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Chaturdash-bhuvan

Shivshankar Sharma · 2009/09

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'वैदिक रहस्य, * प्रथम भाग *
%833633
एव
ओ३म्
"YTYYLITÀ
* चतुर्दश-भुवन ॥ *
सम्पादक
शिवशङ्कर शर्मा
राजकिशोर वर्मा एन्ड ब्रदर्स ने
मुद्रित किया
राजनीति प्रेस पटना सीटी.।
द्वतीय वार।
संवत १९६० वि०
१०००
सन १९१२ ई०

(२) वि मे कर्णा पतयतो वि चतु, विज्योतिर्हृदय आहितं यत् । वि मे मनश्वरति दूरश्राधीः किं स्विद्वक्ष्यामि किमुनू मनिष्ये ।अग्६।९।६॥ (ने+का+वि+पतयतः) मेरे दोनों कान इधर उधर दूर. २.गिर रहे हैं (चक्षुः+वि) मेरे नयन भी इधर उधर दूर २ दौड़ रहे हैं (हृदये । यद् इदम् + ज्योतिः) हृदय से स्थापित जो यह ज्ञानरूप ज्योति है वह भी (वि+पतयति) दूर भाग रहा है (दूरेआधीः मे मनः विचरति) अति दूरस्थ विषय में ध्यान लगाकर मेरा यह नन भी दूर २ विचरण कर रहा है ऐसी अवस्था में प्रभु के समीप (किम् +स्विवयामि) क्या मैं कहूंगो और (किन् । उ+नु. भनिष्ये) क्या ननन करूंगा। शिक्षा-प्रत्येक मनुष्य का नित्य का यह अनुभव है कि कर्ण, चक्षु, मन नादि इन्द्रिय किसी कार्य में स्थिर नहीं रहते। किञ्चिन्मात्र ही नौका निलने पर झट से इधर घर भागने लगते हैं। ऐसी अनवस्थित दशाने मनुष्य सूक्ष्म कार्य कदापि नहीं कर सकता श्रतःयहां प्रार्थनाहै किहे परमात्म- देव!नेरे कर्ण, नयन, हृदयस्थ ज्ञान और यह मन सवही चारों तरफ.भोग रहे हैं। मैं कैसे आपके गुण गाऊं कैसे मनन करूं । हे भगवान् ! आशीर्वाद करो जिससे मेरे सब इन्द्रिय समाहित हों औरउनकेदारानोपकीपरन विभूतियांदेखू। इस ।

१३) पृथिवीपर अभीतक जो ज्ञान, विज्ञान, कलाएं, कौशल, शास्त्र आदि प्रकाशित होचुके हैं, होरहे हैं. और होने- हारेहैं वे सबही इसी प्रात्मा से निकले हैं, निकलरहे हैं, निकलेंगे। इस तत्त्व की जो जानताहै वही पंण्डितहै। सो यह आत्मा मन और इन्द्रियोंका अधीन है जिसके इंद्रिये चंचल घपल हैं उसका प्रात्मा कुछ नहीं कर सकता इन्हीं इन्द्रियों को विवश करने के लिये वेदों से लेकर अद्यावधि सहस्त्रों लक्षों गाथाएं लिखीगई हैं और लिखीजारही हैं। मैं भी आज इनकी ही गाथा वेदों से दिखलाता हूं इसके साथ २ अनेक वस्तुओं का भी निर्णय होगा। सप्तऋषि श्रादि-दो नयन, दो श्रोत्र, दो घ्राण (ना), एक नुख ये मिलके सात ऊपर के अङ्ग होते हैं। इन्हीं सातों को सप्त ऋषि, संत होता, सप्त ऋत्विक, सप्त देव, चप्त असुर, सप्त प्राण, सप्त लोक, सप्त द्वीप, सप्त सा- गर, सप्त सिंधु, सप्त नदियां, सप्ताचल इत्यादि नाना नामों से पुकारते हैं। दो हस्त, दो चरण, एक मलेन्द्रिय, एक भूत्रेन्द्रिय और एक मध्य शरीर अर्थात् गर्दनसे नीचे कमर से ऊपर को भाग, ये मिल के सात नीचे के अवयव होते हैं, इन्हीं सातोंको पुराणों में सप्त पाताल, सप्त अधो- लोक, सप्त अधोभुवन, सप्त नरक इत्यादि विविध नाम देते हैं, नयन आदि सप्त और हस्त आदि संस, मिलके (१४) चतु- देश होते हैं, ये ही चतुर्दश लोक चतुर्दश भुवन प्रभृति नाम से कहे जाते हैं। पुराणों में अत्यन्त विस्तार से इनका । वर्णनह । शिरस्य नयन प्रादि सातोंको भूलॊक, भुव- लॊक, स्वर्लोक,महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक कहते हैं । और हस्त प्रादि सातोंको अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल,रसातल,पाताल कहते हैं येही चतुर्दश भुवन हैं । यह सब वर्णन इस देह- मात्र का है। इसी शरीर में ये चौदह लोकहैं इनको सब प्रकार से जाने जनवावें । इनके पूर्ण ज्ञान से मनुष्य को नंगल-कल्याण होता है । पश्चात् धीरे २ इसके यथार्थ भावको लोग भूल गये तब इस शरीरको छोड़ वाहा जगत मैं१४चतुर्दशभुवनखोजने लगे।स्वस्वननोनुकूल और स्वस्व- अध्यनुसार इसकी व्याख्या होनेलगी। आश्चर्य की बात है जो केवल शरीरमात्र का विवरण था वह अब इस अनन्त. अनादि जगत् का विवरण वनगया। विद्वान् लोगभी इस को ऐसेही मानने मनवाने लगे। क्यों ऐसा महापरिवर्तन वा उलट पुलट हो गया। इस प्रश्न का एकमात्र यही समाधान है कि वेदोंको न पढ़ना, पढ़ाना ही इस महान् अज्ञान का कारण है-अब मैं वेदों के नन्त्रों को लेकर अतिसंक्षिप्त रूप से इस विषय का दिग्दर्शनमात्र कर- वाताहूं। आप देखते जायंगे कि वैदिक परिमित पदार्थों से यह लौकिक जगत कितना विस्तीर्ण बन गया है। सप्त ऋषि अरविलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं (५) विश्वरूपम् । तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदाना॥ बृहदारण्यकोपनिषद् २१२३ प्रथम उपनिषद् का ही प्रमाण इस हेतु लिखा है कि इस की व्याख्या स्वयं एक महर्षि याज्ञवल्क्य ने कियाहै और किंचित् पाठभेदके साथ वेदमें भी यह मंत्र आया है श्रागे देखिये । भर्थ-(भाग बिलः) जिसका बिल अर्थात् छिद्र नीचे हो (उर्वबुनः) और जिसकी जड़ ऊपर हो ऐसा ( चमसः ), एक चमस नाम का पात्र हैं ( तस्मिन् । विश्वरूपम् + यशः+निहितम्) उस घमस में सब प्रकारके रूपवाला यशं स्थापित है। (तस्य+तीरें+ सप्त+ऋषयः+ नासते) इसके तौर पर सात ऋषि वैठे हुए हैं (अष्टमी+ वाग+ब्रह्मणा+संविदाना). और आठवी वाणी ब्रह्म के साथ संवाद कर रही है । ये इसके पदार्थ हुए । अंब इसका आशय स्वयं ऋषि इस प्रकार वर्णन करते हैं:- • "यह शिर ही चमस है इसकी जड़ ऊपर और मुख- रूप छिद्र नीचे है। इसी में सब यश स्थित हैं। इसके तीर- पर दो नयन, दो श्रोत्र, दो प्राण और एक मुख अथवा रसना.ये ही सात ऋषि बैठे हुए हैं और आठवी. वाणी ब्रह्मका विचार कर रही है। ये दोनों कर्ण=गौतम और भरद्वाज हैं। ये दोनों शाखें विश्वामित्र और जम- दग्नि हैं । ये दोनों प्राण (नार्क) वसिष्ठ और कश्यप हैं (रसनाका कोई विशेष नाम नहीं दिया गयाहै) वाणी • अत्रि है" यहां देखते हैं कि सप्तऋषि पद से स्वयं महर्षि । ।

कतं श्रादि सात इंन्द्रियों का ही ग्रहण करते हैं और इन सेनान भी गौतम भरद्वाज भादि पृथक् २ रखते हैं। तिर्यविलश्वमस ऊलवुघ्नो यस्मिन् यशो निहित विश्वरूपम् । अन्नासत पयः सप्त साकं ये अस्य गोपा महतो बभूवुः। अथर्ववेद । १०१ ८१९॥ यह ऋचा निरुक्त देवतकाएट ६।३८ में भी नाई है। अर्थ-जिसका बिल नीचे मूल स्पर है ऐसा एक घनम नाम का पात्र है जिसमें सब प्रकार का यश स्थापित है। यहां इसके साथ सात ऋषि हैं को इस महान् (शरीर) के रक्षक हैं । अर्थ पूर्ववत् ही है। यहां भष्टनी वाणी की चर्चा नहीं है पुनः सप्त ऋषयःप्रतिहिताः शरीरे सप्त रक्षन्ति सदम- प्रमादस् । सप्तापः स्वपतो लोकमीयुस्तत्र जागृतो अस्वप्नजौ सत्रसदौ च देवौ।। निरुक्तदैवत काण्ड अ०६ । ३७॥ (शरीरे सप्त+ ऋषयः प्रतिहिताः) शरीर में सात अपि स्थापित हैं (सप्त+ सुप्रमादम + सदंरक्षन्ति) सातों प्रमादरहित हो शरीर की रक्षा करते हैं (प्रापः स्वपतः + लोकम् + ईयुः) बहुत फैलने हारे सातों सोते हुए पुरुष के धात्मा के निकट जाते हैं (तत्र अस्वम्मी मत्र- दौ+च+देवौ+जागृतः) उस समय न सोने हारे सदा शूरीरस्थ दो देव जागे हुए रहते हैं (७) ये ही दो नयन, दो कर्ण, दो नासिकारं और एक जिह्वा सात ऋषि हैं जो शरीर के उपरितन भाग शिर में स्थित हैं ये ही सातों शरीर की रक्षा करते हैं ये ही सुषु- स्त्यवस्था में जीवात्मा से मिलकर कुछ देर शान्तिलाम करते हैं। इस समय मुख्य प्राण और आत्मा ये दोनों देव जागते रहते हैं ! यहां "शरीर में सात ऋषि स्थित हैं" इतने कहने मात्र से सिद्ध होता है कि इन इन्द्रियों का ही विवरण हैं। यास्काचार्यादिकों ने भी इसी अर्थ का ग्रहण किया है। इतनाही नहीं किन्तु वेदों ने विश्वामित्र, वसिष्ठ, अत्रि, अङ्गिरा श्रादि जितने ऋषिवाचक शब्द आये हैं वे प्राण- वाचक हैं अनवा प्रागविशिष्ठ जीवात्मवाचक है। प्राण नाम इन्द्रियों का है अतएव ब्राह्मण ग्रन्थों में " ऋषयः" शत९ ६।। प्राणा वैऋषयः। इस प्रकार का पाट बहुत आता है। शतपथब्राह्मण के अष्टमकाण्ड के प्रारम्भ में लिखा है फि, प्राणो वै भौवायनः। प्राणो वै वसिष्ठ ऋषिः । मनो वै भरद्वाजः । चतुबै जमदग्निऋषिः । श्रोत्रं वै विश्वामित्र ऋषिः । वाग्वै विश्वकर्मा ऋषिः । इत्यादि अनेक प्रमाणों से सिद्ध है कि वेदों में जो वसिष्ठ आदि पद आये हैं वे प्राणों के नाम हैं। पुनः वृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य कहते हैं- १-वाग्वै यज्ञस्य होता । २-चतुर्वै यज्ञस्याऽध्वर्युः। ३-प्राणो वै यज्ञस्य उद्गाता। -मनो वै यज्ञस्य प्राणा वै - (८) ब्रह्मा। पुनः सप्त वै शीर्षन् प्राणाऐतरेय ३३ ॥ शिर में सात प्राण हैं । सप्तगतर्विशेषितत्वाच्च । वेदा- न्तसूत्र ।२।४।५।। इस वेदान्त सूत्र से भी शिरस्थ सात ही प्राण निर्धारित हुए हैं। इत्यादि अनेकानेक प्रमाणों से सिद्ध है कि जहां शरीरस्थ सप्त ऋषियों का वर्णन है वहां २ इनहीं नयनादि सातों का ग्रहण है। शिक्षा-वेदभगवान कहते हैं कि यह शिर धमस पात्र के समान है इस में सब यश स्थापित हैं। इसके तट पर सात ऋषि बैठे हुए हैं। अष्टमी ऋषिका वाणी ब्रह्म के साथ संवाद कररही है। ऐ भनुष्यो ! ऐसा यह तुम्हारा शरीर परम पवित्र मैंने बनाया है। जहां एक ज्ञानी पुरुष रहता है वहां अन्धकार विलुप्त होजाता तुम्हारे शरीर में. तो सत्या. सत्य निर्णय के लिये सप्त ऋषि स्थापित हैं तब तुम ज्ञान की ओर नहीं आते हो यह कैसा आश्चर्य है । पुनः ये नयजादिक इन्द्रिय ऋषिहैं इनकी लजमा रक्खो इन्हें कल- हित मत करो । इन योग्य कार्या लो । देखो! तुम्हारे शिरःमें सबही यंश स्थापित हैं ज्ञान-विज्ञान की नदियों शिर में बह रहीहैं.। महाप्रकाश होरहा है । इस प्रकाश- मय शिरसे जिस ने कार्य लिया वह सूर्यवत् जगत् में दे- दीप्यमान हुआ उसकी क़ीति और यश अभीतक पृथिवी पर स्थिर है और बहुत दिनों तक रहेगा । पुनः वेद कहते हैं कि मानो यह शरीरा एक महानगर है:इसके नयनादि सात ऋषि रक्षक हैं। प्राण और जीवाल्मा सदा जागते -- - (C) हुए रक्षाकर रहे हैं। किन्तु ऐ मनुष्यो ! जी रक्षा के लिये है उन्हें तुम अपने प्राचरणोंसे भक्षक बना देते हो वे ही सात ऋषि तुम्हारे लिये पीछे महान् प्रमुर व्याघ्र सिंह बन जात हैं तुम्हारा सर्वनाश होजाता अतः ऐ प्यारे ! ऐसा यत्नकरी कि ये सात ऋषि सदा ऋषि हा बने रहें । शुद्ध आचरण ज्ञान विज्ञान की ओर माने, जिज्ञामा में तत्पर होने, प्रालस्य के त्यागने और प्रयत्न आदि व्यापार से ये सदा ऋपि बने हुए रहेंगे अन्यथा बिगड़ के सिंहवत् राक्षस- वत् पिशाचवत् तुम्हें खा लायंगे, इति । समीक्षा-वेद के उक्त प्रमाणों से निश्चय हुआ कि नयनादि सात इन्द्रियों को सप्त ऋषि कहते हैं। वेदों के इस नियम का सदा स्मरण रखना चाहिये कि नियत संख्या का वर्णन वेदों में आता है ।शिर में दो कर्ण, दोनयन, दोघाण और एक मुख ये सात नियत हैं परन्तु इस जगत् में न सप्त ऋषि, न सप्त नदियां, न सप्त नक्षत्र, न सप्त पर्वत न सप्त सागर इत्यादि नियत हैं क्योंकि बाहा जगत् व सव न्यून और अधिक हो सकते हैं प्रतः मापद से नियत शीण्य सप्तन्द्रिय को त्याग अन्य मनुष्यादियों का ग्रहण करना बुद्धिमत्ता नहीं। अब आप देखेंगे कि इस सप्तर्षि को लेकर कितने प्रकार के सप्त ऋषि वनाये गये- सप्त ब्रह्मर्षि देवर्षि महर्षि परमर्षयः। काण्ड- र्षिश्च श्रुतर्षिश्च राजार्पश्च क्रमावराः। इति रत्नकोषे। मरीचिरत्रिभगवानङ्गिराः पुलहाक्रतुः । पुलस्त्यश्च (१०) वसिष्ठश्च सप्तैते ब्रह्मणःसुताः । ऊर्जस्तम्भस्तथा प्रागोदलोलिषभस्तथा । निश्चरश्वार्वबीगश्च तत्र सप्तर्षयोऽभवन् । अत्रिश्चैव वसिष्ठश्च कश्यपश्च महानृषिः । गौतमश्च भरद्वाजो विश्वामित्रोऽय कौशिकः ।। तथैव पुत्रो भगवानृचीकस्य महात्मनः जमदग्निस्तु सप्तैते मुनयोऽत्र तयान्तरे ॥ रामो व्यासो गालवश्च दीप्तिमान्कृप एव च । ऋष्य- श्रृङ्गस्तथाद्रोणिस्तत्र सप्तर्पयोऽभवन् ।। इत्यादिप्रनास नारडेय हरिवंश विष्णु पुरारमादि- कों ने विद्यमान हैं यदि ऋवि सम्बन्धी तर ही सप्तकगणं लिख जायें तो इन्हीं का एक बड़ा ग्रंच वन बाय । ये सब धीरे २ अनेक तप्तकगण बन गये । व्यासादि वह नहर्षि, भोल श्रादि सप्त परनर्षि ।कर्ण आदिमात देवर्षि । वसिष्ठ श्रांदिसप्तब्रह्मर्षि, नुतनादि सततर्षि । ऋतुपर्ण भादि सप्त राजर्षि,जैमिनि प्रादिसप्तकारहर्षिकहलातेहैं।यह रत्न कोष कहताहै पुगेखों ने प्रत्येक स्वायंभवस्वारोचिष इत्या दिनन्वन्तर में सप्त २ धियों की कल्पना की है। प्रत्येक पुराण अपनी गाथा भिन्न २ रूप में गाता है इतकी प्रणाली देखने से इनका काल्पनिकत्व स्वयं सिद्ध हो जाता है ! प्रकाश ने भी सात ऋषि मानते हैं। जिज्ञा -पुरुयो : यह सब कल्पनाक्षात्र है। जब बों का अर्थ भल गये तब नामा कल्पनार करके नादि कवि परमात्मा के सब भाव को कलु येत करने लगे। 1 (११) सप्त होता ॥ एभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनुःसमिद्धाग्निर्मनसा सप्त होतृभिः । त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगा नः कर्त सुपथा स्वस्तये ।। ऋग् १०१६३॥७॥ (मनुः + समिद्धाग्निः) मनु समिदाग्नि हो अर्थात् अग्नि को जलाय (एभ्यः+ प्रथनाम् + होत्राम) इनके निमित्त सर्व श्रेष्ठ माहुति को ( मनसा + सप्त+होतृभिः+ आयेजे ) मन और सप्त होताओं के साथ अच्छे प्रकार देतेहैं (आदित्याः+ ते+अभयं+ शर्म+ यच्छत) हे आदित्यगण ! वे माप भय- रहित कल्याण भवन देखें (नः+ स्वस्तये + सुपथा+सुगा+ कर्त) और हमारे कल्याणार्थ सुकर वैदिक मार्ग को सुग- ग्तव्य बना। शिक्षा-यहां मन्ता,बोहा,विज्ञानी, जीवात्मा का नाम मनु है वह मनु नयन आदि सात होनाओं और मन के साथ सदा अध्यात्म याग किया करताहै। ज्ञानविज्ञान रूप सुप्र- काश का नाम यहां प्रोदित्यहै । इस शरीरमें मनुनामी जी- वात्माज्ञानविज्ञानकी प्राप्ति की इच्छा से समाहित हो जो मननादि व्यापार करताह यही महायज्ञहै । इसीले निर्भ- यता और शोभनपथ प्रास होते हैं। यहां मन के साथ सप्त होता शब्दके पाठ विस्पष्टतया सिद्धहै कि यहभी इन्हीं सात इद्रियोंका व्याख्यानहै। इसी आध्यात्म यज्ञको देख लोगों ने द्रव्यात्मक यज्ञकी रचनाको। नयनादि सात होता. ओंकी जगहमें सोत मनुष्य होता बनाये गए । मन के स्थान में ब्रह्मा, मनु के स्थान में यजमान कल्पित हुए। वेदों में ।

(१२) इस अध्यात्म यज्ञ का व्याख्यान विविध प्रकारसे आये हैं इसी हेतु द्रव्यात्मक यज्ञ में भी विभिन्नता होती गई। येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम् । येन यज्ञस्तायते सप्त होतातन्मे मनःशिवसङ्कल्प- मस्तु ।। यजु० । ३४ । ३ ॥ (येन + अमृतेन ) जिस अमृत अर्थात् शाश्वत अविन- श्वर मनने(इदम् + भूतं + भुवनं + भविष्यत्+ सर्वम् + परि- गृहीतम्) भूत वर्तमान और भविष्यत् इस सब काल का ग्रहण किया है (येन+या+तायते) जिन्न नन की सहा- यता से अग्निष्टोनादि यज्ञ विस्तीर्म होता है (तत+मे+ मनः शिवसङ्कल्पम् + अस्तु) वह नेरा मन शिवसङ्कल्प हो। यज्ञ कैसाहै (सप्त+होता) जिसने सात होता हैं वे सात होता कौन हैं ? निस्सन्देह चक्षुरादि इन्द्रियही मप्त होता हैं । पश्चात लोगों ने यजमान, होता, रद्गाता अध्वर्य, ब्रह्मा, पोता, नेण्टा ये मात प्रकारके मनुष्य क- ल्पित किए। पश्चात् पौरभी कल्पना बढ़ती गई। प्रत्येक वेदके चारर ऋत्विक बनाये गये । ऋग्वेदीय-होता, मैत्रावरुण, अध्छावा, ग्रावस्तुत् । यजुवेंदीय-अध्वयु, प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा, उन्नता । सामवेदीय-उद्गाता, प्रस्तोता, सुब्रह्मण्य, प्रतिहर्ता । अथर्ववेदीयः ब्राह्मशाच्छंशी, पोला, प्राग्नीघ्र । अथर्ववेदीय-सा 'ऋत्विकोंके और भी नाम पाये जातेहैं वे ये हैं-सदस्य, थत्नीदीतिता, शमिता, गृहपति, अङ्गिरा, कैवर्त, घमसा. ध्वयु एवं यजमान यजमानपत्नी इत्यादि संख्या बढ़ती गई। । ।

( १३ )
॥ सप्त विन॥
स सुष्टुभा स स्तुभा सप्त विप्रैः स्वरेणादि स्वयों
नवग्वैः। सरगयुभिः फलिगमिन्द्र शक वलं खेण
दरयो दशग्वैः ।। १। ६२ । ४ ॥
(इन्द्र+शक ) हे इन्द्र ! हे शक ! (सः) सुप्रसिद्ध के
आप ( रवैण ) शब्दमानसे (अद्रिम+ फलिगम+वलम् )
अद्रि, फलिग और वल इन तीन दुष्टों को (दरय:) वि-
दीर्ण कर देते हैं। आप कैसे हैं (सप्त+विप्रैः) सात विनों
से ( स्वर्ग्यः) स्तूयमान हैं (स्तुभा+स्वयंः ) पुनः प्राप
उन सातों विनों को स्तुभ अर्थात् स्तोत्रों से स्तूयमान
हैं । वह स्तोत्र कैसा है ( सुष्टुभा) जिस में सुन्दर २
स्तोत्र हैं पुनः (स्वरेण) वह स्तोत्र स्वर से संयुक्त है ।
घे विप्र फैसे हैं (नवग्वैः) नवग्व हैं पुनः (दशग्वैः) दशग्व
हैं पुनः (सरण्युभिः) गमनशील हैं
व्याख्या-लोक में प्रसिद्ध है कि नवम नथवा दशम
मास में
मनुष्य उत्पन्न होता यो नवम मास में उत्पन्न हो
उसका प्रांण नवग्व और जो दशम मास में उत्पन्न हो
उसका प्राण दशग्व कहाताहै क्योंकि रजोवीर्य के साथ
ही प्राणों का भी बीज रहता है । अत एव ब्राह्मणग्रन्थों
में वर्णन प्राता है कि अङ्गिरा ऋषि दो प्रकारके हैं एक
नवग्व दूसरे दशग्व । जो नव मास में यज्ञ समाप्त करते

( १४ ) दे नवम्ब और वो दश नान ने यज्ञ समाप्त करते थे दध- ग्द ॥ मातृगर्भ में नव दश नान निवारकरना ही नव- दश नाम का यज्ञानुष्ठान करना है। ये कलय, नयनट्टयः प्रारद्वय, और रसना सात हो नुख्य प्रान हैं । अतः ये सात विन कहे गए हैं । ये नारयु अर्थात् गननवान होने सरएयु कहाते हैं । इन्द्र नान जीवात्मा का है यह नने वारम्बार कहा है। मंद्रि, फनिग और वल येत नोंकान मेघ के हैं निघण्टु ।। १० । परन्तु यहां मेघ के नमान सावरख करनेवाले ज्ञान के नान है मेघवा पवंतयानक जो शब्द हैं वे सर्वदा ज्ञानवाचक भी होते हैं । जैसे वृत्र, शम्बर आदि। सव सातो प्राख प्रसन्न होके जीवात्मा की स्तुति प्रार्थना करते हैं तब वह प्रशस्य जीव शारीरिक नानसिक और ऐन्द्रयिक रवी आध्यात्मिक.साधिभौति- क, आधिदैविक प्रथवा शिरोरुप द्यु लोकव्यापी, नध्यशरीर रूपान्तरिक्षव्यापी, अधोभागशरीररू.पपृथिवीव्यापीदुःखों को विदील करता है। जीवात्मा की आज्ञा के अनुसार जब ये प्राण (इन्द्रिय ) चलते रहते हैं : तब कहा जाता है कि ये प्राण जीवात्मा की स्तुति करते हैं अर्थात यह प्रात्मा जितेन्द्रिय है। सप्तविप्रशद को लेके पिछली संस्क- तभाषा में अनेक सप्तक बनते गए। विशेषरुप से यहां वि- घारना यह है कि वेदों के गब्द ले २ कर पश्चात् कितने इतिहास नाल्यायिकाएं बनती गई और वे ननुष्यों के ययार्थ इतिहात मानेगए यह अद्भुत बात है।

(१५) सप्तसिन्धु । यो हत्वाऽहि मरिणात्सप्त सिंधून्यो गा उदाज- दपधा वलस्य । यो अश्मनोरंतरग्नि जजान संवृ. क्समत्सु म जनासइन्द्रः।। ऋग०२।१२।३. (यः+ अहिम् + हत्वा+ सप्त+सिंधून परिणात् )जो अहि को मार मात नदियों को बहने के लिये प्रेरित करता है (यः+वलस्व + अपधा+गाःउदाजत्) जोवल के अवरोध रुकावट से गौओं को निकाल लेता है (यः अंश्मनोः अन्तः अग्निम् जजान) जो दो प्रस्तरों के बीच में अग्नि को उत्पन्न करता है (समत्सु संवृक् ) जो विविध संग्रामों में शत्रुओं के काटनेहारा होता है (जनासः सः इन्द्रः) हे मनुष्यो! वही इन्द्र है। व्याख्या-अहि=आप, अज्ञान। वल-पाप, अज्ञान, अन्धकार।गोइन्द्रिय। अश्मा शरीररूप पर्वताइन्द्र जीवात्मा । सप्तसिंधु =नयन आदि सात इन्द्रिय । जब अज्ञानरूप अन्धकार छा जाता है तो कर्तव्याकर्तव्य भूल जाते हैं जिन इन्द्रियों के द्वारा मनुष्य विचार करता है वे इन्द्रिय विचार से अलग हो जाते हैं । महामहादुष्कर्म में फंसकर जीवात्मा को कलङ्कित कर देते । जब इन्द्रयः की ऐसी दशा होजाती तब कहा जता है कि अहि, वृत्र, शम्बर, नमुचि, धुनि, चुमुरि और वल आदि असुर सप्त नदियों को बहने नहीं देते, नानो इन सप्त नदियों को ।

-
( १६ )
चारी भोर से बांध रखते। नदीरूप गौत्रों को हरणकर
लेताते इत्यादि। पश्चात् देवों के कल्याणार्थ इन वृत्र नादि
असुरों से तुमुल संग्राम कर उन को मार सप्त नदियों को
इन्द्र खोल देता है । तब वे नदियां पुनः बहने लगती हैं।
वे गायें इन्द्र की कृपाद्वारा कारागार से निकल पाती हैं -
त्यादि यहां इन्द्रियों की दुष्ट प्रवृत्तियों के ही नाम अहि,
वृत्र प्रादि हैं । ये अनुर नाम से पुकारे जाते हैं क्योंकि
"असुषुप्राणेषु रमतेयःसोऽसुरः"जो सत्कम्मी कोत्याग
दुष्कर्मों में प्रवृत्त हो केवल प्राणों के ही भरण पोषण में
लगा रहता है वह असुर कहाता,दुष्टोन्द्रिय असुर और शि-
टेन्द्रिय देव कहाते इन्हीं दोनों का जो अहोरात्र तुमुल युद्ध
होरहा है इसी का नाम देवासुर संग्राम है । शुद्ध जीवा-
त्मा इन्द्र और दुष्ट जीवोत्मा वृत्र है सो यह जीवात्मा
ईश्वरोपासनरूप.महायज्ञ करके परम बलिष्ठ होता और
तव सब दुष्टताओं को छोड़ देता यही इसका महाविजय है
इसी प्रकार का आशय श्रागे भी रहेगा-
यःसप्तरश्मिवृषभस्तुविष्मानवासृजत्सर्तवे सप्त सिं-
धून् । यो रोहिणामस्फुरद्वजवाहु-मारोहन्तं स
जना स इन्द्रः ॥ ऋग् २। १२ । १२ ॥
(यः सप्तरश्मिः ) जो सप्तरश्मि नयनादि सात ज्योति
वाला है (वृषभः) जो ज्ञान की वर्षा करनेहारा (तुवि-
मान् ) बलवान् ( वजूवाहुः ) हाथ में वनधारी है वह,

(१७) (सप्त सिंधन सर्तवे अमृजत) नयनादि सात नदियों को बहने क लिये बनाता है ( यःद्याम् प्रारोहन्तम् रौहिणम् ) जो द्यु लोक की ओर प्राते हुए रौहिण को (अस्फुरत् ) मारता है ( जनासः सः इन्द्रः) हे मनुष्यो ! वह इन्द्र है। व्याख्या-इन्द्र= जीवात्मा।रौहिणअज्ञानाद्यौ =धु लोक, प्रकाश, ज्ञान । ज्ञानरूप महाज्योति को दकिने के लिये जब अज्ञान दौड़ता है तब जो जीवात्मा धम्मनिष्ट बलिष्ठ और पापरूप असुरों के निपात के हेतु सदा हस्त में विवेकरूप महास्त्र रखता है वह उसको मार देता है - पमे समीप कदापि प्रज्ञान को नहीं आने देता। और ऐसे जीवात्मा की सातों इन्द्रियरूप नदियां अच्छे प्रकार अपने अपने विषयों में निरुपदव रूप से प्रवाहित होती रहती हैं। अश्व्यो वारो अभवस्तदिन्द्र सके यत्त्वा प्रत्यहन् देव एकः। अजयोगा अजयः शूर सोममवासृजः सतवे सप्त सिन्धून् ।। ऋग् १ । ३२ ॥ १२ ॥ (इन्द्र यद् एकः देवः ) हे इन्द्र ! जब एक देव अर्थाते मदकारी मदोन्मत्त वृत्र नाम का एक असुर ( सूके त्वा प्र- वज छीन लेने के हेतु भाप के ऊपर प्र- हार करता है तब आप (अश्व्यः वारः अभवः ) अश्व (घोड़े ) के समान बलिष्ठ होते हैं ( शूर गाः सोमम् अ- 'जयः ) हे.शूर.! अवरुद्ध गौवों को और सोम को जीत लेते हैं पश्चात् ( सप्त सिंधून प्रवासृजः ) सप्त. नदियों को ब- हाते हैं। त्यहन) पाप से .

(१८) अहेर्यातारं कमपश्य इन्द्र हृदि यत्तेजघ्नुषो भीर- गच्छत् । नव च यन्नवतिञ्च सूवंतीः श्येनो न भीतो अतरो रजांसि ॥ ऋग १ । ३२ ॥ १४ ॥ (इन्द्र जघ्नुपः ते हृदि यद भी अगञ्छत )हे इन्द्र ! शत्रु के हननं कर्ता नापके हृदय में जो भय आया है इसका क्या कारण (कम् अहे: यातारम् अपश्यः) अपने को छोड़ किस अन्य देव को अहि के मारनेहार देखते हैं. आप को शेड़ कौन दूसरा अहि को मार सकता अतः आप क्यों करते हैं ? ( भीतः श्येनः न ) भयभीत श्येन पक्षी सदृश आप (यंत नव च नवतिञ्च ) जो नौ और ( स्त्रवन्मी: रजांसि अतरः) बहती हुई नदियों के पार उतर गए हैं। समीताम्यहां मैंने संक्षेप से दिखलाया कि वृन्न झादि अनुरों को मार सप्त सिन्धुत्रों को इन्द्रप्रवाहित करता है । पृथवी पर शतशः नदियां हैं तव सप्त पद बार क्यों आते हैं? इन से सिद्ध है कि यह नियत संख्या किसी नियत , संश्या ही की सूचना देनेहारी होसकती अन्य की नहीं वे नियत सात शिरस्थ नयनादिक ही हैं अन्य नहीं इजहा नियत सातों को ये वेदन्तंत्र दिखला रहे हैं पुनः एक ऋचीं में देखते हैं कि यह इन्द्र भय सारहा है । उपासक कहता है कि इन्द्र ! तू मत भय कर तू CE नदियों को पार कर भाया है अब.कोई चिन्ता की बात नहीं इत्यादि। कौन हैं? समाधान-पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पञ्च कम्लेन्ट्रिय, और . . (१९) एक मन ये ११ इन्द्यि होते हैं उत्तम, मध्यम, अंधमं, भेद में ये ३३ होते. हैं ।.ये ही ३३ देव हैं । जिस हेतु लीक में देखते हैं कि शिष्टों की अपेक्षा दुष्ट अधिक हैं । अतः वेद भगवान कहते हैं कि देवों की संख्या की अपेक्षा असुर- पण त्रिगुणित अधिक हैं अर्थात् ३३४३=ce . हैं इसी. कारण इन्द्र दिनयन, एकशिरस्क, किन्तु वृत्र षडक्ष (छःनेत्रवाला) और त्रिमर्धा कहाता है अर्थात इन्द्र की अपे क्षा वृत्र त्रिगुण है । अतः देवों की ३३ तैतीस संख्या कि अपेक्षा त्रिगुण .३४ ३३=er निन्यानवे सुर हैं । ये ही लिन्यानवें प्रारूप नदियां हैं इनको जब तक सीवातमाला- पता नहीं तबतक भयभीत होता रहता यहां उपासक अप- ने प्रात्ना को समझाता है अब चिन्ता की कोई बात नहीं तू इन द नदियों का पार उतराया । यहां यछु CC संख्या भी नियत संख्या को ही सूचित कररही है । ये ३३ तैंतीस इन्द्रिय जब दुष्टकर्मों में प्रवृत रहते हैं तब ये त्रिगु- णित असुर कहाते हैं । ये अगाध दुस्वर ल नदियां हैं। इससे भी सिद्ध है कि यह सब वर्णन इसी शरीर का है इसको छोड़ बाह्य जगत में ७ अंथवा ल, नदियों की गवे षणा करनी सर्वथा वैदिक अर्थ और अज्ञानता की ॥ सप्त नदियां और यश.॥ अस्य श्रवी. नद्यः सप्त विभूति यांवातामा पृथिवी दर्शतं वपुः । अस्मै सूर्याचन्द्रमसाभिचते श्रद्धे कमिन्द्र चरतो वितर्तुरम् ।।ग ११.१०२ ॥ २॥. बात है।

(२०)
(सत नद्यः अस्य अंवः विभति) सात नदियों इसके
महान् यश को धारण करती हैं (द्यावाक्षामा पृथिवी वपुः
दर्शतम्) द्यु लोक और यह विस्तीर्ण पृथिवी उसका शरीर
दिसला रही है (अस्मे श्रद्ध) हमलोगों की श्रद्धा के
निमित्त (इन्द्र अभिवते सूर्याचन्द्रमसा) हे इन्द्र प्रत्यक्षतया
ये मूर्य और चन्द्र (कम् वितर्तु रम् चरत:)सुखपूर्वक निरन्तर
विचरण कररहे हैं। जो सात नदियां इस परमात्मा की
महत्ती कीर्ति को धारण किये हुए हैं वे कोई विलक्षण होनी
चाहियें वे सात नदियां निस्सन्देह ये सप्त इन्द्रिय हैं येही
भयवान के परम प्रश को प्रख्यात कररहे हैं ।
यक्षादंहसो मुचद् यो वाऽऽर्यात् सप्त सिन्धुषु।
बर्दासस्य तुविनृम्ण नीनमः॥ऋग्वा२४।२।।
(य; अंहस: ऋक्षात् मुचत् ) जो इन्द्र शुद्ध जीवात्मा
पापरूपी रीछ से उपासक को बुडाता है (य: वा सप्त सि-
न्धुषु भार्यात्) अर्थात् जो सात नदियों के तटपर धन भेजता
है (तुविनम्ण) हे बहुधन इन्दः ! वह श्राप ( दासस्य वध:
नीनमः ) क्षयकरनेहारे दुषट असुरों के लिये हनन
साधक क्षायुध को नमित कीजिये । यही नयम धादि
ससन्द्रिय सप्तसिंधु हैं शुद्ध जीवात्मा पाप से उपासक को
छुड़ा इन्द्रियरूप सप्त सिन्धुओं को विज्ञानरूप विविध
धन भेजता है।

(२१) दुहन्ति सप्तकामुपदा पञ्च सृजतः। तीर्थे सिन्धो राधि स्वरे ।। ऋग् । ८१७२ । ७ ॥ (अधिस्वरे सिन्धो: तीर्थ) शब्दायमान सिन्धु के तीर्थ परं ( संत एकाम् दुहन्ति ) एक गौ को सात अन दुहते (पञ्च हा सृजतः) पांचों को दो कार्य में लगा रहे हैं। व्याख्या-वाणी वा विद्या एक गौ है । सप्त=नयन आदि सप्त इन्द्रिय । पन्च = पांच ज्ञानन्द्रिय स्थान- भेद से सात गिनती होती है परन्तु ज्ञानभेद से पांच इन्द्रिय हैं। दोनों नयन से एक दर्शनक्रिया। दोनों कों से एक श्रवणक्रिया । दोनों प्राणो से एक सूंघने की क्रिया जिहा से एक स्वाद क्रिया ।त्वचा से एक स्पर्शक्रिया । येही पंच ज्ञानेन्द्रिय हैं। दो= मन और जीव ये दोनों पच्च ज्ञा- नेन्द्रियों को कार्य में लगाये हुए रहते हैं । सिन्धु बहने हारा यह शरीर । इस देह के अभ्यन्तर सदा शब्द होता रहता है । इस शब्दायमान शरीररूप सिन्धु के तट पर ये सप्तन्द्रिय विद्यारूपा गौ को दुहा करत हैं। मन "और जीवात्मा दोनों इनको कार्य में लगाए हुये रहते हैं। यही इसका भाव है । वदजिज्ञासु पुरुषो ! यहां यह वारं- वार विचारणीय है कि वैदिक नियत संख्या किसी नियत संख्या का ही वर्णन करेगी। सप्त परिधि और पुरुष पशु- सप्तस्याऽऽसन्परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। दे ।

( २ ) वा यद्यहं तन्वाना अवघ्नन् पुरुष. पशुम् । यजुः ॥३१ । १५ ॥ ( यज्ञन् तन्वानाः ) यज्ञ को करते हुए ( यद् ) जव ( देवाः ) देव ( पुरुषम् पशुम् नवनन् ) पुरुष पशु को बांधते हैं तब ( अस्म सप्त परिधयः प्रासन् ) इस यन के सात परिधि होते हैं और (त्रिः सप्त सनिधः कृता.) त्रिगुणिन मप्त अर्थात् २१ समिधाएं होती हैं । व्याख्या-बब इस ऋचा के नर्थ में भी किञ्चित् सन्देह न रहेगा। पुरुषपशु-प्रत्येक शरीर में रहनेहारा जीवात्मा ही यहां पुरुषपशु है. नयन श्रादि सात इन्द्रिय यहां परिधि हैं। चारों तरफ के घेरे का नाम परिधि है जैसे कभी २ सूर्य और चन्दना के चारों तरफ गोलाकार रेखा वनी हुई प्रतीत होती है। इनहीं सातों के उत्सम, नएन, और अधम भेद से २१ प्रकार के जो विषय हैं येही यहां. २१ सनिधाएं हैं वेदों में भूरि ऐसा वर्णन आता है कि वत्म- के समान यह जांब रस्सी में धन्या हुया है । इसके जयर, नध्य प्रौर नीचेतन स्थानों में फन्दे लगे हुए हैं इत्यादि। जब इन्दियों का अधिष्ठावरूप देव इस जगत् में श्राके शुभा- शुभ कम्मरूर यज्ञ करना चाहता है तब जीवात्मा के चारों तरफ से घेरनेहारे यही सप्तन्द्रिय सात परिधि होते हैं और इनको विषय वामनाएं नानो इनके भोजन होते हैं। इस प्रकार जीवात्मरूप पशु को बांध के देवगण यज्ञ करते ऐ वैदिक पुरुषो ! ऐसे रहो वर्णन देख के यज्ञों ने गौ ।

( २३ )
भैंस, छाग, नेष, आदि पशुओं को बांध मरवाने लगे।
यह कैसी शोकजनक अवनति हुई। जो अध्यात्मपरकं यज्ञ
पा वह आज घृणित व्यमय होगया
गगा यमुना आदि सप्त नदियां ॥
इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोमं सचता
परुष्ण्या। असिकन्या मरुद्धे वितस्तयाऽऽर्जीकीये
शृगुह्या सुपोमया ॥ ऋग् । १०१७५। ५॥
( गङ्ग यमुने सरस्वति शुतुद्रि परुष्णि ) हे गङ्ग ! हे
यमुने ! हे सरस्वति! हे शुद्धि ! हे पाच्य ! (मे इमम् स्तो
मन आसवंत) मेरे इस स्तोत्र कीशन प्रकार से सेवा करी :
(मरुदृधे भार्जीकीये) हे मरुत थे : हे प्रार्जीकीये (अशिकल्या
वितस्तया सुपोमया भाश हि) अलिकनी, वितस्ता, और
तुषोमा के साथ मेरे स्तोम को सुनो।
व्याख्या गङ्गा- गमन करनेहोरी यमुना-चलने
हारी।सरस्वती जलपूर्णा शुतुद्री- शीघ्र दौड़नेहारी।
परुष्णी- कुटिलगामिनी मरुद्दधा-वायुसेबढ़नेहारी
आर्जीकीया-ऋजुगामिनी । असिक्नी-अशुक्ला, ता
मसी। वितस्ता-विवृद्धा विस्तीर्णा सुसोमा- परम शा-
न्तिप्रदर, सौम्यगुणयुक्ता । प्राचीनों ने पुनकी इसी प्रकार
निरुक्ति की है। सप्त नदीवासप्तसिंधुभादि पद वेदों में बहुत.
आये हैं इस पुस्तक में भी दो घार उदाहरण दिए गए हैं
यहां नदीवाचक सात और तीन नाम भी पाए जाते हैं-

- । (२४) गङ्गा २-यमुना ३-सरस्वती ४-शुतुद्री ५--परुष्णी ६- म- रुवधा और 9--आर्जीकीया ये सातों नाम सम्वोधनयुक्त और १--असिकी २--वितस्ता और ३-सुसोना ये तीनों पद तृतीयान्तयुक्त आये हैं। जहां र सप्त सिन्धु भादि पद हैं वहां २ सायणादि भाष्यकार गङ्गादि सप्त नदियां अर्थ करते हैं । परन्तु मैंने पूर्व ने अनेक उदाहरणों से तिद्ध कर दिखलाया है कि सप्त सिन्धु पद से नयनादि सन्द्रियों का ग्रहण है । यहां उन सातों के विशेष नाम दिए हुए हैं । यही विशेषता है। अब जो असिकी, वितस्ता और सुतोमा ये तीन नाम हैं। वे उत्तम, मध्यम और अ- घम श्रेणीमचक हैं वेदों को इस शैली पर सदा ध्यान देना चाहिये कि चेद भगवान सामान्य वाचक शब्द कहते २ नित्य व्यक्तिवाचक शब्द भी कह देते हैं और उनमें चेतनत्व का आरोप करके चेतन व्यक्तिवत् वर्णन करते हैं। वैदिक इतिहासार्थ निर्णय नाम के ग्रंथ में यह बात विस्तृतरूपसे वर्णित है । जैसे नयन प्रादिकों को वे ससं ऋषि कहते हैं अब कहीं इनके पृथक् २ सात नाम रखकर भी वर्णन करें गे। इसी प्रकार ३३ देव, पञ्च मानव, सप्त प्राण, सप्त लोक आदि । अब यहां यह मो.स्मरणीय बात है कि जब इन्द्रियों को लोक कहेंगे तब तत्सदृश ही नाम भी रखेंगे जैने भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् । जब इन्हें असुर कहेंगे तब शम्बर, नमुचि, धुनि, चुमुरि, बल, अहि, वृत्र ( २५ ) आदि नाम देवेंगे। जब इन्हें पशु कहेंगे तब गो, प, अजे, वृक, कं, सिंह, व्याघ्र आदि । इसी प्रकार जब इनको नदी नाम से पुकारेंगे तब गङ्गा, यमुना, सरस्वती, शुतदी, परुष्णी, मरुद्वधा और आर्जीकीया कहेंगे । पुन यहां सातही नाम क्यों ? अतः सिद्ध है कि यह सप्तन्द्रिय का वर्णन है बाह्य नदियों का नहीं। प्रश्न-आपने जो अर्थ किया है वह ठीक है किन्तु प्रथ- स गङ्गा आदि नदियों को वैदिक कवि देख तब ऐसा वर्णन किये हों ऐसा संभव है। समाधान नहीं। वेदों में अनित्य और एकदेशी पदार्थ का वर्णन नहीं आता। वेदों में प्राकृति का वर्णन है व्यक्ति का नहीं। इस विषय को वैदिकइति- हासार्थ नि० में देखिये। यह संभव नहीं कि वसिष्ठ विश्वा- मित्र आदिकों को देख तब नयनादिकों को वसिष्ठादिकहने लगहों किन्तु वेदों के नामोंको लेकर पीछे ये नाम सब मनु- ष्यों के रक्खे गये हैं इसी प्रकार नदी प्रभूतियों के नाम भी वैदिक नामों पर रक्खे गए। शङ्का-इसऋचा में असिक्न वितस्ता और सुसोमा ये तीन नाम भी तो आए हैं ! पुनः सातही नदियां कैसे कही जाती।समाधान-येतीनोंश्रेणी वाचक शब्द हैं । पृथक् र किसी नदीका नाम नहीं क्योंकि असिकी शब्दार्थ अशुक्ला अर्थात् कृष्णा, तामसी। वितस्ता शब्दार्थ विवृद्धा राजसी और सुखोमाशब्दार्थ सुसौम्या सात्त्विाकी है अर्थात् ये सप्तेन्द्रिय उत्तम, मेध्यम और अधम भेद से २१ प्रकार के हैं । इसी कारण अन्यान्य .

(२६) चाओं में ३४७=२१ नदियों की चर्चा देखते हैं यथा-- त्रिः सप्त सस्रा नद्यो महीरपः ऋर १०६४ाप्र सप्त सप्त त्रेधाहि चक्रमुः। ऋग् १०७५/१] .. नदी सम्बन्धी दो घटनाएं। वसिष्ठ और नदियां-मैं अब नदियों के सम्बन्ध में केवल दो ऋषियोंकी घटनाएं दिखलाताहूं इससे पता ल- गेगाकि यह केवल रूपकालङ्कारमानहै ।निरुक्त दैवतकारह न०३।२६ में यास्क कहते हैं। आर्जीकीयां विपाडित्या- हुः। 'पाशा अस्यां व्यपाश्यन्त वसिष्ठस्य मुमूर्ष- तस्तस्माद्विपाडित्युच्यते। आर्जीकीया को निपाट कहते हैं क्योंकि मरनेकी इच्छा करते हुए वासिष्ठ के पाश (फांस) इसी में टूटे थे ॥ विपाट् को पौराणिक भाषा में विपाशा नदी भी कहते हैं । महाभारत के प्रादिपर्व में विश्वामित्र और वसिष्ठ की संग्रामसम्बन्धी अतिविचित्र कथा लिखी हुई है। गौ के कारण इन दोनों में महाकलह उत्पन्न हुआ। एक समयकी बातहै कि वसिष्ठके प्रायः सत्र सन्तानों को विश्वामित्र ने मरवा दिया। इस शोक में वसिष्ठजी अपने शरीर को पोशों से किसी एक नदी में मरणार्थ गिरगये वह नदी ऋषिके सर्व पाशों को तोड़ स्थल में ले आई । अपने में उन को डूबने नहीं दिया। यह विचित्र लीला देख उस नदी का नाम विपाशा रख ऋषि आगे चले । पुनः मरने. की इच्छा से किसी दूसरी नदी में जागिरे। वह नदी भी खूब मज़बूत बांध ! (२७). शतमुख हो इधर उधर भाग गई ! ऋषि को अपने में न मरने दिया! अतः उस नदी को नामशतद्रु हुआ! प्रमाण-- तत्तःपाशैस्तदात्मानंगाढं बध्वा महामुनिः। तस्या जले महानद्या निममज सुदुःखितः। अथ छित्वा नदी पाशस्तिस्यारिवलसूदन । स्थलस्थं तमृर्षि कृत्वा बिपाशं समवासृजत् ॥...सा तमग्निसमं वि- प्रमनुचिन्य सरिद्धरा। शतधा विद्रुता यस्मांच्छतद्रुः रिति विश्रुता । महा० श्रादि पर्व । अ० १७६ ।। समीक्षा-प्रथम यहां देखते हैं कि वेदमें शुतुद्री श- द है उसको महाभारत ने शतट्ठ बनाया। अब वसिष्ठ श- रीरको दृढ़तर बांध नदी में कूद पड़ते किन्तु नदी इनके पाशों को तोड़ तट पर ले आती। इसी प्रकार मुमूर्षु ऋषि को देख नदीभागजाती। इसका क्या भाव है ? क्या नदी कोई चेतन है जो इस तरह समझती है । नहीं। नदी चेतन नहीं। नंदी ऐसा काम नहीं कर सकती। यह केवल भा- लङ्कारिक वर्णन है। ईश्वरोपाशक का नाम यहां वसिष्ठ है। ये इन्द्रिय ही नदियां है। उत्तम बुद्धि ही यहां नन्दिनीधेन है। विश्वानित्र--जगत् का अमित्र, शत्रु, अविवेक, अं- ज्ञान, लोभ, मोह, आदि विश्वामित्र हैं (यहां ऋषिविश्वा- मित्र से तात्पर्य नहीं है। ऋषि अर्थ में विश्वमित्र को ही विश्वामित्र कहते हैं ) ईश्वरभक्तों को प्रथम अविद्या, म.. - (२) हात, लोभ, मोह आदि बहुत तंग करते हैं। इन की गो- रूपा बुद्धि को हरण करना चाहते हैं। कोई उपामक बहुत विघ्न देख प्रोत्मघात करना चाहता। विवेक मना करता है कि ऐसा मत करो। मानो, सब इन्द्रिय समझाते हैं कि तुमचिन्ता मत करो।अब हन सब तुम्हें केशित न करेंगे तुम अब सिद्ध होगए । समाहित हो ईश्वर की ओर जानो। उपासक घबराता है. और इन्द्रिय समझाते हैं। - मेरेर इन्द्रिय वश में आते जाते हैं। इसी घटना को विश्वामित्र और वसिष्ठ दो नाम नानकर कवि वर्णन क- रताहै। इस से भी सिद्ध है कि यह किसी वाह्य नदी को वर्शन नहीं । क्या ऐसी घटनाएं आप लोगों के जीवन में नहीं होती। नदी और विश्वामित्र-यास्क शौनक प्रादि ऐसी कथा कहते आये हैं कि एक सनय पैनवन मुदा राता के पुरो- हित विश्वामित्र हुए। वहां से बहुत धन लेकर विपाट् (वि पाशा ) और शुतुद्री के संगम पर आये । इन के पीछेर लू- टने को डाकू भी पहुंचे ।विश्वानित्र इत्त असनंतस को देख शीघ्र पार उतरने के लिये नदियों को हे नदियो! तुम गाचा अर्यात पार उतरने योग्य हो जावो इत्यादि । इस समय विश्वामित्र और नदियों ने तो संवाद हुआ है वह कई एक ऋचाओं में वर्णित है कुछ ऋचाएं मैं यहां उट्ट त करता हूं।" पुकार र कहने लगे।

यह ( २९ ) एना वयं पयसा पिन्वमाना अनु योनिं देवकृतं चरन्तीः । न वर्त्तवे प्रसवः सर्गतक्तः किंयुर्विप्रो नद्यो जोहवीति ।। ३।३३ । ४ ॥ (एना पयसा पिन्वमानाः ) इस धारा से सींचती हुई (वयम् देवकृतम् योनिम् अनु चरन्तीः). हम नदियां देव- कृत स्थान को जारही हैं (सर्गतक्तः प्रसवः न वर्त्तवें) उन हम सब का प्रादि काल से प्रवृत्त जो उद्योग हैं. वह नि- वृत्त के लिये नहीं है अर्थात् हम. नदियां कदापि ठहर नहीं सकतीं । तब ( किंयुः विप्रः नद्यः जोहवीति ) किम इच्छा से विप्र नदियों को पुकार रहा है ॥ ४॥ रमध्वं मे वचसे सोम्याग ऋतावरीरुप मुहूर्तमेवैः । प्रसिन्धुमच्छा बृहती मनीषाऽवस्यु रहे कुशिकस्य सूनुः ।। ३ । ३३ । ५ ॥ विश्वामित्र कहते हैं कि ( ऋतावरीः) हे जलपरिपूर्ण नदियो ! (मे सोम्याय वचसे) मेरे सुन्दर वचन के लिये ( एवैः मुहूर्तम् उपरमध्वम् ) अपने गमन से मुहूतमात्र ठहर जावें ( वृहती मनीषा अवस्युः ). बड़ी लम्बी चौड़ी: स्तुति कर के रक्षा चाहने हारा ( कुशिकस्य सूनुः ) यह कुशिक का पुत्र मैं (सिन्धुम् अच्छा प्र प्रह) सिन्धु को जोर से पुकार रहा हूं। इन्द्रोऽस्माँ अरदद् वज्रबाहु रपाहन वृत्रं परिधि, नदीनाम् । देवोऽनयत्सविता सुपाणिस्तस्य वयं (३०) . प्रसवै याम उर्वीः ।। प्रवाच्यं शश्वधा वीर्य तदिन्द्र- स्य कर्म यदहि विवृश्चत् । वि वजेण परिषदों जघानाऽऽयन्नापोऽयनमिच्छमानाः ७ ॥ नदियां कहती हैं हे विश्वामित्र ! (वजयाहुः इन्द्रः अस्मान् अरदद्) बजवाहु इन्द्रने हमको खोद कर तैयार किया है (नदीनाम परिधिम् वत्रम् अपाहन) नदियोंके चारों तरफ घेरे हुए वृत्र का इन्द्र ने हनन किया (सविता सुपाणिः देवः अनयत्) वह प्रेरक सुपाणि इन्द्रदेव ही हमको लेकर आया है अर्थात् वृत्रको मार इन्द्र हमारो रक्षा किया करताहै (तस्य प्रसवे उर्वी: वयम् यामः) उसी की अाज्ञा के ऊपर हम जलसे पूर्ण हो जारही हैं । हे कुशिकपुत्र विश्वामित्र ! तब आपकी आज्ञा मानकर कैमे ठहरें (इन्द्रस्य तद् वीर्यम कर्म शश्वधा प्रवाच्यम्) इन्द्र: के उम वीर्य और कम्म को सदा कहना चाहिये ( यद अहिम् विवृश्चत् ) जो यह इन्द्र अहि को काढ़ा करताहै (वजे स. परिषदः विजधान) और जो बज से चारों तरफ वैठे हुए प्रतिवन्धकारियों का हनन किया करता है जिसके मरने से (अयनम् इच्छमानाः आपः प्रायन ) अपने स्थान को. चाहनेहारी ये नदियां सुख में जारही हैं। श्रो षु स्वसारः कारखे श्रृणोत ययौ वो दूरादनसा स्थेन । नि पू नमध्वं भवता सुपारा अधों अक्षाः सिन्धवः स्रोत्याभिः ।।९।।

(३१) पुनः विश्वामित्र कहते हैं कि ( स्वसारः मिन्धवः ) भगिनी नदियो! (कारवे) स्तोत्र करनेहारे मेरे वचन को (श्रो + सु + शूगोत) अच्छे प्रकार श्रवण कीजिये ( दूरात् अनसा रथेन वः ययौ ) दूर प्रदेश से मैं शकट और रथ के द्वारा आपके निकट भाया हूं इस कारण (नि+ सु + नमध्वम्) श्राप सब तरह से नम होजांय (सुपाराः भवत ) सुन्दर पार होने योग हो। (स्रोत्याभिः अधोक्षाः )धराओं से पहिये के नीचे हो जाय ॥८॥ आतेकारो शृणवामा वचांसि ययाथदूरादनसा रथेन । नि ते नेसै पीप्यानेव योषा मर्यायेव कन्या शश्वचै ते ॥ १० ॥ नदियां कहती हैं ( कारो) हे स्तोत्रकर्ता ऋषे ! (ते वचांसि प्रा शृणवाम ) तेरे प्रचनों को अब हम सब अच्छी तरह सुन रही हैं । ( अनसा रथेन ययाथ ) शकट और रथ के द्वारा चले जाइये क्योंकि आप (दूराद्) दूर से आएं हैं (ते नि नसै ) आपके लिये हम नीचे हो जाती हैं (पीप्याना इव योषा) जैसे पुत्र को दूध पिलाती हुइ माता झुक जाती है (कन्यो मर्याय इव शश्वचै) जैसे कन्या पिता भाता श्रादि मनुष्य के निकट नम होती है तद्वत् (ते आपके लिये हम नदियां झुक जाती हैं। आप पार उतर जाय ।।१०।। व्याख्या- यह संवाद अति मनोहर है। एक और न- दियां कहती हैं कि हम सब इन्द्रकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करेंगी। हमारे प्रतिवन्धक वृत्र और अहि को मार के यह देव हमको संकट में बचा लेता है इसके कर्म अद्भुत हैं । इसकी कृपा से स्वतन्त्र हो स्वेच्छानुसार हम अपने नियोग कर रही हैं। यह कौन विप्र है जो हमें रोकके कुछ सुनाना चाहता है हमें इतनी कब छुट्टी कि अपनी गति को रोक इसकी बात सुनें । इत्यादि । दूसरी ओर ऋषि विश्वामित्र जोरसे चिल्ला के कहते हैं ऐ नदियो !' भाप मेरी स्वसाएं अर्थात् बहिनें हैं। केवल एक मुहूर्त ठहरें । मेरे इस सुन्दर यज्ञिय वचन को सुन लेवें। मैं बहुत दूरसे पाया हूं। भव यदि आप कुछ न न होंगी इसीतरह भागाधा रहेंगी तोमैंनष्ट होजाकंगा। देखिये बहिनो ! मैं कारु.अंर्थात् स्तोत्रकर्ता हूं भाप को स्तुति सुनाया करता हूँ मैं भी कुशिक का पुत्र हूं इससम्बन्ध को देख के भी मुझ पर दया कीजिये। ऐसे वि- लपते हुए ऋषि को देख नदियों को दया:आती है और परि- तुष्ट होके कहती हैं कि हे ऋषे ! जाइये पार होजाइये श्राप के लिये हम गाधा हो जाती हैं इसके आगे यह कथा है कि ऋषि सब को प्रथम पार उत्तार नदियों को धन्यवाद देस्वयं भी पार उतर जाते हैं। इस संवाद का क्या नाशय है ? क्या सचमुच ऋषि से नदियां बोली।क्या विश्वामित्र पा- गलथे जो जड़ नदियों को पुकारर अपनी बातें सुनाने लगे। या नदियां पूर्वकाल में मनुष्यवत् बोला करती थीं। ऐसी कथो से वेद का क्या आशय है । समाधान इसका. भाव . (३३) विस्पष्ट हैं न नदियां चेतन थीं न यह संवाद किन्हीं विशेष नदियों और ऋषि का है। यहभी इसी इन्द्रियोंका वर्णन है इन्द्र= जीवात्मा।विश्वामित्र-विश्वमित्र अपने और प्राणीमात्रका जो मित्र हो वह विश्वामित्र कुशिक- प्रकाशको परमात्या वा जीव ॥ अब भाशय इसका यह हुआ कि सर्वहितकारी जी उपासकहै वह जब साधनसम्पन्न होता है तब बीच में अनेक विघ्न उपस्थित होने लगते हैं उस समय उपासक घबरा जाताहै। विघ्न करनेहार कौन हैं? निस्सन्देह ये इन्द्रियगणही हैं। जैसे नदियां जलपरि- पूर्ण हो अपनी विभूतियां दिखलाती हुई बहती हैं वैसे विषय वासनारूप जलोंसे परिपूर्ण हो ये इन्द्रियगण इधर उधर बराबर दौड़तेरहतेहैं। उससमय यह उपासक कहताहै कि ऐ इन्द्रियो! मेरा बचन सुनो तुम मुझे पार उतारदो। तुम ऐसे उद्धत मत होनी । नम्र हो जाभी मैं भी उसो परमात्मा वा जीवात्मा का पुत्र हूं। मुझे तुम क्यों क्लेश देते हो। इस प्रकार जो उपासक सदा इन्द्रियों को सम- झाता रहता निःसन्देह उसके लिये ये इन्द्रियगण नम्र हो जाते । वह उपासक इस शरीररूप रथ पर चढ़ कर पार उतर जाता। यदि कहा जाय कि इन्द्रियगण भी तो जड़ हैं उनको ही समझानेसे कौन लाभ होसक्ता?:समाधान --इन्द्रियों को अथवा मनको समझाना तो अपने को ही समझाना है यह विचारकर देखिये : यह मानव स्वभाव है कि होनहार मनुष्य अपने आप को सदा समझाता -- -- बुझाताहै । यह इन्द्रियोंका ही वर्णन है क्योंकि पूर्व में कहा गयाहै कि वृत्र अहि प्रादि असुरोंको मार इन्द्र नदि- योंको बहने के लिये प्रेरित करताह इत्यादि। यहाँ वै ही नदियां कहतीहैं कि हम इन्द्रको प्राज्ञाकों मानतीहै उसो की कोर्ति गाती हैं। वह वृत्रको मार हमारी रक्षा करता है इत्यादि । अनेक समानताओं से सिद्धहै कि यह वर्णन भी इन्द्रियोका है। पश्चात् कुशिकस्य सूनुः विश्वामित्रनादि पद देख ऐतिहासिकोंने विविध गाधारकल्पितं की हैं। मा- मतेय ऋषि दीर्घतमा की भी ऐसी ही श्राख्यायिका है । गङ्गा की उत्पत्ति- -यह गाया भी परार्थसूचक है । सगर= जलयुक्त श्राकाश का नामहै निघण्टु १।३। पृ. थिवी पर की छोटी २ नदियां सुगरपुत्र हैं । सूर्य का नाम भगीरथ है। तेजोरूप महान् ऐश्वर्ययुक्त जिस का रथ हो । वेदों में आकाश पुत्र सूर्य माना गया है। कपिल अग्नि का नाम है अर्थात् प्रोमऋतु ही कपिल अतएव पुराणों में कपिल को भरन्यवतार भी मानते हैं । पर्जन्य (मेघ) देव का नाम-रुद्र है । ग्रीष्मऋतुरू.प. कपिल जब सगर पुत्रों को दग्ध कर देता तब सगर शोक- मंतप्त हो नानो, पुत्रों के उद्धारके लिये उपाय सोचताहै। तब सगर वंशोद्भव भगीरघ ( सूर्य ) पर्जन्य देव को प्रसन्न कर अधात् नेघों को बनाकर महती जलधारारूप गङ्गा को पृथिवी पर छोड़ता है पुनः नदियां जलों से भर जाती हैं । यहो सगरपुत्रों का उद्धार है। मानो, - (३५) सगर अर्थात् श्राकास का पुत्र यह यूथिवीस्थ समुद्र है अत: इसको सागर कहते हैं (सगरस्य अपत्यम् ) त्रिदेवनिर्णय में विस्तार से वर्णित कथा को देखिये। क्या ही आश्चर्य की बात है क्या था और अब क्या होगया। हे भगवन् ? इस महापरिवर्तन के कारण भी तो आप ही हैं ! सप्त लोक और सप्त पाताल-यह जो केवल चौदह खण्डयुक्त शरीर का दिवण था अब चौदहलोक बन गए। हजारों श्लोकों में इनका पुराण वर्णन करते हैं। विष्णु पुराण के द्वितीय अंश में बहुत विस्तार से सप्त लोक की चर्चा भाईहै । पृथिविीसे लेकर उपरिष्ठ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एवं भूमि के नीचे सम्पूर्ण प्रदेश को सात.२ भागों में बांटते हैं। ऊपर के भागों के क्रम से ये नाम हैं--भः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यन और नीचे के भाग अतल, वितल, नितल,गभस्तिमत्,महातल,सुतल और पाताल । परन्तु भा- अनुसार अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल रसातल, पाताल कहाते हैं । ये भः भुवः इत्यादि लोक यही नयनादि सप्तन्द्रियहैं। अभीतक सन्ध्या के प्राणायाम काल में ये सातों पढ़े जाते हैं। प्राणों के आयाम= व्यायाम को प्राणायाम कहते हैं । प्राण नाम इन्द्रियों का है यह प्रसिद्ध है। इन्हीं सातों इन्द्रियों को योग्य बनाने के लिये प्राणायाम किया जाता है । प्राणायाम से ये सप्तक वशीभूत हो अपने योग्य कार्य में लगते हैं अन्यथा उच्छृखल हो उपासक को भष्ट करते हैं । विचारने की बात है कि प्राणायाम काल म गवत के

।
।
((३६)
येसातं प्रणव क्यों पढ़े जाते । इससे सिद्ध है कि यह
सप्तन्द्रियमात्र का वर्णन है। ये ईश्वर के नाम भी हैं।
ईश्वर से प्रार्थना करते हुए इन सातों को अपने वश में
लावें यही प्राणायाम का उद्देश है। अंव जो नीचे सप्त
लोक माने जाते हैं वे दो हस्त, दो चरण, मलेन्द्रिय, मूत्रे-
न्द्रिय और गर्दनसे लेकर कटिपर्यन्त एक भाग ये ही सात
हैं। इसीका नाम चतुर्दश भुबन है । अन्य चतुर्दश भुवन
कोई नहीं । जिज्ञासुपुरुषो ! नियत संख्यात पदार्थ की
ओर आइये । अनियत की ओर मत जाइये। शरीर में ये
चतुर्दश स्थान नियत हैं किन्तु इस विश्व में चतुर्दश स्थान
कोई नियत नहीं। इसमें अनन्त लोक, अनन्त भुवन
इस असीन जगत् को चतुर्दश ही भागों से कैसे विभक्त कर
सकते । अतःशरीरस्थ दो नयन, दो कर्ण दोघ्रास, एक मुख
ये परके सतलोक और दोहस्त, दोचरण, एक गुदा, एक
मेढ़ और एक मध्य शरीर ये सप्त अधःस्थित लोक हैं। यह
शरीर ही सुनेरु अर्थात् शोभन प्रकार से मरनेहारी पर्वत
है इसी के शिखर पर इधर उधर सब भुवन हैं। इसी सुभेरु
नामधारी शरीरके चारों तरफ नयनाधिष्ठाता सर्य,सनो-
धिधाता चन्द्रना, कर्माधिष्ठाता वायु आदि तव देव परिक्रमा
कर रहे हैं । इसी को अच्छे प्रकार जानने से सर्वलाभ होता
है यह कवि का भाव है। जो इस वाह्य जगत् में १४ भुवन
खोजते हैं वे निस्सन्देह अज्ञानी हैं वे संस्कृत साहित्य से
सर्वघा विमुख हैं । पुराण कहते हैं-

( ३७ )
भूर्भुवः स्वर्महश्चैव जनश्च तप एव च । सत्यलोकश्च
सप्तैते लोका उपरि कीर्तिताः॥ पुनः कहतेहैं जम्बू,
सक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौन्च, शाक और पुष्कर ये सप्त
दीप हैं । लवण, इक्षु, सुरा, सर्पि, दधि, दुग्ध और जल इन
सातों पदार्थों का एक २ सागर है अंर्थात् सातों द्वीपों के
चारों तरफ मात सांगर हैं। इसी प्रकार सप्त पर्वत, सप्त
नदियां, सप्त गङ्गारं इत्यादि अनेक सप्तक पुराण गातेहैं !
ममेरु को मध्य में मानते हैं " इह हि मेरुगिरिः किल
मध्यगः कनकरत्नमय स्त्रिदेशालयः"यदि पौराणिकों
पूछा जाय कि वे सप्त लोक, सप्त पाताल वा सप्त पर्वत,
वा सप्त सागर आदि सप्तकगण कहां हैं तो वे कुछ नहीं
समाधान करसकते क्योंकि दाह्य जगत् का वर्णन यह नहीं।
इसी शरीरका सुमेरु नाम रख इस. पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी
रंचना दिखलाई गई है। पुराणों के सहस्रों श्लोक इसी
भावको दिखलातेहैं । किन्तु अज्ञानी जन नहीं समझते ।
सप्त नरक-दुष्कर्म महामहापातकों के करने से येही
सप्तन्द्रिय सप्त नरक बनजाते हैं । घोरेर पश्चात् सप्त नरक
स्थान. इस शरीर से पृथक् कल्पित हुए "स्मरन्ति च ।।
अपिच सप्त १५ । वेदान्तसूत्र १०३ । पा० १ । इन सूत्रों
का अर्थ शङ्कराचार्य करहैं कि व्यासादिकोंकी स्मतियों में
रौरव भादि सप्तनरक उक्तहैं। पीछेउत्तममध्यमऔर धम
भेद से 9x ३= २९ नरक माने गये, यथा--"तत्र हैके
नरकानेकविंशति गणयन्ति" भा० ५॥ २६ ॥ भागवत
।
।

-
कहता है कि कोई २१ नरक गिनते हैं वे ये हैं १-तानित्र
२-अन्धतामिन,३---ौरद,४-नहारौरव,५-कुंभीपाक,
६.कालमत्रा, 9 असिपत्रावन, -नूकरमुख, -अन्धकृप,
१०- कृमिभोजन, १९. संदंश, ६२ तभनि, १३-वजकण्टक,
शाल्मलि, १४-वैतरणी, १५-पूयोद, १६---प्राणरोध,
१७ विशसन, १८-लालाभक्ष, १८ मारनेवादन, २०-अवीची,
२१-अयःपान । वे कहते हैं कि वहां यमराज चित्रगुप्त के
साथ विराजमान हैं इत्यादि । परन्तु यह भी शरीक का
हो वर्णन है। महोरात्ररूप नहाकाल ही यन है क्योंकि
पुराणों में कहा गयाहै कि नूर्यका पुत्र यमहै। निःसन्देह,
अहोरात्र ही मूर्य का पुत्र यम है । श्राद्धनिर्णय में इसका
वर्णन देखिये : रात्रि यमी और दिन यम है । मन हो
चित्रगुप्तहै क्योंकि मनही गुप्त रीतिसे शुभाशुभ सब को
को लिखता रहता है जो कुछ मनुष्य करता है उसका फोटो
मन पर खींचा जाता है। यह मन एक अद्भुत पदार्थ है। ये .
सप्तन्द्रिय-युक्त शरीर ही स्वर्गवा नरक है अन्य नहीं । क्या
इसी शरीर नाना यातनाओं को लोग भोग नहीं रहे हैं :
अनेक सप्तकगण-यहां यह स्नरण रखना चाहिये कि
वेदोंमें मूर्य सप्तरश्मि, तप्तकिरण कहा गया है । किरणों में
सात प्रकार के रङ्ग है । अतः मूर्य सप्तकिरण है । पश्चात्
अज्ञानी जन सूर्य के रथ
सें
सचमुच सोत घोड़े मानने
लगे। सूर्यवत् यह जीवात्मा भी सहरश्निहै । नयनादिकही
इसके किरण हैं एवं परनास्ना ने गायत्रो, अनुष्टुप् प्रादि
m

( ३ ) सप्त छन्दों में वेदों का उपदेश किया है। सर्य और जीव के सप्त किरण लेके धीरे २ अनेक सप्तक बनते गये । रवि, सोम, आदि दिन भी सप्त माने गये हैं । निषाद, ऋषभ, गान्धार, षड्ज, मध्यम, धैवत और पञ्चम ये सप्तगान स्वर हैं। व्याकरण में प्रथमा, द्वितीयो श्रादि सप्त विभ- क्तियां हैं इसी प्रकार सप्त पाकयज्ञ, सप्त हविर्यज्ञ, सप्त सुत्य आदि हैं ! इन्द्र. देव---मैंने इसलेख में लिखा है कि जीवात्मा फा नाम इन्द्र है। यद्यपि यह शब्द अनेकार्थक है तथापि ऐसे प्रकरण में जीवात्मा को इन्द्र कहते हैं। वेदों के पढने से प्रतीत होता है कि सर्य और जीवात्मा के अर्थ में इसके भूरि २ प्रयोग हुए हैं-१-नाम, २-कर्म, ३-और परिवार से इन्द्र जीवात्मा सिंद्ध होता है १-इद्रिय-इन्द्र शब्द से इन्द्रिय बनता है। महर्षि पाणिनि कहते हैं कि-इद्रिय- मिन्द्रलिङ्ग मिन्द्रदृष्ट मिन्द्रसृष्टमिन्द्रजुष्ट मिन्द्रदत्त- मिति वा । सू० । २ । ९३ । इन्द्रिय शब्द के इन्द्र लिङ्ग इन्द्रदृष्टं, इन्द्रसृष्ट.इन्द्रजुष्ट इन्द्रदत्त ये पांच अर्थ हैं “इन्द्र आत्मा तस्यलिङ्गमिन्द्रियम्" इत्यादि । इन्द्रं जीवा- त्मा इसका मूचक इन्द्रिय है अर्थात् नयनादियों के अस्ति- त्व से जीवात्मा के अस्तित्व का पता लगता है अतः नय- नादिकों को इन्द्रिय कहते हैं। इसी प्रकार. इन्द्रदृष्ट आदि का अर्थ समझिये।शतकंतु= जिसके नानाकम्भ हैं “शतं क्रतवः कर्माणि यस्य” अथवा जीवात्मा के जो १०० वर्ष -

जो
४९ वायु
(४०)
की आयु है वे ही ऋतु अर्थात यज्ञ है । जिसके जन्म,
से लेकर मरण पर्यन्त १०० वर्ष जिसका शुद्ध जीवन बीता
है वही यथार्थ इन्द्र है । अतः पुराणों में कहा गया है कि
जो १०० यज्ञ करता है वह इन्द्र होता है। ठीक है। निश्चय
जिसकी सम्पूर्ण नायु
१०० वर्षको है शुद्धता से बीत रही
है वही जीवात्मा इन्द्रपदधारी होगा। क्योंकि "इदि पर
मेश्वथ्य" परमैश्वर्यशालीको इन्द्र कहते हैं। पश्चात् जब
इन्द्र एक पृथक् देव माना गया तो इसके ऊपर यह लांछन
लगाया कि यह इन्द्र किसी को १०० यज्ञ करने ही नहीं
देता, घोड़ा चुराकर यज्ञ में विघ्न डाल देता। मरुत्वान् =
मरुत वायु -प्राण । इन्द्र
के साथी हैं। यह सिद्ध
करता है कि जीवात्मा का ही नाम इन्द्र है। इसी प्रकार
अन्यान्य नाम भी इसी अंधं के
सूचक
इन्द्र और ४९मरुत्-महाभारत वाल्मीकीयरामायण
और भागवत प्रादिक ग्रन्थों में लिखा है कि देवासुर संग्राम
' में पुत्रों के मरने से परमदुःखिता दिति देवी एक दिन
स्वामी कश्यपजी से प्रार्थना कर बोली कि इन्द्रहन्ता एक
पुत्र मुझे दीजिए ! कश्यपजी ने कहा कि एक वर्ष नियम
धारण कीजिये वैसा ही एक पुत्र होगा। दिति व्रत करने
लगो। इन्द्र ने यह खबर सुन एक दिन दिति को अशुचि
जान पेट में प्रवेश कर उदरस्थ वालक के मात टुकड़े कर
दिये । पुनः एक २ के सात २ टुकड़े किये वह बच्चा पेट
में रोने लगा, इन्द्र ने कहा कि मारुदिहि २“मत रोश्रो
मत रोश्रो। अतः उसका नाम मरुत् वा मारुत हुआ।

. ( ४१ ) दितिने यह साहस देख प्रसन्न हो इन्द्रसे कहाकि तुम्हारे ये भाईहैं अपने साथ ही इन्हें भी रक्खो। इन्द्र ने भी इसे स्वीकार किया। तब से ४९ वायु इन्द्र के गण हुए। इन्द्र मरुत्वान कहलाने लगा। यह ऐतिहासिक कल्पना है। प्रमाण- चकर्त्त सप्तधागर्भवजेण कनकप्रभम् । रुदन्तंसप्त- धैकैकंमारोदीरिति तान् पुनः। भागवत ६ ॥ १८॥ समीता -~मा रोदीः२ वा मा रुदिहिर इत्यादि कथन से मरुत् यह नाम नहीं हुआ किन्तु यह मर मर शब्द करने- हारा है वा मारनेहारा है क्योंकि प्राण वायु के निकलने से ही नादमी मृतक समझा जाताहै । समष्टि अर्थात् समुदाय ब्रह्माण्ड का नाम अदिति हैं (न+दिति= प्रखरह, समु- दाय, अविनाश) और व्यष्टि अर्थात् पृथक २ मनुष्य पश्वादि शरीरदिति है (दिति खण्ड,विनाश) प्रत्येक माता दिति है। जब गर्भ रहता तब एक ही समुदाय प्राणवायु उस जलीय गर्भ के साथ रहता है। प्रात्मा के प्रवेश होते ही अङ्ग प्रत्यङ्ग बन के वही प्राण सात हिस्सों में विभक्त हो नयनादि सात बनजाता है ।पश्चात् एक नयनादिकों के जोअनन्त विषय हैं उनको sx9=४९ उनचास नाम देते हैं यह एक वर्णन करने की प्राचीन शैली है। इस श्राख्यान से विस्पष्टतया सिद्ध है कि यह जीवात्मा का ही वर्सन है। क्योंकि सात नियत संख्याएंइसी शरीर में हैं इसी जीवात्मा के प्रवेश से एक खि सात होते हैं और पुनः ग्रहणीय विषय करके ७४७-ge

(१२)
होते हैं वाह्य जगत् में कोई ४९ मरुद्गण नहीं । विस्तार
से वैदिकइतिहासार्थनिर्णय में देखिये। इस कंन से भी
सिद्ध है कि जीवात्मा ही इन्द्र है । पुनः-
अपां फेनेन नमुचेःशिर इन्द्रोदवर्तयः। विश्वा
यदजयःस्पृधः ॥
चारों वेदों में यह ऋचा आई है (इन्द्र अपां फेनेन)
हे इन्द्र ! भाप जल के फेन से (नमुचेः शिरः उदवर्त्तयः )
नमुचि नाम के
असुर
के शिर को कोट लेते हैं । कव ?
( यद् ) जब ( विश्वाः स्पृधः अजयः ) सम्पूर्ण स्पर्धमान
प्रासुरी सेनाओं को जीतते हैं इस पर शतपथ ब्राह्मण
इन्द्रियस्येन्द्रियमन्नस्य रसं सोमस्य भत्तंसुरयाऽसुरो
नमुचि रहरत् सोऽश्विनौ च सरस्वती चोपाधावत् ।
शेपानोऽस्मि नमुचये न वा.दिवा न नक्तं हनानि ।
न दण्डेन न धन्वना न पृधन न मुष्टिना न
शुष्कण नाट्टैण अथ म इद महादिदं म आजि-
हीर्षथोति" | शत० ब्रा० १२ । ७।३॥
अमुर नमुचि ने सुरा पिलाकर इन्द्र के ऐश्वर्य, अन्नके
रस और सोमयज्ञ के भक्ष का हरण कर लिया । तब
अश्विद्वय और सरस्वती के निकट जा के इन्द्रबोला किमैं
नमुचि को वर दिया कि न दिन में न रात्रि में तुम्हें मा.
रूगा न दण्ड से न धनुषु न मुष्टि से न शुष्क न भाद्र
कहता है-

तव (४३) अर्थात् किसी अस्त्र से मैं तुम्हें न मारूंगा। इसने मेरा स- वस्व हरण कर लिया है देवी ! मेरी रक्षा कीजिये । अश्विद्वय और सरस्वती जल के फेन को वज़ बना इन्द्र को दे बोले कि यह न शुष्क न आई है । प्रातःकाल जो न दिन और न रात्रि है उस समय इससे उसको मारदो इन्द्र ने भी वैसाही किया यह आख्यान भी सूचित करता है कि जीवात्मा का ही नाम इन्द्र है क्योंकि “पाप्मा वै नमुचिः।" शत० ब्रा० १२ । ७॥ पाप, अज्ञान, अविद्या, अन्धकार का नाम नमुचि है। "नमुञ्चतिन त्यजतीति नमुचिः"इस जीवा- स्मा को अज्ञान वा पाप कभी नहीं छोड़ता अतः अज्ञान- पाप का नाम नमुचि है । "नभाण नपान नवेदा ना- सत्या नमुचि नकुल नख नपुंसक नक्षत्र नक्र नाकेषु प्रकृत्या ६ । ३ । ७५ ॥ सूत्रानुसार नमुधिं सिद्ध होता है यह नमुचि जीवात्मा को सुरा अर्थात् मदकारी पदार्थों के द्वारा मोहित कर भोगविलास में फंसा सा हरण कर लेता । पहिले जीव को भोगविलास--मतिमनोहर मालूम होते । महादु- र्व्यसन में फंसना ही नमुचि को. इन्द्रद्वारा वर पाना है यह पोपरूप महासुर जीव को त्रिभुवन से गिरा देता है वही इन्द्र का त्रिलोकीराज्य से भष्ट होना है। जब पुन: नाना दुःख क्लेश यातना पाके किञ्चित् विवेक होता तो घव. राकर वह इन्द्रमश्विद्वय और सरस्वती के निकट पहुंचता। 'अहोरात्रकाल वा तेजोऽन्धकार मिश्रित प्रातःकाल ही अ-

कम्मों
।
(४४)
शिवय भोर विद्याही सरस्वती है अर्थात् जब जीवात्मा
विद्या ज्ञान विवेक श्रादिकों का अभ्यास करता हुआ प्रात
काल ईश्वर का चिन्तन करता है तब पापों से छूटने लगत:
है। विद्याएं, विवेक और प्रातःकाल के विचार इस उपासक
को शुभ कर्म की ओर लेजाते हैं शुभ का सम्पादन
करना ही प्राप् (जल) है । वेदों में श्राप शब्द शुभकर्म का
उपलक्षक होतो है शुभकर्म करते करते इसको ज्ञान प्राप्त
होजाता है। यही अपांफेन है। इस ज्ञानरूप महावन
प्रातःकाल अर्थात् ईश्वर के चिन्तन के परमोत्तम समय में
प्रतिदिन नमुचि को पछारना शुरू करता है । धीरे २
नमुचि के काम लोभ, दुर्व्यसन, अज्ञान ‘श्रादि गणों को
मारकर इसे भी हनन कर इन्द्र निश्चिन्त हो पूजित होने
लगता है। यही इस ऋचा औरं श्राख्यान का आश्य
आप पण्डित महाशय इसे विचारें।
इन्द्रो दधीचो अस्थभिव॒त्राण्यप्रतिष्कुतः ।
जघान नवतीनव ॥ ऋग् १।८४ । १३ ।।
यह ऋचा भी.सब वेदों में आई है (अप्रतिष्कुतः इन्द्रः)
अधर्षणीय भजेतव्य इन्द्र (दधीचः अस्थभिः) दुध्यड्.
ऋषि की हड्डियों से ( नवती: नद वृत्राणि ) ० और द
वृत्रों को (जपान) हनन करता है। अस्थभिः छन्दस्यपि
दृश्यते इति.अनजादावपि अस्थिशब्दस्य अनङादेशः।
व्याख्या- यह आख्यान भी इसी अर्थ का साधक है।
वेदों में दध्यौरनन्यान्यग्रन्थोंमेंदध्यनौरदधीचिदोनो

(४५) पाठाते हैं। शतपथादिब्राह्मण ग्रंथों से लेकर तुलसीदास के रामायण पर्यन्त दधीचि की हड्डी से इन्द्रने असुरोंको मारा है यह गाथा गाई गई है। इसके १८ वें पृष्ठ में 6 नदियों से इन्द्र पार होता है यह कहा गया है। यहां to+c= वृत्रों की चर्चा देखते हैं वे वृत्र कौन हैं ?. इसके रहस्य के जाने विना इसका भाशय प्रगट नहीं होता आवरणशील मेघ, अज्ञान, अन्धकार, पापभादिकोंको वृत्र कहते हैं। वे हैं। क्यों ? देवों की ३३ संख्या है यह विदितही है। ये मनसहित एकादश इन्द्रिय उत्तम,मध्यम, अधम भेद से ३३ होते हैं। और३३४३= CC हैं। वेदों की एक यह शैली है कि दुष्टों की संख्यात्रिगुण अधिक दिखलाते हैं, जैसे वेदों में कहा है कि इन्द्र द्विनेत्र एक शिरस्क है किन्तु वृत्र षडक्ष (छः आंखवाला) और त्रिशीर्षा तीन शिर- वालाहै । अतः देवों अर्थात् शुभ इन्दियों की संख्या ३३ है और तद्विपरीत असुरकीके लए हैं अर्थात् मनुष्य में यदि शुभ कम्म करने की शक्ति एक है तो अशुभ कर्म करने की शक्ति तीन हैं । इसी भाव को लए यह संख्या दिखलाती है: दध्यङ् यह नाम ज्ञानी पुरुषों का है (दधातीति दधिर्धाता परमात्मा तमञ्चतीति दध्यड्) अस्थि-विद्वानों की नि- काली हुई विविध विद्याएं । विद्वानों की हड्डी भी काम आती है यह कहावत लोक में सुप्रसिद्ध है। इन्द्रजी वात्मा। पत्र अर्थात् नाना पाप अज्ञान जब इन्द्र(जीवात्मा) को घेर कर विवश कर लेते हैं तब यह उद्विग्न हो विद्वानों के निकट जाताहै उनसे शिक्षाएं पाके मानो उन शिक्षाओं ।

( ४६ ) को ही अपना परमास्त्र बना वृत्रों को मारदेता है। वैदिक इतिहासार्थ निर्णय विस्तारमे वर्णित कथा को देखिये। इन्द्र और संग्राम-यह भी इसी अर्थ का द्योतक है वेदोंमें इन्द्र का मुख्य कार्य संग्राम करना और विजय के द्वारा देवों व भक्तोंको लाभ पहुंचानाहै। इसके वृत्र, नमुचि, शम्बर, चुमुरि, धुनि, पिनु, वल, अर्बुद, वर्धो, कुयव आदि अनेक शत्रुहैं "शुष्णं पिघु कुयवं वृत्रमिन्द्र यदाऽव- धीर्वि पुरः शम्बरस्य" ऋग् १११०३।८। इसी एक ऋचा में अनेक नाम आये हैं जिनको इन्ट मारा करता है। देवगण यज्ञों में इन्द्र को अभिषिक्त करके यज्ञोंके विविध भाग देत हैं तब वह बलिष्ठ हो निखिल असुरों का नियात करता है। इस वर्णनका भी भाव यह है कि जब जीवात्मा शुभ कम्ों में प्रवृत्त होता है तब ही पापरूप महान् असुरों को अपने निकट नहीं आने देता यही इसका विजय है। इन्द्र के परिवार-शत्री इन्द की स्त्री मानी जाती है। कम और प्रज्ञा का नाम भी शची है निघण्टु । २ । १ और ३ । । जीवात्मा के कर्म अर्थात् प्रयत्न और ज्ञान ये दोनों मुख्य गुण हैं । अतः इन्द्र की स्त्री शची कहोती । इन्द्राणी=इन्द की स्त्री ऐसे २ स्थानों में शक्तिव गुण अर्थ में स्त्रो श द का प्रयोग है । शची और इन्दणी शब्द के पाठ वेदों में बहुत हैं इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगा महमश्रवम् । नह्यस्या अपरञ्चन जरसा मरते पतिः। सर्वस्मां- दिन्द्र उत्तरः १०॥ ९९ ।।

(४७) इन्द्रं का घोड़ा उच्चैःश्रवा है। यह शरीर ही उच्चैःश्रवा है क्योंकि इस मानवशरीर का ही यश उच्च है। अव = यश । यह शरीर ही ऐरावत हाथी है क्योंकि यह अन्नमय है वा अन्न से पुष्ट होता है । इरा=अन्न । इत्यादि परिवार के वर्णन से भी इन्द्र जीवात्मा सिद्ध होता है। इन्द और सूर्य--सूर्य को भी इन्द्र कहते हैं । इस सम्बन्ध में भी अनेकानेक वर्णन आते हैं। सहस्राक्ष, देव- राज, स्वर्गाधिपति, मघवा, वत्रघ्न, मरुत्वान इत्यादि नामों से सूर्य भी पुकारा जाता था। जब सूर्य से भिन्न इन्द्र एक पृथक् देव कल्पित हुआ तब इसके सम्बन्ध में अनेक इति- हास उत्पन्न होने लगे। जैसे इन्द्र को सहसात सिद्ध करने के लिये इतिहास गढ़ा गया कि महल्या को दूखित करतेहुए . इन्द्र को गौतम ने शाप दिया कि तेरा सम्पूर्ण शरीर विकृत होजाय पश्चात् इन्द्र के पुनः २ विनय करने पर प्रसन्न हो गौतम ने कहा कि रामावतार में तेरा शरीर सहस्त्र नेत्रों से युक्त होगा । तब ही से इन्द्र सहस्त्राक्ष कहलाने लगा। अप्सरा यह नान और घताची, मेनका, उर्वशी आदि नाम सूर्य के किरणों के अथवा प्रातःकाल के थे । पश्चात् इन्द्र पृथकदेव होने पर ये सब इन्द्र को वेश्याएं बन गई।, पर्वत, आदि, गिरि आदि मेघ के नाम थे। निघण्टु १ । १० ।। इन्द्र अर्थात सूर्य मेघ को बनाता और विध्वस भी करता है अतः मूर्यही पर्वतघ्नपवंतच्छेदी था। पश्चात् ये सब गुण इन्द्र में भारोपित हुए । इस प्रकार शब्दशास्त्र और संस्कृत साहित्य में महान परिवर्तन हुआ है । मुझे शोक के साथ

(४)
लिखना पड़ता है आज भारतवासियों में स्वल्प पुरुषहैं जो
इस महान परिवर्तन से परिचित हों।
वेद और इतिहास-यद्यपि, मैत्रावरुण वमिध, कौशिक
विश्वामित्र,नामतेय दीर्घतमा,अगस्त्य, लोपामुद्गा,वसिष्ठो-
वंशी, उर्वशी पुरुरवा,कूपपतित त्रित, दीर्घतमा, शुनःशेष,
दधीचि, च्यवन, सोभरि, ययाति, नहुष, भरत, रोमशा,
अपाला, घोषा आदिकों की चर्चा आती है।
परन्तु
वेदों
के देखने मात्र से प्रतीत होजाता है कि ये परार्थद्योतक हैं।
किन्हीं अनित्यमानव इतिहासों नहीं,इसीप्रकारसप्तसिन्धु,
गङ्गा, यमुना, सरस्वती, गोमती, गन्धार आदि पद देखकर
'जो आधुनिक ऐतिहासिकपुरुष अनुमान करते हैं कि वेदों में
भारतवर्षीय इन गङ्गा, यमुना आदि नदियों का नौर
कन्धार प्रादि देशों का वर्णन भाता है वे सर्वथा भम
पड़े हुए हैं। सर्वदा सप्तसिन्धु पद क्यों आता है वेदक्योंकर.
सप्तसिन्धु इस पद पर वारम्वार जोर देते हैं इत्यादि वैदिक
संकेत पर यदि इतिहासवित् पुरुष दृष्टि डालेंगे तो उनको
सर्व
भम दूर होजायगा । मैं जगत् के सम्पूर्ण इतिहासप्रिय
विद्वानों से निवेदन करताहूं कि मेरे वैदिक व्याख्यानों,
पर ध्यान देवें और इस शैली से पुनः वेदों का विचार
कर देखें कि वेद भगवान् क्यो कह रहे हैं। इसमें सन्देह
नहीं कि इन पर इस शताब्दी में ऐसा वजनहार हुआ
कि इनको स्वस्थ होने में बहुत काल लगेगा, यदि
सहस्रों सवेद्य विवार कर इनकी दवाई करने लग जाय ।
।
शुभमस्तु ॥

वैदिक-रहस्य ।।
.
.
कई सहस्त्र
यह कार्य
आर्यभाताओ ! अभीतक वेदों के ऊपर साक्षात् ।
विचार यथार्थरूपसे आर्यो तथा पौराणिकों में नहीं हुआ
हैं । वेदों पर कितने लाञ्छन लगाए हुए हैं उनको कौन
नहीं जानता। प्रत्येक भारतवासी को उचित था कि.वहइस
ओर पूरा ध्यान देता, परन्तु
वर्षों से
न हो सका । मैं अपनी बुद्धि के अनुसार कई वर्षो से वेद
सम्बन्धी लेख लिख आपके निकट पहुंचा रहा। अभी.
संक मेरा मनोरथ पूर्ण नहीं हुआ, मैं इतने से प्रसन्न नहीं हूं
গল मैं ओप लोगों की सहायता से चाहताहूकि.वेदों के
गुप्त २ अर्थ प्रकाशित किये जायं । नमूना के लिये यह
"चतुर्दश भुवन प्रथम आपके समीप उपस्थित है विशेष
लिखने की आवश्यकता नहीं, यदि भाप लोग इससे कुछ
लाभ समझते हैं तो इस के ग्राहक बने और बनावें । अग्रिम
मूल्य भेजनेवालों को १००० एकसहस्रपृष्ठों का ग्रन्थ
३॥८) में मिलेगा इस के चार भाग निकल चुके हैं।
भवदीय
शिवशङ्कर
ग्रन्थ मिलने का पता
मंत्री; आर्यसमाज
मु०. डा० कमतौल
ज़िला दरभङ्गा

ग्रन्थकर्ता के अन्यान्य ग्रन्थ- " " १-छान्दोग्योपनिषद्भाष्य, संस्कृत और आर्य- भापासहित मूल्य ३) २-वृहदारण्यकोपनिषद्भाष्य, संस्कृत और आर्यभाषासहित ३) ३-ओङ्कारनिर्णय 1-) ४-त्रिदेवनिर्णय iii) ५-जातिनिर्णय १) ६-श्राद्धनिर्णय 1) ७-वैदिक इतिहासार्थनिर्णय १||). -अलौकिक-माला... -) --कृष्णमीमांसा '-)| १०-प्रश्न-रामायण-प्रेमियों के प्रति गूढ़ २ :: " . " प्रश्न हैं )। " पुस्तक मिलने का पता- मंत्री, प्रार्यसमाज मु. डाकमतौल ज़िला दरभङ्गा

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Chaturdash-bhuvan

Author
Shivshankar Sharma
Title
Chaturdash-bhuvan
File name
Chaturdash-bhuvan
Text
OCR done
Citation
1912
Published
2009/09
Publisher
Rajneeti Press Patna
Language
Sanskrit
Pages
52
Library
Sanmati Library, Jaipur
DLI number
322459
Barcode
99999990252931.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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ldXQ9VF6Joi
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