Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Sufi Kavi Jaayasi Ka Prem Niroopan
Front matter
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कसूफ़ी
कवि
जायसी
प्रेम-निएपण
का
निज़ामुद्दीन
न अंसारी
पुस्तक संस्थान
१०९/५0ए नेहरु नगर,कानपुर १२
Soofi Kavi Jaysı Ka Prem Niroopan
by
Nijamuddin Ansary
Rs twenty five only
प्रकाशक पुस्तक सस्थान १०९/५०ए नहरूनगर, कानपुर-२०८
पुस्तक सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण
लेखक
निजामुद्दीन असारी
आराधना प्रेस ब्रह्मनगर, कानपुर
पुस्तक बध अदुल गफूर एण्ड सस कानपुर
सस्करण
प्रथम १९७६
मल्य
पचीस रुपये
प्रातस्स्मरणीय गुरुवर डॉ० रामचद्र तिवारी
एव
पूज्य गुरुवर श्री पण्डित वशिष्ठ त्रिपाठी
'पथ लाइ जेहिं दीन्ह गिआनू'
को
प्रणतिपूर्वक
,
निजामुद्दीन असारी
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।
'मानुस पेम भएउ वाठी । नाहिं त वाह छार एक मूठी ॥'
'जो नहिं सौस पेम-पप लावा । सो प्रिथिमी मह काहेब आवा ।'
"घुव ते ऊन पेम व उवा । सिर देइ पाव दे सो छुआ ॥"
'पेम पप जो पहच पारा । बहुरि न मिल' आइ एहि छारा ॥
दुम भीतर जो प्रेम मघु रामा । जग नहिं मरन सहै जा चासा ।।
'जहि के लिए पम रग जामा । बा तहि भूख-नीद विसरामा ।'
'तीनि लोक चौह मण्ड, सब पर मोहिं सपि ।
प्रेम साहि नहि लोन क्छुि, जो देखा मन बूमि ।।
जायसी
.
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आमुख सूफी कवि जायमी का प्रेम निरूपण' श्री निजामुद्दीन असारी एम० ए० (प्रवक्ता शिवली नेशनल कालेज आजमगढ) कृत एक महत्वपूण रचना है । लेखक ने छ अध्यायो में क्रमश 'सूपी सिद्धात और प्रेम तत्त्व जायसी की प्रेम पद्धति', जायसी के प्रेम का स्वरूप 'विरह प्रेम की कसौटो', 'प्रेम का प्रभाव और महत्त्व तथा 'मधुर भाव की साधना और आयसी का प्रेमतत्त्व' जसे महत्त्वपूर्ण विषया का विवेचन किया है। इस प्रकार प्रस्तुत कृति मे जायसी द्वारा निरूपित प्रेम' का सागोपाग विश्लेषण क्यिा गया है । कहना न होगा कि मूफी कवियो की क्ला चेतना प्रेम का द्रत है । उनका मोदय बोध प्रेम दीप्त है और उनकी जीवन दष्टि प्रेमोदभासित है । अपनी रचनाओ के माध्यम से इन कवियो न जीवन के उम मम का उत्घाटन क्यिा है जो समस्त भेद प्रभेदा से ऊपर उठाकर मनुष्य को बकुण्ठी बना देता है । सूफी कवियो का प्रम निरूपण काव्यशास्त्रीय मनोवज्ञानिक एवं आध्यात्मिक तीनो दृष्टियो से विवेच्य है। श्री असारी ने प्रस्तुत अध्ययन मे यथा सभव इन तीनों दृष्टियो का उपयोग किया है। जायसी हिदी सूफी कवियो म अग्रणी हैं। उनकी रचनाओ का जितना ही गहन अनुशीलन किया जायगा उतना ही जीवन एव अभ्यारम के निगूढ़ तत्वो का उदघाटन होगा । मेरी पारणा है कि जायसी को प्रतिमान मानकर ससार के किसी भी प्रेम काव्य का मूल्यांकन हो सकता है । जायसी के प्रेम निरूपण के व्यवस्थित एक गम्भीर अध्ययन का यह विनम्न प्रयास जायसी के पाठको की तुष्टि का कारण वन सकेगा, ऐसा मेरा विश्वास है। रामचन्द्र तिवारी रीडर, हिंदी विभाग गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर प्राक्कथन - प्रस्तुत प्रवन्ध मे मध्ययुगीन हिदी प्रमाण्यानव वाच्य परम्परा में अन यतम कवि जायसी के प्रेम निरूपण वा मागोपाग अध्ययन किया गया है । पूरा प्रवाघ छ अध्याया म विभक्त है। प्रथम अध्याय म मूफी सिद्धा त और प्रेम तत्व का विवेचन दिया गया है। यहाँ गूपी शटल को “युत्पत्ति करते हुए इसके सिद्धाता के विकास प्रम में प्रेम के महत्व का विश्लपण किया गया है। मूफी सिद्धा तो ये विकास के पूरे इतिहाम यो तीन युगा-प्रथम युग प्रारम्भ से एकर ८७० ई० तप, द्वितीय युग ८७० ई० से लेकर १००० ई० तब तथा ततीय युग १००० ई० से लेकर १५०० ई. तक में वोटा गया है । प्रथम युग आचरण प्रधान या। द्वितीय युग में चितन की प्रवत्ति विकसित हुई। ततीय युग म विचारो का संकलन हुआ। उसकी “याख्यायें की गई और इस मत को पुष जीयन दान पनाने की चेष्टा की गई । अध्ययन में यह विशेष रूप से पाया गया कि ऐति हासिक विकास के सभी युगो में प्रेम' का महत्व समान रूप से माय रहा। द्वितीय अध्याय मे जायमी के प्रेम-पतति की सास्विष मीमांसा की गई है। इसके अतगत जायसी के प्रेमादश, प्रेमोदय के आधार, प्रेम मार्ग की बाधायें, प्रेम की पूर्णता और परिपक्वता, आलम्बन का स्वरूप तथा प्रेमी को मन स्थिति का विश्लपण मुरयत जायसी के प्रेम निरूपण को आधार बनाकर किया गया है। जायसी ने प्रेम का ऊँचा आरश प्रस्तुत किया है । पद्मावत महाकाव्य म अनेक स्थला पर उहोन प्रेम के आग को मूत करने की चेप्टा की है । जायसी का प्रेम ही उनकी साधना का सवस्व है । उहोने स्पष्ट कहा है कि प्रम की कसौटी पर कस जाने पर मानव कवन के सनश खरा हो जाता है । प्रेमोदय का आधार निश्चित करना वर कहिन है। प्रेम का आधार सौंदय है लेकिन यह भी द्रष्टा की वयक्तिक रुचि से सम्बद्ध है। सामायत भारम्बन के प्रथम परिचय स्पगुण श्रवण चित्र दशन और सादय से इस - प्रायवथन। ९ विरक्त हाकर भाव का उदय होता है । जायसी के प्रेमोदय का आधार रूप गुण श्रवण ही है। प्रममाग में प्रेमी साधक को अनेक प्रकार की वाघाओ का सामना करना पडता है । आध्यात्मिक प्रेम म प्रेमी (साधक) और प्रिय (साध्य परमतत्व) का एकात्म पटिनाई से होता है । साधक को समार से पूण एकनिष्ठ भाव से प्रेममाग मे जागे बढना पड़ता है बत्तियों का परिष्कृत करना पडता है सासारिक कामनाआ पर विजय प्राप्त करना पड़ता है । तब कही उसे प्रिय की झलक मिलती है। जायसी ने समासोक्ति पद्धति पर इन कठि नाइयो के उल्लेख करने के साथ ना यात्मिक प्रम की व्यजना की है। प्रेम तत्व की पणता और परिपक्वता प्रियतम के प्रति एकनिष्ठ एव अन य भाव से उदय म होती है । प्रेम, जद्व तता की सिद्धि की जार ल जाता है । जायसी के प्रम निम्पण म अद्व त भावापन्नता लक्षित होती है । प्रगाढ एव एकनिष्ठ प्रेम की मनावत्ति इतनी प्रबल होती है कि वह प्रेमी का सदव एक भाव म बन रहने के लिए वाय वरती है जिससे उसका सारा जीवन एको मुस और एपिष्ठ हो जाता है । जायसी ने इमी स्तर पर प्रेम की पूर्णता का प्रतिपादन दिया है। आरम्बन वा (नायिका) स्वरूप ही प्रम के स्थायित्व का आधार होता है। जायसी के भी वा य या योज भाव प्रम ही है। रति का प्ररक' सो दय है । इसलिए प्रेम निरूपण करन वाले कवि जालम्वन की सोदय चेष्टाओ का धणन उत्साहपूर्वक करत हैं । जायसा न जालम्बन (नायिका) का गरीरगत और चप्टागत गेना प्रकार का रूप चित्रण किया है । नायक भी जाग प्रेमी है । वह प्रेयमी को पान व तिए योगी ग्न कर निकल पड़ता है। वीतरागो के समान माग के सभी क्षण को शात भाव स सहता है। वह प्रतिगोध, लाभ, अहकार, कोच ईा घणा आदि से परे है इस प्रकार वह प्रेयसी प्रम आलम्बन का उचित अधिकारी है। प्रेमादय स रेकर प्रिय के साथ पूण तादात्म्य की प्राप्ति तक प्रेमा की मन स्थिति मा विश्पण मनाविज्ञान एव अध्यात्म-दाना के लिए चुनौती है। जायसीने प्रमी की मन स्थिति का कमा उदात बनान की चप्टा की है। वास्तव म भौतिक जगत में भी प्रम एक ऐसा तत्व है जो प्रेमी को मिय की भावना म निरतर लोन रखता है । प्रिय का निर तर ध्यान रता हुमा प्रेमी उसस मिलन की अभिलापा सजोय हुए अन मानसिक स्थितिया को पार करके उस पूर्ण एकात्म नाव स्थापित करता है। अपन अध्ययन प्रम में मन रहस्यवाद र अध्येतामा निषों से प्ररणा लकर प्रेमी रत्नसन की मन स्थिति का अध्ययन दिया है। - - १० । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण तृतीय अध्याय म जायसी के प्रेम के स्वरूप के सम्ब ध म विचार किया गया है कि वह आध्यात्मिक है अथवा लौविव ? विभिन विद्वानो के विचारा का विवेचन करते हुए यह निवप निकाला गया है कि जायसी का प्रेम आध्यात्मिक है जिसकी व्यजना हम तीन रुपा म प्राप्त होती है--रूपक द्वारा, कथा प्रसगो म अलौक्क्तिा की ओर सकेत द्वारा तथा म्फी मत के अनुकूल प्रम की “यजना द्वारा । जायसी के प्रम चिनण को लोक्कि मान रेन पर भी उसका महत्व कम नहीं होता । यह अपन लौकिक रूप में भी प्रेम के त्याग एव उत्सग का भाव जगाने वाला है। यह उत्कट प्रेम प्रमी को न जीन देता है न मरन देता है । प्रतिनायक मे भी जायसी न प्रम की यजना की है जो आचरण के अनौचित्य को देखकर नायक के पाचरण की उच्चता का बोध प्रम की दि यता उज्ज्वलता और सात्विक्ता को ही प्रमाणित करता है। चतुथ अध्याय में यह दिखलाया गया है कि विरह प्रेम की कसोटी है। प्रेम की सच्ची साधना विरह ही है । सयोग तो प्रम का उपभोग पक्ष है । इस पक्ष म प्रम का गाम्भीय स्थायित्व अन यता उज्ज्वलता उसके लिए किये गये त्याग और चुनाय गय मूत्य का पता नहीं चलता। प्रमी की निष्ठा, दढता जटिंगता आत्म समपण सुख वभव का उत्मग, मम पथ के कष्ट सहन का पता वियोग से ही चलता है । वियोग ही प्रेम का त्याग पक्ष है । साध्य क महत्व मूय और अलभ्यता का पता भी वियोग पीडामा के अनुपान से चलता है। जायमी का विरह वणन निश्चित रूप से उनके गम्भीर प्रम की कसौटी बन सका है। पचम अयाय म प्रम के प्रभाव और महत्व का अध्ययन किया गया है । इस अध्ययन म म जायसी द्वारा प्रतिपादित प्रम के महत्व को कइ सूत्रा के माध्यम से स्पष्ट किया गया है। प्रेम प्रमा को प्रिय के व्यक्तित्व म लय पर दता है । प्रम के समान कोई भी वस्तु सुदर नही हो सकता। प्रम के अतिरिक्त ससार की किसी भी वस्तु म ऐसी सु दरता नहा मिल सक्ती जा प्रत्यक स्थिति अथवा दा म एक समान होकर वतमान रह । प्रेम की दाना किसी भी प्रकार खेली जाय उसम राभ ही लाभ है । प्रम ही इश्वर है । सप्टि की रचना प्रम का साथ बनान के लिए की गई है । इन सूत्रा से जायमी के प्रेम की महत्ता प्रक्ट होती है। पष्ठ अध्याय म मधुर भाव की साधना और जायसी का प्रेम तत्व की विषचना की गइ है । इस मधुरभाव को मनुष्य का आदिवासना का परिणाम कहा जाय तो सप्टि की प्रतीकात्मक अनुभूति का अभियक्ति पर यह प्राय प्रत्येक उपासना पद्धति म पाया जाता है । साहित्य के सभी घारामा म अनु प्राकथिन । १ शीलन करने में पता चलता है कि समान भाव, विचार, अनुभूति, स्थिति, पताथ आदि के लिए समान प्रतीको और उपमाना का व्यवहार होता आया है । जायसी के प्रेम निरूपण में मधुर भाव की साधना के तत्त्व लक्षित होते है । प्रस्तुत प्रवध पूज्य गुरुबर डा० रामचन्द्र तिवारी (वरिष्ठ रीडर, हिदी विभाग, गोरखपर विश्वविद्यालय, गोरखपुर) के निर्देशन में लिखा गया है। पूज्य गुरवर द्वारा पद पद प्राप्त अमूल्य परामर्शो तथा पथ निर्देशन के कारण ही यह काय पूर्ण हो सका है। उनके स्नहपूर्ण सदभाव तथा विक्षणता से मुझ सतत नव प्ररणा प्राप्त होती रही है। यदि उनकी असीम अनुकम्पा न हाती तो प्रस्तुत विषय पर काय करना सभव न होता और नाव मझधार मे ही दब गयी होती । उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के लिए मर शब्दा म सामध्य नहीं है मात्र इतना ही कह सकता हूँ कि प्रबध मे जा कुछ बन पड़ा है, वह की कृपा का प्रसाद है। विषय की स्वीकृति प्रदान करके डा. गोपी नाथ तिवारी (भूतपूर्व अध्यक्ष, हिदी विभाग, गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर) ने मुझ पर विशेष कृपा की है । हम हून्य से डा० तिवारी के आभारी हैं । परम श्रद्धेय पूज्य गुरुवर डा० भगवती प्रसाद सिंह (आचाय तथा अध्यक्ष, हि दी विभाग, गारसपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर) ने समय समय पर *स का अपन स्नह पूण सदपरामगों स प्रोत्साहित किया है । वह उनक स्नेह समर्मावत "यवहार और रादपरामर्शों के प्रति कृतज्ञ है। प्रातस्ममरणीय पित तुल्य पूज्य मुस्वर श्री पण्डित वशिष्ठ त्रिपाठी जी (पाग्याता, हि दो संस्कृत विभाग ज० इ० का० सोहसा मठिया देवरिया) से जा सन्प्रेरणा एवं अहेतुकी सहायता मुये प्राप्त हुई है उसका प्रतिदान में जीवन पय त सम्भवत न द सगा । वस्तुत प्रस्तुत काय सम्पादन की चिता मुयस अधिक उह यो । उनवे उपवारा का स्मरण करके मरा चित्त गरगद एव पुलक्ति हो जाता है। इतना ही नहीं, उहोन मर साथ वात्सल्यपूर्ण व्यवहार किया है। उनके अधिकार को समस्त साधन सम्पदा मेर लिए सदव मुभ रही है। उनका जितना स्तह और आशीप मुझ प्राप्त हुआ है, उतना कम होगा को प्राप्त होता है । इस प्राप्त कर मैं स्वयं को कृताथ समझता हूँ। दुगल प्रशासन, परम शिक्षाविद् थी गोकन गु तान (प्राचाय, गिवली नल स्नातकोत्तर महाविद्यालय आजमगढ) से रसक को सदव प्रेम तथा प्रोत्साहन प्राप्त हुआ है । वह उन प्रति उरसा आभारी है। 'हिनी विभाग, (गारसपुर विश्वविद्यालय) के समा गुरुजनो वा आभारी हूँ। सभी की वरस लता और स्नेह मा बराबर मिला है।
१२ । मूफी पवि जायसी का प्रेम स्पिण प्रस्तुत प्रबध को सुचारता मे प्रकाशित करने म पुस्तक सस्थान के सी एक आदरणीय श्री महे। त्रिपाठी ने जो तत्परता एवं उत्साह प्रगित दिया है, तदप उन प्रति कृतनता पापित करना में अपना पत्त य समपता। प्रस्तुत प्रयप हिदी विभाग के रीडर पूज्य गुम्वर डा० रामचन्द्र तिवारी ये निर्देशन मे लिया गया है। प्रवध को प्रस्तुत परेने म डा० तिवारी से हम बराबर सहायता मिली है। विषय की स्वीति प्रदान पर हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डा. गोपीनाथ तिवारी न हम पर विशेष कृपा की है । हम हरप स गुरुवर डा० गोपीनाथ तिवारी के आभारी हैं । यदि उनकी कृपा न हाती, तो प्रस्तुत विषय पर काय करना सभव न होता। मैं हि दी विभाग के सभी गुरजनो वा विष आभारी हूँ। सभी की वत्सलता और स्नेह मुश वरावर मिला है। विश य द स सौवनय निवेदन है कि व प्रय य म प्राप्त यूरतामा की ओर निर्देग करत हुए आवश्यक सशोधन, परिवत्तन एव परिवघन के परामा कर उपवृत परेंगे। गणतत्र दिवस निजामद्दीन सारी २६ जनवरी १०७६ स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग गिरीनेगनर वारज थाजमगर (उ०प्र०)
विषय-सूची
प्रथम अध्याय
पृष्ठ सख्या
भूफी सिद्धात और प्रेम तत्व
१७०५२
विषय प्रवेश
मूरी गट की व्युत्पत्ति
मूफी सिद्धाता के विकास प्रम म प्रेम का महत्त्व
प्रथम युग (५०० ई० से ८७० ई० तक)
द्वितीय युग (८७० ई० से १००० ई० तक)
ततीय युग (१००० ई० से १५०० ई० तक)
भारत मे सूफी मत का प्रवेश और प्रेम काव्यो का प्रारम्भ
द्वितीय अध्याय
जायसी की प्रेम पद्धति तात्त्विक भीमासा
जायसीका प्रेमादश
प्रमादयका आधार
प्रेम माग की बाधायें
प्रेम की परिपक्वता और अनयता
आलम्बन (नायिका) स्वरूप (१)
आलम्बन (नायक) का स्वरूप (२)
प्रेमी की मन स्थिति।
तृतीय अध्याय
प्रेम या स्वरूप आध्यात्मिक या लौषित
१००-१२४
आध्यात्मिा प्रेम की व्यजना
शक्ति प्रेम वशन द्वारा आध्यात्मिर प्रेमवी अभियक्ति
१४ । मूफी कवि जायसी का प्रेम निरुपण (१) रूपर द्वारा आध्यात्मिक प्रेम की यजना (२) क्था प्रसगो में अलौशिवना को ध्याना घटनाएँ वणन सवाद (३) भूफीमत वे अनुकूल प्रेम यजना लोविर सौंदय वणा द्वारा अलोषिक मौल्य की यजना प्रम और विरह का व्यापक वणन जायसी की आध्यात्मिक प्रम यजना का मूल्यावन जायसी में शैक्षिप्रम वी "यजना शृगार वणन जायसी वा सयोग शृगार वणन मिलन प्रसग प्रम भाव की रमात्मा यजना अनुभावा और सचारी भावा का याजना जायसा की प्रेम यजना को विरापताएँ (क) मानसिक पक्ष की प्रधानता (स) भारतीय और फारसी प्रेम पक्षतिया का सम वय (ग) एकता एव लोक सापश्य प्रेम पद्धतियाँ । चतुथ अध्याय विरह, प्रेम की क्सौटी १२५ १८ वियोग वणन पडऋतु वणन बारह मासा १४२-१६२ परमात्मा चिर विरह से दग्ध होते रहता । पचम अध्याय प्रेम का प्रभाव और महत्व प्रेम ही इश्वर है सप्टि रचना प्रम के कारण हुई है वस्तुआ को लावण्यमय बना देता है प्रम का मधु दु स से जावेष्टित है प्रम के लिए समपण नावश्यक है प्रम सभी
विषय सूची। १५
प्रेमदत को अद्वत कर देता है
प्रम की जग्नि को प्रज्वलित करना जीवन कालाय है
पम के अभाव म सारा साधनायें और पाडित्य यथ है
पप्ठ अध्याय
मधुर भाव की साधना और जायसी वा प्रेमतत्न
१६३-१७८
हिदी भक्ति साहित्य म मधुरोपासना
निगुण सता की भक्ति म मधुर भाव
कृष्णका य म माघुय भाव
राम लीला
मिलन और सम्भोग
भक्ता की रसलीनता
रामकाव्य म माय भाव
सीता राम माधुय ली।
(क) युगल विलास
(ख) वह रमणी विलास
(ग) एपानि विलास
जायसी का प्रम-तत्व
जायसी के प्रेम निश्पण म मधुर साधना के तत्व
उपसहार
१७९-१८०
सहायक ग्रय गूची
१८१-१८८
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१ | सूफी सिद्धान्त और प्रेम-तत्त्व विषय प्रवेश सूफी शब्द की व्युत्पत्ति मुफो' शब्द का साधारण अथ इस्लामी सत समझा जाता है । फारसी में जिम तमन्बुफ' कहते हैं यह हिंदी का मूफीमन है । तस त्रुफ' और मूफी' दोना ही प्राय एक दूसरे के पर्यायवाची गर हैं और सूप शन से युत्पन्न हैं। मूफो शब की व्युत्पत्ति और अय विषय म विद्वाना मे मतक्य नहीं है। विविध तो एव युक्तियों के द्वारा इस T की विभिन्न व्युत्पत्तियो को सगत एम समीचीन सिद्ध करने के प्रयल प्रिय गये हैं। प्राय ये "युत्पतिया सूफी साधका के जीवन को लक्ष्य म रखकर दी गयी हैं । अबूनमर अर सर्राज ने अपनी पुस्तक 'चिनाब जल नुमा में 'सूफी गद पर विचार करते हुय बनलाया है कि मूलत सूफी शब्न अरवी के सूफ गब्द से युत्पन्न है, जिसका अथ उन है। भाष शास्त्रीनिकलसन इस व्युत्पत्ति को उचित मानत हैं । इस युत्पत्ति स सहमति का कारण स्पष्ट करते हुए अलसर्राज ने कहा है कि उनका यवहार पगम्बर सत तथा साधक करते आये हैं । इसका समयन विभिनहीगो और विवरणा स हा जाता है । इस व्युत्पत्ति से ऐसा प्रतीत होता है कि औण वस्त्रधारी, एकात जीवनयापी साधको के जीवन को दष्टि में रखकर नामकरण कर लिया गया हो ता इसम इष मात्र भी असगति नहीं दीयती। नो एल्दके' ने भी इस १ म० जम्स हस्टिग्ज इसाइक्लोपीडिया आफ रेलिजन एण्ड एथिक्स, वाल्यूम १२, १९२१ । 2 Jannes Hastings Encyclopedia of Religion and Ethics, Vol II 1921,P 10 3 James Hastings Editor Encyclopaedia of Religion and Ethics Vol XII (1921) P 10 - १८ । मूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण । २ युत्पत्ति का समर्थन करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि इस्लाम की प्रथम दा शताब्दियो म प्राय लोग जौण वस्त्र या प्रयोग करत थ और सायाम जीवन यापक इसका विरापरूप से उपयोग करत थ । ब्राउन ने इसी मतका समथन किया है । मासूत्री को मूल आधार मानते हुय उसने लिखा है कि प्रारम्भिक काल से ही लोगा ने ऊनी वस्त्र धारण करन को जीवन की सहज, सादगी तथा विलासता से दूर रहने का प्रतीक मान लिया था । हजरत मुहम्मत और उनके बाद प्रथम चार सलीफा-अब-बकर-जल, क्लावाघा इन खल्दन तथा लुइमासिओ' न भी सूफी शद को सूफ स ही व्युत्पन बताया है और इमी व्युत्पत्ति को सर्वोत्तम माना है कतिपय विद्वान मूफी T- की युत्पति सूफा श द स मानत हैं । सूफा अथात पवित्र । हुजवीरी का कथन है कि मूलत मूफा शत से ही सूफी नि सत है । उनका कहना है जो लोग पवित्र थ व मूफो बहलाय । इसम आपत्ति यह है कि सूफा' श द स 'सफवी बनगा सूफी नहा । कछ लागा का कहना है कि पगम्बर मुहम्मद साहब के समय म मतीन की मस्जिद के सामने बच पर बठन वाले भक्तो को अह ल अल सुपफाह कहत थे । इस सुफ्फाह' श द से ही सूफी गब्द बना है। इस युत्पत्ति में भी दोप है। सुपफाह श द से सफ्फो बन सकता है, सफी न्हा । कुछ विद्वानो के अनुसार सफ्फ अ बल के सफ्फ श द स सूफा गब्द की सगति बठती है। सफ्फ अ वल अथात प्राथना म निरत इमान राने वाला की प्रथम पक्ति । रक्नि सफ्फ स सूफ्फो गत वनगा, सूफी नहीं । जियामुल लुगात म म्फाह ग से इसका बनना माना गया है। कहा जाता है कि जाहिलिया काल म अरवो की ऐसी जाति थी जो सासारिक “यापारा से अलग होकर मक्कावालय की सेवा में नियुक्त हो गयी। कुछ लोग बनू सूफा नामक एक यायावर जाति के 'सूफा गट से इसका 'युत्पन्न बतात है । मूफी फकीर भी अपन दा नार शागिर्दो क साथ स्थान स्थान पर भ्रमण किया करत थे। इसी तरह ग्रीक गट सोफिरता से मूफी और जियो साफ्यिा' श र स 1 L G Browne Literary History of Persia (1909) P 417 AM A Shashiery vuthats of Islamu wakut Var XS (1938) P 374 3 Encyclopaedia of Islam, Vol VIII (1934) P 681 4 AM A Shushtery outlines of Islamic Culture Vol 2 P374 - 2 मूफी सिद्धात और प्रेम-तत्त्व । १९ तम बुफ' की युति सिद्ध करन की चेष्टा भी की गयी है । सोफिया का अथ है नान । इस विषय में कहा जा सकता है कि सूफी साधक अनुभव सिद्ध ज्ञान महत्त्वपूर्ण मानते थे । अल वरूनी (जम काल ९३७ ई.) के समय मे भी यह मारता थी कि 'सूफ (ऊन) श द से 'सूफी' गब्द बना । पर उसने यह मत प्रकट किया है कि उच्चारण में विकृति के कारण 'सूफी शब्द की व्यु- पति सूफ से की जान -गी। उनका कथन है कि इसका अथ वह यवक है जो 'साफी' (पवित्र) है। उसके अनुसार यह साफी ही 'सूफी हो गया है । मूफी अथात विचारको का दल ।' वाउन का कहना है कि यह निश्चित है कि मूफी शबन की व्युत्पत्ति 'सूफ से हुई है । फारसी रहस्यवादी साधका को पश्मीना पोश (ऊन धारण करने वाला) कहा गया है इससे भी इस बात की पुष्टि होती है।" वस्तुत 'सूफा ग द 'सूफ (ऊन) स ही व्युत्पन है । व्याकरण की दष्टि से भी 'सूफी श द की सूफ' "द से "युत्पत्ति शुद्ध है । आरवेरी, निकल्सन ब्राउन, भारगालिथ मीर वली उद्दीन प्रति विद्वानो न यह सिद्ध कर दिया है कि वास्तव में सूफी शब्द मूप से ही व्युत्पन्न है ।' सूफीमत की साधना का केद्र विदु प्रेम है । अबुल हसन अल हुज्वेरी का क्थन है कि वह शरस जो मुहब्बत के वास्ता से मुस्सफा होता है वह सापी और जो रूस दोस्त को मुह रत में गक हो गैर दोस्त से बरी हो वह सूफी हाता है । यदि हम उपयुक्त सभी बातो को मिलाकर एक साथ दखें तो सूफी गद का अय अधिक स्पष्ट हो जाता है । सूफी इस्लाम के वह मर्मी साधन हैं जो ऊनी चोम का व्यवहार करता है और परम प्रियतम के रूप म परमात्मा की उपासना करता है तथा इसे अपने जीवन का परम लक्ष्य मानता है। अधिकांश मत सूफ से मूफी की युत्पत्ति मानते हैं जो कई कारणो से समीचीन ज्ञात होता है। उनके वस्त्र एक विशेष प्रकार से मोटे ऊन के बने १ अलवरुनोज इण्डिया अनु० सचाऊ ५० ३३ २ वही। 3 E G Browne, A Literary History of Persia, Vol, P 417 4 E G Browne, Encyclopaedia of Religion and Ethics Vol XII, P 10 ५ काफुल महब हुश्वरी (उदू अनुवाद) पृ०४१ ।
२० । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण रहते थे जो लोगो का ध्यान अनायास ही आकृष्ट कर लेते थे । ऊन से वन हुए मोटे वस्त्रा के धारण करने के कारण वे अपनी निस्पहता, सादगी तथा स्वेच्छया दारिद्रमय जीवनयापन की पद्धति को अभिव्यक्ति देते थे । सासारिक वस्तुआ से उ है कोई मोह नही था । ईश्वर के अनराग तथा मबाघ मिलन की साधना मे काल यापन ही उनका सर्वोच्चादश था। परमेश्वर की उपलघि और उनका प्रेम एकमान ध्येय या । इस प्रकार धन वभव गह परिवारादि के प्रति उपेक्षा प्रदर्शित करना सूफियो के लिए स्वाभाविक हो गया था। सादगी की यह वेशभूपा उनका केवल बाहरी परिघान न था । यह स यास प्रत सूफियो की आतरिक मनोवत्तिया का भी प्रभावित करता रहा। भत यह स्पष्ट है कि ऊनी वस्त्र स पासियो सावको या परमा मा के प्रेम में मस्त रहने वाले ममियो के लिए स्वीकृत हो चुका था। सूफी सिद्धातो के विकास क्रम मे प्रेम का महत्त्व सूफीमत के उदभव और विकास के सम्ब व म पाश्चात्य विद्वाना में से पाउन' निकलसन' मारगुलियय' आरवेरी मारगरेट' स्मिथ' तथा गिद आदि ने विचार किया है । उनके अध्ययन का उपयोग करते हुए हिदी साहि त्य म ५० चद्रबली पाण्डेय , १० परशुराम चतुर्वेदी श्री डॉ० भगल कुलश्रेष्ठ', श्रीमती सरला शुक्ला", श्री विमलकुमार जन' एव 1 EG Browne A Literary History of Persia (1909) Vol I II R A Nicholso 2 The Alystics of Islam (1914) studies in Islamic Mysticism (1921), A Literary History of Arab (1930) 3 Muhammdanism 4 Supism 5 Algazalt the mystic Rabrn the mystic 6 Muhammdanism-A Historical Survey ७ तस वुफ अपवा सूफीमत । ८ मूफा काय संग्रह । ९ सूपामत साधना और साहित्य । १० हिली प्रेमास्यान काव्य । ११ जायसी के परवर्ती सूफी कवि और काव्य । १२ सूफीमत और हिंदी साहित्य । रामपूजन तिवारी 2 सूफी सिद्धात और प्रेम तत्त्व । २१ डा. श्याममनोहर पाण्डेय ने इस विषय का विस्तत विवेचन प्रस्तुत किया है। सूफीमत का इतिहाम तब से प्रारम्भ होता है, जब मुम्मद साहब मक्का से मदीना गये थे । अत यह कहा जा सकता है कि भूफी मत का इतिहास ६२३ ई० वे लगभग प्रारम्भ होता है । प्रारम्भ म मूफोमत म दशन का प्रवेश नही था । इस्लाम एक प्रवत्तिमूलक घम था। इस्लाम के रहस्यवादी सूफो नाम से विख्यात है और इस्लाम का रहस्य वाद या सूफियो का दशन ही 'तमवुफ है। इस्लाम के साथको ने इसकी अनेक प्रकार से पाग्याएँ की है । सूफी सत मारूपफ अलमरसी (८२५ ७२ ई०) का क्यन है कि परमा मा सम्ब घी सत्य का जानना और माननीय विषया का त्याग ही सूफी का सच्चा धम है। अबुल हसनअल नूरी (९०७ ई विद्यमान) ने सूफी और सूफी घम की यास्या करते हुए कहा है। सूफी को मसार से घृणा होती है और ईश्वर से प्रम है।'' उसन अयत्र पहा है वि 'नफ्स' (वामनामय हृदय) के सभी आन दो का परित्याग सूफी का धम है । इसी प्रकार जुवद (सन ९०९ ई०, विद्यमान न बतलाया है वि तस बफ का तात्पय है अपने स्वार्थी का त्याग कर परमात्मा के लिय समपित हो जाना। हुग्विरी (१०९२ ई. मृत्यू) का कथन है कि सूफिया के लिये सूफी सिदा त भूय से भी अधिक स्पष्ट है । सच्चा भूपो वह है जो अपवित्रता को पीछे छोड आया है ।' फरीटद्दीन अत्तार (सन १२३० इ० विधमार) न तजकिरा औलिया नामा प्रथम तसवुफ को सत्तर परिभाषा दी हैं । कहा जाता कि मूफीमत कोई ऐसा सुमर्गाठत सम्प्रदाय नहा है कि उनक सिद्धा तो की निश्चित तालिका दी जाय या उमकी मा यताओ की सुनियोजित रूपरखा प्रस्तुत की जाय । याना धम अथवा इस्लामी सम्प्रदायो और मता की भांति इसकी सातिक मर्यादा का निर्धारण नहीं हुआ है। निक्लसन के अनुसार सत मारुषलारसी की परिभाषा ही सूफोमत की प्राचीनतम परिभाषा है। १ मध्ययुगीन प्रेमास्यान । 2 HAR Gibb Muhaimdanism P 100 101 लिटररी हिस्ट्री आफ दी अरबूस' (१९३०) पृ. ३०५ । है वही, प० ३८५-३९२ । ५ 'नामपलाल महजूव अल हुज्विरो (अन०), निपल्सन (१९११ ई.) ६ जनरल रायल एशियाटिक सोसाइटी (१९०४ ई०), १० १३० । लिटररी हिस्ट्री आफ परसिया ई० जी० बाउन, (१९०९६०) १०.२२ ८ सिर हिरदो आप दोबस, (१९३०१०), पृ० ३०५ । ३ ७ २२ । गूरी विनापमो प्रम निगम अभी पुनयिती नागार गोमत गर महार' है। अगल साग प मत गरिधि नियाग वपना हो गूगो मा है। विती ने यत पाया कि मारी यह हैजा परमामा गहार गाय को पवित रखता है । अब सई पत्र "गरी परिभाषा मरता यालाया है कि पित होरर परमारमा म पा सगा हो गूरापत है। मयू पा लिवरी माइत । पि यह पम्मामा अपान गरागार में अपग मान वा* जापाम परमारमा र अतिरित frमामार पान 7 "नाही इमरी बिग पता है । जान मिया 7 गूगो को पतला हुए सा है गूिर। वह है जा पा ओर एम म मामजप गता है और उमरा मौत उग अयस्या परिचया है और जो सामारिम व पराको दूर कर देना है । छावा पपन है वि पिया वा विता यह है कि उन राहय पवित्र और उन वाध्य भो पवित्र। इस प्रकार आप परिमापा दमा पर मिलती है जिनम पाना प्रकार ग मूपिया र गणा पर प्रा राना गया है । जमा विरी न कहा। दि सच्चा गूगा वही जा आवित्रता मो पोर र आया है। दागमस्त परिमापात्रा में इस बात पर बस गिया गपादनमात्य और आपातर शुद्धि और पवित्रा। यनाये रमना गूरी सापा का कतय है। उसके लिए यह आव यक है कि वह अपनी रामरत II गमम्न यासनाभी को मिटावर परमात्मा की इच्या पर अपन को रद । गूपीमत में विद् व्याम्याता अल परली न यारी और आभ्य तरिम जीवन से पवित्रता का हो मूपा घम माना है। उगमा रहना है कि पवित्रता एप यष्ठ यस्तु है । चाह जिस प्रकार की भाषा व द्वारा उस पपोत दिया जाय और उमवे विपरीत अपवित्रता है जिसमा परित्याग वरना पाहिए।' विधि विधाना स मुख मोड निराल विध म व्याप्त इमारत तथा अमूत गति की हाला रावत्र पावर मुस्लिम साधक। जो रहस्य अभि पक्त किए उ हा सामजस्य का नाम मूफीमत है। गत सूफीमत या तसव्वुफ भी रहस्यवाद ही है अनिहित भावना रे १ R A Nicholson studies in Islamic mysticism (1921) p 49 २ अल हुग्विरी दी करफुल महजूव अनु० निकलसन (१९११ ई०). ३ रामपूजन तिवारी सूफी मत साधना और साहित्य पृ० १६८६९
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२६ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण दशन बनाने की चेष्टा की गई। सूफी मत के सम्बध मे यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि ऐतिहासिक विकास के सभी युगो मे प्रेम का महत्व समान रूप से मा य रहा। प्रथम युग-(५००-८७० ई० तर) प्रथम यग के मूफीमत मे दशन का समावेश नहीं था। इस्लाम एक प्रवत्तिमूलक घम या। पहली बार इसम कतिपय ऐस साधक हुए जिनमें भक्ति का सन्निवश हुआ । आत्मा का शुद्धीकरण प्रारम्भ हुआ। इन साधको मे इब्रा हीम विन अधम फुजामल विन अयाज राविया आदि का महत्वपूर्ण स्थान है । प्रथम युग के मूफियो मे इब्राहीम विन अधम का नाम अति महत्वपुण है । इसका जम वल्ख में हुआ था। इसको मत्यु सन ७८३ ई० म हुई । इसने भी फकीरी जीवन, एकातवास और सासारिक वस्तुओ के त्याग पर बल दिया है। परमात्मा के ऊपर अपन को सम्पूर्ण रूप स छोड देना ही उसक उपदेशा का सार है । अत्तार ने उसके एक प्रवचन का उद्धत किया है, जिसम कहा गया है-'ह खुदा जानत हो कि अपना प्रम प्रदान कर जिस प्रकार से तुमने मुझे गौरवावित किया है, उसकी तुलना में आठो स्वग मसर के एक पख से अधिक मूल्य नहीं रखते।। परमात्मा के प्रति अन य भक्ति और ससार प्रति उसका विरक्ति क्तिनी अधिक थी, इसका पान निम्नलिखित कहानी से होता है । जब इब्राहीम राज्य परित्याग कर फकीरी जीवन व्यतीत करता हुआ इतस्त भ्रमण कर रहा था, तो कही उसका एक युवक से साक्षात्कार हो गया । वह युवक उसका पुत्र था। उसको देखकर उसके मन म मोह उत्पन्न हुआ कि तु वह सम्भल गया । कहा जाता है कि उसन परमात्मा से प्राथना का कि हे खुदाब द । तुम्हारे प्रम के लिए मैंन अपने ससार का परित्याग किया और तुम्हार ध्यान मे रत रहने के लिए मैंने अपने वत्स को अनाथ बनाया । यदि अब इस प्रम को प्राप्त करने के लिए तुम्हारी शत हो कि मेरे टुकड टुकड़े कर दिय जाय तो भा मैं तुम्हारे अतिरिक्त क्सिी अन्य की आर सहायताथ नही देखू गा। उपयुक्त उक्तियो से इब्राहीम विन अधम को पारलौकिक प्रम की प्रगाढ़ता प्रतशित होती है। फुजायल विन अयाज (मृ० स० ८५८) और इब्राहीम विन अघम दोना ने अपनी सम्पत्ति तथा राज्य का परित्याग कर बसरा क किसी शिष्य को १ डा. रामपूजन तिवारी सूफी मत साधना और साहित्य प० २१७ सूफी सिद्धात और प्रेम-तत्त्व । २७ मुरीद बनाया था। इन सभी स तो में 'खौफ' की भावना भी प्रेरक तत्व के रूप में विद्यमान थी वितु राविया वसराविया ने सूफीमत मे प्रेम भावना की स्थापना की। उसने अपना सवस्व ईश्वर चिंतन मे अपित कर दिया। राविया म आत्म समपण तथा पूर्ण विश्वास को भावना प्रधान थो। राविया का पूरा नाम राविया अल अदाविया अलवसरी था। उसका जन्म स्थान वसरा था। इसलिए उसे राविया अल वसरिया भी कहते हैं । उसका जन्म सन् ७१७ ई० के लगभग यसरा मे हुआ था । अत्तार ने राविया का परिचय अति आशसा स्मक गन्दा मे दिया है । उसके हृदय म परमात्मा का प्रेम तथा उसका विरह ध्याप्त था। उसकी एकमात्र ईहा ईश्वर प्रेम मे लीन हो जाने को थी, वह निष्कपट नारी दूसरी मरी के समान थी।''राविया को परम प्रेम ही श्रेय था। वह कहती है-' हे नाय | तारे चमर रहे हैं, रोग निद्रा निमग्न हैं सम्राटो के द्वार बद है, प्रत्यक प्रेमी अपनी प्रेयसी के साथ और मैं यहाँ एकाकी आपके साथ है। वह केवल परमात्मा की कृपा कोर पर ही विश्वास करती पी। उसका कहना था- हे ईश्वर मैं आपको द्विविध प्रेम करती हूँ एक तो स्वाथ पूण कि मैं आपके अतिरिक्त किसी अय का ध्यान नहीं करती, दूसरा शुद्ध प्रेम है कि अब आप मेरे मन का आवरण हटा दें तो मैं आपका साक्षा कार कर पाती। दोना ही रूपो म श्रेय आपका है। वह आपकी ही कृपा का प्रमाद है।" 2 She the secluded one was clothed with the clothing of pur ity and was on fire with love and loving and was enamou red of the desire to approach the lord and be consumed in his glory She was a Mary and a spotless woman" Margaret Smith Rabia the mystic P 54 "Two ways I love thee Selfishly And next and worthy 18 of thee Tis selfish love that I do naught Save Think on thee Wim every thought Tis purest love when man dost ra-ise The eveil to my adorin, gaze Not mine the praise in that or this, Thine 13 the praise in both Iwis' A Literary History of Arabs P 234 २८ । सूको कवि जायसी का प्रेम निरूपण १ भय की भावना का सवथा अभाव प्रेममयो राविया में भी नहीं था। उसे रसूल मुहम्मद का डर था क्योकि सम्भवत प्रेम को उपासिका राविया परमात्म चितन मे हम्मद के महत्व का ध्यान नहीं रख पाती थी उसे मध्यस्थ की आवश्यकता ही न थी। उसने प्राथना को-' हे खुदा के रमूल । तुम्हें कोन नहा प्यार करता किन्तु परमेश्वर के प्रेम से मेरा हृदय इतना अधिक ओत प्रोत है कि किसी अ य के लिए घणा या प्रेम का भाव मरे हृदय में भी आता ही नही । राविया उन प्रथम मुस्लिम साधको मे थी जिहे वास्तव में रहस्यवादी कहा जा सकता है । परमात्मा के प्रति उसका प्रेम इतना अधिक था कि उसे दूसरी किसी वस्तु की आवश्यक्ता नही प्रतीत होती थी। उसका कहना था कि प्रेम के द्वारा ही परमात्मा को पाना सम्भव है। उस प्रेम को आंच में मानव मन के सारे कलुष जलकर भस्म हो जाते हैं और परम प्रियतम का पाना सहज हो जाता है। इस्लाम धम के कम काण्ड की राख मे राविया के प्रेम की नित्य जलती हुई ली ने उस अघकार युग मे मुसलमानो के हृदय पर अधिकार जमाना प्रारम्भ कर दिया। परमात्मा का प्रेम पाने के लिए और उसके अन त सौ दय के दशन प्राप्त करन के लिए वह सवस्व त्यागन को तत्पर थी । ' हे परमात्मा, इस ससार में हमारे लिए जो कुछ भी तुमने निर्दिष्ट कर रखा है उसे अपने शत्रुओ को प्रदान कर दे। और परलोक का जो कुछ है, उसे अपने उपासको को प्रदान कर दे। मेरे लिए तो तुम ही यथेष्ट हो मैं और कुछ नहीं चाहती। उसकी यह भी प्राथना थी- 'हे खुदा । यदि मैं नरक के भय से तेरी उपासना करती हू तो तू मुझे नरक में जला और यदि मैं तेरी उपासना रवग प्राप्ति की आशा से करती हू तो तू मुझे स्वग से वचित ही रख किंतु यदि मैं तेरी उपासना केवल तेरे लिए ही करती हूँ तो तू अपना चिर सौंदय मुझ से दूर मत रख ।' Apostle of God who does not love thee? but love of God hath so absorbed me that neither love nor hate of any other thing remains in ny heart A Literary History of Arabs, P 234 --By R A Nicholson 2 R A Nicholson Selected Poems from the Diwan 1 Sham ast Tobraz (1898) 3 Margaret Smith Studies in Early Mysticism in the Near and middle East (1931) सूफी सिद्धात और प्रेम तत्त्व । २९ उस परम प्रियतम का प्रेम प्राप्त किये बिना और बिना उसके मिलन के प्रेमी की प्रम पातनायो वा अवसान नहीं होगा और न उसे शाति ही मिलेगी। उसका सारा जीवन दरिद्रता परमात्मा का ध्यान तथा स्मरण और सर्वाधिक प्रेमाग्नि में तप्त होते हुए बीता । उसका समस्त जीवन प्रेममय या । उस प्रेम के समस्त सासारिक सभी वस्तुए तुच्छ थी। राविया मे ही सवप्रथम प्रेम दशन का उदात्त और प्रसर रूप सामने आता है । वह अयत्र कहती हैं-'सुदा के प्रेम ने मुझे इतना अभिभूत कर दिया है कि मेरे हृदय मे अय किसी के प्रति न तो प्रेम मेष रहा न घृणा रोष रही। अनय भक्ति और प्रेम तथा परमात्मा के हाथो मे समग्र रूपण स्वय को समर्पित कर देना हो राविया की अपनी विशेषता थी। जिसने उसके परवर्ती साधकों को अत्यधिक प्रभावित किया । द्वितीय पुग-(८७० ई० से १००० ई० तक) द्वितीय युग के प्रारम्भ होने के समय तक अवास वश का गासनकाल प्रारम्भ हो गया था। उसके अमात्य वरमर के प्रोत्साहन द्वारा भारतीय विचार धारा का प्रचार भी बढने लगा। मामु ने अपने दरबार मे भिन्न भिन भी के प्रतिनिधियो को अध्यात्म विषयक विचार विनिमय के लिए उत्साहित किया जिसका प्रभाव नविकसित सूफीमत पर भी पडा । इसके अनेक बातो पर तक वितक प्रणाली का भी आश्रय लिया जाने लगा। इसके अतिरिक्त हारू रशीद के राजस्वकाल से अनेक यूनानी दाशनिको के महत्वपूर्ण ग्रथो का अनु वाद काय प्रारम्भ हुआ और उसके साथ ही साथ, भारतीय दशन और विशेष कर बौद्ध दशन एव वेदात दशन का भी अध्ययन और अनुशीलन होते रहने से इस्लाम धम के क्षेत्रो मे नितात नवीन स्रोतो का समाव हो गया । ईरानी सस्कृति ईसाइयो का भावयोग तथा प्लोटिनस का नव-अफलातूनी सतवाद इस अवसर पर प्रभावित करते हुए प्रतीत होते थे और सबके सम्मिश्रण व सम वय द्वारा एक ऐसी विचारधारा की सष्टि हुई, जिसने परम्परागत इस्लामी धम के भीतर एक प्रकार की प्राति उपस्थित कर दी। फलत उस समय बढते हुए बुद्धिवाद को दबाने के लिए शासको को सजग एव सचेष्ट होना पड़ा और समय समय पर मत्य दह की व्यवस्था भी होने लगी। इस समय के प्रसिद्ध सूफियो म सवप्रथम मारुफुल करखी का नाम आता है। इनका जम मेसोपोटामिया के एक प्रमुख नगर वासित मे हुया था और | Margaret Smith, Rabia the mystic (1928) ३० । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण मत्यु सवत ८५२ म हुई थी। इहोने नव मूफीमत का पहले प्रचार किया था । इहाने सूफीमत की शतावरी के लिए जो जो परिभाषाए वनायी व सभी मा य थी और य सूफियो मे श्रद्धा के पात्र हो गय थे । इहाने एक सच्चे फकीर कामकाज, भगवच्चि तन, भागवदाश्रय एव भगवदुद्दिष्ट कायक्लाप के आधार पर निर्धारित किया था और तसव्वुफ अथवा सूफीमत की प्रमुख विशेषता परमतत्व की अनुभूति एव सासारिक विषया से विरक्ति म मानी थी। कहा जाता है कि परमात्मा के प्रेम मे अहर्निशि निमग्न रहता था। उसका कहना था कि मनुष्य की शिक्षा से प्रेम नही होता वह परमात्मा की कृपा और प्रसनता से ही सम्भव हो पाता है। इनके समकालीन अबू सुलमान अब्दुल रहमान विन अतिग्या अल दारानी (म० स० ८८७) का भी नाम सूफी साघको में आदर के साथ लिया जाता है । यह वासित का निवासी था। उसने मारिफत (परमज्ञान) के सिद्धात पर पूर्ण रूपेण प्रकाश डाला है। यह अतीव कोमल हृदय का -यक्ति था। यह अत्यत धयवान् था । इसने प्रेम को हृदय का अलकार माना है। इसका कथन है-प्रत्यक वस्तु के लिए एक एक अलकार है । हृदय का जलकार सहज प्रेमाद्रभाव है।' अबू अल दारानी के कुछ ही समय बाद जून नून मिस्री का नाम आता है। यह मिश्र देश का निवासा था। इसका ज म सन ७९६ ई० में इसमीम मे हुआ था और उसकी मत्यु सन ८६० ई० मे हुई । वह एक बहुत बडा सूफी साधक और विचारक था । उसने सूफी सिद्धा तो की बडी सुदर विवेचना की है । वह सवप्रथम व्यक्ति है जिसने सूफी माग का विशद विवचन किया है। राविया ने जिस प्रम भावना का परिचय दिया था, उसका अनुभव जन नून ने किया । उनका कहना था कि-'प्रम ईश्वरीय देन है जिसे किसी मानव से नहीं सीखा जा सकता है।''जून नून मिश्री ने पूण तौहीद की विवेचना कर इस्लाम को प्रेम का महत्व समझने के लिए बाध्य किया। अल्लाह की अन यता प्रति पादित करते हुए उसने अय सभी वस्तुजा के अनस्तित्व का राग अलापा । उसन कहा कि ईश्वरीय प्रम एक रहस्य है जिसका केवल अनुभव करने का श्रेय ही प्रेम है । जून नून न सूफीमत को अपनी विचार परिपक्वता से पुष्ट किया। उहोने इल्म और मारिफत मे नान और प्रज्ञान मे भेद स्थापित किया और स्पष्ट कहा कि इश्वरीय नान या मारिफत का सम्बघ मुहब्बत या परम प्रम १ डा० रामपूजन तिवारी-सूफीमत-साधना और साहित्य-१० २३७ 2 Tadhakuratu i Awalıya P 272–12 सूफी सिसात और प्रेम-तत्व । ३१ - से है ।" इहोंने सूफीमत मे सवप्रथम अध्यात्म विधा और भाववेश या हाल का भी समावेश किया । जून नून ने सभा, हाल, तौहीद तौवा, करामात आदि प्रमगो पर भी विचार प्रकट क्येि तथा प्रेम को साध्य रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। इम युग के अय प्रसिद्ध मूफियो म अबू माजीद अथवा वायजीद पर विस्तामी का नाम आता है । य पसिया के निवासी थे। इन जीवन के विषय म अधिक नात नहा है । ये मातभक्त थे और माता की कृपा से ही आध्यात्मिर साधना मे लगे थे। सूफी मिदा त के विकास म इसका बहुत बड़ा योग है। ये पसिया के विस्ताम स्कान के निवासी थे, इसीलिए वह अल विस्तामी कहलात हैं। इनका पूरा नाम अबू माजोट तैफूर विन ईसा अर विस्तामी था। इहोंन भी प्रेम को अत्यधिक महत्व प्रदान किया है। नान की भांति प्रेम भी तत्वत एक दवी वरदान है, यह कोई ऐसी वस्तु नही है जो प्राप्त की जा सके । प्रेम एक मी उत्प्रेरक शक्ति है जो साधक का आध्यात्मिक माग में अग्रसर कर देती है । यह एक ऐमी वासना है जो सभी वासनाआ का उरसा दूर कर देती है। यदि सार ससार के लोग भी प्रेम का आकर्षित करना चाह ता नहीं कर सस्ते और यदि वे इम हटाने का अत्यधिर प्रयास करें तो वे ऐसा नहीं कर सक्त । परमात्मा से वही प्रेम करते हैं जिनसे परमात्मा प्रेम करना है। वायजीद न कहा है-'मैं समझता था कि मैं परमात्मा स प्रेम करता हू परतु ध्यानपूर्वक देखने पर ज्ञात हुआ कि मेरे प्रेम करने स पहले ही वह मुझ से प्रेम करता है। वह प्रेम की महत्ता को स्पष्ट करते हुए अन्यत्र कहता है कि- 'दुनियाँ से शत्रुता पर जब मैं परमात्मा की शरण म गया तो उसक प्रेम ने मेरे पर इतना अधिकार कर लिया कि मैं अपना स्वयमेव शत्रु बन गया।" इस प्रेम में ही मारीप (ईश्वरीय ज्ञान) प्राप्त होता है । कहा जाता है कि याहिया विन मुआघ ने अबू माजीद के पास लिखा कि उस आदमा के विषय म आपकी क्या राय है जा प्रेम सिंधु का एक विदु पोकर मस्तमौला बन जाता है।' ५ RA Nicholson Idia of Personality in Sufismn P 91 २ डा० नमटेश्वर चतुवदी-इस्लाम के सूफी साधक-१० ९७ ३ डा० रामपूजन तिवारी-सूफीमत-साधना और साहित्य-पृ० ३१० ४ वही ३१० 5 A L Huwiri-The Kashf Al-Mahjub Trans Roynold A Nicholson (1911) May ३२ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण १ वायजीद ने उत्तर मे लिखा कि 'आप उसके विषय में क्या कहेंगे, यदि ससार के मभी सिधु प्रेम को मदिरा से परिपूण कर दिये जाय, इह पी जाय और फिर भी अपनी पिपासा शात्यथ अत्यधिक चिल्लाता रहै । तथापि प्रम को वह साधक और परमात्मा के मध्य पट सदश मानता है । "क्योकि प्रेम के अस्तित्व मे ही दंत निहित है। 'वह उसी को श्रेष्ठ मानता है जिसकी कोई अपनी इच्छा न हो और परमात्मा की इच्छा ही उसकी इच्छा हो । इसके पश्चात बगदाद निवासी अर जुनद (म० स० ९४६) ने उक्त मिनी की उपदेशावली को क्रमबद्ध रूप में प्रकाशित किया और उनके शिष्य खोरा सानी शिवली ने उसका सवत्र प्रचार और प्रसार किया। जनद अपने समय के सूफी माघको म अग्रगण्य माने जाते थे । कि तु वे सनातन पथी इस्लाम एव मूफीमत मे सामञ्जस्य स्थापित करने के मा पक्षपाती थी । जुनद ने प्रेम को परिभाषित करते हुए कहा है 'प्रिय की विशेषताओं में अपनी विशेषता का विलय ही 'प्रेम' है । दूसरे गब्दो में कहा जा सकता है कि प्रेम की चिोपत्ता यह हाती है कि अपने निज के यक्तित्त्व को समाप्त कर दिया जाय । यह आन द ऐसा है कि इस पर नियत्रण नहीं किया जा सकता है । यह ईश्वरीय कृपा है जो निरता विनय करते रहने और आकाक्षा करते रहने से प्राप्त होती है।। » इस युग मे सूफियो मे सबसे प्रसिद्ध नाम हुमन विन मसूर अथवा हल्लाज का था। उसका पूरा नाम अबुल युगीस अल हुसा बिन मसूर अल हल्लाज था। उसका जन्म ईसा की नवी शतानी के उत्तराद्ध (सन ८५८ ई०) मे हुआ था। फिहरिस्त के अनुसार वह पसिया का निवासी था कि तु इस बात का स्पष्ट पता नहीं चलता कि वह निशापुर, मव तालीकन, रे अथवा कूहि स्तान में कहाँ का निवासी था । इन्नुल जवजी' के अनसार अल हल्लाज का पिता मह फारस के वा स्थान का था और भागी घम का अनुयायी था। २६ माच सन ९२२ ई० दिन मगलवार को उसे शूली पर चढा दिया गया। 1 A L Hujwirı-The hashf Al-Mahjub Trans Roynold A Nicholson (1911) 2 Ibid 3 R A Nicholson Mystic of Islam page 112 4 E G Browne Literary History of Persia, Page 428 5 Ibid p 434 सूफी सिद्धात और प्रेम-तत्त्व । ३ . यजीद ने जिस सत्य की अनुभूति की थी। मसूर ने उसी सत्य को आत्म रूप बना लिया। मसूर ने स्वय का ही सत्य माना है। वह अनन्हा हो गया।' प्रम को उसन परमात्मा के सत्य का सार के रूप में स्वीकार किया है। वह मानता है कि प्रम की महत्ता बिना प्रतिकार किये दुख सहिष्ण होने म है। उसका कथन है मैं वही हूँ जिसको प्रेम करता है, जिसे प्रेम करता हूँ वह मैं ही हूँ। हम एक गरीर के दो प्राण हैं यनि तू मझ दखता है तो उसे देखता है । पदि उसे देखता है तो हम दोनो को देखता है।'' ममूर अर हल्लाज़ ने कहा है ईश्वर से मिलन तमी सभव है जब हम कष्टों के मध्य से होकर गुजरें। ' इसीलिए मूफी साहित्य में प्रेमी को भयवर कष्टों का सामना करना पड़ता है । उसका सवल दद विरह और तडपन है। अन्तुल कादिर जिलानी ने अपनी एक गजल म कहा है हमारे झापड के दरवाजे बपर्दा दाखिल हो जा क्याकि मरे घर म दद के सिवाय और कोई नही है । ' एकवार एक फकीर ने उससे पूछा कि 'प्रम क्या है ? उसने उत्तर दिया आज देखागे कल देखोग परमो देखोग । इस काल के सूफी साधका म अर फरावी का एक विशिष्ट स्थान है । सूफी दानिक अल फरावी (सन ९५०-१००७ ई०) न प्रम को ही ईश्वर माना है और सप्टि का कारण भी उहीन प्रम काही स्वीकार किया है । उसका मत है भौतिक वस्तुओ तथा ज्ञान और बुद्धि से परे एक विशिष्ट वस्तु है, जिसे प्रम कहते हैं । प्रम के सहार इस सप्टि म प्रत्येक वस्तु जिसम व्यक्ति भी सम्मिलित है अपनी समग्र पूर्णता पर पहुच जाती है । 2 P IR A Nicholson Idea of Personal ty in sufism p 29 If you do not recogn se God he sayest at least recognise hus sgns I am that sign I am the creative truth Studies ia Islamic Mysticism, P 84 By-R A Nic Nacholson 3 Outlines of Islamic Culture page 3500 व हजा वाना दर अंदरे काशा नये या। 11 । के कसे नेस्त वजुज दर्द तो दरखा नये मा ।। -~दीवाने गौसुल आज़म पृ० १७ कुतुबन खाना नजीरिया उदू बाजार हेहली। 5 K A Nicholson Mystics of Aslam page3122. sr . ४ - -- - ३४ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण । ३ - मूफ्यिो का कथन है कि ईश्वर ने अपना बोध कराने के लिए सष्टि की रचना की। अपने मत की पुष्टि के लिए एक हदीस का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं । ' मैं एक गुप्त को। था। मरी ईहा थी कि मुझे सब लोग जाने । मत मैंने मखलूक (मष्टि) को रचना की। अल फरावी ने भी इसे स्वीकार क्यिा और कहा है कि 'ईश्वर रद्रय प्रेम, है । सष्टि की रचना का कारण भी प्रेम ही है। प्रेम के सहारे सप्टिाकी इबायां प्रेम के महास्रोत मे, जो पूण सौंदय और सर्वोतम मी हैं निमग्न हा जान के लिए पणरूपेण मरग्न सुप्रसिद्ध सूफी अजीज विन मुहम्मद नफमी (सन १२०६ ई.) ने भी कुछ इसी प्रकार का मत प्रकट किया है। उनका पथन है आपण ईश्वर का जो व्यक्ति अपनी ओर आकृष्ट करता है वाय है । जब तक व्यक्ति पर ईश्वर की अनुकम्पा नहीं होती और उसका अपनी ओर आकृष्ट नही बर ता वह वैभव और गौरव म आसक्त रहता है। जब यक्ति हम ममार को आक्षण का परित्याग पूर्णरूपण कर दता है तब वह ईश्वरो मुख हो जाता है और जब उसके हृदय में केवल डकमात्र ईश्वर गप रहता है तब वह प्रेम में परिवर्तित हो जाता है।' तृतीय युग (१००० ई०-१५०० ई. तक) सूफीमत का वास्तविक इतिहाम उसरे तताय युग से ही प्रारम्भ होता है । सूफीमत का सुव्यवस्थित स्वम्प प्रगान कर उसके विभिन्न सिद्धा तो पर प्रकाश डालने वाले इस युग के ग्रथकारो म कालावाघी (म० म० १०५२) हुज्विरी (म० स० ११४९) एव गजाली (म० म० १९६८) के नाम विशेष रूपेण उल्लेखनीय हैं। कालावाधी ने 'गूफी मतवाद का प्रकृत स्वरूप निणय' का समानायक प्राय लिया । जिसके द्वारा उहोने यह प्रतिपादित कर दिखाया कि विचारपूर्वक देखन पर यह मत मूल इस्लाम घम का किसी भी प्रकार विरोधी नहीं है प्रत्युत् उसी के सिद्धातो का पोषक है । इसी प्रकार अबुलहसन अल हुज्विरी ने भी अपनी रचना करफुल महजब' (रहस्योदघाटन) के द्वारा मूफीमत एव इस्लाम धम के मध्य पूण सामञ्जस्य स्थापित करने की चेष्टा को। इ होने प्रेम के महत्त्व को स्वीकारा है। १ कुतो कजम मखफ्सिन फाह बवतो अन ओ रफा फखलकु तुल खल्क । --कुआन शरीफ AM A. Shushtery Outlines of Islamic Culture page 311 ३ मक्सद अक्स का अग्रेजी अनुवाद आरियटल मिस्टिसिज्म' ५० १९ 2 सूफी सिद्धात और प्रेम-तत्व । ३५ - २ वपुल महजूब' मे हुग्विरी का क्थन है 'आपको जानना चाहिए कि प्रेम को दानिका ने तीन प्रकार से प्रयुक्त किया है। प्रथम वह प्रेमास्पद के लिए अविराम लालसा झुकाव तथा आसक्ति के रूप में प्रयुक्त होता है । जिसका सम्बध सासारिक वस्तुओ तथा प्राणिया और उना पारस्परिक प्रेम से होता है । पर वह ईश्वरीय प्रेम नहीं कहा जा सकता। ईश्वरीय प्रेम सर्वोत्तम वस्तु है । द्वितीय प्रकार के प्रेम का अथ ईश्वरीय कृपा है जो ईश्वर द्वारा क्सिी “यक्ति को प्राप्त होती है, ऐसे व्यक्तियो को ईश्वर पूर्ण साधुता प्रदान करता है और अपनी अपूर्व कृपा से उसे विशिष्ट बना देता है । ततीय प्रकार का प्रेम वह होता है जिसमें ईश्वर व्यक्ति को सदाय के लिए सदगुण प्रदान करता है।'' प्रेम के स्वरूप को अत्यधिक स्पाट करते हुए हुज्विरी ने लिखा है कि "ईश्वर के प्रति मानव का प्रेम वह गुण है जो केवल उन पवित्र व्यक्तियो मे श्रद्धा और गरिमा के रूप म प्रकट होता है जिनकी ईश्वर में आस्था है इस लिए कि वह अपने प्रिय को स तुष्ट कर सके और उसक दशनाथ विकल हो उठे। उसके अतिरिक्त और किसी वस्तु म उन मन न रमे । ऐसा व्यक्ति उसके स्मरण में लगा रहता है और किसी अन्य का स्मरण नही करता है । प्रेमोदय से लेकर ईश्वर से मिलन या उसम पना होने तक की यात्रा मे साधक को अनेक प्रकार की बाधाओ का सामना करना अनिवाय है। इन बाधाओं मे भी प्रेम निखरता है । हुज्विरी ने लिखा है 'प्रिय के द्वारा जो प्रेमी को दुख पहुंचाया जाता है उसमे प्तमी को आन द की प्राप्ति होती है ।। प्रेमी म प्रेम होता अत वह प्रिय को कठोरता और उतारता दोनो को एक: ही प्रकार झेलता है।', उ होन गिवली की क्या ट्रेकर इसको स्पष्टर किया है। प्रम को अन्यत्र परिभाषित करत हुए हुश्विरी ने कहा है कि 'प्रम प्रिय तम की प्राप्ति के लिए विक्रता का ही नाम है। उपयुक्त साधको में अधिक गम्भीर विचारक और व्याख्याता अबूहमीद मुहम्मद अर गजाली हुए। जिनकी विद्वत्ता एव योग्यता के कारण सुपीमत एव मूल इस्लाम धम का पथक्त्व प्राय रुप्त होता मा दीख पडा और प्रथम 1 करफल महजब अनुवादक-निकलसन प० ३०६ २ वही पृ० ३०६-७ ३ आउट हाइन आफ इस्लामिक कल्चर वा० २ १०५०२ - ३ .
३६ । मूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण को द्वितीय के अ तगत सता के लिए स्वीकृत कर लिया गया । ये 'इस्लाम धम मे प्रमाण स्वरूप' कहे जाते हैं और सूफी अपने मत को सुयवस्थित करने वालो मे अति उच्चस्थान प्रदान करते हैं । अल गाजली ने सोन्य को ही प्रेम का जनयिता माना है। वे कहते हैं कि सौन्य भा घनिष्ठता ही। प्रम की घनिष्ठता है । उनका मत है 'सौदय वह है जो वास्तव मे प्रम को जम देता है। अत आत्मा सासारिक प्रेम पर ही नही अवलम्बित रहती प्रत्युत इस सौंदय से होते हुए उसको दष्टि अन्यत्र लगी रहती है । वह सर्वोत्तम से प्रेम करता है जिसे ईश्वरीय म कहते हैं । यह ससार के सौदय का मूल स्रोत है। इस बात को कदापि स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि जहाँ सौंदय होगा वहाँ प्रम भी सहज ही हो जायेगा । सौंदय की माया जितनी ही अधिक होगी प्रेम का घनत्त्व, भी उतना अधिक होगा। पूण सोदय ईश्वर में है अत वही सच्चे प्रम का अधिकारी है । इस प्रकार हम देखते है कि अर गजाली ने भी प्रेम की महत्ता स्वीकार करते हुए सच्चे प्रेम का अधिकारी ईश्वर को ही स्वकीकार किया है। । इस काल के दूसरे प्रसिद्ध सूफी विद्वान शेख शहाबुद्दीन सुहवर्दी का नाम आता है ।। शख सुहवर्दी का देहात सवत १२९१ मे हुआ था। इहोने भी प्रेम को परिभाषित करते हुए कहा है सौदम के गहरे चितन के लिए हृदय का झुकाव ही प्रेम है। शेख सुहवर्दी के अतिरिक्त एक क य सूफी विद्वान ने लगभग वसा ही काय किया जिसका नाम शेख मुहीउद्दीन इल अरती (स० १२२१-१२९७) था। इलुल अरबी का प्रेम, विषयक दृष्टिकोण अन्य मूफी साधका से भिन्न है । उसने नारी प्रेम को भी ईश्वरीय प्रम माना है । अपने प्रथ-फुसुमुल हिकाय' मे, उ होने कहा है कि जिस प्रकार ईश्वर की प्रतिच्छाया के रूप मे ईश्वर का निर्माण हुआ है । उसी प्रकार पुस्प की प्रतिच्छाया के रूप में स्त्री की रचना हुई है। इसलिए यक्ति स्त्री और ईश्वर दोनो से प्रेम करता है । स्त्री का, पुरुप से वही सम्बन्ध है, जो ईश्वर का प्रकृति से है । अत इस अथ में जब स्त्री से प्रेम दिया जाता है तो वह प्रम ईश्वरीय होता है। २ , + r ३ १ अल गजाली दी मिस्टिक-मागरट स्मिथ प० १०९ २ शेख शहाबुद्दीन उमर विन सुहवर्दी आवारिफुल मारिफ. अनुवादक- एच. विल्वर फोस क्लाक, ५०१०१ 3 A M A Shushtery, Qutline of Indian Oulture, page 390 सूफी सिद्धात और प्रेम-तत्त्व । ३७ २ रूमी ने भी एक स्थान पर कहा है "स्त्री ईश्वर की किरण है। वह सासारिक प्रमिका नहीं है । वह निर्माता है, निर्मित नही।" पर रूमी और अरबी की विचारधारा म मौलिक अतर यह है कि रूमी अपने जीवन दशन में स्पष्ट हैं कि सासारिक स्नेह ईश्वरीय स्नेह नहीं है। उनका कथन है ' इस ससार म रहार आत्मा को शुद्ध कर लो तब प्रियतम (ईश्वर) प्राप्त होगा। एक शेर मे भी उ हान कहा है मसार के नश्वर पदार्थों से प्रेम किस काम का प्रेम तो वह है जा ईश्वर से होता है। इन्नुल अरबी के अनसार सासारिक प्रम भी ई वरीय प्रेम की भाति है। कहा जाता है कि निजाम नामर एक स्त्री से उनषा स्नह सम्ब घ था। 'तजमानुल अश्वाक में उसने सम्भवत उमक प्रति अपना प्रणय निवेदन किया है। निजाम अति रमणीया थी। फकीरी जीवन व्यतीत करती थी। प्रगल्भ वक्ता भी थी। अत स्पष्ट है कि नारी प्रेम को भी इब्नुल अरबी ईश्व - रीय प्रम की भांति पवित्र मानते हैं। इनुल अरबी यह घोषित करता है कि प्रेम रूपी प्रम और परमात्मा के प्रति औरसुक्य से श्रेष्ठ अ य कोई धम नहीं है । प्रम सब धर्मों का सार है, चाहे वह जो रूप धारण करे। सच्चा रहस्यवादी इसका सदव स्वागत करता है। जब प्रेमी म प्रम का पूर्ण स्फुरण हो जाता है तब वह ससार को समभाव से देखने लगता है। उसके हृदय म मुसलखन, ईसाई हिदू का कोई भेद भाव नहीं रह जाता है। उसका धर्मवेवल एक रह जाती है । वह है प्रेम का धम ।' रूमी ने भी एक स्थान पर कहा है । 'प्रम धम सभी धर्मों से अलग है। ईश्वरानुरागियो के लिए ईश्वर के अतिरिक्त कोई धम नहीं है ।। इनुल अरबी ने अपने प्रथ तजु मान लअश्वाक मे प्रेम प्रभाव को स्पष्ट मेरा प्रत्येक रूप के योग्य हो गया है । यह मृग शावको के लिए चारागाह है और ईसाई साघुओं के लिए मठ है मूर्तियो के लिए मदिर है और हाफी के लिए कावा है । शरीयत की तख्ती और कुरान का प्रय है मैं प्रेम घम का अनुगामी हूँ । प्रेम को उट मुझे जिस ओर ले जाते । । करते हुए कहा है 1 R A Nicholson, Rumi tho Pod and Mystic, page 44 २ मौलाना रूम श्री जगदीशचन्द्र वाचस्पति पृ० १६९ ३ दी फिलासफी आफ इब्न अरबी-रोम जादय पृ० ८५-८६ ४ रूमी पोयट एड मिस्टिक श्री ए. निक्लसन १० १७१ (एलेन एण्ड अनविन लदन) ३८ । मुफो कवि जायसी का प्रेम निरूपण हैं, उस ओर जाता हूँ । मरा घम और मेरा विश्वास सच्चा पम है।" प्रम बुद्धि का माग नही चुनता। उमवा पथ श्रद्धा और विश्वास का होता है। मूपिया ने प्राय इस पर बल दिया है जिप्रेम माग म अग्रसर होना चारते हा ता तक और बुद्धि का सहारा न लो। अपने का पूर्णरूपेण हो जाओ। म्वाजामुईनुद्दीन चिश्ती ने कहा है ए मुईन । अक्ल की आँख से दोस्त वा हुस्न न स । तू मजनू की आँख स लला के हुस्न को देख ।" तेरहवी ताटी मफोमत का प्रचार काल है। यह वही समय है जब ईरान के प्रमुख सूफी काव्यकारों ने इस अपी पुष्ट एपनी द्वारा हृदयग्राही बनाया। जिसका अनुकरण भारतीय सूफियो ने किया। सूफीमत की सरसे सफल अभियक्ति सनाई काव्य में हुई । सनाई (म० स० ११८८) ने मूपिया। रग म 'हदीक तुल हकीका का प लिसा। इसके पूर्व अरबी में अलसराज, अल क्शरी तथा,अल असारी गद्य में मूफी मत को प्रस्ट वर चु ५ । सनाई से काप की प्ररणा सभवत इ ही रखको स मिला । पारसी के परवर्ती सूफी काय पर सनाई का पूर्ण प्रभाव है । रूमी ने एक शर म सनाई को मायता प्रदान की है-- अत्तार रूह वूद मोसनाई दु चश्मे । मा अज पयसनाई यो अत्तार आमनम॥"" - - रवामी वुहू १ लकद सारा कृल वी साविलन कुल्ला मूरतिन । फमर ई लगिज लानन व दरुन ले रह वानिन । ब वसीतुन ला औंसानिन यावतो ताय फिन । व अल वाहो तोरातिन वमूसह को कुरानिन ।। अदीनो वे दीनिल हर अनी वतज्जहत । पद्दीना दीनी व ईमानी ।' ----तज मानुल अश्वा ती प० १९, रायल एगियाटिक सोसाइटी लदन । २ 'मुईन वचश्मे खिरद हुस्ने दोस्त न नुमायद । बबी नदीयये मजनू जमा' रला ॥ -टीवान स्वाजा गरीब नेवाज प० २४ सु. मुस्लिम अहमद निजामी उदू बाजार, जामा मस्जिद, दिल्ली। 3 E G Browne A Literary History of Persia Vol II - Page317 सूफी सिद्धात और प्रेम तत्त्व । ३९ , "अत्तार रूह था और सनाई उसकी दो आय । हम सनाई तथा अत्तार वाद आये हैं।" सनाई की परम्परा में अनब प्रख्यात कवि हुए। जिनम उमर खय्याम (म० स० ११८०), निजामी ( स० १२६०) और अतार (म० स० १२८७) के नाम प्रमुख हैं। इन पारसी बविया की परम्परा बहुत आगे तक चली और इनमे रूमी (म० स० १३३०) सादी (म० म० १३४९), गमतरी (मु० स० १३७७), हाफीज (म० स० १४४७) एव जाभी (म स० १५४९) जसे प्रतिभाशाली रवि उत्साप्त हुए। जिन पर फारसी साहित्य को आज भी पद है इन पवियो न लोविक थाआ या प्रतावा माध्यम से अपनी दिव्य भावनाआ का प्रकाशन दिया है। ईश्वरीय प्रेम का प्रकट करन के लिए लोकिक प्रेम की भाषा को अपनाया है । सामारिक स्नह ही वह वणमाला है, जिसको हृदयगम पर मूफी ईश्वरीय ममार म प्रवा करना चाहत हैं । मूफियो का एक मकाला है 'अल मजाजो यतरतुर हीका अर्थात् मजाज़ हकीकत का पल है।" अन सासारिक प्रेम और उसकी भापा अपना कर चलने में सूफियो को किसी भी प्रकार की कठिनाई नहा हुई। निजामी का लला मजनू सूफी विचारधाग की एक प्रोट कृति है । जिसम कवि ने प्रम साधना को पूर्णरूपेण स्पष्ट दिया है । प्रम का महत्त्व बतलात हुए उसने लिखा है जो इश्क हमशा नहीं रहने वाला है वह जवानी की स्वाहि शात का खेल है । इश्व वह है जो कम न हो और उमसे कदम न हटे । मजनू जब तक जिन्दा रहा इस वा बोझ उठाता रहा । फूल की तरह इश्क की - नसीम के साथ खुग रहा । लला मजनू के प्रम के माध्यम स हकीकी प्रेम को स्पष्ट करने का प्रयास १ "इश्के के न इश्व जावे जानीस्त । वाजी चये शह्वते जवानीस्त । इश्क आ वागद कि कम न गदद। ता वाशद अजा वदमन गदद। ता जिदा व इश्क वारवश बूद। चू गुल वनमि इश्क खुशबूद ॥ लला मजनू निजामी, पृ० ३० नवलकिशोर प्रस लखनऊ १८८० ई० ।
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मूफी सिद्धान्त और प्रेम तत्व । ४१ जलालुद्दीन रूपी यह घोषित करता है कि आत्मा का परमात्मा के प्रति प्रेम परमात्मा का आत्मा के प्रति प्रेम है और आत्मा से प्रेम करने में परमात्मा स्वयं अपने से प्रेम करता है क्योकि आत्मा जो कुछ दवी तत्व है, उसे वह अपने पास खींच लेता है। इस प्रकार सूफी साधको ने आत्मा का परमात्मा के प्रति और परमात्मा का आत्मा के प्रति प्रेम-दोना को एक दूसरे का पूरय बताते हुए अयो यथित सिद्ध किया है। पद्रहवी शताब्दी में पारसी के श्रेष्ठ सूफी कवियो में जामी का अति महत्वपूर्ण स्थान है । जामी एक बहुत बडा कवि ए बहुत बडा विचारक और एक बहुत बड़ा साधक था । उसका पूरा नाम मुल्ला नूरुद्दीन अदुरहमान जामी था। वह खुरासान के जामनगर का निवासो था । इसीलिए वह जामी कह लाया । उसका जम सन १४१४ ई० में हुआ था । वह मूपिया म नवश- वदिया सम्प्रदाय का था। उसने परमात्मा को परम सौन्य बहा है। उसका कपन या कि सु दर वस्तुएँ मानो उस परम सौदय के साथ हमारा सम्बघ स्थापित करती हैं क्योकि परमात्मा न अपन सौन्य की अभियक्ति के लिए ही सष्टि की रचना किया है । इसीलिए वह प्रेम को साधना में स्थान देता है। प्रेमकर्ता ही उसे प्राप्त कर सकता है स्वय पर, प्रेम के द्वारा ही विजय प्राप्त की जा सकती है । सभी प्रकार के स्वाथ सभी प्रकार की तुच्छनाओ से स्वय को बचाने के लिए प्रेम की ही महायता लेनी चाहिए । प्रेम के सहारे उस बघन को जो इस मसार म निबध कर देता है परमात्मा से मिलन का साधन बनाया जा सकता है । यह दश्यमान जगत ही मानो साधक और परमात्मा के बीच की कडी हो जाता है । अतएव जामी ने प्रेम की साधना को परमात्मा की प्राप्ति के लिए सोपान माना है। जामी ने यूसुफ जुलेखा म कहा है प्रेम के द्वारा ही अपने स्व से मुक्ति प्राप्त हो सकती है। युवावस्था मे विचार सासारिक प्रेम की ओर झुकते हैं । यही सासारिक प्रेम इश्वरीय प्रेम में परिवर्तित हो जाता है । यह प्रारम्भिक वणमाला है। तत्पश्चात हम ईश्वरीय ससार को ग्रहण करत हूँ। और उसके सहारे इसका अध्ययन करते हैं। 'जामी ने आग पहा है "सासारिक प्रेम को छ। कर पिया ताकि तुम्हारे होठ और अधिक शुद्ध प्रेम का सुरापान १ यूसुफ एण्ड जुरखा, अनु०-रेल्फ टी० एच० ग्रिफ्थि, ल दन पृ०२४ ४२ । सूफी कवि जायसी प्रेम निरूपण कर सके।" । ४ निजामी न प्रेम की जिम उच्च भावभूमि पर लैला मजन के प्रेम को स्पिर किया है प्रेम की उसी भावभूमि पर (जामी) ने 'यूसुफ जुरेखा के प्रेम को प्रतिष्ठित किया है । जामी प्रारम्भ में ही कहता है उसो सोदय ने ही लला को मुखाकृति को सुदर बनाया। जिसके प्रत्यक वे पर मजनू लुम्य हो गया । उसने गीरी के मधुराघरो की रचना की जिस पर परवेज और फरहाद का हृय आसक्त हो गया। उसके कारण ही यूसुफ का मस्तर उन्नत हुआ और उस पर दष्टि डालते ही जुलेसा मिट गयी। जामी ने अपनी मसनवी में ईश्वर को शाश्वत सोदय के नाम स अभिहित किया है । यह सौदय सासारिक समस्त सौदय म सवश्रेष्ठ है ।' उहाने यूसुफ और जुलेखा में सासारिक स्नेह स्वीकार कर ईश्वरीय प्रेम प्राप्त करने का आदा प्रस्तुत किया है । उनका कथन है सासारिक स्नेह का रसपान करो। जिससे पवित्र प्रम की सुरा मे परिचित हो सको । परन्तु अपनी आत्मा को वहाँ अधिक समय तक स्थिर न रहन दो। इस पुल से गुजर जाओ। जीघ्रता स आगे बढ जाओ। मूफियो का विश्वास है कि परमारमा प्रेमस्वरूप है और वह उन व्यक्तियो को उसका भेद नही बतलाता है, जिसन अपने सासारिक वालप्य का प्रक्षालन पूणरूपेण नही किया है और जिसने सासारिक वस्तुओ ने लोभ का परित्याग नहीं किया है उमे उस प्रम को प्राप्त करने का अधिकार नहीं है । जो भगवान् से प्रेम करते हैं, भगवान उनसे प्रम करता है । विशुद्ध आत्मा परमात्मा की प्रतिच्छवि है । अत उसे प्रेम करने का अधिकार प्रदाा कर परमात्मा मानो अपने को ही अधिकार देता है । परमात्मा के प्रति उसीका प्रेम होता है जिससे परमात्मा स्वयमेव प्रेम करता है । अपने प्रेमियो के हृदय मे प्रेम को घरोहर के रूप में रख देता है। सूफी कहते हैं कि परमात्मा ही प्रेम है और अपने ही “Drunk deep of carthly love that so my lip Many learn the Wind of holier love to sip Ibid P 24 २ वही, पृ० २१ Yes thought she shrink from earthly loves call Eternal beauty is the queen of all Ibid, p 29 ४ यूसुफ-जुलेखा जामी पृ० २४ - . ३ सूफी सिद्धान्त और प्रेम तत्त्व । ४३ आनद के लिए उसे मानव मानस मे उत्पन्न करता । और उसकी परिणति भी प्रम म ही होती है । ज्ययजीद विस्तायी का कहना है कि "मैं समझता पा कि परमात्मा से प्रेम करता हूँ परतु ध्यानपूव देखने पर ज्ञात हुआ कि मेरे प्रेम करने के पहले ही वह मुझसे प्रेम करता है। इस प्रकार के प्रेम को प्राप्त कर प्रेमी और प्रियतम दोनो ही परितुष्ट होते हैं । प्रेम के द्वारा जब प्रेमी के सारे अतो, सभी वासनाओं का अत हो जाता है तब वह अग्रसरित होता है और उसे परमात्म दशन होत है । पर तु परमात्मा और मनुष्य के इस प्रेम सम्बध म जो बात मानव पर लक्षित होती है वह परमारमा पर नही । सूफ्यिों ने परमात्मा के प्रति मनुष्य के प्रेम के विषय में तो अधिक कहा है परन्तु मनुष्य के प्रति परमात्मा के प्रेम की बात बहुत कम कही है । तथापि इतना स्पष्ट है कि मानव मानस के बीच जो रागात्मक सम्बघ होता है, वसा बस्तु परमात्मा और मनुष्य प्रेम सम्बधी नहीं है । मनुष्य के प्रति परमात्मा का प्रेम उसकी दयालुता के कारण है । जब कि मानव के लिए यह आवश्यक है कि वह परमात्मा से प्रेम करे । जामी ने कहा है कि मैं वहो हूँ जिसे मैं प्यार करता है और जिससे मैं प्रेम करता हूँ वह मैं ही हूँ । एक शरीर में निवास करने वाले हम दो प्राण हैं । यदि तुम मुझे देखते हो तो तुम उसे देखते हो और यदि तुम उसे देखते हो तो तुम हम दोनो को देख रहे हो। अन्य सूफी साधका ने भी प्रेम के स्वरूप और उसके सम्बघ म कापी कहा है । सूफी साधर अल शिवली' का क्यन है कि 'प्रम हृदय में अग्नि के समान है जो परमात्मा की इच्छा के अतिरिक्त अय सभी वस्तुओ को जला कर भस्मीभूत कर देता है । 'अल हुज्विरी ने कहा है कि परमात्मा के प्रेमी के पास इच्छा नाम की कोई वस्तु नहा रह जाती कि वह सदसद् वस्तु की ईहा कर क्योकि वह परमात्मा का प्रेमी है। उसके लिए परमात्मा के अतिरिक्त कोई भी वस्तु अभीप्सित नहीं होती। अपनी समस्त कामनाओ के साथ अपन को समर्पित कर देने में ही प्रेमी सुख प्राप्त करता है । किसी भी वस्तु को अपन प्रियतम पर यौछावर कर देने मे उस हिवद नहीं होती वह समझता है कि अपने समस्त को देकर उसे प्राप्त कर सकता है । अबू अदुला अल कुरशी ने कहा है कि 'सच्चे प्रेम का १ डॉ० रामपूजन तिवारी सूफोमत-साधना और साहित्य पृ० ३१० २ वही प० ३१० । R ६ ४४ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण २ ताराप है कि तुम जिस परम प्रियतम से प्रेम करते हो उमे सवस्व, जो तुम्हारे पास है, समर्पित कर दो जिसम हि तुम्हरा अपना वह्न को कुछ भी 7 रह जाय।'' इसका तात्पय वेवल इतना ही नहीं कि प्रेम में अपनी मासारिप वस्तुओ और वामनाओ का ही परित्याग करना पड़ता है प्रत्युत उसे पूणरूपेण अपने दो उस परम प्रियतम को समर्पित कर दना पडता है । विना एसा किये उस अलौकिक प्रेम का वह अधिकारी नहीं हो सकता। शेख शादी प्रम को पारभापित करते हुए कहते हैं कि यह ईश्वरीय प्रेम कुछ ऐसा निराला है कि इसम एक बार गिरफ्तार हुआ यक्ति कभी व धन मोक्ष की कामना नहीं करता । इस प्रेम वधन में बद्ध यक्ति मुक्ति ही नहीं चाहता- 'अनी रस न पाहद रिहाई जे चद। शिकाररा नखाहद खलास अज़ क्मद ॥ इस प्रम माधुय के कारण बटु भी मीठा हो जाता है। प्रमी को समय लेता है । इस प्रमो माद मे गूली सिंहासन और कारागार उद्यान बन जाता है । मसूर अल हल्लराज इसी तरग मे हंसते गली पर चढ गया था। निस्सदेह प्रम स्वर्गीय गुणो का उत्स है। प्रेम की इस वेक्ली को जान कर प्रेम पात्र का मन द्रवित हो जाता है। यदि कोई सच्चा प्रमी है, सच्चे प्रेम मे याकुल है तो उसका प्यार अवश्य उस मिलेगा- • आशिक वि गुद के यार वहालश नजर न कद ।। जव इश्क मजाजी इश्क हकीको मे परिणत हो जाता है तब साधक को आत्मान द की अनुभूति होती है । वह ध्यान द्वारा ईश्वरीय सौदय पर विस्मय विमुग्ध होता हुआ चरम साक्षात्काराथ प्रयत्नशील रहता है । एक ऐसी स्थिति जाती है जब प्रेमी स्वय प्रेम रूप हो जाता है। प्रेम की एक ऐसी रागिनी छोड देता है जिसके प्रभाव से प्रेमी का सम्पूण यक्तित्व प्रममय हो जाता है । वर उदे दिलय नवाम्त यद जम जमा इश्क । जा जमजमा अम जे पाए ता सर हम इश्क ॥ सच्चा प्रेमी सदा प्रणय की मदिरा में मतवाला रहना चाहता है- डा० रामपूजन तिवारी सूफीमत-साधना और साहित्य ५० ३११ २ ईरान के सूफी कवि (दोख शादी) प० २२४ ३ वही (हाफीज) ५० ३३८ ४ वही (जामी) १०४०० - १ सूफी सिद्धान्त और प्रेम तत्त्व । ४५ - -- "मैं क-वते जिस्मो कुव्वते जानस्त मरा । मैं काशिफे असरारे निहानस्त मरा ।। दीगर तलवे दोनवो उक्वा न कुनम । यक जुरआ पुर अज हर दो जहाँ नस्त मरा ॥ अत कहा जा सकता है कि "सूफियो के रति मे माधुय के साथ साथ मादक भाव भी रहता है, परतु उसमे लिहित वासनाआ को पवित्र वासना ही कहना उचित है क्योकि ईश्वरीय रति का आन नित्य और गातिप्रद होता है।" उपयुस पक्तियो में कहा जा चुका है कि ईश्वर से प्रेम करना, उसकी प्रभानुभूति द्वारा उसका साक्षात्कार करना और उसकी सत्ता में अपनी सत्ता का विलयन ही सूफी साधना ना चरमोद्देश्य है । साधक की उत्कट प्रेमानु- भूति अनिवचनीय होती है । उमकी अभिव्यक्ति अति कठिन है। यही कारण है कि सूफी कवि एव साधक रूप को प्रतीको का आश्रय लेते हैं। सनाई, अत्तार, रूपी निजामी, जामी आदि सूफी कवियो ने अपनी अभियक्ति के लिए प्रतीको, रूपको, सकेतो और तकों का आश्रय लिया है। सूफी कवियो की यह स्पष्ट घोषणा है कि इश्क मजाजी इश्क हकीकी का सोपान है और इसी के द्वारा मानव सुदी का समाप्त कर खुदी बन जाता है। सूफियो के प्रेमभाव का उदय सवप्रथम देवदास और देवतासियो मे हुआ । क्मकाण्डी नवियो के घोर विरोध के कारण उसको परमप्रेम की उपाधि प्राप्त हुई । सूफी साधको को अनेकानब बाधाओ का सामना करना पडा । प्रमो मत्त मसूर को अन अर हक रहने के अपराध मे सूली पर चढाया गया । राविया को जीवन भर दुस के सागर का सतरण करना पडा । इस प्रकार अनेक प्रत्यही का प्रत्याख्यान करते हुए प्रमपरि के ये सच्चे साधक अपने प्रम-पथ पर प्रगतिमान रहे । ईरा अरब भारत आदि देशो में इस साधना का प्रचार और प्रसार हुआ । आठवी नवी शता दी मे इसी प्रम साधना ने इस्लाम धम के अतगत सूप प्रेम भावना का रूप ग्रहण दिया। राविया से अल गज्जाली के समय तक अविच्छिन्न रूप से इस्लाम के साथ ही प्रेम या मादन माव की सूफी साधना भी चलता रही । मूफियो की साधना का मूल मन्त्र है 'प्रम । सूफी १ ईरान के सूफी कवि (उमर खय्याम) ५० ५१ २ डा० शिवसहाय पाठक मलिक मुहम्मद जायसी और उनका काय पू०४१८.
४६ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण साधक परम प्रेममय ईश्वर को जिक्र (नामस्मरण) एव फिक्र (ध्यान) म दिवाने बने रहते है और सासारिक सभी ऐश्वय को वे प्रेम-रूप को महब्बत में पाते हैं । वे प्रत्येक क्ण मे प्रियतम का जलवा देखते हैं- 'वेहि जावी यह कि हर जरें म जलवा आशिकार। फिर भी पर्दा यह कि सूरत आज तक देखी नहीं।' वस्तुत सूफी साधको का प्रधान लभ्य यह है कि सष्टि के कण कण में प्रियतम का जलवा देखना और उसके प्रेम विरह म तडपन प्रलपन का आनद उठाना साक्षात्कार को अनुभूति प्राप्त करना और अततोगत्वा चिर मिलन का आनदप्राप्त करना। इससे स्पष्ट है कि लोविक प्रेम जव उच्च पवित्र और यापन भावभूमि पर पहुंच जाता है तब वह ईश्वरीय प्रेम में परिणत हो जाता है । भारतवष का सूफी काव्य भी इसी प्रकार की विचारधारा से पूणरूपेण प्रभावित है । भारतीय मूफी कवि कुतुबन मझन, जायसी आदि ने लौकिक प्रम के व्याज पारलौकिक प्रेम का वर्णन किया है। भारत मे सूफी मत का प्रवेश और प्रेम-काव्यो का प्रारम्भ भारत में सूफी घम का प्रवेग ईसा को बारहवी शतानी म हुआ। यह घम चार सप्रदायो के रूप म आया। जो समय समय पर देश में प्रचलित हुए। इन सम्प्रदायो से प्रभावित प्रेम-काव्य का परिचय चारण काल से ही मिलना प्रारम्भ हो जाता है। जिस समय मुल्ला दाऊद ने च दायन' की रचना की थी। यह समय अलाउद्दीन खिलजी का राजस्व काल था । हिदू घम के प्रति अश्रद्धा होते हुए भी कुछ मुसलमानी हुन्यो मे हिदू प्रेम कथा के भाव बिंद्य मान थे ! 'च दायन या पदावत' प्रेम-काव्य सवत १३७५ के आसपास की साहित्यिक मनोवत्ति का परिचय देन मे पर्याप्त है।' धार्मिक काल के प्रेमकाय का प्रारम्भ पदायन या 'च दावत' से ही होता है । यद्यपि इस प्रेम कथा की परम्परा बहुत बाद में प्रारम्भ हुई । सूफी प्रेमाख्यानो की परम्परा हिदी मे मुल्ला दाऊद स प्रारम्भ होती है। उनका 'चदापन सन १३८० मे लिखा गया। मझन ने मधुमालती मे प्रेम को बहुत स्पष्ट रूप से विवत करने का १ डा० रामकुमार वर्मा हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास २ ५० परशुराम चतुर्वेदी सूफी काव्य संग्रह ५०७८ सूफी सिद्धात और प्रेम-तत्व । ४७ प्रयत्न किया है । सूफी कविया मे किसी भी अय सूफी कवि ने इतनी पूर्णता के साथ प्रस्तुत नही किया है । यह विवत्ति कथा भाग मे लेखक ने उस समय उपस्थित की है जब कथा नायक मनोहर कथा की नायिका मधुमालती से पहली बार अप्सराओं को सहायता से साक्षात्कार लाभ करता है । मधुमालती के प्रश्न करने पर वडे विस्तार के साथ वह प्रेम का इतिहास उसके समक्ष प्रस्तुत करता । वह कहता है कि उन दोनो का यह प्रेम चिरतन और शाश्वत है---उसमें उसकी प्रीति और उसके (विरह जनित) दुख का सम्बघ उसी क्षण से है जिस क्षण से विराता ने उसके प्राणो के सष्टि की वस्तुत उसके प्रीति के नोर से उसकी मत्तिका (गरीर निर्माण के तत्वो) को सानकर ही उसके शरीर को रचना हुई है। कहै कुवर सुनु प्रेम विचारी । तोहि मोहि प्रीति पु वविधि सारी। एहि जग जीवन मोहि तोहि लावा । मैं जिउ दे तोर दुक्ख वेसाहा । मैं न आजु तोरे दुक्ख दुखारी । तोरे दुख सेंउ मोहि आदि विहारी। जेहि दिन सिरेउ आँस विघि मोरा। तेहि दिन मोहि दरसिउ दुख तोरा। वर कामिनि तोहि प्रीति के नीरू । मोहि माटो मा सानि सरीरू । पु व दिनन सेउ जानहुँ तुम्ही प्रीति के नीर । माहि माटी विधि सानिके तो यह सिरेउ सरीर ॥' मशन के अनुसार आदि घट (शरीर) मे जब प्राण भी नहीं आया था, तभी प्रेमिका के विरह दुख का दशन विधाता ने प्रेमी को करा दिया था, इसी कारण यह विरह दुख प्रेमी के लिए उसके प्राणो से भी अधिक प्रिय है और इस दुख पर वह अपने सहस्रा सुखो को वारने के लिए प्रस्तुत रहता है। उसके लिए इस दुख के क्षण मे जो आनद है वह चतुयुग के सुखो मे भी उसे प्राप्य नहीं। 'मैं सभ तजि सकरेउ दुख तोरा । मार जिउतोर तोर जिउ मोरा । प्रान आदिघट होत न आवा । विधि तार दुख मोरहिं तव दरसावा । जोरे विकल्पि कही मैं तोही । तोर दुख अधिक देवविधि मोही। मैं सह दुख केरे बलिहारी। सहस सुक्ख एहि दुख पर वारी । कौनि जीभि बक्तों दुख दाता । दुख के रूप सुखनिधि के दाता । १ मघुमालती स० डा० माताप्रसाद गुप्त प० ९४ ।
४८ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण -- एक निमिख दुख कह नहिं पूज चारित युग के सवाद । कौन कौन सुख वेरसब तेहि दुस के परसाद ॥'' उसके अनुसार इस विरह दुख न मनुष्य को सप्टि के आदि ही में अपना प्रास बनाया था जीव ने उसी समय से अपन को जीव करके जाना जिस दिन वह दुस सष्टि म समाया इसलिए इस दुख पर प्रेमी दोनो जगत्-- इह लोक और परलोक- समस्त सुखो को निसार करने को तयार रहता है क्योकि यही दु ख वह अमत है जिसने उसे अमरत्व प्रदान किया है प्रेमिका के इसी विरह दूख के कारण प्रेमी का ससार में जम ग्रहण करना सफल होता है-- दुख मानुस कर आदि गरा सा । ब्रह्म कवल मह देख करवासा । जेहिदिन तोहि दुख सिम्टि समाना । तहिदिन ते जिउ क जिउ जाना। मोहि न आजु उपजेउ दुख तोरा । तोर दुख आदि सघाती मोरा । अब ले वही दुक्ख के कावरि । दुइ जग देउ सुक्ख नेउ छावरि । मैं आपन द तार दुख लिया। मरिक अब सो अमत पिया । तोर दुवख मधुमालति मुखदा एक ससार । जेहि जिय मोहि तोर दुख उपजा पनि सो जग जीतार॥ मझन के अनुसार प्रम इसी दुख पर ल ध होकर उसका साथी बना वह मानव मानस में इसीलिए पापण क्यिा कि उसम दुख का निवास था-~-- 'सुनिउ जाहि दिन मिरि उपाई । प्रीति पेखा दिहल उडाई। तीनिहु लोक ढढि क आवा । आयु जोग कह ठाड न पावा । तब फिरि मोहि पमेउ आई । रहउ रोमाइ न गयउ उडाई । तीनि भुवन तब पूछो बाता | बहु तुइवस मानुस घट राता । कहेसि दुक्ख मानुस कर आसा । जहाँ दुक्ख तह मार नेवासा । जेहि ठा दुख होइ जग भीतर प्रीति होइ बस ताहि । प्रीति बात का जान जेहि सरीर दुख नाहि ॥' मनन कहते हैं कि इस प्रेम का रहस्य यह है कि प्रेमी और प्रमिका आदि में एक साय ही होते हैं । इतना ही नहीं, वे वस्तुत एक होते हैं और तदन १ मधुमालनी स० डा० माताप्रसार गुप्त पृ० ९८ मित्र प्रकाशन प्रा. लि. इलाहाबाद (१९६१) । २ वही, पृ० ९६ । । वही, पृ० ९७ मूफी सिद्धात और प्रेम-नत्व । ४९ एक जीव न्तर द्विधा हो जाते हैं।जसे एक ही जल से दो मिटिटयो सानो गयी हो अथवा एक ही जल यो प्रणालियो में प्रवाहित होने सगा हो, अथया एक ही दीपक दो पक्षो में प्रकाश देने लगा हो, अथवा एक जीव दो शरीरो मे सरित हुआ हो, अथवा एव हो अग्नि दो स्थानो पर प्रज्ज्वलित कर दी गयी हो, अथवा एक ही प्रासाद के दा द्वार निर्मित किय गय हो-- 'त में दुवो सदा सघ वासी। औ सतत एक नेह नेवासी । श्री में तुइ दुइ एक सरीरा । दुइ मांटी सानी एक नोरा । एक दारी दुइ बहै पनारी । एक दिया दुइ पर उजियारी। दुइ घट सचारा । एक अगिनि दुइ ठाएँ बारा । के हम दुइ बोतारे । एष मरिल दुइ दिए दुवारे । एक जोति रूप पुनि एक एक परान एक देह । आपुहि आपु जो देव कोइ चाहै तेहि वर कौन सनेह ।।' मझन प्रेमी और प्रेमिका को एक-दूसरे स सवदा अविच्छेद्य बताते है- "त जो समुद लहरि मैं तोरी । ते रवि मैं जग किरनि अजोरी। मोहि आपुहि जनि जानु निरारा । मैं सरीर तुइ प्रान पियारा। मोहि तोहि को पार गराई । एक जोति दुइ भाउ देखाई। सम गियान चखु देखेउ हेरी। हम तुम्ह दह परिच कब फेरी। अजह मोहि न ची हेसि वारी। सबरि देसु चित आदि चिहारी। असझा फाद पेप कर महा जोह जिय मेर। होत आपु मह परिचेस नर घर जिउ फेरि ॥" फलत मान का कहना है कि जब प्रेमी को प्रेमिका का साक्षात्कार हो जाता है, समस्त सष्टि उसे उसी स व्याप्त दिखाई देती है । तब प्रेमिका का रूप उसके लिए रूप मात्र नही उस परम रूप का वेन्द्र विदु हा जाता है जो समस्त सष्टि में व्याप्त है, उस प्रेमिका के रूप के माध्यम से वह उस दिव्य रूप का साक्षात्कार करता है जो शक्ति और शिव है, जो त्रिभुवन का महा जीव है, जो नानात्व में अपना विकास करके त्रिभुवन मे व्याप्त हुआ है, और उसका भोग कर रहा है-- अव लहि विनु जिय जीवन सारा ।आजु देखि ताहि जीत समारा। देखत खिन पहिचाना तोही । रहे रूप जेइ छ दरा मोही । इहै रूप तव अहेउ छपाना । इहै रूप अब सिस्टि समाना। १ मधुमालती स० डॉ० माताप्रसाद गुप्त पृ० ०८-९९ २ वही पृ० ९९ and मशन के ५० । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण इहै रूप सकती औ सोऊ । इहै पत्रिभुवन र जीऊ । इहै रूप परगट बहु भेसा । इहै रूप जगशक नरेसा । इहै रूप त्रिभुवन जग वेरस महि पयाल आगास सोइ रूप परगट मैं देखा दुव माघे परगास ॥' अनुसार प्रेमी को फिर यह प्रेमिका रूप ही अपने रूपमात्र की इयत्ता का दशन कराता है-- "इहै रूप परगट बहु रूपा । इहै रूप बहु भार अनूपा । इहै रूप सब ननह जोती । इहै रूप सम सायर मोनी । इहै रूप सम फलह वासा । इहै रूप रम भवर वेरासा। इहै रूप ससिहर औहरा। रूप जगपूरि अपूरा। इहै रूप अत आदि निदाना। इहै रूप धरि घर सोधियाना। इहै रूप जलघर औ महिअर भाउ अनेग देखाउ । आपु गवाई जोरे कोइ देख सो किछु देख पाउ ।।' कहना नही होगा कि प्रेम का इतना विशद निरूपण हि दी सूफी साहित्य म अ यत्र नहीं मिलता है। पद्मावत एक प्रेम काय है। जायसी ने भी लौक्कि प्रेम के व्याज मे पार लौकिक प्रेम का वणन किया है। जायसी अपनी प्रेम साधना के माध्यम से निराकार प्रभु की आरती उता रते हुए अपना सवस्व उसी में निमज्जित बर देते हैं । पद्मावत मे जायसी ने प्रेममाग उसका महत्व प्रेमगरिमा, उसका सौंदय उस पथ की बाधा का स्थान-स्थान पर अति रमणीय वणन क्यिा है । जिसका हृदय प्रेम बाणो से पूणरूपेण विद्ध है वही इसके मम को जान सकता है-- प्रेम घाव दुख जान न कोई। जेहि लाग जान १ सोई॥" मसूर ने उचित ही कहा था, ईश्वर से मिलन तभी सभव है जबकि हम कष्टो के बीच से होकर गुजरें। 'प्रेम की यवस्था मत्यु से भी कठिन है १ मधुमालती स० डा० माताप्रसाद गुप्त ५० ९९ २ वही, प० १०० ३ जायसी प्रयवली स० रामचद्र गुक्ल (ना० प्र० स० काशी), पृष्ठ ४९ 4 AM A Shushtery, Outline of Islamic Culture, P 350 सूफी सिद्धात और प्रेम तत्व । ५१ 'कठिन मरन ते प्रेम व्यवस्था' । क्रातिदर्शी कबीरदास पर भी सूफियो के प्रेमभाव का पूर्ण रूपेण प्रभाव पड़ा है । उनके प्रेम के आदश शूर हैं । उनके अनुसार प्रेम पथ पर चलना असिधारा पर चलना है। यह कोई खाला के घर का पथ नहा है जब जी मे आया चल दिये। इसमें प्रवेश प्राप्यथ शीश (अहभाव) को समर्पित करना पडता है-- 'सीस उतारे भुइ घर तापर राख पांव दास कबीरा यो कहै ऐसा होय त आव।।' 'सोस उतारे भुई घरै सो पठे घर माहि।' जायसी ने भी प्रेमपथ पर चलने की बात को कुछ इसी प्रकार कहा है "ज्ञान दिस्टि सो जाय पहूँचा । पेम अदिस्ट गगन ते ऊंचा। धुव ते ऊँच प्रम व ऊआ। सिरदइ पांव देइ सोछुआ ॥ प्रेम को खाला का सदन समझने वालो को कबीर ने सावधान किया था। जायमी ने भी कहा है कि वहां पहुँचने के लिए शिर काट कर उस पर पैर रखना पडेगा'। 'करब पिरीत कठिन है काजा प्रेम के पवत पर वही चढ सक्ता है, जो शिर (अभिमान या अहभाव) देकर चढना चाहे । उस प्रेमपथ पर काम, क्रोध आदि वटमारी करते हैं। वह प्रेम पीर 'प्रबोध' में प्रवदित होता है। "उपजो प्रेम पीर जेहि आई। परबोधत होई अधिक सो आई ॥ अल फराकी का मत है कि ईश्वर स्वयमव प्रेम है । सष्टि रचना का मूल प्रम है । सृष्टि की इकाइयां प्रेम के सहारे प्रम के महास्रोत मे जो पूण और सर्वोत्तम हैं निमज्जित हो जान के लिए पूणरूपेण जुड़ी हुई हैं ।' उपयुक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सूफी साधना में प्रेम का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है । प्रेम ही कम है और प्रेम ही धम है। प्रेम ही पय है और परमात्मा भी प्रेममय ही है। इसी प्रेम से हिदी सूफी काव्य पोषित एव सम्वदित है। हिदी सूफी काव्य की प्रत्येक कथा का मूलाधार प्रेम ही है। इसका बीज और अत प्रेम की ही विजय है । फारसी + सभी कविया ने अपने का य मे प्रम को अधिक महत्व प्रदान किया है। । जायसी पथावली स० रामचद्र शुक्ल १०५० २ वही, २०७१ 3 AM A Shushtetu Online 11
५२ । मूफी कवि जायसी या प्रेम निरूपण
मानो प्रेम के अतिरिक्त वे कुछ जानते ही नहीं हैं । प्रमाणस्वरूप पूर्वोल्लिपित
रूमी, जामी, अर गजाली, मतारादि के उदाहरण प्रस्तुत किय जा सकते हैं।
जायसी ने भी पद्मावत म लिखा है--
मानुष पेम भयउ बकुठी । नाहिंत काह छारि भरि मूठी ।
विक्रम घसा प्रेम के वारा । सपनावति कह गयउ पतारा।
मधूमाछ मुगवावति लागा । गगनपूर होइगा वरागा ॥"
जायसी ने परमावत' में प्रमपीर' को विगद और प्राजल अभि यजना
सी है।
३ जायसी प्रथावली स० ० रामचन्द्र शुक्ल पृ० ३
२ जायसी की प्रेम-पद्धति तात्त्विक-मीमासा (क) जायसी का प्रेमादश प्रेम मानव जीवन की दिव्यतम विभूति है । मानवीय चेतना के स्फुरण साथ ही प्रेम का आविर्भाव माय है । सूफी साधको ने प्रेम को ईश्वर का रूप स्वीकार किया है। जायसी 'प्रेम' के मर्मी कवि हैं । उहोने प्रेम का अत्यन्त ऊँचा आदरा प्रस्तुत किया है । पद्मावत महाकाव्य में अनेक स्थलो पर उहोने प्रेम के आदा को मूत करन की चेष्टा की है। प्रेम गगन से ऊँचा है । प्रेम का ध्रुव आकाश स्थिति ध्रुव से भी ऊपर-उदय होता है । जो दुख और वियोग सहने के लिए तत्पर होता है, शिर देने के लिए सनद्ध होता है वही प्रेम का अधिकारी है । इस पथ पर योगी, यती तपस्वी और स यासी ही चल सकते हैं।' प्रेम को विधि ने कठिन पहाड जसा निर्मित पिया है । जो सिर देकर चढ़ना चाहता है, वही घट सकता है। प्रेम-पथ पर चलना गूली पर चलने के समान है । इस पर कोई पक्का चोर या मशूर ही चढ सकता है। प्रेम के फदे मे एकवार जो जाता है वह इससे मुक्त नहीं हो १ 'शान दिष्टि सो जाइ पहूँचा । पेम अदिस्ट गगन ते ऊचा ।। धव ते ऊंच पेम ध्व ऊआ । सिर देइ पाच देइ सो छुआ। -जायसी प्रयावली स० आ• रामचद्र शुक्ल, पृ०५०। २ 'ओहि पप जाइ जो होई उनसी। जोगी, जती तपी सयासी ॥ -वही, पृ० ५०. ३ "प्रेम पहार कठिन विधि गढ़ा । मोप चढ़ जो सिर सौं चढ़ा। पथ सूरि के उठा अकूरु। चोर चढ़ वी चा मसूरु ।। -दही, १०५१" ।
५४ । सूफी कवि जायसा वा प्रेम निरूपण पाता। जो सच्चे मन और दढ़ निश्चय के साथ प्रेम का खेल खेलता है वह दोनो लोको को सफल बना लेता है । प्रेम का लघु दु ख के भीतर सग्निहित है। जो इसे चख लेता है, वह अमर हो जाता है । जो प्रेम पथ पर अग्रसर नहीं होता उसका पथ्वी पर आना ध्यप है। जो सच्चा प्रेम करता है, उसके लिए सोना जागना सब बराबर हो जाता है।' वह सवत्र अपने प्रिय को ही देखता है । मनुष्य प्रेम' के बल पर स्वर्गीय वन जाता है । जब हृदय म प्रेम का दीप जलता है तब उससे उत्पन्न ज्योति से हृदय निमल हो जाता है । जो माग असूफ-अधेरे से भरा होता है उसम प्रकाश हो जाता है और वह जाना बूझा हो जाता है । सच्चा प्रम वही है जो प्राणो के साथ जाता है। प्रेम का भार उठाने पर मन में सोच नही होता चाह वह माग मे भला हो या बुरा । प्रेम पवत का भार जब उठा लिया जाता है तो वह किसी भी प्रकार छूटता नहीं है।' वह तो हृदय स बघा रहता है । प्रेम पवत के सदश है जिसकी पीठ पर इसका भार बघ जाता है वह फिर उससे कभी मुक्त नही हो पाता । इस प्रेम से अनुप्राणित साधक को प्रेम के अतिरिक्त ससार म कुछ भी मधुर नहीं लगता है । रत्नसेन तोते रूपी गुरु के मुख से पद्मावती का रूप वणन सुनकर यह अनुभव करन लगता है कि तीन लाक और चौदह खड पेम फाद जो परा न छूटा । जीउ दी ह प फाद न टूटा ।' -जायसी प्रथावली स० वा. रामचन्द्र शुक्ल प०३९ । भलेहि पेम है कठिन दुहेला । दुइ जग तरा पेम जेइ सेला । दुख भीतर जो पेम मधु राखा । जग नहिं मरन सहै जो चाखा ।। जो महिं सीस पेम पथ लावा । सो प्रिथिमी मह काहे क आवा ?" -वही, प० ४०। ३ 'जेहि के हिये पेम रग जामा । का तेहि भूख नीद विसरामा ॥" -वही ५०५८। ४ लेसा हिये प्रेम कर दीया । उठी जोति भा निरमल होया । मारग हुत अघियार जो मूझा । भा अजोर, सब जाना बूझा। -वही पृ०७। ५ का सो प्रीतितन माह विलाई ? सोई प्रीति जिउ साथ जो जाई । प्रीति भार ल यैि न सोचू । ओहि पथ भल होइ कि पोचू ॥ प्रीति-पहार भार जो काधा । सो कस छुट, लाइ जिउ बाघा ॥ -वही, पृ० २२ । १ २ जायसी की प्रेम पद्धति तात्विक मीमासा । ५५ में प्रेम के अतिरिक्त और कुछ सुदर नहीं है। आदश एव पवित्र प्रेम साधना वही कठिन है । इसमे आत्म समपण करने से ही आन द की प्राप्ति होती है । वास्तव में प्रेम भाव अनिवचनीय है । इसके माधुय को वही जानता है जिसने उस माग का अनुसरण किया है । जिसने यह माग नही देखा, वह इसके वशिष्टय को नहीं जानता । जो प्रेम सुधा से सिक्त वचन सुनता है, वह मदो मत्त होकर चक्कर खाकर गिर जाता है। प्रेम के धाव का दु ख कोई नहीं जानता । जिसे घाव लगता है वही जानता है। वह प्रम के अपार समुद्र में गिर जाता है और लहर पर लहर आने से वेसुध हो जाता है । उसका विरह उसे भवर की तरह घुमाता है । जिसके कारण क्षण क्षण मे उसका जीव हिलोरे लेता है फिर क्षण भर म वौरा कर विश्वास छोडने लगता है। उसका मुख क्षण में श्वेत और क्षण मे पीला हो जाता है । क्षण उसे चेत होता है और क्षण म अचेत हो जाता है। प्रेम की स्थिति मरने से भी कठिन होती है क्योकि उसमें न प्राण जीता है और न ही मत्यु होती है। पेम के पप में जाने वाला दिन और घडी नहीं देखता । जब ज्ञानयुक्त होता है तभी उस माग की ओर देखने लगता है । जो प्रेम मे पगा होता है उसका शरीर भास रहित अत्यत क्षीण हो जाता है । उसके शरीर मे न रक्त हाता है, और न नेत्रो में आसू । पडित भी प्रेम विह्वल होकर भूला रहता है। प्राण लेते तीनि लोक चौदह खण्ड, सब परे मोहि मूपि । पेय छाडि नहिं लोन किछु, जो देखा मन बूझि ॥' जा०प्र०,६०३९। २ वही, पृ० ४०॥ ३ 'भरे प्रेम रस बोल बोला । सुनै सो माति घूमि के होला ।। -वही, पृ०४४। ४ 'पेम पाव दुख जान न कोई । जेहि लगि जान प सोइ । परा सो पेम समुद्र अपारा । लहरहि लहर होइ विमभारा ।। विरह भवर होइ भावरि देइ । विन खिन जीव हिलोरहिं तोई ॥ खिनहि निसास हि जिउ जाई । खिनहि उठ निसस दौराई । सिनहि पति खिन होइ मुख सेता । खिनहि चेत खिल होइ अचेता।। कठिन मरन ते पेम व्यवस्था । न जिस जिवन न दसई अवस्था ।। -स० डा. वासुदेवशरण अग्रवाल पधावत पृ० १३४-३५।
५६ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण समय मृत्यु नही पूनी ।' जिमम प्रेम होता है उसे प्राणा का मोह नही होना । जो पहले गिर देकर इम माग म पर रखता है, वह पहले ही मर जाना है । मत्यु उसका कुछ नहीं गिाड सकती है।' जिमने प्रेम का समुद्र देता है वह इस समुद्र को बूद की तरह समयता है।' प्रेम का समुद्र अगाध है। वहां वारपार नहीं है, न थाह है जो इस समुद्र म पडता है वह जीव को गवा कर हस बन कर पार पहुंचता है।" वे मनुष्य धय हैं जो प्रेम के माग मे चलते हैं । उहोने ही वह उत्तम स्वग प्राप्त किया है। जहाँ मृत्यु नही और सदा सुख का निवास है । जो प्रेम के माग मे पार पहुच जाता है, वह पुन लौटकर इस मिटटी मनही मिलता है।' दघि का मागर देखते ही मन दम्य हो सकता है परन्तु जो प्रेम का शुभाया हुआ है वह दाह सह रता है। वह जीव घय है जो प्रेम से दाय हुआ है। जिसके हृदय मे प्रेम है उसके लिए आग चदन की भांति शीतल होता है पर जो प्रेमरहित है वह आग से भयभीत होकर भागता है । जो कोई प्रेम की आग में जलता है उसका दुख व्यथ नहीं १ पेम पय दिन घरी न देखा। तब देखे जब होइ सरेखा । जेहितन पम कहाँ तेहि मामू । क्या न रक्त नन नहिं आसू ॥ पडित भूल न जान चालू । जीउ लेत दिन पूछ न काल ।' -जा० अपावली प० ५३ । २ प जेहि पेम कहा तेहि जीऊ जो पहिले सिर द पगुधरई । मूए करे मीच का करई ॥ -वही पृ० ५९ । ३ "ओ जेइ समुद्र पेय पर देखा । तेहि एहि समुद वू ६ करि लेखा ।' -वही, ५०६०। पेम समुद्र अस अवहागा । जहाँ न बार पार नहिं थाहा । जौं वह समुद काह एहियरे । जौं अवगाहा हस होइति ।। -डा० बासुदेव शरण अग्रवाल पदमावत' प० १६३ । ५ चढे वेगि और वोहित पेले । धनि ओइ पुरुष पेय पथ खेले ।। तिह पावा उत्तिम कविलास । जहाँ न मीचु सदा सुख वासू ॥ पेम पथ जो पहुँचे पारा । बहुरि न आइ मिल एहि छारा ॥" -पदमावत डा० वा० १० अग्रवाल प०१६६-६७।
जायसी की प्रेम-पद्धति तात्विक मीमासा । ५७ ? जाता । प्रेम मद से दीपक प्रज्ज्वलित होता है । जब तक पतिंगा बन कर उस दापक पर जर न जाय तव तर प्रेम मद का आस्वात्न नही किया जा सकता ' मध्य प्रेम के द्वारा स्वग के योग्य बनता है नहीं तो उसमे है ही धया केवल एक मुटठी राख है। प्रेम में ही विरह और रस दोनो हैं जसे मोम के छत्ते मे शहद का अमृत और वर दोनो रहते हैं । सत्यहीन यक्ति दौड धूप कर मर भी जाय तो क्या ? पर जो सत्य स्वरूप का उपवहार करता है उसे वठे ही लाभ मिलता है।' मछली पश्वी पर जल में निवास करती है । आम वक्ष पर आकाश मे फ्लता है पर दोनो म सच्ची प्रीति है तो अत तोगत्वा दोनो एक साथ मिल जाते हैं । ठीक इसी प्रकार प्रेम के क्षेत्र मे मानव भी प्रेम की सच्चाई होने पर व तत मिल जाते हैं। प्रेम की चिनगारी का नाम सुनकर पथ्वी और आकाश भी डरते हैं । धय है वह हृदय जिसमे यह अग्नि समाहित रहती है। वास्तव म प्रेम के रहस्य को वह नहीं जान सक्ता है जो उसके लिए आत्मबलिदान नहीं करता । इस प्रेम का पथ उलटा है। जो बडो कामनाए रखता है वह पाताल म गिरता है कि तु जो उसमे प्रवेश १ 'दपि समुद देखत मन उहा । पेम क्लुबुध दगघ सहा पम सौ दाधा धनि वह जीऊ । दही माहि मथि काढे घीऊ ।। + जेहि जिय पैम चदन तेहि आगी। पेम विहून फिरहि उरि भागी। पेम कि आगि जर जो कोई । ताकर दुख न अविरथा होई ॥" -वही पृ० १७२-७३। २ जायसी प्रथावली २०५१ । 'मानुस पेय भखर बकुठी। माहित काह छार एक मूठी ॥ + निसत धाइ केय जी भर तो काहा । सत जो कर वसइ होइ लाहा ।। -पदमावत वही, प० १८९ । बस मीन जल घरती अवा विरिस यास। जो रे पिरीति दुहन मह अत होहिं एक पास ॥' -पद्मावत वा०२० अग्रवाल, १० २०६। ५ 'चिनगी प्रेम के सुनि महि गगन हराई। धनि विरही औ धनि हिया तह अस अगिनि समाइ ।' -जायसी प्रयावली १०८८ ॥ ।
५८ । सूफी कवि जायसी वा प्रेम निरूपण कर मारम बलिदान करता है और निष्काम साधना वरता है, वह सफल होता है। जिसके हृदय में प्रेम का अफर होता है, वह पानी की भांति तरल और शीतल रहता है । वह जिस रग मे मिलता है उसी रग का हो जाता है। जो प्रेम को जीत लेता है वह सिद्धो पी भांति तप करक मरता नहीं है ।' जो प्रेम के परो पर अपना सिर दे देता है वह प्रीति को निबाहने के लिए सनद रहता।'प्रेम सुरा जिसक हृदय म होती है उसके लिए साधारण महुआ की मदिरा का कोई मूल्य नही होता है । इस प्रम सुरा का पान करन पर जीवन मरण का भय नही रहता है । जो व्यक्ति प्रेम की बेल म उलझ जाता है तो वह उलझन के बाद मर कर भी नही छूटता है । प्रीति की बल गरीर को दग्ध किया करती है । उमम जब पल्लव फूलते हैं तब सुखानुभव होता है पर उसके विकास को प्राप्त हो जाने पर दुख बट जाता है। प्रीति की बेल के साथ ही अपार दुस भी उत्पन्न होता है जिसकी ज्वाला स्वग से पाताल तव जलती है। प्रीति की अमर वेल दिनानुदिन बढ़ती ही रहती है । कभी भी क्षीण नहीं होती। प्राति की अमरवेल एकाको ही चढकर छाती है फिर दूसरी वेल वहां नहीं फलने पाती है। जब कोई प्रीति को वेल में उलझता है तब उसकी छाह में उसे सुखानुभव होता है। जो एक बार प्रेम सुरा का पान कर लेता है उसके हृदय में मरने जीने का डर नही रहता है । वह पीता हुआ उलटा पथ पेम के वारा। चढ सरग, जो पर पतारा ॥ -वही ५० ९८॥ २ जहि जिय पेम पानि भा सोई । जेहि रग मिले तेहि रग होई । जीप जाइ पेम सिउ जुझा । कन पपि मरहिं सिद्ध जिह बूझा'। -पद्मावत वा० २० अग्रवाल, ५०२७८ ॥ ३ वही, पृ० २७८ ॥ ४ 'प्रेम सुरा जेहि के हिय माहीं । क्ति बठे महुआ के -जायसी प्रथावली २०६५ । ५ "प्रीति वेलि जनि अह्न कोई । असझें भुए न छटै सोई॥ प्रीति वेलि ऐसें तनु डाटा । पलहत सुख वाढत दुख वाढा ।। प्रीति वेलि सग विरह अपारा । सरग पतार जर तेहि शारा।। प्रीति वेलि केइ अम्मर वोई । दिन दिन बाढ खीन न होई ।। प्रीति अकेलि वेलि चढि छावा । दोसरि वेलि न पसर पावा ।। -पद्मावत वा० श० अग्रवाल प०२९०1 छाहा।'
जायसी की प्रेम पद्धति तात्विक मीमासा । ५९ अधाता नहीं है । वह बारम्बार पीने की ईहा पक्त करता है । बार बार बेसुध हो जाता है । जिसे एकबार प्रेम मधु का लाभ हो जाता है, वह सवस्व वहा देता है और कहता है "भले ही सवस्व चला जाय पीना न छुट ।' वह अहर्निश प्रेम रस मे डूबा रहता है, न लाभ देखता है और न हानि । जब प्रात काल होता है तब उसका गरीर हरा भरा हो जाता है और पीने के लिए मया उत्साह आ जाता है। मानो नशा उतरने पर समारी की दशा में उसे शीतल जल मिल गया हो ।' इस प्रेम का माघुय इसका विरह ही है । विरह प्रेम का चरम सोदय है । प्रेम मे विरह का रस हाने के कारण उसम विचित्र मादरता रहती है।' विरह वास्तव में प्रेम का मापदड है जिसका प्रेम जितना तीव्रतम होता है, उसकी विरहानुभूति उतनी ही गहरी होती है। 'कठिन प्रेम विरहा दुख भारी' से यह स्पष्ट है । प्रेम का मूल त्याग है। जो प्रम भाग मे प्रवत्त होता है उसे प्राणो की बलि तक चढानी पड़ती है । वास्तव म प्रेम के रहस्य को वह रही जान सकता जो उसके लिए आत्म वलिदान नहीं कराता।' जब तक प्रेमी पिय से पूण एक्य लाभ कर भृग की भांति तद्रूप नही हो जाता और अपने अस्तित्व को प्रम पात्र में विलय नहीं कर देता तब तक उसक हृदय से सासारिक मय नही निकलते हैं। निश्चय ही प्रेम मा पोर म जागरूकता होती है । प्रेम की कसौटी पर क्स जाने पर मानव क्चन के सदृशा खरा हो जाता है।' (ख) प्रेभोदय का आधार पुरुष और स्त्री के बीच प्रम का उदय एक मानसिक प्रक्रिया है। यह प्रेमोदय क्या और किस प्रकार होता है । यह निर्धारित करना कठिन है । प्रमोदय का कारण बहुत कुछ वयक्ति होता है । प्रेम का आधार सौंत्य है किन्तु सौदय बहुत कुछ गुप्ता का धर्याक्तन रुचि से सम्बद्ध है। फिर भी प्रमाख्यानो में इसके उदय के जो वारण और आधार दिये गये हैं, उनका विवेचन क्सिी निश्चित परिणाम की ओर ले जा सकता है। १ डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल पद्मावत प० ३८५ । २ बा० रामचन्द्र शुक्ल जायसी-प्रथावली पृ०७१। ३ वही, पृ० ५८ ४ वही, पृ०७३ ५ 'ना वह करा भ ग क होई । ना वह आपु मरा जिउ खोई ।।" -वही, पृ० ९९ । ६ वही, पृ० १९।
६० । सूफी कवि जायसी वा प्रेम निरूपण प्रम (रति) भाव को तीन अवस्थाएं होती हैं, उदय साधनावस्था, और सिद्धि । आरम्बन के प्रथम परिचय रूप गुण श्रवण चित्र दशन और साहचय से रतिभाव का उदय हाता है। उसे पाने, चिरस्थायी साहचय स्थापित करने का प्रयत्न और वियोग साधनावस्था है । मिलन और सम्भोग रति को सिद्धा वस्था है। उदयावस्था को सम्भवत साधनावस्था में ही समाविष्ट कर लिया गया है। पर मूफी वाय म प्रेम की उन्यावस्था का जिस विस्तार से वणन हुआ है, उमे जो गम्भीरता और गरिमा दी गयी है उसे देखकर उदयावस्था को पथक मान लेना पडता है। सूफी काव्य मे प्रेम का उदय साक्षात परिचय, चित्रदान, स्वप्न दान, रूप गुण श्रवण और स्वत , अकारण या सरकार प्रेरणा से भी होता है। मधु मालती' (मझन) मे साक्षात दगन और परिचय तथा पद्मावत (जायसी) मे गुण श्रवण से प्रेम का उन्य होता है। पद्मावत' में नायिका पद्मावती के हृदय म स्वत ही रतिभाव जागृत हो जाता है और वियोग में याकुल होन लगती है। इस अकारण या स्वत रतिभावोदय की अस्वाभाविक्ता का निराकरण सूफी साहित्य मे है । प्रिय युग-युग से, जम जमातर स प्रियतमा के विरह मे छट पटाता रहता है । प्रियतमा भी अपने प्रिय के लिए याकुल है । जायसी के पास इसका समाधान कोई है तो वह रत्नसन के योग का अलक्ष्य प्रभाव- 'पद्मावति तेहि लोग सजागा । परी प्रेम बस गहे वियोगा'' स्वप्न दशन स प्रेमोदय का समाधान भी परमात्मा और आत्मा के अनादि अनत प्रम की स्वीकृति म है । चिन दशन या गुण श्रवण द्वारा जो प्रम का उदय हाता है, वह लोक -यवहार और अनुभव सिद्ध है। ऐसा मानना कि केवल साहचय से ही प्रेम का उदय और विकास हाता है, युक्तिसगत नही प्रतीत होता है । साहचय से प्रेम के दढ होने की सम्भावना की जा सकती है । उद्वाह चर्चा चलने पर पुरोहित ही नही प्रत्युत माता पिता और मध्यस्थ लडके के रूप गण का मुक्त कठ से प्रशसा करते और एक दूसरे को परस्पर आकर्षित करते हैं। इसका प्रयोग ही एक-दूसरे म प्रेमाकुर उगाना है। १ मधुमालती स० डा० माताप्रसाद गुप्त प० ३४-४२ २ "सुनतहि राजा गा मुरछाई । जानो लहर सुरज क आई ॥' -जायसी-प्रथावली, प० ४९ ३ वही पृ०७३ जायसी की प्रेम पद्धति तात्त्विक मीमासा । ६१ हरिवश पुराण में गुधि मुखी नाम्नी हँसी के द्वारा प्रद्युम्न जी के रूप- गुण का श्रवण करके प्रभावती उनको पति रूप मे प्राप्त करने के लिए कामना करने लगती है। यहाँ पर भी रूप गुण प्रवण से ही प्रेमोदय हुआ है। शक्तला अनुपमा सुदरी है।' राजा उसके सोदय को देखकर मत्र मुग्ध हो जाता है। उसका सौदय नैसर्गिक है। उसके अगो में असाधारण लावण्य है। उसके यौवन के चिह प्रकट हो रहे हैं । इस प्रकार कालीदास के शपतला और दुष्यत के मध्य प्रम का उदय प्रत्यक्ष दशन से ही हुआ है। आचाय रामचन्द्र शुक्ल ने प्रेम चार प्रकार का माना है- (१) विवाह के बाद जीवन-सघप मे जिसका उत्कष दिखाया जाता है, १ "त्रलोक्ये यस्य रूपेण सदशो न फुलेन वा । गुणर्वा चार सर्वाङ्ग शौर्येणाप्यति वा शुभे ।। देवेषु देव सुश्रोणि दानवेषु च दानव । मानुषेष्वपि धर्मात्मा मनुष्य स महाबल ।। x X X या यागुणा पृथु श्रोणि मनसा कल्पयिष्यसि । एष्ट यास्त्रिप लोवेषु प्रद्युम्नो सव एव ते ॥ -हरिवंशपुराण, विष्णुपव , अ०९४, श्लोक २०-२६, पहित पुस्तकालय, काशी 'पद्यम्नस्यादयथा भर्ता स मे वष्टि कुलोद्भव । मरयत वैरी दैत्यानामुदवेजन करो हरि ॥ + + हेतु स नास्ति स्यात्तेन यया मम समागम । दासी तवाह सख्यहें दूत्य त्वाच विसजये। -वही श्लोक ३४-३७ ३ "मानुपीप क्ष वा स्यादस्य रूपस्य सम्मव । २ मातरल ज्योतिहदति वसुपातलाता -अभिनानगातरम (प्र० अब), डा० पिलदेव द्विवेदी, ५०७८ 'इद क्लिा व्याज मनोहर वपु' -वही, पृ०४६ ५ "अपर दिसलय राग" वही, पृ०५० ६ "अत्र पयोधर विस्तार पित."-वही, पृ. ४९ ७ पापसी प्रयापछी, भूमिका।.२० ६२ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण (२) विवाह वे पूर्व, जो जीवन क्षेत्र में वही मेंट होने से उदित होता है और जिसका परिणाम विवाह होता है (३) राजप्रसाद,वाटिका जल विहार आनि म जो रग रहस्य के रूप में प्रकट होता है, नया (1) गुण-श्रवण चित्र दशन, स्वप्न दान आदि के द्वारा जिसका उत्य होता है । नायक या नायिका जिसमें प्रयत्नवान दिसाय जाते हैं। तीसरे प्रकार को चाहे तो दूसरे या चौथ प्रकार म समविष्ट किया जा सकता है । वास्तव में तीसरे प्रकार का प्रेम शृगार या भोग विलास चित्रण है इसे तो किसी भी प्रम के भीतर समाहित किया जा सकता है । सूफियो का प्रेम दूसरे और चौये प्रक का समवित रूप है यहां यह बात ध्यात य है कि यूसुफ जुलेखा के सिवा सवत्र सूफी काव्य मे स्वकीया प्रम का निरूपण है। युसुफ जुलेखा' म हो परकीया प्रेम की स्थापना की गयी है। जुलेखा ने अपने पति को भी गारीरिक या मानसिक समपण नही किया-वह पवित्र ही बनी रही। प्रयत्न भी जुलेखा के सिवा सभी काव्यो में नायक का ओर से ही है।' प्रेम को उदयावस्था का उत्वप पूवराग मे होता है । पूर्वराग तीन रूपो म उदित होते दिखाया गया है । चित्र-दान गुण श्रवण और स्वप्न दान से । स्वप्नदान द्वारा उदभूत पूर्वराग पहा दोनो प्रकारो को अपेक्षा कम स्वाभाविक है। पहले दोनो प्रकारो को मनोवज्ञानिक, स्वाभाविक और सम्भा य कहा जा सकता है । पूवराग के भी दो पक्ष हैं एक मिलन सुख को त मयता प्रेम की परिपक्वता, चिर साहचय की स्वीकृति समपण आदि और दूसरा विरह । चित्रवली से सुजना और मधुमालती से मनोहर का मिलन होता है । वे परस्पर मुग्ध हो जाते हैं । चिरतन प्रेम को पहनान लते हैं, चिर साहचय का सकल्प करते हैं और इतने प्रेमाकुल हो जाते है- 'प्रेम भाव दुओ जो भरेऊ । परम आनद चित्त मे घरेऊ ।। + + + नन सोहागिनि विस वस, अघर अजित वासु । नन कटाच्छ जो मार, विहसि जियाव तासु ॥' १ हिदी सूफी कवि और काव्य डा० सरला शुक्ल प०५११ २ मधुमालती स० डा० माता प्रसाद गुप्त पृ० ४१ २ जायसी की प्रेम पद्धति तात्विक मीमासा। ६३ आलम्बन वे मुग्धवारी सौदय रस का एक घूट पीते ही आश्रय सुघ-वृध सो बठता है । भावलीनता और विस्मरण की अतल गहराइयो म निमग्न हो जाता है । देवजानी राज प्रासाद के गवाक्ष स माला पिरोती हुई नानदीप को देखती है । उसके रूप में ध्यान मे वह इतनी निमग्न हो जाती है कि अपनी उगली को ही पूर के साथ बीघ डालती है-उस पता तक नहीं चलता। चित्र दशन गुण श्रवण, स्वप्न दशन मे भी नायक पर जम प्रेम का ना सवार हो जाता है । पद्मावती के रूप गण श्रवण बरन पर रत्नसन की यही अवस्था होती है- 'सुनतहि राजा गा मुरयाई । जानी लहरि सुरुज । आई ।। खिनहि उसास डि जिउ जाई । खिनहि उट निसरं चौराई । खिनहि पीत खिन होइ मस मना । पिनहि चत सिन होइ अघता ।" पूवराग के उप और परिपक्व हो जाने के बाद प्रेम का प्रयत्न या साधना पक्ष आता है । अधिकतर नायब राजपाट, पापरती, सुरू ऐश्वय को ठुकरा जोगी बन कर निकल पडत हैं। प्रेम के प्रयता पक्ष भो इतना महत्त्व दिया गया है कि कवलावटी म विवाह हो जाने के बाद नायिका या विछोह हो जाता है और नायक योगी बन कर उसकी खोज करता है ।' नायक को भयकर प्राकृतिक यवधान, वाघाआ और प्रकापो का सामना करना पड़ता है। दुगम वन पवत और विक्ट पथा को वह पार करता है । समुद्री तूफानो का सामना करता है । जगली हाथियो, शेरो और परियो का शिकार होते-होते वचता है । भीषण दत्यो राक्षसो वा वध करके अपनी और अनेक अबलाओ की रक्षा करता है । आताओ अनाचारियो को परास्त करके यह साध्य की ओर अग्रसर होता है । उसके माग की बाधाओ प्रलोभन के रूप मे उसके सामने आती हैं । वह उहें ठुकरा कर अपनी प्रेयसी के प्रति आय प्रेम और निष्ठा का परिचय देता है। यही सघष का पक्ष है। विरह का सूफी का य म अत्यधिक महत्व है । गुरु के द्वारा साधक को परम प्रिय परमात्मा का बोध कराना और उसके हृदय मे विरह की चिनगी १ जायसी प्रथावली १० ४९ २ 'चला मुगुति मागे रह साधि क्या तप जोग । सिद्ध होइ पद्मावति जेहि पर हिप वियोग ॥' -वही, पृ. ५३ ३ सूफी कवि और काय डा० सरला गुवर पृ० ३९८ ६४ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण जलाना ही ज्ञान विरह जाग्रत करना है । विरह चिंगारी जव मुलग कर अबुझ आग बन जाती है तो साधक विश्व के कण कण को उसी प्रियतम की विरह ज्वाला मे सुलगते हुए पाता है या प्रत्येक पदाथ को विरह म जलते हुए देखता है, तो उसके हृदय म वही आग धधक उठनी है । घरती आकाश उसीके कटाक्ष वाणो से पामल है। समस्त जगत उसका अपर पीयूष पान करन के लिए बताब है।' उसक पोलो के तिल पर गगन स्थिर ध्रुव टक्टको लगामे है। उसके सुपमा पराग पर भौरा बना है कोई सौदय दीप शिसा पर पतगा।' देवता तर भी उसके नशीर रूप को देखते हुए वेसुध हो जाते हैं । विरह ही प्रेम परीक्षा की सफलता की सनद है। विरह तीन क्षत्रो मे क्रियाशील पाया जाता है, आथय, आलम्बन और परिवश । विरह के तीस गरल दशन को भाषप अपने भावाल सुकुमार हृदय म धरोहर मानकर पालता है। विरह की अग्नि मे सुलझ पर भी वह उस क्लज स सटाय रखता है । अपने हृदम को गलाकर वह खून के आंसू बहाता है । सूफ़ी अपने प्राणा की धूनी जलाता है । वह वेन्ना का अनुपम साधक होता है 'ननहिं चली रक्त ३ धारा । कथा भीजि भयउ रतनारा। पुहमि जो भीजि भमेउ मब गेरु । औ रात तह पखि पखेरु ।। ईगुर भा पहार जो भी जा। प लुहार नहिं रोव पसीजा । तहाँ चकोर कोक्लिा, तिह हिय मया पईठि। नन रकत भरि आये तुम फिरि की ह न दीठि।। १ "गुरु विरह चिनगी जो मला । जो सुलगाइ लइ सो चेला। -जायसी प्रपावरी, पृ० ५१ २ 'वरुनी का वरनी इमि वनि । साधे वान जानु दुइ अनी ।। उह वान ६ अस को न मारा ? वेपि रहा सगरा ससारा। गगन नखत जो जाहिं न गने । वे सब वान ओहि के हुने ।।" -वहा, १० ४३, दोहा ६ ३ वही, १०४ दोहा ८ है वहा पृ० ४५ दोहा ११ ५ वही, पृ० ८४ दोहा ८ ६ वही, पृ० ८३, दोहा १० ७ जायसी प्रथावली १० ९८, दोहा १२ जायसी की प्रेम पद्धति तात्त्विक मीमासा । ६५ कभी प्रेमी सिसा सिसक कर अपनी वरुनिया स व्यथा की क्या लिखकर भेजता है, सभी हडिडयो की सारगी वनावर रोम रोम से चीलार भरे स्वर अलापता है। कभी शरीर की भस्म बनाकर प्रिय पथ में बिछाता है-- 'मसिनना लिखनी वरुनि, रोइ रोइ लिखा अकस्म । आखर दहै न कोइ दयुव दी है परेवा हत्थ ॥" जब जड चेतन सभी वियोगी की हृदयवेधक दशा देखकर तडप उठते हैं, तो प्रिय पर उसका प्रभाव क्यो न पडेगा । सच्ची साधना से साध्य द्रवित होता ही है । वह भी साधक के विरह मे तडपने लगता है- जसे पवल सूर के आसा । नीर कण्ठसहि परत पिपासा ।। विसरा भोग सेज सूख वासा । जहाँ भौर सब तहाँ हुलामा ।। अगर चादन सुठि दहे सरीर । औ भा अगिनि क्या कर चोर ।। विरह न आपु समोर मल चीर सिर रुप । पिउ पिउ बरत गतिदिन जस पपिहा मुख सूख ।' रत्नसेन के विरह मे पद्मावती जव ऐसी बहाल हा रही है तभी उसकी विरह पाती ले हीरामन आ जाता है, वह तुर त अकुला कर प्रियतम मी कुशल पूछती है-- 'भर तुम्ह सुआ की ह है फेरा । वह कुमल अव पीतम केरा।" प्रेम की सबस वही पहचान है, निज पीडा भूल कर प्रियतम की कुशल कामना करते रहना । साघम की मार्मात वदना, प्रेम पथ में त्याग, कष्ट सहन अडिग धीरता और जन य आस्था ही साध्य के हृदय में मया उत्पन्न करती है । यह 'मया' ही साधक (प्रेमी) और साध्य (प्रियतम) का चिरतर आध्यात्मिक सम्बध (प्रेम) स्थापित करती है । निग ण कवियो के समान ही सूफिया ने भी विरह के प्रतीका का प्रयोग किया है । वहीं विरह को वराग्य' कहा गया है, कही भवर । ईश्वर विरह मे १ जायसी प्रथावली १० ९६ २ वही, प० ९९ ३ वही, पृ० ७९ ४ सुनि के धनि जारी अस क्या। तन मा मयन हिय भई मया ।। -वही, प०७८ ५ वही पृ० ४९ ६ वही, पृ० ४९ + ६६ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण माधक विरागी, त्यागी, भौतिक सुन्द विमुख हो जाता है। उसकी दशा भवर में पडे मनुष्य की सी होती है, विरह के समुद्र मे वह कभी डूबता है, कभी उतराता । विरह की आग म जलकर साधक सच्चा सोना बनता है इसीलिए उसे चिंगारी' और आग बताया गया है । विरह बाण' लग कर प्रेमी छट पटाता है। विरह का घाव खडग से कम पीडा नहीं पहुंचाता ।' वियोग वेदना और वेसुधी सप के विष दशन से कम नहीं है । इसके अतिरिक्त विरह को व्याघ', हाथी , पेहरी, राह आदि प्रतीया द्वारा भी अभि यक्त किया गया है । 'पद्मावत' वियोग खण्ट' मे जो यौवन वणन है वह विरह वणन हिदी सूफी प्रेम काव्यो यद्यपि रति का आधिक्य नायक में दिखाया गया है पर नायक की विरह साधना प्रेम पथ के अद्विताय वष्टसहन और उसकी दीनहीन दशा का प्रभाव नायिका पर इतना पडता है कि नायिका म रतिभाव का उदय इतनी तीव्रता, सघनता और आधिक्य के होता है कि दोनो का प्रेम सम कहा जा सकता है।" समान प्रम का यह भाव अनादि है-कही प्रत्यक्ष, कही अप्रत्यक्ष । नायक में सौयय, शील प्रेम की अन यता के कारण नायिका में जो प्रम उदित और विकसित होता है उससे वह भी रतिमाव की आथय बन जाती है और नायर आलम्बन हो जाता है । विरह साधना के उपरात दोना का मिलन परिणय के स्प मे होता है । नायिका प्रेम मे इतनी १ 'सुनि के पनि जारी बस क्या । तन मा मयन हिय भई मया ॥ -वही पृ०७४ २ वही, पृ. ९६ ३ जायसी प्रथावली २०९७-९८ ४ वही प०७४ ५ मधुमालती डॉ० मावाप्रसाद गुप्त पृ० ४४, ७४ ६ जायसी प्रथावली, पृ०६४ ७ वही। ८ वही। ९ वही, प० ७५ १० वही १०७४-७५ ११ (क) 'काढ़ि प्रान वठी लेइ हाथा । मर तो मरो जियो एक सापा -वही, पृ० ११३ (ख) वही, पृ० २९ जायसी की प्रेम पद्धति तात्त्विक मीमासा । ६७ २ सराबोर हो जाती है कि हृदय में उसे उपस्थित पाती है-न मिलने पर विलक्षण विवशता अनुभव करती है। तन मन जीवन साजकर सवस्व समपण करन के लिए प्रस्तुत करती है-- 'साजन लेइ पठावा, आयसु जाइ न भेंट । तन मन जोवन साजि क, देइ चरी लइ भेंट ॥' मिलन के लिए जात हुए लज्जा, सकोच, अपरिचय, योवन धम, प्रेम की अनभिज्ञता आदि के कारण उसका हृदय धक धक करने लगता है।' प्रथम भेंट में मौंदय के सहसा साक्षात्कार से वेताब हो नायक आनद सम्मोहित हो जाता है उसे सयोग सुख कामातुरता सौंदर्यानुभूति से मूच्छा तक आ जाती है। परिचय बढने पर सकोच और झियक की जडता पिघल जाती है । मनोविनोद होने लगता है-~-- सकुचे उर मनहिं मन वारी । गहु न हाथ रे जोगि भिसारी ।। औहट हो स जोगी तोर चरी । आव वास कुरकुग करी ॥ हो रानी तू जोगि भिखारी। जोगिह भोगिह कौन चिन्हारी ।।" प्रबघ काय में प्रयत्न का चित्रण करने के लिए प्रचुर अवसर और क्षेत्र प्राप्त होता है। साध्य के मिल जाने पर वहन क लिए भी अधिक नहीं रह जाता। सूफी का या मे इसीलिए वियोग की अपेक्षा सयोग चित्रण कम है। पर सभोग का चित्रण सम्पूण अनुभवो, चप्टाआ क्रियाओ और हावा के साथ किया गया है। मधुयामिनी म मिलन और सभोग वा वणन करन में अनेक स्थलो पर मर्यादा और साहित्यिक गोल का उल्लघन भी है। ऐसे उत्तेजक और अश्लील सभोग शृगार में लौक्कि पक्ष ही अधिक उमरा है, आध्यात्मिक बहुत दब गया है । सभोग या केलि क्रिया पक्ष को छोडकर, आध्यात्मिकता का पूरा का पूरा सकेत है। मधुयामिनी वे अभूतपूर्व सुख और पति प्रम को जा अनुभूति प्रयसी को १ पिउ हिरदय मह भट न होई । केहिरे मिलाव कहो केहि रोई ।।" -~~-जायसी प्रथावली-वही, पृ० १७७ २ वही, पृ० १३३ ३ अनचिह पिउ काया मन माहा ! का मैं कहव गहअ जो वाहा ।।' --वही ५० १३२ ४ वही पृ० १३४ ५ जायसी प्रथावली पृ० १४० ६८ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण होती है, उसका वणन आध्यात्मिकता की ओर सकेत अवश्य करता है । चारो मोर प्रिय ही दीखता है शृगार पर उसके पास जाने की आवश्यकता नही रहती। पति पत्नी का मिरन आध्यात्मिक मिलन है। प्रेयसा का अपरामत पान जीवन को अमर कर देता है । प्रिय और प्रयसी गले मिलते ही द त का दुख भूर जाते हैं। सो और साहाग की तरह दोना मिलकर एकाकार हो जाते हैं । दोनो के बीच का अतर मिट जाता है ।' द त भावना का ऐसा तिरोभाव होता है कि कौन किस पर रीझ और कौन किस को रिझाये, यह स्थिति भी उपस्थित नहीं होती। प्रिय प्राप्ति की यह स्थिति सूफी साहित्य का चरम रय है। साधक जव साध्य के साथ आन द सभोग की इस परम दगा को प्राप्त करता है तीनो लोको म बधावा बजने लगता है। धरती से आका तक खुगी की शहनाइयां बज उठती है'--है भी सचमुच यह ऐसे ही मान द उल्लास का अवसर। उपरिलिखित इन सभी मिलन चित्रा मे लौक्विता से अधिक अलौकिकता । इस अखण्ड मिलन को ही, जिसमें प्रिय और प्रियतम एकाकार हो जाते हैं, फ्ना कहा गया है वा रीझे रिश वावई मे डा० सरला गुक्ल ने भी फना की स्थिति बताइ है।' सूफा कवि लौकिक सौन्दय से परम सौदय की ओर अग्रसर होता है । क्या सयाग क्या वियोग दोना मवि प्रेम के उस आध्यात्मिक स्वरूप का आभास देने लगता है, जगत के समस्त यापार जिसकी छाया से प्रतीत होते दृश्य जगत के नाना स्पा को उसी अ यक्त ब्रह्म के यक्त आभास मानकर सूफी लाग भाव मग्न हुआ करते हैं।' ५ सुहागू १ जायसी प्रयावली ५० १४३ २ कहि सत भाव भई कठ लागू । जन कचन और मिला ॥ -~-वही प० १३९ ३ प्रम विछोहे जाहिदिन दहुमिलि पूजी आस । तीह लोक वधावरा । महि पाताल अकास ॥ --मधुमालती स० डा० माताप्रसाद गुप्त प० १०० ४ हि दी सूफी कवि और वाव्य डा० सरला शुक्र ५० ४९४ ५ जायसी प्रथावली प०५५ ६ वही, पृ. १३५ जायसी को प्रेम पद्धति तात्विक मीमासा । ६९ (ग) प्रेम माग की बाधाये सूफी कविया का प्रेम निरूपण आयात्मिक प्रेम की व्यजना के निमित्त किया गया है । आध्यात्मिक प्रेम में प्रमी (साधक) और प्रिय (साध्य परम तत्व) का एकात्म कटिनाई से हाता है। साधक को सस्कार से पूण विरक्त हावर एकनिष्ठ भाव से प्रेम माग म आग बढना पडता है। उसे अपना वत्तिया को परिष्कृत करना पड़ता है । सामारिक कामनाओ पर विजय प्राप्त करना पडती है । तब कही उसे प्रिय की झलक मिलती है। इस आध्यात्मिक कठिनाई को रक्षित करान क लिए प्रेमान्यानो म प्रम माग की कठिनाइयो का विस्तत उल्लेख किया गया है। प्रेममाग मे अनेक बाधाएं आती हैं । यह माग अत्य त दुगम है । यह स्वग से भी कचा पहार है विना आश्रय के इस पर चढना है।' कठिन इस दुगम पवत पर चढ़ना हसी खेल नहीं, इसम अनेके अलध्य घाटियां हैं । जिन तक पक्षियो अथवा चीटियो की भी पच नही । माग की साइयां राधना तो दूर किनारे इसको पाताल जसी गहराई को देखकर ही जघाएँ कप जाती हैं। माग की कठिनाइयो और समुद्र की गहराइयो को देख कर पर डिग जाते है । प्रेम दुख की भीषणता को व्यक्त करन के लिए हिंदी की अधिकारी रचनाओ म नायको का लम्बी लम्बी यातनायुक्त यात्राएँ करनी पड़ी हैं। मृगावती, 'मधुमालती और 'पद्मावत' आदि सभी रचनामा म इन यातनायुक्त यात्राआ की योजना है । इन यात्राआ म अनेक मानवीय यमानवीय अथवा प्राकृतिक बाधाएं इन नायको के माग म प्रतिरोध प्रस्तुत करती हैं। इन बाधाआ के रूप में समुद्र, गत्रु गूली, शझावात आदि सभी आते हैं और नायक इनसे प्राय अपने आपको बचाता हुवा अपने उद्देश्य को ओर बढता है । प्रिया प्राप्ति के लिए नायक का योगी वेग मे जाना मध्य काल के हिदी प्रेमाख्यानो का यो का विशिष्ट अभिप्राय है । कुछ ही एसे प्रेमाख्यान काव्य हैं पेम पहार स्वग ते ऊंचा । विनु रेघे कोर तह न पहूंचा। -चित्रावली, स० जगमाहन वर्मा ना० प्र० स० कागी १९१२ ई० पृ० ४० २ 'कहेसि कुअर यह पथ दुहला । अस जनि जानू हंसी औ खेला । अगम पहार विषम गढ घाटी । परो न जाइ चढ़ नहिं चाटी । खोह घाट नहीं लाधी। देखि पतार काप नर जाधी। -वही, पृ०७९ ७० । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण जिनमे नायक प्रिय प्राप्ति के लिए योगी बन कर नहीं निकल पड़ता है । प्रम क्थाओ में घटनाओ को नयो दिशा देने को दष्टि से यह विधान उपयोगी है ही, साथ ही प्रेम की महत्ता और चारित्रिक उत्कप के चित्रण की दष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है । स्वप्न या चित्र मे नायिका को देखने या शुकादि से उसका रूप गुण सुनने के बाद नायव भयकर विरह यथा से पीडित होता है और यह । वियोग बाघा इतनी बढती है कि यह उपल ध सभी ऐश्वय विलास का परि त्याग करक योगा का वेश धारण कर लता है । दरवेश या फकीर का वेश धारण करना और नायिका अ क्षण म निकलना फारसी मनसवी काव्या का अपना विशिष्ट अभिप्राय है । और हि दो के सूफी प्रेमाख्यानो मे यह असदिग्ध रूप से स्वीकार किया गया है। 'पद्मावत मे रत्नसेन शुक से पद्मावती का रूप गुण सुनकर विरह से व्यषित हो मूछित हो जाता है। मानो सूय की रहर आ गया हो । प्रेममाग के धाव का दुख कोई नहीं जानता। जिसे घाव लगता है वही जानता है । वह प्रेम के अपार समुद्र में गिर जाता है और लहर पर लहर थाने से वेसुध होता जाता है । उस विरह भवर की भांति उसे घुमाता है। जिसके कारण क्षण क्षण उसका जीव हिलोरे रन लगता है । वह कभी बाहर आता है और कभी भीतर जाता है । क्षण म बिना सास के हा जाता है और जीव डूब जाता है फिर क्षण भर मे बौराकर निश्वास छोडन लगता है। उसका मुख क्षण म पोत और क्षण में श्वेत हो जाता है । क्षण मे उसे बेत होता है और क्षण म अचत हो जाता है। प्रम को स्थिति मरन स भी कठिन होती है। क्योकि उसमे न तो प्राण जीता है और न ही मत्यु होती है । नायिका दर्शन के पूर्व ही इस प्रकार की विरह यथा का होना भी इस प्रकार के प्रमाख्यान का अभिप्राय है । इस यथा की चरम परिणति राज्यत्याग और योगी बनकर प्रिय प्राप्ति के लिए चलने १ सुनतहि राजा गा मुरुछाई ! जान हुलहरि सुरुज आई। पेम घाव दुग्न जान न कोई । जेहि लगि जान प सोई ।। परा सो पेम समुद अपारा । लहरहि रहर होइ विसमारा।। विरह भवर होई भावरि देई । खिन सिन जीव हिलोरहिलेई ।। सिनहि निराास टि जिउ आई। खिनहि उठ निसस बौराई ।। सिनहिं पीत सिन होइ मुख सेता । पिनहि वेत खिन होइ अचेता।। कठिन मरन ते प्रेम व्यवस्था ।न जिय जिवन न दसई अवस्था। -पणावत जायसी की प्रेम पद्धति तात्त्विक मीमासा । ७१ में होती है। राजा रत्नसेन राज्य वा परित्याग पर योगी हो जाता है और हाय में किंगरी ले वियोगी बन जाता है । वह तन मन से पागलो की भांति आचरण करने लगता है। मन प्रेम म उलझ जाता है और शिर पर जटायें बड़ आती हैं । योगी वेग मे वह मेखला धारण कर लेता है । हाथ सिंगो चक्र और गोरप धपा ले लेना है। ग्रीवा म योगपटट और रुद्राक्ष धारण मरता है । इस प्रकार तप और योग के लिए शरीर को तयार वर भिक्षाटन करन चलता है और कहता है मेरे हृदय में जिसका वियोग है, उस पद्मावती को प्राप्त करके ही सिद्ध वन गा ।' राजा की इस स्थिति से मुक्ति हेतु परिवार के लोग नेग पाने वाले नौकर चाकर राजा और राय सभी आते हैं। रत्नसेन जसे ही होश मे हा मानो उसे वही वराग्य उठ खडा हुआ। मानो कोई बावला होकर खडा हा ।' सभी प्रेममाग की बाधाओ को स्पष्ट करते हुए कहा हे राजन् । मन में समझ कर देखा किसी से प्रेम नही करना चाहिए । प्रेम का नाम मधुर है पर उस सा लेन पर प्राण देना पडता है । जब प्रेम जोडा जाता है, तब पल सुखानुभूति होती है फिर अ त म निर्वाह वरना कठिन हो जाता है । साढे तीन हाय का यह गरीर सुमह जसा है । इसम इतना घुमाव है कि पहुँचना कठिन हो जाता है । आकाश म दष्टि रखने से सुमेरु पर पहुंचा बा सक्ता है किन्तु प्रेम दृष्टि म नही आता । वह आकाश से भी ऊँचा है। आकाश के ध्रुव से ऊँचे पर प्रेम का ध्रुव जाता है जो पहले सिर देकर पीछे इस माग में पर देता है । वही प्रेम के ध्रुव वा स्पश कर सकता है । तुम राजा हा और सुखी हो। अपने राज्य और सुख का भोग करो। यह माग अति कठिन है । te १ तजा राज राजा भा जोगी। औ गिरी र गहे वियोगी। + चला मुगुति माग कह साजिक पा तप जोग । सिद्ध होउ पद्मावति पाय हिरदै जेहिक वियोग । पदावत-वही, ५० १४२ २ जह लगि कुटुब लोग ओ नेगी। राजा राय आए सब वेगी। -वही ५० १३५ ३ जो मा चेत उठा वरागा । वाउर जनहु सोइ अस जागा ॥ --वही, पृ० १३७ - ७४ ! मूफी कवि नायसी का प्रेम निरूपण उबकर प्रात काल उदित होता है उसके प्रभाव से वन के मजीठ और टेसू भी लाल हो जाते है। इस रुधिर धाग से घरा जितनी क्लात हुई उतनी गरिक वग्य हो जाती है। और इतना ही नही तत्रस्थित पक्षि समवाय भी लाल हा जाने हैं। वसत में नवपल्लव वारी वनस्पति उसी से लाल हो जाती है।' पूणित माग की सभी बाधाओ की सूचना आयसी न राजा रत्नसेन के प्रस्थान के समय ही दे दी है। वह जानता है कि आगे पवता से आपात माग है । अतीव भयानक पवत पडेंगे । बडे बडे दुगम घाट वीच बीच म नदी खोह और नार पडेंगे। स्थान स्थान पर माग म चोर मिरेंगे। फिर हनुमान जी की हार सूनायी देगा। उस समय न जाने कौन पार होगा तथा कौन थकार रुक जायेगा ।' हनुमान जी न भी भीमसेन से कदलीवन को दुगमता का वर्णन करते हुए कहा कि इस भयकर वन म सिंह योगी ही जा सकते हैं- अन परमगम्यो य पवत सुदूराम्ह । विना सिद्धगति धीर गतिश्चन विद्यते ॥ देवलोक्स्य मार्गो यमगम्यो मानुष सदा । कारुण्यात त्वामह वीर वारयामि निबोध म॥ यह पवत बडा दुगम है । वह ही द्गरूढ है। हे वीर विना सिद्धि प्राप्त हुए इस वन म काई नही पहुच सकता। यह माग देवलोक को जाता है। मनुष्य के लिए सवथा अगम्य है । ह वीर म करुणापूर वहाँ जान स तुम्ह " रोकता हूँ। पुन कवि माग की दुरूहता को यजित करते हुए कहता है ह पथिक । अब प्रौख स देखो और दढ हा जाओ। आग जांखा मे पथ्वी को देखकर पर बढाओ। जो पथिक पथ भष्ट हो जाते हैं वे मर जाते हैं क्योकि पथ पर चलना नही जानते । सब लोग परों म चरण पावा धारण कर लो। जिससे न तो परो म काटा चुभे और न काडी गडे । अब तुम उस वन खण्ड मे आ मय हो जहा वि याचल के वन म दडकारण्य है। चारा र ढाक का वन १ २ जस मारइ रहें बाजा तूरू । सूरी देखि हसा मसूरु ।। पद्मावत, प० २६१ है आग परवत ३ वाटा । विषम पहार अगम सुठि घाटा ।। विच विच नदी साह औ नारा । ठावहिं ठाव वठ वट पारा ।। हनुवत कर सुवन पुनि हाका ! दहुँ को पार हाइ का थाका ॥ -जायसी ग्रयावली, ५० ५७ । महाभारत वनपद भ० १४६/९२-९४ । ३ जायसी की प्रेम पद्धति तात्त्विक मीमांसा । ७५ देपत है । जो यहाँ भटक जाते हैं उहे अतीव दुःख मिलता है । जहाँ काटे र शाहियां हो वहां न जाना । मकोय के वक्षो से उलझकर क्या न फाहना भिण हस्त की ओर वीटर देश है और वाम हस्त की ओर चदेरी पडेगा।' न दोनो के बीच स अनजाना रास्ता है। राजा इसी दुगम माग से आगे ढता है । मृगारण्य मे युगा पी सायरी पर सोकर रात्रि व्यतीत करते हुए हड रास्ता पार करता है । एक महीने म वह किसी प्रकार समुद्र तट पर पहुँचता है।' वलिंग नरेश गजपती उसे समझाता है। राजा अपने लक्ष्य पर अडिग है। अतत गजपती उमे वोहित देता है। वोहित पर सवार होकर चल देता है। उसका मन सिंहल द्वीप पर येद्रित है । वोहित जल की उत्ताल तरगो पर हिलकोरें खाते हैं ।' एका एक कर सात भयवर समुद्रो को पार करना पड़ता है। खीर समुद्र' दपि समुद्र', सुरा समुद्र, क्लिक्लिा समुद्र मानि को पार करके राजा 'मानसर" नामक सातवें समुद्र मे प्रवेश करता है। वहां से सिंहल द्वीप का राजमदिर दिखायी देता है। राजा सिंहल तट पर उतरता है। उसका प्रम सच्चा है। इसी के बल पर वह प्रेम की कठिनाइयो को पार कर सका है। शिवमहप म उसे पद्मावती की झर व मिलती है किन्तु अभी उसकी कठिनाइया का अंत नहीं है। पावती उसकी परीक्षा रती है। - १ जायसी प्रथावली २०५७। २ 'मासेक लाग चरत तेहि वाटा । उतर जाइ समद के घाटा।' वही, प० ५९ ३ 'निहच चला भरम जिउ खोई । साहस जहाँ सिद्धि तह होई।" -वही, पृ० ६२ । ४ वही पृ० ६३ । ५ खीर समुद का बरनो नीरू । सतु सरूप पियत जस खीर।" -वही, पृ० ६४॥ ६ वही, पृ. ६४ ॥ " "सुर समुद दुनि राजा आवा । महुआ मद छाता दिवरावा ।" -वही, ५०६५। 'पुनि क्लिक्लिा समुद्र मह आए । गा धीरज देखत उर खाए।" -वही, पृ० ६६ ॥ "सतए समुद मानसर आए । मन जो की ह साहस, सिधि -वही, पृ०६७। ८ १ पाए।'
७६ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण शकर उसे मिद्ध गुटिका देते हैं । सिद्ध गुटिका लकर वह सिंहल गढ मे प्रवेश करता है। पकडा जाता है । उस शूरी की आज्ञा होती है । अतत भाट के समझाने पर जोर यह प्रकट करने पर कि यह सचमुच रत्न है । यदि शूरी दी गयी तो अनथ हो जायगा। महादव ने अपना रणघट वजा दिया है ।' राजा ग घरसेन मान जाता है। रत्नसन और पद्मिनी का विवाह हो जाता है। यह सारी बाधाए प्रेम की शुद्धता एव अन यता की परीक्षा के लिये हैं। इसीलिये इ हे यथासम्भव बटा चढा कर वणन किया जाता है । जसा कि प्रारम्भ म कहा गया है आयास्मिर दुम्हता को यजित रन लिय माग की इन कटिनाइयो का उल्र ख होता है । जायसी न समासोक्ति पद्धति पर इन कठिनाइया के उत्लख करन के साथ आध्यात्मिा प्रेम की व्यजना की है । इस प्रकार प्रम मीमासा + अ तगत य कठिनाइयां अपनी साथक्तता रखती है । जितना हा बडी बाधा का प्रमी अपनी निष्ठा एव निश्चय की दढता से पार करेगा उसका प्रम उतना ही एक निष्ठ एव सच्चा माना जायेगा। (घ) प्रेम की परिपक्वता एव अन यता प्रमतत्व की पूर्णता एव परिपक्वता प्रियतम के प्रति एकनिष्ठ एव आय भाव के उदय म हाती है। प्रम जद तना की सिद्धि की ओर ले जाता है । इसी लिए विचारका ने ज्ञानादत के समाना तर भावाद त की स्थापना की है । सूफी प्रेम माधना में भी यह अद्व त भावापनता रक्षित होता है । जायसी के प्रम निराण में भी प्रम वो इस परिपरवावस्था का निदिष्ट किया जा सकता है। रत्नसन से जब पद्मावता का मिलन होता है तो उस समय पद्मावती अपने प्रम की परिपक्वता और भा यता का परिचय देती है। वह अपने प्रेम को चाव और मीन के प्रम की काटि म रखती है । पभावती प्रम प्रभाव का स्वी कारती हुयी अपने जन य प्रम की ओर इगित करती हुयी कहती है प्रियतम, न जान तुमन यह कौन सी मोहनी डाल दी कि जो प्रेम यथा तुमम थी वही मुझम उत्पन हो गयी। जल के अभाव में जिस प्रकार मीन “यकुल हो जाती है और क्षणभर भी जीवन धारण नही कर सकती है, ठीक वसा ही मेरा मन हो गया जायसी प्रपावली, प०७१। २ वही ५० १११॥ ३ महादेव राघट बजावा -वही, प० ११३ । ४ वही, पृ० १२०॥ १ जायसी की प्रेम-पद्धति तात्त्विक भीमासा ! था। मुये भी तरे अमाव की अनुभूति वसी ही हो रही थी जसी अनुभूति मछली को होती है । मैं चातक होकर 'पिउ पिउ' रटने लगी। मैं विरहाग्नि मे वसे ही दग्य हुई जैसे दीपशिखा दग्ध होती है। तुम्हारा पथ जोहती हुई मैं स्वाति के लिए सीप के समान हो गयी। डाल डाल पर उडने वाली कोक्लिा को भाति में याकुल होन लगी। तुम्हार लिये मैंने चकोरी बनकर रात्रि मे निद्रा को तिलांजलि दे दिया। इतना ही नहीं मरे ही प्रम के कारण तुममे प्रेम का उदय हुआ। जो सुवण अग्नि मे तपाया गया वह स्वयमेव तप्त हो गया। जसे सूर्य की अग्नि से हीरा दिपता है वसे तुम्हारी प्रम ज्योति न हमको प्रदीप्त कर दिया। यह यातव्य है कि मीन और चातक प्रेम की अन यता के लिए साहित्य मे प्रसिद्ध है। पद्मावता आग कहती है कि सूय के प्रकाशित होने म कमल विकसित होता है और नही तो उसमें कहा मिलिद और कैसी सुगध ? जो ऐसा प्रियतम पति है उसस अतपट क्या ? तन, मन यौवन और प्राण दकर अब मैं स्वय तुम पर योछावर हो गया हूँ।' प्रेम की अन यता का इससे भेष्ठ उदाहरण और क्या हो सकता है। जहा प्रिय को स्वयं को समर्पित कर देता हो । वह भी सवतोभावन शिष्कपट और नि याज रूप से । रत्नसेन स्वयं प्रम की स्थिति को स्पष्ट करते हुए रहता है तुम्हारे प्रम के कारण ही में राज्य का परित्याग कर भिखारी हुआ। तुम्हारा प्रम जो हमारे हृदय में समाया तो चित्तौर में भी मैंने किसो का स्मरण नही किया। जम भ्रमर मालती पुष्प के लिए वियोगी बनता है बस ही मुझे तुम्हारा वियाग चढ़ा और मैं योगी बन कर निकल पडा। ह बाले । मैं तुम्हारे लिए भिग्वारी हुआ । दीपक के लिए पतिगा बनकर मने आग स्वीकार की। जस भ्रमर क्टको की चिता न करके क्वनि मोहनी दहुँ हुति ताहा । ना तोहि विथा सो उपनी माही ॥ विनु जल मीन तपी तस जोऊ । चातिय भइउ वहत पिउ पिउ। जरि विरह जरा दीपर वाती । पथ जोवत महउँ सोत सवाती ॥ डारि डारि जउँ कोइल भई । भइञ्चकोरी नीद निसि गइ ।। मोरे पम पेम ताहि भएक । राता हम अगिनि जो तएउ ।। हीरा दिप जो सुरुज उदोती। नाहिंत वित पाहन यह जोती ।। -पद्मावत प०३७८-७९ । 'तासो क्वन अत्तरपट जा अप्स प्रीतम पोउ। नेवछावरि गइ आप हा तन मन जोबन जीउ ।' -वही, पृ. ३७९ । ।
७८ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण । कमल को खोज कर पा लेता है, वसे ही मैंने तुम्हारे लिये अपने हृदय पर पटको का छेवा लिया । एक बार मर कर जब कोई प्रियतम से आ मिलता है, ता वह दूसरी बार मरने क्या जाय ? जो मर कर जिया हो, उसे मत्यु कहाँ ? वह तो प्रेम के कारण ही अमर हा गया और प्रिय का सानिध्य प्राप्त कर मधु का पान करता है। भ्रमर यदि बहुत क्लेश और बहुत आशा के बाद कमल की प्राप्ति करता है तो वह भ्रमर उस पर पाछावर हो जाता है और कमल भी हंसकर प्रम नतापूर्वक सुई व दता है।' इस पर पद्मावती कहता है कि अपने मूह से प्रसशा करना शोभा नही दता। इस पर रतसेन कहता है- हे प्रिये तुम्हारे साथ मैंने प्रम की गाठ जोडी है जो अब न काटे क्ट सकती है और न छुडाये छूट सक्ती है। मैं तुम्हारे रग म रग गया है और सूर्य होकर आकाश माग से धदा हूँ। यहा पर रत्नसेन वे प्रम की परिपक्वता यजित है जिसम प्रगाढ दृढता है। यह स्नेह सम्बव अबाटय है जिसे किसी भी प्रकार समाप्त नही क्या जा सकता है । पद्मावती इस प्रेम की परीक्षा सी लती हुयी कहती है- हे भिखारी यागी तू प्रम मे अनुरक्त होन की बात कहता है पर मैं तुम्ह रगा हुआ (प्रम में अनुरक्त) नही देखती। केवल पट रजन से ही प्रेम का रंग नही पहचाना जा सकता। वस्त्र तो बाहरी वस्तु है और प्रेम मातरिक । 'अनु तुम्ह कारन प्रेम पियारी। राज छाडि क भएउ भिखारी। नेह सम्हार जो हिए समाना । चित्त उर माह न मुमिरउ आना । जस मालात कह भवर वियोगी । चता वियोग चलेउ होई जोगी ।। भएउ भिखारि नारि तुम्ह लागी । दीप पतग होई अगएउ आगो ।। भंवर खोजि जस पाव वेवा । तुम्ह काटे मैं जिव पर छेवा ।। एक बार मरि मिल जो आई । दोसरि बार मरकत जाई ।। क्त तेहि मोच जो मरि क जिया। मा अम्मर मिलि क मधु भवर जो पार कवल वह बहु आरति बह आस । भंवर होइ नेवछावररि क्वल देइ हसि पास ॥ -पद्मावत, १० ३५५ । २ 'अपने मुह न वडाई छाजा -वही प० ३५७ । ३ तुम्हे सा प्रीतिगांठ ही जोरी । कट न काट छुट न छोरी॥ रग तुम्हारे रातेउ चढ गगन होइ सूर। जहें ससि सीतल कह सपनि मन इछा पनि पूर॥ -वही, पृ० ३५८ । १ पिया ॥
जायसी की प्रेम पद्धति तात्त्विक मीमासा । ७९ हृदय मलोटन से जो उत्पन्न होता है, वहाँ रग (प्रम) है । चाँद के रग (प्रम) म जब मूय रग गया, उमे हा साय प्रात सब रक्त दसत हैं।' पद्मावती रत्नसेन के अभाव म अपनी स्थिति का स्पष्ट करती हुयी कहती है कि तुम्हारे अभाव म में जीवन धारण नहीं कर सकती। मैं चातक की भांति पिउ पिउ रटती हुयी भ्रमण करन लगूगी।' इस क्थन म नी प्रम की अन यता लरित की जा सकता है । क्षयत् प्रियतम क अभाव में जीवन का परित्याग करना यह सिद्ध करता है कि पद्मावती के हृदय में रत्नमन के प्रति अपार स्नह है जा पद्मावती के जावन वाती या मिक्त करता हुमा प्रकाशित कर रहा है । रलसेन पद्मावती को देखकर बमुघ हा जाता है।' अनयतम सुटरी अप्सरा के रूप म पावती का देखकर भी माहित नहीं होता है। यहां तक कि उसकी ओर आँस उठाकर भी नहा दसता है। वह कहता है, ह अप्सरि । भर ही तुम लावण्यमयी हा पर मुझे दूसरे स वाता भी अच्छी नहीं लगती है। यह क्थन प्रेम की एक निष्ठता और अन यता का द्योतक है। इससे यह प्रतीत होता है कि रलसन स्पलामा मिरि द नहीं है। यही पर रत्लसन के प्रम का सच्चा स्प मुसरित हुआ है । दुप्यात व। गकता के समान सौदय अ यत्र दिखायी नहीं दिया। रला कोई सूबसूरत नहीं थी परत मजनू की अामा म वह अनुपमा रमणी थी। यह प्रेम की आखें हैं जा प्रियतमा का विश्वसुदरी बना देती हैं। रलसन और पद्मावती के उद्वाह के पश्चात पद्मावती का प्रेम दा स्थलों पर चरम उत्कप प्राप्त करता है। पहला स्थान तो वह है जहाँ . २ 'जोगि मिवारि परसि बहु वाता । मि रग देखों नहिं राना ।। कायर रंगे रग नहिं होई । हिए भोटि अपने रंग साई ॥ चाँद के रग सुरुज जौं राता । देविय जगत सांझ परमाता।। -पद्मावत, ५० ३५९ । तब हुत तुम पिनु रहै न जीऊ । चातर मइक कष्ट पिउ पिउ'। -जायसी ग्रथावली प०१३९ । जो मघु चहत परा तहि पार । मुधि न रही बोहि एक पिगल ।। परा भांति गारख का चय। जिउ तन छाडि सरग कहे मुला॥ -पद्मावत पृ० २२० । भरहिरण ताहि आरि राता । काहि दासरें सौं भाव न वाता॥ -पद्मावत पृ०२८॥ २ ८ ८२ । मूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण प्राण दे दूंगी। यदि वह जीवित रहा तो मैं भी जीवित रहूंगी। प्रम भी परि पक्यता और अन यता का इससे ज्येष्ठ उदाहरण और क्या हो सकता है। रलसेन भी पद्मावती के प्रति अपने अनय प्रेम यो प्रकट करता हुआ पहता है जिसरा मन जिसम रमता है, वह उसी का आश्रय ग्रहण करता है सोना और सुहागा मिलकर एक दूसरे से पदापि विलग नहीं होते वरन सद्रूप हो जाते हैं। ठीक इमी प्रकार पदमावती प्रेमभाव को अन्त मूलयता की अभि घ्यक्ति ससिपो में करती हुई कहती है मरा अपने प्रियतम पति से ऐसा अन्त माव हो गया है कि ममा म नही आता विशृगार पर मैं उसके पास हो जाऊँ ? वह तो मुझे अब सवत्र दिखाई दे रहा है । मन को टटोलती हूँ तो वहीं प्रियतम मिलता है । मन तन म अलग नहीं हो सकता है । नेत्रों में भी वहीं व्याप्त है । वही सिवाय उसके निमी को नहीं देगती हूँ। यह अपना रस अपने आप ही रेता है और अपरारा पान रन पर वह मुझे भी रस प्रदा परता है। हृदय पाल के समान है और बुध दय वपन दे सारे समान है । जिसे मैंने बड़े पाय म बागे यहा पर उसकी भेंट पिया है । मरी र भेंट देनेरे उपरात उनरी से हुलम कर पिपट गयी तब रमणरा पति ने प्रसन्न होकर सम्भाग लिया। मम्पूप यौवन उमी म मिल गया । मेरा मतस्य हार-हार मह सबद सो होई । नस-नस मा उठ पनि सोई। मार विरह गा सागर गूर मोम की सान । हो होर गायरा परि रहा यह होरप समान ।। ---पपावत पृ. २९८-२९१ २ कमिगार तापह रह गाऊँ । माहिह गोटाहिटाई। जो जिउ मह तो उहै पिपारा । तन मह गारमहानिरारा। नाह माह तो उहै ममाना । देगऊ रहो म देगऊ माना। मापुन रम माहिप म । अपर गहें सागे रसदई। हिया पार पपन का अगुमन भेट दीन्ह होर पार। geी हर मर गो सगी। ररान एमि मोटी बगी। जोपन सय मिना माहिवाई हो रे नीष हुनि गई हे। मारिएरीर पर रह माग्न मीर ममारित तम गिर गर मीगि मोहिनीहगिठियारि॥ -पमा पु. १११ जायसी की प्रेम-पद्धति तात्त्विक मीमांसा । ८३ बीच मे खो गया। द त भाव दूर हो गया। जसे कोई कही परोहर रख दे और फिर बाद में अपनी धरोहर लोटा कर सभाल ले, उमी प्रकार पति ने मेरा सब रस निचोड लिया और मुझे रस से रिक्त कर दिया। यहां हम देखते हैं कि जायसी ने नायिका पद्मावती के प्रेमभाव की अद्ध तता की व्यजना की है जो कि प्रेम की परिणति है। यहाँ पर पदमावती का आदश प्रेम भी प्रकट हुआ है। प्रेम की पराकाष्ठा पर पहुँच कर प्रेमी समस्त ससार को प्रियतम मय ही देखने लगता है। प्रेम के परिपक्व हो जाने पर प्रेमी स्वम को, एक प्रकार से पूर्ण रूपेण खो पर अपना अस्तित्व ही नष्ट कर देता है, जिसे स्पष्ट करते हुए जायसी न रत्नसन की अवस्था का चित्र इस प्रकार खीचा है- 'बू द समुद्र जस होइ मेरा । गा हेराइ अस मिल न हेरा। रगाह पान मिला जस होई । आपहि खोइ रहा होइ सोई। कहने का तात्पय यह कि जिस प्रकार घू द का समुद्र में मिलन हो जाय और बहुत दू ढन पर भी न मिल सके अथवा जिस प्रकार ताम्बूल पर रगो में मिलकर अपना अस्तित्व खो बठ उसी प्रकार राजा रत्नसेन ने अपने को खोकर प्रेम में मिला दिया और प्रेमी एव प्रेम पात्र मानो दो से एक हो गये । प्रेम की परिपक्वता और अन यता का इससे उत्कृष्ट उदाहरण और क्या हो सकता है इस प्रकार यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि जायसी ने प्रेम निरूपण के क्रम म प्रम के उस परिपक्व एव अन य रूप का निदशन किया है जो प्रेम को अद्ध त की स्थिति तक ले जाता है । जायसी की दष्टि एक साधक को दष्टि है । उनके लिए प्रेम सब कुछ है । जो ज्ञान, ध्यान योग यम से नहीं मिल सकता वह सब प्रेम की प्रगाढ अनुभूति एव अन य साधना से उप- लप हो जाता है। [च] आलम्बन (नायिका) का स्वरूप सूफी प्रेमगाथाओ का बीजभाव है प्रेम या रति । रति का प्रेस या उत्ते जक है मोदय । सौंदय ही सर्वप्रथम प्रेमी को आकर्षित करता है। सौंदय ही प्रिय को पाने उसके उपभोग और उसके सान्निध्य साहवय की लालसा जगाता है। यही लालसा वासना का सहयोग पाकर उत्कट कामना सकल्प और रति या प्रेम का रूप धारण कर लेती है । सौदप द्विविध होता है । प्रथम रूपात्मक (शारीरिक) और द्वितीय गोल प्रधान (आन्तरिक)। शील का ज्ञान तो १ जायसी प्रथावली १० ११४ १ ८४ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण बहुधा आलम्बन के जीवन में प्रवेश पाने एव निकट सम्पक मे आने पर ही होता है । यदा कदा प्रिय के गुण कम की चर्चा सुन कर भी शोल का पता लता है। रूप सुपमा, सुकमारता, हाव भाव चेप्टाएँ, अतकार परिधान, शृगार सज्जा आदि दैहिक सौन्य को आकार दते हैं । हि दी प्रमगाथानो में आलम्वन का प्रेयसी को भावभूमि से उठाकर पत्नी व गरिमामय मिहामन पर प्रतिष्ठित किया गया है । प्रेयमी रूप म मिलनो रक्ठा प्रेम की तीव्रता वाम कातरता तथा विरह की तीव्रता के लिए अधिक अवकाश रहता है पर चिरन्तन मिलन अटूट सायुज्य निरतर एकात्मक्ता, अशकित तल्लीनना अनत सम्माग सुख सुलभना पत्नी में ही रहती है । भार तीय दाम्पत्य केवल सामाजिक विधान ही नही था यात्मिक धामिक सांस्कृ तिक अनुष्ठान भी है--लोक परनाक जम जमातर का अविभाज्य सम्बध । किसी भी गुण या विशिष्टता का ज्ञान दो स्पा मे होता है--आलम्बन गत और प्रभावगत (प्रतिक्रिया) रूप में । प्रभाव, प्रतिक्रिया परिणाम एक तो आश्रय में देखा जाता है दूसरे परिवेश, वातावरण या प्रकृति में । प्रकृति परि- वश पर जो प्रभाव कवि चित्रित करता है स्वय आश्रय बनकर उसकी कल्पना करता है । या आश्रय स्वय उस प्रभाव का निरूपण करता है। इसलिए परि वेशगत प्रभाव भी जाश्रयगत समझना चाहिए। प्र मगाथाजो वे आलम्बन लोकदुलभ, चिरनन प्रभावशाली निता त मुग्धकारी भवाघा प्रमोत्तेजक रूप मुषमा-यौवन के अक्षय कोप हैं। दहिक सौय चित्रण दो प्रकार स किया जाता है। परम्परागत नख शिख वणन और प्रसगानुसार भाव को अधिक रमात्मक और उत्कष पूण बनाने के लिए रूप चेष्टा चित्रण । एसा ही सौत्य निरूपण सच्चे अर्थों मकाय को समृद्ध करता है भाव का साकार प्रस्तुत करता है रस का अविभाज्य अग बनता है । नख गिख वणन सभी कविया का समान होता है। पथर पथर अगो की बनावट और सुदरता उनके अनुरूप आभूषण रूपाक्न परिधान, विविध अवयवा और जगो की चेष्टाएं तथा उन सबके व्यापक प्रभाव का निरू पण भी नख गिख वणन म किया जाता है। सौदर्योत्क्प दिखाने के रिए उपमान भी अधिकतर बघे हुए और निश्चित से प्रयुक्त किये जाते हैं । जायसी ने पदमिनी को आलम्बन रूप म चित्रित करते हुए उल्लमित भाव से उसका जो रूपाक्न क्यिा है वह हिदी काव्य जगत की अमूल्य निधि है--- माग 'बिनु सेंदुर अस जानह दीआ । उजियर पथ रन मह कोया।
जायसी की प्रेम पद्धति तात्विक मीमासा । ८५ वचन रख कमोटी चमी । जनु पन मह दामिनि परगसी। सुरज विरा जम गगन विसेसी । मुना माह सुरसती देगी। मोटे घार महिर जनु भरा । वरवट रेइ बनी पर परा। तेही पर पूरि घर जो मोती। जमुना माय गांग के मोती उरोज 'हिया पार पच पचन रारू । वन कचोर उठे जन चारू । कुदन केल साजि जन कूद । अमत रतन मौन दुइ मूर्दै ।। भ्र-नेत्र और कटाक्ष 'मोह स्याम धनुर जनि ताना । जा सहुँ हर मार दिस वाना। उह भौंहनि सरिदेउ न जीता। मछरि छपी छपी गोपीता। मौह धनक धनि धानुक, दूसरि मरि न पराइ । गगन धनु जो उग, लाजहि सो छपि जाइ ।। ऊपर मालम्बन (पदिमनी) की मांग उरोज, भ्रू-नेत्र और कटाक्ष का सौत्य अस्ति है । यह नख शिख वणन भी बघी हुई परम्परा के अनुसार ही है। उपयुक्त उद्धरणा के आधार पर यह कहा जा सकता है कि आलम्पन का यह सौदय चित्रण परम्परागत होत हुए भी अपनी विशेषता रखता है । इसम उपमेय (वप वस्तु) का वस्तुपरक रूप भी उपस्थित किया गया है और भावपरक भी। माग की उज्ज्वलता को यजना वरन के लिए उस बहती हुई अमत सरिता बताना जत्य त मूम काय कल्पना का ही काम है । सघन श्यामल बालरो के बीच मोती भरी मांग यमुना के मध्य बहती हुई गगा सी लगती है--अगो के आकार और गठन का आभास भी इससे मिल जाता है। पर ऐसे सौदर्याक्न से रतिभाव के उद्दीपन में न तो विशेष सहायता ही मिलती है और न नापिका के सम्पूण या सम्मिलित सौदय का मुचकारी बिम्ब ही सामने आता है । पाठक उपमानो की लम्बी भीड म भटक जाता है सौदर्या नुभूति का अवसर हा उसे नहीं मिलता। जसा कि पूर्ववर्ती पतिया में सक्त किया गया है जायसी काय मे १ जायसी ग्रचावली प०४१ २ जायसी प्रथावली २०४६ ३ वही, पृ० ४२ ८६ । सूफी कवि जायसी वा प्रेम निरूपण 1 नखशिख वणन परम्परागत हुए भी मुग्धकारी, भावोत्तेजक तथा सुषमा सम्पन्न भी है। उससे आलम्बन को अपूबता अनुपमयता अभिव्यजित होती है-- ललाट 'कहो लिलार दुइज जोती । दुइजहि जोति कहाँ ओती। सहस विरिन जो सुरुज दिपाई। देखि लिलार सोउ छपि जाई। ललित पोल 'पुनि वरनौ का सुरग पोला । एक नारग दुइ किये अमोला । + + + तेहि कपोल बाएं तिल परा । जेइ तिल देखि सो तिलतिल जरा।" पारदर्शी ग्रीवा 'पुनि तेहि ठाव परी तिनि रेखा। धू ट जो पीक लोक सब देखा। सुधा मधुर-वचन रसना कही जो कह रस वाता । अमृत वन सनत मन राता। हर सो सुर चातक कोकिला । बिनु बसत यह बन न मिला।" पोयूप पगे अपर अधर सुरङ्ग अमिय रस भरे । बिम्ब सुरज लाजि बन परे । फूल दुपहरी जानो राता । फूल झरहिं ज्यो ज्यों कह बाता । हीरा लेइ सो विदुम धारा । विह सत जगत होइ उजियारा ।" अमिय अघर वस राजा सब जग बास करे। केहि कह क्वल विगासा, को मधुकर रस लेइ ।' मुक्ताभास मुस्कान जह जह विह सि सुभावहिं ह सी। तह तह छिटकि जोति परगासी। कापिनिदयकि न सरवरि पूजी । पुनि ओहि जोति और को दूजी। हसत दसन अस चमके पाइन उठे झरक्ति । दारि सरि जो 7 क सका फाटेउ हिया दरक्कि । १ जायसी प्रथावली पृ० ४३ २ वही प०४४ ३ वही पु. ४५ ४ वही, प० ४४ ५ बही ५० ४३ ६ वही, पृ० ४४ ७ वही, पृ० ४४ .
जायसी की प्रेम पद्धति तात्त्विक भीमासा। ८७ ऊपर पद्मावती की सुकुमारता सुपमा, मुस्कान और उनके व्यापक प्रभाव को अनुपम व्यजना हुई है। पोलो को नारगो के रूप मे चित्रित करना अलकार मात्र नहीं, उनकी सुकुमारता, मधुरता, रेशमी शोनी अरुणाई, स्निग्धता शीतलता और क्षीणता का भी परिचायक है। तब विश्वमन मिलिंद उस पर मुग्ध क्यो न हो ? पानपीक निगलते हुए पद्मावती के गले म अरुण रेखाएं पह जाना तो उसकी विश्वदुलभ सुकुमारता और शरदपूनम सी उज्ज्वल ज्योत्स्ना के समान पारदगिता का परिचायक है। आलम्बन में जो सो दय प्रतिष्ठा की जाती है, वह कल्पना की कारीगरी या बाजीगरी दिखाने के लिए या लक्ष्यहीन अवाघ दौड प्रकट करने के लिए नही की जाती है । आलम्बन का सोल्य उसरे आतरिव जीवन से तो अखड सम्बध रखता ही है आश्रय के जीवन म भी वह अनुपम अनुभूति बता देता है । उसके भविष्य को भी चिरन्तन सुषमा, अभूतपूर्व अक्षण्ण रस से लबालब कर देता है । जव कवि को ऐसी कला सिद्धि मिलती है, तभी वह अमर काव्य की सष्टि करता है। प्रेम काम्या के सजा इस प्रयाजन म पूणत सफल हुए हैं । जायसी ने रति के आलम्बन रूप में पद्मिनी का जो स्वरूप अक्ति किया है, वह अनयतम है। ऊपर प्रस्तुत चिर प्रशासित सुपमा पुज आलम्बन के अधर पीयूष आप्ला वित हैं । उनको स्वर तरगा म अमन उच्छलित है । उनके शब्दो मे फूल झडते हैं, उसकी अघर माधुरी से पीयूष की वर्षा होती है । जिसके अधरो से पीयूष वषा हाती हो वह आश्रय के जीवन को कितना रसमय कर देगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है--गहन, एकात और अमिश्रित अनुभूति से उसका आस्वादन किया जा सकता है । साधक के उजाड वियावान जीवा को सचमुच पीयूप ही चिर वसन्त में बदल सकता है । जिसका जीवन निविड अघकार के पजो म पड़ा दम तोड़ रहा है, उसे दामिनी को लजाने वाली और प्रस्तराम ज्योति जगाने वाली मुस्कान ही आलोकित कर सकती है । और अगर हीरो की चमक विद्रूप की अरुणिमा के साथ मिलकर साधक के जीवन पथ को आलोक्ति करे तब तो कहता ही क्या हीरो की चिटटो चमक चकाचौध भी पता कर सकती है तब आँखें उस रूप का पूण आस्वाद ही कसे लेंगी ? गुलाबी आमा मिल जाने से वह प्रभावकालीन सुकुमार स्वणिमा ज्योति बन जायगी। सौ दय चित्रण की गरिमा उसके प्रभाव म निहित है। प्रभाव परिवेश गत और आश्रयगत-- दो रूपो में दखा जा सकता है। सूफी 1 य व आलम्बन है परमात्मा जिसको ८८ । सूफी कवि जागसी का प्रेम निरूपण । प्रेयसी और पत्नी के प्रतीक के रुप म निरूपित किया गया है। उसरा प्रभाव भी विश्व यापर दिखाया गया है। ब्रह्म रूप नायिका जब इस पथ्वी पर अवतरित होती है यह धरती मालार और सौ दय स जगमगा उठती है । जिस रात का पद्मावती का जम सिंहल द्वीप म हुआ, चारोबार प्रकारा उमड पडा । रात्रि भी दिन की भांति जगमगा उठी। न केवल यह परिणी ही आला मनिमज्जित हा गयी, स्वग भा नारक्ति हा गया। जिधर वह निकलती है प्रकार की याद आ जाती है सुषमा से वह पथ अभिसिंचित हो जाता है । मानसरावर भी उसर चरण-स्पा 4 लिए उसित हा जाता है। जिधर देखती है, कमल सिल जाने हैं जिस ओर अपनी मुसकान छटा छिटक्ती है हीर माती बरमन र गत है-- पहा मानसर चहा सो पाई। पारस प इहा लगि आई ।। भा निरमर तह पायन परस । पावा रूप रूप के दरस ॥ मलय समीर वाम तन आई । मामीतल ग तपनि बुझाई । न जनो कोमु पोन र जावा । पुन मा मैं पाप गवावा ।। नन जो दवा कमल भा निरमल नीर सरीर । हसत जो देखा हस मा दसन जाति नग होर ॥' रूप सुपमा ६ इस प्रवाह और आलो वे इस वार को देखकर विस्मय आन द होता है तन और मन सुख पुलक्ति पौर विस्मरण शिथिल हो जाता है। मान सगवर का चरण स्पा करन और मन का नाप शात करने के लिए ऊपर उछलना पवि क मौत्य चमत्कृत हत्यालाम को तो प्रकट करता ही है नायिका के ब्रह्मत्व का भी निरूपित करता है । एक टोकरी म नवजात शिशु श्रीकृष्ण को मथुरा ले जात हुए जिहोन यमना की लहरा का उछलकर उनके चरण स्पश करने का वणन पढा है उह इस पर अविश्वास न होगा। आश्रय द्वारा जालम्बन का यर पापक स्प वणन अतीव मनोवज्ञानिक है। प्रेमी यदि अपन प्रिय के स्प गुण को अद्वितीय न समझ तो उसका प्रम एक निष्ठ नही ही मक्ता । अपने प्रिय का सर्वाधिक सु दर मानकर ही प्रेमी उस पर आसक्त होता है। इसके साथ हो प्रमी अपने प्रिय के रूप सौ दय का विराट देखना चाहता है । उसको झलक स यह समस्त दश्य लाक् को आच्छा दित समझता है । यह केवल जायात्मिा प्रिय के बारे में ही नहीं, भौतिक भा निसि मह दिनकर परकासू । जब उजियार भयउ कविलामू ।। ---जायसी न थावली पृ० १९ जायसी प्रथावली प०२५ १ २ जायसी की प्रेम पद्धति तात्त्विक मीमासा । ८९ जीवन में भी देखा जाता । कविया की बात तो निराली ही है, सामा य प्रमी भी अपनी प्रेयसी के रूप गुण को वढा चढा कर कहते हैं, वह किसी से छिपा नही है। सूपी प्रेमगाथाओ मे नायिका (साध्य) को जो रूप सुपमा, यौवन सुकुमारता अन त प्रभाव व्यापकता चित्रित की गयी है वह केवल अलकार वादिता और गास्म परम्परा पालन नहीं है वह प्रयसी के ब्रह्मत्व की प्रतिष्ठा है । प्रियतमा का नख शिख चित्रण ब्रह्म वे उन गुणा की अभिव्यक्ति और अनभूति है, जिनके कारण वह नति नेति कहा जाता है। उसके अग प्रत्यग, जवयव और चेष्टाए क्रियात्मक और भावात्मक गुण सभी ब्रह्म के प्रकट अप्रकट स्थूल और मूक्ष्म गुणो के प्रतीक हैं । इस प्रतीको का अर्थ है उस अयक्त को व्यक्त करना । इनका प्रतीकात्मक अथ जान बिना प्रेयसी के ब्रह्म रूप का बाघ नहीं हो सस्ता विद्वानो ने इनम जा प्रतीकात्मक सकेत ग्रहण दिये हैं वे उल्लेखनीय है। पेयी बाल--अधकार, आवरण माया, अज्ञान परमात्मा के साक्षात्कार मे बाधा, दुर्बोधता, आत्मा परमात्मा के बीच यवधान । साधक यदि क्यो की सधनता, श्यामलता, उमिलता म ही रम गया तो साध्य के सच्चे स्वरूप का परिचय नही पा सकता। मांग-प्रकाश, नान बोधपथ साधना की सरल सीधी पगडण्डी।' भौंह-ब्रह्म की सकेत वत्रता उसके भावा का जाभास पाने में बाधा, साधना पथ की दुगमता और वक्रता । प्राणोत्सग करक ही उसकी साधना के पथ पर चला जा सकता है। इसीलिए उ ह खडग धनुपादि बताया गया है।' नयन तया क्टाप-ब्रह्म की प्रेमातादक मद विह्वलबारी। विरहात्तेजक १ 'वेनी छोर झार जो वारा। सरग पतार होइ अधियारा। -जायमी प्रथावली प० ४१ विन सेंदुर जस जानहु दीपा । उजियर पथ रन में कीला ।' वही प०४१ जायसा ग्रथावली प०४२ बेदि मद चा परा तहि पार | सुधिन रही मोहि ए पियाल ॥ वही, पृ० ८४ ३ ९० । मूफी कवि जायसी का प्रेम निस्पण और मारकशक्ति । प्रेम स्वीकृति मक्त। समय का आवत्तन प्रत्यावत्तन आहोरन मवेत्त । अधर--अनुराग । अपर मुस्कान-प्रेम ज्याति । दतपक्ति तथा मुस्कान--लक्षुण्ण जादि ज्योति, ब्रह्म की सुषमा बा आभास या झलक। रराना और वाणी--इतिहास और धम आदि का आगार। सूफी का य म आने वार अनक प्रतीका के अथ मुहमिन फज काशानी ने रिसाल पी मिगवाक म प्रस्तुत किया है। 'सूफीमत साधना और साहित्य' मे भी इनकी याख्या दी गई है।' आध्यात्मिक क्षेत्र म प्रतीकात्मक अभियजना पद्धति एक अनिवाय तत्व है । मीर अ दुल वाहिद विलनामी ने अपनी पुस्तक हकायके हि दी म ब्रा भाषा मसित गति और आध्यात्मिक दा प म जान वाले अनेकानेक श गे का सूफीमत और कुरआन के अनुसार प्रतीकात्मक अथ स्पष्ट किया है।' आलम्वन (नायक) का स्वरूप सूफी वाय का नायर धीगतत रे गुणा स सर्वाधिक अनुपात म सम्पन्न है । वह वीर निणय युद्ध कुशल उगर प्रतिभाशाली बलिष्ठ चेतनाशील क्षमाशील सु दर क्षत्रिय राजकुमार है । मुरय रूप से वह रति और उत्साह का आश्रय है। किसी विश्वविश्रुत यौवन रूप सुषमा गणशील की अक्षय राशि राजकुमारी के चित्रटान रूप गुण श्रवण या साक्षात्कार से उसके हृदय 'दिस्टि वान तम मारह घायल भा तहि ठाव । इसरि बात न बोल, लेइ पदमापति नाव ।। वही पु० ९८ ૨ जोगी लिस्टि दिम्टि सौ ली हा । नन रापि ननहिं जिउ दी हा ॥ वही प०८४ ३ वही ५० ४२ ४ वही ५० ४३-४४ वही प० ४४ वही ५०४ सूफीमत-साधना और साहित्य डा० रामपूजन तिवारी ! १० ५२४ सन् १५६६ ई० फारसी म लिखित और सयद अतहर अध्यास रिजवी द्वारा हिली म अनूदित होकर ९ फरवरी १९५७ को प्रकाशित । ९ हकाय हिदी, प्रथम अध्याय, प० ३७-७१ । ५ ८ जायसी की प्रेम पद्धति तात्त्विक मीमासा । ९१ । म प्रेम का उदय होता है । वह प्रेम प्रयम दशन का ही नहीं, प्रथम गुण श्रवण का भी है। नायक इतनी भानुक्ता और कल्पना का भडार है कि वह वैयक्तिक प में मिलने से पहले कल्पना के मधुवन मे भावुकता को रोमाच सिहरन से कातर आगा की रगीन चांदनी के तले अपनी प्रेयसी से भेंट कर लेता है। उसके साहचय सुख की अनुभूति भी पा लेता है । देखते या सुनते ही नायक के हृदय से प्रेम का अबाध आकुल, अजस्र और आवग भरा उत्साह उमः परता है तोत के द्वारा पद्मावती का सौ दय वणन सुनकर रत्नसेन भी सुघ बुध भूल जाता है-- "सुनतहि राजा गा मुरयाइ । जानी लहारे सुरुज के आई। प्रेम घाव दुख जान न कोई । तेहि लागै जान पै सोई ।। खिनहि उसास डि जिउ जाई । विनहि उठ निसर बोराई ।। खिनहि पोत खिन होइ मुख सता । खिनहि चेत खिन होइ अचेता ।।' मूफी नायक प्रेमपथ का वघड और आस्थावान पथिक है । ससार की कोई विघ्न बाधा उमे नही रोष सक्ती कोई जवराध विचलित नहीं कर सक्ता और कोई प्रलोभन पथ भ्रष्ट नहीं कर सकता। प्रम की आधार रति की आलम्बन भावुक्ता और कल्पना की विश्राम, अभिलापा की आक्षण के द्र और अनुष्ण मो न्य सीमा प्रयसी ही समस्त प्रयामो की पहुंच है, समस्त सघष का लम्य है समस्त साधना की साध्य है । सभी सकल्प, सभी चेतना सभी कम सभी भाव उसी की साधना म सलग्न करता है । इसीलिए प्रेमी साधक की स्थिति ऐसी हो जाती है-- जब भा चेत उटा वरागा । बाउर जनो सोइ उठि जागा ॥ आवत जग बालक मस राजा । उठा रोइ हा नान सो खोआ प्रेम की दूसरी कसोटी है कि प्रेमी अपने प्रिय के रूप से जीवन और जगत की समस्त परिधियो को जगमग पाये । एक सच्चा प्रेमी अपने प्रिय को विराट रूप में देखता है। प्रिय म जगमगाते सौ दय की इसी व्यापक भावना अलकार शास्त्र को जन्म दिया। सूफी नायिका के ईश्वरत्व की बात " १ जायसी प्रथावली प०४९ २ मलहि रग अछरी तोर राता । मोहि दूसर सौं भाव न वाता! मोहिं आहि सवरि मुए तस लाहा । नन जो देखसि पूछसि काहा वही, पृ० ९१ ३ वही, पृ०४९ " •२। सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण एक ओर रसकर विचार किया जाय तो भी सौदय की विराटमयता, सब व्यापकता, लोकातिशयता ही रूप-वणन में सर्वाधिक तत्व है। प्रेयसी की मानन-श्री को देख कमल, चांद रति आदि के लजान और नारग से कपोल' सुरग अमीरस भरे अधर' अमतमिथित कोकिला का स्वर' ज्योत्सना सी मुसकान आदि की कल्पना ही इसका प्रमाण है कि कवि अपनी नायिका को प्रकृति के असीम क्षेत्र में व्यापक दापना चाहता है। स्फी प्रेमी अपनी प्रेयसी को ब्रह्माण्ड क कण-कण म व्याप्त देखता है। मूफी नायक -मी है वामी नहा । एकनिष्ठ मौ दर्योपासक है रूपलोभी नही । अपनी प्रेयसी वे सिवा विसा दूसर के यौवन सौ दय उपभाग की उस वामना नहीं । प्रयसी के अतिरिक्त वाई भी रुप सुषमा कोई भी यौवन समपण उसे आर्पित नही कर सवता । पाचती एक अप्सरा का रूप धारण कर रत्न सेन के प्रम की परीक्षा लन आगी है रत्नसन अपने अचर प्रम का परिचय देते हुए कहता है- 'भलहि जगे रग तोर राता । मोहि टूसर सौ भाव न वाता" ।' प्रेम की सच्ची वसोटी है वियोग । सयोग है प्रेम का सम्भोग पक्ष । उप भोग है काम की तप्ति । काम पक्ष में प्रम का गाम्भीय स्थायित्व अन यता उज्वलता उमके लिय किय गय त्याग और चुवाये गये मूल्य का पता नही चल सकता । प्रमा की निष्ठा दत्ता अडिगता जात्मसमपण मुख वभव का उत्सग प्रम पथ के कर मन का पता वियोग सही चलता है । वियोग ही प्रेम का त्याग पक्ष या साधना पक्ष है। साध्य के महत्व मूल्य और अलभ्यता का पता भी वियाग पीडाको १ अनुपात से चलता है। सूफी नायक की प्रेयसी असामा य सुदरी है-सकातीत आन द विधात अभय शानि और परितप्ति दात है। उसके पाने के लिए कठिन परीक्षा से भी गुजरना पडना है । वियाग ही परीक्षा है-उसकी पात्रता की कसौटी है। भीषणतम कष्टा दुल य वाघानी और अमह्य जमावा को जगीकार करता है। वह पगडडी विहीन सघन तिमिर आतक्ति वनो में अपनी साधना की लो जायसी प्रथावली प०४४ ॥ २ वही, ५० ४३ । ३ वही प० ४४। ४ वही प०४३ . ५ वही, पृ० ११। १ जायसी की प्रेम पद्धति तात्त्विक मीमांसा । ९३ मलाता पथ बनाता है । बोहड वियावान रेगिस्तान को अपने आँसुओ की भागीरथी से सोचता है। दुगम भूधरा के अभिमानोतत मस्तको पर अपने कठिन कम की अमिट लकीरें खीचता है। प्राण प्यासे बौखलाए सागरो की लहरी स सेलता हुआ पार हो जाता है । उसके विरहादगारो में अततम का चीत्कार है । उच्छवासो मे जीवन भर के समस्त कल्पा और वासनाआ का भस्म कर देने का सामथ्य है । उसकी भीगी सिसकियो म प्रिय को निममता को पिघला देने की क्षमता है। प्रेम वियोगी साधक की अवस्था ऐमी करुणाजनक है कि धरती आकाश, वन कानन और पशु पक्षी भी उसके प्रभाव से नही वचते, मानव की बात ही क्या प्रभाव प्रतिक्रिया ही किसी कम या भावना की सौटी है। यह प्रभाव प्रकृति परिवेश और प्रिय क हृदय परिवतन दोनो पक्षा म देखा जाता है । रत्नसेन की वियाग जजर अवस्था और कठोर साधना देखकर महेश भी 'मयारू' (दयालु) बन जाते है । यहा तक कि पद्मावता के पिता गधवसन द्वारा रत्न सन का बदी बनाकर सूली देन की बात जानकर भगवान शकर उसके विरुद्ध युद्ध करने का तत्पर हा जात है।' नायक के अभूतपूर्व कष्ट सहन, लोक दुलभ त्याग अचल प्रेम, अनासक्ति आस्था को दख नायिका हृदय भी द्रवित हो जाता है । सहानुभूति या सम वेदना जय प्रेम का उदय ही उसके हृदय म नहीं होता, वह रति की आथय भी बन जाती है-नायक आलम्बन हो जाता है । नायिका भी नायक के समान विरह म तहपती और मिलन के लिए आकुर हो जाती है । दोनो मे प्रेम समान आस्था हो जाती है । भक्त की सच्ची माधना उत्सग भावना, अडिग आस्था को देख मगवान् की करुणा उस पर बरसन लगती है । माधुय भाव की भक्ति का साधक होते हुए भी नायक लौकिक उत्तर दायित्व के प्रति पूण सजग और सचेष्ट है। उसका लोर पक्षी रूप भी उतना ही सम्पन है जितना अध्यात्म पक्षी । लौकिक रति मी वीरभाव को प्ररक है। पर उसका प्रदशन वह नायिका प्राप्ति के लिए ही नहीं करता समाज, कुल, ननहिं चली रक्त व धारा । धा भीज भएउ रतनारा ॥ सूरज बूद्धि उठा होइ ताता । ओ मजीठ टेसू बन राता ।। -जायसी ग्रथावली पृ० ९८ । 'रोवत बूढि उठा ससारू ! महादव तब भएर मयारू ॥"-वही ५० ९२ ३ हि दी सूफी कवि और काव्य डा० सरला शुक्ल १० ५५५, ३८१ । - १ ܚܕ २ ९४ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण - . देश और मानवता की स्थिति और रक्षा के लिए भी वह वीरकम करता है। किसी भी अपरिचित असहाय की रक्षा के लिए उसकी बलिष्ठ भुजायें प्रस्तुत हैं किसी भी अरक्षित उत्पीति के उद्धार के लिए वह जान पर सेल जाता है। मभी नायक क्षत्रियोचित उदारता करुणा, वीरता, निभयता क्षमाशीलता और विश्व मगल की भावना वा अनुपम परिचय दते है । सूफी कवियो ने जालम्बन श्रिय या परमात्मा आत्मा के सम्बध को स्पष्ट करन और उनम प्रम की गूढता गहनता, चिताता रहस्यात्मकता एकरूपता आदि को अभि यक्त करने के लिए उन्हें अनेक उपमानो या प्रतीको के रूप में उपस्थित किया है। केतकी कमल मालती चम्पा आलम्बन है और भ्रमर आश्रय ।' दीपक और पतग फितिंग और भ ग', सूय और कमल , जल और मीन', च द्र सूर्य, च द्रमा जौर गहु स्वातिबू द और सीप तथा चातक, चद्र और चकोर साधना क्षेत्र मे उह मरजी वा और मोती' जोगा" तथा गुरु च । गारख और चेला" के रूप मे साय और साधक को प्रस्तुत किया गया है । गुरू शिष्य के रस मे तो निगु ण काय मे साध्य और साधक अभियक्त हुए है अ य प्रतीक भी परम्परागत है। चाद और सूय के रूप म वे सर्वाधिक आये हैं और केवल जायसी में हो। सम्भवत इसीलिए, क्याकि सूय म आग है और च द्रमा मे शीतलता विरह और अमन, जलन और शक्ति। तात्पय यह कि मूफी प्रेमका य म आलम्बन को अत्यधिक महत्व दिया गया है। प्रेम जितना हो ऊँचा प्रगाट एक प्रेरक है उसका धारण करने वाला भी उतना ही उदात्त धीर सयमी, एकनिष्ठ एव व्रती है । जायसी ने प्रेम के आलम्बन (नायक नायिका) को आध्यात्मिक प्रेम की उच्चता के अनुकूल अत्यत महिमामय रूप में प्रतिष्ठत किया है। आलम्बन की यक्तित्व प्रतिष्ठा जायसी प्रयावली, ५०७७ १०० १०९, १३५, १५१ । २-३ वही ५०७७ ५१ ७०, ९९, १००, १३५ । ४ वही, प० १०१। ५ वहीं प० ७९ । ६ वही प०७७ ७८ ८४ ८५ १०० १०१, १२६, १३५ । ७-८-९.१० वही पृ० १०० । ११ चित्रावली समान ५० १३७-१५५ । १२ जायसी प्रथावलो पृ० १०१, १०९, १३५ । १ जायसी की प्रेम पद्धति तात्त्विक मीमामा । ९५ करते हुए उहान केवल पारसी प्रेपारयाना की रूढियो का अनुसरण नहीं क्यिा है वरत भारतीय मयाना का भी ध्यान रखा है। सबसे बड़ी बात यह है कि उ होने प्रेम की आध्यात्मिक गरिमा के अनुकल ही आलम्बन को महिमामय एव धीरोदात्त बनाया है । (छ) प्रेमी की मन स्थिति भौतिक जगत में भी प्रम एक ऐसा तत्व है जो प्रमी को प्रिय का भावना म निर तर लीन "सता है । प्रिय का निर तर ध्यान करता हुअ प्रेमी उससे मिलने की अभिनपा सजोये हुए जोक मानसिक स्थितिया को पार करके उससे पूण एकात्म भाव स्थापित करता है । यदि प्रेम आध्यात्मिक एव रहम्या (मर है तब तो प्रेमी साघर के मन को पूण परिष्टत भी करना पड़ता है। प्रमी साधक को रहस्यमयी सत्ता से पूण ऐक्य की अनुभूति सहसा नहीं होती। उसे अनव मन स्थितिया के पडाव को पार करना पडता है । पहली स्थिति जागरण (State of awakening) की मानी गई है । मावि आत्मा शुद्ध और चत य है । उसका भौतिक पदार्थों स किया गया गटर रन अस्दाभाविक है । यह आत्मा अपने पूवरूप म विलय के लिए-शुद्ध चेतन तत्व स ऐक्य स्थापन के लिए-पाकुल रहती है । जिस समय यह उपयुक्त गुरू के द्वारा उदबुद्ध पर दी जाती है और ससार की असारता को समझ लती है उस समय जागरण की स्थिति मा जाती है । इस अवस्था मा जायसान अपगी प्रेम कथा में स्पष्ट सवेत किया है। गुरू ताते के द्वारा पमिनी वी पचर्चा सुनकर सहसा भौतिक ससार स विरक्त सा हो जाता है । यह रूप वणन उमे इतना प्रभावित करता है कि उसकी भौतिक चेतना रप्त हो जाती है । वह सनाहीन हो जाता है और जब प्रियतमा के उस निय सौदय की त मयता म बुछ समय सनाहीन बने रहने के उपरान उस हो जाता है तो उसर हृदय में पराय की भावना उत्पन्न होती है और उस सारा संसार नोरम प्रतीत हान लगता है- जव भा चत उठा परागा । हीरामन तोत द्वारा पद्मावती का निवचनीय स्प की चर्चा गुनकर राजा रत्नसन का सहमा ससार स विरत्त हो जाना जागरण की स्थिति है । जागरण के पूर्व रा'य है जब साधक रत्नसन गर म दिय सौदय का सदे पाता है तो वह उस पासव की मदिरा म विभोर उठता १ जायसी प्रयावली पृ०४९ । २ 'गुनहिं राजा गा मुरझाई । जानी रहरि सुरुज क आद ।। -वहा, पु. ४० !
९६ । मूफी कवि जायमी का प्रेम निरूपण है । यह वह अवस्था है जब माधव (प्रेमी) मुआ रूपी गुरु से पद्मावनी रूपी विराट ब्रह्म से दिय मौत्य की झलक पता है तो वह उसकी प्राप्ति के लिए तडप उठता है। जब प्रत्यक्ष जगत मे उमे नही पाता है तो विरह म तपने लगता है । अय सूफी कवियो ने भी प्रेमी को मन स्थिति का चित्रण उपयुक्त प्रकार से ही किया है। मितु सासारिक कर्मों का परित्याग किये बिना और पूणत पवित्र तथा निमल हुए विना शुद्ध चेतन सत्ता (साध्य) की ओर अग्रसर नही हो सकता है । इसीलिए परिप्वरण' की आवश्यकता पड़ती है । इस दूसरी स्थिति को परिष्करण (State of purification) की अवस्था कह सकते है । परिष्करण के लिए सूफी साहित्य म अनेकानेक प्रकार के नियमों एव विधाना की यवस्था की गई है । इनमे तोवा (अनुताप) खौफ (ईश्वर भय), ववकुल (ईश्वर का विश्वास) फकर' (द य) सब (धय), रजा (गति) रिजा (आशा) क्र (अनुग्रह) आदि मानसिक स्थितियां आती । जिक (स्मरण) मुराक्वत (ध्यान) शरीअत (विधिनिषेध का पालन), तरीक्त' (गुद्ध मन से भगवान का ध्यान ) जादि साधनाए भी आत्मपरिष्कराणाथ ही मा य हैं । आत्मपरिष्करण की यह स्थिति पद्मावत मे भी प्राप्य है । रत्नसेन का योगो रूप मे निकलकर सात समुद्र पार करना सूली को राहत स्वीकार कराा परिप्रण की स्थिति के रूप म मा य हा सक्ता है । विरह की ज्वारा आत्मा का सारा क्लुप भस्म कर उसका परि कार कर देती है। इसीलिए भक्को और सूफी साधका को हम सा य क विरह मे अतिशय यथित पात हैं। इस अवस्था म साधक अपने साध्य का प्राप्त करने के लिए प्रयत्नमाल हो साता है । विरह की ममा 14 पीडा इस सासा रिक वासनाआ से अलग कर एकमात्र प्रिय के चि तन म लीन कर देती है। वह सारे ससार म प्रिय की अनुभूति करने लगता है। विरह का यह प्रभाव आत्मा का परिष्करण करता जाता है और साधक (प्रेमी) साध्य प्रेम प्रीति जो जिउ डरमरई। प्रीतम रास और सब जरई ।। पेम दुख मब दुख सो भारी । तिल तिल मरन सहज देव हारी।। प्रान जात वरु छाडि सरीरा । विधि क्तसिर प्रेम की पीरा।। राज वग धन जोवा गऊ । जब सो जीव विसभर भएऊ ।। धाइ प्रेम समट यह देखि दौर घसि लेउ । ६ मानिक क ल ऊबरौ क वह पथ जिउ रऊ ।। -जायसी का पद्मावत )डा० गोविद विगुणायत । शास्त्रीय भाष्य पृ० १५७ पर उन्धत । क्रमा १ जायसी की प्रेम पद्धति तात्त्विक मीमांसा । ९७ १ (प्रियतम) प्राप्ति के लिए विभिन्न प्रकार की साधनाएँ करन लगता है । साधक शुद्ध और निवत्तिपरक आचरणा की सहायता से शरीर और मन को शुद्ध करता हुआ इस साधना पथ पर अग्रसर होता है। इस साधना मार्ग मे चार पडाव मान गय हैं। शरीअत, तरीक्त हकीकत और मारिफ्त । इस साधना की अन्तिम अवस्था हाल अर्थात् भावातिरेक की परमावस्था मानी गयी है। यही आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है। जायसी ने पद्मावत' में ही चारी पडावो की आर सकेन करते हुए कहा है चार बसरे सौं चढ सत सौ उतर पार यह चारो पडाव क्रमश प्रेमी साधक की उच्चतर मन स्थिति के द्योतक हैं। शरीअत मे वह धार्मिक विधि विधानो का अनुसरण करके अपने मन को पार्मिक एव पवित्र वातावरण से सम्बद्ध करने का अभ्यास करता है। 'तरीकत' की अवस्था में उसकी भावनाएँ एकनिष्ठ होने लगती हैं और वह उपासना में लीन हो जाता है । मानसिक विकास के तीसरे स्तर पर हकीकत की स्थिति म वह हक या सत्य को पहचान लेता है। 'मारिफ्त' की अवस्था मे प्रेमी साधक को प्रम की गहरी अनुभूति होती है। उसका हृदय दपण के समान स्वच्छ हो जाता है। जिस प्रकार स्वच्छ दपण सूय ये प्रतिबिम्ब को पूण से अपने में धारण कर लेता है उसी प्रकार मारिफ्त' की स्थिति में पहुंचे हुए प्रमी साधर का स्वच्छ हृदय परमतत्व (प्रिय) के स्वरूप को अपने स्वच्छ हृदय मे पूर्ण रूप स धारण करने में समय हो जाता है। यही वह अवस्था है जिसम पहुँच र प्रेमी अपने को प्रिय के स्वरूप मे लय कर देना चाहता है । इस प्रकार हम देखते हैं कि जायसी का परिष्करण विषयक विचार भाव प्रधान है फिर भी वे शारीरिक परिष्करण (State of Purification) की आवश्यकता को स्वीकारते हैं । तीसरी स्थिति प्रकाशानुभव (State of Illumination) की मानी जाती है। यह एक प्रकार से भावातिरेक की स्थिति है । जिसमे साधर को साध्य की प्रेमानुमति होती है। मुक्त शुद्ध और चतय सत्ता स पूण ऐक्य की स्थिति के पूर्व सासारिक विघ्न एकबार पुन साधर को विचलित करना चाहते हैं । जायसी अपन आराध्य की एक झलक पाकर उसके लार का वणन करन लगते हैं। जहाँ न गति न दिवस है जहाँ न पौन न पानि । १ जायसी न घावरी पृ० १६ ।
९८ । सूफी कवि जापसी का प्रेम निरूपण तेहि वन अटा पलि बसा, कौन मिलाव आनि ।" frव मदिर मे पद्मावती का प्रथम साक्षात्कार प्रकाशानुभव की स्थिति के रूप में स्वीकार कर सकते हैं । इस प्रकाणानुभव के बाद भी प्रिय से मिलन की पूरी समावना नहीं होती। प्रेमी की मानसिक दा मे माव की सकल्प विकल्प की समावना रहती है। सच्चा प्रेमी इस झलक के बाद प्रिय के प्रति अत्यात तीव्र भावावेग का अनुभव करता है । रत्नसेन को प्रेम साधना के अन्त गत हम यह स्थिति देखते हैं । गिवर्मादर में पद्मावती को मलक पाकर वह भावाकुल हो जाता है। उसकी प्रेमनिष्ठा बढ़ जाती है। वह बड़े से बड विघ्न पर जय प्राप्त करने के लिये दढ निश्चय कर रेता है। इसी निश्चय के साथ वह सिंहलगढ में प्रवेश करने को उद्यत होता है । चौपी स्थिति विघ्नो की रात' (Dark night) कही जाता है साधक को साध्य की आगिव अनुभूति की यह अवस्था अधिक समय तक नहीं रहती। अनेकानेक प्रकार की बाधाएं माग मे उपस्थित हो उसमे विघ्न डालती हैं। ग पवसेन द्वारा रत्नसेन का पकडा जाना विघ्नो की रात है। जहा रत्नसेन को मानसिक सपप करना पड़ता है। पांचवीं स्थिति पूण ऐक्य (Unitive State) की है। इस स्थिति में साधक साध्य से अभिन्न हो जाता है । साधक (प्रेमी) साध्य प्रियतम का मिलन हो जाता है । जापसी को प्रद्मावती भी सुहाग रात को इस पति मिलन की कल्पना कर रोमाचित हो कहती है 'अनचिह पिउ कापी मनभाहा । का ए करव गहव जो बाहा ।। वारि बस गई प्रीति न जानी । जुवा मई ममत भुलानी ।। जोवन गरव न मैं किछु चेता। नेह कि जानौ सावकि सेता ।।" इस रोमाचित अवस्था के उपरात पूण मिलन की स्थिति पाती है। रत्नसेन का पद्मावती से मिलन पूण तादात्म्य (Untive) की स्थिति है। मिस इयालिन अउरहिल ने साधक (प्रेमी) की उपयुक्त पांच स्पितियाँ बतायी हैं । यह स्थितियां ऐसी हैं जो समा यत सभी रहस्यवादी प्रेमी सापको में लक्षित की जाती हैं। कितु साधक एव परिस्थिति भेद के अनुसार यह स्थितियां अधिक भी हो सकती हैं। साधक को मन स्थितियां पांच ही हा, ऐसा आवश्यक नहीं। पूण एक्त्व को मन स्पिति प्राप्त करने तक अनेक जायसी प्रथावली, प० २७ । २ वही, पृ० १३२ । ।
जायसी की प्रेम पद्धति तात्विक मीमांसा । ९९ मानसिक स्पितियां हो सकती हैं।" वस्तुत प्रेमी साधक की मन स्थितियों का अध्ययन अत्यन्त पठिन विषय है। उपयुक्त विवेचन रहस्यवादी साधना में निरुपति मानसिक विकास की अवस्थाओं को ध्यान म रखकर किया गया है। प्रिय की ओर उ मुख होने की स्थिति स लेकर उसके व्यक्तित्व में लय होने की स्थिति तक जाने कितनी मानसिक दगाओ स साधक को गुजरना पड़ता है। भारतीय प्रेम-पद्धति मे पूर्वानुराग के अतगत ही सभी कामदशाओं का वणन किया गया है । यदि हम चाहें तो उन सभी दशाओ का अन्तर्भाव इसक अतगत कर सकते हैं। प्रिय से मिरने की अभिलापा, चिता स्मरण, जिनासा, भय, लज्जा, सफ्ल्प विकल्प, स्वरूपामास, दिवास्वप्न, औत्सुक्य आदि अनेक दगाएँ प्रेमी मन के साथ जुड़ी होती हैं । जायसी के प्रेम पाव्य म ही यदि 'रत्नसन' और 'पद्मावती' इन दोनो पात्रो को प्रतिक्षण की मानसिक स्थितियो का विवरण प्रस्तुत किया जाय तो प्रमिया के मनोविमान की अच्छी जानकारी हो सकती है। यहां हम इतना ही कहना चाहेंगे कि प्रेमी साधक की जितनी भी मन स्थितियां क्यो न हा वह सब 'प्रम' की बद्रीय चेतना से नित्रित होती हैं । १ मध्ययुगीन काव्य साधना डॉ० रामचद्र तिवारी ५० १२१ । ।
३ प्रेम का स्वरूप : आध्यात्मिक या लौकिक महाकवि जायसी सूफी स त थे और सूफियो में ईश्वर की कल्पना 'प्रेम के रूप मे ही की जाती है। 'पद्मावत मे जिस प्रेम की व्यजना की गयी है, उसके विषय म विद्वानो का मत है कि यह लौकिक प्रेम न होकर अलौकिक या आध्यात्मिक म है और राजा रत्नसेन और राजी पद्मावती की प्रणय कथा लौकिक प्रणय कथा न होकर आत्मा और परमात्मा के मिलन की कथा है। कुछ विद्वानो का मत है कि पद्मावत' म कवि आध्यात्मिक प्रेम की व्यजना करने म असफल रहा है। अतएव पद्मावत की कथा सैविक प्रेमकथा ही है । आध्यात्मिक प्रेम की व्यजना--लौकिक प्रेम वणन द्वारा आध्यात्मिक प्रेम की अभिव्यक्ति आचाय रामचद्र शुक्ल के अनुसार जायसी का पद्मावत एक प्रेमगाथा है पूण जीवन गाथा नही। जायसी ऐकातिक प्रेम का गूढता और गम्भीरता के बीच बोच में जीवन के और अगो के साथ भी उस प्रेम के सम्पब का स्वरूप कुछ दिग्वाते गये है इससे उनकी प्रेमगाथा पारिवारिक और सामाजिक जीवन से विच्छिन्न होने से बच गयी है। पर है वह प्रम गाथा ही पूण जीवन गाथा नहीं। पद्मावत का पूर्वाद्ध प्रेम के विवरण से परिपूर्ण है और उसमे प्रेम भाव का जसा उत्क्प दष्टिगत होता है वह स्वयं मे श्रेष्ठ एव महान है । पद्मावत में जिस प्रेम की यजना की गयी है उसके सम्बघ में विद्वानो का मत है कि यह लौकिक प्रेम न होकर लौकिक अथवा आध्यात्मिक प्रम है । रलसेन और पद्मावती को क्था लौकिक प्रेम कथा न होकर जीवात्मा और १ जायसी प्रथावली-मा० रामचद्र शुक्ल-ना० प्र० सभा, काशी, पृ० ३० प्रेम का स्वरूप आध्यात्मिा या लौक्वि । १०१ - २ परमात्मा के मिलन की क्या है, जिसम लौविक प्रेम की व्यजना द्वारा आध्या त्मिक प्रेम व्यजना करना ही कवि का एक्ष्य रहा है। 'आचाय हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत है कि जायसी ने पद्मावत में जिस उद्दाम प्रेम या वणन किया है, वह आदश और ऐक तक प्रेम है। उसम लोक मर्यादा या अतिश्रमण दोष नही, गुण समझा जाता है। यह प्रम सोद्देश्य भी है। लोविष प्रेम के बहाने कवि सदा अलौविव' सत्ता की ओर इशारा करता रहता है । आचाय शुक्ल + अनुसार इस य। य म एक प्रब घ के भीतर गुदभाव (रतिभाव) के स्वरूप का ऐसा उत्कप जो पार्थिव प्रतिब घो से पर होकर आध्यात्मिक क्षेत्र म जाता दिखायी पडे जायसी का मुख्य लक्ष्य है। 'डा. कमर कुलश्रेष्ठ ने भी इसी प्रकार का विचार व्यक्त किया है। उनके अनुसार इसमे 'जो प्रेम की व्याख्या की गयी है, उसम जहाँ गरीर पक्ष की अवमानना पर सूक्ष्मता की कोर कवि की लेखनी चल देती है वहाँ ऐसा प्रतीत हान लगता है, कि मानो ववि आध्यात्मिक प्रेम की झावियो हम दे रहा है ।" डा. रामकुमार वर्मा के शगे मे भी जायसी ने अपन पद्मावत' की क्या म आध्यात्मिर अभिन्यजना रखी है। सारी कथा के पीछे मूपी सिद्धातो की रूपरेखा है ।" कवि ने पद्मावत में प्रम माग उसका महत्व और प्रेम माग वी वाघाआ या स्थान स्थान पर वणन किया है। जिसका वणन हम परवर्ती परिच्छेदा मे करेंगे । जायसी मे आध्यात्मिक प्रेम की यह व्यजना हम तीन रूपा म प्राप्त होती है-(१) रूपक द्वारा (२) क्या प्रसगो में जलौकिकता की ओर सकत द्वारा और (३) सूफी मत के अनुकूल प्रेम की यजना द्वारा । यहाँ प्रमश इन पर विचार किया जा रहा है--- (१) रूपक द्वारा आध्यात्मिक प्रेम की व्यजना 'पद्मावत' में रवि ने रत्नसेन और पद्मावती की साधारण लौकिक कथा द्वारा आत्मा और परमात्मा के आध्यात्मिक मिलन की यजना की है। रत्नसेन को साधक और पद्मावती को ईश्वर के रूप में चित्रित किया है और इस प्रकार बतलाया है कि रत्नसेन को पदमावती तक पहुँचाने वाला प्रेम जीवात्मा १ हिदी का य के आलोक स्तम्भ-हा० शाति स्वरूप गुप्त ५०१४ २ मध्यकालीन धम साधना-आ० हजारी प्रसाद द्विवेदी, प० २५५ ३ जायसी प्रथावली-आ० रामचद्र शुक्ल, पृ० ३० ४ हिदी प्रेमाख्यानक का य-डा० कमल कुलश्रेष्ठ, प० ३८१ ५ हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास-डा० रामकुमार वर्मा प० ३११ १०२ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण को परमात्मा तक पहुंचाने वाला प्रेम है। प्रेम पथिक रत्नसेन में सच्चे साधन भक्त का स्वरूप दिखाया गया है। इस अप्रस्तुत अथ की यजना के लिए कवि ने 'पदमावत' के अत में एक साकेतिक मूत्र दे दिया है । जो इस प्रकार है-- तन चितउर मन राजा को हा' हिय सिंघल बुधियदमिनि चीहा ।। गुरु सुआ जेइ पय देखावा । विनु गुरु जगत को निरगुन पावा ।। नागमती यह दुनिया धघा । वाचा सोइ न एहि चित बंधा ।। राघव दूत सोइ सतानू । माया अलाउदी सुलतानू ॥ प्रेम क्या एहि भौति विचारहु । बूझि लेहु जो बूथ इस सून के अनुसार तन रूपी चितौर गढ़ के मन रूपी राजा रत्नसन को हियरूपी सिंघल में पद्मिनी ही ईश्वर से मिलाने वाली बुद्धि है जिसकी प्राप्ति का पथ बताने वाला ही रामन शुक गुरु है । राघव चेतन शतान है जो प्रम का उचित माग न बताकर मन का इतस्तत भ्रमित करता । अलाउद्दीन माया का ही रूप है । अयत्र भी कवि ने आध्यात्मिक्ता के इस आरोप की घोषणा पारहु ।।" की है-- २ 'कहा मुहम्मद प्रेम कहानी । सुनि सो ग्यानी भये ध्यानी॥ कवि की ये उक्तियां प्रमाणित करती हैं, कि उसे अपने काय म आध्या त्मिक व्यजना अभीष्ट है। (२) क्था प्रसगो मे अलौकिकता की व्यजना प्रारम्भ मे ही यह कहा जा चुका है कि कथा के बीच-बीच मे जायसी प्रेम की अलौकिकता की ओर भी इगित करते चलते हैं। इस प्रकार के स्थलो में अघोलिखित का उल्लेख विशेष रूपेण किया गया है । जिसमे प्रेमकथा की अलौकिकता और बालोषिक प्रेम की यजना स्पष्टरूपेण उभर कर सामने आती है- (क) घटनाएं-- (१) हीरामन शुक् के मुख से पदिमनी का रूप वणन और सदेश सुनकर रत्नसेन का मूछित हो जाना। (२) रत्नसेन की सिंघल यात्रा। (३) रत्नसेन पदमावती मिलन । १ जायसी प्रथावली-पृ० ३०१ २ वही, पृ० प्रेम का स्वरूप आध्यात्मिक या लौकिक । १०३ (ख) वणन-- (१) "सिंघलगढ़ वणन' जिसमे पदमावती का निवास स्थान सातवें खण्ड पर बतलाया गया है। (ग) सवाद-- (१) 'सात समुद्र खण्ड' में राजा सुआ सवाद । (२) 'पदमावती रत्नसेन भेट सण्ड' म पदमावती तथा सखियों को वार्ता । इन प्रसगो मे से कुछ के उदाहरण द्रष्टव्य हैं--- "आवत जग बालक जस रोआ । उग रोइ 'हा ज्ञान सो खोवा ॥ हों तो अहा अमर पुर जहाँ । इहाँ मरनपुर आएउ कहाँ ॥ केइ उपकार मरन कर कीन्हा । सकति हकारि जीउ हरि लीहा ॥' रत्नसेन के बेसुध हो जाने पर ध्यान (मूछितावस्था) मे उसे परम ज्योति के सामीप्य को जो आनदमयी अनुभूति हो रही थी, उपयुक्त पक्तियो मे उसीका वणन है । रत्नसेन का पदिमनी क ध्यान मे वसुध हो जाना कह कर यहाँ कवि ने साधक भक्त की समाधि द्वारा ईश्वर सान्निध्य की सुदर अभि व्यजना की है। 'देखि मान सर रूप सोहावा । हिय हुलास पुरइनि होइ छावा ।। भा अघियार, रनि मसि छूटी । भा भिनसार किरिन रवि फूटी ।।" इन पक्तियो में राजारत्नसेन के सातवें समुद्र में पहुंचने पर दुख की सारी छाया का घट जाना, आनद का प्रसार होना, सूय किरण का उदय होना, कहकर साधक का अपनी साधना के फल के निकट पहुंचना, तत्क्षण सारे सतापो और भ्रमो का दूर हो जाना और आत्मा का अपनी शुद्ध स्वरूप की ओर अग्रसर होना ध्यजित हुआ है । इनसे यह पूणरूपेण प्रमाणित होता है कि जायसी की प्रेम कथा म अलौकिक प्रेम की ही व्यजना है लौकिक प्रेम को नही। (३) सूफीमत के अनुकूल प्रेम व्यजना सूफीमत अघविश्वास प्रधान शुष्क इस्लाम धम की प्रतिक्रिया के रूप में उदय हुआ था । इस्लाम धम की बौद्धिकता के ब धन से अलग भावुक सूफियो ने एक ऐसे मत की प्रतिष्ठा की थी जिसमे अलौकिक भक्ति के साथ साथ लौकिक रति को भी महत्व प्रदान किया गया। किंचित्काल पश्चात लौविक १ जायसी प्रथावली-१० ४९-५० २ वही, पृ० ६७ १०४ । सूफी पदि जायसी वा प्रेम निस्पण । रति ये ही प्रति इनका रगाव रह गया और अलौषिष रति शी भावना नाम मात्र योगेष रह गयी। रति भावना का सम्बघ मोदय और प्रेम से है। अतएव सूफीमत मे ईश्वर (हप) की कल्पना या तो सौप के रूप में की गयी या प्रेम प में। जायसी म इन दोना रूपो का पूरा पूरा प्रभाव दिसायी पडता है । जिरा सुविधा प लिए दो रूपो में रखकर देखा जा सकता है-(१) सैविक सौय वणा द्वारा अलौविर सोदय की व्यजना, और (२) प्रेम और विरह या व्यापक वणन । (१) लौकिक सौ दय वणन द्वारा अलौकिक सौदय की व्यजना रूप सौन्य ही सारी आरयायिका का आधार है । अतएव जायसी ने पदमावती के रूप वा वडाही विस्तत वणन किया है। यहाँ भी कवि लोविर सोदय का चित्रण करत करत अरविव सौदय की ओर बढ़ जाता है । मूफी मावना के अनुक जायसी का सौंग्य चित्रण प्राय अलौकिक ही है । जायसी का समस्त नखशिख यणन अपना आध्यात्मिक अथ रखता है और इस रूप में प्रेम का मूलाधार यह अलौविक रूप वणन जायसी की आध्यात्मिक प्रेम व्यजना को स्पष्टत प्रक्ट करता है । सि प्रकार राजा रत्नसेन रानी पद्मावती के अपूर्व सोदय पर मुग्ध होता है, उसी प्रकार भक्त हत्य भी परमात्मा के सोदय पर मोहित होता है। रत्नसेन की मुग्धावस्था का चित्रण भी कवि ने उसी रूप में दिया है जिस प्रकार ब्रह्म के साक्षात्कार की स्थिति में भक्त की दगा होती है। पदमावत में पदमावती ईश्वर का प्रतिस्प है। उसका सौदय अपरिमेय है अलौक्कि है और दिव्य है जिसमे वणनमात्र से राजा की यह दा हो जाती सुनतहि राजा गा मुरझाई । जानौं लहरि सुरुज आई ॥"" कवि ने इस अलौकिक रूप के साक्षात्कार की अनुभूति को जिस रूप मे चित्रित किया है वह भी ब्रह्म साक्षात्कार की अनुभति से मेल खाती है और पाठको को सोन्य की लोकोत्तर भावना म मग्न करने वाली है। सोदय को लोकोत्तर यजमा करने के लिए जायसी ने इस प्रकार के उप मानो को ग्रहण क्यिा है जो सात सौ दय की ओर सकेत करते हैं । निम्नाक्ति पक्तियो म पदमावती के रूप वणन में सौ दय की यह लोकोत्तरता द्रष्टय है- वचन रस क्सौटी वसी। जनु छन मह दामिति परगसी ॥र १ जायसी प्रथावली-प०४० २ वही प०४१ प्रेम का स्वरूप आध्यात्मिक या रोकिक । १०५ - जायसी के सौदय पणन की एक अ य विशेषता है सौ दप पे सप्टिप्पापी प्रभाव की कल्पना जिससे उसकी लोकोत्तरता प्रमाणित होती है । पदमावती के केसा की कालिमा के प्रभाव से स्वग और पाताल मे तिमिर छा जाता है। उसके नेत्रों की पुतलियो के होलने से ससार डोलने लगता है और उसके मदमृदु हास से शुभ्र उज्वल गोमा अनेक रूप धारण करके सरोवर के मध्य में फल जाती है-- 'नी छोटि बार जो वारा । सरण पतार होइ अंधियारा ॥" + + 'नैन जो नेसे क्वल भये निरगर और सरीर । हसत जो देमे हम भए दसन जोति नगहीर ।" पद्मावती के इम सौदय म एव विचित्र पवित्रता है एक अलौकिक आनद विधायक विशेषता है जिसके साक्षात्कार मात्र से अज्ञान का अ धकार अदृश्य हो जाता है । जम जमातर के पाप घुल जाते हैं । एक अन्य स्थान पर जायसी कहते हैं कि दीस पडने वाली, उम परम ज्योतिस्वरूप पदमावती की ज्योति स ही जगत् मे नीख पड़ने वाली ज्योतियो निर्मित हुई हैं। पदमावती के दातो की ज्योति से सूय, चद्र, नक्षत्र, रत्न, हीरे, माणिक्य, मोती आदि ज्योतिमय पदार्थों ने ज्योति प्राप्त की है। "जेहि दिन दसन जोति निरयई । बहुत ह जोति जोति ओहि भई ॥ रवि ससि नसत दी ह ओहि जोती। रतन पदारप मानिक मोती।। जह जह विहसि सुभावहिं हसी। तह तह छिरवि जोति परगसी ॥ इसी प्रकार चद्र और सूय पद्मावती के ललाट की चमक ये पारण निमल हैं- "ससि ओ सूर जो निरमा तेहि ललाट को ओप।" इसकी नासिका की सुई घ से ही पुष्प सुर्गा धत जाते हैं- अस वह फूल सुवासित भपउ नासिका वध । जेत फूल ओहि हिरकहिं ति ह वह होइ सुगध । - . १ जायसी प्र यावलो-पृ० ४१ २ पदमावत-वासुदेवशरण अग्रवाल सदन चिरगांव, झांसी ५० ७५ पद्मावत वासुटेद गरण अग्रवाल-प० १२१ ४ वही प० ५९६ ५ जायसी प्रयावली-पृ० २१२ १०६ । सूफी कवि जायसा का प्रेम निरूपण परमात्मा को परमसत्य, परमसत्ता मानन के अतिरिक्त सूफी यह भी मानते हैं कि वह परम कल्याण और परम सौ व्य है । सूफी कहते हैं कि वह सष्टि दपण सदश है जिसमे उस परम सौ दय के गुण प्रतिबिम्बित होत हैं। फारसी के प्रसिद्ध सूफी कवि जामी की कविता म यह बात अत्यत सुदर ढग से पही गयी है। जामी की कविता मे कहा गया है कि तुम परम सत्ता हो और सभी कुछ मरीचिका मात्र है क्योकि तुम्हारी सष्टि में सभी वस्तुएँ एक है । सम्पूण सष्टि को मुग्ध करने वाला तुम्हारा सौ दय अपनी पूणता को प्रकाशित करने के लिये, हजारो दपणो प्रतिभासित होता है । लेकिन वह (मी दय) एक ही है। ' पदमावती के इसी रूप का वणन जायमी निम्नाक्ति पक्तियो म करते हैं- कहा मानसर चहा मो पाई । पारस रूप इहा लगि आई ।। भा निरमर त ह पायन परस । पावा रूप रूप के दरस ।। मल समीर वास तन आई । भा सीतल ग तपा बुझाई ।। + + + + विगसे कुमुद देखि ससि दखा । मैं तेहि रूप जहां जो देखा । पाये रूप रूप जह चह । ससिमुख सब तरपन होइ रह ।। नन जो दखे क्वल भए निरभर नीर सरीर । हसत जो देख हस भए दसन जाति मगहीर ।। उपयुक्त पक्तियो मे कवि ने विम्ब प्रतिबिम्घ भाव का अत्यन्त सुदर निदशन किया है । पद्मावती विम्ब है उसीका प्रतिविम्ब जगत है अर्थात उसीकी प्रतिच्छाया मे ससार व अय सब रूप बने हैं । इस प्रकार हम देखते हैं कि सौ दय के लोकोत्तर व्यजनाथ जायसी ने जो उपमान प्रस्तुत किये हैं व लोकोतर दि य सो दय की ओर इगित करते हैं। (२) प्रेम और विरह का व्यापक वणन सोदय को यही लोकोत्तर भावना प्रेम का मूलाधार है । इसीलिए मूफियो ने प्रम को अधिक महत्ता प्रदान की है। उनका कहना है कि प्रेम हृदय की माग है । वह पूर्णत्व की प्राप्ति का मधुर सस्थान है । हृदय को एक ऐसे परम १ सूफोमत साधना और साहित्य उद्धत । डा० रामपूजन तिवारी, पृ० २५१ पर २ पपावत पृ०७४, प्रेम का स्वरूप आध्यात्मिक या लौक्कि । १०७ हृदय और व्यक्ति को एक ऐसे परम व्यक्ति की जरूरत महसूस होती है जिसके ससग म वह उस सीमा में मा जाना चाहता है कि वह अपने और अपने प्रेम के आश्रय के मध्य किसी दूसरे को उपस्थिति को सवथा अस्वीकार कर देता है । सूफिया को प्रियतम के गल का हार भी असह्य है । ऐसी दशा में अपन और प्रिययम के बीच किसी मध्यस्थ को वे यस बर्दास्त कर सकते हैं ? इस दशा मे बाहर भीतर सवत्र उमे प्रियतम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखाई पडता । उसकी प्रवृत्ति सबकी उपेक्षा सरस स्वच्छ द रूप से प्रियतम मे ही एकात भाव से सग्निविष्ट हो जाती है । इस प्रकार समस्त मानवीय मूल प्रवत्तियो म काम अर्थात रतिभाव सर्वाधिक व्यापक एव महत्त्वपूर्ण है। रति और प्रीति नाम की दो भार्याए हैं ।' जो क्रमश ारीरिक सुख और मान- सिक परितप्ति की विधायिका हैं । इससे स्पष्ट है कि रति मे 'स्व सुखीभाव की तीव्रता होती है कि तु प्रीति में 'त सुखीमाव की प्रधानता रहती है। तात्पय यह है कि कामवासना ही परिप्कृत हाकर प्रेम के प्राणोत्पादक मनो हर पुष्प के रूप में विकसित हो जाती है । ' सूफियो के अनुसार यह प्रेम विरह विशिष्ट होता है । जायसी के प्रेम और विरह में इ हो व्यापक रूपो को अभि व्यक्ति हुई है । प्रेम का यह वणन दशनीय है- सुन धनि । प्रेम सुरा के पिए । मरन जियन उर रहै न हिए। + सोप जान पिय जो कोई।पीन अघाइ जाइ परि सोई॥ रातिहु दिवस र रस भीजा । लाभ न देख न देख छीजा ।" इस प्रेम से छक कर वह जगत की ओर कुछ नही देखता । जव देखता है तब उसी परम प्रियतम को- परगट गपुत सरल मह पूरी रहा सो नाव । जह देखो तह ओही दूसर नाहि जह जाव।। सूफी मत मे अह भाव को साधक के लिए सबसे बड़ा दात्र कहा गया है और उस पर विजय पाने की बात कहा गयो है । जिसस हूँ और में का भाव समाप्त हो जाय--- हो हो कहत सबै मति खाइ। जो तू नाहि पाहि सब कोई॥ १ 'कामस्य तु भायें रतिश्च प्रीतिश्च २ वही ३ जायसी न थावली पृ० १४१ । ४ वही, पृ० १०५।
१०८ । मूफी कवि जायसी या प्रेम निरूपण ४ - आपुहि गरू सो आपुहि चेला । आपुहि सव ओ आप अकेला ॥ इसके लिए प्रम ही एकमात्र साधन है । जायसी रहते हैं कि तीनो लोर और चौदहा भुवन में प्रेम के अतिरिक्त कुछ भी मुटर नहीं है- तीनि लोर चौह सह सब पर मोहि सूझि । प्रम छाडि क्छि और न लोना जो देसी बूशि ।। यह प्रेम का खेल अस्पत कठिन और दुखदायी होता है लेकिन जो इस खेल को खेल रता है वह दोनो लोको म तर जाता है- "मरेहि पेम है कठिन दुहला । दुइ जग तरा पेम जेइ खेला ।। इस प्रेम के द्वारा हो वह ऐसे लोग को प्राप्त कर सकता है जहाँ न मृत्यु है न दुख- तिह पावा उत्तिम कविलासु । जहा न मीच सदा सुख ताम् जायसी की निम्नलिखित पक्ति में कहा गया है कि दुख के भीतर ही प्रेम का मधु है । जो दुख और मरण को सहता है, वही उसका रसास्वादन कर सक्ता है- दुख भीतर जो प्रम मधु राखा । गजन मरन सहै सो चाखा ।' कबीर की अघोलिखित पक्तियो स इसकी तुलना की जा सकती है । कबीर कहते हैं- कबीर इसणा दूरि करि करि रोवण सा चित्त । विनु रोयो क्यू पाइए प्रेम पियारा मित्र ॥" विरह को भी जायसो इसी रूप म चित्रित किया है। जायसी के अनु सार प्रेम मे अपार विरह होता है । उसके ताप से स्वग और पाताल भी जलते हैं । सूय विरहाग्नि मे जल कर ही काप रहा है । और अहनिशि जलता रहता नक्षत्र और तारिकायें भी उसी की विरहाग्नि मे विदग्ध होती हैं- 'विरह की आगि सूर जरि वापा । रातिहि दिवस जर ओहि तापा। सिनहि सरग खिन जाइ पतारा । थिर न रहै एहि बागि अपारा ।' १ जायसी ग्रथावली १० ९३ । २ वही पृ० ३९ । ३ वही प०४०। ४ वही, ५०६२। ५ वही, पृ०४०। ६ कबीर मपावली, डॉ. माताप्रसाद गुप्त, पृ० १७ । ५ जायसी न पावली, पृ०७८ ।
प्रेम का स्वरूप आध्यात्मिक या लौकिक । १०९ आचाय रामचद्र शुल जायसी में विरह के विषय में लिखते हैं कि- 'जायसी का विरह वणन कही कही अत्यत अत्युनिपूण होने पर भी मजाक की हद नक नहीं पहुंचने पागा है । उसमें गाम्भीय बना हुआ है। इसकी अत्यु तियां बात की रामात नही जान पडता, हृदय की अत्यत तीव्र वेदना के शकर सकेत प्रतीक होती है। सूफिया का विश्वास है कि भगवान ही प्रेम है और अपन आनद के लिए वह उस मानव मानस मे उत्पन करता है। अपने प्रेमियो में अपने ही लिए वह प्रेम को परोहर की तरह रख छोडता है। इस प्रेम को प्राप्त कर प्रेमी और प्रमास्पद दोनो ही मतुष्ट हाल हैं। प्रेम क माध्यम से प्रेमी साधक के हृदय की वासनाए समाप्त हो जाती हैं और उनके अतिद द समाप्त हो जाते हैं । वह अपने माग में अग्रसर होता है और उसे परमात्मा के दान हो जाते हैं । उस समय उसके प्रेम की -याकुलता चरम सीमा पर पहुंच जाती है । इस प्रकार हम देखत हैं कि सूफी साधना का आदि भी प्रेम में ही होता है और उसकी परिणति भी प्रेम मे ही होती है । इस प्रेम में विरह की वेदना और प्रम का आनद भी गाश्वत बना रहता है। सूफियो के प्रेम को पीर' यही है । जायसी नै बराबर इस विरह और प्रेम के पोर को चर्चा की है । यह विरह और पीर सूफी साधको का सम्बल है। वे मानते हैं कि परमात्मा से मिलन को यह पाक्लता समस्त प्रकृति मे परिव्याप्त है। "प्रेमहि माह विरह औ रसा । मैंन के घर मधु अमित बसा।'' जिस प्रकार मधुमक्षी दे छत्ते म शहद और मक्खी दोनो ही होते हैं उसा प्रसार परमात्मा के प्रेम में आन द और माधुय दोनो ही हैं। सदैव विरह- व्याकुलता तथा मिलन की उत्कट अभिलाषा भी है। रत्नसेन की दशा का वणन करते हुए जायसी कहते हैं- जेहि के हिये पेम रग जाया । का तेहि भूख नौद विसराया। वन अधियार रनि अघियारी । भाला विरह भएउ अति भारी ॥ साथ ही प्रेमी को विरह के माप से जलते हुए आज म उस प्रेम का निर्वाह करना होता है उसके लिए भी और भय नाम की कोई वस्तु नहीं रह जाती। उसे मुरा दुख की परवाह नहीं होती है। जामसी कहते हैं- १ जायसी प्रथावली भूमिका भाग २ वही ५०७१। १ जायसी प्रभावली, पृ०५८।
११० । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण . 'कठिन वियोग जोग दुख दादू । जरतहि मरताह और निवाहू । डर लज्जा तह दुो गवानी । देव क्छु न आगि नहीं पानी ।।' इस प्रकार जायसी न जागतिक समस्त यापारो को प्रेम के आध्यात्मिक स्वरूप की छाया के समान ही दिखाया है । वियोग पक्ष मे भी वही वियोग अलौकिक रूप म सप्टि व्यापी प्रभाव के साथ चित्रित किया गया है । विरह के शुद्ध भाव लोक में अग्नि पवन इत्यादि सब उस प्रिय (ईश्वर) तक पहुचने के लिए यक्त दिखायी पडते हैं । सारी सष्टि उसी परम तत्व म लीन हान के लिए विह्वल रहती है और अतत उसी मे विलान हो जाती है । जायसी की आध्यात्मिक प्रेम व्यजना का मूल्याकन जिन तीन रूपो-रूपक द्वारा, कथा प्रसगा मे अलौकिकता की ओर सकेत द्वारा और सूफी मत के अनुकूल प्रेम व्यजना द्वारा के माध्यम से जायसी ने अलोक्कि प्रेम की व्यजना की है पदमावत के सम्पूण प्रेम वणनो म आध्या त्मिकता का आरोप नहीं किया जा सकता । जायसी ने जो रूपक कोश दिया है, वह पद्मावत की कथा पर पूणरूपण चरिताथ नही होता है क्योकि पना वती (बुद्धि का) और नागमती (दुनिया घधा का) विरोधी प्रवत्तियो का प्रतीक हान पर भी अत मे दोनो ही रत्नसन के साथ चिता में जल कर भस्म हो जाती है। पदमावती को परमात्मा मानन पर कथा के अधिकाश प्रसग अनुपयुक्त लगने लगते है । जहाँ तक कथा प्रसगो के मध्य में अलौकिकता के सवेत का प्रश्न है, वे प्रसग पदमावत के पूर्वाद्ध के ही हैं । उत्तराद्ध से उनका काई सम्बध नही है। प्रम और विरह का यापक वणन तथा लौकिक सोदय वणन द्वारा अलोक्कि सोदय की व्यजना भी आशिक रूप में ही हुई है। मागमती के विरह वणन तथा सयोग शगार के अनेक प्रसगो मे अलौकिकता की छाया भी नहीं प्राप्त होती है । इस सम्बघ म डा. रामकुमार वर्मा का कथन महत्वपूर्ण है। जायसी ने अपने पदमावत की कथा में आध्यात्मिक अभिव्य जना रखी है पर जायसो इस आध्यात्मिक सकेत को पूर्ण रूप से नही निवाह सके और अधिकारी म 'पदमावत मे चित्रित प्रेम का स्वरूप अलौकिक न होकर लौकिक हो गया है । 'पदमावत मे चित्रित प्रम की लौकिक्ता का निदशन प्रस्तुत करने के १ जायसी प्रयावली प०६० । २ हि दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास रामकुमार वर्मा पृ० ३११। ३ प्रेम का स्वरूप आध्यात्मिक या लौक्कि । १११ " लिए उसके कुछ स्थलो की ओर सकेत करना पर्याप्त होगा। जहाँ तक प्रारम्भ में प्रेम के अनुभूति का प्रश्न है वह लोकोत्तर लगती है परतु उसके बाद पदमावती रत्नसेन के मिलन प्रसगो से लेकर जत तक प्रेम का जो स्वरूप दिखाया गया है वह लौकिक प्रेम से भिन नहीं है। पारसी शैली और भाव भगिमाओ के प्रभाव से प्रेम प्रमगो मे कवि ने वासना के विविध चित्र अकित पिये हैं और कही कहीं तो उसकी लेखनी शृगार के अत्यधिक विलासमय वणन प्रस्तुत करती है। एक चित्र द्रप्ट य है- 'तस होइ मिले पुस्प औ गोरी। जस विछुरी सारस जोरी ।। रची सारि दूनो इन मामा । होइ जुग जुग आवहिं कविलासा ॥ पिय धनि गही दी ह गलवाही । घनि विछरी लागी उमराहीं ।। से छवि नवरस वेलि मगही। लोका लाइ अधर रस लेही ।। इस चित्र मे वणित प्रेम लौकिक प्रेम के चित्र से किसी भी प्रकार अलग नही किया जा सकता । पदमावती युवावस्था को प्राप्त हाने ही तोते से कहती है- "मुनि हीरामन कहीं बुझाई । दिन दिन मान सतावे आई ।। जोवन मोर भय जस गगा। देह देह हम लोग अनगा ।। रत्नसेन ये सिंघलगट में पहुचने के पश्चात भी पदमावती को कामवासना एव योग लिप्सा म विह्वल मुवती के रूप में दिसाया गया है । उससे स्पष्ट है कि पदमावती का प्रेम सवथा लौकिक स्तर का है। उसी को देखते हुये डा. विमल कुमार जन न लिखा है । पदमावती की क्या में जो नखशिख वणन प्रेमावेग तथा एसी ही अय बातो का वणन है उसमें आध्यात्मिक पक्ष कुछ घरका सा लगता प्रतीत होता है।' इस प्रकार जायसी के सयोग वणन में पदि शारीरिक उल्लास का मादक वणन आध्यात्मिक प्रेम को आघात पहुंचाता है तो उनका वियोग वणन भी ( विशेषत नागमती का विरह चित्रण) इतना लोकिर और मानवीय है कि उसे आध्यात्मिा नही रहा जा सकता। डॉ० रामकुमार वर्मा के नना में "इतना कि तो ठीक है कि रत्नसेन और पद्मावती का मिलन होता है जहाँ तक किया और बदे का एकीकरण है पर जहाँ रत्नसेन और परमावती के अश्लीलता की सीमा को २ १ जायमी पपावली पृ० १४० । २ वही पृ० २१ । ३ हिती प्रमाम्यानर काम डॉ. विमलकुमार जन, पृ० २८१ ११२ । सूफी पदि जायसी का प्रेम निरूपण २ 7 स्पश करता हुआ शृगार वणन है, वहां आध्यात्मिाता को किस प्रकार घटित किया जा सकता है। अतएव जिस प्रकार सागर की एक दो लहरें पूरे सागर का प्रतिनिधित्व नही परती उमी प्रकार, कुछ प्रसगो म अलौकिक प्रेम की यजना होने पर भी पद्मावत' को अलौकिक प्रेमका य नही कहा जा सकता । वह लौविक प्रेमकाव्य नहीं कहा जा सकता। वह लौकिक प्रेम काव्य ही है । आगे जायमी की लौक्ति प्रेम व्यजना के विवेचन से इस फ्यन की पुष्टि स्वयमेव हो जायगी। जायसी के प्रेम चित्रण को लोपित मान लेने पर भी उसका महत्त्व कम नहीं होता । यह अपने लौकिक रूप में भी प्रेमी म त्याग एव उत्सग का भाव जगाने वाला है। यह उलट प्रम प्रेमी को न जीने देता है न मरन देता है- कठिन मरन ते प्रेम विवस्था । ना जिउ जिए न दसय अवस्था। कबीर ने भी इसी प्रेम के लिए कहा-- प्रेम छिपाया ना छिर जा घट परगट हाय । जो प भरव बाल नही नन देत हैं रोय ।। यही प्रेम रलसेन का है । इसम सदेह नहीं कि यह प्रेम कामजनित है परतु कामजनित होने पर भी प्रेम में इतनी तीव्रता असागरण वस्तु है । एक स्त्री के लिए माता के ममतापाश को अपरिपक्व धागे की भांति तोडकर इत स्तत बन-वन म भटकना सात समुद्र पार कर जाना हिंसा शस्त्र के बल पर नही प्रत्युत अहिमा और प्रम के अस्त्र के बल पर अपरिचित देश मे जाकर स्पष्ट कहना कि-- 'पद्यावत राजा की वारा हौं जोगी ताहि लागि भिखारी" रलसेन का वर्षा आतर एव गीत का अनुभव करते हुए प्रेम में योगी बनकर सारे राजकीय सुखो का परित्याग करना अपने आप महत्त्व रखता है । वह लौकिक प्रमी ध य है जिसका प्रेम इस प्रकार का है। इस प्रकार के प्रम का उद्देश्य, जायसी की दृष्टि मे दो जीवनो का एकी करण है । यह एकीकरण उद्वाह की सस्था द्वारा सम्प दित किया जाता है १ हिगे साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास डा० रामकुमार वर्मा प० ३११। २ जायसी ग्रयावली पृ०४९ ३ कबीर प्रथावली ५० ३० ४ जायसी प्रथावली प० ९४ प्रेम का स्वरूप आध्यात्मिक या रौकिक । ११३ परतु उद्वाह का कोई भी प्रभाव इस प्रेम पर नहीं पडता । पद्मावती विवाह पूर्व ही रत्नसेन की मूली का समाचार सुनकर सदेश सम्प्रपित करती है कि 'यदि तुम जीवित रहोगे ता म भी तरे सा जीवन धारण करूंगी और यदि तुम न रहे तो म भी नहीं रहेगी। मैं अपने प्राणा का हथेली पर लिय प्रतीक्षा पर रही हूँ-- 'काढि प्रान वठी नेइ हाथा । मरे तो मरों जिओ एक साथा ॥' इतना ही नही प्रत्युत् विवाहापरा त भी वह लक्ष्मी स कहती है कि तुम मुझे उसी घाट की गार प्रवाहित कर दो, जहाँ पर मेरे प्रियतम हैं । मेरे लिये तुम अग्नि प्रज्वलित कर दो। मैं जलकर मर जाना चाहती हूँ। सारस की जोडी बिछुड कर कदापि जीवित नही रह सक्ती- "वारि होइ परी पुनि पारा । देहु बहाइ क्त जेहि धारा । को मोहिं आगि देइ रचि हारी। जियत न बिछुर सारस जोरी ॥' रत्नसेन के बदी बन जाने पर वह गोरा-बादल से क्तिो विनय स्वर मे कहती है कि दुख का पप ऐसा बढ़ गया है कि रोके नही हकना । उसकी जह पाताल, में और गाखाएँ आका गामी हो गयी है । उसकी छाया सारी पृथ्वी पर फैल गया है । विरह की वलि सजूर जसी ऊंची हो गयी है । जायसी कहते हैं- 'दुख बरखा अब रहै न राखा । मूल पतार, सरग भद सासा ।। छाया रहा साल महिं पूरी । विरह वलि भइ वाढि पजूरी।। सूय को ग्रहण न ग्रम लिया है । अर कमल क्या कर । मैं मा वहाँ जाऊगी जहाँ प्रियतम गये हैं-- मूरज गहन रासा केवलन बंट पाट । 'हूँ पथ तेहि गवनव क्स गय जहि वाट ।' और जिस प्रकार जलने हा यक्षागह म साहस बरये भाम प्रविष्ट हुय थे और प्रविष्ट हार “हान रक्षा को थी तुम भी वसा ही करा- जग जरत लमा पर माहम दीहाभाउ । जरत सम्म तरा वादक पुरपारप 13॥ . १ जायसी प्रयावली १० ११३ २ वही, पृ० १७७ ३ वही, पृ. २८. ४ वही पु० २८० ५ दहा, पृ०२८१ ११ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण विवाहोपरात रत्नसेन लक्ष्मी के छल पर कहता है कि मैं भ्रमर हूँ मालती पुष्प को गध स ही पहचान लेता हूँ- 'मैं ही सोइ भवर ओ भोजू । लेत फिरी मालित कर खोजू ॥" तुम क्या रदन कर रही हो। तुममे वह रूप तो है परतु ग घ तो नहीं - माना कि १ का तुइ नारि बठि अस रोई । पूलसोइ पं वास न सोई ।।" और मे तो सुगन्ध पर मरन वालों म हूँ। किसी दूसरे पुष्प की ईहा ही नहीं रखता-- 'हौं ओहि वास जीउ वलि दऊ । और फूल क वास न लेऊ ।। विवाह के पूर्व भी उसन पावती से कहा था कि अप्सरे । तुम्हारा रूप अतीव रमणीय है वितु मुझ तो दूसरे से वार्ता भी अच्छी नही लगती-- "मलेहि रग अछरी तोर राता । मोहिं दुसर सो भाव न वाता ।। मैं स्वग की भी कामना नहीं करता । म जिसके लिए मरता हू वही मेरे लिये स्वग है-- 'हों कविलास काह क करऊ ? साइ कविलास लागि जेहि मरऊ ।। इससे पूणरूपेण स्पष्ट है कि प्रम की तीव्रता पर विवाह का कोई भी प्रभाव नही पडा । उसकी शिखा पूर्ववत जल हो रही है और प्रेमी तथा प्रेमिका एक अनय भाव से परस्पर प्रम पर रहे हैं। यह प्रेम एकातिक है । इसका लक्ष्य भी प्रेम ही है कुछ और नही । यह दो यक्तियो का एक कर देने वाला प्रेम है । यह अन य प्रेम है । यह इतना उत्कट और गहन है कि प्रेमी को जीवन के सारे स दों में काट देता है । पकातिक्ता इसका गुण है दाप नहीं । प्रेम की इसी अन यता का वणन जायसी ने किया है । रलसन कहता है कि जिसका मन जिसमे बसता है वह उसी का आश्रय ग्रहण करता है। स्वण और सुहागा मिलकर एक-दूसरे से अलग नही हाते वरन तद्रूप हो जाते हैं-- १ जायसी प्रयावली, पृ० १८३ २ वही, प० १८३ ३ वही प० १८३ ४ वही, प० ९१ ५ वही प० ९१ ।
११६ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण प्रेम पथ मे इस प्रेम म और नायिकारब्ध प्रम मे कोई अतर नहीं है। दोनो प्रेम समान स्तर पर रखे गये हैं । नागमती स रत्नसेन कहता है-- 'नागमती तू पहिल विआही। कठिन विछोह दहे जनुदाही ॥ बहुत दिन पं आव जो पोऊ । पनि न मिल पनि पाहन जीऊ ।'' इमको म प्रम की प्रगाढता नही मानता । कारण कि अ यत्र अनुरक्त नायक यदि अपनी पत्नी को इस प्रकार की उक्तियो से सतुष्ट करना चाहता है और अपनी कामना की तप्ति चाहता है तो वह प्रम नही है । एकमात्र “याज है । रत्नसेन के कथन से ज्ञात होता है कि वह किसी अबोध बाला को फुमला रहा है । हो यह अवश्य है कि प्रत्येक उद्वाहिता नारी विवा प्यार देती है और प्रत्येक उद्वासित पुरुष विवा प्यार पाता है। निमल प्यार केवल वही नारी दे सकती है जो प्रयसी होती है । जो कुछ भी हो मागमती का सारा रोष समा प्त हो जाता है और नागमती हसि पूछी बाता । इस प्रकार नायक और प्रतिनायिका के प्रम को निम्नस्तरीय प्रम नही माना गया है । हा, यह अवश्य है कि उनमे सघष को स्थान भी नही दिया गया है। इस प्रकार स वह पाठक के मन पर अपनी उज्ज्वल आमा विकीग नहीं कर पाता जो कि नायिकार घ प्रेम डालता है। जायसीन प्रतिनायक द्वारा नायिका प्रति प्रेम प्रकट करने और उसे प्राप्त करने की चेष्ग का भी विस्तारपूवर वणन किया है । अलाउद्दीन का पद्मावती को प्रात करने का प्रयत्न ऐसा ही है। आचाय रामच द्र शुक्ल ने प्रतिनायक (अलाउद्दीन) क प्रेम को रूप लोभ की सना दी है। इसके विपक्ष म (क) पद्यावती का परविवाहिता होना तथा (ख) अलाउद्दीन का उग्र प्रयत्न करना'-ये दो अनुचित काय बताये हैं । जिनके कारण उसके 'प्रम को प्रेम नहीं कहा जा सकता। डा० माताप्रसाद ने स्व सम्पादित पद्मावत में इन दोनो अनौचित्यो पर विचार करते हुए यह स्पष्ट किया ह दि भारत में इन दोना भावनाओ को अनुचित समझते हुए भी सामा यत सूफी माधना से ये विरद्ध नहीं पड़ती।" उनके विचार मे सूफी साधना का चरमाद्देश्य विरहानुभूति है । उसके अभाव में अलाउद्दीन को भी प्रेमी का स्थान प्रदान नहीं किया जा सकता। इन सूफी कवियों की दष्टि १ जायसी प्रथावली प०१८९ २ वही प० १९० ३ वही, पृ. ३३ (भूमिका भाग) पद्मावत डॉ० माताप्रसाद गुप्त पृ० ४६-४९ गुप्त प्रेम का स्वाप आयारिम या विष । ११७ में जब तक पोई भी प्रेम का दम भरो वाला दुरा की बावरी नही ढोता और दोनों जगत के मुप 'उस दुम पर' योछावर परत को प्रस्तुत नहीं होता, वह प्रेमी नहीं है । प लोभी है। भी है घरी है। अराउद्दीत यही है और इसीलिए रत्नगन से भिन्न है।'' ० मातासा' या यह समाधान साम्प्रदायिक माना जा सकता है परन्तु सम्पूर्ण प्रेमारयानर वाव्यधारा वी पप्ठममि म आगम शक्ल दोनो विवार सवल है। प्रेम माग अहिंगा का माग है । छल वाट अपया धमनस्प पा भाव इससी पवित्रता समाप्त कर देता है। प्रतिनायक का गलत्व यहिंसा माग कोन धानान के पारण है। उमर म मधे यल प्रहण का आग्रह है श्याग का नही । प्रतिनायर और प्रनिनायिका के बीच जिस प्रेम का विकास जायसी करते हैं यह दूसरे प्रकार या है। जिस पधावती को रलसेन ने योगी पा वेधारण पर सात सात समुद्रा को पार पर जीवन की बाजी एगार प्राप्त गरन म मपलता प्राप्त की थी, उसा पद्मावती यो अलाउद्दीन तलवार से जोर से प्राप्त परना चाहता है । मलाउद्दीन या दूत कहता है-- वोल न राजा ! आय जनाई। लोह दवगिरि और छिताई ॥ उसका मुनपर रत्नमन वे मत्य की मीमा नहीं रहती। पर तु अव अलाउद्दीन विनय पे स्वर म मपि क निमित्ति पहता है तो रत्नसे। इस दुरा व्यक्ति को अपने प्रासाद म ठहरा लेता है और दपण म पद्मावती का प्रतिविम्ब दिखाने के लिय सहमत हो जाता है । प्रतिनायक के हृदय म नायिका के लिये वह प्रेम नहीं रहना जो परम त्याग एवं क्प्ट सहिष्णुता म परिपूर्ण हो । उसमें प्रेमी तलवार द्वारा हुत्य जीतने का प्रयत्न करता है । जो सफलीभूत नही हो सकता है। यह प्रेम नही है । सच्चे प्रेम म तो अहिंसा योग विनय पीलता यानि का विशेष महत्व है। जिसका स्पष्टीकरण प्रतिनायक और नायिका प्रेम द्वारा कवि ने कर दिया। वस्तुत प्रतिनायर ये प्रेम का पित्रण नायक के प्रेम को उत्वप देने वा एक माध्यम है। प्रतिनायक के आचरण के अनौचित्य को देखकर नायक के आचरण की उच्चता का बोध होता है । अत पद्मावत म अलाउद्दीन का प्रेम जो निश्चय ही रूप लोभ है रत्नसन के प्रेम की दिव्यता उज्ज्वरता और १ पद्मावत डा. माताप्रसाद गुप्त पृ०४९ २ पद्मावत प.२१९ प्रम का स्वरूप आध्यात्मिक या लौकिक । १११ - जनहुँ छांह मह धूप देखाई । तसह झारि लागि जो आई। सही न जाइ सबति क झारा । दुसरे मदिर दी ह उतारा ॥" और एक दिन-- वह ओहि वह वह ओहि कह गहा । कहाँ तस जाइ न कहा। दुवौ नवल भारी जोवन गाज । अछरी जनहु अखारे बाजे । भा वाहुन वाहुन सो जोरा। हिय सो हिय कोइ बाग न मोरा परतु एक ही प्रियतम से प्रेम के कारण दोना ही शात हा जाती है और अत तक सदभाव एव स्नेह के साथ रहती हैं । अतत कवि ने इस प्रेम के स्वरूप को आदश परिणति दे दी है। जायसी मे लौकिक प्रेम की व्यजना शृगार वणन जसा कि ऊपर कहा जा चुका है जायसी का पदमावत प्रमका य है । कवि ने रत्नसेन और पदमावती के प्रेम प्रसगो मे लौकिक प्रेम की मार्मिक और रसात्मक व्यजना की है । यदि रस के विभिन्न उपादानो की दृष्टि से जायसी दे काय की विवेचना की जाय तो हम उनकी रस योजना पर मुग्ध हुए विना नही रह सकते । सुविधा के लिए यहाँ शृगार के दोनो पक्षो--सयोग एव वियोग की दष्टि से पदमावत पर पृथक पथक विचार किया जा रहा है । जायसी का सयोग शृगार वणन जायसी में सयोग शृगार के प्रसग पदमावती और रत्नसन को लेकर घटित हुए हैं। उनमें आलम्बन आश्रय तथा रस के अय अगा की सम्यक योजना पायी जाती है । आलम्बन का वणन पदमावत का विशिष्ट आकषण है। कवि ने इस दष्टि से परमावती के रूप सौदय की मोहक यौकी प्रस्तुत की है। पीछे सौन्य की लोकोत्तर व्यजना के प्रसग मे जायसी के सौदय वणन के कुछ गुणो--सष्टि यापी प्रभाव लोकोत्तरता पवित्रता आदि की विव चना की जा चुकी है । लौकिक दष्टि से जायसी के जालम्बन चित्रण की प्रमुख विशेषता यह है कि कवि का ध्यान सदव सौदय को जपन चरम रूप में यक्त करने की ओर रहा है। इसीलिए जायसी ने पदमावती को रूप राग के वणन में सष्टि के सुदर उपादानो को लाकर उपमान के रूप में प्रस्तुत किया है । अनुभूति की तीव्रता और उत्क्प मे अधिक से अधिक समय उपा दानो का चयन जायसी की विशेषता है। अधोलिखित पक्तियो म यौवन के १ जायसी प्रथावली पृ० १८८ २ वही प० १९६ १२० । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण जग वेगा भार से युकी किशोरी पदमावती के अग प्रत्यगो का मनमोहक और ललित वणन दानीय है-- 'भ अनद पदमावति वारी । रचि रचि विधि सब कला सवारी । तेहि अग सुवासा । भवर आइ लुबघ चहु पासा ।। शृगार के सयोग पक्ष में प्रेमाश्रय का वणन भी जायसी ने किया है । सोन्य के प्रभाव के प्रसग मे पीछे पदमावती के रूप सौ दय का वणन सुनकर रत्नसेन को मुग्धावस्था की चित्र दिया जा चुका है । जायसी ने इसके अति रिक्त भी रत्नसन की अवस्या का वर्णन किया है । निम्नलिखित पक्तियों मे आथय रत्नसन को प्रणय भावना को अभियक्ति दष्टय है--- 'फ्ल फूल फिरि पूछ। जो पहुंची ओहि केत ! तन निछावर क मिलरों ज्यो मयुकर जियन्त ।। जिस प्रकार बारहमासा विप्रलम्भ + उद्दीपन को दष्टि से लिखा गया है, उसी प्रकार पद ऋतुवणन सम्भोग शृगार के उद्दीपन का दष्टि से ।" राजा रत्नसेन के साथ सयोग होन पर पदमावती का पावस ऋतु की शोभा का कसा अनुभव हो रहा है उसका चित्र अघालिखित पक्तियो म दशनीय है- पदमावति चाहत ऋतु पाई । गगन साहावन भूमि सोहाई । चमक बीजु बरस जल सोना । दादुर मोर सवद सुनि लोना । रङ्गराती पीतम सग जागी । गरजे गगन चौंकि गर लागी। सीतल बू द ऊच चौपारा । हपियर सब देखाइ ससारा ॥ नागमती का जो बू दें विरह दशा में वाण की तरह विग्दध करती हैं, पद्मावती को सयोग तशा में य ही बू दें कौध की चमक म सोने की सीरगती हैं । इसी के समाना तर सूरदास की भी उक्ति का उदाहृत करना असमीचीन न होगा निसिदिन बरसत नन हमारे मनुष्य के आन द या दुख के रङ्ग मे रजित प्रकृति का ही जायगा दिया है स्वत रूप में नहीं। सयोगानुभतिया प्रेमभाव की रसात्मक व्यजना प्रेमभाव का जो उत्तष जायसी क पदमावत म पाया जाता है वह अनु- पम है अद्वितीय है। कवि ने सयोग का वहा ही मवर और मादक, परतु १ जायसी प्रयावली प० २० २ जायसी प्रथावली प० ५१ ३ वही, (भूमिका भाग) पृ ४९ ४ वही प०१४९ ।
प्रेम का स्वरूप आध्यात्मिक यालो किक । १२१ भावपूण वणन 'पद्मावत म किया है। प्रथम मिलन के पश्चात्, सभोग माधुरी का एक उल्लासपूर्ण पणन देखते ही बनता है-- "परि सिंगार तापह पा जाऊ । ओही देखहु ठावहि ठाऊँ। जो जिनु मह तो ठहै पियारा । तन मन सौं नहि होइ विचारा। नन माह है उहै समाना । देयो सहाँ नाहिं कोई माना ॥" इन पक्तियो म राजी पदमावती न जिस मानसिक उल्लास का वणन किया है वह प्रियतम के प्रति असीम स्नेह और समपण की भावना पूणरूपेण परिपूर्ण है। जायसी सयोग वणन में मन के स्वाभाविक उल्लास, अभिलाषा पावन मावना उत्कठा और प्रणयाविभारता का चित्रण हा अधिक उपलब्ध होता है। भावों की इस साद्रता में कही कही शारीरिक उल्लास का मादन वणन भी मिलता है। ऐसे प्रसगो मे सयोग की वही तोव और रससकुल अभिव्यक्ति ही पवि का लक्ष्य रहा है। सयोग माधुरी ये मादन वणनो की दृष्टि से विवाह खड का एक उदाहरण लिया जा सकता है । 'पद्मावती प्रसाद के ऊपरी अशा पर खडी है । नीच वारात का अपरिमित सौदय है-रत्नसेन बर रूप म दिखायी द रहा है। पद्मावती इस सौदर्य और साजवाज का देखकर मुग्ध हो रही है । उसका मन मयूर जान दातिरेक से नाच रहा है । हृदय सरोवर में कामना की चचल लहरियो, अठमेलियां कर रही है और रोम रोम अपूर्व उल्लास स सिहर रहा है । मानसिक उल्लास के साथ शारीरिक उल्लास का मादन, परत वाव्यात्मक वणन दृष्टव्य है-- 'इलसे नयन दरस मदमाते । हुलस अधर रङ्ग रस राते । हुलसा बदन आप रवि पाई । हुलसि हिया कचुकि न समाई। हुलसे कुच क्सनी बद टूटे । हुलसी भुजा, वलय कर फूटे । + आज बाद घर आवा सूरू। आजु सिंगार होइ सब चूरू । आजु कटक जोरा है काम् । आज विरह सौं होइ सग्रामू । अग अग सब रस, गार पतहूँ न समाइ । ठावहि ठाव विभोही, गई मुरछा तनु आइ ।' कहीं कहीं शृगार का नग्न और विलासपूर्ण यणन भी जायसी मे मिलता १ जायसी प्रयावली पु० १४३ २ वही' पृ० १२२-२३ । 1.
१२२ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण है । यह फारसी शली के प्रभाव के कारण भी है और कुछ परम्परा के अनु कूल भी। "सुनु, सनि । प्रेम सुरा के पिये। मरन जियन उर रहे न हिये । जेहि मद तेहि कहाँ ससारा । को सो धूमि रह की मतवारा । सोपं जान पिय जो कोई। पी न अघाइ जाइ परि सोई। जान ह होइ बार एक लाहर । रहै न ओहि दिनु ओही चाहा । अरय दरव सो देइ बहाई । की सब जाहु न जाइ पियाई ।। प्रेम के अतगत सयोग दशा से कही अधिक महत्व वियोग दशा को प्राप्त है । सयोग की कामना तो सामा य लौकिक प्रेम मे भी उतनी ही तीव्र होती है, जितनी आध्यात्मिक प्रेम मे लक्नि वियोग की तीव्रता प्रेम के निमल रूप का स्पष्ट करती है । सूफी प्रेमकायों में सयोग से अधिक महत्व वियोग को प्राप्त है । वियोग प्रेम की कसौटी है । जायसी के वियोग वणन एव उसकी उदात्तता का मूल्याक्न हम एक पथक अध्याय मे प्रस्तुत करना चाहेंगे। अनुभावो और सचारीभावो की योजना शृगार के उभय पक्षो मे रस की सम्यक सष्टि के लिए अनुभावो और सचारी भावा की योजना अत्यावश्यक है। जायसी ने पदमावत में इनकी सुदर योजना की है । यह कथन किंचित उदाहरणो से पुष्ट किया जा सकता है । अघोक्ति पक्तियो में अग प्रत्यग के उल्लास का वणन दष्ट य है- फरे सहस साखा होद दारिउ दाख जभीर । सब पखि मिलि आइ जो लोटि उह भइ भोर ।। निकित पक्तिो म पवाभावा -लागि पश्चातापाटि से समर्मावत विरह की तीखी व्यजना देखत ही बनती है- काह ह सो तुम मोसौ कियउ और सों नह । तुम मुख चमके बोजुरी मोहि मुख बरम मेह ।।' जायसी की प्रेम व्यजना की विशेषताएँ जायसी के प्रेमका य म प्रेम के स्वरूप का विस्तारपूर्वक विवचन करने के बाद यहाँ तत्सम्बधी कुछ सामा य विशेषताओ की चर्चा भी आवश्यक है। मुख्य रूपेण यहाँ तीन विरोपताना का उल्लेख किया जा सकता है--(क) १ जायसी ग्रन्थावली पृ० १४१ २ जायसी प्रथावली पष्ठ.९० ३ वही, पृ० १८९ २ .
प्रेम का स्वरूप आध्यात्मिक या लौकिक १२३ मानसिक पक्ष की प्रधानता (ख) भारतीय और फारसी पद्धतियो का समन्वय और (ग) भावात्मक और घ्यावहारिम शलियो का सम वय । (क) मानसिक पक्ष की प्रधानता जायसी की प्रेम ध्यजना मे मानसिक पक्ष की प्रधानता है । सयोग एवं नियोग उभय पक्षो में उनकी दृष्टि भावात्मक्ता की ओर ही अधिक रमी है । गारीरिक काम वासना का चित्रण कम हुआ है । सयोगपक्ष मे कवि ने मन के उल्लास का और वियोग पक्ष में वेदना का चित्रण अधिक किया है । यह कथन पूवणित विवेचन समर्पित हो जाता है । कवि ने जहाँ कही शारीरिक भोग विलास का भी वणन किया है उनमें विलासिता के बीच बीच मे भी प्रेम का भावात्मक स्वरूप प्रस्फुटित होता दिखथी देता है। उनके विरह वणनो में एक गाम्भीय है और देना की अत्य त तीन व्यजना भी प्राप्त होती है । (ख) भारतीय और फारसी प्रेम पद्धतियो का समय भारतीय प्रेम पद्धति मे नायिका के प्रेम का वेग अधिक दिखाई दवा है जबकि पारस के प्रेम में नायक के प्रम का वेग तीव्र रहता है । जायसी ने अपने 'पदमावत' मे इन दोनो पद्धतियो मा मम वय क्यिा है। पहले उन्होंने फारस की प्रेमपद्धति का अनुसरण करते हुए रत्लसन को अपने प्रेमास्पद की प्राप्ति के लिए अत्यधिक प्रयलगील दिखलाया है और फिर नायिका के प्रेमोत्कप का भी वसा ही चित्रण किया है । उत्तराध मे सो नायिका का प्रेम ही प्रधान हो गया है । इस प्रकार पदमावत की प्रेम यजना मे भारताय और फारसी दोनो पत्तियो का समय हो गया है। सयोग और वियोग के विभिन्न प्रसगों के वणन में भी इन पद्धतियो का समवय देखा जा सकता है। भारतीय पद्धति के अनुसार कवि सयोग शृगार म मर्यादित और वियोग वणन वेदना अभियक्ति की ओर झुका रहता है। परतु फारसी पति के प्रभाव से वह सयोग वणना में अश्लील, दृश्यो तथा वियोग मे ऊहात्मक उत्तियों का समावेश भी कर देता है । जस वियाग वन में वीमत्सता की यह योजना देखी जा सकती है-- विरह सराह भूज मासू । गिरि गिरि पर रकत की। कटि कटि मासु सराग पिरोदा । रक्त ३ आँसु मासु सब रोवा ॥ (ग) एकातिक एव लोक सापेक्ष्य प्रेम पद्धतियों का समन्वय पद्मावत की प्रेम व्यजना की एक अय विशेषता है-एकातिर और १ जायसी पपावरी पु० १६१ १२४ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण लोक सापेक्ष्य पद्धतियो का समवय ! 'पद्मावत' म भारतीय प्रेम पद्धति के अनुसार लोक व्यवहार के बीच अपनी आभा का प्रसार करने वाल प्रम और फारसो पद्धति के अनुसार मनस्वियो के ऐकातिक लोक बाह्य और स्वतत्र भावात्मक सत्ता के रूप में विकसित होने वाले प्रेम- इन दोनो की समान रूप से व्यजना हुई है । 'पदमावत मे इसी सम वय के अनुरूप एक ओर पद्मा वती और रत्नसेन और दूसरी ओर नागमती और रत्नसेन के प्रेम प्रसगों की अवधारणा भी है । अत मे दोनो को दाम्पत्य जीवन में परिणति मारतीय प्रेम पद्धति की प्रधानता सूचित करती है । जायसी की प्रेम व्यजना इसके विवेचन से कवि की सम वय कारिणी प्रतिभा के साथ साथ मल भावधारा का जो परिचय हमे मिलता है, उससे यह पूण फपेण स्पष्ट हो जाता है कि मूलत सूफी प्रेम की भावना से अनुप्राणित होने पर भी सभा प्रेमाख्यानक वायो की भांति जायसी के काय में भी भारतीय लौकिक प्रम पद्धति का अनुसरण किया गया है । सभी प्रेमाख्यानो के समान पदमावत' का मूल स्रोत भी भारतीय लोक जीवन और लौक्कि तथा व्याव हारिक प्रेम की प्रधानता रहा है और इसी माध्यम से उन्होने अपनी प्रेम पीर' का सहज सरल और मनोरञ्जक निरूपण किया है । इस रूप में जायसी का पद्मावत भारतीय लौकिक प्रेमाख्यानक काव्यो की परम्परा का एक अमर कीति स्तम्भ है।
| विरह, प्रेम की कसौटी . विरह-वणन मध्यकालीन कवियो का एक विशेष बण्य विषय रहा है । सच्चे प्रेम की परख विरहावस्था में ही होती है। प्रिय के निकट रहने पर प्रतिदिन आन द की उदभावना तो होती ही है कि तु नवनीत की सी स्निग्धता शुष्क होने लगती है। जीवन की इस शुष्कता एव भावो को कोमलता पर आच्छादित इसी आवरण को दूर करने के लिए विरह का आश्रय लेना पड़ता है। जिस प्रकार अग्नि में पड़ने के पश्चात ही सोने की परख होती है, उसी प्रकार वियोग की अग्नि में तपकर ही प्रेम अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट करता है। डा. हनुमानदास 'चकोर' विरह को प्रेम की कसौटी स्वीकार करते हुए कहते हैं । 'वियोग ही तो प्रेम का वास्तविक परीक्षक है जिसके प्रश्नोत्तर के पश्चात सच्चा परिणाम प्राप्त होता है। सच्चा प्रेम वह तप्त स्वण है जो अग्नि मे पड़ने के पश्चात मूल्मवान् बनता है। परमात्मा की सत्ता का सार है प्रेम । इसीलिए सूफी साधना में प्रेम का बहा महत्त्व है। भक्ति मे जिस प्रकार देव विषयक रीति का प्रतिपादन हुआ है, उसमे श्रद्धा एव भय की प्रधानता होती है। भारतीय पद्धति मे इन तत्त्वो के होते हुए भी प्रेम का अग विद्यमान था। कृष्ण और गोपिकाओ को अली किक प्रेम मे हमें इस प्रेम के पूण दशन होते हैं । भागवत मे भी इसी प्रकार के प्रेम का दशन होता है परतु हिदी साहित्य मे सवप्रथम साधना के निमित्त प्रेम को आधार बनाते हुए हम सूफी साधका को ही पाते है । प्राप्त सामग्री के आधार पर ज्ञानमार्गी और प्रममार्गी जिन दो प्रकार के साधको का उल्लेख हुआ है उसमे प्रथम वग के लोगा ने भी प्रेम को महत्ता प्रदान की है । सूफी साधको के लिए यह कोई नवीन माग नही था । परम्परया ही उहें प्राप्त हुआ १ हिंदी साहित्य में विरह प्रसग, पृ० ५। डॉ० हनुमान दास चकोर' ।
१२६ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपणे था । फारस आदि देगा में यह मानव मन मे माधुय भर हो चुका था और यहाँ भी वणव सम्प्रदाय की भक्ति परम्परा मे प्रेम का उदभास हो चुका था। परतु मूफियो न निराकारोपासना मे प्रेम की आधार शिला पर साधना का एक ऐसा सुदर सदन बडा किया और अय तत्कालोन परम्परा से सामग्री लेकर उसमे ऐसा पुट दिया कि देखते ही बनता है। फारसी मनस्वियो के आधार पर प्रेममार्गी कवियो ने प्रेमाख्यान काय लिखे पर प्रेम काय कुछ निश्चित दष्टियो पर लिखे गय । नायक किसी रमणी के प्रेम पाग मे आबद्ध हो योगी वनकर निकल पडता है और अनेक कष्टो के उपरात अपनी प्रेयसी को प्राप्त करना है। चार प्रकार के प्रेमो में से प्राय चतुथ प्रकार से ही प्रेम का आयोजन हम इन क्थाओ म पाते हैं। भारतीय सस्कृति में विवाह का अतीव महत्त्व है । इमे एक धार्मिक क्रिया माना गया है। अपरिचितावस्था मे ही वर वधू के पणिग्रहणोपरात उनमे जो प्रेम का उदभास होता है और पुन गन शन मघग्ना को प्राप्त होता है वह उनके पवित्र दाम्पत्य के नाम से अभिहित होता है । दूसरे प्रकार का प्रेम वह है जो किसी रम्य स्थान पर परिचय स उत्पन्न होता है । इसम नायिका का सौंन्य एव हाव भाव तथा समीपस्थ प्रकृति उद्दीपन का काम करते हैं। उदाह इसका परिणाम होता है। विवाह से पूर्व अधिस्तर नायक और नायिका दोना ही विरह मे तडपते रहते हैं। इस बीच दूती प्रयोग एव पत्र प्रेषण भी होता है जो बिरह को और उद्दीप्त कर प्रेम परिपाक का कारण होता है । यदा कदा क्षणिक सयोग भी प्राप्त हो जाता है। ततीय प्रकार का प्रेम प्राय कामुक्ता पूर्ण ही होता है। बहुपत्नियो मे प्रम का जो स्वरूप हो सकता है, वही इसमे आता है । चतुप प्रकार का प्रेम प्राय गले ही पडा करता है । यह चित्र या स्वप्न मे दशन, गुण-श्रवण अथवा तत्सम्बधी क्सिी सुदर के दशन से होता है । पद्मावती में गुण-श्रवण से ही प्रम का उद्भव दिखाया है। प्रेम चाहे जसे भी उत्पन्न हुआ हो उमम कुछ कष्ट तो होता ही है और जितनी ही आत्मा उसमे रमने का प्रयत्न करती है उतना ही उसमे कष्ट होता है। चूकि ब्रह्म के प्रति हम शृगारिक भावनाओ का प्रदशन करते हैं, अत इसका मूल कारण ब्रह्म के सन्निकट पहुंचन का प्रयल ही कहा जा सकता है। प्रेमामिलाप की प्ररणा से ही प्रत्यक स्थान पर उसका अनुभव करने का प्रयत्न करता है। चकि वह बाह्य दशन न देने के कारण हृदय को प्रभावित करता है परतु उसको वह आत्मीयत्ता हृदय में एक विशेष अनुराग उत्पन्न कर देती है। । और ध्यषा विरह, प्रेम की कसौटी। १२७ विद्वानो ने शृगार के दो भेद माने हैं सयोग और वियोग । जब नायक और नायिका परस्पर सयोगावस्था में होते हैं, वहा पर सयोग शृगार होता है और जहां प्रमी एव प्रेमिका एक दूसरे से दूर रहते हैं और वियोग जन्य अवस्था उत्पन हो जाती है वहाँ वियोग शृगार होता है। वास्तव में आतरिक यत्रण ही वियोग बनाती है और इसका अनुभव प्रेम वेदना पूर्ण हृदय में ही होता है । सूफी कवियो की भावना शृगारी है अत वियोग पक्ष को अधिक महत्त्व दिया गया है क्योकि नायक के विदेश जाने पर नायिका को व्यषित हाना पडता है वहां सच्चे प्रेम की परीक्षा का काल होता है। उस समय अनेकानेक परिस्थितिया आती हैं जो नायक को नायिका के प्रेम के लिए और नायिका को नायक के प्रेम के लिय याकुल बना देती हैं और दानों प्रेम के अभाव की महत्ता को स्वीकार करत हैं । इस समय प्रेमी और प्रेमास्पद के हृदय मे सयोग काल की अपेक्षा अधिक स्नेह होता है। जिस प्रकार दपण में किसी वस्तु का बिम्ब दूरी बढने पर गहरा होता जाता है, उसी प्रकार प्रिय और प्रेमास्पद की दूरी बढन पर स्नेह की गहराई बढ़ती जाती है । यह विरह वणन अनेक रूपों मे हुआ है। साधारत सूफियो ने दो प्रकार स चित्रण किया है। प्रकृति के आश्रय से और सवथा स्वतत्र रूप से । प्रकृति के आश्रय से दो प्रकार से वणन हाता है। उद्दीपन और मानवीकरण के रूप म। पद्मावत मे 'बारहमासा का चित्रण इस बात का स्पष्ट प्रमाण है । इसम हम नागमती के निरीह, निरावरण गम्भीर एव निमल रूप का अनुभव करते हैं । उसका हृदय अत्यन्त ही उज्वल और पवित्र है । यद्यपि अषाढ मास में दादुर भोर और काक्लिा बोलते हैं। उसे अकेले रहन में कारण कष्ट होता है जिन घर क्ता त सुखी हम गारौ नी गव । कन पियारा वाहिरै हम सुख भूला सव ।। आचाय शुक्ल ने नागमती के विरह वणन को हिदी साहित्य का अमूल्य निधि घोषित किया है। उनके अनुसार जायसी के विरह वणन म वेदना का कोमल और निमल स्वरूप, हिदू दाम्पत्य जीवन के ममस्पर्शी माघयपूण चित्र चतुर्दिक व्याप्त प्रकृति और व्यापारी के साथ हृदय की साहचय भावना आदि का प्रसगानुकूल स्वच्छ द प्रवाहपूर्ण ढग से अतीव सु दर अक्न किया गया है । उसम प्राकृतिक वस्तुमा के सश्लिष्ट विशद चित्रण के साथ-साथ सादृश्य और १ जायसी प्रपावली पृ० १५३ । २ वही (भूमिका भाग) पृ० ४० । - १२८ । सूफी कवि जायसी वा प्रेम निरूपण न २ वषम्य के चित्रो द्वारा प्रस्तुत और अप्रस्तुत का सु दर सामजस्य भाव सौदय की एक निराली छटा उत्पन कर देता है इसका एक उदाहरण दष्टव्य है 'बरम मघा कोरि शवोरी । मोर दुइ नन चुब जस ओरी॥ पुरवा लागि भूमि जल पूरी । माक जवास भई तस झूरी ॥ घान भूख भरे भरवी माहा । अवहुं न आएहि सोचेहि लाहा पल जल भरे अपूर सब, घरति गगन मिलि एक । पनि जोवन अवगाह मह दे बूढत पिउ । टेक ॥" यहाँ कवि सादृश्य के आधार पर नागमती के विरह का मार्मिक वणन कर रहा है। विरह व्यजना के लिये प्रकृति का माध्यम ग्रहण करन से जायसी के विरह वणन म हृदय के वेग की व्यजना बडे स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित हुई है और उसकी इस स्वाभाविकता न भावा को चरम उत्कष तक पहुंचा दिया है । जायसी मानव वत्तियो और भावो को किस प्रकार चरमोत्कष प्रदान कर देते हैं इसका एक उदाहरण प्रस्तुत है । वह अभिलाषा का वणन करते हैं- 'राति दिवस बस यह जिउ मोर । लागी निहोर क त अब मोरे ।। 4ह तन जारौं छार क कहीं कि पवन उडाव । मकु तेहि माग उडि पर, क त घर जहें पाव ।। विरहिणी प्रिया की अभिलाषा का ऐसा हृदयग्राही वणन या ता जायसी के 'पद्मावत' में ही मिलता है या मझन के मघुमालनी' में । उपयुक्त पक्तियो मे नागमती के हृदय की सम्पूण कातरता दीनता पति के प्रति निष्ठा और सच्चे प्रेम में आत्म बलिदान की उत्क्ट हृदयस्पf अभिलापा यक्त हो रही है। ऐसी ही पक्तिया ने नागमती के विरह को महत्वगील बना दिया है । जिससे नागमती का रत्नसेन के प्रति अगाध स्नेह का परिचय मिलता है। 'पद्मावत' म नागमती का विरह ही सवथष्ठ है इसीलिए हम सवप्रथम नाग मती के विरह की वस्तविक्ता का ही परीक्षण करेंगे। रत्नसन पद्मावती को प्राप्त करने सिंहल चला गया है। उसे वहाँ प्रेसित करने मे हीरामन व एकमात्र कारण रहा है । नागमती पति विरह मे यथित चित्तौर आने वाले माग पर टकटकी लगाये बठी पति की प्रतीक्षा करती रहती है और उस बालस्वरूप तोते को कोगती रहती है जिससे मागमती का रत्नसेन के प्रति अन य प्रेम प्रक्ट होता है। इस स्थिति का वणन करते हुये जायसी कहते है- जायसी न यावली (भूमिका भाग) पृ० १५३ । २ वही पृ० १५५। - १ विरह, प्रेम का क्सौटी । १२९ -- 1 " 'नागमनी चितउर पथ हेरा । पिउ जो गप पुनि कीह न फेरा। नागर माह नारि बस परा । तेइ मोर पित मोसौं हरा ॥ सुभा काल होइ लइगा पीऊ । पिउ नहिं जात, जात पर जीऊ ।। सारम की जोडी पिछड़ गयी। नागमती पति विरह म मूख-मूख पर पिंजर बन गयी है। प्रिय के अभाव मे सारा संसार उसे भयानक लगता है। प्रकृति, अपने विभिन्न मादा स दर रूपा द्वारा उसकी विरहाग्नि को और अधिक प्रदीप्त करती रहती है। नागमती को जीवन भार लगन लगता है। वह ध्यपास पागल हुई जा रही है - "पिउ वियोग यस बाउर जीक । पपिहा नित बोल पिउ पिऊ ॥ अधिक काम दाधैं सो रामा । हरि लेइ सुआ गयउ पिउ नामा ॥ विरह वान तस लाग न होली । रक्त पसीजि भीजि गई चोली ।। सूबा हिया हार भा भारी । हरे हरे प्रान तनहिं सब नारी ॥ उसे विश्वास सा हो जाता है कि अब उसके प्राण नही बचेंगे । उसका रसा सा उससे दूर है । वह मरते समय उसकी बोली तक नहीं सुन सकेगी-- प्रान पयान होत जो राखा । को सुनाव प्रीतम ३ भाखा ॥ एक-एक कर महीन बीतते चले जाते हैं पर तु उसका प्रियतम रोटपर नही माना । विरह निरतर व्यथित करता रहता है। वह न जीती है न मरती है । उसकी दगा अस्यात विषम हो उठी है। जो प्रारतिर उपादान सयोग में समय उस मद। मत्त वना अधिक मानद प्रदान करते ये व जर भी उसके हृदय मे प्रिय मिरन को उत्कठा तो उत्पत करते हैं पर तु पति के समीप न रहने के कारण उस निरतर दुख ही पहुंचाते रहत हैं । इस प्रकार यहाँ जायसी प्रकृति १ उद्दीपनकारी रूप का वर्णन वर नागमती को चिरह पथा को चरमारप प्रदान कर देते हैं। पति परित्यक्ता, पति विरह वियपा नागमती अपना सारा अहकार और रूप गर भूल एर सामा य नारी बन जाती है। वह यह भूल जाती है कि वह एक रानी है। उसे लगता है जसे सारो प्रकृति न उमके विरुद्ध एक भयानक पड्यत्र रच रखा है और उसे सताने तथा उसकी प्रेम परोषा मे लग गयी है। प्रकृति के उपादान विरह को उत्पन्न करत है जिसम काम की भावना उद्दाप्त हो जाती है और प्रिय को स्मति सतान लगती है । उसी समय प्रम को सच्ची १ जायसो ग्रयावली, ५० १५१। २ वही प० १५ । ३ वही पृ० १.११ - १३० । सूफो पवि जायसी का प्रेम निरूपण परीक्षा होती है। प्रकृति के चतुमुखी आक्रमण से त्रस्त हा नागमती अत्यात करुण स्वर म प्रियतम को पुकारन लगती है । अपाढ़ का मास आ गया है। भाकाश में उमड़ते बाल मेघा का देप उसे ऐसा लगता है मानों विरह ने सेना सजाकर उसपर आक्रमण कर दिया है- चढ़ा अपाढ गगन धन गाजा । साजा विरह बुद दल बाजा। घूम, साम, घोर घन धाए । सत घजा, वग पांति देखाए । खडग बीज चमक चहुँ ओरा । व द वान बरसहि धन घोरा ।। इस परिस्थिति से रावस्त होकर सागमती आत्त स्वर मे पति को रक्षाथ पुकारती है- "औनई घटा आइ चहुँ मेरी । क त । उवारु मदन हौं घेरी ॥ परतु उसका प्रियतम उसकी रक्षा करने लौट नहीं आता। वह प्रतीक्षा करते करते थक जाती है । उसके और प्रियतम के बीच मे अथाह समुद्र लहरा रहा है। उसकी जीवन नया का खिश्या सात समुद्र पार दूर बठा है । नागमती को समझ में नहीं आता कि उस तक से पहुचें। वह वचारी पूरी तरह से विवश और निरुपाय हो कहती है- परवत समद अगम विच बीहड घन वन ढाक । किमि क भेंटो के त तुम्ह ना माहि पाव । पग्खि ॥ इसी प्रकार एक एक कर नये महीन आत जाते हैं और उमे निरतर विरह ज्वाला में अधिकाधिक दग्ध करते बीत जाते हैं। वह सूख मूख कर कमाल बनती जाती है परत प्रियतम फिर भी लौट कर नही आता । वह विदेश म जाकर उसे भुला बठा है- 'त न फिरे विदेसहि भूले ।' अब वह क्या करे । कस पति के पास पहुचे अथवा कसे उस अपन पास बुलाय । अ त मे वह भौरे और कार से प्राथना करती है कि वे प्रियतम के पास उसका स देश रेकर जाने की कृपा कर-- 'पिउ सा कहेउ सदसडा हे भौग । है काग। सोधनि विरहै जरि भुई तेहिक धुआ हम्ह लाग । १ जायसी-ग्र थावली प०१५२ । २ वही प० १५२ . ३ वही प०१५३ । ४ वही प० १५३ । ५ वही, ५० १५४॥ ।
विरह, प्रेम कीमसोटी । १३१ परतु कोई भी उसका सा रेगर प्रियतम के पास नहीं जाना । वह विरह भी भयानर ग्यार। म व्याकुल हो यार बार प्रियतम पो पुकारती है- जरत बजाणिनि पर, पिउ । छाहाँ । माइ बुझाउ, बगारन माही।।' पदि रहता है कि यह विरहाग्नि इतनी मयाना हानी है कि सतोमें मनिरिक्त इसकी ज्वारा काममार भ मग राई नहीं और सस्ता- 'गिरि, समद समि मा, रवि सहि न सरह वह मागि। महामद सती सराहिए, जरे जा यस पिउ आगि ॥ पप र बारह महीने एक एप पर बीत जाते हैं और फिर वषा ऋतु मा भानी है परत फिर भी नागमती पा प्रियतम लौटकर नहीं आता। वारहमामा' ये प म किए गये नागमो 4 इम विरह वणन म हम नागपती को मवत्र एर पनि दिरह व्यथिता गरी रे रूप में ही पात हैं । उसका यह रूप प्रस्तुत पर जायमी न विरह रस की अनुभूति का साधारणीकरण पर लिया है। इस बारहमामा' मे नागमती व विरह का हो नहीं अपितु विरह मात्र वा सवाघिर मामिव योर सावित रूप चित्रित हुआ है। वप ने बारह महीन ता नागमती प्रामाद वे मोतर हा वाट लती है, परन्तु पिर भी जब उसका प्रियनम लौट कर नहा आता तो रह विरहाग्नि की अति गरना स उ मत्त-सी हारर वन वन विलाप ररता फिरता है। उसकी यह विरहाग्नि इतनी भयाना है कि वह जिम पक्षी या वक्ष व पास जा उसे अपनी विरह कथा मुनाती है वहा जलपर भस्म हो जाता है- जहि पपी के नियर हाई, यहै विरह का यात ! सोइ पनी जाइ जरि तरिवर हाद निपान । वेदना को अतिशयता के कारण सरी आँखा स निर तर खून के आंसुओं से पुचियों का सा ढेर लग जाता है- *जह-जहें ठादि हाइ बनवासी । तह तह होइ पनि व रासी ।" नागमती उपवना ये वृक्षा व नीच रात रात भर न बरती फिरती है। इम दाम पर पती पल्लव जा कुछ भी समक्ष आता है उस वह अपना दुख सुनाती है। इस पर आचाय रामचद्र बर का बना । 'वह पुण्य १ जायसी प्रयावली प. १५६ । २ वही, पृ० १५६ ३ वही, पृ० १५८1 ४ वही, पृ० १५८1 १२ । मूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण दगा य है जिसम ये सब अपने सगे लगते हैं और यह जान पडन रुगता है कि इहें दुख सुनाने से भी जो हलका होगा । सब जीवो का शिरोमणि मनुष्य और मनष्या का अघी'वर राजा ! उसकी पटरानी जो कभी बडे बडे राजाओ और सरदारा का वातो की आर भी ध्यान न देती थी वह पक्षियो - अपने हृदय की वेदना कह रही है उनके सामन अपना हृदय खोल रही है । हृदय की इस औटाय्य पूण और यापक दगा का कविया न प्रेम दशा के भीतर ही वणन किया है । वाल्मोति कालिदास आदि से लेकर जायसी, सूर, तुलसी आदि कविया ने इम टगा वा वणन किया है । वाल्मीकि के राम मीता हरण हाने पर वन वन पूछते फिरत है-- है 1 दम्ब ' तुम्हार पुप्पो से अत्यधिक प्रीति रखने वाली मरी प्रिया का यह जानते हा ता बतानो। हे बिल्व वृक्ष यदि तुमने उस पीत पट धारिणी को देखा हो तो बताओ । हे मग उस मग मयनी को तुम जानते हो? ' इसी प्रकार तुलसी के राम भी वन के पशु पक्षिया से पूटते है-- 'हे सग मग ह मधुकर सेनी । तुम देवी सीता मगननी । कालिद मका यक्ष भी इसी चतनाचेतन भेद इसी प्रेम नगा के भीतर मला है । इस प्रकार की स्थिति का चिगण उमाद की राजना के लिए क्यिा जाता है । नागमती उपवना म रोली फिरती है। उसके विलाप से नीडो में स्थित पक्षिया की निद्रा हराम हो जाती है-- पिरि फिरि राव कोइ नहिं बोला । आवी रात विहगम बोला । तू पिरि परि दाहै सव पाखी । कहि दुख रनि न लावति आखी । राजा पुरुरवा काक्लि हस इत्यादि को पुकारता ही फिरता है पर कोई महानुभूति प्रकट करता नही निसायी देता। पर नागमती की दशा पर १ जायसी प्रथावरी भूमिका भाग प० ४० । अपि कच्चित्वया दवा सा काम्ब प्रिया प्रिया। कदम्ब यति जानी शस सीता शुभाननाम ।। सितम्चपल्लवसबागा पीत कौगयवासिनी । गमस्व यदि वा दष्टवा बिल्व वित्वापमस्तनी ।। -श्रीमदवारमीकीय रामायणम अरण्यकाण्ड सग ६० दलो० स० १२-१३ पडित पुस्तकालय कागी प्रथमावत्ति सन १९५१ । ३ रामचरित मानस अरण्यकाण्ड दाहा ३०/९, गीताप्रेस, गोरखपुर । ४ जायसी प्रथावली, पृ० १५९ ॥ ५. विक्रमोवशीयम्, अफ४। ४ २ विरह, प्रेम की कसौटी । १३३ ॥ एक पक्षी को दया आती । वह उसके दुम का कारण पूछता है । नागमती उस पनी से कहती है-- • चरिउ चक्र उजार भए कोई न देसा टेक । वहीं विरह दुस आपन, वठि सुनहु दह एक् ॥" पुन वह आग कहती है हे वीरन । मैं अपना दुस पिसस पहूँ । अपना दुस तो उसस ही कहना चाहिए जो पराई परोहा का अनुभव कर सके । जो प्रियतम की कथा को आकर मुझ सुनायगा, मैं आज म उसकी दासी बनी रहूगी- कथा जो कहै आइ बाहि मेरी । पावरि होउ, जनम भरि पैरा ।'' वह तो अपने प्रियतम य नाम को मारा जपत जपत स्वय माला के सदा क्षीण हो गयी है । वह अपनी व्यथा उसस क्स क्हे क्योकि-- 'हाड भए सब रिंगरी, नस भई सब ताति । रोव राव त धुनि उठ, वहीं विथा केहि भाति ।। विरहिणी की एसो करुण विवा दीन और पातर दशा का ऐसा हृदय माही चित्रण हि दो साहि य म दुलभ हा माना जायगा । यहाँ मानो जायसा ने अपने हृदय की सारी विरह व्यथा को सजीव और साकार बना दिया हो। इमके उपरात नागमता उस पक्षी द्वारा पद्मावती के लिए जा सदेश भिजवाती है उसम उसय जीवन को सारी मार्मिक यथा घुल निसर कर पावन हो उठी है । यह सदश ही वस्तुत इस सारी विरह यथा का मानो प्राण वियु बन गया है । वह सदा इस प्रकार है--- 'पदमावति सौं कहेउ विहगम । वत लोमाई रही परि सगम ।। + मोहि भोग सो बाज न वारी । सौह दीठि क चाहन हारी ।" इस साथ ही नागमती रलसन के लिए जो सदश भिजवाती है उसमें अपने दव की एक भी बात न कर क्वल रत्नसेन की माता की पुत्र वियोग म हो रही दारुण दा का ही वणन करती है । वह स्वाभिमानिनी पत्ना पति को अपनी विरह यथा सुना उसे दुख नही पहुचाना चाहती । उसका यह १ जायसी प्रयावली, पृ० १५९ 1 २ वहीं। ३ वही, पृ० ९५९ । ४ वही।
१३४ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण विरह उस प्रणय का विरह है जो स्वय जलना जानता है, परतु दूसरे तक उसकी ज्वाला नहीं पहुंचने देना चाहता। पदमावती के हृदय मे विरह का आरम्भ काम के प्रभाव से उत्पन्न होता है । जब राजा रत्लसेन सिंहल दीप पहुँच कर उसे प्राप्त करने के लिए योग साधना करने लगा तो उसके योग का प्रभाव पदमावती के हुन्य में विरह को दग्ध कर देने वाली अग्नि उत्पन पर उसे जलाने लगता है । परतु विरह की यह भावना किसी व्यक्ति विशेष के लिए न होकर काम की तीव्रता के ही कारण उत्पन्न होती है । पदमावती उस विरह के कारण याकुल हो उठती है । कवि उसके विरह को रत्नसेन को योग साधना का प्रभाव बताता हुआ कहता है-- पदमावती तेहि जोग सजोगा । परी प्रम बस गह वियोगा ।। नीद न परै रनि जो आवा । सेज केवछि जानु कोइ लावा ॥ " इसमे रत्नमेन का कहीं स्पष्ट उल्लेख न होने से पदमावती को इस विरह ध्याकुलता को काम जनित ही माना जायेगा । वह परम्परायुक्त रूढ विरह वणन है । हम पदमावती के विरह का एकाएक उत्पन्न हो भयकर रूप धारण करते नहीं पाते। उसकी विरह भावना मे ऋमिक विकास होता चलता है । शिवमा म रत्नमा से साक्षात्कार हो जाने के उपरात उसका विरह काम जनित न रहकर सच्चे विरह का रूप धारण कर लेता है। इसके बाद हम उसके विरह का उनरोत्तर प्रगाढ रूप धारण करते देखत हैं । वह रत्नसेन से प्रेम करने लगी है और जब उसका पिता गधव सेन रलसन को बदी बना उसे शूली पर चढा देने की आज्ञा देता है तो उस समाचार को सुन पदमावती का रोम राम अपने प्रियतम के प्रति याकुल हो उठता है और वह असह्य वेदना को न सह पाकर मूच्छित हो जाती है । कवि कहता है । 'चित्त जो पिता की ह धनि रोव रोव समेत । सहस साल सहि थाह भरि मूरुछि परीगा चेत ।।' उसको दगा जतीद विषम हो उठती है। उसके प्रियतम के प्राण सक्ट म पढ़े हुए हैं यह जान वह स्वय मरणासत हो जाती है । उसकी सखियाँ उसकी सासो को गिनने लगती हैं- २ है जायसी प्रथावली, पृ० ६३ । २ वही, पृ १०६.
विरह, प्रेम की सौटी । १३५ * ॥२ जो वहिं सास विनहि खिन सखी। कब जिउ फिर पौन-पर पखी ।। पदमावती की यह विरह यथा सारे विश्व मे व्याप्त हो जाती है । सारा विश्व उसके विरह मे दग्ध हो जाता है--- 'कसेहु विरह न छाड़, भा सति गहन गराप्त । नखत चहूँ दिसि रोवहि, अधर घरनि अकास ।' उसकी यह विरहाग्नि ऐसी प्रवल और भयानक है कि काई भी उपाय उसे शान्त करने में असमर्थ है- जहें लगि चदन मलयगिरि, जो सायर सब नीर ।। सब मिलि आइ बुझावहि, बुझ न आगि सरीर ।'' उसने तो अब स्वय को अपने प्रि की शाश्वत जीवन सगिनी मान लिया है। जीवित रहन से दानो साथ रहेग और यदि मत्यु का आलिंगन करना पड़ेगा तो दोनो साथ ही करेंगे। साथ ही पदमावती अपने प्रियतम की सारी आपदाओ को अपने ऊपर ल लना चाहती है जिसम उसरे प्रियतम का बाल भी बाका न हो सके-- 'जो रे जियहि मिलि गर रहहि मरहिं ती एक दोउ । तुम जिउ कह जिनि होइ किछु मोहि जिउ होइ सो होउ। इस आग भी पदमावती रलसेन भेंट सह में रलसेन से मिलने पर पद्मावती अपने विरह का वणन करती हुई रत्नसेन से कहती है वह उसके विरह मे तडपती रहती थी। परतु पदमावती का यह सारा विरह सयोग से पूर्व का और परम्परा मुक्त विरह रहा है । इसलिए इसम विरह की वह मार्मिक अनुभूति नही मिलती जो सयोग के उपरा त प्रम प्रेमिका के बिछुड जाने पर हृदय म उत्पन्न होती है । विरह की इसी अनुभूति का वास्तविक और मार्मिक भाना जाता है । पद्मावती के जीवन मे विरह की यह स्थिति उस समय आती है, जब सिहल से चित्तोर लौटते समय माग में समुद्र मे जलपोत टूट जाता है और रत्नसेन और पदमावती समुद्र मे बहत हुए भिन भिन्न तटो पर जा लगाते हैं । समुद्र की तनुजा लक्ष्मी तट पर मूछित पडी पदमावती को हाश में लाती है और पदमावती चेवनावस्था में आते ही, स्वय को एकाको पा पति वियुक्ता -- " १ जायसी प्रथावली ५० १०६ २ वही १० १०७ ३ वही, प०१०८ ४ वही पृ० ११० १३६ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण कोंची की भांति आत ऋन्न करने लगाती है। यहाँ पदमावती का विरह विलाप मे आध्यात्मिक अनुभूनि का सा रग आ जाता है । पति चक्षुओ के पास और माउस मे ही स्थित है परतु उस तक पहुंचना सम्भव नही है । इसलिए पदमावती कहती है- पिउ हिरदय मह भेंट न होई । को रे मिलाव कहीं कोहि रोई ।' पद्मावती के विरह का मार्मिक अनुभूतिमय रूप इसी स्थल पर निरखता है । उसकी यह विरह वदा नागमती की विरह वंदना के ही समान अत्यन्त गहन, प्राणातक जोर हृदय द्रावक है । यही विरह प्रेम की कसौटी है । इसके उपरा त पद्मावती के विरह का दूसरा मार्मिक रूप उस समय देखने को मिलता है जब बलाउटीन रत्नसेन को ब दी बना दिल्ली से ले जाता है। पद्मावती को इस समय दुहरा दुख सहना पडता है । एक तो उसका पति उससे बिछुड कर गत्रु के बदी गह में भयर यातना भोग रहा है दूसरे परमावती के कारण ही उमने पति को बदो बनाया गया है । यही सोच सोच कर वह करुणविलाप करने लगाती है। वह स्वयं को वादी बनवा पति की मुक्ति करवाना चाहती है।' पद्मावती के विरह का जा अतिम रूप सामने आता है उसम विरह व्यथा की आहुलता और छटपटाहट न होकर एक प्रगान गाभीय मिलता है । वह पोडग शृगार कर पति के साय सती हा जान के लिए प्रस्तुत हो जाती है और गात स्वर म कहती है- 'यही दिवस हो चाहत नाहा । चरी साव पिउ । देइ गलबाहा ।। सारस पसिन जिय निनारे । हा तुम्ह विनु का जिनौं पियार ॥ नेवछावरि क तन छह रावो । छार हाउँ सग बहुरि न आवो । दीपक प्रीति पतग उ जनम निवाह परेउ ।। नेवछावरि चहु पास हाइ कठ लागि जिउ दउ ।। यह पद्मावती के विरह का चरमावस्था है । हम पूवाक्ति पक्तियो मे देख १ जायसी प्रथावली प० १७७ २ ‘नीर गभीर कहाँ हा पिया । तुम बिन फाट सरवर हिया --जायसी प्रथावली प० २६४ ३ पिय जेहि वदि जोगिनि हाइ धावो । हौं बदि लेउ, पिर्याह मुरराषौं । -वही प० २८० ४ वही, पृ० २९९ - विरह, प्रेम की कसौटी। १३७ १ 1 माय हैं कि पद्मावती का विरह विभिन परिस्थितिया में विकास पाता हुआ उत्तरात्तर अधिक प्रगाढ, गहा और गम्भीर बनता जाता है। इसी कारण उसके विरह में एक अद्भुत स्वाभाविक्ता और मामिकता उत्पन्न हो गयी है। इसके विरह का यह अतिम रूप पूण प्रशान और गम्भीर रूप धारण कर लता है, जिसम बरुण प्रत्न या विरह वेदना के स्थान पर पति से शाश्वत मिलन पी आन दमयो किरणे विकण हा रही है। हा० कमल कुलश्रेष्ठ ने पद्मावती के उपयुक्त चित्र से अभिभूत हो लिखा है। 'पद्मावती के य शर क्तिन मार्मिक है। व्यथा अपनी सारी मधुरता विरह अपनी सारी मिठास, प्रणय अपने सार स्थायित्व और नारी अपनी चरम भावुकता के साथ इन गो म साकार होकर वोल रही है। पदमावत म विरहानभूति का सवप्रथर दशन रलसन के विरह के रूप में होता है। पद्मावती के विरह के समान ही रत्न सेन का विरह भी विभिन्न स्थितियो म पल्लवित और विकसित होता चलता है। इसके विरह को दो वों में विभाजित किया जा सकता है--(१) पूर्वराग का विरह, (२) विवाह के वाद का विरह । प्रथम विरह वा आरम्भ हीरामन शुक द्वारा पद्मावती के रूप सोदय का वणन मुनने के पश्चात होता है । यह 'प्रेम खण्ड स प्रारम्भ होकर पद्मावती सुआ भेट खड' तक चलता है। इस भाग म रत्नसन पद्मावती के लिए विरह म्याकुल तो रहता है पर तु उमे इस बात का निश्चय नही रहता कि पद्मावती उमने प्रणय को स्वीकार कर लगी। इसके आगे पदमावती रत्नसन भेट खण्ड म जब नोना का प्रथम मिान होता है तो रत्नसन का यह विश्वास हो जाता है कि पद्मावती उसे स्वीकार कर हंगी। उसके विरह का दूसरा सण समुद्र में दोना के विछड जाने पर सामन राता है । यहाँ पर भा दानो क सच्चे प्रेम की परख होती है। रत्नमन की विरह भावना क्वन पद्मावती लिए ही रही है । नागमती के प्रति उसके हृदय मे विरह की ईप मात्रा भी नही है। केवल एक ही स्थान पर इसकी हल्की सी झलक मिल जाती है जब रत्नसन चित्तोर लौटकर नाग मती के उगहना दर पर उसम कहता है-- 'नागमती तू पहिलि बियाही । कठिन विछोह दहै जस याही । १ हिली प्रेमाम्यानक दाय डा० अमल कुलश्रष्ठ प० ३१७ । २ जापती प्रथावली १० १८९ ।
१३८ । मूकी कवि मावती का प्रेम निरूपण परन्तु हम रत्नसेन रे क्थन पर विश्वास नहीं हरा, श्याकि सिंहलद्वीप में रत्नसेन को हम एक बार भी नागमती नी याद करते हुए नही देखते । बह परल पपायतो के विरह म इवा रहता है और फिर उस साप कलि त्रीमा करने में । रत्नसेन के वियोग की तीव्रता पद्मावती के प्रति ही दिखाइ रत्नसेन के हृदय म हीरामन द्वारा पद्मावती के सौंदय रावणन सुन विरह मावना का उन्य होता है जिसे आचाय गुवर अस्वाभाविक मानते हैं। रत्नसेन उस वणा को सुनते ही तुरन विरह वदना म याकुल हो मूर्थिन हा जाता है। हाश म आने पर नाहि त्राहि करने लगता है और पुन पमारती को प्राप्त करने का दृढ सक्ल्प कर राजपाट त्याग यागी बन सिहल द्वीप की यात्रा पर निकल पडता है । वह यह न्ढ निश्चय कर लेता है कि सीटूगा तो पपावती का रेकर ही अन्यथा उसी के दरवाजे पर प्राण दे दूंगा-- जो रे जिऔं ता बहुरौ मरौं तो आदि के बार ।। माग की बाधाए उस रच मात्र भी विचलित नही कर सकतीं। उसके मन म य कोई भी अभिलाषा न होकर केवल पद्मावती क दान की ही मभिलाया है क्योकि उसी न उसे प्रममाग का पथिक वा दिया है ।' कुछ मालोचको ने रत्नमेन वे इस प्रेम और विरह को अस्वाभाविक माना है और यह निणय दिया है कि उसके इस विरह म मानवीय संवेदना युक्त गह्न अनु भूति के दशन नही होते । यह अलौकिय अधिक प्रतीत होता है। उसकी विरहानुभूति म मार्मिकता का समावेश उस स्थल स होता है जहाँ वह शिवमडप म पद्मावती के दशन कर उसके लिए अपने प्राणा की बाजी लगा दता है और समाधि लगा पद्मावती के नाम का जप करने लगता है । तताग वा उसे पद्मावती मिल जाती है। दोना का उद्वाह हो जाता है पर तु इसके बाद भी उसके दिरह के एक नये रूप के दशन होते हैं । सुहागरात १ जायसी ग्रथावली, ५० ५९ । २ ही पद्मावती कर भिखमगा। दीठिन नाव समुद औ गगा --वही प०६०। न हो चही सरग व राजू । ना माहिं नरक सति क्छुि का । चाहा आहि कर दरसन पावा । जइ कोहि आनि प्रम पथ लावा॥ -जा० ग्र०प०६६ । ३ विरह, प्रेम मी सौटी। को पद्मावती उसे तग करने के रिए ईपत्काल के लिए छिप जाती है तो वह रिक्षिप्त के समान प्रलाप सरन लगता है। यहाँ पर पलकातर वियोग है जिमसे प्रम की अन यता धोतिन होती है । यद्यपि यह विरह मस्वाभाविक मोर वमोने का कहा जामकता है। उसके विरह का मार्मिक रूप रेवल रत ममय पूणरूपेण उभरता है जब समुद्र में उन दोना का विछोह हो जाता है । यह मतीव आर्त स्वर म विलाप करता है । वह सारे सुरा को पुकारता है कि वह उसका सहायता करें, जिसस समुद्र उसकी प्रिया को परावर्तित कर दे । रह ईश्वर स प्रायना करता है कि- 'मानसि सब अवस्था मारी। जस बिछुरी सारस क जोरी ।। एक मए ररि मुव जो दूजी। रहा न जाइ आउ भव पूजी ॥ गरत तपत बहुत दुख भरऊ । करपी माथ वेगि निस्तरऊ ।। मरों सो लद पद्मावति नाऊ । तुइ कर तार वरसि एक ठाऊ॥ दुख सौ प्रीतम भेटि क सुख सौ साव न वाद। एहि ठाव मन उरप, मिली न विछाहा होइ । रल सेन को यह विरहानुभूति ययाय गहन और प्राजा है । जिसमें प्रेम की उदात्तता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि विरह को "यापक्ता का जसा वणन जायसी ने किया है वसा अय क्सिी न नही। प्रमी के साथ प्रियतम भी विक्ल रहता है वह भी तडपता है यह पहले कहा जा चुका है । सूफी सिद्धा ता नुसार जिस प्रकार जीवात्मा परमात्मा से मिलने के लिए विक्ल है, उसी प्रकार परमात्मा भी जीव से मिलने के लिए उत्सुक है । भारतीय परम्परा के मनुसार भी यदि गोपिकाएं कृष्ण से मिलन के लिए उत्सुक हैं तो कृष्ण भी गोपिकाओ से मिलने के लिए उत्कठिन हैं । प्रेमारयाना काव्यो मे सभी नायक नायिकाएँ विरह स व्याकुल हैं तथा उह सयोग होने पर ही मुखमिला है । नागमती, पद्मावती और रत्नसेन आदि के विरह वणन स यही नात होता है कि सारा ससार ही प्रपच समेत विरह से व्याकुल हो रहा है। नायक, नायिका, एवं उपनायिकाओ का विरह एक्त्व की ही सूचना देता है । एक प्रम ही समस्त ससार विरही हुआ दुखी हो रहा है । जायसी का कहना है कि विरहाग्नि से १ 'काहि पुकारौं, का यह जाऊ । गाड़े मीत होइ ररहि ठाऊ" -वही, प० १८० । -- १४. 1 सूफी कवि जायसी याप्रेम निरूपण -- , मूय अहमिशि तपता है तथा इपित-सा दिखायी देता है । क्षण म स्वग और क्षण म पाताल हो जाता है पर तु तनिक भी चन नही पाता--- 'विरह के आगि सूर जरि काया । रातिहि दिवस जर माहि तापा । खिनहि सरग खिन जाइ पतारा । थिर न रहे पहि आगि अपारा ।'' जीवात्मा ईश्वर का ही मा है, इसलिए वह सदव अपन मूल से मिलने के लिए तडपता, रहता है । यह विरह उसकी साधना में बडा सहायक होता है। यह मम की पीर को जगा देता है और पार आत्म चत य को जगाती है। जीव के सजग हा जान पर सुरति जग जाती है जिसस पिउ पिउ के अतिरिक्त भौर कुछ नही सूयता-- विरह जगाव दरद को, दरद जगाव जाव । जीव जगाव सुरति कौं पच पुकारे पीव ।। विरह क प चात मिलन का जो परम सुख होता है इसका प्रमी ही मानता है । दुस के वार बादल हट जात, हैं और सुख का तारा उदित हो गाता है-- विधुरता जब भेटे, सो जान जेहि नह । सुक्ख सुहेला उग्गव दुख झर जिमि मह ।। निय यह है कि सासारिक दुखो को मिटाने का एकमात्र उपाय सुफी मत के अनुसार ईश्वराय प्रम का भावना है । ईश्वरीय प्रेम के माधुय में ही जोवन को कटुता विलीन हो सकती है यह सूफी सिद्धात की लोकिक उपादे यता है । इस प्रकार IIT तथा यात्म दानो का समय इस मत म प्राप्त होता है। जायसी सूफी कवि हैं । व प्रम में महत्त्व का जात है। प्रेम की साथ- बता प्रिय के प्रति सभी भावना के एक निष्ठ हा जान में है । मन की सारी वत्तिया सिमट कर जन प्रियमयी हो जाती है ता प्रम साथकता प्राप्त कर लता है । मन की वत्तिया की यह एक निष्टता विरह की स्थिति म ही सभव है । विरह के क्षणा म प्रिय को स्मृति अधिक तान हो जाती है । यह तीव्रता चित्त को एकाप करती है । ससार के सारे जाकपणो से हटकर मन प्रय 71 . + 1 1 1 प०७८ १ जायजी प्रयावली २ सत बानी संग्रह (दादू) भाग पहला, पृ. ८२.. ३ जायसी न थावली पृ०७६
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५/ ५ प्रेम का प्रभाव और महत्व प्रेम ही ईश्वर है जायसी ही नहीं अनेक मर्मी कवियो ने प्रेम को मानव जीवन की सर्वा धिक प्रभावशाली, व्यापक एव दिव्य शक्ति के रूप में महत्व दिया है। प्रेम ही मनुष्य को देवत्व प्रदान करता है । प्रेम ही ईश्वर है। कवि गणपति प्रथारम्भ में सवप्रथम रतिरमण की स्तुति करते हुए लिखा है कि ब्रह्मा, हरिहर सभी को कुसुमशर ने विजित कर लिया है। यह सष्टि विस्तार को सभाले हुए हैं विश्व की अभियक्ति का कारण देव प्रथम वदनीय हैं । लगभग इसी प्रकार के भाव रस रतन कवि 'पुहकर ने भी प्रकट किये हैं । उनका कथन है कि जिस तन मे प्रेम' प्रकट हो जाता है, वह अजर अमर हो जाता है । इस माग का अत पाना कठिन है । अनेक लोगो ने अनेक प्रकार से इसका गुणगान किया है। यह सष्टि प्रेम का ही प्रकट रूप है। यह बतलाते हुए कवि मझन ने कहा है कि प्रेम सष्टि का अमूल्य रत्न १ 'सुर नर पग्नग मणि वली, लक्ष चउरासी लोप । ब्रह्मा हरिहर कुसमशर जिणि जित्या सवि कोय ॥ समल ज्यो मवि सष्टिनु पविण आवइ छह । कारण विश्व वधारवा आदि उपायु एह ॥ सम्पादक-एम० आर० मजमूदार, माधवानल कामकदला प्रबघ, पृ० १ (१९४२) २ जिहितन प्रम प्रगट तन कोनो । सो तनु अजर अमर कर दीनी । कठिन पप जिहि अ त न पायौ । बहुविधि विविधि बहुत विधि पायो।" -'रस रतन' स० डा० शिवप्रसाद सिंह, ना०प्र० समा, काशी, पृ० ३९ (२०२० वि०) प्रेम का प्रभाव और महत्व । १४३ है। उसी का जीवन ध य है जिसके मन मे प्रेम निवास करता है। प्रेम की ज्योति से ही ससार मे प्रकाश होता है प्रेम के समान सु दर वस्तु ससार में कोई नहीं है । जिसके हृदय मे प्रेम का दीप जलता है उसका सम्पूण जीवन उज्वल हो जाता है।' रसमजरी के आरम्भ म भक्त शिरोमणि नददास ने भी परम ज्योति ईश्वर को प्रेममय कहकर नमस्कार किया है।" और अततोगत्वा अगम अगोचर प्रभु को अतिनिक्ट लाने का मूल मत्र भी इसी 'प्रेम' को बताया है-- "जदपि अगमते अगम अति निगम कहत है जाहि। तदपि रगीले प्रेम से निपट निकट प्रभु आहिं ।'' आलम ने लिखा है कि जिस व्यक्ति के हृदय मे प्रेम नहीं है वह मूख एव मतिहीन है । मनुष्य एव पशु के मध्य प्रेम ही तो एकमात्र भेदक रेखा है । प्रेम के तेज द्वारा ब्रह्म ज्ञान की भी प्राप्ति की जा सकती है। मानव गरीर तो अधकूप सदश है। नह' का दीपक जलन पर ही उसके रूप और गुणो का वास्तविक ज्ञान होता है ।' पूण ब्रह्म भी प्रेममय है । अत प्रेम को १ 'उतपति सष्टि प्रेम सो आई । सष्टि रूप भर प्रेम सोपाई। जगत जनमि जीवन भल ताही पेय पीर उपजी जिअ जाही॥" मधुमालती स० डॉ० माताप्रसाद गुप्त मित्र प्रकाशन इलाहाबाद, सन १९६१ पृ० २३ २ प्रेम जोति समसिष्टि अजोरा । दोसरन पाव पेय कर जोरा।" प्रेम दिया जाके पर वारा। तोहिमम आदि अत उजियारा।" वही पृ० २४-२५ प्रथमहि प्रनऊ प्रेम मय, परम ज्योति जो आहि । -नददास प्रथावली स० श्रीवजरत्नदास ना० प्र० सभा कागी, प०१११५/ स०२००६ ५ वही, पृ० ४३ ६ सो मतिहीन बच्च तनु होई । सग्रह नेहुन जीव कोई। मानुस पसु अतरु यह महई । मानद सोई नहु जो वहई ॥ ब्रह्मज्ञान पावै पुनि सोई । तिहि तन तेज नेह की होई॥ अधकूप में देहु गुप्त प्रकर कोई नहिं लखहि । जान दीपक नेहु तब सब देख रूप गुन ।' -हिदी प्रेम गाथा काम्य साह स० गणेश प्रसाद द्विवेदी हिदुस्तानी अकादमी, इलाहाबाद, पृ० २१३ ३ - १४४ । मूफी कदि जायसी का प्रेम निरूपण - . ही सर्वोच्च मानना पडता है। प्रेम या इस के बिना इस संसार म चि नहीं हो सकती। जिसम इश्क नहो उसमे कुछ भी नही । यही कारण है कि मुल्ला बजही ने 'इश्क का दर्जा सर्वोच्च स्वीकार करते हुए सवत्र उसका अस्तित्व स्वीकार किया है- 'बडा इश्क सबसे दर्जा अहै । के यक जान हो इश्क हरजा अहै ।। जहाँ दो है वहाँ इश्क बिन रूप नही । नहीं इश्क कुच जिसम वो कुच नही ।' उसमान ने प्रेम के अमरत्व का वणन करते हुए लिखा है कि 'प्रेम रस का पान करने वाला युगयुगातर तक जीवित रहता है । ' क्योंकि वह प्रेम ज्योति सवप्रथम परमात्मा के ही मानस में उत्पन्न हुई थी। प्रेम के कारण ही उसने सष्टि रचना की। कवि कासिम शाह का विचार है कि इस भव सागर को पार करने का एकमात्र साधन ग्रीवा मे प्रमपाश लगाना ही है।' इससे भी आगे बढकर नूर मुहम्मद ने तो उस व्यक्ति को दोनों लोको का स्वामी स्वीकार किया है, जिसने अपने मन में प्रेम रस को जमा लिया है। प्रेममाग मे जीवन का बलिदान करने वाल यक्ति घय हैं। शेख निसार तो यह मानते हैं कि मानव का जाम ही प्रमाग्नि को सभालने के लिए हुआ 'पूरन प्रहा प्रेम मय जानह । सब अपर प्रेमहि पहिचानहु ।" आरमकृत श्याम सनेही, रीति स्वच्छ द काव्यधारा ५० ११९ से उदघृत २ मध्यकालीन हि दी और पजाबी प्रेमाख्यान, डा ओमप्रकाश, प० १९७ से उदधृत। 'औ जो प्रेम अमी रस पीया । मर न मार जुग जुग जीया । -चित्रावली, स० जगमोहन वर्मा, प० २३६ ४ पहले उठा प्रेम विधि होये । उपजी जोति प्रेम के कीये ।" -वही, ५०४ ५ "आदि प्रेम विधिन उपराजा । प्रेमहि लागि जगत सव साजा।" -मध्यकालीन हिदी और पजावी प्रेमाख्यान पृ०५ पर उधत । पासी प्रेम प्रीति को हारी। भव सागर से पार उतारी।' कासिम शाहकृत इस जवाहर, १०४ 'अलप प्रेम कारन जग कीहा, पय जो सीस प्रेम मह दोहा । जाना जेहिक प्रेम मह हीया, मर न कबहूँ सो मर जीया। जा मन जामा प्रेम रस मा दोर जग को राय । -इद्रावती स० श्यामसुदर दास ना०प्र० स०, काशी, ५०६ (१९०६ ई.) १ ३ ६ ७ प्रेम का प्रभाव और महत्व । १४५ " और ईश्वर ने यह थाती वस ही सौंप रखी है जसे कि दीपक की बत्ती । ईश्वर उसी वत्ती मे लाकर छिप जाता है और शरीर को जला कर पुन प्रच्छन्न हो जाता है-- "प्रेम अगिन तेहि काहु सभारा । रचा मनुस बहुविधि विस्तारा ।। तेहि सौंपा वह प्रेम के थाती । दीपक माह धरा जस वाती ॥ तेहिं वाती मह आप छिपाए । होय परछिन पनि देह जराये ।। कवि सूरदास लखनवी ने प्रेम को अमर बताया है और लिखा है fr वेद और पुराण उसी का यशोगान करते हैं जिसका हृदय प्रम के उल्लझन मे उलझा हो, अन्यथा वाणी भ्रम में पड़ जाती है। प्रेम के अतिरिक्त उसके पास कुछ भी गाने को नही है--- "वेइ वेद पुरानहि गाई । जिन मन पेय उरश उरझाई ।। नाहित ऐसे गए हिरानी । प्रम बिना काछू न बखानी ।' क्बीरदास जी कहते हैं कि जिसने प्रेम रस को नही चखा और चख कर उसका रस्वास्थान नहीं किया, वह सूने घर का पाहुन है जसे वह इस लोक में आया वैसे ही चला भी जायेगा। कबीर प्रेम को भवसतरणाथ अलौकिक मानते हैं। वह इसी प्रेमकल्लोलिनी के पावन मूल पर ठुलयन के लिए सदैव तयार रहते हैं-- अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाई। गूगे केरी सरकरा, घठे मुसकाई ॥५ यह प्रेम सवसुलभ है परतु इसका मूल्य चुकाने के लिए कोई राशि पर्याप्त नहीं । इसे प्राप्त करने के लिए शिर देना पडता है-- १ हिदी प्रेमगाथा काव्य संग्रह स० गणेश प्रसाद द्विवेदी, प० ३२८, (१९५३ ई०) २ 'प्रेम अमर यह मर न मारा । बुझेन पेम अगिनि चिनगारा।' नलदमन (मूर लखनगे) स. डा. वासुदेव शरण अग्रवाल पृ० १९३ नलदमन (सूर लखनवी स. वासुदेव गरण अग्रवाल पु० १९३ विबीर प्रेमन चखिया चसि न लिया साव । सूने घर का पाहुणा, ज्यू आया त्यू जाव ॥ वीर प्रथावली, स० डॉ० माताप्रसाद गुप्त पृ० १७ ५ यही पु० २९ ३ ४ १४६ । सूफी कवि जायसी का प्रम निरूपण . "प्रेम न खेतो उपज प्रेम न हाट बिकाइ। राजा परजा जिस रुप, सिर दे सो ले जाइ ॥" उपयुक्त उदाहरणो से प्रकट है वि मर्मी कवियो के लिए प्रेम ईश्वर का पर्याय है। इनकी दृष्टि मे मानव के कल्याणाथ प्रेम का वही स्थान था जो भक्त कवियो वी दष्टि मे भगवान का उसमान ने चित्रावली के तिम दोहे में प्रेम माग की महत्ता को स्पष्ट करते हुए लिखा है-- "श्याम ध्यान मद्धिम सब जप तप सजम नेम । मान सो उत्तम जगत जन, जो प्रति पार प्रेम ।। प्रेम के इसी महत्व को महाकवि जायसी ने पश्चाताप करते हुए राघव चेतन के से भी कहलाया है-- 'कवि सो प्रेम तत कविराजा । झूठ साच जहि कहत न साजा । मनुष्य बिना प्रेम के एक मुटठी घूल से अधिक कुछ भी नहीं। जायसी ने वदावस्था की बुराई की है । कथ यत, वृद्धावस्था में यौवन नहीं रहता और मानव मानस प्रेम नहीं कर सकता है वे अत्यात सतप्त स्वर में कहते हैं कि लम्बी आयु अभिशाप है-- विरिध जो सीस डुलाव सोस घुन तेहि टोस । बूढी माऊ होतु तुम्ह कि हपह दीह असीस ॥ यौवन प्रमत्ता पद्मावती के सम्मुख समस्या दूसरी है । आयु का तकाजा प्रेम का है और समाज प्रेम मे पर रखने से रोकता है वह करे तो क्या करे-- 'जोवन चचल दीठ है कर निकाज काज । धनि कुलात जो कुल घर क जोवन मन लाज ॥ और अत मे वह कुल का परित्याग करने के लिए उद्यत सी है । यह सब ५ ६ १ कबीर प्रथावली, स० श्यामसुन्दर दास, ना० प्र० स० ५०७० (१९२८ ई०) २ चित्रावली, स० जगमोहन वर्मा, प० ८९ ३ पद्मावत (स. डा. वासुदेव शरण अग्रवाल) ५. ५६५ 'मानुस पेमु भएउ वकुठी, नाहिंत काह छार एक मूठी।' --जायसी प्रथावली, प०७१ ५ वही, पृ. ३०२ ६ जायसी प्रथावली, पृ० ७५ ४ प्रेम का प्रभाव और महत्व । १४७ " । -- प्रम प्रभाव के कारण ही हो रहा है। सृष्टि रचना प्रेम के कारण ही हुई है नरमुहम्मद कहते हैं कि इस सष्टि की रचना प्रेम के कारण ही हुई है ।' अगर प्रेम न होता तो सष्टि की रचना न होती । जायसी भी कहत हैं- 'सुमिरी आदि एक करतारु । जेहि जिउ दीह की ह ससा ॥ कीहेसि प्रथम जोति परकासू । की हेसि तेहि पिरीत कैलासू ।।" जायसी इस प्रेम को सरल सष्टि मे परियाप्त देखते हैं--- "रोव रोव ते वान जो फूटे । सूतहि सूत घिर मुख छूटे ।। ननहि चली रकत की धारा । कथा भीनि भएउ रतनारा ।। सूरुज हि उठा होइ ताता । ओ मजठि टेसू वन राता।। भा बसत राती वन सपती। औ राते सब जोगी जती ॥ भूमि जो मोनि भयउ सब गेरु । आ रातें तह परिव पखेरु ।। राती सती अगिन सब काया । गगन मेघ राते नेहि छाया ॥" अयत्र वे कहते हैं--- 'अस पर जरा विरह कर गठा । मेघ साम धूम जो उठा ॥ दाया राहु केतु गाथा । सूरज जरा चाँद और आधा ।। औ सब नखत तराइ जरहीं । टूटहिं लूक घरति मह परही ॥ जर सो धरती ठावहिं ठाऊ । दहकि पलासि जरै तेहि दाऊ ।।" उपयुक्त वणित समस्त स्थितियो प्रेम के प्रभाव के कारण ही उत्पन्न हुई है। इस प्रेम म जब मनुष्य पडता है तो उसकी दशा अतीव शोचनीय हो जाती है । उससे न जीते बनता है और मरते बनता है-- "कठिन मरन ते प्रेम व्यवस्था । न जिउ जिये न दसम अवस्था।। मशन ने तो प्रेम के महत्व के विषय मे कहते हैं कि जिसके हृदय में विरह ने घाव नहीं किया उसका जीवन धारण करना ही व्यथ है-- अल प्रेम कारन जग की हा । धनि सो सीस प्रेम मह दोहा ।" -इद्रावती, स० श्यामसुदर दास, १०८ २ जायसी प्रथावली पु०१ ३ वही पृ० ९८ ४ जायसी प्रथावली पृ० १६३ ५ वही, पृ. ४९ १४८ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण ॥ "मझन जो जग जनमि के विरह न कीना चाउ । सूने घर का पाहुणा जेउ आया तेउ जाउ ॥" जायसी की प्रेमानुभूति सबसे अधिक तीव्र है। उनकी पद्मावती कहती है कि मैं प्रियतम के पास शृगार करके जाऊ । मुझे तो प्रियतम सवत्र व्याप्त दिखायी देता है- 'करि सिंगार तापह का जाऊँ । ओही देखहुँ ठावहि ठाऊ । नन माह है उहे समाना । देखो तहाँ नाहिं कोउ आना ।।' उसका दढ़ विश्वास है। "उह वानन अस को जो न मारा। वघि रहा सगरो ससारा ।। कितु सूरदास के श दो मे ये सारी बातें गोपनीय हैं । जो इहे जानता है, उसे ही ये बतलानी चाहिए किसी दूसरे को मही- प्रेमी प्रीतम को मरम कहै न काहू पहि । जान तहि जनाइए लोगन सो कछु नहि ॥" प्रेम सभी वस्तुओ को लावण्यमय बना देता है जायसी की रचना पदमावत का प्रेमगाथा द्वारा या 'मखरावट मे वणित सिद्धाता द्वारा जिस प्रेम का परिचय प्राप्त होता है, वह अति उच्च एव गाम्भीय पूण है । उसके महत्त्व का ज्ञान हम सवप्रथम उस समय होता है जिस समय हीरामन य द्वारा पदमावती के रूप एव गुण का सक्षिप्त समाचार प्राप्त होते ही उसके प्रेम म परकर वह उठता है- तीनि लोक चौदह खण्ड सर पर मोहिं सूझि । प्रेम छाडि नहि लोन क्छि जो देखा मन बूझि ॥"" अर्थात अब मुझे तीनो लोक और चौदहो भुवन प्रत्यक्ष हो गये । मैंने अपने मन में समझकर यह देख लिया कि वास्तव में प्रेम के समान कोई भी वस्तु मुदर नही हो सकती । तात्पय यह है कि किसी भी सासारिक वस्तु मे ऐसी रमणीयता नही प्राप्त हो सकती जो प्रत्येक स्थिति अथवा दशा में भी १ मधुमालती (मझन) स० डा० माताप्रसाद गुप्त प० २०० २ जायसी प्रथावली, पृ० १४३ । ३ वही, प०४३। ४ नलदगन (सूरदास लखनवी), स० डा. वासुदेव शरण अग्रवाल, प०९१॥ ५ जायसी ग्रथावली, पृ० ३९ , - प्रेम का प्रभाव और महत्व । १४९ 2 -- एवं समा होपर वतमाम रह । यह प्रेम की ही विशेषता है । 3999 मुहम्मद दाजी प्रेम के ज्या भावै त्यों गल । निल फूलाहि के सग ज्यो होय पुरायल तेल ।। कहने का तात्पय यह है कि प्रेम की याजी किसी भी प्रकार मेली जाय उमम लाभ ही राम हाना है। जगे तिल के दाने, पुष्पी के सहवास प उप रक्ष्य में यदि मेरे भी जान हैं तो अतोगत्वा उनका रूप मुगधित तेल के रूप में भी प्रकट होता है। प्रेम के कारण अथवा प्रेम के परिणाम स्वरूप दुष हो ही नहीं सकता। इसका तो नियम ही है- 'प्रेम के आगि जर जो काई । दुख तेहि फरन अविरथा होई ।२ अपात प्रम को ज्वाला मे अपने को भस्मसात कर देने वाले का दुख कभी व्यथ नहीं जाता। कवि यहां व्यजिन करना चाहता है कि बाध्यात्मिक प्रम की ज्वामे जलकर ही परमात्मा रूपी प्रियतम से भेंट होती है अर्थात अध्यात्म प्रेम की ज्वाला म ज्वलित होना व्यय नहीं जाता । इस प्रेम के स्वरूप को महान ने भी कोतारते हुए कहा है- 'प्रेम दीप जावे हिय बराते सब आदि अत उजियारा॥ विरह जीव जाने घर होई । सदा अमर पुनि मर न कोई -अथवा- 'जनम जनम फन जीवन ताही। प्रम पीर जिय उपजा जाही। जेहि जगन यह विरहा भयऊ । त्रिभुवा नेर राउ सो कहेऊ ।'' दुखो के साथ ही साथ सुख भी लगा ही रहता है जिस कारण उसके आनद में बाधा नही पड पानी-- दुख भीतर जा प्रेम मधु राखा । जग नहि मरन सहे जो चावा । प्रेम का मधु दुव से आवेष्टित है । । "प्रेम की पोर में साथ ही जो माधुय अनुभव मे आता है उसका स्वाद इतना तीव्र होता है कि उसके समक्ष ससार मे परण का कप्ट महते महो सह ल्ना कोई असम्भव बात नही ! जो प्रेम माग म शिर ही रखता उमका १ जायसी अथावली प० २५ २ वही, प०६५ ३ मधुमालती स० डा० माताप्रसाद गुप्त, ५०२५ । ४ मधुमालती पृ० २९ ५ जायसी प्रथावली पृ. ४ । F 4. . 7 १५. ! सूफी कवि जायसी का प्रम निरूपण - २ " इस संसार मे जीवन ही व्यथ है। प्रेममाग के महत्व को जानता है जिसने देखा है । जिसने वह माग नहीं देखा है वह उसके महत्त्व को नही मानता है- 'जो नहि सीस प्रेम पथ लावा । सो प्रिथिमी मह काहेक आवा। प्रम वार सो कहै जो देखा। जो न देख का जान विसेखा ।' इस कारण प्रेम नितात एक समान समझा जाता है और इसकी एरर सता ही इसके वास्तविक रूप से सौ दय का कारण । इस अनुपम गुण के ही सयोग से- 'मानुष प्रेम भएउ बकुठी । ना हित काह छार भर मूठी। इस प्रम के ही कारण मनुष्य जमरत्व तक प्राप्त कर लेता है । नहीं तो उस मूठी भर छार मात्र से निर्मित मिटटी के पुतले से हो ही क्या सकता था। अतएव कवि को इस बात पर पूर्ण विश्वास है कि जो प्रेम माग पर पथिक होकर पार पहुँच गया वह पुन मिटटी म ही मिलने के लिए इस क्षण भगुर शारीर को धारण नही कर सकता। वह अमर हो जाता है- 'प्रेम पथ जो पहुँच पारा । बहुरिन मिल आइ एहि छारा । परतु प्रेम जितना ही सु दर और मनोहर है उसका माग उतना ही विकट एवं दुगम है क्याकि इस प्रेम माग पर चलने वाले के लिए यह आवर या है कि वह अपने साधन की सफलता एव पठिनता को अपने विचार से एक्दम निकाल दे। ऐसा करने के कारण प्राय देखा गया है कि उसके माग का ढग ही विभिन्न हो जाता है। वह जितना ही विपरीत माग से चले और जितना ही कष्ट झेले उतना ही स्वय को उद्देश्य की पूर्ति करता हुआ पाता है इसीलिए जायसी कहते हैं। उलटा पथ प्रेम के वारा। चढ सरग जो पर पतारा॥ प्रेम का माग ही विपरीत है क्याकि इसके द्वारा स्वग जान का अधिकारी १ वही पृ० ४० (क) सूफी का य मे हमे भावो की व्यजना अनेक रूपों में मिलती है- 'जगत जाम जीवन फल ताही । प्रेमपोर जिय उपना नाही. मधुमालती प० ११, (ख) ऊचा बठक प्रम ना जोरहीय सत होय । सो पाद संशय नही जाय पाय सब होय ॥ -प्रेमरस ख रहीम । २ जायसी प्रपावली २०७१। ३ वही, पृ. ६२ ४. बदी, पृ. ९८ - ४ प्रेम का प्रमान और महत्त्व । १५१ ग नही हो सरना है जिसन पहले अपन आपको पाताल में डाल दिया हा । इस प्रम पथ का अनुसरण परन से पूर्व ही यह सोच लेना आवश्यक होता है कि मन हमे अपने दुख सुख की कोई परवाह नही करनी है । इसीलिए सिंहन दीप जात समय माग म पडन वाले विस्त समुद्र को पार करने की कठिनाइया काम्पोरा सुनकर प्रेमी राजा रत्नसेन, सहसा कह उठता है- "राज वहा कोह में प्रेमा । जहाँ प्रेम कह कुसल खेमा । अर्थात जब मैंन प्रेम माग ग्रहण कर लिया है ती अब कुशल मम वा सुख सुविधा की बात सोचना ही ध्यप है। प्रेमवता को दुख पेलना हो पहना है । कवि ने इस बात को स्पष्ट करने के लिए जनक स्थला पर उदाह रण प्रस्तुत किये हैं- 'प्रेम फाद जो परा न छूटा । जीउ दो ह प फाद न टूटा ॥ गिरगिट छद घरै दुप तेता । खन खन पोत, रात खिन सेता ।। जान पुछार जो भा वनवासी । रोव रोव परे पद नगवासी। पायह फिरि फिरि परासो फांदू । उडि न सक जरुझा मा धादू ॥ 'मयो मयो अनिसि चिल्लाई । ओही रोस नाग ह थे घाई ।। पड़क सुआ रक वह ची हा । जेहिं गिउ परा चाहि जिउ दी हा ॥ तीतिर गिउ जो फाद है, नितिपुकार दोख । सा क्ति हकारि फाद गिउ (मेल) क्ति मारे हाइ माग्य ।।" अर्थात प्रेम के फदे म जो पड गया वह कभी नहीं छूटता । प्राण देने पर भी उसके फदे का टूट जाना कठिन है । गिरगिट को अनेक कष्ट झेलकर भी क्षण क्षण पर पीत लाल अथवा श्वत रग का होना पडता है। जिसके कारण उसके पख पर फदे क चि ह तक पड जात हैं । वह वदी होकर उडने म अस मथ हो जाता है । वह अहनिगि मुयो मयो कह कर चिल्लाया करता है और क्रोध में दौड दौड पर सपो का भक्षण किया करता है । वह फद का १ जायसी ग्रथावली ५० ९२ । २ वही प०३९-४०1 २ प्रीति फद का वणन अय सफो कवियों ने भा किया है- (व) 'प्रीति दया वम है ससारा । प्रीति पाद सब फाद निहारा । -नूर मुहम्मद कृत अनुराग वासुरी, प० ११७ ॥ भूला सब जगत कर धधा । पडा जा जान प्रेम कर पदा।' -कासिम शाह कृत हस जवाहिर पृ०७२।
१५२॥ मूफी पवि जायसी का प्रमनिरूपण . । नि है। इसी प्रकार पडस, शुक और नीलक्ठ पक्षिया के भी ग्रीवा में पड़ा दीखता है जिसके कारण उन्हें प्राण तक निमार करने पड़ते हैं । तीतर के गरे पर लिखने वाला चि इतना नभ मूचा है कि या तो उसके द्वारा इस सघन स्वीकार करना पड़ता है अथवा मुक्त होना पर भी लहर मग्ना ही पडता है अर्थात इम कहा भी गाति नहीं मिलती । भ्रमर ता इस माग वा पथित होकर एकदम जुट ही जाता है । उमे प्राणा की भी आहुति देने पर छन कारा नहीं मिलना । इसीलिए इस माग का अनुमरण भरमव उमी को करना चाहिए जो उनासी यती योगी तपस्वी अथवा स यासी हो। क्योकि भोग विलास में पड़े हुए को ही यदि यहाँ सफलता मिल मक्ती तो ये लोग भोगो का परित्याग कर कठिन व्रत की साधना करने पर आरट क्या होते प्रम प्राप्ति की सिद्धि के वल साधना करने मात्र से नही हो सकती इसके साथ साध तप की माधना भी आवश्यक है।। हम वही अनुभव कर पाता है जो अपने गिर को पहले घड स जलग कर डालता है। केवल क्थनी से कुछ नहीं होता ॥धी निकालने के लिए दघि वो पहरे भली भांति मथने की आवश्य पडती है । जब तक अपने पाप को भी ढूढन-ढते न खो दे तब तक प्रेम के मम को नही पा सरता । प्रमपहाड की रचना ही कुछ ऐसी विचित है कि उस पर चढ़ने वाले को पग द्वारा न चलकर शिर के बल जाना पडता है । यह वास्तव म सूरी का माग है । जिम पर या ता चोर घटाया जाता है अथवा ममूर। हल्लाज सदश व्यक्ति का बलिदान हाता है- जानहि भवर जो तहि पथ लूटे । जीउ दी ह औ दिए न छटे । + + ओहि पथ जाइ तो होइ उनासी । जोगी जती तपी स यासी ॥ भोग जोरि पाइत वह भोगू । तजि सो भोग कोइ करत न जोर ।। साधह सिद्धि न पाट अ जो लहि साधन तप्प । सोई जानहिं वापुरे जो सिर परहिं कलप्प ।। का मा जोग कहानी क्थे। निक्स न घिउ वाजु दघि मथ । जो लहि आय हेराइन पाई तो लहि हरत पाय न सोई ।। पेय पहार कठिन विवि गढा । सो प चढ सीस मो चढा ॥ पथ सूरि ह कर उठा अकूरु । चोर चढ कि चर मसूरु ।। T १ पदमावत स० डा. वासुदेव शरण अग्नवाल पृ० १४० । -- ।
प्रेम का प्रभाव और महत्व । १५६ प्रेम के लिए समपण आवश्यक है जिसने भ्रमर का रंग धारणा ही किया । जो दीपक देखकर पतगा नहीं बन गया जिस पर भुग का प्रभाव नहीं पडा अपवा जिसने अपने प्राणों का समग नहीं किया और न जाप्रम के कारण तपाया मात्र एक हो गया अथवा जिमके मानस में भय का लोभ न हुआ, उमे प्रियतम के प्रति सच्चा मनुसग हो ही नहीं सक्ता, न वह उसके लिए आग या पानी मे पर ही समता है। बायसी कहते हैं- - "ना जेइ भएउ भोर पर गाना जैइ दीपक भएउ पतग ।। ना जेइ करा भ ग के होई। ना जेई आर मर जिउ खोई ।। ना जेई प्रेम औटि एक भएउ ना जेद हिए माल उर गएक" तहि कर वाहिय रहव जिउ रहे जो पीतम शांग ।। जौं वह सुन लेइ सि का पानी का आगि । प्रम म पड जाने पर प्रमो की अवस्था ही विचित्र हो जाती है। प्रेम वे प्रभाव द्वारा अभिभूत होने पर प्रेमी की मनोवत्ति इस प्रकार परिवर्तित हो जाती है कि इसे हिनाहित की पहचान हो नहीं रह जाती- "उपजी प्रेम पोर जेहि आई। पर योधक होइ अधिक सो आई। अमृत वात बत विप जाना। प्रम वचन मोठ माना।' अर्थात् जिस मानव मानस म प्रम को सक बठ गयी उम यदि समझापा बुझाया जाय तो उस पर प्रभाव विपरीत ही पड़ता है। पाहा कम होने के स्थान पर बढ़ने लगती है। प्रेमावेश में उसे अच्छी से अच्छी बात दुरी जान पहती है और वह केवल प्रम सम्बन्धी वार्तालाप को ही अपने अनुकूल समझा करता है । वह अपने दारीर तक की रक्षा के विचार से इस प्रकार उदासीन हो जाता है कि उमे रिसी रात को चिता ही नहीं रहती- "हि के हिये प्रेम रग जामा ! का तेहि भूख नीद विसरामा" अर्थात् जिसके हृदय म प्रम न अपना रंग जमा रिया है उसके लिए भूख निद्रा अथवा विश्राम प्राप्त करना अमभव है। उसे शाति प्राप्त हो ही नहीं सकती। उसकी मासिक स्थिति का वणन करता हुआ स्वयम रलसेन पपावती से कहता है है प्यारी | प्रेम वास्तव म, मदिरा के समान है। जिसके पान करने से जीवन मरण का भय एकदम जाता रहता है। इसका पान जिसने एक्वार भी कर लिया उसके लिए यह मसार कुछ भी नहीं है। और वह प्रेम मद के कारण मस्त होकर इतस्तत भ्रमण किया करता है । इसकी मादकता का प्रभार वही जानता है जो इसका पान करता है और पान करके जायधी-पापली पृ० १९ ॥
१५४ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण - भी अतृप्त ही रहता है और पीते पीते निद्रामग्न हो जाता है । इसकी प्राप्ति जिसे एक बार भी हो गई वह इसके अभाव में रह ही नहीं सकता और सदा इसके लिये अधीर हुआ फिरता है । अपनी सारी सम्पदा को तिलाजलि देकर मानो वह मन में निश्चय कर लेता है कि चाहे सवस्व चला जाय रितु में इस रस का आस्वादन नही छोड सक्ता । अतएव वह अहला स्वय को इसी रस मे सिक्त क्येि रहता है और अपने लाभ हानि पाईपमान भी चिता नहीं करता।" यहाँ पर हम सूफियो का सप्ट प्रभाव पाते हैं क्योकि सुरा और सुदरी की मान्यता सूफ्यिा मे हो है । प्रेम-द्वत को अद्वत कर देता है प्रेमी अपने को एक प्रकार से पूणरूपण खोकर अपना अस्तित्व ही नष्ट कर देता है । जिसे स्पष्ट करते हुए जायसी ने राजा रत्नसेन की अवस्था का चित्र इस प्रकार अक्ति किया है-- "वूद समद्र जस होइ मेरा । गा हेराइ अस मिल न टेरा ।। रगहि पान मिला जस होई । आपहिं खोइ रहा होइ सोई ॥"" अर्थात् जिस प्रकार विन्दु का सिधु से समागम हो जाय और बहुत ढूढने पर भी प्राप्त न हो सके अथवा जिस प्रकार ताम्बूल पत्र रगो मे मिल कर अपना अस्तित्व सो बठे उसी प्रकार राजा ने अपने को खोकर प्रेम में मिला दिया और प्रेमी एव प्रेमास्पद दो से एक हो गये । प्रेम के प्रभाव का इससे उत्कृष्ट उदाहरण और क्या हो सकता है ? जिसका हृदय प्रेम बाणो से विद्ध है वही उसके मम को जाना है-- "प्रेम घाव दुख जान न कोई । जिहि लाग जान प सोई ।' इसी प्रकार मान ने भी लिखा है-- १ सुनु । घनि प्रेम सुरा, के पिए मरन जियन उर रहै न हिए। जेहिं मद तेहि कहाँ ससारा, को सो घूमि रह, की भतवारा। सोपं जान पिय जो कोई पो न अघाइ जाइ परि सोई। जा कह होइ वार एक लाहा, रहै न ओहि दिनु ओही चाहा । अरय दरव सो देह बहाई, की सब जाह, न जाह पियाई। रातिहुँ दिवस रहै रस भीजा, लाभ न देख, न देख छीजा। जायसी प्रथावली, पृ० १४१ २ वही पृ० १४१ ३ वही, पृ० ४९ प्रेम का प्रभाव एव महत्त्व । १५५ "कठिन पीर यह जान सोई। प्रेम विछोह पराजेहि हाई ॥" मसूर अल हल्लाज ने ठीक ही कहा था। "ईश्वर से मिलन तभी सम्भव है जब हम मष्टा के बीच से होकर गुजरें । क्रातिदर्शी कबीर पर भी सूफियो का प्रभाव पूणरूपेण पडा था। उनके प्रेम के आदश सूर हैं । कबीर अनुसार प्रेम पथ पर चलना असिघारा पर चलना है प्रेम बहुत बड़ी चीज है । वही चीज को पाने के लिये साधना भी बडी होनी चाहिए । प्रेम का यह व्यापार कुछ खाला का घर नही है । जब जी में आया चल पडे और बात बात पर मचल गये तथा फरमाईश पूरी हुई । यहाँ तो वही प्रवेश पान का अधि कारी है जो पहले सिर को उतार कर घरती पर रख दे- "कबीर यहु पर प्रेम का खाला का घर नाहिं । सीस उतारे हाथि करि सो पसे घर माहिं ।। कबीर निज घर प्रेम का, मारग अगम-अगाघ । सीस उतारि पगतलि घरे, तब निकट प्रेम का स्वाद ।। जायसी ने प्रेम पथ पर चलने की बात को कुछ इसी प्रकार से यक्त किया है- छुआ।' 'गगन दिस्टि सो जाय पहूँचा । प्रेम अविष्ट गगन ते ऊँचा ।। घुव ते ऊँच प्रेम धुव उआ। सिर देइ पांव देह सो खाला का घर समझान वालो को कबीर ने सावधान किया था। जायसी ने भी कहा है कि वहां पहुंचने के लिय सिर काटकर उस पर पैर रखना पडेगा । 'करब पिरीत कठिन है काजा'। प्रेम के पहाड पर वही चढ सकेगा जो सिर (अभिमान, अहभाव का परित्याग कर) देकर चढना चाह । उस पथ पर काम, क्रोध, तृष्णादि चोर बढमारी करते हैं । पथिक को उनस क्षण क्षण सावधान रहने की आवश्यक्ता होती है । यह प्रेम पीर प्रबोध' से सम्बद्धित होता है- । मधुमालती, पृ. ३५४ 2 Out line of Islamic Culture AM A Shushtry P 311 हिंदी अनुवादक-म० य० जायसो और उनका काव्य, शिवसहाय पाठक, ५०४१९ से उदृत । ३ कबीर प्रयावली स० श्री श्यामसुदर दास, पृ०६९ पमावत स. डॉ. वासुदेवारण अग्रवाल १० १३८ ५ जायसी प्रचावली, पृ०५० Him १५६ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण - "उपजी प्रेम पीर जेहि माई । परबोधत होइ अधिक सो आई ॥"" अल फरावो का कथन है कि "ईश्वर स्वय प्रेम है । सष्टि रचना का मूल प्रेम है । सष्टि की इकाइया प्रेम के सहारे प्रेम के महास्रोत म जो पूर्ण और सर्वोच्च है, डूब जान लिय पूणरूप से जुडी हुई है । चित्ररेसा' जायसी की मवश्रेष्ठ कलात्मक कृति है। इसमे भी जायसी ने अपनी प्रेम सापना का सविस्तार विवेचन क्यिा है । चित्ररखा जायसी ने स्पष्ट कहा है- "जब लगि विरह न होई तन हिये न उपजइ पम । तब लगि हाथ न यावतप करम धरम सत नेम अथात विरह का हृदय म उ पन होना आवश्यक है । पद्मावत की समस्त क्था का केन्द्र यि दु प्रेम साधना ही है । डा० रामचन्द्र तिवारी भी कहते हैं । भावात्मक दष्टि से सूफी रहस्य साधना का केद्र वि दु प्रेम है । सूफी साधक न इस सत्य को स्पष्ट करते हुए कहा है कि प्रेम ही सब रसो का मूल है ।' अगर इश्व न होता इतजाम आलमे सूरत न पकडता । इश्क के बगर जिदगा ववाल है । इश्क को दिल दे देना कमाल है । इश्क बनाता है इश्क जलाता है। दुनियाँ म जो कुछ है इश्क का जलवा है । आग इश्क की गर्मी है, हवा इश्क की बेचनी है, पानी इश्क की रफ्तार है खाक इश्क की क्यिाम है । मौत इश्व की बेहोशी है जिदगी इश्क की होशियारी है रात इश्क की नीद है दिन इश्क का जागना है। मुश्लिम इश्क का जमाल है, काफिर इश्क का जलार है नेकी इ की कुरबत है, गुनाह इश्क से दूरी है विहिश्त इश्क का शौक है, दोजख इश्क का जोक है।"" शेखतुरहान मेहदी गुरु न ही उ हे प्रेमप्याला के पथ को दिखाया था-- 'प्रेम पियाला पथ लखावा । आपु चासि मोहिं बू द चखावा ।। एक १ जायसी प्रथावली प०५१ RAM A Shushtry Outline of Islamic Culture, P 311 हिदी अनु० मलिक मुहम्मद जायसी और उनका काय शिवसहाय पाठक, पृ० ४२० से उक्त । ३ स. शिवसहाय पाठक, चित्ररेखा, १० ९८ ४ मध्ययुगीन काय साधना डा० रामचन्द्र तिवारी पृ० १३२ ५ तस दफ अथवा सूपीमत ५० च द्रवली पाण्डय पृ० ११६ प्रेम का प्रभाव एव महत्त्व । १५७ + ३ प्रेम पियाला जिह पिया, क्यिा प्रेम चित बघ । साचा मारग जिह लिया तजि झूठा जगण्य ॥" जायसी ने प्रेम की महत्ता को प्रदर्शित करत हुए स्वय को प्रेम मधु और भ्रमर कहा है-- 'मुहम्मद मलिक प्रेम मधु भौरा। उन्होने प्रेम प्रीति का मत तक निर्वाह किया है--- "हाथ पियाला साथ सुराही । प्रेमप्रीति र इ ओर निवाही ॥ प्यारे सैयद अशरफ की कृपा से उनके मानस मे प्रम दीप प्रज्ज्वलित हुआ था-- "लेसा हिये प्रेम कर दीया । उठी जोति मानिर मल हीया ।।' हीरामन शुक द्वारा वर्णित पद्मावती के नखशिख वणन के अन तर राजा रत्नसेन के हृदय मे प्रेमभाव का उदय होता है । अपना राजपाट सुख वभव भोग आदि का परित्याग करके जोगी बन जाता है और तब तक प्रयल करता है, जब तक उसे प्राप्त नही कर लेता । चित्तौर से सिंहल तक वा माग एक प्रकार से प्रेम पथ ही है । इस पर वह विघ्नो जतराया और प्रत्यूहा का प्रत्याख्यान करता हुआ गतिमान होता है---- "प्रेम सुनत मन भूल नर्जारा । कठिन प्रेम दइ सो छाजा ।। प्रेम फांद सो परा न छूटा । जीउ दी ह बहु फदि न छूटा ।। पद्मावती का रूप वणन सुनकर राजा मूछित हो जाता है । इस प्रेम प्रभाव को भला कौन जान सकता है- "प्रेम घाव दुख जान न कोई । जेहि लाग जान ए सोई॥ परा सो पेय समुद अपारा । छहरहि रहर होइ विस मारा ॥ प्रारम्भ मे प्रेम प्राय वासनात्मक होता है । विरह की तपाग्नि में प्रज्ज्व लित होकर प्रेमी द्वादगवर्णी कम्पन की तरह फातिमान हो जाता है । हीरा से पद्मावती ने कहा कि यदि म चाहूँ तो उससे आज ही मिल सकती १ चित्ररेखा स०प शिवसहाय पाठक पृ०७४ २ वही पृ० १०३ ३ चित्ररेखा पृ०७५ ४ जायसी अपावली-पृ०७ ५ वही, पृ०९७ ६ वही, पृ.४९ ५ मन " १२ १५८। सूफी कदि जायसी का प्रेम निरूपण हूँ परतु अभी तक उसे मेरे प्रेम का मम तात नही है। मुझे अभी पूणत ज्ञात नहीं है कि वह प्रेम के रग म पूणरूपण रग चुका है या नही-- "ऐसो मरम न जाने मोरा । जाने प्रीति जो अरि के जोरा ।। ही जानति ही अब ही कांचा । ना वह प्रीति रग चिर रावा ॥ ना वह भयउ मलय गिरि वासा । ना वह रवि चढि चढ़ा अमासा। ना वह भयउ भोर के रगू। ना वह दीपक भयउ पतगू ।। ना वह करा भृग के होई । ना वह आपु मरा जिस सोई॥ इस प्रकार जब दोनो का मिलन हो जाता है तो प्रेमी मर कर भी अमर हो जाता है। प्रेम एक एसा अमर, एव शाश्वत सत्य है जिसका कभी भी अस्त नही होता । अलाउद्दीन और राघव कहाँ है ? रलसेन और हीरामन कहाँ हैं ? वह सुरूपा पद्मावती कहाँ है ? वे सब नहीं रहे पर उनकी प्रेम क्या ससार में है- 'कहु सुरूप पद्मावति रानी। कोइ न रहा जग रही कहानी। धन सोई जस कीरति जासू । फुल भर पर मर न वासू ।। प्रेम माग के पथिक के लिए हृदय की पवित्रता परमावश्यक है । कल्याण युक्त हृदय से प्रेम प्रभु की प्राप्ति असम्भव है। महादेव जी ने रत्नसेन को उप देश दिया था कि दुख सहो पर तु प्रेमपथ पर गतिमान रहो--- 'कहेसि न रोव, बहुत ते रोवा । अवईसर मा दारिद सोवा ॥ अबत सिद्ध भरसि सिधि पाई । परपन भया छूटि गल काई ।। कही बात अब हो उपदेसी । लाउ पथ मूले पर देसी ।' प्रेम पथ के पथिव के हृदय म क्रोध, ईष्र्या आदि के लिए स्थान नहीं रहता । वह सहिष्ण उदार और तपस्वी हो जाता है-- "गुरू कहा चेला सिद्ध होई । प्रेम वार होइ करहु न कोई ॥ जाह के बीज । सग न होइ उम जो भीज ।। जेहि जिउ पेय पानि पा सोई । जहि रग मिल ओहि रग होई ॥ जो प जाइ पेम सो जूझा । क्ति तप करहि सिद्ध जो छूझा ॥ सीस दीह प अगमन, पेम पानि सिर मेलि । अब सो प्रीति निबही, चलो सिद्ध होइ सेलि ॥" . जायसी प्रथावली पु०९९ २ वही, पु० ३०१ ३ वही पृ० ३०॥ ४ वही पु०१०४ सीस जाइ प्रेम का प्रमाव एव महत्त्व । १५९ । प्रेम की अग्नि को प्रज्ज्वलित करना जीवन का लक्ष्य है प्रम निरतर जलने वाली वह ज्वाला है जो प्रेमी के हृदय मे विरह का संचार करके उसे उज्ज्वल एव पवित्र कर देती है । जायसी ने कहा है- "मुहम्मद चिनगी प्रेम क सुनि महि गगन उराइ । पनि विरही औ पनि हिया तह बस अगिनि समाइ॥' जिसके हृदय में विरह की निष्पत्ति होती है वह व्यक्ति घय यय हो जाता है । 'प्रत्येक स्थान पर ज्योतिमय नग उत्पन्न नहीं होते । सवत्र जल में मुक्ता नहीं मिलती। प्रत्येक वन मे च दन के वृक्ष नहीं होते। वसे ही प्रत्येक मानव मानस में प्रेमजनित विरह की भावना भी उत्पन्न नहीं होती। भाग्य शाली व्यक्ति ही इस विरह जनित प्रेम प्रभाव का अनुभव करते हैं- "थल पल नग न होहि जेहि जोती। जल जल सीप न उपनहि मोती। वन वन विरिछ न च दन होई । तन तन विरह न उपज सोई।" जायसी व्यय की तपश्चर्या तथा वाह्याडम्बर को महत्त्वहीन समझते थे। मन में विरह का होना वे प्रेम प्रभु के लिए आवश्यक मानते थे। बिना विरह के प्रेम नही उत्पन्न होता-- "का मा परगट क्या परवारे । का मा भगति भुई सिर मारे ।। का मा जटा भभूत चढ़ाये । का भा गेरू कापटि लाये ॥ का मा भेस दिगम्बर छोट । का भा आपु उलटि गए कोट ।। जो भेरवाहि तजि मौन तू गहा 1 ना वग रहै भगत वे चहा ।। पानिहि रहे मच्छि औरादुर । टांगे नितहि रह पुनि गादर ।। पसु पछी टांगे सब सरे । मसम कुम्हार निज भरे ॥ वट पीपर सिर जटा न थोरे । मइस भैस की पावसि मोरे ।। जब लगि विरह न होइ तन हिये न उपजइ पेम । तब लगि दाधन आव तम करम परम सत नेम ॥' जायसी बाघा, डर और प्रेमरहित साधना की निस्सारता के विषय में लिखते हैं । प्रकट रूप से काया प्रक्षालन से कोई लाभ नही होता परा पर जायसी प्रथावली पृ० ७८ २ शलेशले मणिक्य मौक्तिक न गजे गजे। साधव नहि सवत्र चदन न वन-वन ।। जायसी प्रथावली पृ० १०६ । ४ चित्ररेखा स० डॉ० शिवसहाय पाठक, पृ० ९८ १६० । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण शिर पटक्ने वाली साधना व्यथ है । जटा और भभूत धारण करम का कुछ भी महत्त्व नहीं । गरिक वस्त्र धारण करने से कोई अभिप्राय नहीं दिगम्बर योगियो के समान भी रहना व्यथ है । कटक पर उत्तान शयन करना और साधक होने का स्वांग करना भी व्यथ है । मौन ग्रहण करना भी यथ है । बकुले भी मोन बनकर भक्त होते हैं । नीर में ही तो मत्स्य और ददु र रहते हैं। गादुर पक्षी भी तो स्वय को टाँगे रहता है । कुम्भकार भी तो भस्म से सना रहता है । क्या वट या पीपल के वक्ष में कम जटाएं हैं ? अरे भोले । ऐसे वेश मे कहीं कुछ प्राप्त होता है जब तक हृदय म विरह नहीं होता। तब तक प्रेम की निष्पत्ति नहीं होती है । बिना प्रेम के तप कम घम और सत नेम की प्राप्ति सभी अर्थो मे नही होगी। इसमें यह पूर्ण रूपेण स्पष्ट है कि जायसी सहज प्रेम साधना को ही सवश्रेष्ठ मानते हैं । प्रेम के साथ विरह का शाश्वत सम्बध बताते हुए प्रेम की महत्ता को स्पष्ट करते हुए डॉ० रामचन्द्र तिवारी कहते हैं। प्रेम की लता के साथ विरह की अग्नि का सम्बन्ध स्वाभाविक है। प्रेमी को विरहानि भी सरस प्रतीति होती है । सच्चा कवि वही है जिसके काय मे प्रेम मधु का अमूल्य रस भरा हुआ है, जिसकी वाणी मे विरह की वेदना है। प्रेम का कवि ही सच्चा कवि है, उसके शरीर मे न रक्त रहता है न मास । वह समस्त व्यक्त प्रकृति को अयक्त और रहस्यमयी सत्ता के प्रेम मे याकुल और मिलने के लिए उत्सुक देखता है । उसे सवत्र प्रेम की लालिमा दिखायी देती है। वह चराचर को रहस्यमयी सत्ता के प्रेम वाणो से विद्ध अनुमव करता है । जायसी ऐसे ही प्रेमकवि थे। 'जायसी ने स्वय कहा है-- "मुहम्मद कवि जो प्रेम का ना तन रक्त न मासु । जेइ मुख देखा तइ हमा सुना तो आए आंसु ।' प्रेम के अभाव मे मागे साधनायें और पाण्डित्य व्यथ हैं विना प्रेम भाव के जीवन निस्सार है । जिस मानव मानस मे प्रेम नही, उसम कोई (यक्ति या ईश्वर) किस प्रकार आ सकता है । भला सून गांव मे कोइ जाता है-- 'बिना प्रेम जो जीव निवाहा । मूने गांड मां भाव काहा १ मध्ययुगीन काप साधना डॉ० रामचद्र निवारी, ५० १०४ २ जायसी प्रथावली प०९ ३ चित्ररेखा, स० शिव सहाय पाठक, पृ० १४० २ प्रेम का प्रभाव एव महत्व । १६१ २ मलिक मुहम्मद जायसी प्रेमपथ के महान् साधक ये । हनसला नामा मे भी उहान प्रमपथ की महत्ता को दष्टिपथ म रखा है । जायसी ससार का असार मानते थे । उनका जीवन सदेश है कि समार में रहकर मानव के लिए जो कुछ भी कारणीय है उसे कर लेना चाहिए । उसे प्रेम प्रभु की आर गति भान होना चाहिए । उसे प्रेम स्वय को खो देना चाहिए । अ ततोगत्वा इम जगत २ जजाल को छोडकर जीव को जागा ही है-- कर ले आजु अहै जो करना । धधा छाडि जाखिर है मरना ।' जब जीव प्रम प्रभु स मिलने जाता है तो उसके साथ इस असार ससार सप वा, पोथा आदि कोई भी वस्तु नही जाती केवल प्रेम ही जाता है- 'घधा परथि जाइब नहिं साथ जायसी प्रम की महता को प्रतिपादित करते हुय कहते है कि करोडा पोथिया का अध्ययन करके सार मानव परलोक वासी हो गय परतु काई भी परित नहीं हुआ । पण्डित वही हुआ जिसन प्रेम को पुस्तक को पढा और समझा कोटिक पोथी पढि मरे पण्डित माने कोई । एक जच्चर प्रेम का पढ सो पण्डित हाई ॥' नातिनी कपीर भी प्रेम की महत्ता को स्वीकार किया है- 'बधीर पोथी पढि-पढि जग मुवा पण्डित भया न कोइ । ढाई अच्छर प्रेम का पढ़ सा पण्डित होई॥ जायसी क्त है कि इस जगत में प्रेम ही मब कुछ है । प्रेम के द्वारा ही मनुष्य स्वग का अधिकारी होता अगर उमने प्रेम नही दिया तो वह एक मुटठी रास व सिवा और क्या है " जामी की एक कविता में कहा गया है दि इस संसार म तुम सकडा उपाय कर सकते हो लेकिन एकमात्र प्रेम हो एमा है जा तुम्हारे अब स भा तुम्हारी रक्षा करेगा। इस प्रकार हम देखते है कि जापती ने स्थान स्थान पर प्रेमक १ चियरवा म. शिवमहाय पाठक १० १३५ २ वा प०१५२ ३ बी ५०१४५ ४ कवीर प्रयावरी डा. मानाप्रसाद गुप्त ५०६५ मानुम प्रेम नयउ वाठी । नाहित काह छार एक मूठी ।। -जायसी प्रथावली पृ. ७१ ६ जायसी डा० गमपूजन तिवारी प.८५ »
१६२ । मूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण
महत्त्व का स्पष्ट किया है। कभी प्रेमी जीव के लिय अग्नि भी च दन है और
कमी प्रेम सुरापान कर लेने पर जीव को जीवन मत्यु के भय स मुक्त घोषित
करते हैं। प्रसिद्ध सूफी कवि रूमी ने कहा है--
It is the flame of love that fired me
It is the wine of love that inspired me
यह उत्कृष्ट प्रेम ही सापक को साध्य तक पहुंचा सकता है । इसीलिय
जायसी ने प्रेम कया के माध्यम से प्रेम के दि य स्वरूप को प्रतिष्ठा की है
और सवत्र यह घोषित किया है कि तीनो लोक और चौ-हो भुवन म प्रेम
को छोडकर और कुछ भी सु दर नहा--
तीन लोक चौदह खण्ड सब पर मोहि मूझि ।
प्रेम छाडि किछु और न लोना जो देखो मन वृद्धि ।।'
।
जेहि जिय पम च दन तेहि आगी।
-जायसी न यवली प०६४
२ सुन । धनि प्रेम सुरा के पिए । मग्न जियन डर रहै न हिय ।।
--वही, प० १४१
३ मध्ययुगीन का य साधना डा० रामच द्र तिवारी प० १२३ पर उद्धत।
४ जायसी प्रयावली, पृ० ३९
६ मधुर भाव की साधना और जायसी का प्रेमतत्व मधुर भाव मानव मन की सहज वत्ति की परिणति है । इस भाव मे भक्त और भगवान, ब्रह्म और उसकी शक्तियो के पारस्परिक मधुर भाव वधन की अभिव्यजना होती है। मधुर भाव की सम्प्राप्ति के लिए अनुरागी मन की आतरता, निस्सीम आन द सागर म निमग्न रहकर सतत रसास्वादन की आकाक्षा सवत्र पायी जाती है । इस भाव को जानने के लिए प्रेम दष्टि आव "यक है । यह दष्टि प्राप्त कर रने पर ज्ञान द्वारा अगम्य ब्रह्म प्रेम म बंधकर प्रत्या अनुभव का विषय बन जाता है। इस भाव को विलक्षणता यह है कि भगवान स्वय प्रेम स्वरूप होकर भी प्रेम के याचक बने रहते हैं। वे स्वय रस स्वम्म हात हुए भी रस के अभिलाषी हैं और स्वय आन द स्वरूप रहते हए रम पाकर ही आना दत होते हैं।' मधुर भाव का सस्थान जीवात्मा और परमात्मा का सहज विलास, ब्रह्म, और सरी पत्तियो यो आनद केलि भक्त प्रेयसी और भगवान प्रियतम वी प्रम-लीला ही है। रावदा से विभिन्न साधना मागों द्वारा इसी दव विषयव प्रम प्रतीति को लीला में दुधप रस से परितप्त किया गया है। ऋग्वेद क कई मत्र घोषित करते हैं कि सृष्टि का आदिस्रोत साम अर्थात् मधु का कोई मन त समुद्र है जिसकी मघमान उमि अर्थात् बान दमयी रहर ही जीवन है।' सोम अत्यत सरम, सुस्वादु एव तीन हाता है जो माघ मनि द स मानव प्राण म मधुर आन २ का उमेश करता है जिमग प्राण परितप्स होते हैं।' १ सत्तिरीयोपनिषद्-२/७ २ समगर्मिमधुमा उदारदुपांना सममृतत्वमानट -अावेद ४/५/१ । स्गदुनिलाय मधुमा उतार्य तीव रिलाय रसयो वामम्'-ऋग्वेद ६/४/t १६४ । सूफी कवि जायसी का प्रम निरुपण भर्यात प्राणतत्व उस स्वादिष्ट, मधुमान तीन और रसवान साम' के पान के लिए आतुर रहता है। वदिक साहित्य में अ यत्र भा मधु' श द परमात्मा के लिए यवहृत किया गया है । ऋग्वेद में ही एक स्थल पर ऐसा प्रसग जाता है जिसम दध्यद अथ वण ने स्वय मधु ब्रह्म स सम्बद्ध ज्ञान को अश्विनीकुमारा के प्रति मधुविधा' के रूप म ही दिया था जिसकी चर्चा वहदारण्यकोपनिषद में की गयी। परत कहा जा सकता है कि परमात्मा ही सब कुछ सारतत्व है, सबका तिम लक्ष्य है तथा वही सच्चा परमान द है । उसम लीन होना सभी का परम ध्येय हाना चाहिए तथा उससे मिलन की चेष्टा ही सबक लिए मधुर भाव कहला सक्ता है।' यही ब्राह्मी स्थिति है जिसका वणन श्रीमदभगवदगीता म किया गया है और जिसकी अनुभूति भी शृगारिक जसी बतलाइ गई है ।' मानव मन को आप्लावित करने वाली रति इप्रकार स मानवीय सम्ब वो द्वारा प्रत्यक्षानुभूत होती है। रति के दो क्षन-मोग और भक्ति है। इन दोना क्षेत्रो मे शात दास्य सरय वात्सल्य और दाम्पत्य (मधुर) भाव के सम्ब प्रमुख माने गये हैं। इन पांचा म मधुरभाव सर्वाधिक महत्वपूर्ण है क्योकि इसम आत्म समपण भाव का चरमोक्ष अन य प्रेम की आसक्ति जीर अत्यधिक ज तरगता विद्यमान रहती है । इसी परिप्रे य म क्रमश गा ता प्रीता, प्रेयसी जनुकम्पा और कात पाच प्रकार की भगवदविषय रति होती है । नातभाव म विरक्ति से य सेवक भाव में अनुबत्ति का सत्यभाव में प्रीति का वात्सल्य म स्नह की प्रधानता है । मधुरभाव में इन सब का समावेश हो जाता है । इसके अतिरिक्त इसमे प्रियतम को सुमधुर रति प्रदान करन की विशेषता रहती है । शृगार रस मे मर्वाधिक माधुय होने के कारण मधुर भक्ति अयात प्रेमभक्ति सवश्रेष्ठ है । प्रेमभक्ति गुणरहित कामनारहित, प्रतिक्षण बढनवाला १ दयाह य मध्वाथवणा वामश्वस्य थीष्णा प्रयदामवाच ऋग्वट १/११/१२ २ बहारण्यकोपनिषद ४/३/२१ 3 Vedic Culture Swami Afannder ananda Giri P 361 ४ श्रीमदभगवदगीता २/५५-७२ ५ बहदारण्यकोपनिषद ४/ (२१ ६ चत य चरितामत मध्य रोलरा, प०२५२ सा भक्ति साधन भाव प्रमाचति त्रिधारिता' -~-भक्तिरसामत सिंधु, पूर्व रहरी, २/१ मधुर भाव की साधना और जायसी वा प्रेमतत्व । १६५ विच्छेद रहित तथा स्वसवेद्य है। इसे पाकर प्रेमी प्रेम को ही देखता है, प्रेम को हो मुनना है चिंतन करता है । निष्पत मधुरभाव का वास्तविक स्रोत भक्तिशास्त्र है। इस प्रकार भरभक्ति भक्त के विमल मानव से नि सत दिव्य प्रेम की वह उज्ज्वल रस की धारा है जिसके प्रवाह मे लौकिक प्रेम का विषयान द अपने समस्त कलुषो का प्रक्षालन कर अलौकिक प्रेम के ब्रह्मान द म परिणत हो जाता है । लौकिक प्रम का पारलौकिक प्रेम म रूपातरित हो जाने का तथा लौकिक प्रेम प्रतीका द्वारा अलौकिक प्रेमाभि यजन का यही रहस्य है । माधुय भाव मे सरसता, मधुरता प्रेम की तीव्रता तथा अखण्डान द का आस्वाद विद्यमान रहता है । अत साघको हेतु अत्यत स्पहणीय है । इसमे साधक काताभाव गोपीभाव और सखीभाव में मधुरस का जास्वादन करता है जिसम प्रेम के अनुभति की तीनता त मयता की दष्टि से का ताभाव सवश्रेष्ठ है। हि दी भक्ति साहित्य की सभी धाराओं पर मधुर उपामना ना प्रभाव रक्षित किया जा सकता है। हिदी भक्ति साहित्य मे मधुरोपासना हि दी साहित्य मे सबसे पहले निगुण भक्ति घाग का उल्लेख किया जाता है । इस भक्तिधारा मे भी परमसत्ता को प्रिय रूप म देखा गया है। उसे प्रेम का विषय बनाया गया है। प्रेम के आधार पर उससे अद्ध तता स्थापित की गइ है। अत निगुण भक्तिधारा मे भी मधुरभाव की साधना का स्वरूप रक्षित किया जा सकता है । निगु ण सतो की भक्ति मे मधुर भाव निगु ण सता म अग्रणी वरोरदास ने अपने को राम की बहुरिया और राम को अपना प्रिय मानकर मधुभाव की अभियक्ति की है । क्वीरदास राम को इस प्रम साधना मे मधुर भाव की साधना के सभी तत्व प्राप्त होते हैं । प्रिय का सौदय चित्रण, प्रिय मिलन की आतुरता मिल्न प्ररामो की उदभा पना प्रेम चर्या, मिलन के आनद का अनुभव प्रिय वियोग वियोग व्यथा मे प्रिय स्वाप का ध्यान आरलता और अतत प्रिय का नाश्वत सन्निध्य प्राप्त कर उनमे अभदात्मक सम्बय स्थापित कर रना यह सभी कुछ क्वीर वीप्रम साधना में क्षित होता है । सगुण ब्रह्म को मा यता न दनक कारण पीरटास प्रेम गीता का वह प्रत्यक्ष लोक्व्यापी विस्तार न निवा सके जो कृष्ण भक्तों एय रामभत्ता न दिसाया कि तु तत्वत उनकी साधना म मधुरभाव की १६६ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण साधना की मौलिक विशेषता म विद्यमान है। विष्णु के अवतार राम कृष्ण को लेकर वष्णवभक्ति की दो शाखाएं हो गयी । कृष्णभक्ति गाखा और रामभक्ति शाखा । कृष्णभक्ति शाखा मे मधुरभाव की उपासना को अधिक महत्व दिया गया है। कृष्ण काव्य म माधुर्य भाव भगवान कृष्ण गोपिया के साथ नित्यलीला में रत रहते हैं और अपनी श्वय माधुरी क्रीडामाधुरी वणमाघरी, विग्रहमाधुरी का पान भत्तो को कराते हैं । क्रीडामाधुरी म गोप लीला सवश्रेष्ठ है । वेणमाधुरी के जादूभरे प्रभाव से सभी परिचित हैं । इस वेणु सगीत को सुनकर तो गाय पक्षी, मग और वक्ष तक पुलकित हो जाते हैं तब कौन मुग्ध न हो जाय ।' कृष्ण को ब्रह्म का अवतार मानकर उनकी भक्ति के प्रचारक निम्बार्काचाय विष्णुस्वामी और माधवाचाय थे। कृष्णभक्ति का माधुय पक्ष सख्य या दाम्पत्यभाव पर आधारित है । इमम राधाकृष्ण समान रूप से आलम्बन और आश्रय रूप मे चित्रित हुए हैं।' अत कृष्ण का रूपमाघुय भी उसी त मयता, पूर्णता और विपरता से हुआ है जिस भावलीनता, विस्तार और पूर्णता स राधा का। कृष्ण का रूप सौ दय विविध रंगा, अभूतपूर्व कल्पनाआ अलौकिक प्रभावा तथा अभिनव ज्योति रश्मिया को लेकर प्रत्यक्ष होता है। राधा की यौवन सुषमा भी इतने रगो में नही झाक्ती दीखती । नायक और नायिका यह रूप चित्रण कृष्णकाय की मौलिक विशेषता है । इस रूप चित्रण के मूल में मधुभाव की साधना ही प्रधान कारण है । मधुर भाव की इस साधना को प्रत्यक्ष और “यापक आधार देने के लिए प्रमचर्या को ही माध्यम बनाया गया है । प्रेमचर्या के मतगत प्रियदशन प्रेमोदय पूवराग मान प्रिय के आक्षण का प्रभाव तथा प्रिय समागम के अनेक अवसरो एव प्रसगा की उदभावना की गई है। राधा और कृष्ण की प्रेमचर्या को कृष्ण भक्तो ने मधुरमाव की साधना का प्रतीक बनाया है। कृष्ण के जीवा विकास म आफ प्रकार की लीलालो की कल्पना वस्तुत इस मधुर भावना को न्याप्ति दने की दष्टि से की गयी है। गादोहन गोचारण चीरहरण दधिदान माखनचोरी आदि लोलाए मधुर १ श्रीमदभागवत, १०/२९/४० ? अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय-तीनदयाल गुप्त-प० ४५, भाग-1 ३ राधावल्लभ सम्प्रदाय-विजयेद्र स्नातक, पृ० २१०-११ मपुर भाव की साधना और जायसी ना प्रेमतत्व । १६७ , भावना का मूत करती हैं । इस मधुर भावना को मूत करने का सवश्रेष्ठ माघार रासलीला है। रासलीला रासलीला महाचिति का नतन है। यही सोदय, उल्लास, चेतना और यात्मलीतता की झकार है। महाचिति का महासौदय अल्पज्ञ जीव के लिये अलभ्य है। इसे भक्त सुलभ बनाने के लिए ही महाप्रभु वल्लभाचाय न पुष्टि माग को स्थापना की। पुष्ट जीव को ही भगवान की अनुकम्पास्वरूप महाचिति ना यह महासौदय प्राप्त होता है। रास मे ब्रह्म और जीव का मिलन होता है । इसम जीव के अहु का तिरोभाव और भगवान के सायुज्यभाव का आवि र्भाव होता है । राधा और गोपियो को त्याग कर कृष्ण का अतर्धान हो जाना पह सवेतित करता है कि वह अपने सोदय और यौवन का अहकार न हो।' मिलन और सम्भोग मिलन शृगार म नायक नायिका के गोपनीय विलास का चित्रण रहता है । उद्दाम काम चलाएं, केलि क्रीडा, अभिसार मान मनुहार आदि रति के बाद की अवस्था का चित्रण-ये सब एकातिक पक्ष म समायोजित किये जा सकते हैं । स्वामिनी के रति सुख व रसासव का पान ही तो उन साधको की सबस बढी सिद्धि है जिसक समस्त प्रकार के ऐश्वय तिरस्कृत हो जाते हैं, यहा तक कि मोक्ष भी। सम्भोग मिरन के दो रूप उपस्थित होने हैं--प्रथम सखी या दूती द्वारा भेंट कराना और राधा का वेलि भवन या सकेत स्थल पर पहुँचाना । द्वितीय, नायक-नायिका (कृष्ण राधा) वा स्थय सभोगाथ मिलना। मूर की राधा म सपम और सबोच अधिक नहीं पाया जाता । राधाकृष्ण दोनो ही समान वाम यातर और रति सक्रिय हैं । प्रथम भेंट म ही राधा ये उरोजो और नीवि पर वृष्ण के आकुल हाप पड़ते हैं। प्राय सभी कवियों न मर्यादाहीन अलीर चित्रण किया है। १ गूर सौरभ-मनीराम शमा पृ० ३११ २ सूरसागर-पद १७०६ १७१र १७१८ तथा १७२० ३ नौरोहित गही जदुराई । जयहि सरो। घरमो श्रीफ पर तय सुमति गई भाई॥ + माह पो सरसोरत नोए परहन र सताई। -भूरसागर, १५ १६०० १६८ । सूफी कवि जायसी का प्रेम frरूपण भक्तो को रसलीनता कृष्ण काय का माधुय पक्ष नावलीनना का ऐसा लोक है जहाँ अपरिमित मूच्छना की स्वर यकार है अन द विस्मत मे अहभाव वा तिरोभाव है । लीला माधुय में वासनाओ का अतल विलय है । माययभाव वी भक्ति वो भागवतकार, महाप्रभु चत य वल्लभाचाय, जीवगोस्वामी और अ य वृष्णभक्त कवियो न इसीलिए श्रेष्ठ माना क्याकि दाम्पत्य ही सर्वाधिक लोन करने वाला भाव है। जिस रस में दवता स्वय परप्रह्म विष्णु हा वह कितना जान द समद हो सकता है इसकी कल्पना स्वय की जा सकती है । इसीलिए रतिभाव को माधुय नाम कर भक्ति म सर्वोच्च स्थान दिया गया। माधुय भाव को का य के विसी भी रूप म-चाह भक्ति या शृगार परखा जाय वह अनुभूति की चरम अवस्था पर स्थित है । आरम्बन उद्दीपन, आश्रय, जनुभाव आदि सब उस अनुभति का जाकार दन के उपकरण है। नित्य परि वतनशील सोल्य की अनुभूति-दगा म सयाग और वियोग दोना का आस्वादन गोपिया करती रहती है। क्षण भर को कृष्ण का रूप नयना म जोर मन म समाया, उसकी मूच्छना भरी अनुभूति हदय न की तो सयोग सुख और क्षण भर वह बदल गया तो वियोग दु ख । इस स्थिति म जाधय की विवशता तडप द य रूप सुघा पान की आकाक्षा और जाकरता है उस परपना और अनुभूति करने पर भी शब्ा मे आबद्ध है। सयोग के पश्चात वियाग पक्ष का भी विचार कर लेना समीचीन है। माधुय भाव म विरह की कल्पना प्राय सभी का य प्रवत्तियो म की गई है, जिस कबीर ने भी प्रेम विरह कहा है। विरह के प्रेम और नान दो पक्षा का सकेत क्वल कबीर म है । क्वीर मे विरह के जिस स्वरूप का मान विरह कहा गया है वसा मूफी काय म भी पाया जाता है । इस प्रकार विरह के दो पक्ष- पान और भाव हुए। ज्ञान विरह एक जानकारी मात्र है तथा भाव विरह जात्रय की अनुभूति । आत्रय की विरहावस्था दख पढ या सुन कर सामाजिक म भी वही अनुमति होती है। आश्रय के भावलीनता स सामाजिक का तादात्म्य होता है । यही विरह रस दगा का पहुंचता है नान विरह रस दशा का नही पहुंचता । भाव विरह म रम के माधणारण की सामथ्य है नान विरह म नहीं । नान विरह १ क्वीर ग्रथावली-दयामसुदर दास-पृ० ७ मधुर भाव वी साधना और जायसी सा प्रेमतत्व । १६९ सायर में विरह जगान म उद्दीपा का काम परता है । इसीलिए मान विरह मनमानित या आरापित है और भाव विरह स्वानुभूत । नान विरह की अभिव्यक्ति सूरदास व विरह चित्रण म मिलती है । वृष्ण वा विरह सम्पूण गाकुल अनुभव कर रहा है। विरह निमगता ही प्रेम की सधनता अन यता, उत्सग, वासना के तिरोभाव, आत्मा के ज्योति जागरण और सवस्व की कमोटी है । मिलन सुप वाम है और विरह साधना प्रेम । वास्तविक अथ म रति चि मुन या ब्रह्मो मुग विरहीनता ही म होती है। निगु ण मार्गा क्वीर दादू और सूफी कवि जायसी आदि न जिस प्रकार विरह का विविध प्रतीका द्वारा अभियक्त किया है उमी प्रकार कृष्ण भक्त रवियो न किया है। रामकाव्य में माधुय भाव सोना परब्रह्म भगवान राम की परा आहादिनी शक्ति है । श्री भ, लीला आदि की वह अधिष्ठात्री है । इच्छा, नान, कम तीना गतिया मे समन्वित, मल प्रति स्प म वह परम पुरुष राम या भोग्या है ! परब्रह्म को रमणेच्छा से उसका जाविभाव हुआ है। राम और सीता एक परमतत्व के दो स्प है । यह परमतत्व पति पत्नी व गरीर धारण कर आत्म विलास करता है । सीता न राम को सतुष्ट करने के लिए अपन जगा से ३३ सखियाँ उत्पन की हैं। रासलीला म राम वा प्रसन्न करने के लिए जन त सखिया विहार करता है। राम नाम स्वयं ब्रह्मवाचक है। तत्वनानी यागी नित्य राम म रमते है । सवभूता में रमन के कारण परब्रह्म का मुख्य नाम राम है । मूल रूप म सभी क्छ राम मे निहित है। वर प्रणव का मूर है। राम व दो रूप है--एक मर्यादा पुरुषोत्तम और दूसरा लीला पुरुषोत्तम । अयोध्या म वह विश्व सचाल्न पी सामथ्य से सम्पन्न ऐपयगुणा का प्रवाश करते हैं-यह उनवा मर्याग पुरुषोत्तम रूप है । साकेत में वह नित्य सौ दय सुषमा स्प यौवन शृगार माय रूप से विहार और क्रीडा करत है। यह उनका रोला पुरुषोत्तम माधुय म्प आ तरिक है-यही राम का आत्मरूप या स्वयरूप है ।' राम पुरुप और सीता प्रकृति है । साकेत की माधय लीला प्रनि - १ भ्रमरगीसार-पद-२७८ ३४२ ३२५ २ रामभक्ति मे रसिक सम्प्रदाय-डा० भगवती प्रसाद सिंह-५० २८९-९० ३ रामभक्ति में रसिक सम्प्रदाय-भगवती प्रसाद सिंह-प० २७७ १७० । सूफा कवि जायमा वा प्रम निम्पण पुरुष वी नित्य लीला है।' दाना ही इसा प्रचार अभिन्न हैं जस सूय और उसकी प्रभा। राम वी सहस्रो परिणीताना के अतिरिक्त रास में भाग लेने वाली, युगल सरकार की विलास केलिया का प्रवध करने वाला, उनकी नित्य सवा करने वाली और इन विहार, विलास, काम क्रीडाओ की झापी पर तत्सम्ब' और स्वमुख की अनुभूति करनेवाली अनेक सखियो की सख्या भी रसिक साहित्य म विस्तार से दी गई है।' रामभक्ति के अ तगत मधुरभाव की पूण अभि यक्ति राम और सीता की प्रेमलीलाजा के माध्यम से की गई है। सीता-राम माधय लीला रामभक्ति म माधुय भाव में तीन स्प मिलत ह-- (1) युगल विलास, जिसम सीताराम के शृगार कलि विलास' अष्टयाम, नत्यगान, फाग, रास जादि का चित्रण रहता है। इस दशन से प्राप्त सुखानुभूति ही तत्सुख भावना कहलाता है । भक्त सीता की अनुभूति को अपनी अनुभूति मानता है। वह सखी रूप म या द्रष्टा रूप म इस लीला सुन्व को प्राप्त करता है। (ख) बहुरमणी विलास, इसम राम दक्षिण नायक रूप में चित्रित है । इस विलास म राम के दो रूप मिलत है-ए तो जराख्य राजा मुनियो गधवा की पुत्रियो और जनकवशी क याआ के साय विहार, जो राम का परिणाता १ यात सोता राम तत्व यक रुप दुई। मूल प्रकृति है अ य तनर नहि सक्त हुई। --रामभक्ति म रमिक सम्प्रदाय, ५० २९७ (उद्धत) २ सीता राम विना नव राम सीता विना नहि । श्रीसीत पारेम सम्बध शा तो मत ॥ -~वहीं उद्धत, प० २९७ ३ रामक्ति म रसिद सम्प्रदाय-प० २९१-९३ ४ गमभक्ति म रसिक सप्रदाय-भगवती प्रसाद सिंह प० ५२६ पर (सीतारामशरण शुभलोला, १० २७) उद्धत । ५ ज्ञाना अली, सिय केलि पदावली रा० भ० उ०, प० २२०-वहा, पृ० २२७ पर उद्धृत।
मधुर भाव की साधना और जायसी या प्रेमतल।११ 7 पत्नियां हैं दूमरे उन रमणियो के साथ जिनसे राम का विवाह नहीं हुआ है, पा जिनको निश्चित स्थिति प्रेमिका प म निमपित नहीं। यह राम रमणी सम्बय वसा ही है जमा रीतिकालीन गोपी-कृष्ण। यह परकीय प्रेम बहा जायगा । निज को परिणीता या परकीया दोनाप में पहुंचावर रसिक भक्त इम मुम्ब भावना की अनुभूति करता है । (ग) एकान्तिक विलास' जिममें भक्त राम से सीधा प्रेमिका या पत्नी का सम्बप मानकर मिलन विरह की अनुभूति करता है। यह अनुभूति की स्वगुण भावना के अतगत है । यह प्रेम भावना मूफिया के ढग की है। राम रसिक साहित्य म विरह-पल का चित्रण नहीं मिलता। उनकी मा यता है कि सीता राम नित्य मिलन पीडालीन हैं। रसिक भक्तो द्वारा चित्रित सीत राम के लीला विरासा जो स्वरूप प्रस्तुत किया गया है वह सारा का सारा भाव कृष्ण काव्य या अनुकरण है। जायमी का प्रेम तत्व प्रेमाश्रयी साधक हिदी साहित्य के मतगत 'यूपी सत' नाम से प्रसिट है । ये सूफी उजडी हुई यस्तिया को वसाते हुए जन जन के हृदय म प्रेम का बीज बोते हुए अपन उस प्रिय प्रभु को प्राप्त करने की चटा करते हैं, जो नित्य सौदयवान एव आन द का सागर है । सूपिया की दृष्टि म प्रेम ही इस प्रिय को प्राप्त करान का एकमात्र अवलम्ब है । इनके द्वारा विरचित साहित्य प्रेम गाया नाम से अभिहित किया गया है। प्रेमगाथाआ का बाजमाव प्रेम है । इस प्रेम का दूसरे राम रति रहा जा सकता है। रति का प्रेरक है सौ दय । सौदय ही आपण या कारण है। सौदय ही पान उपयोग की लासा जगाता है। यही लालसा वासना का महयोग पाकर उत्स्ट कामना, सकल्प और रति या प्रेम का रूप १ रामभक्ति में रसिक सम्प्रदाय-भगवती प्रसाद सिंह पु. ५२८ पर उदत- (अ) कृपानिवास लगन पचीसी, रा० म०, उ० ५० ११५ (ब) श्यामससे-पदावली, वही, प.० ३६९ ७० (स) रामससे-जानकी नौरत्न माणिक्य वही प० ३२३ २ (अ) रामरास, पदावरी, रा० भ० उ० पृ. ३२५ (ब) श्याम सखे-पदावरी वही, पृ० ३६९ (स) वही, पृ० ३७३ (द) युगलान यारण, वही, पृ० २७७ को परिणाता । २९७ (31) पर्ट १७२ । सूफी रवि जायसी का प्रेम निरूपण धारण कर लेती है। हि दी प्रेमगायाजा म आलम्बा को प्रेयसी को भाव घरती से उठागर पत्नी ये गरिमा सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया गया है । इसम सदेह नही हि प्रेयसी स्पम मिलनो वठा, प्रेम की तीव्रता वाम कातरता विरह की तीव्रता को सदा अधिक वसा रहता है, पर चिर ता मिलन, नटूट सायुज्य, निर तर एकात्मकता, अस दिन तल्लीनता, अन त सम्भोग सुख मुल भता पत्नी म ही रहती है। जात्मा परमात्मा के प्रतीक रूप में भी जालम्बा (परमात्मा) पत्नी रूप में ही सूफी भक्ति के अधिर अनुकूल है। पारसी सूपो सारित्य म अमरत (विशार) को भी आलम्वन माना गया है । सोदय सोदय चित्रण दो तरह से किया जाता है--परम्परा नव गिव वणन और प्रमगानुसार भाव का अघिर रसात्मक और उत्वपपूण बनान के लिए रूप चेष्टा चित्रण । सूफी साहित्य म मांग' उराज' भवो और कटाक्ष' का मौ न्य चित्रण किया गया है । यह नम गिस वणन परम्परागत है। कभी कभा य प्रभाव साम्य भावाक्प में सहायक होने की अपेक्षा विराधी हो जाते हैं । ' सूफी साहित्य में वर्णित सौ दय निरूपण से रतिभाव के उद्दीपन म न ता सहायता ही मिलती है और न नायिका के सम्पूण या सम्मिलित सौ दय का मुग्धवारी विम्ब ही सामने आता है। पाठ उपमानो की रम्बी भीड म भटक जाता है, सौरानभूति का अवसर ही उस नहीं मिलता। सूफी नायक प्रेमपथ रा बघडर जोर आस्थावान पथिक है । ससार की कोई विघ्नबाधा उसे नहीं रोक सक्ती प्रेम का आधार रति वा आलम्बन, १ तसबुफ अथवा सूफीमत प० १०३ ० जायसी प्रथावली रामचन्द्र शुक्ल प० ४१ ३ वही ५० ४६ ४ हिदी प्रेमगाथा का य राग्रह (चित्रावली) प० ११४ ५ जायसी न थावली १०४१ ६ जायसी द्वारा चित्रित पदमावती का अघर-- 'राता जगत देखि रगराती । रुहिर भरे आछहि विसाती ।। बही, प०४४ मधुर भाद की साधना और जायसी का प्रेमतत्व । १७३ - भावुक्ता और कल्पना का विश्राम, अभिलाषा वा गावपण के दौर अक्षुण्ण मौन्य सीमा प्रेयसी ही समस्त प्रयामा की पहुंच है समस्त मघप वा रभ्य है । उसकी एक झलक भर में लिए प्रेमी साधर वैसा याकुर रहता है- "दरसन दसे कार नहि, रोम रोम मय नन । नीद न आवत निसि कह, वामर परत न चन। यह प्रम इस जाम का नहीं अनादि का है। साधक अपने साध्य को दसत ही पहत्तान रता है और प्रेम विहल हो जाता है । प्रम की मत्यता यही है। जायसी की साधना न प्रम की शक्ति र सांसारिक पति पत्नी के सयोग परमात्मा आत्मा + मयुर मिलन की झांकी का प्रत्यक्ष करत हुए प्रेममागिया का एक नयी दिशा भी दी और प्रेम के अलौवित्र आण या प्रतिपादन भी किया। सासारिक्ता स प्रेमी का सम्बध न हान के कारण इन प्रेमिया न मसार को उस परम प्रभु के प्रम वा प्रसार ही मान लिया और भगवत प्रेम म सराबोर हो गय । इस प्रेम के कारण अम्ल, मधुर, अरूप रूपवान ताम्रवण अग्निप्रयाग दुम जान द मूत्री सिहामन, कांटा फूल और मत्यु जीवन बन जाता है । क्तिना सामथ्यबान है यह प्रेम जिसन जल का चेतन और गुप्त को सरस बनाकर रस सागर मे डुबो दिया । गापिया इसी प्रेम म मतवाली हो गई थी और राधा ने दमी प्रम में श्यामसुदर के हृदय को जीत कर उनका नित्य सयोग प्राप्त कर लिया था। जायसी का इश्वरा मुख प्रेम पदमावन म जपन सम्पूर्ण छवि के साथ उपस्थित हुआ है । उसम प्रियतम के प्रेम म वणीभूत उनकी जात्मा प्रारम्भ अपने प्यार के वियोग में तडपती हुई प्रतीत होती है । इस प्रकार जायसी की उपासना माघुय भाव से प्रेमी और प्रिय के भाव से है। जिस प्रेमगाथा के सहारे जायसी ने अपने प्रेम सिद्धानों का प्रसार किया उसका एकमात्र कारण पा अपनी साधना मधुर स्पम उपस्थित करना । यह प्रेमगाथा दिमावा है किंतु इस अ तर म परममयागी प्रभु के सयोग की अपार राति छिपी है। जिसके हृदय में उस पाने को टास उत्पन हो जाय दही सच्चा साधक है और उसे प्राप्त भी कर सकता है। पद्मावत काव्य का रलमेन भी उस माधुप का प्राप्त करने के लिए ससार के समस्त बावना को तोहकर योगी बन जाता १ हिदी प्रमगाथा काव्य संग्रह (इंद्रावती) प० २५६ २ जामसी न यावली भूमिका भाग पृ० १५६ १७४ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण है और प्रेम पथ को विघ्न वाघाना की चिता न करते हुए प्रिय मिलन के हेत चल पडता है । ससार में इस समय मिवाय प्रियतम के कुछ नहीं लिवाई देता-- 'तीनि लोक चौदह सड सब पर मोहिं मूझ । पम छोडि नहि लोन क्छुि जो देवा मन बूझि ॥ रत्नसेन रूपी भक्त ने बडे विश्वास के साथ अपने को प्रेम के समुद्र में डाला था और कहा था-- "प्रेम समुद्र जो अति अवगाहा । जहा न वार पार न थाहा । जो एहि खीर समुद्र मह परे। जीव गवाइ इस होइ तर "२ आत्मा युग युग से जम जमा नर से परमात्मा के विरह म छटपटा रही है । परमात्मा भी अपने अग आत्मा के लिए आकुल है । जायसी के पास उसका समाधान यदि कोई है तो वह रत्नसेन के भोग का अलक्ष्य प्रभाव । प्रेम चार प्रकार का माना गया है-- (१) विवाह के बाद जीवन सघप में जिसका उत्कप दिग्वाया जाता है। (२) विवाह से पूर्व, जो जीवन क्षेत्र में कही भेंट होने मे उदित होता है और जिसका परिणाम विवाह होता है। (३) राजा प्रसाद वाटिका जल विहार आदि म जो रङ्ग रहस्य के रूप म प्रकट होता है। (४) गुण श्रवण चित्र दशन स्वप्न दशन आदि के द्वारा जिसका उत्य होता है। सूफियो का प्रेम दूसरे और चौथे प्रकार का सर्मा वत रूप है। प्रेम की उदयावस्था पूराग है। पूर्व राग तीन स्पो-चित्रदशन गुण श्रवण और स्वप्न दान में उदित होते दिखलाया गया है । स्वप्न दशन द्वारा उत्पन्न पूवराग कम स्वाभाविक है । राग के दो पक्ष है--एक मिला सुख की त मयता, प्रेम की परिपक्वता चिर साहचय की स्वीकृति, समपण आदि और दूसरा, विरह। आरम्बन के मुग्धकारी सौदय रस का एक घूट पीते ही आश्रय मुघ बुध खो वठता है । भावलीनता और विस्मरण की अतल गहराइया मे निमग्न १ जायसी प्रथावली प० ३९ २ वही पृ०६० ३ वही, पृ० २७ मपुर भाव की साधना और जायसो वा प्रेमतरव । १७५ हो जाता है । पद्मावती के गुण प्रवण परन पर भी रत्नसेन मी यही जयस्या होती है- "सुनतेहि राजा गा मुरहाई । जानी एहरि गरज य आई। सिनहि उसास यूडि जिउ जाई। पिनहि उठ विसर बोराई। पिनहि पीत मिा होइ मुग गता। मिनाह पेन पिन होइ अोता। नायव वा प्रेम विहर दा म हो जाना मगवरप्रेम पाहीप सास्थित करता है। इमस एक तो ब्रह्म के प्रति व्यापर सोदय को आर गवत मिलता है दूसरे साधक के हृदय के चिरता प्रेम मस्कार वो बोर । पूवराग वे परिपक्व हो जाने के पश्चात् प्रेम का प्रयत्न या सापा पक्ष आता है । साधना पक्ष के दो भाग- बाहरी मधप और विरह है । नायर राज पाट सुख ऐश्वय छोडकर जोगी बनकर निरल पहते हैं- चला भुगुति माग यह सापि क्या तप जोग । सिद्ध हाइ पद्मावति, जेटि पर हिये वियोग ।' साधक के समक्षा भनेर पठिनाइया गा प्रादुमाव होता है । रविन साधक उह युक्रा कर अपनी प्रेयसी के प्रति अनय प्रेम और निष्ठा का परिचय देता है। इस ही साधना का सघप पक्ष बहत हैं। विरह साधना का प्रतीक है। विरह साधना दा प्रकार की होती है-- नान विरह और प्रेम विरह । गुरू के द्वारा माघर को परम प्रिय परमात्मा का बोध कराना और उसके हृदय म विरह का चिंगारी जलाना ही ज्ञान विरह जागत करना है।' विरह चिंगारी जब सुलग कर कभी न बुझन वाली आग बन जाती है तो साधक विश्व के कण कण का उसी प्रियतम की विरह ज्वाला म सुलगते हुए पाता है। साधनावस्था का भावपक्ष विरह है । विरह वी मूफी काय का प्राण तत्व है-- मुहमद चिनगी पम क, सुनि महि गगन डेराइ । धनि विरही औ धनि हिया, अह अस अगिनि समाइ ॥ वियोग साधना ही प्रम परीगा की सफलता की सनन है। यह वितना १ जायसी प्रथावली प०४९ २ वही प० ५३ ३ वही प० ५१ ४ जायसी प्रथावली ५० ४३ दोहा ६ ५ वही पृ०८८ १७८ । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण m २ . "अनचिहाह पिउ कापो मन माहा । का मैं कहव गहय जो वाहा।' पति पत्नी का मिलन आध्यात्मिा मिलन है । प्रेयसी का अपरामतपान जीवन को जमर कर दता है-- 'यधर घट सो अमिरित पीया। जेहि के विपत अमर भा हीया॥ प्रिय और प्रयसी गले मिलत ही द्व त का दुख भूल जाते है । सोने और सोहागे की तरह दोनो मिलकर एकाकार हो जाते हैं । दाना के बीच का अंतर मिट जाता है-- कहि सतभाव भई कठ लागू । जन कचन भी मिला सोहागू ।। इस अखड मिलन का ही जिसम साधक और साध्य (आत्मा परमात्मा) एकाकार हो जाते हैं फ्ना कहा गया है।" जायसी लौकिक सो दय से परम सौ दय की ओर अग्रसर होत जाते हैं। क्या सयोग क्या वियोग दोनो मे कवि प्रेम के उस आ यात्मिक स्वरूप का आभास दन लगता है। जगत के सारे यापार जिसकी छाया से प्रतीत होन लगत है। तात्पय यह कि जायसी के प्रेम निरूपण म वे सारी विशेषताएँ लक्षित होता है जो मधुरभाव के साधका मे पाई जाती हैं । अतर केवल यह है कि जायसी मूफी साधक थ और सूफी साधक भानिक प्रेम की उपेक्षा नही वर पात । उनकी दष्टि मे भौतिक प्रेम केवल प्रतीक हो नहीं सत्य भी है जबकि मधुरभाव का साधक भौतिक रति को जड विषयक रति मानता है । वह भौतिक जीवन के प्रणय प्रसगा को आध्यात्मिक प्रेम लीला की अभि यत्ति का साधन मानता है। मितु जहां तक मधुर भाव की साधना के अतिम लक्ष्य का प्रश है जायसी की प्रम साधना मे भी उसे ही महत्व दिया गया है । १ वायसी प्रथावलोप.१३२ २ चिनावली, १०२.४ ३ जायसी प्रथावरी प०१३९ ४ हिदा सूफी कवि बार काव्य सरला गुक्ल, प०४९6 ५ जायसी नथावली पृ० ५५ (भूमिका भाग) उपसंहार पिछले अध्यायो मे जायसी के प्रेम निरूपण का विस्तत अध्ययन प्रस्तुत दिया गया है । जायसी भक्तिकालीन प्रेमाम्यानक वाय परम्परा के सवश्रेष्ठ कवि हैं । उनके काय-पद्मावत, चित्ररेखा-का बीज भाव प्रेम है। उनकी अन्य कृतिया में भी 'प्रेम का महत्व प्रतिपादित किया गया है । वस्तुत सूफी साधना के मूल म 'प्रेम ही सवप्रधान तत्व है । आरम्भ से लेकर सूफी सापना से चरम विकास तक जितने सूफी साधन हुए हैं प्राय सभी ने प्रेम की नियता, यापकता और अलौक्क्तिा का प्रतिपादन किया है । जायसी ने 'प्रेम को केंद्र में रखकर क्या प्रतीक के माध्यम से सूफी साधना के गूढ रहस्य को प्रकट किया है। मनुष्य के जीवन को साथक्ता प्रदान करने वाला न जप है, न तप, न नान, न ध्यान, न वराग्य न पूजा वह प्रेम के बल पर ही दि यता प्राप्त करता है । जप तप योग, मान तो प्रेग निष्ठा के लिए मनोभूमि प्रस्तुत करते हैं । प्रेम ही मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाता है । प्रेम ही ईश्वर है। सम्पूण सप्टि प्रेममयी है । इसकी रचना प्रेम के लिए-प्रेम को स्थापित करने के लिए की गयी है । यह स्वय स्रष्टा के प्रेम में मग्न अनवरत उसी की खोज मे गतिमयी । सष्टि का कण कण अनात प्रिय का खोज रहा है । गति के मूल म प्रेम का आकषण है । प्रेम विश्व यापी है। प्रेम ही चेतना का सस्कार करता है । प्रेम ही सत्य है । सच्ची अद्व तता प्रेममूलक होती है । नानात्मक एकात्मभाव से अधिक स्थायी भावात्मक एकात्मभाव है । सूफी साधना इसीलिए प्रेम भाव के द्वारा पूण अट्ट तता की स्थिति तक पहुंचती है । जायसी की प्रेम साधना का यही रक्ष्य है-~प्रिय के साथ पूण एकात्म । मधुर साधना का केद्र प्रेम है । प्रेम से वही काई साधना नहीं है। प्रेम ईश्वर और मनुष्य को एक सूत्र म पिरोने वाला तत्व है । प्रम ध्रुव ये १८० । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपणे समान ऊँचा, श्रेष्ठ और प्रकाशमान है। प्रेम की ज्वाला म जल कर जो निष्क्लुप हो गय हैं वे ही सच्चे साधक हैं । उही का जीवन साथक है । प्रेम निरूपण करके जायसो यशस्वी हुए हैं। प्रेम ने ही जायसी का अमर बनाया है। प्रेम करना है तो विरह के मम को समझना होगा। सच्चा प्रेम विरह की तीन अनुभूति से ज्योतित होकर सारे संसार को प्रकाशित परता है । जायसी का प्रेम ऐसा ही दि य, अमर, अलौकिक विरह गर्भित प्रम है ।
सहायक ग्रन्थ सूची (क) संस्कृत ग्रथ १ अभिज्ञान शाकु तलम स० कपिलदेव द्विवेदी प्रथमावत्ति २ ऋग्वेद पना १९३३ ई० ३ ततिरीयोपनिषत गीतप्रेस गोरखपुर २०२६ ई० ४ भक्तिरसामतसि घु रूपगोस्वामी स० डा० नगेन्द्र १९६३ ई० ५ महाभारत गीताप्रेस, गोरखपुर २०२५ वि० ६ विक्रर्मोवगीयम् एच० जी० वेलकर १९४८ ई. ७ वहदारण्यकोपनिषद गोताप्रेस, गोरखपुर २०२५ वि० ८ श्रीमदवाल्मीकीय रामायणम पडित पुस्तकालय काशी १९५१ इ. ९ श्रीमदभगवदगीता टीकाकार-बाबूराव विष्णु पराडकर १९७१ वि० १० श्रीमदभागवत मोतीलाल बनारसीदास पटना १९६४ ई. ११ हरिवंशपुराण पण्डित पुस्तकालय, कानी प्रथमावत्ति (ख) हिन्दी ग्रन्थ १२ अनुराग बांसुरी (नूरमुहम्मद) स०रामचन्द्र शुक्र चद्रबली पाण्डेय २००२ वि० १३ अष्टछाप और बल्लभसम्प्रदाय दीनदयाल गुप्त २००४ वि० १४ इन्द्रावती (नूरमुहम्मद) स० श्यामसुदरदास १५ इस्लाम के मूफी सापक धनु० नमदेश्वर चतुर्वेदी प्रथम सस्वरण १६ ईरान वे गूफी कवि चांद विहारी तथा व हैयालाल १७ पवीर प्रयावलो श्यासुदरदास २००८ वि० 10 गीतापली (सुलसी प्रयावली) स० रामचन्द्र शुक्ल २०२५ कि..
१८० । सूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपणे समान ऊंचा, श्रेष्ठ और प्रकाशमान है। प्रेम को ज्वाला मे जल कर जो निष्कल्प हो गये है वे ही सच्च साधक हैं । उही का जीवन साथ है। प्रेम निरूपण करके जायसो यशस्वी हुए हैं। प्रेम ने ही जायसी का अमर बनाया है। प्रेम करना है तो विरह के मम को समझना होगा । सच्चा प्रेम विरह की तीव्र अनुभूति से ज्योतित होकर सारे संसार को प्रकाशित करता है । जायसी का प्रेम ऐसा हा दिय, अमर, अलौकिक विरह गर्भित प्रम है ।
सहायक ग्रन्थ सूची २०२५ वि० २०२५ वि० (क) संस्कृत ग्रथ १ अभिज्ञान गा तलम स० कपिलदेव द्विवेदी प्रथमावत्ति २ कग्वद पूना १९३३ ई० ३ तत्तिरीयोपनिषद् गीतप्रेस, गोरखपुर २०२६ ई० ४ भक्तिरसामृतसि घु पगोस्वामी, स० डॉ० नगेद्र १९६३ ई० ५ महाभारत गीताप्रेस, गोरखपुर ६ वित्रावगीयम् एच० जी० वेलकर १९४८ ई. ७ वहतारण्यकोपनिषद गीताप्रेस गोरखपुर ८ श्रीमन् वाल्मीकीय रामायणम् पडित पुस्तकालय बागी १९५१ इ० ९ श्रीमदभगवद्गीता टीकाकार-वाबूराव विष्णु पराडकर १९७१ वि० १. श्रीमदभागवत मोतीलाल बनारसीदाम, पटना १९६४ ई. ११ हरिवशपुराण पण्डित पुस्तकालय भागी प्रथमावत्ति (ख) हिन्दी ग्रथ १२ अनुराग बासुरी (नूरमुहम्मद) स०रामचन्द्र गुक्ल, पदवला पाण्डेय २००३ वि० १३ अष्टछाप और बल्लभसम्प्रदाय दीनदयाल गुप्त २००४ वि० १४ इमावती (नूरमुहम्म) स० श्याममुरादाम १५ इस्लाम के मूफी माधव अनु० नमदेश्वर चतुर्वेदी वाव विहारी तपा व पालार यामुदरतास २००८ वि० गीतापली (तुलसीप यादरी) स. रामपर गुस्ल २०२५ वि. प्रपम रास्करण १६ ईरान में गूपी रवि १७ रवीर प्रपावली १८२ । मूफी कवि जायसी का प्रेम निरूपण रामपूजन तिवारी सरला गुक्ल १९ गोस्वामी तुलसीदास रामचद्र शुक्र २० चित्रावली (उसमान) म० जगमोहन गर्मा १९१२ ई० २१ चित्ररेया (जायसी) म० शिवसहाय पाठा २२ जायसी १९६७ ई. २३ जायसी ग्रथावली स. रामचद्र शुक्ल २०१३ वि० २४ जायसी का पद्मावत नास्त्रीय भाष्य गापिद त्रिगुणायत प्रथम सस्करण २५ जायसी व परवर्ती सूफी कवि और काव्य प्रथम सस्करण २६ तरा वुफ अथवा गूफीमन चद्रवली पाण्डेय १९४८ ई० २७ दोहावली स० लाला भगवानदीन १९८३ वि० २८ नददास प्रथावली म० नजरत्नरास २०१४ वि० २९ नल दमन (सूरदास लसनवी)स० वासुदेव गरण अग्रवाल ३० पद्मावत स० वासुदेव शरण अग्रवाल २०१२ वि० ३१ पद्मावत का वाय सौदय शिवसहाय पाठक १९५६ ई. ३२ प्रामाणिक हिदी कोश रामचद्रवमा २००८ वि० ३३ भमर गीत सार स० रामचन्द्र गुक्ल २०१० वि० ३४ भक्ति का य म मधुर भाव का स्वरूप जयनाथ नलिन' ३५ मध्यकालीन धम साधना हजारी प्रसाद द्विवेदी १९६२ ई० ३६ मध्यकालीन प्रम साधना परशुराम चतुर्वेदी १९६२ ३० ३७ मध्ययुगीन काव्य साधना रामचन्द्र तिवारी प्रथम सस्करण ३८ मध्ययुगी प्रेमाख्यान श्याम मनोहर पाण्डय ३९ मलिक मुहम्मद जायसी और उनमा काय शिवसहाय पाठक १९६४ ३० ४० मधुमालती (मझन) स० माता प्रसाद गुप्त ४१ मध्यकालीन हिदी और पजाबी प्रेमाख्यात जोमप्रकाश १९७१ ई० ४२ माघवान द कामक दला म० एम० जार० मामूदार प्रबध ४३ रस रतन (पृहकर) शिवप्रसाद सिंह ४४ रामचरित मानस गीताप्रस, गोरखपुर + २०२०वि० सहायक नथ सची। १८३ मित्र मजूमदार १९६२ २०१४ वि० २०१० वि० २०१४ वि० १९५१ वि० १९५० ई० २००५ वि० २००७ वि० २०१५ वि० , " मुशीराम शर्मा राजपूजन तिवारी २०१३ वि० २०१३ वि० ४५ रामचरित मानस काशिराज सस्करण ४६ राधावल्लभ सम्प्रदाय विजयेद्र स्नातक ४७ रामभक्ति म रसिक सम्प्रदाय भगवती प्रसाद सिंह ४८ रामभक्ति म मधुर उपासना भुवनेश्वर प्रसाद मिन ४१ विद्यापति पदावली ५० स तवानी संग्रह (पहला भाग) वेलवडियर प्रेस, इलाहाबाद ५१ सूरसागर (प्रथम भाग) नागरी प्रचारिण सभा ५२ सूरसागर (द्वितीय भाग) ५३ सूर नौर उनका साहित्य हरवशलाल शर्मा ५८ सूर साहित्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ५५ सूर सौरभ ५६ सूफीमत साधना और साहित्य ५७ सूफीमत और हि दी साहित्य विमल कुमार जन ५८ सूफीकाव्य-सग्रह ५९ हम जवाहर (कासिमगाह) तेजकुमार प्रेस रखनऊ ६० हि दा साहित्य का आला चनात्मक इतिहास ६१ हिंदी साहित्य म विरह हनुमानदास चकोर ६२ हिनी प्रमगाथा काव्य सग्रह गणेगप्रसाद द्विवदी ६३ हिदी प्रमाख्यान वाय कमल कुलश्रेष्ठ ६४ हिली वृष्णयाव्य म माधुर्योपासना कमल कुलश्रेष्ठ ६५ हिली सूफी कवि और काय सरला शुक्र (ग) उर्दू, अरवी ग्रन्थ परशुराम चतुर्वेदी १९५५ ई० २०१३ वि० १९५२ ई० रामकुमार वर्मा १९५४ ई० प्रसग प्रथम सस्वरण १९५३ ई० १९५३ ई. २०१३ वि.
१८४ । मुफो कवि जायसी का प्रम निरूपण
दुरखाना नजोरिन
उदूघाजार दिला
६९ दीवान ग्वाजा गरीब नवाज स० मुस्लिम अहमद निजामी जामा मस्जिद
दिल्ली
७० दीवाने गौसुल आजम
७१ यूसुफ जूलेसा स० गोपालपद सिहा प्रथम सस्करण
७२ लला मजनू (निजामी) नवल किशोर प्रेस
१८८० इ०
७३ हायवे हिदी (मोर मनुल अनु० सैयद अतहर
वाहिद विलग्राम)
अपास रिजवी
१९५७ ई०
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