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Gherand Sanhita

Sharma,jagganath · 2012/08

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LIBRI
घेरण्ड संहिता।
हठयोगका सचित्र अपूर्व ग्रन्थ।
भाषा टीका सहित ।
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ADITIODOHARIPESALA
जिसको पण्डित जगन्नाथशर्मा, राजवैद्य ने
उत्तमता के साथ शुद्ध देवनागरी अक्षराम
अनुवादकरके योगाभ्यासियोंके
उपकारार्थ'
शामिकयन्त्रालयप्रयागमें
पं० रामगोपाल शर्मा द्वारा प्रकाशित किया।
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सिवाय ग्रंथ फर्ता किमी छापने अथवा मापा अदलयदल
करने का अधिकार मेहीं है।
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पनि मनानशासन
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शवासन
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मतानर. पन्द्रासन प्रथमपासना

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मसेन्द्रासन.
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धनुगमन.
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महामन्य.
।
909

विपरीति.
बजोली
19091

मूलबन्ध AIMOHon 11AJita NuILA- अहीयामबन्ध नतान्तर पुनःपद्मास मीसम.

नाम DUD UUDUDUUDDOUDUDUDODO मद्रासन- कुचाटारना महावेध.

अथ घेरण्डसंहिता । एकदाचण्डकापालि र्गवाघेरण्ड कुहिमम् । प्रणम्यविनयात्भक्तमा घेरण्डंपरिपछति ॥१॥ एक समय अहकामानि नामक कोई एक योग शिक्षामितापी, घर नाल एक यहे भारी योगेश्वर को कुदी को गये और विनयपूर्वक भक्ति महिन प्रणाम करके घेरंड महाराज से पूछने लगे । क्या पूछते हैं, और यह क्या चाहते हैं जो नीचे वर्णन किया जाता है। घटस्ययोगयोगेश ! तत्वज्ञानस्थकारणम् । इदानीं श्रोतुमिच्छामि योगीश्वर ! बदप्रभो ॥२॥ श्री चयहकापानिने कहा कि दे येगेगा तत्यज्ञानका कारण घटस्य ( यरोरस्थ ) योग है सो इस समय मेरो रच्दा 3मक सुो की हुई है। हे योगेश्वर । प्रभो! पाप रुपाकर उसे मुगााये ॥ तात्पर्य यह किसान दो प्रकार का होताई एक सामान्य नाम जो पशु पक्षी कोट भ्रमरादि को भी है शिरते कि पशु भी अपनी खाद्य वस्तु घाम भूमा छोटभर फका पत्त्य न कभी नहीं खाता औरपक्षी मादि भी गार के तिनगे नहीं भरती । श्रीर दुमरा विशेष म यी जिसमे ।। कि अनन्न काममा मन स्वछन्दता प्राप्त होने के उपाय सृको हैं । भूमिका में कहा है कि योग विद्या गरीर साक्षण का एक प्रधान है बिमारीर फेस्त्रम्ध रहने से अमन्तकालिक सुरा सध्ठन्दता लाग भुषाय है। सति हममे अनन्त हानिक मुार स्वदन्दगा लाभके पाय का जान तस्वम कमाता है। यह शोर के भावी विचार का स्थिर करके च एकापानि माप मिंक घटस्थ भयोत्स्य योगासवनम का कारण कई घेरह महज पूजा म २ घराण्डमंहिता। साधुसाधु महाबाहो! यस्मात्नं परिपछसि । कथयामि हि तेवत्स ! सावधानोऽवधारय ॥३॥ घे. गड जी ने कहा हे महाबाहो । अर्थात् बाहुघल शानिन क्षत्रियचंग भूपण जो तुमने मुझसे पूछा इसमे में तुमको साधुवाद अर्थात् धन्यवाद करता हूं. हे पास ! में सुमसे कहता हूं, सावधान हाशे सुनो। तात्पर्य यह कि योगियों के पास मक्तर वेदी लोग साया नाया करते हैं जिनकी केवल पेहि चिन्ता रहती है, अर्थात् धन, मिले. पुत्र पौत्र कुटुम्य प्रादि सृद्धि हो तथा दुनिया में मुयश फैले परन्तु यथार्थ माथी महल मालकी घिन्ता करनेवाले योगियोंके निकट अछुतही कम लोग जाते हैं, फिर उक्त घन पुत्रादि लालचियों को प्रकृति जान कर ऐसे योगी भी समस्य मिलते हैं जो ताकते रहते हैं कि काई सोने की चि. हिया फँसे ते चेन ठहा, वे कृत्रिम योगी महाशय चण्डकापालि मरीशे पुरुषों के प्रश्न को ऐसा मागे कहेंगे कि हमारे गुरु की आज्ञा है कि किमी को मत बताना जिममे ऐमा जान पडता है मानो सघ इन्हीं के हाप में हे परवे ऐसे हैं जैसे हाथी के पेट का कैया । अयोत देखने में पूरा भीता कुछ भी नहीं । पहिले तर ठगों को छोड़ योग विद्या के मा. मयाले योग ही नहीं मिलते कदाचित् कोई मिलें भी तो उसके सीखने थाले दुर्लभ हैं । पदि देवा कोई मत्संगी मनुष्य उनके पास गये तो वे योगी महा. शय यत दी प्रसन्न होते हैं जैमे कि घेरंड महाराज ने चाडकापालिको प्रन्न करने पर घन्पमाद दिया । इसमे हम यह भी यहां पर अपने पाठकों के सामान करते हैं कि जो लोग योगाम्यामी बने रहस्यों के यहां मीज ठहराते है और पूछने से या तो क्रोध करते हैं पा कहते हैं हमारे गुरु को धाता बताने को नहीं है उन पाहियों को कभी न समादर कर अल्कि नहा ना हो मुझे दगड दिलाने का पत्र करे।

३ धेरण्डसंहिता। घेरंह महाराज ने जब प्रश्न का चण्डकापालि जी को पम्यबाद दिया तस हर्ष के वेग में सम योग का और कपट का जो सच्चा फल है उससे कहने लगे। नास्तिमाया समंपापं, नास्तियोगात्परंबलं । नास्तिज्ञानात्परो बंधु हिङ्कारात्परोरिपुः ॥en माया अर्थात् ठा प्रपञ्च (जैसे कोई २ योगी लोग यह दिखाया करते हैं कि हम योग विद्या से रांगा की चांदी, तांयाका सेना वमाया करते हैं, तथा मंत्र मन्त्र टोटका टामर के जेर से धन पुवादि दिया करते हैं प्रत्यादि बातें बना के लोगों को ठगा करते हैं) इसकी घराघर दूसरा पापं दुनियां में नहीं है। इन सय प्रपञ्च कत पापियों का अन्त अच्छा नहीं होता वे सदा श्राभ्यान्तरिक निर्बल रहते हैं अर्यास् हरते रहते हैं कि न जानें किस समय इमारे प्रपञ्च का फसाद सुल पड़े. इसके व्यपरीत सच्चाई का घन दिखाते हैं कि "नीतियोगात्वरंयलम्" योग के पर कोई भी सच्चा यल मनुष्य का नहीं है। फिर यह यात पिसके भरोसे है? इसपर कहते हैं कि "नास्तिज्ञानात्परोयंधुः" ज्ञान ही मनुष्य का मधु है अर्थात् सत् असत् का विवेक जो लोग करके कुछ काम करते हैं होते हैं। सत् अमत् के विवेक होने पर भी मनुष्य के कार्य पुष्ट नहीं होते अर्थात् वे कार्य व्यपरीत दुखदाई हेाते | हैं इसपर कहते हैं कि "नाहङ्कारात्परिपुः" अहङ्कार के परे कोई भी रिपु नहीं है जो कि सत् असत् वस्तु के विवेक होने पर भी व्यपरीत फल है। तात्पर्य यह कि बहुत से कपटी मनुष्य और ही मतलब सोच के किसी महात्मा के पास जाते हैं पर वहां कुछ और ही प्रगट करते हैं इसी प्रकार महात्मा भी और ही मतलम ठाने बैठे रहते हैं परन्तु लोगों ४ घेण्डसहिता। को कुछ मौरही धोखा देते हैं । और उनके पास कुछ ऐसे अज्ञानी मनुष्य जाते हैं जो यो हो लाम में फूल उठते हैं और वे अपने को मिद्ध सम औरो को निरे अहमक समा बैठ जाते हैं उनके नम अहकार से मागे और सुखोत्पादक विज्ञान की उन्नति नही होती बल्कि जो कुछ थोडा बमा रहता है वह भी कच्चे के कारण भद्दा हो जाता है। इससे अह कार को बराबर काई भी दुश्मन दुनिया में नहीं है। इसके उप. रात घेरड जी कहते हैं अहकार छोह के जिस वस्तु को सिद्ध किया चाई उसमें अभ्यास करे, इस पर दृष्टान्त देन है । अभ्यासात्कादिवर्णानि यथाशास्त्राणियोधयेत् । तधायोगंसमासाझ तत्वज्ञानंच लभ्यते ॥५॥ " जैसे भ्यास करते २ ककरादि धर्ण चीम्ह पहने लगते हैं और उनके परिचय के अनन्तर नाना प्रकार के शास्त्रो में घोध हो जाता है इसी प्रकार योगाभ्यास करते २ तत्वज्ञान (ज। पहिले कह पाये हैं) प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य यह कि अहकारी मनुष्य का चित्त अभ्यास में कम लगता , यह अपनी गुरुनाईके आगे दूमरेके उपदेश पर कम विश्वाम लाता ढिग्नाई आ जाती है सा प्रकार के छोड कर और ढिलाई फेो दूर बहाय ने अभ्यास में दृढ होने से योग शास्त्र का फल प्राप्त होता है । कल कहने में नहीं। इसके उपरान्त कहते है कि जय यह शरीर थोडे दिल माद जरा स्पाधि मे पनित छा नष्ट हो जायसी सब चाहे दिन के लिये पो इतनी मिष्ठधना करें कि राय प्रसार सामारिक्षा नाराम सोर के एकान्त मिजंग में बैठ कर शरीर को कर दें। दृष्टान्त देसे ॥

घेण्डसहितः। ५ ॥ सुटतैर्दुष्कृतैः कार्यर्जायते प्राणिनां घटः । घटादुत्पद्यते कर्म घटीयत्रं यथा भ्रमेत् ॥६॥ ऊर्ध्वाधो भमते यद्वत् घठोयत्रं गवावशात् । तद्वत्कर्म यशाज्जीवो भ्रमतेजन्ममृत्युभिः ॥७॥ भले और बुरे काम करने में प्राणियों का शरीर उत्पन्न होता है और उम शरीर से फिट कर्म उत्पन्न होते हैं जैसे कि घड़ी यत्र उलट पुनट कभी नीचे कभी ऊचे की ओर कला के बम ही घूमती है र सी प्रकार चलम मध्यम निकप्टक के बस रे। वह जीष भी काम और मृत्यु | फेर में पड़ा पूमा करता है । कहते हैं कि यदि जोत्र कर्म अम जन्म मृत्यु के फेर में पहा घूमा करता है तो फिर किस उपाय से वह मिट सक्ता है इस पर दृष्टात देते हैं। आमं कुम्भमिवाम्भस्यो जीर्यमागाः सदाघटः । योगानलेन संदहर घठशुद्धिं समाचरेत् ॥ ८ ॥ यह शरीर ऐसा गलायमान है जैसे कपचे पटे में जल भरने में वह घटा गन जाता है। परन्तु जब उसको प्राग में पकाय लेते हैं तत्र कभी नहीं गलला इसी प्रकार इस शरीर को योग रूपी आग से अच्छी सरह पकार के पक्की करनी चाहिये । तात्पर्य यह कि यह शरीर मट्टी से निर्मित करचे प? के समान मना है जैसे फच्चे घहे में पानी भरने पर जल का गुण व्याप्त होने से षट क्राय गान के फिर मट्टी में मिल जाता है। इसी प्रकार पाच तत्वो मे मो शरीर में नीव पानी रूप है जब वह शुभाशुभ काम करता है तब क्रमण जरा व्याधि उत्पन हेनेि में कुछ दिन बाद नष्ट हो जाता है परन्तु जैसे पडे को आग में मच्छी तरह पकाप लेने पर सम कारा.

धेरगडमंहिता हरी चोट न पावे सो कमी नही नष्ट हो सत्ता चहै हजारोघर्ष रखिये। हमी प्रकार योग रूपी भाग से (अर्थात् योगाभ्यास करके) असी तरह मे यदि देव को पक्की कर ले तो कभी नहीं नष्ट हो सक्ता लय तक कि कोई बाहरी पाकस्मिक बाधा न भान पड़ेगी ॥ रस्से जो लोग जराम | रणादि से वारवार जन्म लेना नही चाहते तथा शरीर पुष्ट कर ऐहिक बिशुद्ध सुख भोग को आकाक्षा करने वालो को चाहिये कि योगाभ्यास में अपने शरीर को अवश्य विशुद्ध करें। इसके विशुद्ध करने से जब तक चहैं इस ससार में निर्लिप्त हा विचरण करें या कहीं एक विशुद्ध स्थान में बैठे रहैं और जय इछा हो तघ समाधि के द्वारा परब्रह्म में तय है। कर परम पुरुपार्थ मोक्ष पद प्राप्त कर लें। अपघा जप फिर इच्छा हेरे पर ब्रह्माश बन दिव्याति दिव्य शरीर धारण कर ससार रूपी दावाग्नि से जगते भुनते मनुष्यों का उद्धार करें और इसी प्रकार की योग क्रिया का सचार कर जीवनमुक्ति ज्ञान स्वरुप पर्ने जो इच्छा हो करें करावें ॥इति। मय यह बात उपस्थित ई कि योग विद्या सीखने के पूर्व कौन २ सी सामग्री की आवश्यकता है जिसको सग्रह करके कोई माथक क्रम पूर्षक योगाभ्यास में प्रवृत्त हो तुम पर प्रथम सात प्रकार के साधन अथ सप्तसाधनं। शोधनं दृढ़ताचैव स्थैय्यं धैर्य्यञ्च लाघवम् । प्रत्यक्षं च निलिप्तञ्च घठस्य सप्त साधनम् ॥१॥ घेर महाराज कहते हैं कि योगशिक्षा करने वाले के लिये शरीर के सात साधन हैं जैसे-१पन (देहको शुद्ध करना) दृढता (मजयूमी) ३ स्थैर्य (एकसमान सर्षदा देहकास्थिर रहना) ४ धैर्य (घबहाना नहीं) ५ धेरगडसंहिता । लाधव ( हलकापन ) ६ प्रत्यक्ष ( ख मादि इद्रियों से देखना, स्पर्थ करना आदि ) ७ निर्लिप्स ( सब बस्तु का व्यवहार करना परन्तु मम से अलग रहना) तात्पर्य यह कि शोधन दूढ़ता आदि सप्त साधन न करने से योगा. भ्यास में पहिले तर मनही नहीं लगता, यदि च किमी, खभाव मिद्ध योगाभ्यासी का मन भी लगाया तो फ्रम न रहने से बीच में कोई स्थान ऐसा मान पदने का संयोग हो जाया करता है जिससे उधर उधर कुछ नहीं मृत पड़ता और विरक्तता आ जाती है वम सब कुछ मट्टी हेर जाता है इससे ये सप्त साधन ही योग शास्त्र के मूल समके नाते हैं पक्क योगी हमी से चीन्दे जाते है जो कि, सप्त साधन संपन्न हैं । अय सप्त साधन किस २ कर्म से और किस २ बस्तु से होते हैं उनका वर्णन करते हैं। पटकर्मणाशोधनञ्च पासनेनमवेदृढम् । मुद्रयास्थिरताचैव प्रत्याहारेणधीरता ॥३०॥ प्राणायामालाधवञ्च ध्यानात्प्रत्यक्षमात्मनि । समाधिनानिलिंप्तंच मुक्तिरेवनसंशयः ॥११॥ १ शोधन छ. कमी से होता है । २ भासनों से दृढता होती है. मुद्रानो से स्थिरता, प्रत्याहार से धैर्य । प्राणायाम से लाघव, ध्यान से अपने मात्मा में जो चाहै प्रत्यक्ष हो जाता है। सीपकार ममाघि फे द्वारा निर्लिप्तता अर्थात् वासना रहित हो जाता है। इसीप्रकार सापनी मे अन्त में अवश्य मुक्ति हो जाती है हममें संशय नहीं है। मम उन सह साधनो में प्रथम शोधन को बटूकमी से होता है उन पट्कों को धेरण्ड हिता 4 अथ षट्कर्माणि ॥ धौति गस्तथा नेति लालिको ताटकं तथा । कपालभातिश्चैतानि पटकर्माणि समाचरेत् ॥१२॥ जिन उ कर्मों से शोधन होता है वे ये हैं जैसे:-१ घोति २ वस्ति । ३ नेति ४ लोलिको ५ लटका ६ कपालभाति । तात्पर्य्य यह कि इन छ: कमों के द्वारा देह शुद्ध हो कर चेतनाकी चमत्कारी हो जाती है, यह शरीर मल से परिपूर्ण है, जिन २ माडो में जिन २ नाडियों में रोमकूपों में चमेपेशियों में तथा अस्थि बन्धना में जय मल लिपटा रहता है तब म शिथिल रहते हैं । नापियां पद्ध चाल ने रहित दयी चालती है।गमकूपो में से भीतरी दुप वायु शिशल में नहीं पाती याहरी प्रिमत यायु घुसने नहीं पाती, धमहा फटा परदा रूस साल फोहर फुन्सो आदि से दूषित रहता है, इसी प्रकार पेशिया ठीक २ लचक मधक नहीं बनी तथा अस्थि बन्धन भी हड्डियो को जमडे रहते है, यदि कभी शीघ्र गमनादि परिश्रम पहातो पीडा उत्पन्न होती है इत्यादि कारणो से शरीर के याह्याभ्यन्तरिक मल का शुद्ध होना बहुत हो मावश्यक है, इसी लिये शरीर के घायाभ्यन्तर मल शुद्ध करने के लिये गा पामी लोग छ यार्म निर्धारित कर लिये है । अUrn s' कों में धान का पर्णन करते हैं । अथ धौतिः॥ अन्ततिइन्तधौति हटौतिमूलशीधनम् । धौतिञ्चतुर्विधांकृत्वा घटकुर्वन्ति निर्मलम् ॥१३॥ पीति चार प्रकार की है, अम्त धौति (शरीर के भीतर साफ धेरण्डसंहिता। . - करना) २ दम्त घौति (दातों को माफ करना) ३ इंदौति (हाय को साफ करना) ४ मुलीधन (नामि एद्धि)स चार प्रकार की धौति से शरीर को निर्मल करना चाहिये। अन्तीतिः। चातसारं, बारिसारं, चन्हिसारं, वहिष्कृतम् । घटस्य निर्मलार्धाय अन्तिितश्चतुर्विधा १४|| धौति भी चार प्रकारी की है। १ वातसार (वायु रयागगा )२वारि सार (जल पागना) ३ घन्हि सार (भागे कहेंगे) ४ वदित ( यह भी मागे कहेगे) भय इन चारो में पहले बात सार का विधान कहते है। अथ वातसारः। काक चञ्चवदास्येन पिवेद्वायुं शनैः शनैः । चालयेदुदरं पश्चाद्वर्त्मना रेचयेच्छनैः ॥१५॥ अपने को कौवे की टोट के ममाग मनावे अर्थात् देना मोठी को सिकार कर कौवे की टोट सी करे और धीरे २ वायु पाग कर के पेट में उस वायु को चलावे पिरावे पश्चात् फिर धीरे २ उमी के मुंह क द्वारा हमी क्रिया को प्रातमार कहते हैं । एमका फल वैद्य गास से मम्या रसता है यह घेरबह महाराज कहर हैं। बातसारं परंगाप्यं देह निर्मल कारणम् । सरोिग क्षयकर देहानल विपद्धकम् ।। यह परम गोप्य मातमार कर्म दे गिर्मग कर मेवाना, मर्च रोग PIN, और देह की अग्नि महानयागा है। ATV घेगडमाहिता। तात्पर्य यह कि घरह जी कहते हैं है दण्डकापालि ! इस बातसार कम को योगी मोग परम गोप्य कहते हैं परन्तु इमने तुम से छिपाय नहीं रक्खा पोकि यदि छिपायेंगे तो हम सपटी योगी ठहरेंगे । पोंकि हमासी धासना म स्वार्थ मापन की नहीं रही यह स्वार्थ साधका लोगही भाष्य करके किमीसे नहीं बताते, यदि घेराव महाराजही यथार्थ | गोप्य माने रहते तो क्यों दण्डकापालि से फटपट कह देते याने बिना मेवा टहला के एकही दिन की यात चीत से कह चले ? इसे सिद्ध हुमा कि मरचे येोगियो की ओर से यह योग विद्या गोप्य नहीं रहनी चाहिये। परन्तु प्रधभेमरे स्वार्थ पारायन योगियों को प्रकृति को दर्शाय के घेरठ महात्मा ने हेमकर, 'धातमारपरंगोप्य" ऐमा कहा है। और मब रोग क्षपकर इत्यादि मे साफ जाहिर है कि वैद्यक विद्या मे सम्बन्ध रखता हे अथ वारिसारः। प्राकंटंपूरयेारि वक्तेण च पिवेच्छनैः ॥ चालये[दरेणैव चौदरानेचयेदधः ॥ १७ ॥ मुख मे धीरे २ करट पर्यन्त भूध पानी पोधे फिर उसको उदा में |घुराये फिरावे श्री. उमको अपामार्ग अपांत गुदा द्वारा रेचन की, हम का धारिमार कहते हैं। . वारिसार प्ररंगोप्यं देह निर्मल कारकम् । साश्येत्तं प्रयत्नेन देव देहं प्रपद्यने ॥१८॥ यारिमार मी पदिने की ताद रामगोप्य कहा जाता है यह देह को मिल करनेवालारमको पहेयर में माम करना चाहिये रमके माधन मे देनदे६ प्राप्त होना है। परम माया तात्पर्य यह कि पह क्रिया यसरी फटिग काट .

धेरण्डसंहिता।
पट सब से नहीं हो सकी । बहुत से लोग ऐसे कठिन कार्य दोधार
दिन करके माम्नस्य बस दाद देते हैं और फिर कहा करते है कि कटा
गपोड़ा है। इस प्रकार के लोगों ने एक ठपकारी वस्तु की महिमा मष्ट.
हाती रस लिये सिवाय अधिकारी के तौर किमो के फट पद
नहीं बताना यह भी पेय जी का गूढ तात्पर्य है परन्तु मम किमी में
गोप्य नहीं है। यह पला मिहानत है।
अथ अग्निसारः।
नाभिगन्धिं मेरुपृष्ठे शतवारं च काग्येत् ।
अग्निसारमियंधोति योगिनां योगसिद्धिदा ॥१९॥
उदरामयजं त्यक्ता- जठराग्निं विवर्द्धयेत् ॥२०॥
एपाधौतिः परागोप्या देवानामपि दुर्लभा ।
फेवलं धौति मात्रेण देवदेहो भवेद्भुवम् ॥२१॥
नाभी की गति को मौ बार मे पृष्ठ में संलग्न कर अर्यात पेट को
मेसा खलाये कि नाभी पुप कर जा पीट की हही में लग जाय करें।
मानिसार पोति कही जाती हैजो कि योगियाँको योगकी सिद्धि
देनेयालो है। यह पेट के रोगों को दूर करके जठरागिन को बढ़ाती है
भऔर यह भी पूर्ववत् परम गोप है और देवताओंकी भी दुर्मभहे । और
कुछ करे यह नहीं परन्तु केवल इसी धोति से देय देह नियम जाता
है। सात्पर्य यह कि रोगो कभी नहीं होगा।
अथ वहिष्कृत धौतिः।
काकीमुर्दा शोधयित्वा पूरयेदुदरं महत् ।
धारयेद? यामन्तु चालयेदयो.वर्मना ॥२२॥
एपाधौतिः परागोप्यान प्रकाश्याकदाचन ॥२२॥

१२ घेरण्डमंहिता। पहिले कौवे की टोट के समान मुह कर के ऐसी बायु पान की जिस्से उदर पूर्ण हो जावे फिर उसी बायु को उदर में जाधे पहर तक रक्स पश्चात् गुदा के द्वारा बाहर करै। यह भी धौति परम गे प्यहै इस को कमी किमी जैसे तैसे से नहीं प्रकाश करना क्योंकि बिना दृढता क्रिया | मधेगो नहीं झूठी कहके निन्दा करने लगेगा । परन्तु दृढ से तो अवश्य कहना ॥ अथ प्रक्षालनम्। नाभिमग्नाजस्लेस्थित्वा शक्तिनाडीविसर्जयेत् । कराभ्यां क्षालयेन्नाडी यावन्मल विसर्जनम् ॥ तावत्प्रक्षाल्य नाडी च उदरे वेशयेत् पुनः ॥२३॥ इदं प्रक्षालनं गोप्य ठेवानामपि दुर्लभम् । केवलं धौति मात्रेण देव्देही भवेध्रुवम् ॥२४॥ नाभी गावे ऐमे गहिरे जल में खड़ा हो के शक्ति नाही अर्थात पेट की चित्रही वही प्रतही को बाहर करके जय तक भग साफ न है। ठे तप तक सूध चावे घाद माफ हो के फिर पेट के भीतर पैठार ले यह प्रक्षालन मिधि गोपनीय है और देवतानो को को दुर्लभ है, केवल इस घोति से ही मिश्चम देव देह हो जाता है । अथ वहिप्कृतधौति प्रयोगः । यामाई धारणे शक्ति यावन्न धारयेनर । अहिटत महदीति स्तावञ्चय न जायते ॥२५|| जय सक भाषक माधे पहर तक श्याम रोकने की शक्ति प्राप्त कर लेतन तक यह माहीति क्रिया का काना उचित नहीं है. क्योंकि गतिबिंगा निष्टाने का डर रहता है।

घेरण्डमहिना। अथ दन्तधौतिः। दन्तमूलं जिह्वामूल रध्रजकर्णयुग्मयो । । कपालरध्रपञ्चैते दन्तधौतिबिंधीयते ॥२६॥ दन्त धौति पाच प्रकार की है जैसे-१ दालो की जस को धोना, २ जिला की नड को धोना ३ । ४ कान के दानो छेदो को पाना, ५ तथा कपाल के रमको धोना ।। - - दन्तमूलधौतिः - खादिरेणरसेनाथ मृत्तिकयाचशुष्कयां । मार्जयेद्दन्तमूलंच, यावत्किल्विपमाहरेत ॥२०॥ खैर के रस से अथवा मिशुद्ध भूपी मृत्तिका से दातो को जष्ठ को साफ करे और जब तक मैल म साफ है। तब तक कुल्ला कर २ फिर २ माफ करे। - - दन्तधौतिकाफल। दन्तमूल पराधौति योगिनां योग साधने । नित्यकुर्यात्प्रभाते च दन्तरक्षाञ्चयोगवित् ॥२८॥ दन्तम्लंघावनादि कार्येषु योगिनांमतम् । योगियो के योग साधन में दन्तमूल धोति अर्थात् दास का घोमा, भब से दप्तम हार्य है। इसे योग के जाननेवाले मनुष्य प्रतिदिन मात काल दातों की रक्षा को किया करें दन्तधाधन भपांत् दातूम मादि का करना यागियो का मुख्य काम है।

घाराडमहिता । तात्पर्य यह कि दातों से और मन से ऐसा भारी सम्बन्ध रहता कि यदि दात में मैला रहता है तो उससे एक प्रकार को दुर्गन्धि पैदा होती है जो मस्तिष्क में ला कर बुद्धि को भ्रष्ट फाडालती है, तथा नाना प्रकार के रोग तत्पन कर गरीरही शिथिल करडालती है, इसके प्रत्यक्ष लक्षण यह है कि जब दातो के बीच में कोई कस्तु जैसे प्रामका रेगा वगेरा है कभी अटक जाते तो जब तक नहीं निकलते तक जिहा विकल रहती है उसी पर लुरफुराया करती है । इस्से और मन येचैन रहता है दूसरी बात यह कि योगाभ्यास से आयु की वृद्धि है।ती है अर्थात् योग बल से योगी लोग हजारो वर्ष जीते हैं की. धन पर्यन्त इन्द्रिपा विनष्ट म हो रसलिये समके रक्षाकी उपाय अवश्य करनी चाहिये । सीसे दात की जड़ को योगी लोग साफ रखने की क्रिया को योग साधन कह गये हैं। पास्तविक्ष यह क्रिया सय के लिये नतम है और नारोग्यता का एक मा। जिहा शोधन। अथातःसंप्रवक्ष्यामि जिहाशोधन कारणम् । जरामरण रोगादीन् नाशयेद्दीर्घलम्बिका ॥२९॥ घेरण्ड महाराज कहते हैं कि दन्त शेधन के पथात् जिहा शोधन कहते हैं । मिह के रोधिन से जीभ लम्बी हो जाती है जिससे कि जरा (युढाई मरण तपा और रोग नए से जाते हैं। जिहा मूल धौतिः।। तर्जनीमध्यमानामा भगुलिनय योगतः । येशयेद्गल मध्येतु भाजयेद्वम्विकामूलं ।। शनैः शनर्माजयित्वा कफदोपं निवारयेत् ॥३०॥ -- घेरण्डसहिता। . ~ तर्जनी (अंगूठे के पास की अंगुली) मध्यमा (बोध की अगुनी) भ- मामिका (अँगूठे से चीथी) ये तीन अंगुलियोका गले भोतर प्रवेश करे और जिहा की ल तक बार २ घस्से लगा कर धीरे २ जो कुछ कफ का दोष हो उसे साफ करें। फिर इस्से कफ मात्र निकल जाता है। मार्जयेन्नवनीतेन , दोहयेच्च पुनः पुनः । तदयं लोहयन्त्रण कर्षयित्वाशनःशनैः ॥३१॥ फिर नवनीत (नैनू ) को मिट्टी में लगा, कर रोज २ घार २ दुहे और फिर लोहे के चिमटे से उसी जीभ का अग्र माग पकड के पारे २ राज खींचा करें। नित्यकुर्यात् प्रयत्नेन रबरूदयकेस्तके। एवंकृतेचनित्येच लम्बिकादीर्घतांब्रजेत् ॥३२॥ प्रति दिन सूर्य के उदय और अस्त्र समय यह धौति का अभ्यास करै यदि इसी प्रकार नित २ यह क्रिया की जाये तो जीभ लम्बी है। जावेगी । - १ - तात्पर्य यह कि मधुर कपाय आदि षट्रमेर का स्वाद. मी जिहा के द्वारा अनुभव हेरता है, और उनका जो गुण ऐगुण है वह भी मारे आयु रस जीभ की शिराओ के द्वारा समस्त नाहियो में झट पट व्याप्त देता है और यह रक्त में मिल कर या तो रागादि इत्पन्न करता है, पा मज्जा मास उत्पन्न कर के शरीर को मोटा कर देता है जिस्से कि मनुष्य मारे मज्जो मासके चलने फिरनेकी शक्तिसे मी विहीन हो निकम्मा साहा जाता है । सो इस क्रिया के द्वारा नीमके शिरा कठोर पड जाते हैं और जो 'कुछ मधुर कयायादि रस खाता है वह झटपट नारियो में गमन न कर आमाशय में ना भता है और वह पित्त रस के सोग

धेिगडसहिता।
प्रह
से पच कर क्रम मे सार भाग आकर्षक नारिया द्वारा समस्त शरीर में
व्याप्त होता है और वायु तथा जलका लेश उस रसके साप नहीं जाता
उस्से वह पुरुष बस्न पौरुष में उन मोटे मनुष्यों से अधिक होता है और
नमके कहे रहते हैं । फुर्ती बनी रहती है। और सहसा रोगासे भय
नहीं रहता । इसी लिये योगी लोग दीर्घ जीबी भी हो सके हैं और
दूमरी बात यह है कि बिना जीभ को लम्बा किये योगी लोग अमृत
पान नहीं कर सके जिसकी क्रिया मागे करेंगे।
कर्ण धौतिः।
तर्जन्यानामिकायोगान्मार्जयेकर्ण रंध्रयोः ।
नित्यमभ्यास योगेन नादान्तरं प्रकाशयेत् ॥३३॥
तर्मनी और अनामिकागुिणी के योग से कानो के दोनो छेद।
को प्रति दिन साफे करे तो एक प्रकार का विशुद्ध नाद प्रगट हुमा
करता॥
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हात्पर्य यह कि एक तो कर्ण में मल नहीं रह जाता जिस्से कि
पधिरादि अथवा कर्ण मृगादि रोग उत्पन्न होते हैं । दूसरी बात यह भी
मन्यु के कुछ दिन पूर्ण हो सो भव्यक्त नाद मुनाई पहता है पर
मा परिजात हा जाता है। जिससे कि मनुष्य अपनी मृत्यु जान कर
उत्तम कर्म उत्तम स्थान या उत्तम समय का भाप्रय ले पक्का है।
कपाल रंधु शोधन।
वृद्धाहृष्टेन दक्षेण मार्जयेहाल रंधकम् ।
प्रयमभ्यास योगेन' कफदोपनिवारयेत् ॥३॥

घेरण्डम हिता।
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नाडीनिर्मलतांयाति दिव्यदृष्टिःप्रजायते ।
निदातेभोजनातेच दिनान्तेचदिनेदिने ॥३॥
दाहिने हाथ के अगूठे के द्वारा प्रतिदिन सेय के उठे तत्र मोसन
के अन्त में, तथा सूर्यास्त समय में, कपाल रन अर्थात् शिर के प्रोच में
जो गढ्ढा रहता है उसे जलही से साफ करै । इस प्रकार के अभ्यास मे
भीतरी कफ का दाप नष्ट हो जाता है । नाडिया निमग्न हो जाती है
और दिव्य दृष्टि होती है अर्थात् 'यहुत दूर तक देखते की शक्ति बद
'जाती है," - "FT
111 हौतिः ( हृदय शोधन ) ।
हृतित्रिविधांकुर्या इंडअमनवाससा ॥३६॥
हद्धीति अर्यात् हृदय साफ करने को मिघि तीन प्रकार से है. १
दण्ड धौति २ बमन धौति, ३ यास धौति ।
रंभादगढ़ हरिद्राया चेत्रदण्ड तथैवच ।
हृनमध्येचालयित्वातु पुन प्रत्याहरेच्छनै ॥३७॥
केला के बीच का सार भाग उनका दगड वा हरिदी के पेट का दगई
प्रयया चीकने बेत का दगड बनाय के हृदय के बीच धोरे २ मश करके
फिर धोरे २ बाहर किपा करें। इसी का इवीति कहते है।
दण्ड धौति।
कफपित्तंतथालेद रेचयेटू यमना ।
दण्डधौनिषिधानेन हृद्रोग नाशये प्रम ॥३८॥

१८ घेरण्डमंहिता। इम दराठ घोति के करने से, कफ पित्त तपाद (सखार) शादि विकारी मल मुह के द्वारा हृदय से निकल बाहर होते हैं, जिसे कि हृदय के समस्त रोग निश्चय नष्ट हो जाते हैं । वमन धौति। भोजनांतपिवेद्वारि प्राकंठपूर्णितंसुधीः । ऊर्ध्वदृष्टिक्षणकृत्वा तज्जलंयमयेत्पुनः ॥ नित्यमभ्यासयोगेन कफपित्तनिवारयेत् ॥३९॥ बुद्धिमा पुरुप भोजन के अन्त में एट पर्यन्त जलपिये फिर पोही देर तन ऊपर की भोर तापता रहे फिर थोड़ी देर के बाद उसी जल थे। धमन कर हाले मी मन भौति कहते हैं । इस वमन भौति का प्रतिदिन अभ्यास करने मे कफ और पित्त नष्ट हो जाते हैं। विवेचना। बमा करने में ऐसा अभ्याम करे जिम्मे अन्न न गिरनेपा के वस्त न मान गिरे और भोगनान्त से भागन के उपरान्त ही यमन नहीं करना समक्के रहना ४ । ५ पटे बाद चाहिये तात्पर्य यह है कि साली पेट में अमन करे। जय जल पीके भाकाम को मोर ताके और यमो करने लगे. पदि जनम गिो हो किच्चिर गुनी हानिकर गिराय है। हमी प्रकार सम्पाएर किरायट्री गिरने लगेगा। ज्य जल प्रोकर अपर तातम कुन १० मिनिटि इससे अधिक पदों त्यादि र २ भी बातें गोप से।

धेरगडसहिसा। वासधौतिः। चतुरहुल विस्तारं सूक्ष्मवस्त्रं शनैर्विशेत् । पुनः प्रत्याहरेदेतत् प्रोच्यते धौतिकर्मकम् ॥४॥ चार अगुलका घोडा और कम से कम ५ हाय सम्या महौल कपाटा लेबर धौरे ३ निगल जावे, और फिर नमको घोरे २ निकाल बाहर करे, रसी को बास धीति कहते हैं । गुल्मज्वर प्लीहकुष्टं कफपित्तं बिनश्यति । आरोग्यं बल पुष्टिञ्च भवेनस्य दिनेदिने ॥४१॥ बास घोति अभ्यास करने से गुरुमरोग, लोहारोग कुष्टरोग, तथा कफ मार पित्त रोगों का नाश शेता है और अभ्यास करने वाले को भारोग्य वस्ल पुष्टि ये सब शारीरक सुख दिन मिलते हैं। तात्पर्य-जो नाना प्रकार के पदार्थ भोजन किये जाते हैं उनमें से एक प्रकार का पंचा युक्ता लार पैदा होता है जो थो दिन माद गावा हो कर नाहियो का मुख रोक लेता है। और भन्न रस शरीर संपारी नहीं हो कर मल मूत्र के द्वारा निकल जाता है जिस अ रस से, शुक्र मनता है, जब मान रस शरीर सञ्चारी नहीं होने पाता ते शुक्र कम हो जाता है. इससे शरीर दुर्वल (कमजोर हो जाता है, परन्तु इस घास भौति के द्वारा वह लार वा पच्छा रोज २ निकन बाहर होता है नाही मुख साफ रहता है, बस शुक्र की पद्धि अमायाम होती है और वह शुक्र पुष्ट होता है, जिससे शरीर में कास्ति बल मादि उपरोक्त समस्त प्रा. रोग्यसा भी प्रापही प्राप प्राप्त होती है ।

२० घेरण्डाहता। मूलशोधन। अपान कूरता तावद्यावन्मूलं न शोधयेत् । तस्मात्सर्व प्रयत्नेन मूल शोधनमाचरेत् ॥४२॥ जय तक मूल शोधन अर्थात् गुह्य द्वार माफ नहीं होता तब तक अपानवायुको प्रूरता अर्थात् कडापन बनारहता है । और गुह्यसे घायु कष्ट से निकलता है । एरसे सब प्रकार के यनसे मूल शोधन करना उचित है । पीतमूलस्य दण्डेन मध्यमाहुलिनापिवा । यत्नेन क्षालयेत् गुह्यं वारिणाचं पुनपुनः॥४३॥ कच्ची हलदी की जाट से या मध्यगा अगुली से यार । ययके सहित जरा द्वारा गुह्य द्वार साफ करना चाहिये बारयेत्कोप्टकाठिन्यमामाणि निवारयेत् । कारणंकान्तिपुष्टयोश्च दीपनंवट्टिमण्डलम् ॥४४॥ भूल शोधन के द्वारा काष्ठ काठिन्य अर्थात् पेट के भीतर कडापन तथा भाग की अजीर्णता विनष्ट होती है हमी प्रकार देश की काति गरीरा गुप्ता और गटरामि की यदि होती है। से त्पर्य-मास मे यायु प्राप्ति के मनुष्य होते हैं जिनका कोठाहर दा करा रहता है और न को गिमायत अगी रहती है फिर पहातक नावे हि कभी २ वायु मरन भी नहीं होता जिस भाप या जीर्ण हो जाया करता है और अन्त में ज्या में भी पीसि । कर मदा कष्ट पाया करते हैं परन्तु ऐम मनुष्य पदि मन गोमा फ्रिपा में शरार सिप किपा करे तो पप कष्ट गितहास है । पदा पर एक यात - 1 - २१ धेिरण्डसहिता । , १ असभ्यता की भी कही जाती है पाठक गम क्षमा करेंगे। प्रस्तर ऐसेभी मनुष्य देखे गये हैं कि जो योग विद्या मे मालसी होकर कष्ट के कारण कुकर्म द्वारा पोहादि निधारण किया करते हैं। अर्थात् गुदा मैथुन कराय के चैन का मार्ग निकाल लेते हैं। इस कर्म में ऐय्यास और मोटी ताद वाले धनी भक्तर होते हैं। देखिये यह फैसा भन्याय कार्य है। अन्याय के सिवाय उनकी अंतहियां इसी-कर्म से कमजोर हो जाती हैं और फट पट नर्क गामी भी हो जाते हैं। इसी निमित्त घेरह महा मुनि ने यह योग क्रिया निकाली है जिसमें रोग शांति और निर्मले बुद्धि मादि अनेक गुण है, जिनके,यह उपरोक्त शिकायत हा वे भंवश्य इस क्रियाको साधनक। अथ. बस्ति प्रकरणम्.free ‘जलयस्तिरशुष्कवस्तिर्वावस्तिःस्याविबिधास्मृता ।', जलवस्ति जलेकुंर्याच्छुप्कवस्ति संदाक्षितौ ॥४५॥ घस्ति दो प्रकार की है-जल बस्ति और शुष्क यस्ति, जलवस्ति जमा से, तया शुष्क वस्ति स्थल में साधन करना चाहिये । जलवस्तिकीविधि ॥ नाभिमग्न जलेपाथु न्यस्तयानुत्कंटासन । माकुचन प्रसारज्ज, जलवस्तैि समाचरेत ॥ नामी बूड जावे ऐसे जलमें पैठ,फर उत्कट प्रासन बैठ कर गुदादेश को सिकोड़े ओर फैलावै । इमो को जलपस्ति कहते हैं । ( उत्कट प्रा. सन प्रासनी के प्रकरण में देखो) वस्तिकाफल ॥ प्रमेहच्च उदावतं, फरवायु निधारयेत् । भवेत्स्वच्छंद देहश्य, कामदेव समोमवेत् ॥४॥ 11 २२ घेराडमहिता। जम्न बस्ति के माधन से प्रमेह रोग उदायर्त रोग (९३ रोग हैं) क्रूर घायु (जो घी कठिनता से वायु छूटता हो) रोग नष्ट होते हैं, और साधक स्वच्छ शरीर ( देह काबू में रहै ) तथा कामदेव की भाति रूप- बान (देह में कान्ति आ जाती है ) हो जाता है । दूसरी स्थल वस्ति वस्तिंपश्चिमोत्तानेन चालयित्वा- शनैरधः । अश्विनी मुद्रयापायु माकुञ्चयेत्प्रसारयेत् ॥४॥ स्थलही में पीठ की ओर उत्तान ही फर पडे और क्रमश गुह्य के द्वारा चलाये इसी प्रकार अश्विनी मुद्रा (भागे मुद्रा प्रकरण देखो) के द्वारा गुह्य को सिकार भोर फैलाये, ऐसा करने से स्थल बस्ति साधी जा सक्ती॥ फल॥ एवमभ्यास योगेन कोष्ठदोपं न विद्यते । विवर्द्धयेज्जाठराग्नि मामयातं विनाशयेत् ॥४९॥ सी प्रकार स्थल यति साधना करने से होप्ठ में दोप नहीं रह जात और उदर की भग्नि यट जाती, तथा मामयातरोग भी नष्ट हो जाता है। - रति शक्ति प्रकरणम् ॥ .

धेरराडसहिता। अथ नेतियोगः॥ बितस्तिमान सूक्ष्मसूत्र, नासानाले प्रवेशयेत् । मुखातिर्गमयेत् पश्चात् प्रोच्यते नेतिकर्मकम् ॥५०॥ बीतामर का महीन हेरा माफ के खेदो में डालकर पोछे तसे मुख की ओर निकाल लिपा करै । इसको नेतिकर्म कहते हैं 7 साधनान्नेतिकर्माणि खेचरी सिद्ध माग्नुयात् । कफदोप विनश्यन्ति दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥१॥ मेति कर्म साघन करने से खेवरी सिद्धि हो जाती है अर्थात् कफ | दोष नष्ट हो जाता है और दिव्य दृष्टि हो जाती है। शिक्ने भाकाम बहुत सी बस्तुऐं देख पाती हैं। तात्प-एक प्रकार का कफ नासिका में जमा करता है और जय वह बहुत जम जाता है तब उस कफ के रेशे बढते २ मास सह जा पहूपते हैं, जिस्से को भाने लगता है और फिर बेहो कर के रेशे भास में फैल कर माहा बन छाप लेते हैं फिर मास उयों की त्यों धनी रहने पर भी नहीं देख पडता उमी माहा को अर्थात् कम के जाला को भाख बनाने वाले नहन्नी से गोद कर निकाल लेते हैं वह जाला मग- वृत भी हो जाता है अर्थात् माख मोगने वा धोन में नहीं कटता ग इंटता फिर यह योग इसको माफ नप कर हालता है। लौलिको योग॥ प्रमन्तवेगेतुन्दञ्च भामयेठभपाश्वयोः । सरोगानिहन्तीह देहानल विबर्द्धनम् ॥५२॥ , . -- घरगडसहिता। - - प्रति प्रयल वेग से पेट के दोनों यगल घुमावे, इसी का नाम ली निकी योग है यह योग सघ प्रकार के रोगो को नष्ट करता है और देह की अग्नि को बढाता है अर्थात् सुधा बहुत लगती है, और जो भी जन किया जाता है यह पच जाता है। T त्रोटक योग। निमेपोमेन्पक त्यक्त्वा सूक्ष्मलक्ष्य निरीक्षयेत् । यावदयूणि पतन्ति त्रोटक प्रीच्यते वुधैः ॥५३॥ पन्नक का भाजमा यन्द करके किसी सूक्ष्म बस्तुको और जघ सक मामू न गिरें एक टक देयता रहे इसी को वोटक योग कहते हैं । फल। एवमभ्यास योगेन शाम्भवी जायते ध्रुवम् । नेत्र रोग विनश्यन्ति दिव्य दृष्टि प्रजायते ॥१४॥ एमो प्रकार प्रोटक योग का म्याम करने से शाम्भवी मुद्रा मिद्ध हो जाती प्रांत एक टक निमेष देखने का अभ्याम यहा तक बत नाता? कि वो जितमी देर तक बिना पान भाजे ताकते रहे। इस्से समाही नहीं बल्कि मेत्र के समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं और दिव्य दृष्ट भी हो जाता है भपांत पात मूक्ष्म २ यस्तु भी देख पाने गती त्य-पाकिसे परमा सगामे मे छोटी पातु बडी सी ३० परती भी प्रकार म मायामा भी कम है।

धेरण्डमरिता। २५ m कपाल भाति योग। यातक्रमेणव्युत्क्रमेण शीतक्रमेणविशेषतः । भालभातिंत्रिधांकुर्यात् कफदोपंनिवारयेत् ॥५५ कपान भाति योग सीन प्रकार का है। यातमाम मुसम्म, तपा गीतकम । इसके साधन से कफ के मंपूर्ण दोष नए होते हैं । वातकम कपाल माति। ईडयापूरयेद्वायुं रेचयेपिंगलांपुनः । पिंगलयापूरयेद्वा पुनश्चंद्रेशरेचयेत् ॥५६॥ ईश और अर्थात् नाफ के सायें छेद के द्वारा घायुको खोंच भरे और पिंगला अर्थात् दहिने छेद से निकाले । एसीप्रकार दहिने छेद में वायु पूरण करें और फिर माय वेद से निकाले । पूरकरेचकंकृत्वा बेगेननतुचालयेत् । एवमभ्यासयोगेन कफदोपनिवारयेत् ॥५०॥ जयपूरक या रेचक कर मर्यात् स्याम सोधे और छह तय बरद मानकर कम से धीरे साफ इसी प्रकार प्रभ्या योग करने का दोष भ्रमात नष्ट हो जाते हैं। व्युत्क्रमकपाल भाति। नासाभ्यांजलमाकृप्य पुनर्यकत्रेगरेयेत् । पायंपायव्युत्क्रमेण श्लेप्मादोपंनिधारयेत् ॥८॥ ४

घग्गडमंहिता।
दोनों माक के छेदो मे जग को पींध कर फिर मुह की राह से
गिराता गाये और मुष्ट की राह मे भी जल पी २ कर नाक को राह गिराधे
इसी को व्युतकम कपामा भाति कहते हैं । यह कफ के समस्त दोषों को
नष्ट करती है। यह क्रिया यहुत ही कठिग ३'और बड़े अभ्यास से
मिद हो मक्ती है, नहीं तो मुख से पानी पीकार मामिका से गिराना
और नाक से पीकर मुह ने गिराना है।ई नहीं सका । बल्कि पिया हुआ
पानी पेट में धना जाता है इसलिये सावधानी से करना ।
शीतकम कपाल भाति।
शीत्त्वपीत्याबकोण नासानालविरेचयेत् ।
एवमभ्यासयोगेन कामदेवसमोभवेत ॥५९॥
नजायतंचवाईक्यं, जरा नैव प्रजायते ।
भवेत्स्वच्छन्ददेहश्व कफदोपनिवारयेत् ॥६॥
मुख रो शीतकार कर ( सुरक कर ) पानी पौवे और उसे नाक के
छेदों से गिराय दे. इसको शीतझम कपाल भाति कहते हैं । इस प्रकार
योगाभास करने से मनुष्य कामदेव की तरह सुन्दर हो जाता है और
बुढाई तथा बुढ़ापे को निर्यलता नभो शरीर में कभी नहीं मा सकी।
फिर देह अपने काबू रहती है और कफ के जितने दोष हैं सब नष्ट
हो जाते हैं।
इतिथी घेण्डम हिसायां घेरण्डचण्डकापालि सम्वादे
पट कर्म साधन नाम प्रथमेपदेशः ॥ १ ॥

धेरण्डसंहिसा।
अथ द्वितीयोपदेशः
अब आसनों की विधि कहते हैं।
आसनानि समस्तानि यावन्तो जीवजन्तवः ।
चतुरशीति लक्षाणि शिवेन कथितं पुरा ॥१॥
तेषांमध्ये विशिष्टानि पोडशोनं शतं कृतम् ।
तेपांमध्ये मयलोके द्वात्रिंशंदासनंशुभम् ॥२॥
घेरपट महाराज ने कहा कि पृथ्वी में जितने जीव जन्तु हैं उतने ही
भासन भी हैं। शास्त्रकारों ने औसत दर्जे चौरासी लाख सानि संख्या
ठहराया है इसी से प्रथम महादेव जी चौरासी लाख आसन पाहू भी
चुके हैं । परन्तु उनके बीच सौ साला कम में अर्थात् चौरासी भासन
श्रेष्ट हैं। उनमें भी संपला यत्ती शासन मनुष्य नोफ के लिये शुभ हैं
बाकी ५२ प्रापन देव लेक के लिये कहे गये हैं।
आसनों के भेद।
सिद्धं, पहा, तथा भई, मुक्तं, वजञ्चस्वस्तिकम् ।
सिंह, च गोमुखं, वीरं, घनु, रासन मेवच ॥३॥
मृतं, गुप्तं,तथा मत्स्य, मत्स्येन्द्रासन मेवच ।
गोरक्षं, पश्चिमोत्तान, उत्कटं, सङ्कटं तथा ॥४॥
मयूर, कुक्कुट, कूर्म, तथा चोत्तान कूर्मकम् ।
उचान मण्डुकं, दृक्ष, मण्डूकं, गरुडं पम् ॥६॥

२८ घेरण्डहिसा। शलभं, मकरं, उष्ट्र, भुजङ्गमञ्च, योगासनम् । धात्रिंशदासनानितु, मर्त्यलोकेच सिद्धिदम् ॥६॥ सिद्धासन १ पनामन २ भद्रामन ३ गुहासन ४ बजासन ५ वति- कासम ६ सिंहासन ७ गोमुखासन ८ चौरासन र धनुरासन १० मुतामन ११ गुप्तासम १२ मत्स्यासन ९३ मत्स्येन्द्रासन १४ गोरक्षामन १५ पश्चिमोत्ता- नामन १६ उत्कटासन १७ संकटामन १८ मयूरासन १९ कुक्कुटासन २२ पूर्मामन २१ उत्तान कूम कासम २२ उत्तान मगकामन २३ पक्षासन २४ मयकासन २५ गरुड़ासन २६ कृषभासन २७ शलभासन - मकरामम २९ उष्ट्रासन ३० भुजगासम ३१ योगासन ३२ ये यत्तीस प्रासन मनुष्य साकके लिये सिद्धि देने वाले हैं अर्थात् रोगादि निवारक तपा घल पुष्टि भादि बहुविध गुणकारक है ॥ तात्पर्य-योगियों के मत से रोग दो प्रकार के होते हैं एकता का. विष्य को देह में उत्पन्न होके पन्द्रियो के द्वारा मन को क्श पहुंचाते हैं दूसरे मानसिफ जो केवल माही में उत्पन्न हो के तमी मन को परम होग पहुंचाते हैं । योमियो ने यहे परिश्रम से यह प्रासन प्राणायाम भादि को "एक क्रिया व्यर्थ करी" निकाला है। प्रासना के सम्बन्ध में एक यात और भी बाहमा दे कि जो लोग अक्सर देखा करते हैं शिव हुत से बाजीगर वगैरा भी यन में सामान करते हैं और देश के टेर भांग की घडी २ झियायें दिखाया करते हैं। वह भी शारीरक फायदा पहुंचाती। हमी से प्रायमर निरोग रहते हैं। परन्तु वे उस विद्या का | तस्य नहीं जानते इसलिये उनके मानसिक स्लेश न दूर कर बल्कि और भी बढ़ते हैं। यानी, मोह प्लादिक देोप बढ़ के माधक को धष्ट मागी कर हामते हैं। यहां पर सनी लिये जनाया जाता है घर की दृष्टि उस प्रकार न गाये।

धेराड हिता।
२६
सिद्धासन ॥१॥
योनिस्थानकमधुमूलघाटकं सम्पीडययगुरफेतरम् ।
मे सम्प्रणिधायतन्तुचिबुकं कृत्वाहृदिस्थायिनम् ।
स्थाणुःसंयमितेंद्रियोऽचल दृशा पश्यन्भुवोरन्तरम् ।
मोक्षचत्रविधायतेफलकर सिहासनंप्रोच्यते ॥ ७ ॥
जितेन्द्रिप सापक पैर की लह याने एड़ी की योनिस्पान ( MET
मित्रयों की योनि हेरती है ऐसी कल्पना कर अर्थात् प्रयडकोश के नीचे)
में मिहाये और फिर दूमरा गुरुफ चीत् एडी लि के संपर पर, फिर
विद्युक यानी डाटी को छाती में लगांवे फिर इन्द्रियों को साधकर अर्थात्
एक ध्यान में वाध कर अचल दृष्टि यानी एकटकी लगा कर भौहो के
बीच के स्थान को देखै । इसी प्रकार करने से सिद्धासन कहा जाता है
और यह मामन मोक्ष फन तथा भग्पाम्य नौरोग भादि का का देने
पाता है॥
तात्पर्प-मेक्षि यह कि शरीर नौरोग रहने से बुद्धि पडती हे बुद्धि
बढ़ने से सत् ममत् का ज्ञान होता है, भ्रम निसृत होकर जन्म मरणका
जो दुःख है उससे छूट जाता है. अकाल मृत्यु से न मर कर काल मृत्यु
से मर कर परमात्मा में लप हो जाता है।
पदमासन ॥२॥
'वामोरूपरिदक्षिणहिचरणं संस्थाप्ययामंतथा ।
दक्षोरुपारपक्षिमेनविधिना कृत्याकराभ्यांदृढम् ॥
अंगुठेहदयनिधायचिकं नासाग्रमालोकयेत् ।
एतद्व्याधिविनाशकारणपरं पद्मासनंचोच्यते ॥८॥

. घेण्डसहिता। दहिगा पैर बाई जाप पर तपा धाया पैर दहिनी जाघ पर रक्स और पीछू को भोर से दहिगे हाप से दहिने पैर के अंगूठे को तपा पायें हाय से बायें पैर के अंगूठे को दृढता से पकरे । इसी प्रकार विद्युत ( ठाढी ) छातो पर रक्वै और मासिका का अग्र भाग देरी । इसी का नाम पद्मामन है। यह भामम ममस्त व्याधि विनाश करने में श्रेष्ठ है। भद्रासन ॥३॥ गुल्फोचवृषणस्याधो व्युत्क्रमेणसमाहित. । पादागुष्ठेकराभ्यांच धृत्वाचपृष्ठदेशतः ॥९॥ जालंधरंसमासाझ नासाग्रमवलोकयेत् । भद्रासनंभवेदेतत् सर्वव्याधिविनाशकम् ॥१०॥ देशमी गुरफ प्रोस् एडी अहकोण के नोचे उलट के रक् माद पीठ श्री श्रीर में दोनों हाथो से देनी पो के अँगूठों को पकहे और जाल. घर धंघ (भागे में देखें।) करके नामिका का अन्न भाग ध्यान करके देखें । मी का नाम मद्रासन है और यह प्रासन सय प्रकार की उपाधिपा को नष्ट करता है॥ मुक्तासन॥४॥ 'पायुमूलेयामगुल्फं दक्षगुल्फसोपरि। शिरोगोवासमंकार्य मुक्तासनंतुसिद्धिदम् ॥११॥ याई पड़ी गुदा के जद में लगाये उसी के कपर दहिनी एसौ रक्स fir at गाना ममान भाग से रक्लै हिरो हुनने न पाये और सीधा शारीर करके मेटे, मो को मुक्तासन कहते हैं। यह शासन साधक को सब प्रकार की सिद्धि देने वाला है। T - धेरगड संहिता। AM - 'वजासन ५। जंघाभ्यां बजवत् कृत्वा गुदपार्थे पदात्रुभौ । बजासनं भवेदेतत् योगिनां सिद्धि दायकम् ॥१२॥ दोनों सांघों को वज़ के साकार कर के गुदा के दोनो तरफ दोनों | पैर मिहावे। इसी को बजामन कहते हैं ..., यह आमन योगियों को | सिद्धि प्रदान करता है। स्वस्तिकासन । जानोरन्तरे कृत्वा 'योगी पाद तले उभे। ऋजुकायः समासीनः स्वस्तिकंतप्रचक्षते ॥१३॥ देना 'जानु प्रर्यात् पिडुनी दोनो जांधों के बीच करके दानी चरण तल भी उसी मध्य में रक्ये और ऐठायेंट रह कर सरल भाव शरीर करके बैठे । यो स्वस्तिकासन कहता है ॥ सिंहासन ७॥ गुल्फो च वृपणस्याधो व्युत्क्रमेणो तांगतः । चितिमलोभूमिसंस्थः कृत्वाच जानुनोपरि ॥१४॥ व्यक्ताव्यतो जलंधच, नासाथ मवलोकये। सिंहासनं भवेदेतत् सर्व व्यघि विनाशकम् ॥१८॥ दाना एठी अंहकोश के नीचे उलट कर परम्पर मिहाप के रक्खें भौर ऊपर की भोर मार कर ले सौ दाना पिदुलो भूांग मे लगाय दे सपा पिडुलिया के अपर मुख को सोल कर जपो फरक । जालपर बध .

घरमडसंहिता। (भागे देखो) के मात्रय से नामिका का अग्रभाग देस । सो को सिहा. सग कहते है। इमो भासन के द्वारा सब प्रकार की व्याधि बिमष्ट होती है। 4 गोमुखासन ८॥ पादोच भमोसंस्थाप्य, पृष्ठपाश्वें निवेशयेत् । स्थिरकायं समासाद्य, गोमुखं गोमुखाकृतिः ॥१६॥ देना पैरो को भूमि में स्थापन करके पोटफे बगो लगावे और स्थिर गरीरहेकर यैठे तो यह गोमुख के साकार देख पाठेगा, रसी का नाग गामुसासन है ॥ बीरासन ९। एक पाद मथैकस्मिन् विन्यसेदुरुसंस्थितम् । इतरस्मिन्स्तथा पश्चादीरासन मितीरितम् ॥१७॥ एशजपा के ऊपर एक पर रन के दूसरा पैर पीछे की ओर रखें पसी के घोरासन पाहते हैं। धनुरासन १०। पसार्थपादों भुविदण्डरूपो, कराँचपृष्ठे तपादयुग्मम् । कृत्याधनस्तुल्यपरिवर्तिताम् जगादयोगीधनुरासनन्तत्३८ देना चरण भूतल में ममान भाय से देगा का पप्त पो भोर से ला कर दोनो पैरों को पो और देव को धनुष के साकार यनाये और उगटै पुनटे एसोको योगी डेग धमुराधन करते॥ दण्डा की तरह फैलाय दे घेरण्डमड़िता। मृतासन ११ । - + उलान शववभूमी, शयामन्तु सवासनम् । शवासनं श्रमहरं, चित्तवित्रान्ति कारणम् ॥११॥ मरे मनुष्य की तरह धरातल में शपन करनेही मे मृतामम हताहै रसको शवासन कहते हैं यह शासन श्रम को धिनष्ट करता है और मिश्राम का कारण है। गुप्तासन २२॥ जानुनारन्तरे पादौ कृत्वापादौ च गोपयेत् । 'पादोपरिच सस्याप्य गुदं गुप्तासन विदुः ॥२०॥ दोनेा गुटुना के बीच में दोनो पात्रो को गुप्त भाव से रमी और | दोनो पावो पर गुदा का स्थापन करै । इसी को गुप्तामन कहते हैं । मत्स्यासन १३। मुक्तपद्मासनं कृत्वा उत्तानशयन चरेत् । कूर्पराभ्यांशिरीवेष्ठन, मत्स्यासनन्तु रोगहा ॥२॥ मुक्त पद्मासन गाय के हाथ के दोनो गुठुना मे शिर को लपेटे और धित होके पर जावे। इमी को मत्स्यासन कहते हैं । यही भासन समस्त रोगो का नाश करता है। पश्चिमोत्तान आसन १४ । प्रसायंपादौ विदगडर पी, सन्यस्तभालग्वितियुम्ममश्ये। यनेनपादीचश्तीकराभ्यां, योगींद्रपोठपश्चिमोत्तानमाहुः२२ ३४ घेरण्डमहिता। दोनी पाय भूमि में दण्डा की तरह फैलाय दे और पत्र के सहित दोना पाय हाथों से पकडे और दाना जाघो के बीच अपने शिर को पैठारे, उसी को योगीन्द्र लोग पश्चिमोत्तान भासन कहते हैं। मत्स्येन्द्रासन १५। उदरं पश्चिमाभासं कृत्वातिष्ठति यत्नतः । नम्रांग वामपादं हि, दक्षनानु परिन्यसेत् ॥२३॥ तत्र याम्यं कूपरञ्च याम्यं करेच वक्तूकम् । भुवोर्मध्ये गतादृष्टि पीठंमात्स्येन्द्रमुच्यते ॥२४॥ पेट के। पीठकी तरह कर अर्थात् पेट फुत्रा पहे और बाये पैरका नयाय के दहिने पैर की जघा पर रक्से, इसी प्रकार उस धायें पैर पर दहिने पैर की एसी रयत । इधर दहिने हाथ पर मुह के। रक्स और भीहो । मध्पलला देखे । सिको गत्स्येन्द्र श्रासन कहत हैं। गोरक्षासन १६ । जानूर्वो रन्तरपादो उत्तानाव्यक्त संस्थितौ । गुल्फोचाच्छाद्य हस्ताभ्यामुत्तानाभ्यां प्रयत्नतः॥२५॥ कण्टसोचनंयत्वा नासाग्र मवलोकयेत् गोरक्षासनमित्याह योगिनांसिद्धिकारणम् ॥२६॥ होमा जाप और पिदुनिया के मध्य में दमी पैर उत्तान करके गुप्त भाप में फिर देगी छायो मे दोग पो मंद ठे। इसमें याद कठ दो भनितानामिलाप भाग भवन करें। मोनी । साम। या योगियों को मिद्धि देने वाला है।

धेरण्डसंहिता ३५ उत्कटासन ॥१७॥ अंगुष्ठाभ्यामवष्टभ्य घरांगल्फेचखेगतौ । तत्रोपरिगुदंन्यस्य यिज्ञेयमुत्कटासनं ॥२०॥ पैर को दोनों अंगूठों के घल से भूमि में स्थित होके दोनों एहियों की निरालम्ब के. ठायदे और नाहीं एरियों पर गुदा को रक्खे । रसी को उत्कटासन नागना चाहिये । सङ्कटासन ॥१॥ वामपादंचितेर्मूलं सन्यस्यधरणौतले । पाददण्डेनयाम्येन येष्टयेवामपादकम् ॥२८॥ जानुयुग्मेकरौयुग्म मेतत्तुसङ्कटासनं । भायां पैर और वायां गुठुना भूमि में लगाये और दहिने परसे बायां लपेट ले भार रि दोनों लापों पर देनों राय रक्स सोनी (सकटान कहते हैं। मयूरासन ॥१६॥ घरामवष्टभ्यकरयोस्तखाभ्यां, तत्कूपरेस्थापितनामि पार्श्वम् । उवासनोदण्डवदुत्यितःखे मयूरमेतत्प्रयदन्ति- पीठम् ॥२९॥ दाप के दोनों तटों से भूमि को धारण करे फिर दापकी दोनों गाठियों को नामी के दोनों बगलों में स्थापन करना और देणों से को फैलाय के अंधे भासा में दो की हा भावाश में २ ठाये । पही गपूर भान है.

घण्डमंडिता। ! कुक्कुटासन-॥२०॥ र - । पद्मासनसमासादा जानोरन्तरेकरौ । कूपराभ्यांसमासीनो मञ्जस्य कुक्कुटासनम् ॥३॥ पद्मासन में बैठकर दोनों जंघा और देोगों पिंडुलों के भीधर्मे हाथ को पैठारे और दोनों हाथों की गाड़ियों पर मंच की तरह चठ के बैठे इसी को कुक्कुटासन कहते हैं । कूर्मासन ॥२१॥ गुल्फोचपास्याधी व्युत्क्रमेणसमाहिती । ऋजुकायशिरोग्रीवं कूर्मासनमितीरितं ॥३१॥ दोनों एडियों को अण्डकोप के नीचे सलटके रक्क । शिर और गोवा रुपा देश को सीधे तौर पर रपव इसी को कूर्मासन कहते हैं।' उत्तान कूर्मासन ॥२२॥ कुक्कुटासनबन्धस्यं कराभ्यांतकन्धरम् । १. पीटकूर्मवत्तान मेतदुत्तानकूर्मकम् ॥३२॥ अहिले कुक्कुटामन बाथ से फिर दोनो हाथो से काधा पकड़ के काधे की तरह उत्तान हो जाय, इधी को उत्तान फूर्मासन कहते हैं । उत्तान मण्डूकासन ॥२३॥ भगडूकासनमध्यस्थ कूपराभ्यांतशिरः । एतभेकवदुत्तान मेतदुत्तानमगडकम् ॥३३॥ .

धेरण्डसंहिता। . ॥ FITS T" 1. मंडूकासग में बैठकर हाथों के टिहुनों शिर धारण करके आत्तान हो नावे। इसी का नाम है तताल मंडू वृक्षासन ॥२४॥ वामोरुमूलदेशेच याम्येपादौनिधायतु ।। तिष्ठेत्तुवृक्षवद्भूमौ वृक्षासनमिदंविदुः ॥३४॥ दहिना पांच पाई जांधके मूल भोत जहमें रखे और समानमा से शुज की तरह रहा है। इसी का मुहान जानना। मण्डूकासन ॥२५॥ पादतलौएष्ठदेशे ऽगुप्ठेद्वेचसंस्पृशेत् । जानुयुग्मंपुरस्कृत्य साधयेन्मंडुकासनम् ॥३५॥ दोनो पैर पीठ को और करके सनम दोनों अंगूठे परस्पर एक २ से भिडावे, तथा दोनों जांघ सामने की और से, इसी प्रकार मतकामा , . साधम करे। गरुडासना॥२६॥ जड्डोरुभ्याधरांपीय स्थिरंकायोट्विजानुना। जानूपरिकरंयुग्मं गरुडासनमुच्यते ॥३६॥ देनी जाधो से तथा देगो पिटुलियो में भूमि को दयावे और दोनेा पिंहुनिया पर दोनो हाप रयो । सो गासग हाते हैं। - ३८ धेरामहिता। वृषासन ॥२७॥ याम्यगल्फेपायमूलं घामभागेपदेतरं। विपरोतरएशेदभूमि पासनमिदम्भवेत् ॥३७॥ गुष्य द्वार का दक्षिण एडी के अपर रख के उसी के वाम भाग में मायें गाय को पलटा करके रखे भूमि के सशं करे इसी को षासन कहते हैं । शलभासन ॥२८॥ अधास्यःशेतकरयुग्म अक्षभूमिमवष्टभ्य करयोस्त- लाभ्यां। पादौचान्येच वितस्तिचोर्डम् घदंतिपीठंशल- भंमुनींद्राः ॥३८॥ । नीचे मुह फरक शयन करे । पक्षस्थल में दानों कर स्थापन कर के दानों करतालों से मृत्तिका पका कर दोनों पैर शून्य भाग में बिलस्तभर ऊंचे तरी सी का नाम शमभासन है। मकरासन ॥२९॥ 'अधास्यःशेते हृदयंनिधाय भूमीचपादौ चप्रसार्य: माणौ। शिरश्चत्वाकरदण्डयुग्मे देहाग्निकारंमकारा- सनन्तत् ॥३॥ भूमि में पेटकुन्ना पोट जावे और नीचे मुह करके छातीको भूमि में लगाय से, भार देशनों पैर फैलाय दे। फिर दोनों हाथों से शिर धारण करे । सोको मकरासन कहते हैं ।

३६ घेरण्डसंहिता। उष्ट्रासन ३०। प्रघास्यःशेतेपदयुग्मव्यस्तं, पृष्ठनिघायापिटतंकराभ्याम् । माकुञ्चयेत्सम्यगुदरास्यगाटं, उष्ट्रश्चपीठंयोगिनोबदन्ति ४० अपो बदन शयन करके दोनों पैर उनट के पीठ की भोर लावे। पीछे दोनों हाथों से उन्हीं पैरों को घर के मुह और पेट हुन भाव से सिकोड़ ले. इसी को उष्ट्रासन कहते हैं ।- भुजंगासम। अंगुष्टनाभि पर्यन्त मघो भूमौ.बिनिन्यसेत् । करतताभ्यां घरांकृत्वा, उर्वशीर्ष फणीवहि ॥४॥ देहाग्नि बद्धते नित्यं, सर्व रोग बिनाशनम् । जागर्ति भुजगी देवी साधनात् भुजगासनम् ॥४२॥ पैर के अंगूठे में लेकर नामी पर्यन्त देश की नीधी भोरवाला भाग घरातल में अच्छी तरह स्थापन करके हाथ के दोनों सलों ( पक्षों) से भूमि को भवनम्बन करै भोर सर्प के फन की भांति गिर भागके। उठावे, सो को भुजंगासन कहते हैं। फल। इसके साधन से शरीर को अग्नि दिन २ बढ़ती जाती है। सात्पर्य से लगती है. मन जो कुछ खाया जाता मच्छी तरह से परिपक्व हो कर शरीरको पुष्ठि पहुंचाता है। इसी कारण रोग राशि अर्थात् जिसने रोग इस मामम साधन के पूर्व रोहों सबको - अच्छी तरह

घेण्डसहिता
नष्ट करता है। इसी सामन के अभ्यास करने से भुजगी देवी अर्थात्
कुण्डलिनी शक्ति जाग उठती है। जिसका वृत्तान्त आगे लिखेंगे ।
योगासन ।
उत्तानौचरणौ कृत्वा संस्थाप्य जानुनोपरि ।
आसनोपरि संस्थाप्य उत्तानं कर घुग्मकम् ॥४३॥
पूरकैवायुमाकृष्य नासाय मवलोकयेत् ।
योगासनं भवेदेतत् योगिनां योग साधने ॥४४॥
दोनो पैरो का चित्त कर दोना जाघों के ऊपर सस्थापित कर के
दोनेा कर सत्ताम भाव से आसन के कपर राखे, बाद पूरक प्राणायामके
द्वारा घायु खींच कुम्भक करे अर्थात् जहाँ तक हो। मकै थाभे रहे और
ਚਲ
समय में मासिका का अग्रभाग अवलोकन करै । इमी को योगा.
सन कहते हैं। योग माधन विषय में यह प्रासम योगिया को अवश्य
साधन करना चाहिये।
इति घेरगण्डसहिसाया तोयापदेश ॥ २ ॥
तृतोयोपदेशः
अथ मुद्रा कथनम् (अन मुद्रा कहते है)
महामुद्रा, नभोमुद्रा, उड्डीयानं, जलंधरम् ।
मूलबन्ध महाबन्ध, महावेधश्च, खेचरी ॥१॥

घेरण्डमन्तिा। विपरीतकरी, योनि, वजाणी, शक्तिधारिणी। ताड़ागी, मांडवीमुद्रा, शाम्भवी पञ्चधारणी ॥२॥ अश्विनी, पाशिनी, काकी,मातमीच,भुजङ्गिनी। पञ्चविंशति मुद्राणि, सिदानीह योगिनाम् ॥३॥ घेरगड महाराज ने फिर कहा कि, पहिले है। भुमासन कुण्डलिनी शक्ति के जागने को दान कह पाये हैं उस फुगल लिगी शक्ति भी पाहिमे मिना मुद्रा फुण्डलिनी शक्ति सेई रहती है समलिये पधीय प्रकार की मुद्रा है, उनके नाम ये हैं:- केलागने में • सहपामल में लिखा है कि गुरू के प्रमाद से यह से।ई हुई कुपट- लिगी शक्ति जागती है अन्यथा नहीं, यह कुपहलिनी शनि क्या है उसपर कहते हैं कि देहके अन्तर्गत जाधम हैं सनमें कमनकी पखुरियों के समान माम पेशियां मापस में लकड़ी कमल के फूल की सरह मिकुडी रइसी तथा जहां २ हड्डियों के बाद है वे भी "अस्थिबन्धन" नाम कठोर २ नसे से कहे रहते हैं. इससे जय शरीर में मांश या रक्त मना की श्र. धिकता होती है तो यह शरीर मन के बेग की प्रम में नहीं रहता, जि- चाहिये उघर फेरिये, जिधर चाहिये उघर झुकाइये, जिधर चाहिये अपर गरेडिये, अथवा शीघ्रगति से ही उठाइये बैठाइये. यह नहीं है। उक्ता । परन्तु जब देहको कुण्डलिनीशक्ति जाग नठतोहे से ये सध मान के अधीन हो जाते हैं, जिपर घाहिये फेरिये मरेगरिये उठाइये वै. ठपये, लम्प, सम्प, मोर, मिटिक नही पुर्ती मे हो भक्ते हैं, वह कुराह- लिनी शक्ति यही है कि रग, नश, पेशो मादि की जकड़ बन्दी, उसका जागना यह है कि उन रग, नश, पेशियों की जायन्दी खुल जाये, यह सुलगाही उसका नागना है। .

४२ घरगहमंहिता। १ महामुद्रा. २ नभोमुद्रा ३ नहीयान, ४ जालन्धर, ५ मुल्यबन्ध, ६ महामन्ध, ७ महावेध, ८ रोप्ररी. विपरीतकरी, १० यानि, ११ बलोणी, १२ शक्तिधारिणी, १३ तालागी, १४ मांडवी, १५ शाम्भवी, धारणा मृद्रा पांच प्रकार की है जैसे १ पार्थियोधारणा (१६) २ प्राम्भमा धारणा (९७) ३ धेश्यानती धारणा (१८) ४ घायवी धारणा (१) ५ नमो. धारणा (२०) इसके बाद २१ अश्विनी, २२ पाशिनी, ३ काफी, २४ मातङ्गी २५ भुमहिनी ॥ मुद्रानां पटलं देवि, कथितं तव सन्निधौ । येनविज्ञात मात्रेण, सर्वसिद्धिः प्रजायते ॥४॥ गोपनीयं सयत्नेन न देयं यस्य कस्यचित् । प्रीतिदं योगिनां चैव, दुर्लभं मरुतामपि ॥५॥ श्री महादेय जी पार्यती जी से कहते हैं कि हे देवि! तुम्हारे निकट सब मुद्राओ का नाम हमने कहा । इनके जान लेगे ही मे सन्न , लिखा है कि वह कुपानिनी शशि ग्रल्ल रंध्र की ओर गोती है, तात्पर्य यह है कि वृदय फमन जिसको कलेजा कहतह उससे सब नादियां निकल कर ममस्त शरीर में व्याप्त है और उनकी दौड म- स्तिष्क की शोर है, नहा कहीं घटा लगता है तो यह लाहट बिजुली की शक्ति से भी शीघ्र मस्तिष्क में पहुंच कर मुख दुख बोध करती हैं। परनु जब तक उन रग, नश, नाही, पेशो आदि शरीर के टुकडे अलग २ शक्ति कारक नहीं होते तर तो मानसिक यत्ति की स्थिति स्यापकता मही जाती और इमोसे पढ़ लिप कर जान होने पर भी वित्त पति का निरोध जो योग का प्रथम लक्षण है नहीं प्राप्त होता। इसी लिये हठ योग द्वारा उस कुदलिनी शक्ति को गाना उचित है, इससे सामन मुद्रा आदि प्रयोग करना आवश्यक है ॥

धेरण्डस हिसा। ४३ प्रकार की सिद्धियां लाम होती हैं। ये मम विषय परम गोपनीय है। जिस किसी को कमी नहीं देना चाहिये ( पोंकि बिना प्रतिज्ञा ये साधित हो नहीं सक्त, धञ्चव'जन देाषित करेंगे, न वन पटेगा तो इस विद्या को झूठी कह कर दूढ प्रसिजो का भी मन भडकाय देंगे, थोड़े दिन बाद यह विद्या लोप नायगी ) ये सब मुद्रा योगियों को दी परम प्रीति देनेवाली हैं । यह मुद्गा देवताओं को भी दुर्लभ हैं । तात्पर्य पह कि जो कोई साधन करेगा उसी को मपत्ति है, दिल्हो को कभी मयस्सर नहीं है। महा मुद्रा। पायुमूलंबामगुल्फे संपीडबदृढयत्नतः । याम्यपादप्रसार्यांथ करेतपदांगुलः ॥६॥ कंठसंकोचनंकृत्वा भुवोर्मध्यनिरीक्षयेत् । महामुद्राभिधामुद्रा कथ्यतेचैवसूरिभः ॥७॥ गुदा मुल को पाईएडीसे सूम मजपूती पो साथ दयावे और दहिने पैर के मेलाप दे। और हाथ से पैर की अंगुली धरै, फिर कंठ को संकुचित करके भौहों के मध्य भाग को देशै । इसी को पपिडत गण महामुद्रा नाम से पुकारते हैं । इसका फल । क्षयकासंगुदावर्त प्लीहाजीर्णज्वरन्तथा । नाशयेत्सर्वरोगांश्च महामुद्रातिसेवनात् ॥८॥ उपरोक्त मामुद्रा को अधिक सेवन करने से अर्थात् अभ्यास करने मे, क्षय कास, (क्षयो की सांसमो) गुदायत (गुदा के चारों ओर वाले वज) ४४ घेण्डमंहिता। लोहा ( पिलई ) जीर्ण ज्वर (पुरामा ज्वर) तथा भोर २ सय प्रकार रोगो को यह महामुद्रा नाश करती है । नभोमुद्रा। यत्रयस्थितेयोगी सर्वकार्यपुसर्वदा । ऊर्द्ध जिहःस्थिराभूत्वा धारयेत्पवनंसदा । नभीमुद्राभवेदेपा योगिनांयोगनाशिनी ॥९॥ जय जय योगी किसी कार्य में लगे तय २ सर्बदा ही कपर की ओर जिहा करके कुम्भक द्वारा स्थिर हा पवन को धारण किया करे, यह अभ्यास गदा रखने से योगिया के समस्त रोग नष्ट हुमा करते हैं, इसी को नभी मुद्रा कहते हैं । सात्पर्य यह कि हर काम में हर प्रकार की गुण ऐगुणकारी हवा शापही गुण औगुणकारी रही भाती है। यदि इस नभोमुद्रा का अभ्यास रहेगा तो झट पुम्भा के द्वारा, बाहर को हवा का प्राना बन्द कर देगा तो मलीन दुर्गन्धित तथा विकारी हया पेट के भीतर न जा सकेगी। गो की नत्पत्ति अकसर सुधा के माप जहरीले रेशो के पेट में पाने से हुमा करती है सो देशकाल देख तरसे तो बहुत ही अनाव हुभा रैगर ॥ उड्डीयानबन्ध । उदरेपश्चिमंतानं नाभेरूद्धन्तुकारयेत् । उड्डीयानकुरुतेयत् तदविथातंमपाखग. ॥ उड्डोयानन्त्यसौवन्धो भृत्युमातह केशरी ॥३॥ नाही का ऊपरी भाग और पश्चिम द्वार को सदर के मग भाव में सिकोडना चाहिये । भर्षात् उदर को मध्यम भागस्य गुह्यादि पर स्थित धेरण्डेसहिता। ४५ माली समूह को मामी के ऊपर सिकार के उठाना चाहिये, इसी को अड्डोपामवन्ध कहते हैं, यह उड्डीयानन्य मृत्यु के लिये मातंग और केशरी भाव से हैं. अर्थात् मृत्यु रूपी दापी को यह सिंह की तरह मारहालता है, तात्पर्य यह कि मृत्यु इसके साधन से जल्द नहीं हो सकी । उड्डीयान बंध का विशेष फल । समग्रात्बन्धनात् तत् उड्डीयानंविशिष्यते । उड्डीयानेसमभ्यस्तेमुक्ति स्वाभाविकीभवेत् ॥११॥ जिसने मुद्रा सन्य कहे गये हैं सब में यह उड्डीमान मन्त्र विशेष भपात उत्तम है। उड्डीयान यन्त्र के अभ्यास से, भारही माप मुक्ति मास हेन्सी है, अर्थात् और बहुत मानसिक व्यापारों को भरवश्यकता नहीं रहती। तात्पर्य यह कि इसके साधन से सदसत् का जान स्वभाव बढ़ता शिव संहिता में इस मुद्रा का फान यह लिखा है कि योगी स को प्रतिदिन चार वार करता है उसके नाभी का प्रवन शुद्ध हो जाता है । इसी प्रकार छः महीना अभ्यास करने से मृत्यु को जीत लेता है। भात वपके उदर की अनि मञ्चलित होती है और जो कुछ खासा है | यह सब भस्म हे के रस यानी (समसार की वृद्धि करता है और रोगों को नष्ट कर डालता है, फिर दत्तात्रयी जी की महिता में भी लिखा है कि जो लोग अत्यन्त युष्टे हेगये हैं और इस उट्ठोयानबंध का अभ्यास करें तो युवा है। सके हैं और छः महीमा प्रतिदिन करने से मृत्यु का जीत सके हैं। इस भय पोग अन्य से साफ मालुम होता है कि यैद्यक शास्त्र से और योग शास्त्र से बहुतही सम्बन्ध है, सभी निमित हमारे भारत ४६ घेण्डमहिता फा वैद्यक स्वाश सघ देश के वैद्यक से नत्तम था, परन्तु अब इस समय भानमी लोगों ने मप नष्ट करहाला, मिर्फ विदेशी चिकित्सा के आधीन हो गये। . जालंधर बंध। कगठसंकोचनंकृत्वा चिबुकंहृदयेन्यसेत् । जालन्धरेकृतेबंधे पोड़शाधारवन्धनम् ॥१२॥ जालन्धरंमहामुद्रा मृत्योश्चक्षयकारिणी । कण्ठ सद्बोधन करने पदय (छासी) पर घिधुक (घाटी) रसनेही से जालन्धर बन्घ कहा जाता है. इसके माधन करो से सोलह प्रकार के भापर पन्ध हुप्रा करते हैं, और यह मृत्यु को भी नष्ट करहालता है । जालंधर वन्ध का फल । सिटुंजालन्धरंबंध योगिनांसिद्धिदायकं । पण्मासमभ्यस्येत् योहिससिद्धोनात्रसंशयः ॥१३॥ यह नालंधर यंप स्वयं सिद्ध है। यह योगियो को सिद्धि देनेयाला है। युद्धिमान छः महीमा रमका सम्पाम करता है यह अयश्य सिद्ध हो जाता है, ममें सराय नहीं है। गिय महिता में निमामि भाउजर पंधको माग कर माधव मोके द्वारा शरीरस्थ महसूदन काल में अमन के नीचे की भोर कतार पान कर मना रे मोर अगर पद प्रांत ऐमा पदपा भाता है। शव पह है कि दय में एयाम ऐमारे मृत्यु कभी न मिले, यह सपा में कमल की तहरीर तग की घेण्डमश्तिा। ७४ - मसे पेशियां भी कमल दल की तरह हैं। वे पेशियां हजारसे भी अधिक होगी। भामाशय से जब भोजन की वस्तु का रस रक्त अन के जाताहे तेर पहिले वहीं जमा होकर नाड़ियों के द्वारा शरीर में व्याप्त होता है, स मुद्रा से नाड़ियां तन कर पंच्छ छोह.सार भाग को ध्यास का रोग नष्ट करती है। सूलबन्ध । पार्णिनात्रामपादस्य योनिमाञ्चयेत्ततः । नाभिग्रन्धिमेरुदण्डं सम्पीडंय यत्नतःसुधीः ॥१४॥ मेद् दक्षिण गुल्फेतु दृढ़वन्ध समाचरेत् । जराबिनाशिनी मुद्रा, मूलबन्धो निगद्यते ॥१५॥ थायें पैर की एडी से गुदा प्रदेश को मिकोड़े जमके बाद नाभी की यि हो मेरुदण्ड (कमर के पीछे की हड्डी) से दयावे और अपस्य को दहिने एही में मयूत दया के रासे. इसी को मूलमन्ध कहते हैं। यह मुद्रा बुढ़ाई को मष्ट फर हालती है। मूलवन्ध का फल । संसार सागरं तर्नु मभिलपति यः पुमान् । घिरलेपुगुप्तीभूत्वा, मुद्रामेनां समभ्यरोत् ॥१६॥ अभ्यासावधनस्यास्य मरुत्सिद्धिर्भवेध्रुवम्। साढयेद्यत्नतत्तर्हि मौनी तु विजितालसः ॥१७॥ जो मनुष्य मेंमार मागर पार होने को टा करें ये घिरा श्याम (निन ) में गुप्त भाप में इस मुद्रा का अभ्यास करें। म पनाम .

४८ + घेण्डसंहिता। अभ्यास से निश्चय मरु सिद्धि ( वायु को बाथ) कर सक्ते हैं। इससे साधक प्रालस्य पोो परित्याग करके मोम हो यत्र पूर्वक इसको , साधन तात्पर्य यह है कि जब बायु काबू हो जायगा तब यह साधक जण पूरी तौर से बायु को गरीर में भर के कुम्भक प्राणायाम से अपने पौरुष को भी सचानन करेगा तो जहा इच्छा है। वहां उड़ सक्ता है। इसी साधना से बहुतेरे हाथ दो हाथ ऊंची जमीन से निराधार उठ जाया करते हैं। महाबन्ध। बाम पादस्य गुल्फेतु पायुमानं निरोधयेत् । दक्षपादेन तद्गल्र्फ सम्पोडय यत्नतः सुधीः ॥१८॥ शनैःशनैश्यालयेत्पाणिं योनिमाकुञ्चयेच्छनैः। जालंधरे धारयेत्प्राणं, महाबन्धीनिगदपते ॥१९॥ यायें गुरुफ (एक) से गुदा द्वार को रोक लेना और दहिने पैर से | यायें को दावते हुये घोरे २ गुह्य देश को चलाये और धीरे २ उसी गुह्य | देग को सिकाहे । और जालपर घम्ध जो कह भाये हैं उसके द्वारा माछ पायु को धारण करे। इसी को नहायग्ध कहते हैं । महावन्ध का फल । महामन्यः परोवन्धो जरामरण नाशनः । प्रसादादस्य अन्धस्य साधयेत्सर्व वांछितम् ॥२०॥ पद महाप नागकी मुद्रा संभ गुद्राभोमे श्रेष्ठ और जरा (खुला) घग्गडसंहिता। - तया मरण नाश करने वाली है।म महायन्य के प्रसाद से स प्रकार के वाञ्छित माधे गाम है ॥ महावेध कथन। रूपयौवनलावण्यं नारीणांपुरुपंत्रिना। मूलबंधमहाबंधौ महावेधविनातथा ॥२॥ महायन्धं समासाद्य उड्डोनकुम्भकंचरेत् । महावेधःसमास्याता योगिनोसिद्धिदायकः ॥२२॥ मे पुरुष के पिता नारियों का सुन्दर प. जवानो रापा मारण्य (लोनाई) निष्फल रहती है। वैभाही महावेध मुद्रा के बिगा मूमन मान्य सपा महाबन्ध भी किमी काम के नहीं रहते। पहिने महापंध मुद्रा करे फिर बडीयान यन्ध (जो कह पाये हैं) मुद्रा करके कुम्भक प्राणायाम मे घायु को निराध करने ही से महायेध मुद्रा कही जाती है । इसी महा- बेघ द्वारा योगी लोग मिद्धि काम किया करते हैं। महावेध का फल। महाबन्धमूलबन्धी महावेधसमन्विती। प्रत्यहंकुरुतेयस्तु सयोगीयोगविनमः ॥२३॥ नमृत्युताभयंत्तस्य नजरातस्यविनते। गोपनीयःप्रयत्नेन बेधोयंयोगिपुंगवः ॥२४॥ तो मा प्रतिदिगम महामेष के मरिस पर मीर पुन का पापन किया करते हो योनियो में बता पेग विद्या जागे . . M घेरण्डमंहिता। वाले कहे जामक्ते हैं । मृत्यु और बुढ़ाई उनको कभी नहीं दबाय सकी यह मुद्रा परम गोपनीय है योगियों में श्रेष्ट जन इसको हर किसी से नहीं कहते ॥ खेचरी मुद्रा। जिहाधोनादींसंछिन्नां रसनांचालयेत्सदा । दोहयेन्नवनीतेन-लौहयंत्रेणकर्पयेत् ॥२५॥ एवंनित्यंसमभ्यासाल्लम्बिका दीर्घतांव्रजेत् । यावद्गच्छेद्भवोर्मध्ये तथागच्छतिखेचरी ॥२६॥ रसनांतालुमध्येतु शनैःशनैःप्रवेशयेत् । कपालकुहरेजिहा प्रविष्टाविपरीतगा। भुवोर्मध्येगतादृष्टि मुंद्राभवतिखेचरी ॥७॥ जिला के नीचे nिgण और जिला हम दोनों को जो नाही ना? रहती है उसको काट देये और नित्यही निहा के मयं भाग निहार नीचे, सदा चलाया करे । और जीभ के। नवनीत (मेनू) से दुहा को गौर नाद को मिला लेखमी (निमटा) द्वारा सीना करे। मी प्रकार प्रति- दिन करने मे, जीभ उंगी हो जाती है। क्रम में प्रायास करते २ जीभ म प्रकार संगो करे जिस्म नि यह दोनों भौहों के घोच तक ९ गा। फिर भी जीम को कम से तनु के योच से जाना चाहिये । नानु प्रदेश अध्याय र.( गदा का पाल कुहर कहते हैं। जीभ सो सपान कार में हर को मोर नट येशित कर दो भौर का मध्ययन अवलोकन करे. समको रोनरी मुद्रा कहते हैं ।

घेरण्डसंहिता।
५१
खेचरी मुद्रा का फल ।
नचमूर्छा क्षुधाटप्णा नैवालस्यं प्रजायते ।
नं च रोगो जरा मृत्यु दैवदेहः स जायते ॥२८॥
अनुष्य इस रोचरी मुद्रा का साधम किया करते हैं उनकी मूछो,
क्षुधा, कृष्णा, कभी नहीं लेश दे सके, और न कभी नालस्य आधे, न रोग
निकट पावै, और उनके समीप बुढ़ाई, था मृत्यु कमी नहीं मा सत्ती,
मोर वे देव देह हालाते हैं। और भी:-
नाग्निना दहाते गात्रं, न शोपयति मारुतः ।
न देहं लेदयन्त्यापो दंशयेन्न भुजंगमः ॥२९॥
जो खेचरी मुद्रा काम्यास करते हैं, उनको मारिन नहीं जलाय
उक्ती, वायु उसको नहीं सुखाय सक्त । जल उसके शरीर को धुलाय नहीं
सक्के । तथा तमसा सर्प भी नहीं काट सक्त ।
विपरीतकरी मुद्रा।
नामिनूले यसेत्सूर्य स्तालुमूले च चन्द्रमाः ।
प्रमृतं ग्रसतेसृर्य स्ततोमृत्यु चशीनरः ॥३०॥
ऊर्चेच गमयेत्सूर्य चन्द्रञ्च अध प्रानयेत् ।
घिपरीतकरी मुद्रा सर्चतन्त्रेषु गीपिता ॥३१॥
भूमौ शिरश्न संस्थाप्य करयुग्म, समाहितः ।
ऊर्ध्वपादः शिरोभूत्वा विपरीतकरीमता ॥३२॥

५२ घेराडसहिता। नाभि की जस में सूर्य्य (सूयं गाही) मास करते हैं और मुखके त लुये की जह में गन्द्रमा (चन्द्र नाड़ी) है जब नीचे से सूर्य्य अपने तेत्र को सार्पण से देह स्थित अमृत की ग्राम कर लेते हैं, तब मनुष्य मृत्यु यस हो जाता है। एम लिये ऊपर की ओर मूर्य को उठाना चाहिये और नीचे की मोर चन्द्रमा को ले भाना चाहिये । इसी का नाम विपरीतकरी मुद्रा जो सय तन्त्रों में गुप्त रक्खी गई है। इसकी क्रिया इस प्रकार है-भूमि ने शिर के स्थापन करें और दोनों हायों से भूमि थाम कर पैरों को ऊपर की ओर उठाय के सीधा सपा करे और पूरा प्राणायाम से वायु सींच कर कुम्भक के द्वारा जहा तफ टहरा जाये टहरे। इसी को विपरीतफरी मुद्रा कहते हैं । तात्पर्य-नाभि में एक नाही ऐमी है जिसको जठराग्नि उत्तेजक कहते हैं अर्थात् हृदय के पास जो पित्तस्राय नाही? उससे बड़ा गरम २ पित्त थाहा २ बरकर उमी मही के द्वारा जा कर भामाशय के मन को पकाता है और यहां से जान म निकल कर भात रस बाहक नामी के द्वारा पमस्त शरीर में पहुंचता है. परन्तु जय पित्त रस अधिक प्रवाहित हो कर उस नारी में जाता है तब पित्त कापित हुआ कहा जाता। मात पित्त की रतनी अधिकाई जाती है कि गौर के समस्त रह की भरग कर हानता है और मन रम की शक्ति को दूषित करके अनेक प्रकार की पेत्तिक व्याधिया उत्पन्न करता है. पिर ठम व्याधियों में म. मुष्य बहुत जल्द मर जाता है, इस क्रिया के निवारण के वास्ते यह विपरीतकरीमुद्रा का, यानी गिर नीचे करफे उपरकी भोर पर उठाय के प्रति दिन घंटे | पंटे जहा तक ठहर भर दिया करे तो यह पित्त रमन मधिकार में नामि की जड़ वालो नाकी में जाके विकार उत्पन्न किया करता पद नहीं हाथ, मांद यद पित्त र नसीय पदाधे है, घेरसहित) १३ जल की गति नीचे की ओर से नीचे तालु नाहीको ओर भाकर कफ को माडी लिसे चन्द्र नाही कहते हैं भाकर मिलेगा तो लेद (खिखार) बनके दन्तधायम आदि क्रिपामो से निकल जाया करेगा, बस शरीर नोरोग रह कर दीर्घायु प्राप्त करेगा। नक्सर जब पित्त कोप करता है तब नाभि के पास टटोलने से भाग की तरह जलता है. मून गरम और लाल होता है, तमाम बदन मोरसकर पोहा करता है, पैतिक ज्वर हाने से दाह, (बालग) वृषा (प्याम) भादि तेजमय उपद्रव शरीर भर में हो जाते है योगी लोग इन सम उपद्रयो से साफ बचे रहते हैं। विपरीतकरी मुद्रा का फल । मुद्रेयं साधयेन्नित्यं जरां मृत्यु च नाशयेत् । ससिद्धः सर्वलोकेषु प्रलयेपिान सीदति ॥३३॥ जा गनुष्य इस मुद्राको प्रतिदिन साधन करता है, वह जरा (धुढाई) और मरण से बचा रहता है, फिर वह सब लोको में सिद्ध हो जाता है भौर प्रहाय होने पर भी अभय रहता है, नहीं माता, अथ योनि मुद्रा। सिद्धासनं समासादर कर्णचक्षुर्नसेोमुखम् । अंगुष्टतर्जनीमध्यानामादिभिश्वसाधयेत् ॥३४॥ काकीमि. प्राणंसकृष्य अपाने योजयेत्ततः पट्चकामिकमायात्वा हुं, इस., मनुनासुधीः॥३५॥ चैतन्य मानये देवी निंट्रिताया भुजगिनी ।

५४ घेण्डसंहिता जीवेन सहितां शक्ति समुत्थाप्य करांजे ॥३६॥ ! शक्तिमयः स्वयं भूत्वा परंशिवेन संगमम् । नानासुखं विहारं च, चिन्तयेत्परमं सुखम् ॥३७॥ शिवशक्तिसमायोगा देकान्तं भुविभावयेत् । आनन्दंचस्वयंभूत्वा अहंब्रह्मति सम्भवेत् ॥३८॥ योनिमुद्रा परागोप्या देवानामपि दुर्लभा । सकृत्तुलाभ संसिद्धिः समाधिस्थः स एवहि ॥३९॥ प्रपम मिद्वासन (जो पहिले कह पाये है) से बैठे, फिर कान, मांस, नाक, मुंह ये चार द्वारों को अंगूठे.. राजनी, मध्यमा, अनामिका इनमें गुलियों मे दांप ले । अर्थात् कान के दोनों छेदों को दोनों अंगूठों से, दोनों मांखों के दोनों तर्जनी मे, दोनों नाक के छेदों को दोनों मध्यमा | से, मुख को दोनों अनामिका से दायै । फिर काकी मुद्रा से प्राण वायु को माकर्षण करे और फिर सन्चे अपान वायु (अधोधायु) में मिलाप दे माद शरीरस्य जो छः पहें नमका ध्यान करै अर्थात् यह कल्पना करे मामे हम उन्हें देख रहे हैं नमी समय में "" और "हंसः" इन दो मंत्रों के द्वारा भुजंगिनी रूप कुप लिमी देयी को जगावै । तपा की- वात्मा सहित नमकुमाणिनी की मस्तार काल में उठाय के ले जावे. मोर.यह मापन स प्रकार चिन्ता कर माना "मैं शक्तिमय होकर शिव के माप प्रसंग में भामताते हुये परम भागन्द भोग और बिहार का रता तथा शिव लिग से महों मानन्द भय ग्रस्त हूं" हमी कोपोनि मुद्रा कहते हैं, पर मुद्रा परम गोपनीय है यह देवता भी दुलंग है हम मुद्रा को एक बार भी कई माधम करत साधनेवाला पुरुष मिद का नाता है, इसके द्वारा बहुत हो जल्द समाधि प्राप्त है। मत्ती समके ५५ घेरण्डसंहिता। तात्पर्य यह कि-मनुष्य जिस वस्तु का क्याप जी लगा कर करे वही वस्तु उसके मनोत्ति में दृढ बद्ध हो जाती है. यदि यनुष्य गत दिन दुःख की कपा, दुःख को बार्ता, की प्रालोचना चिन्ता करता रहे तो वह दुःख उसके तन मन में विधा रहता है. परतु पदि मनुष्य निरंतर मुख की ओर मन को लगाये रहे तो उस के समीप मदाही मुख रूपवान सा बना रहता है. इसीलिये योगी लोग दुःख की जगह भी सुखही ध्यान किया करते हैं। योग शमत्र का यष्ट सिद्ध न्त है कि सुख दुःख समान मानना, परतु यह बात बिना प्रभ्यास नहीं हो सक्ती, घेरंड महाराज ने सब मुद्राओं को शारीरक दुःग्व निवृत्ति के लिये कहा है परन्तु समको मानसिक दु स निवृत्ति के लिये बताया है । - याम करते २ जब इस प्रकार की शक्ति है। जावे कि चित्त वृत्ति जिस में लगावे उसी में चुभी रहे अन्यत्र न टलें तो ममाधि मिद्ध हो गई । बस सब से बढ़ कर चित्त वृत्ति निरोध के अभ्यास को पढ़ाने वाली यह योनि मुद्रा है। शिव संहिता आदि ग्रन्थों में इस योनि मुद्रा को दूसरे प्रकार से कहा है परंतु वह इस घेरंड महाराज की दर्शाई हुई योनि मुद्रा के | तुरूप शीघ्र फलदायक नहीं है। यहां इस प्रकार लिखा है-प्रथम मन को पूरक योग से अपने मूलाधार पन्न के सहित पूरण करै वाद योनिस्यान (गुदा और लिंग के बीच के स्थान को योनि स्थान कहते हैं) को पैरो से सिकोड कर भगाकार बनाये। उसी समय में नम ब्रह्मयोनि में कामदेव को ध्यान कर, वह कामदेव जब पुष्प की तरह लाम्न वर्ण कोटि सूर्य की तरह तेज, कोटि चन्द्रमाकी भाति शीतन है यह भी चिन्ता करे, फिर कपर परमाशक्ति को भी इसी प्रकार पान करै कि मानों के शक्ति भग्निशिखा की तरह, सूक्ष्म रूप, चैतन्य भाब हैं और वे परमात्मा के भहित एकत हो मिली हैं। इस प्रकार ध्यान करना होगा फिर पाणायाम के बल से न्यून, सूक्ष्म और कारण इन तीन प्रकार के मन बायु धा ६ घेरण्डसंहिता। - पषों से युक्त जीवात्मा कुंडलिनी शक्ति के सहित सुपुम्ना के छेद हो। ग्रा मार्ग में जाता है । शिर के मध्य में ओ नीचे मुख कमल है नसको कर्णिका के भीतर कुण्डलिनी शक्ति परमात्मा के साथ सङ्गम में प्राम हो रही है उसके संगम मे पाटल वर्ण (कुछ सफेदी लिये पीला) तेजवान् मानन्द भय अमृत की धारा बहती है। जीवात्मा योग बल से मूलाधार | के ऊपर हे के उठ कर समी बहते हुये अमृत को पान करता है । मी प्रकार फिर माप नीचे की तरफ निकल के मूलाधारमें स्थित ब्रह्मयोनि में प्राकर प्रवेश करे। इसी प्रकार साधक जीवात्मा को ब्रह्मयोनि में निकाल पैठार रूपी प्राणायाम की मात्रा युक्त करे। इमी प्रकार प्राणा याप तीन बार करना चाहिये । मूलाधार पद्म में ब्रह्मयोनि में प्राप्त कुपहलिगो परमात्मा की प्राण भूपिणी हो रही हैं। हमी प्रकार मिकाल | पैठार के बाद फिर भी यही जीयात्मा कालाग्नि प्रादि शिवात्मक ब्रह्म योनि में गय प्राप्त होता है, उसी प्रकार चिन्ता करै । हमी को योनि मुद्रा कहते हैं । यह मुद्रा जिसनी मुद्रा है सघ में प्रधान है । इसके प्रभाय मे साधक समस्त कर्म अच्छी तरह से मिद्ध कर सका है। इन सत्र यातों का गून तात्पर्य यह है कि श्याम के रोकने के सहित भामसिक | वृत्ति के जिर तरफ लगाये उसी तरफ यह लग कर उसी प्रकार का छग्य दुःप अनुभव करेगा । भाप अपने मन को यदि पूरी तौर से म कएपगा में लगायें कि हम नर्क फुण्ड में हुोये जा रहे हैं, हमें लोहे के साप्त भे में कोई निपकाप रहा है तो यही दुःए साक्षात् होगा, पदि पन्द्रामन पर पेटे देव लोक को माम्राज भोग रहे हैं ऐसी कल्पना की. जियेगा हो वही मुग प्राप्त होगा। मी मिमित्त माममिक स्थिति के अपाम के लिये इट योगोपेड महाराज ने सत्ता समझ कर ऐसी देमी प्रिपा मिद्धकी एं। - धेरगड संहिता। ५७ योनिमुना का फल । ब्रह्महा भूणहा चैव सुरापी गुरुतल्पगः । एतैः पापैन लिप्येत योनिमुद्रा निबन्धनात् ॥४०॥ थानिपापानिघोराणि, उपपापानि यानिच । तानिसर्वाणिनश्यन्ति योनिमुद्गानिवन्धनात् ॥23॥ तस्मादभ्यसनं कुर्या दशदि मुक्तिसमिच्छति । जो जन योनिमुद्रा माधन करते है,वे.यदि ब्रह्मधात भी पार चुलेही वा याल घात कर चुके है। अपवा सुरा पान करते २ पिाठक हे गये हो, या गुरुपक्षी के साथ पापाचरण कर चुके हैं तो भी इनके महापापो सेलिप्त नहीं होते। और भी जो २ व २ भयानक महा पाप हैं, या जितने उप पाप हैं वे भी सब इस योनिमुद्रा के निवन्धन से नष्ट हो जाते हैं, इसमे यदि | कोई मुक्ति की इच्छा परें तो वह योनिमुद्रा का अम्पास जरूर करे ॥ तात्पर्य-ब्रह्मपात प्रादि पाप से छूटने का जहां कदी फस्न माता है यहां भक्तर लोग शङ्का कर बैठते हैं कि यह तो और भी पाप का बढ़ाना दादरा यानी रोशर पाप करे और रोजर योनिमुद्र आदि कर्म साधन करो तो भी पाप नहीं लगेगा, यस गानो पार करने के लिये पण अभय मार्ग ठहराया गया । विवेचना-देनों रूपरके लोक में लिया कि 'एत: पापिनलियित" अर्थात् न पाणे से लिप्त न हो। से। निष्ट होने का या तात्यो है? जिस कहते हैं कि रात दिन मोमें माघ धाम मे लिपटा रहे, मात् राणा रहे. परन्तु जी शक्त पोनि मुद्रा का अभ्याम करेगा यह कदाचित् ब्रह्म हत्या गुरु पत्री घेग्गडमंहिता। प्रसङ्ग मादि पापों में लिप्त भर्षास् मन बच कम से रात दिन लगा भी हो तो इस मानन्द की क्रिया में लगने से फिर उसको उधर के पापों के करने की फुरसत नहीं रह जावेगी। आप जानते हैं कि एक तुच्छ वात चौपड शतरंज का खेल है जिसमें कोई भी फल नहीं परन्तु जय मनुष्य का चित्त नघर लग जाता है तो रोटी खाना तक नहीं अच्छा लगता और यहां तक देखा गया है कि शाम से सेलने बैठे और मधेरा होगया, | सूर्य उदय हो पाये, निद्रा का सुस भस्मीभूत कर, प्रिय समागम में तिलाञ्जलि दे पी-बारा-पह छकरी-कर रहे हैं, तो यदि योग की क्रिया | में मन लग जाये तो कहिये फिर यह लिप्तता जोकि दिन रात भयानक पापों की प्रोर तुझे ममान दौरता हुभा मन विभाग नहीं पाता पा क्यों कर रह सकता है ? अर्थात् योनिमुद्रा के मद्भुत सुख की साधना से ये सब भूल नायगे गौर यह मूढ़ चित्त उन सब महा पापों से तथा उप पापों से प्रगापास यप कर विशुद्धता लाभ करेगा, इसीसे श्लोक में एक पद लिखा है कि "योगि मुद्रा नियन्धनात्" अर्थात् योनिमुद्रा साधन यन्धन से। तात्पर्य यह कि यामिमुद्रा का साधन उसको बान्धे रहेगा कि सी प्रकार उक्त महापातक तथा उप पासकों के निकट नहीं जानेपाधेिगा, इससे यह सिद्ध भया कि फा के लिसने याले घेरगड महाराज ने मिथ्या नाही लिया, जे शक्त माघग करेगा यह भयश्य मय पापों से मुक्त है। मिति माय को प्राप्त शेगा, अन्त में मुक नाम करेगा। घेरए जी ने माफ किया है कि जो मुहिम को ध्या करें अर्थात् यदि चाहे कि हा मन्त्र पापों मे टूट येही हम मुद्रा का सम्पास करें, तात्पर्य यह कि दूगरे से भदोह। मफेगा। वज़ोणीमुद्रा। घरामवष्टभ्यकरयोस्तलाभ्यां ऊदक्षिपेत्पादयुगंशिरःखे । शक्तिमनोधायधिरजीयनाय वजोणिमुद्रांमुनयाघदन्ति ४२ ५८ घेरण्डहिता। दोनों हाथों की गदारी से धरातल को पकह २ दामो पावों को ऊपर उठाय दे और उधर गिर भी आकाश में उठाय दे केवल हाथ के बल खदारहै, इसीको मुनिलोग बजोणीमुद्रा कहते हैं, इसके अभ्यास से शरीर की शक्ति (ताकत) बढ़ती है और यहुत दिन तक जो सका है। वजोणीमुद्रा का विशेष फल । प्रयंयोगोयोगश्रेष्ठो योगिनांमुक्तिकारणम् । 'अयंहितप्रदायोगी योगिनांसिटुंदायकः ॥३॥ एतद्योगप्रसादेन विन्दुसिद्धिर्भवेदध्रुवम् सिद्धेविन्दौमहायत्ने किंनसिध्यतिमूतले ॥४४॥ भोगेनमहतायुक्तो यदिमुद्रांसमाचरेत् । तथापिसकलासिद्धि स्तस्यभवतिनिश्चितम् ॥४५॥ - - यह मुद्रा साधन रूप योग सम योगों से श्रेष्ठ है और योगियों के मुक्ति का कारण है. फिर यह योग अत्यना हित का देनेवाला है, तथा योगियों को सब प्रकार सिद्धि दायक है ॥ इसी योग के प्रसाद से बिन्दु की सिद्धि हो जाती है अर्थात् इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर रक्षित कामदेव किसी प्रकार बूंदी के द्वारा नहीं कर सका (रक्षित कामदेव भी मूत्र के सग, वा स्वप्नादि दोष से कभी कर जाता है वह इसके अभ्यास से बंधा रहता है) जब इस प्रकार के महा यन से बिन्दु सिद्ध हो जाता है अर्थात् शरीर में कामदेव बैंघ जाता है तब भूतन में कौनसी बात है तो सिद्ध न हो नावे ? अर्थात् सब सिद्धि प्राप्त हो सकी है योनि कामदेव ही शरीर का राजा है। जब शरीर में कान्ति मा जावेगी तब उसको देख कर लेग्गा का चित्त घेरण्डसहिता। माकर्षित होगा, स्नेह के स्थान पर स्नेह, भय के स्थान पर भय, मनोरण के स्थान पर मनोरथ सिद्धि जान कर लोग वशीभूत हो जायेंगे । समस्त यढे २ भेागो से युक्त पुरुष भी यदि इस मुद्रा का म पास करे तो सय प्रकार की सिद्धियां निश्चय करके उसको प्राप्त होती हैं। भर्यात् धनधान्य कुटुम्बादि नाना विभव रहते महात्मापन उसमें नहीं भा सक्ता, वह भी यहुत मी बातों को आकाक्षा से महा दरिद्र साधु सन्त फकीर वगैरा के मुह की भोर ताका करता है, सो इसके साधन से यह यात न होकर इसी भोर भी बड़े २ यिभय धारी ताका करेंगे । शक्तिचालनी सुता । मूलाधारेशात्मशक्तिः कण्डलीपरदेवता । शयितानुजगाकारा साईत्रिबलयान्विता ॥१६॥ यावत्सानिद्रितादेहे ताबज्जीवःपशुर्यथा । ज्ञाननजायतेतावत् कोटियागंसमभ्यसेत् ॥४॥ मूलाधार में भारम शक्ति (परमात्मा की ताकत) सब से परे देवता दुपहलिनी (जिमका पयाम पोटे का साये १) सर्प की तरह साढ़े तीग मपेटे.फी गुंदरी याधे मे। रदी थे। जय का यह देश में मोती रहतीनवीय पशु की तरह मान बना रहता है, मत् अमात् कुछ भी नहीं जान पष्टता तय तर चाहे कोटि प्रकार पोगायोग कभी मचा शाम नहीं कीगा। भात समे पशु भी पामलो कर पत्थर के गाने में विचार रहनाई मही पर तिमाही मात्र रहता है: पितु ठमके रूपर ४ गार योगी न नाददाता परिमे १६ नुएको मालुम नहीं पड़ेगा कि पह येसा मेरी घिरगड संहिता। पीठ पर प्राने से कष्ट दायक होगा इसे लादनेवाले को इसारो से रोश भके बल्कि लाद देने पर जय नहीं चल सकेगा तर येठ जावेगा, मार खायगा, नाना प्रकार की दुर्दशा भोगेगा । उधर लादनेवाला भी मिना उसकी गहमाई की वेदना जान उसको गरिमार समाज के गारते २ एक बार ऐसा मारा कि वह पशु पर गया, भन्त, उघर पशु अपनी प्रज्ञानता से दुःख पाय प्राण त्याग किया । इधर वह लादने वाला मनुष्य मी भ- पने काम कामी यशु से हाय थे। बैठा, निशको हानि किया और जयर पप हत्या का भागी हो लेकि, निन्दित हुधा इत्यादि रौतिने दाना अर्थात् पशु और मनुष्य यराबर सानयाले दहरे विचार कि किसी में नहीं भाई । मह सम विवेश अघ तक कुण्डलिनी शक्ति सोती रहती है | कभी नहीं होता, यदि वह जंगी रहती है तो यह योगाभ्यास कर च है नहीं, घर कर दिखाने को शहि रहे चहै नहीं, पर यह सत् यह असत् ऐसा विज्ञान त उसके हृदय में अवश्य निरन्तर प्रज्वलित रहता है ॥ उद्घाठयेत्कपाठञ्चयथा कुञ्जिकयाहठात् । कुण्डलिन्याप्रयोधेन ब्रह्मद्वारं प्रयोधयेत् ॥१८॥ इसी निमित्त कहा है कि जैसे ताले से बन्द, किवाड को फुझी से घट पद सघारके भीतर पैठा जाताहे इसी प्रकार कुण्डलिनी के जागने पर मलद्वार अर्थात् मस्तिष्क (मगज) प्रभेद किया जा सका है अर्थात् चै- तप किया जा सका है कि जिस्से सत् असत् का ज्ञान हो जाये ॥ शक्तिचालिनी मद्रासी बिधि । नाभिसवेष्टबत्रवेण नचनग्नावहिस्थितः । गोपनीयगृहेस्थित्वा शक्तिचालनमभ्यसेत् ॥४९॥ एक घर के द्वारा नाभि देश के लपेटके किसी गुप्त गृह में बैठकर घेरगडसंहिता शक्ति चालनी मुद्रा का अभ्यास करै, किन्तु नाम से वहिर्भाग में इस योग का साधन भरना सुधित नहीं है। भर्यात् यह योग नग्न हो के | गुप्त स्थान में करना चाहिये । वितस्तिप्रमितंदीर्घ विस्तारेचतुरंगुलं । मृदुलंधवलंसूक्ष्म वेष्ठनाम्बरलक्षणम् ॥५०॥ एवमम्बरयुक्तञ्च कटिसूत्रेणयोजयेत् । एक बिलस्त लम्बा और चार अंगुल चौड़ा कोमल और महीन सुफेद वस्त्र से नाभि को वेष्ठन कर (भपेटें) और फिर उसी वस्त्र की | कटि सूत्र (करधनी) से बांधे : भस्मनागात्रसंलिप्तं सिद्धासनसमाचरेत् । नासाभ्यांप्राणमाकृप्य अपानेयोजयेद्वलात् ॥५॥ तावदाकुञ्चयेद्गुह्यं शनैरश्विनिमुद्रया। यावद्गच्छेत्सुपुन्नायां वायुःप्रकाशयेद्धठात् ॥५२॥ भस्म (रास) से गरीर को लेपन करे और सिद्धासन बांध कर बैटे, फिर नामिका के दोनो टेदों से प्राण वायु को खींच के बल के सहित श्रपान यायु के साप मिशाय दे. जय तक घायु सुपुम्ना नाडी के भीतर लाफे प्रकाशित न हो तय तक अश्विनी मुद्रा के द्वारा पीरे २ गुह्य प्र. | देश को शिकाहे॥ तदाबायुप्रयन्धेन कुम्भिकाच जमिनी । बद्धश्वासस्तताभूत्वा ऊर्द्धमार्गप्रपद्यते ॥५३॥ इभी प्रकार निश्वास को रोंक के कुंभ प्राणायाम धारण कर ते

धेरयडमंहिता।
मुजङ्गाकार कुण्डलिनी शक्ति जाग के ऊपर की ओर उठती है । भर्यात्
सहस्त्र दल कमल में परमात्मा के सहित मिल जाती है।
विनाशक्ते श्वालनेन योनिमुद्रा न सिहयति ।
मादीचालनमस्य योनिमुद्रां समन्यसेत् ॥५॥
बिना शक्ति चालिनी मुद्रा के अभ्यास किये यानि मुद्रा कभी सिद्ध
नहीं हो सक्ती इसें प्रथम इस शक्ति पालिनी मुद्रा का सम्पास कर ले
तय योनि मुद्रा अभ्यास करै ।।
इति ते कथितं चण्डकापाले शक्तिचालनम् ।
गोपनीयं प्रयत्नेन दिनेदिने समभ्यसेत् ॥५५॥
पैर महाराज कहते हैं कि हे घगकापालि ! तुम्हारे सिकट यह
मुद्रा मैंने कही जिसका नाम शक्तिशालिनी है, यह मुद्रा पत्र से दिन २
अभ्यास करना चाहिये और वह अभ्यास करना गुस माय से रहे सहसा
प्रमिट न होने पाये।
शक्तिचालिनीमद्रा का फल ।
मुद्रयं परमागोप्या जरामरण नाशिनी ।
तस्मादम्यसनंकुऱ्या झोगिभिःसिद्धिकांक्षिभिः ॥५६॥
यह मुद्रा परम गोप्य है (इसकी क्रिया गुप्त करनी चाहिये) इमके
द्वारा खुदाई और मृत्यु देनी नष्ट हो जाती है. इमोसे सिद्धि के चाहने
याले योगियों को इसका अभ्यास अवश्य करना चाहिये।
नित्यंयोभ्यसतेयोगी सिदिस्तस्यकरोस्थिताः।
तस्पषिग्रहसिद्धिस्याद्रोगाणां संक्षयोमवेत् ॥५॥

घेरण्डसंहिता । नो योगी इस मुद्रा को प्रतिदिन सम्पास करता है उसके हाथ में मिहि पा जाती है मर्यात् वह पूरा सिद्ध हो जाता है, और उसी को विग्रह मिद्धि होती है (विग्रह मिदि वह है जिसमें विशेष ग्रहण शक्ति होती है अयांत् कोई कार्य करै झटपट पूरा हो जायगा) और उसके रोगाशिनष्ट हो जाते हैं। तड़ागी मुद्रा। उदरंपरिचमाप्तानं कृत्वाचतड़ागाकृतिः । तड़ागीसा परामुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ॥८॥ पश्चिमोत्ताम अर्थात् उत्तान होकर पहे और पेट को तहाण (तलाम) की तरह गहिरा कर और कुंभक प्राणायाम करै रमी को तड़ागी मुद्रा कहते हैं । यह मुद्रा एक प्रधान गिनी जाती है, इसके द्वारा बुढ़ाई और मृत्यु जीती जा सक्ती है ॥ मांडूकी मुद्रा। मुखंतृमुद्रितं कृत्वा जिह्वामूलं प्रचालयेत् । शनैर्ग सदेमृतं तन्मांडूको मुद्रिकां विदुः ॥९॥ मुंह को मंद ले और जिव्हा के मूल के तलुवे के अपर की प्रोर चलाये और घोरे २ सहस्त्र दस कमान निर्गत अमृत पान करै । रमी को मांडूकीमुद्रा कहते है। मांडूकीमुद्रा का फल । बलित पलितं नैव जायते नित्ययौवनम् । नकेश जायसेपाको यः कुर्यानित्यमांडुर्की ॥६०॥ .

धेरगड संहिता भाईको मुद्रा का नित्य अभ्यास की कोई चारै उमके शरीर में वलित ( चमहे, की मिकुहन ) पलित (मांच गलकर हड्डो मात्र का रहना ) ये दो शरीर के शिपिल करनेवाले मायु के नाशक आगम नहीं जा सक्त और निरहही युधायस्या मी बनी रहती है. तथा शिर के बात भी नहीं पकते॥ शांभवी मद्रा। नेत्रांजनंसमालोक्य आत्मारामंनिरीक्षयेत् । साभवेच्छांभवीमुद्रा सर्वतंत्रेपुगोपिता ॥६१॥ दोनों भाड़ों के बीच में पानी भहाँ कोही स्थिा दूषि से अत्र लोकन करके और मन को एक रस करके वही धारमा राम (परमात्मा) को देश (मानो मच्चिदानन्द यही बैठे हैं) इमो को शांभवी 'मुद्रा कहते हैं, यह सब तन्त्रों में गुप्त मानी गई है। शांभवो मुद्रा का फल वेदशासपुराणानि सामान्यगणिकाइव । इयन्तुशांभवीमुद्रा गुप्ताकुलवधूरिव १६२।। ४ घेद, ६ शास्त्र (न्यायादि तथा धर्मशास्त्र) - पुराण ये असे गणिका (वेश्या) लोग सथ जगह प्रसिद्ध रहती हैं, किसी से ,गुप्त नहीं रहती वैसेछो सामान्य बस्तु हैं, परन्तु यह गाभवी कुण वधू बड़ी पत्र से सहसा फिसों की दृष्टि में नहीं पड़तों वैसे दी जानिये ॥ सएयप्रादिनाधश्च सचनारायण स्वयं सचनानासृष्ठिकारो योमुद्रांवत्तिशांभवी ॥६३ घेरण्डस हिता। जो मनुष्य इस शांभवी मुद्रा को जानता है यह शादिनाथ (सबका प्रथम स्वामी) है वही नारायण (जीव समूह की शक्ति) है, और यही जग रचने वाला ब्रह्मा भी है ॥ सत्यं सत्यं पुनस्सत्यं सत्यमूचेमहेश्वरः । शांभवांयोविजानीयात् सचत्रह्मनचान्यथा ॥६॥ जो मनुष्य इस शांभवी मुद्रा को जानता है बही भूर्तिमान ब्रह्म है, इस बात को महादेय जी पीन यार (निषाचा) करके सत्य कहते हैं पसमें संशप नहीं है। पंचधारसाा मुद्रा। कषिताशांभवोमुद्रा शृणुप्वपंचधारणां । धारणानिसमासाद्य निसियतिभूतले ॥६॥ पेरपट गहाराज कहते शांभवी मुद्रा ता कह जाये आप चण्ड कापाशि ! तुम पाचपाराणा मुद्रा मुने। यह पधधारणा मुद्रा भी पांच प्रकार की है जिन पांचोके प्राप्त होने पर फिर भूतल में कौन ऐसी बात जो मिटु न ? अपांत् सम कुछ मिद्ध हो जाता है। अनननरदेहेन स्वर्गपुगमनागमम् । मनोगतिर्भवेत्तस्यं सेचरत्वंनचान्यथा ॥६६॥ ये पांच प्रकार को धारणा मुद्रा सिद्ध होने पर हमोगरदेश में शि. nा गर; जीतनो) सगलीक में MIRL Hामा मला है, और सम मा• धन कानेपानीको मागति (नहे हा नवा जाय) हो मली है. तपा गरपाय (माकाग में रीको गति) प्राप्त हो जाती है (पाच ENT धेरण्डसंहिता। की धारणा पहिले कह आये हैं, जैसे-पाधियो १, भारभनी २, घायवी ३. मानेपी ४, पाकाशी ५.) पार्थिवीधारणा मुगा। यत्तत्वहरितालदेशरचितं मौमलकारान्वितं । वेशास्त्रकमलासनेनसहितं कृत्वाहृदिस्थायिनं ॥ प्राणांस्तत्रविनीयपंचघटिका चिंतान्वितांधारये। देपाशाम्भकरीभवेक्षितिजयं कुर्यादधोधारणा १६७॥ पृथिवी तत्य का वर्ण हरिसाल के समान पीला है, पृषिषीतप्त का बीज लकार है, इसका प्राकार चौकोना बराबर है. बता सके दे. बता है, योग के प्रभाव सह सम यस्तुओं के सहित हृदय में ध्यान कर स्थापी करे, उसी समय में मासवायु को आकर्षण करके कुंभा के द्वारा पांच घड़ी (दो घंटे) चित्त न दुगने पावे धारण किये रहै, इसी स्तंभकारी (श्याम उहरानेवाली) द्विपा को पार्थियी धारणा करते हैं, इसका दूसरा नाग अधोधारणा भी है, इसके धारय पारनेसे वर्षात म- भ्यास करने से पृषियी जीती जा सती है, अर्थात् पृषिधी सम्बन्धी कोई | भी साधा हो तो इसके धारक को कुछ भी गिन नहीं कर मतो ॥ पार्थिवीधारणामुद्रा का फल । पाधिबोधारणांमुद्रा याकरोतीनित्यिशः । मृत्युंजय स्वयंसेपि ससिद्धोविचरेबुधि ॥६॥ जो मनुष्य प्रतिदिन (रोज) इस पापियोधारणा मुद्राको करता वही निज मृत्युञ्जय हो जाता है, अर्थात् कभी गौ माता, और यही सिद्ध होके विधी में मिरण करता है। .

६८ घेरण्डसहिता। आम्मसोधारणमद्रा। शंखेन्दुप्रतिमञ्चकुन्दधवलं तत्वकिलालंशुभ । तत्पीयूपवज्ञारबीजसहितं युक्तंसदाविप्णुना ॥ प्राणांस्तत्रधिनीयपंचघटिकां चित्तान्विताधारये । देपादुःसहत्तापपापहरिणो स्यादाम्भसीधारणा॥६९॥ जन तत्व का वर्ण शस तथा चन्द्रमा की तुल्य यिमल और कुन्द पुष्प घी तरह सज्जन है. और शोभन है, इसकी अमृत सशा है और पकार इसका बीज है, और विष्णु इसके देवता हैं. योग के प्रभाव से शुदय के बीच उक्त जल तत्व के ममुदाय का ध्यान करै श्रीर उसी ममय प्रासधायु को सींच कर पाच घही चित्त स्थिर करके फुभफ प्राणायाम में स्थिर है, इसी को जाम्भती घारण मुद्रा कहते हैं, यही मुद्रा बढे २ दुमद सार्यों का तथा पापो को नाश करती है ॥ आम्मसोमुद्रा का फल। प्राम्भसीपरमांमुद्रां योजानातिमयोगयित् । जलेचगंमोरेघोरे मरणंतस्यनाभवेत् ॥७॥ • माधक इम गाभवी मुद्रा को जानता है वही योगयित् (योग का जानवाना) है. यह पदि मा भयानक और गभीर (गहिरे) जान में भी पह जाये न ममका मरण नहीं है। मक्ता, अपांत् श्याम साधन के प्रभाव में वह इस मदी का इयंतुपरमामुद्रा गोपनीयाप्रयत्नतः । प्रकाशास्सिदिहानिः स्यात्सत्यं वच्मिचतत्वत 1921 धेरण्डसंहिता रान मुद्रा। यही शांभवी मुद्रा परम श्रेष्ट है और यह यत्न के मक्षित गुप्त करने योग्य है, इसके प्रकाश से सिद्धि की हानि होती है, घेरयडजी कहते हैं यह मैं यूप.विचार करके सत्य कहता, ई.॥ तात्पर्य यह कि यदि रसको करनेवाला सब जगह है कि हम इस प्रकार की क्रिया करते हैं तो बहुत से लोग इस के करने की अभिलाषा करके उसके पास भागे जिसे उसके चित्त की एकाग्रता में विघ्न डालेंगे रमसे गुप्त रीति से साधने करने पर कोई भी बाधा नी पहुंच सकेगी भोर कम से अभ्यास बढ़ जावेगा, परन्तु जो नितान्त दृढ़ है। इस को सीखा चाहे उसके लिये गुप्त नहीं हो सकी, यही तात्पर्य घेरगढ महा. का आग्नेयी यन्नाभिस्थितमिन्द्रगोपसदृशं,योत्रिकोणान्वितम् । तत्वतेज मयं प्रदीप्त मरुणं, रुद्रेण यत्सिद्धिदम् ॥ प्राणांस्तत्र विनीयपंचघटिका, चितान्वितंधारये । देपाकाल भगोरभीति हरिणो, वैश्वानरोधारणा ॥७२॥ अमितत्व का स्थान नाभी स्थल है. इसका मर्ण इन्द्रगोप कोट (बोरबहूटी) की तरह लाल है, रकार इसका धीन है, इसका भाकार त्रिकोण और रुद्र हमके देवता हैं. पह तत्व सेश का पुञ्ज है यह दोस- गान ( प्रकाश करने वाला ) और सिद्धिं दायक है, योग चल से इस करांप के एकाय वित्त हे पांच पड़ी तक कुष्पक प्राणायाम से प्राण वायु को धारण करे । सीका माम माग्ने धारणा मुद्रा है। इसके सश्याम करने में संमार का भय दूर हो जाता है, और अनि के द्वारा साधनको मृत्यु कभी नहीं है। सक्ती ॥ अनि तत्या नदप घग्गडमंहिता। आग्नेयी धारणा मुद्रा का फल । प्रदीप्ते ज्वलितेबन्हो पतितो यदि साधकः । एतन्मुद्रा प्रसादेन सजीवति न मृत्युमाक् ॥७३॥ यदि सापक सूत्र बरती हुई पायकाती भाग में पह जावे तभी हुम भाग्नेयोधारणा मुद्रा के प्रसाद से जीता रहेगा, कभी मृत्यु का भागी नहीं होगा। वायवोधारणा मुद्रा। यद्भिन्नांजनपुंज सनिभमिदं, धूम्रावभासंपरम् । तत्वंसत्यमयं यकारमहितं, यत्रेश्वरी देवता ॥ प्राणांस्तत्रविनीयपंचघटिकां चित्तान्वितांधारय। देषाखेगमनकरोतियमिना, स्याद्वायवीधारणा ॥१॥ मायु सत्य का वर्ग घिसा हुमा अञ्जन (मुम्मा) तथा धुयें की ताह है. पकार का योग है और ईश्वर के देवता हैं, यह तत्व सत्य. गुग्प मय है, योग के प्रभाय में इस यायु सत्य को उदित करायके एकाग्र नित हैभाव यापु को आकर्षण कर कुम्भक प्राणायाम के द्वार पाप पछी धारण 1. मी का नाम मापायी मुद्रा है, पर मुद्रा साधन करमे पालेका पायु मे कभी मृत्यु नहीं है। मक्को, और साधक की शक्ति प्राकाश जाम भाम की भी हो जाती है। वायवोधारणा मुद्रा का फल । इयतु परमा मुद्रा जरा मृत्यु पिनाशिनी । यायुनामियते नापिसे च गति प्रदायिनी ॥

घेण्डसहिता। सक्ता, - यह मुद्रा परमठ जरा ( वुढाई ) और मरण इन दोनों को नष्ट कर हालती है और साधक बायु.के किमी प्रकार के कोप से नहीं सर और यह मुद्रा माकाश गमन की शक्ति को भी देनेवाली है। सठायभक्तिहानाय नदेयायस्यकस्यचित् दत्तेचसिद्धिहानिः स्यात्सत्यंबन्मिचण्डते ॥६॥ घेरण्ड जी कहते हैं कि हे चहापालि ! इस मुद्रा की विधि सठ (जो लोगों को ठगने के लिये चाहै ) को और भक्ति हीन (ओ चाहे कि मिर्फ जाग कर आचरण न करें, लोगों को धोखा दे सिद्धाई फेना) को कभी नहीं बताना चाहिये, और भी जिस तिम को कभी नहीं देना चाहिये. यदि दे ता देने वाले की सिद्धि में हानि होती है, अर्थात् उन सठ श्रादि को कम्न ई खुलने पर यथार्थ सिद्ध को भी लोग सठ गादि समझ कर याचा काला करते हैं. घेरण्ठ जी प्रतिज्ञा करते हैं कि हम यह तुम मे सत्य कहते है। अकाशी धारण मुद्रा यत्सिन्धौबरशुद्धबारिसदृशं ब्योमंपरंमासितं । तत्वंदेवसदाशिवेनसहितं बीजंहकारान्वितं । प्राणांस्तत्रविनीयपंचघटिकां चित्तान्वित्तांधारये । देपामोक्षकपाटभेदनकरी कुर्यान्नभोधारणा ॥७॥ भाकाशतत्य का वर्ण ममुद्र के विशुद्ध जल की तरह प्रकाशित हेाता है. सदाशिय इसके देवता हैं, हकार इसका बीज है, इसी आकाश तत्व को सदाशिव के सहित योग प्रभाव से उदित कर एकाग्र मन ही ध्यान कर गौर नमो समय प्राण वायु को खोंच कर कुम्भक प्राणापम मे पांच ७२ घेरण्डसंहिता । । - घही धारण क्येि रहै. इसी को प्राकोशी धारण कहते हैं, यह मुद्रा माह के किवाहों को खोल देती है, अर्थात् साधक शीघ्र मुक्ति हो जाता है। आकांशी धारण मुद्रा का फल । प्राकाशोधारणांमुद्रां-योवेत्तिसैवयोगवित् । नमृत्युजीयतेतस्य प्रलयेनावसीदति ॥७॥ जो मनुष्य भाकाशी मुद्रा' को जागता है वहीं निश्चय योग का नाननेवाला है, उसकी मृत्यु' भी किमी से नहीं होती और वह प्रलय होनेपर भी क्यों का त्यों बना रहता है। ये पंच धारण 'मुद्रा समाप्त हुई। अश्विनी मुद्रा। आकुंचयेद्गुद्वारं प्रकाशयेत्पुनःपुनः ।.. साभवेदश्विनीमुद्री शक्तिप्रबोधकारिणी ॥७९॥ भाक.फिर २ अपने 'गुह्य द्वार को सिकोड़े और के नाये इसी का माम अश्यिमी मुद्रा है, यह मुद्री शक्ति (ताकत) को जगाने वाली है ॥ अश्वनी, मद्रा का फल । अश्विनीपरमामुद्रा गुह्यरोगविनाशिनी । बलपुष्टिकरीचैव अकालमरगहरेत् ॥८॥ यह श्रेष्ठ अश्विनी मुद्रा गुदा के 'जितने रोग है संघको मप्ठं करती घन और पुर्णि की यदाती और अकाल मृत्यु को भी हरलेती है ।

घग्गडमर्माहता। पाशिनी मुद्रा। कराठे रष्ठे क्षिपेत्यादौ पाशवं दृढ़ बन्धने । साएर पाशिनीमुद्रा शक्ति प्रबोध कारिणो १८११॥ देतो पाव पण्ड ( गरदन ) की पीठमें छामा कर लेसे पाश (रस्से) से बाधा आता है मादी टूट (मजपूनी मे) बाथै, यही पाशिनी मुद्रा काही जाती है, यह भी शक्ति (तारत) जगाने वाली है। पाशिनी मुद्रा का फल। पाशिनी महतीमुद्रा बल पुष्टि विधागिनी । साधनीया प्रयत्नेन साधः सिद्धिकांक्षिभिः ॥८॥२ यह पाशिनी एक बही भारी हा यहंघल और पुष्टि देनाको पढानेवाली है, मिद्धि के चाहयाले साधका लोग इसका अवश्य बड़े यव से साधन करें। काको मुद्रा। काक चंचुवदास्येन पिडायुं शनैः शनैः । काको मुद्रा भदपा सब रोग विनाशिनी ॥३॥ सपने मुख को पायी टोट फी नार नाय धरि २ बायु पान भी मी मा माम साको मुदा है। यह सुन प्रकार के २ गो को नष्ट ६रता है। - काकीमुद्रा परामुद्रा रवंतपु गोपिता। मस्या प्रसाद मानेगा काकवीरोगी भवेत " ७४ घेरण्डसहिता। यह काकी मुद्रा बहुत उत्तम है और सय तन्त्रो में गोपनीयहै. इस के प्रसाद मात्र से मनुष्य काफ की तरह रोग रहित हो जाता है। " मातङ्गिनीमद्रा। . कण्ठमग्नेजलेस्थित्वा नासाभ्यांजलमाहरेत् । मुखानिगमयेत्पश्चात् पुनर्वक्त्रेण चाहरेत् ॥८४॥ नासाभ्यां रेचयेत्पश्चात् कुर्यादेवं पुनः पुनः । मातङ्गिनी परामुद्रा जरा मृत्यु पिनाशिनी ॥८६॥ गला पर्यन्त जल में संहा हर कर पहिले नाक से जल को खींचके मुख से गिराय दे, तिर मुख से भी नल को सींच के पीछे नाक के देना छेदी से सहाय,दे. इसी प्रकार यार २ सोंचे और फेंके, इसी का, नाम मातहिनी मुद्रा है। यह मुद्रा जरा ( युदाई ) और मृत्यु को नष्ट कर हालती है। मातङ्गिनी मुद्रा का फल । विरले निर्जने देशे स्थित्वा चैकान.मानसः । कुर्यान्मातद्गिनी मुद्रां मातहाइव जायते ॥८६॥ सापक निर्जन स्थानमें स्थित है। एकाग्र चित्त करने इस भातलिनी मुद्राही साध तो मात (हापो) की तरह यली हो जावे ॥ यत्रयत्र स्थितो योगी सुखमत्यन्त मश्नुते । तस्मात्सर्व प्रयत्नेन साधयेन्मुद्रिका परां ॥८॥ इस मुद्रा के साधन करनेवाला येोगी जहा जहाँ स्थित रहेगा, वहीं P

घेरण्डसरिता।
७५
.
.
वो अत्यन्त सुख का भोगी हेगा, पलिये सब तरह से प्रपत्र करके
इस श्रेष्ठ मुद्रा का साधन करना चाहिये ,
भुजंगिनी मुद्रा।।
घकनकिञ्चित्सुप्रसार्य चानिलंगलयापिवेत्।
साभवेद्गुजगीमुद्रा-जरासृत्युविनाशिनीबाट
मुंद को किञ्चित् (पोटामा) ,फैलाय के गठे द्वारा धायु पानकर
गला में वायु का पाकर जोर से लगे ) इसी को माझिनो मुद्रा कहते
हैं। पह जरा (महा) को नष्ट,फरती AAPF .. ...
भुजंगिनो मुद्रा-का-फ़ल।
यावदरेरोग मेजीर्णादिविशेषता
: तत्सर्वनाशयेदाशु यन्त्रमुद्राभुजंगिती ॥१९॥ . ;
उदर (पेट) में जितने रोगहों, विशेषकर अमीर हम संभों
को
यस पद पर भुङ्गिनी मुद्रा मष्ट कर डालती है। यदि
ti कही ऐमा मौका भापुढे कि कोई दया महों का नहीं,
किमी प्रकार की क्षमता नहीं नि पेट को पोसामादि रोग नष्ट हो
और दुःरा मा पारी हो रहा है यहां हम मुद्रा के करने में मयरेप तुरंत
रोग मg दो मार है, पर मुद्रा यान मह २. जिमने भी काम
भी नहीं किया यह भी माघधान हेकि करे तो फायदा पहुंन मता
अब समस्त मुंद्राओंका फलं कहतेहैं।
इदंन्तुमुद्रापटले कथितंचंढकपाले ।
यल्लभंसर्वसिट्टानां जरामरणनाशनम् ॥९०॥

घेरगड मंहिता। तुम्हारे निकट घेरबह मुनि जी कहते हैं कि हे घण्डकपालि ! मैंने | यह मुद्दा पटल (मुद्रामो की गिनती और विधि आदि) कहा यह पटल समस्त सिट्ठों का प्रिय है और जरामरण को नष्ट करनेवाला है। सठायभक्तिहीनाव नदेयं यस्यकस्यचित् । गोपनीयंप्रयत्नेन दुर्लभमरुनामपि ॥११॥ जो सठ हो और भक्ति हीन हो उसको ये सब मुद्रा कभी नही देमा चाहिये, और जिस तिस को भी देना उचित नही है इसको यत्न से गुप्त रखना चाहिये, ये सब मुद्रा देयतो को भी दुर्लभ हैं । ऋजुवेशांतचित्ताय गुरुभक्तिपरायच । कुलीनायप्रदातव्यं भोगमुक्तिप्रदायकम् ॥१२॥ ये गर्व मुद्रा भोग और मुक्ति दोनों देनेवाली हैं इससे ऐसे विधार से छोगों को बताना चाहिये जोकि ऋजु (कोमल सुभाव) को, जो शान्त | चित्त ( धनुलता रणित ) हो जो गुरु भक्ति पर ( उपदेष्टा के बचन को मामने वाले ) हों, और यो कुम्नीन ( जिनको अपने नामी पुरुखो की बदनामी के हरसे समको उत्तम लोक पर चले जागे में दृढता हो) उन्हीं को देना चाहिये । तात्पर्य यह कि कोमल नित नहीं है और सिद्ध हो गयां तो सिवाय संसार को कष्ट देने के और कुछ भी नाम कार्य नहीं करेगा यदि चञ्चल हुआ तो नमको इन आसन मुद्रादि से सिद्धिही नहीं प्राप्त होगी, यदि उपदेष्टा के पचन को न मानने वाला हुधा ता भी फ्रिपा, उटपटाग करने से कुछ भी मिद हासिल नहीं होगी, और यदि अपने नामी पुरतो को बदमामी को नही हरैगा तो वह बडे २भषामक अत्याचार करके अपमाडी योग देगा ऐसे २ लोगो का रस योग विद्या का यत मा चराटा फलदायक होता है अर्थात भोग वस्तु

घेरण्डसंहिता
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क्रिया से ग्रहण करेंगे परन्तु मुक्ति जो परम पुरुषाले उसको नहीं प्राप्त
कर सकेंगे, मी निमित्त मघ जगह "नदातव्य नदातव्य" हा॥
मुद्राणां पटलं तत्सर्व व्याधि बिनाशनम् ।
नित्यमभ्यास शीलस्य, जठराग्निविवर्द्धनम् ॥१३॥
यह मुद्रा पटल मय व्याधि को नष्ट करनेवाला है, और जो मित्य
अभ्यास करता है उसके गठर की अग्नि सूर्य बहाती है।
तस्य नोजायतेमृत्यु नास्य जरादिकं तथा ।
नाग्निजल भयंतस्य वायोरपि कुतोभयम् ॥९॥
जो मनुष्य मुद्दा मापन करते हैं उमनो न मरपु न धुनाई. मादि. न
भाग, न पानी, न बापु यह, मय कभी नहीं भय पहुंगय मते हैं।
कासःश्वासप्लीहकुष्ठं श्लेप्नरागाश्चविंशतिः।
मुद्राणां साधनाच्चैव . विनश्यन्ति न संशयः ॥९॥
मुद्रा साधन करने में काम (सामी) श्याम (दमा) मीहा (विल)
पष्ट (काद) तथा पीप प्रकार के पन्नेमा (G) रोग नष्ट हो जाते
यहुनाकिमि हक्तेिन सारं यमि प.चण्डते ।
नास्तिमुद्रासमकिञ्चित् सिद्धिदक्षितिमण्डले ॥९॥
रसह महागत करते हैं, हे चपापानि ! तुम्हारे मिण्ट बहुत
कहने से पारितु सार यान में कहता हूं कि मममसमें मुद्रा
के समान साई भी पशु मिह देने वाली नहीं है।
इति घेण्डसहितायां घेगड चण्डकपालि सम्बंदेि चटस्खयोग
प्रकारमा मुद्रा प्रयोगानाम गायोपदेशः ॥ ३ ॥

t N घेण्डम हिसा। a for 1 अथ चतुर्थोपदेशः। प्रयातः संप्रवक्ष्यामि प्रत्याहारक मुतमम् । यस्यविज्ञानमात्रेण कामादि रिपनाशनम् ॥ IFEIFFERIFIER FT...तो महाते है कि हे चण्डकपालि ! मुद्रा कथानके अनन्तर श्रय हम तुमसे प्रत्याहार तमगा . HE SANILITIES से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर्या ये छ: रिपु जो प्राणियों को इस संमार में मतीय रहते थे बिनहि जाते हैं। tiy? सस्तो नियम्येत दात्मन्ये शनयेत् ॥२॥ Iri.REE उस २ विषय से मन को निवृत्त (लोटा) करके अपने वश में लाना चाहियो air.. fr !!?" पुरस्कार तिरष्कार, सुश्राव्य भावमायकम् । Ema) मनस्तस्मानियम्येत दात्मन्येव वशनयेत् ॥३॥ #fire ifRETREPTEMPTETS) में मनकी कमी नहीं पीना चाहिये. मी प्रकार नई पुरष्कार ( मादर) हे घरे तिरस्कार (निरादर) हो किसी समाध्या ( कामको जातिमा शब्द हो. श्राव्या कानाको अप्रिय हो, किसी। में सन के. पाये, तात्पर्य यह, कि गीतादि सुन कर, वा स्तुति धाद दि स्नुकर महत सुग होमन को भुलाय नहीं देना और न भयानक चिम्पार तथा निन्दा, याद श्रादि सुनकर विकल हो जामा, .इस प्रत्या हार योग का सही साधन है कि मम सबों में मन को निवृत्त करके मनिया में कमी, अपार सुनना मध पर 'मन की एक रम स्थिर " रखमा - .

घेण्डसंहिता। OE +त सुगन्धीत्रापिदुर्गन्धो घ्राणेपुजायतमनः । तस्मात् प्रत्यारेदेतदात्मत्येववशंनयेत् ॥४॥ है मुशन्ध है।, चहै दुर्गन्ध प्रदि घाण (मूंघने ) में भाये और मन धार २ चाहे तो मन को यहां से लौटार को अपने वश में करले मधुरानकतिक्तादि रसेगामियदोमनः । तस्मात्प्रत्याहरेदे दात्मन्येवरशंतयेत् ॥५ पहे मधुर (गोठा) ही, चहे शम (पाटा) पर शितोता) | हो, चाहे कपाय (याकस) हो, चहे कटु (कटुमा ) है, पहे लयण (लोमा) हो. यदि मन इन छः रमों को और दौड़े तो घर में लोटारा मनको मामा के घश में लाने का अभ्यास कर इसी का नाम प्रत्योहार इति थी घरेण्डमैहितार्या धेरगड' चगंडकंपालि सम्बाद प्रत्याहार प्रयोगोनाम चतुर्थोपदेशः समाप्त re अथ पंचमोपदेशः ।.... अथातःसंप्रवक्ष्यामि प्राणायामस्ययविधिम् । यस्यसाधनमात्रेण देवतुल्योभवेतरः ॥१॥ पर महाराज परपाग्नि में करने शिम मवादार करके भपके भगता प्राणायाम की शिधि मे कई जिसे मापन करते ही मनुष्य देवता के समान हो जाता है। प्रादौस्यानंतयाकालं मिताहारतवापरम् ।। नाडीशुढुिंचतत्पश्चात्यायामंचसाधयेत् ॥२॥ ० . " GO घग्गडमहिला । - प्राणायाम साधन करने के पहिले मान करने का स्थान ठीक करना चाहिये फिर कमी प्रचार समय भी नियत करना चाहिये। फिर उसके बाद मिताहार (एक प्रमाण से सदा भोजन करमा) साधन करना चाहिये । फिर मुझे बाद माही शुद्धि करनी चाहिये । ये चार बात प्राणायाम के साधको को अवश्य माध लेना चाहिये । स्थान निर्णय। दूरदेशेतघारगये राजधान्यांजनांतिके । योगारभनकुर्वीत तेनसिद्धिदोभवेत् ॥३॥ मनुष्य बस्ती से दूर, तथा धन में भी राजधानी (राजा के रहने की नगरी) में, अहुत जमा के समीप । इन स्थानों में योगारभ ( प्राणायाम साधन) कभी नहीं करना चाहिये, करे ता सिद्धि फगी म है।। अविश्वासंदूरदेशे अरण्येरक्षिवर्जितम् । लोकारण्येप्रकाशश्च तरमात्त्रीणिविवर्जयेत् ॥४॥ यदि दूर देश में जाकर योग माधन करे तो वहा किसी का विश्वास नहीं कि कौन योगी की ठीक २ रक्षा करेंगा । यदि धन में योगाभ्यास कर तो यहा भी कोई रक्षक नहीं मिल मगे पदि यात मे भनुप्यो के बीच योग साधन करै तो सब प्रगट रहेगा जिस्से लेग देखन आया करेंगे और उसे गर स्थिर नहीं जान पावेगा। इसीलिये ये तीन प्रधश्य अर्जित है। राजधानी के विशेष घाजत लिथ ही शिया की सहा जहा तक बवाय मकै बचावे परन्तु यदि राजधानी ही का रहने वाला मनुष्य योगाम्याम फर तो यह कहा जाना है प्योंकि नधर दूर देश भो यजित कर पाये हैं स राजधानी का मनुष्य यदि योगाभ्याम करे तr राजधानी विशेष नित नहीं है। अर्जित करने का कारण यह है - T 2 धेरगडमपिता। - प्राणायाम साधन करने के पहिले साधग कामे का स्थान ठीक करना चाहिये फिर मी प्रकार समय भी नियत करना चाहिये । पिर ससके बाद मिताहार (एक प्रमाण से सदा भोजन परमा) साधन करना चाहिये । फिर अभझे याद नाही शुद्धि करनी चाहिये। ये चार बात प्राणायाम के साधको को अवश्य साध लेना चाहिये ॥ 1 . स्थान निर्णय। दूरदेशेतधारराये राजधान्यां जनांतिके । योगारंभनकुर्वीत तेचसिद्धिदोभवेत् ॥३॥ मनुष्ण बस्ती से दूर, तथा धन में भी राजधानी (राजा के राने की नगरी) में, बहुत जमा के समीप । इन स्थान में मौगारम ( प्राणाया' साधन) भी नहीं करना चाहिये, कर ता सिद्धि कमी है।। अविश्वासंदूरदेशे प्ररगयेरक्षिवर्जितम । लोकाररावेप्रकाशश्च तस्मात्त्रीणिविवर्जयेत् ॥४ यदि दूर देश में जाकर योग साधन करतो वहा किसी का हि नदी कि कोम योगी रही ठीक २ रक्षा करेंगा । यदि घर में यो करत पहाभी कोई रक्षा नहीं मिल भी पदि बात मे म बीच योग साधन फरें तो सब प्रगट रहेगा जिससे लोग देर करेंगे भौर से गन स्थिर नही छान पायेगा। इसीलिये ये तो वर्जिश राजधानीको विशेष बात इसलिये ही पिया जहा समधाय सके यथाये परन्तु यदि राजधानी की कार मनुष्य योगाम्याम करे वा यता मा पो िनघ भी बर्जित कर आये हैं. स राजशनी का मनुष्य यदि योगा तर राजधानी विशेष जित नहीं अर्जित करने का कार .

घेरण्डसहिता। -९ : वसन्त ऋतु काल निर्णय। हेमन्तेशिशिरेग्रीमे वर्षायांचतौतथा। योगारम्भनकुर्वति कृतेयोगोहिरोगदः ॥८॥ , हेमन्त ऋतु, शिशिर प्रातु, गोप्य अतु और वर्षा भतु, इनमें योगा. | रम्भ कभी नही करना चाहिये, यदि करें तो वह योग...रोग का देने | वाला जायगा। बसन्तेशरदिप्रोक्तं योगारम्भंसमाचरेत । तपायोगीभवेत्सिदो रोगान्मुक्तोभवेध्रुवम् ॥९॥ और शरद ऋतु में योगारम्भ करनेटो मुनियोंने लिखा रस्से उन्हीं दो ऋतुओ में योगारम्भ करना चाहिये, इनमें करने से योगी सिद्ध हो जाता है और रोगों से भी निश्चय मुक्त हो जाता है ॥ चैत्रादिफाल्गुणान्तेच माघादिफाल्गुणान्तिके । द्वौद्धौमासौऋतुभोगी अनुभावश्चतुश्चतुः ॥१०॥ चैत्र के महीना से लेकर फाल्गुण के अन्त तक तु तथा माघ मार को प्रादि करके दूसरे वर्ष के फाल्गुण तक चौदा महीने मो छः यतु बाधी गई है। इस प्रकार देश २ माम की एक २ ऋतु-तण दो मास और दश दिन की ऋतु अनुभव की जाती हैं । वसन्तश्चैववैशाखौ ज्येष्ठापदिश्चग्रीष्मकी। यश्रिावणभाद्राभ्यां शरदाश्विनकार्तिको ॥ चैत और वैशाख ये दो महीना मसन्त शतु को जाते हैं, जेठ और आषाढ़ ये प्रोम चतु, सावन और मादो ये , कुमार और कातिल

घरण्डमंहिता।
ये शरद , अगहन और पूम ये हेमन्त, माघ और फागुन ये शिशिर
ऋतु कहे जाते हैं।
अनुभावंप्रवक्ष्यामि ऋतुनाञ्चयथोदित
माधादिमाधवान्तेषु वसन्तानुभवश्चतुः ॥३२॥
चैत्रादिचापाढान्तञ्च निदाद्यानुभवश्चतुः ।
प्रापादादिचाश्विनान्तः प्रापानुभवश्वतः ॥१३॥
भाद्रादिमार्गशीर्पान्तं शरदोनुभवश्चतुः ।
कार्तिकादिमाघमासान्तं हेमन्तानुभवश्चतुः ॥१४॥
मार्गादिचतुरोमासान् शिशिरानुभवम्बिदुः ।
घेरपड जी पटकापालि से कहते है कि जिन २ महीनों में जो २
अतु 'अनुमय से जानी जाती हैं यामी लक्षणोसे मिलती है उनका कहते
है, जैसे:-माप मे धेगास तक चार महीना यमन्त ऋतु अनुभव होती है,
फिर उसी के भीतर और उनके घाहर जैसे चैत से मापाढ़ पर्यन्त चार
महीना ग्रीम ऋतु अनुभव होती है, उसी तरह भाषाढमे ले कुमार प.
म्यन्त चार महीना वर्षा ऋतु अनुभव होती है, तथा भादेमि लेकर अग.
इन पर्यन्त शरद ऋतु का अनुभव होता है, कातिक से लेकर माघ तक
हेमन्त ऋतुमा अनुभव देता है. अगहन मे लेकर फागुनतम चारमहीना
गीत
तु का अनुभव होता है, हमी प्रकार अनुभव की ऋतु जाममा
साहिये, और नन्हीं के विधाघ मे योगारम्भ करना उचित है ॥
वसन्तेवापिशरदि योगारम्भःसमाचरेत् ।
सदायोगोभवेत्सिवो बिनायासेनकथ्यते ॥१५॥

धाडसंहिता।
बसन्त अपशा शरद रितु में योगारम्भ कर तो शिना परिश्रम योग
सिद्ध के जावेगा यह मेोगियों के द्वारा कहा गया है।
मिताहार !
मिताहारंविनायस्तु यागोरम्भस्तुकारयेत् ।
नानारोगोमवेनस्य किञ्चिद्योगोनसिद्ध्यति ॥१६॥
जो मनुष्य मित अर्थात एक तील बांध कर भोजन नहीं करता और
| योगारम्भ करता है. वह नाना प्रकार के रोगों से पीड़ित होता है और
प्रमको कुछ भी योग विद्या का लाभ नहीं होता।
वात्पर्य भोजन की साधना प्रधान योग है, मोअनही से देह प्रति
| पालित होता है और भोजन की गाड़ी हुई तो बहुत जल्द मनुष्प मर
| भी आता है, इसलिये पेपर महाराज ने भोजन सम भाव रखने के
| দি বুধ নিনস্বা এক হায়া, জা সকল বাগাশা বি
आहे व तो मिताहार का माधना अवश्य करे परन्तु विना योग
भाधेही सपने शरीर निरोग रस्ता चाहे वे भी मिसार करें तो
पासनही योगियों से लत गुणा उत्तम गंगे, डाई माय के देश
कि जे एश यर्प मिताहार करता है सके को ध्यान में पाती
है या नहीं हम दृढ़ता से कहते हैं कि मिताहार को बराबर और कोई
भी गरीर रक्षा के लिये उपयोगी और नो मिसने मिता'नहीं
किया पाहे कादि भोप बार पर ताश निरोगतर नही मी नेमा
किमिद ने मतो से भारोग्य पाइनेवाले पुरुष मितबार
अवयर
शाल्यन्नंयवपिंडंबा गोधूमपिंडकंतया ।
मुदगमापचणगादि शुभ्रंचतपवर्जितं ॥१७॥

८६ घेण्डस हिता। जो कोई योग साधन मिया चारी वे शाम्नी (उत्सम धान के) घायल धा यश पिड (जय पिसान की रोटी वा सेतुना) तथा गोहूं की रोटी, और मूंग अथवा नई वा चना भादि की दाल, जो सूब साफ और भूसी रहित भोजन करै॥ पटोलंपनसंमानं कलोलंचशुकाशकं । द्राढिकांकर्कट रम्भां दुम्बरीकंटकंटकं ॥१८॥ परवर, कटहर, मान (मरुई की तरह बड़े पत्ते का होता है और उसकी जद बडे की तरह बड़ी लम्बी होती है) कक्कोल ( रैला ) बेर, करज फॅकरी, केला, गूनर, कँटीली चौराई आदि का साग, इत्यादि , वस्तु खाये ॥ भामरम्भा बालरम्भा रम्भादण्डंच मूलकम् । वार्ताकी मूलकंऋद्धिं योगी भक्षण माचरेत् ॥१९॥ कच्चे केले की तरकारी, केले की वतिया (जो फूलो में लगी है।) केला का दरड (बीच का नरम गधोक्षा) केला की जड़, भाटा, मूली, इन सम की तरकारी योगी खावे॥ बाल शार्क काल शाकं तथा पटोल पत्रकम् । पद्यशाकं प्रशंसीयादास्तुकं दिलमोचिकां ॥२० पाल गा पार सामान कोई भी प्रचलित मागरे, कामा शाक भगांत जिम ममय में भी भागमा करना , स्टेशन पत्र मांस पर. पर पती का माग ( यह माने में कडू होता है परन्तु भव से ज्यादा निगोहार पात २ अभ्यास परने पर भया भी लगने लगता २) पधुमा का मारा और रिस भाग पे पार राग योगियों सिप मराहनीय घेरयमहिता। सुदं सुमधुरं स्निग्धं उदराई विवर्जितम् । भुज्यते सुरसंप्रीत्या मिताहार मिमंविदुः ॥२१॥ शुद्ध अर्थात् साफ, सुन्दर मधुर (जो खाने में मिठाय) स्निग्ध (जिसमें सखाई न हो) सरस (जिसफा रस सराब न लगे) ऐसे भोजन को योगी लोग वही प्रीति जिन करें और वह भोजन थापा पेट खाप्राधा खाली रक्सें । इसी को मिताहार कहते है । तात्पर्य-प्राधा पेट साने की विधि से बहुत से मरभुक्स योगा. म्यासी लोग यह सोचेंगे कि हम प्राधापड वाकर कैसे बचेंगे? उनको यह धीरज दिया जाता है कि जम शुद्ध सुररा और स्निग्ध आदि पदार्थ मोति से सावेंगे और सिर्फ आघाही पेट खायेंगे तो वह मामन माणा- सामादिक क्रियाओ से टपट पचकर प्राण पोयक रस उत्पन्न करना, यह रस जब नाठिया में दौड़ कर शरीर में पास ही जागा ताड़ेि दो देर के बाद सन्तोष लाभ होगा। फिर ज्यों रोज इसी प्रकार |भाधे पेट खाने का अभ्यास यढ़ेगा त्यो २ सन्तोष भी बढ़ता जायेगा और | उसका गुण मी घडता जावेगा। यदि मन पूरा पेट खाया जाता है तो यह भासन प्राणायाम आदि क्रियाशी के रगडसे भामाशय के कष्ट पहुचाता और झटपट मान के नीचे पंस कर तरियो को ए से मल हो कर निकल जाता है उस्ते प्रासापक र मानहीं पत्र होने पाता, चप्त यही मिताहार का मोशन हि मनादि साधे वह उत्तमता से पच जावे, उस्ते विकार रस पैदा न बर के शरीर के। भारोग्य रक्ड। भन्नेन पूरयेदर्द्ध तोये नतु तृतीयकम्। उदरस्य तुरीयांश संरक्षदायु चारणे ॥२२॥ पेट का मापा भाग भव भोजन से पूरा रगा चाहिये, तीमा घेरण्डसहिता। भाग जल पीकर पूरण करना चाहिये, इसी प्रकार उदर का धौपा भाग वायु घलाने फिराने के लिये छोड़ रखना चाहिये। कटुम्ल लवणंतिक्तं भृष्टञ्च दधितक्रकम् । शाकोत्कटं तथा मद्यं तालञ्च पनसन्तथा ॥२३॥ कुलस्थं मसरं पाण्डु, कुष्मांडं शाकदण्डकम् । तुम्वीकोल कापत्यञ्च, कंटविल्वंपलाशकम् ॥२४॥ कदम्ब जम्बीर विम्वं लकूचं लशुनं विषम् । कामरझं पियालञ्च हिशाल्मलिके मुकम् ॥ योगारम्भे वर्जयेत पथस्त्री वन्हि सेवनम् ॥२६॥ कटु (कहू) भन्न (खटाई) लवेण (नानखरा, नमकीन) तिक्त (सीता) ये चार प्रकार के रस युक्त पदार्थ योगरम्भ में छेड़ देना चाहिये, भृष्ट (मूंजा धना) दही, मह, पृणित या सराम शाग, मदिरा, ताइ फल तपा उसका रस, पक्का कटहर, कुलत्य (कुरथी की दाल) ममूर की दाल, पहारा नामक फल, कुम्हशा, मा हाठे या अरुई प्रादि के पुल्ने, लोको, येर, कैपा, जिस घेल में कांटा हों, पलाश, कदम्य के फल, जम्मीरीनोंधू. कुंदुरू. लकच (लामुन) मृणाल (कमन को उठी) कमरख, प्याज होग, शेमा फल, मुश (गोभी) योगारम्भन में ये भी सय द्रश्य भोजन में यजितमी प्रकार पथ का चलना, सौ प्रस तथा तापना भादि भी यजित है. तात्पप्पं पहन योगाभ्याम को किया भारम्भ की जायगी तय गरीर को ये सध वस्तुये ग या कर देगा पान्तु जप योगाभ्याम पामा मायगी योगी मिद्धा जायगा तम ताबाई भी बस्तु भोजम पान मा विवार दो करेंगी. अलिक परएक यस्तु में धाय भागका ६१ घेरण्डसंहिता। तात्पर्य यहां पर एक शंका यह होती है कि २६ श्लोक में नैनू घी दूध इन पदाधों का निषेध किया है कि योगारंभ में न खावे और यहां पर घी दूध रोज २ पहिले सेवन करके तत्र प्राणायाम करै । यह कैसे सतत हो सता है? यहां पर विवेचना करना चाहिये कि वहां ६ श्वास में योगारंभ समय घी दृध को निपेष किया है, कुछ साधन हो जाने पर निपेष नहीं किया। परंतु यहा जो घी दूध की विधि है यह इस तात्मय से है कि जब साधन करते २ कुछ प्राणायाम की शक्ति जम जावे तय उसी के | साथ २ घी दूध के सेवन का भी क्रम से अभ्यास कर परन्तु कम से कम मारंभ से एक पक्ष यानी चन्द्रमा को जब तक दूसरी प्रकृति न मावे तय तक उसी प्रकार जैसे कि २६ लेक में लिखा है साधन कर, वाद जप १ पर बीत जावे तय फिर क्रम से घी दूध मेयन करे, और वहीं तक बढ़ावे जहां तक कि अजीर्ण न हो । यस पूर्व निषेध मोर विधि संगत हो गये। इसी प्रकार जहां २ विधि निषेध पाये जायें वहां २ समय पात भौर स्थान भेद से संगत करलेना चाहिये, क्योंकि समय एकसा सदा नदी रहता, तथा पात्र भी सम एक नहीं होते, इसी तरह स्थान भी सब एक समान नहीं रहते, विवेधमा से काम करना भी येोग शास्त्र | एक प्रधाग है। यदि विवेचना से चूका तो पप येोग मही हे बाता है, इसे विवेचना को सूभ साधना चाहिये । विचार करो कि पहिले प्रत्याहार प्रकरण लिसमाये हैं कि भोग्य वस्तुमो से मन मे। निवृत्त करना चहिये, परन्तु यह भी लिखा है कि अमुह बस्तु योगी ठोग अयश्य भोजन करें, तो यहां पर यह पियेचना पानी जरूर कि मन को निवृत्तिही प्रधान है पोफिदा कहीं देय भोग से मावश्यकीय वस्तु न मिलों यहां सय विपा कराया नष्ट भपा दिनहीं ? पम्ही स्पलों में प्रत्याहार धाम में आते हैं कि भायश्यकीय .

६० घेरण्डसंहिता । काठिन्यं दुरितं पूतिमुणं पर्युपितं तथा । अतिशीतंचातिचोयं भक्ष्यं योगी विवर्जयेत् ॥२९॥ जो द्रव्य कठिनता युक्त हे, जिससे भोजन से पाप उत्पन है, सह पच के दुर्गन्ध युक्त हुये हों, अधिक गरम हो, वा अधिक उदाही, बामी हो, अति उग्र (अधिक तेजी लिये हो) ऐसे पदार्थो को योगी लोग कभी भोजन न करें। प्रातःस्नानोपवासादि कायकेश विधि विना । एकाहारं निराहारं, यामान्ते च नकारयेत् ॥३०॥ जप योगारम फर तय प्रातःस्नान नहीं करना चाहिये । उपधासादि शरीर के केश देने वाले फर्म नहीं करने पाहिये। एक ही बार भागन फरमा यह भी गहों करना चाहिये, या कुछ नहीं खाना यह भी गहरी, फरमा धाहिये, और एक प्रहर तक निराहार रहना अधिक नहीं, ता. त्पर्य यह कि पूर्वोक्त उत्तम पदार्थो में से कुछ घोड़ा अयश्य एक २ प्रहर पाद लिया करे॥ एवंविधि विधानेन प्राणायाम समाचरेत् । भारंभं प्रयमेकुर्यात् क्षीराज्यं नित्य भोजनम् ॥३१॥ मध्यादेचेव सायान्दे भोजनदय माचरेत् ॥ मी प्रकार की यिपि मे प्रांपायान साधन करमा पाहिये । प्राणा- पामार्ग के पहिले राग २ दूध और पी संयम फरमा चाहिये। मार मध्याय (दुपदरी) में सपा सायकाल में हों दो एमपी में योगी साग भामा . म ६१ धेरण्डसंहिता। . साथ पी तात्पर्य यहां पर एक शंका यह होती है कि २६ श्लोक में नैनू पी दूध इन पदार्थों का निपेध किया है कि योगारंभ में न खावे और यहां पर घी दूध रोज र पहिले सेवन करके तष प्राणायाम करै । यह कैसे सङ्गत हो सका है? यहां पर विवेचना करना चाहिये कि वहां ६ श्लेम में योगारंभ से समय पी दृघ को निषेध किया है, कुछ साधन हो जाने पर निषेध नहीं किया। परंतु यहां जो पी दूध की विधि है यह इस तालार्य से है कि जब साधन करते २ कुछ प्राणायाम की शक्ति जम जावे तब इसी के के सेवन का भी कम से अभ्यास करै परन्तु कम से कम भारंभ से एक पक्ष यानी चन्द्रमा की जय तक दूसरी प्रकृति न भावे तय तक उसी प्रकार जैसे कि २६ श्लोक में लिखा है साधन कर, वाद जम १ पत्त बीत जावे तय फिर फ्रम से घी दूध सेवन करै, और वहीं तक बढ़ावे जहां तक शि अजीर्ण न हो । वस पूर्व निषेध और मिधि मंगत | हो गये । इसी प्रकार जहां २ विधि निषेध पाये जावे यहां २ समय | पाव और स्थान भेद से संगत करलेना चाहिये, क्योंकि समय एकसा सदा नहीं रहता, तथा पाल भी सब एकसे नहीं होते, इसी तरह स्यान भी सब एक समान नहीं रहते, विवेचना से काम करना भी योग शास्त्र का एक प्रधान आ है । यदि विवेचना से चूका तो सब योग मही हे जाता है, इसे विवेचना को सूप साधना चाहिये । विराधार करो कि पहिले प्रत्याहार प्रकरणमें लिसमाये हैं कि भोग्य वस्तु प्रों से मन को निवृत्त करना चहिये, परन्तु यह भी लिखा है कि अमुच २ बस्तु योगी लोग अवश्य भोजन करें, तो यहां पर यह विवेचना करनी जरूर है कि मन को नितिही प्रधान है क्योंकि जहां कहीं देव सयोग से प्रावश्यकीय बस्तु न मिली वहां समक्षिया कराया गट भया कि नहीं? सही स्थलों में प्रत्याहार काम में आते हैं कि आवश्यीय .

દર घेरण्डमंहिता। . बस्तु न मिलने पर भी जो कार्य विधेय हैं वे कर लिये जायें, उनके स्थान में योगी लोग अपनी शक्ति से दूसरे उपस्थित पदार्थों को मुक्त कर ठे और यही गुण उत्यन्न करलें । कैसे ? मायना से, भावना दृढ़ होने से जैसे भृष्टी दूसरे कीड़े को अपना स्वरूप यनाय लेती है वैसेही योगी लोग भी एक यस्तु के स्थान में दूसरी यस्तु का गुण उत्पन्न करलेते हैं। यदि यह न हुमा a योग की क्रिया ध्यान धारणा सप झूठी है । से नहीं यह यहुत फाल से भारतवर्ष में निश्चय है कि ध्यान से ध्येय बस्तु सिंघ जाती है, जैसे कि फोटो में दूरस्य यस्तु के अवयव सिंच जाते हैं, माजकल के यारोप वासी यिज्ञानी लोग भी इस योग विद्या की तारीफ इसी शक्ति के प्रभाव से करते हैं, इससे सय से उत्तम शक्ति का बढ़ाना हो यिधि निषेध का कार्य है। अथ नाडीशुद्धि। कुशासनेमृगाजिने व्याघ्राजिनेचकम्बले । स्थूलासनेसमासीनः प्राङ्मुखोवाप्युदङ्मुखः ॥ नाड़ीशुद्धिंसमासाद्य प्राणायामंतमभ्यसेत् ॥३२॥ जय प्राणायाम साधन करने लगे तय पहिले नाही शुद्धि करले तो ठीक होगा नहीं कभी ठीक नहीं होगा, सो उसका विधान यह है कि मासन में, या मृगशाला पर, या याचम्यर पर सपना कम्यान पर बैठे, यह कोई भाछन हो मोटा हो यानी गुलगुल के पूर्व मुख हा यैठे या उत्तर मुरा हो । नाड़ीशुटिंकथंकुऱ्या नादीशुद्धिस्सुकीदृशी । ? तत्सर्वत्रोतुमिच्छामि तद्वदस्पदयानिधे ! ॥३३॥ परपाणिते भये कि दयानिधि ! नादी शुदि किस Fat प्रपम फुगा ।

घेरण्ड सहिता। करनी चाहिये और नाडी शुद्धि किस तरह की है यह सब हमसे कहा हमारी इच्छा इसके सुनने को बहुत ही हुई है। मालाकुला सुनाड़ीपु मारुतो नैवगच्छति । प्राणायामः कथंसिध्येत्तत्वज्ञानं कथंभवेत् ॥ तस्मादादौनाडीशुद्धिप्राणायाम तताभ्यसेत् ॥३४॥ घेरर महाराज ने कहा कि माला की भाति गुीं हुई नाडिया के भीतर घायु अच्छी तरह पैठ के गममागमन नहीं कर सकता, इससे मा- शायाम कैसे सिद्ध हो सकता है ? और तत्वज्ञान भी कैसे प्राप्त होसकता है . मी कारण पहिले नाही शुद्धि करके तय प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये। नाडी शुद्धिर्द्विधा प्रोक्ता समनुर्निर्मनुस्तथा । योजेनसमनु कुर्यान्निर्मनु धौत कर्मणा ॥३५॥ नाही शुद्धि दो प्रकार से होती है, ९ समनु, २ निर्मनु, इनमें गोश मन्त्र के द्वारा जो ना शुद्ध की जावे उसके । समनु तथा घोति कर्म के द्वारा जो नाडी शुद्ध को जाधे उसको निर्मनु माही शुद्धि कहते हैं । धौतकर्म पुराप्रोक्तं पट् कर्म साधने यथा । शृणुप्वसमनुचण्ड ! नाडीशुद्धिर्यवाभवेत् ॥३६॥ हे धपशपालि ! पटक साधन के समय में पहिले ही पौतिकर्म कह भाये हैं, अब जिस प्रकार "ममनु" नाही शुद्धि है ससको कहते हैं तुन सुने।।

६४ घेण्डसहिता। - उपविश्यासने योगी पद्मासनं समाचरेत् । गुर्थादि न्यासनं कुर्याद्यथैव गुरुभापितम् ॥ नाडीशुद्धिं प्रकर्वीत प्राणायामबिशुद्धये ॥३०॥ प्रथम येगी पद्मामन बाध कर गामान पर बैठे, फिर गुरू प्रादि | न्यास कर उसी के अनन्तर जैसे गुरू ने सिखाया है। उसी के अनुसार प्राणायाम साधन के लिये नाडी शुद्धि करे। वायुजि ततेा ध्यात्वा, धूम्रवर्णं सतेजसम् । चन्द्रेण पूरयेद्वायु वीजं पोडशकैः सुधीः ॥३८॥ चतुःपष्टया मात्रयां च, कुभके नैवधारयेत् । द्वात्रिंशन्मात्रया बायु सूर्यनाडयाच रेचयेत् ॥३९॥ भासन, गुरु-यास के उपरान्त आयु बीग (य, यह वायु पीज) का ध्यान धूम्र वर्ण और तेग सहित कर, फिर बुद्धिमान साधक उमी बायु | बीज को पोहरा (१६) मात्रा अर्थात् सोलह बार जप करते हुये नाक के पाए छेद से बायु को पूरण कर फिर चौपट मात्रा की सख्यासे कुम्भक प्राणायाम (दोनो नाक के छेद और मुह बन्द किये) धारण करै, इसी प्रकार बत्तीस मात्रा वायु बोज का जप करते हुये नाक के दहिने छेदको छोर पर रेचक (वायु को निकालना) प्राणायाम करें । नाभिमूलाद्वन्हिमुत्थाप्य ध्यायेत्तेजोवनीयुत्तम् । वन्हिवीजं पोडशेन सूर्यनाडयाच पूरयेत् ॥20॥ चतु-पष्टयाच मात्रया कुम्भकेनैव धारयेत् द्वात्रिशन्मात्रयावायु शशिनाझाच रेचयेत् ॥४॥ -

घेरण्डमपिता।
-
.
नाभि मूल अग्नि तत्व का स्थान है। योग के प्रभाव में उसी भाभी
से अग्नि सत्व को प्रगट कर उठाये और पृथियो तत्व को उसी
अग्नि तत्व में संयुक्त करते हुये ध्यान करै । अनन्तर सोलह मात्रा अग्नि
भोज (र यह अग्नि बीज है) का जप करते २ नाम दहिने छेद से
वायु पूरण करे। इसी प्रकार चौसठमात्रा () जपते हुये कुम्भक प्राणा-
| याम करें ( सब द्वार मदे वायु धारण किये रहै ) फिर मत्तीस मात्रा
(र) जपते २ नाक के बाए छेद से वायु को त्याग करें।
नासाग्रेशशग्यि ध्यात्वाज्योत्स्नासमन्वितम् ।
ठं, बीजपोडशेनैव ईडयापूरयेन्मरुत् ॥४२॥
चतुपष्टवामात्रयाच 'व' योजनवधारयेत् ।
अमृतंप्लावितंध्यात्वा नाड़ीधौतविभावयेत् ॥
लकारेणद्वात्रिशेन दृढभाव्यंविरेचयेत् ॥१३॥
उसके बाद नासिका के अग्र भाग में, किरणो के सहित चन्द्र बिम्ब
का ध्यान करते हुये ( ठं) यह बीज सोलह मात्रा जप करते २ नाक के
| गाए छेद से वायु पूरा करे, फिर जल बीज (व) इसको पीमठ मात्रा
जपते हुये सुपुम्रा नाही में (भीवर हृदय की नादी) कुम्भक योग से वायु
धारण कर, बाद ऐसा ध्यान कर मानो नाक के भयभाग स्थित चन्द्रविध
से प्रभूत्त की धारा यह रही है उसी के द्वारा शरीर की जितनी नादी है
सब घोई जा रही है. इसीप्रकार ध्यान करते २ पृथिवी बीज (
लम
को यत्तीस धार नप करते हुये नाक के दहिने छेद से वायु को धन
(त्याग) करे।
एवविधांनाडीशुद्धिं कृत्वानाडोंविशोधयेत् ।
दृढ़ोमूत्वासनंकृत्वा प्राणायामसमाचरेत् ॥४४॥

घेरण्डसंहिता। इसी प्रकार नेही शुद्धि कर्म के द्वारा नाड़ियों को शुद्ध करफे दृढ़ भाय हो भासन में बैठ कर प्राणायाम का अभ्यास करें। सहितःसूर्यभेदश्च उज्जायोशीतलीतथा । भस्त्रिकाधामरोमूर्छा केवलीचाष्ट कुंभिकाः ॥४५॥ कुम्भक प्राणायाम आठ प्रकार का है, जैसे-१ सहि, २ मूर्यमेद ३ उज्जायी, ४ शीतलो, ५ भमिका, ६ चामरी, मूर्या, एवं केवग्नी ।। सहितोद्विविधामोक्तः प्राणायामंसमाचरेत् । सगर्भावीर्यमुच्चार्य निर्गर्भावीजवर्जितः ॥४६॥ धहित नामक कुस्मक प्राणायाम दो प्रकार है, १ सगर्भ, तथा २ निगर्भ, जिए कुम्भक में बीजमन्त्र उच्चारण करके साधना की जावे उसके सगर्भ कहते हैं और जिसमें बीजमन्त्र वर्जित र उसको निगम करते हैं। प्राणायामंसगर्भच प्रथमंकययामिते । सुखासनेचीपविश्य प्राङ्मुखोयाप्युटङ्मुखः ॥ ध्यायेदिधिरजोगुण्यं रक्तवर्णमवर्णकम् ॥४॥ घेरंह जी ने पढकापालि से कहा कि सगर्भ प्राणायाम किस प्रकार माधा करना चाहिये नमको पहिले तुमसे कहते हैं। यह यह है कि- मुवामन (माराम के प्रासन) पर पूर्व मुख मा उत्तर मुसहर के बैठे और जला को ऐमा ध्यान कर मानों. यह रक्त वर्ण है और मकार स्वर वर्ण के रूप है । तपा रजो गुण विशिष्ट है । ईडयापूरयेद्वायं मात्रयापोडशैःसुधाः । पूरकांतेकुम्भकाये कर्त्तव्यस्तृड्डीयानकः ॥४॥ -

घेरण्ड संहिता।
.
ध्यान के अनन्तर बुद्धिमान साधक, (अ) यह योज मत्र सोलह यार
जपनामा नाक के बाए छेद से वायु पूरण करें। उसी समय कुम्भकके
आगे और पूरक के अन्त में प्रथम उही पानयन्ध जो पीछे का प्राये है
भाचरण करना चाहिये ।
सत्वमयं हरिंध्यात्वा उकारं कृपणुवर्णकम् ।
चतुःपष्टवाच मात्रया कुम्भके नैव धारयेत् ॥४९॥
उसके अनन्तर सत्व गुण संयुक्त उकार स्वारूपो. कण पर्ण विष्णुमा
ध्यान करता हुमr (5) इस योज को चौसठ माना जप द्वारा कुम्भक
| मासायाम में यागु धारण कर ।
तमोमयं शिवंध्यात्वा प्रकारं शुलयाकम् ।
द्वात्रिशमात्रया चैव रेचयेद्विधिना पुनः ॥५०॥
फिर तुम नन्तर तमानुपयुक्त मकार व्यानरूपी श्वेतवर्ण शिव
का ध्यान करता पा (म) बीज से बत्तीस मात्रा जप के द्वारा सस
परित बायु को नाम के दहिने छेद से रेचन करै ।।
पुनःपिंगलयापूर्य कुम्भकेनैव धारयेत् ।
ईडया रेचयेत्पश्चात्तद्वोजेन क्रमेणतु ॥ ५ ॥
उसके अन्तर फिर भी तक प्रहारसे तनिखित समस्त वीजाको यथा
सस्य (जेपी संख्या का माये हैं) अपके द्वारा दहिनी नासिका से छेद
वायु पूरा कर कुम्भ योग से उसी प्रकार धारण करके बाद फिर भी
वाम नासा छिद्र से रेषन करें ।
अनुलोम विलोमेन बारंबारं च साधयेत् ।
पूरकान्ते कुम्भकान्तं धृतनासा पुटद्वयम् ॥
फनिष्ठानामिकांगुष्टः तर्जनीमध्यमांविना ॥२॥

घरगडमंहिता । इसी प्रकार पुनः ३ अनुलोम विलोम (याए सीधै दहिने छोड़े और दहिने से सीधे बांए से धी) के द्वारा प्रापायाम साधन करें । यायु पूरल के शेष से लेकर कुम्भ के शेप पर्यन्त तर्जनी शोर मध्यमा को छोड़ कर यानिष्ठा, अनामिका और मुष्ट ये तीन मनियोके द्वारा गागापुट घरना चाहिये । अर्थात जिस समय पूरफ प्राणायाम से घायु जोधे उस समय दहिने नासा के छेद को गूठे से दाये रदै भीर पाएं | छेद से सीधे । जय कुम्भश प्राणायाग से वायु को रोके तय नाक के पाए छेद फो कनिष्ठा और तर्जनी पर दो अमुलियों से दाये और पर अंगूठे को भी दाये रहे और मुह भी धन्द रयर । और जय दक्षिसे छेद से यायु सीधे त पहिले पाए छेद की क्षतिष्ठा और अनामिका से दाये से चोर कुंभक में अंगूटा भी. पिने छेद में दधाये ॥ प्राणायामं निर्गर्भ मिना बीजेन जायते । एकादि शतपर्यन्तं पूर कुम्भक रेचनम् ॥५३॥ निगं प्राणायाम जो दूसरी बिधि का भाये ई पद विमा योज मन्त्र पी किया जाता है, पूरक्ष, कुभक, रेचक ये ती मायायाम अग सहित साधन करने में एक से लेकर सो पर्यन्त माना । उत्तमा विंशतिर्मात्रा पोडशीमात्रामध्यमा । प्रथमाद्वादशीमात्रा प्राणयानाविधास्मृताः ॥४॥ माटाके अनुसार माशापाम वोग प्रकारची है, जिसमें बीच माया की स्पिति ३ यप उत्तम, जिसमें नए मात्रा या मध्यन, जिसमें प्रारम मात्रा रियति दे यह मपम पे । प्रथमाज्जायते धर्म मेरुकं पञ्च मध्यमात् । उत्तमाच मित्यागनिविधं सिविलक्षणम् ॥५५॥ .

६६ घेरण्डसंहिसा। वायु अधम मात्रावाली प्राणायाम मापन करने से देह में पसीना माता है, मध्यम मात्रा यो प्राणायाम मे मेरू ( पीठ से कमर तक ) कांपने कगता है, अर्थात् एक नाही गुदा से लेकर मसाक पर्यन्त दगडाकार है मरने पर कांपने लगती , उत्तन मात्रा की प्राणायाम से देष | भूमि से उठ के सून्य में धलीजाती है. तीन प्रकार प्राणायाम की सिद्धि के येही तीन चिन्ह है कि पसीना प्राधे, देह कांप, और देव पायाश उठ गावे, इन चिन्हों के विना माणापाम में सिद्धि प्राप्त नहीं हुई पही जानना पाहिये। यिवेधना-प्राणायाम में जो बोस, सेलह, पारए, ये तीन संख्या बांधी गई हैं उनका तात्पर्य यह है कि जमे रा धोश में पोलह पूरक कुम्भक बत्तीस रेचफ हैं, इसी प्रकार बीस मात्रा पाली में बीस पूरक, अस्सी रेकच, चालीस के हिसाब से इतना जानना चाहिये, उसी प्रकार सेोलह पूरक धेरठ कुम्भ, बत्तीम रेचक के हिसाब से मध्यमा, वधा पारछ पूरा मातालीस कुम्भक भीर घीयोस रेधा से मधमा बोमट जाननी चाहिये। मागायामात्खेचरत्वं प्राणायामाद्रीगनाशनम् । प्राणायामाद्वीधयेच्छक्तिं प्राणायामान्मनोन्मनः ॥ आनंदोजायतेचित्ते प्राणायामीसुखीभवेत् ॥५६॥, प्राणायाम सापन करने से खेचात्य शक्ति (पाफाश में छड़ने की तापत ) होती है, मायायाम से रोग 'नटे हेरते हैं, प्राणायाम से परम गति भाग उठती है. तया प्राणायाम से दिव्य जान लाभ देता है भयांत | एक नयीन युदि उत्पन्न होती है, फिर प्राणायाम से चित्त में भापही भाप भानन्द प्राप्त होता है. भोर मागायान साधग करनेयाता पुरुप सय प्रकार मुखी हो जाता है।

घेण्डसंहिता। है शरीर तात्पर्य-नाड़ियों में जो वायु भरा रहता है यह पिना परिचालन झिया के गुम्न साधे एक रस बना रहता है जघकोई और दूसरे प्रकार का यायु नमझे भीतर जा पेठा और उस यायु में मिलगया तो द पट नाना विकार उत्पन्न फरके रोग राशि प्रगट करता है, विशेष का वायु के विकार अधिक उत्पन्न देते हैं । परन्तु प्राणायाम से गया वायु माहियों में पैठता है. पुराना गुम्न सधा हुमा यायु निकालता रहता रस्ते विकारी भी वायु प्रर्यात् विक्षारी यस्तु से उपजा भी चायु में जाकर नारियों में पैठ रत में निफर भी अपना नसर नही पहुंचा मला फोकि नाहिया व्यायाम ( कमरत ) ने अंगी रहती है, पुष्ट है। जाती है, उनके भीतर विकार निर्यिकार बरामार गुण करता है । यी निमित योगी लोग दीर्घायु और मुखी रक्षत है । अथ सूर्यभेद कुम्भक। कथितं सहितं कुंभ सूर्यभेदनकटणु । पूरयेत्तूर्यनाड्या च यथाशक्तिबहिर्मगत् ॥५॥ धारयेद्वहुयत्नेन कुम्भकेन जलंधरैः। यावत्त्वेदोनसकेशाभ्यां तावत्कुर्वतुकुम्भकम् ॥५८॥ पेपर महाराज ने पपरसपालि से फदा जि, सहित मामन भेद मे पहिला कुंम का पानसमा मिचरण ते कह पाये भय मूर्य भेद नाममा कुम्मन का विवरण सुने । पहिले पालघर पंध नागदगुद्रा पारए कर माक के दरिने छेद मे मिती शक्ति वायु भींच कर पाए करें। फिर यरे पय महित नमा मत योग से ife, ma. नए मोर यासों में पसीमा न भाये तब तक गियर र 2/22 घेरण्डसंहिता। प्रायोपानः समानश्योदानव्यायौ तथैवच । नागः कूर्मश्चककरो देवदत्तो धनजयः ॥५१॥ माण अपान, समान, व्याग, दान, ये पांच प्रकार के पायु. शरीर के भीतर रहते है। तथा नाग, कूर्म, सफर, देवदत्त, धनञ्जय, ये पाध मकार ले बायु शरीर के बाहर भाग में रहते हैं । हृदिमागो बहेनित्यं अपाना गुदमयडले । समाना नाभिदेशेतु उदानः कण्ठ मध्यमः ॥६०॥ व्यानाव्याप्य शरोरेतु, प्रधानाः पञ्च बायवः । प्राणादाम्पचविख्याता नांगाझाःपञ्चबायवः॥६॥ माण साम यायु पदय में, पान कुदा देश में, समान नामी में उदान फट में, एमी नमार प्यान नामक यायु समस्त शरीर में व्याप्त है। घर पढ़ता रहता है। ये प्रधान प्राप प्रकार के यायु है। धन कार, देवदा, सनम, ये पाप बाहर वाले यायु प्रधान है। तेपामपिच पचानां स्थानान्यपि बदाम्यहं । उदारेनाग मास्यातः कूर्मरतून्मीलनेस्मृतः॥१२॥ कृकरः सुकृते शेयो देवदत्तो बिजम्भणे। . नजहाति मृतेशापि सर्वव्यापी धनञ्जयः ॥३३॥ ये प्रकार यापु भिम जिम स्थान में प्रवाहित होते हैं या राम करते ३ मुना, नाग नाम वायु यह इमार लेने में माता है. कूर्म नामक यायु पास मदने सेनने में मत पलक गाने का नाम यायु गो में याहिपको में देवदा मामा माय अयान में . तपा माग, .

१०२ घेण्डश्तिा। यहता थे. मौर धनवप नामक घायु मरण नेपर भी मृतक देश (ताश) में भी ओ यना रहता है, जिसके द्वारा लाश का फूलना पचकना आदि बहुत से वायु कार्य देख परते हैं । नागोगृहाति चैतन्यं, कूर्मश्चैव निमेपणम् । क्षुट कृकरश्चैव जुम्भणं चतुर्थेनतु ॥ भवेद्धनञ्जयाच्छब्दं क्षणमात्रं न निःसरेत् ॥६४॥ पांच प्रकार जोमाय बायु उनसे पांच प्रशारफे शारीरक कार्य :-नाग नाम यायु जो टिकार में रहता है वह चैतन्यता ग्रप करता है भर्यात भोजन किया हुमा मन भामाशय में पहुंच कर जप तक ठो भपने परिपाक दे स्थान पर नहीं पहुंचता तम तक एक प्रकार का नया उत्पक किये रहता थे जिस्से कुछ मानसिक स्वाभाविक वित्त विकृति रमतो थे. परन्तु जय एकार जाती है व यह भामाशयस्य सद सपने परिपक्क स्थानपर पहुंच कर माराम देता है और फिर मान सिफाये उत्तमता से हो सकते हैं. इसी मिमित्त कार के घायु का गुरा घेतन्यता सम्पादक कहा जाता थे । फूर्म नामप यायु तो पलक भागने में रहता या पलक भानने at iलो का भाराम मिलता है ऐसे कार्य सम्पादन करता है. मेमों में एक प्रकार का रस पता थे जिस्ले ने मदा सर रहते है भीर बम रावट से किसी प्रकार का मत उस नेत्रको पुप्तली पर नहीं पेट सत्ता, पदि नेत्र में सरायटन रुपा कारण परमार श्री सदी पून मादि पुतनो भलीमो माये और फुप भी न दे पर पान धर्म नाम पायुममाय मे पल पा करतीता ने को भए पापा कामा समेतरापट न पा ली और गण आदि भी पुतनी देर टार नही मत। पेग गाम भी घेवडमेशिता १.२ -- पुष्टता मुद्रादि के द्वारा हो सकती है कि पलक न मांजनेसे नेत्रने मधिल दिपता प्राप्त देश ने गांभयो मुद्दा आदि में पद पाये हैं. परन्तु पिना मुद्रा कुछ मंत्र की रक्षा के यह कमी कूर्म वायु का गुण है। हार नाम प्रायु तुधा और कृष्णा ग्रहण करता है. अर्थात लक्ष भागे से एक प्रकार का आयु बाहर से आकर असे वेग से निकलता है उसे भामागंयका स्थित पचा हुभा भन्न प्रल बहुतही शो नीचे भैतड़ियों में फँस जामा और भामाशय का भाग खाली हो जाता और उसे भामाशय पूर्ण होने के लिये गारिपां उद्यत होती है वही दुधा वया कबी मासी है. शान की कमी से क्षुधा और जन्न की कमी से वृप्या हाती ३. ये कार्य इसी कार नाम वायु को द्वारा सम्पादित ऐति ३ ॥ देवदा नामफ यायु से जानुमा कार्य हुमा करते हैं अर्थात् जय गर में यायु की गति शिपिल मे जाती व एक, प्रशार का मासस माजाता उस भानस मे मानिस यति मी शिपिन्न हो जाती है. तय उप शिपिन वायु की गति को सघश करने के लिये धाएर से रम देष | गामक यायु के मुर से नाय जे माफपंण किया जाता है और पिर केले जाता उस्त गप तक भागते रहो पायो नहीं सब तम मारान गिज्ञा रहता है, परन्तु का पाम से इसकी भी आवश्यकता नहीं रहती यह भी चाल यश र ॥ पनतर वायु किसी समय अलग नहीं का मामा से मद का सामना करता है, मत् चहे माने पदपन्न करने, शद दत्यनाने के कारण दो व्यका येगमे एमाग भोर प्रियाग , यह सयोग और पिग जैसे अकारादि समीर सादि मन में तथा करता नादि में प्रगट है, पहिले उदय में मा उठा दाग पंट मलो में नया सगता तय भकार ar. Irarit र विखार समोर और भनि मदा गरीर में रहता घेरण्डसंहिता। संकोच भाव से प्रगट देते हैं, इससे स्वरों को विवृत प्रयत्न के वर्ण को हैं. इसी प्रकार पहिले कठ नली के तर उपर भाग का सयोग करके पीछे वेग से यियोग करने पर कवर्ग वाले पर्ण प्रगट होते है, उसी से उसको स्पर्श कहते हैं, दोनो हापों को येग से एक २ के साथ योग करने से ताली बजती है, इत्यादि कार्य जितने होते है ये सब धनञ्जय नामक वायु फे हैं. मुख्य पात पद हे कि बायु एक ही है परन्तु कार्य भेदसे अपने २ स्थान पर पृथक् २ नाम धारण शिये है ॥ सर्वते सूर्य भिन्ना नाभिमूलात्समुद्धरेत् । ईडया रेचयेत्पश्चादुधैर्यणाखण्डवगतः ॥६५॥ पुनःसूर्यणचाकृप्य कुम्भयित्वा यथा विधि । रेचयित्वा साधयेत्तु क्रमेण च पुनः पुनः ॥६६॥ पहिले ५७-५८ श्लोक में कह पाये, हि मूर्य की गाड़ी (नासो दरिने छेद) से यार को वायु को यथा शक्ति खींच के जालंधर बंध के परित कुंभक में धारण करे से इस काम के समय कथित १० प्रकार के प्राणादि समस्त माह के भेदो की, मूप्यं नाही (नाक के दहिने छेद) से भाग २ करके सीधे हुये का, धारण र जैसा हि पहिले पाह पाये हैं कि जय तक गए शोर मास में पसीना न आये पाभे से सौर उधर मे ममान नामक माय को पटाये, उसके मनन्तर धीरता के माप यो थेग मे (पीच में नदी) नाक के पाए छेद मे रेपन करे । भी प्रकार फिर भी उमो मूपे मारी ( दहिने छेद) से भाकर्षण करके कुम्भ करे भीर मे कह गाये है येमाही रेपग करे। इसी प्रकार पार पार का में भागी के मूगं भेद दुमत कह ॥ नाभी धेरगडमपिता। सूर्यभेद कुम्भक का फल। कुम्भःसूर्यभेदस्तु जरामृत्युविनाशकः । बोधयेत्कुंडलीशक्तिं देहानलविबर्दनः ॥ इतितेकथितंचण्ड सूर्यभेदनमुत्तमम् ॥६॥ यह मूर्यभेद नामक कुम्भक जरा (बुढाई) मरण पन मन को नष्ट रता है । इसके माधन से कुगडलिनी शक्ति जाग उठती है और देशको अग्नि बढ़ जाती है अर्थात् क्षुधा लगती और भोजन किपा पदार्थ पच जाता॥ तात्पर्य-गरीर सञ्चारी जितने प्रकार के वायु गिनाप पाये हैं और मिनसे कार्य दिपाय भाये हैं वे यदि अपने २ कार्य को ठीक परिमाण से दिया करें तो शरीर निरोग रहता है और यदि अधिक प्रमाण से या अस्त्र प्रमाण से करें तो रोग वृद्धि के कारण है तथा मानसिक शक्ति को पदाय के उन्हीं व्यापारों को मोर कुमाये रहते है। जमे हृदय का बहुत गल्द २ पापकाना, माणको अधिकता है, ऐसादी वायुका भधिक यूटगा मपान के कार्य की अधिकता है, पेट का धित फूनमा समान यायु के कार्य श्री प्रधिकता हे, स्वास का मधिन घलना (दमा) मादि दान के कार्य की प्रपिता है. इसीप्रकार शरीर की पीड़ा व्याग के काम्यं की मधि. | आता है, मरुद २ पन्नों का फिरमा कूर्म ने कार्य की भधिकता है. क्षुधा विमा का गधिक होगा पा हिचकी का यहना कभर के बाप्पं को मधिल इता है. जमुहाई का प्राधिक ना देवदत्त के कार्यो मधिनता, वपाद में कर्फशता होगा भादि पनप के कार्य को अधिरतावा म मरों को न्यूनता, यानी हद कम पाप, माम नही, पेट में मुटे. माम , में सट मा दुः७, मुलाया जाये त्यादिमीरोगों के पारप ६. तपा मगार इमारवा

घेरण्डसंहिता
न मावे, पलक्ष न फिरें या कम फिरै दुधा तृप्ता न लगै या कम लगें,
जमुहाइन आवे, वा कम आवे शब्द उच्चारश न किया जाय वा स्वर मद
हो जाय इत्यादि भी रोगो के प्रकार हैं. इनसे शरीर दुखी रहता है, मन
विफल रहता, तथा मानसिक शक्ति को उत्तेजना जाती रहती है, बुद्धि
विषम हो जाती है, स्मृति नष्ट हो जाती है इत्यादि नाना प्रकार की
शांति प्राजाती है। योगाभ्यास से जैसे कि सूर्यभेद कुम्भक कह पाये
इससे तन सय प्राणादि वायू के कार्य अपने साधीन (काबू) में रहते है
चहे घटाघे घई यढ़ावे, घहे बन्द करदे, चहै ठीक २ हाने दे त्पादि ।
मुस्य बात यह है कि जय हुन वायु के कार्यों से कोई कष्ट प्राप्त हो तब
उक्त कुम्भक मे शांत कर सका है. जैसे फि सांमी या हिचकी होने लगी
तो यह कुम्भफ करने से कटपत बंद हो सकी है, इसकी परीक्षा भी की
गई है. इसी निमित्त यह योगशस्त्र सय प्रकार के रोगों को एक मात्र
दिव्य श्रीषच है जो अपने शरीरही में सदा वर्तमान ही ढूंढने की
नरूरत नहीं रहेगी। इससे योग विद्या में मनुष्यों को प्रष चित्त लगा.
ना चाहिये।
उज्जाय्यी कुंभक ।
नासाभ्यांबायुमाकृप्य वायुवक्तेणधारयेत् ।
हृद्गलाभ्यांसमाप्य मुखमध्येचधारयेत् ॥६॥
याहरी यापु को मान से दामो उदो मे गौच कर मुठ में धारण
.१ सपा और के भीतर की वायु को भी हदप मौर गले के घेग गोर
दयाय मे सीप र मुरा में मो.यायु फे साप मिलाप दे जो कि पक्षित
पादर में शौच कर भरी गई पी
मुसंरक्षाल्यसवेदर कुर्याज्जालंधरततः ।
आगक्तिकुम्भकंकृत्या धारयेदविरोधतः ॥६९॥

घरगडसंहिता। को जब बाहरी भीतरी दोनों वायु मुख में एकर क्षर तय रुपर से मुह धोय डाले और सम्यक् बन्दनादि करके जालन्धर बन्ध नामक मुद्रा सा- चरण करै । और जहां ता शक्ति रहै कुम्भस प्राणायाम के योग से यायु में धारण किये रहै परन्तु कोई विधान पढ़ने पाये बाद मुखही मे रेचन करें। इसी सज्जायी कुम्भक कहते हैं । उज्जाय्यी कम्भक का फल। उज्जायीकुम्भकंकृत्वा सर्वकार्याणिसाधयेत् । न भवेत्कफ रोगं च क्रूरयायुरजीर्णकम् ॥७०॥ आमवातं क्षयंकासं क्वरप्लीहा न विक्षते । जरामृत्यु बिनाशायचोज्जायों साधयेवरः ॥७॥ उज्जायो नामक पुस्तक को करके सय कार्य साधन करना चाहिये। इम कुम्भक के करने में कार के रोग नहीं होते। फूर वायु ( रुख वायु का विकार ) भी, मामवाल, क्षयी, सांमी, ज्यरप्लीहा, ये सब राग भी नहीं सताते । जो मनुष्य जरा मृत्यु को मिनट किया था यह एप उन्नायी को अवश्य साधन करें। शीतली कुम्भक। जिहया वायुमाकृष्य उदरे पूरयेच्छनैः । क्षचकमकं कृत्वा नासाभ्यां रेचयेत्पुनः ॥७२।। जिला द्वारा या पापंचकर अयान जोग । मोठा के पाहर गिलास के गोदा और लिशित सांस स्पो चिस्से वायु भीतर की भोर गाँधे थे.जाये। भगनार मशही धीरे २४ हे १०८ घेरण्डसंहिता। भीतर पूरण करे और जब शक्ति भर वायु खींच ले तब कुछ थोड़े ही फाल तक कुम्भक करें और फिर नाफ के दोनों छेदों में रेचन कर दे। यहां पर यह विधेचना भी रो कि पहिले ही से नाशिका के दोनों छेदों को मूद ले तय जिहा से वायु खोचे ? या नाक के छेद सुले रहैं तय खीचै? तो ऐमी दशा पर यह निश्चय रखना चाहिये कि यह शीतली कुंभन दोनों प्रकार से श सक्ता है और दोनों प्रकार की माधना से गुण दायक हो सकता है परंतु पिना नाशिमा दयाये पर उत्तम है। शोतलो कुम्भक का फल । सर्वदा साधयेझोगी शीतली कुंभकं शुभम् अजीर्ण कफ पित्तंचं नवतस्य प्रजायते ॥७३॥ योगी सर्वदा प्रर्यात सय काल में जहां कहीं रहे इस शुभकारी गोतनी कुम्मक को साधन करे। स्से अजीर्ण, कफ रोग, पित्त विकार, ये कभी नहीं नम साधक को सताय सके । भस्त्रिका कुम्भक। भस्त्रेव लोहकाराणां यथा क्रमेण संभ्रमेत् । तथाचायुंच नासाभ्यामुभाभ्यांचालयेच्चनैः॥७॥ जिम प्रकार लोहार की कमी मार २ उठ २ ३ यायु रचिती है पी प्रकार नाक के दोनों की में धीरे २ वायु को पार २ गीध मोर मदर में पूर्ण.. प्रयंविंशति पारञ्च कृत्वा कुर्याच्च कुम्भकम् । नदले धालयद्वायं पूर्वोक्तच. याशिंध ॥५॥ .

धेरण्डमंहिता। त्रिचार साधयेदेनं भस्त्रिका कुंभकं सुधीः । नचरोगं नचक्लेशमारोग्यंच दिनदिने ७६ ॥ उसी प्रकार जैसा कि पहिले वह मायेहैं योस बार बायु खोचकर फिर कभक पर जम कुंभक शक्ति भर पूरा हो जाय तब उसी प्रकार जैसा चि पहिले धोकनी की तरह चींचने को प्राये हैं, उसी नाक छेदों | मे बीम बार के झोकामे रेचन करें। इसी प्रकार म भमित्रका कुंभम को | बुद्धिमाग नर तीन चार साधन करै ते नमो न रोग हों • कोई केश है। और दिन २ प्रारोग्यता प्राप्त होगी भामरो कुम्भक। अर्द्धरागिते योगी जन्तूनां शब्दबर्जिते । कीपिधायहस्ताभ्यां कुर्यात्पूरककुंभकम् ॥७॥ जय प्राची रात पीत जावे तय योगी एकान्त स्थान में आय, जहां कि निमो जीव जन्तु का शब्द न सुन पड़ता है, वहां बैठ कर दोनों हाथों में कान मूंद ले और पूरक तपा कुंभम प्राणायाम करे । शृणुयाद्दक्षिणे कर्णे नादमन्तर्गतं शुभम् । मयमंझिजि नादच, वंशीनादं ततःपरम् ॥२८॥ मेचमार भमरी, घंटा कांस्यं ततः परम् । तुरी भेरी मृदङ्गादि निनादानक दुन्दुभिः ॥९॥ जय प्रयोक्त विधि में योगी कुंभक करेगा तब उसको ध्यान देकर दहिने कान में मुनगा धाहिये. ममप गरीnaire नाद यह सुनाई पड़ेगा, परि श्रीगुरक्षा सम्म गुन पहेगा पिर घोड़ी देर घेण्डमंहिता। में वंशी का मा शब्द मुन पड़ेगा, उमझे उपरान्त मेघों की सी गर्जन मु. नाई देगा, उसके उपरान्त झा का शब्द सुन पड़ेगा, फिर भ्रमरी कासा गुन्गुनाना सुन पड़ेगा, नसके बाद घटा का सा नाद सा सुन पड़ेगा, उस के बाद मजीराका शब्द शुनपड़ेगा, फिर तुम्ही का मा नाद, फिर भेरी (नरसिंहा) फिर मृदङ्ग, फिर नगाड़े का सा शब्द सुन पड़ेगा। एवंनानाविधनादं जायने नित्यमभ्यसात् । अमाहतस्यशब्दस्य तस्यशब्दस्य याध्वनिः ॥८॥ ध्वनेरन्तर्गतंज्योतिज्योतिरन्तर्गतमनः । तन्मनोविलयंयाति तद्विष्णोः परमंपदम् ॥ एवंभ्रामरी संसिद्धः समाधिसिद्धिमाप्नुयात् ॥८॥ उक्त नाना प्रकार के नाद तभी उत्पन्न होगे जब कोई मनुप्य प्रति दिन अभ्यास करे, अन्यथा चाहे कि एकही दिनमें सुन पढ़े से नहीं । उस समाहत (जिमको किसी ने नही किया जापही होता है) उमकी "द्भुत ध्वनि सस ध्वनि के अन्तर्गत एक प्रकार की ज्योति उत्पन्न होती है, उस उयोति के अन्तर्गत मान है. उसमें लप हो जाता है. यही यिष्णु का परम पद दे, इसी प्रकार भ्रामरी कुम्भक सिद्ध हो जाने पर समाधि सिद्ध ऐ जाती थे। सापयं--गर पाधफ भ्रामरी कुम्भक के योग से मांख मूद कर हाय के मध्य में जो द्वादश दल कमल ऐ उसी देरीगा भीर उस भगा- ६१ नाद की अद्भुत ध्वनि मुगा तय मन अयश्य एकाप होगा। इस ममप मारा के मूदने पर जो भीतर एक प्रकार की दृष्टि उत्पन्न होती है " दृष्टि में एक प्रकारको ज्योति मानुन पढ़ती है। यही ज्योति पिशु । परम पद । भात मी अवस्था से गौर एवार की मुख्यायस्या घे संहित।। कुछ भी फर्क नहीं है। योगी लोग उभ अवस्था को इसी र म बात कर परमानन्द जाम किया करते है। ध्वनि एक ऐसा पदार्थ है विमा नघर स्वभावही में जा सहारन होता है। जैसा कुछ ध्वनि में मम एमाण होता है वैसा किसी विषय में नहीं । इसी मिमित कहा है कि:- "जपादष्टगुणध्यानं ध्यानादष्टगुणंतपः । तपसाऽष्टगुणं गानंगानात्परतरंनहि" ॥ यानी जप करने से आठगुमा मग ध्यान में लगता है और ध्यान माठगुना तप में क्योकि तप न्द्रिय दोनों को एकत्र कर देता है ध्यान भल्द पमता नही । तप से साठगुना गान में पोकि श्रवण गति सब तरफ से मन को खींच लेती है। गान परे कोई भी प्रस्तु नहीं है को मन एकाय कर सके त्यादि। मुख्य बात यह है कि योग विद्या का सार समाधि यह समाधि इम भ्रामरी नामक कुंगफ से बहुत जल्द मिद्ध हो सकी है। मूच्छी कुम्मक। सुखेनकुम्भकंवत्वा मनश्वभुवोरतरम् । संत्यज्यविषयान् सर्वान् मनोमूर्छासुखप्रदम् ॥ मात्मनिमनोयोगा नंदीजायतेध्रुवं १८२॥ मयम र यो सहित पूर्य कधित विधान से कुE Aणापाot और मन की दृष्टि के द्वारा माहों के योध में लगा दे। और मित विषय, रूप, रस, गन्ध, स्पां. सदमादि ई.सय में मन को तिर में। मोदी के मध्य में भामा पुर नाम द्विदल स्वेत कमल के नी में घेगडमंहिता। - मन । संयुक्त करै । और मन मुख प्रद मूर्छित की भांति है। जावे । और मन के योग से परमात्मा में लय हो जाय इस्से निश्चय आनन्द प्राप्त होता है॥ केवलो कुम्भक। हंकारेणबहिर्याति सः कारेणधिशेत्पुनः । पट्शतानिदिवारात्रौ सहखाण्येकविंशतिः ॥ अजपानामगायत्री जीवोजपतिसर्वदा ॥३॥ स्वास वायु जब भीतर से बाहर निकलता है तय (ह) यह अक्षर सच्चरित देता है। और जय स्वाम भीतर की ओर खींचत है तब (सः) | यह अक्षर उच्चारित होता है। ये दोनों प्रक्षरों का समुह एकार हजार छः मी २१६०० दिन रात में उच्चारित होता है अर्थात् दिन रात में इतने स्वाम चलते हैं। इन देनों अक्षरों का विचार तंत्रकारों ने यह किया हे कि (ह) शिव । (मः) गक्ति है । तथा (हंमः) और (माह) दोनों पद एकही वस्तु हैं । इस्स इसका अजपा गायत्री कहते हैं (आप ही भाप निकलने से अजपा है) से। जोय हमको मदाष्ठी जपता रहता है । मूलाधारेयथा हंसस्तथाहिहृदिपंकजे । • तथानासापुटद्वंट्वे त्रिविधंसङ्गमागमम् ॥८॥ मूत्राधार अर्थात् लिङ्ग भौंर गुदा क्षे मध्य भाग में हृदय पद्म अर्थात् भमाहत नामक कान में, तथा नाक के दोनों छेद अर्थात् ईसा और पिङ्गला नाड़ी में इन तीनों स्थानों से (हंमः) रुप अजपा का जप हुआ करता है । अपांत् इन तीनों स्थानों से स्याम बाय का mamar war करता है।

११३ घेरण्डसंहिता। शरीर षण्णवत्यंगुलीमानं शरीरं कर्मरूपकम् । देहाबहिर्गतावायुः स्वभावोद्वादशांगुलिः ॥८॥ गायनेपोदशांगुल्यो भोजनविशतिस्तथा । चतुर्विंशांगुली प्रस्थः निद्रायां निशदंगुलिः ॥ मैथुनेपनिशदुर व्यायामेचततोऽधिकम् ॥८६॥ और शास्त्रों के हिसाब से मनुष्य का देश ८४ अंगुन का प्रमाण, अर्थात् माढ़े तीन हाय लम्बा है, परन्तु योग प्रस्त्र के हिमायने मनुष्य ६६ छानवे प्रगुल का है। इस भेद का कारण यह है कि और शास्त्र कार खड़े मनुष्य की बराबर एक दण्ड खड़ाकर नापते हैं तो ठीक ठमी की शरीर के से होगा, परन्तु योग शास्त्रयाले पैर के अंगूठे दो यल मनुष्य को खडा धार के दौरे से नापते है और वह हारा नाक के ऊपर होकर ब्रह्मरंध्र में लगातहै स्लेि १२ संगुल नौरो घर लाता है। इस्ले ६ बानबे अंगुन का मनुष्य शरीर है। इसी लिये दि. | शेषश दिया है कि (कर्म सक) प्रर्धात् अंगूठे से लो ब्रह्मरन तक कर्म रूपक शरीर है और केवल नाप वाला त८४ नंगुन है ॥ प्रय गरीर से बायु को भी योग शारत्र उतना ही लम्बा मानते हैं जितना लम्या कि शरीर थे। यानी ६ अंगुन परिमारा शरीर के अभ्य. न्तर वाना कर्म स्वरुर यायु है । वदी बायु जब देश के बाहर स्थाना- विक श्वास प्रश्वाम द्वारा होता है तय उमकी दो शरीर से बाहर बारह १२ घंगुल की होती है। यानी {म या माया पाम से जय पापही भाप यायु निकलता है तब केवन १२ अंगुल तक माता है। जय गान किया जाताहे तय कुश येग अधिक शताहे रस्ते व नायु माना अंगुन ता जाता है। भोजन में न मोटर पेठता है तब भीतर से घायु दयाव के कारण वोमं अंगुम तक शरीर वार प्राता - - घेरण्डसंहिता। है। इसी प्रकार पंच (रास्ता) चलने में चोमोम २४ अंगुन बाहर जाता है क्योंकि परिश्रम से बायु का वेग बढ़ता है तो बाहर की गति भी बढ़ जाती है निद्रा में तीस अगुन तक याहर जाता है क्योकि उस म- भय मानसिक व्यापार जो वायु के व्यापार को कुन च भे रहते हैं वे शिथिल रहते हैं और वायु का माना जामा मेरोंक रहता है । मैथुन में छत्तीस भगुन शरीर से बाहर वायु जाता है, क्योंकि उसमें शरीर की समस्त नापियो का वायु कपित हो कर झोंक से निकलता है। मुख्य करके वीर्य पतन में इसका स्वरूप प्रत्यक्ष होता है। और व्यापाम, यानी कसरत, या दौड़ना, या कोई काम वेग से या मेहनत करने पर उसे भी अधिक वायु शरीर से बाहर निकल के जाता है और यही उसका स्वरूप कहा जाता है॥ स्वभावेऽस्यगतेयूँने परमायुःप्रवर्द्धते । आयुःक्षयोऽधिकेप्रोक्ती मारुतेचान्तराद्ते ॥८७॥ स्वाभाविक स्वास वायु का परिमाण केवल १२ बाहर सगुन घाहर गति में कह पाये हैं. से यदि उस्से कम गति किसी प्रकार शरीर से थाहर गमन में दोय तो परमायु (गर) यदगाती है और यदि स्वाभा- यिक घायु को गति उस्से (१२ अंगुल से) अधिक हो जाय तो वायु उप शती है। . पियेगा.-सामाविक वायु का पटना चिन्ता, व्याधि, शोक, भादिनमाय मे भानन्द युक्त शरीर में होता है और उसका बढ़ना सनी चिन्ता, व्याधि पाठ मावि में होता है. इसी वायु को ठीक रसमे पाम परिमाण से यादर मिलने के लिये योगगास्थनी गायश्यकता है। उधर गाम, भाना, पन्य, मिद्रा, मैथुम, मायाम ममें मे यायु बढ़ • माना है। हममे भी भायु के पत में हानि पहुचती है, पान्तु पदि गागवाये मय का परिमाय म.शायर किये जायें गोर

घेरण्डसंहिता
कुम्भक अधिक बढ़ाप दिया जाये तो भायु के पक्षमें हानि न पहुंचेगी, या
भोजन को छोड़ बिलकुल न किये जावे तो और भी सत्तम है। फिर पूरा
कुम्मा पदि भरमकै अर्थात् शत, सहस्र, वा असंख्य वर्ष तक स्वास,रोक
सके तो भोजन को भी शाई आवश्यकता नहीं रहेगी। रहा गात उसमें
एचपि वायु शरीर से अधिक प्रभार निकलती है तो मी उसका एक
हमरा गुस यह है कि नित्य के पास से कट गली भादि को नालिया
कमी पड़ जाती हैं इससे बाहर की जो विकारी वायु प्रतिक्षण पैट फर
व्याधि उत्पान करती है वह नहीं ठहरने पाती, वही प्रापः छन २ के
निकला करती है. और यदि विशुद्ध ध्यान शाम AT सपदेश विषयक गान
देता है तो रित्त को परमानन्द प्रदान करता है।
पायाम के विषय में भी यही बात है कि अभ्यास से नाही, पेशी,
इसो सब पुष्ट होती है और विक्षारी वायु का असर नहीं देता, परन्तु
| वस पायाम के प्रयोग भी इसी योग के रीति से होना चाहिये, नहीं तो
पहिले तो नाही भादि पुष्ट होती हैं किन्तु जहां बसा भी विकार
भीतर पहुंच के रक्त में मिम्बा तहां तुरन्त भायु सय करता है। इससे
पूर्वोक्त मासनों की रीति से ही भापाम ठीक है अन्यथा शरीर का
प्राणवायु नष्ट हो जाता है।
तस्मात्प्राणेस्थितेदेहे मरणनवजायते ।
वायुनाघठसम्बन्धे भवेत्केपलकुम्भकम् ॥८॥
तिस्स यह सिद्धान्त है कि जब तक माणवायु देश में स्थित रहता
'म त मरण नही होता । इसीलिये शोर रक्षा के सम्बन्ध में उस
| प्राणवायु के द्वारा केवल कुम्भही मुरस है ।।
जावजीवाजपेन्ममन्त्र मजपासस्यकेवलं ।
भझायथितंसख्या विममधलीकृते ॥९॥

घेरण्डसंहिता। अतएवहिकर्तव्यः केवलीकुम्भकोनरैः । केवलीचाजपासख्या द्विगुणाचमनोन्मनी ॥९॥ मनुप्य अब तक जीता रहे तय तक जैमी संख्या विहिन है उसी प्रकार अजपा मन्त्र जपे देह के भीतर प्राणवायु के समागम सेही कंवनी कुम्भ माधित होता दे, इंसने मनुष्यों की सेवाली कुम्भ अवश्य करना चाहिये । फेवली कुम्भ में मजपा की भस्या यदि दूनी घरके जपे ते यह भाजपा मग फेो दिन २ सन्मन अर्थात् ऊंधे भाव को पहुंघाती है । नासाभ्यांबायुमाकृप्य केवलकुम्भकंचरेत् । एकादिन्यतःपष्टं धारयेत्त्रयमेदिने ॥११॥ नाक के दोनों लेदों से यायु को मांध को केयण कुंग का माधन पर और उच्च दुम्भा नगय पहिठे दिन पूर्वोक्त अजपा मत्रको मस्या एम में लेकर उन तफ चीमठ बार पूर्ण मातयत धारण किये रहे । केवलोमष्टधाकुर्या धामेयामेदिनेदिने । प्राथवापञ्चधाकुर्या धयातककथयामिते ॥१२॥ प्रकार से संयती कुम्भ को प्रतिदिन भाठ पहर में साठ यार करना चाहिये, नयया प्रतिदिन पांच यार साधन फरे। यह घेरा भी गिप्प गे कहते हैं. जेघा कि तुम इम कहते हैं प्रातमध्यान्हसायान्हे मध्यरात्रिचतुर्षके । त्रिसंध्यमययाकुयाँ ससमानेदिनेदिने ॥१३॥ मातााग्न. मध्याद मायाल, मध्यराति, तथा रातिशेष भाग में । भपया यर भी हो सके तो तीनों मंध्या में पर भाग .tपाच मिदिन म्मे कभी न पूरे । ।

धेरएसंहिता।
पञ्बारंदिनेवृद्धिारकंचदिनेतथा।
प्रजपापरिमाणंच यावसिद्धिःप्रजायते ॥१४॥
न त यह केवली कुभिक सिद्ध न हो लेप तप तक प्रति दिन
या परिमाण एक यार भपका पांच बार क्रम से बढ़ाते जागा
प्राणायामंफेवलीच तदावदतियोगवित् ।
कुम्भककेवलीसिद्धौ किनसिद्धादिभूतले ॥६५॥
NE सापक देवली कुम्भक साधन कर लेता है वम व योगवित
भधार योग विद्या का जानने वाला. कहा जाता है। केयली कुम्भक
मिद्ध होने में भूतन में ऐसी कोई यस्तु नहीं याकी रहती जो सिद्धन
माय असते क्षेत्राशी कुष्पक को भयश्य माधम करना तधित है।
इति वा घेरण्डसहितायां घेरण्ड बण्ड कापानि सम्बादे
घटख योगप्रकार यो प्रायायाम प्रयोगा नाम
पञ्चमीपर्दगः ॥ ५॥
षष्ठोपदेशः।
प्रय ध्यान ोगः।
स्थूलज्योतिस्तथासूक्ष्मं ध्यानस्यनिविषिदुः।
स्थूलमूर्तिमयंप्रोक्तं ज्योतिस्तेजोमयंतचा ॥
सूत्मविन्दुमचंग्रह कुण्डष्टोपादेयता ॥१॥

११८ घे सूडसहिता। के घेरसह महाराज प्राणायाम की बिंधि कहकर ध्यानयोगका प्रकरण कहते हैं उसमें ध्यान तीन प्रकार वर्णन करते है, १ स्धूनध्यान, २ ज्योनिान, तपा ३ मूत्म ध्यान, तिनमें धून ध्यान मूर्तिमय होता भीत जिस देवता की मूर्ति में साधक की रुचि हो वा गुरु की मूर्ति का चिन्तवन । जिमकेद्वारा तेजोमय ब्रह्म भ्रषवा प्रकृतिका ध्यान डिया पाय उसको तेजोमय ध्यान कहते हैं। इसी प्रकार जिम ध्यान द्वारा विंदमय ब्रह्म तथा कुपहलिनी शक्ति का दर्शन मास होता है उसको मूक्ष्म ध्यान कहते हैं। स्थूलं ध्यान की विधि। स्वकोयहृदयेध्यायेत्.सुधासागरमुत्तमम् । तन्मध्येरत्नद्वीपन्तु सुरत्नवालुकामयम् ॥२॥ साधक भासन बाप के दोनो नेव मृदसर अपने हृदय के मध्य में ऐसी चिन्ता कर मानों परमातम ममृत भरा मागर वर्तमान है। भीर तुमी समुद्र के मध्य में एक रवमय दीप विराजमान है। उसी रखमय द्वीप में रख रूपो वालू की राशि चारोमोर ली है और अपूर्व शोभा पढाय दी है। चतुर्दिनुनीपतरुवंहपुप्पसमन्वितः । नोपोपयनसंफूले वेष्ठितंपरिखाइव ॥३॥ उम रख द्वीप के हा मोर नाय के यश यहुतर पुष्पों के सहित मिराममान हो। उस नायडे पयन को गाभा माना पिते की पारे ऐमी मानुम की। मालनीमतिकाजातो केशरेचंपकैस्तथा । पारिगातःस्थतैःपगन्धामादितदिङ्मुसः ॥४॥ .

घेगडमड़िता।
११६
उस नौध वृक्ष के दारी भोर मानती, बेनी, जूही, केशर, पम्प,
परिजात, स्थान पर शोर रहे हैं तथा उनको मुगन्धि से दशादिशा
तन्मध्ये संस्मरेद्योगी कल्पवृक्षमनाहरम् ।
चतुःशाखाचतुर्वेद नित्यपुप्पफलान्वितम् ॥५॥
इसके अनन्तर योगी इसी रख द्वीप के मध्य में एक मनहर कल्प
| वक्ष में धार शाखा (डाल) भाग वेदों को ध्यान पलमे स्थापन कर, उम
| गोरो वेदमई हाली में नित्य पुष्प (गिन्त नैमित्तफ काम्य में) और शुभ
कर्म के फल की प्रगटा लपी फल युक्त ध्यान करे ।
भ्रमराकोकिलास्तत्र गुंजन्तिनिगदन्तिच ।
ध्यायेत्तत्रस्थिरीभूत्वा महामाणिक्यमण्डपम् ॥६॥
उमो वेद मई शाखा के पुष्पों में समर सोकिल (मसमें परायण
साधुमज्जन) मूंज रहे हैं (पढ़ पढ़ाप रहे हैं) और निगदन्ति (परस्पर उप-
देश) कर रहे हैं। पिस समी वृक्ष के नीचे स्थिर भायमे ध्यान को माना
एक बड़ा भारी माने का मयहप बना है मौर शोभा बढ़ाय रहा है।
तन्मध्येतुस्मरेद्योगी पर्यंकंसुमनोहरम् ।
तत्रेप्टदेवतांध्यांपैयद्यमानगुममापितम् ॥२॥
फिर मुसु मायके मध्य में योगी स्मरण र मात एक मो.
सदिय रख मय पलंग
मितिम पल कपर इष्ट देवता
का ध्यान करमा कि
यस्यदेवस्ययपं यथाभूपण याहनम् ।
तद्रूपध्यायतनित्यं स्यूल ध्यानमिदविदुः ॥८॥

घेरण्डमंहिता। जिस देवता का जैसा रूप हो वैसाही भूषण और माहन यह सब | तद्प नित्यही ध्यान करे। इसी को स्थूल ध्यान कहते हैं । तात्पर्यः-पहिले जो चारो वेद शाखा वर्णन किया है इसे यह साफ जाहिर होता है कि योगियों को धेदिक मार्ग का प्रचार अधिक करना उचित है क्योंकि ध्यान कोटि में उसी का रूपक बांधा है । प्रकारांतर स्थूल ध्यान। राहस्रारेमहापनेकर्णिकायांविचिन्तयेत् । विलग्नसहितंपमं द्वादशैर्दलसंयुतम् ॥९॥ प्रय दूमरी भांति का स्यूम ध्यान वर्णन करते हैं । ब्रह्म में महनार मामक एक सहस्त्र दल कमल है. तहां योगी भी रूप मे ध्यान फरै फि उस महा पद्म की पसुरियों के योच जो कलि का है उसमें भी एषा द्वादश दल कमाल है ॥ शुक्रवर्णमहातेजो द्वादशै:जभापितम् । ह सक्षम ल व र यूं, ह स ख कें यथाक्रमम् ॥१०॥ पर दाग दाल कमान स्वेत परी और तेज में पक रहा है. मीर नमी कमल के द्वादश दलो में कम से भागे लिये भक्षर घोध करके येठारे । यपा:-ह. भ. प. म. ल. थ, र, यु. इ. १, ख. में। येही थोत्रा तन्मध्यकर्णिकायांतु प्रकथादिरेखात्रयम् । ह लक्ष कोणसयुक्तं, प्रणवंतत्रवर्तते ॥१॥ भी दापय ६१ मा मध्य में लिपुरमीच ग.

घेरण्डमंहिता। य, ये तीन वर्ण, तीन रेखा और ह, लक्ष, ये तीन वर्ण सोनामों में मिले हुये हैं, तथा मध्य भाग में प्रणव अर्थात् ओंकार विद्यमान है । नादविन्दुमयंपीठं ध्यायेत्तत्रमनोहरम् । तत्रोपरिहंसयुग्मं पादुकातनवर्तते ॥१२ योगी मप्रफार ध्यान करें मानों वहा नाद बिन्दु मय एक मनोहर पोढ़ा पिछा है, उसके ऊपर एक हस का जेष्टा विराजमान है और यही | एक जोड़ी पादुका ( सहाई ) भी धरे है । ध्यायेत्तत्रगुरुन्देवं द्विभुजंचत्रिलोचनम् । श्वेताम्बरधरन्देवं मुलान्यानुलेपनम् ॥३३॥ तहाही देश भुजा युक्त और वोग नेत्र युक गुरुदेव का ध्यान पर गौर उन गुरुदेव का यस्य श्वेत, दिश्यप, और भागों शुभवर्ण गान शरीर में लपन किये दे। तात्पर्य यहा पर गुरु को द्विभुज काह के त्रिनेत्र पसलिये कहा 'हे कि गुरु पिशानी देना चाहिये, उसके सामान्य मंत्री की भयेछ। विज्ञान नत्र भी एक विशेष नेत्र रहता ६ जिममे सात प्रत्यत krat ६ आजकल जो लोग मोटो बुदिवालों को गुरु करते हैं यह टीस शशाप्पमयमाल्यं रक्तशक्तिसमन्वितम् । एवंविधगुरुध्यानात स्यूलव्यानंप्रसाध्यति ॥१४॥ धौर यह भी ध्यान करे नानी गुरुजी ग्यत पुष्यों की माला पभिगे रक्त पर्वको शक्ति के मक्षित विमान इप्रका गुरु भाग गने में स्पून ध्यान साधित होता 4 १२२ घेरण्डमंड़िता। में तात्पर्य-रक्त शक्ति समस्थित इसलिये कहा है कि में किसी प्रकार की दिलाई नहेर, रक्त वर्ण का गुण तेजस्वी योधमा दे। अथ ज्योतियान। कथितंस्थूलध्यानन्तु तेजोध्यानंशृणुष्वमे । यहचाननयोगसिद्धि रामप्रत्यक्षमेवच ॥१६॥ घेरगर महाराज ने कहा. हे घड कापालि ! हमने तुम स्थल ध्याम यहा भय से प्याम -इते हैं तमे मुगो, जिम ध्यागसे योग सिद्ध आता है और आत्मा भी प्रत्यक्ष जाता है। गर्यात् कार्य कारण मगट हो जाता ॥ मूलाधारेकुण्डलिनी भुजङ्गाकाररूपिणी । जीवात्मातिष्ठतितत्र प्रदीपकलिकारुतिः ॥१६॥ ध्यायेनेजोमयंब्रह्म तेजोध्यानंपरात्परं । मूलाधार भात् गुख देग भौर लिन मूल के मध्य त्याग , कुपण लिपी गक्ति भुगा (स) से भाकार में विराजमान है, उसी पान दोप शिखा फी तह मोवामा भी विराजमार उसी स्थान में ज्योति छपी ग्रह का ध्यान करना चाहिये। पोका तो याम या ज्योतिष्यांग पाते हैं. यह ध्यान योगी को परात्पर रे॥ प्रकारांतर ज्योतिर्सान। भुयोर्मध्येमनाध्येच यत्तेजःप्रणवात्मकम् । ध्यायेन्नालायरलोयुक्त तेजोध्यानंतदेवहि ॥१७॥ : में घेरण्डसहिता। १२३ पर प्रकार ज्योनियान पर कह आये है अब दूसरे प्रकार का ज्योतिर्ध्यान या कि दोनी मोड़ो के घीपमें तथा मन के कपर (मान- सिक क्रिया के भी ऊचे दर्जे पर) भी ठोकार मप, शिखा माला समन्धित याति वर्तमान रहती है उसी ज्योति बलशान से ध्यान करें। इस भी लेनाध्याम बा ज्योतियान कहते है। तात्पर्य ---जय योगी गोदी बीप मान लगा का ध्यान करते ৗ ময় জান্নাত জন গান & নয় ব গ ক্ষায় ব্রাষ্ট এর को ही देखता है, फिर कुछ फाण में प्रणय गन में रहता है सही पर सोमप होशाता है. नए उस धू मध्य को दृष्टि और प्रणय की पिना मे मन को कपी गति के भर में से प्रसिभाप्त होता है वही ज्योति धाम है. इसके पान से मनुष्य के शरीर में कोई भी विकार हो गए ते निर्मल २ मन भी प्राप्त हेता है। अथ सूक्षम ध्यानम्। तेजोमयानं श्रुतं चण्ड सूक्ष्मध्यानंबदाम्यहम् । बहुभाग्यशादास्य कुण्डलीजागृताभवेत् ॥१८॥ घेरपा महाराज कहते हैं दे पापान्ति । तुमने तेजस्थान सुना अब हम तुममे सूक्ष्म ध्यान कहते हैं यह भी मुने । शिस मनुष्य को कुडलिनी जागती है वह याही भाग्यमान है। आत्मन सहयोगेन नेत्ररमाद्विनिर्गता। विहरेद्वाजमार्गच चझुलत्वान्नदृश्यते ॥३९॥ यह कुगलिनी शक्ति जप की किसी प्रकार भाग्य व जागती रे तष भी षड् नेत्रो के उदों से निकल कर माला के माप मिल के राज

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घेण्डसहिता।
मार्ग में विहार करने लगती है और ऐसी घनता धारण करती है कि
फभी किसी प्रकार भी नही देस पडतो॥
शाम्भवीमुद्रयायोगी ध्यानयोगेनसिध्यति ।
सूक्ष्मध्यानमिदगोप्य देवानामपिदुर्लभम् ॥२०॥
जय फुपडगिनी पूर्जत विधियो ने कदाचित् जागे और चञ्चन हे।
राम मार्ग में पिदर तय योगो ने पूर्वात शाम्भवी मुद्रा के योग मे
ध्यान धरे तो तुरन्त मिद के पान में माजावेगी। यह मूक्ष्म ध्यान
परम गोप्य और देयतामओ को भी दुर्लभ है ॥
सात्पर्य--पीछे लिस पाये है कि कुगडग्निनी शक्ति शरीर अहता
फा रूपका और उनफा नागना जता विनाशं है। शरीर का प्रात्मा
परा में देता है। प्राय अनेक योगी तोग शरीर को वश में लाकर भी
योग विद्या के मदाग २ कार्य नहीं करते पर नेत्र इन्द्रिय के द्वारा चित्र
पिचित पदार्थो के देखने में रागी ३ फिरते और गृहस्थो का गाल
घामत । समोसे कहा है कि हमने सुनता से योगी जन उसके रूप
के धिर नदी करमाने, अपांत् शरीर के यन देने का कार्य नहीं प्रगट
फार मा. उपी के अभ्याम लिये, जिससे कि शरीर वगीभूत देने के
उपरात याले कार्य योगी नाग किया करें शाभयो मुद्रा योग मे सिद्धि
दपा । अपात् फिर गागरण अपघार न करता मारोग ऐ
फर या दोघांगु मादि कार्य दियाप दे कि युग युगातर तक योगियो
स्थिति योग सायों में शिव है। परन्तु यह भय यही दृन युद्धि में
म्यूलध्यानाच्छ्तनुश्यं तेजेध्यानं यजते ।
तेजाध्यानालसगुण, मृत्मवानररात्परम् ॥२१॥

घरगडसंहिसा। भूल ध्यान से सौगुना अधिक तेजो ध्यान कहा जाता है और तो पान से लाख गुना अधिक सूक्ष्म ध्यान है तथा यह ध्यान परे से भी पा है। घर पह महाराज ने इतितेकथित्रचण्ड ध्यानयोगसदुर्लभम् । भारनासाक्षानुभवेदास्मात्तस्माध्यानविशिष्यते॥२२॥ कहा कि हे च कापालि ! हमने लुगमे इस म- दुलंग ध्यान योगका ब्योरा कहा, जिससे कि आत्मा माक्षात् कार हता है। और इसी कारणा ध्यान योग सब प्रकार के योगो से विशेष है ॥ इति शो धेण्ड सहितायां घेरण्ड , चण्ड कापालि सम्बादे, घटस्सयांगे, सप्तम साधर्ग, ध्यानयोगेा नाम छोपदेशः ॥ ६॥ - अथ सप्तमोपदेशः। समाधि योग । रामाविञ्चपरयोग बहुभाग्येनलभ्यते । गुरापाप्रसादेन प्राप्यतेशुमभक्तिः ॥३॥ पेगह महाराज ने घपकापानि से कहा कि मुन्न योगो मे परे म. माधि योग । परन्त यह बहुत हो यो भाग्य से पाम दाता है। माधियो की गति करने पर जब गुरसन्न होते है हम उसी हो कृपा से प्राता ३ अन्यथा गहों। ध १२६ घेरण्डसंचिता। विद्याप्रतीति.स्वगुरुप्रतीतिरात्मप्रतातिर्मनसःप्रबोधः । दिनदिनेयस्यभवेत्सयोगी सुशोभनाभ्यासमुपैतिसदसः २ जिम मनुष्य की प्रतीति विद्या (योग घिद्या) में , अपने गुरु में प्रतीति है और अपने पास्मा में प्रतीति सपा मन का प्रयाध (दृढ़ विश्वास ) हे देही योगी दिन २ मति सुन्दर अभ्यास को । सो यात जल्द प्राप्त होते हैं। घटादभिन्मनाकृत्वा ऐक्यंकृत्वापरात्मनि । समाधिंतद्विजानीयान्मुक्तसज्ञोदशादिभिः ॥३॥ शरीर से मन को मलग करके सबमे परे जो परमात्मा है उसमें ए. ता कर दे. मी को समाधि जानना चाहिये, यए भवस्था सब प्रकार की दया भादि मयस्थानों से मुक्त संशक है। तात्पर्य-इसके पूर्व दूसरे लोकमें विद्या विषय प्रतीति कहलाये है उपका मुख्य तात्पर्य यह कि विमो विद्या की साधना यदि किया चा? भार उममें प्रतीति नरेत यास में पित कभी नहीं लगेगा। ग पिये प्रथम या मावश्यक है कि विद्या विषय प्रतीति लावे, वि भामुक विद्या से मदुत कार्य वर्णन किये गये ६ वे माधनसे अवश्य का मकैगे । यदि पहिलेहो यह उपेक्षा हो गई शिव गोर पाजी हे ना को किया ठीक ही नहीं सकेगी। दूसरी मास गुरु में प्रतीति चार विद्या मिषाने याले में विश्वास रहमा धादिये, यदि पदिलेगी मे पा वृद्धि उत्पादन लियर.कुछ नहीं मिलाय सकेगा तो मीलिये पनि हो कर पाये। दि मित्ताने या की परीक्षा पाछे तर गुजरेतात्पर पर नि परीक्षा लो मे पाद उपमें मप्रतीति दोनो पितोमरी बात माम प्रतीति प्रोत् आपने पित में पास विममुकाम हम नहीं हो सकेगा। ऐगा कित घेरगडसंहिता १२७ में माने से कोई भी कार्य नही साल यही कारण है कि भाका भारत बासी गप किसी विद्या की नहीं जत्तम रीति से प्राप्त कर मुक्ते, सत्र में धांचा परी एसी कारण योग विद्या भी लुप्त शेगडी, साधक को ऐसा नहीं करना चाहिये । मंगोज गो में पढता है कि कोई शक्त कोई नई विद्या की प्रगरता करमा भारभ करता है और यह उसका ठीक सत्य नहीं हासिल कर मुक्का तो इसके पुत्र पोनाति कई (पुरुष तक चोरते नहीं कोई नामवश्य प्राप्त करके सष करते है। स समय रेल ला, पडी भादि के अद्भुत २ व्यापार हम रंगे को दिखाय रहे हैं इससे अपने पित्त की कमी नहीं बदाना चाहिये। चौथी बात मम का प्रयोधरे भात समझदासी मो अवश्य देनी चाहिये नही मोर की जगह तरह जायगा। ये बात शिममें * सही का अभ्यास दिन दिन पाता है और उन्हों की सिद्धि प्राम रामो दूता हासी ॥ मागे समाधि का जो रापण कदाकिरोर से मन मिला करके परब्रह्म में मिलाय दे उसका तात्पर्य यह है कि जो प्राय सुख दुख आदि शरीर के धर्म प्राप्त हो कर मन को माहादित और व्यथित करते हैं, उसके भान प्रयोग (जान की दूरता) से यह समझ ले भागेर केवल शरीर को के लिये सुख दुख है मन को नही । जैसे कि भगुली में फोर हुमा तो मम की दूवता तय फोडे की पीकाको सिफ अगुणों | हो में मनाना मन से उसे लगान रखना ऐसा भश्वर देखने में भी माता है कि यह प्रलयान मनुष्य के शरी में कपास कुता भारे पिसाइट के माप दुखी और कुल कुटुम्ब देला पानी भय को ध्या पहुचाता है लेकिन बहुत से दुर्गन्ध मनुष्यो को देखा गया है कि वे उसे भी अधिक पोशित होने पर भी अपने दुसी कुल कुटुम्मियों को धीरज देकर उनकी पहर को शामिया करते है। ऐमी अचम्पर में विशेष मन के प्रयोग को जरूरत है जिसे हम को शरीर से पप

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घेरण्डमंहिता।
छू नहीं जाता और
समा कर परमात्मा में लगावे । भर्यात् शरीर इन्द्रिय इनके कार्य है।
रहैं. उनमें शुभाशुम का ध्यान मात्र रहै, पर माने मन उसमे दूर है यह
भावना ग्यो । यस यही समाधि है। यह समाधि बहुत ही कठिन
माधन है । बढ़े २ येोगारुद्र पुरुषों के उन मन में
साधारण मनुष्यों में ईश्वर की कृपा से स्वभाव ही मिटु देखा जाता है,
ठमी को जन्मान्तर का साधन कहते हैं। परन्तु जो कोई इसका साधन
दृढ़ता से करेगा अवश्य फल प्राप्त कर सकता है उस्से परे दूमरा मानन्द
और मुह मनुष्य के लिये कोई भी नहीं है। इस्से इसको अयश्य साधन
करना चाहिये।
अइंब्रह्मनचान्योऽस्मि ब्रह्मैवाहनशोकभाक् ।
सच्चिदानन्दरूपोऽहं नित्यमुक्तस्वभाववान् ॥४॥
ना माधक सन साधनां यास कर चुका हो गौर समाधि
माधन शिया चाहे या अपने मन को इम ज्ञान को और सदा मुकाये
कि. में माल हूं दूमरा कुछ नहीं। और निघप करके पहा हूं किन्तु से
ममस्त व्याधि जनक गोक हुभा करते हैं ठमका भागी में नहीं हूं. कंबल
शीर है । मैं तो कया मत (तीनी काल में एक भमाम) चित् (मत् भ•
पत् का प्रानने याला घेतन्य) घानन्द रूप (मुरादुर विगत ममम एक
भीमा) मय बन्धनों में नित्य ही छूटा हुमा अपने अमली भागों में युक्त
(यसामगानी) हूं ऐसी हो भायमा पदा चित्त में रयते ।
प्रय समाधि के कई भेद हैं उनका वर्णन
करते हैं; यथाः--
शभिव्यावसेचा प्रामायोनिमुद्रया ।
ध्याननादरसानंदं टयसिद्धिश्चतुर्विधा ॥३॥

धारासंहिता नामक पञ्चधाभक्तियोगेन मनोमूर्छाचपविधा । "पविधीयंराजयोगः प्रत्येकमवधारय ॥६॥ समाधि योग छ प्रकार से है जैसे-१ ध्यान योग मगाधि । २ नाद योग समाधि, ३ रमानन्द योग समाधि, लप भिद्धि योग समाधि, ५ भक्तियोग समाधि ६ रागयोग समाधि। ये 8 प्रकार की समाधियों को 12 मकार की मुद्राभो से साधन करना चाहिये । शामयीमुद्रा से ध्यान fan समाधि, सेघरो मुद्रा से नादयोग प्रमाधि, भ्रामरो नाम कुम्भक के ११ से खान्दयोग समाधि, योसिमुद्रा पोग से लय सिद्धि योग समाधि, भक्ति अवलय पूर्वक्ष भक्ति ये समाधि, पसी प्रकार मनो मूळ कुम्मक के योग से सपायोग समाधि का साधन करना चाहिये ।। ध्यानयोग समाधि। शांभवीमुद्रिकांकृत्वा आत्मप्रत्यक्षमानयेत् । बिंदुब्रह्मसकृद्दृष्टा मनस्तत्रनियोजयेत् ॥५॥ प्रपा शाभयो मुद्रा का अनुष्ठान करके तय शात्मा का प्रत्यक्ष रे भनन्तर बिन्दु मय ब्रह्म हा एक बार दर्शन करके यही मम को | नियुक्त करे। स्वमध्येकुरुचात्मानं आत्ममध्येचखंकुरु । अात्मानंखमयंदृष्टा नकिञ्चिदपिवाधते ॥ चदानन्दमयोभूत्वा समाधिस्योभवेन्नरः ॥८॥ तर शिर स्थित प्रहलोशमय भागाश मे मध्य में सपने मोबा. त्मा को स्थापग करें और इस प्रकार अपने जीवात्मा के मम में शिर स्थित ब्रह्मलोक मय भाका.फेरो स्वापत करे, पचात् घपो जीवात्मा १७ . घेरण्डसंहिता। को आकाश में देख के वह पुरुप किसी वस्तु से किञ्चित् भी बद्ध न हो मी सदानन्द मय हो के समाधि में स्थित हो जाधे इसी को शाम योग समाधि कहते हैं। नादयोग समाधि। साधनातखेचरीमुद्रा रसनार्द्धगतासदा । तदासमाधिसिद्धःस्या द्वित्वासाधारणक्रियां ॥९॥ खेचरी मुद्रा साधन के द्वारा जीभ को ऊपर की ओर जानेवाली कार रक्से, अर्थात् तलुये के गड्ढे में जो अमृत कूप विद्यमान है उसी में जीभ को सयुक्त करना होगा । स क्रिपा के द्वारा समाधि सिद्ध है। जाती है और जितनी साधारण क्रियायें हैं सब को छोड़ दे इसका नाद माग समाधि कहते हैं। रसानन्दयोग समाधि । अनिलंमन्दवेगेन भ्रामरीकम्भकंचरेत् । मन्दमन्दंरेचयेद्वायुं भृगनादततेाभवेत् ॥१०॥ भामरी नामक कुम्भक का मनुष्ठान करके. घोरे धीरे हलके येग से त्रास यायु को परित्याग कर हम योग के मापन करने से देह भीतर भ्रमर की यनि के समान नाद मुन पड़ता ॥ अन्तःत्यंभ्रमरोनादं त्यातत्रमनोनयेत् । समाधिर्जायतेतत्र प्रानन्दःरोहमित्यतः ॥११॥ जय गोरमीवर मीका गाद मने तय यही बयान परता घेरण्डसंहिता। अपने मन की लगाम दे, तर उस समय समाधि प्राप्त होती है और सुट समय के भागन्द से 'साह (वही ब्रह्म मैं हूं) यह भार उत्पन्न होता है, इसीको नादयेर समाधि करते है ।। लयसिद्धि समाधि। योनिमुद्रांसमासाद्य स्वयंशक्तिमयोभवेत् । सुङ्गाररसेनेत्र विहरेत्परमात्मनि ॥३२॥ प्रानन्दमयःसभूत्वा ऐक्यंब्रह्मणिसम्भवेत्। अनहोतिवाद्वैतं समाधिस्तेनजायते ॥१३॥ योगी पुरुप मपम योनिमुद्रा का अनुष्ठान करके सपने को शकिप मान लेवे, अर्थात् अपनेको मसी और पामेश्वरको पुरुषस्वरूप अनुभषकर अमन्तर मनही मन में ऐसी भावना करे माने पुरुष स्वरूप परमात्मा के माय मी स्वरूप प्राप शृङ्गार रस सम्बन्धी विहार कर रहे है। उसके अनन्तर यह भी अनुमय करना गा मानो उस बिहार के द्वारा जो परमानन्द र उत्पन्न हुमा है मो रस में मैं निमग्न हो के परवल के सहित अभिम भाव में प्रयाय में सम्मिलित हुमा हू । इसी योग के द्वारा "मैंही ब्रह्म पी अद्वितीय हूं। ऐसे विज्ञान का मच्चार होता है, इसी समाधि को लय सिद्धि समाधि कहते हैं । ता:-पापा पुरुष अपने को स्त्री अनुभव करे यह बात विचार कोटि में भट्टी सो मालुम पाती है। फिर इस समय को नवीन शिक्षा को सौदी में और भी महा लिपिटु जोगी। परन्तु परपर म. हाराज ने मनुष्यों को विषय वासना को मयी तरह जान सम मासका भारिकार किया है। समाधि प्रकार कीसी निमित्त दिखाया कि मनुप्पो को एत्ति पत प्रकार को होती है। कोई १

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घेागडसंहिता।
सद्दाह स्वभाष सदा बीर रस में मस्त रहते हैं। २ कोई शांत स्वभा
सदा भजन पूनन में रत रहते हैं। ३ कोई उदासीम स्वभाव सदा स
तरह के माया से दूर ही बने रहते हैं उन्हें कुछ भी नहीं सुहाता ।
कोई ऐसे भी पुरुष हेाते हैं कि उनको स्त्री संसर्ग, स्त्री चिन्ता स्त्री
रव समझना, यही भच्छा लगता है । ५ कोई पुरुष ऐसे होते हैं कि उन'
साय धादा भी उपकार करे तो वे उसको यदली भावाद में तन अप
किये रहते हैं। ६ कोई ऐसे पुरुष होते हैं जो मदा न्यायमें रत रहते ।
न्याय हो के लिये शरीर तक परित्याग कर देते हैं। इन छ: प्रकार
पुरुष जय उक्त वः प्रकार की समाधि साधन में लगेंगे तब उनके व
प्रकार के याय से उः प्रकार की क्रियाओं का अभ्यास होगा और
जिसमें जिम स्वाक्ष की अधिकता.शगी अर्थात् स्वभाव की अजीत
से फगी २ जो हानि हुमा करती है, जैसे मर्यादा में अधिक वीर "
वाले ने कदाधिन फुल कुटुम्य माता पिता के साप मारता चरितार
किपा । शांत रस वाले ने भायश्यक कार्य लोग मज़म पूजन में बाल
विसाय दिया। उदामीन वाले ने शारीरक व्योहारों में हाथ धोया ।
स्त्री प्रेमी ने भगम्य तर्फ न बचाया। त पुरुप ने किसी पूतं बस
को मियेको दिपा । न्याय परायण ने न्याय मून को न समझ मुसी
में तम मपंग किया । त्यादि फुण्यापार महो प्राप्त हो सकेंगे। विशेष
धात गहां पर पा स्मरण रहे नि जय स्त्री परायण पुरुष ईश्वर के .
नियम स्त्रो भाय का भम्पा . नमकी या प्रति घोरे २
बदाम र दूमरी मोर मुजायेगी। यस मी निमित्त यह योग एस
भांति निवा३॥
भक्तियोगं समाधि ।
स्वसीय हृदये. ध्याये विटदेव स्वरूपकम् ।
चिन्तयेदुभक्तियोगेन परमाहुाद पूर्वकम् ॥१४॥

धेरगडमड़िता। १३३ प्रानन्दायुपुलकेन दशाभावःप्रजायते । समाधिःसम्भवेत्तेन सम्मवेञ्चमनोन्मनी ॥१॥ बिशुद्ध भक्ति और परम माहाद के सहित अपने हृदय में अपने पष्ट देव के स्वरूप का ध्यान करे और मानन्द के भायई, तया रोमांच हो और बेहोसी मामा । से जो समाधि अर्थात् मन की एकाग्रता हाती है उस्से मनामनी अर्थात् मन का खुलासापन हो जाता है इसी को भक्रियाग समाधि कहते है ॥ - राजयोग समाधि। . मनोमू समासाद्य मनन्नात्मनियोजयेत् । 'परमात्मनःसमायोगात् समाधिसमवाप्नुयात् ॥१६॥ मथम मा मूळ नामक कुम्भक का मुहान करके भाग को पा. मात्मा के सहित मिलाय देसी प्रकार परमात्मा के साग से समाधि माप्त होती है। इसी हो राजयोग समाधि कहते हैं । समाधि योग का महात्म । इतितेकथितंचण्ड समाधिमुक्तिलक्षणम् । राजयोगःसमाधिः स्यादेकात्मन्येवसाधनं । उन्मनीसहजावस्था सर्वचैकात्मवाचकाः ॥१७॥ परपा महाराज कहते हैं कि पाकानि । मैंने समाधि योग का कदा न मुक्ति का लक्षण है। श्रय मुख्य बात यह जताई कि सारागयोग समाधि हो, साई सम्मान पाहे समावस्या तुम 1 १३४ धेरगडसंहिता। के कोई भी योग हों मग एकही प्रारमा के वाधक्ष हैं और मब का माधन मारमा की एकाग्रता है अर्थात एक रस ध्यान का लगाना है । जलेबिष्णुःस्थलेबिष्णुः विष्णुःपर्वतमस्तके । ज्वालमालाकलेविष्णुः सर्वत्रिष्णुमयंजगत् ॥८॥ ऐमा कोई स्थान नहीं है जहां विष्णु परमात्मा न हों। जल में विष्णु हैं. थल में विष्णु हैं । पर्वत के मस्तक पर घिष्णु हैं। अग्नि की राशि में भी विष्णु हैं, यह सम्पूर्ण जगत् विष्णु भय है । अर्थात कोई पदार्थ विष्णु से भिन्न नही है । भचराःखेचराश्यामी यावन्तोजीवजन्तवः । वृक्षगुल्मलताबल्ली तृणाझाबारिपर्वताः॥ सर्वब्रह्मविजानीयात् सर्वपश्यतिचात्मनि ॥१९॥ भूधर 'मर्थात् पृथिपर विधरन करनेवाले जीव खेचर अर्थात् माकाश में चलनेषाले जीव । और भी जो ये सब जोध जंतु देख पढ़ते हैं। तया बढे २ वृक्ष, छोटे २ पौधे लता, माली (एक हाल वाले लबे पक्ष ) नृपा भादि समस्त घाम, पानी, पहाड रन सयों को ब्रह्म जानना नाहिये और सौर सत्रों को अपने पारमा में देखना चाहिये। प्रात्माघटस्थचैतन्य मद्वैतंशाश्वतंपरं । घटाद्विमिन्नतोज्ञात्वा बीतरागोविधासनः ॥२०॥ इसी गरीर स्थित नाजीयामा है वह चैतन्य है और दिनीय है (एकदो घटु म्यापी) मह निरन्तर रहता है कभी नाश को नहीं प्राप्त शोमा । तथा सय पदार्थों से पर है। हमको शरीर से अलग मानने हो श्रोतराग ( यन्धन से मुक्त) और पामना रहित भाय प्राप्त होता है । .

घरराडसहिता। १३५ एयंषिधः समाधिःस्यात् सर्वसङ्कल्पअर्जितः । स्वदेहे पुत्र दारादि बांधयेषु धनादिषु ।। सर्वेषु निर्ममोभूत्वा समाधि समवानुयात् ॥२१॥ जैसा कि कह भाये। इसी प्रकार समाधि साधन करना चाहिये, किन्तु इस समाधि के साधन में सब प्रकार के सपो का लाइ हुना चाहिये । किस विषय का सस्प छेाहना चाहिये. इसपर कहते है कि अपनी देह के विषय में, पुत्र दारा भादि के विषय, वायू बाधने और पन भादि के विषय में, तथा सम पदापी से कमला छाइभर समाधिक। मात करें। । 7 तत्वलयामृतं गोप्यं शिवोक्तं विधितानिच । वाशांसंक्षेपमादाय कधितं मुक्तिलक्षणम् ॥२२॥ यह तत्व लपामुत दै मर्यात ईश्वर में लय है जीवन मरण ही पर के मोक्ष प्राप्ति का लक्षण है, इसी महादेव जी ने बहुत प्रकार से | बदर है, परन्तु इमने उन सबो में से मलेप लेकर कहा, जो कहा यही प्रधान मुक्ति का लक्षण है। इतिते कथितं चण्ड' ! समाधि दुर्लभःपर । पज्ञात्वा न पुनर्जन्म जायते भूमिमण्डले ॥२३॥ घेरपट महाराग ने कहा हे कापालि। हमने तुमसे दुर्लभ श्रीर सय मेगा में पर घमाधि समर कहा बस, पनाहो पात , जिस से कि जानने में भूमि मारनमें फिर जन्म नहीं हाता मयात् मान्म मरय यन्धन से मुक्ति हो जाती है।

१३६ घेरगडम पिता। उपसंहार ॥ योग विद्या और वैद्यक शास्त्र में कुछ भी फर्म नहीं है, क्योंकि पाठकों के मादि से अन्त नां पम घेरग महिता के सहिताके माधना का विधार भनीभाति विदित हो गया होगा कि शारीरक आधार (सन• दुरुस्ती) ही इसमें प्रधान साधन है। इसी प्रकार वैद्यकमें भी शारीरक भाचार की व्यवस्था सर्वज वर्तमान है, फिर प्रध पाप कह सके हैं कि ये ग और पैद्यक से कोई भी फर्क नहीं रहा । अन्त में मुक्ति भी दोनों शास्त्रों का धन सिद्धान्त है, में वैद्यक का सिद्धान्त "धर्मार्थकाममेक्षिा• मारेरोग्यंमूलमुत्तमम्" अन्त में मोक्ष पद दिया. समी प्रकार एस योग में भी हर जगह आरोग्यता दर्शाय के भात में समाधि साधन का फल शिखा दे कि "न पुगजन्म मजायते" यस इसी निमित्त हमने अपने हम आरोग्यदर्पण के चतुर्थ सपा में इस अनूपम योगविद्या साधन दिखाय के अपने पाठकों को परिश्रम दिया कि ये भाप इन साधनेासे फायदा नठा मोर समार का भी ठपक्षार परस्पर कथोपकपन से करें, मस दमारा भी परिश्रम सफन है । इति ॥ घेरण्ड सहिता योगशास्त्र की भाषा टीका समाप्त। .

घेरण्डसंहिता का सूचीपत्र। पृष्ठ विषय भासाधन पटकम पृष्ठ । विषय ६ वातक्रम कपालभाति ८ व्युत्क्रम कपालभाति शासक्रम कपालभाति श्रासनविधि सिद्धासन १० पद्मासन ११ भद्रासन ११ मुक्तासन १२ वजासन १२ | स्वस्ति हासन, ३१ सिंहासन १३ गोमुखापन ३२ ३२ अन्तरधीतिः बातसर: पारिमार: अग्निमारः वरिष्कृतधोति मालनम बहिष्कृतधोतिः प्रयोग दन्तधौति दन्तम्लधीति दन्तीति का फल महाशोधन महामृन्नधौति कर्णधीति कपालरंध्रशोधन उदयशोधन दापोति बमनधोति विवेचना बामधोति मुनशोधन बस्ति प्रकरणम् जनयस्ति की विधि यस्ति का फल स्थग्नस्ति नतियोग लोलिकी योग ऋोटर योग १३ बोरासन १४/ धनुरासन १४. मृतासन १६ गुप्तामन १६ मत्स्यासन १३ पश्चिमोत्तामसासन १७ मत्स्येन्द्रासन गरक्षामन ३५ १७ उत्कटासन १. सङ्कटासन २. मयूर मन २२ | कुक्कुटामान २१ कामन २१ उत्तानफूमापन वृत्तानमगडूकासन २३ पक्ष सन २३ मंदृक्षामन २४ गड़ामम २३। वृपामुन २७ १७ . पालभाति योग बिषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ शलभामम १५ मकररामन ३६ भुजगिनी मुद्रा चतुर्थोपदेश । प्रत्याहार कथन पञ्चमोपदेश। प्राणायाम विधि स्थान निर्णय ४३ काल निर्णय ४० ५० CO १२ कुम्भक ४४ मिताहार ४४ नानी शुद्धि ४६ | मूर्यभेद कुम्भक ४७ | उज्जायी ४८ शीतली कुम्भक ge भस्त्रिका कुम्भक ५० भ्रामरी कुम्भक १९ मा कुम्भ ५३ | फेवली कुम्भक १०७ अष्ट्रासन भुज गामन योगासन मुद्राकथनम् । महामुद्रा नमीमुद्रा उड्डीयानयन्ध सालघरबन्ध मनबन्ध महाबन्ध महावेध खेचरी मुद्रा चिपरीति करी मुद्रा येनिमुद्रा योनिमुद्रा का फल यजो गोमद्रा यजो की मुद्रा का विशेष फन गतिघालिनी मुद्रा सपानी मुद्रा गहु की मुद्रा नामयी मुद्रा पञ्चधारमा मुद्रा पाधिवीधारमा मुद्रा म्भमाधारण मुद्रा भारनेगी मुद्रा सापचीधारए मुद्रा धारण मुद्रा १०८ १६ ५८ पष्टोपदेश । अथ ध्यान योग ६० यूज ध्यान की विधि प्रकारावर मधून ध्यान ज्योतियान प्रकारातर ज्योतिध्यांग ११७ ११८ १० १२२ १२२ | मूक्ष्म ध्यान १२८ ६५ सप्तमोपदेश । ६. समाधि योग इस समाधि के कई भेद ध्यान योग समापि '७१/ रसानन्द योग समाधि ७२ नादयोग समाधि २३ सय मिद्वि गमाधि २४ मक्ति योग समाधि ४ राग धेगममाधि श्यमी मुद्रा पागिनी मद्रा डाकी भद्रा मासगिनी

Gherand Sanhita

Author
Sharma,jagganath
Title
Gherand Sanhita
File name
Gherand Sanhita
Text
OCR done
Citation
1899
Published
2012/08
Publisher
Prayag.,dharmik Yantralay
Language
Sanskrit
Pages
159
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
405206
Barcode
99999990292300.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
loaHIQ2EpcF
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