Prakrit Bharti Academy

Saptasmarnadi Stotra Sagrah (devsmaran Nityamala)

Smt,devshriji · 2010/11

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Front matter

निवेदन- - इम पुस्तक में पूर्वाचार्यों द्वारा रचित महाप्रभाविक चमत्का- रिक स्तोत्री का प्रकाशन किया गया है । स्तोत्रों के संग्रह की हुई पुस्तकें प्रायः करके छपती ही रहती है । क्योंकि प्रायः करके बहुत से भाई बहिन नित्य पाठ करते हैं इस लिए ऐसी पुस्तकों की आवश्यकता अधिक रहती है। साध्वीजी महाराज श्री जसवंत श्रीजी मनमोहन श्रीजी व मीलापश्रीजी ने अपने भक्त गणों की उपदेश देकर इस पुस्तक के प्रकाशन के निमित प्रव्य इकट्ठा किया और मेरे जुम्मे इस पुस्तक के प्रकाशन का भार डाला गया । मगर वीकानेर में प्रेसे आवश्यतानुसार कम है और उनके पास काम भी अधिक रहता है इस लिए प्रकाशन से कुछ अधिक समय लग गया । आशा है पाठक गण इस पुस्तक से नित्य पाठ करके लाभ लेंगे। निवेदक बक्षी चम्पालाल जैन सम्पादक 'अभय संदेश बीकानेर ( चवदे पूर्व का सार) श्री नवकार मंत्र नमो अरिहंताणं | नमो सिद्धाणं नमो पायरियाणं । नमो उत्रज्मायारणं नमो लोए सव्वसाह । एसो पंच णमोक्कारो सच पाव पणासणो। मंगलाच सव्वेसि पढमं हाइ मंगलं ।। १ ।।

Skoleckalkamerala
खरतर गच्छीया-साध्वीश्रेष्ठा-पूज्यवर्या-प्रवर्तनी
श्रीश्री १०८ श्रीमती देवश्रीजी महाराज साहिबा
स्वर्गवास सवत् २०१० भादवा बदि १३
जन्म सवत् १६२८ चै० शु० फलोदी
CorrectroFreCFree
AMOM
anhe suminstonxikinaarmika
दिक्षा संवत् १६५० फा० शु० २ फलोदी-प्रवर्तिनी पद संवत् १९६७
मा० ऋ० १३ फलोदी
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*श्री देव स्मरण नित्य माला* ( माङ्गलिक स्तोत्राणि.) सप्त स्मरणा. प्रथमं श्रीबृहदजितशान्तिस्मरण. अजिअं जिअ-सब-भयं । संतिं च पसंत- सव्व-गय-पावं ॥ जय-गुरु-संति-गुणकरे। दोवि जिरावरे पणिक्यामि ॥१॥ (गाहा ववगय-मंगुल. भावे । ते हैं -विउल-तव-निम्मल-सहावे ॥ निरु- वम-मह-प्पभावे । थोसामि सुदिट्ठ-सब्भावे ॥२॥ (गाहा) सव्व-दुक्ख-पसंतीणं सव्य-पाव-प्पसं- तिणं । सया.अजिय-संतीणं । नमो अजिअ-संतीणं ॥३॥ (सिलोगो ) अजिय ! जिण ! सुहप्पवत्तणं तव पुरिसुत्तम ! नाम-कित्तणं ॥ तह य धिइमइ- , * , संति थुणानि जिणं । संति विहेड मे ॥ १२ ॥ (रासानदियं) इक्खाग-विदेह-नरीसर ! नर-बसहा मुणि-वसहा !, नव-सारय-ससि-सकलाणण ! विगय तमा ! विहुअ-रया ! । अजिउत्तम-तेष गुणेहि महा--मुणिअमिय--वला ! विउल--कुला !, पणमा- मि ते भव--भय-मूरण ! जग--सरणा ! मम सर- णं ॥ १३ ॥ (चित्तलेहा) देव-दाणिविंद'चंद-- सूर--बंद ! हष्ट--तु--जि--परम, लट्ट--रूव ! धंत -रुत्प--पट्ट--लेअ--सुद्ध-निद्ध- धवल देत--पंति ! संति ! सत्ति-कित्ति-मुत्ति--जुत्ति-गुत्ति-पवर ! दिक्त--तेज बंद-धे ! सव्वलोअ--भावि अप्पभाव --णेय ! पइस मे समाहि ॥ १४॥ · ( नारायओ) विमल-ससि-कलाइरेअ-सोभं । वितिमिर-सूर कराइरेअ-- तेनं ॥ तियसवइ-गणाइरे रुवं । धरणिधरपवराइरेअ-सारं ॥ १५ ॥ (कुसुमलया) सत्ते असया अजिअं । सारीरे अ बले अजिअं ॥ तव-संजमे अ अजिअं । एस थुणामि जिणं अ- जिनं ॥ १६ ॥ (भुगपरिरंगियं) सोमगुणेहि 18 ( ५ ) पावइ न तं नव-सरय-ससी ! तेअ-गुणोहिं पावइ न तं नव-सरय-रवी ॥ रूवगुणेहिं पावइ न तं तिअस- गण-बई, सार-गुणेहिं पावइ न तं धरणि-धर- वई ॥ १७ ॥ (खिजिप्रयं) तित्थ-वर-पवत्तयं तम-रय-रहिअं । धीर-जण थुअच्चिनं चुअकलि- कलुसं ॥ संति-सुह-प्पवत्तयं ति-गरण-पयो । सं- तिमहं महामुणिं सरणमुवणमे ॥ १८॥ (ललिअ- यं) विणोणय-सिरि-रइअंजलि-रिलिगण-संथु- अं थिमिश्र । विबुहाहिव-धणवइ-नरवइ-थुअ-महि- अच्चियं बहुसो ॥ अइरुग्गय-सरय-दिवायर-सम- हिस-सप्पभं तवसा । गयणंगणविअरण-समुइय- चारण-वंदिअं-सिरसा ॥१६॥ (किसलयमाला) असुर-गरुल-परिवंदिनं । किन्नरोरगणमंसिनं ॥ देव-कोडि-सय-संथुनं । समण-संघ-परिवंदिअं॥ २० ॥ (सुमुहं ) अभयं अणहं । अयं अरुयं ॥ अजिअं अजिअं । पयो पणमे ॥ २१ ॥ (विज्जु- विलसिअं) आगया वरविमाण-दिव्व-कणग-रह- ( ६ ) तुरय-पहकर सएहिं हुलिअं॥ ससंभमोअरण-खु. भित्र लुलिअ-चल-कुण्डलंगयतिरीड-सोहंत-मउ-. लि-माला ॥ २२ ॥ (वेदृढओ) जं सुर-संघा सा- सुर संघा वेर विउत्ता, भत्ति सुजुता। आयर भु- सिअसंभम पिंडिअ सुट्ठ सुविम्हिय सव्व बलो- घा ॥ उत्तम कचण रयण परुविन भासुर भूसण- भासुरिभंगा । गाय समोणय भत्तिवसागय पंज- लि पेलिश्र सीस पणामा ॥ २३ ॥ (रयणमाला) वैदिऊण थोऊण तो जिणं । तिगुणमेव य पुणो पयाहिणं ॥ पणमि ऊण य जिणं सुरासुरा । पमु- इत्रा स भवणाई तो गया ॥ २४ ॥ (खित्तियं ) तं महामुणिमहंपि पंजली । राग दोष भय मोह वजिनं ॥ देव दाणवनरिंद वंदिनं । संति मुत्तम- महातवं नमे ॥ २५ ॥ (खित्तियं ) अंबरंतर विया रणित्राहि । ललिअ हंस बहू गामिणिआहि ॥ पीण- सोणि थण सालिणिआहिं । सकल कमल दल-- लोअणिमाहिं ॥ २६ ॥ (दीवयं) पीण निरं तर. -- (७) थण भर विणमित्र गाय लयाहि । मणि कंचण- पसि ढिल मेहल सोहि सोणि तडाहिं ॥ वर- खिखिणि नेउर सतिलय वलय विभूसणियाहि । रइकर चउर मणोहर सुन्दर दसणिश्राहिं ॥ २७॥ (घित्तखरा) देव सुंदरीहिं पाय बंदाहिं, वंदिया- य जस्स ते सुविकमा कमा । अप्पणो निडालएहिं, मंडणोड्डुण पगा.एहि ॥ केहि केहिं वि अवंग ति- लय पत्त लेह नामए हिं, चिल्लएहिं संगयं गयाहि । भत्ति सन्निविट्ठ बंदणा गयाहिं, हुँति ते वंदिया पुणो पुणो ॥ २८ ॥ (नारायओ) तमहं जिणचंदं। अजिअं जिअ मोहं ॥ धुप सव्व किलेस । पयो पणमामि ॥ २६ ॥ (नंदिअयं) थुअ वंदिअस्सा रिसि गणदेव गणेहिं । तो देव बहूहिं पयो पण- मामिअस्सा ॥ जस्स जगुत्तम सासणअस्सा। भत्ति वसागय पिन्डिअाहिं ॥ देव वरच्छरसा बहुमाहि । सुर वर रइ गुण पंडिअाहि ॥३०॥ (भासुरय) वंस सद्द तंति ताल मेलिए । तिउ क्खराभिराम सद्द- - ( ८ ) मीसए कए अ । सुइ समागणे अ सुद्ध सज्ज गी- अ पाय जाल घंटियाहि । वलय मेहला कलाव-- नेउरा भिराम सद्द मीसए कए थ, देव नटिआहि, हाव भाव विभमप्पगारएहि, लच्चिऊण अंग हार- एहि, बंदिश्रा य जल ते सुविकमा कमा, तयं ति- लोय सव्व सत्त संति कारयं, पसत सव्व पाव- दोसमेल हं नमामि संतिमुत्तमं जिणं ॥ ३१ ।। (नारायओ) छत्त चामर पडाग जून जव मंडि-- आ। भय वर मगर तुरय लिरिवच्छ सुलंछणा ।। दीव समुह मंदर दिसागय लोहिया । सत्थियव- सह-सीह-रह-चक्क वर किया ॥ ३२ ॥ (ललिजयं) सहावलट्ठा सम प्पइट्ठा। अदोस दुट्ठा गुणेहि जिट्ठा ॥ पसाय सिट्ठा तवेण पुट्ठा । सिरीहि इट्टा रिलीहि जुट्ठा॥ ३३ ॥ (वाणवासिया) ते . तवेण धुअ-- सव्व पावया। सव्व लोन हि मूल पावया ॥ संथुप्रा अजिय संति पायया । हुँतु मे सिवसुहाण दायथा ॥ " ॥ (अपरान्तिका) एवं तव बल..

( १ ) वनगय कम्म विउलं, थुनं मए अजिए संति जिणजुयलं । रयमलं, गई गयं सासर्य विडलं ॥ ३५ ॥ गाहा । तं बहुगुणप्पसाय मुक्ख सुहैण परमेण अविसायं । नासेउ मे विसायं, कुणउ अ परिसावि अप्पसायं ॥ ३६॥ गाहा तं मोएउ अनंदि, पावेउ अ नंदिसेण मभिनंदि परिसावि अ सुहनदि मम य दिसउ संजमे नंदि ॥ ३७ ॥गाहा ॥ परिख चाउस्माले, संवच्छ रिएक अवस्स भणिअव्वो । सोअव्वो सव्वेहि, उवसग्ग निवारणो एसो ॥ ३८ ॥ जो पढइ जोश्र निसुणइ, उभत्रो कालं पि' अजिअ संतिथयं । न हु हुंति तस्स रोगा, पुव्वुप्पन्ना वि नासंति॥३६॥ जइ इच्छह परम पयं, अहवा कित्तिं सुवित्थडां भुबणे । ता तेलुक्कुवरणे, जिण वयणेआयर कुणह।। ४०॥ t संवच्छरइए थ दिअहे अ, इति पाठान्तरम् (१०) २ लघु अजितशांति स्मरणम् ॥ उल्लासिक्कम नक्ख निगमयपहा दंडच्छलेांगिणं, चंदारूण दिसंत इब्ध पयर्ड निमाण मग्मावलि । कुँदिदुज्जल दंतकंति मिसो नीहंत नाणंकुरु-केरे दोवि दुइज्ज सोलस जिणे थोसामि खेमंकरे ।। १ ।। चरम जलहिनीरं जो मिणि- जजलीहि, ख्य समय समोरं जो जिणिज्जा गईए । सयल नहयलं वा लंपए जो पएहिं, अजिय महव संति सो समत्थो थुणेउ ॥ २ ॥ तह वि हु बहुमागुल्लास भत्तिम- रेण, गुणकणमवि कित्तीहामि चिंतामणि च । अलमहब अचिंताणंत सास्तथो सि, फलिहा लहु मव्वं वंछिअं णिच्छिय मे ॥३॥ सपल जय हिमाणं नाममित्तणे जाणं, विहडइ लहु दुट्टा नि दोघथट्ट । नमिर सुर किर डुग्घिट्ट पायरबिंदे, सयय भजिय संती ते जिशिंदेऽभिवंदे ॥४॥ पसरइ घरकिची वड्ढए देहदिती विलसइ भुवि मिची जाइए मुपवित्ती । फुरई परमवित्ती होइ संसारछित्ती, जिणजुअ पयमत्ती ही अचितोरसची ॥५॥ लसिथ पय पयार भूरिदिव्वंग हार, फुड पण रसभावो दार सिंगार सारं अणि , ( ११ ) मिस रमणीजईसणच्छे भीया, इव पणमण मंदा कासि नट्टोवयारं ॥६॥ थुणह अजिअसंती ते कया सेस संति ऋखय रय पिसंगा छज्जए जाणमुत्ती । सर भस परिरंभा रमि नियाण लच्छी, घण थण घुसिणंकुप्पंक पिंगीकयञ्च ॥ ७॥ बहुविह नयभंगं वत्थु णिच्चं अणिच', सदसदणभिलप्पा लप्पमेगं अगं । इय कुनय विरुद्धं सुप्पसिद्धं च जेसि, वयण मवयणिज्ज ते जिणे संभरामि ॥ ८॥ पसरह तियलोए साच मोहंधयारं, भमइ जय मसन्नं ताव मिच्छत्तछन्न । फुरइ फुड फलंताणंत वाणांसुपूरो, पयड मजियसंती झाण सूरो न जाव ॥ ६ ॥ अरि करि हरि तिराहुएहंबु चोराहि वाही, समर डमर मारी रुद्द खुद्दोवसग्गा। पलय मजिअ संती कित्तणे झत्ति जंती, निविड तर तमोहा भक्खरा लुखिमय ॥१०॥ निचित्र दुरित्र दारू दित्त झाणग्गि जाला, परिगयमिव गोर चिंति जाण रूवं । कणय निहस रेहा कति चोरं करिज्जा, चिर थिर मिह लच्छि गाढ संमि अव्व ॥ ११॥ अडवि निवडियाण पत्थिवुत्तासियाणं, जलहि लहरि हीरं ताण गुत्ति द्वियाणं । जलिय जलण जाला लिंगिाणं च झाणं जणयह लहु संतिनाहानिप्राणं ॥ १२ ॥ हरि करि परिकिएणं पक्क . ( १२ ) पाइक पुगणं, सयल पुहवि रज्जं छद्धियाण सज्ज । तण मित्र पडि लग जे जिणा मुत्तिमनगं, चरण मणुपवन्ना हुतु ते मे पसन्ना ॥ १३ ॥ छण ससि वयणाहिं फुल्ल नित्त प्पलाहिं, थण भर नमिरीहिं मुहि गिज्मोदरीहिं । ललिब भुन लयाहिं पीण सोणिस्थलीहिं, सय सुर रमणीहिं बंदियाजेसि पाया ॥१४॥ अरिसकिडिभ कुछ गंठि कासाइसर, खय जर वण लूा सास सोसोदराणि । नह मुह दसरणच्छ। कुच्छि करणाइरोगे, मह जिणजुन पाया सुप्पसाया इरंतु ॥ १५ ॥ इन गुरुदुह तासे पक्खिए चाउमासे, जिणवर दुग थुत बच्छरे वा पवित् । पढह सुणह सिज्झाएह झारह चित्ते, कुणह भुणह विग्यं जे थाएह सिग्धं ॥ १६ ॥ इय विजयाजियसत्तु पुत्त सिरि अजिय जिसर, तह अहराविसेसेण तणय पंचम चकीसर । वित्थंकर सोलसम संति जिणवल्लह' संधु कुरु मंगल मम हाम् दुरिय मखिलंपि धुणंतह ॥ १७ ॥ - (१३) ई नमिऊणनामकं स्मरणम् । १ नमिऊण, पणय सुरमण, चूडामणि किरण रंजिभ युणिणो। चलण जुअलं महाभय, पण सण संवं बुच्छ ॥ १॥ सडिय कर चरण नह मुह, निवुड्ड नासा विचन्न लावण्णा । बुद्ध महारो- गानल कुलिंग निद्दड्ढ सम्बंगा ॥ २ ॥ ले तुह चलणा राहण, सलिलंजलि से वृट्टियच्छया। वणदत्र दवा गिरिपाय-बन्ध पत्ता पुणो लच्छि ।। ३ ।। दुव्याय खुभिय जल -निहि, उमड कल्लोल भीसणारा। संभंत भय विसठ्ठल, निज्जामय मुकवा- बारे ॥ ४ ॥ अविदलिय जाणवत्ता, खणेण पावंति इच्छि कूल । पामजिस चलणजुअणं, निच चित्र जे नमंति नरा॥५॥ खर पवणुधुय वणदव, जालावलि मिलिय सपल दुम गहणे । डत मुद्धमियवहु, मीसणपष भीसणंमि वणे ॥ ६ ॥ जग- गुरुषो कमजुअलं, निष्याविय सयल तिहुअग्णाभो । जे संभरति मणुआ, न कुणा जलणो भयं तेसिं ।। ७॥ विलसंत भोग भीसण, फरिवारुण नयणतरल नीहाले । उन सुअंग नवजलय, सस्थह मीसणाया ॥८॥ मन्न ति कीडसरिस, दूर परिच्छूढ विसम विसवेगा । तुह नामश्वर फुडसिद्ध, मंत --

( १४ )
गुरुया नरा लोए ॥ ६ ॥ अडचीसु मिल्ल तक्कर पुलिंद सद्ल
सद्दभीमासु । भय विहुरखुन्न कायर, उन्लुरित्र पहिश्र सत्थासु
॥ १०॥ अविलुत्त विहव सारा, तुंह नाह ! पणाममत्त बावारा
वक्या बिग्घा सिग्धं, पत्ता हिय इच्छियं ठाणं ॥ ११ ।।
पज्जलिया नल नयणं, दूर विधारिम मुहं महाकाय ।
नह कुलिस घाय विअलिअ, गईद कुमत्थलाभो ॥ १२ ॥
पणय ससंभम पत्थिव, नहमणि माणिक पडि पटिमस्स ।
तुह वयण पहरण घरा, सीहं कुद्धपि न गति ॥ १३ ॥
ससिधवल दंत मुसलं, दोह करुल्लाल पुट्ठिउच्छाह । महपिंग
नयण जुअल, ससलिल नवजलहरारावं ॥ १४ ॥ भीम
महागइंदं, अच्चासन्नपि ते नवि गणंति । जे तुम्ह चलण
जुअलं, मुणिवइ ! तुगं समल्लीणा ॥ १५ ॥ समरिम्मि
तिक्ख खग्गा, भिधाय पविद्ध उध्धुय कवंधे । कुंतविणिभिन्न
करि कलह, मुक्क सिकारपउरम्मि ॥ १६ ॥ निजिय दप्पुध्धुर
रिउ, नरिंद निवहा भडा जसं धवलं । पार्वति पाव पसमिण
पासजिण ! तुहप्पभावेण ॥ १७ ॥ रोग जल जलण विसहर,
चोरारिम द गय रण भयाई । पास जिण नामसेकी-तणेण
पसमंति सवाई ॥ १८ ॥

( १ ) एवं महा भयहरं, पास जिणि दस्स संथव मुयारं । भविय जणाणंदयर, कल्लाणपरंपर निहाणं ।। १६ ।। राय भय जक्ख- रक्खस, कुसुमणि दुस्सउण रिक्खपीडा। संझासु दोसु पंथे उवसग्गे वह य रयणीम् ॥ २० ॥ जो पढई जो अनिसुणह, ताणं कइणो य माणतुंगरस । पासो पांव पसमेउ, सयल भुवणचित्र चलयो ॥ २१ ॥ ४ गणधरदेवस्तुतिनामकं स्मरणम् । तं जयउ जए तित्थं, जमित्थ तिस्थाहिवेण चीरेण । सम्म पवित्तियं भव्य सत्त संताण सुह जयं ॥१॥ नासियमबल किलेसा, निहय कुलेसा पसत्यसुहलेषा । सिरि. बद्धमाण वित्थास, मंगलं दितु ते श्ररिहा ॥ २ ॥ निद्दड्ढकम्मवीच्या, बीश्रा परमे- ठिणो गुणसमिद्धा । सिद्धा तिजर पसिद्धा, हणंतु दुस्थाणि तिस्थस्स ॥ ३ ॥ श्रायार मायरता, पंचपयारं सपा पयासता । पायरिया तह तित्थं, निहय कुतित्थं पयासंतु ।। ४ ।। सम्मसुभ वायगा, वायगा य सिवाय वायगा वाए। पायण' पडिणीय , ( १६ ) कए, वणिंतु सबस्म संघस्स ।। ५ ॥ निवाण साहणुज्जुय, . साहुणं जणिश्र साहज्जा । तित्थप्पभावगा ते, हवंतु परमे हिणो जहणो ॥ ६ ॥ जेणाणुगयं णाणं, निव्याण फलं च चरण मषि हवई । तित्थम्स दसणं तं, मंगुल भवणेउ सिद्धियरं ॥ ७ ॥ निच्छम्मो सुयधम्मो, समग्ग भव्यगि वग्ग कयसम्मो । गुणसुटिअस्स संघस्स, मंगलं सम्ममिह दिसउ || ८ || रम्मो चरित्तधम्मो, संपावित्र भव्य सत्त सिवसम्मो । निसेसफिलेसहरो, हवउ सया सयल संधस्स ।। ६ ॥ गुणगण गुरुणो गुरुणो, सिबसुह मइणो कुरणंतु तित्थस्त । सिरि बद्धमाण पहुपय-डिस्स कुमलं समग्गरस ॥१॥ जिय पडिवक्खा जक्खा, गोमुह मायंग गयमुह पमुक्खा । सिरि चंभस त सहिया, कय नयरक्खा सिवं दितु ।। ११ ।। अंबा पडिहय डिंबा, सिद्धा सिद्धाइया पश्यणस्स । चकेसरि चईरुट्टा, संतिसुरा दिसउ सुक्खाणि ।।१२।। सोलस विज्जा देवीओ, दितु संघस्स मंगलं विउलं । अच्छुता महिलाओ विस्सुअ सुयदेवयाउ समं ।। १३ ।। जिण सासण कयरक्खा, जक्खा यउव्वीस सासणसुरा वि। सुहभावा संतावं तित्थस्स सया प्रणासंतु ॥ १४ ॥ निणपवयणम्मि निरया, विरया कुपहाउ सव्वहा सदे । वेयावच्च फरावि अ, तित्थस्स हवंतु संतिकरा ॥ १५ ॥जिणसमय सुद्ध समग, विहिय भव्याण ( १७ ) जणिय साहज्जो । गीयरई गीअजसो, सपरिवारो सिर्व दिसउ ॥ १६ ॥ गिह गुत्त खित्त जलथल, वण पव्यय वासि देव देवियो । जित सासण ठिाणं, दुहाणि सव्वाणि निहणंतु ॥ १७ ॥ दस दिसिवाला सखित्त-वालया नवग्गहा सनक्खत्ता । जोइणिराउरगह काल-पास कुलिअद्ध पहरेहिं ।। १८ ।। सह काल- कंटएहिं सविष्ठि वच्छेहि कालवेलाहिं । सव्वे सवत्थ सुह, दिसंतु मयस्स संघस्स ।। १६ ।। भवणवइ वाणमंतर, जोइस वेमाणित्रा य जे देवा । धरणिंद सक सहिया, दलंतु दुरियाई तित्थस्स ॥ २० ॥ चकं जस्स जलंतं, गच्छइ पुरो पणासिय तमोहं । तं तित्यस्म भगवओ, नमो नमो बद्धमाणस्स ॥ २१ ॥ सो जयउ जिणो वीरो, जस्सऽज्जवि सासणं जए जयइ । सिद्धिपह- सासणं कुपह, नासणं सवभय महणं ॥ २२ ॥ सिरि उममसेण पमुहा, हपभय निवहा दिसंतु तित्थस्म । सव्व जणाणं गुणहा रिणोऽणहं पंछियं सर्च ॥ २३ ॥ सिरि बद्धमाण तित्था हिवेण तित्थं समाप्पियं जस्स | सम्म सुहम्ममामि, दिसउ सुहे सयल संघस्स ।। २४ ॥ पयइए भद्दियाजे, महाणि दिसंतु सयल सघस्स । इयरसुरावि हु सम्म जिण गणहर कहिय कारिस ॥२५॥ Pr ( १८ ) इप जो पढइ तिसंझ तस्स नत्थि किंपि जएं। जिणदत्ताणाए ठिो, निद्विअहो सुही होई ।। २६ ।। ५ गुरूपारतंत्र्यनामकं स्मरणम् । मयरहियं गुणगण स्या, सायरं सायरं पणमिळणं । सुगुरुजण पारतंत उवहिब धुणामि तं च ।। १ ॥ निम्महिय मोह जोहा, निहय पिरोहा पणट्ट संदेहा । पणयगि वा दाविय, सुह संदेहा सुगुण गेहा ॥२॥ पत्तसुजइत्त सोहा, समत्त पर तित्थ जणि सखोहा । पडिभग्ग मोह जोहा, दमित्रा मुमहत्य सत्योहा ॥ ३ ॥ परिहरिश सत्यवाहा, हय दुहदादा सिवं तत्साहा। संपाविश्न सुहलाहा, खीरोटहिणुन्च अग्गाहा ॥ ४ ॥ सुगुणजण जणि पुज्जा, सज्जो निस्वज गहिर पञ्चज्जा । सिवसुह साहण सज्जा, भवगुरु गिरि चुरणे वजना ।। ५ ।। अज्ज सुहम्म प्पमुहा, गुणगण निवहा सुरिंद विहिन महा। ताण विसंझ नाम, नाम न पणासइ जियाणं ॥६॥ पडिवन्जिय जिणदेवो, देवायरिश्रो दुरत भवति । सिरि . ( १६ ) नेमिचंद सूरी, उज्जोत्रण सूरिणो सुगुरु ।। ७ ।। सिरिबद्धमण सूरी, पयडीकय सू रेमंत माइप्पो । पडिहय कसाय पसरो, सरय ससंकुच सुह जणओ . ), ८ ॥ सुहसील चोर चष्परण, पच्चलो निचलो जिणमयामि । जुगषवर सुद्ध मिद्धत, जाणो पणय मुगुण जणओ ।। ६ ।। पुरो दुल्लह महि व लहस्स अणहिल्लबाडए पयडं । मुक्का विआरिऊणं, सीहेण व दब्बलिंगि गया ॥१०॥ दसमच्छरय निसिवि-प्फुरंत सच्छंद थरिमय तिमिरं । सूरेणव मूरिजिणेसरेण हयमहिअ दोसेण ॥ ११ ॥ सुकइत्तपत कित्ती, पयाड गुत्ती पसंत सुहमुत्ती। पहय परवाइ दित्ती, जिणचंद जईसरो मंती ॥ १२ ॥ पडिअ नवंगसुत्तत्व स्यणुकोसो पणासिब परोसो । मब भविश्र जणमण, कायसंतोसो विगयदोसो ॥ १३ ॥ जुग पवरागम सार, परूवणा करण बंधुरो धणियां । सिरि अभयदेव सूरी, मुणिपवरो परम पसमधरो ॥१४॥ कय सावय संतासो, हरिव्व सारंग भग संदेहो। गय समय र दप्प दलणो, प्रासाइम पवर कव्वरसो ॥ १५ ॥ भीम भव काणणमि अ दंसिघ गुरुवयल रयण संदेहो । निसेस सत्त गुरुयो, सूरी जिणवल्लहो जयइ ॥ १६ ॥ उवरिद्वित्र खच्चरणो चउरणुप्रोगप्पहाण सच्चरणो। असम मयराय महणो, उठ्नुहो -- -- -- -- ។ -- ( २० ) सहई जस्स करो ॥ १७॥ दंसिथ निम्मल निचल दंतगणो गणिय सावोत्थ भयो । गुरु गिरि गरुषो सरहुब, मूरि जिणवल्लहो होत्था ॥ १८ ॥ जुग पवरागम पीऊम-पाण पीणिय मणा कया भव्या । जेण जिणवल्लहेणं, गुरुणा तं सबहा वंदे ॥ १६ ॥ विप्फुरिय पवर परयण, सिरोमणी बूढदुव्बह खमोया जो सेसाणं सेसुब्व, सहइ सत्ताण ताणकरों ॥ २० ॥ सच्चरित्राण महीणं, सुगुरुणं पारतंत मुव्वहइ । जयद जिणदत्तमरी, सिरि निलो पणयमुणिपिलो ॥ २१ ॥ ६ सिग्घमवहरउ नामकं स्मरणम् । सिग्ध मवहरउ विग्धं, जिण बोराणाणुगामि संघस्स । सिरि पासजिणो थंभण, पुरहिरो निद्विानिट्ठा ॥ १ ॥गोयम सुहम्म पमुहा, गणवाणो विहिन भव्य सत्तसुहा । सिरि बद्धमाण जिण तित्थ, सुत्थयं ते कुणंतु सया ॥ २॥ सका इणो सुरा जे, जिण वेयावच्च कारिणो संति । अवहरिय विग्ध संघा, हवंतु ते संघ संतिकरा॥३॥ सिरि थंभणय ठियपास, साम पयपउम पणय पाणीणं । निद्दलिय दुरिय विदो, धरणिंदो हरउ दुरिआई ॥४॥ गोमुह पमुक्ख जक्खा, पडिहय पडिवक्ख परख लक्खा ते। कय सुगुण संघ रक्खा, हेवंतु संपत्त सव सुक्खा ॥ ५ ॥ अप्पहिचक्का .

( २१ । पमुहा, जिणपासण देवयाउ जिणपणया । सिद्धाइया समेया, हवंतु संघस्स विग्घहरा ॥ ६॥ सकाएसा सच्चउर-पुरट्टिो वद्ध- माण जिणभत्तो । सिरि वभसंति जक्खो, रक्खउ सघं पयत्तेणं ॥७॥ खित गिह गुत्त संताण, देस देवाहि देवया ताओ । निव्वु- इपुर पहिआणं, भव्वाण कुणंतु सुक्खाणि ॥ ८ ॥ चक्केसरी चक- धरा, विहिपह रिउछिन्न कंधरा धणियं । सिवसराण लग्ग संघ- स्स, मबाह हरउ विग्याणि ॥ ॥ तित्थवइ वद्धमाणो, जिणे- सरो संगो सु 'घेण । जिणचंदो-ऽभयदेवो, रक्खउ जिणवल्लहो पहु मं ॥ १० ॥ सो जयउ बद्धमाणो, जिणेसरो सरुव्व हयति- मिरो । जिणचंदामयदेवा, पहुणी जिणवल्लहा जे अ॥ ११ ॥ गुरु जिणवल्लह पाए-मयदेव पहुत्तदायगे वंदे । जिणचंद जिणे- सर-वद्धमाण तित्यस्स बुडिकए ॥ १२ ॥ जिणदत्ताणं सम्म, मंन्नति कुणति जे य कारंति । मणसा वयसा वउसा, जयंतु साहम्मिमा तेनि ॥ १३ ॥ जिणदत्त गुणे नाणा-इणो सया जे . धरंतिधारिति दिसिम सिवाय पए नमामि साहम्मिा तेवि ॥१४॥ ७ उवसग्गहरं नामकं स्मरणम् । उबसग्गहरं पासं पासं बंदामि कम्मघण मुकं । विसहर विस निन्नासं मंगल कल्लाण आवासं ॥१॥. विसहर फुलिंग ( २२ ) , मंतं, कंठे धारेह जो मा मणुयो । तस्म गह रोग मारी, बुद्ध जर जति उचसामं ॥ २ ॥ चिट्ठउ दुरे मंतो, तुझ पणामो वि बहुफलो होइ । नर तिरिएसु वि जीवा, पावंति न दुक्ख दोहग्गं ॥ ३ ॥ तुह सम्मत्ते लद्वे, वितामणि कप्पणायकमहिए । पावंति अविग्घेणं, जीवा अयरामरं ठाणं ।। ४ ।। इअ संथुप्रो महायस, भत्तिभर निम्मरेण हिपएण । ता देव ! दिडज योहिं, भवे भवे पास जिणचंद ! ॥ ५ ॥ ॥ इति सप्त स्मरणानि ॥ ऋषिमंडलस्तोत्रम् । याचंताक्षरसंलच्य-मक्षरं व्याप्य यत स्थितं । अग्निज्वाला संमं नाद-विंदुरेखासमन्वितं ॥ १ ॥ अग्निज्वालासमाक्रांत मनोमलविशोधकं । देदीप्यमानं हृत्पद्म, तत्पदं नौमि निमलं ॥ २ ॥ अहमित्यक्षरे ब्रह्मा, बाचक परमेष्ठिनः । सिद्धचक्रस्य सदबीजं, सर्वतः प्रणिधमहे ।। ३ ।। ऊँ नमोऽहंद्य इशेभ्यः, ॐ सिद्धेभ्यो नमो नमः ऊँ नमः सर्वमूरिभ्यः,. उपाध्यायेभ्य ॐ नमः ॥ ४ ॥ ऊँ नमः सर्वसाधुभ्यः, ऊँ ज्ञानेभ्यो नमो नमः । ॐ नमस्तत्वदृष्टिभ्य-श्वरिभ्यस्त ऊँ नम ॥ ५॥ श्रेयसे स्तु ( २३ ) . . थियस्त्वेत-दहंदाधष्टकै शुभं स्थानेश्वष्टसु विन्यस्तं, पृथग्रगीज- समन्वितं ॥ ६ ॥ आद्य पदं शिखां रक्षेत्, परं रक्षेत मस्तकं । तृतीयं रक्षेनेत्रे द्व', तुर्य रक्षेच्च नासिकां ।। ७ ॥ पंचमं तु मुखं रक्षेत, षष्ट क्षेच्च घंटिकां । नाभ्यंतं सप्तम रक्षेद्, रोल्पादांतम ष्टमं ॥ ८ ॥ पूर्वप्रणवतः सांतः, सरेको द्वयब्धिपंचपांन् । सप्ताष्ट- दशसूर्या कान्, श्रितो बिंदुखरान् पृथक् ॥ ६ ॥ पूज्यनाम क्षरा आद्याः, पंचैते ज्ञानदर्शने । चारित्रेभ्यो नमो मध्ये, ही सांतः समलंकुतः ॥१०॥ ॐ हॉ ही हुँ, हूँ, हे, है, हो हः, असिया उमासम्यग् ज्ञानदर्शनचारित्रेभ्यो ही नमः । जम्बूचधरो द्वीपः, क्षारोदधिसम वृतः । अहंदावष्टकैरष्ट काष्ठाधिष्टरलंकृतः ॥ ११ ॥ तन्मध्ये संगतो मेरुः, कूटलरलकृतः उच्च रुच्चस्तरस्तारस्तारा- मंडलमंडितः ॥ १२ ॥ तस्योपरि सकारांतं, बीजमध्यास्य सर्वगं । नमामि विंधमार्हन्त्य, ललाटस्थं निरंजनं ।। १३ ।। अक्षयं निर्मलं शांतं, बहुलं जाड्यतोज्झितं । निरोहं निरहंकार, सारं सारतरं धनं ।। १४ । अनुद्धतं शुभं स्फीतं, सात्विक राज मतं । तामस चिरसवुद्धं, तैजसं शर्वरीसमं ॥ १५ ॥ साकारं च निराकारं सरसं विरसं परं । परापर परवीतं, परंपर परापर ।। १६ ॥ एकवर्ण द्विवर्ण व, त्रिवणं तुर्यवर्णकं ! पंचवर्ण महा- ( २४ ) वर्ण, सपरं च परापरं ॥ १७ ॥ सकलं निष्कलं तुष्ट', निवृतं भ्रांतिवजितं । निरंजनं निराकार, निर्लेप वीतसंश्रयं ॥ १८ ॥ ईश्वरं ब्रह्मसंयुद्धं बुद्धं सिद्धं मतं गुरु | ज्योतीरूपं महादेवं, लोकालोक प्रकाशकं ॥ २६ ॥ अदाख्यस्तु वर्णातः, सरेको विदुमंडितः । तुयस्वर सामायुक्तो, बहुधा नादामालितः ।। २० । अस्मित् वीजे स्थिताः सर्वे, वृषभाया जिनोत्तमाः। वर्णेनिजेनि- जैयुक्ता, ध्यातव्यास्तत्र संगताः ॥ २१ ॥ नादच'द्रसमाकारो, विदुर्नीलसमप्रभः । कलारुणसमासांतः, स्वर्णामः सर्वतोमुखः'।२२ । शिरःसंलोन ईकारो, विनीलो वर्णतः स्मृतः । वर्णानुसारसलीनं, तीर्थमृत्मंडलं स्तुमः ॥ २३ ॥ चंद्रपभ पुष्पदती, नादस्थिति समाश्रितौ । विंदुमध्यगतौ नेमि-सुनतौ जिनसत्तमौ ॥ २४ । पद्मप्रभवासु-पूज्यौ, कलापद मधिष्टितौ । शिरईस्थिति-सलीनौ, पाचमल्ली जिनेश्वरौ ।। २५ । शेपास्तीर्थकृतः सर्वे, हरस्थाने नियोजिताः । मायावीजाक्षरं प्राप्ता-चतुर्विशति-रहतां ॥ २६ ॥ गतरागद्वेषमोहाः, सर्वपापविवर्जिताः । सर्वदा सर्वकालेषु, ते भवंतु जिनोत्तमाः ॥ २७ ॥ देवदेवस्य यच्चक्रं, तस्य चकस्य या विभा। तया च्छादितसर्वांगं मा मां हिनस्तु डाकिनी । २८ ।। देवदे० मा मां हिनस्तु राकिनी ॥ २६ ॥ देवदे. मामां हिनस्तु ( २५ ) लाकिनी ॥३०॥ देवदे० मा मां हिनस्तु काकिनी ॥३१॥ देवदे० मा मां हिनस्तु शाकिनी ।। ३२ ।। देवदे। मा मां हिनस्तु हांकिनी ॥ ३३ ॥ देवदे० । मा मां हिनस्तु याकिनी ॥३४॥ देवदे० । मा मां हिंसंतु पन्नागाः ॥ ३५ ॥ देवदे० । मा मां हिंसंतु हास्तिनः ॥३६॥ देवदे० । मा मां हिंसंतु राक्षसाः ॥३७॥ देवदे० । मा मां हिंसंतु वह्नयः ।। ३८॥ देवदे० । मा मां हिंसंतु सिंहका ॥ ३६॥ देवदे। मा मां हिंसंतु दुर्जनाः ॥४०॥ देवदे० । मा मां हिंसंतु भूमिपाः ।। ४१ ॥ श्रीगौतमस्य या मुद्रा, तस्या या भुवि लब्धयः । तामि रभ्युद्यत ज्योति-रहं सर्व निधीश्वरः ॥ ४२ ॥ पाताल वासिनो देवा, देवा भपीठवासिनः । स्वर्गासिनोऽपि ये देवाः, सर्वे रतंतु मामितः ॥४३॥ येऽवधि :लब्धयो ये तु, परमावधि लब्धयः । ते सर्वे मुनयो देवा, मां संरक्षतु सर्वदा ।।४४॥ दुर्जना भूतवेतालः, पिशाचा मुद्गलास्तथा । तेसर्वेऽप्युप शाम्यंतु, देवदेव प्रभावतः ॥४५॥ ॐ ह्रीं श्रश्व धृतिर्लक्ष्मी-गौरी चडी सरस्वती । जयांबा विजया नित्या, क्लिन्ना जिता मदद्रवा ॥४६॥ कामांगा काम- वाणा च, 'सानंदा नंदमालिनी । माया मायाविनी रौद्रो, कला , (• २६ ) काली कलिप्रिया ॥४७॥ एताः सर्वा महादेव्यो, वर्तन्ते या जग- स्त्रये । मह्यं सर्वाः प्रयच्छंतु, कांति कीर्ति वृति ममि ॥४८॥ दिव्यो गोप्यः सुदुष्प्राप्यः, श्रीऋपिमंडलस्तयः । भापितस्तीर्थ- नायेन, जगत्त्राणकृतेऽनघः ॥४६॥रणे राजकुले वहौ, जले दुर्गे गजे हरौ । श्मशाने विपिने घोरे, स्मृतो रक्षति मानवं ।। ५० ॥ राज्यभ्रष्टा निजं राज्यं, पदभ्रष्टा निजं पदं । लक्ष्मीभ्रष्टा निजां लक्ष्मी, प्राप्नुवंति न संशयः ।। ५१।। भार्यार्थी लभते भार्यां, पुत्रार्थी लभते सुतं । वित्तार्थी लभते वित्तः, नरः, स्मरण मात्रतः ॥५२॥ स्वर्णे रूप्ये पटे कांस्ये, लिखित्वा यस्तु पूजयेत् । तस्यैवाप्टमहासिद्धि गृहे दसति शाश्वती ॥५३॥भूर्जपत्रे लिखित्वेदं गलके मूर्ध्नि वाभुजे। धारित सर्वदा दिव्य,सर्वभीतिविनाशकं ॥५४॥ भूत प्रेतेहैयः,पिशाचै- मुद्गलैमलैः। वातपित्ताकफोद्रेक- मुच्यते नात्र संशयः ॥५५॥ भूर्भुवःस्वस्त्रयीपीठ-वत्तिनः शाश्वता जिनाः तैः स्तुतैन्दितैप्टै यत् फलं तत्फलं श्रुतौ ।।५६।। एतद् गोप्यं महास्तोत्रं, न देयं यस्य कस्यचिद् | मिथ्यात्ववासिने दत्ते, बालहत्या पदे पढ़े ॥ ५७॥ आचाम्लादि तपः कृत्वा, पूज-यित्वा जिनावलि । अष्टसाहस्त्रिको आपः, कार्यस्वसिद्धिहेतवे ।। ५८ ॥ शतमप्टोत्तरं प्रात-यें पठति . . ( २७ ) दिने दिने। तेषां न व्याधयो देहे, प्रभवति न चापदः ॥ ५६ ॥ 'अष्टमासावधि यावत् , प्रातः प्रातस्तु यः पठेत् । स्तोत्रमेतन्महा- तेजो, जिनविम्न, सपश्यति ॥ ६०॥ दृष्टे सत्य हतो विवे, भवे “सप्तमके ध्रुवं । पदं प्राप्नोति शुद्धात्मा, परमानंदनंदित ॥ ६१॥ विश्ववंद्यो भवेद् ध्याता, कल्याणानि च सोऽश्नुते । गत्वा स्थानं पर सोऽपि, भूयस्तु न निवर्त्तते ॥ ६२ ।। इदं स्तोत्रं महास्तोत्रं, स्तुतीनामुत्त, मैं परं । पठनात्स्मरण जापा-ल्लभ्यतेप- दमुत्तमं ।। ६३ ।। इति श्रीऋषिमंडलस्तोत्रं । श्रीभकामर-स्तोत्रम् । भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रमाणा-मुद्यो-तकं दलित- पाप-तमो-वितानम् ॥ सम्यक् प्रणम्म जिन-पाद-युगं युगादा- वालम्बनं भव-जले पततां जन नाम् ।। १ ।। यः संस्तुतः सकल- वाङ्मय--तत्वबोधा-दुद्भूत-बुद्धि-पटुमिः सुरलोक-नाथैः ॥ स्तोत्रैर्जगत्रितय-चित्तहरैरुदारैः। स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथम जिनेन्द्रम् ॥ २ ॥ (युग्मम् ) बुद्धया विनापि विबुधार्चित-पाद- २८ ) - पीठ ! स्तोतुं समुद्यत-मतिविंगत-त्रपोऽहम् ॥ वालं विहाय जल- संस्थितन्दुिबिम्ब-मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ? ॥३॥ वक्तुं गुणान् गुण-समुद्र ! शशाङ्क-कान्तान् । कस्ते क्षमः सुरगुरु-प्रतिमोऽपि बुद्धया १ ॥ कल्पान्त-काल-पवनोद्धत- नक्र-चक्र | को बा तरी तुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम् ? ॥४॥ सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश ! कर्तुं स्तवं विगत-शक्तिरपि प्रवृत्तः ।। प्रीत्यात्म-वीर्यमविचार्य मृगो मृगेन्द्र । नाभ्येति किं निज-शिशोः परिपालनार्थम् १ ॥ ५ ॥ अल्पश्रुतं श्रुतवतां परि- हास-धाम । त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम् ॥ यत् कोकित्तः फिल मधौ मधुरं विरोति । तच्चारु-चूत-कलिकानिकरैक--हेतुः ॥६॥ त्वत्संस्तवेन भव--संतति--सन्निवद्धं । पाप क्षणात् क्षय- मुपैति शरीरभाजाम् ॥ श्राकान्तलोकमलि--नीलमशेषमाशु । सूर्यांशु--भिन्नमित्र शावरमन्धकारम् ॥ ७ ॥ मत्वेति नाथ ! तब संस्तवनं मयेद--मारभ्यते तनुधियापि तव प्रभावात् ।। चेतो हरिप्यति सतां नलिनी-दलेषु । मुक्ताफल--द्युतिमुपैति ननूद-- बिन्दुः ॥ ८॥ प्रास्तां तव स्तवनमस्त--समस्त-दोपं । त्वत्संक- थापि जगतां दुरितानि हन्ति ॥ दूरे सहस्रकिरणः कुरुते प्रभव । 뿔 ( २६ ) प्रमाकरेषु ! जलजानि विकाशभाजि ॥ ६॥ नात्यद्भुतं भुवन- भूषण ! भूतनाथ ! भूतगुणैभुवि भवन्तमभिष्टुव॑न्तः ॥ तुल्या भवन्ति भवतो ना तेन किं वा । भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति १ ॥ १० ॥ दृष्ट्वा भवन्तमनिमेषविलोकनीयं । नान्यत्र तोष पुपयाति जनस्य चक्षुः ॥ पीत्वा पयः शशि--कर--धुति - दुग्ध-सिन्धोः । क्षारं जलं जलनिधेरशितुं क इच्छेत् १ ॥ ११ ॥ यः शान्तराग--रुचिभिः परमाणुमिस्त्वं । निर्मारितत्रिभुवनैक-- ललाम--भूत ! ।। तावन्त एव खलु तेऽप्यणवः पृथिव्यां । यत्त समानमपरं न हि रूपमस्ति ॥ १२॥ वक्त्रं क ते सुर--नरोरग-- नेत्र-हारि । निःशेषनिर्जितजगत्-त्रितयोपमानम् ॥ विम्बं कलङ्क- मलिनं च निशाकरस्य । यद् वासरे भवति पाण्डु--पलाश-- कल्पम् ॥ १३ ॥ सम्पूर्ण--मण्डल-शशाङ्क--कला--कलाप--शुभ्रा गुणास्त्रिभुवनं तव लङघयन्ति ॥ ये संश्रितास्त्रि--जगदीश्वर-नाथ- मेकं । कस्तान निवारयति संचरतो यथेष्टम् १ ॥ १४ ॥ चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्गनाभि-नीतं मनागपि मनो न विकार- मार्गम् ॥ कल्पान्त-काल-मस्ता चलिताचलेन । किं मन्दराद्रि- शिखर चलितं कदाचित् १ ॥ १५ ॥ निधूमवर्त्तिरपवजित- (३०) तैलपूरः। कृत्स्नं जगत्त्रयमिदं प्रकटीकरोपि।। गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां । दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाशः ।। १६ ।। नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्यः । स्पष्टीकरोपि सहसा युगपज्जगन्ति ॥ नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा--प्रभावः । सूर्यातिशायि--महिमाऽमि मुनीन्द्र ! लोके ॥ १७ ॥ नित्योदयं दलित--मोह-महान्कारं । गम्यं न राहु-बदनस्य न वारिदानाम् ।। विभ्राजते तब मुखाजमनल्प--कान्ति । विद्योतयज्जगदपूर्वशशाङ्क- बिम्बम् ॥ १८ ॥ किं शरापु शशिनाऽति विवस्वता वा । युष्मन्मुखेन्दु-दलितेषु तमस्तु नाथ ! || निप्पन्न--शालि--धन- शालिनि जीव-लोके । कार्य कियजल वरजल--भार नम्र ? ॥ १६ ॥ ज्ञानं यथा त्वयि विमाति कृतावकाश । नैव तथा हरिहरादिषु नायकेपु ॥ तेनः स्फुरन्मणिपु याति यथा महत्वं । नै तु काच-शकले किरणाकुलेऽपि ।। २० ।। मन्ये वरं हरिहरा- दय एव दृष्टा । दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोपमोति ।। किं वीक्षिवेन मवता भुवि येन नान्यः । कश्चिन्मनो हरति नय ! भवान्तरेऽपि ॥ २१ ॥ स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति 'पुत्रान् । नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता ।। सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र- - ( ३१ ) रश्मि । प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशुजालम् ॥ २२ ॥ त्वामा- मनन्ति मुनयः परमं पुमांस--मादित्यवर्णममलं तमसः परस्तात् ।। त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयन्ति मृत्यु । नान्यः शिवः शिव--पदस्य मुनीन्द्र ! पन्थः ॥ २३ ॥ त्वामव्ययं विभुमचिन्त्यमसं- ख्यमाघ । ब्रह्माणमीश्वरमनन्तमनङ्गकेतुम् ॥ योगीश्वरं विदित- गोगमनेकमेकं । ज्ञान--स्वरूपममलं प्रवदन्ति सन्तः ॥ २४ ॥ वुद्धस्त्वमेव विवुधार्चित--बुद्धिबोधात् । त्वं शंकरोऽसि भुवनत्रय-- शंकरत्वात् ॥ धाताऽसि धोर ! शिव--मार्ग--विधेविधानाद् । व्यक्त लमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि ॥ २५ ॥ तुभ्यं नमत्रिभुव- नातिहराय नाथ ! तुभ्यं नमः क्षिति--तलामलभूषणाय ॥ तुभ्यं नमत्रिजगतः परमेश्वराय । तुभ्यं नमो जिन ! भवोदधि--शोष- गाय ॥ २६ ॥ को विस्मयोऽत्र- यदि नाम गुणैरशेषै--स्त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश ! दोषै--हमात--विविधाश्रय--जात- गईः । स्वप्नान्तरेपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि ॥ २७ ॥ उच्चर- शोक--तरु--संश्रितमुन्मयूख--माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम् ।। स्पष्टोल्न सकिरणमस्त--तमो--वितानं । विम्बं वेरिव पयोधर पार्श्व-वर्ति ॥ २८ ॥ सिंहासने मणि--मयूख--शिखा--विचित्रे .

( ३ )
विभ्राजते ८व वपुः कनकावदातम् ॥ विम्यं वियद्विलसदंशुलता--
वितानं । तुङ्गोदयाद्रि शिरसीव सहस्ररश्मेः ।। २६ ॥ कुन्दावदात
चलचमार -चारु- शोभं । विभ्राजते तव वपुः कलधौत-कान्तम् ।।
उद्यच्छशाङ्क--शुचि--निर्भर--बारिधार--मुच्चस्तटं सुरगिरेरिव शात
कौम्भम् ॥ ३० ॥ छत्र--त्रयं तव विभाति शशाङ्क-कान्तमुच्चः
स्थितं स्थगित--मानु--कर--प्रतापम् ॥ मुक्ताफल--प्रकरंजाल--विवृद्ध
शोभं। प्रख्यापयत् त्रिजगतः परमेश्वरत्वम् ॥ ३१ । उन्निद्र--
हेम--नव--पङ्कज पुञ्ज-कान्ति--पर्युलसन्नखमयूख । पादौ पदानि
वर यत्र जिनेन्द्र ! धत्तः। पनानि तत्र विबुधाः परिकल्पयति
॥ ३२ ॥ इत्थं यथा तब विभूतिरभूजिनेन्द्र ! धर्मोपदेशन--
विधौ न तथा परस्य || यादृक् प्रमा दिनकृतः प्रहतान्धकारा।
तादृक् कृतो ग्रह--गणस्य विकासिनो ॥ ३३ ॥ श्च्योतन्मदा-
बिलविलोल--कपोल--मूल--मत्त--भ्रमर--नाद-विवृद्धकोपम् ॥
ऐरावताममिममुद्ध तमापतन्तं । दृष्टवा भयं भवति नो भवदाश्रि-
तानाम् ॥ ३४ ॥ मिन्नेम--कुम्मगलदुज्ज्वल--शोणिताक्त । मुक्ता-
फल--प्रकर-भूषितभूमि--भागः॥ बंद्ध-क्रमः क्रम-गतं हरिणा-
धिपोऽपि । नाकामति क्रम--युगाचल--संश्रित ते ॥ ३५ ॥

( ३३ ) कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-वह्वि-कल्पं । दावानलं ज्वलित- मुज्ज्वलमुत्स्फुलिङ्गम् ॥ विश्व जिघत्सुमित्र संमुखमापतन्तं । त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम् ॥ ३६ ॥ रक क्षणं समद- कोकिल-कण्ठ-नीलं । क्रोधोद्धतं फणिनमुत्फणमायतनम् ॥ श्राकामति क्रम-युगेन निरस्त-शङ्क-स्त्वन्नाम-नाग-दमनी हृदि यस्य पुंसः ॥ ३७ ॥ वल्ग-तुरङ्ग--गज-गर्जित-भीमनाद-माजी बलं बलवतामपि भूपतीनाम् ।। उद्यदिवाकर-मयूखशिखापविद्धं । त्वत्कीर्तनात् तम इवाशु भिदामुपैति ॥ ३८ ॥ कुन्ताग्र-भिन्न गज-शोणितवारिवाह-वेगावतार- तरणोतुर-याधभीमे ॥ युद्धे जयं विजित-दुर्जेय जेय-पक्षा-स्त्वत्पादपङ्कज-बनाय॑िणो लभन्ते ॥ ३६ ॥ अम्भोनिधौ क्षुभितभीषण-नक्र-चक्र-पाठीन- पीठ-भयदोल्बण-वाडवाग्नौ ॥ रङ्गत्तरङ्ग-शिखर-स्थित-यान- पात्रा-स्त्रासं विहाय भवतः स्मरणाद् व्रजन्ति ॥ ४० ॥ उद्भूत- भीषणजलोदर-भारभुग्नाः । शोच्यां दशामुपगताश्चयुतजावि- ताशाः ॥ त्वत्पादपङ्कज-रजोऽमृत-दिग्ध-देहा। मां भवन्ति मकरध्वजतुल्य-रूपाः ॥ ४१ ।। आपाद कएठमुरु शृङ्खल-वेष्टि- ताङ्गा । गाढं बृहन्निगडकोटि-निघृष्टजङ्घाः ॥ त्वन्नाममन्त्र- ( ३४ ) मनिशं मनुजाः स्मरन्तः । सद्यः स्वयं विगत-बन्ध--मया भवन्ति ॥ ४२ ॥--मत्त--द्विपेन्द्र--मृगराज--दवानलाहि--संग्रामवारिधि-- महोदर-बन्धनोत्थम् ॥ तस्याशु नाशमुपयाति भयं भियेव । यस्तावकं स्तवमिमं मतिमानधीते ॥ ४३ ॥ स्तोत्रसज तब जिनेन्द्र गुणैर्निवद्धां । भक्त्या मया रुचिरवर्णविचित्रपुष्पाम् ।। धत्ते जनो य इह कंठगतामजस्र । तं मानतुंगगमनशा समुपैति लक्ष्मीः॥४४॥ श्री कल्याणमन्दिरस्तोत्रम्: कल्याणमन्दिरमुदारमवद्यभेदि । भीताभयप्रदमनिंदितमंघि- पमम् ॥ संसारसागरनिमज्जदशेषजन्तु-पोतायमनममिनम्प जिनेश्वरस्य ॥ १॥ यस्य स्वयं सुरगुरुर्गरिमाम्बुराशेः । स्तोत्रं सुविस्तृतमतिर्न विभुविधातुम् ॥ तीर्थेवरस्य कमठस्मयधूमकेतो-- स्तस्याहमेप किल संस्तवनं करिष्ये ॥ २॥ (युग्मम् ) सामान्य तोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूप--मस्मादृशाः कथमधीश ! भवन्त्य- धीशाः ? धृष्टोऽपि कौशिकशिशुर्यदि वा दिवान्धो । रूपं प्ररूप- यति किं किल धर्मरश्मः ॥ ३ ॥ मोहक्षयादनुभवन्नपि नाथ !

मयो। नूनं गुणान् गणयितुं न तव क्षमेत ॥ कल्पान्तवान्त- पयसः प्रकटोऽपि यस्मा--मीयेत केन जलधेर्ननु रत्नराशिः ॥४॥ अभ्युद्यतोऽस्मि तब नाथ ! जडाशयोऽपि । कतुं स्तवं लसदस- ङ्ख्यगुणाकरस्य || चालोऽपि किं न निजबाहुयुगं वितत्य । विस्तीर्णतां कथयति स्वधियाऽम्बुराशेः॥ ५॥ ये योगिनामपि न यान्ति गुणास्तवेश ! वक्तु कथं भवति तेषु ममावकाशः ॥ जाता तदेवमसमीक्षितकारितेयं जल्पन्ति वा निजगिरा ननु पक्षिणोऽपि ।॥ ६ ॥ आस्तामचिन्त्यमहिमा जिन ! संस्तवस्ते । नामापि पाति भवतो भवतो जगन्ति । तीव्रातपोपहतपान्थजनान्निदाघे । प्रीणाति पद्मसरसः सरसोऽनिलोऽपि ॥ ७ ॥ हृद्ववर्तिनि त्वयि विभो शिथिलीभवन्ति । जन्तोः क्षणेन निविडा भपि कर्मबन्धाः । सद्यो भुजङ्गमया इव मध्यभाग--मभ्यागते वनशिखण्डिनि चन्दनस्य ॥ ८॥ मुच्यन्त एव मनुवाः सहसा जिनेन्द्र ! रौद्ररुपद्रवश- तैस्त्वयि वीक्षितेऽपि ॥ गोस्वामिनि स्फुरिततेजासि दृष्टमात्रे । चौरैरिवाशु पशवः प्रपलायमानः ॥६॥ त्वं तारको जिन ! कथं भविनां त एव ? त्वामुद्वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्तः ॥ यदा दतिस्तरति पज्जलमेष नून--मन्तर्गतस्य मरुतः स किलानुभावः ( ३६ ) ॥१०॥ यस्मिन् हरप्रभृतयोऽपि हतप्रभावाः । सोऽपि त्वया रतिपतिः क्षपितः क्षणेन ।। विध्यापिता हुनभुनः पयासाऽथ येन । पीतं न किं तदपि दुर्द्धरयाडवेन ? ॥ ११ ॥ स्वामिन्ननल्पगरि- मालामपि प्रपन्ना--स्त्वां जन्तवः कथमहो हदये दधानाः ॥ जन्मोदधिं लघु तरन्त्य तिलाघवेन ? । चिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रमावः ।। १२ ।। क्रोधस्त्वया यदि विभो प्रथमं निरस्तो। ध्वस्तास्तदा वत कथं किल कर्मचोगः ॥ लोपत्यमुत्र यदि वा शिशिराऽपि लोके । नीलद्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी ? ॥ १३ ॥ त्वां योगिनी जिन सदा परमात्मरूप-मन्वेषयन्ति हृदयाम्बुजकोशदेशे ।। पूतस्य निर्मलरुचेर्यदि पा किमन्य-दक्षस्य सम्भवि पदं ननु कर्णिकायाः ॥ १४॥ ध्यानाजिनेश ! भवतो भविनः क्षणेन । देहं विहाय परमात्मदशां व्रजन्ति ॥ तीव्रानला- दुपलभावमपास्य लोके । चामीकरत्वमचिरादिव धातुभेदाः ॥१॥ अन्तः सदैव जिन ! यस्य विभाव्यसे त्वं । भव्यः कथं तदपि नाशयसे शरीरम् ।। एतत्स्वरूपमथ मध्यविवात्तिनो हि । यद्विग्रह प्रशमयन्ति महानुभावाः ।। १६ ॥ आत्मा मनीषिभिरयं त्वदमे- दवुद्धया । ध्यातो जिनेन्द्र ! भवतीह भवत्प्रभावः ।। पानीयमप्यमृ- - ( ३७ ) तमित्यनुचिन्त्यमानं । किं नाम नो विषविकारमपाकरोति १ ॥१७॥ त्वामेव बीततमसं परवादिनोऽपि । नूनं विभो हरिहरादिधिया प्रपन्नाः॥ किं काचकामलिभिरीश सितोऽपि शङ्खों । नो गृह्यते विविधवर्णविपर्ययेण ॥ १८॥ धर्मोपदेशसमये सविधानुभावा- दास्तां जनो भवति ते तरुरप्यशोकः ॥ अभ्युग्दते दिनपतौ समही- रुहोऽपि । किं वा विवोधमुपयाति न नीवलोकः ।। १६ ।। चित्रं विभो कथमवाङ्मुखपृन्तमेव । विष्वक् पतत्य-विरला सुरपुष्पवृष्टिः। त्वग्दोचरे सुमनसां यदि वा मुनीश । गच्छन्ति नूनमध एव हि बन्धनानि ।। २० ।। स्थाने गमोरहृदयोदधिसम्भवायाः । पीयूषता तत्र गिरः समुदीरयन्ति ॥ 'पीत्वा यतः परमसम्मदसङ्गभांजो । भव्या व्रजन्ति तरसाप्यजरामरत्वम् ।। २१ ।। स्वामिन् ! सुदूरमव- नम्य समुत्पतन्तो । मन्ये वदन्ति शुचयः सुरचामरौघाः । येऽस्मै नतिं विदधते मुनिपुङ्गवाय । ते नूनमूर्ध्वगतयः खलु शुद्धभावाः ॥ २२ ॥ श्यामं गभीरगिरमुज्ज्वलहेमरत्न । सिंहासनस्थमिड भव्यशिखण्डिनस्त्वाम् ॥ आलोकयन्ति रभसेन नदन्तमुच्च- श्रामिकराद्रिशिरसीव नवाम्बुबाहम् ॥ २२ ॥ उग्द्च्छाता तव शितिद्युतिमण्डलेन । लुप्तच्छदच्छविरशोकतरुय । सान्निध्यतोऽपि - .

- ( ३८ ) यदि वातव वीतराग ! नीरागतां वनति को न सचेतनोऽपि ॥२४॥ भो भोः प्रमादमवधूय भजधमेन-भागत्य नितिपुरी प्रति सार्थवाहम् ॥ एतनिवेदयति देव ! जगत्त्रयाय । मन्ये नदन्नभिनमः सुरदुन्दुभिस्ते ॥ २५ ॥ उद्योतितेषु भवता भुवनेषु नाथ ! तारा- न्वितो विधुरयं विहिताधिकारः ।। मुक्ताकलापकलितोवसितातपत्र व्याजास्त्रिधा धृततनुर्धवमभ्युपेतः ।। २६ ।। स्वेन प्रपूरितजगत्त्र- यपिग्रिडतेन । कान्तिप्रतापयशसामिव सञ्चयेन || माणिक्यहेमरज- तप्रविनिर्मितेन । सालत्रयेण भगवन्नमितो विभासि ॥ २७ ॥ दिव्यस्रजो जिन ! नमत्-त्रिदशाधिपाना-मुत्सृज्य रत्नरचितानपि मौलिबन्धान् ।। पदी श्रयन्ति भवतो यदि वा परत्र । त्वत्सङ्गमे सुमनसो न रमन्त एव ॥ २८ ॥ त्वं नाथ जन्मजलधेविपराङ्मु- खोऽपि । यत्तारयस्यसुमतो निजपृष्ठलग्नान् ॥ युक्त हि पार्थि- वनिपस्य सतस्तवैव । चित्रं विमो यदसि कर्म विपाकशून्यः ॥२६॥ विश्व श्वरोऽपि जनपालक ! दुर्ग-तस्त्वं । किंवावर प्रकृतिरप्यलि- पिस्त्वमीश || अज्ञानवत्यपि सदैव कथश्चिदेव । ज्ञानं त्वयि स्फुरति विश्वविकाशहेतुः ॥ ३० ॥ प्राग्मारसम्भृतनमांसि रजांसि रोपा-दुत्थापितानी कमठेन शठेन पानि ।। छायाऽपि तैस्तव न !

३१ नाथ हता हताशो । ग्रस्तस्त्वमीभिरयमेव परं दुरात्मा ।।३।। यद्ग दुर्जितघनौष-मश्रभीमं । भ्रश्यत्तडिन्मुसलमांसलधोर- धारम् ॥ दैत्येन मुक्तमथ दुस्तरवारि दः । ते नैव तस्य जिन दुस्तरवारिकृत्यम् ।। ३२ ॥ धस्तोर्ध्वकेशविकृताकृतिमय॑मुण्ड- प्रालम्प्रभृद्भयदवक्त्रविनियंदग्निः ॥ प्रेतत्रजः प्रति भवन्तमपीरिती यः । सोऽस्याऽभवत्प्रतिभवं भवदुःखहेतुः ॥ ३३ ॥ धन्यास्त एव भुवनाधिप ये त्रिसन्ध्य-माराधयन्ति विधिवद्विधुतान्यकृत्याः ।। भन्योल्लसत्पुलकपक्षमलदेहदेशाः । पादद्वयं तव. विभो भुवि जन्मभाजः ॥ ३४॥ अस्मिन्नपारभववारिनिधौ सुनीशं ! मन्ये न मे श्रवणगोचरतां गतोऽसि ॥ आकणिते तु तव गोत्रपवित्र- मन्त्रे किंवा विपद्विषधरी सविध समेति ॥ ३५ ॥ जन्मानतरेऽपि तब पादयुगं न देच ! मन्ये मया महितमीहितदानदचम् ॥ तेनेह जन्मनि मुनीश ! परभवानां । जातो निकेतनमहं मथिताश- यानाम् ॥ ३६ ।। नूनं न मोहतिमिरावृतलोचनेन' पूर्व विभो ! सकृदपि प्रविलोकितोऽसि ॥ मर्माविधी विधुरयन्ति हि मामनर्थाः । प्रोद्यत्प्रबन्धगतयः कथमन्यथैते ॥३७॥? आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीचितोऽपि । नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या ।। ।

(४०) जातोऽस्मि तेन जनवान्धव दुःखपात्रं । यस्मात्क्रियाः प्रतिफलन्ति न भावशून्याः ॥ ३८ ॥ त्वं नाथ ! दुःखिजनवत्सल ! हे शरएप ! कारुण्यपुण्यवसते वशिनां वरेण्य ! ॥ भक्त्या नते मयि महेश ! दयां, विधाय । दुःखांकुरोदलनतत्परतां विधेहि ॥ ३६॥ निःसंख्य- सारशरणं शरणं शरण्यमासाद्य सादितरिपुप्रथितावदातम् ॥ त्वत्पादपङ्कजमपि प्रणिधानवन्ध्यो । वध्योऽस्मि चेभुवनपावन ! हा हतोऽस्मि ॥ ४० ॥ देवेन्द्रवन्ध विदिताखिलवस्तुसार !। संसारतारक ! विभो ! भुवनाधिनाथ ! ॥ त्रायस्व देव ! करणा- हुंद मां पुनीहि । सीदन्तमद्य भयदव्यसनाम्बुराशेः ॥ ४१ ।। यद्यस्ति नाथ भवदधियरोरुहाणां । भक्तेः फलं किमपि सन्तति- सञ्चितायाः ॥ तन्मे त्वदेकशरणस्य शरण्यः भूयाः । स्वामी त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि ॥ ४२ ॥ इत्थं समाहितधियो विधिवजिनेन्द्र । सान्द्रोलसत्पुलकञ्चुकिताङ्गभागाः ॥ त्वबिम्ब- निर्मलमुखाम्बुजबद्धलक्ष्य । ये संस्तवं तव विभो ! रवयन्ति भव्याः ।। ४३ ॥ जननपनकुमुदचन्द्र-प्रभास्वराः स्वर्गसम्पदो भुक्त्वा । ते विगलितमलनिचया । अचिरान्मोक्षं प्रपद्यन्ते (युग्मम्) ॥४४|| ( ४१ ) ॥ अथ जिनपञ्जर स्तत्रोम् ॥ ॐ ह्रीं श्रीं अर्ह अहद्भ्यो नमोनमः । ॐ ह्रीं श्रीं अर्ह सिद्धेभ्यो नमोनमः । ॐ ह्रीं श्रीं अहं प्राचार्येभ्य नमोमनः । ॐ हीं श्रीं अह उपाध्यायेभ्यो नमानमः । ॐ ह्रीं श्रीं अह श्री गौतमस्वामिप्रमुख सर्वसाधुभ्यो नमोनमः ॥ १॥ एस पञ्च- नमस्कारः, , सर्व-पापक्षयंकरः। मंगलानां च सर्वेषां प्रथमं भवति मंगलम् ॥ २॥ ॐ हीं श्री जये विजये, अहं परमात्माने नमः । कमलप्रभ-सूरीन्द्रो, भापते जिनपञ्जरम् ।। ३ । एकभक्तोपवासेन, त्रिकालं यः पठेदिदम् । मनोऽभिलषितं सर्च, फलं स लभते ध्रुवम् ॥ ४ ॥ भूशय्याब्रह्मचर्येण, क्रोधलोभविवर्जितः । देवताग्रे पवित्रात्मा, परमासैर्लभते फलम् ॥ ५॥ अर्हतं स्थापये मूर्ध्नि, मिद्धं चक्षुर्ललाटके । आचार्य श्रोत्रयोमंध्ये, उपाध्यायं तु प्राणके ॥ ६ ॥ साधुवृन्दं मुखस्याग्रे, मनः शुद्धं विधाय च । सूर्य-चन्द्र . निरोधेन, सुधीः सर्वार्थ-सिद्धये ॥ ७॥ दक्षिणे मदन-द्वेषी, वाम- पार्वे स्थितो जिनः । अंगसंधिषु सर्वज्ञः, परमेष्ठी शिवङ्करः ॥८॥ पूर्वाशां श्री जिनो रक्ष,-दाग्नेयीं विजितेन्द्रिः । दक्षिणाशां पर ( ४२ ) - ब्रह्म, नैऋती च त्रिकालवित् ।। || पश्चिमाशां जगन्नाथो, वायवीं परमेश्वर । उत्तगं तीर्थकृत् सर्वामीशानी च निरञ्जनः ॥ १० ॥ पातालं भगवानहन्नाकाशं पुरुषोत्तम । रोहिणीप्रमुखा देव्यो, रक्षन्तु सकलं कुलम् ॥ ११ ॥ ऋपमो मस्तकं रक्षे- दजितोऽपि विलोचने । संभवः कर्ण-युगल. नासिका चामिनन्दनः ॥ १२ ॥ औष्ठौ श्रीसुमती रक्षेद्, दन्तान् पद्मप्रभो विभुः । जिह्वां सुपार्श्वदेवोऽयं, तालु चन्द्रप्रभो विभुः ॥ १३ ॥ कण्ठं श्रीसुविधी रक्षेद्, हृदयं श्रीसुशीतलः । श्रेयांसो वाहु-युगलं, वासु- पूज्यः कर-द्वयम् ॥ १४ ॥ अगुलीविमलो रक्षेद् , अनन्तोऽसौ स्तनावपि । सुधर्मोऽप्युदरास्थीनि, श्रीशान्ति मि-मण्डलम् ।।१।। श्रीकुन्थुगुह्यकं रक्षे,-दरो रोम-कटी-तटम् । मल्लिहरू पृष्ठवंशं, जङ्घ च मुनिसुव्रतः ॥ १६ ।। पादाङ्गुलीनमी रक्षेत् , भीनोमि- श्चरणद्वायम् । श्रीपार्श्वनाथः सर्वांगं, वर्धमानश्चिदात्मकम् ॥१७॥ पृथि-बीजल-तेजस्क-बाबांकाशमयं "जगत् । रक्षेदशेप-पापेभ्यो, वीतरागो निरञ्जनः ॥ १८॥ राजद्वारे स्मशाने वा, संग्रामे शत्रुसंकटे व्याघ-चोराग्नि-सर्षादि-भूत प्रेत-भया-श्रिते ॥ १६ ॥ अकाल-मरण-प्राप्त दारिद्रयापत्स-माश्रिते। मपुत्रत्वे महादोषे, - ( ४३ ) मूर्खत्वे रोगपीड़िते ॥ २० ॥ डाकिनी-शाकिनी-ग्रस्ते, महा-ग्रह- गणार्दिते । नद्युत्तारेऽध्व-वैषम्ये, व्यसने चापदि स्मरेत् ।। २१ ॥ प्रातरेव समुत्थाय, यः स्मरेजिनपञ्जरम् । तस्य किश्चिद्भय नास्ति, लभते सुखसंपदम् ।। २२ ॥ जिनपञ्जरनामेदं यः स्मर- त्यनुवा सरम् । क्रमलप्रमराजेन्द्र, श्रि 'यं स लभते नरः॥२३॥ प्रातः समुत्थाय पठेत् कृतज्ञो, यः स्तोत्रमेतज्जिनपञ्जराख्यम् । आसादयेत्स कमलप्रभारुयां,-लक्ष्मी मनोवाञ्छित-पूरणाय ॥ २४ ॥ श्रीरुद्रपल्लीग्र-वरेण्य-गच्छे, देवप्रभाचार्य-पदान्ज-हंसः । वादीन्द्र-चूडाणिरेष जैनो जीयाद् गुरुः श्रीकमल-प्रभाख्यः ॥२५॥ इति श्रीजिनपंजर-स्तोत्रं संपूर्णम् ।। - ॥ श्रीमहावीराय नमः॥ अथ लघुजिनसहस्रनाम प्रारंभः नमस्त्रिलोकनाथाय, · सर्वज्ञाय महात्मने । वक्ष्ये तस्यैव नामानि, मोक्षसौख्यामिलाषया ॥ १॥ निर्मलः शाश्वतः शुद्धो, निर्विकल्पो निरामयः । निःशरीरी निरातंक, सिद्धः सूक्ष्मो ( ४४ ) - निरंजनः निष्कलं को निरालंबो, निर्मोह निमलोत्तमः । निर्भयो निरहंकारो, निर्विकारोऽथ निष्क्रियः ॥३॥ निदापो नीरुजः शान्तो, निर्भयो निर्ममः शिवः । निस्तरंगो, निराकर निष्कर्मा निष्कलः प्रभु ॥ ४॥ निर्वादोऽनुपमज्ञानो, नीरागो निरघो जिनः । निःशब्दः प्रतिमश्लेष्ठ, उत्कृष्टो ज्ञानगोचरः ॥ ५॥ निःसंगात्मा- सकैवल्यो, नैष्ठिकः शब्दवर्जितः । अनियो महपूतात्मा जगतशिखर शेखरः ॥ ६॥ निःशब्दो गुणसंपन्नः पापतापप्रणाशनः । सोऽपि योग.च्छुभं प्राप्तः, कर्मयोतिबलावहः ।। ७ ।। अजरचामरः सिद्ध, स्त्वर्चितश्चाक्षयो विभुः । अमूर्तस्त्वच्युतो ब्रह्म, विष्णुरीशः प्रजापतिः ॥ ८॥ विश्वनाथस्त्वनिंद्यश्चा, अननोऽनुपमो भवः । अप्रमेयो जगन्नाथो, बोधरूपो जिनात्मकः ॥ ॥ श्रव्ययः सुकलाराध्यो, निष्पन्नो ज्ञानलोचनः । अच्छेद्यो निर्मलो नित्यः, सर्वशल्यविवर्जितः ॥ १०॥ अजेयः सर्वतोभद्रो, निष्कपायो मवान्तकः । विश्वनाथः स्वयंयुद्धो, वीतरागो जिनेश्वरः ॥ ११॥ अंतका सहजानंद, स्त्ववाङ्मनसगोचरः । असाध्यः शुद्धश्चैतन्यः कर्मण्योऽकर्मचर्जितः ॥ १२ ॥ श्रितो विमलज्ञानी, निस्पृहो निष्प्रकाशकः । कर्मार्जितो महात्मा च लोकत्रयशिरोमणिः ॥१३॥ - १ - ..

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( ४७ ) देवदेवेशनायकः ॥ ३६॥ वरेण्यो भवविध्वंसी, योगिनांज्ञान- मोचरः जन्ममृत्युजरातीतः, सर्वविघ्नहरो हरः ॥ ३७॥ विश्व- हरभव्य संबंधः, पवित्रो गुण मागरः । प्रसन्नः परमाराध्यो, लोका- लोकप्रकाशकः ॥३८॥ रत्नगर्भो जगत्स्वामी, शक्रवंद्यः सुरा- र्चितः । निष्प्रपंचो निरात को, निःशेषत शनाशकः ॥ ३६॥ लोकेशो लोकसंसेव्यो, लोकालोकविलोकिनः । लोकोत्तमस्त्रिलो- केशो, लोकाग्रशिखरस्थितः ॥ ४०॥ नामाष्टकसहस्राणि ये पुनः। ते निर्वाणपदं यांतिप्राणिनो नात्र संशयः ॥४१॥ य लघुजिनसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।। - ste त्यं, जिनः परमशङ्करः । नाथः परम- ॥ १॥ सर्पविघ्नहरः स्वामी सर्व- श्रीकरः परमार्थदः ॥ २॥ शिवः । परमात्मा परब्रह्म : सुरज्येष्ठो, भूतेशः पुरुषो-

( ४४ )
निरंजनः निष्कलंको निरालंबो, निर्मोह निमलोत्तमः । निर्भयो
निरहंकारो, निर्विकारोऽथ निष्क्रियः ॥३।। निदापो नारुनः शान्तो,
निर्भयो निर्ममः शिवः । निस्तरंगा, निराकर निष्कर्मा निष्कलः
प्रभु ॥४॥ निर्वादोऽनुपमज्ञानो, नीरागो निरयो जिनः ।
निःशब्दः प्रतिमश्लेष्ठ, उत्कृष्टो ज्ञानगोचरः ।। ५ ।। निःसंगात्या-
सकैवल्यो, नैष्ठिकः शब्दवर्जितः । अनियो महपूतात्मा जगतशिखर
शेखरः ॥ ६॥ निःशब्दो गुणसंपन्नः पापतापग्रणाशनः ।
सोऽपि योग च्छुभं प्राप्तः, कर्मयोतिबलावहः ॥ ७॥ अजरश्चामरः
सिद्ध, स्त्वर्चितश्चाक्षयो विभुः । अमूर्तस्त्वच्युतो ब्रह्म, विष्णुरीशः
प्रजापतिः ॥८॥ विश्वनाथस्त्वनिंद्यश्चा, अननोऽनुपमो भवः ।
अप्रमेयो जगन्नाथो, बोधरूपो जिनात्मकः ॥ ६॥ अव्ययः
सकलाराध्यो, निष्पन्नो ज्ञानलोचनः । अच्छेद्यो निर्मलो नित्यः,
सर्वशल्यविवर्जितः ॥ १०॥ अजेयः सर्वतोभद्रो, निष्कपायो
मवान्तकः । विश्वनाथः स्वयंयुद्धो, वीतरागो जिनेश्वरः ॥११॥
अंतकः सहजानंद, स्त्ववाङ्मनसगोचरः । असाध्यः शुद्धश्चैतन्यः
कर्मण्योऽकर्मवर्जितः ॥ १२ ॥ अनंतो विमलज्ञानी, निस्पृहो
निष्प्रकाशकः । कर्मार्जितो महात्मा च लोकत्रयशिरोमणिः ॥१३॥

- ( ४५ ) अव्यावाधो वरः शंभुर्विश्वेदी पितामहः शर्वभूतहितो देवः, सर्व- लोकशरण्यकः ॥ १४ ॥ अनान्दरूप-श्चैतन्यो, भगवांत्रिजगद्- गुरुः । अनंतानंतधीशक्तिः, सत्यव्यक्तोऽव्ययात्मकः ॥ १५ अष्टकम विनिमुक्तः, सप्तधातुविवर्जितः । गौरवादित्रयाद्रः, सर्व- ज्ञानादिसंयुतः ॥ १६ ॥ अभयः प्राप्तकैवन्यो, निर्मानो निरपे- क्षकः । निष्कलः केवल ज्ञानी, मुक्तिसौख्यप्रदायकः ॥१७॥ अनामयो महाराध्यो, वरदो ज्ञानपावकः । सर्वेशः सत्सुखावासो, जिनेंद्रो मुनिसंस्तुतः ॥ १८ ॥ अन्यूनः परमज्ञानी, विश्वतत्त्व- प्रकाशकः । प्रबुद्धो भगवन्नाथः प्रस्तुतः पुण्यकारकः ।। १६ ।। शंकरः सुगतो रौद्रः, सर्वज्ञोमदनांतक । ईश्वरो भुवनाधीशः, सच्चित्तः पुरुषोत्तमः ॥ २० ।। - सद्योजातमहात्मा च विमुक्को मुक्तियन्लभः । योगीन्द्रोऽनादिसंसिद्धो, निरीहो ज्ञानगोचरः ॥ २१ ॥ सदाशिवश्चतुर्वक्त्रः, सत्सौख्यस्त्रिपुरान्तकः । त्रिनेत्रस्त्रि- जगत्पूज्यः, कल्याणकोष्टमूर्तिकः ॥ २२ ॥ सर्वसाधुननैर्वन्धः सर्वपापविवर्जितः । सर्वदेवाधिको देवः सर्वभूतहितकरः ॥ २३ ।। स्वयंविद्यो- महात्मा च प्रसिद्धः पापनाशनः । तनुमात्रचिदानंद, श्चैतन्य श्चैत्यवैभवः ॥ २४ ॥ सकलातिशयो देवो, मुक्तिस्थो ( ४६ ) - महतामहः । मुक्ति कार्याप संतुष्टो, नीरोगः परमेश्वरः ।। २५ ।। महादेवो महावीरो, महामोहविनाशकः । महाभावो महादों, महामुक्तिप्रदायकः ॥ २६ ॥ महाज्ञानी महायोगी, महातपो महात्मकः । महर्दिको महावीर्यो, महान्तिकपदस्थितः ॥ २७ ॥ महापूज्यो महावंद्यो, महाविघ्नविनाशकः । महासौख्यो महापुंसो, महामहिम अच्युतः ॥ २८ ॥ मुक्तो मुक्तिजसंबोध, एकोऽनेको विनिश्चलः । सर्व-बंधविनिर्मुक्तः सर्वलो प्रधानकः ॥ २६ || महा- शूगे महाधीरो, महादुःखविनाशकः । महामुनिप्रदो धीरो, महा- हृयो महागुरुः ॥ ३० ॥ निर्मारो मार विध्वंसो, निष्कामो विप- यच्युतः । भगवांश्च महाभ्रांत:, शांतिकल्याणकारका ॥ ३१ १॥ परमात्मा परंज्योतिः, परमेष्ठीरमेश्ररः । परमात्मा परानन्द, परश्च परमात्मकः ॥ ३२ ॥ प्रस्तुतानंतविज्ञानी, सौख्यनिर्वा- णसंयुतः । नाकृतिरक्षरो वर्णों, व्योमरूपो जितात्मकः ॥ ३३ ॥ व्यत्तोऽन्यतजसंयुद्धः, संसारच्छेदकारणः । निरवद्यो महाराध्यः, कर्मजिद्धर्मनायकः ॥ ३४ ॥ बोधिसत्वो जगन्यो, विश्वात्मा नरकांतकः । स्वयंभूः पापहृत्पूज्यः, पुनीतो विभवः स्तुतः ॥३५॥ वर्णातीतो महातीतो, रूपातीतो निरंजनः । अनंतज्ञानसंपूर्णी, ( ४७ ) ... देवदेवेशनायकः ॥ ३६॥ वरेण्यो भवविध्वंसी, योगिनांज्ञान- गोचरः जन्ममृत्युजरातीतः, सर्वविघ्नहरो हरः ॥ ३७ ॥ विश्व- भिव्यसंबंधः, पवित्रो गुण मागरः । प्रमन्नः परमाराध्यो, लोका- लोकप्रकाशकः ॥ ३८ ॥ रत्नगर्भो जगत्स्वामी, शक्रवंद्यः सुरा- चितः । निष्प्रपंचो निरात को, निःशेषत शनाशकः ॥ ३९ ॥ लोकेशो लोकसंसेव्यो, लोकालोकविलोकिनः । लोकोत्तमस्त्रिलो- केशो, 'लोकाग्रशिखरस्थितः ॥ ४० ॥ नामाष्टकसहस्राणि ये पठन्ति पुनः पुनः । ते निर्वाणपदं यांतिप्राणिनो नात्र संशयः ॥४१॥ इति श्रीभद्रबाहुस्वामिविरचितं लघुजिनसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।। ~ . .॥ श्रीमन्त्राधिराजस्तोत्रम् ॥ श्रीपार्श्वः पातु वो नित्यं, जिनः परमशङ्करः । नाथः परम- शक्तिश्च, शरण्यः शरण कामदः ॥ १ ॥ सर्वविघ्नहरः स्वामी सर्व- सिद्धिप्रदायकः । सर्ववत्वहितो योगी, श्रीकरः परमार्थदः ॥ २ ॥ देवदेवः स्वयंसिद्ध-श्चिदानन्दमयः शिवः । परमात्मा परब्रह्म परमः परमेश्वरः ॥ ३ ॥ जगन्नाथः सुरज्येष्ठो, भूतेशः पुरुषो- तमः । सुरेन्द्रो नित्यधर्मश्च, श्रीनिवासः शुभार्णवः ॥ ४ ॥ सर्वज्ञः सर्वदः सर्वगोत्तमः । सर्वात्मा सर्वदर्शी च, सर्वव्यापी जगद्गुरुः ॥ ५ ॥ तत्त्वमूर्तिः परादित्यः, परब्रह्म प्रकाशकः । परमेन्दुः परप्राणः परमामृतसिद्धिदः ॥ ६ ॥ अजः सनातनः शम्भु-रीश्व- रश्च सदाशिवः प्रमोदात्मा, क्षेत्राधीशः शुभप्रदः ॥ ७ ॥ साकारश्च निराकारः, सकलो निष्कलोऽव्ययः । निर्ममो निर्विकारच, निर्वि- कल्पो निरामयः ॥ ८ ॥ अमरश्चाजरोऽनन्त, एकोऽनन्तः शिवा- स्मकः । अलक्ष्यश्चैव वामेयो, ध्यानलच्यो निरंजनः ॥ ६ ॥ ॐ काराकृतिरव्यको, व्यक्तरूपस्त्रययीमयः। ब्रह्मद्वयप्रकाशात्मा, निर्भयः परमाक्षरः ॥ १० ॥ दिव्यतेजोमयः शान्तः परामृतमपोऽच्युतः । आढ्योऽनाढ्यः परेशानः, परमेष्ठी परः पुमान् ॥ ११ ॥ शुद्ध- स्फटिकसंकाशः, स्वयंभूः परमाच्युतः । व्योमाकारस्वरूवश्च, लोकालोकावभासकः ॥ १२ ॥ ज्ञानात्मा परमानन्दः, प्राणारूढो नमः स्थितिः । मनः साध्यो मनोध्येयो, मनोदृश्यः परापरः ॥ १३ ॥ सर्वतीर्थमयो नित्यः, सर्वदेवमयः प्रभुः । भगवान् सर्वतत्त्वेशः शिवश्रीसौख्यदायकः ॥ १४ ॥ इतिश्री पार्श्वनाथस्य, सर्वज्ञस्य जगद्गुरोः । दिव्यमष्टोत्तरनाम, शतमत्र प्रकीर्तितम् " ( ४ ) ॥ १५ ॥ पवित्रं परमं ध्येयं, परमानन्द-दायकम् । भुक्तिमुक्तिप्रदं नित्यं, पठते मंगलप्रदम् ॥ १६ ॥ श्रामम् परमकल्याण-सिद्धिदः श्रेय सेऽस्तु वः। पार्श्वनाथ जिनः श्रीमान् , भगवान् परमः शिव- ॥ १७॥ धरणेन्द्रफलछत्रालंकृतो व श्रियं प्रभुः । दद्यात् पद्माव- तीदेव्या, समधिष्ठितशासनः ॥ १८ ॥ ध्यायेत् कमलमध्मस्थं, श्रीपार्श्व जगदीश्वरम् ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं समायुक्तं, केवलज्ञानभास्करम् ॥ १६ ॥ पद्मावत्यालित वामे, धरणेन्द्रेण दक्षिणे। परितोऽटद- लस्थेन मंत्रराजेन संयुतम् ॥ २० ॥ अष्टपत्रस्थितैर्यस्य, नमस्का- रैस्तथा त्रिभिः । ज्ञानार्वेष्टितं नाथं, धर्मार्थकाममोक्षदम् ॥२१॥ शतपोडशदलारूढं, विद्यादेवीमिन्वितम् । चतुर्विशतिपत्रस्थं, जिन मातृसमावृतम् ॥ २२ ॥ माया वेष्टयत्रयाग्रस्थं, क्रौंकारसहित प्रभुम् । नवग्रहावृतं देवं, दिक्पालैर्दशभिवृतम् ।। २३ ॥ चतुष्को- णेषु मंत्राघचतुर्वीजान्वितैर्जिनैः । चतुरष्टदशद्वीति द्विधाङ्कसंज्ञकैयु- तम् ॥ २४ ॥ दिक्षु क्षकारयुक्तेन, विदिक्षु लांकितेन च । चतुर- स्रण बज्राङ्क-क्षितितत्वे प्रतिष्ठितः॥ २५ ॥ श्रीपार्श्वनाथमित्येव, यः समाराधयेजिनम् । तसर्वपापनिमुक्त, भजते श्रीः शुभप्रद्रा ॥ २६ ॥ जिनेशः पूजितो भक्त्य संस्तुतः प्रस्तुतोऽथवा । ध्या- - (५०) तस्त्वं यः क्षणं वापि सिद्धिस्तेषां महोदय ॥ २७ ॥ श्रीपार्श्व में- • राजान्ते चिन्तामणि गुणास्पदम् । शान्तिपुष्टिकरं नित्यं, क्षुद्रो- पद्रवनाशनम् ॥ २८ ॥ ऋद्धिसिद्धि महाबुद्धिधृति-धीकान्तिकीर्ति- दम् । मृत्युञ्जयं शिवान्यानं जपन्नानन्दितो जनः ॥ २६ ॥ सर्व- कल्याणपूर्णः स्यात् , जरामृत्युविवर्जितः । अणिमादिमहामिद्धि वक्षजापेन चाप्नुयात् ॥ ३० ॥ प्राणायाममनोमंत्रयोगादमृत- 'मात्मनि । त्वमात्मानं शिवं ध्यात्वा स्वामिन् सिध्यन्ति जन्तव ॥ ३१॥ हर्षदः कामदश्वोति रिपुनः सर्वसौख्यदः । पातु वः परमानंदलक्षणः संस्मृतो जिनः ॥ ३२ ॥ तत्वरूपमिदं स्तोत्रं सर्वमंगलसिद्धिदम् । त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं, प्राप्नोति च स हि श्रियम् ।। ३३ ॥ ॥ अथ आत्मरक्षास्तोत्रं ॥ ॐ परमेष्ठी नमस्कार सारं नवपदात्मकं । प्रात्मरचाकर वज्रपिंजराभं स्मराम्यहम् ॥ १॥ ॐ नमो अरिहंताणं शिरस्क शिरसिस्थितम् । ॐ नमोसिमसिद्धाणं मुखे मुखपटंबरं ॥ २ ॥ ॐ नमो आयरियाणं अंगरक्षाविशायिनी। ॐ नमो उपझायाणं ( ५१ ) . आयुध हस्तयोरें ॥३॥ ॐ नमो सब्यसाहुणं मोचके पदायोः शुभे। एसो पंव नमोकारो शिलाबनमयीतले ॥ ४ ॥ सबपा- वपणासणो वोपत्रमयीवही । मंगलाणं च सव्वेसि खादिरांगा- रखातिका ॥ ५॥ स्वाहांतं च पदं ज्ञेयं पढमं हबई मंगलम्। वोपरि वन्नमयं पिधानं देहरक्षणे ॥ ६॥ महाप्रभावरक्षेयं क्षुद्रों- पद्रवनाशिनी । परमेष्ठिपदोद्भुता कथिता पूर्वसूरिमिः ॥ ७ ॥ यश्चैवं कुरुते रक्षां परमेष्ठिपदः हृदा । तस्य न स्याइयं व्याधि- राविश्वापि कदाचन ॥८॥ इति आत्मरक्षास्तोत्र समाप्त' । ॥ अथ पंचषष्ठियंत्रगर्भितं श्रीचतु- विशतिजिनस्तोत्रम् ॥ श्रादौ नेमिजिन नौमि संभव सुविधि तथा । धर्मनाथ महा देवं शान्तिः शान्तिकरं सदा ॥१॥ अनंत सुव्रतं भक्त्या नमिनाथं जिनोत्तमं । अजितं जितकंदपं चन्द्र चन्द्रसमप्रभम् ॥२॥ आदिनाथं तथा देवं सुपाव विमलं जिनं । मल्लिनाथं गुणोपेतं ( ५२ ) धनुपां पंचविंशतिम् ॥३॥ अरनाथं महावीरं सुमतिं च जगद्- गुरुम् । श्रीपद्मप्रभुनामानं वासुपूज्यं सुरैर्नतम् ॥ ४॥ शीतलं शीतलं लोके श्रेयांसं श्रेयसे सदा । कुन्थुनाथं च वामेयं विश्वा- मिनन्दनं विभु॥ ५ ॥ जिनानां नामभिर्यद्धः पंचपष्ठिसमुद्भवः । यन्त्रोयं राजते पत्र तत्र सौख्यं निरंतरम् ॥ ६॥ यस्मिन्गृहे महाभक्त्या यन्त्रोयं पूज्यते बुधैः । भूतप्रेतपिशाचादिभयं तत्र न विद्यते ।। ७ ।। सकलगुणनिधानं यंत्रमेतद्विशुद्धं, हृदयकमलको रो वीमतां ध्येयरूपम् । जयतिलकगुरोः श्रीमूरिराजस्य शिष्यो वदति मुखनिधानं मोक्षलक्ष्मीनिवासः ॥ ८॥ शति ।। ॥ सरस्वतीस्तोत्रम् ॥ त्वं शारदा देवि समस्त शारदा विचित्ररूपा बहुवर्णसंयुता । स्फुरन्ति लोकेषु तवैव सूक्तयः सुधास्वरूपा वचसा महोर्मयः १॥ भवद्विलोलम्बकदर्शनादहो मन्दोपि शीघ्र' कविरेव जायते । तचैव महात्म्यमखगडमीक्ष्यते तवार्थवादः पुनरेव गीयते m -- ( ५३ ) ॥ २ ॥ करनीहारकरोज्वलो तनुर्विभाति ते भारति शुक्लनीरजे। कराग्रभागे धृतचारुपुस्तका डिण्डीरहीरामलशुभ्रचीवरा ॥३॥ मरालवाला मलवामवाहना स्वहस्तविन्यस्त विशालकच्छपी । ललाटपट्ट कृतहेमशेखरा सन्ना प्रसन्ना भवतात्सरस्वती ॥४॥ सद्विद्याजलराशितारणतरी सद्रूपविद्याधरी । जाड्यध्धान्तहरी सुधा- ब्धिलहरी श्रेयस्करी सुन्दरी ॥ सत्या त्वं भुवनेश्वरी शिवपुरी सूर्यप्रभाजित्वरी ॥ स्वेच्छादानवितागनिर्जरगवी सन्तापतांछित्त्वरी ॥ ५॥ सुरनरसुसेव्या सेवकेनापि सेव्या । भवति यदि भवत्या किं कृपा कामगव्या ॥ जगति सकलसूर्यस्त्वत्समाननभव्या । रुचिरसकल विद्या दायिका त्वं तु नव्या ॥६॥ यो भक्त्या सुरितो नीति सततं जन्नन्ति मौढ्य महत्त्वत्सेवा च चरीकरीति तरसा बोमोति संश्रेयसां ॥ त्वं भात रिधर्ति चेतसि निजे दद्र- ष्टिरोचिर्मयम् । तस्याग्रे नरिनति योजित करो भूपो नटीवत्स्व- यम् ॥ ७॥ श्राख्यातु तव देवि कोपि न विभुर्माहात्म्यमामू- लतो नो ब्रह्मा न च शंकरो नहि हरिनों वाशतिः स्वपतिः ।। स्वच्छक्तिर्वरिवति विश्वजननी लोकत्रयव्यापिनी । सा त्वं काचिद- गम्यरम्यहृदया वाग्वादिनी पाहि माम् ॥ ८॥ स्तोत्रं पठेद्यः ( ४ ) श्रुतदेवतायाः। भक्त्यायुतः शुद्ध मनाः प्रभाते । विद्याविलास विपुलं प्रकाशं । प्राप्नोति पूर्ण कमलानिवासम् ॥ ६ ॥ ॥ ग्रहशान्तिस्तोत्रम् ॥ नगद्गुरु नमस्कृत्य श्रुत्वा सद्गुरुभाषितम् । ग्रहशान्ति प्रवक्ष्यामि लोकानां सुखहेतवे ॥ १॥ जिनेन्द्रा खेचरा ज्ञेयाः पूजनीया विधिक्रमात् । पुष्पविलेपने पैवेद्य स्तुष्टिहेतवे ॥२॥ पद्मप्रमस्य मातंडश्चंद्रप्रमस्य च । वासुपूज्यो भूमिपुत्रो बुधोप्यष्ट- जिनेश्वराः ॥३॥ विमलानंतधर्माराः शान्तिकु धुमिस्तथा । वर्द्धमानो जिनेन्द्राणां पादपद्म धुधं न्यसेत् ॥ ४॥ ऋपमानित- सुपाश्चिाभिनंदनशीतलौ। सुमतिः संभवः स्वामी श्रेयांसश्च वृहस्पतिः ॥ ५॥ सुविधेः कथितः शुक्रः सुव्रतस्य शनैश्चरः । नेमिनाथो भवेद्राहु: केतुः श्रीमल्लिपाययोः जन्मलग्ने च राशी च यदा पीयन्ति खेचराः । तदा संपूजयेद्धीमान् खेचरैः सहितान जिनान् ॥ ७॥ पुष्पगंधादिमिळू पैनैवेद्य फलसंयुतैः । वर्णसह- शदानैश्च वासोमिदक्षिणान्वितैः ॥ ॥ ॐ आदित्यसोममंगल- . :

( ५५ ) बुधगुरुशुक्रशनैश्चरोराहुः। केतुप्रमुखाः खेटा जिनपतिपुरतोऽवति छन्तु ॥ ॥ जिननामकृतोचारा देशनक्षत्रवर्ण के । स्तुताश्च पूजिता भक्त्या ग्रहाः संतु सुखावहाः ॥ १० ॥ जिनानामग्रतः स्थित्वा ग्रहाणां तुष्टिहेतवे । नमस्कारशतं भक्त्या जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥ ११ ॥ भद्रबाहुस्वाचेदं पंचमः श्रुतकेवली । विद्याप्रवा- दतः पूर्वाद् ग्रहशान्तिर्विनिर्मितः ॥ १२ ॥ ॥ इति श्रीनवग्रहशान्तिस्तोत्रम् ॥ M ॥ श्री गौतमाष्टकम् ॥ श्रीइन्द्रभूतिर्वसुभूतिपुत्रं पृथ्वीभवं गौतमगोत्ररत्नम् । स्तुवन्ति देवाः सुरमानवेन्द्राः स गौतमो यच्छतु वाञ्छित मे ॥१॥ श्रीवर्धमानस्त्रिपदीमवाप्य, मुहूर्तमात्रेण कृतानि येन । अंगानि पूर्वाणि चतुर्दशापि स गौ० ॥ २॥ श्रीवीरनाथेन पुरा प्रणीतं, मंत्रं महानंदसुखाय यस्य । ध्यायन्त्यमी सरिवराः समग्राः, स गौ० ॥३॥ यस्याभिधानं मुनयोऽपि सर्वे, गृह्णन्ति मिता भ्रम- णस्य काले । मिष्टानपानाम्बर पूर्णकामाः, स गौ० ॥ ४ ॥ अष्टापदाद्री गगने स्वशक्त्या, ययौ जिनानां पदवंदनाय ।

( ५६ ) निशम्य तीर्थातिशयं सुरेभ्यः स गौ० ॥ ५ ॥ त्रिपञ्चसंख्याशत- वापसानां तपःकशानांनपुनर्मवाय । अक्षीणलब्ध्या परमानदाता, स गौ० ॥ ६॥ सदक्षिणं भोजनमेव देयं साधर्मिक संघसपर्य- येति । कैवल्यवस्त्रं प्रददौ मुनीनां, स गौ० ॥ ७॥ शिवंगते मर्तरि वीरनाथे युगप्रधानत्वमिहेव मत्वा । पट्टाभिषेके विदधे सुरेन्द्रः, स गौ० ॥ ८॥ त्रैलोक्यनीज विज्ञानबीजं परमात्मवीजं परमेष्ठि- बीजम् । यन्नाममंत्रं विदधे सुरेन्द्रः, स गौ० ॥ ६ ॥ श्रीगौतम- स्याष्टकमा दरेण प्रबोधकाले मुनिपुगवा ये । पठन्ति ते रिपद मूरिषद सदैवानन्दं लभन्ते सुतरां क्रमेण ॥ १० ॥ इति गौतमस्याष्टकम् ।। HA M ॥ अथ वृहद् शान्तिः ॥ भो भो भव्याः ! शृणुत वचनं प्रस्तुतं सर्वमेतत् , ये यात्रायां त्रिभुवनगुरोराहतामक्तिभाजः । तेषां शान्तिर्भवतु भवता मईदादि-प्रभावा,-दारोग्य श्रीधृति-मतिकरी क्लेश-विध्वंश-हेतुः ॥१॥ मो मो भव्यलोका इह हि भरतैरावत-विदेह-सम्भवाना, ( ५७ ) - समस्त-तीर्थकृतां जन्मन्यासन-प्रशम्पानन्तर-मवधिना विज्ञाय सौध- मर्माधिपतिः सुघोषो-घण्टा-चालना-नन्तरं सकल-सुरासुरेन्द्र सह समागत्य । सविनयमहट्टारकं गृहीत्वा गत्वा कनकाद्रिशृ.गे विहितजन्माभिपेकः शान्ति-मुद्घो-पयति, ततोऽहं कृता नुकार- मिति कृत्वा-'महाजनो येन गतः स पन्थाः' इति भव्य-जन। सह समागत्य, स्नानपीठे स्मात्रं विधाय शान्तिमुद्घोपयामि। तत्पूजायात्रा-लात्रादि-महोत्सवानन्तरम् , २ स्वाहा । ॐ पुण्याई २, प्रायन्तां २, भगवन्तोऽर्हन्तः सयज्ञाः, सर्वदर्शिनः । त्रैलोक्य- नाथा, त्रैलोक्य महिताः, त्रैलोक्ये-पूज्याः, त्रैलोक्येश्वराः, त्रैलो- क्योद्योतकराः ॥ ॐ श्री केवलज्ञानी १; निर्वाणी २, सागर ३, महायशः ४, विमल . ५, सर्वानुभूति ६, श्रीधर ७, दत्त ८, दामोदर है, सुतेजः १०, स्वामी ११, मुनिसुव्रत १२, सुमति १३, शिवगति १४, अस्वाग १५, नमीश्वर १६, अनिल १७, यशोधर १८, कृतार्थ १६, जिनेश्वर २०, शुद्धमति २१, शिव- कर २२, स्यन्दन २३, संप्रति २४, एते अतीतचतुर्विशति- तीर्थकराः॥ ॐ श्रीऋषम १, अजित २, सम्भव, ३, अभिनन्दन ४, 4 (५८) सुमति ५, पद्मप्रभ ६, सुपार्श्व ७, चन्द्रप्रभ ८, सुविधि ६, शीतल १०, श्रेयांस ११, वासुपूज्य १२, विमल १३, अनन्त १४, धर्म १५, शान्ति १६, कुन्थु १७, अर १८. मल्लि १६, मुनिसुव्रत २०, नमि २१, नेमि २२, पार्श्व २३, वर्द्धमान २४, एते वर्तमानजिनाः ॥ ॐ श्रीपद्मनाभ १, शूरदेव २, सुपार्श्व ३, स्वयंभ ४, सर्वानुभूति ५, देवश्रुत ६, उदय ७, पेढाल ८, पोटिल है, शतकीर्ति १०, सुव्रत ११, अमम १२, निष्कपाय १३, निष्पु- लाक १४, निर्मम १५, चित्रगुप्त १६, समाधि १७, संवर १८, यशोधर १६, विजय २०, मल्लि २१, देव २२, अनन्तवीर्य २३, भद्र'कर २४, एते भाव-तीर्थ-करा जिनाः शान्ताः शान्ति- करा भवन्तु । ॐ मुनयो मुनि-प्रवरा रियु-विजय-दुर्मिक्षकान्तारेषु दुर्ग-मार्गेपु रक्षन्तु यो नित्यम् ॥ ॐ श्रीनाभि १, जितशत्रु २, जितारि ३, संवर ४, मेघ ५, धर ६, प्रतिष्ठ ७, महसेन ८, सुग्रीव ६, दृढरथ १०, विष्णु ११, वासुपूज्य १२, कृतवर्म १३, सिंहसेन १४, मानु १५, विश्वसेन १६, सूर १७, सुदर्शन १८, कुम्भ १६, सुमित्र २०, विजय २१, समुद्रविजय २२, अश्वसेन ( ५६ ) . २३, सिद्धार्थ २४, इति वर्तमान-चतुर्विशति-जिन-जनकाः ॥ ॐ श्री परुदेवी १, विजया २, सेना ३, सिद्धार्थी ४, सुमंगला ५, सुसीमा ६, पृथ्वीमाता ७, लक्ष्मणा ८, रामा ६, नन्दा १., विष्णु ११, जया १२, श्यामा १३, सुयशा १४, सुव्रता १५, अचिरा १६, श्री १७, देवी १८, प्रभावती १६, पमा २०, वप्रा २१, शिवा २२, वामा २३, त्रिशला २४, इति वर्तमानजिनजनन्यः॥ ॐ श्री गोमुख १, महायच २, त्रिमुख ३, यक्षनायक ४, तुम्जुरु ५, कुसुम ६, मातंग ७, विजय ८, अजित 8, ब्रह्मा १०, यवराज ११, कुमार १२, षण्मुख १३, पाताल १४, किन्नर १५, गरुड १६, गन्धव १७, यक्षराज १८, कुबेर १६, वरुण २ , भृकुटी २१, गोभेध २२, पार्श्व २३, ब्रह्मशान्ति २४. इति वर्तमानजिनाः यक्षाः ॥ ॐ चक्रेश्वरी १, अजितबला २, दुरितारि ३, काली ४, महाकाली ५, श्यामा ६, शान्ता ७, भृकुटि ८, सुतारका ६, अशोका १०, मानवी ११, चण्डा १२, विदिता १३, अङ्कशा १४, कन्दर्पा १५, निर्वाणी १६, बला १७, धारिणी १८, घर- - 1 A -- (६०) , प्रिया १६, नरदत्ता २०, गान्धारी २१, अम्बिका २२, पमा- वती २३, सिद्धायिका २४, इति वर्तमान- चतुर्विंशति-तीर्थकर- शासनदेव्यः। ॐ ह्रीं श्रीं धृति-कीर्ति-कान्ति-बुद्धि-लक्ष्मी-मेधा-विद्या साधन प्रवेश-विवेशनेषु सुगृहीतनामानी जयन्ति ते जिनेन्द्राः। ॐ रोहिणी १, प्रज्ञप्ति ३, वज्रशृङ्खला ३, वज़ाक,शा ४, चक्रेश्वरी ५, 'पुरुपदत्ता, ६, काली ७, महाकाली, गौरी , गान्धारी १०, सर्वा-स्त्रमहाज्वाला ११, मानवी १२, वैरोख्या १३, अच्छुप्ता १६, मानसी १५, महामानसी १६, एता: पोडश विद्यादेव्यो रक्षन्तु मे स्वाहा ॥ ॐ आचार्योपाध्याय-प्रमृति-चातुर्वर्यस्य श्रीश्रमण-सङ्घस्य शान्तिर्भवतु तुष्टिर्भवतु पुष्टिर्भवतु । ॐ ग्रहा- श्चन्द्रसूर्याऽगारक-बुध-बृहस्पति-शुक्र-शनैश्चर-राहु-केतु-सहिताः सलोकपाला सोम-यम-वरुण-कुवेर-बासवादित्य स्कन्द-विना- पका ये चान्येऽपि ग्राम-नगर क्षेत्रदेवतादयस्ते सर्वे प्रीयन्ता २ अक्षीण-कोश-कोष्ठागारा नरपतयश्च 'भवन्तु स्वाहा ।। ॐ पुत्र- मित्रभ्रातृ--कलत्र-सुहृत्-स्वजन-संबन्धि-बन्धु-वर्गसहितानित्यं चामोद-प्रमोद-कारिणो भवन्तु । अस्मिश्च भूमण्डले आयतन- . - ( ६१ ) निवासिनां साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविकाणां रोगोषसर्ग-व्याधि- दुखः-दुर्मिक्ष-दौर्मन-स्योपशम-नाय शान्तिर्भवतु ॥ ॐ तुष्टि-पुटि ऋद्धि-वृद्धि-मांगन्योत्सवा भवन्तु । सदा प्रादुर्भूतानि दुरितानि पापानि शाम्यन्तु, शत्रवः पराङ्मुखा भवन्तु स्वाहा ।। श्रीमते शान्तिनाथाय, नमः शान्तिविधायिने । त्रैलोक्य-श्यामराधीश,- मुकुटाभ्यर्चितात्रये ॥१॥ शान्तिः शान्तिकरः श्रीमान् , शान्ति दिशतु मे गुरुः । शान्तिरेव सदा तेषां येषां शान्ति हे गृहे ॥२॥ ॐ उन्मृष्टरिष्ट-दुष्ट-ग्रह-गति-दुस्वप्न-दुर्निमित्तादि । सपादित-हित-संपद् , नाम-ग्रहणं जपति शान्तेः ॥३॥ भीसंघ- पौर- जन-पद,-राजाधिप-राजसंनिवे-शानाम् । गोष्ठिक-पुरमुख्याणां, व्याह-रणैहिरेच्छान्तिम् ।। ४ ॥ श्री श्रमणसंघस्य शान्तिर्भवतु, श्रीपौर-जोकस्य शान्तिर्भवतु, श्रीजनपदानां शान्तिर्भवतु, श्रीराजा- विधानां शान्तिर्भवतु,श्रीराज-संनिवेशानां शान्तिर्भवतु,श्रीगोष्ठिकानां शान्तिर्भवतु । ॐ स्वाहा २ ॐ ह्रीं श्रीं पार्थ नाथाय स्वाहा । एषा शान्तिः प्रतिष्ठा-यात्रा-लात्रावसानेषु शान्तिकलशं गृहीत्वा कुत,म चन्दन-कपूरागुरु-धू -वास-कुसुमाञ्जलि-समेतः' - स्मात्रपीठे श्री संघसमेतः शुचिः शुचिवपुः पुष्पवस्त्र-चन्दनामरणालंकृतः, चन्द- M ।

नतिलकं विधाय पुष्प माला कण्ठे कृत्वा शान्तिमुद्घोषयित्वा शान्ति-पानीय मस्तके दातव्यमिति । नृत्यन्ति नृत्यं मणि-पुष्प- वर्ष, सृजन्ति गायन्ति च मंगलानि । स्तोत्राणि गोत्राणि पठन्ति मन्त्रान्, कल्याणमाजो हि जिनाभिषेके ॥ १॥ अहं तित्थयर-माया, सिवादेवी तुम्ह नयर-निवासिनी अम्ह सिव तुम्ह सिवं, असुहोवनम सिर्व भवतु स्वाहा ।। २ ॥ शिवमस्तु सर्व- जगतः, परहित-निरता भवन्तु भूत-गणाः । दोषाः प्रयान्तु नाशं, सर्वत्र सुखीभवंतु लोकाः ॥ २ ॥ उपसर्गाः क्षयं यान्ति, विद्यन्ते विनाल्लयः । मनः प्रसन्नतामेति पूज्यमाने जिनेश्वर ॥३॥ सर्वमंगलमांगल्यं सर्व कल्याणकारणम् । प्रधानं सर्वध- माणां जैन जयति शासनम् ॥ ४ ॥ इति वृद्धशान्तिः समाप्तः ।। ॥ अथ तिजयपहुत्त नाम स्मरणम् ।। विजयपहुत्तपयासय-गट्टमहापाडिहरजुत्ताणं। समयक्खित- ठिाणं, सरेमि चकं जिणंदाणं ॥ १॥ पणुचीसा य असीमा, पारस पन्नास जिणवर समूहो । नासेउ सयल दुरि, भविमाणं -- । ६३ ) भत्ति जुत्ताणं ॥२॥ वीसा पणयालावि य, तीसा पन्नहत्तरी जिणवरिंदा । गहभूमरक्खसाइणि- घोरुषसगं पणासंतु ॥ ३ ॥ सत्तरि पणतीसावि य, सट्ठी पंचेव जिणगणो एसो । वाहिजल- जलणहरिकरि-चोरारिमहाभयं हरउ पणपन्ना य दसेव य, पनट्ठी तह चेव चालीसा। रक्खंतु मे सरीरं-देवासुरपणमित्रा सिद्धा ॥४॥ ॐ हरहुंहः सरसुंसः हरहुँहः तह य चेव सरसुस । आलिहियनामगर्भ, चकं किर सबो मद्द॥ ५॥ ॐ रोहिणि पन्नती, वज्झसिंखला तह य वज्झन कुसिया । चक्क सरि नर- दत्ता, कालि महाकालि तह गोरी ॥ ६॥ गंधारी महाजाला माणवि वहरुट्ट तह य अछुत्ता । माणसि महमाणसिया, विज्झा देवीमो रक्खंतु ॥ ७॥ पंचदसकम्मभूमिसु, उप्पन्नं सत्तरी जिणाण सयं । विविहरणाइवन्नो-बमोहिम हरप्रो दुरिमाई ॥ ८॥ चउतीसअइसप जुआभट्ठमहापाडिहेरकयसोहा । तित्थ- • यरा गयमोहा, झाएअव्या पयत्तणं ॥ ॥ ॐ वरकणयसंख- विद्रुम-मरगयघणसन्निहं विगयमोहं । सत्तरिसयं जिणाण, सम्बामरपूडा चंदे ॥ स्वाहा ॥ १० ॥ ॐ भवणयह वाणवंतर, जोइसवासी विमाणवासी अ । जे केवि दुटु देवा, ते सव्वे उबस- ( ६४ ) मंतु मम || स्वाहा ॥ ॥ ११ ॥ चंदणकप्पूरेणं, फलए लिहिउण खालिम पी। एगंतराइगहभूह-साइण्मुिग्ग पणासेइ ॥१२॥ इअ सत्तरिसयं जंतं, सम्म मंतं दुवारि पडिलिहि। दुरिमारि विजयवंत, निभंतं निचमच ह ।। १३ ॥ इति ॥ . . ॥ अथ जयतिहुअणस्तोत्र लिख्यते ॥ ॥ जय. तिहु.अण वरकप्परुक्ख जय जिण धनं तरि, जय तिहुश्रण कल्लाणकोस दुरिप्रकार के सरि ॥ तिहुअण जण अविलंबियाण भुवणत्तय सामित्र, कुणसुसुहाई जिणेस पास थमणय पुरटिश ॥ १ ॥ तई समरंत लहंति झत्तिवर पुत्त कल- चर्हि, धण्ण सुवन्न हिरण पुरण जणभुजहि रज्जहि ॥ पिक्स- हि मुक्ख असंखसुक्ख तुह पासप साइण, इय तिहुअण वरकप्प- रुख सुक्खाह. कुण महजिण ॥२॥ जरजज्जर परिजुएण हएणनह सुकुद्धिण, , चक्खुक्खीणखएणसुरण नरसल्लिय सलिण ॥ तुह जिण सरणरसायणेण लहु हुंति-पुणगणव, जय धएणतरि पास महवि तुह रोगहरो भव ॥ ३॥ विज्जाजोइस . - (. ६५ ) मंततंतसिद्धिउ अपयत्तिण, भुवणभुन अट्टविह सिद्धि सिज्जा तुह नामिण ॥ तुह नामिण अपवित्तउवि जण होइ पवित्तउ, तं तिहुअण कल्लाणकोस तुह पास निरुत्तउ ॥ ४ ॥ खुद्द पवत्तइ मंत तत जंताईवि सुत्तइ, चरथिर गरलगहुग्गखग्गरिउवग्गविगंजय ॥ दुत्थियसत्थ अणस्थ घत्थ नित्थारइ, दयकरि. दुरिअई हरउ सुपा- सदेव दुरिअकरिकेसरि ॥ ५॥ तुह प्राणार्थभेइ भीमदप्पुद्धर सरवर, रक्खस जक्ख फणिंद विंदचोरानलजलहर ॥ जलथलचा- रिरउद्दखुद्दपसुजोइणि जोइय इस तिहुअणम विलंघिप्राण जय पास सुसामिश्र ॥६॥ पत्थिश्र अत्थ अणत्थ तत्थमत्तिभर निभर, रोमंचंचिअचारुकाय किएणरनरसुरवर ॥ जसुसेवहिं कम- कमलजुअल पक्खालिअकलिमलु, सो भुवणत्तयसामि पास मह मद्दउ रिउवलु ॥ ७॥ जय जोइअमणकमलभसलभय पंजरकुजर, तिहुअणजण आणंदचंद भुवणत्तयदिणयर ॥ जय मइमेइणि वारिवाह जयजंतु पियामह, थंभणयट्ठिा पासनाह नाहत्तणकुण- मह ॥ ८॥ बहु विहवएणुअवएणु सुण्णु वरिणउछपएणहिं, मुक्खधम्मु कामत्थकाम नर नियनियसत्थहि ।। जं झायइ बहु दरिसणस्थ बहु नाम पसिद्धउ, सो जो जोइ अमण कमलमसल- है ( ६६ ) सुह पास पर्वद्धउ ॥ ६॥ भय विभल रणझणिरदसण थरहरिश्र सरीरय, तरलिअ नयणविसएणुसुरएणुगग्गर गिरकरुणय ॥ तई सहसत्तिसरंति हंति नरनासिब गुरुदर, महविज्जविसज्जसइ पास अय पंजरकुंजर ॥ १० ॥ पई पासविय संतनित्तपत्त तपवित्तिय, वाहपवाहपवूहरूढ दुहदाहसुपुलयाय ॥ मरणहिमगरण मरण पुण्ण अप्पाणं सुरनर, इय तिहुश्रण आणंदचंद जय पास जिणे- सर ॥ ११ ॥ तुह कल्लाणमहेसुषंट टकारवपिल्लि, वन्लरमन्ल- महल्लभत्तिसुरवर गजुलिय॥ हल्लुप्फलिप पवतयंति भरणेहि महसक, इस तिहुश्रण आणंदचंद जय पाससुहब्भव ।। १२ ।। निम्मल फेवल किरणनियर विदुरिध तमपयर० देखि सयल- पपत्थसत्यवित्थरिश्र पहामर । अलिकलुमिन जण अलोयलो यणअगोयर, तिमिरई निरुहर पासनाह भुवणत्तय दिणयर ॥ १३ ॥ तुह समरणजलवारिससित्त माणब मइ मेइणि, अवरा- वरसुहुमत्थवोह कंदल दलरेहिणि ।। जायइ फलभरभरिय हरिय दुहदाह "अणोवम, इयगइ मेइणि वारिवाह दिसि पाम मई मम ॥ १४ ॥ कय अविकल कल्लाणवल्लि उल्लूरियदुहवणु दावि- असग्गपवग्गमग्ग दुग्गड़गम वारणु। जय जंतुहजणएणतुल्ल- ( ६७ ) जंजणि यहियावहु, रस्सु धम्म सो जयउ पास जय जंतु पिया- मह ॥ १५ ॥ भुवणारएणनिवास दरिअपरदरिसणदेवय, जोइ- पिंपूअणखित्ताल खुद्दासुर पसुवय ॥ तुह उत्तटु सुनह सुह अविसंठुल चिट्ठहिं, इस तिहुअण वणसिंह पास पावाइ पणासहि ॥ १६ ॥ फणिफणफारफुरंतरयण कर रंजिअ नहयल फलिणी कंदलदलतमाल निल्लुप्पल सामल || कमठासुर उपसगवा संसग्ग अगंजिअ, जय पञ्चक्खजिणेस पाम थंभणय पुरविन ॥ १७ ॥ महमणतरलुपमाणनेय वायावि विसंठलु, नियतणुरवि अविणयसहाव आल सविहिलंघलु ।। तुहमाइप्पुपमायदेव कारुण्ण पवत्तउ, इयमइमाअवहीरपासपालहिविलवं तउ ॥ १८ ॥ विकि- कप्पिउणेयकलुणु किंकिवनजं पिउ, किं वनचिट्ठिउकिट्ठठेवदीण- यमविलंबिउ । कासुनक्रियनिकल्ललल्लुब्रीहिदुहत्तई तहवि न पत्तउताण किंपि पई पहु परिचत्तई ।। १६ ।। तुहुं सामिह तुहु' याय वप्प तुहुं मित्तपियंकरू, तुहुँ गइनुहुँ मइ तुहिंज ताण तुहुँ गुरु खेमकरु ।। हउं दुहमरमारिअबराउ राउल निमग्गउ, लोणउ तुह कमकमल सरणजिणपालहि चंगउ ॥ २०॥ पइंफिविकयनी- रोयलोय किविपावियसुहसया कि विमई मंतमहंतकवि किविसाहि- ( ६८ ) यसिवपय ॥ किवि गंजिअरिउवग्गकेविजसधवलिय भूमल, मई अबहीरहिकेणपाससरणागयवच्छल ॥ २१ ।। पञ्च वयारनिरीहना- हनिफ्फराण पयोअण, तुई जिण पासपरोषयार करुणिकपरा- यण ।। सत्तु मित्त सम चित्तवित्तिनयनिदिनसममण, मा अपही- रिअजुग्गोविमई पासनिरंजण ।। २२ ।। हउ बहुविहदु हत्तत्त- गत्ततुहं दुहनासणपरु, हउ सुयणहकरुणि कठाणु तुहुं निरुकरू- णाकरु ॥ हउ जिण पासअसामिसालु तुहुँ तिहुअणसामित्र, जं अवहीरहि मई झवताय पासन सोहिअ॥ २३ ॥ जुग्गा- जुग्ग विभागनाहनहुनोग्रणतुहसमा भवणुवयारसहावमाव करुणा- रससत्तम ।। समविसमह किंघण ना एइ भुविदाहुसमंतउ, दुहबंधव पासनाह मई पाल धुणंतउ ॥ २४ ॥ नयदीणहदीणयमुएवि अरणविकिविजुग्गव जं जोइपउवयारुकरइउपयारसमुज्जय ॥ दीणह दीणनिहीणजेणतुहनाहिण चत्तउ. तो जुग्गउअहमेव पास- पालहिमई चंगउ ।। २५ ।। अहएणुविजुग्गयविसे सकिविमरण- हि दीणह, जं पासविउवयारुकरइ तुहनाह समगह ।। सुचित्र- किल कल्लाणुजेण जिण तुम्ह पसीयह किं अएणुण तंचेव देव मामई अवहीरह ॥ २६ ॥ तुह पत्थण नहु होइ विहलु जिण- ( ६६ ). जाण उ किं पुण, हउं दुक्खिउ निरुसत्तचत्तदुक्कहु उस्सु यमण ।। तं मएणउ निमिसेण एउ एउविजइ लभइ, सच्च जं भुक्खि- यवसेण कि उंबरु पच्चइ ॥ २७ ॥ तिहुअणसामित्र पासनाह मई अप्पप यासिउ, किज्जउ जं नियरूवसरि सुनमुणुवहुं जंपिड ॥ अण्णु णं जिणजगतहसमोविदक्खिन्नदयास उ, जह अवगिएणसि तुहिजअहहकिहोइसहयासउ ॥ २८ ॥ जद तहरूविणकिणविपेय पाइणवेलंबिउ, तउजाणु जिणपास तुम्ह हउंअगीकरिअउ ॥ इयमहइत्थिउ जं न होइ सातुहरोहावण, रक्खंतह नियकित्तिणे य जुज्जइअवहीरण ॥ २६ ॥ एहमहारिहजत्तदेवड्हुन्हवणमहसउ जं अणलिय गुणगहण तुम्ह मुणिजणश्रणिसिद्धउ ॥ एम मई पसीहसुपासनाहथंभणयपुरडिअ, इय मुणिवरुसिरि अभयदेव विएणबई आणिदिअ । ३० ॥ इति श्रीस्तंभनकत थराजश्रीपाश- नाथस्तवनम् । . - ( ७० ) गुरु स्तुति यथा प्राणा नराधारास्तथैव मुखसागरः ॥ नित्यं नमामि नाथ त्वां त्वमेव शरणं मम ।। १ ।। चखान दुष्टकमाणि दिव्य- ज्ञानदिवाकर । चारित्ररत्नभण्डारदर्शनं विमलं कृतम् ॥ २ ॥ दानशीलतपोभाव अष्टमातृपरायणः । यात्रालब्रह्मचारी च भाविता भावना सदा ॥ ३ ॥ कपायमदनिद्रादिपञ्चन्द्रियाणि शेप :। जितानि हास्याजन्न नं वैरिणी विकथाजिता ॥ ४ ॥ निजिता काम- मोहो च रागद्वेषविवर्जितः । धीतं मालमिथ्यात्वं सम्यक्त्वगग- रंजितः ।। ५ ।। नयनिक्षेपसंवेत्ता गुणस्थानं विशेषतः । विजा- नासि गुणग्राहिन् स्याद्वादञ्च महारसम् ॥ ६ ॥ पवित्रनामजापेन नानादिसकलं फलं लभन्ते सर्वधीमन्तो नैवात्र कोपि मंशयः ॥७॥ त्वमेव प्राणकाधारम्त्वमेव हितकारकः । त्वमेव मुखसौन्दर्यम्त्व मेव भवतारकः ॥ ८॥ त्रैलोक्यसिन्धोर्भवतापहतगुरोः प्रसाद- प्रभुतांकितांतः । तस्यैव सानन्दसुखाम्बुराशेः पादौ सदानन्दरसेन नौमि ॥६॥ ।।शुभम् ।। m ।

J || ( ७१ ) ॥ श्रीगौडीपार्श्वनाथवृद्धस्तवनम् ॥ दोहा । वाणी ब्रह्मावादिनी, जाणे जगविख्यात । पासतणा गुणगारतां मुज मुख बसज्यो मात ॥ १॥ नारंगै अणहलपुरै, अह-मदावादे पास । गौडीनो धणी जागतो, सहनी पूरे पास ॥२॥ सुभ वेला सुभ दिन घडी मुहुरत एक मंडाण | प्रति- माते इह पासनी, थई प्रतिष्ठा जाणं ।। ३ ।। ( ढाल ) गुणहि वि-शाला मंगलीक माला, वामानो सुत साचोजी । धण कर्ण कंचण मणि माणक दे, गौडीनो धणी जाचौजी (गु०) ॥४॥ अणहिलपुर पाटण माहे प्रतिमा, तुरक तणे घर हुँ तीजी ! अश्वनी भूमि अश्वनी पीडा, अश्वनी बाल विगूती जी (गुरु) ॥ ५ ॥ जागंतो जक्ष जेहनै कहिये, सुहणो तुरकनै आपे जी । पास जिनेसर केरी प्रतिमा, सेवक तुझ सतापे जी (गु.)॥६॥ ग्रह ऊठीने परगट करजे, मेघा गोठी ने देजे जी ! अधिको म लेजे प्रोछो म लेजे, टक्का पांचसै लेजे जी (गुरु)॥७॥ नहिं श्रापिस तो मारीस मुरडीस, मोर बंध बंधास्ये जी पुत्र कलत्र धन हय हाथी तुझ. लछि घणी घर जास्य जी (गु०) ( ७४ ) प्रयाण कटको कोई न दीस पहाण । देवल पास जिनेसर तणी, मंडा किम गर| वियो ।। २७ ।। जल विन श्रीसंघ रहस्य किहां सिलावटो किम आवे इहां । चिन्तातुर थयो निद्रा लहै, यक्षराज अभीने कहैं ॥२८॥ गुहली ऊपर नाणो जिहां, गरथ घणो जाणीजे विहां । स्वस्तिक सोपारीन ठाणि पाणी तणी उल्लटम्य खाणि ॥ २६ ॥ श्रीफल सजल तिहां किल ग्रो, अमृत जल- नीरसी कूओ ! खारा कुवा तणो इह सेनाण, भूमि पच्चो छ, नीलो छाण ॥ ३० ॥ सिलावटो सीरोही वस कोड पराभरियो किसमिस । किहां थकी तुइहां आणजे, सत्य वचन माहगे मानजे ॥ ३१ ॥ गोठीनो मन थिर थापियो, सिलावटने सुहणो दियो ! रोग गमीने पूरूँ आस, तणो मंडे प्रावास ॥ ३२ ॥ मुपन मांहे मान्यो ते वेण, हेम वरण देखाड्यो नै । गोठी मनह मनोरथ हुआ, सिलावटने गया तेडवा ।। ३३ ।। सिला- वटो आवै मुरमो, जिमें खौर खाँड घृत चूरमो । बडें बाट कर कोरणी, लगन मले पाया रोपणी ॥ ३४ ॥ थंभ २ कीधी पुतली, नाटक कौतुक करती रली । रङगमंडप रलियामणो रस, जोता मानवनो मन यसै || ३५ ।। नीपायो पूरी प्रासाद, स्वर्ग ,

( ७५. ).
समो मडे आवास । दिवस विचारी इंडो घड्यो ततखिण देवल
ऊपर चढ्या ॥ ३६ । शुभ लगन शुभ वेला, वास, पव्वासण
वेठा, श्रीपास । महिमा मोटी मेरु समान, एकलमिल वगडे रहै-
चान ।। ३७॥ बात पुराणी मैं सांभली, स्तवन मांहि सूधी
सांकली। गोठी तणा गोतरिया अछ, यात्रा करीने परने पछे
॥ ३८ ॥ (दोहा) विधन विडारन यक्ष जगि, तेहनो अकल
सरूप । प्रीत करे श्रीसंघने, देखाडै निज रूप ॥ ३६॥ गिरुओ
गोडी पास जिन, आपे अरथ भडार । सांनिध करै श्री सङ्घने,
आसा पूरणहार ॥ ४० ॥ नील पलाणे नील हय, नीलो थई
असवार । मारग चूका मानवी, वाट दिखावण हार ।। ४१ ॥
(दाल) वरण अढार तणो लहै भोग, विधन निवारे टाले
रोग। पवित्र थई समरै जे जाप, टाले सगला पाप संताप
॥ ४२ ॥ निरधनने घरि धन नो सुत, आपै अपुत्रीयाने पुत्र
कायरने सूरापण धरै, पार उतारै लच्छी चरै ॥ ४३ ॥ दोभागी
ने दे सौभाग; पण विहणाने आपै पग । ठाम नहीं देहने यै
ठाम, मनवांछित पूरें अभिराम ॥ ४४॥ निराधाराने द्य
आधार, भवसायर उतारे पार । प्रारतियानी भारत भंग, धरै

( ७६ ) ध्यान ते लहै सुरंग ॥ ४५ ॥ समस्या सहाय दीये यक्ष राज, तेहना मोटा अछे दिवाज । बुद्धि हीण ने बुद्धि प्रकाश, गूगाने दे वचन विलास ।। ४६ ॥ दुखियाने सुखनो दातार, भय भजण रंजण अवतार । बंधन तूटे वेडी तणा श्री पार्थ नाम अक्षर स्मरणा ॥ ४७ ॥ (दूहा) श्री पार्थ नाम अक्षर जपे, विश्वानर विकराल । हस्ती जूथ दूरे टलै, दुद्धर सिह सियाल । ४८ ॥ चोर तणा भय चुकवे, विप अमृत उहकार । विप उतरे संग्राम जय जय कार ॥ ४६॥ रोग सोग दारिद्र दुख, दोहग दूर पुलाय । परमेसर श्री पासनो, महिमा मन्त्र जपाय ॥ ५० ॥ (कडखानी चाल ) उजितु. २ उजि उपमम धरी, ॐ ह्रीं श्री श्री पार्थ अक्षर जपते । भूत ने प्रेत झोटिंग.व्यन्तर सुग, उपसमे वार इकवीस गुणते ( उं.)।। ५१ || दुद्धरा रोग सोग जरा जंतने ताव एकान्तरा दुत्तपते । गर्भवन्धन वणं सर्प विछु विपं, चालिका वालमेवा झखंत (उ.) ॥५२॥ साइणी डाइणी रोहिणी रंकनी, फोटका मोटका दोप हुँते । दाढ़ उंदरतणी कोल नोला तणी, स्वान सीयाल विकराल दंते ॥ ५३ ॥ (उं० ) धरणेंद्र पद्मावती समर सोभावती, वाट अाघाट अटवी अटते । - ( ७७ ) लखमी लोढुं मिलें सुजस वेला उलै, सयल आया फलै मन हसंत (०) ॥ ५४॥ अष्ट महाभय हरें कानपीडा टले ऊतरै मूल सीसग मणंते । वदत वर प्रीतसुप्रीतिविमल प्रभू, श्री पास जिण नाम अभिराम ,मन्ते ( उंजितु)॥ ५५॥ इति श्रीगोडी पार्श्वनाथजी बृद्धस्तवनं समाप्तम् ।। - ॥ अथ गुर्वष्टकम् ॥ नमाम्यहं श्रीजिनदत्तसरि गुणाकरं किन्नर पूज्यपादम् ।। यतीश्वरं तुष्टिकरं स्वरुपं लावव्यगात्रं बहुसौख्य कारम् ॥ १॥ भूपानराये प्रणमंति नित्यं तेषां मनीषां सफलीकरोति ॥ लक्ष्मी- यशो राज्यरति प्रस्ते विद्यावरं श्रीललनासुखानि ॥ २ ॥ भत्त्या नराये तवपादसेवां कुर्वति सत्पुत्रालभंत एव ।। न दुखः दौर्भाग्य भयंन मारिं स्मरंति ये श्रीजिनदत्तरिम् ॥ ३ ॥ कविः स्वबुध्या- गुरुसंनिभोपि कस्ते गुणान् वर्णयितुं समर्थः तथापित्वद्भक्तिरतो मुनींद्रः करोमि किंचिद्दगुणवणनं ते ॥४॥ महार्णवे भूधर मस्तकेपि स्मरंति ये श्रीजिनदत्तमरिम् ॥ सुखैः सहायोति जना- स्वधानि ततोभवंतं प्रणमामि कामम् ॥ ५ ॥ जैनाब्जसंबोधन (८०) निशिस्वापाधीनं निशदिनमधीनी समयीनां । परंवाणीलचम्यो- निलियमपिलतदाननियुणौ ॥ सदायौ वर्त्तते जयत इव पायोज- युगलं, समृद्धयर्थ ॥ २ ॥ क्षिपंताती प्रेक्षां मर सिरुहयोयों मृद्- लयो-र्जपापुढपामासोः किशलयजिताशेपमह सोः ॥ लसल्लं खा लक्ष्मप्रकटितपरा श्रीसदनयोः समृद्धर्थवंदे ॥ ३ ॥ सुरेम्यः स्व- स्थेभ्यः क्वतिपयदिनैर्यः फलमथो । कदाचिहते द्राकृभियमपि दरिद्राय परमाम् ।। सुरद्रुत्यत्कोपासतइतिवुधौ यो भुविगती। समृद्धयर्थवंदे ॥ ४॥ सुरैरास्वाद्य ते परमगुरुधर्मोपदिशतः । सदा कामं पीता मृतरसवरांशैरपिगिरः ॥ श्रुता यस्य श्रेयः श्रिय मपिदिशंतिस्थिरधियां । समृद्धयर्थः ॥ ५॥ निधिस्सर्वाश्रीणा मनधिकरणौ मविपदाम् | मृदुस्निग्धौ शौणावुपवितनरवी गूढ घुटिकौ ॥ समाना प्रोत्तुगप्रपदपदशाखाविलसितौ, समृ ॥ ६ ॥ ययोरर्चा सूते धनसुखधरा धामरमणिः शरीरारोग्गत्वं विनयन- यविद्यानिपुणताम् ।। गुणा नौदार्यादीनपितनयलक्ष्मीः श्रिनृटणां । समृद्धयर्थः ॥ ७॥ भयंकारागारा मयसमरपारींद्र फणमृ-न्महा पाशवारः द्विरदवनवैश्वानरभवम् ।। नडाकिन्यायु ग्रग्रहगरलजय- समृरणतः । समृद्धयर्थः ॥ ८॥ इथं श्रीजिनपद्मसूरचितं . ( ८१ ) दिव्याष्टकं सद्गुरोः पुण्यं मंत्रमयं मनोज्ञफलदं पापौधविध्वंसनम् ।। भक्त्या यः पठति प्रभात समये सर्वत्र तस्य धुवं । वश्या भूपतयो भवंति सततं लक्ष्मीश्चिरस्थायिनी ॥ 8 ॥ इति समाप्तम् ।। सरस्वती स्तोत्रम् ॥ नमस्ते शारदादेवि काश्मीर प्रतिपासिनी । त्वामहं प्रार्थये मातविद्यादानं प्रदेहिमे ॥ १ ॥ सरस्वती मया दृष्टा । देवीकमल लोचना ॥ हंसस्कंधसमारूता। वीणा रतक धारिणी ॥ २ ॥ सरस्वती प्रसादेन । काव्यं कुर्वन्ति पण्डिताः ॥ तस्मानिश्चलभा- वेन । पूजनीया सरस्वती ॥ ३॥ प्रथम भारतीनाम । द्वितीयं चसरस्वती ॥ तृतीयं शारदादेवी । चतुर्थ हंस वाहिनी ॥ ४ ॥ पंचमं जगद्विख्याता, षष्ठं वागीश्वरी तथा ॥ सप्तमं कुमारी प्रोक्ता | अष्टमं ब्रह्म चारिणी ।। ५ ।। नवमं त्रिपुरादेवी । दशमं ब्राह्मणिसुत ॥ एकादशंतु ब्राह्मणी । द्वादशं ब्राह्मवाहिनी ॥ ६॥ वाणी त्रयोदशिनाम । भाषाचैव चतुर्दशी ॥ पंचदशं श्रुतादेवी । पोडश श्रीनिंगद्यते ॥ ७ ॥ एतानि पोडशनामनि, प्रातरुत्थाय यः पठेत् ॥ तस्य सतुष्यते देवी । शारदा वरदायिनी ॥ ८ ॥ याकुं- देन्दुतुपारहारधवला या चन्द्रपिचानना । या त्रैलोक्य विभूपणा भगवती या राजहंसप्रिया ॥ या पद्मोदलनेत्रपद्मयुगला या जाति- पुढपप्रिया । सा नक्षत्रललाटपट्टतिलका सा शारदा पातुमाम् ।।६।। या कुदेन्दुतुषारहारधवला या श्वेत पद्मासना । या वीणा वरदंड मडितकरा या मुभव स्त्रान्टता ॥ या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिमिदेवः सदावन्दिता। सा मां पातु सरस्वती भगवतीनिः शेष जाडया- पहा ॥ १० ॥ इति समाप्तम् ।।

छन्द व पद संस्मरतो
श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ छन्द ।
सेवो पास संखेसरी मनशुद्ध । नमो नाथ निश्चेकरी एक बुद्ध ।
देवी देवता अन्यने स्यु नमो छो, अही भव्यलोकां काई भमो छो ।।१।।
त्रैलोक्य ना नाथ ने स्युतजो छो । पड्या पास मां भूत ने स्यु भमो
छो ।। सुर धेनु छीड़ी अजा स्यु अजो छो। महा पंथ मूकी कुपंथे
वजो छो ।।२।। तजे कौन चिन्तामणी कांचमाटे । ग्रहे कौन रासभ ने
हस्तिसाटे ।। सुर दुम उपाडी कौन आकडोने, महामूढ आकुला
अंतपावे ॥३।। कहां विश्वनाथं किहां अन्यदेवा । करो एकचित्ते प्रभु
पार्श्व सेवा ।।४|| पूजो देव प्रभावती प्राणनाथं सहु देवने ते करे के
अनाथं ।। महातत्व जाणी सदा जेह ध्यावे । तेहना दुःख दारिद्र दूरे
पलावे ॥५।। पायी मानुसो ने वृथा का गमो छो। कुशीले करी देहने
कां दमो छो || नहीं मुक्तिवासं विना बीतरागं भजो भगवंतं तजो
दृष्टिरागं ॥६॥ हदयरत्न भाषे सदा हेत आणी। दयाभाव कीजे मोहे
दास जाणी । न्हारे आज मति मेह बूठा । प्रभु पास संखेसरो आप
ते
तूडा ॥७॥
श्री शांतिनाथजी का पद ।
सारद मात नमूसिर नामी । डूं गोऊ त्रिभुवन के स्वामी ।।
संतहि संत जपे सहु कोई । ता घर शान्ति सदा सुख होई ॥११॥

शान्ति जपीने कीजे कामा। सो ही काम हुए अभिरामा ।। शान्ति जपी परदेश सिधावे 1 ते कुशले लमला लहियावे ॥२॥ गर्भ थकी प्रभु मारि निवारी । शान्त हि नाम दियो महतारी ।। जे नर शान्ति तणा गुण गावे । ऋद्धि अचिंती सो नर पावे ॥३॥ जा नर को प्रभु शान्ति सहाई । ता नर को कछु अारति नाहीं । जो कछु बंछ सी ही पूरे । दारिद्र दुष्ट मिथ्यामनि चूरे ॥ ४ ॥ अलख निरंजन ज्योति प्रकाशी । घट घट अन्तर के प्रभु बासी ।। स्वामी स्वरूप कयो नहिं जावे। कहतॉ मो मन अचरज थावे || ५ || डार दिये सबही हथियारा। जीत्या मोहतणा दल सारा । नारदजी शिव सूरंग राचे । राज तजी पण साहिब सांचे ॥६॥ महा बलवन्त कही जे देवा । कायर कुन्य एक गणेवा ॥ ऋद्धि सयत प्रभु पास कहीजे । भिक्षा ग्राहारी नाम भणीजे ॥ ७॥ निन्दव पूजक है सत भावक । पण सेवक को है सुख- दायक । तयो परिग्रह ते जगनायक । नाम अनीत सवे विधि- लायक }} ८ || शत्रु मित्र समचित्त गिनीजे । नाम देव अरिहन्त गुणी जे | सकल जीव हितवन्त कहीजे ॥ सेवक जानि महापद दीजे ॥ ६ ॥ सायर जैसा होत गम्भीरा । दोप नहीं इक नांहि शरीरा ॥ मेरु अचल जिम अंतरयामी । पण न रहे प्रभु एकणठामी ॥ १० ॥ लोक कहे जिनजी सब देखे । पण सुपनो कवहिं नही पेखे ।। रीस बिना वावीस परीसह । सेना जीती ते जगदीसे ।। ११॥ मान विना जग प्राण मनायो । माया विना सवसू लय लायो 11 लोभ विना गुण राशि प्रहीने । भिक्षु भये निगडो सेवीजे ॥ १२ ।। निग्रन्थ पणे शिर छत्र धरावे । नाम यतीपन चवर दुलाहें । अभयदान दाता सुख कारण। आगल चक्र चले अरिदारण ॥ १३ ॥ श्रीजिनराज दयाल भजीजे । कर्म सबे को मूल खनीजे ॥ चविह संघज तीरथ थापे : लच्छि घणी देखे नखे आपे ॥ १४ ॥ विनयवन्त भगवन्त कहावे । ना कहू को सीस नमावे ॥ अकिंचन को पद धरावे । पण सोवन पद पंकज ठावे ॥ १५ ॥ तज तरुणी निजगुण को ध्यावे । शिव रमणी को साथ चलावे ॥ राग नहीं पण सेवक तारे । द्वष नहीं निगुण संग वारे ॥ १६ ॥ तेरी महिमा अद्भुत कहिये । तेरा गुण को पार न लहिये ॥ तू प्रभु समरथ साहिब मेरा । हूं मनमोहन सेवक तेरा ॥ १७ ॥ तुरे त्रिलोक तणो प्रतिपाला ।। हुरे अनाथ अधीर प्रतिपाला || तु सरणागत राखणधीरा । तूं वलि तारिक छो बड़वीरा ॥ १८ ॥ तोहि जिसो वड़भागजपायो । तो मेरी कारज चढ़े सवायो ।। कर जोड़ी प्रनु विनवुतोसू। कर कृपा जिनवरजी मोसू ॥ १६ ॥ जन्म मरण निवारी वारो। भवसागर थी पार उतारी ।। श्री हथणापुर मंडण मोहे । तहां श्री शान्तिमन मोहे ॥ २० ॥ श्री परम सागर गुरु पास पसाये । श्रीगुणसागर के मन भाये ॥ जे नर नारी इकचित ध्यावे । ते मनवांछित शिवसुख पावे ॥ २१ ॥ -- श्री नवकार मंत्र का छन्द मरु सुख कारण भवियण, समरो श्री नवकार । जिन शासन आगम चवदे पूरव सार ॥ १॥ इण मंत्र नी महिमा, कहतां न लहे पार । सुर जिमि चिंतित, वांछित फल दातार ॥ २ ॥ दानव मानव, सेव करे कर जोड़ । भूमण्डल विचरे, तारे भविजन कोड़ ॥ ३ ॥ सुर छंदे विलसे, अतिशय जास अनन्त । पहले पद नमिये, अरिगंजण अरिहन्त ॥४॥ जे पनरे भेदे, सिद्ध थया भगवन्त । पंचम गति पोहता, अप्ट कर्म करि अन्त ।। ५ ।। कर अकल सरुपी पंचानतक जेह । जिनवर पय प्रणाम्, बीजे पदवलि जेह॥ ६ ॥ गछभार धुरधर, सुन्दर ससियर सोम । करि सारण वारण, गुण छत्तीसे तोम ।। ७ ।। श्रु त जाणशि रोमणी, सागर जेम गंभीर । तीजे पद नमिये, आचारज गुण धीर ॥ ॥ श्रुतधर गुण अागम, सूत्र भावे सार । तप विधि संयोगे, भापे अरथ विचार ।। ६ ।। मुनिवर गुणयुत्ता जे कहिये उवझाय । चौथे पद नमिये, अहनिसि तेहना पात ॥ १० ॥ पंचाभव टाले, पा लेपंचाचार । तपसी गुणधारी, वारी विपय विकार ॥ ११॥ त्रसधावर पीहर, लोक मांहे जे साध । त्रिविधे ते प्रणमू, परमारध गण लाध ॥ १२॥ अरि करि हरि सायण डायण भूत वेताल । सवि पाप पणासे, थासे मंगल माल ॥ इण समर्या संकट, दूर टले ततकाल । जंपे गुण गुण इम, सुर वट सीस रसाल ॥१४॥ , श्री सोलह सती छन्द आदिनाथ आदि जिनवर बंदी सफल मनीरथ कीजिये ए। प्रभात उठे मंगलीक कामे सोले सती नाम लीजिये ए॥ १॥ बाल- कुमारी जगनहितकारी, ब्राह्मी भरतनी बेनडीरा । घट घट व्यापक अक्षयरूपे, सोले सती माहे जेवडी ए ॥ २।' बाहूबली भगनी सतिय शिरोमणि सुन्दरी नामे रिपभ सुता ए। अंगे स्वरूपी त्रिभुवन मांहे, जेह अनुम गुणमुता ए ॥ ३ ॥ चन्दनवाला बाल पणाथी, शीयलवती शुधश्राविकाए । उड़दना वाकुला वीरे पडिलाभ्या, केवल लही व्रत भाविका ए ॥४॥ उग्रसेन सुता धारणी नंदनी, राजमती नेमवल्लाभाए । जीवन मे से काम ने जीत्यो, संगम लही देव दुल्लभाए ॥ ५॥ पंच भरतारी पांडव नारी, द्रुपद तनया वखानिये ए। ऐक सौ आठे चीर पुराण, सीयल महिमा सुयश जाणिये ए ॥ ६ ॥ दशरथ नृप नी नारी निरुपम कौशल्या कुलचन्द्रिका ए। शीयल सजनी राम जनिता, पुण्यमणि परनालिका ए ।। ७ ।। कोसीवक ठामे सतनीक नामे, राज करे रंगराजियो ए। तिस घर घरणी मृगावती सती, सुरभुवने जस गाजियो ए ॥ ८ ॥ सुलसा सांची शियल न काची, राची नहीं विषया रसे ए । मुखड़ो जोतां पाप पुलावे, नाम लेतां मन हुलसे ए ॥ ६ ॥ राम रघुवंशी जेहनी कामिनी, जनक सुता सीता .

(६) सतीए । जग सहु जाणे धीज करंता, अनल सीतल थयो शीलथी ए॥ १०॥ काचे तांतणे चालनी वांधी, कुआ थकी जल कादियो ए। कलंक उतारवा सतिय सुभद्रा, चंपा पोल उघाड़ियो ए ॥ ११ ॥ सुर नर बन्दित शियल अखण्डित, शिवा शिवपदगामिनीए । जेहने नामे निरमल थइये, बलिहारी तस नामिनी ए॥ १२ ॥ हस्तिनागपुरे पाण्डु रानी, कुंतीनामे कामिनी ए । पांडव माता दस दसा रवी, वहिन पतिव्रता पदमनी ए ॥ १३ ॥ शीलवती नामे शीलवती नाम से शीलबूत धरिणी, त्रिविध तेहने वन्दिये ए । नाम जपन्तां पातक जावे दर्शन दुरित निकन्दिये ए ॥ १४ ॥ निपिधा नगरी नल नरिन्दनी, दमयन्ती तस गेहनी ए । सफ्ट पड़ता शीयल राख्यो । त्रिभुवन कीरति जेहनी ए. ॥ १५॥ अनङ्ग अजीता जगजन पुनीता, पुष्प चूला ने प्रभावती ए । विश्व विख्याता कामित दाता, सीलमी सती पद्यावती ए,।। १६ ।। सतियन नामा मन अभिरामा, दुःख दोहर कु हरता ए.॥ भविया त्राता सिद्धियन दाता, ऋद्धियन कर्ता गुणे युता ए ॥ १७॥ बीरे भापी शास्त्रे साखी, उदय रतन भाषे मुदा ए। प्रभातेऊठि जे नर भणसे, ते लहसे सुख सम्पदा ए. ।। १७ !! श्री महावीर चौमासी श्री अरहिन्त अनन्तगुण, अतिशय पूरण गात्र । मुनि जे ज्ञानी संयमी, ते कहिये उत्तम पात्र || १ || पात्रतनी अनुयोदाना, करतो - ७ जीरण सेठ । श्रावक ऊँच गति लहे , नव ग्रैवेयक हेठ ।। २ ।। दस चौमासा वीरजी विचरत संगमवास । वैशालपुर आविया, इग्यारमी चौमास ॥३॥ढाल । चौमासी ग्यारमी जी, विचरत साहस धीर । वैशाला पुरी आविया जी स्वामी महावीर ' जगनगुरू त्रिसला नंदनजी ॥ १ ॥ भले मैं भेट्रया श्री जिनराय सखीरी, चौक पुरावी आज मेरे भाग अनूपम थाय || जगत० ॥२॥ वलदेव नीवेदे हरो जी तिहांदे प्रभु काउसम्ए लीध । पचएखान चौमासी ना जी, रवामी एतप कीध जग ।।३।। जीरण सेठ तिहां वसे जी, पाले श्रावक धर्म। आकारे तिण ओलख्या जी, जे जाते जिन मर्म ।। जरा० ॥४|| आज अछे उपवासिया जी, स्वामी श्रीवर्धमान । काले सही प्रभु जीमसे जी, से हथ देसू दान जग० ॥ सदा सेठ इम चितवेजी, होसी सफल मुझ आस ।। पक्ष मास गिणतां थकांजी, पूरी थई चौमास || जग० ॥ ६॥ सामग्री आहारना जी, जीरण कीधी तयार । प्रभुनो मारग देखतो जी, बैठो घरने वार |जग०१७। घरि आवे छे पाहुणा जी, नौत्या एकज वार । प्रभू कान पधारसी जी, मैं न्यौता वारम्बार |जगा|८पीछे करसू पारणो जी, हूं प्रभूने पडिलाभ । होय मनोरथ एहवो जी, तो बिन बरसे आभ ॥जग०||६|| अवसर ऊठ्या गोचरी जी, श्री सिद्धारथ पुत्र । वैशालापुर श्रावतां जी, पूरन घर पहुत्त जग-||१०|| मिथ्यात्वी जाणे नहीं जी, जंगम तीरथ एह । चेटी से कहे एहवो जी, काइक भिक्षा देह जिगः॥११॥ चाटू भरने बाकुला जी, प्रभुने आणी दीध ।

(६)
निरागी तेही लिया जी, तिहां प्रभु पारणो कीध जग ॥१२॥ देव
वजावे दुन्दुभी जी, जय बोले कर जोड़। हेमवृष्टि हुई तिहां जी,
साढ़े बारह क्रोड़ ||जग०।१३।। कहे सेठ तुमे स्यू दियो जी, कीयो
पारणो वीर । लोकां प्रते इम कहे जी, मैं पहराई खीर |जग०||१४||
राज लोक सहु ए कहे जी, धन धन पूरण सेठ । ऊंची करणी ते करी
जी, अवसर हू तुझ हेठ जग०॥१५|| जीरण सेठ सुने तवे जी,
वाजिंत्र दुन्दुभी नाद ' अनन्त कियो तिहां पारणोजी नन में थयो
विपवाद ॥जग०।१६।। हूं जग में अभागियो जी, मोरे न आया स्वाम।
कल्पवृक्ष केम पामियेजी, मारू मंडल ठाम जग०॥१७॥ जेता मनोरथ
मैं किया जी, तेता ही रह्या मांय । निरधन जिम जिम चिंतवे जी,
तिम तिम निस्फल थाय ||जगा|१८|| स्वामी तिहां कियो पारणो जी,
कियो अन्य विहार । आया पास संतानिया जी, तिहां मुनि केवल
धार ॥जग०॥१६॥ वैशालापुर राजिया जी, लोक सहू आनन्द । राय
प्रश्न पूछे तिहां जी, सुगुरु चरण अरविन्द ॥जगा॥२०॥ मेरे नगर में
को अछे जी, जीव पुण्य जसवंत । कहे केवली आज तो जी, जीरण
ते जसवंत जिग०।२१।। राय कहे किण कारणे जी, जीरण सेठ
महंत । दान दियो जिण वीरने जी पूरण ते जसवंत जग०।२२।।
राय प्रते कहे, केवली जी, पूरण कीनो दान । हेम वृष्टि फल तेहने जी,
अवर न कोई प्रमाण ॥जग॥२॥ देवलोक तिण वारमे जी, जीरण
यो बंध । विना दान दीथा लह्यो जी, उत्तम फल संबंथ जग०॥२४॥

(६) घड़ी एक सुर दुदुभी जी, जो न सुणंता कान । लहोतो जीरण तो सही जी, केवल अविचल थान || जग ० ॥२५ ।। राजा जीरण ने दियो जी, अधिक मान सम्मान, मुख्य नगर मे धापियो जी जोवो पुण्य प्रमाण ।। जग० ॥ २६॥ दान दियो सुपात्र ने जी, ते निस्फल नवि जाय । पात्र दान अनुमोदना जी, जीरण जिसफल थाय, ।। जग० ।। २७ ।। हम जणी अनुमोदना जी, दान सुपात्र रसाल । दान देवे सुपात्र मे जी, तेहने नमे मुनिमाल || जग० ॥ २८ ॥ श्री नाकोड़ा जी जिन स्तवन । अपने घर बैठा लीला करो, निज पुत्र कलत्र सुप्रम धरो । तुम देश देशान्तर काई दोडो, नित्य नाम जपो श्री नाकोड़ो ॥ १॥ मन वंछित सगली आस फले, सर ऊपर चामर छत्र ढले। पारल चालेजल २ घोड़ो। नित० ॥ २ ॥ भूत ने प्रेत पिशाच वली, शाकण ने डाकण जाय टली । छज्ञ छिद्र ने लागे कांई कोडो । नित || ३ || एकान्तर ताव सियो दाऊ, औषध बिन जाय थइ नाऊ । नवि दूखे माथा पग गोडो ॥ नितः ॥ ४॥ कंठमाला गड गुम्बड सगला, ब्रण कुमर रोग टले सबला । पीडा न करे फणगण फोडो ॥ नित० ॥ ५॥ तू जागतो तीरथ पास पहु, तुमें जाने सगली जगत सहु ततक्षण अशुभ करम तोडो ॥ नितः ॥ ६॥ श्रीपास महेवापुर नगरे, मैं भेठ्या जिनवर हरष , भरे । समय सुन्दर कहे गुण जोडो ।। नित० ॥ ७ ॥ श्री नवकार स्तवन । श्री नवकार जपो मन रंगे, श्रीजिनशासन साररी माई । सर्व मंगल मांहे पहलो मंगल जपतां जय जयकार री माई ॥ श्रीनव० ॥ ॥ १ ॥ पहले पद त्रिभुवन जन पूजित, प्रणमू श्री अरिहंतरी माई । अष्ट करम वरजित वीजे पद, ध्यावो सिद्ध अनन्त री माई ।। श्रीनव ।। ॥ २॥ अचारज तीजे पद सुमरो, गुण छत्तीस निधान री माई। चौथे पद उवझाय जपीजे, सूत्र सिद्धांत सुजाण री माई ।। श्रीनव० ॥३॥ सर्व साधु पंचम पद प्रणमू, पंच महाव्रत धार री माई । नवपद अष्ट इहां छ सम्पद, अडसठ वरण संभार री माई || श्रीनवट ॥४॥ सात यहां गुरु अक्षर एहना, एक अक्षर उच्चार री माई । सात सागर ना पातिक जाये, पद पचास विचार री माई ।। श्रीनव० ॥ ५॥ संपूरण पणसे सागर ना, पाप पुलावे दूर री माई । इह मन क्षेम कुशल भव चंछित, पर भव सुख भरपूर री माई ।। श्रीनव ० ॥ ६॥ रतिवर सोवन पोरसी सिधो, शिवकुमार इण ध्यान री माई । सर्प छोड़ हुई फूलमाला, श्रीमति ने परधान री माई ॥ श्रीनव० ॥ ७ ॥ इति उपद्रव करतो निवार थो, परचो इहां पर सिद्ध री माई ॥ श्रीनव०॥ ८ चोर चंड पीगल ने हुँडक । पामे सुर नर रिद्विरी माई ।। थीनब० ॥ ८ ॥ पंच परमेप्टी जग में उत्तम, चवदे पूरच सार री माई । गुण बोले श्री ( ११ ) पदमराज जसु, महिमा अपरंपार री माई ॥ श्रीनव ॥१॥ श्री चिन्तामणि पास स्तवन । आणी मनसुध आसाता, देव जुहारू सासता। पारसनाथ मनवंछित पूर, चिन्ता मणि म्हारी चिन्ता चूर ॥ १॥ अणियाली तोरी आंखड़ी, जाने कमल तणी पांखड़ी । सुखदीखे दुख जावे दूर ॥ चिन्ता ॥२॥ दूजे तो को केहने नमे, माहरे मन में तुहिज रमे। सदा जुहारू उगते सूर ।। चिन्ता० ॥ ३॥ मुज मन लागी तुम सू प्रीत. दूजो कोई न आवे चित्त । कर मुझ तेज प्रताप पंडूर । चिन्ता० ॥ ४ ॥ वीछड़िया चालेसर मिला, वेरी दुश्मन पाछा ठिला । तूंछे माहरे हाजरो हजूर ॥ चिन्ता ॥ ५॥ एह स्तोन मनमें जेधरे, तेहना चिन्त्या कारज सरे आधि व्याधि दुख जाचे दूर ।। चिंता० ॥ ६॥ भव भव होज्यो तुम पाय सेवा, श्री चिन्तामणि अरिहंत देव। समय सुन्दर कहे सुख भरपूर ॥ चिंता०॥७॥ श्री गौतमाष्टक । अह उठी गौतम प्रणमीजे, मन बंछित फल नो दातार । लब्धि निधान सकल गुण सागर, श्रीवर्धमान प्रथम गणधार ॥ प्रह० ।। १ ।। गोतम गोत्र चवद विद्यानिधि, पृथिवी मात पिता बसुभूत । जिनवर वाणी सुणी मन हरख्यो, बोलाब्यो नामे इन्द्रमूत ।। प्रहः ॥ २॥ पंच .

( १२ ) ते ध्यान महाबत लही प्रभू पासे, ये त्रिपदी जिनवर मनरंग। श्री गौतम गण- घर तिहां गूथ्यां, पूरव चवद दुबालस अंग ।। प्रह० ॥३॥ लवधे अप्टापद गिरी चढ़िया, चैत्य वन्दन जिनवर चौबीस । पनरे से तीहोतर तापस, प्रतिबोधी कीधा निज सीस ।। मह० ॥ ४॥ अद्भुत एह सद्गुरुनो अतिशय, जसु दिखे तसु केवल नान । जावजीव छठ २ तप पारणो, आपण गोचरी पै यमध्यान ॥ प्रह ।। ५ ।। कामधेनु सुर तरु चिंतामणी, नाम माहै सज करेरे निवास । सदगुरु नो धरता, लाभे लक्ष्मी लील विलास । ग्रह ॥ ६ ॥ लाभघरोविणजे व्यापारे, आवे प्रवहण कुशले क्षेम श्री सद्गुरु नो नाम जपंतां पामे पुत्र कलत्र बहु प्रेम ।। प्रह० ।। ७ ।। गोतम स्वामी तणा गुण गाता, अष्ट महासिद्धि नवे रे निधान । ससय सुन्दर कहै सुगुरु प्रसादे । पुन्य उदय प्रगट्यो परधान ।। ग्रह ।।८।। श्री गोतम स्वामी छन्द । वीर जिनसर केरो सीस, गौतम नाम जपो निस दीस । जो कीजे गौतम नो ध्यान, तो वर विलसे नवे निधान ।। १ ।। गौतम नाम गयबर चड़े, मनवछित लीला संपजे । गौतम नामे नावे रोग, गौतम नामे सर्व संयोग ।। २॥ जे वैरी विरुवा वांकड़ा, तस नामे नावे टूकड़ा। भूत प्रेत नवि मंडे पाण, ते गौतमना करु वखान ॥ ३ ॥ गौतम नामे निरमल काय, गौतम नामे वाधे प्राय । गौतम जिन ( १३ ) - शासन सिणगार, गौतम नामे जयजयकार ॥४॥साल दाल सुहरा घृत गोल मनवंछित कापड़ तंवोल । घरे सुधरणी निरमल चित्त, गोतम नामे पूत विनीत ।। ५॥ गौतम उदयो अविचल भाण, गौतम नाम जपो जगभाण । मोह माया मन्दिर मेरु समान, गौतम नामे सफल विहाण ॥ ६॥ घर गय गल घोड़ा नी जोड़, वारुं पहुंचे वांछित कोड । महि- ल माने मोटा राय, जो तूठे गौतम ना पाय ।। ७ ॥ गौतम प्रणम्यां पातक टले, उत्तम नर नी संगति मले। गौतम नामे निरमल ज्ञान, गौतम नामे वाधे वान ॥ ८॥ पुण्यवन्त अवधारो सहु, गुरु गौतम ना गुण के बहु। कहे लावन्य समय कर जोड़, गौतम तूठे सम्पत कोड़ ॥६॥ श्री कुशल सूरिजी स्तवन । सदगुरु पूजण जवस्यां, म्हे तो कुशल सुरिन्द गुण गास्या हे माय। श्रीफल भेट चड़ावस्यां, मैं तो चरण री पूज रचास्यां हे माय ।। सद० ।। ॥१॥ मरु देश मे शोभत एतो नगर बिकाणे छाजे हे माय । गाम गाडाले दीरता, ज्यारी महियल महिमा गाजे हे माय ॥ सद् ।। २ ।। समर यां संकट चूरता, ए तो कुशल करण अवतारी हे माय । सुख दायक श्री संघ ने एतो खरतरगच्छ अधिकारी हे माय ॥ सद० ।। ३ ।। दूर देशान्तर थी घणा, एतो हिल मिल यात्री आबे हे माय । लुलि २ शीस नमावतां । एतो संत सुयश मिलगावे हे माय ।। सइ० ( १४ ) ॥ ४॥ सज सिणगार मनोहरू, एतो गौरी मंगल गावे हे माय । तनमन प्राण लोभावती, एतो सन्त सुयश मिल गावे हे माय ।। सदः॥ ।। ५॥ विछुड्यां साजन मेलवे, एतो अनमी पाय नामाये हे माय । मन रो मनोरथ पूरवे, परघर लखमी लावे हे माय ॥ सद० ॥ ६॥ विषमी वेला वाट मे, एतो समरयां सानिध भावे हे माय । भूखां भोजन मेलवे, एतो तिसियां नीर पिलावे हे माय । सद्० ॥ ७ ॥ यात्री भावे नितनवा, एतो शान आगल थिर थाटे हे माय । सीरणीया नित सामठी, एतो गावे गुण गहगाटे हे माय ।। सद• ॥ ८ ॥ कुशल सूरिन्ह गुरु अागले, एतो भविमिल भावना भावे हे मात्र । चन्द फत मुनि नित नमे एता परमानन्द सुख पावे हे माय ।। सद० ॥६॥ श्री दादा गुरु गुण-इकतीसा दोहा श्री गुरु देव दयाज को, मन में ध्यान लगाय, अष्ट सिद्धि नवनिद्धि मिले, मनवांजित फल पाय। चोपाई- श्री गुरु चरण शरण में आयो, देख दरस मन अति सुख पायो। इत्त नाम सुख भंजन हारा, विजली पात्र तले धरनारा ।। १ ।। उपशम रसका कन्द कहावे, जो सुमरे फत निश्चय पावे । दत्त सम्मति दातार - ( १५ ) दयालु, निज भक्तनके हैं प्रतिगलु ॥२॥ बावन वीर किये वश भारी. तुम साहिब जग में जयकारी । जोगणी चौसठ वशकर लीनी, विद्या- पोथी परगट कीनी ।। ३ ।। पांच पीर साधे वलकारी, पच नदी पंजाब मझारि । अन्धों की आंखें तुम खोली, गुगों को दे दीनी बोली ॥ ४ ॥ गुरु वल्लभ के पाट बिराजो, सूरिन में सूरज सम राजो । जग में नाम तुम्हारो कहिए, परतिज सुर तरु सम सुख लहिये ॥५॥ इष्ट देव मेरे गुरु देवा, गुणी जन मुनि-जन करते सेवा तुम सम और देव नहीं कोई जो मेरे हितकारक होई ॥ ६॥ तुम हो सुरतरु वञ्छित दाता, में निसदिन तुमरे गुण गाता । पार ब्रह्म गुरु हो परमेश्वर, अलख निरंजन तुम जगदीश्वर ।। ७ ।। तुम गुरु नाम सदा सुख दाता, जपत पाप कोटी कट जाता । कृग तुम्हारी जिन पर होई, दुःख कष्ट नही पावे सोई ।।८।। अभयदान दाता सुखकारी, परमात्म पुरण ब्रह्मचारी । महा शक्ति बल-बुद्धि-विधाता, मैं गुरु नित उठ तुम्हें मनाता ॥ ६ ॥ तुम्हरी महीमा है अतिभारी, टुटी नाव नई कर डारी । देश देश में थम्भ तुम्हरा, सघ सकल के हो रखवाला ॥ १० ॥ सर्व सिद्धि निधि मंगल दाता. देव परि सब सीस नमाता । सोमवार पूनम सुखकारी, गुरु दर्शन पावे नरनारी ॥ ११॥ गुरु छलने को किया विचारा, श्राविका रूप जोगणी धारा । कीली उज्जयनी मझधारा, गुरु गुण अगणित किया विचारा ॥१२॥ हो प्रसन्न दीने वरदाना, सात ( १६ ) जो पसरे मही दरम्याना । युग प्रधान जय जन हितकारा अंबड मान चुर्ण कर डारा ॥ १३॥ मात अम्विका प्रकट भवानी, मन्त्र कला धारी गुरु ज्ञानी । अमावस को चांद उगायो, देख अचम्भो सब को आयो ॥ १४ ॥ मणिधारी जिनचन्द कहावे, जांकी सुनिजर मुझ मन चावे । अकवर को अभक्ष्य छुड़ाया, मुगल-पून को तुरत जिलाया ॥ १५॥ पृजे दील्ही मे जो ध्यावे, संकट नहीं सुपने में आवे । ऐस दादा साहब मेरे, हम चाकर चरणन के चेरे ॥ १६ ॥ निशदिन भैरू गोरे काले, हाजिर हुकम खडे रखवाले । कुशल करण लीनो अवतारा, सद्गुरु मेरे सानिधकारा ।। १७ ।। डूबती जहाज भक्त की तारी, पंखी रूप धर्यो हितकारी । सघ अचम्भा मन में लावे, गुरु तव शुभ व्याख्यान सुनावे ॥१८|| गुरु वाणी सुन सब हरखाये, गुरु भवतारण तरण कहाये । समय सुन्दर की पच नदी मे, फट गई जहाज नई की छिन मे || १६ || अव है सद गुरु मेरी बारी, मुझ पतित न ओर भिस्यारी । श्री जिनचन्द सूरी महाराजा, चौरासी गच्छ के सिरताजा ॥ २० ॥ शास्त्र सिद्धान्त महोदधि सारे, जगम युग प्रधान जयकारे । भट्टारक पद नाम धरावे, जय जय जय जय गुणिजन गावे ॥ २१ ॥ फरक सहित गुरु अंक बत्तावे, भुखा भोजन आन खिला।। प्यास भक्त को नीर पिला, जलधर उण लालबावे ॥२२॥ अमृत जैसा जल वरमांव कभी काल नहीं पड़ने पावे । अन धन से ( १७ ) भरपुर वनावे. पुत्र पौत्र बहु सम्पति पावे ।। २३ ।। चामर- -युगल ढुले सुखकारी, छत्र कीरणीया सोभा भारी । राजा राणी सीस नमावे, देव परी सब ही गुण गावे ।। २४ । पूरब पच्छिम दक्षिण ताई, उत्तर सर्व दिशा के मांही। जोत जागती सदा तुम्हारी, कल्प-तरु सदगुरु गणधारी ।। २५ ।। विजयइन्द्र सूरी सूरीश्वर राजे, छड़ीदार सेवक संग साजे । जो यह गुरु इकतीसा गावे, सुन्दर लक्ष्मी लीला पावे ॥ २६ ।। जो यह पाठ करे चितलाई, सदगुरु उनके सदा सहाई। वार एक सोपाठ जो गावे, राज-दण्ड बन्धन कट जावे ॥ २७ ॥ संवत् पाठ दोय हजारा, आसो तेरस शुक्रवारा । शुभ मुहरत बुर सिंह लगन में, पूरण कीनो वैठ मगन में ।। २८ ।। - । (दोहा) - सद्गुरु का समरण करे, धरे सदा जो ध्यान । प्रात उठी पसिले पढ़े, होय कोटि कल्याण । २६ । सुनो रतन चितामणि, सद्गुरु देव महान् । चन्दन श्री गोपाल का लीजे विनय विधान । ३० । चरण शरण में मैं रहूं-रखियो मेरा ध्यान ।, भूल चूक माफी करो- हे मेरे भगवान । ३१ । ॥ इति ॥

( १८ ) ॥ अथ श्री शांतिनाथजी नो छन्द ॥ जी - (वीर जिनेसर केरो शिष्य- ए देशी) शांतिनाथ को कीजे जाप, क्रोड भवोना काटे पाप || शांति- नाथजी म्होटा देव, सुरनर सारे जेहनी सेव ॥ १ ॥ दुःख दारिद्र जावे दूर, सुख सपति होवे भरपूर ॥ ठग फांसी गर जावे भाग, चलती होवे शीतल आग ॥ २॥राज लोक मां कीर्ति घणी, शांति- जिनेश्वर माथे धणी । जो ध्यावे प्रभुजी नुध्यान, राजा देव अधिकु- मन ॥३॥ गड गुबड़ पीड़ा मिट जाय, देखी दुश्मन लागे पाय । चलो भाग्यो मननो भर्म, पाम्यो समकित काटयां कर्म ॥ ४॥ सुणो प्रभु मोरी अरदाश, हूं सेवक तमे पूरो आश । मुझ मन चिंतित कारज करो, चिन्ता आरति विघ्नज हरो ॥ ५॥ मेटो म्हारां आल जंजाल प्रमु मुझने तु नयण निहाल । अपनी कीर्ति ठामो ठाम, सुधारो प्रभु म्हारा काम ॥ ६ ॥ जो नित्य नित्य प्रभुजी ने रटे, मोती बंधा फूला कटे । चेपलावण दोनों जल जाय, विण औषध कटजाचे छाय ॥ ७॥ शांतिनाथ ना नाम थी थाय, अांखे टूट पडल कट जाय। कमलो पोलो जल जल झरे, शांति जिनेश्वर शांति करे ॥ ८॥ गरमी व्याधि मिटाये रोग, सज्जन मिलनों मले संयोग । एहवो देव न दीसे और, नहीं चाले दुश्मन को जोर ॥ १०॥ लुटारा सब जावे नास, दुर्जन फीटी होवे दास । शांतिनाथ नी कीर्ति गणी, कृपा करो तमे ( १६ ) - त्रिभुवन धणी ॥ १० ॥ अरज करू छु जोड़ी हाथ, आप सू नहीं कोई छानी बात । देख रह्या छो पोते आप, काटो प्रभुजी म्हारां. पाप ।। ११ ।। मुज मन चिन्तित करियो काज, राखो प्रभुजी म्हारी लाज | तुम सम जग मांहि नहीं कोय तुम भजवाथी शाता होय ॥ १२ ।। तुम पास चले नहीं मर को रोग, ताव तेज रो नांखे तोड़ मारि मिटाई कीधी प्रभु संत, तुज गुणनो नही आवे अन्त ।। १३ ।। तुमने सम रे साधु सती, तुमने सम रे जोगी जती। काटो संकट राखो मान, अविचल पदनु आयो थान ॥ १४ ॥ संवत 'अठारह चोराणुजाण, देश मालवो अधिक वखाण । शेहरे 'जविरो'चैतर मास, हुँ प्रभु तुम चरणों का दास ।। १५ ।। ऋषि रूगनाथ जी कीधो छन्द, काटो प्रभुजी म्हारा फन्द । हूं जोऊ प्रभुजी नी बाट, मुझ आरति चिंता सबि काट ॥ १६ ॥ ॥ वन्दे वीरम । वीर जिनंद वांदिने, गौतम गोचरिये सिधाया । इम पालास पुर नगरी में, गौतम घर घर आंगण फिरिया, आगा एम पधारो : पूज, हम घर वहरण वरिया ।। १ ।। इण अवसर एमेतो, रमतो मन गमता मुनि दिटा . कंचन वणि काया जाणी, मनमें लागे' मिठा ॥ आः ॥२॥ बोले कुमर अमृत वाणी, एक करो 'अभिरीमी खरे दुपहारा पाया’ उमराणा, ममता किणदिक कामी, आ० ॥ । इति । -- । - ? ३ ( २० ) . - सांभल कुमर राज सौभागी, सुद्ध मवेशणा किजे, निदपणा ने अति चारी । भावे भिक्षा लीजे, आ० ॥ ४ ॥ चालोनि हमारे मन्दिर, जे केसोते करसां । जे जोइरा. जुगत करीने, भावे भिक्षा देसॉ। बा. ॥ ५॥ इम कही घरते डेलाया, आया मन अानन्दे । एमन्ति रान देखीना, विधि सु गौतम वन्दे । पा० ॥ ६ ॥ अाज हमारे रत्न चिन्तामणि मेह अमीरस बुठा कही मारे प्रांगण, सुर तरु फलिया। कहीं गौतम जिन दिठा । अा० ॥ 3 ॥ रे बालुरा बहु गण वंता, गौतम गण- घर आया । थाल भरीने मोटा मादक, भाव सु बहराया । श्रा० ||८|| कुमरक हे प्रभु भार आपो, भार घणो तुम से । गौतम कह हूं तेहने श्रापु, चारित्र ले उल्लासे । श्रा० ॥ ६ ॥ हूं चारित्र लेसु तुम पासे भार देवो मुझ हाथे । गौतम पूछ कह नया मोकला या सार्थ । ॥ १०॥ चन्दे कुमर पाया, मुनिवरना हाथ धरायो माथे। भोलायो दिनो माताजी, इत कही चाल्या साथे । या० ॥ ११ ॥ श्री गौतम गुरु ज्ञानी जाने, दीक्षा दोधी तेने । वर्द्धमान भोलायो दीनो, मार्ग दीनी एहने । श्रा०॥ १२ ॥ तीन सध्याय एमन्तो चाल्यो, साधु संगते वनमें नानो सरोवर नीर भरी- देखी हरख्यो मनमे ॥ १३ ॥ नानो सरोवर नालो भाजन, एमन्तो साधु जी वलता देखोनी । वालक रमणी करतो । श्रा० ॥१४|| रे बालुरा वहु गुण वन्ता । ए अपराध न कीजे,छ छ छकायना जीव हणता, दुर्गति ना फल लीने । श्रा० ॥ १५ ॥ लाज घणी तिहाँ मनमें आई । समवसरण मे आया. इरिया वही पडिक्कमतां, शुक्ला ध्यान प्रा. नार करे A ( २१ ) मन ध्याया। आ० ।। १६ ।। केवल ज्ञान तिहां उपजायो, धन मुनि एमन्ता । शुद्ध मन चारित्र पाली । ते मुनि मुक्ति पोहता। आ० ।। १७ ॥ गौतम आज एमन्ता सरिखा । गुणवन्ता ऋपि राया, लक्ष्मी रत्न कर जोड़ी ने, वन्दे मुनिना पाया। आ० ।। १८ ।। . । . "[इति] -- . १ - .- - अथ सिद्ध भगवान नु स्तवन हमीरीयानी (अथवा) समवजिन अवधरीये- ए देशी श्री गौतम पृच्छा करे, बिनय करी शीश नमाय | प्रभुजी । अविचल स्थानक में सुण्यु, कृपा करी मोय वताय ॥ प्रभुजी | शिव- पुर नगर मोहामणु ! १ ॥ (ए श्रांकणी ) | आठ कर्म अलगांकरी सार या आतम काम हो । प्र० ॥ छूट्या संसारना दुःख थकी, तेणे रहेवानु किहाँ ठाम हो । प्र० ॥ शि० ॥२॥ वीर कहे ऊर्ध्व लोकमां सिद्ध शिलातणु ठाम हो गौतम ॥ स्वर्ग छब्बीशनी उपरे, तेहंनां वारे नाम हो । गौ० ॥ शि० ॥ ३ ॥ लाख पिरंतालीश जोजना लांबी पोहली जाण हो । गौ० । आठ जोजन जाडी विच्चे, छेड़े मक्खी पंख ज्युजाण हो । गौ० ॥ शि०। ४॥ उज्जवल हार मोतीतणो, गोदुग्धशंख वखाण हो ॥ गौ० ॥ ते थकी ऊजली अति घणी, उलट छत्र संठास हो ॥ गौ० ॥ शि० ॥ ५॥ अर्जुन स्वर्णसम दीपती, गठारी मठारी जाण सो !। गौः ॥ फ़िटक रत्न थकी निर्मली, सुहाली अत्यन्त वलाण हो । गौ०॥शि०॥ ६॥ सिद्ध शिला ओलंघी गया, . . - ॥ SH - - अधर रह्या सिद्ध राज हो || गौ० ॥ अनोक शुजाई अड्या, साच्या आतम काज हो ।। गौ० ।। शि०॥७॥ जन्म नहीं मरण नहीं, नहीं जरा नहीं रोग हो । गौ० ॥ वैरी नहीं मित्रज नहीं, नहीं संजोग विजोग हो । गौ० ।। शि० ॥ ८ ॥ भूख नहीं तिरपा नहीं, नहीं हर्प नहीं सोग हो । गौ ॥ कर्म नही काया नहीं, नहीं विषयारसयोग हो ॥ गौ० ॥ शि० ॥ ६ ॥ शब्द रूप रस गंध नहीं, नहीं फरस नहीं वेद हो ॥ गौ० ॥ बोले नही चाले नहीं मौन पणु नहीं खेद हो ॥ गौ० ॥शि०॥ १० ॥ गाम नगर तिहां कोई नहीं, नहीं वसती न उजाड़ हो ॥गौ० ॥ काल सुकाल वर्ते नहीं, नहीं रात दिवस तिथि वार हो || गौ० ॥ शि० ॥ ११ ॥ राजा नहीं परजा नहीं, नहीं ठाकुर नहीं दास हो ।। गौ० ।। मुक्तिमा गुरू चेला नहीं, नहीं लघु बड़ाई तास हो । गौ० ॥ शि० ॥१०॥ अनन्ता सुखतां झीली रह्या, अरूपी ज्योति प्रकाश हो ।। गौ० ॥ सहु कोईने सुख सारीखां, सघला ने अविचिल वास हो । गौ० ॥ शि० ॥ १३॥ अनन्त सिद्ध मुगतें गया वली अनंत जाय हो.॥ गौ० ॥ अवरजग्या रू घे नहीं, ज्योति मां ज्योति समाय हो || गौ० ॥ शि०॥ १४ ॥ केवल ज्ञान सहित छे , केवल दर्शन खास हो ।। गौ० ॥ क्षायक समकित दीपन्तु, कदीयन होवे उदास हो । गौ. ॥ शिः ॥ १५ ॥ सिद्ध स्वरूप जे ओ लखे, अणीमन वैराग्य हो ॥ गौ० ॥ शिवसुन्दरी वेगेवरे, नय कहे सुख अथाग हो ॥ गौतम । शिव०॥१६॥ इति ।

( २३ ) ॥ सरस्वती का स्तोत्र ॥ - मा भगवती विद्यानि दे नारी, माता सरस्वती, तु वाणी विलासनी देनारी, अज्ञान तीमीरणी हरनारी. तु ज्ञान विकासनी करनारी ।। मा० ॥ १॥ तु ब्रह्माणी जगमाता आदि भवानी तु त्राता कासमीर मडनी सुख दाता ॥ मा || २॥ माने मस्तके मुकट विराजे खे दोय काने कुडल छाजे छे हिये हार मोतीनों राजे छे ।। मा० ॥ ३ ॥ एक हाथ वीणा सोहे छे वीजे पुस्तक पढी बोहे छे, कमलाकर माला महे छे ।। मा० ॥ ४ ॥ हंस आसन बेसी जगत फिरे, कवि जननां मुख मां संचरे मा मुजने बुद्धि प्रकाश करे, ।। मा० ॥५॥ सचराचर मां तु हवमितुज ध्यान 'धरे चीत उलसीने विद्या पामे हसि हसि ।। मा० ।। ६ ।। क्षुद्रोपद्रव हर नारी कहे, दयानदने सुखकारी शासनदेवी मनोहरी हुँ जावू बलीहारी ॥ मा० ॥ ७ ॥ ॥ श्री मणिभद्रजी का छन्द ॥ (श्री शिवकीति मुनि विरचित) श्री माणिभद्र सदा समरो, उर बीच ध्यान अखड धरो॥ जपिया जय जयकार करो, भजीया सहु नित्य भंडार भरो ॥ १॥ जे कुशल करे नामज लिया, आनन्द करे देव आश कीयां ॥ सोभाग्य वधे जग सहस्स गुणो दिल से व्योदे प्रभुजश गणो।।।।अरियण सहु अलगा भागे, विरूआवेरी जन पायल गे। संकट शोक वियोगहरे, उणवेला आयसहाय करे ॥ ३ ॥ भूत भयंकर सहु भागे, जक्ष योगणो सायणी नवि लागे । वाय चोरासी जोय अलगी, लखमी सहु आप मले वेगी ॥ ४ ( २४ ) मने ॥ || गुल पापड़ियां गुरुवार दिने, लापसिया लाडूशुद्ध धूप दीप नेवेद्य धरो, आठम दिन पुजा अयश्य करो ॥ ५ ॥ जेहने दिन प्राते जाप सदा, तस सुपनांतर में प्रत्यक्ष कदा ॥, जपयाँ सहु जाये आपदा कोउ मणा घरे रहे न कदा ॥ ६॥ मुहमद सारू तमें जस करयो, गुण सायर जिस्यो तमे गुण भरयो || श्री दीननाथ जी दया करो, शिर उपर हाथ दियो सखरो ॥ ७ ॥ भवियण जे भावे मनशे, कारज सिद्धो अापणी करशे ।। पूज्यां पुत्र ववे दुगुणा किणी वाते कदि रहे न उणा || 5 || श्री मणिभद्र मनमें ध्यावो, सुख संपत्ति बहु वेगो पावो || लक्ष्मी कीर्ति वर आप लहे, शिव कीर्ति मुनि एम सुजस कहे ।। ।। [ इति समाप्तम् ] कविता उपम कनक देव, उपमन काहू तेव, चुल्ल हेम तेज जेम, जोती मोती नीरकी। लंछन हजार आठ, कर्म दल दोना काट, जोजन गमन रूप, वाणी एक वीर की ॥ १ ॥ पत्थर फटिक मांहि, ताउ पै विराजमान, वचन प्रकाशे प्रभु, धूट जैसी खीर की । तरण तारण देव, सुरपति सारे सेव, ऐसी महिमा लोक में, विराजे महाधीर की ॥२॥ चौवीसमो महावीर, शूरवीर महावीर, वाणी मीठी दूध खीर, सिद्धारथ नन्द है । 7 - .

( ५ ) नाग जैसी नार जाणे, घट में वैराग आणे। जोग लियो जग मांहि, छोडा मोह फन्द है ।। ३ ॥ चौदह हजार सन्त, तार दिया भगवन्त, करमों का किया अन्त, पाम्या सुख कुन्द है। भणे "मुनि चन्द्र भांण" सुणो भविक ? गण, महावीर किया ध्यान, उपजे आनन्द है ॥ ४ ॥ [ समाप्त ] स्तुति ब्राह्मी चन्दन बालीका, भगवती राजीमती, द्रौपदी कौसल्या च सृगावती, च सुलसा सीता सुभद्रा शिवा, कुन्ति शीलवती नलस्य दहिता, चुला प्रभावत्यपि पद्मावत्यपि सुन्दरी, दीन प्रते कुर्वन्तु वो मांगलम् ।। १॥ इति । गौतम स्वामी का छन्द प्रह उठी नित प्रणमिये गुणवन्ता, गौतम गणधार पर गुर्वर नामे, भलो गांव, सोहे देश मगध मझार द्विज वसुभूति ने धरे तिहां लिनो उतम अवतार ॥ १ ॥ पृथ्वी माता जन्म या तनु सोहे, सुन्दर सुकुमार, गौतम गोत्र विराजता नाम थाप्यो इन्द्र भूति उदार ॥ २ ।। सोवन घरण सुहावणो तनु उचोकर लात निहाल, श्री महावीर जिणंद के पटधारी पहला गणधार ॥ ३ ॥ वानुवरष को आउखो प्रभु पहुँता ( २६ ). मुक्ति मझार, नाम लिये सुख संपजे दुःख नावे दोहग दूर पुलाय ॥ ४॥ पदसेवा गुरु राय की पुण्य योगे पाये नर नार साधु क्षमा कल्याण की नित हो जो बन्दना वारम्वार ॥५॥ [इति समाप्तम्] श्रीमान देवसूरि कृत लधुशान्ति स्तव शान्ति शान्ति निशान्तं, शान्तं शान्ताऽशिवं नमस्कृत्य । स्तोतुः शान्ति निमित्त , मन्त्रपदैः शान्तये स्तौमि ।। १ ।। श्रोमिति निश्चित- वचसे, नमो नमो भगवतेऽहते पूजाम् । शान्ति, जिनाय जयवते, यशस्विने स्वामिने दमिनाम् ।। २ ।। सकलातिशेषकमहा, सम्पत्ति सम- न्विताय शस्य'य। त्रैलोक्य पूजिताय च, नमो नमः शान्तिदेवाय ॥३॥ सर्वामर सुसमूह, स्वामिक संपूजिताय निजिताय । भुवन जन पालनोद्यत, तमाय सततं नमस्तरस्मै ॥ ४ ॥ सर्व दुरितोष नाशन कराय सर्वाऽशिव प्रशमनाय । दुप्ट ग्रह भूत पिशाच, शाकिनीनां प्रमथनाय १५॥ यस्येति नाम मन्त्र, प्रधान वाक्योपयोग कृततोपा । विजया कुरुते जनहित, मिति च नुता नमत त शान्तिम् ॥६॥ भवतु नमस्ते भगवति ! विजये। सुजये! परापरैरजिते ! अपराजिते । जगत्यां, जयतीति जयावहे भवति ।। ७ || सर्वस्यापि च संघस्य, भद्रकल्याण मङ्गलं प्रददे । साधूनां च सदाशिव, सुतुष्ठि पुष्टि प्रदेजीयाः ।।८।। भन्वाना कृतसिद्ध ! निवृत्ति निर्वाण जननि ! सत्वानाम | अभयप्रदान 5.

निरते ! नमोऽस्तु स्वस्ति प्रदे तुभ्यम् ॥ ६ ॥ भक्तानां जन्तूना, शुभावहे नित्यमुद्यते देवि ! सम्यग्दृष्टीनां धृति, रति मति बुद्धि प्रदानाय ॥ १०॥ जिन शासन निरताना, शान्ति नतानां च, जगति जनतानाम् श्री सम्पत् कीर्तियशो वर्तनि जयदेवि ! विजयस्व ।। ११ । सलिलानल विव विपधर, दुष्ट ग्रह राज रोग रण भयतः । राक्षस रिपुगण मारि चौरेति श्वापदादिभ्यः ॥ १२ ।। अथ रक्ष रक्ष सुशिव, कुरु कुरु शांति च कुरु कुरु सदेति । तुष्टि कुरु कुरु पुष्टि कुरु कुरु स्वस्ति च कुरु कुरुत्वम् ।। १२ ।। भगवति ! गुणवति ! शिव शान्ति तुष्टि पुष्टि स्वस्तीह कुरु कुरू जनानाम । ओमिति नमो नमो हां ह्रीं ह हः यः क्षः ह्रीं फुट फुट स्वाहा ॥ १४ ॥ एवं यन्नामातर पुररसरं, संस्तुता जयादेवी। कुरुते शान्ति नमतां, नमो नमः शान्तये तस्मै ॥ १५ ।। इति पूर्वसूरि- दर्शित, मन्त्रपदविदर्भितः स्तवः शान्तेः । सलिलादि भय विनाशी, शान्त्यादि करश्च भक्तिमातम् ।। १६ ।। यश्चैनं पठति सदा, शृणोति भावयति वा यथा योगम् । स हि शान्तिपदं यायात् , सूरिः श्रीमान- देवश्च ।। १७ ।। उपसर्गाः क्षयं यान्ति, छिद्यन्ते विघ्रवल्लयः । मनः प्रसन्नतामेति, पूज्यमाने जिनेश्वरे ।। १८ ।। सर्व मङ्गल माङ्गल्यं सर्व कल्याणकारणम् । प्रघानं सर्बधर्माणां, जैनं जयति शासनम् ।।१६।।

( २८ ) - वृद्ध णमोकार स्तोत्र किं कायत्तरु रे अयाण, चितउ मभितरि । किं चिंतामणि कामधेनु, आराहो बहुपरि ।। चित्तावेली काज किसे, देसान्तर लंघर रयणरासि कारण किसे, सायर उल्लंउ ।। १ ॥ चवदे पूरब सार युग लद्धउ ए णवकार । सयल काज महियल सरे, दुत्तर तरे संसार ।। केवलि भासिय रीत जिके, नवकार अाराहे । भोगवि सुक्व अणंत, अन्त परम प्पय साहे ॥ २ ॥ इग झाणे सुर ऋद्धि पुत्त, मुह विलसे बहु परि । इण भाणे सुरलोक इन्द, पद पामे सुन्दरी ।। एह मत्र सासतो जपे, अचिंत चिंतामणि एह। समरण पाप सबै टले, ऋद्धि सिद्धि रिणयगेह ।। ३ ।। गिय सिर ऊपर माण, मन्झ चितवे कमल नर । कंचणमय अठदल सहित, तिहां माहे कनम्वर ॥ तिहां बैठा अरिहत देव, पउमासण फिदकमणि । सय वत्थ पहरेवि पहम पय चिंते रिणय- मणि ॥ ४ ॥ णिचारय चउ गई गमण, पामिय सासय सुक्ख । अरि- हंत झाणे तुम लहो, जिम अजरामर मुक्ख । पनर भेय तिहां सिद्ध बीय पद जे याराहे । राते विद्रु मत्रणे वणणिय सोहग साहे ॥ ५ ॥ राती धोवत पहर जपें, सिद्धहि पुव्वे दिसि । सयज लोय तिह नर ही होइ ततखिण सेंबसि ।। मूल मंत्र वसीकरण, अवर सहू, जंगबंध । मणमूली ओपध करे बुद्धिहीण जाचंध ॥ ६॥ दक्षिण दिसि पखड़ी जपे नमो आयरियाणं । सोवणवण्हं ।। सीससहित उवए सहिणाणं ।। मृद्ध सिद्ध कारणे लाभ, , १ ( २६ ) ऊपर जे ध्यावे । पहरे पीलावत्थ तेह, मण वंछिय पावे || ।। इण झाणे णवणिधि हुवे, ए रोग कदे णवि होय । गय रह हय वर पालखी, चामर छत्त सिर जोय ॥णीलवण्ण उवझाव, सीस पाढता पच्छिम । आराहिज्जे श्रङ्ग पुव धारन्त मणोरम || ८ || पच्छिम दिस पंखडीय कमल ऊपर सुहमाण । जोवौ फरमाणंद तासु गय देवविमाण || गुरु लघु जे रक्खे विदुर. तिहां नर वहु फल होई । मन सूधे विण जे जपे, तिहां फत्त सिद्ध ण जोई ।। ६ ॥ सव्व साधु उत्तर विभाग सामला बइठा । जिण धर्म लोय पयासयंत चारित्र गुण जिट्ठा ॥ मण वयण काएहिं जपे जे एके झाणे 1 पंचवरण तिहां णाण झाण गुण एह पमाणे ॥ १० ॥ अनन्त चौवीस जग हुए होसी अवर अणंत । आदि कोइ जाणी नहीं, इण णवकारह मंत । एसो पंच णमुक्कारो, पद दिसिय गणेहिं । सव्व पावप्पणासणो, पद जपणेरेहिं ॥ ११ ।। वायव दिसि झाएह, मंगलाणं च सव्वेसि । पढम हवई मंगलं ईसाण पएसि ॥ चिहुँ दिसि विदिसे मिलिय, अठ दल अमल ठवेइ । जो गुरु लघु जाणी जपे, सो घण पाव खवेइ ।। १२ । इण प्रभाव धरणिंद हुओ, पायालह सामी । समली कुमर उपएण भिल्ल, सुर लोयह गामी ।। संबल कंवल वे वलद पहुतां देवा कप्पे । सूली दीधो चोर देव थयो रणवकारहि जप्पे ।। १३ ।। शिवकुमार मण वंछिय करे. जोगी लियो मसाण । सोणापुरसो सीधलो, इण णवकार पमाण || छीके बैठो , चोर एक आकासेगामी । अहि फिट्टि हुई फूल माल णवकारह णामी ॥ १४ ॥ वाछरुया चारंत बाल, जल नदी प्रवाहे । वीक्ष्यों कंटहि उयर मन्त्र, जपियो मन मांहे | चित्या काज सवे सरे, ईरत परत विमास । पालित सूरितणी परे, विद्या सिद्ध आकास ॥ १५ ॥ चोर धाड़ संकट टले, राजा वसि होवे । तित्थंकर सो होइ, लाख गुण विधिसू जोवे ॥ साइण डाइण भूत प्रेत, वैताल न पोहवे । श्राधि व्याधि ग्रहतणी पीडते, किमहि न होवे ।। १६ ।। कुछ जलोदर रोग सर्वे नासे एणही मंत । मयणासुन्दरितणी परे णव पय झाण करंत ॥ एक जीह इण मन्त्रतणा, गुण किता बखार । णणहीण छउमस्थ एह, गुण पार न जाणू ॥ १७ ॥ जिम सन्तु जय तित्थराय, महिमा उदवतो । सयल मंत्र धुरि एह मन्त्र राजा जयवन्तो ।। तित्थंकर गणहर पणिय, चवदह पूरव सार । इण गुण अनन्त को कहे, गुण गिरवो णमोक्कार ॥ १८ ॥ अडसंश्य नव पय सहित, इग्.सठ लहु अक्खर । गुरु अक्खर सत्तेव, इह जाणो परमक्खर ॥ गुरु जिण वलह सूरि भणे, सिव सुक्खह कारण । एरय तिरय गय रोग सोग, बहु दुक्ख निवारण ।। १६ ।। जल थल महियल वरणगहण, समरण हुए इक चित्त । पंच परमेष्ठि मंत्रह तणी, सेवा दीजो नित्त ।। २० ॥

( ३१ ) श्री गौतम स्वामीजी का रास वीर जिणेसर चरण कमल, कमला कय वासो । पणमवि पभणिसु सामिसाल, गोयम गुरु रासो ॥ मण तणु वयण। एकन्त करिवि, निसुणहु भो भविया । जिम निवसे तुम देह गेह गुण गण गहहिया ।। १ ।। जम्बूदीव सिरि भरह खित्त, खोणी तल मण्डण । मगह देस सेरिणय नरेश, रिउ दल बल खण्डण । धणघर गुब्वर गाम नाम, जिहां गुण गण सज्जा । विप्प बसे वसुभूइ तत्थ, तसु पुहवी भज्जा ॥२॥ ताण पुत सिरि इन्द भूइ, भूवलय पसिद्धो । चउदह विज्जा विविह रूव, नारी रस लुद्धो ॥ विनय विवेक विचार सार, गुण गणह मनोहर । सात हाथ सुप्रमाण देह, रूवहि रम्भावर ॥ ३ ॥ नयण वयण कर चरण जणवि, पंकज्जल पाडिय । तेजहि तारा चन्द सूरि आकाश भमाडिय ॥ रूवहि मयण अनङ्ग करवि, मेल्यो निरधाडिय। धीरम मेरु गम्भीर सिन्धु, चंगम चय चाडिय ॥४॥ पेखवि निरुवम रूव जास, जण जंपे किंचिय । एकाकी किल मित्त इत्थ गुण मेल्या सिंचिय ।। अहवा निच्चय पुव्व जम्म जिणवर इण अंचिय, रम्भा पउमा गउरि गङ्ग तिहां विधि वंचिय ॥ ५ ॥ नल बुध नय गुरु कविण कोय जसु भागल रहियो । पंच सयां गुण पान छात्र हीडे परवरियो | करय निरन्तर यज्ञ करम मिथ्यामति मोहिय, अणचल होसे चरम नाण दंसह विसोहिय ॥ ६ वस्तु ॥ जम्बूदीव ( ३२ ) - जम्बूदीव भरह वासम्मि, खोणीतल मण्डण । मगह देस सणिय नरेस बर गुब्बर गाम तिहां ।। विष्प बसे वसु भूइ सुन्दर. तसु पुवि भज्जा । सयल गुण गण रूव निहान, ताण पुत्त विज्जानिलो गोयम अतिहि सुजान ।। ६ भास || चरम जिनेसर केवलनाणी, चौविह सघ पइट्ठा जाणी । पावापुर सामी सम्पनो, चविह देव निकायहिं नुत्तो ॥८॥ देवहि समवसरण तिहां कीजे, जिण दीठे मिथ्या मत छीजे। त्रिभुवन गुरु सिंहासन बैठा, ततखिण मोह दिगन्त पइट्टा ॥ ६॥ क्रोध, मान, माया, मद पूरा, जाये नाठा जिम दिन चोरा। देव दुन्दुभि आगासे बाजी, धरम नरेसर याव्यो गाजी ।। १० । कुसुम वृष्टि अरचे तिहां देवा, चउसठ इन्द्रज मांगे सेवा । चामर छत्र सिरोवरि सोहे, रूवहि जिनवर जग सहु मोहे ॥ ११ ॥ उपसम रस भर वर वर सन्ता, जो जन वाणि वखाण करन्ता । जाणवि बर्द्धमान जिण पाया, सुर नर किनर आवइ राया ।। १२ ।। कन्त समोहिय जल हल कन्ता, गयण विमाणहि रणरण कन्ता । पेख व इन्द्र भूइ मन चिन्ते, सुर आवे अम यज्ञ हुवन्ते ।। १३ ।। तीर तरण्डक जिम ते चहिता समवसरण पुहता गह गहिता । तो अभिमाने गोयम जंपे, इण अवसर कोपे तणु कम्पे ॥ १४ ॥ मूढा लोक अजाण्यू बोले, सुर जाणंता इम काइ डोले । मो आगल कोई जाण भणीजे, मेरु अवर किम उपमा दीजे ।। १५ वस्तु ।। बीर जीनवर चीर जीनवर नाण सम्पन्न पावापुर सुरमहीय, पत्त नाह संसार तारण, 'तही देवइ निम्माहय समवसरण (1 ३३ ) बहु सुक्ख कारण । जिणवर जग उज्जोय करे, तेजहि कर. दिनकारः । सिंहासणं सौमी ठव्यो हुो ते जय जयकार ।। १६ भास ।। तो चडियो घणमाण गजे : इन्दभूइ भूयदेव तो। हुकारो कर संचरिय कवणसु जिनवरदेच तो । जोजन भूमि समवसरण, पेखवि प्रथमारंभ तो । दह दिस देखे विबुध वधू., आवती सुररभ तो ।। १७ ।। मणिमय तोरण दण्ड ध्वज, कोशीशे नवघाट तो । वइर विवर्जित जतुगण, प्राती हारज आठ तो ।। सुरनर किन्नर असुरवंर , इन्द्र इन्द्राणी राय तो। चित्त चमक्कियं चितव ए, सेवंतां प्रभु पाय तो ॥ १८ ॥ सहस किरण सामी वीर जिण, पेखिरं रूव विसाल तो। एह असभव संभव ए, साचो ए इन्द्रजाल तो ॥ तो बोलावइ त्रिजग गुरु इन्द्रभूइ नामेण तो । श्री मुख संसय सामी सवे फेडे वेद पएण तो ॥ १६ ॥ मान मेंल मद ठेल फरे, भगतिहिं नाम्यो सीस तो । पंच सयांसूव्रत लियो ए गोयम पहिलोसीस तो ।। बंधव संजम सुरणवि करे, अगनि- भूइ आवेय तो । नाम लेई आभास करे ते पण प्रतिबोधेय तो ॥ २० ॥ इणं अनुक्रम गणहर रयण, थाप्या वीर इग्यार तो।तो उपदेशे भुवन गुरु सयमसू व्रत बार तो । बिहुँ उपवासे पारणे ए, आपणपे विहरंत तो । गोयम संयंम जग सयल, जय जयकार करत तो ॥२१॥ वस्तु ।। इन्द्रभूइ 'इन्द्रभूइ चंडियो बहु मान, हूंकारो करि कंपतो'। समवसरण पतो तुरंततो जे संसा सामि सवे॥ चरमनाह फेडे फुरत तो, बोधि ( ३४ ) बीज सजाय मर्ने । गोयम भवहि विरत्त, दिक्खा लेई सिक्खा सही गणहर पय संपत्त ॥ २२ ॥ भास ॥ आज हुयो सुविहाण प्राउ पचेलिमा पुण्य भरो । दीटा गोयम सामि, जो निय नवर्ण अमिय झरो ॥ समवसरण मझार, जे जे संसय ऊपज ए। ते ते पर उपगार, कारण पूछे मुनि पवरो ।। २३ ।। जिहां जिहां दीजें दीख, तिहां तिहां केवल ऊपज ए। श्राप कने अणहुँत, गोयम दीजे दान इम || गुरु ऊपर गुरु भक्ति, सामी गोयम उपनिय । अणचल केवल नाण, रागज राखे रङ्ग भरे ।। २४ ॥ जो अष्टापद सैल, चंदे चढ चवीस जिन ! अातम लब्धि बसेण, चरम सरीरी सोज मुनि ॥ इम देसणा निसुणेह गोयम गणहर सचरिय । तापस पन्नरसएण, तो मुनि दीठो पावतो ए ॥ २५ ॥ तप सोसिय निय अङ्ग, अम्हां सगति न उपज ए। क्रिम चूइसे,ह काय, गज जिम दीसे गाजतो ए ! गिरयो ए अभिमान, तापस जो मन चिंतव ए । तो मुनि चढियो वेग, अलबवि दिनकर किरण ॥५६॥ कंचण मणि निष्फन, दण्ड कलस ध्वज वड माहिय लेखवि परमानन्द, जिणहर भरतेसर महिय ॥ निय निय कायोमास, चिहुं दिसि संठिय जिगह विच । पणमवि मन उल्लास, गोयमे गणहर तिहां वसिय ॥ २७ ॥ वयर सामीनो जीव, तिर्यक बृभक देव तिहां प्रतिबोध्या पुण्डरीक । कंडरीक अध्ययन भणी, बलता गोयम सामि ।। सवि तापस प्रतिवोध करे, लेई आपण साथ । . 1 ( ३५ ) 1 चाले जिम जूथाधिपते ॥ २८ ॥ खीर खॉड घृत श्राण, अमिय ब्रूट अंगूठ ठवे । गोयप एकण पात्र, करावे पारणो सवे ! पंच सयां शुभ भाव, उज्जल भरियो खीर मिसे । साचा गुरु संयोग कवल ते केवल रूप हुए ॥ २६ ॥ पञ्च सयां जिननाह समवसरण प्राकारत्रय । पेखवि केवल नाण, उपपन्नो उज्जोय कहे ।। जाणे जिनवि पीयूष, गाजंती धन मेघ जिम । जिनवाणी निसुणेवि, नाणी हुआ पंच सया ।। ३० ।। वस्तु ।। इण अनुक्रम इाए अनुक्रम नाण सम्पन्न । पन्नरेसे परिवरिय, हरि दुरिय जिणनाह बदइ ॥ जाणेवि जग गुरु वयण, तिहि नाण अप्पण निदइ । चरम जिनेसर इम भणे, गोयम मकरिस खेव, छह जाय आपण सही होस्यां तुल्लावेव ।। ३१ ।। भास ॥ सामियो ए वीर जिनन्द, पूनमचन्द जिम उल्लसिय । विहरियो ए' भरहवासम्म बरस बहुत्तर संवसिय ।। ठवतो ए कणय पउमेण, पाय कमल संधै सहिय ।, आवियो ए नयणानन्द, नयर पावापुर सुरमहिय ॥ २२ ॥ पेसियो ए गोयम सामि, देव समा प्रतिवोध करे । आपणो ए तिसला देवि, नन्दन पहुतो परमपए ॥ बंदतो ए देव आकाश, पेखवि जाण्यो जिंण तो मुनि ए मने विषवाद, नाद भेद जिम ऊपनो ए ॥ ३२॥ इण समे ए सामिय देखि आप कनासू टालियो ए । जाणतो ए तिहुअण नाह, लोक विवहार न पालियो ए ॥ अति भलो ए कीधलो सामि, जाण्यो केवल मांग से ए । चिंतव्यो ए बालक जेम. अहवा केडे लागसे ए॥ ३४ ॥ हूं किम ए वीर जिनन्द, भगतिहि भोले समो ए ( ३६ ) भोलव्यो ए आपणो ए ऊचलो नेहा, नाहन संपे सांचव्यो ए॥ साचो ए वीतराग, नेह न इजलालियो ए। तिणसम ए गोयम चित्त, राग वैराग वालियो ए॥ ३५ ॥ यावतो ए जो उल्लट, रहितो रामे साहिय' ए । केवल ए नाण उपन, गोयम सहिज उमाहियो ए ॥ तिहुश्रण ए जय जयकार, केवल महिमा सुर करे ए । गणधर ए करय वखाण भविया भव जिम निस्तर ए ॥ ३६ ।। वस्तु ॥ पढम गणहर बढम गणहर बरस पच्चास गिहवासें संवसिय । नीस बरस संयम विभूसिय, सिर केवल नाण पुण ॥ वार बरस तिहुअण नमंसिय, राजगृही नयरी ठन्यो । बाणवाइ नरसायो सामी गोयम गुण नीलो होसे शिवपुर ठामो ।। ३७ ॥ भास. ॥ जिम सहकारे कोयल टहुके जिम कुसुमावन परिमल महके । जिम चन्दन सोगन्ध निधि, जिम गंगाजल लहिर था लहके ।। जिम कणयाचल तेजे मलके, तिम गोयम सोभाग निधि ॥ ३८ ॥ जिम मान सरोवर, निवसे हसा, जिम सुरतरु वर कणय वतंसा । जिम महुयर राजीय वनें, जिम रयणायर रयणे विलसे।। जिम , अम्बर - तारागण विकसे तिम गोयम गुरु केवल घनें ॥ ३६ ॥ पूनम निसि जिम ससियर. सोहे, सुरतरु महिमा- जिम जग मोहे, पूरब दिस लिम सहस. करो ॥ पचानन जिम गिरिवर राजे, नर वई घर जिम मयगल गाजे । तिम जिन शासन मुनि ।। पवरो ॥ ४ ॥ सिम गुरु तरुवर सोहे साखा, जिम उत्तमः,मुख मधुरी, भाषा । जिम , - + ( ३७ ) . pri ५ . है । बन केतकि महमहे ए, जिम भूमीपति भुयवल चमके ॥ जिम जिन मन्दिर घण्डा रणके, गोयम लब्धे गहगह्यो ए ॥४१॥ चिन्तामणि कर चढ़ियो आज, सुरतरु सारे बंछिय काज । काम कुम्भ सहु वशि हुआ ए, कामगवी पूरे मन कामी ॥ अष्ट महासिद्धि आवे धामी, सामी गोयम अणुसरि ए॥ ४२ ॥ यणवक्खर पहिलो पभणीजे, माया धीजो श्रवण सुणी जे। श्रीमति सोभा सम्भवो ए, देवां धुर अरहित नमीजे ॥ विनय पहु उवझाय थुणी जे, इण मन्त्र गोयम नमो ए ॥ ४३ ।। पर घर वसतां काय करीजे, देश देशांवर काय भमी जे । कवण काज श्रायास करो, प्रह ऊठी गोयम' समरी जे ॥ काज समग्गल ततखिण सीजे, नव निधि विलसे तिहां घरे ए ।।४४ ॥ चवद्य सय बाहोत्तर वरसे, गोयम गणहर केवल दिवसे। कियो कवित उमगार करो, आदिहि मंगल ए पभणी जे ॥ परब महोच्छव पहिलो दीजे, ऋद्धि वृद्धि कल्याण करो ॥ ४५१ धन माता जिण उयरे धरियो, धन्य पिता जिन 'कुल अवतरियो । धन्य सुगुरु जिन दीखियो ए विनयवन्त विद्या भण्डार तसु गुण पहुवि न लभइ पार ॥ बड़ जिम साखा विस्तरो ए, गोयम स्वामि नो रास भणीजे । चरविह संघ रलियायत कीजे, ऋद्धि वृद्धि कल्याण करो ॥४६॥ कुंकुम चन्दन छडो दिवरावो, माणक मोतीना चौक पुरावो । रयण सिंहासण बेसणो ए, तिहां बेसी गुरु देसना देसी ॥ भविक जीवना A -- -- 17 7 hor ( ३८ ) 7 काज सरेसी, नित नित मङ्गल उदय करो।। ४७ ।। राग प्रभाती जे करे, प्रह ऊगमते सूर । भूखां भोजन संपजे कुरजा करे कसूर ॥ १।। अंगूठे अमृत वसे, लब्धि तणा भंडार । जे गुरु गौतम समरिये, मन बंछित दातार ॥ २॥ ग्राम तणे पैशाल डे, गुरु गौतम समरन्त । इच्छा भोजन घर कुशल, लच्छी लील करन्त ॥ ३ ॥ पुण्डरीक गोयम पमुहा, गणधर गुण सम्पन्न । ग्रह ऊठीने प्रणमतां, चवदेसे वावन्न ।। ४ ॥ खन्ति खमगुणकलियं, सुविणियं सव्वलद्धि सम्पएगां । वीरस्स पढम सीसं, गोयम सामी नमसामी ॥५॥ सर्वारिष्ट प्रणाशाय, सर्वाभिप्टार्थदायिने । सर्वलब्धि निधा- नाय, गौतमस्वामिने नमः ॥६॥ श्री शत्रुञ्जय रास ॥ दोहा ।। श्री रिसहेसर पाय नमी, प्रांणी मन आनन्द । राम भरण रलिया मणो, शत्रुञ्जय सुख कंद ॥ १॥ संवत् चार सतोतरे, हुए धनेश्वर सूर । तिण शत्रुञ्जय महातम कियो, शिलादित्य हजूर ।। २ ।। वीर जिनन्द समवसर था, शत्रुजय ऊपर जेम । इन्द्रादिक आगल कह्यो, शत्रुञ्जय महातम एम ॥ ३ ॥ शत्रुञ्जय तीरथ सरिखो, नहीं छे तीरथ कोय । स्वर्ग मृत्यु पाताल में, तीरथ सगला जोय ॥ ४॥ चामे नव निधि संपजे, दीठा दुरित पुलाय । भेटता भव भय टले, (. ३६. ) 1 सेवंता सुख थाय ॥ ५ ॥ जम्बू नामे दीपए, दक्षिण भरत मझार । सोरठ देश सुहामणो, तिहां छे तीरथ सार ॥ ६ ॥ ॥ राग रामगिरी ॥ शत्रुञ्जय ने श्री पुण्डरीक, सिद्धक्षेत्र कहूं तहतीक · विमला- चलने करू परणाम, ए शत्रुजयना इकवीस नाम ।। १ ।। सुरगिरने महागिरि पुण्य राश, श्री पद पर्वत इन्द्र प्रकाश । महा ती थ पूरके सुख काम ए० ॥ २ ॥ सासतो पर्वतने दृढ शक्ति, मुक्ति निलो तिण कीजे भक्ति । पुष्पदन्त महापद्म सुठाम ए० ॥ ३ ॥ पृथ्वी पीठ सुभद्र कैलाश, पाताल मूल अकर्मक ताश । सर्व काम कीजे गुण ग्राम ॥ ४ ॥ श्री शत्रुब्जयना इकवीस नाम, जपेजे बैठा अपने ठाम । शत्रुञ्जय याबानो फल लहे, महावीर भगवन्त इम कहे ।। ५ ।। ॥दोहा॥ शत्रुञ्जय पहले अरे, अस्सी जोयण परिमान । पिहलो मूल ऊंचोपणे छब्बीस जोवण जाण ॥ १ ॥ सत्तर जोयण जाणवों, वीजे अरे विसाल । चीस जोयण ऊंचो कह्यो, मुझ वन्दना त्रिकाल १२॥ साठ जोयण तीजे अरे, पहिलो तीरथ राय । सोल जोयण ऊंचो सही, भ्यान धरू चित्त लाय ।। ३ ।। पचास जोयण पिहुलपण चौथे अरे मझार । ऊंचो दस जोयण अचल, नित प्रणमें नर नार ॥ ४॥ बार जोयण पंचम अरे, मूल तणे विस्तार । दो जोयण ऊंचो अछे, शत्रुञ्जय तीरथ सार |॥ ५॥ सात हाथ छ8 आरे, om () १ पिहुलो परवत एह । ऊंचो होसी सौ धनुष, सासतो तीरय एह ॥६॥ .. ॥ ढाल॥ केवल ज्ञानी प्रमुख तीर्थकर, अनन्त सीधा इण ठाम रे। अनन्त वली सिमस्ये इण ठामे, तिन करूं नित परनाम रे ॥ १ ॥ शत्रुञ्जय साधु अनन्ता सीधा, सीमसी वलिय अनन्त रे । जिन शत्रुजय तीरथ नहिं भेट्यो. ते गरभावास कहन्त रे ।। श० २.॥ कागुन सुंदि अाठमने दिवसे, ऋषभदेव सुखकार रे । रायणरूख समवसरथा स्वामी, पूर्व निनाणू वार रे ॥३॥ भरत पुत्र, चैत्री पूनम दिन, इण शत्रुञ्जय गिरि श्राय रे। पांच कोडी सूपुण्डरीक सीधा, तिन पुण्डरीक कहाय रे ॥ ४॥ नमि विनमी राना विद्याधर, बे वे कोडी संघात रे । फागुन सुदि दशमी दिन सीधा, तिण प्रणम् परमात रे ॥ ५ ॥ चैत्र मास वदि चौदस ने दिन, नमि पुत्री चचसट्टि रे ! अणसण कर शत्रुञ्जय गिरि ऊपर, ए सहु सीधा एकदिरे ॥६॥ पोतरा प्रथम तीर्थकर केरा, द्रावडनु वारिखिल्ल रे। काती सुदि पूनम दिन सीधा, दश कोडी सू मुनि सल्ल रे॥७॥ पांच गिर सीधा, नव नारद ऋपिराय रे। संब प्रज्जून गया इहां मुगते, आठ कर्म खपाय रे । नेमि बिना तेवीस तीर्थकर समवसरथा गिरि शृङ्ग । अजित शान्ति तीर्थकर बैहूँ, रया चौमासे मुरङ्गरे।। ६ ।। सहस साधु परिवार संघाते, थावच्या सुत साय रे। पांडव इण रे पांच से साधु सो सेलग मुनिवर, त्रुजय शिव सुख लाध रे ।। १० ।। असंख्याता मुनि शत्रुञ्जय सीधा, भरतेसरने पाट रे। राम अने भरतादिक सीधा, मुक्ति तणी ए बाट रे ॥ ११ ॥ जालि मयालीने उक्याली, प्रमुख साधुनी कोडि रे । साधु अनन्ता शत्रुञ्जय सीधा, प्रणम् वे करजोड़ि रे ॥ १२ ॥ [ढाल] शत्रुञ्जय कहुँ सोल उद्धार, ते सुणज्योः सहुको सुविचार । सुनन्ता आनन्द अङ्ग न माय, जनम जनमना, पातक जाय ।।१।। ऋषभदेव अयोध्यापुरी, समवसर था. स्वामी हित करी । भरत गयो वन्दनने काज, ये उपदेश दियो जिनराज ॥२॥ जग माहे मोटा अरिहन्त. देव, चौसठ इन्द्र करे जसु सेव । तेहथी मोटो सघ कहाय, जेहने प्रणमें जिनवर राय ॥३॥ तेहथी मोटो संघवी कह्यो, भरत भरत सुनीने, मन गह गह्यो । भरत कहे ते किम पामिये, प्रमु कहे शत्रुञ्जय, यात्रा किये ॥ ४ ॥ भरत कहे संघवीपद' मुझ, थे आपो हूँ अङ्गज तुझ । इन्द्र प्राण्या अक्षत वास, प्रभु आपे संघवी पद तास ॥ ५॥ इन्द्र तिण बेला ततकाल, भरत सुभद्रा.बिहुने माल. । पहिरावी घर संपेडिया सकल सोनाना रथ ओपिया ॥६॥ ऋषभदेवनी प्रतिमा बली , रत्न तणी दीधी मनारली । भरते गणधर घर तेडिया, शांतिक पौष्टिक सहु तिहां किया ॥ ॥ कंकोत्री मूकी सहु देस, भैरत तेडायो .

( ४२ )
सघ असेस । आयो संघ अयोध्यापुरी, प्रथम थकी रथयात्रा करी
॥ ८॥ संघ भक्ति कीधी अति वणी, सब चलायो शत्रुजय भणी ।
गणधर वाहुबलि केवली, मुनिवर कोड साथे लिया बली || ६ || चक्र-
वर्तिनी सघली ऋद्धि, भरते साथे लीधी सिद्ध । हयगय रथ पायक
परिवार, ते तो कहतां नावे पार ॥ १०॥ भरतेसर संघवी कवाय,
मारग चैत्य उध तो जाय। संघ पायो शत्रुञ्जय पास, सहुनी पूगी
मननी आस ॥ ११ ।। नयने निरख्यो शत्रुञ्जय राय, मणि माणिक
मोत्यांसू वधाय । तिण ठामे रहि महोच्छव कियो, भरते आनन्द पुर-
वासियो ॥ १२ ।। संघ शत्रुञ्जय ऊपर चढ्यो, फरसन्ता पातक झड़
पहुँचो केवल नानी पगला तिहां, प्रभम्यां रायण रूंख छ जिहां
॥ १५ ।। केवल ज्ञानी स्नात्र निमित्त, ईशानेन्द्र पाणी सुपवित्त । नदी
शत्रुञ्जय सोहामनी, भरतें दीठी कौतुक भणी ॥ १४ ॥ गणवर देव
तने उपदेश, इन्द्र बलि दीधो आदेश । श्री आदिनाथ तनो देहरो,
भरत करायो गिरिसेहरो॥ १५॥ सोनानो प्रासाद उत्तंग, रतनतणी
प्रतिमा मनरङ्ग । भरते श्री आदीसरतणी, प्रतिमा थापी सोहामणी
॥ १६ ॥ मरुदेवानी प्रतिमा वली, माही पृनम थापी रली । ब्राम्ही
सुन्दरि प्रमुख प्रासाद, भरते थाप्या नवला नाद ॥ १७ ॥ इम अनेक
प्रतिमा प्रसाद, भरत कराया गुरु सुप्रसाद । भरत तणो पहिलो उद्धार
सगलोही जाने संसार. ॥ १८ ॥

- [ राग सिन्धोडो आशावरी] भरत तने पाढ आठ मे , गडवीरज थयो रायोजी । भरत तनी पर संघ कियो, शत्रुञ्जय संघवि कहायोजी ॥ १॥ शत्रुञ्जय उद्धार सांभलो, सोल मोटा श्री कारोजी । असंख्यात वीजा वली, तेन कहूं अधिकारोजी ॥ २ ॥ चैत्य करायो रूपातणो, सोनानो बिम्ब सारोजी. मूलगो बिब भण्डारियो, पच्छिमदिसि तण बारोजी॥३॥शत्रुञ्जयनी यात्रा करी, सफल कियो अवतारोजी । दण्डवीरज राजा तणो, ए बीजो उद्धारोजी ॥४॥ सो सागरोपम व्यति क्रम्या, दण्डवीरज थी जीवा- डोजी । ईशानेन्द्र करावियो, ए तीजो उद्धारोजी ॥ ५ ॥ चौथा देव- लोकनो धणी माहेन्द्र नाम उदारोजी। तिण शत्रुञ्जयनो करावियो, ए चौथो उद्धारोजी ।। ६ ।। पांचमा देवलोकनो धणी ब्रह्मन्द्र समकित धारोजी । तिण शत्रुञ्जय करावियो, ए पांचमो उद्धारोजी ।। ७ ।। भुवनपति इन्द्रनो कियो, ए छट्ठो उद्धारोजी । चक्रवत्ति सगरतणो कियो, ए सातमो उद्धारोजो ॥ ८॥ अभिनन्दन पासे सुन्यो, शत्रुञ्जय नो अधिकारोजी । व्यन्तर इन्द्र करावियो, ए आठमो उद्धारोजी ॥ ६ ॥ चन्द्र प्रभु स्वा मनो पोतरो, चन्द शेखर नाम मल्हारोजी। चन्द्रयशराय करावियो ए नवमो उद्धारोजी ॥ १० ॥ शान्तिनाथनी सुणि देशना, शान्तिनाथ सुत सुविचारीजी। चक्रधर राय करावियो, ए दशमो उद्धा- रोजी ॥ ११ ॥ दशरथसुत जगदीपतो,- मुनि सुव्रत स्वामी वारोजी ।

( ४४ ) श्री रामचन्द्र करावियो, ए ग्यारमो उद्धारोजी ॥ १२ ॥ पाण्डव कहे हहे पापिया, किम छूटे मेरी मायोजी, कहे कुन्ती शत्रुञ्जय तणी, यात्रा कियां पाप जायोजी ॥ १३ ॥ पांचे पांडव सब करी शत्रुञ्जय, भेट्यो अपारोजी । काष्ठ चैत्य विम्व लेपना ए वारमो उद्धारोजी ।।१४।। मम्माणी पाखाणनी, प्रतिमा सुन्दर सरूपोजी । श्री शत्रुञ्जयनो सघ करी , थापी सकल सरूपोजी ॥ १५ ॥ अट्ठोत्तर सौ वरसां गया। विक्रम नृपति जिवारोजी । पोरवाड जावड करावियो, ए तेरमो उद्धा- रोजी ॥ १६ ॥ सम्वत् वार तिडोतरे श्रीमाली, सुविचारोजी । बाहडदेह मुंहत करावियो, ए चवदमो उद्धारोजी ।। १७ ।। सम्बत् तेरे इकोत्तरे देसलहर अधिकारोजी । समरे साह करावियो, ए पनरमो उद्धारोजी ॥ १८ ॥ सम्वत् पनर सत्यासिये, वैसाख पदि शुभ वारोजी । करमे डोसि करावियो, ए सोजमो उद्धारोजी ॥ १६ ॥ सम्प्रति काले सोलमो ए वरते के उद्धारोजी । नित नित कीजे वन्दना, पांमीजे भव पाराजी॥ २० ॥ ।।दोहा।। वलि शत्रुञ्जय महातम कहूं , सांभलो जिम छे तेम । सूरि धनेसर इम कहे, महावीर कह्यो एम ॥ १ ॥ जेहवो तेहवो दर्शनी, शत्रुजय पूजनीक । भगवन्तनो वेष मानतां, लाम हुए तहतीक ॥२॥ श्री शत्रुब्जय ऊपरे, चैत्य करावे जेह । दल परमांन समो लहे, पल्यो- ( ४५ ) पम सुख तेह ॥ ३ ॥ शत्रुञ्जय ऊपर देहरो, नवो नीपादै कोय । जीर्णोद्धार करावतां, पाठ गुणो फल होय ॥४॥ सिर ऊपर गागर धरी, स्नात्र करावे नार । चक्रवत नी स्त्री थई, शिव सुख पामे सार ॥ ५॥ काती पूनम शत्रुञ्जय, चढिने करे उपवास । नारकी सौ सागर समो करे करमनो नास ॥ ६ ॥ काती परव मोटो को जिहीं सीधा दश कोड़ । ब्रह्म स्त्री बालक हत्या, पापैथी नाखे छोड़ ७॥ सहस लाख श्रावक भणी; भोजन पुण्य विशेष । शत्रुजया साधु पडिला भता अधिको तेहथी वेष ॥ ८ ॥ . || ढाल ॥ शत्रुञ्जय गयां पाप छूटिये, लीजे आलोयस एमो जी । तप जप कीजे तिहां रही, तीर्थकर कह्यो तमोजी ॥ १ ॥ जिण सोनानी चोरी करी, ए आलोयण तासोजी । चैत्रे दिन शत्रुञ्जय चढी, एक करे उपवासोजी ॥ २ ॥ वस्तुतनी चोरी, सात आंबिल शुद्ध थायोजी। काती सात दिन तप कियां रतन हरन पाप जायोजी ॥३॥ कांसी पीतल, तांबा रजतनी, चोरी कीधी जेणो जी । सात दिवस पुरिमद्ध करे, तो छुटे गिरी एणोजी ॥ ४ ॥ मोती, प्रवाला, मूगया, जिए चोरथा नर नारोजी ! आंबिल कर पूजा करे, त्रिणं टङ्क शुद्ध आंचारोजी ॥ ५॥धान, पानी रस चोरिया, ते भेठे सिद्ध क्षेत्रोजी । शत्रुन्जय तलहटी साधु ने, पडिला. सुध चिचौजी ।। ६॥ वस्त्राभरका - ( ४६ ) जिने हर था, ते छूटे इण मेलोजी । आदिनाथ नी पूजा करे, प्रहठी वहु वेलोजी ।। ७ ।। देव गुरु नो धन जेहरे, ते शुद्ध थाये एमोजी । अधिको द्रव्य खरचे तिहां, पात्र पोपे वहु मेमोजी||८||गाय भैस घोड़ा मही, ग़ज ग्रह चोरन हारोजी । देते वस्तु तीरथे, अरिहन्त ध्यान प्रकारोजी || ६ || पुस्तक देहरा पारका, तिहां लिखे आपनो नामोजी • छूट छम्मासी तप कियां सामायिक तिन ठामोजी ।। १० । कुवारी परिवा- जका, सघव, विधव गुरु नारोजी । व्रत भांजे तेहने कह्यो, छम्मासी तप सारोजी ॥ ११ ॥ गो, विप्र, स्त्री, बालक, पि, एहनो घातक जे होजी । प्रतिमा अागे आलोवतां, छूटे तप कर तेहो जी ।। १२ ।। [ ढाल] सम्प्रति काले सोलमो, ए वरते छे उद्धार | शत्रुजय यात्रा करू ए, मफल करू अवतार ।। १ ।। छहरी पालता चालिये ए, शत्रु- जय केरी वाट । पालीताणे पहुँचिये ए, संघ मिल्या बहु थाट ॥२॥ ललित सरोवर पेखिये ए, वलि सत्तानी वावि । तिहां विसरामो लीजिये ए, बड़ने चौतरे आवि ॥ ३ ॥ पालीताणे पांजड़ी ए, चढ़िये उठ परभात । शत्रुञ्जय नदिय सोहामणि ए, दूर थकी देखंत ॥४॥ चड़िये हिङ्गलाजने हडे ए, कलि कुंड नमिये पास । बारी मांहे पेसिये ए, यानी अंग उल्लास ॥ ५॥ मरुदेव टुक मनोहरु ए, गज चढ़ मरु- ( ४७ ) देवी माय । शान्तिनाथ जिन सोलमो ए, प्रणमी जे तसु पाय ॥ ६॥ वंश पोरवाडे परगड़ो ए सोमजी साहमलार । रूपंजी संघवी करावियो ए, चौमुख मूल उद्धार ॥ ७ ॥ चौमुख प्रतिमा चरचिये ए, भमती माहे भला बिम्ब । पांचे पाण्डव पूजिये ए, अद्भुत आदि प्रलम्ब ।। ८ । खरतर वसही खंतसूए, बिम्ब जुहारू अनेक । नम- नाथ चवरी नमू ए, टा अलग उदेग ॥ ६ ॥ धरम दुवार माहि नीसरू ए, कुगति करू अति दूर । श्राऊ आदिनाथ देहरे ए, करम करू चकचूर ।। १० । मूल नायक प्रणमू मुदा ए, आदिनाथ भगवंत । देव जुहारू देहरे ए, भमती मांहे भमंत ॥ ११ ।। शत्रुञ्जय ऊपर कीजिये ए, पांचे ठाम स्नात्र । कगश अठोत्तर सूकरिये ए, निरमल नीरसू गात्र ।। १२ ।। प्रथम आदीसर आगले ए, पुण्डरीक गणधार । रायण तल पगला नमूए. शान्तिनाथ सुखकार ॥ १३ ॥ रायण तल पगला नमु' ए. चौमुख प्रतिमा चार : वीजी भूमि बिम्बावली ए, पुण्डरीक गणधार ।। १४ ।। सूरज कुण्ड निहालिये ए, अति बली उलका झोल । चेलण तलाई सिद्ध शिला ए, अंग फरसू उल्लोल ।। १५ ।। आदिपुर पांजे ऊतरू, ए,' सिद्ध व डतू विसराम । चैत्य प्रवाडी इण पर करी ए, सीधा वं छत काम ॥ १६ ॥ यात्रा करी शत्रु- जय तणी ए, सफल कियो अवतार । कुशल क्षेम सू आवियो ए, संघ सहू परवार ॥ १७ ॥ शत्रुञ्जय रास सोहामणो ए, सांभलज्यो सहु ( ४८ ) कोय । घर बैठां भणे भाव सूए, तमु यात्रा फल होय ।। १८ ।। संवत्त मोल क्यासिये ए, श्रावण वदि सुखकार । रास रच्यो शत्रुञ्जय तो प, नगर नागोर मझार }} १६ || गिरुवो गल्छ खरतर तणो ए, श्री जिनचन्द सूरीस । प्रथम शिष्य श्री पूजना ए, सकलचन्द सुजगीस }} २० ॥ तास सीस जग जाणिये , समय सुन्दर उवाय । रास एच्यो तिण बडो घ. तुणतां आनन्द याय ।। २१ ।।

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Saptasmarnadi Stotra Sagrah (devsmaran Nityamala)

Author
Smt,devshriji
Title
Saptasmarnadi Stotra Sagrah (devsmaran Nityamala)
File name
Saptasmarnadi Stotra Sagrah (devsmaran Nityamala)
Text
OCR done
Citation
1957
Published
2010/11
Publisher
Bikaner, Champalal Jain Abhay Sandesh
Language
Sanskrit
Pages
131
Library
Prakrit Bharti Academy
DLI number
325897
Barcode
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Saptasmarnadi Stotra Sagrah (devsmaran Nityamala)