७२
अल्पायुष्यादधर्मत्वात् पारुष्य-जल्पनात् शिवे !
कलौ देवेशि ! नान्येषामधिकारो मयेरितः ।। २७३
वालाधिकारी यो देवि ! तस्य विद्याधिकारिता ।
विद्याधिकारे सम्पने पोडश्यामधिकारवान् ॥ १७४
पोढा-विद्यादि-सम्पन्नः परा-विद्याधिकारवान् ।
पराधिकार-संयुक्तः परा-प्रासाद-वान् भवेत् ॥ २७५
श्रीप्रासाद-परा-युक्तो निर्वाणाधिपतिर्भवेत् ।
निर्वाण-दीक्षा-संयुक्तः षडन्वय-विधौ शिवे ॥ २७६
अधिकारी भवेत् सो हि तत्त्वं शृणु महेश्वरि !
षडन्वय-समायुक्तो मेधा-दीक्षाधिकार-वान् ॥ २७७
षडन्वयान्तगं कृत्वा मेधा-दीक्षणमाचरेत् ।
मेधा-दीक्षण-युक्तश्चेत् चन-पारायणं चरेत् ॥ २७८
चक्र पारायणे संख्या सुन्दरी-चरणान्तको ।
वहिः-पारायणे संख्या गदिता तृतयेऽपि च ।। २७६
तथैव कालिकायास्तु प्रोक्ता श्रीचरणान्तको ।
यदैव दर्शनं जातं तदैव तु समापनम् ॥ २८०
बहिरन्तरयो दस्वेतावद् वर्तते शिवे !
प्रस्तार-षोडशान्तं हि कलौ पारायणं चरेत् ॥ २८१
अत्र पारायणं नाम न्यसनं परमेश्वरि !
हठात्-तैरपर्यस्तु करोति परमेश्वरि
॥ २८२
तस्य नाशो भवेद् देवि ! देवता-शापमाप्नुयात् ।
मेधा-दीक्षा-समायुक्तः पोडशोत्तरगं चरेत् ॥ २८३
प्रस्तार-कम-योगेन ज्ञातव्यं परमेश्वरि !
वाला-दीक्षा-समायुक्तश्चन्द्र-प्रस्तार-युक् न्यसेत् ॥ २८४
विद्या-दीक्षा-समायुक्तः साधनाद्यन्तगं न्यसेत् ।
सम्प्रदाय-क्रमेणव विन्यसेत् साधकोत्तमः ॥२८५
पूर्णाभिषेक-युक्तो हि वह्नि-प्रस्तार-सम्पुटान् ।
परा-दीक्षण-युक्तो हि भूत-प्रस्तार-सम्पुटान् ॥२८६
श्रीप्रासाद-परा-युक्तो मुनि-प्रस्तार-सम्पुटान् ।
निरिण-दीक्षा-संयुक्तो नन्द-प्रस्तार-सम्पुटान् ॥ २८७
[५१
षडत्वय-समायुक्तः कला-प्रस्तार-सम्पुटान् योगं त्वथ प्रकुर्वीत ह्यादावन्तेऽपि पार्वति ॥ २८८ मध्ये वर्ण तु कृत्वा च वर्ण-सम्पुटितं न्यसेत् । पूर्णाभिषेक-युक्तो हि पडन्वय-समः शिवे ॥ २८६ पडन्वयानां यत् कर्म तदेतस्यापि कीर्तितम् । पडन्बयोत्तरं देवि ! मेधा-दीक्षां समाचरेत् ।। २६० मेधा-दीक्षण-संयुक्तः प्रस्तार-षोडशोत्तरम् । न्यास-योगेन देवेशि ! चक्र-पारायणं चरेत् ।। २६१ पाकर्षणं त्रिलोकानां वश्याज्ञा-सिद्धिरेव च । पर-काय-प्रवेशश्च गुटिका-सिद्धिरेव च ॥ २६२ वायु-स्तम्भस्तु वेताल-सिद्धिस्तद्धस्त-गोचराः । इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥ २६३ श्रीदेव्युवाच- देव-देव महा-देव ! संसार-स्थिति-कारक ! पूर्व संसूचितं यन्मे तन्मे कथय शङ्कर ।। २६४ किमेतावन्महा-देव ! ममापि गोपितं च यत् । श्रीशिव उवाच- महा-देवि ! पराराध्ये ! सर्व-कारण-विग्रहे ।। २६५ प्राणायाम-रहस्यं हि कथ्यते शृणु साम्प्रतम् । प्राणायामः पञ्चधा स्यात् तत्क्रमं शृणु यत्नतः ॥ २६६ कलाभिः पूरफ फुर्यान्महतीभिश्च कुम्भकम् । रेचकं च तदर्धाभिः पुनरेतत् वयं चरेत् ।। २६७ त्रिवारं वितयं कुर्यात् प्राणायामः प्रकीर्तितः । क्रमोत्क्रमेण देवेशि ! द्वितीयः परिकीर्तितः ॥ २६८ कुम्भकान्तो,महेशानि ! यतीनां वाम-चारिणाम् । रेचकं वा पूरकं वा कृत्वा द्विविध ईरितः ।। २६६ अवान्तरास्य-भेदो हि कथितस्ते मया तव । तृतीयस्तु महेशानि ! कथ्यते शृणु साम्प्रतम् ॥ ३०० ५२] कला-वृद्धि तवधं च कृत्वादौ .परमेश्वरि ! अन्यदादि समारभ्य क्रमेणानेन कारयेत् ॥ ३०१ पूर्व-वत्तु तृतीयं स्यादेवं वार-त्रयं चरेत् । कुम्भकाद्यं तद् द्वयान्ते प्राणायाम-द्वयं भवेत् ॥ ३०२ पूर्वोक्त-क्रम-योगेन तदन्यः परिकीर्तितः । द्वितीयाख्य-क्रमेणव द्वितीयः परिकीर्तितः ॥ ३०३ तृतीयाख्य-क्रमेणव तृतीयः परिनिण्ठितः । माला-शृङ्खलिका-योगात् तृतीयः परिकीर्तितः ॥ ३०४ माला-शृङ्घलिका-योग-निरुक्ति शृणु सादरम् । आद्यादन्तं चरेद् देवि ! ह्यन्तादाद्यं समाचरेत् ॥ ३०५ पुनराद्यं तथान्तं च प्राणायामः कला-पतिः । अत्र पूर्व-त्रयं कृत्वा प्रस्तारः परिकीर्तितः ॥३०६ पुनरन्तं तथाद्यं च यावत् तृतयकं भवेत् । कला-शृङ्खलिकाख्यस्तु प्राणायामः प्रकीर्तितः ॥ ३०७ कला-वसुर्वेद-संख्य-प्राणायामस्तथापरः महा-मन्त्र-विधौ देवि ! कीर्तितस्ते मया तव ॥३०८ अष्टौ वेद-द्वितयकं ततोऽधिक्ये प्रकीर्तिताः । ततोऽधिक्ये महेशानि ! वेद-नेत्र-शशि-क्रमात् ॥ ३०६ प्रस्ताराः कथिता देवि ! शृणु वर्ण-क्रमेण तु । कुम्भकाद्यं समारभ्य द्विविधोऽयं प्रकीर्तितः ॥ ३१० पूर्वोक्त-वह्नि-भेदेन भेद-बाहुल्यमीरितम् कला-शृङ्खलिका-योगात् प्रस्तारः पूर्व-सुचिताः ॥ ३११ वर्ण-क्रमो महेशानि ! कथ्यते शृणु साम्प्रतम् । स्वरैः पूरकमाचर्य वर्णैः कुम्भककं भवेत् ॥३१२ आद्या तु नासिका प्रोक्ता चतुस्त्रिशतिक पुनः । कृत्वा तु कुम्भकं देवि ! द्विरावृत्या स्वरैः शिवे ॥ ३१३ रेचकं कारयेद् देवि ! प्राणायाम-त्रयं शिवे ! पूर्वोक्त-क्रम-योगेन ईरितः ॥३१४ प्रस्तार-क्रम
केवलेन स्वरेणव कला-पट-वेद-संयुतम् ।
अत्र पूर्वोक्त-योगेन प्रस्तार-भव-भाजनम् ॥३१५
ईडया कर्षयेद्
वायुर्वाह्य-पोडश-मात्रया ।
धारयेत पूरकं योगी चतु षष्टया तु मात्रया ॥३१६
सुपुम्णा-मध्यग सम्यक् द्वात्रिंशन्मात्रया शनैः।
नाड्या पिङ्गलया चैनं रेचयेद् योग-वित्तमः ॥ ३१७
प्राणायाममिमं प्राहुर्योग-शास्त्र-विशारदाः
भूयो भूयः क्रमात् तस्य व्यत्यासेन समाचरेत् ॥ ३१८
मात्रा-वृद्धि-क्रमेणव सम्यक् द्वादश षोडश ।
जप-ध्यानादिभिर्युक्त सगभं तं विदुर्बुधाः ।। ३१६
तदपेतं विगर्भ तु प्राणायाम परे विदुः ।
क्रमादम्यसतां पुंसा देहे स्वेद-भ्रमोद्गमः ।। ३२०
अगर्भ तु महेशानि ! एतदन्यं शृणु प्रिये !
मध्यमा कम्प-सयुक्तो भूमि-त्यागोऽपरो मतः ॥ ३२१
मध्यमस्तु ससन्धिः स्यात् परः साध्याय्यको भवेत् ।
पञ्चधा कथितो देवि ! प्राणायाम-क्रमो मया ।। ३२२
प्राणायाम-जपासक्तः सिद्ध-योगीश्वरो भवेत् ।
प्राणायाम-जपेनैव कि न सिद्ध यति भू-तले ॥ ३२३
पल-नाडी-मुहूर्ताख्यः तद् द्वय प्रहर-क्रमात् ।
विवाहोरान-योगेन साधयेत् स्थिर-मानसः ।। ३२४
एवं साधयतः पुंसो योगाः सर्वेऽपि हस्तगाः ।
प्राणायाम-जपो देवि ! मुख्यत्वेन प्रकोतितः ॥ ३२५
तदभावे महेशानि । प्राणायामं च वा चरेत् ।
भूत-शुद्धि-विधौ योज्यः शोषणादि-विधौ शिवे ।। ३२६
प्राणायाम-प्रमेणव निः सकृद् वा समाचरेत् ।
नन्द-सय्या यदा भूयात् प्राणायामस्तदा चरेत् ।। ३२७
केरलाण्य-क्रमे देवि ! न च शोपणमोरितम् ।
काश्मीराख्य-क्रमे देवि ! शोषणादि समाचरेत ॥ ३२८
गौडः काश्मीर-तुल्यः स्याच्चैतन्यस्तु चतुर्थकः ।
प्राणायाम-क्रमो देवि ! भूत-शुद्धि-क्रमोऽपि च ॥ ३२६
यथा-योगं योजनीयं किमन्यच्छोतुमिच्छसि ।
क
चतुर्थः पटलः मन्त्र-प्रस्तार-निर्णयः श्रीदेव्युवाच- पूर्व संसूचितं यन्मे यन्त्र-प्रस्तार निर्णयम् । तन्मे कथय देवेश ! यद्यहं तव वल्लभा ॥१ श्रीशिव उवाच- गोप्याद् गोप्यतरं देवि ! स्व-योनिरिव पावति ! तहि तत् ते वदाम्यत्र वक्तव्यं त्वया शिवे ॥२ चत्वारि शिव-चकारिण शक्ति-चक्राणि पश्व च । सामरस्याद् भवेच्चकं श्रीचक्रं सर्व-रूपकम् ॥ ३ विन्दोमन्वन-पर्यन्तं शक्ति-चक्रं प्रकीर्तितम् । तदुत्तरं महेशानि ! द्वारान्तं शिव-चक्रकम् ॥ ४ शुद्ध-चक्नमिदं प्रोक्तमिदमेव त्रिधा भवेत् । भूः कैलासस्तथा मेर-प्रस्तारत्वेन पार्वति ॥५ भू-प्रस्तारो द्विधा देवि ! पातालोर्ध्व-क्रमेण तु । कैलासाख्यस्तु प्रस्तारो द्विविधः परिकीर्तितः ॥६ अर्ध-कैलास-संज्ञस्तु पूर्ण-कैलासकस्तथा तथैव मेरु-प्रस्तारः कीर्तितस्तु मया तव ॥७ सृष्टि-स्थित्युपसंहार-क्रमादष्टादशव सृष्टि-स्थित्युपसंहार-बीज-लेख-क्रमेण तु ऋत्वग्निसंख्याःप्रस्तारास्त्वङ्कानां वामतो गति।। नित्यायाश्चैव तादात्म्यं प्रस्तारे मेरु-संज्ञके ॥६ मातृकायाश्च तादात्म्यं कैलासाख्यं प्रकीर्तितम् । वाग्-देवतायास्तादात्म्यं भू-प्रस्तारे प्रकीर्तितम् ॥ १० इमं यन्त्रं तु पोडश्यां कीर्तितं तु मया तव । शुद्धमष्टादशाख्यं हि मातृका-लेखन-क्रमात् ॥ ११
सृष्टि-स्थित्युपसंहारे वाण-वेद-विपर्ययः
अथवा तु दलाकारं सिद्धं यन्त्रं तु कारयेत् ॥ १२
प्रस्तारैः पूर्व-सम्प्रोक्तः सृष्टि-स्थिति-लयादिकः
एवं यन्त्रं तु निःशप्तं कोर्तितं तु मया तव ॥ १३
नव संख्या-विधै दललितायां महेश्वरि
प्रस्तारा बहवो देवि ! जायन्ते तानहं ब्रुवे ॥ १४
कादि-हादि-मतेनैव द्विधात्वं परिकीर्तितम् ।
पड्-भेदाः कादि-षट्के तु काम-राजादिकेऽपि पट् ॥ १५
एतद् विबोधनं देवि ! कथ्यते शृणु सत्वरम् ।
चतुर्दशारं देवेशि ! काम-राजे तु भिद्यते ॥ १६
लोपादि-षट्के शुद्धेऽन्ये द्वितीयं परिभिद्यते ।
कादि-षट्के तु हाये च दशारे भेद-भाजनम् ॥ १७
लोपादि-षट्के नेत्राख्ये दशारे भेद-भाजनम्
एवं मिलित्वा देवेशि ! प्रस्तारा द्वादशेरिताः ॥ १८
प्रत्येकं तु महेशानि ! पूर्व-प्रस्तार-भेदतः ।
सृष्टि-स्थित्युपसंहार-लेखन-क्रमतः शिवे ॥१६
सृष्टि - स्थित्युपसंहार-क्रम-योगेन पार्वति !
दलाकार-क्रमेणव
प्रत्येकं भेद-भाजनम् ॥२०
एकैक-पत्रे देवेशि ! शतमष्टोत्तरं शिवे !
त्रयोदश-प्रभेदैस्तु प्रस्तारः
परिकीर्तितः ॥ २१
चन्द्र-चन्द्र-पडङ्क च मुनि-ऋत्वङ्क-संख्यकम् ।
यन्त्राणि चोद्धृतान्यत्र प्रस्तार-कम-योगतः ॥ २२
रहस्याति-रहस्यं हि तव स्नेहादिहोदितम् ।
यस्य स्मरण-मात्रेण साक्षाद् रुद्रो भविष्यति ॥ २३
त्वया सङ्कथिता देवि ! प्रस्ताराः पूर्व-सूचिताः।
ते सर्वे कथिता देवि ! गोपनीयं स्व-योनि-वत् ॥ २४
एतदज्ञानतो देवि ! हथवा ज्ञान-मोहितः।
यत्र कुत्र वसेद् देवि ! यत्र कुत्र प्रपूजकः ॥ २५
स दरिद्रः प्रभवति नात्र कार्या विचारणा । श्रीविद्योपासका यो हि देवेन्द्र इव चापरः ॥ २६ देवेन्द्रस्य महेशानि ! सिद्ध लक्ष्मीः प्रकोतिता । श्रीविद्योपासकस्याथ लक्ष्मी-नाम शृणु प्रिये ॥ २७ सर्व-सम्भोग-साम्राज्य लक्ष्मीः तस्य गृहे स्थिता । स दरिद्रः कयं देवि ! श्रीमद्-ब्रह्माण्ड-नायकः ॥ २८ एतदज्ञानतो देवि ! ज्ञानतोऽपि महेश्वरि ! दरिद्रत्वं महेशानि ! भवत्येव न संशयः ॥ २६ स दारिद्रयमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा । ज्ञात्वाऽपि देव-देवेशि ! यत्र कुत्र वदेद् यदि ॥ ३० स दारिद्रयमवाप्यान्ते रौरवं नरकं व्रजेत् । पूर्णाभिषेके न ब्रुवन्नाम-पारायण-क्रमे ॥३१ मन्त्र-पारायणे देवि ! चन-पारायणे तथा । मेधा-दीक्षान्तगा दीक्षा यस्य हस्ते विराजते ॥ ३२ तस्याधिकारी देवेशि ! यन्त्र-प्रस्तार-निर्णय । अधिकारो न चान्यस्य यः कुर्यात् स तु नारकी ॥ ३३ दारिद्रयान्भ्रियते जन्तुः दारिद्रये तु निमज्जति । दारिद्रय-हरणं देवि ! योऽभिवांच्छति सर्वदा ॥ ३४ स दीक्षितः पुरा भूयात् पश्चात् प्रस्तार-दर्शकः । एतज्जानाति यः सम्यक् स शिवो नात्र संशयः ॥ ३५ शिवः सत्यं शिवः सत्यं शिवः सत्यं न संशयः। शिव एव परो देवि ! सर्वया पूजयेच्च तम् ॥ ३६ तस्य पूजन-मात्रेण तुल्यो लक्ष्मी-पतिर्भवेत् । कि बहुक्तेन देवेशि ! कावि-हादि-मतात्मकम् ।। ३७ गोपनीयं महेशानि ! स्व-योनिरपरा यथा । राज्यं दद्यात् शिरो दद्यात् स्त्रियं दद्यान्महेश्वरि ॥ ३८ न तु दद्यादिदं शास्त्रं सर्वथाऽपि प्रगोपयेत् । इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥ ३६ ५८] यन्त्र-प्रस्तार-नामानं स्तवं यः पठति प्रिये ! सर्व-सिद्धीश्वरः साक्षान्महा-देव इवापरः ॥ ४० महेन्द्र-जालमिन्द्रादि-जालानां रचनां तथा। पातात-खेचरी-सिद्धिर्गुटिकाञ्जनमेव च ॥४१ यक्षिणी-खड्ग-सिद्धिस्तु तस्य हस्त-प्रवेशिका । ब्रह्माण्ड-गोलके या च या काचिज्जगती-तले ॥ ४२ समस्ताः सिद्धयस्तस्य भवन्त्येव न संशयः । प्रस्तार-स्मरणादेव ये ये तस्य हि सिद्धयः ॥ ४३ स्वयमायान्ति पुरतो रचनायास्तु का कथा । यन्त्र-पारायणं नाम स्तवं देवि ! प्रकीर्तितम् ।। ४४ नाडी-पारायणं नाम नाम-पारायणं तथा । मन्त्र-पारायणं नाम चक्र-पारायणं तथा ॥४५ यन्त्र-पारायणं देवि ! प्रत्यहं कारयेत् प्रिये ! एकावर्तन-मात्रेण तैलोक्य-विजयं भवेत् ॥ ४६ आवर्तन-द्वये श्रीशः त्रिरावर्तन-मानत: त्रिगुणात्मा भवत्येव नात्र फार्या विचारणा ॥ ४७ पञ्चावर्तन-मात्रेण राज-राजेश्वरी भवेत् यावद्धि दर्शनं भूयात् तावद्धि परमेश्वरि ॥ ४८ अर्णवस्य च मर्यादा कोतिता परमेश्वरि ! यं यं कामं विचिन्त्याथ स्तोत्रमेतत् पठेत् सदा॥ ४६ तं तं काममवाप्यान्ते तत्तद्-रूपो भवेन्नरः। कि वहूक्तेन देवेशि ! राज-राजेश्वरी तु सा ॥ ५० यथा छिन्ना तथा कालो तयैव सुन्दरी परा। तथैव तारा सन्दिष्टा चतुर्णा न हि भिन्नता ॥ ५१ कालिकायामपि तथा यन्त्र-पारायणं चरेत् । कादि-हादि-मतत्वेन द्विधात्वं परिकीर्तितम् ॥ ५२ एतज्-ज्ञान-युतं दृष्ट्वा दण्ड-वत् प्रणिपत्य च । देव-वत् पूजनं कुर्यादन्यथा न हि सिद्धयति ॥ ५३ [५६ ।
यन्त्र-प्रस्तार-राजानं यन्त्र-पारायणं परम् ।
नाम ख्यातं महेशानि ! शिव-शक्त्यात्मकं तथा ॥ ५४
शिव-शक्त्यात्मकं देवि ! यत्-किञ्चिज्जगतो-तले ।
तस्माच्छक्त्यात्मकं देवि ! जगत् स्थावर-जङ्गमं ॥ ५५
सर्वस्वं तु मयाख्यातं किमितोऽपि विशेषणम् ।
भेद-प्रस्तार-सिद्धयर्थमान् शृणु महेश्वरि ॥ ५६
राज्यष्ट कुणपाख्यं हि शक्ति-चिह्नाभिधस्ततः ।
विष्णु-केतु-गजावर्त-क्रमेण परिकीर्तितः ॥५७
प्रथमस्य दशारस्य प्रोक्तो रेखा-विनिर्णयः ।
एवं पञ्च चतुर्भेदाः सर्व-सिद्धि-प्रदायकाः ॥ ५८
द्वितीयस्य दशारस्य रेखाङ्कानां विनिर्णयः ।
ऋत्वष्ट-गणमारान्त्यादर्थ-वीरादिभिस्ततः ॥ ५६
नाथ-मार्ग-क्रमेणव दिन-वेधेन सिद्धति
रश्मि-द्वन्द्व रसो वाणी चैवं रेखां विभेदयेत् ॥ ६०
एवं पञ्च प्रभेदाः स्युर्मन्वने शृणु साम्प्रतम् ।
नित्या वाणी मातृकाप्तिः संख्यावर्तेन वै भवेत् ॥६१
द्वितीयस्य महेशानि ! गुण-वाक्-रस-चन्द्रता ।
कला-योजन-मार्गेण द्वितीयं परिकीर्तितम् ॥ ६२
इति संक्षेपतः प्रोक्तं फल-सङ्कथनं शिवे !
जिह्वा-कोटि-सहस्रस्तु वक्त्र-कोटि-शतैरपि ॥ ६३
महिमां वरिणतुं चास्य न शक्नोमि महेश्वरि !
इति संक्षेपतः प्रोक्तं तत्त्व-न्यास-क्रमं शृणु ॥ ६४
आत्म-विद्या-शिवस्तत्त्वस्तत्त्व-न्यासं समाचरेत् ।
पादादि-नाभि-पर्यन्तमात्म-तत्त्वं प्रकीर्तितम् ॥ ६५
नाभ्यादि-हृदयान्तं हि विद्या-तत्त्वं प्रकीर्तितम् ।
हृदयाद् विन्दु-पर्यन्तं शिव-तत्त्वं प्रकोतितम् ॥ ६६
सर्य-मन्त्रं समुच्चार्य सर्वाने व्यापनं शिये !
सर्व-तत्त्वमिदं प्रोक्तं सर्व-देवत्व-कारकम् ॥ ६७
१०]
तिथि-तत्त्वानि देवेशि ! आत्म-तत्त्वे भवन्ति हि।
पञ्च-विशति-तत्त्वानि विद्या-तत्वे भवन्ति हि ॥ ६८
पद-त्रिशच्छव-तत्त्वानि शिवे-तत्वे भवन्ति हि ।
अथ पञ्चाशत् तत्त्वानि सर्व-तत्त्वे भवन्ति हि ॥ ६६
स्थापने वेद-तत्त्वानि शोधने तत्त्व-पञ्चकम् ।
भूत-शुद्धौ त्रिःक्रमेण आचामेच्च त्रि-तत्त्वतः
सर्व-मन्ने महेशानि ! आचामेत् तत्व-वैदिकीम् ।
बीज-मध्य-गतं नाम किं वा कुर्याद्धि संकुलम् ॥७१
कि वा नाना समानान्ते मन्ने तत्त्व-प्रकल्पना ।
एकाक्षरे त्यक्षरादौ तत्त्वास्पद-विजिते ॥ ७२
तत्त्व-न्यासोदितं सिद्धं नान्यत्र परिकल्पयेत् ।
सिद्ध-विद्या-विधौ देवि ! श्रीविद्यायां महेश्वरि ॥७३
सर्व-भेदाख्य-तत्त्वानि त्रि-तत्वे निवसन्ति वै।
त्रि-तत्त्वस्य परिज्ञानी शक्ति पाताधिपो भवेत् ॥ ७४
आलापाद् दर्शनात् संस्पर्शाद् दानाद्यनुग्रहादपि ।
तत्-स्पृष्ट-वस्तु-संस्पर्शान्मन्त्र-दानाजपादपि
॥७५
जिह्वायां मन्त्र-संलेखात ताम्बूलोच्छिष्टभक्षणात् ।
गण्डूषाद वस्त्र-जलतस्त्वभिमन्त्रण-योगतः ॥७६
तन्नाम-स्मरणात् क्रोश-शतान्ते स्मरणादपि ।
यनिःसृतं तत् तथव शापानुग्रहणे शिवे ॥ ७७
सर्व-शास्त्र-रहस्यज्ञस्तथा श्रुति-धरो भवेत् ।
अष्टादश-विधी देवि ! शक्ति-पातो भवेच्छिवे ।। ७८
अथवा सिद्धि-बाहुल्यं मया वक्तुं न शक्यते ।
तत्र चेत् सिद्धि-बाहुल्यमिच्छा-शक्ति-परो भवेत् ।।
शक्ति-संसर्ग-मात्रेण सर्व पूतं भवेच्छिवे
शक्ति विना न वै मुक्तिः शक्तिर्मोक्ष-प्रदा मना150
।
..........." पञ्चमः पटलः स्नान-भेद-निर्णयः श्रीदेव्युवाच- देवेश! श्रोतुमिच्छामि पूर्वोक्तं निर्णयं महत् । श्रीशिव उवाच- रहस्याति-रहस्यं च कथ्यते शृणु साम्प्रतम् ।। १ स्नान-मुख्याः क्रियाः सर्वाःस्नानं च देवते भवेत् । प्रातः काले च मध्याह्न सायाह्न स्तोत्र-पाठके ॥ २ यदा यदा मनो-ग्लानिस्तदेव स्नानमाचरेत् । "ब्रह्म-योगे म्लेच्छ-स्पर्श तथैव च ॥३ भाषणे पतितस्याथ मन्त्र-स्नानं समाचरेत् । श्रीविद्यायां चतुः-कालं कालिकायां त्रि-फालफम् ।।४ यदैव मनसो ग्लानिस्तदैव स्तानमाचरेत् । विद्योच्चारं तु यः कुर्यादस्नातः कृत-भोजनः॥५ तस्य विद्या भवेन्नष्टा रौरवं नरकं व्रजेत् । अशुचिः सन् महेशानि! विद्योच्चारं तु पश्चरेत् ॥ ६ तस्य नाशो भवेद् देवि! विद्या दग्धा भवेद् ध्रुवम् । स्नान-कालश्च सम्प्रोक्ताः स्नान-भेदान् शृणु प्रिये ॥ ७ स्नानं पश्च-विधं प्रोक्तं येन देवी-मयो भवेत् । वारुणं नामसं चैव तृतीयं भस्मजं स्मृतम् ॥ ८ चतुथं तेजसं देवि ! पञ्चमं दैवतं भवेत् । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः ।। एते पञ्च-महादेवाः पञ्च-स्नाने व्यवस्थिताः । परा च तदतोता च तत्-परा तदनन्तरम् ॥ १० चित-परा च तदतीता च पञ्चमी परिकीर्तिताः। वारुणं द्विविधं प्रोक्तं वैदिकं तान्त्रिकं तया ॥ ११
स्व-शाखोक्त-विधानेन वैदिकं स्नानमोरितम् ।
स्व-स्व-कल्पोक्त-विधिना तान्त्रिक स्नानमाचरेत् ॥ १२
वीराणां तु कनिष्ठं स्यात् त्रितयं शृण पार्वति !
उत्तमं तु महेशानि ! सर्वत्र परिकोतितम् ॥१३
मध्यमं तु महेशानि ! प्राणायाम-पुरःसरम् ।
ऋष्यादिकं प्रविन्यस्य सप्त-मुद्रा-पुरःसरम् ॥ १४
जलमानीय देवेशि ! सर्वाङ्ग मूलमुच्चरन् ।
दशधा सप्तधा वापि देहं सम्माजयेच्छिवे ॥ १५
कुशेन दूर्वया वापि ह्यथवा तत्व-मुद्रया ।
ततस्तु तिलकं देवि ! दशधा वाग्-यतोऽथवा ॥ १६
ऊर्ध्व-पुण्ट्र नि-प्रकारं त्रि-पुण्डू द्वि-प्रकारकम् ।
अगस्ति-पन्नाकारं तु पट्ट-बन्धनमेव च
अस्ति-पत्राकारं तु सिन्दूरैघुसृणेन च
कुचन्दनेन वा देवि ! योग-मार्गेण कारयेत् ।। १८
पूर्वोक्तं मन्त्र-मात्रे स्यादिदं श्रीकालिका-मनौ ।
सर्व-देवेऽपि कर्तव्यं स्व-स्व-यन्त्रेण पार्वति ॥ १६
मणि-बन्धादधो हस्तौ पादौ गुल्फादधः प्रिये !
आननं क्षालयेद् देवि ! ताराच्छिन्ना-विधौ शिवे॥ २०
कारयेत् स्नानमेतद्धि पञ्चाङ्ग-शुद्धि-दायकम् ।
वारुणं कथितं देवि ! नाभसं शृणु पार्वति ॥ २१
अष्टादश-विधं देवि ! नामसं परिकीर्तितम् ।
शुद्धानमोऽन्ताः स्वाहान्ताः तर्पणान्ता जयान्तिकाः।२२
माला-मनुः पञ्च-विधः शिव-शत्ति-क्रमेण च ।
तद्-द्वय-क्रम-योगेन मन्त्राः पञ्चदश स्मृताः ।। २३
साधकः कृष्ण-प्रतिपदित्यादि फाल्गुनान्तकम् ।
रश्मि-फ्रमेण देवेशि ! पट्-चन्न-मगेऽपि च ॥ २४
प्रोक्तमष्टादश-विधं स्नानं नाभस-संज्ञकम् ।
मूलाधाराद् विलान्तं च सम्भाव्य या भवान्तिकम् ।। २५
[६३
रश्मयोऽन्न महेशानि ! त्रि-शतं षष्टि कीर्तिताः ।
वर्ष-मात्रं तु जाह्नव्यां स्नानं निपवणं कृतम् ॥ २६
तत् फलं प्राप्नुयाद् देवि! नात्र कार्या विचारणा।
ऋत्वादि-क्रम-योगेन तत्तद्-ऋतु-भनर्जल ॥ २७
स्नाने कृते फलं यच्च सकृदेव भवेच्च तत् ।
रश्मि-क्रमेण देवेशि! साक्षाच्छाम्भव-रूप-भाक् ॥ २८
प्रति-चक्ने महेशानि ! चक्रान्तस्तस्य देवताः ।
चिन्तयेत् प्रयतो भूत्वा मूलाधाराद् विलान्तकम् ॥ २६
अन्तः-स्नानमिदं प्रोक्तं देवता-दर्शन-प्रदम् ।
ब्रह्म-रन्ध्र तु देवेशि ! सर्वेषां लयमाचरेत् ॥ ३०
पुनः शुद्धि-स्वरूपं तु विभाव्य जपमाचरेत् ।
नाभसं कथितं स्नानं भस्म-स्नानं शृणु प्रिये ॥ ३१
अग्निर्जलं स्थलं चेति वायुर्योमेति सर्वतः ।
अभ्रकाभिस्त्रिभिर्देवि ! स्नानं मृत्यु-ज्वरापहम् ॥ ३२
शैव-ऋक्-पक्षकेनैव द्वितीयं परिकीतितम् ।
श्रीमालिन्यादिभिर्देवि ! श्रीविद्यायां तृतीयकम् ॥ ३३
सूर्य-मन्त्रं भस्म-मध्ये तेन सर्वाङ्ग-लेपनम् ।
ध्यानोक्तं होम--कुण्डस्थं भस्मना पञ्चमं भवेत् ॥ ३४
अन्येऽपि बहवो भेदाः सन्ति च प्राणकोदिताः।
तैजसमथ वक्ष्यामि येन सिद्धयन्ति सिद्धयः ।। ३५
गुरु-देवत-मन्त्राणामैक्यं सम्भावयन्
गुरु-तेजो मन्त्र-तेजो देव-तेजस्तथैव च ॥३६
एकीकृत्य त्रि-चैतन्यं तन्मूति परिकल्पयेत् ।
हृदये देवता-स्थानं कण्ठे चैव मनुर्मतः ।। ३७
सहनारे गुरुः प्रोक्तस्त्रि-चैतन्यं विभावयेत् ।
तां मूर्ति स्वस्य देहे तु यथा स्यावयव-क्रमात् ॥ ३८
धिया।
६४]
- सम्भावयेन्महेशानि ! बैवता-दर्शन-प्रदम् तेजसं गदितं देवि ! दैवतं शृणु पार्वति ॥ ३६ मूलाधार समारभ्य विलान्तं - परमेश्वरि ! देवतां भावये देवि !'स्व-मुखेन मुखं शिवे ॥४० तस्याः सर्वाङ्गके देवि ! स्व-देहे स्थान-योगतः। द्वार-देशे महेशानि ! गङ्गां च यमुनां तथा ॥,४१ सर्व-सम्भावनायां तु गङ्गया कि फलं' भवेत् । इडा गङ्गेति विख्याता सुषुम्णा यमुना नदी ॥४२ सरस्वती पिङ्गला स्यात् प्रयाग देह-मध्यगम् । देह-ज्ञानं विना देवि ! बाह्य-ज्ञानेन किं फलम् ।।,४३ गुरु-पक्ति सहस्रारे ह्यङ्गानि भुवि भावयेत् । कण्ठ-मूलान्तकं देवि ! सर्वावरण-देवताः ॥४४ भावयेद् यत्नतो देवि ! दैवतं स्नानमीरितम् ।' अनेन स्नान-योगेन किं तद् यन्न करे स्थितम् ।। ४५ ब्रह्माद्या देवताः सिद्धाः स्नानेनानेन पार्वति !" इति संक्षेपतः प्रोक्तं . सन्ध्या-कर्म शृणु प्रिये ॥ ४६ सुन्दर्या' तु चतुःकाल सन्ध्या-वन्दनमाचरेत । प्रातःकाले च मध्याह्न । सायाह्नऽप्यर्ध-रानके ॥ ४७ चतुविधां तु गायत्री जपेद् यत्नेन पार्वति ! प्रस्ताराकृति-रूपा च उपस्थानाभिधा तथा ।। ४० वांच्छा-कल्पलता देवि ! चतुर्थी परिकीर्तिता। पष्टि-पारायणं प्रातमध्याह्न नाम-संज्ञकम् ॥४६ “मन्त्र-पारायणं रात्रौ निशायां चक्र-संज्ञकम् । तृतीयामर्ध-राने : तु तूर्य-सन्ध्यां समाचरेत् ॥ ५० कालिकायामिदं प्रोक्तमुपस्थान-विवर्जितम्।। मेधा-दीक्षादि-राज्ञीत्यात् काल्यां सन्ध्या चतुष्टयं ॥ ५१ सन्ध्या-नयं तु तारायां छिन्नायां विविधा भवेत् । एतासां न हि भेदोऽस्ति भेद-भाङ् नरकं व्रजेत् ॥ ५२ . 1 - फा०५ 3 [६५ - षष्ठः पटलः दीपेशादि-विनिर्णयः श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि दीपेशादि-विनिर्णयम् । श्रीशिव उवाच- बद्ध-पद्मासनो मूनि दोप-नाथं प्रपूजयेत् ॥ १ वर्गाष्टकं चाष्ट-दिक्षु स्वर-द्वन्द्व-समन्वितम् । विलिखेत् तत्र वर्ग च महा-नादातरं भवेत् ॥ २ सत्य-बिन्दुकः प्रथमं श्रीकण्ठादि ततः परम् । तद्-वर्णेशं नन्दनाथं . च चतुर्थमनन्तरम् ॥ ३ अतिरिक्त-पदस्यान्ते वर्णायेति समुद्धरेत् । रक्त-द्वादश-शक्त्यार्घ-युक्तायेति पदं वदेत्॥४ अस्मिन् क्षेत्र इमा पूजां गृह्ण-युग्ममथापि, वा । - स्वाहान्तगो मनुरयं दीए-नाथस्य कीर्तितः ॥ ५ ईशाने, दीप-नाथं च पूजयेत् , परमेश्वरि !. उच्छिष्टो मृदमानीय नदी-तीर-द्वयात् तथा ।। ६ रूपं ताल-मितं कृत्वा नामान्यस्य तद्-धृदि । नाम-मायास्त्र-धत्तूर-लिखितं पूरितं भुवि ॥७ त्रि-सप्त जपती साधं वशयेदुर्वशीमपि । अथान्यदपि देवेशि ! रहस्यं कथ्यते शृणु ॥८ वाम-हस्ते "धृत्वा दक्ष-हस्तेन होमयेत् । मालां दत्वा शक्ति-हस्ते गणनां कारयेच्छिवे ॥६ द्वि-त्रि-मासोत्तरं देवि ! माला संग्नथयेच्छिवे ! स्वयं सन्त्रुटिता माला प्रायश्चित्ताय कल्पते ॥ १० जीर्ण-सूत्रं तु विज्ञाय माला संग्रथयेच्छिवे ! पण्मासोत्तरगं देवि ! जीर्ण-सूत्रस्य मालिका ॥ ११ ד . A यः स्थापयेन्महेशानि ! तस्य नाशो भविष्यति । बुदिता चेत् स्वयं मालां प्रायश्चित्तं समाचरेत् ।। १२ गजान्तक-सहलं तु जप-होमं , समाचरेत् । पुनः । संग्रथन कृत्वा प्राण-स्थापन-पूर्वकम् ॥ १३ तदा माला सिद्धिदा स्यान्नान्यथा शाङ्करं वचः । पुरश्चर्या-जपे होमे माला हस्त-च्युता यदि ॥ १४ प्रायश्चित्तं शतं जप्त्वा तद्-दशांश-प्रवर्धनम् । 'तद्-दशांशं त्यजेज्जापं प्रायश्चित्त-क्रमेण च ॥ १५ केचित्र समिच्छन्ति पुरश्चर्या पुनर्भवेत् । । शतं जप्त्वा पुरश्चर्या पुनश्चरेत् ॥ १६ अयुतं होमयेद् देवि ! पायसारिकेलजैः। त्रैलोक्यं च वशोकुर्यात्नान कार्या विचारणा ॥१७ तिल-तण्डुल-होमेन प्रोति सजनयेत प्रिये ! श्रीदेव्युवाच- प्रसृतिस्तण्डुलाः प्रोक्ताः शत-मानं तिलाः स्मृताः॥१८ कयं'साम्यं महा-देव ! तन्मे कथय शङ्कर ! अर्ध-प्रसृति-मात्रं तु 'तण्डुला वा महेश्वर ॥ १६ पञ्चाशद् वा तिला ग्राह्याः सन्देहं हर मे प्रभो ! श्रीशिव उवाच- प्रसृतिश्च शतं देवि !, संयोगेन तु होमयेत् ॥ २० दक्षिणामूर्ति-देवस्य सम्मत परिकीर्तितम् । अर्घ-प्रसृप्ति-मानं तु तण्डुलाः परमेश्वरि ॥ २१ पश्चाशच्च तिला ग्राहा अक्षोभ्य-ऋषि-सम्मतम् । यवानां च तिलानां च यथा योगेन चाहुतिः ।। २२ तर्थव तिल-संयोगः कर्तव्यः काल-सम्मतः। सम-तोल-समे कुण्डे होमपेत् कालिका-मते ॥ २३ [ ៤ .
.. स्व-मुख दत्वा वाम-हस्तेन होमयेत् । देवता वरदा तस्य नात्र कार्या विचारणा ॥ २४ "देवेशि ! होमयेदविचारयन् । त्रैलोक्याधिपति यानान कार्या विचारणा ॥ २५ पान पोडशकं स्थाप्य सम्पूज्य पर-देवताम् । तदन्ते होमयेद् रात्रौ तदन्ते तर्पणं भवेत् ॥ २६ देवि-शङ्ख-मुख नेत्रे देवतायाः समाचरेत् । केरलाख्य-मते प्रोक्तं काश्मीराख्य-मत शृणु ॥ २७ यथा देवी तथा देवी-विशेपाख्यः प्रकीर्तितः । स्व-साम्मुख्येन देवेशि! स्थापयेत् पात्र-राशिकम् ।। २८ चैतन्यस्य मतं देवि ! तिर्यक् चक्रेण स्थापयेत् । स्व-साम्मुख्ये तथा तिर्यक् देवता-सम्मुखेऽपि च ॥ २६ प्राची नव पट् च प्रोक्ता कथमङ्गादि-कल्पना । स्वस्य प्राची च वा देवि ! देवतायाऽथवा भवेत् ३० श्रीशिव उवाच- रहस्याति-रहस्य च कथ्यते शृणु सादरम् । स्व-साम्मुख्ये स्थिते पाने देव-वच्चाङ्ग-कल्पनम् ॥ ३१ निरञ्जन-मत प्रोक्तं तत्-साम्मुख्येऽपि पार्वति ! पार्वती-मतमाख्यात रुद्र-वीर-मत शृणु ॥ ३२ देवी-पात्र देव-मुख्ये अङ्गादि स्वाङ्ग-वद् भवेत् । तत्र प्राची-क्रम ज्ञात्वा सर्व ससाधयेद् ध्रुवम् ॥ ३३ समारभ्य भूत-शुद्धयन्तग 'शिवे ! "सिद्ध-प्राची तु सम्प्रोक्ता ततस्तु करिफ्ला भवेत् ॥ ३४ स्थित्यादि-पात्र-कर्मान्त सिद्ध-प्राची प्रकीतिता पूजाया तु महेशानि । कल्पिता दिक् शुभ-प्रदा ॥ ३५ अन्ति-पूजा-न्यतने कल्पिता दिक् च शम्बरे । महा-भूत-बलिदेवि । स्वस्य प्राची-विधौ भवेत् ।। ३६ ॥ शासनाद्य देवी-बलिः स्व-वामे तु स्व-दक्षे मृड-सम्मते । अग्नीशासुर-वायव्ये मध्ये दिवङ्ग-पूजनम् ॥ ३७ केरलस्य मतं प्रोक्तं चिद्-घनस्य मतं शृणु । अग्नि-नैऋत-वायव्ये शम्भु-कोणेषु मध्यतः ।। ३८ चतुर्दिा महेशानि ! मण्डलावर्त-मार्गतः। अग्नीशासुर-वायव्ये मध्ये पृष्ठे षडङ्गकम् ॥ ३६ केसरेषु च कोणेषु देहेपु च पडङ्ग कम्। काल-रुद्र-मते देवि । पडन-पूजनं भवेत् ॥ ४० क्रमदर्पण कथित प्राची चाङ्ग-प्रपूजनम् भवेत् । चतुरावर्त-मार्गेण संहाराष्य-कमेण पडङ्ग-पूजनं प्रोक्तं विशेषं शृणु सादरम् । अर्घ-पूजा-विधी सिद्ध-प्राची प्रोक्ता तु पीठके ॥ ४२ मृडेन परमेशानि ! कल्पिता तु क्वचिद् भवेत् । क्वचित् सिद्धा महेशानि कल्पिता तु क्वचिद् भवेत्।। ४३ वायपदिशि पर्यन्तं गुरु-पंक्ति प्रपूजयेत् । विद्या-पृष्ठे महेशानि ! गुरवः सन्ति सर्वदा ॥ ४४ काल्या त्रि-पक्ति-मार्गेण देवी-पृष्ठ-क्रमेण च । दिव्यादि-क्रम-योगेन स्व-गुरु-त्रयम् ॥ ४५ दक्षोदक् च प्रतीच्यां च रेसा-त्रितयकं चरेत् । दिव्योघो देवता-पृष्ठे तदन्यौ तत्-स्थल-द्वये ॥ ४६ विद्याया भेद-भावे तु स्व-गुरुं पूजयेच्छिवे ! सर्वोपरि महेशानि ! गुरु-स्थान प्रकीर्तितम् ।। ४७ सिद्ध-प्राचो-विधौ देवि! विलोके केरल-मते । गौडे कल्पित-दिड्-मार्गा यथा देवी तथैव ते ॥ ४८ न तेषा मुख्यत्ता देवि ! मुख्या तु देवता भवेत् । भोदेव्युवाच- अनार्थे संशयो मेऽस्ति संशयं मम हारय ॥४६ [६६ तदध:
कल्पित-क्रम-मार्गेण यदि पूजा भवेच्छिव !
तेषां दिक्-व्यत्यये देव ! स्थानस्य संच्युतिर्भवेत् ॥ ५०
श्रीशिव उवाच--
स्वामी यत्र समायाति तत्रैवाङ्गादि-देवताः ।
न चाङ्गे मुख्यता देवि ! तत्-पूजायां तु मुख्यता ।। ५१
दशांशेनाङ्ग मन्त्राणां जप-पूजा समाचरेत् ।
तेन ते सिद्धिदा देवि ! नान्यथा सिद्धि-रोध-कृत् ॥ ५२
कदा को वा महा-देवः का वा प्राची स्थिता भवेत् ।
सूर्यस्तु वारुणी थाति नित्यानित्यं महेश्वरि ॥ ५३
दिवा-रात्रि-व्यत्ययस्तु साधकस्य करे स्थितः ।
चन्द्र-सूर्य-व्यत्ययं च स फत् भवति क्षमः ॥ ५४
सूर्य-स्थाने भवेच्चन्द्रः चन्द्र-स्थाने तु सूर्यता।
एवं क्रमेण देवेशि ! ब्रह्माण्डानां परम्परा ॥ ५५
कदा का वा स्थिता प्राची कति जाताः पुरन्दराः ।
एकैक-वारं देवेशि ! कोटाद्यपि पुरन्दर ॥ ५६
'- कुन के वा स्थिता देवि ! सर्व साधक-गोचरम् ।।
यदाशाभिमुखो' भूत्वा चक्र-राजं समुद्धरेत् ॥ ५७
सैव पूर्वा विनिर्दिष्टा सर्वत्र योजयेत् क्रमम् ।
यदा पूर्व मुखो भूत्वा चक्रेशों परिपूजयेत् ॥ ५८
तदा प्रतीची पूर्वा स्याद् देवताया महेश्वरि !
पश्चिमाभिमुखो भूत्वा यदा चक्रं समुद्धरेत् ॥५६
पूर्वैव पूर्वा निर्दिष्टा दक्षिणे शृणु पार्वति !
दक्षिणाभिमुखो भूत्वा यदा चक्र समुद्धरेत् ॥६०
तदोत्तरा भवेत पूर्वा प्रतीची दक्षिणा भवेत् ।
उत्तराभिमुखो भूत्वा यवा वेवों प्रपूजयेत् ।। ६१
दक्षिणव भवेत् पूर्वा संक्षेपात् परमेश्वरि !
: तथा काम्प-विधौ देवि ! विदिक्षु संस्थितो यदि ।। ६२
७.]
,
देवि ! स्व-मध्ये पूर्वा तु संक्षेपेरण प्रकीर्तिता ।
यथा यथा शिवा याति परिवारास्तथा तथा ॥ ६३
यत्याः कृपा-कटाक्षेण स्थानं लब्धं च तैः
पुरा
ते सेवार्थ समायान्ति देवताया महेश्वरि ॥ ६४
वलिदान-विधौ देवि ! सिद्धावा कल्पिता च वा।
देवता-हस्त-दक्षाख्यः स्व-साम्मुख्य-क्रमेण च ॥ ६५
प्राची प्रोक्ता केरले च गौडे प्राग-दक्ष-भावतः ।
देव्यग्र-दलमारभ्य प्रादक्षिण्य-क्रमेण
तु ।। ६६
काश्मीराख्य-मते प्रोक्तं पूजनं तत्-क्रमेण तु ।
स्व-देहं च स्व-देवी च स्व-गुरु , परमेश्वरि ॥ ६७
स्व-देह-स्थिति-मार्गेण स्व-रूपं पूजयेत् प्रिये !
पूजा-विधौ महेशानि ! स्वाग्ने सञ्चिन्त्य पूजयेत् ॥ ६८
अत्रापि देव-देवेशि ! स्व-रूपेण स्व-रूपता ।
तद्-रूपे स्वस्य -रूपं च तथैव - च गुरोरपि ॥६६
एवं क्रमेण - देवेशि ! त्रितयं प्रितयं त्रिषु
मार्ग-त्रय-क्रमेणैव सर्व संक्षेपतो मतम् ॥ ७०
वलि-दान-भव-द्रव्यं देवताग्ने निवेदयेत् ।
स्व-साम्मुख्येन वा देवि | तत्साम्मुख्येन वा प्रिये ॥ ७१
केरल-कम-योगेन
काश्मीर-कम-योगतः ।
गौउ-मार्ग क्रमेणैव
सर्व संक्षेपतो मतम् ॥ ७२
[७१
७
.. - सप्तमः पटलः देश-व्यवस्था-नियमः श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि रहस्याति-रहस्यकम् । श्रीशिव उवाच-- भिन्नाञ्जनं समारभ्न मा भैर्मा भैर्महेश्वरि ॥ वृत्तानन्दं तु देवेशि ! ध्यात्वा वाञ्छा-मितं शिवे ! शिखा-गतं स्मरेत् वह्नि-शिखा-साधक-रूपिणम् ।। २ खड्गं तु देव्या रसनां बुद्धया ध्यात्वा महेश्वरि ! साध्यस्य जाडय-रूपत्वं शिखायां परमेश्वरि ॥३ साध्यस्य हृदये देवि! देवो तिष्ठति सर्वदा । जाड्य तत्रैव देवेशि ! रसना लेह-भक्षणा ॥ ४ एवं ध्यात्वा जपेद् बोरस्काल्य-ज्ञानमाप्नुयात् । तारा विधी महेशानि ! काम्य-ध्यानं महेश्वरि ॥ ५ प्रत्यालीढं समारम्प पञ्च-मुद्रा-विभूषितम् । . इत्येतं चित्य यत्नेन जाड्यं न्यस्य कपालके ॥६ का सद्धर्तनं चिन्त्यं त्रैलोक्याधिपतिः कविः । राज्य-दातृत्व-सामथ्र्य नहि तारां बिना कलौ ॥ ७ विपरीत-रता सक्तामाग्नेयो-नाटिका-गताम् । शवस्य हृदये न्यस्तं दक्षिणं चरणं शुभम् ॥८ शवस्य पाद-युगलमनुलोमाकृति-क्रमात् । संन्यस्य वाम-चरणे प्रत्यालीढं तदुच्यते ॥६ साधनायां दक्ष-शिरःप्राक् प्रत्यक् च शिरः सदा । शव-स्वरुप कथितं वाम-हस्त हुदि स्थितम् ॥ १० चतुर्भुजा कालिका स्यातु धनुरायुध-धारिणी । कपाल पञ्चमं चेत् स्यात् वर-हस्ते विधारयन् ॥ ११ मुण्ड-रूपं, कपालं तु महा-काल-मते नतम् । कलौतारा कलौ काली कलौ तारा च कालिका ॥ १२ शिव-शक्ति-प्रभेदेन देहे शक्तिरुपस्थिता । तारा शिवस्तथा कालो शक्ति-रूपा प्रकीर्तिता ॥ १३ काली शिवस्तथा तारा शक्ति-रूपा प्रकीर्तिता। अहो ज्ञान-वता . ज्ञानी कालो-तारा-परायण. ॥१४ रहस्याति-रहस्पं च प्रोक्तं देवि ! तवाग्रतः। देश-व्यवस्थां देवेशि ! कथ्यते शृणु यत्नतः ॥ १५ वैद्यनाथं समारभ्य भुवनेशान्तगं .शिवे ! तावदङ्गाभिधो देशो यानायां न हि दुष्यति ॥ १६ रत्नाकर समारभ्य ब्रह्म-पुत्रान्तगं शिवे ! वङ्ग-देशो मया प्रोक्तः सर्व-सिद्धि-प्रदायकः ।। १७ जगन्नाथात् पूर्व-भागात् कृष्णा-तीरान्तगं शिवे ! कलिङ्ग-देशः सम्प्रोक्तो वाम-मार्ग-परायणः ॥ १८ कलिङ्ग-देशमारभ्य पञ्चाण्ट-योजनं शिवे ! दक्षिणस्यां महेशादि ! कालिन्दः परिकीर्तितः ॥ १६ सुब्रह्मण्यं समारभ्य यावद् देवो जनार्दनः । तावत् केरल-देशः स्पात् तन्मध्ये सिद्धि-केरलं ॥ २० रामेश्वरो वेङ्कटेशो हंस-केरल-बोधकः। अनन्त शैलमारभ्य यावत् स्यादुडुपं पुरम् ॥ २१ तावत् सर्वेश-नामा तु केरलः परिकीर्तितः ! शारदा-मठमारभ्य कुंकुमाद्रि-तटान्तकम् तावत् काश्मीरदेशः स्यात् पश्चाशद्योजनान्तकः। कालेश्वरं श्वेत-गिरि त्रिपुरां नील-पर्वतम् ।। २३ काम-रूपाभिधो देवि ! गणेश-गिरि-मूर्द्धनि । त्रि-पञ्चकं समारभ्य मध्ये चोज्जयिनी शिवे ॥ २४ ॥ २२
मार्जार-तीर्थ राजेन्द्र कोला-पुर-निवासिनम् ।
तावद् देशो महा-राष्ट्रः कारर्णाटस्याभिगोचरः ॥ २५
जगन्नाथादूर्ध्व-भाग अकि श्रीभ्रमराम्बिका ।
तावदन्ध्राभिधो देशः सौराष्ट्र शृणु सादरम् ॥ २६
कोणात् पश्चिम तीर्वा समुद्र-प्रान्त-गोचरः।
हिंगुलाजान्तका देवि ! जन्तवो जन-लेशतः ॥ २७
सौराष्ट्र-देशो देवेशि ! नाम्ना तु गुर्जराभिधः ।
श्रीशैलं तु समारभ्य चोलेशान्मध्य-भागतः ।। २८
तैलङ्ग-देशो देवेशि ! ध्यानाध्ययन-तत्परः।
मूकाम्बिकां समारभ्य मलयाद्रचन्तगं शिवे ॥ २६
मलयालाभिधो देशो मन्त्र-सिद्धि-प्रवर्तकः ।
राम नाथ समारभ्य श्रीरङ्गान्तं बिलेश्वरि ॥ ३०
कर्णाट-देशो देवेशि ! साम्राज्य-भोग-दायकः ।
ताम्र-पर्णी समारभ्य शैलार्द्धात् पुरतोद्धतः ॥ ३१
अवन्ती-संज्ञको देश कालिका तत्र तिष्ठति ।
भद्र-काली महत्-पूर्व राम-दुर्गाच्च पश्चिमे ॥ ३२
श्रीविदर्भाभिधो देशो वैदर्भास्तत्र तिष्ठति ।.
गुर्जरात् पूर्व-भागे तु द्वारकातो हि दक्षिणे ॥ ३३
“मरु-देशो महेशानि ! उष्ट्रोत्पत्ति-परायणः ।
श्रीकोकणादघो-भामे तापीतः पश्चिमोत्तरे ॥ ३४
आभीर-देशो देवेशि ! विन्ध्य-शैले व्यवस्थितः ।
अवन्तीत पूर्व-भागे गोदावर्यास्तथोत्तरे ॥ ३५
मालवाख्यो महा-देशो धन-धान्य-परायणः ।
द्रविड-तैलङ्गयोर्मध्ये चोल-देशः प्रकीर्तितः ॥ ३६
लम्ब-कर्णाश्च ते प्रोक्ता भेदो ह्यवान्तरो भवेत् ।
कुरु-क्षेत्रात् पश्चिमे तु तथा चोत्तर-भागतः ॥ ३७
इन्द्र-प्रस्थान्महेशानि ! दश-त्रि-योजनोत्तरम् । पाञ्चाल-देशो देवेशि ! सौन्दर्य-नार्व-भूषितः ॥ ३८ पाञ्चाल-देशमारभ्य म्लेच्छाद् दक्षिण-पूर्वतः । काम्बोज-देशो देवेशि ! वाजि-राशि-परायणः ॥३६ वैदर्भ-देशावं च इन्द्र-प्रस्थाच्च दक्षिणे । मर-देशात् पूर्व-मागे वैराड्-देशः प्रकीर्तितः ॥ ४० काम्बोजाद् दक्ष-भागे तु इन्द्र-प्रस्थाच्च पश्चिमे । पाण्डय-देशो महेशानि ! महा-शूरत्व-कारकः ॥४१ गण्डकी-तीरमारभ्य चम्पारण्यान्तकं शिवे ! विदेह-भूः समाख्याता तैरभुक्त्यधः स तु ॥ ४२ काम्बोज-देशमारभ्य महा-म्लेच्छातु पूर्वके । वाह्नीक-देशो देवेशि! अश्वोत्पत्ति-परायणः ॥४३ तप्त-कुण्ड समारभ्य राम म-क्षेत्रान्तकं शिवे! किरात-देशो देवेशि ! विन्ध्य-शैले च तिष्ठति ॥ ४४ कर-तोयां समारभ्य हिंगुलाजान्तकं शिवे ! बक्तान-शो देवेशि ! महा-म्लेच्छ-परायणः ॥ ४५ हिंगु-पीठं समारभ्य मर्के शान्तं महेश्वरि ! खुरासानाभिधो देशो म्लेच्छ-मार्ग-परायणः ॥ ४६ तन्मध्ये चोत्तरे देवि ! ऐराकः परिकीर्तितः। काश्मीरं तु समारभ्य काम-रूपाच्च पश्चिमे ।। ४७ भोटान्त-देशो देवेशि | मानसेशाच्च दक्षिण । मानसेशाद् दक्ष-पूर्व चीन-देशः प्रकीर्तितः ॥ ४८ फैलास-गिरिमारभ्य सरयू-योनितः श्रामोङ्गान्तं महेशानि! महा-चीनाभिधो भवेत् ॥ ४६ जटेश्वरं समारभ्य योगिन्यन्तं महेश्वरि ! नेपाल-देशो देवेशि ! शिल-हट्ट श्रृणु प्रिये ॥ ५० गणेश्वरं समारभ्य महोदध्यन्तगं शिवे! शिल-हट्टाभिधो देशः पर्वते तिष्ठति प्रिये ॥५१ [७५ . परे ।
वङ्ग-शं समारभ्य भुबनेशान्तगं शिवे !
गोड-देशः समाख्यातः
सर्व-विद्या-विशारदः ॥ ५२
गोकर्णेशात् पूर्व-भागे आर्यावर्तात्तु चोत्तरे ।
तैरभूक्तात् पश्चिमे तु महा-पुर्याश्च पूर्वतः ॥ ५३
महाकोशल-देशः स्यात् सूर्य-वंश-परायणः ।
व्यासेश्वरं समारभ्य तप्त-कुण्डान्तकं शिवे ॥ ५४
मगधाख्यो महा-देशो यात्रायां न हि दुष्यति ।
दक्षोत्तर-क्रमेणव क्रमात् कोकष्ट-मागधौ ॥५५
चरणाद्रि समारभ्य गृध्र-फूटान्तकं
शिवे !
तावत् कोकट-देशः स्यात् तदुत्तरो मागधो मतः॥५६
जगन्नाथ-प्रान्त-देशस्वौत्कलः परिकोलितः।.
काम-गिरि समारभ्य द्वारकान्तं महेश्वरि ॥ ५७
श्रीकुन्तलाभिधो देशो हणं शृणु महेश्वरि !
काम-गिरेर्दक्ष-भागे
मरु-देशात् तथोत्तरे ॥ ५८
हूण-देशः समाख्यातः शूरास्तत्र वसन्ति हि ।
अथ घट्टं समारभ्य कोटीशस्य च मध्यगः ॥ ५६
समुद्र-प्रान्त-देशो हि कोणः परिकीर्तितः ।
ब्रह्म-पुत्रात काम-रूपान्मध्य-भागे तु कैकयः ॥ ६०
मगधाद् दक्ष-भागे तु विन्ध्यात् पश्चिमतः शिवे !
शौरसेनाभिधो देशः सूर्य-वंश-प्रकाशकः ॥ ६१
हस्तिनापुरमारभ्य कुरु-क्षेत्राच्च दक्षिणे।
पाञ्चालात् पूर्व-भागे तु कुरु-देशः प्रकीर्तितः ॥ ६२
मरु-देशात् पूर्व-भागे कामानेदक्षिणे शिवे
सिंहलाप्यो महा-देशः सर्व-देशोत्तमोत्तमः ॥ ६३
शिल-हट्टात् पूर्व-भागे काम-रूपात् तथोत्तरे ।
पुलिन्द देशो देवेशि !- नर-नारायणः परः ॥ ६४
गणेश्वरात् पूर्व-भागे समुद्रादुत्तरे शिवे !
कच्छ-देशः समाख्यातः सेवनं शृणु सादरम् ।। ६५
पुलिन्दादुत्तरे भांगे कच्छाच्च पश्चिमे शिते !
मत्स्य-देशः समाख्यातो मत्स्य-बाहुल्य कारकः।। ६६
वैराट-पाण्डययोर्मध्ये पूर्व-दक्ष-क्रमेण च ।
मद्र-देशः समाख्यातो माद्रीशस्तन तिष्ठति ॥ ६७
शूर-सेनात् पूर्व-भागे कण्ठकात् पश्चिमे बरे।
सौवीर-देशो देवेशि ! सर्व-देशाधमोऽधमः ॥ ६८
अवन्तीतः पश्चिमे तु वैदर्भाद् दक्षिणोत्तरे ।
लाट-देशः समाख्यातो बर्बरं शृणु पार्वति ॥ ६६
माया-पुरं समारभ्य : सप्त-शृङ्गात् तथोत्तरे ।
वर्वराख्यो महा-देशः सैन्धवं । शृणु सादरम् ॥ ७०
लङ्का प्रदेशमारभ्य
मक्कान्तं परमेश्वरि !
सैन्धवाख्यो महा-देशः पर्वते तिष्ठति प्रिये ॥ ७१
एते पट्-पञ्चाशद् देशा मया प्रोक्तास्तव प्रिये !
एतन्मध्येऽपि देवेशि ! देश-भेदास्त्वनेकशः ॥ ७२
कोटिशः सन्ति देवेशि ! एते मुख्याः प्रकीर्तिताः ।
रहस्याति-रहस्यं च । गोप्तव्यं पशु-सङ्कटे ॥ ७३
[७७
अष्टमः पटल पञ्च-प्रस्थ-कथनम् श्रीदेव्युवाच- दवेश | श्रोतुमिच्छामि पञ्च प्रस्थानि साम्प्रतम् । श्रीशिव उवाच- इन्द्र-प्रस्थं यम-प्रस्थं वरुण-प्रस्थमेव च ॥१ कूर्म -प्रस्थं महा-देवि ! देव प्रस्थं च पञ्चमम् । इन्द्र-प्रस्थं महेशानि ! शृणु वक्ष्ये यथा-क्रमम् ॥२ इन्द्र-प्रस्थं महेशानि ! योगिनी-कोटि-संयुतम् । मथुरा-गोकुलं पूर्व-भागे तस्य प्रकीर्तितम् ।। ३ वृन्दावनं कोण-देशे हस्तिनापुरमुत्तरे। द्वारका पश्चिमायां तु गदावर्तस्तु दक्षिणे ॥ ४ इन्द्र-प्रस्थ-मध्य-भागे कालिका-मुख-मोचरम् । वाराही-क्षेत्रमुद्दिष्टमिन्द्र-प्रस्थं तदुच्यते ॥५ सिंहासनं चाश्व-पतेस्तदेव , परिकीर्तितम् । यम-प्रस्थं महेशानि ! दक्षिणस्या व्यवस्थितम् ॥ ६ सोमेश्वरः पश्चिमाया सप्त-शृङ्गी तु पूर्वगा । माया-पुर वाम-भागे व्यङ्कटेशस्तु दक्षिणे यम-प्रस्थं भवेन्मध्ये कमला-मुख-गोचरम् । शङ्खावतॊ भवेत् तत्र क्षेत्रं मायाभिधं भवेत् ॥ ८ सिंहासन नर-पतेस्तद्-दक्षे परिकीतितम् । ततः पूर्वे जगन्नाथः प्राप्ते कवि-पतिर्भवेत् ॥६ वारुणाख्यं तथा देवि ! कथ्यते शृणु साम्प्रतम् । 4 .
- तदन्ते सागराः सप्त समुद्र श्चि तदन्तके। तावत् श्रीवारुणाख्यं तु प्रस्थं प्रोक्तं मया तव ॥ १२ कूर्म-प्रस्थं सहेशानि'! कथ्यते श्रृणु पार्वति ! गोकर्णेशाद् दक्ष-भागे कामाख्यात् पूर्व-गोचरः।। १३ उत्तरे मानसेशः स्यात् पश्चिमे सारदा भवेत् । त्रिगुरणावर्तमेतद्धि वज्रश्या मुखमीरितम् ॥ १४ षट्-पञ्च-कोटि-चामुण्डा-गणव्याप्तिं तु तद् भवेत् । देव-प्रस्थं महेशानि ! कथ्यते शृणु साम्प्रतम् ॥ १५ श्रीरङ्गो दक्षिणे प्रोक्तो गायत्री पश्चिमे भवेत् । पूर्वे चैव जगन्नाथस्तूत्तरेऽमर-कण्टकम् ॥१६ काञ्ची-पुरं मध्य-भागे मोहनावर्तनमेव च । ललिताया मुखं तच्च विद्या-गरण-विभूषितम् ॥ १७ कामाख्या-क्षेत्रमुद्दिष्टं महा-मन्त्र-विभूषितम् । नव-लक्ष-महा-विद्या सगणः, परि-भूषिताः ॥१८ पञ्च-प्रस्थानि देवेशि! कथितानि मया तव । कृष्ण-मुद्रण-रामश्च श्रीविष्णुर्वरदेश्वरः ॥१॥ ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशियः । परादि तदतीतान्तं तृतीये परिवर्तते ॥ २० विष्णो दाः स्मृता ह्य ते नाविष्णुः पृथिवी-पतिः । 'पञ्च-प्रस्येश्वरो भूयात् काली-तारा-परायणः ॥ २१ रहस्याति-रहस्यं च कथितं परमेश्वरि ! गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं स्व-योनि-वत् ॥ २२ [७६ नवमः पटलः लता-साधनम् श्रीदेव्युवाच-- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि पूर्वमुक्त रहस्यकम् । श्रीशिव उवाच- रहस्याति-रहस्यं च कथ्यते तव भक्तितः॥१ आनन्द-भुवन नाम महा-योग-वनं शृणु । शक्तिमानीय देवेशि ! तस्याः सन्दीक्षण चरेत् ॥२ दीक्षिता च सुशीला च मन्त्र-यन्त्र-परायणाम् । राज-पत्नी देव-पत्नी देवता गुरु-रूपिणीम् ॥ ३ राज-वेश्या ब्रह्म-वेश्या दिव्य-वैश्या कला-पराम् । तीर्थ-वेश्यां गुप्त-वैश्या नृत्य-वश्यां च वा प्रिये ॥ ४ समानीय दिवा-रानी यथा-योगेन पार्वति ! सन्दोक्ष्य यत्नतो देवि ! त्रैलोक्य-रञ्जिनी कलां ॥५ प्रसून-मञ्चे सस्थाप्य पाद्याचमनीयकम् । दत्वा सम्पूज्य यत्नेन चतुःषष्ट्युपचारक ॥६ शृङ्गार-रत्नाभरणर्माना दिव्यमहेश्वरि ! स्वेष्ट-देवीं सञ्चिन्त्य पूजयेत् त्रि-जटेश्वरीम् ॥७ मन्त्र-भेदे स्वल्प-मन्त्रे आवृत्तिर्भूयसी यदा। बिन्दोश्च परितः कोणे पूजयेत् ता च देवताम् ॥८ साङ्गा सावरणा पूज्य यथा-काम-वर-प्रदाम् ता विलोक्य जपेद् देवि ! सर्व-कालमतन्द्रितः ॥६ तस्या तु देवता-बुद्धया देवी चिन्त्य महोत्सवैः । तत्-पादौ चिन्त्य देवेशि ! जपेद् यत्नेन पार्वति ॥१० सर्व-सिद्धीश्वरो भूयानान कार्या विचारणा । तस्या तु देवं सम्पूज्य शक्यालोकन-तत्परः ॥ ११ ſ ।
पूजयेत् परमेशानि ! बैलोक्य-विजयो फविः ।
तस्या मुखं तु सञ्चिन्त्य देवी-बुद्धचा दिवा शिवे ॥ १२
त्रि-सहस्र जपेन्मासं त्रिकालज्ञो नरो भवेत् ।
तस्याः कूटमिदं ज्ञात्वा जपेल्लक्षं दिवा शिवे ॥ १३
तस्याः मोदायितं दृष्ट्वा दिवा पञ्चायुतं जपेत् ।
पञ्च-काम-समो भूयान्नान कार्या विचारणा ॥ १४
कञ्चुकं तस्याः संवीक्ष्य दिवा लक्ष-द्वयं जपेत् ।
सर्व-सिद्धीश्वरो भूयानात्र कार्या विचारणा ॥ १५
लतायाश्चकितं दृष्ट्वा दिवा जप्त्वा दिवाकरः ।
दिवा पश्यन् जपेत् तारां विकार-रहितः शिवे ॥ १६
सर्व-सिद्धीश्वरो भूयात् काली-तुल्यो नरो भवेत् ।
दिवा हास्य-रतां वीक्ष्य योगिनी-मेलनं लभेत् ॥ १७
लता...."दिवा कृत्वा त्रि-लक्षात् त्रिगुणेश्वरः।
दिवा "तु संवीक्ष्य देवता-ध्यान-तत्परः ॥ १८
मास-त्रय-प्रयोगेरण
देवतां पश्यति ध्रुवम् ।
दिवा "मासाद्य समालिग्य महेश्वरि ॥१६
प्रजपेत् सार्ध-लक्षं च शिव-शक्ति-समो भवेत् ।
दिवा तां.........."तु कृत्वा लक्षान्मही-पतिः ॥ २०
दिवा चा लतां वीक्ष्य चन्द्र-कोटि-समं जपेत् ।
दिवा सौरोंच संवीक्ष्य त्रि-लक्षाच्च त्रिशक्तिधृक् ॥ २१
लता-ग्रन्योंश्च संवीक्ष्य दिया जपति भू-पतिः ।
स्थायी-भाव-गतां वीक्ष्य जपेल्लक्षमनन्य-धीः ।। २२
त्रि-लक्ष-जपतो नूनं राज-राज-समो भवेत् ।
लतां पुष्प-वतों दृष्ट्वा दिवा जपति सुन्दरी ॥ २३
लतां काम-गतां वीक्ष्य दिवा जपति शङ्करः।
लता-मण्डलगो भूत्वा देवता-ध्यान-तत्परः ।। २४
फा०-६
[८१
-
दिवा-रानं जपेद् देवि ! भुवनेशी-समो भवेत् ।
लतां गान-रतां दृष्ट्वा ताम्बूल-दानमाचरेत् ॥ २५
ताम्बूल-रागं संवीक्ष्य लक्षं जपति नित्यशः ।
दिवा नित्यं जपेत् काली शिव एव न संशयः ॥ २६
लता-ताम्बूल-वोटों तु गृहीत्वा भक्ष्य संजपेत् ।
स्वरोद्युक्तां तत्र देवि ! देवता-वरमाप्नुयात् ॥ २७
शय्या-भङ्गी-लता-हस्ताद् दिवा कृत्वा तु
गन्धर्व-वेशमासाद्य सर्व-सिद्धि स विन्दति ॥ २८
अष्टमी-सन्धि-वेलायामष्टोत्तर-लता-गृहम्
वजन दिवा जपेन्नित्यं दिन-मानं महेश्वरि ॥ २६
प्रत्यष्टम्यां चरनेवं सर्व-सिद्धीश्वरो भवेत् ।
अमा-चतुर्दशी-सन्धौ लता-त्रि-शतकान्वितः ॥३०
पुष्पं प्रत्येकं दत्वा तु चीन-वेष-परायणः ।
दिवा जपेन्महेशानि ! यावदन्या चतुर्दशी ॥ ३१
तावज्जपेन्निरातङ्कः सर्व-सिद्धि-समन्वितः ।
नील-वेशं
समासाद्य' "पूजन चरेत् ॥ ३२
त्रि-मासं कुरुते यस्तु सुरतेशी स वै लभेत् ।
तां लता भोग-सामग्री-समुद्युक्तां च वोक्ष्य च ॥ ३३
त्रि-दिनं च दिवा-रात्रि जपात् सिद्धीश्वरो भवेत् ।
तां नाट्यस्थां च संवीक्ष्य देवता-ध्यान-तत्परः ॥ ३४
रात्रौ दिवा जपेद् देवीं त्रैलोक्य-कवितां लभेत् ।
तां वीणा-वाद्य-निरतां वीक्ष्य देवों दिवा जपेत् ॥ ३५
राज-राज-समो भूयान्नात्र कार्या विचारणा ।
मृदङ्ग वादन-रतां लतां वीक्ष्य दिवा जपेत् ।। ३६
देवतां वरदां मास-पञ्चकैः पश्यति ध्रुवम् ।
डिण्डी-रव-गतां वीक्ष्य लतां दिन-गतं जपेत् ॥ ३७
२]
सर्व-सिद्धीश्वरो भूत्वा त्रैलोक्य-विजयो हरः।
लतां नाटय-गतां वीक्ष्य अहोरात्रं जपेच्छिवे ॥ ३८
तारा-रूपो नरो भूयान्नान कार्या विचारणा ।
मुक्त केशों लतां दृष्ट्वा दिवा लक्ष-द्वयं जपेत् ॥ ३६
कालो-तारा-समो भूत्वा छिन्ना-सिद्धि स विन्दति ।
रहस्याति-रहस्यं च तव प्रीत्या च फोर्तितम् ॥ ४०
आनन्द-योगो देवेशि ! तव प्रीत्या मयेरितः ।
इति संक्षेपतः प्रोक्तं विशेषाद् दिवसे शुभः ॥४१
[८३
दशमः पटलः अज्ञात-दुनिमित्तम् श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि सूचितस्य विनिर्णयम् । श्रीशिव उवाच- शक्ति-सङ्गम-तन्त्रादौ मेर-स्थाने च सूचितम् ॥१ तदेव कथ्यते यत्नात् सावधान-मना भव । सामान्यत्वेन कथितं विशेषं शृणु सादरम् ॥ २ पौधे माघे भाद्रपदे ज्येष्ठे वा परमेश्वरि ! कृष्ण शुक्लेऽथवा देवि ! कृष्ण-पक्षे विशेषतः ॥ ३ सप्तम्यां वा प्रयोदश्यां नवम्यामायुधे तथा । पष्ठयाममायां देवेशि! धूम्रोदेति नभः-स्थले ॥४ पाते भद्रा-दिने वापि गण्डे शूलेऽथवा प्रिये ! भरण्यां कृत्तिकायां च त्वायां रौद्रगेऽपि वा ॥ ५ हस्त-चित्रा ऋक्ष-तो धूम्रो भूयान्महेश्वरि ! अधिकार-विहीनेन यत्कृतं यच्च कारितम् ॥६ तेन योगेन वा देवि! महा-पाप-वशादथ । भूमि-भार-विनाशार्थ धूम्र-कोतुर्भविष्यति ॥७ त्रि-वर्ष पञ्च-मासश्च पष्टि-नाडी-पलानि च । तत्त्व-संख्यानि देवेशि ! मध्य-धूम्रो भविष्यति ।। चतुर्मासोत्तरं देवि ! शक-फेतुर्भविष्यति । अहि-केतुस्ततो भूयात् सर्पाकारो महेश्वरि ॥६ शक-केतुष्ट्रि-निभो घट-केतुस्तथापरः । पादुका-केतुरपरो हसन्ती-संज्ञिकस्ततः ॥ १० ८४] .
व्याघ्र-पुच्छ-निभश्चैव सर्प-पुच्छ-निमस्ततः ।
चिह्लान्येतानि देवेशि ! सम्भवन्ति पदे पदे ॥ ११
श्रीविद्या-मण्डपं कुर्यात्तवा शान्तिर्मविष्यति ।
तस्मात त्विदं महेशानि! गोपनीयं कलौ युगे ॥ १२
अर्ध-मध्य-पूर्ण-भेवाद् भेद-बाहुल्यमीरितम् ।
एवं भेदेन देवेशि ! त्रि-शतं पञ्च मेरवः ॥ १३
अग्नि-मेरुमहेशानि ! विधिः सिद्धि-प्रदायिका।
सम्प्रदाय-क्रमेणव कर्तव्य मेर-साधनम् ।।१४
लोभान्मोहाद् भयाद् दम्भाधदि कुर्यात्नराधमः ।
सर्वस्व-हरणं कृत्वा नरके पातयाम्यहम् ॥ १५
घट-केतुयंदा भूयात् कुटुम्बं तु विनश्यति ।
धूम-केतुर्महेशानि ! स भूपाल-विनाश-कृत् ॥ १६
धूम्र-केतुर्यदा भूयात् तत्-कुटुम्ब तु वर्पतः।
यमालये प्रविष्ट स्यानात्र कार्या विचारणा ॥ १७
वेद-वाह्यो यथा देवि ! सर्व-कर्म-बहिष्कृतः।
तथायं द्विज-बाह्यः स्यान्नान कार्या विचारणा ॥ १८
कुटुम्वहा भवेत् सो हि प्रायश्चित्तेन शुद्धयति ।
तस्य संसर्ग-मात्रेण राज्य-भ्रष्टो भवेद् विभुः॥१६
तस्माद् यत्नेन देवेशि ! प्रायश्चित्तं तु कारयेत् ।
शुद्धो भूयात् ततो देवि ! नान्यथा नारको ध्रुवम् ॥२०
श्रोमेरु-रश्मि-विज्ञानात् त्रैलोक्य-विजयी भवेत् ।
अज्ञानात् परमेशानि ! यः करोति नराधमः ॥ २१
स पापिष्ठो दुराचारी दुःख-भागी भवेद् ध्रुवम् ।
प्राजापत्य-शतं कृत्वा गोदानान्तं तु विशतिः ॥ २१
सहस्रं भोजयेद् विप्रान् शुद्धो भवति नान्यथा ।
अन्यथा देव-देवेशि ! संहर्ता परमेश्वरः ॥ २३
[५
प्रत्यङ्गिरा स्वयं शास्ता हेलया ह्याध-नायिका।
ब्रह्मास्त्रमपि देवेशि । तत्-संहाराय निश्चितं ॥ २४
सप्त-वर्षे रन्ध्र-वः सकेशो नश्यति ध्रुवम् ।
त्रि-मास-वेद-वस्तु पृथ्वी-पालो विनश्यति ।। २५
वर्षेण च कलत्रं च पञ्च-वर्षेण कन्यकाम् ।
स्वसां तु ऋतु-वर्षेण तत्-संसर्गात् ऋषि-क्रमात् ।। २६
दीक्षा-युक्तस्तु यः कुर्यात् तत्फलं तु कयं शिवे !
वक्त्र-कोटि-सहस्रस्तु जिह्वा-कोटि-शतैरपि ।। २७
महिमा वर्णितुं शक्तिः कथमत्र फलौ युगे ।
कलौ पाप-समाकोणे न मेरु-साधनं मतम् ।। २८
न्यास-मेर्यन्त्र-मेहः कर्तव्यः कुत्र-चित् प्रिये !
तामसं कर्म चैतद्धि न कर्तव्यं हितेच्छुना ॥ २६
गो-लोकेन समालापात् गो-लोकत्वं यथा भवेत् ।
अज्ञात-द्विज-संलापात् स भवेद् ब्राह्मणाधमः ॥ ३०
गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं निरन्तरम् ।
गोपनात् सिद्धिमाप्नोति गोपनात् शिवतां व्रजेत् ॥ ३१
न देयं पर-शिष्येभ्यः कृपरणायेति सुन्दरि !
दीक्षा-होनाय नो वद्याद् गोपयेन्मातृ-जार-वत् ॥ ३२
एकादशः पटलः महाकाल-मन्त्र-विधिः श्रीदेव्युवाच- भू-फम्पादिकमेतद्धि सूचितं तद् वदाधुना। श्रीशिव उवाच- रहस्यमिति विज्ञाय नोक्तं देवि ! मया तव ॥१ इदमेव महेशानि ! उक्तं कोटि-विनायके । अष्टादश-सहलं तु केतु-संख्या प्रकोतिता ॥२ तन्मध्ये तु शतं चाष्टादश-संख्या प्रकीर्तिता। एतन्मध्ये महेशानि ! पञ्चाशत्-केतवः शिवे ॥३ सम्मार्जन-समाकारा वृक्षाकारास्तथैव च। शिखाकार-समापन्नास्तथा हस्तक-सन्निभाः ॥४ तृणाकारास्तथा कम्यु-सदृशाः कुटिलाः शिवे ! वृक्ष-मात्र-समाकारा घटाकारास्तथा प्रिये ।। ५ एक-विशद्-दिनं व्याप्य तद्-द्वयं वा महेश्वरि ! मास-मान तथा देवि ! तद्-द्वयं परमेश्वरि ॥६ चतुर्विक्षु भ्रमन्त्येव दिवा वा चोदयो भवेत् । चतुःप्रहर-योगेन रात्री तूदयमेव एक-वारं द्वि-वारं वा त्रि-चतुः-पञ्च-वारकम् । फम-केतुर्महेशानि ! समुदेति निरन्तरम् ॥ एक-रूपं च वा देवि ! भिन्न-रूपं च वा प्रिये ! प्रा-ब्रह्म-कल्प-पर्यन्तं सर्व-रूपेण वर्तते ॥६ देश-भङ्गो भवेदादी राष्ट्र-भङ्गो द्वितीयके । छत्र-भङ्गस्तृतीये स्याच्चतुर्थे सर्व-पीडनम् ॥१० [८७ च॥ ७
पञ्चमे देव-देवेशि ! सर्वत्र भूत-सङ्गमः ।
नि-त्रि-मास-क्रमेणव पञ्च-पड्-वर्ष-योगतः ॥११
धन-केतुर्यदा भूयात् तदा छत्रं विनश्यति ।
एवं विचार्य यत्नेन शान्तिकं च समाचरेत् ।। १२
इति संक्षेपतः प्रोक्तो धूम्र-केतुविनिर्णयः ।
दिवा नक्षत्र-पातस्तु नक्षन-दर्शनं
तथा ॥ १३
अहि-केतुस्तथा देवि ! दिवा चोल्का-प्रदर्शनम् ।
पौणिमायां नष्ट-चन्द्रः कार्तिक्यां तु विशेषतः ॥ १४
सप्त-विशति-नक्षत्र-योगे दिड्-मण्डलं तथा।
मण्डलं पञ्च-भूतानां सप्तर्षीणां समागमे ।। १५
अमायां चन्द्र-सन्दर्शः प्रलयस्य तु कारणम् ।
भूकम्प प्रतिमा-हासः तद्-भङ्गस्तु तथैव च ॥ १६
उल्का-पातो दिवा रात्री दुश्चिह्नानि महेश्वरि !
चिह्नान्येतानि दृष्ट्वा तु कारयेत् स्वस्ति-वाचनं ॥ १७
महोत्पातादिकं भूपान्नान कार्या विचारणा ।
छन-भङ्गो राष्ट्र-भङ्गो महा-मारी-भयं तथा ॥ १८
सर्वथा सम्भवत्येव येन लक्षणमुच्यते ।
मोरगं तु समासाद्य महा-म्लेच्छान्तकं शिवे ॥ १६
प्रोक्तस्त्वश्व-पतिर्देवि ! शृणुष्व गज-नायकम् ।
कोकणान्तं समासाद्य आग्नेयान्तं महेश्वरि ॥ २०
प्रोक्ता गज-पतिर्देवि ! शृणुष्व नर-नायकम् ।
आ-पूर्व-पश्चिमं व्याप्य प्रोक्तो नर-पति प्रिये ॥ २१
सर्वेषां लक्षणं देवि ! कथितं शम्भु-ताण्डवे ।
दिन-होराभिधं चक्रं प्रवक्ष्यामि समासतः॥ २२
रहस्याति-रहस्यं च गोप्याद् गोप्य-तरं शिवे !
यस्य विज्ञान-मात्रेण काल्य-गोचरो भवेत् ॥ २३
८८]
मद्-भक्तोऽसि महा-देवि! तस्मात् तत्ते वदाम्यहं ।
काल-कौशल-चक्रं च विष्णु-कौशलमेव च ॥ २४
युद्ध-कौशल-चक्र च रुद्र-कौशलकं तथा ।
दिन-कौशल-चनस्य कलां नाहन्ति षोडशीम् ॥ २५
दिन कौशल-चक्रस्य विज्ञानी शिव एव हि।
रेखाः पञ्च समास्फाल्य ततो दण्डाहतास्तथा ॥ २६
दिक्-क्रमः कथितो देवि ! विदिङ्-मार्ग-क्रमेण च ।
एवमष्टार्गलं चक्रं मुखं प्राच्यां समाचरेत् ॥ २७
प्रतीच्या पाद-युग्मं स्याद् वेव-हस्ताभिधं ततः।
गोल-वद् भ्रमरणादेव तत्तन्नाम्ना मुखं भवेत् ॥ २८
नित्याः षोडश देवेशि ! प्रति-रेखागत-क्रमात् ।
पञ्चाशन्भातृका-वर्णाः सर्वाङ्गे यदि निश्चिताः ॥ २६
योगिनीनां चतुःषष्टिर्यथा-रेखा-क्रमेण तु ।
पद-पञ्चाशद्-गणेशाश्च दोप-रेखा-समाश्रिताः ॥ ३०
केशवाद्या वैष्णवाश्च कारके परि-निष्ठिताः ।
कारकाणां च संख्या वै भुवनाख्या प्रकीर्तिता ॥ ३१
प्राधिपत्ये महा-देव-श्रीकण्ठाः परिकीर्तिताः।
चतुर्दश-ग्रहास्तव चराचर-विभेदतः
॥ ३२
चराचर र-विभेदेन चतुर्धा शशि-भास्करौ ।
अष्टाविशति ऋक्षानि परिवर्त-क्रमेण च ।। ३३
चराचर-विभागेन तत्र राशि समाचरेत् ।
एवं तार्तीय-युग्मे तु नेत्र-युग्मं प्रकीर्तितम् ॥ ३४
पाद-स्थाने तु सर्वज्ञः विधा भेदः प्रकीर्तितः।
साम्मुख्यं वाम-दक्षश्च त्रिधा भागः प्रकीर्तितः॥ ३५
अहो-रात्रेण देवेशि ! ग्रह-ऋक्ष-परिक्रमः ।
द्वे द्वे नाडीमभिव्याप्य सृष्टि-संहरणः शिवे ॥ ३६
व्याप्य . सृष्टि-मार्गेण सूर्यः स्यात् संहृत्या चन्द्र एव च । स्थूल-क्रमेण सर्वेशे ! प्रातरारभ्यते रविः ॥ ३७ सन्ध्यामारभ्य चन्द्रः स्याद् रात्रौ व्यत्यय एव च। विशत् साहस्रक सप्तशती पद-त्रिंशदीरिताः ।। ३८ दिन-कौशलक परिवर्त-क्रमाच्छिवे ! फलं यच्छन्ति विश्वेशि! ममाज्ञा-पालकाः सदा ॥ ३६ अन्येषां तु मते देवि ! सत्य-मार्गेण वर्तनम् । अथाष्टादश-सिद्धान्त उपाधिः परिकीतिता ॥४० क्वचित् कदाचिन्मिलति भाग्य-योगान संशयः । सूर्योदये तु यो वारः स ग्रहः प्रातरेव तु ॥ ४१ फेरले व्यङ्कटेशाख्ये सतां मतं मयेरितम् । श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि रहस्यं पूर्व-सूचितम् ॥ ४२ श्रीशिव उवाच- क्षमा-पालो भवेद् दासः कविर्मकस्तथा भवेत् । दीनत्वतां धनाधीशो वह्निः शैत्यत्वतां व्रजेत् ॥ ४३ महेन्द्रोऽपि विरूपः स्यान्मेधा-ग्रह्णजं फलम् । साम्राज्य मेधा-दीक्षायाः फलं प्रोक्तं पदान्तकम् ॥ ४४ नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा । विद्या-न्यासाच्चिन्तनाच्च ब्राह्मणत्वं भवेच्छिवे ॥ ४५ युगानां तु सहस्र हि तपस्या येन वै कृता । महा-विद्या-क्रमेणव पञ्च-पोढा-क्रमेण च ॥४६ शक्ति-न्यास-क्रमेणव नित्य-पूजा क्रमेण च । एवं तपस्या-संयुक्तः पृथ्वी-पति-पदं लभेत् ॥ ४७ पट्-पञ्च-कोटि-चामुण्डा-पञ्चाशद्-गणपैर्युतम् । गदावर्त-समाफ्रान्तं वाराह्यापि विभूषितम् ॥ ४८ 0]
पदम् ।
अष्टोत्तरशतं देवि ! बाराही-गण-संकुलम् ।
योगिनीनां चतुःषष्टि-कुलै सम्भूषितं पदम् ॥ ४६
कालि-हृदय-मध्यस्थमिन्द्र-प्रस्थाभिधं
साम्राज्य-मेधा-दीक्षा_भूषितो यो युगे युगे ।। ५०
तस्य हस्त-गतं देवि ! पदं भवति नान्यथा ।
तापर्य-ग्रहे महेशानि ! साम्राण्मेधा-युतश्चरेत् ॥ ५१
मनोरथ-मयी सिद्धिर्यस्य
हस्ते विराजते।
इच्छा-सिद्धिस्तथा तारा यस्य राजति सर्वदा ॥ ५२
कालो वा सुन्दरी वापि प्रसन्ना यस्य चास्ति च ।
अङ्क-मन्त्रः पताकाद्यैः कालो विन्द्यात् पदादिकः॥ ५३
पूर्वोक्त-रक्षकास्तस्य क्षीणश्चेन्नश्यति ध्रुवम् ।
पूर्व कृत-युगे देवि ! देव-दैत्य-पुरोगमाः ॥ ५४
आचार्य-द्वितयं कृत्वा राज्य-भोगं च चक्रतुः ।
भौमाचार्यो प्रोक्तो शुक्रो दैत्य-गुरुः स्मृतः ॥ ५५
मृत-सञ्जीविनी विद्या
पर-काय-प्रवेशनम् ।
पर-विद्याकर्षणं च स्वस्त्रारपां शतकं तथा ॥ ५६
त्रयस्त्रिंशत्-कोटि-संख्या माया यद्धस्तगाः शिवे !
तत्-प्रीत्या तु महेशानि ! क्षणमेकं तु याचितः ॥ ५७
अस्मिन् क्षणे जायमानाः सर्वे सिद्धा भवन्ति च ।
इति ज्ञात्वा महेशानि ! क्षणं दत्तं मया तदा ॥ ५८
तत्काले येच वै जाताम्ते सिद्धाः सिद्धि-दायकाः ।
चतुरशीति सिद्धाश्च जातास्तत्काल-गोचराः ॥ ५६
नव-नाथास्तथा जाता शुक्र-जन्म-क्षणे शिवे !
यस्य जन्म-क्षणे देवि ! जाता ये सिद्ध-रूपिणः ॥ ६०
प्रत्यक्ष-रूपिरणस्तस्य का कथा परमेश्वरि !
तस्य निग्रह-कर्ता तु भूमौ कोऽस्ति सुरालये ॥ ६१
[३१
नागालये वा देवेज्ये त्रैलोक्य-विजयी स तु ।
तस्य निग्रह-कर्ता तु न च कोऽप्यस्ति भू-तले ॥ ६२
त्रैलोक्य-विजयास्त्रं च यस्य हस्ते विराजते ।
नाम-पारायणं देवि ! मन्त्र-पारायणं तथा ॥६३
खेचरी-संयुतो यो हि स्तम्भकः शशि-सूर्ययोः ।
कालानलास्त्र-सम्पन्नस्तस्य निग्रह-कारकः ॥६४
॥ इति शुभः॥
शिव-पूजा-रतः पूर्व विशद्-वर्ष-युगं शिवे !
प्रत्यहं करवीरेण
पूजा-कारी महेश्वरि ॥ ६५
तदा तुष्टो महा-देवस्त्विदं वचनमब्रवीत् ।
निधीनां नवकं दत्तमिन्द्राधास्तव पूजकाः ॥ ६६
कुबेरस्त्वं सुराध्यक्ष ! मम हारि सवा वस ।
निधि-नाथस्य पदवी तदा दत्ता मया शिवे ॥ ६७
धनदा कमला सौख्यं लक्ष्मीस्तत्र वसेत् सदा ।
नर-शास्तास्तथा यक्षा यक्षिण्यः किन्नरीनाणाः ॥ ६८
तव सेवां प्रकुर्वन्ति धनेशस्त्वं भव प्रिय !
एवं तस्य वरो दत्तो मया पूर्व महेश्वरि ॥६६
तस्य विग्रह-कर्ता तु को वा भुवन-मध्यगः ।
श्रीक्रोध-मण्डलं देवि ! यस्य हस्ते विराजते ॥७०
मन्त्र-मण्डलकं देवि ! महा-मण्डलमेव च ।
विद्या-मण्डलकं वापि पार्षमण्डलमेव च ॥७१
पद-शाम्भव-युतो यो हि तस्य निग्रह-कारकः ।
महा-क्रोधांकुशेनैव धनदां ताडयेच्छिवे ॥ ७२
धनदा तु कुबेरस्थ निधनत्वं करिष्यति ।
॥ इति धनेशः॥
महा-काल्या महेशानि! ताये स्थापितस्तु यः ॥ ७३
२]
तार्तीय-नेत्र-रूपस्तु
वह्निरित्यभिधीयते
वीर-भद्रस्तथा रुद्रः क्रोधः कालान्तकेति च ॥ ७४
प्रलयाद् वस्तु-संहार-पर्यायाः कीर्तिता मया।
यद्यत् कार्य समायाति तत्तद्-रूपेण वर्तते ॥ ७५
श्रीकाल्याः प्रेर्यमाणस्तु तत्तद्-रूपेण वर्तते ।
काली-क्रोधात् समुद्भूतो देवता-मुख-वाचकः ॥७६
तस्मिन् हुतं च दत्तं च सर्व भस्म भविष्यति ।
स एव वाडवाग्निस्तु तत्तत् कार्य-वशाद् भवेत् ॥ ७७
अग्निं विना महेशानि ! न देवि न महेश्वरः ।
कोटाद् ब्रह्माण्ड-पर्यन्तं वह्निः सर्वत्र तिष्ठति ॥ ७८
काली-श्मशान-सम्भूतः काल्या नेत्रे नियोजितः।
संहार-समये प्राप्ते काल्या सम्प्रेरितः शिवे ॥७६
ब्रह्माण्डं भस्मसात् कृत्वा ज्वाला-माला-समाकुलः।
अनादि-सृष्टि-रूपाया महा-मायाद्य-चण्डिका ॥८०
श्रीमत्-सिद्धि-कराली या गुह्य-कालो तु या परा।
काल-काली तु या प्रोक्ता महा-काम-कला तु या ॥ ८१
स्व-राज-दन्ते दवेशि ! ब्रह्माण्डं स्थापितं तया ।
अनन्त-कोटि-ब्रह्माण्डं राज-दन्ते विराजते ॥२
दन्तेषु राजते यस्माद् राज-दन्ताविति स्मृतौ ।
त्रैलोक्य-चर्वको दन्तौ मम कार्य-करावुभौ ॥ ८३
तेन कारगतो देवि ! राज-दन्ती प्रकीर्तिती ।
इच्छा-शक्त्या तया देवि ! सृष्टिरुत्पादिता पुनः ॥ ८४
तदा वह्निमहेशानि ! स्व-नेने स्थापितस्तदा ।
अष्टोत्तर-शतं वह्नः पोडशोत्तरगं रवेः ॥ ८५
शतं षट्वशत्-सोमस्य नेत्र-बितयक शिवे !
एता एव कला देवि ! शाम्भवादी प्रयोजिताः॥८६
[१३
:
ईदृग-विधो महेशानि ! वह्निरुक्तो मया तव ।
तस्य निग्रह कर्ता च ब्रह्माण्डे कोऽस्ति वे प्रिये ॥८७
नव-चक्रोपासको यः षट्-चनोपासकोऽपि वा।
साम्राज्य-शाम्भवाक्रान्तः पञ्चास्त्र-साधने रतः॥ ८८
दश-विद्या-मयी या तु तस्योपासन-तत्परः ।
दिवा-रात्रि-व्यत्ययं तु यः कर्तुं भवति क्षमः ॥
स वह्ननिग्रहे शक्तो भवत्येव न चान्यथा ।
॥ इति वह्निः॥
पट-त्रिंशत्-कोटि-देवानामीश्वरो यस्तु कीर्तितः ।।६०
स देवेन्द्र इति ख्यातो महा-साम्राज्य-दायकः ।
निखर्व-वारं देवेशि! श्रीविद्योपास्ति-तत्परः ॥६१
ततः शाम्भव-सम्पन्नो मेधा-दीक्षा-युतस्ततः
रश्मि-मण्डल-संयुक्तः साम्राज्य-मण्डलान्वितः ॥६२
चक्र-पारायणासतो यन्त्र-पारायणान्वितः ।
कला-युग्म-सहस्राणां कादि-हादि-फ्रमेण च ॥६३
एतद्-युक्त-तपस्या तु येन यम-युगं कृता ।
तेनेदं प्राप्यते देवि ! पदमिन्द्राभिधं शिवे ॥६४
पञ्च-रत्नं समासाद्यं वीर-साधन-तत्परः ।
तस्य हस्त-गतं देवि ! पदमिन्द्राभिधं भवेत् ॥ ६५
नव-कोटि-महा-मन्त्रैः समानान्तं शिवे ! पदम् ।
तद्-रक्षका महेशानि ! पञ्चाशत्-कोटि-भैरवाः ॥६६
श्रोध-राजस्तु शरभस्तथा प्रत्यङ्गिरा शिवे !
अनन्त-कोटि-मन्त्रैश्च रक्षितं तत्पदं शिवे ॥६७
प्राप्तिस्त्विन्द्र-पदस्याथ नाल्पस्य तपसः फलम् ।
तस्य निग्रह-कर्ता तु कोऽस्ति क्वापि चराचरे ॥६८
कर-कर्म-करत्वाच्च राक्षसाः परिकीर्तिताः।
ब्रह्माण्डमोलके या च या काविज्जगतो-तले ॥६६
तव । समस्ताः सिद्धयो देवि ! यस्य हस्त-गताः सदा । स एव निग्रहं कर्तुं शाक्तो भवति नान्यथा ॥ १०० अञ्जन-खेचरी-खड़ग-बेताल-गुटिकास्तथा चन्द्र-सूर्य-सहस्राणि साधको यः करोति च ॥ १०१ सुन्दरी-कालिका-तारा यस्य गेहलाताः सदा । देवेन्द्र-निग्रहे शक्तिस्तस्य वै भवति ध्रुवम् ॥ १०२ नराय न प्रकाश्यं स्यात् किमन्यद् बहु-जल्पनम् । इति संक्षेपतः प्रोक्तं कालिका-सिद्धि-लक्षणम् ॥ १०३ कादि-हादि-मतत्वेन प्रोक्तमेतन्मया गोपनीयं गोपनीयं स्व-योनिरपरा यथा ॥ १०४ श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि जीव-भोग-विनिर्णयम् । श्रीशिव उवाच- शृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि जीव-न्यास-विनिर्णयम् ॥ १०५ जीव-न्यासः पञ्चधा स्यात् बीज-स्त्री-दक्ष-सागराः। फालानल-कमेणव प्रोक्तः पञ्च-विधः शिवे ॥ १०६ गौड-केरल-काश्मीर-क्रम-भेदेन पार्वति देव-देहे च पुत्तल्यां षष्ठी चन्द्र-विनिर्णयः ॥ १०७ गारणपे चैव पुत्तल्यां शिव-लिङ्गे च पार्वति ! पार्थिवाभिध-दुर्गायां यथा-लिङ्गेन योजयेत् ॥ १०८ काश्मीराख्य-क्रमे देवि ! पष्ठी वह्नि-विभूषिता । बहुत्वादि-क्रमे देवि ! कम एषः प्रकीर्तितः ।। १०६ गौडे द्वयं तु साम्यं स्यादित्यागमेषु गोपितम् । केरलाख्य-क्रमे देवि ! षष्ठी चन्द्रेण योजयेत् ॥ ११० द्वि-त्रि-रुद्र-शतान्ते तु ग्रह - दोप-निवारणे । विशद्-दिनं पूजयेद्धि सर्व-ग्रह-निवारणम् ॥ १११ !
एक-विशति सम्पूज्य सर्व-पापैः प्रमुच्यते !
शतं सम्पूजयेन्नित्यं सर्व-कामांल्लभेच्छिवे ॥ ११२
सहस्र-पूजनाद् देवि ! दुर्भगः सुभगो भवेत् ।
सहन-त्रितयं पूज्य सर्वकार्य-क्षमो भवेत् ॥११३
एवं लक्षादि सम्पूज्य सर्व-सिद्धीश्वरो भवेत् ।
एक-द्वि-त्रि-विधौ देवि ! कोटिशोऽनन्त-रूप-धृक् ॥ ११४
शिवः संव्याप्य सर्व तु सदा तिष्ठति पार्वति !
शिवस्य प्राणा इत्युक्त्वा पार्थिवे प्रारण-योजनम् ॥ ११५
एकः शिवो महेशानि ! प्राणास्तु बहवः शिवे !
शिवस्य प्राणाः सर्वत्र संव्याप्य सन्ति पार्वति ॥ ११६
पाथिवेपु शिवः प्राणाः षष्ठी चन्द्र-समाङ्किते ।
काश्मीराख्य-क्रमो देवि ! कथितस्ते मया तव ॥ ११७
शिवो दाता शिवो भोक्ता शिवः कर्ता निरंजनः ।
भस्मोद्धूलित-सर्वाङ्गो रुद्राक्ष-भूपिताङ्गकः ॥ ११८
सप्त-विशति-रुद्राक्षाः सन्ध्या-वत् परिकीर्तिताः ।
उक्त-संख्या महेशानि ! स्नान-वत् परिकीर्तिताः ॥ ११६
सहस्र-मणयो देवि ! नैमित्तिक-विधौ शिवे !
द्वि-त्रि-वेद-सहस्राणि रुद्राक्षान् धारयेत् प्रिये ॥ १२०
रुद्राक्ष-मण्डलं
कृत्वा तूत्तमाधम-मध्यमः ।
रुद्राक्ष-भूपितो भूत्वा रुद्र-तुल्यः क्षणाद् भवेत् ॥ १२१
मस्तके त्रिगुणा धार्या द्विगुणा बाहु-मण्डले ।
यथेच्छया च सर्वाङ्ग उक्त-संख्या श्रुतौ शिवे ॥ १२२
रुद्राक्ष-धारणे देवि ! विशेपानियम-द्वयम् ।
स्त्री-द्विष्टं गुरु-शप्तं च तत्-संसर्ग न कारयेत् ॥ १२३
नेत्र-त्रयात् समुत्पन्ना रुद्राक्षास्त्रिविधाः कलो।
धन-धोदक्ष-नेने स्यात् मोरङ्गोऽन्यस्तु घोत्तरः ॥ १२४
तृतीयस्तु मलाकी त्यानाग्निर्वहति तत्तनुम् । रुद्र-चक्षुः समाख्याता रुद्राक्षाः परिकीर्तिताः ॥ १२५ रुद्राक्ष-मण्डपे स्थित्वा यं यं मन्त्रं जपेच्छिवे ! स एव सिद्ध-रूपः स्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥ १२६ जीर्णे सूत्रे पुनः सूत्रं कृत्वा स्थाप्य जपेन्मनुम् । रुद्राक्ष मण्डपे देवि ! पूजयेत् सिद्धि-हेतवे ॥ १२७ रुद्राक्ष-मण्डपे देवि ! द्विधा श्रीचक्र-पूजनात् । श्रीविद्या-रूपमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ १२८ द्विविधत्वं प्रवक्ष्यामि येन देवी-मयो भवेत् । चत्वारि शिव-चक्राणि शक्ति-चक्राणि पश्च च ॥ १२६ भूपुरं गुण-रेखा च नाग-युग्म-दलानि च । ततो नाग-दलं देवि ! शिव-चक्राणि पार्वति ॥ १३० मन्वन दिग्युगात्रं च त्वष्टालं च त्रिकोणकम् । पञ्च वै शक्ति-चक्राणि दक्षिणामूर्ति-सम्मते ॥ १३१ आनन्दभैरव-मते शक्ति-शेवानि संशृणु । चतुः श्रीकण्ठ-संयुक्तः शिव-रामादि पञ्चभिः ।। १३२ परस्पर-प्रभिन्नाभिः शम्भोः प्रकृतिभिनव । श्रीचक्र-सिद्धिमेतद्धि शिव-शक्त्यात्मकं महः ॥ १३३ अन्तगृहं बहिश्चैव गृहं तु द्विविधं शिवे ! चतुर्दशार-पर्यन्तमन्तहमिदं शिवे ॥ १३४ बहिर्ग हं त्वष्ट-दलाद् भूपुरान्तं प्रकीर्तितम् । चतुर्दशार-पर्यन्तं श्रीचक्र परिकीतितम् यथा परा-पूजनादी विन्दु-मध्ये गृहं शिवे ! तथान्तर्गृहमित्युक्तं सर्व-देव-प्रपूजिते रुद्राक्ष-मण्डपे देवि ! चन-द्वय-विचारणात् । सर्व-सिद्धीश्वरो भूयानान कार्या विचारणा ॥ १३७ [६७ ॥१३५ ॥ १३६ फा०-७ तन्त्र पीठ-क्रमं ज्ञात्वा यन्त्र शक्ति प्रपूजयेत् । श्रीदेव्युवाच- पीठ-कुम्भं प्रपूज्यं स्यात् तन्मे वद महेश्वर ॥ १३८ अधो मध्येऽथवा पूज्यं कुत्र वा परमेश्वर ! अथवोपरि पूज्यं वा कुत्र पूजा विधीयताम् ॥ १३६ तन्मे वद महेशान ! यद्यहं तव वल्लभा । श्रीशिव उवाच- पोठं तु पात्रमित्युक्तं पीठोपरि प्रपूजयेत् ॥ १४० यन्त्रं चैतन्य मित्युक्तं पोठं चाधस्तनं भवेत् । यन्त्राधः पूजयेत् पीठं यन्त्र मूर्ति-मयं शिवे ॥ १४१ मूर्तेरधो भवेत् पीठं मूर्तिः पीठोपरि प्रिये ! यन्नाधः पूजयेत् पोठं यन्त्रं भूतो निधापयेत् ॥ १४२ अत्र केचिदपीच्छन्ति यन्त्र-मध्ये प्रपूजनम् । शुभ-योगे शुभ-दिने महा-पर्वणि साधकः ॥ १४३ चन्द्र-सूर्य-प्रहे वापि यन्त्र-स्थापनमाचरेत् । यन्त्र-संस्थापन कार्य चन्द्र-सूर्य-ग्रहे शिवे ।। १४४ तद्-यन्नस्था देयता तु सहसा वर-दायिनी । चन्द्र-सूर्य ग्रहे देवि ! यद्यत् कर्म करोति च ॥ १४५ तत्तदक्षयमायाति विद्या-राज्ञी प्रमादान्मोहतो वापि पवित्रारोपणं प्रिये ॥१४६ अधि-वासनकं कर्म न जानन पूर्वमेव चेत् । तदा किया महेशानि !तत् कार्य वा विलोपयेत् ॥ १४७ लोपने चेत् महत्-पापं कार्य यत्नेन शाकरि ! प्रथम-प्रहरे देवि ! ह्यधि-वासनमाचरेत् ॥१४८ तृतीय-प्रहरे देवि ! पवित्रारोपणं चरेत् । हधि-वासनमीरितम् ॥१४६ प्रसादतः। प्रहर-द्वय भेदेन ८ ]
कार्य-सोपो न कर्तव्यः सर्वथा हितमिच्छता ।
यन्त्राधि-वासनं कार्यमेवमेव प्रकीर्तितम् ॥१५०
कर्म-लोपे क्रियमाणे देवता-शापमाप्नुयात् ।
इति संक्षेपतः प्रोक्तं सम्प्रदाय-त्रये शिवे ॥१५१
पुरश्चर्या विधा देवि ! तत् फ्रम शृणु पार्वति !
दशाङ्गा केरले प्रोक्ता काश्मीरे वसु-संजिता ॥ १५२
पञ्चाङ्गा गौड-मार्गे तु साम्राज्य-मण्डलं शृणु।
कालिका-शाप-मुक्तिस्तु महा-कालश्च कुल्लुका ॥ १५३
तद्-गायत्रो स्पर्श-मरिणस्तारा तस्याश्च कुल्लुका ।
प्रक्षोभ्य-वटुको देवि ! तथा चकाक्षरी शिवे ॥ १५४
तद् गायत्री तथा बाला तद्-गायत्री तथैव च ।
काम-विद्यामणिः कोलास्तद्-विद्या कुल्लुका तथा ॥१५५
स्वर्णेशः क्षेत्रपालश्च तयव छिन्नमस्तका ।
एकार्णा तस्या गायत्री ततः काम-कला शिवे ।। १५६
तद्-गायत्री मधुमती तथा पद्मावती शिवे !
सम्पत्-सरस्वती चैव नवार्णा विजया तथा ।। १५७
द्वात्रिंशदक्षरी विद्या त्रैलोक्य-विजया तथा ।
हेलका चा-पटिका
मृत-स
-सञ्जीवनी तथा ॥ १५८
....."स्तम्भ-करी विद्या तथा कर्ण-पिशाचिनी ।
अमरी-कुण्डली देवि ! तथा वै काल-सुन्दरी ॥ १५८
कर्ण-चण्डा तथामोघ-करख्या तु पिशाचिनी ।
महा-कर्ण-पिशाची च तथा स्वप्नेश्वरी शिवे ॥ १६०
स्वप्न-वाराहिका विद्या द्वितीया महती शिवे !
श्रीमहा-रक्त-चामुण्डा त्रिपुराकर्षणी तथा ॥ १६१
चिटि-विद्या महेशानी कमलाक्षी ततः परम् ।
आकर्षणी महा-काली श्रीविद्याकर्षिणी तथा ॥ १६२
[ន
वशीकरण-काली महा-नील-सरस्वती। नकुली बगला विद्या तद् गायत्री च कुल्लुका ।। १६३ वसोर्धारा च धूमेशी तथा मारण-कालिका। त्रैलोक्य-मोहिनी चैव श्रीमहा-कुल-हारिणी ॥ १६४ सुरतेशी किन्नरी च रजकी तदनन्तरम् । वशीकरण-ताम्बूला द्वितीयाऽपि तथैव च ॥ १६५ क्षिप्र-कामिनिका विद्या काली कामकला शिवे ! ताम्बूलाकपिणो विद्या द्वितीया मुख-मार्जनी ॥ १६६ श्रीविद्या कुल्लुका चैव दीपिनी च महेश्वरी । कालिका दीपिनो चैव महा-मण्डलमेव च ॥ १६७ खड्ग-धारण-विद्या च भूत-रुद्र-महांकुशा । प्रत्यङ्गिरेति देवेशि ! साम्राज्य-मण्डलं मतम् ॥ १६८ जप-पूजा जपश्चैव ध्यानं चैव तथा जपः । पुतानं बलिश्चैव नैवेद्यं च विसर्जनम् ।। १६६ कुमारी-पूजन होमो बलिदानं च भोजनम् । पुनर्जपो महेशानि ! साम्राज्य-मण्डल-क्रमः ॥ १७० क्रूर-चण्डी क्रूर-जटा उग्न-घण्टा तथैव च । एते विज्ञाय यत्नेन साधयेत् सिद्धि-साधनम् ॥ १७१ जपेन पुटिता पूजा पूजया पुटितो जपः। अन्योन्य-पूजनं कृत्वा साधयेद् वीर-साधनम् ॥ १७२ पूजा-युक्तं जपेन्मन्त्रं न मन्त्रं केवलं जपेत् । जप-युक्ता भवेत् पूजा न पूजा केवला भवेत् ॥ १७३ इति संक्षेपतः प्रोक्तं गोपनीयं स्व-योनिवत् । श्रीदेव्युवाच- देव-देव महादेव ! विश्व-सिद्धि-परायण ॥ १७४ चराचरमिदं सर्व त्वन्मुखाद् विश्रुतं मया । इदानी बद सर्वज्ञ ! भूतानां निग्रहो महान् ॥ १७५ १००] 18, 1269,SIONTH BOMBAY 400 022 INDIA
श्रीशिव उवाच---
रहस्याति-रहस्यं च कथं तत् प्रवदाम्यहम् ।
तथापि तव सम्प्रीत्या कथ्यते शृणु सान्प्रतम् ॥ १७६
भूताः प्रेताः पिशाचाश्च राक्षसा ब्रह्म-राक्षसाः ।
भूत-प्रेत-ग्रहाश्चव तथा याल-ग्रहाः शिवे ॥ १७७
कश्मलाश्च निवाताश्च डाकिनी शाकिनी तथा ।
याकिनी राकिनी चैव हाकिनी लाकिनी तथा ॥ १७८
काकिनी प्रमुखाश्च कोटिज्ञाः भैरवैरिताः ।
रुद्र-ग्रहास्तथा विष्णु-नहा ब्रह्म-ग्रहास्तथा ॥ १७६
कृत्य-ग्रहास्तथा देवि ! कूष्माण्डा यक्षिणी-ग्रहाः ।
काम-ग्रहा मदोन्मादास्तथोन्मत्त-ग्रहाः शिवे ॥ १८०
जल-ग्रहास्तथा सर्वे ग्रहाश्चेटक-पूतनाः
स्कन्द-ग्रहा महेशानि ! तथा वैनायिकाः शिवे ॥ १८१
धन-प्रहास्तथा देवि ! तथा देव-ग्रहा अपि ।
यक्षाश्च दानवा दैत्या वेतालाः किन्नरी-गणाः ॥१८२
भूतिन्यप्सरसश्चैव तथैव नागिनी-ग्रहाः ।
एवमादि-ग्रहादोनां नाशनं येन जायते ॥ १८३
शूलिनी शरभश्चैव
शिव-पञ्चाक्षरी तथा ।
नव-दुर्गा बहिबन्धस्तथान्तर्बन्ध एव च ॥ १८४
सुभ्र णश्च महेशानि ! तथैव खड्ग-वारणः ।
महा-विद्या-मण्डलं च महा-मण्डलमेव च ॥ १८५
हनुमान् भैरवश्चैव बटुकः क्रोध-भैरवः ।
प्रत्यङ्गिरा वीर-भद्रस्त्रैलोक्य-विजया तथा ॥१८६
नारसिंहो महेशानि ! महा-शरभ-शूलिनी ।
चण्ड-काली भद्रकाली प्रोक्ता रुद्र-महांकुशा ॥ १८७
महा-पाशुपतास्त्रं चाघोरास्त्रं च तथैव च ।
एते मन्त्रा मया प्रोता शावर-द्वय-योगतः ॥ १८८
[१०१
।
ब्रह्म-राक्षस-वेताल-कृत्यादी खड्ग-वारणे । ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रः प्रेतापस्मार-नाशने ॥ १८६ यातुधान-विनाशे तु तथा किम्पुरुषादिके । शरभो हनुमान् देवि ! विरूपाक्षोङ्गिरा अपि ॥ १६० भूत-प्रेत-पिशाचादि क्रूर-ग्रह-निवारणे शूलिनी नव-दुर्गा च तथा पञ्चांगुलिः प्रिये ॥ १६१ कूष्माण्ड-डाकिनी-नाशे प्रेतापस्मार-नाशने । वीर-भद्रः शिवः प्रोक्तः सर्व-नाशे तु तद्-गणाः ॥ १६२ सर्वेषां नाशने शान्तौ प्रोतावपि महेश्वरि ! महा-विद्या-मण्डलं च बन्ध-द्वय-समन्वितम् ॥१६३ महा-विद्या मण्डलेन किं तद् यन्न करे स्थितम् । गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ॥१६४ रहस्याति-रहस्यं च स्व-योनिरपरा यथा । इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥ १६५ थोदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि रहस्यमपरं वद । श्रीशिव उवाच- आवेशं भैरवादीनां निग्रहो येन जायते ॥ १६६ तेनैव शक्यते फतुं नान्यथा शाङ्करं वचः । तन्मूल-विद्या-योगेन किंवा सिद्धयति पार्वति ॥ १६७ नृसिंहानां भैरवाणां तथा हनुमदादिके । श्रीवीर-वायु-पुत्रेण खड्ग-वारणतः शमः ॥१६८ रक्तय-भैरवादीनां शास्ता श्रीभरवेश्वरः । दामिनीनां तयेष्टानां महेप्टानामपि प्रिये ॥१ निग्रहे वीर-काली तु किमन्यच्छोतुमिच्छसि । श्रीदेव्युवाच- अय वै फुल्जुकोत्पत्ति कथयस्व ममाधुना ॥ २०० १०२] श्रीशिव उवाच- रहस्यमपि देवेशि ! कथ्यते शृणु साम्प्रतम् । कुल्लुका च तथा सेतुर्महा-सेतुस्तथैव च ॥ २०१ निर्वाणं कुण्डली पप्ठी सर्वोत्पत्ति शृणु प्रिये ! विद्यानां कुल-पूज्यत्वात् कुल्लुका तेन कीर्तिता ॥ २०२ विद्या-सम्बन्धि-दोषाणां भक्षधित्री यतः शिवे ! तेनेयं कुल्लुका नाम कालि-नित्या तृतीयका ॥ २०३ कुल्लव कुल्लुका नाम्नी नीला नील-सरस्वती । विद्या-सिद्धयर्णवे देवि ! पारं प्रगच्छति ॥२०४ तेन सेतुर्महेशानि ! विद्या मार्गः प्रकीर्तितः । महा-विद्याप्ति-सन्दी महा-सेतुर्महेश्वरि ॥ २०५ महा-विद्यार्णवस्याथ चैतन्यस्य प्रदर्शकः । महा-सेतुर्महादेवि ! महा-विद्या-स्वरूप-धृक् ॥ २०६ देवतायास्तु निर्वाणं चैतन्यं यच्च कोर्तितम् । निर्वाणं कथितं भद्रे ! विद्या-वाक्-मातृकार्णकैः ॥ २०७ निर्वाणं परमेशानि ! सेतुश्चरण-रूप-धक । निर्वाणं तु महेशानि पर-ब्रह्मात्मता शिवे ॥ २०८ चतुर्थ कथितं भद्रे ! विद्या-चरणमीरितम् । पञ्चमी कुण्डली देवी यथा-वदवधारय । २०६ मूलाधाराव बिलान्तं च विष-तन्तु-स्वरुपिणीम् । सर्व-देव-स्वरूप सर्व-वर्ण-प्रदीपिनीम् ॥ २१० महा-कुण्डलिनी देवोममरों कुण्डली पराम् । प्रथमं कालिका-देव्याः कुल्लुका पञ्चमी परा ॥२११ काली कूचं वधू माया फडन्ता परिकीर्तिता । तारायास्न्यक्षरी नीला छिन्ना चाष्टाक्षरी भवेत् ।। २१२ वन-वैरोचनीये च अन्ते वर्म प्रकीर्तितम् । हैस्त्र बीजं तु भैरव्याः कुल्लुका परिकीर्तितम् ॥ २१३ [१०३ श्रीमत-त्रिपुरसुन्दर्याः कुल्लुका द्वादशाक्षरी। वाग्भवं काम-राजं च लज्जां च त्रिपुरेति च ॥ २१४ भगवति ततः स्वाहा कुल्लुका त्रिपुरा-मनोः अन्यासां प्रणवं तारा कूर्चेति त्र्यक्षरी मता ॥ २१५ अघोरश्न विरूपाक्षः छिनाया द्वार-देवताः । क्रमेण फुल्लुकादीनां ऋपयः परिकीर्तिताः ॥२१६ छन्दः स्व-स्व-देवताया बोज-शक्त्यादिकं तथा । पुरश्चर्यादिकं देवि ! कर्तव्यं स्व-स्व-मूल-वत् ॥ २१७ महा-कुण्डलिनों वक्ष्ये सर्व-तन्त्रेषु गोपिताम् । प्रणवं च तथा जूं सः काल-मूर्ति-पदं ततः ॥ २१८ काल-प्रबोधिनि-पदं कालातीते-पदं वदेत् । काल-दायिनि-शब्दान्ते कपाल-पात्र-धारिणि ॥२१६ अमरोति कुण्डलिनि जूं सः वं च त्रयं तथा । सोऽहं स्वाहा महेशानि महा-कुण्डलिनी-मनुः ॥ २२० चिन्तपेत् कुण्डलों देवीं मूल-चूलि-निवासिनीम् । तवधः काम-राजं च सा प्रोक्ता स्पर्श-सुन्दरी ॥ २२१ महा-काम-कला-रूपा काकिनी-मूनि संस्थिताम् । सेत्वादिकं पूर्वमुक्तं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २२२ श्रीदेव्युवाव- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि पूर्वोक्तं यद् रहस्यकम् । श्रीशिव उवाच-- किं तद् रहस्यं देवेशि! प्रकाशय ममाधुना ॥ २२३ श्रीदेव्युवाच- महा-कालादि-नित्यानां निर्णय-द्वितयं श्रीशिव उवाच- महा-काल समारभ्य नित्यानां निर्णयं शृणु ॥ २२४ घद।
महा-कालो महा-भीमः प्रलयानल-सन्निभः।
काली-माया-समुद्भूतः काली-मानसिकः शिवः ।। २२५
महा-कालः पर-शम्भुः परातीत-गुणाकरः ।
तस्य मन्नं प्रवक्ष्यामि येन रक्ष्यं जगत्-त्रयम् ॥ २२६
कूर्च-युग्मं महा-काल प्रसीदेति पद-द्वयम् ।
लज्जा-युग्मं वह्नि-जाया-संयुक्तः पोडशार्णकः ॥ २२७
पोडशार्णा यथा मुख्या सर्व-श्रीचक्र-मण्डले ।
तथायं सर्वकालीपु महा-कालः प्रकीर्तितः ॥२२८
कालिकास्य ऋषिः प्रोक्तो विराट् छन्दः प्रकोतितं
देवता तु महा-कालः सर्व-रूपो निरञ्जनः ॥ २२६
कूचं बोजं तथा माया शक्तिरत्र प्रकीर्तिता।
स्वाहा कोलफमुद्दिष्टं काल्यर्थे विनियोगिता ॥ २३०
मायया तु षडङ्गानि ध्यानं शृणु वरानने !
कोटि-कालानलाभासं चतुर्भुजं त्रिलोचनम् ॥ २३१
श्मशानाष्टक-मध्यस्यं मुण्डाण्टक-विभूषितम् ।
पञ्च-प्रेत-स्थितं देवं त्रिशूलं उमरं तथा ॥ २३२
खड्गं च खर्परं चैव वाम-दक्षिण-योगतः।
बिभ्रतं सुन्दरं देहं श्मशान-भस्म-भूषितम् ॥ २३३
नाना-शवः क्रीड-मानं कालिका-हृदय-स्थितम् ।
लालयन्तं रसासक्तं घोर-चुम्बन-तत्परम् ।। २३४
गृध्र-पोमायु-संयुक्तं फेरवी-परण-संयुतम् ।
जटा-पटल-शोभाढ्यं सर्व-शून्यालय-स्थितम् ॥ २३५
सर्व-शून्यं मुण्ड-भूषं प्रसन्न-वदनं शिवम् ।
भावयेत् परमेशानि ! रति-यन्त्रं तु पश्व च ॥ २३६
त्रिकोण-संज्ञा योनिः स्यात् तच्चकं काल-चल ।
योनी वा हृदये भाने कामिन्याः स्तन-मण्डले ॥ २३७
[१०५
महा-कालं यजेद् देवं पञ्चावरण-संयुतम् ।
त्रिकोणे पूजयेद् देवि ! त्रिकोणं कालिकादिकं ॥ २३८
पड्-दले तु षडङ्गानि नाभौ दिक्-शक्तयो मताः ।
हृदये द्वादशादित्याः कण्ठे षोडश-नित्यकाः ॥ २३६
द्वि-पत्रे परमेशानि ! महा-कालों प्रपूजयेत् ।
...."देवि ! तां देवीं पूजयेद् विभूम् ॥ २४०
शक्तिं स्वाभिमुखी कृत्वा पूजयेत् कालिकां पराम् ।
मूलाधाराद् द्वि-पत्रान्तं यथा चक्राणि कारयेत् ॥ २४१
पूजयेत् परमेशानि ! गुरु-पूजा-पुरःसरम् ।
पात्रासादनकं कृत्वा काली-वत् परिपूजयेत् ॥ २४२
एवं पूजां विधायाऽथ लक्ष-संख्यं जपेच्छिवे !
तद् दशांशेन हवनं करवीर-प्रसूनकैः ॥ २४३
स्वयम्भुवाक्तर्वोजाक्तः कारणाक्तश्च वा हुनेत् ।
नित्यं नैमित्तिकं काम्यं कालो-वत् सर्वमाचरेत् ॥ २४४
अन्तर्धान-करी काली विद्याया विधिरुच्यते ।
मूर्ति ध्यानोदितां ध्यात्वा सर्वावयव-शोभिताम् ॥ २४५
मूलाधारे गणपतिं लिङ्ग गणप-वल्लभाम् ।
नाभौ वटुक-नायं च हृदि बटुक-वल्लभाम् ॥ २४६
कण्ठे उड्यान-पीठं भ्रवि प्रदीप्त-मङ्गलाम् ।
ललाटे करवीरं च अलके क्षेत्र-पालकम् ॥ २४७
मूनि वै कालिकां चैव चतुर्यान्तां प्रपूजयेत् ।
मूनि व्योमैश्वर्यम्बां च ललाटे खेचरों तथा ॥ २४८
5 मध्ये दिक-चरी चैव हृदये गोचरी तथा ।
नाभौ च भू-चरों चैव लिने च खग-मूर्तिकाम् ॥ २४६
मूल-पत्रे विचित्रां च पूजयेत् साधकोत्तमः ।
तथा ललाटे सूर्य च दक्ष-नेने फलाधिपम् ॥ २५०
फट्-कार-भैरवश्चय
वैश्वानरं वाम-नेत्रे कण्ठे च कालिकां तथा ।
हृदये दास-योनि च नाभौ च दास-सिद्धकम् ॥ २५१
ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारी वैष्णवी तथा ।
वाराह्य न्द्री च चामुण्डा महालक्ष्मी परा मता ॥ २५२
मन्थान-भैरवश्च व
पट्-चक्र-भैरवस्तथा।
विभक्ष-भैरवस्तथा ॥ २५३
वीरेश-भैरवश्व धीमत्-त्रिपुर-भैरवः।
हंस-गर्भ-भैरवश्चैव
चण्डिकेश्वर-भैरवः ॥ २५४
मूनि ललाटे फण्ठे च हृदये नाभि-मण्डले ।
लिङ्ग च मूलाधारे च सर्वाङ्गे पूजयेत् सुधीः ॥ २५५
यथा-शक्ति जपेद् विद्यांवलिं दद्याद् यथा-विधि ।
ॐ ब्रह्म (क्षे) च क्षेत्र-पाल इमं बलि पदं वदेत् ॥ २५६
गृह्ण-युक् स्वाहया युक्तः क्षेत्र-पाल-बलिर्मता ।
इति पूजा-विधिदेवि ! श्रीकालो-कालयोर्मता ॥ २५७
अन्तर्धान-विधी देवि !........
महा-काल-प्रसङ्गेन रहस्यमपि दर्शितम् ॥ २५८
गोपनीयं त्वया भद्रे ! रहस्याति-रहस्यकम् ।
गोपनीयं गोपनीयं स्व-योनिरपरा यथा ॥ २५६
मता।
[१०७
द्वादशः पटलः कालो-नित्या श्रीदेव्युवाच -- देवेश! श्रोतुमिच्छामि रहस्याति-रहस्यकम् । अन्तर्धान-विधिः प्रोक्ता पर काय-प्रवेशनम् ॥१ श्रीशिव उवाच- तथा कथ्यते देव-देवेशि ! शृणु सावहिता भव । कुलाकुल-समुद्भूतममृतानन्दमयेत् ।। २ सूर्य-कोटि-समं मन्त्रं बादि-मध्ये व्यवस्थितम् । जपेत् कुलामृतं दत्वा" "समुद्भवम् ॥३ कुले..."कुण्डली-दृढ़-वन्धनात् । आधारे पत्र-मध्ये च द्वि-पत्रे द्वि-पदालये ॥ ४ पोडशारे युते लिङ्गे द्वादशे मणिपूरके । हृदये दश-पत्रे च द्वादशार्धे चतुर्दले ॥५ कण्ठे भाले यजेद् देवि ! जिह्वा-ललन-संकुले । अबलागार-मध्ये तु ब्रह्मचर्य-व्रतो नरः॥६ सङ्कल्पैर्धवलापि श्वेत-वस्त्रावगुण्ठितम् । गच्छति ब्रह्म-मार्गेण लिङ्ग-भेद-कमेण च ॥७ विसर्गस्थामृतं दिव्यं क्षीर-धारोपमं द्रवम् । पीत्वा कुलामृतं तत्र पुनरेव विशेत् कुलम् ॥८ पुनरेवाफुलं गच्छेद् द्वादशान्ते निवेदयेत् । सहस्रारे महा-चने वाग्भवं पूर्ण चन्द्रकम् ॥६ ब्रह्म-प्रयिं ततो भित्वा पोत्वा सप्ताष्ट-धारया। लम्बिकाद् ब्रह्म-मार्गेण तालु-मूले प्रवेशयेत् ॥ १० १०८] जिह्वामापूर्य तां विद्यां मातृका-वर्ण-रूपिणीम् । वहिनतां वर्ण-रूपां जिह्वाग्ने दोप-रूपिणीम् ॥ ११ आमूलाद् ब्रह्म-रन्ध्रान्तं तथा जिह्वाग्र-देशगाम् । वाग्भवाद्यां महा-विद्या दीपाकारां विचिन्तयेत् ।। १२ हस्तयोः पादयोविद्यां तथा नाडी-त्रयेषु च । प्राधारात्त समुत्थाप्य वागीशी द्वादशे नयेत् ॥ १३ द्वादशाधारमादाय तद्-ग्रन्थिं परिभेदयेत् । तस्माज्जिह्वाग्रमादाय दोपाकारां विभावयेत् ।। १४ लक्षमेकं तन्न जप्त्वा सर्व-पापं विनिर्दहेत् । ततश्चराचरं सर्व ज्ञात्वा सर्वज्ञतां नयेत् ॥ १५ प्राणायाम-प्रभावेन जप-सिद्धिः प्रजायते। एक-विंशति-साहलं पट्-शताधिकमेव च ॥१६ प्रत्यहं जयते जीवो ब्रह्मानन्द-मयीं पराम् । उत्पत्तिर्जप आरम्भो भूतिरस्या निवेदनम् ॥ १७ विना जपेन सततं जपो भवति सर्वदा । एवं जपं सुविज्ञाय गणेशादौ निवेदयेत् ॥ १८ जीवात्मनः क्रमेणव तथा च पट्-शतानि सहस्राणि षडेव च तथा पुनः ॥ १६ पद-सहस्राणि ततो सहस्रं चैतदेव हि। पुनः सहस्र गुरवे क्रमेण विनिवेदयेत् ॥ २० आधारे स्वर्ण-वर्णेऽस्मिन् वादि-सान्तानि संस्मरेत् । विद्युत्-पुञ्ज-प्रभाभानि चिन्तयेत् मणिपूरके ॥ २१ महा-नील-प्रभाभानि डादि-फान्तानि चिन्तयेत् । पिङ्ग-वर्ण-महा-ह्नि फणिका विचिन्तयेत् ॥ २२ कादि-ठान्तानि वर्णानि चतुर्थेनाहते स्मरेत् । विशुद्धे धूम्र-वर्णे तु रक्त-वर्णान् स्वरान् न्यसेत् ॥ २३ परमात्मनः। [१०६
आज्ञायां विद्युदाभायां शुभ्रौ ह-क्षौ विचिन्तयेत् ।
कर्पूर-द्युति-संराजत्-सहस्र-दल-पङ्कजे ॥ २४
नीलात्मकं ब्रह्म-रन्ध्रे चिन्तयेच्च ततः परम् ।
फलं चास्य प्रवक्ष्यामि षड्-चक्केषु यथा-क्रमम् ॥ २५
आधारे भावनाभ्यासान्मन्त्र-सिद्धिः प्रजायते ।
"""च भावनाभ्यासाद् विद्या वीर्य-वती भवेत् ॥ २६
ततो ध्यायेन्नाभि-चक्ने विद्या-ज्ञानस्य हेतवे ।
देह-ज्ञानं लभेन्मन्त्री पण्मासाभ्यन्तरेण च ॥ २७
हृदब्जे भावनाभ्यासात् त्रिकालज्ञो नरो भवेत् ।
कण्ठे च भावनाभ्यासाद् देह-सिद्धिः प्रजायते ॥ २८
सूर्य-सत्वान्महा-योगी त्रैलोक्ये यद-भवत्यपि ।
जानात्यहरहो मन्त्री त्रैलोक्ये च न संशयः ॥ २६
शिव-चन्द्र-समायोगाज्जाप्य शुक्रज्ञवान् भवेत् ।
उदानमभ्यसेन्नित्यं जल-स्तम्भन हेतवे ॥३०
समानाभ्यासतो योगी वह्निनाऽपि न दह्यते ।
ततः सूक्ष्मो महा-भूतः सूक्ष्ममुत्तारयेदपि ॥ ३१
मनोजवो भवेन्मन्त्री कालिका-ध्यान-योगतः ।
देह-ज्ञान-प्रभावेन अन्तर्धानमवाप्नुयात् ॥ ३२
अन्तर्धान-प्रभावेन पर-देहं प्रवेशयेत् ।
अणिमाद्यष्ट-भावेशः कोटि-सिद्धीश्वरो भवेत् ॥ ३३
अलभ्यं लभते योगी महा-मन्त्रानुभावतः।
इत्यादि सिद्धि-भावेषु वैराग्यं यदि जायते ॥ ३४
कंवल्यं लभते योगी काली-व्यापकतामियात् ।
इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥ ३५
श्रीदेव्युवाच--
देवेश ! श्रोतुमिच्छामि फाली-नित्या-विनिर्णयम् ।
११०]
श्रीशिव उवाच-~-
काली कपालिनी कुल्ला कुरुकुल्ला विरोधिनी ॥ ३६
विप्रचित्ता तथोनोग्रप्रभा दोप्ताऽथवा तथा ।
नीला घना बलाका च मात्रा मुद्रा मिता तथा ॥ ३७
नित्या-मण्डलमेतद्धि तत्-ममं शृणु शाम्भवि !
कालोनित्या च तन्मन्त्रः कथ्यते शृणु साम्प्रतम् ॥ ३८
विप-वीजं तथा मायां कालीति युगलं वदेत् ।
महा-कालि पदं प्रोच्य कौमारीति पद वदेत् ।। ३६
मह्य देहि पदं देवि ! ठठ-युक्ता मनुर्मता।
ऊन-विंशाक्षरी विद्या कालो-नित्या प्रकीर्तिता ।। ४०
पशुरामो ऋषिः प्रोक्तश्छन्दोऽनुष्टुप् प्रकीर्तितम् ।
देवता कालिका प्रोक्ता माया वीजं प्रकीर्तितम् ॥ ४१
कालिका च भवेच्छक्तिः ठ-युग्मं कोलकं भवेत् ।
कालिका-प्रोगनाद्यर्थे विनियोगः प्रकीर्तितः॥ ४२
पडङ्गमाचरेद् देवि ! जाति-युक्तेन मायया ।
ततो ध्यायेन्महेशानि ! चिता-निर्वाण-मण्डले ॥ ४३
श्याम-वर्णा महा-भीमा घोर-रावा करालिनी ।
मुण्ड-माला-विभूषादया दक्षे खड्ग प्रविनती ॥ ४४
तर्जनी धारयन् वामे नृत्यन्ती प्रेत-भूमिषु ।
एवं ध्यात्वा महेशानि ! तद्-यन्त्रं शृणु पार्वति ॥ ४५
त्रिकोण-युग्मं देवेशि ! वृत्ताष्ट-दल-भूपुरम् ।
विन्दौ काली समाराध्य त्रिकोण-युग्मके पुनः॥ ४६
गुण-त्रयं तत्पुरुषास्तच्छक्तयः क्रमान मताः।
ब्राह्मयादि-मातरश्चाष्टौ लोकपालाः सशस्त्रकाः॥ ४७
भूपुरे पूजयेद् देवि ! धूम-दीपोपचारकः ।
नैवेद्यं विविध खाद्यं पश्च-खाद्यं विशेषतः ॥ ४८
[ १११
निवेदयेत् कालिकायै ततस्तुष्टा भविष्यति ।
नोराजनान्तं कृत्वाऽथ प्रजपेल्लक्ष-मात्रकम् ॥ ४६
दशांशं पायसेनैव होमं कुर्याद् विधानतः ।
अथवा करवीरेण होमयेत् सर्व-सिद्धये ॥ ५०
सर्व-सिद्धीश्वरो देवि! भवत्येव न संशयः ।
मन्त्र-भेदान् प्रवक्ष्यामि यथावदवधारय ॥ ५१
नाम-त्रयं महेशानि ! प्रत्येकं प्रणव-क्रमात् ।
मन्त्र-त्रयं महेशानि ! वीज-त्रय-नियोजनात् ॥ ५२
विद्या-नयं पुनर्देवि ! ध्रुव-माया-नियोजनात् ।
विद्या-त्रयं महेशानि ! प्रत्येकं नवधा मनुः ।। ५३
दुर्भगानां च दीनानां यूराणां पाप-कर्मिणाम् ।
मन्त्रमेनं न कथयेत् सर्वैश्वर्य-मयो भवेत् ॥ ५४
लक्ष्मीवान् कीर्तिमान् धन्यो भवेत् न संशयः।
सुन्दरों कामिनों दृष्ट्वा तस्याश्च व"""वदेत् ॥ ५५
..."शब्देन तद्-भङ्गं सा दासी मन्त्र-जापतः।
व्याकुला सा भवत्येव स्वेच्छया भोगमेष्यति ॥ ५६
ललाटे हृदये विद्यां योनि-मध्ये यया-क्रमम् ।
यस्याः सञ्चिन्तयेद् विद्यां तन्नाम-स्मृति-पूर्वकम् ।। ५७
तामाफर्पयति क्षित्रं किमन्यैर्वह-जल्पितः।
साक्षात् स काली-पुनः स्यान्नानकार्या विचारणा ॥ ५८
११२ ]
त्रयोदशः पटलः कुल्ला-नित्या-विधिः श्रीदेव्युवाच- देवेश! श्रोतुमिच्छामि कपालिन्या विधि पराम् । नित्या द्वितीया देवेश ! प्रोक्ता कपालिनो परा ।।१ तस्या मन्त्रं महेशान ! कथयस्व ममाधुना । श्रीशिव उवाच- देवेशि ! कथ्यते गोप्यं यन्न कुत्रापि कीर्तितम् ॥ २ कपालिनी महा-विद्या द्वितीया तन्मनुं शृणु । आदौ सप्त-कुलं प्रोच्य कामं वह्नि-पदे स्थितम् ॥ ३ इन्दिरा-बिन्दु-भूपाढय-वीजं काली-स्वरूपकम् । कपालिनि महा-कपाल-प्रिय-मानते वदेत् ॥४ कपाल-सिद्धि मे देहि हूं फट् स्वाहान्तको मनुः । त्रिंशद-वर्णोऽर्ध-वर्णाढयो मन्त्र-राजो महोत्तमः॥५ भैरवोऽस्य ऋषिः प्रोक्तस्त्रिष्टुप् छन्द उदाहृतं । कपालिनी-देवताऽन कालिका-बीजमीरितम् ॥६ स्वाहा शक्तिः समाख्याता हूँ फट् कोलकमोरितम् । कपालिनी-सिद्धयेऽत्र विनियोगः प्रकीर्तितः ।। ७ पड़-दीर्घ-भाजा बोजेन कुर्यादङ्गानि पद क्रमात् । ध्यायेदजन-पुजाभामापीन-स्तन-युग्मकाम् ॥ चन्द्र-धपत्रां च विम्बोष्ठी मुक्त-केशी दिगम्बराम् । चतुर्मुण्डोपरिगतां शङ्ख-कण-भूषिताम् ॥4 सड़ग-त्रिशूल-वरदाभयान हस्त-चतुष्टये । क्रमात् सम्बिभ्रती देवी गीत-हास्य-परायणां ॥ १० एवं सचिन्तयेद् देवि ! नित्यां कपालिनों परां । त्रिकोण-प्रितयं वृत्तं दलाष्टक-विभूषितम् ॥ ११ [११३ फा०-८ भूपुरेण समाकीर्ण चतुरोप-शोभितम् । यन्त्र कपालिनी-देव्याः सर्व-साम्राज्य-दायकम् ।। १२ महा-काली महा-लक्ष्मी महा-सरस्वती तथा । रति प्रीति तथा कान्ति द्वितीये तु त्रिकोणके ॥ १३ इच्छां ज्ञानं क्रियां चैव त्रिकोणे तु तृतीयके । मध्ये कपालिनों पूज्य दलेऽष्टौ मातृकार्चनम् ॥ १४ ततोऽष्टौ भैरवांश्चैव दिगोशान् शस्त्रकान् यजेत् । पक्षोपचारैः सम्पूज्य कुलाचार-परायणः ॥ १५ साधकः प्रजपेल्लक्ष हयारि-फुसुमैहु नेत् । मांसेन मधुना चापि जुहुयादिष्ट-सिद्धये ॥ १६ तदा कपालिनी देवी सिद्धा भवति निश्चितम् । पुरश्चर्या विना देवि ! कथं सिद्धा कपालिनी ॥१७ मुण्डासने नरः स्थित्वा सदा तद्-गत-मानसः । महा-मालां महा-पानं महा-यन्त्रासनादिकम् ॥१८ कृत्वा तु विधिवद् देवि ! तदा भवति साधकः । अथान्यदपि वक्ष्यामि कपालिन्याः पराक्रमम् ॥१६ रण-धीर-कपालानि कुज-यारे निशा-मुखे । समाहृत्य महेशानि ! पञ्च पञ्च समन्वितः ॥ २० दिग्बन्ध-भूत-शुद्धयादि-कपालाद्युपहारकैः साधकः सहितो भूत्वा सिन्दूर-तिलकाद्धितः ॥२१ खड्ग-हस्तो दिशा-वासो मुक्त-केशो मुदान्वितः । ईदृशः साधकः सोऽहं-कृति-भाव-समन्वितः ॥ २२ सुदूरे साधकान स्थाप्य पुष्प-वा घृताक्तया । दीपं संलापयेद् देवि ! जपेत् तत्र कपालिनीम् ॥ २३ भाग्यात् कपालिनी-सिद्धिः कदाचित् प्रभविष्यति । तथापि कालिका-भक्त भविष्यति भविष्यति ॥ २४ कपालं भाग्य-योगेन कदाचिद् यदि लभ्यते । तदा कपालिनी-सिद्धिः कज्ज्वलं तद्धि संग्रहेत् ॥ २५ ११४] -
तत्-कज्ज्वलं कपाले तु कज्ज्वलं स्थाप्य वै जपेत् ।
सम्मोहनाञ्जनं नाम महद-जनमीरितम् ॥ २६
तत् कपाले महेशानि ! कि तद् यन्न करे स्थितं ।
एपा कपालिनी नित्या द्वितीया कालिका भवेत् ॥ २७
इति संक्षेपतः प्रोक्तं कुल्ला शृणु तृतीयकाम् ।
कालिका कुल्लुका कुल्ला त्रिधा नाम्ना तु या मता ॥ २८
तस्मात् कुल्लेति नान्ना च कुल-पूज्यत्वतां गता।
विद्यानां कुल-पूज्यत्वात् कुल्लुका परिकोतिता ॥ २६
कुल्लुका कुल-पूज्यत्वात् कुल्ला-नानी कुलेश्वरी।
तस्या मन्वं प्रवक्ष्यामि यथावदवधारय ।।३०
प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य कालिका-बीजमुद्धरेत् ।
कुल्लाये हृन्मनुर्देवि ! प्रोक्तः सप्ताक्षरो मनुः ॥ ३१
भैरवोऽस्य ऋषिः प्रोक्तो गायत्री छन्द ईरितम् ।
कुल्ला काली देवताऽत्र कालिका बीजमोरितम् ॥ ३२
कुल्ला-शक्तिरिति ख्याता नमः कोलकमोरितम् ।
सर्वार्थ-साधने चैव विनियोगः प्रकीतितः ॥ ३३
कालिकोक्ते यजेत् पोठे कुमारी-यन्त्रमेव हि ।
कुमार्याः पूजनाद् देवि कुला सिद्धा भवेद् ध्रुवं ॥ ३४
लक्ष-द्वयं जन्मन्वं हविष्याशी दिवा शुचिः ।
अशुचिश्च तथा रात्री श्रीकुल्ला-दर्शनोत्सुकः ॥ ३५
कदाचिदम्र-सदृशा कदाचित् ज्योति-सन्निभाम् ।
चतुर्भुजां बिनयनां मुकुटाटोप-मण्डिताम् ॥ ३६
शवासन-गतां कुल्लां दश-मुण्डोपरि-स्थिताम् ।
वराभयो करे वामे पुस्त-लक् दक्षिणे करे ॥ ३७
नाना-विलास-कुशला कुल्लाम्बां परिचिन्तयेत् ।
एवं चिन्तयतस्तस्य दश-विद्या-मयी कला ॥ ३८
भवत्येव महेशानि ! कुल्लाम्बायाः प्रभावतः ।
करवीरजपा-पुष्पहुं नेज्जप-दशांशतः
[११५
- तथा तद्-दशांशं गन्ध-तोयस्तयेन्माजयदपि ब्राह्मणान् भोजयेद् देवि ! तदन्ते तु कुमारिकां ॥ ४० पूजयेत् परमेशानि ! कुल्ला-विद्या प्रसिद्धयति । कुल्ला-विद्या महेशानि ! सर्व-विद्या-प्रकाशिनी ॥ ४१ यन्त्रमस्यास्ति देवेशि ! नमित्त काम्य-कर्मरिण । त्रिकोण-द्वयमुद्धृत्य वृत्ताष्ट-दल-भूषितम् ॥ ४२ चतार-समायुक्तं भूपुरकेण भूपुरकेण संयुतम् मध्ये बीजं न्यसेत् काली-बीज-युक्तं महोत्तमम् ॥ ४३ धृति पुष्टि तथा मेधां तुष्टि प्रज्ञां तथा जयां । त्रिकोण-द्वितये पूज्य दलेऽष्ट-मातृ-भैरवाः ॥ ४४ लोक-पालान् शस्त्र-युक्तान् फुल्लुकावरणे यजेत् । अथवा देव-देवेशि ! कालिका-वत् समस्तकम् ॥ ४५ नवरात्र-द्वये चन्द्र-सूर्य-ग्रह-द्वये तथा संक्रमणे चैव पूजयेद् यन्त्रमुत्तमम् ॥ ४६ यदैव कार्यमुत्पन्नं तदैव कुल्लुकार्चनम् न विद्या सिद्धिमाप्नोति कुल्लकार्जुनमन्यतः ॥ ४७ आदिमान्त्य-समायुक्ता सा विद्या सिद्धिमाप्नुयात् । आदिमान्त्यमजानन् हि यो गुरुः स तु शिष्यहा ॥ ४८ आदिमान्त्यक्रियायुक्तो नित्यामन्त्री हि सिद्धयति । आदिमान्त्य-विहीनस्य न स्याद् देवस्य दर्शनम् ॥ ४६ प्रीतिभयं द्वयमिति द्वाभ्या सम्व्यापितं जगत् । अयं प्रयोगो गोप्तव्यो न कुत्रापि मयेरितः ॥ ५० कुल्ला-देव्यादि-नित्यासु जपो हि द्वितयावधिः । द्वितयाभ्यां न सिद्धोऽसौ स मन्त्रो न जपे क्षमः ॥ ५१ कुल्ला नित्या तृतीयोक्ता यस्यामेतत् प्रतिष्ठितम् । समस्त-जगती-सारं फुल्ला-संक्षेप-पूंजनम् ॥ ५२ ११६] - कुरुकुल्ला-विधान वल्लभा चतुर्दशः पटलः विरोधिनी-विधिः श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि रहस्यमपरं महत् । च कथयस्व ममाधुना ॥ १ कुरुकुल्ला च कि नाम कि विधा कि विधो मनुः । सर्व कथय देवेश ! यद्यहं तव ॥ २ श्रीशिव उवाच- शृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि रहस्याति-रहस्यकम् । विद्यानां कुल-पूज्यत्वात् कुरुकुल्ला कुलाधिका ॥ ३ कुल्लाया अपि पूज्यत्वात् कुरुकुल्ला महोदया । तस्या मन्त्री महेशानि ! सर्व-मन्त्रोत्तमोत्तमः ॥४ कालिकाचं समुद्धृत्य कुरुकुल्ले-पदं वदेत् । काली मायां मम-पदं सर्व-जन-पदं ततः ॥५ वशमानय चोच्चार्य काली च कुरुकुल्ले च वै । पदमुद्धृत्य देवेशि! माया-स्वाहान्तगो मनुः ॥६ सप्त-विंशत्यर्ण-संख्यो मन्त्रोऽयं सुर-पादप. । एतस्या हृन्मनुर्देवि ! कुरुकुल्ला नवाक्षरी ॥७ श्रीविद्या-विपये भिन्ना बालान-विद्या देवेशि !श्रीविद्या कुरुकुल्लिका ॥ इयं भिन्ना महा-विद्या कालो-नित्या चतुर्थिका । विना तु हन्मनुर्देवि ! कुरुकुल्ला न सिद्धयति ॥६ हृन्मनुं कुरुकुल्लाया ज्ञात्वा यत्नेन पार्वति ! प्रणवं कूर्चमुखत्य कुरुकुल्ले-पदं घदेत ॥ १० [११७ कुरुकुल्ला महेश्वरि !
."
ह्री-स्वाहान्तो मनुर्देवि ! कुत्कुल्ला कुमारिका ।
हुन्मनुत्वेन कथितः
सर्व-मन्त्रोत्तमोत्तमः ॥११
काल-भैरवी ऋषिश्वास्य वृहती छन्द ईरितम् ।
देवता कुरुकुल्ला च सर्व-विद्या-मयो परा ॥१२
की बीजं ह्रीं तथा शक्तिः स्वाहा कीलकमीरितं।
कुरुकुल्ला-कुमार्यास्तु भैरवो ऋपिरीरितः ॥१३
विराट् छन्दो निगदितं कूचं वीजं प्रकीर्तितम् ।
स्वाहा शक्तिः समुद्दिष्टा विनियोगो यथेच्छया ।।१४
कुल्ल-फुल्लां मित्र-कुल्लां कुरुकुल्लां हृदङ्गामा ।
कालो-ध्रुवः कुरुकुल्ले को हों च मम सर्वतः ॥ १५
जन-वशं को कुरु-युक् कुरुकुल्ले त्रिविष्टपे ।
स्वाहान्तोऽयं समुद्दिष्टो भैरवो हि विराट् ततः ।। १६
ह्रीं बीजं च तथा स्वाहा शक्तिः को कोलकं मतं ।
सर्वार्थे विनियोगः स्यात् पूर्व-वत् क्वापि कीर्तितः॥ १७
विनियोगः पूर्व-वत् स्यात् शृणुष्वाङ्गादि-कल्पनां ।
पड़-दीर्घ-काली-बीजेन पडङ्गानि क्रमाच्चरेत् ॥ १५
ततो ध्यायेन्महा-देवि ! कुरुकुल्ला कुलेश्वरीम् ।
शवोपरि समासीनां मुण्ड-माला-विभूपिताम् ।। १६
कपाल-कर्तृका-हस्तां खड्ग-खेटक-धारिणीम् ।
अञ्जनाद्रि-निभां दिव्यां मुक्त-केशी चतुर्भुजाम् ॥ २०
पीनोन्नत-कुच-द्वन्द्वां पीन-वक्षो नितम्बिनीम् ।
भक्तानन्द-फरोद्युक्तां साधकाभीष्ट-दायिनीम् ॥ २१
आसयाघूर्ण-नयनां कामिनी जन-मोहिनीम् ।
एवं सचिन्तपेद् देवों कुरुकुल्लां महोदयाम् ॥ २२
एवं ध्यात्वा जपेल्लक्ष-सख्यं त्रि-मधुरान्वितैः ।
होमयेद् विल्व-पवेश्च बिल्व-पुष्परपि प्रिये ॥ २३
११८]
। दशांश तर्पणं कुर्यात् तदशांशेन मार्जनम् । तद्-दशांशं विप्र-भोज्यं तेन तिज्ञो मनुर्मवेत् ॥ २४ पूजपेत् कालिका-पोठे त्रिकोण-त्रय-सोज्ज्वले । वृत्ताष्ट-दल-भूपाढ्य भूपुर-द्वय-शोभिते ॥२५ विन्दौ बीजं लिखेत् काल्यास्त्रिशक्ति-नयमर्चयेत् । काली तारां छिन्नमस्तां वालाम्बां बगला रमां ॥ २६ उग्र-गर्भामुग्र-योजामुन-वीर्यां तृतीयकाम् त्रिकोण-त्रितये पूजा क्रमेण परिकीर्तिता ॥ २७ ब्रह्माद्यष्टौ भैरवांश्च पूजयेत् द्वि-दलाष्टके । लोक-पालास्तदस्त्रांश्च पूजयेत् परमेश्वरि ॥ २८ शवे श्मशाने विपिनेऽरण्ये च भूत-संकुले । पूजयेत् कुरुकुल्लां च सर्व-सिद्धिं स विन्दति ॥ २६ यद्यत् प्रार्थयते चित्ते तत्तदाप्नोति साधकः । समस्तान पूजयेद् देवि ! ब्राह्मणांश्च सुवासिनीम् ॥ ३० विप्राराधन-मात्रेण किं तद् यत्न करे स्थितम् । तण्डुलेन जयावाप्तिर्गोधूमेन मापैः शत्रुम॒तिं याति मुद्गर्मोक्ष-फलं लभेत् । तिल-तण्डुल-होमेन महा-प्रीति स विन्दति ॥ ३२ राजी-लवण-होमेन कामिनी वशयेद् ध्रुवम् । सर्पपलवणर्देवि ! कामिनी-मन-रञ्जनम् ॥ ३३ सपिलवण-होमेन कामिनी-मनोरञ्जनम् हरिद्रया दरिद्राणि नश्यन्त्येव न संशयः ॥ ३४ इति संक्षेपतः प्रोक्तः कुरुकुल्ला-विनिर्णयः । रहस्याति-रहस्यं च किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ३५ श्रोदेव्युवाच- विरोधिनी-विधि भूहि यद्यहं तव वल्लभा । धनागमः ॥३१ - श्रीशिव उवाच- रहस्यादति-गोप्यं हि नित्या प्रोक्ता विरोधिनी ॥ ३६
॥३७
पञ्चमी-संशका नित्या यथावदवधारय ।
प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य कालो-प्रणवमुद्धरेत्
मायां कामं ततः कूर्च प्रोवत्वा विरोधिनी-पदं ।
शवूनुच्चाटय-पदं
विरोधयन्द्रयं वदेत् ॥३८
शन्नु-क्षय-करो प्रोच्य हूं फट् स्वाहान्तको मनुः ।
द्वात्रिंश-वर्ण-संयुक्तो मन्त्र-राजो महोत्तमः ॥
महा-मन्त्रोऽयमाख्यातो ऋपिभैरव ईरितः
गायत्री छन्द आदिष्टो देवता तु विरोधिनी ॥ ४०
काली-बीज वीजमस्याः माया शक्तिः प्रकीतिता।
काम-बीजं कोलकं स्याद् विनियोगो यथेच्छया ॥ ४१
काली-पड़-दीर्घ-बोजेन पडङ्ग-युग्ममाचरेत् ।
ध्यायेदजन-गिरि-निभा द्विरष्ट-वर्ष-देशिनीम् ॥ ४२
पीनोन्नत-कुच-द्वन्द्वां सर्पास्थि-मालिका-युताम् ।
चतुर्भुजां त्रिनयनां शव-पद्मोपरि स्थिताम् ॥ ४३
विशिखं नाग-पाशं च घण्टां च डमरु तथा।
सम्बिधती महा-देवि ! क्रमाद् भुज-चतुष्टये ॥ ४४
धूम्राम्बरां पीत-गानामोषत्-प्रहसिताननाम् ।
मा भैर्वीर! वरं ब्रूहि सर्व तत् ते ददाम्यहम् ॥ ४५
उपस्थितं तु यत्-कार्य तत्तत् कार्य करोम्यहम् ।
एवं सम्वदतों देवीं चार-हासां मनोहराम् ॥ ४६
विरोध-करणोद्युक्तां शत्रूणां नाश-कारिणीम् ।
कालिकोक्ते यजेत् पीठे त्रिकोण-त्रय-शोभिते ॥ ४७
वृत्ताण्ट-दल-भूपाढ्ये भूपुरैकेन शोभिते
चतुरि-विभूपाढ्ये श्रीबीजोज्ज्वल-कणिके
विरोधिनी कणिकायां त्रिकोण-त्रितये ऊमात्
धूम्राचिरूष्म-स्वालिनी विस्फुलिङ्गिनीम् ॥४६
१२०]
सुश्री सुरूपां कपिला ततो हव्यवहां यजेत् ।
विरोधिनी-मस्तके तु ततो हि दशमों यजेत् ॥ ५०
दलाष्टके भैरव्यष्टौ भैरवेण समन्विताः ।
भूपुरे लोक-पालाश्च तवस्त्नाणि च तद्-बहिः ॥५१
ततो नीराजनं कृत्वा लक्ष-संख्यं जपेन्मनुम् ।
दशांशं जुहुयाद् वह्नौ निम्ब-वह्नौ यथा-विधि ॥ ५२
अरिष्ट-मालां कृत्वा च महा-मुण्डासनो नर ।
जुहुयादरि-नाशाय अरिष्ट-फलमादरात्
विभोतकेन जुहुयात् सर्व-शत्रु-निवर्हणम् ।
धुस्तूर-फुसुमै)मात् शबून् विद्वेषयेन्नरः
काकोलूकस्य मांसेन शत्रु मारयति क्षणात् ।
राज-वृक्ष-प्रसूनैश्च तत्-काष्ठाग्नौ हुनेत् सुधीः ॥ ५५
विरोधिनी भवेत् सिद्धा धूमावत्यादि-संयुता ।
अर्क-ज्योति-समायुक्ता शत्रु-विद्वेष-कारिणी ॥५६
वायव्याभिभुखो भूत्वा कटु जीरकजं जलम् ।
कोष्णं पिबेन्महेशानि ! शत्रुज्वर-युतो भवेत् ।। ५७
पराभिचार-नाशार्थ स्व-रक्षार्थ यथा-विधि ।
एकान्ते मातृ गेहे वा मृत-हट्टे शिवालये
विरोधिनों जपेद् विद्या ह्ययुतं चोक्त-मार्गतः।
विभीतकस्य समिधो हुनेच्छत्र -निवारणम् ॥५६
नाभि-मात्रोदके गत्वा मरोच-जल-योगतः ।
तपयेद् देवतां नीरस्त्रैलोक्य-द्वेषणं चरेत् । ६०
अयाकरणमन्विच्छन् यल्मीक-मृत् समानयेत् ।
श्मशान-मृत् समादाय गोधूम-हिंगु-जीरकः ॥ ६१
पुत्तली साध्य-रूपां च कारयेत् परमेश्वरि !
नासायां दोरकं दत्वा प्राण-स्थापन-पूर्वकम् ॥ ६२
[१२१
.
विरोधिनों जपेत् तत्र करवीरैः समर्चयेत् ।
दुग्धे पुत्तलों कृत्वा तापयेत् खदिरानले ॥६३
अनेन क्रम-योगेन दिनानि तु चतुर्दश।
यः करोति नरः श्रेष्ठः सर्वाकर्षण कारकः ॥६४
वनितां मद-गढियां समाकर्षति योगतः ।
बिचार्याकर्षणं कायं भवेद् वा न भविष्यति ॥ ६५
ध्यात्वा साध्य गले पाशं मस्तके ज्वलितांकुशम् ।
एवं सञ्चिन्त्य देवेशि ! त्रैलोक्याकर्षको भवेत् ॥ ६६
१२२]
पञ्चदशः पटलः उग्रप्रभा-नित्या-विधि: श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि विप्रचित्ता-विधानकम् । समासेन वदेशान ! यद्यहं तव वल्लभा ॥१ श्रीशिव उवाच- शृणु वक्ष्यामि देवेशि! विप्रचित्तां मनोहराम् । या जाता चैव शत्रूणां वधार्थ पूर्वमुद्धृता ॥२ विप्रचित्तेति विख्याता वैप्रचित्त-विनाशिनी । षष्ठी नित्या महा-विद्या तन्मन्वं शृणु पार्वति ॥ ३ प्रणवं कमलां कामं चामुण्डे-पदमुच्चरेत् । विप्रचित्ते-पदं प्रोच्यं दुष्ट-घातिनि चोच्चरेत् ॥ ४ शत्रून्नाशय चोच्चार्य एतद् दिनावधि प्रिये ! सिद्धि मे देहि चोच्चार्य हुँ स्वाहान्तगो मनुः ॥ ५ चतुस्त्रिशद्-वर्ण-युतो विप्रचित्ता-मनुर्महान् । ईश्वरोऽस्य ऋषिर्देवि ! जगतो छन्द ईरितम् ॥ ६ विप्रचित्ता देवता हि चामुण्डा बोजमीरितम् । कमला शक्तिराख्याता काम-बोजं तु कोलकम् ॥ ७ पड़-दीर्घायेन कामेन पडङ्ग-न्यासमाचरेत् । सिंहोपरि समारूढां शव-पञ्जर-मध्यगाम् ॥ चतुर्भुजां त्रिनयनां पोनोग्नत-पयोधराम् । दिगम्बरां मुक्त-केशी ललज्जिह्वां भयानकाम् ॥ ६ भीम-दंष्ट्रां करालास्यां सृपिकणी-रक्त-वाहिनीम् । खड्ग-मुण्ड-कपाल-निशूल-हस्तां महोदरीम् ॥ १० [१२३
नोलोत्पल-निभा श्यामां भक्तानुग्रह-कारिणोम् ।
दैत्य-संहरणोयुक्तां साधकानामभीतिदाम् ॥११
एवं सचित्य देवेशि ! विप्रचित्तां शिव-प्रियाम् ।
लक्ष-मानं जपेन्मन्त्रं दशांशं कुमुदहु नेत् ॥ १२
अथाष्ट-गन्ध-नीरेण तद्-दशांशं प्रतर्पयेत् ।
मार्जनं तद्-दशांशेन दशांशेनाभिपेचनम् ॥ १३
तद्-दशांशं विप्र-भोज्यं विप्रचित्ता-सुसिद्धये ।
त्रिकोणं वृत्त-पट-कोणं वृत्ताष्ट-दल-भूषितम् ॥ १४
वृत्त-भूपुर-संयुक्तं विन्दु-वोज-विभूषितम् ।
विन्दौ यजेत् विप्रचित्तां त्रिकोणे त्रिगुणां यजेत् ॥ १५
पद-कोणे तु पडङ्गानि तद्-दले मातृ-भैरवी ।
भूपुरे लोकपालाश्च तदस्त्राणि च तद्-बहिः ॥१६
ततो नीराजनं कृत्वा जपं देव्यै समर्पयेत् ।
पुरश्चर्या-समायुक्तः प्रयोगार्हो न चान्यथा ॥ १७
साकल्यैर्जुहुयाद् देवि ! शान्ति-कर्मणि साधकः ।
मालत्या जुहुयाद् वश्ये केतक्या बाग-विभूतये ॥ १८
करवोरैवंशीकारः किंशुकः स्तम्भनं भवेत् ।
मोहनं चोड़-पुष्पेण धुस्तूरैरिगं दिशेत् ॥१६
वृहत्या तु रिपूच्चाटो गिरिका धनागमः ।
काश-पुष्प रिपूच्चाटो विद्वेपो कणिका-रजः ॥२०
नीवारज हयात् देवि ! धान्य-सिद्धयर्थमेव हि।
कलाय-पुष्पैर्जुहुयात् ततः स्युः सर्व-सम्पदः ॥ २१
कौसुम्भ-कुसुमैर्देवि! कामिनों वांछितां लभेत् ।
मधु-पुष्पैश्न जुहुयादभीष्ट-सिद्धये ध्रुवम् ॥२२
धातक्या जुहुयाद् देवि ! धन-धान्य-पतिर्भवेत् ।
यद्-रोगे भेषजं यच्च तेन तद्-रोग-नाशनम् ॥ २३
१२४]
इति संक्षेपतः प्रोक्तो विप्रचित्ता-विनिर्णयः । श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि उग्रनित्या-विनिर्णयम् ॥ २४ श्रीशिव उवाच- रहस्याति-रहस्यं च तथापि कथ्यते शृणु । प्रणवं च वधू-वीजं हूँ-बीजं भुवनां ततः॥ २५ पुनः पूर्व ततो हूँ फट् उग्रा सप्ताक्षरो मनुः । भैरवोऽस्य ऋषिः प्रोक्तो वृहती छन्द ईरितम् ।। २६ उना तु सप्तमी नित्या देवता परिकीर्तिता । कूर्च बोजं च फट् शक्तिर्वधूः कीलकमीरितम् ।। २७ सर्वाभीष्टादि-सिद्धयर्थे विनियोगः प्रकीर्तितः । पड्-दीर्घाव्येन बोजेन मायाख्येन पडङ्गकम् ॥ २८ ततो ध्यायेत् परामुग्रां प्रत्यालीढ-पद-स्थिताम् । चतुर्भुजां त्रिनयनां मुण्ड-माला-विभूषिताम् ॥२६ दिगम्बरां करालास्यां घोर-दंष्ट्रां भयानकाम् । शवोत्सङ्गे फोडमानां श्मशानालय-वासिनीम् ॥ ३० श्याम-वर्णा मुक्त केशों खड्गेन्दीवर-धारिणीम् । कपाल-कर्तृका-हस्तां वरन्दान-परायणाम् ॥ ३१ उनां ध्यायेन्महा-विद्यां लक्ष-युग्मं जपं चरेत् । तद्-दशांशेन जुहुयात् कमलघृत-संयुतैः ॥ ३२ तद्-दशांशं तर्पणं च तद्-दशांशं च भार्जनम् । विप्र-भोज्यं दशांशेन तेनोग्रा सिद्धिदा ध्रुवम् ॥ ३३ पर्वते प्रान्तरे घोरे विपिने तटिनी-तटे । एक-लिङ्गे श्मशाने वा पुरश्चरण-वान् भवेत् ।। ३४ अयास्याः पूजा-यन्नं च यथा-वत् कथ्यते शृणु। विकोणं वृत्ताष्ट-दलं वृत्त-भूपुर-भूषितम् ॥ ३५ [१२५ सम्पूज्य परमेश्वरि ! शूलाष्टक-विभूषाढ्यं किम्वा वन-विभूपितम् । त्रिकोण-मध्ये विलिखेत् कूर्च-बीजं महोत्तमम् ॥ ३६ तारां नीलामेक-जटां तत् त्रिकोणे प्रपूजयेत् । ततो दलाष्टके देवि ! उग्रा-घोराष्टकं यजेत् ॥ ३७ वैरोचनाष्टकं पूज्य । ततः पद्मान्तकान् यजेत् । लोक-पालान् तदस्वाणि यथा-वद् विधिता यजेत् ॥३८ ततो नीराजनं कृत्वा जपं देव्यै समर्प्य च । शवासने वा. • संस्थित्वा सर्वदा जपेत् ॥ ३६ सिन्दूर-तिलको नित्यं सम्बिदासब-णितः । मुक्त-केशो दिशा-वासो भक्त-भक्तो जितेन्द्रियः ॥ ४० महा-चोन-द्रुम-लतां तत्-त्रिकोणं च सम्बोक्ष्य सदा तद्-गत-मानसः॥ ४१ लक्ष-मानं जपेन्मन्त्रं उग्रा सिद्धयति निश्चितम् । अन्यत् सर्वं तु तारा-वत् कीतितं जगदीश्वरि ॥ ४२ ग्यास-पूजाबिर्फ ध्यान पुरश्चर्या-विधानकम् । महोग्रतारा-वज्जयं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ४३ श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि नित्यामुग्रप्रभाभिधाम् । अष्टमी शुभवां नित्यां नित्यानन्द करां वराम् ॥ ४४ श्रीशिव उवाच- प्रणवं पूर्वमुवृत्य शिव-बीजं समुद्धरेत् । वह्नयारूढं नाद-विन्दु धष्ठ-स्वर-विभूषितं ॥ ४५ वोज-द्वयं समुच्चार्य उग्रप्रभे-स्वरूपकं। देवि कालि महा-देवि स्वरूपं दर्शयेति च ॥ ४६ हूँ फट् स्वाहा-समायुक्तः प्रोक्तस्तूग्रप्रभा-मनुः । पञ्चविंशति-तत्त्वादयः प्रोक्तश्चोन-प्रभा-मनुः ॥ ४७
.
महाकालो ऋषिः प्रोक्तस्त्रिष्टुप् प्रकीर्तितम् ।
उग्नप्रभा महा-काली देवता परिकीर्तिता ॥४८
हूँ वीज ॐ तथा शक्तिः फट कीलकमुदाहृतम् ।
कालिका-दर्शनाद्यर्थे विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ४६
उग्रप्रभाख्य-बोजेन
पड्-दीर्घरप षडङ्गकम् ।
ध्यायेदुग्रप्रभां दिव्यां दिव्य-नीलोत्पल प्रभाम् ॥ ५०
चतुर्भजां त्रिनयनां शव-पद्मोपरि-स्थिताम्
दिगम्बरां मुक्त-फेशी पोनोन्नत-पयोधराम् ॥५१
सुप्रसन्न-मुखाम्भोजां शव-मांस-प्रभोजनीम्
शवानां कर-सङ्घातः कृत-काञ्ची हसन्मुखीम् ॥ ५२
खड्ग-मुण्ड-धरां वामे दक्षे खर्पर-कर्तृ के
विनती परमाह्लाद-जननी काल वञ्चनीम् ॥ ५३
एवं ध्यात्वा महा-विद्यां लक्ष-युग्मं जपेच्छिवे !
कालिकोक्ते यजेत् पोठे त्रिकोण-द्वय-सोज्ज्वले ॥ ५४
वृत्ताष्ट-दल-भूषाढय भूपुर-द्वय-भूपिते ।
उग्रप्रभा-विन्दु-मध्ये कालों तारां च रोचनीम् ॥ ५५
प्रथमे पूजयेद् देवी द्वितीये तारिणी-गणाः ।
तारामेक-जटां नीलां द्वितीये तु त्रिकोणके ॥ ५६
दलाष्टके मातृकाष्टौ दलाग्ने भैरवाष्टकम् ।
भूपुरे लोक-पालांश्च तवस्त्राणि च तद्-बहिः ॥ ५७
त्रिस्त्रिः पूजा प्रकर्तव्या सर्वेषामपि देशिकः ।
एवमुग्रप्रभामिष्टां लक्ष-युग्मं जपं चरेत् ॥५८
दशांशं वत्र-पुष्पाणि मैरेयाक्तानि होमयेत् ।
तर्पयेत् तद्-दशांशेन दुग्धेन मधुनाऽय वा ॥ ५६
दध्ना चेक्षु-रसेनापि पोठ-तोयेन वा पुनः ।
तद्-दशांश मार्जनं च दशांशं विप्र-भोजनम् ।। ६०
[१२७
कुमारी पूजयेत् पश्चाक्ति चापि प्रपूजयेत् ।
उग्रप्रभा-पताकायां मूति कृत्वा विधारयेत् ॥ ६१
रणे देवासुरान् जित्वा त्रैलोक्य-विजयी भवेत् ।
दुन्दुभौ फलके खड्गे जप्त्वा चोग्रप्रभां शिवाम् ।। ६२
सर्व-सिद्धि समासाद्य काली-रूपो नरो भवेत् ।
मानिनी-मण्डलं दृष्ट्वा जपेदुप्रप्रभा-मनुः ॥ ६३
काशिका सिद्धिदा भूयानात्र कार्या विचारणा ।
'लिख्य जपेदुनप्रभां पराम् ॥ ६४
तत्र सञ्चिन्त्य देवेशि ! साधकः किन्न साधयेत् ।
उग्रप्रभाख्यां काली तु कृत्वा मासं जपेच्छिवे ॥ ६५
मास-मान-प्रयोगेण कालिका वरदा भवेत् ।
इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छोतुमिच्छसि ।। ६६
१२८]
घी विरोधिनी नित्या-पन्नम् श्री विप्रचित्ता नित्या-यन्त्रम् कालिकोक्त यजेत् पोठे ग्रिकोण-य-शोभिते ॥४७॥ पत्ताष्ट-दस-पाये भूपुरकेन शोभिते चतुरि-विभूपाद श्रीवोजोज्यल-कणिके ॥४८॥ (पृष्ठ १२०) त्रिकोणं वृत्त-पट-कोणं वृत्ताष्ट-दल-भूपितम् ॥१४ वृत्त-मूपुर-सयुक्तम् बिन्दु-मोज-विगूषितम । पृष्ठ १२४] श्री उग्रा नित्या-यन्त्रम् श्री उग्रप्रभा नित्या-यन्त्रम् त्रिकोपं वृत्ताष्ट-दलं वृत्त-भूपुर-भूषितम् ॥३५॥ [पृष्ठ १२५] कालिकोक्ते यजेत् पोठे त्रिकोण-द्वय-सोज्ज्वले ॥५४॥ वृत्ताण्ट-वल-भूषाढ्ये भूपुर-द्वय-भूपिते । (पृष्ठ १२७) । षोडशः पटलः दीप्ता-नित्या-विधिः श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि रहस्याति-रहस्यकम् । तन्मे कथय देवेश ! दीप्ता-नित्या-विधानकम् ॥१ श्रीशिव उवाच- सर्व-तन्त्रेषु संगुप्ता दीप्ता-नित्या महोदया । नवमी-संख्यका नित्या सारात् सारा महोदया ॥ २ तस्या मन्वं प्रवक्ष्यामि यथा-वदवधारय प्रणवं कालिका-वीजं कोलिनी-बीजमेव च ॥ फूर्च-बीजं समुद्धृत्य दीप्तायै तदनन्तरम् । सर्व-मन्त्र-फल प्रोच्य दाय-शब्द समुच्चरेत् ॥४ हुं फट् स्वाहान्तको मन्त्रस्तून-विशाक्षरः परः । अर्ध-संख्या-विहोनेन वोति-संख्यः प्रकीर्तितः ॥५ महादेव ऋषिश्चास्य उष्णिक छन्दः प्रकीर्तितम् । दीप्ताख्या नवमी नित्या देवता परिकीतिता ॥६ काली-बीजं बीजमस्याः कोलिनी शक्तिरेव हि । स्वाहा कोलकमित्युक्तं काल्यर्थे विनियोगता ॥७ फाल्याः पड्-दीर्घ-युक्तेन पडङ्ग-न्यासमाचरेत् । ध्यायेद् दीप्तां महा-नील-मणि-प्रख्यां महोदरीम् ।। ८ चतुर्भुजां त्रिनयनां मुण्ड-माला-विभूषिताम् । दिगम्बरां मुक्त केशी घोर-दंष्ट्रां करालिकाम् ॥६ शव-पद्मे समासीनां पीनोन्नत-पयोधराम् । शवास्थि-कृत-केयूर-शङ्ख-कङ्कण-भषिताम् ॥ १० [१२६ फा०-६
लेलिहानां शवं क्वापि प्रहसन्ती मदातुराम ।
भक्तानां वरदां नित्यां कालिकां घोर-राविरपीम् ॥११
नरान्त्र-योग-पट्टेन भूषितां योग-मार्गगाम् ।
खड्ग-मुण्ड-धरां वामे सव्येऽभय-वर-प्रदाम् ॥ १२
सुदन्तुरां महा-रोद्री श्मशानालय-वासिनीम् ।
एवं सञ्चिन्त्य दीप्ताम्बां लक्षमेकं जपेच्छिवे ॥ १३
दशांशं फरवीरेण हवनं समुपाचरेत्
कदल्या हवनं कार्य सर्व-दीप्ति-प्रसिद्धये ॥ १४
दशांशं पीठ-तोयेन हवनं समुपाचरेत्
तद्-दशांशं मार्जनं च गन्धाष्टक-जलेन वै ॥ १५
तद्-दशांशं विप्र-भोज्यं भोजयेद्धि कुमारिकाम् ।
ततः सिद्ध-मनुमन्त्री प्रयोगार्हो न चान्यथा ॥ १६
बाह्म मुहूर्ते चोत्थाय गुरु-स्मरण-पूर्वकम् ।
गुरुं ध्यात्वा सहस्रारे पूर्वोक्त-ध्यान-योगतः ॥ १७
मूलाधारात् स्व-जिह्वान्तं मूत-पिचा परां स्मरेत् ।
सरस्वती दीप-एप्पां पूरा-वीण-स्वरुपिणीम् ॥ १८
सम्पूर्णा मातृका प्रोज्य गरा-विधो समुज्वरेत् ।
पुनय मातफt प्रोज्य पुनपिंद्या रागुण्चरेत ॥ १६
विधाभिमाश्य तोयं । पमेणानेन सन्चरि।
दूर्वया शान्तिको होमो गुडुच्या मृत्यु-वारणम् । सुरया मोहनं प्रोक्तं जम्बा स्तम्भनमोरितम् ॥ २४ आम्रण वश्य-सिद्धिः स्यादम्वुजेन महोदयः। उच्चाटनं करीषेण विद्वेषः कर्कटी-फलैः ॥२५ मारणं नील-पुष्पेण मरीचेन तु कर्षणम् । एवमादि-क्रियाः सर्वाः सिद्ध-मन्त्री समाचरेत् ।। २६ अञ्जनं गुटिका खड़गो धातु-वादो रसायनम् चरुकं तिलकं वासो दुन्दुभिश्च कपालकम् ॥ २७ एवमादि-क्रिया-सिद्धिर्दीप्ता मन्त्रेण वै भवेत् । इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥ २८ श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि नीला-विद्या-विधानकम् । नीला नील-स्वरूपा हि महा-नील-सरस्वती ॥२६ तस्या विधानं सम्यूहि यद्यहं तव वल्लभा । श्रीशिव उवाच- मन्त्रोद्धारं शृणु प्राक्षे ! येन सिद्धि स विन्दति कूर्च-युग्मं महा-देवि ! काली-वीज-द्वयं तथा । माया-द्वयं समुद्धृत्य हसबलमरी-स्वरूपकम् ॥ ३१ अथ नील-पताके च हुँ फडन्ता महेश्वरि ! नीला नील-पताकेयं सर्व-सिद्धि-करालिका ।। ३२ उग्रचण्डा ललज्जिह्वा या सा सिद्धि-करालिका। पञ्चधा कथिता नीला महा-नील-पताकिका ॥ ३३ भैरवोऽस्य ऋषिः प्रोक्तो वृहती छन्द ईरितम् । देवता दशमी नित्या महा-नोल-पताकिका ॥ ३४ कूर्च-बीज-स्वरूपं हि शक्तिरित्यभिधीयते हूं फट् च कोलकं भद्रे ! काल्यर्थे विनियोगता ॥ ३५ [१३१
लेलिहानां शव क्वापि प्रहसन्ती मदातुराम ।
भक्तानां वरदां नित्यां कालिकां घोर-राविरणीम् ॥११
नरान्न-योग-पट्टेन भूषितां योग-मार्गगाम् ।
खड्ग-मुण्ड-धरां वामे सव्येऽभय-वर-प्रदाम् ॥ १२
सुवन्तुरां महा-रौद्रों श्मशानालय-वासिनीम् ।
एवं सञ्चिन्त्य दीप्ताम्बां लक्षमेकं जपेच्छिवे ॥ १३
दशांशं करवीरेण हवनं समुपाचरेत्
कदल्या हवनं कार्य
सर्व-दीप्ति-प्रसिद्धये ॥ १४
दशांशं पीठ-तोयेन हवनं समुपाचरेत्
तद्-दशांशं मार्जनं च गन्धाष्टक-जलेन वै ॥ १५
तद्-दशांशं विप्र-भोज्यं भोजयेद्धि कुमारिकाम् ।
ततः सिद्ध-मनुमन्त्री प्रयोगार्हो न चान्यथा ॥ १६
ब्राझे मुहर्ते चोत्थाय गुरु-स्मरण-पूर्वकम् ।
गुरुं ध्यात्वा सहस्रारे पूर्वोक्त-ध्यान-योगतः ॥ १७
मूलाधारात् स्व-जिह्वान्तं मूल-विद्यां परां स्मरेत् ।
सरस्वतों दीप-रूपां मूल-बीज-स्वरूपिणीम् ॥१८
सम्पूर्णा मातृकां प्रोच्य मूल-विद्यां समुच्चरेत् ।
पुनर्वै मातृका प्रोच्य पुनविद्यां समुच्चरेत् ॥१६
त्रिधाभिमन्त्र्य तोयं तु क्रमेणानेन सुन्दरि !
मूल-विद्यां ततो ध्यात्वा जिह्वायां दोप-रूपिणी ।। २०
तेजोल्पां सायुधां वै तज्जलं तु पिवेच्छिवे !
योगेनानेन देवेशि ! त्रिकालज्ञो नरो भवेत् ॥ २१
विना न्यासविनाभ्यासविना पाठादिना शिवे !
चतुर्विधं तु पाण्डित्यं तस्य हस्ते व्यवस्थितम् ॥ २२
जाती-पुष्पेरण देयेशि ! कविता वश-वतिनी।
कुन्द-पुष्पेण देवेशि ! सर्व-शास्त्र-वशीकृतिः ।। २३
१३०
दूर्वया शान्तिको होमो गुडुच्या मृत्यु-वारणम् । सुरया मोहनं प्रोक्तं जम्बा स्तम्भनमोरितम् ॥ २४ आम्रण वश्य-सिद्धिः स्यादम्बुजेन महोदयः। उच्चाटनं करोषेण विद्वेषः कर्कटी-फलैः ॥२५ मारणं नील-पुष्पेण मरीचेन तु कर्पणम् । एवमादि-क्रियाः सर्वाः सिद्ध-मन्त्री समाचरेत् ।। २६ अञ्जनं गुटिका खड़गो धातु-वादो रसायनम् । चरुकं तिलकं वासो दुन्दुभिश्च कपालकम् ॥ २७ एवमादि-क्रिया-सिद्धिर्दीप्ता मन्त्रेण वै भवेत् । इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ २८ श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि नीला-विद्या-विधानकम् । नोला नील-स्वरूपा हि महा-नील-सरस्वती ॥ २६ तस्या विधानं सम्बूहि यद्यहं तव वल्लभा । श्रीशिव उवाच- मन्त्रोद्धारं शृणु प्राज्ञे ! येन सिद्धि स विन्दति ॥ ३० कूर्च-युग्मं महा-देवि ! कालो-वीज-द्वयं तथा। माया-द्वयं समुद्धृत्य हसबलमरी-स्वरूपकम् ॥ ३१ अथ नील-पताके च हुं फडन्ता महेश्वरि ! नीला नील-पताकेयं सर्व-सिद्धि-करालिका ।। ३२ उन-चण्डा ललज्जिह्वा या सा सिद्धि-करालिका। पञ्चधा कथिता नीला महा-नील-पताकिका ॥ ३३ भैरवोऽस्य ऋपिः प्रोक्तो बृहती छन्द ईरितम् । देवता दशमी नित्या महा-नील-पताकिका ॥ ३४ कूर्च-वीज-स्वरूपं हि शक्तिरित्यभिधीयते हूं फट् च कोलकं भद्रे ! काल्यर्थे विनियोगता ॥ ३५ [१३१ ॥४० काली-पड्-दीर्घ-बीजेन पडङ्ग-न्यासमाचरेत् । अथ ध्यायेन्महा-नीला नीलाजन-गिरि-प्रभाम् ।। ३६ चतुर्भुजां त्रिनयनां मुण्ड-माला-विभूषिताम् । शवोपरि समासोनां मदिराघूर्ण-लोचनाम् ॥ ३७ मृग-शावक-नेत्र च प्रसन्न-वदनाम्बुजाम् । फर-कावी-शोभमानां शव-फर्णावतंसिनीम् ।।३८ ललज्जिह्वां करालास्यां घोर-दंष्ट्रां भयानकाम् । पापिना सर्वदा नीला रां पुण्यवतां वराम् ॥ ३६ दुष्ट-संहरणोयुक्तां साधकस्य वर-प्रदाम् । फेरु-वगंध्र-गणश्चतुदिक्षु निनादिनीम् ईदृशीमादि-रूपां तां नीलाम्भोज-वन-प्रभाम् जपेल्लक्ष-त्रयं देवि ! हविष्याशी जितेन्द्रियः ॥४१ कुलाचार-क्रमेणैव यथोक्त-क्रम-योगतः करवीरवा-बिल्वमल्लिकाद्यघृतान्वितैः ॥४२ त्रिकोण-कुण्डे जुहुयात् सुपरिष्कृत-भू-तले । दशांशं तर्पणं कार्य दुग्धेन सुरयाऽपि च ॥ ४३ मार्जयेद् रक्त-नोरेश्च ब्राह्मणान् भोजयेत्ततः । मुवासिनी कुमारी च शक्तिं वा त्रितयां शुभाम् ॥ ४४ पुरश्चरण-सम्पन्नो मन्त्रः सर्वार्थ-साधकः यथा-द्रव्यं नृपादीनां पुरश्चर्या तु मन्त्रिणां ॥ ४५ पुरश्चरण-सम्पन्नः प्रयोगार्हो न यन्त्रमस्याः प्रवक्ष्यामि येन सिद्धीश्वरो भवेत् ॥ ४६ विन्दु मध्ये लिखेत् कूर्च त्रिकोणं च ततोपरि । वृत्त-पट-कोण-यूत्ताष्ट-दलं वृत्तं च भूपुरम् ॥ ४७ चतुर्दारोप-शोभाढय यन्त्रं नीला-मनोः शुभम् । चटुपायाश्चतुर्दारि परितो द्वार-देवताः १३२] चान्यथा ।
तदस्त्राणि च तद्-बाह्य दलेष्टो भैरवाः प्रिये ! केसरे मातृकाष्टौ च वृत्तेऽष्ट-सिद्धयः क्रमात् ॥ ४६ षट्-कोणे तु पडङ्गानि त्रिकोणे वैवत-त्रयम् । कालरात्रि-महारात्रि-मोहरात्रि-क्रमात् त्रिके ॥ ५० मध्ये नीलां समाराध्य ततो नैवेद्यमर्पयेत् । नीराजनं ततः कृत्वा स्तुत्वा नत्वा विसृज्य च ।। ५१ नीलां संसाध्य यत्नेन पट्-त्रिंशद्-यक्षिणी-गाणं । कालो-फूर्च-वधू-माया अमुको यक्षिणीति च ॥ ५२ अन्तेऽपोमानि वीजानि हूं फट् स्वाहान्वितो मनुः । पट-विंशच्चैव यक्षिण्यः क्रमेण चोद्धृताः प्रिये ॥ ५३ तथैव बलिनो यक्षाः हूं क्रों हूं प्रीं पुटेन च । सर्वे यक्षा हुं फडन्ता चतुरशीति कीर्तिताः ॥ ५४ यक्षिणी-सिद्धिमासाद्य साधकः सुखमाप्नुयात् । राजा भवति लोकेऽस्मिन् विना राज्येन पार्वति ॥ ५५ अल्पज्ञमपि विद्वांसं मूढं च पण्डित तथा। यः करोत्येवमादीनि राज्य-रत्न-धनान्यपि ॥ ५६ यो वै ददाति साध्यायः स यक्षो नात्र संशयः। देव-योनिर्मानवी च द्विधा योनिः प्रकीर्तिता ॥ ५७ तत्तद्-रूपं समासाद्य तत्-सिद्धिमधि-गच्छति । थीदेव्युवाच- फलं तु यक्षिणो-सिद्धर्यक्ष-सिद्धेश्च किं फलम् ॥ ५८ तन्मे वद दयापार ! परात्पर ! नमोऽस्तु ते। श्रीशिव उवाच- दीनारं गुटिका खड्गं वेताल-पादुकाजनाः ॥५६ रसं रसायनं गुप्तिस्तिलकोऽदृश्यता तथा । कपालं च पटः शङ्कस्त्रिशूलं डमरूं तथा ॥ ६० [१३३
आकर्षणं वश्यता च मोहनोच्चाटनं तथा।
महेन्द्र-जालमिन्द्रादि-जालानां रचना तथा ॥६१
ऊोत्क्रमण-कर्मादि खेचर्याद्या हि सिद्धयः ।
गोपनीयं गोपनीयं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥६२
प्रोक्ता नीलाभिधा नित्या श्रीविद्यादौ पताकिका ।
यन्त्र-मन्त्रादि-प्रस्तार-सङ्कत-भ्रशनं तथा
लोपामुद्रा-विधौ कादौ यदुक्तं तद्-विधौ चरेत् ।
लोपामुद्रा कादि-हादि कामराजेऽपि तद् द्वयम् ॥ ६४
तत्-काल्यां कादि-काली च हादि-कल्पद्रुमो यथा।
फादौ निगदितं देवि! यक्षिणी-यक्ष-मण्डलम् ॥ ६५
१३४]
सप्तदशः पटलः मुद्रा-नित्या-विधिः श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि घना-नित्या-कमार्चनम् । उद्यद्-घना घनाकारा घना-नित्या घनोदया ॥१ चनालया घोषवती घटिकोदय-रूपिणी । तस्या मन्त्राचंनं नित्यं वद त्वं करुणा-निधे ॥ २ श्रीशिव उवाच- प्रणवं पूर्वमुद्धत्य कालिका-त्र्यक्षरं तथा। घनालये घनाघने ह्रीं हूं फट् च मनुर्मतः ॥ ३ भुवनाक्षरो घनायास्तु मन्त्रोऽयं सुर-पादपः । अघोर-भैरव-ऋपिविराट् छन्दः प्रकीर्तितम् ॥४ काली बीजं तथा माया शक्तिः हुं फट् च कीलकं। कालिका-प्रीतये देवि ! विनियोगः प्रकीर्तितः॥ ५ षड-दीर्घ-भाजा बीजेन कपूरेण पडङ्गकम् । घना-नित्यां महा-विद्यां नील-जीमूत-सन्निभाम् ॥६ मत्त-कोकिल-नेवाभां पक्व-जम्बू-फल-प्रभाम् । सुदीर्घ-प्रपदालम्बि-मुक्तालम्बि-कचोच्चयाम् ॥७ चतुर्भुजां विनयनां दिगम्बर-विनोदिनीम्। करालास्यां घोर-दंष्ट्रां पीनोन्नत-पयोधराम् ॥ ओष्ठ-प्रान्त-गलद-रक्त-धारा-विस्फुरिताननाम् । वीराणां कर-काञ्च्या तु भूषितां भीम-विग्रहाम् ।।६ खड्ग ग-खेटक-पट्टीश-मुद्गरान् बिभ्रती क्रमात् । ध्यातव्यां सततं वोरैर्महा-वीर-धनालया ॥ १० [१३५
लक्ष-मानं जपेल्मन्त्रं धुताक्त: कमलहु नेत् ।
तद्-दशांशं तर्पणं तु गन्ध-दुग्धादिभिः प्रिये ।। ११
तद्-दशांशं मार्जन
तु
शोतलेन जलेन च।
तद्-दशांशं ब्राह्मणानां भोजनं समुपाचरेत् ॥ १२
एवं क्रिया-समायुक्तो मन्त्र सिद्धि स विन्दति ।
धना-यन्नं प्रवक्ष्यामि पूजनं यादृशं भवेत ॥ १३
पट-कोरण-वृत्ताष्ट-दलं भूपुरेणोप-शोभितम् ।
षट्-कोणे तु षङ्गानि षड्धा तु देवता अपि ॥ १४
दलाष्टके मातृकाष्टौ ततो भैरव-पूजनम् ।
लोक-पालान् भूपुरेषु तदस्त्राणि च तद-बहिः ।। १५
यथा-शक्ति जपित्वा तु ततो नोराजयेद् विभुम् ।
नीराजनान्ते देवेशि ! स्तुत्वा नत्वा विसृज्य च ॥ १६
इति संक्षेपतः प्रोक्ता घना-नित्या घनालया।
सिद्धयष्टक-समाकान्ता किं पुनः श्रोतुमिच्छसि ॥१७
देवेशि ! शृणु वक्ष्यामि बलाका-पूजन-क्रमम् ।
बलाका द्वादशी नित्या सर्व-नित्या-वशङ्करी ॥ १८
यज्ञानात् सकला विद्याः स्वस्वस्थानपदं गताः।
तस्या मन्त्री महेशानि! कथ्यते शृणु साम्प्रतम् ॥ १६
प्रणवं कालिका-बीजं कूर्च-माये समुद्धरेत् ।
बलाका कालि-शब्दान्ते अत्यद्भत-पराक्रमे ॥ २०
अभीष्ट-सिद्धि मे देहि हुं फट् स्वाहा मनुर्मतः ।
कालिकास्या भवेद् बीजं फूचं शक्तिः परिकोतिता ॥ २१
माया कोलकमुद्दिष्टं कीलकेन पडङ्गकम् ।
पडङ्ग-न्यासमासाद्य ध्यानं कुर्यान्महेश्वरि ॥ २२
अञ्जनानन्त-सदृशी कोटि-कालानल-प्रभाम् ।
चतुर्भुजां त्रिनयनां मुण्ड-दुर्ग-निवासिनीम् ॥ २३
३६]
दिगम्बरां करालास्यां पीनोन्नत-पयोधराम् । शवानां कर-संहत्या कृत-कानीं शवासनाम् ॥ २४ मुक्त-केशों मदाघूर्णा प्रसन्न-मुख-पङ्कजाम् । सूर्य-कोटि-समाभासां मुण्ड-माला-विभूपिताम् ॥ २५ खड्ग-मुण्ड-घरां वामे सव्ये सपर-तर्जनीम् । सम्बिभ्रती महा-काली वलाका-रूप -धारिणीम् ।। २६ श्मशान-निलयां देवीं भूत-प्रेत-समन्विताम् । शिवाभि?र-रूपाभिर्वेष्टितां घोर-नादिनीम् ॥ २७ मा भैर्वीर ! वरं ब्रूहि हृद्-गतं ते करोम्यहम् । एवं ध्यात्वा जपेल्लक्ष मन्त्र: सिद्धो भवेद् ध्रुवम् ॥ २८ दशांशं बिल्व-पत्रैश्च घृताक्तर्जुहुयात् सुधीः । तर्पणं तद्-दशांशेन तद्-दशांशेन मार्जयेत् ॥ २६ तद्-दशांशं ब्राह्मणानां भोजनं परिकीर्तितम् । विप्राराधन-मात्रेण सर्वाङ्ग-पूर्णतामियात् ॥३० यद्यवङ्ग विहीनं च तत्-साङ्ग विप्र-भोजनम् । अन्यत् सर्व महेशानि ! कालिका-वत् समाचरेत् ॥ ३१ इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि । श्रीदेव्युवाच- देवेश! श्रोतुमिच्छामि रहस्याति-रहस्यकम् ॥ ३२ मात्रा-नित्या-विधानं तु कथयस्व ममाधुना । श्रीशिव उवाच- मात्रा नित्या तुंया प्रोक्ता सर्व-नित्योत्तमोत्तमा ॥ ३३ तस्या मन्त्रं महेशानि ! यथा-वदवधारय प्रणवं कालिफा-बोज माया-कूचं च मातृकाम् ।। ३४ सविन्दु-मातृका-वणं चतुर्वीजानि वै पुनः । पुनश्च मातृका-वणं चतुर्बीजं पुनश्चरेत् ॥ ३५ [१३७
एवं क्षान्ता महेशानि ! महा-माना प्रकोतिता ।
चतुर्बीजं महा-मात्र सिद्धि मे देहि सत्वरम् ॥ ३६
हूं फट् स्वाहेति देवेशि ! मात्रा मन्त्रः परो मतः ।
प्रणवं फालिफा-बीजं कूर्च-माये ततः शिवे ॥ ३७
मध्ये नित्या नाम दद्यात् सम्बुद्धयन्तं च फेवलम् ।
नित्या-मन्त्राश्च जायन्ते भिन्न-रूपाश्च पार्वति ॥ ३८
पुनर्बोजानि हूं फट् स्वाहान्ताः परिकीतिताः ।
आद्य-योगात् सम्पुटाद् वा हुं फडन्त-प्रयोगतः ॥३६
एवं नवति नित्यानां मन्त्र-भेदा भवन्ति च ।
भैरवोऽस्य ऋषिःप्रोक्तो उष्णिक छन्दः प्रकीर्तितं ॥४०
मात्रा-देवोति विख्याता देवता परिकीतिता।
क्री बीजं हूं तथा शक्तिः ह्रीं कीलकमुदाहृतम् ॥ ४१
विनियोगो महेष्टार्थे कालिकार्थे प्रकीर्तितः ।
माया-पड्-दीर्घ-युक्तेन पडङ्ग-न्यासमाचरेत् ॥४२
तथा ध्यायेन्महा-विद्यां नीलाञ्जन-गिरि-प्रभाम् ।
चतुर्भुजां त्रिनयनां मुण्ड-पद्मोपरि-स्थिताम् ॥ ४३
कपाल-कर्तृका-हस्तां खड्ग-मुण्ड-धरां पराम् ।
सुदन्तुरां महा-रौद्री चण्ड-नादाति-भोषणाम् ॥ ४४
शव-वक्षः-समारूढां लेलिहानां शवं शिवाम् ।
एवं विधां तां श्रीमात्रां महा-घोर-निनादिनीम् ॥ ४५
इति सञ्चिन्त्य देवेशि ! लक्ष-मानं जपं चरेत् ।
दशांशं जुहुयाद् बिल्वरथवा कदली-फलैः ॥ ४६
द्राक्षाभिः पायसर्यापि दशांश हवनं चरेत् ।
तर्पणं मार्जनं विप्र-भोज्यं यत्नेन कारयेत् ॥ ४७
यद्यदङ्गं विहीयेत तत्-संख्या-द्विगुणो जपः ।
जप-पूजा-प्रयोगादि काली-वल्लिपि-मातृ-वत् ॥ ४८
इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छोतुमिच्छसि । श्रीदेव्युवाच- देवेश! श्रोतुमिच्छामि रहस्याति-रहस्यकम् ॥ ४६ श्रीशिव उवाच- रहस्यमपि ते देवि ! कथ्यते शृणु साम्प्रतम् । मुद्रा-नित्या-विधानं हि सर्व-सारोत्तमोत्तमम्॥ ५० मुद्रिणी नामिका नित्या श्रीविद्यायां तु मुद्रिणी। मुद्रिणी दण्डिनी नान्नी देवी सौन्दर्य-विग्रहा ॥ ५१ महा-विद्यादिकादीनां मनो-मुद्रण-कारिणी। तेनेयं मुद्रा-नित्याख्या सर्व-सिद्धि-पराम्विका ॥ ५२ प्रणवं कालिका-बीजं माया कूर्च कमेण च । प्रो. बीज-युगं प्रोच्य मुद्राम्बा-पदमुद्धरेत् ॥ ५३ मुद्रा-सिद्धि मे देहि भो जगन्मुद्रा-स्वरूपिणी । हूं फट् स्वाहा-समायुक्ता वोति-वर्णो मनुः शुभः ॥ ५४ महादेवो ऋपिश्चास्य गायत्री छन्द ईरितम् । मुद्रा-नित्या महादेवी देवता परिकीर्तिता ॥ ५५ काली-बीजं बीजमस्या माया शक्तिः प्रकीर्तिता। कूच कोलकमित्युक्तं काल्या पड्-दोघं-युक्तया ॥ ५६ पडङ्ग-न्यासमाचर्य मुद्रां ध्यायेन्महेश्वरि ! अञ्जनाद्रि-निभां मुद्रां मुण्ड-माला-विभूषिताम् ॥ ५७ दिगम्बरां घोर-दंष्ट्रां चण्ड-नादाति-भीपणाम् । दक्षिणां मुक्त केशाली दिगम्बर-विनोदिनीम् ॥ ५८ पिङ्गाक्षी प्रज्वलजिह्वां घोर-चेष्टा-भयानकाम् । शवानां कर-सद्धातः कृत-काश्चों हसन्मुखीम् ॥ ५६ सृषक द्वय-गलद्-रक्त-धारा-विस्फुरिताननाम् कपालं कर्तृ का हस्ते खड्ग-खेटक-धारिणीम् ।। ६० [१३६ ..
,
महा-
-कालेन च समं रतासक्तां क्षुधातुराम् ।
वरं हि बरं हि वरं होति वादिनीम् ॥६१
एवं सञ्चिन्त्य देवेशि ! पूजयेद् यन्त्रमादरात् ।
त्रिकोणं वृत्त-पद-कोणं वृत्ताण्ड-दल-भूपुरम् ॥ ६२
चतुर्दारोप-शोभाढचं तद्-द्वारि गणपस्तथा।
योगिनी-क्षेत्रपालान बटुको हि चतुर्थकः ॥ ६३
लोक-पालास्त्र-लोकेशा भूपुरे क्रमशो पजेत् ।
दलेऽष्ट-मातृकां पूज्य केसरे भरवाष्टकम् ॥ ६४
दलाष्टाग्ने त्वष्ट-सिद्धिः पट-कोणेषु पडङ्ग कम् ।
राज्यदा भोगदा मोक्ष-जयदाऽभयदा तया ॥६५
पष्ठी तु सिद्धिधा प्रोक्ता पट्-कोणेषु फ्रमाद् यजेत् ।
इच्छां ज्ञानं क्रियां चैव त्रिकोणे परिपूजयेत् ॥ ६६
मध्ये मुद्रां च सम्पूज्य सर्व-पञ्चोपचारकः ।
इति पूजां समासाद्य ततो नीराजनं चरेत् ॥ ६७
नीराजनान्ते देवेशि ! प्राणायाम-पुरःसरम् ।
लक्ष-दर्य जपेन्मन्त्रं सुश्वेतैः करवीरज:॥ ६८
दशांशं हवनं कृत्वा तद्-दशांशेन तर्पणम् ।
मार्जनं ब्राह्मणानां च भोजनं समुपाचरेत् ॥ ६६
एवं सिद्ध-मनुमन्त्री प्रयोगार्हो न चान्यथा ।
यद्यदि समाधत्ते तत्तत्-कृत्यं करोति हि ॥७०
सर्व तु कालि-वत् प्रोक्तं विशेषः कथितो मया ।
इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥७१
१४.]
अष्टादशः पटलः मिता-नित्या-विधिः श्रीदेव्युवाच-- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि मिता-नित्या-विधि-क्रम । सर्व-विद्या-वरारोहां मितां मे बूहि सादरम् ।। १ श्रीशिव उवाच- शृणु वक्ष्यामि देवेशि ! रहस्याति-रहस्यकम् । सर्व-विद्या-महाराज्ञो मिता-नाम्नी महोदया ॥२ तस्या मन्त्रं प्रवक्ष्यामि काली-सर्वाङ्गमद्भुतम् । प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य कालिका-बीजमुद्धरेत् ॥३ कूर्च-बीजं तथा मायां वाग्भवं बीजमुद्धरेत् । मिते-पदं समुच्चार्य तथा परिमिते-पदम् ॥ ४ पराक्रमाय च पदं पुन:जानि चोद्धरेत् । सोहं हूं फट् ततः स्वाहा सप्त-विशति-वर्णवान् ॥५ मन्त्रोऽयं कथितो देवि ! ऋषि-छन्दादिकं शृणु। महाकालो ऋपिश्चास्य त्रिष्टुप् छन्दः प्रकीर्तितम् ॥६ मिता-नित्या देवता च कालिका बीजमीरितम् । कूचं शक्तिमहेशानि-माया कोलकमीरितम् ॥७ कीलकेग पडङ्गानि पड-वीडिचन कारयेत् । ध्यायेन्नीलाद्रि-सङ्काशां नील-जीमूत-सन्निभाम् ॥ ८ रक्त-वस्त्रां शवासीनां मुण्ड-माला-विभूषिताम् । पीनोन्नत-कुच-द्वन्द्वां पीन-वक्षो नितम्बिनी ॥६ दक्षिणां मुक्त-फैशाली दिगम्बर-विनों-दिनी । महादेव-हृदम्भोज-मध्यस्थां शक्ष-कङ्कणां ॥१० [१४१
कोटि-कालानल-प्रख्यां श्मशानालय-वासिनीम् ।
खड्ग-मुण्ड-धरां वामे सव्येऽभय-वर-प्रदाम् ॥११
साधकाकांक्ष-हृदयां साधकस्य वर-प्रदाम् ।
मुख-सान्द्र-स्थितामोद-मोदिनी मद-विह्वलाम् ॥ १२
आरक्त मुख-सान्द्राभिर्नेत्रादिभिविराजिताम्
दक्षिणां सस्मितां दिव्यां दीन-नायां विभावयेत् ॥ १३
एवं ध्यात्वा मितां देवी लक्ष-त्रयं जपं चरेत् ।
किंशुकहवनं कार्य ज्योतिष्मत्याथवा प्रिये ॥ १४
ज्योतिष्मती-प्रसूनेन फलं किंशुक-वन्मतम् ।
आरक्त-करवीरेण जुहुयान्मन्त्र-सिद्धये ॥१५
त्रिकोण-कुण्डे जुहुयात् संस्कृते खादिरानले ।
ताम्बूल-पत्र-होमेन कालिकां वशमानयेत् ॥ १६
पुष्पाक्त-नागवल्या च नागिनी-सिद्धिमाप्नुयात् ।
वन-पुष्पेण जुहुयात् डाकिन्या वा महेश्वरि ॥ १७
धुस्तूरेणारि-निधनं कुन्दैश्च कवितां लभेत् ।
जाती-पुष्पैर्जयावाप्तिस्तिल-पुष्पैर्बलोन्नतिः
पुन्नागैः पुरुषार्थाय केतक्या कामिनी लभेत् ।
श्रासुर्या रिपु-नाशश्च चन्दनेन जयी सदा ॥१६
तथवागुरुणा देवि ! राज-राज-पदं लभेत् ।
रक्त-चन्दन-होमेन सर्व-मोहनमाचरेत् ॥ २०
गिरि-का कन्यकाप्तिः सेवन्त्या शिव-रूपता ।
गुडूच्या रिपु-नाशश्च मरोचेनाकृष्टिरुत्तमा ॥२१
पूगी-फलैर्महा-भाग्यं तथा जाति-फलंर्धनम् ।
स्तम्भनं चम्पकेनैव जम्ब्या जन्माति-नाशनम् ॥ २२
एवं नाना-विधानेन फाममुद्दिश्य साधयेत् ।
ततो होम-दशांशेन तर्पण
पीठ-नीरतः ॥२३
१४२]
॥ १८
अष्ट-गन्धोदकेनापि तथा
केसर-नीरतः।
तर्पणस्य दशांशेन मार्जनं समुपाचरेत् ॥ २४
तद्-दशांशं वि-भोज्यं शक्तयश्च कुमारिकाः ।
पूजयेद् भोजयेद् देवि ! सर्व-सिद्धि स विन्दति ॥ २५
अथ पूजा-विधानस्य यन्त्रं सच्यते शृणु ।
त्रिकोण-त्रितयं लिख्य वृत्तं पट्-कोरण-संयुतम् ॥ २६
वृत्ताष्ट-दल-शोभाढ्य भूपुरेण समन्वितम् ।
चतुरोप-शोभाढ्यं मध्ये विन्दु-विभूपितम् ॥ २७
काली करालिनी घोरां प्रथमे तु त्रिकोणके ।
द्वितीये तु त्रिकोणे च वामां ज्येष्ठां च रौद्रिकां ॥२८
तृतीये तु त्रिकोणे च इच्छां ज्ञानं क्रियां तथा ।
अथ वृत्ते यजेद् देवि ! वार्ताली प्रथमं यजेद् ॥ २६
द्वितीय-भागे देवेशि ! लघु-वाराहिकां यजेत् ।
तृतीय-भागे देवेशि ! स्वप्न-वाराहिकां यजेत् ॥ ३०
तिरस्करिणिकां पूज्य चतुर्थ-भागके शिवे !
षट्-कोण-चामे देवेशि ! चतुरिं प्रपूजयेत् ॥ ३१
पट-कोणे तु षडङ्गानि वृत्ते सिद्ध्यप्टकं तथा।
दलेण्टौ मातृकाः पूज्यास्तदन्तेऽष्टौ च भैरवाः ॥ ३२
भूपुरे लोक-पालाश्च तदस्त्राणि च तद्-बहिः।
एवमिष्ट्वा मितां नित्यां विद्या मित्रां निरञ्जनी ॥३३
एवमाराधना-युक्तो मन्त्र-सिद्धि लभेन्नरः ।
अथवान्य-प्रकारेण ध्यानं नित्या-क्रमे शृणु ॥ ३४
अञ्जनाद्रि-निभाः सर्वा मुण्ड-माला-विभूषणाः ।
दक्ष-हस्ते देवी-खड्गं वाम-हस्ते च तर्जनीम् ॥ ३५
धारयन्त्यः शुभाः काल्या वरदाभय-तत्-कराः।
एतत् सामान्यतो ध्यानं नाम-मन्त्र-विधौ स्मृतम् ॥ ३६
तथा। रहस्यमन्त्र कथितं सिद्धयोऽष्ट-विधाः करे। मजन गुटिका खड्गं वेतालं यक्षिणी-गणम् ॥ ३७ चरुकं तिलकं वासः कपालं पादुकां तथा । लगुडः किन्नरी-सिद्धि मर्यादि महा-कला ॥ ३८ चराचर-गतिश्चैव त्वणिमा-लघिमादिकम् । पर-काय-प्रवेशश्च ततश्चैव रसायनकम् ॥३६ स्पर्शश्चिन्तापहारश्न भूत-सश्चरणं मृतकोत्थापनं दिव्याः सिद्धयस्तत्-करे स्थिताः ॥ ४० महा-पीठं समुद्धृत्य नित्या स्थाप्या यथा-क्रमम् । अथवा मूल-मन्त्रेण यजेन्मध्ये स्व-देवताम् ॥४१ यथोक्त-मन्त्र-सिद्धयर्थं ध्यायेच्च कुल-वस्तुभिः । यजेत् सन्तर्पयेच्छक्ति भोजनाच्छादनादिभिः॥ ४२ धूपयेद् दक्ष-गन्धेन देवताश्वतरेत् तदा। रक्ताक्षी स्तब्ध-नेत्राङ्गी प्रसन्न-मुख-पङ्कजा ॥ ४३ काचिदेका भवेच्छक्तिरितरास्तन्मुख-स्थिताः । तस्मिन् क्षणे तु प्रकृति कृत्वा माप-मयों शुभाम् ॥ ४४ घृत-पक्वा मांस-मया उपभोगाः प्रकल्पयेत् । ग्रासे ग्रासे सुरां दद्यान्मत्स्य-शाफलकानि च ॥ ४५ आद्यं बीजं समुच्चार्य नित्ये क्रूर-मुखे तथा । क्रूर-दंष्ट्र ललज्जिह्वऽमुकस्तेऽयं प्रकल्पितः ॥ ४६ आहारो भक्षय-युगं स्वाहान्तं ठ-द्वयं पुनः । आद्य-चीज समुच्चार्य मृतं ध्यायेद् रिपुं तदा ॥ ४७ तत्कालमेव हरते मिता प्रारणान् सुरेश्वरि ! श्रूयतेऽसौ मृत इति तावत् सम्भोजन्मितान् ॥ ४८ पश्चात् पश्चाङ्ग-धूपेन घूपयेत् तां वर-प्रदाम् । हासं कृत्वा वरं दत्वा प्रजेत् सा शक्ति देहतः ॥४६ •४४] श्मशाने वाऽय सम्पूज्या वडवाग्नि-सम-प्रभा । स-सैन्य-राजो नाशाय त्रि-मासः कुल-वस्तुभिः ॥ ५० उद्यानेषु वशोक उच्चाटे तु नदी-तटे । नातः पर-तरा विद्या सद्यः प्रत्यय-कारिणी ॥ ५१ विख्याता उत्तरानाये शतधा पूजिता मया । गोप्याद् गोप्यतराप्येषा मया तुभ्यं प्रकाशिता ॥ ५२ अतः परं महा-देवि ! किमन्यच्छोतुमिच्छसि ? श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि यश्च धूपस्त्वयोदितः ॥ ५३ दश-गन्ध-प्रियस्तस्य कानि द्रव्यारिग तत्र तु ? श्रीशिव उवाच- काश्मीरस्य त्रयो भागास्त्रयो दद्यात् तथाऽगुरोः॥ ५४ भागाः पञ्चव चन्द्रस्य मृग-नामेर्द्वयं तथा । कृष्णचन्दनकाद्यष्टौ श्वेत-चन्दनकाश्च पट् ॥ ५५ महिषाक्षस्य सप्तव सर्जका द्वादशैव हि। मांस्या भागाष्टकं कृत्वाऽज्याद् भागेकं समाहरेत् ॥ ५६ दश-गन्धस्तु धूपोऽयं पञ्चाङ्ग शृणु तत् प्रिये ! मूलं कृष्णागुरोर्भागं पत्रकं त्वचस्तथा ॥५७ स्वर्ण-पुष्पं जाति-पत्नी सम-भागेन धूपयेत् । इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥५८ फा०-१० [१४५.
एकोनविंशति-तमः पटलः तिरस्करणिका-विधिः श्रीदेव्युवाच- देवेश ! त्वत्-प्रसादेन मितायाः संश्रुतो विधिः। तिरस्करणिकां ब्रूहि महा-मोहन-कारिणीम् ॥ १ श्रीशिव उवाच- शृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि महा-मोहन-कारिणीम् । श्रीविद्यायाश्च बालाया अङ्ग-भूतां सुगोपिताम् ॥ २ वाग्भवं कालिका-बीजं भुवनेशी हरि-प्रियाम् । तिरस्कररिण-शब्दान्ते ततः सकल-जनं वदेत् ॥ ३ वाग्वादिनि सकल-पदं पशु-जन-मनी वदेत् चक्षुः श्रोत्रं तथा जिह्वां घ्राणं तिरस्करणं वदेत् ॥ ४ कुरु-द्वयं ठ-द्वयं च स्वाहान्तोऽयं मनुः स्मृतः। वाग्भवं भुवनां लक्ष्मी फ्लो भगवति वदेत् ॥ ५ स्वाहया तु संयुक्तो द्वितीयोऽयं परी मनुः । माहेश्वरी सर्व-पशु-जन-चक्षुस्तिरस्कर णं कुरु-युक् स्वाहया तु संयुक्तोऽयं परो मनुः । बैलोक्य-मोहिनि-पदं महा-माये-पदं ततः सर्व-जन-मनश्चक्षुस्ततस्तिरस्कृति वदेत् कुरु-युक् स्वाहया युक्तश्चतुर्थोऽयं ऋमान्मनु ॥ ८ पाड्-माया कमला-बोज हसौ युगक्षरमुद्धरेत् । ॐ नमो भगवति-पद श्रीमहेश्वरि चोद्धरेत् ॥६ ततः सर्व-जन-मनश्चक्षुः-पदमुदीरयेत् तिरस्करण-शब्दान्ते कुरु-युक् स्वाहयान्वितः ॥ १० ॥ ७
पञ्च-मन्त्राः कमेणोक्ताः मकार-पञ्च-रक्षकाः ।
मकार-पञ्च-रक्षार्थ मन्त्र-पञ्चकमुच्चरेत् ॥११
ह्रीं क्लीं नमो भगवति माहेश्वरि-पदं वदेत् ।
ततः सर्व-जन-पदं
मनश्चक्षुः-पदं
वदेत् ॥ १२
तिरस्करणमुच्चार्य कुरु-युक् स्वाहयान्वितः ।
समस्त-रक्षणाद्यर्थे षष्ठो योगः प्रकीर्तितः ॥ १३
मन्त्रस्यास्य ऋपिः शक्तिर्गायत्री छन्द ईरितम् ।
सर्व-पशु-जन-मनश्चक्षुरादि तिरस्कृतः ॥ १४
देवता गदिता देवि ! क्ली बीजं परिकीर्तितम् ।
ह्रीं शक्तिः को कोलकं स्याद् विनियोगस्तिरस्कृतौ।१५
वाङ्-माया-कमला-कामैरंगुष्ठाभ्यां नमो वदेत्
बीजं भगवति तत्र तर्जन्यां विन्यसेत् सुधीः ॥ १६
माहेश्वरि मध्यमाभ्यां सर्वा तिरस्करणी ततः।
अनामिकां गदिताभ्यां कनिष्ठाभ्यां कुरु-द्वयम् ॥ १७
बोजानि तु पुनः स्वाहा कर-पृष्ठ-युगे न्यसेत् ।
एवं हि हृदये न्यस्य वर्ण-न्यासं समाचरेत् ॥ १८
दक्ष-बाही दक्ष-पृष्ठे दक्षोरौ दक्ष-जानुनि ।
दक्ष-पादे दक्ष-मस्तेऽप्येवं वामेऽपि विन्यसेत् ॥ १६
बाहु-मूलं पृष्ठ-जानु-मस्तके न्यस्य वै भनुम् ।
सम्पूर्ण-विद्यया देवि ! व्यापक-न्यासमाचरेत् ॥ २०
ततो ध्यायेन्महा-विद्यां तिरस्करण-रूपिणीम् ।
मुक्त-केशी विवसनां सर्वालङ्कार-लंकृतां ॥ २१
स्व"दर्शनान्मुग्ध-पशु-वर्गां नमामि ताम्
निग्रहार्थ महा-ध्यानं यथा-वदवधारय
श्याम-वर्णा मदापूरक्त-नेत्र-त्रयां शिवाम् ।
कृष्णाम्बरां तथा खड्गं दधतीं च भुज-द्वये ॥ २३
[१४७
॥ २२
दोया मनोहराभ्यां तु खजूरी-कुम्भ-धारिणों। नोलाश्वस्यां पुरो यान्ती नीलाभरण-भूषितां ।। २४ नील-माल्यादि-वसतां नील-गन्धां मनोहरां । निद्रा-मिर्पण भुवनं तिरोभावं प्रकुर्वतीम् ॥ २५ खड्गायुधां भगवती भक्त-पालन-तत्परा पशु-निर्मूलनोयुक्तां पशु-तर्जन-मुद्रिकाम् तिरस्करणिकां प्रोक्तां भूर्ज-पत्रे लिखेन्मनुम् । कुम्भाग्ने स्थापयेद् देवि ! लिखितं फुकुमादिना ॥ २७ जपेल्लक्षं महा-मन्त्र संस्थानकतमे शिवे ! दशांश हवनं कार्य विल्वैर्मधु-घूत-प्लुतैः ॥ २८ तद्-दशांशं तर्पणं च तद्-दशांशं च मार्जनम् । ब्राह्मणानां भोजनं च तद्-दशांशं समाचरेत् ॥ २६ एवं सिद्ध-मनुमन्त्री तिरस्करणमाचरेत् सर्व-साध्य-करी विद्या पशूनां मान्य-कारिणी ॥ ३० स्वप्न-वाराहि-वद् देवि ! पुरश्चर्या-विशेषकौ । इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥ ३१ श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि कौतुकानि महान्त्यपि । तन्मे वद दयापार ! यद्यहं तव वल्लभा ।। ३२ श्रीशिव उवाच- रहस्यादति-गोप्यं च कथ्यते शृणु साम्प्रतम् । स्वप्न-वाराहिका विद्या विधाऽन्न परिकीर्तिता ॥ ३३ प्रादौ पञ्च-दशी विद्या ततोऽष्टादश-वर्णगा । चतुविशति-तत्त्वाढ्या महती परिकीर्तिता ॥ ३४ सर्वश्रेष्ठा कौतुकाढया तन्मध्येऽष्टादशाक्षरी । तस्या मन्त्र-विधानं च कथ्यते शृणु साम्प्रतम् ॥ ३५ १४८]
॥४०
वाग्भवं भुवना हृ? वाराही तु ततो वदेत् ।।
अघोरेति समुद्धृत्य स्वप्ने च ठचतुष्टयम् ॥ ३६
वह्नि-जायान्तिको मन्त्री भविष्यादि-प्रदर्शकः।
अष्टादशाक्षरः प्रोक्तो ऋषिरीश्वर ईरितः ॥ ३७
अनुष्टुप् छन्द इत्युक्तं स्वप्नेशी देवता मता।
ऐं बीजं ह्रीं तथा शक्तिः ठठ-स्वाहान्त-पटकम् ॥ ३८
हृदये ऐं तथा माया नमो वाराहि वै शिरः।
अधोरे चेति च शिखां स्वप्ने वै कवचं भवेत् ॥ ३६
ठ-चतुष्कं भवेन्नेत्रे स्वाहेत्यस्त्रं भवेत् प्रिये !
कटि-कण्ठ-गण्ड-कर्ण-नेव-मूर्धसु विन्यसेत्
नीलाञ्जन-गिरि-श्यामां मणि-रत्न-विभूषितां ।
अश्वारूढां चन-हस्तामपरे च हलायुधाम् ॥ ४१
अधस्थयोः कर्तरी च कपालं रक्त-पूरितम् ।
पादाधःस्थ-हिरण्याक्षं रतमारणां मदोद्धताम् ॥ ४२
नाना-शक्ति-समाकोर्णा नाना-गरण-विराजिताम् ।
एवं ध्यात्वा विष्णु-शक्ति ततः पूजनमारभेत् ॥ ४३
आराधपेद् विन्दु-मध्ये देवीं व्यस्रं ततो लिखेत्
तन निद्रां सुप्रसन्नां डिम्भाङ्गों च प्रपूजयेत् ॥ ४४
ततःपट-कोण-मध्ये तु महोग्रां प्रेत-यक्षिकाम् ।
श्वास-काला भीम-बती नख-ज्वालां महोदरीम् ॥ ४५
ततोऽष्ट-दल-मध्ये तु गिरीशं चतुराननम् ।
फट-कारं बद्ध-मातङ्गं कुलीरं वायसं वलिम् ॥ ४६
चण्डीश्वरं च सम्पूज्य ततो द्वादशवर्णके ।
मातङ्गों वृद्ध-मातङ्गोमसिताङ्गों कफोत्कटाम् ॥ ४७
महोद्धतां प्रेत-वाहां ज्ञान-शक्तिं कियावतीम् ।
वलिकां भानुमती सोम-देवों चिरन्तनीम् ।। ४०
[१४६
JAMNADAS THAKKAR 18, ,269,SION-H Bariasy 4oadय षोडशारे संहारेणव पूर्वतः । ऐन्द्री सौरों महेशानी तारां यक्ष-प्रसूं घराम् ॥ ४६ वामां विरोधिनों श्यामां मातङ्गी सुर-राक्षसीम् । पद्मावती काल-रात्रि तामसी मदनां मदाम् ॥ ५० पीत-गन्धाक्षतैः पूज्या तथैव फुल-वस्तुभिः । संयुक्तः शक्तिभिः सार्ध-लक्षमेकं जपेन्मनुम् ॥ ५१ यमारस्य कुसुमेहयारि-पललैस्तथा । दशांशं जुहुयान्मन्त्री व्यस्र वा योनि-कुण्डके ॥ ५२ तर्पणं मार्जनं कुर्याद् योगिनीनां समर्चनम् । एवं सिद्ध-मनुर्मन्त्री प्रयोगान् साधयेच्छुभान् ॥ ५३ मध्वाज्य-सुरसाभिश्च होमो दर्शयते हरिम् । अष्टोत्तर-सहस्रण साधकस्येप्सितं वदेत् ॥ ५४ कदम्ब-पुष्पमस्तु निधानं निशि दर्शयेत् । नीलोत्पल-कृतो होमः स्त्रियमाकर्षयेद्धठात् ॥५५ जवा-पुष्पः काल-खण्डहोमो भूपं वशं नयेत् । मार्जारान्नः कृतो होमस्त्रासयेत् साधकार्थिनम् ॥ ५६ पुत्राजीवक-बीजैश्च होमः पुत्र-करो भवेत् । यस्य प्रतिकृतिं कृत्वा मांस-पिण्ड-मयों शुभां ।। ५७ जुहुयात् तस्य भवति सद्यो मृत्युर्न संशयः । सहस्र-त्रितयं जप्त्वा स्वप्ने वक्ति शुभाशुभम् ॥ ५८ जाङ्गलैः पललैहोंमः किं किं कार्य न साधयेत् । तारे नमो भगवति वाराहि द्वितयं द्विठः ॥ ५६ पञ्च-दशाक्षरो अक्षोभ्यो भैरवः ऋपिच्छन्दस्तु शक्वरि मतम् ॥ ६० देवता स्वप्न-वाराही षडङ्गानि पदैः क्रमात् । प्राग-वत् पूजादिकं देवि! प्रयोगश्चापि पूर्व-वत् ॥ ६१ १५०] .. सद्यः प्रत्यय-कारकः।
वीजान्ते भुवनेश्वर्या अंकुशं बोजमुच्चरेत् ।
वार्तालीति पद-द्वन्द्वं वाराही-द्वितयं तया ॥ ६२
स्वप्नेश्वरि-युगं तस्मादैन्दवी विन्दु-भूषिताम् ।
वायं विन्दु-युतं पश्चाच्चतुविशाक्षरो मनुः ॥ ६३
जनार्दनो ऋषिश्चास्य छन्दः संस्कृतिरीरितम् ।
देवतां स्वप्न-वाराहीं रक्तपां घूर्ण-लोचनाम् ।। ६४
स्मरोद्भिन्नां त्रि-नयनां खण्डेन्दु-कृत-शेखराम् ।
दंष्ट्रा-कराल-वदनां शिरो-माला-विभूपिताम् ॥ ६५
यजेत् पूर्वोदिते पोठे सर्व-काल-फल-प्रदाम् ।
अत्रैव कृष्ण-मातङ्गि-कौतुकं शृणु पार्वति ॥ ६६
प्ररणवं पूर्वमुद्धृत्य
नमो भगवतीति वै ।
कृष्ण-मातङ्गिनि शिरो-वल्कल-धारिणि चोद्धरेत् ॥ ६७
सर्व-जनमहरि माया षट्-दीर्घ-युक् ततः ।
अमुकं पदमुद्धृत्य मे वश्यावृष्टिमुच्चरेत् ॥ ६८
कुरु स्वाहान्दितो मन्त्रः सर्वेषां सुर-पादपः ।
ऋषिः कृष्ण इति ख्यातः सर्व-देवोत्तमोत्तमः ॥ ६६
विराट् च्छन्द इति ख्यातं मायया तु पडङ्गकं ।
ॐ बीजं भुवना शक्तिः स्वाहा कोलकमोरितं ।
त्रैलोक्य-वश्यार्थमथ विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ७०
वीणा-वादन-कोविदाम्बुद-घटा लावण्य-लीला वरा,
बिम्बोष्ठी वनजाक्षिमश्वित-तनू व्याकीर्ण-केश-सजा ।
लीला-लोल-सुवर्ण-कुण्डल-धरा धर्मार्थ-कामोदया,
चण्डी चण्ड-पराक्रमा भवतु नः सर्वार्थ-संसाधिका ॥ ७१
एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं ततः सिद्धो भवेन्मनुः ।
उच्छिष्ट-हस्तः प्रजपेत् उच्छिष्टेण वलिं चरेत् ।। ७२
एवं प्रजपतस्तस्य
सिद्धयो जन-वश्यता 1
जायते देव-देवेशि ! किं पुनः श्रोतुमिच्छसि ॥ ७३
[१५१
विंशति-तमः पटलः पथिषद्-रुद्र-विधिः श्रीशिव उवाच- कामं शक-पदारूढ़ रति-विन्दु-समन्वितम् । घाग्भवं बीजमुद्धृत्य परा-प्रासादमुद्धरेत् ॥१ अनुलोम-विलोमेन प्रोक्ता सम्पत-सरस्वती। पडक्षरी महा-विद्या सर्व-विद्योतमोत्तमा ॥२ दोनानां तु दरिद्राणां गताधिकारिणां तथा । सम्पत्-सरस्वती विद्या महा-सम्पति-दायिनी ॥ ३ कृष्णो ऋषिमहेशानि ! गायत्रोच्छन्द ईरितम् । सम्पत्-सरस्वती देवी देवता परिकीर्तिता ॥ ४ ऐं बीजं क्लों तथा शक्तिः हसौः कीलकमोरितम् । सम्पत्यर्थे महेशानि ! विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ५ पडक्षरेण देवेशि ! पडङ्ग-न्यासमाचरेत् । व्यापकं नवधा कृत्वा ध्यायेद् देवी मनोहराम् ॥ ६ अनेक-कोटि-मातङ्ग-तुरङ्ग-रथ-पंक्तिभिः सेवितामरुणाकारा वन्दे सम्पत्-सरस्वतीम् ॥ ७ इति ध्यात्वा महेशानि ! त्रिकोणं चक्रमालिखेत् । पट-कोण च ततो लेख्यं वृत्ताण्ट-दल-भूपितम् ॥८ भपुरेण समायुक्तं यन्त्रं सम्पन्मनोर्मतम् । सम्पत्-सरस्वती देवी त्रिकोणे परिपूजयेत् ॥६ दलेषु मातृकाः पूज्या भैरवेण समन्विताः। चतुरस्र लोक-पालाः तदस्त्राणि च तद्-बहिः ॥ १० एवमावरणान् पूज्य जपेल्लक्ष-त्रयं शिवे ! दशांशेन महेशानि ! पलाश-सुमेहुं नेत् ॥११ पुरश्चरण-सम्पन्नो प्रयोगार्हो न चान्यथा। लक्षमेकं जपेन्मन्न दशांशं पायसहु नेत् ॥ १२ १५२]
अश्व-साहस्र सम्पन्नो राजा भवति भू-तले ।
पद-सहस्र जपेन्नित्यं दशांशं कमलहुँ नेत् ॥ १३
मातङ्ग-रथ-वृन्दाश्व-धन-धान्य-समन्वितः
तस्य सम्वत्सराल्लक्ष्मीरचला जायते ध्रुवम् ॥ १४
सहस्र जुहुयान्नित्यं अनले शालि-तण्डुलैः ।
मण्डलान्नात्र सन्देहो भू-पतित्वमाप्नुयात् ॥ १५
बिल्व-मूले जपेन्मन्त्री नित्यं दश-सहलकम् ।
मासा त सकलां लक्ष्मी प्राप्नोति साधकः परां ॥ १६
हुनेद बिल्व-समिद्भिर्यो तन्मूलेऽष्टोत्तरं शतम् ।
तद्-गृहे महदेश्वयं त्रिभिर्मास वेदपि ॥ १७
दश-वारं स्पृशेदन्नं जप्त्वा भुक्ते नरो यदि ।
तद्-गृहे अन्न-समृद्धिः स्यादक्षयं नात्र संशयः ॥ १८
नदी-तीरे जपेन्मन्त्रमेकाग्र-मनसा शुचिः।
दशांशं गो-धृतं हुत्वा वशीकुर्याज्जगत्-त्रयम् ।। १६
घृतेन जुहुयान्नित्यं चतुः-सहस्रमादरात् ।
अणिमादि-गुणैश्वर्य मासादाप्नोति साधकः॥ २०
इति संक्षपतः प्रोक्तं शृणु मृत्युञ्जयं शिवे !
प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य काष्ठं षष्ठ-स्वरान्वितम् ॥ २१
विन्दु-युक्त महेशानि ! चन्द्र-विन्दु-समन्वितम् ।
क-पञ्च-विंशति पश्चाद् विन्दु-युक्तं महेश्वरि ॥ २२
नाचं दीर्घ-समायुक्तं शक्र-वीजं च मारुतं ।
मारुतं दीर्घ-संयुक्तं महीं वायुमथोच्चरेत् ॥ २३
वशार्णोऽयं महा-विद्या काल-मृत्यु-विनाशिनो ।
वाम-देवो ऋषिश्चास्य पंक्तिश्छन्दः प्रकीर्तितम् ॥ २४
मृत्युञ्जयो महा-रुद्रो देवता परिकीर्तिता।
प्रणवं बीजमित्युक्तं जूं शक्तिः परिकीर्तिता ॥ २५
चन्द्र-चन्द्र चन्द्र-वह्निः पुनर्वह्नि क्रमेण च ।
इति मन्त्राक्षरासं कृत्वा ध्यायेत् परं शिवम् ॥ २६
[१५३
अच्छ-स्वच्छारविन्द स्थितिमुभय-कराङ्क-स्थितं पूर्ण-कुम्भ,
द्वान्यां वेदाक्ष-गाले निज-कर-कमलाभ्यां घटी नित्य-पूरणों।
द्वाभ्यां तावत्स्वन्तो शिरसि शशिकलां बन्धुरां प्लावयन्तो,
एवं देवं दधानः प्रविशति विशदां कल्प-जालश्चिरं नः ।। २७
एवं ध्यात्वा बाह्य-पीठे पट्-कोणं विलिखेच्छिवे !
दलाष्टकं लिखेत् तत्र वृत्तं तत्र लिखेत् ततः ॥ २८
पट-कोण-मध्ये देवेशि! पजेन्मृत्युञ्जयं शिवम् ।
कोण-पटके च सत्यादि मन्त्रान् पञ्च सदाशिवम् ॥ २६
ततो यजेल्लोक-पालान् सायुधान् परमेश्वरि !
लक्षं जपेत् पुरश्चर्या तिलोमो दशांशतः
अनन्तरं जपेल्लक्ष-त्रितयं परमेश्वरि !
काल-मृत्यु-विनाशश्च भवत्येव न
चान्यथा ॥ ३१
पर्वताने जपेद् देवि ! लक्ष-द्वादशकं शिवे !
कल्पायुः शत-जीवी च भवत्येव न चाग्यथा ।। ३२
अयुतं होमयेद देवि ! दूर्वया मृत्यु-नाशने ।
इति संक्षेपतः प्रोक्तं पथिषद्-रुद्रकं शृणु ॥ ३३
प्रणवं नतिमुच्चार्य रुद्राय-पदमुच्चरेत् ।
पथिपद्-पवमुच्चार्य चतुर्थ्यन्त-समन्वितम् ॥ ३४
स्वस्तीत्युक्त्वा मां रक्ष च सम्पालय-पदं ततः ।
पथिपद्-रुद्र-विद्येयं श्रुता पथि भयापहा ॥ ३५
वाम-देवोऽस्य मन्त्रस्य ऋपिरित्युच्यते बुधैः
पंक्तिश्छन्द इति प्राहुर्गायत्रमथवा शिवे ॥३६
देवता पथिषद्-रुद्रो मार्गे सकल-भोतिहा।
प्रणवं बीजमित्युक्तं नमः शक्तिरितीरिता ॥ ३७
एकाक्षरेण द्वाभ्यां च त्रिभिश्च चतुरक्षरैः ।
त्रिभिश्चतुभिरित्युक्तो पडङ्गोऽयं मया शिवे ।। ३८
शुद्ध-स्फटिफ-सङ्काशं चतुर्बाहु-समन्वितम् ।
पिनाक-कार्मुकोपेतं
बाण-टडू-समन्वितम् ॥ ३६
विभिमन्त्रः समोपेतं एणाङ्क-चन्द्र-शेखरम् । कैलास-गिरि-सङ्घनशं वृषभारूडमीश्वरम् ॥ ४० अन्न-पूणेश्वरी-युक्तं पथिषद्-रुद्र-नामकम् । पथि चोरादि-भीतिघ्नं ध्यायेद् देवं सदाशिवम् ॥ ४१ ध्यानमेतन्मया प्रोक्तं यन्त्रं वच्मि ततः परम् । षट्-कोणं विलिखेदादी दलान्यष्टा ततो लिखेत् ॥ ४२ भू-गृह विलिखेत् पश्चाद् द्वारोपेतं सुलक्षणम् । पडल-मध्यमे देवं पथिषद्-रुद्रमर्चयेत् ॥ ४३ षट्-कोणेषु पडङ्गानि तन मन्त्रैः समर्चयेत् । नन्दीकेशश्च नन्दी च भृङ्गी च भृङ्गिरीटि वै ॥ ४४ मृडश्च वीरभद्रश्च कुमारो गरणपस्तथा । अष्ट-पत्रे यजेद् देवि ! प्रार्थयेन्मम वल्लभे ॥ ४५ दिवष्टसु मही-गेहे दिक-पालानष्ट पूजयेत् । एवमावरणयुक्तं पथिषद्-रुद्रमीश्वरम् ॥ ४६ पूजयित्वा जपेन्मन्त्रं चतुर्लक्षमतन्द्रितः। दशांशं तु तिलहुं त्वा मन्त्र सिद्धो भविष्यति ॥ ४७ सिद्धनानेन मन्त्रेण प्रयोगं कारयेद् वुधः । पथि-चोर-भये प्राप्ते जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥ ४८ ततश्चौरैरदृश्यः स्यात् पुमानयमसंशयः । पिपासा-संयुते मार्गे विजने साधकोत्तमः ॥ ४६ जपेदम महा-मन्त्र वसु-पूर्व-शत-त्रयम् । तनव लभते सद्यो जलं पीयूप-सन्निभम् ॥ ५० अन्नेन रहितो मार्ग क्षुधा-सम्पीडितो जपेदमुं महा-मन्त्रमष्टोत्तर-सहस्रकम् ॥ ५१ मिष्ठान्नं लभते सद्यो ब्राह्मणानां शतस्य च । रहस्याति-रहस्यं च रहस्याति-रहस्यकम् ॥ ५२ गोपनीयं कौतुकं हि स्व-योनिरिव पार्वति ! इति संक्षेपतः प्रोक्तं किमन्यच्छोतुमिच्छसि ॥५३ [१५५ नरः।
एकविंशति-तमः पटलः धूमावती-कौतुक-संक्षेप-विधिः श्रीदेव्युवाच- देवेश ! श्रोतुमिच्छामि कौतुकं शत्रु-निग्रहम् । श्रीशिव उवाच- रहस्याति-रहस्यं च कौतुकं कथ्यते शृणु ॥१ आर्द्र-पटेश्वरी विद्या कथ्यते शत्रु-निग्रहे । प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य नमो भगवतीति च ॥२ आई-पटेश्वरि प्रोच्य हरि-नील-पदं वदेत् । कालि-पटं ततोच्चार्य आर्द्र-जिह्वे पदं चरेत् ॥ ३ चण्ड ड-लोहिनि चोद्धृत्य रुद्राण्यथ कपालिनि । ज्वाला-मुखि सप्त-जिह्व सहस्र-नयने वदेत् ॥ ४ एहि-युक् चामुकं ते च पशु ददामि व वदेत् । अमुष्य जीवमुद्धृत्य निकृन्त-पदमुद्धरेत् ॥५ अथाहित-जीव-पदमपहारिणि हूं वदेत् । फट-भूर्भुवः स्वः पदं च फट् स्वाहा रुधिरं पिव ।। ६ मार-वादिनि चोदत्य मम शतृ पदं वदेत् । छेदय-द्वितयं प्रोच्य पिब-द्वन्द्वं समुद्धरेत् ॥७ शोणितं च पदं हूं फट् स्वाहान्तो मनुराडयम् । व्यञ्जन-त्रितयाकान्तं शतं विशत्-त्रयाधिकम् ॥ ८ दुर्वासा ऋपिराख्यातो गायत्री छन्द ईरितम् । निकृन्त इति बीजं स्यात् स्वाहा शक्तिः समीरिता॥६ शत्रु-निग्रह-कार्यार्थ विनियोगः प्रकीर्तितः। ह्री पट्यास्तु पडङ्गानि ततो ध्यायेत् पराम्बिकां ॥ १० १५६]
,
कृते ।
शितोन-तर-दष्ट्रिफा त्रि-नयनोर्व-केशोल्वणा,
कपाल-फलसोत्य-सड्डमरुकत्रिशूलाङ्किता
घनाधन-निभारुणारिणत-किङ्किणी-मालिका
भवेद् भव-सुसिद्धये मम तु भद्र-काली चिरम् ॥ ११
अयुतं प्रजपेन्मन्त्रं मरु-भूमी श्मशानके।
स्नानं कृत्वा चा-वासः शत्रुमुद्दिश्य योजयेत् ॥ १२
क्षणार्धाच्छत्रु-मरणं भवत्येव जपे
केवलं जप-मात्रेण मासान्ते शन्नु-मारणम् ॥ १३
कृष्णाष्टमी समारभ्य यावत् कृष्ण चतुर्दशी ।
शत्रु-नाम-समायुक्तस्तावत् कालं जपेन्मनुम् ॥ १४
यमालये व्रजेच्छत्रुर्मुकुन्द-सदृशोऽपि चेत् ।
आरम्भ-दिवसाद् देवि ! ब्रह्म-रुद्रादयः सुराः ।। १५
न रक्षितुं प्रशक्तास्ते मृत्युस्तस्य भविष्यति ।
कृष्ण-प्रतिपदारभ्य यावत् स्याद्दशमी तिथिः ।। १६
मन्त्रमुच्चार्य देवेशि ! शत्रु-देशे जलं क्षिपेत् ।
गृहीत्वाञ्जलिना नीरं शत्रु-देशे क्षिपेज्जलम् ॥ १७
मारयेच्छत्रु-सङ्घातं नान कार्या विचारणा ।
शत्रु-नाम समुच्चार्य मनुना पर-देवते ॥१८
अष्टोत्तर-शतं जप्त्वा शत्रु नाशो भवेद् ध्रुवम् ।
देवानां वृहती-पुष्पर्मूलेन नियत-व्रतः ॥१६
उपचार षोडशभिर्मास-नैवेद्यमर्पयेत्
कार्य विज्ञाप्य प्रजपेच्छन्नु-नाशो भवेच्छिवे ॥ २०
इति संक्षेपतः प्रोक्तं वार्ता यक्षीं शृणु प्रिये !
प्रणवं वाग्भवं मायां श्री-बीजं ज्योतिर्बीजकम् ॥ २१
अंकुशं भृगु-बीजं च मुख-वृत्तं स-बिन्दुकम् ।
च-तृतीयं बिन्दु-युक्तं वीर-मोदनमुद्धरेत् ॥ २२
[१५७
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आग्नेयी-पदमुद्धृत्य महा-बोरे पदं वदेत् ।
सर्व-भाव-पदं प्रोच्य दशिनीति पदं वदेत् ।। २३
उक्त्वा नन्दन-वन-पदं वासिनीति पदं वदेत् ।
महा-सुप्त-पदं प्रोच्य जागरिणी-पदं वदेत् ॥ २४
मम कर्णे दर्शयेति स्वाहान्तो मनुराडयम् ।
रविवारे पर्वणि वा तैलाभ्यङ्ग समाचरेत् ।। २५
अयुतं प्रजपेन्मन्नं तिल-पुष्पेण होमयेत् ।
अपराह्ने सहस्रं च त्वष्टोत्तर-शत च वा ॥ २६
जप्त्वा सुप्ते नरे रात्री सर्व कथयति प्रिये !
नै-काल्य-ज्ञान-सिद्धयर्थ करिष्येऽहं जपं तव ।। २७
इति सङ्कल्पमासाद्य जपात् बैकाल्यमाप्नुयात् ।
इहाफलं फलं चैव परा-फलं च प्राफलम् ॥२८
जानामि इति सम्प्रोच्य सिद्ध-मन्त्रो नरो भवेत् ।
ऋषिच्छन्दादिकं ध्यानं नास्ति चास्याः प्रियम्बदे ॥ २६
इति संक्षेपतः प्रोक्तं पिशुनस्य मनुं शृणु ।
श्री-बीजं पुरतः प्रोच्य शत-रुद्र-पदं वदेत् ॥ ३०
सौ प्रस्ताङ्गी-पदं प्रोच्य ततः सकल-शब्दतः ।
वार्ता कह-पदं प्रोच्य ततः कर्ण-पदं वदेत् ॥ ३१
पिशुनाख्य-पदं प्रोच्य माया-स्वाहान्वितो मनुः ।
मन्त्र-राजः समाख्यातः सहस्रेण पुरस्क्रिया ॥ ३२
महा-देय ऋपिश्चास्य अनुष्टुप् छन्द ईरितम् ।
श्रीमत-कर्णाख्य-पिशुनो महा-लक्ष्मी च देवता ॥ ३३
वाग्भवं वीजमाख्यातं शक्तिः स्यात् काम-बीजकं ।
‘परा-बीजं कीलकं स्यान्मम शब्दं समुच्चरेत् ।। ३४
सकलेति पदं प्रोच्य रहस्य-पदमुद्धरेत् ।
वाग्-विज्ञानार्थेति पदं विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ३५
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ह्रीं-षट्कैश्च पडङ्गानि व्याहृत्या दिग्-निबन्धनम् ।
अनेन क्रम-योगेन पिशुनः सर्व-सिद्धिदः ॥३६
इति संक्षेपतः प्रोक्तं किरात-पद-पूर्विकां ।
वाराहीं शृणु देवेशि ! सावधान-मना भव ।। ३७
वाग्भवं बोजमुद्धृत्य वाराहो-बीजमुद्धरेत् ।
श्री बीजं च ततस्तारं नमो भगवतीति वै ॥३८
वाराही-पदमुद्धृत्य वराह-मुखि चोद्धरेत् ।
किरात-रूपिरिण प्रोच्य एक-रात्रि-पदं - वदेत् ॥३६
प्रसन्ने पदमुद्धृत्य वरदे-पदमुद्धरेत्
मम कार्य-पदं प्रोच्य सिद्धिं फुरु-युगं यदेत् ॥ ४०
श्री-बीज स्तम्भ-धीजं च वाग्-वीजं स्वाहयान्वितं
विभीतकं समानोय तस्य मज्जां समाहरेत् ॥ ४१
तद्-भस्माजनमासाद्य कज्जलं नेत्रयोर्ददेत् ।
रात्रौ धूपं ततो दत्वा प्रजपेत् परमेश्वरि ।। ४२
प्रसन्ना भवति क्षिप्रं नात्र कार्या विचारणा ।
- स्वप्न-वाराहि-वत् सर्व शृणुष्व काल-वादिनीम् ॥ ४३
प्रणवं भुवनां लक्ष्मों वाग्-बोज काम-योजकम् ।
सम्वर्त-रति-संयुक्तं विन्दु-युक्तं समुद्धरेत् ॥४४
प्रणवं हृदयं प्रोच्य ततो भगवति-पदम् ।
भूतमुद्धृत्य देवेशि ! भविष्यमुद्धरेत् ततः ॥४५
वर्तमान-पदं प्रोच्य तदन्ते काल-वादिनि
प्रपञ्च-पदमुद्धृत्य
शरीरिणि-पदं वदेत् ॥४६
सह-शब्दं समुद्धृत्य अमुकं मे वदेत् ततः।
कार्य कथयेति प्रोच्य पुन:जानि चोद्धरेत् ॥ ४७
अयुतं प्रजपेन्मन्त्रं दशांशं हवनं चरेत् ।
आकर्षणार्थ देवेशि ! भानुवारे यथा-विधि ॥ ४८
।
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रात्रौ तु शयनात् पूर्व सहलं प्रजपेच्छिवे !
अष्टोत्तर-शतं वापि शयोत तदनन्तरम् ॥४६
तत् स्वप्ने चिन्तितं कार्य देवता कथयेद् ध्रुवम् ।
नामादि-दर्शनं तत्र द्रष्टव्यं विधि-पूर्वकं ॥५०
यस्य या चिन्तिता शक्तिः स्वप्न-द्वारा भविष्यति ।
इति संक्षेपतः प्रोक्त शृणु धूमावती-विधि ॥ ५१
धू-बीज वितयं प्रोच्य धुरु-युग्मं समुच्चरेत् ।
धूमावति-पदं प्रोच्य को स्वाहा फट-समन्वितः ॥ ५२
मन्त्रः प्राथमिकः प्रोक्तो द्वितीयं शृणु सादरं ।
प्रएवं धूम्र-बीजं च धूमावति-पदं वदेत् ॥ ५३
देवदत्तो धावतीति स्वाहान्तो मनुराडयम् ।
ऋपिः क्षपणकः ख्यातो गायत्री छन्द ईरितम् ॥ ५४
धूमावती देवता च धूं-बीजं बीजमोरितम् ।
स्वाहा शक्तिः समुच्चाटे विनियोगः प्रकीर्तितः॥५५
धूं-धट्कैस्तु षडङ्गानि ध्यानं शृणु वरानने !
काकारूढाति-कृष्णाभा भिन्न-दन्ता विरागिणी ॥ ५६
मुक्त-फेशी सु-धूम्राक्षी क्षुत्-तृषार्ता भयातुरा ।
चञ्चला चाति-कामार्ता क्लिष्टा पुष्टालसाङ्गिका ॥५७
मलिना श्रम-नीरक्ता व्यक्त-गर्भा विरोधिनी ।
धृत-सग्नि-हस्ता च ध्येया धूमावतो परा ॥ ५८
लक्षं जपेन्महेशानि ! जगदुच्चाटनं चरेत् ।
सर्व-तन्त्रे प्रयुक्तत्वादन
संक्षेपतो मता ॥५८
॥इति धीशक्ति-सङ्गम-महा-तन्त्रराजे सुन्दरीखण्डः समाप्तः।।
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